UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 18 मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के साधन के रूप में परिवार

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 18 मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के साधन के रूप में परिवार (Family as a Means for Satisfying Human Needs)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 18 मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के साधन के रूप में परिवार

UP Board Class 11 Home Science Chapter 18 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक सामाजिक संस्था के रूप में परिवार का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। परिवार की मुख्य विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
‘परिवार’ मानव समाज की सबसे प्राचीनतम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था है। परिवार वह सामाजिक संस्था है, जहाँ मनुष्य शिशु के रूप में जन्म लेता है तथा विभिन्न प्रकार के आश्रय, संरक्षण एवं सहयोग द्वारा अपनी असहाय अवस्था को गुजारता है। इस शारीरिक संरक्षण के अतिरिक्त, परिवार व्यक्ति के समाजीकरण की भी प्रमुख संस्था है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में भी परिवार का योगदान असीमित होता है। यही नहीं बल्कि वृद्धावस्था की असहाय स्थिति में भी व्यक्ति परिवार में ही आश्रय प्राप्त करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि परिवार वह सामाजिक संस्था है, जिसका सदस्य प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी स्थिति में अवश्य होता है तथा सामान्य रूप से परिवार पर किसी-न-किसी प्रकार से आश्रित भी होता है।

परिवार की परिभाषाएँ (Definitions of Family) –
प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, बच्चा हो या बूढ़ा, ‘परिवार’ से भली-भाँति परिचित रहता है। परन्तु परिवार का यह परिचय एक सामान्य परिचय होता है। समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए सुनिश्चित तथा वैज्ञानिक परिभाषा प्रस्तुत करना अनिवार्य है। विभिन्न विद्वानों ने ‘परिवार’ की सामान्य विशेषताओं को दृष्टिगत रखते हुए कुछ आपस में मिलती-जुलती परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं, जो निम्नवर्णित हैं –

1. मैकाइवर एवं पेज द्वारा प्रतिपादित परिभाषा – मैकाइवर एवं पेज ने परिवार की संक्षिप्त परिभाषा इन शब्दों में प्रस्तुत की है – “परिवार पर्याप्त निश्चित यौन सम्बन्धों द्वारा प्रतिपादित एक ऐसा समूह है, जो बच्चों को पैदा करने तथा लालन-पालन करने की व्यवस्था करता है।”

2. डी० एन० मजूमदार द्वारा प्रतिपादित परिभाषा – “परिवार उन व्यक्तियों का एक समूह है, जो एक छत के नीचे रहते हैं, मूल और रक्त सम्बन्धी सूत्रों से सम्बन्धित होते हैं तथा स्थान, रुचि और कृतज्ञता की अन्योन्याश्रितता के आधार पर सम्बन्धों की जागरूकता रखते हैं।”

3. ऑगबर्न एवं निमकॉफ द्वारा प्रतिपादित परिभाषा – “बच्चों सहित अथवा बच्चों रहित एक पति-पत्नी के या किसी एक पुरुष या एक स्त्री के अकेले ही बच्चों सहित एक थोड़े-बहुत स्थायी संघ को परिवार कहते हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा ‘परिवार’ नामक सामाजिक संस्था का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि परिवार एक लगभग स्थायी सामाजिक संगठन है, जिसकी नींव स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों के नियोजन पर होती है तथा बच्चों का जन्म, लालन-पालन एवं समाजीकरण आदि मुख्य कार्य होते हैं।

परिवार की विशेषताएँ (Characteristics of Family) –
उपर्युक्त विवरण के आधार पर ‘परिवार’ की निम्नलिखित मुख्य विशेषताओं का वर्णन किया जा सकता है –

  • परिवार समाज की प्राचीनतम सामाजिक संस्था है।
  • परिवार विश्व की एक सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है; अर्थात् यह संस्था सब कहीं पायी जाती है।
  • परिवार नामक सामाजिक संस्था विवाह पर आधारित है।
  • परिवार नामक सामाजिक संस्था में भावात्मक सम्बन्धों का विशेष महत्त्व है।
  • परिवार नामक सामाजिक संस्था का आकार सीमित होता है।
  • प्रत्येक परिवार का एक सामान्य निवास स्थान होता है।
  • प्रत्येक परिवार का एक विशिष्ट नाम होता है।
  • परिवार एक प्रबल नियन्त्रणकारी सामाजिक संस्था है।
  • परिवार की सामाजिक संगठन में केन्द्रीय एवं महत्त्वपूर्ण स्थिति होती है।
  • परिवार के सदस्यों के असीमित कर्त्तव्य होते हैं।
  • परिवार कुछ निश्चित सामाजिक नियमों पर आधारित होता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य की आवश्यकताओं को कितने वर्गों में बाँटा जा सकता है? इन आवश्यकताओं की पूर्ति में परिवार की क्या भूमिका है?
अथवा
परिवार में मनुष्य की कौन-कौन सी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है? किन्हीं दो का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
अथवा
मानवीय आवश्यकताओं की परिवार में होने वाली पूर्ति का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
अथवा
मानवीय आवश्यकताएँ परिवार द्वारा किस प्रकार पूर्ण होती हैं?
उत्तरः
परिवार द्वारा मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करना (Fulfilment of Human needs by Family) –
व्यक्ति के जीवन में परिवार का बहुत महत्त्व है। इसी के द्वारा वह अपने जन्म से लेकर मरण तक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इसलिए परिवार का सदस्य बने बिना, मनुष्य के सुचारु जीवन एवं विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। परिवार द्वारा मनुष्य की शारीरिक, सामाजिक, आध्यात्मिक एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की प्रक्रिया को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है –

(1) शारीरिक व भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति –
(अ) आहार एवं पोषण-भोजन की पूर्ति परिवार द्वारा सुव्यवस्थित तथा सुचारु रूप से की जाती है। परिवार अपने सभी सदस्यों के लिए, भले ही वे रोगी, वृद्ध, अपाहिज क्यों न हों, अटूट प्रेम, श्रद्धा एवं स्नेह से ओतप्रोत होकर भोजन की व्यवस्था करता है। परिवार द्वारा आयोजित सन्तुलित आहार-व्यवस्था से ही व्यक्ति का समुचित पोषण होता है।

(ब) शारीरिक सुरक्षा-परिवार द्वारा अपने सदस्यों के लिए उपयुक्त वस्त्रों की व्यवस्था की जाती है। परिवार के किसी सदस्य को यदि शारीरिक सुरक्षा अथवा सहायता की आवश्यकता होती है तो सारे सदस्य मिलकर उसकी सहायता को तैयार हो जाते हैं।

(स) मनोरंजन-दिन भर के परिश्रम के बाद मनोरंजन की आवश्यकता होती है। इससे मनुष्य की सारी थकान दूर हो जाती है। हारा-थका पिता जब अपने बच्चों की बातों को सुनता है तो उसका मन प्रसन्न हो जाता है। परिवार में अनेक उत्सव होते रहते हैं, इनके द्वारा भी मनोरंजन होता है। परिवार के विभिन्न सदस्यों के मध्य होने वाले हास-परिहास से भी व्यक्ति का भरपूर स्वस्थ मनोरंजन होता रहता है।

(द) बालकों का पालन-पोषण-नवजात शिशु की असहायावस्था में परिवार ही उसकी सारी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए पालन-पोषण करता है।

(2) सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति –
(अ) मनुष्यों के मध्य रहना-कोई मनुष्य एकान्तवासी होना नहीं चाहता। यदि मनुष्य को कुछ समय के लिए एकान्त में रखा जाए तो वह व्यथित हो उठता है। परिवार ही इस आवश्यकता की सन्तुष्टि करता है।

(ब) आत्म-प्रदर्शन-बच्चे अध्ययन तथा अन्य सामाजिक कार्यों में विशिष्ट स्थान प्राप्त कर अपने परिवार के सदस्यों से प्रशंसा, प्रोत्साहन और उत्साह ग्रहण करते हैं।
(स) शिशु रक्षा-परिवार शिशु के विकास तथा रक्षा के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करता है।

(3) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति –
मनुष्य एक ऐसा प्राणी है, जो केवल शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति से पूर्ण सन्तुष्ट नहीं हो पाता। मनुष्य के लिए मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं का भी विशेष महत्त्व है। मनुष्य को प्रेम, स्नेह, सहानुभूति तथा आत्म-गौरव आदि की भी लालसा होती है। इन समस्त मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम ढंग से परिवार में ही होती है।

(4) आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति –
परिवार के वृद्ध सदस्यों से अनेक धार्मिक व सांस्कृतिक उपाख्यानों को श्रवण कर व्यक्ति अपने चरित्र को परिमार्जित तथा आदर्शमय बनाने की प्रेरणा ग्रहण करता है। परिवार में ही मनुष्य नैतिकता का सच्चा पाठ पढ़ता है और सभ्य नागरिक बनकर समाज में प्रतिष्ठित होता है।

प्रश्न 3.
परिवार की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों की चर्चा करते हुए, विकासवादी सिद्धान्त की समालोचना कीजिए।
उत्तरः
परिवार की उत्पत्ति के सिद्धान्त (Theories of Origin of Family) –
मानव समाज के विकास की प्रारम्भिक अवस्था में भी किसी-न-किसी रूप में “परिवार’ नामक संस्था का अस्तित्व था तथा आज परिवार एक सुविकसित एवं सुनियोजित संस्था के रूप में उपस्थित है। परन्तु, फिर भी परिवार की उत्पत्ति के विषय में प्रश्न उठता ही है। इस विषय में मैकाइवर एवं पेज का प्रस्तुत कथन उल्लेखनीय है – “परिवार की इस अर्थ में कोई उत्पत्ति नहीं है और न ही मानव जीवन में कोई ऐसी अवस्था थी जबकि परिवार अनुपस्थित था या कोई दूसरी ऐसी अवस्था थी, जिसमें से यह निकला है।”

परिवार की इस पृथ्वी पर.उत्पत्ति किस प्रकार हुई है तथा वह अपनी वर्तमान अवस्था में कैसे पहुँचा है? इस सम्बन्ध में समाजशास्त्रियों (sociologists) ने निम्नलिखित सिद्धान्त बताए हैं –

  • पितृ-सत्तात्मक सिद्धान्त
  • लिंग साम्यवाद का सिद्धान्त
  • विकासवादी सिद्धान्त
  • एक विवाह का सिद्धान्त तथा
  • मातृ-सत्तात्मक सिद्धान्त।

उपर्युक्त सिद्धान्तों में विकासवादी सिद्धान्त का अधिक महत्त्व है। विकासवादी सिद्धान्त का विस्तृत विवरण निम्नवर्णित है –

परिवार की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विकासवादी सिद्धान्त –
सर्वप्रथम इस सिद्धान्त का प्रस्तुतीकरण बैकोफेन (Bechofen) द्वारा किया गया। बाद में इस सिद्धान्त का समर्थन स्पेन्सर, टायलर, मेकलेनन आदि ने किया। प्रमुख भूमिका इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में बैकोफेन ने प्रस्तुत की, जिसका विवरण निम्नलिखित है –

1. प्रारम्भ में मनुष्य के जीवन के अन्तर्गत पति-पत्नी के सम्बन्ध बहुत ढीले थे। केवल माँ और बच्चों के सम्बन्ध कुछ मजबूत थे, लेकिन इस बात का पता नहीं था कि उन बच्चों का वास्तविक पिता कौन है। सभी समूह बनाकर रहते थे। यह परिवार का सबसे प्रारम्भिक रूप था।

2. इसके बाद परिवार का स्वरूप कुछ और स्पष्ट हुआ। उस समय लोगों को खाने-पीने की वस्तुएँ कठोर परिश्रम के बाद मिलती थीं और यह काम लड़कियाँ नहीं कर सकती थीं। इसलिए उनके पैदा होते ही उन्हें मार दिया जाता था। इस प्रकार समाज में लड़कियों की संख्या बहुत कम हो गई। परिणामस्वरूप एक स्त्री के अनेक पति होते थे। इस प्रकार इस स्तर पर बहुपति-विवाही परिवार का जन्म हुआ।

3. इसके बाद धीरे-धीरे कृषि स्तर आया और खाने-पीने की सामग्री काफी मात्रा में उपलब्ध होने लगी। लड़कियों को मारने की प्रथा बन्द हो गई और समाज में उनकी संख्या एवं अनुपात बदल गया और अब पुरुषों के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना आसान हो गया। इस प्रकार बहु-पत्नी विवाही परिवार का जन्म हुआ।

4. समय एवं अनुभव के साथ लोगों के ज्ञान में वृद्धि हुई। वे सभ्य होते गए और बहु-विवाह के दोष स्पष्ट होते गए। साथ ही सामाजिक जीवन में समानता का विचार पनपा और स्त्रियों ने अपने समान अधिकारों और सामाजिक न्याय की माँग की। इन सबके फलस्वरूप एक पुरुष का विवाह एक ही स्त्री से होना प्रारम्भ हो गया और एक-विवाही परिवार का जन्म हुआ। यही परिवार का आधुनिक रूप है।

लुईस मार्गन ने परिवार के उद्विकास में पाँच स्तरों का उल्लेख किया है –

  • रक्त सम्बन्धी परिवार-इस प्रकार के परिवार मानव जीवन के प्रारम्भिक काल में पाए जाते थे। इनमें यौन सम्बन्ध स्थापित करने के विषय में कोई भी प्रतिबन्ध न था और भाइयों तथा बहनों तक में बिना संकोच इस प्रकार के सम्बन्ध स्थापित हुआ करते थे।
  • समूह परिवार—यह परिवार के विकास की दूसरी अवस्था है। इस स्तर में एक परिवार के सब भाइयों का विवाह दूसरे परिवार की बहनों के साथ हुआ करता था, जिसमें प्रत्येक पुरुष सभी स्त्रियों का पति होता था और प्रत्येक स्त्री सभी पुरुषों की पत्नी होती थी और इसलिए वे आपस में यौन सम्बन्ध भी स्थापित कर सकते थे।
  • स्डेस्मियन परिवार इस तीसरी अवस्था में एक पुरुष का विवाह तो एक ही स्त्री के साथ होता था, परन्तु उसी परिवार में ब्याही हुई सभी स्त्रियों से यौन सम्बन्ध स्थापित करने की स्वतन्त्रता प्रत्येक पुरुष को रहती थी।
  • पितृसत्तात्मक परिवार इस चौथी अवस्था में परिवारों में पुरुष ही सर्वशक्तिमान होता था। इस कारण वह अपनी इच्छानुसार एकाधिक स्त्रियों से विवाह करता था और उनके साथ यौन सम्बन्ध रखता था।
  • एकविवाही परिवार – यह परिवार के क्रम में अन्तिम और आधुनिक अवस्था है, इसमें एक पुरुष का एक ही स्त्री से विवाह और यौन सम्बन्ध होता है।

विकासवादी सिद्धान्त की आलोचना –
परिवार के विकासवादी सिद्धान्त के उपर्युक्त मतों की आलोचना निम्नलिखित प्रकार से की जा सकती है –

  • वैज्ञानिक आधार पर यह स्वीकार करना कठिन है कि प्रत्येक समाज में परिवार की उत्पत्ति व विकास एक ही तरह से या कुछ निश्चित स्तरों में से गुजरा हुआ है, बल्कि यह सम्भव भी नहीं; क्योंकि प्रत्येक समाज की भौगोलिक, सामाजिक या सांस्कृतिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं तो फिर प्रत्येक समाज में परिवार की उत्पत्ति एक ही ढंग से कैसे हो सकती है?
  • विकासवादी सिद्धान्त के समर्थकों की यह कल्पना भी गलत है कि यौन साम्यवाद की स्थिति कभी थी। वास्तव में अभी तक किसी ऐसी आदिवासी जाति का पता नहीं लग सका है, जिसमें यौन .. साम्यवाद या कामाचार की अवस्था पायी जाती हो या पायी गई हो।
  • विकासवादी लेखकों ने जो कुछ भी कहा है वह सब उनकी कल्पनाओं या सैद्धान्तिक आधार पर आधारित है, वास्तविक रूप में नहीं। अत: काल्पनिक सिद्धान्त वैज्ञानिक सत्य नहीं हो सकता।

उपर्युक्त आलोचना के आधार पर इस सिद्धान्त को भी अप्रामाणिक ही माना जाता है।

प्रश्न 4.
मातृसत्तात्मक परिवार से आप क्या समझती हैं?
अथवा
पितृसत्तात्मक परिवार से आप क्या समझती हैं?
अथवा
अन्तर स्पष्ट कीजिए-पितृसत्तात्मक परिवार और मातृसत्तात्मक परिवार।
उत्तरः
मातृसत्तात्मक और पितृसत्तात्मक परिवार –
परिवार के वर्गीकरण का एक आधार सत्ता सम्पन्नता भी है। इस आधार के अन्तर्गत यह विचार मुख्य होता है कि परिवार में सत्ता पुरुष के हाथ में हो या स्त्री के हाथ में। इस आधार पर दो प्रकार के परिवार माने गए हैं, जिन्हें क्रमश: मातृसत्तात्मक तथा पितृसत्तात्मक परिवार कहा जाता है। इन दोनों प्रकार के परिवारों का सामान्य परिचय तथा अन्तर निम्नवर्णित है

(अ) मातृसत्तात्मक परिवार-कुछ समाजों में परिवार का संगठन इस प्रकार का होता है कि उनमें स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक सत्ता-सम्पन्न होती हैं तथा परिवार की सभी नीतियाँ और सभी अधिकार स्त्रियों के पक्ष में होते हैं। इन परिवारों को मातृसत्तात्मक परिवार (matriarchal family) कहा जाता है। मातृसत्तात्मक परिवार की मुख्य विशेषताएँ निम्नवर्णित हैं –

  • वंश का नाम माँ के नाम से चलता है। वंश का नाम पिता से उसके पुत्रों को हस्तान्तरित नहीं होता बल्कि माता से उसकी पुत्रियों को होता है।
  • सम्पत्ति का उत्तराधिकार भी पिता द्वारा पुत्र को न प्राप्त होकर माता से उसकी पुत्री अथवा पुत्रियों को प्राप्त होता है। पुरुष को यदि उत्तराधिकार में कुछ मिल सकता है तो वह मातृपक्ष की ओर से ही सम्भव है।
  • सामान्य रूप से मातृसत्तात्मक परिवार मातृस्थानीय या मातृवंशीय परिवार ही होते हैं।

(ब)पितृसत्तात्मक परिवार-जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है; इस प्रकार के परिवारों में पुरुष ही परिवार में अधिक सत्ता-सम्पन्न होता है तथा वही परिवार का मुखिया होता है। वंश का नाम पिता या पुरुष के नाम से ही चलता है तथा पिता के उपरान्त पुत्र ही वंश के मुख्य उत्तराधिकारी होते हैं। पितृसत्तात्मक परिवार की मुख्य विशेषताएँ निम्नवर्णित हैं

  • परिवार के सन्दर्भ में समस्त सामाजिक एवं पारिवारिक पद तथा उपाधियाँ पुत्र को प्राप्त होती हैं। सामान्य रूप से पिता के उपरान्त बड़े पुत्र को सत्ता प्राप्त होती है।
  • इस प्रकार के परिवारों में पारिवारिक सम्पत्ति का अधिकार पिता से पुत्रों में हस्तान्तरित होता है। माता के परिवार की सम्पत्ति पर पुत्रों का अधिकार नहीं होता।
  • पितृसत्तात्मक परिवार में सभी बच्चों को पिता के वंश का नाम मिलता है, न कि माता के वंश का।
  • पितृसत्तात्मक परिवार पितृस्थानीय होते हैं; अर्थात् सभी बच्चे अपने पिता के स्थान पर रहते हैं।

अन्तर – उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि मातृसत्तात्मक तथा पितृसत्तात्मक परिवारों में मुख्य अन्तर सत्ता के केन्द्रण से सम्बन्धित है। मातृसत्तात्मक परिवारों में पारिवारिक सत्ता स्त्री (माता) के हाथ में होती है, जबकि पितृसत्तात्मक परिवार में यह सत्ता पुरुष (पिता) के हाथ में होती है। इस अन्तर के कारण वंश का नाम, सम्पत्ति का हस्तान्तरण आदि भी मातृसत्तात्मक परिवार में माता से पुत्रियों में तथा पितृसत्तात्मक परिवार में पिता से पुत्रों में होता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 18 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि परिवार समाज की प्राचीनतम संस्था है?
उत्तरः
परिवार-प्राचीनतम सामाजिक संस्था –
परिवार एक सामाजिक संस्था है, जिसके गठन का आधार स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्ध तथा बच्चों का जन्म एवं पालन-पोषण है। परिवार के ये दोनों आधार उतने ही प्राचीन हैं जितना कि मनुष्य का अस्तित्व। जब से मनुष्य की सृष्टि हुई है, तब से इस पृथ्वी पर किसी-न-किसी रूप में परिवार का अस्तित्व रहा है। यह अलग बात है कि प्राचीन परिवार का स्वरूप वर्तमान परिवार के स्वरूप से नितान्त भिन्न रहा हो। सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार के स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है, परन्तु प्राचीनता के दृष्टिकोण से परिवार समाज की प्राचीनतम संस्था है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि मानव समाज में परिवार का अस्तित्व उस समय भी था, जब ‘विवाह’ नामक संस्था अस्तित्व में नहीं आई थी।

प्रश्न 2.
विवाह-प्रणाली के आधार पर परिवार के प्रकारों या स्वरूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के गठन में विवाह द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। विवाह-प्रणाली की भिन्नता के आधार पर परिवार के अग्रलिखित प्रकार या स्वरूप हैं –

  • एक विवाही-परिवार-एक स्त्री तथा एक पुरुष के परस्पर विवाह के आधार पर गठित परिवार को एकविवाही परिवार कहा जाता है।
  • बहुपत्नी परिवार-यदि एक पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करके परिवार गठित करता है तो उस परिवार को बहुपत्नी परिवार कहा जाता है।
  • बहुपति परिवार-यदि एक स्त्री तथा एक से अधिक पुरुषों से विवाह करके परिवार को गठित करती हैं तो उस परिवार को बहुपति परिवार कहते हैं। हमारे देश में खस तथा टोडा जनजातियों में बहुपति परिवार पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
परिवार के मुख्य शारीरिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
परिवार के शारीरिक कार्य –

  • काम-इच्छा की पूर्ति-परिवार का प्रथम कार्य स्त्री-पुरुष की काम-इच्छा की पूर्ति करना है। व्यक्ति परिवार के बाहर भी अपनी काम-इच्छा की पूर्ति कर सकता है, परन्तु उसका यह कृत्य पूर्णतया असामाजिक माना जाता है। विवाह के द्वारा समाज; स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है। इस प्रकार परिवार में स्त्री-पुरुष अपनी काम-इच्छाओं की पूर्ति स्वतन्त्रतापूर्वक करते हैं।
  • सन्तानोत्पत्ति-सन्तान की कामना करना प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए स्वाभाविक है। परिवार मनुष्य की इस जन्मजात इच्छा को पूरी करता है। पति-पत्नी के यौन सम्बन्धों की स्थापना के पश्चात् उत्पन्न होने वाली सन्तान को ही सामाजिक एवं वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है।
  • सन्तान का लालन-पालन-जन्म के समय शिशु पूर्णतया अबोध एवं असहाय होता है। उसके लालन-पालन और भरण-पोषण का कार्य परिवार के द्वारा ही होता है। यदि परिवार द्वारा बालक की उपेक्षा की जाए तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। परिवार का कार्य केवल प्रजनन अथवा सन्तानोपत्ति ही नहीं है अपितु सन्तान का लालन-पालन करना भी है।
  • भोजन की व्यवस्था-परिवार अपने सदस्यों के लिए भोजन की व्यवस्था करता है जो कि सभी की एक मौलिक एवं आधारभूत आवश्यकता है।
  • जीवन की सुरक्षा-परिवार के सदस्य परस्पर मिलकर रहते हैं और एक-दूसरे की सुरक्षा तथा रोग-निवारण में योगदान करते हैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य परिवार में अपने को हर प्रकार से सुरक्षित अनुभव करता है।
  • वस्त्रों आदि की व्यवस्था परिवार अपने सदस्यों के लिए वस्त्रों तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करता है।
  • निवास की व्यवस्था परिवार के सदस्य भली प्रकार सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सकें, इसके लिए परिवार ही निवास स्थान या घर की भी व्यवस्था करता है।

प्रश्न 4.
परिवार के मुख्य सामाजिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के मुख्य सामाजिक कार्य –
1. बालक का समाजीकरण-परिवार का प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण कार्य बालक का समाजीकरण करना है। जन्म के उपरान्त बालक में कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ भी पायी जाती हैं, जो समाज-सम्मत नहीं होती। परिवार के वातावरण द्वारा ही इन प्रवृत्तियों का शोधन तथा मार्गान्तरीकरण होता है, जिससे मानव शिशु क्रमश: एक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनता है। परिवार ही बालक को सामाजिकता का प्रथम पाठ पढ़ाता है। अन्य लोगों से व्यवहार करना, उठने-बैठने तथा बातचीत करने का शिष्टाचार आदि बालक परिवार से ही सीखता है। परिवार समाजीकरण की सभी अवस्थाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. सामाजिक विरासत का प्रसार करना-परिवार सामाजिक विरासत (social heritage) का प्रसार तथा हस्तान्तरण करता है। परिवार ही जनरीतियाँ, कानून, विश्वास, रूढ़ियाँ, नैतिक नियम, शिक्षा आदि को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान करता है तथा उनका संग्रह और विस्तार करता है।

3. सदस्यों को सामाजिक स्थिति प्रदान करना-परिवार की स्थिति के अनुसार उसके सदस्यों को समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। परिवार की सामाजिक स्थिति के अनुसार ही यह निश्चित किया जाता है कि उसके सदस्यों को किन लोगों में उठना-बैठना चाहिए। वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना भी इसी आधार . पर की जाती है।

4. सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना-परिवार अपने सदस्यों को सामाजिक अपमान, दिवालियापन आदि से सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करता है। परिवार ही एक ऐसा संगठन है, जो व्यक्ति के सामाजिक सम्मान की सुरक्षा के प्रति चिन्तित रहता है तथा यथासम्भव सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है।

5. जीवन-साथी के चुनाव में सहायता-परिवार अपने सदस्यों के विवाह सम्बन्ध स्थापित करने या जीवन-साथी के चुनाव में योगदान करता है। इस प्रकार परिवार एक अन्य परिवार को जन्म देने में सहायक होता है।

6. सामाजिक नियन्त्रण में सहायक-सामाजिक नियन्त्रण के प्रथा, कानून जनमत, प्रचार, नेतृत्व, शिक्षा संस्थाएँ तथा रीति-रिवाज आदि अनेक अभिकरण हैं, परन्तु इन सब में परिवार का विशिष्ट स्थान है। यथार्थ में परिवार ही एक ऐसी संस्था है, जो व्यक्ति को इन सब को मानने के लिए बाध्य करता है। व्यक्ति को भले-बुरे का ज्ञान कराने में परिवार विशेष सहायक होता है। यह केवल अपने तक ही व्यक्ति को नियन्त्रित नहीं करता वरन् बाह्य जगत में भी व्यक्ति पर नियन्त्रण रखता है। अन्य शब्दों में, पारिवारिक नियन्त्रण व्यक्ति को समाज तथा समूह में नियन्त्रित रहने की आदत डाल देता है। परिवार की प्रतिष्ठा और मान-मर्यादा की रक्षा के लिए उनका सदस्य कोई भी अनुचित कार्य नहीं करता है।

परिवार के सामाजिक कार्यों के उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि वास्तव में व्यक्ति को सामाजिक प्राणी बनाने में परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है। परिवार ही व्यक्ति को उसकी सामाजिक पहचान प्रदान करता है तथा समाज के अनुरूप व्यक्तित्व प्रदान करता है। इसीलिए परिवार को व्यक्ति के समाजीकरण की प्रथम संस्था कहा जाता है।

प्रश्न 5.
परिवार के मुख्य आर्थिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के मुख्य आर्थिक कार्य –
परिवार द्वारा निम्नलिखित आर्थिक कार्य सम्पन्न होते हैं –

  • श्रम-विभाजन-परिवार के अधिकांश कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित रहते हैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी योग्यता एवं क्षमता तथा लिंग और आयु के आधार पर अपना-अपना कार्य करता है। पिता द्वारा प्राय: धनोपार्जन होता है तथा माता घर के खाने-पीने एवं सफाई आदि का प्रबन्ध करती है। पुत्र शाक-सब्जी तथा बाजार से सौदा आदि लाते हैं, बेटियाँ माँ के कार्यों में हाथ बँटाती हैं। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य का कुछ-न-कुछ कार्य निश्चित रहता है।
  • व्यावसायिक प्रशिक्षण–परिवार में बालक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करता है। पिता यदि दुकानदार, लुहार या बढ़ई है तो बालक उसके साथ रहकर उसके व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार परिवार व्यावसायिक प्रशिक्षण का कार्य करता है।
  • उत्पादन की प्रेरणा-परिवार अपने सदस्यों को आर्थिक उत्पादन की प्रेरणा प्रदान करता है। प्रत्येक सदस्य परिवार की दशा को सुधारने के लिए कुछ-न-कुछ आर्थिक उत्पादन की चेष्टा करता है।
  • आर्थिक क्रिया का केन्द्र प्राचीनकाल से ही परिवार विभिन्न आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र रहा है। सर्वप्रथम आर्थिक क्रियाओं का प्रारम्भ परिवार में ही हुआ और वहीं से उसका प्रसार समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ।
  • उत्तराधिकार का निश्चय-परिवार में सम्पत्ति के उत्तराधिकार का भी निश्चय होता है। यह विभाजन किस प्रकार हो, इसका निश्चय परिवार में होता है।

प्रश्न 6.
परिवार के मुख्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य –
परिवार वह स्थल है, जहाँ अनेक धार्मिक एवं आध्यात्मिक विषयों की पृष्ठभूमि तैयार होती है। परिवार के समस्त सदस्य सामान्य रीति से ईश्वर की उपासना करते हैं। छोटे-छोटे बालक अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी से कहानियाँ सुनकर ईश्वर और धर्म तथा अध्यात्म सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करते हैं। माता-पिता के धार्मिक आचरण बालकों को प्रभावित करते हैं और वे अनुकरण द्वारा अनेक धार्मिक क्रियाएँ सीख जाते हैं। धार्मिक उत्सवों द्वारा भी बालकों को धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है।

परिवार संस्कृति के विकास का महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। परिवार में रहकर बालक सामाजिक संस्कृति . से परिचित होता है। परिवार का सांस्कृतिक वातावरण बालक को समाज की संस्कृति का ज्ञान कराता है। बालक अनुकरण द्वारा भाषा और अच्छी बातें सीखते हैं और उन्हें अपने जीवन का अंग बनाते हैं। रीति-रिवाज, परम्पराओं तथा प्रथाओं को सुरक्षित रखने के साथ-साथ परिवार बालकों को उनका ज्ञान भी कराता है। परिवार ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

प्रश्न 7.
परिवार के मुख्य शैक्षिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के मुख्य शैक्षिक कार्य ऑगस्त कॉम्ट के शब्दों में, “परिवार सामाजिक जीवन की अमर पाठशाला है।” पेस्तालॉजी के अनुसार, “परिवार शिक्षा का सबसे उत्तम स्थान और बालक का प्रथम विद्यालय है।” फ्रोबेल भी लिखते हैं – “माताएँ आदर्श अध्यापिकाएँ हैं और घर द्वारा दी जाने वाली अनौपचारिक शिक्षा सबसे अधिक प्रभावशाली और प्राकृतिक है।” वास्तव में परिवार में बालक अपने माता-पिता तथा बड़ों का अनुकरण करके अनेक बातें सीखता है तथा अपना बौद्धिक विकास करता है। प्राचीन समाजों में शिक्षा संस्थाओं का कार्य भी परिवार ही करते थे तथा आज भी अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करने में परिवार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। परिवार के विस्तृत सहयोग से ही विद्यालय की शिक्षा सुचारु रूप से चल पाती है।

प्रश्न 8.
परिवार के मुख्य मनोरंजनात्मक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के मनोरंजनात्मक कार्य –
मनुष्य के जीवन में मनोरंजन का भी अपना महत्त्व है। दिन भर परिश्रम करने के पश्चात् मनुष्य के लिए मनोरंजन करना आवश्यक हो जाता है। मनोरंजन से शरीर की थकावट दूर होती है तथा शरीर में स्फूर्ति आती है। परिवार मनोरंजन का प्रमुख केन्द्र है। थका हुआ व्यक्ति घर में अपने बाल-बच्चों के बीच बैठकर आनन्द और स्फूर्ति का अनुभव करता है। छोटे बालक अपने बाबा तथा दादी से कहानियाँ तथा मनोरंजक चुटकुले सुनकर अपना मनोरंजन करते हैं। परिवार में मनाए जाने वाले उत्सव भी मनोरंजन के उद्देश्य को पूरा करते हैं।

प्रश्न 9.
परिवार के मुख्य मनोवैज्ञानिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार के मनोवैज्ञानिक कार्य –
परिवार द्वारा किए जाने वाले मुख्य मनोवैज्ञानिक कार्य निम्नलिखित हैं –

  • परिवार बालकों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है।
  • परिवार बालकों का संवेगात्मक विकास उचित दिशा में करता है।
  • परिवार में अनेक मूलप्रवृत्तियों की सन्तुष्टि होती है। काम, वात्सल्य, सहानुभूति तथा प्रेम इसके उदाहरण हैं।
  • अनेक मानसिक प्रक्रियाएँ; जैसे जिज्ञासा, निरीक्षण, प्रत्यक्षीकरण, तर्क तथा विचार आदि का विकास परिवार में ही होता है।

प्रश्न 10.
स्पष्ट कीजिए कि बालक के समाजीकरण में परिवार की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
अथवा
“परिवार समाजीकरण की प्रथम संस्था है।” इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तरः
परिवार द्वारा बालक का समाजीकरण –
परिवार का एक प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण कार्य बालक का समाजीकरण करना है। परिवार के वातावरण के द्वारा ही बालक की तमाम प्रवृत्तियों का शोधन तथा मार्गान्तरीकरण होता है, जिससे वह एक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनता है। परिवार ही बालक को सामाजिकता का प्रथम पाठ पढ़ाता है। अन्य लोगों से व्यवहार करना, उठने-बैठने तथा बातचीत करने का शिष्टाचार आदि बालक परिवार से ही सीखता है। परिवार समाजीकरण की सभी अवस्थाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार में ही रहकर बालक भाषा का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त करता है, सामाजिक सद्गुणों को अपनाता है तथा नियन्त्रित जीवन व्यतीत करना सीखता है। इन सभी कारणों से परिवार को समाजीकरण की प्रथम संस्था माना जाता है।

प्रश्न 11.
टिप्पणी लिखिए-सामाजिक-नियन्त्रण में परिवार की भूमिका।
उत्तरः
सामाजिक नियन्त्रण के अनेक अभिकरण हैं; यथा-  प्रथा, कानून, जनमत, प्रचार, नेतृत्व, शिक्षा संस्थाएँ तथा रीति-रिवाज आदि। परन्तु इन सब में परिवार का विशिष्ट स्थान है। यथार्थ में परिवार ही एक ऐसी संस्था है, जो व्यक्ति को इन सबको मानने के लिए बाध्य करती है। व्यक्ति को भले-बुरे का ज्ञान कराने में परिवार विशेष सहायक होता है। यह केवल अपने तक ही व्यक्ति को नियन्त्रित नहीं करता वरन् बाह्य जीवन में भी व्यक्ति पर नियन्त्रण रखता है। अन्य शब्दों में, पारिवारिक नियन्त्रण व्यक्ति को समाज तथा समूह में नियन्त्रण सहने की आदत डाल देता है। परिवार की प्रतिष्ठा और मान-मर्यादा की रक्षा के लिए उसका सदस्य कोई भी अनुचित कार्य नहीं करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सामाजिक-नियन्त्रण में परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 18 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परिवार की मैकाइवर एवं पेज द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तरः
“परिवार पर्याप्त निश्चित यौन सम्बन्धों द्वारा प्रतिपादित एक ऐसा समूह है, जो बच्चों को पैदा करने तथा लालन-पालन की व्यवस्था करता है।’ (-मैकाइवर एवं पेज )

प्रश्न 2.
एक सामाजिक संस्था के रूप में परिवार की प्रमुख विशेषता का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार मानव-समाज की प्राचीनतम सामाजिक संस्था है।

प्रश्न 3.
परिवार की चार मुख्य विशेषताओं (लक्षण) का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः

  1. यह प्राचीनतम सामाजिक संस्था है।
  2. यह मानव जगत की सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है।
  3. यह विवाह पर आधारित संस्था है।
  4. इस संस्था की सदस्य-संख्या सीमित होती है।

प्रश्न 4.
परिवार की उत्पत्ति सम्बन्धी एक मुख्य सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
परिवार की उत्पत्ति सम्बन्धी एक मुख्य सिद्धान्त है-विकासवादी सिद्धान्त।

प्रश्न 5.
परिवार में पुरुष को मुखिया क्यों माना जाता है?
उत्तरः
पितृसत्तात्मक समाजों में परिवार के पुरुषों को अधिक अधिकार, कर्त्तव्य तथा सत्ता प्राप्त होती है। इस स्थिति में पारम्परिक रूप में वयोवृद्ध पुरुष को ही परिवार का मुखिया मान लिया जाता है।

प्रश्न 6.
बालक की प्रथम पाठशाला किसे माना जाता है?
उत्तरः
परिवार को बालक की प्रथम पाठशाला माना जाता है।

प्रश्न 7.
बालक के समाजीकरण में सर्वाधिक योगदान किसका होता है?
उत्तरः
बालक के समाजीकरण में सर्वाधिक योगदान परिवार का होता है।

प्रश्न 8.
बच्चे की प्रथम समाजीकरण संस्था क्या है?
उत्तरः
बच्चे की प्रथम समाजीकरण संस्था ‘परिवार’ है।

प्रश्न 9.
पारिवारिक मूल्यों से आप क्या समझती हैं?
उत्तरः
परिवार द्वारा जिन बातों को महत्त्वपूर्ण माना जाता है तथा अर्जित करने का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है, उन्हें पारिवारिक मूल्य कहा जाता है।।

प्रश्न 10.
समाज की इकाई क्या है?
उत्तरः
समाज की इकाई परिवार है।

प्रश्न 11.
बच्चों में अच्छे गुणों का निर्माण कहाँ से प्रारम्भ होता है?
उत्तरः
बच्चों में अच्छे गुणों का निर्माण परिवार से प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 12.
भावात्मक सुरक्षा सुखी परिवार के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तरः
यदि परिवार से समुचित भावात्मक सुरक्षा हो तो परिवार के सभी सदस्यों के व्यक्तित्व का विकास सामान्य तथा सन्तुलित रूप से होता है। इस स्थिति में सभी सदस्य जीवन के सभी पक्षों में उत्साहपूर्वक कार्य एवं प्रगति करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 18 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. परिवार का गठन होता है –
(क) सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर
(ख) वित्तीय हितों के आधार पर
(ग) विवाह नामक संस्था के आधार पर
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तरः
(ग) विवाह नामक संस्था के आधार पर।

2. परिवार के लक्षण हैं –
(क) सदस्यों का रक्त सम्बन्ध से जुड़े होना
(ख) सदस्यों का एक ही गाँव का होना
(ग) सदस्यों का आपस में मित्र होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(क) सदस्यों का रक्त सम्बन्ध से जुड़े होना।

3. समाज की इकाई है –
(क) स्कूल
(ख) परिवार
(ग) समुदाय
(घ) घर।
उत्तरः
(ख) परिवार।

4. परिवार के मुख्य शारीरिक कार्य हैं
(क) काम-इच्छा की पूर्ति एवं सन्तानोत्पत्ति
(ख) बच्चों का पालन-पोषण
(ग) जीवन की सुरक्षा तथा भोजन की व्यवस्था
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी।

5. परिवार द्वारा किए जाने वाले आर्थिक कार्य हैं –
(क) व्यावसायिक प्रशिक्षण
(ख) उत्पादन की प्रेरणा
(ग) उत्तराधिकार का निश्चय
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी।

6. पारिवारिक उद्देश्यों की उपलब्धि का पूर्ण उत्तरदायित्व होता है –
(क) केवल गृहिणी का
(ख) केवल घर के मुखिया का
(ग) परिवार के सभी सदस्यों का
(घ) इन सभी का।
उत्तरः
(ग) परिवार के सभी सदस्यों का।

7. बालक के समाजीकरण की प्रथम संस्था है
(क) राज्य
(ख) समाज
(ग) परिवार
(घ) समुदाय।
उत्तरः
(ग) परिवार।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 4 पाचन तन्त्र

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 4 पाचन तन्त्र (Digestive System)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 4 पाचन तन्त्र

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाचन तन्त्र से क्या आशय है? मनुष्य के पाचन तन्त्र के अंगों का चित्र सहित सामान्य परिचय दीजिए।
अथवा नामांकित चित्र की सहायता से पाचन तन्त्र का वर्णन कीजिए।
अथवा पाचन तन्त्र के विभिन्न अंगों का चित्र सहित वर्णन कीजिए।
अथवा पाचन तन्त्र का एक नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
पाचन तन्त्र का अर्थ (Meaning of Digestive System):
व्यक्ति चाहे जिस प्रकार का आहार ग्रहण करे, परन्तु आहार के तत्त्व व्यक्ति के शरीर के उपयोग में तभी आते हैं, जब उनका समुचित पाचन हो जाता है। भोजन को पचाने, तत्त्वों को अवशोषित करने आदि के लिए हमारे शरीर में एक लम्बी (लगभग 9 मीटर लम्बी) नली जैसी रचना होती है, जो मुखद्वार (mouth) से मलद्वार (anus) तक फैली रहती है। इस नली को पाचन प्रणाली या आहार नाल (alimentary canal) कहते हैं। आहार नाल में विभिन्न अंग या भाग होते हैं, जिनके आकार तथा कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं।

आहार नाल के इन विभिन्न अंगों के अतिरिक्त मानव शरीर में कुछ अन्य अंग भी होते हैं, जो आहार के पाचन एवं शोषण में कुछ-न-कुछ सहायता प्रदान करते हैं तथा भोजन के स्वांगीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आहार नाल तथा ये सहायक अंग ही सम्मिलित रूप से मिलकर पाचन तन्त्र (digestive system) का निर्माण करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि आहार नाल के समस्त अंग तथा आहार नाल के बाहर स्थित पाचन में सहायक अंग सम्मिलित रूप से पाचन तन्त्र कहलाते हैं।

मनुष्य की आहार नाल या पाचन तन्त्र के अवयव (Human Alimentary Canal or Organs of Digestive System):
मनुष्य की आहार नाल के मुख्य भाग निम्नवर्णित हैं-
(1) मुख व मुखगुहा (mouth and buccal cavity);
(2) ग्रसनी (pharynx);
(3) ग्रासनली (oesophagus);
(4) आमाशय (stomach) तथा
(5) आँत (intestine)।
इनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है-
1. मुख व मुखगुहा (Mouth and Buccal cavity): दो चल होंठों से घिरा हुआ हमारा मुखद्वार (mouth), मुखगुहा (buccal cavity) में खुलता है। मुखगुहा दोनों जबड़ों तक, गालों से घिरी चौड़ी गुहा है। इसकी छत तालू (palate) कहलाती है। तालू का अगला तथा अधिकांश भाग कठोर होता है, तथा कठोर तालू (hard palate) कहलाता है। इसके पीछे कंकालरहित कोमल तालू (soft palate) होता है जो अन्त में एक कोमल लटकन के रूप में होता है। इसे काग (uvula) कहते हैं। काग के इधर-उधर छोटी-छोटी गाँठों के रूप में गलांकुर (tonsils) होते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 28
गाल, होंठ, तालू आदि मुखगुहा के अंग अन्दर से चिकने तथा कोमल प्रतीत होते हैं। ये अंग एक विशेष स्राव, श्लेष्मक (mucous) स्रावित करने वाली कोशिकायुक्त कोमल झिल्ली श्लेष्मिक कला से ढके रहते हैं। श्लेष्मक एक लसलसा तरल है और इसके साथ ही कुछ लार (saliva) भी रहती है, जो इसी झिल्ली में उपस्थित कोशिकाओं के द्वारा बनाई जाती है। किन्तु बड़ी तथा विशेष लार ग्रन्थियाँ (salivary glands) अलग से भीतरी भागों में होती हैं, जिनकी नलियाँ होंठों के पीछे तथा अन्य स्थानों में मुखगुहा के अन्दर खुलती हैं। निचले तथा ऊपरी जबड़े में कुल मिलाकर 32 दाँत (teeth) होते हैं। दाँतों की संख्या उम्र के साथ बदलती रहती है।

भोजन को दाँतों के द्वारा चबाए जाने पर मुख में उपस्थित लार इसमें मिल जाती है। लार में एक पाचक रस (एंजाइम) होता है, जिसे टायलिन कहते हैं। इस प्रकार, भोजन एक लुगदी के रूप में बदल दिया जाता है। जीभ भोजन में लार इत्यादि मिलाने में सहायता करती है।

2. ग्रसनी (Pharynx): नीचे जीभ तथा ऊपर काग के पीछे, कीप के आकार का लगभग 12 से 15 सेमी लम्बा भाग ग्रसनी (pharynx) कहलाता है। इसके तीन भाग किए जा सकते है
(क) नासाग्रसनी (nasal pharynx) जो श्वसन मार्ग के पीछे स्थित होता है;
(ख) स्वर-यन्त्री ग्रसनी, जहाँ वायुमार्ग तथा आहार मार्ग एक-दूसरे को काटते (cross) हैं तथा
(ग) मुख-ग्रसनी (oropharynx); . अर्थात् ठीक सामने वाला भाग, जो अन्त में ग्रासनली (oesophagus) में खुलता है।

3. ग्रासनली (Oesophagus): यह लगभग 25 सेमी लम्बी सँकरी नली है, जो गर्दन के पिछले भाग से प्रारम्भ होती है। यह वायु नलिका के साथ-साथ तथा इसके तल पृष्ठ पर स्थित होती है तथा पूरे वक्ष भाग से होती हुई तन्तु पट (diaphragm) को छेदकर उदर गुहा में पहुंचती है।

ग्रासनली की दीवार मोटी व मांसल होती है तथा भीतरी तल पर श्लेष्मिक कला से ढकी रहती है। यह कला एक लसलसा तरल श्लेष्मक स्रावित करती रहती है, जिससे इसकी गुहा मुलायम तथा चिकनी बनी रहती है। दीवार का भीतरी तल कई मोटी-मोटी सिलवटों में सिकुड़ा होने के कारण गुहा के रास्ते को लगभग रुंधा हुआ रखता है। जब भोजन नली में आता है तो वह काफी फैल सकती है। ग्रासनली आमाशय में खुलती है।

4. आमाशय (Stomach): आमाशय उदर गुहा में आड़ी अवस्था में स्थित एक मशक की तरह की रचना है। आहार नाल का यह सबसे चौड़ा भाग है, जिसकी लम्बाई लगभग 25-30 सेमी तथा चौड़ाई 10 सेमी होती है। आमाशय के स्पष्ट रूप से दो भाग किए जा सकते हैं—एक, प्रारम्भ का अधिक चौड़ा भाग, जिसमें ग्रासनली खुलती है-हृदयी भाग (cardiac part) कहलाता है; जबकि दूसरा भाग क्रमशः सँकरा होता जाता है और एक निकास द्वार के द्वारा आँत के प्रथम भाग में खुलता है। इस भाग को पक्वाशयी भाग (pyloric part) तथा निकास द्वार को पक्वाशयी छिद्र (pyloric aperture) कहते हैं।

सम्पूर्ण आहार नाल की अपेक्षा आमाशय की दीवार में सबसे अधिक पेशियाँ (muscles) होती हैं; अत: यह सबसे अधिक मोटी होती है। इसकी श्लेष्म कला में श्लेष्मक उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं के अतिरिक्त सहस्रों विशेष ग्रन्थियाँ होती हैं, जिन्हें जठर ग्रन्थियाँ (gastric glands) कहते हैं। ये जठर रस (gastricjuice) नामक पाचक रस बनाती हैं। आमाशय की दीवार में भी अनेक उभरी हुई सिलवटें होती हैं।

5. आँत (Intestine): आहार नाल का शेष भाग आँत कहलाता है तथा यह अत्यधिक कुण्डलित होकर लगभग पूरी उदर गुहा को घेरे रहता है। इसके दो प्रमुख भाग किए जा सकते हैं-छोटी आँत तथा बड़ी आँत।
(क) छोटी आँत (small intestine): यह लगभग 5 मीटर लम्बी अत्यधिक कुण्डलित नली है जिसको तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

  • ग्रहणी,
  • मध्यान्त्र तथा (
  • शेषान्त्र।

(i) ग्रहणी या पक्वाशय (duodenum): यह लगभग 25 सेमी लम्बी, छोटी आंत की सबसे छोटी तथा चौड़ी नलिका है। आमाशय इसी में पक्वाशयी छिद्र (pyloric aperture) द्वारा खुलता है। यह भाग आमाशय के साथ लगभग ‘C’ का आकार बनाता है। इसके मुड़े हुए भाग तथा आमाशय के बीच अग्न्याशय (pancreas) नामक ग्रन्थि होती है।

यकृत (liver) ग्रन्थि, जो आहार नाल के बाहर स्थित होती है, शरीर में उपस्थित सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इससे पित्त रस बनता है। पित्त रस को लाने वाली पित्त नली (bile duct) तथा अग्न्याशय से आने वाली अग्न्याशयिक नली (pancreatic duct); पक्वाशय में ही खुलती हैं।

(ii) मध्यान्त्र (jejunum): यह लगभग 2.5 मीटर लम्बी, 4 सेमी चौड़ी नलिका है, जो अत्यधिक कुण्डलित होती है।

(iii) शेषान्त्र (ileum): यह लगभग 2.75 मीटर लम्बी व 3.5 सेमी चौड़ी कुण्डलित आँत है। छोटी आंत की दीवारें अपेक्षाकृत पतली होती हैं, किन्तु इनमें मांसपेशियाँ आदि सभी स्तर होते हैं। ग्रहणी को छोड़कर शेष छोटी आंत में भीतरी सतह पर असंख्य छोटे-छोटे उँगली के आकार के उभार आँत की गुहा में लटके रहते हैं। इनको रसांकुर (villi) कहते हैं। इनकी उपस्थिति के कारण आँत की भीतरी दीवार तौलिए की तरह रोएँदार होती है।

प्रत्येक रसांकुर की बनावट उँगली के समान होती है। यह पचे हुए भोजन को सोखने (अवशोषित करने) के लिए, अत्यधिक विशिष्ट संरचना वाली होती है। रसांकुरों के बीच-बीच में, श्लेष्म कला में आन्त्र ग्रन्थियाँ (intestinal glands) होती हैं जो एक पाचक रस, आन्त्री रस (intestinal juice) बनाती हैं।

(ख) बड़ी आँत (large intestine): छोटी आंत के बाद शेष आहार नाल बड़ी आँत का निर्माण करती है। यह लम्बाई में छोटी आंत से छोटी किन्तु अधिक चौड़ी होती है। इसमें तीन भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं-

  • उण्डुक,
  • कोलन तथा
  • मलाशय। छोटी आँत, बड़ी आँत के किसी एक भाग में खुलने के बजाय उण्डुक तथा कोलन के संगम स्थान पर खुलती है।

(i) उण्डुक (caecum): यह लगभग 6 सेमी लम्बी, 7.5 सेमी चौड़ी थैली की तरह की संरचना है, जिससे लगभग 9 सेमी लम्बी सँकरी, कड़ी तथा बन्द नलिका निकलती है। इसको कृमिरूप परिशेषिका (vermiform appendix) कहते हैं। वास्तव में यह संरचना मानव शरीर में अनावश्यक है; अत: कई बार यह रोगग्रस्त हो जाती है और तब शल्य क्रिया द्वारा इसे निकाल दिया जाता है।

(ii) कोलन (colon): यह लगभग 1.25 सेमी लम्बी, 6 सेमी चौड़ी नलिका है, जो ‘U’ की तरह पूरी छोटी आँत को घेरे रहती है। इसका अन्तिम भाग मध्य से कुछ बाईं ओर झुककर मलाशय (rectum) में खुलता है।

(iii) मलाशय (rectum): लगभग 12 सेमी लम्बा तथा 4 सेमी चौड़ा नलिका की तरह का यह भाग अपने अन्तिम 3-4 सेमी भाग में काफी सँकरी नली बनाता है। इसे गुदा नाल (anal canal) कहते हैं। इसकी भित्ति में मजबूत संकुचनशील पेशियाँ होती हैं तथा यह एक छिद्र गुदा द्वार (anal aperture) द्वारा बाहर खुलती है। इस छिद्र को भी पेशियाँ बन्द किए रखती हैं।

उपर्युक्त विवरण द्वारा पाचन तन्त्र के मुख्य अंगों का सामान्य परिचय प्राप्त होता है। ये अंग वास्तव में आहार नाल के भाग हैं तथा इनके माध्यम से शरीर में आहार चलता है और उसका व्यर्थ भाग मल के रूप में विसर्जित हो जाता है। परन्तु पाचन तन्त्र के कुछ अन्य अंग भी हैं, जो आहार नाल से बाहर स्थित होते हैं। इस वर्ग के अंग हैं—यकृत (liver), पित्ताशय (gall bladder), अग्न्याशय या क्लोम (pancreas) तथा प्लीहा या तिल्ली (spleen)।

प्रश्न 2.
आहार नाल के एक मुख्य भाग के रूप में आमाशय की संरचना चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए।
अथवा आमाशय की रचना नामांकित चित्र द्वारा समझाइए। आमाशयिक रस से स्रावित होने वाले मुख्य एन्जाइम्स के नाम और कार्य लिखिए।
उत्तर:
आहार नाल का एक भाग : आमाशय (Stomach : A Part of Alimentary Canal):
आहार नाल एवं पाचन तन्त्र में आमाशय (stomach) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वास्तव में मुख द्वारा ग्रहण किया गया आहार सर्वप्रथम आमाशय में ही जाकर रुकता है तथा वहाँ उसका व्यवस्थित पाचन प्रारम्भ होता है।

आमाशय की संरचना (Structure of Stomach):
यह एक थैले के समान होता है, जो एक सिरे पर चौड़ा परन्तु दूसरे सिरे पर सँकरा होता है। निगल या भोजन नलिका (oesophagus) का अन्तिम सिरा आमाशय से जुड़ा रहता है। इसकी लम्बाई 25-30 सेमी और चौड़ाई 9-10 सेमी होती है। इसमें दो मार्ग होते हैं—एक भोजन आने का मार्ग, जो बाईं ओर हृदय के पास होता है, हृदयी द्वार या कार्डियक छिद्र (cardiac opening) कहलाता है; दूसरा मार्ग आमाशय के निचले भाग में दाहिनी ओर स्थित होता है, जो पाइलोरिक सिरा (pyloric end) है। इस सिरे के छिद्र को पक्वाशयी छिद्र या पाइलोरिक छिद्र (pyloric opening) कहते हैं। आमाशय की भित्ति में श्लेष्मिक कला का अधिच्छद होता है, जिसमें अनेक ग्रन्थियाँ होती हैं। इनसे ही जठर रस या आमाशय रस निकलता है।

आमाशय की अन्दर की भित्ति में चार परतें होती हैं
1. पेरीटोनियम (Peritoneum): यह सबसे बाहर की परत होती है।

2. पेशी स्तर (Muscular layer): इसमें भी दो परतें होती हैं

  • आयाम पेशी स्तर (longitudinal muscle layer): इन मांसपेशियों के तन्तु लम्बाई में लगे होते हैं।
  • वर्तुल पेशी स्तर (circular muscle layer): इन मांसपेशियों के तन्तु गोलाई में लगे होते हैं।

3. अधोश्लेष्मिक स्तर (Submucosa layer): यह तीसरा स्तर है।

4. श्लेष्मिक कला (Mucous membrane): यह आमाशय की भित्ति की सबसे अन्दर की परत या झिल्ली होती है। इस झिल्ली में अनेक रक्त केशिकाएँ फैली होती हैं, इसी कारण इसका रंग लाल दिखाई देता है। इसमें जठर ग्रन्थियाँ भी होती हैं। जठर ग्रन्थि की भित्ति ऐपिथीलियम कोशिकाओं की बनी होती है। जठर ग्रन्थियाँ जठर रस बनाती हैं। यह रस ग्रहण किए गए आहार के पाचन में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है। आमाशयिक रस में पेप्सिन तथा रेनिन नामक दो एन्जाइम्स पाए जाते हैं। पेप्सिन का मुख्य कार्य है—आहार की प्रोटीन को घुलनशील पेप्टोन में बदलना। इसके अतिरिक्त रेनिन के प्रभाव से दूध फट जाता है तथा उसकी प्रोटीन अलग हो जाती है अर्थात् यह प्रोटीन के पाचन में सहायक होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 29
प्रश्न 3.
आहार के पाचन से क्या आशय है? आहार नाल के विभिन्न भागों में होने वाले पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा पाचन से क्या तात्पर्य है? पाचन तन्त्र के भिन्न-भिन्न भागों में भोजन को पचाने में सहायता देने वाले विभिन्न पाचक रसों का उल्लेख करते हुए पाचन क्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पाचन (Digestion):
पाचन का अर्थ है अघुलनशील (जल में) एवं जटिल भोज्य पदार्थों को घुलनशील एवं सरल अवस्था में बदलकर उन्हें अवशोषण (absorption) के योग्य बनाना, जिससे वे रुधिर में मिलकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुँच जाएँ।

पाचन क्रिया वास्तव में कुछ भौतिक और रासायनिक क्रियाओं के द्वारा होती है। इन क्रियाओं में (विशेषकर रासायनिक क्रियाओं में) कुछ सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले पदार्थ विशेष महत्त्व के हैं, जो इन क्रियाओं को उत्तेजित करते हैं तथा चलाते हैं। इन्हें विकर या एंजाइम (enzyme) कहते हैं। इस प्रकार ठोस, अघुलनशील व अविसरणशील (indiffusible) खाद्य को पाचक एंजाइम्स (digestive enzymes) द्वारा घुलनशील व विसरणशील रूप में बदलने की क्रिया को पाचन (digestion) कहते हैं। पाचन वास्तव में एंजाइम जल-अपघटन (enzymatic hydrolysis) की क्रिया होती है, जिसमें एंजाइम कार्बनिक उत्प्रेरकों का कार्य करते हैं और जल का एक अणु, भोजन के एक अणु से मिलकर दो भागों में टूटता है। यही प्रक्रम होते रहने से भोजन घुलनशील व विसरणशील अवस्था में आ जाता है। इसके बाद आँत आदि की दीवारों द्वारा अवशोषण (absorption) होता है। पाचन की क्रिया मुख से प्रारम्भ हो जाती है तथा पाचन तन्त्र के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न रूप में सम्पन्न होती है। पाचन के उपरान्त व्यर्थ बचे पदार्थों का विसर्जन मल के रूप में मलद्वार द्वारा हो जाता है। पाचन क्रिया को विस्तृत रूप से निम्नलिखित पदों में समझा जा सकता है-

1. मुखगुहीय पाचन (Digestion in buccal cavity):
व्यक्ति द्वारा मुख में भोजन ग्रहण करने के बाद मुखगुहा में दाँतों द्वारा चबाया जाता है। इस समय जीभ भोजन को उलटने-पलटने में, गाल भोजन को मुखगुहा में रोके रखने में तथा लार भोजन को पचाने में सहायता करती है।

मुखगुहा में भोजन चबाते समय लार ग्रन्थियों से लार (saliva) इस भोजन में मिलती है। लार कुछ क्षारीय होती है और इसमें मुख्य रूप से टायलिन नामक एंजाइम पाया जाता है। टायलिन से मण्ड घुलनशील शर्करा (maltose) में बदलता है। लार भोजन को चिकना बनाती है जिससे भोजन सरलता से ग्रास नलिका द्वारा आमाशय में जाता है।

2. आमाशयिक पाचन (Gastric digestion):
आमाशय में जैसे ही भोजन पहुँचता है, इसकी दीवारों से गैस्ट्रिन (gastrin) नामक एक हॉर्मोन निकलता है। यह हॉर्मोन रुधिर परिसंचरण के साथ जठर ग्रन्थियों में पहुँचकर उन्हें उत्तेजित करता है। जठर ग्रन्थियों से जठर रस भोजन में मिलकर उसका पाचन करता है।

क्रमाकुंचन गति के कारण यह जठर रस, आमाशय के अन्दर भोजन में अच्छी तरह मिल जाता है। जठर रस में लगभग 90% जल और थोड़ा-सा (लगभग 1%) नमक का अम्ल (HCl) होता है। इसके अतिरिक्त इसमें पेप्सिन (pepsin) तथा रेनिन (renin) नामक दो एंजाइम्स होते हैं। HCl के कारण भोजन में उपस्थित जीवाणु आदि नष्ट हो जाते हैं और भोजन अम्लीय हो जाता है। पेप्सिन इस अम्लीय माध्यम में प्रोटीन को घुलनशील पेप्टोन (peptone) में बदल देता है।

रेनिन (renin) के प्रभाव से दूध (milk) फट जाता है। यह बच्चों में अधिक उपयोगी होता है क्योंकि बच्चों का प्रमुख भोजन दूध होता है। बच्चों के जठर रस में गैस्ट्रिक लाइपेज नाम का एंजाइम भी होता है, जो दूध में उपस्थित वसा को वसा अम्लों व ग्लिसरॉल में बदल देता है।

आमाशय के अन्दर मांसपेशियों की क्रमाकुंचन गति के कारण भोजन अच्छी तरह मथ जाता है और पानी से मिलकर लेई के समान हो जाता है। लेई के समान भोजन की इस लुगदी को काइम (chyme) कहते हैं। काइम बनने के बाद आमाशय का पाइलोरस द्वार धीरे-धीरे खुलने लगता है और काइम ग्रहणी में चला जाता है।

3. आन्त्रीय पाचन (Intestinal digestion):
ग्रहणी (duodenum) की दीवार से दो प्रकार के हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं। सीक्रीटिन रुधिर परिसंचरण द्वारा अग्न्याशय (pancreas) में जाकर उसे उत्तेजित करता है, फलतः अग्न्याशय रस (pancreatic juice) निकलकर काइम पर आ जाता है। इसी प्रकार, कोलीसिस्टोकाइनिन यकृत में पहुँचकर पित्ताशय की दीवार को उत्तेजित कर उसे पिचकाता है, फलत: पित्त रस निकलकर काइम पर आ जाता है। पित्त रस क्षारीय होता है, जिसके कारण यह काइम की अम्लीयता को नष्ट कर देता है। इसी अवस्था में अग्न्याशय रस क्रियाशील होता है।

(क) पित्त रस (bile juice) में सोडियम बाइकार्बोनट (Narcos), टारोकोलेट (taurocholate), ग्लाइकोलेट (glycolate) तथा कोलेस्ट्रॉल (cholestrol) आदि कई लवण तथा पित्त रंगाएँ (bile pigments) होते हैं, जो वसाओं को महीन कर, अवशोषण के योग्य बनाते हैं। पित्त की उपस्थिति में अग्न्याशय रस क्रियाशील होकर पाचन कार्य करता है। पित्त जीवाणुनाशक होने के कारण आँत के अन्दर खाद्य पदार्थों को सड़ने से बचाता है।

(ख) अग्न्याशय रस (pancreatic juice) में तीन प्रकार के एंजाइम्स पाए जाते हैं

  • एमाइलोप्सिन (amylopsin): यह मण्ड पर क्रिया कर उसे शर्करा में बदल देता है।
  • ट्रिप्सिन (trypsin): यह प्रोटीन्स पर क्रिया कर उन्हें घुलनशील पेप्टोन (peptones) में बदलता है।
  • स्टीएप्सिन (steapsin) या लाइपेज (lipase)-यह वसाओं को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदल देता है।

4. क्षुद्रान्त्री पाचन (Digestion in ileum):
ग्रहणी में भोजन का पाचन लगभग मूर्ण हो चुका होता है। अब ये भोज्य पदार्थ इस अवस्था में क्षुद्रान्त्र (ileum) में पहुँचते हैं। यहाँ क्षुद्रान्त्र की दीवारों से आन्त्र रस आता है, जो अधपचे भोजन के साथ मिलकर इसे पचाने में सहायक होता है। इसमें कई महत्त्वपूर्ण एंजाइम्स होते हैं, जो आहार के बिना पचे प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट के पाचन में सहायता करते हैं। क्षुद्रान्त्र में ही भोजन के पचे हुए अवयवों; जैसे-अमीनो अम्ल, ग्लूकोज, ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्लों का अवशोषण होता है। अपच भोजन वृहदान्त्र के कोलन (colon) भाग में भेज दिया जाता है।

बड़ी आंत के कार्य (Functions of Large Intestine):
बड़ी आँत के कोलन (colon) भाग में आ जाने तक भोजन के अधिकांश पचे हुए अवयवों का अवशोषण भी हो जाता है। बड़ी आँत का प्रमुख कार्य जल, खनिज लवण तथा कुछ विटामिन्स इत्यादि का अवशोषण करना है। क्षारीय म्यूसिन (mucin) के स्रावण से बड़ी आँत के प्रारम्भिक भाग में शेष भोजन मुलायम बना रहता है तथा इसमें आए एंजाइम्स इत्यादि भोजन पर क्रिया करते रहते हैं। बड़ी आँत में किसी प्रकार का पाचक रस या एंजाइम्स स्रावित नहीं होता है। अधिकांश जल के अवशोषण से अपच भोजन मलाशय में पहुँचते-पहुँचते अर्द्ध-ठोस हो जाता है और मल का रूप ले लेता है। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि आहार के पाचन में विभिन्न एंजाइम्स महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं।

प्रश्न 4.
यकृत की संरचना स्पष्ट करते हुए इसके पाचन सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख कीजिए। अथवा मानव शरीर में यकृत की स्थिति, बनावट और कार्यों का विवरण दीजिए। अथवा यकृत के कार्य लिखिए।
उत्तर:
यकृत की संरचना (Structure of Liver)
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 30
यकृत (liver) कुछ भूरे-लाल रंग की शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि होती है। यह उदर के ऊपर मध्यपट के नीचे पसलियों के पास स्थित होती है। इसके दो भाग होते हैं, दाहिना भाग बाएँ भाग से कुछ बड़ा होता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के यकृत का भार लगभग 1.5 किग्रा होता है। यकृत में रुधिर दो मार्गों द्वारा आता है। एक ओर यकृत में शुद्ध रक्त दो यकृत धमनियों (hepatic arteries) के माध्यम से आता है। ये धमनियाँ महाधमनी की शाखाएँ हैं। दूसरी ओर आहार नाल के विभिन्न भागों से निवाहिका शिरा (hepatic portal vein) के माध्यम से यकृत में शुद्ध रक्त आता है। यकृत से अशुद्ध रुधिर बाहर ले जाने वाली रुधिर वाहिनियाँ, यकृत शिराएँ (hepatic veins) कहलाती हैं।

यकृत के नीचे की ओर पास में ही एक छोटी-सी थैली स्थित होती है, जिसे पित्ताशय (gall bladder) कहते हैं। यकृत में बनने वाला हरे रंग का पित्त रस (bile juice) इसमें इकट्ठा रहता है, जो यकृत से कई छोटी-छोटी नलियों द्वारा इसमें आता है।

पाचन तन्त्र में यकृत के कार्य (Functions of Liver in Digestive System):
यद्यपि यकृत शरीर के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करता है, तथापि पाचन तन्त्र एवं पाचन क्रिया के लिए भी इसका अत्यधिक महत्त्व है। पाचन तन्त्र और शरीर में भोजन की उपस्थिति से सम्बन्धित यकृत के निम्नलिखित कार्य हैं-

1. पित्त रस का स्त्रावण करता है: यकृत पित्त रस का स्रावण करता है। यह एक क्षारीय द्रव है जिसमें पित्त लवण, कॉलेस्टेरॉल,लेसिथिल तथा पित्त वर्णक कोशिकाएँ पायी जाती हैं। पित्त रस

  • आमाशय से आए भोजन को क्षारीय बनाता है;
  • वसा के इमल्सीकरण में सहायक होता है;
  • भोजन को सड़ने से रोकता है;
  • हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है;
  • पित्त वर्णक, लवण आदि उत्सर्जी पदार्थों को यकृत से बाहर ले जाने का कार्य करता है;
  • आहार नाल में क्रमाकुंचन गति उद्दीप्त करता है।

2. ग्लाइकोजन के रूप में ग्लूकोज का संचय करता है: स्वांगीकरण के समय जब रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होती है तो यकृत कोशिकाएँ ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदल देती हैं। इस क्रिया को ग्लाइकोजेनेसिस (glycogenesis) कहते हैं।

3. ग्लुकोजिनोलाइसिस (glucogenolysis): इस क्रिया के अन्तर्गत जब रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है तो संचित ग्लाइकोजन पुन: ग्लूकोज में बदल जाता है।

4. ग्लाइकोनियोजेनेसिस (glyconeogenesis): इस क्रिया के द्वारा यकृत कोशिकाएँ आवश्यकता पड़ने पर अमीनो अम्ल तथा वसीय अम्लों आदि से भी ग्लूकोज का निर्माण कर लेती हैं।

5. वसा एवं विटामिन्स का संश्लेषण एवं संचय करता है: यकृत कोशिकाएँ ग्लूकोज को वसा में भी बदल सकती हैं। यह वसा, वसीय ऊतकों (adipose tissues) में संग्रह के लिए पहुँचा दी जाती है। इसी प्रकार विटामिन्स का भी संश्लेषण हो जाता है।

6. अकार्बनिक पदार्थों का संचय करता है: यकृत द्वारा अकार्बनिक पदार्थ संचित किए जाते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मनुष्य के दाँत कितने प्रकार के होते हैं?
उनके कार्यों का भी उल्लेख कीजिए।
अथवा कृन्तक तथा चर्वणक दाँतों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
अथवा वयस्क मनुष्य में दाँतों के प्रकार व उनके कार्य लिखिए।
उत्तर:
आहार के पाचन की प्रक्रिया में दाँतों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। दाँत ग्रहण किए गए आहार को काटने, फाड़ने तथा चबाने का कार्य करते हैं। मनुष्य के दाँत चार प्रकार के होते हैं, जिनकी संख्या एवं कार्यों का संक्षिप्त परिचय अग्रलिखित है-

  • कृन्तक दाँत: इन्हें छेदक भी कहते हैं। इनके किनारे तेज धार वाले होते हैं। इनका मुख्य कार्य भोजन को कुतरना है। इनकी कुल संख्या 8 होती है। ये बच्चों एवं वयस्कों में समान होते हैं।
  • भेदक दाँत: इन्हें रदनक या श्वसन दाँत भी कहते हैं। ये कृन्तक दाँतों से अधिक लम्बे व नुकीले होते हैं। इनकी संख्या 4 होती है। भोजन को काटना, चीरना व फाड़ना इनका मुख्य कार्य है।
  • अग्रचर्वणक: इनकी संख्या 8 होती है। इनके किनारे चपटे, चौकोर तथा रेखाओं द्वारा बँटे होते हैं।
  • चर्वणक दाँत: इस वर्ग के दाँत केवल वयस्कों में होते हैं अर्थात् छोटे बच्चों में ये नहीं होते। ये संख्या में 12 होते हैं। इनके सिरे चौरस व तेज धार वाले होते हैं। इनका मुख्य कार्य भोजन को चबाना है।

प्रश्न 2.
दाँत की संरचना चित्र सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दात की संरचना
आकार एवं कार्यों के अनुसार हमारे दाँत चार प्रकार के होते हैं, परन्तु सभी प्रकार के दाँतों की रचना लगभग समान ही होती है। ये जबड़े की अस्थि के गड्ढों में अपने मूल वाले भाग से जमे रहते हैं। एक सीमेण्ट जैसे पदार्थ से दाँत की अस्थि के साथ पकड़ अत्यधिक मजबूत होती है। इसके अतिरिक्त इसके निचले भाग पर मसूड़े चढ़े रहते हैं। सभी दाँत डेण्टाइन नामक पदार्थ से बने होते हैं। यह पदार्थ हड्डी से भी मजबूत होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 31
प्रत्येक दाँत तीन भागों में विभक्त होता है-
1. शिखर (Crown): मसूड़े के आगे बाहर दिखाई देने वाला भाग ही शिखर है। यह सफेद एवं चमकदार होता है। इसकी बाहरी पर्त अत्यन्त कठोर पदार्थ की बनी होती है। इसे दन्तवल्क (enamel) कहते हैं। यह दाँतों को घिसने से बचाता है। दाँतों का यही भाग प्रमुख कार्यकारी भाग है।

2. ग्रीवा (Neck): शिखर एवं मूल के बीच का भाग ग्रीवा कहलाता है।

3. मूल (Root): यह ऊपर से दिखाई नहीं देता और मसूड़ों तथा अस्थि के अन्दर स्थित होता है। प्रत्येक प्रकार के दाँत में इनकी संख्या भिन्न-भिन्न होती है। जैसे-चर्वणक में तीन, अग्र चर्वणक में दो तथा शेष दाँतों में एक-एक मूल होती है, जो अत्यन्त मजबूती से अस्थि में जुड़ी हुई तथा मसूड़ों से चिपकी रहती है।

सभी दाँत अन्दर से खोखले होते हैं। इस खोखले भाग को दन्त गुहा (pulp cavity) कहते हैं, जो दन्त मज्जा से भरी होती है। इसमें अनेक सूक्ष्म रक्त नलिकाएँ, स्नायु जाल तथा तन्तु पाए जाते हैं। प्रत्येक दाँत के मूल में एक छोटा छिद्र होता है। इसी छिद्र से ये केशिकाएँ तथा नलिकाएँ इत्यादि दन्त मज्जा में आती हैं।

प्रश्न 3.
आमाशय के पाचन सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख कीजिए। अथवा आमाशय में पाए जाने वाले दो मुख्य एन्जाइमों के नाम एवं कार्य लिखिए। अथवा पाचन तन्त्र में रेनिन का कार्य लिखिए। यह कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
आमाशय में भोजन लार व श्लेष्मक में मिला हुआ तथा काफी पिसी हुई अवस्था में आता है, जिसका कुछ मण्ड (starch) भी शर्कराओं में बदल चुका होता है। यहाँ भोजन को जठर ग्रन्थियों से निकला हुआ जठर रस (gastric juice) मिलता है। इसमें नमक का अम्ल (hydrochloric acid) होता है, जो भोजन को लेई जैसी भूरे रंग की काइम (chyme) के रूप में बदलने में अत्यधिक सहायक होता है। आमाशय में हर समय तरंग गति या क्रमाकुंचन गति (peristalsis) होती रहती है। इसके कारण भोजन जठर रस के साथ खूब मिलने के साथ-साथ पिस भी जाता है। उधर, जठर रस में उपस्थित एंजाइम्स इसे पचने में सहायता करते हैं, विशेषकर इसके प्रोटीन वाले भाग के पाचन में।

जठर रस में दो पाचक एंजाइम्स होते हैं-
(i) रेनिन (renin): यह आमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रन्थियों द्वारा स्रावित जठर रस में पाया जाता है। रेनिन नामक एंजाइम दूध को फाड़कर उसकी प्रोटीन (protein) को अलग कर देता है
और इस प्रकार इसके पचने में सहायता करता है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि रेनिन पहले निष्क्रिय अवस्था (प्रोरेनिन के रूप) में होता है और नमक के अम्ल की उपस्थिति में ही सक्रिय होता है।

(ii) पेप्सिन (pepsin): यह भी पहले निष्क्रिय अवस्था में होता है और अम्ल की उपस्थिति में सक्रिय होता है। यह प्रोटीन पर क्रिया करता है और उसे उसके अवयवों में तोड़ देता है। इससे बनने वाले प्रमुख सरल यौगिक पेप्टोन्स (peptones) तथा प्रोटिओजेज (proteoses) होते हैं। दूध की प्रोटीन (केसीन) पर भी यही एंजाइम क्रिया करता है।

सामान्य स्थिति में ग्रहण किया गया आहार आमाशय में 3-4 घण्टे तक रहता है। यदि व्यक्ति चिन्ता, भय या तनाव से ग्रस्त हो तो आमाशय में आहार अधिक समय तक भी रह सकता है तथा ऐसे में पाचन की क्रिया सुचारु रूप से नहीं चल पाती।

प्रश्न 4.
पाचन तन्त्र में पाए जाने वाले पाचक रसों एवं उनके एंजाइम्स का विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा आहार नाल में प्राप्त होने वाले मुख्य एंजाइम्स के नाम और उनके कार्यों का वर्णन कीजिए तथा आहार नाल के जिन अंगों से इनका स्त्राव होता है, उनकी सूची तैयार कीजिए। अथवा पाचन तन्त्र में स्रावित होने वाले प्रमुख एंजाइम्स के नाम तथा कार्य लिखिए।
उत्तर:
पाचक रस तथा एंजाइम्स
आहार नाल में पाए जाने वाले विभिन्न पाचक रसों, उनके एंजाइम्स तथा उनके कार्य आदि को निम्नांकित तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है

पाचक रस उनके एंजाइम्स तथा उनका पाचन क्षेत्र:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 32
तालिका से स्पष्ट है कि मनुष्य की आँत में भोजन का पाचन मुखगुहा से प्रारम्भ हो जाता है तथा इसके विभिन्न अवयवों का पाचन भिन्न-भिन्न रसों में पाए जाने वाले विभिन्न एंजाइम्स के कारण होता है। भोजन को आहार नाल में आगे बढ़ाने के लिए क्रमाकुंचन नामक एक विशेष प्रकार की गति होती है, जिससे भोजन का पाचक रस के साथ मन्थन भी होता है।

प्रश्न 5.
यकृत का शरीर में महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यकृत का शरीर में महत्त्व
यकृत शरीर में सबसे बड़ी ग्रन्थि है, जो पाचन क्रिया में सहायक अंग की भूमिका निभाती है। इसका शरीर के सम्पूर्ण उपापचय (metabolism) में अत्यधिक महत्त्व है। शरीर की लगभग सभी क्रियाओं में इसका कोई-न-कोई योगदान होता है अथवा क्रिया को करने में यह नियन्त्रक का कार्य करता है। इसके महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं

  • यह शरीर की अनेक उपापचयी क्रियाओं को चलाता है; जैसे— भोजन में आए विभिन्न पोषक पदार्थों को तोड़ना, जोड़ना अथवा उनका आवश्यकतानुसार स्वरूप परिवर्तित करना।
  • पित्त रस का निर्माण करना, जो शरीर की मुख्य पाचन क्रिया में सहायता करता है। (3) शरीर में आए हुए अथवा उप-उत्पादों के रूप में शरीर में बन गए विषों को नष्ट करना।
  • अनेक हानिकारक अथवा अनुपयोगी पदार्थों का स्वरूप बदलकर उन्हें अहानिकारक तथा उत्सर्जन योग्य बनाना; जैसे-अमोनिया को यूरिया या यूरिक अम्ल में बदलना।।
  • शरीर के लिए संग्राहक (store house) का कार्य करना; जैसे—ग्लाइकोजन के रूप में श्वेतसार (कार्बोज) एकत्र करना।
  • विभिन्न बेकार, मृत तथा टूटी-फूटी कोशिकाओं को नष्ट करना तथा उन्हें पित्त रस के द्वारा शरीर से बाहर निकालने का प्रबन्ध करना। जैसे-यह रुधिर के साथ आई बेकार कोशिकाओं को नष्ट करता है।
  • अनेक पाचन सम्बन्धी कार्यों में महत्त्वपूर्ण योगदान करना।

प्रश्न 6-एक रोगी के यकृत ने काम करना बन्द कर दिया। उस व्यक्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि किसी व्यक्ति का यकृत कार्य करना बन्द कर दे तो उसके शरीर में अमोनिया जैसे विषैले तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाती है तथा शरीर की विभिन्न महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ भी रुक जाती हैं। ऐसे में व्यक्ति के शरीर पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगते हैं। यकृत के पूरी तरह से काम बन्द कर देने के 24 घण्टे के अन्दर ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 7.
श्वेतसार के पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा पाचन तन्त्र में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के पाचन का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्वेतसार का पाचन श्वेतसार; जैसे मण्ड का पाचन मुखगुहा में लार से ही प्रारम्भ हो जाता है। टायलिन (ptylin) ‘ नामक एंजाइम यहाँ इस पर क्रिया करके इसे जटिल शर्कराओं में तोड़ देता है। बनने वाली शर्कराओं में माल्टोज, सुक्रोज आदि होती हैं।

मण्ड आदि का आमाशय में पाचन नहीं होता; शेष श्वेतसारों का पाचन ग्रहणी में अग्न्याशय रस (pancreatic juice) के एमाइलेज एंजाइम से होता है। यहाँ भी जटिल शर्कराएँ बनती हैं। जटिल शर्कराओं का पाचन छोटी आँत में आन्त्र रस (intestinal juice) के विभिन्न एंजाइम्स के द्वारा सम्पन्न होता है; जैसे–माल्टोज का माल्टेज के द्वारा, सुक्रोज का सुक्रेज के द्वारा तथा लैक्टोज का लैक्टेज के द्वारा आदि। इस प्रकार, इनके पचने से ग्लूकोज या फ्रक्टोज जैसी जल में पूर्णतः विलेय तथा कोशिकाओं द्वारा ग्राह्य शर्कराएँ बन जाती हैं।
(नोट-प्रोटीन तथा वसा के पाचन का विवरण आगामी प्रश्नों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है।)

प्रश्न 8.
प्रोटीन के पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का पाचन आहार में विद्यमान प्रोटीन का पाचन आमाशय से प्रारम्भ होता है। प्रोटीन का पाचन अम्लीय माध्यम में (HCl अम्ल की उपस्थिति में) पेप्सिन (pepsin) नामक एंजाइम द्वारा होता है। यह एंजाइम जठर रस में होता है। इसके प्रभाव से प्रोटीन्स पेप्टोन्स तथा पॉलीपेप्टाइड्स में टूट जाते हैं। सामान्यत: इससे अधिक पाचन आमाशय में नहीं होता। दूध की प्रोटीन (केसीन) पर पेप्सिन का प्रभाव तभी होता है, जब रेनिन नामक एंजाइम इसे दूध से अलग कर देता है। यह एंजाइम भी जठर रस में ही होता है।

ग्रहणी में प्रोटीन से प्राप्त अवयवों पर क्रिया, क्षारीय माध्यम (पित्त रस की उपस्थिति के कारण) में, अग्न्याशय रस के ट्रिप्सिन नामक एंजाइम से होती है। इसके द्वारा पॉलीपेप्टाइड्स, पेप्टोन्स आदि को अमीनो अम्लों में तोड़ दिया जाता है। अमीनो अम्ल ही प्रोटीन के पूर्ण पचित स्वरूप हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रोटीन के अर्द्ध-पचित अवयवों पर छोटी आँत में आने वाले आन्त्र रस को इरेप्सिन नामक एंजाइम के प्रभाव से अमीनो अम्लों में बदल लिया जाता है।

प्रश्न 9.
आहार के माध्यम से ग्रहण की गई वसा के पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
वसा का पाचन
वसा का पाचन करने से पूर्व आमाशय में अम्ल के साथ क्रमाकुंचन क्रिया के द्वारा तथा बाद में पित्त रस के साथ ग्रहणी में इनका मन्थन तथा इमल्सीकरण आवश्यक होता है। इमल्सीकृत वसाओं पर लाइपेज एंजाइम क्रिया करता है, जो ग्रहणी में अग्न्याशय रस में तथा छोटी आँत में आन्त्र रस में होता है। वसा के पाचन से वसीय अम्ल (fatty acids) तथा ग्लिसरॉल (glycerol) बनते हैं। यही इसके पचे हुए (घुलनशील) स्वरूप हैं।

प्रश्न 10.
शरीर में पचे हुए भोजन के अवशोषण की क्रिया समझाइए।
उत्तर:
पचे हुए भोजन का अवशोषण
भली-भाँति पचे हुए भोजन का अवशोषण मुख्य रूप से छोटी आँत में होता है। छोटी आँत की अवशोषण सतह रसांकुरों के कारण बहुत बढ़ जाती है। घुलित अवस्था में विद्यमान पाचित आहार रसांकुरों में रुधिर केशिकाओं तथा लसीका वाहिनियों के अन्दर उपस्थित तरल अर्थात् रुधिर एवं लसीका में अवशोषित किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन्स के पचे हुए अवयव-ग्लूकोज व अमीनो अम्ल आदि रुधिर में अवशोषित हो जाते हैं। वसाओं के पाचन से प्राप्त ग्लिसरॉल व वसीय अम्ल लसीका वाहिनी में अवशोषित होते हैं। बाद में वसाएँ वापस रुधिर में मिला दी जाती हैं। इस प्रक्रिया से भोजन का अवशोषण हो जाता है, शरीर का पोषण होता है तथा ऊर्जा प्राप्त होती है।

प्रश्न 11.
पाचन तन्त्र के एक सहायक अंग के रूप में पित्ताशय का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
पित्ताशय
पाचन क्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाला पाचन तन्त्र का एक अंग पित्ताशय (gall bladder) भी है। यह अंग एक थैली के रूप में होता है तथा इसका आकार नाशपाती के समान होता है। शरीर में यह यकृत नामक सबसे बड़ी ग्रन्थि के नीचे पाया जाता है तथा इसका सम्बन्ध भी यकृत से ही होता है। पित्ताशय में यकृत द्वारा बनाया जाने वाला पित्त रस (bile juice) एकत्र रहता है। यह पित्त रस आहार के पाचन में विशेष रूप से सहायक होता है। व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया गया आहार जब पक्वाशय में पहुँचता है, तब उसके पाचन के लिए पित्त रस की आवश्यकता होती है। इस अवसर पर पित्ताशय में एकत्र हुआ पित्त रस, पित्त नलिका द्वारा पक्वाशय में पहुँच जाता है।

पित्त रस के प्रभाव से पक्वाशय में पहुँचने वाला आहार क्रमशः क्षारीय बन जाता है; अर्थात् उसकी अम्लीयता समाप्त हो जाती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अग्न्याशय से आने वाला पाचक रस केवल क्षारीय माध्यम में ही प्रभावशाली होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भले ही पित्त रस में कोई एंजाइम विद्यमान नहीं होता, परन्तु अग्न्याशय से आने वाले एंजाइम की सक्रियता के लिए पित्त रस ही आधार प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त पित्त रस के प्रभाव से ही आहार में विद्यमान वसा जल में मिलकर इमल्शन का रूप ग्रहण करती है।

प्रश्न 12.
पाचन तन्त्र के एक सहायक अंग के रूप में अग्न्याशय या क्लोम ग्रन्थि का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अग्न्याशय या क्लोम ग्रन्थि अग्न्याशय या क्लोम (pancreas) भी एक ग्रन्थि है, जो पाचन तन्त्र का ही एक अंग है। यह ग्रन्थि आमाशय के पीछे उदर की पिछली दीवार से सटी हुई होती है। यह आकार में लम्बी ग्रन्थि है। सामान्य रूप से इसकी लम्बाई 16 सेमी तथा चौड़ाई 4 सेमी होती है। इस ग्रन्थि का बायाँ भाग तिल्ली की ओर तथा दायाँ भाग ग्रहणी या पक्वाशय की ओर होता है। अग्न्याशय द्वारा जो रस बनाया जाता है; उसे अग्न्याशयिक रस (pancreatic juice) कहते हैं।

यह रस एक नलिका द्वारा पक्वाशय में पहुँचाया जाता है। अग्न्याशयिक रस पतला, स्वच्छ तथा खारेपन के गुण से युक्त होता है। इस रस में मुख्य रूप से तीन एंजाइम होते हैं, जो पाचन क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन एंजाइम्स के नाम हैं क्रमश: एमाइलोप्सिन, स्टिएप्सिन तथा ट्रिप्सिन। एमाइलोप्सिन एंजाइम के प्रभाव से आहार में बिना पचा मण्ड क्रमशः शर्करा में बदल जाता है। स्टिएप्सिन या लाइपेज एंजाइम वसा को क्रमशः ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल में विखण्डित कर देता है। जहाँ तक ट्रिप्सिन नामक एंजाइम का प्रश्न है, यह एंजाइम आहार में विद्यमान प्रोटीन को पेप्टोन में परिवर्तित कर देता है।

प्रश्न 13.
पाचन तन्त्र के एक सहायक अंग के रूप में तिल्ली या प्लीहा का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए। उत्तर
तिल्ली या प्लीहा पाचन तन्त्र से अप्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध एक अंग तिल्ली या प्लीहा (spleen) भी है। यह एक ग्रन्थि है। यह ग्रन्थि हमारे शरीर में आमाशय के बाईं ओर तथा अग्न्याशय के दाईं ओर पायी जाती है। इसका रंग बैंगनी होता है तथा आकार सेम के बीज जैसा होता है। इस ग्रन्थि का वजन लगभग 375 ग्राम होता है तथा यह लगभग 12 सेमी लम्बी होती है। छूने पर यह ग्रन्थि मुलायम तथा पिलपिली-सी होती है।

भले ही तिल्ली का पाचन तन्त्र से सीधा सम्बन्ध न हो, परन्तु इससे पाचन संस्थान तथा पाचन क्रिया को सहायता अवश्य प्राप्त होती है। यदि किसी कारण से तिल्ली बढ़ जाती है तो पाचन क्रिया में व्यवधान आने लगता है तथा पेट में पीड़ा भी होने लगती है। तिल्ली का मुख्य कार्य शरीर में रक्त को संचित रखना है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाचन तन्त्र से क्या आशय है?
उत्तर:
आहार नाल के समस्त अंग तथा आहार नाल के बाहर स्थित पाचन में सहायक अंग सम्मिलित रूप से पाचन तन्त्र कहलाते हैं। पाचन तन्त्र का कार्य आहार का पाचन एवं पोषक-तत्त्वों का अवशोषण करना है।

प्रश्न 2.
पाचन तन्त्र के मुख्य अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पाचन तन्त्र के मुख्य अंग हैं-मुख व मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रासनली, आमाशय तथा आँत। इनके अतिरिक्त यकृत, पित्ताशय, अग्न्याशय तथा तिल्ली या प्लीहा भी पाचन तन्त्र के ही अंग हैं।

प्रश्न 3.
आहार नाल से क्या आशय है?
उत्तर:
मुखद्वार से मलद्वार तक फैले मार्ग को आहार नाल या पाचन प्रणाली कहते हैं।

प्रश्न 4.
मुख में कौन-सा पाचक रस पाया जाता है तथा उसमें कौन-सा एंजाइम होता है?
उत्तर:
मुख में लार नामक पाचक रस पाया जाता है तथा लार में टायलिन नामक किण्व या एंजाइम होता है।

प्रश्न 5.
टायलिन नामक एंजाइम आहार के किस तत्त्व के पाचन में सहायक होता है?
उत्तर:
टायलिन नामक एंजाइम कार्बोहाइड्रेट के पाचन में सहायक होता है।

प्रश्न 6.
आमाशय में कौन-सा पाचक रस बनता है तथा उसमें कौन-कौन से किण्व या एंजाइम्स पाए जाते हैं?
उत्तर:
आमाशय में जठर रस नामक पाचक रस बनता है तथा इसमें रेनिन एवं पेप्सिन नामक दो किण्व या एंजाइम्स पाए जाते हैं।

प्रश्न 7.
रेनिन कहाँ पाया जाता है? इसका मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर:
रेनिन आमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रन्थियों द्वारा स्रावित जठर रस में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य दूध को फाड़कर केसीन नामक प्रोटीन को अलग करना है।

प्रश्न 8.
आमाशय में आहार के किस तत्त्व का पाचन होता है?
उत्तर:
आमाशय में आहार के प्रोटीन नामक तत्त्व का पाचन होता है।

प्रश्न 9.
यकृत द्वारा किस रस का निर्माण किया जाता है? यह कहाँ एकत्र होता है? इसका क्या कार्य है?
उत्तर:
यकृत द्वारा पित्त रस का निर्माण किया जाता है। यह रस पित्ताशय में एकत्र रहता है। इसका मुख्य कार्य आहार के पाचन में सहायता प्रदान करना है।

प्रश्न 10.
अग्न्याशय या क्लोम द्वारा किस रस का निर्माण किया जाता है तथा उस रस में कौन-कौन से एंजाइम्स पाए जाते हैं? .
उत्तर:
अग्न्याशय या क्लोम द्वारा अग्न्याशयिक रस का निर्माण किया जाता है। इस रस में एमाइलोप्सिन, स्टिएप्सिन तथा ट्रिप्सिन नामक तीन एंजाइम्स पाए जाते हैं।

प्रश्न 11.
आहार के पाचन से क्या आशय है?
उत्तर:
आहार के पाचन का अर्थ है अघुलनशील एवं जटिल भोज्य पदार्थों को घुलनशील एवं सरल अवस्था में बदलकर अवशोषण के योग्य बनाना।।

प्रश्न 12.
पचे हुए आहार का अवशोषण आहार नाल के किस भाग में होता है? उत्तर-पचे हुए भोजन का अधिकांश अवशोषण छोटी आंत में होता है। प्रश्न 13-मनुष्य के दाँतों के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य के दाँत चार प्रकार के होते हैं-(i) कृन्तकं दाँत, (ii) भेदक दाँत, (ii) अग्र चर्वणक दाँत तथा (iv) चर्वणक दाँत।

प्रश्न 14.
दाँतों के कौन-कौन से तीन भाग होते हैं? उत्तर–दाँतों के तीन भाग होते हैं-(i) शिखर, (ii) ग्रीवा तथा (iii) मूल। प्रश्न 15-इनेमल क्या है? यह कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
दाँतों की बाहरी सुरक्षा परत को इनेमल कहा जाता है। यह दाँतों के शिखर नामक भाग में पाया जाता है।

प्रश्न 16.
कृन्तक तथा चर्वणक दाँतों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कृन्तक दाँत खाद्य-सामग्री को कुतरने का कार्य करते हैं तथा चर्वणक दाँत खाद्य-सामग्री को चबाने तथा पीसने का कार्य करते हैं।

प्रश्न 17.
एंजाइम क्या है? पाचन में इनका क्या कार्य है?
उत्तर:
एंजाइम विशेष प्रकार के जटिल पदार्थ हैं, जो सामान्यत: विशेष प्रोटीन होते हैं। ये आहार के जटिल अविलेय पदार्थों को सरल तथा जल में विलेय स्वरूप में बदलते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए- .

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा अंग पाचन तन्त्र का अंग नहीं है
(क) आहार नली
(ख) अग्न्याशय
(ग) फेफड़ा
(घ) छोटी आँत।
उत्तर:
(ग) फेफड़ा।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर में मुँह से लेकर मलद्वार तक के मार्ग को कहते हैं
(क) आमाशय
(ख) आँतें
(ग) आहार नाल
(घ) पाचन तन्त्र।
उत्तर:
(ग) आहार नाल।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा अंग आहार नाल का भाग नहीं है
(क) मुख
(ख) ग्रसनी
(ग) आमाशय
(घ) यकृत।
उत्तर:
(घ) यकृत।

प्रश्न 4.
दाँतों को मजबूत करने वाला तत्त्व कौन-सा है
(क) प्रोटीन
(ख) कैल्सियम
(ग) कार्बोहाइड्रेट
(घ) वसा।
उत्तर:
(ख) कैल्सियम।

प्रश्न 5.
आहार नाल का सबसे लम्बा भाग होता है
(क) आमाशय
(ख) छोटी आँत
(ग) बड़ी आँत
(घ) मलाशय।
उत्तर:
(ख) छोटी आँत।

प्रश्न 6.
मनुष्य की लार में कौन-सा एंजाइम (किण्व) पाया जाता है
(क) लाइपेज
(ख) रेनिन
(ग) टायलिन
(घ) ग्लूकोज।
उत्तर:
(ग) टायलिन।

प्रश्न 7.
टायलिन नाम का एंजाइम किस रस में मिलता है
(क) जठर रस
(ख) अग्न्याशय रस
(ग) पित्त रस
(घ) लार।
उत्तर:
(घ) लार।

प्रश्न 8.
मनुष्य के मुँह में कितनी लार ग्रन्थियाँ होती हैं
(क) 6
(ख) 8
(ग) 10
(घ) 2.
उत्तर:
(क) 6.

प्रश्न 9.
मनुष्य के पाचन तन्त्र में आहार के कार्बोहाइड्रेट का पाचन प्रारम्भ हो जाता है
(क) मुखगुहा से
(ख) आमाशय से
(ग) पक्वाशय से
(घ) आँतों से।
उत्तर:
(क) मुखगुहा से।

प्रश्न 10.
आमाशय का आकार कैसा होता है
(क) लम्बा
(ख) गोल
(ग) खोखला
(घ) थैले या मशक जैसा।
उत्तर:
(घ) थैले या मशक जैसा।

प्रश्न 11.
ग्रसनी के बाद भोजन जाता है
(क) छोटी आंत में
(ख) ग्रहणी में
(ग) आमाशय में
(घ) बड़ी आँत में।
उत्तर:
(ग) आमाशय में।

प्रश्न 12.
आमाशय से स्रावित होता है
(क) नाइट्रिक अम्ल
(ख) साइट्रिक अम्ल
(ग) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
(घ) इन्सुलिन।
उत्तर:
(ग) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल।

प्रश्न 13.
आमाशयिक रस में निम्नलिखित में से कौन-सा एंजाइम पाया जाता है
(क) रेनिन
(ख) एमाइलेज
(ग) ट्रिप्सिन
(घ) टायलिन।
उत्तर:
(क) रेनिन।

प्रश्न 14.
रेनिन नामक एंजाइम जो आमाशय में बनता है
(क) प्रोटीन पर क्रिया करता है
(ख) केवल दूध की प्रोटीन पर क्रिया करता है
(ग) दूध को फाड़कर उसकी प्रोटीन को अलग करता है
(घ) मण्ड को पचाता है।
उत्तर:
(ग) दूध को फाड़कर उसकी प्रोटीन को अलग करता है।

प्रश्न 15.
पेप्सिन नामक एंजाइम पाया जाता है(क) जठर रस में
(ख) पित्त रस में
(ग) आन्त्रीय रस में
(घ) अग्न्याशयिक रस में।
उत्तर:
(क) जठर रस में।

प्रश्न 16.
यकृत का मुख्य कार्य होता है
(क) पित्त संग्रह करना
(ख) विभिन्न एंजाइम्स बनाना
(ग) पित्त रस बनाना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) पित्त रस बनाना।

प्रश्न 17.
यकृत अतिरिक्त शर्करा को किस वस्तु में परिवर्तित कर देता है
(क) ग्लाइकोजन में
(ख) सेलुलोस में
(ग) एंजाइम में
(घ) मण्ड या स्टॉर्च में।
उत्तर:
(क) ग्लाइकोजन में।

प्रश्न 18.
प्रोटीन के पाचन से बनता है
(क) ऐमीनो अम्ल
(ख) ग्लूकोज
(ग) ग्लिसरॉल व वसीय अम्ल
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) ऐमीनो अम्ल।

प्रश्न 19.
वसा के पाचन से बनता है
(क) ऐमीनो अम्ल
(ख) ग्लाइकोजन
(ग) ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ग) ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल।

प्रश्न 20.
पचे हुए भोजन का अवशोषण आहार नाल के किस भाग में होता है
(क) आमाशय
(ख) पक्वाशय .
(ग) छोटी आँत
(घ) यकृत।
उत्तर:
(ग) छोटी आँत।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 25 प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल (3-6 वर्ष)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 25 प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल (3-6 वर्ष) (Care in Early Childhood (3-6 years))

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 25 प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल (3-6 वर्ष)

UP Board Class 11 Home Science Chapter 25 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था से क्या आशय है? इस अवस्था की मुख्य विशेषताएँ भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
बाल-विकास की प्रक्रिया जन्म से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती है तथा किसी-न-किसी रूप में यह जीवन-भर चलती रहती है। बाल-विकास के विभिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न विशेषताओं एवं लक्षणों का अविर्भाव होता है। विकास की प्रक्रिया के व्यवस्थित अध्ययन के लिए विभिन्न अवस्थाओं का व्यवस्थित अध्ययन करना आवश्यक होता है। बाल-विकास की अवस्थाओं का कोई स्पष्ट विभाजन सम्भव नहीं है, फिर भी विद्वानों में अपने-अपने दृष्टिकोण से बाल-विकास की अवस्थाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। एक सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत जन्म के उपरान्त इन अवस्थाओं को क्रमशः शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था के रूप में स्वीकार किया गया है। विद्वानों ने बाल्यावस्था को पुनः दो उप-वर्गों में विभाजित किया है जिन्हें क्रमशः पूर्व या प्रारम्भिक बाल्यावस्था तथा उत्तर बाल्यावस्था के रूप में वर्णित किया जाता है। प्रारम्भिक बाल्यावस्था की विशेषताओं, समस्याओं तथा देखभाल का विवरण निम्नवर्णित है –

प्रारम्भिक बाल्यावस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ –
बाल-विकास क्रम में शैशवावस्था के उपरान्त आने वाली अवस्था को प्रारम्भिक बाल्यावस्था (Early childhood) के नाम से जाना जाता है। इस अवस्था की आयु-अवधि 2-3 वर्ष से 5-6 वर्ष की आयु तक मानी जाती है। इस अवस्था में बच्चे शैशवावस्था की तुलना में कुछ अधिक विकसित तथा सक्षम हो जाते हैं। उनकी अन्य व्यक्तियों पर निर्भरता कुछ कम हो जाती है। अब उन्हें पूर्ण रूप से असहाय मान कर दिया जाने वाला संरक्षण तथा देखभाल का रूप बदल जाता है। अब बच्चा स्वयं घूमने-फिरने लगता है तथा अपने कुछ साधारण कार्य भी स्वयं करने लगता है। कुछ बड़ा होने पर बच्चा प्ले स्कूल या नर्सरी स्कूल में भी जाने लगता है।

इस अवस्था में बच्चे के मित्र भी बनने लगते हैं तथा खेल-समूह के बच्चों से भी वह सम्पर्क बनाने लगता है। इन सब गतिविधियों का स्पष्ट प्रभाव बच्चे के विकास पर दिखाई देने लगता है। सामाजिक सम्पर्क का दायरा बढ़ जाने के कारण इस अवस्था को ‘सामाजिक अवस्था’ के रूप में भी जाना जाता है। स्पष्ट है कि इस अवस्था में बच्चे का तेजी से सामाजिक विकास होता है। विकास की इस प्रक्रिया के माध्यम से बच्चा अपने सामाजिक पर्यावरण के साथ समायोजन करना भी सीखने लगता है। इस स्थिति में उसमें जिज्ञासा प्रवृत्ति प्रबल होने लगती है तथा वह विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित अधिक-से-अधिक जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करने लगता है।

प्रारम्भिक बाल्यावस्था में होने वाले विकास तथा सम्बन्धित समस्याओं एवं आवश्यक देखभाल के उपायों को जानने के लिए इस अवस्था की मुख्य विशेषताओं को जानना भी आवश्यक है। इस अवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नवर्णित हैं –

1. आत्मनिर्भरता का विकास – इस अवस्था में बालक की दूसरों पर आश्रितता घट जाती है। वह अपनी शारीरिक तथा मानसिक क्षमता के द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने का प्रयास करता है। वह अपने कपड़े, जूते स्वयं पहनता है। अपने खिलौने तथा अन्य वस्तुएँ स्वयं समेटना प्रारम्भ कर देता है।

2. प्रबल जिज्ञासा प्रवृत्ति—इस अवस्था की एक मुख्य विशेषता जिज्ञासा प्रवृत्ति का प्रबल होना भी है। बच्चे के सम्पर्क में जो भी वस्तु आती है, उसके सम्बन्ध में वह उपयुक्त जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करता है। अब बालक यह नहीं पूछता कि-‘यह क्या है?’ बल्कि वह पूछता है कि-‘ऐसा क्यों हैं?’

3. संग्रह प्रवृत्ति का जाग्रत होना इस अवस्था में बालक की संग्रह प्रवृत्ति भी जाग्रत हो जाती है। वह खिलौने, वीडियो गेम्स, गोलियाँ आदि जो कुछ भी वातावरण से प्राप्त होता है, उनका संग्रह करने लगता है। बच्चे को वेशभूषा में लगी जेब का इस्तेमाल करना आ जाता है।

4.खेल-कूद का विकास-प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बच्चा विभिन्न खेलों में रुचि लेने लगता है। वह अपने समान आयु के बच्चों के साथ खेलना चाहता है। वह सामाजिकता की ओर अग्रसर होने लगता है।

5. सामूहिक प्रवृत्ति की परिपक्वता-इस अवस्था में बालक की सामूहिक प्रवृत्ति में परिपक्वता आ जाती है। अब वह मण्डली बनाकर रहने के लिए नाना प्रकार के प्रयास करता है। वह सामूहिक खेलों में अधिक रुचि लेने लगता है।

6. पूर्व अनुभवों को पुनः स्मरण करना-प्रारम्भिक बाल्यावस्था के दौरान ही पूर्व अनुभवों का पुन:स्मरण करने लगता है। आवश्यकता पड़ने पर यह विचार करने लगता है कि पहले हमने यह कार्य किया था। हम इस वस्तु अथवा व्यक्ति को देख-चुके हैं आदि।

7.कल्पना में वास्तविकता का स्थान-जब बालक शैशवावस्था में होता है तब वह अवास्तविक काल्पनिक जगत में विचरण करता है, परन्तु जब वह थोड़ा बड़ा होता है तब वह उसकी अधिक कल्पना करता है जो उसके वास्तविक जीवन से सम्बन्धित होता है।

8. बहिर्मुखी व्यक्तित्व-इस अवस्था में बालक का व्यक्तित्व बहिर्मुखी होता है। वह हमेशा वातावरण के प्रति सजग रहता है। वह प्रायः अन्य बालकों के साथ समायोजित होकर रहने का यथासम्भव प्रयास करता है।

9. अनुभव में वृद्धि–इस अवस्था में बालक को परिवार के बाहर स्कूल, पड़ोस तथा संगी-साथियों से नित नये अनुभव प्राप्त होते हैं, जिनसे न केवल उसके ज्ञान में वृद्धि होती है बल्कि वह जीवन की वास्तविकता से भी परिचित होने लगता है।

10. सामाजिक एवं नैतिक विकास-इस अवस्था में बालक का सामाजिक एवं नैतिक विकास भी प्रारम्भ हो जाता है। जो भी आज्ञाएँ या निर्देश उसे समूह के द्वारा प्राप्त होते हैं, उन्हें वह मानने के लिए सदैव तैयार रहता है। उसमें आज्ञापालन, सहयोग, सहिष्णुता आदि गुणों का भी विकास होने लगता है।

प्रश्न 2.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास तथा गामक या क्रियात्मक विकास का विवरण।
उत्तरः
पूर्व बाल्यावस्था में विकास के सभी पक्षों का समुचित विकास होता है। इस अवस्था में होने वाले शारीरिक तथा गामक या क्रियात्मक विकास का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है

1. शारीरिक विकास-पूर्व बाल्यावस्था शारीरिक रूप से पुष्ट होने की अवस्था है। इस अवस्था में शारीरिक विकास एवं वृद्धि की दर शैशवावस्था की दर से कम होती है। इस अवस्था में बालक के वजन तथा लम्बाई में वृद्धि होती है। शरीर के अंगों के अनुपात में परिवर्तन होने लगता है। पाँच वर्ष के बालक का सिर प्रौढ़ व्यक्ति के सिर से लगभग 10% छोटा होता है। इस अवस्था में सामान्य रूप से अस्थायी दाँत भी होते हैं। लड़कियों की तुलना में लड़कों का वजन एवं लम्बाई अधिक होती है।

इस अवस्था में बालक स्नायु तन्त्र तथा अन्य अंगों का भी समुचित विकास होता है। शरीर के पाचन तन्त्र का भी विकास होता है तथा परिणामस्वरूप बालक की भूख तथा आहार की आवश्यकता में भी वृद्धि होती है। शरीर के पाचन तन्त्र के साथ-साथ बालक के कंकाल तन्त्र तथा पेशी संस्थान में भी समुचित विकास होता है। शरीर की सभी अस्थियाँ तथा पेशियाँ विकसित एवं मजबूत होने लगती हैं। इस अवस्था में आकर बालक का अपने विसर्जन संस्थान पर भी समुचित नियन्त्रण हो जाता है। इस अवस्था में बालक की मुखाकृति तथा जबड़े की बनावट में भी परिवर्तन आने लगता है तथा सिर के बाल भी काले तथा चमकदार होने लगते हैं।

2. गामक या क्रियात्मक विकास—इस अवस्था में बालक का समुचित गामक या क्रियात्मक विकास (Motor Development) भी होता है। इस अवस्था में होने वाले गामक या क्रियात्मक विकास प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल 253 की दर कुछ अधिक होती है। इसके लिए बालक द्वारा की जाने वाले शारीरिक गतिविधियों तथा अभ्यास की अधिकता जिम्मेदार होती है। शरीर के क्रमशः परिपक्व होने के कारण भी क्रियात्मक विकास में वृद्धि होती है। यदि बालक को समुचित प्रोत्साहन मिलता रहे तो उसके क्रियात्मक विकास में सराहनीय वृद्धि हो सकती है। इस अवस्था में होने वाले बालक के गामक विकास को दैनिक जीवन के प्रायः सभी क्रियाकलापों में देखा जा सकता है।

अब बालक अपने कपड़े-जूते स्वयं पहनने लगता है। शौच के लिए कमोड पर बैठने लगता है, तीन पहिये वाली साइकिल या अन्य गाड़ी आदि चलाने लगता है। बालक अपनी किताब कॉपी के पन्ने सुचारु रूप से पलटने लगता है। पेन-पेन्सिल को सही ढंग से पकड़ने लगता है तथा अपनी सभी वस्तुओं, खिलौनों तथा पुस्तकों आदि को समेटकर निर्धारित स्थान पर रखना सीख जाता है। वह स्वयं आहार ग्रहण करता है, चम्मच आदि का प्रयोग भी भली-भाँति सीख लेता है। इस अवस्था में बालक गतिशील खेलों तथा दौड़-भाग की गतिविधियों को भी सफलतापूर्वक करने लगता है। स्पष्ट है कि प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बालक का पर्याप्त गामक विकास हो जाता है तथा वह शारीरिक गतियों में समुचित समायोजन भी सीख लेता है।

प्रश्न 3.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास तथा सामाजिक विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बालक के सामाजिक सम्पर्क का दायरा विस्तृत होता है तथा उसे परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के भी सम्पर्क में रहना पड़ता है। ऐसे में बालक में कुछ संवेगात्मक परिवर्तन होते हैं तथा सामाजिक विकास की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस अवस्था में होने वाले संवेगात्मक तथा सामाजिक विकास का विवरण निम्नवर्णित है

1. संवेगात्मक विकास–जहाँ तक संवेगात्मक विकास का प्रश्न है, इस अवस्था में संवेगात्मक अस्थिरता बनी रहती है। किसी भी समय कोई संवेग प्रबल हो जाता है। प्रायः बालक किसी भी कारण से शीघ्र ही क्रोधित या भयभीत हो जाता है। इस अवस्था में ईर्ष्या का संवेग भी प्रबल होने लगता है। इसका मुख्य रूप अपने ही भाई या बहन से ईर्ष्या के रूप में देखा जा सकता है। बच्चे क्रोध में प्रायः चीखते-चिल्लाते हैं, पैर पटकते, चुटकी काटते हैं, साँस रोक लेते हैं तथा शरीर को कड़ा कर लेते हैं।

इस अवस्था में क्रोध को प्यार एवं सहानुभूति से नियन्त्रित किया जा सकता है। बालक के भय संवेग को उसकी समझदारी बढ़ाकर नियन्त्रित किया जा सकता है। इस अवस्था में बालकों में द्वेष का भाव भी प्रबल हो जाया करता है। इनका विकास क्रोधपूर्ण विरोध के परिणामस्वरूप होता है। द्वेष के प्रबल होने पर बालक का व्यवहार काफी असामान्य हो जाता है तथा वह इसके अन्तर्गत बिस्तर पर पेशाब करना, अँगूठा चूसना या सिरदर्द व पेट दर्द का बहाना करने लगता है। इस अवस्था में बालक में जिज्ञासा तथा हर्ष के भाव भी पर्याप्त रूप से विकसित होने लगते हैं। इन भावों के समुचित विकास के लिए माता-पिता को विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए।

2. सामाजिक विकास-इस अवस्था में बालक का सामाजिक विकास भी तेजी से होता है। इसमें सर्वाधिक योगदान खेल-समूह तथा विद्यालय के वातावरण का होता है। यदि बालक का शारीरिक एवं संवेगात्मक विकास सामान्य हो तो निश्चित रूप से इस अवस्था में बालक का सामाजिक विकास भी सुचारु रूप में होता है। बालक के अच्छे सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है कि बच्चों के माता-पिता तथा अभिभावकों का स्नेहपूर्ण एवं सक्रिय व्यवहार हो। सुखद सामाजिक सम्पर्क से बालक के सामाजिक विकास की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती है। इस अवस्था में बालक प्राय: समूह में खेलते हैं। सामूहिक गतिविधियों से बालक में सामूहिक भावना, सहयोग तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के सामाजिक गुणों का यथा सम्भव विकास होता है।

इस अवस्था में बच्चों में यदि किसी बात से लड़ाई-झगड़ा भी हो जाता है तो शीघ्र ही मित्रता हो जाती है। इस अवस्था में बच्चे में अन्य बच्चों के साथ सहमति या असहमति, आज्ञा पालन या अवज्ञा, नेतृत्व या अनुसरण की प्रवृत्तियों का भी समुचित विकास देखा जाता है। यदि व्यवहार में देखा जाए तो इस अवस्था में बालक के व्यवहार में नकारात्मक प्रवृत्ति प्राय: अधिक पायी जाती है। उसके अधिकांश उत्तर नकारात्मक रूप में ही होते हैं। इसके लिए प्राय: कड़ा अनुशासन तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की कमी ही मुख्य कारण हुआ करते हैं। अतः बालक की इस प्रवृत्ति को नियन्त्रित करने के लिए अभिभावकों को चाहिए कि सामान्य अनुशासन तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार को ही प्राथमिकता दें।

प्रश्न 4.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का सामान्य परिचय दें। इस अवस्था की एक मुख्य समस्या के रूप में अनावश्यक गुस्सा करने की समस्या’ के कारणों तथा निराकरण के उपायों एवं देखभाल का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
बाल-विकास के सुचारु अध्ययन के लिए विकास की प्रत्येक अवस्था में उत्पन्न होने वाली समस्याओं को भी जानना आवश्यक होता है तथा उचित देखभाल के अन्तर्गत सम्बन्धित समस्याओं के निराकरण के उपाय किए जाते हैं ।

प्रारम्भिक बाल्यावस्था में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याएँ शारीरिक तथा व्यवहार सम्बन्धी होती हैं। यह काल व्यक्तित्व के निर्माण का काल होता है तथा व्यक्तित्व निर्माण के मार्ग में आने वाली विभिन्न बाधाओं के कारण विभिन्न समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं। इन समस्याओं के निराकरण के लिए माता-पिता तथा शिक्षकों को हर समय सचेत रहना चाहिए तथा प्रत्येक समस्या को प्रबल रूप ग्रहण करने से बचाना चाहिए।

यदि इस काल की समस्याओं का समुचित निराकरण न किया जाए तो बालक के व्यक्तित्व विकास पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। प्रारम्भिक बाल्यावस्था की अधिकांश समस्याओं को बालक के असामान्य व्यवहार से जाना जा सकता है। इस अवस्था की मुख्य समस्याएँ हैं-अनावश्यक गुस्सा करना, बिना कारण ही भयभीत हो जाना, बिस्तर गीला करना, दाँतो से नाखून काटना तथा प्रायः झूठ बोलना। इन समस्याओं के कारणों तथा निवारण के उपायों का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है –

अनावश्यक गुस्सा करना –
गुस्सा करना एक सामान्य प्रवृत्ति है जो कि प्रत्येक व्यक्ति में किसी-न-किसी रूप में जन्म से ही पायी जाती है। एक सीमा में गुस्सा करना तो स्वभाव की एक सामान्य प्रवृत्ति है। छोटे बच्चे की यदि कोई आवश्यकता पूरी नहीं होती या उसकी वस्तु छीन ली जाती है तो वह तुरन्त गुस्सा करता है। इसे समस्या नहीं माना जाता। जब कोई बालक सामान्य से अधिक तथा बार-बार गुस्सा या क्रोध करने लगता है तो उसके इस व्यवहार को एक समस्या माना जाने लगता है। इस प्रकार की समस्यात्मक व्यवहार में बालक प्रायः चिल्लाता है, हाथ-पैर पटकता है, वस्तुएँ फेंकता या तोड़ता है। अनावश्यक गुस्सा करने वाला बालक सामाजिक समायोजन स्थापित करने में असफल रहता है तथा उसके व्यक्तित्व पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अनावश्यक गुस्सा करने की समस्या के मुख्य कारणों तथा समस्या निवारण के उपायों का विवरण निम्नवर्णित है-

समस्या के कारण – अनावश्यक गुस्सा करने के असामान्य व्यवहार के विकास के लिए विभिन्न कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। सर्वप्रथम यदि बच्चे भी अधिकांश इच्छाओं की पूर्ति न करके उनकी निरन्तर अवहेलना की जाती है तो बालक में गुस्से की आदत प्रबल हो जाती है। बच्चे द्वारा सामान्य रूप से किए जाने वाले कार्यों में अनावश्यक बाधाओं के बार-बार आने से भी बच्चा असामान्य रूप से गुस्सा करने लगता है। किसी भी कारण से बच्चे में यदि ईर्ष्या की भावना प्रबल हो जाए तो भी बच्चा गुस्सैल बन जाता है।

बच्चे की स्वतन्त्र गतिविधियों पर अनावश्यक रूप से प्रतिबन्ध लगने से भी गुस्से की प्रवृत्ति प्रबल होने लगती है। बच्चे के द्वारा किए जाने वाले कार्यों की यदि निरन्तर आलोचना की जाती रहे तो भी बच्चा खिन्न होकर गुस्सा या क्रोध करने लगता है। कुछ निरन्तर लम्बे समय तक चलने वाले रोग या बच्चे की शारीरिक असमर्थता भी बच्चे को गुस्सैल बना देती है। कुछ विद्वानों ने अनावश्यक गुस्से को आनुवंशिक भी माना है। यदि बच्चे के माता-पिता भी अत्यधिक गुस्सैल हों तो उस स्थिति में आनुवंशिकता के आधार पर बच्चे में यह प्रवृत्ति आ जाती है।

समस्या का निवारण एवं देखभाल – बच्चे के अनावश्यक रूप से गुस्सा करने की समस्या के निवारण के लिए समुचित रूप से ध्यान रखना तथा उपाय करना आवश्यक होता है। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों की उचित इच्छाओं तथा आवश्यकताओं को पूरा करते रहें। कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे बच्चा चिड़ता हो। बच्चों के सामान्य कार्यों में बाधा नहीं डालनी चाहिए तथा कठोर नियन्त्रण से भी बचना चाहिए। बच्चों के सामान्य कार्यों एवं व्यवहार की अनावश्यक रूप से आलोचना नहीं करनी चाहिए तथा प्रत्येक अच्छे कार्य की खूब प्रशंसा करनी चाहिए।

यदि बच्चा ईर्ष्यावश क्रोध करता हो तो उसके ईर्ष्या भाव को शान्त करना चाहिए। इसके लिए स्नेहपूर्ण व्यवहार तथा सहयोग की प्रवृत्ति को प्रेरित करना चाहिए। ध्यान रहे जिस समय बच्चा अधिक गुस्से के आवेश में हो, उस समय बच्चे को डाँटना या पीटना नहीं चाहिए बल्कि प्यार एवं दुलार से नियन्त्रित करना चाहिए। यदि बच्चा किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या के कारण गुस्सैल बन गया हो तो उसकी सम्बन्धित समस्या के निवारण के उपाय करने चाहिए। इसके साथ ही बच्चे को अपने क्रोधी स्वभाव को छोड़ने के लिए सकारात्मक रूप से प्रेरित भी करते रहना चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में प्रायः देखी जाने वाली एक समस्या है ‘बिना कारण के भयभीत होना’। इस समस्या के मुख्य कारणों तथा निराकरण के उपायों एवं देखभाल का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
वैसे तो भय या भयभीत होना मानव स्वभाव का एक गुण या लक्षण है। वयस्क व्यक्ति भी अनेक परिस्थितियों में भयभीत हो जाते हैं परन्तु उनके भयभीत होने के पीछे कोई स्पष्ट कारण या खतरा निहित होता है। इसे असामान्य व्यवहार नहीं माना जाता परन्तु बच्चों में अनेक बार बिना पर्याप्त कारणों के ही भयभीत होने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। इस प्रवृत्ति को असामान्य व्यवहार तथा व्यवहारगत समस्या माना जाता है। बच्चे प्राय: काल्पनिक खतरों से डरते हैं। इस रूप में डरना अनेक बार व्यक्तित्व के विकास में बाधक बन जाता है। अनावश्यक रूप से डरने वाला बच्चा दब्बू बन जाता है तथा उसमें समुचित आत्मविश्वास का भी विकास नहीं हो पाता। बच्चों में बिना कारण के भयभीत होने की समस्या के कारणों तथा उसके निवारण के उपायों का विवरण निम्नवर्णित है –

समस्या के कारण – अनावश्यक रूप से भयभीत होने की प्रवृत्ति के लिए विभिन्न कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यदि गर्भावस्था में माँ अनावश्यक भय से ग्रस्त रहती है तो जन्म लेने वाला शिशु भी बिना कारण के भयभीत होने लगता है। यदि बच्चों को प्राय: भय उत्पन्न करने वाली कहानियाँ-किस्से सुनाए जाते रहें तो भी बच्चे के मन में भय घर कर जाता है। यदि बच्चे में आत्मविश्वास की कमी हो तो भी इस बात की आशंका रहती है कि वह भयग्रस्त रहने लगे। प्रायः बच्चा असहाय तथा कमजोर होने के कारण भी भयग्रस्त रहने लगता है। यदि परिवार के सदस्य किन्हीं कारणों से डरकर रहने वाले बन गए हों तो उस परिवार में बच्चे भी भयग्रस्त रहने लगते हैं।

समस्या का निवारण एवं देखभाल – बच्चों में व्याप्त होने वाली अनावश्यक भय की समस्या को रोकने तथा निवारण के लिए समुचित उपाय किए जाने चाहिए। सर्वप्रथम प्रत्येक भावी माता को गर्भावस्था में अपने आप को हर प्रकार के अनावश्यक तथा काल्पनिक भय से मुक्त रहना चाहिए। उसे पूर्ण आत्म-विश्वास तथा उत्साह में रहना चाहिए। यदि बच्चा किसी वस्तु, घटना या पशु आदि से डरने लगे तो उसके इस भय को समाप्त करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से प्रयास करने चाहिए। उदाहरण के लिए अधिकांश बच्चे बिल्ली-कुत्ते तथा अँधेरे से डरते हैं।

ऐसे अभिभावकों को चाहिए कि वे किसी पालतू बिल्ली-कुत्ते को पुचकार कर अपने निकट लाएँ तथा बच्चे को बताएं कि इनसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार अँधेरे स्थान पर प्रकाश करके दिखाना चाहिए कि वहाँ तो डरने वाला कोई कारक है ही नहीं। बच्चों को भयभीत होने से बचाने के लिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें डरावने कहानीकिस्से न सुनाए जाएँ तथा न ही टी०वी० पर प्रसारित होने वाले इस प्रकार के कार्यक्रम ही दिखाएँ। यदि बच्चा अनावश्यक रूप से डरने लगा ही तो उसकी इस आदत का उपहास न करें बल्कि उसे वीरता एवं साहस से कार्य करने के लिए प्रेरित करें।

प्रश्न 6.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बच्चों की उचित देखभाल के लिए ध्यान रखने योग्य बातों का विवरण दीजिए।
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था व्यक्तित्व विकास के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण होती है। इस अवस्था में सुचारु विकास तथा समस्याओं के नियन्त्रण के लिए अग्रलिखित बातों को ध्यान में रखना उपयोगी सिद्ध होता है –

  • माता-पिता तथा शिक्षकों का दायित्व है कि यदि बालक में स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई दोष या समस्या हो तो उसके निराकरण के लिए यथाशीघ्र प्रयास करने चाहिए।
  • शिक्षकों तथा अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों की जिज्ञासा प्रवृति को शान्त करने का हर सम्भव प्रयास करें। बच्चों को हर प्रकार की आवश्यक जानकारी सही ढंग से उपलब्ध कराएँ।
  • बच्चों की सामूहिक प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करने के लिए आवश्यक साधन एवं अवसर उपलब्ध कराए जाएँ। बच्चों के लिए सामूहिक खेलों की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • विद्यालय में शिक्षकों को चाहिए कि वे नेतृत्व की क्षमता वाले बच्चों का विशेष प्रशिक्षण दें।
  • बच्चों को व्यक्तित्व विकास के लिए समय-समय पर सरस्वती यात्राओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
  • विद्यालय में शिक्षकों को बालकों के समक्ष अच्छे-अच्छे सामूहिक खेलों का नमूना प्रस्तुत करना चाहिए।
  • बच्चों को स्वयं करके सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए, क्योंकि उनकी विविध प्रकार के कार्यों को करने की तीव्र प्रवृत्ति होती है।
  • अभिभावकों तथा शिक्षकों को चाहिए कि बालकों में आत्म संयम, स्वावलम्बन, आज्ञापालन, अनुशासन, विनयशीलता, उत्तरदायित्व आदि गुणों का विकास करें।
  • बालकों के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति का व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्हें कठोर अनुशासन तथा दण्ड से मुक्त रखना चाहिए।
  • बालकों को विभिन्न प्रकार के अन्धविश्वासों, दूषित प्रथाओं एवं छल-कपट की बातों से दूर रखना चाहिए।
  • बालकों को व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए। उन्हें यौन शोषण की समस्या के प्रति जागरूक बनाना चाहिए।
  • बच्चों की ‘संचय-प्रवृत्ति’ का सदुपयोग करने के लिए उन्हें अच्छी-अच्छी वस्तुओं को संचित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • बच्चों के नैतिक एवं सामाजिक विकास के लिए समुचित प्रयास किए जाने चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 25 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-‘प्रारम्भिक बाल्यावस्था में भाषागत विकास’।
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बालक का भाषागत विकास तेजी से होता है। इसके लिए बच्चे का खेल-समूह तथा विद्यालय का वातावरण जिम्मेदार होता है। इस अवस्था में पायी जाने वाली प्रबल जिज्ञासा प्रवृत्ति के परिणास्वरूप भी बालक का भाषागत विकास तेजी से होता है। इस अवस्था में बालक की भाषा में क्रिया, सर्वनाम, संयोजक तथा विभक्ति सूचक शब्दों का भी पर्याप्त समावेश हो जाता है। सामान्य रूप से बालक सुबह, दोपहर, शाम, रात, सर्दी-गर्मी तथा बरसात आदि शब्दों का भी सही अर्थों में प्रयोग करने लगता है। यही नहीं वह सार्वजनिक रूप से ‘नमस्कार’, ‘धन्यवाद’, ‘क्षमा करें’, ‘सॉरी’ आदि शब्दों को भी बोलना सीख लेता है।

यह सत्य है कि इस अवस्था में बालक के भाषागत विकास में वृद्धि होती है परन्तु इस अवस्था में बालक की भाषा में अनेक त्रुटियाँ तथा उच्चारण सम्बन्धी दोष भी पाए जाते हैं। इसके लिए अभिभावकों तथा शिक्षकों को सुधारने के समुचित उपाय करने चाहिए। इस अवस्था में बच्चों के भाषागत विकास में पर्याप्त विविधता देखी जा सकती है। इसके लिए बच्चे की आर्थिक-सामाजिक स्थिति शैक्षिक वातावरण तथा आवासीय क्षेत्र आदि कारक जिम्मेदार होते हैं। वर्तमान समय में टी०वी० के विभिन्न कार्यक्रम भी बच्चों के भाषागत विकास को गम्भीरता से प्रभावित करते हैं। जहाँ तक हो सके बच्चों को वहीं कार्यक्रम दिखाने चाहिए जो बच्चों के लिए प्रसारित किए जाते हैं। नगरीय वातावरण तथा ग्रामीण वातावरण भी बच्चों के भाषागत विकास को भिन्न-भिन्न रूप में प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए–’प्रारम्भिक बाल्यावस्था में दाँतों से नाखून काटने की समस्या या असामान्य व्यवहार’।
उत्तर
दाँतों से नाखून काटना –
बाल्यावस्था में दाँतों से नाखून काटना भी एक व्यवहार सम्बन्धी असामान्यता या समस्या है। यह व्यवहार एक असामान्य व्यवहार है तथा इससे विभिन्न हानियाँ हो सकती हैं। सर्वप्रथम यह व्यवहार देखने में भद्दा तथा अशोभनीय प्रतीत होता है। इसके साथ ही यह कार्य स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। प्रायः नाखूनों में गन्दगी तथा कुछ कीटाणु होते हैं। ऐसे में दाँतों से नाखून काटने से किसी रोग के संक्रमण की बहुत अधिक आशंका रहती है।

समस्या के कारण – दाँतों से नाखून काटने की असामान्य आदत के लिए विभिन्न कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। इस असामान्य व्यवहार का एक मुख्य कारण बच्चे में संवेगात्मक तनाव का प्रबल होना है। बच्चा अपने संवेगात्मक तनाव को कम करने के लिए यह असामान्य व्यवहार करता है। इसके साथ ही परिवार एवं अपने समूह से तिरस्कृत या उपेक्षित बालक भी इस आदत का शिकार हो सकता है। यदि बच्चा स्वभाव से चिड़चिड़ा तथा बेचैन रहता हो तो यह आदत विकसित हो जाती है। हीनता की भावना का शिकार बालक भी ऐसा असामान्य व्यवहार कर सकता है। कभी-कभी बच्चे के पास करने के लिए कोई काम न हो तथा वह अपने आप को खाली महसूस करता हो तो भी इस आदत के बनने की आशंका रहती है।

समस्या का निराकरण – सामान्य स्वास्थ्य तथा व्यक्तित्व के सुचारु विकास के लिए बच्चे में दाँतों से नाखून काटने की आदत का निराकरण करना आवश्यक होता है। इसके लिए कुछ उपाय करने पड़ते हैं। सर्वप्रथम इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा कभी यह महसूस न करे कि उसका तिरस्कार किया जा रहा है। बच्चे के संवेगात्मक तनाव को समाप्त करने का हर सम्भव उपाय करना चाहिए। इस असामान्य व्यवहार को करने वाले बच्चे में यदि हीन भावना व्याप्त हो तो उसे समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

इसके लिए समय-समय पर बच्चे की प्रशंसा करनी चाहिए। इस आदत को छुड़ाने का एक अच्छा व्यावहारिक उपाय है-बच्चे को किसी-न-किसी कार्य में व्यस्त रखना। बच्चे को किसी खेल या ड्राइंग बनाने आदि के कार्य में व्यस्त रखना चाहिए। ऐसे में बच्चे के हाथ खाली नहीं रहेंगे तथा उसे दाँत से नाखून काटने का अवसर ही उपलब्ध नहीं होगा।

प्रश्न 3.
बिस्तर पर मूत्र-त्याग की समस्या से क्या आशय है? अथवा टिप्पणी लिखिए-बिस्तर गीला करना।
उत्तरः
बच्चे द्वारा बिस्तर पर मूत्र-त्याग –
जन्म के बाद प्रारम्भिक काल में बालक का शौच एवं मूत्र-त्याग पर किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता तथा ये क्रियाएँ स्वतः ही चलती रहती हैं। इस काल में बच्चा बिस्तर पर या जहाँ भी होता है वहीं मूत्र-त्याग कर देता है। परन्तु धीरे-धीरे बच्चे को उचित स्थान पर ही मूत्र-त्याग के लिए प्रेरित किया जाता है तथा सामान्य रूप से तीन-चार वर्ष का बालक मूत्र-त्याग को नियन्त्रित कर लेता है। वह प्रायः उचित स्थान पर ही मूत्र-त्याग करता है, परन्तु यदा-कदा सोते समय बिस्तर पर ही मूत्र-त्याग कर दिया करता है।

यदि यह क्रिया यदा-कदा ही होती है तो उसे असामान्य नहीं माना जाता, परन्तु जब ऐसा नियमित रूप से होने लगता है तथा आयु बढ़ने के साथ भी यह आदत नहीं छूटती तब इसे एक असामान्य बात तथा समस्या के रूप में माना जाने लगता है। यह समस्या कई बार 10-12 वर्ष के बच्चों के साथ देखी जा सकती है। इस असामान्य व्यवहार के शिकार हुए बच्चे कभी-कभी जाग्रत अवस्था में भी कपड़ों में मूत्र-त्याग कर दिया करते हैं। ऐसा प्रायः किसी उत्तेजना या भय की स्थिति में हुआ करता है। इस असामान्य व्यवहार के शिकार बच्चों में हीन भावना घर कर जाती है तथा उसमें आत्मविश्वास कम होने लगता है। इस असामान्य व्यवहार के निवारण के लिए उचित प्रयास किए जाने चाहिए।

प्रश्न 4.
बच्चे द्वारा बिस्तर पर मूत्र-त्याग के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
बच्चे द्वारा बिस्तर पर मूत्र-त्याग के कारण –
बिस्तर अथवा कपड़ों में ही मूत्र-त्याग कर देने के असामान्य व्यवहार के सम्भावित कारणों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है –

  • यदि प्रारम्भ से ही बच्चे को मल-मूत्र त्याग का उचित प्रशिक्षण दे दिया जाए तो इस असामान्य व्यवहार के विकसित होने की सम्भावना कम रहती है।
  • सोने के लिए उचित एवं आरामदायक बिस्तर न होना। सर्दियों के मौसम में बिस्तर का ठण्डा होना भी एक महत्त्वपूर्ण कारण हो सकता है।
  • यदि बालक का पर्याप्त बौद्धिक विकास न हो तो भी यह समस्या हो सकती है। मन्दबुद्धि बालकों का मांसपेशियों एवं अन्य संस्थानों पर नियन्त्रण नहीं होता; अत: वे प्रायः अनियमित रूप से मल-मूत्र त्याग दिया करते हैं।
  • बच्चे द्वारा सामान्य से अधिक मात्रा में तरल पदार्थ विशेष रूप से ठण्डे तरल पदार्थ (शर्बत आदि) ग्रहण करना भी बिस्तर गीला करने का कारण बन सकता है।
  • पाचन क्रिया के अनियमित होने पर भी कभी-कभी बच्चा सोते हुए मूत्र-त्याग कर देता है।
  • संवेगात्मक तनाव के परिणामस्वरूप भी यह असामान्य व्यवहार हो सकता है। यदि कभी बच्चों को भूत-प्रेत की भयानक कहानियाँ या बातें सोने से पहले सुनाई जाएँ तो भी रात को सोते हुए बिस्तर पर ही मूत्र-त्याग हो सकता है।
  • अधिक शर्मीले एवं संवेदनशील बच्चों को प्राय: यह शिकायत हो जाती है।
  • परिवार में बच्चे का किसी प्रकार का तिरस्कार होने पर भी यह समस्या उत्पन्न हो सकती है। कभी-कभी छोटे भाई-बहन को अभिभावकों द्वारा अधिक प्यार किए जाने पर भी यह समस्या खड़ी हो जाती है।
  • किसी भी कारण से बच्चों में हीनभावना जाग्रत होने पर या आत्मविश्वास में कमी आ जाने पर भी बिस्तर गीला करने की समस्या उठ सकती है।
  • बच्चों में असुरक्षा एवं भय की भावना प्रबल होने पर भी बिस्तर गीला करने की आदत पड़ सकती है।
  • किसी शारीरिक दोष के कारण भी यह असामान्य क्रिया हो सकती है। गुर्दो के दोष या नाड़ी संस्थान के समुचित नियन्त्रण के अभाव में भी यह समस्या उत्पन्न हो सकती है।

प्रश्न 5.
बच्चों द्वारा बिस्तर पर मूत्र-त्याग की समस्या के निवारण के उपाय बताइए।
उत्तरः
बिस्तर पर मूत्र-त्याग समस्या का निवारण –
बच्चों द्वारा बिस्तर गीला करने की समस्या के निवारण के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं –

  • बच्चों को मल-मूत्र त्याग के लिए यथासम्भव उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
  • यदि बच्चा संवेगात्मक तनाव या अस्थिरता का शिकार हो तो उसके संवेगात्मक तनाव को समाप्त करने के लिए उपाय किए जाने चाहिए। इसके लिए बच्चे को प्यार तथा धैर्य से समझाना एवं बहलाना चाहिए। ऐसे बच्चों को कभी भी डाँटना, फटकारना या पीटना नहीं चाहिए। बिस्तर गीला करने की बात को लेकर इनकी न तो हँसी उड़ानी चाहिए और न ही उन्हें शर्मिन्दा करना चाहिए।
  • बच्चे को यह अनुभव कराना चाहिए कि वह हर प्रकार से सुरक्षित है। उसमें आत्मविश्वास भी जाग्रत करना चाहिए।
  • बच्चे की पाचन क्रिया का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए तथा सोने से कम-से-कम दो घण्टे पूर्व ही भोजन करवा देना चाहिए।
  • सोने से पहले बच्चे को अधिक मात्रा में कोई भी तरल पदार्थ पीने के लिए नहीं देना चाहिए।
  • सोने से पहले बच्चे को मूत्र-त्याग करवा देना चाहिए तथा रात में भी एक-दो बार उठाकर बच्चे को मूत्र-त्याग करवा देना चाहिए।

प्रश्न 6.
टिप्पणी लिखिए–’बालक की जिज्ञासा की सन्तुष्टि’।
उत्तरः
बालक की जिज्ञासा की सन्तुष्टि –
बालकों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति बड़ी प्रबल होती है। वे व्यापक जगत के विषय में अधिक-से-अधिक जानना चाहते हैं। इस उद्देश्य से वे माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों से तरह-तरह के प्रश्न पूछा करते हैं। बालकों के कुछ प्रश्न कभी-कभी अतार्किक तथा अटपटे भी होते हैं। इससे कभी-कभी माता-पिता खीज जाते हैं तथा बच्चे को डाँटकर चुप करा देते हैं। यह उचित नहीं है। बच्चे के सभी प्रश्नों का धैर्यपूर्वक उत्तर देना चाहिए तथा उसकी जिज्ञासा को जहाँ तक सम्भव हो सके अवश्य ही सन्तुष्ट करना चाहिए।

बच्चों की जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के लिए जहाँ तक हो सके सरल एवं स्पष्ट भाषा को अपनाना चाहिए। बच्चे की जिज्ञासा की सन्तुष्टि से उसका मानसिक एवं बौद्धिक विकास सुचारु रूप से होता है। यही नहीं इसका उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत यदि बालक की जिज्ञासा का दमन किया जाता है तो उसका प्रतिकूल प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। ऐसे में बालक कुछ कुण्ठाओं का शिकार हो सकता है।

प्रश्न 7.
टिप्पणी लिखिए-बच्चों के विकास में खेल का महत्त्व।
उत्तरः
बच्चों के लिए खेल का महत्त्व –
बाल-विकास में खेल का अत्यधिक महत्त्व है। बाल-विकास के विभिन्न पक्षों को सुचारु बनाने में खेलों का विशेष योगदान होता है। सर्वप्रथम खेलों से बच्चों का शारीरिक विकास सुचारु होता है। खेल से शरीर सुदृढ़ होता है तथा उसकी वृद्धि एवं विकास को गति प्राप्त होती है। इसी प्रकार खेल के माध्यम से बच्चों का सामाजिक विकास भी सुचारु रूप से होता है।

खेल के माध्यम से बच्चे सहयोग, समानता, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा अनुशासन जैसे सामाजिक गुणों को सरलता से आत्मसात कर लेते हैं परिणामस्वरूप उनका उत्तम सामाजिक विकास हो जाता है। जहाँ तक संवेगात्मक विकास का प्रश्न है, उसमें भी खेल से समुचित योगदान प्राप्त होता है। खेलों से संवेगात्मक तनाव दूर होता है तथा संवेगात्मक स्थिरता एवं आवश्यक नियन्त्रण की क्षमता का विकास होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बाल-विकास में खेलों का बहुपक्षीय महत्त्व है।

प्रश्न 8.
बालकों द्वारा अंगूठा चूसने की समस्या का सामान्य परिचय दीजिए।
अथवा
बालक के अँगूठा चूसने की आदत पर दो बिन्दु लिखिए।
अथवा
बालक की अंगूठा चूसने की आदत आप कैसे छुड़ाएँगी?
उत्तरः
बालक का अंगूठा चूसना –
जब बालक बहुत छोटा होता है तो उसको केवल अपने शरीर से ही प्रेम होता है। उसका अँगूठा चूसना इसी प्रेम का प्रदर्शन है। अंगूठा चूसने से उसे कोई रस नहीं मिलता लेकिन उसे इसकी आदत पड़ जाती है और उसे छोड़ना मुश्किल पड़ जाता है। कुछ बच्चे जब काफी बड़े हो जाते हैं, तब भी इस आदत को नहीं छोड़ते हैं। उन्हें उनके माता-पिता और घर के सदस्य बहुत धमकाते हैं। धमकाने पर तो अँगूठा बाहर निकल आता है लेकिन थोड़ी देर बाद फिर वही आदत शुरू हो जाती है। इस आदत को छुड़ाने के लिए माता-पिता अँगूठे पर मिर्च या अन्य कोई कड़वी वस्तु लगा देते हैं तथा बच्चे को यह भी समझाते हैं कि अँगूठा चूसने से वह पतला पड़ जाएगा।

वास्तव में इस प्रकार के उपाय उचित नहीं हैं। इस समस्या के निदान के लिए विभिन्न उपाय किए जा सकते हैं। सर्वप्रथम बच्चे को सही समय पर आहार दिया जाना चाहिए ताकि वह भूखा न रहे। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे का हाथ खाली न रहे। हाथ में कोई खिलौना दे देना चाहिए। अनेक बार अंगूठा चूसने की आदत के पीछे कोई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकता है। ऐसे में बच्चे का संवेगात्मक सन्तुलन बनाए रखना चाहिए। उसका किसी भी प्रकार से तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए। बच्चे को हर प्रकार से सन्तुष्ट एवं प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाना चाहिए।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए – ‘बालक का हकलाना’।
उत्तरः
बालक का हकलाना –
बच्चों में कुछ रोग या दोष जन्म से ही विद्यमान होते हैं। इन पर विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है इसी प्रकार का एक दोष हकलाना भी है। हकलाना एक भाषा सम्बन्धी दोष है। इस दोष में बालक शब्दों का उचित एवं स्पष्ट उच्चारण नहीं कर पाता। यदि बच्चा भय के कारण हकलाता है तो उसका भय दूर किया जा सकता है। हकलाने वाले बच्चों के साथ प्रेम तथा सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए। कुछ बच्चे बड़े होने पर हकलाना स्वयं ही छोड़ देते हैं, कुछ हकलाना कम कर देते हैं लेकिन कुछ बच्चे जीवन भर हकले ही बने रहते हैं। यदि मुँह या जीभ में किसी प्रकार का दोष हो तो उसके निवारण से भी हकलाना ठीक हो जाता है, परन्तु मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक उपचार ही उपयोगी होता है।

प्रश्न 10.
भाई-बहनों में पायी जाने वाली ईर्ष्या का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
भाई-बहनों में ईर्ष्या भाई-बहनों में ईर्ष्या का पाया जाना एक मनोवैज्ञानिक दोष है। भाई-बहनों में ईर्ष्या, घर के वातावरण के कारण पैदा होती है। कुछ लोग लड़कों को अधिक प्यार करते हैं और लड़कियों को हीन भावना से देखते हैं। लड़कियों की उपेक्षा की जाती है। ऐसी स्थिति में भाई-बहनों में ईर्ष्या का होना स्वाभाविक है।

कभी-कभी ईर्ष्या दोनों के स्वभाव में अन्तर होने के कारण भी हो जाती है। ईर्ष्या को दूर करना माता-पिता का परम कर्तव्य है। प्रेम न होने से घर में वातावरण दूषित हो जाता है। घर का एक सदस्य दूसरे को बुरी भावना से देखता है जिससे मस्तिष्क में अशान्ति रहती है। संरक्षकों को चाहिए कि अपने पुत्र तथा पुत्री के साथ एक-सा व्यवहार करें जिससे ईर्ष्या होने का प्रश्न ही न उठे।

प्रश्न 11.
स्पष्ट कीजिए कि बच्चे झूठ क्यों बोलते हैं?
उत्तरः
“बच्चे झूठ क्यों बोलते हैं” –
बच्चों से जब कोई गलती हो जाती है तो वे समझते हैं कि गलती के कारण उन पर मार पड़ेगी। उदाहरण के लिए यदि बच्चे से गिलास टूट जाता है तो वह नहीं बताना चाहता कि गलती उससे हो गई है। ऐसी अवस्था में बच्चे को समझाना चाहिए कि गिलास टूट जाने दो, घबराने की कोई बात नहीं है लेकिन झूठ न बोलो। जब बच्चे के मस्तिष्क से भय निकल जाएगा तो वह झूठ नहीं बोलेगा।

कुछ बच्चे माता-पिता से झूठ बोलना सीख जाते हैं। वे झूठ बोलने में कोई बुराई नहीं समझते। झूठ बोलना साधारण बात समझते हैं।
बच्चों को झूठ बोलने से बचाने के लिए उनके हृदय से भय निकाल देना चाहिए। यदि बच्चे से गलती हो जाए तो उसे समझाना चाहिए तथा उसे माफ कर देना चाहिए। बच्चों को झूठ बोलने से रोकने के लिए ऐसी कहानी सुनानी चाहिए जिससे वे यह अनुभव करने लगें कि झूठ बोलने का परिणाम अच्छा नहीं होता। आजकल दूरदर्शन पर भी बच्चों के कुछ शिक्षाप्रद कार्यक्रम प्रसारित होते हैं जो सच बोलने तथा अन्य सद्गुणों को अपनाने की व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 25 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किस आयु-अवधि को प्रारम्भिक बाल्यावस्था के रूप में निर्धारित किया गया है?
उत्तरः
2-3 वर्ष से 5-6 वर्ष की आयु-अवधि को प्रारम्भिक बाल्यावस्था के रूप में निर्धारित किया गया है।

प्रश्न 2.
एक वाक्य में प्रारम्भिक बाल्यावस्था का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बच्चे शैशवावस्था की तुलना में कुछ अधिक विकसित तथा सक्षम हो जाते हैं। उनकी अन्य व्यक्तियों पर निर्भरता कुछ कम हो जाती है।

प्रश्न 3.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था को अन्य किस रूप में जाना जाता है?
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था को ‘सामाजिक अवस्था’ के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 4.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था की दो मुख्य विशेषताएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था की दो मुख्य विशेषताएँ हैं – (i) आत्मनिर्भरता का विकास तथा (ii) सामूहिक प्रवृत्ति की परिपक्वता।

प्रश्न 5.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में होने वाली अनुभवों में वृद्धि को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
इस अवस्था में बालक को परिवार के बाहर स्कूल, पड़ोस तथा संगी-साथियों से नित नए अनुभव प्राप्त होते हैं, जिनसे न केवल उसके ज्ञान में वृद्धि होती है बल्कि वह जीवन की वास्तविकता से भी परिचित होने लगता है।

प्रश्न 6.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में होने वाले सामाजिक विकास में सर्वाधिक योगदान किसका होता है?
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में होने वाले सामाजिक विकास में सर्वाधिक योगदान खेल-समूह तथा विद्यालय के वातावरण का होता है।

प्रश्न 7.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था की मुख्य समस्याएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था की मुख्य समस्याएँ हैं-अनावश्यक गुस्सा करना, बिना कारण ही भयभीत हो जाना, बिस्तर गीला करना तथा दाँतों से नाखून काटना।

प्रश्न 8.
बालकों में अनावश्यक गुस्सा करने की आदत कैसे प्रबल हो जाती है?
उत्तरः
यदि बच्चे की अधिकांश इच्छाओं की पूर्ति न करके उनकी निरन्तर अवहेलना की जाती है तो बच्चे में गुस्से की आदत प्रबल हो जाती है।

प्रश्न 9.
अनावश्यक रूप से भयभीत रहने वाले बच्चे पर इस आदत का क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
अनावश्यक रूप से भयभीत रहने वाले बच्चे दब्बू बन जाते हैं तथा उनमें समुचित आत्मविश्वास का भी विकास नहीं हो पाता।

प्रश्न 10.
बच्चों द्वारा बिस्तर गीला करने की समस्या का मुख्य कारण क्या होता है?
उत्तरः
बच्चों द्वारा बिस्तर गीला करने की समस्या का मुख्य कारण है प्रारम्भ में बच्चे को मलमूत्र त्याग का उचित प्रशिक्षण न देना।

प्रश्न 11.
बच्चों में दाँतों से नाखून काटने के असामान्य व्यवहार का मुख्य कारण क्या होता है?
उत्तरः
बच्चों में दाँतों से नाखून काटने के असामान्य व्यवहार का मुख्य कारण बच्चों में संवेगात्मक तनाव का प्रबल होना है।

प्रश्न 12.
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में ध्यान रखने योग्य एक मुख्य बात बताइए।
उत्तरः
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में बच्चों के माता-पिता तथा शिक्षकों का दायित्व है कि यदि बच्चे में स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई दोष या समस्या हो तो उसके निराकरण के लिए यथा शीघ्र प्रयास करने चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 25 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. बाल-विकास की प्रक्रिया में शैशवावस्था के उपरान्त आने वाली अवस्था को कहा जाता है –
(क) असहाय अवस्था
(ख) प्रारम्भिक बाल्यावस्था
(ग) बाल्यावस्था
(घ) परिपक्वता की अवस्था।
उत्तरः
(ख) प्रारम्भिक बाल्यावस्था।

2. 2-3 से 5-6 वर्ष की आयु-अवधि को बाल-विकास की अवस्था माना जाता है –
(क) महत्त्वपूर्ण अवस्था
(ख) अस्पष्ट अवस्था
(ग) प्रारम्भिक बाल्यावस्था
(घ) असहाय अवस्था।
उत्तरः
(ग) प्रारम्भिक बाल्यावस्था।

3. प्रारम्भिक बाल्यावस्था की विशेषता है –
(क) आत्मनिर्भरता का विकास
(ख) प्रबल जिज्ञासा प्रवृत्ति
(ग) खेल-कूद का विकास
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

4. प्रारम्भिक बाल्यावस्था में किस विकास की दर अधिक होती है –
(क) शारीरिक विकास
(ख) सामाजिक विकास
(ग) सम्पूर्ण विकास
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तरः
(ख) सामाजिक विकास।

5. प्रारम्भिक बाल्यावस्था में समस्या प्रबल नहीं होती –
(क) अनावश्यक गुस्सा करना
(ख) बिना कारण के भयभीत होना
(ग) यौन समस्याएँ
(घ) दाँतों से नाखून काटना।
उत्तरः
(ग) यौन समस्याएँ।

6. बच्चे के भयभीत होने की समस्या का कारण हो सकता है –
(क) भय उत्पन्न करने वाली कहानियाँ सनाना
(ख) बच्चे में आत्मविश्वास की कमी होना ।
(ग) परिवार में डर या भय का वातावरण होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 जीवित ऊतक : कोशिकीय संरचना

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 जीवित ऊतक : कोशिकीय संरचना (Living Tissues: Cellular Structure)

UP Board Class 11 Home Science Chapter 1 जीवित ऊतक : कोशिकीय संरचना

UP Board Class 11 Home Science Chapter 1 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवित कोशिका की रचना का चित्र बनाकर उसके प्रत्येक भाग के कार्य का वर्णन कीजिए।
अथवा “कोशिका मानव शरीर की इकाई है।” स्पष्ट कीजिए। एक जीवित कोशिका का चित्र बनाइए · तथा इसके भागों के नाम व कार्य बताइए। अथवा जीवित प्राणी कोशिका की बनावट को चित्र सहित समझाइए।
उत्तर:
“कोशिका मानव शरीर की इकाई है’ (Cell is a Unit of Human Body):

सभी जीवों का शरीर कोशिका (cell) या कोशिकाओं (cells) से मिलकर बना है। मनुष्य एक बहुकोशिकीय प्राणी है, जिसके शरीर में असंख्य कोशिकाएँ होती हैं। प्रत्येक कोशिका जीवद्रव्य (protoplasm) का एक पिण्ड है तथा सभी कोशिकाएँ अपने-अपने जैविक कार्य (vital activities) स्वयं करती हैं। अत: शरीर को बनाने वाली ये कोशिकाएँ जीवित संरचनाएँ कहलाती हैं। इस प्रकार, कोशिका शरीर की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाई है। कोशिकाओं का आकार सूक्ष्म होता है तथा इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखा जा सकता है।

अनेक सूक्ष्म कोशिकाएँ मिलकर एक विशेष कार्य को करने के लिए समूह के रूप में व्यवस्थित रहती हैं। इन समूहों को ऊतक (tissue) कहते हैं। किसी अंग (organ) को बनाने में एक से अधिक प्रकार के ऊतक मिलकर (सम्मिलित रूप में) व्यवस्थित होते हैं तथा कोई कार्य करने में एक-दूसरे की सहायता करते हैं। दूसरी ओर, विभिन्न अंग मिलकर एक अंग-तन्त्र या संस्थान (organ system) तथा अनेक अंग-तन्त्र मिलकर शरीर (body) बनाते हैं।

एक-एक कोशिका की जैव सक्रियता से ही सम्पूर्ण अंग-तन्त्र एक विशेष कार्य को करने में सक्षम होता है। अतः स्पष्ट है कि कोशिका मानव शरीर की इकाई है।

प्राणी कोशिका (Animal Cell):

प्राणियों के शरीर में विद्यमान कोशिकाएँ आकार में अत्यन्त सूक्ष्म होती हैं; अतः ये केवल सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखी जा सकती हैं। मनुष्यों के शरीर में विद्यमान कोशिकाओं का आकार 0 : 0001 मिमी से 0.0001 मिमी तक होता है। कार्य के अनुसार कोशिकाओं का आकार भिन्न-भिन्न हो सकता है, फिर भी ये प्रायः गोल होती हैं। अन्य कोशिकाओं की उपस्थिति तथा उनके दबाव के कारण वे बहुभुजी हो जाती हैं।

एक सामान्य जन्तु कोशिका, जैसा कि अब तक के अध्ययनों से ज्ञात है, सामान्यतः एक दोहरी कला से घिरे जीवद्रव्य (protoplasm) का एक पिण्ड है। जीवद्रव्य में अनेक घटक या कोशिकांग (organelle) होते हैं, जिनमें सबसे अधिक व्यवस्थित तथा स्पष्ट संरचना केन्द्रक (nucleus) है। केन्द्रक के अतिरिक्त शेष जीवद्रव्य को आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा साइटोसोम (cytosome) नाम दिया गया है तथा इसके तरल भाग को कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) कहा जाता है। कोशिकाद्रव्य के दो भाग किए जा सकते हैं-

एक्टोप्लास्ट या कोशिका कला (Ectoplast or Plasmalemma):
यह एक इकाई कला है, जो प्रोटीन तथा वसा की बनी होती है और विभिन्न पदार्थों के कोशिका के अन्दर आने-जाने का नियमन करती है। इसमें अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। अनेक पोषक पदार्थ कोशिका कला में बनी थैलियों में अन्दर धंसते रहते हैं। इन थैलियों को पिनोसाइटिक आशय (pinocytic vesicles) कहते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 13
मीजोप्लास्ट (Mesoplast):
कोशिका कला के अन्दर शेष कोशिकाद्रव्य को मीजोप्लास्ट कहते हैं। इनके अनेक भाग हैं, जो एक समांगी व अविरत हायलोप्लाज्म (hyaloplasm) में रहते हैं। इस द्रव्य में पड़ी हुई वस्तुओं को ही कोशिकीय अन्तर्वस्तुएँ कहते हैं।

कोशिका की आन्तरिक संरचना तथा कार्य (Internal Structure and Functions of a Cell):

सक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर प्राणि कोशिका के जो भाग दिखाई देते हैं, उनकी संरचना तथा कार्यों का विवरण निम्नवर्णित है-

अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic reticulum):
यह अनेक झिल्लियों से बना विभिन्न प्रकार की संरचनाएँ बनाने वाला जाल है। इसमें तीन प्रकार की संरचनाएँ दिखाई पड़ती हैं

  • वेसिकल्स (vesicles): ये अण्डाकार थैलियाँ हैं।
  • सिस्टर्नी (cisternae): ये भी थैलियाँ ही होती हैं, किन्तु ये लम्बी, चपटी, शाखाविहीन तथा एक-दूसरे के समानान्तर होती हैं।
  • नलिकाएँ (tubules): ये नलिकाएँ वेसिकल्स एवं सिस्टर्नी इत्यादि को आपस में जोड़ती हैं और जालिका का निर्माण करती हैं।

कोशिका के इस भाग को कोशिका का परिवहन तन्त्र माना जा सकता है। यह कोशिका द्रव्य में कंकाल का निर्माण करता है। यह विभिन्न प्रकार के पदार्थों का कोशिकाद्रव्य में संवहन करता है। यही भाग विभिन्न प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए आधार प्रदान करता है। प्रोटीन संश्लेषण का कार्य इसी आधार पर होता है।

माइटोकॉण्ड्यिा (Mitochondria):
ये जीवित कलाओं की दोहरी परत के द्वारा बने हुए अण्डाकार या शलाका के आकार के कोशिकांग हैं। इनके अन्दर विभिन्न प्रकार के पदार्थ, विशेषकर श्वसन सम्बन्धी एंजाइम्स आदि होते हैं। ये सूक्ष्म रचनाएँ हैं। माइटोकॉण्ड्रिया श्वसन केन्द्र है। ऊर्जा के सिक्के, ATP यहीं पर बनते हैं। इसीलिए इन्हें ऊर्जा केन्द्र कहते हैं।

गॉल्जीकाय (Golgi body):
यह कुछ झिल्लियों की एक सामूहिक संरचना है। अनेक झिल्लियों के बने थैले जैसे आकार, प्रमुखत: तीन प्रकार के होते हैं-

  • एक के ऊपर एक तहों के रूप में फँसे हुए चपटे आकार सिस्टर्नी (cisternae),
  •  सिस्टर्नी के किनारों पर टूटकर अलग होने वाली अनेक छोटी-छोटी पुटिकाएँ (vesicles) तथा
  • चौड़ी थैली के आकार की ही गोल रिक्तिकाएँ (vacuoles)

कोशिका के इस भाग का मुख्य कार्य कुछ पदार्थों का स्रावण (secretion) करना है। इसके अतिरिक्त इस भाग द्वारा ही कुछ सरल पदार्थों को जोड़कर जटिल पदार्थों का भी निर्माण किया जाता है।

तारककाय या सेण्ट्रोसोम (Centrosome):
केन्द्रक के निकट मिलने वाली यह संरचना एक या दो या अधिक स्थानों पर कुछ छड़ों के समान इकट्ठे हुए कणों से बनती है। ये तारककेन्द्र या सेण्ट्रिओल्स (centrioles) कहलाते हैं। इनको चारों ओर से घेरे हुए जीवद्रव्य की आकृति किरणों (rays) के रूप में पूरे तारककाय की रचना करती है। तारककाय कोशिका विभाजन के समय अधिक स्पष्ट दिखाई देता है तथा दो भागों में बँटकर तर्क के दोनों ध्रुवों पर चला जाता है। इनका कार्य कोशिका विभाजन से सम्बन्धित होता है।

राइबोसोम्स (Ribosomes):
ये अति सूक्ष्म कण की तरह की संरचनाएँ हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के आर०एन०ए० अणुओं (RNA mols.) का संग्रह होता है। ये मुख्य रूप से प्रोटीन्स के संश्लेषण का कार्य करते हैं।

माइक्रोसोम्स (Microsomes):
ये विभिन्न आकार की सूक्ष्म संरचनाएँ हैं, जो अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के विभिन्न भागों (पुटिकाओं, सिस्टर्नी आदि) के अलग हो जाने से बनती हैं। इन अलग हुए भागों में अनेक राइबोसोम्स भी लगे रहते हैं। इस प्रकार ये हायलोप्लाज्म में स्वतन्त्र रूप में पड़े रहते हैं। इनका मुख्य कार्य अनेक प्रकार के पदार्थों का संग्रह करना तथा उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाना होता है।

लाइसोसोम्स (Lysosomes):
ये माइटोकॉण्ड्रिया से कुछ छोटी (0. 21 μ से 0 .80 μ), लगभग गोल, थैले जैसी रचनाएँ हैं, जो कुछ जन्तुओं में देखी गई हैं। इनकी कला एक इकाई कला होती है। इन संरचनाओं में विभिन्न प्रकार के पाचक एंजाइम्स भरे रहते हैं। ये एंजाइम्स प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, DNA, RNA इत्यादि के बड़े अणुओं को तोड़कर छोटे अणुओं में बदल देते हैं।

रिक्तिकाएँ (Vacuoles): ये झिल्ली से ढकी हुई ऐसी संरचनाएँ हैं, जिनमें जल में घुले हुए अनेक पदार्थ जैसे लवण तथा शर्कराएँ आदि रहते हैं। इस घोल को सेल सैप (cell sap) कहा जाता है। ये जन्तु कोशिका में कम तथा छोटे आकार की पायी जाती हैं। इनकी उपस्थिति से जल का आदान-प्रदान होता रहता है और कोशिका में जल की मात्रा का नियमन होता है।

अन्य सूक्ष्म संरचनाएँ (Other micro structures): उपरिवर्णित आकारों के अतिरिक्त भी, अन्य अनेक प्रकार के छोटे-छोटे आकार कोशिकाओं में मिलते हैं। ये अन्त:प्रद्रव्यी जालिका आदि से पुटिकाओं के रूप में टूटकर अलग हो जाने से बनते हैं। इनके द्वारा विभिन्न प्रकार के विशिष्ट कार्य किए जाते हैं।

केन्द्रक (Nucleus): यह एक अधिक घना कोशिकांग है। इसमें क्रोमेटिन (chromatin) नामक पदार्थ के सूत्र होते हैं, जो सामान्य अवस्था में जाल के रूप में रहते हैं। इसके चारों ओर एक दोहरी झिल्ली होती है, जिसे केन्द्रक कला (nuclear membrane) कहते हैं। क्रोमेटिन जाल के अतिरिक्त केन्द्रक में केन्द्रक रस (nuclear sap) तथा एक या अधिक केन्द्रिक (nucleolus) होते हैं। प्राणी कोशिका में केन्द्रक प्राय: कोशिका के मध्य में स्थित होता है।

कोशिका का यह भाग पूरी कोशिका पर नियन्त्रण रखता है। कोशिका का यही भाग उसके विभिन्न भागों के कार्यों का नियमन करता है तथा सन्तति कोशिकाओं में लक्षणों की आनुवंशिकी भी इसके द्वारा ही होती है।

प्रश्न 2.
मानव शरीर में पायी जाने वाली विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं का सामान्य परिचय दीजिए। अथवा हमारे शरीर में कितने प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं? प्रत्येक प्रकार की कोशिका का चित्र सहित सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
प्राणि शरीर की समस्त कोशिकाओं की आन्तरिक रचना समान होती है, परन्तु इन कोशिकाओं की बाहरी आकृति अथवा स्वरूप में पर्याप्त अन्तर एवं विविधता देखी जा सकती है। शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों एवं भागों में विद्यमान कोशिकाओं का आकार एवं बाहरी रूप भिन्न-भिन्न होता है। यही कारण है कि हमारे शरीर में गोल, चपटी, लम्बी तथा बेलनाकार कोशिकाएँ देखी जा सकती हैं। वास्तव में प्राणि-शरीर में विद्यमान कोशिकाओं में न केवल आकार की भिन्नता पायी जाती है बल्कि उनके द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं। शरीर की कोशिकाओं की आकृति की भिन्नता तथा इनके द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्यों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए शरीरशास्त्र के अन्तर्गत मुख्य रूप से छह प्रकार की कोशिकाओं का उल्लेख किया जाता है।
कोशिकाओं के इन विभिन्न प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है-

आच्छादक कोशिकाएँ या उपकला कोशिकाएँ (Epithelium cells):
शरीर के प्रायः सभी भागों में पायी जाने वाली एक प्रकार की कोशिकाओं को आच्छादक या उपकला कोशिका (epithelial cells) कहते हैं। इन कोशिकाओं का आकार चपटा होता है तथा सामान्य रूप से इन कोशिकाओं द्वारा कुछ महीन झिल्लियाँ बनती हैं। इस प्रकार से बनने वाली झिल्लियाँ शरीर के आवरण का कार्य करती हैं। इन झिल्लियों से निर्मित आवरण शरीर के अंगों की रक्षा भी करते हैं। आच्छादक कोशिकाओं का एक विशिष्ट गुण यह होता है कि इन कोशिकाओं में रिक्त स्थान नहीं होता। रिक्त स्थान न होने के कारण आच्छादक कोशिकाओं में अन्तःकोशीय पदार्थ भी नहीं पाया जाता।

पेशी कोशिकाएँ (Muscular cells):
द्वितीय प्रकार की शरीर-कोशिकाओं को पेशी कोशिकाएँ (muscular cells) कहते हैं। इन कोशिकाओं से क्रमश: पेशी ऊतक तथा शरीर की सभी मांसपेशियों का निर्माण होता है। पेशी कोशिकाएँ लम्बे तथा पतले आकार की होती हैं। पेशी कोशिकाएँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं, जिन्हें क्रमशः ऐच्छिक पेशी कोशिकाएँ तथा अनैच्छिक पेशी कोशिकाएँ कहा जाता है। इनके अतिरिक्त हृदय में एक भिन्न प्रकार की पेशियाँ भी पायी जाती हैं और उन्हें हृद पेशी के नाम से जाना जाता है।

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रक्त कोशिकाएँ (Blood cells):
शरीर में रक्त का निर्माण करने वाली कोशिकाओं को रक्त कोशिकाएँ (blood cells) कहते हैं। प्राणी शरीर में ये कोशिकाएँ भी दो प्रकार की पायी जाती हैं। एक प्रकार की रक्त कोशिकाओं को श्वेत रक्त कोशिकाएँ तथा दूसरे प्रकार की रक्त कोशिकाओं को लाल रक्त कोशिकाएँ कहते हैं। दोनों प्रकार की रक्त कोशिकाओं का आकार भी भिन्न-भिन्न होता है तथा उनके कार्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं। सामान्य रूप से श्वेत रक्त कोशिकाओं का कोई निश्चित आकार नहीं होता, ये अनियमित, गोल आकार की किन्तु लिजबिजी-सी होती हैं।

ये रक्त कोशिकाएँ मुख्य रूप से शरीर को सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करती हैं। जहाँ तक लाल रक्त कोशिकाओं का प्रश्न है, उनका आकार गोल टिकिया के समान होता है। इन कोशिकाओं का आकार उभयावतल (biconcave) होता है; अर्थात् ये कोशिकाएँ दोनों ओर मध्य से कुछ पिचकी हुई होती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं का मुख्य कार्य शरीर में ऑक्सीजन का परिवहन करना है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि रक्त में श्वेत एवं लाल रक्त कोशिकाओं का अनुपात भिन्न होता है। सामान्य रूप से लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या, श्वेत कोशिकाओं की तुलना में बहुत अधिक होती है।

अस्थि कोशिकाएँ (Bone cells):
शरीर की अस्थियों का निर्माण करने वाली कोशिकाएँ, अस्थि कोशिकाएँ (bone cells) कहलाती हैं। इन कोशिकाओं का आकार अनियमित होता है। इन कोशिकाओं की रचना कुछ इस प्रकार होती है कि इन कोशिकाओं का केन्द्रक अन्य कोशिकाओं के केन्द्रक की तुलना में बड़ा होता है। इन कोशिकाओं के चारों ओर कुछ अत्यधिक सूक्ष्म रेशे भी पाए जाते हैं। ये सूक्ष्म रेशे वास्तव में रक्त कोशिकाओं तथा तन्त्रिकाओं द्वारा घिरे रहते हैं।

संयोजक कोशिकाएँ (Connective cells):
शरीर के किन्हीं दो भागों को आपस में जोड़ने का कार्य करने वाली कोशिकाओं को संयोजक कोशिकाएँ (connective cells) कहा जाता है। इन कोशिकाओं का आकार भी अनियमित ही होता है। इन कोशिकाओं की रचना कुछ इस प्रकार की होती है कि उनके बीच रिक्त स्थान अपेक्षाकृत रूप से अधिक होता है। इसी कारण इन कोशिकाओं में अन्त:कोशीय पदार्थ भी सामान्य से अधिक विद्यमान होता है। इस प्रकार की कोशिकाओं से बने ऊतकों में सामान्य रूप से कुछ महीन झिल्लियाँ बनती हैं।

तन्त्रिका कोशिकाएँ (Nerve cells):
तन्त्रिका या स्नायु कोशिकाएँ (nervous cells) सम्पूर्ण शरीर में पायी जाती हैं। ये कोशिकाएँ कुछ लम्बे तथा तिकोने आकार की होती हैं। इन्हीं कोशिकाओं से शरीर के सम्पूर्ण तन्त्रिका तन्त्र का निर्माण होता है। तन्त्रिका तन्त्र की सम्पूर्ण शरीर में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। तन्त्रिका तन्त्र द्वारा ही सम्पूर्ण शरीर की गतिविधियों का परिचालन एवं नियन्त्रण होता है। इन महत्त्वपूर्ण कार्यों के पीछे तन्त्रिका कोशिकाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका निहित रहती है।

प्रश्न 3.
‘ऊतक’ शब्द से क्या तात्पर्य है? ये कितने प्रकार के होते हैं? ऊतकों की संरचना तथा कार्य का विवरण दीजिए।
अथवा ऊतक से क्या तात्पर्य है? निम्नलिखित ऊतक शरीर में कहाँ पाए जाते हैं-
(क) उपकला ऊतक (एपीथीलियम),
(ख) तन्त्रिका ऊतक।
इन ऊतकों की रचना एवं कार्य लिखिए। अथवा ऊतक कितने प्रकार के होते हैं? ऊतक के कार्य लिखिए।
उत्तर:
ऊतक (Tissues):
जीवित प्राणियों के शरीर की इकाई को कोशिका कहते हैं। कोशिकाएँ शरीर की इकाई होते हुए भी शरीर के अंगों के निर्माण में प्रत्यक्ष रूप से योगदान नहीं देतीं। अंगों के निर्माण के लिए शरीर में एक अन्य संरचना की आवश्यकता होती है। यह संरचना कोशिकाओं के समूहीकरण से बनती है तथा इसे ऊतक (tissue) कहते हैं। स्पष्ट है कि ऊतकों का निर्माण कोशिकाओं से होता है। इस प्रकार ऊतक अनेक कोशिकाओं के व्यवस्थित समूह का नाम है। सामान्य रूप से एक ही प्रकार की अनेक कोशिकाएँ परस्पर सम्बद्ध होकर एक विशिष्ट संरचना का निर्माण करती हैं तथा शरीर-रचना विज्ञान के अन्तर्गत इसी संरचना को ऊतक कहते हैं। सभी प्राणियों के शरीर में विभिन्न प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के ऊतकों की रचना तथा कार्यों में पर्याप्त अन्तर देखा जा सकता है। ऊतकों से शरीर के अंगों का निर्माण होता है। इस प्रकार शरीर में ऊतकों का विशेष महत्त्व है।

ऊतकों के प्रकार (Kinds of Tissues):
मानव शरीर में निम्नलिखित चार प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं-

  • उपकला ऊतक (epithelial tissues);
  • संयोजी ऊतक (connective tissues);
  • पेशी ऊतक (muscular tissues);
  • तन्त्रिका ऊतक (nervous tissues)

1. उपकला ऊतक (Epithelial tissues):
उपकला ऊतक सदैव महीन परतों के रूप में पाए जाते हैं। ये परतें शरीर के अंगों पर बाहरी अथवा भीतरी रक्षक आवरण बनाती हैं। ये ऊतक दो प्रकार के होते हैं-
A. सामान्य उपकला (Simple epithelium): ये केवल एक स्तर के रूप में होते हैं। कोशिकाओं के आकार एवं कार्य के आधार पर ये कई प्रकार के हो सकते हैं; यथा

  • शल्की उपकला (squamous epithelium): इस प्रकार के ऊतकों की कोशिकाएँ चौड़ी, चपटी तथा परस्पर सटी रहती हैं। इनका प्रमुख कार्य रक्षात्मक होता है।
  • स्तम्भी उपकला (columnar epithelium): इस प्रकार के ऊतकों की कोशिकाएँ लम्बी तथा परस्पर सटी होती हैं। आहार नाल के अधिकांश भाग की दीवार का भीतरी स्तर इसी प्रकार के ऊतकों का बना होता है। ये पचे हुए तरल खाद्य पदार्थों का अवशोषण करते हैं।
  • घनाकार उपकला (cuboidal epithelium): इस प्रकार के ऊतकों की कोशिकाएँ घनाकार होती हैं। ये ऊतक मूत्र व जनन नलिकाओं, जनन ग्रन्थियों आदि में पाए जाते हैं। जनन ग्रन्थियों में ये ऊतक जनन उपकला कहलाते हैं।
  •  ग्रन्थिल उपकला (glandular epithelium): शरीर में स्थित विभिन्न प्रकार की ग्रन्थियाँ इस प्रकार के उपकला ऊतकों की बनी होती हैं। इनमें कोशिकाएँ किसी-न-किसी स्रावी पदार्थ का स्त्रावण करती हैं।
  • रोमाभि उपकला (ciliated epithelium): इस प्रकार के ऊतकों की प्रत्येक कोशिका के स्वतन्त्र किनारे पर अनेक रोमाभिकाएँ (cilia) लगी रहती हैं। ये ऊतक श्वास नली, अण्डवाहिनी, मूत्रवाहिनी आदि का भीतरी स्तर बनाते हैं।
  • तत्रिका-संवेदी उपकला (neuro-sensory epithelium): इनकी कोशिकाओं के स्वतन्त्र सिरे पर संवेदी रोम होते हैं। संवेदी रोम संवेदनाओं को ग्रहण करने का कार्य करते हैं। ये अन्त:कर्ण की उपकला, घ्राण अंगों की श्लेष्मिक कला तथा आँखों की रेटिना में पाए जाते हैं।

B. स्तरित उपकला (Stratified epithelium):
यह कई स्तरों की बनी होती है। सबसे भीतरी स्तर की कोशिकाएँ निरन्तर विभाजित होकर नए स्तर बनाती रहती हैं। इस स्तर को जनक स्तर
(germinative layer) कहते हैं। इससे बने स्तर बाहर की ओर खिसकते रहते हैं। सबसे बाहर का स्तर घर्षण के कारण मृत होकर अलग होता रहता है; जैसे-त्वचा की ऐपिडर्मिस, ग्रास नली, नासा गुहाओं, योनि आदि में।
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2. संयोजी ऊतक (Connective tissues):
इस प्रकार के ऊतक शरीर में सबसे अधिक होते हैं। ये सभी अंगों के भीतर तथा दो अंगों के बीच में पाए जाते हैं। इन ऊतकों का प्रमुख कार्य अंगों को सहारा प्रदान करना, अंगों को ढककर इनकी रक्षा करना तथा इन्हें परस्पर बाँधे रखना होता है। इन ऊतकों की कोशिकाएँ एक आधारभूत पदार्थ या मैट्रिक्स (matrix) स्रावित करती हैं और स्वयं भी इसी में धंसी रहती हैं। संयोजी ऊतक निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
A. सामान्य संयोजी ऊतक (General connective tissues):इस प्रकार के ऊतकों में मैट्रिक्स तरल या अर्द्ध-तरल जैली के रूप में होता है। ये ऊतक कई प्रकार के होते हैं; जैसे

वर्णक ऊतक (pigmented tissues): ये ऊतक त्वचा की डर्मिस में मिलते हैं। इनमें वर्णक कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें क्रोमेटोफोर्स (chromatophores) भी कहते हैं। इनके कोशिका द्रव्य में अनेक रंगीन कणिकाएँ होती हैं। इन ऊतकों में इलास्टिन तन्तु तथा लिम्फोसाइट्स भी पाए जाते हैं।

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वसामय ऊतक (adipose tissues): ये ऊतक त्वचा के नीचे पाए जाते हैं। ये पीत अस्थि मज्जा के चारों ओर तथा रक्त वाहिनियों के आस-पासभी पाए जाते हैं। इनमें बड़ी-बड़ी गोल वसा कोशिकाएँ होती हैं, जो वसा गोलकों से भरी होती हैं।

अन्तराली संयोजी ऊतक (interstitial connective tissues): ये ऊतक शरीर के सभी आन्तरिक अंगों के चारों ओर पाए जाते हैं। इनकामैट्रिक्स जैली के समान पारदर्शक तथा चिपचिपा होता है। इनमें दो प्रकार के तन्तु श्वेत कोलेजन तन्तु (white collagen fibres) तथा पीले इलास्टिनतन्तु (yellow elastin fibres) पाए जाते हैं। श्वेत कोलेजन तन्तु लहरदार गुच्छों में पाए जाते हैं जबकि पीले इलास्टिन तन्तु अकेले इधर-उधर बिखरेरहते हैं। मैट्रिक्स में तन्तुओं के अतिरिक्त कई प्रकार की कोशिकाएँ; जैसे फाइब्रोब्लास्ट, हिस्टियोसाइट्स, प्लाज्मा कोशिकाएँ, मास्ट कोशिकाएँआदि भी पायी जाती हैं।

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B. तन्तमय संयोजी ऊतक (Fibrous connective tissues): इनमें मैट्रिक्स की मात्रा कम तथा तन्तुओं की संख्या अधिक होती है। इनमें दो प्रकार के तन्तु होते हैं-एक श्वेत तथा लोचरहित होते हैं, जिनके ऊतक कड़े तथा मजबूत होते हैं तथा दूसरे पीले, शाखित एवं लचीले होते हैं। ये ऊतक कण्डरा (tendon), स्नायु (ligaments) तथा पेशियों के आवरण बनाते हैं।

C. कंकाल संयोजी ऊतक (Skeletal connective tissues): सभी कशेरुकी जन्तुओं में कंकाल का निर्माण कंकाल ऊतक करते है । ये दो प्रकार के होता है –
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उपास्थि (cartilage): उच्च श्रेणी के कशेरुकी जन्तुओं में उपास्थि की मात्रा अस्थि से कम होती है। इसमें मैट्रिक्स, कॉण्ड्रिन नामक अर्द्ध-ठोस प्रोटीन से बना होता है। इसमेंबहुत-से छोटे-छोटे गड्ढे या गर्तिकाएँ होती हैं, जिनमें एक तरल. पदार्थ भरा रहता है। प्रत्येक गर्तिका में कॉण्ड्रियोब्लास्ट नामक कोशिका होती है। उपास्थि पेरीकॉण्ड्रियम (perichondrium) नामक झिल्ली से ढकी रहती है। इसमें रक्त वाहिनियाँ प्रवेश कर उपास्थि को पोषक पदार्थ प्रदान करती हैं। नाक, कान के पिन्ना आदि को उपास्थि ही सहारा देती है।

अस्थि (bone): इन ऊतकों में मैट्रिक्स, ओसीन नामक प्रोटीन से बना होता है। इसमें कैल्सियम और मैग्नीशियम के कण जमा होने से यह कठोरहो जाती है। अस्थि की गुहा को मज्जा गुहा कहते हैं। इसमें वसामय ऊतक भरा रहता है, जिसे अस्थि मज्जा (bone marrow) कहते हैं। अस्थि केमध्य भाग में पीली अस्थि मज्जा तथा सिरों पर लाल अस्थि मज्जा होती है। लाल अस्थि मज्जा में लाल रुधिर कणिकाओं का निर्माण होता है। मज्जा गुहाको घेरे हुए अन्तराच्छद नामक स्तर होता है। इसकी कोशिकाएँ (osteoblasts), ओसीन (ossein) स्रावित करती हैं, जो संकेन्द्रीय धारियों के रूप मेंएकत्र होती रहती हैं और मैट्रिक्स बनाती हैं। इन धारियों को पटलिकाएँ कहते हैं। इनमें गर्तिकाएँ होती हैं। गर्तिका में अस्थि कोशिका होती है। अस्थि के आवरण को अस्थिच्छद कहते हैं, जिसमें अनेक महीन तन्त्रिकाएँ और रुधिर वाहिनियाँ होती हैं। मैट्रिक्स में रुधिर वाहिनियों के प्रवेश हेतु नलिकाएँ बन जाती हैं, जिन्हें हैवर्सियन नलिकाएँ (haversian canals) कहते हैं। प्रत्येक हैवर्सियन नलिका 8-15 संकेन्द्रीय पटलिकाओं द्वारा घिरी रहती है। इस पूरी रचना को हैवर्सियन तन्त्र कहते हैं।

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D. तरल संयोजी ऊतक (Fluid connective tissues): रुधिर तथा लसीका तरल ऊतकों के उदाहरण हैं। इनमें मैट्रिक्स तरल अवस्था में होता है और प्लाज्मा (plasma) कहलाता है। यह सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर वाहिनियों और केशिकाओं के अन्दर बहता है। इन ऊतकों में तन्तुओं का अभाव होता है; कोशिकाएँ प्लाज्मा का स्राव नहीं करती हैं। इनमें कई प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं।

3. पेशी ऊतक (Muscular tissues):
पेशी कोशिकाओं के समूहीकरण से पेशी ऊतकों का निर्माण होता है। शरीर की मांसपेशियों का निर्माण इन्हीं ऊतकों से होता है। पेशी ऊतक सम्पूर्ण शरीर में पाए जाते हैं। ये त्वचा के नीचे तथा अस्थियों के ऊपर पाए जाते हैं। पेशी ऊतक ही मांसपेशियों के माध्यम से विभिन्न शारीरिक क्रियाओं एवं गतियों को सम्पन्न कराते हैं। पेशी ऊतक भी तीन प्रकार के होते हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है-

A. रेखित या ऐच्छिक पेशी ऊतक (Striped or Voluntary muscular tissues): एक विशेष प्रकार की मांसपेशियों का निर्माण करने वाले ऊतक, रेखित या ऐच्छिक ऊतक (striped or voluntary tissues) कहलाते हैं। इस प्रकार के तन्तु लम्बे, अशाखित तथा बेलनाकार होते हैं। इस प्रकार के ऊतक शरीर के उन समस्त भागों में पाए जाते हैं, जो गति करते हैं।

B. अरेखित या अनैच्छिक पेशी ऊतक (Unstriped or Involuntary muscular tissues): द्वितीय प्रकार के पेशी ऊतकों को अरेखित या अनैच्छिक पेशी ऊतक (unstriped or involuntary muscular tissues) कहते हैं। इस प्रकार के पेशी ऊतक शरीर के उन भागों या अंगों में पाए जाते हैं, जिनकी गति या क्रिया स्वत: होती रहती है। इस प्रकार अनैच्छिक पेशी ऊतक मुख्य रूप से आहार नाल, रक्त वाहिनियों की भित्ति, मूत्राशय, पित्ताशय तथा जनन वाहिनियों में पाए जाते हैं।
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C. हृद-पेशी ऊतक (Cardiac muscular tissues): तृतीय प्रकार के पेशी ऊतकों को हृद-पेशी ऊतक (cardiac muscular tissues) कहते हैं। इस प्रकार के पेशी ऊतक केवल हृदय की मांसपेशियों का निर्माण करते हैं। इन ऊतकों में ऐच्छिक तथा अनैच्छिक दोनों प्रकार के ऊतकों के गुण समन्वित रहते हैं।

4. तन्त्रिका ऊतक (Nervous tissues):
ये ऊतक विभिन्न प्रकार के ऊतकों के मध्य स्थित होते हैं। इनकी कोशिकाएँ तन्त्रिका कोशिकाएँ या न्यूरॉन्स (neurons) कहलाती हैं। इन कोशिकाओं का निर्माण गर्भावस्था में ही हो जाता है तथा ये एक बार नष्ट होने पर दोबारा निर्मित नहीं होती हैं; अर्थात् इनका पुनरुद्भवन (regeneration) सम्भव नहीं है।

मस्तिष्क, सुषुम्ना, तन्त्रिकाएँ आदि इसी प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने हुए हैं। ये कोशिकाएँ मिलकर तन्त्रिका तन्तुओं (nerve fibres) का निर्माण करती हैं। ये कोशिकाएँ विशेष आकार व संरचना की होती हैं—प्रत्येक तन्त्रिका कोशिका में एक मुख्य जीवद्रव्यी भाग होता है, इसी में केन्द्रक (nucleus) रहता है। कोशिका में अनेक छोटी-बड़ी शाखाएँ होती हैं। इनमें से एक बड़ी शाखा तन्त्रिकाक्ष (axon) बनाती है, जो वास्तव में तन्तु का निर्माण करती है। शेष छोटी शाखाएँ वृक्षिकाएँ (dendrons) कहलाती हैं; जो अन्य कोशिकाओं की ऐसी ही शाखाओं की और छोटी शाखाओं, जिन्हें वृक्षिकान्त (dendrites) कहते हैं, के साथ युग्मों (synapses) का निर्माण करती हैं। इस प्रकार ये कोशिकाएँ तन्त्रिका ऊतक का भाग हैं। ये ऊतक शरीर में संवेदनाओं को एक स्थान पर ग्रहण कर दूसरे स्थान तक लाने-ले जाने अर्थात् ग्रहण करने तथा संचालन का कार्य करते हैं।
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UP Board Class 11 Home Science Chapter 1 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवद्रव्य के भौतिक एवं जैविक गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जीवद्रव्य के गुण
कोशिकीय रचना के सन्दर्भ में जीवद्रव्य के गुणों का अध्ययन करना भी आवश्यक है। जीवद्रव्य कोशिका-झिल्ली द्वारा घिरा रहता है। यह अर्द्ध-पारदर्शक जैली के समान गाढ़ा, चिपचिपा तथा रंगहीन पदार्थ होता है। वास्तव में कोशिका का जीवन उसके इसी भाग पर निर्भर रहता है। जीवद्रव्य के भौतिक एवं जैविक गुणों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है
(अ) भौतिक गुण:

  • जीवद्रव्य चिपचिपा, पारभासी तथा जैली की तरह अर्द्ध-तरल है। यह जल में अविलेय है, किन्तु इसकी अत्यधिक मात्रा को अवशोषित कर सकता है। यह जल से भारी है। अनेक प्रकार के ठोस, तरल (बूंदों के रूप में) तथा गैस इत्यादि इसमें तैरते रहते हैं।
  • जीवद्रव्य अत्यधिक प्रत्यास्थ होता है और अपने सामान्य स्वरूप से 25 गुना अधिक फैल सकता है। इसी कारण यह तुरन्त अपनी सामान्य स्थिति को लौट सकता है।
  • जीवद्रव्य की श्यानता बदलती रहती है; यहाँ तक कि यह एक ही कोशिका के अन्दर अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न तथा एक ही स्थान पर भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में अलग-अलग होती है।
  • यह तरल से जैल अवस्था या इसके विपरीत बदलता रहता है।
  • यह स्कन्दित होकर संकुचित हो सकता है। यह कार्य विभिन्न प्रकार के भौतिक परिवर्तनों के कारण हो सकता है, जैसे-ताप परिवर्तन, विद्युत प्रवाह, pH परिवर्तन आदि।
  • जीवद्रव्य पर प्रकाश पुंज डालने से इसके कण किरणों को इधर-उधर छितरा देते हैं (टिण्डल . घटना); अतः प्रकाश का मार्ग तथा ये कण हमें दिखाई दे जाते हैं।
  • जीवद्रव्य, कोशिका के अन्दर इधर-उधर घूमता रहता है (प्रवाही गति)। यदि यह गति एक ही बड़ी रिक्तिका (vacuole) के चारों ओर हो तो घूर्णन (rotation), किन्तु जब अनेक रिक्तिकाओं के चारों ओर हो तो परिसंचरण (circulation) कहलाती है।

(ब) जैविक गुण:
रासायनिक संरचना तथा इसकी भौतिक प्रकृति के कारण जीवद्रव्य में अनेक विशेष लक्षण होते हैं .. जो जीवन को प्रदर्शित करते हैं। ये प्रमुख लक्षण हैं-गति या चलन, पोषण, उपापचय, श्वसन, उत्सर्जन, उत्तेजनशीलता, वृद्धि, जनन आदि।

प्रश्न 2.
वनस्पति तथा जन्तु (प्राणी) कोशिकाओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वनस्पति तथा जन्तु (प्राणी) कोशिकाओं में अन्तर .
वनस्पति कोशिकाओं तथा जन्तु (प्राणी) कोशिकाओं में विद्यमान अन्तर का. विवरण चित्र सहित अग्रवत् है-
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 10

प्रश्न 3.
ऊतकों का शरीर में क्या महत्त्व है? अथवा ऊतक कितने प्रकार के होते हैं? ऊतकों के कार्य लिखिए। अथवा टिप्पणी लिखिए-ऊतक एवं उनकी उपयोगिता।
उत्तर:
ऊतकों के प्रकार एवं कार्य या महत्त्व
अनेक कोशिकाओं के व्यवस्थित समूह को ऊतक (tissues) कहते हैं। मानव शरीर में चार प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं। ये प्रकार हैं क्रमश:
(i) उपकला ऊतक,
(ii) संयोजी ऊतक,
(iii) पेशी ऊतक तथा
(iv) तन्त्रिका ऊतक। शरीर में ऊतकों के महत्त्व अथवा कार्यों का विवरण निम्नलिखित है-

  • कोशिकाएँ अति सूक्ष्म आकार की होती हैं, वे शरीर की आवश्यकता के अनुसार कार्य नहीं कर पातीं। इन कार्यों को ऊतक ही सफलतापूर्वक करते हैं।
  • ऊतकों की उपस्थिति के कारण श्रम का विभाजन होता है; अर्थात् विभिन्न ऊतक अपने-अपने विशिष्ट कार्यों को सम्पादित करते हैं।
  • ऊतक ही मिलकर अंग बनाते हैं तथा उसको एक बड़े तथा विशिष्ट कार्य को करने में सहायता प्रदान करते हैं।
  • विभिन्न अंगों के मध्य कुछ ऊतक संयोजन का कार्य करते हैं। जैसे-रुधिर तथा लसीका विभिन्न प्रकार के पदार्थों को एक अंग से दूसरे अंग में पहुँचाने अथवा लाने-ले जाने का विशिष्ट कार्य करते हैं।
  • कुछ ऊतक शरीर की बाहरी वातावरण आदि से सुरक्षा करते हैं अथवा सुरक्षा करने में सहयोग देते हैं। जैसे—उपकला ऊतक शरीर पर विशिष्ट आवरण बनाते हैं; तन्त्रिका ऊतक बाह्य आघातों की सूचना मस्तिष्क को देते हैं तथा उसके नियमन कार्य के रूप में उन अंगों को कार्यवाही करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो सुरक्षा करने के योग्य हैं।
  • अनेक ऊतक शरीर का विशिष्ट स्वरूप बनाने में सहायता करते हैं; जैसे-कंकालीय ऊतक (skeletal tissues), पेशी ऊतक (muscular tissues) आदि। स्पष्ट है कि ऊतकों द्वारा विभिन्न कार्य सम्पादित किए जाते हैं तथा शरीर में इनका विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 4.
शरीर-रचना के सन्दर्भ में अंग (organ) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अंग का अर्थ
अंग शरीर के उन भागों को कहा जाता है, जो अपने आकार एवं गुणों के कारण स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकते हैं। अंगों का निर्माण ऊतकों से होता है। हम कह सकते हैं कि जब किसी एक ही प्रकार के कुछ ऊतक परस्पर सम्बद्ध होकर शरीर के किसी ऐसे भाग की रचना करते हैं, जो अपने विशेष आकार तथा गुणों के कारण शरीर के अन्य भागों से अलग पहचाना जाता है, तो शरीर के उस भाग को शरीर के एक अंग (organ) के रूप में जाना जाता है। शरीर के सभी अंगों का अपना-अपना महत्त्व होता है तथा उनके द्वारा विशिष्ट कार्य किया जाता है। उदाहरणार्थ-आँख एक अंग है, जिसका अपना विशिष्ट आकार है तथा उसके द्वारा देखने का कार्य किया जाता है। इसी प्रकार हृदय, यकृत तथा गुर्दे आदि भी विभिन्न अंग हैं तथा ये अपने-अपने कार्य करते हैं। उँगली, हाथ, बाँह, पैर तथा टाँग आदि को भी विशेष अंग ही माना जाएगा।

प्रश्न 5.
शरीर-रचना के सन्दर्भ में तन्त्र या संस्थान (system) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
तन्त्र अथवा संस्थान का अर्थ
हमारा शरीर विभिन्न व्यवस्थित कार्य सम्पन्न करता है। विशिष्ट कार्यों को व्यवस्थित ढंग से कोई एक अंग सम्पन्न नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए पाचन-क्रिया को केवल मुँह या आमाशय पूरा नहीं कर सकता है। इसी प्रकार श्वसन या रक्त परिसंचरण की क्रिया को शरीर का कोई एक अंग सम्पन्न नहीं कर सकता। इन व्यवस्थित क्रियाओं को पूरा करने के लिए शरीर के विभिन्न अंगों को परस्पर सहयोग से कार्य करना पड़ता है। इस प्रकार, किसी विशिष्ट प्रक्रिया को पूरा करने के लिए या शरीर के किसी विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शरीर के अनेक अंग परस्पर सम्बद्ध होकर कार्य करते हैं तथा इन सभी अंगों की व्यवस्था को ही शरीर-रचना विज्ञान में तन्त्र या संस्थान (system) कहते हैं।

उदाहरणार्थ- श्वसन क्रिया को सम्पन्न करने के लिए नासिका, श्वास नलिका, श्वसनी तथा फेफड़े आदि अंग परस्पर सम्बद्ध होकर श्वसन तन्त्र के रूप में कार्य करते हैं। इसी प्रकार पाचन क्रिया को सम्पन्न करने के लिए आहार नाल के विभिन्न अंग तथा कुछ अन्य ग्रन्थियाँ परस्पर सम्बद्ध होकर पाचन तन्त्र के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रकार से परस्पर सम्बद्ध होकर कार्य करने वाले अंगों की व्यवस्था को ही तन्त्र या संस्थान कहते हैं। हमारे शरीर में विभिन्न तन्त्र हैं, जो अपने-अपने कार्यों को सफलतापूर्वक करते रहते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शरीर के विभिन्न तन्त्र आपस में सम्बद्ध रहते हैं तथा पारस्परिक सहयोग से सम्पूर्ण शरीर को चलाते हैं। हमारे शरीर के मुख्य तन्त्र या संस्थान निम्नलिखित हैं-

  • कंकाल या अस्थि तन्त्र (Skeletal system);
  • पेशी तन्त्र (Muscular system);
  • पाचन तन्त्र (Digestive system);
  • श्वसन तन्त्र (Respiratory system);
  • रुधिर-परिसंचरण तन्त्र (Circulatory system);
  • उत्सर्जन तन्त्र (Excretory system);
  • तन्त्रिका तन्त्र (Nervous system);
  • प्रजनन तन्त्र (Reproductive system);
  • अन्तःस्रावी तन्त्र (Endocrine system)।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 1 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कोशिका से क्या आशय है?
उत्तर:
कोशिका प्राणियों के शरीर की सबसे छोटी संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई को कहते हैं।

प्रश्न 2.
शरीर की सबसे छोटी संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई को क्या कहते हैं?
उत्तर:
शरीर की सबसे छोटी संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई को कोशिका (cell) कहते हैं।

प्रश्न 3.
प्राणियों के शरीर में पायी जाने वाली कोशिकाओं को हम कैसे देख सकते हैं?
उत्तर:
प्राणियों के शरीर में पायी जाने वाली कोशिकाओं को हम सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देख सकते हैं।

प्रश्न 4.
क्लोरोफिल नामक पदार्थ किस वर्ग की कोशिकाओं में पाया जाता है?
उत्तर:
क्लोरोफिल नामक पदार्थ वनस्पति कोशिकाओं में पाया जाता है। .

प्रश्न 5.
कोशिका के सन्दर्भ में जीवद्रव्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कोशिका का मुख्य भाग जीवद्रव्य कहलाता है। यह अर्द्ध-पारदर्शक जैली के समान गाढ़ा, चिपचिपा तथा रंगहीन पदार्थ होता है। .

प्रश्न 6.
हमारे शरीर में कितने प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में छह प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं-

  • आच्छादक कोशिकाएँ या उपकला कोशिकाएँ,
  • पेशी कोशिकाएँ,
  • रक्त कोशिकाएँ,
  • अस्थि कोशिकाएँ,
  • संयोजक कोशिकाएँ,
  • तन्त्रिका कोशिकाएँ।

प्रश्न 7.
स्नायु तन्त्र की कोशिका का नाम लिखिए।
उत्तर:
स्नायु तन्त्र की कोशिका का नाम है-तन्त्रिका कोशिका अथवा स्नायु कोशिका (nervous cell)

प्रश्न 8.
जन्तु तथा पादप कोशिका में क्या समानता होती है? ‘
उत्तर:
जन्तु तथा पादप कोशिकाओं में मुख्य समानता यह है कि इन दोनों में केन्द्रक तथा जीवद्रव्य पाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
एक ही प्रकार की अनेक कोशिकाओं के समूहीकरण से बनने वाली संरचना को क्या कहते हैं?
उत्तर:
ऊतक या तन्तु (tissue)

प्रश्न 10.
मानव शरीर में कितने प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं? अथवा कार्य के आधार पर मानव ऊतकों के प्रकार दीजिए।
उत्तर:
मानव शरीर में कार्यों के आधार पर चार प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं-

  • उपकला ऊतक,
  • संयोजी ऊतक,
  • पेशी ऊतक,
  • तन्त्रिका ऊतक।

प्रश्न 11.
पेशी ऊतक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं-

  • रेखित या ऐच्छिक पेशी ऊतक,
  • अरेखित या – अनैच्छिक पेशी ऊतक तथा
  • हृद-पेशी ऊतक।

प्रश्न 12.
अनेक ऊतकों के परस्पर सम्बद्ध होने से बनने वाली संरचना को क्या कहते हैं?
उत्तर:
अनेक ऊतकों के परस्पर सम्बद्ध होने से बनने वाली संरचना को अंग (organ) कहते हैं जैसे-हृदय, यकृत, गुर्दे, हाथ, पैर, बाँह आदि।

प्रश्न 13.
शरीर के तन्त्र अथवा संस्थान से क्या आशय है?
उत्तर:
शरीर के किसी विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, शरीर को परस्पर सहयोग प्रदान करने वाले अनेक अंगों की व्यवस्था को तन्त्र अथवा संस्थान कहते हैं जैसे कि पाचन तन्त्र अथवा श्वसन तन्त्र।

प्रश्न 14.
मानव शरीर के मुख्य तन्त्र या संस्थान बताएँ।
उत्तर:
मानव शरीर के मुख्य तन्त्र या संस्थान हैं—पाचन तन्त्र, कंकाल तन्त्र, रक्त परिसंचरण तन्त्र, उत्सर्जन तन्त्र तथा प्रजनन तन्त्र।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 1 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
कोशिका के विषय में सत्य है-
(क) यह जीवित संरचना है
(ख) इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा ही देखा जा सकता है
(ग) यह शरीर की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाई है
(घ) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं।

प्रश्न 2.
मानव शरीर की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है –
(क) ऊतक
(ख) कोशिका
(ग) अंग
(घ) तन्त्र या संस्थान।
उत्तर:
(ख) कोशिका।

प्रश्न 3.
वनस्पति तथा जन्तु कोशिकाओं में समान रूप से पाए जाते हैं –
(क) क्लोरोफिल नामक पदार्थ
(ख) ग्लाइकोजन
(ग) स्टार्च
(घ) केन्द्रक तथा जीवद्रव्य।
उत्तर:
(घ) केन्द्रक तथा जीवद्रव्य।

प्रश्न 4.
जन्तु कोशिकाओं के अन्तर्गत नहीं पाया जाता
(क) जीवद्रव्य
(ख) कोशिका भित्ति
(ग) माइटोकॉण्ड्रिया
(घ) केन्द्रका
उत्तर:
(ख) कोशिका भित्ति।

प्रश्न 5.
आच्छादक कोशिकाएँ पायी जाती हैं(क) शरीर की हड्डियों में
(ख) शरीर की पेशियों में
(ग) शरीर के रक्त में
(घ) शरीर की झिल्लियों में।
उत्तर:
(घ) शरीर की झिल्लियों में।

प्रश्न 6.
अस्थि कोशिकाओं का आकार होता है –
(क) गोल
(ख) पतला-लम्बा
(ग) चपटा
(घ) अनियमित।
उत्तर:
(घ) अनियमित।

प्रश्न 7.
अनेक कोशिकाओं के मिलने से बनने वाली रचना है –
(क) शरीर
(ख) तन्त्र
(ग) ऊतक
(घ) अंग।
उत्तर:
(ग) ऊतक।

प्रश्न 8.
ऊतकों का निर्माण होता है- .
(क) अपने आप से
(ख) पोषण से
(ग) कोशिकाओं के मिलने से
(घ) आकस्मिक रूप से।
उत्तर:
(ग) कोशिकाओं के मिलने से।

प्रश्न 9.
ऊतकों के परस्पर सम्बद्ध होने से बनने वाली संरचना को कहते हैं –
(क) हाथ
(ख) पैर
(ग) तन्त्र
(घ) अंग।
उत्तर:
(घ) अंग।

प्रश्न 10.
कुछ अंगों के व्यवस्थित ढंग से कार्य करने के परिणामस्वरूप विकसित होने वाली संरचना
को कहते हैं
(क) शरीर
(ख) स्नायविक रचना
(ग) तन्त्र या संस्थान
(घ) जीवित प्राणी।
उत्तर:
(ग) तन्त्र या संस्थान।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 20 बालक-बालिका सम्बन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 20 बालक-बालिका सम्बन्ध (Boys-Girls Relationship)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 20 बालक-बालिका सम्बन्ध

UP Board Class 11 Home Science Chapter 20 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बालक-बालिका सम्बन्धों एवं मेल-मिलाप पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तरः
छह वर्ष की अवस्था के लगभग लड़के-लड़की बिना भेदभाव के एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जब बालक तथा बालिकाएँ 7 से 12 वर्ष की आयु में आ जाते हैं तो बहुत कुछ आपस में समझने लगते हैं। उनको अपनी शारीरिक तथा सामाजिक स्थिति का ज्ञान होने लगता है। समाज में 12 वर्ष की अवस्था तक बालक तथा बालिकाएँ एक साथ खेल सकते हैं, पढ़ सकते हैं तथा घूम सकते हैं।

13 से 18 वर्ष की आयु में दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। 18 वर्ष की अवस्था में यह काम-चेतना अपने प्रबलतम रूप में लड़के व लड़कियों में आ जाती है, सामाजिक बन्धन उन्हें बुरे लगने लगते हैं।

कक्षा 8 तक के लड़के और लड़कियाँ एक साथ पढ़ सकते हैं, लेकिन इण्टरमीडिएट कक्षाओं में एक साथ शिक्षा देना अधिक उचित नहीं है। इस अवस्था में उनका मानसिक एवं संवेगात्मक ज्ञान अपरिपक्व होता है। वे भावनाओं की तीव्रता से शीघ्र प्रभावित हो जाते हैं और अनुचित कार्य कर बैठते हैं। वे अपना हित-अहित नहीं समझते हैं।

डिग्री कक्षाओं में पहुँचकर विद्यार्थियों के अनुभव परिपक्व होने लगते हैं। इस स्तर पर छात्र-छात्राओं का तार्किक पक्ष भी काफी विकसित हो जाता है। उनमें उत्तरदायित्व की भावना भी आ जाती है। इस कारण इस स्तर पर यदि लड़का-लड़की मैत्री सम्बन्ध स्थापित करें तो कोई हानि नहीं है।

सह-शिक्षा से वे एक-दूसरे को भली-भाँति समझ लेते हैं। परिचय प्राप्त कर लेने से लड़के-लड़की का वैवाहिक जीवन बहुत सुखपूर्वक बीतता है, क्योंकि वे एक-दूसरे के आदर्शों से परिचित हो जाते हैं। बहुत-से गरीब घराने की लड़कियों की शादी सम्पन्न घराने में हो जाती है क्योंकि लड़के सुन्दर एवं शिक्षित लड़कियों के इच्छुक होते हैं। इस प्रकार लड़कियों के माता-पिता दहेज के चक्रव्यूह से बच जाते हैं।

बालक-बालिका सम्बन्धों का उपर्युक्त विवरण एक पारम्परिक मान्यता से जुड़ा हुआ है। वर्तमान सामाजिक, पारिवारिक तथा व्यावसायिक परिस्थितियाँ बड़ी तेजी से बदल रही हैं तथा इन परिवर्तित परिस्थितियों में बालक-बालिका सम्बन्धों के प्रारूप को भी पुनः निर्धारित करना अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण विचारणीय तथ्य है।

प्रश्न 2.
भारत में लड़के-लड़कियों के स्वतन्त्रतापूर्ण सम्बन्धों पर लगे प्रतिबन्धों के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तरः
भारत में लड़के-लड़कियों के स्वतन्त्रतापूर्ण सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध –
भारतीय आदर्शों एवं परम्पराओं में आस्था रखने वाले विद्वानों के मतानुसार यदि लड़के और लड़कियाँ आपस में मिलते-जुलते हैं तो उनके विकास में बाधा उत्पन्न होती है। इसी कारण से बाल्यकाल में सह-शिक्षा के बाद अधिकतर लड़के-लड़कियों के विद्यालय अलग कर दिए जाते थे। परिवार के बाहर भी उनको मेल-मिलाप के अवसर बहुत कम दिए जाते थे। यद्यपि आजकल पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर भारतीय समाज में तरुणावस्था के लड़के-लड़कियों में स्वतन्त्रतापूर्ण सम्बन्धों का प्रचलन बढ़ रहा है, तथापि आदर्श भारतीय समाज में यह आलोचना का विषय बना हुआ है।

किशोरावस्था के लड़के-लड़कियों के विवाह आदि तय करने में माता-पिता का मुख्य हाथ होने से प्रायः सुविधा ही रहती है और किशोरों को अपनी अनुभवहीनता में की गई त्रुटियों से बचाव रहता है। किन्तु कभी-कभी कुछ अवस्थाओं में व्यक्ति के स्वभाव एवं इच्छाओं का सामाजिक बन्धनों के कारण अत्यधिक दमन करना पड़ता है, जिसका परिणाम अधिकतर हानिकारक सिद्ध होता है। वास्तव में किशोरों के मेल-मिलाप में पूर्ण स्वतन्त्रता अथवा कठोर नियन्त्रण दोनों ही उनके विकास में बाधक होते हैं।

प्रश्न 3.
अपने समाज में लड़के-लड़कियों में पाए जाने वाले सामाजिक भेद के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तरः
लड़के-लड़कियों में पाए जाने वाले सामाजिक भेद –
स्त्री तथा पुरुष में शारीरिक भेद के अतिरिक्त उनके आचरण, स्वभाव और व्यवहार में अन्तर पाया जाता है। यह सम्भव हो सकता है कि यह अन्तर शरीर रचना और पारिवारिक व सामाजिक परिस्थितियों के अन्तर के कारण हो। यह भी देखने में आता है कि सामान्यत: बालिकाएँ स्वभाव की कोमल, विनम्र, सहनशील तथा करुणामयी होती हैं और दूसरी तरफ बालक स्वभाव के कठोर होते हैं।

मनोवैज्ञानिक इस बालक-बालिका के अन्तर को उनके पारिवारिक और सामाजिक पर्यावरण के कारण मानते हैं। परिवार में सभी सदस्यों की बालक-बालिका के प्रति एक-सी भावना नहीं होती। बालिकाओं के प्रति प्रारम्भ से ही कुछ भिन्न भावना रहती है, उनको पराया धन समझा जाता है, उनको घर में गृहस्थी का कार्य करना पड़ता है। इसलिए बालिकाएँ स्वभाव से ही सहनशील और विनम्र होती हैं। बालकों को बाबा-दादी तथा अन्य सदस्य सिर पर चढ़ाकर रखते हैं और उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा किया जाता है। इसलिए वे क्रोधी, जिद्दी तथा कठोर स्वभाव के होते हैं।

अत: अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहँचते हैं कि बालक-बालिका, एक ही सृष्टि की रचना होते हुए भी, भिन्न हैं। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनमें स्वाभाविक अन्तर होता है। यह अन्तर कुछ तो शारीरिक रचना के कारण होता है और कुछ पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि वर्तमान युग में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ बदल रही हैं। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप लड़कियों की शिक्षा एवं विकास को भी क्रमश: महत्त्व दिया जाने लगा है। वह दिन दूर नहीं जब हमारे समाज में लड़के-लड़कियों के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाया जाने लगेगा।

प्रश्न 4.
किशोरावस्था में बालक और बालिका की एक-दूसरे के प्रति कैसी भावना होती है?
उत्तरः
किशोरावस्था में बालक और बालिका की एक-दूसरे के प्रति भावना –
छह वर्ष तक के लड़के-लड़कियों के सम्बन्ध में लिंग-भेद का कोई आधार नहीं होता। वे अनजान रहकर एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, एक-दूसरे के मित्र बन जाते हैं। जब लड़के-लड़कियाँ 6 से 12 वर्ष के बीच की उम्र के होते हैं तो बहुत कुछ समझने लगते हैं। उनको यह ज्ञान हो जाता है कि उनकी शारीरिक रचना में क्या अन्तर है। हमारे समाज में लड़के को अधिक महत्त्व दिया जाता है, क्योंकि उससे यह आशा की जाती है कि वह बड़ा होकर कुटुम्ब की सेवा करेगा और लड़की कुछ दिनों बाद पराये घर की हो जाएगी। लड़कियाँ समझती हैं कि उनका स्थान लड़कों की अपेक्षा नीचा है। यह ऊँच-नीच की भावना 6-7 वर्ष की आयु के बाद बच्चों में आने लगती है; अत: वे एक-दूसरे से अलग रहने का प्रयत्न करते हैं।

यह विरोध की भावना उस समय तक चलती है, जब तक उनके शरीर में तरुणाई के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं। जब उनके शरीर में तरुणाई के लक्षण प्रकट होने लगते हैं तो उनका यह विरोध समाप्त हो जाता है। घृणा प्रेम में बदल जाती है। इस अवस्था (13 से 17 वर्ष) में लड़कियों के शरीर में कुछ परिवर्तन हो जाता है और सौन्दर्य बढ़ जाता है। लड़के भी अपने को अधिक आकर्षक बनाने का प्रयत्न करते हैं। इस समय वे एक-दूसरे के सम्पर्क में लज्जा अनुभव करते हैं। यह अवस्था करीब 16-17 वर्ष की उम्र तक रहती है।

17-18 वर्ष की अवस्था में लड़के-लड़कियों में काम-चेतना अत्यन्त प्रबल रूप धारण करती है। वे एक-दूसरे को अधिक-से-अधिक आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं और प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। इस समय वे सामाजिक बन्धनों की चिन्ता तक नहीं करते। वे समाज से घृणा करते हैं और समाज से पृथक होकर प्रेमी अथवा प्रेमिका के साथ निर्जन स्थान में अधिक-से-अधिक समय तक रहना पसन्द करते हैं। एक के अभाव में दूसरा प्राण तक दे देता है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के शब्दों में, “जब दो भिन्न लिंगी एक-दूसरे को देखते हैं, संकेत करते हैं, छिपकर प्रेम करते हैं, भेंट देते हैं या परस्पर स्पर्श करते हैं तो उन्हें चामत्कारिक आनन्द प्राप्त होता है।”

लड़के और लड़कियों के सम्बन्ध की यह अवस्था बड़ी नाजुक होती है। वे कभी-कभी पथभ्रष्ट भी हो जाते हैं। वे पढ़ाई-लिखाई, माता-पिता, धन-सम्पत्ति और मान-मर्यादा की परवाह नहीं करते। प्रेमी-प्रेमिकाओं का घर से भाग जाना, इधर-उधर की ठोकरें खाना साधारण-सी बात है। इसके अतिरिक्त, वे भ्रूण हत्याओं, शारीरिक रोगों, नैतिक और चारित्रिक पतन आदि के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं। अज्ञान और भावुकता में वे अपना और समाज दोनों का अहित करते हैं।

विभिन्न अध्ययनों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि बालक और बालिका के परस्पर मिलने-जुलने में जितना बड़ा बन्धन होगा, ‘मिलन भावना’ उतनी ही तीव्र होगी। इसलिए बालक-बालिकाओं के सम्बन्धों को स्वाभाविक रूप से विकसित होने देने के लिए उन्हें परस्पर मिलने-जुलने की कुछ हद तक स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। सम्पर्क और स्वतन्त्रता को उच्छंखलता की सीमा तक पहुँचने से रोकने के लिए संयम का अंकुश बड़े-बुजुर्गों के हाथ में होना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 20 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बालक-बालिका सम्बन्धों के अध्ययन का मूल आधार क्या है?
उत्तरः
बालक-बालिका सम्बन्धों के अध्ययन का मूल आधार लिंग-भेद है।

प्रश्न 2.
सामान्य रूप से किस अवस्था में लड़के-लड़कियाँ अपने अलग-अलग समूह बनाने लगते हैं?
उत्तरः
सामान्य रूप से किशोरावस्था प्रारम्भ होते ही लड़के-लड़कियाँ अपने अलग-अलग समूह बनाने लगते हैं।

प्रश्न 3.
बालिकाओं के लिए पढ़ाई क्यों जरूरी है?
अथवा
बालिकाओं को शिक्षित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तरः
आज की बालिकाएँ ही भावी गृहिणियाँ एवं माताएँ हैं; अतः उत्तम गृह-व्यवस्था तथा बच्चों के उत्तम पालन-पोषण के लिए बालिकाओं की पढ़ाई जरूरी है। वैसे, जिस प्रकार लड़कों के लिए पढ़ाई आवश्यक है, वैसे ही लड़कियों के लिए भी पढ़ाई आवश्यक है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 20 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. किशोरावस्था में बालक-बालिका सम्बन्ध होने चाहिए –
(क) अत्यधिक घनिष्ठ
(ख) सीमित एवं स्वाभाविक
(ग) कोई सम्बन्ध नहीं होने चाहिए
(घ) विरोधपूर्ण सम्बन्ध।
उत्तरः
(ख) सीमित एवं स्वाभाविक।

2. मानसिक एवं संवेगात्मक ज्ञान किस अवस्था तक अपरिपक्व माना गया है –
(क) किशोरावस्था
(ख) युवावस्था
(ग) प्रौढ़ावस्था
(घ) वृद्धावस्था।
उत्तरः
(क) किशोरावस्था।

3. किशोरावस्था की मुख्य समस्या क्या है –
(क) मकान
(ख) नौकरी
(ग) अनुशासन
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तरः
(ग) अनुशासन।

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