UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 20
Chapter Name Interest, Attention and Education
(रुचि, अवधान तथा शिक्षा)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। बालकों में रुचि उत्पन्न करने के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
रुचि क्या है? विषय-वस्तु में रुचि पैदा करने के लिए अध्यापक को कौन-से उपाय करने चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
या
रुचि से आप क्या समझते हैं? सीखने में रुचि के महत्त्व की विवेचना कीजिए। [2015]
या
रुचि के स्वरूप पर प्रकाश डालिए। किसी पाठ को पढ़ाते समय अध्यापक अपने छात्रों पर किस प्रकार रुचि उत्पन्न कर सकता है? [2009, 11]
या
वे कौन-से कारक हैं जो रुचियों के निर्माण को आगे बढ़ाते हैं? [2015]
या
रुचिसे आप क्या समझते हैं?”रुचि सीखने की वह दशा है जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए आवश्यक है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2008, 11, 13]
या
रुचि क्या है? क्या यह जन्मजात अथवा अर्जित होती है? अधिगम में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए। [2016]
या
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। छात्रों में रुचि उत्पन्न करने की विधियों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :
रुचि का अर्थ एवं परिभाषा
रुचि अवधान का अन्तरंग प्रेरक है। रॉस (Ross) के अनुसार, रुचि का अर्थ है-लगाव अर्थात् जिस वस्तु के प्रति हमारा लगाव होता है, उसमें हमारी रुचि होती है। एक किशोर का लगाव पाठ्य-पुस्तकों की अपेक्षा उपन्यास में अधिक होता है। इस प्रकार यह लगाव ही रुचि है। रुचि में अन्तर करने की भावना होती है। हम किसी वस्तु में इस कारण रुचि रखते हैं, क्योंकि उसे अन्य वस्तुओं से अधिक महत्त्वपूर्ण समझते हैं।

रुचि की कुछ परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है

  1. क्रो व क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहा जाता है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”
  2. डॉ० एस० एम० माथुर के अनुसार, “रुचि को प्रेरक शक्ति कहा जाता है, जो हमारे ध्यान को एक व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की तरफ उन्मुख करती है या इसे प्रभावपूर्ण कहा जा सकता है, जो स्वयं ही अपनी सक्रियता से उत्तेजित होती है।”
  3. भाटिया के अनुसार, “रुचि का अर्थ है-अन्तर करना। हम वस्तुओं में इस कारण रुचि रखते हैं, क्योंकि हमारे लिए उनमें और दूसरी वस्तुओं में अन्तर होता है, क्योंकि उनका हमसे सम्बन्ध होता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा रुचि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। रुचियों के दो प्रकार या वर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश :

  • जन्मजात रुचियाँ तथा
  • अर्जित रुचियाँ कहते हैं।

[संकेत : रुचियों के प्रकार के विस्तृत विवरण हेतु लघु उत्तरीय प्रश्न 1 का उत्तर देखें।]

बालकों में रुचि उत्पन्न करने के उपाय
निम्नांकित उपायों या विधियों द्वारा बालकों में पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सकती है

  1. छोटे बालक सबसे अधिक रुचि अपने आप में लेते हैं। अत: किसी नीरस विषय को बालकों के अपने मन से सम्बन्धित करके पढ़ाया जाए।
  2. छोटे बालकों की रुचि मूल-प्रवृत्तियों पर आधारित होती है। अतः अध्यापक को चाहिए कि पढ़ाते समय मूल-प्रवृत्यात्मक रुचियों को सुविधानुसार पाठ से सम्बन्धित करें।
  3. आयु के विकास के साथ-साथ बालकों की रुचियों में भी परिवर्तन होता है। अतः इस बात को ध्यान में रखकर ही पाठ्य विकास का आयोजन किया जाए।
  4. रुचि का आधार जिज्ञासा प्रवृत्ति है। अतः विषय के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करना आवश्यक है।
  5. रुचि के अनुसार विषय में परिवर्तन भी किया जाना चाहिए।
  6. पाठ पढ़ाते समय बालकों को उसका उद्देश्य भी बता दिया जाए, क्योंकि बालक किसी कार्य में । तभी रुचि लेते हैं, जब उन्हें उद्देश्य को पता चल जाता है।
  7. पाठ्य वस्तु का सम्बन्ध यथासम्भव जीवन की आवश्यकताओं से किया जाए।
  8. किसी पाठ का अध्ययन करते समय प्रभावशाली स्थूल दृश्य-श्रव्य साधनों या सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिए।
  9. बालक रचनात्मक कार्यों में विशेष रुचि लेते हैं। अत: पाठ का यथासम्भव सम्बन्ध रचनात्मक कार्यों में किया जाए।
  10. लगातार मौखिक शिक्षण बालकों में नीरसती उत्पन्न कर देता है। अतः बीच में उन्हें प्रयोग व निरीक्षण आदि के अवसर दिये जाएँ।
  11. प्राथमिक स्तर पर खेल विधि का प्रयोग उचित है।
  12. नवीन ज्ञान का सम्बन्ध पूर्व ज्ञान से करना परम आवश्यक है, क्योंकि छात्र उसे वस्तु में ही विशेष रुचि लेते हैं, जिनका उन्हें पहले से ही ज्ञान होता है।
  13. पढ़ाते समय किसी तथ्य की आवश्यकता से अधिक पुनरावृत्ति न की जाए, क्योंकि अधिक पुनरावृत्ति से नीरसता उत्पन्न होती है।
  14. पाठ्य विषयं को रोचक व प्रभावशाली बनाने में पर्यटन का सहारा लेना अधिक उपयोगी है। अतः अध्यापक को समय-समय पर शैक्षिक भ्रमण यात्राओं का आयोजन करना चाहिए।

शिक्षा या सीखने (अधिगम) में रुचि का महत्त्व
वास्तव में अध्यापक के लिए आवश्यक है कि वे विद्यार्थी में शिक्षा के प्रति रुचि जाग्रत करें और स्वयं भी शिक्षण-कार्य में रुचि लें, क्योंकि “रुचि सीखने की वह दशा है जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए आवश्यक है।” शिक्षा के क्षेत्र में रुचि का अत्यधिक महत्त्व एवं आवश्यकता है। रुचि के नितान्त अभाव में शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल ही नहीं सकती।

इनके विपरीत यह भी सत्य है कि यदि किसी विषय के प्रति रुचि जाग्रत हो जाए तो उस दशा में शिक्षा की प्रक्रिया सरल, उत्तम तथा शीघ्र सम्पन्न होने लगती है। रुचि से जिज्ञासा उत्पन्न होती है तथा जिज्ञासा से ज्ञान प्राप्ति के हर सम्भव प्रयास किये जाते हैं तथा परिणामस्वरूप ज्ञान प्राप्त भी कर लिया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा के लिए रुचि आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 2
अवधान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। अवधान की विशेषताओं का भी विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अवधान का अर्थ एवं परिभाषा
‘अवधान’ वह मानसिक क्रिया है, जिसमें हमारी चेतना किसी वस्तु या पदार्थ पर केन्द्रित होती है। उदाहरण के लिए, हम किसी पार्क में बैठे एक गुलाब के फूले को देख रहे हैं। यद्यपि पार्क में स्त्री, पुरुष, बच्चे, फव्वारे भी हमारी कुछ-न-कुछ चेतना में हैं, परन्तु हमने अपने चेतना को केन्द्रित केवल गुलाब के फूल पर ही कर रखा है। इस प्रकार सेञ्चेतना का किसी वस्तु-विशेष पर केन्द्रित करना ही अवधान क्रहलाता है।

अवधान की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं

  1. डूमवाइल के अनुसार, “अन्य वस्तुओं की अपेक्षा एक ही वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण ही अवधान है।”
  2. रॉस के अनुसार, “अवधान विचार की वस्तु को मन के समक्ष स्पष्ट रूप से प्रकट करने की प्रक्रिया है।”
  3. वेलेण्टाइन के अनुसार, “अवधान मस्तिष्क की शक्ति नहीं है, वरन् सम्पूर्ण रूप से मस्तिष्क की क्रिया या अभिव्यक्ति है।’
  4. बी० एन० झा के अनुसार, “किसी विचार या संस्कार को चेतना में स्थिर करने की प्रक्रिया को अवधान कहते हैं।”
  5. मन के अनुसार, “हम चाहे जिस दृष्टिकोण से विचार करें, अन्तिम निष्कर्ष में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।”
  6. मैक्डूगल के अनुसार, “ज्ञानात्मक प्रक्रिया पर पड़े प्रभाव की दृष्टि से विचार करने पर अवधान एक चेष्टा या प्रयास भर है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि जब चेतना के समक्ष आने वाले पदार्थों में एकता स्थापित करने की चेष्टा की जाती है तो उस मानसिक प्रक्रिया को अवधान कहा जाता है।

अवधान की विशेषताएँ
अवधान की ‘निम्नांकित विशेषताएँ पायी जाती हैं

1. एकाग्रता :
अवधान किसी वस्तु पर चेतना को एकाग्र करना है। अतः अवधान के लिए चित्त की एकाग्रता परम आवश्यक है।

2. मानसिक क्रियाशीलता :
अवधान की एक प्रमुख विशेषता क्रियाशीलता है। बिना मानसिक क्रियाशीलता के हम किसी वस्तु पर अवधान नहीं लगा सकते। उदाहरण के लिए, यदि हमें गुलाब के फूल पर अवैधान केन्द्रित करना है, तो इसके लिए मन को क्रियाशील बनाना होगा।

3. चयनात्मकता :
जिस वस्तु पर हम अवधान केन्द्रित करते हैं, उसका चयन अनेक वस्तुओं में से होता है। किसी बगीचे के अनेक फूलों में से किसी एक विशेष फूल पर हमारा अवधान केन्द्रित होता है।

4. प्रयोजनशीलता :
हम उन वस्तुओं पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, जिनमें हमारा किसी-न-किसी प्रकार का प्रयोजन होता है। बालक का ध्यान रसगुल्ले पर क्यों एकदम चला जाता है, क्योंकि वह उसे खाने में अच्छा लगता है।

5. परिवर्तनशीलता :
अवधान अस्थिर तथा चंचल प्रकृति का होता है। कठिनता से ही एक वस्तु पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं, परन्तु प्रयास द्वारा अवधान केन्द्रित करने की शक्ति को बढ़ाया जा सकता है।

6. संकीर्ण या संकुचित प्रसार :
अवधान का विस्तार संकीर्ण या सन्तुलित होता है। हमारा अवधान विभिन्न पहलुओं में से किसी एक वस्तु पर ही केन्द्रित होता है। कुछ देर बाद हमारा अवधान दूसरी वस्तु पर केन्द्रित हो जाता है।

7. सजीवता :
अवधान चेतना के कारण प्रतिपादित होता है। अत: वह सजीव है। हम जिस वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उसका अस्तित्व हमारी चेतना में होता है।

8. तत्परता :
वुडवर्थ (wood worth) के अनुसार, “अवधान की आवश्यक क्रिया तत्परता है।” अवधान की दशा में हमारा शरीर एक प्रकार की तत्परता की दशा में होता है।

9. गति-समायोजन :
अवधान में गतियों का समायोजन होता है, अर्थात् जब हम किसी वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उस समय हमारी ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के संचालन का समायोजन उस प्रक्रिया की प्रकृति के अनुसार हो जाता है। भाषण सुनते समय श्रोता के आँख, कान, गर्दन तथा बैठने की स्थिति नेता या भाषणकर्ता की ओर समायोजन कर लेती हैं।

प्रश्न 3
अवधान में सहायक दशाओं का वर्णन कीजिए।
या
अवधान केन्द्रित करने में सहायक बाह्य तथा आन्तरिक दशाओं का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अवधान की दशाएँ।
अवधान का केन्द्रीकरण किस प्रकार होता है ? अथवा वे कौन-कौन-सी दशाएँ हैं, जो अवधान केन्द्रित करने में सहायक होती हैं ? इन प्रश्नों के लिए हमें उन दशाओं का अध्ययन करना होगा, जो कि अवधान केन्द्रित करने में सहायक होती हैं। ये दशाएँ दो वर्गों में विभक्त की जा सकती हैं-बाह्य दशाएँ तथा आन्तरिक दशाएँ।

अवधान केन्द्रित करने की बाह्य दशाएँ
अवधान केन्द्रित करने की बाह्य दशाएँ निम्नलिखित हैं अवधान केन्द्रित करने में सहायक बाह्य दशाओं के अन्तर्गत जिन कारकों को सम्मिलित किया जाता है, उनका सम्बन्ध मुख्य रूप से बाह्य विषय-वस्तु से होता है। इस वर्ग की दशाओं यो कारकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है।

1. स्वरूप :
अधान का केन्द्रीकरण उद्दीपन की प्रकृति या स्वरूप पर निर्भर करता है। छोटे बालक चटकीले रंग की वस्तुओं की ओर आकर्षित हो जाते हैं। जिन पुस्तकों में रंगीन चित्र होते हैं, उनमें बालक का ध्यान अधिक लगती है।

2. आकार :
अधिक या बड़े आकार की वस्तु की ओर हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर किसी मुख्य समाचार को मोटे-मोटे अक्षरों में इस कारण ही छापा जाता है। बड़े-बड़े विज्ञापन के पोस्टर भी इसके उदाहरण हैं।

3. गति :
स्थिर वस्तु की अपेक्षा गतिशीलं या चलती वस्तु की ओर, अवधान केन्द्रित करने हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। बैठे हुए मनुष्य की ओर हमारा ध्यान की बाह्य दशाएँ। नहीं जाती, परन्तु सड़क पर दौड़ता मनुष्य हमारा ध्यान आकर्षित कर लेता है।

4. विषमता :
विषमता के कारण भी हमारा ध्यान आकर्षित होता है। एक गोरे परिवार के व्यक्तियों में यदि कोई काला व्यक्ति है तो उसकी ओर विषमता के कारण हमारा ध्यान अवश्य जाता है।

5. नवीनता :
किसी नवीन या विचित्र वस्तु की ओर हमारा ध्यान तत्काल जाता है। यदि कोई अध्यापक प्रतिदिन कोट-पैंट में विद्यालय आते हैं। और किसी दिन वे धोती-कुर्ता पहनकर आ जाते हैं तो समस्त छात्रों का ध्यान । उनकी ओर आकर्षित हो जाता है।

6. अवधि :
जिस वस्तु पर जितना देखने का अवसर मिलती है, उतना ही उस पर हमारा ध्यान केन्द्रित होता है। इसी कारण भूगोल के शिक्षण में । मानचित्र बार-बार दिखाये जाते हैं।

7. परिवर्तन :
कक्षा में यदि शान्त वातावरण है, परन्तु सहसा किसी कोने से शोर होने लगता है, तो तुरन्त ही हमारा ध्यान उस ओर चला जाता है। इस प्रकार उद्दीपन में जब भी परिवर्तन होता हैं, तो उस परिवर्तन की ओर हमारा ध्यान तुरन्त चला जाता है।

8. प्रकार या रूप :
हमारा ध्यान आकर्षक, सुन्दर तथा सुडौल वस्तुओं की ओर शीघ्र जाता है और उन्हें बार-बार देखने की इच्छा होती है।

9. स्थिति :
उद्दीपन या वस्तु की स्थिति के समान हमारे अवधान की अवस्था होती है। प्रतिदिन हम सड़क पर वृक्षों के नीचे से गुजरते हैं, किन्तु हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित नहीं होता है। परन्तु यदि किसी दिन उनमें से किसी वृक्ष को गिरा हुआ देखते हैं, तो हमारा ध्यान उसकी ओर तुरन्त चला जाता है।

10. तीव्रता :
शक्तिशाली और तीव्र उद्दीपन हमारा ध्यान अधिक आकर्षित करते हैं। मन्द ध्वनि की अपेक्षा तीव्र ध्वनि की ओर हमारा ध्यानं शीघ्र जाता है।

11. पुनरावृत्ति :
जिस बात को बार-बार दोहराया जाता है, उस ओर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से चला जाता है। इसी कारण किसी पाठ के तत्त्वों को बार-बार दोहराया जाता है।

12. रहस्यमयता :
रहस्यपूर्ण बातों की ओर हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। दो व्यक्तियों में यदि कोई सामान्य बात हो रही हो तो उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता, परन्तु जब वे कानाफूसी करने लगते हैं तो तुरन्त ही हम उनकी ओर देखने लगते हैं।

अवधान केन्द्रित करने की आन्तरिक दशाएँ

अवधान की वे दशाएँ जो व्यक्ति में विद्यमान होती हैं, आन्तरिक दशाएँ कहलाती हैं। इन दशाओं का विवरण इस प्रकार है
1. अभिवृत्ति :
जिन वस्तुओं में हमारी अभिवृत्ति होती है, प्राय: उन वस्तुओं में हमारा ध्यान अधिक केन्द्रित होता है।

2. रुचि :
रुचि का ध्यान से घनिष्ठ सम्बन्ध है। हम उन्हीं वस्तुओं की ओर ध्यान देते हैं, जिनमें हमारी रुचि होती है। अरुचिकर वस्तुओं की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है।

3. मूल-प्रवृत्तियाँ :
ध्यान को केन्द्रित करने में मूल-प्रवृत्तियों का भी योग रहता है। रोमांटिक उपन्यास तथा कहानियों में किशोर-किशोरियों मूल-प्रवृत्तियों का ध्यान सामान्य पुस्तकों की अपेक्षा अधिक लगता है। साबुन, पाउडर, तेल आदि के विज्ञापनों पर स्त्रियों के चित्र इसी उद्देश्य से लगाये जाते हैं।

4. पूर्व अनुभव :
ध्यान के केन्द्रीकरण का एक अन्य कारण हमारे पूर्व अनुभव भी होते हैं। पूर्व अनुभव के आधार पर ही हम अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं।

5. मस्तिष्क :
जो विचार हमारे मस्तिष्क पर जिस समय छाया रहता है, उस समय उससे सम्बन्धित बात पर ही हम ध्यान देते हैं। उदाहरण के लिए, हमारे मस्तिष्क में किसी रोजगार का विचार है तो अखबार में हमारा सर्वप्रथम ध्यान रोजगार के विज्ञापनों पर ही जाएगा।

6. जानकारी या ज्ञान :
जिस विषय की हमें विशद जानकारी होती है, उस विषय पर हमारा ध्यान सरलता से केन्द्रित हो जाता है। जब बालक गणित के प्रश्न ठीक प्रकार से समझ जाता है तो वह उन पर अपना ध्यान सरलता से केन्द्रित कर लेता है।

7. आवश्यकता :
जो वस्तु हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है, उसकी ओर हमारा ध्यान स्वतः हीं चला जाता है। भूख के समय हमारा ध्यान भोजन की ओर तुरन्त चला जाता है।

8. जिज्ञासा :
जिज्ञासा अवधान को केन्द्रित करने में विशेष योग देती है। जिस वस्तु में हमारी जिज्ञासा होती है, उस पर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से केन्द्रित हो जाता है।

9. लक्ष्य :
जब व्यक्ति को अपना लक्ष्य ज्ञात हो जाता है तो उस पर उसका ध्यान केन्द्रित हो जाता है। परीक्षा के दिनों में छात्रों का अध्ययन पर इस कारण ही केन्द्रित हो जाता है।

10. आदत :
आदत के कारण भी ध्यान केन्द्रित होता है, जो व्यक्ति किसी कारखाने के पास रहता है, उसे कारखाने के शोरगुल में भी ध्यान केन्द्रित करने की आदत पड़ जाती है। जो बालक शाम के पाँच बजे खेलने के अभ्यस्त हैं, तो प्रतिदिन पाँच बजे उनका ध्यान खेल की ओर चला जाता है।

प्रश्न 4
कक्षा में बालकों के अवधान को केन्द्रित करने के मुख्य उपायों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बालकों का अवधान केन्द्रित करने के उपाय
शिक्षण को उत्तम एवं प्रभावकारी बनाने के लिए बालकों के अवधान को पाठ्य विषय पर केन्द्रित होना आवश्यक माना जाता है। कक्षा में बालकों को अवधान केन्द्रित करने के लिए निम्नांकित उपाय काम में लाये जा सकते हैं

1. शान्त वातावरण :
ध्यान की एकाग्रता के लिए शान्त वातावरण का होना अत्यन्त आवश्यक है। शोरगुल बालकों के ध्यान को विचलित कर देता है। अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि वह कक्षा में सदा शान्ति बनाये रखने का प्रयत्न करें।

2. विषय के प्रति रुचि जाग्रत करना :
यह बात सर्वमान्य है। कि जिस विषय में बालक की रुचि होती है, उसे वह कम समय में और कुशलता से सीख लेता है। अतः रुचि उत्पन्न करना अध्यापक का एक आवश्यक कार्य हो जाता है। वास्तव में विषय में रुचि उत्पन्न हो जाने पर छात्रों के ध्यान के भटकने को प्रश्न ही नहीं उठता।

3. बालकों की रुचियों का ध्यान :
विषय के प्रति रुचि जाग्रत करने के साथ-साथ अध्यापक को बालकों की रुचियों का भी ध्यान अतः शिक्षण के समय बालकों की रुचियों का ध्यान रखा जाए।

4. जिज्ञासा प्रवृत्ति का उपयोग :
बालकों का ध्यान पाठ पर केन्द्रित करने के लिए उनमें जिज्ञासा जाग्रत करना भी अत्यन्त आवश्यक है।

5. विषय में परिवर्तन :
ध्यान स्वभाव से चंचल होता है। अतः बालक अधिक काल तक किसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकते। अत: एक विषय को अधिक समय तक न पढ़ाकर किसी दूसरे विषय का शिक्षण प्रारम्भ करना चाहिए।

6. सहायक सामग्री का प्रयोग :
सहायक सामग्री बालक के ध्यान को विषय पर केन्द्रित करने में विशेष योग देती है। ऐसी दशा में यथासम्भव सहायक सामग्री का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

7. उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग :
व्याख्यान विधि जैसी परम्परागत शिक्षण विधियाँ छात्रों का ध्यान अधिक देर तक विषय पर केन्द्रित नहीं रख पातीं। अतः बालक को ध्यान आकर्षित करने के लिए। अध्यापक को चाहिए कि वह खेल विधि, निरीक्षण विधि तथा प्रयोगात्मक विधि आदि का उपयोग भी करें।

8. पूर्व ज्ञान का नवीन ज्ञान से सम्बन्ध :
बालकों के पूर्व ज्ञान से नवीन ज्ञान को सम्बन्धित करना आवश्यक है। जब नवीन ज्ञान पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित हो जाता है तो बालक का ध्यान सरलता से केन्द्रित हो। जाता है।

9. उचित वातावरण :
अनुचित वातावरण बालकों के ध्यान की एकाग्रता में सहायक नहीं होता है। यदि प्रकाश का अभाव है, बैठने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है तथा आसपास बदबू आती है तो छात्रों को। अपना ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई होगी। अत: कक्षा के वातावरण को अनुकूल बनाना चाहिए।

10. बालक का स्वास्थ्य :
कमजोर बालक, जिसके सिर में दर्द रहता है, जिनकी आँखें कमजोर हैं। तथा जो कम सुनते हैं, वे पाठ पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं। अतः बालक के स्वास्थ्य के विषय में अध्यापक को अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।

11. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार :
अध्यापक को बालकों के ध्यान को विषय के प्रति आकर्षित करने के लिए उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। कठोर व्यवहार से बालक ध्यान को एकाग्र नहीं कर पाते हैं।

12. पर्याप्त विश्राम :
थकान ध्यान को विचलित करने में सहायक होती है। अत: प्रधानाचार्य को कर्तव्य है कि वह विद्यालय की समय-सारणी का निर्माण इस ढंग से करे कि बालकों को पर्याप्त विश्राम मिल सके तथा उन्हें कम-से-कम थकान का अनुभव हो।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रुचि के प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2007]
या
मानवीय रुचियों का स्पष्ट वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
रुचि मुख्यतः दो प्रकार की होती है

  1. जन्मजात एवं
  2. अर्जित।

1. जन्मजात रुचि :
जन्मजात रुचि, मूल-प्रवृत्तियों (Instincts) पर आधारित होती है और मनुष्य के स्वभाव तथा प्रकृति में निहित होती है। इनका स्रोत व्यक्ति के अन्दर जन्म से ही विद्यमान होता है। भोजन में हमारी रुचि भूख की जन्मजात प्रवृत्ति के कारण है। काम-वासना में रुचि होने के कारण हमारा ध्यान विपरीत लिंग की ओर आकृष्ट होता है। चिड़िया दाना खाने, गाय तथा भैंस हरा चारा खाने तथा हिंसक पशु मांस खाने में रुचि रखते हैं। यह जन्मजात क्रियाओं के कारण।

2. अर्जित रुचि :
अर्जित करने का अर्थ है उपार्जित करना (अर्थात् कमाना)। अर्जित रुचियों को व्यक्ति अपने वातावरण से अर्जित करता है। इनका निर्माण मनुष्य के अनुभव के आधार पर होता है। मनुष्य के मन की भावनाएँ तथा आदतें इनकी आधारशिला हैं। अतः भावनाओं तथा आदतों में परिवर्तन के साथ ही इनमें परिवर्तन आता रहता है। अपने हित या लाभ की परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की रुचियाँ बढ़ जाती हैं। किसी वस्तु या प्राणी के प्रति आकर्षण के कारण उसके प्रति हमारी रुचि पैदा हो जाती है। एक फोटोग्राफर को अच्छे कैमरे में रुचि होती है तथा बच्चों की रुचि नये-नये खिलौनों में।

प्रश्न 2
अवधान के मुख्य प्रकार कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर :
अवधान के मुख्य प्रकारों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

1. ऐच्छिक अवधान :
जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु या उद्दीपन पर अपनी समस्त चेतना को केन्द्रित कर देता है तो इस अवस्था को ऐच्छिक अवधान कहते हैं। इस प्रकार के अवधान में हमें किसी वस्तु या विचार पर ध्यान लगाने के लिए अपनी संकल्प-शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। सामान्य शब्दों में हम कहते हैं कि पूर्ण प्रयास करने पर ही ऐच्छिक अवधाने को लगाया जा सकता है। इस प्रकार के अवधान को सक्रिय अवधान भी कहते हैं।

2. अनैच्छिक अवधान :
जब किसी वस्तु या विचार पर हम बिना किसी प्रयत्न के अवधान लगाते हैं तो इस प्रकार के अवधान को अनैच्छिक अवधान कहते हैं। अनैच्छिक अवधान के लिए हमें अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग नहीं करना पड़ता। इस प्रकार के अवधान को निष्क्रिय अवधान भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, किसी जोर की आवाज पर, तीव्र प्रकाश पर तथा मधुर संगीत पर हमारा ध्यान अपने आप चला जाता है।

प्रश्न 3
अवधान और रुचि के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों में अवधान और रुचि के विषय में परस्पर मतभेद है। रुचि और अवधान के परस्पर सम्बन्ध में तीन मत प्रचलित हैं

1. अवधान रुचि पर आधारित है :
इस मत के प्रतिपादकों का कहना है कि व्यक्ति उन्हीं बातों पर ध्यान देता है, जिनमें उसकी रुचि होती है। दूसरे शब्दों में, अवधान रुचि पर आधारित है। जिसे वस्तु में हमारी रुचि नहीं होगी, उस पर हमारी चेतना केन्द्रित नहीं होगी।

2.रुचि अवधान पर आधारित है-कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि रुचि का आधार ध्यान है। जब हम किसी वस्तु पर ध्यान देंगे ही नहीं तो हमारी उस वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न होगी ही नहीं। रुचि की। जागृति तभी होती है, जब हम किसी वस्तु पर ध्यान देते हैं।

3. समन्वयवादी मत :
यह मत उक्त दोनों मतों का समन्वय करता है। इस मत के समर्थकों के अनुसार अवधान और रुचि दोनों ही एक-दूसरे पर आधारित हैं। रॉस (Ross) के अनुसार, “अवधान तथा रुचि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि रुचि के कारण कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान देता है तो अवधान के कारण उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाएगी।” मैक्डूगल ने भी लिखा है, “रुचि गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्ति की रुचियों के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य है कि व्यक्ति की कुछ रुचियाँ जन्मजात होती हैं, परन्तु रुचियों का समुचित विकास जीवन में धीरे-धीरे तथा क्रमिक रूप से होता है। शिशु की रुचियों का आधार उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, अर्थात् शैशवावस्था में रुचियों का विकास ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित होता है। बाल्यावस्था में बालक की सक्रियता बढ़ जाती है; अतः इस अवस्था में उसकी रुचियों का विकास क्रियात्मक खेलों के माध्यम से होता है।

बाल्यावस्था के उपरान्त किशोरावस्था में व्यक्ति की रुचियों का विकास कल्पनाओं, संवेगों तथा जिज्ञासा के माध्यम से होता है। इसके उपरान्त प्रौढ़ावस्था में व्यक्ति की नयी रुचियाँ प्रायः उत्पन्न नहीं होती। इस अवस्था में व्यक्ति की रुचियाँ स्थायी रूप ग्रहण करती हैं।

प्रश्न 2
रुचि और योग्यता का घनिष्ठ सम्बन्ध है।” इस कथन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
हम जानते हैं कि रुचि एक शक्ति है जो व्यक्ति को किसी विषय, वस्तु या कार्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रेरित करती है। रुचि से लगन उत्पन्न होती है तथा व्यक्ति की शक्तियाँ अभीष्ट दिशा या कार्य में केन्द्रित हो जाती हैं। रुचि की इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए ही कहा जाता है कि रुचि और योग्यता को घनिष्ठ सम्बन्ध है।

वास्तव में रुचि की दशा में व्यक्ति अधिक ध्यानपूर्वक, लगन से तथा अपनी समस्त शक्तियों को जुटा कर कार्य करता है। इस स्थिति में योग्यता को विकास होना स्वाभाविक ही हो जाती है। यही कारण है कि हम कह सकते हैं कि रुचि और योग्यता का घनिष्ठ सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
अनभिप्रेत अवधान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
अनभिप्रेत अवधान एक विशेष प्रकार का अवधान है जिसमें व्यक्ति को विशिष्ट प्रयास की जरूरत होती है। यह अवधान ऐच्छिक होकर भी ऐच्छिक अवधान से भिन्न होता है। अनभिप्रेत अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति किसी उत्तेजना या वस्तु पर अपनी इच्छा तथा रुचि के विरुद्ध जाकर ध्यान केन्द्रित करता है, लेकिन ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति उस उत्तेजना या वस्तु की ओर अपनी इच्छा और रुचि के अनुकूल ध्यान केन्द्रित करने को प्रयास करता है।

उदाहरणार्थ :
माना एक कवि अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुकूल काव्य-रचना में लगा है। उसी समय उसे किसी बीमार आदमी के लिए जरूरी तौर पर दवा लेने जाना पड़े। कविता से हटकर उसका जो ध्यान दवाइयों की दुकान पर केन्द्रित होगा; उसे अनभिप्रेत अवधान कहेंगे।

प्रश्न 4
व्यक्ति के अवधान का आदत से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर :
व्यक्ति के अवधान में आदत का विशेष योगदान होता है। आदत को अवधान की सबसे अधिक अनुकूल या सहायक दशा माना गया है। व्यक्ति की जब जिस वस्तु की आदत होती है, उससे सम्बन्धित पदार्थ की ओर एक निर्धारित समय पर उसका अवधान अवश्य केन्द्रित हो जाता है। उदाहरण के लिए–यदि किसी व्यक्ति की दोपहर बाद तीन बजे चाय पीने की आदत हो तो निश्चित समय पर उसका ध्यान चाय की ओर केन्द्रित हो जाएगा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
“रुचि को वह प्रेरक शक्ति कहा जाता है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है।”-रुचि की यह परिभाषाकिसके द्वारा प्रतिपादित है?
उत्तर :
रुचि की प्रस्तुत परिभाषा क्रो तथा क्रो द्वारा प्रतिपादित है।

प्रश्न 2
ध्यान या अवधान का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
ध्यान या अवधान वह मानसिक क्रिया है, जिसमें हमारी चेतना किसी व्यक्ति, विषय या वस्तु पर केन्द्रित होती है।

प्रश्न 3
अवधान की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान की प्रक्रिया की मुख्य विशेषताएँ हैं

  1. एकाग्रता
  2. मानसिक क्रियाशीलता
  3. चयनात्मकता तथा
  4. प्रयोजनशीलता

प्रश्न 4
कोई ऐसा कथन लिखिए जिससे अवधान एवं रुचि के सम्बन्ध को जाना जा सके।
उत्तर :
“अवधान तथा रुचि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि रुचि के कारण कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान देता है तो अवधान के कारण उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाएगी।” [रॉस]

प्रश्न 5
“रुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक प्रवृत्ति है।” यह किसका कथन है ? [2007, 10]
उत्तर :
प्रस्तुत कथन जेम्स ड्रेवर का है।

प्रश्न 6
रुचियों के मुख्य वर्ग या प्रकार कौन-कौन से हैं? [2007, 2016]
या
रुचि के कितने प्रकार हैं?
उत्तर :
रुचियों के मुख्य वर्ग या प्रकार दो हैं

  1. जन्मजात रुचियाँ तथा
  2. अर्जित रुचियाँ

प्रश्न 7
रुचि क्या है? [2013]
उत्तर :
रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।

प्रश्न 8
अवधान के मुख्य दो प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान के मुख्य दो प्रकार हैं

(1) ऐच्छिक अवधान तथा
(2) अनैच्छिक अवधान।

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. अवधान अपने आप में एक चयनात्मक प्रक्रिया है।
  2. प्रबल उत्तेजनाओं के प्रति व्यक्ति का अवधान केन्द्रित नहीं हो पाता।
  3. अवधान तथा रुचि का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता।
  4. रुचि गुप्त. अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।
  5. अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए शान्त तथा अनुकूल वातावरण आवश्यक होता है।
  6. रुचिकर विषय-वस्तुओं के प्रति अवधान शीघ्र केन्द्रित हो जाता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य
  6. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
“किसी दूसरी वस्तु की अपेक्षा एक वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण अवधान है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) जे० एस० रॉस ने
(ख) मैक्डूगल ने
(ग) डम्बिल ने
(घ) वुडवर्थ ने
उत्तर :
(ग) डम्बिल ने

प्रश्न 2
“किसी भी दृष्टिकोण से देखा जाए, अन्तिम विश्लेषण में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।” यह किसका कथन है ?
(क) मन का
(ख) जंग का
(ग) डम्बिल का
(घ) मैक्डूगल का
उत्तर :
(क) मन का

प्रश्न 3
“अवधान गतिशील होता है, क्योंकि वह अन्वेषणात्मक है।” यह कथन है
(क) वुडवर्थ का
(ख) मैक्डूगल का
(ग) हिलेगार्ड का
(घ) डम्बिल को
उत्तर :
(क) वुडवर्थ का

प्रश्न 4
रुचि एक
(क) अर्जित शक्ति है
(ख) प्रेरक शक्ति है
(ग) नैसर्गिक शक्ति है
(घ) बौद्धिक शक्ति है
उत्तर :
(ख) प्रेरक शक्ति है

प्रश्न 5
रुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार है।” यह कथन है
(क) मैक्डूगल का
(ख) वुडवर्थ को
(ग) डेवर का
(घ) गेट्स का
उत्तर :
(ग) ड्रेवर का

प्रश्न 6
“रुचिं गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।” यह मत किसका है ?
(क) को तथा क्रो का
(ख) स्किनर का
(ग) वुडवर्थ को
(घ) मैक्डूगल का
उत्तर :
(घ) मैक्डूगल का

प्रश्न 7
विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से लाने की प्रक्रिया है
(क) रुचि
(ख) कल्पना
(ग) अवधान
(घ) संवेदन
उत्तर :
(ग) अवधान

प्रश्न 8
पाठ को रुचिकर बनाने के लिए क्या आवश्यक है। [2012]
(क) शांतिपूर्ण वातावरण हो
(ख) पाठ के क्रियात्मक पद पर ध्यान दिया जाए
(ग) उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाए
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 9
अवधान तथा रुचि के आपसी सम्बन्ध के विषय में सत्य है
(क) रुचि ध्यान पर आधारित होती है
(ख) ध्यान रुचि पर आधारित होता है
(ग) रुचि तथा ध्यान परस्पर फूक होते हैं
(घ) ये सभी कथन सत्य हैं
उत्तर :
(ग) रुचि तथा ध्यान परस्पर पूरक होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India (भारत के प्रमुख पत्तने बन्दरगाह) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India (भारत के प्रमुख पत्तने बन्दरगाह).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 25
Chapter Name Major Ports of India (भारत के प्रमुख पत्तने बन्दरगाह)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India (भारत के प्रमुख पत्तने बन्दरगाह)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के किन्हीं दो प्रमुख बन्दरगाहों की स्थिति एवं महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या
निम्नलिखित बन्दरगाहों के विकास हेतु उत्तरदायी भौगोलिक कारकों का विश्लेषण कीजिए –
(1) कॉदला, (2) पाराद्वीप, (3) कोचीन, (4) कोलकाता, (5) विशाखापट्टनम् एवं (6) मुम्बई।
या
मुम्बई पत्तन का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए।
(क) स्थिति एवं पृष्ठ प्रदेश (ख) निर्यात एवं आयात। [2016]
या
भारत के पूर्वी समुद्री तट पर स्थित दो प्रमुख पत्तनों (बन्दरगाहों) का भौगोलिक वर्णन कीजिए। टिप्प्णी लिखिए। काँदला बन्दरगाह की स्थिति एवं महत्त्व
या
पूर्वी भारत के किन्हीं दो मुख्य बन्दरगाहों की स्थिति एवं महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या
पश्चिमी भारत के किन्हीं दो समुद्र पत्तनों की स्थिति एवं महत्त्व की समीक्षा कीजिए। (2016)
या
भारत के पाराद्वीप बन्दरगाह की स्थिति एवं महत्त्व बताइए।
या
विशाखापट्टनम् पत्तन (बन्दरगाह) का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(अ) स्थिति, (ब) पृष्ठ प्रदेश (पश्च भूमि), (स) आयात एवं निर्यात। [2008]
या
भारत के पूर्वी तट के किन्हीं दो बन्दरगाहों के नाम लिखिए एवं इन्हें रेखा-मानचित्र पर प्रदर्शित कीजिए। [2014]
उत्तर

(1) काँदला Kandla

काँदला भारत का एक महत्त्वपूर्ण आधुनिक पत्तन है। कराँची पत्तन के पाकिस्तान के आधिपत्य में चले जाने के उपरान्त पश्चिमी तट पर काँदला पत्तन का विकास किया गया, जिससे यह गुजरात के उत्तरी भाग, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली एवं जम्मू-कश्मीर राज्यों के लिए मुख्य द्वार का काम कर सके तथा मुम्बई पत्तन के व्यापारिक भार को घटाया जा सके। इस कृत्रिम पत्तन के विकास के लिए सरकार ने करोड़ों रुपये का व्यय किया है। इसका विकास मुम्बई के सहायक पत्तन के रूप में किया गया है। इस पत्तन के विकास में निम्नलिखित भौगोलिक कारकों ने अपना प्रभाव डाला है –
(1) स्थिति – यह पत्तन एक सामुद्रिक कटाव पर स्थित है जो भुज से 48 किमी दूर एवं कच्छ की खाड़ी के पूर्वी सिरे पर स्थित है। इसमें जल की औसत गहराई 9 मीटर है, जहाँ जलयान सुविधा से ठहर सकते हैं। भारत सरकार ने सन् 1965 से इसे मुक्त व्यापार क्षेत्र घोषित कर दिया है अर्थात् यहाँ पर विदेशी आयातित माल पर कोई कर नहीं देना पड़ता है। इसी कारण इस पत्तन का विकास तीव्र गति से हुआ है।

(2) पोताश्रय – इस पत्तन का पोताश्रय प्राकृतिक एवं सुरक्षित है। यहाँ पर 4 डॉक्स इतने गहरे एवं बड़े हैं जिनमें किसी भी आकार के9 मीटर गहरी तली वाले जलयान खड़े हो सकते हैं। इस पत्तन को सभी आधुनिक आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयी हैं। यहाँ पर गोदामों की भी अच्छी व्यवस्था है। काँदला पत्तन पर 4 बड़े शेड हैं जिनमें माल सुरक्षित रखा जा सकता है। यहाँ एक खनिज तेल का गोदाम भी है।

(3) आधुनिक संचार सुविधाएँ – इस पत्तन पर 1,600 किमी दूरी तक के समाचार प्राप्त करने और भेजने वाला संचार यन्त्र तथा 48 किमी तक की सूचना देने वाला राडार यन्त्र भी लगाया गया है। एक तैरते हुए डॉक और ज्वार-भाटा के समय प्रयुक्त होने के लिए डॉक भी बनाये गये हैं। यह पत्तन अपने पृष्ठ प्रदेश से रेल एवं सड़क मार्गों से जुड़ा है। यह पत्तन यूरोपीय तथा अन्य पश्चिमी देशों के सबसे निकट पड़ता है।

(4) पृष्ठ प्रदेश – कॉंदला पत्तन का पृष्ठ प्रदेश बहुत ही विशाल है। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली एवं पश्चिमी मध्य प्रदेश के कुछ भाग सम्मिलित हैं। इसको पृष्ठ प्रदेश मछली, सीमेण्ट बनाने का कच्चा माल, जिप्सम, लिग्नाइट, नमक, बॉक्साइट, अभ्रक, मैंगनीज आदि पदार्थों में काफी धनी है। यहाँ सूती एवं ऊनी वस्त्र, सीमेण्ट, दवाई, घड़ी आदि बनाने के अरब सागरेअनेक उद्योग भी विकसित हुए हैं।
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(5) आयात एवं निर्यात – इस पत्तन की स्थिति पत्तन द्वारा लोहे-इस्पात का सामान, मशीन, पेट्रोल, गन्धक, रॉक फॉस्फेट, पोटाश, रासायनिक उर्वरक, उत्तम किस्म की कपास, रसायन, खाद्यान्न आदि वस्तुओं का आयात किया जाता हैं।
यहाँ से लकड़ियाँ, अभ्रक, लोहा, चमड़ा, खालें, ऊन, सेलखड़ी, अनाज, कपड़ा, नमक, सीमेण्ट, हड्डी का चूरा, मैंगनीज, चीनी, इन्जीनियरिंग का सामान आदि वस्तुओं का निर्यात किया जाता है।
इस पत्तन की समृद्धि के लिए इसे मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) घोषित किया गया है। यहाँ आयात किये जाने वाले माल पर कोई कर नहीं देना पड़ता। इस पत्तन द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 165 लाख टन को व्यापार (आयात 91% तथा निर्यात 9%) किया जाता है।

(2) पारादीप Paradweep

पाराद्वीप पत्तन भारत के पूर्वी तट पर ओडिशा राज्य में कोलकाता एवं विशाखापट्टनम् बन्दरगाहों के मध्य स्थित है। इसके द्वारा सभी मौसमों में व्यापार किया जाता है। यहाँ 60,000 टन क्षमता के जलयान आसानी से ठहर सकते हैं। इस पत्तन के 6 वर्ग किमी क्षेत्र में भवन आदि का निर्माण किया गया है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र पहले दलदली था जिसे सुखाकर लेंगून हारबेर, जलयानों के मुड़ने के लिए स्थान, खनिज तथा अन्य सामानों के लिए दो बर्थ, लैगून तक पहुँचने के लिए एक जलधारा तथा माल लादने के लिए एक जैटी का निर्माण किया गया है। जलतोड़ दीवार सागर की ओर से लैगून हारबर में आने वाले जलयानों को संरक्षण प्रदान करती है। इस द्वार से होकर जलयान जलधारा में जा पाते हैं। इसके विकास में निम्नलिखित भौगोलिक कारकों ने अपना योगदान दिया है –
(1) स्थिति – इस पत्तन का विकास उत्कल तट पर कटक से 96 किमी दूर बंगाल की खाड़ी में किया गया है। यह कोलकाता एवं विशाखापट्टनम् पत्तनों के मध्य केन्द्रीय स्थिति रखता है।

(2) पोताश्रय – इसका पोताश्रय लैगून सदृश है, जो चारों ओर से जलतोड़ दीवारों से घिरा हुआ है। यहाँ प्रथम चरण में एक समय में दो जलयान ठहर सकते हैं, परन्तु बाद में अधिक जलयानों को ठहराने की सुविधा के लिए बर्थ क्षेत्र को विस्तृत किये जाने का कार्य विचाराधीन है।

(3) संचार सुविधाएँ – इसका पृष्ठ प्रदेश सड़क एवं रेलमार्गों द्वारा इस पत्तन से जुड़ा हुआ है। पाराद्वीप पत्तन को एक ओर तोमका तथा दूसरी ओर दैतारी लोहे की खानों से जोड़ने के लिए 145 किमी लम्बा राजमार्ग बनाया गया है। इस मार्ग को क्योंझर जिले से लेकर बिहार की सीमा पर स्थित भारत की सबसे बड़ी लोहे की खानों—जादा एवं नारबिल–तक बढ़ाये जाने का प्रस्ताव विचाराधीन है।

(4) पृष्ठ प्रदेश – इस पत्तन का पृष्ठ प्रदेश ओडिशा, उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ राज्यों पर विस्तृत है। यहाँ मैंगनीज, लोहा, अभ्रक, बॉक्साइट, कोयला, ग्रेफाइट आदि खनिज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ इमारती लकड़ी भी उपलब्ध है। इस पृष्ठ प्रदेश में लोहा-इस्पात, भारी मशीनें, विद्युत-यन्त्र एवं उपकरण, रासायनिक उर्वरक, सीमेण्ट, कागज आदि उद्योग विकसित हुए हैं।

(5) आयात एवं निर्यात – इस पत्तन के प्रमुख आयात रासायनिक उर्वरक, गन्धक, पोटाश आदि हैं, जबकि यहाँ से लोहा, मैंगनीज, लोहे एवं इस्पात का सामान, इमारती लकड़ी, मछलियाँ, क्रोमाइट आदि वस्तुओं का विदेशों को निर्यात किया जाता है।
सन् 1966 के बाद से इस पत्तन को भारत के 19 बड़े पत्तनों में सम्मिलित कर लिया गया है। इस पत्तन में प्रतिवर्ष 121 जलयान आते हैं तथा 22 लाख टन वस्तुओं का व्यापार किया जाता है, जिसमें
आयात 4 लाख टन एवं निर्यात 18 लाख टन का है। इस पत्तन का विकास देश के निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए किया गया है।

(3) कोचीन (कोच्चि) Kochin

कोचीन पत्तन, भारत के पश्चिमी तट अर्थात् मालाबार तट पर केरल राज्य में स्थित है। यह एक प्राकृतिक पत्तन है जो समुद्र के समानान्तर एक विशाल अनूप के सहारे स्थित है। यह सुदूर-पूर्व, ऑस्ट्रेलिया एवं यूरोप को जाने वाले जलमार्गों के मध्य पड़ता है। इस पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – यह केरल राज्य में मुम्बई महानगर से दक्षिण में 928 किमी की दूरी पर पश्चिमी तट पर स्थित है। यह एक विशाल पेरियार लैगून के मुहाने पर अपनी स्थिति रखता है।
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(2) पोताश्रय – इसका पोताश्रय काफी विकसित है। पोताश्रय से सम्बन्धित जलधारा 140 मीटर चौड़ी तथा 7 किमी लम्बी है। यहाँ पर बड़े-बड़े जलयान सुरक्षित खड़े रह सकते हैं। पूर्वी एवं पश्चिमी देशों के मध्य यह एक कड़ी का कार्य करता है।

(3) यातायात के साधन – इसका पृष्ठ प्रदेश राजमार्गों एवं रेलों द्वारा जुड़ा है। दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर यह एक प्रमुख पत्तन है जो मुम्बई के भार को कम करता है।

(4) पृष्ठ प्रदेश – कोचीन पत्तन का पृष्ठ प्रदेश पश्चिमी घाट के दक्षिणी भाग, नीलगिरि, इलायची की पहाड़ियों, केरल, कर्नाटक और दक्षिणी तमिलनाडु पर विस्तृत हैं। दक्षिणी भारत के शेष भागों में यह रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा है। इसके पृष्ठ प्रदेश में चाय, कहवा, चावल, नारियल, रबड़, काजू, गर्म मसाले एवं रबड़ का अधिक उत्पादन किया जाता है। इसके अतिरिक्त मछलियाँ एवं अन्य सामुद्रिक जीव, इलायची एवं नारियल से बने सामान; जैसे-तेल, चटाई, रस्सी आदि; का भी उत्पादन किया जाता है, परन्तु वृहत् उद्योगों को इसके पृष्ठ प्रदेश में अभाव पाया जाता है। अत: लघु एवं कुटीर वस्तुओं का उत्पादन ही अधिक किया जाता है तथा इन्हीं वस्तुओं का व्यापार किया जाता है।

(5) आयात एवं निर्यात – इस पत्तन के प्रमुख आयात कपास, रासायनिक उर्वरक, पेट्रोल, बॉक्साइट, जस्ता, लोहा एवं इस्पात का सामान, कोयला, वस्त्र आदि वस्तुएँ हैं।
प्रमुख निर्यातक वस्तुओं में नारियल की जटाएँ, रस्से, सूत, चटाइयाँ, खोपरा, गिरि, नारियल का तेल, चाय, कहवा, रबड़, काजू, गर्म मसाले, इलायची, मछलियाँ आदि हैं।

दक्षिणी भारत में कोचीन एक औद्योगिक नगर के रूप में विकसित हुआ है। जलयान निर्माण उद्योग यहाँ का प्रमुख उद्योग है। इसके अतिरिक्त पेट्रोलियम शोधन उद्योग भी विकसित हुआ है। अन्य उद्योगों में विद्युत उपकरण, रासायनिक उर्वरक आदि प्रमुख हैं। इस पत्तन का सामरिक महत्त्व बहुत अधिक है। यह ऑस्ट्रेलिया एवं पूर्वी एशियाई देशों के लिए समुद्री पत्तने की सुविधा प्रदान करता है। यहाँ प्रतिवर्ष 918 जलयाने आते हैं। व्यापार की मात्रा 55 लाख टन हैं, जिसमें आयात 42 लाख टन तथा निर्यात मात्रा 13 लाख टन है।

(4) कोलकाता Kolkata

कोलकाता भारत का ही नहीं अपितु एशिया महाद्वीप का एक प्रमुख पत्तन है। वास्तव में यह गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी का पूर्वी सामुद्रिक द्वार है। निम्नलिखित भौगोलिक कारकों ने इस पत्तन के विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है –
(1) स्थिति – कोलकाता पत्तन हुगली नदी के बायें किनारे पर बंगाल की खाड़ी से 144 किमी की दूरी पर उत्तर दिशा की ओर स्थित है।

(2) पोताश्रय – कोलकाता पत्तन हुगली नदी द्वारा समुद्र से जुड़ा है। हुगली नदी के तट पर उत्तर में श्रीरामपुर से लेकर दक्षिण में बज बज तक यह पत्तन विस्तृत है। इससे 64 किमी दूर खाड़ी में डायमण्ड एवं खिदिरपुर पोताश्रय बनाये गये हैं। जहाँ जल की पर्याप्त गहराई के कारण 9,000 टन से भी अधिक भार के जलयान आसानी से पहुँच सकते हैं, तथा वहाँ ठहरकर ज्वार की प्रतीक्षा करते हैं। ज्वार के समय ये जलयान खिदिरपुर तक जाते हैं। इस प्रकार जलयानों को समुद्रतटे से कोलकाता पत्तन तक पहुँचने के लिए 8 घण्टे का समय लग जाता है। यहाँ पर अनेक जैटी, गोदाम, व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र स्थित हैं।
(3) कोलकाता पत्तन के विकास के कारण

    1. इसका पृष्ठ प्रदेश सघन जनसंख्या रखने वाला है।
    2. इसका पृष्ठ प्रदेश आर्थिक विकास में बहुत ही धनी है, जहाँ जूट, चावल, चाय तथा गन्ने का अधिक उत्पादन किया जाता है।
    3. इसके समीप ही कोयला, लौह-अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक, चूना-पत्थर आदि खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में निकाले जाते हैं।
    4. इसके पृष्ठ प्रदेश में सभी प्रकार के आवागमन के साधन विकसित हैं।
    5. इसका पृष्ठ प्रदेश लोहा-इस्पात, इंजीनियरिंग, भारी विद्युत संयन्त्र, सीमेण्ट, कागज, जूट, सूती वस्त्र आदि उद्योगों में विकसित है।
    6. समीप में स्थित दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देश भारतीय माल के अच्छे ग्राहक हैं, जो बाजार की सुविधा उपलब्ध कराते हैं।
    7. कोयले से प्राप्त ताप-विद्युत तथा जल-विद्युत शक्ति पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
    8. कोलकाता भारत का प्रमुख शैक्षिक, व्यावसायिक एवं व्यापारिक केन्द्र है।
    9. कोलकाता के समीपवर्ती प्रदेश में सघन जनसंख्या के कारण सस्ते श्रमिक काफी संख्या में उपलब्ध हो जाते हैं।
    10. हुगली नदी इस पत्तन को परिवहन की सुविधा के साथ-साथ स्वच्छ जल की सुविधा प्रदान करती है।

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(4) पृष्ठ प्रदेश – इसके पृष्ठ प्रदेश में असोम, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ राज्य सम्मिलित हैं। यह देश के सभी भागों से पूर्वी, उत्तरी-पूर्वी, मध्य और पूर्वी-सीमान्त रेलमार्गों, राष्ट्रीय राजमार्गों, नदी मार्गों और नहरों द्वारा जुड़ा है। अतः सम्पूर्ण क्षेत्र का उत्पादन आसानी से कोलकाता तक लाया जा सकता है तथा विदेशों से प्राप्त माल को देश के भिन्न-भिन्न भागों में आसानी से पहुंचाया जा सकता है।

(5) व्यापार – कोलकाता देश का दूसरा बड़ा पत्तन है। यहाँ से अधिकांशतः भारी पदार्थों का व्यापार किया जाता है। इस पत्तन पर यात्री जलयान बहुत ही कम आते हैं। यहाँ से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुएँ-जूट एवं जूट का सामान, चाय, चीनी, लोहा एवं इस्पात का सामान, तिलहन, चमड़ा, अभ्रक, मैंगनीज आदि हैं। इस पत्तन द्वारा आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में कपास, सूती, ऊनी एवं रेशमी वस्त्र, कृत्रिम रेशम, रासायनिक पदार्थ, कागज, लुग्दी, पेट्रोल, काँच का सामान, रबड़, मशीनें, दवाइयाँ तथा मोटरकार आदि वस्तुएँ सम्मिलित हैं।

इस पत्तन के विकास के कारण ही इस पृष्ठ प्रदेश में अनेक उद्योग-धन्धे स्थापित हो गये हैं। सूती वस्त्र एवं कागज इसी प्रकार के उद्योग हैं। दोनों ही उद्योग आयातित कच्चे माल पर निर्भर करते हैं। जूट उद्योग के विकास में कोलकाता पत्तन का विशेष महत्त्व है। मशीनों के आयात की सुविधा ने इस पत्तन के पृष्ठ प्रदेश में प्रथम इस्पात कारखाना जमशेदपुर में स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। दुर्गापुर, हीरापुर, बर्नपुर तथा कुल्टी के इस्पात कारखाने इसी पत्तन की देन हैं। चमड़ा, दियासलाई, रेशमी वस्त्र, मोटरकार आदि अन्य प्रमुख उद्योग भी यहाँ स्थापित हैं।

(6) कोलकाता पत्तन के भावी विकास की प्रवृत्तियाँ – इस पत्तन पर व्यापारिक दबाव बढ़ जाने के कारण कोलकाता महानगर के दक्षिण में हुगली नदी के नीचे की ओर 90 किमी की दूरी पर हल्दिया पोताश्रय एवं पत्तन का विकास किया गया है। बड़े-बड़े जलयान जो कोलकाता तक नहीं पहुँच पाते, यहाँ पर आसानी से लंगर डाल सकते हैं। यहाँ कोलकाता पत्तन के लिए अनेक आवश्यक वस्तुएँ आयात की जा सकेंगी। हल्दिया पत्तन पर सन् 1981 से माल उतारने-लादने की आधुनिक तकनीक का उपयोग शुरू कर दिया गया है। इस प्रकार हल्दिया, कोलकाता के सहायक पत्तन के रूप में विकसित किया गया है। कोलकाता से प्रतिवर्ष 42 लाख टन तथा हल्दिया से 87 लाख टन माल का व्यापार किया जाता है, जिसमें 80% आयातित एवं 20% निर्यातित माल होता है।

(5) विशाखापट्टनम्
Vishakhapattanam

विशाखापट्टनम् पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – यह पत्तन भारत के पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी में कोरोमण्डल तट पर कोलकाता से 800 किमी दक्षिण तथा चेन्नई से 425 किमी उत्तर में आन्ध्र प्रदेश राज्य में स्थित है। यह पत्तन पूर्ण रूप से एक सुरक्षित, प्राकृतिक एवं सबसे गहरा पत्तने है।

(2) पोताश्रय – इसका पोताश्रय काफी गहरा एवं सुरक्षित है। यहाँ जल की गहराई 9 मीटर से कम नहीं है। इस पत्तन पर 4 मुख्य बर्थ हैं जिनमें से प्रत्येक 152 मीटर लम्बा है तथा इनमें सभी आधुनिक सुविधाएँ विकसित की गयी हैं। इनमें से दो बर्थ विशेष रूप से लोहे एवं मैंगनीज के व्यापार के लिए सुरक्षित हैं। इनसे प्रतिदिन लगभग 3,000 मीट्रिक टन माल का व्यापार होता है। लगभग 61 मीटर लम्बी बर्थ पेट्रोल के व्यापार के लिए सुरक्षित है। इसके पोताश्रय में काफी बड़े जलयान भी आकर लंगर डाल सकते हैं।
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(3) आवागमन के साधन – विशाखापट्टनम् पत्तन का पृष्ठ प्रदेश दक्षिणी-पूर्वी एवं दक्षिणी-मध्य रेलमार्गों द्वारा जुड़ा है। इसके पृष्ठ प्रदेश से कोलकाता की अपेक्षा यंहाँ पहुँचने में कम समय लगता है तथा व्यय भी। कम करना पड़ता है। यहाँ पर जलयान निर्माण, लोहा-इस्पात, रासायनिक उर्वरक तथा तेलशोधन के कारखाने भी स्थापित किये गये हैं।

(4) पृष्ठ प्रदेश – विशाखापट्टनम् को पृष्ठ प्रदेश आन्ध्र प्रदेश के अधिकतर भाग, ओडिशा, पूर्वी मध्य प्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों पर विस्तृत है। इन राज्यों के व्यापार के लिए यही पत्तन उत्तम एवं सुविधाजनक है। इसका पृष्ठ प्रदेश कृषि पदार्थों की अपेक्षा खनिज पदार्थों में अधिक धनी है। यहाँ कोयला, लौह-अयस्क तथा मैंगनीज के भारी भण्डार हैं। चावल, मूंगफली, नारियल, चमड़ा एवं खाले भी यहाँ के प्रमुख उत्पाद हैं।

(5) व्यापार – इस पत्तन द्वारा सूती वस्त्र, लोहा-इस्पात का सामान, मशीनें, पेट्रोल एवं रासायनिक पदार्थ प्रमुख रूप से आयात किये जाते हैं।
जापान को लौह-अयस्क निर्यात करने में इस पत्तन की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। अन्य वस्तुओं में कोयला, लकड़ियाँ, चमड़ा, खालें, मूंगफली, मैंगनीज, लोहा, हरड़, बहेड़ा, लाख, खली आदि का निर्यात किया जाता है। आयातक वस्तुओं में वस्त्र, पेट्रोलियम उत्पाद, सीमेण्ट, मशीनें, कोयला, लोहा, रासायनिक पदार्थ, अखबारी कागज एवं खनिज तेल प्रमुख हैं। विशाखापट्टनम् पत्तन में प्रति वर्ष 563 जलयान आते हैं, जिनके द्वारा 148 लाख टन माल का व्यापार किया जाता है।

(6) मुम्बई Mumbai

यह भारत का ही नहीं अपितु विश्व का एक प्रमुख पत्तन है। देश का 20% से भी अधिक व्यापार मुम्बई पत्तन द्वारा किया जाता है। इस पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – मुम्बई पत्तन सालसट द्वीप पर लगभग 200 वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है। यह भारत के पश्चिमी तट पर एक प्राकृतिक कटान में स्थित है, जहाँ मानसून काल के तूफानों से जलयान सुरक्षित खड़े रह सकते हैं। यह पत्तन यूरोप, पूर्वी एशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के मार्ग में पड़ता है। पत्तन के निकट 11 मीटर गहराई होने से जलयान समुद्रतट तक आकर ठहर जाते हैं। यहाँ पर एक खाड़ी बन गयी। है जो 23 किमी लम्बी एवं 10 किमी चौड़ी है। स्वेज नहर को पार कर आने वाले सभी प्रकार के जलयान यहाँ पर आसानी से ठहर सकते हैं। इस प्रकार पश्चिम से पूर्व को जोड़ने में इस पत्तन की भूमिका बड़ी ही। महत्त्वपूर्ण है।

(2) संचार सुविधाएँ – मुम्बई को यद्यपि पश्चिमी घाट ने देश के भीतरी भागों से अलग-थलग कर दिया है, परन्तु थालघाट एवं भोरघाट दरों ने इसे सड़क एवं रेलमार्गों द्वारा उत्तरी-दक्षिणी एवं मध्य-पूर्वी भारत से जोड़ दिया है। मुम्बई अन्तर्राष्ट्रीय वायु सेवाओं का भी प्रमुख केन्द्र है।

(3) पोताश्रय – जिस स्थान पर मुम्बई पत्तन का निर्माण किया गया है, वहाँ जल की गहराई 11 मीटर है। इतनी गहराई में वे सभी जलयान आकर ठहर सकते हैं जो स्वेज नहर से होकर निकल सकते हैं, क्योंकि स्वेज नहर की गहराई भी लगभग इतनी ही है।

मुम्बई पत्तन के तीन मुख्य डॉक्स हैं-प्रिंस डॉक में 12, विक्टोरिया डॉक में 13 और एलेक्जेण्ड्रा डॉक में 17 बर्थ हैं। यहाँ पर 2 शुष्क डॉक भी बनाये गये हैं। इनके अतिरिक्त कुछ उप-पत्तनों का भी विकास किया गया है जिनमें नावों से आने वाला सामान एवं यात्री उतरते-चढ़ते हैं। तटीय व्यापार की दृष्टि से इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस पत्तन के निकट ही पेट्रोलियम के गोदाम भी बनाये गये हैं। एक नया गोदाम बचूर द्वीप के समीप में भी निर्मित किया गया है। विशाल गोदामों का होना मुम्बई पत्तन की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ अनाज एवं कपास रखने के गोदाम भी बनाये गये हैं। जिनमें 178 अग्नि-सुरक्षित कमरे हैं। इन गोदामों में अग्निसुरक्षा, आवागमन, अस्पताल, जलपान-गृह आदि की भी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
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(4) पृष्ठ प्रदेश – मुम्बई पत्तन का पृष्ठ प्रदेश बड़ा ही विशाल है जो दक्षिण में तमिलनाडु के पश्चिमी भाग से लेकर उत्तर में कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों तक फैला है। इसका पृष्ठ प्रदेश कृषि उत्पादन में बड़ा ही धनी है।
इस पत्तन के विकास के लिए सन् 1969 में मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट प्राधिकरण बनाया गया, जिससे इसके विकास की विभिन्न योजनाएँ बनायी गयी हैं। कुल मिलाकर 55 घाटों का निर्माण किया गया है जहाँ पर एक साथ कई जलयानों से माल लादा एवं उतारा जा सकता है। प्रारम्भ में इसकी व्यापार क्षमता 150 लाख मीट्रिक टन थी जिसे बढ़ाकर 300 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया है।

(5) व्यापार (महत्त्व) – व्यापार की दृष्टि से इस पत्तन को भारत में प्रथम स्थान है। देश के पेट्रोलियम व्यापार का 45%, सामान्य व्यापार को 44%, खाद्यान्न व्यापार का 30% तथा यात्रियों को लाने-ले-जाने का अधिकांश कार्य इसी पत्तन द्वारा किया जाता है। इस पत्तन द्वारा अलसी, मूंगफली, चमड़े का सामान, तिलहन, लकड़ी, ऊन, ऊनी एवं सूती वस्त्र, चमड़ा, मैंगनीज, अभ्रक, इंजीनियरिंग का सामान, लकड़ी, चाँदी आदि वस्तुएँ विदेशों को निर्यात की जाती हैं।

पेट्रोलियम का आयात इसी पत्तन द्वारा सबसे अधिक किया जाता है। बॉम्बे-हाई (Bombay-High) में तेल के भारी उत्पादन से इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है। यहाँ पर विदेशों से सूती, ऊनी एवं रेशमी वस्त्र, मशीनें, नमक, कोयला, कागज, रंग-रोगन, फल, रासायनिक पदार्थ, मिट्टी का तेल एवं लोहे का सामान, उत्तम किस्म की कपास, रासायनिक उर्वरक आदि वस्तुओं का आयात किया जाता है।

इस पत्तन के कारण ही इसके पृष्ठ प्रदेश में सूती वस्त्र उद्योग का विकास सम्भव हो सका है। दो पेट्रोल-शोधनशालाएँ ट्राम्बे में आयातित पेट्रोल के कारण स्थापित की जा सकी हैं। इसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरक, इन्जीनियरिंग, ऊनी वस्त्र, चमड़ा, दवाइयाँ, सीमेण्ट, मोटर, सिनेमा आदि उद्योग भी काफी विकसित हैं। इस पत्तन पर 3,557 जलयानों का आवागमन प्रतिवर्ष होता है जिनके द्वारा 286 लाख टन सामान का व्यापार किया जाता है जिसमें 134 लाख टन का आयात तथा 152 लाख टन का निर्यात किया जाता है। भविष्य में इसकी व्यापार क्षमता और भी अधिक बढ़ जाने की सम्भावना है, क्योंकि इसके निकट ही न्हावाशेवा नाम का एक नया पत्तन र 985 करोड़ की लागत से विकसित किया गया है।
मुम्बई पत्तन के विकास के कारण

  1. अन्य भारतीय पत्तनों की अपेक्षा यूरोप के अधिक निकट स्थिति।
  2. स्वेज नहर मार्ग तथा उत्तमाशा-अन्तरीप मार्ग पर केन्द्रीय स्थिति रखना।
  3. प्राकृतिक एवं विस्तृत पोताश्रय।
  4. पत्तन का वर्ष भर आवागमन के लिए खुले रहना।
  5. अपने पृष्ठ प्रदेश से रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा होना।
  6. इसके पृष्ठ प्रदेश का कपास, गेहूँ, गन्ना, मूंगफली जैसी फसलों के उत्पादन में विशेष स्थान।
  7. पश्चिमी घाट की प्राकृतिक स्थिति का जल-विद्युत शक्ति के विकास के लिए अनुकूल होना।
  8. समीप में तारापुर अणु शक्ति-गृह का स्थापित किया जाना।
  9. इसके पृष्ठ प्रदेश में सघन जनसंख्या का निवास होना।

(7) चेन्नई Chennai

पूर्वी तट पर यह भारत का मुख्य कृत्रिम पत्तन है। इसे सुरक्षित बनाने के लिए तट से 3.5 किमी की दूरी पर 90 मीटर गहरे सागर की नींव पर दो चौड़ी सीमेण्ट व कंकरीट की दीवारें बनाकर 80 हेक्टेयर से अधिक सागर जल को सुरक्षित बन्दरगाह क्षेत्र की भाँति विकसित किया गया है। इस पत्तन का मुख्य द्वार 120 मीटर लम्बा है। यहाँ जल की गहराई 10 मीटर रहती है, किन्तु ज्वार आने पर यह 12 मीटर तक हो जाती है। इस सुरक्षित पोताश्रय में वर्षा और तूफान के समय 16 जहाज सरलता से खड़े रहते हैं। बड़े जहाज भी साधारणतया 10 मीटर गहरे भागों तक आते हैं, किन्तु अक्टूबर-नवम्बर में जब कभी बंगाल की खाड़ी में तूफान आते हैं तो इनके द्वारा समुद्र का जल लहर के रूप में ऊपर उठ जाता है। और हानि की सम्भावना रहती है। अब इससे बचाव के लिए दीवारों को ऊँचा एवं अधिक सक्षम अनाया गया है। कुल व्यापार की दृष्टि से अब यह मुम्बई के पश्चात् सबसे व्यस्त बन्दरगाह हो गया है।
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चेन्नई का पृष्ठ प्रदेश दक्षिण के प्रायद्वीप के पूर्वी और दक्षिणी राज्यों तक विस्तृत है। इसमें दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, सम्पूर्ण तमिलनाडु और कर्नाटक का पूर्वी भाग सम्मिलित होता है, किन्तु मुम्बई और कोलकाता की भाँति न तो यह इतना उपजाऊ और समृद्ध है और न ही इतना घना बसा है। तमिलनाडु का पृष्ठ प्रदेशे सड़कों और रेलमार्गों द्वारा अन्य राज्यों से जुड़ा है और यह स्वयं एक औद्योगिक नगर है जहाँ सूती वस्त्रे, सीमेण्ट, सिगरेट, रेशमी वस्त्र, चमड़ा आदि उद्योग स्थापित हैं। इसका पृष्ठ प्रदेश भी अब सुविकसित है।

चेन्नई पत्तन से विदेशों को सूती और रेशमी कपड़े, चाय, नारियल, कहवा, हड्डी की खाद, तम्बाकू, मैंगनीज, विविध समुद्री उत्पाद, इन्जीनियरी सामान, संरक्षित खाद्य पदार्थ, मोटर, अन्य वाहन, प्याज, आलू, खली, मसाले आदि वस्तुएँ निर्यात की जाती हैं। आयात व्यापार में कोयला, कोक, खाद्यान्न, मोटरें, रंग, पेट्रोलियम, कागज, दवाइयाँ, धातुएँ, मशीनें, रासायनिक पदार्थ व उर्वरक मुख्य हैं। सभी बन्दरगाहों से जितना माल लादा या प्राप्त किया जाता है, उसका लगभग 20 प्रतिशत माल इस बन्दरगाह द्वारा प्राप्त किया या लादा जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत का रेखा मानचित्र खींचकर उस पर पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट की स्थिति अंकित कीजिए।
या
भारत का रेखा मानचित्र बनाइए तथा उसमें कॉदला पत्तन (बन्दरगाह) को दिखाइए।
या
मुम्बई बन्दरगाह को एक रेखा मानचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए। [2014]
या
कोलकाता बन्दरगाह को एक रेखा मानचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए। [2014, 15]
उत्तर
इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का अध्ययन करें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उस पत्तन का नाम बताइए जिसकी स्थापना कोलकाता के सहायक पत्तन के रूप में की गयी है?
उत्तर
हल्दिया।

प्रश्न 2
उस पत्तन का नाम बताइए जिसका विकास मुम्बई पत्तन पर दबाव को कम करने के लिए किया गया।
उत्तर
न्हावाशेवा।

प्रश्न 3
उस पत्तन का नाम बताइए जो पश्चिमी तट से लौह धातु का निर्यात करता है।
उत्तर
मार्मागोआ।

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प्रश्न 4
पाराद्वीप पत्तन किसलिए प्रसिद्ध है?
उत्तर
पाराद्वीप पत्तन इसलिए प्रसिद्ध है कि इस पत्तन से मुख्यत: जापान को लौह धातु का निर्यात किया जाता है।

प्रश्न 5
काँदला बन्दरगाह के दो व्यापारिक महत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. काँदला पत्तन पर आयात किये जाने वाले माल पर कोई कर नहीं देना पड़ता।
  2. अन्य पत्तनों की भाँति यहाँ विदेशों से लाकर भरे जाने वाले छोटे और पुन: तैयार किये जाने वाले माल व मशीन पर चुंगी नहीं लगती।

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प्रश्न 6
भारत के पश्चिमी तट के दो प्राकृतिक बन्दरगाहों के नाम लिखिए। [2007, 09, 16]
उत्तर

  1. मुम्बई तथा
  2. कोच्चि (कोचीन)।

प्रश्न 7
भारत के पूर्वी तट के दो प्राकृतिक बन्दरगाहों के नाम लिखिए। [2007, 10]
उत्तर

  1. विशाखापट्टनम तथा
  2. कोलकाता।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित शहरों में कौन बन्दरगाह नहीं है?
(क) नागपुर
(ख) मुम्बई
(ग) कोलकाता
(घ) विशाखापट्टनम्
उत्तर
(क) नागपुर।

प्रश्न 2
निम्नलिखित पत्तनों (बन्दरगाहों) में से कौन भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2008, 2014]
(क) तूतीकोरिन
(ख) काँदला
(ग) मार्मागोआ
(घ) कोच्चि
उत्तर
(क) तूतीकोरिन।

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से कौन-सा बन्दरगाह भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2011]
(क) कॉदला
(ख) कोचीन
(ग) मंगलौर
(घ) चेन्नई
उत्तर
(घ) चेन्नई।

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से कौन-सा बन्दरगाह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है? [2013, 14]
(क) पाराद्वीप
(ख) कोच्चि
(ग) तूतीकोरिन
(घ) हल्दिया
उत्तर
(ख) कोच्चि

प्रश्न 5
निम्नलिखित बन्दरगाहों में से कौन-सा भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है?
(क) पाराद्वीप
(ख) हल्दिया
(ग) विशाखापट्टनम्
(घ) मार्मागोआ
उत्तर
(घ) मार्मागोआ।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है? [2007]
(क) गुजरात-मंगलौर
(ख) तमिलनाडु-तूतीकोरिन
(ग) महाराष्ट्र-पाराद्वीप
(घ) कर्नाटक-कॉदला
उत्तर
(ख) तमिलनाडु-तूतीकोरिन।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन-सा पत्तन भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2010]
(क) मुम्बई
(ख) मंगलौर
(ग) कोच्चि
(घ) पाराद्वीप
उत्तर
(घ) पाराद्वीप।

प्रश्न 8
पाराद्वीप समुद्री पत्तन स्थित है – [2010]
(क) गुजरात में
(ख) कर्नाटक में
(ग) ओडिशा में
(घ) तमिलनाडु में
उत्तर
(ग) ओडिशा में।

प्रश्न 9
न्हावाशेवा उपग्रह पत्तन है – [2010]
(क) चेन्नई का
(ख) कोलकाता का
(ग) मुम्बई का
(घ) कोच्चि का
उत्तर
(ग) मुम्बई का।

प्रश्न 10
भारत का सबसे बड़ा नगर है – [2010]
(क) दिल्ली
(ख) मुम्बई
(ग) कोलकाता
(घ) चेन्नई
उत्तर
(ख) मुम्बई।

प्रश्न 11
निम्नलिखित में से कौन-सा बन्दरगाह भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2015]
(क) कोचीन
(ख) मंगलौर
(ग) विशाखापट्टनम्
(घ) मुम्बई
उत्तर
(ग) विशाखापट्टनम्।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 17
Chapter Name Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व)
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती राज से आप क्या समझते हैं ? ग्रामीण पुनर्निर्माण में पंचायतों के कार्यों एवं महत्त्व को बताइए। [2010, 11, 15]
या
ग्रामीण समाज (समुदाय) पर पंचायत के प्रभाव का वर्णन कीजिए। [2014, 15]
या
ग्रामीण समुदाय के विकास में पंचायतों का महत्त्व बताइए। [2008, 09, 13]
या
ग्रामीण विकास में ग्राम पंचायतों के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2007, 09]
या
ग्रामीण पुनर्निर्माण में पंचायती राज की भूमिका का वर्णन कीजिए। [2016]
या
ग्रामीण क्षेत्र में पंचायती राज-व्यवस्था का क्या महत्त्व है? [2014]
या
ग्रामीण आर्थिक विकास में ग्राम पंचायतों के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2007, 09]
या
ग्राम पंचायत के चार प्रमुख कार्य बताइए। [2009]
या
ग्राम पंचायतों के दो दायित्व बताइए। [2009, 12, 13]
या
पंचायती राज से आप क्या समझते हैं? ग्राम पंचायतों के महत्त्व पर अपने विचार लिखिए। [2008, 11]
या
ग्राम पंचायत का महत्त्व लिखिए। [2013, 15]
या
ग्राम पंचायत के सन्दर्भ में ग्रामीण समुदाय के बदलते स्वरूप की विवेचना कीजिए। [2013]
उत्तर:
भारत गाँवों में बसता है। गाँव भारत गणराज्य की आत्मा हैं। ग्रामीण अंचलों का विकास करके ही भारत का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए ‘पंचायती राज’ की व्यवस्था की गयी है। पंचायती राज का लक्ष्य लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण तथा राष्ट्र के विकास में जनसामान्य की भागीदारी सुनिश्चित करना है। पंचायती राज का मुख्य आधार व्यवस्था में जनसामान्य की भागीदारी है। पंचायत भारतीय लोकतन्त्र की नींव का पत्थर है, जिस पर राष्ट्र का भव्य और टिकाऊ भवन खड़ा हो सकता है।

ग्राम पंचायतों का अस्तित्व बहुत पुराना है। ये प्राचीन काल से भारतीय सामाजिक संगठन का एक सबल आधार रही हैं। ब्रिटिश शासकों ने भी पंचायती राज के महत्त्व को समझते हुए देश में स्थानीय स्वशासन सम्बन्धी अधिनियम पारित करके पंचायतों के संगठन में योग दिया। भारत के सर्वांगीण विकास के लिए संविधान में पंचायतों के गठन का प्रावधान रखा गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 में लिखा है, “राज्य ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ व अधिकार प्रदान करेगा जो स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश सरकार ने 1947 ई० में उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम’ पारित करके पंचायती राज की पक्की नींव रखी। 1994 ई० में इसके अधिनियम सं० 9 में संशोधन करके इसे और अधिक प्रभावशाली बना दिया। | 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के द्वारा ‘पंचायती राज-व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। यह संशोधन अधिनियम 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसके अनुसार ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष कर दिया गया और यह भी प्रावधान किया गया कि ग्राम पंचायत के कार्यकाल समापन होने के 6 माह के भीतर पुन: चुनाव करा दिये जाएंगे।

पंचायती राज की दृष्टि से ‘त्रि-स्तरीय ढाँचे’ (Three-tier System) की व्यवस्था की गयी है। ये तीन स्तर हैं-ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, विकास-खण्ड स्तर पर खण्ड समिति या क्षेत्र समिति या पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद्। यह भी प्रावधान किया गया है कि जिन राज्यों या संघीय राज्य क्षेत्रों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वे स्वयं निर्णय कर सकेंगे कि उनके क्षेत्र में मध्यवर्ती स्तर पर अर्थात् खण्ड समिति रखी जाए या नहीं। इस प्रकार ग्राम पुनर्निर्माण की प्रभावी व्यवस्था लागू की गयी है। इनका उद्देश्य गाँवों का चहुंमुखी विकास करना है।

ग्राम पंचायत के कार्य

ग्राम पंचायत के एमए कार्य निम्नलिखित हैं

  1. ग्रामीण क्षेत्रा में प्रकास के लिए योजनाएँ बनाना तथा उन्हें क्रियान्वित करना।
  2. सहकारी समितियों के माध्यम व का विकास करना।
  3. किसानों के लिए अच्छे बीज की व्यवस्था करना।
  4.  पुस्तकालय एवं वाचनालय का प्रबन्ध करना।
  5. ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन की व्यवस्था करना।
  6.  गलियों में खडूंजे लगवाना।
  7. सार्वजनिक चरागाहों की व्यवस्था एवं देखभाल करना।
  8.  गाँव में जन्म एवं मृत्यु का लेखा-जोखा रखना।
  9. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना।
  10.  गाँव में मेलों, हाटों तथा बाजारों की व्यवस्था करना।
  11.  कुओं व तालाबों की मरम्मत करवाना तथा पेयजल की व्यवस्था करना।
  12. पंचायती भवनों की सुरक्षा करना तथा सार्वजनिक स्थानों से अनधिकृत कब्जे हटाना।
  13. कृषि तथा कुटीर उद्योगों के विकास की व्यवस्था करना।
  14. मृत पशुओं की खाल निकालने तथा सुखाने के लिए स्थान निर्धारित करना।
  15. गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत की रक्षा करना।
  16. गरीबी हटाने के लिए कार्यक्रम चलाना।
  17.  प्रारम्भिक तथा माध्यमिक विद्यालय संचालित करना।
  18. प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा की उन्नति पर बल देना।
  19.  ग्रामीण हस्त शिल्प के विकास तथा शिल्पियों की उन्नति की योजनाएँ बनाना।
  20.  ग्रामीण आवासों की व्यवस्था करना।
  21.  ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास की योजनाएँ बनाना।
  22. ग्राम स्तर पर महिला प्रसूति-गृह एवं बाल विकास के कार्यक्रम लागू कराना।
  23.  वृद्धावस्था तथा विधवा पेन्शन योजनाओं में सहायता करना।
  24.  विकलांगों के हित के लिए तथा सामाजिक-कल्याण के कार्यक्रम चलाना।
  25. अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करना।
  26. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारु रूप देना।
  27.  परिवार-कल्याण कार्यक्रमों को लागू करना।
  28. खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कराना तथा ग्रामीण क्लबों की स्थापना और उनका प्रबन्ध करना।
  29. सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ बनाना और उन्हें लागू कराना।
  30.  कृषि तथा कुटीर उद्योग-धन्धों की उन्नति के प्रयास करना।

ग्रामीण पुनर्निर्माण में ग्राम पंचायतों का महत्त्व

ग्रामीण पुनर्निर्माण की दृष्टि से पंचायतों का निम्नलिखित महत्त्व है

1. सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने में सहायक – ग्रामीण समाज में सार्वजनिक कल्याण-कार्यों को करने में पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवश्यक सुविधाएँ (जैसे – स्वच्छ पानी, पक्के कुओं व गन्दगी फैलने से रोकने में) उपलब्ध कराने में पंचायतें सहायक हैं।

2. रोगों की चिकित्सा में सहायक – सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ संक्रामक बीमारियों की रोकथाम की दृष्टि से भी पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं। स्थानीय
संगठन होने के कारण रोगों की रोकथाम पंचायतों द्वारा सरलता से हो जाती है।

3. यातायात के विकास में सहायक – ग्रामीण पुनर्निर्माण के लिए गाँवों में यातायात के साधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पंचायतें सड़कों की मरम्मत करके, नयी सड़कें बनवाकर तथा प्रकाश का प्रबन्ध करके इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं।

4. मनोरंजन के साधनों का प्रबन्ध – ग्रामीण जीवन में मनोरंजन के साधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पंचायतें मेलों, प्रदर्शनियों व खेल-कूदों की व्यवस्था करके तथा सामुदायिक स्तर पर टेलीविजन इत्यादि का प्रबन्ध करके मनोरंजन में सहायता प्रदान करती हैं।

5. प्राकृतिक प्रकोपों के समय सहायता प्रदान करना – ग्राम पंचायतें प्राकृतिक प्रकोपों के समय सहायता प्रदान करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन विपत्तियों के समय ग्रामवासियों को सुरक्षा प्रदान करने, उनकी आर्थिक सहायता करने तथा उनका मनोबल ऊँचा बनाये रखने में पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं।

6. उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता करना – ग्राम पंचायतें कृषि उत्पादन में तो सहायता करती ही हैं, साथ ही छोटे-छोटे उद्योग स्थापित करने में भी सहायता प्रदान करती हैं। पंचायतें लघु व कुटीर उद्योगों की जानकारी ग्रामवासियों को उपलब्ध कराकर उन्हें स्थापित करने की प्रेरणा देती हैं।

7. कृषि उत्पादन में सहायता देना – ग्राम पंचायतें सुधरे हुए बीज, खाद व कीटनाशक औषधियाँ उपलब्ध कराने के साथ-साथ सिंचाई की सुविधाएँ प्रदान करके कृषि की उन्नति में सहायता देती हैं।

8. पशुओं की नस्ल में सुधार – पंचायतें पशुओं की नस्ल सुधारने में भी सहायता प्रदान करती हैं। नये गर्भाधान केन्द्र स्थापित करके तथा पशु चिकित्सा की सुविधाएँ उपलब्ध करके पंचायतें इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

9. सहकारिता को प्रोत्साहन – ग्रामीण पुनर्निर्माण में सहकारिता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस कार्य में भी पंचायतें ग्रामवासियों की सहायता करती हैं तथा उन्हें सहकारिता में सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

10. शिक्षा के विकास में सहायता – पंचायतें शिक्षा प्रसार का महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए स्कूल खोलने के अतिरिक्त पंचायतें प्रौढ़ शिक्षा में भी सहायक हैं।

11. समाज-कल्याण कार्यों में सहायता – पंचायतें अनेक प्रकार के समाज कल्याण कार्यों को भी करती हैं। पंचायतें सामाजिक कुरीतियों (जैसे – बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा, अस्पृश्यता, विधवा पुनर्विवाह आदि पर रोक इत्यादि) के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। साथ ही मातृत्व व बालकल्याण सुविधाएँ भी उपलब्ध कराती हैं।

12. लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण में सहायक – पंचायतें लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। ग्रामवासियों में राजनीतिक चेतना व सहभागिता को बढ़ाने, देश की समस्याओं के प्रति उन्हें सचेत करने तथा नागरिकता की शिक्षा प्रदान करके पंचायतें इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर सकती हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण एवं सर्वांगीण विकास के क्षेत्र में पंचायत राज नींव का पत्थर सिद्ध हुआ है। ग्राम पंचायतों ने ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त युगों-युगों की गन्दगी, अशिक्षा, अज्ञानता और अन्धकार को दूर करके एक नया ग्रामीण परिवेश तैयार किया है, लेकिन चुनाव-प्रणाली पर आधारित इस पंचायत व्यवस्था के लागू होने से गाँवों में गुटबन्दी भी बढ़ी है। चुनावी रंजिश के कारण हत्याएँ भी हुई हैं। फिर भी, यह कहा जा सकता है कि जनसहभागिता और स्वशासन पर आधारित ये ग्राम पंचायतें दीर्घकालीन दृष्टि से ग्रामों के पुनर्निर्माण और उनकी समृद्धि की सशक्त एजेन्सी सिद्ध होंगी।

प्रश्न 2
ग्रामीण समुदाय के विकास में क्षेत्र पंचायतों पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायत एवं जिला पंचायत के मध्य का स्तर है जिसका गठन प्रत्येक खण्ड (ब्लॉक) के स्तर पर किया जाता है। ग्रामों के विकास में क्षेत्र पंचायत की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह विभिन्न ग्राम पंचायतों में समन्वय तथा सामंजस्य को बनाए रखने का प्रभावी माध्यम है। क्षेत्र पंचायत का गठन ब्लॉक प्रमुख, खण्ड की समस्त ग्राम पंचायतों के प्रधानों, मतदाताओं द्वारा प्रत्येक ग्रामसभा से निश्चित संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधियों, क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित लोकसभा, राज्य विधानसभा तथा विधानपरिषद् के सदस्यों के सम्मिलित स्वरूप के आधार पर होता है। क्षेत्र पंचायत में भी ग्राम पंचायत की भाँति अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% तथा एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किये गये हैं। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों में आरक्षण उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है।।

क्षेत्र पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक

  1. व्यक्ति का नाम क्षेत्र पंचायत की प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में हो।
  2. व्यक्ति विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  3. उसकी आयु इक्कीस वर्ष हो।
  4.  वह किसी लाभ के सरकारी पद पर न हो। क्षेत्र पंचायत का मुख्य निष्पादक (प्रशासक) खण्ड विकास अधिकारी (Block Development Officer) होता है।

खण्ड विकास अधिकारी एक प्रकार से पंचायत समिति के कर्मचारियों की टीम का कप्तान (Captain) होता है।
क्षेत्र पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष की अवधि तक होता है। राज्य सरकार पाँच वर्ष की अवधि से पहले भी क्षेत्र पंचायत को विघटित कर सकती है। प्रमुख, उप-प्रमुख अथवा क्षेत्र-पंचायत का कोई भी सदस्य पाँच वर्ष की अवधि से पूर्व भी त्याग-पत्र देकर अपना पद त्याग सकता है।

कार्य एवं महत्त्व-क्षेत्र पंचायत पंचायती राज व्यवस्था की धुरी है। इसके कार्यों को दो प्रमुख वर्गों में विभक्त किया जाता है। पहली श्रेणी में वे कार्य सम्मिलित किये जाते हैं; जिनका सम्बन्ध नागरिक सुविधाओं को प्रदान करने से है तथा दूसरी श्रेणी में विकास कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। क्षेत्र पंचायत द्वारा नागरिक सुविधाएँ प्रदान करने हेतु किये जाने वाले कार्यों में क्षेत्र में

  1. सड़कों का निर्माण एवं उनकी देख-रेख, मरम्मत आदि कार्य करना,
  2.  पीने के जल की उचित व्यवस्था करना,
  3. प्राथमिक पाठशालाएँ खोलना,
  4. प्रौढशिक्षा केन्द्रों तथा वयस्क साक्षरता केन्द्रों की व्यवस्था करना,
  5. चिकित्सालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, औषध केन्द्र इत्यादि की व्यवस्था करना,
  6. प्रसूति केन्द्रों की स्थापना करना,
  7.  नालियों तथा पानी के निकास की व्यवस्था करना,
  8. शारीरिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलाप को प्रोत्साहन देना,
  9. युवक-संघों, महिला-मण्डलों तथा किसान-गोष्ठियों की स्थापना करना तथा
  10. ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों की स्थापना करना तथा उनको लोकप्रिय बनाना प्रमुख हैं।

क्षेत्र पंचायत के विकास कार्यक्रमों में जिन कार्यों को मुख्य रूप से सम्मिलित किया जाता है। उनमें

  1.  ग्रामवासियों के लिए उन्नत, संकर तथा नवीनतम बीजों की उपलब्धि तथा वितरण की व्यवस्था करना,
  2.  सामुदायिक विकास से सम्बन्धित सभी कार्य करना,
  3. बंजर, परती, रेतीली, पथरीली आदि भूमि का कटाव रोकने की व्यवस्था करना,
  4.  उन्नत किस्म की खाद तथा उर्वरकों को प्राप्त करके उनका उचित वितरण करना,
  5. कृषि हेतु ऋण की व्यवस्था करना,
  6. वृक्षारोपण करना तथा ग्रामीण क्षेत्र में वनों का विकास करना,
  7. सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध करना तथा उसके लिए कुओं का जीर्णोद्वार कराना,
  8. नये कुएँ तैयार कराना व तालाबों को साफ कराना,
  9.  सिंचाई में लघु साधनों की व्यवस्था करना,
  10. पशुओं, भेड़ों, मुर्गी आदि की नवीन नस्लों का प्रसार करना, पशुओं के रोगों का उपचार, टीकाकरण, बन्ध्याकरण आदि करना,
  11. दुग्ध व्यवसाय का प्रबन्ध करना,
  12.  सहकारी समितियों की स्थापना करना,
  13.  घरेलू उद्योग-धन्धों का विकास करना,
  14. अधिक उत्पादन के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना एवं व्यवस्था करना तथा
  15.  अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के लाभ के लिए सरकार द्वारा सहायता प्राप्त छात्रावासों की व्यवस्था करना आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार क्षेत्र पंचायत अपने क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का निष्पादन करती है। उसकी बजट अनुमोदन के लिए जिला पंचायत (जिला परिषद्) को भेजा जाता है। क्षेत्र पंचायत के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह जिला पंचायत द्वारा बताये गये परिवर्तनों को स्वीकार ही करे। क्षेत्र पंचायत इस मामले में पूर्ण स्वतन्त्र होती है।

क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायत के सहयोग एवं सहायता से अपने कार्यों का निष्पादन करती है। अपने कार्यों के समुचित सम्पादन के लिए क्षेत्र पंचायत कुछ समितियों की स्थापना करती है। जिसमें प्रमुख समितियाँ चार होती हैं; जैसे

  1. कार्य समिति,
  2. वित्त एवं विकास समिति,
  3.  शिक्षा समिति तथा
  4.  समता समिति।।

आय के स्रोत कम होने के कारण क्षेत्र पंचायत अपने कार्यों को भी ठीक प्रकार से पूरा नहीं कर पाती है। क्षेत्र पंचायतों को अपने दायित्वों के निर्वाह हेतु अपने आय के क्षेत्रों का दोहन करम होगा, जिससे उसे सौंपे गये कार्य पूर्ण हो सकें।

प्रश्न 3
ग्रामीण समुदाय के विकास में जिला पंचायतों के योगदान पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जिस प्रकार नगर का प्रबन्ध करने के लिए नगर-निगम, नगरपालिका परिषदें एवं नगर पंचायतें होती हैं, ठीक उसी प्रकार जिले के ग्रामीण क्षेत्र का प्रबन्ध करने के लिए जिला पंचायतें होती हैं। जिस प्रकार नगर में, एक नगरपालिका परिषद् सम्पूर्ण नगर की व्यवस्था रखती है, उसी प्रकार एक जिला पंचायत एक जिले के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्रों का प्रबन्ध करती है। प्रत्येक राज्य में जिला पंचायत का गठन निम्न स्तरीय पंचायतों पर नियन्त्रण रखने तथा उनके कार्यों में समन्वय करने के लिए किया जाता है।

प्रत्येक जिला पंचायत का एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष होता है। इनका निर्वाचन जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा अपने में से ही किया जाता है, जो गुप्त मतदान के द्वारा होता है। इन दोनों पदाधिकारियों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, परन्तु इस अवधि से पूर्व भी इन्हें अविश्वास प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है। राज्य सरकार भी इन्हें पदच्युत कर सकती है। अध्यक्ष बनने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति उसी जिले में रहता हो, उसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो तथा उसका नाम उस क्षेत्र की मतदाता सूची में हो। जिला पंचायत में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के अतिरिक्त और भी अनेक स्थायी एवं वैतनिक पदाधिकारी होते हैं। इन सभी अधिकारियों को जिला पंचायत के अध्यक्ष की देखरेख में ही कार्य करना पड़ता है। जिला पंचायत अपने कार्यों का समुचित ढंग से संचालन करने के लिए अनेक समितियों का निर्माण करती है।

प्रत्येक जिला पंचायत में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। तथा आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, जिला पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होता है जो अनुपात इन जातियों एवं जनजातियों की जनसंख्या का जिला पंचायत क्षेत्र की समस्त जनसंख्या में होता है। पिछड़े वर्गों के लिए सुनिश्चित आरक्षण, कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होता है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की स्त्रियों के लिए आरक्षित होते हैं जिनकी संख्या 5 से कम नहीं होती है।

कार्य एवं महत्त्व – ‘पंचायत विधि अधिनियम, 1994 ई० में जिला पंचायत के कार्यों की विस्तृत सूची समाहित है। जिला पंचायत के कार्यों में

  1. पंचायत समितियों के बजट का नियमों के अनुसार निरीक्षण करना,
  2. राज्य सरकार द्वारा जिलों को दिये गये तत्कालीन अनुदान को पंचायत समिति में वितरित करना,
  3.  पंचायत समिति द्वारा तैयार की गयी योजनाओं तथा पंचायत के पंचायत समिति के कार्यों में समन्वय रखना,
  4.  राज्य सरकार को पंचायतों के कार्यों की सूचना देना,
  5. जिले से पंचायतों और संचालन समितियों के सभी सरपंचों, प्रधानों व अन्य सदस्यों की गोष्ठियाँ आयोजित करना,
  6. राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से निर्दिष्ट की गयी किसी वैधानिक या कार्य निष्पादन सम्बन्धी आदेश को कार्यान्वित करना तथा
  7. जिले से सम्बन्धित कृषि व उत्पादन कार्यक्रमों को योजनाबद्ध ढंग से पूरा करना प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जिला पंचायतें ग्रामीणों के कल्याण से सम्बन्धित कार्य भी करती हैं। इन कार्यों में
  8. अस्पताल खोलना,
  9. खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकना,
  10. सड़क, पुल, तालाब एवं नाले आदि बनवाना,
  11. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना,
  12. नदी व नालों पर पुल बनवाना एवं रोशनी का प्रबन्ध करना,
  13. कृषि प्रसार के कार्य करना,
  14. पेय जल की व्यवस्था करना,
  15. पशुपालन तथा दुग्ध उद्योग सम्बन्धी कार्य करना,
  16. समाज-कल्याण के कार्यों को करना,
  17. जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा की व्यवस्था करना,
  18.  पंचायती राज संस्थाओं के कार्यों की देखभाल करना आदि सम्मिलित हैं।

जिला पंचायतों को मेलों, प्रदर्शनियों, पुलों, घाटों आदि के अतिरिक्त निजी सम्पत्ति से भी आर प्राप्त होती है। जिला पंचायत सरकार से ऋण तथा अनुदान भी प्राप्त करती है। वस्तुतः जिला पंचायतों के कार्य नियन्त्रण सम्बन्धी अथवा समन्वयमूलक प्रकृति के होने के कारण इनकी आय के सम्बन्ध में कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गयी है। इनकी आय के प्रमुख स्रोत राज्य सरकार से प्राप्त होने वाली धनराशियाँ तथा पंचायत समितियों से प्राप्त होने वाले अंशदान आदि होते हैं।

प्रश्न 4
भारतीय ग्राम पंचायत के दोषों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर:
भारतीय ग्राम पंचायत के दोष । भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात् ग्रामीण विकास तथा प्रगति के लिए ग्राम पंचायतों के महत्त्व को सर्व-सम्मति से स्वीकार किया गया तथा देशभर में ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई। इन पंचायतों को विभिन्न प्रकार के अधिकार तथा कर्त्तव्य सौंपे गए। परन्तु पिर भी ग्राम पंचायतों को आशा से काफी कम सफलता मिली है। कुछ क्षेत्रों में तो ग्राम पंचायतें पूर्णरूप से असफल रही हैं। अब प्रश्न उठता है कि सरकार द्वारा स्थापित तथा जनता के हित के लिए कार्य करने वाली इन संस्थाओं (पंचायतों) को अपने कार्य में सफलता क्यों नहीं मिली। भारतीय ग्राम पंचायतों की असफलता के मुख्य दोष (कारण) निम्नलिखित हैं

1. सामान्य निर्धनता – भारतीय ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आम व्यक्ति को अपने जीविकोपार्जन की ही चिन्ता लगी रहती है। ऐसी स्थिति में योग्य व्यक्ति पंचायत के कार्यों को करने से कतराते हैं। पंचायत के कार्य करने से कोई आर्थिक लाभ तो होता नहीं। अतः वे इसे केवल समय की बरबादी मानते हैं। योग्य व्यक्तियों के अभाव में अयोग्य व्यक्ति
की पंचायत का कार्य संभालते हैं। अयोग्य पदाधिकारियों के कारण पंचायत की सफलता सदैव ही सन्दिग्ध रहती है।

2. परस्पर पार्टीबाजी और गुटबन्दी – पंचायतों के निर्वाचन के समय गाँव में परस्पर गुटबन्दी और पार्टीबाजी से काम लिया जाता है। गाँव, जो कि इन दोषों से बचे हुए थे, पंचायतों के कारण गुटबन्दी और पार्टीबाजी के शिकार हो गए हैं। हारा हुआ समूह जीते हुए संमूह को कोई काम नहीं करने देता; यहाँ तक कि रचनात्मक कार्यों में भी उसका सहयोग नहीं मिल पाता है।

3. बिरादरीवाद – अनेक पंचायतें भाई-भतीजावाद तथा पक्षपात का अड्डा बन गई है। पंचायती चुनाव ने जातिवाद को और अधिक विकसित कर दिया है। जातिवाद व बिरादरीवाद के कारण
पंचायतें अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाती हैं।

4. अशिक्षा – पंचायत के अधिकांश सदस्य एवं पंच ज्यादा शिक्षित नहीं होते; अतः वे अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से नहीं निभा पाते। पंचायतों पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रामीण जनता पंचायतों के प्रति अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के विषय में जागरूक नहीं है। तथा इसे अपनी संस्था न मानकर एक सरकारी संगठन मात्र मानती है।

5. घमण्ड – प्रायः गाँवों की पंचायतों के सरपंच घमण्डी होते हैं। वे अपने को एक शासक के रूप में समझते हैं और अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हैं। वे गाँव वालों को विकास कार्यों
में सम्मिलित ही नहीं करते और गुटबन्दी को बढ़ावा भी देते हैं।

6. राजनीतिक हस्तक्षेप – ग्रामीण समाज में ग्राम पंचायत का काफी महत्त्व होता है, अतः विभिन्न राजनीतिक दल ग्राम पंचायत को अपने स्वार्थ पूर्ति का साधन बनाना चाहते हैं। इस स्थिति में पंचायत के विभिन्न पदाधिकारियों को गुमराह किया जाता है तथा अपने निहित स्वार्थों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। ऐसी स्थिति में पंचायत अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति से चूक जाती है तथा असफल हो जाती है।

7. पेशेवर नेता – योग्य एवं इज्जतदार व्यक्ति की उदासीनता के कारण कुछ अवसरवादी लोग लाभ उठाते हैं। प्रत्येक गाँव में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साधारण भाषा में पेशेवर नेता कहा जा सकता है। ये पेशेवर नेता ही ग्राम पंचायत के सभी पद प्राप्त कर लेते हैं तथा अपनी नेतागीरी को अधिक महत्त्व देते हैं। इन्हें समाज कल्याण एवं सुधार से कोई सरोकार नहीं होता ” है। ऐसी स्थिति में पंचायत का असफल होना स्वाभाविक ही है।

8. चुनावों में प्रभावशाली लोगों का दबाव – आज भी गाँव में सामन्तशाही और जमींदारी प्रथा के अंश पाए जाते हैं। ऐसे प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण ग्रामीण सच्चे प्रतिनिधि नहीं
चुन पाते तथा इनका नेतृत्व पेशेवर लोगों के हाथ में चला जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
भारत में ग्राम पंचायतों के सफलतापूर्वक कार्य-संचालन में क्या बाधाएँ हैं ?
या
पंचायतों की असफलता के कारण बताइए। [2008, 12]
उत्तर:
भारत में अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जो ग्राम पंचायतों के सफलतापूर्वक कार्य-संचालन में बाधक रही हैं। उनमें से प्रमुख निम्नवत् हैं

  1. अशिक्षा – अधिकांश ग्रामीण अशिक्षित हैं; अतः वे ग्राम पंचायतों के महत्त्व को नहीं समझ पाते और पंचायत द्वारा किये जाने वाले विकास कार्यों में आवश्यक सहयोग नहीं दे पाते।
  2. अधिकारियों में परस्पर तनाव – पंचायतों से सम्बद्ध सरकारी एवं गैर-सरकारी सदस्यों में तनावपूर्ण सम्बन्धों के कारण पंचायतें ठीक से कार्य नहीं कर पातीं।
  3.  वित्त का अभाव – धन के अभाव के कारण पंचायतें विकास-कार्य करने में असफल रही
  4. जातिवाद – जातिवाद के कारण पंचायतें जातियों का अखाड़ा बन गयीं और निर्माण कार्य ठीक से नहीं कर पायीं।
  5. दलबन्दी ग्रामों में पायी जाने वाली दलबन्दी के कारण लोगों ने अपने – अपने दलीय हितों की पूर्ति पर ही अधिक जोर दिया है, परिणामस्वरूप ग्रामीण विकास का लक्ष्य पूरा नहीं हो
    सका है।
  6. योग्य कर्मचारियों का अभाव – पंचायतों से सम्बन्धित योग्य और ध्येयनिष्ठ कर्मचारियों का अभाव भी पंचायती राज संस्थाओं के कार्य-संचालन में बाधक रहा है।
  7.  ग्राम सभा का कमजोर होना – पंचायती राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्राम सभा को शक्तिशाली बनाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसकी वर्ष में एक या दो बैठकों की व्यवस्था मात्र से विभिन्न विकास कार्यक्रमों के प्रति जनता में रुचि और जनसहयोग के लिए तत्परता उत्पन्न नहीं की जा सकती। परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण पुनर्निर्माण सम्बन्धी योजनाओं में आशा के
    अनुरूप जनसहयोग प्राप्त नहीं हो सका।।
  8.  कार्यकर्ताओं में समन्वय का अभाव – विकास-खण्ड स्तर पर विभिन्न कार्यकर्ताओं में जिस प्रकार समन्वय की व्यवस्था की गयी है, उस प्रकार की व्यवस्था जिला स्तर के कार्यकर्ताओं में नहीं की गयी है। परिणाम यह हुआ है कि ग्रामों में परिवर्तन लाने और विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम सफल नहीं हो सके।
  9. योग्य नेतृत्व का अभाव – गाँवों में योग्य नेतृत्व का अभाव है।

पेशेवर नेता सार्वजनिक हित के बजाय अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगे रहते हैं तथा वे पंचायत के धन का दुरुपयोग करते वास्तव में, ग्राम पंचायतों को अनेक लक्ष्यों से दूर ले जाने में अनेक कारण उत्तरदायी रहे हैं। गाँवों के चहुंमुखी विकास के लिए इस संस्था का सक्रिय होना आवश्यक है। गाँवों को सुखी और सम्पन्न जीवन दिलाने के लिए ग्राम पंचायतों में आ गये दोषों का निराकरण आवश्यक है, अन्यथा न तो गाँधी जी का रामराज्य का सपना पूरा होगा और न यहाँ स्वराज सफल हो सकेगा।

प्रश्न 2
ग्राम पंचायतों के कार्यों में सुधार हेतु अपने सुझाव दीजिए।
उत्तर:
समय-समय पर पंचायतों को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार अनेक कदम उठाती रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस द्वारा 1954 ई० में पंचायतों को प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिये गये थे, जिनकी प्रासंगिकता आज भी है

  1.  अधिक-से-अधिक व्यक्तियों से सहयोग प्राप्त करने के लिए पंचायती राज के प्रति जागरूकता में वृद्धि की जाए।
  2. सर्वमान्य ग्रामीण नेतृत्व का विकास किया जाए।
  3. निर्विरोध नेताओं के चुनाव को प्रोत्साहन दिया जाए।
  4. चुनाव पद्धति गुप्त बनायी जाए।
  5. पंचायतों के कार्यों की देख-रेख के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाने चाहिए।
  6. ग्राम स्तर पर सभी कार्यों को ग्राम पंचायतों को सौंपा जाए।
  7. पंचायतों को राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त सहायता मिलनी चाहिए।
  8. ग्रामवासियों में आर्थिक असमानताएँ कम की जाएँ।
  9.  राजनीतिक दलों को पंचायत के कार्यों से अलग रखा जाए।
  10. न्याय पंचायत के कार्य ग्राम पंचायत से अलग नहीं होने चाहिए।

उपर्युक्त सुझावों के अतिरिक्त पंचायतों को कुछ अन्य सुझावों द्वारा भी अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। जिनका विवरण निम्नवत् है

  1. पंचायतों को अधिक लोकतान्त्रिक एवं लोकप्रिय बनाया जाए।
  2.  पंचायतों की आय के साधन बढ़ाये जाएँ। सरकार द्वारा अनुदान की राशि बढ़ायी जाए।
  3. जनता में पंचायत के कार्यों के प्रति जागरूकता विकसित की जाए।
  4. पंचायत अधिकारियों को उपयुक्त प्रशिक्षण दिया जाए।
  5. सहकारी समितियों और पंचायतों में सहयोग बढ़ाया जाए।
  6. चुनाव लड़ने वालों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित की जाए।
  7. पंचायतों के चुनाव निश्चित अवधि में कराये जाएँ।
  8.  पंचायतों की देख-रेख के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाएँ।
  9. पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की जाए तथा उनका कार्य-क्षेत्र विस्तृत किया जाए।
  10. कुशल लोगों को पंचायतों का नेतृत्व अपने हाथों में लेने के लिए तथा निर्विरोध चुनाव के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  11.  सहकारी समितियों, क्षेत्र समितियों तथा विकास खण्डों के कार्य-कलापों में समन्वय उत्पन्न किया जाए।
  12. समयसमय पर सरकारी अधिकारियों द्वारा गाँवों में जाकर ग्राम पंचायत के प्रधानों के साथ गोष्ठी की जाए तथा उन्हें सुझाव दिये जाएँ।
  13. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार करके सुशिक्षित व्यक्तियों की ग्राम पंचायतों में भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  14.  ग्रामीण जनसामान्य की अभिरुचि तथा आस्था ग्राम पंचायतों तथा उनकी कार्यप्रणाली के प्रति जगायी जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती व्यवस्था के चार उद्देश्य बताइए। [2008, 09, 10, 12, 13, 15, 16]
उत्तर:
पंचायती व्यवस्था के चार उद्देश्य निम्नवत् हैं

  1. स्थानीय निवासियों को स्वशासन का अवसर प्रदान करना – किसी गाँव या कस्बे तथा नगरों की समस्याओं का सबसे अच्छा ज्ञान उसी गाँव या कस्बे के निवासियों को होता है। इसलिए पंचायती व्यवस्था की गयी जिससे प्रत्येक गाँव या कस्बे तथा नगर की अपनी एक छोटी-सी सरकार हो जिसका संचालन स्थानीय जनता स्वयं करे।
  2. लोकतन्त्र प्रणाली का प्रशिक्षण – स्थानीय स्वशासन लोगों को प्रशासन में प्रभावी भागीदारी करने तथा लोकतान्त्रिक जीवन-पद्धति अपनाने का आधारभूत प्रशिक्षण देता है।
  3.  प्रशासन को उत्तरदायी बनाना – स्थानीय निवासियों की भागीदारी से प्रशासन उस क्षेत्र की आवश्यकताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी हो जाता है।
  4. स्थानीय स्तर पर तीव्र विकास – पंचायत व्यवस्था में प्रत्येक जिला कई प्रखण्डों में और प्रत्येक प्रखण्ड कई गाँवों में विभाजित किया गया है। इस प्रकार तीनों स्तरों पर विकास-कार्य साथ-साथ चलते हैं और उनके स्थानीय निवासियों की भागीदारी होने के कारण विकास-कार्य तेजी से होता है।

प्रश्न 2
पंचायतों को प्रभावशाली (सफल) बनाने के किन्हीं दो सुझावों को लिखिए। या पंचायतों के प्रभावी नियन्त्रण हेतु कोई दो सुझाव दीजिए। (2014)
उत्तर:
पंचायतों को सफल बनाने हेतु दो सुझाव निम्नलिखित हैं

  1.  पंचायती राज संस्थाओं को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इनसे सम्बद्ध सरकारी अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों के बीच सन्देह और अविश्वास को दूर किया जाए और सम्बन्धों में सुधार लाया जाए। दोनों को ही एक-दूसरे के कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से रोका जाना अच्छे सम्बन्ध बनाने की दृष्टि से आवश्यक है।
  2.  ऐसे व्यक्तियों का चयन किया जाए जो पंचायती राज-व्यवस्था के मूल लक्ष्यों को समझते हों और उसके प्रति पूरी तरह समर्पित हों। ऐसी दशा में उनमें कार्य के प्रति उदासीनता नहीं
    पायी जाएगी। अत: आवश्यकता कुशल और कार्य के प्रति निष्ठावान व्यक्तियों के चयन की है।

प्रश्न 3
पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए किन योग्यताओं की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक होंगी

  1. नागरिक ने 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो।
  2. वह व्यक्ति प्रवृत्त विधि के अधीन राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचित होने की योग्यता (आयु के अतिरिक्त योग्यताएँ) रखता हो।
  3. यदि वह सम्बन्धित राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित विधि के अधीन पंचायत को सदस्य निर्वाचित होने के योग्य हो।

प्रश्न 4
पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकाल के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। इसके पूर्व भी उनका विघटन किया जा सकता है। यदि उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसा उपबन्ध हो। किसी पंचायत के गठन के लिए चुनाव

  1.  पाँच वर्ष की अवधि के पूर्व और
  2. विघटन की तिथि से 6 माह की अवधि समाप्त होने के पूर्व करा लिया जाएगा।

प्रश्न 5
उत्तर प्रदेश की त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में ‘पंचायत विधि अधिनियम, 1994′ पारित करके पंचायत राज-व्यवस्था का नया रूप दिया गया है। इसके अनुसार त्रि-स्तरीय व्यवस्था की गयी है-जिला स्तर पर जिला पंचायत, खण्ड स्तर पर क्षेत्र पंचायत तथा ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत। इन तीनों स्तरों पर पंचायत राज संस्थाओं के कार्यों को पूर्ण करने के लिए अनेक स्थायी समितियों का गठन किया गया है तथा ग्राम पंचायत के कार्यों को नये सिरे से निर्धारित किया गया है। इस नयी व्यवस्था की सर्वप्रमुख विशेषता पंचायत राज की सभी संस्थाओं में कमजोर वर्गों के लिए स्थान आरक्षित करना तथा उनमें महिलाओं की सहभागिता को बढ़ाना है।

प्रश्न 6
तीन-स्तरीय वाली पंचायती राज की योजना किसके द्वारा और किस उद्देश्य से प्रस्तुत की गयी थी ?
उत्तर:
सन् 1952 में ग्रामों के सर्वांगीण विकास हेतु सामुदायिक विकास कार्यक्रम और 1953 ई० में राष्ट्रीय विस्तार सेवा योजना प्रारम्भ की गयी। इस कार्यक्रम को जनता का कार्यक्रम बनाने और आवश्यक जन-सहयोग प्राप्त करने हेतु बेलवन्तराय मेहता कमेटी ने सन् 1957 में प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में पंचायती राज की योजना प्रस्तुत की, जिसे साधारणतया लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण कहा जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत तीन-स्तरीय व्यवस्था (Three-tier System) की स्थापना का सुझाव दिया गया। इसके अन्तर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 7
73वें संवैधानिक संशोधन के विषय में बताइए।
उत्तर:
73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग ( भाग 9) तथा एक नयी अनुसूची (ग्यारहवीं) जोड़ी गयी है और पंचायत राज-व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण किया गया है।

प्रश्न 8
त्रिस्तरीय पंचायती राज ढाँचे से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भारत में पंचायती राज की दृष्टि से त्रिस्तरीय ढाँचे की व्यवस्था की गई है। ये तीन स्तर है – ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर), खण्ड समिति या क्षेत्र समिति या पंचायत समिति (विकासखण्ड स्तर पर) तथा जिला परिषद् (जिला स्तर पर)।

प्रश्न 9
ग्राम पंचायत के गठन के बारे में बताइए।
उत्तर:
प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रधान तथा 9 से लेकर 15 तक सदस्य होंगे। सदस्यों की संख्या के सम्बन्ध में निम्नवत् व्यवस्था है| ग्राम की जनसंख्या एक हजार होने पर ग्राम पंचायत में 9 सदस्य; एक हजार से अधिक, किन्तु दो हजार से कम होने पर 11 सदस्य; किन्तु तीन हजार से कम होने पर 13 सदस्य; तीन हजार से अधिक हों तो 15 सदस्य होते हैं।

प्रश्न 10
ग्राम सभा के द्वारा सम्पादित किये जाने वाले चार कार्य बताइए।
उत्तर:
ग्राम सभा निम्नलिखित चार कार्यों का सम्पादन करती है

  1.  सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए स्वैच्छिक श्रम और अंशदान जुटाना।
  2.  ग्राम से सम्बन्धित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हिताधिकारी की पहचान।
  3.  ग्राम से सम्बन्धित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता पहुँचाना।
  4. ग्राम में समाज के सभी वर्गों के बीच एकता और समन्वये में अभिवृद्धि।

प्रश्न 11
ग्राम पंचायतों के चार अधिकार बताइए।
उत्तर:
ग्राम पंचायतें अपने कार्यों को विधिवत् कर सकें, इसके लिए इन्हें कुछ अधिकार दिये गये हैं। जिनमें से चार निम्नलिखित हैं ।

  1.  अपने क्षेत्र के तालाब, कुएँ तथा जमीन पर पंचायत का अधिकार होता है और पंचायत के द्वारा इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जाते हैं। ग्राम पंचायत के द्वारा सार्वजनिक स्थानों के उपयोग के सम्बन्ध में नियमों का निर्माण किया जा सकता है।
  2. पंचायत द्वारा निजी कुओं और स्थानों के मालिकों को उनकी सफाई, मरम्मत आदि के आदेश दिये जा सकते हैं।
  3.  प्राथमिक पाठशालाओं पर इसका नियन्त्रण होता है।
  4. अपने क्षेत्र के किसी भी पदाधिकारी के कार्य की जाँच करने तथा उसके सम्बन्ध में शासन को रिपोर्ट देने का पंचायत को अधिकार होता है।

प्रश्न 12
ग्राम पंचायतों का अर्थ व इनके कार्य बताइए।
उत्तर:
ग्राम सभा की कार्यकारिणी को ग्राम पंचायत कहते हैं। इसको चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों में से होता है। ग्राम सभा के प्रधान और उपप्रधान (ग्राम पंचायत के सदस्यों द्वारा चुना गया) ही ग्राम पंचायत के प्रधान तथा उपप्रधान होते हैं। प्रधान पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है। ग्राम पंचायत के कार्यों में कृषि व ग्राम विकास, प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूल की व्यवस्था, नलकूपों एवं हैण्डपम्पों का संचालन, अखाड़ा, व्यायामशाला, स्वास्थ्य उपकेन्द्रों, पशु सेवा केन्द्र आदि की। व्यवस्था करना तथा पेंशन के लिए लाभार्थियों का चयन तथा छात्रवृत्तियों को स्वीकृत करने एवं उन्हें बाँटना प्रमुख हैं।

प्रश्न 13
ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए क्या आरक्षण-व्यवस्था है ?
उत्तर:
ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित होंगे। ग्राम पंचायत के कुल पदों में से एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए जो आरक्षित पद हैं, उनमें भी कम-से-कम एक-तिहाई पद इन जातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। आरक्षण की उपर्युक्त समस्त व्यवस्था ग्राम पंचायत के प्रधान पद पर भी लागू की गयी है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए ग्राम पंचायतों के प्रधान के पद उतनी संख्या में आरक्षित होंगे, जो अनुपात समस्त राज्य की जनसंख्या में इन वर्गों का है।

प्रश्न 14
न्याय पंचायत का गठन किस प्रकार से किया जाता है ? [2008, 09, 11]
उत्तर:
ग्रामीणों को सस्ता और शीघ्र न्याय देने के लिए न्याय पंचायतों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। साधारणतया एक न्याय पंचायत की स्थापना 10 से 12 तक ग्राम पंचायतों के ऊपर की जाती है। एक न्याय पंचायत के कम-से-कम 10 तथा अधिक-से-अधिक 25 पंच होते हैं। इन पंचों को राज्य द्वारा निर्धारित अधिकारी, साधारणतया जिलाधीश द्वारा उस प्रखण्ड की ग्राम पंचायतों के सदस्यों में से मनोनीत किया जाता है। इस प्रकार जितने भी पंच मनोनीत होते हैं, वे अपने में से ही एक को सरपंच तथा एक को सहायक सरपंच के रूप में निर्वाचित कर लेते हैं।

प्रश्न 15
ग्राम की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर:
ग्राम की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. साफ एवं स्वच्छ वातावरण।
  2. सादा एवं सरल जीवन।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत किन स्तरों पर पंचायती राज-व्यवस्था स्थापित की गयी ?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत तीन-स्तरीय व्यवस्था की गयी। इसके अन्तर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 2
पंचायती राज योजना को प्रारम्भ करने वाले प्रथम दो प्रदेश कौन-से थे ?
उत्तर:
पंचायती राज योजना को प्रारम्भ करने वाले प्रथम दो प्रदेश थे-राजस्थान तथा आन्ध्र प्रदेश।

प्रश्न 3
पंचायती राज-व्यवस्था की तीन सीढियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:
पंचायती राज-व्यवस्था की तीन सीढ़ियाँ हैं-ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद् या जिला पंचायत।

प्रश्न 4
पंचायती राज योजना का उद्घाटन कब, कहाँ और किसके द्वारा किया गया था ?
उत्तर:
पंचायती राज योजना का उद्घाटन 2 अक्टूबर, 1959 को प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान राज्य के नागौर जिले में किया गया था।

प्रश्न 5
संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत स्थान सुरक्षित किये गये हैं ? [2011]
उत्तर:
संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान सुरक्षित किये गये हैं।

प्रश्न 6
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज-व्यवस्था किस आधार पर की गयी है ?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था उत्तर प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम, 1994 के आधार पर की गयी है।

प्रश्न 7
भारत में पंचायतों की प्राचीनता के प्रमाण किन ग्रन्थों में मिलते हैं ?
उत्तर:
भारत में पंचायतों की प्राचीनता के प्रमाण ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा जातक ग्रन्थों में मिलते है।

प्रश्न 8
स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में गाँव पंचायतों के लिए सर्वप्रथम कानून बनाने वाला राज्य कौन-सा था ?
है।
स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में गाँव पंचायतों के लिए सर्वप्रथम कानून बनाने वाला राज्य उत्तरप्रदेश था।

प्रश्न 9
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान में 73वाँ संशोधन किस सन में पारित हुआ ?
उत्तर:
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान में 73वाँ संशोधन सन् 1993 ई० में पारित हुआ।

प्रश्न 10
गाँव सभा की कार्यकारिणी को क्या कहते हैं ? [2011]
उत्तर:
गाँव सभा की कार्यकारिणी को गाँव पंचायत कहते हैं।

प्रश्न 11
गाँव सभा की एक वर्ष में कितनी बैठकें होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
गाँव सभा की एक वर्ष में दो बैठकें होना अनिवार्य है।

प्रश्न 12
ग्राम पंचायत का अध्यक्ष कौन होता है ? [2007, 15]
उत्तर:
ग्राम पंचायत का अध्यक्ष प्रधान होता है।

प्रश्न 13:
ग्राम पंचायत की एक वर्ष में कितनी बैठकें होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
ग्राम पंचायत की साधारणतया प्रत्येक माह में कम-से-कम एक बैठक होगी, लेकिन विशेष परिस्थितियों में किन्हीं भी दो बैठकों के बीच दो माह से अधिक का अन्तर नहीं होगा।

प्रश्न 14
पंचायती राज-व्यवस्था में न्याय देने का कार्य कौन-सी संस्था करती है ?
उत्तर:
पंचायती राज व्यवस्था में न्याय देने का कार्य पंचायती अदालत (न्याय पंचायत) करती है।

प्रश्न 15
भारत एक नगर प्रधान देश है। सही-गलत [2016]
उत्तर:
गलत।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान (तिहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1993 कब से प्रभावी हुआ ?
(क) 14 जनवरी, 1993
(ख) 24 जनवरी, 1993
(ग) 14 अप्रैल, 1993
(घ) 24 अप्रैल, 1993

प्रश्न 2
उत्तर प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम’ किस सन में पारित हुआ ? [2007]
(क) 2000 ई० में
(ख) 1998 ई० में
(ग) 1995 ई० में
(घ) 1994 ई० में

प्रश्न 3
एक गाँव के सभी वयस्क व्यक्ति निम्नलिखित में से किसके सदस्य होते हैं ?
(क) गाँव सभा के
(ख) गाँव पंचायत के
(ग) पंचायत के
(घ) न्याय पंचायत के

प्रश्न 4
न्याय पंचायत, फौजदारी मुकदमों में अधिकतम दण्ड कितना दे सकती है ?
(क) दो सौ पचास रुपये
(ख) पाँच सौ रुपये
(ग) सौ रुपये
(घ) पचास रुपये

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से कौन-सा कारक पंचायत राज की असफलता से सम्बन्धित है ? [2009]
(क) प्रभावशाली नेतृत्व का अभाव
(ख) अशिक्षा
(ग) जातिवाद एवं गुटबन्दी
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (घ) 24 अप्रैल, 1993,
2. (घ) 1994 ई० में,
3. (क) गाँव सभा के,
4. (क) दो सौ पचास रुपये,
5. (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 3 Akbar: The Great

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 3
Chapter Name Akbar: The Great (अकबर महान)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 3 Akbar: The Great (अकबर महान)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 15 अक्टूबर, 1542 ई०
2. 5 नवम्बर, 1556 ई०
3. 14 फरवरी, 1556 ई०
4. 25 अक्टूबर, 1605 ई०
उतर.
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-54 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्यया असत्य बताइए
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 54 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-55 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 55 व 56 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ क्या थीं?
उतर.
अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ निम्नलिखित थीं|

  1. साम्राज्य के प्रतिद्वन्द्वी
  2. मुगलों का विदेशीपन
  3. सम्बन्धियों का विश्वासघात

प्रश्न 2.
पानीपत के द्वितीय युद्ध के परिणामों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उतर.
पानीपत का द्वितीय युद्ध सन् 1556 ई० में अकबर और हेमू के बीच हुआ। इस युद्ध में अकबर की विजय के साथ भारत में मुगलों की स्थिति सुदृढ़ हो गई तथा हिन्दुस्तान की सत्ता पर अफगानों का अधिकार सदैव के लिए समाप्त हो गया। विजयी सेनाओं ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया गया।

प्रश्न 3.
अकबर के मृत शरीर को कहाँ दफनाया गया था?
उतर.
अकबर के मृत शरीर को आगरा से 5 मील दूर उसी के द्वारा बनवाए गए सिकन्दराके मकबरे में दफनाया गया।

प्रश्न 4.
हल्दी घाटी का युद्ध किस-किस के बीच हुआ और इस युद्ध में कौन विजयी हुआ?
उतर.
हल्दी घाटी का युद्ध मेवाड़ के शासक और राणा उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रतापसिंह तथा अकबर की सेना के मध्य सन् 1576 ई० में हुआ। इस युद्ध में मुगलों की विजय हुई।

प्रश्न 5.
अकबर की सुलह-कुल नीति क्या थी? इसका क्या परिणाम हुआ?
उतर.
अकबर की सुलह-कुल नीति एक धार्मिक उदार नीति थी। जिसके द्वारा अकबर ने भारत में धर्मों एवं सम्प्रदायों में एकता, समन्वय एवं धार्मिक सहिष्णुता को स्थापित किया। इस नीति से मुगल साम्राज्य स्थायित्व एवं दृढ़ता प्राप्त कर सका।

प्रश्न 6.
अकबर की दक्षिण नीति के बारे में आप क्या समझते हैं?
उतर.
अकबर ने अपने साम्राज्य के विस्तार एवं भारत को राजनीतिक इकाई में परिवर्तित करने के उद्देश्य से दक्षिण भारत के राज्यों से युद्ध करने से पूर्व राजदुतों द्वारा आज्ञा-पत्र भेजकर अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा। खान देश के शासक अली खाँ ने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, किन्तु अन्य राज्यों के शासकों ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 7.
अब्दुल फजल द्वारा लिखित दो फारसी ऐतिहासिक ग्रन्थों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
अब्दुल फजल द्वारा लिखित दो फारसी ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘अकबरनामा’ एवं ‘आइन-ए-अकबरी’ हैं। इन ग्रंथों में अकबर के राज्यकाल की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन मिलता है। दोनों ग्रंथ अकबर की प्रशंसा से भरे हैं।

प्रश्न 8.
टोडरमल कौन था और वह क्यों प्रसिद्ध था?
उतर.
टोडरमल अकबर का दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष था। कुछ समय तक वह अकबर का वजीर भी रहा। टोडरमल भूमि सुधार एवं राजस्व प्रबंध में किए गए महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न 9.
अकबर के दीन-ए-इलाही’ की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उतर.
अकबर के दीन-ए-इलाही की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. दीन-ए-इलाही के अनुसार ईश्वर एक है और अकबर उसका सबसे बड़ा पुजारी एवं पैगम्बर है।
  2. दीन-ए-इलाही के अनुयायियों को अच्छे कार्य करने और सूर्य व अग्नि के प्रति श्रद्धा रखने के आदेश दिए गए थे।
  3. दीन-ए-इलाही के सदस्य को मांस खाना वर्जित था।
  4. दीन-ए-इलाही में सब धर्मों के अच्छे सिद्धान्त थे और यह दार्शनिकता, प्रकृति-पूजा और योग का सम्मिश्रण था। इसका आधार विचार पूर्ण था और इसमें कोई कट्टरपन देवी-देवता अथवा धर्मगुरु नहीं थे।

प्रश्न 10.
अकबर द्वारा निर्मित दो भवनों के बारे में लिखिए।
उतर.
अकबर द्वारा निर्मित दो भवन निम्नवत हैं
आगरा का किला – अकबर ने लाल पत्थरों से आगरा का भव्य किला बनवाया। इस किले में उसने 50 इमारतें बनवाईं जिसमें जहाँगीरी महल सबसे सुन्दर है। बुलन्ददरवाजा-अकबर ने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में अनेक भवन बनवाए जिनमें बुलन्द दरवाजा विश्वविख्यात है।

प्रश्न 11.
पानीपत के द्वितीय युद्ध के महत्व का वर्णन कीजिए।
उतर.
पानी के द्वितीय युद्ध के परिणामस्वरूप भारत में मुगलों की स्थिति सुदृढ़ हो गई और मुगल वंश 1887 ई० तक भारत में जमा रहा। भारत की सत्ता पर सूर वंश का अधिकार सदा के लिए समाप्त हो गया। विजयी सेना ने दिल्ली और आगरा पर शीघ्र अधिकार कर लिया।

प्रश्न 12.
अकबर की धार्मिक नीति स्पष्ट कीजिए।
उतर.
अकबर ने धर्म-सहिष्णुता की नीति अपनाई। अकबर की महानता उसकी धार्मिक नीति पर आधारित है। उसने तुर्क-अफगान शासकों की धार्मिक विभेद की नीति के स्थान पर उदार नीति अपनाई तथा सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों में एकता और समन्वय स्थापित किया और धार्मिक विद्वेष, वैमनस्य एवं कटुता को समाप्त कर एक संगठित राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया।

प्रश्न 13.
“अकबर एक राष्ट्रीय शासक था।” विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर ने जिन उदार और नवीन सिद्धान्तों को जन्म दिया उनका इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान हैं उसने सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार किया। धर्म, जाति और वंश के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया। अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का प्रयास किया। दूसरी ओर शासन-प्रणाली, न्याय व्यवस्था, मालगुजारी बन्दोबस्त, एक राज्य भाषा, एक मुद्रा व्यवस्था की स्थापना की। इस प्रकार अकबर की नीति, भावना एवं प्रयास उसे राष्ट्रीय शासक के निकट पहुँचाते हैं।

विस्तृत उत्तरीय

प्रश्न 1.
“मुगल साम्राज्य की स्थापना बाबर ने की, परन्तु उसका विकास एवं सुदृढ़ीकरण अकबर ने किया।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उतर.
मुगल साम्राज्य की स्थापना काबुल के शासक एवं अकबर के दादा बाबर ने की। पानीपत तथा खानवा के युद्धों में उसने भारत की दोनों प्रमुख शक्तियों को पराजित करके उनका विनाश करने का प्रयास किया था। किन्तु बाबर द्वारा भारत की विजय केवल एक सैनिक विजय थी; अत: वह स्थायी नहीं हो सकी, इस दृष्टिकोण से बाबर मुगल वंश की स्थापना करने में सर्वथा असफल रहा। वह केवल एक वीर विजेता था, परन्तु शासक के गुणों का उसमें सर्वथा अभाव था। उसने साम्राज्य की विशृंखलता एवं अव्यवस्था को ठीक करने का कोई प्रयास नहीं किया तथा अपने पुत्र हुमायूं के मार्ग में उसने भयंकर काँटे बो दिए, जिनके कारण हुमायूँ को जीवन भर संघर्ष करना पड़ा। हुमायूँ ने 15 वर्ष के निर्वासन के पश्चात जब भारत पर पुनः अधिकार किया तो कुछ समय बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार अकबर को अव्यवस्थित और नाममात्र का राज्य उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ था, जिसे अपने चारित्रिक गुणों से उसने विशाल एवं सुदृढ़ बनाया। उसने सम्पूर्ण भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की। जीवन भर कठोर परिश्रम करके अपने उत्तराधिकारियों के लिए उसने जो राज्य छोड़ा, वह इतना दृढ़ तथा शक्तिशाली था कि भयंकर आघात सहन करके भी लगभग 200 वर्षों तक चलता रहा। मुगल शासकों में ही नहीं सम्पूर्ण मध्ययुग के भारतीय शासकों में अकबर को श्रेष्ठ स्थान किया गया है।

मुगल साम्राज्य को भारत में स्थायित्व के साथ संस्थापित करने का श्रेय निश्चय की अकबर को है। उसने राजस्व और शासन में जिन नवीन तत्त्वों एवं उदार सिद्धान्तों का भारतीय परिवेश के साथ समन्वय किया, वह निश्चय ही अतुलनीय है। उससे पूर्व कोई मुसलमान शासक इतने वृहत् स्तर पर ऐसा नहीं कर सका। उसकी सुलह-कुल की नीति ने उसे एक राष्ट्रीय शासक के निकट ला खड़ा किया। अकबर से पहले शेरशाह ने प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया था परन्तु शेरशाह को थोड़ा समय मिला। शेरशाह के विपरित अकबर को अपनी नीति और प्रभाव को देखने के लिए एक लम्बा समय प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त, वह निश्चय ही शेरशाह की तुलना में अधिक उदार दृढ़, नीतिज्ञ और विशाल दृष्टिकोण वाला सिद्ध हुआ। उसकी उदार एवं व्यावहारिक नीति के कारण उसके वंशों को भिन्न धर्मावलम्बियों पर शासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ।

इसी में अकबर की महानता थी। अकबर की मौलिक योग्यता और सफलताओं की तुलना तत्कालीन यूरोपीय शासकों से करने पर उसकी श्रेष्ठता स्थापित होती है। अकबर के चरित्र और उसके कार्यों के बारे में मतभेद हो सकते हैं। कुछ उसे राष्ट्रीय शासक, श्रेष्ठ व्यवस्थापक एवं प्रबन्धक मानते हैं तो कुछ उसे ऐसा नहीं मानते हैं। वे अकबर की चन्द गलतियों एवं कतिपय बुराइयों की ओर ध्यान खीचते है। तथा इस ओर ध्यान देने में असफल रहते हैं कि अकबर ने ही मध्ययुग में सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार अपनाने की प्राचीन भारतीय शासकों के आदर्श का अनुसरण किया। धर्म, जाति एवं वंश के आधार पर इससे अधिक उन्मीद करना बेईमानी होगी। अकबर की शासन-व्यवस्था ऐसी थी जिसमें उसके सभी नागरिक अपने को एक राज्य का नागरिक मान सकते थे और राज्य से समान सुविधाओं और सुरक्षा की आशा कर सकते थे।

प्रश्न 2.
अकबर की राजपूत नीति की विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर की राजपूत नीति – अकबर एक दूरदर्शी सम्राट था। उसने शीघ्र समझ लिया कि राजपूतों की सहायता के बिना हिन्दुस्तान में मुस्लिम साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता तथा उनके सक्रिय सहयोग के बिना कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक एकता सम्भव नहीं हो सकती। अत: उसने प्रेम, सहानुभूति तथा उदारता से राजपूतों के हृदय को जीतकर उनसे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। इस नीति के परिणामस्वरूप अकबर मुगल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ कर सका। अकबर की उदार राजपूत नीति अपनाने के कारण- अकबर द्वारा राजपूतों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखने के निम्नलिखित कारण थे

(i) व्यक्तिगत कारण – राजनीतिक एवं साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के अतिरिक्त अकबर की राजपूत नीति के व्यक्तिगत कारण भी थे। अकबर ने अनुभव किया था कि उसके बड़े-से-बड़े पदाधिकारी अत्यन्त स्वार्थी हैं तथा वे समय पड़ने पर सदा विद्रोह करने को तत्पर रहते हैं। राज्यारोहण के बाद ही उसने देखा कि उसके सम्बन्धी तथा संरक्षक विश्वसनीय नहीं हैं। उसका भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम, उसका संरक्षक बैरम खाँ, उसकी धाय माँ माहम अनगा तथा उसका (माहम अनगा का) पुत्र आधम खाँ सभी शक्ति हस्तगत करने को इच्छुक थे और उन्हें अकबर की कोई चिन्ता न थी। इसी प्रकार भारतीय मुसलमानों पर भी अकबर विश्वास नहीं कर सकता था।

अतः एक कुशल एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते अकबर इस निर्णय पर पहुँचा कि राजपूत ही सबसे अधिक विश्वस्त एवं वीर जाति है, जो एक बार वचनबद्ध होकर कभी धोखा नहीं देती है और उस पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वीरता में भी राजपूत जाति अद्वितीय थी, जिसका उपयोग अकबर अपने हित के लिए कर सकता था। अत: अन्त में उसने राजपूतों एवं मुगलों की शत्रुता का अन्त करने का निश्चय किया, जो कि उसके पिता एवं पितामह के समय से चली आ रही थी। अकबर का यह विश्वास था कि राजपूतों के सहयोग के बिना न तो कोई सुदृढ़ साम्राज्य भारत में स्थापित किया जा सकता है। और न ही उसे स्थायी बनाया जा सकता है; अतः उसने निश्चय किया कि उसका साम्राज्य हिन्दू एवं मुसलमान दोनों जातियों के सहयोग से तथा दोनों के हित पर आधारित होगा। वह चाहता था कि राजपूत तथा हिन्दू मुगलों को विदेशी न समझकर भारतीय समझे।

इस कारण उसने प्रमुख राजपूत राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों तथा मुगलों के सम्बन्ध दृढ़ हो जाएँ। राजपूतों तथा हिन्दुओं के लिए उसने उच्च से उच्च पदों के द्वार खोल दिए। योग्यता के अनुसार पदों का वितरण किया गया, धर्म अथवा जाति के आधार पर नहीं। हिन्दुओं की प्रतिष्ठा, सम्पत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का भार राज्य ने सँभालने का निश्चय किया तथा हिन्दुओं की पूर्ण सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अकबर ने उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता भी प्रदान की। उसके हरम में उसकी हिन्दू रानियों को अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी तिलक लगाता एवं सूर्य की उपासना करता था। इस प्रकार उसने राजपूतों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करके उनका पूरा सहयोग प्राप्त किया।

(ii) राजनीति तथा साम्राज्यवादी दृष्टिकोण – अकबर एक दूरदर्शी तथा साम्राज्यवादी सम्राट था। वह यह भली प्रकार जानता था कि उसके पूर्व के मुस्लिम सुल्तानों के वंशों का अल्पकालीन होने का एक प्रमुख कारण राजपूतों की शत्रुता थी। वीर राजपूत जाति अभी तक मुसलमानों को अपना शत्रु समझती थी तथा उनको देश के बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील थी। खानवा के युद्ध में राणा साँगा के नेतृत्व में राजपूतों ने एक महान् किन्तु असफल प्रयास इसीलिए किया था। अकबर यह भी जानता था कि राजपूत स्वभाव के सच्चे, ईमानदार एवं स्वामिभक्त होते हैं और उनको मित्र बनाकर भारी लाभ प्राप्त किया जा सकता है, अत: एक कुशल कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर ने राजपूतों को मुगलों का मित्र बनाने में अपने तथा अपने वंश का कल्याण समझा। इसी उद्देश्य को लेकर उसने ‘राजपूत नीति’ को जन्म दिया। किन्तु अकबर की राजपूत नीति का केवल यही एकमात्र कारण नहीं था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। वास्तव में यदि यही एक कारण रहा होता तो अकबर के पाखण्ड का भण्डाफोड़ उसके जीवनकाल में कभी-न-कभी अवश्य हो गया होता और राजपूतों के सहयोग को प्राप्त करने में वह असफल रहता। अकबर यह जानता था कि बलबन, अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक जैसे वीर एवं योग्य सुल्तान भी भारत में स्थायी राज्य स्थापित नहीं कर सके थे। इसका प्रमख कारण राजपत थे, जिनके साथ सल्तानों का व्यवहार हमेशा शत्रतापर्ण रहा था। अतः यदि इन रा मैत्रीपर्ण व्यवहार किया जाए तो इनकी शक्ति का उपयोग मगल साम्राज्य को दृढ़ बनाने के लिए किया जा सकता है। इस
दृष्टिकोण से अकबर ने राजपूतों के प्रति सहृदयता एवं मैत्रीपूर्ण व्यवहार का नीति को जन्म दिया।

राजपूत नीति सम्बन्धी कार्य – अकबर ने राजपूतों से निकट का सम्बन्ध स्थापित करने तथा उन्हें प्रेमपूर्वक तथा सद्भावना सहित अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु जो ढंग अपनाए वे प्रधानतया चार प्रकार के थे
(i) धार्मिक सहिष्णुता की नीति – अकबर ने हिन्दुओं को पूर्णत: धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की, यहाँ तक कि उसके हरम की हिन्दू स्त्रियों को मूर्ति पूजा करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी हिन्दुओं के रीति-रिवाजों को मनाता था। उसने तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर हटा दिया, अत: राजपूत ऐसे सम्राट को सहयोग देने को सहर्ष प्रस्तुत हो गए, जो उनके धर्म तथा गुणों को मान्यता एवं प्रतिष्ठा प्रदान करता था।

(ii) उच्च पदों पर नियुक्ति – अकबर ने उच्च पदों के द्वार सबके लिए खोल दिए। उसने योग्यता के आधार पर, धार्मिक भेदभाव किए बिना, पदों का वितरण किया। उसके नवरत्नों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मावलम्बी सम्मिलित थे। उसने कछवाहा-नरेश बिहारीमल को पंचहजारी मनसबदार बनाया तथा उसके पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को भी सेना एवं प्रशासन सम्बन्धी उच्च पद प्रदान किए। अकबर के अन्य हिन्दू पदाधिकारियों में राजा टोडरमल तथा राजा बीबरल के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। अकबर ने 1582 ई० में राजा टोडरमल को दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष बना दिया। राजा बीरबल को उसने अपने नवरत्नों में स्थान दिया और उन्हें सेनापति का भार सौंपकर अपनी साथ नीति को आगे बढ़ाया। जनता ने बीरबल को विनोदप्रियता का प्रतीक मानकर अकबर-बीरबल सम्बन्धी हजारों-लाखों किंवदन्तियाँ गढ़ लीं। इस प्रकार उसकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई। यही नहीं, अकबर की सेना में भी आधे हिन्दू थे तथा उनमें से अनेक सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। अकबर ने बाद में यह अनुभव किया कि हिन्दुओं एवं राजपूतों पर विश्वास करके उसने कोई भूल नहीं की थी।

(iii) वैवाहिक सम्बन्ध – अकबर ने प्रमुख राजपूत राजवंशों की राजकुमारियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करने में अकबर को सहायता प्राप्त हुई। नार्मन जीग्लर तथा डिक हर्बर्ट आरनॉल्ड कोफ के अनुसार, राजस्थान तथा अन्य स्थानों पर राजपूत सरदारों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को निश्चित रूप प्रदान करने में इन वैवाहिक सम्बन्धों का विशिष्ट योगदान था। डॉ० बेनी प्रसाद के शब्दों में- “इन वैवाहिक सम्बन्धों से भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देश को प्रसिद्ध सम्राटों की एक परम्परा प्राप्त हुई और मुगल साम्राज्य की चारों पीढ़ियों को मध्यकालीन भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों और योग्य राजनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त होती रही।

(iv) अनाक्रमण तथा सामाजिक सुधार – अकबर ने अन्य राज्यों को आत्मसात करने तथा उन पर आक्रमण करने की नीति का परित्याग कर दिया। उसने अपने धन व शक्ति को जनता के कल्याण में लगा दिया। अकबर ने मुस्लिम समाज के साथसाथ हिन्दू समाज के दोषों के निराकरण का भी प्रयास किया, जिससे वह हिन्दुओं के और भी निकट आ गया। उसने अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर देहज प्रथा, सती प्रथा, जाति की जटिलता, बाल-विवाह, शिशु हत्या आदि का विरोध किया तथा इनको सुधारने के लिए नियम भी बनाए। उसने विधवा पुनर्विवाह को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। 1562 ई० के आरम्भ से ही उसने राजाज्ञा देकर युद्धबन्दियों को गुलाम बनाने की प्रथा पर रोक लगा दी। मथुरा के तीर्थयात्रियों पर कर लगाना उसे अनुचित लगा, अतः 1563 ई० में उसने सर्वत्र यात्री-कर समाप्त करने का आदेश दिया। फिर 1564 ई० में उसने जजिया कर को बन्द करवा दिया। इस प्रकार सम्पूर्ण देश के एक विशाल बहुमत की सहानुभूति और शुभकामनाएँ उसे प्राप्त हो गई। अबुल फजल ने लिखा है – “इस प्रकार सम्राट ने लोगों के आचरण को सुधारने का प्रयास किया।

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम – अकबर की राजपूत नीति से मुगल साम्राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई। राज्य का विस्तार हुआ, शासन व्यवस्था सुदृढ़ हुई, व्यापार को प्रोत्साहन मिला और सैनिक सम्मान में वृद्धि हुई। इन सबके परिणामस्वरूप देश समृद्ध हुआ और सम्राट को राष्ट्र के निर्माण में राजपूतों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।

(i) मुगलों की शक्ति में वृद्धि – अकबर की सहिष्णुतापूर्ण नीति मुगल वंश के लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुई। युद्ध कौशल में दक्ष राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध जोड़कर अकबर ने एक बहुत बड़ा लाभ यह उठाया कि अब उसे कुशल सैनिकों की भर्ती के लिए पश्चिमोत्तर प्रान्तों का मुँह नहीं ताकना पड़ता था। इससे मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हो गई तथा अकबर के उत्तराधिकारी जब तक इस सहिष्णतापर्ण नीति का अनसरण करते रहे तब तक मगल चलता रहा। इस नीति का परित्याग करते ही मगल वंश का पतन आरम्भ हो गया।

(ii) सद्भावना की प्राप्ति – अकबर की राजपूत नीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि राजपूत, जो अभी तक मुसलमानों के शत्रु रहे थे तथा जिनसे सभी मुस्लिम सुल्तानों को युद्ध करने पड़ते थे, अब मुगल साम्राज्य के आधार स्तम्भ बन गए। अकबर ने अपनी उदार राजपूत नीति के फलस्वरूप न केवल राजस्थान पर अपना सुदृढ़ अधिकार स्थापित कर लिया, वरन् राजपूतों की सहायता से उसने भारत के विभिन्न मुस्लिम राज्यों तथा पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ राज्यों को पराजित करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

(iii) विद्रोह दमन में सहायता – इतना ही नहीं; विद्रोही राजपूत राज्यों को दबाने में भी उसने मित्र राजपूत राज्यों से पूरी-पूरी सहायता प्राप्त की। पूर्वी और दक्षिणी विजयों में भी अकबर को राजपूतों से पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई।

(iv) राज्य–विस्तार – मेवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के सभी राज्य अकबर के अधीन हो गए। मेड़ता और रणथम्भौर जैसे राज्यों ने भी युद्ध के उपरान्त मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। आमेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर आदि राज्यों ने अकबर से मित्रता कर ली, जिनको देखकर छोटे-छोटे राज्य जैसे प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा, दुर्गापुर आदि बिना युद्ध के ही अकबर के अधीन हो गए। मेवाड़ के महाराणा प्रताप को इन्हीं राजपूतों की सहायता से अकबर ने 1576 ई० में पराजित किया। अन्य छोटे-छोटे राज्यों को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कराने का श्रेय भी मुख्यत: उन्हीं राजपूतों को है, जो अकबर के सेनापति के रूप में कार्य कर रहे थे, अतः यथाशीघ्र सम्पूर्ण उत्तर भारत में अकबर की वीरता की धाक जम गई और दूसरी और उसकी उदारता का भी व्यापक प्रचार हो गया। अकबर ने राजपूतों की सहायता से केवल एक विशाल साम्राज्य ही अर्जित नहीं किया वरन् उसकी सुव्यवस्थित शासनव्यवस्था भी राजपूतों के सहयोग का ही परिणाम थी। उसने हिन्दुओं को योग्यतानुसार उच्च पदों पर आसीन किया तथा उनकी योग्यता का पूरा लाभ उठाया। राजा टोडरमल उसकी भूमि-व्यवस्था के लिए उत्तरदायी थे, जिनके द्वारा शासक तथा शासित दोनों वर्गों को भारी लाभ पहुँचा। इस प्रकार उसका जाज्वल्यमान युग राजपूतों के सहयोग से ही निर्मित हो सका। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के अनुसार- “राजपूतों के माध्यम से उत्तर भारत के लाखों हिन्दू, अकबर के शुभचिन्तक बन गए और उसकी उन्नति तथा सफलता की प्रार्थना करने लगे।

प्रश्न 3.
अकबर की धार्मिक नीति की विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर की धार्मिक नीति- अकबर महान् भारत में ही नहीं, वरन् विश्व के महानतम सम्राटों में प्रमुख स्थान रखता है। उसकी महानता का प्रमुख कारण है उसकी धार्मिक नीति, जिसके द्वारा वह दो परस्पर विरोधी धर्मावलम्बियों में समन्वय स्थापित करने में सफल रहा।

16वीं शताब्दी, जिस शताब्दी में अकबर भारत का शासक था, यूरोप के इतिहास में धर्मान्धता की शताब्दी मानी जाती है। उस समय धर्म के नाम पर अमानुषिक युद्ध एवं लोगों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। ऐसे समय में अकबर ने ‘सुलह-कुल की नीति को अपनाया, जिसके द्वारा एक अपूर्व धार्मिक सहिष्णुता को उसने भारत में स्थापित किया। मुस्लिम साम्राज्य के आरम्भ होने से लेकर अकबर के राज्यारोहण तक भारत में धर्म के नाम पर असंख्य अत्याचार किए गए थे किन्तु प्रकृति से ही सहिष्णु एवं उदार सम्राट अकबर ने शासितों को सुरक्षा एवं धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। उसकी यह उदार नीति विभिन्न परिस्थितियों की उपज थी।

अकबर की धार्मिक सहिष्णुता के तत्त्व – अकबर आरम्भ से ही धर्मान्ध अथवा अनुदार नहीं था। अपने पूर्वजों से उसे धार्मिक सहिष्णुता उत्तराधिकार में मिली थी। तैमूर, बाबर तथा हुमायूँ दिल्ली के अन्य सुल्तानों के समान धर्मान्ध अथवा अत्याचारी नहीं थे। इसके अतिरिक्त अकबर का संरक्षक बैरम खाँ भी उदार स्वभाव का था। 15वीं एवं 16वीं शताब्दी के भक्ति आन्दोलनों का प्रभाव भी अकबर पर पड़ा था। 1581 ई० में इबादतखाने की स्थापना के पश्चात् अकबर हिन्दू, जैन, सिक्ख, पारसी आदि अनेक धर्मावलम्बियों के सम्पर्क में आया, जिससे उसका धार्मिक दृष्टिकोण उदार होता गया तथा अन्त में उसने एक नवीन धर्म की स्थापना भी की, जिसके अनुसरण के लिए किसी भी धर्म का बन्धन आवश्यक नहीं था। अकबर के धार्मिक विचारों में क्रमिक परिवर्तन हुआ।

आरम्भ से वह उतना उदार एवं सहिष्णु नहीं वरन् इस्लाम में उसे पूरी आस्था थी तथा इस्लाम का वह सच्चा अनुयायी था, किन्तु हिन्दुओं के प्रति उसकी उदार नीति ने उसके धार्मिक दृष्टिकोण में धीरे-धीरे परिवर्तन लाना आरम्भ किया। स्मिथ के मत में उसके धार्मिक विचारों के विकास की तीन प्रमुख सीढ़ियाँ है- (i) 1556 से 1575 ई० तक, जिसमें वह इस्लाम का अनुयायी था। (ii) 1575 से 1581 ई० तक, जब उसने इबादतखाने में होने वाले वाद-विवादों को ध्यानपूर्वक सुनकर अन्य धर्मों की ओर आकर्षित होना एवं धर्म के विषय में चिन्तन करना आरम्भ कर दिया था। (iii) 1582 ई० के पश्चात् जब उसने ‘दीन-ए-इलाही’ नामक धर्म की स्थापना की तथा सभी धर्मों को समभाव देखना आरम्भ किया।

अकबर के धार्मिक विचारों में परिवर्तन
(i) 1556 से 1575 ई० तक का काल – आरम्भिक काल में अकबर एक सच्चे मुसलमान की भाँति आचरण करता था। वह रोज नमाज पढ़ता था, मुल्ला तथा मौलवियों का आदर करता था और पीरों की दरगाहों के दर्शनार्थ जाता था। उसने कई मसजिदों का भी निर्माण कराया, वह हिन्दुओं से जजिया कर भी लेता था, इस प्रकार वह सच्चे मुसलमान सम्राट का प्रतिरूप था। तब भी हम उसे कट्टर एवं धर्मान्ध मुसलमान नहीं कर सकते, क्योंकि उसने धार्मिक अत्याचार की नीति को कभी भी नहीं अपनाया। परन्तु 15 मार्च, 1564 ई० से उसने जजिया कर लेना बन्द कर दिया था। वह आरम्भ से ही उदार हृदय था, किन्तु पहले उदार नहीं था जितना कि बाद में हो गया। इस प्रकार अपने जीवन के प्रथम काल में अकबर एक मुसलमान होने के नाते इस्लाम में पूरी आस्था रखने वाला तथा अपने धर्म का सच्चा अनुयायी सम्राट था।

(ii) सन् 1575 से 1581 ई० तक का काल – यह अकबर के जीवन का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल था। वास्वत में इसी काल में उसके धार्मिक विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ।
(क) इबादतखाने की स्थापना – अनेक धर्मों से प्रभावित होकर अकबर ने फतेहपुर सीकरी में, 1575 ई० में एक इबादतखाना अथवा पूजागृह निर्मित करवाया जिसमें सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने धर्म के विषय में बतलाने तथा अन्य धर्मावलम्बियों से तर्क करने की स्वतन्त्रता थी। आरम्भ में इस इबादतखाने में केवल मुसलमानों को ही भाग लेने का अधिकार था किन्तु उनकी कट्टरता, धर्मान्धता तथा असहिष्णुता से अकबर असन्तुष्ट हो उठा और सभी धर्मों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने की उसकी जिज्ञासा प्रबल हो उठी। इसी समय मुसलमान मौलवियों के दो वर्ग हो गए। एक दल का नेता मखदूम-उल-मुल्क अब्दुल्ला सुल्तानपुरी था तथा दूसरे का शेख अब्दुल नबी था। इसमें परस्पर ईष्र्या, द्वेष होने के कारण संघर्ष आरम्भ हो गया, जिससे अकबर की इस्लाम के प्रति श्रद्धा कम होने लगी और उसने हिन्दू, जैन, सिक्ख, ईसाई तथा पारसी सभी मतावलम्बियों के लिए इबादतखाने के द्वार खोल दिया। सम्राट स्वयं इबादतखाने में होने वाले वाद-विवाद में भाग लेता था। पारसी एवं पुर्तगाली पादरियों से वह काफी प्रभावित हुआ था। एक पारसी पादरी दस्तूर मेहर जी राना ने सम्राट को यह सिखाया कि दरबार में सदैव अग्नि जलती रहनी चाहिए। उसी के प्रभाव से उसने सूर्य की उपासना भी करनी आरम्भ कर दी।

(ख) एक नए धर्म का विचार – निरन्तर धार्मिक चिन्तन एवं मनन के उपरान्त सम्राट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सभी धर्मों के मूल तत्त्व समान हैं तथा धर्म के नाम पर झगड़े एवं युद्ध करना व्यर्थ है। उसने यह सोचना आरम्भ किया कि वह एक ऐसा धर्म चलाएगा जिसे संसार के सभी धर्मों के अनुयायी अपना सकें तथा जो सब धर्मों का सार हो। धर्माचार्य बनने के लिए प्रथम कदम सम्राट ने 22 जून, 1579 ई० में उठाया, जब मुहम्मद साहब के जन्मदिन पर उसने स्वयं खुतबा पढ़ा। यद्यपि यह खुतबा पढ़ने का अधिकार केवल मुहम्मद साहब एवं उनके खलीफाओं को ही था। अकबर ने खुतबे के अन्त में ‘अल्ला हो अकबर’ शब्द का उच्चारण किया, जिसका अर्थ है कि अल्लाह सबसे बड़ा है और इस प्रकार उसने अपनी धार्मिक नीति को प्रचलित रखा।

दीन-ए-इलाही – अकबर ने गम्भीर धार्मिक चिन्तन के उपरान्त ‘दीन-ए-इलाही’ का निर्माण किया तथा 1581 ई० में उसने इस धर्म की घोषणा कर दी। इस धर्म के सिद्धान्त सरल थे तथा प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छा से इसका सदस्य बन सकता था। अकबर ने किसी भी व्यक्ति को इस धर्म के अनुसरण के लिए बाध्य नहीं किया और इसलिए उसके प्रमुख दरबारियों में से बहुत ही कम व्यक्तियों ने उसके इस धर्म को अंगीकार किया तथा अकबर की मृत्यु के साथ ही उसका धर्म ‘दीन-एइलाही’ भी लगभग समाप्त हो गया। इस धर्म का अन्तिम अनुयायी शाहजहाँ का पुत्र दारा शिकोह था, जिसके साथ ही दीन-ए-इलाही का पूर्णतया अन्त हो गया। अकबर के काल में केवल 18 व्यक्ति ही इसके सदस्य थे। राजा मानसिंह, भगवानदास, टोडरमल आदि कोई भी इसका सदस्य नहीं था। हिन्दुओं में केवल बीरबल दीन-ए-इलाही के अनुयायी थे। शेख मुबारक, अबुल फजल, फैजी, अजीज कोका आदि इसके महत्वपूर्ण सदस्य थे।

दीन-ए-इलाही के प्रमुख सिद्धान्त – दीन-ए-इलाही के सिद्धान्त अत्यन्त सरल थे
(अ) इसका प्रथम सिद्धान्त यह था कि ईश्वर एक है और अकबर उसका सबसे बड़ा पुजारी एवं पैगम्बर है।
(ब) दीन-ए-इलाही के अनुयायी को सूर्य तथा अग्नि की पूजा करनी पड़ती थी।
(स) इसके सदस्य को अपने जन्म दिन पर दावत देनी पड़ती थी।
(द) जो दावत मनुष्य के मरने के बाद उसके परिजनों को देनी पड़ती है, वह मनुष्य को अपने जीवनकाल में ही देनी पड़ती थी।
(य) प्रत्येक सदस्य के लिए मांस-भक्षण निषिद्ध था।
(र) परस्पर मिलने पर वे ‘अल्ला हो अकबर’ तथा ‘जल्ले-जलाल हू’ कहकर अभिवादन करते थे।
(ल) निम्न श्रेणियों के व्यक्तियों के साथ उन्हें भोजन करने का निषेध था।
(व) उन्हें सम्राट को सजदा करना पड़ता था।
(श) दीन-ए-इलाही के अनुयायी चार श्रेणियों में विभक्त थे- प्रथम, जो अपनी सम्पत्ति सम्राट पर न्योछावर करने को प्रस्तुत रहते थे, द्वितीय, जो सम्पत्ति तथा जीवन समर्पित करने को उद्यत रहते थे, तृतीय, जो सम्राट के लिए सम्पत्ति, जीवन एवं सम्मान का बलिदान कर सकते थे तथा चतुर्थ जो सम्पत्ति, जीवन, सम्मान एवं धर्म समर्पित करने के लिए उद्यत रहते थे।
(ष) रविवार के दिन सम्राट धर्म की दीक्षा देता था तथा नए व्यक्तियों के धर्म परिवर्तन के लिए भी यही दिन निश्चित था।

प्रश्न 4.
अकबर की सुलह-कुल नीति की विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर ने जिन उदार और नवीन सिद्धान्तों को जन्म दिया उनका इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान हैं उसने सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार किया। धर्म, जाति और वंश के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया। अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का प्रयास किया। दूसरी ओर शासन-प्रणाली, न्याय व्यवस्था, मालगुजारी बन्दोबस्त, एक राज्य भाषा, एक मुद्रा व्यवस्था की स्थापना की। इस प्रकार अकबर की नीति, भावना एवं प्रयास उसे राष्ट्रीय शासक के निकट पहुँचाते हैं।

प्रश्न 5.
‘दीन-ए-इलाही’ अकबर की बुद्धिमत्ता का नहीं, बल्कि उसकी मूर्खता का प्रतीक था। इस कथ के आलोक में अकबर की धार्मिक नीति की समीक्षा कीजिए।
उतर.
दीन-ए-इलाही के बारे में डॉ० श्रीराम शर्मा ने लिखा है “दीन-ए-इलाही को एक धर्म का स्तर देना कोरी अतिशयोक्ति है। यह सम्राट के राष्ट्रीय आदर्शवाद का ज्वलन्त उदाहरण है। इसका कोई धर्म-ग्रन्थ, पुरोहित, संस्कार वास्तविक रूप से कोई धार्मिक विश्वास नहीं थे। इसे धर्म न कहकर एक संस्था अथवा परिपाटी कहना अधिक उपयुक्त होगा जो किसी धार्मिक आन्दोलन के विपरित एक स्वतन्त्र विचारधारा के निकट है।” स्मिथ ने दीन-ए-इलाही को अकबर की बुद्धिमता का नहीं, अपितु उसकी मूर्खता का प्रतीक बताया है। लेकिन इस सम्बन्ध में डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव का मत है कि दीन-ए-इलाही इस उच्च उद्देश्य से प्रेरित होकर चलाया गया था कि इससे देश की विभिन्न जातियाँ एकाकार होकर राष्ट्र का रूप धारण कर लेंगी।

अकबर उत्तरी-भारत में राजनीतिक प्रशासकीय, आर्थिक और कुछ हद तक सांस्कृतिक एकता स्थापित करने में सफल हुआ। अकबर की इस सहनशीलता की नीति की बदायूँनी और जेसुइट पादरियों ने बड़ी आलोचना की है तथा बदायूँनी ने यह आरोप लगाया कि अकबर ने इस्लाम के साथ अन्याय किया। लेकिन उसकी इस आलोचना को सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था और उस जैसे धर्मान्ध मुल्ला की दृष्टि में वह अक्षम्य अपराध था कि इस्लाम को प्रमुखता की स्थिति से गिराकर उसे अन्य धर्मों के साथ समानता की स्थिति पर ले जाया जाये। जेसुइट पादरी भी जो बादशाह को ईसाई बना देने की आशा में थे किन्तु अन्त में निराश हो गये तो अकबर की आलोचना करना इनके लिए स्वाभाविक ही नहीं अवश्यम्भावी भी था।

प्रश्न 6.
“अकबर एक राष्ट्रीय शासक था।” इस कथन के आलोक में उसकी उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।
उतर.
अकबर ने अपने शासन के दौरान ऐसे कार्य किये जिसके आधार पर उसे एक राष्ट्रीय शासक कहा गया है। राष्ट्रीय शासक वह कहलाता है जिसके शासन में उसकी सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार किया जाये और राज्य की ओर से व्यक्ति-व्यक्ति में धर्म, जाति और वंश के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाये। शासक अपनी प्रजा को पुत्रवत् समझे और राष्ट्र की सारी जनता सम्राट को अपना शासक माने। अकबर ऐसा ही सम्राट था। इस दिशा में राजनीतिक एकता स्थापित करना अकबर का प्रथम कदम था। दूसरा उसने पूरे देश में एक जैसी शासन-प्रणाली, न्याय व्यवस्था तथा मालगुजारी बन्दोबस्त, एक राज्य भाषा, एक मुद्रा व्यवस्था की स्थापना की। अकबर का लक्ष्य सम्पूर्ण भारत को एक राज्य और एक शासन के अन्तर्गत संगठित करने का था।

जिस समय अकबर गद्दी पर बैठा उस समय भारत की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्थिति अशांत थी। केन्द्रीय सत्ता का नामोनिशान नहीं था। स्थानीय तत्त्व ही राजनीति और प्रशासन में अधिक प्रभावशाली थे। प्रशासनिक व्यवस्था ठप्प पड चकी थी। सामाजिक एवं आर्थिक विभेद चरम सीमा पर पहुँच चुके थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में अकबर ने साहस नहीं खोया। उसने भारत को ही अपना देश समझा और इसके विकास के लिए अनवरत प्रयास किये। उसके ये कार्य उसे एक राष्ट्रीय शासक बनाते हैं। इस संदर्भ की पुष्टि अकबर के निम्नलिखित कार्यों से की जा सकती है

(i) राजनीतिक एकीकरण – अकबर का सबसे पहला उद्देश्य भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बाँधकर भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना जगाना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने साम्राज्यवादी नीति अपनाई और पानीपत से लेकर असीरगढ़ के युद्ध तथा सम्पूर्ण उत्तर-पूर्वी भारत और दक्षिण के एक बड़े भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसने राजपूतों और अफगानों की शक्ति को भी नतमस्तक कर दिया। इसके लिए उसने सैनिक शक्ति के अतिरिक्त कूटनीति का भी सहारा लिया। उसके प्रयासों से लगभग सम्पूर्ण भारत एक केन्द्रीय सत्ता के अधीन आ गया तथा मुगल सैनिक आक्रमणकारी से भारतीय राजवंशी बन गए।

(ii) प्रशासनिक एकीकरण – अकबर ने न सिर्फ सम्पूर्ण भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की, बल्कि उसने पूरे साम्राज्य के लिए समान प्रशासनिक व्यवस्था भी स्थापित की। उसके प्रशासन का उद्देश्य राजनीति को धर्म से अलग कर साम्राज्य में रहने वाले सभी लोगों का कल्याण करना एवं उन्हें न्याय तथा समान अवसर प्रदान करना था। इसलिए, उसने तुर्क अफगानयुगीन धार्मिक कट्टरता की नीति त्याग दी और अपने प्रबलतम राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों- राजपूतों को भी प्रशासन और सेना में प्रमुखता दी। राजनीतिक एकता बिना प्रशासनिक एकता के अधूरी रहती। इसलिए, उसने पूरे साम्राज्य में एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। यह उसकी एक महान् उपलब्धि थी।

(iii) धार्मिक एकीकरण – राष्ट्रीय एकता स्थापित करने की दिशा में अकबर का साहसिक और मौलिक कार्य धार्मिक क्षेत्र में था। तुर्क-अफगान शासकों के समय में धर्म एवं राजनीति का अटूट सम्बन्ध था। अकबर इस बात को अच्छी तरह समझता था कि इस्लाम धर्म का सहारा लेकर सम्पूर्ण भारत पर शासन नहीं किया जा सकता। इसलिए, उसने राजनीति और धर्म को पृथक् कर दिया। बलात् धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया बन्द कर दी गई। हिन्दुओं पर से जजिया और तीर्थयात्रा कर हटा लिए गए। उन्हें मंदिरों के निर्माण और मरम्मत की सुविधा एवं आवश्यक सहायता भी प्रदान की गई। अन्य धर्मावलंबियों-सिक्खों, पारसियों, ईसाइयों, मुसलमानों को भी धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गई। इस प्रकार अकबर ने धार्मिक विद्वेष, वैमनस्य एवं कटुता की भावना को समाप्त कर आपसी सद्भाव, सहयोग, एकता एवं धर्म-सहिष्णुता की भावना जगाई और एक संगठित राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया।

(iv) सामाजिक एकता के लिए प्रयास – अकबर का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य था सामाजिक एकता स्थापित करने का प्रयास। उसने समाज के दो बहुसंख्यक वर्गों- हिन्दू और मुसलमानों के उत्थान के लिए समान रूप से प्रयास किए। उसने हिन्दू समाज में प्रचलित सती प्रथा एवं बाल-विवाह को प्रतिबन्धित करने की कोशिश की। इसी प्रकार मुसलमानों के दाढ़ी रखने, गो-मांस भक्षण, शराबखोरी, रमजान का व्रत रखने एवं हज की यात्रा समाप्त करने का प्रयास किया। वह इस्लाम धर्म को मानते हुए भी हिन्दुओं के पर्वो एवं त्योहारों- दशहरा, दीपावली, रक्षाबन्धन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि को पूरी श्रद्धा और उत्साह से मनाता था। अकबर की सुलह-कुल की नीति ने आपसी विभेद को मिटाने एवं एक सुसंगठित राज्य, समाज और राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया।

(v) सांस्कृतिक एकता की दिशा में योगदान – सांस्कृतिक उत्थान के क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य किए। उसने फारसी के साथ-साथ संस्कृत भाषा और साहित्य के विकास पर भी पूरा ध्यान दिया। उसने महाभारत, गीता, रामायण, बाइबिल, कुरान, अथर्ववेद, पंचतन्त्र इत्यादि का फारसी में अनुवाद करवाया। कुछ फारसी ग्रन्थों का संस्कृत में भी अनुवाद किया गया। अकबर ने अपने दरबार में अनेक कलाकारों, कवियों, चित्रकारों, संगीतकारों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया। भवन निर्माण के क्षेत्र में भी उसकी महान् उपलब्धियाँ हैं। उसने ऐसे भवनों का निर्माण करवाया जिनमें हिन्दू और इस्लामी शैलियों का मिश्रण स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। अकबर के प्रयासों से भारत की विभिन्न कला-पद्धतियों का समन्वय एवं विकास हो सका। ईरानी, इस्लामी और हिन्दू कला एक-दूसरे के निकट आ सकीं।

(vi) आर्थिक एकता – अकबर ने व्यवसाय और व्यापार को नियन्त्रित कर देश की आर्थिक समृद्धि का मार्ग भी खोला। अनेक प्रकार की दस्तकारियों को देश में प्रोत्साहन मिला जिसके फलस्वरूप देश विकास एवं समृद्धि की चरम सीमा पर पहुंचकर विदेशी यात्रियों और दूतों की आँखों में चकाचौंध पैदा करने लगा। इस प्रकार सभी इतिहासकारों यह स्वीकार करते हैं कि अकबर का उद्देश्य भारत की एकता, उसकी उन्नति और उसके सभी निवासियों की समान प्रगति तथा उन्हें सुविधाएँ प्रदान करना था। इस दृष्टि से प्रायः सभी इतिहासकार उसे राष्ट्रीय शासक स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 7.
अकबर की राजपूत नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए एवं मुगल साम्राज्य पर इसके प्रभावों का परीक्षण कीजिए।
उतर.
अकबर की राजपूत नीति – अकबर एक दूरदर्शी सम्राट था। उसने शीघ्र समझ लिया कि राजपूतों की सहायता के बिना हिन्दुस्तान में मुस्लिम साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता तथा उनके सक्रिय सहयोग के बिना कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक एकता सम्भव नहीं हो सकती। अत: उसने प्रेम, सहानुभूति तथा उदारता से राजपूतों के हृदय को जीतकर उनसे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। इस नीति के परिणामस्वरूप अकबर मुगल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ कर सका। अकबर की उदार राजपूत नीति अपनाने के कारण- अकबर द्वारा राजपूतों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखने के निम्नलिखित कारण थे

(i) व्यक्तिगत कारण – राजनीतिक एवं साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के अतिरिक्त अकबर की राजपूत नीति के व्यक्तिगत कारण भी थे। अकबर ने अनुभव किया था कि उसके बड़े-से-बड़े पदाधिकारी अत्यन्त स्वार्थी हैं तथा वे समय पड़ने पर सदा विद्रोह करने को तत्पर रहते हैं। राज्यारोहण के बाद ही उसने देखा कि उसके सम्बन्धी तथा संरक्षक विश्वसनीय नहीं हैं। उसका भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम, उसका संरक्षक बैरम खाँ, उसकी धाय माँ माहम अनगा तथा उसका (माहम अनगा का) पुत्र आधम खाँ सभी शक्ति हस्तगत करने को इच्छुक थे और उन्हें अकबर की कोई चिन्ता न थी। इसी प्रकार भारतीय मुसलमानों पर भी अकबर विश्वास नहीं कर सकता था।

अतः एक कुशल एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते अकबर इस निर्णय पर पहुँचा कि राजपूत ही सबसे अधिक विश्वस्त एवं वीर जाति है, जो एक बार वचनबद्ध होकर कभी धोखा नहीं देती है और उस पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वीरता में भी राजपूत जाति अद्वितीय थी, जिसका उपयोग अकबर अपने हित के लिए कर सकता था। अत: अन्त में उसने राजपूतों एवं मुगलों की शत्रुता का अन्त करने का निश्चय किया, जो कि उसके पिता एवं पितामह के समय से चली आ रही थी। अकबर का यह विश्वास था कि राजपूतों के सहयोग के बिना न तो कोई सुदृढ़ साम्राज्य भारत में स्थापित किया जा सकता है। और न ही उसे स्थायी बनाया जा सकता है; अतः उसने निश्चय किया कि उसका साम्राज्य हिन्दू एवं मुसलमान दोनों जातियों के सहयोग से तथा दोनों के हित पर आधारित होगा। वह चाहता था कि राजपूत तथा हिन्दू मुगलों को विदेशी न समझकर भारतीय समझे।

इस कारण उसने प्रमुख राजपूत राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों तथा मुगलों के सम्बन्ध दृढ़ हो जाएँ। राजपूतों तथा हिन्दुओं के लिए उसने उच्च से उच्च पदों के द्वार खोल दिए। योग्यता के अनुसार पदों का वितरण किया गया, धर्म अथवा जाति के आधार पर नहीं। हिन्दुओं की प्रतिष्ठा, सम्पत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का भार राज्य ने सँभालने का निश्चय किया तथा हिन्दुओं की पूर्ण सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अकबर ने उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता भी प्रदान की। उसके हरम में उसकी हिन्दू रानियों को अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी तिलक लगाता एवं सूर्य की उपासना करता था। इस प्रकार उसने राजपूतों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करके उनका पूरा सहयोग प्राप्त किया।

(ii) राजनीति तथा साम्राज्यवादी दृष्टिकोण – अकबर एक दूरदर्शी तथा साम्राज्यवादी सम्राट था। वह यह भली प्रकार जानता था कि उसके पूर्व के मुस्लिम सुल्तानों के वंशों का अल्पकालीन होने का एक प्रमुख कारण राजपूतों की शत्रुता थी। वीर राजपूत जाति अभी तक मुसलमानों को अपना शत्रु समझती थी तथा उनको देश के बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील थी। खानवा के युद्ध में राणा साँगा के नेतृत्व में राजपूतों ने एक महान् किन्तु असफल प्रयास इसीलिए किया था। अकबर यह भी जानता था कि राजपूत स्वभाव के सच्चे, ईमानदार एवं स्वामिभक्त होते हैं और उनको मित्र बनाकर भारी लाभ प्राप्त किया जा सकता है, अत: एक कुशल कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर ने राजपूतों को मुगलों का मित्र बनाने में अपने तथा अपने वंश का कल्याण समझा। इसी उद्देश्य को लेकर उसने ‘राजपूत नीति’ को जन्म दिया। किन्तु अकबर की राजपूत नीति का केवल यही एकमात्र कारण नहीं था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। वास्तव में यदि यही एक कारण रहा होता तो अकबर के पाखण्ड का भण्डाफोड़ उसके जीवनकाल में कभी-न-कभी अवश्य हो गया होता और राजपूतों के सहयोग को प्राप्त करने में वह असफल रहता। अकबर यह जानता था कि बलबन, अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक जैसे वीर एवं योग्य सुल्तान भी भारत में स्थायी राज्य स्थापित नहीं कर सके थे। इसका प्रमख कारण राजपत थे, जिनके साथ सल्तानों का व्यवहार हमेशा शत्रतापर्ण रहा था। अतः यदि इन रा मैत्रीपर्ण व्यवहार किया जाए तो इनकी शक्ति का उपयोग मगल साम्राज्य को दृढ़ बनाने के लिए किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से अकबर ने राजपूतों के प्रति सहृदयता एवं मैत्रीपूर्ण व्यवहार का नीति को जन्म दिया।

राजपूत नीति सम्बन्धी कार्य – अकबर ने राजपूतों से निकट का सम्बन्ध स्थापित करने तथा उन्हें प्रेमपूर्वक तथा सद्भावना सहित अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु जो ढंग अपनाए वे प्रधानतया चार प्रकार के थे
(i) धार्मिक सहिष्णुता की नीति – अकबर ने हिन्दुओं को पूर्णत: धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की, यहाँ तक कि उसके हरम की हिन्दू स्त्रियों को मूर्ति पूजा करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी हिन्दुओं के रीति-रिवाजों को मनाता था। उसने तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर हटा दिया, अत: राजपूत ऐसे सम्राट को सहयोग देने को सहर्ष प्रस्तुत हो गए, जो उनके धर्म तथा गुणों को मान्यता एवं प्रतिष्ठा प्रदान करता था।

(ii) उच्च पदों पर नियुक्ति – अकबर ने उच्च पदों के द्वार सबके लिए खोल दिए। उसने योग्यता के आधार पर, धार्मिक भेदभाव किए बिना, पदों का वितरण किया। उसके नवरत्नों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मावलम्बी सम्मिलित थे। उसने कछवाहा-नरेश बिहारीमल को पंचहजारी मनसबदार बनाया तथा उसके पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को भी सेना एवं प्रशासन सम्बन्धी उच्च पद प्रदान किए। अकबर के अन्य हिन्दू पदाधिकारियों में राजा टोडरमल तथा राजा बीबरल के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। अकबर ने 1582 ई० में राजा टोडरमल को दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष बना दिया। राजा बीरबल को उसने अपने नवरत्नों में स्थान दिया और उन्हें सेनापति का भार सौंपकर अपनी साथ नीति को आगे बढ़ाया। जनता ने बीरबल को विनोदप्रियता का प्रतीक मानकर अकबर-बीरबल सम्बन्धी हजारों-लाखों किंवदन्तियाँ गढ़ लीं। इस प्रकार उसकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई। यही नहीं, अकबर की सेना में भी आधे हिन्दू थे तथा उनमें से अनेक सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। अकबर ने बाद में यह अनुभव किया कि हिन्दुओं एवं राजपूतों पर विश्वास करके उसने कोई भूल नहीं की थी।

(iii) वैवाहिक सम्बन्ध – अकबर ने प्रमुख राजपूत राजवंशों की राजकुमारियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करने में अकबर को सहायता प्राप्त हुई। नार्मन जीग्लर तथा डिक हर्बर्ट आरनॉल्ड कोफ के अनुसार, राजस्थान तथा अन्य स्थानों पर राजपूत सरदारों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को निश्चित रूप प्रदान करने में इन वैवाहिक सम्बन्धों का विशिष्ट योगदान था। डॉ० बेनी प्रसाद के शब्दों में- “इन वैवाहिक सम्बन्धों से भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देश को प्रसिद्ध सम्राटों की एक परम्परा प्राप्त हुई और मुगल साम्राज्य की चारों पीढ़ियों को मध्यकालीन भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों और योग्य राजनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त होती रही।

(iv) अनाक्रमण तथा सामाजिक सुधार – अकबर ने अन्य राज्यों को आत्मसात करने तथा उन पर आक्रमण करने की नीति का परित्याग कर दिया। उसने अपने धन व शक्ति को जनता के कल्याण में लगा दिया। अकबर ने मुस्लिम समाज के साथसाथ हिन्दू समाज के दोषों के निराकरण का भी प्रयास किया, जिससे वह हिन्दुओं के और भी निकट आ गया। उसने अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर देहज प्रथा, सती प्रथा, जाति की जटिलता, बाल-विवाह, शिशु हत्या आदि का विरोध किया तथा इनको सुधारने के लिए नियम भी बनाए। उसने विधवा पुनर्विवाह को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। 1562 ई० के आरम्भ से ही उसने राजाज्ञा देकर युद्धबन्दियों को गुलाम बनाने की प्रथा पर रोक लगा दी। मथुरा के तीर्थयात्रियों पर कर लगाना उसे अनुचित लगा, अतः 1563 ई० में उसने सर्वत्र यात्री-कर समाप्त करने का आदेश दिया। फिर 1564 ई० में उसने जजिया कर को बन्द करवा दिया। इस प्रकार सम्पूर्ण देश के एक विशाल बहुमत की सहानुभूति और शुभकामनाएँ उसे प्राप्त हो गई। अबुल फजल ने लिखा है – “इस प्रकार सम्राट ने लोगों के आचरण को सुधारने का प्रयास किया।

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम – अकबर की राजपूत नीति से मुगल साम्राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई। राज्य का विस्तार हुआ, शासन व्यवस्था सुदृढ़ हुई, व्यापार को प्रोत्साहन मिला और सैनिक सम्मान में वृद्धि हुई। इन सबके परिणामस्वरूप देश समृद्ध हुआ और सम्राट को राष्ट्र के निर्माण में राजपूतों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।

(i) मुगलों की शक्ति में वृद्धि – अकबर की सहिष्णुतापूर्ण नीति मुगल वंश के लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुई। युद्ध कौशल में दक्ष राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध जोड़कर अकबर ने एक बहुत बड़ा लाभ यह उठाया कि अब उसे कुशल सैनिकों की भर्ती के लिए पश्चिमोत्तर प्रान्तों का मुँह नहीं ताकना पड़ता था। इससे मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हो गई तथा अकबर के उत्तराधिकारी जब तक इस सहिष्णतापर्ण नीति का अनसरण करते रहे तब तक मगल चलता रहा। इस नीति का परित्याग करते ही मगल वंश का पतन आरम्भ हो गया।

(ii) सद्भावना की प्राप्ति – अकबर की राजपूत नीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि राजपूत, जो अभी तक मुसलमानों के शत्रु रहे थे तथा जिनसे सभी मुस्लिम सुल्तानों को युद्ध करने पड़ते थे, अब मुगल साम्राज्य के आधार स्तम्भ बन गए। अकबर ने अपनी उदार राजपूत नीति के फलस्वरूप न केवल राजस्थान पर अपना सुदृढ़ अधिकार स्थापित कर लिया, वरन् राजपूतों की सहायता से उसने भारत के विभिन्न मुस्लिम राज्यों तथा पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ राज्यों को पराजित करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

(iii) विद्रोह दमन में सहायता – इतना ही नहीं; विद्रोही राजपूत राज्यों को दबाने में भी उसने मित्र राजपूत राज्यों से पूरी-पूरी सहायता प्राप्त की। पूर्वी और दक्षिणी विजयों में भी अकबर को राजपूतों से पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई।

(iv) राज्य–विस्तार – मेवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के सभी राज्य अकबर के अधीन हो गए। मेड़ता और रणथम्भौर जैसे राज्यों ने भी युद्ध के उपरान्त मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। आमेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर आदि राज्यों ने अकबर से मित्रता कर ली, जिनको देखकर छोटे-छोटे राज्य जैसे प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा, दुर्गापुर आदि बिना युद्ध के ही अकबर के अधीन हो गए। मेवाड़ के महाराणा प्रताप को इन्हीं राजपूतों की सहायता से अकबर ने 1576 ई० में पराजित किया। अन्य छोटे-छोटे राज्यों को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कराने का श्रेय भी मुख्यत: उन्हीं राजपूतों को है, जो अकबर के सेनापति के रूप में कार्य कर रहे थे, अतः यथाशीघ्र सम्पूर्ण उत्तर भारत में अकबर की वीरता की धाक जम गई और दूसरी और उसकी उदारता का भी व्यापक प्रचार हो गया। अकबर ने राजपूतों की सहायता से केवल एक विशाल साम्राज्य ही अर्जित नहीं किया वरन् उसकी सुव्यवस्थित शासनव्यवस्था भी राजपूतों के सहयोग का ही परिणाम थी। उसने हिन्दुओं को योग्यतानुसार उच्च पदों पर आसीन किया तथा उनकी योग्यता का पूरा लाभ उठाया। राजा टोडरमल उसकी भूमि-व्यवस्था के लिए उत्तरदायी थे, जिनके द्वारा शासक तथा शासित दोनों वर्गों को भारी लाभ पहुँचा। इस प्रकार उसका जाज्वल्यमान युग राजपूतों के सहयोग से ही निर्मित हो सका। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के अनुसार- “राजपूतों के माध्यम से उत्तर भारत के लाखों हिन्दू, अकबर के शुभचिन्तक बन गए और उसकी उन्नति तथा सफलता की प्रार्थना करने लगे।

प्रश्न 8.
अकबर के चारित्रिक गुणों पर प्रकाश डालिए।
उतर.
अकबर ने विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अपनी योग्यता एवं प्रतिभा का परिचय दिया। वह एक वीर सैनिक, महान सेनापति, बुद्धिमान शासन-प्रबन्धक, उदार शासक तथा उचित निर्णायक था। वह मनुष्यों का जन्मजात नेता था और इतिहास के शक्तिशाली सम्राटों में गणना किए जाने की क्षमता रखता था। अकबर के व्यक्तित्व एवं चरित्र के विषय में उसके समकालीन इतिहासकारों ने प्रकाश डालने का प्रयास किया है। उसके पुत्र जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ में उसके व्यक्तित्व को बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित किया है। जहाँगीर लिखता है कि वह वास्तव में बादशाह था। संक्षेप में अकबर के व्यक्तित्व एवं चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(i) स्वभाव और रुचियाँ – अकबर विनोदी स्वभाव का था और सदा प्रसन्नचित रहता था। मधुर वचन बोलना उसका स्वभाव था और अहंकार एवं दम्भ से उसे घृणा थी। बच्चों से उसे असीम स्नेह था। उसका क्रोध भी अत्यन्त भयंकर था और क्रोध में वह निर्दयतापूर्ण कार्य भी कर देता था, जैसे आधम खाँ को उसने किले की दीवार पर से दो बार गिराने की आज्ञा दी थी, किन्तु साधारणत: उसका स्वभाव दयालु था तथा उसका क्रोध भी शीघ्र ही शान्त हो जाता था। वह अपने सद्व्यवहार के कारण अपने अमीरों, दरबारियों तथा प्रजाजनों में अत्यन्त लोकप्रिय था।। सम्राट को आखेट में विशेष अभिरुचि थी। वह जंगल में भयंकर-से-भयंकर शेर, चीते तथा हाथी का शिकार करता था। हाथियों के युद्ध तथा पोलो खेलने का उसे अत्यधिक शौक था। अकबर साहसी, धैर्यवान, कठोर परिश्रमी तथा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। पराजित शत्रु के प्रति वह मानवोचित उदार व्यवहार करने में विश्वास रखता था, किन्तु विरोधियों के प्रति वह उतना ही कठोर भी हो जाता था और उन्हें कभी क्षमा नहीं करता था।

(ii) मानसिक गुण – अकबर यद्यपि स्वयं विद्वान नहीं था (सम्भवतः वह निरक्षर था), तथापि उसका व्यवहारिक ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। उसकी व्यवहारिक बुद्धि का लोहा सभी लोग मानते थे। अकबर साहित्य का बड़ा प्रेमी था तथा दूर-दूर के देशों के विद्वान उसके दरबार में आश्रय प्राप्त करते थे। उसके नवरत्नों में अधिकतर विद्वान व्यक्ति ही सम्मिलित थे। अकबर ने एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण करवाया था, जिसमें लगभग 24,000 हस्तलिखित पुस्तकें संगृहीत थीं। तर्क करने में वह इतना कुशल था कि उसको तर्क करते देखकर कोई उसके निरक्षर होने पर विश्वास ही नहीं कर सकता था।

(iii) कला प्रेमी – अकबर को केवल साहित्य से ही नहीं, वरन् ललित कलाओं से भी यथेष्ट अनुराग था। सु-लेखन कला, संगीतकला, भवननिर्माण कला, चित्रकला सभी को उसने राजाश्रय प्रदान किया था और उच्चकोटि के कलाकारों को सम्मानित किया था। वह कलपुर्जा का विशेषज्ञ भी था तथा उसने एक ऐसे यन्त्र का निर्माण किया था, जिससे 17 तोप के गोलों को एक साथ दागा जा सकता था।

(iv) धार्मिक उदारता – अकबर के चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसकी धार्मिक उदारता एवं सहिष्णुता थी। उसने सभी धर्मों के साथ दया, सहानुभूति एवं समानता का व्यवहार किया। वह निष्ठावान तथा ईश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति था, किन्तु उसके धार्मिक विचार संकीर्ण न होकर व्यापक थे, जिनका अन्तिम परिणाम दीन-ए-इलाही’ के रूप में प्रस्फुटित हुआ था।

(v) साहित्य का संरक्षक – अकबर गुणग्राही सम्राट था। वह विद्यानुरागी और साहित्य-प्रेमी बादशाह था। उसने विद्वानों, कवियों, लेखकों और साहित्यकारों को उदारता से आश्रय प्रदान किया। इस राज्याश्रय के परिणामस्वरूप अकबर के शासनकाल में उत्कृष्ट ग्रन्थों की रचना हई। इनमें ऐतिहासिक ग्रन्थ, अनवाद के ग्रन्थ और काव्य-ग्रन्थ है। ऐतिहासिक ग्रन्थों में मुल्ला दाउद की तारीख-ए-अल्फी’, बदायूँनी का मुन्तखब-उत-तवारीख’, निजामुद्दीन अहमद का तबकात-एअकबरी’ तथा शेख अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ और ‘आइने-अकबरी’ प्रमुख हैं। उसके काल में संस्कृत, तुर्की, अरबी में लिखे कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद भी किया गया। अकबर के दरबार के ही गिजाली, फैजी, मुहम्मद हुसैन नजीरी, सैयद जमालुद्दीन उर्फी और अब्दुर्रहीम खानखाना ने अनेक काव्य-ग्रन्थों की रचना की।

(vi) शारीरिक गठन, वेशभूषा एवं खानपान – अकबर मझले कद का व्यक्ति था और उसका रंग गेहुंआ था। ऊँचा ललाट, लम्बी भुजाएँ, विशाल वक्षस्थल, सीधी नाक के बाईं ओर सौभाग्य का चिह्न (मस्सा), चमकीले नेत्र, सुदृढ़ तथा निरोग शरीर आदि लक्षण उसे एक सम्राट बना देने के लिए पर्याप्त थे। उसके अंग-प्रत्यंग से उसका महान व्यक्तित्व झलकता था। वह केवल मूंछे रखता था तथा दाढ़ी उसने मुंडवा दी थी। उसकी आवाज तेज और कड़कती हुई थी। वह कठोर परिश्रमी था। एक बार वह एक रात और एक दिन में आगरा से अजमेर तक 240 मील घोड़े पर सवार होकर चला गया था। घड़सवारी का उसे विशेष शौक था। वह बहमल्य वस्त्र धारण करता था और जरी के काम के सन्दर रेशमी वस्त्र तथा रत्नाभूषणों से सुसज्जित पगड़ी पहनता था। अकबर फलों का बहुत शौकीन था। उसने अपनी हिन्दू रानियों का दिल न दुखाने के लिए गो-मांस खाना बन्द कर दिया था, परन्तु सप्ताह में दो बार वह मांस-भक्षण करता था। युवावस्था में वह मद्यपान भी करता था किन्तु बाद में उसने इसका परित्याग कर दिया था। वह पीने के लिए गंगाजल का प्रयोग करता था।

(vii) हँसमुख एवं प्रसन्नचित्त सम्राट – स्वस्थ मनोरंजन अकबर को प्रिय था। फतेहपुर सीकरी में अनेक ऐसे स्थल निर्मित किए गए थे, जहाँ चिन्ताओं से मुक्त होकर सम्राट आमोद-प्रमोद में समय व्यतीत करता था।

(viii) प्रजावत्सल सम्राट- अकबर एक प्रजावत्सल सम्राट था। यद्यपि वह निरंकुशता में विश्वास रखता था तथापि उसकी निरंकुशता प्रजाहित पर आधारित थी, स्वेच्छाचारिता पर नहीं। वह दिन-रात प्रजा के हित के कार्यों में व्यस्त रहता था तथा उसके काल में उसकी प्रजा सुखी व समृद्ध थी। वह न्यायप्रिय था और न्याय के समय सबको समान समझता था। योग्यता तथा प्रतिभा का वह आदर करता था तथा उच्च पदों पर वह योग्य व्यक्तियों को ही नियक्त करता था। सारांश यह है कि अकबर बहुमुखी प्रतिभा वाला सम्राट था। वह कठोर परिश्रमी, उत्साही, धैर्यवान, साहसी, सहिष्णु, उदार, प्रजावत्सल, साहित्य एवं कला का पारखी, राजनीतिज्ञ, गुणग्राही, जिज्ञासु तथा दयावान सम्राट था। उसका स्वभाव नम्र एवं शिष्ट, उसकी बुद्धि कुशाग्र, स्मरण शक्ति विलक्षण तथा उसके आदर्श ऊँचे थे। इन्हीं कारणों से भारत के इतिहास में उसे अत्यन्त उच्च स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 9.
अकबर मुगल शासकों में सर्वश्रेष्ठ भारतीय शासक था’ इस कथन के आलोक में अकबर का मूल्याकंन कीजिए।
उतर.
अकबर मुगल शासकों में सर्वश्रेष्ठ, भारतीय शासकों में महान् और विश्व के शासकों में एक श्रेष्ठ और सम्मानित पद का अधिकारी है। लेनपूल ने उसे भारत के बादशाहों में सर्वश्रेष्ठ बादशाह’ तथा उसके युग को ‘मुगल साम्राज्य का स्वर्णकाल कहा। इतिहासकार स्मिथ जो कई दृष्टिकोणों से अकबर की आलोचना करता है, इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि वह मनुष्यों का जन्मजात बादशाह था।’ इतिहास के सर्वशक्तिशाली बादशाहों में से एक होने का उसका न्यायपूर्ण अधिकार है।

अकबर का व्यक्तित्व सुन्दर और प्रभावशाली था। वह एक आज्ञाकारी पुत्र, प्रिय पति और आदरणीय पिता था। वह अबुल फजल की मृत्यु पर बहुत रोया था और दो दिन तक उसने भोजन ग्रहण नहीं किया था। वह शिक्षित न था, परन्तु उसने विद्वानों को सम्मान और आश्रय दिया। उसने एक पुस्तकालय बनाया, जिसमें 24,000 ग्रन्थ थे। उसे खेलकूद और शिकार का शौक था। कठोर परिश्रम करने तथा कठिनाइयों को बर्दाश्त करना उसका स्वभाव था। उसमें साहस और धैर्य कूट-कूटकर भरा हुआ था। वह धार्मिक दृष्टि से अपने युग का प्रवर्तक था। अकबर भी शराब, अफीम आदि मादक द्रव्यों का सेवन करता था परन्तु वह उनका आदी न था। अकबर ने तत्कालीन अन्य शासकों की भाँति बहुत विवाह किए थे। उसके हरम में करीब 5000 स्त्रियाँ थीं और उनमें उसकी रखैलों की संख्या भी बहुत रही होगी परन्तु जैसा कि प्रति सप्ताह मीना बाजार लगाकर सुन्दर स्त्रियों को खोजना और बीकानेर के पृथ्वीराज राठौर की पत्नी के शील पर आक्रमण करने की चेष्टा आदि किंवदन्तियाँ ठीक प्रतीत नहीं होती।

अकबर एक कुशल और प्रतिभाशाली सेनापति था। उसने सेनापति के रूप में अनेक सैनिक अभियानों में सफलता प्राप्त की। गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए वह जिस तीव्र गति से गया था, वह एक ऐतिहासिक सैनिक अभियान माना गया है। उसके समय में मुगलई सेना अजेय बन गई। संगठन और युद्ध नीति दोनों ही इसके लिए उत्तरदायी थीं और अकबर का इसमें बहुत बड़ा हाथ था। एक शासन-प्रबन्धक की दृष्टि से अकबर में मौलिकता एवं व्यवहारिकता दोनों ही थीं। अकबर के शासन की एक मुख्य विशेषता यह थी कि उसने साम्राज्य के शासन-सूत्र को एक धागे में पिरो दिया था, जिससे मुगल साम्राज्य राजनीतिक स्थायित्व प्राप्त कर सका। एक शासक और राजनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर की धार्मिक उदारता की नीति और राजपूत नीति अद्वितीय थी।

निश्चय ही अकबर ने भारत की सांस्कृतिक एकता की उन्नति के लिए प्रयत्न किए। फारसी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया और विभिन्न भाषाओं के श्रेष्ठ ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया। इसी प्रकार अकबर ललित कलाओं की विभिन्न पद्धतियों में समन्वय स्थापित करने में सफल हुआ। चित्रकला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में इस समय किए गए नवीन प्रयोगों ने भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया।

अकबर ने अनेक सामाजिक कुरीतियों के निराकरण के प्रयास किए। दास प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह, वृद्ध विवाह आदि को रोकने का प्रयत्न किया। अकबर ने जिन उदार और नवीन सिद्धान्तों को जन्म दिया वे इतिहास में दर्ज करने योग्य हैं। उसने हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का प्रयत्न किया। यद्यपि वह इस दिशा में अधिक सफल नहीं हो सका, परन्तु वह पहला मुस्लिम शासक था जिसने इस आवश्यकता को समझा और उसके लिए ठोस कदम उठाए। उसकी राजपूत एवं धार्मिक नीति हमारे कथन की पुष्टि करती हैं। उसकी न्यायिक प्रणाली भी इस सन्दर्भ में विचारणीय है। अकबर की नीति, भावना और प्रयत्न उसे एक राष्ट्रीय शासक के निकट ला खड़ा करते हैं।

इस प्रकार अकबर का चरित्र उदार और प्रभावशाली था। एक व्यक्ति, एक विजेता, एक शासक, एक राजनीतिज्ञ और एक बादशाह की दृष्टि से उसका जीवन सफल और प्रेरणा प्रदान करने वाला था। इसी कारण अकबर को ‘महान’ की पदवी से विभूषित किया गया है। डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव का मानना है कि “अकबर मध्ययुगीन भारत का सबसे महान् सम्राट था और वास्तव में इस देश के सम्पूर्ण इतिहास में सर्वश्रेष्ठ शासकों में से एक था।”

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 10 Environmental Psychology

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 10
Chapter Name Environmental Psychology
(पर्यावणीय मनोविज्ञान)
Number of Questions Solved 62
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 10 Environmental Psychology (पर्यावणीय मनोविज्ञान)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरणीय मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
पर्यावरणीय मनोविज्ञान की विशेषताएँ लिखिए।(2015)
उत्तर

भूमिका
(Introduction) 

पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Evironmental Psychology) मनोविज्ञान की नवीनतम शांखा है। इसका विकास बीसवीं सदी के सातवें दशक उत्तरार्द्ध और आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में हुआ। इसकी पृष्ठभूमि में विश्व के जागरूक वैज्ञानिकों एवं सामाजिक चिन्तकों की पर्यावरण-प्रदूषण से उत्पन्न मानव अस्तित्व के संकट के प्रति बढ़ती हुई जागरूकता भी। इस संकट से उबरने के उपायों की खोज ने पर्यावरणीय मनोविज्ञान के विकास को गति प्रदान की है। पर्यावरणीय संकट एक वस्तुस्थिति है। जिसने इस पृथ्वी पर जीवन समर्थक शक्तियों का तीव्र ह्रास कर दिया है, जिससे मानव-जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। इसलिए पर्यावरणीय मनोविज्ञान का महत्त्व स्वयं सिद्ध हो गया है।

पर्यावरणीय मनोविज्ञान : अर्थ एवं परिभाषा
(Environmental Psychology: Meaning and Definition)

‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ यदि हम देखें तो यह दो शब्दों से मिलकर बना है-‘पर्यावरण एवं ‘मनोविज्ञान’। पर्यावरण से अर्थ उस सब-कुछ से है जो मनुष्य को चारों ओर से घेरे हुए है और मनुष्य के तन-मन एवं व्यवहार को प्रभावित करता है। पर्यावरण’ की शब्दोत्पत्ति ही परि’ (चारों ओर से) + ‘आवरण’ (घेरे हुए होना) है। इस दृष्टि से ‘पर्यावरण’ एक व्यापक शब्द है। मनुष्य के कुल पर्यावरण में प्राकृतिक (Natural) तथा सामाजिक-सांस्कृतिक (Socio-cultural) दोनों ही भाग सम्मिलित हैं। प्राकृतिक पर्यावरण जल, वायु, तापमान, भूमि की बनावट तथा भूगर्भीय संरचना एवं प्रक्रियाएँ और सम्पदाएँ अर्थात् वे सभी प्राकृतिक बल सम्मिलित हैं जो अभी तक मनुष्य के संकल्प और नियन्त्रण से बाहर हैं। जो कुछ मानव द्वारा निर्मित, संचालित और नियन्त्रित है, वह उसका सामाजिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण है। ”

मनुष्य स्वयं प्रकृति का एक अंश है। वह जल, वायु, आकाश, अग्नि तथा पृथ्वी; अर्थात् पंचतत्त्वों का एक पुतला है; अतः इसका प्राकृतिक पर्यावरण से प्रभावित होना स्वाभाविक है, किन्तु वह प्रकृति के हाथ में नि:सहाय और निष्क्रिय खिलौना नहीं है। उसने अपने जागरूक प्रयासों से प्राकृतिक बाधाओं पर विजय पाने और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से अपने लिए सुख-सुविधा के साधनों के विकास का प्रयास किया है। मानव-सभ्यता की कहानी का अधिकांश तथ्य मनुष्य की प्रकृति पर विजय है, लेकिन इस सभ्यता के विकास ने विपरीत परिणाम भी दिये हैं। भौतिक सुख की चाह ने प्राकृतिक सन्तुलन में व्यवधान पहुँचाया है और पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। वास्तव में, मानव अपने कुल पर्यावरण की उपज है। वह उसका भाग भी है। यदि उसके व्यवहार ने पर्यावरण सन्तुलन को बिगाड़ा है। तो उसका व्यवहार ही पर्यावरण सन्तुलन को पुनस्र्थापित करने में सक्षम हो सकता है।

मनोविज्ञान मनुष्य की अन्तश्चेतना का व्यवस्थित अध्ययन है। यह मनुष्य के मानसिक जगत् की प्रक्रियाओं का व्यवस्थित अध्ययन है। मनुष्य का अस्तित्व वस्तुतः भावात्मक प्रवाह है। यह प्रवाह त्रिआयामी है—ज्ञानात्मक (Cognitive), भावात्मक (Affective) एवं क्रियात्मक (Conative or Psychomotor activity)। पर्यावरण के किसी भी अंश के प्रति वह अपनी प्रतिक्रिया इन तीनों ही रूपों में अभिव्यक्त करता है। इसी भाँति, उसके प्राकृतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण का प्रत्येक संघटक उसके ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक व्यवहार को प्रभावित करता है।

अँधेरे में आँखों की पुतली फैल जाती है तो प्रकाश में सिकुड़ जाती है, शाकाहारी समाज में पला व्यक्ति मांस की दुकान के पास से गुजरने-मात्र से वितृष्णा अनुभव करता है, उसे मितली आने लगती है, जबकि मांसाहारी परिवेश में पले व्यक्ति के मुँह में मांसाहारी भोजन को देखकर लार आ सकती है। | स्पष्ट है कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही पर्यावरण मनुष्य के मानसिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। मनोविज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जो मनुष्य के मानसिक व्यवहार के रहस्य के पर्दो को उठाने का प्रयास करती है। | इस भाँति पर्यावरणीय मनोविज्ञान को हम मनुष्य के मानसिक व्यवहार तथा पर्यावरण के बीच अन्तर्सम्बन्ध के अध्ययन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।

विभिन्न विद्वानों ने पर्यावरणीय मनोविज्ञाम् की परिभाषा निम्नलिखित रूप से की है ।

(1) प्रोशैन्सकी, लिट्रेलसन तथा रिवलिन के अनुसार, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान वह है जो पर्यावरणीय मनोवैज्ञानिक करते हैं।’यह परिभाषा सरल तो है, किन्तु पर्यावरणीय मनोविज्ञान की विषय-वस्तु को स्पष्ट नहीं करती और इसका एक अस्पष्ट अर्थ दान करती है।

(2) हेमस्ट्रा तथा मैकफारलिंग का कथन है, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो मानव-व्यवहार तथा भौतिक वातावरण के परस्पर सम्बन्धों का अध्ययन करती है।”

इन विद्वानों के दृष्टिकोण के अनुसार पर्यावरणीय मनोविज्ञान का अर्थ सीमित हो जाता है, क्योंकि ये मनुष्य के पर्यावरण के केवल प्राकृतिक पक्ष तथा मानव-व्यवहार के पारस्परिक सम्बन्ध तक ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र को सीमित कर देते हैं।

(3) फिशर के अनुसार, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान व्यवहार तथा प्राकृतिक एवं निर्मित पर्यावरण के बीच अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन करता है। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि मानवीय व्यवहार तथा प्राकृतिक एवं मानव निर्मित पर्यावरण के पारस्परिक प्रभावित होने के व्यवस्थित अध्ययन को पर्यावरणीय मनोविज्ञान कहा जाता है।

(4) कैटर तथा क्रेक पर्यावरणीय मनोविज्ञान की सही परिभाषा करते हुए लिखते हैं, पर्यावरणीय मनोविज्ञान विज्ञान का वह क्षेत्र है जो मानवीय अनुभवों और क्रियाओं तथा सामाजिक एवं भौतिकी पर्यावरण के प्रासंगिक पक्षों में होने वाले व्यवहारों तथा अन्तक्रियाओं का संयोजने और विश्लेषण करता है। स्पष्ट है कि इन विद्वानों के अनुसार मनुष्य के कुल पर्यावरण एवं मानवीय व्यवहार के बीच अन्तर्सम्बन्धों का आनुभविक अध्ययन ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान है।

पर्यावरणीय मनोविज्ञान की विशेषताएँ
(Salient Features of Environmental Psychology)

वास्तव में, किसी भी विषय का अनूठापन उसके दृष्टिकोण में निहित होता है। यही उसे अन्य विषयों से अलग करता है। पर्यावरणीय मनोविज्ञान का दृष्टिकोण अथवा उसकी रुचि मानव-व्यवहार और उसके कुल पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों को जानने में है। यही चयनशील रुचि उसे अन्य विज्ञानों से पृथक् करती है और उसकी निजी विशेषताओं को जन्म देती है। पर्यावरणीय मनोविज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

(1) मनुष्य का पर्यावरणीय व्यवहार इकाई रूप है- पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनुष्य के पर्यावरणीय व्यवहार को एक इकाई के रूप में मानकर अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए यह किसी नगरवासी के पर्यावरणीय व्यवहार में केवल उद्दीपक और अनुक्रिया को ही स्पष्ट नहीं करेगा, बल्कि उस व्यक्ति के सौन्दर्यबोध की अनुभूति को भी इस स्पष्टीकरण में सम्मिलित करेगा। वह जानने का प्रयास करेगा कि उस व्यक्ति ने उस विशिष्ट उद्दीपक को पर्यावरणीय दृष्टि से क्या अर्थ प्रदान किया है? उसके पिछले अनुभव क्या रहे हैं? उस स्थिति के पर्यावरण में उसने किन विशेषताओं  पर विशेष रूप से ध्यान दिया है-आदि।

(2) व्यवस्था उपागम- मनोविज्ञान की इस शाखा की मान्यता है कि कोई पर्यावरणीय व्यवहार एक समग्र सैटिंग (Setting) या मंच के रूप में होता है। मान लीजिए हम किसी सहभोज में आमन्त्रित हैं। वहाँ पण्डाल में भोजन की मेजें सजी हैं और काफी भीड़-भाड़े है। वहाँ की सजावट, रोशनी की व्यवस्था सभी कुछ हमें प्रभावित करेगा। हम पाएँगे कि भीड़-भाड़ के बावजूद भी व्यक्ति अपनी प्लेट में रुचि के अनुकूल खाने की सामग्री लेकर अलग-अलग छोटे-छोटे समूहों में बँट जाते हैं।

वे भोजन करते समय भी परस्पर परिचय, अभिवादन, संवाद और अन्तक्रिया करते हैं। उसे पूरी सैटिंग से उनका व्यवहार प्रभावित होता है। सहभोज में एक व्यक्ति का व्यवहार इस पूरी पर्यावरणीय सैटिंग से पृथक् करके नहीं समझा जा सकता। इसे ही तकनीकी भाषा में व्यवस्था उपागम’ (System Approach) कहा गया है, जिसमें व्यवहार-स्थल की प्रत्येक इकाई को ध्यान में रखकर किसी एक इकाई के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।

(3) अन्तःअनुशासित दृष्टिकण- स्वभावतः ही , पर्यावरणीय मनोविज्ञान अन्री:अनुशासित (Inter-disciplinary) होता है। इसमें संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, प्रेरक, उद्दीपक व अनुक्रिया सदृश मनोविज्ञान के संप्रत्ययों का प्रयोग होता है। इतना ही नहीं वरन् इसमें समाजशास्त्र के सामाजिक सम्बन्ध, सामाजिक क्रिया, अन्तक्रिया, भीड़-व्यंत्रहार जैसे—सम्प्रत्ययों का भी प्रयोग होता है। मानवशास्त्र के सांस्कृतिक सम्प्रत्ययों; जैसे—प्रथा व रूढ़ि आदि का भी इसमें सहयोग लिया जाता है। कारण स्पष्ट है कि मानव का पर्यावरणीय व्यवहार अपने समग्र पर्यावरण से प्रभावित होता है, न कि केवल उसके प्राकृतिक पक्ष से। उदाहरण के तौर पर बुजुर्ग और सम्मानित व्यक्तियों की उपस्थिति में किसी भी व्यक्ति का व्यवहार वैसा नहीं होता है जैसा कि वह अपने हम उम्र साथियों के बीच होने पर करता है। इसी भाँति भीड़ में सामूहिक उत्तेजना और निजी उत्तरदायित्व की भावना की अनुपस्थिति व्यक्ति के व्यवहार को असामान्य बना देती है। वह ऐसा व्यवहार कर बैठता है जैसा अकेला होने पर वह शायद कभी न करता। अतः पर्यावरणीय व्यवहार का अध्ययन अन्त:अनुशासनिक दृष्टिकोण के प्रयोग को अनिवार्य बना देता है।

(4) समस्या समाधान हेतु रचनात्मक उपाय– पर्यावरणीय मनोविज्ञान का व्यावहारिक पक्ष उतना ही महत्त्व रखता है जितना कि सैद्धान्तिक पक्ष; क्योंकि पर्यावरणीय मनोविज्ञान का मूल उद्देश्य पर्यावरणीय व्यवहार से उत्पन्न समस्याओं का निदान अथवा समाधान होता है। उससे आशा की जाती है कि वह पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक उपाय सुझाएगा।

(5) सामाजिक- मनोवैज्ञानिक तत्त्वों का प्रभाव पर्यावरणीय मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान के बीच न सिर्फ समानता है अपितु घनिष्ठ सम्बन्ध भी है। मनुष्य का पर्यावरणीय व्यवहार उसके सामाजिक-मनोवैज्ञानिक तत्त्वों से अत्यधिक प्रभावित होता है और उन्हीं के वशीभूत होकर व्यक्ति एक ही पर्यावरणीय उद्दीपक के प्रति विभिन्न अनुक्रियाएँ करता है। उदाहरणार्थ-सूअर पालने वाले व्यक्तियों के लिए गन्दगी का पर्यावरण सहयोगी हो सकता है, किन्तु अन्य व्यक्तियों के लिए वह स्थिति असहनीय हो सकती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान के बीच परस्पर आदान-प्रदान का सम्बन्ध है।

(6) पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक संश्लेषणात्मक विज्ञान है- पद्धतिशास्त्र की दृष्टि से पर्यावरणीय मनोविज्ञान’को एक संश्लेषणात्मक विज्ञान (Synthetic Science) कहा जा सकता है। इसकी पद्धतिशास्त्रीय के उपागम संकलक (Electic) होता है। वह किसी एक कारक को निर्णायक की भूमिका प्रदान नहीं कर सकता, वह वह तो अनेक विज्ञानों के निष्कर्षों का लाभ उठाता है। इसी प्रकार वह विभिन्न अनुसन्धान पद्धतियों का प्रयोग करता है। उसका दृष्टिकोण है कि विभिन्न स्रोतों से विचार और जानकारी आने दो, उनका संचालन करो और फिर व्यवस्थित रूप से पर्यावरणीय संश्लेषण प्रस्तुत करो।

प्रश्न 2
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के स्वरूप तथा उसकी प्रकृति का विवेचन कीजिए।
उत्तर
ज्ञान की प्रत्येक शाखा के सम्बन्ध में यह एक जिज्ञासा सदा से ही उभरी है कि उसका यथार्थ स्वरूप या प्रकृति क्या है? उसे विज्ञान की श्रेणी में रखा जाये अथवा कला की श्रेणी में? वैज्ञानिक निष्कर्ष जबकि कला में व्यवहार या निषपत्ति का पक्ष प्रबल होता है। दूसरे शब्दों में, विज्ञान में सैद्धान्तिक पक्ष और कला में व्यावहारिक पक्ष शक्तिशाली होता है। अब हम बारी-बारी से पर्यावरणीय मनोविज्ञान के वैज्ञानिक एवं कलात्मक स्वरूपों का अध्ययन करेंगे।

पर्यावरणीय मनोविज्ञान का स्वरूप 

पर्यावरणीय मनोविज्ञान के स्वरूप की विवेचना हमें दो प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है—एक, क्या यह विज्ञान की आदर्श कसौटी पर एक विज्ञान कहा जा सकता है? और दूसरे, यदि यह विज्ञान है तो उसे किस प्रकार का विज्ञान कहा जाये अर्थात् विज्ञान के रूप में उसकी पृथक पहचान बनाने वाली विशेषताएँ कौन-सी हैं? दोनों प्रश्नों का संक्षिप्त विवेचन अग्रलिखित रूप में किया जा रहा है

(I) पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक विज्ञान है।
यह तो सर्वविदित है कि विज्ञान अन्तर्वस्तु या विषय-वस्तु में नहीं होता, वह तो किसी भी विषय-वस्तु के अध्ययन करने के तरीकों में निहित होता है। यही कारण है कि भूगर्भशास्त्र, खगोलशास्त्र, मनोविज्ञान, जीवविश्न, भौतिक विज्ञान आदि अलग-अलग विषयों का अध्ययन करते हुए भी विज्ञान कहलाते हैं; क्योंकि उनके अध्ययन की पद्धति समान है और उनके अध्ययनों से प्राप्त निष्कर्षों की गुणात्मकता भी समान हैं वैज्ञानिक पद्धति तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण, विश्लेषण, निर्वजन और सामान्यीकरण पर आधारित है। यह तथ्यात्मक अध्ययन है, व्यवस्थित अध्ययन है।

अत: विज्ञान के निष्कर्ष सामान्य, निश्चित, कार्य-कारण सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाले तथा भविष्यकथन करने वाले होते हैं। विज्ञान किसी भी प्रघटना के सम्बन्ध में तीन प्रश्नों का उत्तर खोजना है-क्या है? कैसे है? और क्यों है? इन प्रश्नों के उत्तर के रूप में उपलब्ध ज्ञान को व्यवहार में लागू करके कैसे मानव-व्यवहार, व्यक्तित्व और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है-यह विज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है। इसी कारण इसे व्यावहारिक विज्ञान (Applied Science) कहते हैं। भौतिकशास्त्र विशुद्ध विज्ञान है तो इलेक्ट्रिक इन्जीनियरिंग या इलेक्ट्रॉनिक्स उसका व्यावहारिक विज्ञान है।

उपर्युक्त पृष्ठभूमि में पर्यावरणीय मनोविज्ञान को यदि परखा जाये तो निश्चित ही उसे हम विज्ञान की श्रेणी में रखेंगे। इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

(1) अन्तर्सम्बन्धों का यथार्थवादी अध्ययन- पर्यावरणीय मनोविज्ञान; पर्यावरण और मनुष्य के व्यवहार के बीच अन्तर्सम्बन्धों का यथार्थवादी अध्ययन है। यह इस अन्तर्सम्बन्ध कि ‘क्या है?’-को तथ्यात्मक विवेचन है। यह तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण, विश्लेषण और सामान्यीकरण पर आधारित है।

(2) कार्य-कारेण की व्याख्या- यह विज्ञान पर्यावरण और मनुष्य के व्यवहार के बीच अन्तक्रिया की कार्य-कारण व्याख्या प्रस्तुत करता है। उदाहरणार्थ-यह व्यक्ति-व्यक्ति के बीच दूरी (Personal space) जैसे सूक्ष्म पर्यावरणीय प्रघटना का भी अध्ययन करता है। चारों ओर भीड़ से घिरे नेता या अभिनेता की व्यवहार बिल्कुल अलग होता है। हम अपने बड़ों या सम्मानित व्यक्तियों से कुछ दूरी से बात करते हैं; जबकि बच्चा हमारे समीपतम आ सकता है और वह हमें अच्छा लगेगा, बुरा महसूस नहीं होगा। इस प्रकार से एक ही मेज पर खाने वाले दो व्यक्तियों के बीच अचेतन रूप से मेज के ‘स्पेस’ (Space) का बँटवारा हो जाता है। कोई भी उन अचेतन सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करता क्योकि वह अशिष्टता या आक्रामकता ही मानी जाएगी।

(3) एक सामाजिक विज्ञान- पर्यावरणीय मनोविज्ञान ऐसे निष्कर्षों पर पहुँचने का प्रयास करता है जिन पर स्थान या समय की सीमा लागू नहीं होती अर्थात् वे सामान्य रूप से हर जगह घटित होते हैं। इतना अवश्य ही कहा जा सकता है कि वे उतने सामान्य ठोस और भविष्यवाणी योग्य नहीं होते जितने कि प्राकृतिक विज्ञानों के निष्कर्ष। कारण स्पष्ट है-उनके अध्ययन-विषय चेतन, संकल्पशील और प्रतिक्रियाशील मनुष्य हैं, वे कोई निर्जीव प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं। अत: पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक विज्ञान नहीं।

(4) प्रयोगशालीय पद्धति का प्रयोग- पर्यावरणीय मनोविज्ञान नियन्त्रित अवस्था में प्रयोगशालीय पद्धति का भी प्रयोग करता है। उदाहरणार्थ-सघनता (Density) तथा व्यवहार के परस्पर सम्बन्धों को जानने के लिए अनुसन्धानकर्ताओं ने प्रयोगशालाओं में अनेक अध्ययन किये हैं। और पाया है कि उच्च सघनता का; व्यवहार तथा संवेगों पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार तापमान और मनुष्य की कार्यक्षमता के बीच सम्बन्ध का भी प्रयोगशाला में अध्ययन किया गया है। कई शताब्दियों पूर्व अरस्तू ने कहा था कि ठण्डी जलवायु में रहने वाले लोग ज्यादा परिश्रमी, कर्मठ और जोखिम उठाने वाले होते हैं। इसी भाँति, यह भी पाया गया है कि दुर्गन्धमय वायु प्रदूषण न सिर्फ अन्य लोगों के प्रति आकर्षण को कम कर देता है वरन् छायांकन तथा चित्रकारी के प्रति अनुकूलन अभिवृत्ति को भी कम कर देता है।

(5) आदर्शात्मक पक्ष– पर्यावरणीय मनोविज्ञान का आदर्शात्मक पक्ष (Normative Aspect) भी है। इसके अध्ययनों से उन कसौटियों के निर्धारण में सहायता मिलती है जो मनुष्य के स्वास्थ्य, व्यवहार और समायोजन के लिए आदर्श पर्यावरण का निर्धारण करने में सक्षम हैं। जैसे—चिकित्सा विज्ञान स्वस्थ मर्नुष्य के आदर्श तापमान का निर्धारण 98.4°F के रूप में करता हैं। इस आदर्श से कम या ज्यादा तापमान होना अस्वस्थता का सूचक है। इसी प्रकार वह मनुष्य के व्यवहार की दृष्टि से पर्यावरणीय दशाओं में आदर्श स्वरूप का निर्धारण करने की चेष्टा करता है।

(6) व्यावहारिक विज्ञान- पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक व्यावहारिक विज्ञान (Applied science) भी है। इसका मूल उद्देश्य उन उपायों, साधनों एवं पद्धतियों का सुझाना है जिनके द्वारा पर्यावरण संरक्षण तथा पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का समाधान किया जा सके। इसका प्रमुख लक्ष्य मनुष्य को विशुद्ध बनाकर उसके वैयक्तिक और सामाजिक जीवन का क्रमागत उन्नयन है।

(7) बहु- आयामी एवं अन्तः अनुशासनिक मनोविज्ञान-जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है; एक बात पुनः ध्यान दिलाने योग्य है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान बहुआयामी और अन्त:अनुशासनिक मनोविज्ञान है। यह मनुष्य के प्राकृतिक, वैयक्तिक तथा सामाजिक पहलुओं का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से अध्ययन करता है।

(8) संकलक एवं संश्लेषणात्मक विज्ञान– अन्त में, यह भी उल्लेखनीय है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान संकलक (Electic) तथा संश्लेषणात्मक (Synthetic) विज्ञान है जो अनेक विज्ञान के विशिष्ट क्षेत्रों से तथ्य लेकर मनुष्य और उसके पर्यावरण के सम्बन्ध में व्यवस्थित ज्ञान प्रस्तुत करता है।
 इस तरह से पर्यावरण मनोविज्ञान सामान्य, कार्य-कारण का सम्बन्ध स्थापित करने वाला, सामाजिक, प्रयोगशालीय, आदर्शात्मक, व्यावहारिक, अन्तर्विज्ञानी, बहुआयामी तथा संश्लेषणात्मक विज्ञान है।

(II) पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक कला है।

किसी भी विज्ञान का स्वरूप निर्धारण करते समय कभी-कभी यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि वह विज्ञान है या कला अथवा दोनों ही है? पर्यावरणीय मनोविज्ञान के सम्बन्ध में इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि कला क्या है? कला के अर्थ को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है। मोटे तौर पर कला के अर्थ के सम्बन्ध में तीन प्रकार के मत पाये जाते हैं

(1) कला सृजनात्मक क्रिया के रूप में- कला में कल्पना का तत्त्व होता है जिसके द्वारा चित्रकार, संगीतकार, मूर्तिकार, नर्तक अथवा स्थापत्य कलाविद् अपने-अपने क्षेत्रों में सौन्दर्यमयी निष्पत्ति करते हैं।

(2) कला मनुष्य और समाज की स्थिति का यथार्थवादी प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण है- कुछ विद्वानों के अनुसार, कला समाज का दर्पण है। कलाकार जो कुछ भी मनुष्य या समाज के व्यवहार में देखता है और उससे स्पन्दित या उद्वेलित होता है, उसी को अपनी लेखनी, तूलिका, छेनी-हथौड़े या रेखांकन द्वारा विभिन्न माध्यमों से अभिव्यक्त करता है। यही कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति सिर्फ सौन्दर्यमूलक ही नहीं होती बल्कि वह वितृष्णा, वीभत्सता या कुरूप घटनाओं का भी चित्रण करता है। इस दृष्टि से कला वैयक्तिक और सामाजिक यथार्थ की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।

(3) कला आनन्दमूलक क्रिया के रूप में- आदर्शवादी विद्वान कला को उस क्रिया के रूप में परिभाषित करते हैं जो मनुष्य के हृदय में आनन्द की तरंगें उत्पन्न करती है। कला वह जो आनन्द लाये। आनन्द आत्मा का लक्षण है। इस दृष्टि से कला आध्यात्मिक साधन है। भारत में परम्परागत कला, चाहे वह किसी भी रूप में रही हो, ईश्वर की लीलाओं की अभिव्यक्ति है या ईश्वर के प्रति कलाकार के समर्पण को ही अभिप्रकाशित करती है। कला मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार करने में सहायता देती है। कलाकार कला के माध्यम से ‘स्व’ (Self) की उपलब्धि करता है।

वास्तव में, कला की उपर्युक्त परिभाषाओं से कला के कुछ सामान्य तत्त्व प्रकट होते हैं जिनके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि कोई मानवीय व्यवहार या क्रिया कला है या नहीं। कला के ये सामान्य तत्त्व अग्रलिखित हैं|

(1) कला वस्तुत: कला है, विचार नहीं। यह निष्पादन में निहित है। कला के शास्त्रीय स्वरूप का समीक्षक, आलोचक या विद्वान् वैज्ञानिक तो हो सकता है किन्तु यदि वह स्व का निष्पादन नहीं कर सकता तो वह कलाकार नहीं कहा जा सकता।

(2) कला भी व्यवस्थित क्रिया है। एक वैज्ञानिक जब अपने निष्कर्षों को शब्दों व रेखाचित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। तब उसकी निजी शैली और अभिव्यक्ति की क्षमता अलग ही प्रकट होती है, तब वह वैज्ञानिक साहित्य या साहित्यकार बन जाता है। अव्यवस्थित क्रिया कभी कला नहीं हो सकती। प्रत्येक कला का अपना वैज्ञानिक पक्ष भी है।

(3) प्रत्येक कला में कल्पना और सृजन के तत्त्व होते हैं। वे प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। यहाँ भी यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो विज्ञान में भी कल्पना और सृजन के तत्त्व मौजूद होते है।। विज्ञान का प्रारम्भ ही कल्पना से है; अतः पूर्वानुमान को परिकल्पना (Hypothesis) कहा जाता है। जेम्स वाट का यह अनुमान कि भाप में शक्ति है; प्रमाणित होने पर ऊर्जा के महान् स्रोत का सृजन हो गया।

इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि विज्ञान और कला के बीच रेखा बड़ी धुंधली-सी है। वह केवल अध्ययन-विश्लेषण के लिए बनायी गयी है। विज्ञान में सैद्धान्तिक या वैचारिक पक्ष प्रबल है, जबकि कला में क्रियात्मक, व्यावहारिक या निष्पादन सम्बन्धी पक्ष प्रबल है। वस्तुत: प्रत्येक कला का वैज्ञानिक पक्ष होता है और प्रत्येक विज्ञान का कलात्मक पहलु।

उपर्युक्त कसौटी के आधार पर निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक विज्ञान है,कला नहीं, किन्तु इसका कलात्मक अथवा व्यावहारिक पक्ष भी अत्यन्त प्रबल है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य के पर्यावरण का संवर्द्धन एवं संशोधन करना है ताकि मनुष्य का सौन्दर्य-बोध बढ़े।और उसका जीवन आनन्दमय हो सके। इस दृष्टि से पर्यावरण मनोविज्ञान एक विज्ञान भी है और एक कला भी।

प्रश्न 3
पर्यावरषा-प्रदूषण से क्या आशय है? पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूप कौन-कौन-से हैं?
पर्यावरण-प्रदूषण के प्रमुख सामान्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
पर्यावरणीय प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? (2010)

पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ 

पर्यावरण- प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है कि जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाये तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। पर्यावरण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाएगा।

पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूप

पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य रूप या भाग निम्नलिखित हैं

  1. वायु-प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण।।
    (नोट-पर्यावरण-प्रदूषण के प्रकारों का विस्तृत विवरण लघु उत्तरीय प्रश्नों के अन्तर्गत वर्णित हैं।)

पर्यावरण- प्रदूषण के प्रमुख सामान्य कारण पर्यावरण-प्रदूषण अपने आप में एक बहुपक्षीय तथा व्यापक समस्या है तथा इस समस्या की निरन्तर वृद्धि हो रही है। पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण अनेक हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषण के लिए भिन्न-भिन्न कारण जिम्मेदार हैं, परन्तु यदि पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य तथा सामान्य कारणों का उल्लेख करना हो तो अग्रलिखित कारण ही उल्लेखनीय हैं|

(1) जल-मल का दोषपूर्ण विसर्जन- पर्यावरण-प्रदूषण का सबसे प्रबल कारण आवासीय क्षेत्रों में जल-मल का दोषपूर्ण विसर्जन है। खुले शौचालयों से उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध वायु-प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान देती है। वाहित मल से जल के विभिन्न स्रोत प्रदूषित होते हैं। घरों में इस्तेमाल होने वाला जल भी विभिन्न घरेलू क्रियाकलापों से अत्यधिक प्रदूषित हो जाता है तथा नाले-नालियों के माध्यम से होता हुआ जल के मुख्य स्रोतों में मिल जाती है तथा उन्हें प्रदूषित कर देता है।

(2) घरों से विसर्जित अवशिष्ट पदार्थ- सभी घरों में अनेक ऐसे पदार्थ इस्तेमाल होते हैं जो पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि करने वाले होते हैं। उदाहरण के लिए घरों में इस्तेमाल होने वाले फिनायल, मच्छर मारने वाले घोल, डिटर्जेन्ट, शैम्पू, साबुन तथा अनेक कीटनाशक ओषधियाँ घरों से विसर्जित होकर जल, वायु तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं।

(3) निरन्तर बढ़ने वाला औद्योगीकरण- पर्यावरण प्रदूषण का एक सामान्य तथा मुख्य कारण है—निरन्तर बढ़ने वाला औद्योगीकरण। औद्योगिक संस्थानों से जहाँ एक ओर वायु-प्रदूषण होता है, वहीं दूसरी ओर उनमें इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री के अवशेष आदि वायु, जल तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक संस्थानों में चलने वाली मशीनों, सायरनों तथा अन्य कारकों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

(4) दहन तथा उसमें उत्पन्न होने वाला धुआँ– आज सभी क्षेत्रों में दहन की दर में वृद्धि हुई है। घर के रसोईघर से लेकर भिन्न-भिन्न प्रकार के वाहनों तथा औद्योगिक संस्थानों में सभी कार्य दहन द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। विभिन्न प्रकार के ईंधनों के दहन से अनेक विषैली गैसे, धुआँ तथा कार्बन के सूक्ष्म कण पर्यावरण में निरन्तर व्याप्त होते रहते हैं। ये सभी कारक वायु प्रदूषण को अत्यधिक बढ़ाते हैं। |

(5) कीटनाशक दवाओं के प्रयोग में वृद्धि– विभिन्न कारणों से आज कृषि एवं उद्यान-क्षेत्र में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग निरन्तर बढ़ रहा है। इन कीटनाशक दवाओं द्वारा पर्यावरण-प्रदूषण में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। इससे वायु, जल तथा मिट्टी तीनों ही प्रदूषित हो रहे हैं।

(6) जल-स्रोतों में कूड़ा-करकट तथा मृत शरीर बहाना- नगरीय एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के कूड़े के विसर्जन की समस्या निरन्तर बढ़ रही है। इस स्थिति में कूड़े-करकट तथा प्राणियों के मृत शरीरों को जल-स्रोतों में बहा दिया जाता है। इस प्रचलन के कारण जल-प्रदूषण में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस प्रकार से प्रदूषित होने वाला जल क्रमशः वायु तथा मिट्टी को भी प्रदूषित करता है।

(7) वनों की अधिक कटाई- पर्यावरण प्रदूषण का एक मुख्य कारण वनों की अन्धाधुन्ध कटाई भी है। वृक्ष वायु को शुद्ध करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। जब वृक्ष कम होने लगते हैं तो वायु-प्रदूषण की देर में भी वृद्धि होती है।

(8) रेडियोधर्मी पदार्थ- रेडियोधर्मी पदार्थों द्वारा भी पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। विभिन्न आणविक परीक्षणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों ने पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत अधिक वृद्धि की है। इस कारण से होने वाला पर्यावरण प्रदूषण अति गम्भीर होता है तथा इसका प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यों, अन्य प्राणियों तथा सम्पूर्ण वनस्पति-जगत पर भी पड़ता है।

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण की रोकथाम कैसे करेंगे?
उत्तर

पर्यावरणीय प्रदूषण की रोकथाम

प्रदूषण की समस्या पर विचार करने से यह स्पष्ट हो गया है कि यह एक गम्भीर समस्या है तथा इसके विकराल रूप धारण करने से मानव-मात्र तो क्या, पूरी सृष्टि के अस्तित्व को खतरा हो सकता है। इस स्थिति में बढ़ते हुए पर्यावरणीय-प्रदूषण को नियन्त्रित करना नितान्त आवश्यक है। यह सत्य है।

कि प्रदूषण का मुख्यतम स्रोत औद्योगिक संस्थान हैं, परन्तु औद्योगीकरण के क्षेत्र में हम इतना आगे बढ़ चुके हैं कि उससे पीछे कदम रखना अब सम्भव नहीं। अतः पर्यावरण के प्रदूषण को रोकने के लिए हम औद्योगिक प्रगति को नहीं रोक सकते, बल्कि कुछ अन्य उपाय करके ही प्रदूषण को नियन्त्रित करना होगा। विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को कम करने के कुछ मुख्य उपायों का संक्षिप्त परिचय अग्रवर्णित है

(1) वायु-प्रदूषण पर नियन्त्रणवायु- प्रदूषण के मुख्य स्रोत औद्योगिक संस्थान, सड़कों पर चलने वाले वाहन तथा गन्दगी हैं। अतः वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए इन्हीं स्रोतों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए अंति आवश्यक है कि औद्योगिक संस्थानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ कों नियन्त्रित किया जाए। इसके लिए दो उपाय अवश्य किये जाने चाहिए। प्रथम यह कि चिमनियाँ बहुत ऊंची होनी चाहिए ताकि उनसे निकलने वाली दूषित गैसें काफी ऊँचाई पर वायुमण्डल में मिलें और पृथ्वी पर इनका अधिक प्रभाव न पड़े। दूसरा उपाय यह किया जाना चाहिए कि औद्योगिक संस्थानों की चिमनियों में बहुत उत्तम प्रकार के छन्ने लगाये जाने चाहिए।

इन छन्नों द्वारा व्यर्थ गैसों में से सभी प्रकार के कण छनकर भीतर ही रह जाएँगे, केवल गर्म हवा एवं कुछ गैसे ही वायुमण्डल में निष्कासित हो पाएँगी, इससे प्रदूषण नियन्त्रित होगा। इसके अतिरिक्त औद्योगिक संस्थानों के अन्दर श्रमिकों को स्थानीय प्रदूषण से बचाने के लिए सभी सम्भव उपाय किये जाने चाहिए। इसके लिए संवातन की सुव्यवस्था होनी चाहिए तथा ऑक्सीजन की कृत्रिम व्यवस्था भी अवश्य होनी चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के विकेन्द्रीकरण से भी वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित किया जा सकता है। औद्योगिक संस्थानों के अतिरिक्त वायु-प्रदूषण के मुख्य स्रोत वाहन हैं; इसके लिए भी कुछ कारगर उपाय करने होंगे। सर्वप्रथम यह अनिवार्य है कि सड़क पर चलने वाला प्रत्येक वाहन बिल्कुल ठीक होना चाहिए।

उसका कार्बोरेटर तथा धुआँ निकालने वाला भाग बिल्कुल ठीक होना चाहिए; इस स्थिति में कम धुआँ तथा कार्बन मोनोऑक्साइड निकलते हैं। इसके अतिरिक्त जहाँ तक सम्भव हो सके सड़कों पर यातायात नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि चलते हुए वाहन की अपेक्षा स्टार्ट स्थिति में रुके हुए वाहन पर्यावरण का अधिक प्रदूषण करते हैं। वाहनों के धुआँ निकालने वाले पाइप के मुंह पर भी फिल्टर लगाये जाने चाहिए। पेट्रोल एवं डीजल में मिलावट को रोककर भी प्रदूषण को कम किया जा सकता है। रेलगाङ्गियों का विद्युतीकरण करके भी काफी हद तक वायु प्रदूषण को नियन्त्रित किया जा सकता है।

(2) जल-प्रदूषण पर नियन्त्रण– वायु प्रदूषण के ही समान जल-प्रदूषणों के भी मुख्य स्रोत औद्योगिक संस्थान ही हैं। जल-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए भी औद्योगिक संस्थानों की गतिविधियों को नियन्त्रित करना होगा। औद्योगिक संस्थानों में ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि कम-से-कम व्यर्थ पदार्थ बाहर निकालें तथा निकलने वाले व्यर्थ पदार्थों एवं जल को उपचारित करके ही निकाला जाए। इसके अतिरिक्त नगरीय कूड़े-करकट को भी जैसे-तैसे नष्ट कर देना चाहिए तथा जल-स्रोतों में मिलने से रोकना चाहिए। जहाँ तक घरेलू जल-मल का प्रश्न है, इसकी भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। इससे गैस एवं खाद बनाने की अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए।

(3) ध्वनि-प्रदूषण पर नियन्त्रण- ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए भी विशेष उपाय किये जाने चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो वाहनों के हॉर्न अनावश्यक रूप से न बजाये जाएँ। कल-कारखानों में जहाँ-जहाँ सम्भव हो मशीनों में साइलेन्सर लगाये जाएँ। सार्वजनिक रूप से लाउडस्पीकरों आदि के इस्तेमाल को नियन्त्रित किया जाना चाहिए। घरों में भी रेडियो, टी० वी० आदि की ध्वनि को नियन्त्रित रखा जाना चाहिए। औद्योगिक संस्थानों में छुट्टी आदि के लिए बजने वाले उच्च ध्वनि के सायरन न लगाए जाएँ। इन उपायों एवं सावधानियों को अपनाकर काफी हद तक ध्वनि प्रदूषण से बचा जा सकता है।

प्रश्न 5
‘भू-भागिता से आप क्या समझते हैं। भू-भागिता के प्रमुख प्रकारों के बारे में समझाइए। (2017, 18)
उत्तर
पर्यावरणीय मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से पर्यावरण का एक रूप अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण 
भी है। पर्यावरण के इस रूप का सम्बन्ध जनसंख्या से है। जब हम अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण की बात करते हैं तब इसके मुख्य कारकों का विश्लेषण करते हैं। ये कारक हैं—वैयक्तिक स्थान, भू-भागिता, जनसंख्या घनत्व तथा भीड़। अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण के एक महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में भू-भागिता का व्यवस्थित अध्ययन आल्टमैन ने किया है। भू-भागिता : का सम्बन्ध सम्बन्धित भू-भांग के स्वामित्व या अधिकार से है। भू-भाग अपने आप में अदृश्य नहीं होता बल्कि इसकी कुछ स्पष्ट रूप से निर्धारित सीमाएँ होती हैं। हम स्वाभाविक रूप से ही अपने आस-पास के क्षेत्र तथा अधिकार वाले भाग को अपना समझते हैं। हम सभी अपने घर को अपना भू-भाग मानते हैं।

घर के अतिरिक्त कुछ व्यक्तियों के लिए बाग-बगीचे तथा खेत-खलियान भी निजी भू-भाग के रूप में हाते हैं। भू-भागिता एक ऐसा कारक है कि कोई भी व्यक्ति अपनी भू-भागिता में अर्थात् अपने क्षेत्र में किसी अन्य व्यक्ति के बलपूर्वक प्रवेश या अतिक्रमण को कदापि सहन नहीं करता। भू-भागिता के साथ निजीत्व का भाव जुड़ा हुआ है। व्यक्ति अपनी भू-भागिता को अपने नियन्त्रण में ही रखता है। व्यक्ति के लिए घर के अतिरिक्त कुछ अन्य भू-भागिता भी महत्त्वपूर्ण है, भले ही उनके स्वरूप एवं नियन्त्रण में कुछ अन्ता है। आलमैन ने भू-भागिता के तीन वर्ग या प्रकार निर्धारित किए हैं जिन्हें उसने क्रमशः प्राथमिक भू-भाग, गौण भू-भाग तथा सार्वजनिक भू-भाग के रूप में वर्णित किया है। इन तीनों प्रकार के भू-भागों को सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) प्राथमिक भू-भाग- व्यक्ति के लिए सबसे अधिक आवश्यक एवं उपयोगी भू-भाग को आल्टमैन ने प्राथमिक भू-भाग के रूप में वर्णित किया है। प्राथमिक भू-भाग उस भू-भाग को कहा जाता है, जिसका उपयोग कोई व्यक्ति या समूह पूर्ण स्वतन्त्र रूप से करता है। घर इस वर्ग के भू-भाग को सबसे मुख्य उदाहरण है। घर के अतिरिक्त यदि व्यक्ति के अधिकार में कोई दुकान, कार्यशाला या बगीचा आदि है, तो उसे भी प्राथमिक भू-भाग की ही श्रेणी में रखा जायेगा। प्राथमिक भू-भाग के किसी अन्य व्यक्ति को प्रवेश का अधिकार नहीं होता तथा सामान्य रूप से इसे सहन भी नहीं किया जाता। किसी व्यक्ति के प्राथमिक भू-भाग में यदि कोई अन्य व्यक्ति बलपूर्वक प्रवेश करता है तो व्यक्ति उसका विरोध करता है। उसे क्रोध भी आता है तथा यह दुःख की बात होती है।

(2) गौण भू-भाग- गौण भू-भाग उस भू-भाग को कहा गया है, जिसका स्वामित्व स्पष्ट रूप से निश्चित नहीं होता। इस वर्ग के भू-भाग को कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि अनेक व्यक्ति उपयोग में लाते हैं। विद्यालय का कक्ष इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। कक्षा के अनेक छात्र होते हैं और वे किसी भी सीट पर बैठ सकते हैं तथा कमरे का उपयोग सम्मिलित रूप से करते हैं। व्यक्ति के जीवन में गौण भू-भाग का महत्त्व प्राथमिक भू-भाग की तुलना में कम होता है।

(3) सार्वजनिक भू-भाग- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है-भू-भाग का यह रूप किसी एक व्यक्ति का स्वामित्व नहीं होता। सार्वजनिक भू-भाग पर जन-साधारण का समान अधिकार होता है। इसे भू-भाग पर निजी स्वामित्व का प्रश्न ही नहीं उठता। सार्वजनिक भू-भाग के मुख्य उदाहरण हैं-पार्क, रेलवे प्लेटफॉर्म, हर प्रकार के प्रतीक्षालय तथा वाचनालय आदि। इन भू-भागों में किसी व्यक्ति का कोई स्थान आरक्षित नहीं होता। उदाहरण के लिए, पार्क में किसी भी बेंच पर कोई भी व्यक्ति बैठ सकता है। सार्वजनिक भू-भाग में किसी स्थान पर कोई व्यक्ति अपनी दावेदारी नहीं कर सकता। कानून भी इसके लिए अनुमति नहीं देता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरणीय मनोविज्ञान का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
अध्ययन की सरलता की दृष्टि से पर्यावरणीय मनोविज्ञान को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है|
(1) प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Positive Environmental Psychology)- यह पर्यावरणीय मनोविज्ञान की वह शाखा है जो मनुष्य के प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण तथा व्यक्ति के व्यवहार के मध्य अन्तर्सम्बन्ध और अन्तक्रिया का कार्य-कारण सम्बन्धी अध्ययन करती है। इस अध्ययन के आधार पर कुछ सामान्य निष्कर्षों और नियमों की स्थापना की जाती है। सामान्य नियमों की स्थापना से पूर्व निष्कर्षों की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की जाँच की जाती है।

(2) निदानात्मक पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Diagnostic Environmental Psychology)– यह पर्यावरणीय मनोविज्ञान की वह शाखा है जो पर्यावरण प्रदूषण के लक्षणों, कारणों और परिणामों का अध्ययन करती है। इसमें ज़ल, वायु, तापमान, ध्वनि एवं मृदा के प्रदूषण का समग्रवादी अध्ययन किया जाता है। प्रदूषण के लक्षणों और कारणों की खोज की जाती है। इससे उत्पन्न परिणामों को चिह्नित किया जाता है। समाधान की दिशाओं का निरूपण भी होता है।

(3) व्यावहारिक पर्यावरणीये, मनोविज्ञान (Applied Environmental Psychology)यह पर्यावरणीय मनोविज्ञान की वह शेखा है जो उन उपायों और साधनों की खोज करती है जिनके द्वारा पर्यावरण का संवर्द्धन और संरक्षण किया जाता है। यह उपर्युक्त दोनों शाखाओं के निष्कर्षों को व्यवहार में लाने योग्य बनाकर मनुष्य के पर्यावरण को सन्तुलित बनाना चाहती है। इसका उद्देश्य मानव और समाज के जीवन को कल्याणमय बनाना है।इस प्रकार पर्यावरणीय मनोविज्ञान का दृष्टिकोण समग्रवादी है। वह पर्यावरण और मानव व्यवहार के बीच अन्तक्रिया का प्रत्यक्षवादी, निदानात्मक और व्यावहारिक विज्ञान है।

प्रश्न 2
वर्तमान सन्दर्भ में मानव-व्यवहार एवं पर्यावरण के मध्य सम्बन्ध बताइए। (2012)
उत्तर
मनुष्य को प्रत्येक व्यवहार अनिवार्य रूप से पर्यावरण में ही होता है। मानव-व्यवहार तथा पर्यावरण में घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध पारम्परिक है। मानव-व्यवहार से पर्यावरण पर अनेक प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। मनुष्यों के व्यवहार एवं क्रियाकलापों ने पर्यावरण के सन्तुलन को बिगाड़ा है। तथा प्रदूषित किया है। इस प्रकार से सन्तुलित एवं प्रदूषित पर्यावरण अब मनुष्य के व्यवहार एवं जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रहा है। वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण एवं ध्वनि-प्रदूषण तो प्रत्यक्ष रूप से मनुष्यों के व्यवहार एवं जीवन पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि मानव-व्यवहार तथा पर्यावरण में अन्योन्याश्रितता का सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
जल प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर

जेल-प्रदूषण

“जल ही जीवन है।” यह पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं के लिए अति आवश्यक है। जल का मुख्य स्रोत जमीन के अन्दर नीचे की तरफ एकत्रित जल है, इसके अतिरिक्त यह नदियों, नहरों, झीलों, समुद्रों आदि से भी अप्त होता है। प्रकृति में मुख्यतया जल, वर्षा से प्राप्त होता है जो ऊपर लिखे स्रोतों में बहकर आता है। जल बहकर आता है तो अपने साथ बहुत-सारे दूषित पदार्थ भी बहा लाता है, जिनसे जल प्रदूषित हो जाता है।

जल-प्रदूषण के मुख्य कारकों में वाहित मल (Sewage), घरेलू अपमार्जक (Detergents), धूल, गन्दगी, उद्योग-धन्धों से निकले रसायन एवं उनके व्यर्थ पदार्थ, अम्ल, क्षार, तैलीय पदार्थ, लेड (Lead), मरकरी, क्लोरीनेटेड हाइड्रोकार्बन्स, अकार्बनिक पदार्थ, फिनोलिक यौगिकी, भारी धातु, सायनाइड आदि होते हैं। इनमें से कुछ चीजें बहुत अधिक विषैली होती हैं। इसी प्रकार डी० डी० टी०, कीटाणुनाशक रसायन (Pesticides), अपतृणनाशी रसायन (Weedcides) भी जल प्रदूषित करते हैं, जिनका उपयोग हम विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकोड़ों आदि को नष्ट करने में करते हैं। यह सब हानिकारक पदार्थ, खाद्य-श्रृंखला के द्वारा मनुष्यों के शरीर में एकत्रित होते रहते हैं और विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं; जैसे-स्नायु रोग, कैन्सर, टाइफॉइड, पेचिश आदि।।

प्रश्न 4
मृदा-प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर
मृदा-प्रदूषण– मिट्टी, पेड़-पौधों के लिए बहुत आवश्यक है, और पेड़-पौधे, जीव-जन्तुओं के लिए बहुत आवश्यक हैं, अत; हम कह सकते हैं कि मिट्टी सभी जीवों के लिए आवश्य है। मिट्टी में बहुत-सारे अनावश्यक पदार्थ, कूड़ा-कचरा, मल-मूत्र, अपमार्जक, धूल, गर्द, रेत, औद्योगिक रसायन, अम्ल, क्षार, तैलीय पदार्थ, कीटाणुनाशक एवं अपतृणनाशी रसायन, रासायनिक उर्वरक, डी० डी० टी० आदि विभिन्न कार्यों में उपयोगिता के कारण मृदा में एकत्रित होते रहते हैं और मृदा का प्राकृतिक सन्तुलन बिगाड़ते रहते हैं तथा पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। इनमें से कुछ पदार्थ जीवों के लिए विषैले होते हैं। ये हानिकारक पदार्थ खाद्य श्रृंखला द्वारा जीव-जन्तुओं और मनुष्य के शरीर में हानिकारक प्रभाव डालते हैं एवं मृदा प्रदूषण करते हैं।

प्रश्न 5
वायु-प्रदूषण से क्या आशय है? ।
या
वायु-प्रदूषण क्या होता है? उदाहरण द्वारा समझाइए। । (2013)
उत्तर
वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक निश्चित अनुपात में पायी जाती हैं एवं वातावरण में सन्तुलन बनाये रखती हैं। इसमें मुख्य रूप से नोइट्रोजन, ऑक्सीजन, ऑर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, नियॉन, हीलियम, हाइड्रोजन, ओजोन आदि गैसें प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त इसमें जलवाष्प, छोटे-छोटे ठोस कण, जीवाणु आदि भी होते हैं। जीव श्वसन में ऑक्सीजन लेते हैं और वातावरण में कार्बन डाई-ऑक्साइड बाहर निकालते हैं लेकिन पेड़-पौधे प्रकाश-संश्लेषण में वातावरण से कार्बन डाइ-ऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं। इससे वातावरण में ऑक्सीजन और कार्बन डाइ-ऑक्साइड का सन्तुलन बना रहता है। जब वातावरण में किसी भी बाह्य कारक के कारण (गैसों, ठोस, कणों या वाष्पकणों के कारण) या उपस्थित गैसों के अनुपात में घटत या बढ़त के कारण असन्तुलन उत्पन्न होता है तो इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 6
वायु-प्रदूषण का मानव-जीवन एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
या
वायु-प्रदूषण हमें किस प्रकार से हानि पहुँचाता है?
या
वायु-प्रदूषण के दुष्परिणामों की व्याख्या कीजिए। (2018)
उत्तर
‘वायु-प्रदूषण’ शब्द मस्तिष्क में आते ही प्रायः दुर्गन्धमय और विभिन्न गैसों से युक्त तथा धुएँ से आच्छादित वायुमण्डल का दृश्य उपस्थित हो जाता है। वस्तुतः अनेक रासायनिक पदार्थ और गैस वायु-प्रदूषण को अत्यन्त खतरनाक बना रहे हैं। उद्योगों से नि:सृत व्यर्थ पदार्थ गैसों के सन्तुलन को बिगाड़ रहे हैं। उदाहरणार्थ-कपड़ा, शराब, दवाई, कागज, सीमेण्ट, चमड़ा, रँगाई, तेलशोधक कारखाने, रासायनिक उर्वरक के कारखाने आदि ऐसे उद्योग-धन्धे हैं जो वायु-प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं।

स्वचालित वाहन भी 60% वायु-प्रदूषण के लिए उत्तरदायी हैं। इनके धुएँ में गैसे, कार्बन-कण, हाइड्रोकार्बन, ऑक्साइड आदि पदार्थ होते हैं। पेड़-पौधों की कीट-पतंगों से रक्षा और बीमारियों की रोकथाम के लिए डी० डी० टी० आदि का छिड़काव भी वायु को प्रदूषित कर देता है। स्प्रे-पेण्टिग और धातु उद्योग भी इसे प्रभावित करते हैं। वायु-प्रदूषण के मानव-व्यवहार पर प्रभावों को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है

(1) शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव वायु- प्रदूषण से आँख और नाक से पानी बहने लगता है। इसके कारण दमा-श्वास और फेफड़ों का कैन्सर जैसे रोग हो जाते हैं। स्वचालित वाहनों से निकले धुएँ और धूल से श्वसन सम्बन्धी रोग उत्पन्न हो जाते हैं जिनमें खाँसी और गले की खराश मुख्य हैं। कैडमियम, मरकरी, डी० डी० टी० पदार्थ भी खाद्य श्रृंखला या अन्य विधियों द्वारा मानव के शरीर में पहुँचकर हृदय रोग, कैंसर, स्नायु रोग, रक्तचाप, तन्त्रिका-तन्त्र के भयंकर रोग पैदा कर देते हैं।

(2) मनोरोगों में वृद्धि- शारीरिक रोगों के अतिरिक्त वायु-प्रदूषण मानसिक व्याधियों में वृद्धि का भी एक प्रमुख कारण है। कार्बन मोनो-ऑक्साइड, जो वायु-प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी कारक है, इससे सिरदर्द, मिर्गी, थकान तथा स्मृति ह्रास पैदा होते हैं। राटन तथा फ्रे ने अपने अध्ययनों में पाया कि वायु-प्रदूषण की अधिकता में मनोरोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है।

(3) कार्य-निष्पादन क्षमता में ह्रास- वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों से सिद्ध किया है कि जैसे-जैसे वायु में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है, वैसे-ही-वैसे कार्य निष्पादन की क्षमता में ह्रास होता है। चूहों पर किये गये प्रयोगों के निष्कर्ष इस बात की पुष्टि करते हैं। ग्लीनर तथा अन्य वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि वायु-प्रदूषण, वाहन चालक की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। और इससे दुर्घटनाएँ बढ़ने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।

(4) सौन्दर्यबोधक संवेगों में हास- राटन, याशिकावा तथा अन्य ने अपने अध्ययनों से सिद्ध किया है कि दुर्गन्धमय वायु-प्रदूषण छायांकन तथा चित्रकारी आदि से सम्बन्धित अभिवृत्ति को कम कर देता है। केवल इतना ही नहीं अपितु इससे अन्य लोगों के प्रति आकर्षण भी कम हो जाता है और मनुष्य की सौन्दर्यबोधक संवेदनशीलता में ह्रास आता है।

(5) बाह्य वातावरण में आयोजित सामाजिक कार्य- कलापों में कमी–प्रदूषित वायु के कारण खुले में आयोजित होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों को कम करना पड़ता है, क्योंकि उनके कारण अधिक लोग एक ही स्थान पर वायु प्रदूषण के शिकार हो जाते हैं।

प्रश्न 7
ध्वनि-प्रदूषण से क्या आशय है? ।
या
ध्वनि-प्रदूषण के लिए उत्तरदायी कारणों का विश्लेषण कीजिए। (2016)
उत्तर
वातावरण में विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न अप्रिय एवं अनचाही आवाज, जिसका हमारे ऊपर बुरा या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शोर या ध्वनि कहलाता है। यह अगर अप्रिय, असहनीय और कर्कश होता है तो वातावरण को प्रदूषित करता है और शोर या ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि-प्रदूषण मुख्यतया बड़े शहरों या औद्योगिक दृष्टि से विकसित क्षेत्र, रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप, हवाई अड्डों, भीड़-भाड़ वाले स्थानों, सभास्थलों, सिनेमाघरों, फैक्ट्री या कल-कारखानों के आस-पास ज्यादा होता है। इसके अलावा रेडियो, ट्रांजिस्टर, टी० वी०, लाउडस्पीकर, सायरन, स्वचालित वाहन (बस, ट्रक, हवाई जहाज आदि) भी ध्वनि प्रदूषण करते हैं।

ध्वनि-प्रदूषण से सुनने की क्षमता में कमी आती है, अर्थात् बहरापन होता है, मोटापा बढ़ता है, गुस्सा ज्यादा आता है, सहनशक्ति कम होती है, तन्त्रिका-तन्त्र सम्बन्धी सभी रोग होते हैं, नींद न आना, अल्सर, सिरदर्द, हृदय रोग, रक्तचाप सम्बन्धी रोग, घबराहट आदि होती है।

ध्वनि-प्रदूषण से हमारी एकाग्रता प्रभावित होती है। इसीलिए अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्कूल एवं कॉलेजों के पास यह चेतावनी लिखी होती है कि “यहाँ हॉर्न का प्रयोग वर्जित है”, “ध्वनि मुक्त क्षेत्र (Silence Zone) आदि।

प्रश्न 8
ध्वनि प्रदूषण का मानव-जीवन एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2014)
उत्तर
शोध कार्यों से पता चलता है कि ध्वनि प्रदूषण का मानव-व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रभात का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है–

(1) स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव- अत्यधिक शोर का व्यक्ति के स्नायुमण्डल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे उसकी श्रवण-शक्ति कमजोर होती है, बहरापन बढ़ता है।

(2) आक्रामकता और चिड़चिड़ेपन में वृद्धि- ब्लम तथा एजरीन नामक वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों से प्रदर्शित किया है कि अति तीव्र शोर से मनुष्य शारीरिक रूप से उद्वेलित और उत्तेजित हो जाता है, परिणामस्वरूप उसमें आक्रामकता और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।

(3) अनुक्रियात्मकता का ह्रास- कुछ विद्वानों का कहना है कि मनुष्य में अपने उद्दीपकों के साथ अनुकूलन की स्वाभाविक क्षमता होती है। इसे अभ्यस्त होना (Habituation) कहा जाता है, किन्तु ग्लास तथा अन्य ने अपने प्रयोगों में पाया कि अनुकूलन की प्रक्रिया में मनुष्य की मानसिक ऊर्जा व्यय होती है। शनैः-शनैः वह पर्यावरणीय अपेक्षाओं और कुण्ठाओं के प्रति सकारात्मक अनुक्रिया करने में अक्षम हो जाते हैं।

(4) परार्धमूलक क्रियाओं में अरुचि- मैथ्यूज तथा कैनन ने अपने अध्ययन से यह भी प्रदर्शित किया कि शान्त वातावरण में व्यक्ति दूसरों की सहायता करने के प्रति अधिक सक्रिय थे, जब कि शोरगुल के वातावरण में उन्होंने दूसरों की सहायता या सेवा-कार्य में कोई रुचि प्रदर्शित नहीं की।

(5) गर्भ-स्थिति पर कुप्रभाव-ध्वनि- प्रदूषण का गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ता है और प्रसव पीड़ादायक हो जाता है। |

(6) मानसिक प्रक्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव- ध्वनि-प्रदूषण का मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इसमें रक्तचाप (Blood pressure) बढ़ जाता है तथा अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ अधिक सक्रिय हो जाती हैं। स्पष्टतः इनका मानसिक प्रक्रियाओं पर बुरा असर पड़ेगा ही, पाचक रसों का स्राव भी कम होगा जिससे अल्सर व दमा जैसे रोगों की सम्भावना बढ़ेगी। इतना ही नहीं, इससे मनुष्य की एकाग्रता भी भंग हो जाती है जिससे अध्ययन और मनन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 9
ताप-प्रदूषण का व्यक्ति के जीवन एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2014)
या
मानव-व्यवहार पर ताप-प्रदूषण के प्रभावों की व्याख्या कीजिए। 
(2017)
उत्तर
कारखानों और स्वचालित वाहनों से निकलती गैसें व धुआँ, आणविक विस्फोटों, ओजोन के विक्षेपण तथा वनों की कमी और जुनसंख्या विस्फोट ने तापमान में निरन्तर वृद्धि की है। गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है। इसी को ताप-प्रदूषण कहा जाता है। यदि यह प्रदूषण बढ़ता गया तो पृथ्वी ग्रह मनुष्य के रहने योग्य नहीं बचेगा मानव-व्यवहार पर ताप-प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते है

(1) बौद्धिक प्रखरता पर प्रभाव- तापमान वृद्धि बौद्धिक प्रखरता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। ताप प्रदूषण में आदमी सुस्त, थका हुआ और निष्क्रिय महसूस करने लगता है, जबकि कम तापमान व्यक्ति की कुशलता में वृद्धि करता है। |

(2) गर्म-जलवायु और आक्रामक-व्यवहार– गोरान्सन तथा किंग ने अपने अनुसन्धान में पाया कि अधिकांशतः व्यावहारिक विकार गर्मी के महीनों में ज्यादा देखने को मिलते हैं। फ्रांस के सामाजिक चिन्तक दुर्णीम ने कुछ देशों के अपराधों के आँकड़ों का अध्ययन करके यह पाया कि गर्मियों में मानव शरीर के प्रति अपराध ज्यादा होते हैं; जैसे—मारपीट, हत्या, बलात्कार आदि; जबकि जाड़ों में सम्पत्ति के प्रति अपराध; जैसे-चोरी, डकैती आदि अधिक होते हैं। ग्रिफिट तथा वीच ने कमरों के तापमान में वृद्धि करके देखा कि अधिक गर्मी में रहने वाले व्यक्ति ठण्डे कमरों में रहने वाले व्यक्तियों से अधिक आक्रामक थे।

(3) चन्द्रमा की चक्रीय क्रिया का मानव- व्यवहार पर प्रभाव-यह सर्वविदित है कि समुद्र में ज्वार-भाटा चन्द्रमा, की चक्रीय क्रिया अर्थात् क्रमागत घटने-बढ़ने से आते हैं। मानव-शरीर में भी जल-विद्यमान है। वह भी चन्द्रमा के चक्रीय प्रभाव से वंचित नहीं हैं। प्राचीनकाल से ही यौन-वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन से सिद्ध किया है कि चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं का मनुष्य; विशेषकर महिलाओं की यौन-इच्छाओं, यौन-उत्तेजनाओं तथा यौन-व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है।

(4) तापमान एवं शारीरिक स्वास्थ्य- बढ़ता हुआ तापमान मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इससे अधिक चर्म रोग उत्पन्न हो जाते हैं। बहुत ठण्ड में अत्यधिक शीतप्रधान क्षेत्रों में भी मनुष्य की त्वचा विदीर्ण एवं मस्सों वाली हो जाती है।

(5) तापमान वृद्धि के सामाजिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव– तापमान वृद्धि के कुछ अप्रत्यक्ष कुप्रभाव जानने में आये हैं। इससे फसलों और पौधों को नुकसान होता है, भूमि में जल-स्तर नीचे चला जाता है, पेयजल का संकट उत्पन्न हो जाता है और समूचा सामाजिक जीवन ही अस्त-व्यस्त हो जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न1
पर्यावरण के सन्दर्भ में वैयक्तिक स्थान (Personal Space) के अर्थ को स्पष्ट कीजिए। (2014)
या
अन्त:वैयक्तिक वातावरण से आप क्या समझते हैं? (2018)
उत्तर
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में पर्यावरण तथा मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता हैं। पर्यावरण से आशय प्रायः प्राकृतिक पर्यावरण ही माना जाता है, परन्तु यथार्थ में अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण का प्रत्यय भी महत्त्वपूर्ण है। अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण में सर्वाधिक महत्त्व वैयक्तिक स्थान (Personal space) का है।

व्यक्ति के आस-पास के अदृश्य सीमा वाले उस स्थान को वैयक्तिक स्थान कहा जाता है जो सम्बन्धित व्यक्ति के ‘स्व’ के भाग के रूप में स्वीकार किया जाता है। मानव-स्वभाव के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने ‘स्व’ के भाग या क्षेत्र में किसी अन्य वैयक्तिक के प्रवेश को अतिक्रमण मानता है तथा इसका विरोध करता है।

एक उल्लेखनीय मनोवैज्ञानिक हल ने। व्यक्तिक स्थान की चार सीमाएँ या भाग निर्धारित किये हैं। ये भाग या सीमाएँ हैं-अन्तरंग दूरी, वैयक्तिक दूरी, सामाजिक दूरी तथा सार्वजनिक दूरी। वैयक्तिक स्थान को यह मान्यता जहाँ एक ओर . व्यक्तियों के मध्य महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाती है वहीं विभिन्न समूहों में भी इस अवधारणाा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

प्रश्न 2
पर्यावरण-प्रदूषण का जम-स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण- प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। जैसे-जैसे पर्यावरण का अधिक प्रदूषण होने लगता है, वैसे-वैसे प्रदूषण जनित रोगों की दर एवं गम्भीरता में वृद्धि होने लगती है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु-प्रदूषणेंके परिणामस्वरूप श्वसन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूपाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि-प्रदूषण भी तन्त्रिका-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्झन्धी विकारों को जन्म देता है। इसके साथ-ही-साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारगत सामान्यता को भी ध्वनि-प्रदूषण विकृत कर देता है। अन्य प्रकार के प्रदूषण भी जन-सामान्य को विभिन्न सामान्य एवं गम्भीर रोगों का शिकार बनाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण प्रदूषण अनिवार्य रूप से जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदूषित पर्यावरण में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आयु भी घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न रहता है।

प्रश्न 3
पर्यावरण-प्रदूषण का व्यक्ति की कार्यक्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
व्यक्ति एवं समाज की प्रगति में सम्बन्धित व्यक्तियों की कार्यक्षमता का विशेष महत्त्व होता है। यदि व्यक्ति की कार्य-क्षमता सामान्य या सामान्य से अधिक हो तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा समृद्ध बन सकता है। जहाँ तक पर्यावरण-प्रदूषण का प्रश्न है, इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की कार्यक्षमता अनिवार्य रूप से आती है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति ने तो अपने कार्य को कुशलतापूर्वक ही कर सकता है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता ही सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो तो भी उसकी चुस्ती एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त सिद्ध होता है।

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण का आर्थिक-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? ।
उत्तर
व्यक्,समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भी पर्यावरण-प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में, यदि व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है। इसके साथ-ही-साथ भी सत्य है कि यदि व्यक्ति अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य प्रदूषण का शिकार होकर किन्हीं साधारण या गम्भीर रोगों से ग्रस्त रहता है तो उसके उपचार पर भी पर्याप्त व्यय करना पड़ सकता है। इससे भी व्यक्ति एवं परिवार का आर्थिक बजट बिगड़ जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में कुप्रभावित होती है। इस कारक के प्रबल तथा विस्तृत हो जाने से समाज एवं राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है।

प्रश्न5
फ्र्यावरणीय-प्रदूषण के कारण मानव-व्यवहार पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव लिखिए।
उत्तर
पर्यावरणीय-प्रदूषण के कारण मानव-व्यवहार पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है।
  2. पर्यावरण प्रदूषण के कारण व्यक्ति के व्यवहार में चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता आ सकती है
  3. पर्यावरण-प्रदूषण के कारण व्यक्तियों में पारस्परिक आकर्षण एवं सामाजिकता का व्यवहार क्षीण पड़ सकता है।
  4. पर्यावरण-प्रदूषण के कारण व्यक्ति के व्यवहार में त्रुटियाँ अधिक होती हैं।

प्रश्न 6
ध्वनि-प्रदूषण से होने वाले किन्हीं दो दुष्प्रभावों के बारे में लिखिए। | (2014)
उत्तर
ध्वनि-प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार दोनों पर पड़ता है। ध्वनि-प्रदूषण के कारण बहरापन, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप तथा पाचन-तन्त्र सम्बन्धी रोग हो 
सकते हैं। ये रोग साधारण से लेकर अति गम्भौर तक हो सकते हैं। ध्वनि-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्तिः के स्वभाव में चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता में वृद्धि हो सकती है। इसके अतिरिक्त इस स्थिति में व्यक्ति अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने में कठिनाई अनुभव करता है। उसकी कार्यक्षमता भी कुछ घट जाती है।

प्रश्न 7
ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर
ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  1. कल-कारखानों तथा औद्योगिक संस्थानों को आवासीय क्षेत्रों से दूर स्थापित करना चाहिए।
  2. आवासीय क्षेत्रों में उच्च ध्वनि वाले लाउडस्पीकरों पर कड़ा प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  3. वाहनों की ध्वनि नियन्त्रित करने के समस्त तकनीकी उपाय करने चाहिए। ऊँची ध्वनि वाले हॉर्न नहीं लगाये जाने चाहिए।
  4. औद्योगिक शोर को प्रतिबन्धित करने के लिए यथास्थान अधिक-से-अधिक साइलेंसर लगाये जाने चाहिए।
  5. जहाँ तक सम्भव हो, मकानों को अधिक-से-अधिक ध्वनि अवरोधक बनाया जाना चाहिए।

प्रश्न 8
टिप्पणी लिखिए-पर्यावरण के सन्दर्भ में ‘जनसंख्या घनत्व। (2018)
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के अन्तर्गत पर्यावरण के सन्दर्भ में जनसंख्या-घनत्व (Density of Population) का भी अध्ययन किया जाता है। जनसंख्या के अधिक घनत्व से व्यक्तियों को । अन्त:क्रिया की विवशता का सामना करना पड़ता है। जनसंख्या के घनत्व का व्यक्ति के व्यवहार पर अनेक प्रकार से प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या घनत्व का आशये किसी क्षेत्र में जनसंख्या की सघनता से है। जनसंख्या की सधनता का सम्बन्ध सामाजिक व्याधि, अपराध दर तथा सामाजिक विघटन आदि से है। कुछ अध्ययनों में देखा गया है कि जनसंख्या के उच्च सघनता का व्यक्ति के व्यवहार तथा सवेगों पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या की सघनता का एक रूप भीड़ (crowd) भी है। भीड़ में व्यक्ति का सामान्य व्यवहार बदल जाता है। वास्तव में भीड़ में घनत्व अधिक होता है तथा सामान्य नियन्त्रण की कमी होती है; अतः व्यक्ति का व्यवहार बिगड़ जाता है।

प्रश्न 9
भीड़ का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर
जब हम अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण की बात करते हैं तब जनसंख्या सम्बन्धी एक मुख्य कारक के रूप में भीड़ की चर्चा होती है। भीड़ से आशय है-अत्यधिक जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्र। भीड़ का यह एक साधारण अर्थ है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भीड़ को स्थानीय, सामाजिक तथा वैयक्तिक कारणों से उत्पन्न एक प्रेरणात्मक अवस्था माना जाता है। पर्यावरण सम्बन्धी अन्य कारकों के ही समान भीड़ भी व्यक्ति के व्यवहार तथा जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित करती है।

भीड़ के प्रभाव से ऋणात्मक मनोभाव तथा प्रतिबल उत्पन्न होते हैं। इन प्रभावों के परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने सामान्य क्रियाकलापों को सुचारु रूप से करने में कुछ कठिनाइयाँ या असुविधा महसूस करता है। भीड़ से प्रभावित व्यक्ति अर्थात् भीड़ का हिस्सा बने व्यक्ति का निजीत्व भी बाधित होने लगता है। भीड़ से व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य एवं सामान्य व्यवहार भी प्रभावित होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I. निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए

1. पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की……………….शाखा है।।
2. पर्यावरण के प्रति …………के परिणामस्वरूप ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान का विकास | हुआ है।
3. पर्यावरण एवं मानव व्यवहार के मध्य सम्बन्धों एवं प्रभावों का अध्ययन ……….. मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया
जाता है (2011)
4. पर्यावरणीय मनोविज्ञान का सम्बन्ध मनोविज्ञान के …………….पक्ष से है।
5. मनुष्य के प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण तथा व्यक्ति व्यवहार के मध्य अन्तर्सम्बन्ध का कार्य-कारण सम्बन्धी अध्ययन करने वाली पर्यावरणीय मनोविज्ञान की शाखा को …………….. कहते हैं।
6. पर्यावरण प्रदूषण के लक्षणों, कारणों एवं परिणामों का अध्ययन करने वाली पर्यावरणीय 
मनोविज्ञान की शाखा को ……………. कहते हैं।
7. पर्यावरण के संवर्द्धन एवं संरक्षण के उपायों का अध्ययन करने वाली पर्यावरणीय मनोविज्ञान 
की शाखा को……….. कहते हैं। 8. पर्यावरणीय सूचनाएँ मनुष्य तथा ………… के बीच सन्तुलन स्थापित करने में सहायक होती हैं।
9. पर्यावरण के किसी एक या अधिक पक्षों के दूषित हो जाने को………… कहते हैं।
10. आधुनिक नगरीय-औद्योगिक समाज की मुख्य समस्या …………. है।
11. पर्यावरण प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव………….पर पड़ता है।
12. कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ से होने वाली प्रदूषण ……………….कहलाता है।
13. वायु-प्रदूषण द्वारा मानव शरीर के अंगों में ……………….. सर्वाधिक प्रभावित होते हैं (2017)
14. श्वाससम्बन्धी बीमारी ………………प्रदूषण से होती है। 
(2009)
15. पर्यावरण में शोर या ध्वनि का बढ़ जाना……………..कहलाता है। 
(2018)
16. “ध्वनि प्रदूषण प्रश्नावली का प्रयोग” …………सम्बन्धी प्रदत्तों के संग्रह के लिए किया | जाता है।
17. गन्दे नालों का पानी नदियों में छोड़ने से……….होता है।
18. पर्यावरण में तापमान में होने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में……………
 बढ़ती है।
19. यदि पर्यावरण में दुर्गन्ध बढ़ जाती है तो उस स्थिति में ………………. नहीं हो पाते।
20. दुर्गन्धयुक्त पर्यावरण में व्यक्तियों का पारस्परिक आकर्षण……………है।
21. मनुष्य द्वारा पर्यावरण में किया जा रहा कृत्रिम बदलाव मनुष्य के लिए …………….सिद्ध हो 
रहा है।
22. एक निश्चित भू-भाग में रहने वाले लोगों की संख्या को ……..कहते हैं। (2014)
23. भीड़ में घनत्व ……………एवं नियन्त्रण की ………………… होती है। (2012, 15)
24. आल्टमैन की भूभागिता के प्रकार के अनुसार प्रतीक्षालय एक भू भाग है। (2008)
25. व्यक्ति के चारों ओर की अदृश्य सीमा का वह भाग, जिसे वह अपना मानता है,………….कहलाता है। 
(2018)
उत्तर
1. नवीनतम
2. जागरूकता
3. पर्यावरणीय
4. व्यावहारिक
5. प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
6. निदान्त्यक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
7. व्यावहारिक पर्यावरणीय प्रदूषण
8. पर्यावरण
9. पर्यावरण प्रदूषण
10. पर्यावरण-प्रदूषण
11. जन-स्वास्थ्य
12. वायु-प्रदूषण
13. फेफड़े
14. वायु
15. ध्वनि-प्रदूषण
16. ध्वनि-प्रदूषण
17. जल-प्रदूषण
18. आक्रामकता
19. मनोरंजक कार्यक्रम
20. घट जाता
21. हानिकारक
22. जनसंख्या का घनत्व
23. अधिक, कमी
24. सार्वजनिक
25. वैयक्तिक स्थान।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित-उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए-

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान का विकास कब हुआ?
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान का विकास बीसवीं सदी के सातवें दशक के उत्तरार्द्ध और आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में हुआ है।

प्रश्न 2.
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि क्या थी?
उत्तर
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान के विकास की पृष्ठभूमि में विश्व के जागरूक वैज्ञानिकों एवं सामाजिक चिन्तकों की पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न मानव अस्तित्व के संकट के प्रति बढ़ती हुई जागरूकता थी।

प्रश्न 3.
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर
मनुष्य के मानसिक व्यवहार तथा पर्यावरण के बीच पाये जाने वाले अन्तर्सम्बन्ध का व्यवस्थित अध्ययन ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान है।

प्रश्न 4.
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर
हेमस्ट्रा तथा मैफ्फारलिंग के अनुसार, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक वह शाखा है जो मानव-व्यवहार तथा भौतिक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करती है।”

प्रश्न 5.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के मुख्य भागों या प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के तीन भाग या प्रकार हैं

  1. प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
  2. निदानात्मक, पर्यावरणीय मनोविज्ञान तथा
  3. व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान।

प्रश्न 6.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान को किस श्रेणी में रखा जाता है?
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान को व्यावहारिक महत्त्व का विज्ञान माना जाता है।

प्रश्न 7.
आधुनिक युग में किस कारण से पर्यावरणीय मनोविज्ञान का महत्त्व बढ़ गया है?
उत्तर
आधुनिक युग में पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि तथा पर्यावरण-सन्तुलन के बिगड़ने के कारण पर्यावरणीय मनोविज्ञान का महत्त्व बढ़ गया है।

प्रश्न 8.
पर्यावरण-प्रदूषण से क्या आशय है? ।
उत्तर
प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपाते इस रूप में बदलने लगता है, जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसे पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है।

प्रश्न 9.
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य प्रकार हैं

  1. वायु प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण। 

प्रश्न 10.
जल-प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर
जल के मुख्य स्रोतों में दूषितं एवं विषैले तत्त्वों का समावेश होना जल-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 11.
जल-प्रदूषण के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं-घरेलू वाहित मल, वर्षा का जल, औद्योगिक संस्थानों द्वारा विसर्जित पदार्थ तथा शव विसर्जन।

प्रश्न 12.
ध्वनि-प्रदूषण से क्या आशय है।
उत्तर
पर्यावरण में अनावश्यक शोर या ध्वनि का व्याप्त होनी ही ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 13.
ध्वनि-प्रदूषण का स्वास्थ्य फर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ध्वनि-प्रेदूषण का व्यक्ति के स्नायुमण्डल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, श्रवण-शक्ति कमजोर हो जाती है तथा बहरापन होने की आशंका बढ़ती है।

प्रश्न 14.
ध्वनि-प्रदूषण का व्यक्ति के व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ध्वनि-प्रदूषण से व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ती है तथा चिड़चिड़ापन झलकने लगता है।

प्रश्न 15.
यदि पर्यावरण का तापक्रम सामान्य से अधिक हो जाता है तो व्यक्ति के व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण का तापक्रम सामान्य से अधिक होने की दशा में व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ने लगती है।

प्रश्न 16.
यदि वातावरण में दुर्गन्ध व्याप्त हो तो उसका हमारे जीवन पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उत्तर
दुर्गन्धयुक्त वातावरण में हम मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर पाते तथा इस वातावरण में व्यक्तियों का पारस्परिक आकर्षण भी घटने लगता है।

प्रश्न 17
व्यक्ति की क्षमताओं पर वायु-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
वायु प्रदूषण का व्यक्ति की ध्यान-केन्द्रण-क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसके हस्तकौशल में कमी आती है तथा प्रतिक्रिया-काल बढ़ जाता है।

प्रश्न 18.
किन परिस्थितियों में नामकीय प्रदूषण उत्पन्न होता है? (2018)
उत्तर
परमाणु परीक्षणों तथा आणविक ऊर्जा के इस्तेमाल से नाभिकीय प्रदूषण उत्पन्न होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रेश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान विज्ञान का वह क्षेत्र है जो मानवीय अनुभवों और क्रियाओं तथा सामाजिक एवं भौतिक अनुभवों के प्रासंगिक पक्षों में होने वाले व्यवहारों तथा अन्तक्रियाओं का संयोजन और विश्लेषण करता है।”-प्रस्तुत परिभाषा प्रतिपादित है
(क) कैटर तथा क्रेक द्वारा
(ख) हेमस्ट्रा तथा मैक्फारलिंग द्वारा
(ग) मन द्वारा
(घ) विलियम जेम्स द्वारा।
उत्तर
(क) कैटर तथा क्रेक द्वारा

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान की उस शाखा को क्या कहा जाता है जिसके अन्तर्गत मानवीय-व्यवहार तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है?
(क) सामान्य मनोविज्ञान
(ख) विकासात्मक मनोविज्ञान
(ग) पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(घ) व्यावहारिक मनोविज्ञान
उत्तर
(ग) पर्यावरणीय मनोविज्ञान

प्रश्न 3.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के भाग हैं
(क) प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ख) निदानात्मक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ग) व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 4.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के उस भाग को क्या कहते हैं, जिसके अन्तर्गत पर्यावरण के संवर्द्धन और संरक्षण उपायों को खोजा जाता है ?
(क) निदानात्मक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ख) प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ग) व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(घ) इन में से कोई नहीं
उत्तर
(ग) व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान

प्रश्न 5.
पर्यावरण-दिवस मनाया जाता है (2011).
(क) 5 जून को
(ख)15 जून को
(ग) 25 जून को
(घ) 30 जून को
उत्तर
(क) 5 जून को

प्रश्न 6.
आधुनिक औद्योगिक नगरीय समाज की मुख्यतम समस्या है
(क) निर्धनता
(ख) निरक्षरता
(ग) बेरोजगारी
(घ) पर्यावरण-प्रदूषण
उत्तर
(घ) पर्यावरण-प्रदूषण

प्रश्न 7.
कौन-सा कथन पर्यावरणीयं मनोविज्ञान से सम्बन्धित है?
(क) यह मनोविज्ञान की एक आँखा है।
(ख) इसके अन्तर्गत पर्यावरण तथा मानवीय व्यवहार के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन किया 
जाता है।
(ग) इसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्य
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्य

प्रश्न 8.
पर्यावरण-प्रदूषण के प्रकार हैं|
(क) वायु-प्रदूषण
(ख) जल-प्रदूषण
(ग) ध्वनि-प्रदूषण
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन प्रदूषण से सम्बन्धित नहीं है। (2016)
(क) पेड़ों की कटाई
(ख) लाउडस्पीकर का प्रयोग
(ग) जैविक खाद का प्रयोग।
(घ) औद्योगिक अपशिष्ट
उत्तर
(ग) जैविक खाद का प्रयोग।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन पर्यावरण प्रदूषण से सम्बन्धित है (2013)
(क) वृक्षारोपण
(ख) जैविक खाद
(ग) धुआँरहित वाहन
(घ) औद्योगिक अपशिष्ट
उत्तर
(घ) औद्योगिक अपशिष्ट

प्रश्न 11.
पर्यावरणीय प्रदूषण के स्रोत होते हैं (2018)
(क) दो।
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) चार से अधिक
उत्तर
(ग) चार

प्रश्न 12.
वायु-प्रदूषण से सबसे पहले प्रभावित होता है
(क) फेफड़ा ।
(ख) पेट ।
(ग) सिर ।
(घ) यकृत
उत्तर
(क) फेफड़ा

प्रश्न 13.
मानवीय जीवन के किन पक्षों पर वायु-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है?
(क) हस्त कौशल पर ।
(ख) प्रतिक्रिया काल पर
(ग) ध्यान की एकाग्रता पर
(घ) इन सभी पक्षों पर
उत्तर
(घ) इन सभी पक्षों पर

प्रश्न 14.
मानवीय व्यवहार पर ध्वनि-प्रदूषण के प्रभाव हैं
(क) ध्यान का विचलित होना
(ख) व्यवहार में अनुक्रियात्मकता घटना
(ग) व्यवहार में चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता बढ़ जाना
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव

प्रश्न 15.
वायु-प्रदूषण के कारण उत्पन्न हो सकता है (2014)
(क) अस्थमा
(ख) उच्च रक्त चाप
(ग) पीलिया
(घ) मधुमेह
उत्तर
(ख) उच्च रक्त चाप

प्रश्न 16.
पीलिया रोग किससे उत्पन्न होता है?
(क) जल-प्रदूषण से
(ख) वायु-प्रदूषण से |
(ग) ध्वनि-प्रदूषण से
(घ) मृदा-प्रदूषण से
उत्तर
(क) जल-प्रदूषण से

प्रश्न 17.
जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है
(क) वायु प्रदूषण
(ख) जल-प्रदूषण
(ग) ध्वनि-प्रदूषण
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 18.
पर्यावरण में दुर्गन्ध अधिक होने की स्थिति में
(क) व्यक्ति का अन्य व्यक्तियों के प्रति आकर्षण घटता है .
(ख) फोटोग्राफी एवं चित्रकारी के प्रति अनुकूल अभिवृत्ति घटती है।
(ग) मनोरंजक कार्यक्रमज़हीं हो पाते।
(घ) उपर्युक्त सभी परिवर्तन देखे जा सकते हैं।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी परिवर्तन देखे जा सकते हैं।

प्रश्न 19.
पर्यावरण के तापमान के सामान्य से अधिक हो जाने की स्थिति में
(क) व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता की वृद्धि होती है।
(ख) व्यवहार सम्बन्धी विकारों में वृद्धि होती है।
(ग) बौद्धिक प्रखरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं।

प्रश्न 20.
आल्टमैन के अनुसार भू-भागिता के प्रमुख प्रकार हैं (2017)
(क) दो ।
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) छः
उत्तर
(ख)
तीन

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में कौन प्राथमिक भू-भाग नहीं है?
(क) दुकान
(ख) पुस्तकालय
(ग) खेत
(घ) घर
उत्तर
(ख) पुस्तकालय

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