UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 27 Storing of Rainwater and Rearing of Water Table

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 27
Chapter Name Storing of Rainwater and Rearing of Water Table (वर्षाजल संचयन एवं भू-गर्भ जल संवर्द्धन)
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 27 Storing of Rainwater and Rearing of Water Table (वर्षाजल संचयन एवं भू-गर्भ जल संवर्द्धन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी निर्धारित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर

भारत में जल संसाधन और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी कारक

धरातलीय जल संसाधन
धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं-नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब। देश में कुल नदियों तथा उन सहायक नदियों, जिनकी लम्बाई 1.6 किमी से अधिक है, को मिलाकर 10,360 नदियाँ हैं। भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत वार्षिक प्रवाह 1,869 घन किमी होने का अनुमान किया गया है। फिर भी स्थलाकृतिक, जलीय और अन्य दबावों के कारण प्राप्त धरातलीय जल का केवल लगभग 690 घन किमी (32%) जल को ही उपयोग किया जा सकता है। नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन और इस जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है। भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम संकेद्रित है।

भारत में कुछ नदियाँ, जैसे-गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु के जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ये नदियाँ यद्यपि देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती हैं जिनमें कुछ धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया, जाता है। दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे-गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है, लेकिन ऐसा ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी सम्भव नहीं हो सका है।

भौम जल संसाधन
देश में कुल पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन लगभग 432 घन किमी है। कुल पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन का लगभग 46 प्रतिशत गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में पाया जाता है। उत्तर-पश्चिमी प्रदेश और दक्षिणी भारत के कुछ भागों के नदी बेसिनों में भौम जल उपयोग अपेक्षाकृत अधिक है।

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु राज्यों में भौम जल का उपयोग बहुत अधिक है। परन्तु कुछ राज्य; जैसे-छत्तीसगढ़, ओडिशा, केरल अतिद अपने भौम जल क्षमता का बहुत कम उपयोग करते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, त्रिपुरा और महाराष्ट्र अपने भौम जल संसाधनों का मध्यम दर से उपयोग कर रहे हैं।

यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है तो जल की माँग की आपूर्ति करने की आवश्यकता होगी। ऐसी स्थिति विकास के लिए हानिकारक होगी और सामाजिक उथल-पुथल एवं विघटन का कारण हो. सकती है।

लैगून और पश्च जल
भारत की समुद्र तट रेखा विशाल है और कुछ राज्यों में समुद्र तट बहुत दतुंरित (indented) है। इसी कारण बहुत-सी लैगून और झीलें बन गई हैं। केरल, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इन लैगूनों और झीलों में बड़े धरातलीय जल संसाधन हैं। यद्यपि सामान्यतः इन जलाशयों में खारा जल है, इसका उपयोग मछली पालन और चावल की कुछ निश्चित किस्मों, नारियल आदि की सिंचाई में किया जाता है।

प्रश्न 2
नगरीय क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की प्रक्रिया एवं प्रकार का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2016]
या
भारत में वर्षा जल संचयन का विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत
कीजिए (अ) जल संचयन की प्रक्रिया, (ब) जल संचयन के प्रकार, (स) जल संचयन के लाभ।
उत्तर

वर्षा-जल संचयन की प्रक्रिया

नगरीय क्षेत्रों में वर्षा-जल संचयन की प्रक्रिया एवं प्रकार सामान्य उपयोग के लिए घरों में वर्षाजल संचयन के प्रति चेतना नहीं है, वर्षाजल व्यर्थ ही चला जाता है। प्रतिदिन के उपयोग के लिए बहुमंजिला इमारतों में पानी की टंकी का उपयोग किया जाता है। एक पानी की टंकी सामान्यतया एक कंटेनर होती है। यह प्लास्टिक, सीमेण्ट, पत्थर, लोहे, स्टेनलेस स्टील आदि की बनी होती है। बहुमंजिली इमारतों में इलेक्ट्रिक मोटर के माध्यम से इसमें जल संचय किया जाता है। पानी की टंकी से पाइप लाइन जोड़कर घरों में पानी पहुँचाया जाता है।
वर्षाजल के संचयन में पानी की टंकी का उपयोग वर्षा होने पर किया जा सकता है। टंकी के अतिरिक्त भूमिगत टैंक या टंकी का प्रयोग वर्षाजल संग्रह में अधिक लाभकारी रहता है। वर्षाजल संचयन की कुछ प्रमुख प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

टाँका वर्षा-जल संचयन प्रक्रिया राजस्थान के अर्द्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में लगभग हर घर में पीने के पानी का संग्रह करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा टाँका’ हुआ करते थे। इसका आकार लगभग एक बड़े कमरे जितना होता था। सर्वे करने पर फलोदी के एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लम्बा और 2.44 मीटर चौड़ा टाँका देखने को मिला। टॉका यहाँ सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तन्त्र का अभिन्न हिस्सा माना जाता है जिसे घर के मुख्य क्षेत्र या आँगन में बनाया जाता था। वे घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़े हुए होते थे। छत से वर्षा का जल इन नलों से होकर भूमिगत टाँका तक पहुँचता था जहाँ इसे एकत्रित किया जाता था। वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में प्रयोग होता था और उसका संग्रह नहीं किया जाता था। इसके बाद होने वाली वर्षा के जल का संग्रह किया जाता था।

टाँका में वर्षाजल अगली वर्षा ऋतु तक के लिए संग्रह किया जा सकता है। यह इसे जल की कमी वाली ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल उपलब्ध करवाने वाला जल स्रोत बनाता है। वर्षाजल अथवा पालर पानी’ जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का सर्वाधिक शुद्ध रूप समझा जाता है। कुछ घरों में तो टॉकों के साथ भूमिगते कमरे भी बनाए जाते हैं क्योंकि जल का यह स्रोत इन कमरों को भी ठण्डा रखता था जिससे ग्रीष्म ऋतु में गर्मी से राहत मिलती है।

कूल प्रणाली यह प्रणाली मुख्यत: जम्मू-कश्मीर, उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश में प्रचलित है। इसे नहरी तन्त्र के समान विकसित किया जाता है। पहाड़ी धाराएँ प्रायः 15 किमी तक लम्बी होती हैं। हिमनद का पिघला जल एवं अन्य जलधाराओं का जल बहकर तालाबों में संचित होता है। यह हिमपात के समय तीव्र गति से बहते हैं तथा ठण्डे समय में इसमें पानी की कम मात्री आती है। इसके जल के उपयोग हेतु बँटवारा निश्चित कर दिया जाता है।

झरना प्रणाली पूर्वी हिमालय में दार्जिलिंग नगर में झोरों (झरनों) से सिंचाई होती है। इनसे बॉस के पाइपों द्वारा पानी को सीढ़ीदार खेतों तक पहुँचाया जाता है। झोरा विधि को लेप्या, भोटिया एवं गुरूंग लोगों ने जीवित रखा है। सिक्किम में पेयजल के लिए झरनों एवं खोलों (तालाबों) का जल उपयोग में लाया जाता है। इन तालाबों में बाँस के पाइपों से जल पहुँचाया जाता है। पेयजल हेतु घरों के अहातों में जल कुण्डियाँ बनाते हैं जिन्हें खूप कहा जाता है। अरुणाचल प्रदेश में बाँस की नालियों के माध्यम से सिंचाई की जाती है। यहाँ अपर सुबनसिरी जिले में केले नदी पर अपतानी आदिवासियों द्वारा परम्परागत प्रणाली से बाँध बनाए गए हैं। यहाँ झरनों के पानी का संचय किया जाता है जिनमें मछली पालन भी किया जाता है।

उपर्युक्त दी गई प्रणालियों के अलावा नगरों में वर्षा के जल को मकानों की छतों पर एकत्रित कर लिया जाता है।
नगरों में छतों पर रखी पानी की टंकियों के द्वारा भी वर्षा जल संचयन किया जाता है।
नगरों में छतों के अलावा बड़े टेंकों को भी वर्षा के पानी संचयन के लिए बना लिया जाता है।
जल संचयन के लाभ-लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जल के गुणों का ह्रास क्या है? जल प्रदूषण का निवारण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर

जल के गुणों का ह्रास

जल गुणवत्ता से तात्पर्य जल की शुद्धता अथवा अनावश्यक बाहरी पदार्थों से रहित जल से है। जल बाह्य पदार्थों; जैसे— सूक्ष्म जीवों, रासायनिक पदार्थों, औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से प्रदूषित होता है। इस प्रकार के पदार्थ जल के गुणों में कमी लाते हैं और इसे मानव उपयोग के योग्य नहीं रहने देते हैं। जब विषैले पदार्थ झीलों, सरिताओं, नदियों, समुद्रों और अन्य जलाशयों में प्रवेश करते हैं, वे जल में घुल जाते हैं अथवा जल में निलंबित हो जाते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जल के गुणों में कमी आने से जलीय तंत्र (aquatic system) प्रभावित होते हैं। कभी-कभी प्रदूषक नीचे तक पहुँच जाते हैं। और भौम जल को प्रदूषित करते हैं। देश में गंगा और यमुना दो अत्यधिक प्रदूषित नदियाँ हैं।

जल प्रदूषण का निवारण

उपलब्ध जल संसाधनों का तेज़ी से निम्नीकरण हो रहा है। देश की मुख्य नदियों के प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों के ऊपरी भागों तथा कम बसे क्षेत्रों में अच्छी जल गुणवत्ता पाई जाती है। मैदानों में नदी जल का उपयोग गहन रूप से कृषि, पीने, घरेलू और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। अपवाहिकाओं के साथ कृषिगत (उर्वरक और कीटनाशक), घरेलू (ठोस और अपशिष्ट पदार्थ) और औद्योगिक बहिःस्राव नदी में मिल जाते हैं। नदियों में प्रदूषकों को संकेन्द्रण गर्मी के मौसम में बहुत अधिक होता है। क्योंकि उस समय जल का प्रवाह कम होता है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सी०पी०सी०बी०), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एस०पी०सी०) के साथ मिलकर 507 स्टेशनों की राष्ट्रीय जल संसाधन की गुणवत्ता को मॉनीटरन किया जा रहा है। इन स्टेशनों से प्राप्त किया गया आँकड़ा दर्शाता है कि जैव और जीवाणविक संदूषण नदियों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। दिल्ली और इटावा के बीच यमुना नदी देश में सबसे अधिक प्रदूषित नदी है। दूसरी प्रदूषित नदियाँ अहमदाबाद में साबरमती, लखनऊ में गोमती, मदुरई में कली, अड्यार, कूअम (संपूर्ण विस्तार), वैगई, हैदराबाद में मूसी तथा कानपुर और वाराणसी में गंगा है। भौम जल प्रदूषण देश के विभिन्न भागों में भारी/विषैली धातुओं, फ्लुओराइड और नाइट्रेट्स के संकेंद्रण के कारण होता है।

वैधानिक व्यवस्थाएँ; जैसे-जल अधिनियम 1974 (प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण) और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986, प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं हुए हैं। परिणाम यह है कि 1997 में प्रदूषण फैलाने वाले 251 उद्योग, नदियों और झीलों के किनारे स्थापित किए गए थे। जल उपकर अधिनियम 1977, जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना है, उसके भी सीमित प्रभाव हुए। जल के महत्त्व और जल प्रदूषण के अधिप्रभावों के बारे में जागरूकता का प्रसार करने की आवश्यकता है। जन जागरूकता और उनकी भागीदारी से, कृषिगत कार्यों तथा घरेलू और औद्योगिक विसर्जन से प्राप्त प्रदूषकों में बहुत प्रभावशाली ढंग से कमी लाई जा सकती है।

प्रश्न 2
जल-संभर प्रबंधन क्या है? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत पोषणीय विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।
उत्तर

जल संभर प्रबंधन

जल संभर प्रबंधन से तात्पर्य, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों; जैसे– अंत:स्रवण तालाब, पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल हैं। तथापि, विस्तृत अर्थ में जल संभर प्रबंधन के अंतर्गत सभी संसाधनों–प्राकृतिक (जैसे-भूमि, जल, पौधे और प्राणियों) और जल संभर सहित मानवीय संसाधनों के संरक्षण, पुनरुत्पादन और विवेकपूर्ण उपयोग को सम्मिलित किया जाता है। जल संभर प्रबंधन का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और समाज के बीच संतुलन लाना है। जल-संभर व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से संप्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है।

केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने देश में बहुत-से जल-संभर विकास और प्रबंधन कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें से कुछ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा भी चलाए गए हैं। ‘हरियाली’ केन्द्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को जल पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण करना है। परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है।

नीरू-मीरू (जल और आप) कार्यक्रम (आंध्र प्रदेश में) और अरवारी पानी संसद (अलवर राजस्थान में) के अंतर्गत लोगों के सहयोग से विभिन्न जल संग्रहण संरचनाएँ; जैसे–अत:स्रवण तालाब ताल (जोहड़) की खुदाई की गई है और रोक बाँध बनाए गए हैं। तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना को बनाना आवश्यक कर दिया गया है। किसी भी इमारत का निर्माण बिना जल संग्रहण सरंचना बनाए नहीं किया जा सकता है।

कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था कायाकल्प करने में सफल हुई हैं। फिर भी सफलता कुछ की ही कहानियाँ हैं। अधिकांश घटनाओं में, कार्यक्रम अपनी उदीयमान अवस्था पर ही हैं। देश में लोगों के बीच जल-संभर विकास और प्रबंधन के लाभों को बताकर जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है और इस एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन उपागम द्वारा जल उपलब्धता सतत पोषणीय आधार पर निश्चित रूप से की जा सकती है।

प्रश्न 3
वर्षा-जल प्रबन्धन के लाभों का वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर

वर्षा-जल प्रबन्धन के लाभ

  1. जहाँ जल की अपर्याप्त आपूर्ति होती है या सतही संसाधन का-या तो अभाव होता है या पर्याप्त मात्रा हमें उपलब्ध नहीं है, वहाँ यह जल समस्या का आदर्श समाधान है।
  2. वर्षा-जल जीवाणुरहित, खनिज पदार्थ मुक्त तथा हल्का होता है।
  3. यह बाढ़ जैसी आपदा को कम करता है।
  4. भूमि जल की गुणवत्ता को विशेष तौर पर जिसमें फ्लोराइड तथा नाइट्रेट हो, ध्रुवीकरण के द्वारा सुधारता है।
  5. सीवेज तथा गन्दे पानी में उत्पन्न जीवाणु अन्य अशुद्धियों को समाप्त/कम करता है जिससे जल पुनः उपयोगी बनती है।
  6. वर्षा-जल का संचयन आवश्यकता पड़ने वाले स्थान पर किया जा सकता है, जहाँ आवश्यकतानुसार इसका प्रयोग कर सकते हैं।
  7. शहरी क्षेत्रों में जहाँ पर शहरी क्रियाकलापों में वृद्धि के कारण भूमि जल के प्राकृतिक पुनर्भरण में , तेजी से कमी आई है तथा कृत्रिम पुनर्भरण उपायों को क्रियान्वित करने के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं है, भूमि जल भण्डारण का यह एक सही विकल्प है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर
धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं-नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब।

प्रश्न 2
जल संरक्षण और प्रबन्धन की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर
जल संरक्षण और प्रबन्धन की आवश्यकता अलवणीय जल की घटती हुई उपलब्धता और बढ़ती माँग के कारण है।

प्रश्न 3
वर्षा जल संग्रहण क्या है? [2016]
उत्तर
वर्षा जल संग्रहण विभिन्न उपयोगों के लिए वर्षा जल को रोकने और एकत्र करने की विधि है।

प्रश्न 4
भारतीय राष्ट्रीय जल नीति, 2002 की तीन मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
भारतीय राष्ट्रीय जल नीति, 2002 की तीन मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं –

  1. पेयजल सभी मानव जाति और प्राणियों को उपलब्ध कराना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
  2. भौमजल के शोषण को सीमित और नियमित करने के लिए उपाय करने चाहिए।
  3. जल के सभी विविध प्रयोगों में कार्यक्षमता सुधारनी चाहिए।

प्रश्न 5
लोगों पर संदूषित जल/गंदे पानी के उपभोग के क्या सम्भव प्रभाव हो सकते हैं?
उत्तर
संदूषित जल का उपभोग करने में मनुष्यों में हैजा, पीलिया, टाइफाइड, डायरिक आदि रोग ही सकते हैं। इसके अतिरिक्त अमीबीज पेलिस, ऐस्केरियासिस आदि रोग भी हो सकते हैं।

प्रश्न 6
यह कहा जाता है कि भारत में जल संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है। जल संसाधनों की कमी के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
जनसंख्या बढ़ने से जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। इसके अतिरिक्त उपलब्ध जल संसाधन भी औद्योगिक, कृषि और घरेलू क्रिया-कलापों के कारण प्रदूषित होता जा रहा है। इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता सीमित होती जा रही है।

प्रश्न 7
भारत में वर्षा-जल संचयन की किन्ही दो विधियों की विवेचना कीजिए। (2016)
या
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
वर्षा-जल संचयन की विधियाँ ‘निम्नलिखित हैं –

  1. भूमि सतह पर जल संचयन इस विधि में वर्षा के जल को झीलों व तालाबों आदि में एकत्रित किया जाता है तथा बाद में इसको सिंचाई आदि के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
  2. वर्षा-जल का घरों की छतों तथा टंकियों में एकत्रण इस विधि में वर्षा-जल को मकानों की छतों तथा टंकियों आदि में एकत्रित कर लिया जाता है। यह विधि कम खर्चीली व बहुत प्रभावी है।

प्रश्न 8
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्यों में सबसे अधिक भौम जल विकास के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?
उत्तर
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निवल बोए गए क्षेत्र का 85 प्रतिशत भाग सिंचाई के अन्तर्गत है। इन राज्यों में गेहूँ और चावल मुख्य रूप से सिंचाई की सहायता से उगाए जाते हैं। निवल सिंचित क्षेत्र का 76.1 प्रतिशत पंजाब में, 51.3 प्रतिशत हरियाणा में तथा 58.21 प्रतिशत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुओं और नलकूपों द्वारा सिंचित है। इस प्रकार इन राज्यों में सबसे अधिक भौम जल को प्रयोग कृषि कार्य के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 9
देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की सम्भावना क्यों है?
उत्तर
वर्तमान में हमारे देश में उद्योगों का विकास बड़ी तीव्रता से हो रहा है। इन उद्योगों को लगाने वे बढ़ती जनसंख्या को मकान बनाने के लिए भूमि की आवश्यकता पड़ती है, जिसके कारण कृषि भूमि कम होती जा रही है। हम जानते हैं कि उद्योगों एवं घरेलू कार्यों में बहुत अधिक जल व्यय होता है। इसीलिए हम यह मानते हैं कि भविष्य में देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि का हिस्सा कम होने की सम्भावना है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित में से जल किस प्रकार का संसाधन है?
(क) अजैव संसाधन
(ख) अनवीकरणीय संसाधन
(ग) जैव संसाधन
(घ) चक्रीय संसाधन
उत्तर
(घ) चक्रीय संसाधन।

प्रश्न 2
निम्नलिखित नदियों में से, देश में किस नदी में सबसे ज्यादा पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन है?
(क) सिंधु
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गंगा
(घ) गोदावरी
उत्तर
(ग) गंगा।

प्रश्न 3
घन किमी में दी गई निम्नलिखित संख्याओं में से कौन-सी संख्या भारत में कुल वार्षिक वर्षा दर्शाती है?
(क) 2,000
(ख) 3,000
(ग) 4,000
(घ) 5,000
उत्तर
(ग) 4,000.

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प्रश्न 4
निम्नलिखित दक्षिण भारतीय राज्यों में से किस राज्य में भौम जल उपयोग (% में)। इसके कुल भौम जल संभाव्य से ज्यादा है?
(क) तमिलनाडु
(ख) कर्नाटक
(ग) आन्ध्र प्रदेश
(घ) केरल
उत्तर
(क) तमिलनाडु।

प्रश्न 5
देश में प्रयुक्त कुल जल का सबसे अधिक समानुपात निम्नलिखित सेक्टरों में से किस सेक्टर में है?
(क) सिंचाई
(ख) उद्योग
(ग) घरेलू उपयोग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) सिंचाई।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका).

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Subject Sociology
Chapter Chapter 15
Chapter Name Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका)
Number of Questions Solved 21
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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
महिला उद्यमिता से आपका क्या आशय है ? सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका की समीक्षा कीजिए। [2009, 10, 15, 16]
या
सामाजिक पुनर्निर्माण में महिला उद्यमियों के योगदान का क्या महत्त्व है ? [2011]
या
भारत में सामाजिक विकास के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान की विवेचना कीजिए। [2010, 11]
या
सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता का महत्त्व दर्शाइए। [2014, 16]
या
महिला उद्यमिता तथा सामाजिक विकास को आप एक-दूसरे से कैसे सम्बन्धित करेंगे ? भारत में महिला सशक्तीकरण पर एक निबन्ध लिखिए। [2011, 14]
या
उद्यमिता से आप क्या समझते हैं? अपने देश के सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता के महत्त्व को समझाइए। [2012, 13]
या
महिला उद्यमिता एवं सामाजिक विकास का विश्लेषण कीजिए। [2015]
उत्तर:
महिला उद्यमिता से आशय
नारी समाज का एक महत्त्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। वर्तमान काल में उसकी भूमिका बहुआयामी हो गयी है। वह परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से लेकर व्यवसाय और औद्योगिक क्षेत्र में अपनी पूरी भागीदारी निभा रही है। आज एक उद्यमी के रूप में उसका विशेष योगदान है। औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्र में अब नारी पुरुष के समकक्ष है। व्यवसाय और उद्योग को नारी की सूझबूझ और कौशल ने नयी दिशाएँ प्रदान की हैं।

उद्यमिता शब्द की व्युत्पत्ति उद्यमी’ शब्द से हुई है। उद्यमिता का अर्थ किसी व्यवसाय या उत्पादन-कार्य में लाभ-हानि के जोखिम को वहन करने की क्षमता है। प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादनकार्य में कुछ-न-कुछ जोखिम या अनिश्चितता अवश्य होती है। यदि व्यवसायी या उत्पादक इस जोखिम का पूर्वानुमान लगाकर ठीक से कार्य करता है तो उसे लाभ होता है अन्यथा उसे हानि भी हो सकती है। किसी भी व्यवसाय के लाभ-हानि को जोखिम अथवा अनिश्चितता ही उद्यमिता कहलाती है। इसे वहन करने वाले को; चाहे वह स्त्री हो या पुरुष; ‘उद्यमी’ या ‘साहसी’ कहते हैं। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने उद्यमी को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है

शुम्पीटर के अनुसार, “एक उद्यमी वह व्यक्ति है जो देश की अर्थव्यवस्था में उत्पादन की किसी नयी विधि को जोड़ता है, कोई ऐसा उत्पादन करता है जिससे उपभोक्ता पहले से परिचित न हो। किसी तरह के कच्चे माल के नये स्रोत अथवा नये बाजारों की खोज करता है अथवा अपने अनुभवों के आधार पर उत्पादन के नये तरीकों को उपयोग में लाता है।

नॉरमन लॉन्ग के अनुसार, “कोई भी व्यक्ति जो उत्पादन के साधनों के द्वारा नये रूप में लाभप्रद ढंग से आर्थिक क्रिया करता है, उसे एक उद्यमी कहा जाएगा।” उद्यमी की उपर्युक्त परिभाषाओं के प्रकाश में महिला उद्यमी की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है कि “महिला उद्यमी वह स्त्री है जो एक व्यावसायिक या औद्योगिक इकाई का संगठन

तथा संचालन करती है और उसकी उत्पादन-क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करती है। इस प्रकार महिला उद्यमिता से आशय, “किसी महिला की उस क्षमता से है, जिसका उपयोग करके वह जोखिम उठाकर किसी व्यावसायिक अथवा औद्योगिक इकाई को संगठित करती है तथा उसकी उत्पादनक्षमता बढ़ाने का भरपूर प्रयास करती है।” वास्तव में, महिला उद्यमिता वह महिला व्यवसायी है, जो व्यवसाय के संगठन व संचालन में लगकर जोखिम उठाने के कार्य करती है। भारत में महिला उद्यमिता से आशय किसी नये उद्योग के संगठन और संचालन से लगाया जाता है।

सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका
सामाजिक विकास से अभिप्राय उस स्थिति से है, जिसमें समाज के व्यक्तियों के ज्ञान में वृद्धि हो और व्यक्ति प्रौद्योगिकीय आविष्कारों के कारण प्राकृतिक पर्यावरण पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर ले तथा आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो जाए। समाज का विकास करने में सभी वर्गों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यदि महिलाएँ इसमें सक्रिय योगदान नहीं देतीं, तो समाज में विकास की गति अत्यन्त मन्द हो जाएगी।

महिलाएँ विविध रूप से सामाजिक विकास में योगदान दे सकती हैं। इनमें से एक अत्यन्त नवीन क्षेत्र, जिस पर अब भी पुरुषों का ही अधिकार है, उद्यमिता का है। प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादनकार्य में कुछ जोखिम या अनिश्चितता होती है। इस जोखिम व अनिश्चितता की स्थिति को वहन करने की क्षमता को उद्यमिता कहते हैं और इसे सहन करने वाली स्त्री को महिला उद्यमिता कहते हैं।

भारतीय समाज में महिला उद्यमिता की अवधारणा एक नवीन अवधारणा है, क्योंकि परम्परागत रूप से व्यापार तथा व्यवसायों में महिलाओं की भूमिका नगण्य रही है। वास्तव में, पुरुष प्रधानता एवं स्त्रियों की परम्परागत भूमिका के कारण ऐसा सोचना भी एक कल्पना मात्र था। ऐसा माना जाता था कि आर्थिक जोखिमों से भरपूर जीवन केवल पुरुष ही झेल सकता है, परन्तु आज भारतीय महिलाएँ इस जोखिम से भरे जीवन में धीरे-धीरे सफल और सबल कदम रखने लगी हैं। नगरों में आज सफल या संघर्षरत महिला उद्यमियों की उपस्थिति दृष्टिगोचर होने लगी है।

दिल्ली नगर के निकटवर्ती क्षेत्रों में महिला व्यवसायियों और उद्यमियों में से 40% ने गैरपरम्परागत क्षेत्रों में प्रवेश करके सबको आश्चर्यचकित कर दिया है। ये क्षेत्र हैं

  1. इलेक्ट्रॉनिक,
  2. इन्जीनियरिंग,
  3. सलाहकार सेवा,
  4. रसायन,
  5. सर्किट ब्रेकर,
  6.  एम्प्लीफायर, ट्रांसफॉर्मर, माइक्रोफोन जैसे उत्पादन,
  7.  सिले-सिलाये वस्त्र उद्योग,
  8.  खाद्य-पदार्थों से सम्बन्धित उद्योग,
  9. आन्तरिक घरेलू सजावट के व्यवसाय तथा
  10.  हस्तशिल्प व्यवसाय।

बिहार जैसे औद्योगिक रूप से पिछड़े राज्य में भी करीब 30 से 50 महिला उद्यमी हैं, जिनमें से दो तो राज्य के चैम्बर ऑफ कॉमर्स की सदस्या भी रही हैं। उत्तरी भारत में भी महिला उद्यमियों की संख्या बढ़ रही है। सरकार और निजी संस्थानों द्वारा इन्हें पर्याप्त सहायता और प्रोत्साहन भी दिये जा रहे हैं।
पर्याप्त आँकड़े न उपलब्ध हो पाने के कारण महिला उद्यमियों की बदलती हुई प्रवृत्ति के आयामों और सामाजिक विकास में इनकी भूमिका का पता लगाना कठिन है, परन्तु महानगरों में यह परिवर्तन स्पष्ट देखा जा सकता है और पहले की अपेक्षाकृत छोटे नगरों में भी अब इनकी झलक स्पष्ट दिखायी देने लगी है।

सामाजिक पुनर्निर्माण में महिला उद्यमियों का योगदान (महत्त्व)
सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता के योगदान का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से किया जा सकता है

1. आर्थिक क्षेत्र में योगदान – महिला उद्यमिता उत्पादन में वृद्धि करके राष्ट्रीय आय में वृद्धि करती है। व्यवसाय और उद्योगों की आय बढ़ने से प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, जिससे आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। इस प्रकार महिला उद्यमिता राष्ट्र के आर्थिक क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देकर राष्ट्र का नवनिर्माण कर रही है।

2. रोजगार के अवसरों में वृद्धि – महिला उद्यमिता द्वारा जो व्यवसाय, उद्योग तथा प्रतिष्ठान स्थापित किये जाते हैं उनमें कार्य करने के लिए अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। इनमें लगकर महिलाएँ तथा पुरुष रोजगार प्राप्त करते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में महिला उद्यमिता का यह योगदान बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो रहा है।

3. उत्पादन में वृद्धि – भारत में महिला उद्यमिता की संख्या लगभग 18 करोड़ है। यदि यह समूचा समूह उत्पादन में लग जाए तो राष्ट्र के सकल उत्पादन में भारी वृद्धि होने लगेगी। यह उत्पादक श्रम निर्यात के पर्याप्त माल जुटाकर राष्ट्र को विदेशी मुद्रा दिलाने में भी सफल हो सकता है। इस प्रकार राष्ट्र की सम्पन्नता में इनकी भूमिका अनूठी कही जा सकती है।

4. सामाजिक कल्याण में वृद्धि – महिला उद्यमिता द्वारा उद्योगों और व्यवसायों में उत्पादन बढ़ाने से वस्तुओं के मूल्य कम हो जाएँगे। उनकी आपूर्ति बढ़ने से जनसामान्य के उपभोग में वृद्धि होगी। उपभोग की मात्रा बढ़ने से नागरिकों के रहन-सहन का स्तर ऊँचा उठेगा, जो सामाजिक कल्याण में वृद्धि करने में अभूतपूर्व सहयोग देगा।

5. स्त्रियों की दशा में सुधार – भारतीय समाज में नारी को आज भी हीन दृष्टि से देखा जाता है। आर्थिक दृष्टि से वे आज भी पुरुषों पर निर्भर हैं। महिला उद्यमिता महिलाओं को क्रियाशील बनाकर उन्हें आर्थिक क्षेत्र में सबलता प्रदान करती है। महिला उद्यमिता समाज में एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करके महिला-कल्याण और आर्थिक चेतना का उदय कर सकती है। इस प्रकार महिलाओं की दशा में सुधार लाने में इसकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती

6. विकास कार्यक्रमों में सहायक – महिला उद्यमिता राष्ट्र के विकास-कार्यों में अपना अभूतपूर्व योगदान दे सकने में सहायक है। बाल-विकास, स्त्री-शिक्षा, परिवार कल्याण, स्वास्थ्य तथा समाज-कल्याण के क्षेत्र में इसका अनूठा योगदान रहा है।

7. नवीन कार्यविधियों का प्रसार – परिवर्तन और विकास के इस युग में उत्पादन की नयी-नयी विधियाँ और तकनीक आ रही हैं। महिला उद्यमिता ने व्यवसाय और उद्योगों को नवीनतम कार्य-विधियाँ तथा तकनीकी देकर अपना योगदान दिया है। उत्पादन की नवीनतम विधियों ने स्त्रियों के परम्परावादी विचारों को ध्वस्त कर उन्हें नया दृष्टिकोण प्रदान किया है।

8. आन्तरिक नेतृत्व का विकास – व्यवसाय तथा उद्योगों में लगी महिलाओं को गलाघोटू स्पर्धाओं से गुजरना पड़ता है। इससे उनमें आत्मविश्वास और आन्तरिक नेतृत्व की भावना बलवती होती है। यह नेतृत्व सामाजिक संगठन, सामुदायिक एकता और राष्ट्र-निर्माण में सहायक होता है। नैतिकता के मूल्यों पर टिका नेतृत्व समाज की आर्थिक और राजनीतिक दशाओं को बल प्रदान करता है। महिला उद्यमिता समाज में आन्तरिक नेतृत्व का विकास करके स्त्री जगत् में नवचेतना और जागरूकता का प्रचार करती है।

प्रश्न 2
भारतीय समाज में कामगार स्त्रियों की परिस्थिति में हो रहे परिवर्तनों को बताइए। [2011, 16]
या
समाज में कामकाजी महिलाओं की परिस्थिति में हो रहे परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए। [2015]
या
भारत में महिला उद्योग किन क्षेत्रों में विकसित हो रहा है ?
उत्तर:
कामगार स्त्रियों की परिस्थितियों में हो रहे परिवर्तन
आधुनिक युग में भारत में महिला उद्यमिता को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला है। अब महिला उद्यमियों को केवल समान अधिकार ही प्राप्त नहीं हैं, बल्कि कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ भी प्रदान की गयी हैं। उदाहरण के लिए, महिला उद्यमियों को प्रत्येक विभाग में मातृत्व-अवकाश की अतिरिक्त सुविधा उपलब्ध है। सरकार द्वारा निजी उद्योग या व्यवसाय स्थापित करने के लिए भी महिलाओं को अतिरिक्त सुविधाएँ एवं अनुदान प्रदान किये जाते हैं। इन सुविधाओं के कारण तथा सामान्य दृष्टिकोण के परिवर्तित होने के परिणामस्वरूप भारत में महिला उद्यमिता के क्षेत्र में तेजी से वृद्धि हुई है। आज लगभग प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का सक्रिय योगदान है। शिक्षित एवं प्रशिक्षित महिलाएँ जहाँ सरकारी, अर्द्ध-सरकारी तथा गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं, वहीं अनेक महिलाओं ने निजी प्रतिष्ठान भी स्थापित किये हैं। अनेक महिलाएँ सिले-सिलाये वस्त्रों के आयातनिर्यात का कार्य कर रही हैं, प्रकाशन संस्थानों का संचालन कर रही हैं, रेडियो तथा टेलीविजन बनाने वाली इकाइयों का कार्य कर रही हैं।

एक सर्वेक्षण के अनुसार नगरों में महिलाएँ जिन व्यवसायों तथा कार्यों से मुख्य रूप से सम्बद्ध हैं, वे निम्नलिखित हैं।

  1. स्कूलों व कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य।
  2.  अस्पतालों में डॉक्टर तथा नर्स का कार्य।
  3.  सामाजिक कार्य।
  4. कार्यालयों एवं बैंकों में नौकरी सम्बन्धी कार्य।
  5. टाइपिंग तथा स्टेनोग्राफी सम्बन्धी कार्य।
  6. होटलों व कार्यालयों में स्वागती (Receptionist) का कार्य।
  7. सिले-सिलाए वस्त्र बनाने के कार्य।
  8. खाद्य पदार्थ बनाने, संरक्षण एवं डिब्बाबन्दी के कार्य।
  9. आन्तरिक गृह-सज्जा सम्बन्धी कार्य।
  10. हस्तशिल्प जैसे परम्परागत व्यवसाय।
  11. ब्यूटी पार्लर तथा आन्तरिक सजावट उद्योग।
  12. घड़ी निर्माण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग।
  13. पत्रकारिता, मॉडलिंग एवं विज्ञापन क्षेत्र।
  14. इंजीनियरिंग उद्योग।
  15. रसायन उद्योग आदि।

भारत में महिला उद्यमिता निरन्तर बढ़ रही है। सन् 1988 में किये गये एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्र में महिला व्यावसायियों तथा उद्यमियों में से लगभग 40% महिलाओं ने गैर-परम्परागत व्यवसायों का वरण किया है। भारत सरकार भी महिला उद्यमियों को आर्थिक तथा तकनीकी सहायता प्रदान कर रही है। भारत में जितने भी बड़े घराने हैं उनकी महिलाएँ अब महिला उद्यमिता के रूप में रुचि लेकर प्रमुख भूमिका निभाने लगी हैं। पहले महिला उद्यमी कुटीर उद्योग तथा लघु उद्योगों के साथ ही जुड़ी थीं, परन्तु अब वे बड़े पैमाने के संगठित उद्योगों में भी अपनी सहभागिता जुटाने लगी हैं। वर्तमान समय में महिला उद्यमियों ने गुजरात में सोलर कुकर बनाने, महाराष्ट्र में ढलाई-उद्योग चलाने, ओडिशा में टेलीविजन बनाने तथा केरल में इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण बनाने में विशेष सफलता प्राप्त की है।

1983 ई० में महिला उद्यमिता से सम्बन्धित प्रशिक्षण सुविधाएँ प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय संस्थान’ की स्थापना की गयी थी। अनेक राज्यों में वित्तीय निगम, हथकरघा विकास बोर्ड तथा जिला उद्योग केन्द्र महिला उद्यमियों को ऋण तथा अनुदान देने की व्यवस्था कर रहे हैं। महिला उद्यमियों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ सस्ती और श्रेष्ठ होती हैं, जो महिला उद्यमिता की सफलता और उपयोगिता की प्रतीक हैं।

भारत में महिला उद्यमियों के विषय में अलग से आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिए महिला उद्यमियों की परिवर्तित प्रवृत्ति के विषय में तथा इनके विस्तार के विषय में कुछ भी कह पाना कठिन है। हाँ, इतना अवश्य है कि आज महानगरों तथा नगरों में महिला उद्यमियों के परिवर्तित लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। आज महिला को प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत देखा जा सकता है।

प्रश्न 3
भारत में महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने वाले उपायों की चर्चा कीजिए। [2010, 11, 12]
उत्तर:
महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने हेतु उपाय
जब हम भारत में महिला उद्यमिता के विकास के प्रश्न पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्हें शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से तथा सुगम-ऋण, कच्चे माल की सप्लाई, माल के विपणन की तथा अन्य सुविधाएँ देकर उनकी क्षमता को बढ़ाया जा रहा है। इस कार्य में केन्द्रीय समाज-कल्याण मण्डल अग्रणी रहा है। यह मण्डल स्वयंसेवी संगठनों को स्त्रियों के लिए आय उपार्जन हेतु इकाई स्थापित करने में तकनीकी और आर्थिक सहायता देता है। महिला और बाल-विकास विभाग स्त्रियों को खेती, डेयरी, पशुपालन, मछली-पालन, खादी और ग्रामोद्योग, हथकरघा, रेशम प्रयोग के लिए प्रशिक्षण देने की कार्य योजनाओं, ऋण विपणन तथा तकनीकी सुविधा देकर उनकी सहायता करता है। विभाग की अन्य योजनाओं के अन्तर्गत कमजोर वर्ग की महिलाओं को इलेक्ट्रॉनिक्स घड़ियाँ तैयार करने, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, छपाई और जिल्दसाजी, हथकरघा, बुनाई जैसे आधुनिक उद्योगों में प्रशिक्षण दिया जाता है।

कृषि मन्त्रालय स्त्रियों को कृषक प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से भू-संरक्षण, डेयरी विकास आदि में प्रशिक्षण प्रदान करता है। समन्वित ग्रामीण विकास योजना की एक उपयोजना ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल-विकास कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्त्रियों को समूहों में संगठित करना, उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण और रोजी-रोटी कमाने में सहायता देना है।

श्रम मन्त्रालय ऐसे स्वयंसेवी संगठनों को सहायता देता है जो महिलाओं को रोजी-रोटी कमाने वाले व्यवसायों का प्रशिक्षण देते हैं। राष्ट्रीय और छ: क्षेत्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थाओं द्वारा महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। महिलाओं के लिए विभिन्न राज्यों में अलग से औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (I.T.I.) चलाए जा रहे हैं। खादी और ग्रामोद्योग निगम ने भी अपने संस्थान में प्रबन्ध कार्य में महिलाओं को सम्मिलित करने के उपाय किये हैं।

सहकारी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर महिलाओं को शामिल करने के उद्देश्य से उनके लिए अलग से दुग्ध सहकारी समितियाँ चलायी जा रही हैं। जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत लाभ प्राप्तकर्ताओं में 30 प्रतिशत महिलाएँ होंगी। अनेक राज्यों में महिला विकास निगम’ (W.D.C.) स्थापित किये गये हैं, जो महिलाओं को तकनीकी परामर्श देने तथा बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं से ऋण दिलाने एवं बाजार की सुविधा दिलाने का प्रबन्ध करेंगे। महिलाओं में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक विकास विभाग उन्हें शेड और भूखण्ड देने की सुविधा देता है। हाल ही में महिला उद्यमियों को परामर्श देने के लिए अलग से एक व्यवसाय संचालन खोला गया है। जिनकी प्रधान एक महिला अधिकारी होती है। राष्ट्रीय स्तर पर एक स्थायी समिति गठित की गई है जो महिलाओं के उद्यमशीलता के विकास हेतु सरकार को सुझाव देगी। लघु उद्योग संस्थानों और देशभर में फैली उनकी शाखाओं की मार्फत उद्यमशीलता विकास कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है।

‘राष्ट्रीय उद्यमशीलता संस्थान और लघु व्यवसाय विकास द्वारा महिलाओं के लिए प्रशिक्षण शुरू किया गया है। लघु उद्योग विकास संगठन 1983 ई० से सर्वोत्तम उद्यमियों को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करता है। शिक्षित बेरोजगारों को अपना उद्योग-धन्धा शुरू करने की योजना में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। छोटे-छोटे उद्योगों में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ाने के लिए महिला औद्योगिक सहकारी समितियों को गठित किया गया। इन समितियों के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप स्त्रियों ने मधुमक्खियों को पालने, हाथ से चावल कूटने व देशी तरीके से तेल निकालने आदि के उद्योग प्रारम्भ किये। इन प्रयत्नों के बावजूद प्रगति नहीं हुई। भारत में वर्ष 1973 को ‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष’ के रूप में मनाया गया। उस समय स्त्रियों की प्रस्थिति का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया। इस समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखकर ही सातवीं पंचवर्षीय योजना में एक ओर महिला रोजगार को प्रमुखता दी गयी और दूसरी ओर उद्योग की एक ऐसी सूची भी तैयार की गयी जिनके संचालन का कार्य महिलाओं को सौंपने की बात कही गयी। इस सूची में वर्णित उद्योगों में महिलाओं को प्राथमिकता दी गयी।

वर्तमान में भारत में महिलाओं द्वारा चलायी जाने वाली औद्योगिक इकाइयों की संख्या 4,500 से अधिक है। इनमें से केवल केरल में 800 से अधिक इकाइयों का संचालन महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। आज तो महिला उद्यमिता का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है। महिला उद्यमियों द्वारा चलाये जाने वाले प्रमुख उद्योग इस प्रकार हैं-इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रबड़ की वस्तुएँ, सिले हुए वस्त्र, माचिस, मोमबत्ती तथा रासायनिक पदार्थ, घरेलू उपकरण आदि। महिलाओं को उद्योग लगाने की दृष्टि से प्रोत्साहित करने हेतु सरकार वित्तीय सहायता और अनुदान तो देती ही है, साथ ही इन उद्योगों में निर्मित वस्तुओं की बिक्री में भी सहायता करती है।

उद्यमिता से सम्बन्धित प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से 1983 ई० में राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना की गयी। इस संस्थान द्वारा महिला उद्यमियों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया गया। महिला उद्यमियों को विभिन्न राज्यों में प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय निगम, जिला उद्योग केन्द्र एवं हथकरघा विकास बोर्ड भी स्थापित किये गये हैं। साधारणतः यह पाया गया है कि महिलाओं द्वारा संचालित उद्योगों में श्रमिक एवं मालिकों के बीच सम्बन्ध अपेक्षाकृत अधिक मधुर हैं एवं उत्पादित वस्तुएँ तुलनात्मक दृष्टि से अधिक अच्छी हैं। इससे स्पष्ट है कि भारत में महिला उद्यमिता सफल होती जा रही है।
इन सभी उपायों का एक नतीजा यह निकला है कि काफी संख्या में स्त्रियाँ न केवल पारिवारिक उद्योगों को चलाने में सहयोग दे रही हैं, वरनु वे स्वयं अपने उद्योग-धन्धे चला रही हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
महिला उद्यमिता की परिभाषा देते हुए भारत में इसके वर्तमान स्वरूप का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अक्षर महिला उद्यमी वह स्त्री है जो एक व्यावसायिक या औद्योगिक इकाई का संगठनसंचालन करती है और उसकी उत्पादन-क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करती है। दूसरे शब्दों में, महिला उद्यमिता से आशय किसी महिला की उस क्षमता से है, जिसका उपयोग करके वह जोखिम उठाकर किसी व्यावसायिक अथवा औद्योगिक इकाई को संगठित करती है तथा उसकी उत्पादनक्षमता बढ़ाने का भरपूर प्रयास करती है।”
वास्तव में, महिला उद्यमिता वह महिला व्यवसायी है जो व्यवसाय के संगठन व संचालन में लगकर जोखिम उठाने के कार्य करती है। भारत में महिला उद्यमिता से आशय किसी नये उद्योग के संगठन और संचालन से लगाया जाता है।

महिला उद्यमिता का वर्तमान स्वरूप

वर्तमान युग में नारी की स्थिति में महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ है। शिक्षा-प्रसार के लिए लड़कियों की शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया और हाईस्कूल तक की शिक्षा को नि:शुल्क रखा गया। बालिकाओं के अनेक विद्यालय खोले गये। सह-शिक्षा का भी खूब चलन हुआ। स्त्रियाँ सार्वजनिक चुनावों में निर्वाचित होकर एम० एल० ए०, एम० पी० तथा मन्त्री और यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री भी होने लगी हैं। उन्हें पिता की सम्पत्ति में भाइयों के बराबर अधिकार प्राप्त करने की कानूनी छूट मिली है। पति की क्रूरता के विरोध में या मनोमालिन्य हो जाने पर तलाक प्राप्त करने का भी वैधानिक अधिकार उन्हें प्रदान किया गया है। विधवा-विवाह की पूरी छूट हो गयी है; हालाँकि व्यवहार में अभी इनका चलन कम है।

उन्हें कानून के द्वारा सभी अधिकार पुरुषों के बराबर प्राप्त हो गये हैं। आज स्त्रियाँ सभी सेवाओं में जिम्मेदारी के पदों पर कार्य करते हुए देखी जा सकती हैं; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, वकील, शिक्षिका, लिपिक, अफसर इत्यादि। बाल-विवाहों पर कठोर प्रतिबन्ध लग गया है। पर्दा-प्रथा काफी हद तक समाप्त हो गयी है। युवक समारोहों, क्रीड़ा समारोहों और राष्ट्रीय खेलों में उनका सहभाग बढ़ा है। वे पढ़ने, नौकरी करने और टीमों के रूप में विदेश भी जाने लगी हैं। अन्तर्जातीय विवाह बढ़े हैं। हिन्दुओं में बहुपत्नी-प्रथा पर रोक लग गयी है। अन्तर्साम्प्रदायिक विवाह भी होने लगे हैं। स्त्रियों को अपने जीवन का रूप निर्धारित करने की अधिक स्वतन्त्रता मिली है।
उपर्युक्त सुधार नगरों में अधिक मात्रा में हुए हैं। गाँवों में अब भी अशिक्षा, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, पर्दा-प्रथा, परम्पराओं, दरिद्रता व पिछड़ेपन का ही बोलबाला है। इन सुधारों का गाँवों की स्त्रियों की परिस्थितियों पर बहुत कम प्रभाव पड़ा है।

प्रश्न 2
भारत में महिला उद्यमियों के मार्ग में क्या बाधाएँ हैं ? [2010]
उत्तर:
हमारे देश में स्त्रियाँ सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण विकासात्मक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले पाती हैं, जब कि देश की लगभग आधी जनसंख्या महिलाओं की है। लोगों की आम धारणा है कि स्त्रियाँ अपेक्षाकृत कमजोर होती हैं और उन्हें व्यक्तित्व के विकास के समुचित अवसर नहीं मिल पाते। इसलिए वे शिक्षा, दक्षता, विकास और रोजगार के क्षेत्र में पिछड़ गयी हैं। भारत में महिला उद्यमिता के मार्ग में प्रमुखत: दो प्रकार की बाधाएँ या समस्याएँ हैं – प्रथम, सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ व द्वितीय, आर्थिक समस्याएँ।।

  1. सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ – महिला उद्यमिता के क्षेत्र में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ हैं–परम्परागत मूल्य, पुरुषों द्वारा हस्तक्षेप सामाजिक स्वीकृति तथा प्रोत्साहन का अभाव।।
  2. आर्थिक समस्याएँ – महिला उद्यमिता के मार्ग में आने वाली प्रमुख आर्थिक कठिनाइयाँ हैं – पंजीकरण एवं लाइसेन्स की समस्या, वित्तीय कठिनाइयाँ, कच्चे माल का अभाव, तीव्र । प्रतिस्पर्धा एवं बिक्री की समस्या। इसके अतिरिक्त महिला उद्यमियों को अनेक अन्य बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है; यथा – सृजनता व जोखिम मोल लेने की अपेक्षाकृत कम क्षमता, प्रशिक्षण को अभाव, सरकारी बाबुओं व निजी क्षेत्र के व्यापारियों द्वारा उत्पन्न अनेक कठिनाइयाँ आदि।

प्रश्न 3
महिला उद्यमिता को कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है ? [2007]
उत्तर:
महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने हेतु कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं

  1. महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन देने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा कुछ ऐसे उद्योगों की सूची तैयार की जाए जिनके लाइसेन्स केवल महिलाओं को ही दिये जाएँ। ऐसा होने पर महिलाएँ बाजार की प्रतिस्पर्धा से बच सकेंगी।
  2. महिलाएँ जिन उद्योगों को स्थापित करना चाहें, उनके सम्बन्ध में उन्हें पूरी औद्योगिक जानकारी दी जानी चाहिए। स्त्रियों को आय प्रदान करने वाले व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जाए।
  3.  महिला औद्योगिक सहकारी समितियों का गठन किया जाए जिससे कम पूँजी में महिलाओं द्वारा उद्योगों की स्थापना की जा सके।
  4.  ऋण सम्बन्धी प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए तथा सुगमता से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  5.  महिला उद्यमियों को सरकारी एजेन्सी द्वारा आसान शर्तों पर कच्चा माल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  6. इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि महिला उद्यमियों द्वारा जो वस्तुएँ उत्पादि। की जाएँ, वे अच्छी किस्म की हों जिससे प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।
  7.  महिला उद्यमियों को अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बेचने की समस्या का सामना करना पड़ता है। यदि सरकार स्वयं महिला उद्यमियों से कुछ निर्धारित मात्रा में माल खरीद ले तो उनके माल की बिक्री भी हो सकेगी तथा उन्हें तीव्र प्रतिस्पर्धा से भी बचाया जा सकेगा।

प्रश्न 4
भारत में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के बराबर रही है। तथा उन्हें पुरुषों के समान ही सब अधिकार प्राप्त रहे हैं। धीरे-धीरे पुरुषों में अधिकार-प्राप्ति की लालसा बढ़ती गयी। परिणामस्वरूप स्मृति काल, धर्मशास्त्र काल तथा मध्यकाल में इनके अधिकार छिनते गये और इन्हें परतन्त्र, निस्सहाय और निर्बल मान लिया गया। परन्तु समय ने पलटा खाया। अंग्रेजी शासनकाल में देश में राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में जागृति आने लगी। समाज-सुधारकों एवं नेताओं का ध्यान स्त्रियों की दशा सुधारने की ओर गया। यहाँ पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

विवेकानन्द ने कहा है – ‘स्त्रियों की अवस्था में सुधार हुए बिना विश्व के कल्याण का कोई दूसरा मार्ग नहीं हैं। यदि स्त्री-समाज निर्बल रहा तो हमारा सामाजिक ढाँचा भी निर्बल रहेगा, हमारी सन्तानों का विकास नहीं होगा, समाज में सामंजस्य स्थापित नहीं होगा, देश का विकास अधूरा रहेगा, स्त्रियाँ पुरुषों पर बोझ बनी रहेंगी, देश के विकास में 56 प्रतिशत जनता की भागीदारी नहीं होगी तथा देश में स्त्री-सम्बन्धी अपराधों में वृद्धि होगी। अतः भारत में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता है।

प्रश्न 5
महिला उद्यमिता के नारी उत्थान पर होने वाले लाभ बताइए। [2009, 10, 11, 12]
या
महिला उद्यमिता एवं नारी उत्थान एक-दूसरे के पूरक हैं। व्याख्या कीजिए। [2015]
उत्तर:
महिला उद्यमिता के नारी उत्थान पर निम्नलिखित लाभ हैं।

1. आत्मनिर्भरता – महिला उद्यमिता के कारण महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं, इससे अन्य कार्यों के लिए भी इनकी पुरुष सदस्यों पर निर्भरता कम हुई है।
2. जीवन स्तर में सुधार – परम्परागत संयुक्त परिवारों में महिलाओं की शिक्षा-स्वास्थ्य इत्यादि आवश्यकताओं पर कम ध्यान दिया जाता था, जिससे इनका जीवन स्तर निम्न था। महिला उद्यमिता के कारण इनके जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार हुआ है।
3. नेतृत्व क्षमता का विकास – महिलाओं द्वारा उद्यम एवं व्यवसायों के संचालन से उनमें नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ है, फलतः महिलाएँ सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में भी नेतृत्व सम्भालने लगी हैं।
4. सामाजिक समस्याओं में कमी – महिला उद्यमिता से महिलाओं की परिवार व समाज में स्थिति सुधरी है, इससे घरेलू हिंसा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी महिला सम्बन्धी समस्याएँ कम होने लगी हैं।
5. नारी सशक्तिकरण – महिला उद्यमिता, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही उनमें संचालन, नेतृत्व, संगठन आदि गुणों का विकास करती है, इससे नारी सशक्तिकरण को बल मिलता है। अत: इन सब कारणों से कहा जा सकता है कि महिला उद्यमिता तथा नारी उत्थान
एक-दूसरे के पूरक हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
डेविड क्लिलैण्ड ने उद्यमी की क्या परिभाषा दी है ?
उत्तर:
डेविड क्लिलैण्ड ने लिखा है कि “उद्यमी व्यक्ति वह है जो किसी व्यापारिक व औद्योगिक इकाई को संगठित करता है या उसकी उत्पादन-क्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करता है।” भारतीय सन्दर्भ में उद्यमी की यह परिभाषा अधिक उपयुक्त मालूम पड़ती है, क्योंकि यहाँ अधिकांश उद्यमी किसी औद्योगिक इकाई को संगठित करते हैं, अपनी औद्योगिक इकाई की क्षमता व उत्पादन बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं और लाभ कमाते हैं।

प्रश्न 2
देश की आर्थिक प्रगति में महिला उद्यमिता का क्या योग है ?
या
सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
इस देश में 25 वर्ष से 40 वर्ष की आयु समूह में आने वाली स्त्रियों की संख्या करीब 20 करोड़ है। इनमें से करीब 5 करोड़ स्त्रियाँ घरों में ही रहती हैं। इन 5 करोड़ में से अधिकांश स्त्रियाँ शिक्षित हैं। यदि इन सब स्त्रियों में उद्यमिता के प्रति रुचि उत्पन्न की जाए तो देश के कुल उत्पादन में काफी वृद्धि होगी। यदि इस महिला शक्ति का उद्यमिता के क्षेत्र में अधिकतम उपयोग किया जाए तो देश आर्थिक दृष्टि से काफी कुछ प्रगति कर सकता है। यदि महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जाए तो महिलाएँ उत्पादक-शक्ति के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में काफी योग दे सकती हैं।

प्रश्न 3
महिला उद्यमिता ने स्त्रियों में आत्मनिर्भरता का विकास किस प्रकार किया है?
उत्तर:
महिला उद्यमिता के जरिए वर्तमान में स्त्रियाँ देश की उत्पादन शक्ति में अहम योगदान कर रही हैं। इसके जरिए वे आर्थिक रूप से मजबूत हुई हैं तथा उनमें नवचेतना और जागरुकता का प्रसार हुआ है। साथ ही उत्पादन की नवीनतम विधियों ने स्त्रियों के परम्परावादी विचारों को ध्वस्त कर उन्हें नया दृष्टिकोण तथा आत्मविश्वास दिया है। इस प्रकार महिला उद्यमिता ने स्त्रियों में आत्मनिर्भरता का विकास किया है।

प्रश्न 4
महिलाओं को उद्यमिता के परामर्श से क्या उनमें आत्मनिर्भरता का विकास हुआ है?
उत्तर:
अनुभव यह बताता है कि आर्थिक अधिकारों से वंचित होने के कारण ही स्त्रियों पर समय-समय पर अनेक प्रकार की निर्योग्यताएँ लाद दी गयीं। यदि उद्योगों के क्षेत्र में स्त्रियों को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाए तो उनमें आत्मविश्वास जाग्रत होगा, वे स्वतन्त्र रूप से निर्णय ले सकेंगी और आर्थिक दृष्टि से उनको पुरुषों की कृपा पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होने पर स्त्रियाँ सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी स्थिति को ऊँचा उठा सकेंगी। स्त्रियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता उनके लिए वरदान सिद्ध होगी और वे स्वयं सामाजिक विकास में बहुत कुछ योग दे सकेंगी।

प्रश्न 5
महिला उद्यमिता द्वारा पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं का किस प्रकार निराकरण किया जा सकता है ? समझाइए।
उत्तर:
पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन से सम्बन्धित अधिकांश समस्याएँ किसी-न-किसी रूप में स्त्रियों से ही जुड़ी हुई हैं। इन समस्याओं की तह तक जाने पर पता चलता है कि इसका मुख्य कारण स्त्रियों का सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों से वंचित रहना है। जब महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जाएगा तो इसके परिणामस्वरूप स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनेगी और वे कई महत्त्वपूर्ण निर्णय स्वयं ले सकेंगी। विधवा पुनर्विवाह की संख्या बढ़ेगी, पर्दाप्रथा समाप्त होगी और पुरुषों के द्वारा सामान्यत: स्त्रियों का शोषण नहीं किया जा सकेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्त्रियों में सामाजिक एवं आर्थिक चेतना का विकास किया जाए।

प्रश्न 6
एक सफल महिला उद्यमी के किन्हीं दो सामाजिक गुणों पर प्रकाश डालिए। [2012 ]
उत्तर:
1. नेतृत्व कुशलता – नेतृत्व कुशलता सफल उद्यमता का गुण हैं। प्रत्यक सफल उद्यमी महिला इस गुण से परिपूर्ण होती है तथा उद्योग में लगे हुए कर्मचारियों एवं श्रमिकों को अधिक-से-अधिक लगनपूर्वक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
2. हम की भावना – सफल उद्यमी में ‘हम’ की भावना अत्यधिक प्रबल होती है। वह स्वयं के स्थान पर संगठन को प्राथमिकता देता है। प्रत्येक सफल महिला उद्यमी में भी यह भावना उसके श्रेष्ठ गुण के रूप में दिखाई देती है।

निश्चित उत्तीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1
महिला उद्यमिता को क्या तात्पर्य है ? [2008, 09, 11]
उत्तर:
महिला उद्यमिता का तात्पर्य महिलाओं द्वारा किये जाने वाले किसी नये उद्योग के संचालन तथा व्यवस्था से है।

प्रश्न 2
देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ावा देने में कौन-सी संस्था अग्रणी रही है ?
उत्तर:
देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ावा देने में केन्द्रीय समाजकल्याण बोर्ड अग्रणी रहा है।

प्रश्न 3
महिला और बाल-विकास विभाग स्त्रियों को प्रशिक्षण देने की कौन-सी कार्य योजनाएँ तैयार करता है ?
उत्तर:
महिला और बाल-विकास विभाग स्त्रियों को खेती, डेयरी, पशुपालन, मछली-पालन, खादी और ग्रामोद्योग, हथकरघा, रेशम उद्योग के लिए प्रशिक्षण देने की कार्य-योजनाएँ तैयार करता है।

प्रश्न 4
महिला उद्यमियों द्वारा चलाये जाने वाले प्रमुख उद्योग कौन-से हैं ?
उत्तर:
महिला उद्यमियों द्वारा चलाये जाने वाले प्रमुख उद्योग इस प्रकार हैं – इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रबड़ की वस्तुएँ, सिले हुए वस्त्र, माचिस, मोमबत्ती, रासायनिक पदार्थ, घरेलू उपकरण आदि।

प्रश्न 5
राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना क्यों की गयी ?
उत्तर:
राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना स्त्रियों को उद्यमिता से सम्बन्धित प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से की गयी।

प्रश्न 6
‘आँगन महिला बाजार’ क्या है ?
उत्तर:
महिलाओं को उद्यम क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए 1986 ई० में देश में सर्वप्रथम आँगन महिला बाजार की स्थापना की गयी। महिलाएँ इस उद्यम के द्वारा निर्मित अचार, चटनी, घरेलू उपयोग की वस्तुएँ, पौधों की नर्सरी, फोटोग्राफी के सामानों का विक्रय करती हैं।

प्रश्न 7
भारत में ‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष कब मनाया गया था ?
या
महिला सशक्तिकरण किस सन में प्रारम्भ हुआ? [2015]
उत्तर:
भारत में अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष 1973 ई० में मनाया गया था।

प्रश्न 8
जवाहर रोजगार योजना में महिलाओं को क्या विशेष लाभ दिया गया है ?
उत्तर:
जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत लाभ प्राप्तकर्ताओं में 30 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण किया गया है।

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1
राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना कब की गयी ?
(क) 1983 ई० में
(ख) 1984 ई० में
(ग) 1985 ई० में
(घ) 1986 ई० में

प्रश्न 2
उद्यमिता एक नव प्रवर्तनकारी कार्य है। यह स्वामित्व की अपेक्षा एक नेतृत्व कार्य हो।” यह परिभाषा किसने दी है? [2011]
(क) बी० आर० गायकवाड़
(ख) जोसेफ ए० शुम्पीटर
(ग) ए० एच० कोल
(घ) हिगिन्स

उत्तर:
1. (क) 1983 ई० में,
2. (ख) जोसेफ ए० शुम्पीटर।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange: Exchange System

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange: Exchange System (विनिमय : विनिमय प्रणालियाँ) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange: Exchange System (विनिमय : विनिमय प्रणालियाँ).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 1
Chapter Name Exchange: Exchange System (विनिमय : विनिमय प्रणालियाँ)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange: Exchange System (विनिमय : विनिमय प्रणालियाँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
अर्थशास्त्र में विनिमय से आप क्या समझते हैं ? विनिमय से होने वाले लाभों एवं हानियों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
प्रो० मार्शल के अनुसार, “दो पक्षों के बीच होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं।”
प्रो० जेवेन्स के अनुसार, “कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही विनिमय कहते हैं।”
ऐ० ई० वाघ के अनुसार, “हम एक-दूसरे के पक्ष में स्वामित्व के दो ऐच्छिक हस्तान्तरणों को विनिमय के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।’
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वस्तुओं के आदान-प्रदान को विनिमय कहते हैं, परन्तु वस्तुओं के सभी आदान-प्रदान को विनिमय नहीं कहा जा सकता। अर्थशास्त्र में केवल वही आदान-प्रदान विनिमय कहलाता है जो पारस्परिक, ऐच्छिक एवं वैधानिक हो।

विनिमय से लाभ
विनिमय क्रिया से प्राप्त लाभ निम्नवत् हैं

1. आवश्यकता की वस्तुओं की प्राप्ति – आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण ही विनिमय का जन्म हुआ। आज व्यक्ति अपनी सभी आवश्यकताओं की वस्तुएँ स्वयं उत्पादित नहीं कर सकता। आवश्यकताओं की वृद्धि के कारण पारस्परिक निर्भरता बढ़ गयी है। विनिमय के माध्यम से व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त कर सकता है। विनिमय के कारण ही आयात-निर्यात होता है।

2. प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन –
ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ आवश्यकताओं में भी तीव्र गति से वृद्धि हुई है तथा वस्तुओं की माँग बढ़ी है। इसीलिए वस्तुओं के . अधिक उत्पादन की आवश्यकता हुई। अधिक उत्पादन संसाधनों के कुशलतम दोहन पर ही निर्भर करता है। विनिमय के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाता है।

3. बड़े पैमाने पर उत्पादन –
वर्तमान प्रतियोगिता व फैशन के युग में वस्तुओं का उत्पादन केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही नहीं, वरन् देश-विदेश के व्यक्तियों की माँग को भी ध्यान में रखकर बड़े पैमाने पर मशीनों द्वारा किया जाता है, जिससे वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग को पूरा किया जा सके।

4. बाजार का विस्तार –
विनिमय के कारण ही वस्तुओं का आयात-निर्यात सम्भव हो सका है। विनिमय के क्षेत्र में वृद्धि के साथ-साथ वस्तुओं का बाजार भी विस्तृत होता जाता है। बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन होने से बढ़े हुए उत्पादन को निर्यात करके बाजार का क्षेत्र विस्तृत किया जा सकता है।

5. जीवन –
स्तर में सुधार विनिमय द्वारा आवश्यकता की वस्तुएँ सरलतापूर्वक कम कीमत पर उपलब्ध हो जाने से लोगों के जीवन-स्तर में सुधार होता है। अपने देश में अप्राप्त वस्तुएँ विदेशों से मँगाई जा सकती हैं। अत: विनिमय के माध्यम से लोगों का जीवन-स्तर ऊँचा होता है।

6. कार्य-कुशलता में वृद्धि –
विनिमय द्वारा लोगों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। इसका मुख्य कारण आवश्यक वस्तुओं का सरलता से मिलना तथा उन वस्तुओं का उत्पादन करना है, जिनमें कोई व्यक्ति या राष्ट्र निपुणता प्राप्त कर लेता है। एक कार्य को निरन्तर करने से कार्य-निपुणता में वृद्धि होती है।

7. ज्ञान में वृद्धि –
विनिमय द्वारा मनुष्यों का परस्पर सम्पर्क बढ़ता है। फलस्वरूप व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के धर्म, रहन-सहन, भाषा, रीति-रिवाजों आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार विनिमय द्वारा ज्ञान व सभ्यता में वृद्धि होती है।

8. राष्ट्रों में पारस्परिक मैत्री व सद्भावना –
विनिमय के कारण ही वस्तुओं का आयात-निर्यात सम्भव हो सका है; फलस्वरूप विश्व के विभिन्न राष्ट्र परस्पर निकट आये हैं। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर वस्तुओं की प्राप्ति हेतु निर्भर हो गया है। परिणामस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों में मित्रता व सद्भावना बलवती हुई है।

9. विपत्तिकाल में सहायता – 
विनिमय द्वारा प्राकृतिक प्रकोप; जैसे – अकाल, बाढ़, भूकम्प, सूखा आदि के समय एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सहायता करता है। इस प्रकार विनिमय के कारण परस्पर पास आये राष्ट्र विपत्तिकाल में सहायक सिद्ध होते हैं।

10. विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ –
विनिमय द्वारा दोनों पक्षों को कम आवश्यक वस्तुओं के स्थान पर अधिक आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार विनिमय से दो व्यक्तियों या दो राष्ट्रों को लाभ मिलता है।

विनिमय से हानियाँ

1. आत्मनिर्भरता की समाप्ति – विनिमय के कारण व्यक्ति एवं राष्ट्र परस्पर निर्भर हो गये हैं, जिसके कारण आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी है। युद्ध या अन्य संकट के समय एक राष्ट्र अन्य राष्ट्र को वस्तुएँ देना बन्द कर देता है। इस स्थिति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

2. राजनीतिक पराधीनता –
विनिमय के कारण विस्तारवादी नीति का प्रसार होता है। औद्योगिक दृष्टि से सबल राष्ट्र, निर्बल राष्ट्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। उदाहरणस्वरूप-इंग्लैण्ड भारत में विनिमय (व्यापार) करने के लिए आया था, लेकिन उसने धीरे-धीरे भारत पर अपना अधिकार कर लिया। इस प्रकार विनिमय से राजनीतिक दासता की भय बना रहता है।

3. प्राकृतिक साधनों का अनुचित उपयोग –
विनिमय के कारण विनिमय क्रिया बलवती होती जाती है। आयात-निर्यात अधिक मात्रा में होने लगते हैं। शक्तिशाली राष्ट्र निर्बल राष्ट्रों के प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग अपने हित में करना प्रारम्भ कर देते हैं, जिससे उनका विकास अवरुद्ध होता जाता है।

4. अनुचित प्रतियोगिता –
विनिमय के कारण प्रत्येक राष्ट्र अपनी अतिरिक्त वस्तुओं को विश्व के बाजार में बेचना चाहता है। प्रत्येक राष्ट्र अपने निर्यात में वृद्धि कर अधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार एक अनुचित व हानिकारक प्रतियोगिता प्रारम्भ हो जाती है और निर्बल राष्ट्रों को अधिक आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।

5. युद्ध की सम्भावना –
शक्तिशाली राष्ट्र अपनी आर्थिक उन्नति हेतु बाजार की प्राप्ति तथा कच्चे माल की आपूर्ति हेतु संघर्ष करता है, जिसके कारण युद्ध की सम्भावना बनी रहती है।

6. असन्तुलित आर्थिक विकास –
विनिमय के कारण प्रत्येक देश उन वस्तुओं का अधिक उत्पादन करता है, जिनकी विदेशों में अधिक माँग होती है। इस प्रकार देश का आर्थिक विकास असन्तुलित रूप में होने लगता है। यह आर्थिक संकट में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर देता है जिससे क्षेत्रीय विषमताएँ भी बढ़ने लगती हैं। पर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि विनिमय में दोषों की अपेक्षा गुण अधिक हैं। विनिमय प्रक्रिया में जो दोष दृष्टिगत होते हैं वे मात्र गलत आर्थिक नीतियों के कारण हैं। यदि आर्थिक नीति विश्व-हित को ध्यान में रखकर निर्मित की जाए तो उक्त दोष दूर किये जा सकते हैं। विनिमय एक आवश्यक प्रक्रिया भी है, जिसके अभाव में विश्व की सम्पूर्ण प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती।

प्रश्न 2
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है ? इसके गुण व दोषों का वर्णन कीजिए। [2008, 11, 12]
या
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है ? इसकी कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
विनिमय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2012]
या
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है? वस्तु विनिमय प्रणाली के लाभों (गुणों) का वर्णन कीजिए। [2014]
या
संक्षेप में विनिमय में लाभ एवं हानियों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर:
आवश्यकता आविष्कारों की जननी है। अतः मनुष्य की आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण ही ‘विनिमय’ का आविष्कार (जन्म) हुआ। यह विनिमय अब तक दो रूपों में प्रचलित है

  1.  प्रत्यक्ष विनिमय अथवा वस्तु विनिमय तथा
  2. परोक्ष विनिमय अथवा क्रय-विक्रय प्रणाली।

वस्तु विनिमय प्रणाली वस्तु विनिमय प्रणाली को अदला-बदली की प्रणाली भी कहते हैं जो कि विनिमय की प्राचीन पद्धति है। इस प्रणाली में वस्तुओं तथा सेवाओं को प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान किया जाता है अर्थात् जब कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु या सेवा के बदले किसी अन्य व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है तो इस क्रिया को अदल-बदल या वस्तु विनिमय या प्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत मुद्रा (द्रव्य) का प्रयोग नहीं होता बल्कि वस्तुओं तथा सेवाओं का आदान-प्रदान होता है। भारत के ग्रामों में आज भी अनाज के बदले सब्जी ली जाती है या ग्रामों में नाई, बढ़ई, धोबी आदि को उनकी सेवाओं के बदले अनाज दिया जाता है।

वस्तु विनिमय की परिभाषा
प्रो० थॉमस के अनुसार-“एक वस्तु से दूसरी वस्तु के प्रत्यक्ष विनिमय को ही वस्तु विनिमय कहते हैं।”
प्रो० जेवेन्स के अनुसार, “अपेक्षाकृत कम आवश्यक वस्तु से अधिक आवश्यक वस्तुओं का आदान-प्रदान ही वस्तु विनिमय है।”

वस्तु विनिमय प्रणाली के गुण/लाभ
वस्तु विनिमय प्रणाली में निम्नलिखित गुण (लाभ) विद्यमान हैं

1. सरलता – वस्तु विनिमय प्रणाली एक सरल प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें वस्तु के बदले वस्तु का लेन-देन होता है। एक व्यक्ति अपनी अतिरिक्त वस्तु दूसरे जरूरतमन्द व्यक्ति को देकर उसके बदले अपनी आवश्यकता की वस्तु उस व्यक्ति से प्राप्त कर लेता है।

2. पारस्परिक सहयोग –
वस्तु विनिमय प्रणाली से आपसी सहयोग में वृद्धि होती है, क्योंकि मनुष्य अपनी अतिरिक्त वस्तुओं को अपने समीप के व्यक्ति को देकर उससे अपनी आवश्यकता की वस्तु प्राप्त कर लेता है, जिससे उनमें पारस्परिक सहयोग की भावना बलवती होती है।

3. धन का विकेन्द्रीकरण –
वस्तु विनिमय प्रणाली में मुद्रा पद्धति के अभाव के कारण धन का केन्द्रीकरण कुछ ही हाथों में न होकर समाज के सीमित क्षेत्र के लोगों में बँट जाता है। वस्तुओं के शीघ्र नष्ट होने के भय के कारण वे वस्तुओं का संग्रहण अधिक मात्रा में नहीं कर पाते हैं। अत: वस्तु विनिमय प्रणाली में सभी पारस्परिक सहयोग की भावना से मानव-हित को सर्वोपरि मानकर कार्य करते हैं।

4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए उपयुक्त –
विभिन्न देशों की मुद्राओं में भिन्नता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के भुगतान की समस्या बनी रहती है, जबकि
वस्तुओं के माध्यम से भुगतान सरलता से हो जाता है। वस्तु विनिमय द्वारा इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकती है।

5. मौद्रिक पद्धति के दोषों से मुक्ति –
वस्तु विनिमय प्रणाली मुद्रा-प्रसार व मुद्रा-संकुचन के दोषों से मुक्त है, क्योंकि इसमें वस्तुएँ मुद्रा से नहीं बल्कि वस्तुओं के पारस्परिक आदान-प्रदान से ही प्राप्त की जाती हैं। इससे वस्तुओं के सस्ते या महँगे होने का भय नहीं रहता। परिणामस्वरूप मुद्रा की मात्रा की वस्तुओं के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

6. दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ –
वस्तु-विनिमय की क्रिया उन्हीं व्यक्तियों द्वारा की जाती है, जिनके पास वस्तुओं का आधिक्य होता है, जबकि सम्बन्धित वस्तु की उपयोगिता उस व्यक्ति के लिए अपेक्षाकृत कम होती है। यह सर्वमान्य है कि व्यक्ति कम उपयोगी वस्तु को देकर अधिक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार वस्तु विनिमय की क्रिया में दोनों पक्षों को ही उपयोगिता का लाभ प्राप्त होता है।

वस्तु विनिमय की असुविधाएँ या कठिनाइयाँ या दोष
वस्तु विनिमय प्रणाली की प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नवत् हैं

1. दोहरे संयोग का अभाव – वस्तु विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कठिनाई दोहरे संयोग का अभाव है। इस प्रणाली के अन्तर्गत मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ऐसे व्यक्ति की खोज में भटकना पड़ता है जिसके पास उसकी आवश्यकता की वस्तु हो और वह व्यक्ति अपनी वस्तु देने के लिए तत्पर हो तथा वह बदले में स्वयं की उस मनुष्य की वस्तु लेने के लिए तत्पर हो। उदाहरण के लिए-योगेश के पास गेहूँ हैं और वह गेहूं के बदले चावल प्राप्त करना चाहता है, तो योगेश को ऐसा व्यक्ति खोजना पड़ेगा जिसके पास चावल हों और साथ-ही-साथ वह बदले में गेहूं लेने के लिए तैयार हो। इस प्रकार दो पक्षों का ऐसा पारस्परिक संयोग, जो एक-दूसरे की आवश्यकता की वस्तुएँ प्रदान कर सके, मिलना कठिन हो जाता है।

2. मूल्य के सर्वमान्य माप का अभाव – इस प्रणाली में मूल्य का कोई ऐसा सर्वमान्य माप नहीं होता जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु के मूल्य को विभिन्न वस्तुओं के सापेक्ष निश्चित किया जा सके। इस स्थिति में दो वस्तुओं के बीच विनिमय दर निर्धारित करना कठिन होता है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी वस्तु को अधिक मूल्य ऑकते हैं तथा वस्तु विनिमय कार्य में कठिनाई होती है।

3. वस्तु के विभाजन की कठिनाई – कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका विभाजन नहीं किया जा सकता; जैसे – गाय, बैल, भेड़, बकरी, कुर्सी, मेज आदि। वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं की अविभाज्यता भी बहुधा कठिनाई का कारण बन जाती है। उदाहरण के लिए-यदि योगेश के पास एक गाय है और वह इसके बदले में खाद्यान्न, कपड़े तथा रेडियो चाहता है, तो इस स्थिति में योगेश को अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। वह ऐसे व्यक्ति को शायद ही खोज पाएगा जो उससे गाय लेकर उसकी सभी आवश्यक वस्तुएँ दे सके। साथ ही योगेश के लिए गाय का विभाजन करना भी असम्भव है, क्योंकि विभाजन करने से गाय का मूल्य या तो बहुत ही कम हो जाएगा या कुछ भी नहीं रह जाएगा।

4. मूल्य संचय की असुविधा – वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं को अधिक समय तक संचित करके नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वस्तुएँ नाशवान् होती हैं। वस्तुओं के मूल्य भी स्थिर नहीं रहते हैं; अतः वस्तुओं को धन के रूप में संचित करना कठिन होता है।

5. मूल्य हस्तान्तरण की असुविधा – वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत वस्तु के मूल्य को हस्तान्तरित करने में कठिनाई उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए-योगेश के पास मेरठ में एक मकान है। यदि वह अब अपने गाँव में रहना चाहता है तो वस्तु विनिमय प्रणाली की स्थिति में वह अपने मकान को न तो बेचकर धन प्राप्त कर सकता है और न ही उस मकान को अपने साथ जहाँ चाहे ले जा सकता है। इस प्रकार उसके सामने बहुत बड़ी असुविधा उत्पन्न हो जाती है।

6. स्थगित भुगतानों में कठिनाई – वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तु के मूल्य स्थिर नहीं होते हैं। तथा वस्तुएँ कुछ समय के पश्चात् नष्ट होनी प्रारम्भ हो जाती हैं। इस कारण उधार लेन-देन में असुविधा रहती है। यदि वस्तुओं के मूल्य का भुगतान तुरन्त न करके कुछ समय के बाद किया जाता है तब सर्वमान्य मूल्य-मापक के अभाव के कारण बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3
द्रव्य के प्रयोग ने वस्तु विनिमय की कठिनाइयों को किस प्रकार दूर कर दिया है ? समझाइए।
उत्तर:
द्रव्य या मुद्रा के प्रादुर्भाव से वस्तु विनिमय की कठिनाइयों का निवारण
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों के कारण एक ऐसी वस्तु की आवश्यकता प्रतीत हुई जिसके द्वारा वस्तु विनिमय की कठिनाइयाँ दूर हो सकें तथा विनिमय प्रक्रिया में सुविधा व सरलता हो। इसी आवश्यकता ने मुद्रा (द्रव्य) को जन्म दिया। द्रव्य के माध्यम से अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली प्रारम्भ हुई जिसने वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों का निवारण किया। हैन्सन का यह कथन सत्य है कि, “मुद्रा का जन्म वस्तु विनिमय की कठिनाइयों से सम्बन्धित है।”
द्रव्य के प्रयोग से वस्तु विनिमय की कठिनाइयों का निवारण हो गया है, जो निम्नवत् है

1. आवश्यकताओं के दोहरे संयोग के अभाव का निवारण – द्रव्य के प्रादुर्भाव से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव समाप्त हो गया है। अब क्रय-विक्रय प्रणाली के अन्तर्गत ऐसे व्यक्ति की खोज नहीं करनी पड़ती जिसके पास आपकी आवश्यकता की वस्तु हो तथा वह बदले में उस वस्तु को स्वीकार कर सके जो आपके पास हो। द्रव्य के प्रयोग से विनिमय प्रक्रिया दो उपविभागों में बँट जाती है—क्रय तथा विक्रय। अपनी अतिरिक्त वस्तु को बाजार में बेचकर मुद्रा प्राप्त की जा सकती है। और द्रव्य के द्वारा अपनी आवश्यकता की वस्तु सरलतापूर्वक बाजार से क्रय की जा सकती है।

2. मूल्यों के सर्वमान्य माप की समस्या का अन्त – द्रव्य के चलन से प्रत्येक वस्तु को मूल्य द्रव्य में व्यक्त किया जाता है। अतः विनिमय करते समय वस्तु विनिमय की भाँति यह चिन्ता नहीं रहती कि क्रय की जाने वाली वस्तु के लिए हमें कितना मूल्य देना पड़ेगा। द्रव्य के प्रचलन से अब सभी वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य द्रव्य के द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। द्रव्य में सर्वमान्यता का गुण पाये जाने के कारण अब सभी वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्यांकन द्रव्य के माध्यम से सम्भव हो जाता है; अतः द्रव्य ने वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य मापन की समस्या का अन्त कर दिया है।

3. वस्तु विभाजन की कठिनाई का निवारण – वस्तु विनिमय प्रणाली में अविभाज्य वस्तुओं के विनिमय में कठिनाई उत्पन्न होती थी। द्रव्य ने इस समस्या को दूर कर दिया है। अब अविभाज्य वस्तु को विक्रय करके द्रव्य प्राप्त किया जा सकता है तथा इस द्रव्य के माध्यम से आवश्यकता की विभिन्न वस्तुएँ क्रय की जा सकती हैं।

4. मूल्य के संग्रह का कार्य सरल – द्रव्य के प्रादुर्भाव से मूल्य संचय का कार्य सरल व सुविधाजनक हो गया है। अब आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को बेचकर द्रव्य प्राप्त कर लिया जाता है तथा उस द्रव्ये को बैंक, डाकघर आदि में जमा करके लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है तथा यह शीघ्र नष्ट भी नहीं होता है। अतः मूल्य संग्रह की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है।

5. मूल्य के हस्तान्तरण में सुविधा – वस्तु विनिमय प्रणाली में एक व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को या अपने पास संगृहीत मूल्य को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से नहीं ले जा सकता था। वर्तमान समय में द्रव्य ने इस असुविधा को दूर कर दिया है। अब व्यक्ति अपनी चल वे अचल सम्पत्ति का विक्रय करके प्राप्त द्रव्य को जहाँ चाहे ले जा सकता हैं।

6. भावी भुगतान की समस्या का समाधान – द्रव्य के चलन से भावी भुगतान की समस्या का निराकरण हो गया है। मुद्रा के माध्यम से भुगतानों को भावी समय के लिए स्थगित करना या उधार का लेन-देन करना सरल हो गया है।
उपर्युक्तं विवेचन से स्पष्ट है कि द्रव्य के प्रादुर्भाव से वस्तु विनिमय की समस्त कठिनाइयों का निवारण हो गया है। हैन्सन का यह कथन है कि, “मुद्रा का जन्म वस्तु विनिमय की कठिनाइयों से सम्बन्धित है’, सत्य है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
प्रत्यक्ष एवं परोक्ष विनिमय के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
या
वस्तु विनिमय तथा क्रय-विक्रय में अन्तर बताइए।
उत्तर:
विनिमय के दो रूप होते हैं (1) प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय या अल-बदल प्रणाली। (2) अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली।।

1. प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय प्रणाली – “जब दो व्यक्ति परस्पर अपनी वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान करते हैं, तब इस प्रकार की क्रिया को हम अर्थशास्त्र में वस्तु विनिमय (Barter) कहते हैं।” वस्तु विनिमय = वस्तु → वस्तु। उदाहरण के लिए–भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनाज देकर सब्जी प्राप्त की जाती है तथा नाई, धोबी, बढ़ई आदि को उनकी सेवाओं के बदले में अनाज दिया जाता है।

2. अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली –
जब विनिमय का कार्य मुद्रा (द्रव्य) के माध्यम द्वारा किया जाता है तो इस प्रणाली को क्रय-विक्रय अथवा अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति मुद्रा देकर किसी वस्तु या सेवा को क्रय करता है या किसी वस्तु या सेवा को देकर मुद्रा प्राप्त की जाती है, तब इस क्रिया को अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली कहते हैं।
अप्रत्यक्ष विनिमय = वस्तु → मुद्रा → वस्तु।
विनिमय के इन दोनों प्रकार के अन्तर को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

क्र०सं० प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय प्रणाली अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली
1. जब कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु या सेवा के बदले किसी अन्य व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है तो उसे प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय कहते हैं। जब वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा (द्रव्य) के माध्यम से विनिमय होता है तब इसे अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं।
2. प्रत्यक्ष विनिमय, विनिमय की एक पूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रणाली में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को वस्तुएँ या सेवाएँ देता है तथा बदले में उसी समय वस्तुएँ या सेवाएँ प्राप्त करता है। अप्रत्यक्ष विनिमय में विनिमय प्रक्रिया दो उपविभागों-क्रय तथा विक्रय–में विभक्त की जा सकती है। विक्रय तथा क्रय के पश्चात् ही विनिमय प्रक्रिया पूर्ण होती है।
3. प्रत्यक्ष विनिमय में द्रव्य का प्रयोग नहीं होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय में द्रव्य का प्रयोग किया जाता है।
4. प्रत्यक्ष विनिमय में आवश्यकता से अतिरिक्त वस्तुओं एवं सेवाओं के बदले आवश्यकता की वस्तुएँ तथा सेवाएँ प्राप्त की जाती हैं। अप्रत्यक्ष विनिमय में वस्तु या सेवा के बदले पहले द्रव्य प्राप्त किया जाता है तथा फिर द्रव्य के बदले आवश्यकता की वस्तुएँ या सेवाएँ प्राप्त की जाती हैं।
5. वस्तु विनिमय प्रणाली को उपयोग केवल सीमित क्षेत्र में ही सम्भव होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय का उपयोग विस्तृत क्षेत्र में किया जा सकता है।
6. वस्तु विनिमय का प्रचलन प्रायः उस अवस्था में होता है, जब कि मनुष्य की आवश्यकताएँ बहुत कम, सरल तथा सीमित होती हैं। मनुष्य की आवश्यकताओं की वृद्धि के कारण ही अप्रत्यक्ष विनिमय के द्वारा अधिकाधिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है।
7. वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तु की अदल-बदल एक व्यक्ति के साथ अर्थात् जिसे आप अपनी वस्तु वस्तु देते हैं, बदले में आप उसकी वस्तु को प्राप्त करते हैं, की जाती है। अप्रत्यक्ष विनिमय में वस्तुओं का क्रय-विक्रय एक ही व्यक्ति के साथ नहीं करना पड़ता है। वस्तु का क्रय एक व्यक्ति से तथा विक्रय अन्य व्यक्ति को किया जाता है।
8. वस्तु विनिमय को प्रचलन केवल ऐसे समाज में होता है जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा होता है अथवा जिसमें द्रव्य का चलन नहीं होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय सभ्य व विकसित समाज में प्रचलित होता है।

प्रश्न 2
आधुनिक युग में वस्तु विनिमय प्रणाली क्यों सम्भव नहीं है? कारण बताइए। [2007]
उत्तर:
आधुनिक युग में वस्तु विनिमय का स्थान प्राचीनकाल में मनुष्य की आवश्यकताएँ कम, सीमित तथा सरल थीं। द्रव्य का प्रचलन नहीं था। इस कारण वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी। ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताओं में निरन्तर वृद्धि होने के कारण इस प्रणाली में असुविधाएँ उत्पन्न होने लगीं तथा वस्तु विनिमय के लिए जो आवश्यक परिस्थितियाँ या दशाएँ होनी चाहिए थीं, प्रायः उनका लोप भी होने लगा। वर्तमान में वस्तु विनिमय प्रणाली सम्भव नहीं है। अब यह समाप्त होती जा रही है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. आवश्यकताओं में अत्यधिक वृद्धि – आज समाज की आवश्यकताएँ बहुत अधिक बढ़ गयी हैं। उपभोक्ता-स्तर बढ़ने के कारण अधिक वस्तुएँ और उनके व्यापक विनिमय की प्रणाली प्रारम्भ हो गयी है। ऐसी अवस्था में वस्तु विनिमय से समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं की जा सकती।

2. उत्पादन में निरन्तर वृद्धि –
आज प्रायः प्रत्येक देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है, जिसके कारण उत्पादन बढ़ रहा है। इस अधिक उत्पादन का विनिमय, वस्तु-विनिमय प्रणाली के माध्यम से होना असम्भव है।

3. तीव्र गति से आर्थिक विकास –
आधुनिक युग में प्रत्येक देश आर्थिक नियोजन के माध्यम से अपने आर्थिक विकास की ओर अग्रसर है। इस स्थिति में वस्तु-विनिमय प्रणाली सर्वथा अनुचित है। वितरण की समस्या, विशाल उत्पादन, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतियोगिता के कारण वस्तु-विनिमय प्रणाली असम्भव है।

4. मुद्रा या द्रव्य का प्रचलन –
आज प्रायः संसार के सभी देशों में मुद्रा का प्रचलन है। इस स्थिति में वस्तु विनिमय प्रणाली की बातें करना अज्ञप्नता है।

5. व्यापार का विस्तार –
शनैः-शनैः देशी तथा विदेशी व्यापार में वृद्धि होती जा रही है। ऐसी स्थिति में वस्तु विनिमय प्रणाली का उपयोग नहीं किया जा सकता।

6. यातायात के साधनों का विस्तार –
परिवहन के साधनों में विकास के कारण सम्पूर्ण विश्व एक इकाई बन गया है। उत्पादन तथा व्यापार में वृद्धि होती जा रही है। इस कारण वस्तु विनिमय प्रणाली सफल नहीं है।

7. जीवन-स्तर में वृद्धि –
ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानवीय आवश्यकताएँ तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं। मनुष्यों में उपभोग प्रवृत्ति बढ़ रही है। इस कारण जीवन-स्तर में वृद्धि हो । रही है। शिक्षा का स्तर ऊँचा उठ रहा है। इन परिस्थितियों में आज वस्तु विनिमय प्रणाली की बातें अव्यावहारिक हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अब वस्तु विनिमय प्रणाली समाप्त हो गयी है, परन्तु कुछ पिछड़े हुए तथा अल्प-विकसित क्षेत्रों में इस प्रणाली का प्रचलन आज भी है। भारत के कुछ भागों में अब भी नाई, धोबी, बढ़ई, खेतिहर मजदूर आदि को उनकी सेवाओं के बदले में अनाज दिया जाता है। तथा कुछ वस्तुएँ जैसे सब्जी आदि अनाज के बदले में ही ली जाती हैं। इस कारण आज भी वस्तु विनिमय प्रणाली पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है।

प्रश्न 3
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली आज भी प्रचलित है, क्यों ? समझाइए।
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली के प्रचलन के कारण

1. ग्रामीण समाज का पिछड़ापन – भारतीय ग्रामीण समाज आज भी पिछड़ी तथा दीन-हीन अवस्था में है। अधिकांश लोग अशिक्षित हैं। वे द्रव्य द्वारा हिसाब-किताब नहीं लगा पाते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की सरलता आज भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

2. सीम्मित आवश्यकताएँ – ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी हुई अवस्था में हैं। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण लोगों की आवश्यकताएँ कम हैं, जिसके कारण वस्तु-विनिमय प्रथा आज भी प्रचलित है।

3. यातायात के साधनों का अभाव – ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात के साधनों की अपर्याप्तता के कारण वे अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ नगरीय बाजारों से प्राप्त करने में असमर्थ हैं। वे अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ अपने गाँव में ही एक-दूसरे से प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इस कारण वस्तु विनिमय प्रणाली अब भी विद्यमान है।

4. कृषि पर निर्भरता – ग्रामीण समाज कृषि-प्रधान है। किसान को प्रतिमाह या प्रतिदिन आय प्राप्त नहीं होती है। केवल फसल के समय ही किसान को फसल के रूप में अनाज प्राप्त होता है। अत: वह अपने सभी आश्रितों (जैसे-नाई, धोबी, बढ़ई आदि) को फसल के रूप में ही पूरे वर्ष का पारिश्रमिक दे देता है। इस प्रकार किसान द्रव्य के अभाव में अनाज द्वारा ही अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करता है। इस कारण आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली विद्यमान है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय का प्रयोग आज भी सीमित मात्रा में विद्यमान है; परन्तु यह पूर्ण विनिमय न होकर अल्प मात्रा में ही वस्तु विनिमय है, क्योंकि इस प्रणाली में वस्तुओं के मूल्यांकन का आधार वस्तुतः द्रव्य ही है। अत: वह पूर्ण वस्तु विनिमय नहीं है।

प्रश्न 4
विनिमय से दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ होता है, समझाइए।
उत्तर:
विनिमय से दोनों पक्षों को उपयोगिता तुष्टिगुण का लाभ
विनिमय क्रिया में प्रत्येक पक्ष कम आवश्यक वस्तु देकर अधिक आवश्यक वस्तु प्राप्त करता है। अर्थात् एक पक्ष उस वस्तु को दूसरे व्यक्ति को देता है जो उसके पास आवश्यकता से अधिक है तथा जिसकी कम उपयोगिता है और बदले में उस वस्तु को लेता है जिसकी उसे अधिक आवश्यकता या तुष्टिगुण होता है। अतः विनिमय से दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ होता है। यदि किसी भी पक्ष को हानि होगी तब विनिमय सम्पन्न नहीं होगा। इस तथ्य का स्पष्टीकरण निम्नलिखित उदाहरण द्वारा किया जा सकता है

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण – माना प्रिया व अरुणा के पास क्रमशः आम व सेब की कुछ इकाइयाँ हैं। वे परस्पर विनिमय करना चाहते हैं। दोनों को एक-दूसरे की वस्तु की आवश्यकता है। क्रमागत तुष्टिगुण ह्रास नियम के अनुसार, प्रिया व अरुणा की आम व सेब की इकाइयों का तुष्टिगुण क्रमशः घटता जाता है, परन्तु जब विनिमय प्रक्रिया दोनों के मध्य प्रारम्भ होती है तब दोनों के पास आने वाली इकाइयों का तुष्टिगुण अधिक होता है तथा बदले में दोनों अपनी अतिरिक्त इकाइयों का त्याग करती हैं जिनका तुष्टिगुण अपेक्षाकृत कम होता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ मिलता रहता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange Exchange System q4
उपर्युक्त तालिका के अनुसार प्रिया व अरुणा में विनिमय प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। प्रिया आम की एक इक देकर अरुणा से सेब की एक इकाई प्राप्त करती है। प्रिया को सेब की प्रथम इकाई से प्राप्त तुष्टिगुण से अधिक होता है। उसे सेब की पहली इकाई से 25 इकाई तुष्टिगुण मिलता है। सेब के बदले उपर्युक्त तालिका के अनुसार प्रिया व अरुणा में विनिमय प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। प्रिया आम की एक इकाई देकर अरुणा से सेब की एक इकाई प्राप्त करती है। प्रिया को सेब की प्रथम इकाई से प्राप्त तुष्टिगुण से अधिक होता है। उसे सेब की पहली इकाई से 25 इकाई तुष्टिगुण मिलता है।

सेब के बदले में वह आम की अन्तिम इकाई, जिसका तुष्टिगुण 6 इकाई है, देती है। इस प्रकार उसे 25 – 6 = 19 तुष्टिगुण का लाभ होता है। इसी प्रकार अरुणा सेब की अन्तिम इकाई, जिसका तुष्टिगुण 4 है, को देकर आम की पहली इकाई जिससे उसे 20 तुष्टिगुण मिलता है, प्राप्त करती है। उसे 20 – 4= 16 तुष्टिगुण के बराबर लाभ मिलता है। विनिमय की यह प्रक्रिया आम व सेब की तीसरी इकाई तक निरन्तर चलती रहती है, क्योंकि विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ होता रहता है। परन्तु दोनों पक्ष चौथी इकाई के विनिमय हेतु तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि अब विनिमय प्रक्रिया से उन्हें हानि होती है। इस प्रकार दोनों पक्ष उस सीमा तक ही विनिमय करते हैं जब तक दोनों पक्षों को लाभ प्राप्त होता है। अत: यह कथन कि विनिमय से दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ प्राप्त होता है, सत्य है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
विनिमय की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
विनिमय में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  1. दो पक्षों का होना – विनिमय क्रिया के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों या दो पक्षों का होना आवश्यक है। अकेला व्यक्ति विनिमय प्रक्रिया को सम्पादित नहीं कर सकता।
  2.  वस्तु, सेवा या धन का हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में सदैव वस्तु, सेवा या धन को हस्तान्तरण किया जाता है।
  3.  वैधानिक हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में धन का वैधानिक हस्तान्तरण होता है। धन का अवैधानिक हस्तान्तरण विनिमय नहीं है।
  4.  ऐच्छिक हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में वस्तुओं व सेवाओं अर्थात् धन का हस्तान्तरण ऐच्छिक होता है। किसी दबाव के अन्तर्गत किया गया धन का हस्तान्तरण विनिमय नहीं है।
  5. लेन-देन पारस्परिक होना – धन या वस्तुओं का लेन-देन दो या दो से अधिक पक्षों के बीच पारस्परिक लाभ प्राप्त करने के लिए होता है। विक्रेता वस्तु देकर उसको मूल्य प्राप्त करता है और क्रेता पैसे देकर वस्तु।

उपर्युक्त लक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि “दो पक्षों के बीच होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं।”

प्रश्न 2
विनिमय क्रिया के लिए कौन-कौन से आवश्यक तत्त्व हैं ?
या
विनिमय की शर्ते बताइए।
उत्तर:
विनिमय की शर्ते (तत्त्व) निम्नलिखित हैं

  1. विनिमय क्रिया को सम्पादित करने के लिए दो पक्षों का होना आवश्यक है।
  2.  विनिमय क्रिया तभी सम्भव होगी जब दोनों पक्षों के पास दो या दो से अधिक प्रकार की वस्तुएँ होंगी।
  3. विनिमय तभी सम्भव है जब दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तुओं की आवश्यकता हो तथा वे परस्पर विनिमय हेतु स्वेच्छा से तत्पर हों।
  4.  विनिमय क्रिया में दोनों पक्षों को लाभ होना चाहिए, अन्यथा विनिमय सम्भव नहीं होगा।
  5.  विनिमय क्रिया में दो या दो से अधिक वस्तुएँ यथेष्ठ मात्रा में उपलब्ध होनी चाहिए। यदि वस्तुएँ व्यक्ति के पास केवल उसकी आवश्यकता-पूर्ति तक ही सीमित हैं तब विनिमय नहीं हो सकता।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
विनिमय के दो प्रकारों को लिखिए।
उत्तर:
(1) वस्तु विनिमय या प्रत्यक्ष विनिमय तथा
(2) अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय।

प्रश्न 2
वस्तु विनिमय से आप क्या समझते हैं ? [2008, 09, 10, 13, 15]
उत्तर:
“कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही वस्तु विनिमय कहते हैं।”

प्रश्न 3
वस्तु विनिमय प्रणाली की दो आवश्यक दशाएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) सीमित आवश्यकताएँ तथा
(2) अविकसित अर्थव्यवस्था तथा पिछड़ा समाज।

प्रश्न 4
विनिमय के दो प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
(1) दो पक्षों का होना तथा
(2) वस्तुओं तथा सेवाओं का ऐच्छिक हस्तान्तरण।

प्रश्न 5
आधुनिक युग में वस्तु विनिमय प्रणाली क्यों सम्भव नहीं है ? दो कारण लिखिए। [2007]
उत्तर:
(1) आवश्यकताओं में तीव्र गति से वृद्धि तथा
(2) मुद्रा का प्रचलन।

प्रश्न 6
मौद्रिक विनिमय के दो लाभ बताइए। [2016]
उत्तर:
(1) मूल्य का सर्वमान्य मापन तथा
(2) मूल्य संचय की सुविधा।

प्रश्न 7
प्रत्यक्ष विनिमय एवं अप्रत्यक्ष विनिमय का अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2008]
उत्तर:
जब कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु या सेवा के बदले अन्य व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है, तो उसे प्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। जब वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा (द्रव्य) के माध्यम से विनिमय होता है तब इसे अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं।

प्रश्न 8
विनिमय की आवश्यकता क्यों हुई ?
उत्तर:
मनुष्य की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकता के कारण उनमें पारस्परिक निर्भरता बढ़ने के फलस्वरूप विनिमय सम्बन्धी क्रियाओं का विकास होता चला गया।

प्रश्न 9
विनिमय के लिए एक आवश्यक शर्त क्या है ?
उत्तर:
विनिमय के लिए दो पक्षों का होना अति आवश्यक है।

प्रश्न 10
विनिमय से प्राप्त किन्हीं दो लाभों को लिखिए।
उत्तर:
(1) आवश्यकता की वस्तुओं की प्राप्ति तथा
(2) बड़े पैमाने पर उत्पादन।

प्रश्न 11
विनिमय से होने वाली किन्हीं दो हानियों को लिखिए। [2016]
उत्तर
(1) आत्मनिर्भरता की समाप्ति तथा
(2) राजनीतिक पराधीनता।

प्रश्न 12
वस्तु विनिमय पद्धति की दो कठिनाइयाँ बताइए। [2014, 16]
उत्तर:
(1) दोहरे संयोग का अभाव तथा
(2) मूल्य-मापन में कठिनाई।

प्रश्न 13
किस विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ मौद्रिक विनिमय प्रणाली द्वारा दूर हुईं? [2007]
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ मौद्रिक विनिमय प्रणाली द्वारा दूर हुईं।

प्रश्न 14
क्रय-विक्रय प्रणाली में विनिमय को माध्यम क्या होता है? [2014]
उत्तर:
क्रय-विक्रय प्रणाली में अप्रत्यक्ष विनिमय होता है अर्थात् मुद्रा का प्रयोग होता है।

प्रश्न 15
एक वस्तु को दूसरी वस्तु से बदलने की प्रणाली ” कहलाती है। [2014]
उत्तर:
वस्तु विनिमय।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही विनिमय कहते हैं।” यह कथन है
(क) प्रो० मार्शल का
(ख) एडम स्मिथ का
(ग) जेवेन्स का
(घ) रॉबिन्स को
उत्तर:
(ग) जेवेन्स का।

प्रश्न 2
“दो पक्षों के मध्य होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं।” यह कथन किसका है ?
(क) जेवेन्स का
(ख) मार्शल का
(ग) वाघ का
(घ) टॉमस का
उत्तर:
(ख) मार्शल का।

प्रश्न 3
वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान किया जाता है
(क) क्रय-विक्रय प्रणाली में
(ख) वस्तु विनिमय में
(ग) अप्रत्यक्ष विनिमय में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) वस्तु विनिमय में।

प्रश्न 4
द्रव्य के माध्यम से किया जाने वाला विनिमय कहलाता है [2017]
(क) वस्तु विनिमय
(ख) प्रत्यक्ष विनिमय
(ग) क्रय-विक्रय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) क्रय-विक्रय।

प्रश्न 5
विनिमय के लिए आवश्यक है
(क) दो पक्षों का होना
(ख) ऐच्छिक होना।
(ग) वैधानिक होना
(घ) इन सभी का होना
उत्तर:
(घ) इन सभी का होना।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 16 Problem of Social (Adult) Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 16
Chapter Name Problem of Social (Adult) Education
(सामाजिक (प्रौढ़) शिक्षा की समस्या)
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 16 Problem of Social (Adult) Education (सामाजिक (प्रौढ़) शिक्षा की समस्या)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सामाजिक शिक्षा (प्रौढ शिक्षा) से आप क्या समझते हैं? सामाजिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
या
सामाजिक शिक्षा का प्रमुख कार्यक्रम क्या है? [2013]
उत्तर :
समाज या प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ
प्रौढ़ शिक्षा या सामाजिक शिक्षा यथार्थ में वह अंशकालिक शिक्षा है, जिसे व्यक्ति अपना काम करते समय प्राप्त करता है। संकुचित अर्थ में सामाजिक शिक्षा का आशय निरक्षर को साक्षर बनाना है। जिन वयस्कों की आयु 18 वर्ष से अधिक है और उन्होंने किसी कारण से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त नहीं की है, उन्हें साक्षर बनाना ही प्रौढ़ शिक्षा है।

परन्तु अब प्रौढ़ शिक्षा की अवधारणा को व्यापक रूप दे दिया गया है तथा वह साक्षरता प्रदान करने तक सीमित नहीं रह गयी है। अब प्रौढ़ शिक्षा को ‘सामाजिक शिक्षा’ के रूप में जाना जाता है तथा इस शिक्षा के अन्तर्गत प्रौढ़ व्यक्तियों को सम्पूर्ण जीवन को उन्नत बनाने के लिए आवश्यक ज्ञान प्रदान किया जाता है। प्रौढ़ शिक्षा या सामाजिक शिक्षा का वास्तविक अर्थ स्पष्ट करते हुए मौलाना आजाद ने लिखा है “सामाजिक शिक्षा से हमारा तात्पर्य सम्पूर्ण मनुष्य की शिक्षा से हैं। वह उसे साक्षरता प्रदान करेगी, जिससे उसे संसार का ज्ञान प्राप्त हो सके।

वह उसे यह बताएगी कि किस प्रकार वह अपने को वातावरण से सन्तुलित कर सके और प्राकृतिक परिस्थितियों का, जिनमें वह रहती है, उपयोग कर सके। इसके द्वारा। उसको कुशलताओं तथा उत्पादन-विधियों का समुचित ज्ञान देना है, जिनसे वह आर्थिक उन्नति कर सके। इसके द्वारा उसे स्वास्थ्य के प्रारम्भिक विषयों का ज्ञान व्यक्तिगत एवं सामाजिक दृष्टिकोण से देना है, जिससे उसका पारिवारिक जीवन स्वस्थ और उन्नतिशील बने। अन्त में वह उसे नागरिकता की शिक्षा दे, जिससे शान्ति और समृद्धि हो।”

हुमायूँ कबीर ने लिखा है
“समाज शिक्षा को अध्ययन के एक प्रकार के पाठ्यक्रम के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका उद्देश्य लोगों में नागरिकता की चेतना उत्पन्न करना है और उनमें सामाजिक सुसंगठन की भावना की वृद्धि की जाती है। समाज शिक्षी बड़ी आयु के लोगों को केवल अक्षर ज्ञान कराकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाती, बल्कि इसका लक्ष्य सामान्य जनता में एक सुनिश्चित समाज का निर्माण करना रहता है।

इसके स्वाभाविक परिणाम के रूप में समाज शिक्षा का लक्ष्य यह रहता है कि लोगों में व्यक्तिगत रूप से और समाज के सदस्य होने के नाते अपने अधिकारों और कर्तव्यों की सचेष्ट भावना उत्पन्न की जाए।” इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ देश के प्रौढ़ नागरिकों को ऐसी शिक्षा देना है जिससे उन्हें प्रगतिवादी समाज में भली प्रकार समायोजन स्थापित करने में सुविधा हो और वे राष्ट्र की उन्नति में योगदान दे सकें। सामाजिक या प्रौढ़ शिक्षा के उद्देश्य सामाजिक या प्रौढ़ शिक्षा देश के उत्थान और प्रगति के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इसके प्रमुख उद्देश्य अग्रलिखित हैं

1. मानसिक एवं बौद्धिक विकास :
राष्ट्र की प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि उसके नागरिकों का मानसिक एवं बौद्धिक स्तर उच्च हो। इसी कारण प्रौढ़ शिक्षा में मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर विशेष बल दिया गया है।

2. व्यावसायिक शिक्षा और आर्थिक समृद्धि :
प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को व्यावसायिक शिक्षा देकर उन्हें जीविकोपार्जन के योग्य बनाना तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध बनाना है।

3. सामाजिक भावना का विकास :
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। बिना समाज के मनुष्य का अस्तित्व सम्भव नहीं है। इसलिए उद्देश्य समाज शिक्षा द्वारा प्रौढ़ों में सामूहिक रूप से कार्य करने की भावना उत्पन्न की जाती है। उनमें एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सहानुभूति, दया, आदर के भाव उत्पन्न करना तथा सहयोग से रहना और कार्य करना एवं प्रशिक्षण देना सामाजिक शिक्षा का एक आवश्यक अंग है।

4. नागरिकता की शिक्षा :
सामाजिक शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों का ज्ञान कराना है, जिससे वे अपने देश में लोकतन्त्र को सुदृढ़ और स्थायी बना सकें।

5. आध्यात्मिक विकास :
देश के नागरिकों में सत्य, अहिंसा, प्रेम, सदाचार आदि की भावनाओं को जाग्रत करके उन्हें सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की अनुभूति करने में सहायता करना भी सामाजिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है।

6. स्वास्थ्य सम्बन्धी बातों का ज्ञान :
सामाजिक शिक्षा का उद्देश्य प्रौढ़ नागरिकों को स्वास्थ्य सम्बन्धी उपयोगी नियमों का ज्ञान देना है, जिससे कि वे पूर्ण स्वस्थ होकर अपने-अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें।

7. राष्ट्रीय साधनों की सुरक्षा :
प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र की एक महत्त्वपूर्ण इकाई होता है। इसलिए व्यक्तियों की प्रौढ़ शिक्षा के द्वारा इस योग्य बनाया जाता है कि वे राष्ट्रीय साधनों का दुरुपयोग न करके उनकी सुरक्षा करें।

8. सांस्कृतिक ज्ञान :
प्रौढ़ शिक्षा का एक उद्देश्य नागरिकों को उनकी प्राचीन संस्कृति से परिचित कराना तथा सांस्कृतिको गौरव के प्रति उनके हृदय में प्रेम और आदर के भाव उत्पन्न करना है।

9. मनोरंजन के अवसर प्रदान करना :
सामूहिक गीत, नृत्य, कविता, कहानी, नाटक आदि के द्वारा नागरिकों को सुन्दर तरीके से मनोरंजन करने के योग्य बनाना भी प्रौढ़ शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास करके उसे आदर्श एवं सफल नागरिक बनने में सहायता प्रदान करना है।

प्रश्न 2
सामाजिक शिक्षा के मुख्य साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सामाजिक शिक्षा के मुख्य साधन
प्रौढ़ या समाज शिक्षा के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं।

1. प्रौढ कक्षाएँ :
प्रौढ़ों को ज्ञान प्रदान करने के लिए प्रौढ़ कक्षाएँ खोली जाती हैं। उन्हें अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त विभिन्न उपयोगी विषयों की शिक्षा भी दी जाती है।

2. सामुदायिक केन्द्र :
ग्रामों में सामुदायिक केन्द्रों की स्थापना की जाती है। इनमें सांस्कृतिक और मनोरंजनात्मक कार्य सम्पन्न होते हैं, हस्तकला की शिक्षा दी जाती है तथा पुस्तकालयों व वाचनालयों की व्यवस्था रहती है। इसके साथ-ही-साथ ग्रामवासियों के लिए भाषण व विचार-विमर्श की व्यवस्था भी की जाती है।

3. पुस्तकालय और वाचनालय :
प्रौढ़ शिक्षा में पुस्तकालयों और वाचनालयों का महत्त्व सर्वविदित है। इनके द्वारा प्रौढ़ों को विभिन्न प्रकार के कार्य करने के तरीके ज्ञात होते हैं। इससे प्रौढ़ों को ज्ञान विस्तृत होता है। पुस्तकालयों में प्रौढ़ों को कृषि, कुटीर उद्योग, मनोरंजन, सरल साहित्य व नागरिकता सम्बन्धी पुस्तकें उपलब्ध होती हैं।

4. संग्रहालय :
भारत सरकार ने देश में स्वास्थ्य संग्रहालयों, शिक्षा संग्रहालयों एवं व्यावसायिक संग्रहालयों की व्यवस्था की है, जिससे मनुष्य प्राचीन वस्तुओं को देखकर प्राचीन विचारों से परिचित हो सके।

5. मेला एवं प्रदर्शनी :
ग्रामों में विभिन्न प्रकार की प्रदर्शनियों का आयोजन करके विश्व में होने वाली प्रेगति और उन्नति का ज्ञान ग्रामवासियों को कराया जाता है; जैसे-कृषि प्रदर्शनी, शिक्षा प्रदर्शनी, स्वास्थ्य प्रदर्शनी आदि का आयोजन समय-समय पर ग्रामों में किया जाता है। इन मेलों एवं प्रदर्शनियों का उद्देश्य प्रौढ़ों में सामाजिकता की भावना का विकास करना है।

6. रात्रि पाठशालाएँ :
प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए रात्रि पाठशालाएँ खोली जानी चाहिए, जहाँ अपना काम समाप्त करने के बाद व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहुँच जाए।

7. समाचार-पत्र :
समाचार-पत्रों के द्वारा भी प्रौढ़ों का ज्ञान विस्तृत किया जाता है। इसके द्वारा वे देश-विदेश के समाचारों से अवगत होते हैं।

8. भ्रमण :
प्रौढ़ों को भ्रमण और निरीक्षण के द्वारा भी शिक्षा दी जा सकती है। व्यक्ति तीर्थ यात्रा करके देश के विभिन्न स्थान देखकर बहुत-सी बातों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं।

9. श्रमदान एवं समाज-सेवा :
प्रौढ़ शिक्षा में श्रमदान एवं समाज-सेवा को बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ग्रामों में सफाई, बाँध बनाना, कुएँ तथा तालाब बनाना आदि कार्य सामूहिक श्रम द्वारा बिना धन के ही सम्पन्न हो जाते हैं। इन कार्यों के द्वारा नागरिकों में सामाजिकता की भावना का विकास होता है।

10. राष्ट्रीय पर्व :
हमारे देश में राष्ट्रीय दिवस, सफाई सप्ताह, शिक्षा सप्ताह एवं अस्पृश्यता निवारण सप्ताह आदि प्रमुख राष्ट्रीय पर्व मनाये जाते हैं। इनके द्वारा भी प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षा मिलती है।।

11. शिक्षक और विद्यार्थियों का योगदान :
विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं विद्यार्थियों को अवकाश के समय अपने निवास स्थान के निकट ग्रामों में जाकर प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षा देनी चाहिए तथा प्रभावशाली भाषण देने चाहिए, जिससे ग्रामवासी अपने कर्तव्यों से परिचित हो जाएँ।

12. युवक गोष्ठी :
युवकों द्वारा समाज के रूढ़िवादी विचारों में परिवर्तन लाया जा सकता है। इसलिए युवक गोष्ठी का स्थान प्रौढ़ शिक्षा के अन्तर्गत बहुत महत्त्वपूर्ण है। सरकार ने भी इन गोष्ठियों को महत्त्व दिया है और युवक कृषक गोष्ठी, ग्राम रक्षा दल, पंचायत व सभा आदि की स्थापना की है।

13. रेडियो, चलचित्र व टेलीविजन :
रेडियो, चलचित्र और टेलीविजन प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। इन साधनों द्वारा ग्रामवासियों को अन्धविश्वासों के दुष्परिणाम, बीमारी फैलने के कारण, विदेशों की खबरें आदि बातों का ज्ञान कराया जाता है।

प्रश्न 3
सामाजिक (प्रौढ) शिक्षा की समस्याएँ क्या हैं? इन समस्याओं के समाधान के उपाय बताइए। [2012]
या
भारतवर्ष में प्रौदों के लिए शिक्षा-प्रसार में क्या-क्या बाधाएँ हैं? [2011]
या
प्रौढ शिक्षा के प्रसार की बाधाओं को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए। [2011]
उत्तर :
सामाजिक शिक्षा (प्रौढ़ शिक्षा) की मुख्य समस्याएँ
सामाजिक शिक्षा या प्रौढ़ शिक्षा के प्रचार के लिए यद्यपि व्यापक प्रयास किये जा रहे हैं, इस पर भी इसके प्रसार में अनेक बाधाएँ हैं। सामाजिक शिक्षा के प्रसार एवं सफलता के मार्ग में उत्पन्न होने वाली मुख्य समस्याओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. व्यापक निरक्षरता :
भारत में व्यापक निरक्षरता फैली हुई है। नगरों की अपेक्षा गाँवों में निरक्षरता का अधिक बोलबाला है। जब तक निरक्षरता की समस्या बनी रहेगी, तब तक देश की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति नहीं हो सकती और न ही प्रौढ़ों में नवचेतना उत्पन्न की जा सकती है।

2. आर्थिक समस्या :
भारत में सामाजिक शिक्षा के प्रसार के लिए एक लम्बी धनराशि की आवश्यकता है। भारत की वर्तमान जनसंख्या 121 करोड़ से भी अधिक्र है। इतनी विशाल ज़नसंख्या में प्रौढ़ों को साक्षर बनने के लिए इतने अधिक धन की आवश्यकता है, जिसे जुटाना सरकार के बस की बात नहीं है। इसके साथ ही प्रौढ़ों को साक्षर बनाने के लिए पर्याप्त अध्यापकों तथा समाज शिक्षा केन्द्रों की व्यवस्था करना भी एक कठिन कार्य है।

3. पाठ्यक्रम की समस्या :
सामाजिक शिक्षा की तीसरी समस्या पाठ्यक्रम का निर्धारण करने की है। सामाजिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के विषय में विद्वानों में परस्पर मतभेद हैं। प्रौढ़ों की रुचियाँ तथा आवश्यकताएँ बालकों की रुचियों तथा आवश्यकताओं से भिन्न होती हैं। ऐसी दशा में बालकों का पाठ्यक्रम प्रौढ़ों के लिए निर्धारित नहीं किया जा सकता।

कुछ प्रौढ़ लोग पूर्णतया निरक्षर होते हैं, कुछ अर्द्ध-शिक्षित तथा कुछ नव साक्षर इन सभी के लिए पृथक्-पृथक् पाठ्यक्रम की व्यवस्था करना एक कठिन कार्य है। इस प्रकार प्रौढ़ों की रुचियों के अनुकूल साहित्य का हमारे देश में पूर्णतया अभाव है और विभिन्न आयु के प्रौढ़ों के लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण करना एक जटिल समस्या है।

4. योग्य अध्यापकों की कमी :
सामाजिक शिक्षा को । कार्यक्रम तभी सफल हो सकता है, जब कि वह प्रौढ़ मनोविज्ञान (Adult Psychology) के ज्ञाता अध्यापकों द्वारा संचालित हो, परन्तु हमारे देश में सामाजिक शिक्षा के क्षेत्र में अधिकतर प्राथमिक, माध्यमिक या अप्रशिक्षित अध्यापक ही कार्य कर रहे हैं। ये लोग सामाजिक शिक्षा की समस्याओं, उद्देश्यों तथा प्रौढ़ मनोविज्ञान से पूर्णतया अपरिचित होते हैं। ऐसी दशा में इनसे सफलतापूर्वक कार्य करने की आशा करना व्यर्थ है। सामाजिक शिक्षा को सफल बनाने के लिए लाखों प्रौढ़ मनोविज्ञान के ज्ञाता अध्यापकों की आवश्यकता होगी जिनकी पूर्ति करना एक कठिन कार्य है।

5, शिक्षा के साधनों की कमी :
सामाजिक शिक्षा के साधनों से तात्पर्य–वे समूह अथवा संस्थाएँ हैं, जो समाज शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों से सम्पर्क रखती हैं, उन्हें ज्ञान प्रदान करती हैं तथा उनकी आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करती हैं। इस दृष्टि से उत्तम फिल्मों, चार्ट व चित्र तथा अन्य दृश्य सामग्री की परम आवश्यकता है, परन्तु इन साधनों को जुटाना कोई सरल कार्य नहीं है।

6. उपयुक्त साहित्य की कमी :
सामाजिक शिक्षा का उद्देश्य प्रौढ़ों को केवल साक्षर बनाना ही नहीं है, वरन् समाज को एक जागरूक तथा उत्तरदायित्वपूर्ण सदस्य बनाना है, परन्तु ऐसा करने के लिए उनके अनुकूल साहित्य की आवश्यकता नवचेतना भरने तथा उनके दृष्टिकोण को आलोचनात्मक बनाने के लिए एक श्रेष्ठ एवं प्रभावशाली साहित्य के सृजन की है, लेकिन साहित्य का निर्माण करने और उसके प्रकाशन की व्यवस्था करना भी एक जटिल समस्या है।

7. शिक्षण पद्धति की समस्या :
प्रौढ़ों की बुद्धि परिपक्व होती है और इस कारण उन्हें बालकों के समान नहीं पढ़ाया जा सकता। इसके अतिरिक्त जीवन तथा समाज के प्रति प्रौढ़ों का दृष्टिकोण समान नहीं होता है। प्रौढ़ समाज के पूर्वाग्रहों से ग्रसित होते हैं और उनके विरुद्ध कुछ सुनना नहीं चाहते हैं। ऐसी स्थिति में प्रौढ़ों के लिए किसी उपयोगी शिक्षण-पद्धति का निर्माण करना एक कठिन कार्य है।

8. समाज शिक्षा केन्द्रों पर उपस्थिति की समस्या :
सामाजिक शिक्षा केन्द्रों पर प्रौढ़ प्रायः अनुपस्थित रहते हैं। इसका मूल कारण आलस्य एवं उदासीनता है। दूसरे प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों का वातावरण नीरस होता है। प्रौढ़ों की अनुपस्थिति में सामाजिक शिक्षा केन्द्रों पर आयोजित किये गये कार्यक्रमों का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाता है।

9. सामाजिक शिक्षा के प्रति उत्तरदायित्व की समस्या :
सामाजिक शिक्षा की एक अन्य समस्या यह है कि सामाजिक शिक्षा के प्रसार का उत्तरदायित्व किसका है? केन्द्र सरकार ने इस उत्तरदायित्व का भार राज्य सरकारों पर डाल रखा है, लेकिन शिक्षा परिषद् और शिक्षा विभाग इसके प्रति पूर्ण उदासीन हैं। ऐसी दशा में सामाजिक उपेक्षा के प्रसार की अपेक्षा करना व्यर्थ है।

10. प्रौढों के निराशावादी तथा रूढिवादी दृष्टिकोण की समस्या :
भारतीय प्रौढ़ निराशावादिता, रूढ़िवादिता तथा सन्देहों से ग्रस्त होता है। प्रायः प्रौढ़ सोचते हैं कि इतनी आयु बीत चुकी है, अब पढ़-लिखकर क्या होगा? यदि उनसे सामाजिक शिक्षा केन्द्र पर जाने का आग्रह किया जाता है तो वे कह देते हैं कि “बाबू जी बूढ़े तोते को पढ़ाकर क्या करोगे?” इसके अतिरिक्त वे शिक्षा को केवल जीविका का साधन मानते हैं।

अतः जब वे पढ़े-लिखे नौजवानों को बेरोजगार देखते हैं, तो वे शिक्षा के प्रति उदासीन हो जाते हैं। वास्तव में प्रौढ़ों का यह निराशावादी दृष्टिकोण सामाजिक शिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनकर आता है।

(संकेत : सामाजिक शिक्षा की समस्याओं के निवारण के उपायों का विवरण लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 के अन्तर्गत देखें।)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘प्रौढ़ शिक्षा’ को ‘सामाजिक शिक्षा’ का रूप क्यों दिया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले भारत में प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को साक्षरता प्रदान करने के लिए एक शिक्षा योजना को लागू किया गया था तथा उस योजना को प्रौढ़ शिक्षा कहा जाता था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के देश के जनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह महसूस किया गया कि प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को शिक्षित बनाने के लिए उन्हें साक्षरता प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं बल्कि उन्हें जीवनोपयोगी सम्पूर्ण ज्ञान प्रदान करना आवश्यक है।

इस दृष्टिकोण को स्वीकार करते हुए प्रौढ़ शिक्षा हो । उत, तथा बहुपक्षीय रूप प्रदान करना अनिवार्य माना गया। इस प्रकार से विस्तृत एवं बहुपक्षीय प्रौढ़ शिक्षा को “सामाजिक शिक्षा का नाम दिया गया। स्पष्ट है” कि साक्षरता प्रदान करने के साथ-ही-साथ जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्रदान करने वाली शिक्षा व्यवस्था को सामाजिक शिक्षा का नाम दिया गया।

प्रश्न 2
भारत में सामाजिक शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
भारत में सामाजिक शिक्षा अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। सर्वप्रथम भारत में आज भी निरक्षरता की दर ऊँची है। इस स्थिति में निरक्षर प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाने के लिए सामाजिक शिक्षा अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त जन-स्वास्थ्य से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी प्रदान करने के लिए भी सामाजिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण है।

प्रौढ़ व्यक्तियों को दैनिक जीवन के लिए आवश्यक ज्ञान एवं जानकारी प्रदान करने के दृष्टिकोण से भी सामाजिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान वैज्ञानिक एवं तकनीकी युग में प्रौढ़ व्यक्तियों को व्यावसायिक, औद्योगिक एवं कृषि के क्षेत्र में होने वाले नित नवीन आविष्कारों की जानकारी प्रदान करने के लिए भी सामाजिक शिक्षा आवश्यक है। वास्तव में शिक्षित माता-पिता ही अपने बच्चों को शिक्षित बनाने में अधिक रुचि लेते हैं। तथा आवश्यक प्रयास भी करते हैं। इस दृष्टिकोण से भी भारत में सामाजिक शिक्षा आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 3
सामाजिक शिक्षा की समस्याओं के निराकरण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सामाजिक शिक्षा की विभिन्न समस्याओं के निराकरण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं।

  1. केन्द्र व राज्य सरकारों को देश से निरक्षरता को मिटाने के लिए जनता के सहयोग से एक व्यापक अभियान चलाना चाहिए।
  2. समाज शिक्षा का मुख्य उद्देश्य साक्षरता की वृद्धि के साथ ही प्रौढ़ों का सर्वांगीण विकास करना भी है। अत: निरक्षर, अर्द्ध-शिक्षित तथा नव-साक्षर प्रौढ़ों और विभिन्न आयु के वयस्कों की आवश्यकताओं तथा अभिरुचियों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाना चाहिए जो वयस्कों का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास करने में सुमर्थ हो सके।
  3. प्रौढ़ शिक्षा के अन्तर्गत सबसे पहले प्रौढ़ों को पढ़ना और लिखना सिखाया जाए औंर जब उन्हें इनका पर्याप्त ज्ञान हो जाए तब मातृकला, इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र, अर्थशास्त्र, गणित, सामान्य विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, साहित्य, कृषि, पशुपालन आदि विषयों की शिक्षा दी जाए।
  4. देश के अधिकांश ग्रामों में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाए।
  5. प्रौढ़ शिक्षा के लिए अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के लिए काफी संख्या में प्रशिक्षण विद्यालयों . की स्थापना की जाए।
  6. यदि शिक्षण संस्थाओं के अध्यापक, विद्यार्थी, कार्यालयों के कर्मचारी और अन्य नि:स्वार्थी समाज सेवी ‘प्रत्येक पढ़ाये एक को’ (Each one, Teach one) का सिद्धान्त ग्रहण कर लें तो प्रौढ़ शिक्षा के लिए अध्यापकों की समस्या को स्वतः ही समाधान हो जाएगा।
  7. प्रौढ़ों के लिए ऐसी रुचिपूर्ण और ज्ञानवर्द्धक शिक्षण-विधि अपनायी जाए, जो उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित कर सके।
  8. प्रौढ़ शिक्षा साहित्य के निर्माण के लिए साहित्यकार और सरकार संयुक्त रूप से सहयोग करें ताकि उपयुक्त साहित्य का निर्माण विपुल मात्रा में तैयार हो सके।
  9. समाज शिक्षा के प्रचार और प्रसार का उत्तरदायित्व किसी उपयुक्त संस्था को सौंपा जाना चाहिए, जो स्वतन्त्र रूप से समाज शिक्षा का विधिवत् संचालन कर सके।
  10. भारतीय प्रौढ़ों के निराशावादी और रूढ़िवादी दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने के लिए चलचित्रों व प्रदर्शनियों को प्रबन्ध किया जाए।
    उपर्युक्त उपायों को अपनाकर भारत में समाज शिक्षा का प्रसार व्यापक रूप में किया जा सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत सरकार के अनुसार सामाजिक शिक्षा के पंचमुखी कार्यक्रम क्या हैं?
उत्तर :
प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को शिक्षित करने के लिए जिस योजना को लागू किया गया है, उसे ‘सामाजिक शिक्षा का नाम दिया गया है। इस योजना का उद्देश्य प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को बहुपक्षीय जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान करना है। इस विस्तृत उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने एक कार्यक्रम लागू किया है जिसे सामाजिक शिक्षा के पंचमुखी कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है। इस कार्यक्रम के पाँचों सूत्रों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

  1. समस्त निरक्षर प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाना।
  2. प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं जन-स्वास्थ्य की आवश्यक एवं उपयोगी जानकारी । प्रदान करना।
  3. प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को उद्योग-धन्धों एवं व्यवसायों की आवश्यक जानकारी प्रदान करना ताकि वे आर्थिकउन्नति कर सकें।
  4. प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को स्वस्थ मनोरंजन के साधनों की जानकारी प्रदान करना।
  5. प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों में जिम्मेदार नागरिकता की भावना को विकसित करने के लिए उन्हें उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों की जानकारी प्रदान करना।

प्रश्न 2
सामाजिक शिक्षा से आप क्या समझते हैं। इसके संसाधनों का वर्णन कीजिए। [2013]
उत्तर :
प्रौढ़ स्त्री-पुरुष को साक्षरता तथा जीवन-उपयोगी ज्ञान प्रदान करने की व्यवस्था को सामाजिक शिक्षा कहा जाता है। वास्तव में सामाजिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा का ही अधिक विकसित तथा विस्तृत रूप है। सामाजिक शिक्षा में जीवन के सामाजिक पक्ष को समुचित महत्त्व दिया जाता है।

सामाजिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों में नागरिकता की चेतना का निर्माण तथा सामाजिक सुदृढ़ता का विकास किया जाता है। सामाजिक शिक्षा के प्रमुख संसाधन हैं। सामाजिक शिक्षा या प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, रात्रि पाठशालाएँ, व्याख्यान, समाचार-पत्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन, चलचित्र तथा प्रदर्शनियाँ।

प्रश्न 3
सामाजिक शिक्षा के क्षे उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए। [2007]
उत्तर :

1. मानसिक एवं बौद्धिक विकास :
राष्ट्र की प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि उसके नागरिकों का मानसिक एवं बौद्धिक विकास हो। इसीलिए प्रौढ़ शिक्षा में मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर बल दिया गया है।

2. व्यावसायिक शिक्षा और आर्थिक समृद्धि :
प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को व्यावसायिक शिक्षा देकर उन्हें जीविकोपार्जन के योग्य बनाना तथा आर्थिक समृद्धि के योग्य बनाना है।

प्रश्न 4
राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान के मुख्य लक्ष्य क्या हैं ? [2009, 11, 15]
उत्तर :
भारत में सन् 1991 में स्थापित ‘राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान का मुख्य लक्ष्य समस्त प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाना तथा पर्याप्त जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान करना तथा जीवन के प्रति जागरूक बनाना है।

प्रश्न 5
‘सामाजिक शिक्षा’ की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए। या प्रौढ शिक्षा (सामाजिक शिक्षा) से आप क्या समझते हैं? [2015]
उत्तर :
“सामाजिक शिक्षा को अध्ययन के एक प्रकार के पाठ्यक्रम के रूप में परिभाषित किया जो सकता है, जिसका उद्देश्य लोगों में नागरिकता की चेतना उत्पन्न करना है और उनमें सामाजिक सुसंगठन की भावना की वृद्धि की जाती है।”

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
वर्तमान सामाजिक शिक्षा को स्वतन्त्रतापूर्व काल में किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर :
वर्तमान सामाजिक शिक्षा को स्वतन्त्रतापूर्व काल में प्रौढ़ शिक्षा के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 2
कोई ऐसा कथन लिखिए जो प्रौढ़ शिक्षा तथा सामाजिक शिक्षा के अन्तर को स्पष्ट करता हो?
उत्तर :
“प्रौढ़ शिक्षा की संकल्पना में आज बहुत बड़ा परिवर्तन हो गया है। वह साक्षरता के अपने छोटे से दायरे से निकलकर सामाजिक शिक्षा का व्यापक रूप ग्रहण कर चुकी है।” बंसीधर श्रीवास्तव

प्रश्न 3
भारत में किस क्षेत्र (ग्रामीण अथवा नगरीय) के प्रौढ स्त्री-पुरुषों को सामाजिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है?
उत्तर :
भारत में ग्रामीण क्षेत्र के प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को सामाजिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है।

प्रश्न 4
वर्तमान सामाजिक शिक्षा की सफलता के मार्ग में मुख्य बाधक कारक क्या है?
उत्तर :
वर्तमान सामाजिक शिक्षा की सफलता के मार्ग में मुख्य बाधक कारक है-प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों का निरक्षर होना।

प्रश्न 5
‘राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा परिषद् की स्थापना कब हुई? [2007, 09]
उत्तर :
राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा परिषद् की स्थापना 5 सितम्बर, 1969 को हुई थी।

प्रश्न 6
सामाजिक शिक्षा का प्रमुख कार्यक्रम क्या है? [2013]
उत्तर :
सामाजिक शिक्षा का प्रमुख कार्यक्रम समस्त प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को आधुनिक जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान करना है।

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था को सामाजिक शिक्षा कहते हैं।
  2. केवल साक्षरता प्रदान करने से सामाजिक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  3. सामाजिक शिक्षा के अन्तर्गत केवल व्यावसायिक शिक्षा ही प्रदान की जाती है।
  4. नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक शिक्षा पूर्णरूप से अनावश्यक है।
  5. सामाजिक शिक्षा के अन्तर्गत हर प्रकार का जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान किया जाता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए।

प्रश्न 1
भारत में प्रौढ शिक्षा का आरम्भ कब हुआ?
(क) 1908 ई० में
(ख) 1910 ई० में
(ग) 1921 ई० में
(घ) 1922 ई० में
उत्तर :
(ख) 1910 ई० में

प्रश्न 2
अखिल भारतीय प्रौढ शिक्षा परिषद्’ की स्थापना कब हुई? [2010]
(क) 1937 ई० में
(ख) 1938 ई० में
(ग) 1939 ई० में
(घ) 1940 ई० में
उत्तर :
(ग) 1939 ई० में।

प्रश्न 3
देश में राष्ट्रीय प्रौढ शिक्षा कार्यक्रम कब लागू किया गया?
(क) 2 अक्टूबर, 1978 में
(ख) 26 जनवरी, 1980 में
(ग) 15 अगस्त, 1985 में
(घ) 1 जुलाई, 1990 में
उत्तर :
(क) 2 अक्टूबर, 1978 में

प्रश्न 4
प्रौढ़ शिक्षा को सामाजिक शिक्षा किस वर्ष से कहा जाने लगा है?
(क) 1947 ई० से
(ख) 1949 ई० से
(ग) 1952 ई० से
(घ) 1956 ई० से
उत्तर :
(ख) 1949 ई० से

प्रश्न 5
समाज के प्रौढ स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाने तथा जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान करने के लिए चलाई जाने वाली शैक्षिक योजना को कहते हैं
(क) रात्रि पाठशाला योजना
(ख) प्रौढ़ शिक्षा योजना
(ग) सामाजिक शिक्षा योजना
(घ) महत्त्वपूर्ण शिक्षा योजना
उत्तर :
(ग) सामाजिक शिक्षा योजना

प्रश्न 6
सामाजिक शिक्षा के पक्ष माने गये हैं
(क) प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाना
(ख) प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों में शिक्षित मस्तिष्क का विकास करना
(ग) प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों में नागरिकता की भावना का विकास करना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7
सामाजिक शिक्षा का उद्देश्य है [2008, 09, 14]
(क) शिक्षा प्रमाण-पत्र देना
(ख) साक्षरता प्रदान करना
(ग) जीवनोपयोगी ज्ञान देना
(घ) मनोरंजन देना
उत्तर :
(ग) जीवनोपयोगी ज्ञान देना

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 16 Status of Women in Indian Society

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 16
Chapter Name Status of Women in Indian Society (भारतीय समाज में स्त्रियों का स्थान)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 16 Status of Women in Indian Society (भारतीय समाज में स्त्रियों का स्थान)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
भारतीय समाज में स्त्रियों की वर्तमान परिस्थिति पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
वर्तमान (स्वतन्त्र) भारत में स्त्रियों की स्थिति में हुए परिवर्तन की विवचेना कीजिए। [2007, 09, 10]
या
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात स्त्रियों ने शिक्षा के क्षेत्र में क्या प्रगति की है?
उत्तर:
भारतीय समाज में स्त्रियों की वर्तमान स्थिति
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद पिछले 61 वर्षों में भारतीय स्त्रियों की स्थिति में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। डॉ० श्रीनिवास के अनुसार, “पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण तथा जातीय गतिशीलता ने स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्नत करने में पर्याप्त योगदान दिया है। वर्तमान में स्त्री-शिक्षा का प्रसार हुआ है। अनेक स्त्रियाँ औद्योगिक संस्थाओं और विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी करने लगी हैं। अब वे आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होती जा रही हैं। उनके पारिवारिक अधिकारों में वृद्धि हुई है। वर्तमान में स्त्रियों की स्थिति में निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आये हैं

1. स्त्री-शिक्षा में प्रगति – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्री-शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है। सन् 1882 में पढ़ी-लिखी स्त्रियों की कुल संख्या मात्र 2,054 थी, जो 1971 ई० में बढ़कर 5 करोड़ 94 लाख तथा 1981 ई० में 7 करोड़ 91.5 लाख से अधिक थी। 2001 ई० में स्त्रियों का साक्षरता प्रतिशत 53.67 तथा 2011 ई० में यह बढ़कर 64.64 हो गया है। स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1964-65 से दसवीं कक्षा तक लड़कियों की शिक्षा नि:शुल्क कर दी है। वर्तमान में शिक्षण से सम्बन्धित ट्रेनिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज आदि में लड़कियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। स्त्री-शिक्षा के व्यापक प्रसार ने स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में समुचित अवसर प्रदान किये हैं, उन्हें रूढ़िवादी विचारों से पर्याप्त सीमा तक मुक्त किया है, पर्दा-प्रथा को कम किया है तथा बाल-विवाह के प्रचलन को घटाने में योगदान दिया है।

2. आर्थिक क्षेत्र में प्रगति – शिक्षा के व्यापक प्रसार, नयी-नयी वस्तुओं के प्रति आकर्षण, उच्च जीवन बिताने की बलवती ईच्छा तथा बढ़ती हुई कीमतों ने अनेक मध्यम व उच्च वर्ग की स्त्रियों को नौकरी यो आर्थिक दृष्टि से कोई-न-कोई काम करने के लिए प्रेरित किया है। अब मध्यम वर्ग की स्त्रियाँ उद्योगों, दफ्तरों, शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, समाज-कल्याण केन्द्रों एवं व्यापारिक संस्थाओं में काम करने लगी हैं। वर्तमान में भारत में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की संख्या 35 लाख से भी अधिक है। 1956 ई० के हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम ने हिन्दू स्त्रियों को पत्नी, बहन एवं माँ के रूप में पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार प्रदान किया है। सरकार ने स्त्रियों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए कई नयी योजनाएँ भी बनायी हैं। परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

3. राजनीतिक चेतना में वृद्धि – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। जहाँ सन् 1937 में महिलाओं के लिए 41 स्थान सुरक्षित थे, वहाँ केवल 10 महिलाओं ने ही चुनाव लड़ा; जब कि 1984 ई० के चुनावों में 65 स्त्रियों ने सांसद के रूप में चुनाव में सफलता प्राप्त की। इसके बाद के लोकसभा चुनावों में स्त्री सांसदों की संख्या कम ही हुई है, परन्तु उनकी राजनीतिक चेतना बढ़ी है। ग्राम पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में स्त्रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित किये गये हैं। इसके साथ ही पार्लियामेण्ट और विधानमण्डलों में स्त्री-प्रतिनिधियों की संख्या और विभिन्न गतिविधियों में उनकी सहभागिता, राज्यपाल, मन्त्री, मुख्यमन्त्री और यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री तक के रूप में उनकी भूमिकाओं से स्पष्ट है कि भारत में स्त्रियों में राजनीतिक चेतना दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। भारतीय महिलाओं ने राज्यपालों, कैबिनेट स्तर के मन्त्रियों और राजदूतों के रूप में यश प्राप्त किया है। स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में वृद्धि हुई है और उनकी स्थिति में सुधार हुआ है।

4. सामाजिक जागरूकता में वृद्धि – पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की सामाजिक जागरूकता में अत्यधिक वृद्धि हुई है। अब स्त्रियाँ पर्दा-प्रथा को बेकार समझने लगी हैं। बहुत-सी स्त्रियाँ घर की चहारदीवारी के बाहर खुली हवा में साँस ले रही हैं। वर्तमान में कई स्त्रियों के विचारों के दृष्टिकोणों में इतना परिवर्तन आ चुका है कि अब वे अन्तर्जातीय-विवाह, प्रेम-विवाह और विलम्ब-विवाह को अच्छा समझने लगी हैं। अब वे रूढ़िवादी बन्धनों से मुक्त होने के लिए प्रयत्नशील हैं। आज अनेक स्त्रियाँ महिला संगठनों और क्लबों की सदस्य हैं तथा समाजकल्याण के कार्यों में लगी हुई हैं।

5. विवाह एवं पारिवारिक क्षेत्र में अधिकारों की प्राप्ति – वर्तमान में स्त्रियों के पारिवारिक अधिकारों में वृद्धि हुई है। वर्तमान में स्त्रियाँ संयुक्त परिवार के बन्धनों से मुक्त होकर एकाकी परिवार में रहना चाहती हैं। आज बच्चों की शिक्षा, परिवार के आय के उपयोग, पारिवारिक अनुष्ठानों की व्यवस्था और घर के प्रबन्ध में स्त्रियों की इच्छा को विशेष महत्त्व दिया जाता है। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ने हिन्दू स्त्रियों को अन्तर्जातीय विवाह करने और कष्टमय वैवाहिक जीवन से मुक्ति पाने के लिए तलाक के अधिकार प्रदान किये हैं। बाल-विवाह दिनों-दिन कम होते जा रहे हैं और विधवाओं को भी पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त है। स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय स्त्रियों के शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व पारिवारिक जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है।

भारतीय स्त्रियों में सुधार के कुछ प्रमुख कारक

स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को परिवर्तित करने में निम्नलिखित कारकों का योगदान रहा है

1. संयुक्त परिवारों का विघटन – परम्परागत प्राचीन भारतीय संयुक्त परिवारों में स्त्रियों को पुरुषों के अधीन रहना पड़ता था, उनका कार्य-क्षेत्र घर की चहारदीवारी के अन्दर था, किन्तु नगरीकरण के परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। ग्रामीण परिवार की स्त्रियों के नगरों के सम्पर्क में आने से उनकी स्थिति में काफी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। यह सब नये-नये नगरों के उदय के कारण ही सम्भव हुआ है, क्योंकि रूढ़िवादी व्यक्तियों के बीच में रहकर उनकी स्थिति में सुधार होना सम्भव नहीं था।

2. शिक्षा का विस्तार – वर्ममान में स्त्री-शिक्षा का दिन-प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। शिक्षा के प्रसार से स्त्रियाँ रूढ़िवादिता और जातिगत बन्धनों से मुक्त हुई हैं। उनमें त्याग, तर्क और वितर्क के भाव जगे हैं और ज्ञान के द्वार खुले हैं। स्त्रियों के शिक्षित होने से वे अपने आपको आत्मनिर्भर बनाने में सफल सिद्ध हो सकी हैं तथा राजनीतिक जागरूकता भी उनमें आज देखने को मिलती है।

3. अन्तर्जातीय विवाह – वर्तमान में स्कूलों में लड़के-लड़कियों के साथ-साथ पढ़ने तथा दफ्तरों में काम करने से प्रेम-विवाह एवं अन्तर्जातीय विवाह पर्याप्त संख्या में होते दिखाई पड़ रहे हैं। इससे स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हुआ है। अब वे परिवार पर भार नहीं समझी जाती हैं। ऐसे विवाह से बने परिवार में पति-पत्नी में समानता के भाव पाये जाते हैं और स्त्री को पुरुष की दासी नहीं समझा जाता।।

4. औद्योगीकरण – औद्योगीकरण के कारण स्त्रियों की पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता कम हुई है। स्त्रियों ने पुरुषों के समान आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए नौकरी करना आरम्भ किया है। इससे उन्हें आत्म-विकास करने में पर्याप्त सहायता मिली है।

5. सुधार आन्दोलन – 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही कुछ चिन्तनशील व्यक्तियों ने स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के सम्बन्ध में अपना बहुमूल्य योगदान दिया; जैसे – राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि। उन्होंने सती – प्रथा, पर्दा-प्रथा, बहुपत्नी विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध आदि को समाप्त करने के लिए सुधार आन्दोलन किये और इस क्षेत्र में किसी हद तक सफलता भी प्राप्त की। महात्मा गाँधी भी स्त्री-पुरुषों की समानता के समर्थक थे। उन्होंने भी स्त्रियों को राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

6. सरकारी प्रयास – स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार की तरफ से कई अधिनियम भी पास किये गये, जिससे स्त्रियों की स्थिति में अत्यधिक परिवर्तन हुए। इस सम्बन्ध में ‘बालविवाह निरोधक अधिनियम, 1929’, ‘मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939’, ‘दहेज निरोधक अधिनियम, 1961’, ‘हिन्दू विवाह तथा विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1955’ तथा ‘विशेष विवाह अधिनियम, 1954’ आदि महत्त्वपूर्ण अधिनियम हैं।

प्रश्न 2
महिलाओं के उन्नयन (उत्थान) के लिए किये जाने वाले विभिन्न उपाय बताइए। [2013]
या
भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार के उपाय बताइए। [2008, 11]
उत्तर:
नारी-मुक्ति को स्वर सदैव प्रतिध्वनित होता रहा है। भारत के अनेक मनीषियों और समाज-सुधारकों ने नारी को समाज में सम्मानजनक पद दिलाने का भरसक प्रयास किया। राष्ट्र की आधारशिला और पुरुष प्रेरणा-स्रोत नारी को सबल बनाने के लिए अनेक सामाजिक आन्दोलन किये गये। ब्रह्म समाज, आर्य समाज तथा अन्य सुधारवादी सामाजिक आन्दोलनों ने नारी-मुक्ति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये।

बीसवीं शताब्दी में नारी को शोषण और अन्याय से बचाने के लिए अनेक सामाजिक विधान पारित किये गये। आज के दौर में, अनेक महिला संगठनों ने नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान कराने के कई आन्दोलन चला रखे हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने नारी-सुधार के क्षेत्र में श्लाघनीय प्रयास किये। स्वतन्त्रता के पश्चात् नारी की दशा में गुणात्मक सुधार आया और, युगों-युगों से पुरुष के अन्याय की कारा में पिसती नारी को उन्मुक्त वातावरण में साँस लेने का अवसर मिला। भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति सुधारने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

1. पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव – पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय विद्वानों का ध्यान नारी-शोषण और उनकी दयनीय दशा की ओर आकृष्ट किया। भारतीय समाज एकजुट होकर इस अभिशाप को मिटाने में लग गया। अतः समाज में नारी को सम्मानजनक स्थान मिल गया।

2. स्त्री-शिक्षा-स्त्री – शिक्षा का प्रचलन होने से शिक्षित नारी में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हुई। उसने शोषण, अन्याय और कुरीतियों के पुराने लबादे को उतारकर प्रगतिशीलता का नया कलेवर धारण किया। महिला-जागृति ने नारी को समाज में ऊँची परिस्थिति प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया।

3. महिला संगठन – भारत में नारी की दशा में गुणात्मक सुधार लाने के लिए वुमेन्स इण्डियन एसोसिएशन, कौंसिल ऑफ वुमेन्स, आल इण्डिया वुमेन्स कॉन्फ्रेन्स, विश्वविद्यालय महिला संघ, कस्तूरबा गाँधी राष्ट्रीय स्मारक निधि आदि महिला संगठनों की स्थापना की गयी। इन महिला संगठनों ने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठायी और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिलवाकर उनका उत्थान किया।

4. आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता – शिक्षित नारी ने धीरे-धीरे व्यवसाय, नौकरी, प्रशासन था उद्योगों में भागीदारी प्रारम्भ कर दी। आर्थिक क्षेत्र में निर्भरता ने उन्हें स्वयं वित्तपोषी बना दिया। आजीविका के साधन कमाने पर उनकी पुरुषों पर निर्भरता घट गयी है और समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता गया।

5. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण – विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने औद्योगीकरण और नगरीकरण को बढ़ावा दिया। इन दोनों के कारण समाज में प्रगतिशील विचारों का जन्म हुआ। प्राचीन रूढ़ियाँ समाप्त हो गयीं। स्त्री-शिक्षा, व्यवसाय, प्रेम-विवाह, अन्तर्जातीय विवाह तथा नारी संगठनों ने नारी को पुरुष के समकक्ष ला दिया।

6. यातायात एवं संचार-व्यवस्था – भारत में यातायात और संचार के साधनों का विकास होने पर भारतीय नारी देश तथा विदेश की नारियों के सम्पर्क में आयी। इन साधनों ने उसे महिला आन्दोलनों और उनकी सफलताओं से परिचित कराया। अतः भारतीय नारी भी अपनी मुक्ति तथा अधिकारों की प्राप्ति के लिए जुझारू हो उठी।।

7. अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन – स्व-जाति में विवाह की अनिवार्यता समाप्त करके अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। सहशिक्षा, साथ-साथ नौकरी करना तथा पाश्चात्य शिक्षा के उन्मुक्त विचारों ने नारी में अन्तर्जातीय विवाहों का बीज रोप दिया है। अन्तर्जातीय विवाहों के कारण वर-मूल्य में कमी आ गयी है और नारी की समाज में परिस्थिति ऊँची उठ गयी है।

8. संयुक्त परिवारों का विघटन – संयुक्त परिवार में पुरुषों का स्थान स्त्रियों की अपेक्षा ऊँचा था। संयुक्त परिवारों में विघटन पैदा होने से एकाकी परिवारों का जन्म हो रहा है। एकाकी परिवारों में स्त्री और पुरुष का स्तर एक समान होता है।

9. दहेज-प्रथा का उन्मूलन – दहेज-प्रथा के कारण समाज में नारी का स्थान बहुत नीचा बना हुआ था। सरकार ने 1961 ई० में दहेज निरोधक अधिनियम पारित करके दहेज-प्रथा को उन्मूलन कर दिया। दहेज-प्रथा समाप्त हो जाने से समाज में नारी की परिस्थिति स्वतः ऊँची हो गयी।

10. सुधार आन्दोलन – भारतीय स्त्रियों की दयनीय दशा सुधारने के लिए ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज तथा रामकृष्ण मिशन ने अनेक समाज-सुधार के आन्दोलन चलाये। गाँधी जी ने महिला सुधार के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन चलाया। सुधार आन्दोलनों ने सोयी हुई स्त्री जाति को जगा दिया। उनमें नयी चेतना, जागृति और आत्मविश्वास का सृजन हुआ। समाजने उनके महत्त्व को समझकर उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान प्रदान किया।

11. सामाजिक विधान – भारतीय समाज में नारी को सम्मानजनक स्थान दिलवाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका सामाजिक विधानों ने निभायी है। हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1956; बाल-विवाह निरोधक अधिनियम, 1929; हिन्दू स्त्रियों को सम्पत्ति पर अधिकार अधिनियम, 1937; विशेष विवाह अधिनियम, 1954; हिन्दू विवाह तथा विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1955; हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956; हिन्दू नाबालिग और संरक्षकता का अधिनियम, 1956; हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956; स्त्रियों का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1956 तथा दहेज निरोधक अधिनियम, 1961 ने स्त्रियों की दशा में गुणात्मक सुधार किये। स्त्री का शोषण दण्डनीय अपराध बन गया। अतः नारी की समाज में परिस्थिति ऊँची होती चली गयी।

12. विधायी संस्थाओं में महिला आरक्षण – 1990 ई० से भारतीय राजनीति में यह चर्चा है। कि विधायी संस्थाओं (विधानसभाओं और लोकसभा) में एक-तिहाई (33%) स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किये जाने चाहिए। इस सम्बन्ध में महिला आरक्षण का विधेयक प्रस्ताव 1996, 1997 तथा 1998 ई० में लोकसभा में पेश किया जा चुका है, किन्तु वह राजनीतिक दलों के विरोध के कारण अभी पारित नहीं किया जा सका। लेकिन संविधान के 73वें संशोधन (1993 ई०) के द्वारा पंचायती राज में 1/3 सीटों पर महिलाओं के लिए आरक्षण कर दिया गया है। तदानुसार अब वे ग्राम-पंचायत, क्षेत्र-समितियों और जिला पंचायतों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके इस सशक्तिकरण के परिणामस्वरूप उनकी स्थिति में उन्नयन होने की पूरी आशा है।

13. महिला-कल्याण की विभिन्न केन्द्रीय योजनाएँ – 31 जनवरी, 1992 को राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना कर दी गयी है, जो उनके अधिकारों की रक्षा और उनकी उन्नति के लिए प्रयासरत है। इसी प्रकार, उनके रोजगार, स्वरोजगार आदि के प्रोग्राम चल रहे हैं। अन्य योजनाएँ इन्दिरा महिला योजना, बालिका समृद्धि योजना, राष्ट्रीय महिला कोष आदि उनके विकास का प्रयास कर रही हैं।

14. परिवार-कल्याण कार्यक्रम – स्त्रियों की हीन दशा का एक कारण अधिक बच्चे भी थे। परिवार-कल्याण कार्यक्रमों ने परिवार में बच्चों की संख्या सीमित करके स्त्रियों की दशा में गुणात्मक सुधार किया है। परिवार में बच्चों की संख्या कम होने से स्त्री का स्वास्थ्य ठीक हुआ है, घर का स्तर ऊँचा उठा है तथा स्त्री को अन्य स्थानों पर काम करने, आने-जाने तथा राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा है। इस प्रकार परिवार कल्याण कार्यक्रमों ने भी नारी को समाज में ऊँचा स्थान दिलवाने में भरपूर सहयोग दिया है। नारी उत्थान एवं नारी जागृति में शिक्षा और विज्ञान का सहयोग सराहनीय रहा है। समाज में नारी को सम्मानजनक स्थान प्रदान कराने के लिए आवश्यक है-‘नारी स्वयं को सँभाले और अपना महत्त्व समझे।’ मानव के मानस को सरस तथा स्वच्छ बनाने में नारी को जितना योगदान है वह शब्दों से परे है। नारी को समाज में सम्मानजनक स्थान मिले बिना हमारी संस्कृति अधूरी है। नारी, जो समाज के निर्माण में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है, समाज से आस्था और सम्मान की पात्रा है। नारी को सम्मान देकर, आओ! हम सब एक नये और प्रगतिशील समाज का निर्माण करें।

प्रश्न 3
क्या राजनीति और लोक-जीवन में स्त्रियों को प्रवेश वांछनीय है ? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
राजनीति और लोक-जीवन में
स्त्रियों का प्रवेश स्त्रियों की विभिन्न क्षेत्रों में बदली हुई स्थिति को देखकर कुछ व्यक्ति क्षुब्ध हुए हैं तो कुछ ने प्रसन्नता प्रकट की है। इस सन्दर्भ में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या नारी को लोक-जीवन, सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए अथवा नहीं। दूसरे शब्दों में, लोक-जीवन में उनका प्रवेश वांछनीय है या नहीं? इस बारे में दो मत पाये जाते हैं—एक मत उनके लोक-जीवन में प्रवेश के विपक्ष में है और दूसरा पक्ष में। जो लोग विपक्ष में हैं, उनका कहना है कि

  1. स्त्रियों का कार्य-क्षेत्र घर है, उन्हें पति-सेवा तथा बच्चों के लालन-पालन आदि का कार्य कर अच्छे परिवार के निर्माण में सहयोग देना चाहिए, क्योंकि परिवार ही समाज का आधार है। सार्वजनिक कार्य करने पर घर की उपेक्षा होगी, बच्चों का समुचित पालन-पोषण नहीं होगा, वे अनियन्त्रित एवं आवारा हो जाएँगे और परिवार विघटित हो जाएगा।
  2. राजनीति और लोक-जीवन में प्रवेश करने पर स्त्रियों में यौन स्वच्छन्दता एवं अनैतिकता फैलेगी।
  3. परिवार की धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन सुचारु रूप से नहीं हो सकेगा।
  4. स्त्रियाँ कोमल स्वभाव की होने से बाह्य जीवन की कठोरता एवं कठिनाइयों का सफलतापूर्वक मुकाबला नहीं कर सकेंगी।
  5. चूंकि स्त्रियाँ प्रजनन के कार्य से सम्बन्धित हैं, अतः सार्वजनिक जीवन में भाग लेने की उनकी सीमा है।
  6.  स्त्रियों का लोक-जीवन में भाग लेना भारतीय सामाजिक मूल्यों के विपरीत है।
  7. कई व्यक्ति स्त्रियों की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को पुरुषों से कम मानते हैं। अत: उनकी मान्यता है कि स्त्रियाँ उचित निर्णय लेने में असमर्थ होती हैं। इन सभी दलीलों के आधार पर कुछ व्यक्ति स्त्रियों के लोक-जीवन में प्रवेश को अवांछनीय मानते हैं।

दूसरी ओर कई व्यक्ति स्त्रियों के राजनीति और लोक-जीवन में प्रवेश के पक्ष में हैं। उनका मत है कि आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्त्रियों को सौंपे गये दायित्वों का यदि हम मूल्यांकन करें तो पाएँगे कि उन्होंने सराहनीय कार्य किये हैं तथा कई क्षेत्रों में तो वे पुरुषों से बढ़कर योगदान दे पायी हैं। वे इस बात को उचित नहीं मानते हैं कि स्त्रियों के राजनीतिक और लोक-जीवन में प्रवेश करने से परिवार विघटित हो जाएगा। परिवार का संचालन एवं संगठन केवल स्त्री का कार्य ही नहीं है, वरन् स्त्री व पुरुष दोनों का है। रूढ़िवादी सामाजिक मूल्यों को बनाये रखने के लिए स्त्रियों को

राजनीति और लोक-जीवन में प्रवेश की इजाजत न देना भी पिछड़ेपन का सूचक है। यह पुरुषों की स्वार्थी-प्रवृत्ति एवं शोषण की नीति को प्रकट करता है। वर्तमान में प्रजातन्त्रीय विचारों की भी सँग है कि स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त हों। यदि स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण कर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करेंगी तो वे समाज को अनेक कुप्रथाओं, अन्धविश्वासों, आडम्बरों, रूढ़ियों आदि से मुक्त कर सकेंगी और परिवार तथा समाज की सेवा बदलते समय की माँग के अनुरूप कर सकेंगी। राजनीति में आने पर वे अपने अधिकारों की रक्षा अच्छी प्रकार से कर सकेंगी। वास्तव में, नवीन परिस्थितियों को देखते हुए ही स्त्रियों का राजनीतिक और लोक-जीवन में प्रवेश वांछनीय है, किन्तु उन्हें इतना ध्यान रखना चाहिए कि वे इतनी स्वच्छन्द न हो जाएँ कि अपना सन्तुलन खो दें और पथभ्रष्ट हो जाएँ।

प्रश्न 4
हिन्दू एवं मुस्लिम समाज में स्त्रियों की स्थिति पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
हिन्दू एवं मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति की तुलना कीजिए।
उत्तर:
मुस्लिम स्त्रियों में बहुपत्नीत्व, पर्दा-प्रथा, धार्मिक कट्टरता, अशिक्षा एवं स्त्रियों द्वारा वास्तव में तलाक देने सम्बन्धी कई समस्याएँ पायी जाती हैं। हिन्दू और मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति में कुछ समानताएँ पायी जाती हैं; जैसे – पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह एवं बहुपत्नी–प्रथा का प्रचलन दोनों में ही है। किसी क्षेत्र में हिन्दू स्त्री की स्थिति अच्छी है, तो किसी में मुस्लिम स्त्री की। हम यहाँ विभिन्न आधारों पर दोनों की ही स्थिति की तुलना करेंगे

1. पर्दा-प्रथा – दोनों में ही पर्दा-प्रथा पायी जाती है, किन्तु हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों में इसका कठोर रूप पाया जाता है।

2. शिक्षा – मुस्लिम स्त्रियों की तुलना में हिन्दू स्त्रियों में शिक्षा का प्रचलन अधिक है।

3. आर्थिक – राजनीतिक स्थिति –
आर्थिक, राजनीतिक एवं सार्वजनिक क्षेत्र में मुस्लिम स्त्रियों की अपेक्षा हिन्दू स्त्रियाँ अधिक कार्यरत हैं और उनकी स्थिति भी ऊँची है। हिन्दू स्त्रियाँ सामाजिक कल्याण, सार्वजनिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में अधिक भाग लेती हैं।

4. तलाक –
हिन्दू स्त्री को तलाक देने का अधिकार प्राप्त नहीं है, जब कि मुस्लिम स्त्री को है। 1955 ई० के हिन्दू विवाह अधिनियम ने हिन्दू स्त्रियों को भी तलाक का अधिकार दिया है, किन्तु व्यवहार में इसका प्रयोग कम ही होता है।

5. विधवा पुनर्विवाह –
हिन्दू विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था, जब कि मुस्लिम विधवाओं को है। 1856 ई० के हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ने हिन्दू स्त्रियों को भी यह अधिकार दिया है, किन्तु व्यवहार में इसका प्रयोग कम ही होता है।

6. बाल-विवाह – हिन्दुओं में बाल-विवाह का प्रचलन है, मुसलमानों में बाल-विवाह संरक्षकों व माता-पिता की स्वीकृति से ही होते हैं। ऐसे विवाह को लड़की बालिग होने पर चाहे तो मना भी कर सकती है।

7. दहेज – हिन्दुओं में दहेज-प्रथा पायी जाती है, जिसके कारण स्त्रियों की स्थिति निम्न हो जाती है, उन्हें परिवार पर भार और उनका जन्म अपशकुन माना जाता है, जब कि मुसलमानों में ‘मेहर’ की प्रथा है जिसमें वर विवाह के समय वधू को कुछ धन देता है। या देने का वादा करता है। इससे स्त्री की सामाजिक, पारिवारिक व आर्थिक स्थिति ऊँची होती है।

8. सम्पत्ति – सम्पत्ति की दृष्टि से मुस्लिम स्त्रियों को माँ, पुत्री एवं पत्नी के रूप में हिस्सेदार व उत्तराधिकारी बनाया गया है और वह अपनी सम्पत्ति का मनमाना उपयोग कर सकती है, किन्तु सन् 1937 तथा 1956 ई० के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिनियमों से पूर्व हिन्दू स्त्रियों का सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं था। व्यवहार में आज भी उनकी स्थिति पूर्ववत् ही है।

9. बहुपत्नीत्व – मुसलमानों में बहुपत्नीत्व के कारण हिन्दू स्त्री की तुलना में मुस्लिम स्त्री की स्थिति निम्न है। हिन्दुओं में भी बहुपत्नीत्व पाया जाता है, किन्तु यह अधिकांशतः सम्पन्न लोगों तक ही सीमित है।

10. विवाह की स्वीकृति – मुसलमानों में विवाह से पूर्व लड़की से इसकी स्वीकृति ली जाती है, जब कि हिन्दुओं में ऐसा नहीं होता था, यद्यपि अब ऐसा होने लगा है।

11. सार्वजनिक जीवन – हिन्दू स्त्रियों को सार्वजनिक जीवन एवं राजनीति में भाग लेने की स्वीकृति दी गयी है, जब कि मुस्लिम स्त्रियों को इसकी मनाही है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सैद्धान्तिक दृष्टि से मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति हिन्दू स्त्रियों से उच्च है, किन्तु व्यवहार में नहीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
वैदिक काल में स्त्रियों की दशा को वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैदिक काल में स्त्री-पुरुषों की स्थिति में समानता थी। इस काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय लड़के-लड़कियों की शिक्षा साथ-साथ होती थी, सह-शिक्षा को बुरा नहीं समझा जाता था। इस युग में अनेक विदुषी महिलाएँ हुई हैं। इस काल में लड़कियों का विवाह साधारणतः युवावस्था में ही होता था। बाल-विवाह का प्रचलन नहीं था और लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतन्त्रता थी। विधवा अपनी इच्छानुसार पुनर्विवाह कर सकती थी या ‘नियोग’ द्वारा सन्तान उत्पन्न कर सकती थी। धार्मिक कार्यों के सम्पादन में स्त्री-पुरुष के अधिकार समान थे। इस काल में पर्दा-प्रथा नहीं थी और स्त्रियों को सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने का अधिकार प्राप्त था। स्त्रियों की रक्षा करना पुरुषों का सबसे बड़ा धर्म माना जाता था और उनको अपमान करना सबसे बड़ा पाप। इस समय पुत्री के बजाय पुत्र के जन्म को विशेष महत्त्व दिया जाता था, परन्तु ऐसा धार्मिक दायित्वों को पूरा करने की दृष्टि से ही था।

प्रश्न 2
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्रियों में राजनीतिक चेतना में वृद्धि पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। जहाँ सन् 1937 में महिलाओं के लिए 41 स्थान सुरक्षित थे, वहाँ केवल 10 महिलाओं ने ही चुनाव लड़ा। भारत के नवीन संविधान के अनुसार सन् 1950 में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर नागरिक अधिकार प्रदान किये गये। सन् 1952 में 23 स्त्रियाँ लोकसभा के लिए चुनी गयी थीं, जब कि सन् 1984 के चुनावों में 65 स्त्रियों ने सांसद के रूप में चुनाव में सफलता प्राप्त की। इसके बाद के लोकसभा चुनावों में स्त्री सांसदों की संख्या कम ही हुई है, परन्तु उनकी राजनीतिक चेतना अत्यधिक बढ़ी है। ग्राम पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित किये गये हैं।

अब लोकसभा एवं राज्यों के विधानमण्डलों में स्त्रियों के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित किये जाने की दृष्टि से प्रयास किये जा रहे हैं। ग्राम पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में उत्तर प्रदेश में यह आरक्षण मिल भी गया है। ग्राम पंचायतों, पार्लियामेण्ट और विधानमण्डलों में स्त्री प्रतिनिधियों की संख्या और विभिन्न गतिविधियों में उनकी सहभागिता, राज्यपाल, मन्त्री, मुख्यमन्त्री और यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री तक के रूप में उनकी भूमिकाओं से स्पष्ट है कि इस देश में स्त्रियों में राजनीतिक चेतना दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। अब तक हुए विधानमण्डलों एवं संसद के चुनावों से भी ज्ञात होता है कि महिलाओं में अपने वोट का स्वतन्त्र रूप से उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। भारतीय महिलाओं ने राज्यपालों, कैबिनेट स्तर के मन्त्रियों और राजदूतों के रूप में यश प्राप्त किया है। स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में अत्यधिक वृद्धि हुई और उनकी स्थिति में भी पर्याप्त सुधार हुआ है।

प्रश्न 3
भारतीय स्त्री की स्थिति में हुए सुधार के दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारतीय स्त्री की स्थिति में हुए सुधार के दो कारण निम्नवत् हैं

1. शिक्षा का प्रसार – भारत में स्त्रियों की शिक्षा नित नये आयाम स्थापित कर रही है। शिक्षा ने स्त्रियों में जागरूकता पैदा की है। वे अब अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गयी हैं। अब वे आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होने की बजाय आत्मनिर्भर होती जा रही हैं। समाज को कोई भी क्षेत्र स्त्रियों के लिए अछूता नहीं रहा है। वे कार्यालयों में, सेना में, पुलिस में, चिकित्सा सेवाओं में अर्थात् हर स्थान पर पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर कार्य कर रही हैं। नि:सन्देह शिक्षा-प्रसार ने स्त्रियों की दशा में बड़ा सुधार किया है।

2. सामाजिक विधान – हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956; स्त्रियों का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1956; हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 आदि सामाजिक विधानों के कारण, भारतीय स्त्री की दशा में बड़ा सुधार आया है। इन अधिनियमों से स्त्रियों को पुरुषों के समान सम्पत्ति के अधिकार मिले हैं, उनकी पारिवारिक स्थिति में सुधार हुआ है, अनैतिक जीवन से मुक्ति प्राप्त हुई है तथा विवाह-विच्छेद एवं विवाह के क्षेत्र में पुरुषों के समान व्यापक अधिकार प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 4
भारत में महिलाओं की निम्न स्थिति के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए। 2016 या हिन्दू स्त्रियों की निम्न स्थिति के चार कारणों को लिखिए। [2014]
उत्तर:
हिन्दू स्त्रियों की निम्न स्थिति के चार कारण निम्नलिखित हैं

1. आर्थिक निर्भरता – स्त्रियों को अपने भरण-पोषण के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था, इसीलिए पति को भर्ता कहा जाता था। स्त्रियों को घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर नौकरी, व्यवसाय या अन्य साधन द्वारा धन कमाने की आज्ञा नहीं थी। आर्थिक निर्भरता के कारण पुरुषों की प्रभुता उन पर हावी थी और उन्हें पुरुषों के अधीन रहना पड़ता था। पुरुषों पर आश्रित होने के कारण ही उनकी समाज में परिस्थिति नीची थी।

2. अशिक्षा  – प्राचीन काल में स्त्री शिक्षा का कम प्रचलन था। अशिक्षा और अज्ञानता के कारण स्त्रियों में अन्धविश्वास, कुरीतियाँ और रूढ़िवादिता का बोलबाला था। अशिक्षित नारी को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं था। वह पति को परमेश्वर मानकर उसका शोषण और अन्याय सहते हुए निम्न स्तर का जीवन-यापन करने के लिए विवश थी।

3. बाल-विवाह – प्राचीन काल में भारत में बाल-विवाहों का प्रचलन था। बाल-विवाहों के कारण बाल-विधुवाओं की संख्या बढ़ गयी। बाल-विधवाओं का जीवन दयनीय था। वे समाज पर भार थीं। बाल-विवाह पद्धति ने नारी की समाज में परिस्थिति नीची बना दी।

4. पुरुष-प्रधान समाज – प्राचीन भारतीय समाज पुरुष-प्रधान था। पुरुष स्त्री को अपने नियन्त्रण में रखने तथा उसे अपने से नीचा समझने की प्रवृत्ति रखता था। पुरुष के इस अहम् भाव ने भी समाज में नारी की परिस्थिति को नीचा बना दिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
मध्यकाल (मुगल शासकों का काल) में स्त्रियों की क्या दशा थी ?
उत्तर:
मुगल शासकों के काल को मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। 11वीं शताब्दी से ही भारतीय समाज पर मुसलमानों का प्रभाव पड़ने लगा था। इस काल में हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के नाम पर स्त्रियों पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये गये, उन्हें अधिकारों से वंचित कर दिया और उन पर कई नियन्त्रण लागू किये गये। इस समय स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं रहा। अब 5 या 6 वर्ष की छोटी-छोटी कन्याओं का भी विवाह किया जाने लगा। इस काल में स्त्रियाँ पूर्णतः परतन्त्र हो चुकी थीं। पारिवारिक, सामाजिक एवं धार्मिक सभी दृष्टि से स्त्री पुरुष पर निर्भर हो गयी थी।

प्रश्न 2
पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को कैसे प्रभावित किया
उत्तर:
भारत में 150 वर्षों तक अंग्रेजों को राज्य रहा। इससे यहाँ के लोग पश्चिम की सभ्यता व संस्कृति के सम्पर्क में आये। पश्चिमी संस्कृति में स्त्री-पुरुषों की समानता, स्वतन्त्रता तथा सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया है। पश्चिम के सम्पर्क का प्रभाव भारतीय स्त्रियों पर भी पड़ा और वे भी अपने जीवन में पश्चिम के मूल्यों, विचारों और विश्वासों को अपनाने लगीं। उन्होंने स्वतन्त्रता, समानता, न्याय और अपने अधिकारों की माँग की जिसके फलस्वरूप उन्हें कई सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सुविधाएँ एवं अधिकार प्राप्त हुए।

प्रश्न 3
शिक्षा के प्रसार से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में क्या परिवर्तन हुए हैं ?
उत्तर:
जब स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार हुआ तो वे जातिगत बन्धनों, रूढ़िवादिता व धर्मान्धता से मुक्त हुईं। जिन सामाजिक कुरीतियों को वे सीने से चिपटाए हुए थीं, उन्हें त्यागा, उनमें तर्क और विवेक जगा और ज्ञान के द्वार खुले। आधुनिक शिक्षा प्राप्त स्त्रियाँ बन्धन से मुक्ति चाहती हैं, पुरुषों की दासता को स्वीकार नहीं करतीं और वे स्वतन्त्रता तथा समानता की पोषक हैं। शिक्षा ने स्त्रियों को अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक बनाया। इस प्रकार शिक्षा का प्रसार भी स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन के लिए मुख्य कारक रहा है।

प्रश्न 4
भारतीय स्त्रियों की सामाजिक जागरूकता में क्या वृद्धि हुई है ?
उत्तर:
पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की सामाजिक जागरूकता में पर्याप्त वृद्धि हुई है। अब स्त्रियाँ पर्दा-प्रथा को बेकार समझने लगी हैं और बहुत-सी स्त्रियाँ घर की चहारदीवारी के बाहर खुली हवा में साँस ले रही हैं। आजकल कई स्त्रियों के विचारों और दृष्टिकोणों में इतना अधिक परिवर्तन आ चुका है कि अब वे अन्तर्जातीय-विवाह, प्रेम-विवाह और विलम्ब-विवाह को अच्छा समझने लगी हैं। जातीय नियमों और रूढ़ियों के प्रति महिलाओं की उदासीनता बराबर बढ़ रही है। अब वे रूढ़िवादी सामाजिक बन्धनों से मुक्त होने के लिए प्रयत्नशील हैं। आज अनेक स्त्रियाँ महिला संगठनों और क्लबों की सदस्य हैं तथा समाजकल्याण के कार्य में भी लगी हुई हैं।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
हिन्दू समाज में स्त्री को पुरुष की अद्भगिनी क्यों कहा गया है ?
उत्तर:
हिन्दू समाज में पुरुष के अभाव में स्त्री को और स्त्री के अभाव में पुरुष को अपूर्ण माना गया है। इसी कारण स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है।

प्रश्न 2
वैदिक काल में स्त्रियों की क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी तथा पुरुषों के समान ही थी।

प्रश्न 3
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में स्त्रियों को किस दृष्टि से देखा गया है ?
उत्तर:
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में स्त्रियों को आदर की दृष्टि से देखा गया है।

प्रश्न 4
पाश्चात्य प्रभाव से स्त्रियों की स्थिति में क्या अन्तर आया ?
उत्तर:
पाश्चात्य प्रभाव से स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया।

प्रश्न 5
संयुक्त परिवार में स्त्रियों की क्या दशा थी ?
उत्तर:
संयुक्त परिवार व्यवस्था स्त्रियों को सम्मान देने के पक्ष में नहीं थी।

प्रश्न 6
क्या हिन्दू स्त्री को सम्पत्ति का अधिकार है ? (हाँ/नहीं) [2010]
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 7
क्या राजा राममोहन राय ने स्त्रियों की दशा में सुधार के लिए प्रयास किये ? (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 8
‘सती प्रथा समाप्त करने के लिए सबसे पहले किसने अथक प्रयास किया ? [2011, 12]
उत्तर:
राजा राममोहन राय ने।

प्रश्न 9
क्या मुस्लिम स्त्री को सम्पत्ति का अधिकार है ? [2009]
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
उस सुधारक का नाम चुनिए जिसने स्त्रियों की स्थिति सुधारने के सक्रिय प्रयत्न किये
(क) जयप्रकाश नारायण
(ख) महात्मा गांधी
(ग) चन्द्रशेखर आजाद
(घ) राजा राममोहन राय

प्रश्न 2
निम्नलिखित में उस व्यक्ति का नाम बताइए जिसने स्त्रियों की स्थिति सुधारने में सक्रिय भाग नहीं लिया
(क) राजा राममोहन राय
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) स्वामी दयानन्द
(घ) गोपालकृष्ण गोखले

प्रश्न 3
निम्नलिखित दशाओं में से कौन-सी दशा स्त्रियों की शोचनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी है?
(क) पश्चिमी शिक्षा
(ख) एक-विवाह का नियम
(ग) औद्योगीकरण व नगरीकरण
(घ) अशिक्षा

प्रश्न 4
भारतीय नारी की स्थिति में सुधार किस उपाय से होगा ? [2013, 15]
(क) बाल-विवाह से
(ख) आश्रम-व्यवस्था से
(ग) पाश्चात्य शिक्षा से
(घ) समानता के अधिकार से

प्रश्न 5
दि पोजिशन ऑफ वुमेन इन हिन्दू सिविलाइजेशन’ पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
(क) पी० एच० प्रभु
(ख) डॉ० नगेन्द्र
(ग) अल्तेकर
(घ) राधाकमल मुखर्जी

प्रश्न 6
मुस्लिम स्त्रियों की निम्न स्थिति हेतु कौन-सा कारक उत्तरदायी है? [2012]
(क) पर्दा प्रथा
(ख) अशिक्षा
(ग) पुरुषों का धार्मिक आधिपत्य
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (घ) राजा राममोहन राय,
2. (घ) गोपालकृष्ण गोखले,
3. (घ) अशिक्षा,
4. (घ) समानता के अधिकार से,
5. (ग) अल्तेकर,
6. (घ) ये सभी।

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