UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters  (प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर का चयन करें
(i) इनमें से भारत के किस राज्य में बाढ़ अधिक आती है?
(क) बिहार
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) असम
(घ) उत्तर प्रदेश
उत्तर-(ग) असम।

(ii) उत्तराखण्ड के किस जिले में मालपा भू-स्खलन आपदा घटित हुई थी?
(क) बागेश्वर
(ख) चम्पावत
(ग) अल्मोड़ा
(घ) पिथौरागढ़
उत्तर-(घ) पिथौरागढ़।

(iii) इनमें से कौन-से राज्य में सर्दी के महीनों में बाढ़ आती है?
(क) असम
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर-(घ) तमिलनाडु।।

(iv) इनमें से किस नदी में मजौली नदीय दीप स्थित है?
(क) गंगा
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गोदावरी
(घ) सिन्धु
उत्तर-(ख) ब्रह्मपुत्र।

(v) बर्फानी तूफान किस तरह की प्राकृतिक आपदा है?
(क) वायुमण्डलीय
(ख) जलीय ।
(ख) जलीय
(ग) भौमिकी
(घ) जीवमण्डलीय
उत्तर-(क) वायुमण्डलीय।।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 से कम शब्दों में दें
(i) संकट किस दशा में आपदा बन जाता है?
उत्तर-संकट उस दशा में आपदा बन जाता है जब वह आकस्मिक उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में मनुष्य उसका सामना करने के लिए तैयार नहीं होता तथा इसके नियन्त्रण हेतु भी पूर्व प्रबन्धीय तैयारी नहीं की जाती है।

(ii) हिमालय और भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अधिक भूकम्प क्यों आते हैं?
उत्तर–हिमालय और भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में भूकम्प अधिक आते हैं, क्योंकि भारतीय भू-प्लेट उत्तर तथा पूर्व की ओर खिसक रही है तथा यूरेशियन भू-प्लेट से टकराकर इसमें अधिक ऊर्जा एकत्र हो जाती है। यही ऊर्जा इस क्षेत्र से विवर्तनिकता (हलचल) उत्पन्न कर भूकम्प का कारण बनती है। |

(iii) उष्ण कटिबन्धीय तूफान की उत्पत्ति के लिए कौन-सी परिस्थितियाँ अनुकूल हैं?
उत्तर-उष्ण कटिबन्धीय तूफान की उत्पत्ति के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों को अनुकूल माना जाता है

  • पर्याप्त एवं सतत उष्ण व आर्द्र वायु की उपलब्धता जिससे बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा निर्मुक्त हो।
  • तीव्र कोरियोलिस बल जो केन्द्र के निम्न वायुदाब को भरने न दे।’
  • क्षोभमण्डल में अस्थिरता जिससे स्थानीय स्तर पर निम्न वायुदाब क्षेत्र बन जाते हैं।
  • शक्तिशाली उच्च दाबवेज (Wedge) की अनुपस्थिति, जो आई व गुप्त ऊष्मायुक्त वायु के ऊध्र्वाधर बहाव को अवरुद्ध करे।

(iv) पूर्वी भारत की बाढ़ पश्चिमी भारत की बाढ़ से अलग कैसे होती है?
उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ प्रतिवर्ष आती है तथा भारी नुकसान पहुँचाती है। पश्चिमी भारत में बाढ़ कभी-कभी और अचानक आती है। पश्चिमी भारत में पंजाब, हरियाणा, गुजरात राज्यों में प्रवाहित होने वाली नदियों के जलस्तर में जब वृद्धि हो जाती है तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। राजस्थान में कभी आकस्मिक तीव्र वर्षा के फलस्वरूप बाढ़ आ जाती है।

(v) पश्चिमी और मध्य भारत में सूखे ज्यादा क्यों पड़ते हैं?
उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत जिसमें मुख्यत: राजस्थान का पूर्वी भाग, मध्य प्रदेश का अधिकांश भाग तथा महाराष्ट्र के पूर्वी भाग आते हैं जो सूखे से अधिक प्रभावित रहते हैं। इस भाग में अत्यधिक कम वर्षा एवं मानसून के समय पर न आने के कारण सूखे की विपत्ति बार-बार उत्पन्न होती रहती है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दो में दें
(i) भारत में भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करें और इस आपदा के निवारण के कुछ उपाय बताएँ।
उत्तर-भारत में भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्र
भारत में अस्थिर युवा हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएँ, जिसमें उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर तथा असम राज्य, अण्डमान और निकोबार, पश्चिमी घाट, नीलगिरि में अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, भूकम्प प्रभावी क्षेत्र और इन भागों में अत्यधिक मानव क्रियाकलापों वाले वे क्षेत्र जहाँ सड़क और बाँध निर्माण अधिक किए गए हैं, भू-स्खलन से अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों में सम्मिलित हैं।

आपदा निवारण के उपाय-भू-स्खलन से निपटने के लिए निम्नलिखित उपाय उपयोगी होते हैं-

  1. पर्वतीय क्षेत्रों में तीव्र ढाल वाले भागों को काटकर सड़क निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।
  2. इन क्षेत्रों में कृषि कार्य नदी घाटी तथा कम ढाल वाले भागों तक सीमित होना चाहिए तथा बड़ी विकास योजना पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  3. सकारात्मक कार्य जैसे बृहत् स्तर पर वनीकरण को बढ़ावा और जल प्रवाह को नियन्त्रित करने के | लिए बाँध आदि का निर्माण भू-स्खलन के उपायों के पूरक हैं।
  4. स्थानान्तरी कृषि वाले उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जानी चाहिए।

(ii) सुभेद्यता क्या है? सूखे के आधार पर भारत को प्राकृतिक आपदा भेवता क्षेत्रों में विभाजित करें और इसके निवारण के उपाय बताएँ।
उत्तर-सुभेद्यता
सुभेद्यता (Vulnerability) अथवा असुरक्षा किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा क्षेत्र को हानि पहुँचाने की वह दशा या स्थिति है जो मानव के नियन्त्रण में नहीं होती है। दूसरे शब्दो में, यह जोखिम की वह सीमा है जिस पर एक व्यक्ति या समुदाय अथवा क्षेत्र प्रभावित होता है। भारत को सूखा के आधार पर निम्नलिखित भेद्यता (प्रभावित क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है|

1. अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र—इसमें राजस्थान में अरावली के पश्चिम में स्थित मरुस्थली और गुजरात का कच्छ क्षेत्र सम्मिलित है।
2. अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र-राजस्थान का पूर्वी भाग, मध्य प्रदेश का अधिकांश क्षेत्र, महाराष्ट्र | के पूर्वी भाग, तेलंगाना तथा आन्ध्र प्रदेश के आन्तरिक भाग, कर्नाटक का पठार, तमिलनाडु के उत्तरी-पूर्वी भाग, झारखण्ड का दक्षिणी भाग और ओडिशा को आन्तरिक भाग अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र हैं।
3. मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र-इस वर्ग में राजस्थान के उत्तरी भाग, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के दक्षिणी जिले, गुजरात के शेष भाग, झारखण्ड तथा कोयम्बटूर पठार सम्मिलित हैं (मानचित्र 7.1)।

निवारण के उपाय
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सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण पर सूखे का प्रभावित तात्कालिक एवं दीर्घकालिक होता है। अतः इसके निवारण के उपाय भी तात्कालिक व दीर्घकालिक होते हैं|

1. तात्कालिक उपाय-सुरक्षित पेयजल वितरण, दवाइयाँ, पशुओं के लिए चारे और जल की | उपलब्धता तथा मानव और पशुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचानी सम्मिलित है। .

2. दीर्घकालिक उपाय–अनेक ऐसी योजनाएँ बनाई जाती हैं जो सूखे की विपत्ति में उपयोगी हों; जैसे—भूमिगत जल भण्डारण का पता लगाना, जल आधिक्य क्षेत्रों से अल्प जल क्षेत्रों में जल पहुँचाना, नदियों को जोड़ना, बाँध व जलाशयों को निर्माण करना, वर्षा जल का संग्रह करना, वनस्पति आवरण का विस्तार करना तथा शुष्क कृषि फसलों के क्षेत्र में विस्तार करना आदि योजनागत उपाय महत्त्वपूर्ण हैं।

(iii) किस स्थिति में विकास कार्य आपदा का कारण बन सकता है?
उत्तर-भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में ही नहीं वरन् अन्य स्थितियों में भी सामाजिक प्रगति और आर्थिक विकास हेतु विभिन्न विकास कार्य अत्यन्त आवश्यक हैं, किन्तु संकटं या आपदाओं की अनदेखी करके विकास कार्यों को करते रहना अत्यन्त घातक एवं मूर्खतापूर्ण निर्णय कहलाता है। इस परिप्रेक्ष्य में कभी-कभी विभिन्न विकास कार्य आपदा का कारण बन जाते हैं। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य उल्लेखनीय हैं

1. मानव द्वारा बाँध आदि का निर्माण जो सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है। यदि बाँध की ऊँचाई बढ़ाई जाती है तो इसके टूटने से बाढ़ आपदा का संकट उत्पन्न हो सकता है।
2. पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण यद्यपि आवश्यक है, किन्तु तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों को काटकर सड़कें बनाई जाती हैं तथा ढाल के किनारे भूस्खलने अवरोधी दीवारों का निर्माण नहीं किया जाता है तो भू-स्खलन की विपत्ति का सामना करना पड़ सकता है।
3. बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति के लिए जंगलों का बेरहमी से विनाश करना तथा अनियोजित तरीके से लगातार भूमि उपयोग करते रहना वन, जल, वन्य-जीव आदि प्राकृतिक
संसाधनों के ह्रास का कारण बन सकता है।
4. तीव्र औद्योगिकीकरण आर्थिक विकास के लिए अविश्यक है, परन्तु इनसे निकलने वाली गैसें; जैसे–CFCs आदि को यदि इसी प्रकार वायुमण्डल में छोड़ा जाता रहा तो वायु-प्रदूषण की
समस्या में वृद्धि होती रहेगी।
5. परमाणु ऊर्जा, जिसे वर्तमान में विकास के लिए आवश्यक समझा जाता है, के उत्पादन में मानवीय | असावधानी के करिणं रूस की वाणु संयन्त्र में दुर्घटनाओं के समान होने वाली घटनाओं में वृद्धि होती रहेगी।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सामाजिक प्रगति और आर्थिक विकास के लिए विकास कार्य आवश्यक हैं, पर इन्हें प्रारम्भ करने से पूर्व पर्यावरण असन्तुलन का मूल्यांकन तथा आपदा जैसे संकटों को न्यूनतम करने और इनमें वृद्धि न होने के उपायों के लिए योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन करना भी अत्यन्त आवश्यक है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्प प्रलं
प्रश्न 1. प्राकृतिक आपदाएँ होती हैं
(क) जन्तुजनित
(ख) मानवजनित
(ग) वनस्पतिजनित
(घ) प्रकृतिजनित
उत्तर-(घ) प्रकृतिजनित ।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में कौन-सी प्राकृतिक आपदा नहीं है?
(क) ज्वालामुखी विस्फोट
(ख) जनसंख्या विस्फोट
(ग) बादल विस्फोट
(घ) चक्रवात
उत्तर-(क) ज्वालामुखी विस्फोट

प्रश्न 3. भू-प्लेटों के खिसकने से क्या होता है।
(क) ज्वालामुखी विस्फोट
(ख) चक्रवात
(ग) बाढ़
(घ) सूखा
उत्तर-(क) ज्वालामुखी विस्फोट

प्रश्न 4. विश्व में सर्वाधिक भूकम्प कहाँ आते हैं?
(क) जापान
(ख) भारत
(ग) इटली
(घ) सिंगापुर
उत्तर-(क) जापान

प्रश्न 5. भू-स्खलन से सबसे अधिक प्रभावित कौन-सा क्षेत्र है?
(क) पहाड़ी प्रदेश
(ख) मैदानी भाग
(ग) पठारी प्रदेश
(घ) ये सभी
उत्तर-(क) पहाड़ी प्रदेश ।

प्रश्न 6. सागरों में भूकम्प के समय उठने वाली लहरों को क्या कहते हैं?
(क) सुनामी
(ख) चक्रवात
(ग) भूस्खलन ।
(घ) ज्वार-भाटा
उत्तर-(क) सुनामी

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन-सी प्राकृतिक आपदा नहीं है?
(क) सूखा
(ख) चक्रवात
(ग) रेल दुर्घटना
(घ) सूनामी
उत्तर-(ग) रेल दुर्घटना

प्रश्न 8. निम्नलिखित में से कौन-सी आपदा मानव-निर्मित है?
(क) भू-स्खलन
(ख) भूकम्प
(ग) हरितगृह प्रभाव
(घ) सूनामी लहरें
उत्तर-(ग) हरितगृह प्रभाव

प्रश्न 9. सूनामी है
(क) एक नदी
(ख) एक पवन
(ग) एक पर्वत चोटी।
(घ) एक प्राकृतिक आपदा ।।।
उत्तर-(घ) एक प्राकृतिक अपदा ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आपदाओं को ‘सभ्यता का शत्रु क्यों कहा जाता है?
उत्तर–आपदाएँ प्राकृति एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जिससे मनुष्य एवं जीव-जन्तुओं की सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यवधान ही उत्पन्न नहीं होता, बल्कि इसके कारण अनेक लोगों की मृत्यु और सम्पत्ति का विनाश भी होता है। कई सभ्यताएँ; जैसे-हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो, बेबीलोन तथा नील नदी घाटी आदि इसी के कारण नष्ट हुई हैं। इसीलिए आपदाओं को सभ्यता का शत्रु कहा जाता है।

प्रश्न 2. आपदाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर–आपदाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति वृद्धि की दर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन पर निर्भर करती है। वर्तमान भोगवादी अर्थव्यवस्था और जनसंख्या तीव्रता के कारण प्राकृतिक संसाधनों के कुप्रबन्धन एवं ह्रास में वृद्धि हुई है, जिसके कारण प्राकृतिक प्रक्रिया तन्त्र में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण आपदाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 3. प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के नाम निम्नलिखित हैं(1) भूकम्प, (2) ज्वालामुखी विस्फोट, (3) भू-स्खलन, (4) चक्रवाती तूफान, (5) बादल फटना, (6) बाढ़, (7) सूखा, (8) सुनामी आदि। इन सभी आपदाओं को रोकना असम्भव है किन्तु इनसे होने वाले जान-माल के नुकसान को विशेष , सुरक्षात्मक उपायों द्वारा न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है।

प्रश्न 4. चरम घटनाओं से क्या तात्पर्य है।
उत्तर-प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों द्वारा जनित सभी दुर्घटनाएँ चरम घटनाएँ कहलाती हैं। चरम घटनाएँ कभी-कभी ही घटित होती हैं। अतः जब प्राकृतिक प्रक्रम या मानवीय अनुक्रियाएँ इतनी त्वरित हों जिसका अनुमान लगाना कठिन हो और मानव समाज पर इसके प्रतिकूल प्रभाव से संकट या विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो उनको चरम घटनाएँ या आपदा कहा जाता है।

प्रश्न 5. बहिर्जात आपदाएँ कौन-सी होती है? उनके नाम बताइए।
उत्तर–बहिर्जात आपदाओं का सम्बन्ध वायुमण्डल से होता है, इसीलिए इन्हें ‘वायुमण्डलीय आपदाएँ भी कहते हैं। प्रमुख बहिर्जात आपदाओं के नाम इस प्रकार हैं-चक्रवाती तूफान, बादल का फटना, आकाशीय विद्युत का गिरना, तड़ित झंझा, ओलावृष्टि, सूखा, बाढ़, ताप एवं शीत लहर आदि।

प्रश्न 6. मानवजनित आपदाओं को कौन-कौन से वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उतर-मानवजनित आपदाओं को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जाता है(1) मानवजनित भौतिक आपदाएँ, (2) मानवजनित रासायनिक आपदाएँ, (3) मानवजनित सामाजिक आपदाएँ, (4) मानवजनित जीवीय आपदाएँ।

प्रश्न 7. विश्व बैंक ने आपदा को किस प्रकार परिभाषित किया है?
उत्तर–विश्व बैंक ने आपदा को निम्नलिखित प्रकार परिभाषित किया है –
“आपदा अल्पावधि की एक असाधारण घटना है, जो देश की अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से अस्त-व्यस्त कर देती है।”

प्रश्न 8. भू-स्खलन के लिए उत्तरदायी कारक बताइए।
उत्तर-भू-स्खलन के लिए कई प्राकृतिक एवं मानवीय कारक उत्तरदायी होते हैं
प्राकृतिक कारक-भूकम्प, वर्षा की अधिकता, ढालयुक्त कमजोर चट्टानें, पर्वतीय चट्टानों में भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की अधिकता तथा जलप्रवाह में अवरोध उत्पन्न होना।
मानवीय कारक-वनों का अत्यधिक विनाश, अनियोजित भूमि उपयोग, अकुशल विधियों द्वारा उत्खनन, निर्माण कार्यों हेतु पर्वतों का कटान एवं दोषपूर्ण स्थान का चयन।।

प्रश्न 9. भारत में भू-स्खलन से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-भू-स्खलन भीषणता के आधार पर भारत के उत्तर-पश्चिमी एवं पूर्वोत्तर पर्वतीय राज्य सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। इन राज्यों में जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्यों में प्रतिवर्ष भू-स्खलन से सर्वाधिक हानि होती है।

प्रश्न 10. प्रतिरोधक दीवारों का निर्माण किस प्रकार भू-स्खलन रोकने में उपयोगी है?
उत्तर-भू-स्खलन रोकने एवं क्षति को न्यूनतम करने के लिए भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों में प्रतिरोधक दीवारों का निर्माण उपयुक्त युक्ति है। इस प्रकार की दीवारें सड़कों के किनारे तीव्र ढाल को रोकने में सहायक होती हैं। इन दीवारों के बनने पर पत्थर एवं मलबा गिरने से रुक जाता है तथा भू-स्खलन से क्षति न्यूनतम हो जाती है और कुछ समय बाद भू-स्खलन की सम्भावना भी नगण्य रह जाती है।

प्रश्न 11. बाढ़ एवं त्वरित बाढ़ में क्या अन्तर है?
उत्तर-बाढ़ को सामान्य अर्थ स्थलीय भाग को निरन्तर कई दिनों तक जलमग्न होना है। वास्तव में बाढ़ प्राकृतिक पर्यावरण की एक विशेषता है, जिसे जलीय चक्र का संघटक माना जाता है; जबकि त्वरित बाढ़ या फ्लैश फ्लड तब उत्पन्न होती है जब तटबन्ध टूट जाते हैं या बैराज से अधिक मात्रा में जल छोड़ दिया जाता है।

प्रश्न 12. बाढ़ आपदा के लिए उत्तरदायी कारक बताइए।
उत्तर-बाढ़ प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारकों का परिणाम है। प्राकृतिक कारकों में लम्बी अवधि तक उच्च तीव्रता वाली जलवर्षा, नदियों के घुमावदार मोड़, नदियों की जलधारा में अचानक परिवर्तन, भू-स्खलन आदि उत्तरदायी हैं; जबकि मानवीय कारकों में वनों का विनाश, नगरीकरण एवं अनियोजित भूमि उपयोग महत्त्वपूर्ण कारक हैं।

प्रश्न 13. भारत में बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-भारत में पश्चिम बंगाल, असम, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित राज्य हैं। वास्तव में देश की गंगा द्रोणी में बाढ़ का प्रकोप अधिक रहता है। ऐसा अनुमान है कि देश की कुल आपदा की लगभग 60 प्रतिशत हानि केवल गंगा के प्रवाह क्षेत्रों में होती है।

प्रश्न 14. भारत के भीषण सूखा प्रभावित राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर-भारत में राजस्थान एवं गुजरात भीषण सूखा प्रभावित राज्यों की श्रेणियों में आते हैं। यहाँ लगभग प्रतिवर्ष कम वर्षा के कारण कहीं-न-कहीं भीषण सूखे का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 15. भारत में अत्यधिक भूकम्प सम्भावित क्षेत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर-भारत में अत्यधिक भूकम्प सम्भावित क्षेत्र जोन-V के अन्तर्गत आता है। इस क्षेत्र में भारत की हिमालय पर्वतश्रेणी, बिहार में नेपाल का सीमावर्ती क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी उत्तराखण्ड, भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य, कच्छ प्रायद्वीप तथा अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सम्मिलित हैं।

प्रश्न 16. भूकम्प के दौरान प्रबन्ध की विधियाँ बताइए।
उत्तर-भूकम्प के दौरान निम्नलिखित कार्यविधि अपनाना उचित रहता है(1) भूकम्प आने पर घबराएँ नहीं बल्कि साहस बनाए रखें। (2) आप जहाँ हैं, वहीं रहें, परन्तु दीवारों, छतों और दरवाजों से दूरी बनाए रखें। (3) दरारों, पलस्तर झड़ने आदि पर नजर रखें। यदि ऐसा हो तो सुरक्षित स्थान पर जाने का प्रयास करें। (4) यदि चलती कार में हों तो कार को सड़क के किनारे रोक लें, पुल या सुरंग पार न करें। (5) बिजली का मेनस्विच बन्द कर दें, गैस सिलेण्डर का रेगुलेटर बन्द करके सिलेण्डर को सील कर दें।

प्रश्न 17. सुनामी उत्पन्न होने के तीन महत्त्वपूर्ण कारण बताइए।
उत्तर–सुनामी उत्पन्न होने के तीन महत्त्वपूर्ण कारण हैं-(1) भूकम्प, (2) ज्वालामुखी विस्फोट, (3) भू-स्खलन। जब समुद्र या उनके निकटवर्ती क्षेत्रों में इनमें से किसी भी एक आपदा की आवृत्ति होती है। तो सागरों में सुनामी उत्पन्न हो जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आपदाओं का क्या अर्थ है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-आपदा प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जो व्यापक रूप से मनुष्य एवं अन्य जीव-जन्तुओं की सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यवधान डालती है। इसके कारण सम्पत्ति की भारी क्षति ही नहीं होती बल्कि अनेक लोग काल-कवलित भी हो जाते हैं।

प्राचीनकाल में विनाशकारी आपदाओं को प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ के लिए प्रकृति द्वारा दिया गया दण्ड माना जाता था, किन्तु वर्तमान में इसे एक घटना के रूप में देखा जाता है। यह घटना प्राकृतिक या मानवीय दोनों में से किसी भी कारक द्वारा उत्पन्न हो सकती है। आपदाओं और घटनाओं का निकट का सम्बन्ध है। कभी-कभी इन्हें एक-दूसरे के विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है। घटना एक आशंका है तो आपदा दु:खद घटना का एक परिणाम है। विश्व बैंक ने आपदा को इस प्रकार परिभाषित किया है-“आपदा अल्पावधि की एक असाधारण घटना है जो देश की अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से अस्त-व्यस्त कर देती है।”

प्रश्न 2. आपदाएँ कितने प्रकार की होती हैं। किसी एक प्रकार की आपदा का वर्णन कीजिए।
उत्तर–सामान्यतः आपदाएँ दो प्रकार की होती हैं
(i) प्राकृतिक आपदाएँ तथा (ii) मानवकृत आपदाएँ।
प्राकृतिक आपदाएँ-प्राकृतिक रूप से घटित वे सभी आकस्मिक घटनाएँ जो प्रलयकारी रूप धारण का मानवसहित सम्पूर्ण जैव जगत् के लिए विनाशकारी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं, प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। प्राकृतिक आपदाओं को सीधा सम्बन्ध पर्यावरण से है। पर्यावरण की समस्त प्रक्रिया पृथ्वी की अन्तर्जात एवं बहिर्जात शक्तियों द्वारा संचालित होती है। यही वे शक्तियाँ हैं जो पर्यावरण को गतिशील रखती हैं तथा विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संकट और आपदाओं के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 3. सुनामी लहरों से सुरक्षा के क्या उपाय हैं?
उत्तर–सुनामी लहरों से सुरक्षा के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. चेतावनी दिए जाने के बाद क्षेत्र को खाली कर देना चाहिए तथा जोखिम और खतरे से बचने के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेना उपयुक्त रहता है।
  2. कमजोर एवं क्षतिग्रस्त मकानों का निरीक्षण करते रहना चाहिए तथा दीवारों और छतों को अवलम्ब देना चाहिए।
  3. वास्तव में, भूकम्प एवं समुद्री लहरों जैसी प्राकृतिक आपदा से बचने का कोई विकल्प नहीं है। सावधानी, जागरूकता और समय-समय पर दी गई चेतावनी ही इसके ब्रचाव का सबसे उपयुक्त उपाय है।
  4. समुद्रतटवर्ती क्षेत्रों में मकान तटों से अधिक दूर और ऊँचे स्थानों पर बनाने चाहिए। मकान बनाने से पूर्व विशेषज्ञों की राय अवश्य लेनी चाहिए।
  5. यदि आप समुद्री लहरों से प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं तो सुनामी लहरों की चेतावनी सुनने पर मकान खाली करके किसी सुरक्षित समुद्र तट से दूर ऊँचे स्थान पर चले जाएँ। यदि आप स्थान छोड़कर जा रहे हैं तो अपने पालतू पशुओं को भी साथ ले जाएँ।
  6. बहुत-सी ऊँची इमारतें यदि मजबूत कंक्रीट से बनी हैं तो खतरे के समय इन इमारतों की ऊपरी मंजिलों को सुरक्षित स्थान के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  7. खुले समुद्र में सुनामी लहरों की हलचल को पता नहीं चलता। अत: यदि आप समुद्र में किसी नौका या जलयान पर हों और आपने चेतावनी सुनी हो, तब आप बन्दरगाह पर न लौटें क्योंकि इन समुद्री लहरों का सर्वाधिक कहर बन्दरगाहों पर ही होता है। अच्छा रहेगा कि आप समय रहते जलयान को गहरे समुद्र की ओर ले जाएँ।
  8. सुनामी आने के बाद घायल अथवा फँसे हुए लोगों की सहायता से पहले स्वयं को सुरक्षित करते हुए पेशेवर लोगों की सहायता लें और उन्हें आवश्यक सामग्री लाने के लिए कहें।

प्रश्न 4. भूस्खलन के लिए महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–सामान्यतः भूस्खलन का मुख्य कारण पर्वेतीय ढालों या चट्टानों का कमजोर होना है। चट्टानों के कमजोर होने पर उनमें प्रविष्ट जल चट्टानों को बाँध रखने वाली मिट्टी को ढीला कर देता है। यही ढीली हुई मिट्टी ढाल की ओर भारी दबाव डालती है। इस कारण मलबे के तल के नीचे सूखी चट्टानें ऊपर के भारी और गीले मलबे एवं चट्टानों का भार नहीं सँभाल पातीं, इसलिए वे नीचे की ओर खिसक जाती हैं और भूस्खलन हो जाता है। पहाड़ी ढीलों और चट्टानों के कमजोर होने तथा भूस्खलन को उत्प्रेरित करने वाले मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. भूस्खलन भूकम्पों या अचानक शैलों के खिसकने के कारण होते हैं।
  2. खुदाई या नदी-अपरदन के परिणामस्वरूप ढाल के आधार की ओर भी तेज भूस्खलन हो जाते हैं।
  3. भारी वर्षा या हिमपात के दौरान तीव्र पर्यतीय ढालों पर चट्टानों का बहुत बड़ा भाग जल तत्त्व की अधिकता एवं आधार के कटाव के कारण अपनी गुरुत्वीय स्थिति से असन्तुलित होकर अचानक तेजी के साथ विखण्डित होकर गिर जाता है, क्योंकि जल भार के कारण चट्टानें स्थिर नहीं रह सकती हैं; अत: चट्टानों पर दबाव की वृद्धि भूस्खलन का मुख्य कारण होती है।
  4. कभी-कभी भूस्खलन का कारण त्वरित भूकम्प, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, अनियमित वन कटाई तथा सड़कों का अनियोजित ढंग से निर्माण करना भी होता है।
  5. सड़क एवं भवन बनाने के लिए लोग प्राकृतिक ढलानों को सपाट स्थितियों में परिवर्तित कर देते हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों के परिणामस्वरूप भी पहाड़ी ढालों पर भूस्खलन होने लगते हैं।

प्रश्न 5. भारत के मुख्य भू-स्खलन क्षेत्र बताइए।
उत्तर-भारत के मुख्य भू-स्खलन क्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. उत्तरी-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र–इस क्षेत्र में भूस्खलन आपदा से सर्वाधिक हानि होती है, अत: इसे उच्च से अति उच्च भूस्खलन क्षेत्र कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड इसी क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

2. पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र-भारत के समस्त उत्तर-पूर्वी राज्य इस क्षेत्र में सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा ऋतु में उच्च भीषणता वाले भूस्खलन से जान-माल की अधिक हानि होती है।

3. पश्चिमी घाट तथा नीलगिरि की पहाड़ियाँ-भारत के प्रायद्वीप के पश्चिमी घाट के राज्यों का समुद्रतटीय क्षेत्र जिसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल राज्य तथा तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियों का क्षेत्र सम्मिलित है। यहाँ मध्यम से उच्च भीषणता वाला भूस्खलन होता रहता है।

4. पूर्वी घाट–पूर्वी घाट के राज्यों के तटवर्ती क्षेत्र में कभी-कभी सामान्य भूस्खलन की घटनाएँ होती | रहती हैं, जो वर्षा ऋतु में अधिक हानिकारक हो जाती हैं। भीषणता की दृष्टि से यह भारत का निम्न | भूस्खलन क्षेत्र माना जाता है।

5. विन्ध्याचल–यहाँ प्राचीन पहाड़ियों और पठारी भू-भाग वाले क्षेत्र में निम्न भीषणता वाले भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं।

प्रश्न 6. चक्रवात के न्यूनीकरण की मुख्य युक्तियाँ समझाइए।
उत्तर–चक्रवात यद्यपि अत्यन्त विनाशकारी विपत्ति है, किन्तु वर्तमान में भौतिक विकास के साथ-साथ भवन रचनाओं में तकनीकी परिवर्तनों और अन्य शमनकारी रणनीतियों द्वारा इस पर नियन्त्रण तथा क्षति न्यूनीकरण सम्भव है। चक्रवात न्यूनीकरण से सम्बन्धित मुख्य युक्तियाँ निम्नलिखित हैं–

  • चक्रवात सम्भावित क्षेत्रों में समुद्र से निकली भूमि पर नुकीली पत्तियों वाले पेड़ों की हरित पट्टी का विस्तार करनी चाहिए।
  • समुद्रतटीय भाग में विस्तृत भू-भाग पर ऊँचे चबूतरे, तटबन्ध आदि का निर्माण करना चाहिए।
  • तटीय क्षेत्रों में घास-फूस की छतों वाले कच्चे घर बनाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, बल्कि इनके स्थान पर निश्चित विशेषताओं वाले मकान ही बनाए जाएँ।
  • चक्रवात सम्भावित क्षेत्रों में सरकार को मकान बनाने के लिए समुचित मार्गदर्शन तथा ऋण सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।
  • सम्भावित क्षेत्रों में विशेष प्रकार के शरैण-स्थल बनवाए जाने चाहिए जिनसे राहत एवं बचाव दल को सुविधा प्राप्त होगी।

प्रश्न 7. 1999 के ओडिशा के भीषण चक्रवात के प्रभाव का एक स्थिति-विषयक अध्ययन कीजिए।
उत्तर–भारत का पूर्वी तटीय क्षेत्र चक्रवाती तूफानों की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील है। यहाँ ओडिशा में चक्रवाती तूफानों द्वारा कई बार भारी क्षति हो चुकी है। ऐसा ही एक भयंकर चक्रवाती तूफान 29 अक्टूबर, 1999 ई० को आया जिसकी गति 260-300 किमी प्रति घण्टा थी। इस तूफाने का प्रभाव केवल समुद्र तटों तक ही सीमित न रहा, बल्कि 250 किमी अन्दर तक इसने क्षति पहुँचाई। 36 घण्टे की अवधि में इस तूफान ने लगभग 200 लाख हेक्टेयर भूमि नष्ट कर दी और अपने पीछे बरबादी के भयावह नजारे छोड़ गया। यह महाचक्रवाती तूफान इतना विस्तृत और विनाशकारी था कि इसने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया तथा लाखों मकानों को नष्ट कर दिया।

प्रश्न 8. सूखा निवारण के दो महत्त्वपूर्ण उपाय बताइए।
उत्तर-सूखा निवारण के दो महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं

1. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षाजल का संग्रह और जल संरक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है। भारत में वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती है परन्तु वर्षाजल का समुचित उपयोग नहीं किया जाता। जल के अकुशल प्रबन्धन के कारण वर्षा का समस्त जल नदियों में बह जाता है या बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है। अतः वर्षाजल का समुचित संग्रह और प्रबन्धन कर उस जल का उपयोग सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए किया जाना चाहिए।

2. सूखाग्रस्त क्षेत्रों में हरित पट्टी को विस्तार किया जाना चाहिए। हरा-भरा पर्यावरण वातावरण-आर्द्रता के संरक्षण और जलवायु सन्तुलन का सबसे उत्तम माध्यम होता है, जिससे सूखे की समस्या पर नियन्त्रण किया जा सकता है।

प्रश्न 9. आधुनिक काल में प्राकृतिक आपदाओं के स्वरूप में आपको किस प्रकार के परिवर्तन का अनुभव होता है?
उत्तर–आपदाएँ आदि-अनादिकाल से प्रकृति के घटनाक्रम के रूप में प्रकट होती रही हैं। प्राचीनकाल में जनसंख्या अत्यन्त कम थी। दूसरे, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के उपायों का ज्ञान भी मनुष्य को नहीं था। आधुनिक काल में जनसंख्या वृद्धि के कारण मनुष्य के प्रकृति-विपरीत कार्यों में वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति में भी वृद्धि का अनुभव किया जाता है। इसके अतिरिक्त अंब मनुष्य ने अपने तकनीकी ज्ञान का विकास भी पूर्व की अपेक्षा अधिक कर लिया है। अत: यदि इन उपायों का ठीक से पालन किया जाए तो आपदाओं से होने वाली क्षति को पूर्वकाल की अपेक्षा कम किया जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आपदाओं से क्या तात्पर्य है? इनका वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-आपदा का अर्थ
आपदा प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जो व्यापक रूप से मनुष्य एवं अन्य जीव-जन्तुओं की सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यवधाम डालती है। इसके कारण सम्पत्ति की भारी क्षति ही नहीं होती, बल्कि अनेक लोग काल-कवलित भी हो जाते हैं। इसीलिए आपदाओं को ‘सभ्यता का शत्रु’ कहा जाता है। कई सभ्यताएँ; जैसे-हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो, बेबोलोन तथा नील नदी घाटी आदि आपदाओं के कारण ही आज इतिहास की विषय-वस्तु बन गई हैं। प्राकृतिक आपदाएँ कभी-कभी इतनी त्वरित या आकस्मिक होती हैं कि इनसे सँभल पाना कठिन हो जाता है। जब इनका प्रभाव विस्तृत या क्षेत्रीय होता है तो समूचा राष्ट्र आक्रान्त हो जाता है। विश्व बैंक के अनुसार, आपदाएँ अल्पावधि की एक असाधारण घटना हैं जो देश की अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से अस्त-व्यस्त कर देती हैं। अत: आपदाएँ देश की अर्थव्यवस्था को ही नहीं, सामाजिक एवं जैविक विकास की दृष्टि से भी विनाशकारी होती हैं।

आपदा एक अनैच्छिक घटना है जो बाह्य शक्तियों के कारण मनुष्य के नियन्त्रण में नहीं है। आपदा की चेतावनी तुरन्त नहीं मिलती; यह थोड़े समय के बाद मिलती है, तब तक आपदा आ चुकी होती है, बेचाव को समय कम मिलता है जिससे जान एवं सम्पत्ति की व्यापक हानि होती है तथा संकटकालीन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है।

आपदाओं का वर्गीकरण

आपदाओं से शक्ति से निपटने के लिए उनकी पहचान एवं वर्गीकरण को एक प्रभावशाली कदम समझा जाता है। आपदाओं को सामान्यत: दो बृहत् वर्गों-(i) प्राकृतिक एवं (ii) मानवकृत आपदाओं में विभाजित किया जाता है। प्राकृतिक आपदाएँ निम्नलिखित चार प्रकारों में वर्गीकृत की जाती हैं|
1. वायुमण्डलीय-इनके अन्तर्गत बर्फानी तूफान, तड़ित झंझा, टॉरनेडो, उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात, सूखा, पाला, लू तथा शीतलहर को सम्मिलित किया जाता है।
2. भौमिक–इनमें स्थलमण्डलीय आपदाएँ शामिल हैं; जैसे—भूकम्प, भू-स्खलन, ज्वालामुखी, मृदा अपरदन तथा अवतलन आदि।
3. जलीय-जल के कारण उत्पन्न आपदाएँ जलीय प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। इनके अन्तर्गत बाढ़, ज्वार, महासागरीय घटनाएँ तथा सुनामी सम्मिलित हैं।
4. जैविक-पौधों के कीट-पतंगे, फफूद, बैक्टीरिया और वायरल संक्रमण, बर्ड फ्लू, डेंगू, मलेरिया, प्लेग आदि जैविक आपदाएँ हैं।

मानवकृत आपदाओं में वे सभी आपदाएँ आती हैं जो मानव की असावधानी या जानकारी होते हुए लापरवाही भी बरतने के कारण घटित होती हैं। इस प्रकार की आपदाएँ आकस्मिक या दीर्घ अवधि दोनों समयान्तरालों में घटित हो सकती हैं। दुर्घटना, जहरीली गैसों का रिसाव, विभिन्न प्रकार के प्रदूषण, परमाणु विस्फोट, बम विस्फोट, आन्तरिक गृह युद्ध, साम्प्रदायिक दंगे, आतंकवादी वारदात आदि मानवकृत आपदाओं के उदाहरण हैं।

प्रश्न 2. क्या प्राकृतिक आपदाएँ विश्वव्यापी होती हैं? यदि हाँ, तो विश्व स्तर पर इन्हें रोकने के क्या प्रयास हैं?
उत्तर- सामान्यत: प्राकृतिक आपदाएँ विश्वव्यापी होती हैं। ये कहीं भी, कभी भी अपने आगोश में जीवजगत को लेकर क्षतिग्रस्त कर सकती हैं। जिस ढंग से प्रत्येक सामाजिक वर्ग इनसे निपटता है वह अद्वितीय होता है, क्योंकि दो आपदाएँ न तो समान होती हैं और न ही उनमें आपस में तुलना की जा सकती है। अत: विश्व समुदाय आपदाओं से आज भी उतना ही भयभीत एवं आक्रान्त है जितना वह प्राचीन काल में था। वर्तमान में प्राकृतिक आपदाओं के परिणाम, गहनता एवं बारम्बारता और इसके द्वारा किए गए नुकसान बढ़ते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण मानव जनसंख्या में वृद्धि तो है ही, साथ ही उसका प्रकृति के प्रति शत्रुरूप में व्यवहार एवं पर्यावरण सिद्धान्त के प्रति उदासीन होना भी है। इन विचारों की पुष्टि निम्नांकित सारणी से भी होती है जो गत 60 वर्षों में 12 गम्भीर प्राकृतिक आपदाओं से विभिन्न देशो में मरने वालों की संख्या को दर्शाती है।

तालिका : विश्व के विभिन्न देशों में गत 60 वर्षों (1948 से 2005)
में प्राकृतिक आपदाओं से हुई मौतें

UP Board Solutions for Class 11Geography Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters  (प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ) img 2
स्रोत: *यूनाइटेड नेशन्स इन्वारनमेण्टल प्रोग्राम (यू०एन०ई०सी०) 1991.
**राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान की न्यूज़ रिपोर्ट, भारत सरकार, नई दिल्ली। वास्तव में आपदा द्वारा पहुँचाई गई क्षति के परिणाम भू-मण्डलीय प्रतिघाते हैं और अकेले किसी राष्ट्र में इतनी क्षमता नहीं है कि वह इन्हें सहन कर सके। इसलिए 1989 में संयुक्त राष्ट्र सामान्य असेम्बली में इस मुद्दे को उठाया गया था और मई 1994 में जापान के याकोहामा नगर में आपदा प्रबन्ध की विश्व कॉन्फ्रेंस में इसे औपचारिकता प्रदान कर दी गई थी। बाद में इसी प्रयास को योकोहामा रणनीति तथा अधिक सुरक्षित संसार के लिए कार्ययोजना कहा गया।

इसी प्रयास के अन्तर्गत 1990-2000 को आपदा न्यूनीकरण का अन्तर्राष्ट्रीय दशक भी घोषित किया गया।

प्रश्न 3. आपदाओं के न्यूनीकरण एवं प्रबन्धन के उपायों की एक योजना प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर—यद्यपि आपदाएँ जीव-जन्तुओं के लिए सामान्य रूप से तथा मानव समुदाय के लिए मुख्य रूप से संकटापन्न होती हैं, परन्तु प्राकृतिक संरचनाओं की दृष्टि से प्राकृतिक आपदाएँ कतिपय लाभदायक भी होती हैं; जैसे—बाढ़ द्वारा बाढ़कृत मैदान का निर्माण जिसकी मिट्टी पोषक तत्वों से युक्त होने के कारण अत्यन्त उपजाऊ होती है। ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाली राख और लावा काली मिट्टी का निर्माण करता है। जो कपास की कृषि के लिए आवश्यक होती है। इसी प्रकार, भू-स्खलन से क्षेत्र में झील का निर्माण तथा भूकम्प के कारण भूमिगत जल के प्रवाह अवरोध से जलभर (Aquifer) (पारगम्य शैल की परत जिसमें जल भरा रहता हो) का निर्माण हो जाता है जो उन क्षेत्रों की जलापूर्ति में सहायक है। इस प्रकार, प्राकृतिक आपदाएँ एक ओर प्रकृति का वरदान हैं तो दूसरी ओर मानव की असावधानी और प्रकृति-विरुद्ध कार्यों में वृद्धि के कारण मानव समुदाय के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप हैं। इसलिए प्राकृतिक और मानवजनित । दोनों ही प्रकार की आपदाएँ जन-धन की क्षति की दृष्टि से अत्यन्त कष्टकारी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं। अत: मानव हित में आपदाओं के न्यूनीकरण एवं प्रबन्धन महत्त्वपूर्ण हैं। प्रबन्ध के लिए निम्नलिखित तीन स्थितियों पर योजना बनाने की आवश्यकता है

1. आपदापूर्व प्रबन्धन योजना-आपदापूर्व प्रबन्धन का अर्थ किसी आपदा या विपत्ति से होने वाले जोखिम को न्यूनतम करने का पूर्व प्रयास है। इसके अन्तर्गत विपत्ति का सामना करने की पूर्ण तैयारी, जनजागरूकता और आपदा न्यूनीकरण के उपायों हेतु योजना बनाई जाती है। पूर्ण तैयारी में आपदा प्रभावित क्षेत्रों की पहचान एवं जोखिम का मूल्यांकन और प्रभाव का पूर्वानुमान लगाया जाता है, फिर इसके आधार पर अन्य तैयारी की रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें पूर्व सूचना प्रणाली को विकसित करना, संसाधन प्रबन्धन पर ध्यान देते रहना और सहायता के लिए अभ्यास करते, रहना आवश्यक है।

2. आपदा के समय प्रबन्धन योजना-आपदा के समय प्रबन्धन से यह अभिप्राय है कि आपदा के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचकर बचाव कार्यों को तत्काल शुरू किया जाए और प्रभावित मानव समुदाय की विभिन्न प्रकार से सहायता की जाए। इस अवधि में मुख्य ध्यान खोज और बचाव तथा राहत सामग्री के उचित रूप से प्रबन्ध एवं वितरण पर दिया जाना आवश्यक है।

3. आपदा के पश्चात् प्रबन्धन योजना-आपदा के पश्चात् पुनर्वास, पुनर्लाभ और विकास कार्यों से सम्बन्धित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इस समय नीति निर्धारकों की अहम् भूमिका होती है। उन्हें वर्तमान में हुई आपदा से क्षतिपूर्ति को पूरा करने के लिए उचित वितरण प्रणाली के साथ-साथ मानक तकनीकों के अनुसार ही विकास कार्यों को पूरा करना चाहिए। इसी अवसर पर आपदापूर्व, प्रबन्धन के अन्तर्गत स्थापित आपात कोष तथा जोखिम स्थानान्तरण संस्थाओं (बीमा कम्पनी) के कार्यों का पूरा उपयोग करते हुए राहत एवं पुनर्वास कार्यों में सहयोग प्रदान करना होता है। अत: आपदा निवारण हेतु आपदा न्यूनीकरण प्रबन्धन को न केवल जीवन के अंग के रूप में बल्कि आवश्यक जीवन रक्षा कौशल के रूप में अपनाकर अपनी और प्रियजनों की सुरक्षा के लिए तत्पर रहना और जनसामान्य को तैयार करना ही सर्वोत्तम उपाय है।।

प्रश्न 4. भूकम्प क्यों आते हैं? भारत में इसके गहनता क्षेत्र बताइए। इस आपदा से होने वाली क्षति | को किस प्रकार न्यूनतम किया जा सकता है?
उत्तर-हमारी पृथ्वी गतिशील सक्रिय ग्रह है। इसकी सबसे ऊपरी सतह क्रस्ट का निर्माण विशाल प्रस्तरीय प्लेटों से हुआ है। विशाल प्रस्तरीय प्लेटें अति प्रत्यास्थ एवं सान्द्र प्रकृति की भीतरी सतह, मैंटिल में उत्पन्न संवहन तरंगों के कारण निरन्तर गतिशल, संघनित एवं प्रसारित होती रहती हैं। इन भू-विवर्तनिकी गतियों के कारण भू-भाग कहीं संकुचित हो जाते हैं तो कहीं परस्पर टकराते हैं और प्रसारित होते हैं, जिससे पृथ्वी पर . कम्पन उत्पन्न होने से भूकम्प आते हैं। अतः भूकम्प का प्रमुख कारण पृथ्वी की प्लेटों का गतिशील होना है। इस गतिशीलता के परिणामस्वरूप भूगर्भीय ऊर्जा का निष्कासन होता है, तभी भूकम्प का अनुभव किया जाता है।

भारत के भूकम्पीय कटिबन्धीय क्षेत्र या वितरण

राष्ट्रीय भू-भौतिकी प्रयोगशाल, भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण, मौसम विज्ञान विभाग तथा कुछ समय पूर्व बने राष्ट्रीय प्रबन्धन संस्थान ने भारत में आए 1,200 भूकम्पों के गहन विश्लेषण के आधार पर देश को निम्नलिखित 5 भूकम्पीय क्षेत्रों (Zones) में बाँटा है

1. अत्यधिक क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-V)-इसमें हिमालय पर्वतश्रेणी, नेपाल, बिहार सीमावर्ती क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी उत्तराखण्ड, देश के उत्तर-पूर्वी राज्य तथा कच्छ प्रायद्वीप और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सम्मिलित हैं।
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2. अधिक क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-IV)-इसके अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, . उत्तराखण्ड (उत्तर-पश्चिमी एवं दक्षिणी भाग), उत्तर प्रदेश.एवं बिहार के उत्तरी मैदानी भाग तथा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं।

3. मध्य क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-II)—इस क्षेत्र का विस्तार उत्तरी प्रायद्वीपीय पठार पर अधिक है।

4. निम्न क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-1)-इसमें उत्तर-पश्चिमी राजस्थान, मध्य प्रदेश का उत्तरी | भाग, पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी ओडिशा तथा प्रायद्वीप के आन्तरिक भाग सम्मिलित हैं।

5. अति निम्न क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-I)-इसके अन्तर्गत जोन II के अन्तर्गत सम्मिलित क्षेत्र के आन्तरिक भाग सम्मिलित हैं।

भूकम्प आपदा से सुरक्षा के उपाय – भूकम्प आपदा से सुरक्षा के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं

  1. भूकम्परोधी भवनों का निर्माण किया जाए।
  2. जनसामान्य को भूकम्प आपदा की जानकारी प्रदान की जाए तथा सुरक्षात्मक प्रशिक्षण दिया जाए।
  3. भूकम्प के दौरान घर की छत, दीवार, दरवाजे और खिड़कियों से दूर रहा जाए।
  4. यदि आप घर से बाहर हैं तो खुले मैदान में रहने का प्रयास करें।
  5. ऐसे समय पर घबराएँ नहीं, साहस रखें और बिजली के खम्भों एवं ज्वलनशील पदार्थों से दूर रहें।

प्रश्न 5. सुनामी लहरें क्या हैं? सुनामी लहरों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–प्राकृतिक आपदाओं में समुद्री लहरें अर्थात् सुनामी सबसे अधिक विनाशकारी आपदा है। सुनामी जापानी मूल का शब्द है जो दो शब्दों सु (बन्दरगाह) और ‘नामी’ (लहर) से बना है अर्थात् सुनामी का अर्थ है—बन्दरगाह की ओर आने वाली समुद्री लहरें। इन लहरों की ऊँचाई 15 मीटर या उससे अधिक होती है । और ये तट के आस-पास की बस्तियों को तबाह कर देती हैं। सुनामी लहरों के कहर से पूरे विश्व में हजारों लोगों के काल-कवलित होने की घटनाएँ इतिहास में दर्ज हैं। भारत तथा उसके निकट समुद्री द्वीपीय देश श्रीलंका, थाईलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार आदि में 26 दिसम्बर, 2004 को इसी प्रलयकारी सुनामी ने करोड़ों की सम्पत्ति का विनाश कर लाखों लोगों को काल का ग्रास बनाया था।

समुद्री लहरों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्य

  1.  सुनामी लहरें अत्यधिक शक्तिशाली होती हैं। इनकी भयावह शक्ति से कई टन वजन की विशाल चट्टान, नौका तथा अन्य प्रकार का मलबा मुख्य भूमि में कई मीटर अन्दर पॅस जाता है।
  2. तटवर्ती मैदानी इलाकों में सुनामी की गति 50 किमी प्रति घण्टा हो सकती है।
  3. कुछ सुनामी लहरों की गति वृहदाकार होती है। तटीय क्षेत्रों में इनकी ऊँचाई 10 से 30 मीटर तक हो सकती है।
  4. समुद्री लहरें एक के बाद एक आती रहती हैं। प्रायः पहली लहर इतनी विशाल नहीं होती। पहली लहर आने के बाद कई घण्टों तक आने वाली लहरों का खतरा बना रहता है। कभी-कभी समुद्री लहरों के कारण समुद्र तट का पानी घट जाता है और समुद्र तल नजर आने लगता है। इसे प्रकृति | की ओर से सुनामी आने की चेतावनी समझना चाहिए।
  5. ये लहरें दिन या रात में कभी भी आ सकती हैं। जलधाराओं या समुद्रों में मिलने वाली नदियों में प्रवेश करने पर सुनामी लहरें उफान पैदा कर देती हैं।
  6. भूकम्प के कारण उत्पन्न समुद्री लहरें कई सौ किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से तट की ओर दौड़ती हैं और भूकम्प आने के कई घण्टों बाद ही तट तक पहुँचती हैं।
  7. गहरे समुद्र में सुनामी लहरों की उत्पत्ति के समय समुद्र में कोई हलचल न होने के कारण ये दिखाई नहीं देतीं। उत्पत्ति के समय इन लहरों की लम्बाई 100 किमी तक होने के बावजूद बीच समुद्र में ये लहरें बहुत ऊँची नहीं उठतीं और कई सौ किमी की रफ्तार से दौड़ती हैं।

सुनामी लहरें अपनी इसी विशाल ऊर्जा के कारण बड़ी तेज रफ्तार से सागर तक पहुँचने में सक्षम होती हैं। इनकी रफ्तार समुद्र की गहराई के साथ बढ़ती जाती है, जबकि उथले सागर में रफ्तार कम होती है। यही कारण है कि समुद्र तट के पास पहुँचने पर सागर की गहराई अचानक कम होने पर लहरों की रफ्तार कम हो जाती है, परन्तु पीछे से तेजी से आती लहरें एक के ऊपर एक सवार होकर लहरों की ऊँची दीवार बना देती हैं। इसी ऊँचाई और ऊर्जा का घातक मेल सागर तटों पर तबाही का कारण बनता है।

प्रश्न 6. सुनामी लहरों की उत्पत्ति क्यों होती है? इनसे प्रभावित क्षेत्र बताइए।
उत्तर-सुनामी लहरों की उत्पत्ति के कारण
विनाशकारी समुद्री लहरों (सुनामी) की उत्पत्ति भूकम्प, भू-स्खलन तथा ज्वालामुखी विस्फोटों का परिणाम है। हाल के वर्षों के किसी बड़े क्षुद्रग्रह (उल्कापात) के समुद्र में गिरने को भी समुद्री लहरों का कारण माना जाता है। वास्तव में, समुद्री लहरें इसी तरह उत्पन्न होती हैं, जैसे तालाब में कंकड़ फेंकने से गोलाकार लहरें किनारों की ओर बढ़ती हैं। मूल रूप से इन लहरों की उत्पत्ति में सागरीय जल का बड़े पैमाने पर विस्थापन ही प्रमुख कारण है। भूकम्प या भू-स्खलन के कारण जब कभी भी सागर की तलहटी में कोई बड़ा परिवर्तन आता है या हलचल होती है तो उसे स्थान देने के लिए उतना ही ज्यादा समुद्री जल अपने स्थान से हट जाता है (विस्थापित हो जाता है) और लहरों के रूप में किनारों की ओर चला जाता है। यही जल ऊर्जा के कारण लहरों में परिवर्तित होकर ‘सुनामी लहरें” कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि समुद्री लहरें सागर में आए बदलाव को सन्तुलित करने का प्राकृतिक प्रयास मात्र हैं।

पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इन समुद्री लहरों को ‘भूगर्भिक बम’ कहते हैं। सन् 1949 में ला–पाल्का आइलैण्ड के उत्तरी तटीय भाग में एक ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था। यह विस्फोट इतनी तीव्र था कि ज्वालामुखी बीच से ही आधा चिटक गया था, किन्तु यह चिटका हुआ भागे समुद्री में नहीं गिरा था अन्यथा वहाँ भी अकल्पनीय विनाशकारी समुद्री लहरें उत्पन्न हो सकती थीं। अब वैज्ञानिकों का मानना है। कि जब भी यह ज्वालामुखी जाग्रत होगा तब 50 अरब टन का ज्वालामुखी का चिटका हुआ आधा हिस्सा अटलाण्टिक महासागर में गिरकर विनाशकारी समुद्री लहरें उत्पन्न कर देगा। समुद्री लहरों से यद्यपि प्रशान्त महासागर के तटीय भाग सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं, परन्तु अटलाण्टिक एवं हिन्द महासागर में भी तटवर्ती भूकम्प एवं ज्वालामुखी मेखलाओं में सुनामी लहरों को कहर होता रहता है।

सुनामी प्रभावित क्षेत्र ।

यद्यपि विश्व के सभी समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों को सुनामी प्रभावित क्षेत्रों के अन्तर्गत रखा जा सकता है, किन्तु भूकम्प संवेदनशील क्षेत्र सुनामी की दृष्टि से अधिक प्रभावशाली होते हैं। विश्व में प्रशान्त महासागर तटवर्ती क्षेत्र, जहाँ भूकम्प आने की सम्भावनाएँ अधिक विद्यमान हैं, में सुनामी का सर्वाधिक जोर रहता है। यह भाग भूकम्प और ज्वालामुखियों की सर्वप्रमुख मेखलाओं से घिरा है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग दो बार सुनामी का प्रकोप हो जाता है। अत: प्रशान्त महासागरीय तट पर, जिसमें अलास्का, जापान, फिलिपीन्स, दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे द्वीप इण्डोनेशिया और मलेशिया तथा हिन्द महासागर में म्यांमार, श्रीलंका और भारत के तटीय भाग सुनामी प्रभावित मुख्य क्षेत्र हैं।

प्रश्न 7. भू-स्खलन क्या है? इसके लिए उत्तरदायी कारक कौन-कौन से हैं? भारत में इसके प्रभाव
एवं प्रभावित क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-भू-स्खलन का अर्थ, प्रभाव एवं प्रभावित क्षेत्र ।
पर्वतीय ढालों का कोई भाग जब जल तत्त्व भार की अधिकता एवं आधार चट्टानों के कटाव के कारण अपनी गुरुत्वीय स्थिति से असन्तुलित होकर अचानक तीव्रता के साथ सम्पूर्ण अथवा विच्छेदित खण्डों के रूप में गिरने लगता है तो यह घटना भू-स्खलन कहलाती है। भू-स्खलन प्रायः तीव्र गति से आकस्मिक उत्पन्न होने वाली प्राकृतिक आपदा है। भौतिक क्षति और जन-हानि इसके दो प्रमुख दुष्प्रभाव हैं। भू-स्खलन अपने मार्ग में आने वाले प्रत्येक पदार्थ-मानव बस्तियों, खेत-खलियान, सड़क आदि सभी को नष्ट कर देता है। भू-स्खलन से नदी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं जिससे नदी के ऊपरी भाग में बाढ़ आ जाती है। कभी-कभी किसी क्षेत्र में बड़ी झील बन जाती है जिसके टूटने पर त्वरित बाढ़ से भारी तबाही होती है। भू-स्खलन मानव समुदाय पर कहर बरसाने वाली प्रकृतिक आपदा है। भारत में इस आपदा का रौद्र रूप हिमालय पर्वतीय प्रदेश एवं पश्चिमी घाट में बरसात के दिनों में अधिक देखा जाता है। वस्तुतः हिमालय प्रदेश युवावलित पर्वतों से बना है, जो विवर्तनिक दृष्टि से अत्यन्त अस्थिर एवं संवेदनशील भू-भाग है। यहाँ की भूगर्भिक संरचना भूकम्पीय तरंगों से प्रभावित होती रहती है। इसलिए यहाँ भू-स्खलन की घटनाएँ अधिक होती रहती हैं।
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भू-स्खलन के लिए उत्तरदायी कारक

भू-स्खलन के लिए कई प्राकृतिक एवं मानवीय कारक उत्तरदायी होते हैं। इन कारकों की गहनता ही भू-स्खलन की तीव्र उत्पत्ति के कारणों को प्रभावी बनाती है। सामान्यतः भू-स्खलन के लिए निम्नलिखित कारक अधिक उत्तरदायी माने जाते हैं—
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प्रश्न 8. उत्तराखण्ड राज्य के भूस्खलन सुभेद्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए तथा इसकी क्षति के न्यूनीकरण की युक्तियाँ बताइए।
उत्तर-उत्तराखण्ड के भूस्खलन सुभेद्य क्षेत्र
उत्तराखण्ड राज्य का भू-स्खलन प्रभावशाली की दृष्टि से विश्व में चौथा स्थान है। यहाँ लगभग 1200 से अधिक गाँवों को भू-स्खलन सुभेद्य क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है। हैदराबाद स्थित सुदूर संवेदन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इनमें से अधिकांश गाँव ऋषिकेश-बद्रीनाथ-गंगोत्री-केदारनाथ मार्ग पर स्थिति हैं। एन०आर०एस० के लैण्ड हेजार्ड जोनेशन मानचित्र के आधार पर अलकनन्दा घाटी में 137, गंगा-अलकनन्दा घाटी में 24, गंगा-चन्द्रप्रभा घाटी में 25, गंगा घाटी में 21 तथा बेतसुथी नदी के निकट 23 गाँव संवेदनशील हैं। रुद्रप्रयाग-ऊखीमठ-केदारनाथ क्षेत्र के 60 तथा पिथौरागढ़-मालपा मार्ग के 13 गाँव अति संवेदनशील बताए गए हैं। राज्य के आपदा प्रबन्धन एवं न्यूनीकरण केन्द्र के अनुसार भी ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर लगभग 600, रुद्रप्रयाग-ऊखीमठ-केदारनाथ मार्ग पर 200, पिथौरागढ़-मालपा मार्ग पर 150 तथा उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग पर 275 गाँव भू-स्खलन सुभेद्य क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

न्यूनीकरण की युक्तियाँ
भूस्खलन के न्यूनीकरण हेतु निम्नलिखित युक्तियाँ महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती हैं।

1. नियोजित भूमि उपयोग–नियोजित भूमि उपयोग भू-स्खलन न्यूनीकरण की महत्त्वपूर्ण युक्ति है। इसके अन्तर्गत विभिन्न कार्यों के लिए उपयुक्त भूमि का चुनाव सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यदि मकानों का निर्माण सुरक्षित स्थानों पर किया जाए तथा वनस्पति के लिए निर्धारित अनुपात में भूमि का उपयोग हो तो भू-स्खलन का जोखिम कम हो जाता है।

2. प्रतिधारण दीवारों का निर्माण-भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों के किनारे तीव्र ढाल को रोकने के लिए विशेष प्रकार की प्रतिधारण दीवारों का निर्माण किया जाता है। रेल लाइनों के लिए बनाई गई सुरंग तथा मार्ग के किनारे काफी दूर तक इन दीवारों को बनाने से पर्वतीय ढाल से आने वाले मलबे को रोका जा सकता है।

3. स्थलीय जल प्रवाह को नियन्त्रित करना-वर्षा तथा अन्य स्रोतों से बहने वाले जल के निकास की उचित व्यवस्था करने से जल तत्त्व चट्टानों पर अपना दबाव नहीं बनाता है। इसीलिए आधार चट्टानें सुरक्षित रहती हैं, जिससे भू-स्खलन की सम्भावनाओं में कमी आती है।

4. इन्जीनियरी संरचना–कुशल अभियन्ताओं द्वारा निर्धारित मानकों के आधार पर भवनों की संरचनाएँ अधिक टिकाऊ होती हैं। अतः भू-स्खलन सम्भावित क्षेत्रों में कुशल इंजीनियरों के मार्गदर्शन में ही भवनों का निर्माण किया जाना उपयुक्त है।

5. वनस्पति आवरण-भू-स्खलन को नियन्त्रित एवं न्यूनतम करने में वनस्पति आवरण सबसे सरल और सस्ता उपाय है। इसके द्वारा चट्टानों को सुरक्षा कवच प्राप्त होता है तथा चट्टानें जल तत्त्व के प्रभाव से मुक्त रहकर भू-स्खलन से प्रेरित नहीं होती हैं।

प्रश्न 9. बाढ़ तबाही से आप क्या समझते हैं। इसके उत्पन्न होने के क्या कारण हैं? भारत के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-बाढ़ का सामान्य अर्थ स्थलीय भाग का कई दिनों तक जलमग्न होना है। सामान्य तौर पर बाढ़ की स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब जल नदी के किनारों के ऊपर प्रवाहित होते हुए विस्तृत क्षेत्र में फैल जाता है। वास्तव में, बाढ़ प्राकृतिक पर्यावरण की एक विशेषता है जिसे जलीय-चक्र का संघटक माना जाता है, किन्तु जब वह लगातार तीव्र गति से कई दिनों तक बनी रहती है तो इसी प्रक्रिया को बाढ़ तबाही या बाढ़ आपदा कहा जाता है।

बाढ़ प्रकोप के कारण

यद्यपि बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है जिसके लिए कई प्राकृतिक कारण उत्तरदायी हैं, किन्तु वर्तमान में उन कारकों को उत्तेजित करने में मानवीय कारकों का विशेष योगदान है। अतः बाढ़ प्राकृतिक एवं मानवजनित कारकों का सम्मिलित परिणाम है। संक्षेप में इन कारणों का वर्णन निम्नांकित है

1. अत्यर्थिक वर्षा-लम्बी अवधि तक घनघोर वर्षा का होना नदियों की बाढ़ के लिए सर्वप्रथम कारक है। नदियों के ऊपरी जल-ग्रहण क्षेत्रों में घनघोर वर्षा के कारण निचले भागों में जल के आयतन में आकस्मिक वृद्धि हो जाती है, जिस कारण नदियों में अपार जलराशि प्रवाहित होकर आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न कर देती है।

2. पर्यावरण हास-मानव द्वारा प्रकृति के कार्यों में अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण पर्यावरण ह्रास या विनाश की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, जो बाढ़ का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों तथा अन्य सभी भागों में तेजी से वन-विनाश हो रहा है। इसलिए भूमि कटाव अधिक होता है। जो नदियों के तल को ऊँचा कर देता है। अत: वर्षा के समय जल नदी के किनारों से बाहर आकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देता है।

3. भू-स्खलन-पर्वतीय क्षेत्रों में भू-स्खलन होने से नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है तथा बड़े-बड़े जलाशय बन जाते हैं। जब कभी अनाचक जलाशय टूटते हैं या नदी का मार्ग खुलता है तो • प्रलयकारी बाढ़ आ जाती है। इस प्रकार की बाढ़ का वेग इतना तीव्र होता है कि वह बड़ी-से-बड़ी बस्ती का अस्तित्व समाप्त कर देती है। उत्तराखण्ड की गंगा घाटी में 1978 में डबरानी तथा 1992 में गंगवाड़ी में इसी कारण बाढ़ आई थी।

4. बाँध या तटबन्ध का टूटना-कभी-कभी अचानक बाँध या नदी के तटबन्ध टूट जाते हैं जिससे प्रचण्ड बाढ़ आ जाती है। 1984 में पूर्वी कोसी नदी का तटबन्ध टूटने के कारण ही बाढ़ की भयावह स्थिति उत्पन्न हुई थी।

5. नगरीकरण-बढ़ता अनियोजित नगरीकरण मानवजनित बाढ़ आपदा का प्रमुख कारण है। नगरीकरण के परिणामस्वरूप भूमि अभाव के कारण निम्न भूमि क्षेत्रों के उपयोग से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र

विश्व में बांग्लादेश के बाद भारत सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित देश है। भारत में बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा असम को प्रतिवर्ष बाढ़ का सामना करना पड़ता है। ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना, राजस्थान व पंजाब को भी कभी-कभी बाढ़ का सामना करना पड़ता है। पर्यावरण में आए परिवर्तनों के कारण तो राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों को विगत कुछ वर्षों से बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। देश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

1. प्रमुख बाढ़ प्रभावित क्षेत्र—भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा की द्रोणी, असम में ब्रह्मपुत्र की द्रोणी तथा ओडिशा में वैतरणी, ब्राह्मणी और स्वर्ण रेखा नदियों की द्रोणियाँ भारत के सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं (चित्र में देखें)। देश की कुल बाढ़ आपदा की लगभग 60% हानि केवल गंगा के जल-प्रवाह क्षेत्रों में होती है। पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष बाढ़ आपदा से सर्वाधिक हानि होती है।
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2. गौण बाढ़ प्रभावित क्षेत्र देश के सामान्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात और राजस्थान राज्य आते हैं। इन राज्यों में 1976-77 के बीच बाढ़ आपदा में देश की कुल बाढ़ क्षति का आधा हिस्सा थी। 1993 की बाढ़ द्वारा पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में 423 व्यक्तियों की मृत्यु तथा लगभग 20 हजार पशु-सम्पदा क्षतिग्रस्त हो गई थी।

प्रश्न 10. भारत में चक्रवात प्रभावित क्षेत्रों मुंख्य वाओं का उल्लेख कीजिए तथा इस आपदा से सुरक्षा के उपाय बताइए।
उत्तर-भारत में, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों के तटीय क्षेत्र चक्रवात प्रभावित क्षेत्र हैं (चित्र)।

UP Board Solutions for Class 11Geography Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters  (प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ) img 6

भारत विश्व के उन 6 प्रमुख क्षेत्रों में सम्मिलित है जहाँ प्रतिवर्ष उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आते हैं। यद्यपि 1999 के चक्रवात को सुपर साइक्लोन कहा जाता है। इस चक्रवात की गति 250 किमी प्रति घण्टा थी। ओडिशा राज्य में करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो गई थी तथा हजारों की संख्या में लोग काल के ग्रास बन गए थे, किन्तु भारत के आपदा इतिहास के इसके अतिरिक्त भी अन्य अनेक विनाशकारी चक्रवाती तूफानों का आगमन होता रहा है। आन्ध्र प्रदेश के समुद्रतटीय भाग पर 9 मई, 1990 को आया चक्रवात, सन् 1977 के विनाशंकारी चक्रवाते की अपेक्षा लगभग 25 गुना अधिक शक्तिशाली था। इसमें 1000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई थी तथा लगभग 30 लाख लोग बेघर हो गए थे। भारत में चक्रवाती तूफानों के कारण मृत व्यक्तियों का ऐतिहासिक परिदृश्य तालिका से स्पष्ट होता है जिसमें 1737 से 1999 तक मानवे क्षति को दर्शाया गया है

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चक्रवाती आपदा से सुरक्षा के महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं
1. मजबूत एवं ऊँचे मकानों का निर्माण-चक्रवाती तूफानों से प्रभावित समुद्रतटीय क्षेत्रों में फूस की | छतों वाले या कमजोर मकान बनाने पर प्रतिबन्ध होना चाहिए। इसके स्थान पर निर्धारित मानक वाले तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सुझाई विधियों के आधार पर ही मकान बनाने की अनुमति होनी चाहिए। इन क्षेत्रों में ऊँचे टीलों या बल्लियों (मचान) पर घर बनानी अधिक सुरक्षित होता है। चक्रवाती तूफानों से तेज गतिं वाली हवाएँ और समुद्री लहरें उठती रहती हैं जिससे तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं। अतः आवास-स्थल का चयन अत्यन्त सावधानीपूर्वक करना अत्यन्त
आवश्यक है। चक्रवात सम्भावित क्षेत्रों में नक्शे के आधार पर ठोस आधार वाली सन्तुलित इमारतें | सर्वाधिक सुरक्षित रहती हैं।

2. चक्रवातरोधी ढाँचों का निर्माण-हवाओं और मूसलाधार वर्षा के वेग को झेल सकने के लिए समुद्रतटीय भागों में चक्रवातरोधी ढाँचों का निर्माण किया जाना चाहिए। ये ढाँचे निर्धन जनता द्वारा नहीं बनाए जा सकते। इसलिए सरकार द्वारा इन्हें बनाने में विशेष आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाना चाहिए।

3. शरणस्थलों का विकास-चक्रवाते सम्भावित क्षेत्रों में सरकार को चक्रवात शरणस्थलों की | व्यवस्था करनी चाहिए। ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश राज्यों को इस प्रकार के शरणस्थलों के विकास | पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता है।

4. विशेष प्रकार के वृक्षों की हरित पटेर्यों का विस्तार-चक्रवातों और पवनों के वेग को कम | करने की सबसे कारगर रणनीति ऐसे विशेष पेड़ लगाए जाना है, जिनकी जड़े मजबूत तथा पत्तियाँ सुई जैसी हों। इन पेड़ों को उखड़ने से बचाने के लिए उनके चारों ओर बाड़े लगाई जानी चाहिए। वृक्षों की ऐसी हरित पट्टियाँ पूरे तटीय क्षेत्र में बनाई जानी चाहिए।

मानचित्र कार्य

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मानचित्र-2
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions (अपचयोपचय अभिक्रियाएँ)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions (अपचयोपचय अभिक्रियाएँ).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्पीशीज में प्रत्येक रेखांकित तत्व की ऑक्सीकरण संख्या का निर्धारण कीजिए-
(क) NaH2PO4
(ख) Na HSO4
(ग) H4P2O7
(घ) K2MnO4
(ङ) CaO2
(च) NaBH4
(छ) H2S2O7
(ज) KAl(SO4).12H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-1
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions img-2
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-2

प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों के रेखांकित तत्वों की ऑक्सीकरण संख्या क्या है तथा इन परिणामों को आप कैसे प्राप्त करते हैं?
(क) KI3
(ख) H2S4O6
(ग) Fe3O4
(घ) CH2CH2OH
(ङ) CH3COOH
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-3
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-4
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-5
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-6

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं का अपचयोपचय अभिक्रियाओं के रूप में औचित्य स्थापित करने का प्रयास कीजिए–
(क) CuO(s)+ H2(g) + Cu(s) + H2O(g)
(ख) Fe2O3(s) + 3CO(g)—-→ 2Fe(s) + 3CO2(g)
(ग) 4BCl3(g) + 3LiAlH4(s) → 2B2H6(g) + 3LiCl(s) + 3AlCl3(s)
(घ) 2K(s) + F2(g) → 2K+F (s)
(ङ) 4NH3(g) + 5O2(g) → 4NO(g) + 6H2O(g)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-7
इस अभिक्रिया में, Cu की ऑक्सीकरण अवस्था +2(CuO में) से घटकर शून्य (Cu में) हो जाती है जबकि H की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य (H2 में) से बढ़कर +1(H2O में) हो जाती है। इसलिए अभिक्रिया में CuO का अपचयन तथा H का ऑक्सीकरण हो रहा है। अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-8
इस अभिक्रिया में, Fe2O3 का अपचयन हो रहा है क्योंकि Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +3(Fe2O3 में) से घटकर शून्य (Fe में) हो जाती है। CO का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि C की ऑक्सीकरण अवस्था +2 (CO में) से बढ़कर +4 (CO,2में) हो जाती है। अत: यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया (redox reaction) है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-9
इस अभिक्रिया में, BCl3 का अपचयन हो रहा है क्योकि B की ऑक्सीकरण अवस्था +3 (BCl3 में) से घटकर -3 (B2H6 में) हो जाती है तथा LiAlH4 का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योकि H की ऑक्सीकरण अवस्था -1(LiAlH4 में) से बढ़कर +1 (B2H6 में) हो जाती है। अतः यह एक अपचयोपचय (redox) अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-10
इस अभिक्रिया में, K का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था शून्य से बढ़कर +1 हो जाती है तथा F को अपचयन हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था । शून्य से घटकर -1 हो जाती है। अत: यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-11
इस अभिक्रिया में, NH3 को ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था -3 से बढ़कर +2 हो जाती है तथा O2 का अपचयन हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था शून्य से घटकर -2 (H2O में) हो जाती है। अतः यह एक अपचयोपचय (redox) अभिक्रिया है।

प्रश्न 4.
फ्लुओरीन बर्फ से अभिक्रिया करके यह परिवर्तन लाती है
H2O(s) + F2(g) → HF(g) + HOF(g)
इस अभिक्रिया का अपचयोपचय औचित्य स्थापित कीजिए।
उत्तर
H2O(s) + F (g) → HF(g) + HOF (g)
इस अभिक्रिया में, F2 का अपचयन के साथ-साथ ऑक्सीकरण भी हो रहा है क्योंकि यह H (वैद्युत धनात्मक तत्त्व) को जोड़कर HF बनाती है तथा 0 (एक वैद्युत ऋणात्मक तत्त्व) को जोड़कर HOF बनाती है। अत: यह एक ऑक्सीकरण अपचयन अभिक्रिया (redox reaction) है।

प्रश्न 5.
H2SO5, Cr2O2-7 तथा NO3 में सल्फर, क्रोमियम तथा नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए। साथ ही इन यौगिकों की संरचना बताइए तथा इसमें हेत्वाभास | (fallacy) का स्पष्टीकरण दीजिए।
उत्तर
(i) H2SO5 में S की ऑक्सीकरण संख्या :
(+1)x2 + (x) + [(-2)x5]= 0
अथवा x= 10-2= +8
S की ऑक्सीकरण संख्या +8 सम्भव नहीं है क्योंकि s के बाह्य कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं और उसकी अधिकतम ऑक्सीकरण संख्या +6 हो सकती है। अत: H, SO में दो ऑक्सीकरण परमाणुओं को एक-दूसरे से जुड़ा होना चाहिए। इस हेत्वाभास (fallacy) को H2SO4 की निम्नलिखित संरचना द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-12
(ii) Cr2O2-7 में Cr की ऑक्सीकरण संख्या :
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-13
(iii) NO3 में N की ऑक्सीकरण संख्या :
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-14
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-15

प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र लिखिए-
(क) मर्करी (II) क्लोराइड
(ख) निकिल (II) सल्फेट
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड
(घ) थैलियम (I) सल्फेट
(ङ) आयरन (II) सल्फेट
(च) क्रोमियम (III) ऑक्साइड
उत्तर
(क) HgCl2
(ख) NiSO4
(ग) SnO2
(घ) Th2SO4
(ङ) Fe2(SO4 )3
(च) Cr2O7

प्रश्न 7.
उन पदार्थों की सूची तैयार कीजिए जिनमें कार्बन-4 से +4 तक की तथा नाइट्रोजन-3 से +5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-16

प्रश्न 8.
अपनी अभिक्रियाओं में सल्फर डाइऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड ऑक्सीकारक तथा अपचायक-दोनों ही रूपों में क्रिया करते हैं, जबकि ओजोन तथा नाइट्रिक अम्ल केवल ऑक्सीकारक के रूप में ही। क्यों?
उत्तर
SO2 में S की ऑक्सीकरण संख्या +4 होती है। S अपनी अभिक्रियाओं में -2 और +6 के बीच की कोई भी ऑक्सीकरण-संख्या दर्शा सकता है। अत: SO2 में S की ऑक्सीकरण संख्या घट सकती है और बढ़ भी सकती है; अर्थात् इसका ऑक्सीकरण तथा अपचयन दोनों सम्भव है। इस कारण SO2 ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों अभिकर्मकों की तरह व्यवहार करती है। H2O2 की स्थिति भी समान प्रकार की है। H2O2 में, O की ऑक्सीकरण अवस्था -1 होती है। ऑक्सीजन -2 और 0 (शून्य) के बीच की कोई भी ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है (+2 भी जब F से जुड़ा होता है) अतः H2O2 में ऑक्सीजन अपनी ऑक्सीकरण संख्या घटा तथा बढ़ा सकता है। इस कारण H2O2 ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों अभिकर्मकों की तरह व्यवहार करता है।
O3 में, ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है। यह अपनी ऑक्सीकरण-अवस्था को -1 तथा -2 तक घटा सकता है परन्तु अपनी ऑक्सीकरण-अवस्था को बढ़ा नहीं सकता। अत: O3 केवल एक ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करती है। H2O2 की स्थिति भी समान प्रकार की है। HNO3 में, N की ऑक्सीकरण-अवस्था +5 होती है जो N की अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था है। अत: N केवल अपनी ऑक्सीकरण अवस्था घटा सकता है। इस कारण HNO3 केवल ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करता है।

प्रश्न 9.
इन अभिक्रियाओं को देखिए
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6 (aq) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + 2O2(g)
बताइए कि इन्हें निम्नलिखित ढंग से लिखना ज्यादा उचित क्यों है?
(क) 6CO2(g) + 12H2O(I) → C2H12O6 (aq) + 6H2O(I) + 6O2(g)
(ख) O2(g) + H2O2(l) → H2O(I) + O2(g) + O2(g)
उपर्युक्त अपचयोपचय अभिक्रियाओं (क) तथा (ख) के अन्वेषण की विधि सुझाइए।
उत्तर
(क) यह प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की अभिक्रिया है जो कि एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है और अनेक चरणों में सम्पन्न होती है। इस अभिक्रिया में, 12H2O अणु क्लोरोफिल (chlorophyll) की उपस्थिति में पहले अपघटित होकर H2 तथा O2 देते हैं। इस प्रकार निर्मित H2CO2 को अपचयित कर C2H12O6 का निर्माण करती है। अतः अभिक्रिया को एक सरल रूप में अभिक्रिया निम्न प्रकार दिखाया जा सकता है|
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-17
इसलिए इस अभिक्रिया को समीकरण (iii) की भाँति लिखना ज्यादा उचित है। इस निरूपण में 12H2O अणु भाग लेते हैं तथा 6H2O अणु उत्पन्न होते हैं।
(ख) दी गई अभिक्रिया का वास्तविक प्रारूप निम्न प्रकार है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-18
समीकरण (iii) प्रदर्शित करती है कि O2 का एक अणु O3 से प्राप्त होता है, जबकि दूसरा H2O2 से प्राप्त होता है। इसलिए, समीकरण को प्रदर्शित करने की यह विधि अधिक उपयुक्त है। समीकरण (क) तथा (ख) का अन्वेषण ट्रेसर तकनीक (tracer technique) के द्वारा किया जा सकता है। समीकरण (क) में H2O18 तथा समीकरण (ख) में H2O18 (या O183) का प्रयोग कर अभिक्रिया के पथ को निर्धारित किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
AgF2 एक अस्थिर यौगिक है। यदि यह बन जाए तो यह यौगिक एक अति शक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है। क्यों?
उत्तर
AgF2 में, Ag की ऑक्सीकरण-अवस्था +2 होती है जो Ag की अत्यधिक अस्थायी अवस्था है। इसलिए, यह एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने के बाद शीघ्रता से अपचयित होकर स्थायी ऑक्सीकरण-अवस्था +1 प्राप्त कर लेता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-19
इसी कारण AgF2 (यदि प्राप्त हो जाये) एक अत्यन्त प्रबल ऑक्सीकारक की भाँति व्यवहार करता है।

प्रश्न 11.
“जब भी एक ऑक्सीकारक तथा अपचायक के बीच अभिक्रिया सम्पन्न की जाती है, तब अपंचायक के आधिक्य में निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक तथा ऑक्सीकारक के आधिक्य में उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक बनता है। इस वक्तव्य का औचित्य तीन उदाहरण देकर दीजिए।
उत्तर
दिये गये वक्तव्य का औचित्य निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-20
अभिक्रिया (i) में अपचायक (reducing agent) कार्बन अधिकता में है, जबकि अभिक्रिया (ii) में ऑक्सीकारक (oxidising agent) O2 अधिकता में है। अभिक्रिया (i) में CO (कार्बन की O.S.= +2) तथा अभिक्रिया (ii) में CO2 (कार्बन की O.S. = +4) का निर्माण होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-21

प्रश्न 12.
इन प्रेक्षणों की अनुकूलता को कैसे समझाएँगे?
(क) यद्यपि क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट तथा अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट दोनों ही
ऑक्सीकारक हैं। फिर भी टॉलूईन से बेन्जोइक अम्ल बनाने के लिए हम ऐल्कोहॉलिक पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग ऑक्सीकारक के रूप में क्यों करते हैं? इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित अपचयोपचय समीकरण दीजिए।
(ख) क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल डालने पर हमें तीक्ष्ण गन्ध वाली HCI गैस प्राप्त होती है, परन्तु यदि मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थित हो तो हमें ब्रोमीन की लाल वाष्प प्राप्त होती है, क्यों?
उत्तर
(क) यदि टॉलूईन का ऑक्सीकरण क्षारीय अथवा अम्लीय KMnO4 द्वारा किया जाये तो ऑक्सीकरण को नियन्त्रित करना कठिन होगा। इसमें मुख्य उत्पाद बेंजोइक ऐसिड (benzoic acid) के साथ-साथ सह अभिक्रियाओं (side reactions) द्वारा दूसरे उत्पाद भी प्राप्त होंगे। इसलिए टॉलूईन के ऑक्सीकरण के लिये क्षारीय अथवा अम्लीय KMnO4 के स्थान पर ऐल्कोहॉलिक KMnO4 को वरीयता दी जाती है। अपचयोपचय (redox reaction) अभिक्रिया नीचे दी गई है–
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-23
(ख) जब सान्द्र H2SO4 को क्लोराइडयुक्त एक अकार्बनिक मिश्रण में मिलाया जाता है, तो कम वाष्पशील अम्ल H2SO4 अधिक वाष्पशील अम्ल HCl को विस्थापित करता है और HCl गैस की तीक्ष्ण गन्ध आती है।

2NaCl (5) + H2SO4 (l) → 2NaHSO4 (s) + 2HCl(g)

HCl एक दुर्बल अपचायक है। यह H2SO4 को SO2 में अपचयित करने में असमर्थ है। जब मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थित होता है तो अधिक उड़नशील अम्ल HBr विस्थापित होता है। HBr एक अधिक प्रबल अपचायक है और H2SO4 को SO2 में अपचयित कर देता है। यह स्वयं ऑक्सीकृत होकर ब्रोमीन देता है जो लाल वाष्प के रूप में प्राप्त होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-24

प्रश्न 13.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में ऑक्सीकृत, अपचयित, ऑक्सीकारक तथा अपचायक पदार्थ पहचानिए-
(क) 2AgBr(s) + C6H6O2(aq) → 2Ag(s) + 2HBr (aq) + C6H4O2(aq)
(ख) HCHO(7) +2[Ag(NH3)2]+ (aq) + 3OH (aq) → 2Ag(s)+ HCOO7 (aq) +4NH3(aq) +2H2O(7)
(ग) HCHO(1) + 2Cu2+(aq) + 5OH (aq) → Cu2O(s)+ HCOO (aq) +3H2O(l)
(घ) N2H4(l) + 2H2O(l) → N2(g)+ 4H2O(l)
(ङ) Pb(s) + PbO2(s)+ 2HSO4 (aq) → 2PbSO4(s) + 2H2O(l)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-25

प्रश्न 14.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में एक ही अपचायक थायोसल्फेट, आयोडीन तथा ब्रोमीन से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया क्यों करता है?
2S2O2-3 (aq) + I2(s) → S4O2-6(aq) + 2I (aq)
S2O2-3 (aq) + 2Br2(l) + 5H2O(l) → 2SO2-4 (aq) + 4Br(aq) + 10H+ (aq)
उत्तर
प्रस्तुत स्पीशीज (species) में S की ऑक्सीकरण संख्या निम्न है-

S2O2-3 = +2, S4O2-6 = 2.5, SO2-4 = +6

ब्रोमीन, आयोडीन से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है। इसलिये यह S2O2-3 (S की 0.S. = +2) को SO2-4 (S की O.S. = +6) में ऑक्सीकृत कर देता है; जिसमें S उच्च-ऑक्सीकरण अवस्था में है। I2 एक दुर्बल ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करता है। यह S2O2-3 को S4O2-6(S की O.S. = 2.5) में . ऑक्सीकृत करता है, जिसमें S की ऑक्सीकरण-अवस्था कम है। यही कारण है कि S2O2-3, Br2 से I2 से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया करता है।

प्रश्न 15.
अभिक्रिया देते हुए सिद्ध कीजिए कि हैलोजनों में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक तथा हाइड्रोहैलिक यौगिकों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है।
उत्तर
हैलोजनों की ऑक्सीकारक क्षमता का घटता हुआ क्रम निम्न है-F2 > Cl2, > Br2 > I2। F2 एक प्रबल ऑक्सीकारक है तथा यह Cl, Br तथा I आयनों का ऑक्सीकर कर देती है। Cl2 केवल Br तथा I आयनों को और Br2 केवल I आयनों को ही ऑक्सीकृत कर पाती है। I2 इनमें से किसी को भी ऑक्सीकृत करने में असमर्थ है। अभिक्रियायें नीचे दी गई हैं-
F2 की ऑक्सीकारक अभिक्रियाएँ-

F2(g) + 2Cl(aq) -→ 2F (aq) + Cl2 (g)
F2 (g)+2Br(aq) 2F(aq) + Br2 (1)
F2(g) + 2I(aq) → 2F(aq) + I(s)

Cl2 की ऑक्सीकारक अभिक्रियाएँ-

Cl2(g)+ 2Br(aq) -→ 2Cl(aq) + Br (1)
Cl2(g) + 2I(aq) → 2C(aq) + I2(l),

I2 की ऑक्सीकारक अभिक्रियाएँ-

Br2(l) + 2I(aq) → 2Br(aq) + I2(s)

इस प्रकार F2 सबसे अच्छा ऑक्सीकारक है। हाइड्रोलिक अम्लों की अपचायक क्षमता का घटता हुआ क्रम निम्न प्रकार है-

HI> HBr> HCl> HF

HI और HBr सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) को SO2 में अपचयित कर देते हैं, जबकि HCl व HF ऐसा नहीं कर पाते।

2HBr + H2SO4 → SO2+ 2H2O+ Br2
2HI + H2SO4 → SO2 + 2H2O + I2

HCI, MnO2 को Mn2+ में अपचयित कर देता है परन्तु HF ऐसा करने में असमर्थ है। यह दर्शाता है। कि HCl की ऑक्सीकृत क्षमता HBr से अधिक है।

MnO2 +4HCl → MnCl2 + Cl2 + 2H2O
MnO2 + 4HF → कोई अभिक्रिया नहीं

अतः हाइड्रोलिक अम्लों में HI प्रबलतम अपचायक है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित अभिक्रिया क्यों होती है?
XeO4-6(aq) + 2F(aq) + 6H+(aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(I)
यौगिक Na4XeO6 (जिसका एक भाग XeO4-6 है) के बारे में आप इस अभिक्रिया में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-26
इस अभिक्रिया में XeO6 को XeO3 में अपचयन तथा F का F2 में ऑक्सीकरण हो रहा है। यह अभिक्रिया इसलिये सम्पन्न होती है क्योंकि XeO6, F2 से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है। चूंकि XeO4-6 F2 की तुलना में अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है, अत: Na4XeO6 एक प्रबल ऑक्सीकारक होगा।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में-
(क) H3PO2(aq) + 4AgNO3(aq) + 2H2O(l) → H2PO4(aq) + 4Ag(s) +4HNO3(aq)
(ख) H3PO2(aq) + 2CuSO4 (aq) + 2H2O(I)→ H3PO4 (aq) + 2Cu(s) +2H2SO4 (aq)
(ग) C2H5CHO(l) + 2[Ag(NH3)2]+(aq) + 3OH (aq) → C6H5COO (aq) +2Ag(s) +4NH3(aq) +2H2O(l)
(घ) C6H5CHO(l) +2Cu2+ (aq) + 5OH (aq) कोई परिवर्तन नहीं।
इन अभिक्रियाओं से A+ तथा Cu2+ के व्यवहार के विषय में निष्कर्ष निकालिए।
उत्तर
ये अभिक्रिया दर्शाती है कि Ag+,Cu2+ से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है। यह निम्न तथ्यों से स्पष्ट है-

  1. अभिक्रिया (क) और (ख) दर्शाती है कि Ag2व Cu2+ दोनों आयने H3PO2 को H3PO4 में ऑक्सीकृत कर सकते हैं। अत: दोनों ऑक्सीकारक हैं।।
  2. अभिक्रिया (ग) दर्शाती है कि [Ag(NH3)2]+ आयन C6H5CHO को C6H2COOH में ऑक्सीकृत कर सकता है, परन्तु अभिक्रिया (घ) के अनुसार Cu2+ आयन ऐसा करने में असमर्थ है।
    अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि Ag+व Cu2+ दोनों ऑक्सीकारक अभिकर्मक हैं, परन्तु Ag+,Cu2+ से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है।

प्रश्न 18.
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रियाओं को सन्तुलित कीजिए-
(क) MnO4(aq) +I(aq) → MnO2(s) +I2(s)
(क्षारीय माध्यम)
(ख) MnO4(aq) + SO2(8) → Mn2+ (aq) + HSO4(aq) (अम्लीय माध्यम)
(ग) H2O2(aq) +Fe2+ (aq) → Fe3+ (aq) +H2O(l) (अम्लीय माध्यम)
(घ) Cr2O2-7 +SO2(g) → Cr3+ (aq) + SO2-4(aq) (अम्लीय माध्यम)
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-31
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-32

प्रश्न 19.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरणों को आयन-इलेक्ट्रॉन तथा ऑक्सीकरण संख्या विधि (क्षारीय माध्यम में) द्वारा सन्तुलित कीजिए तथा इनमें ऑक्सीकारक और
अपचायकों की पहचान कीजिए-
(क) P4(s) + OH (aq) → PH3(g) + HPO27 (aq)
(ख) N2H4(l) + ClO3(aq) → NO(g) + Cl(g)
(ग) Cl2O7(g) + H2O2(aq) → ClO2 (aq) + O2(g) + H+(aq)
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-34
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-35
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-36
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-37
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-38
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-39
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-40
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-41

प्रश्न 20.
निम्नलिखित अभिक्रिया से आप कौन-सी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं-
(CN)2(g) + 2OH (aq) → CN (aq) + CNO (aq) + H2O(l)
उत्तर
यह एक असमानुपातन (disproportionation) अभिक्रिया है। इसमें (CN)2 एक ही समय में CN में अपचयित और CNO में ऑक्सीकृत होता है। यह अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है।

प्रश्न 21.
Mn3+ आयन विलयन में अस्थायी होता है तथा असमानुपातन द्वारा Mn2+, MnO2 और H+ आयन देता है। इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित आयनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-43
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-44

प्रश्न 22.
Cs, Ne, I तथा F में ऐसे तत्व की पहचान कीजिए, जो
(क) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
उत्तर
(क) F : यह सर्वाधिक वैद्युत ऋणात्मक तत्त्व है और सदैव -1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) Cs : यह एक क्षार धातु है जो अत्यधिक वैद्युत धनात्मक है। यह सदैव +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) I: यह एक हैलोजन है। इसके संयोजक कोश में सात इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं। इसलिये यह -1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। 4-कोश (orbitals) की उपस्थिति के कारण यह +1, +3, +5, और +7 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी प्रदर्शित करता है।
(घ) Ne: यह एक उत्कृष्ट गैस (noble gas) है तथा किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग नहीं लेती है। इसलिए, यह न तो धनात्मक ऑक्सीकरण-अवस्था में पाई जाती है और न ही ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था में।

प्रश्न 23.
जल के शुद्धिकरण में क्लोरीन को प्रयोग में लाया जाता है। क्लोरीन की अधिकता हानिकारक होती है। सल्फर डाइऑक्साइड से अभिक्रिया करके इस अधिकता को दूर किया जाता है। जल में होने वाले इस अपचयोपचय परिवर्तन के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर
क्लोरीन तथा सल्फर डाइऑक्साइड की अभिक्रिया निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त की जा सकती है

Cl2 + SO2 → Cl + SO2-4

इस अपचयोपचय अभिक्रिया को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से निम्नांकित पदों में सन्तुलित करते हैं-
पद 1. पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं-

Cl2 + SO2 → Cl+ SO2-4

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-

  1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया : SO2 → SO2-4
  2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया : Cl2 → Cl

पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 0 परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं-

SO2 + 2H2O → SO2-4 +4H+

पद 4. सन्तुलित अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया निम्नवत् होगी ।-

Cl2 → 2Cl

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन इस प्रकार करेंगे-

SO2 + 2H2O → SO2-4 +4H+ +2e
Cl2 +2e → 2Cl

पद 6. उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर-

Cl2 + SO2 + 2H2O → 2Cl + SO2-4 +4H+

अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण परमाणुओं की संख्या एवं आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है।

प्रश्न 24.
आवर्त सारणी की सहायता से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(क) सम्भावित अधातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन की अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
(ख) किन्हीं तीन धातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
उत्तर
(क) P4, Cl2 और S हैं।
(ख) Cu, Ga और In| इनकी असमानुपातन की अभिक्रियाएँ निम्न हैं-

2Cu+ (aq) -→ Cu2+(aq) + Cu (s)
3Ga+ (aq) → Ga3+(aq) + 2Ga(s)
3In+ (aq) → In3+(aq) + 2In (3)

ये धातु तीन ऑक्सीकरण अवस्थाओं में पायी जाती हैं, जो निम्न हैं-

Cu: +2, 0, +1
Ga : +3, 0, +1
In : +3, 0, +1

प्रश्न 25.
नाइट्रिक अम्ल निर्माण की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीकरण से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनती है। 10.0 ग्राम अमोनिया तथा 20.00 ग्राम ऑक्सीजन द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की कितनी अधिकतम मात्रा प्राप्त हो सकती है?
उत्तर
प्रक्रम की रासायनिक समीकरण निम्न है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-45
समीकरण के अनुसार 68 ग्राम NH3 के ऑक्सीकरण के लिए 160 ग्राम O2 की आवश्यकता होती है।
∴ 10 ग्राम NH3 के ऑक्सीकरण के लिए होगी [latex]\frac { 160 }{ 68 } \times 10=23.53g[/latex] O2 की आवश्यकता। प्रक्रम में केवल 20g O2 का प्रयोग किया गया है। अत: O2 सीमान्त अभिकर्मक है।
∵ 160g O2 से प्राप्त होती है, NO= 120g
∴ 20g O2 से प्राप्त होगी, NO=[latex]\frac { 120 }{ 160 } \times 20=15.00g[/latex]

प्रश्न 26.
पाठ्य-पुस्तक की सारणी 8:1 में दिए गए मानक विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या इन अभिकारकों के बीच अभिक्रिया सम्भव है?
(क) Fe3+ तथाI(aq)
(ख) Ag+ तथा Cu(s)
(ग) Fe3+(aq) तथा Br (aq)
(घ) Ag(s) तथा Fe3+(aq)
(ङ) Br2(aq) तथा Fe2+
उत्तर
(क) सम्भव है- 2Fe3+(aq) + 2I (aq) → 2Fe2+ (aq) + I2(s)
(ख) सम्भव है- Cu (s) + 2Ag+ (aq) Cu2+ (aq) + 2Ag (s)
(ग) सम्भव है- Cu (s) + 2Fe3+(aq) → Cu2+ (aq) + 2Fe2+ (aq)
(घ) सम्भव नहीं है।
(ङ) सम्भव है— Br2 (aq) +2Fe2+(aq) 2Br (aq) + 2Fe3+(aq)

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के विद्युत-अपघटन से प्राप्त उत्पादों के नाम बताइए-
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO का जलीय विलयन
(ख) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO का जलीय विलयन
(ग) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H,SO4 का तनु विलयन ।
(घ) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl2 का जलीय विलयन।
उत्तर
(क) कैथोड पर Ag प्राप्त होती है। ऐनोड घुलकर Ag+ आयन देगा।
(ख) कैथोड पर Ag, ऐनोड पर O2
(ग) कैथोड पर H2, ऐनोड पर O2
(घ) कैथोड पर Cu, यदि विलयन सान्द्र है तो ऐनोड पर Cl2 अन्यथा O2

प्रश्न 28.
निम्नलिखित धातुओं को उनके लवणों के विलयन में से विस्थापन की क्षमता के क्रम में लिखिए-
Al, Cu, Fe, Mg तथा Zn
उत्तर
Mg > Al> Zn > Fe>Cu

प्रश्न 29.
नीचे दिए गए मानक इलेक्ट्रोड विभवों के आधार पर धातुओं को उनकी बढ़ती अपचायक क्षमता के क्रम में लिखिए-
K+/K= -2.93V, Ag+/Ag= 0.80 V, Hg2+/Hg= 0.79V
Mg2+/Mg = -2.37 V, Cr3+/Cr = -0-74V
उत्तर
Ag < Hg < Cr < Mg < K

प्रश्न 30.
उस गैल्वेनी सेल कों चित्रित कीजिए, जिसमें निम्नलिखित अभिक्रिया होती है
Zn(s) +2Ag+ (aq) → Zn2+ (aq) + 2Ag(s)
अब बताइए कि-
(क) कौन-सा इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है?
(ख) सेल में विद्युत-धारा के वाहक कौन हैं?
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
Zn (s)|Zn2+ (aq) || Ag+ (aq)| Ag (5)
(क) Zn/ Zn2+ इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है।
(ख) बाह्य परिपथ में वैद्युत धारा के वाहक इलेक्ट्रॉन हैं जिनका प्रवाह Zn इलेक्ट्रोड से Ag इलेक्ट्रोड की ओर होता है।
(ग) ऐनोड पर : Zn (s) → Zn2+ (aq) +2e
कैथोड पर : 2Ag+ (aq) + 2e → 2Ag (s)

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
CHC2 में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या है
(i) 0
(ii) + 2
(iii) -2
(iv) +4
उत्तर
(ii) +2

प्रश्न 2.
NaOCl तथा NaClO3 में क्लोरीन की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) + 1, +2
(ii) +1, +5
(iii) -1, +5
(iv) -1,-5
उत्तर
(ii) +1, +5

प्रश्न 3.
OF2 एवं H2O2 में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या है
(i) – 2,- 1
(ii) + 2, – 1
(iii) + 2, + 1
(iv) – 2,+ 1
उत्तर
(ii) +2,-1

प्रश्न 4.
S4O2-6 एवं S2O2-8 में S की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) + 2.5,+ 6
(ii) + 2.5,+7
(iii) – 2.5, + 6
(iv) + 2.5,- 6
उत्तर
(ii) + 2.5,+ 7

प्रश्न 5.
CH2O में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) -2
(ii) +2
(iii) 0
(iv) +4
उत्तर
(iii) 0

प्रश्न 6.
CH2Cl2 में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) +2
(ii) +1
(iii) 0
(iv) +4
उत्तर
(iii) 0

प्रश्न 7.
H2S2O8 में s की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) +4
(ii) +5
(iii) +6
(iv) +7
उत्तर
(iii) +6

प्रश्न 8.
ऑक्सीजन की सर्वाधिक ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित करने वाला यौगिक है
(i) H2O2
(ii) F2O
(iii) Cl2O2-7
(iv) NaOCl
उत्तर
(ii) F2O

प्रश्न 9.
H2SO4, H2SO4 तथा SO2Cl2 में s की ऑक्सीकरण संख्याएँ क्रमशः हैं-
(i) +6, +4, +6
(ii) +6, +6, +4
(iii) +6, -6 +4
(iv) -4, +6, +6
उत्तर
(i) +6, +4, +6

प्रश्न 10.
निम्नलिखित यौगिकों में से किसमें Mn की ऑक्सीकरण संख्या अधिकतम है?-
(i) Mn2O3
(ii) KMnO4
(iii) K2MnO4
(iv) MnO2
उत्तर
(ii) KMnO4

प्रश्न 11.
Mn की ऑक्सीकरण संख्या K2MnO4 तो MSO4 में क्रमशः है-
(i) +7 और 12
(ii) +6 और +2
(iii) + 5 और +2
(iv) +2 और +6
उत्तर
(ii) +6 और +2

प्रश्न 12.
पोटैशियम डाइक्रोमेट में क्रोमियम की ऑपलीकरण संख्या है-
(i) +2
(ii) + 3
(iii) +4
(iv) +6
उत्तर
(iv) + 6

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से किसमें नाइट्रोजन की औसीकरण संख्या भिन्नात्मक है?
(i) N2H4
(ii) Ca3N2
(iii) HN3
(iv) N2F2
उत्तर
(ii) HN3

प्रश्न 14.
एक अभिक्रिया में एक धातु आयन M2+ से दो इलेक्ट्रॉनों के निष्कासित होने के बाद ऑक्सीकरण संख्या हो जाती है-
(i) शून्य
(ii) +2
(iii) +1
(iv) +4
उत्तर
(iv) +4

प्रश्न 15.
क्लोरीन की सर्वाधिक ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित करने वाला यौगिक है–
(i) ClO2
(ii) Cl2O
(iii) Cl2O7
(iv) NaClO3
उत्तर
(iii) Cl2O7

प्रश्न 16.
Sg, S2F2 और H2S में सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या के मान क्रमशः हैं|
(i) + 2, + 1 तथा -2
(ii) -2,-1 तथा + 2
(iii) 0, + 1 तथा + 2
(iv) 0, + 1 तथा – 2
उत्तर
(iv) 0, + 1 तथा – 2

प्रश्न 17.
Cl2 NaOCl तथा ClO3 में Cl की क्रमशः ऑक्सीकरण संख्याओं के मान हैं-
(i) +2, 0, +5
(ii) 0, + 2, +5
(iii) +2, +, +5
(iv) 0, + 1, +5
उत्तर
(iv) 0, +1, +5

प्रश्न 18.
Na2S4O6 की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) + 2
(ii) + 3
(iii) + 15
(iv) + 2.5
उत्तर
(iv) + 2.5

प्रश्न 19.
Ni(CO)4 में Ni की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) 0
(ii) 4
(iii) 8
(iv) 2
उत्तर
(i) 0

प्रश्न 20.
सोडियम नाइट्रोपुसाइड में आयरन (Fe) की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) +3
(ii) +2
(iii) +4
(iv) 0
उत्तर
(ii) +2

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में Mn की न्यूनतम ऑक्सीकरण संख्या वाला यौगिक है-
(i) KMnO4
(ii) MnO2
(iii) KaMnO4
(iv) Mn2O3
उत्तर
(iv) Mn2O3

प्रश्न 22.
O3 तथा H2O2में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या के मान क्रमशः हैं-
(i) 0, -1
(ii) 0, +1
(iii) 0-2
(iv) -2,-1
उत्तर
(i) 0, -1

प्रश्न 23.
निम्न में कौन-सी रेडॉक्स अभिक्रिया है?
(i) AgNO3 + HCl → AgCl + HNO3
(ii) BaO2 + H2SO4 → BaSO4 + H2O2
(iii) SO2 + 2H2S → 2H2O+ 3s
(iv) CaC2O4 +2HCl → CaCl2 + H2C2O4
उत्तर
(iii) SO2 + 2H2S→ 2H2O+ 3s

प्रश्न 24.
निम्नलिखित अभिक्रिया में ऑक्सीकारक है-
2CrO2-2 + 2H+ → Cr2O2-7 + H2O
(i) H+
(ii) CrO2-4
(iii) Cr+3
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(iv) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 25.
निम्न अभिक्रिया में अपचयित होने वाला पदार्थ है–
2CusO4+ 4KI→ Cu2I2 + 2K2SO4+I2
(i) CuSO4
(ii) KI
(iii) Cu2I2
(iv) I2
उत्तर
(i) CuSO4

प्रश्न 26.
हाइड्रोजन द्वारा अपचयित होने वाला ऑक्साइड है
(i) MnO2
(ii) MgO
(iii) CaO
(iv) CoO
उत्तर
(iv) CoO

प्रश्न 27.
4Fe + 3O2 → 4Fe3+ + 6O2- अभिक्रिया में निम्न में कौन-सा कथन सही नहीं है?
(i) रेडॉक्स अभिक्रिया है।
(ii) Fe अपचायक है।
(iii) Fe का अपचयन Fe3+ में हुआ है।
(iv) ऑक्सीजन का अपचयन हुआ है।
उत्तर
(iii) Fe का अपचयन Fe3+ में हुआ है।

प्रश्न 28.
298 K पर अर्द्ध अभिक्रियाओं के मानक अपचयन विभव हैं
(i) zn2+ +2e → Zn (s); – 0.762
(ii) Cr3++ 3e → Cr (3);- 0.740
(iii) 2H+ +2e → H2 (g);- 0.000
(iv) Fe3+ + e → Fe3+(aq); + 0.770
कौन-सा प्रबलतम अपचायक है।
(i) Zn (s)
(ii) Cr (s)
(iii) H2 (g)
(iv) Fe2+ (aq)
उत्तर
(i) Zn (s)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रेडॉक्स अभिक्रिया की व्याख्या एक उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर
परमाणु या आयन जिस अभिक्रिया में इलेक्ट्रॉन त्यागता है, उसे ऑक्सीकरण और जिसमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, उसे अपचयन कहते हैं। ऑक्सीकरण तथा अपचयन क्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं क्योंकि जब कोई परमाणु या आयन एक इलेक्ट्रॉन त्यागेगा तो उसको ग्रहण करने वाला कोई अन्य परमाणु या आयन ही होगा अर्थात् जब किसी अभिक्रिया में एक पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है। तो दूसरे किसी अन्य पदार्थ का अपचयन भी होता है। स्पष्ट है कि ऑक्सीकरण व अपचयन क्रियाएँ साथ-साथ होती हैं। इन ऑक्सीकरण व अपचयन अभिक्रियाओं को सम्मिलित रूप से ऑक्सीकरण-अपचयन अभिक्रिया या रेडॉक्स अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ-
2HgCl2 + SnCl2 → Hg2Cl2 + SnCl4
उपर्युक्त अभिक्रिया में HgCl2 का Hg2Cl2 में अपचयन होता है और HgCl2, SnCl2 को SnCl4 में ऑक्सीकृत कर देता है।

प्रश्न 2.
ऑक्सीकरण संख्या के आधार पर ऑक्सीकारक तथा अपचायक की पहचान किस प्रकार की जाती है? एक उदाहरण से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ऑक्सीकरण संख्या के आधार पर, ऑक्सीकारक वह पदार्थ है जिसकी ऑक्सीकरण संख्या घटती है, जबकि अपचायक पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या बढ़ती है। उदाहरणार्थ-ऑ०सं. प्रति परमणु लिखने पर,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-46
उपर्युक्त अभिक्रिया में SnCl2 में Sn की ऑक्सीकरण संख्या +2 है तथा उत्पाद SnCl4 में +4 है। Sn की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि हो रही है।
∴ SnCl2 अपचायक है जबकि FeCl3 में Fe की ऑक्सीकरण संख्या +3 व FeCl2 में Fe की ऑक्सीकरण संख्या +2 है, अत: FeCl3 ऑक्सीकारक है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अभिक्रिया की दो अर्द्ध अभिक्रियाएँ लिखिए। यह भी उल्लेख कीजिए कि कौन-सी अर्द्ध अभिक्रिया ऑक्सीकरण व कौन-सी अपचयन अभिक्रिया है?
SnCl2 + 2HgCl2 → SnCl4 + Hg2Cl2
उत्तर
प्रश्न में उल्लिखित अभिक्रिया को दो अर्द्ध अभिक्रियाओं में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं-

  1. SnCl2 + Cl2 → SnCl2 (ऑक्सीकरण अभिक्रिया)
  2. 2HgCl2 → Hg2Cl2 + Cl2 ↑ (अपचयन अभिक्रिया)
    इस अभिक्रिया में HgCl2 में Hg की ऑक्सीकरण संख्या +2 है तथा Hg2Cl2 में Hg की ऑक्सीकरण संख्या 0 है। चूंकि ऑक्सीकरण संख्या में कमी हो रही है, अतः Hg2Cl2 ऑक्सीकारक है|

प्रश्न 4.
कारण सहित बताइए कि निम्नलिखित अभिक्रिया में कौन ऑक्सीकारक तथा कौन अपचायक है?
2KI + Cl2 → 2KCI + I2
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-47
चूंकि KI में 1 की ऑक्सीकरण संख्या -1 तथा I2 में 0 है, अर्थात् I की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि हो रही है, अतः KI अपचायक है। इसके विपरीत, Cl2 में CI की ऑक्सीकरण संख्या 0 है तथा KCI में -1 है। चूंकि ऑक्सीकरण संख्या में कमी हो रही है, अतः Cl2 ऑक्सीकारक है।

प्रश्न-5.
ऑक्सीकरण संख्या को उदाहरण सहित समझाइए।
या
ऑक्सीकरण संख्या पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
किसी यौगिक या आयन में तत्त्व के एक परमाणु पर स्थित धन या ऋण आवेशों की संख्या उस तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या कहलाती है, जबकि उस अणु या आयन में उपस्थित अन्य परमाणुओं को उनके सम्भावित आयनों के रूप में पृथक् कर दिया जाता है। यह संख्या धनात्मक व ऋणात्मक दोनों प्रकार की हो सकती है। उदाहरणार्थ-NaCl में Na की ऑक्सीकरण संख्या +1 और Cl की ऑक्सीकरण संख्या -1 है, क्योंकि Na पर इकाई धनावेश तथा Cl पर इकाई ऋणावेश है।

प्रश्न 6.
शून्य, -1 तथा +1 ऑक्सीकरण संख्या से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
एक यौगिक में किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या शून्य (0) से तात्पर्य है कि तत्त्व के परमाणु पर धन या ऋण आवेश नहीं है अर्थात् परमाणु विद्युत उदासीन है। तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या +1 से तात्पर्य यह है कि तत्त्व के परमाणु पर इकाई धन आवेश है, जिसे उदासीन करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की आवश्यकता होती है। तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या -1 से तात्पर्य है कि तत्त्व के ” परमाणु पर इकाई ऋणावेश है, जिसे उदासीन करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन त्यागने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 7.
ब्लू परक्रोमेट में Cr की ऑ०सं० ज्ञात कीजिए।
उत्तर
ब्लू परक्रोमेट की संरचना
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-48
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-49

प्रश्न 8.
सम्बन्धित तत्त्वों की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए
(i) KMnO4 में Mn की
(ii) ClO3में Cl की
(iii) NaOCl में Cr की
(iv) H2S2O6 में S की
(v) Cl2 में Cl की
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-50

प्रश्न 9.
निम्नलिखित यौगिकों में s (सल्फर) की ऑक्सीकरण संख्या बताइए-
(i) Na2S4O6,
(ii) SO2Cl2
उत्तर
(i) Na2S4O6-माना S की ऑक्सीकरण संख्या x है। अत:
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-51
(ii) SO2Cl2-माना S की ऑक्सीकरण संख्या x है। अत:
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-52

प्रश्न 10.
K2FeO4 में Fe तथा NH4 में N की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-53

प्रश्न 11.
I—Cl में ci तथा H—H में H की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए। कारण भी दीजिए।
उत्तर
I—Cl में Cl की ऑक्सीकरण संख्या -1 होगी; क्योंकि Cl की विद्युत ऋणात्मकता I से अधिक है, जबकि H—H में H की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होगी क्योंकि समान परमाणु वाले यौगिक के अणुओं में तत्त्वों के परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होती है।

प्रश्न 12.
S8 अणु में s की संयोजकता तथा ऑक्सीकरण संख्या क्या है?
उत्तर
S8 में S की संयोजकता 2 है, जबकि ऑक्सीकरण संख्या शून्य है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित एवं पूर्ण कीजिए-
SO2+ MnO4+…… → SO2-4 + Mn2+ +…..
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-54

प्रश्न 14.
आयनिक समीकरण Br2 + OH → Br + BrO3 + H2O को सन्तुलित कीजिए तथा ऑक्सीकारक और अपचायक बताइए।
उत्तर
दी गई आयनिक अभिक्रिया समीकरण को अर्द्ध अभिक्रिया समीकरण के रूप में लिखने पर,

Br2 → Br …(i)
Br2 → BrO3 …(ii)

समी० (i) से,
[Br2 +2e → 2Br]x 5
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-55

प्रश्न 15.
(i) Cl2O7 में Cl की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए।
(ii) 2FeCl3 + H2S → 2FeCl2 + 2HCI+S इस अभिक्रिया में ऑक्सीकारक और
अपचायक का नाम लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-56

प्रश्न 16.
निम्न में से किसमें Mn की ऑक्सीकरण संख्या सबसे अधिक है और क्यों?
Mn2O3, MnO2, Mno, K2MnO4
उत्तर
K2MnO4 में Mn की ऑक्सीकरण संख्या सबसे अधिक (+6) है, क्योंकि इसमें ऑक्सीजन परमाणुओं का आपेक्षिक अनुपात बाकी अणुओं से अधिक है।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित कीजिए।
Fe2+ + NO3 + H+ —> Fe2 + …. + H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-57

प्रश्न 18.
विद्युत रासायनिक श्रेणी के आधार पर F, CI, Br तथा I की ऑक्सीकारक क्षमता को समझाइए।
या
कारण देते हुए समझाइए कि हैलोजन ऑक्सीकारक के रूप में क्यों कार्य करते हैं?
उत्तर
हैलोजनों की ऑक्सीकारक क्षमता उनके इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। जिस हैलोजन की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिक होती है वह अधिक प्रबल ऑक्सीकारक होता है। अधिक प्रबल ऑक्सीकारक के रेडॉक्स युग्म का मानक अपचयन विभव अधिक धनात्मक होता है। हैलोजनों (X2) की ऑक्सीकारक क्षमता उनके रेडॉक्स युग्मों (X2/X) के मानक अपचयन विभवों के मान बढ़ने के क्रम में बढ़ती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-58

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक सिद्धान्त के आधार पर ऑक्सीकरण-अपचयन अभिक्रिया को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
ऑक्सीकरण—किसी परमाणु, अणु या आयन के इलेक्ट्रॉनों का पृथक् होना ऑक्सीकरण कहलाता है। इसके फलस्वरूप धनात्मक संयोजकता बढ़ती है तथा ऋणात्मक संयोजकता घटती है जो कि त्यागे गये इलेक्ट्रॉन संख्या के बराबर होती है। चूंकि इस क्रिया में इलेक्ट्रॉन त्यागे जाते हैं अत: इसे इलेक्ट्रॉन वियोजन भी कहते हैं।
उदाहरणार्थ–
(i)
Fe2+ → Fe3+ +e (धनात्मक संयोजकता का बढ़ना)
(ii) 2Cl → Cl2 + 2e (ऋणात्मक संयोजकता का घटना)
अपचयन-किसी परमाणु, अणु या आयन से इलेक्ट्रॉनों का जुड़ना अपचयन कहलाता है। इसके फलस्वरूप धनात्मक संयोजकता घटती है तथा ऋणात्मक संयोजकता बढ़ती है जो कि ग्रहण किये गये इलेक्ट्रॉन संख्या के बराबर होती है। चूंकि इस विभव में इलेक्ट्रॉन ग्रहण किये जाते हैं अतः इसे इलेक्ट्रॉनीकरण भी कहते हैं।
उदाहरणार्थ- (i) Fe3+ + e → Fe2+ (धनात्मक संयोजकता का घटना)
(iii) Cl2 +2e → 2Cl (ऋणात्मक संयोजकता का बढ़ना)

प्रश्न 2.
ऑक्सीकरण संख्या तथा संयोजकता में क्या अन्तर है? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर

  1. किसी तत्त्व की संयोजकता उसके एक परमाणु द्वारा स्थानान्तरित या साझे में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या को कहते हैं, जबकि किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या उसे तत्त्व के किसी यौगिक में उसके एक परमाणु पर उपस्थित आवेश को कहते हैं।
  2. किसी तत्त्व की संयोजकता सदैव पूर्णाक होती है, जबकि किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक भी हो सकती है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित समीकरण को ऑक्सीकरण संख्या के आधार पर सन्तुलित कीजिए। सूत्रों के ऊपर सम्बन्धित तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-59
उत्तर
इस अभिक्रिया में कॉपर और नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या में परिवर्तन हुआ है।
कॉपर की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि = 2 यूनिट प्रति परमाणु Cu
नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या में कमी = 1 यूनिट प्रति अणु HNO3 सन्तुलित समीकरण में ऑक्सीकरण संख्या में हुई कुल वृद्धि और कुल कमी दोनों का बराबर होना
आवश्यक है, अत: समीकरण में HNO3 को 2 से तथा Cu को 1 से गुणा करना आवश्यक है। ऐसा करने पर निम्नलिखित समीकरण प्राप्त होती है
Cu+2HNO3 →Cu(NO3)2 + 2NO2 + H2O
Cu(NO3)2 में एक कॉपर परमाणु से दो नाइट्रेट मूलक संयुक्त हैं, अत: समीकरण को सन्तुलित करने के लिए HNO3 के दो और अणुओं की आवश्यकता पड़ेगी तथा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन परमाणुओं की संख्या सन्तुलित करने के लिए H2O अणु को 2 से गुणा करना आवश्यक है।
Cu+4HNO3 →Cu(NO3)2 + 2NO2 + 2H2O यह समीकरण सन्तुलित है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित अभिक्रिया को ऑक्सीकरण अंक विधि द्वारा पूर्ण एवं संतुलित कीजिए
I2 + HNO3 → NO2 + HIO3
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-60

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अभिक्रिया को सन्तुलित कीजिए-
Zn + HNO3 → Zn(NO3)2 + NO2 + H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-61

प्रश्न 6.
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा अम्लीय माध्यम में निम्न अभिक्रिया की समीकरण सन्तुलित कीजिए
MnO4 + Fe2+ → Fe3+ + Mn2+ + H2O
उत्तर
सर्वप्रथम समीकरण के ऑक्सीकारकों तथा अपचायकों की अर्द्ध-अभिक्रियाएँ पृथक्-पृथक् सन्तुलित की जाती हैं; जैसे-
प्रथम अर्द्ध-अभिक्रिया।

MnO4 → Mn2- (अपचयन)

ऑक्सीजन सन्तुलित करने के लिए 4H2O दाईं तरफ जोड़े जाते हैं। अतः

MnO4 → Mn2+ +4H2O

फिर हाइड्रोजन सन्तुलित करने के लिए 8H+ बाईं तरफ जोड़े जाते हैं। अत:

MnO4 + 8H+ → Mn2+ +4H2O

अब समीकरण में दोनों तरफ आवेश सन्तुलित करने के लिए 5e बाईं तरफ जोड़ने पर निम्नलिखित समीकरण मिलती है-

MnO4 +8H+ +5e → Mn2+ +4H2O …..(i)

दूसरी अर्द्ध-अभिक्रिया

Fe2+ → Fe3+ (ऑक्सीकरण)

आवेश सन्तुलित करने के लिए दाईं तरफ le जोड़ने पर,

Fe2+ → Fe3+ +e …(ii)

अब समीकरण (ii) में 5 की गुणा करके, इसे समीकरण (i) में जोड़ने पर निम्नलिखित समीकरण प्राप्त होती है-

MnO4 + 8H+ + 5Fe2+ +5e → 5Fe3+ + Mn2+ +4H2O+ 5e

इस समीकरण में दोनों तरफ से 5e2 कट जाते हैं। अतः

MnO4 + 8H+ + 5Fe2+ → 5Fe3+ + Mn2+ +4H2O

यही सन्तुलित समीकरण है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रिया की समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से सन्तुलित कीजिए-
K2Cr2O7 + H2SO4 + FeSO4→ Fe2(SO4)3 + Cr2(SO4)3+ K2SO4 + H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-62
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-63

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऑक्सीकरण संख्या को निर्धारित करने के नियम लिखिए।
उत्तर
ऑक्सीकरण संख्या को निर्धारित करने के नियम किसी यौगिक/आयन में किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या का मान जानने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। ये नियम निम्नवत् हैं-

  1. स्वतन्त्र अथवा तात्त्विक अवस्था में उपस्थित किसी तत्त्व के प्रत्येक परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या सदैव शून्य होती है।
    उदाहरणार्थ- He, H2, O2, Cl2, O3, P4, S8, Na, Mg तथा Al में प्रत्येक परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या शून्य है।
  2. किसी तत्त्व के अपररूपों की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होती है। उदाहरणार्थ-C के अपररूप हीरा तथा ग्रेफाइट दोनों की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होती है।
  3. किसी एकपरमाणुक आयन (monoatomic ion) की ऑक्सीकरण संख्या उस पर उपस्थित आवेश के बराबर होती है। उदाहरणार्थ-Na+, Mg2+, Fe3+, Cl2,O2- आयनों की ऑक्सीकरण संख्याएँ क्रमशः 1, 2, 3, -1 तथा -2 हैं।
  4. अधातुओं के साथ यौगिकों में हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या +1 होती है। धात्विक हाइड्राइडों | (जैसे-NaH,MgH2, LiH, CaH2 आदि) में हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या -1 होती है।
  5. अधिकांश यौगिकों में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -2 होती है। परॉक्साइडों (जैसे H2O2, BaO2 आदि) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -1 होती है। सुपर ऑक्साइडों (जैसे-KO2, RbO2 आदि) में प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु के लिए ऑक्सीकरण संख्या -92 निर्धारित की गई है। एक अन्य अपवादस्वरूप ऑक्सीजन डाइफ्लुओराइड (OF2) तथा डाइऑक्सीजन डाइफ्लुओराइड (O2F2) जैसे यौगिकों में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या
    क्रमशः +2 तथा +1 है।
  6. सभी क्षार धातुओं की अनेक यौगिकों में ऑक्सीकरण संख्या +1 होती है तथा सभी क्षारीय मृदा धातुओं की ऑक्सीकरण संख्या +2 होती है। ऐलुमिनियम की उसके यौगिकों में ऑक्सीकरण संख्या सामान्यतः +3 होती है।
  7. सभी यौगिकों में फ्लुओरीन की ऑक्सीकरण संख्या -1 होती है। यौगिकों में क्लोरीन, ब्रोमीन तथा आयोडीन की ऑक्सीकरण संख्या साधारणत: -1 होती है, परन्तु जिन यौगिकों में ये तत्त्व ऑक्सीजन से जुड़े होते हैं उन यौगिकों में इन तत्वों की ऑक्सीकरण संख्या कोई धनात्मक संख्या होती है।
  8. दो अधातु परमाणुओं वाले यौगिकों में अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्त्व के परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या ऋणात्मक होती हैं जबकि कम विद्युत ऋणात्मक तत्त्व के परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या धनात्मक होती है। उदाहरणार्थ-NH2 तथा NI2 में N कम विद्युत ऋणात्मक परमाणु से जुड़ा है इसीलिए इसको -3 ऑक्सीकरण संख्या दी जाती है, परन्तु जब यह NF2 में अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु से जुड़ा होता है, तब इसे +3 ऑक्सीकरण संख्या दी जाती है।
  9. उदासीन यौगिकों में सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का बीजीय योग शून्य होता है। उदाहरणार्थ-CH4 में सभी परमाणुओं का बीजीय योग शून्य है।
  10. जटिल तथा बहुपरमाणुक आयनों में, आयन के सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का बीजीय योग आयन पर उपस्थित आवेश के बराबर होता है।

धात्विक तत्त्वों की ऑक्सीकरण संख्या धनात्मक होती है तथा अधात्विक तत्त्वों की ऑक्सीकरण संख्या धनात्मक या ऋणात्मक होती है। संक्रमण धातु तत्त्व अनेक धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या दर्शाते। हैं। -ब्लॉक के तत्त्वों के लिए उनकी उच्चतम धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या उनकी वर्ग संख्या के बराबर होती है। 2-ब्लॉक के तत्त्वों (उत्कृष्ट गैसों को छोड़कर) के लिए उच्चतम धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या उनकी वर्ग संख्या में से 10 घटाकर प्राप्त की जाती है। यद्यपि p-ब्लॉक के तत्त्वों के लिए उच्चतम ऋणात्मक ऑक्सीकरण संख्या 8 में से संयोजी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या घटाकर प्राप्त की जा सकती है। इसका अर्थ है कि आवर्त सारणी के किसी आवर्त में उच्चतम धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या सामान्यत: बढ़ती है। आवर्त सारणी के तीसरे आवर्त में ऑक्सीकरण संख्या +1 से +7 तक बढ़ती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 7 Introduction to Remote Sensing

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 7 Introduction to Remote Sensing (सुदूर संवेदन का परिचय)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 7 Introduction to Remote Sensing (सुदूर संवेदन का परिचय)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. दिए गए चार विकल्पों में सही उत्तर का चुनाव करें
(i) धरातलीय लक्ष्यों का सुदूर संवेदन विभिन्न साधनों के माध्यम से किया जाता है; जैसे
(क) ABC
(ख) BCA
(ग) CAB
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ख) BCA.

(ii) निम्नलिखित में से कौन-से विद्युत चुम्बकीय विकिरण क्षेत्र का प्रयोग उपग्रह सुदूर संवेदन में नहीं होता है?
(क) सूक्ष्म तरंग क्षेत्र
(ख) अवरक्त क्षेत्र
(ग) एक्स-रे क्षेत्र
(घ) दृश्य क्षेत्र
उत्तर-(ग) एक्स-रे क्षेत्र।

(iii) चाक्षुष व्याख्या तकनीक में निम्न में से किस विधि का प्रयोग नहीं किया जाता है?
(क) धरातलीय लक्ष्यों की स्थानीय व्यवस्था
(ख) प्रतिबिम्ब के रंग परिवर्तन की आवृत्ति
(ग) लक्ष्यों को अन्य लक्ष्यों के सन्दर्भ में
(घ) आंकिक बिम्ब प्रक्रमण
उत्तर-(घ) आंकिक बिम्ब प्रक्रमण।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
(i) सुदूर संवेदन अन्य पारम्परिक विधियों से बेहतर तकनीक क्यों है?
उत्तर–सुदूर संवेदन युक्तियाँ ऊर्जा के वृहत्तर परिसर तथा विकिरण, परावर्तित, उत्सर्जित, अवशोषित तथा पारगत ऊर्जा पर आधारित हैं। इस पद्धति द्वारा निर्मित चित्र वस्तुस्थिति एवं भौगोलिक सामग्री का सटीक प्रदर्शन करते हैं, जबकि परम्परागत विधियाँ अनुमानों, आकलनों तथा गणितीय गणनाओं पर आधारित होती हैं जिसमें वस्तुस्थिति और क्षेत्रीय सामग्री का विशुद्ध प्रदर्शन असम्भव है, इसलिए सुदूर संवेदन को अन्य । पारस्परिक विधियों से अधिक श्रेष्ठ तकनीक माना जाता है।

(ii) आई० आर०एस० व इंसेट क्रम के उपग्रहों में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर-आई०आर०एस० ( भारतीय सुदूर संवेदन) उपग्रह इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर प्रक्षेपित किए गए हैं कि इनका उपयोग भू-संसाधन, सर्वेक्षण और प्रबन्धन तथा दूरसंचार में प्रगति हेतु किया जा सके, जबकि इंसेट क्रम के उपग्रहों के माध्यम से टीवी प्रसारण, दूरसंचार, मौसम विज्ञान, जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान सम्बन्धी सूचनाएँ प्राप्त हो सकें। इन दोनों प्रकार के उपग्रहों में विशेषतागत अन्तर निम्नांकित तालिका के माध्यम से भी देखा जा सकता है।

तालिका 7.1: आई०आर०एस० व इंसेट क्रम के उपग्रहों में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 7 Introduction to Remote Sensing (सुदूर संवेदन का परिचय) img 1
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(iii) पुशबूम क्रमवीक्षक की कार्यप्रणाली का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-पुशबूम क्रमवीक्षक बहुत सारे संसूचकों पर आधारित होता है, जिसमें क्षैतिज अक्ष पर घूर्णन करने वाले दर्पण की जगह एक लेंस लगा रहता है जो उड़ान मार्ग के समानान्तर सम्पूर्ण रेखीय जाल के आधार पर धरातल का संवेदन करता है। अत: इसकी कार्यप्रणाली बहुत सारे संसूचकों पर आधारित है, जिनकी संख्या विभेदन के कार्यक्षेत्र को क्षेत्रीय विभेदन से विभाजित करने से प्राप्त संख्या के समान होती है (चित्र 7.2)।
नोट-अधिक स्पष्टता के लिए बॉक्स 7.1 में दिए गए उदाहरण का अवलोकन करें।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 7 Introduction to Remote Sensing (सुदूर संवेदन का परिचय) img 4

बॉक्स 7.1

उदाहरण के लिए, फ्रांस के सुदूर संवेदन उपग्रह स्पॉट (SPOT) में लगे हुए उच्च विभेदन दृश्य विकिरणमापी संवेदन का कार्यक्षेत्र 60 किमी है तथा उसका क्षेत्रीय विभेदन 20 मीटर है। अगर हम 60 किलोमीटर अथवा 60,000 मीटर को 20 मीटर से विभाजित करें तो हमें 3,000 का आँकड़ा प्राप्त होगा अर्थात् SPOT में लगे HRV-I संवेदक में 3,000 संसूचक लगाए गए हैं। पुशबूम स्कैनर में सभी डिटेक्टर पंक्ति में क्रमबद्ध होते हैं और प्रत्येक डिटेक्टर पृथ्वी के ऊपर अधोबिन्दु दृश्य पर 20 मीटर के आयाम वाली परावर्तित ऊर्जा का संग्रहण करते हैं (चित्र 7.2)।

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें|
(i) विस्क-ब्रूम क्रमवीक्षक की कार्यविधि का चित्र की सहायता से वर्णन करें तथा यह भी बताएँ कि यह पुशबूम क्रमवीक्षक से कैसे भिन्न है?
उत्तर-क्रमवीक्षक (Scanner) सुदूर संवेदन उपग्रहों में संवेदन के रूप में कार्य करने वाले उपकरण हैं। ये क्रमवीक्षण (मशीन से संचालित दर्पण) हैं जो दृश्य क्षेत्र पर दृष्टि दौड़ते ही वस्तुओं को चित्रित कर लेते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं–(i) विस्क-बूम क्रमेवीक्षक (Cross Track Scanner), जिसमें घूमने वाला दर्पण व एकमात्र संसूचक स्पेक्ट्रम लगा होता है। (i) पुशबूम क्रमवीक्षक (Along Track Scanner), जिसमें क्षैतिज अक्ष पर घूर्णन करने वाले दर्पण के स्थान पर लेंस लगा रहता है तथा बहुत सारे संसूचकों द्वारा उड़ान मार्ग के समान्तर सम्पूर्ण रेखीय जाल के आधार पर धरातल का संवेदन करता है।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 7 Introduction to Remote Sensing (सुदूर संवेदन का परिचय) img 5
विस्क-ब्रूम क्रमवीक्षक में एक घूमने वाला दर्पण व एकमात्र संसूचक लगा होता है। इसका दर्पण इस प्रकार से विन्यासित होता है कि जब यह एक चक्कर पूरा करता है तो संसूचक स्पेक्ट्रम के दृश्य एवं अवरक्त क्षेत्रों में बहुत सारे सँकेरे स्पेक्ट्रमी बैंडों में प्रतिबिम्ब प्राप्त करते हुए दृश्य क्षेत्र में 90° से 120° के मध्य भाग को कवर करता है। संवेदक का यह पूरा क्षेत्र, जहाँ तक वह पहुँच सकता है, उसे स्कैनर का कुल दृश्य क्षेत्र कहा जाता है। पूरे क्षेत्र के क्रमवीक्षण के लिए संवेदक का प्रकाशयुक्त भाग एक निश्चित आयाम का होता है, जिसे तात्कालिक दृश्य क्षेत्र कहा जाता है। चित्र 7.3 में विस्क-ब्रूम स्कैनर की प्रक्रिया को दर्शाया गया है। अत: यह पुशबूम स्कैनर से इस रूप में भिन्न है कि इसमें क्षैतिज अक्ष पर घूर्णन करने वाले दर्पण पर लगे टेलिस्कोप की सहायता से धरातल के दृश्य संवेदक पर अंकित होते हैं जबकि पुशबूम में यह कार्य लेंस और बहुत सारे संसूचकों द्वारा पूरा होता है।

(ii) चित्र 7.9 (पाठ्य-पुस्तक भूगोल में प्रयोगात्मक कार्य) में हिमालय क्षेत्र की वनस्पति आवरण में बदलाव को पहचानें व सूचीबद्ध करें।
उत्तर-चित्र (पाठ्य-पुस्तक चित्र-7.9, पृष्ठ 105) में भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह द्वारा प्राप्त हिमालय तथा उत्तरी मैदान का है। इसमें बाएँ चित्र में मई एवं दाएँ चित्र में नवम्बर माह की परिवर्तित वनस्पति और अन्य भौगोलिक विशेषताओं को प्रदर्शित किया गया है।

ये प्रतिबिम्ब वनस्पति के प्रकार में अन्तर को दर्शाते हैं। मई के प्रतिबिम्ब में चित्र में दिखाई दे रहे लाल धब्बे शंकुधारी वन दर्शाते हैं। नवम्बर के प्रतिबिम्ब में दिखाई दे रहे अतिरिक्त लाल धब्बे पर्णपाती वने दर्शाते हैं तथा हल्का लाल रंग फसल को दर्शाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. सुदूर संवेदन तकनीकी से आप क्या समझते हैं? इस तकनीकी से आँकड़े प्राप्त करने की प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-सुदूर संवेदन तकनीकी एक सूचना संग्रहण तकनीक है। इसके लिए विद्युत प्रकाशित यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। इसमें सबसे अधिक प्रयोग में आने वाली विधि विद्युत चुम्बकीय विकिरण के संवेदन पर आधारित है जो वस्तुओं से निरन्तर परावर्तित होती है। अत: वस्तुओं को स्पर्श किए बिना दूर से ही उनके विषय में सूचनाएँ एकत्र करने के विज्ञान को सुदूर संवेदन कहते हैं।

सुदूर संवेदन स्तर

चित्र 7.4 में उस प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है जो सुदूर संवेदन आँकड़ों को प्राप्त करने में प्रयुक्त होती है। इस प्रक्रिया के निम्नलिखित स्तर या अवस्थाएँ हैं
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  1. ऊर्जा का स्रोत,
  2. स्रोत से पृथ्वी तक ऊर्जा का स्थानान्तरण,
  3. पृथ्वी के धरातल के साथ ऊर्जा की अन्योन्य क्रिया,
  4. परावर्तित/उत्सर्जित ऊर्जा का वायुमण्डल से प्रवर्धन,
  5. परावर्तित/उत्सर्जित ऊर्जा का संवेदन द्वारा अभिसूचन,
  6. प्राप्त ऊर्जा का फोटोग्राफी/अंकीय आँकड़ों के रूप में अभिसरण,
  7. आँकड़ा उत्पाद से विषयानुरूप सूचना को निकालना,
  8. मानचित्र एवं सारणी के रूप में आँकड़ों एवं सूचनाओं का अभिसारण।

सुदूर संवेदन तकनीकी में ऊर्जा का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत सूर्य है। सूर्य से ऊर्जा तरंगो के रूप में विस्तारित होकर प्रकाशगति (3,00,000 किमी/सेकण्ड की दर से) पृथ्वी के धरातल तक पहुंचती है। इसी ऊर्जा संचरण को विद्युत चुम्बकीय विकिरण कहा जाता है। सुदूर संवेदन में दृश्य ऊर्जा क्षेत्र, अवरक्त क्षेत्र व सूक्ष्म तरंग क्षेत्र सबसे अधिक उपयोगी है।

संचारित ऊर्जा भूतल पर उपस्थित वस्तुओं के साथ अन्योन्य क्रिया करती है। इससे वस्तुओ द्वारा ऊर्जा का अवशोषण, प्रेषण, परावर्तन व उत्सर्जन होता है। अन्ततः तैयार ऊर्जा पृथ्वी के तत्वों को प्रभावित करती है। इससे ऊर्जा का शोषण, स्थानान्तरण और परावर्तन होता है।

सुदूर संवेदन तकनीकी में प्रयुक्त संवेदक ऊर्जा का अभिलेख (रिकॉर्ड) रखते हैं और विकिरण विद्युतीकरण से डिजिटल इमेज में परावर्तित करते हैं। पृथ्वी पर डाडा इमेज प्राप्त हो जाने के बाद गलतियों का सुधार किया जाता है तथा सूचनाओं को इकाई में परिवर्तित कर मानचित्र प्राप्त किए जाते हैं।
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प्रश्न 2. संवेदक क्या है? संवेदन विभेदन के प्रकार बताइए।
उत्तर-संवेदक संवेदक वह उपकरण/युक्ति है जो विद्युत-चुम्बकीय विकिरण ऊर्जा को एकत्रित करते हैं, उन्हें संकेतकों में बदलते हैं तथा उपयुक्त आकारों में प्रस्तुत करते हैं। आँकड़ा उत्पाद के आधार पर संवेदक दो प्रकारे के होते हैं

  • फोटोग्राफी संवेदक (कैमरा) तथा
  • आंकिक संवेदक (स्कैनर)।

फोटोग्राफी संवेदक (कैमरा) किसी भी लक्ष्य बिन्दुओं को एक क्षण में अभिलेखित कर लेता है, जबकि आंकिक संवेदक लक्ष्य के प्रतिबिम्ब को पंक्ति-दर-पंक्ति अभिलेखित करता है। सुदूर संवेदन उपग्रहों में आंकिक संवेदक का ही प्रयोग अधिक किया जाता है।

संवेदन विभेदन

सुदूर संवेदक धरातलीय (Spatial), वर्णक्रमीय (Spectral) तथा विकिरणमितीय विभेदनयुक्त होते हैं, जो विभिन्न धरातलीय अवस्थाओं से सम्बन्धित उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं

1. धरातलीय विभेदन-धरातलीय विभेदन भू-पृष्ठ पर दो साथ-साथ स्थित परन्तु भिन्न वस्तुओं को पहचानने की संवेदक क्षमता से सम्बन्धित है। यह एक नियम है कि धरातलीय विभेदन बढ़ने के साथ भू-पृष्ठ की छोटी-से-छोटी चीज को पहचानना व स्पष्ट रूप से देखा जाना सम्भव हो सकता है। हमारी आँखों पर लगने वाला चश्मा इसी कार्य को करता है तभी हम चश्मे के प्रयोग से पुस्तक में लिखे अक्षरों को स्पष्ट रूप से पढ़ते हैं।

2. वर्णक्रमीय स्पेक्ट्रम विभेदन-यह विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के विभिन्न ऊर्जा क्षेत्रों (बैंड) में संवेदक के अभिलेखन की क्षमता से सम्बन्धित है। जिस प्रकार तरंगों के प्रकीर्णने से इन्द्रधनुष बनता है या हम प्रयोगशाला में प्रिज्म का प्रयोग करते हैं, उसी सिद्धान्त के विस्तृत प्रयोग से हम इन मल्टीस्पेक्ट्रल प्रतिबिम्बों को प्राप्त करते हैं।

3. रेडियोमीटिक विभेदन-विकिरणमितीय या रेडियोमीट्रिक विभेदन संवेदक की दो भिन्न लक्ष्यों की भिन्नता को पहचानने सम्बन्धित है। जितना रेडियोमीट्रिक विभेदन अधिक होगा, विकिरण अन्तर उतना ही कम होगा। इससे दो लक्ष्य क्षेत्रों के मध्य अन्तर को जाना जा सकता है।

प्रश्न 3. अंकीय प्रतिबिम्ब से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-अंकीय प्रतिबिम्ब अलग-अलग पिक्चर तत्त्वों के मेल से बनते हैं। इन्हें पिक्सल (Pixels) कहा जाता है। इमेज में हर पिक्सल का एक अंकीय मान होता है जो धरातल के द्विविमीय-बिम्ब को इंगित करता है। अंकीय मान को अंकीय नम्बर (DN) कहा जाता है। एक डिजिटल नम्बर एक पिक्सल के विकिरण माने का औसत होता है। यह मान संवेदक द्वारा विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा पर आधारित है। इसकी गहनता का स्तर इसके प्रसार (Range) को व्यक्त करता है (चित्र 7.6)।
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प्रश्न 4. प्रतिबिम्ब (Image) में प्रदर्शित तथ्यों की पहचान किस प्रकार की जाती है? समझाइए।
उत्तर-सामान्यत: प्रतिबिम्ब में प्रदर्शित तथ्यों की पहचान और उनका विभेदन दो विधियों पर आधारित है

  • कम्प्यूटर-आधारित सॉफ्टवेयर द्वारा DN मूल्य (0-255)।
  • प्रतिबिम्ब और उससे सम्बन्धित मानचित्र में तुलना करके।

प्रतिबिम्ब और उससे सम्बन्धित मानचित्र में अंकित तत्त्वों के वितरण और स्थिति निर्धारण की प्रक्रिया तुलनात्मक अध्ययन द्वारा पूरी की जाती है। केवल प्रतिबिम्ब को देखकर विभिन्न प्राकृतिक तथा मालवीय तथ्यों की पहचान निम्न प्रकार की जा सकती है
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मौखिक परीक्षा के लिए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. उपग्रह चित्रों की व्याख्या के प्रमुख तत्त्वों के नाम लिखिए।
उत्तर-उपग्रह चित्रों की व्याख्या के तत्त्व हैं-आकार, आकृति, छाया, आभा, रंग, बनावट, प्रतिरूप, सम्बन्धित तत्त्व।

प्रश्न 2. इमेजरी क्या है?
उत्तर-सुदूर संवेदन तकनीकी से प्राप्त प्रतिबिम्ब।

प्रश्न 3. भारत के दो उपग्रह जो सुदूर संवेदन से सम्बन्धित हों, के नाम बताओ।
उत्तर-(i) IRS-1A-1988 (ii) IRS-1B-1991.

प्रश्न 4. भारत में कितने राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक स्तर के सूचना संवेदन केन्द्र हैं?
उत्तर-भारत में राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक स्तर के 350 सूचना संवेदन केन्द्र हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 6 Introduction to Aerial Photographs

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 6 Introduction to Aerial Photographs (वायव फोटो का परिचय)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए प्रश्नों के चार विकल्पों में से सही विकल्प को चुनें
(i) निम्नलिखित में से किन वायव फोटो में क्षितिज तल प्रतीत होता है ?
(क) ऊध्र्वाधर
(ख) लगभग ऊध्र्वाधर
(ग) अल्प तिर्यक
(घ) अति तिर्यक
उत्तर-(घ) अति तिर्यक।।

(ii) निम्नलिखित में से किस वायव फोटो में अधोबिन्दु एवं प्रधान बिन्दु एक-दूसरे से मिल जाते
(क) ऊर्ध्वाधर
(ख) लगभग ऊर्ध्वाधर
(ग) अल्प तिर्यक
(घ) अति तिर्यक
उत्तर-(क) ऊर्ध्वाधर।

(iii) वायव फोटो निम्नलिखित प्रक्षेपों में से किसका एक प्रकार है ?
(क) समान्तर
(ख) लम्बकोणीय ।
(ग) केन्द्रक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ग) केन्द्रक।।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. वायव फोटो किस प्रकार खींचे जाते हैं ?
उत्तर-वायव फोटो वायुयान या हैलीकॉप्टर में लगे परिशुद्ध कैमरे के द्वारा लिए जाते हैं। इस तरह से प्राप्त किए गए फोटोग्राफ स्थलाकृतिक मानचित्रों को बनाने तथा लक्ष्यों की व्याख्या करने के लिए उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 2. भारत में वायव फोटो का संक्षिप्त में वर्णन करें।
उत्तर-भारत में वायव फोटो का इतिहास पुराना नहीं है। यहाँ सर्वप्रथम 1920 में बड़े पैमाने पर आगरा शहर का वायव फोटो लिया गया था। उसके बाद भारतीय सर्वेक्षण विभाग के वायु सर्वेक्षण द्वारा इरावदी डेल्टा के वनों का वायु सर्वेक्षण किया गया जो 1923.24 में पूरा हुआ था। इसके बाद इस प्रकार के अनेक सर्वेक्षण किए गए। इनका उपयोग उन्नत मानचित्र बनाने में किया गया। वर्तमान में पूरे देश का वाथव फोटो सर्वेक्षण ‘वायव फोटो वायु सर्वेक्षण निदेशालय, नई दिल्ली की देख-रेख में किया जाता है। भारत में तीन उड्डयन एजेन्सियाँ वायु फोटोग्राफ लेने के लिए अधिकृत हैं

  1. भारतीय वायुसेना,
  2. वायु सर्वेक्षण कम्पनी (कोलकाता) तथा
  3. राष्ट्रीय सुदूर संवेदी संस्था (हैदराबाद)।

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें
(क) वायव फोटो के महत्त्वपूर्ण उपयोग कौन-कौन से हैं?
उत्तर-वायव फोटो के महत्त्वपूर्ण उपयोग
वायव फोटो भौगोलिक अध्ययनों के लिए बहू-उपयोगी हैं। इनका उपयोग स्थलाकृतिक मानचित्रों को बनाने एवं उनमें अद्यतन सूचनाएँ अंकित करने में किया जाता है। वायव फोटो के दो विभिन्न उपयोग स्थलाकृतिक मानचित्रों को बनाने और उनका निर्वचन करने के कारण ही फोटोग्राममिति तथा । फोटो/प्रतिबिम्ब निर्वचन के रूप में दो स्वतन्त्र किन्तु एक-दूसरे से सम्बन्धित विज्ञानों का विकास हुआ है। वायव फोटो के कुछ महत्त्वपूर्ण उपयोग एवं लाभ निम्नलिखित हैं

  1. वायव फोटों से पृथ्वी के विहंगम दृश्य प्राप्त होते हैं जो सतह की आकृतियों को स्थानिक सन्दर्भ में समझने के लिए उपयोगी हैं।
  2. वायव फोटो ऐतिहासिक अभिलेखन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं।
  3. वायव फोटो धरातलीय दृश्यों का त्रिविम स्वरूप प्रदान करते हैं जो भौगोलिक अध्ययन के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
  4. किसी क्षेत्र के भूमि उपयोग सर्वेक्षण को समझने और उस क्षेत्र के नियोजन की रूपरेखा तैयार करने में यह एक विश्वसनीय विधा है।
  5. इसके द्वारा किसी क्षेत्र का समकालिक भौगोलिक अध्ययन करना अत्यन्त सरल है।

(ख) मापनी को निर्धारित करने की विभिन्न विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर- मापनी को निर्धारित करने की विभिन्न विधियाँ वायव फोटो की व्याख्या के लिए क्षेत्रों एवं उनकी लम्बाइयों के विषय में जानकारी आवश्यक होती है, जिसके लिए फोटो की मापनी की जानकारी अवश्य होनी चाहिए। वायव फोटो की मापनी की संकल्पना मानचित्रों की मापनी के समान ही है। वायंव फोटों पर किन्हीं दो स्थानों के बीच की दूरी एवं उनकी वास्तविक धरातल पर दूरी के मध्य अनुपात को मापक कहते हैं। इसे इकाई समतुल्यता के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है; जैसे 1 =1,000 फुट या 12,000 इंच या निरूपक भिन्न 1/12,000. वायव फोटो की मापनी को निर्धारित करने की निम्नलिखित तीन विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं

(1) प्रथम विधि : फोटो एवं धरातलीय दूरी के मध्य सम्बन्ध स्थापित करना
यह विधि तब उपयोगी होती है जब वायव फोटो में कोई अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध है; जैसे—धरातल पर दो पहचानने योग्य बिन्दुओं की दूरी, तो एक ऊर्ध्वाधर फोटो की मापनी सरलता से प्राप्त हो जाती है। यदि वायव फोटो पर मापी गई दूरी (Dp) के साथ धरातल (Dg) की संगत से दूरी ज्ञात हो तो वायव फोटो की मापनी को इन दोनों के अनुपात अर्थात् Dp/Dg में मापा जाएगा।

(2) द्वितीय विधि : फोटो दूरी एवं मानचित्र दूरी में सम्बन्ध स्थापित करना
विधि का उपयोग तब किया जाता है जब जिस क्षेत्र के फोटो में मापनी की गणना करनी है उस क्षेत्र को मानचित्र उपलब्ध हो। दूसरे शब्दों में, मानचित्र एवं वायव फोटो पर पहचाने जाने वाले दो बिन्दुओं के बीच की दूरी हमें वायव फोटो (Sp) की मापनी की गणना करने में सहायता प्रदान करती है। इन दोनों दूरियों के बीच के सम्बन्ध को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है
(फोटो मापनी : मानचित्र मापनी) (फोटो दूरी : मानचित्र दूरी)
अतएव
फोटो मापनी (Sp) = फोटो दूरी (Dp) : मानचित्र दूरी (Dm) x मानचित्र मापनी कारक (mst)

(3) तृतीय विधि : फोकस दूरी (f) एवं वायुयान की उड़ान ऊँचाई (H) के बीच सम्बन्ध स्थापित करना
चित्र 6.1 के अनुसार ऊर्ध्वाधर फोटो में कैमरे की फोकस दूरी (f) तथा वायुयान की उड़ान (H) को सीमान्त जानकारी के रूप में लिया जाता है।
फोटो मापनी सूत्र को ज्ञात करने के लिए चित्र 6.1 का उपयोग निम्न प्रकार से किया जा सकता है
फोकस दूरी (f) : उड़ान ऊँचाई (H) = फोटो दूरी (Dp) : धरातलीय दूरी (Dg)
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 6 Introduction to Aerial Photographs (वायव फोटो का परिचय) img 1

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. एक वायव फोटो में दो बिन्दुओं के बीच की दूरी को 2 सेमी मापा जाता है। उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच धरातल पर वास्तविक दूरी 1 किमी है तो वायव फोटो (Sp) की मापनी की गणना करें। . (पा०पु०पृ०सं० 92)
हल-Sp = Dp : Dg
(Sp = वायवे फोटो, Dp = फोटो में दो बिन्दुओं के बीच की दूरी, Dg = उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच धरातल पर वास्तविक दूरी)
Sp = Dp : Dg
= 2 सेमी : 1 किमी ।
= 2 सेमी : 1 x 1,00,000 सेमी (क्योंकि 1 किमी = 1,00,000 सेमी):
= 1: 1,00,000/2
= 50,000 सेमी
= 1 इकाई 50,000 इकाई को प्रदर्शित करती है।
इसलिए Sp = 1: 50,000

प्रश्न 2. एक मानचित्र पर दो बिन्दुओं के बीच की दूरी का माप 2 सेमी है। वायव फोटो पर संगत दूरी 10 सेमी है। फोटोग्राफ की मापनी की गणना कीजिए, जबकि मानचित्र की मापनी | 1:50,000 है। (पा०पु०पृ०सं० 93)
हल-Sp = Dp : Dm x msf
(Sp = वायव फोटो, Dp = वायव फोटो की संगत दूरी, Dm = मानचित्र पर दो बिन्दुओं के बीच दूरी, msf = मानचित्र की मापनी) |
Sp = Dp : Dm x msf
= 10 सेमी : 2 सेमी x 50,000
= 10 सेमी : 1,00,000 सेमी
अथवा 1 : 1,00,000/10 = 10,000 सेमी या 1 इकाई = 10,000 इकाई को व्यक्त करती है।
इसलिए Sp = 1 : 10,000

प्रश्न 3. एक वायव फोटो की मापनी की गणना कीजिए, जबकि वायुयान की उड्डयन ‘तुंगता 7,500 मीटर है तथा कैमरे की फोकस दूरी 15 सेमी है। (पा०पू०पृ०सं० 94)
हल-Sp = f : H ।
Sp = 15 सेमी : 7,500 x 100 सेमी
(क्योंकि 1 मीटर = 100 सेमी) |
= [latex s=2]\frac { 1:75,00,000 }{ 15 } [/latex]
= 1 : 50,000
इसलिए Sp = 1 : 50,000

प्रश्न 4. फोटोग्राममिति (Photogrammetry) एवं प्रतिबिम्ब निर्वचन (Image Interpretation) से आप क्या समझते हैं? इनकी उपयोगिता बताइए।
उत्तर-फोटोग्राममिति ।
यह वायव फोटो द्वारा विश्वसनीय मापन का विज्ञान एवं तकनीक है। फोटोग्राममिति के सिद्धान्त ही वायव फोटो की परिशुद्ध लम्बाई, चौड़ाई एवं ऊँचाई की माप प्रदान करते हैं। यह तकनीक स्थलाकृतिक मानचित्रों को तैयार करने और उनको अद्यतन बनाने में उपयोगी होती है।

प्रतिबिम्ब निर्वचन
प्रतिबिम्ब निर्वचन का अर्थ है फोटोग्राममिति द्वारा प्राप्त चित्र का अध्ययन एवं व्याख्या करना। अत: यह वस्तुओं के स्वरूपों को पहचानने तथा उनके सापेक्षिक महत्त्व से सम्बन्धित निर्णय लेने की प्रक्रिया हैं। इसका उपयोग किसी क्षेत्र के वायव फोटो या सुदूर संवेदन चित्र के द्वारा भौगोलिक जानकारी और उनकी व्याख्या करने के लिए किया जाता है। किसी क्षेत्र की स्थलाकृतियों, वनस्पति, भूमि उपयोग, मिट्टी का प्रकार तथा अन्य भौतिक एवं सांस्कृतिक तत्त्वों का सटीक अध्ययन द्वारा संसाधन, प्रबन्धन एवं नियोजन के लिए प्रतिबिम्ब निर्वचन अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 5. वायव फोटो के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-वायव फोटो के प्रकार वायव फोटो का वर्गीकरण कैमरा अक्ष, मापनी, व्याप्त क्षेत्र के कोणीय विस्तार एवं इनके उपयोग और प्रयोग फट तल में लाई गई फिल्म के आधार पर किया जाता है। कैमरे के प्रकाशिक अक्ष तथा मापक के आधार पर वायव फोटो निम्नलिखित प्रकार के होते हैं
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 6 Introduction to Aerial Photographs (वायव फोटो का परिचय) img 2

1. कैमरा अक्ष की स्थिति के आधार पर वायव फोटो के प्रकार ।
कैमॅरी अक्ष की स्थिति के आधार पर वायव फोटो निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं-
(i) ऊर्ध्वाधर फोटोग्राफ – जब फोटो की सतह को धरातलीय सतह के समान्तर रखा जाता है, तब दोनों अक्ष (धरातलीय जल तथा फोटोतल) एक-दूसरे से मिल जाते हैं। इस आवर्त क्षेत्र प्रकार प्राप्त फोटो को ऊर्ध्वाधर वायव फोटो कहते हैं (चित्र 6.2)।

(ii) अल्प तिर्यक फोटोग्राफ-ऊर्ध्वाधर अक्ष से कैमरा अक्ष में 15 से 30° के अभिकल्पित विचलन | के साथ लिए गए वायव फोटो को अल्प तिर्यक फोटोग्राफ कहते हैं (चित्र 6.3)। इस प्रकार के फोटोग्राफ प्रारम्भिक सर्वेक्षण में उपयोगी होते हैं।
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(iii) अति तिर्यक फोटोग्राफ-ऊर्ध्वाधर अक्षं से कैमरे की धुरी को लगभग 60° झुकाने पर एक | तिर्यक फोटोग्राफ प्राप्त होता है। इस प्रकार के फोटोग्राफ भी प्रारम्भिक सर्वेक्षण में प्रयोग किए जाते हैं (चित्र 6.4)।

2. मापनी के आधार पर वायव फोटो के प्रकार
मापक के आधार पर वायव फोटो निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं-
(i) वृहत मापनी फोटोग्राफ-वृहत् मापनी वायव फोटोग्राफ की मापनी 1 : 15,000 तथा इससे अधिक होती है।
(ii) मध्यम मापनी फोटोग्राफ-मध्यम मापक वायव फोटोग्राफ 1 : 15,000 से 1 : 30,000 के मध्य होते हैं।
(iii) लघु मापनी फोटोग्राफ-लघुमापक वायव फोटोग्राफ 1 : 30,000 पर बने होते हैं।

प्रश्न 6. वायव फोटो की ज्यामिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर-धरातल के सापेक्ष किसी वायव फोटोग्राफ की अनुस्थापना को जानने के लिए वायव फोटो की ज्यामिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रत्येक वायव छायाचित्र केन्द्रीय प्रक्षेप पर होता है, क्योंकि विभिन्न धरातलीय लक्ष्यों से नि:सृत किरणें उड़ान रेखा पर स्थित सन्दर्श केन्द्र से होकर गुजरती हैं। केन्द्रीय प्रक्षेप की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर धरतलीय भू-भाग के छाया चित्रण को चित्र 6.5 एवं 6.6 में केन्द्रीय प्रक्षेप के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। चित्र 6.5 में प्रक्षेपित किरणें Aa, Bb एवं Cc एक ही बिन्दु () से गुजरती है जिसे सन्दर्श केन्द्र कहते हैं। एक लेंस के ति को केन्द्रीय प्रक्षेप माना जाता है। ऊध्र्वाधर फोटोग्राफ की ज्यामिति को ।
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स्पष्ट किया गया है। चित्र में ‘S’ कैमरा लेंस का केन्द्र है। धरातलीय सतह से आती हुई किरण पुंज इस बिन्दु पर। अभिसृत हो जाती है तथा वस्तुओं के चित्र बनाने के लिए नेगेटिव (फोटो) की सतह की ओर अपसरित हो जाती है। इस प्रकार सिद्ध होता है कि केन्द्रीय प्रक्षेप में संगत बिन्दुओं को मिलाने वाली सभी सीधी . रेखाएँ, जो वस्तु एवं आकृति के संगत बिन्दुओं को जोड़ती हैं, एक ही बिन्दु से होकर गुजरती हैं।

यदि कैमरा अक्ष से होते हुए नेगेटिव की सतह पर एक लम्ब खींचा जाए तो जिस बिन्दु पर लम्ब मिलता है, उसे प्रधान बिन्दु कहते हैं। जब इस रेखा को बढ़ाकर धरातल पर लाते हैं तो चित्र के अनुसार PG बिन्दु पर मिलेगी, किन्तु नेगेटिव पर मिलने पर यही बिन्दु अधोबिन्दु कहलाता है (देखिए चित्र 6.6)।
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प्रश्न 7.विभिन्न विशेषताओं के आधार पर वायव फोटोग्राफ के प्रकारों की संक्षेप में तुलना कीजिए।
उत्तर-वायव फोटोग्राफ के प्रकारों की तुलना
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प्रश्न 8. मानचित्र एवं वायव फोटो में अन्न्नर बताइए।
उत्तर-मानचित्र एवं वायव फोटो में अन्तर
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मौखिक परीक्षा के लिए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. वायव फोटोग्राफ क्या है?
उत्तर-वायुयान में लगे कैमरे द्वारा लिए गए फोटोग्राफ वायव फोटोग्राफ कहलाते हैं।

प्रश्न 2. प्रथम वायव फोटोग्राफ के विषय में बताइए।
उत्तर-प्रथम वायव फोटो 1858 में फ्रांस में एक गुब्बारे द्वारा लिया गया था। वायव फोटो खींचने के लिए वायुयान का प्रयोग पहली बार 1909 में इटली के एक नगर का फोटो खींचने में किया गया था।

प्रश्न 3. भारत में शैक्षणिक उद्देश्य के लिए वायव फोटोग्राफ की क्या व्यवस्था है?
उत्तर-भारत में शैक्षणिक उद्देश्य के लिए वायव फोटो को APFS पार्टी नं० 73 को भारतीय सर्वेक्षण विभाग के वायु सर्वेक्षण निदेशालय के साथ जोड़कर सुलभता प्रदान की गई है।

प्रश्न 4. नत फोटोग्राफ क्या है?
उत्तर-ऊध्र्वाधर अक्ष से प्रकाशीय अक्ष में 3°से अधिक विचलन वाले फोटोग्राफ को नत फोटोग्राफ कहा जाता है।

प्रश्न 5. क्या वायव फोटो से मानचित्र को अनुरेखित किया जा सकता है?
उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रक्षेप तथा एक मानचित्र के सन्दर्भ एवं एक वायव फोटो के मध्य मूलभूत अन्तर होता है।

प्रश्न 6. ऑर्थोफोटो क्या है?
उत्तर-वायव फोटो से मानचित्र बनाने के पूर्व सन्दर्श दृश्य से समतलमिति दृश्य में परिवर्तन आवश्यक होता है। इस तरह के रूपान्तरित चित्रों को ऑर्थोफोटो कहा जाता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 8 Cell The Unit of Life

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 8 Cell The Unit of Life (कोशिका : जीवन की इकाई)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इनमें से कौन-सा सही नहीं है?
(अ) कोशिका की खोज राबर्ट ब्राउन ने की थी।
(ब) श्लीडेन व श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रतिपादित किया था।
(स) विरचोव के अनुसार कोशिका पूर्व स्थित कोशिका से बनती है।
(द) एककोशिकीय जीव अपने जीवन के कार्य एक कोशिका के भीतर करते हैं।
उत्तर :
(अ) कोशिका की खोज राबर्ट ब्राउन ने की थी।

प्रश्न 2.
नई कोशिका का निर्माण होता है
(अ) जीवाणु-किण्वन से।
(ब) पुरानी कोशिकाओं के पुनरुत्पादन से
(स) पूर्व स्थित कोशिकाओं से
(द) अजैविक पदार्थों से
उत्तर :
(स) पूर्व स्थित कोशिकाओं से।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
निम्न के सही जोड़े बनाइए
(अ) क्रिस्टी   – (i) पीठिका में चपटी कलामय थैली
(ब) कुंडिका  – (ii) सूत्रकणिका में अन्तर्वलन
(स) थाइलेकोइड – (iii) गॉल्जी उपकरण में बिंब आकार की थैली
उत्तर :
(अ) (ii)
(ब) (iii)
(स) (i)

प्रश्न 4.
इनमें से कौन-सा सही है?
(अ) सभी जीव कोशिकाओं में केन्द्रक मिलता है।
(ब) दोनों जन्तु व पादप कोशिकाओं में स्पष्ट कोशिका भित्ति होती है।
(स) प्रोकैरियोटिक की झिल्ली में आवरित अंगक नहीं मिलते हैं।
(द) कोशिका का निर्माण अजैविक पदार्थों से नए सिरे से होता है।
उत्तर :
(स) प्रोकैरियोटिक की झिल्ली में आवरित अंगक नहीं मिलते हैं।

प्रश्न 5.
प्रोकैरियोटिक कोशिका में क्या मीसोसोम होता है? इसके कार्य का वर्णन करो।
उत्तर :
प्रोकैरियोटिक कोशिका में विशिष्ट झिल्ली नामक एक संरचना मिलती (UPBoardSolutions.com) है जो प्लाज्मा झिल्ली में वलनों से बनती है इसे मीसोसोम (mesosome) कहते हैं। इसका मुख्य कार्य श्वसन में सहायता करना है।

प्रश्न 6.
कैसे उदासीन विलेय जीवद्रव्य झिल्ली से होकर गति करते हैं? क्या ध्रुवीय अणु उसी प्रकार से इससे होकर गति करते हैं। यदि नहीं तो इनका जीवद्रव्य झिल्ली से होकर परिवहन कैसे होता है?
उत्तर :
जीवद्रव्य झिल्ली का महत्त्वपूर्ण कार्य “इससे होकर अणुओं का परिवहन है।” यह झिल्ली वरणात्मक पारगम्य (selectively permeable) होती है। उदासीन विलेय अणु सामान्य या निष्क्रिय परिवहन द्वारा उच्च सान्द्रता से कम सान्त्रता की ओर साधारण विसरण द्वारा झिल्ली से आते-जाते रहते हैं। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। ध्रुवीय अणु सामान्य विसरण द्वारा इससे होकर आ-जा नहीं सकते,  इन्हें परिवहन हेतु वाहक प्रोटीन्स की आवश्यकता होती है। इन्हें आयने कैरियर (ion carriers) भी कहते हैं। इनका परिवहन सामान्यतया सक्रिय विसरण द्वारा होता है। इसमें ऊर्जा व्यय होती है। ऊर्जा  ATP से प्राप्त होती है। ऊर्जा व्यय करके आयन या अणुओं का परिवहन निम्न सान्द्रता से उच्च सान्द्रता की ओर भी हो जाता है।

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प्रश्न 7.
दो कोशिकीय अंगकों के नाम बताइए जो द्विककला से घिरे होते हैं। इन दो अंगकों की क्या विशेषताएँ हैं? इनके कार्य लिखिए व रेखांकित चित्र बनाइए।
उत्तर :
माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) तथा लवक (plastid) द्विकला (double membrane) से घिरे कोशिकांग (cell organelles) हैं। माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना माइटोकॉन्ड्रिया को सर्वप्रथम कालीकर (Kallikar, 1880) ने देखा। आल्टमैन (1894) ने इन्हें बायोप्लास्ट कहा। (UPBoardSolutions.com) बेण्डा (1897) ने इन्हें माइटोकॉन्ड्रिया कहा। माइटोकॉन्ड्रिया को  कॉन्ड्रियोसोम भी कहते हैं। यह शलाका, गोल अथवा कणिकारूपी होते हैं। इनकी लम्बाई 40µ तक तथा व्यास 3.5 µ तक होता है। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में इनका अभाव होता है।

परासंरचना (Ultrastructure) :
यह दोहरी पर्त वाली संरचना है। बाह्य पर्त चिकनी तथा अन्दर की पर्त में अंगुलियों के समान अन्तर्वलन मिलते हैं जिन्हें क्रिस्टी (cristae) कहते हैं। दोनों पर्यों के मध्य के स्थान को पेरीमाइटोकॉन्ड्रियल स्थान  कहते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया की गुहा में प्रोटीनयुक्त मैट्रिक्स मिलता है। क्रिस्टी की सतह पर छोटे-छोटे कण मिलते हैं जिन्हें F1 कण अथवा ऑक्सीसोम (oxysomes) कहते हैं। ऑक्सीसोम ऑक्सीकरणीय  फॉस्फेटीकरण (श्वसन) की क्रिया में ATP निर्माण में भाग लेते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया के क्रिस्टी पर इलेक्ट्रॉन अभिगमन होता है जिसके फलस्वरूप ATP बनते हैं। इसके मैट्रिक्स में D.N.A., राइबोसोम, जल,
लवण, क्रेब्स चक्र सम्बन्धी विकर आदि मिलते हैं।
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रासायनिक संघटन (Chemical Composition) :
इनमें 65-70% प्रोटीन, 25% लिपिड, D.N.A., R.N.A. आदि मिलते हैं। अन्दर की कला में श्वसन तन्त्र श्रृंखला सम्बन्धी सभी साइटोक्रोम; जैसे—Cyt b, c, a, a 3, क्वीनोन, NAD, FAD, FMN आदि  मिलते हैं।

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माइटोकॉन्ड्रिया का कार्य
माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रेब्स चक्र तथा ऑक्सीसोम (F1 कण) पर श्वसन’ श्रृंखला का इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र सम्पन्न होता है, इससे मुक्त ऊर्जा ATP में संचित होती है। ATP समस्त जैविक  क्रियाओं के लिए गतिज ऊर्जा प्रदान करता है। माइटोकॉन्ड्रिया को ‘कोशिका का ऊर्जा गृह’ (Power house of the cell) कहते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया में स्वद्विगुणन की क्षमता होती है।

लवक की संरचना

लवक दोहरी झिल्ली से घिरे होते हैं। ये यूकैरियोटिक पादप कोशिकाओं में ही मिलते हैं। ये कवक में नहीं मिलते हैं। हीकेल (1865) ने इसकी खोज की तथा शिम्पर ने इसे प्लास्टिड (Plastid) नाम दिया। लवक तीन प्रकार के होते हैं ल्यूकोप्लास्ट; क्रोमोप्लास्ट तथा क्लोरोप्लास्ट।

1. ल्यूकोप्लास्ट (Leucoplast) :
ये संचयी लवक हैं। वर्णक न होने के कारण ये रंगहीन होते हैं। ये तीन प्रकार के एमाइलोप्लास्ट (UPBoardSolutions.com) (मण्ड संचयी); इलियोप्लास्ट (वसा संचयी) तथा प्रोटीनोप्लास्ट (प्रोटीन संचयी) होते हैं।

2. क्रोमोप्लास्ट (Chromoplast) :
ये रंगीन लवक हैं। सामान्यतः फूलों की पंखुड़ियों, फल, रंगीन पत्तियों आदि में होते हैं। भूरे शैवालों में फियोप्लास्ट, लाल शैवालों में रोडोप्लास्ट तथा प्रकाश संश्लेषी जीवाणुओं में क्रोमैटोफोर आदि मिलते हैं।

3. क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) :
हरितलवक अथवा क्लोरोप्लास्ट की खोज शिम्पर (Schimper, 1864) ने की। इनमें क्लोरोफिल (पर्णहरित) मिलता है। ये लवक पौधे के हरे भागों में सामान्यतः पत्तियों में  (मीसोफिल, खम्भ ऊतक, क्लोरेनकाइमा) मिलते हैं। ये विभिन्न आकार के होते हैं। हरे शैवाल सामान्यतः हरितलवकं के आकार से पहचाने जाते हैं। उच्च पादप में ये गोल, अण्डाकार, चपटे, दीर्घवृत्ताकार  (elliptical) होते हैं। सामान्यतया इनकी लम्बाई 2-5µ तथा चौड़ाई 3-4µ होती है। कोशिका में इनकी संख्या 20-40 तक हो सकती है।
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4. हरितलवक की परासंरचना (Ultrastructure of Chloroplast) :
इनकी संरचना जटिल होती है। यह दो एकक कलाओं की झिल्ली से बना होता है। दोनों कलाओं के मध्य का स्थान पेरीप्लास्टीडियल स्थान कहलाता है। झिल्ली से घिरा रंगहीन मैट्रिक्स स्ट्रोमा  (stroma) होता है। मैट्रिक्स में कलातन्त्र से बना ग्रैना (grana) होता है। ग्रैना में प्लेट जैसी रचना का समूह होता है, जो पटलिकाओं से जुड़ी रहती हैं, इन्हें लैमिली कहते हैं। ग्रेना की इकाई को  थाइलेकॉइड कहते हैं। ये एक-दूसरे के ऊपर स्थित होते हैं। दो ग्रैना को जोड़ने वाली (UPBoardSolutions.com) पटलिका को स्ट्रोमा लैमिली अथवा फ्रेट चैनल कहते हैं। थाइलेकॉइड पर ‘क्वान्टासोम (quantasomes) पाए जाते हैं। प्रत्येक क्वान्टासोम पर लगभग 230 पर्णहरित अणु पाए जाते हैं। क्लोरोप्लास्ट का रासायनिक संघटन

5. (Chemical Composition of Chloroplast) :
प्रत्येक क्लोरोप्लास्ट में 40-50% प्रोटीन, 23-25% फॉस्फोलिपिड; 3-10% पर्णहरित, 5% R.N.A., 0. 02 -0.01% D.N.A., 1-2% कैरोटीन, विभिन्न विकर, विटामिन तथा धातु; जैसे Mg,Fe, Cu, Mn, Zn आदि मिलते हैं।
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6. क्लोरोप्लास्ट के कार्य (Functions of Chloroplast) :
क्लोरोप्लास्ट का मुख्य कार्य प्रकाश संश्लेषण है। ग्रैना में प्रकाश संश्लेषण की प्रकाशीय क्रिया तथा स्ट्रोमा में अप्रकाशीय क्रिया होती है। प्रकाशीय क्रिया में जल के अपघटन से ऊर्जा निकलती है तथा  अप्रकाशीय अभिक्रिया में CO2, का स्वांगीकरण होता है। भोजन बनाने का चित्र-ग्रेना तथा स्ट्रोमा लैमिली की संरचना। दायित्व होने के कारण इसे कोशिका की किचिन अथवा रसोई कहते हैं।

प्रश्न 8.
प्रोकैरियोटिक कोशिका की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर :
प्रोकैरियोटिक कोशिका या असीमकेन्द्रकीय कोशिकाएँ ऐसी कोशिकाएँ, जिनमें सत्य केन्द्रक (केन्द्रक-कला सहित) नहीं पाया जाता तथा केन्द्रक में पाए जाने वाले प्रोटीन एवं न्यूक्लीक अम्ल  (D.N.A. तथा R.N.A.) केन्द्रक-कला के अभाव में कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) के सम्पर्क में रहते हैं, प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ कहलाती हैं। इनमें एक ही घेरेदार क्रोमोसोम होता है,  जिसमें हिस्टोन प्रोटीन नहीं होती। इनमें राइबोसोम्स 70S प्रकार के होते हैं। इन कोशिकाओं में (UPBoardSolutions.com) अनेक कोशिकांग; जैसे–केन्द्रिक, गॉल्जीकाय, माइटोकॉन्ड्रिया, अन्त:प्रद्रव्यी जालिका आदि; नहीं होते हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में सूत्री विभाजन के लिए घटकों का अभाव होता है। रचना की दृष्टि से इस प्रकार की कोशिकाएँ आदिम मानी गई हैं। जीवाणु कोशिका तथा  नीली-हरी शैवालों की कोशिकाएँ प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 9.
बहुकोशिकीय जीवों में श्रम विभाजन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
एककोशिकीय जीवों में समस्त जैविक क्रियाएँ; जैसे—श्वसन, गति (प्रचलन), पोषण, उत्सर्जन, जनन आदि जीव कोशिका द्वारा ही सम्पन्न होती हैं। इनमें इन कार्यों को सम्पन्न करने हेतु सामान्यतया विशिष्ट अंगक नहीं होते। इनमें मान्य कोशिकाविभाजन द्वारा ही जनन प्रक्रिया हो जाती है। कुछ एककोशिकीय जीवों में लैंगिक जनन भी पाया जाता है। सरल बहुकोशिकीय जीवों में;  जैसे–स्पंज में विभिन्न जैविक कार्य अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं द्वारा सम्पन्न होते हैं, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर कोशिका अन्य कार्य भी सम्पन्न कर सकती है। इनमें कार्य विभाजन या श्रम  विभाजन स्थायी नहीं होता। संघ सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata) के सदस्यों में कोशिकाएँ विभिन्न जैविक कार्यों के लिए विशिष्टीकृत हो जाती हैं, वे अन्य कार्य सम्पन्न नहीं करतीं। इसे श्रम विभाजन  कहते हैं। श्रम विभाजन की परिकल्पना सर्वप्रथम हेनरी मिलने (UPBoardSolutions.com) एडवर्ड (H. M. Edward) ने प्रस्तुत की। विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करने के लिए कोशिकाएँ ऊतक तथा ऊतक तन्त्र का निर्माण करती हैं।  समान कार्य करने वाली कोशिकाओं में संरचनात्मक समानता पाई जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि कोशिकाओं में कार्यिकी भिन्नन (physiological differentiation) के अनुरूप संरचनात्मक और  औतिकीय भिन्नन (structural and histological differentiation) पाया जाता है।

प्रश्न 10.
कोशिका जीवन की मूल इकाई है। संक्षिप्त में वर्णन करें।
उत्तर :
कोशिका शरीर निर्माण की इकाई ही नहीं बल्कि जीवन की कार्यिक इकाई भी है। जीव की सभी क्रियाएँ कोशिका में हो रहे कार्यों के समन्वय से होती हैं। नई कोशिका पूर्व स्थित कोशिका से बनती है।  एक कोशिका से पूर्ण जीव का निर्माण सम्भव है। कोशिका की यह क्षमता टोटीपोटेंसी कहलाती है। प्रत्येक कोशिका में अनेको अंगक होते हैं जो कोशिका द्रव्य में रहते हैं। इनमें हो रहे कार्यों से ही  जीव का जीवन चलता है।

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प्रश्न 11.
केन्द्रक छिद्र क्या है? इनके कार्य बताइए।
उत्तर :

केन्द्रक छिद्र

केन्द्रक के चारों ओर 10 nm से 50 nm मोटी दोहरी केन्द्रक-कला (nuclear membrane) होती है। दोनों झिल्लियों (कलाओं) के मध्य स्थान को परिकेन्द्रकीय स्थान (perinuclear space) कहते हैं।  यह लगभग 100-300 Åचौड़ी होती है। केन्द्रक कला पर अनेक सूक्ष्म छिद्र होते हैं। इन्हें केन्द्रक छिद्र (nuclear pores) कहते हैं। प्रत्येक का व्यास लगभग 400-1000 Å होता है। केन्द्रक-कला का सम्बन्ध कोशिकाद्रव्य में स्थित अन्त:प्रद्रयी जालिका (ER) से होता है।

कार्य :
केन्द्रक में निर्मित विभिन्न प्रकार के R.N.A. अणु विशेषकर m-R.N.A. केन्द्रक कला छिद्रों से होकर कोशिकाद्रव्य में पहुँचते हैं और प्रोटीन संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 12.
लयनकाय तथा रसधानी दोनों अन्तः झिल्लीमय संरचनाएँ हैं परन्तु कार्य की दृष्टि से ये अलग होते हैं। इस पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
लयनकाय (lysosome) एकक कला युक्त थैली है जो गॉल्जी काय से बनती है। इसमें हाइड्रोलिटिक विकर होते हैं; जैसे-लाइपेज, ओप्टिएज आदि जो अम्लीय pH में सक्रिय होते हैं। ये विकर कार्बोहाइड्रेट,  प्रोटीन, वसा, न्यूक्लिक अम्ल आदि का पाचन करते हैं। रसधान्ने (vacuole) कोशिकाद्रव्य में उपस्थित थैलीनुमा संरचना है जो एकक कला टोनोप्लास्ट से घिरी रहती है। इसमें जल, उत्सर्जी पदार्थ  जो कोशिका के लिए आवश्यक नहीं हैं तथा कोशिका रस मिलता है। पौधों में ये कोशिका आयतन का 90 प्रतिशत घेर लेती है। पौधों में टोनोप्लास्ट आयन तथा अन्य पदार्थों का सान्द्रता विभव के विरुद्ध  रसधानियों में आना सुनिश्चित रहता है। अतः रसधानी (UPBoardSolutions.com) में सान्द्रता कोशिकाद्रव्य से अधिक रहती है। अमीबा में संकुचनशील रसधानी मिलती है जो उत्सर्जन का कार्य करती है। प्रोटिस्टा के सदस्यों में खाद्य  वेक्युओल मिलते हैं जो खाद्य पदार्थों के निगलने के कारण बनते हैं।

प्रश्न 13.
रेखांकित चित्र की सहायता से निम्नलिखित की संरचना का वर्णन कीजिए
(i) केन्द्रक
(ii) तारककाय।
उत्तर :

(i) केन्द्रक 

सामान्यतः कोशिका का सबसे बड़ा, स्पष्ट तथा महत्त्वपूर्ण कोशिकांग केन्द्रक है। सर्वप्रथम इसकी खोज रॉबर्ट ब्राउन (1831) ने की। यह एक सघन, गोल अथवा अण्डाकार संरचना है। एक कोशिका में इनकी  संख्या सामान्यतः एक (एककेन्द्रकीय; uninucleate) होती है। कभी-कभी इनकी संख्या दो (द्विकेन्द्रकी, binucleate) अथवा अनेक (बहुकेन्द्रकी multinucleate) होती है। पादप कोशिका के  परिपक्वन के साथ-साथ रिक्तिका के केन्द्र में स्थित होने से यह कोशिका दृति (primordial utricle) में एक ओर आ जाता है।

1. संरचना (Structure) :
केन्द्रक के चारों ओर दोहरी केन्द्रक कला  (nuclear membrane) मिलती है। यह कला एकक कला (unit membrane) के समान ही लिपोप्रोटीन की बनी होती है। दोनों कलाओं के मध्य परिकेन्द्रीय स्थान (perinuclear space)  मिलता है। केन्द्रक कला सतत (continuous) नहीं होती है। इसमें बीच-बीच में छिद्र मिलते हैं। इन्हें केन्द्रकीय छिद्र (nuclear pore) कहते हैं। इनका व्यास लगभग 400 होता है। ये  केन्द्रकद्रव्य तथा कोशिकाद्रव्य में सम्बन्ध बनाए रखते हैं। बाह्य केन्द्रक कला का सम्बन्ध अन्तर्द्रव्यी जालिका से होता है। बाहरी केन्द्रक कला पर राइबोसोम चिपके रहते हैं (चित्र)।। केन्द्रक कला के  अन्दर प्रोटीनयुक्त सघन तरल होता है, जिसे केन्द्रकद्रव्य (nucleoplasm) कहते हैं। केन्द्रकद्रव्य में प्रोटीन तथा फॉस्फोरस की मात्रा अधिक होती है। इसमें न्यूक्लियोप्रोटीन (nucleoprotein)  मिलते हैं। केन्द्रकद्रव्य में केन्द्रिक (nucleolus) तथा क्रोमैटिन (chromatin) सूत्र मिलते हैं। केन्द्रिक सामान्यतः एक, परन्तु कभी-कभी अधिक भी हो सकते हैं। केन्द्रिक में r-R.N.A. संश्लेषण होता है,  जो राइबोसोम (UPBoardSolutions.com) के लिए आवश्यक है। केन्द्रिक कोशिका विभाजन के समय लुप्त हो जाते हैं।

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2. क्रोमैटिन सूत्र (Chromatin threads) :
सामान्य अवस्था में जाल के रूप में रहते हैं। इसका कुछ भाग अभिरंजन में गहरा रंग लेता है जिसे हेटरोक्रोमैटिन कहते हैं तथा जो भाग हल्का रंग लेता है, उसे यूक्रोमैटिन (euchromatin) कहते हैं।  कोशिका विभाजन के समय ये संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं।
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केन्द्रक के कार्य
केन्द्रक के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. सम्पूर्ण कोशिका की संरचना, संगठन व कार्यों का नियन्त्रण तथा नियमन करना।
  2. D.N.A. पर उपस्थित संदेश m-R.N.A. के रूप में कोशिकाद्रव्य में जाते हैं और वहाँ प्रोटीन के रूप में अनुवादित होते हैं।
  3.  प्रोटीन से विभिन्न विकर बनते हैं जो विभिन्न उपापचयी क्रियाओं का नियन्त्रण करते हैं।
  4.  कोशिका विभाजन का उत्तरदायित्व केन्द्रक पर होता है।
  5.  आनुवंशिक पदार्थ D.N.A केन्द्रक में मिलता है। संतति में लक्षण इसी के द्वारा पहुँचते हैं।
  6. नई संतति में जीन ही लक्षणों को पहुँचाते हैं तथा संगठित स्वरूप प्रदान करते हैं।

(ii) तारककाय

तारककाय प्रायः जन्तु कोशिकाओं में केन्द्रक के समीप पाया जाता है। कुछ शैवाल तथा कवक आदि की पादप कोशिकाओं में भी तारककाय पाया जाता है। तारककार्य में दो सेन्ट्रिओल (centriole) पाए  जाते हैं। प्रत्येक सेन्ट्रिओल नौ जोड़े (nine sets) त्रिक तन्तुओं (triplets fibres) से बना (UPBoardSolutions.com) होता है। प्रत्येक त्रिक तन्तु में तीन सूक्ष्म नलिकाएँ (microtubules) एक रेखा में स्थित होती हैं।  ये त्रिक तन्तु एमॉरफस पदार्थ में धंसे रहते हैं। सेन्ट्रिओल के चारों ओर स्वच्छ कोशिकाद्रव्य का आवरण होता है, इसे सेन्ट्रोस्फीयर (centrosphere) कहते हैं। सेन्ट्रिओल तथा सेन्ट्रोस्फीयर मिलकर  तारककाय (centrosome) कहलाते हैं।
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तारककाय के कार्य

  1. यह कोशिका विभाजन के समय त (spindle) का निर्माण करता है। तारककाय विभाजित होकर विपरीत ध्रुवों का निर्माण करता है।
  2. शुक्राणुओं के निर्माण के समय दोनों सेन्ट्रियोल में से एक शुक्राणु के अक्षीय तन्तु (axial filament) का निर्माण करता है।

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प्रश्न 14.
गुणसूत्र बिन्दु क्या है? गुणसूत्र बिन्दु की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र का वर्गीकरण किस रूप में होता है? अपने  उत्तर को देने हेतु विभिन्न प्रकार के गुणसूत्रों पर गुणसूत्र बिन्दु की स्थिति को दर्शाने हेतु चित्र बनाइए।
उत्तर :

गुणसूत्र बिन्दु

प्रत्येक गुणसूत्र दो अर्द्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड्स (chromatids) से बना होता है। क्रोमेटिड्स पर क्रोमोमीयर्स (chromomeres) स्थित होते हैं। गुणसूत्र के दोनों क्रोमेटिड्स गुणसूत्र बिन्दु या सेन्ट्रोमीयर  (centromere) द्वारा परस्पर जुड़े होते हैं। गुणसूत्र बिन्दु की स्थिति के आधार (UPBoardSolutions.com) पर गुणसूत्रे निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

1. अन्तकेन्द्री (Telocentric) :
इसमें गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र के एक ओर स्थित होता है।

2. अग्र बिन्दु (Acrocentric) :
इसमें गुणसूत्र का एक भाग बहुत छोटा तथा दूसरा भाग बहुत बड़ा होता है। इसमें गुणसूत्र बिन्दु एक सिरे के पास स्थित होता है।

3. उपमध्य केन्द्री (Submetacentric) :
इसमें गुणसूत्र बिन्दु एक किनारे के पास होता है। इसे गुणसूत्र की दोनों भुजाएँ असमान होती हैं।

4. मध्य केन्द्री (Metacentric) :
इसमें गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र के बीचों-बीच स्थित होता है। इससे गुणसूत्र की दोनों भुजाएँ बराबर लम्बाई की होती हैं।

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जब गुणसूत्र में गुणसूत्र बिन्दु (centromere) नहीं पाया जाता तो गुणसूत्र को एसेन्ट्रिक (acentric) कहते हैं और जब गुणसूत्र बिन्दु की संख्या दो या अधिक होती है तो इसे डाइसेन्ट्रिक  (dicentric) या पॉलीसेन्ट्रिक (polycentric) कहते हैं। कुछ गुणसूत्रों में द्वितीयक संकीर्णन (secondary constriction) पाया जाता है। इस प्रकार के गुणसूत्र को सैट गुणसूत्र  (sat-chromosome) कहते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवन का भौतिक आधार है।
(क) केन्द्रक
(ख) लिंग गुणसूत्र
(ग) जीवद्रव्य
(घ) DNA
उत्तर :
(ग) जीवद्रव्य

प्रश्न 2.
वह कोशिकांग जो रूपान्तरण में मदद करता है, है।
(क) केन्द्रक
(ख) हरितलवक
(ग) राइबोसोम्स
(घ) माइटोकॉण्ड्रिया
उत्तर :
(ग) राइबोसोम्स

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प्रश्न 3.
राइबोसोम की दोनों सब-इकाइयों के जुड़ने में  Mg
++ सान्द्रता की आवश्यकता होती है।
(क) 0.001 M
(ख) 0.0001 M
(ग) 0.01 M
(घ) 0.1 M
उत्तर :
(घ) 0.1 M

प्रश्न 4.
70 S राइबोसोम के कौन-से दो उपभाग है?
(क) 50 S और 20 S
(ख) 50 S और 30 S
(ग) 50 S और 40 S
(घ) 40 S और 30 S
उत्तर :
(ख) 50 S और 30 S

प्रश्न 5.
80 S राइबोसोम के कौन-से दो उपभाग होते हैं?
(क) 40 S और 40 S
(ख) 50 S और 30 S
(ग) 60 S और 40 S
(घ) 70 S और 30 S
उत्तर :
(ग) 60 S और 40 S

प्रश्न 6.
डाइमोर्फिक हरितलवक पत्तियों में पाये जाते हैं ।
(क) मटर में
(ख) सूर्यमुखी में
(ग) साइप्रस में
(घ) चना में
उत्तर :
(ग) साइप्रस में

प्रश्न 7.
यूलोथ्रिक्स में हरितलवक का आकार लेता है।
(क) मेखला के आकार का
(ख) कप के आकार का
(ग) सर्पिलाकार का
(घ) तारा के आकार का
उत्तर :
(क) मेखला के आकार का

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प्रश्न 8.
एण्टीकोडोन्स पाये जाते हैं।
(क) t-RNA में
(ख) r-RNA में
(ग) m-RNA में
(घ) इनमें से सभी में
उत्तर :
(क) t-RNA में

प्रश्न 9.
डी०एन०ए० नहीं होता है।
(क) क्लोरोप्लास्ट में
(ख) माइटोकॉण्ड्रिया में
(ग) न्यूक्लियस में
(घ) परऑक्सीसोम्स में
उत्तर :
(घ) परऑक्सीसोम्स में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर :

  1. एश्केरिशिया कोलाई
  2. आकबैक्टीरिया

प्रश्न 2.
प्रोकैरियोटिक कोशिका के केन्द्रक की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर :
प्रोकैरियोटिक कोशिका में आरम्भी अवास्तविक केन्द्रक होता है जिसे न्यूक्लियाड कहते हैं। (UPBoardSolutions.com) केन्द्रक,कला एवं केन्द्रिका भी अनुपस्थित होती हैं। DNA के धागों के साथ प्रोटीन नहीं जुड़ी होती है।

प्रश्न 3.
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिकाओं के केन्द्रकों में क्या अन्तर होता है?
उत्तर :
प्रोकैरियोटिक कोशिका में विशिष्ट केन्द्रक अनुपस्थित होता है तथा उसके स्थान पर न्यूक्लियाईड या जीनोफोर उपस्थित होता है जबकि यूकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक कला, क्रोमैटिन, केन्द्रक द्रव्य,  केन्द्रक मैट्रिक्स व केन्द्रिक युक्त एक विशिष्ट केन्द्रक होता है।

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प्रश्न 4.
एक यूकैरियोटिक पादप कोशिका में पाये जाने वाले दो अर्द्ध-स्वायत्त कोशिकांगों के नाम बताइए। या सुकेन्द्रकीय कोशिका में पाये जाने वाले दो अर्द्ध-स्वायत्त कोशिकांगों के नाम लिखिए।
उत्तर :
यूकैरियोटिक पादप कोशिका में पाये जाने वाले माइटोकॉण्डिया (mitochondria) तथा लवक (plastids) अर्द्ध-स्वायत्त कोशिकांग (semi-autonomous cell organelles) हैं।

प्रश्न 5.
तृतीयक कोशिकाभित्ति का पता लगाने वाले वैज्ञानिक का नाम लिखिए।
उत्तर :
साइरिल फिग।

प्रश्न 6.
एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम के कार्य बताइए।
उत्तर :

  1.  प्रोटीन संश्लेषण के लिए स्थान प्रदान करना।
  2. ग्लाइकोजन संश्लेषण तथा संचय करना।

प्रश्न 7.
हरितलवक के किस भाग में कार्बन स्वांगीकरण होता है?
उत्तर :
हरितलवक (chloroplast) के स्ट्रोमा (stroma) भाग में।

प्रश्न 8.
पर्णहरित के पाइरोल चक्र से सम्बन्धित तत्त्व का नाम लिखिए।
उत्तर :
Mg (मैग्नीशियम)।

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प्रश्न 9.
पादप कोशिका के उस कोशिकांग का नाम लिखिए जो प्रकाश श्वसन के लिए उत्तरदायी है।
उत्तर :
परऑक्सीसोम (peroxisome)।

प्रश्न 10.
किसी एक पौधे का नाम बताइए जिसमें द्विआकारिक हरितलवक होते हैं।
उत्तर :
मक्का (C4 पौधे) में द्विआकारिक हरितलवक पाये जाते हैं।

प्रश्न 11.
उस कोशिकांग का नाम बताइए जो प्रोटीन-संश्लेषण से सम्बन्धित है।
उत्तर :
राइबोसोम।

प्रश्न 12.
RNA में कौन-सी शर्करा पाई जाती है?
उत्तर :
RNA में राइबोस (ribose) शर्करा पाई जाती है।

प्रश्न 13.
न्यूक्लियोसोम अभिधारणा किस वैज्ञानिक ने दी?
उत्तर :
वुडकोक (1973) ने क्रोमेटिन की संरचना के अध्ययन के दौरान न्यूक्लियोसोम शब्द का (UPBoardSolutions.com) प्रयोग किया, जबकि इसकी संरचना का वर्णन कॉर्नबर्ग (1974) द्वारा किया गया।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए
(क) प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिका
(ख) जन्तु कोशिका तथा वनस्पति कोशिका।
(ग) डी०एन०ए० तथा आर०एन०ए०
उत्तर :
(क)
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिकाओं के बीच अन्तर

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(ख)
जन्तु तथा पादप (वनस्पति) कोशिकाओं के बीच अन्तर

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(ग)
डी०एन०ए० तथा आर०एन०ए० के बीच अन्तर

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प्रश्न 2.
एक ग्रेनम थायलेकॉयड की संरचना का नामांकित चित्र बनाइए।

उत्तर :
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प्रश्न 3. 
राइबोसोम की संरचना तथा कार्य का वर्णन कीजिए। या राइबोसोम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर :
राइबोसोम राइबोसोम कलाविहीन (non-membranous) तथा गोलाकार आकृति के सूक्ष्म कण होते हैं। ये कोशिका में अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से चिपके हुए अथवा कोशिकाद्रव्य में स्वतन्त्र रूप में मिलते हैं।  ये लगभग समान परिमाण के होते हैं तथा इनमें लगभग 60% राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA) तथा 40% प्रोटीन्स होते हैं।
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राइबोसोम लगभग 100-150 Å व्यास के दो प्रकार के होते हैं  70S तथा 80S, इनमें से 70s आकार के राइबोसोम छोटे होते हैं तथा ये जीवाणु कोशिका, माइटोकॉण्डूिया क्लोरोप्लास्ट तथा अन्य प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में तथा 80S राइबोसोम्स सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाये जाते हैं। राइबोसोम्स की संरचना अत्यन्त जटिल होती है। इसकी दो इकाइयाँ होती हैं।  एक इकाई छोटी और दूसरी बड़ी होती है। दोनों इकाइयाँ मिलकर एक गरारी (UPBoardSolutions.com) की तरह की संरचना बनाती हैं। बड़ी इकाई गुम्बदाकार तथा छोटी इकाई टोपी की तरह होती है। कोशिकाद्रव्य में जब  Mg++ आयन का सान्द्रण कम हो जाता है तो दोनों इकाइयाँ अलग अलग हो जाती हैं, किन्तु इन आयनों की अधिकता होने पर दो राइबोसोम भी जुड़ जाते हैं। इन जुड़े हुए आकारों को डायमर  (dimer) कहते हैं। राइबोसोम का निर्माण केन्द्रिक में होता है तथा वहाँ से केन्द्रक द्रव्य में होकर ये केन्द्रक कला के छिद्रों से निकलकर कोशिकाद्रव्य में आ जाते हैं।

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राइबोसोम्स के कार्य

इबोसोम (ribosome), ऐसी विशिष्ट संरचनाएँ हैं जो प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) के स्थल के रूप में कार्य करती हैं। इनकी संरचना में राइबोसोमल आर०एन०ए०  (ribosomal RNA = r-RNA) होता है। यह अन्य आर०एन०ए० अणुओं (messenger RNA =m-RNA and transfer RNA= t-RNA) के साथ मिलकर प्रोटीन संश्लेषण की  न्तिम कड़ी बनाते हैं। इसी पर विभिन्न एन्जाइम्स आदि की उपस्थिति में प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

प्रोटीन के संश्लेषण के लिए कई राइबोसोम्स (ribosomes) मिलकर पॉलिराइबोसोम (polyribosome) श्रृंखला का निर्माण करते हैं जिनमें उपस्थित r-RNA अणु महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं।  ये सन्देशवाहक आर०एन०ए० (messenger RNA = m-RNA के द्वारा) डी०एन०ए० से प्राप्त सन्देशों के अनुसार अन्तरण आर०एन०ए० अणुओं (transfer RNA = t-RNA) की सहायता  से एक निश्चित तथा विशेष क्रम में अमीनो अम्लों को संगठित (organize) तथा श्रृंखलाबद्ध करते हैं। (UPBoardSolutions.com) अपने-अपने कार्यों को सम्पादित करने के लिए विभिन्न RNA अणुओं पर विशेष प्रकार के कोड  (code) तथा प्रतिकोड (anticode) स्थित होते हैं। इन्हीं के आधार पर श्रृंखला की विशेषता तथा निश्चित क्रम बना रहता है।

प्रश्न 4.
80 S तथा 70 s राइबोसोम्स में अन्तर बताइए।
उत्तर :
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प्रश्न 5.
केन्द्रिका की अतिसूक्ष्म संरचना का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर :
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प्रश्न 6.
गुणसूत्रों की आकृतिक संरचना तथा उनके कार्यों का उल्लेख चित्रों की सहायता से कीजिए।
उत्तर :
कोशिका विभाजन की मध्यावस्था (metaphase) में प्रत्येक गुणसूत्र में लम्बे तथा पूरी लम्बाई में फैले अर्द्ध-गुणसूत्र या क्रोमैटिड (chromatids) पाये जाते हैं। दोनों अर्द्ध गुणसूत्र एक-दूसरे से एक स्थान पर जुड़े रहते हैं जिसे गुणसूत्र बिन्दु (centromere) कहते हैं। गुणसूत्र बिन्दु से गुणसूत्र दो भागों में विभाजित होता है उन्हें गुणसूत्र की भुजा (arm) कहते हैं। कुछ गुणसूत्र में एक  लम्बी भुजा में द्वितीय संकीर्णन (secondary constriction) भी मिलता है। द्वितीय संकीर्णन के (UPBoardSolutions.com) बाद क्रोमोसोम का जो सबसे छोटा भाग होता है, उसे सैटेलाइट (satellite) कहते हैं।  जिन गुणसूत्रों में सैटेलाइट मिलता है, उन्हें SAT chromosome कहते हैं।
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गुणसूत्र का वह भाग जो केन्द्रिक से जुड़ा रहता है उसे केन्द्रिक संघटक (nucleolar organiser) कहते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र परसूक्ष्म मोतीनुमा संरचनाएँ (beaded structure) होती हैं,  उन्हें क्रोमोमियर्स (chromomeres) कहते हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार ये ही जीन्स तथा जीन्स के समूह हैं जो आनुवंशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित करते हैं।

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प्रश्न 7.
क्रोमैटिन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
क्रोमैटिन धागे सदृश रचना हैं जो एक-दूसरे के ऊपर फैलकर एक जाल-सदृश रचना बना लेते हैं। जिसे क्रोमैटिन जालिका (chromatin reticulum) कहते हैं, परन्तु यह वास्तविक  जाल नहीं होता, क्योकि प्रत्येक क्रोमैटिन धागे का सिरा अलग होता है। कोशिका विभाजन (cell division) के अवसर पर ये धागे एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं और सिकुड़कर छोटे व मोटे हो जाते हैं। इन्हें गुणसूत्र (chromosomes) कहते हैं। केन्द्रक का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग क्रोमैटिन है। (UPBoardSolutions.com) रासायनिक दृष्टि से यह एक न्यूक्लिओप्रोटीन (nucleoprotein) है जो  न्यूक्लिक अम्ल और क्षारीय प्रोटीन (base protein) के मिश्रण से बनता है। क्षारीय प्रोटीन विशेष रूप से हिस्टोन (histone) है जो क्षारीय अमीनो अम्ल से बना होता है।

प्रश्न 8.
हेटरोक्रोमैटिन तथा यूक्रोमैटिन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
हेटरोक्रोमैटिन तथा यूक्रोमैटिन में अन्तर
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प्रश्न 9.
स्थानान्तरण आर.एन.ए. (t-RNA) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
इसका अणुभार लगभग 25000 डाल्टन होता है। इसमें क्षारक का अनुपात A : U तथा G: C लगभग 1 होता है। यह लगभग 70-75 न्यूक्लिओटाइड की एक श्रृंखला है। इस श्रृंखला का 80% भाग द्विक  कुण्डलीय (double helical) हो जाता है। इसके CS’ सिरे पर G तथा C3′ सिरे पर C-C-A क्षार मिलता है। AUGC के अतिरिक्त और भी क्षारक मिलते हैं, जैसे—5′ राइबोसिले यूरेसिल अथवा
स्यूडोयूरिडिन (5′ ribosyl uracil or pseudouridine Ψ ), डाइहाइड्रो यूरिडायलिक अम्ल (dihydro uridylic acid), 5-मिथाइल साइटोसीन (5-methyl cytosine) आदि। इस प्रकार  के क्षारक कुल क्षारकों का 10-20% तक होते हैं।  t-RNA की संरचना क्लोवर की पत्ती (clover leaf) के समान होती है। इसके चार भुजाएँ (arms), तीन लूप (loop) तथा एक लम्प (lump) होता है।

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C3′ भुजा को ग्राही भुजा (acceptor arm) कहते हैं। इस पर C-C-A अनुक्रम होता है। इस भुजा पर अमीनो अम्ल जुड़ता है तथा अमीनो एसाइल t-RNA बनता है।  TΨC लूप या राइबोसोम बन्ध लूप (ribosomal binding site) में राइबोसोम से जुड़ता है। दूसरा लूप एन्टीकोडोन लूप होता है। इस पर तीन विशिष्ट क्षारक कोड बनते हैं जिससे m-RNA के  कोडॉन की पहचान की जाती है। तीसरा लूप DHU लूप होता है। यह अमीनो अम्ल सिंथेटेस को बाँधता है। यह 8-12 क्षारकों का बना होता है। TΨCलूप तथा एन्टीकोडोन लूप के मध्य एक लम्प  (lump) मिलता है। t-RNA के क्लोवर लीफ मॉडल को आर० होले (R. Holley) ने 1968 में यीस्ट (UPBoardSolutions.com) (Yeast) के t-RNA विश्लेषण के समय प्रस्तुत किया। किम (Kim) तथा उनके साथियों ने  1973 में X-किरणों के विवर्तन से यीस्ट के फिनाइल एलानीन t-RNA का ‘L’ आकार का मॉडल प्रस्तुत किया। यह t-RNA की त्रिविम ‘रचना भी कहलाती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
(क) पादप कोशिका की संरचना का, जैसा कि इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में दिखाई देती है, एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
(ख) दो कोशिकांगों के कार्यों का वर्णन कीजिए। या एक यूकैरियोटिक पादप कोशिका की इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शीय संरचना का नामांकित चित्र खींचिए। या निम्नलिखित में से एक कोशिकांग की संरचना तथा कार्य का विस्तृत विवरण दीजिए
(क) हरितलवक (chloroplast)।
(ख) माइटोकॉण्डिया (mitochondria)।
या माइटोकॉण्डूिया की संरचना तथा कार्य का वर्णन कीजिए। या हरितलवक की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए। या पादप हरितलवक का एक इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शीय नामांकित चित्र बनाइए। या पौधे के विभिन्न भागों को रंगयुक्त बनाने वाले लवकों का नाम लिखिए तथा उनकी अभिलक्षणिक विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

पादप कोशिका

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(क)
हरितलवक
(अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 7 का उत्तर देखें।)

(ख)
माइटोकॉण्डिया
(अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 7 का उत्तर देखें।)

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित की संरचना तथा कार्य का वर्णन कीजिए।
(क) केन्द्रक,
(ख) प्लाज्मा झिल्ली।
या जीवद्रव्य कला से आप क्या समझते हैं? चित्र की सहायता से इसके कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

(क) केन्द्रक

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 13 का उत्तर देखें।

(ख) प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला

संरचना (Structure) :
प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला (plasmalemma or plasma membrane) कोशिका में उपस्थित अन्य इकाई कलाओं के समान ही होती है। यह रासायनिक संरचना में प्रोटीन्स  (proteins) तथा लिपिड्स (lipids) से मिलकर बनती है। इनमें प्रोटीन्स पात्रा में लगभग 60% तथा लिपिड्स लगभग 40% पाये जाते हैं। प्लाज्मा झिल्ली में मध्य में फॉस्फोलिपिड्स (phospholipids)  अणुओं की दो पर्ते पाई जाती हैं जिनके दोनों ओर प्रोटीन अणुओं की एक-एक परत पाई जाती है। प्रत्येक प्रोटीन की परत की मोटाई (thickness) 20-25 A तथा दोनों स्तरों के मध्य की लिपिड परत की  मोटाई 25-35 A होती है। स्पष्ट है, इकाई कला की संरचना त्रिस्तरीय (trilamellar) होती है तथा इसकी कुल मोटाई लगभग 75-100 मैं होती है। यह 75-100 $ मोटाई की प्रोटीन-लिपिड-प्रोटीन  (protein-lipid-protein = PLP-sandwich) संरचना रॉबर्टसन (Robertson, 1959) ने इकाई कला मत (unit membrane concept) के अन्तर्गत दी। दूसरे वैज्ञानिक जैसे  बेन्सन (Benson, 1968) ने इकाई कला को प्रोटीन तथा (UPBoardSolutions.com) लिपिड अणुओं के पुंजों के रूप में लगे हुए माना है तथा इन पुंजों (clusters) के बीच-बीच में अनेक चैनलों (channels)  का प्रतिपादन किया है। कुछ वैज्ञानिकों जैसे फिनियन (Finean, 1961) के अनुसार इकाई कला के फॉस्फोलिपिड अणुओं के बीच-बीच कॉलेस्टेरॉल (Cholesterol) के अणु भी होते हैं।

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अध्ययन की अनेक नयी तकनीकों (techniques) के प्रयोग करने से जैव कलाओं (biomembranes) की संरचना के सम्बन्ध में नये-नये तथ्य प्रकट किये गये हैं। इस दिशा में कार्य  करने वाले वैज्ञानिकों में कैवेनौ (Kavanau, 1965), बेन्सन (Benson, 1966), कॉर्न (Kom, 1966), लेहनिंगर (Lehninger, 1968), लिन (Lin, 1970) प्रमुख रहे।  इन्होंने कई प्रकार के मॉडल दिये। वर्ष 1962 में बेल (Bell, 1962) ने इन कलाओं में कार्बोहाइड्रेट्स की उपस्थिति स्पष्ट की। कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा तथा स्वरूप कोशिका के कार्य  आदि पर निर्भर करता है।

जैव कलाओं का तरल मोजेक मॉडल

सिंगर तथा निकोलसन (S.J. Singer and G. Nicholson, 1974) ने विशेष तकनीकों तथा रासायनिक विश्लेषणों के आधार पर जैव कलाओं की संरचना के लिए तरल मोजेक मॉडल प्रस्तुत किया है।  इसके अनुसार, प्रोटीन की दो परतों का लिपिड की परत के बाहर होना ही आवश्यक नहीं, बल्कि प्रोटीन परत के अणु दो प्रकार के होते हैं

  1. परिधीय या बाह्य (extrinsic or peripheral) तथा
  2. समाकल (intrinsic or integral)।

समाकल प्रोटीन के अणु लिपिड अणुओं में कुछ दूरी तक धंसे हुए अथवा आर-पार भी हो सकते हैं। इस विचारधारा में यह भी बताया गया है कि धंसी हुई समाकल प्रोटीन (intrinsic protein) सरलता  सेअलग नहीं की जा सकती है जबकि बाह्य प्रोटीन परत को आसानी से अलग कर सकते हैं। इस प्रकार इस विचारधारा के अनुसार

  1. लिपिड अणु (lipid molecules) तथा समाकल प्रोटीन (intrinsic protein) कलाओं में मोजेक व्यवस्था (mosaic arrangement) में होते हैं तथा ।
  2.  जैव कलायें (biomembranes) अर्द्ध-तरल (quasi-fluid) होती हैं जिससे लिपिड तथा समाकल प्रोटीन-लिपिड (UPBoardSolutions.com) के द्विअणु स्तर में गति कर सकते हैं।

प्लाज्मा झिल्ली के कार्य (Functions of plasmalemma) :
प्लाज्मा झिल्ली का प्रमुख कार्य पदार्थों का कोशिका की सतह पर आदान-प्रदान (विनिमय) करना है। यह एक जीवित कला होती है, अतः कोशिका की आवश्यकता तथा संरचना के अनुसार पदार्थों के चयन में विशेष रूप में महत्त्वपूर्ण है।
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प्रश्न 3.
डी०एन०ए० की संरचना एवं इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए। या कोशिका में न्यूक्लिक अम्ल कहाँ पाये जाते हैं? डी०एन०ए० की संरचना को केवल नामांकित चित्रों की सहायता से समझाइए।
उत्तर :
कोशिका में न्यूक्लिक अम्ल अधिकतम मात्रा में केन्द्रक में होते हैं। इनमें DNA प्रमुखतः क्रोमैटिन (गुणसूत्रों) का भाग होता है जबकि RNA केन्द्रिक (न्यूक्लियोलस) में प्रमुखता से पाया जाता है। RNA सम्पूर्ण जीवद्रव्य में विभिन्न प्रकार की संरचनाओं के साथ अथवा स्वतन्त्र रूप में भी पाया जाता है। DNA माइटोकॉण्ड्रिया तथा क्लोरोप्लास्ट्स में भी कुछ मात्रा में मिलता है।

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डी०एन०ए० = डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल

एक डी०एन०ए० (डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल) अणु में दो लम्बी श्रृंखलाओं के बने दो कुण्डल (helixes) होते हैं जो आधारभूत रूप में विशेष इकाइयों जिन्हें न्यूक्लियोटाइड्स (nucleotides) कहा जाता है, से बने होते हैं। इस प्रकार, एक अणु में सहस्रों से लेकर लाखों तक न्यूक्लियोटाइड्स अणु होते हैं। इस प्रकार DNA में दो पॉलिन्यूक्लियोटाइड (polynucleotide) श्रृंखलाएँ पाई जाती हैं। प्रत्येक श्रृंखला का प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड अणु एक विशिष्ट तथा जटिल संरचना है। यह स्वयं तीन प्रकार के घटकों (components) से मिलकर बना होता है, जिनमें

  1.  एक पेण्टोज शर्करा (pentose sugar) डीऑक्सीराइबो (deoxyribo) प्रकार की होती है।
  2. एक फॉस्फेट (phosphate) मूलक तथा ।
  3. एक नाइट्रोजन क्षारक (nitrogen base) जो दो प्रकार के चार क्षारकों में से एक होता है। ये हैं

(क) प्यूरीन (purine) प्रकार के, ऐडीनीन (adenine) व ग्वैनीन (guanine) तथा
(ख) पिरीमिडीन (pyrimidine) प्रकार के साइटोसीन (cytosine) तथा थाइमीन (thymine) क्षारक।

वाटसन एवं क्रिक का DNA मॉडल
वाटसन तथा क्रिक (Watson & Crick) को डी०एन०ए० की संरचना को समझाने तथा प्रतिरूप तैयार करने के लिए सन् 1962 में नोबेल पुरस्कार मिला था। यद्यपि उन्होंने यह, खोज 1953 ई० में कर ली थी। उनके अनुसार केवल चार प्रकार के नाइट्रोजन क्षारकों से चार ही प्रकार के न्यूक्लियोटाइड्स अणुओं का निर्माण होता हैं। ये चारों प्रकार के न्यूक्लियोटाइड अणु विशिष्ट क्रमों में जुड़कर एक लम्बी पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला (polynucleotide chain) का निर्माण करते हैं। DNA में इस प्रकार की दो श्रृंखलाएँ पाई जाती हैं। प्रत्येक कुण्डल का स्तम्भ या सूत्र डीऑक्सीराइबो शर्करा तथा फॉस्फेट के द्वारा बना होता है जबकि सीढ़ी के पगदण्डों (UPBoardSolutions.com) की तरह की रचना नाइट्रोजन क्षारकों के निश्चित युग्मों (pairs) के जुड़े होने से होती है। दो निकटतम युग्मों की दूरी 3.4A तथा एक कुण्डल जिसकी लम्बाई 34A होती है, में कुल 10 क्षारक युग्म होते हैं। इन युग्मों में प्यूरीन क्षारक ऐडीनीन (adenine) केवल पिरीमिडीन क्षारक थाइमीन (thymine) से तथा ग्वैनीन (guanine) प्रकार का प्यूरीन क्षारक केवल पिरामिडीन प्रकार के साइटोसीन (cytosine) क्षारक के साथ ही जुड़कर पगदण्ड को एक भाग बनाता है। इसमें अन्य किसी भी प्रकार का युग्म सम्भव नहीं है। इस प्रकार, यदि एक श्रृंखला में T-C-G-A-T-C-G- आदि हैं तो दूसरी श्रृंखला में T के सामने A, C के सामने G, G के सामने C तथा A के सामने T आदि ही होंगे। इस प्रकार ।

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पगदण्ड में न्यूक्लियोटाइड के क्षारक हाइड्रोजन बन्धों (bonds) के द्वारा जुड़े होते हैं। इसमें ऐडीनीन, थाइमीन के साथ दो तथा साइटोसीन, ग्वैनीन के साथ तीन बन्धों से बन्धनयुक्त होता है। क्षारकों का निश्चित क्रम डी०एन०ए० की रासायनिक शब्दावली बनाता है जिससे आनुवंशिक लक्षणों की स्थापना होती है।
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डी०एन०ए० का महत्त्व

प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण कोशिका पर सभी प्रकार का नियन्त्रण डी०एन०ए० का ही होता है। इस प्रकार के कार्यों (UPBoardSolutions.com) को यह आर०एन०ए० के द्वारा सम्पन्न करता है। यह एक आनुवंशिक पदार्थ है। अतः क्रोमैटिन के रूप में गुणसूत्रों में रहकर जीव के लक्षणों को संतति में ले जाने का कार्य करता है।

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