UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 1 India Location

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 1 India Location (भारत: स्थिति)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए
(i) निम्नलिखित में से कौन-सा अक्षांशीय विस्तार भारत की सम्पूर्ण भूमि के विस्तार के सन्दर्भ में प्रासंगिक है?
(क) 8°41′ उ० से 37°7′ उ०
(ख) 8° 4′ उ० से 35°6′ उ०
(ग) 8° 4′ उ० से 37°6′ उ०
(घ) 6°45′ उ० से 37°6′ उ०
उत्तर – (ग) 8° 4′ उ० से 37°6′ उ०।

(ii) निम्नलिखित में से किस देश की भारत के साथ सबसे लम्बी स्थलीय सीमा है?
(क) बाँग्लादेश
(ख) पाकिस्तान
(ग) चीन
(घ) म्यांमार
उत्तर – (क) बाँग्लादेश।

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से बड़ा है?
(क) चीन
(ख) फ्रांस
(ग) मिस्र
(घ) ईरान
उत्तर – (क) चीन। |

(iv) निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?
(क) 69° 30′ पूर्व
(ख) 75° 30′ पूर्व
(ग) 82° 30′ पूर्व
(घ) 90° 30′ पूर्व
उत्तर – (ग) 82° 30′ पूर्व।

(v) अगर आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैण्ड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किस एक को आप पार नहीं करेंगे? |
(क) यमुना
(ख) सिन्धु
(ग) ब्रह्मपुत्र
(घ) गंगा
उत्तर – (ख) सिन्धु।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों का लगभग 30 शब्दों में उत्तर दें
(i) क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ, तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
उत्तर – वास्तव में भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता नहीं है। यदि एक से अधिक मानक समय होगा तो स्थानीय समय निर्धारण में कठिनाइयाँ आएँगी। एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता केवल उन देशों को होती है जिनका पूर्व-पश्चिम विस्तार अधिक होता है। जैसे—संयुक्त राज्य अमेरिका में है, जहाँ लगभग छह समय कटिबन्ध पाए जाते हैं।

(ii) भारत की लम्बी तटरेखा के क्या प्रभाव हैं?
उत्तर – भारत की सम्पूर्ण तटरेखा द्वीप समूहों सहित 7,516.6 किलोमीटर है। देश की बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के रूप में लम्बी तटरेखा समुद्री यातायात और पर्यावरणीय दृष्टि से लाभदायक है। लम्बी तटरेखा जहाँ एक ओर सस्ता जल यातायात प्रदान करती है वहीं यह समुद्री संसाधन प्रदान करने और स्थानीय जलवायु की दृष्टि से भी लाभप्रद होती है।

(iii) भारत का देशान्तरीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?
उत्तर – भारत का देशान्तरीय फैलाव पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक 68°07′ पूर्वी देशान्तर से 97°5′ पूर्वी देशान्तर (गुजरात तक) है अर्थात् कुल देशान्तरीय विस्तार केवल 28°55′ है। इतने कम देशान्तरीय विस्तार के कारण ही भारत की एक मानक समय रेखा (82°30′ पूर्व) है। यह देशान्तर रेखा देश के मध्य से गुजरती है, इसलिए इस रेखा को देश को मानक समय माना जाता है। वास्तव में, यदि देश का देशान्तरथ विस्तार बहुत अधिक होता तब हमें कई मानक कटिबन्धों की आवश्यकता होती। अत: देश का वर्तमान देशान्तरीय फैलाव मानक समय की दृष्टि से लाभप्रद है।।

(iv) जबकि पूर्व में, उदाहरणतः नागालैण्ड में, सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती हैं?
उत्तर – यह सत्य है कि भारत के पूर्व में सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, किन्तु देश की घड़ियाँ समय एक ही दिखाती हैं, क्योंकि घड़ियों के समय का निर्धारण केन्द्रीय देशान्तर या 8230′ पूर्व मानक याम्योत्तर द्वारा होता है। यही कारण है कि कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं।

प्रश्न 3. परिशिष्ट-1 पर आधारित क्रियाकलाप
(i) एक ग्राफ पेपर पर मध्य प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, गोवा, केरल तथा हरियाणा के जिलों की संख्या को आलेखित कीजिए। क्या जिलों की संख्या का राज्यों के क्षेत्रफल से कोई सम्बन्ध हैं?
UP Board Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 1 India Location (भारत स्थिति) img 1
उत्तर – 
UP Board Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 1 India Location (भारत स्थिति) img 2
ग्राफ (चित्र 1.1) से स्पष्ट है कि राज्यों के क्षेत्रफल एवं जिलों की संख्याओं में धनात्मक सम्बन्ध है। अर्थात् जिस राज्य को क्षेत्रफल अधिक है उसमें जिलों की संख्या भी अधिक है तथा जिस राज्य का क्षेत्रफल कम है उसमें जिले भी कम हैं। मध्य प्रदेश तथा गोवा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(ii) उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा, राजस्थान तथा जम्मू और कश्मीर में से कौन-सा राज्य सर्वाधिक घनत्व वाला और कौन-सा एक न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है?
उत्तर – सर्वाधिक घनत्व वाला राज्य (904 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी) पश्चिम बंगाल तथा सबसे कम घनत्न वाला राज्य (13 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी) अरुणाचल प्रदेश है।

(iii) राज्य के क्षेत्रफल व जिलों की संख्या के बीच सम्बन्ध को ढूंढिए।
उत्तर – राज्य के क्षेत्रफल व जिलों की संख्या के बीच सामान्यत: धनात्मक सम्बन्ध पाया जाता है। यदि राज्य का क्षेत्रफल अधिक होता है तो जिलों की संख्या भी अधिक पाई जाती है। |

(iv) तटीय सीमाओं से संलग्न राज्यों की पहचान कीजिए।
उत्तर – तटीय सीमाओं पर स्थित राज्य निम्नलिखित हैंअरब सागर की ओर-गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक एवं केरल। बंगाल की खाड़ी की ओर-तमिलनाडु, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा तथा प० बंगाल।

(v) पश्चिम से पूर्व की ओर स्थलीय सीमा वाले राज्यों का क्रम तैयार कीजिए।
उत्तर – पश्चिम से पूर्व की ओर स्थित स्थलीय सीमा वाले राज्य क्रमश: इस प्रकार हैं–जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, प० बंगाल तथा अरुणाचल प्रदेश।

प्रश्न 4. परिशिष्ट II पर आधारित क्रियाकलाप
(i) उन केन्द्रशासित क्षेत्रों की सूची बनाइए जिनकी स्थिति तटवर्ती है।
(ii) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह के क्षेत्रफल और जनसंख्या में अन्तर की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
(iii) एक ग्राफ पेपर पर दण्ड आरेख द्वारा केन्द्रशासित प्रदेशों के क्षेत्रफल व जनसंख्या को आलेखित कीजिए।
उत्तर – अध्यापक की सहायता से विद्यार्थी स्वयं करें।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. भारत किस महाद्वीप में स्थित है?
(क) यूरोप में
(ख) अफ्रीका में
(ग) एशिया में
(घ) ऑस्ट्रेलिया में
उत्तर – (ग) एशिया में।

प्रश्न 2. भारत किस कटिबन्ध में स्थित है?
(क) उपोष्ण
(ख) उष्ण ।
(ग) शीतोष्ण
(घ) शीत
उत्तर – (क) उपोष्ण।।

प्रश्न 3. भारत की वह नदी जो ज्वारनदमुख बनाती है–
(क) ताप्ती
(ख) महानदी
(ग) गोदावरी
(घ) लूनी
उत्तर – (क) ताप्ती।

प्रश्न 4. ‘शिपकी-ला दर्रा भारत को जोड़ता है
(क) पाकिस्तान से
(ख) चीन से
(ग) भूटान से
(घ) नेपाल से
उत्तर – (ख) चीन से।

प्रश्न 5. भारत के दक्षिण में स्थित देश का नाम है
(क) श्रीलंका
(ख) नेपाल
(ग) चीन
(घ) म्यांमार
उत्तर – (क) श्रीलंका।।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. उन देशों के नाम लिखिए जिनकी सीमाएँ भारत की उत्तरी सीमा से मिलती हैं।
उत्तर–भारत की उत्तरी सीमा से मिलने वाले देशों के नाम इस प्रकार हैं–(1) चीन, (2) अफगानिस्तान, (3) पाकिस्तान, (4) नेपाल, (5) भूटान।

प्रश्न 2. भारत के उन राज्यों के नाम लिखिए जो बांग्लादेश की सीमा बनाते हैं।
उत्तर–भारत के राज्य जिनकी सीमाएँ बांग्लादेश से मिलती हैं, उनके नाम हैं-पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा मिजोरम।

प्रश्न 3. भारतीय उपमहाद्वीप के हिमालय पर्वत को पार करने में सहायक चार दरों के नाम लिखिए।
उत्तर–हिमालय पर्वत को पार करने में सहायक चार दरें हैं-(1) काराकोरम, (2) शिपकीला, (3) नाथुला, (4) बोमडिला।।

प्रश्न 4. उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर-(1) अरुणाचल प्रदेश, (2) असम, (3) नागालैण्ड, (4) मणिपुर, (5) मिजोरम, (6) त्रिपुरा, (7) मेघालय।।

प्रश्न 5. भारत के अक्षांशीय एवं वेशान्तरीय विस्तार को लिखिए।
उत्तर–भारत हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित एक विशाल देश है। इसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी है। भारत 8°4′ उत्तर से 37°6′ उत्तरी अक्षांश और 68°7′ से 97°25′ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है।

प्रश्न 6. भारत की सीमाओं पर स्थित पडोसी देशों के नाम लिखिए।
उत्तर–भारत की पूर्वी सीमा बांग्लादेश तथा म्यांमार से, पश्चिमी सीमा पाकिस्तान व अफगानिस्तान से, उत्तरी सीमा चीन, नेपाल और भूटान से तथा दक्षिण में श्रीलंका से मिलती है।

प्रश्न 7. क्षेत्रफल में भारत से बड़े छः देशों के नाम बताइए।
उत्तर-भारत का विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवाँ स्थान है। इससे बड़े छः अन्य देश हैं-(1) रूस, (2) संयुक्त राज्य अमेरिका, (3) कनाडा, (4) चीन, (5) ब्राजील, (6) आस्ट्रेलिया।

प्रश्न 8. भारत-पाकिस्तान अन्तर्राष्ट्रीय सीमा-रेखा का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत और पाकिस्तान के बीच निर्धारित कृत्रिम सीमा रेखा 1,120 किमी लम्बी है। यह सीमा-रेखा प्राकृतिक नहीं है। भारत के गुजरात, राजस्थान, पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर राज्यों की सीमाएँ पाकिस्तान को भारत से पृथक् करती हैं।

प्रश्न 9. भारत के मध्य से कौन-सी देशान्तर एवं अक्षांश रेखाएँ गुजरती हैं?
उत्तर-82°30′ पूर्वी देशान्तर रेखा उत्तर-दक्षिण में तथा 23°30′ उत्तरी अक्षांश (कर्क रेखा) भारत के मुध्य से गुजरती है।

प्रश्न 10. भारत की तट रेखा की कुल लम्बाई कितनी है?
उत्तर-भारत की तट रेखा की कुल लम्बाई 7,516.6 किमी है।

प्रश्न 11. भारत का कुल क्षेत्रफल कितना है?
उत्तर–भारत का कुल क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी है।

प्रश्न 12. क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर-क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवाँ स्थान है।

प्रश्न 13. भारत किस गोलार्द्ध में स्थित है?
उत्तर-भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है।

प्रश्न 14. भारत का दक्षिणतम बिन्दु (सिरा) कौन-सा है तथा कहाँ स्थित है?
उत्तर-भारत का दक्षिणतम बिन्दु इन्दिरा प्वॉइण्ट है जो निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिण में स्थित है।

प्रश्न 15. भारत के सुदूरवर्ती पूर्वी राज्य का नाम बताइए।
उत्तर–भारत के सुदूरवर्ती पूर्वी राज्य का नाम अरुणाचल प्रदेश है।

प्रश्न 16. भारत का कौन-सा पश्चिमी राज्य कच्छ क्षेत्र में स्थित है?
उत्तर-भारत का पश्चिमी राज्य गुजरात कच्छ क्षेत्र में स्थित है।

प्रश्न 17. भारत का पूर्व-पश्चिम विस्तार कितने देशान्तरों के बीच फैला है?
उत्तर–भारत का पूर्व-पश्चिम विस्तार लगभग 30 देशान्तरों के बीच फैला है।

प्रश्न 18. भारत किस महासागर के शीर्ष पर स्थित है?
उत्तर–भारत हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित हैं।

प्रश्न 19. भारत के उत्तर में स्थित किन्हीं दो देशों के नाम लिखिए।
उत्तर-(1) चीन तथा (2) नेपाल।।

प्रश्न 20. भारत का कौन-सा राज्य क्षेत्रफल एवं जनसंख्या में प्रथम स्थान रखता है?
उत्तर-राजस्थान क्षेत्रफल एवं उत्तर प्रदेश जनसंख्या में देश में प्रथम स्थान रखता है।

प्रश्न 21. भारत के दक्षिण में कौन-से दो द्वीपीय देश स्थित हैं?
उत्तर–भारत के दक्षिण में मालदीव व श्रीलंका दो द्वीपीय देश स्थित हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत का अक्षांशीय विस्तार बताइए। इसके प्रभाव को समझाइए।
उत्तर–भारत का अक्षांशीय विस्तार भूमध्य रेखा के उत्तर में 8°4′ उत्तरी से 37°6′ उत्तरी अक्षांशों के मध्य है। इस देश का उत्तर-दक्षिण विस्तार 3,200 किलोमीटर है। इस विस्तृत भाग पर अक्षांशों के प्रभाव को निम्नांकित तथ्यों में स्पष्ट किया जा सकता है|
(i) अक्षांशीय विस्तार के कारण भारत के दक्षिणी भागों में सूर्यातप की मात्रा उत्तरी भागों की अपेक्षा अधिक है।
(ii) भारत के दक्षिणी भाग की अपेक्षा उत्तरी भाग में रात और दिन की अवधि का अन्तर बढ़ता जाता
(iii) ऐसा देखा गया है कि भारत के सुदूर दक्षिण भाग में जब दिन और रात का अन्तर केवल 45 मिनट होता है तो उत्तर को जाते हुए यह अन्तर सुदूर उत्तरी क्षेत्रों में पाँच घण्टे तक हो जाता है।
(iv) प्रायद्वीपीय भारत, जो भूमध्य रेखा के अधिक निकट है, की जलवायु गर्म रहती है तथा यहाँ शीत ऋतु नहीं होती है, जबकि भूमध्य रेखा से दूर उत्तरी भारत की जलवायु विषम रहती है, यहाँ गर्मियों | में अधिक गर्मी और सर्दियों में अधिक सर्दी होती है।

प्रश्न 2. भारत के देशान्तरीय विस्तार के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–भारत के देशान्तरीय विस्तार का प्रभाव उसके पूर्व-पश्चिम विस्तार से व्यापक महत्त्व रखता है। अपने इसी विस्तार के कारण इसके पड़ोसी देशों की दूरी का निर्धारण होता है। देशान्तरीय विस्तार के कारण भारत के पूर्व में स्थित देश; जैसे–म्यांमार, थाईलैण्ड, सिंगापुर, मलेशिया व वियतनाम तथा पश्चिम में स्थित देश; जैसे-पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक आदि भारत के निकट स्थित हैं। इसीलिए इन देशों से भारत के आर्थिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध प्राचीनकाल से रहे हैं। अपने विस्तृत पूर्वी-पश्चिमी विस्तार के कारण भारत जहाँ पूर्व की ओर चीन, जापान व ऑस्ट्रेलिया के निकट है, वहीं पश्चिम की ओर अफ्रीकी और यूरोपीय देशों से भी इसकी निकटता है। इस प्रकार भारत अपने देशान्तरीय विस्तार के कारण सुगमता से विश्व के सभी देशों के साथ व्यापारिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता है।

प्रश्न 3. पूर्वी गोलार्द्ध में भारत की स्थिति केन्द्रीय है, क्यों?
उत्तर-पूर्वी गोलार्द्ध का देशान्तरीयं विस्तार 0° से 180° पूर्व है। इसकी मध्य स्थिति 90° पूर्वी देशान्तर रेखा पर है, जबकि 87°30′ पूर्वी देशान्तर भारत की केन्द्रीय मध्याह्न रेखा है। यह भारत से ही होकर गुजरती है। इसी प्रकार भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ उत्तर से आरम्भ होता है, जो विषुवत् रेखा के अति निकट है। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि पूर्वी गोलार्द्ध में भारत की स्थिति लगभग केन्द्रीय है। केन्द्रीय स्थिति होने के कारण ही भारत के विदेशों से व्यापारिक एवं वाणिज्यिक सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ हुए हैं। इस प्रकार भारत पश्चिमी औद्योगिक देशों को पूर्वी खेतिहर देशों से मिलाने के लिए एक कड़ी का कार्य करता है।

प्रश्न 4. भारत को उपमहाद्वीप क्यों कहा जाता है?
उत्तर-भारतीय उपमहाद्वीप एक सुस्पष्ट भौगोलिक इकाई है, जो एशिया महाद्वीप के उच्चावच स्वरूप को देखते ही स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। यहाँ एक विशिष्ट संस्कृति का विकास हुआ है। भारत सहित उसके पड़ोसी देशों–पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका एवं मालदीव की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी तथा जनसंख्या विशेषताओं में विभिन्नताएँ एवं विविधताएँ होते हुए भी एकरूपता दिखाई देती है। इसी कारण इसे उपमहाद्वीप कहा जाता है। एशिया महाद्वीप में भारतीय उपमहाद्वीप की स्थिति वास्तव में एशिया से पृथक् दिखाई देती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत का भौगोलिक वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए
(क) स्थिति एवं विस्तार,
(ख) भू-आकृति (उच्चावच)।
उत्तर- (क) भारत की स्थिति एवं विस्तार
हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित भारत एक विशाल देश है। इसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी (2.43%) है। भारत 894 से 37°6′ उत्तरी अक्षांशों और 687′ से 9725 पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। निकोबार द्वीप समूह में स्थित इन्दिरा प्वॉइण्ट’ भारत का दक्षिणतम बिन्दु है। मुख्य स्थल पर कन्याकुमारी भारत का सबसे दक्षिण में स्थित बिन्दु है जबकि जम्मू-कश्मीर राज्य में स्थित ‘इन्दिरा कोल’ सबसे उत्तरी बिन्दु। 26 दिसम्बर, 2009 में सूनामी के कारण भारत के सबसे दक्षिणी बिन्दु ‘इन्दिरा प्वॉइण्ट’ ने जल समाधि ले ली। 82°30′ पूर्वी देशान्तर रेखा भारत की प्रामाणिक देशान्तर रेखा है, जो इलाहाबाद से होकर गुजरती है। कर्क वृत्त (23°30′ उत्तरी अक्षांश) देश के लगभग मध्य में होकर गुजरती है; अत: क्षेत्र का उत्तरी भाग उपोष्ण (सम-शीतोष्ण) कटिबन्ध में तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है। भारतीय मानक समय रेखा भारत के पाँच राज्यों-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आन्ध्र प्रदेश से गुजरती है। भारत का दक्षिणी भाग, जिसमें प्रायद्वीपीय भारत सम्मिलित है, उष्ण कटिबन्ध में आता है। उत्तरी भाग, जिसमें मुख्यतः उत्तर का पर्वतीय मैदानी भाग है, उपोष्ण कटिबन्ध में आता है। तीन ओर से सागरों से घिरा होने के कारण यहाँ विशिष्ट मानसूनी जलवायु पायी जाती है, जो देश के समूचे अर्थतन्त्र को प्रभावित करती है। भारत यूरोप से ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी और पूर्वी एशियाई देशों के व्यापारिक मार्गों पर स्थित है। इसलिए प्राचीन काल से ही यहाँ विदेशी व्यापार उन्नत रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप एक सुस्पष्ट भौगोलिक इकाई है जिसमें एक विशिष्ट संस्कृति का विकास हुआ है। इस महाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान, केन्द्र में भारत, उत्तर में नेपाल, उत्तर-पूर्व में भूटान तथा पूर्व में बांग्लादेश सम्मिलित हैं। हिन्द महासागर में स्थित द्वीपीय देश श्रीलंका और मालदीव हमारे दक्षिणी पड़ोसी देश हैं। इन प्रदेशों की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, प्राकृतिक मिट्टी तथा जनसंख्या की विशेषताओं में विभिन्नताएँ तथा विविधताएँ होते हुए भी उनमें एकात्मकता दिखाई पड़ती है। इसीलिए इसे उपमहाद्वीप कहा जाता है।

भारत विषुवत रेखा के उत्तर में स्थित है। इस कारण यह उत्तरी गोलार्द्ध में आता है। प्रधान मध्याह्न रेखा (ग्रीनविच रेखा) के पूर्व में स्थित होने के कारण भारत पूर्वी गोलार्द्ध में आता है। हम जानते हैं कि मध्याह्न रेखा की मध्य स्थिति 90° पूर्वी देशान्तर है, जो भारत से ही होकर गुजरती है। 82°30 पूर्वी

मध्याह्न रेखा भारत की मानक मध्याह्न रेखा है। इससे पूर्वी गोलार्द्ध में भारत की केन्द्रीयं स्थिति स्पष्ट हो जाती है।

भारत एशिया महाद्वीप के दक्षिण मध्य प्रायद्वीप में स्थित है। एशिया संसार में सबसे बड़ा तथा सबसे अधिक जनसंख्या वाला महाद्वीप है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण ही भारत को प्राचीन काल से ही आर्थिक लाभ प्राप्त हुए हैं।

(ख) भारत का उच्चावच अथवा प्राकृतिक स्वरूप (बनावट)
उच्चावच से तात्पर्य किसी भू-भाग के ऊँचे व नीचे धरातल से है। सभी प्रकार के पहाड़ी, पठारी व मैदानी तथा मरुस्थलीय क्षेत्र मिलकर किसी क्षेत्र के उच्चावच का निर्माण करते हैं। उच्चावच की दृष्टि से भारत में अनेक विभिन्नताएँ मिलती हैं। इनका मूल कारण अनेक शक्तियों और संचालनों का परिणाम है, जो लाखों वर्ष पूर्व घटित हुई थीं। इसकी उत्पत्ति भूवैज्ञानिक अतीत के अध्ययन से स्पष्ट की जा सकती है। आज से 25 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप विषुवत् रेखा के दक्षिण में स्थित प्राचीन गोण्डवानालैण्ड का एक भाग था। अंगारालैण्ड नामक एक अन्य प्राचीन भूखण्ड विषुवत् रेखा के उत्तर में स्थित था। दोनों प्राचीन भूखण्डों के मध्य टेथिस नामक एक सँकरा, लम्बा, उथला सागर था। इन भूखण्डों की नदियाँ टेथिस में अवसाद जमा करती रहीं, जिससे कालान्तर में टेथिस सागर पट गया। पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण दोनों भूखण्ड टूटे। गोण्डवानालैण्ड से भारत का प्रायद्वीप अलग हो गया तथा भूखण्डों के टूटे हुए भाग विस्थापित होने लगे। आन्तरिक हलचलों से टेथिस सागर के अवसादों की परतों में भिंचाव हुआ और उसमें विशाल मोड़ पड़ गए। इस प्रकार हिमालय पर्वत-श्रृंखला की रचना हुई। इसी कारण हिमालय को वलित पर्वत कहा जाता है।

हिमालय की उत्पत्ति के बाद भारतीय प्रायद्वीप और हिमालय के मध्य एक खाई या गर्त शेष रह गया। हिमालय से निकलने वाली नदियों ने स्थल का अपरदन करके अवसादों के उस गर्त को क्रमश: भरना शुरू किया जिससे विशाल उत्तरी मैदान की रचना हुई। इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक इकाइयाँ अस्तित्व में आयीं।

भारत एक विशाल देश है। भू-आकृतिक संरचना की दृष्टि से भारत में अनेक विषमताएँ एवं विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। भारत का 29.3% भाग पर्वतीय, पहाड़ी एवं ऊबड़-खाबड़, 27.7% भाग पठारी तथा 43% भाग मैदानी है। भारत में अन्य देशों की अपेक्षा मैदानी क्षेत्रों का विस्तार अधिक है (विश्व का औसत 41%)। देश में एक ओर नवीन मोड़दार पर्वत-श्रृंखलाएँ हैं तो दूसरी ओर क्स्तृित तटीय मैदान, कहीं नदियों द्वारा निर्मित समतल उपजाऊ मैदान हैं तो कहीं प्राचीनतम कठोर चट्टानों द्वारा निर्मित कटा-फटी पठारी भाग है।

प्रश्न 2. भारत की भौगोलिक स्थिति के दो महत्त्वपूर्ण प्रभाव बताइए।
उत्तर-भारत की भौगोलिक स्थिति की अमिट छाप इसके समग्र प्रतिरूप पर पाई जाती है। चाहे जलवायु की बात हो या व्यापार की, उद्योग की बात हो या कृषि की, राजनीति की बात हो या धर्म की; सभी क्षेत्रों में इसकी भौगोलिक स्थिति का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है; यथा—
1. भौगोलिक स्थिति का जलवायु पर प्रभाव-
हिन्द महासागर में भारत का प्रायद्वीपीय भाग लगभग 1,600 किमी तक प्रवेश कर गया है, जिसके कारण अरब सागर और बंगाल की खाड़ी अपना समकारी प्रभाव सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत की जलवायु पर डालते हैं और उत्तरी भारत की जलवायु को भी प्रभावित करते हैं। हिन्द महासागर और हिमालय पर्वत का ही प्रभाव है कि भारत का लगभग दो-तिहाई भाग उपोष्ण कटिबन्ध में स्थित होते हुए भी भारत उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी जलवायु का देश कहलाता है। हिमालय पर्वत भारत की जाड़ों में उत्तर से आने वाली अत्यन्त शीतल एवं बर्फीली पवनों से रक्षा करता है और गर्मियों में मानसूनी पवनों को रोककर पर्वतीय ढालों पर वर्षा कराता है।

2. हिन्द महासागर का व्यापार पर प्रभाव-
हिन्द महासागर ने न केवल भारत की जलवायु को ही प्रभावित किया है, वरन् तटीय व विदेशी व्यापार को भी प्रभावित किया है। हिन्द महासागर को तीन । महाद्वीप-अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया-घेरे हुए हैं तथा इसके तटों पर संसार की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या निवास करती है। इस महासागर के शीर्ष पर स्थित होने से भारत इस जनसंख्या से सीधा व्यापारिक सम्पर्क कर सकता है। हिन्द महासागर से होकर संसार का प्रसिद्ध समुद्री मार्ग स्वेज नहर गुजरता है, जिसका लाभ भारत को ठीक उसी प्रकार प्राप्त है जैसे कोई नगर किसी व्यस्त सड़क मार्ग का लाभ उठाता है। स्वेज नहर मार्ग द्वारा भारत पश्चिम में यूरोप और उत्तरी अमेरिकी देशों से जुड़ा है। इसी प्रकार पूरबे में मलक्का जलडमरूमध्य द्वारा यह
जापान, चीन, दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों और ऑस्ट्रेलिया से जुड़ा है।

प्रश्न 3. हिन्द महासागर के शीर्ष पर भारत की केन्द्रीय स्थिति किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-पूर्वी गोलार्द्ध में भारत की स्थिति लगभग केन्द्रीय है। अपनी केन्द्रीय स्थिति के कारण ही प्राचीन काल में भारत के पश्चिम में अरब देशों से तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं सुदूरपूर्व के देशों के साथ सांस्कृतिक, व्यापारिक एवं वाणिज्यिक सम्बन्ध स्थापित हो गए थे। हिन्द महासागर के शीर्ष पर भारत की स्थिति पूर्वी गोलार्द्ध में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। पश्चिम से पूर्व तथा पूर्व से पश्चिम जाने वाले महत्त्वपूर्ण जलमार्ग तथ वायुमार्ग भारत से होकर गुजरते हैं। इसकी केन्द्रीय स्थिति का महत्त्व इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है

  1. केन्द्रीय स्थिति के कारण भारत अन्तर्राष्ट्रीय जलमार्गों का केन्द्र हैं। पूर्व से पश्चिम तथा पश्चिम से | पूर्व जाने वाले सभी जलयान भारत से ही होकर गुजरते हैं (देखिए चित्र 1.2)।
  2. भारत हिन्द महासागर द्वारा अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों से जुड़ा हुआ है। इसकी केन्द्रीय स्थिति विदेशों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने में बहुत सहायक रही है।
  3. केन्द्रीय स्थिति के फलस्वरूप ही भारत पूर्व और पश्चिम के लिए अन्तर्राष्ट्रीय वायुमार्गों का संगम
    स्थल है। इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क स्थापित करने में भारत को बड़ी सहायता मिली है।
  4. भारत के समीपवर्ती अधिकांश दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश औद्योगिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए हैं। अतः भारत के विनिर्मित माल आसानी से इन देशों में बिक जाते हैं।
  5. प्रायद्वीपीय भारत तीन ओर से समुद्र द्वारा घिरा है। इसकी तट रेखा सपाट एवं विशाल है। अत: इसके पत्तन वर्षभर सभी देशों के जल परिवहन के लिए खुले रहते हैं।
  6. सन् 1865 ई० से स्वेज नहर जलमार्ग के खुल जाने से पश्चिमी देशों के बीच भारत की दूरी लगभग 7,000 किमी कम हो गई है। अत: भारत पूर्व एवं पश्चिम को जोड़ने वाली एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 4. भारत की सीमाओं का वर्णन कीजिए। भारत के समीपवर्ती देशों से सम्पर्क स्थापित करने में भौगोलिक कठिनाइयों को बताइए।
उत्तर- भारत की सीमाओं का वर्णन इस प्रकार है
1. चीन से लगने वाली उत्तरी सीमा–भारत की उत्तरी सीमा चीन, नेपाल तथा भूटान देशों से मिलती है। यहाँ हिमालय पर्वतमाला एक प्राकृतिक सीमारेखा के रूप में कार्य करता है। भारत चीन के मध्य की सीमा को मैकमोहन रेखा कहते हैं जो सिक्किम राज्य से म्यांमार की सीमा तक 4,248 किमी लम्बी है। सामरिक दृष्टि से यह सीमारेखा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

2. पाकिस्तान से लगने वाली पश्चिमी सीमा-भारत की पश्चिमी सीमा पाकिस्तान से मिलती है, जो अप्राकृतिक है तथा जिसकी लम्बाई 1,120 किमी है। भारत के अनुसार, राजस्थान, पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर राज्यों की सीमाएँ पाकिस्तान को पृथक् करती हैं।

3. बांग्लादेश तथा म्यांमार से लगने वाली सीमा-पूर्व की ओर भारत की सीमा बांग्लादेश से मिलती है, जो अप्राकृतिक है। इसके सीमान्त पर पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिजोरम राज्य स्थित हैं। म्यांमार और भारत के मध्य हिमालय की अराकानयोमा पर्वत-श्रेणी है। इस सीमान्त पर अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर तथा मिजोरम राज्य स्थित हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 1 India Location (भारत स्थिति) img 3

4. भारत की तटरेखा–भारत की तटरेखा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर हिन्द महासागर के शीर्ष से होती हुई पश्चिम में कच्छ की खाड़ी (अरब सागर) तक विस्तृत है। अरब सागर में लक्षद्वीप मिनीकॉय एवं अमीनदीवी द्वीपसमूह तथा बंगाल की खाड़ी में अण्डमान-निकोबार द्वीपसमूह स्थित हैं। इस क्षेत्र में भारत की सीमा पाक जलडमरूमध्य द्वारा श्रीलंका से मिलती है। समीपवर्ती देशों से सम्पर्क स्थापित करने में भारत की भौगोलिक कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं
(i) भारत का उत्तरी भाग अत्यन्त ही दुर्गम है; अत: हिमालय पर्वतमाला के कारण केवल कुछ दर्रा मार्गों द्वारा ही इसे पार किया जा सकता है।
(ii) भारत की उत्तरी सीमा पर पाकिस्तान एवं चीन हैं। इन दोनों ही देशों से सामरिक खतरों के कारण इस संवेदनशील क्षेत्र में सम्पर्क स्थापित करना कठिन है।
(iii) विदेश नीति के कारण भी दुर्गम सीमान्त क्षेत्रों में सम्पर्क स्थापित करना कठिन है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 3 Plant Kingdom 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 3 Plant Kingdom (वनस्पति जगत)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शैवालों के वर्गीकरण का क्या आधार है?
उत्तर :
शैवालों का वर्गीकरण मुख्यतया उनमें उपस्थित वर्णक (pigments), (UPBoardSolutions.com) फ्लेजिला (flagella), संगृहीत खाद्य पदार्थ (storage food product) और कोशिका भित्ति की रासायनिक संरचना (chemical structure of cell wall) के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 2.
लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म के जीवन चक्र में कहाँ और कब निम्नीकरण विभाजन (reduction division) होता है?
उत्तर :
लिवरवर्ट तथा मॉस में निम्नीकरण विभाजन कैप्सूल (capsule) की बीजाणु मातृ कोशा (spore mother cell) में होता है। फर्न में निम्नीकरण विभाजन स्पोरेन्जिया (sporangia) की बीजाणु मातृ कोशा (spore mother cell) में होता है। जिम्नोस्पर्म में निम्नीकरण विभाजन माइक्रोस्पोरेन्जियम (microsporangium) में माइक्रोस्पोर (परागकण) के निर्माण के समय तथा मेगास्पोरेन्जियम में मेगास्पोंर (megaspore) के निर्माण के समय होता है। एन्जियोस्पर्म में निम्नीकरण विभाजन परागकोश (anther) की    माइक्रोस्पोरेन्जियम तथा अण्डाशय (ovule) की मेगास्पोरेन्जियम में होता है।

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प्रश्न 3.
पौधों के तीन वर्गों के नाम लिखिए जिनमें स्त्रीधानी (archaegonia) होती है। इनमें से किसी एक के जीवन-चक्र का संक्षिप्त वर्णन कीजिए
उत्तर :
ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा तथा जिम्नोस्पर्म वर्ग के पौधों में स्त्रीधानी पाई जाती है।

मॉस (ब्रायोफाइट पादप) को जीवन-चक्र

इसकी प्रमुख अवस्था युग्मकोभिद् (gametophyte) होती है। युग्मकोभिद् की दो अवस्थाएँ पाई जाती हैं

(क)
शाखामय, हरे, तन्तुरूपी प्रोटोनीमा (protonema) :
का निर्माण अगुणित बीजाणुओं के अंकुरण से होता है। इस पर अनेक कलिकाएँ (UPBoardSolutions.com) विकसित होती हैं जो वृद्धि करके पत्तीमय अवस्था का निर्माण करती हैं।

(ख)
पत्तीमय अवस्था पर नर तथा मादा जननांग समूह के रूप में बनते हैं। नर जननांग को पुंधानी (antheridium) तथा मादा जननांग को स्त्रीधानी (archegonium) कहते हैं। पुंधानी में द्विकशाभिक पुंमणु (antherozoids) तथा स्त्रीधानी में अण्डाणु (ovum) बनता है।निषेचन जल की उपस्थिति में होता है। पुमणु तथा अण्डाणु संलयन के फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (oospore) बनाते हैं। युग्मनजे से वृद्धि तथा विभाजन द्वारा द्विगुणित बीजाणुउभिद् (sporophyte) का निर्माण होता है। यह युग्मकोभिद् पर अपूर्ण परजीवी होता है।

बीजाणुउभिद् के तीन भाग होते हैं

  1. पाद (foot)
  2.  सीटा (seta) तथा
  3.  सम्पुट (capsule)
    UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 3 Plant Kingdom image 1

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सम्पुट के बीजाणुकोष्ठ में स्थित द्विगुणित बीजाणु मातृ कोशिकाओं से अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित बीजाणु (spores) बनते हैं।
सम्पुट के स्फुटन से बीजाणु मुक्त हो जाते हैं। बीजाणुओं का प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है। अनुकूल (UPBoardSolutions.com) परिस्थितियाँ मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर तन्तुरूपी, स्वपोषी प्रोटोनीमा (protonema) बनाते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित की सूत्रगुणता (ploidy) बताइए मॉस की प्रथम तन्तुक कोशिका, द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक, मॉस की पत्तियों की कोशिका, फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ, मारकेंशिया की जेमा कोशिका, एकबीजपत्री की मेरिस्टेम कोशिका, लिवरवर्ट के अण्डाशय तथा फर्न के युग्मनज।
उत्तर :
इनकी सूत्रगुणता निम्नवत् है

  1. मॉस की प्रथम तन्तुक कोशिका – अगुणित (Haploid-X)
  2.  द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक – त्रिगुणित (Triploid-3X)
  3.  मॉस की पत्तियों की कोशिका – अगुणित (Haploid-X)
  4.  फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ – अगुणित (Haploid-X)
  5.  मारकेंशियां की जेमा कोशिका – अगुणित (Haploid-X)
  6. एकबीजपत्री की मेरिस्टेम कोशिका – द्विगुणित (Diploid-2X)
  7. लिवरवर्ट का अण्डाशय – अगुणित (Haploid-X)
  8. फर्न का युग्मनज  – द्विगुणित (Diploid-2X)

प्रश्न 5.
शैवाल तथा जिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
शैवाल का आर्थिक महत्त्व

1. भोजन के रूप में (Algae as Food) :
पृथ्वी पर होने वाले प्रकाश संश्लेषण का 50% शैवालों द्वारा होता है। शैवाल कार्बोहाइड्रेट, खनिज तथा विटामिन्स से भरपूर होते हैं पोरफाइरा (Porphyra), एलेरिया (Alaria), अल्वा (Ulva),सारगासम (Sargassum), लेमिनेरिया (Luminaria) आदि खाद्य पदार्थ (UPBoardSolutions.com) के रूप में प्रयोग किए जाते हैं क्लोरेला (Chlorella) में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन्स तथा विटामिन्स पाए जाते हैं। इसे भविष्य के भोजन के रूप में पहचाना जा रहा है इससे हमारी बढ़ती जनसंख्या की खाद्य समस्या के हल होने की पूरी सम्भावना है

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2. शैवाल व्यवसाय में (Algae in Industry) :

  1. डायटम के जीवाश्म/मृत शरीर डायटोमेशियस मृदा (diatomaceous earth or Kiselghur) बनाते हैं। यह मृदा 1500°C ताप सहन कर लेती है। इसका उद्योगों में विविध प्रकार से उपयोग किया जाता है; जैसे–धातु प्रलेप, वार्निश, पॉलिश, टूथपेस्ट, ऊष्मारोधी सतह आदि।
  2. कोन्ड्रस (Chondrus), यूक्यिमा (Eucheuma) आदि शैवालों से कैरागीनिन (carrageenin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग शृंगार-प्रसाधनों, शैम्पू आदिबनाने में किया जाता है
  3. एलेरिया (Alaria), लेमिनेरिया (Laminaria) आदि से एल्जिन (algin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग अज्वलनशील फिल्मों, कृत्रिम रेशों आदि के निर्माण में किया जाता है  यह शल्य चिकित्सा के समय रक्त प्रवाह रोकने में भी प्रयोग किया जाता है।
  4. अनेक समुद्री शैवालों से आयोडीन, ब्रोमीन आदि प्राप्त की जाती है।
  5.  क्लोरेला से प्रतिजैविक (antibiotic) क्लोरेलीन (Chlorellin) प्राप्त होती है। यह जीवाणुओं को नष्ट (UPBoardSolutions.com) करती है। कारा (Chara) तथा नाइटेला (Nitella) शैवालों की उपस्थिति से जलाशय के मच्छर नष्ट होते हैं; अतः ये मलेरिया उन्मूलन में सहायक होते हैं
  6.  लाल शैवालों से एगार-एगार (agar-agar) प्राप्त होता है, इसका उपयोग कृत्रिम संवर्धन के लिए  किया जाता है।

जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्त्व

1. सजावट के लिए (Ornamental Plants) :
सोइकस, पाइनस, एरोकेरिया (Arqucurid), गिंगो (Ginkgo), थूजा (Thujq), क्रिप्टोमेरिया (Cryptomeria) आदि पौधों का उपयोग सजावट के लिए किया जाता है।

2. भोज्य पदार्थों के लिए (Plants of Food value) :
साइकस, जैमिया से साबूदाना (sago) प्राप्त होता है। चिलगोजा (Pinus gerardiana) के बीज खाए जाते हैं। नीटम (Gnetum), गिंगो (Ginkgo) व साइकस के बीजों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है।

3. फर्नीचर के लिए लकड़ी :
चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus), कैल (Pinus wallichiana), फर (Abies) से प्राप्त लकड़ी का उपयोग फर्नीचर तथा इमारती लकड़ी के रूप में किया जाता है।

4. औषधियाँ (Medicines) :
साइकस के बीज, छाल व गुरुबीजाणुपर्ण को पीसकर पुल्टिस बनाई जाती है। टेक्सस बेवफोलिया (Taxus brevfolia) से टेक्साल औषधि प्राप्त होती है। जिसका उपयोग कैन्सर में किया जाता है। थूजा (Thuja) की पत्तियों को उबालकर बुखार, खाँसी, गठिया रोग के निदान के लिए प्रयोग किया जाता है।
5. एबीस बालसेमिया (Abies balsamea) :
से कैनाडा बालसम, जूनिपेरस (Juniperus) से सिडार वुड ऑयल (cedar wood oil), पाइनस से तारपीन का तेल प्राप्त होता है।

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प्रश्न 6.
जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं फिर भी उनका वर्गीकरण अलग-अलग क्यों है?
उत्तर :
जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म दोनों का वर्गीकरण अलग-अलग इसलिए किया जाता है क्योंकि जिम्नोस्पर्म में बीज नग्न (naked seeds) होते हैं, फल अनुपस्थित होते हैं, फूल अनुपस्थित होते हैं, भ्रूणपोष (endosperm) अगुणित (haploid) होता है तथा निषेचन से पहले बनता है। द्विनिषेचन (UPBoardSolutions.com) (double fertilization) अनुपस्थित होता है। वर्तिकाग्र (stigma) अनुपस्थित होता है तथा स्त्रीधानी (archaegonia) पाई जाती है, जबकि एन्जियोस्पर्म के बीज फल से घिरे रहते हैं, फूल उपस्थित होते हैं, भ्रूणपोष त्रिगुणित (triploid) होता है तथा द्विनिषेचन के पश्चात् बनता है। वर्तिकाग्र (stigma) पाया जाता है। तथा स्त्रीधानी (archaegonia) नहीं पाई जाती है।

प्रश्न 7.
विषम बीजाणुकता क्या है? इसकी सार्थकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। इसके दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
एक पौधे में दो प्रकार के बीजाणुओं (छोटा माइक्रोस्पोर तथा बड़ा मेगास्पोर) की उपस्थिति विषम बीजाणुकता (heterospory) हलाती है। यह कुछ टेरिडोफाइट; जैसे-सिलेजीनेला (Seluginella), साल्वीनिया (Savinia), मालिया (Marsiled) आदि में तथा सभी जिम्नोस्पर्म व एन्जियोस्पर्म में पाई जाती है। विषम बीजाणुकता का विकास सर्वप्रथम टेरिडोफाइट में हुआ था। विषम बीजाणुकता बीज निर्माण प्रक्रिया की शुरूआत मानी जाती है जिसके  फलस्वरूप बीज का विकास हुआ। विषम बीजाणुकता ने नर एवं मादा युग्मकोभिद् (male and female gametophyte) के विभेदने में सहायता की तथा मादा युग्मकोभिद् जो मेगास्पोरेन्जियम के अन्दर विकसित (UPBoardSolutions.com) होता है कि उत्तरजीविता बढ़ाने में सहायता की।

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प्रश्न 8.
उदाहरण सहित निम्नलिखित शब्दावली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए

  1. प्रथम तन्तु
  2. पुंधानी
  3. स्त्रीधानी
  4. द्विगुणितक
  5. बीजाणुपर्ण तथा
  6. समयुग्मकी

उत्तर :
1.प्रथम तन्तु (Protonema) :
यह हरी, अगुणित (haploid), प्रकाश-संश्लेषी, स्वतन्त्र प्रारम्भिक युग्मकोभिद् (gametophytic) संरचना है जो मॉस (ब्रायोफाइट) में पाई जाती है। यह बीजाणुओं (spores) के अंकुरण से बनती है तथा नये युग्मकोभिद् पौधे का निर्माण करती है।

2. पुंधानी (Antheridium) :
यह बहुकोशिकीय, कवच युक्त (jacketed) नर जनन अंग (male sex organ) है जो ब्रायोफाइट व टेरिडोफाइट में पाया जाता है। पुंधानी में नर युग्मक (male gamete or antherozoids) बनते हैं।

3. स्त्रीधानी (Archaegonium) :
यह बहुकोशिकीय, फ्लास्क के समान मादा जनन अंग (female sex organ) है जो ब्रायोफाइट, टेरिडोफाइट तथा कुछ जिम्नोस्पर्म में पाई जाती है। यह ग्रीवा (neck) तथा अण्डधा (venter) में विभाजित होती है। इसमें एक अण्ड (egg) बनता है।

4. द्विगुणितक (Diplontic) :
यह जीवन-चक्र का एक प्रकार है जिसमें पौधा द्विगुणित (2n) होता है तथा इस पर युग्मकीय अर्धसूत्री (UPBoardSolutions.com) विभाजन (gametic meiosis) द्वारा अगुणित (haploid) युग्मक (gametes) बनते हैं। उदाहरण-फ्युकस, सारगासम।

5. बीजाणुपर्ण (Sporophyll) :
फर्न (टेरिडोफाइट) में बीजाणु (spores) बीजाणुधानियों (sporangia) में पाए जाते हैं। इन बीजाणुधानियों के समूह को सोरस (sorus) कहते हैं। ये पिच्छक या पत्ती (pinna or leaf) की नीचे की सतह (lower surface) पर मध्य शिरा (mid rib) के दोनों ओर दो पंक्तियों में शिराओं के सिरे पर लगी रहती हैं। इन सोराई धारण करने वाल पत्तियों को बीजाणुपर्ण (sporophyll) कहते हैं।

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6. समयुग्मकी (Isogamy) :
यह एक प्रकार का लैंगिक जनन है जिसमें संलयन करने वाले युग्मक (gametes) संरचना तथा कार्य में समान होते हैं।

उदाहरण :

  1. यूलोथ्रिक्स (Ulothrs)
  2. क्लेमाइडोमोनास(Chlamydomonas)
  3. तथा एक्ट्रोकार्पस (Ectocarpus)

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में अन्तर कीजिए लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल

  1. लिवरवर्ट तथा मॉस
  2.  समबीजाणुक तथा विषमबीजाणुक (UPBoardSolutions.com) टेरिडोफाइट
  3.  युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन

उत्तर :

(i)
लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल में अन्तर

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(ii)
लिवरवर्ट तथा मॉस में अन्तर

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(iii)
समबीजाणुक तथा विषमबीजाणुक टेरिडोफाइट में अन्तर

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(vi)
युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन में अन्तर

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प्रश्न 10.
एकबीजपत्री को द्विबीजपत्री से किस प्रकार विभेदित करोगे?
उत्तर :

एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री पौधे में अन्तर
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प्रश्न 11.
स्तम्भ I में दिए गए पादपों का स्तम्भ-II में दिए गए पादप वर्गों से मिलाने कीजिए
स्तम्भ-I (पादप)                    स्तम्भ-II (वर्ग)
(a) क्लेमाइडोमोनास               (i) मॉस
(b) साइकस                           (ii) टेरिडोफाइट
(c) सिलैजिनेला                       (iii) शैवाल
(d) स्फेगनम                           (iv) जिम्नोस्पर्म
उत्तर :
(a) (iii)
(b) (iv)
(c) (ii)
(d) (i)

प्रश्न 12.
जिम्नोस्पर्म के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
जिम्नोस्पर्म के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण ये सामान्यत: ‘नग्नबीजी पौधे’ कहलाते हैं। इनके मुख्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं

  1. अधिकतर पौधे मरुद्भिदी, (xerophytic), काष्ठीय (woody), बहुवर्षीय (perennial) वृक्ष या झाड़ी होते हैं।
  2. पत्तियाँ प्राय: दो प्रकार की होती हैं-शल्क पर्ण और सत्य पर्ण (scale leaves and foliage leaves) स्टोमेटो निचली सतह पर तथा गत में स्थित होते हैं।
  3. तने में संवहन पूल (vascular bundles), संयुक्त (conjoint), कोलेटरल (UPBoardSolutions.com) m(collateral) तथा खुले (open) होते हैं।
  4. जाइलम (xylem) में वाहिकाओं (vessels) तथा फ्लोएम (phloem) में सह कोशिकाओं श(A) (companion cells) का अभाव होता है।
  5. पौधे विषमबीजाणुक (heterosporous) होते हैं-लघुबीजाणु (microspores) तथा गुरुबीजाणु (megaspores)।
  6. पुष्प शंकु (cones) कहलाते हैं। प्रायः नर और मादा शंकु अलग-अलग होते हैं। पौधे एकलिंगाश्रयी (monoecious) होते हैं। नर शंकु का निर्माण लघुबीजाणुपर्णो (micro SHOOT sporophylls) तथा मादा शंकु का निर्माण गुरुबीजाणुपर्णो से होता है।
  7. नर युग्मकोभिद् (male gametophyte) अत्यन्त ह्रासित (reduced) होता है। परागनलिका (pollen tube) बनती है।
  8. मादा युग्मकोभिद् (female gametophyte) एक गुरुबीजाणु (megaspore) से बनता है। यह बहुकोशिकीय (multicellular) होता है। यह पोषण के लिए पूर्णत: बीजाणुभि पर निर्भर करता है।
  9. भ्रूणपोष अगुणित होता है। यह निषेचन से पहले बनता है।
  10. इन पौधों में सामान्यतः वायु परागण (wind pollination) होता है।
  11. प्राय: बहुभ्रूणता (polyembryony) पाई जाती है; किन्तु अंकुरण के समय केवल एक ही धूण
    विकसित होता है।
  12. नग्न बीजाण्ड से निषेचन तथा परिवर्द्धन के बाद नग्न बीज बनाता है। फल (fruits) नहीं बनते।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सभी शैवालों में पाया जाता है
(क) पर्णहरित-a तथा पर्णहरित-b
(ख) पर्णहरित-b तथा कैरोटीन्स
(ग) पर्णहरित-a तथा कैरोटीन्स
(घ) फाइकोबिलिन्स तथा कैरोटीन्स
उत्तर :
(क) पर्णहरित-a तथा पर्णहरित-b

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा शैवाल भूमि में वातावरण की नाइट्रोजन स्थिर करता है?
(क) ऐनाबीना
(ख) यूलोथ्रिक्स
(ग) स्पाइरोगायरा
(घ) म्यूकर
उत्तर :
(क) ऐनाबीना

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प्रश्न 3.
ऐसीटेबुलेरिया नामक शैवाल के प्रयोगों द्वारा केन्द्रक के महत्व को सर्वप्रथम बताया
(क) वाट्सन ने
(ख) हैमरलिंग ने
(ग) नीरेनबर्ग ने
(घ) रॉबर्ट ब्राउन ने
उत्तर :
(ख) हैमरलिंग ने

प्रश्न 4.
ऐसीटेबुलेरिया है एक
(क) एककोशिकीय हरी शैवाल
(ख) बहुकोशिकीय हरी शैवाल
(ग) एककोशिकीय लाल शैवाल
(घ) बहुकोशिकीय लाल शैवाल
उत्तर :
(क) एककोशिकीय हरी शैवाल

प्रश्न 5.
एल्सिनेट्स, एल्जिनिक अम्ल के लवण हैं जो कोशिका भित्ति में पाये जाते हैं।
(क) रोडोफाइसी के सदस्यों में
(ख) मिक्सोफाइसी के सदस्यों में
(ग) फियोफायसी के सदस्यों में
(घ) क्लोरोफाइसी के सदस्यों में
उत्तर :
(ग) फियोफायसी के सदस्यों में

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प्रश्न 6.
निम्न में से कौन-सा ब्रायोफाइट मृतोपजीवी है?
(क) फ्यूनेरियो
(ख) रिक्सिया
(ग) बक्सबोमिया
(घ) ये सभी
उत्तर :
(ग) बक्सबोमिया

प्रश्न 7.
टेरिडोफाइट्स………..भी कहलाते हैं
(क) फैनेरोगैम्स
(ख) वैस्कुलर क्रिप्टोगैम्स
(ग) क्रिप्टोगैम्स
(घ) एन्जिओस्पर्स
उत्तर :
(ख) वैस्कुलर क्रिप्टोगैम्स।

प्रश्न 8.
प्रवालाभ जड़े (coralloid roots) पायी जाती हैं
(क) साइकस में
(ख) फ्यूनेरिया में
(ग) टेरिस में
(घ) लाइकोपोडियम में
उत्तर :
(क) साइकस में

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से किसमें चूषक परीगनली पायी जाती है?
(क) पाइनस में
(ख) साइकस में
(ग) हिबिस्कस में
(घ) एलियम में
उत्तर :
(ख) साइकस में

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लाइकेन के दोनों घटकों का नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. कवक
  2.  शैवाल

प्रश्न 2.
चाय की पत्तियों पर लाल किट्ट (Red rust) रोग किस कारण होता है? या एक परजीवी शैवाल का नाम लिखिए।
उत्तर :
सीफैल्यूरोस (Cephaluros) शैवाल से।

प्रश्न 3.
नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाले दो नीले-हरे शैवालों के नाम लिखिए। या किसी शैवाल का नाम लिखिए जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भाग लेता है।
उत्तर :
नॉस्टॉक तथा ऐनाबीना।

प्रश्न 4.
उस एककोशिकीय शैवाल का नाम लिखिए जो प्रकाश संश्लेषण के अनुसन्धान में प्रयुक्त होता है।
या किस शैवाल में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाई जाती है?
उत्तर :
क्लोरेला (Chlorella)

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प्रश्न 5.
एक शैवाल का नाम बताइए जिसमें सर्पिल हरितलवक होते हैं
उत्तर :
स्पाइरोगायरा

प्रश्न 6.
नीले-हरे शैवालों और जीवाणुओं में क्या समानताएँ हैं? या नीले-हरे शैवालों को सायनोबैक्टीरिया क्यों कहते हैं?
उत्तर :

नीले :
हरे शैवाल और जीवाणु दोनों ही मृदा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। नीले-हरे शैवालों में क्लोरोफिल पाया जाता है जिसकी सहायता से वे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं इसीलिए उन्हें सायनोबैक्टीरिया कहते हैं।

प्रश्न 7.
ब्रायोफाइटा के दो प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर :

  1. इस समुदाय के अधिकांश पौधे हरे होते हैं तथा पृथ्वी पर नम एवं छायादार स्थानों पर उगते हैं। (UPBoardSolutions.com) किन्तु इनमें निषेचन (fertilization) के लिए जल की आवश्यकता होती है, अत: इन्हें पादप जगत का उभयचर (amphibians of the plant kingdom) कहते हैं।
  2. ये पौधे छोटे और थैलस की तरह (thalloid) होते हैं। कुछ उच्च श्रेणी के ब्रायोफाइट्स में वास्तविक (true) जड़े, तना तथा पत्तियाँ तो नहीं होतीं, परन्तु पौधे में तने तथा पत्ती के समान संरचनाएँ मिलती हैं। जड़ों के स्थान पर मूलांग (rhizoids) होते हैं। ये मूलांग पौधों को स्थिर रखने और भूमि से खनिज-लवण का अवशोषण करने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 8.
फ्यूनेरिया के परिमुख में कितने दाँत पाये जाते हैं?
उत्तर :
32 दाँत पाये जाते हैं, जो दो कतारों में (प्रत्येक कतार में 16 दाँत) में व्यवस्थित होते हैं।

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प्रश्न 9.
उस पौधे का नाम लिखिए जिसमें परिमुख (peristome) पाया जाता है।
उत्तर :
परिमुख (peristome) अनेक ब्रायोफाइट्स विशेषकर मॉस (mosses), जैसे–फ्यूनेरिया (Fundria) में पाया जाता हैं।

प्रश्न 10.
उस ब्रायोफाइट का नाम लिखिए जिसमें पाइरीनॉइड पाया जाता है।
उत्तर :
एन्थोसिरोस (Anthoceros)

प्रश्न 11.
किस टेरिडोफाइटा का उपयोग जैव उर्वरक के रूप में किया जाता है?
उत्तर :
जलीय टेरिडोफाइट ऐजोला (Azolla) का, क्योंकि इसमें नीला-हरा शैवाल ऐनग्बीना (Anabaena) पाया जाता है।

प्रश्न 12.
टेरिडोफाइटस में रम्भ (स्टील) की विचारधारा किसने प्रस्तुत की थी?
उत्तर :
वान टोघम (Van Tiegham) एवं डुलिट (Doulit) ने।

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प्रश्न 13.
टेरिडोफाइट्स के चार प्रमुख लक्षण लिखिए। उत्तर–टेरिडोफाइट्स के चार प्रमुख लक्षण निम्नवत् हैं

  1. मुख्य पौधा बीजाणुभिद् (sporophyte) होता है जो प्रायः जड़, पत्ती तथा स्तम्भ में विभेदित रहता है।
  2. ऊतक तन्त्र विकसित होता है, संवहन बण्डल उपस्थित, इनमें संवहन (UPBoardSolutions.com) ऊतक (vascular tissue), जाइलम एवं फ्लोएम में भिन्नत होता है।
  3. इसमें जाइलम में वाहिकाओं (vessels) तथा फ्लोएम में सह-कोशिकाओं (companion cells) का अभाव होता है।
  4. द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) अनुपस्थित, अपवाद स्वरूप आइसोइट्स (Isoetes) में द्वितीयक वृद्धि होती है।

प्रश्न 14.
किस पौधे से तारपीन का तेल प्राप्त किया जाता है? उसका नाम लिखिए।
उत्तर :
अनावृतबीजी पौधे पाइनस से।

प्रश्न 15.
बीरबल साहनी के योगदानों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
प्रो० बीरबल साहनी विश्व के जाने-माने जीवाश्म वनस्पति विज्ञानी (palaeobotanist) थे। उन्हें भारतीय जीवाश्म वनस्पति विज्ञान का जनक (Father of Indian Palaeobotany) कहा जाता है। उनका विशेष योगदान जुरैसिक युग (Jurassic age) के अनावृतबीजी (gymnosperm) विशेषकर एक वर्ग पेण्टोजाइली (pentoxylae) पर शोध कार्य है। उनके प्रयत्नों से, सन् 1946 में विश्व मान्य ‘बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट ऑफ पेलियोबॉटेनी’ (Birbal Sahni Institute of Palaeobotany) लखनऊ की स्थापना हुई। पेलियोबॉटेनिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया (Palaeobotanical Society of India) की स्थापना भी उनके ही विशिष्ट प्रयत्नों से हुई।

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प्रश्न 16.
उस संरचना का नाम बताइए जो साइकस की पर्णिका में पाश्र्वशिरा का कार्य करती है।
उत्तर :
संचरण ऊतक (transfusion tissue) जिसकी कोशिकाएँ अनुप्रस् रूप में लम्बी होती हैं।

प्रश्न 17.
अनावृतबीजी पौधों के चार प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) लिखिए। या अनावृतबीजी पौधों की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
अनावृतबीजी पौधों के चार प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) निम्नवत् हैं।

  1. इस वर्ग के पौधे प्रायः बहुवर्षीय तथा काष्ठीय होते हैं।
  2. ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं जिनमें रन्ध्र पत्ती में धंसे होते हैं तथा बाह्यत्वचा पर उपत्वचा की परत चढ़ी रहती है।
  3.  भ्रूणपोष अगुणित होता है तथा इसका निर्माण निषेचन के पूर्व ही होता है।
  4.  युग्मकोभिद् पीढ़ी बहुत कम विकसित तथा बीजाणुभिद् पीढ़ी पर ही निर्भर होती है।

प्रश्न 18.
भारतीय जीवाश्म वनस्पति विज्ञान (पुरावनस्पति-विज्ञान) का जनक किसे कहा जाता है?
उत्तर :
प्रो० बीरबल साहनी को।

प्रश्न 19.
साइकस तथा फर्न की समानताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर :
साइकस तथा फर्न में निम्नलिखित समानताएँ हैं

  1. बीजाणुभिद् का जड़, तना व पत्ती में विभेदन
  2.  अनावृतबीजीयों के गण साइकेडेल्स के सदस्यों की संयुक्त पत्ती में फर्न की भाँति कुण्डलिन विन्यास (circinate venation)
  3. संवहन ऊतक का विकास, दारु या जाइलम में वाहिनियाँ व पोषवाह या (UPBoardSolutions.com) फ्लोएम में सह-कोशिकाएँ अनुपस्थित।
  4. विषमबीजाणुकता (heterospory)
  5. युग्मकोभिद् के आकार में ह्रास।
  6.  बीजाणुभिद् की जटिलता में क्रमिक वृद्धि।
  7. कुछ अनावृतबीजीयों गण साइकेडेल्स, गिंगोएल्स (order Cycadales, Ginkgoales) में बहुपक्ष्माभीय चलनशील पुंमणु (antherozoids)
  8. निषेचन से पूर्व भ्रूणपोष का विकास।

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प्रश्न 20.
उभयलिंगी पादप किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
वे पादप जिनमें नर पुष्प एवं मादा पुष्प दोनों अलग-अलग एक ही पादप पर उपस्थित होते हैं, उभयलिंगी पादप कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ :

  1. सिडूस देवदार

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यूलोथ्रिक्स और स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना कीजिए। या राइजोपस तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक प्रजनन की तुलना कीजिए। 
या चित्रों की सहायता से यूलोथ्रिक्स में लैगिक जनन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

यूलोथ्रिक्स तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना

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राइजोपस तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना
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प्रश्न 2.
शैवाल तथा कवक में अन्तर बताइए।

उत्तर :
शैवाल तथा कवक में अन्तर

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित को ओसवाल्ड टिप्पो के वर्गीकरण के अनुसार वर्गीकृत कीजिए
(i) यूलोथ्रिक्स
(ii) राइजोपस
(iii) साइकस
(iv) गुड़हल (हिबिस्कस)
(v) प्याज (एलियम)
(vi) एलब्यूगो
(vii) अरहर
(viii) पाइनस
(ix) आलू
उत्तर :

(i) यूलोथ्रिक्स

जगत (kingdom)  – पादप (plantae)
उप-जगत (sub -kingdom)  – थैलोफाइटा (thallophyta)
संघ (phylum)   – क्लोरोफाइटा (chlorophyta)
वर्ग (class)    – क्लोरोफाइसी (chlorophyceae)
क्रम (order)   – यूलोट्राइकेल्स (ulotrichales)
उप-क्रम (sub-order)  – यूलोट्राइकिनी (ulotrichineae)
कुल (family)  – यूलोट्राइकेसी (ulotrichaceae)
वंश (genus)  – यूलोथ्रिक्स (Ulothrix)
जाति (species)   – जोनेटा (zonata)

(ii) राइजोपस

जगत व उप-जगत    – यूलोथ्रिक्स के समान
संघ    – यूमाइकोफाइटा (eumycophyta)
वर्ग    – फाइकोमाइसीट्स (phycomycetes)
उप-वर्ग   – जाइगोमाइसीट्स (zygomycetes)
क्रम     – म्यूकोरेल्स (mucorales)
कुल    – म्यूकोरेसी (mucoraceae)
वंश     – राइजोपस (Rhizopus)
जाति    – निग्रीकैन्स (nigricans)

(iii) साइकस

जगत        – पादप (plantae)
उप-जगत – एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta)
संघ       – ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta)
उप-संघ – टेरॉप्सिडा (pteropsida)
वर्ग         – जिम्नोस्पर्मी (gymnospermae)
उप-वर्ग  – साइकेडोफाइटी (cycadophytae)
क्रम      – साइकेडेल्स (cycadales)
वंश      – साइकस (Cycus)

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(iv) गुड़हल

जगत से उप-संघ तक  – साइकस के समान
वर्ग          – एन्जियोस्पर्मी (angiospermae)
उप-वर्ग   – डाइकॉटीलीडनी (dicotyledonae)
विभाग    – पॉलीपिटेली (polypetalae)
श्रेणी       – थैलेमीफ्लोरी (thalamiflorae)
क्रम        – मालवेल्स (malvales)
कुल        – मालवेसी (malvaceae)
वंश        – हिबिस्कस (Hibiscus)
जाति     – रोजासिनेन्सिस (rosasinensis)

(v) प्याज

जगत -से उप-संघ तक – साइकस के समान
वर्ग              – एन्जियोस्पर्मी (angiospermae)
उप-वर्ग       – मोनोकॉटीलीडनी (monocotyledonae)
श्रेणी            – कॉरोनेरी (coronarieae)
कुल             – लिलिएसी (liliaceae)
वंश             – एलियम (Allium)
जाति           – सीपा (cepa)

(vi) एलब्यूगो

जगत           – पादप (plantae)
उप-जगत    – थैलोफाइटा (thallophyta)
संघ             – यूमाइकोफाइटा (eumycophyta)
वर्ग             – फाइकोमाइसिटीज (phycomycetes)
वंश             – एलब्यूगो (Albugo)
जाति           – कैन्डिडा (candida)

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(vii) अरहर

जगत            – पादप (plantae)
उप-जगत     – एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta)
संघ              – ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta)
उप-संघ      – टेरॉप्सिडा (pteropsida)
वर्ग              – एन्जियोस्पर्मी (arigiospermae)
उप-वर्ग      – डाइकॉटीलीडनी (dicotyledonae)
वंश            – कजानस (Cajanus)
जाति          – कजन (cajan)

(viii) पाइनस

जगत          – पादप (plantae)
उप-जगत   – एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta)
संघ            – ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta)
उप-संघ     – टेरॉप्सिडा (pteropsida)
वर्ग             – जिम्नोस्पर्मी (gymnospermae)
उप-वर्ग      – कोनिफेरोफाइटी (coniferophytae)
गण            – कोनिफेरेल्स (Coniferales)
वंश            – पाइनस (Pinus)
जाति          – रॉक्सबर्थी (roxburghii)

(ix) आलू

जगत          – पादप (plantae)
गण            – सोलेनेल्स (solanales)
कुल           – सोलेनेसी (solanaceae)
वंश            – सोलेनम (Solanum)
जाति          – ट्यूबेरोसम (tuberosum)

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प्रश्न 4.
मॉस (फ्यूनेरिया) सम्पुटिका की अनुदैर्घ्य (ऊर्ध्व) काट का नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की आवश्यकता नहीं है) या फ्यूनेरिया के बीजाणुभिद् की अनुदैर्ध्य काट का एक नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर :

मॉस (फ्यूनेरिया) सम्पुटिका (बीजाणुभिद्) 
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प्रश्न 5.
ब्रायोफाइट्स एवं टेरिडोफाइट्स में कोई चार अन्तर लिखिए।
उत्तर :
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प्रश्न 6.
निम्नलिखित के केवल नामांकित चित्र बनाइए
(क) साइकस के सूक्ष्मबीजाणुधानी की लम्ब काट
(ख) साइकस के पत्रक (पर्णक) की अनुप्रस्थ काट
(ग) साइकस के बीजाण्ड की अनुदैर्घ्य काट
उत्तर :

(क)
साइकस के सूक्ष्मबीजाणुधानी की लम्ब काट

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(ख)
साइकस के पत्रक (पर्णक) की अनुप्रस्थ काट

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(ग)
साइकस के बीजाण्ड की अनुदैर्घ्य काट

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प्रश्न 7.
साइकस की कोरैलॉइड जड़ की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए। यह साइकस की सामान्य जड़ से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
साइकस की कोरैलॉइड जड़ की सामान्य जड़ से भिन्नता साइकस की कोरैलॉइड जड़ (coralloid root) सामान्य जड़ से निम्नलिखित विशेषताओं में भिन्न होती है

  1.  कोरैलॉइड जड़े वायवीय (aerial) होती हैं, जबकि सामान्य जड़े भूमिगत होती हैं।
  2. कोरैलॉइड वल्कुट (cortex) बाहरी, मध्य तथा आन्तरिक वल्कुटों में विभक्त होता है जबकि सामान्य जड़ों में सम्पूर्ण वल्कुट एक ही होता है।
  3. कोरेलॉइड जड़ का मध्य वल्कुट वास्तव में एक शैवालीय क्षेत्र (algal zone) होता है (UPBoardSolutions.com) जिसके बड़े-बड़े अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) में एनाबीना (Anabaed), नॉस्टॉक (Nostoc) आदि नीले-हरे शैवाल रहते हैं, जो सामान्य जड़ों में नहीं पाये जाते हैं। साइकस की कोरैलॉइड जड़ की अनुप्रस्थ काट
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए
(क) कवक (फफूद)
(ख) टेरिडोफाइट्स
उत्तर
(क) कवकों का आर्थिक महत्त्व कवकों से निम्नलिखित लाभ हैं

1. भोज्य पदार्थों के रूप में (As food) :
अनेक कवकों में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन तथा विटामिन होते हैं अतः इन कवकों को भोजन के रूप में काम में लाया जा सकता है। उदाहरण-सब्जी । के रूप में (vegetables) कुकुरमुत्ते (mushrooms), गुच्छी (Morchella), लाइकोपरडॉन (Lycoperdon) आदि। खमीर (yeast) अनेक प्रकार से भोज्य पदार्थों को सुधारने, उनमें विटामिन इत्यादि की मात्रा बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

2 औषधि निर्माण में (In medicines) :
अनेक कवकों से अब प्रतिजैविक (antibiotics) प्राप्त किये जाते हैं। एण्टीबायोटिक्स का उपयोग प्रमुखतः जीवाणु रोगों (bacterial diseases) में कियाजाता है। उदाहरण-पेनिसिलिन (penicillin), पेनिसिलियम की जातियों (Penicillium notatum, p chrysogenum), अरगट (ergot) नामक औषधि क्लेविसेप्स परप्यूरिया (Claviceps purpurea) से प्राप्त की जाती है जो रुधिरस्राव (bleeding) रोकने के लिए (विशेषकर प्रसव के समय) प्रयोग में लायी जाती है।

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3. उद्योगों में (In industry) :
कवकों से अनेक प्रकार के कार्बनिक अम्ल (organic acids); जैसे— ऑक्सेलिक, लैक्टिक, साइट्रिक अम्ल आदि तथा ऐल्कोहॉल्स’ (alcohols), विकर (enzymes), विटामिन्स (vitamins) आदि रासायनिक पदार्थ बनाये जाते हैं जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं।

उदाहरण :
यीस्ट के द्वारा शराबों का निर्माण।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 3 Plant Kingdom image 20
पौधों की वृद्धि के लिए जिबरेलिन्स (gibberellins) उपयोगी सिद्ध हुए हैं। ये जिबरेला फ्यूजीकोराई (Gibberella jugikordi) से तैयार किये जाते हैं। ऐस्पर्जिलस (Aspergillus) तथा पेनिसिलियम (Penicillium) आदि यीस्ट (yeast) के अतिरिक्त पनीर बनाने के काम आते हैं। बेकिंग (baking) उद्योग में यीस्ट अत्यन्त उपयोगी है। अनेक विकर (enzymes) तथा विटामिन्स (vitamins) को औद्योगिक निर्माण यीस्ट, एस्पर्जिलस, राइजोपस (Rhizopus), पेनिसिलियम आदि कवकों के द्वारा किया जाता है। कवक ऑडियम लैक्टिस (Oidium lactis) प्लास्टिक उद्योग में काम आता है।

4. मृदा उर्वरता बनाये रखने में (In maintenance of soil fertility) :
कवक जीवाणुओं की तरह प्राकृतिक अपमार्जक (natural scavengers) का कार्य करते हैं और इस प्रकार भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं। जल को रोकने की शक्ति, ह्यूमस (humus) बनाने में सहयोग, लवणों को। अवशोषित कर उन्हें रोके रखने की शक्ति भी भूमि में उत्पन्न करते हैं।

5. पौधों के पोषण में (In nutrition of plants) :
अनेक पौधों की जड़ों पर या उनके अन्दर कुछ कवक (fungi) रहते हैं। इन्हें क्रमशः एक्टोट्रॉफिक माइकोराइजा तथा एण्डोट्रॉफिक माइकोराइजी (ectotrophic and endotrophic mycorrhiza) कहते हैं। अनेक ऑरकिड्स (orchids), मोनोटोपा यूनीफ्लोरा (Monotropd uniflora), साराकोड्स (Sardcodes), पाइनस (Pinus), जैमिया (Zamia) आदि इसके उदाहरण हैं।

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(ख)
टेरिडोफाइट्स का आर्थिक महत्त्व

टेरिडोफाइट्स से निम्नलिखित लाभ हैं

1. जैव उर्वरक के रूप में (As Biofertilizer) :
एजोला के अन्दर एनाबीना ऐजोली (Anabdena gzotlae) नामक नीला-हरा शैवाल वास करता है। यह शैवाल स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिरीकरण करता है।
इस कारण से एजोला को धान आदि के खेतों में उर्वरक (fertilizer) के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह पौधा तालाब की सतह पर अधिक वृद्धि करके मच्छर के लार्वा को साँस लेने में अवरोध करता है।

2. सजावट के लिए (Ornamental Plants) :
फर्न की विभिन्न जातियाँ घरों व बगीचों में सुन्दरता के लिए लगाई जाती हैं; जैसे-लाइकोपोडियम (ground pines) तथा सैलाजिनेला (spike mosses) आदि।

3. खाद्य पदार्थ के रूप में (As Food) :
क्विलक्स (आइसोइट्स- Isoetes) के घनकन्द (corms), मनुष्यों, पालतू व जंगली जन्तुओं द्वारा खाए जाते हैं।

4. मनोरंजन हेतु (For Entertainment) :
सैलाजिनेला की कुछ मरुभिद् जातियों को पुनर्जीवनी पौधे (resurrection plant) कहा जाता है, इन्हें कौतुहल वश बाजार में बेचा जाता है। ये पौधे सूख जाने पर मुड़कर छोटी गेंद (balls) के रूप में बदल जाते हैं और पूर्णतया मृत प्रतीत होते हैं। पुन: जल में डाल दिए जाने पर पौधे तेजी से पूर्णतया खुलकर हरे हो जाते हैं।

5. जीवाश्म ईंधन का निर्माण (Formation of Fossil Fuel) :
टेरिडोफाइट्स जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) के जमा होने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। आदि काल में ये विशाल हार्सटेल्स (giant horsetails), क्लब मॉस आदि दलदली वनस्पति (swampy vegetation) का प्रमुख अंश थे। दलदल धीरे-धीरे डूबने लगे और पौधों के विभिन्न भाग एकत्रित होते गए। जल में ऑक्सीजन के अभाव में इन पौधों को जीवाणु विघटित (decompose) नहीं कर पाए। इन परिस्थितियों के कारण कालान्तर में कोयले (coal) का निर्माण हुआ।

6. जीवनाशक के रूप में (As Pesticides) :
लाइकोपोडियम (Lycopodium) की अनेक जातियाँ नाइट्रोजनयुक्त रसायन (alkaloids) बनाती हैं। यह विष का कार्य करता है। अत: कुछ देशों में इसे जीवनाशक (pesticides) के रूप में प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 2.
उपयुक्त नामांकित चित्रों के द्वारा फर्न के जीवन चक्र का वर्णन कीजिए। मॉस के वयस्क पौधे की समानता फर्न के जीवन चक्र की किस अवस्था से की जा सकती है? कारण सहित लिखिए। या पीढी एकान्तरण की परिभाषा लिखिए। नामांकित चित्रों की सहायता से इसे फर्न के जीवन चक्र के साथ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

पीढी एकान्तरण

लैंगिक जनन (sexual reproduction) के समय जब दो युग्मकों (gametes) के संलयन (fusion) से युग्मज (Zygote) का निर्माण होता है तो एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta) समूह के पोधों में यह सूत्री विभाजन के द्वारा एक बहुकोशिकीय (multicellular) स्पष्ट भ्रूण (embryo) का निर्माण करता है। यह भ्रूण एक द्विगुणित संरचना है तथा एक विशेष अवस्था है जो एक द्विगुणित पीढ़ी या सन्तति (diploid generation) का निर्माण करती है। इस पीढ़ी को बीजाणुभिद् (sporophyte) कहते हैं। बीजाणुभिद् बीजाणुओं (spores) द्वारा जननकरता है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के बाद बनते हैं और अगुणित (haploid) होते हैं। प्रत्येक बीजाणु अंकुरित होता है और सामान्य सूत्री विभाजनों द्वारा बहुकोशिकीय अवस्था अर्थात्यु ग्मकोभिद् (gametophyte) पीढ़ी का निर्माण करता है। इसी पीढ़ी से युग्मकों का निर्माण होता है। उपर्युक्त के अनुसार, एक एम्ब्रयोफाइटिक पौधे (embryophytic plant) में दो पीढ़ियाँ (generations), युग्मकोद्भिद् तथा बीजाणुभिद् एक जीवन चक्र (life cycle) को बनाती हैं। इस प्रकार युग्मकोभिद् पीढ़ी से बीजाणुभिद् पीढ़ी तथा बीजाणुभिद् पीढ़ी से युग्मकोभिद् पीढ़ी का एक के बाद एक आना पीढ़ियों का एकान्तरण (alternation of generations) कहलाता है।

एक फर्न, टेरिस या ड्रायोप्टेरिस का जीवन चक्र

विभाग ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta) के उपविभाग टेरोफाइटा या फिलिकोफाइटा (pterophyta or filicophyta), वर्ग लेप्टोस्पोरैन्जियोप्सडा (leptosporangiopsida), गण फिलिकेल्स (filicales) के सदस्य सामान्यत: फर्न (fern) कहलाते हैं। इन पौधों के जीवन चक्र सामान्य रूप से समान प्रकार के होते हैं। यहाँ वर्णन प्रमुखतः ड्रायोप्टेरिस फिलिक्स मैस (Dryoteris filix mas) नामक पौधे के सन्दर्भ में है।
1. बीजाणुभिद् (Sporophyte) :
यह फर्न का मुख्य पौधा होता है। इसके तीन प्रमुख भाग होते हैं

  1.  प्रकन्द (rhizome), जो भूमि में तिरछा उगता है। इसका केवल अगला शीर्ष भाग ही भूमि से बाहर निकला रहता है।
  2.  प्रकन्द से निकलने वाली अनेक पत्तियाँ तथा
  3.  अपस्थानिक जड़े। फर्न के पौधे में पत्तियाँ विशेष रूप से काफी बड़ी सामान्यतः द्विपिच्छाकार संयुक्त (bipinnate compound) होती हैं और ये पौधे की प्रमुख पहचान हैं।

2. बीजाणुपर्ण (Sporophylls) :
कुछ सामान्य पत्तियाँ ही बीजाणुपर्ण (sporophylls) का कार्य करती हैं। इन पत्तियों के पर्णकों की निचली सतह पर अनेक बीजाणुधानियाँ (sporangia) समूहों के रूप में लगी रहती हैं। बीजाणुधानियों के समूहों को सोराई (sori) कहा जाता है।

3. सोरस तथा उसकी बीजाणुधानियाँ (Sorus and its sporangia) :
प्रत्येक सोरस में कई बीजाणुधानियाँ होती हैं। प्रत्येक बीजाणुधानी की भित्ति एक कोशिका मोटी होती है तथा इसमें 12 से 16 तक बीजाणु मातृ कोशिकाएँ (spore mother cells) होती हैं। प्रत्येक बीजाणु मातृकोशिका (2n) से अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के द्वारा चार अगुणित (haploid=n) बीजाणुओं (spores) का निर्माण होता है। इस प्रकार फर्न का पौधा जो एक बीजाणुभिद् होता है, बीजाणुओं के द्वारा अलैंगिक जनन (asexual reproduction) करता है।

4. बीजाणुधानी का स्फुटन तथा बीजाणुओं का प्रकीर्णन (Dehiscence of sporangium and dispersal of spores) :
शुष्क अवस्थाओं में सोरस तथा बीजाणुधानी का स्फुटन एक विशेष प्रकार से होता है। इससे बीजाणु (spores) दूर तक छिटक जाते हैं तथा वायु में तैरतेहुए भूमि पर पहुँचकर अंकुरित होते हैं।

5. युग्मकोभिद् (Gametophyte) :
प्रत्येक बीजाणु अनुकूल अवस्थाओं में अंकुरित होकर एक नयी पीढ़ी को जन्म देता है। यह एक पूर्णतः (UPBoardSolutions.com) स्वतन्त्रजीवी, पौधे की तरह की संरचना बनाता है। इसे प्रोथैलस (prothallus) कहते हैं। यही फर्न की प्रमुख युग्मकोभिद् (gametophyte) अवस्था है।

6. प्रोथैलस (Prothallus) :
यह एक हरे रंग की चपटी, पतली, हृदयाकार (heart shaped) तथा शयान (prostrate) संरचना होती है और भूमि पर लेटी हुई दशा में बढ़ती है। इसका अग्र भाग चौड़ा होता है तथा इसके मध्य भाग में एक गर्त (notch) होता है जिसके दोनों ओर की पालियाँ एक-दूसरे को ढकने वाली (overlapping) होती हैं। प्रोथैलस के पश्च, संकरे सिरे के निचले भागे से मूलाभास (rhizoids) निकलते हैं। यह स्वपोषी (autotrophic) होता है।

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7. जननांग (Reproductive organs) :
फर्न का प्रोथैलस एक उभयलिंगाश्रयी (monoecious) संरचना है अर्थात् एक ही प्रोथैलस पर नर तथा मादा जननांग बन जाते हैं यद्यपि केवल परनिषेचन (cross fertilization) ही होता है। नर जननांग पुंधानियाँ (antheridia) होती हैं तथा मादा जननांग
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 3 Plant Kingdom image 21

स्त्रीधानियाँ (archegonia) होती हैं। जननांग प्रोथैलस के मध्य तथा पश्च भाग तक फैले अधिक मोटे (thick), गद्दी (cushion) के समान भाग पर बनते हैं। स्त्रीधानियाँ गर्त (notch) के आस-पास किन्तु पुंधानियाँ पश्च भाग में बनती हैं।

8. पुंधानी तथा नर युग्मक (Antheridium and male gametes) :
एक परिपक्व पुंधानी प्रोथैलस के तल से बाहर उभरी होती है। यह एक गोल, एककोशिका मोटी भित्ति वाली संरचना होती है। इसके अन्दर 20-50 तक नर युग्मक (male gametes) अर्थात् पुमणुओं (antherozoids) का निर्माण होता है। पुमणु एक सिंप्रग के समान कुण्डलित, (UPBoardSolutions.com) बहुपक्ष्माभिकी (multicilliate) तथा सचल (motile) होते हैं। ये रसायन अनुचलित (chemotactic) होते हैं और जल में तैरकर स्त्रीधानी तक पहुँचते हैं।

9. स्त्रीधानी तथा मादा युग्मक (Archegonium and female gamete) :
एक परिपक्व स्त्रीधानी (archegonium) फ्लास्क के समान तिरछी गर्दन वाली संरचना होती है। इसकी गर्दन, चार ऊर्ध्व पंक्तियों में लगी कोशिकाओं से बनी होती है। इसके फूले हुये भाग अण्डधा (venter) का कोई अपना स्तर नहीं होता। यह प्रोथैलस में ही धंसी रहती है। इसकी गर्दन में ग्रीवा नाल कोशिका (neck canal cell) एक ही, किन्तु द्विकेन्द्रकीय (binucleate) होती है। इसके अतिरिक्त एक अण्डधा नाल कोशिका (venter canal cell) तथा सबसे भीतरी फूले हुये भाग में एक अण्डाणु (oosphere) होता है। अण्डाणु ही अचल (non-motile) मादा युग्मक है।

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10. निषेचन (Fertilization) :
निषेचन की क्रिया के लिए जल आवश्यक होता है। स्त्रीधानी के परिपक्व होने पर इसका मुँह खुल जाता है। इस समय मुंह पर उपस्थित कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं, साथ ही ग्रीवा नाल कोशिका तथा अण्डधा नाल कोशिका नष्ट होकर श्लेष्मक बना लेती हैं। श्लेष्मक मुँह से भी बाहर निकलने लगता है जिसमें उपस्थित मैलिक अम्ल (malic acid) से आकर्षित होकर पुमणु जल में तैरते हुये स्त्रीधानी में घुस आते हैं। इनमें से एक अण्डाणु (oosphere) में प्रवेश कर इसे निषेचित (fertilize) करता है। इस प्रकार अण्डाणु से द्विगुणित (diploid = 2n) युग्मनज (zygote) बनता है। शीघ्र ही युग्मनज अपने चारों ओर एक मोटी भित्ति का निर्माण करता है और निषिक्ताण्ड (oospore) में बदल जाता है।
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11. भ्रूण तथा नये बीजाणुभिद् का निर्माण (Formation of embryo and new sporophyte) :
निषिक्ताण्ड (oospore) सामान्य सूत्री विभाजनों (mitotic divisions) से बार-बार एक विशेष पैटर्न में विभाजित होता है तथा एक भ्रूण (embryo) का निर्माण करता है। एक प्रोथैलस पर यद्यपि कई स्त्रीधानियों में निषेचन तथा उससे आगे की अन्य क्रियाएँ हो सकती हैं, किन्तु सामान्यतः भ्रूण एक ही निर्मित हो पाता है। यही भ्रूण बढ़ते हुये अण्डधा द्वारा बनाये गये कैलिप्ट्रा (calyptra) को भी तोड़-फोड़ देता है। इसका एक भाग पाद की तरह प्रोथैलस से सम्बन्धित (UPBoardSolutions.com) रहता है, किन्तु शीघ्र ही एक मूल कुछ दूरी तक प्रोथैलस के साथ बढ़कर बढ़ते हुये भ्रूण को मृदा में जमा देती है। उधर प्ररोह शीर्ष पर लगी प्राथमिक पत्ती प्रोथैलस के गर्त में से होकर ऊपर निकल आती है और हरी हो जाती है। शीर्ष अब प्रकन्द (rhizome) में बदल जाता है। इस प्रकार एक छोटा-सा नया बीजाणुभिद् (new sporophyte) तैयार हो जाता है। उपर्युक्त विवरण स्पष्ट करता है कि यहाँ पीढ़ियों को एकान्तरण दो स्पष्ट, स्वतन्त्रजीवी, स्वपोषी सन्ततियों अर्थात् प्रोथैलस (युग्मकोद्भिद्) तथा मुख्य पौधे (बीजाणुभिद्) के मध्य होता है मॉस का वयस्क पौधा (adult plant of moss) मॉस के जीवन चक्र की युग्मकोभिदी (gametophytic) पीढ़ी है। फर्न के जीवन चक्र में प्रमुख युग्मकोभिद् इसका प्रोथैलस (prothallus) होता है।

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निम्नलिखित कारण इसे स्पष्ट करते हैं

  1. दोनों की कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या अगुणित (n) होती है।
  2.  दोनों का निर्माण बीजाणु (spore) के अंकुरण से बने सूत्राकार संरचनाओं पर होता है।
  3. दोनों ही लैंगिक जनन के लिए नर तथा मादा जननांगों अर्थात् पुंधानियाँ व स्त्रीधानियाँ (antheridia and archegonia) तथा उनसे क्रमश: नर व मादा युग्मकों अर्थात् एन्थ्रोजोइड्स (antherozoids) व अण्डाणु (oosphere) का निर्माण करते हैं।
  4. निषेचन के बाद दोनों के ऊपर नये बीजाणुभिदों (sporophytes) का निर्माण होता है।
  5. निषेचन तथा बीजाणुभिद् के परिवर्द्धन की अवस्थाओं आदि में भी काफी समानता होती है।

प्रश्न 3.
नामांकित चित्रों की सहायता से आवृतबीजी पौधों के जीवन चक्र का वर्णन कीजिए। या एक द्विबीजपत्री पौधे के जीवन चक्र का नामांकित रेखीय चित्र बनाइए।
उत्तर :
आवृतबीजी (द्विबीजपत्री) पौधे का जीवन चक्र एक आवृतबीजी पौधा एक अत्यधिक विकसित तथा जटिल शरीर वाला बीजाणुभिद् (sporophyte) होता है अर्थात् यह द्विगुणित (diploid = 2n) होता है। इसके जीवन चक्र की प्रमुख अवस्थाएँ

निम्नलिखित होती हैं

1. पौधे पर पुष्प (flowers) लगते हैं जिनमें लैंगिक अंग (sexual organs) क्रमशः नर तथा मादा पुंकेसर (stamens) और स्त्रीकेसर या अण्डप (carpels) होते हैं।

2. प्रत्येक पुंकेसर का जनन भाग विशेष अंग परागकोष (anther) होता है जिसके अन्दर विशेष  कोशिकाओं द्विगुणित  (diploid=2n) लघुबीजाणु मातृ कोशिकाओं (microspore mother cells) में अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के द्वारा अगुणित (haploid=n) लघुबीजाणुओं (microspores) का निर्माण होता है। लघुबीजाणु ही युग्मकोभिद् (gametophyte) की प्रथम अवस्था है

3. प्रत्येक स्त्रीकेसर या अण्डप (carpel) में अण्डाशय (ovary) के अन्दर बीजाण्ड (ovule) बनते हैं, जो इसकी गुरुबीजाणुधानियाँ (megasporangia) हैं।

4. बीजाण्ड के मुख्य भाग बीजाण्डकाय (nucellus) में एक बीजाणु मातृ कोशिका (megaspore mother cell) से चार गुरुबीजाणुओं (megaspores) का निर्माण होता है जो इसके मादा युग्मकोभिद् (female gametophyte) की प्रारम्भिक अवस्था है

5. प्रत्येक बीजाण्ड में बनने वाले चार गुरुबीजाणुओं में से केवल एक बढ़कर भ्रूणकोष (embryo sac) बनाता है। यही इसका मादा युग्मकोभिद् है जिसमें प्राय: केवल आठ केन्द्रक ही होते हैं, इनमें एक मादा युग्मक (female gamete) या अण्ड (ovum or egg cell) भी सम्मिलित है।

6. परिपक्व नर युग्मकोभिद् या परागकण केवल दो ही कोशिकाओं का बना होता है तथा इसी अवस्था में परागण के लिए यह परागकोष से बाहर निकलता है।

7. परागण (pollination) की क्रिया के द्वारा परागकण मादा अंग जायांग के वर्तिकाग्र पर किसी साधन से पहुँचते हैं और यहीं अंकुरित होकर पराग नलिका (pollen tube) बनाते हैं। प्रत्येक पराग नलिका के सिरे पर नर युग्मकोभिद् का वर्दी केन्द्रक या नलिका केन्द्रक (tube nucleus) (UPBoardSolutions.com) तथा थोड़ा जनन केन्द्रक (generative nucleus) होता है, जो बाद में पराग नलिका में ही विभाजित होकर दो नर युग्मक (male gametes) बनाता है। पराग नलिका वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में तथा बाद में बीजाण्ड के अन्दर प्रवेश करके नर युग्मकों (male gametes) को भ्रूणकोष (embryo sac) के अन्दर पहुँचाती है।

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8. दो नर युग्मकों में से, एक मादा युग्मक (अण्ड कोशिका) से संयुग्मित होता है तथा दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक (secondary nucleus) से संयुक्त होता है। इस प्रकार, इन पौधों में दिनिषेचन (double fertilization) की क्रिया होती है।

9. द्वितीयक केन्द्रक पहले ही दो ध्रुवीय केन्द्रकों के मिलने से बनता है; अत: द्विनिषेचन के अन्त में दौ भिन्न-भिन्न प्रकार के केन्द्रक बनते हैं–एक द्विगुणित (diploid=2n) अब भ्रूणीय कोशिका (embryonal cell) में उपस्थित तथा दूसरा प्रायः त्रिगुणित (triploid=3n) अर्थात् भ्रूणपोष केन्द्रक (endospermic nucleus) जो सम्पूर्ण भ्रूणकोष का प्रतिनिधित्व करने वाले जीवद्रव्य में स्थित होता है।

10. भ्रूणीय कोशिका (embryonal cell) से भ्रूण (embryo) का निर्माण होता है। भ्रूणपोषीय केन्द्रक (endospermic nucleus) भ्रूणकोष के जीवद्रव्य के साथ एक पोषक संरचना भ्रूणपोष (endosperm) का निर्माण करता है।

11. सम्पूर्ण बीजाण्ड भ्रूण और भ्रूणपोष के बनने से बीज में बदल जाता है, जबकि अण्डाशय फल (UPBoardSolutions.com) (fruit) बनाता है। बीज के अन्दर भ्रूण नया बीजाणुभिद् (sporophyte) है; अतः ये जब भी अंकुरित होते हैं तो नये पौधे बनाते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter (द्रव्य की अवस्थाएँ)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter (द्रव्य की अवस्थाएँ).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
30°C तथा 1 bar दाब पर वायु के 50 dm आयतन को 200 dm तक संपीडित करने के लिए कितने न्यूनतम दाब की आवश्यकता होगी?
उत्तर
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प्रश्न 2.
35°C ताप तथा 1.2 bar दाब पर 120 mL धारिता वाले पात्र में गैस की निश्चित मात्रा भरी है। यदि 35°C पर गैस को 180 mL धारिता वाले फ्लास्क में स्थानान्तरित किया जाता है तो गैस का दाब क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 3.
अवस्था-समीकरण का उफ्योग करते हुए स्पष्ट कीजिए कि दिए गए ताप पर गैस का घनत्व गैस के दाब के समानुपाती होता है।
उत्तर
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प्रश्न 4.
0°C पर तथा 2 bar दाब पर किसी गैस के ऑक्साइड का घनत्व 5 bar दाब पर डाइनाइट्रोजन के घनत्व के समान है तो ऑक्साइड का अणुभार क्या है?
उत्तर
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प्रश्न 5.
27°C पर एक ग्राम आदर्श गैस का दाब 2 bar है। जब समान ताप एवं दाब पर इसमें दो ग्राम आदर्श गैस मिलाई जाती है तो दाब 3 bar हो जाता है। इन गैसों के अणुभार में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 6.
नाली साफ करने वाले ड्रेनेक्स में सूक्ष्म मात्रा में ऐलुमिनियम होता है। यह कॉस्टिक सोडा से क्रिया पर डाइहाइड्रोजन गैस देता है। यदि 1 bar तथा 20°C ताप पर 0.15 g ऐलुमिनियम अभिक्रिया करेगा तो निर्गमित डाइहाइड्रोजन का आयतन क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 7.
यदि 27°C पर 9 dm धारिता वाले फ्लास्क में 3.2 ग्राम मेथेन तथा 4.4 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण हो तो इसका दाब क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 8.
27°C ताप पर जब 1L के फ्लास्क में 0.7 bar पर 2.0L डाइऑक्सीजन तथा 0.8 bar पर 0-5 L डाइहाइड्रोजन को भरा जाता है तो गैसीय मिश्रण का दाब क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 9.
यदि 27°C ताप तथा 2 bar दाब पर एक गैस का घनत्व 5.46 g/dm’ है तो STP पर इसका घनत्व क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 10.
यदि 546°C तथा 0.1 bar दाब पर 34.05 mL फॉस्फोरस वाष्प का भार 0.0625 g है तो फॉस्फोरस का मोलर द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 11.
एक विद्यार्थी 27°C पर गोल पेंदे के फ्लास्क में अभिक्रिया-मिश्रण डालना भूल गया तथा उस फ्लास्क को ज्वाला पर रख दिया। कुछ समय पश्चात उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने उत्तापमापी की सहायता से फ्लास्क का ताप 477°C पाया। आप बताइए कि वायु का कितना भाग फ्लास्क से बाहर निकला?
उत्तर
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प्रश्न 12.
3.32 bar पर 5 dm आयतन घेरने वाली 4.0 mol गैस के ताप की गणना कीजिए। (R = 0.083 bar dm3 K-1mol-1)
उत्तर
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प्रश्न 13.
1.4g डाइनाइट्रोजन गैस में उपस्थित कुल इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 14.
यदि एक सेकण्ड में 100 गेहूँ के दाने वितरित किए जाएँ तो आवोगाद्रो संख्या के बराबर दाने वितरित करने में कितना समय लगेगा?
उत्तर
आवोगाद्रो की संख्या = 6.022×1023। चूँकि 1010 दाने प्रति सेकण्ड वितरित होते हैं,
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प्रश्न 15.
27°C ताप पर 1 dm3 आयतन वाले फ्लास्क में 8 ग्राम डाइऑक्सीजन तथा 4 ग्राम डाइहाइड्रोजन के मिश्रण का कुल दाब कितना होगा?
उत्तर
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प्रश्न 16.
गुब्बारे के भार तथा विस्थापित वायु के भार के अन्तर को ‘पेलोड कहते हैं। यदि27°C पर 10 m त्रिज्या वाले गुब्बारे में 1.66 bar पर 100 kg हीलियम भरी जाए तो पेलोड की गणना कीजिए। (वायु का घनत्व = 1.2 kg m3 तथा R = 0.083 bar dm3 K-1mol-1)
उत्तर
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प्रश्न 17.
31.1°C तथा 1 bar दाब पर 8.8 ग्राम CO2) द्वारा घेरे गए आयतन की गणना कीजिए। (R = 0.083 bar LK-1mol-1)
उत्तर
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प्रश्न 18.
समान दाब पर किसी गैस के 2.9 ग्राम द्रव्यमान का 95°C तथा 0.184 ग्राम डाइहाइड्रोजन का 17°C पर आयतन समान है। बताइए कि गैस का मोलर द्रव्यमान क्या
होगा?
उत्तर
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प्रश्न 19.
1 bar दाब पर डाइहाइड्रोजन तथा डाइऑक्सीजन के मिश्रण में 20% डाइहाइड्रोजन (भार से) रखा जाता है तो डाइहाइड्रोजन का आंशिक दाब क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 20.
PV2T2/n राशि के लिए S.I. इकाई क्या होगी?
उत्तर
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प्रश्न 21.
चार्ल्स के नियम के आधार पर समझाइए कि न्यूनतम सम्भव ताप -273°C होता है।
उत्तर
जिस प्रकार गैस को गर्म करने पर उसका आयतन बढ़ता है ठीक उसी प्रकार उसे ठण्डा करने पर अर्थात् उसका ताप घटाने पर उसका आयतन घटता भी है। ऐसी स्थिति में,
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अतः -273°C पर गैस का आयतन शून्य हो जाना चाहिए।
इससे कम ताप पर आयतन ऋणात्मक हो जाएगा जो कि अर्थहीन है। वास्तव में सभी गैसें इस ताप पर पहुँचने से पउत्तरे ही द्रवित हो जाती हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि -273°C (0K) ही न्यूनतम सम्भव ताप है।

प्रश्न 22.
कार्बन डाइऑक्साइड तथा मेथेन का क्रान्तिक ताप क्रमशः 31.1°C एवं -81.9°C है। इनमें से किसमें प्रबल अन्तर-आण्विक बल है तथा क्यों?
उत्तर
क्रान्तिक ताप जितना अधिक होगा, गैस को उतनी ही सरलता से द्रवीभूत किया जा सकता है। यह केवल तब सम्भव है जब अन्तर आणविक बल मजबूत हो। अत: CO2में, CH4 की तुलना में प्रबल अन्तराणविक बल है।

प्रश्न 23.
वाण्डरवाल्स प्राचल की भौतिक सार्थकता को समझाइए।
उत्तर

  1. वाण्डरवाल्स प्राचल ‘a’-इसका मान गैस के अणुओं में विद्यमान आकर्षण बलों के परिमाण की माप होता है। अत: a का मान अधिक होने का तात्पर्य, अन्तर-आण्विक आकर्षण बलों का अधिक होना है।
  2.  वाण्डरवाल्स प्राचल ‘b’-इसका मान गैस-अणुओं के प्रभावी आकार की माप है। इसका मान गैस-अणुओं के वास्तविक आयतन का चार गुना होता है। यह अपवर्जित आयतन कउत्तराता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गैस के किसी निश्चित भार के लिए यदि दाब को आधा तथा ताप को दोगुना कर दिया जाए, तो गैस का आयतन होगा ।
(i) V/4 ,
(ii) 2V2
(iii) 6V
(iv) 4V
उत्तर
(iv) 4V

प्रश्न 2.
स्थिर दाब पर ऐक लीटर धारिता वाले पात्र को 27°C से 37°C तक गर्म किया जाता है। बाहर निकलने वाली वायु का आयतन है।
(i) 22.2 लीटर
(ii) 0.333 लीटर
(iii) 0.222 लीटर
(iv) 33.3 लीटर
उत्तर
(iv) 33.3 लीटर

प्रश्न 3.
27°C पर एक गैस का दाब 90 सेमी है। स्थिर आयतन पर -173°C ताप पर गैस का दाब होगा
(i) 30 सेमी
(ii) 40 सेमी
(iii) 60 सेमी
(iv) 68 सेमी
उत्तर
(i) 30 सेमी

प्रश्न 4.
एक बर्तन में 25°C पर मेथेन तथा हाइड्रोजन के समान भार भरे गए हैं। हाइड्रोजन का दाब होगा, कुल दाबे का
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उत्तर
(ii) [latex]\frac { 8 }{ 9 } [/latex]

प्रश्न 5.
किसी गैस के 0.1 ग्राम का सा० ता० दा० पर आयतन 20 मिली है। इस गैस का अणुभार है।
(i) 56
(ii) 40
(iii) 80
(iv) 60
उत्तर
(iii) 80

प्रश्न 6.
ऑक्सीजन के 16 ग्राम तथा हाइड्रोजन के 3 ग्राम को मिलाया गया और 760 मिमी दाब तथा 273 K ताप पर एक बर्तन में रखा गया। मिश्रण द्वारा घेरा गया कुल आयतन होगा
(i) 22.4 लीटर
(ii) 33.6 लीटर
(iii) 11.2 लीटर
(iv) 44.8 लीटर
उत्तर
(iv) 44.8 लीटर

प्रश्न 7.
एक मिश्रण का कुल दाब ‘P’ है। इस मिश्रण में 5.6 ग्राम नाइट्रोजन और 6.4 ग्राम ऑक्सीजन है। मिश्रण में नाइट्रोजन का आंशिक दाब है।
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उत्तर
(ii) [latex]\frac { P }{ 2 } [/latex]

प्रश्न 8.
समान धारिता वाले दो फ्लास्कों में 500 मिमी दाब पर नाइट्रोजन एवं 250 मिमी दाब पर हाइड्रोजन भरी है। दोनों पात्रों को जोड़ देने पर सम्पूर्ण मिश्रण का दाब होगा
(i) 500 मिमी
(ii) 375 मिमी
(iii) 250 मिमी
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) 375 मिमी

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में किस गैस का द्रवीकरण आसानी से होता है?
(i) NH3
(ii) SO2
(iii) H2
(iv) CO2
उत्तर
(i) NH3

प्रश्न 10.
जिस ताप पर द्रव का वाष्प दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है, उसे कहा जाता
(i) हिमांक
(ii) क्वथनांक
(iii) गलनांक
(iv) क्रान्तिक ताप
उत्तर
(ii) क्वथनांक

प्रश्न 11.
किसी द्रव की पृष्ठ तनाव
(i) ताप वृद्धि से बढ़ता है।
(ii) ताप वृद्धि से घटता है।
(iii) ताप का कोई प्रभाव नहीं होता है
(iv) कोई उत्तर सही नहीं है।
उत्तर
(ii) ताप वृद्धि से घटती है।

प्रश्न 12.
एक द्रव और जल के समान आयतन द्वारा एक बिन्दुमापी से क्रमशः 40 और 20 बूंदें बनाईं गईं। द्रव और जल के घनत्वों का अनुपात 2:1 है। यदि जल का पृष्ठ तनाव 7.2 x10-2न्यूटन/मीटर है, तो द्रव का पृष्ठ तनाव होगा।
(i) 14.4×10-2 न्यूटन/मीटर।
(ii) 28.8 x 10-2 न्यूटन/मीटर
(iii) 7.2×10-2 न्यूटन/मीटर
(iv) 0.36×10-2 न्यूटन/मीटर
उत्तर
(iii) 7.2 x 10-2 न्यूटन/मीटर

प्रश्न 13.
श्यानता की S.I. इकाई है।
(i) पॉइज
(ii) पास्कल
(iii) डाइन सेमी-2
(iv) न्यूटन सेमी-2
उत्तर
(ii) पास्कल

प्रश्न 14.
श्यानता गुणांक के C.G.S. और S.I. मात्रक में सम्बन्ध है।
(i) 1 पॉइज = 10 पास्कल-सेकण्ड
(ii) 1 पॉइज = 10-1 पास्कल-सेकण्ड
(iii) 1 पॉइज = 10-2 पास्कल-सेकण्ड
(iv) 1 पॉइज = 102 पास्कल-सेकण्ड
उत्तर
(ii) 1 पॉइज = 10-1 पास्कल-सेकण्ड

प्रश्न 15.
किसकी श्यानता अधिकतम है?
(i) ऐल्कोहॉल
(ii) ईथर
(iii) ग्लाइकॉल
(iv) ग्लिसरॉल
उत्तर
(iv) ग्लिसरॉल

प्रश्न 16.
श्यानता के सन्दर्भ में कौन-सा कथन असत्य है?
(i) दाब बढ़ाने पर श्यानता घटती है।
(ii) जल में सुक्रोस मिलाने पर श्यानता बढ़ती है।
(iii) जल में KCI मिलाने पर श्यानता घटती है।
(iv) ताप बढ़ाने पर श्यानता घटती है।
उत्तर
(i) दाब बढ़ाने पर श्यानता घटती है।

प्रश्न 17.
किसकी श्यानता अधिकतम होगी?
(i) (C2H5)2O
(ii) C2H5OH
(iii) C4H9OH
(iv) (CH3)2O
उत्तर
(iii) C4H9OH

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
15°C पर एक गैस का आयतन 360 मिली है। यदि दाब स्थिर है, तो किस ताप पर उसका आयतन 400 मिली हो जाएगा?
उत्तर
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प्रश्न 2.
स्थिर दाब तथा 127°C ताप पर एक गैस का आयतन किस ताप पर दोगुना हो जायेगा?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-38

प्रश्न 3.
गैस समीकरण PV = nRT में n क्या है? इसका मान कैसे निकालते हैं?
उत्तर
गैस समीकरण PV=nRT में n गैस के मोलों की संख्या है। यदि गैस समीकरण PV = nRT में P,V, R तथा T के मान ज्ञात हों, तो n का मान निम्न सूत्र से ज्ञात कर लेते हैं।
[latex]n=\frac { PV }{ RT } [/latex]

प्रश्न 4.
किसी विशेष ताप पर किसी गैस का दाब, घनत्व से किस प्रकार सम्बन्धित होता है?
उत्तर
ताप और दाब की स्थिर दशाओं में विभिन्न गैसों के घनत्व उनके मोलर द्रव्यमानों के समानुपाती होते हैं।
अर्थात्
[latex]M=\frac { dRT }{ P } [/latex]

प्रश्न 5.
गैस स्थिरांक के मान को S.I. मात्रकों में लिखिए।
उत्तर
गैस स्थिरांक R का मान S.I. मात्रकों में 8314 JK-1mol-1 है।

प्रश्न 6.
1 ग्राम H2 का S.T.P. पर आयतन क्या होगा?
उत्तर
1 ग्राम H2 में मोलों की संख्या = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
∵ 1 मोल H2 का S.T.P. पर आयतन = 22.4 ली।
∴ 1 मोल H2 का S.T.P. पर आयतन = [latex]22.4\times \frac { 1 }{ 2 } =11.2[/latex] ली

प्रश्न 7.
किसी गैस को इतना गर्म किया जाता है कि उसका दाब और आयतन दोनों दोगुना हो जाते हैं। गैस का नया परमताप क्या होगा?
उत्तर
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प्रश्न 8.
– 73°C ताप पर किसी गैस का दाब 1 वायुमण्डल है। यदि आयतन स्थिर रखा जाये, तो उसे किस ताप तक गर्म करें कि दाब दोगुना हो जाए?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-40

प्रश्न 9.
17°C ताप तथा 870 मिली दाब पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान का आयतन 76 मिली है। मानक ताप तथा दाब पर उस गैस का आयतन क्या होगा?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-41

प्रश्न 10.
आदर्श गैस से आप क्या समझते हैं? गैस के किसी एक मोल के लिए आदर्श गैस समीकरण लिखिए।
उत्तर
जो गैस ताप व दाब की सभी परिस्थितियों में बॉयल एवं चार्ल्स के नियम का तथा आदर्श गैस समीकरण का पालन करती है, उसे आदर्श गैस कहते हैं।
1 मोल गैस के लिए आदर्श गैस समीकरण इस प्रकार होगी
PV =nRT
यदि n = 1 मोल हो, तो
PV = RT
जहाँ, P = दाब, V = आयतन, R = सार्वत्रिक गैस स्थिरांक, T = परमताप

प्रश्न 11.
परमताप को समझाइए।
उत्तर
273°C का वह न्यूनतम सम्भव परिकल्पित ताप जिस पर सभी गैसों को आयतन शून्य माना जाता है परमताप कउत्तराता है। वास्तव में प्रयोगों द्वारा परमताप का मान -27315°C ज्ञात हुआ है परन्तु सुविधा की दृष्टि से इसके सन्निकट मान -273°C का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 12.
किन परिस्थितियों में आदर्श गैस आदर्श व्यवहार प्रदर्शित करती है?
उत्तर
वह गैस जो सभी तापों और दाबों पर गैस के नियमों और आदर्श गैस समीकरण (PV = nRT) का पालन करती है आदर्श गैस कउत्तराती है परन्तु यह पाया गया है कि कोई भी गैस सभी तपों और दाबों पर गैस के नियमों तथा गैस समीकरण का पालन नहीं करती है अतः कोई भी गैस आदर्श नहीं है।

प्रश्न 13.
क्रान्तिक ताप की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
वह ताप जिसके नीचे दाब की वृद्धि करने से गैस द्रवित हो जाती है और जिसके ऊपर वह किसी भी दाब पर द्रवित नहीं होती है उसे क्रान्तिक ताप कहा जाता है। क्रान्तिक ताप को 7 से प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 14.
जलीय तनाव को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
किसी निश्चित ताप पर जल वाष्प द्वारा आरोपित दाब एक नियतांक होता है तथा इसे जलीय तनाव कहते हैं।

प्रश्न 15.
श्यानता गुणांक को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
किसी द्रव की श्यानता की परिमाणात्मक मापे उसका श्यानता गुणांक n (ईटा) होता है जिसे सामान्यतः द्रव की श्यानता कहते हैं।
द्रव की श्यानता (η) ताप पर निर्भर करती है। ताप वृद्धि के साथ श्यानता घटती है। इसकी इकाई पॉइज तथा S.I. मात्रक किलोग्राम प्रति मी/से या पास्कल-सेकण्ड है।

प्रश्न 16.
द्रव की श्यानता पर ताप तथा दाब के प्रभाव को समझाइए।
उत्तर

1. द्रव की श्यानता पर ताप परिवर्तन का प्रभाव–ताप बढ़ाने पर द्रव की श्यानता का मान घटता है क्योंकि ताप बढ़ाने पर द्रव के अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा बढ़ती है जिससे अन्तराणविक आकर्षण बल का मान कम हो जाता है।
2. द्रव की श्यानता पर दाब परिवर्तन का प्रभाव-दाब बढ़ाने पर द्रव के अणु निकट आ जाते हैं। ” जिसके कारण अन्तराणविक आकर्षण बल का मान बढ़ जाता है जिससे श्यानता बढ़ जाती है।

प्रश्न 17.
जल की तुलना में ग्लिसरीन धीरे-धीरे बहती है, क्यों?
उत्तर
किसी द्रव के बहने का गुण द्रव की प्रकृति पर निर्भर करता है, क्योंकि द्रव के अणुओं के मध्य अन्तराणविक आकर्षण बलों का मान उच्च होने पर श्यानता का मान भी उच्च होता है जिससे बहने की दर कम हो जाती है। ग्लिसरीन के अणुओं के मध्य अन्तराणविक आकर्षण बल का मान जल के अणुओं के मध्य अन्तराणविक आकर्षण बल के मान से उच्च होता है अर्थात् ग्लिसरीन की श्यानता जल की श्यानता की तुलना में अधिक होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सम्बन्ध PV = nRT को निगमित कीजिए जहाँ R सार्वत्रिक गैस नियतांक है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-42

प्रश्न 2.
आदर्श गैस और वास्तविक गैस में अंतर लिखिए।
उत्तर
वह गैस जो सभी तापों और दाबों पर गैस के नियमों और आदर्श गैस समीकरण (PV =nRT) का पालन करती है आदर्श गैस कउत्तराती है जबकि ऐसी गैसें जो सभी तापों और दाबों पर आदर्श व्यवहार नहीं दर्शाती हैं वास्तविक गैसें कउत्तराती हैं।
वास्तव में कोई भी गैस आदर्श गैस नहीं है जबकि सभी गैसें वास्तविक गैसें हैं।

प्रश्न 3.
गतिज गैस समीकरण के प्रयोग से प्रदर्शित कीजिए कि गैस की प्रति मोल औसत गतिज ऊर्जा [latex]\frac { 3 }{ 2 } [/latex]RT से दी जाती है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-43

प्रश्न 4.
क्रान्तिक दाब तथा क्रान्तिक आयतन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
क्रान्तिक दाब–किसी गैस को क्रान्तिक ताप पर द्रवित करने के लिए जिस न्यूनतम दाब की आवश्यकता होती है वह उस गैस का क्रान्तिक दाब कउत्तराता है। इसे Pe से प्रदर्शित करते हैं। क्रान्तिक ताप जितना कम होता है क्रान्तिक दाब भी उतना ही कम होता है।

क्रान्तिक आयतन–क्रान्तिक दाब तथा क्रान्तिक ताप पर किसी गैस के 1 मोल का आयतन उसका ” क्रान्तिक आयतन कउत्तराता है। इसे Vc द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 5.
वाष्पन तथा क्वथन में अन्तर बताइए।
उत्तर
वाष्पन तथा क्वथन में निम्नलिखित अन्तर हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-45
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-44

प्रश्न 6.
ताप का निम्न पर क्या प्रभाव पड़ता है।
(1) द्रव का घनत्व,
(2) द्रव का पृष्ठ तनाव,
(3) द्रव का वाष्प दाब।
उत्तर

  1. ताप बढ़ने पर अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है जो अणुओं के मध्य अन्तराणविक आकर्षण बलों के विरुद्ध कार्य करके द्रव के आयतन में वृद्धि कर देती है। आयतन में वृद्धि के कारण द्रव का घनत्व घट जाता है। अतः ताप बढ़ाने पर द्रव का घनत्व घटता है। ताप घटाने पर इसका विपरीत होता है।
  2. ताप के बढ़ने पर अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है और उनके मध्य अन्तराणविक आकर्षण बल घट जाता है। इसलिए द्रव की सतह पर उपस्थित अणुओं को द्रव के अन्दर स्थित अणु कम आकर्षित करते हैं जिससे पृष्ठ तनाव घट जाता है। इसके ठीक विपरीत, ताप के घटने पर पृष्ठ तनाव बढ़ जाता है।
  3. अधिक ताप पर द्रव के अधिकं अणुओं के पास द्रव से बाहर निकलने के लिए पर्याप्त ऊर्जा होती है। जबकि कम ताप पर ऐसे अणु बहुत कम होते हैं इसलिए ताप बढ़ने पर द्रव का वाष्प दाब बढ़ जाता है। इसके ठीक विपरीत ताप घटने पर द्रव का वाष्प दाब घट जाता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बॉयल का नियम क्या है? यह नियम ग्राफीय रूप से किस प्रकार सत्यापित होता है। इस नियम का क्या महत्त्व है?
उत्तर
बॉयल का नियम (आयतन-दाब सम्बन्ध)-सन् 1962 में आयरिश भौतिक विज्ञानी राबर्ट बॉयल ने सर्वप्रथम गैस के आयतन और दाब में मात्रात्मक सम्बन्ध का अध्ययन किया। इस सम्बन्ध को बॉयल का नियम (Boyle’s law) कहते हैं। इस नियम के अनुसार, स्थिर ताप पर किसी गैस की निश्चित मात्रा का आयतन उसके दाब के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यदि स्थिर ताप T पर किसी गैस की निश्चित मात्रा का आयतन V तथा उसको दाब P है तो बॉयल के नियमानुसार,
[latex]P\propto \frac { 1 }{ V } [/latex] (जब ताप और द्रव्यमान स्थिर हैं)
अथवा [latex]P=k\frac { 1 }{ V } [/latex] अथवा PV=k (नियतांक)
जहाँ, k एक स्थिरांक (constant) है जिसका मान गैस की मात्रा, गैस के ताप और उन मात्रकों पर निर्भर करता है जिनके द्वारा P तथा V व्यक्त किए गए हैं।
उपर्युक्त समीकरण के आधार पर बॉयल नियम के अनुसार, स्थिर ताप पर गैस की निश्चित मात्रा के आयतन तथा दाब का गुणनफल स्थिर (constant) होता है।
माना किसी गैस की निश्चित मात्रा का ताप T पर आयतन , तथा दाब P2 है। अब यदि ताप T पर ही गैस का दाब , कर दिया जाए तथा इससे उसका आयतन V2 हो जाए तब बॉयल के नियम के अनुसार,
P1V1 = P2V2 = स्थिरांक (जब द्रव्यमान और ताप स्थिर हैं)
अथवा [latex]\frac { { P }_{ 1 } }{ { P }_{ 2 } } =\frac { { V }_{ 2 } }{ { V }_{ 1 } } [/latex]
यदि इस स्थिति में हमें इन चार चरों (variables) में से तीन के मान ज्ञात हों, तो चौथे का मान ज्ञात किया जा सकता है। बॉयल के नियम का ग्राफीय निरूपण बॉयल के नियम का ग्राफीय निरूपण निम्न प्रकार से किया जा सकता है।
1.V तथा P के मध्य ग्राफ–नियत ताप पर किसी गैस की निश्चित मात्रा के आयतन (V) तथा दाब (P) के मध्य ग्राफ एक परवलय (hyperbola) होता है। यह दर्शाता है कि गैस का आयतन गैस के दाब का व्युत्क्रमानुपाती होता है।
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2. PV तथा P के मध्य ग्राफ—यह ग्राफ़ X-अक्ष के समानान्तर एक सीधी रेखा होता है। यह ग्राफ दर्शाता है कि नियते ताप पर किसी गैस की निश्चित मात्रा के आयतन तथा दाब का गुणनफल स्थिरांक होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-47
3.P तथा [latex]\frac { 1 }{ V } [/latex] के मध्य ग्राफ—यह ग्राफ मूल बिन्दु से गुजरती हुई एक सीधी रेखा होता है। यह दर्शाता है कि नियत ताप पर गैस की निश्चित मात्रा के आयतन का व्युत्क्रम उसके दाब के अनुक्रमानुपाती होता है। अर्थात् गैस का आयतन उसके दाब के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter img-48
जैसा कि आप जानते हैं बॉयल नियम के अनुसार,
PV=k
तथा k का मान गैस के द्रव्यमान तथा ताप दोनों पर निर्भर करता है। इसलिए किसी गैस की निश्चित मात्रा के लिए भिन्न-भिन्न तापों पर P-V वक्र, [latex]P-\frac { 1 }{ V } [/latex] वक्र तथा P-PV वक्र भिन्न-भिन्न आते हैं। एक ही ताप से सम्बन्धित वक्र समतापी (isothermal) कउत्तराता है। विभिन्न ग्राफों के वक्र नीचे दर्शाए गए हैं।
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बॉयल के नियम का महत्त्व
बॉयल का नियम दर्शाता है कि गैसों को सम्पीडित किया जा सकता है। जब किसी गैस की निश्चित मात्रा को सम्पीडित किया जाता है तो उसके अणु कम स्थान घेरते हैं अर्थात् गैस अधिक सघन हो जाती है।
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अतः कहा जा सकता है कि नियते ताप’ पर गैस की निश्चित मात्रा के लिए, गैस का घनत्व उसके दाब के समानुपाती होता है।
समुद्र-तल के पास की वायु पर उसके ऊपर स्थिर वायु का दाब होता है जबकि पर्वतों की वायु पर यह दाब कम होता है इसलिए समुद्र-तल के पास की वायु अधिक सघन तथा पर्वतों की वायु कम सघन होती है। यही कारण है कि पर्वतों पर कम ऑक्सीजन उपलब्ध होती है जिसके कारण वहाँ पर सिरदर्द, बेचैनी आदि होने लगती है। इससे बचने के लिए ही पर्वतारोही अपने साथ पर्वतों पर ऑक्सीजन के सिलेण्डर ले जाते हैं। इसी कारण से ऊँचाई पर उड़ने वाले वायुयानों में सामान्य दाब रखा जाता है। दाब के कम होने पर इनमें ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था होती है।
हीलियम के गुब्बारों को केवल आधा भरा जाता है। यदि इन्हें पूरा भर दिया जाए तो ऊपर जाकर दाब कम होने के कारण इनमें भरी गैस का आयतन बढ़ जाता है जिससे वे फट जाते हैं।

प्रश्न 2.
चार्ल्स का नियम क्या है? यह नियम ग्राफीय रूप से किस प्रकार सत्यापित होता है? इस नियम का क्या महत्त्व है?
उत्तर
चार्ल्स का नियम (ताप-आयतन सम्बन्ध)-स्थिर दाब पर किसी गैस के आयतन में ताप के साथ परिवर्तन का अध्ययन सर्वप्रथम फ्रांसीसी रसायनज्ञ जैक्स चार्ल्स (Jacques Charles) ने सन् 1787 में किया। बाद में इस सम्बन्ध का अध्ययन जोसफ गै-लुसैक ने भी किया। इनके प्रेक्षणों के आधार पर प्रतिपादित नियम को चार्ल्स का नियम कहते हैं जिसके अनुसार, स्थिर दाब पर किसी गैस की निश्चित मात्रा का आयतन ताप के प्रत्येक 1°C बढ़ने या घटने पर उसके 0°C ताप के आयतन का 1/273 वाँ भाग बढ़ या घट जाता है।
यदि किसी गैस का 0°C पर आयतन , तथा १°C पर आयतन है, तब चार्ल्स के नियमानुसार,
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इस प्रकार यदि गैस की निश्चित मात्रा का 0°C पर आयतन ज्ञात हो, तो किसी अन्य ताप पर उसका आयतन ज्ञात किया जा सकता है।
चार्ल्स के नियम का ग्राफीय निरूपण
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जब स्थिर दाब पर किसी गैस की निश्चित मात्रा के आयतन तथा ताप के मध्य ग्राफ खींचा जाता है, तो एक सीधी रेखा (straight line) प्राप्त होती है।
जब इस सीधी रेखा को नीचे की ओर बढ़ाते हैं, तो यह रेखा X-अक्ष अर्थात् ताप के अक्ष को -273°C पर काटती है। यह दर्शाता है कि एक गैस का आयतन -273°C पर शून्य होता है। इससे कम ताप पर गैस का आयतन ऋणात्मक होता है जो कि असम्भव है। गैस की निश्चित मात्रा के लिए, प्रत्येक दाब पर V-t वक्र अलग होता है। जब दाब कम होता है, तो रेखा का ढाल अधिक होता है तथा जब दाब अधिक होता है, तो रेखा को ढाल कम होता है। स्थिर दाब पर खींची गई प्रत्येक V- t रेखा को समदाबी रेखा (isobar) कहते हैं। ऊपर दिए गए ग्राफ में प्रत्येक रेखा समदाबी है।
चाल्र्स के नियम का महत्त्व
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गुब्बारों में गर्म वायु का प्रयोग चार्ल्स के नियम पर ही आधारित है। चार्ल्स के नियम के अनुसार, ताप बढ़ने पर गैस का आयतन बढ़ता है। चूंकि गैस का द्रव्यमान वही रहता है इसलिए गैस का घनत्व कम हो जाता है। इसलिए गर्म वायु ठंडी वायु से कम सघन होती है। इसी कारण से गर्म वायु वाले गुब्बारे वायुमण्डल को ठण्डी वायु को विस्थापित करके ऊपर उठ पाते है।

प्रश्न 3.
गै-लुसैक का नियम क्या है? विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
गै-लुसैक का नियम (दाब-ताप सम्बन्ध)-स्थिर आयतन पर किसी गैस की निश्चित मात्रा का दाब ताप के प्रत्येक 1°C बढ़ने या घटने पर उसके 0°C वाले दाब का [latex]\frac { 1 }{ 273 } [/latex] भाग बढ़ या घट जाता है।
यदि किसी गैस की निश्चित मात्रा के ताप 0°C और t°C पर दाब क्रमशः P0तथा Pt हैं तब
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जहाँ, k एक स्थिरांक है जिसका मान गैस की मात्रा, उसके आयतन और उस मात्रक पर निर्भर करता है। जिसमें दाब व्यक्त किया गया है।
अत: स्थिर आयतन पर किसी निश्चित मात्रा वाली गैस का दाब उसके परमताप के समानुपाती होता है। इस सम्बन्ध को गै-लुसैक का नियम (Gay-Lussac’s law) कहते हैं।
P= kT से, [latex]\frac { P }{ T } =k[/latex] (जबकि गैस की मात्रा और आयतन स्थिर हैं)
यदि स्थिर आयतन पर गैस के एक नमूने के प्रारम्भिक दाब, प्रारम्भिक परमताप, अन्तिम दाब तथा अन्तिम परमताप क्रमशः P1,T1,P2, तथा T2, हैं तब गै-लुसैक के नियमानुसार, [latex]\frac { { P }_{ 1 } }{ { T }_{ 1 } } =\frac { { P }_{ 2 } }{ { T2 }_{ } } =k[/latex]
गै-लुसैक के नियम का प्रायोगिक सत्यापन
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गै-लुसैक के नियम को संलग्न चित्र में दर्शाए गए उपकरण द्वारा सत्यापित किया जा सकता है। फ्लास्क में ली गई गैस का ताप तापस्थायी (thermostat) द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है। तापमापी से गैस का ताप तथा दाबमापी से गैस का दाब ज्ञात करते हैं। प्रत्येक स्थिति में [latex]\frac { P }{ T } [/latex] का मान स्थिर (constant) आता है जो गै-लुसैक के नियम का सत्यापन करता है।
गै-लुसैक के नियम का ग्राफीय निरूपण
नियत आयतन वाली किसी गैस की निश्चित मात्रा के दाब तथा परमताप (केल्विन पैमाने पर। ताप) के मध्य ग्राफ एक सीधी रेखा होता है। नीचे की ओर बढ़ाने पर यह सीधी रेखा मूल बिन्दु पर मिलती है जो यह दर्शाता है कि किसी गैस का परम शून्य ताप पर दाब शून्य हो जाता है। दूसरे शब्दों में, परम शून्य ताप पर गैस के अणु गति नहीं करते हैं।
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आरेख की प्रत्येक रेखा स्थिर आयतन पर प्राप्त की गयी है अतः इसकी प्रत्येक रेखा सम आयतनी. (isochore) कउत्तराती है।

प्रश्न 4.
द्रव के वाष्प दाब से आप क्या समझते हैं? यह किन-किन कारकों पर निर्भर करता है?
उत्तर
वाष्प दाब “निश्चित ताप पर यदि कोई द्रव एवं उसकी वाष्प साम्यावस्था में हो, तो वाष्प द्वारा द्रव पर डाला गया दाब, उस द्रव का वाष्प दाब कउत्तराता है।
द्रव ⇌ वाष्प
दिए गए ताप पर द्रव का वाष्प दाब उसका अभिलाक्षणिक गुण है।
द्रव के वाष्प दाब को प्रभावित करने वाले कारक
(1) द्रव की प्रकृति-द्रव का वाष्प दाब उसकी प्रकृति पर निर्भर करता है। द्रव के अणुओं के मध्य अन्तरा-अणुक आकर्षण बल का मान उच्च होने पर वाष्प दाब का मान कम होता है क्योंकि द्रव की सतह के अणु शीघ्रता से सतह नही छोड़ते हैं, जबकि अधिक वाष्पशील द्रवों के वाष्प दाब उच्च होते हैं। कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4), एथिल ऐल्कोहॉल (C2H5OH) तथा जल (H2O) में अन्तराअणुक आकर्षण बल का क्रम कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) < एथिल ऐल्कोहॉल (C2H5OH) < जल (H2O) होता है, जबकि इनके वाष्प दाबों के मान का क्रम कार्बन टेट्राक्लोराइड > एथिल ऐल्कोहॉल. > जल होता है।
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(2) द्रव का ताप-द्रव को ताप बढ़ाने पर वाष्प दाब के मान में वृद्धि होती है क्योंकि ताप बढ़ाने पर द्रव के अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है, फलस्वरूप वाष्पन की दर भी बढ़ जाती है। अतः द्रव का वाष्पीकरण बढ़ जाता है, अर्थात् सतह के अणुओं की द्रव की सतह छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इस कारण वाष्प दाब बढ़ जाता है। वाष्पदाब में ताप के साथ होने वाले परिवर्तन की गणना निम्नलिखित समीकरण द्वारा की जाती है
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जहाँ, P1 तथा P2 क्रमशः परम ताप T1 व T2 पर द्रव के वाष्पदाब हैं तथा ∆Hvapan वाष्पीकरण की ऊष्मा है।
(3) अवाष्पशील विलेय का मिलाना-जब विलायक में कोई अवाष्पशील विलेय मिलाते हैं, तो उसका वाष्प दाब घट जाता है क्योंकि द्रव की सतह के कुछ क्षेत्र विलेय के अणु घेर लेते हैं। जिसके कारण द्रव की सतह का क्षेत्रफल कुछ कम हो जाता है, फलस्वरूप वाष्पन कम होता है। वाष्प दाब में होने वाली कमी की गणना राउल्ट के नियम की सहायता से की जाती है। वाष्प दाब का मापन स्थैतिक विधि, गतिक विधि तथा गैस चूंतप्त विधि द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 5.
पृष्ठ तनाव से आप क्या समझते हैं। इसे प्रभावित करने वाले कारकै लिखिए?
उत्तर
पृष्ठ तनाव-द्रव के अणुओं के मध्य आकर्षण बल होते हैं। द्रव के तले में उपस्थित अणुओं पर लगे शुद्ध आकर्षण बल के कारण ही पृष्ठ तनाव उत्पन्न होता है। माना किं एक बर्तन में द्रव भरा है। इसमें दो द्रव के अणुओं पर विचार करते हैं, अंणु A द्रव के अन्दर है। इसे अणु पर चारों ओर उपस्थित अणुओं के आकर्षण बल लेगेंगे, अतः इस पर लगने वाला शुद्ध आकर्षण बल शून्य हो जाएगा। अणु B द्रव के तल पर स्थित है, अतः इस पर नीचे की ओर एक शुद्ध आकर्षण बल लगेगा, परिणामस्वरूप तल पर एक बल नीचे की ओर लगता है और द्रव के तल का क्षेत्र न्यूनतम होने की कोशिश करेगा द्रव के तल पर लगने वाला वह बल जो उस द्रव के तल का क्षेत्र न्यूनतम रखने की प्रवृत्ति रखता हो, पृष्ठ तनाव कउत्तराता है। माना कि किसी एक द्रव के मुक्त पृष्ठ तल पर रेखा CD खींची जाती हैं जिसकी लम्बाई । तथा उस पृष्ठ के तल में बल F कार्यरत है तो पृष्ठ तनाव ( γ) = F/l होगा। C.G.S. इकाई में यह डाइने प्रति सेमी dyme cm-1) या अर्ग प्रति सेमी (erg cm-1) तथा S.I. इकाई में न्यूटन प्रति मीटर (Nm-1) में व्यक्त किया जाता है। द्रव की बूंद की गोलाकार आकृति, केशनलिका में द्रव्र का चढ़ना या गिरना, द्रव के तल का गोलाकार (उत्तल अथवा अवतल होना) आदि द्रव के पृष्ठ तनाव द्वारा ही समझाए जा सकते हैं; जैसे–ब्यूरेट के जल की सतह अवतल होती है। क्योंकि संसंजक बल का मान आसंजक बल से कम होता है। परन्तु नली में पारे की सतह उत्तल होती है क्योंकि संसंजक बल का मान आसंजक बल से अधिक होता है।
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माना कि दो द्रवों के पृष्ठ तनाव γ1 तथा γ2 हैं और एक ही केशनली में दोनों द्रवों के समान आयतन V उपस्थित हैं। केशनली में गिरने वाली द्रव की बूंदों की संख्या n1 और n2 तथा द्रवों के घनत्व d1 और d2 हैं, तो
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पृष्ठ तनाव को प्रभावित करने वाले कारक
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(1) द्रव का ताप-ताप बढ़ाने पर द्रवों के पृष्ठ तनाव का मान घटता है। क्योकि ताप वृद्धि पर द्रवों के अणुओं की गतिज ऊर्जा के मान में वृद्धि होती है जिसके फलस्वरूप अन्तर-आण्विक आकर्षण बलों के मान घटते हैं। इस कारण पृष्ठ तनाव का मान भी घट जाता है। क्रान्तिक ताप पर जहाँ द्रव एवं वाष्प में विभेद करने वाला तल समा हो जाता है, पृष्ठ तनाव का मान घटकर शून्य हो जाता है।
आटवोस (Eotvos) ने पृष्ठ तनाव को ताप का एक रेखीय फलन (linear function) बताया तथा निम्नलिखित समीकरण दी
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जहाँ M→ द्रव पदार्थ का आण्विक द्रव्यमान, D→ द्रव का घनत्व, Tc → क्रान्तिक ताप, T → परम ताप तथा k→ नियतांक है।
(2) द्रव की प्रकृति-पृष्ठ तनाव द्रव की प्रकृति पर निर्भर करता है। द्रवों में अणुओं के मध्य अन्तर-आण्विक बलों के मान बढ़ने पर, पृष्ठ तनाव के मान में वृद्धि होती है। उदाहरणार्थ-ईथर, एथिल ऐल्कोहॉल तथा जल के अणुओं के मध्य अन्तर आण्विक आकर्षण बलों के मान का क्रम ईथर < एथिल ऐल्कोहॉल < जल होता है। इस कारण इनके पृष्ठ तनाव (20°C) के मानों का क्रम ईथर (17.0 डाइन/सेमी) < एथिल ऐल्कोहॉल (22.27 डाइन/सेमी) < जल (72.75 डाइन/सेमी) है। इनके अतिरिक्त ग्लिसरीन, ग्लाइकॉल तथा एथेनॉल में पृष्ठ तनाव का बढ़ता क्रम एथेनॉल < ग्लाइकॉल < ग्लिसरीन होता है।
(3) बाह्य पदार्थों की उपस्थिति–किसी द्रव में पृष्ठ सक्रिय पदार्थ (साबुन/अपमार्जक) मिलाने पर उसका पृष्ठ तनाव कम हो जाता है जबकि आयनिक पदार्थों की उपस्थिति से द्रव का पृष्ठ तनाव बढ़ जाता है। उदाहरणार्थ-जल में साबुन मिलाने पर उसका पृष्ठ तनाव घट जाता है जबकि नमक मिलाने पर जल का पृष्ठ तनाव बढ़ जाता है।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter (द्रव्य की अवस्थाएँ) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 5 States of Matter (द्रव्य की अवस्थाएँ), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 The Living World

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 The Living World (जीव जगत)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology chapter 1 The Living World

अभ्यास के अ न्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवों को वर्गीकृत क्यों करते हैं?
उत्तर :
जीवों का वर्गीकरण निम्नलिखित कारणों से किया जाता है

  1.  जीवों की सरलता से पहचान हेतु।
  2. अन्य स्थानों के जीवों के अध्ययन हेतु।
  3. जीवाश्मों के अध्ययन हेतु।
  4. समूह बनाकर सभी जीवों का अध्ययन किया जा सकता है जबकि सभी जीवों का पृथक अध्ययन असम्भव है।
  5.  वर्गीकरण से जीवों में समानता व असमानता का पता चलता (UPBoardSolutions.com) है जिससे विभिन्न जीव समूहों के बीच सम्बन्ध का ज्ञान होता है।
  6. विभिन्न टैक्सा के विकास (evolution) को पता चलता है।

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प्रश्न 2.
वर्गीकरण प्रणाली को बार-बार क्यों बदलते हैं?
उत्तर :
नये उपकरणों और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ वैज्ञानिक अध्ययन का भी लगातार विकास होता रहता है। प्राचीन काल में वैज्ञानिक जीवों का वर्गीकरण उनके आवास तथा गुण के आधार पर करते थे। उसके पश्चात् बाह्य आकारिकी (external morphology) वर्गीकरण का मुख्य आधार बन गई। उसके पश्चात् सूक्ष्मदर्शी (microscope) व अन्य उपकरणों की खोज के पश्चात् आन्तरिक संरचना (anatomy) तथा भौणिकी (embryology) का उपयोग वर्गीकरण हेतु होने लगा। वर्तमान में कोशिकीय संरचना (cellular structure), गुणसूत्र (chromosomes), जैव रासायनिक विश्लेषण (biochemical analysis), जीन संरचना (gene structure) (UPBoardSolutions.com) तथा DNA में समानता का भी उपयोग जीवों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने में तथा वर्गीकरण में किया जा रहा है। इसलिए वर्गीकरण प्रणाली समय के साथ-साथ परिवर्तित एवं विकसित की जाती रही है।

प्रश्न 3.
जिन लोगों से आप प्रायः मिलते रहते हैं, आप उनको किस आधार पर वर्गीकृत करना पसंद
करेंगे? [संकेत-ड्रेस, मातृभाषा, प्रदेश जिसमें वे रहते हैं; आर्थिक स्तर आदि।]
उत्तर :

  1.  परिवार के सदस्य (Family members)
  2. रिश्तेदार (Relatives)
  3. पारिवारिक मित्र (Family friends)
  4. स्कू ल मित्र (School friends)
  5.  सहपाठी (Classmates)
  6. वयस्क, अपने से बड़े, अपने से छोटे, समान उम्र वाले (Adults, seniors, juniors, same age)
  7. लिंग-स्त्री या पुरुष (Sex : Female or male)
  8. ऊँचाई (Height)
  9.  खेल मित्र (Playmates)

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प्रश्न 4.
व्यष्टि तथा समष्टि की पहचान से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर : 
व्यष्टि (Individual) : 
प्रत्येक व्यष्टि में कुछ विशिष्ट लक्षण होते हैं जो उसकी समष्टि के अन्य व्यष्टियों में नहीं पाए जाते हैं। समष्टि (Population)

  1.  प्रत्येक समष्टि जनन में पृथक (reproductively isolated) होती है।
  2. एक समष्टि के सदस्य आपस में अन्तरे प्रजनन (interbreed) करके नये जीव को जन्म दे सकते हैं।
  3.  एक समष्टि के सदस्यों में समानता होती है तथा (UPBoardSolutions.com) ये अन्य समष्टि से असमान दिखाई देते हैं।
  4. समष्टि के प्रत्येक सदस्य का कैरियोटाइप (karyotype) समान होता है।
  5. एक समष्टि के सदस्यों में आन्तरिक संरचना में समानता पायी जाती है।

प्रश्न 5.
आम का वैज्ञानिक नाम निम्नलिखित है। इनमें से कौन- सा सही है ? मैंजीफेरा इंडिका, मैजीफेरा इंडिका
उत्तर :
मैंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica).

प्रश्न 6.
टैक्सोन की परिभाषा दीजिए। विभिन्न पदानुक्रम स्तर पर टैक्सा के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
टैक्सोन, किसी भी स्तर को वर्गिकी समूह होता है। (Taxon is a taxonomic group of any rank). यह किसी भी स्तर पर जीवों के समूह को निरूपित करता है। उदाहरणार्थ-मक्का (species), रोजेज (genus), घास (family), कोनिफर (order), (UPBoardSolutions.com) द्विबीजपत्री (class), बीजीय पौधे (division) शब्द टैक्सोन (taxon) सर्वप्रथम 1956 में  ICBN (International Code of Botanical Nomenclature) ने प्रतिपादित किया था तथा मेयर (1964) ने इसकी परिभाषा ‘किसी भी स्तर के वर्गिकी समूह’ के रूप में दी थी।

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प्रश्न 7.
क्या आप वर्गिकी संवर्ग का सही क्रम पहचान सकते हैं ?

(a) जाति (Species) → गण (Order) →संघ (Phylum) → जगत (Kingdom)
(b) वंश (Genus) → जाति (Species) → गण (Order) → जगत (Kingdom)
(c) जाति (Species) → वंश (Genus)→ गण (Order) → संघ (Phylum)

उत्तर: 
(c) जाति (Species) → वंश (Genus) → गण (Order) → संघ (Phylum)

प्रश्न 8.
‘जाति’ शब्द के सभी मानवीय वर्तमान कालिक अर्थों को एकत्र कीजिए। क्या आप अपने शिक्षक से उच्च कोटि के पौधों, प्राणियों तथा बैक्टीरिया की स्पीशीज का अर्थ जानने के लिए चर्चा कर सकते हैं?
उत्तर :

  1.  जाति (species) एक प्राकृतिक जनसंख्या अथवा समान आकारिकी (morphology), आन्तरिक संरचना (anatomy), कार्यिकी (physiology) तथा कोशिकीय संरचना (cellular structure) वाले जीवों की प्राकृतिक जनसंख्या है।
  2.  जाति (species), वर्गीकरण की आधारीय इकाई (basic unit) है जिसमें एक जाति के जीव | समान आनुवंशिक गुण रखते हैं।
  3.  जाति (species) ऐसे संरचनात्मक रूप से समान जीवों का समूह है जो आपस में मुक्त (UPBoardSolutions.com) लैंगिक जनन (freely sexual reproduction) द्वारा संतान उत्पन्न कर सकते हैं परन्तु अन्य जाति के जीवों से जनन में पृथकता (reproductively isolated) दर्शाते हैं।

उच्च पादप तथा जन्तुओं (higher plants and animals) में लैंगिक जनन होता है। अतः इनकी जाति निर्धारण के लिए जनन पृथकता (reproductive isolation) का उपयोग किया जाता है। अत: परिभाषा (3) सही है। जीवाणुओं (bacteria) में मुक्त प्रजनन (free reproduction) तथा जनन पृथकता (reproductive isolation) नहीं पाया जाता है। इसलिए जीवाणुओं की जाति का निर्धारण आकारिकी (morphology) के आधार पर किया जाता है। अत: परिभाषा (1) सही है।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित शब्दों को समझिए तथा परिभाषित कीजिए

(i) संघ
(ii) वर्ग
(iii) कुल
(iv) गण
(v) वंश

उत्तर :

(i) संघ (Phylum) :
समान गुणों वाले वर्गों (class) को एक संघ (phylum) में रखा जाता है, जैसे मत्स्य, उभयचर, सरीसृप (reptiles), पक्षी तथा स्तनधारी जंतुओं को एक ही संघ कॉडेटा (chordata) में रखा गया है। इन सभी जंतुओं में रीढ़ की हड्डी पाई जाती है। पौधों में समान गुणों वाले वर्गों (class) को एक डिविजन (division) में वर्गीकृत किया जाता है।

(ii) वर्ग (Class) :
समान गुणों वाले गण (order) को एक वर्ग (class) में रखा जाता है। गण प्राइमेटा (order primata) में बंदर, गोरिल्ला, चिंपैंजी आदि को एक ही वर्ग मैमेलिया (mammalia) में शेर, कुत्ता, बिल्ली आदि के साथ रखा गया है, क्योंकि ये सभी स्तनधारी श्रेणी में रखे गए हैं।

(iii) कुल (Family) :
जिस प्रकार समान गुणों वाली जाति को एक वंश में रखते हैं उसी प्रकार समान गुणों वाले सभी वंशों को एक कुल या कुटुंब (family) में रखते हैं। जैसे आलू, टमाटर, बैंगन में कई गुण समान होते हैं इसलिए इन्हें एक ही कुल सोलेनेसी (solanaceae) में रखा गया है। कुटुंब को वर्धिक (vegetative) तथा जननीय लक्षणों (reproductive characters) के आधार पर विशेषीकरण (characterization) किया जाता है। उदाहरण के लिए, शेर, बाघ तथा तेंदुआ (UPBoardSolutions.com) को वंश पैथेरा (Panthera) में बिल्ली (Felis) के साथ कुटुंब फेलिडी (Felidae) में रखा गया है। इसी प्रकार कुत्ता और बिल्ली में कुछ समानताएँ तथा कुछ अन्तर होते हैं। इन्हें दो अलग-अलग कुटुंबों क्रमशः कैनिडी (Canidae) तथा फेलिडी (Felidae) में रखा गया है।

(iv) गण (Order) :
समान गुणों वाले कुलों को एक गण (order) में रखा जाता है। उदाहरण के लिए, बिल्ली, कुत्ता तथा शेर को एक ही ऑर्डर कार्निवोरा (carnivora) में रखा गया है। पौधों में कानवॉल्वुलेसी (convolvulaceae) तथा सोलेनेसी (solanaceae) कुटुंब को एक गण | पॉलीमोनिएल्स (polemoniales) में पुष्पीय गुणों के आधार पर रखा गया है।

(v) वंश (Genus) :
वंश, सम्बन्धित स्पीशीज का एक समूह है। (Genus is a group of related species)। वर्गीकरण में वंश का बहुत महत्त्व है। द्विपद-नाम-पद्धति (binomial nomenclature) के अनुसार किसी भी स्पीशीजे को तब तक कोई नाम नहीं दिया जा सकता जब तक कि वह किसी वंश के साथ न हो।

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प्राय: एक ही वंश की जाति के गुणों में काफी समानता होती है। सामान्य गुणों के ऐसे समूह को सह-संबंधित गुण (correlated characters) कहा जाता है। ऐसी जाति को एक वंश के अन्तर्गत रखा जाता है। एक वंश के अन्दर कई जाति हो सकती हैं, जैसे आम का वंश है मैंजीफेरा (Mangifera), जिसके अन्तर्गत 35 जातियों को रखा गया है। मैंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica) 35 जातियों में से एक है। एक वंश के अन्तर्गत केवल एक जाति भी (UPBoardSolutions.com) हो सकती है। जैसे वंश जिंगो (Ginkgo) में केवल एक जाति है-जिंगो बाइलोबा (Ginkgo biloba)। ऐसे वंश, जिनमें केवल एक ही जाति होती है-मोनोटिपिक जीनस (monotypic genus) कहलाते हैं।

प्रश्न 10.
जीव के वर्गीकरण तथा पहचान में कुंजी किस प्रकार सहायक है?

उत्तर :
कुंजी एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा विभिन्न वर्गों में स्थित प्रत्येक प्रकार के जीव की पहचान की जा सकती है। वैज्ञानिक जीवों की पहचान उनके गुणों के आधार पर बनाई गई कुंजी (keys) से करते हैं। कुंजी (key) पौधों तथा जन्तुओं के समान तथा असमान गुणों के आधार पर बनाई जाती है। वर्गिकी कुंजी (taxonomic key) दो विपरीत लक्षणों पर आधारित होती है। इनमें से एक को स्वीकार किया जाता है जबकि दूसरे को अस्वीकृत कर दिया जाता है। कुल, वंश तथा जाति के लिए अलग-अलग कुंजी का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
पौधों तथा प्राणियों के उचित उदाहरण देते हुए वर्गिकी पदानुक्रम का चित्रण कीजिए।
उत्तर :
वर्गीकरण एकल सोपान प्रक्रम नहीं है, बल्कि इसमें पदानुक्रम सोपान (hierarchy of steps) होते हैं जिसमें प्रत्येक सोपान पद अथवा वर्ग (rank or category) को प्रदर्शित करता है। चूंकि संवर्ग (category) समस्त वर्गिकी व्यवस्था है इसलिए इसे वर्गिकी संवर्ग (taxonomic category) कहते हैं। और तभी सारे संवर्ग मिलकर वर्गिकी पदानुक्रम (taxonomic hierarchy) बनाते हैं। प्रत्येक संवर्ग वर्गीकरण की एक इकाई को प्रदर्शित करता है। वास्तव में, यह एक पद को दिखाता है और इसे प्रायः वर्गक (टैक्सोन) कहते हैं। वर्गिकी संवर्ग तथा पदानुक्रम का वर्णन एक उदाहरण द्वारा कर सकते। हैं। कीट (insects) जीवों के एक वर्ग को दिखाता है जिसमें एक समान गुण जैसे तीन जोड़ी संधिपाद (टाँगे) होती हैं। इसका अर्थ है कि कीट संघ स्वीकारणीय सुस्पष्ट जीव है जिसका वर्गीकरण किया जा सकता है, इसलिए इसे एक पद (rank) अथवा संवर्ग (UPBoardSolutions.com) (category) का दर्जा दिया वर्ग (क्लास) गया है। स्मरण रहे कि वर्ग (group) संवर्ग (category) को दिखाता है। प्रत्येक पदे (rank) अथवा वर्गक (taxon) वास्तव में, वर्गीकरण की एक इकाई को बताता है। ये वर्गिकी वर्ग/संवर्ग सुस्पष्ट जैविक है ना कि केवल आकारिकीय समूहन। सभी ज्ञात जीवों के वर्गिकीय अध्ययन से सामान्य संवर्ग जैसे जगत । (kingdom), संघ (phylum) अथवी भाग (पौधों के लिए), वर्ग (class), गण (order), कुल (family), वंश (genus) तथा जाति (species) का विकास हुआ। पौधों तथा प्राणियों दोनों में जाति । सबसे निचले संवर्ग में आती है। इनका वर्गीकरण संलग्न चित्र के अनुसार होता है।
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मनुष्य तथा आम का वर्गिकी पदानुक्रम में वर्गीकरण निम्न प्रकार है

पदानुक्रम                                                      मनुष्य
जगत (Kingdom)                                एनीमेलिया (Animalia)
संघ/डिविजन (Phylum/Division)    कॉडेंटा (Chordata)
वर्ग (Class)                                           मैमेलिया (Mammalia)
गण (Order)                                          प्राइमेटा (Primata)
कुल (Family)                                       होमोनीडी (Homonidae)
वंश (Genus)                                         होमो (Homo)
जाति (Species)                                    होमो सेपियन्स(Homo sapiens)
पदानुक्रम                                                            आम
जगत (Kingdom)                                  प्लाण्टी (Plantae)
संघ/डिविजन (Phylum/Division)  एन्जियोस्पर्मी (Angiospermae)
वर्ग (Class)                                             डाइकोटिलीडनी (Dicotyledonae)
गण (Order)                                           सेपिंडेल्स (Sapindales)
कुल (Family)                                         एनाकाडेंसी (Anacardiaceae)
वंश (Genus)                                          मैंजीफेरा (Mangifera)
जाति (Species)                                     मैंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica)

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मछलियों का अध्ययन जीव विज्ञान की किस शाखा के अन्तर्गत करते हैं?

(क) हरपेटोलॉजी
(ख) हेल्मिन्थोलॉजी
(ग) ओफियोलॉजी
(घ) इक्थियोलॉजी
उत्तर : 
(घ) इक्थियोलॉजी

प्रश्न 2.
जन्तु किन लक्षणों में पादपों से मिलते हैं?

(क) ये दिन-रात श्वसन करते हैं।
(ख) ये केवल दिन में श्वसन करते हैं।
(ग) ये केवल रात में श्वसन करते हैं।
(घ) ये जब चाहें श्वसन करते हैं।
उत्तर :
(क) ये दिन-रात श्वसन करते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“जीव विज्ञान” शब्द का प्रयोग सबसे पहले किसने किया था?
उत्तर :
“जीव विज्ञान (Biology) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1802 ई० में लैमार्क (Lamarck) और ट्रैविरैनस (Treviranus) द्वारा किया गया।

प्रश्न 2.
जीव विज्ञान, जन्तु विज्ञान तथा वनस्पति विज्ञान के पिता का नाम लिखिए। या जन्तु विज्ञान के जनक कौन थे?
उत्तर :
जीव विज्ञान       → अरस्तू (Aristotle)
जन्तु विज्ञान       → अरस्तू (Aristotle)
वनस्पति विज्ञान → थियोफ्रेस्टस (Theophrastus)

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प्रश्न 3.
सजीव एवं निर्जीव में अन्तर बताइए।
उत्तर :
सभी सजीवों में जीवद्रव्य उपस्थित होता है जोकि सभी सजीवों (जीवधारियों) की भौतिक आधारशिला है। इसके विपरीत निर्जीवों में यह अनुपस्थित होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीव विज्ञान की दो परम्परागत शाखाओं के नाम लिखिए तथा इनमें अन्तर बताइए।
उत्तर : 
जीव विज्ञान की दो परम्परागत शाखाएँ निम्नवत् हैं

  1. जन्तु विज्ञान (Zoology)
  2. वनस्पति विज्ञान (Botany)

जन्तु विज्ञान शाखा के अन्तर्गत जन्तुओं (animals) का अध्ययन किया जाता है, जबकि वनस्पति विज्ञान शाखा के अन्तर्गत वनस्पतियों (plants) का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
सजीवों के किन्हीं दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

1. श्वसन (Respiration) :
जीवधारियों में श्वसन हर समय होता रहता है। इस क्रिया में जीव वायुमण्डल से ऑक्सीजन (O,) लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड (CO,) बाहर निकालते हैं। इस क्रिया में कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन का ऑक्सीकरण (Oxidation) होता है और ऊर्जा मुक्त होती है। (UPBoardSolutions.com) इस मुक्त ऊर्जा से ही जीवधारियों की समस्त जैविक-क्रियाएँ संचालित होती हैं। श्वसन क्रिया एक अपचयी क्रिया (catabolic reaction) है।

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2. जनन (Reproduction) :
जनन भी जीवों का अभिलक्षण है। बहुकोशिक जीवों में जनने (लैंगिक जनन-sexual reproduction) का अर्थ अपनी संतति उत्पन्न करना है जिसके अभिलक्षण लगभग उसके अपने माता-पिता से मिलते हैं। जीव अलैंगिक जनन (asexual reproduction) भी करते हैं। फंजाई (कवक) लाखों अलैंगिक बीजाणुओं (asexual spores द्वारा गुणन करती है और सरलता से फैल जाती है। निम्न कोटि के जीवों; जैसे- यीस्ट तथा हाइड्रा में मुकुलन (budding) द्वारा जनन होता है। प्लैनेरिया (चपटा कृमि) में वास्तविक पुनर्जनन (true regeneration) होता है अर्थात् एक खंडित जीव अपने शरीर के लुप्त अंग को पुनः प्राप्त (जीवित) कर (UPBoardSolutions.com) लेता है और इस प्रकार एक नया जीव बन जाता है। फंजाई, तंतुमयी शैवाल, मॉस का प्रथम तंतु (protonema of moss) सभी विखण्डन (fragmentation) विधि द्वारा गुणन करते हैं।

प्रश्न 3.
पौधों तथा जन्तुओं में मुख्य अन्तर बताइए।
उत्तर : 
पौधों तथा जन्तुओं में मुख्य अन्तर निम्नवत्
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 The Living World image 2

प्रश्न 4.
अजायबघर या म्यूजियम किसे कहते है? म्यूजियम एवं चिड़ियाघर में अन्तर बताइए।
उत्तर :
संग्रहालय (Museum) :
संग्रहालय प्रायः शैक्षिक संस्थानों; जैसे विद्यालय तथा कॉलेजों में स्थापित किए जाते हैं। संग्रहालय में अध्ययन के लिए परिरक्षित पौधों तथा प्राणियों के नमूने होते हैं। पौधे तथा प्राणियों के नमूनों को सुखाकर परिरक्षित करते हैं। कीटों को एकत्र करके मारने के बाद डिब्बों में पिन लगाकर रखते हैं। बड़े प्राणी; जैसे–पक्षी तथा स्तनधारी; को प्रायः परिरक्षित घोल में डालकर जारों में भरकर परिरक्षित करते हैं। संग्रहालय में प्राय: प्राणियों के कंकाल भी रखे जाते हैं।

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प्रमुख संग्रहालय

  1. नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, लंदन
  2.  फॉरेस्ट म्यूजियम, अण्डमान-निकोबार द्वीप
  3. नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री, दिल्ली
  4. प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम, मुम्बई
  5. इण्डियन म्यूजियम, कोलकाता
  6. महाराजा सवाई मान सिंह म्यूजियम, जयपुर

प्राणी उपवन अथवा चिड़ियाघर (Zoological Park) :
इन उपवनों में अधिकांशतः वन्य आवासी जीवित प्राणी रखे जाते हैं। इनसे हमें वन्य जीवों की मानव की देख-रेख में आहार-प्रकृति तथा व्यवहार को सीखने का अवसर प्राप्त होता है। जहाँ तक संभव होता है; चिड़ियाघरों में विभिन्न प्राणी उपलब्ध कराए जाते हैं। चिड़ियाघर में सभी प्राणियों को उनके प्राकृतिक आवासों वाली परिस्थितियों में रखने का प्रयास किया जाता है। इन उद्यानों को प्रायः चिड़ियाघर (zoos) कहते हैं। इसे देखने के लिए बहुत-से लोग तथा बच्चे आते हैं।

प्रश्न 5.
वानस्पतिक उद्यानों का क्या महत्त्व है? भारतवर्ष के किन्हीं दो वानस्पतिक उद्यानों के नाम लिखिए। या पादप (वानस्पतिक) उद्यान को समझाइए।
उत्तर :
विभिन्न प्रकार के पौधों की जातियाँ लगाकर उसे सुरक्षित करने हेतु सम्पूर्ण क्षेत्रफल को चारों ओर से घेर देते हैं। इन्हें ही वानस्पतिक या पादप उद्यान कहते हैं। वानस्पतिक उद्यानों से निम्नलिखित लाभ हैं जिसके कारण इनका बहुत महत्त्व है।

  1. वर्गीकरण अध्ययन हेतु जीवित जातियों को वानस्पतिक उद्यानों से प्राप्त किया जाता है।
  2. यहाँ पर विदेशों से भी लाकर नई जातियाँ लगाई जाती हैं तथा उनका (UPBoardSolutions.com) विकास किया जाता है।
  3. अनुसंधान के लिए यहाँ पर पौधों को लगाकर रखा जाता है।
  4.  अनुसंधान द्वारा यहाँ नई जातियों का विकास किया जाता है।
  5. विलुप्त होने वाली पादप जातियों को यहाँ संरक्षण प्रदान किया जाता है।

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भारत के दो प्रमुख वानस्पतिक उद्यान निम्नवत् हैं

1. Royal Botanical Garden (Kolkata)
2. National Botanical Garden (Lucknow)

प्रश्न 6.
हरबेरियम किसे कहते हैं? इसे तैयार करने में किन चीजों की आवश्यकता होती है?
उत्तर :
हरबेरियम पौधों या पौधों के भागों का संग्रहालय होता है जिसे मान्य वर्गीकरण पद्धति के अनुसार व्यवस्थित रखा जाता है। इसे हरबेरियम शीट या पादपालय पत्र पर चिपकाकर व्यवस्थित ढंग से रखा जाता है। हरबेरियम को तैयार करने के लिए निम्नलिखित चीजों की (UPBoardSolutions.com) आवश्यकता होती है|

  1. कैंची
  2. चाकू
  3. नमूनों को रखने हेतु वैस्कुलम नामक बॉक्स
  4.  पादप प्रेस
  5.  अखबार
  6.  लेंस आदि

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 6 Soils

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 6 Soils (मृदा)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 6 Soils (मृदा)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1. नीचे दिए गए प्रश्नो के सही उत्तर का चयन करें
(i) मृदा का सर्वाधिक व्यापक और सर्वाधिक उपजाऊ प्रकार कौन-सा है?
(क) जलोढ़ मृदा
(ख) काली मृदा
(ग) लैटेराइट मृदा
(घ) वन मृदा
उत्तर-(क) जलोढ़ मृदा।

(ii) रेगुर मृदा का दूसरा नाम है
(क) लवण मृदा
(ख) शुष्क मृदा
(ग) काली मृदा
(घ) लैटेराइट मृदा
उत्तर-(ग) काली मृदा।।

(iii) भारत में मृदा के ऊपरी पर्त हास का मुख्य कारण है
(क) वायु अपरदन ।
(ख) अत्यधिक निक्षालन
(ग) जल अपरदने ,
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ग) जल अपरदन।

(iv) भारत में सिंचित क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि निम्नलिखित में से किस कारण से लवणीय हो रही हैं?
(क) जिप्सम की बढ़ोतरी
(ख) अति सिंचाई
(ग) अति चारण
(घ) रासायनिक खादों का उपयोग
उत्तर-(ख) अति सिंचाई।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) मृदा क्या है?
उत्तर–पृथ्वी के धरातल पर अपक्षय और विघटन के कारकों के माध्यम से चट्टानों और जैव पदार्थों के संयोग से बनी असंघनित पदार्थों की ऊपरी परत मृदा कहलाती है।

(ii) मृदा-निर्माण के प्रमुख उत्तरदायी कारक कौन-से हैं?
उत्तर-मृदा-निर्माण एक दीर्घ अवधि की प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसके निर्माण में सहयोगी कारक निम्नलिखित हैं(i) मूल जनक चट्टानें, (ii) उच्चावच, (iii) जलवायु, (iv) वनस्पति एवं जैव अवशेष, (v) अपवाह तन्त्र, (vi) समय या अवधि।।

(iii) मृदा परिच्छेदिका के तीन संस्तरों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-मृदा परिच्छेदिका के तीन संस्तरों के नाम निम्नलिखित हैं
1. ‘क’ संस्तर या सबसे ऊपरी जलोढ़ संस्तर–यह सबसे ऊपरी खण्ड होता है, जहाँ पौधों की | वृद्धि के लिए अनिवार्य जैव पदार्थों का खनिज पदार्थ, पोषक तत्त्वों का जल से संयोग होता है।

2. ‘ख’ संस्तर या अत्यधिक निक्षालित स्तर—यह संस्तर ‘क’ संस्तर एवं ‘ग’ संस्तर के मध्य संक्रमण खण्ड होता है, जिसे नीचे व ऊपर दोनों से पदार्थ प्राप्त होते हैं।

3. ‘ग’ संस्तर या अपेक्षाकृत कम निक्षालित संस्तर—इस संस्तर की रचना ढीली जनक सामग्री से होती है। यह परत मृदा निर्माण की प्रक्रिया में प्रथम अवस्था होती है और अन्ततः ऊपर की दो परतें इसी से बनती हैं।

(iv) मृदा अवकर्षण क्या होता है?
उत्तर-सामान्यतः मृदा अवकर्षण को मृदा की उर्वरता के ह्रास के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस दशा में मिट्टी का पोषण स्तर गिर जाता है तथा अपरदन और दुरुपयोग के कारण मृदा की गहराई कम हो। जाती है। मृदा अवकर्षण की दर भू-आकृति, पवनों की गति तथा वर्षा की मात्रा के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होती है।

(v) खादर और बांगर में क्या अन्तर है?
उत्तर-खादर और बांगर में अन्तर खादर
UP Board Solutions for Class 11Geography Indian Physical Environment Chapter 6 Soils (मृदा) img 1

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दों में दीजिए
(i) काली मृदाएँ किन्हें कहते हैं? इनके निर्माण तथा विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-गाढ़े काले और स्लेटी रंग की वह मृदा जिसमें चूने, लौह, मैग्नीशिया तथा ऐलुमिना के तत्त्व की प्रधानता होती है, काली मिट्टी कहलाती है। इस मृदा को रेगुरे या कपास मृदा भी कहते हैं। काली मृदा का निर्माण ज्वालामुखी प्रक्रिया के दौरान होता है। भारत में दकन पठार के निर्माण के समय ज्वालामुखी द्वारा निस्सृत लावा पदार्थ पर अपक्षय एवं विघटन के फलस्वरूप काली मृदा का निर्माण हुआ है।।

आमतौर पर काली मृदाएँ मृण्मय, गहरी और अपारगम्य होती हैं। ये गीली होने पर फूल जाती हैं और चिपचिपी हो जाती हैं। सूखने पर ये सिकुड़ जाती हैं। इस प्रकार शुष्क ऋतु में काली मृदा में चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं। नमी के धीमे अवशोषण और नमी के क्षय की विशेषता के कारण काली मृदा में दीर्घकाल तक नमी बनी रहती है। इसी कारण काली मृदा में वर्षाधीन फसलों को शुष्क ऋतु में भी नमी मिलती रहती है और वे फलती-फूलती रहती हैं।

(ii) मृदा संरक्षण क्या होता है? मृदा संरक्षण के कुछ उपाय सुझाइए।
उत्तर-मृदा संरक्षण ।

मृदा संरक्षण एक विधि है, जिसमें मिट्टी की उर्वरता बनाए रखी जाती है। इसमें मिट्टी के अपरदन और क्षय रोका जाता है और मिट्टी की निम्नीकृत दशाओं में सुधार लाया जाता है।

मृदा संरक्षण के उपाय

मृदा अपरदन और मृदा क्षरण प्रकृति के अतिरिक्त मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा अधिक होता है; अंतः मानव द्वारा इसे रोकना सम्भव है। मृदा संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय कारगर सिद्ध हो सकते हैं

1. ढालयुक्त भूमि पर कृषि कार्य नहीं किया जाना चाहिए। प्राय: 15 से 25 प्रतिशत ढाल प्रवणता वाली भूमि का उपयोग कृषि कार्य में करने से मिट्टी के कटाव में वृद्धि होती है। अतः ऐसी भूमि पर यदि कृषि कार्य आवश्यक हो तो केवल सीढ़ीदार खेतों में ही कृषि कार्य करना चाहिए।

2. भारत के विभिन्न भागों में अति चराई और स्थानान्तरी कृषि से भूमि का प्राकृतिक आवरण दुष्प्रभावित होता है जिससे विस्तृत क्षेत्र अपरदन की चपेट में आ जाता है। अत: ग्रामवासियों को
इसके दुष्परिणामों से अवगत कराना चाहिए तथा इन्हें चराई और स्थानान्तरी कृषि को रोकने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

3. समोच्च रेखाओ के अनुसार खेतों की मेड़बन्दी, जुताई, सीढ़ीदार खेतों में कृषि नियमित वानिकी, नियन्त्रित चराई, मिश्रित खेती तथा शस्यावर्तन आदि उपाय भी मृदा संरक्षण के लिए उपयोगी हैं।

4. बड़ी अवनालिकाओं में जल की अपरदनात्मक तीव्रता को कम करने के लिए रोक बाँधों की श्रृंखला बनानी चाहिए।

5. शुष्क कृषि योग्य भूमि पर बालू के टीलों के प्रसार को वृक्षों की रक्षक मेखला बनाकर तथा वन्य कृषि करके रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए।

6. मृदा संरक्षण का सर्वोत्तम उपाय भूमि उपयोग की समन्वित योजनाएँ ही हो सकती हैं। भूमि का उसकी क्षमता के आधार पर वर्गीकरण और उपयोग मृदा संरक्षण में महत्त्वपूर्ण उपाय है।

(iii) आप यह कैसे जानेंगे कि कोई मृदा उर्वर है या नहीं? प्राकृतिक रूप से निर्धारित उर्वरता और मानवकृत उर्वरता में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–उर्वरता मिट्टी का विशेष गुण है। ऐसी मिट्टी जिसमें नमी और जीवांश उपलब्ध होते हैं, उर्वर होती है। इसका पता मृदा में खेती की पैदावार से होता है। जिस मृदा में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध तत्त्वों के होते हुए बिना किसी मानवीय प्रयास के अच्छी कृषि पैदावार प्राप्त होती है उस मिट्टी को उर्वर मृदा माना जाता है, किन्तु यदि पैदावार प्राप्त नहीं होती तो उस मृदा को अनुर्वर मृदा कहा जाता है।

प्राकृतिक रूप से निर्धारित उर्वरता में रासायनिक खाद या कम्पोस्ट खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती, जबकि मानवकृत उर्वरता के अन्तर्गत तब तक अच्छी कृषि पैदावार सम्भव नहीं है जब तक उस मृदा का रासायनिक परीक्षण करके उसमें पर्याप्त मात्रा में व निश्चित अनुपात में रासांयनिक उर्वरकों का प्रयोग न किया जाए। अतः प्राकृतिक उर्वरता और मानवकृत उर्वरता में यही अन्तर है कि प्राकृतिक उर्वरक मृदा बिना किसी रासायनिक उपचार के अच्छी कृषि पैदावार देती है, जबकि मानवकृत उर्वरता को मृदा में रासायनिक उपचार के उपरान्त कुछ समय तक स्थायी रखकर कृषि पैदावार प्राप्त की जाती है। इस प्रकार प्राकृतिक उर्वरता स्थायी होती है, जबकि मानवकृत उर्वरता स्थायी नहीं होती है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर ||

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. कपास, चावल, गन्ना, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, तम्बाकू के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी है
(क) काली मिट्टी
(ख) लैटेराइट मिट्टी
(ग) काँप मिट्टी
(घ) लाल व पीली मिट्टी
उत्तर-(क) काली मिट्टी।

प्रश्न 2. कौन-सी मिट्टी सूखने पर चटकती है?
(क) लाल मिट्टी
(ख) काली मिट्टी
(ग) लैटेराइट मिट्टी
(घ) काँप मिट्टी
उत्तर-(ख) काली मिट्टी।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में किस घाटी में काली मिट्टी पायी जाती है?
(क) तापी घाटी
(ख) गंगा घाटी
(ग) नर्मदा घाटी
(घ) गोदावरी घाटी
उत्तर-(ग) नर्मदा घांटी।

प्रश्न 4. कपास की मिट्टी किसे कहा जाता है?
(क) जलोढ़ मिट्टी को
(ख) लैटेराइट मिट्टी को
(ग) लाल मिट्टी को
(घ) काली मिट्टी को ।
उत्तर-(घ) काली मिट्टी को।

प्रश्न 5. लैटेराइट मिट्टी में कौन-सी फसल पैदा होती है?
(क) चावल
(ख) गेहूँ
(ग) कपास
(घ) बागानी
उत्तर-(घ) बागानी।

प्रश्न 6. भारत में किस मिट्टी का सर्वाधिक विस्तार है?
या कौन-सी मिट्टी सबसे अधिक उपजाऊ है?
(क) जलोढ़
(ख) लाल
(ग) काली
(घ) लैटेराइट
उत्तर-(क) जलोढ़।

प्रश्न 7. भारत में काली मिट्टी का अधिकांश क्षेत्र स्थित है
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) राजस्थान में
(ग) बिहार में
(घ) महाराष्ट्र में
उत्तर-(घ) महाराष्ट्र में।

प्रश्न 8. किस मिट्टी के लिए दकन का पठार प्रमुख स्रोत है?
(क) लाल
(ख) जलोढ़
(ग) रेगर
(घ) लैटेराइट
उत्तर-(क) लाल।।

प्रश्न 9. निम्नलिखित में से किस राज्य में लैटेराइट मिट्टियाँ पायी जाती हैं?
(क) पंजाब
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) हिमाचल प्रदेश
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर-(घ) मध्य प्रदेश।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में पायी जाने वाली सबसे उत्तम मिट्टी का नाम बताइए।
उत्तर-नदियों द्वारा लायी जाने वाली जलोढ़, कछारी, दोमट भारत की सर्वोत्तम मिट्टियाँ हैं।।

प्रश्न 2. मरुस्थलीय या बलुई मिट्टी का क्षेत्र बताइए।
उत्तर-यह मिट्टी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के दक्षिणी भाग तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पायी जाती है।

प्रश्न 3. कौन-सी मिट्टी खेती के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है?
उत्तर-लाल या पीली मिट्टी।।

प्रश्न 4. चाय की कृषि के लिए किस प्रकार की मिट्टी चाहिए?
उत्तर-जिस मिट्टी में लोहांश की मात्रा अधिक एवं चूने का अंश कम होता है वह चाय-उत्पादन के लिए सर्वोत्तम होती है।

प्रश्न 5. बांगर मिट्टी को और किस नाम से जानते हैं?
उत्तर–पुरातन काँप मिट्टी।

प्रश्न 6. विशाल मैदान के दक्षिण-पश्चिम में कैसी मिट्टी पायी जाती है?
उत्तर-मरुस्थलीय अथवा रेतीली मिट्टी।

प्रश्न 7. लाल या पीले रंग वाली मिट्टी का नाम बताइए।
उत्तर-लाल या पीले रंग वाली मिट्टी को लैटेराइट मिट्टी कहते हैं।

प्रश्न 8. लैटेराइट मिट्टी में किस प्रकार की कृषि होती है?
उत्तर-लैटेराइट मिट्टी में मोटे अनाज; जैसे-बाजरा, ज्वार, कपास, दालें आदि की कृषि होती है।

प्रश्न 9. काली मिट्टी की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-(1) काली मिट्टी में जल धारण करने की अधिक क्षमता होती है; अतः अधिक सिंचाई या वर्षा के कारण यह चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर चटकती है।
(2) काली मिट्टी बहुत उर्वर होती है। इसमें कपास तथा गन्ने की खेती अच्छी होती है।

प्रश्न 10. काली मिट्टी पाये जाने वाले दो राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर-(1) गुजरात तथा (2) महाराष्ट्र।

प्रश्न11. खादर मिट्टियाँ क्या हैं?
उत्तर–बाढ़ वाले क्षेत्रों में नदियों द्वारा वहाँ काँप मिट्टी बिछती रहती है जिसे खादर मिट्टी कहते हैं। यह मिट्टी रेतीली एवं कम कंकरीली होती है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की शक्ति अधिक होती है।

प्रश्न 12. भारत में लैटेराइट मिट्टी के क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-लैटेराइट मिट्टी कर्नाटक, केरल, राजमहल की पहाड़ियों, महाराष्ट्र के दक्षिणी भागों, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, असोम तथा मेघालय के कुछ भागों में पायी जाती है।..

प्रश्न 13. भारत में काली मिट्टी के क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारत में काली मिट्टी के क्षेत्र हैं-गुना मध्य प्रदेश) से दक्षिण में बेलगाम (कर्नाटक) तक और पश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात) से अमरकण्टक (मध्य प्रदेश) तक।

प्रश्न 14. प्रायद्वीपीय पठार की दो मिट्टियों के नाम लिखिए।
उतर-(1) काली मिट्टी तथा (2) लैटेराइट मिट्टी

प्रश्न 15. मिट्टी-निर्माण की प्रक्रिया बताइए।
उत्तर-मिट्टी का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें प्राकृतिक वातावरण का प्रत्येक तत्त्व अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। अपक्षय एवं अपरदन के कारक भू-पृष्ठ की चट्टानों को चट्टानी चूर्ण बना देते हैं। इस चूर्ण में लम्बे समय तक वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के गले-सड़े अवशेष मिश्रित चट्टानी चूर्ण को उपजाऊ मिट्टी का रूप प्रदान करते हैं। यही तत्त्वं पेड़-पौधों को जीवन प्रदान करते हैं।

प्रश्न 16. मिट्टी के आवरण में भिन्नता उत्पन्न करने वाले प्रमुख घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर-मिट्टी आवरण में भिन्नता उत्पन्न करने वाले प्रमुख घटक हैं-(i) मूल चट्टान या जनक पदार्थ, (ii) उच्चावच एवं जलप्रवाह, (iii) जलवायु, (iv) समय यो अवधि, (v) प्राकृतिक वनस्पति एवं जीव-जन्तु।

प्रश्न 17. मिट्टी अपक्षरण या मिट्टी अपरदन क्या है? इसके तीन प्रमुख साधन कौन-से हैं?
उत्तर-मिट्टी की ऊपरी परत या आवरण के नष्ट होने को ही मिट्टी (भूमि) अपक्षरण या अपरदन कहते हैं। भूमि अपक्षरण के तीन प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं-(1) जल द्वारा मिट्टी अपरदन, (2) पवन द्वारा मिट्टी अपरदन तथा (3) हिम द्वारा मिट्टी अपरदन।।

प्रश्न 18. भूमि कटाव के दो कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–भारत की एक-चौथाई भूमि कटाव की समस्या से ग्रस्त है। राजस्थान राज्य इस समस्या से सर्वाधिक प्रभावित है। भूमि कटाव के दो कारण हैं—(1) मूसलाधार वर्षा तथा (2) वनों को तेजी से विनाश।

प्रश्न 19. बीहड़ किसे कहते हैं?
उत्तर-नदी द्रोणियों में अत्यधिक अपरदन से भूमि-क्षरण होता है। इस प्रकार की भूमि को बीहड़ कहते हैं। चम्बल नदी का बीहड़ इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। यहाँ अवनालिका अपरदन के कारण भूमि-क्षरण अधिक होता है।

प्रश्न 20. थार मरुस्थल में अनुपजाऊ मिट्टी क्यों पाई जाती है?
उत्तर-थार मरुस्थल में वर्षा की कमी, शुष्कता, असंगठित शैल संरचना तथा लवणता की अधिकता के कारण मिट्टी अनुपजाऊ होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में मिट्टी के अपरदन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।”
या टिप्पणी लिखिए–भारत में मिट्टी का कटाव।
उत्तर- भारत की एक-चौथाई भूमि अपरदन की समस्या से ग्रस्त है। वर्षा, नदी, जल, पवन आदि साधनों द्वारा जब भूमि की ऊपरी परत (मिट्टी) नष्ट हो जाती है तो उसे भूमि अपरदन कहते हैं। भूमि की ऊपरी परत में ही वनस्पतियाँ तथा फसलों के उगने के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व उपस्थित रहते हैं। इस सतह के नष्ट हो जाने से भूमि की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो जाती है। इसलिए विद्वानों ने मिट्टी के अपरदन (कटाव) को ‘रेंगती हुई मृत्यु’ कहा है।

मिट्टी के कटाव के अनेक कारण हैं; जैसे—मूसलाधार वर्षा, बाढ़, अत्यधिक पशुचारण करना, वनों का विनाश तथा स्थानान्तरी खेती। वनों के विनाश से मिट्टी के कटाव की समस्या प्रतिदिन बढ़ रही है। स्थानान्तरी खेती से भी मिट्टी का कटाव बहुत होता है।

मिट्टी का कटाव दो प्रकार से होता है-जल द्वारा तथा वायु द्वारा। जब पहाड़ी ढालों या अन्य भूमि पर मूसलाधार वर्षा से मिट्टी की ऊपरी परत बह जाती है तब इसे ‘आवरण क्षय’ कहते हैं। वर्षाकाल में नदियों में बाढ़ आने से मिट्टी के किनारों की भूमि पर गहरी नालियाँ बन जाती हैं जिसे ‘अवनालिका अपरदन’ कहते हैं। मरुस्थलों तथा अर्द्ध-मरुस्थलों में वनस्पति का अभाव होने के कारण वायु निर्बाध रूप से चलती है। ग्रीष्म काल में विशेष रूप से रेत की आँधियाँ चलती हैं जो ढीली रेत या मिट्टी को उड़ाकर ले जाती हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं द्वारा भारत की लाखों हेक्टेयर भूमि अपरदन का शिकार हो गयी है।

मिट्टी के अपरदन से प्रभावित प्रमुख क्षेत्र हिमालय के दक्षिणी ढाल (शिवालिक), उत्तर प्रदेश में गंगा, चम्बल तथा यमुना नदी के कछारी भाग, मध्य प्रदेश के चम्बल के कछारे, असोम में ब्रह्मपुत्र घाटी, दकन के पठार की लावी मिट्टी का क्षेत्र, तमिलनाडु के पहाड़ी क्षेत्र, राजस्थान के मरुस्थली जिले दक्षिणी-पश्चिमी हरियाणा आदि हैं।

प्रश्न 2. मिट्टी के कटाव के मुख्य कारण बताइए।
उत्तर-मिट्टी के कटाव के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. मूसलाधार वर्षा–अत्यन्त तीव्र गति से वर्षा होने पर भूमि जल को सोखने में असमर्थ रहती है, इस कारण भूमि की ऊपरी परत की मिट्टी कटकर जल के साथ बह जाती है।
  2. भूमि का तीव्र ढाल–अधिक ढालू भूमि पर मिट्टी का कटाव तेजी से होता है, इसी कारण मैदानों की अपेक्षा पर्वतीय क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव की समस्या अधिक रहती है।
  3. वनों का तेजी से विनाश-वृक्षों की जड़े मिट्टी के कणों को बाँधकर रखती हैं। अतः अत्यधिक वन विनाश के कारण वनस्पतिविहीन भूमि कटावकारी शक्तियों से प्रभावित होती है।
  4. अनियन्त्रित पशुचारण-पशु चराई के कारण मिट्टी के. कण बिखर जाते हैं। पशुओं के खरं (पैर) भी मिट्टी के कणों को ढीला कर देते हैं। अत: पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल वाली भूमि पर पशुचारण के कारण मिट्टी के कटाव में वृद्धि होती है।
  5. स्थानान्तरणशील कृषि–पर्वतीय क्षेत्रों में झूमिंग या स्थानान्तरणशील कृषि से वनों के विनाश में | तेजी से वृद्धि के कारण मिट्टी के कटाव में तीव्रता आई है।
  6. अनियन्त्रित जुताई-भूमि के ढाल के अनुरूप जुताई के कारण भी मिट्टी के कटाव में वृद्धि होती है।

प्रश्न 3. मिट्टी के कटाव को रोकने हेतु कृषिगत प्रमुख उपाय बताइए।
उत्तर-मिट्टी के कटाव को रोकने की प्रचलित विधियों में कृषिगत उपाय निम्नलिखित हैं

  •  हरी खादों का प्रयोग-भूमि की उर्वरता बढ़ाने से मिट्टी का कटाव कम होता है, क्योंकि हरी तथा कम्पोस्ट खाद से मिट्टी के कणों में संगठन शक्ति की वृद्धि होती है।
  • शस्यावर्तन-यदि एक खेत में एक फसल की खेती लगातार की जाए तो उसमें किसी विशेष तत्त्व की अत्यधिक कमी हो जाती है। अतः खेतों में फसलों को अदल-बदलकर बोना चाहिए, | इससे मिट्टी संरचना सन्तुलित रहती है तथा मिट्टी के कटाव की सम्भावना न्यूनतम रहती है।
  • समोच्च जुताई-यह विधि ढालूदार स्थानों में अपनाई जाती है। इसमें किसी ढलान के समकोण पर जुताई करके फसलें उगाई जाती हैं। इससे वर्षा के जल के बहाव में अवरोध उत्पन्न होता है । और मिट्टी का कटाव कम होता है।
  • वेदिकाकरण-यह विधि भी ढोलू क्षेत्र में अपनाई जाती है। इसमें किसी ढालू सतह पर सीढ़ीनुमा खेत बनाए जाते हैं। इससे वर्षा के जल के बहाव में रुकावट आ जाती है।
  • गहरी जुताई-मरुस्थलीय भागों में अधिक गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे अपक्षालन क्रिया द्वारा जो आवश्यक तत्त्व नीचे चले जाते हैं, वे पुनः ऊपर आ जाते हैं।..
  • संरक्षी पेटियाँ लगाना-स्थान-स्थान पर ऐसे पौधों को उगाना चाहिए जो तेज हवा को रोककर मिट्टी के कटाव को कम कर सकें।
  • पट्टीदार कृषि-इस विधि में किसी पहाड़ी ढलान के किनारे सदावर्षी पौधे, बीच में वार्षिक तथा | द्विवर्षीय पौधे लगाए जाने चाहिए।

प्रश्न 4. मिट्टी का कटाव रोकने के लिए पशु चराई पर नियन्त्रण एवं वन क्षेत्र में विस्तार महत्त्वपूर्ण | उपाय हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- मिट्टी कटाव रोकने हेतु पशु सम्बन्धी उपाय
1. चराई पर नियन्त्रण–पशुओं के अनियमित रूप से चरने पर प्रतिबन्ध होना चाहिए। पशुओं द्वारा घास के चरने से किसी भी स्थान की मिट्टी कठोर हो जाती है; अत: बीज अंकुरण के योग्य नहीं रहती। इसके अतिरिक्त जानवर छोटे-छोटे पौधों को रौंद डालते हैं, उनकी शाखाएँ तोड़ते हैं तथा अनेक पौधों को जड़ से उखाड़ देते हैं। नहरों के किनारे पर पशुओं के चरने पर प्रतिबन्ध हों। चाहिए, क्योंकि पशुओं के खुरों से उखड़ने वाली मिट्टी का तेजी से अपरदन हो जाता है।

2. चरागाहों का प्रबन्ध–पशुओं को चरने के लिए अलग से चरागाहों की व्यवस्था होनी चाहिए। ग्राम-समाज की खाली भूमि को चरागाहों में बदलकर उसमें उन्नत किस्म की घास बोनी चाहिए।

मिट्टी के कटाव रोकने हेतु वन सम्बन्धी उपाय,

1. वनों के कटान पर प्रतिबन्ध-मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं (जैसे-रहने के लिए स्थान, फर्नीचर, ईंधन, कागज, दवाइयाँ आदि) की पूर्ति हेतु वनों को काटता जा रहा है। वनों के कटाव से किसी भी क्षेत्र की मिट्टी ढीली हो जाती है। मूसलाधार वर्षा बाढ़ लाती है और भूस्खलन भी होता है। वनों को काटने से समय पर वर्षा नहीं होती; अत: वनों के अनियमित रूप से कटान
पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।

2. वृक्षारोपण तथा पुनः वनरोपण-वनों के काटने से पहले नए वनों की स्थापना करनी चाहिए, जिससे मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे। खाली स्थानों पर वृक्ष लगाए जाने चाहिए।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ‘वन महोत्सव मनाया जाता है।

3. बालू के बन्धकों को उगाना-पौधों की जड़ों में किसी भी स्थान की मिट्टी को जकड़े रखने की क्षमता होती है। कुछ पौधों में यह क्षमता बहुत अधिक होती है; जैसे-सैकरम मुंजा (Saccharum Munja), सैकरम स्पॉण्टेनियम (S. Spontaneum), साइनोडर्न डेक्टाइलोन (Cymodon Dactylon), इण्डिगोफेरा कॉर्डिफोलिया (Indigofera Cordifolia) आदि। अत: ऐसी प्रजातियों के वृक्षो को नहरों के किनारों पर लगाना चाहिए।

प्रश्न 5. दक्षिण भारत के अधिकांश भागो में लाल मिट्टी पाई जाती है। क्यों?
उत्तर-दक्षिण भारत के अधिकांश भागों में लाल मिट्टी पाई जाती है, इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  • दक्षिणी भारत में दकन के पठार पर प्राचीन कठोर, रवेदार एवं आग्नेयं शैलें पाई जाती हैं। इन शैलों में लोहांश की प्रधानता होती है, इसीलिए मिट्टी का रंग लाल होता है।
  • दक्षिणी भारत की अधिकांश मिट्टी इन्हीं शैलों के विखण्डन से बनी है।
  • इस मिट्टी में लोहे के अंशों की अधिकता के कारण ऑक्सीकरण की क्रिया अधिक होती है, फलतः यह लाल रंग की हो जाती है।
  • ऑक्सीकरण की क्रिया के फलस्वरूप लोहे के अंश वर्षा ऋतु में नमी पाकर आयरन ऑक्साङ्ड में बदल जाते हैं, जिससे इस मिट्टी का रंग लाल हो जाता है।

प्रश्न 6. ऐसा कहा जाता है कि पश्चिमी उत्तर भारत की ओर रेगिस्तान का विस्तार हो रहा है, क्यों? इसे रोकने के लिए क्या किया जा रहा है?
उत्तर-राजस्थान के पश्चिमी जिलों जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, बाड़मेर, नागौर आदि में मरुस्थलीय दशाएँ पाई जाती हैं। यहाँ से उत्तर-पूर्व की ओर चलने वाली आँधियाँ अपने साथ बड़ी मात्रा में बालू के कणों को उड़ा ले जाती हैं। सघन प्राकृतिक वनस्पति के अभाव में ये आँधियाँ अविरल गति से आगे बढ़ती हैं तथा राजस्थान की सीमा को पार कर हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा एवं मथुरा जिलों में प्रवेश कर वहाँ बालू का जमाव करती हैं। इस प्रकार रेगिस्तान का विस्तार धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ रही है।

इसको रोकने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब की सीमा पर रक्षात्मक वृक्षों की हरित पट्टी लगाने का प्रयास किया गया है तथा जोधपुर में एक मरुस्थल वृक्षारोपण तथा अनुसन्धान केन्द्र खोला गया है।

प्रश्न 7. भारत में मिट्टी के कटाव से क्या समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं?
उत्तर-मिट्टी के ह्रास से अधिक गम्भीर समस्या मिट्टी के कटाव या अपरदन की होती है। हास की दशा में मिट्टी की उपयोगी क्षमता घट जाती है तथा यदि उसे कुछ दिन तक अछूती छोड़ दिया जाए तो मिट्टी की प्राण-शक्ति (उत्पादन क्षर्मता) लौट सकती है, परन्तु मिट्टी का कटाव हो जाने पर उक्त मिट्टी उस स्थान से सदा के लिए समाप्त हो जाती है। अत: प्राकृतिक कारकों (जल, पवन आदि) एवं मानव द्वारा वन विनाश आदि के कारण जब भूमि की ऊपरी परत या आवरण नष्ट हो जाता है तो उसे मिट्टी का कटाव अथवा अपरदन कहते हैं।

भारत की एक-चौथाई भूमि मिट्टी के कटाव की समस्या से ग्रस्त है। उपग्रहों द्वारा लिए गए छवि चित्रों से पता चलता है कि भारत में राजस्थान के 14 में से 13 जिलों में विगत दशक में 53,370 वर्ग किमी क्षेत्र में वायु के कटाव के कारण भूमि बंजर हो गई है। मरुस्थलीय क्षेत्रों की बालू अजमेर, नागोर, सीकर तथा जयपुर जिलों में तेजी से फैल रही है। मिट्टी के कटाव के कारण एक ओर जहाँ मूल क्षेत्र की उपयुक्त मिट्टी नष्ट होती है, वहीं दूसरी ओर यह मिट्टी जिस क्षेत्र में भी पहुँचती है, वहाँ भी समस्या उत्पन्न करती है। मरुस्थलीय मिट्टी के विस्तार से अनेक उपजाऊ क्षेत्र नष्ट हो रहे हैं, इसी प्रकार उपजाऊ मिट्टी के कटाव से नदी क्षेत्रों में अत्यधिक निक्षेप की समस्या उत्पन्न हो रही है। अतः मिट्टी के कटाव प्रत्येक दशा में कुप्रभाव (अनुर्वरता) उत्पन्न करता है। मिट्टी कटाव को वैज्ञानिकों ने रंगती हुई मृत्यु’ की संज्ञा प्रदान की है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में मिट्टियों के वितरण एवं महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या भारत की मिट्टियों का वर्गीकरण कीजिए और उनमें से किसी एक की विशेषताओं, विस्तार और कृषि के लिए उसकी उपयुक्तता पर प्रकाश डालिए।
या भारत में मिट्टी के प्रकारों का उल्लेख कीजिए तथा काली मिट्टी के वितरण तथा विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या भारत में पायी जाने वाली प्रमुख मिट्टियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-मिट्टी भारतीय कृषक की अमूल्य सम्पदा है जिस पर सम्पूर्ण कृषि-उत्पादन निर्भर करता है। डॉ० बैनेट के अनुसार, “मिट्टी भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत है जो मूल चट्टानों अथवा वनस्पति के योग से बनती है।” मिट्टियों की रचना चट्टानों के विखण्डन के फलस्वरूप होती है जिसमें अनेक रासायनिक तत्त्व एवं जीवांश मिले होते हैं। तापमान, वर्षा, वायु एवं वनस्पति का चट्टानों पर प्रभाव पड़ता है। जिससे स्थानीय मिट्टियों का निर्माण होता है। अपरदन के कारकों द्वारा मिट्टी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा दी जाती है। मिट्टी की उर्वरता तथा समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था सघन जनसंख्या के पोषण में सक्षम होती है। भारत के विशाल मैदान तथा तटीय क्षेत्रों की उपजाऊ मिट्टी उन्नतशील कृषि को प्रोत्साहन देती है।

भारत में मिट्टियों का वर्गीकरण एवं वितरण

मिट्टियों का वर्गीकरण अनेक भारतीय तथा विदेशी विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। परम्परागत दृष्टिकोण से भारतीय मिट्टियों का विभाजन कछारी, लाल, काली (रेगड़), लैटेराइट आदि में किया जाता है। भौगोलिक दृष्टिकोण से मिट्टियों को विभाजन प्राकृतिक रचना तथा उनकी विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है। इस आधार पर भारतीय मिट्टियों को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है(1) हिमालय पर्वतीय प्रदेश की मिट्टियाँ, (2) विशाल मैदान की मिट्टियाँ, (3) प्रायद्वीपीय पठार की मिट्टियाँ एवं (4) अन्य मिट्टियाँ।

(1) हिमालय पर्वतीय प्रदेश की मिट्टियाँ
हिमालय पर्वतीय प्रदेश में अनेक प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं। पर्वतीय मिट्टियाँ नदियों की घाटियों तथा पहाड़ी ढालों पर अधिक गहरी हैं। ढालों पर हल्की बलुई, छिद्रमय मिट्टियाँ पायी जाती हैं जिसमें जीवांश कम मात्रा में पाये जाते हैं। पर्वतीय मिट्टियों की रचना, कणों के आकार एवं कृषि-उत्पादन के दृष्टिकोण से इन्हें निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है–

(i) चूना एवं डोलोमाइट से निर्मित मिट्टियाँ–हिमालय पर्वतीय प्रदेश में चूना एवं डोलोमाइट पाये जाने वाले क्षेत्रों में इस प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं। वर्षा की अधिकता के कारण चूने का अधिकांश भाग इस मिट्टी के साथ बह जाता है। चूने का थोड़ा-सा अंश भूमि पर रह जाने के कारण भूमि अनुत्पादक हो जाती है। इसमें चीड़ एवं साल के वृक्ष बहुतायत में उगते हैं।

(ii) चाय की मिट्टी-मध्य हिमालय के पर्वतीय ढालों पर मिट्टी में वनस्पति अंशों की अधिकता होती है। इसमें लोहांश की मात्रा अधिक तथा चूने का अंश कम होता है; अतः यह मिट्टी चाय-उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। काँगड़ा, देहरादून, दार्जिलिंग तथा असोम के पहाड़ी ढालों पर चाय की मिट्टी अधिक पायी जाती है।

(iii) पथरीली मिट्टी-हिमालय के दक्षिणी भागों में पथरीली मिट्टी अधिक पायी जाती है। नदियों ने इस मिट्टी को निचले ढालों पर जमा कर दिया है। इसके कण मोटे होते हैं तथा इसमें बालू एवं कंकड़-पत्थर के टुकड़े भी मिले होते हैं।

(iv) टर्शियरी मिट्टी-इस मिट्टी की गहराई कम होती है, परन्तु यह काफी उपजाऊ होती है। यह मिट्टी घाटियों में एकत्रित होती रहती है, जो दून एवं कश्मीर घाटियों में पायी जाती है। इसमें चाय, चावल एवं आलू उगाया जाता है।।

(2) विशाल मैदान की मिट्टियाँ
विशाल मैदान में सर्वत्र कांप (जलोढ़) मिट्टी का विस्तार है। यह मिट्टी कृषि-उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसका विस्तार 7.5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर है। इसी कारण इस क्षेत्र में सघन जनसंख्या निवास करती है। काँप मिट्टियाँ हिमालय पर्वत से निकलने वाली सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियों द्वारा लाई गयी अवसाद से निर्मित हुई हैं। यह मिट्टी हल्के भूरे रंग की होती है। इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और वनस्पति के अंशों की कमी होती है तथा सिलिका एवं चूने के अंशों की प्रधानता होती है। यह मिट्टी पीली दोमट है। कुछ स्थानों पर यह चिकनी एवं बलुई होती है। विशाल मैदान की मिट्टियों को वर्षा की भिन्नता, क्षारीय गुणों, बालू एवं चीका की भिन्नता के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता। है

(i) पुरातन काँप-इसे बाँगर मिट्टी के नाम से भी पुकारा जाता है। इस मिट्टी का विस्तार उन क्षेत्रों में है जहाँ नदियों की बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता है। इसमें कहीं-कहीं कंकड़ भी पाये जाते हैं। खुरदरे एवं बड़े कणों वाली मिट्टी को भूड़ कहते हैं। इस मिट्टी में गन्ना एवं गेहूँ अधिक उगाया जाता है।

(ii) नवीन काँप-इसे खादर मिट्टी भी कहा जाता है। यह मिट्टी रेतीली एवं कम कंकरीली होती है। इस मिट्टी के क्षेत्रों में प्रति वर्ष बाढ़े आती हैं तथा उनके द्वारा नवीन काँप मिट्टी बिछती रहती है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। कहीं-कहीं पर दलदल भी होती हैं। इसमें पोटाश, फॉस्फोरस, चूना एवं जीवांशों की मात्रा अधिक होती है।।

(iii) डेल्टाई काँप-यह मिट्टी नदियों के डेल्टा में पायी जाती है। यहाँ नदियाँ नवीन काँप मिट्टी का जमाव करती रहती हैं; अतः यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है। इस मिट्टी के कण बहुत ही बारीक होते हैं। जिन फसलों को अधिक जल की आवश्यकता होती है, उनमें सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। चावल, जूट, तम्बाकू, गेहूँ, तिलहन आदि इस मिट्टी की प्रमुख फसलें हैं। विशाल मैदान के दक्षिण-पश्चिम में मरुस्थलीय अथवा रेतीली मिट्टी पायी जाती है। वर्षा की कमी के कारण इसमें नमी की मात्रा कम होती है। जल की कमी के कारण यह मिट्टी अनुपजाऊ होती है।

(3) प्रायद्वीपीय पठार की मिट्टियाँ
प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन एवं रवेदार चट्टानों से निर्मित हैं। प्रायद्वीपीय पठार की मिट्टियों को निम्नलिखित समूहों में बाँटा जा सकता है

(i) काली मिट्टी–इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी चट्टानों के अपरदन से हुआ है; अतः इसका रंग काला है। इस मिट्टी में लोहा, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम तथा जीवांशों की मात्रा अधिक होती है। यह काली, चिकनी तथा बारीक कणों से युक्त मिट्टी है, जिसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक है। वर्षा होने पर यह चिपचिपी-सी हो जाती है तथा सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों के द्वारा ऑक्सीजन पर्याप्त गहराई तक प्रवेश कर जाती है। भारत में काली मिट्टी का विस्तार प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी-पश्चिमी भाग में लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर पाया जाता है। इस मिट्टी का विस्तार उत्तर में गुना (मध्य प्रदेश) से दक्षिण में बेलगाम (कर्नाटक) तक और पश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात) से पूरब में अमरकण्टक (मध्य प्रदेश) तक है। अत: गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी कर्नाटक की ये प्रमुख कृषि मिट्टियाँ हैं। राजस्थान में बूंदी एवं टोंक जिलों में तथा उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड के भाग में भी ये मिट्टियाँ पायी जाती हैं।

इस सम्पूर्ण प्रदेश की नदी-घाटियों में गहरी और उपजाऊ मिट्टियाँ पायी जाती हैं तथा पहाड़ी ढालों पर मिट्टियाँ छिछली और कम उपजाऊ हैं। काली मिट्टी का कृषि के लिए विशेष महत्त्व है। इस मिट्टी की प्रमुख फसल कपास है। इसी कारण इसे कपास की काली मिट्टी कहा जाता है। कपास के अतिरिक्त इस मिट्टी में चावल, गन्ना, सब्जियाँ, फल, ज्वार-बाजरा, मूंगफली, तम्बाकू और सोयाबीन भी पैदा किया जाता है। इन मिट्टियों को सिंचाई की पूर्ण सुविधा उपलब्ध नहीं है; अतः फसलों की प्रति हेक्टेयर उपज अपेक्षाकृत कम है।
विशेषताएँ-(क) यह मिट्टी काले रंग की होती है।
(ख) इस मिट्टी में जल धारण करने की क्षमता अधिक होती है। वर्षा होने पर यह चिपचिपी हो जाती
(ग) सूखने पर इस मिट्टी में 10 से 15 सेमी तक चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं।
(घ) इस मिट्टी में कैल्सियम कार्बोनेट और मैग्नीशियम तत्त्वों की मात्रा अधिक होती है।
(ङ) यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है। इसमें जुताई भी कम करनी पड़ती है तथा यह शीघ्र ही भुरभुरी हो जाती है।

(ii) लाल व पीली मिट्टियाँ–यह मिट्टी लाल, पीले या भूरे रंग की होती है, परन्तु इसमें लाल रंग की अधिकता होती है। इस मिट्टी में लोहे का अंश अधिक होने के कारण इसका रंग लाल होता है। इस मिट्टी का निर्माण ग्रेनाइट, नीस व शिस्ट जैसी प्राचीन आग्नेय शैलों के टूटने से हुआ है। दक्षिण भारत में यह मिट्टी लगभग 2 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है। यह मिट्टी चिकने कणों से युक्त होती है। इसमें फॉस्फोरस, पोटाश, नाइट्रोजन, चूना तथा ह्यूमस की कमी पायी जाती है, किन्तु लोहा, ऐलुमिनियम व चूना यथेष्ट मात्रा में होता है। इस मिट्टी में मोटे अनाज अधिक उगाये जाते हैं, जिसमें बाजरे का स्थान सर्वोपरि है। ऊँचे ढालों पर इन मिट्टियों में मूंगफली व आलू तथा घाटियों में गन्ना भी पैदा किया जाता है। भारत में इस प्रकार की मिट्टी का विस्तार कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्वी भागों, तमिलनाडु, मेघालय, ओडिशा, पश्चिम बंगाल राज्यों एवं छोटा नागपुर के पठार पर है। उत्तर प्रदेश राज्य के बाँदा, झाँसी, ललितपुर, मिर्जापुर एवं हमीरपुर जिलों में भी यह मिट्टी पायी जाती है।
विशेषताएँ-(क) यह मिट्टी लाल से चॉकलेटी रंग की शुष्क तथा कुछ अनुपजाऊ होती है।
(ख) निम्न भू-भागों में ये मिट्टियाँ दोमटी होती हैं और ऊँची भूमि पर बिखरी हुई कंकड़ों के समान होती हैं।
(ग) ढीले गठन की होने के कारण इस मिट्टी में जलधारण शक्ति कम होती है, अतः इसमें बिना सिंचाई के अच्छी खेती नहीं की जा सकती।
(घ) इस मिट्टी में लोहे की मात्रा अधिक होती है; अत: वर्षा ऋतु में लोहा ऑक्साइड के रूप में • मिट्टी के ऊपर आ जाता है।
(ङ) इस मिट्टी में मोटे कण तथा अघुलनशील तत्त्व अधिक मिले होते हैं।

(iii) लैटेराइट मिट्टी-इस मिट्टी का रंग लाल या पीला होता है। मानसूनी जलवायु की विशिष्टता के कारण ये मिट्टियाँ 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा वाले ऊँचे पर्वतीय ढालों पर उत्पन्न होती हैं। यह मिट्टी सिलिका तथा लवण कणों से युक्त होती है। इसमें मोटे-मोटे कण तथा कंकड़-पत्थरों को बाहुल्य होता है। इस मिट्टी में चूना, फॉस्फोरस एवं पोटाश कम पाया जाता है, किन्तु वनस्पति का अंश यथेष्ट मात्रा में होता है। भारत में लैटेराइट मिट्टी 1.5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर फैली हुई है। वर्षा होने पर यह मिट्टी मुलायम हो जाती है, परन्तु सूखने पर कठोर हो जाती है। उर्वरकों की सहायता से इसमें चावल, गन्ना, काजू, चाय, रागी, कहवा तथा रबड़ की कृषि की जाती है। लैटेराइट मिट्टी कर्नाटक, केरल, राजमहल की पहाड़ियों, महाराष्ट्र के दक्षिणी भागों, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, असोम तथा मेघालय के कुछ भागों में पायी जाती है। वास्तव में ये मिट्टियाँ पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, राजमहल की पहाड़ियों, मेघालय और असोम की पहाड़ियों के ढालों पर विस्तृत हैं।
विशेषताएँ—(क) यह मिट्टी ईंट के रंग जैसी लाल या गहरे भूरे रंग की होती है।
(ख) इसमें मोटे कण तथा कंकड़-पत्थर अधिक पाये जाते हैं।
(ग) यह मिट्टी अधिक उपजाऊ नहीं है।
(घ) इस मिट्टी में नाइट्रोजन, चूना तथा फॉस्फोरस की मात्रा बहुत कम होती है। .

(4) अन्य मिट्टियाँ
(i) पीट मिट्टियाँ–आर्दै प्रदेशों में सड़ी हुई वनस्पति से पीट मिट्टी का निर्माण होता है। इनका निर्माण जैविक पदार्थों के एकत्रण से हुआ है। केरल एवं तमिलनाडु के कुछ भागों में यह मिट्टी पायी जाती है। यह मिट्टी काली, भारी एवं अम्लीय होती है। इसमें धान उगाया जाता है।

(ii) दलदली मिट्टियाँ–समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों में नदियों एवं झीलों के सूखने से तथा प्राकृतिक वनस्पति के सड़ने से इन मिट्टियों का निर्माण हुआ है। इसमें लोहे एवं जीवांशों की अधिक मात्रा होने के कारण इसका रंग कुछ नीला होता है। ओडिशा एवं तमिलनाडु के दक्षिणी-पूर्वी समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों, पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन डेल्टा तथा उत्तरी बिहार के मध्यवर्ती क्षेत्रों में इस मिट्टी का
विस्तार पाया जाता है।

(iii) मरुस्थलीय मिट्टियाँ-मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होने के कारण यहाँ ऊसर, थूर तथा कल्लर जैसी मिट्टियाँ पायी जाती हैं। यह मिट्टी लवण एवं क्षारीय गुणों से युक्त होती है। इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम व मैग्नीशियम तत्त्वों की प्रधानता होती है, जिससे यह अनुपजाऊ हो गयी। है। इसमें नमी एवं वनस्पति के अंश नहीं पाये जाते। इसमें सिंचाई करके केवल मोटे अनाज ही उगाये जाते हैं। यह मिट्टी सरन्ध्र होती है। इस मिट्टी में बालू के ढेर दिखलाई पड़ते हैं। मरुस्थलीय मिट्टी पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा दक्षिणी पंजाब एवं हरियाणा राज्यों में पायी जाती है।
विशेषताएँ—(क) इस मिट्टी में बालू के मोटे कणों की प्रधानता होती है।
(ख) इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अत्यधिक कम होती है।।
(ग) यह मिट्टी बहुत अधिक अनुपजाऊ है।
(घ) इस मिट्टी में जल गहराई तक प्रवेश कर जाता है।
(ङ) इस मिट्टी में जल की अधिक आवश्यकता होती है।
(च) आर्थिक दृष्टि से मरुस्थलीय मिट्टियाँ उपयोगी नहीं होतीं, परन्तु इनमें सिंचाई द्वारा मोटे अनाज उगाये जा सकते हैं।

(iv) नमकीन या खारी मिट्टियाँ–विशाल मैदान के बहुत से भागों में मिट्टी की ऊपरी परत पर सफेद रंग की परत-सी जम जाती है जिससे भूमि अनुपजाऊ हो जाती है। इसे ‘ऊसर’ या ‘कल्लर’ के नाम से पुकारा जाता है। इस मिट्टी में कैल्सियम, मैग्नीशियम तथा सोडियम लवणों की मात्रा अधिक होती है। इन लवणों की तह मिट्टी की ऊपरी परत पर जम जाती है जिसे रह’ कहते हैं।

(v) वन मिट्टियाँ–वन मिट्टियों की रचना वन प्रदेश में जैविक तत्त्वों के एकत्रण से होती है। सामान्यतया ये मिट्टियाँ दो प्रकार की होती हैं–(अ) प्रथम प्रकार की मिट्टियों का निर्माण जीवांशों को अम्लीय रूप में बदलने से होता है, जिनमें मूल सामग्री की कमी होती है। (ब) इन मिट्टियों का निर्माण हल्की अम्लीय स्थिति में होता है। इनमें मूल सामग्री की अधिकता होती है जिससे भूरी
मिट्टियों का निर्माण होता है। देश के वन प्रदेशों में इस प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 2. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(क) शुष्क मृदा, (ख) लवण मृदा, (ग) पीटमय मृदा, (घ) वन मृदा।
उत्तर-(क) शुष्क मृदा
शुष्क मृदाओं का रंग लाल से लेकर किशमिशी तक होता है। यह मिट्टी संरचना की दृष्टि से बलुई और प्रकृति से लवणीय होती है। कुछ क्षेत्रों में इसमें नमक की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसलिए मिट्टी को वाष्पीकृत करके नमक प्राप्त किया जाता है। शुष्क जलवायु, उच्च तापमान और तीव्र गति से वाष्पीकरण के कारण इस मृदा में नमी और ह्यूमस कम होते हैं। इसमें नाइट्रोजन अपर्याप्त और फॉस्फेट सामान्य मात्रा में होता है। नीचे की ओर चूने की मात्रा के बढ़ते जाने के कारण निचले संस्तरों में कंकड़ों की परतें पाई जाती हैं। मृदा के निम्न संस्तर में कंकड़ों की परत बनने के कारण पानी का रिसाव सीमित हो जाता है। यह मृदा विशिष्ट शुष्क स्थलाकृति वाले पश्चिमी राजस्थान में अभिलाक्षणिक रूप से विकसित हुई है। यह मृदा अनुर्वर है, क्योंकि इनमें ह्यूमस और जैव पदार्थ कम मात्रा में पाए जाते हैं।

(ख) लवण मृदा ।
मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा की कमी के कारण ऊसर, रॉकड, थुर तथा कल्लर जैसी अनुर्वर मिट्टियाँ पाई जाती हैं। ये मिट्टियाँ लवण एवं क्षारीय गुणों से युक्त होती हैं। इसलिए इनको लवण मृदा कहते हैं। इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम तत्त्वों की प्रधानता होती है, जिससे यह अनुपजाऊ हो गई है। इसमें नमी एवं वनस्पति के अंश नहीं पाए जाते हैं। इनमें सिंचाई कर केवल मोटे अनाज, मूंगफली व दलहन ही उगाए जाते हैं। यह मिट्टी सरन्ध्र होती है। यह मिट्टी कोमल एवं प्रवेश्य होती है। इसमें बालू के ढेर दिखाई पड़ते हैं। इस मिट्टी का विस्तार 1.14 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल पर मिलता है। मरुस्थलीय मिट्टी पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा दक्षिणी पंजाब एवं दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा राज्यों में पाई जाती है। इस मृदा में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  • इस मिट्टी में बालू के मोटे कणों की प्रधानता होती है।
  • इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अत्यधिक कम होती है।
  • यह मिट्टी अपेक्षाकृत अनुपजाऊ होती है।
  • इस मिट्टी में जल गहराई तक प्रवेश कर जाता है।
  • इस मिट्टी को जल की अधिक आवश्यकता होती है।
  • आर्थिक दृष्टि से मरुस्थलीय मिट्टी उपयोगी नहीं होती, परन्तु इसमें सिंचाई द्वारा मोटे अनाज ऋगाए जा सकते हैं।

(ग) पीटमय मृदा
यह मृदा भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता से युक्त उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वनस्पति की वृद्धि अच्छी हो। अत: इन क्षेत्रों में मृत जैव पदार्थ बड़ी मात्रा में इकट्ठे हो जाते हैं, जो मृदा को ह्युमस और जैव तत्त्व पर्याप्त मात्रा में प्रदान करते हैं। इस मृदा में जैव तत्त्व 40 से 50 प्रतिशत तक होते हैं। यह मृदा सामान्यत: गाढे काले रंग की होती है। अनेक स्थानों पर यह क्षारीय भी है। यह मृदा मुख्यतः बिहार के उत्तरी भाग, उत्तराखण्ड के दक्षिणी भाग, पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों, ओडिशा और तमिलनाडु में पाई जाती है।

(घ) वन मृदा
वन मृदा पर्याप्त वर्षा वाले वन क्षेत्रों में बनती है। इसके लिए पर्वतीय पर्यावरण अनुकूल क्षेत्र है। इस पर्यावरण में परिवर्तन के अनुसार मृदाओं का गठन और संरचना बदलती रहती है। घाटियों में यह दुमटी और पांशु होती है तथा ऊपरी ढालों पर यह मोटे कणों वाली होती है। अपने प्राकृतिक गुणों व गठन के कारण फसलों, पौधों और वनस्पति की वृद्धि के लिए यह मिट्टी सर्वोत्तम होती है।

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