UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 26
Chapter Name Disaster Management (आपदा प्रबन्धन)
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management (आपदा प्रबन्धन)

विस्तृत उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं ? कौन-कौन सी संस्थाएँ इस कार्य में संलग्न हैं?
या
भारत में आपदा प्रबन्धन की विवेचना कीजिए। [2015]
या
आपदा प्रबन्धन का उद्देश्य बताइए। [2016]
उत्तर

आपदा प्रबन्धन
Disaster Management

प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने अर्थात् उनके प्रबन्धन के तीन पक्ष हैं –

  1. आपदाग्रस्त लोगों को तत्काल राहत पहुँचाना
  2. प्रकोपों तथा आपदाओं की भविष्यवाणी करना तथा
  3. प्राकृतिक प्रकोपों से सामंजस्य स्थापित करना।

आपदाग्रस्त लोगों को राहत पहुँचाने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं –
(1) आपदा की प्रकृति तथा परिमाण का वास्तविक चित्र उपलब्ध होना चाहिए। प्रायः मीडिया की रिपोर्ट घटनाओं का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करने की अपेक्षा भ्रमपूर्ण तथ्य प्रस्तुत करती है। (यद्यपि ऐसा जान-बूझकर नहीं किया जाता है, पर्यवेक्षक या विश्लेषणकर्ता के व्यक्तिगत मत के कारण ऐसा होता है) अतएव, अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों को सम्बन्धित सरकार से जानकारी हासिल करनी चाहिए।

(2) निवारक तथा राहत कार्यों को अपनाने के पूर्व प्राथमिकताएँ निश्चित कर लेनी चाहिए। उदाहरणार्थ–राहत कार्य घने आबाद क्षेत्रों में सर्वप्रथम करने चाहिए। बचाव के विशिष्ट उपकरण, मशीनें, पम्प, तकनीशियन आदि तुरन्त आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भेजने चाहिए। दवाएँ तथा औषधियाँ भी उपलब्ध करानी चाहिए।

(3) विदेशी सहायता सरकार के निवेदन पर ही आवश्यकतानुसार भेजनी चाहिए अन्यथा आपदाग्रस्त क्षेत्र में अनावश्यक सामग्री सम्बन्धी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा समस्याएँ अधिक जटिल हो जाती हैं।

(4) प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन में शोध तथा भविष्यवाणी का बहुत महत्त्व है। प्राकृतिक आपदाओं की पूर्वसूचना ( भविष्यवाणी) किसी प्राकृतिक आपदा से ग्रस्त क्षेत्र में आपदा की आवृत्ति, पुनरावृत्ति के अन्तराल, परिमाण, घटनाओं के विस्तार आदि के इतिहास के अध्ययन के आधार पर की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, बड़े भूस्खलन के पूर्व किसी क्षेत्र में पदार्थ का मन्द सर्पण लम्बे समय तर्क होता रहता है; किसी विस्फोटक ज्वालामुखी उद्गार के पूर्व धरातल में साधारण उभार पैदा होता है। तथा स्थानीय रूप से भूकम्पन होने लगता है। नदी बेसिन के संग्राहक क्षेत्र में वर्षा की मात्रा तथा तीव्रता के आधार पर सम्भावित बाढ़ की स्थिति की भविष्यवाणी सम्भव है। स्रोतों के निकट उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों तथा स्थानीय तूफानों एवं उनके गमन मार्गों का अध्ययन आवश्यक है।

(5) प्राकृतिक प्रकोपों एवं आपदाओं का मानचित्रण करना, मॉनीटर करना तथा पर्यावरणीय दशाओं में वैश्विक परिवर्तनों का अध्ययन करना बहुत आवश्यक है। इसके लिए वैश्विक, प्रादेशिक एवं स्थानीय स्तरों पर आपदा-प्रवण क्षेत्रों का गहरा अध्ययन आवश्यक होता है। इण्टरनेशनल काउन्सिल ऑफ साइण्टिफिक यूनियन (ICSU) तथा अन्य संगठनों ने मानवीय क्रियाओं तथा प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तनों की क्रियाविधि, मॉनीटरिंग तथा उन्हें कम करने सम्बन्धी अनेक शोधकार्य प्रारम्भ किये हैं। आपदा-शोध तथा आपदा कम करने सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम निम्नलिखित हैं –

(i) SCOPE-ICSU ने साइण्टिफिक कमेटी ऑन प्रॉब्लम्स ऑफ एनवायरन्मेण्ट नामक समिति की स्थापना 1969 में की, जिसका उद्देश्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों के लिए पर्यावरण पर मानवीय प्रभावों तथा पर्यावरणीय समस्याओं सम्बन्धी घटनाओं की समझ में वृद्धि करना है। SCOPE यूनाइटेड नेशन्स के एनवायरन्मेण्ट कार्यक्रम (UNEP), यूनेस्को के मानव एवं बायोस्फियर कार्यक्रम (MAB) तथा WMO के वर्ल्ड क्लाइमेट प्रोग्राम (wCP) की भी सहायता करता है।

(ii) IGBP– ICSU ने अक्टूबर, 1988 में स्टॉकहोम (स्वीडन) में इण्टरनेशनल जिओस्फियरबायोस्फियर कार्यक्रम (IGBP) या ग्लोबल चेंज कार्यक्रम (GCP) भूमण्डलीय पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों का अध्ययन करने के लिए प्रारम्भ किया।
यह कार्यक्रम भौतिक पर्यावरण के अन्तक्रियात्मक प्रक्रमों के अध्ययन पर बल देता है। ये अध्ययन उपग्रह दूर संवेदी तकनीकों, पर्यावरणीय मॉनीटरिंग तथा भौगोलिक सूचना तन्त्रों (GIS) पर आधारित हैं।

(iii) HDGC – सामाजिक वैज्ञानिकों ने ‘ह्युमन डाइमेन्शन ऑफ ग्लोबल चेंज’ (HDGC) नामक एक समानान्तर शोध कार्य चालू किया है। यह कार्यक्रम GNU, ISSC तथा IFIAS जैसे संगठनों से सहायता तथा वित्त प्राप्त करता है।

(iv) IDNDR-UNO ने 1990-2000 के लिए IDNDR (International Decade for Natural Disaster Reduction) कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसका उद्देश्य विश्व की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं का अध्ययन करना तथा मानव समाज पर उसके घातक प्रभावों को कम करना था। इसके अन्तर्गत भूकम्प, ज्वालामुखी उद्गार, भू-स्खलन, सूनामी, बाहें, तूफान, वनाग्नि, टिड्डी-प्रकोप तथा सूखा जैसे प्रक्रम सम्मिलित हैं। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  • प्रत्येक देश में प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की क्षमता में सुधार करना।
  • प्राकृतिक आपदाओं को कम करने सम्बन्धी जानकारी बढ़ाने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकसित करना।
  • प्राकृतिक आपदाओं के आकलन, भविष्यवाणी, रोकने तथा कम करने की दिशा में वर्तमान तथा नयी सूचनाओं का संग्रह करना।
  • अनेक विधियों तथा प्रदर्शन परियोजनाओं के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं के आकलन, भविष्यवाणी, रोकने तथा कम करने के उपाय करना।

(6) प्राकृतिक प्रकोपों को कम करने हेतु आपदा शोध में निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  1. प्राकृतिक प्रकोप एवं आपदा के कारकों तथा क्रियाविधि का अध्ययन।
  2. प्राकृतिक प्रकोपों तथा आपदा के विभाव (सम्भावना) का वर्गीकरण एवं पहचान करना तथा आँकड़ा-आधार तैयार करना जिसमें पारितन्त्र के भौतिक तथा सांस्कृतिक घटकों, परिवहन एवं संचार साधनों, भोजन, जल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रशासनिक सुविधाओं आदि का मानचित्रण करना सम्मिलित है। प्राकृतिक आपदा शोध को महत्त्वपूर्ण पक्ष दूर संवेदन, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों से धरातलीय जोखिम के क्षेत्रों की पहचान करना है।

(7) आपदा कम करने के कार्यक्रम में आपदा सम्बन्धी शिक्षा की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस शिक्षा का आधार व्यापक होना चाहिए तथा यह वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, नीति एवं निश्चयकर्ताओं तथा जनसाधारण तक जनसंचार के माध्यमों (समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविजन, पोस्टरों, डॉक्यूमेण्ट्री फिल्मों आदि) द्वारा पहुँचनी चाहिए। अधिकांश देशों में जनता को आने वाली आपदा की सूचना देने का उत्तरदायित्व सरकार का होता है। अतएव शोधकर्ताओं एवं वैज्ञानिकों को निश्चयकर्ताओं (प्रशासकों एवं राजनीतिज्ञों) को निम्नलिखित उपायों द्वारा शिक्षित करने की आवश्यकता है –

  1. निश्चयकर्ताओं तथा सामान्य जनता को प्राकृतिक प्रकोपों एवं आपदाओं के प्रति सचेत करना। तथा उन्हें स्थिति का सामना करने के लिए प्रशिक्षित करना।
  2. समय से पहले ही संम्भावित आपदा की सूचना देना।
  3. जोखिम तथा संवेदनशीलता के मानचित्र उपलब्ध कराना।
  4. लोगों को आपदाओं से बचने के लिए निर्माण कार्य में सुधार करने के लिए प्रेरित करना।
  5. आपदा कम करने की तकनीकों की व्याख्या करना।

(8) भौगोलिक सूचना तन्त्र (GIS) तथा हवाई सर्वेक्षणों द्वारा प्राकृतिक आपदा में कमी तथा प्रबन्धन कार्यक्रमों में सहायता मिल सकती है।
(9) जनता को प्राकृतिक आपदाओं के साथ सामंजस्य करने की आवश्यकता है, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  1. प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं के प्रति व्यक्तियों, समाज एवं संस्थाओं के बोध (Perception) एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन।
  2. प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं के प्रति चेतना में वृद्धि।
  3. प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं की समय से पूर्व चेतावनी का प्रावधान।
  4. भूमि उपयोग नियोजन (उदाहरणार्थ-आपदा प्रवण क्षेत्रों की पहचान तथा सीमांकन एवं लोगों को ऐसे क्षेत्रों में बसने के लिए हतोत्साहित करना)।
  5. सुरक्षा बीमा योजनाओं द्वारा जीवन एवं सम्पत्ति की हानि के मुआवजे का प्रावधान करना, जिससे समय रहते लोग अपने घर, गाँव, नगर आदि छोड़ने के लिए तैयार रहें।
  6. आपदा से निपटने की तैयारी का प्रावधान।

प्रश्न 2
भूकम्प से आप क्या समझते हैं? भूकम्प के कारण व इसके हानिकारक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
या
किसी एक प्राकृतिक आपदा व इससे प्रभावित क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। [2011]
या
भूकम्प को प्राकृतिक आपदा क्यों कहा जाता है? [2014]
या
भूकम्प के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए। [2014]
या
भारत में भूकम्प एवं भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर

भूकम्प (Earthquake)

भूकम्प का सामान्य अर्थ ‘भूमि का कॉपना या हिलना है जो पृथ्वी के अन्तराल की तापीय दशाओं के कारण उत्पन्न विवर्तनिक शक्तियों (Tectonic forces) के कारण घटित होता है। भूमि का कम्पन सामान्य से लेकर तीव्रतम हो सकता है जिससे इमारतें ढह जाती हैं तथा धरातल पर दरारें उत्पन्न हो जाती हैं।

भूकम्प की उत्पत्ति धरातल के नीचे किसी बिन्दु से होती है जिसे उत्पत्ति केन्द्र (Focus) कहते हैं। इस बिन्दु से ऊर्जा की तीव्र लहरें उत्पन्न होकर पृथ्वी के धरातल पर पहुँचती हैं। ऊर्जा की तीव्रता को ‘रिक्टर मापक’ (Richter Scale) द्वारा नापा जाता है। यह मापक 0 से 9 के मध्य होता है। सन् 1934 में बिहार (भारत) के भूकम्प का माप रिक्टर मापक पर 8.4 था, जबकि सन् 1964 में अलास्का (संयुक्त राज्य अमेरिका) के भूकम्प का माप 8.4 से 8.6 तक था। ये दोनों भूकम्प विश्व के उग्रतम भूकम्पों में गिने जाते हैं।
भूकम्प की तीव्रता मापने का एक अन्य पैमाना या मापेक ‘मरकेली मापक’ (Mercalli Scale) भी है, किन्तु रिक्टर मापक अधिक प्रचलित है।

भूकम्प के कारण
Causes of Earthquake

भूकम्प पृथ्वी की सतह पर किसी भी मात्रा में अव्यवस्था या असन्तुलन के कारण उत्पन्न होते हैं। यह असन्तुलन अनेक कारणों से सम्भव है; जैसे-ज्वालामुखी उद्गार, भ्रंशन एवं वलन, मानवनिर्मित जलाशयों का जलीय भार तथा प्लेट विवर्तनिकी। इन सभी कारणों में से प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त (Plate tectonic theory) भूकम्पों की उत्पत्ति की सर्वोत्तम व्याख्या करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार भूपटल ठोस तथा गतिशील दृढ़ प्लेटों से निर्मित है। इन्हीं प्लेटों के किनारों पर सभी विवर्तनिक घटनाएँ होती हैं। कम गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकम्प प्लेटों के रचनात्मक किनारों के सहारे पैदा होते हैं, जबकि अधिक गहराई पर स्थित उत्पत्ति केन्द्र वाले भूकम्प विनाशात्मक प्लेट किनारों के सहारे उत्पन्न होते हैं। विनाशात्मक प्लेट किनारे वे होते हैं जो दो प्लेटों के परस्पर निकट आने पर टकराते हैं। यही कारण है कि विश्व के सर्वाधिक भूकम्प अग्निवलय (Ring of Fire) या परि-प्रशान्त पेटी के सहारे तथा मध्य महाद्वीपीय पेटी (आलप्स-हिमालय पर्वतश्रृंखला) के सहारे उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार, कैलीफोर्निया (संयुक्त राज्य अमेरिका) में संरक्षी प्लेट किनारों के सहारे उत्पन्न रूपान्तरित भ्रंशों के स्थान पर भी भयंकर भूकम्प आते हैं।

भारत में हिमालय तथा उसकी तलहटी में आने वाले भूकम्पों की व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी के सन्दर्भ में की जा सकती है। एशियाई प्लेट दक्षिण की ओर गतिशील है, जबकि भारतीय प्लेट उत्तर की ओर खिसक रही है। अतएव भारतीय प्लेट एशियाई प्लेट के नीचे क्षेपित हो रही है। इन दोनों प्लेटों के परस्पर टकराने से वलन या भ्रंशन क्रियाएँ होती हैं जिनसे हिमालय की ऊँचाई निरन्तर बढ़ रही है। इससे भू-सन्तुलन बिगड़ता रहता है, जो इस क्षेत्र में भूकम्पों की आवृत्ति का कारण है।

भूकम्पों के हानिकारक प्रभाव
Hazardous Effects of Earthquakes

भूकम्पों की तीव्रता का निर्धारण रिक्टर मापक की अपेक्षा मानव-जीवन तथा सम्पत्ति पर भूकम्पों से होने वाले हानिकारक प्रभावों के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि रिक्टर मापक पर उच्च तीव्रता वाला भूकम्प हानिकारक है। भूकम्प तभी विनाशकारी होता है जब वह सघन आबाद क्षेत्र में आता है। कभी-कभी रिक्टर मापक पर साधारण तीव्रता वाले भूकम्प भी भयंकर विनाशकारी होते हैं। भूकम्प के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभावों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

(1) ढालों की अस्थिरता एवं भूस्खलन – पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ कमजोर संरचनाएँ पायी जाती है. वहाँ ढाल अस्थिर होते हैं जिससे भूस्खलन तथा शैल-पतन जैसी घटनाएँ बस्तियों तथा परिवहन मार्गों को हानि पहुँचाती हैं। सन् 1970 में पीरू तथा सन् 1989 में तत्कालीन सोवियत संघ के ताजिक गणतन्त्र में आये भूकम्पों से इसी प्रकार की क्षति हुई थी जिनमें युंगे (पीरू) तथा लेनिनाकन (ताजिक) नगर ध्वस्त हो गये।

(2) मानवकृत संरचनाओं को क्षति – इमारतें, सड़कें, रेलें, कारखाने, पुल, बाँध आदि संरचनाओं को भूकम्पों से भारी क्षति पहुँचती है। इस प्रकार मानव सम्पत्ति की हानि होती है। सन् 1934 में नेपाल-बिहार सीमा पर तथा पुनः सन् 1988 में बिहार के भूकम्प से 10,000 से अधिक मकान क्षतिग्रस्त हो गये। सन् 1985 में मैक्सिको सिटी के भूकम्प से 40,000 इमारतें ढह गयीं तथा 50,000 अन्य मकान क्षतिग्रस्त हुए।

(3) नगरों तथा कस्बों को क्षति – घने आबाद नगर तथा कस्बे भूकम्प के विशेष शिकार होते हैं। उच्च तीव्रता वाले भूकम्पों से बड़ी इमारतें ध्वस्त हो जाती हैं तथा उनके निवासी मलबे में दबकर काल का ग्रास बन जाते हैं। पाइप लाइनें, बिजली एवं टेलीफोन के खम्भे व तार आदि भी नष्ट हो जाते हैं।

(4) जनजीवन की हानि – भूकम्पों की तीव्रता जीवन की क्षति द्वारा भी निर्धारित की जाती है। भारत के इतिहास में सबसे भीषण भूकम्प सन् 1737 में कोलकाता में आया, जिसमें 3 लाख व्यक्ति काल-कवलित हुए। सन् 1905 में कॉगड़ा के भूकम्प में 20 हजार व्यक्ति मारे गये। सन् 2001 में भुज के भूकम्प में 20,000 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी। विश्व के इतिहास में 1556 ई० में शेन शु (चीन) में 8,30,000 व्यक्तियों की जाने गयीं। पुन: सन् 1976 में तांगशान (चीन) में 7,50,000 व्यक्ति मृत हुए। सन् 1920 में कान्सू (चीन) में 1,80,000 व्यक्ति, 1927 ई० में नामशान (चीन) में 1,80,000 व्यक्ति सन् 1908 में मेसीना (इटली) में 1,60,000 व्यक्ति, 1923 ई० में टोकियो (जापान) में 1,63,000 व्यक्ति, सन् 1932 ई० में सगामी खाड़ी (जापान) में 2,50,000 व्यक्ति, सन् 1990 में उत्तरी ईरान में 50,000 व्यक्ति मारे गये। सन् 2004 में सुमात्रा में भूकम्प से उत्पन्न सूनामी लहरों के विध्वंसकारी प्रभाव से 3,50,000 लोग मारे गये। 2005 ई० में कश्मीर के भूकम्प में भारत तथा पाकिस्तान में लगभग 1 लाख लोगों की मृत्यु हो गयी।

(5) अग्निकाण्ड – तीव्र भूकम्पों के कारण होने वाले कम्पन से इमारतों तथा कारखानों में गैस सिलिण्डरों के उलटने तथा बिजली के नंगे तारों के मिलने आदि से आग लग जाती है। सन् 1923 में सगामी खाड़ी (जापान) में ऐसे ही अग्निकाण्ड से 38,000 व्यक्ति मारे गये। सन् 1906 में सैनफ्रान्सिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में भी भूकम्प से नगर के अनेक मार्गों में आग लग गयी।

(6) धरातल की विकृति – कभी-कभी भूकम्पों से धरातल पर दरारें पड़ती हैं तो कभी धरातल का अवतलन या उत्क्षेप हो जाता है। सन् 1819 के भूकम्प से सिन्धु नदी के मुहाने (पाकिस्तान) पर 4,500 वर्ग किमी क्षेत्र का अवतलन हो गया जो सदा के लिए समुद्र में डूब गया। इसके साथ ही 80 किमी लम्बा तथा 26 किमी चौड़ा क्षेत्र निकटवर्ती भूमि से 3 मीटर ऊँचा उठ गया, जिसे ‘अल्लाह-बन्द’ कहा जाता है।

(7) बाढे – तीव्र भूकम्पीय लहरों से बाँधों के टूटने पर बाढ़े आती हैं। सन् 1971 में लॉस एंजिल्स (संयुक्त राज्य अमेरिका) नगर के उत्तर पश्चिम में भूकम्प के कारण सान फर्नाण्डो घाटी क्षेत्र में स्थित वॉन नार्मन बाँध में दरार पड़ने से ऐसी ही क्षति हुई थी। सन् 1950 में असम के भूकम्प में दिहांग नदी के मार्ग में भूस्खलन के कारण उत्पन्न अवरोध से भयंकर बाढ़ आयी।

(8) सूनामी – समुद्रों के अन्दर भूकम्प आने पर तीव्र सूनामी लहरें उत्पन्न होती हैं। सन् 1819 ई० में कच्छ क्षेत्र में सूनामी लहरों से भारी क्षति हुई। सन् 1755 में लिस्बन (पुर्तगाल) में सूनामी लहरों के कारण 30 हजार से 60 हजार लोग मृत्यु का ग्रास बने। दिसम्बर, 2004 ई० में सुमात्रा के निकट भूकम्प उत्पन्न होने पर सूनामी लहरों का प्रकोप श्रीलंका तथा तमिलनाडु तट (भारत) तक देखा गया।

प्रश्न 3
बाढ़ नियन्त्रण के उपायों पर प्रकाश डालिए। [2011]
या
भारत में बाढ़ नियन्त्रण एवं बाढ़ प्रबन्धन हेतु उपाय सुझाइए। [2014]
उत्तर
बाहें एक प्राकृतिक परिघटना हैं तथा इससे पूर्णतः मुक्ति सम्भव नहीं है, किन्तु इसके प्रभाव को मनुष्य अपनी तकनीकी क्षमता द्वारा अवश्य कम कर सकता है। बाढ़ नियन्त्रण के निम्नलिखित उपाय सम्भव हैं –

(1) प्रथम तथा सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय वर्षा की तीव्रता तथा उससे उत्पन्न धरातलीय भार को नियन्त्रित करना है। मनुष्य वर्षा की तीव्रता को तो कम नहीं कर सकता है, किन्तु धरातलीय वाह (वाही जल) को नदियों तक पहुँचने पर देरी अवश्य कर सकता है। यह उपाय बाढ़ों के लिए कुख्यात नदियों के जल संग्राहक पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण द्वारा सम्भव है। वृक्षारोपण द्वारा जल के धरातल के नीचे रिसाव को प्रोत्साहन मिलता है जिससे वाही जल की मात्रा कुछ सीमा तक कम हो जाती है। वृक्षारोपण से मृदा अपरदन में भी कमी आती है तथा नदियों में अवसादों की मात्रा कम होती है। अवसादन में कमी होने पर नदियों में जल बहाने की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार बाढ़ों की आवृत्ति तथा परिमाण में कमी की जा सकती है।

(2) घुमावदार मार्ग से होकर बहने पर नदियों में जल बहने की क्षमता में कमी आती है। इसके लिए नदियों के मार्गों को कुछ स्थानों पर सीधा करना उपयुक्त रहता है। यह कार्य मोड़ों को कृत्रिम रूप से काटकर किया जा सकता है, किन्तु यह उपाय बहुत व्ययपूर्ण है। दूसरे, विसर्पण (Meandering) एक प्राकृतिक प्रक्रम है, नदी अन्यत्र विसर्प बना लेगी। वैसे यह उपाय निचली मिसीसिपी में ग्रीनविले (संयुक्त राज्य अमेरिका) के निकट सन् 1933 से 1936 में अपनाया गया, जिसके तहत नदी का मार्ग 530 किमी से घटाकर 185 किमी कर दिया गया।

(3) नदी में बाढ़ आने के समय जल के परिमाण को अनेक इंजीनियरी उपायों द्वारा; जैसे-भण्डारण जलाशय बनाकर, कम किया जा सकता है। ये बाँध बाढ़ के अतिरिक्त जल को संचित कर लेते हैं। इसे जल की सिंचाई में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। यदि जलाशयों के साथ बाँध भी बना दिया जाता है तो इससे जलविद्युत उत्पादन में भी सफलता मिलती है। ऐसे उपाय सन् 1913 में ओह्यो राज्य (संयुक्त राज्य अमेरिका) में मियामी नदी पर किये गये थे जो बहुत प्रभावी एवं लोकप्रिय सिद्ध हुए। सन् 1933 के पूर्व टैनेसी नदी बेसिन भी बाढ़ों के लिए कुख्यात था, किन्तु सन् 1933 में टैनेसी घाटी प्राधिकरण द्वारा अनेक बाँध तथा जलाशय बनाकर इस समस्या का निदान सम्भव हुआ। वही टैनेसी बेसिन अब एक स्वर्ग बन गया है। टैनेसी घाटी परियोजना से प्रेरित होकर भारत में भी दामोदर घाटी निगम की स्थापना की गयी तथा दामोदर नदी तथा इसकी सहायकों पर चार बड़े बाँध एवं जलाशय बनाये गये। इसी प्रकार तापी नदी पर उकई बाँध एवं जलाशय के निर्माण से नदी की निचली घाटी तथा सूरत नगर को बाढ़ के प्रकोप से बचा लिया गया है।

(4) तटबन्ध, बाँध तथा दीवारें बनाकर भी बाढ़ के जल को संकीर्ण धारा के रूप में रोका जा सकता है। ये दीवारें मिट्टी, पत्थर या कंकरीट की हो सकती हैं। दिल्ली, इलाहाबाद, लखनऊ आदि अनेक नगरों में इस प्रकार के उपाय किये गये हैं। चीन तथा भारत में कृत्रिम कगारों का निर्माण बहुत प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। कोसी (बिहार) तथा महानन्दा नदियों पर भी बाढ़ नियन्त्रण हेतु इसी प्रकार के उपाय किये गये हैं।

(5) सन् 1954 में केन्द्रीय बाढ़ नियन्त्रण बोर्ड के गठन तथा राज्य स्तर पर बाढ़ नियन्त्रण बोर्ड की स्थापना भी बाढ़ नियन्त्रण में लाभकारी रही है। भारत में बाढ़ की भविष्यवाणी तथा पूर्व चेतावनी की प्रणाली सन् 1959 में दिल्ली में बाढ़ की स्थिति मॉनीटर करने हेतु प्रारम्भ की गयी। तत्पश्चात् देश भर में प्रमुख नदी बेसिनों में बाढ़ की दशाओं को मॉनीटर करने हेतु एक नेटवर्क बनाया गया। बाढ़ की भविष्यवाणी के ये केन्द्र वर्षा सम्बन्धी, डिस्चार्ज दर आदि आँकड़े एकत्रित करते हैं तथा अपने अधिकार क्षेत्र के निवासियों को विशिष्ट नदी बेसिन के सन्दर्भ में बाढ़ की पूर्व चेतावनी देते हैं।

प्रश्न 4
सूखे के प्रभाव एवं नियन्त्रण के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

सूखे के प्रभाव
Effects of Droughts

सूखा जैवमण्डलीय पारितन्त्र के सभी जीवन-रूपों को प्रभावित करता है। जल की किसी भी प्रकार की कमी पेड़-पौधों एवं प्राणियों को प्रभावित करती है। लम्बी अवधि तक सूखा पड़ने पर अनेक प्रकार के पारिस्थितिकीय, आर्थिक, जनांकिकीय एवं राजनीतिक प्रभाव पड़ते हैं।

(1) निरन्तर कई वर्षों तक सूखा पड़ने पर किसी प्रदेश के प्राकृतिक पारितन्त्र के जैविक घटक में परिवर्तन हो जाता है, क्योंकि कुछ ऐसे पेड़-पौधे एवं प्राणी हैं जो अतिशय सूखा सहन नहीं कर सकते। अनेक प्राणी अन्यत्र स्थानान्तरित हो जाते हैं तब किसी विशेष प्राणी प्रजाति की जनसंख्या में कमी आ जाती है। कुछ प्राणी भूख से मर जाते हैं। भोजन के लिए स्पर्धा बढ़ने पर कमज़ोर प्राणी लुप्त होने लगते हैं।
(2) कृषि उत्पादन में कमी होने पर पशु पदार्थों के उत्पादन में भी कमी हो जाती है।
(3) सूखाग्रस्त क्षेत्रों से लोगों का पलायन होने लगता है। गुजरात, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में ऐसी स्थिति प्राय: देखने को मिलती हैं।

(4) सूखाग्रस्त निर्धन देशों को खाद्यान्नों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे अनेक बार राजनीतिक समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। उदाहरणार्थ-अफ्रीका की सहेल प्रदेश’ (सहारा मरुस्थल के दक्षिण तथा सवाना प्रदेश के उत्तर में स्थित प्रदेश जो पश्चिमी अफ्रीका से लेकर पूर्व में इथोपिया तक विस्तृत है) एक शुष्क प्रदेश है जहाँ बंजारे पशुचारक तथा कृषक अल्प वर्षाकाल में प्राप्त वर्षा पर निर्भर करते हैं। यहाँ के निवासी पेयजल के लिए भूमिगत जल पर निर्भर हैं। निरन्तर सूखा पड़ने पर भूमिगत जल का स्तर गिर जाता है तथा पेयजल की भारी कमी हो जाती है। इस प्रदेश में 1968-1975 तक निरन्तर सूखा पड़ा जो 1971-1974 के मध्य विकट हो गया, तब यहाँ के निवासियों को अपने घर, मवेशी आदि छोड़कर नगरों के निकट लगाये गये विशिष्ट कैम्पों में रहना पड़ा। विश्व के अनेक देशों में खाद्यान्नों की सहायता भेजी, फिर भी हजारों लोग भुखमरी का शिकार हो गये। अकेले इथोपिया में ही 50,000 लोग भूख, कुपोषण एवं रोगों से मुत्यु का ग्रास बन गये। सम्पूर्ण रुहेल प्रदेश में 5 मिलियन मवेशी भी मर गये। पुनः 1992-93 में इथोपिया में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें 30 लाख लोग मारे गये।

ऑस्ट्रेलिया में भी सूखा बहुत सामान्य प्राकृतिक परिघटना है। इनकी पुनरावृत्ति तथा व्यापकता भी अधिक़ है। देश का सबसे बुरा सूखा 1895-1902 के दौरान पड़ा था। इसके बाद भी अनेक बार सूखा पड़ा जिसके दुष्प्रभाव पशु (भेड़ों) तथा कृषि उत्पादन पर पड़े।

भारत भी प्रायः सूखे की चपेट में रहता है। देश के 67 जिले निरन्तर सूखे से ग्रस्त रहते हैं, जहाँ देश की 12% जनसंख्या निवास करती है तथा 25% शस्य भूमि विद्यमान है। प्रमुख सूखाग्रस्त क्षेत्र का विस्तार राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश राज्यों में है। द्वितीय सूखा-प्रवण प्रदेश पश्चिमी घाटों के वृष्टिछाया प्रदेश में चतुर्भुजाकार क्षेत्र के रूप में स्थित है। इसके अन्तर्गत दक्षिण-पश्चिमी आन्ध्र प्रदेश, पूर्वी कर्नाटक, दक्षिण-पश्चिमी महाराष्ट्र सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त तिरुनेलवेली, कोयम्बटूर (तमिलनाडु), पलामू (बिहार), पुरुलिया (बंगाल), कालाहण्डी (ओडिशा) आदि जिले भी सूखा प्रवण हैं। 1899 में भारत का भीषणतम अकाल ‘छप्पन का अकाल पड़ा था, जिसकी पुनरावृत्ति 1917 में हुई। इन दोनों अकालों में लाखों लोग मारे गये।

सूखा नियन्त्रण के उपाय
Drought Control Measures

बाढ़ों की भाँति सूखे की चेतावनी देना सम्भव नहीं है, यद्यपि कम्प्यूटर के आधार पर विभिन्न जलवायवीय एवं मौसमी प्राचलों के अध्ययन से आगामी वर्षों की वर्षा का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। वायु की नमी तथा वर्षण की मात्रा को वृक्षारोपण द्वारा बढ़ाया जा सकता है। सूखे से निपटने के लिए अधिकांश देशों में प्रचलित व्यवस्था यही है कि सूखाग्रस्त लोगों को राहत दी जाये। इसके अतिरिक्त सूखे को कम करने के कुछ दीर्घकालीन उपाय भी करने चाहिए। इन उपायों में वृक्षारोपण, शुष्क कृषि तकनीकों का प्रयोग, मरुस्थलीकरण रोकना, जल संरक्षण की योजनाएँ बनाना, बागवानी तथा चरागाहों का विकास, सूखा-प्रवण क्षेत्रों के कार्यक्रमों को अपनाना, जलाशयों तथा कुओं का निर्माण आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5
जनजीवन को प्रभावित करने वाली भारत की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1, 2, 3 व 4 का अध्ययन करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण संकट एवं आपदा क्या है ? आपदा का वर्गीकरण कीजिए।
या
प्राकृतिक आपदाएँ किसे कहते हैं ? [2009, 11]
उत्तर
वे घटनाएँ अथवा दुर्घटनाएँ जो प्राकृतिक प्रक्रमों या मानवीय कारणों से उत्पन्न होती हैं, चरम घटनाएँ (Extreme events) कहलाती हैं। ऐसी घटनाएँ अपवाद-रूप में उत्पन्न होती हैं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के प्रक्रमों को उग्र कर देती हैं जो मानव-समाज के लिए आपदा बन जाते हैं; उदाहरणार्थ-पृथ्वी की विवर्तनिक संचलनों के कारण भूकम्प या ज्वालामुखी विस्फोट होना, निरन्तर सूखा पड़ना या आकस्मिक रूप से बाढ़ आना, ऐसी ही प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

पर्यावरणीय संकट की परिभाषा ऐसी चरम घटनाओं (प्राकृतिक या मानवकृत) के रूप में दी जा सकती है, जो सहने की सीमा से परे होती हैं तथा सम्पत्ति एवं जनजीवन का विनाश उत्पन्न करती हैं।
आपदा वर्गीकरण – उत्पत्ति के कारणों के आधार पर आपदाओं को दो वर्गों में रखा जाता है –

  • प्राकृतिक आपदाएँ तथा
  • मानवजनित आपदाएँ।

प्रश्न 2
प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर
प्राकृतिक तथा मानव-जनित आपदाओं का वर्गीकरण
Classification of Natural and Man-made Disasters
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management 1

प्रश्न 3
ज्वालामुखी उद्गारों के हानिकारक प्रभाव लिखिए।
उत्तर
ज्वालामुखी उद्गारों के हानिकारक प्रभाव-जवालामुखी उद्गार निम्नलिखित विधियों से मानव-जीवन तथा सम्पत्ति को भारी हानि पहुँचाते हैं –
(1) उष्ण लावा के प्रवाह से, (2) ज्वालामुखी पदार्थों के पतन से, (3) इमारत, कारखाने, सड़कें, रेले, विमान पत्तन, बाँध, पुल, जलाशय आदि मानवीय संरचनाओं की क्षति द्वारा, (4) अग्निकाण्ड द्वारा, (5) बाढ़ों तथा (6) जलवायु परिवर्तनों द्वारा।

(1) उष्ण तथा तरल लावा की विशाल राशि तीव्र गति से प्रवाहित होते हुए मानवीय संरचनाओं को ढक लेती है, जीव-जन्तु तथा सभी लोग मारे जाते हैं, फार्म तथा चरागाह नष्ट हो जाते हैं, नदियों के म तथा झीलें अवरुद्ध हो जाती हैं तथा वन जलकर नष्ट हो जाते हैं। हवाई द्वीप पर मोना लोको ज्वालामुखी के उद्गार से 53 किमी दूर तक लावा का प्रवाह हुआ था। आइसलैण्ड में लाकी ज्वालामुखी प्रवाहं से भी बड़ी मात्रा में लावा निकलकर सम्पूर्ण द्वीप पर फैल गया था। माउण्ट पीली तथा सेण्ट हेलेन्स के उद्गार भी ऐसे ही क्षतिकारी थे।

(2) ज्वालामुखी विस्फोट से अपखण्डित पदार्थ, धुआँ, धूल, राख आदि पदार्थ बाहर निकलकर भूमि को ढक लेते हैं जिससे खड़ी फसलें, वनस्पतियाँ, इमारतें आदि नष्ट हो जाती हैं। विषैली गैसें भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं तथा अम्ल वर्षा का कारण बनती हैं।

(3) सभी प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार मानव-जीवन को भारी हानि पहुँचाते हैं। विस्फोटक उद्गार होने पर लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचने का समय ही नहीं मिल पाता है। मार्टिनीक द्वीप पर माउण्टे पीली के आकस्मिक उद्गार (1902) से समस्त सेण्ट पियरे नगर तथा उसके 28,000 निवासी मारे गये, केवल दो व्यक्ति शेष बचे। सन् 1985 में कोलम्बिया के नेवादो डेल रुइज ज्वालामुखी के उद्गार से लगभग 23,000 व्यक्ति काले-कवलित हो गये। सन् 1980 में वाशिंगटन राज्य (संयुक्त राज्य अमेरिका) के माउण्ट सेण्ट हेलेन्स के भयंकर उद्गार से 2 बिलियन डॉलर की सम्पत्ति नष्ट हो गयी।

(4) ज्वालामुखी उद्गारों से भारी मात्रा में धूल तथा राख बाहर निकलकर आकाश में व्याप्त हो जाती हैं जिससे प्रादेशिक तथा वैश्विक स्तर पर मौसमी एवं जलवायवीय परिवर्तन होते हैं। ज्वालामुखी उद्गारों से नि:सृत धूल समताप मण्डल में एकत्रित होकर पृथ्वी पर आने वाली सौर्थिक ऊर्जा की मात्रा को कम कर देती है, जिससे तापमानों में कमी आ जाती है। क्राकाटोआ ज्वालामुखी उद्गार (1883) के ऐसे ही प्रभाव सामने आये। 1783 में आयरलैण्ड के लाकी उद्गार से भी तापमानों का ह्रास हुआ।

(5) कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार ज्वालामुखी उद्गारों से नि:सृत धूल तथा राख से जीवों की कुछ प्रजातियों का सामूहिक विनाश (विलोप) हो जाता है। दकन लावा प्रवाह के दौरान ब्रिटेशस के अन्त तथा टर्शियरी के आरम्भ में भारत में प्राणियों की अनेक प्रजातियों का विलोप हो गया।

प्रश्न 4
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कहाँ आते हैं ? विभिन्न चक्रवातों का वर्णन कीजिए।
या
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों को किन-किन स्थानीय नामों से जाना जाता है ?
उत्तर
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात पृथ्वी ग्रह पर अत्यधिक शक्तिशाली, विनाशकारी एवं घातक वायुमण्डलीय तूफान हैं जिन्हें ग्लोब के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। उत्तरी अटलांटिक महासागर (मुख्यत: दक्षिण-पूर्वी संयुक्त राज्य) में ये हरीकेन’ कहलाते हैं, जबकि उत्तरी प्रशान्त महासागर (मुख्यत: चीन, जापान, फिलीपीन्स तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया) में ये ‘टाइफून’ कहलाते हैं। बांग्लादेश तथा भारत में इन्हें चक्रवात’ कहा जाता है तथा ऑस्ट्रेलिया में ‘विली विलीज’।

इन उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की गति 180 से 400 किमी प्रति घण्टा तक होती है जिससे समुद्रों में उच्च ज्वारीय तरंगें पैदा होती हैं, भारी वर्षा होती है, समुद्रतल में असाधारण वृद्धि होती है तथा ये कई दिन (प्राय: एक सप्ताह) तक कायम रहते हैं। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से प्रभावित क्षेत्र में भारी क्षति होती है, जनजीवन तथा सम्पत्ति की अपार हानि होती है। इन चक्रवातों के इतिहास के अध्ययन से इनकी विभीषिका का अनुमान लगाया जा सकता है।

(1) चक्रवात (Cyclone) – ये भारत के पूर्वी तट एवं बांग्लादेश के दक्षिणी तटवर्ती भागों में आते हैं। इतिहास में सबसे भयंकर चक्रवात बांग्लादेश में 1970 में आया, जिसमें 3 लाख व्यक्ति मृत्यु के ग्रास बने। अधिकांश लोगों की मृत्यु स्थल पर 20 फीट ऊँची समुद्री लहरों में डूबने से हुई। बांग्लादेश की सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, 2 लाख लोग मारे गये, 50 हजार से 1 लाख व्यक्ति लापता हो गये, 3 लाख मवेशी मारे गये, 40 हजार घर बरबाद हो गये तथा 63 मिलियन डॉलर की फसलें क्षतिग्रस्त हो गयीं।

भारत में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के तटवर्ती भाग विशेष रूप से उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों से क्षतिग्रस्त होते हैं। सन् 1737 में पूर्वी तट पर आये चक्रवात से 3 लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। इसी प्रकार सन् 1977 (55,000 मृत्यु), 1864 (50,000 मृत्यु) के चक्रवात भी । विनाशकारी थे। सन् 1977 में आन्ध्र तट पर चक्रवाती लहरों ने 55,000 लोगों के प्राण ले लिये। बीस लाख – लोगों के घर बरबाद हो गये तथा 12,00,000 हेक्टेयर भूमि पर फसलें नष्ट हो गयीं।

सन् 1990 में आन्ध्र तट पर 1977 की अपेक्षा 25 गुना तीव्र तथा विनाशकारी चक्रवात आया, जिसमें लोगों की मृत्यु तो अधिक नहीं हुई किन्तु 30 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए, 3 लाख लोग बेघरबार हो गये, 90,000 मवेशी मर गये तथा १ 1,000 करोड़ की सम्पत्ति नष्ट हो गयी। इस चक्रवात से तमिलनाडु तट भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। सन् 1999 में ओडिशा के सुपर साइक्लोन ने राज्य में भारी तबाही मचायी। इसी वर्ष कच्छ क्षेत्र में भी चक्रवातों से काँदला बन्दरगाह एवं तटवर्ती क्षेत्रों में 15,000 व्यक्ति मारे गये। सम्पत्ति की भी अपार हानि हुई।

(2) हरीकेन (Hurricane) – संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी तथा दक्षिण-पूर्वी -क्ट्रीय राज्य (लूसियाना, टेक्सास, अलाबामा तथा फ्लोरिडा) हरीकेनों से सर्वाधिक क्षतिग्रस्त होते हैं। सन् 1990 में गाल्वेस्टन (टेक्सास) में हरीकेन से 6,000 लोग मारे गये तथा 3,000 मकान नष्ट हो गये। सितम्बर, 2005 में संयुक्त राज्य में कैटरिना हरीकेन से न्यूऑर्लियन्स नगर के 1,000 लोग मारे गये। हरीकेन रीटा उतना विध्वंसकारी सिद्ध नहीं हुआ। हरीकेन विल्मा मैक्सिको में तथा हरीकेन ओटाने निकारागुआ तट पर प्रहार किया।

(3) ऑस्ट्रेलिया के डार्विन नगर में सन् 1974 में ट्रेसी चक्रवात से यद्यपि मात्र 49 व्यक्ति मृत हुए किन्तु इस नगर की 80% इमारतें नष्ट हो गयीं। जल वितरण, विद्युत व्यवस्था, परिवहन तथा संचार तन्त्र अस्त- व्यस्त हो गये। तेज पवनों तथा मूसलाधार वर्षा से यह विध्वंस हुआ।

(4) स्थानीय तूफान (Local storms) – दक्षिणी तथा पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के टॉरनेडो तथा थण्डरस्टॉर्म स्थानीय तूफान हैं जो छोटे किन्तु अत्यन्त विनाशकारी होते हैं। इनसे प्रतिवर्ष अनुमानतः 150 मृत्यु तथा 10 मिलियन डॉलर की सम्पत्ति नष्ट होती है। वर्जीनिया, उत्तरी कैरोलिना, दक्षिणी कैरोलिना, जॉर्जिया, अलाबामा, मिसीसिपी, टेनेसी ओह्यो तथा केण्टुकी राज्य इनसे विशेषतः प्रभावित होते हैं।

(5) टाइफून (Typhoon) – ये तूफान पूर्वी एशियाई तट को प्रभावित करते हैं। इनसे 1881 में चीन में 3 लाख व्यक्ति तथा 1923 में जापान में 2,50,000 व्यक्ति मृत्यु का ग्रास बने।

प्रश्न 5
टिप्पणी लिखिए–रासायनिक दुर्घटनाएँ।
उत्तर
रासायनिक दुर्घटनाएँ (Chemical Accidents) – विषैली गैसों के रिसाव से पर्यावरण दूषित हो जाता है तथा उस क्षेत्र के निवासियों के स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए गम्भीर संकट पैदा हो जाता है। दिसम्बर, 1984 में भोपाल (मध्य प्रदेश) में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से विषैली मिथाइल आइसो-सायनाइड के स्टोरेज टैंक से रिसाव की घटना भारतीय इतिहास की बड़ी मानवीय दुर्घटनाओं में से है। इस गैस के तेजी से रिसाव से 3,598 लोगों की जाने चली गयीं तथा हजारों पशु तथा असंख्य सूक्ष्म जीव मारे गये। गैर-राजनीतिक स्रोतों के अनुसार, मृतकों की संख्या 5,000 से अधिक थी। इस गैस के रिसाव से आसपास का वायुमण्डल तथा जलराशियाँ भी प्रदूषित हो गयीं। गैस रिसाव के प्रभाव से लगभग 50% गर्भवती स्त्रियों को गर्भपात हो गया। दस हजार लोग हमेशा के लिए पंगु हो गए तथा 30,000 लोग आंशिक रूप से पंगु हो गए। डेढ़ लाख लोगों को हल्की-फुल्की असमर्थता पैदा हो गयी। इसी प्रकार सन् 1986 में पूर्ववर्ती सोवियत संघ के चनबिल परमाणु संयन्त्र में से रिसाव की दुर्घटना से सैकड़ों लोग मृत्यु का ग्रास बने।

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी नगरों पर परमाणु बमों के प्रहार से मानवता की जो अपूरणीय क्षति हुई, जिसकी विभीषिका आज भी याद है, मानवकृत आपदाओं में सबसे भयंकर घटना है। यही नहीं, आज भी अनेक देश जैव-रासायनिक शस्त्रों का निर्माण कर रहे हैं, जो मानवता के लिए घातक सिद्ध होंगे।

प्रश्न 6
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(i) भूस्खलन एवं एवलांश।
(ii) अग्निकाण्ड। (2011)
या
भू-स्खलन क्या है? [2013, 14]
उत्तर
(i) भूस्खलन एवं एवलांश – लोगों का ऐसा मानना है कि धरातल जिस पर हम रहते हैं, ठोस आधारशिला है, किन्तु इस मान्यता के विपरीत, पृथ्वी का धरातल अस्थिर है, अर्थात् यह ढाल से नीचे की ओर सरेक सकता है।

भूस्खलन एक प्राकृतिक परिघटना है जो भूगर्भिक कारणों से होती है, जिसमें मिट्टी तथा अपक्षयित शैल पत्थरों की, गुरुत्व की शक्ति से, ढाल से नीचे की ओर आकस्मिक गति होती है। अपक्षयित पदार्थ मुख्य धरातल से पृथक् होकर तेजी से ढाल पर लुढ़कने लगता है। यह 300 किमी प्रति घण्टा की गति से गिर सकता है। जब भूस्खलन विशाल शैलपिण्डों के रूप में होता है तो इसे शैल एवलांश कहा जाता है। स्विट्जरलैण्ड, नॉर्वे, कनाडा आदि देशों में तीव्र ढालों वाली घाटियों की तली में बसे गाँव प्रायः शिलापिण्डों के सरकने से नष्ट हो जाते हैं। भारत में भी जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रायः भूस्खलनों के समाचार मिलते रहते हैं। भूस्खलनों से सड़क परिवहन का बाधितं होना सामान्य परिघटना है। कभी-कभी छोटी नदियाँ भी भूस्खलनों से अवरुद्ध हो जाती हैं।

शिलाचूर्ण से मिश्रित हिम की विशाल राशि, जो भयंकर शोर के साथ पर्वतीय ढालों से नीचे की ओर गिरती है, एवलांश कहलाती है। एवलांश भी मानवीय बस्तियों को ध्वस्त कर देते हैं।

(ii) अग्निकाण्ड – अग्निकाण्ड प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारणों से होते हैं। प्राकृतिक कारणों में तड़ित (Lightening) या बिजली गिरना, वनाग्नि, (Forest-fire) तथा ज्वालामुखी उद्गार सम्मिलित हैं। मानवीय कारणों में असावधानी, बिजली का शॉर्ट सर्किट, गैस सिलिण्डर का फटना आदि सम्मिलित हैं। इन सभी कारणों से उत्पन्न अग्निकाण्डों में वनाग्नि तथा बिजली के शॉर्ट सर्किट द्वारा उत्पन्न अग्निकाण्ड सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

वनों में आग लगना एक सामान्य घटना है। यह वृक्षों की परस्पर रगड़ (जैसे—बाँस के वृक्ष), असावधानीवश भूमि पर जलती सिगरेट आदि फेंक देने अथवा कैम्प-फायर के दौरान होती है। इस प्रकार की आग से ऊँची लपटें तो नहीं निकलती हैं किन्तु धरातल पर पड़े हुए समस्त पदार्थ जलकर खाक हो जाते हैं। छोटी-मोटी झाड़ियाँ भी जल जाती हैं। सबसे विनाशकारी वितान-अग्नि (Crown-fire) होती है जिससे बड़े पैमाने पर विनाश होता है। ऐसे अग्निकाण्ड घने वनों में होते हैं। वनाग्नि के परिणाम दूरगामी होते हैं। इससे वन्य जीव-जन्तु व वनस्पतियाँ ही नहीं, समस्त पारिस्थितिकी प्रभावित होती है।

नगरों तथा बस्तियों में अग्निकाण्ड से जनजीवन तथा सम्पत्ति की बहुत हानि होती है। निर्धन लोगों की झुग्गी-झोंपड़ियों में आग लगना सहज बात होती है। नगरीय इमारतों में बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने की घटनाएँ होती हैं। मेलों तथा जलसों में भी शॉर्ट सर्किट से प्रायः आग लग जाती है। इस सन्दर्भ में सन् 1995 में डबबाली (जिला सिरसा, हरियाणा) में एक विद्यालय के वार्षिक जलसे में शॉर्ट सर्किट से उत्पन्न अग्निकाण्ड में 468 लोगों की जाने चली गयीं। 10 अप्रैल, 2006 को उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर के विक्टोरिया पार्क में आयोजित एक उपभोक्ता मेले में 50 से अधिक लोग अग्निकाण्ड में मृत हुए तथा 100 से अधिक गम्भीर रूप से घायल हो गये।

प्रश्न 7
सूनामी कैसे उत्पन्न होती है? [2013]
या
सूनामी किसे कहते हैं? [2014]
उत्तर
समुद्र में लहरें उठना एक सामान्य बात है तथा ये सदैव ही उठती रहती हैं, परन्तु कुछ स्थितियों में ये विकराल रूप ग्रहण कर लेती हैं तथा सम्बन्धित क्षेत्र के लिए भयंकर आपदा सिद्ध होती हैं। सामान्य समुद्री लहरें (Sea waves) कभी-कभी विनाशकारी रूप धारण कर लेती हैं। इनकी ऊँचाई 15 मीटर और कभी-कभी इससे भी अधिक तक होती है। ये तट के आस-पास की बस्तियों को तबाह कर देती हैं। ये लहरें मिनटों में ही तट तक पहुँच जाती हैं। जब ये लहरें उथले पानी में प्रवेश करती हैं, तो भयावह शक्ति के साथ तट से टकराकर कई मीटर ऊपर तक उठती हैं। तटवर्ती मैदानी इलाकों में इनकी रफ्तार 50 किमी प्रति घण्टा तक हो सकती है।

इन विनाशकारी समुद्री लहरों को ‘सूनामी’ कहा जाता है। सूनामी, जापानी भाषा का शब्द है, जो दो शब्दों ‘सू’ अर्थात् ‘बन्दरगाह और नामी’ अर्थात् ‘लहर से बना है। सूनामी लहरें अपनी भयावह शक्ति के द्वारा विशाल चट्टानों, नौकाओं तथा अन्य प्रकार के मलबे को भूमि पर कई मीटर अन्दर तक धकेल देती हैं। ये तटवर्ती इमारतों, वृक्षों आदि को नष्ट कर देती हैं। 26 दिसम्बर, 2004 को दक्षिण-पूर्व एशिया के 11 देशों में सूनामी’ द्वारा फैलाई गयी विनाशलीला से हम सब परिचित हैं।

प्रश्न 8
भारत में भूस्खलन को रोकने के किन्हीं दो उपायों को बताइए। (2015)
उत्तर
भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है फिर भी मानव-क्रियाएँ इसके लिए उत्तरदायी हैं। इसके न्यूनीकरण की दो युक्तियाँ निम्नलिखित हैं –
(1) भूमि उपयोग – वनस्पतिविहीन ढलानों पर भूस्खलन का खतरा बना रहता है। अतः ऐसे स्थानों पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वनस्पति उगाई जानी चाहिए। भू-वैज्ञानिक विशेषज्ञों के द्वारा सुझाये गये उपायों को अपनाकर, भूमि के उपयोग तथा स्थल की जाँच से ढलान को स्थिर बनाने वाली विधियों को अपनाकर भूस्खलन से होने वाली हानि को 95% से अधिक कम किया जा सकता है। जेल के प्राकृतिक प्रवाह में कभी भी बाधक नहीं बनना चाहिए।

(2) प्रतिधारण दीवारें – भूस्खलन को सीमित करने तथा मार्गों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए सड़कों के किनारों पर प्रतिधारण दीवारें तीव्र ढाल पर बनायी जानी चाहिए जिससे ऊँचे पर्वत से पत्थर सड़क पर गिर न जाएँ। रेल लाइनों के लिए प्रयोग की जाने वाली सुरंगों के पश्चात् काफी दूर तक प्रतिधारण दीवारों का निर्माण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 9
भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं (दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 13, 14]
उत्तर

भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्रों की समस्याएँ

सूखा एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है, क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध मानव की तीन आधारभूत आवश्यकताओं वायु, जल और भोजन से है। सूखे से मानव के सामने अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं, ऐसी ही कुछ समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. सूखा पड़ने पर कृषि उपजे नष्ट होने लगती हैं, जिससे भोजन की कमी हो जाती है।
  2. सूखा पड़ने से पशुओं के लिए चारे की कमी हो जाती है, कभी-कभी चारे की कमी के कारण पशुओं की मृत्यु भी हो जाती है।
  3. ग्रामों की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, परन्तु सूखे के कारण कृषि नष्ट हो जाती है। इसलिए ग्रामों में किसान को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है।
  4. ग्रामों में कृषि पर आधारित रोजगारों की प्रधानता होती है परन्तु सूखे के कारण ग्रामों में रोजगार की कमी हो जाती है। इससे गाँव के लोगों की क्रयक्षमता कम हो जाती है जिसका प्रभाव सम्पूर्ण वाणिज्य व्यवस्था पर पड़ता है।
  5. लम्बी अवधि तक सूखा पड़ने पर दुर्भिक्ष (Famine) जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे भुखमरी के कारण व्यापक रूप में मानव एवं पशुओं की मृत्यु होने लगती है।
  6. सरकार को सूखे से निपटने के लिए विविध उपायों पर धन व्यय करना पड़ता है जिससे राष्ट्रीय बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा विकास कार्यों में धन की मात्रा में गिरावट आने लगती है।
  7. सूखा पड़ने पर उद्योगों के लिए कृषि आधारित कच्चे माल की कमी हो जाती है जिससे औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के कारण कीमतें ऊँची हो जाती हैं।
  8. सूखे के कारण लोग अपने मूल स्थान से पलायन करने लगते हैं इसलिए अन्य क्षेत्रों में जनसंख्या असन्तुलन की समस्या उत्पन्न होने लगती है।

प्रश्न 10
भारत में सूखा प्रभावित किन्हीं दो क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर
भारत में सूखा संकट के आधार पर सूखा प्रभावित तीन प्रमुख क्षेत्र हैं –
(i) उच्च या प्रचण्ड सूखाग्रस्त क्षेत्र
(ii) मध्यम सूखाग्रस्त क्षेत्र
(iii) न्यून सूखाग्रस्त क्षेत्र। इनमें दो क्षेत्रों का उल्लेख इस प्रकार है –

(i) उच्च या प्रचण्ड सूखाग्रस्त क्षेत्र इस क्षेत्र में राजस्थान का मरुस्थलीय एवं अर्द्ध-मरुस्थलीय क्षेत्र, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश का दक्षिणी भाग प्रचण्ड सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र का विस्तार लगभग 6 लाख वर्ग किमी में हैं।
(ii) मध्यम सूखाग्रस्त क्षेत्र इसके अन्तर्गत महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु का पश्चिमी भाग सम्मिलित है। यह प्रदेश लगभग 300 किमी की चौड़ाई में पश्चिमी घाट के पूर्व में चतुर्भुजाकार रूप में फैला है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्राकृतिक आपदा से क्या तात्पर्य है ? दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर
वे घटनाएँ अथवा दुर्घटनाएँ जो प्राकृतिक प्रक्रमों या मानवीय कारणों से उत्पन्न होती हैं और जिनसे अपार जान-माल की हानि होती है, प्राकृतिक आपदा कहलाती है। उदाहरण-स्वरूप, भूकम्प तथा बाढ़ ऐसी ही प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

प्रश्न 2
भूकम्प की तीव्रता किस प्रकार मापी जाती है ?
उत्तर
भूकम्प की तीव्रता रिक्टर पैमाने से मापी जाती है।

प्रश्न 3
विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी कहाँ स्थित हैं?
उत्तर
विश्व के 80% सक्रिय ज्वालामुखी विनाशकारी या अभिसारी प्लेट किनारों (Convergent margins) के सहारे स्थित हैं। अभिसारी प्लेट किनारे अग्निवलय के सहारे स्थित हैं।

प्रश्न 4
सूखा से क्या आशय है?
उत्तर
हॉब्स (Hobbs) के अनुसार, किसी विशेष समय में औसत वर्षा न होने की स्थिति को सूखा कहा जाता है।

प्रश्न 5
भारत के किन भागों में भयंकर सूखा पड़ता है?
या
उत्तर भारत के दो सूखाग्रस्त क्षेत्रों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर
राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश राज्य के क्षेत्र भारत के प्रमुख सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं।

प्रश्न 6
भारत में बाढ़ के किन्हीं दो कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर

  1. तीव्र भूकम्पीय लहरों से बाँधों के टूटने पर।
  2. नदी के मार्ग में भूस्खलन के कारण उत्पन्न अवरोध से।

प्रश्न 7
प्राकृतिक आपदा के दो उदाहरण दीजिए। [2012]
उत्तर

  1. भूकम्प तथा
  2. सूखा पड़ना।

प्रश्न 8
आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं? [2012, 13, 15, 16]
उत्तर
प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने को आपदा प्रबन्धन कहते हैं।

प्रश्न 9
भारत में भूस्खलन से प्रभावित किन्हीं दो राज्यों के नाम लिखिए। [2012]
उत्तर

  1. जम्मू एवं कश्मीर तथा
  2. हिमाचल प्रदेश।

प्रश्न 10
भूस्खलन क्या है? [2016]
उत्तर
भूस्खलन एक प्राकृतिक घटना है जो भौगोलिक कारणों से होती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
भोपाल गैस रिसाव की दुर्घटना थी –
(क) प्राकृतिक
(ख) मानवीय
(ग) वायुमण्डलीय
(घ) आकस्मिक
उत्तर
(ख) मानवीय।

प्रश्न 2
भूस्खलन परिघटना है –
(क) भूगर्भिक
(ख) मानवीय
(ग) वायुमण्डलीय
(घ) आकाशीय
उत्तर
(क) भूगर्भिक।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management

प्रश्न 3
सूनामी की उत्पत्ति का सम्बन्ध है – [2011]
(क) भूकम्प से
(ख) ज्वालामुखी से
(ग) भूस्खलन से
(घ) बाढ़ से
उत्तर
(क) भूकम्प से।

प्रश्न 4
सर्वाधिक भूस्खलन होता है – [2015]
(क) पठारी क्षेत्र में
(ख) पर्वतीय क्षेत्र में
(ग) तटीय क्षेत्र में
(घ) तराई क्षेत्र में
उत्तर
(ख) पर्वतीय क्षेत्र में।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से कौन-सी मानवकृत आपदा है? [2016]
(क) निर्वनीकरण
(ख) बाढ़
(ग) भूस्खलन
(घ) ज्वालामुखी
उत्तर
(क) निर्वनीकरण।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अच्छे पत्र के गुण

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name अच्छे पत्र के गुण
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अच्छे पत्र के गुण

अच्छे पत्र के गुण

(1) सरलता-पत्र की भाषा सरल व सुबोध होनी चाहिए। जिस प्रकार सरल और निष्कपट व्यक्ति के व्यवहार का बहुत असर होता है, उसी प्रकार सरल, सुबोध पत्र भी पाठक के मन पर अत्यधिक प्रभाव डालते हैं।
(2) स्पष्टता–पत्र में अपनी बात स्पष्ट तथा विनम्रता से कहनी चाहिए, जिससे पाने वाला उसका आशय सही-सही समझ सके।
(3) संक्षिप्तता-जहाँ तक हो पत्र संक्षेप में लिखना चाहिए, पत्रे में कोई ऐसी बात नहीं लिखनी चाहिए, जिससे पत्र पढ़ने में रुचि ही न रहे।
(4) शिष्टाचार-पत्र-लेखक और पाने वाले के बीच में कोई-न-कोई सम्बन्ध तो होता ही है। आयु और पद में बड़े व्यक्तियों को आदरपूर्वक, मित्रों को सौहार्दपूर्वक और छोटों को स्नेहपूर्वक लिखना चाहिए।
(5) केन्द्र में मुख्य विषय–औपचारिक अभिवादन के बाद सीधे मुख्य विषय पर आ जाना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology (मनोविज्ञान में परीक्षण।)
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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 11
Chapter Name Tests in Psychology
(मनोविज्ञान में परीक्षण।)
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology (मनोविज्ञान में परीक्षण।)

प्रश्न 1
बुद्धि-परीक्षण से सम्बन्धित प्रयोग का वर्णन कीजिए जो आपने किया हो। (2010, 11, 12, 17)
या
सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण पर आपने जो प्रयोग किया हो, उसका वर्णन कीजिए। (2014)
या
स्वयं द्वारा किए गए किसी सामूहिक बुद्धि-परीक्षण का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2008, 09, 11, 15)
नोट-बोर्ड परीक्षा में एक प्रश्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण से सम्बन्धित होता है। नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार केक्षा 12 के निर्धारित पाठ्यक्रम में तीन मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को सम्मिलित किया गया है। ये परीक्षण हैं

  1. बुद्धि-परीक्षण-उपलब्धता के अनुसार,
  2. व्यक्तित्व का अन्तर्मुखी-बर्हिमुखी परीक्षण तथा
  3. रुचि-परीक्षण। 

उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 1

प्रयोग का उद्देश्य– सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण द्वारा 13 वर्ष के विद्यार्थियों की बुद्धि-लब्धि ज्ञात करना तथा बुद्धि-स्तर के अनुसार उनका वर्गीकरण करना।।

प्रयोग सामग्री-
(1) मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद द्वारा निर्मित सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण (संशोधित बी० पी० टी० 7) की प्रतियाँ,
(2) परीक्षण का मैनुअल तथा विराम घड़ी।

परीक्षण का परिचय– सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण (संशोधित बी० पी० टी० 7) का निर्माण मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद द्वारा हुआ है। यह परीक्षण कक्षा 7 एवं इससे ऊँची कक्षाओं में पढ़ने वाले 13 वर्ष से 13 वर्ष 11 माह तक के विद्यार्थियों की बुद्धि मापने के लिए बनाया गया है।

सावधानियाँ-
(1) परीक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व वातावरण को शान्त रखा गया।
(2) विद्यार्थियों के बैठने की उचित व्यवस्था की गयी।
(3) इस बात का भी ध्यान रखा गया कि विद्यार्थियों में कार्य के लिए रुचि एवं उत्साह भी है। अथवा नहीं।
(4) परीक्षार्थियों के पास पेन्सिल अथवा पेन के अतिरिक्त और कुछ नहीं था, इस बात का विशेष ध्यान रखा गया।

निर्देश एवं प्रयोग-विधि– उंसर्युक्त सावधानियाँ रखने के पश्चात् विद्यार्थियों को निम्नलिखित निर्देश दिये गये

“आज तुम्हें एक भिन्न प्रकार की परीक्षा देनी है, उसमें दिये गये प्रश्नों का सम्बन्ध तुम्हारी पढ़ी हुई पुस्तकों से नहीं है। इस परीक्षा का प्रश्न-पत्र एक कॉपी के रूप में होता है। उत्तर भी इस कॉपी में लिखने होते हैं। इस प्रश्न-पत्र को हल करने के लिए तुम्हें केवल 45 मिनट का समय दिया जाएगा, इसलिए तुम्हें प्रश्नों पर थोड़ा-सा ध्यान देकर उसका शीघ्र ही उत्तर देना है।’

“अब तुम्हें एक-एक प्रश्न-पुस्तिका मिल रही है। जब तक मैं तुमसे इसे खोलने के लिए न कहूँ तब तक इसे ने खोलना।’

उपर्युक्त निर्देश देने के पश्चात् प्रत्येक परीक्षार्थी को एक-एक प्रश्न-पुस्तिका दे दी जाती है। फिर प्रत्येक परीक्षार्थी से परीक्षा-पुस्तिका के ऊपर के पृष्ठ पर लिखी गयी सूचनाएँ; जैसे-परीक्षार्थी का नाम, पिता का नाम, पिता का व्यवसाय, आयु, तिथि आदि भरवा दी जाती है और पेन को रख देने का आदेश दिया जाता है। इसके बाद परीक्षा-पुस्तिका के प्रथम पृष्ठ पर छपे आदेशों को क्रमशः पढ़कर परीक्षार्थियों को सुनाया जाता है।

परीक्षा-पुस्तिका पर अंकित आदेश

(1) जब तुमसे परीक्षा आरम्भ करने को कहा जाए तो इससे प्रश्न जितनी शीघ्र और सावधानी से कर सकते हो, क्लरो।।
(2) प्रश्नों को हल करने के लिए जो आदेश और उदाहरण पहले दिये गये हैं, उन्हें ठीक से पढ़ो और समझो।
(3) यदि तुम्हें कोई प्रश्न न आता हो तो उस पर अपना समय नष्ट मत करो और उसे छोड़कर । अगला प्रश्न हल करो।
(4) यदि तुम्हें कुछ रफ काम करना हो तो बायीं ओर की खाली जगह पर कर सकते हो।
(5) यदि तुम्हें कोई उत्तर बदलना हो तो उसे काटकर साफ-साफ लिख दो। .

इसके बाद परीक्षार्थियों से यह कहा गया कि “परीक्षण प्रारम्भ होने जा रहा है। इसलिए तुममें से किसी को कुछ पूछना हो तो पूछ लो। परीक्षण प्रारम्भ होने के बाद किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाएगा।’

अब प्रयोगकर्ता परीक्षण प्रारम्भ करता है। सर्वप्रथम उसने विद्यार्थियों को तैयार’ कहा, इससे विद्यार्थी कार्य करने के लिए तत्पर हो बैठ गये। इसके बाद प्रयोगकर्ता ने प्रारम्भ कहा तथा साथ ही विराम घड़ी भी चालू कर दी। सभी परीक्षार्थियों ने अपना काम प्रारम्भ कर दिया। आधा घण्टा बीत जाने पर प्रयोगकर्ता ने कहा कि, ‘अब पन्द्रह मिनट बाकी हैं और समय समाप्त हो जाने के पश्चात् कहा गया कि अब समय समाप्त हो गया है। अपना-अपना पैन नीचे रख दो और परीक्षण-पुस्तिकाएँ बन्द कर दो।’

उपर्युक्त कथन के पश्चात् सब परीक्षार्थियों की कॉपी एकत्रित करके गिन ली गयीं और पूरी होने पर परीक्षार्थियों को जाने के लिए कहा गया।

परीक्षा-पुस्तिकाओं का अंकन- परीक्षण की उत्तर-सूची की सहायता से सभी परीक्षा-पुस्तिकाओं की जाँच कर ली गयी और प्राप्त प्राप्तांकों को मुख्य पृष्ठ पर निश्चित स्थान पर लिख दिया गया। इसके पश्चात् इस बुद्धि-परीक्षण (संशोधित बी० पी०टी० 7) के मैनुअल में दिये गये सामान्य तालिका में देखकर बुद्धि-लब्धि ज्ञात कर ली गयी।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 2
निष्कर्ष– उपर्युक्त परिणाम-तालिका देखने से ज्ञात होता है कि इस कक्षा में एक विद्यार्थी अति श्रेष्ठ बुद्धि वाला है, 5 विद्यार्थी उत्तम बुद्धि वाले हैं, 16 विद्यार्थी सामान्य, 7 विद्यार्थी निम्न बुद्धि वाले एवं 1 विद्यार्थी मन्द बुद्धिवाला है।

मनोवैज्ञानिक परीक्षण-2

प्रश्न 2
व्यक्तित्व के अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी परीक्षण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2010, 12, 13, 14, 15, 17, 18)
या
बालक के अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी व्यक्तित्व को जानने हेतु किसी एक व्यक्तित्व परीक्षण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन कीजिए।(2016)
उत्तर

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 3

(1) समस्या–प्रयोज्य की अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी प्रवृत्ति का मापन करना।
(2) परिचय–

  1. परीक्षण का इतिहास।
  2. व्यक्तित्व की परिभाषाएँ।

गुथरी के अनुसार, “व्यक्तित्व की परिभाषा सामाजिक महत्त्व की उन आदतों तथा संस्थाओं के रूप में की जा सकती है जो स्थिर तथा परिवर्तन कै अवरोध वाली होती है।”

(3) सामग्री–

  1. अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी प्रवृत्ति माषक प्रश्नावली-पत्र (M.P I)
  2. गणना कुंजी तथा मापदण्ड।
  3. पेन।

(4) सावधानियाँ–

  1. प्रत्येक वेक्य के सामने लिखे हुए, ‘हाँ’, ‘नहीं” तथा ‘मालूम नहीं में से किसी एक को ही अंकित करें। |
  2. सभी प्रश्नों के प्रति अपनी पसन्दगी-नापसन्दगी प्रकट करें।

(5) निर्देश- परीक्षण शुरू करने के पहले प्रयोज्य को निम्नलिखित निर्देश दिया-“आप आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए। मैं आपके साथ एक परीक्षण करने जा रहा हूँ। परीक्षण की सफलता पूर्णतः आपके ऊपर निर्भर है; अतः परीक्षण सम्बन्धी आवश्यक निर्देशों को भली-भाँति सुन लीजिए और उनका सावधानीपूर्वक पालन कीजिए।” मैंने प्रयोज्य को व्यक्तित्व-सूची देने के पश्चात् यह निर्देश दिया–“इस व्यक्तित्व सूची में 56 कथन हैं। इन कथनों को पढ़कर कथनों के सामने दिये गये हाँ/नहीं में यदि आप किसी कथन से सहमत हैं तो उसके आगे ‘हाँ” के नीचे सही
(✓) का चिह्न लगा दें तथा जो कथन आपकी समझ में न आये वहाँ पर मालूम नहीं’ के नीचे सही ।
(✓) का चिह्न लगा दीजिए। इसी तरह से 56 कथनों अर्थात् सभी कथनों पर आपको अषनी सहमति तथा असहमति प्रकट करनी है।”

(6) प्रकाशन– उपर्युक्त निर्देश को भली-भाँति समझकर कार्य को प्रारम्भ करने का संकेत दिया। सम्पूर्ण कार्य समाप्त करने के पश्चात् प्रयोज्य से प्रश्नावली-पत्र लेकर उसे धन्यवाद दे विदा किया। इसके पश्चात् जिस प्रश्न पर स्टार बना हुआ है उस प्रश्न में ‘हाँ पर निशान (✓) लगे हुए को गिन लिया तथा सिना स्टार बने “नहीं” के निशान को गिनकर दोनों को जोड़ दिया। तत्पश्चात् बिना स्टार बना हुआ हूँ के निशान  (✓) को गिन लिया तथा स्टार बना हुआ “नहीं” को गिनकर एक में जोड़ लिया। फिर उत्तर-पुस्तिका में योग के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व में अन्तर्मुखी, बहिर्मुखी का स्तर ज्ञात कर लिया।

(7) प्राप्त प्रदत्त :

(i) बहिर्मुखी के प्राप्तांक- सर्वप्रथम यह ज्ञात करें कि गणना कुंजी के प्रथम भाग अर्थात् ‘हाँ’ के द्योतक शीर्षक के अन्तर्गत लिखे गये प्रश्नों में से कितने प्रश्नों का उत्तर प्रयोज्य ने ‘हाँ’ के रूप में दिया है। इनकी संख्या ज्ञात करें। इसी प्रकार नहीं के द्योतक शीर्षक के अन्तर्गत लिखे गये प्रश्न संख्या में कितने का उत्तर ‘हाँ के रूप में दिया है। इन दोनों का योग ही बहिर्मुखी को प्राप्तांक होगा।

(ii) अन्तर्मुखी के प्राप्तांक- सम्पूर्ण प्रश्नों के योग 56 में से बहिर्मुखी प्राप्तांक को घटा देने पर जो कुछ भी शेष बचे वही अन्तर्मुखी का प्राप्तांक होगा। उदाहरण के लिए-यदि बहिर्मुखी का प्राप्तांक 27 है और प्रश्नों का योग 56 है, तो अन्तर्मुखी प्रवृत्ति का प्राप्तांक 56 – 27 = 29 होगा। अन्तर्मुखी का प्राप्तांक ऋणात्मक (-) और बहिर्मुखी को प्राप्तांक धनात्मक (+) होता है।

(iii) अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी के प्राप्तांक का अन्तर– बहिर्मुखी के प्राप्तांक में से अन्तर्मुखी के प्राप्तांक को घटा देते हैं। उत्तर धनात्मक होगा तो प्रयोज्य बहिर्मुखी और ऋणात्मक होने पर अन्तर्मुखी होगा।

(8) परिणाम।

(9) व्याख्या– व्यक्तित्व व्यक्ति के रूप, गुण-प्रवृत्तियों, सामथ्र्यों आदि का संगठन है। वह व्यक्ति और पर्यावरण की परस्पर अन्त:क्रिया का परिणाम है। व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व हैं
(1) जैविकीय (Biological) तथा
(2) सामाजिक (Social)

(10) निष्कर्ष– उपर्युक्त परीक्षण से यह निष्कर्ष निकला कि प्रयोज्य अन्तर्मुखी प्रवृत्ति का है, क्यांकि वह अधिकांश बातों को अपूर्ण रूप से बताता है। वह एकान्तप्रिय है, आदर्शवादी है तथा उसमें संवेगों की प्रधानता है अर्थात् जुग़ द्वारा बताये गये अन्तर्मुखी प्रकृति के अनेक लक्षण प्रयोज्य के व्यवहारों में वर्तमान हैं।

मनोवैज्ञानिक परीक्षण-3

प्रश्न 1
रुचि परीक्षण के क्रियान्वयन का विस्तार से वर्णन कीजिए। | (2009, 11, 14)
या 
बालक की रुचि मापन हेतु किसी एक रुचि परीक्षण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2016, 18)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 4

(1) समस्या– रुचि-पत्र के माध्यम से प्रयोज्या के विभिन्न रुचि-क्षेत्रों का मापन करना।
(2) निर्देश- प्रस्तुत रुचि-पत्र मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद के द्वारा बनायी गयी है। इस रुचि-पत्री में 10 रुचि-क्षेत्र हैं-

  • बाह्य
  • यान्त्रिक
  • गणनात्मक
  • वैज्ञानिक
  • फ्रेवर्तकीय
  • कलात्मक
  • साहित्यिक
  • संगीतात्मक
  • समाजसेवा तथा
  • लिपिकीय

(3) प्रयोज्य विस्तार-
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 5
(4) सामग्री एवं यन्त्र– रुचि-परीक्षण पुस्तिका, उत्तर-पुस्तिका, नियमावली, कागज, पेन्सिल, ग्राफ पेपर आदि।

(5) व्यवस्थापन– सर्वप्रथम परीक्षणकर्ता ने प्रयोज्या को बुलाकर शान्त कमरे में आराम से बैठाया, फिर Material को मेज पर व्यवस्थित किया। मेज पर सभी सामान रखने के बाद परीक्षणकर्ता ने विषयी को Test से सम्बन्धित कुछ निर्देश दिये।।

(6) निर्देशन- परीक्षणकर्ता ने प्रयोज्या को पुस्तिका पर लिखे सभी निर्देश पढ़कर सुनाए तथा निम्नलिखित निर्देश दिये
प्रस्तुत सूची तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य यह जानना है कि तुम्हें कौन-कौन-से कार्य पसन्द हैं; अत: निर्भयता एवं ईमानदारी से इस सूची को भरो। इस सूची में कुछ कार्य दिये गये हैं जो 5 भागों में बाँटे गये हैं। प्रत्येक भाग में 50 कार्य दिये हुए हैं। प्रथम पेज पर उन कार्यों पर सही (✓) का निशान लगाना है जो तुम्हें बहुत पसन्द हैं। दूसरे भाग पर उन कार्यों पर सही (✓) का निशान लगाना है जो तुम्हें कुछ पसन्द हैं। तीसरे भाग में ऐसे कार्यों पर सही (✓) का निशान लगाइए जो तुम्हें नापसन्द हैं लेकिन यदि उन्हें करना पड़े तो कर सकते हैं। चौथे भाग पर ऐसे कार्यों पर सही (✓) का निशान लगाइए जो कार्य तुम्हें बिल्कुल पसन्द नहीं हैं और साधारणतया उसको करना पसन्द नहीं करेंगे। पाँचवें भाग में आपको उन कार्यों पर सही (✓) का निशान लगाना है जिन्हें तुम बिल्कुल पसन्द नहीं करते से।

(7) सम्पादन- निर्देश देने के पश्चात् परीक्षणकर्ता ने विषयी को पुस्तिका दी। द्वितीय खण्ड अर्थात् भाग 1 पर प्रयोज्या ने उने संभी कार्यों पर निशान लगाये जो उसे बहुत पसन्द थे। भाग 2 पर प्रयोज्या ने उन कार्यों पर निशान सृगाये जो उसे कुछ पसन्द थे। भाग 3 पर उन कार्यों पर जो उसे नापसन्द थे, भाग 4 पर उन कार्यों परे जो उसे पसन्द न होते हुए भी अगर उसको करने को दिये जाएँ तो कर सकती थी तथा 5 में उन सभी कार्यों पर जो उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थे। पूरी Booklet Solve करने के बाद प्रयोज्या ने पुस्तिका प्रयोगकर्ता को दे दी।

(8) सावधानियाँ- वातावरण शान्त रखा, परीक्षणकर्ता ने विषयी के साथ बातचीत करके सामंजस्य स्थापित किया। Raw Score ठीक से Count करने के लिए Manual से Percentile ठीक से नोट किया।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 6
(9) आकलन- परीक्षणकर्ता ने पुस्तिका लेने के बाद प्रत्येक का अलग-अलग क्षेत्र का Raw Score ज्ञात किया, फिर उसको निरीक्षण तालिका में लिखा। पुस्तिका में परीक्षणकर्ता ने सभी Part 1 से 5 तक बाह्य, 6 से 10 तक यान्त्रिक, 11 से 15 तक गणनात्मक, 16 से 20 तके वैज्ञानिक, 21 से 25 तक प्रवर्तकीय, 26 से 30 तक कलात्मक, 31 से 35 तक साहित्यिक, 36 से 40 तक संगीतात्मक, 41 से 45 तक समाजसेवा तथा 46 से 50 तकं लिपिकीय थे। इस तरह प्रत्येक Area में लगाये गये निशान को परीक्षणकर्ता ने गिन लिया। उसके बाद प्रथम भाग के Raw Score को 5 से, दूसरे भाग के Raw Score को 4 से, तीसरे भाग के Raw Scote को 3 से, चौथे भाग के Raw Score को 2 से और पाँचवें भाग के Raw Score को 1 से गुणा किया। गुणा करने से जो Score प्राप्त हुए उन्हें जोड़कर Total Score प्राप्त किये। प्रत्येक Area का इसके बाद परीक्षणकर्ता ने नियमावली से प्रत्येक Total Raw Score का प्रतिशत ज्ञात किया। प्रतिशतता की सहायता से ही नियमानुसार प्रत्येक की श्रेणी एवं क्षेत्र को ज्ञात किया।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 11 Tests in Psychology 7

(10) मौखिक रिपोर्ट।

बोध-प्रश्न

प्रश्न 1
आपको यह प्रयोग कैसा लगा?
उत्तर
अच्छा लगा।

प्रश्न 2
आपको किन क्षेत्रों में अधिक रुचि है और किन क्षेत्रों में नहीं?
उत्तर
मुझे कलात्मक, साहित्यिक और समाजसेवा में बहुत रुचि है तथा गणनात्मक और वैज्ञानिक आदि कार्यों में रुचि नहीं है।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 9 Rent: Definition and Theory

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 9
Chapter Name Rent: Definition and Theory (लगान : परिभाषा एवं सिद्धान्त)
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 9 Rent: Definition and Theory (लगान : परिभाषा एवं सिद्धान्त)

विस्तृत उतरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
आभास लगान की व्याख्या कीजिए। [2007]
या
आभास लगान की संकल्पना को समझाइए। [2015]
उत्तर:
आभास लगान – आभास लगान का विचार सर्वप्रथम प्रो० मार्शल ने प्रस्तुत किया। प्रो० मार्शल के अनुसार, “कुछ ऐसे साधन हो सकते हैं जिनकी पूर्ति अल्पकाल में निश्चित होती है और जिनके कारण उन्हें लगान के प्रकार का भुगतान प्राप्त होता है। मनुष्य के द्वारा निर्मित मशीनों तथा अन्य , यन्त्रों की पूर्ति अल्पकाल में तो निश्चित होती है किन्तु दीर्घकाल में उसमें परिवर्तन किये जा सकते हैं, क्योंकि उनकी पूर्ति भूमि की भाँति दीर्घकाल में निश्चित नहीं होती, इसलिए इनकी आय को लगान नहीं कहा जा सकता; परन्तु इनकी पूर्ति अल्पकाल में निश्चित होती है. इसलिए अल्पकाल में इनकी आय लगान की भाँति होती है, जिसे आभास लगान कहा जाता है।” आभास लगान, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह आय वास्तव में लगान न होकर लगान की प्रकार आभासित होती है। मनुष्य द्वारा निर्मित पूँजीगत वस्तुओं की पूर्ति अल्पकाल में निश्चित होती है, इस कारण उन्हें लगान मिलता है।

जिस प्रकार भूमि की पूर्ति सीमित होती है, उसी प्रकार अन्य साधनों की पूर्ति भी अल्पकाल में सीमित हो सकती है। भूमि में सीमितता का गुण स्थायी रूप से विद्यमान है, इसी कारण इसकी आय को लगान कहा जाता है। भूमि तथा अल्पकाल में सीमित साधनों में सीमितता का गुण समान होने के कारण अन्य साधन जो अस्थायी रूप से सीमित हैं, उनकी आय को आभास लगान कहते हैं। इस प्रकार अल्पकाल में मनुष्य द्वारा निर्मित पूँजीगत वस्तुओं, अधिक योग्यता वाले श्रमिकों और साहसियों की आय में भी आभास लगान सम्मिलित होता है।

प्रो० मार्शल के अनुसार, “उत्पत्ति के उपकरणों (मशीन अर्थात् पूँजीगत वस्तुओं) से प्राप्त होने वाली शुद्ध आय को उनका आभास लगान इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि बहुत अधिक अल्पकाल में उन उपकरणों की पूर्ति अस्थायी रूप से स्थिर होती है और उसे माँग के अनुसार घटाना-बढ़ाना सम्भव नहीं होता। कुछ समय तक वे उन वस्तुओं के मूल्य के साथ, जिनके पैदा करने में उन्हें प्रयोग किया जाता है, वही सम्बन्ध रखते हैं जो भूमि अथवा सीमित पूर्ति वाले किसी अन्य प्राकृतिक उपहार का होता है और जिनकी आय शुद्ध लगान होती है।” इस प्रकार प्रो० मार्शल ने पूँजीगत वस्तुओं, जिनकी पूर्ति अल्पकाल में बेलोचदार तथा दीर्घकाल में लोचदार होती है, की अल्पकालीन आयों के लिए आभास लगान शब्द का प्रयोग किया है।

मार्शल के अनुसार, “मशीन (अर्थात् पूँजीगत वस्तुओं) की अल्पकालीन आय में से उसको चलाने की अल्पकालीन लागत को घटाने से जो बचत प्राप्त होती है, उसे आभास लगान कहते हैं। आभास लगान यह बताता है कि मशीन की अल्पकालीन आय उसके चलाने की अल्पकालीन लागत से कितनी अधिक है। इस प्रकार आभास लगान अल्पकालीन लागत के ऊपर एक प्रकार की अल्पकालीन बचत है।’

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आभास लगान केवल अल्पकाल में प्राप्त होता है। यह एक अस्थायी आधिक्य है जो पूँजीगत वस्तुओं पर केवल अल्पकाल में प्राप्त होता है और दीर्घकाल में उसकी पूर्ति बढ़ जाने के कारण समाप्त हो जाता है।

प्रो० स्टोनियर व हेग के शब्दों में – “मशीनों की पूर्ति अल्पकाल में निश्चित होती है, भले ही उससे प्राप्त आय अधिक हो अथवा कम, फिर भी वे एक प्रकार का लगान अर्जित करती हैं। हाँ, दीर्घकाल में यह आभास लगान समाप्त हो जाता है, क्योकि यह पूर्ण लगान न होकर समाप्त हो जाने वाला अर्द्ध-लगान ही होता है।”

मार्शल के अनुसार, “आभास लगान पूँजीगत साधनों की अल्पकालीन लागत के ऊपर अल्पकालीन बचत है, जिसको अल्पकालीन आय में से अल्पकालीन लागत को घटाकर प्राप्त किया जाता है।”

सिल्वरमैन
के अनुसार, “आभास लगान तकनीकी रूप में उत्पत्ति के उन साधनों को किया गया अतिरिक्त भुगतान है जिनकी पूर्ति अल्पकाल में स्थिर तथा दीर्घकाल में परिवर्तनशील होती है।” संक्षेप में, आभास लगान कुल आगम तथा कुल परिवर्तनशील लागत को अन्तर है। सूत्र रूप में, आभास लगान = कुल आगम – परिवर्तनशील लागते
QR = TR – TVC

प्रश्न 2
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त की व्याख्या विस्तृत एवं सघन खेती के अन्तर्गत कीजिए। [2009]
या
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। [2007,09,10,12,14]
या
लगान को परिभाषित कीजिए। विस्तृत खेती के अन्तर्गत लगान के निर्धारण को समझाइए। [2007, 09]
या
लगान भूमि की उपज का वह भाग है जो भूमि के स्वामी को भूमि की मौलिक व अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के लिए दिया जाता है।” व्याख्या कीजिए। [2010]
या
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16]
या
विस्तृत खेती के अन्तर्गत रिकार्डों के लगान सिद्धान्त को समझाइए। [2013]
या
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या केवल विस्तृत खेती के अन्तर्गत कीजिए। [2015]
या
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त की उपयुक्त चित्र की सहायता से व्याख्या कीजिए। [2016]
या
गहन खेती के अन्तर्गत रिकार्डों के लगान सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। [2016]
उत्तर:
रिकार्डों का लगान सिद्धान्त – लगान के विचार को सर्वप्रथम रिकाडों ने एक निश्चित सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया था। इसलिए इसे ‘रिका का लगान सिद्धान्त के नाम से सम्बोधित किया जाता है। रिकार्डों के अनुसार, केवल भूमि ही लगाने प्राप्त कर सकती है, क्योंकि भूमि में कुछ ऐसी विशेषताएँ विद्यमान हैं जो अन्य साधनों में नहीं होती; जैसे-भूमि प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है, भूमि सीमित होती है आदि। इस कारण रिकाडों ने इस सिद्धान्त की व्याख्या भूमि के आधार पर की है।

रिकार्डों के अनुसार, “लगाने भूमि की उपज का वह भाग है जो भूमि के स्वामी को भूमि की मौलिक तथा अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के लिए दिया जाता है।”
रिकार्डों के अनुसार, सभी भूमियाँ एकसमान नहीं होतीं और उनमें उपजाऊ शक्ति तथा स्थिति में अन्तर पाया जाता है। कुछ भूमियाँ अधिक उपजाऊ तथा अच्छी स्थिति वाली होती हैं तथा कुछ अपेक्षाकृत घटिया होती हैं। जो भूमि स्थिति एवं उर्वरता दोनों ही दृष्टिकोण से सबसे घटिया भूमि हो तथा जिससे उत्पादन व्यय के बराबर ही उपज मिलती हो, अधिक नहीं; उस भूमि को रिकाडों ने सीमान्त भूमि कहा है। सीमान्त भूमि से अच्छी भूमि को रिकाडों ने अधिसीमान्त भूमि बताया है। अतः रिकार्डों के अनुसार, “लगान अधिसीमान्त (Supermarginal) और सीमान्त भूमि (Marginal Land) से उत्पन्न होने वाली उपज का अन्तर होता है। चूंकि सीमान्त भूमि से केवल उत्पादन व्यय के बराबर उपज मिलती है और कुछ अतिरेक (Surplus) नहीं मिलता। इसलिए रिकार्डों के अनुसार, ऐसी भूमि पर कुछ अधिशेष (लगान) भी नहीं होता अर्थात् सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि (No Rent Land) होती है।

सिद्धान्त की व्याख्या
विस्तृत खेती के अन्तर्गत लगान–रिकाडों ने भू-प्रधान खेती (Extensive Cultivation) के आधार पर इस सिद्धान्त को समझाने के लिए एक नये देश का उदाहरण लिया जिसमें थोड़े-से लोग बसे हों। आरम्भ में ऐसे देश की जनसंख्या कम होती है तथा भूमि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है। अत: सर्वप्रथम सर्वोत्तम कोटि की भूमि पर खेती की जाती है। जनसंख्या कम होने के कारण अनाज की समस्त आवश्यकताएँ केवल प्रथम श्रेणी की भूमि पर खेती करने से ही पूरी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में कोई लगान पैदा नहीं होता है, क्योंकि भूमि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। भूमि के लिए किसी प्रकार की कोई प्रतियोगिता नहीं है, किन्तु यदि जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है तो अनाज की बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिए दूसरी श्रेणी की भूमि पर खेती करना आवश्यक हो जाता है और पहली श्रेणी की।

भूमि लगान देने लगती है, क्योंकि श्रम व पूँजी की समान मात्रा लगाने पर दूसरी श्रेणी की भूमि पर पहली श्रेणी की भूमि की अपेक्षा कम उत्पत्ति होगी। दूसरी श्रेणी की भूमि सीमान्त भूमि कहलाएगी। यह । लगानरहित भूमि होगी तथा पहली श्रेणी की भूमि अधिसीमान्त भूमि कहलाएगी। इसी प्रकार जब तीसरी श्रेणी की भूमि भी कृषि के अन्तर्गत आ जाती है तो दूसरी श्रेणी की भूमि लगान देने लगती है तथा प्रथम श्रेणी की भूमि पर लगान बढ़ जाता है। इस प्रकार किसी समय पर सबसे घटिया भूमि, जिस पर खेती की जाती है, को रिकाडों ने सीमान्त भूमि कहा है। यह भूमि लगानरहित भूमि (No Rent Land) होती है। इससे प्राप्त उपज केवल उत्पादन लागत के बराबर होती है, किसी प्रकार का अतिरेक नहीं देती है।

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण – रिका के लगान सिद्धान्त को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए, किसी स्थान पर A, B, C, D, E श्रेणी की समान क्षेत्रफल की भूमियों पर समान लागत लगाकर खेती की जाती है। A श्रेणी की भूमि पर 100 क्विटल, B श्रेणी की भूमि पर 80 किंवटल, c श्रेणी की भूमि पर 50 क्विटल, D श्रेणी की भूमि पर 30 क्विटल तथा E श्रेणी की भूमि पर 20 क्विटल अनाज उत्पन्न किया जाता है। यदि प्रत्येक प्रकार की भूमि पर अनाज उत्पन्न करने की लागत ३ 3300 हो और अनाज का मूल्य ₹165 प्रति क्विटल हो तो E श्रेणी की भूमि । सीमान्त भूमि होगी, क्योंकि उस पर उत्पन्न होने वाली उपज या लगान 20 क्विटल को बेचकर केवल उत्पादन लागत अर्थात् ₹3,300 ही प्राप्त किये जा सकते हैं। अत: E श्रेणी की भूमि लगानरहित भूमि होगी तथा A, B, C, D श्रेणी की भूमि पर तालिका के अनुसार लगान हो
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संलग्न चित्र में Ox-अक्ष पर भूमि की विभिन्न श्रेणियाँ तथा OY-अक्ष पर उत्पादन की मात्रा किंवटल में दिखाई गयी है। विभिन्न श्रेणियों की भूमि पर उनकी उपज के आधार पर आयत बनाये गये हैं। E सीमान्त भूमि है; अतः उस पर कुछ अधिशेष नहीं है। शेष चारों प्रकार की भूमि पर जितना अधिशेष है उसे प्रत्येक आयत में रेखांकित किया गया है। आयत A, B, C को देखने से पता चलता है। कि रेखांकित भाग भी कई उप-विभागों में बँटा हुआ है। यह इस ओर संकेत करता है कि जब भी घटिया श्रेणी की भूमि का उपयोग किया जाता है तभी अतिरिक्त अधिशेष (लगान) में परिवर्तन हो जाता है।

गहन खेती के अन्तर्गत लगान – यद्यपि रिकार्डो ने लगान सिद्धान्त की व्याख्या भू-प्रधान खेती (Extensive Cultivation) के आधार पर की है, परन्तु रिकाडों के अनुसार, लगान विस्तृत और गहन दोनों ही प्रकार की खेती से प्राप्त होता है। जब भूमि की मात्रा (क्षेत्रफल) को स्थिर रखकर, श्रम व पूँजी की इकाइयों में वृद्धि करके कृषि उत्पादन को बढ़ाया जाता है, उसे श्रम प्रधान या गहन खेती कहते हैं।” रिकार्डों का विचार है कि गहन खेती से भी लगान प्राप्त होता है, क्योंकि गहन खेती या श्रम-प्रधान खेती में उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील रहता है। इस कारण श्रम व पूँजी की प्रत्येक अगली इकाई के लगाने से भूमि से जो उपज प्राप्त होती है वह क्रमशः घटती जाती है।

इस प्रकार अन्त में एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जब श्रम व पूँजी की एक और अतिरिक्त इकाई लगाने पर, जो उसे भूमि पर कुल उपज में जो वृद्धि होती है वह उस इकाई की उत्पादन लागत के बराबर होती है। श्रम व पूँजी की इस अतिरिक्त इकाई को सीमान्त इकाई कहते हैं। सीमान्त इकाई से प्राप्त उत्पादन, सीमान्त इकाई के उत्पादन लागत के बराबर होता है, इसलिए उससे कोई अतिरेक अथवा लगान प्राप्त नहीं होता। अधिसीमान्त इकाइयों की उपज सीमान्त इकाई की उपज़ से अधिक होती है। इसलिए उस पर अतिरेक अथवा आर्थिक लगान होता है। इस प्रकार गहन खेती में लगान श्रम और पूँजी की अधिसीमान्त इकाई और सीमान्त इकाई की उपज के अन्तर के बराबर होता है।

उदाहरण – माना कोई उत्पादक अपनी भूमि पर श्रम व पूँजी की चार इकाइयाँ लगाता है, जिससे उसे क्रमशः 40, 30, 20 लगानरहित व 10 क्विटल गेहूँ की उपज प्राप्त होती है। इस प्रकार चौथी इकाई सीमान्त इकाई है। सीमान्त इकाई की अपेक्षा पहली, दूसरी और तीसरी इकाइयों से क्रमशः 40 – 10 = 30, 30 – 10 = 20 तथा 20 – 10 = 10 क्विटल अधिक उपज प्राप्त होती है। यही इन इकाइयों का आर्थिक लगान है।
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चित्र में Ox-अक्ष पर श्रम व पूँजी की इकाइयाँ तथा श्रम व पूँजी की इकाइयाँ OY-अक्ष पर उपज क्विटलों में प्रदर्शित की गयी है। चित्र में रेखांकित आयत भाग लगान की ओर इंगित करता है। चौथी इकाई सीमान्त इकाई है; अत: यह लगानरहित है।

सिद्धान्त की आलोचनाएँ
आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने रिकाडों के लगान (अधिशेष) सिद्धान्त की कटु आलोचनाएँ की हैं। प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. भूमि में मौलिक एवं अविनाशी शक्तियाँ नहीं होतीं – रिकोड़ों के अनुसार, लगान भूमि की मौलिक एवं अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के लिए दिया जाने वाला प्रतिफल है। आलोचकों का मत है। कि भूमि में मौलिक एवं अविनाशी शक्तियाँ नहीं होती। भूमि की उपजाऊ शक्ति प्राकृतिक होती है। उसमें सिंचाई, खाद व अन्य प्रकार के भूमि सुधारों से भूमि की उपजाऊ शक्ति में वृद्धि की जा सकती है; अत: भूमि की उपजाऊ शक्ति मौलिक नहीं है। भूमि की शक्ति को अविनाशी भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भूमि के निरन्तर प्रयोग से उसकी उपजाऊ शक्ति का ह्रास होता है। इस प्रकार रिका का मते उचित प्रतीत नहीं होता।

2. खेती करने का क्रम ऐतिहासिक दृष्टि से ठीक नहीं – रिकार्डों के अनुसार, सबसे पहले खेती अधिक उपजाऊ तथा अच्छी स्थिति वाली भूमि पर की जाती है तथा उसके बाद घटिया भूमि पर, परन्तु कैरे और रोशर आदि अर्थशास्त्रियों के अनुसार खेती का यह क्रम ठीक नहीं है। लोग सबसे पहले उन भूमियों पर खेती करते हैं जो सबसे अधिक सुविधापूर्ण होती हैं चाहे वह कम उपजाऊ ही क्यों न हों।।

3. अपूर्ण एवं अस्पष्ट सिद्धान्त – यह सिद्धान्त लगान उत्पन्न होने के कारणों पर उचित प्रकाश नहीं डालता। यह सिद्धान्त केवल यह बताता है कि श्रेष्ठ भूमि का लगान निम्न श्रेणी की भूमि की तुलना में अधिक क्यों होता है। यह इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि लगान क्यों उत्पन्न होता है और न ही लगान को उत्पन्न करने वाले कारणों का विश्लेषण करता है।

4. यह सिद्धान्त काल्पनिक है – यह सिद्धान्त अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है। वास्तविक जीवन में पूर्ण प्रतियोगिता नहीं पायी जाती है। अत: यह सिद्धान्त व्यावहारिक दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। इसलिए कहा जा सकता है कि यह सिद्धान्त काल्पनिक है।

5. कोई भी भूमि लगानरहित नहीं होती – रिकाडों की यह मान्यता कि सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि होती है, उचित नहीं है। विकसित देशों में ऐसी कोई भूमि नहीं होती जिस पर लगाने न दिया जाता हो। अतः सीमान्त भूमि तथा लगानरहित भूमि की मान्यता केवल कल्पना मात्र है।

6. लगान केवल भूमि को प्राप्त होता है – रिकाडों की यह धारणा गलत है कि लगान केवल भूमि को ही प्राप्त होता है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लगान अवसर लागत पर अतिरेक है जो उत्पत्ति के किसी भी साधन को प्राप्त हो सकता है।

7. लगान कीमत को प्रभावित करता है – रिकाडों का यह विचार कि लगान कीमत को प्रभावित नहीं करता, ठीक नहीं है। केवल कुछ दशाओं में अधिशेष कीमत में सम्मिलित रहता है और कीमत का निर्धारण भी करता है। व्यक्तिगत किसान की दृष्टि से लागत एक लगान होती है, इसलिए वह अनाज की कीमत को प्रभावित करता है।

8. कृषि पर सदैव ही उत्पत्ति ह्रास नियम लागू नहीं होता – लगान का यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि कृषि में केवल उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है, जबकि वास्तविकता यह है कि कृषि में उत्पत्ति वृद्धि नियम तथा उत्पत्ति समता नियम भी लागू हो सकते हैं।

9. लगान कीमत में सम्मिलित होता है – रिकाड तथा प्राचीन अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिशेष (लगान) खेती की उपज की कीमत में सम्मिलित नहीं रहता अर्थात् खेती की उपज की कीमत के निर्धारण में लगान का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि लगान और कीमत एक-दूसरे से भिन्न या असम्बन्धित नहीं हैं। यद्यपि अधिशेष ( लगान) कीमत का निर्धारण नहीं करता, परन्तु स्वयं अधिशेष का निर्धारण भूमि की कीमत द्वारा होता है।

प्रश्न 3
लगान के आधुनिक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। यह रिकार्डों के लगान सिद्धान्त से किस प्रकार श्रेष्ठ है ?
उत्तर:
लगान का आधुनिक सिद्धान्त – लगान का आधुनिक सिद्धान्त माँग और पूर्ति के सामान्य सिद्धान्त का ही एक संशोधित रूप है। इस सिद्धान्त के अनुसार लगान दुर्लभता के कारण प्राप्त होता है। लगान केवल भूमि की ही विशेषता नहीं, बल्कि वह अन्य उत्पत्ति के साधनों को भी मिल सकता है; क्योंकि आधुनिक अर्थशास्त्रियों का मत है कि उत्पत्ति के अन्य साधन भी भूमि की भाँति सीमितता अथवा भूमि तत्त्व को प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार लगान का भी एक सामान्य सिद्धान्त होना चाहिए; अत: इन अर्थशास्त्रियों ने माँग और पूर्ति के सिद्धान्त को लगान के निर्धारण के सम्बन्ध में लागू करने का प्रयत्न किया है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने लगान के दुर्लभता सिद्धान्त’ को विकसित किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार, भूमि की दुर्लभता के कारण लगान उत्पन्न होता है। यदि भूमि असीमित होती तो कीमत या लगान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

लगान के आधुनिक सिद्धान्त का आधार – लगान के आधुनिक सिद्धान्त का आधार साधनों की विशिष्टता का होना है। वॉन वीजर (Von wieser) ने विशिष्टता के आधार पर उत्पत्ति के साधनों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा है

  1. पूर्णतया विशिष्ट साधन – पूर्णतया विशिष्ट साधन वे साधन होते हैं जिनका उपयोग केवल एक विशिष्ट कार्य में ही किया जा सकता है। इस प्रकार के साधनों को किसी अन्य उपयोग में नहीं लाया जा सकता, इसलिए इनकी अवसर लागत शून्य होती है।
  2. पूर्णतया अविशिष्ट साधन – पूर्णतया अविशिष्ट साधन वे साधन होते हैं जिन्हें किसी भी उपयोग में लाया जा सकता है अर्थात् जिनमें गतिशीलता पायी जाती है।

परन्तु कोई भी साधन न तो पूर्णतया विशिष्ट होता है और न पूर्णतया अविशिष्ट। प्रायः साधन आंशिक रूप से विशिष्ट और आंशिक रूप से अविशिष्ट होते हैं।

आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लगान साधनों की विशिष्टता का परिणाम है। ‘विशिष्टता एवं ‘भूमि तत्त्व’ एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं, अर्थात् विशिष्टता शब्द के लिए भूमि तत्त्व’ शब्द का भी प्रयोग किया जा सकता है।

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार, “लगान के विचार का सार वह बचत है जो कि एक साधन की इकाई को उस न्यूनतम आय के ऊपर प्राप्त होती है जो कि साधन को अपने कार्य करते रहने के लिए आवश्यक है।”

प्रो० बोल्डिग के शब्दों में, “आर्थिक बचत अथवा आर्थिक लागत उत्पत्ति के किसी साधन की एक इकाई का वह भुगतान है जो कि कुल पूर्ति मूल्य के ऊपर आधिक्य है अर्थात् साधन को वर्तमान व्यवसाय में बनाये रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम धनराशि के ऊपर आधिक्य है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लगान एक बचत है जो किसी साधन को उसके न्यूनतम पूर्ति मूल्य अर्थात् अवसर लागत के ऊपर प्राप्त होती है। अर्थात्
लगान = वास्तविक आय – अवसर लागत

स्पष्ट है कि लगाने प्रत्येक साधन को विशिष्टता के गुण के कारण प्राप्त होता है।
लगान के आधुनिक सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ

  1.  इस सिद्धान्त के अनुसार उत्पत्ति का प्रत्येक साधन लगान प्राप्त कर सकता है।
  2.  साधने की वास्तविक आय में से अवसर लागत को घटाकर लगान ज्ञात किया जा सकता है।
  3.  लगान की उत्पत्ति का कारण साधन की विशिष्टता या सीमितता का होना है।
  4.  लगान का सिद्धान्त माँग और पूर्ति का ही सिद्धान्त है।

रिकार्डों के सिद्धान्त से आधुनिक सिद्धान्त की भिन्नता – आधुनिक लगान सिद्धान्त व रिकार्डों के लगान सिद्धान्त में निम्नलिखित भिन्नताएँ पायी जाती हैं

(1) प्राचीन अर्थशास्त्री यह समझते थे कि लगान केवल भूमि के सम्बन्ध में ही प्राप्त होता है। रिकाडों ने भी केवल लगान की व्याख्या भूमि के सन्दर्भ में ही की, परन्तु आधुनिक लगान सिद्धान्त के अनुसार उत्पत्ति के अन्य साधनों को भी लगान प्राप्त हो सकता है। उदाहरण के लिए—‘योग्यता के लगान का विचार’ यह बताता है कि मनुष्य की प्राकृतिक योग्यता एक प्रकार की भूमि ही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल भूमिपति ही अतिरिक्त आय प्राप्त नहीं करता, बल्कि उत्पत्ति के अन्य साधनों को भी इसी प्रकार की आय प्राप्त हो सकती है।

(2) रिकार्डों का लगाने सिद्धान्त एक संकुचित धारणा है, जबकि आधुनिक लगान सिद्धान्त का दृष्टिकोण व्यापक है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों की यह धारणा है कि लगान उत्पादन के सभी साधनों को प्राप्त हो सकता है, अपेक्षाकृत व्यापक धारणा है।

(3) रिकाडों के लगान सिद्धान्त के अनुसार भूमि प्रकृति का उपहार है, इसकी पूर्ति सीमित है। भूमि की सीमितता के गुण अन्य साधनों में नहीं पाये जाते, इसलिए उन्हें लगान प्राप्त नहीं होता है। आधुनिक लगान सिद्धान्त के अनुसार अल्पकाल में सभी साधनों की पूर्ति सीमित होती है तथा लगान सिद्धान्त भी माँग और पूर्ति का सामान्य सिद्धान्त ही है। इसके लिए किसी पृथक् सिद्धान्त की आवश्यकता नहीं थी।

रिकार्डों का लगान सिद्धान्त लगान उत्पन्न होने के कारणों पर उचित प्रकाश नहीं डालता। यह केवल यह बताता है कि श्रेष्ठ भूमि का लगान निम्नकोटि की भूमि की तुलना में अधिक क्यों होता है ? यह इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि लगान क्यों उत्पन्न होता है। इसके विपरीत आधुनिक लगाने सिद्धान्त यह बताता है कि लगाने की उत्पत्ति किसी साधन की विशिष्टता या सीमितता के कारण होती है;
अत: यह तर्क उचित व न्यायसंगत है।
उपर्युक्त कारणों से रिकार्डों के लगान सिद्धान्त की अपेक्षा, लगान के आधुनिक सिद्धान्त को श्रेष्ठ माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
“अनाज का मूल्य इसलिए ऊँचा नहीं होता है, क्योंकि लगान दिया जाता है, बल्कि लगान इसलिए दिया जाता है, क्योंकि अनाज महँगा है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
लगान तथा कीमत के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लगान तथा कीमतों में सम्बन्ध
लगान कीमत का निर्धारण नहीं करता, परन्तु स्वयं अधिशेष का निर्धारण भूमि की कीमत द्वारा होता है। इस विचार को रिकार्डो ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-“अनाज इसलिए महँगा नहीं है, क्योंकि अधिशेष दिया जाता है; बल्कि अधिशेष इसलिए दिया जाता है, क्योंकि अनाज महँगा है।”
रिकार्डों के इस कथन की व्याख्या दो भागों में बाँटकर की जा सकती है

1. लगान मूल्य को प्रभावित नहीं करता या अधिशेष कीमत का निर्धारण नहीं करता – अधिशेष न तो कीमत में सम्मिलित होता है और न उसका निर्धारण ही करता है। रिकाडों के लगाने सिद्धान्त से यह तथ्य पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। रिकार्डों के अनुसार, अनाज की कीमत सीमान्त भूमि पर होने वाले उत्पादन व्यय द्वारा निश्चित होती है। चूंकि रिकार्डों के अधिशेष सिद्धान्त के अनुसार सीमान्त भूमि लगानहीन भूमि होती है। अतः अधिशेष (लगान) न तो सीमान्त भूमि की उत्पादन लागत का अंश ही होता है और न कीमत का निर्धारण ही करता है। इस प्रकार अनाज के मूल्य में जो सीमान्त भूमि के उत्पादन व्यय द्वारा निश्चित होता है, लगान सम्मिलित नहीं होता है। अत: यदि लगान कम कर दिया जाए अथवा भूमि को लगाने-मुक्त कर दिया जाए तो भी अनाज के मूल्य पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

2. मूल्य लगान को प्रभावित करता है या लगान का निर्धारण कीमत द्वारा होता है – अधिशेष कीमत का निर्धारण नहीं करता, परन्तु स्वयं अधिशेष का निर्धारण खेती की उपज की कीमत के अनुसार होता है। कृषि पदार्थों का मूल्य बढ़ जाने पर खेती की सीमा या क्षेत्र विस्तृत हो जाता है अर्थात् घटिया भूमि पर भी खेती की जाने लगती है। जैसे-जैसे घटिया भूमि का उपयोग खेती में किया जाता है वैसे-वैसे अच्छी भूमि का लगान बढ़ता जाता है। मूल्य बढ़ जाने से सीमान्त भूमि अधिसीमान्त हो जाती है, जिसके कारण लगानहीन भूमि पर भी लगान उत्पन्न हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो भूमि पहले से ही अधिसीमान्त थी उस पर अधिशेष (लगान) की मात्रा बढ़ जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि कृषि वस्तुओं के मूल्यों में होने वाली वृद्धि भूमि के लगान को बढ़ाती है। इनका मूल्य गिरने पर लगान भी कम हो जाता है। इसलिए रिकार्डो का यह कथन सत्य है कि “अनाज का मूल्य इसलिए ऊँचा नहीं है कि लगान दिया जाता है, वरन् लगान इसलिए दिया जाता है, क्योंकि अनाज की कीमत ऊँची है।”

प्रश्न 2
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त तथा आधुनिक लगान सिद्धान्त में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त तथा आधुनिक लगान सिद्धान्त में अन्तर
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प्रश्न 3
क्या लगान केवल भूमि को ही प्राप्त होता है ?
उत्तर:
रिकार्डों के अनुसार, केवल भूमि ही लगान प्राप्त कर सकती है, क्योंकि भूमि में कुछ ऐसी विशेषताएँ पायी जाती हैं जो अन्य साधनों में नहीं होतीं; जैसे-भूमि प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है। अर्थात् समाज के लिए भूमि की उत्पादन लागत शून्य होती है। भूमि सीमित होती है और समाज की दृष्टि से उसकी कुल मात्रा को घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता। सीमितता केवल भूमि की ही विशेषता है जो उसे उत्पत्ति के अन्य साधनों से अलग कर देती है।

आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार लगान अवसर लागत (Opportunity cost) पर अतिरेक है जो उत्पत्ति के किसी भी साधन को प्राप्त हो सकता है। जिस साधन की पूर्ति बेलोचदार हो जाती है। वही साधन लगान प्राप्त करने लगता है।
लगान के आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार किसी साधन को लगान उसकी दुर्लभता के कारण प्राप्त होता है। लगान केवल भूमि की विशेषता नहीं है, बल्कि वह अन्य उत्पत्ति के साधनों को मिल सकता है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अन्य साधन भूमि की भाँति सीमितता (Limitedness) अथवा भूमि तत्त्व (Land element) को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए लगान उन्हें भी प्राप्त हो सकता है।

प्रो० मार्शल ने योग्यता के लगान का विश्लेषण करके लगान के विचार को विस्तृत कर दिया है। प्राचीन अर्थशास्त्री यह समझते थे कि लगान केवल भूमि के सम्बन्ध में ही उत्पन्न होता है, किन्तु मार्शल के अनुसार, लगान कई प्रकार के हो सकते हैं और भूमि का लगान उसका एक विशेष उदाहरण है। इस प्रकार, प्रो० मार्शल ने योग्यता के लगान का विचार देकर लगान के आधुनिक सिद्धान्त की नींव डाली। योग्यता का लगान का विचार हमें यह बताता है कि मनुष्य में भी भूमि (Land) का कुछ अंश पाया जाता है। मनुष्य की प्राकृतिक योग्यता एक प्रकार से भूमि ही है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि केवल भूमिपति ही अतिरेक आय प्राप्त नहीं करता, बल्कि उत्पत्ति के अन्य साधनों को भी इस प्रकार की आय प्राप्त हो सकती है। अत: लगान केवल भूमि को ही प्राप्त नहीं होता है, बल्कि उत्पादन के अन्य उपादानों श्रमिकों, पूंजीपतियों तथा उद्यमियों आदि को भी प्राप्त होता है।

प्रश्न 4
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त व आभास लगान की तुलना कीजिए।
उत्तर:
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त तथा आभास लगान में तुलना

समानताएँ (Similarities)

  1. दोनों के उत्पन्न होने के कारण समान हैं। लगान कृषि उपज की माँग बढ़ने के कारण उत्पन्न होता है और आभास लगान मानव द्वारा निर्मित पूँजीगत वस्तुओं की माँगे बढ़ने के कारण उत्पन्न होता है।
  2. लगान भूमि की पूर्ति निश्चित होने के कारण उत्पन्न होता है। इसी प्रकार आभास लगान अल्पकाल में पूँजीगत वस्तुओं की पूर्ति निश्चित होने के कारण उत्पन्न होता है।
  3. लगान कीमत को प्रभावित नहीं करता, अपितु कीमत द्वारा प्रभावित होता है। इसी प्रकार आभास लगान भी कीमत को प्रभावित नहीं करता, अपितु कीमत द्वारा प्रभावित होता है।

असमानताएँ (Dissimilarities)

  1. रिकार्डों के अनुसार, “लगान प्राकृतिक उपहारों (भूमि) पर प्राप्त होता है, जबकि आभास लगान मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं पर प्राप्त होता है।”
  2. आभास लगान केवल अल्पकाल में प्राप्त होता है, जबकि रिकार्डों के अनुसार लगान अल्पकाल व दीर्घकाल दोनों में प्राप्त होता है।
  3. रिकाडों के अनुसार, लगान एक स्थायी आधिक्य हैं, जबकि आभास लगन एक अस्थायी आधिक्य है।

प्रश्न 5
आर्थिक लगान तथा ठेका लगान में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
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प्रश्न 6
जनसंख्या की वृद्धि का लगान पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
जनसंख्या में वृद्धि होने पर लगान में वृद्धि हो जाती है। जनसंख्या की वृद्धि से खाद्य-पदार्थों की माँग बढ़ती है। इस माँग की पूर्ति हेतु खाद्य-पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए या तो भू-प्रधान खेती की जाएगी या श्रम-प्रधान खेती। इन दोनों प्रकार की खेती में लगान बढ़ेगा।

भू-प्रधान खेती में लगान पर प्रभाव –  मान लीजिए खाद्य-पदार्थों की माँग की पूर्ति हेतु विस्तृत खेती का प्रयोग किया जाता है। तब हम कम अच्छी अर्थात् ‘घटिया’ प्रकार की भूमि पर भी खेती करना आरम्भ कर देंगे। इससे खेती की सीमा (क्षेत्रफल) में वृद्धि होगी, जिससे सीमान्त भूमि अब अधिसीमान्त भूमि हो जाएगी तथा सीमान्त भूमि और अधिसीमान्त भूमि की उपज का अन्तर बढ़ जाएगा, परिणामस्वरूप अधिशेष (लगान) में वृद्धि होगी।

श्रम-प्रधान खेती में लगान पर प्रभाव – यदि उपज बढ़ाने के लिए श्रम-प्रधान खेती की जाती है अर्थात् उसी भूमि पर श्रम तथा पूँजी की मात्रा बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जाता है तब भी अधिशेष में वृद्धि होगी, क्योंकि श्रम और पूँजी से सीमान्त इकाई तथा अधिसीमान्त इकाई की उपज का अन्तर अधिक हो जाएगा। इस प्रकार लगान में वृद्धि होगी।

भूमि का अधिशेष या लगान इस कारण भी बढ़ जाता है, क्योंकि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ रहने के लिए आवास, पार्क, क्रीड़ास्थल, कारखाने, विद्यालय, चिकित्सालय आदि के लिए भी भूमि की आवश्यकता पड़ती है। अतः अतिरिक्त भूमि की माँग बढ़ जाती है या उपयोग में आने लगती है, परिणामस्वरूप लगान में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 7
परिवहन के साधनों के विकास का लगान पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
परिवहन के साधनों के विकास का लगाने पर प्रभाव–यदि यातायात के साधनों की उन्नति हो जाती है तो यातायात के साधन उत्तम, सस्ते एवं सुविधापूर्वक उपलब्ध होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में लगान पर दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। लगान की मात्रा में वृद्धि भी हो जाती है तथा कमी भी।
यातायात के उत्तम और सस्ते साधन उपलब्ध होने से दूर-दूर से कृषि उत्पादन को बाजार व मण्डियों में भेजकर फसल की उचित कीमत प्राप्त की जा सकती है, जिसका परिणाम यह होता है कि घटिया श्रेणी की भूमि पर भी कृषि कार्य प्रारम्भ हो जाता है, जिसके कारण सीमान्त भूमि अधिसीमान्त हो जाती है तथा लगान उत्पन्न हो जाता है।

परिवहन के साधन विकसित हो जाने से सुदूर स्थानों से जनसंख्या आकर बसने लगती है, जिसके कारण भूमि व अनाज की माँग बढ़ती है और लगाने में भी वृद्धि हो जाती है। यातायात के साधनों में विकास हो जाने से कभी-कभी लगाने की मात्रा पर विपरीत प्रभाव भी पड़ता है, क्योंकि यदि अनाज का विदेशों से कम मूल्य पर आयात कर लिया जाता है तब वहाँ पर घटिया भूमि अर्थात् सीमान्त भूमि पर खेती होनी बन्द हो जाएगी, जिससे लगान की मात्रा कम हो जाएगी।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
लगान और लाभ में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
लगान और लाभ में अन्तर
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प्रश्न 2
कुल लगान किसे कहते हैं ? कुल लगान के तत्त्व बताइए।
उत्तर:
कुल लगान – कुल लगान के अन्तर्गत आर्थिक लगान के अतिरिक्त कुछ अन्य तत्त्व भी सम्मिलित होते हैं, जो इस प्रकार हैं

  1. केवल भूमि के प्रयोग के लिए भुगतान अर्थात् आर्थिक लगान।
  2. भूमि सुधार पर व्यय की गयी पूँजी पर ब्याज।
  3.  भूस्वामी के द्वारा उठाई गयी जोखिम का प्रतिफल।
  4. भूमि की देख-रेख अथवा उसके प्रबन्ध के लिए पुरस्कार।

प्रश्न 3
रिकार्डों के अनुसार भूमि को ही लगान क्यों प्राप्त होता है ?
उत्तर:
रिकाडों के अनुसार, भूमि ही लगान प्राप्त कर सकती है, क्योंकि भूमि में ही कुछ ऐसी विशेषताएँ पायी जाती हैं जो अन्य साधनों में नहीं होती। ये विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1.  भूमि प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है अर्थात् समाज के लिए भूमि की उत्पादन लागत शून्य होती है।
  2. भूमि सीमित होती है और समाज की हानि से उसकी कुल मात्रा को घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। सीमितता का यह गुण केवल भूमि की ही विशेषता है जो उसे उत्पत्ति के अन्य साधनों से अलग कर देती है। भूमि की पूर्ति बेलोचदार होने के कारण ही उस पर लगान प्राप्त होता है।

प्रश्न 4
रिकार्डों के अनुसार ‘सीमान्त भूमि’ क्यों लगानरहित भूमि होती है ?
उत्तर:
रिकाडों ने लगान को एक अन्तरीय अतिरेक (Differential surplus) माना है। उनके अनुसार सभी भूमियाँ एकसमान नहीं होतीं और उनमें उपजाऊ शक्ति तथा स्थिति का अन्तर पाया जाता है। कुछ भूमियाँ अधिक उपजाऊ तथा अच्छी स्थिति वाली होती हैं तथा कुछ उनकी तुलना में घटिया होती हैं। सीमान्त भूमि पर उपज कम होती है, ऐसी स्थिति में अच्छी भूमि (उपसीमान्त भूमि) अतिरेक देती है सीमान्त भूमि नहीं। इस कारण सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि होती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
ठेके का लगान क्या है? [2011]
उत्तर:
किसान द्वारा भूमिपति को भूमि के उपयोग के बदले में जो धनराशि देने का वादा किया जाता है, उसे ‘ठेके का लगान’ कहा जाता है।

प्रश्न 2
आर्थिक लगान किसे कहते हैं ?
उत्तर:
आर्थिक लगान को शुद्ध लगान भी कहते हैं। केवल भूमि के प्रयोग के बदले में दिये जाने वाले भुगतान को आर्थिक लगान कहा जाता है। रिकार्डों के अनुसार, “श्रेष्ठ भूमि की उपज और सीमान्त भूमि की उपज में जो अन्तर होता है, उसे आर्थिक लगान कहते हैं।”

प्रश्न 3
आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार लगान किसे कहते हैं ?
उत्तर:
आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार आर्थिक लगान एक साधन को उसकी अवसर लागत से प्राप्त होने वाला अतिरेक है। यह लगान केवल भूमि पर ही प्राप्त नहीं होता बल्कि उत्पत्ति के किसी भी उस साधन को आर्थिक लगान प्राप्त हो सकता है जिसकी पूर्ति बेलोचदार हो।

प्रश्न 4
रिकार्डों के अनुसार सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि होती है, क्यों ?
उत्तर:
क्योंकि सीमान्त भूमि से केवल उत्पादन व्यय के बराबर उपज मिलती है और कुछ अतिरेक नहीं मिलता है। इसलिए रिकार्डों के अनुसार, ऐसी भूमि पर कुछ अधिशेष (लगान) भी नहीं होता अर्थात् सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि होती है।

प्रश्न 5
‘लगान का दुर्लभता सिद्धान्त’ से क्या आशय है ?
उत्तर:
आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने माँग एवं पूर्ति के सिद्धान्त को लगान के निर्धारण के सम्बन्ध में लागू करने का प्रयत्न किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार भूमि की दुर्लभता के कारण लगान उत्पन्न होता है क्योकि यदि भूमि असीमित होती तो भूमि की कीमत या लगान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

प्रश्न 6
लगान के परम्परागत सिद्धान्त के जन्मदाता कौन हैं? [2008]
उत्तर:
जे०बी० क्लार्क।

प्रश्न 7
रिका द्वारा दी गई लगान की परिभाषा लिखिए। [2013, 15]
या
लगान का अर्थ लिखिए। [2015]
उत्तर:
रिकार्डों के अनुसार, “लगान भूमि की उपज का वह भाग है जो भूमि के स्वामी को भूमि की मौलिक तथा अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के लिए दिया जाता है।

प्रश्न 8
रिकाड़ों के लगान सिद्धान्त एवं आधुनिक लगान सिद्धान्त का एक अन्तर लिखिए।
उत्तर:
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त के अनुसार केवल भूमि ही लगान प्राप्त कर सकती है, जबकि आधुनिक लगान सिद्धान्त के अनुसार लगान केवल भूमि को ही नहीं, बल्कि उत्पादन के अन्य साधनों को भी मिल सकता है।

प्रश्न 9
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त की दो आलोचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
रिकार्डों के लगान सिद्धान्त की दो आलोचनाएँ इस प्रकार हैं

  1.  आलोचकों का मत है कि भूमि में मौलिक एवं अविनाशी शक्तियाँ नहीं होती हैं।
  2. खेती करने का क्रम ऐतिहासिक दृष्टि से ठीक नहीं है।

प्रश्न 10
रिकार्डों के अनुसार लगान किसे प्राप्त होता है ?
या
रिकाडों के अनुसार, लगान उत्पादन के मात्र एक साधन को मिलता है। उस उत्पादन के साधन का नाम बताइए। [2007]
उत्तर:
रिकार्डों के अनुसार केवल भूमि ही लगान प्राप्त कर सकती है।

प्रश्न 11
आभास लगान से क्या तात्पर्य है ? [2006, 07, 09]
उत्तर:
प्रो० मार्शल ने पूँजीगत वस्तुओं, जिनकी पूर्ति अल्पकाल में बेलोचदार तथा दीर्घकाल में लोचदार होती है, की अल्पकालीन आयों के लिए आभास लगान शब्द का प्रयोग किया है।

प्रश्न 12
रिकार्डो ने सीमान्त भूमि किसे कहा है ?
उत्तर:
रिकार्डों के अनुसार, जो भूमि स्थिति एवं उर्वरता दोनों ही दृष्टिकोण से सबसे घटिया हो तथा जिससे उत्पादन व्यय के बराबर ही उपज मिलती हो अधिक नहीं, उसे रिकाडों ने सीमान्त भूमि कहा है।

प्रश्न 13
रिकार्डों के अनुसार अधिसीमान्त भूमि किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सीमान्त भूमि से कुछ अच्छी भूमि को रिकाड ने अधिसीमान्त भूमि कहा है।

प्रश्न 14
क्या सीमान्त भूमि अथवा लगानरहित भूमि एक कल्पनामात्र है ?
उत्तर:
आधुनिक अर्थशास्त्रियों के मतानुसार विकसित देशों में ऐसी कोई भूमि नहीं होती जिस पर लगान न दिया जाता हो। अतः रिकाडों की यह मान्यता कि सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि होती है, एक कोरी कल्पना है।

प्रश्न 15
“लगान मूल्य को प्रभावित नहीं करता है।” यह किस अर्थशास्त्री का विचार है ?
उत्तर:
रिकाडों का।

प्रश्न 16
आर्थिक लगान की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
आर्थिक लगान को शुद्ध लगान भी कहते हैं। केवल भूमि के प्रयोग के बदले में दिये जाने वाले भुगतान को आर्थिक लगान कहा जाता है। रिकाडों के अनुसार श्रेष्ठ भूमि की उपज और सीमान्त भूमि की उपज में जो अन्तर होता है उसे आर्थिक लगान कहते हैं।

प्रश्न 17
अर्थशास्त्र में ‘आभास लगान’ का विचार किसने प्रस्तुत किया ? [2009, 12, 13]
या
आभास लगान की अवधारणा किसने प्रतिपादित की है ? [2015, 15]
उत्तर:
आभास लगाने का विचार सर्वप्रथम मार्शल के द्वारा प्रस्तुत किया गया।

प्रश्न 18
रिकार्डो ने भूमि की उपजाऊ शक्ति को किस प्रकार की शक्ति माना है ?
उत्तर:
रिकाडों ने भूमि की उपजाऊ शक्ति को उसकी मूल तथा अविनाशी शक्ति माना है।

प्रश्न 19
लगान के सिद्धान्त के प्रवर्तक का नाम लिखिए।
या
लगान सिद्धान्त की विधिवत व्याख्या सर्वप्रथम किसने की?
उत्तर:
रिका।

प्रश्न 20
लगान के किन्हीं दो प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2006, 07]
उत्तर:
(1) आर्थिक लगान तथा
(2) ठेका लगान।

प्रश्न 21
लगान उत्पत्ति के किस साधन को प्राप्त होता है? [2014]
उत्तर:
भूमि को।

प्रश्न 22
लगान किसे दिया जाता है? [2014]
उत्तर:
लगान भूमि के स्वामी को दिया जाता है।

प्रश्न 23
आभासी लगान प्राप्त होता है-अल्पकाल में अथवा दीर्घकाल में? [2014, 15]
उत्तर:
अल्पकाल में।

प्रश्न 24
‘लगान निर्धारण के किन्हीं दो सिद्धान्तों के नाम लिखिए। [2016]
उत्तर:
(1) विस्तृत खेती के अन्तर्गत लगान
(2) गहन खेती के अन्तर्गत लगान।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
लगान सिद्धान्त के जन्मदाता थे [2009]
(क) एडम स्मिथ
(ख) रिकाड
(ग) प्रो० मार्शल
(घ) जे० बी० से
उत्तर:
(ख) रिका।

प्रश्न 2
आभास लगान की अवधारणा के प्रतिपादक हैं [2006, 14]
(क) रिका
(ख) माल्थस
(ग) प्रो० मार्शल
(घ) इनमें से किसी ने नहीं
उत्तर:
(ग) प्रो० मार्शल।

प्रश्न 3
रिकार्डों के अनुसार लगान प्रभावित नहीं करता
(क) माँग को
(ख) कीमत को
(ग) विनिमय को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) कीमत को।

प्रश्न 4
लगान सिद्धान्त का यथाक्रम व्यवस्थित विकास सबसे पहले किसने किया ?
(क) मार्शल
(ख) माल्थस
(ग) रिकाड
(घ) एडम स्मिथ
उत्तर:
(ग) रिका।

प्रश्न 5
सही उत्तर चुनें
(क) लगान मूल्य को प्रभावित करता है।
(ख) मूल्य लगान को प्रभावित करता है।
(ग) मूल्य और लगाने में कोई सम्बन्ध नहीं होता है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) मूल्य लगान को प्रभावित करता है।

प्रश्न 6
आभासी लगान प्राप्त होता है ?
(क) भूमि को
(ख) पूँजी को
(ग) श्रम को
(घ) पूँजीगत वस्तुओं को
उत्तर:
(घ) पूँजीगत वस्तुओं को।

प्रश्न 7
ठेके का लगान आर्थिक लगान से हो सकता है
(क) अधिक
(ख) कम
(ग) अधिक या कम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) अधिक या कम।

प्रश्न 8
“ऊँचे लगान प्रकृति की उदारता के कारण उत्पन्न नहीं होते बल्कि उसकी कंजूसी के कारण उत्पन्न होते हैं।” यह कथन है
(क) प्रो० मार्शल का
(ख) रिकाडों का
(ग) माल्थस का
(घ) रॉबिन्स का।
उत्तर:
(ख) रिकाडों का

प्रश्न 9
लगान की सर्वप्रथम एक स्पष्ट व सन्तोषजनक व्याख्या दी
(क) एडम स्मिथ ने
(ख) मार्शल ने
(ग) रिकाड ने
(घ) जे० एस० मिल ने
उत्तर:
(ग) रिकाडों ने।

प्रश्न 10
विस्तृत खेती में सीमान्त भूमि के आधार पर लगाने का विचार किसका है ?
(क) प्रो० मार्शल का
(ख) रिकाडों का
(ग) कीन्स का
(घ) माल्थस का
उत्तर:
(ख) रिकाडों का।

प्रश्न 11
निम्नलिखित में से कौन-सा एक अल्पकाल से सम्बन्धित है ?
(क) आर्थिक लगान
(ख) दुर्लभता लगान
(ग) आभासी लगान
(घ) वास्तविक लगान
उत्तर:
(ग) आभासी लगान।

प्रश्न 12
आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ‘लगान’ प्राप्त होता है [2015]
(क) भूमि को
(ख) श्रम को
(ग) पूँजी को।
(घ) ये सभी
उत्तर:
(क) भूमि को।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 7 Religion Morality and Customs

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Religion, Morality and Customs (धर्म, नैतिकता और प्रथाएँ।)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 7 Religion, Morality and Customs (धर्म, नैतिकता और प्रथाएँ।)

विस्तृत उतरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
नैतिकता की परिभाषा दीजिए।
धर्म और नैतिकता में अन्तर स्पष्ट करते हुए सामाजिक नियन्त्रण में नैतिकता की भूमिका के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2013]
या

धर्म एवं नैतिकता का आधुनिक समाज में भविष्य क्या है? [2013, 15]
या
नैतिकता की विशेषताएँ बताइए तथा धर्म और नैतिकता में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
या
धर्म की समाजशास्त्रीय अवधारणा को स्पष्ट करते हुए नैतिकता से इसका अन्तर बताइए। [2015]
या
धर्म तथा नैतिकता से आप क्या समझते हैं? यह समाज में नियन्त्रण कैसे रख पाता है? समझाइए। [2016]
उतर:

नैतिकता की परिभाषा

उचित-अनुचित के विचार की संकल्पना को नैतिकता कहा जाता है। नैतिकता वह है जो हमें किसी कार्य को करने की या न करने की आज्ञा देती है। नैतिकता में यह भाव भी समाहित है कि अमुक कार्य अनुचित है; अत: उसे नहीं करना चाहिए। नैतिकता का आधार पवित्रता, न्याय और सत्य होते हैं। अन्तरात्मा की सही आवाज नैतिकता है। नैतिकता के मूल्यों को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है; अतः इसका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का पावने कर्तव्य बन जाता है। नैतिकता का वास्तविक अर्थ जानने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं का अनुशीलन करना होगा। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने नैतिकता की परिभाषा निम्नवत् प्रस्तुत की है

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “नैतिकता का तात्पर्य नियमों की उस व्यवस्था से है जिसके द्वास व्यक्ति का अन्त:करण अच्छे और बुरे का बोध प्राप्त करता है।”

किंग्सले डेविस के अनुसार, नैतिकता कर्त्तव्य की भावना पर अर्थात् उचित व अनुचित पर बल देती है।”

जिसबर्ट के अनुसार, “नैतिक नियम, नियमों की वह व्यवस्था है जो अच्छे और बुरे से सम्बद्ध है तथा जिसका अनुभव अन्तरात्मा द्वारा होता है।’ | नैतिकता, आचार संहिता का दूसरा नाम है। आचार संहिता का उल्लंघन नैतिकता का उल्लंघन है, जिसे समाज बुरा समझता है। नैतिकता में सार्वभौमिकता का गुण पाया जाता है, अर्थात् नैतिकता विश्व के सभी समाजों में विद्यमान रहती है। प्रो० कोपर के अनुसार, नैतिकता के साथ व्यवहार के कुछ नियम जुड़े हैं; जैसे- चोरी न करना, बड़ों का सम्मान करना, चुगली न करना, परिवार का पालन-पोषण करना, किसी की हत्या न करना तथा अविवाहितों को यौनसम्बन्ध स्थापित न करना। नैतिकता अच्छाई और बुराई का बोध कराती है। नैतिकता के नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति का अन्त:करण उसे धिक्कारता है। नैतिकता के पीछे सामाजिक शक्ति होती है। नैतिकता, व्यक्ति के अन्त:करण द्वारा उचित-अनुचित का बोध है।

नैतिकता की विशेषताएँ

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम नैतिकता की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख कर सकते हैं

  1. नैतिकता व्यवहार के वे नियम हैं जो व्यक्ति में उचित-अनुचित का भाव जगाते हैं।
  2. नैतिकता व्यक्ति के अन्त:करण की आवाज है। यह सामाजिक व्यवहार का उचित प्रतिमान है।
  3. नैतिकता के साथ समाज की शक्ति जुड़ी होती है।।
  4. नैतिकता तर्क पर आधारित है। नैतिकता का सम्बन्ध किसी अदृश्य पारलौकिक शक्ति से नहीं होता।
  5. नैतिकता परिवर्तनशील है। इसके नियम देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं।
  6. नैतिकता का सम्बन्ध समाज से है। समाज जिसे ठीक मानता है, वही नैतिक है।
  7. नैतिक मूल्यों का पालन व्यक्ति स्वेच्छा से करता है, किसी ईश्वरीय शक्ति के भय से नहीं।
  8. नैतिकता व्यक्ति के कर्तव्य और चरित्र से जुड़ी है।
  9. नैतिकता का आधार पवित्रता, ईमानदारी और सत्यता आदि गुण होते हैं।
  10. नैतिकता कभी-कभी धर्म के नियमों का प्रतिपादन करती प्रतीत होती है।

धर्म की अवधारणा

धर्म की समाजशास्त्रीय विवेचना करने वाले विद्वानों में टायलर, फ्रेजर, दुर्वीम, मैक्स वेबर, पारसन्स, मैकिम मेरिएट आदि के नाम प्रमुख हैं। इन विद्वानों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से धर्म की विवेचना की है, लेकिन एक सामान्य निष्कर्ष के रूप में सभी ने इस तथ्य को स्वीकार किया। है कि धर्म अनेक विश्वासों और आचरणों की वह संगठित व्यवस्था है जिसका सम्बन्ध कुछ। अलौकिक विश्वासों तथा पवित्रता की भावना से होता है। स्पष्ट है कि इस ‘रूप में सामाजिक संगठन तथा व्यक्ति के व्यवहारों को प्रभावित करने में धर्म का विशेष योगदान होता है। इस सन्दर्भ में किंग्सले डेविस ने लिखा है, “धर्म मानव-समाज का एक ऐसा सार्वभौमिक, स्थायी और शाश्वत तत्त्व है जिसे समझे बिना समाज के रूप को बिल्कुल भी नहीं समझा जा सकता।” विभिन्न विद्वानों के विचारों के सन्दर्भ में धर्म के अर्थ को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है| टायलर ने धर्म की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है, “धर्म का अर्थ किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास करना है। इस कथन के द्वारा टायलर ने यह स्पष्ट किया कि धर्म का सम्बन्ध उन आचरणों और विश्वासों से है जो किसी अलौकिक शक्ति से सम्बन्धित होते हैं। यही विश्वास मानव-व्यवहारों को नियन्त्रित करने का एक प्रमुख आधार है। जेम्स फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मेरा तात्पर्य मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की सन्तुष्टि अथवा आराधना करना है जिनके बारे में व्यक्तियों का यह विश्वास हो कि वे प्रकृति और मानव-जीवन को नियन्त्रित करती हैं तथा उन्हें मार्ग दिखाती है।”

वास्तव में, धर्म एक जटिल व्यवस्था है। धर्म की प्रकृति को किसी विशेष परिभाषा के द्वारा स्पष्ट कर सकना बहुत कठिन है। इस दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि कुछ प्रमुख विशेषताओं अथवा तत्त्वों के आधार पर धर्म की प्रकृति को स्पष्ट किया जाए।

धर्म और नैतिकता में अन्तर

धर्म और नैतिकता स्थूल रूप में समानार्थी प्रतीत होते हैं। दोनों की परिभाषाओं और विशेषताओं पर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि धर्म और नैतिकता में भारी अन्तर पाया जाता है। दोनों में पाये जाने वाले अन्तरों को निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है

सामाजिक नियन्त्रण में नैतिकता की भूमिका

धर्म की भाँति नैतिकता भी सामाजिक नियन्त्रण का एक प्रभावपूर्ण अभिकरण है। नैतिकता व्यक्ति को उचित-अनुचित का ज्ञान कराकर उसे उसके कर्तव्य पथ पर आरूढ़ रखती है। नैतिक आदर्शो से बँधा व्यक्ति केवल वही कार्य करता है जो समाजोपयोगी है। नैतिक नियम व्यक्ति के आन्तरिक पक्ष को नियन्त्रित रखने में अभूतपूर्व सहयोग देते हैं। नैतिकता प्रगतिशीलता की पक्षधर है। अतः यह सामाजिक नियन्त्रण में प्रमुख भूमिका निभाती है तथा उसे प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है। वर्तमान सामाजिक जीवन में जैसे-जैसे नैतिक नियमों का महत्त्व बढ़ रहा है, वैसे-वैसे नैतिकता सामाजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम होती जा रही है। नैतिकता में व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर उचित-अनुचित का विवेक कर व्यवहार करता है। नैतिकता के नियम सामाजिक आदर्श के उचित प्रतिमान हैं। अत: इनका क्रियान्वयन समाज को संगठित रखता है। नैतिकता समाज के सदस्यों के व्यवहार को नियन्त्रित करके सामाजिक नियन्त्रण में सहभागी बनती है। व्यक्ति सामूहिक निन्दा और परिहास से बचने के लिए नैतिक मूल्यों का पालन करता है। आलोचना और निरादर के दण्ड के भय से व्यक्ति नैतिकता को अपना अंग बनाता है। नैतिकता व्यक्ति के चरित्र को संगठित बनाकर समाज के नियन्त्रण में अद्वितीय सहयोग देती है। नैतिकता व्यक्ति को अनुचित कार्यों को करने से रोकती है। उचित कार्यों को करने से व्यक्ति में आत्मबल उत्पन्न होता है, जो उसे विषम परिस्थितियों में भी समाज-कल्याण के लिए प्रेरणा देता है। इस प्रकार के सद्कार्य सामाजिक नियन्त्रण को और अधिक बल देते हैं। नैतिकता सामूहिक कल्याण की पोषक होने के कारण सामाजिक नियन्त्रण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 2
प्रथा का क्या अर्थ है ? सामाजिक नियन्त्रण में प्रथा की भूमिका के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। [2009, 12, 14, 16]
या
सामाजिक नियन्त्रण में प्रथाओं की भूमिका की विवेचना कीजिए। [2012, 14]
या
प्रथा से आप क्या समझते हैं ? [2012, 15, 17]
या
प्रथा के दो प्रकार्यों का उल्लेख कीजिए। [2010, 15,]
उतर:

प्रथा का अर्थ

प्रथा सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है। समाज में कार्य करने की जो मान्यता प्राप्त विधियाँ होती हैं, उन्हें प्रथा कहा जाता है। लोकरीतियाँ जब लम्बे समय तक प्रचलन में रहने के पश्चात् सामाजिक मान्यता प्राप्त कर लेती हैं तथा उसका हस्तान्तरण अगली पीढ़ी के लिए होने लगता है तब वे प्रथाएँ बन जाती हैं। समाज में रहकर मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए नयी-नयी विधियाँ खोजता है। धीरे-धीरे इन विधियों को जनसामान्य का समर्थन मिल जाता है। विधियों की निरन्तर पुनरावृत्ति होने पर वह प्रथा का रूप ग्रहण कर लेती हैं। प्रथाएँ समाज की धरोहर होती हैं। प्रत्येक समाज अपने सदस्यों से यह आशा करता है कि वे इस सामाजिक धरोहर को अक्षुण बनाये रखें। आदिम समाज से लेकर वर्तमान जटिल समाज तक प्रथाओं को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। प्रथाएँ रूढ़िवादिता की पक्षधर होती हैं तथा नवीनता का विरोध करती हैं।

प्रथा की परिभाषा

प्रथाएँ समाज द्वारा स्वीकृत कार्य करने की विधियों को कहा जाता है। इनका सही-सही अर्थ जानने के लिए प्रथाओं की परिभाषाओं का अध्ययन आवश्यक है। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने प्रथाओं को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है|

मैकाइवर एवं पेज़ के अनुसार, “सामाजिक रूप से स्वीकृत कार्य करने की विधि समाज की प्रथाएँ हैं।”

लुण्डबर्ग के अनुसार, “जनरीतियाँ, जो कई पीढ़ियों तक चलती रहती हैं वे औपचारिक मान्यता की एक मात्रा प्राप्त कर लेती हैं, प्रथाएँ कहलाती हैं।”

फेयरचाइल्ड के अनुसार, “एक सामाजिक रूप से प्राधिकृत व्यवहार की विधि जो परम्परा से चलती है एवं उसके तोड़ने की अस्वीकृति से प्रबाधित की जाती है। प्रथा के पीछे राज्य की शक्ति नहीं होती जिससे न कानूनी रूप बनता है, न ही रूढ़ियों की स्वीकृति होती है।”

बोगार्डस के अनुसार, “प्रथाएँ और परम्पराएँ समूह द्वारा स्वीकृत नियन्त्रण की विधियाँ हैं। जो सुव्यवस्थित हो जाती हैं और जिन्हें बिना सोचे-समझे मान्यता प्रदान कर दी जाती है और जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती हैं।”

सामाजिक नियन्त्रण में प्रथाओं की भूमिका

प्रथाएँ सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इनका सहारा लेता है। अनेक समाजों में इनका महत्त्व विधि से भी बढ़कर होता है। प्रथाएँ व्यक्ति के व्यवहारों को नियन्त्रित करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रथाओं के अनुपालन से समाज में सुरक्षा आती है, जो सामाजिक नियन्त्रण का प्रतीक है। प्रथाएँ सामाजिक नियन्त्रण में निम्नवत् अपनी भूमिका का निर्वहन करती हैं|

1. सीखने की प्रक्रिया द्वारा सामाजिक नियन्त्रण-
प्रथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरितं होती हैं। ये मानव-जीवन के व्यवहार के आवश्यक अंग बन जाती हैं। समाज से मान्यता प्राप्त प्रविधियाँ सीखने की प्रक्रिया को सरल और तीव्र कर देती हैं। प्रथाओं के माध्यम से मूल्यों के अनुपालन की कला सीखकर व्यक्ति समाज में योग देकर सामाजिक नियन्त्रण का कारण बन जाता है। अनुभवों से प्राप्त पूर्वजों का यह ज्ञान सीखने की प्रक्रिया को सरल कर देती है। इस प्रकार प्रथाएँ सीखने की प्रक्रिया द्वारा सामाजिक नियन्त्रण में अपना योगदान देती हैं।

2. प्रथाएँ सामाजिक परिस्थितियों का अनुकूलन करके सामाजिक नियन्त्रण में सहायक होती हैं-
प्रथाएँ अनेक सामाजिक समस्याओं को हल करने में सक्षम हैं। कठिन परिस्थितियाँ आने पर भी व्यक्ति प्रथाओं के सहारे उनका समाधान खोज ही लेता है। प्रथाएँ समयानुकूल नयी विधियों को जन्म देकर सामाजिक नियन्त्रण को सुदृढ़ करती हैं।

3. प्रथाएँ व्यक्तित्व का निर्माण करके सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग देती हैं-
नवजात शिशु प्रथाओं के बीच आँखें खोलता है। प्रथाओं से उसका लालन-पालन होता है। प्रथाएँ उसके विकास में सहायक होती हैं। यहाँ तक कि उसको मृत्यु-संस्कार भी प्रथाओं के अनुरूप ही होता है। प्रथाएँ व्यक्तित्व के विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संस्कारित व्यक्ति सामाजिक नियन्त्रण के कार्य में अपना भरपूर सहयोग देता है।

4. प्रथाएँ सामाजिक कल्याण में वृद्धि करके सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग देती हैं-प्रथाएँ व्यक्ति को समाज-विरोधी कार्यों से सुरक्षित रखती हैं। प्रथाओं का विकास समाज हित और जनकल्याण को ध्यान में रखकर किया जाता है। प्रथाएँ अधिकतम व्यक्तियों का हित करके सामाजिक नियन्त्रण के कार्य में पूरा-पूरा सहयोग देती हैं।

5. प्रथाएँ सामाजिक अनुकूलन में सहयोग देकर सामाजिक नियन्त्रण में भूमिका निभाती हैं-
प्रथाएँ व्यक्ति को उचित-अनुचित का ज्ञान कराकर सामाजिक मूल्यों के अनुपालन का मार्ग प्रशस्त करती हैं। प्रथाएँ व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक होकर उसे समाज के अनुकूल ढाल देती हैं। सामाजिक मूल्यों और आदर्शों को ग्रहण करके व्यक्ति अपना व्यवहार समाज के अनुकूल बंदल लेता है। इस प्रकार का व्यवहार सामाजिक नियन्त्रण में भरपूर सहयोग देता है।

6. प्रथाएँ सामाजिक जीवन में एकरूपता लाकर सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग देती हैं-
प्रथाएँ समाज के सभी सदस्यों को आदर्शों के अनुरूप एक समान व्यवहार करने की प्रेरणा देती हैं। प्रथाएँ सदस्यों के व्यवहार का अंग बनकर उनमें एकरूपता उत्पन्न करने में सहयोग देती। हैं। सामाजिक जीवन में एकरूपता आने से सामाजिक नियन्त्रण को बल मिलता है। सामाजिक एकरूपता व्यक्तिवादी विचारधारा पर अंकुश लगाकर संघर्ष से बचाव करती है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि प्रथाएँ सामाजिक नियन्त्रण के कार्य में बहुत प्रभावी होती हैं। सामाजिक आदर्शों और मूल्यों का संरक्षण करके प्रथाएँ सामाजिक नियन्त्रण में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लॉक ने प्रथाओं को प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति कहा है। जिन्सबर्ग महोदय ने प्रथाओं के इस पक्ष को इन शब्दों में व्यक्त किया है, “निश्चय ही आदिम युग के समाजों में प्रथा जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त रहती है और व्यवहार की छोटी-छोटी बातों में भी उसका हस्तक्षेप होता है और सभ्य समाजों में प्रथा का प्रभाव साधारणतया जितना समझा जाता है, उससे कहीं अधिक होता है। वास्तव में प्रथाएँ, सामाजिक नियन्त्रण में अन्य अभिकरणों से कम महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभातीं। वर्तमान युग में जब विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आविष्कारों का बोलबाला है, ऐसे में सामाजिक नियन्त्रण में प्रथाओं के महत्त्व को कम आँकना त्रुटिपूर्ण होगा। टी० बी० बॉटोमोर के शब्दों में, “आधुनिक औद्योमिक समाजों में प्रथा की महत्ता उपेक्षणीय से कहीं परे है, क्योंकि धर्म व नैतिकता का अधिक भाग प्रथागत है, बौद्धिक नहीं तथा साधारण सामाजिक आदान-प्रदान का नियमन अधिकांशतः प्रथा और जनमते से होता है।”

लघु उतरीय प्रश्न (4 अक)

प्रश्न 1
धर्म के चार रूप (तत्त्व) लिखिए।
या
धर्म के दो मौलिक लक्षण लिखिए। [2015]
या
धर्म की दो विशेषताएँ लिखिए। [2015, 16]
उतर:
उम्र धर्म के चार रूप (तत्त्व) निम्नलिखित हैं–
1. पवित्रता की धारणा-जिस धर्म से व्यक्ति सम्बन्धित होता है, उस धर्म व उससे जुड़ी प्रत्येक वस्तु, धारणा व व्यक्ति के प्रति उसकी पवित्र धारणा होती है। अत: उसका पूरा प्रयास रहता है कि वह अपवित्रता से स्वयं का बचाव कर सके।
2. प्रार्थना, आराधना या पूजा-विशिष्ट धर्म से जुड़े व्यक्ति अपने मनवांछित फल प्राप्त करने हेतु तथा आने वाली विपदाओं से बचने हेतु उस अलौकिक शक्ति या धार्मिक देवी-देवता की पूजा करते हैं। पूजा, प्रार्थना या आराधना के द्वारा वे अपने इष्ट को प्रसन्न करने का प्रयास करते रहते हैं।
3. धार्मिक प्रतीक व सामग्री-विशेष धर्म के अपने-अपने धार्मिक प्रतीक व सामग्री होती हैं, जिसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति की पवित्रता व सम्मान की भावना रहती है; जैसे-हिन्दुओं में मन्दिर, गीता, रामायण आदि। मुस्लिम में कुरान, मस्जिद आदि, ईसाइयों में चर्च, बाइबिल, क्रॉस आदि, सिखों में गुरुद्वारा, गुरु ग्रन्थ साहेब आदि। प्रत्येक धर्म की कुछ कथाएँ व लोकोक्तियाँ होती हैं, जिनके द्वारा मनुष्य एवं ईश्वर में सम्बन्धों को बताने का प्रयास किया जाता है।
4. धार्मिक संस्तरण-विभिन्न धर्मों के अन्तर्गत उच्च व निम्न की स्थिति पाई जाती है जिसे . धार्मिक संस्तरण कहा जाता है। उच्च स्थिति में पण्डित, पुजारी, मौलवी, पंच प्यारे तथा पादरियों आदि को शामिल किया जाता है तथा निम्न के अन्तर्गत अन्य लोग आते हैं। उच्च , वर्ग के धार्मिक व्यक्तियों के मन में श्रेष्ठता का भाव रहता है तथा वे अन्य लोगों से अपने लिए सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा करते हैं।

प्रश्न 2
समाज पर धर्म के कोई चार प्रभाव लिखिए। या धर्म के चार कार्यों का उल्लेख कीजिए। [2008, 09]
उतर:
धर्म समाजशास्त्रीय सद्कार्य करने की प्रेरणा देता है। मनुष्य समाज-विरोधी कार्यों से हटकर सामाजिक नियमों का पालन करता है। इस प्रकार धर्म सामाजिक नियन्त्रण का रक्षा कवच है। धर्म का सामाजिक जीवन में विशेष महत्त्व है। समाज पर धर्म के चार प्रभाव निम्नलिखित हैं—
1. निराशाओं को दूर करने में सहायक-धर्म समय-समय पर व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाली निराशाओं व चिन्ताओं को दूर करके उन्हें शान्ति प्रदान करता है। यह उन्हें कष्टों को सहन करने की शक्ति भी प्रदान करता है। यही कारण है कि विपत्तियों के दिनों में व्यक्तियों के व्यवहारों में धार्मिकता अधिक देखी जाती है।
2. जीवन में निश्चितता लाना-धर्म जीवन में निश्चितता लाता है। यह समाज द्वारा स्वीकृत प्रथाओं व मान्यताओं को स्पष्ट करता है, संस्कृति व पर्यावरण को दृढ़ता प्रदान करता है और रीति-रिवाजों को धार्मिक मान्यता देकर जीवन में निश्चितता लाता है।
3. मानव-व्यवहार में नियन्त्रण-धर्म जीवन में निश्चितता लाने के साथ-साथ मानव-व्यवहार पर नियन्त्रण रखने में भी सहायक है। यह व्यक्ति को अनैतिक कार्यों को करने से रोकता है। इस प्रकार यह व्यक्तियों के व्यवहार पर अनौपचारिक रूप से नियन्त्रण रखने का महत्त्वपूर्ण साधन है।
4. प्रथाओं को संरक्षण देना-धर्म सामाजिक आदर्शों व प्रथाओं को मान्यता देकर उन्हें केवल संरक्षण ही प्रदान नहीं करता, अपितु इन्हें सुदृढ़ भी बनाता है। जिन आदर्शो, मान्यताओं व प्रथाओं को धार्मिक स्वीकृति मिल जाती है, उन्हें परिवर्तित करना कठिन कार्य हो जाता है तथा वे धीरे-धीरे सबल होती जाती हैं।

प्रश्न 3
प्रथा की विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए। या प्रथा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए। [2007]
उतर:
प्रथा की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  1. प्रथाएँ समाज में व्यवहार करने की मान्यता प्राप्त विधियाँ हैं।
  2. प्रथाएँ वे जनरीतियाँ हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित की जाती हैं।
  3. प्रथाओं को समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है, इसलिए इनमें स्थायित्व पाया जाता है।
  4. प्रथाएँ व्यक्ति के व्यवहार पर नियन्त्रण रखती हैं। ये सामाजिक नियन्त्रण का अनौपचारिक साधन हैं। इनकी प्रकृति बाध्यतामूलक होती है।
  5. प्रथाएँ अलिखित एवं अनियोजित होती हैं।
  6. प्रथाओं का निर्माण नहीं होता, वरन् ये समय के साथ धीरे-धीरे विकसित होती हैं।
  7. प्रथाओं के उल्लंघन पर समाज द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है और उल्लंघनकर्ता की निन्दा या आलोचना की जाती है।
  8. प्रथाओं का पालन कराने वाली कोई औपचारिक संस्था या संगठन नहीं होता है और न ही इनकी व्याख्या व देख-रेख करने वाला कोई अधिकारी ही होता है। समाज ही प्रथा का न्यायालय है।
  9. प्रथाओं के कठोर एवं अपरिवर्तनशील होते हुए भी समय के साथ-साथ इनमें कुछ परिवर्तन अवश्य आ जाते हैं।

प्रश्न 4
प्रथा के चार कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उतर:
प्रथाओं के चार कुप्रभाव निम्नलिखित हैं

1. तर्कसंगत विचारों पर रोक-व्यक्ति बचपन से ही बहुत-सी प्रथाओं के बीच पलता है और |इस कारण प्रथाओं का पालन करना उसकी आदत बन जाती है। प्रथाओं की अधिकार-शक्ति इतनी अधिक होती है कि व्यक्ति बिना तर्क-वितर्क उनको स्वीकार करता रहता है। इस प्रकार प्रथाएँ मनुष्य की तार्किक बुद्धि पर रोक लगा देती हैं।
2. नवीन विचारों एवं व्यवहार के प्रति आशंका उत्पन्न होना-अपनी पुरातनता एवं अधिकार-शक्ति के कारण जो भी नवीन विचार एवं व्यवहार की लहर मनुष्य के अन्दर उठती है, प्रथाएँ उनका दमन करती हैं तथा उनके प्रति आशंका उत्पन्न करती हैं। उदाहरणार्थ श्राद्ध के स्थान पर अनाथाश्रम को दान देने का विचार आशंकाएँ उत्पन्न करता है।
3. बाध्यकारी बन्धन-अपनी प्राचीनता के कारण प्रथाओं की अवहेलना करना एक बड़ा सामाजिक अपराध माना जाता है। इसी कारण बेकन ने प्रथाओं को मनुष्य के जीवन का प्रमुख दण्डाधिकारी कहा है। प्रथाएँ मनुष्य को एक बाध्यकारी बन्धन में बाँधती हैं। अपनी ही उपजाति में विवाह करना, पितृपक्ष अथवा मातृपक्ष से सम्बन्धित व्यक्तियों से विवाह न करना, दहेज और बाल-विवाह में विश्वास रखना आदि बाध्यकारी बन्धनों के उदाहरण हैं।
4. अन्यायपूर्ण प्रवृत्ति-अनेक प्रथाओं की प्रवृत्ति अन्यायपूर्ण होती है। इसका कारण प्रथाओं का रूढ़िवादी तत्त्वों से जुड़ा होना है। इसी कारण कुछ विद्वानों ने प्रथाओं को ‘अन्यायी राजा की संज्ञा दी है। पशु-बलि, सती–प्रथा आदि अन्यायपूर्ण प्रथाओं के उदाहरण हैं।

अतिलघु उतरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
धर्म का व्यक्तित्व के विकास में क्या योगदान है ?
उतर:
धर्म व्यक्तित्व के विकास में योग देता है। धर्म व्यक्ति के सम्मुख पवित्र लक्ष्य रखता है, कठिनाइयों के समय धैर्य से काम लेने एवं संकटों का मुकाबला साहस से करने की प्रेरणा देता है। अतः निराशाओं के कारण व्यक्ति का व्यक्तित्व विघटित नहीं हो पाता। वह समस्याओं को ईश्वर की इच्छा मानकर उनका मुकाबला करता है। विघटित व्यक्तित्व समाज के लिए समस्याएँ पैदा करता है। धर्म संगठित व्यक्तित्व का विकास करके भी सामाजिक नियन्त्रण को बनाये रखता है।

प्रश्न 2
बदलते हुए सामाजिक परिवेश के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक नियन्त्रण में नैतिकता की महत्ता बताइए।
उतर:
धर्म की तरह नैतिकता भी सामाजिक नियन्त्रण को एक महत्त्वपूर्ण साधन है। नैतिकता व्यक्त को उचित-अनुचित का बोध कराती है और साथ ही उसे अच्छे कार्य करने का निर्देश देती है। नैतिकता अनुचित एवं बुरे कार्यों पर रोक लगाती है। नैतिकता हमें सत्य, ईमानदारी, अहिंसा, न्याय, समानता और प्रेम के गुण सिखाती है और असत्य, बेईमानी, अनाचार, झूठ, अन्याय, चोरी आदि दुर्गुणों से बचाती है। नैतिक नियमों को समाज में उचित एवं आदर्श माना जाता है। इनके उल्लंघन पर सामाजिक निन्दा एवं प्रतिष्ठा की हानि का डर रहता है। नैतिकता में समूह कल्याण की भावना छिपी होती है। धर्म के प्रभाग के कमजोर पड़ जाने के कारण आजकल नैतिकता सामाजिक नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभ रही है। शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ समाज में नैतिक नियमों का महत्त्व भी बढ़ रहा है।

प्रश्न 3
सामाजिक एकीकरण एवं अपराध तथा समाज-विरोधी कार्यों पर नियन्त्रण में धर्म की क्या भूमिका है ?
उतर:
दुर्णीम कहते हैं कि धर्म उन सभी लोगों को एकता के सूत्र में बाँधता है, जो उसमें विश्वास करते हैं। समाज के सदस्यों को संगठित करने के लिए धर्म सबसे दृढ़ सूत्र है। एक धर्म को मानने वाले लोगों में हम की भावना का विकास होता है, वे परस्पर सहयोग करते हैं, उनमें समान विचार, भावनाएँ, विश्वास एवं व्यवहार पाये जाते हैं। धर्म व्यक्ति को कर्तव्यपालन की प्रेरणा देता हैं। सभी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करके सामाजिक संगठन एवं एकता को बनाये रखने में योग देते हैं।

धर्म व्यक्ति की समाज-विरोधी क्रियाओं एवं अपराध पर नियन्त्रण रखता है। धार्मिक नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति में अपराध की भावना पैदा होती है। व्यक्ति को ईश्वरीय दण्ड का भय होता है और वह इस भय के कारण अक्सर अपराध व समाज-विरोधी कार्य करने से बचने का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 4
प्रथाएँ व्यक्तित्व के विकास में कैसे सहायक होती हैं ? [2007]
उतर:
नवजात शिशु प्रथाओं के बीच आँख खोलता है। प्रथाओं से उसका लालन-पालन होता है। प्रथाएँ उसके विकास में सहायक होती हैं। यहाँ तक कि उसका मृत्यु संस्कार भी प्रथाओं के अनुरूप ही होता है। इस प्रकार प्रथाएँ व्यक्तित्व के विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 5
प्रथा और आदत में अन्तर बताइए। या प्रथा से आप क्या समझते हैं? [2012, 15]
उतर:
प्रथा शब्द का प्रयोग ऐसी जनरीतियों के लिए होता है, जो समाज में बहुत समय से प्रचलित हों। प्रथा में समूह-कल्याण के भाव निहित होते हैं। इनको पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित किया जाता है। प्रथाएँ नवीनता की विरोधी होती हैं तथा यह परम्परागत तरीके से कार्य करने को प्रोत्साहित करती हैं। आदत मानव की एक व्यक्तिगत अनुभूति है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति के अपने आचार-व्यवहार तथा उसके अपने कल्याण से ही होता है। आदतों का स्वभाव स्थिर नहीं होता तथा ये परिस्थितियों और व्यक्ति के विकास के साथ-साथ बदलती रहती हैं। ये नवीनता की विरोधी नहीं होतीं।

प्रश्न 6
सामाजिक नियन्त्रण में प्रथाओं की क्या भूमिका है? [2016]
उतर:
प्रथाएँ सीखने की प्रक्रिया, सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन, व्यक्तित्व का निर्माण, सामाजिक कल्याण में वृद्धि, सामाजिक अनुकूलन में सहयोग तथा सामाजिक जीवन में एकरूपता प्रदान कर सामाजिक नियन्त्रण में अहम भूमिका निभाती है।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
धर्म आध्यात्मिक शक्तियों पर विश्वास है। किसने कहा? [2013, 16, 17]
उतर:
टॉयलर महोदय ने।

प्रश्न 2
धर्म की चार विशेषताएँ बताइए। [2015]
या
धर्म की दो विशेषताएँ बताइए। [2016]
उतर:
धर्म की चार विशेषताएँ या रूप हैं

  • अलौकिक शक्ति में विश्वास,
  • पवित्रता की धारणा,
  • प्रार्थना,
  • पूजा एवं आराधना तथा तर्क का अभाव।

प्रश्न 3
धर्म के दो दुष्प्रकार्य बताइए। [2011]
उतर:
धर्म के दो दुष्प्रकार्य निम्नलिखित हैं

  1. प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को अच्छा मानता है जिसके कारण तनाव, संघर्ष, भेदभाव का जन्म होता है।
  2. धर्म, बुद्धि और तर्क से परे होता है, जिसके कारण समाज में अनेक पूजा-प्रणाली और कर्मकाण्ड होते हैं।

प्रश्न 4
जनरीति व रूढियाँ अवधारणाओं से किस समाजशास्त्री का नाम जुड़ा हुआ है ?
उतर:
जनरीति व रूढ़ियाँ अवधारणाओं से समनर का नाम जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 5
‘धर्मशास्त्र का इतिहास नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं ? [2009]
उतर:
‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ नामक पुस्तक के लेखक पी० वी० काणे हैं।

प्रश्न 6
पॉजिटिव फिलोसॉफी के लेखक कौन हैं ? [2017]
उतर:
आगस्त कॉम्टे।

प्रश्न 7
धर्म और नैतिकता एक-दूसरे के सम्पूरक हैं। (सत्य/असत्य) [2017]
उतर:
असत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
यह कथन किसका है ‘धर्म आध्यात्मिक शक्तियों पर विश्वास है?
(क) मैकाइवर
(ख) डेविस
(ग) पैरेटो
(घ) टॉयलर

प्रश्न 2.
धर्म की विशेषता क्या है ?
(क) पारस्परिक सहयोग
(ख) समानता
(ग) अलौकिक शक्ति पर विश्वास
(घ) गुरु पर विश्वास

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से धर्म की विशेषता नहीं है
(क) पवित्रता
(ख) आदर
(ग) विश्वास
(घ) सदाचार

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में धर्म की विशेषता नहीं है
(क) कर्मकाण्डों का समावेश
(ख) अलौकिक शक्ति के प्रति विश्वास
(ग) तर्क का समावेश
(घ) अपरिवर्तनशील व्यवहार

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में नैतिकता की विशेषता है|
(क) उद्वेगपूर्ण व्यवहार
(ख) कर्तव्य का बोध
(ग) कर्मकाण्ड में विश्वास
(घ) अपरिवर्तनशील व्यवहार

प्रश्न 6.
प्रथा को ‘मानव जीवन का न्यायाधीश’ किस विद्वान् ने माना है ?
(क) शेक्सपियर
(ख) बेकन
(ग) बेजहॉट
(घ) क़ॉम्टे

प्रश्न 7.
प्रथा को ‘महान शक्ति’ किस विद्वान् ने कहा है ?
(क) मार्क्स
(ख) पैरेटो
(ग) लॉक
(घ) वेबर

प्रश्न 8.
प्रथा है [2011, 13]
(क) मूल्य
(ख) लोकाचार
(ग) जनरीति
(घ) प्रतिमान

प्रश्न 9.
‘धर्म अफीम के समान है।’ किसने कहा? [2015]
या
‘धर्म जनता के लिए अफीम है।’ यह किसने कहा? [2016]
(क) काणे ने
(ख) कूले ने
(ग) कार्ल मार्क्स ने
(घ) डेविस ने

उतर:

1. (घ) टॉयलर,
2. (ग) अलौकिक शक्ति पर विश्वास,
3. (घ) सदाचार,
4. (ग) तर्क का समावेश,
5. (ख) कर्तव्य का बोध,
6. (ख) बेकन,
7. (ग) लॉक,
8. (ग) जनरीति,
9. (ग) कार्ल मार्क्स ने।

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