UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 2 Map Scale

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 2 Map Scale (मानचित्र मापनी)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनें
(1) निम्नलिखित में से कौन-सी विधि मापनी की सार्वत्रिक विधि है? |
(क) साधारण प्रकथन
(ख) निरूपक भिन्न
(ग) आलेखी विधि।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ख) निरूपक भिन्न। |

(ii) मानचित्र की दूरी को मापनी में किस रूप में जाना जाता है?
(क) अंश ।
(ख) हर
(ग) मापनी का प्रकथन ।
(घ) निरूपक भिन्न
उत्तर-(क) अंश।

(iii) मापनी में अंश व्यक्त करता है
(क) धरातल की दूरी
(ख) मानचित्र पर दूरी
(ग) दोनों दूरियाँ ।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ख) मानचित्र पर दूरी।।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें,
(i) मापक की दो विभिन्न प्रणालियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर-मापक की दो विभिन्न प्रणालियाँ निम्नलिखित हैं–
1. मेट्रिक प्रणाली तथा 2. अंग्रेजी प्रणाली।

(ii) मेट्रिक एवं अंग्रेजी प्रणाली में मापनी के एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर-उदाहरण-1 किमी = 1,000 मीटर, 1 मीटर = 100 सेमी आदि मापक की मेट्रिक प्रणाली कहलाती है; जबकि 1 मील = 8 फर्लोग, 1 फर्लाग = 220 यार्ड (गज) आदि मापक की अंग्रेजी प्रणाली है।

(iii) निरूपक भिन्न विधि को सार्वत्रिक विधि क्यों कहा जाता है?
उत्तर-निरूपक भिन्न विधि को सार्वत्रिक विधि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस भिन्न के लिए किसी भी प्रकार की इकाई नहीं लिखी होती है। इस भिन्न का अंश सदैव 1 इकाई होता है, जिसे किसी भी देश में वहाँ प्रचलित मापक प्रणाली के आधार पर पढ़ा जाता है। जैसे-1 सेमी = 1 इंच आदि। |

(iv) आलेखी विधि के मुख्य उपयोग क्या हैं?
उत्तर-आलेखी विधि में मानचित्र की दूरी के लिए धरातल की दूरी दी गई होती है। इसके माध्यम से दो स्थानों की दूरी आसानी से ज्ञात की जा सकती है। इस विधि को मुख्य उपयोग यह भी है कि यह मानचित्र के छोटा या बड़ा करने पर भी उसी अनुपात में छोटी या बड़ी हो जाती है। अतः मानचित्र छोटा या बड़ा किए जाने पर मापक को सरलता से जाना जा सकता है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित मापनी के प्रकथन को निरूपक भिन्न में बदलें
(i) 5 सेण्टीमीटर, 10 किलोमीटर को व्यक्त करता है।
उत्तर-5 सेण्टीमीटर व्यक्त करता है = 10 किलोमीटर
1 सेण्टीमीटर व्यक्त करेगा = [latex]\frac { 10 }{ 5 } [/latex] = 2 किलोमीटर
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(ii) 2 इंच के द्वारा 4 मील व्यक्त होता है।
उत्तर-प्रश्न संख्या (i) के उत्तर में अपनाई गई विधि के आधार पर
2 इंच व्यक्त करता है = 4 मील
1 इंच व्यक्त करेगा = [latex]\frac { 4 }{ 2 } [/latex] = 2 मील
अतः 1 इंच = 2 मील
नि० भि० = [latex]\frac { 1 }{ 2\times 63,360 } =\frac { 1 }{ 1,26,720 } [/latex]

(iii) 1 इंच के द्वारा 1 गज व्यक्त होता है।
उत्तर-1 इंच व्यक्त करता है = 1 गज
अतः नि० भि० = [latex]\frac { 1 }{ 1\times 36 } =\frac { 1 }{ 36 } [/latex]

(iv) 1 सेण्टीमीटर 100 मीटर को व्यक्त करता है।
उत्तर-1 सेण्टीमीटर व्यक्त करता है = 100 मीटर
अतः नि० भि० = [latex]\frac { 1 }{ 1\times 100 } =\frac { 1 }{ 10,000 } [/latex]

प्रश्न 4. निरूपक भिन्न को कोष्ठक में दी गई माप-प्रणाली के अनुसार मापनी के प्रकथन में परिवर्तित करें :
(i) 1:1,00,000 (किलोमीटर में)
उत्तर-1 सेमी व्यक्त करता है 1 किलोमीटर को।

(ii) 1: 31,680 (फर्लाग में)
उत्तर-1 इंच व्यक्त करता है 4 फर्लाग को।
(क्योंकि 1 मील = 8 फर्लंग या 1 मील = 63,360 इंच तथा 1 फर्लाग =7,920 इंच; अत: यदि 31,680 को 7,920 से भाग दिया जाता है तो =4 फर्लाग आता है।)

(iii) 1:1,26,720 (मील में)
उत्तर-1 इंच व्यक्त करता है =2 मील को।
(1,26,720 ÷ 63,360 = 2 मील)। |

(iv) 1:50,000 (मीटर में)
उत्तर-1 सेमी व्यक्त करता है = 500 मीटर को।
(50,000 ÷ 100 सेमी = 500 मीटर)।

प्रश्न 5. 1 : 50,000 मापक पर एक आलेखी मापनी की रचना कीजिए जिसमें किलोमीटर एवं मीटर पढ़े जा सकें।
उत्तर-नि० भि० (R. F.) = 1/50,000
1 सेमी व्यक्त करता है = 50,000 किमी।
15 सेमी व्यक्त करेगा = [latex]\frac { 50,000\times 15 }{ 1,00,000 } =\frac { 15 }{ 2 } [/latex] = 7.5 किमी
7.5 किमी अपूर्ण संख्या है; अत: इसे पूर्णांक संख्या 8 मान लेना चाहिए।
7.5 किमी व्यक्त होता है = 15 सेमी के द्वारा
8 किमी व्यक्त होगा = [latex]\frac { 8\times 15 }{ 7.5 } [/latex] = 16 सेमी
अतः 16 सेमी लम्बी रेखा द्वारा 8 किमी की दूरी पढ़ी जाएगी, जिसे निम्नांकित रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मापक का महत्त्व एवं प्रकार बताइए तथा मानचित्र पर मापक प्रकट करने की विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-मापक का महत्त्व

  1. मापक के माध्यम से छोटे क्षेत्रों को बड़े आकार में तथा बड़े क्षेत्रों को छोटे आकार में मानचित्रों के | द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
  2. मापक द्वारा किसी भी मानचित्र में दो स्थानों (बिन्दुओं) के मध्य धरातल की वास्तविक दूरी ज्ञात | की जा सकती है।
  3. मापक के माध्यम से एक मानचित्रकार अपने उद्देश्य के अनुसार किसी भी क्षेत्र का छोटा या बड़ा मानचित्र तैयार कर सकता है।

मापक के प्रकार ।

साधारण रूप से मानचित्रों में दो प्रकार के मापक प्रयोग में लाए जाते हैं-
1. दीर्घ मापक मानचित्र-इन मापकों में धरातल की छोटी दूरियों को मानचित्र पर बड़ी माप से प्रदर्शित किया जाता है; जैसे-5 सेमी = 1 किमी या 10″ = 1 मील।।

2. लघु मापक मानचित्र-इन मापकों में धरातल की विशालतम दूरियों को मानचित्र में लघुतम दूरी | से प्रकट किया जाता है; जैसे-1 सेमी = 1,000 किमी या 1″ = 100 मील। लघु मापकों का चुनाव विशाल क्षेत्रों के मानचित्र बनाने के लिए किया जाता है।

मानचित्र पर मापक प्रकट करने की विधियाँ

मापक अभिव्यक्त करने की निम्नलिखित तीन विधियाँ हैं

(I) कथनात्मक विधि
मापक प्रकट करने की यह सरलतम विधि है। इस विधि में मापक को शब्दों द्वारा संक्षेप में व्यक्त किया जा सकता है। यह विधि विभिन्न देशों में प्रचलित माप की इकाई के अनुरूप व्यक्त की जाती है।

उदाहरण के लिए-1 सेमी = 5 किमी, 1″ = 10 मील आदि। इस विधि में दोनों दूरियाँ अलग-अलग । इकाइयों में प्रदर्शित की जाती हैं।

(II) प्रदर्शक भिन्न विधि
इस विधि में मापक का प्रदर्शन एक भिन्न द्वारा किया जाता है। भिन्न का अंश सदैव एक रहता है जो मानचित्र की दूरी प्रकट करता है तथा हर उसी इकाई में क्षेत्र की वास्तविक दूरी को प्रकट करता है। इसे अनुपात को माप की विभिन्न इकाइयों में सरलता से परिवर्तित किया जा सकता है। यद्यपि इस विधि में एक इकाई के द्वारा अनेक इकाइयों का प्रतिनिधित्व किया जाता है; अत: इसे प्रतिनिधि भिन्न या निरूपक भिन्न (R. F.) कहते हैं; जैसे
प्र० भि० = [latex s=2]\\ \frac { 1 }{ 2,000 } [/latex] में मानचित्र की 1 इकाई धारातल की 2,000 इकाइयों का प्रतिनिधित्व कर रही है।

प्रदर्शक भिन्न ज्ञात करने का सूत्र ।
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मापक प्रकट करने की इस विधि को भिन्नात्मक या R. F. विधि भी कहते हैं।

मापक परिवर्तन
उदाहरण 1-5 सेमी = 12.5 मीटर को प्र० भि० में बदलो।
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उदाहरण 2-2″ प्रति मील को प्र० भि० में बदलो।
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कथुनात्मक मापक 1 सेमी =2.5 किमी।

प्रदर्शक भिन्न विधि का महत्त्व-यह विधि मापक प्रदर्शित करने की अन्तर्राष्ट्रीय विधि है, क्योंकि इस विधि का अन्तर्राष्ट्रीय जगत में उपयोग किया जाता है। इस विधि को विश्व के प्रत्येक राष्ट्र में समझा जा सकता है, क्योंकि इनमें माप की कोई भी इकाई अंकित नहीं होती वरन् यह केवल भिन्नात्मक अनुपात होता है। इस अनुपात को प्रत्येक राष्ट्र अपनी माप की इकाई में बदलकर पढ़ सकती है। इससे मापक की सभी देशों में सार्थकता बनी रहती है।

(III) रेखात्मक विधि
इस विधि में मापक की दूरियाँ एक निश्चित रेखा द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं। इस रेखा को समान भागों एवं उपविभागों में बाँट लिया जाता है तथा उस पर विभिन्न माप की दूरियाँ अंकित कर दी जाती हैं। इस मापक विधि के द्वारा बिना किसी गणना किए हुए ही वास्तविक दूरी ज्ञात की जा सकती है। मानचित्र को फोटो द्वारा घटाने या बढ़ाने पर भी रेखात्मक मापनी शुद्ध रहती है, क्योंकि मापनी भी मानचित्र के साथ उसी अनुपात में घट या बढ़ जाती है।

रैखिक मापक बनाने में ध्यान रखने योग्य सावधानियाँ ।

  • रेखा की लम्बाई मापन के अनुसार प्राय: 6″ या 15 सेमी अधिक सुविधाजनक रहती है।
  • रेखा को सावधानी से सुविधानुसार समान भागों एवं उपविभागों में विधिवत् विभक्त करना चाहिए।
  • रेखा का विभाजन पूर्णांक संख्या में ही किया जाना चाहिए।
  • रेखा की मोटाई प्रत्येक स्थान पर एकसमान होनी चाहिए।
  • बाईं ओर के उपांश को लघु इकाई में दिखाने के लिए प्रयुक्त करना चाहिए तथा एकान्तर भाग को छाया से रँग देना चाहिए। इसी प्रकार दाईं ओर के समान भागों पर मापे की इकाई अंकित कर देनी चाहिए तथा एकान्तर भाग को छाया से रँग देना चाहिए।
  • रेखा को समान भागों में विभाजित करने के लिए ज्यामितीय विधियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • रेखा के मुख्य भागों एवं बाईं ओर के उपांशों पर माप की इकाई अंकित कर देनी चाहिए।
  • मापक के ऊपर लगभग मध्य में प्र० भि० अंकित कर देनी चाहिए।

रेखा विभाजन की विधि-दी हुई रेखा के एक सिरे पर न्यूनकोण बनाइए। न्यूनकोण वाली रेखा को परकार में ली गई किसी भी उचित दूरी से उतने ही सम भागों में विभक्त कीजिए जितने भागों में रेखा को बाँटना है। कोण वाली रेखा के अन्तिम भाग को सरल रेखा के अन्तिम भाग से मिला दीजिए। शेष भागों पर समकोण गुनिया की सहायता से, इसी रेखा के सामान्तर रेखाएँ खींचिए। समानान्तर रेखाएँ सरल रेखा को अपेक्षित समान भागों में बाँट देंगी। (देखिए चित्र 2.1)।

रैखिक मापक के प्रकार
रैखिक मापक के निम्नलिखित प्रकार होते हैं-
1. साधारण मापक-यह सबसे सरल मापक है। इस मापक में दो इकाइयाँ एक साथ प्रदर्शित की जाती हैं; जैसे–मील एवं फर्लाग, गज एवं फुट, किमी एवं हेक्टोमीटर तथा डेकामीटर एवं मीटर आदि। इस मापक में इकाई के दसवें भाग तक को सरलता से पढ़ा जा सकता है। सभी मानचित्रों पर यह मापक बनाया जा सकता है।

2. तुलनात्मक मापक-तुलनात्मक मापक में एक साथ दो या दो से अधिक इकाइयों के साधारण मापक एक ही प्रदर्शक भिन्न पर प्रकट किए जाते हैं तथा इनकी पारस्परिक तुलना की जाती है। प्रत्येक इकाई को प्रदर्शित करने के लिए अलग-अलग मापकों की रचना की जाती है तथा उन्हें एक साथ इस प्रकार रखा जाता है कि सभी मापकों का शून्य एक सीध में रहे। इस मापक में प्रायः मील एवं किमी, गज एवं मीटर, जरीब एवं कदम आदि इकाइयों की तुलना के लिए एक साथ मापक बनाए जा सकते हैं। दो इकाइयों की तुलना के लिए मापक प्रदर्शन की सर्वोत्तम विधि है।

3. कर्णवत मापक-कर्णवत मापक में उपांश को समान भागों में विभक्त करने के लिए आयत के विकर्ण खींचे जाते हैं तथा कर्ण के सहारे-सहारे दूरियाँ प्रकट की जाती हैं; अत: इसे विकर्ण . मापक या कर्णवत मापक कहते हैं। एक साथ तीन इकाइयों अथवा इकाई के सौवें भाग तक के प्रदर्शन के लिए कर्णवत मापक का प्रयोग किया जाता है।

साधारण मापक की रचना

उदाहरण 1-किसी मानचित्र पर दो नगरों के बीच की दूरी को 12 सेमी से प्रकट किया गया है, जबकि उनकी वास्तविक दूरी 420 किमी है। मापक की प्र० भि० ज्ञात कीजिए तथा किमी का साधारण मापक बनाइए।
हल-प्र० भि० = [latex s=2]\frac { 12 }{ 420\times 100000 } =\frac { 1 }{ 3500000 } [/latex] या 1: 35,00,000

मापक की रचना के लिए गणना-
∵1 सेमी प्रकट करता है = 35,00,000 सेमी
∵15 सेमी प्रकट करेंगे = [latex s=2]\\ \frac { 35,00,000\times 15 }{ 1,00,000 } [/latex] किमी = 525 किमी
चूँकि 525 किमी की निकटतम पूर्णांक संख्या 500 है; अत: 500 किमी की दूरी प्रदर्शित करने के लिए रेखा की लम्बाई की गणना निम्नलिखित प्रकार से होगी
∵525 किमी प्रदर्शित होते हैं = 15 सेमी की रेखा द्वारा ।
∵1 किमी प्रदर्शित होगा = [latex s=2]\\ \frac { 15 }{ 525 } [/latex] सेमी की रेखा द्वारा
500 किमी प्रदर्शित होंगे = [latex s=2]\\ \frac { 15 }{ 525 } [/latex] x 500 सेमी की रेखा द्वारा
= [latex s=2]\\ \frac { 100 }{ 7 } [/latex] = 14.28 सेमी की रेखा द्वारा

रचना-14.28 या 14.3 सेमी की रेखा खींचकर उसे 5 समान भागों में विभाजित कीजिए। प्रत्येक भाग 100 किमी की दूरी प्रकट करेगा, पुनः बाएँ उपांश को 10 बराबर भागों में बाँटिए। प्रत्येक उपांश 10 किमी की दूरी प्रकट करेगा (देखें चित्र 2.2)।
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चित्र 2.2-सरल रेखा का ज्यामितीय विभाजन एवं साधारण मापक का प्रदर्शन।

उदाहरण 2-[latex s=2]\\ \frac { 1 }{ 200 } [/latex] की प्र० भि० पर मीटर तथा डेसीमीटर प्रदर्शित करने के लिए एक साधारण मापक बनाइए।
हल-1 सेमी प्रकट करता है =200 सेमी
15 सेमी प्रकट करेंगे = [latex s=2]\\ \frac { 200\times 15 }{ 100 } [/latex] = 30 मीटर
अतः 15 सेमी की रेखा 30 मीटर प्रकट करेगी।

रचना-15 सेमी एक रेखा खींचकर उसे 6 समान भागों में विभाजित कीजिए। प्रत्येक भाग 5 मीटर की दूरी प्रकट करेगा। पुनः बाएँ उपांश को 5 बराबर भागों में बाँटिए। प्रत्येक भाग 10 डेसीमीटर की दूरी प्रकट करेगा (देखें चित्र 2.3)।
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चित्र 2.3: साधारण मापक।

उदाहरण 3-एक आलेखी मापनी की रचना कीजिए जिसकी मापनी का प्रकथन 1 मील = 1 इंच है और जिसे मील एवं फर्लाग में पढ़ा जा सके। (पा० पु० पृ० सं० 20; प्र० 2)
हल-नोट: मील या फर्लाग में आलेखी मापक बनाने के लिए प्रायः 6 इंच की लम्बाई ली जाती है।

गणना : नि० भि० (R.F.) 1 इंच = 1 मील या 1/63,360 |
1 इंच व्यक्त करता हैं = 1 मील को ।
6 इंच व्यक्त करेगा = 6 मील को।
अत: 6 इंच लम्बी एक सीधी रेखा खीचें और उसे 6 बराबर भागों में विभाजित करें। प्रत्येक भाग 1 मील को दर्शाएगा। अब बाएँ भाग को चार बराबर भागों में विभाजित करें (1 मील = 8 फर्लाग)। प्रत्येक भाग 2 फर्लंग को प्रदर्शित करेगा (देखिए चित्र 2.4)।
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चित्र 2.4

उदाहरण 4-एक आलेखी मापनी बनाएँ जिसमें दिया गया निरूपक भिन्न 1: 50,000 है तथा दूरियों को मील एवं फर्लाग में व्यक्त करें। (पा० पु० पृ० सं० 21; प्र० 3)
हल-गणना–नि० भि० (R.F.) 1 : 50,000
1 इंच व्यक्त करता है = 50,000 इंच
6 इंच व्यक्त करेगा = [latex s=2]\\ \frac { 6\times 50000 }{ 63360 } [/latex] = 4.73 मील
4.73 मील अपूर्ण संख्या को 5 पूर्ण संख्या अर्थात् 5 मील मान लिया जाना चाहिए; अतः रेखा की लम्बाई ज्ञात करें
6 इंच की रेखा द्वारा 4.75 मील व्यक्त किया जाता है।
इसलिए 6 x 5 + 4.73 की रेखा के द्वारा 5 मील व्यक्त किया जाएगा।
अत: 6.34 इंच लम्बाई की रेखा पर 5 मील की दूरी प्रदर्शित की जाएगी।
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चित्र 2.5

मौखिक परीक्षा के लिए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मापक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-“मापक, मानचित्र पर दो स्थानों के बीच की दूरी एवं धरातल पर उन्हीं दोनों स्थानों के बीच की वास्तविक दूरी के मध्य का अनुपात है, जिसे मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।”

प्रश्न 2. मापकं प्रकट करने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
उत्तर-मापक प्रकट करने की निम्नलिखित तीन विधियाँ हैं

  1. कथनात्मक विधि,
  2. प्रदर्शक भिन्न विधि तथा
  3. रेखात्मक विधि।

प्रश्न 3. प्रदर्शक भिन्न क्या है?
उत्तर-“मापक को भिन्न द्वारा प्रकट करने वाली इकाई को प्रदर्शक भिन्न कहते हैं; जैसे – [latex s=2]\\ \frac { 1 }{ 500 } [/latex] या [latex s=2]\\ \frac { 1 }{ 100000 } [/latex] – आदि।” इसमें अंश से मानचित्र की दूरी तथा हर से धरातल की वास्तविक दूरी प्रकट की जाती 1,00,000 है। इस भिन्न का अंश सदैव 1 रहता है। इसे प्र० भि० या नि० भि० (R.F.) भी कहते हैं।

प्रश्न 4. प्रदर्शक भिन्न ज्ञात करने का सूत्र क्या है?
उत्तर-प्रदर्शक भिन्न ज्ञात करने का सूत्र निम्नलिखित है
UP Board Solutions for Class 11Geography Practical Work in Geography Chapter 2 Map Scale (मानचित्र मापनी) img 11

प्रश्न 5. रेखात्मक मापक में रेखा की लम्बाई कितनी होनी चाहिए?
उत्तर-रेखात्मक मापक में रेखा की लम्बाई 6 इंच अथवा 15 सेमी उपयुक्त रहती है।

प्रश्न 6. रैखिक मापक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-रैखिक मापक चार प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 7. कर्णवत मापक क्या है?
उतर-लघुतम दूरियाँ प्रकट करने के लिए कर्णवत मापक बनाया जाता है। इसमें एक साथ माप की तीन इकाइयाँ प्रकट की जाती हैं अर्थात् माप इकाई के सौवें भाग तक पढ़ा जा सकता है। कर्णवत मापक में कोई भी दूरी दशमलव के दो अंकों तक मापी जा सकती है। इस मापक में उपांश पर बनाए गए आयतों के विकर्ण बनाए जाते हैं जिसके सहारे तीसरी दूरी प्रकट की जाती है।

प्रश्न 8. साधारण मापक तथा विकर्ण मापक में क्या अन्तर है?
उत्तर–प्रथम, साधारण मापक में एक साथ माप की केवल दो इकाइयाँ ही प्रकट की जा सकती हैं, जबकि विकर्ण मापक में नाप की तीन इकाइयाँ एक साथ प्रदर्शित की जा सकती हैं। द्वितीय, साधारण मापक में इकाई के दसवें भाग तक ही प्रकट किया जा सकता है, जबकि विकर्ण मापक में इकाई के सौवें भाग तक की सूक्ष्म दूरी पढ़ी जा सकती है।

प्रश्न 9. मापक से क्या लाभ हैं?
उत्तर–मापक से निम्नलिखित लाभ हैं—

  1. मापक द्वारा छोटे क्षेत्रों को बड़े तथा बड़े क्षेत्रों को छोटे आकार में दर्शाया जा सकता है।
  2. मापक द्वारा मानचित्र पर किन्हीं भी दो स्थानों के मध्य की वास्तविक धरातलीय दूरी ज्ञात की जा सकती है।

प्रश्न 10. मापनी बनाने की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर-मापनी द्वारा बहुत बड़े क्षेत्रों को छोटा या छोटे क्षेत्रों को बड़े आकार में प्रदर्शित किया जा सकता है, जो अन्यथा सम्भव नहीं है। इसके द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित क्षेत्र से वास्तविक क्षेत्रफल ज्ञात किया जा सकता

प्रश्न 11. भारतवर्ष में कथनात्मक विधि का प्रयोग प्रायः किस प्रकार के मानचित्र में किया जाता है?
उत्तर-भूसम्पत्ति मानचित्रों एवं भवनों के प्लानों में प्रायः इस विधि का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 12. रेखात्मक मापनी की क्या विशेषता है?
उत्तर-रेखात्मक मापनी वाले मानचित्र को किसी भी आकार में मुद्रित करने पर मुद्रित मानचित्र की मापनी शुद्ध बनी रहती है, क्योंकि जिस अनुपात में मानचित्र का आकार बदलता है, उसी अनुपात में मापनी की लम्बाई भी बदल जाती है।

प्रश्न 13. प्र० भि० विधि की क्या उपयोगिता है?
उत्तर-इस विधि के मापक का अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व है, क्योंकि इस पर किसी भी देश में प्रचलित इकाई को पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 14. मापक के दो प्रकार बताइए।
उत्तर-1. लघु मापक तथा 2. व्यापक या दीर्घ मापक।

प्रश्न 15. रेखात्मक मापक के मुख्य प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर-रेखात्मक मापक के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं—

  1. साधारण मापक,
  2. तुलनात्मक मापक,
  3. कर्णवत मापक तथा
  4. वर्नियर मापक।।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 1 Introduction to Maps

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 1 Introduction to Maps (मानचित्र का परिचय)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनें
(i) रेखाओं एवं आकृतियों के मानचित्र कहे जाने के लिए निम्नलिखित में से क्या अनिवार्य है?
(क) मानचित्र रूढ़ि
(ख) प्रतीक
(ग) उत्तर दिशा
(घ) मानचित्र मापनी
उत्तर-(ख) प्रतीक।।

(ii) एक मानचित्र जिसकी मापनी 1:4,000 एवं उससे बड़ी है, उसे कहा जाता है
(क) भूसम्पत्ति मानचित्र
(ख) स्थलाकृतिक मानचित्र
(ग) भित्ति मानचित्र ।
(घ) एटलस मानचित्र
उत्तर-(क) भूसम्पत्ति मानचित्र।।

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा मानचित्र के लिए अनिवार्य नहीं है?
(क) मानचित्र प्रक्षेप
(ख) मानचित्र व्यापकीकरण |
(ग) मानचित्र अभिकल्पना
(घ) मानचित्रों का इतिहास
उत्तर-(घ) मानचित्रों का इतिहास।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
(क) मानचित्र व्यापकीकरण क्या है?
उत्तर—मानचित्र के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उसकी विषय-वस्तु को नियोजित किया जाना मानचित्र व्यापकीकरण कहलाता है। चूंकि मानचित्रों को एक निश्चित उद्देश्य के लिए लघुकृत मापनी पर तैयार किया जाता है। ऐसा करते समय मानचित्रकार को चुनी गई विषय-वस्तु से सम्बन्धित सूचनाओं (आँकड़ों) को एकत्रित करके आवश्यकतानुसार सरल रूप में प्रदर्शित करना ही वास्तव में व्यापकीकरण है।

(ख) मानचित्र अभिकल्पना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-मानचित्र अभिकल्पना किसी मानचित्र का ऐसा पक्ष है जो उसकी पृष्ठभूमि का समकलित प्रदर्शन करता है। इसके अन्तर्गत मानचित्र निर्माण में प्रयुक्त संकेतों का चयन, उनके आकार एवं प्रकार, लिखने का ढंग, रेखाओं की चौड़ाई का निर्धारण, रंगों का चयन आदि को सम्मिलित किया जाता है। अतः मानचित्र अभिकल्पना मानचित्र निर्माण की एक जटिल अभिमुखता है जिसमें उन सिद्धान्तों की व्यापक जानकारी आवश्यक होती है जो आलेखी संचार द्वारा मानचित्र को प्रभावी व उद्देश्यपरक बना सकें।

(ग) लघुमान वाले मानचित्रों के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर-लघुमान वाले मानचित्रों को निम्नलिखित दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है-
1. भित्ति मानचित्र-यह मानचित्र बड़े आकार के कागज या प्लास्टिक पर बनाया जाता है। इसकी | मापनी स्थलाकृतिक मानचित्र से लघु किन्तु एटलस मानचित्र से बृहत् होती है।
2. एटलस मानचित्र-ये मानचित्र बड़े आकार वाले क्षेत्रों को प्रदर्शित करते हैं तथा भौतिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं को सामान्य ढंग से दर्शाते हैं। |

(घ) बृहत मापनी मानचित्रों के दो प्रमुख प्रकारों को लिखें।
उत्तर-बृहत् मापनी मानचित्रों को अग्रलिखित दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है

1. भूसम्पत्ति मानचित्र-इन मानचित्रों को क्षेत्रीय सम्पत्ति की पंजिका कहा जाता है। ये मानचित्र सरकार द्वारा विशेष रूप से भूमिकर, लगान की वसूली एवं स्वामित्व का रिकॉर्ड रखने के लिए बनाए जाते हैं। इन मानचित्रों का मापक बृहत् होता है। जैसे—गाँवों के भू-सम्पत्ति मानचित्र 1:4,000 की मापनी पर तथा नगरों के मानचित्र 1 : 2,000 और इससे अधिक मापनी पर बनाए जाते हैं।

2. स्थलाकृतिक मानचित्र-ये मानचित्र भी सामान्यतः बृहत् मापनी पर बनते हैं, जो परिशुद्ध सर्वेक्षण पर आधारित होते हैं। इन मानचित्रों को श्रृंखला के रूप में विश्व के लगभग सभी देशों की राष्ट्रीय मानचित्र एजेंसी के द्वारा तैयार किया जाता है। भारत में इनका निर्माण व प्रकाशन सर्वेक्षण विभाग, देहरादून द्वारा किया जाता है। इनका मापक 1 : 2,50,000, 1 : 50,000 तथा 1 : 25,000 होता है। इन मानचित्रों में उच्चावच, अपवाह, वनस्पति, अधिवास, सड़कें आदि भौतिक व सांस्कृतिक तत्त्वों को दर्शाया जाता है।

(ङ) मानचित्र रेखाचित्र से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर-मानचित्र सम्पूर्ण पृथ्वी या उसके किसी भाग का समतल पृष्ठ पर समानीत मापनी द्वारा वर्णात्मक, प्रतीकात्मक तथा व्यापकीकृत निरूपण करता है; जबकि रेखाचित्र बिना मापनी के खींचा गया खाका है, जिसमें विषय-वस्तु को सामान्य जानकारी के लिए प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 3. मानचित्रों के प्रकारों की विस्तृत व्याख्या करें।
उत्तर-भूगोल के विद्यार्थी अनेक प्रकार के मानचित्रों का प्रयोग करते हैं। मानचित्रों का वर्गीकरण उनके मापक, रचना एवं उद्देश्य के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है

(क) मापक के अनुसार मानचित्र के भेद ।
मापक के आधार पर मानचित्रों को निम्नलिखित चार भागों में बाँटकर दो समूहों में रखा जा सकता है

  1. भू-कर, मानचित्र (Cadastral Map);
  2. भूपत्रक मानचित्र (Topographical Map);
  3. दीवार मानचित्र (Wall Map) तथा
  4. एटलस मानचित्र (Atlas or Chorographical Map)।

1. दीर्घ मापक मानचित्र-ये मानचित्र बड़े मापक पर निर्मित किए जाते हैं। इनका निर्माण मानचित्रों | में विस्तृत विवरण प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इनमें 1 सेमी = 1 किमी तक की दूरी प्रकट की जाती है। भू-कर मानचित्र (Cadastral Map) तथा स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Map) इसी श्रेणी में सम्मिलित हैं।

2. लघु मापक मानचित्र-ये मानचित्र छोटे मापक पर निर्मित किए जाते हैं। इनका निर्माण विशाल क्षेत्र में सीमित विवरण प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इनका मापक 1 सेमी = 1,000 किमी या इससे भी अधिक हो सकता है। मानचित्रावली मानचित्र (Atlas Map) तथा दीवार मानचित्र (Wall Map) इसी प्रकार के मानचित्र होते हैं।

(ख) उद्देश्य के अनुसार मानचित्र के भेद
उद्देश्य के आधार पर मानचित्रों को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है

  1. प्राकृतिक या उच्चावच मानचित्र,
  2. भू-तात्त्विक मानचित्र,
  3. जलवायु मानचित्र,
  4. वनस्पति मानचित्र,
  5. यातायात मानचित्र,
  6. सांस्कृतिक मानचित्र,
  7. जनसंख्या मानचित्र,
  8. आर्थिक मानचित्र,
  9. भाषा मानचित्र,
  10. जाति मानचित्र,
  11. अन्तर्राष्ट्रीय मानचित्र,
  12. वितरण मानचित्र,
  13. राजनीतिक मानचित्र,
  14. खगोल मानचित्र,
  15. भूगर्भिक मानचित्र।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मानचित्र की परिभाषा दीजिए तथा उसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर-मानचित्र का अर्थ मानचित्र भूगोल के अध्ययन की समस्याओं का समाधान खोजने के उपकरण तथा विभिन्न रहस्यों को पता लगाने वाली कुंजियाँ हैं। मानचित्र ऐसी सांकेतिक लिपि है, जिसमें भूगोल का अपरिमित ज्ञानरूपी खजाना छिपा है। वस्तुतः मानचित्र गागर में सागर की उक्ति को चरितार्थ करते हैं। ‘मानचित्र’ लैटिन भाषा के मैपा (Mappa) शब्द से उत्पन्न मैप (Map) शब्द का पर्यायवाची है, जिसका शाब्दिक अर्थ कपड़े का रूमाल या टुकड़ा होता है। मानचित्र द्वारा विश्व के किसी भाग अथवा विशाल क्षेत्र का प्रदर्शन तथा चित्रण समतल कागज पर सरलता से किया जा सकता है।

मानचित्र की परिभाषाएँ

विभिन्न भूगोलविदों ने मानचित्र को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

ए०ए० मिलर के अनुसार, “मैं मानचित्र को औजार के रूप में मानता हूँ। वास्तव में यह स्काउट के चाकू की अपेक्षा अधिक कल्पना प्रवीण चिह्नों से युक्त औजारों का पूर्ण थैला होता है। यदि इसका उचित प्रयोग किया जाए तो यह किसी भी भौगोलिक समस्या को अधिकांशतः सुलझा देता है।”

सिंह एवं कन्नौजिया के अनुसार, “मानचित्र समस्त पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग का, जैसा कि वह ऊपर से दृष्टिगत होती है, परम्परागत लघु मापक चित्रण है।” इस प्रकार, मानचित्र पृथ्वी या उसके किसी भाग की धरातलीय अथवा मानवीय आकृतियों एवं कृतियों के सांकेतिक चिह्नों द्वारा समतल कागज पर बने आनुपातिक चित्रण को कहते हैं।

मानचित्र का महत्त्व

मानव अपने उपयोग के लिए मानचित्रों का निर्माण प्राचीनकाल से ही करता चला आ रहा है। मानचित्रों का उपयोग कृषकों, विद्यार्थियों, व्यापारियों, अर्थशास्त्रियों, योजना आयोग, राजनीतिज्ञों, यात्रियों, अन्वेषकों, विमानचालकों, त्योतिषियों, इतिहासकारों, अध्यापकों आदि के द्वारा पर्याप्त रूप में किया जाता है। भूगोल के अध्ययन में तो मानचित्रों का विशेष महत्त्व होता है। देश के योजनाकार मानचित्रों के आधार पर ही देश की भावी विकास योजनाओं का निर्माण करते हैं तथा भावी कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। सैनिक मानचित्रों की सहायता से सैनिक अधिकारी सेना के संचालन का मार्ग तथा आक्रमण करने के स्थल सुनिश्चित करते हैं। वायुयान तथा जलयान चालक मानचित्रों के द्वारा अपनी आकाशीय एवं जलमार्ग सुनिश्चित करते हैं। भूगोल के जिज्ञासु भी इन्हीं मानचित्रों के सहयोग से पृथ्वी का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तथा भूगोल के अध्यापक मानचित्रों की सहायता से ही विद्यार्थियों को विश्व का भौगोलिक ज्ञान प्रदान करते हैं। इस प्रकार मानचित्र एक पथ-प्रदर्शक तथा सहयोगी के रूप में भूगोल के अध्ययन और अध्यापन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वस्तुत: मानचित्र, भूगोल के यन्त्र एवं उपकरण हैं। मानचित्रों का उपयोग भूगोल के अध्ययन को सरसे, सरल, रोचक एवं बोधगम्य बना देता है। कोई भी दुरुह विषय मानचित्रों के माध्यम से छात्रों के लिए हृदयगामी बन जाता है। भौगोलिक यात्राओं की आधारशिला मानचित्र ही होते हैं।

प्रश्न 2. मानचित्र के क्रमिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर-मानचित्रण का इतिहास मानव इतिहास के समानान्तर प्राचीन है। विश्व का सबसे पुराना मानचित्र मेसोपोटामिया में पाया गया था जो चिकनी मिट्टी की टिकिया से बना था और 2,500 ईसा पूर्व का माना जाता है।

आधुनिक मानचित्र कला की नींव अरब एवं यूनान के भूगोलविदों द्वारा रखी गई। भारत में मानचित्र बनाने का कार्य वैदिककाल में शुरू हो गया था। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने पूरे विश्व को सात द्वीपों में बाँटा था। महाभारत में माना गया था कि यह गोलाकार विश्व चारों ओर से जल से घिरा है। टोडरमल तथा शेरशाह सूरी के लगान मानचित्र भारत में मध्यकाल में मानचित्र विकास का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
ना ।

आधुनिक काल के प्रारम्भिक दौर में मानचित्र बनाने की कला एवं विज्ञान को पुनजीर्चित किया गया है। सही दिशा, दूरी व क्षेत्रफल के परिशुद्ध माप के लिए ही इस युग में विभिन्न प्रक्षेपों पर मानचित्र बनाए गए हैं। 19वीं शताब्दी में वायव्य (फोटोग्राफी) के सहयोग से मानचित्र बनाने में विशेष प्रगति हुई है। वर्तमान में उपग्रह प्रणाली, सुदूर संवेदन तकनीकी और कम्प्यूटर के सहयोग से कम समय में अधिक उपादेय और सटीक मानचित्र बनाए जाते हैं।

प्रश्न 3. दिशा मापन क्या है?
उत्तर-दिशा मानचित्र पर एक काल्पनिक सीधी रेखा है, जो एकसमान आधार से दिशा की कोणीय स्थिति को प्रदर्शित करती है। मानचित्र पर प्रदर्शित दिशा रेखा उत्तर व दक्षिण दिशा को प्रकट करती है, किन्तु यह शून्य दिशा या आधार दिशा रेखा कहलाती है। अतः एक मानचित्र सदैव उत्तर दिशा को दर्शाता है, अन्य सभी दिशाएँ इसके सम्बन्ध में निर्धारित होती हैं।

प्रश्न 4. क्षेत्र मापन क्या है?
उत्तर-मानचित्र के आकार का मापन क्षेत्र मापन कहलाता है। सामान्यत: इसके लिए वर्गविधि अधिक प्रचलित है। इस विधि द्वारा क्षेत्र को मापने के लिए एक प्रदीप्त ट्रेसिंग टेबल के ऊपर मानचित्र के नीचे एक ग्राफ पेपर रखकर मानचित्र को वर्गों से ढक लेते हैं तथा सम्पूर्ण वर्गों की संख्या एवं आंशिक वर्गों की संख्या सम्मिलित कर एक साधारण समीकरण से क्षेत्रफल ज्ञात कर लिया जाता है। यह समीकरण इस प्रकार है
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 1 Introduction to Maps (मानचित्र का परिचय) img 1
इस विधि के अतिरिक्त ध्रुवीय प्लेनीमीटर के द्वारा भी किसी मानचित्र के क्षेत्रफल की गणना की जा सकती है।

प्रश्न 5. दिशाएँ कितनी होती हैं?
उत्तर-सामान्यतः दिखाएँ चार होती हैं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम)। इन्हें प्रधान दिशाएँ माना जाता है, जबकि इनके प्रधान दिग्बिन्दुओं के बीच कई अन्य मध्यवर्ती दिशाएँ भी होती हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 1 Introduction to Maps (मानचित्र का परिचय) img 2

प्रश्न 6. मानचित्र के आवश्यक लक्षण कौन-से हैं?
उत्तर-शीर्षक, मापक, निर्देश, प्रक्षेप, दिशा तथा परम्परागत या रूढ़ चिह्न मानचित्र के आवश्यक लक्षण हैं।

प्रश्न 7. मानचित्र पर दूरी मापन कैसे सम्भव है?
उत्तर-मानचित्र पर सीधी रेखाओं को पट्टी के द्वारा तथा टेड़ी-मेढ़ी रेखाओं को धागे के द्वारा मापा जाता है और उसे मानचित्र के मापक के द्वारा व्यक्त किया जाता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Bio logy Chapter 4 Animal Kingdom 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 4 Animal Kingdom (प्राणि जगत)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?
उत्तर :

  1. यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात नहीं हैं तब सभी जीवों का पृथक रूप से अध्ययन करना सम्भव नहीं होगा।
  2. जीवों के मध्य परस्पर सम्बन्ध स्थापित करना कठिन होगा।
  3. एक वर्ग के सभी जन्तुओं की केवल एक या दो (UPBoardSolutions.com) जीवों के अध्ययन से जानकारी प्राप्त करना सम्भव नहीं होगा।
  4. अन्य जन्तु जातियों का विकास नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 2.
यदि आपको एक नमूना (specimen) दे दिया जाये तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएँगे?
उत्तर :

  1. संगठन के स्तर (levels or grades of organisation)
  2.  संगठन का पैटर्न (patterns in organisation)
  3. सममिति (symmetry)
  4. द्विकोरिक तथा त्रिकोरिक संगठन (diploblastic and triploblastic organisation)
  5. देहगुहा (body cavity) तथा प्रगुहा (coelom) 6. खण्डीभवन (segmentation)

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प्रश्न 3.
देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर :
देहभित्ति एवं कूटगुहा (pseudocoelom) के बीच प्रगुहा की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति वर्गीकरण के लिए विशेष प्रयोजनीय है। देहगुहा जब मीसोडर्म से स्तरित रहता है तब इसे सीलोम (coelom) कहते हैं। जिन जन्तुओं में सीलोम उपस्थित रहता है उन्हें सीलोमेटा (coelomata) कहते हैं, जैसे एनेलिडा, मोलस्का, आर्थोपोडा, इकाइनोडर्मेटा , हेमीकॉडेंटा तथा कॉडेंटा। कुछ जन्तुओं में देहगुहा मीसोडर्म द्वारा स्तरित नहीं होती, लेकिन एक्टोडर्म एवं एण्डोडर्म के (UPBoardSolutions.com) बीच छोटी-छोटी गोलाकार आकृति में छितरा रहता है। इस तरह की देहगुहा को आहारनाल कहते हैं एवं उन जन्तुओं को स्यूडोसीलोमेटा (pseudocoelomata) कहते हैं, जैसे-एस्केल्मिंथीज (Aschelminthes)। जिन जन्तुओं में देहगुहा अनुपस्थित रहती है उन्हें एसीलोमेट्स (acoelomates) कहते हैं, जैसे-प्लेटीहेल्मिंथीज (Platyhelminthes)।

प्रश्न 4.
अन्तः कोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद करें।
उत्तर :
अन्तः कोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में निम्नलिखित अन्तर है
UP Board Solutions for Class 11 Bio logy Chapter 4 Animal Kingdom image 1 UP Board Solutions for Class 11 Bio logy Chapter 4 Animal Kingdom image 2

प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में निम्नलिखित अन्तर हैं

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 4 Animal Kingdom image 3

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प्रश्न 6.
परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज के विशेष लक्षण बताइए।
उत्तर :

  1. टेगुमेन्ट (tegument) का मोटा स्तर उपस्थित।
  2. पोषक (host) के शरीर में ऊतकों से चिपकने के लिये चूषक (suckers) और प्रायः कंटक या अंकुश (spines or hooks) उपस्थित।
  3. चलन अंग (locomotory organs) अनुपस्थित।
  4.  कुछ चपटे कृमि खाद्य पदार्थ को परपोषी से सीधे अपने शरीर (UPBoardSolutions.com) की सतह से अवशोषित करते हैं।
  5. जनन तन्त्र (reproductive system) पूर्ण विकसित होता है।
  6. प्रायः अवायवीय श्वसन (anaerobic respiration) पाया जाता है।

प्रश्न 7.
आर्थोपोडा प्राणी समूह का सबसे बड़ा वर्ग है। इस कथन के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर :

  1. सुरक्षा के लिए क्युटिकल (cuticle) की उपस्थिति।
  2. विकसित पेशी तन्त्र गमन में सहायक।
  3. कीटों में श्वसनलियों द्वारा श्वसन (tracheal respiration) से सीधे ऑक्सीजन प्राप्त होती है।
  4. संधियुक्त उपांगों (jointed appendages) द्वारा विभिन्न कार्य सम्भव होते हैं।
  5. तन्त्रिका तन्त्र (nervous system) तथा संवेदी अंग (sense organs) विकसित होते हैं।
  6.  संचार हेतु फेरोमोन्स (pheromones) पाये जाते हैं।

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प्रश्न 8.
जल संवहन तन्त्र किस वर्ग का मुख्य लक्षण है
(a) पोरीफेरा
(b) टीनोफोरा
(e) इकाइनोडर्मेटा
(d) कॉडेंटा
उत्तर :
(c) इकाइनोडर्मेटा

प्रश्न 9.
सभी कशेरुकी (vertebrates) रज्जुकी (chordates) हैं लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं इस कथन को सिद्ध कीजिए।
उत्तर :
सभी कॉडेंट्स (chordates) में पृष्ठ रज्जु (notochord) पायी जाती है। कॉडेंट्स के अन्तर्गत यूरोकॉडेंटा तथा सेफैलोकॉडेंटा (दोनों को प्रोटोकॉडेंटा कहा जाता है) तथा वर्टीब्रेटा सम्मिलित हैं। कशेरुकियों (vertebrates) में पृष्ठ रज्जु (notochord) भ्रूणीय अवस्था में (UPBoardSolutions.com) पायी जाती है। वयस्क अवस्था में पृष्ठ रज्जु अस्थिल अथवा उपास्थिल मेरुदंड (backbone) में परिवर्तित हो जाती है। यद्यपि प्रोटोकॉडेंटस में वर्टिब्रल कॉलम (vertibral column) नहीं पायी जाती है। अतः कशेरुकी (vertebrates) रज्जुकी (chordates) भी हैं, परन्तु सभी रज्जुकी, कशेरुकी नहीं हैं।

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प्रश्न 10.
मछलियों में वायु-आशय (air bladders) की उपस्थिति का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
मछलियों में वायु कोष/आशय (air bladders) उत्प्लावन (buoyancy) में सहायक होते हैं। इनकी सहायता से मछलियाँ जल में तैरती हैं। वायु कोष इन्हें जेल में डूबने से बचाते हैं। वायु कोष वर्ग ओस्टिक्थीज (osteichthyes) में पाये जाते हैं जबकि वर्ग कॉन्ड्रीक्थीज (chondrichthyes) में अनुपस्थित होते हैं। जिन मछलियों में वायु कोष नहीं होते हैं उन्हें जल में डूबने से बचने के लिये लगातार तैरना पड़ता है।

प्रश्न 11.
पक्षियों में उड़ने हेतु क्या-क्या रूपान्तरण हैं?
उत्तर :

  1. अग्रपाद (forelimbs) रूपान्तरित होकर पंख बनाते हैं।
  2. अन्त: कंकाल की लम्बी अस्थियाँ खोखली तथा वायुकोष युक्त होती हैं, जिससे शरीर हल्का रहता है।
  3.  मूत्राशय (urinary bladder) अनुपस्थित होता है।
  4.  उड़ने में सहायक पेशियाँ (flight muscles) विकसित होती हैं।

प्रश्न 12.
क्या अण्डजनक तथा जरायुज द्वारा उत्पन्न अण्डे या बच्चे संख्या में बराबर होते हैं? यदि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर :
नहीं, अण्डजनक (oviparous) जन्तुओं में अण्डे से बच्चा मादा शरीर के बाहर अर्थात् बाह्य वातावरण में विकसित होता है। अत: बहुत से अण्डों के नष्ट होने की संभावना होती है। इसलिए ये जन्तु अधिक संख्या में अण्डे देते हैं। जरायुज (viviparous) जन्तुओं में भ्रूण का विकास मादा शरीर के अन्दर होता है। अतः केवल 1 या कुछ बच्चे ही उत्पन्न होते हैं।

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प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से शारीरिक खण्डीभवन किसमें पहले देखा गया?
(a) प्लेटीहेल्मिंथीज
(b) एस्केल्मिंथीज
(c) एनेलिडा
(d) आर्थोपोडा
उत्तर :
(c) एनेलिडा

प्रश्न 14.
निम्न का मिलान कीजिए
(a) प्रच्छद (Operculum)  –  (I) टीनोफोरा (Ctenophora)
(b) पाश्र्वपाद (Parapodia)   – (II) मोलस्का (Mollusca)
(c) शल्क (Scales)  – (III) पोरीफेरा (Porifera)
(d) कंकत पट्टिका(Comb plates)  – (IV) रेप्टीलिया (Reptillia)
(e) रेडूला (Radula)  – (V) एनेलिडा (Annelida)
(f) बाल (Hairs)  – (VI) साइक्लोस्टोमेटा एवं कॉन्ड्रीक्थीज (Cyclostomata and Chondrichthyes)
(g) कीपकोशिका (Choanocytes)  – (VII) मैमेलिया (Mammalia)
(h) क्लोम छिद्र (Gill slits)  –  (VIII) ऑस्टिक्थीज (Osteichthyes)
उत्तर :
(a) (VIII)
(b) (V)
(c) (IV)
(d) (I)
(e) (II)
(f) (VII)
(g) (III)
(h) (VI)

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प्रश्न 15.
मनुष्यों पर पाये जाने वाले कुछ परजीवियों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. टीनिया (फीताकृमि)
  2. एस्केरिस (गोलकृमि)
  3. वुचेरेरिया (फाइलेरिया कृमि)
  4. एनसाइकोस्टोमा (अंकुश कृमि)
  5. ट्राइचुरिस (व्हीप कृमि)
  6. ड्रेकुनकुलस (गुइनिया कृमि)
  7. पेडीकूलस (जू)

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसे जीव जो पानी की सतह पर उतराते रहते हैं, वे क्या कहलाते हैं?
(क) नितलस्थ
(ख) पिलैजिक
(ग) प्लवकीय
(घ) उभयचरी
उत्तर :
(ग) प्लवकीय

प्रश्न 2.
संघ पोरीफेरा का वर्गीकरण किस पर आधारित है ?
(क) नालतंत्र
(ख) कंटिकाएँ
(ग) कोएनोसाइट्स का आकार
(घ) एस्कोसाइट्स
उत्तर :
(ख) कंटिकाएँ

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प्रश्न 3.
स्पंजों में ‘टोटीपोटेन्ट’ कोशिकाएँ होती हैं।
(क) थीजोसाइट्स
(ख) ट्रोफोसाइट्स
(ग) आर्किओसाइट्स
(घ) कोएनोसाइट्स
उत्तर :
(ग) आर्किओसाइट्स

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन स्वतंत्रजीवी है?
(क) फैसिओला
(ख) टीनिया
(ग) प्लैनेरिया
(घ) सिस्टोसोमा
उत्तर :
(ग) प्लैनेरिया

प्रश्न 5.
क्लाइटेलम केंचुए के किन खण्डों में होता है?
(क) 19, 20 तथा 21
(ख) 14, 15 तथा 16
(ग) प्रथम तीन खण्ड
(घ) अन्तिम तीन खण्ड
उत्तर :
(ख) 14, 15 तथा 16

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(क) दोमुँहा सर्प (इरिक्स जोनाई) में मुँह आगे तथा पीछे दोनों ओर होते हैं।
(ख) बड़ों की अपेक्षा छोटे स्तनधारी प्राणियों की आधारी उपापचय दर (बी०एम०आर०) प्रायः अधिक होती है
(ग) फैसिओला हिपेटिका में गुदा द्वार तथा वास्तविक सीलोम नहीं पाया जाता
(घ) एड्रीनल ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन्स को ‘जीवन-रक्षक’ हॉर्मोन्स भी कहते हैं।
उत्तर :
(क) दोमुँहा सर्प (इरिक्स जोनाई) में मुँह आगे तथा पीछे दोनों ओर होते हैं।

प्रश्न 7.
पक्षियों के वायु-कोष सहायक होते हैं।
(क) रुधिर परिसंचरण में
(ख) ताप नियन्त्रण में
(ग) शरीर भार को कम करने में
(घ) शरीर को गर्म रखने में
उत्तर :
(ग) शरीर भार को कम करने में

प्रश्न 8.
निम्न में से किसकी अनुपस्थिति में चिड़िया चमगादड़ से भिन्न होती है ?
(क) समशीतोष्णता (समतापता)
(ख) चतुर्वेश्मी हृदय
(ग) श्वासनली
(घ) डायफ्राम
उत्तर :
(घ) डायफ्राम

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्पंज के व्यक्तित्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
यह बहुकोशिकीय जन्तु होता है जिसका शरीर ऊतकों में विभाजित नहीं होता है। यह जन्तु जलीय होता है तथा अधिकांशतः समुद्रों में, पत्थरों पर, शिलाओं पर, लकड़ी के लट्ठों, अन्य जन्तुओं के खोलों आदि पर चिपका रहता है। इसके शरीर की रचना अति (UPBoardSolutions.com) सरल होती है। इसकी देहभित्ति में असंख्य सूक्ष्मछिद्र होते हैं जिससे बाहरी जल से लगातार इसका सम्पर्क रहता है। यह जल छिद्रों से अन्दर स्पंजगुहा में आता है तथा ऑस्कुलम से बाहर निकल जाता है।

प्रश्न 2.
प्रोटोस्टोमिया तथा ड्यूटेरोस्टोमिया में दो अन्तर बताइए।
उत्तर :

  1. प्रोटोस्टोमिया जन्तुओं का एक समूह है जिसके अन्तर्गत आर्थोपोडा, मोलस्का,ऐनेलिडा तथा अन्य समूह आते हैं। ड्यूटेरोस्टोमिया भी जन्तुओं का एक समूह है, परन्तु इसके अन्तर्गत इकाइनोडर्मेटा, कॉडेंटा, एग्नेथा तथा बैंकिओपोडा समूह आते हैं।
  2. प्रोटोस्टोमिया में पहले मुख को निर्माण होता  है जबकि ड्यूटेरोस्टोमिया में पहले गुदा का निर्माण होता है।

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प्रश्न 3.
केंचुआ तथा तिलचट्टे के उत्सर्जन अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. केंचुआ के उत्सर्जी अंग – वृक्कक
  2. तिलचट्टे के उत्सर्जी अंग – मैल्पीघियन नलिकाएँ

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित जन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए
(i) मकड़ी
(ii) टिड्डी
(iii) तारामीन या सितारा मछली
(iv) घोंघा (पाइला)/सेब घोंघा
(V) कटल फिश
(vi) केंचुआ
(vii) हाइड्रा
(viii) घरेलू मक्खी
(ix) फीताकृमि
(x) लिवर फ्लूक
(xi) यूग्लीना
(xii) पैरामीशियम
(xiii) जोंक
(xiv) समुद्री अर्चिन
(xv) पुर्तगीज मैन ऑफ वार

उत्तर :
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प्रश्न 2.
हाइड्रा में श्रम विभाजन पर टिप्पणी लिखिए। या ऊतकीय विभेदीकरण की परिभाषा दीजिए। हाइड्रा के शरीर की संरचना के सन्दर्भ में इसे संक्षेप में समझाइए।
उत्तर :
ऊतकीय विभेदन तथा शरीर क्रियात्मक श्रम विभाजन प्रत्येक जीवधारी गमन, श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, वृद्धि, जनन आदि जैविक क्रियाएँ करने में सक्षम होता है। प्रोटोजोआ संघ के सदस्य एककोशिकीय (unicellular) होने पर भी उपर्युक्त क्रियाएँ सम्पन्न कर पाते हैं, जबकि उच्च श्रेणी के जन्तु बहुकोशिकीय होते हैं तथा विभिन्न महत्त्वपूर्ण क्रियाओं के लिए उनके अनुसार विशिष्ट ऊतक तन्त्रों एवं अंगों का निर्माण कर लेते हैं। हेनरी मिल्नी एडवर्ड (Henry Milne Edward,1800-1885) के अनुसार, जिस प्रकार मानव समाज में कार्यों का विभाजन (जैसे—अध्यापक, चिकित्सक, इन्जीनियर, कृषक, बढ़ई, लुहार, अन्य मजदूर आदि) होता है, उसी प्रकार प्राणियों के शरीर में जैविक क्रियाओं के लिए कोशिकाओं के बीच क्रियात्मक श्रम विभाजन होता है। प्राणी जगत् में हाइड्रा से ही वास्तविक संरचनात्मक विभेदीकरण तथा इससे सम्बन्धित क्रियात्मक श्रम विभाजन प्रारम्भ हुआ है। हाइड्रो एक द्विस्तरीय (diploblastic) प्राणी है और इसकी देहभित्ति के एक्टोडर्म व एण्डोडर्म स्तर विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। ये कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए उपयोजित होती हैं।

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एक्टोडर्म की उपकला-पेशी कोशिकाएँ मुख्यत: रक्षात्मक होती हैं तथा शरीर के फैलने व सिकुड़ने में सहायता प्रदान करती हैं। अन्तराली कोशिकाएँ रूपान्तरित होकर अन्य प्रकार की कोशिकाओं को जन्म देती हैं। जनन कोशिकाएँ केवल जनन में योगदान देती हैं। दंश कोशिकाएँ सुरक्षा, आक्रमण, चिपकने एवं शिकार पकड़ने का कार्य करती हैं। ग्रन्थिम-पेशी कोशिकाएँ हाइड्रा को आधार से चिपकने एवं गमन में सहायता करती हैं। एण्डोडर्म की पोषक-पेशी कोशिकाएँ अमीबा के समान हाइड्रा को भोजन के प्राणिसम अन्तर्ग्रहण (holozoic ingestion) में सहायता करती हैं। हाइड्रा में कोई विशिष्ट संवहन व उत्सर्जन तन्त्र नहीं पाया जाता है। इस प्रकार, हाइड्रा एक सरल द्विस्तरीय प्राणी है, जिसमें संरचनात्मक विभेदीकरण के क्रियात्मक श्रम विभाजन से सम्बन्धित होने के कारण जैविक क्रियाएँ सुविधापूर्वक सम्पन्न होती हैं।

प्रश्न 3.
पोरीफेरा संघ में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के नाल तन्त्रों का उल्लेख कीजिए। या नाल तन्त्र क्या है ? साइकॉननाल तन्त्र का सचित्र वर्णन कीजिए तथा ल संवहन पथ को  तीरों द्वारा प्रदर्शित कीजिए। नाल तन्त्र के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। या निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-स्पंज में नाल तन्त्र।
उत्तर :
संघ-पोरीफेरा (स्पंजों) में नाल तन्त्र स्पंजों के शरीर की भित्ति में अनेक छिद्रों एवं नलियों का जाल बना होता है, जिसके माध्यम से कीप कोशिकाओं (choanocytes) के कशाभिकों (flagella) की निरन्तर गति होते रहने से स्पंज गुहा (Spongocoel) में जल प्रवाह की धारा अविरल बनी रहती है। इसे नाल तन्त्र या नाल प्रणाली (canal system) कहते हैं। नाल तन्त्र स्पंजों के शरीर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तन्त्र होता है। स्पंजों की सम्पूर्ण कार्यिकी; जैसे-श्वसन, उत्सर्जन, पोषण आदि नाल तन्त्र में प्रवाहित होने वाले जल द्वारा ही पूरी होती है।

नाल तन्त्रों के प्रकार

स्पंजों में शारीरिक संगठन की जटिलता के आधार पर निम्नलिखित प्रकार के नाल तन्त्र पाये जाते हैं।

1. एस्कॉन प्रकार का नाल तन्त्र :
स्पंजों में पाया जाने वाला यह सबसे सरल प्रकार का नाल तन्त्र है। इस प्रकार के नाल तन्त्र में स्पंज गुहा (spongoceal) के अन्दर उपस्थित कीप कोशिकाओं की कशाभिकाओं की निरन्तर गति के कारण बाहरी जल की अविरल धारा असंख्य ऑस्टिया (रन्ध्रों) से होकर सीधे स्पंज गुहा में प्रवेश करती है और ऑस्कुलम से होकर बाहर निकलती है। इस प्रकार स्पंज का पूरा शरीर एक नाले तन्त्र का कार्य करता है। ल्यूकोसोलेनिया Leucosolenia) नामक सरल स्पंज में इसी प्रकार का नाल तन्त्र पाया जाता है।
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2. साइकॉन प्रकार की नाल तन्त्र :
इस प्रकार का नाल तन्त्र साइकॉन (स्काइफा) एवं कुछ अन्य स्पंजों में पाया जाता है। यह मूलतः एस्कॉन प्रकार के नाल तन्त्र की भित्ति में अनुप्रस्थ वलन (transverse folds) हो जाने से बनता है। इससे स्पंज की देहभित्ति, पास-पास सटी व शरीर के अक्ष के समकोण पर स्थित अनेक महीन नलिकाओं का रूप ले लेती है, जिन्हें अरीय नाल (radial canals) कहते हैं। प्रत्येक अरीय नाल बाहर की ओर बन्द होती है और भीतर की ओर एक बड़े छिद्र द्वारा स्पंज गुहा (UPBoardSolutions.com) में खुलती है जिसे निर्गम छिद्र या अपद्वार या एपोपाइल (apopyle) कहते हैं। इस प्रकार के नाल तन्त्र में ऑस्टिया अरीय नलिकाओं की भित्ति में होते हैं जिन्हें आगामी द्वार या प्रोसोपाइल (prosopyle) कहते हैं।

कीप कोशिकाएँ केवल अरीय नालों को स्तरित करती हैं। स्पंज गुहा का भीतरी स्तर पिनैकोसाइट कोशिकाओं का होता है। अरीय नालों की भित्ति के बीच के स्थान अन्तर्वाही नालों (incurrent canals) का रूप ले लेते हैं। ये स्पंज गुहा की ओर बन्द किन्तु शरीर की बाहरी सतह पर खुलती हैं। बाहरी जल पहले अन्तर्वाही नालों में आता है और आगामी द्वार या प्रोसोपाइल (prosopyle) में होकर अरीय नलिकाओं (जिन्हें कशाभीनलिकाएँ भी कहते हैं) में और फिर एपोपाइल्स द्वारा स्पंज गुहा में आता है। स्पंज गुहा में आया हुआ ल ऑस्कुलम से होकर बाहर निकल जाता है।

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3. ल्यूकॉन प्रकार का नाल तन्त्र :
यह सबसे जटिल प्रकार का नाल तन्त्र है। इस प्रकार का नालतन्त्र स्पॉन्जिला (Spongilla) आदि स्पंजों में पाया जाता है। इसका निर्माण कशाभिकी लिकाओं की दीवार के वलन से होता है। वलन के कारण इन नलिकाओं की दीवार में छोटे-छोटे गोले कक्ष बन जाते हैं। इन कक्षों को कशाभिकी कक्ष flagellated chambers) कहते हैं। कीप कोशिकाएँ इन कक्षों की दीवार पर ही सीमित रह जाती हैं। अरीय नलिकाओं की गुहाओं के चारों ओर पिनैकोसाइट्स का स्तर होता है। इन्हें अपवाही नलिकाएँ (excurrent canals) कहते हैं। इसमें बाहरी जल पहले अन्तर्वाही नलिकाओं (incurrent canals) में, फिर प्रोसोपाइल्स से कशाभी कक्षों में और एपोपाइल्स से अपवाही नलिकाओं में से होता हुआ स्पंज गुहा में आकर ऑस्कुलम से बाहर निकल जाता है।

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प्रश्न 4.
दंश कोशिकाओं की संरचना एवं कार्य समझाइए। या हाइड्रा में पायी जाने वाली दो प्रकार की दंश कोशिकाओं का सचित्र वर्णन कीजिए। , या हाइड्रा की दंश कोशिका की स्खलित अवस्था का एक नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की । आवश्यकता नहीं है)। या हाइड्रा में पायी जाने वाली पेनीट्रैण्ट प्रकार की दंश कोशिकाओं का सचित्र वर्णन कीजिए। या टिप्पणी लिखिए-दंश कोशिका।
उत्तर :

दंशिका की संरचना

दंश कोशिका की इस थैलीनुमा रचना का मुख्य भाग सम्पुट (capsule) कहलाता है। सम्पुट के अग्र सिरे पर भित्ति अन्दर की ओर धंसकर एक गड्डा बनाती है, जो झिल्ली द्वारा ढका रहता है। इस गड्ढे में पायी जाने वाली सूक्ष्म कणिकाओं में एक विशिष्ट पदार्थ भरा रहता है। यह सम्पुट (UPBoardSolutions.com) के ढक्कन (lid of operculum) का कार्य करता है। भीतर की ओर धंसने वाली भित्ति एक लम्बे, कुण्डलित वे काँटेदार सूत्र (thread) में रूपान्तरित होती है।
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दंशिकाओं के प्रकार

संध निडेरिया के विभिन्न सदस्यों में पायी जाने वाली दंश कोशिकाओं में लगभग 30 प्रकार की दंशिकाएँ होती हैं। हाइड्रा में कुल चार प्रकार की दंशिकाएँ पायी जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।

1. स्टीनोटील्स अथवा पेनीटैण्ट्स (Stenoteles or Penetrants) :
ये सबसे बड़ी व जटिल रचना वाली दंशिका हैं। इनके बड़े कुन्दे पर स्टाइलेट्स व शूल (stylets and spines) पाये जाते हैं। इनके सूत्रों पर भी शूलों (spines) की तीन सर्पिल पंक्तियाँ होती हैं।

2. होलोट्राइकस आइसोराइजाज (Holotrichous Isorhizas) :
ये कुछ लम्बी, अण्डाकार तथा कुन्दविहीन होती हैं। इनका सूत्र लम्बा व सिरे पर खुला होता है। इन पर स्पाइन्स की केवल एक ही सर्पिल पंक्ति होती है।
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3. एट्राइकस आइसोराइजाज (Atrichous Isorhizas) :
ये कुछ छोटी होती हैं तथा इनके सूत्रों पर स्पाइन्स नहीं पाये जाते हैं।

4. डेस्मोनीम या वॉलवेण्ट (Desmoneme Or Volvent) :
सबसे छोटी, 9 μ व्यास की, नाशपाती के आकार की, गोल व अण्डाकार इन दंशिकाओं को सूत्र छोटा, मोटा, सिरे पर बन्द व कुन्दविहीन होता है। ये एक ही बार कुण्डलित होती हैं तथा इन पर केवल कुछ ही स्पाइन्स पाये जाते हैं।

5.दंशिकाओं का दगना या स्खलन (Dscharge of Nematocysts)
उत्तेजित होने पर दंश कोशिकाओं के सूत्र तुरन्त झटके के साथ ऑपरकुलम को धकेल कर बाहर निकल आते हैं। इस प्रकार भीतरी पदार्थ एवं काँटे सूत्र के साथ दंशिका की बाहरी सतह पर आ जाते हैं। इवान्जोफ (Iwanzoff, 1895) के मतानुसार दंशिका में जब भी द्रव्य का दबाव बढ़ता है तो यह स्खलित हो जाती है।

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दंशिकाओं के कार्य

  1.  स्टीनोटील्स या पेनीट्रैण्ट्रेस का सूत्रे भोजन योग्य शिकार के सम्पर्क में आने पर तेजी से दगकर  शिकार के शरीर में चुभ जाता है। यह हिप्नोटॉक्सिन (hypnotoxin) नामक विषैले पदार्थ द्वारा शिकार को अचेत कर मार देता है।
  2.  डेस्मोनीम्स जब शिकार के सम्पर्क में आती हैं तो इनके सूत्र शिकार को चारों ओर से लपेटकर (UPBoardSolutions.com) जकड़ लेते हैं।
  3. होलोट्राइकस आइसोराइजाज के सूत्रों के स्पाइन्स शत्रु के शरीर में घुसकर हाइड्रा को उससे बचाने में सहायता करते हैं।
  4. एट्राइकस आइसोराइजाज के सूत्र चिपचिपे होते हैं। ये उपयुक्त आधार पर स्पर्शकों को चिपकने में सहायता करते हैं। इस प्रकार ये हाइड्रा को गमन में सहयोग देते हैं।

प्रश्न 5.
ज्वाला कोशिका किसे कहते हैं? यह किस जन्तु में पायी जाती हैं? इसके कार्य लिखिए। या ज्वाला कोशिकाओं की संरचना एवं कार्य समझाइए।
उत्तर :
ज्वाला कोशिकाएँ या शिखा कोशिकाएँ ये विशेष प्रकार की उत्सर्जी (excretory) कोशिकाएँ हैं जिनमें प्रमुखतः दो भाग होते हैं।

  1.  कोशिका का प्रमुख अण्डाकार भाग कोशिका काय (cell body) कहलाता है। इसको शिखा कन्द (flame bulb) भी कहते हैं। इसी भाग में केन्द्रक (nucleus) होता है। इसकी सतह से लगभग सभी ओर शाखित प्रवर्द्ध (cytoplasmic processes) निकले रहते हैं जो पैरेन्काइमा में इधर-उधर फैले रहते हैं।
  2. शिखा कन्द से एक ओर एक लम्बा सँकरा तथा नाल के समान भाग होता है जिसका अन्दर का खोखला भाग कन्द के अन्दर उपस्थित गुहा से सम्बन्धित होता है। यह गुहा काफी चौड़ी होती है। इसके चौरस भाग के जीवद्रव्य में छोटे-छोटे कई आधार कण (basal granules) होते हैं। जिनसे कशाभिकाएँ (flagella) निकलकर गुहा में लटकी रहती हैं तथा एक लौ के समान हर समय काँपती रहती हैं। ये आपस में गुच्छा बनाती हैं। यह गुहा सँकरी होकर एक महीने नलिका के रूप में अन्य नलिकाओं से सम्बन्धित रहती है।
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ज्वाला कोशिकाएँ प्लेटीहेल्मिन्थीज समूह की उत्सर्जन इकाइयाँ होती हैं। टीनिया जैसे अन्त:परजीवी जन्तुओं में इनका कार्य स्पष्ट नहीं है।

प्रश्न 6.
नर तथा मादा ऐस्कैरिस में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या मनुष्य के शरीर में पाये जाने वाले गोलकृमि का वैज्ञानिक नाम व वासस्थान (अंग) लिखिए तथा उनके नर व मादा के एक-एक पहचान के लक्षण बताइए।
उत्तर :
मनुष्य में पाया जाने वाला गोलकृमि-ऐस्कैरिस लम्ब्रीकॉयडिस (Ascaris lumbricoides)। इसका वासस्थान (अंग)-मनुष्य की आँत।

नर तथा मादा ऐस्कैरिस में अन्तर

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित के नामांकित चित्र बनाइए

(क) मादा ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट।
(ख) नर ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट।

उत्तर :

(क)
मादा ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट

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(ख)
नर ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट

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प्रश्न 8.
केंचुए के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए या “केंचुए किसानों के परम मित्र हैं?” संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। या केंचुए की जैव पारिस्थितिकी एवं आर्थिक महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
केंचुए का आर्थिक महत्त्व केंचुए ‘किसान के मित्र’ कहे जाते हैं, क्योंकि वे खेतों की मिट्टी को सुरंगें बनाकर पोली कर देते हैं तथा नीचे की मिट्टी को ऊपर पलट देते हैं, जिससे भूमि अधिक उपजाऊ बनती है। इसके साथ ही केंचुए कार्बनिक पदार्थों को सुरंगों में ले (UPBoardSolutions.com) जाते हैं जो खाद के रूप में सहायक होते हैं तथा केंचुए स्वयं भी मरकर सुरंगों के अन्दर खाद के रूप में बदल जाते हैं। केंचुए से मनुष्य को खेती के लिए उपजाऊ भूमि प्राप्त करने के अतिरिक्त अन्य लाभ भी हैं; जैसे

  1. ऑस्ट्रेलिया की आदिम जातियाँ केंचुए को भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं।
  2.  काँटों में लगाकर मछलियों को पकड़ने हेतु इसे चारे के रूप में प्रयोग करते हैं।
  3. अपने देश में गठिया रोग के लिए यह औषधि बनाने के काम में आता है।
  4. प्रयोगशाला में अध्ययन सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता है। केंचुओं से होने वाली हानियाँ कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती हैं। कई बार वर्षा ऋतु में इनके द्वारा बनायी गयी सुरंगों के ढेर मृदा अपरदन का कारण बन जाते हैं। केंचुओं की कुछ जातियाँ पान, इलायची, धान आदि के पौधों के लिए हानिकारक होती हैं।

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प्रश्नु 9.
किन्हीं दो ऐसे लक्षणों को लिखिए जो नॉन-कॉडेंट्स को कॉडेंट्स से पूर्णतः विभेदित करते हैं?
उत्तर :
कॉडेंट एवं नॉन-कॉडेंट में अन्तर
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प्रश्न 10.
निम्नलिखित के संघ सहित जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए

(क) जेली फिश (jelly fish)
(ख) सिल्वर फिश (silver fish)
(ग) स्टार फिश (star fish)
(घ) डॉग फिश (dog fish)
(ङ) कबूतर (pigeon)
(च) खरगोश (rabbit)
(छ) जोंक (leech)

उत्तर :
सामान्य नाम :
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प्रश्न 11.
चमगादड़ का वर्गीकरण वर्ग तक कीजिए तथा इसके दो लक्षण लिखिए।या चमगादड़ चिड़ियों के समान उड़ता है फिर भी इसे स्तनी वर्ग में क्यों रखा गया है ?
उत्तर :
लक्षण :

  1. शरीर पर बाल (hair) तथा बाह्य कर्ण (pinna) होते हैं।
  2.  मादा बच्चे उत्पन्न करती है तथा अपनी स्तन ग्रन्थियों से बच्चों को दूध पिलाती है। उपर्युक्त (UPBoardSolutions.com) दोनों ही लक्षण स्तनियों के मूल लक्षण हैं। इनके शरीर पर अथवा विकास में पक्षियों के कोई लक्षण; जैसे शरीर पर परों (feathers) की उपस्थिति आदि नहीं होते हैं अतः इन्हें स्तनी वर्ग में ही रखा जाता है।

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प्रश्न 12.
कारण बताइए

(अ) हेल मछली नहीं, स्तनधारी है। क्यों?
(ब) एकिडना अण्डे देता है, फिर भी स्तनधारी वर्ग का सदस्य है। क्यों?
उत्तर :
ह्वेल मछली तथा एकिडना दोनों को ही संघ कॉडेंटा वर्ग-स्तनधारी में रखा गया है, क्योंकि इनमें बाल तथा स्तन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। दाँत, विषमदन्ती एवं गर्तदन्ती होते हैं। ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या सात होती है। मध्य कर्ण में तीन छोटी अस्थियाँ पाई जाती हैं।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित जन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए

(i) जेली फिश (jelly fish)
(ii) मेंढक (frog)
(iii) गौरेया (sparrow)
(iv) कुत्ता मछली (स्कोलिओडॉन) (dog fish)
(v) समुद्री घोड़ा (sea horse)
(vi) घरेलू छिपकली (wall lizard)
(vii) नाग(cobra)
(viii) कबूतर (pigeon)
(ix) आधुनिक मनुष्य (modern man)
(x) झींगा मछली (prawn)
(xi) तिलचट्टा (cockroach)
(xii) टोड  (toad)
(xiii) ड्रैको (Draco)
(xiv) खरगोश (rabbit)

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प्रश्न 2.
कॉडेटा संघ के प्राणियों के मूल लक्षणों का सविस्तार वर्णन कीजिए। स्तनी वर्ग के प्राणियों को उपवर्ग तक प्रमुख लक्षणों एवं उदाहरण सहित वर्गीकृत कीजिए। या स्तनी वर्ग के प्राणियों के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए तथा प्रोटोथेरिया, मेटाथेरिया एवं यूथेरिया में उदाहरणों सहित अन्तर बताइए। या पृष्ठवंशी के चार मूल लक्षणों को लिखिए।
उत्तर :

संघ-कॉडेंटा के प्रमुख लक्षण

  1. कॉडेटा संघ के प्राणियों का शरीर द्विपार्श्व सममित (bilaterally symmetrical), देहगुहीय (coelomate) तथा त्रिजनस्तरीय (triploblastic) होता है।
  2.  इनके जीवन में किसी-न-किसी अवस्था में शरीर के मध्य पृष्ठ भाग में मेरुदण्ड अथवा नोटोकॉर्ड (notochord) अवश्य ही पाया जाता है।
  3.  इनमें जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में ग्रसनी (pharynx) की (UPBoardSolutions.com) दीवार में एक जोड़ा गिल दरारों (gills clefts) को अवश्य बनती है।
  4.  इनमें शरीर के पृष्ठ मध्य तल में मस्तिष्क से लेकर शरीर के पिछले सिरे तक विस्तृत एक खोखली केन्द्रीय तन्त्रिका नाल (central neural tube) पायी जाती है।
  5.  इनमें हृदय देहगुहा में अधर तल पर स्थित होता है तथा रुधिर परिसंचारी तन्त्र बन्द (closed) प्रकार का होता है।
  6. इनमें रुधिर में लाल रुधिर कणिकाएँ (red blood corpuscles) पायी जाती हैं जिनमें ऑक्सीजन ग्राही हीमोग्लोबिन (haemoglobin) नामक लाल वर्णक पाया जाता है

स्तनधारियों (मैमेलिया) के प्रमुख लक्षण

  1.  इस वर्ग के जन्तु नियततापी होते हैं अर्थात् इनका ताप सदैव एक-सा रहता है।
  2.  इन जन्तुओं की त्वचा रोमयुक्त होती है। अधिकतर जन्तुओं का शरीर बालों (hair) से ढका रहता है।
  3.  इनमें बाह्य कर्ण (external ears) पाये जाते हैं।
  4. मादी में स्तन ग्रन्थियाँ (mammary glands) होती हैं, जिनसे ये नवजात शिशु को दूध पिलाती है।
  5.  गर्दन में केवल सात ग्रीवा कशेरुकाएँ (cervical vertebrae) होती हैं।
  6. त्वचा में तेल ग्रन्थियाँ (oil glands) तथा स्वेद ग्रन्थियाँ (sweat glands) होती हैं।
  7. देहगुहा एक पेशीय मध्यछद या डायफ्राम (diaphragm) द्वारा वक्षीय गुहा तथा उदरगुहा (thoracic and abdominal cavity) में बँटी रहती है।
  8. हृदय में चार कोष्ठ (four chambers) होते हैं तथा यह पूर्ण विकसित होता है। केवल बायाँ दैहिक चाप (left systemic arch) ही उपस्थित होता है।
  9.  मुख गुहिका (buccal cavity) नासामार्ग (nasal passage) से एक उपास्थि-अस्थि की प्लेट से अलग रहती है।
  10. श्वसन केवल फेफड़ों (lungs) के द्वारा होता है।
  11.  कपाल तन्त्रिकाएँ (cranial nerves) बारह जोड़े होती हैं।
  12.  नर स्तनधारियों में शिश्न (penis) के रूप में मैथुन अंग होता है तथा वृषण (testes) उदरगुहा के बाहर वृषण कोषों (scrotal sacs) में पाये जाते हैं।
  13.  योनि एकल (vagina single) होती है तथा दोनों गर्भाशय परस्पर पूर्णतः मिले रहते हैं।
  14. निषेचन मादा के शरीर के अन्दर अण्डवाहिनी (fallopian tube) में होता है।
  15.  बच्चों को जन्म देते हैं जिनका परिवर्द्धन गर्भाशय (uterus) में होता है। (कुछ स्तनधारी; जैसे-एकिडना (echidna) तथा डकबिल प्लेटीपस या ऑर्निथोरिंकस (Ornithorhynchus) अण्डे देते हैं।

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स्तनधारियों का वर्गीकरण

पुराने वर्गीकरण में वर्ग मैमेलिया को सीधे तीन उपवर्गों (subclasses) में बाँट दिया करते थे-प्रोटोथेरिया, मेटाथेरिया तथा यूथेरिया किन्तु वर्तमान में वर्ग मैमेलिया को दो उपवर्गो-प्रोटोथेरिया (prototheria) तथा थेरिया (theria) में वर्गीकृत करते हैं।

उपवर्ग 1.
प्रोटोथेरिया :

  1.  चुचुक स्पष्ट नहीं होते, स्तन ग्रन्थियाँ सक्रिय।
  2. अण्डे देते हैं शिशु बाहर ही अण्डे से निकलता है।
  3.  जरायु (placenta) उपस्थित नहीं।
  4.  एक ही छिद्र अवस्कर द्वार (Cloacal aperture) के रूप में।
  5.  मस्तिष्क में कॉर्पस कैलोसम अनुपस्थित।

उदाहरण :

(i) डकबिल प्लेटोपस (Duckbill platypus) या ऑर्निथोरिंकस (Ornithorhynchus),
(ii) एकिडना (echidna) आदि।

उपवर्ग 2.
थेरिया

अधिवर्ग 1 :

पैण्टोथेरिया (Pantotheria) :
सभी जन्तु विलुप्त हो चुके हैं।

अधिवर्ग 2 :

मेटाथेरिया (Metatheria) :
कुछ ही जन्तु जीवित हैं। इनके निम्नलिखित लक्षण हैं।

  1.  मादा के उदर पर चूचुकों को ढके हुए त्वचा की थैली होती है, इसे शिशुधानी या मार्क्सपियम (marsupium) कहते हैं। जन्म के समय शिशु अपरिपक्व होते हैं। ये रेंगकर, शिशुधानी में पहुँचकर, अपने मुख द्वारा चूचुकों (UPBoardSolutions.com) से चिपक जाते हैं तथा दुग्धपान करते हैं।
  2.  कपाल गुहा छोटी होती है।
  3. दाँत जीवन में केवल एक ही बार निकलते हैं (monophyodont)
  4.  जरायु (placenta) अल्प विकसित अथवा अनुपस्थित होता है।
  5. गर्भाशय तथा योनि जोड़े में (paired) होते हैं।

उदाहरण :

(i) ऑस्ट्रेलिया का कंगारू (Macropus)
(ii) तस्मानिया का डैसीयूरस (Dasyurus)
(iii) अमेरिका : का ओपोसम (Opossum or Didelphis)

अधिवर्ग 3.

यूथेरिया (Eutheria) :
पूर्ण विकसित स्तनी हैं। इनके निम्नलिखित लक्षण हैं।

  1. मादा के गर्भाशय में भ्रूण एवं शिशु का जरायु (placenta) द्वारा पूर्ण पोषण होने से शिशु जन्म के समय पूर्ण परिपक्व।
  2. मार्क्सपियम अनुपस्थित, चूचुक भली-भाँति विकसित।
  3. कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) तथा मस्तिष्क भली-भाँति विकसित।
  4. गर्भाशय एवं योनि केवल एक-एक (uterus and vagina single) होते हैं।

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उदाहरण :

(i) चूहा
(ii) खरगोश
(iii) चमगादड़
(iv) ह्वेल
(v) हाथी
(vi) मनुष्य आदि।

प्रश्न 3.
उभयचर वर्ग के प्राणियों के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए। इस वर्ग को गण तक उनके लक्षणों एवं उदाहरणों सहित वर्गीकृत कीजिए। या उभयचर वर्ग (क्लास एम्फिबिया) के दो प्राणियों के जन्तु-वैज्ञानिक नाम लिखिए तथा उनके चार प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर :

उभयचरों के प्रमुख लक्षण

  1.  ये जीवन चक्र का अधिकांश भाग जल व थल दोनों स्थानों पर पूरा करते हैं। इनके शरीर असमतापी (cold blooded) होते हैं। शरीर सिर, धड़ व पुच्छ में विभाज्य होता है।
  2. त्वचा शल्कविहीन होती है तथा इसमें अनेक श्लेष्म ग्रन्थियाँ (mucous glands) व विष ग्रन्थियाँ (poison glands) होती हैं। इस पर बाल या फर भी नहीं होते। त्वचा अधिकांशतः चिकनी तथा नम होती है। सभी ग्रन्थियाँ बहुकोशिकीय होती हैं।
  3. सभी में कायान्तरण (metamorphosis) पाया जाता है।
  4. अवस्कर वेश्म (cloacal chamber) उपस्थित होता है।
  5. करोटि (skull) में रीढ़ की अस्थि की प्रथम कशेरुका के (UPBoardSolutions.com) साथ सन्धियोजन (articulation) के लिए दो पश्चकपाल मुण्डिकाएँ (occipital condyles) होती हैं।
  6. उँगलियों में नख या नखर (claws) आदि नहीं होते हैं।
  7. हृदय त्रिवेश्मी (three-chambered) होता है, दो अलिन्द (auricles) व एक निलय। इनकी लाल रुधिर कणिकाएँ (RBCS) केन्द्रकयुक्त (nucleated) होती हैं।
  8. उत्सर्जन वृक्कों (nephridia) द्वारा। ये यूरिया उत्सर्गी (ureotelic) होते हैं।
  9. ये अंडायुज (oviparous) होते हैं। अण्डे जल में या नम जगहों में दिये जाते हैं। इनके चारों ओर जेली की तरह लसलसे पदार्थ का सुरक्षात्मक आवरण होता है।
  10. एकलिंगी (unisexual) अर्थात् नर तथा मादा अलग-अलग होते हैं। निषेचन आन्तरिक या पानी में होता है।
  11.  लारवा पूर्ण रूप से जलचारी होता है। इनमें श्वसन क्लोमों (gils) द्वारा होता है, जबकि वयस्क अवस्था में (केवल कुछ अपवादों को छोड़कर) फेफड़ों द्वारा तथा नम और रुधिर वाहिनियों के घने जाल से युक्त त्वचा द्वारा होता है।

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उदाहरण :

1. सामान्य मेंढक  :
राना टिग्रीना तथा
2. टोड :
ब्यूफो मिलेनोस्टिक्टस

उभयचरों का वर्गीकरण

विलुप्त तथा जीवित सभी उभयचरों को पाँच उपवर्गों तथा 10 गणों में वर्गीकृत किया गया है।

A.
उपवर्ग लेबरिन्थोडोन्शिया (Labrinthodontia) :

विकास में पहले उभयचर। केवल विलुप्त जातियाँ। तीन गणों (orders) में वर्गीकृत; जैसे – सेमूरिया (Seymouria)

B.
उपवर्ग लीपोस्पोन्डाइली (Lepospondyli) :

सभी विलुप्त पुरातन उभयचर। तीन गंणों में वर्गीकृत; जैसे-डिप्लोकॉलस (Diplocaulus)।

C.
उपवर्ग सैलेन्शिया (Salientia) :

दो गण

  1. प्रोएन्यूरा (proanura) सभी विलुप्त
  2.  एन्यूरा (anura) कुछ विलुप्त और अन्य विद्यमान जातियाँ; जैसे-मेंढक तथा टोड (frogs and toads)

लक्षण :

  1.  वयस्क में पूंछ व क्लोम अनुपस्थित।
  2. धड़ छोटा, करोटि छोटी।
  3.  कशेरुकाएँ कम, अन्तिम कशेरुका छड़नुमा यूरोस्टाइल (urostyle)
  4.  पश्चपाद अग्रपादों से लम्बे, अँगुलियाँ जालयुक्त (webbed)
  5.  अन्त:कंकाल का काफी भाग उपास्थीय।
  6. अण्डनिक्षेपण, संसेचन एवं भ्रूणीय परिवर्धन जल में जीवन-वृत्त में मछली-सदृश भेकशिशु (tadpole) प्रावस्था। अतः कायान्तरण (metamorphosis) महत्त्वपूर्ण; जैसे-टोड (Bufo), हायला (Hyla), मेंढक (Rana)

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D.
उपवर्ग यूरोडेला (Urodela) :

विलुप्त एवं विद्यमान जातियाँ, एक ही गण, कॉडेटा (Caudata)

लक्षण :

  1. शरीर सिर, धड़ एवं पूँछ में विभेदित धड़ लम्बा।
  2. दोनों जोड़ी पाद लगभग समान लम्बाई के।
  3.  मेखलाएँ उपास्थीय।
  4. जातियाँ कुछ पूर्णरूपेण जलीय, कुछ मुख्यत: स्थलीय; श्वसनांग जलीय जातियों में क्लोम, स्थलीय में फेफड़े।
  5. भेकशिशु वयस्क के समान अतः कायान्तरण स्पष्ट नहीं। उदाहरण-सैलामैण्डर (Salamender), नेक्ट्यू रस (Necturus) आदि।

E.
उपवर्ग ऐपोडा (Apoda) :

एक गण जिम्नोफियोना (Gymnophiona)

लक्षण :

  1. बिलों में रहने वाले पादविहीन उभयचर।
  2. शरीर लम्बा व सँकरा, देखने में केंचुए जैसा।
  3. पादों की मेखलाएँ नहीं।
  4. सिर सुरंग खोदने के लिए मजबूत, नेत्र अर्धविकसित, पलकरहित व प्रायः त्वचा से ढके।
  5.  त्वचा चिकनी, इस पर अनुप्रस्थ झुर्रियाँ।
  6. पूँछ छोटी या अनुपस्थित।
  7.  क्लोम (gills) केवल शिशु में। वयस्क में श्वसन फेफड़ों द्वारा; जैसे-इक्थियोफिस (Ichithyophis)

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प्रश्न 4.
सरीसृप वर्ग के प्राणियों के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए तथा गण तक उदाहरण सहित वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर :

वर्ग रेप्टीलिया (सरीसृप) के प्रमुख
लक्षण :

  1. ये साधारणतः स्थलवासी होते हैं, लेकिन कुछ जलवासी भी होते हैं।
  2. इनमें बाह्य कर्ण छिद्र अनुपस्थित, लेकिन टिम्पैनम कर्ण उपस्थित हैं।
  3.  ये थल पर रेंगकर (repere = crawl) चलते हैं इसलिए, इस वर्ग को रेप्टीलिया कहा जाता है।
  4.  ये असमतापी जन्तु हैं।
  5. त्वचा में एपिडर्मल शृंगी शल्क (epidermal horny scales) पाए जाते हैं।
  6. त्वचा रुखी होती है। इसमें ग्रन्थियाँ (glands) नहीं होती हैं।
  7. अन्त:कंकाल अस्थि (bony) का बना होता है।
  8. खोपड़ी में केवल एक ऑक्सिपिटल कॉण्डाइल, (Occipital condyle) होता है।
  9.  क्लोम (gills) विकास की प्रारम्भिक अवस्था में पाए जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) वयस्क में श्वसन-क्रिया फेफड़े। (lungs) द्वारा होती है।
  10.  हृदय में दो अलिंद तथा आंशिक रूप से विभाजित एक निलय (ventricle) होता है।
  11. लाल रुधिर कणिकाएँ पाई जाती हैं।
  12. आहारनाल, जनन तथा मूत्रवाहिनियाँ क्लोएका में खुलती हैं, इसलिए पृथक्-पृथक् गुदा एवं जनन छिद्र नहीं होते हैं।
  13. साधारणतः अन्त:निषेचन (internal fertilization) होता है। अण्डे बड़े और चूनेदार (calcareous) कवच (shell) द्वारा आच्छादित रहते हैं।
  14.  इनमें कोई लार्वा अवस्था नहीं होती।

सरीसृपों का वर्गीकरण

सरीसृप वर्ग को निम्नलिखित 6 उपवर्गों में बाँटा गया है।

(क)
उपवर्ग ऎनेप्सिडा (Subclass Anapsida) :

करोटि का पृष्ठ भाग पूर्ण अर्थात् इसके टेम्पोरल क्षेत्र में कोई छिद्र (fossa) नहीं, क्वाड्रेट अस्थि कर्ण अस्थि से समेकित। तीन गण (orders), दो में केवल विलुप्त जातियाँ, केवल एक (किलोनिया) में विलुप्त एवं विद्यमान जातियाँ। गण किलोनिया (Order Chelonia)-विभिन्न प्रकार के कछुए (turtles, tortoises and terrapins)।

  1. जल में, कभी-कभी किनारे की नम भूमि पर आ जाते हैं।
  2.  शरीर चौड़ा, हॉर्न (horm) एवं अस्थि के बने कठोर खोल (shell) में बन्द। खोल का पृष्ठभाग पृष्ठवर्म अर्थात् कैरापेस (carapace) तथा अधर भाग प्लास्ट्रोन (plastron)} खोल पर चिम्मड़ त्वचा ढकी, त्वचा सपाट या षट्भुजीय प्रशल्कों (scutes) द्वारा ढकी।
  3.  सिर, पाद एवं पूँछ शल्कों से ढके। इन्हें खोल में समेटकर जन्तु शत्रुओं से रक्षा करता है।
  4. जबड़े हॉर्न के बने, दन्तविहीन।
  5. क्वाड्रेट हड्डी अचल।
  6.  अवस्कर छिद्र अनुलम्ब दरार के रूप में।
  7. नर में उत्तेजित होकर तनने वाला मैथुन अंग (copulatory organ) अर्थात् शिश्न (penis)
  8. मादा भूमि में गड्ढा बनाकर अण्डे देती और रेत से इन्हें ढक देती है।

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उदाहरण :

ट्रायोनिक्स (Trionyx) :

भारतीय नदियों का कछुआ

  1. कीलोन (Chelone)
  2. टेस्टुडो (Testudo)

(ख)
उपवर्ग यूरेऐप्सिडा (Subclass Euryapsida) :

विलुप्त जातियाँ, दो गण।

(ग)
उपवर्ग सिनेप्सिडा (Subclass Synapsida) :

विलुप्त जातियाँ, दो गण।

(घ)
उपवर्ग इथिओप्टेरीजिया (Subclass Ichthyopterygia) :

विलुप्त जातियाँ, एक गण।

(ङ)
उपवर्ग लेपिडोसॉरिया (Subclass Lepidosauria) :

एक विलुप्त तथा दो विलुप्त एवं विद्यमान जातियों के गण।करोटि (skull) के टेम्पोरल क्षेत्र में दो जोड़ी टेम्पोरल छिद्र (temporal fossae)

विलुप्त एवं विद्यमान जातियों के दो गण निम्नलिखित हैं

1.
गण रिकोसिफैलिया (Order Rhynchocephalia) :

इसकी अब एक ही जाति स्फीनोडॉन पंक्टेटस (Sphenodon punctatus)-न्यूजीलैण्ड के निकट छोटे-छोटे द्वीपों में पाई जाती है। इसे स्थानीय लोग टुआटरा (Tuatara) कहते हैं। इसके लक्षण विलुप्त सरीसृपों जैसे हैं। अतः ये “जिन्दा जीवाश्म (living fossils)’ कहलाते हैं। लगभग 55 सेमी लम्बा शरीर छिपकली-जैसा और बहुत सुस्त। बिलों से रात्रि में निकलकर (nocturnal) केंचुओं, घोंघों, कीड़ों आदि को खाते हैं। उपापचय (metabolism) की दर बहुत कम, परन्तु आयु लगभग 100 वर्ष मध्यवर्ती तीसरा नेत्र तथा त्वचा की शल्कें दानों के रूप में। नर में मैथुन अंग नहीं। अण्डे छोटे। अवस्कर छिद्र दरार जैसा।

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2.
गण स्क्वै मैटा (Order Squamata) :

छिपकलियाँ (lizards) एवं सर्प (snakes)

  1.  कुछ जलीय; शेष जंगलों, खेतों, घरों, बगीचों आदि में; कुछ बिलों में रहने वाले।
  2. तेजी से रेंगकर शत्रुओं से बचने की क्षमता।
  3.  त्वचा के हॉर्नी शल्कों के आवरण का समय-समय पर टुकड़ों या केंचुल के रूप में त्याग (moulting)
  4.  पूँछ लम्बी।
  5. जबड़े करोटि से दोनों ओर एक-एक चल क्वाड्रेट हड्डी द्वारा इस प्रकार जुड़े कि मुख-ग्रासने गुहिका बहुत चौड़ी खुल सकती है। दाँत जबड़ों की हड्डियों से समेकित (fused)
  6.  कशेरुकाएँ अग्रगर्ती (procoelous)
  7.  नर में दोहरा मैथुन अंग।
  8.  अवस्कर छिद्र अनुप्रस्थ दरार जैसा। दो उपगण

(अ)
उपगण लैसरटिलिया या सॉरिया (Suborder Lacertilia or Sauria) छिपकलियाँ।

  1. पाद प्रायः विकसित और पंजेदार।
  2.  नेत्रों की पलकें प्रायः चल।
  3. अंसमेखला प्रायः विकसित।
  4. निचले जबड़े के अर्धाश आगे परस्पर समेकित।
  5.  स्टर्नम, टिम्पैनम एवं मूत्राशय उपस्थित।
  6.  मस्तिष्क खोल आगे से खुला। उदाहरण-घरेलू छिपकली अर्थात् हेमोडेक्टाइलस (Hemidactylus), गोह अर्थात् वैरेनस (Varunus), साँडा अर्थात् यूरोमेस्टिक्स (Uromastix), विषैली छिपकली-हीलोडर्मा अर्थात् गिला मोन्स्टर (Heloderma-Gila monster) आदि।

(ब)
उपगण ओफीडिया या सर्पेन्टीज (Suborder Ophidia or Serpentes) सर्प।

  1. पाद स्टर्नम, टिम्पैनम, अंसमेखला तथा मूत्राशय प्रायः अनुपस्थित।
  2.  निचले जबड़े के अर्धांश आगे एक लचीले स्नायु (ligament) द्वारा जुड़े। अतः मुख शिकार को समूचा निगलने के लिए काफी फैल सकता है।
  3.  मस्तिष्क खोल आगे से बन्द।
  4. चल पलकों तथा बाह्य कर्णछिद्रों का अभाव।
  5. प्रायः लम्बी और आगे से कटी हुई जीभ संवेदांग का काम करती है।
  6. बायां फेफड़ा छोटा या अनुपस्थित।
  7.  दाँत पतले व नुकीले।
  8. मूत्राशय अनुपस्थित।

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उदाहरण :

(i) अजगर (Python)
(ii) काला नाग या कोबरा (Cobra-Ngja)
(iii) करैत (Bungarus)
(iv) वाइपर (Viper)

(च)
उपवर्ग आर्कोसॉरिया (Subclass Archosauria) :

चार विलुप्त जातियों के गण। केवल एक गण, क्रोकोडिलिया, में विद्यमान जातियाँ।

गण क्रोकोडिलिया या लोरीकैटा (Order Crocodilia or Loricata) :

    1. गहरी नदियों, बड़ी झीलों आदि के वासी।
    2. शरीर छिपकलियों जैसा, परन्तु बड़ा व भारी। सबसे बड़े वर्तमान रेप्टाइल्स।
  1. सिर लम्बा एवं तुण्डाकार। इसके सिरे पर नासाद्वार (nostrils)।
  2. नेत्र बड़े व उभरे हुए। नासाद्वार, नेत्र तथा कर्ण एक सीध में।
  3. त्वचा मोटी व चिम्मड़। इस पर मोटी शल्कें (scales)शल्कों (UPBoardSolutions.com) के नीचे, दृढ़ता के लिए, हड्डी की प्लेटें।
  4. पूँछ लम्बी, पाश्र्वो में चपटी।
  5.  पाद छोटे। अग्रपादों में 5-5 तथा पश्चपादों में 4-4 पंजेदार अँगुलियाँ। अँगुलियों के बीच जाल (web)। जालयुक्त पाद तथा चपटी पूँछ तैरने में सहायक।
  6. कशेरुकाएँ उभयगर्ती या अग्रवर्ती।
  7. क्वाड्रेट स्थिर।
  8.  मुखद्वार चौड़ा। जबड़े मजबूत। दाँत मजबूत, भीतर की ओर मुड़े और नुकीले। अवस्कर छिद्र अनुलम्बे दरारनुमा।
  9. मादा भूमि पर गड्ढे खोदकर इनमें अण्डे देती है।
  10. श्वसन फेफड़ों द्वारा।
  11.  मूत्राशय अनुपस्थित। इनका चमड़ा कीमती होता है। उदाहरण-भारतीय घड़ियाल या गैवियेलिस (Guvialis), ऐलीगेटर (Alligator), क्रोकोडाइलस (Crocodilus-मगरमच्छ)

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 3 Drainage System

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 3 Drainage System (अपवाह तंत्र)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 3 Drainage System (अपवाह तंत्र)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर |

प्रश्न 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए.
(i) निम्नलिखित में से कौन-सी नदी बंगाल का शोक के नाम से जानी जाती थी?
(क) गंडक
(ख) कोसी
(ग) सोन
(घ) दामोदर
उत्तर-(घ) दामोदर।।

(ii) निम्नलिखित में से किस नदी की द्रोणी भारत में सबसे बड़ी है?
(क) सिन्धु
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गंगा
(घ) कृष्णा
उत्तर-(ग) गंगा।

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सी नदी पंचनद में शामिल नहीं है?
(क) रावी |
(ख) सिन्धु
(ग) चेनाब
(घ) झेलम
उत्तर-(ख) सिन्धु।

(iv) निम्नलिखित में से कौन-सी नदी पंचनद भ्रंश घाटी में बहती है?
(क) सोन
(ख) यमुना ।
(ग) नर्मदा
(घ) लूनी
उत्तर-(ग) गर्मदा।।

(v) निम्नलिखित में से कौन-सा स्थान अलकनन्दा व भागीरथी का संगम स्थल है?
(क) विष्णुप्रयाग
(ख) रुद्रप्रयाग
(ग) कर्णप्रयाग
(घ) देवप्रयाग
उत्तर-(घ) देवप्रयाग।

प्रश्न 2. निम्न में अन्तर स्पष्ट करें
(i) नदी द्रोणी और जल-संभर,
(ii) वृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रारूप,
(iii) अपकेन्द्रीय और अभिकेन्द्रीय अपवाह प्रारूप,
(iv) डेल्टा और ज्वारनदमुख।
उत्तर-
(i) नदी द्रोणी और जल-संभर में अन्तर-बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी कहते हैं, जबकि छोटी नदियों व नालों द्वारा अपवाहित क्षेत्र जल-संभर कहलाता है। वास्तव में नदी द्रोणी का आकार बड़ा होता है तथा जल-संभर का आकार छोटा।

(ii) वृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रारूप में अन्तर–वृक्षाकार अपवाह क्षेत्र में नदी अपवाह प्रतिरूप वृक्षाकार आकृति में होता है। इस प्रकार के नदी अपवाह में एक मुख्य नदी धारा से विभिन्न शाखाओं में उपधाराएँ प्रवाहित होती हैं। जालीनुमा अपवाह प्रारूप में प्राथमिक सहायक नदियाँ समानान्तर एवं गौण शाखाएँ समकोण पर काटती हुई प्रवाहित होती हैं।

(iii) अपकेन्द्रीय और अभिकेन्द्रीय अपवाह प्रारूप में अन्तर-जब किसी उच्च भाग से नदियों का प्रवाह चारों ओर हो तो उसे अपकेन्द्रीय या अरीय अपवाह प्रारूप कहते हैं। ऐसी प्रणालियाँ किसी ज्वालामुखी पर्वत पर गुम्बद पर या उच्च टीले पर विकसित होती हैं।

जब किसी भू-भाग में ऐसा क्षेत्र पाया जाए जो चारों ओर से ऊँचा हो किम्तु बीच में निचला हो तो नदियाँ चारों ओर से बहकर मध्य भाग की ओर आती हैं अर्थात् नदियाँ किसी झील या दलदल में समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार की नदी प्रणाली को अभिकेन्द्रीय अपवाह कहा जाता है। रेगिस्तानी क्षेत्रों में जहाँ अन्त:स्थानीय अपवाह मिलता है, ऐसी अपवाह प्रणाली देखने को मिलती है। तिब्बत का पठार की तथा लद्दाख में भी ऐसी प्रणालियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।

(iv) डेल्टा और ज्वारनदमुख में अन्तर–डेल्टा काँप मिट्टी का विशाल निक्षेप है। इसकी आकृतित्रिभुजाकार, पंजाकार या पंखाकार होती है। इसका निर्माण नदी के निचले मार्ग में वहाँ होता है जहाँ दाब नाममात्र का होता है। यह नदी की वृद्धावस्था में बनता है। अतः नदी अपने साथ बहाकर लाई गई अवसाद को ढोने में असमर्थ रहती है तथा विभिन्न शाखाओं में विभक्त होकर अवसाद का निक्षेप करने लगती है। इस प्रकार समुद्री मुहाने पर मिट्टी तथा बालू के महीन कणों से त्रिभुजाकार रूप में निर्मित अवसाद डेल्टा कहलाता है। ज्वारनदमुख के निर्माण में नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसाद को मुहाने पर जमा नहीं करतीं, बल्कि अवसाद को समुद्र में अन्दर तक ले जाती हैं। नदी में इस प्रकार बना मुहाना ज्वारनदमुख या एस्च्युरी कहलाता है। नर्मदा नदी इसी प्रकार की मुहाने का निर्माण करती है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
(i) भारत में नदियों को आपस में जोड़ने के सामाजिक-आर्थिक लाभ क्या हैं?
उत्तर-भारत में नदियाँ प्रतिक्र्ष जल की विशाल मात्रा का वहन करती हैं, किन्तु समय वे स्थान की दृष्टि से इसका वितरण समान नहीं है। इसी कारण वर्षा ऋतु में अधिकांश जल व्यर्थ बह जाता है अथवा बाढ़ की समस्या उत्पन्न करता है। जब देश के एक भाग में बाढ़ आती है तो दूसरे भाग में सूखा उत्पन्न हो जाता है। वास्तव में जले प्रबन्धन द्वारा इस समस्या को समाप्त किया जा सकता है। यह तभी सम्भव है जब जल आधिक्य क्षमता वाली नदियों को अल्प जल क्षमता वाली नदियों से जोड़ दिया जाए। उदाहरण के लिए-हिमालय नदियों को प्रायद्वीपीय नदियों से जोड़ने की योजना बनाई जा सकती है; जैसे–गंगा-कावेरी योजना। इस योजना से आर्थिक क्षति समाप्त होगी तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि होकर आर्थिक-सामाजिक समृद्धि आएगी।

(ii) प्रायद्वीपीय नदी के तीन लक्षण लिखें।
उत्तर–प्रायद्वीपीय नदियों के तीन लक्षण निम्नलिखित हैं
(i) प्रायद्वीपीय नदियाँ वर्षा जल पर आश्रित रहती हैं। |
(ii) ये नदियाँ सदानीरा नहीं हैं।
(iii) प्रायद्वीपीय नदियाँ प्रौढ़ हैं तथा इनकी घाटियाँ सन्तुलित एवं उथली हैं।

प्रश्न 4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दों से अधिक में न दें
(i) उत्तर भारतीय नदियों की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं? ये प्रायद्वीपीय नदियों से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर- उत्तर भारतीय नदियों की प्रायद्वीपीय नदियों से भिन्नता
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(ii) मान लीजिए आप हिमालय के गिरिपद के साथ-साथ हरिद्वार से सिलीगुड़ी तक यात्रा कर रहे हैं। इस मार्ग में आने वाली मुख्य नदियों के नाम बताएँ। इनमें से किसी एक नदी की विशेषताओं का भी वर्णन करें।
उत्तर-हरिद्वार उत्तरी भारत में गंगा नदी के किनारे स्थित है, जबकि सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल में स्थित है। हिमालय के गिरिपद के साथ हरिद्वार से सिलीगुड़ी तक की यात्रा करने पर हमें उत्तरी भारत की अधिकांश सभी नदियों तथा उन नदियों को भी पार करना होगा जो हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। इन नदियों के नाम हैं-गंगा, यमुना, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी एवं महानदी।

गंगा नदी की विशेषताएँ

गंगा नदी उत्तरी भारत ही नहीं, विश्व की सर्वप्रमुख नदी मानी जाती है। इस पवित्र मानी जाने वाली नदी की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. गंगा अपनी द्रोणी और सांस्कृतिक महत्त्व दोनों के दृष्टिकोण से भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है।
  2. यह नदी उत्तराखण्ड राज्य में उत्तरकाशी जिले में गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से 3,900 मीटर | की ऊँचाई से निकलती है। यहाँ इसे भागीरथी कहते हैं।
  3. देव प्रयाग में भागीरथी में अलकनन्दा नदी मिलती है, इसके बाद यह गंगा कहलाती है।
  4. गंगा नदी हरिद्वार से मैदान में प्रवेश करते हुए उत्तराखण्ड में 110 किमी उत्तर प्रदेश में 1,450 किमी, बिहार में 445 किमी और पश्चिम बंगाल में 520 किमी की दूरी तय कर अन्त में बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  5. गंगा द्रोणी केवल भारत में लगभग 8.6 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैली हुई है। यह भारत का सबसे बड़ा अपवाह तन्त्र बनाती है जिसमें उत्तर में हिमालय से निकलने वाली नदियाँ तथा दक्षिण प्रायद्वीप से निकलने वाली अनित्यवाही नदियाँ भी सम्मिलित हैं।
  6. यमुना, सोना, रामगंगा, घाघरा, गोमती, गंडक, कोसी, महानन्दा, चम्बल आदि इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर ॥

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को क्या कहते हैं?
(क) जल-संभर
(ख) नदी द्रोणी
(ग) जल-संकर
(घ) ये सभी
उत्तर-(ख) नदी द्रोणी।।

प्रश्न 2. डेल्टा नदी की ……….: में बनता है। |
(क) वृद्धावस्था
(ख) प्रौढ़ावस्था ।
(ग) यौवनावस्था
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) वृद्धावस्था।

प्रश्न 3. प्रायद्वीपीय नदियाँ…… जल पर आश्रित रहती हैं।
(क) नलकूप
(ख) वर्षा
(ग) कुएँ
(घ) ये सभी
उत्तर-(ख) वर्षा।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. नदी अपवाह प्रतिरूप किसे कहते हैं?
उत्तर–नदी एवं उसकी सहायक नदियों के विन्यास से विकसित प्राकृतिक अपवाह नदी उपवाह तन्त्र या प्रतिरूप कहा जाता है।

प्रश्न 2. अपवाह द्रोणी किसे कहते हैं?
उत्तर—विशाल नदियों के जल संभर (Water Shed) को नदी द्रोणी या अपवाह द्रोणी कहा जाता है।

प्रश्न 3. सिन्धु नदी का उद्गम स्थल कहाँ है? इसकी पाँच सहायक नदियों के नाम बताइए।
उत्तर–सिन्धु नदी हिमालय पर तिब्बत के क्षेत्र में मानसरोवर झील के निकट निकलती है। सतलुज, रावी, व्यास, चेनाब तथा झेलम इसकी पाँच प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।

प्रश्न 4. डेल्टा किसे कहते हैं?
उत्तर-समुद्री मुहाने पर नदी की निक्षेपण क्रिया द्वारा मिट्टी एवं बालू के महीन कणों से निर्मित अवसाद की त्रिभुजाकार आकृति ‘डेल्टा’ कहलाती है।

प्रश्न 5. ज्वारनदमुख से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-जिन नदियों के मुहानों पर ज्वार-भाटा अधिक सक्रिय रहते हैं, वे नदियों द्वारा निक्षेपित पदार्थों को अपने साथ बहाकर ले जाते हैं जिससे नदियाँ डेलटाओं की रचना नहीं कर पातीं। ऐसी नदियों के मुहाने ‘ज्वारनदमुख’ (एस्चुअरी) कहलाते हैं।

प्रश्न 6. नदियाँ प्रदूषित क्यों हैं?
उत्तर-नदियाँ औद्योगिक कूड़ा-करकट, शमशान घाट की राख एवं त्योहारों पर फूल एवं अन्य सामग्री के जल में विसर्जन, बड़े पैमाने पर स्नान और कपड़े धोने तथा नगरीय बस्तियों की गन्दगी को नदी में डालने से प्रदूषित होती हैं।

प्रश्न 7. गंगा नदी कहाँ से निकलती है?
उत्तर-गंगा नदी उत्तराखण्ड राज्य में हिमालय के गंगोत्री नाम की हिमानी से निकलती है।

प्रश्न 8. बंगाल की खाड़ी में गिरते समय ब्रह्मपुत्र किस नाम से पुकारी जाती है?
उत्तर-मेघना।।

प्रश्न 9. सिन्धु नदी का कितना भाग भारत में स्थित है?
उत्तर-33 प्रतिशत भाग (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब)।

प्रश्न 10. गंगा नदी की कुल लम्बाई किलनी है?
उत्तर-2,830 किमी से अधिक।

प्रश्न11. सिन्धु नदी की कुल लम्बाई कितनी है?
उत्तर-2,900 किमी।।

प्रश्न 12. गंगा कार्य योजना क्यों बनाई गई?
उत्तर-गंगा का प्रदूषण कम करने के लिए।

प्रश्न 13. जल प्रवृत्ति किसे कहते हैं?
उत्तर–किसी नदी में जल के वस्तुनिष्ठ प्रवाह के प्रतिरूप को इसकी प्रवृत्ति कहते हैं।

प्रश्न 14. पश्चिम की ओर प्रवाहित छोटी नदियों के नाम लिखिए।
उत्तर-माही, साबरमती, कालिंदी, भरतपूझा, पेरियार, शरावती तथा ढाढर।

प्रश्न 15. घाघरा नदी का उद्गम एवं सहायक नदियों के नाम लिखिए।
उत्तर–घाघरा नदी मापचाचूँगों हिमनद से निकलती है। इसकी सहायक नदियों में तिला, सेती व बेरी मुख्य हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सहायक नदी तथा जल वितरिका में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-सहायक नदी तथा जल वितरिका में निम्नलिखित अन्तर हैं
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प्रश्न 2. डेल्टा तथा ज्वारनदमुख में चार अन्तर बताइए।
उत्तर-डेल्टा तथा ज्वारनदमुख में निम्नलिखित अन्तर हैं
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प्रश्न 3. राजस्थान में प्रवाहित नदी क्रम का वर्णन कीजिए।
उत्तर-राजस्थान शुष्क प्रदेश है। यहाँ पर लूनी नदी तन्त्र ही महत्त्वपूर्ण है। अरावली के पश्चिम में लूनी राजस्थान का सबसे बड़ा नदी तन्त्र है। यह पुष्कर के समीप दो धाराओं (सरस्वती और साबरमती) के रूप में उत्पन्न होती है, जो गोविन्दगढ़ के निकट परस्पर मिल जाती है और लूनी कहलाती है। तलवाड़ा तक यह पश्चिम दिशा में बहती है और तत्पश्चात् दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हुई कच्छ के रन में जा मिलती है। यह सम्पूर्ण नदी तन्त्र अल्पकालिक है।

प्रश्न 4. भारत के दक्षिण-पश्चिम की ओर प्रवाहित छोटी नदी प्रणाली का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत के दक्षिण-पश्चिम की ओर प्रवाहित नदियों में अरब सागर की ओर बहने वाली नदियों का जलमार्ग छोटा है। शेतरूनीजी एक ऐसी ही नदी है जो अमरावती जिले में डलकाहवा से निकलती है। भद्रा नदी राजकोट जिले के अनियाली गाँव के निकट से निकलती है। ढाढर नदी पंचमहल जिले के घंटार गाँव से निकलती है। साबरमती और माही गुजरात की दो प्रसिद्ध नदियाँ हैं। महाराष्ट्र में नासिक जिले में त्रिबंक पहाड़ियों से वैतरणा नदी निकलती है। कालिंदी नदी बेलगाँव जिले से निकलकर करवाड़ की खाड़ी में गिरती है। शरावती पश्चिम की ओर बहने वाली कर्नाटक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण नदी है। यह नदी कर्नाटक के शिमोगा जिले से निकलती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 2,209 वर्ग किमी है। गोवा में ऐसी ही दो नदियाँ हैं। इनमें एक का नाम मांडवी और दूसरी जुआरी है। केरल में सबसे बड़ी नदी भरतपूझा अन्नामलाई पहाड़ियों से निकलती है। पेरियार केरल की दूसरी बड़ी नदी है। केरल की अन्य महत्त्वपूर्ण नदी पांबा है जो वेबनाद झील में गिरती है।

प्रश्न 5. नदियों की बहाव प्रवृत्ति से आप क्या समझते हैं? गंगा नदी की बहाव प्रवृत्ति का वर्णन कीजिए।
उत्तर-नदी में बहने वाले जल की मात्रा को सामान्य नदी की बहाव प्रवृत्ति कहते हैं, किन्तु वास्तव में एक नदी के चैनल में वर्षपर्यन्त जल प्रवाह का प्रारूप नदी बहाव प्रवृत्ति (River regime) कहलाता है। गंगा नदी में न्यूनतम जल प्रवाह जनवरी से जून की अवधि में होता है, जबकि अधिकतम प्रवाह अगस्त या सितम्बर में होता है। सितम्बर के बाद प्रवाह में लगातार कमी होती जाती है। इस प्रकार गंगा नदी का जल प्रवाह वर्षा ऋतु या मानसून पर निर्भर है। गंगा द्रोणी के पूर्वी या पश्चिमी भागों की जल बहाव प्रवृत्ति में चौंकाने वाले अन्तर नजर आते हैं। बर्फ पिघलने के कारण गंगा नदी का प्रवाह मानसून आने से पहले भी काफी बड़ा होता है। फरक्का में गंगा नदी का औसत अधिकतम जल प्रवाह लगभग 55,000 क्यूसेक्स है, जबकि न्यूनतम औसत केवल 1,300 क्यूसेक्स है।

प्रश्न 6. भारत की नदियाँ किस प्रकार देश के लिए वरदान हैं?
उत्तर-नदियाँ जल का स्थायी स्रोत मानी जाती हैं, इसलिए नदियों को जीवन रेखा कहा गया है। भारत की नदियाँ वास्तव में जीवन रेखा ही हैं। इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तर्क निम्नलिखित हैं
1. नदियाँ देश का आधारभूत आर्थिक संसाधन एवं सामाजिक व सांस्कृतिक विकास को आधार हैं।
सभी प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ और सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएँ नदियों या जल से सम्बद्ध | होती हैं।
2. नदियाँ पेयजल, कृषि की सिंचाई के लिए जल, उद्योगों में उत्पादन के लिए जल और परिवहन के लिए जलमार्ग उपलब्ध कराती हैं।
3. नदियों के जल को बाँध के रूप में बदलकर जल विद्युत का उत्पादन किया जाता है जो वर्तमान आर्थिक विकास का आधार है।

प्रश्न 7. कावेरी नदी द्रोणी की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-कावेरी नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले की 1,341 मीटर ऊँची ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से निकलती है। इस नदी में वर्ष भर जल प्रवाह बना रहता है क्योंकि इसके प्रवाह क्षेत्र में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से वर्षा होती रहती है। कावेरी नदी द्रोणी का 3 प्रतिशत क्षेत्र केरल, 41 प्रतिशत कर्नाटक तथा 56 प्रतिशत तमिलनाडु में स्थित है। इस नदी की लम्बाई 800 किलोमीटर है और यह 81,155 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती है। कावेरी नदी की सहायक नदियों में काबीनी, भवानी और अमरावती मुख्य हैं।

प्रश्न 8. गोदावरी दक्षिणी भारत की गंगा कहलाती है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–गंगा भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है। यह नदी भारत में धार्मिक आस्था का आधार मानी जाती है। इसके समरूप दक्षिण भारत में भी गोदावरी नदी को गंगा के समतुल्य माना जाता है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. उत्तरी भारत में गंगा के समान ही गोदावरी नदी भी दक्षिणी भारत की सबसे लम्बी नदी है और इस नदी के प्रति भी पवित्र गंगा के समान ही जनसामान्य में श्रद्धा पाई जाती है।
  2. दक्षिणी भारत में गोदावरी नदी पर भी गंगा के समान धार्मिक आयोजन होते हैं।
  3. गोदावरी नदी की लम्बाई 1,456 किलोमीटर है जो दक्षिणी भारत की अन्य नदियों से अधिक है। | इसीलिए इसे दक्षिणी भारत की गंगा कहा जाता है।
  4. वेनगंगा, पूर्णा, प्रवरा तथा ईन्द्रावती गोदावरी की सहायक नदियाँ हैं। इसका अपवाह क्षेत्र 3,12,812 वर्ग किमी है। अत: इसके विशाल आकार, विस्तार व पवित्रता आदि के कारण इसे दक्षिणी भारत की गंगा कहा जाना उपयुक्त है।

प्रश्न 9. क्या कारण है कि पश्चिमी तट की नदियाँ भारी मात्रा में अवसाद बहाकर लाती हैं, किन्तु डेल्टा का निर्माण नहीं करतीं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-पश्चिमी तट पर बहने वाली प्रमुख नदियाँ नर्मदा तथा ताप्ती हैं। इसके अतिरिक्त अनेक छोटी-छोटी नदियाँ भी पश्चिमी घाट से निकलकर पश्चिमी तटीय मैदान में बहती हुई अरब सागर में गिरती हैं। यद्यपि ये नदियाँ पश्चिमी घाट से पर्याप्त मात्रा में तलछट बहाकर लाती हैं, परन्तु ये डेल्टा नहीं बनाती हैं। इसके निम्नलिखित कारण हैं–

  1. ये नदियाँ संकीर्ण मैदान में प्रवाहित होती हैं, अत: इनका वेग अधिक होता है। इसलिए अवसाद निक्षेप की आदर्श दशाएँ नहीं बनती हैं।
  2. इन नदियों के मार्ग की ढाल प्रवणता अधिक होने के कारण ये तीव्र वेग से बहती हैं जिससे इनके मुहाने पर तलछट का निक्षेप नहीं हो पाता है।

प्रश्न 10. हिमालय के तीन प्रमुख नदी तन्त्रों के नाम, इनके स्रोत तथा प्रमुख सहायक नदियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–हिमालय के तीन प्रमुख नदी तन्त्र निम्नलिखित हैं|

  1. गंगा नदी तन्त्र–इसका उद्गम गंगोत्री हिमानी है। गंगा की सहायक नदियों में–यमुना, सोना, घाघरा, गंडक, कोसी, रामगंगा आदि हैं।
  2. ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र—यह नदी मानसरोवर झील (तिब्बत हिमालय) से निकलती है। इसकी सहायक नदियों में लोहित तथा दिहांग प्रमुख हैं।
  3. सिन्धु नदी तन्त्र–सिन्धु नदी भी मानसरोवर झील के निकट से निकलती है। सतलुज, जास्करे, झेलम, चेनाब, रावी, व्यास तथा गिलगित आदि इस नदी तन्त्र की प्रमुख नदियाँ हैं।

प्रश्न 11. प्रायद्वीपीय अपवाह तन्त्र की विवेचना कीजिए तथा इसके उदविकास की मुख्य घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-प्रायद्वीपीय अपवाह-तन्त्र
प्रायद्वीपीय अपवाह-तन्त्र हिमालयी अपवाह तन्त्र से पुराना है। यह तथ्य नदियों की प्रौढ़ावस्था और नदी घाटियों के चौड़ा व उथला होने से प्रमाणित होता है। नर्मदा और ताप्ती को छोड़कर अधिकतर प्रायद्वीप नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं। प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषता है कि ये एक सुनिश्चित मार्ग पर चलती हैं, विसर्प नहीं बनातीं और ये बारहमासी नहीं हैं। यद्यपि भ्रंश घाटियों में बहने वाली नर्मदा और ताप्ती इसका अपवाद हैं।

प्रायद्वीपीय अपवाह-तन्त्र का उदविकास

प्रायद्वीपीय अपवाह-तन्त्र के उविकास एवं स्वरूप निर्धारण में निम्नलिखित तीन भूगर्भिक घटनाएँ। महत्त्वपूर्ण हैं
1. आरम्भिक टर्शियरी काल की अवधि में प्रायद्वीपीय पश्चिमी पार्श्व का अवतलन या धंसाव जिससे यह समुद्र तल से नीचे चला गया। इससे मूल जल-संभर के दोनों ओर नदियों की सामान्यत
सममित योजना में असन्तुलन उत्पन्न हो गया।

2. हिमालय में होने वाले प्रोत्थान के कारण प्रायद्वीप खण्ड के उत्तरी भाग का अवतलन हुआ और परिणामस्वरूप भ्रंश द्रोणियों का निर्माण हुआ। नर्मदा और ताप्ती इन्हीं भ्रंश घाटियों में बह रही हैं। इसलिए इन नदियों में जलोढ़ व डेल्टा निक्षेप की कमी पाई जाती है।

3. इसी काल में प्रायद्वीपीय खण्ड उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण-पूर्व दिशा में झुक गया। परिणामस्वरूप इसका अपवाह बंगाल की खाड़ी की ओर उन्मुख हो गया।

प्रश्न 12. प्रायद्वीपीय नदी तन्त्र की मुख्य नदी द्रोणियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–प्रायद्वीपीय अपवाह में अनेक नदी द्रोणी हैं। इनमें प्रमुख नदी तन्त्रों का विवरण इस प्रकार है
1. गोदावरी नदी तन्त्र–प्रायद्वीपीय खण्ड में गोदावरी सबसे बड़ी नदी तन्त्र है। इसे दक्षिण की गंगा कहते हैं। गोदावरी नदी महाराष्ट्र में नासिक जिले से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यह 1,465 किमी लम्बी नदी है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 3.13 लाख वर्ग किमी है। इसकी सहायक नदियों में पेनगंगा, इन्द्रावती, प्राणहिता और मंजरा हैं।

2. महानदी नदी तन्त्र-महानदी छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में सिहावा के निकट निकलती है और उड़ीसा में प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यह नदी 851 किलोमीटर लम्बी है और
इसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1.42 लाख वर्ग किमी है।

3. कृष्णा नदी तन्त्र-कृष्णा पूर्व दिशा में बहने वाली दूसरी बड़ी प्रायद्वीपीय नदी है, जो सह्याद्रि में महाबलेश्वर के निकट निकलती है। इसकी लम्बाई 1,401 किमी है। कोयना, तुंगभद्रा और भीमा
इसकी प्रमुख सहायक नदिया हैं।

4. कावेरी नदी तन्त्र-कावेरी नदी कर्नाटक के कोगाड़ जिले में ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से निकलती है। इसकी लम्बाई 800 किमी है। यह 81,155 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती है।
काबीनी, भावानी और अमरावती इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं।

5. नर्मदा नदी तन्त्र—यह नदी कर्नाटक पठार के पश्चिमी पार्श्व से लगभग 1,057 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। लगभग 1,312 किमी की दूरी में बहने के बाद यह भड़ौच के दक्षिण में अरब
सागर में मिलती है और 27 किमी लम्बी ज्वारनदमुख बनाती है।

6. ताप्ती नदी तन्त्र-ताप्ती पश्चिमी दिशा में बहने वाली प्रायद्वीप की एक अन्य महत्त्वपूर्ण नदी है। यह मध्य प्रदेश में बेतूल जिले में मुलताई से निकलती है। यह 724 किमी लम्बी है और 65,145 वर्ग किमी क्षेत्र को अपवाहित करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत के अपवाहं-तन्त्र के स्वरूप का विवरण दीजिए तथा उत्तरी भारत के पश्चिमी नदी तन्त्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर–किसी भी देश अथवा प्रदेश की छोटी-बड़ी सभी नदियों, नालों एवं सरिताओं आदि की समग्र अपवाह प्रणाली को अपवाह-तन्त्र की संज्ञा दी जाती है। किसी भी क्षेत्र का अपवाह-तन्त्र उस क्षेत्र की भौतिक संरचना, भू-भाग के ढाल, जल-प्रवाह का वेग एवं आकार आदि तथ्यों पर निर्भर करता है। भारत एक विशाल देश है जिसकी धरातलीय संरचना एवं भूस्वरूप में सर्वत्र अनेक विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। इसका प्रभाव यहाँ के अपवाह-तन्त्र पर भी पड़ा है। यही कारण है कि भारत में अपवाह-तन्त्र के अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं।

भारत के अपवाह-तन्त्र

उद्गम के आधार पर भारत की नदियों के अपवाह-तन्त्र को दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता हैं-
1. उत्तरी भारत या बृहत् मैदान का अपवाह-तन्त्र
(i) सिन्धु नदी अपवाह-तन्त्र, |
(ii) गंगा नदी अपवाह-तन्त्र तथा हि-तन्त्र तथा
(iii) ब्रह्मपुत्र नदी अपवाह-तन्त्र।

2. प्रायद्वीपीय भारत का अपवाह-तन्त्र–
(क) पश्चिमोगामी अपवाह-तन्त्र
(i) नर्मदा नदी अपवाह-तन्त्र,
(ii) ताप्ती नदी अपवाह-तन्त्र,
(ख) पूर्वगामी अपवाह तन्त्र
(iii) महानदी अपवाह-तन्त्र,
(iv) दामोदर नदी अपवाह-तन्त्र,
(v) गोदावरी नदी अपवाह-तन्त्र,
(vi) कृष्णा नदी अपवाह-तन्त्र,
(vii) कावेरी नदी अपवाह-तन्त्र।
उत्तरी भारत के पश्चिमी नदी तन्त्र में सिन्धु एवं सतलज नदियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। इनका विवरण अग्र प्रकार है–

सिन्धु नदी–सिन्धु नदी तिब्बत के पठार के निकलकर 2,880 किमी की दूरी तक प्रवाहित होती हुई अरब सागर से मिल जाती है। हमारे देश में यह नदी मात्र 709 किमी की दूरी तय करती है। इसकी मुख्य सहायक नदियाँ सतलुज, व्यास, झेलम, चिनाब तथा रावी हैं। भारत-विभाजन के फलस्वरूप सिन्धु नदी तन्त्र के मुख्य भाग पाकिस्तान में चले गए। सिन्धु की सहायक नदियों में सतलुज नदी भारत में सबसे अधिक जल प्रदान करती है।

सतलुज नदी–नदी कैलास पर्वत से निकलकर लगभग 1,440 किमी की दूरी में प्रवाहित होती हुई सिन्धु नदी में मिल जाती है। झेलम कश्मीर राज्य की प्रमुख नदी है। पर्वतीय प्रदेश से मैदान की ओर मुड़ने पर इसका जल प्रवाह मन्द हो जाता है। कश्मीर की प्रसिद्ध हरी-भरी सुखद घाटी झेलम नदी के मोड़ के समीप स्थित है। नदियों ने इस मैदान को बहुत ही उपजाऊ बना दिया है। इस भाग में नहरी सिंचाई की सघनतम जाल पाया जाता है।

प्रश्न 2. भारत के पूर्वी नदी तन्त्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत के पूर्वी विशाल नदी-तन्त्र को निम्नलिखित उप-तन्त्रों में विभाजित किया जा सकता है
1. गंगा नदी तन्त्र-गंगा भारत की प्रसिद्ध एवं धार्मिक महत्त्व वाली नदी है जो हिमालय के गंगोत्री
या गोमुख हिमानी से निकलती है। हरिद्वार से गंगा नदी की मैदानी यात्रा आरम्भ होती है तथा इसकी गति भी मन्द पड़ जाती है। मैदानी भाग में इसकी चौड़ाई अधिक है। प्रयाग (इलाहाबाद) में यमुना व अदृश्य सरस्वती नदियाँ इसमें आकर मिलती हैं तथा इससे आगे इसके ढाल में कमी आनी
आरम्भ हो जाती है। डेल्टा के समीप गंगा नदी का ढाल बहुत ही मन्द हो जाता है। गंगा नदी का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है। गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी मानी जाती है जिसकी लम्बाई 2,510 किमी है। इसके तट पर हरिद्वार, कानपुर, प्रयाग (इलाहाबाद), वाराणसी, पटना एवं कोलकाता जैसे बड़े नगर स्थित हैं। गंगा नदी का अपवाह क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा अपवाह
क्षेत्र है। गोमती, सोन, घाघरा, गंडक एवं कोसी इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।

2. यमुना नदी तन्त्र-यमुना नदी हिमालय पर्वत के यमुनोत्री हिमानी से निकलकर गंगा नदी के समानान्तर प्रवाहित होती हुई प्रयाग में गंगा नदी से मिल जाती है। प्रयाग तक इसकी लम्बाई 1,375 किमी है। दिल्ली, मथुरा एवं आगरा यमुना नदी के किनारे स्थित महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर हैं। सिन्धु, बेतवा, केन एवं चम्बल इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। ये सभी दक्षिण के उत्तर
की ओर प्रवाहित होती हुई यमुना नदी से मिल जाती हैं।

3. ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र-ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत में स्थित मानसरोवर झील के निकट कैलास पर्वत श्रेणी से निकलती है। यह नदी दक्षिणी तिब्बत में बढ़ती हुई पूर्वी हिमालय के नामचबरवा शिखर के समीप अचानक दक्षिणे की ओर मुड़कर भारत में प्रवेश करती है। तिब्बत में इसे सांगपो नदी के नाम से जाना जाता है। असम में इसे दिहांग कहा जाता है। दिहांग तथा लोहित इसकी सहायक नदियाँ हैं जो विपरीत दिशाओं से आकर इसमें मिल जाती हैं। ब्रह्मपुत्र नदी असम राज्य में प्रवाहित होती हुई गंगा नदी से मिल जाती है। बंगाल की खाड़ी से लेकर डिब्रूगढ़ तक इसमें नावें एवं जलयान चल सकते हैं। गोहाटी एवं डिब्रूगढ़ ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर स्थित प्रमुख नगर हैं। यह नदी अपनी बाढ़ों तथा प्रवाह मार्ग में परिवर्तन के लिए विख्यात है। इसकी बाढ़ों से प्रतिवर्ष धन-जन की बहुत अधिक हानि होती है। ब्रह्मपुत्र नदी की कुल लम्बाई 2,880 किमी है।

प्रश्न 3. हिमालय से निकलने वाली नदियों की तुलना प्रायद्वीपीय भारत की नदियों से कीजिए।
उत्तर-हिमालय से निकलने वाली नदियों की प्रायद्वीपीय
भारत की नदियों से तुलना
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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 2 Structure and Physiography

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 2 Structure and Physiography (संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर का चयन करें|
(i) करेवा भू-आकृति कहाँ पाई जाती है?
(क) उत्तरी-पूर्वी हिमालय
(ख) पूर्वी हिमालय
(ग) हिमाचल-उत्तरांचल हिमालय
(घ) कश्मीर हिमालय
उत्तर-(घ) कश्मीर हिमालय। |

(ii) निम्नलिखित में से किस राज्य में ‘लोकताक’ झील स्थित है?
(क) केरल
(ख) मणिपुर
(ग) उत्तरांचल (उत्तराखण्ड)
(घ) राजस्थान
उत्तर-(ख) मणिपुर।

(iii) अण्डमान और निकोबार को कौन-सा जल क्षेत्र अलग करता है?
(क) 11° चैनल ।
(ख) 10° चैनल
(ग) मन्नार की खाड़ी।
(घ) अण्डमान सागर
उत्तर-(ख) 10° चैनल। |

(iv) डोडाबेटा चोटी निम्नलिखित में से कौन-सी पहाडी श्रृंखला में स्थित है?
(क) नीलगिरि
(ख) काडमम
(ग) अनामलाई
(घ) नल्लामाला
उत्तर-(क) नीलगिरि।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 शब्दों में दीजिए
(i) यदि एक व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो वह कौन-से तटीय मैदान से होकर जाएगा और क्यों?
उत्तर-यदि किसी व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो उसे पश्चिमी तटीय मैदान होकर जाना होगा, क्योंकि यही उसके लिए निकटतम दूरी वाला मार्ग होगा। यह द्वीप केरल तट से 280 किलोमीटर दूर है।

(ii) भारत में ठण्डा मरुस्थल कहाँ स्थित है? इस क्षेत्र की मुख्य श्रेणियों के नाम बताएँ।
उत्तरं-भारत में उत्तरी-पश्चिमी यो कश्मीर हिमालय क्षेत्र ठण्डा मरुस्थल कहलाता है। यहाँ वर्षभर तापमान निम्न रहने के कारण सम्पूर्ण क्षेत्र हिमाच्छादित रहता है, इसलिए यह निर्जन क्षेत्र ठण्डा मरुस्थल कहलाता है। वास्तव में यह क्षेत्र वृहत् हिमालय और कराकोरम श्रेणियों के बीच स्थित है। इस क्षेत्र में कराकोरम, जास्कर और लद्दाख श्रेणियाँ हैं। |

(iii) पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा क्यों नहीं है?
उत्तर-पश्चिमी तट पर बहने वाली प्रमुख नदियाँ नर्मदा तथा ताप्ती हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक छोटी-छोटी नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में गिरती हैं। ये नदियाँ डेल्टा नहीं बनातीं। इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. ये नदियाँ सँकरे मैदान में बहकर आती हैं। इनका वेग अधिक होने के कारण ये नदियाँ तेज गति से बहती हैं।
  2. इन नदियों के मार्ग की ढाल प्रवणता अधिक होने के कारण ये तीव्र वेग से बहती हैं, जिससे इनके | मुहाने पर तलछट का निक्षेप न होने के कारण डेल्टा का निर्माण नहीं होता है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए
(i). अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें।
उत्तर- अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह ।
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(ii) नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्त्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ कौन-सी हैं? इनका विवरण
उत्तर-नदी घाटी मैदानों का निर्माण नदियों द्वारा लाए गए अवसाद से हुआ है। ये मैदान दो प्रकार के होते हैं–खादर एवं बांगर। खादर मैदान नवीन जलोढ़ मृदा से तथा बांगर पुराने जलोढ़ से बने हैं। नदी घाटी मैदानों की उत्तरी सीमा पर्वतीय है, जिन्हें गिरिपाद मैदान कहते हैं, जो महीन मलबे और मोटे कंकड़ों से बने हैं। इन्हें भाबर कहते हैं। इनके दक्षिण में तराई के मैदान हैं। यहाँ नदियों का विस्तार अधिक हो जाता है तथा कहीं-कहीं दलदले बन जाते हैं। नदी घाटी मैदानों में बाढ़कृत मैदान पेनीप्लेन, ऊँचे टीले, गर्त, विसर्प, गोखुर झील, बालू रोधिका आदि प्रमुख स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं जो नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकृतियाँ हैं।

(iii) यदि आप बद्रीनाथ सुन्दरवन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ चलते हैं तो आपके रास्ते में कौन-सी मुख्य स्थलाकृतियाँ आएँगी?’
उत्तर-बद्रीनाथ उत्तराखण्ड राज्य के मध्य हिमालय में चमोली जिले की फूलों की घाटी के समीप स्थित है। यदि हम बद्रीनाथ से गंगा के साथ-साथ सुन्दरवन डेल्टा के लिए चलें तो हमें कई प्रकार की भू-आकृतियों से होकर जाना होगा। पर्वतीय क्षेत्र में ऊँची-ऊँची चोटियाँ, गहरी घाटियों व तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों को पार करना पड़ेगा। इस मार्ग में गॉर्ज, V-आकार की घाटी और तीव्र ढाल मुख्य स्थलाकृतियाँ हमें मिलेंगी। हरिद्वार के पास हमारा पर्वतीय मार्ग समाप्त हो जाएगा और मैदानी मार्ग आरम्भ हो जाएगा। यहाँ पर तराई अथवा भाबर क्षेत्र से गुजरना पड़ेगा। इसके पश्चात् समतल मैदान पार करना होगा। इस मैदान में धरातल प्राय: समतल मिलेगा, कोई भी ऊँची श्रेणी नहीं मिलेगी। गंगा के टेढ़े विसर्पो और झीलों के साथ हम सुन्दरवन डेल्टा पर पहुंचेंगे। यह डेल्टा गंगा नदी द्वारा निर्मित है। यहाँ गंगा विभिन्न शाखाओं में विभक्त होकर इस डेल्टा का निर्माण करती है। यह डेल्टा 150 मीटर ऊँचा है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. हिमालय पर्वत की सर्वोच्च चोटी है
(क) एवरेस्ट
(ख) कंचनजंगा
(ग) K-2
(घ) नन्दादेवी
उत्तर-(क) एवरेस्ट।

प्रश्न 2. गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है
(क) चम्बल
(ख) यमुना
(ग) बेतवा
(घ) नर्मदा
उत्तर-(ख) यमुना।।

प्रश्न 3. नन्दा देवी शिखर किस पर्वत से सम्बन्धित है?
(क) नीलगिरि
(ख) सतपुड़ा
(ग) हिमालय
(घ) मैकाले
उत्तर-(ग) हिमालय।।

प्रश्न 4. भारत का सर्वोच्च शिखर कौन-सा है?
(क) गॉडविन ऑस्टिन
(ख) कंचनजंगा
(ग) नन्दा देवी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ख) कंचनजंगा।

प्रश्न 5. नाथूला दर्रा किस राज्य में स्थित है?
(क) अरुणाचल प्रदेश में ।
(ख) असोम में
(ग) सिक्किम में
(घ) मणिपुर में
उत्तर-(ग) सिक्किम में।

प्रश्न 6. शिवालिक पर्वत स्थित है
(क) उत्तरी भारत में
(ख) दक्षिणी भारत में
(ग) पूर्वी भारत में
(घ) पश्चिमी भारत में
उत्तर—(क) उत्तरी भारत में। ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सर्वोच्च हिमालय किसे कहते हैं?
उत्तर–हिमालय पर्वत की सबसे उत्तरी पर्वत श्रृंखला सर्वोच्च हिमालय के नाम से प्रसिद्ध है।

प्रश्न 2. भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित दरों के नाम बताइए।
उत्तर–भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित दरों के नाम निम्नलिखित हैं— (1) खैबर, (2) गोमल, (3) बोलन, (4) टोची, (5) कुर्रम।

प्रश्न 3. बोमडिला दर्रा भारत के किस पूर्वांचल राज्य में है?
उत्तर–बोमडिला दर्रा भारत के अरुणाचल प्रदेश नामक राज्य में स्थित है।

प्रश्न 4. हिमालय के दो प्रमुख दरों के नाम लिखिए।
उत्तर–हिमालय के दो प्रमुख दरों के नाम निम्नलिखित हैं (1) थांगला एवं (2) लिपुलेख।।

प्रश्न 5. हिमालय पर्वतमाला की तीन समानान्तर पर्वत-श्रृंखलाओं के नाम लिखिए।
उत्तर–हिमालय पर्वतमाला की तीन समानान्तर पर्वत-शृंखलाओं के नाम निम्नलिखित हैं–
1. महान् या बृहद् हिमालय अथवा हिमाद्रि हिमालय,
2. लघु हिमालय,
3. बाह्य हिमालय या शिवालिक हिमालय।

प्रश्न 6. हिमालय को भारत का प्रहरी क्यों कहा जाता है?
उत्तर–हिमालय पर्वत भारत की उत्तरी सीमा पर एक अभेद्य दीवार के रूप में सन्तरी की भाँति अडिग खड़ा है, जिस कारण हिमालय को भारत का प्रहरी कहा जाता है।

प्रश्न 7. मध्यवर्ती उच्च भूमि को किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर-मध्यवर्ती उच्च भूमि के उत्तर-पश्चिमी भाग को ‘मालवा कां पठार’, दक्षिणी उत्तर प्रदेश के भू-भाग को ‘बुन्देलखण्ड’ व ‘बघेलखण्ड’ तथा दक्षिणी बिहार में सम्मिलित भू-भाग को ‘छोटा नागपुर’ पठार के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8, शिवालिक किसे कहते हैं? ।
उत्तर–हिमालय की दक्षिणतम श्रेणी को शिवालिक कहते हैं।

प्रश्न 9. पूर्वांचल किसे कहते हैं?
उत्तर- भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित पर्वत-श्रेणियाँ पूर्वांचल के नाम से प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 10. लघु हिमालय किसे कहते हैं? इसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-महान् हिमालय के दक्षिण में स्थित पर्वतश्रेणी लघु या मध्य हिमालय कहलाती है। इसे ‘हिमाचल हिमालय’ कहा जाता है।

प्रश्न 11. हिमालय की तीन प्रमुख श्रेणियों के नाम लिखिए।
उत्तर-(1) महान् या हिमाद्रि हिमालय, (2) लघु या मध्य हिमालय, (3) बाह्य या शिवालिक हिमालय।

प्रश्न 12. हिमालय को नवीन वलित पर्वत कहने के तीन कारण बताइए।
उत्तर-हिमालय को नवीन वलित पर्वत कहा जाता है, इसके तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. इस पर्वत का निर्माण अवसादी पदार्थ में वलन प्रक्रिया के द्वारा हुआ है।
  2. यह भूभाग वैज्ञानिक युग की नवीनतम उच्च पर्वत-शृंखला है।
  3. हिमालय पर्वत की युवा श्रेणियों में वर्तमान में भी उत्थान हो रहा है।

प्रश्न 13. कश्मीर हिमालय की प्रमुख विशेषता बताइए।
उत्तर-कश्मीर हिमालय का उत्तरी-पूर्वी भाग जो बृहत् हिमालय और कराकोरम श्रेणियों के बीच स्थित है, एक ठण्डा मरुस्थल है। हिमालय के इसी भाग में बृहत् हिमालये और पीरपंजाल के बीच विश्वप्रसिद्ध कश्मीर घाटी और डल झील स्थित हैं।

प्रश्न 14. करेवा क्या हैं?
उत्तर-करेवा झील के अवसाद हैं। इनका निर्माण कश्मीर हिमालय में चिकनी मिट्टी और दूसरे हिमोढ़ पर्वतों से हुआ है।

प्रश्न 15. पर्यटन की दृष्टि से कश्मीर हिमालय का क्या महत्त्व है?
उत्तर-कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी हिमालय विलक्षण सौन्दर्य एवं खूबसूरत दृश्य स्थलों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ कई प्रसिद्ध तीर्थस्थल; जैसे-वैष्णोदेवी, अमरनाथ गुफा और चरार-ए-शरीफ भी पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 16. जलोढ़ मैदान का विस्तार बताइए।
उत्तर–जलोढ़ मैदान उत्तरी भारत में सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बहाकर लाए गए जलोढ़ निक्षेप से बना है। इसकी पूर्व से पश्चिमी लम्बाई, 3,200 किलोमीटर है तथा अधिकतम चौड़ाई 150 से 300 किमी है। इस मैदान में जलोढ़ का निक्षेप अधिकतम 1,000 से 2,000 मीटर गहरा है।।

प्रश्न 17, पामीर ग्रन्थि कहाँ स्थिति है? इससे निकली उत्तरी-पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी पर्वत श्रेणियों केनाम बताइए।
उत्तर–पामीर ग्रन्थि भारत के उत्तर में मध्य एशिया में स्थित है। इससे निकलने वाली उत्तरी-पूर्वी पर्वत श्रेणी तियानशान तथा दक्षिण-पूर्वी श्रेणी कराकोरम है।

प्रश्न 18. कराकोरम के दक्षिण में स्थित दो समानान्तर पर्वत श्रेणियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर-लद्दाख तथा जास्कर श्रेणियाँ कराकोरम के दक्षिण में स्थित समानान्तर श्रेणियाँ हैं।

प्रश्न 19. हिमालय की किन्हीं चार ऊँची चोटियों के नाम बताइए।
उत्तर-माउण्ट एवरेस्ट (सबसे ऊँची चोटी), कंचनजंगा, नन्दादेवी तथा धौलगिरि (उत्तराखण्ङ)।

प्रश्न 20. भारत का कौन-सा भौतिक भाग सबसे अधिक उपजाऊ है और क्यों?
उत्तर-भारत के उत्तरी विशाल मैदान सबसे अधिक उपजाऊ हैं। इसका कारण यह है कि यहाँ की जलोढ़ मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है और सिंचाई की अच्छी सुविधाएँ एवं आदर्श जलवायु उपलब्ध है।

प्रश्न 21. उत्तरी मैदानों को कौन-कौन से नदी-तन्त्रों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर-(1) पश्चिम में सिन्धु नदी तन्त्र। (2) पूर्व में गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र।

प्रश्न 22. तराई प्रदेश कहाँ स्थित है? इसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर–तराई प्रदेश भाबर के दक्षिण में स्थित है।
विशेषताएँ–(1) यह प्रदेश दलदली है। (2) यह घने वनों से ढका था किन्तु वर्तमान में यहाँ कृषि भूमि का विकास हो रहा है।

प्रश्न 23. पश्चिमी तटीय मैदानों को कौन-कौन से भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर-कोंकण (उत्तरी भाग), कन्नड़ (मध्य भाग) तथा मालाबार (दक्षिण भाग)। प्रश्न 24. पूर्वी तटीय मैदानों के उत्तरी तथा दक्षिणी भागों को किस-किस नाम से पुकारा जाता है? उत्तर-क्रमशः उत्तरी सरकार तथा कोरोमण्डल तट।

प्रश्न 25. भारत के पाँच भौतिक विभाग कौन-से हैं?
उत्तर–भारत के पाँच भौतिक विभाग हैं-(1) उत्तर के विशाल पर्वत, (2) उत्तर भारत के मैदान, (3) प्रायद्वीपीय पठार, (4) तटीय मैदान, (5) द्वीप समूह।

प्रश्न 26. पूर्वांचल बनाने वाली पाँच प्रमुख पहाड़ी श्रेणियों के नाम लिखिए।
उत्तर-पूर्वांचल बनाने वाली पाँच प्रमुख पहाड़ी श्रेणियाँ हैं-गारो, खासी, जयन्तिया, नागा तथा मिजो।

प्रश्न 27. भारत का कौन-सा भू-भाग प्राचीनतम है?
उत्तर-भारत का प्राचीनतम भू-भाग दक्षिण का पठार है। यह कठोर आग्नेय तथा रूपान्तरित शैलों से बना है। यह भाग प्राचीनतम गोण्डवानालैण्ड का भाग है।

प्रश्न 28. भारत के नवीन और प्राचीनतम पर्वतों का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर–नवीन या युवापर्वत–हिमालय।। प्राचीनतम पर्वत-अरावली।

प्रश्न 29. हिमालय के चार प्रमुख दरों के नाम लिखिए।
उत्तर-हिमालय में अनेक महत्त्वपूर्ण दरें हैं। कश्मीर में कराकोरम, हिमालय में शिपकीला, सिक्किम में नाथुला तथा अरुणाचल प्रदेश में बोमडिला दर्रा स्थित है।

प्रश्न 30. दून क्या है?
उत्तर-पर्वतीय क्षेत्र में अनुदैर्घ्य विस्तार में पाई जाने वाली समतल संरचनात्मक घाटियाँ दून कहलाती हैं। जैसे-देहरादून की घाटी।

प्रश्न 31. पश्चिमी घाट के दो दरों के नाम बताइए।
उत्तर-पश्चिमी घाट के दो दरों के नाम हैं-(1) भोरघाट तथा (2) थालघाट।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत के उत्तरी विशाल मैदान का निर्माण किस प्रकार हुआ ? ।
उत्तर-भारत का उत्तरी मैदान हिमालय तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के मध्य स्थित है। यह मैदान हिमालय तथा प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर उत्तर की ओर बहने वाली नदियों द्वारा लायी गयी मिट्टियों से बना है। इन महीन मिट्टियों को जलोढ़क’ कहते हैं। उत्तरी मैदान जलोढ़कों द्वारा निर्मित एक समतल उपजाऊ भू-भाग है। प्राचीनकाल में इस मैदान के स्थान पर एक विशाल गर्त था। हिमालय पर्वतों के निर्माण के बाद हिमालय से निकलकर बहने वाली नदियों ने उस गर्त में गाद भरने शुरू किये। अनाच्छादन के कारकों ने हिमालय का अपरदन किया तथा भारी मात्रा में अवसाद उस गर्त में एकत्रित होते गये। क्रमशः वह गर्त अवसादों से पट गया तथा उत्तरी मैदान की रचना हुई।

प्रश्न 2, पश्चिमी तटीय मैदान की भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार तथा उसकी तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या भारत के पश्चिमी तटीय भाग के दोनों नामों को स्थिति सहित लिखिए।
उत्तर-पश्चिमी तटीय मैदान एक सँकरी पट्टी के रूप में विस्तृत हैं। प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक इस मैदान का विस्तार है। इसकी औसत चौड़ाई 64 किमी है, जबकि नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के मुहाने के निकट ये 80 किमी तक चौड़े हैं। इस मैदान के उत्तरी भाग को कोंकण तथा दक्षिणी भाग को मालाबार कहते हैं। यहाँ सघन जनसंख्या पायी जाती है। इनकी स्थिति का विवरण निम्नलिखित है|

1. कोंकण का मैदान इस मैदान का विस्तार दमन से लेकर गोआ तक 500 किमी की लम्बाई में | है। इस मैदान की चौड़ाई 50 से 60 किमी के बीच है तथा मुम्बई के निकट सबसे अधिक है।

2. मालाबार का तटीय मैदान–इस मैदान का विस्तार मंगलोर से लेकर कन्याकुमारी तक 500 किमी की लम्बाई में है। इस पर लैगून नामक छोटी-छोटी तटीय झीलें पायी जाती हैं। पश्चिमी तटीय मैदानों की प्रमुख तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • ये मैदान एक सँकरी पट्टी के रूप में विस्तृत हैं। गुजरात में ये अधिकतम चौड़े हैं तथा दक्षिण की
    ओर सँकरे हैं।
  • इस तट पर अनेक ज्वारनदमुख स्थित हैं जिनमें नर्मदा और ताप्ती के ज्वारनदमुख (एस्चुरी) मुख्य हैं।
  • दक्षिण में केरल में अनेक लैगून या पश्चजल स्थित हैं। उनके मुख पर बालूमिति या रोधिकाएँ स्थित हैं।

प्रश्न 3. पूर्वी तटीय मैदान की स्थिति, विस्तार तथा उसकी तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी किनारे पर बंगाल की खाड़ी के तट तक तथा पूर्वी घाट के मध्य प० बंगाल से लेकैर दक्षिण में कन्याकुमारी तक पूर्वी तटीय मैदानों का विस्तार है। तमिलनाडु में यह मैदान 100 से 120 किमी चौड़ा है। गोदावरी के डेल्टा के उत्तर में यह सँकरा है। कहीं-कहीं इसकी चौड़ाई 32 किमी तक है। इसकी तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • यह मैदान पश्चिमी तटीय मैदान से अधिक चौड़ा है। नदियों के डेल्टाओं के निकट विशेष रूप से यह अधिक चौड़ा है।
  • नदी डेल्टाओं के मैंदान अत्यधिक उर्वर तथा सघन आबाद हैं। महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी यहाँ बहने वाली नदियाँ हैं।
  • डेल्टाओं में नदियों से अनेक नहरें निकाली गयी हैं, जो सिंचाई के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। यहाँ अनेक लैगून झीलें भी मिलती हैं, जिनमें ओडिशा की चिल्का, आन्ध्र प्रदेश की कोलेरू तथा तमिलनाडु की पुलीकट झीलें उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 4. उत्तरी पर्वत प्राचीर तथा प्रायद्वीपीय पठार में क्या अन्तर है?
उत्तर-उत्तरी पर्वत प्राचीर तथा प्रायद्वीपीय पठार में निम्नलिखित अन्तर हैं
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प्रश्न 5. हिमालय की उत्पत्ति की विवेचना कीजिए। |
या हिमालय का निर्माण किस प्रकार हुआ ?
उत्तर-उच्चावच से तात्पर्य किसी भू-भाग के ऊँचे व नीचे धरातल से है। सभी प्रकार के पहाड़ी, पठारी वे मैदानी तथा मरुस्थलीय क्षेत्र मिलकर किसी क्षेत्र के उच्चावच का निर्माण करते हैं। उच्चावच की दृष्टि से भारत में अनेक विभिन्नताएँ मिलती हैं। इनका मूल कारण अनेक शक्तियों और संचलनों का परिणाम है, जो लाखों वर्ष पूर्व घटित हुई थीं। इसकी उत्पत्ति भूवैज्ञानिक अतीत के अध्ययन से स्पष्ट की जा सकती है। आज से 25 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप विषुवत रेखा के दक्षिण में स्थित प्राचीन गोण्डवानालैण्ड का एक भाग था। अंगारालैण्ड नामक एक अन्य प्राचीन भूखण्ड विषुवत रेखा के उत्तर में स्थित था। दोनों प्राचीन भूखण्डों के मध्य टेथिस नामक एक सँकरा, लम्बा, उथला सागर था। इन भूखण्डों की नदियाँ टेथिस में अवसाद जमा करती रहीं, जिससे कालान्तर में टेथिस सागर पट गया। पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण दोनों भूखण्ड टूटे। गोण्डवानालैण्ड से भारत का प्रायद्वीप अलग हो गया तथा भूखण्डों के टूटे हुए भाग विस्थापित होने लगे। आन्तरिक हलचलों से टेथिस सागर के अवसादों की परतों में भिंचाव हुआ और उसमें विशाल मोड़ पड़ गये। इस प्रकार हिमालय पर्वत-श्रृंखला की रचना हुई। इसी कारण हिमालय को वलित पर्वत कहा जाता है।

हिमालय की उत्पत्ति के बाद भारतीय प्रायद्वीप और हिमालय के मध्य एक खाई या गर्त शेष रह गया। हिमालय से उतरने वाली नदियों ने स्थल को अपरदन करके अवसादों के उस गर्त को क्रमश: भरना शुरू किया जिससे विशाल उत्तरी मैदान की रचना हुई। इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक इकाइयाँ अस्तित्व में आयीं।।

प्रश्न 6. भारत के समुद्रतटीय मैदानों के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर–प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय क्षेत्रों पर पतली सँकरी पट्टी के रूप में जो मैदान फैले हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहते हैं। ये क्रमश: पश्चिमी तथा पूर्वी समुद्रतटीय मैदान कहलाते हैं। इनका आर्थिक महत्त्व अग्रवत् है

1. पश्चिमी तटीय मैदान–प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक इस मैदान का विस्तार है। नर्मदा तथा ताप्ती यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। नदियों के मुहानों पर बालू जम जाने से यहाँ लैगून निर्मित होते हैं। इनमें मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। उपयुक्त जलवायु तथा उत्तम मिट्टी के कारण यहाँ चावल, आम, केला, सुपारी, काजू, इलायची, गरम मसाले, नारियल आदि की फसलें उगायी जाती हैं। सागर तट पर नमक बनाने तथा मछलियाँ पकड़ने का व्यवसाय भी पर्याप्त रूप में विकसित हुआ है। भारत के प्रमुख पत्तन इन्हीं मैदानों में स्थित हैं। काण्दला, मुम्बई (न्हावाशेवा) व कोचीन इस तट के प्रमुख बन्दरगाह हैं।

2. पूर्वी तटीय मैदान–प्रायद्वीपीय पठारों के पूर्वी किनारों पर बंगाल की खाड़ी के तट तक तथा पूर्वी घाट के मध्य प० बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक पूर्वी तटीय मैदानों का विस्तार है। इस मैदान में महानदी, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों के डेल्टा विकसित हुए हैं। डेल्टाओं में नदियों से अनेक नहरें निकाली गयी हैं, जो सिंचाई का महत्त्वपूर्ण साधन हैं। यह तटीय मैदान उपजाऊ है तथा कहीं-कहीं पर काँप मिट्टी से ढका है। यह मैदान कृषि की दृष्टि से बड़ा अनुकूल है। चावल, गन्ना, तम्बाकू व जूट इस मैदान की मुख्य उपज हैं।

प्रश्न 7. भारत के पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय मैदानों में दो मुख्य अन्तर लिखिए।
या भारत के पूर्वी व पश्चिमी तटीय मैदानों की तुलना कीजिए।
उत्तर–प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय क्षेत्रों पर पतली पट्टी के रूप में जो मैदान फैले हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहते हैं। इन मैदानों को दो क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है-पूर्वी तटीय मैदान एवं पश्चिमी तटीय मैदान। इन दोनों मैदानों में दो मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं

  • आकार-पश्चिमी तटीय मैदान एक सँकरी पट्टी के रूप में विस्तृत हैं। इनकी औसत चौड़ाई 64 किमी है तथा नर्मदा एवं ताप्ती के मुहाने के निकट ये 80 किमी चौड़े हैं, जबकि पूर्वी तटीय मैदान | अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं। इनकी औसत चौड़ाई 161 से 483 किमी है।।
  • विस्तार–पश्चिमी तटीय मैदान प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक फैले हैं, जबकि पूर्वी तटीय मैदान प्रायद्वीपीय पठारों के पूर्वी किनारों पर बंगाल की खाड़ी के तट तक तथा पूर्वी घाट के मध्य पश्चिमी बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक विस्तृत हैं।

प्रश्न 8. हिमालय को नवीन वलित पर्वत क्यों कहते हैं?
उत्तर-हिमालय पर्वत भारत और तिब्बत (चीन) के मध्य एक अवरोध के रूप में स्थित है। यह एक नवीन वलित पर्वतश्रेणी है, जो अब भी क्रमशः ऊँची उठ रही है।

हिमालय पर्वत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भू-वैज्ञानिकों का मत है कि आज जहाँ हिमालय है, वहाँ पहले कभी टेथिस नामक महासागर लहराता था। टेनिस महासागर भारत और म्यांमार (बर्मा) की वर्तमान सीमा से लेकर पश्चिमी एशिया के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था (वर्तमान में भूमध्यसागर इसी का अवशॆष है)। इस महासागर के उत्तर में अंगारालैण्ड तथा दक्षिण में गोंडवानालैण्ड कठोर स्थलखण्ड स्थित थे। इन स्थलखण्डों से नदियाँ प्रतिवर्ष भारी अवसाद बहाकर टेथिस सागर में जमा करती चली गईं। कालान्तर में भूगर्भ की आन्तरिक परिवर्तनकारी शक्तियों के फलस्वरूप ये दोनों कठोर स्थलखण्ड एक-दूसरे की ओर खिसके, जिससे टेथिस की अवसाद में वलन पने आरम्भ हो गए। कालान्तर में इस अवसाद ने वलित पर्वत का रूप धारण कर लिया, जो आज हिमालय के नाम से जाना जाता है। हिमालय की उत्पत्ति आज से लगभग 7 करोड़ वर्ष पूर्व मैसोजोइक (मध्य-जीव) महाकल्प से आरम्भ होकर अब से 20 लाख वर्ष पूर्व प्लीस्टोसीन युग तक चलती रही। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में आज भी आन्तरिक परिवर्तनकारी शक्तियाँ क्रियाशील हैं, इसी कारण हिमालय आज भी ऊँचा उठ रहा है। इसीलिए हिमालय को नवीन वलित पर्वत कहा जाता है।

प्रश्न 9. पश्चिमी हिमालय और पूर्वी हिमालय का सचित्र तुलनात्मक वर्णन कीजिए।
उत्तर- पश्चिमी और पूर्वी हिमालय की तुलना
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प्रश्न 10. भारत के दो प्राकृतिक विभागों के नाम लिखिए तथा संक्षेप में उनकी स्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भारत के दो प्राकृतिक भाग तथा उनकी स्थिति इस प्रकार है–

1. उत्तर में विशाल पर्वतों की प्राचीर अथवा हिमालय पर्वतीय प्रदेश–भारत के उत्तर में लगभग 2,500 किमी की लम्बाई तथा 150 से 400 किमी की चौड़ाई में हिमालय पर्वतीय प्रदेश का विस्तार है। यह विशाल पर्वतों की प्राचीर पूर्व से पश्चिम दिशा में चाप के आकार में फैली हुई है। इस पर्वतीय प्रदेश का विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है।

2. उत्तरी मैदान अथवा उत्तर का विशाल मैदान–हिमालय पर्वत के दक्षिण तथा दकन पठार के उत्तर में गंगा, सतलज, ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों की काँप मिट्टी द्वारा निर्मित उपजाऊ एवं समतल मैदान को उत्तर को विशाल मैदान कहते हैं। इसका क्षेत्रफल लगभग 7 लाख वर्ग किमी है। इसे जलोढ़ मैदान’ के नाम से भी पुकारते हैं। इस मैदान की लम्बाई पूर्व से पश्चिमी
लगभग 2,414 किमी तथा चौड़ाई पूर्व में 145 किमी तथा पश्चिम में 480 किमी है।।

प्रश्न 11. कश्मीर भारत का स्विट्जरलैण्ड कहलाता है, क्यों?
उत्तर-कश्मीर स्विट्जरलैण्ड की भाँति अद्वितीय प्राकृतिक एवं नैसर्गिक सौन्दर्य रखने वाला प्रदेश है। स्विट्जरलैण्ड को ‘यूरोप का स्वर्ग’ कहकर पुकारा जाता है; अत: कश्मीर ‘भारत का स्विट्जरलैण्ड’ तथा ‘भारत का स्वर्ग’ भी कहलाता है। इस सन्दर्भ में निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं

  • स्विट्जरलैण्ड अपनी सुन्दर दृश्यावलियों एवं पर्वतीय ढालों के लिए प्रसिद्ध है, ठीक उसी प्रकार कश्मीर प्राकृतिक एवं नैसर्गिक सौन्दर्य की विशिष्टता रखने वाला प्रदेश है।
  • स्विट्जरलैण्ड के पर्वतीय ढाल हिम से ढके रहते हैं, ठीक उसी प्रकार कश्मीर के पर्वतीय ढाल भी वर्षभर हिम से आच्छादित रहते हैं।
  • स्विट्जरलैण्ड बर्फ के खेलों के लिए यूरोप में ही नहीं, अपितु विश्वभर में प्रसिद्ध है, ठीक उसी | प्रकार कश्मीर में भी बर्फ के खेलों (स्कीइंग) का आनन्द उठाया जा सकता है।
  • स्विट्जरलैण्ड की घाटी हरे-भरे वृक्षों, उत्तम जलवायु तथा अनूठे सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है, ठीक उसी प्रकार कश्मीर घाटी अँगूठी में जड़े नगीने के समान सौन्दर्य की खान है। यही कारण है कि इसकी तुलना स्विट्जरलैण्ड के साथ की जाती है।

प्रश्न 12. पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में अन्तर
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प्रश्न 13. पूर्वांचल में कौन-कौन सी श्रृंखलाएँ सम्मिलित हैं?
उत्तर–भारत की पूर्वी सीमा पर विस्तृत पर्वतों को पूर्वांचल कहा जाता है। ये पर्वत श्रृंखलाएँ हिमालय की भाँति विशाल नहीं हैं तथा न ही अधिक ऊँची हैं। ये मध्यम ऊँचाई की पर्वतश्रेणियाँ हैं। इन पर्वतश्रेणियों में उत्तर की ओर पटकोई, बुम एवं नाग पहाड़ियाँ तथा दक्षिण की ओर मिजो पहाड़ियाँ (लुशाई पहाड़ियाँ) सम्मिलित हैं। मध्य में ये पहाड़ियाँ पश्चिम की ओर मुड़ जाती हैं तथा मेघालय राज्य में भारत-बांग्लादेश की सीमा के साथ विस्तृत हैं। यहाँ इन पहाड़ियों को पश्चिम से पूर्व की ओर गारो, खासी और जयन्तिया के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

प्रश्न 14. भारत की त्रिस्तरीय भू-आकृति में क्या-क्या समानताएँ पाई जाती हैं?
उत्तर–भारत की त्रिस्तरीय भू-आकृति में निम्नलिखित समानताएँ पाई जाती हैं

  • भारत के प्रायद्वीपीय पठार पर युवा स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं जो हिमालय पर्वत क्षेत्र की विशेषता | है। दूसरी ओर हिमालय पर भी घर्षित धरातल मिलते हैं जो प्रायद्वीपीय पठार की विशेषता है।
  • प्रायद्वीपीय पठार तथा हिमालय पर्वतमाला के निर्माण की प्रक्रिया में समानता दिखाई देती है। | हिमालय पर्वत के उत्थान के समय प्रायद्वीपीय पठार का एक भाग तथा अरावली पहाड़ियाँ भी। प्रभावित हुई हैं।
  • उत्तरी मैदान के निर्माण में हिमालय की तलछट तथा प्रायद्वीपीय पठार की तलछट दोनों का योगदान रहा है।

प्रश्न 15. दोआब से आप क्या समझते हैं? भारतीय उपमहाद्वीप से पाँच उदाहरणं दीजिए।
उत्तर-दो नदियों का मध्य भाग दोआब कहलाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में निम्नलिखित दोआब स्थित हैं

  1. गंगा-यमुना दोआबे,
  2. व्यास एवं सतलज के बीच का विस्ट-जालंधर दोआब,
  3. व्यास एवं रावी के मध्य का बारी दोआब,
  4. रावी एवं चेनाब के मध्य का रेचना दोआब,
  5. चेनाब एवं झेलम के मध्य का छाज दोआब।

प्रश्न 16. विशाल मैदान के विशिष्ट भौतिक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–हिमालय के दक्षिण से विशाल मैदान का विस्तार आरम्भ हो जाता है। इस मैदान की उत्पत्ति नूतन काल में हुई है। यह मैदान रोचक भू-लक्षणों से युक्त है। इसकी उत्तरी सीमा पर गिरिपाद मैदान स्थित है जो महीन मलबे और मोटे कंकड़ों से बना है, जिन्हें भाबर कहते हैं। इस मैदान के दक्षिण में तराई का मैदान मिलता है। इस मैदान के प्राचीन जलोढ़कों को बांगर तथा नवीन जलोढ़कों को खादर कहते हैं। विशाल मैदान में कहीं-कहीं गर्त भी पाए जाते हैं। पटना के निकट के गर्त को जिल्ला तथा मोकाम के निकट के गर्त को ‘ढाल’ कहते हैं। इस मैदान में जलोढ़ झीलें हैं जिनका स्थानीय नाम ‘बिल’ हैं।

प्रश्न 17 दार्जिलिंग और सिक्किम हिमालय की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-सिक्किम और दार्जिलिंग हिमालय अपने रमणीय सौन्दर्य वनस्पतिजात और प्राणिजात के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ तेज बहाव वाली तिस्ता नदी बहती है और कंचनजंगा जैसी ऊँची चोटियाँ एवं गहरी घाटियाँ स्थित हैं। इन पर्वतों के उच्च शिखरों पर लेपचा जनजाति और दक्षिणी में मिश्रित जनसंख्या है, जिसमें नेपाली, बंगाली तथा मध्य भारत की जनजातियाँ निवास करती हैं। हिमालय का यह भाग चाय उत्पादन के लिए आदर्श दशाएँ रखता है। इसलिए यहाँ चाय बागानों का पर्याप्त विकास हुआ है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत को प्रमुख भू-आकृतिक विभागों में बाँटिए और भारतीय प्रायद्वीपीय पठार का वर्णन कीजिए।
या भारत को भौतिक विभागों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किन्हीं एक का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) स्थिति का विस्तार, (ख) प्राकृतिक स्वरूप।
या भारत को उच्चावच के आधार पर भौतिक विभागों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किसी एक की स्थिति, विस्तार एवं भौतिक स्वरूप का वर्णन कीजिए।
या भारत को विभिन्न भौतिक विभागों में बाँटिए और पूर्वी तथा पश्चिमी मैदानों की
विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर – भारत का प्राकृतिक स्वरूप (बनावट)।
भारत एक विशाल देश है। भू-आकृतिक संरचना की दृष्टि से भारत में अनेक विषमताएँ एवं विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। भारत का 29.3% भाग पर्वतीय, पहाड़ी एवं ऊबड़-खाबड़; 27.7% भाग पठारी तथा 43% भाग मैदानी है। भारत में अन्य देशों की अपेक्षा मैदानी क्षेत्रों का विस्तार अधिक है (विश्व का औसत 41%)। देश में एक ओर नवीन मोड़दार पर्वत-श्रृंखलाएँ हैं, तो दूसरी ओर विस्तृत तटीय मैदान, कहीं नदियों द्वारा समतल उपजाऊ मैदान हैं तो कहीं प्राचीनतम कठोर चट्टानों द्वारा निर्मित कटा-फटा पठारी भाग है। इस प्रकार जम्मू से कन्याकुमारी तक भारत को उच्चावच अथवा भू-आकृतिक संरचना के अनुसार निम्नलिखित पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है

  1. उत्तरीय पर्वतीय प्रदेश,
  2. उत्तरी भारत का विशाल मैदान,
  3. दक्षिण का पठार,
  4. समुद्रतटीय मैदान एवं द्वीप समूह,
  5. थार का मरुस्थल।

इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
1. उत्तरी पर्वतीय प्रदेश-भारत के उत्तर में लगभग 2,500 किमी की लम्बाई तथा पूर्व में 150 किमी तथा पश्चिम में 400 किमी की चौड़ाई में उत्तरी अथवा हिमालय पर्वतीय प्रदेश का विस्तार है। यह पर्वत-श्रृंखला पूर्व से पश्चिम तक चाप के आकार में फैली हुई है। इस पर्वतीय प्रदेश का विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी है। यह मोड़दार पर्वतमाला तीन समानान्तर श्रेणियों-(i) महान् हिमालय (हिमाद्रि हिमालय), (ii) लघु हिमालय, (iii) बाह्य हिमालय (शिवालिक हिमालय) में विस्तृत है। महान् हिमालय की औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से अधिक होने के कारण ये श्रेणियाँ सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं। विश्व की सर्वोच्च पर्वत-श्रेणी माउण्ट एवरेस्ट इसी हिमालय पर्वतमाला में स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 8,848 मीटर है। हिमालय पर्वत उत्तरी भारत की अधिकांश नदियों का उद्गम स्थल तथा हरे-भरे वनों का भण्डार है। यहाँ बहने वाली नदियाँ तीव्रगामी तथा अपनी युवावस्था में हैं। ये उत्तरी मैदानों में बहती हुई अरब सागर या बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। इनसे भारतीय उपमहाद्वीप की तीन प्रमुख नदियाँ सिन्धु, सतलुज तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय के उस पार से निकलती हैं।

हिमालय अपनी सुन्दर और रमणीक घाटियों के लिए विश्वविख्यात है, जिनमें कश्मीर घाटी, दून घाटी, कुल्लू और काँगड़ा घाटी पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 2 Structure and Physiography (संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान) img 5

2. उत्तरी भारत का विशाल मैदान-उत्तरी भारत अथवा गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान हिमालय पर्वत के दक्षिण में और दक्षिणी पठार के उत्तर में भारत का ही नहीं वरन् विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान है। इसका क्षेत्रफल लगभग 7 लाख वर्ग किमी से अधिक है। इस मैदान की पश्चिम से पूरब की लम्बाई 2,414 किलोमीटर तथा उत्तर-दक्षिण की चौड़ाई 150 से 500 किलोमीटर है। इस मैदान का ढाल लगभग 25 सेण्टीमीटर प्रति किलोमीटर है। अरावली पर्वत-श्रेणी को छोड़कर इसका कोई भी भाग समुद्र तल से 150 मीटर से ऊँचा नहीं है।

यह मैदान सिन्धु, सतलुज, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और उनकी अनेक सहायक नदियों द्वारा लाई गयी मिट्टी से बना है; अत: यह बहुत ही उपजाऊ है। इस मैदान के बीच में अरावली पर्वत आ जाने के कारण सिन्धु और उसकी नदियाँ पश्चिम में तथा गंगा और उसकी सहायक नदियाँ तथा ब्रह्मपुत्र पूर्व में बहती हैं। पश्चिमी मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है और पूर्वी मैदान का ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है। इस मैदान में गहराई नहीं पायी जाती। सम्पूर्ण गंगा का मैदान बाँगर तथा खादर से निर्मित है। यहाँ देश की 45% जनसंख्या निवास करती है। प्रति वर्ष नदियाँ इस मैदान में उपजाऊ काँप मिट्टी अपने साथ लाकर बिछाती रहती हैं।

3. दक्षिण का पठार (प्रायद्वीपीय पठार)–भारत के दक्षिण में प्राचीन ग्रेनाइट तथा बेसाल्ट की
कठोर शैलों से बना दकन का पठार है, जिसे दक्षिण का पठार भी कहते हैं। यह राजस्थान से लेकर कुमारी अन्तरीप तक और पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व की ओर पश्चिम बंगाल तक विस्तृत है। इसको आकार त्रिभुजाकार है एवं आधार उत्तर की ओर तथा शीर्ष दक्षिण की ओर है। पठार के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियाँ हैं, पश्चिम में ऊँचे पश्चिमी घाट और पूरब में निम्न पूर्वी घाट और दक्षिण में नीलगिरि पर्वत हैं।

इसके पश्चिमी भाग पर ज्वालामुखी द्वारा निर्मित लावा के निक्षेप हैं, जो काली मिट्टी के उपजाऊ क्षेत्र हैं। इस पठारी क्षेत्र पर अधिकांश नदियों ने गहरी घाटियाँ बना ली हैं। इस पठार की औसत ऊँचाई 500 से 750 मीटर है। इसका धरातल बहुत ही विषम है। इस पठारी भाग का क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किमी है। दकन का पठारी क्षेत्र खनिज पदार्थों का विशाल भण्डार है। इस पठार पर बहुमूल्य मानसूनी वन सम्पदा पायी जाती है। सागौन एवं चन्दन की बहुमूल्य लकड़ी इसी पठारी भाग में मिलती है। यह कृषि-उपजों का भण्डार तथा उद्योग-धन्धों का महत्त्वपूर्ण केन्द्र भी हैं।

इस पठार पर बहने वाली अधिकांश नदियाँ दक्षिण-पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी ऐसी ही नदियाँ हैं। नर्मदा और ताप्ती नदियाँ भ्रंश घाटी में होकर बहती हैं तथा अरब सागर में गिरती हैं। अरब सागर में गिरने वाली अन्य नदियाँ बहुत छोटी तथा तीव्रगामी हैं।

4. समुद्रतटीय मैदान एवं द्वीप समूह–दकन के पठार के दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय क्षेत्रों पर पतली पट्टी के रूप में जो मैदान फैले हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहते हैं। इन मैदानों का निर्माण सागर की लहरों तथा नदियों ने अपनी निक्षेप क्रियाओं द्वारा लाये गये अवसाद से किया है। इस मैदानी क्षेत्र को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है

(i) पश्चिमी तटीय मैदान–यह मैदान पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक फैला हुआ है। इसकी औसत चौड़ाई 64 किलोमीटर है। इसमें बहने वाली नदियाँ अत्यन्त तीव्रगामी हैं। इसके दक्षिणी मार्ग में नावों के लिए अनेक अनूप (Lagoons) पाये जाते हैं। नया मंगलोर, कोचीन इन्हीं अनू” पर स्थित हैं। यहाँ चावल, केला, गन्ना व रबड़ खूब पैदा होता है। कांदला, मुम्बई व कोचीन इस तट पर स्थित अन्य प्रमुख बन्दरगाह हैं।

(ii) पूर्वी तटीय मैदान–पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा यह मैदान अधिक चौड़ा है। इसकी औसत चौड़ाई 161 से 483 किलोमीटर है। यह उत्तर में गंगा के मुहाने से दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक फैला हुआ है। कोलकाता, मद्रास (चेन्नई) व विशाखापत्तनम् इसे तट के प्रमुख बन्दरगाह हैं।

द्वीप समूह–भारत के मुख्य स्थल भाग के पश्चात् सागरों के बीच में जो आकृतियाँ स्थित हैं वे द्वीपसमूह के रूप में जानी जाती हैं। ये भारत का अभिन्न अंग हैं। छोटे-बड़े मिलाकर कुल 247 द्वीप हैं, जो स्थिति अनुसार निम्नलिखित दो भागों में बँटे हुए हैं

(i) अरब सागरीय द्वीप-ये द्वीप अरब सागर के मुख्य स्थल (केरल तट) के पश्चिम में स्थित हैं। इन द्वीपों की आकृति घोड़े की नाल या अँगूठी के समान है। इनका निर्माण अल्पजीवी सूक्ष्म प्रवाल जीवों के अवशेषों के जमाव से हुआ है। इसलिए इन्हें प्रवालद्वीप वलय (एटॉल) कहते हैं। इनमें लक्षद्वीप, मिनीकोय एवं अमीनदीवी प्रमुख हैं। इन द्वीपों पर नारियल के वृक्ष बहुत अधिक उगाये जाते हैं। इन द्वीपों की संख्या.43 है तथा लक्षद्वीप का क्षेत्रफल मात्र 32 वर्ग किलोमीटर है। कवरत्ति यहाँ की राजधानी है।

(ii) बंगाल की खाड़ी के द्वीप-बंगाल की खाड़ी में भी भारत के अनेक द्वीप हैं। इन्हें अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह के नाम से पुकारते हैं। ये द्वीप बड़े भी हैं और संख्या में भी अधिक हैं। ये जल में डूबी हुई पहाड़ियों की श्रृंखला पर स्थित हैं। इन द्वीपों में से कुछ की उत्पत्ति ज्वालामुखी के उद्गार से हुई है। भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी इन्हीं द्वीपों में एक बैरन द्वीप पर स्थित है। इनका विस्तार 590 किमी की लम्बाई तथा अधिकतम 50 किमी की चौड़ाई में अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में बना हुआ है। ये द्वीप यहाँ एक समूह के रूप में पाये जाते हैं, जो एक-दूसरे से संकीर्ण खाड़ी द्वारा पृथक् होते हैं। इनकी कुल संख्या 204 है तथा पोर्ट ब्लेयर यहाँ की राजधानी है।।

5. थार का मरुस्थल-राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी भाग रेगिस्तानी है जिसे ‘थार का मरुस्थल कहा जाता है। इस मरुस्थल का कुछ भाग पाकिस्तान में भी है। इस भाग में प्रतिदिन धूल व रेतभरी तेज हवाएँ चलती हैं, जो जगह-जगह रेत के टीले बना देती हैं। यहाँ 10 सेमी से भी कम वर्षा होती है, इसलिए यह भाग वर्ष भर शुष्क बना रहता है और पूरे भाग में पानी की कमी रहती है। अत: यहाँ ज्वार-बाजरा जैसी कम पानी वाली फसलें अधिक उगाई जाती हैं। यह मरुस्थलीय भाग 644 किमी लम्बा व लगभग 161 किमी चौड़ा है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,04,000 वर्ग किमी है तथा इसका विस्तार हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात राज्यों में है। इस प्रदेश में अत्यन्त विरल जनसंख्या निवास करती है। लूनी इस मरुस्थलीय प्रदेश की मुख्य मौसमी नदी है। यहाँ पर साँभर, डिंडवाना, लूनकरनसर, कुचामन तथा डेगाना खारे पानी की प्रमुख झीलें हैं, जिनसे नमक बनाया जाता है। कुछ भागों में ग्रेनाइट, नीस तथा शिस्ट चट्टानों की नंगी सतह दिखलायी पड़ती हैं। खनिज पदार्थों में ताँबा, जिप्सम पत्थर तथा मुल्तानी मिट्टी यहाँ मुख्यतः मिलती हैं। राजस्थान में झुंझुनू जिले के खेतड़ी नगर के पास ताँबे की अनेक खाने हैं। यहाँ ऊँट यातायात का प्रमुख साधन है, जिसे रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है। मरुस्थलीय संरचना एवं जलवायु की विषमताओं के कारण यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। पूर्व की ओर इन्दिरा गांधी नहर के बन जाने से धीरे-धीरे सम्बद्ध क्षेत्रों में विकास हो रहा है।

प्रश्न 2. भारत के उत्तर में स्थित हिमालय पर्वत की बनावट कैसी है? इस प्रदेश का भौगोलिक वर्णन कीजिए।
या हिमालय पर्वत से भारत को क्या लाभ हैं? स्पष्ट कीजिए।
या हिमालय के कोई दो महत्त्व लिखिए।
या हिमालय पर्वतों की तीन समान्तर शृंखलाओं के नाम लिखिए और प्रत्येक की एक-एक विशेषता लिखिए।
या भारत के हिमालय पर्वतीय प्रदेश का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) स्थिति एवं विस्तार, (ख) धरातलीय संरचना, (ग) जल-प्रवाह।
उत्तर-हिमालय पर्वत की संरचना
भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत चाप के आकार में तथा पश्चिम में सिन्धु नदी के मोड़ से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक 2,500 किमी की लम्बाई में चन्द्राकार रूप में फैले हैं। इसकी औसत चौड़ाई 150 से 400 किमी के बीच है। हिमालय; भारत और तिब्बत (चीन) के मध्य एक अवरोध के रूप में स्थित है। मुख्य हिमालय में विश्व की सर्वोच्च पर्वत-चोटियाँ पायी जाती हैं, जिनकी औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से भी अधिक है। एशिया महाद्वीप में 97 ऐसी ज्ञात चोटियाँ हैं, जिनकी ऊँचाई 7,500 मीटर से अधिक है। इनमें से 95 चोटियाँ भारत के इसी पर्वतीय प्रदेश में स्थित हैं। हिमालय की ये पर्वत-श्रेणियाँ सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं, इसलिए इस पर्वतमाला का नाम हिमालय रखा गया है। इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख वर्ग किमी है। भौगोलिक दृष्टि से हिमालय पर्वतीय प्रदेश को अग्रलिखित उपविभागों में बाँटा जा । सकता है

1. महान् या बृहद् हिमालय–हिमालय की यह पर्वत-श्रेणी सबसे ऊँची है, जिन्हें हिमाद्रि या वृहत्तर हिमालय भी कहा जाता है। इस पर्वत-श्रेणी की औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से अधिक होने के कारण यह वर्षभर बर्फ से आच्छादित रहती है। इस पर्वत-श्रेणी की लम्बाई सिन्धु नदी के मोड़ से अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक 2,500 किमी तथा औसत चौड़ाई 25 किमी है। इस क्षेत्र में गंगोत्री, जेमू तथा मिलाम जैसे विशाल हिमनद (Glaciers) पाये जाते हैं, जिनकी लम्बाई 20 किमी से भी अधिक है। माउण्ट एवरेस्ट, कंचनजंगा, मकालू, धौलागिरि, नंगा पर्वत, गॉडविन-ऑस्टिन, त्रिशूल, बदरीनाथ, नीलकण्ठ, केदारनाथ आदि इस क्षेत्र के प्रमुख पर्वत-शिखर हैं। इन पर्वत-श्रेणियों का निर्माण ग्रेनाइट, नीस, शिस्ट आदि कठोर और प्राचीन शैलों से हुआ है। माउण्ट एवरेस्ट (नेपाल देश में स्थित) विश्व की सर्वोच्च पर्वत-श्रेणी है, जिसकी ऊँचाई 8,848 मीटर है। महान् हिमालय में अनेक दरें पाये जाते हैं जिनमें शिपकीला, थांगला, नीति, लिपुलेख, बुर्जिल, माना, नाथुला तथा जैलेपला आदि मुख्य हैं। इन्हीं दरों के मार्ग द्वारा भारत की सीमा के पार जाया जा सकता है। महान् हिमालय की पूर्वी सीमा पर ब्रह्मपुत्र तथा पश्चिमी सीमा पर सिन्धु नदियाँ गहरी एवं सँकरी घाटियों से होकर प्रवाहित होती हैं। बृहद् हिमालय और श्रेणियों के मध्य दो प्रमुख घाटियाँ हैं—काठमाण्डू की घाटी (नेपाल) और कश्मीर की घाटी (भारत)।

2. लघु या मध्य हिमालय—यह पर्वत-श्रेणी महान् हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर फैली हुई है, जो 80 से 100 किमी तक चौड़ी है। इस श्रेणी की औसत ऊँचाई 2,000 से 3,500 मीटर तक है तथा अधिकतम ऊँचाई 4,500 मीटर तक पायी जाती है। इस भाग में नदियाँ ‘वी’ (V) आकार की घाटियाँ तथा गहरी कन्दराएँ बनाकर बहती हैं, जिनकी गहराई 1,000 मीटर तक है। महान् और लघु हिमालय के मध्य कश्मीर, काठमाण्डू, काँगड़ा एवं कुल्लू की घाटियाँ महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। शीत-ऋतु में तीन-चार महीने यहाँ हिमपात होता है। ग्रीष्म-ऋतु में ये पर्वतीय क्षेत्र उत्तम एवं स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु तथा मनमोहक प्राकृतिक सुषमा के कारण पर्यटन के केन्द्र बन जाते हैं। कश्मीर की जास्कर और पीर पंजाल इसकी महत्त्वपूर्ण श्रेणियाँ हैं, जो अनेक भुजाओं वाली हैं। इस श्रेणी की ऊँचाई 4,000 मीटर है। चकरौता, शिमला, मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, दार्जिलिंग आदि स्वास्थ्यवर्द्धक पर्वतीय नगर लघु हिमालय में ही स्थित हैं, जहाँ प्रति वर्ष लाखों पर्यटक सैर के लिए जाते हैं। इस श्रेणी के उत्तरी ढाल मन्द हैं, जब कि दक्षिणी ढाल तीव्र। इस पर्वतीय क्षेत्र में उपयोगी कोणधारी वृक्ष तथा ढालों पर घास उगती है। घास के इन मैदानों को कश्मीर में मर्ग (गुलमर्ग, खिलनमर्ग, सोनमर्ग) तथा उत्तराखण्ड में बुग्याल और पयार (गढ़वाल एवं कुमाऊँ हिमालय) के नाम से पुकारते हैं। इस भाग की संरचना में अवसादी
शैलों की प्रधानता है, जिनमें अधिकांश चूने की चट्टानें विस्तृत क्षेत्र में फैली हैं।

3. उप-हिमालय या शिवालिक श्रेणियाँ अथवा बाह्य हिमालय–हिमालय की सबसे निचली तथा दक्षिणी पर्वत-श्रेणियाँ इसके अन्तर्गत आती हैं, जिन्हें बाह्य हिमालय या शिवालिक श्रेणियों के नाम से भी पुकारते हैं। यह हिमालय का नवनिर्मित भाग है, जो पंजाब में पोतवार बेसिन के दक्षिण से आरम्भ होकर पूर्व में कोसी नदी अर्थात् 87° देशान्तर तक विस्तृत है। इन पर्वत-श्रेणियों का निर्माण-काल बीस लाख वर्ष से दो करोड़ वर्ष के मध्य माना जाता है। शिवालिक श्रेणियों का निर्माण नदियों द्वारा लायी गयी अवसाद में मोड़ पड़ने से हुआ है, इसलिए इन पर अपरदन की क्रियाओं का विशेष प्रभाव पड़ा है। तिस्ता और रायडॉक के निकट 50 किमी की चौड़ाई में इन पहाड़ियों का लोप हो जाता है। इनकी औसत चौड़ाई पश्चिम में 50 किमी और पूरब में 15 किमी है। ये पर्वत औसत रूप से 600 से 1,500 मीटर तक ऊँचे हैं। इस क्षेत्र में अनेक उपजाऊ तथा समतल विस्तृत घाटियाँ हैं, जिन्हें दून और द्वार कहते हैं, जैसे-देहरादून, पूर्वादून, कोठड़ीदून, : पाटलीदून, हरिद्वार, कोटद्वार आदि।

भौगोलिक महत्त्व/लाभ

हिमालय पर्वत ने हमारे देश के भौतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक स्वरूप का निर्माण किया है। इनके भौगोलिक महत्त्व/लाभ का वर्णन निम्नलिखित है

  1. ये पर्वत साइबेरिया और मध्यवर्ती एशिया की ओर से आने वाली बर्फीली, तूफानी और शुष्क हवाओं से भारत की रक्षा करते हैं।
  2. हिमालय की ऊँची-ऊँची हिमाच्छादित चोटियाँ उत्तरी भारत के तापमान एवं आर्द्रता (वर्षा) को प्रभावित करती हैं। इसी के फलस्वरूप हिमालय में हिम नदियाँ, सदावाहिनी नदियाँ प्रारम्भ होती हैं, जो उत्तरी मैदान को उपजाऊ बनाती हैं।
  3. हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों और नैसर्गिक दृश्यों के कारण इन पर्वतों का पर्यटकों के लिए महत्त्व बढ़ गया है।
  4. हिमालय की घाटी में जैसे ही वृक्षों की सीमा समाप्त होती है, वहाँ छोटे-छोटे चरागाह पाये जाते हैं. जिन्हें मर्ग कहते हैं; जैसे—गुलमर्ग, सोनमर्ग आदि। यहाँ कश्मीरी गड़रिये भेड़-बकरियाँ चराते हैं।
  5. हिमालय पर्वत से निकलने वाली सदावाहिनी नदियाँ अपने प्रवाह-मार्ग में प्राकृतिक जल-प्रपातों की रचना करती हैं। ये जल-प्रपात जल-विद्युत शक्ति के उत्पादन में सहायक सिद्ध हुए हैं।
  6. शीत ऋतु में उत्तरी ध्रुवीय प्रदेश से ठण्डी एवं बर्फीली पवनें दक्षिण की ओर चला करती हैं। हिमालय पर्वतमाला इन पर्वतों के मार्ग में बाधा बनकर भारत को ठण्ड से बचाती है।
  7. हिमालय पर्वत पर पर्याप्त मात्रा में कोयला, पेट्रोल तथा अन्य खनिज पदार्थ प्राप्त होने की | सम्भावना व्यक्त की गयी है, जिससे इसका आर्थिक महत्त्व और अधिक बढ़ गया है।
  8. हिमालय पर्वतमाला भारत के उत्तर में पहरेदार की भाँति एक अभेद्य दीवार के रूप में खड़ी है, जो । आक्रमणकारियों से भारत की रक्षा करती है।
  9. हिमालय की कश्मीर घाटी को फलों का स्वर्ग कहा जाता है। यहाँ सेब, अखरोट, आड़, खुबानी, अंगूर व नाशपाती आदि फल उगाये जाते हैं। पर्वतीय ढालों पर चाय, सीढ़ीदार खेतों में चावल व आलू की खेती भी की जाती है।
  10.  हिमालय पर्वत के दोनों ढालों पर उपयोगी वनों का बाहुल्य है। इन वनों से विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल, उपयोगी इमारती लकड़ियाँ आदि प्राप्त होती हैं।
  11. हिमालय पर्वतमाला से अनेक जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं, जो अनेक रोगों की चिकित्सा में काम आती हैं। इसके अतिरिक्त हिमालय के वनों से शहद, आँवला, बेंत, गोंद, लाख, कत्था, बिरोजा आदि प्राप्त होते हैं, जो मानव की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। हिमालय के अनेक पर्वतीय नगर ग्रीष्म-ऋतु में पर्यटकों के भ्रमण के लिए आकर्षण के केन्द्र बन जाते हैं।

प्रश्न 3. दक्षिण के प्रायद्वीपीय पठार की भौगोलिक रचना तथा आर्थिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
या भारत के दक्षिणी पठारी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए
(क) स्थिति,
(ख) विस्तार,
(ग) खनिज सम्पदा।
या भारत के दक्षिणी पठारी भाग के किन्हीं तीन खनिज संसाधनों का वर्णन कीजिए।
या भारत के दक्षिणी पठारी भाग की छ: विशेषताएँ बताइए।
या भारत के दक्षिणी पठारी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(अ) धरातल,
(ब) जल-प्रवाह प्रणाली,
(स) भौगोलिक महत्त्व।
या दकन के पठार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर- दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार की भौगोलिक रचना (धरातल)
भारत के दक्षिण में प्राचीन ग्रेनाइट तथा बेसाल्ट की कठोर शैलों से निर्मित द्रकन (दक्षिण) का पठार है। यह विशाल प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन गोण्डवानालैण्ड का ही एक अंग है, जो भारतीय उपमहाद्वीप का, सबसे प्राचीन भूभाग है। यह पठारी प्रदेश 16 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है। इसकी आकृति । त्रिभुजाकार है। इसके उत्तर में गंगा-सतलुज-ब्रह्मपुत्र का मैदान, पूर्व में पूर्वी तटीय मैदान एवं बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्द महासागर तथा पश्चिम में पश्चिमी तटीय मैदान एवं अरब सागर स्थित है। इस पठार पर अनेक पर्वत विस्तृत हैं, जो मौसमी क्रियाओं; अर्थात् अपक्षय; द्वारा प्रभावित हैं। इस भौतिक प्रदेश में सबसे अधिक धरातलीय विषमताएँ मिलती हैं। समुद्र-तल से इस पठार की औसत ऊँचाई 500 से 700 मीटर है।

इस पठारी प्रदेश का विस्तार उत्तर में राजस्थान से लेकर दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक 1,700 किमी की लम्बाई तथा पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में पश्चिम बंगाल तक 1,400 किमी की चौड़ाई में है। प्राकृतिक दृष्टिकोण से इसकी उत्तरी सीमा अरावली, कैमूर तथा राजमहल की पहाड़ियों द्वारा निर्धारित होती है। यहाँ मौसमी क्रियाओं द्वारा चट्टानों को अपक्षरण होता रहता है। नर्मदा नदी की घाटी सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र को दो असमान भागों में विभाजित कर देती है। उत्तर की ओर के भाग को मालवा का पठार तथा दक्षिणी भाग को दकन ट्रैप या प्रायद्वीपीय पठार के नाम से पुकारते हैं। इस प्रदेश में निम्नलिखित स्थलाकृतिक विशिष्टताएँ पायी जाती हैं

1. मालवा का पठार-मालवा का पठार ज्वालामुखी से प्राप्त लावे द्वारा निर्मित हुआ है, जिससे यह समतल हो गया है। इस पठार पर बेतवा, माही, पार्वती, काली-सिन्धु एवं चम्बल नदियाँ प्रवाहित होती हैं। चम्बल एवं उसकी सहायक नदियों ने इस पठार के उत्तरी भाग को बीहड़ तथा ऊबड़-खाबड़ गहरे खड्डों में परिवर्तित कर दिया है, जिससे अधिकांश भूमि खेती के अयोग्य हो। गयी है। शेष भूमि समतल और उपजाऊ है। इस पठार का ढाल पूर्व तथा उत्तर-पूर्व की ओर है। विन्ध्याचले की पर्वत-श्रृंखलाएँ यहीं पर स्थित हैं।

2. विन्ध्याचल श्रेणी–प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पश्चिमी भाग पर विन्ध्याचल श्रेणी का विस्तार है। इस श्रेणी के उत्तर-पश्चिम (राजस्थान) में अरावली श्रेणी स्थित है। यह श्रेणी अत्यधिक अपरदन के कारण निचली पहाड़ियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। विन्ध्याचल श्रेणी के दक्षिण में नर्मदा की घाटी स्थित है। नर्मदा घाटी के दक्षिण में सतपुड़ा श्रेणी का विस्तार है, जो महानदी और गोदावरी के बीच स्थित है।

3. बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड का पठार—यह पठार मालवा पठार के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यमुना एवं चम्बल नदियों ने इस पठार को काट-छाँटकर बीहड़ खड्डों का निर्माण किया है, जिससे यह असमतल तथा अनुपजाऊ हो गया है। इस पठार पर नीस, ग्रेनाइट, बालुका-पत्थर की चट्टानें तथा पहाड़ियाँ मिलती हैं।

4. छोटा नागपुर का पठार—यह पठार एक सुस्पष्ट पठारी इकाई है। इसके उत्तर व पूर्व में गंगा का मैदान है। इसका पश्चिमी मध्यवर्ती भाग 100 मीटर ऊँचा है, जिसे ‘पाट क्षेत्र’ कहते हैं। झारखण्ड राज्य के गया, हजारीबाग तथा राँची जिलों में यह पठार विस्तृत है। महानदी, सोन, स्वर्ण-रेखा एवं दामोदर इस पठार की प्रमुख नदियाँ हैं। यहाँ ग्रेनाइट एवं नीस की-शैलें पायी जाती हैं। यह पठार खनिज पदार्थों में बहुत धनी है। इसकी औसत ऊँचाई 400 मीटर है।

5. मेघालय का पठार-उत्तर-पूर्व में इस पठार को मिकिर की पहाड़ियों के नाम से पुकारते हैं। | इसका उत्तरी ढाल खड़ा है, जिसमें ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक नदियाँ प्रवाहित होती हैं। इसी
पठार में गारो, खासी तथा जयन्तिया की पहाड़ियाँ विस्तृत हैं।

6. दकन का पठार—यह महाराष्ट्र पठार के नाम से भी जाना जाता है। इसका क्षेत्रफल 5 लाख वर्ग किमी है। इसका विस्तार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, पश्चिमी तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश राज्यों पर है। यह पठार बेसाल्ट शैलों से निर्मित है तथा खनिज पदार्थों में धनी है। यह पठार दो भागों में विभाजित है-तेलंगाना एवं दकन का पठार।।

7. प्रायद्वीपीय पठार की प्रमुख पर्वत-श्रेणियाँ-यह पठारी प्रदेश अनाच्छादन की क्रियाओं से प्रभावित है। यहाँ विन्ध्याचल, सतपुड़ा एवं अरावली की पहाड़ियाँ प्रमुख हैं। इनकी औसत ऊँचाई 300 से 900 मीटर तक है। .

8. पश्चिमी घाट–इन्हें सह्याद्रि की पहाड़ियों के नाम से भी पुकारा जाता है। ये पश्चिमी.तंट के समीप उसके समानान्तर विस्तृत हैं। इनकी औसत चौड़ाई 50 किमी है। इनका विस्तार मुम्बई के उत्तर से दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक लगभग 1,600 किमी है। थाकेघाट, भोरघाट व पालघाट यहाँ के प्रमुख दरें हैं। इस श्रेणी के उत्तर-पूर्व में पालनी तथा दक्षिण में इलायची की पहाड़ियाँ हैं।
अनाईमुडी इसका सर्वोच्च शिखर (2,695 मीटर) है।

9. पूर्वी घाट–इस श्रेणी का विस्तार महानदी के दक्षिण में उत्तर-पूर्व दिशा से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर नीलगिरि की पहाड़ियों तक 1,300 किमी की लम्बाई में है। इनकी औसत ऊँचाई 615 मीटर तथा औसत चौड़ाई उत्तर में 190 किमी तथा दक्षिण में 75 किमी है। इन घाटों को काटकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियाँ पश्चिमी भागों से पूर्व की ओर बहती हुई उपजाऊ मैदान में डेल्टा बनाती हैं।

जल-प्रवाह प्रणाली

दक्षिण पठारी भाग की जल प्रवाह प्रणाली में नर्मदा, ताप्ती, महानदी, कृष्णा, कावेरी, पेन्नार आदि नदियों का योगदान है। इनमें नर्मदा व ताप्ती पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती हैं। नर्मदा अमरकण्टक की पहाड़ियों से निकलती है तथा ताप्ती मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से निकलती है। यह दोनों नदियाँ सतपुड़ा के दक्षिण में सँकरी तथा गैहरी भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं।

महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी तथा पेन्नार नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। साबरमती व माही नदियाँ कच्छ की खाड़ी में गिरती हैं।

भौगोलिक महत्त्व

प्रायद्वीपीय पठार के भौगोलिक-आर्थिक महत्त्व का वर्णन निम्नलिखित है
1. प्राचीन आग्नेय कायान्तरित शैलों से निर्मित होने के कारण यह भू-भाग खनिज सम्पन्न है। मध्य प्रदेश में मैंगनीज, संगमरमर, चूना-पत्थर, बिहार व उड़ीसा (ओडिशा) में लोहा व कोयला, | कर्नाटक में सोना, आन्ध्र प्रदेश में कोयला, हीरा आदि आर्थिक महत्त्व के खनिज उपलब्ध होते हैं।

2. लावा की मिट्टी कपास व गन्ने की खेती के लिए अत्युत्तम है। पहाड़ी क्षेत्रों में लैटेराइट मिट्टियाँ चाय, कहवा तथा रबड़ के लिए उपयुक्त हैं। गर्म मसाले, काजू, केला अन्य महत्त्वपूर्ण उपजें हैं।

3. वनों में चन्दन, साल, सागौन, शीशम आदि बहुमूल्य लकड़ी तथा लाख, बीड़ी बनाने के लिए तेन्दू व टिमरु वृक्ष के पत्ते, हरड़, बहेड़ा, आँवला, चिरौंजी, अग्नि व रोशा घास आदि आर्थिक महत्त्व की गौण वन-उपजे प्राप्त होती हैं।

4. पठारी धरातल पर प्रवाहित होने वाली नदियों के प्रपाती मार्ग में अनेक स्थानों पर जल-विद्युत शक्ति के विकास की सम्भावनाएँ उपलब्ध हैं। कठोर चट्टानी धरातल होने के कारण वर्षा के जल को एकत्रित करने के लिए जलाशय में बाँध की सुविधाएँ प्राप्त हैं।

5. सामान्यतः प्रायद्वीपीय पठार की जलवायु उष्ण है, किन्तु उटकमण्ड, पंचमढ़ी, महाबलेश्वर आदि * सुरम्य एवं स्वास्थ्यवर्द्धक स्थल पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र हैं।

6. विषम धरातल होने के कारण यहाँ आवागमन के साधनों का समुचित विकास नहीं हो सका है। उत्तरी मैदान की तुलना में यहाँ कृषि भी अधिक विकसित नहीं है। चम्बल व अन्य नदियों के बीहड़ लम्बी अवधि तक डाकुओं व असामाजिक तत्वों के शरणस्थल रहे हैं। विन्ध्याचल एवं सतपुड़ा पर्वत प्राचीन काल से ही उत्तर एवं दक्षिण भारत के मध्य प्राकृतिक व सांस्कृतिक अवरोध रहे हैं; अतएव दक्षिणी भारत में उत्तर भारत से सर्वथा भिन्न संस्कृति विकसित हुई है।

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