UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संमास

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name संमास
Number of Questions Solved 10
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संमास

परिभाषा
जब दो या दो से अधिक शब्द अपने बीच की विभक्ति को छोड़कर आपस में मिल जाएँ तो उसे समास कहते हैं, जैसे- सूर्यस्य उदयः (सूर्य का उदय) से नया शब्द ‘सूर्योदयः’ बनता है, जिसमें षष्ठी विभक्ति लुप्त हो जाती है। शब्दों के ऐसे मेल से जो एक स्वतन्त्र शब्द बनता है उसे सामासिक पद अथवा समस्त पद कहते हैं। सामासिक पद को अनुसार विभक्तियों सहित तोड़ना समास-विग्रह कहलाता है। जैसे–सामासिक पद श्वेताम्बरम् का विग्रह होगा श्वेतम् अम्बरम्। यहाँ ‘श्वेतम्’ पूर्व पद एवं ‘अम्बरम्’ उत्तर पद हैं।

समास के भेद
समास के छ: भेद हैं।

  1. तत्पुरुष
  2. कर्मधारय
  3. अव्ययीभाव
  4. द्विगु
  5. बहुव्रीहि
  6. द्वन्द्व

आइए, पाठ्यक्र में सम्मिलित तीन समास कर्मधारय, अव्ययीभाव एवं बहुप्रीहि के वारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।

1. कर्मधारय समास
विशेषण विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय वाले समास को कर्मधारय समास कहते हैं। इसमें दोनों शब्द (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रथमा विभक्ति में होते हैं तथा दोनों ही पदों की प्रधानता होती है; जैसे—’कृष्णाश्वः’ में प्रथम पद ‘कृ’:’ अर्थात् काला विशेषण, जबकि अन्तिम पद ‘अश्वः’ अर्थात् घोड़ा विशेष्य है। इसका विग्रह होगा ‘कृष्णः अश्वः’ अर्थात् काला घोड़ा। उदाहरण-
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2. अव्ययीभाव समास
जिस समास में प्रथम पद अव्यय तथा अन्तिम पद संज्ञा हो तथा प्रथम पद अर्थात् अव्यय के ही अर्थ की प्रधानता हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। इस समास के | शब्द हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में ही रहते हैं। इस समास को अपने पदों में विग्रह नहीं होता; जैसे–’निर्धनः’ का विग्रह होगा ‘धनानां अभावः
उदाहरण-
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3. बहुव्रीहि समास
जिस समास में दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) को छोड़कर कोई अन्य पद प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। इस प्रकार इसमें सामासिक अर्थ दोनों पदों से भिन्न होता है; जैसे–’त्रीनेत्र’ का विग्रह ‘त्रीणि नेत्राणि यस्य सः’ (तीन हैं नेत्र जिसके) है, जिससे ‘शंकर’ का बोध होता है।
उदाहरण
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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रामस्य पुत्रः का समस्तपद होगा
(क) रामपुत्रः
(ख) रामेपुत्रः
(ग) रामायपुत्रः
(घ) राममपुत्रः

प्रश्न 2.
‘नीलोत्पलम’ में विग्रह है।
(क) नीलम् उत्पलम्
(ख) निलमुत्पलम्
(ग) नलमोत्पलम्
(घ) नलस्योत्पलम्

प्रश्न 3.
‘यथाशक्ति’ में समास है।
(क) कर्मधारय
(ख) तत्पुरुष
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्विगु

प्रश्न 4.
एकं
एकं प्रति का सामासिक पद होगा
(क) प्रत्येक
(ख) हरेक
(ग) द्विरेकं
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
‘त्रिलोकी में समास है।
(क) द्वन्ट्स
(ख) द्विगु
(ग) तत्पुरुष
(घ) बहुव्रीहि

प्रश्न 6.
‘प्राप्तोदकः’ में समास है।
(क) तत्पुरुष
(ख) बहुव्रीहि
(ग) कर्मधारय
(घ) द्विगु

प्रश्न 7.
‘घनश्यामः’ में समास है।
(क) द्विगु
(ख) अव्ययीभाव
(ग) कर्मधारय
(घ) बहुव्रीहि

प्रश्न 8.
‘रामस्य समीपे’ का सामासिक पद होगा।
(क) उपरामम्
(ख) उपारामम्
(ग) उपेरामम्
(घ) उपोरामम्

प्रश्न 9.
‘चन्द्रशेखरः’ में समास है।
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) बहुव्रीहि
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
‘महान् च असौ देवः’ का सामासिक पद होगा।
(क) महादेव
(ख) महादेवी
(ग) शिवः
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर

1. (क, 2. (क), 3. (ग), 4. (क), 5. (ख), 6. (ख), 7. (ग), 8. (क), 9. (ग), 10. (क)

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद

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Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Name हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद

अनुवाद।
एक भाषा की किसी पंक्ति को किसी अन्य भाषा में परिवर्तित करना ही अनुवाद कहलाता है। जैसे—यदि हम संस्कृत के किसी वाक्य को हिन्दी में परिवर्तित करते हैं तो यह ‘संस्कृत का हिन्दी में अनुवाद’ कहा जाता है। ठीक उसी प्रकार यदि हम हिन्दी के किसी वाक्य को संस्कृत में परिवर्तित करते हैं तो यही ‘हिन्दी का संस्कृत में अनुवाद’ कहा जाता है।

हिन्दी भाषा के वाक्यों को संस्कृत भाषा में परिवर्तित करने के लिए निश्चित नियम हैं। उन नियमों के अनुसार हिन्दी वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद ठीक प्रकार से किया जा सकता है। वे नियम या बातें निम्न प्रकार हैं।
हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद करने के लिए संस्कृत व्याकरण के इन नियमों को भली-भाँति समझना आवश्यक है

संस्कृत में तीन पुरुष, तीन वचन और तीन लिंग होते हैं।
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संस्कृत में कर्ता के पुरुष एवं वचन के आधार पर क्रिया का रूप निर्धारित होता है, किन्तु क्रिया पर लिंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।। उदाहरणार्थ-‘राम पढ़ता है’ वाक्य के लिए संस्कृत में लिखा जाएगा ‘रामः पठति’, जबकि ‘सीता पढ़ती है’ के लिए भी ‘सीता पठति’ ही लिखा जाएगा। इस प्रकार यहाँ क्रिया कर्ता के लिंग से अप्रभावित है। हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद करने के लिए कर्ता के पुरुष और वचन की पहचान करना अति आवश्यक है। संस्कृत में प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष एवं उत्तम पुरुष के प्रत्येक वचन के लिए एक-एक कर्ता होता है।

अतः तीन वचन होने से प्रथम पुरुष के तीन कर्ता, मध्यम पुरुष के तीन कर्ता और उत्तम पुरुष के तीन कर्ता होंगे। इस प्रकार कुल नौ कर्ता हुए। आइए, इस तालिका को समझे-.
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यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि ‘तुम’ का बहुवचन में प्रयोग होने पर मध्यम पुरुष बहुवचन की क्रिया ही ली जाती है। उदाहरणार्थ-बालक! तुम विद्यालय जाओ’। का संस्कृत में अनुवाद होगा ‘बालक! यूयं विद्यालयं गच्छत।’ संस्कृत में क्रिया को ‘धातु के नाम से जाना जाता है और मुख्यतः पाँच लकारों के द्वारा धातुओं (क्रियाओं) का बोध कराया जाता है। वर्तमान काल के अर्थ में लट्लकार का, भूतकाल के अर्थ में ललकार का एवं भविष्यत् काल के अर्थ में लट्लकार का प्रयोग होता है। आज्ञा देना, प्रार्थना करना, प्रस्ताव रखना एवं इच्छा ध्या करने के अर्थ में लोट्लकार तथा चाहिए, सम्भावना एवं शनि प्रदर्शन के अर्थ में विधिलिङ्लकार को प्रयोग में लाया जाता हैं। नीचे ‘भू’ धातु अर्थात् ‘होना’ क्रिया के तीनों कालों के लिए लकार में रूप दिए जा रहे हैं

भू (होना)
लट्लकार (वर्तमान काल)

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(उपर्युक्त धातुओं के भू के तुल्य रूप चलेंगे।)
हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि कर्ता जिस वचन का होगा, क्रिया भी उसी वचन की ली जाएगी।
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विभक्तियाँ
संस्कृत में हिन्दी के कारक चिह्नों (परसर्ग) के स्थान पर सात विभक्तियाँ एवं आठवीं सम्बोधन प्रयुक्त किए जाते हैं, जो इस प्रकार हैं-
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प्रथम विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) मोहन लिखता है। मोहनः लिखति।
(ii) मालती बोलती है। मालतीं वदति।
(iii) आप नहीं खाते हैं। भवान् न खादति।
(iv) यमुना बहती है। यमुना वहति।।

द्वितीय विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) तुम सब पुस्तक पढ़ते हो। यूयं पुस्तकं पठथ।
(ii) पण्डित ज्ञान देता है। पण्डितः ज्ञानं ददाति।
(iii) मैंने पत्र दिया। अहं पत्रम् अददाम्।
(iv) सीता दान करती है। सीता दानं करोति।

तृतीय विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) राजा स्वभाव से सज्जन है। नृपः प्रकृत्या सज्जनः अस्ति।
(ii) उमेश सिर से गंजा है। उमेशः शिरसा खल्वाटोऽरित।
(iii) विनीत कमर से कुबड़ा है। विनीत कटया कुजः अस्ति।
(iv) वह आँखों से देखती हैं। सः नेत्राभ्यां पश्यति।

चतुर्थी विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) राजा पण्डित को दान देता है। नृपः पण्डिताय दानं ददाति।
(ii) अनीता को लड्डू अच्छा लगता है। अनीतायै मोदकम् रोचते।
(iii) इस बालक के लिए मिठाई लाओ। अस्मै बालकाय मिष्टान्नम् अन्य।
(iv) मोहन ने गरीब को धन दिया। मोहनः दरिद्राय सम्पदाम् अदात्।

पञ्चमी विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) पेड़ से पत्ते गिरते हैं। (2018) वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।
(ii) गाँव से बाहर विद्यालय है।। ग्रामात् बहिः विद्यालयः अस्ति।
(iii) ममता नदी से जल लाती है। ममता नद्याः जलम् आनयति।
(iv) सज्जन दुर्जन से डरता है। सज्जनः दुर्जनात् बिमैति।

षष्ठी विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) यह राम की किताब है। इदं रामस्य पुस्तकम् अस्ति।
(ii) कृष्ण का घर कहाँ है? कृष्णस्य गृहम् कुत्र अस्ति?
(iii) वह किसका हाथी है? सः कस्य गजः अस्ति?
(iv) अशोक मगध के राजा थे? अशोक: मगधस्य नृपः आसीत्।

सप्तमी विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) सन्ध्या विद्यालय में है। सन्ध्या विद्यालये अस्ति।
(ii) भीम युद्ध में प्रवीण था।। भीमः युद्धे प्रवीणः आसीत्।
(iii) कार्यालय में छुट्टी है। कार्यालये अवकाशः अस्ति।
(iv) पण्डित आसन पर बैठा है। पण्डितः आसने तिष्ठति।

सम्बोधन विभक्ति पर आधारित संस्कृत अनुवाद

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
(i) हे देव! कल्याण करो। हे देव! कल्याणं कुरु।
(ii) प्रभु! मेरी रक्षा करो। भों प्रभु! मां रक्षा
(iii) बालकों! तुम सब घर जाओ। हे बालकाः! यूयं गृहं गछता
(iv) हे दुर्योधन! प्रिय वचन बोलो। हे दुर्योधनः! प्रिय वचनं वद।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए हिन्दी-संस्कृत अनुवाद

वर्ष 2018

हिन्दी वाक्य संस्कृत वाक्य
1. विद्यालय के सामने उपवन है। विद्यालयं सम्मुखें उपवनम्अस्ति ।
2. हम दोनों को हँसना चाहिए। आवां हसेव।
3. घोड़ा पाँव से लँगड़ा है। अश्वः पादेन पङ्गु अस्ति।
4. पुस्तकों में गीता श्रेष्ठ है। पुस्तकानां पुस्तकेषु वा गीता श्रेष्ठ अस्ति
5. हम लोग कहाँ जाएँगे? वयं कुत्र गामिष्यामः।
6. बालक पढ़ रहे हैं। बालकाः पठन्ति।
7. कल मैं विद्यालय जाऊँगा। श्वः अहं विद्यालयं गमिष्यामि।
8. हमें सदा सत्य बोलना चाहिए। वयं सदा सत्यं वदेम।
9. विद्या व्यय से बढ़ती है। विद्या व्ययात् वर्धते।
10. मोहन गा रहा है। मोहनः गीयते।
11. कवियों में कालिदास श्रेष्ठ हैं। कवीनां कवीषु वा कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति।
12. प्रयाग के दोनों तरफ गंगा बहती है। प्रयागं परितः गंगा वहति।
13. राधा कृष्ण के साथ यमुना किनारे जाती थी राधा कृष्णेन सह यमुनातरे गच्छति स्म।
14. भिक्षुक के लिए कपड़ा दीजिए। भिक्षुकाय वस्त्रं यच्छ।
15, प्रतिदिन प्रातःकाल गुरु जी को प्रणाम करो। प्रतिदिनं प्रातः गुरवे नमः कुरु।
16. मेरा बड़ा भाई पिता से लड्डू माँगता है। ममं अग्रजः पितर मोदकं याचते।
17, मैदान के चारों ओर हरे वृक्ष हैं। क्षेत्रं परितः हरितानि वृक्षाणि सन्ति
18. कवियों में तुलसीदास श्रेष्ठ कवीनां कवीषु वा तुलसीदासः श्रेष्ः अस्ति।
19. पथिक किसान से रास्ता पूछता है। पथिकः कृषकं मार्गं पृच्छति।
20. हम लोग तुमको यह पुस्तक देंगे। वयं तुभ्यं इदं पुस्तकं दास्यामः।
21. भगवान शंकर को नमस्कार है। भगवते शंकराय नमः
22. संस्कृत भाषा सब भाषाओं की जननी है। संस्कृत भाषा सर्वांषां भाषाणां जननी अस्ति।
23. दुष्ट कभी दुष्टता नहीं छोड़ता।। दुष्टः कदापि दुष्टता न त्यजति।
24. प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करो। प्रतिदिनं ईश्वर स्मर।
25. आज वह वाराणसी जाएगा। अद्य सः चाराणसीम गमिष्यति।
26. हमें प्रतिदिन खेलना चाहिए। वयं प्रतिदिन क्रीडेम।
27. ईष्र्या मनुष्य की शत्रु है। ईष्र्या मनुष्याणां शत्रु अस्ति।
28. सदाचार मनुष्य का आभूषण है। सदाचारः मनुष्यानाम् आभूषणम् अस्ति
29. कल वर्षा अवश्य होगी। श्वः वर्षा अबश्या भविष्यति।
30. तुम लोग शीघ्र विद्यालय जाओ। यूयं शीघ् विद्यालयं गच्छत्।
31. वृक्ष से पत्ते गिरते हैं। वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।

वर्ष 2017

हिन्दी वाक्य संस्कृत वाक्य
1. तुम्हें क्या करना चाहिए? त्वं किं कुर्या:?
2. हम जा रहे हैं। वयं गच्छामः।
3. आज समाज उनका ऋणी है। अद्य समाजः तेषा ऋणी अरित।
4. रीतिका एक मेधावी छात्रा है। रीतिको एक मेधावी छात्रा अस्ति!
5. वे दोनों कल काशी गए थे। तौ हुयः काशीम् अगच्छातम्।
6. कवियों में कालिदास श्रेष्ठ । कविषु कालिदासः श्रेष्ठः
7. राम श्याम के साथ घर जाता है। राम: श्यामेन सह गृहं गच्छतः।
8. पक्षी आकाश में उड़ते है। खगाः गगने विचरन्ति
9. भिक्षुक राजा से वस्त्र माँगता है। भिक्षुकः राजानाम् वस्त्रं याचति।
10. अध्यापक के चारों ओर विद्यार्थी दौड़ते हैं। अध्यापकं परितः छात्राः धावन्ति।
11. हनुमान वानरों के साथ लङ्का गए। हनुमानः वानरैः सह लङ्काम् अगच्छन्।
12. वृक्ष से पके हुए फल गिरते हैं। वृक्षात् पक्वानि फलानि पतन्ति।
13. देवी दुर्गा को नमस्कार है। दुर्गादेव्याः नयः।
14. गीता का छोटा भाई छात्राओं को पुस्तकें देता है। गीतायाः कनिष्ठ भातरः छात्राणाम् पुस्तकं ददति।।
15. खेत के दोनों ओर भवन हैं। क्षेत्रम् अभितः भवनानि सन्ति।
16. राम ने रावण को बाण से मारा। (2017) रामः रावणं बाणेन अह्नत्।
17. मोहन चावलों से भात पकाता है। मोहनः तण्डुलेन् ओदनं पचति।
18. हिमालय भारत की रक्षा करता हैं। हिमालयः भारतस्य रक्षां करोति।
19. तुम प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करो। त्वं प्रतिदिनं ईश्वरस्य स्मरणं कुरू।
20. धीर पुरुष न्याय के रास्ते से विचलित नहीं होते। न्यायपथात् प्रविचलन्ति पढ़ा न धीराः।

वर्ष 2016

हिन्दी वाक्य संस्कृत वाक्य
1. शिव पार्वती के साथ कैलाश गए। शिवः पार्वत्या सह कैलाशम् अगच्छत्।
2. रमेश की छोटी बहन पैर से लंगड़ी हैं। रमेशस्य अनुजा (भगिनी) पादेन खजः अस्ति।
3. सभी देवताओं को नमस्कार है। सर्वे देवेभ्यःनमः।।
4. दाता भिखारियों को अन्न देता है। दाता भिक्षुकेभ्यः अन्नं यच्छति।
5. वृक्ष से फल गिरते हैं। वृक्षात् फलानि पतन्ति।
6. गाँव के सब ओर उपवन है। ग्रामम् सर्वतः उपनामि सन्ति।
7. वह भिखारी को भिक्षा देता है। सः भिक्षुकाय भिक्षा ददाति।
8. बालकों में रमेश सबसे बड़ा है। बालकेषु रमेशः ज्येष्ठ अस्ति।
9. वे दोनों कहाँ जा रहे हैं? तौ कुत्र गच्छतः।
10. मैं कल प्रयाग गया था। अहम् श्वः प्रयागम् अगच्छम्।
11. तुम लोग माँ के साथ जाओ। यूयम् मात्रा सह गच्छता
12. हमें नित्य पढ़ना चाहिए। अस्माभिः नित्यं पठितव्यम्।।
13. आकाश कल कहाँ जाएगा? आकाशः इवः कुत्र गामिष्यतिः
14. श्री राम ने पूछा मुझे कहाँ  रहना चाहिए? श्री रामः अपृच्छत्-मया कुत्र स्थातव्यम्।।
15. सड़क के दोनों ओर हरे वन हैं।। मार्गम् उभयतः हरितानि वनानि सन्ति
16. पिता पुत्र को मिठाई देता है। पिता पुत्राय मिष्ठान्नम् यच्छति।
17. बालिकाएँ अध्यापिकाओं के साथ गीत गाती हैं। बालिकाः अध्यापिकाभिः सह गीत गायन्ति।
18. कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल को मारा। कृष्णः सुदर्शन चक्रणे शिशुपाल अनत्।।
19. मेरा बड़ा भाई अपने साथियों में सबसे कुशाग्र हैं। मम अग्रजः निज मित्रेषु कुशाग्रः अस्ति
20. हमें अपने गुरुजनों का सदैव आदर केरना चाहिए। अस्माभिः सदैव निजगुरुजनान् सम्मानं कर्तव्यम्।
21. योग स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है। योगः स्वस्थ जीवनाय आवश्यकम्। अस्ति

वर्ष 2015

हिन्दी वाक्य संस्कृत वाक्य
1. नदियों में गंगा श्रेष्ठ है। नदीषु गङ्गा श्रेष्ठा अस्ति।
2. राम विद्यालय गया। रामः विद्यालयम् अगच्छत्।
3. यह मोहन की पुस्तक है। इदं मोहनस्य पुस्तकं अस्ति।
4. मोहन गैर से लंगड़ा है। मोहनः पार्दन खजः अस्ति।
5. नदी के दोनों ओर नगर हैं। नदीं उभयतः नगरम् अस्ति।
6. अध्यापक छात्र को पुस्तक देता है। अध्यापक: छात्राय पुस्तकं ददाति।
7. नदी के दोनों ओर हरे-भरे खेत हैं। नदीं उभयतः स्यश्यामलानि क्षेत्राणि सन्ति
8. रमेश अपनी बहन को मीठे फल देती हैं। रमेशः स्वभगिन्यै मधुरं फलं ददाति।
9. अध्यापकों ने विद्यालय आकर छात्रों को पढ़ाया। अध्यापकाः विद्यालये आगत्य छषान् अध्यापयन्ति स्म।
10. सीता का छोटा भाई मोहन के साथ खेलने जाएगा। सीतायाः अनुजः मोहनेन सह क्रीडष्यति
11. भिखारी दोनों आँखों से अन्धा है। भिक्षुक नेत्राभ्याम् अन्धः अस्ति।
12. अभिज्ञानशाकुन्तलम् अन्य नाटकों से अधिक रम्य हैं। अभिज्ञानशाकुन्तलम् अन्येषुनाटकेषु अधिकं रम्यम् अस्ति।

वर्ष 2014

हिन्दी वाक्य संस्कृत वाक्य
1. वे दोनों क्या करते हैं? तौ किं कुरुतः?
2. आकाश विद्वानों में श्रेष्ठ है। आकाशः विद्वत्सु श्रेष्ठः अस्ति।
3. अध्यापिका छात्रा से प्रश्न का उत्तर पूछती है। अध्यापिका छात्र प्रश्नोत्तरं पृच्छति।
4. तुम दोनों कल मेरे साथ बाजार नहीं जाओगे। युवा श्वः मया सह आपणं न गमिष्यथः।
5. स्नान करने से रूप की रक्षा होती है। स्नानेन रूपस्य रक्षा भवति।
6. लोभ पाप का कारण होता है। लोभः पापस्य कारणं भवति।
7. वे अपने विद्यालय जाएँ। ते स्वविद्यालयं गच्छन्तु।
8. पिता की आज्ञा से श्रीराम वन को गए। पितुः आज्ञया श्रीरामः वनम् अगच्छतु।
9. सुरेश दोनों कानों से बहरा है। सुरेशः कर्णभ्यां बधिरः अस्ति।
10. हम लोगों ने पानी पीकर अपना पाठ पड़ा। वयं जलं पीत्वा स्वपाठम् अपठाम्।

वर्ष 2013

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
1. तालाब में कमल खिलते हैं। तड़ागे कमलानि विकसन्ति।
2. वे दोनों विद्यालय जाते हैं। तौ विद्यालयं गच्छतः।
3. किसी वन में एक सिंह रहता था। (2017) कस्मिंश्चिद् वने एकः सिंह: निवसति स्म।
4. मैं तुम्हारे साथ विद्यालय नहीं जाऊँगी। अहं त्वया सह विद्यालयं न गमिष्यामि।
5. पिता की आज्ञा से श्रीराम वन को गए। पितुः आज्ञया श्रीरामः वनम् अगच्छत्।
6. कुएँ के चारों ओर लोग बैठते हैं कूपं परितः जनाः तिष्ठन्ति।
7. गाँव के चारों ओर वृक्ष हैं। (2017) ग्रामं परितः वृक्षाः सन्ति।
8. छात्रों में राम श्रेष्ठ हैं छात्रेषु रामः श्रेष्ठः अस्ति।
9. चरित्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्।
10. वह चावलों से भात पकाएगी सा तण्डुलैः ओदनं पक्ष्यति।
11. भिखारी दोनों कानों से बहरा है। भिक्षुकः कर्णाभ्यां बधिरः, अस्ति।
12. विद्यार्थी को सुख छोड़ना चाहिए। विद्यार्थी सुखं त्यजेत्।।
13: संस्कृत भाषा देवभाषा है। संस्कृतभाषा देवभाषा अस्ति।
14. तुम सब संस्कृत पढौ।। यूयं संस्कृतं पठतम्।।
15. सोनू सिंह से नहीं डरता। सोनू सिंहात् न बिभेति।

वर्ष 2012

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
1. मैं कल बाजार जाऊँगा।। अहं श्वः आपणं गमिष्यामि।
2. सदा सत्य और प्रिय वचन बोलो। सदा सत्यं प्रियवचनं च वद।
3. पुरुषोत्तम राम यहाँ आए थे। पुरुषोत्तमः रामः अत्र आगच्छत्।
4. तेरी पुस्तक कहाँ है? तव पुस्तकं कुत्र अस्ति?
5. वह मेरे साथ विद्यालय में पढ़ता है। सः मया सह विद्यालये पठति।
6. हिमालय उत्तर दिशा में स्थित है। हिमालयः उत्तरदिशि स्थितः।।
7. साँप वेग से चलता है। सर्पः वेगेन चलति।
8. बाग में आम के पेड़ हैं। उद्याने आम्रवृक्षाः सन्ति।
9. हम मित्रों के साथ भोजन करेंगे। वयं मित्रैः सह भोजनं करिष्यामः।
10. यह मेरा विद्यालय है। अयं मम विद्यालयः अस्ति।
11. मैं दूध नहीं पीऊँगा। अहं दुग्धं न पास्यामि।
12. तुम सब कहाँ पढ़ते हो? यूयं कुत्र पथ?
13. छात्रों को विद्यालय जाना चाहिए। छात्राः विद्यालयं गच्छेयुः।
14. बालकों में राम श्रेष्ठ है। बालकेषु रामः श्रेष्ठः अस्ति।
15. मेरी माताजी गृहकार्य में निपुण हैं। मम माता गृहकार्यं निपुणा अस्ति।

वर्ष 2011

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
1. पुत्र प्रातः पिता को प्रणाम करता है। पुत्रः प्रातःकाले पितरं प्रणाम करोति।।
2. क्या राम ने अभी को अपनी पुस्तक अददात्? किं रामः प्रभायै स्वपुस्तकं न नहीं दी?
3. वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठता है। सः प्रतिदिन प्रातःकाले उत्तिष्ठति।
4. मैं अपने मित्र के साथ विद्यालय जाता हैं। अहं स्वमित्रेण सह विद्यालयं गच्छामि।
5. इन्द्र बादलों से खेल रहे हैं। इन्द्रः मेघैः क्रीडति।।
6. सड़क के दोनों ओर हरे-भरे खेत हैं। मार्ग उभयतः हरितानि क्षेत्राणि सन्ति।
7. मैं कल दिल्ली जाऊँगा। अहं श्वः दिल्लीं गमिष्यामि।
8. प्रजा का कल्याण हो। प्रजाभ्यः स्वस्ति।
9. सदा सत्य और प्रिय वचन बोलो। सदा सत्यं प्रियवचनं च वद।
10. राजा दिलीप एक महापुरुष थे। राजा दिलीपः एकः महापुरुषः आसीत्।
11. राम, लक्ष्मण के साथ वन में गए। रामः लक्ष्मणेन सह वनम् अगच्छत्।
12. बालकों में गोविन्द श्रेष्ठ है। बालकेषु गोविन्दः श्रेष्ठः अस्ति।
13. श्रीकृष्ण के दोनों ओर गोपाल हैं। श्रीकृष्णम् उभयतः गोपालकाः सन्ति।
14 .हम सब कल प्रयाग गए थे। वयं ह्यः प्रयागम् अगच्छाम।।
15. फूलों पर भौंरे गूंजते हैं। पुष्पेषु भ्रमराः गुञ्जन्ति।

वर्ष 2010

हिन्दी वाक्य संस्कृत अनुवाद
1. क्या तुम आज वाराणसी जाओगे? किं त्वम् अद्य वाराणसीं गमिष्यति?
2. छात्रों को गुरु के प्रति विनम्र होना चाहिए। शिष्याः गुरु प्रति विनमः भवेयुः।
3. जानवर सायंकाल जंगल से घर आ गए। पशवः सायंकाले वनात् गृहे आगच्छन्।
4. पिताजी बालक के साथ विद्यालय जाते हैं। पिता बालकेन सह विद्यालयं गच्छति।।
5. सफलता के लिए हमें अति परिश्रम करना चाहिए। सफलतायाः हेतो वयं अतिपरिश्रम कुर्याम्।
6. उमेश दोनों कानों से बहरा है। उमेशः कर्णाभ्यां दधिरः अस्ति।
7. छात्रों में मोहन श्रेष्ठ है। छात्रेषु मोहनः श्रेष्ठः अस्ति।
8. विद्यालय का वार्षिकोत्सव कब होगा? विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवः कदा भविष्यति?
9. विद्यालय के चारों ओर वृक्ष हैं। विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति
10. हिमालय से गंगा निकलती है। हिमालयात् गङ्गा प्रभवति।
11. सरोवरों में कमल खिलते हैं। सरोवरेषु कमलानि विकसन्ति।
12. मनुष्य सदाचार से यश प्राप्त करता है। मनुष्यः सदाचारेण यशं प्राप्नोति।
13. तुम जल्दी घर जाओ। त्वं शीघ्रं गृहं गच्छ।
14. गुरु को नमस्कार है। गुरुवे नमः।।
15. मैं तुम्हारे साथ विद्यालय नहीं जाऊँगी। अहं त्वया सह विद्यालयं न गमिष्यामि।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi अलंकार

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name अलंकार
Number of Questions Solved 55
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi अलंकार

अलंकार का अर्थ एवं परिभाषा
प्रसिद्ध संस्कृत आचार्य दण्डी ने अपनी रचना ‘काव्यादर्श’ में अलंकार को परिभाषित करते हुए लिखा है-‘अलंकरोतीति अलंकारः’ अर्थात् शोभाकारक पदार्थ को अलंकार कहते हैं। हिन्दी में रीतिकालीन कवि आचार्य केशवदास ने ‘कविमिया’ रचना में अलंकार की विशेषताओं का विवेचन प्रस्तुत किया है।

वस्तुतः भाषा को शब्द एवं शब्द के अर्थ से सुसज्जित एवं सुन्दर बनाने की मनोरंजक प्रक्रिया को ‘अलंकार” कहा जाता है। ‘अलंकार’ काव्य भाषा के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। यह भाव की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

अलंकार के भेद
अलंकार को दो रूपों में व्यक्त किया जाता है- शब्दालंकार एवं अर्थालंकार)

1. शब्दालंकार
शब्द निर्माण की प्रक्रिया में ‘ध्वनि’ तथा ‘अर्थ’ का महत्वपूर्ण समन्वय होता है। ध्वनि के आधार पर काव्य में उत्पन्न विशिष्टता अथवा साज-सwण। ‘शब्दालंकार’ की सृष्टि करते हैं। इस अलंकार में वर्ण या शब्दों की लयात्मकता अथवा संगीतात्मकता उपस्थित होती है। ‘शब्दालंकार’ वर्णगत, शब्दगत तथा वाक्यगत होते हैं। अनुमास, यमक, श्लेष इत्यादि प्रमुख शब्दालंकार हैं।

2. अर्थालंकार
जब शब्द, वाक्य में प्रयुक्त होकर उसके अर्थ को चमत्कृत या अलंकृत करने वाला स्वरूप प्रदान करे तो वहाँ ‘अर्थालंकार’ की सृष्टि होती है। *अर्थालंकार’ की एक विशेषता यह है कि यदि वाक्य से किसी शब्द को हटाकर उसकी जगह उसके पर्याय शब्द को रखा जाए, तब भी अलंकार की प्रवृत्ति में कोई अन्तर नहीं आता। वस्तुतः ‘अर्थालंकार” की निर्भरता शब्द पर न होकर शब्द के अर्थ पर होती है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, दृष्टान्त, मानवीकरण इत्यादि प्रमुख अर्थालंकार हैं।

शब्दालंकार
1. अनुप्रास अलंकार (2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12)
अनुप्रास वर्णनीय रस की अनुकूलता के अनुसार समान वर्गों का बार-बार प्रयोग है। यह एक प्रचलित अलंकार है, जिसका प्रयोग ,छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, लाटानुप्रास
आदि के रूप में होता है।
उदाहरण सम सुबरनं सुखाकर सुजस न थोर।
इस वाक्यांश (काव्यांश) में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति दिखती है। यह आवृत्ति ‘अनुप्रास अलंकार’ के रूप में जानी जाती हैं।
अनुप्रास अलंकार के भेद
इसके पाँच भेद हैं।

  • श्रुत्यानुप्रास एक ही स्थान से उच्चारित होने वाले वर्षों की आवृत्ति।
  • वृत्यानुप्रास समान वर्ण की अनेक बार आवृत्ति।
  • छेकानुप्रास जब कोई वर्ण मात्र दो बार ही आए।
  • लाटानुप्रास शब्द व अर्थ की आवृत्ति के बाद भी अन्य के उपरान्त भिन्न अर्थ मिले।
  • अन्त्यानुप्रास शब्दों के अन्त में समान ध्वनि की आवृत्ति।

2. यमक अलंकार(2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12)
‘यमक’ एक शब्दालंकार है। यमक का अर्थ होता है-‘युग्म्’ अर्थात् ‘जोड़ा। इसमें भिन्न अर्थ के साथ किसी वर्ण अथवा शब्द की आवृत्ति होती हैं।
उदाहरण ”कहै कवि बेनी ब्याल की चुराय लीनी बेनी”
इस काव्यांश में ‘बेनी’ की आवृत्ति है। प्रथम ‘बेनी’ का अर्थ है-‘कवि बेनीप्रसाद’ तथा दूसरे ‘बेनी’ का अर्थ है- ‘चोटी’।।

3. श्लेष अलंकार (2018, 17, 16, 13, 12)
जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त होकर दो-या-दो से अधिक भिन्न-भिन्न अर्थ दे तो वहीं ‘श्लेष अलंकार’ होता है। इस अलंकार के अन्तर्गत एक शब्द एक से अधिक अर्थों का बोध कराकर पूरे काव्य को विशिष्ट अर्थ प्रदान करने में सक्षम होता है।
उदाहरण “सुबरन को इँदै फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।”
इस काव्य पंक्ति में ‘सुबरन’ के कई अर्थ ध्वनित हो रहे हैं। ‘सुबरम्’ का अर्थ यहाँ | कवि, व्यभिचारी और चोर से सम्बन्धित है। यथा- कवि ‘सुबरन’ अर्थात् सुवर्ण (अच्छे शब्द) को ढूंढता है। व्यभिचारी ‘सुबरन’ अर्थात् ‘गौरी’ को ढूँढता है। चोर ‘सुबरन’ अर्थात् ‘स्वर्ण’ को ढूंढता है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार हैं।

अर्थालंकार
1. उपमा अलंकार (2017, 16, 14, 13)
जब काव्य में समान धर्म के आधार पर एक वस्तु की समानता अथवा तुलना अन्य वस्तु से की जाए, तब वह उपमा अलंकार होता है, जिसकी उपमा दी जाए उसे उपमेय तथा जिसके द्वारा उपमा यानी तुलना की जाए उसे उपमान कहते हैं। उपमेय और उपमान की समानता प्रदर्शित करने के लिए सादृश्यवाचक शब्द प्रयोग किए जाते हैं।
उदाहरण ”मुख मयंक सम मंजु मनोहर।”
इस काव्य पंक्ति में ‘मुख’ उपमेय है, ‘चन्द्रमा’ उपमान है, ‘मनो५’ समान धर्म है। तथा ‘सम’ सादृश्य वाचक शब्द होने से उपमा अलंकार परिपुष्ट हो रहा है।

2. रूपक अलंकार (2018, 17, 16, 15, 14)
रूपक का अर्थ होता है- एकता। रूपक अलंकार में पूर्ण साम्य होने के कारण प्रस्तुत में प्रस्तुत का आरोप कर अभेद की स्थिति को स्पष्ट किया जाता है। इस प्रकार जहाँ ‘उपमेय’ और ‘उपमान’ की अत्यधिक समानता को प्रकट करने के लिए ‘उपमेय’ में ‘उपमान’ का आरोप होता है, वहाँ ‘रूपक अलंकार’ उपस्थित होता है।
उदाहरण “चरण कमल बन्द हरिराई।”
इस काव्य पंक्ति में उपमेय ‘धरण’ पर उपमान ‘कमल’ का आरोप कर दिया गया है। दोनों में अभिन्नता है, पर दोनों साथ-साथ हैं। इस अभेदता के कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
रूपक अलंकार के भेद रूपक के विभिन्न भेदों में से तीन मुख्य भेद नीचे दिए गए हैं।

  • सांगरूपक इसमें अवयवों के साथ उपमेय पर उपमान आरोपित किए जाते
  • निरंग रूपक इसमें अवयवों के बिना ही उपमेय पर उपमान आरोपित किए जाते हैं।
  • परम्परित रूपक इसमें उपमेय पर प्रयुक्त आरोप ही दूसरे आरोप का कारण बनता है।

3. उत्प्रेक्षा अलंकार (2018, 17, 15, 14, 12)
‘उत्प्रेक्षा’ का अर्थ है- किसी वस्तु के सम्भावित रूप की उपेक्षा करना। उपमेय अर्थात् प्रस्तुत में उपमान अर्थात् अप्रस्तुत की सम्भावना को ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ कहते हैं। ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ में मानों, जानों, जनु, मनु, ज्यों इत्यादि शब्दों का प्रयोग होता है।
उदाहरण

“सोहत ओढ़ पीत-पट, श्याम सलोने गात।।
मनहुँ नीलमणि सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।”

इस काव्यांश में श्रीकृष्ण के श्यामल शरीर पर नीलमणि पर्वत की तथा पीत-पट पर प्रातःकालीन धूप की सम्भावना व्यक्त की गई है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

4. भ्रान्तिमान् (2014, 13, 12, 11, 10)
जब उपमेय को भ्रम के कारण उपमान समझ लिया जाता है तब वहीं ‘भ्रान्तिमान अलंकार’ होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस अलंकार में उपमेय में उपमान का धोखा हो जाता है।
उदाहरण

“नाक का मोती अधर की कान्ति से,
बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से।
देख उसको ही हुआ शुक मौन है,
सोचता है अन्य शुक यह कौन हैं?”

5. सन्देह अलंकार (2017, 16, 13, 12)
जब किसी वस्तु में उसी के सदृश अन्य वस्तुओं का सन्देह हों और सदृशता के कारण अनिश्चित की मनोदशा हो तब वहाँ सन्देह अलंकार होता है।
उदाहरण

“सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है,
सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।”

6. अतिशयोक्ति अलंकार (2014, 13)
जब किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थिति की प्रशंसा करते हुए कोई बात बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अथवा लोक सीमा का उल्लंघन करके कहीं जाए, तब वहाँ ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ उपस्थित होता है।
उदाहरण

“आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा उतरे कैसे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।।

इस काव्यांश में राणा अभी नदी पार करने की सोच ही रहे थे कि उनका घोड़ा चेतक नदी के पार भी हो गया। यहाँ वेग (गति) के विषय में बहुत बढ़ा चढ़ा कर कहने से अतिशयोक्ति अलंकार परिपुष्ट हुआ है।

7. अनन्वय अलंकार (2016, 12)
काव्य में जहाँ उपमान के अभाव के कारण उपमेय को ही उपमान बना दिया जाए वहाँ ‘अनन्वय अलंकार’ होता है।
उदाहरण

“राम-से राम, सिया-सी सिया,
सिरमौरे बिरंचि बिचारि सँवारे।”

8. प्रतीप अलंकार (2017, 15, 14, 13, 11)
जहाँ उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया गया हो तो यह ‘प्रतीप अलंकार’ होता है। प्रतीप अलंकार में उपमा अलंकार की विपरीत स्थिति होती है। उदाहरण “उसी तपस्वी से लम्बे थे देवदारु दो चार खड़े।”

9. दृष्टान्त अलंकार (2018, 13)
उपमेय एवं उपमान के साधारण धर्म में भिन्नता होने पर भी बिम्ब-प्रतिबिम्य भाव से कथन करने को ‘दृष्टान्त अलंकार’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दृष्टान्त अलंकार के अन्तर्गत पहले एक बात कहकर उसको स्पष्ट करने के लिए उससे मिलती-जुलती अन्य बात कही जाती है।
उदाहरण

‘परी प्रेम नन्दलाल के मोहि न भावत जोग।
मधुप राजपद पाइकै भीखन माँगत लोग।।”

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“चरन धरत चिन्ता करत, चितवत चारित्र ओर।।
सुबरन को खोजत फिरत, कवि व्यभिचारी चोर।।”
में अलंकार है। (2014, 12)
(क) उपमा
(ख) यमक
(ग) रूपक
(घ) श्लेष
उत्तर:
(घ) श्लेष

प्रश्न 2.
जहाँ एक शब्द अथवा शब्द-समूह का एक से अधिक बार प्रयोग हो, किन्तु उसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो, वहाँ कौन-सा अलंकार होता (2010)
(क) अनुप्रास
(ख) श्लेष
(ग) यमक
(घ) भ्रान्तिमान्
उत्तर:
(ग) यमके

प्रश्न 3.
जहाँ उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप हो, वहाँ अलंकार होता है। (2010)
अथवा
जहाँ उपमेय (प्रस्तुत) पर उपमान (अप्रस्तुत) का अभेद आरोप किया जाए, वहाँ अलंकार होता है। (2010)
(क) उपमा
(ख) रूपक
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) प्रतीप
उत्तर:
(ख) रूपक

प्रश्न 4.
“ऊधौ जोग जोग हम नाहीं।” इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? (2010)
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(ख) यमक

प्रश्न 5.
जहाँ उपमेय और उपमान के साधारण धर्म में भिन्नता होते हुए भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से कथन किया जाए, वहाँ अलंकार होता है। (2011)
(क) उपमा
(ख) अनन्वय
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) दृष्टान्त
उत्तर:
(घ) दृष्टान्त

प्रश्न 6.
“अर्जी तरयौना ही रह्यौ श्रुति सेवत इक रंग।
नाक बास बेसरि लह्यौ, बसि मुकतनु के संग।।”
इस दोहे में अलंकार है। (2010)
(क) यमक
(ख) श्लेष
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) उपमा
उत्तर:
(ख) श्लेष

प्रश्न 7.
“अम्बर पनघट में डुबो रही, तरा-घट ऊषा-नागरी।”
उपरोक्त पद में अलंकार है। (2011)
(क) रूपक
(ख) श्लेष
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) उपमा
उत्तर:
(क) रूपक

प्रश्न 8.
“अब जीवन की कपि आस न कोय।
कनगुरिया की मुदरी कँगना होय।।”
पद में निहित अलंकार का नाम निम्नांकित विकल्पों में से लिखिए। (2011)
(क) दृष्टान्त
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) उपमा
(घ) अतिशयोक्ति
उत्तर:
(घ) अतिशयोक्ति

प्रश्न 9.
“पापी मनुज भी आज मुख से राम-राम निकालते।
देखो भयंकर भेड़िये भी, आज आँसू ढालते।।”
इन पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है? (2011, 10)
(क) सन्देह
(ख) भ्रान्तिमान्
(ग) दृष्टान्त
(घ) अतिशयोक्ति
उत्तर:
(ग) दृष्टान्त

प्रश्न 10.
जहाँ किसी वस्तु की इतनी प्रशंसा की जाए कि लोक-मर्यादा का अतिक्रमण हो जाए, वहाँ अलंकार होता है। (2011)
अथवा
जहाँ किसी वस्तु का इतना बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाए कि सामान्य लोक सीमा का उल्लंघन हो जाए, वहाँ कौन-सा अलंकार होता (2011)
(क) रूपक
(ख) भ्रान्तिमान्
(ग) सन्देह
(घ) अतिशयोक्ति
उत्तर:
(घ) अतिशयोक्ति

प्रश्न 11.
जहाँ उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया जाए, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है? (2011, 10)
अथवा
जहाँ प्रसिद्ध उपमान को उपमेय बना दिया जाए अथवा उसकी व्यर्थता प्रदर्शित की जाए, वहाँ अलंकार होता है (2011, 10)
(क) रूपक
(ख) प्रतीप
(ग) अनन्वय
(घ) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(ख) प्रतीप

प्रश्न 12.
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।।”
में अलंकार है। (2013, 10)
(क) उपमा
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) रूपक
उत्तर:
(ग) श्लेष

प्रश्न 13.
“उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उनका लगा।
मानो हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।।”
में निहित अलंकार है (2011)
(क) भ्रान्तिमान्
(ख) दृष्टान्त
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) सन्देह
उत्तर:
(ग) उत्प्रेक्षा

प्रश्न 14.
जहाँ उपमान के अभाव में उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है, वहाँ अलंकार होता है।
अथवा
“वयं विषय को बहुत उत्कृष्ट दिखाने के क्रम में, उसके समान कोई अन्य है ही नहीं, सूचित करने के लिए उपमेय को ही उपमान बना देना,” किस अलंकार का लक्षण हैं? (2011)
(क) उपमा
(ख) रूपक
(ग) अनन्वय
(घ) सन्देह
उत्तर:
(ग) अनन्वय

प्रश्न 15.
जहाँ रूप-रंग आदि के सादृश्य से उपमेय में उपमान का संशय बना रहे, वहाँ अलंकार होता है। (2010)
(क) सन्देह
(ख) भ्रान्तिमान्
(ग) दृष्टान्त
(घ) प्रतीप
उत्तर:
(ख) भ्रान्तिमान्

प्रश्न 16.
उपमेय में उपमान की सम्भावना (या कल्पना) किस अलंकार में होती है? (2011)
अथवा
जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना की जाए, वहाँ अलंकार होता है। (2011, 10)
(क) सन्देह
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) भ्रान्तिमान्
(घ) अतिशयोक्ति
उत्तर:
(ख) उत्प्रेक्षा

प्रश्न 17.
‘कैर्धी ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
वीररस बीर तरवारि-सी उघारी है।’
उपरोक्त पद में कौन-सा अलंकार है? (2010)
(क) अनन्वय
(ख) भ्रान्तिमान्
(ग) सन्देह
(घ) दृष्टान्त
उत्तर:
(ग) सन्देह

प्रश्न 18.
‘रहिमन अँसुआ नयन ढरि, जिय दुख प्रगट करे।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देड़।।”
उक्त पंक्तियों में अलंकार हैं। (2010)
(क) अनन्वय
(ख) रूपक
(ग) सन्देह
(घ) दृष्टान्त
उत्तर:
(घ) दृष्टान्त

प्रश्न 19.
“बंदउँ कोमल कमल से, जग जननी के पाँय” उक्त पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? (2014)
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) रूपक
(ग) दृष्टान्त
(घ) उपमा
उत्तर:
(घ) उपमा

प्रश्न 20.
“विदग्ध होके कण धूलि राशि का, तपे हुए लौह कणों समान था।” उक्त पद में अलंकार है। (2011)
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) उपमा
उत्तर:
(घ) उपमा

प्रश्न 21.
“ओ चिन्ता की पहली रेखा, अरे विश्व वन की व्याली।” में अलंकार है। (2011)
(क) यमक
(ख) रूपक
(ग) श्लेष
(घ) प्रतीप
उत्तर:
(ख) रूपक

प्रश्न 22.
“जनक बचन छुट बिरवा लजाऊ के से,
वीर रहे सकल सकुचि सिर नाय के।”
उपरोक्त पद में अलंकार हैं।
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) उपमा
उत्तर:
(घ) उपमा

प्रश्न 23.
मंजु मेचक मृदुल तनु, अनुहरत भूवन भरनि।
मनहूँ सुभग सिंगार सिमु-तरु फरयौ अद्भुत फरनि।।
उपरोक्त पंक्तियों में अलंकार है।
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) यमक
(घ) श्लेष
उत्तर:
(ख) उत्प्रेक्षा

प्रश्न 24.
“कनक कनक तै सौ गुनी, मादकता अधिकाइ।
उहिं खाएँ बौराई जग, इहिं पाएँ बौराई।।”
उपरोक्त पद में अलंकार है
(क) रूपक
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) यमक
(घ) श्ले ष
उत्तर:
(ग) यमक

प्रश्न 25.
‘हरि पद कोमल कमल-से’ पद में अलंकार है। (2010)
(क) अनुप्रास
(ख) उपमा
(ग) उत्प्रेक्षा।
(घ) यमक
उत्तर:
(ख) उपमा

प्रश्न 26.
जहाँ रूप-रंग आदि के सादृश्य से उपमेय में उपमान का संशय बना रहे, वहाँ अलंकार होता है (2010)
(क) उत्प्रेक्ष
(ख) भ्रान्तिमान्
(ग) उपमा
(घ) सन्देह
उत्तर:
(घ) सन्देह

प्रश्न 27.
सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही सारी है।।
उपरोक्त पद में अलंकार है। (2011)
(क) भ्रान्तिमान्
(ख) दृष्टान्त
(ग) सन्देह
(घ) अतिशयोक्ति
उत्तर:
(ग) सन्देह

प्रश्न 28.
जहाँ काव्य की शोभा का कारण शब्द होता है, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) अर्थालंकार
(ख) शब्दालंकार
(ग) उपमा
(घ) सन्देह
उत्तर:
(ख) शब्दालंकार

प्रश्न 29.
रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम। उक्त पंक्तियों में अलंकार है।
(क) यमक
(ख) श्लेष
(ग) अनुप्रास
(घ) उपमा
उत्तर:
(ग) अनुप्रास

प्रश्न 30.
जहाँ उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना की जाए, वहाँ अलंकार होता है।
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) रूपक
(घ) यमक
उत्तर:
(ख) उत्प्रेक्षा

प्रश्न 31.
‘नील घन-शावक से सुकुमार,
सुधा भरने को विधु के पास।
उक्त पंक्तियों में अलंकार है।
(क) उपमा
(ख) रूपक
(ग) दृष्टान्त
उत्तर:
(क) उपमा

प्रश्न 32.
‘रण-कमल बन्द हरिराई।’ में अलंकार हैं।
(क) उपेक्षा
(ख) अनुपास
(ग) रूपक
(घ) उपमा
उत्तर:
(ग) रूपक

प्रश्न 33.
रूपक अलंकार के भेद हैं।
(क) 4
(ख) 2
(ग) 5
(घ) 3
उत्तर:
(घ) 3

प्रश्न 34.
जहाँ समान वर्गों की बार-बार आवृत्ति होती है, वहाँ अलंकार होता है।
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) भ्रान्तिमान
(घ) उपमा
उत्तर:
(क) अनुप्रास

प्रश्न 35.
उपमा अलंकार का विपरीत अलंकार होता है।
(क) दृष्टान्त
(ख) श्लेष
(ग) प्रतीप
(घ) सन्देह
उत्तर:
(ग) प्रतीप

प्रश्न 36.
उपमेय और उपमान के साधारण धर्म में भिन्नता होने पर अलंकार होता
(क) भ्रान्तिमान
(ख) सन्देह
(ग) उपमान
(घ) दृष्टान्त
उत्तर:
(घ) दृष्टान्त

प्रश्न 37.
जहाँ उपमेय को ही उपमान बना दिया जाए, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) प्रतीप
(ख) अनन्वय
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) भ्रान्तिमान
उत्तर
(ख) अनन्वये

प्रश्न 38.
प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सम्भावना को कौन-सा अलंकार कहते हैं?
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा।
(ग) रूपक
(घ) भ्रान्तिमान
उत्तर:
(ख) उत्प्रेक्षा

प्रश्न 39.
‘तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।’ उक्त काव्य पंक्ति में कौन-सा अलंकार हैं? (2008)
(क) यमक
(ख) श्लेष
(ग) उपमा
(घ) अनुप्रास
उत्तर:
(घ) अनुप्रास

प्रश्न 40.
माला फेरत जुग भया, फिरा न मनका फेर।
करका मनका हारि दे मनका-मनका फेर।।
उक्त दोहे में कौन-सा अलंकार है?
(क) श्लेष
(ख) यमक
(ग) अनुप्रास
(घ) रूपक
उत्तर:
(ख) यमके।

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार का नाम और उसका लक्षण लिखिए।
सोहत ओढे पीत पट स्याम सलोने गात।
मनुहुँ नीलमणि शैल पर आतप परयो प्रभात।।
उत्तर:
यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। जहाँ प्रस्तुत में अप्रस्तुत की सम्भावना की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसके वाचक शब्द, मनु, जनु, मनहु, जनहु, मानो, जानों आदि हैं।

प्रश्न 2.
रूपक अलंकार के कितने भेद होते हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
रूपक अलंकार के तीन भेद होते हैं, जो निम्न प्रकार हैं।
(क) सांग रूपक
(ख) निरंग रूपक
(ग) परम्परित रूपक

प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में अलंकार का नाम तथा उसका लक्षण लिखिए।
‘कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यानँ।’
उत्तर:
यहाँ रूपक अलंकार हैं। जहाँ उपमेय में उपमान का भेद रहित आरोप हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

प्रश्न 4.
‘पूत सपूत तो क्यों धन संचे।’
पूत कपूत तो क्यों धन संचे।।
उत्तर:
यहाँ अनुप्रास का एक भेद लाटानुप्रास है। जहाँ शब्द और अर्थ की आवृत्ति हो अर्थात् जहाँ एकार्थक शब्दों की आवृत्ति तो हो, परन्तु अन्वय करने पर अर्थ भिन्न हो जाए, वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है।

प्रश्न 5.
कहत नटत रीझत खीझत मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु हीं सौं बात।।
उक्त दोहे में कौन-सा अलंकार है? उसका लक्षण लिखिए।
उत्तर:
यहाँ अनुप्रास का एक भेद अन्त्यानुप्रास’ है। जब छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति हो, वहाँ ‘अन्त्यानुप्रास’ अलंकार होता है।

प्रश्न 6.
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चुन।।।
उक्त पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है? उसका लक्षण लिखिए।
उत्तर:
यहाँ श्लेष अलंकार है। जहाँ एक शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता हैं।

प्रश्न 7.
अनुप्रास अलंकार का लक्षण एवं उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
जहाँ समान वर्षे की आवृत्ति बार-बार होती है अर्थात् कोई वर्ण एक से अधिक बार आता है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है; जैसे
उदाहरण

रघुपति राघव राजा राम,
पतित पावन सीता राम।।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सबको सम्मति दे भगवान।

प्रश्न 8.
मकराकृति गोपाल के, सोहत कुण्डल कान।
धयो मनौ हिय धर समरु, इयौढी लसत निसान।।
उक्त पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है? उसका लक्षण लिखिए।
उत्तर:
यहाँ रूपक अलंकार है। जहाँ उपमेय और उपमान में अभिन्नता प्रकट की जाए अर्थात् उन्हें एक ही रूप में प्रकट किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

प्रश्न 9.
‘तेरी बरछी ने बरछीने हैं खलन के।’
उक्त काव्य पंक्ति में अलंकार का नाम तथा उसका लक्षण लिखिए।
उत्तर:
यहाँ यमक अलंकार है। जहाँ कोई शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त होता है और प्रत्येक बार उसके अर्थ अलग होते हैं। वहाँ यमक अलंकार होता है।

प्रश्न 10.
‘पछताने की परछाहीं-सी, तुम उदास छाई हो कौन?’ इस पंक्ति में अलंकार का नाम और उसका लक्षण लिखिए।
उत्तर:
यहाँ उपमा अलंकार है। जहाँ उपमेय (संज्ञा) की उपमान (विशेषण) से समानता बताई जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है। इसके वाचक शब्द हैं, सी, सा, से, सम, सरिस आदि।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार का नाम तथा उसका लक्षण लिखिए।
‘चरण-कमल बन्द हरिराई।’ (2013, 10)
उत्तर:
उक्त रूपक अलंकार है। जहाँ उपमेय में उपमान का भेद रहित आरोप हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित दोहे में अलंकार का नाम तथा लक्षण लिखिए।
चिरजीव जोरी जुरै, क्यों न सनेह गम्भीर
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।।
उत्तर:
यहाँ श्लेष अलंकार है। जहाँ एक शब्द एक ही स्थान पर प्रयुक्त हो और उसके एक से अधिक अर्थ हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन-सा अलंकार है?
मुख मयंक सम मंजु मनोहर।।
उत्तर:
यहाँ उपमा अलंकार है, क्योंकि मुख की समानता चन्द्रमा से की गई है। तथा मंजु और मनोहर साधारण धर्म हैं साथ में वाचक शब्द सा भी प्रयुक्त है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन-सा अलंकार है?
ओ चिन्ता की पहली रेखा, अरे विश्व वन की व्याली।
उत्तर:
इस पंक्ति में रूपक अलंकार है, क्योंकि चिन्ता उपमेय में विश्व वन की व्याली में उपमान का आरोप किया गया है।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है?
नाक का मोती अधर की कान्ति से,
बीज़ दाडिम का समझकर भ्रान्ति से।
देख उसको ही हुआ शुक मौन है,
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?
उत्तर:
इन पंक्तियों में भ्रान्तिमान अलंकार है। जहाँ समानता के कारण एक वस्तु को दूसरी समझ लिया जाता है। वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है। इसमें तोता उर्मिला की नाक के मोती को भ्रमवश अनार का दाना और उसकी नाक को दूसरा तोता समझकर भ्रमित हो जाता है। इस कारण यहाँ पर भ्रान्तिमान अलंकार है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name छन्द
Number of Questions Solved 56
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द

छन्द का अर्थ एवं परिभाषा
‘छन्द’ शब्द की उत्पत्ति ‘छिदि’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- ढकना अथवा आच्छादित करना। छन्द उस पद-रचना को कहते हैं, जिसमें अक्षर, अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा, मात्रा की गणना के साथ-साथ यति (विराम) एवं गति से सम्बद्ध नियमों का पालन किया गया हो।

छन्द के अंग अथवा तत्त्व
छन्दबद्ध काव्य को समझने अथवा रचने के लिए छन्द के निम्नलिखित अंगों का ज्ञान होना आवश्यक है।

1. चरण
चरण या पाद छन्द की उस इकाई का नाम है, जिसमें अनेक छोटी-बड़ी ध्वनियों को सन्तुलित रूप से प्रदर्शित किया जाता है। साधारणतः छन्द के चार चरण होते हैं—पहले तथा तीसरे चरण को ‘विषम’ तथा दूसरे और चौथे चरण को ‘सम’ चरण कहते हैं।

2. मात्रा और वर्ण
किसी ध्वनि के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते हैं। छन्दशास्त्र में दो से अधिक मात्राएँ किसी वर्ण की नहीं होती। मात्राएँ स्वरों की होती है, व्यंजनों की नहीं। यही कारण है कि मात्राएँ गिनते समय व्यंजनों पर ध्यान नहीं दिया जाता। वर्ण का अर्थ अक्षर से हैं, इसके दो भेद होते हैं।

(क) ह्रस्व वर्ण (लघु)
जिन वर्गों के उधारण में कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व वर्ण कहते हैं। छन्दशास्त्र में इन्हें लघु कहा जाता है। इनकी ‘एक’ मात्रा मानी गई है तथा इनका चिह्न ” है। ‘ अ, इ, उ तथा ऋ लघु वर्ण हैं।
लघु के नियम

  • ह्रस्व स्वर से युक्त व्यंजन लघु वर्ण कहलाता है।
  • यदि लघु स्वर में स्वर के ऊपर चन्द्रबिन्दु UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 1 है तो उसे लघु ही माना जाएगा। उदाहरण-सँग, हँसना आदि।
  • छन्दों में कहीं-कहीं हलन्त (,) आ जाने पर लघु हीं माना जाता है।
  • हस्व स्वर के साथ संयुक्त स्वर हो तो भी लघु ही माना जाता है। कभी-कभी उच्चारण की सुविधा के लिए भी गुरु को लघु ही मान लिया जाता है।
  • संयुक्त वर्ण से पूर्व हस्व पर जोर न पड़े तो वह भी लघु मान लिया जाता है।

(ख) दीर्घ वर्ण (गुरु)
जिन वर्गों के उच्चारण में हस्व वर्ण से दोगुना समय लगता है, उन्हें दीर्घ वर्ण कहते हैं। इन्हें गुरु भी कहा जाता है। इनकी दो मात्राएँ होती हैं तथा इनको चिह्न ‘ऽ’ है।
आ, ई, ऊ, ओ, औं आदि दीर्घ वर्ण हैं।

गुरु के नियम

  • दीर्घ स्वर और उससे युक्त व्यंजन गुरु माने जाते हैं।
  • यदि हस्त स्वर के बाद विसर्ग (:) आ जाए, तो वह गुरु माना जाता है; जैसे प्रातः आदि।।
  • अनुस्वार (∸) वाले सभी स्वर एवं सभी व्यंजन भी गुरु माने जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर अन्तिम हस्व स्वर को गुरु मान लिया जाता है।
  • संयुक्त अक्षर या उसके ऊपर अनुस्वार हो तो भी ह्रस्व स्वर गुरु माना जाता है।

3. यति
छन्द पदते समय उच्चारण की सुविधा के लिए तथा लय को ठीक रखने के लिए कहीं-कहीं विराम लेना पड़ता है। इसी विराम या ठहराव को यति कहते हैं।

4. गति
छन्द पढ़ने की लय को गति कहते हैं। हिन्दी में छन्दों में गति प्रायः अभ्यास और नाद के नियमों पर ही निर्भर हैं।

5. तुक
छन्द के चरणों के अन्त में समान वर्गों की आवृत्ति को तुक कहते हैं।

6. संख्या, क्रम तथा गण
छन्द में मात्राओं और वर्गों की गिनती को संख्या कहते हैं तथा छन्द में लघु वर्ण और गुरु वर्ण की व्यवस्था को क्रम कहते हैं। तीन वर्षों के समूह को ‘गण’ कहते हैं। गणों का प्रयोग वर्णिक (वृत्त) में लघु-गुरु के क्रम को बनाए रखने के लिए होता है। इनकी संख्या आठ निश्चित की गई हैं। इनके लक्षण और स्वरूप की तालिका निम्न है ।

गण लक्षण रूप उदाहरण
1. मगण सर्व गुरु ऽऽऽ  नानाजी
2. यगण आदि लघु, बाद में दो गुरु |ऽऽ सवेरा
3. रंगण आदि-अन्त में गुरु, मध्य में लघु प्रथम दो लघु ऽ|ऽ  केतकी
4. सगण प्रथम दो लघु,  अन्त में गुरु ||ऽ रचना
5. तगण प्रथम दो गुरु, अन्त में लघु ऽऽ| आकार
6. जगण आदि-अन्त में लघु, मध्य में गुरु |ऽ| नरेश
7. भगण प्रथम गुरु, बाद में दो लघु ऽ|| गायक
8. भगण सर्व लघु ||| कमल

छन्द के भेद
सामान्यतः वर्ण और मात्रा के आधार पर छन्दों के निम्न चार भेद हैं।

1. मात्रिक छन्द
यह छन्द मात्रा की गणना पर आधारित होता है, इसीलिए इसे मात्रिक छन्द कहा जाता है। जिन छन्दों में मात्राओं की समानता के नियम का पालन किया जाता हैं, किन्तु वणों की समानता पर ध्यान नहीं दिया जाता, उन्हें मात्रिक छन्द कहा जाता है। दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई, हरिगीतिका, छप्पय आदि प्रमुख मात्रिक

2. वर्णिक छन्द
जिन छन्दों में केवल वर्गों की संख्या और नियमों का पालन किया जाता है, वे वर्णिक छन्द कहलाते हैं। पनामारी, रूपघनाक्षरी, देवघनाक्षरी, मुक्तक, दण्डक आदि वर्णिक छन्द हैं।

3. उभय छन्द
जिन छन्दों में मात्रा और वर्ण दोनों की समानता एक-साथ पाई जाती है, उन्हें उभय छन्द कहते हैं।

4. मुक्तक छन्द
इन छन्दों को स्वछन्द छन्द भी कहा जाता है, इनमें मात्रा और वर्गों की संख्या निश्थित नहीं होती। भावों के अनुकूल यति-विधान, चरणों की अनियमितता, असमान गति आदि भुक्तक छन्दों की विशेषताएँ हैं। ये अपनी स्वेच्छाचारिता का भरपूर परिचय देते हैं।

प्रमुख मात्रिक छन्द
मात्रिक छन्दों में केवल मात्राओं पर ध्यान दिया जाता है। मात्रिक छन्द तीन प्रकार के होते हैं-

  1.  सम्
  2. असम
  3. विषम्।

प्रमुख मात्रिक छन्दों का वर्णन नीचे किया जा रहा है।

1. चौपाई (2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12)
परिभाषा चार चरण वाले इस सम मात्रिक छन्द के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अन्त में जगण (|ऽ|) अथवा तगण (ऽऽ|) नहीं होता है। प्रथम तथा द्वितीय चरणों में ‘तुक’ समान होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 17

स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में चार चरण हैं। प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ तथा अन्त में दो गुरु वर्ण हैं। प्रत्येक चरण के अन्त में यति है। अतः यह चौपाई छन्द का उदाहरण है।

2. दोहो (2018, 17, 16, 14, 13, 12, 10)
परिभाषा दोहा अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इस छन्द के प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11.11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अन्त में गुरु-लघु आते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 2

स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में चार चरण हैं। पहले (कागा काको धन हरै) और तीसरे (मीठे बचन सुनाय कर) चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे (कोयल काको देय) एवं चौथे (जग अपनो कर लेय) चरणों में 11-11 मात्राएँ हैं। सम चरणों के अन्त के वर्ण गुरु और लघु हैं। अतः यह दोहा छन्द को उदाहरण हैं।

3. सोरठा (2018, 17, 16, 14, 13, 12)
परिभाषा दो का उल्टा रूप सोरठा कहलाता है। यह एक अर्बसम छन्द है अर्थात् इसके पहले तीसरे तथा दूसरे-चौथे चरणों में मात्राओं की संख्या समान रहती है। इसके विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 11-11 और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। तुक विषम चरणों में ही होता है तथा सम चरणों के अन्त में जगण (|ऽ|) का निषेध होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 3

स्पष्टीकरण
इस उदाहरण के पहले चरण (मूक होई वाचाल) और तीसरे चरण (जासु कृपा सु । दयाल) में 11-11 मात्राएँ हैं तथा दूसरे (पंगु चदै गिरिवर गहन) और चौथे चरण (द्रव सकल कलिमल दहन) में 13-13 मात्राएँ हैं। विषम चरण में तुक है तथा सम् चरण के अन्त में जगण (|ऽ|) नहीं है। अतः यह सोरठा छन्द का उदाहरण है।

4. रोला (2018, 15, 14, 13, 12, 10, 04)
परिभाषा यह एक सम मात्रिक छन्द है अर्थात् इसके प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या समान रहती हैं। चार चरणों वाले इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। तथा ग्यारह (11) और तेरह (13) मात्राओं पर यति होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 5

स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में चार चरण हैं और प्रत्येक चरण में चौबीस (24) मात्राएँ हैं। ग्यारह (11) और तेरह (13) मात्राओं पर यति है। अतः यह रोला छन्द का उदाहरण है।

5. कुण्डलिया (2018, 17, 14, 13)
परिभाषा यह विषम मात्रिक एवं संयुक्त छन्द हैं। इस छन्द का निर्माण दोहा और रोला के संयोग से होता है। इसमें 6 चरण होते हैं। आरम्भ में दोहा और पश्चात् में दो छन्द रोला के होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 6

स्पष्टीकरण
छ; चरणों वाले इस उदाहरण के प्रत्येक चरण में चौबीस (24) माएँ हैं। इसका प्रथम चरण (कोई संगी”) दोहे में प्रथम एवं द्वितीय चरण को मिलाकर रचा गया है और इसके द्वितीय चरण (पथी लेहु ”) की रचना दोहे में तृतीय व चतुर्थ चरण के सम्मिश्रण से हुई है। इसके अन्य चरणों की रचना रोला के चरणों को मिला कर की गई है। इसमें यतियों की व्यवस्था दोहे एवं रोले के अनुसार ही है। अतः यह कुण्डलिया छन्द का उदाहरण है।

6. हरिगीतिका (2018, 17, 14, 13, 12)
परिभाषा इस सम मात्रिक छन्द के प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं तथा 16 और 12 मात्रा पर यति होती है। अन्त में लघु-गुरु का प्रयोग ही अधिक प्रचलित है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 7

स्पष्टीकरण
यहाँ प्रत्येक चरण 28 मात्राओं वाला है, जिसमें 16 मात्रा पर यति है। अतः यह उदाहरण हरिगीतिका छन्द का है।

7. बरवै (2018, 17, 16, 15, 14, 11, 10)
परिभाषा इस असम मात्रिक छन्द में कुल 38 मात्राओं वाले चार चरण होते हैं। इसके प्रथम और तृतीय चरणों में 12 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में 7 मात्राएँ होती हैं।

सम अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ चरण में जगण (|ऽ|) अथवा तगण (ऽऽ|) के प्रयोग से कविता सरल हो जाती है। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती हैं।
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स्पष्टीकरण
यहाँ प्रथम एवं तृतीय चरण 12.12 तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण 7-7 मात्राओं के हैं। तथा सम चरणों के अन्त में जगण (|ऽ|) है। अतः यह बरवै छन्द का उदाहरण है।

प्रमुख वर्णिक छन्द (वर्णवृत्त)
वर्णिक छन्दों की रचना का आधार वर्गों की गणना होती है।
इसके तीन मुख्य भेद होते हैं-

  1. सम
  2. असम
  3.  विषम

प्रमुख वर्णिक छन्दों का उल्लेख नीचे किया जा रहा है।

1. इन्द्रवज्रो (2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12)
परिभाषा यह राम वर्णवृत्त अर्थात् सम वर्णिक छन्द है। चार चरण वाले इस छन्द के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 2 तगण, 1 जगण तथा 2 गुरु होते हैं। 11वें वर्ण पर यति होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 9

स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में 11-11 वर्गों वाले 4 चरण हैं तथा प्रत्येक चरण के 11वें वर्ण पर यति है। इसके प्रत्येक चरण में दो जगण, एक तगण एवं अन्त में दो गुरु हैं। अतः यह इन्द्रवज्रा छन्द का उदाहरण है।

2. उपेन्द्रवज्रा (2018, 17, 16, 14, 13, 10)
परिभाषा इस सम वर्णिक छन्द के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 2 जगण, 1 तगण तथा 2 गुरु होते हैं। 11वें वर्ण पर यति होती हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 10

स्पष्टीकरण
इस पद्य के प्रत्येक चरण में जगण, तगण, जगण और दो गुरु के क्रम से 11 वर्ण है; अतः यह ‘उपेन्द्रवज्रा’ छन्द है।

3. मालिनी (2016, 13)
परिभाषा यह सम वर्णवृत्त है। इसमें 15 वर्षों वाले प्रत्येक चरण में दो नगण, एक मगण तथा दो यगण क्रम से रहते हैं। यति 8 एवं 7 वर्गों पर होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 11

4. वसन्ततिलका (2018, 16, 13, 12)
परिभाषा यह सम पर्णिक छन्द अर्थात् सम वर्णवृत्त है। इसके 14 वर्णों वाले प्रत्येक चरण में एक तगण (ऽऽ|), एक भगण (ऽ||), दो जगण (|ऽ|) सहित अन्त में दो गुरु ‘ होते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 12

स्पष्टीकरण
यहाँ 14 वर्णों वाले प्रत्येक चरण में क्रम से 1 तगण,1 भगण, 2 जगण सहित 2 गुरु का विधान किया गया है। अतः यह वसन्ततिलका छन्द का उदाहरण है।

5. सवैया (2017, 16, 14, 13, 12)
परिभाषा इस सम वर्णवृत्त के प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण (अक्षर) होते हैं। सवैया छन्द के कई भेद हैं; जैसे—मत्तगयन्द, सुन्दरी, सुमुखी, मनहर इत्यादि।
(क) मत्तगयन्द (सवैया) यह सम वर्णवृत्त है। इसके 23 वर्गों वाले प्रत्येक चरण में 7 भगण तथा 2 गुरु क्रम से रहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 13
स्पष्टीकरण
यहाँ प्रत्येक चरण में 23 वर्ण हैं तथा चरण का प्रारम्भ 7 भगण एवं अन्त 2 गुरु से हुआ है। अत: यह मत्तगयन्द छन्द का उदाहरण हैं।
(ख) सुन्दरी (सवैया) यह सम वर्णवृत्त है। इसका प्रत्येक चरण 25 वर्ण (अक्षर) वाला होता है। प्रत्येक चरण में 8 सगण तथा एक गुरु वर्ण क्रम से रहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 14

स्पष्टीकरण
इस उदाहरण का प्रत्येक चरण 25 वणों वाला है। यहाँ सभी चरणों के प्रारम्भ में 8 सगण तथा अन्त में 1 गुरु के होने से यह सुन्दरी संवैया का उदाहरण है।

(ग) मनहर या मनहरण (सवैया) इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इस प्रकार मनहर छन्द में सवैया के वर्षों की अधिकतम निर्धारित संख्या 26 से अधिक होने के कारण इसे दण्डक छन्द या दण्डक वृत्त कहा जाता है। मनहर को कवित्त भी कहते हैं। इसमें 16-16 अथवा 8-8-8-7 वर्षों पर यति होती हैं तथा अन्त में एक गुरु वर्ण रहता है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 15

स्पष्टीकरण यहाँ प्रत्येक चरण में 31 वर्ण हैं तथा सभी चरणों में 8-8-8-7 वर्षों पर यति है। अतः यह मनहर छन्द का उदाहरण हैं।

(घ) सुमुखि (सवैया) इसमें सात जगण तथा लघु-गुरु से छन्द की सृष्टि होती है। यति 11वें और 12वें वर्गों पर होती है। मदिरा संवैया के प्रारम्भ में एक लघु वर्ण जोड़ देने से सुमुखी सवैया की रचना होती है। संवैये का यह रूप जगण (|ऽ|) अर्थात् लघु गुरु लघु की आवृत्ति के आधार पर चलता है।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 16

स्पष्टीकरण
उपर्युक्त उदाहरण में सात जगण के पश्चात् लघु-गुरु का विधान है। अतः सात जगण + लघु + गुरु होने से यहाँ सुमुखि छन्द है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जिस छन्द में चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं, वह कहलाता है। (2010)
अथवा
यह सम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण और तगण के प्रयोग का निषेध है। इस छन्द का नाम है (2010)
(क) दोहा
(ख) सोरठा
(ग) रोला
(घ) चौपाई
उत्तर:
(घ) चौपाई

प्रश्न 2.
चौपाई छन्द में कितने चरण होते हैं? सही विकल्प चुनकर लिखिए।
(क) दो
(ख) चार
(ग) छः
(घ) आठ
उत्तर:
ख) चार

प्रश्न 3.
“प्रिय पति वह मेरा, प्राण प्यारा कहाँ है।
दुःख-जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है।
अब तक जिसको मैं देख कर जी सकी हैं।
वह हृदय हमारा, नेत्र तारा कहाँ है।”
उपर्युक्त पद्य में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) सवैया
(ख) सोरठा
(ग) मालिनी
(घ) रोला
उत्तर:
(ग) मालिनी

प्रश्न 4.
हरिगीतिका छन्द में प्रत्येक चरण में मात्राएँ होती हैं (2011)
(क) 24
(ख) 28
(ग) 26
(घ) 22
उत्तर:
(ख) 28

प्रश्न 5.
“नव उज्ज्वल जले-धार, हीर हीरक सी सोहति।
बिच-बिच छहरति बूंद, मध्य मुक्तामनि मोहति।।”
इसमें प्रयुक्त छन्द का नाम है। (2011)
(क) दोहा
(ख) चौपाई
(ग) सोरठा
(घ) बरवै
उत्तर:
(ग) सोरठा

प्रश्न 6.
यह सम मात्रिक छन्द है। यह चार चरण में लिखा जाता है। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। 11वीं और 13वीं मात्राओं पर यति रहती है। वहाँ छन्द होता है। (2010)
(क) रोला
(ख) कुण्डलिया
(ग) इन्द्रवज्रा
(घ) बरवै
उत्तर:
(क) रोला

प्रश्न 7.
“सुनत सुमंगल बैन, मन प्रमोद सनपुलक भर।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह जल।।”
इसमें छन्द है।
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) बरवै
(घ) सोरठा
उत्तर:
(घ) सोरठा

प्रश्न 8.
“नील सरोरुह स्याम, सरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीरसागर संयन।।”
इसमें छन्द है।
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) सवैया
(घ) बरवै
उत्तर:
(ख) सोरठा

प्रश्न 9.
“मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाईं परै श्याम हरित-दुति होय।।”
इस पद में छन्द है।
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) बरवै
उत्तर:
(ग) दोहा

प्रश्न 10.
“मैं लखि नारी ज्ञानु, करि राख्यौ निरधारु यह।
वहई रोग-निदानु, वहै बैदु, औषधी वहै।।
उपर्युक्त पद्य में कौन-सा छन्द है?
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) उपेन्द्रवज्रा
(घ) सोरठा
उत्तर:
(घ) सोरठा

प्रश्न 11.
बरवै छन्द में कुल मात्राएँ होती हैं। (2010)
(क) 48
(ख) 44
(ग) 38
(घ) 32
उत्तर:
(ग) 38

प्रश्न 12.
“अवधि शिला का उर पर, था गुरु भार।
तिल-तिल काट रही थी, दृग जल-धार।।”
इसमें प्रयुक्त छन्द है। (2010)
(क) सोरठा
(ख) दोहा
(ग) रोला
(घ) बरवै
उत्तर:
(घ) बरवै

प्रश्न 13.
सोरठा छन्द की प्रत्येक पंक्ति में कुल मात्राएँ होती हैं।
(क) 16
(ख) 24
(ग) 32
(घ) 64
उत्तर:
(ख) 24

प्रश्न 14.
“सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ।।”
इस पद्य में छन्द है। (2010)
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) सवैया
उत्तर:
(ग) दोहा

प्रश्न 15.
सिय मुख शरद कमल जिमि, किमि कहिजाय।
निसि मलीन वह, निसि दिन, यह बिगसाय।।
पद में प्रयुक्त छन्द का नाम हैं।
(क) दोहा
(ख) सोरठा
(ग) बरवै
(घ) चौपाई
उत्तर:
(ग) बरवै

प्रश्न 16.
ऋषिहिं देखि हरषै हियो, राम देखि कुम्हलाई।
धनुष देखि इरपै महा, चिन्ता चित्त डोलाइ।।।
इसमें प्रयुक्त छन्द है।
(क) सोरठा
(ख) चौपाई
(ग) बरवै
(घ) दोहा
उत्तर:
(घ) दोहा

प्रश्न 17.
यगण का सही सूत्र है।
(क) ||ऽ
(ख) |||
(ग) ऽऽ|
(घ) |ऽऽ
उत्तर:
(घ) |ऽऽ

प्रश्न 18.
“कागद पर लिखत न बनत, कहत सन्देसु लेजात।
कहिहै सब तेरो हियौ, मेरे हिय की बात।।”
इसमें प्रयुक्त छन्द का नाम है।
(क) मालिनी
(ख) सवैया
(ग) बरवै
(घ) दोहा
उत्तर:
(घ) दोहा

प्रश्न 19.
“जो न होत जग जनम भरत को।
सकल धरम धुर धरनि धरत को।।”
उपरोक्त पंक्तियाँ किस छन्द में हैं? (2010)
(क) बरवै
(ख) सवैया
(ग) कुण्डलिया
(घ) चौपाई
उत्तर:
(घ) चौपाई

प्रश्न 20.
रोला छन्द में कितनी मात्राएँ होती हैं? (2010)
अथवा
‘रोला’ छन्द के एक (प्रत्येक चरण में कुल कितनी मात्राएँ होती हैं? (2011, 10)
(क) 28
(ख) 24
(ग) 16
(घ) 19
उत्तर:
(ख) 24

प्रश्न 21.
कुण्डलिया के प्रत्येक चरण में मात्राएँ होती हैं।
(क) 22
(ख) 24
(ग) 26
(घ) 20
उत्तर:
(ख) 24

प्रश्न 22.
जिस छन्द में चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में तगण, भगण, दो जगण और दो गुरु होते हैं, वहाँ छ्न्द होता है
(क) इन्द्रवज्रा
(ख) मालिनी
(ग) वसन्ततिलका
(घ) मत्तगयन्द सवैया
उत्तर:
(ग) वसन्ततिलको

प्रश्न 23.
चम्पक हरवा अँग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कॅमिलाय।।
उपरोक्त पद्य में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) दोहा
(ख) बरवै
(ग) सोरठा
(घ) रोला
उत्तर:
(ख) बरवै

प्रश्न 24.
जिस छन्द में प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं, वह कहलाता है?
(क) दोहा
(ख) सोरठा
(ग) रोला
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ख) सोरठा

प्रश्न 25.
“बिनु पग चले सुने बिनु काना। कर बिनु कर्म करे विधि नाना।।
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। गहे घ्राण बिनु बास असेखा।।”
उपरोक्त पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) बरवै
(ख) चौपाई
(ग) हरिगीतिका
(घ) वसन्ततिलका
उत्तर:
(ख) चौपाई

प्रश्न 26.
“सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहँसे करुणा ऐन, चिरौ जानकी लखन तन।।”
उपरोक्त पद्य में कौन-सा छन्द है?
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) सोरठा
(घ) बरवै
उत्तर:
(ग) सोरठा

प्रश्न 27.
“कातिक सरद चन्द उजियारी जग सीतल हाँ विरहै जारी।”
उक्त पंक्ति में प्रयुक्त छन्द का नाम है। (2010)
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) चौपाई
(घ) सोरठा
उत्तर:
(ग) चौपाई

प्रश्न 28.
“मैं जो नया ग्रन्थ विलौकता हैं, भाता मुझे सो नव मित्र-सा है।
देखें उसे मैं नित नेम से ही, मानो मिला मित्र मुझे पुराना।।”
उपरोक्त पद्य में कौन-सा न्द है? (2010)
(क) उपेन्द्रवज्रा
ख) संवैया
(ग) वसन्ततिलका
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(घ) इन्द्रवज्रा

प्रश्न 29.
“भू में रमी शरद की कमनीयता थी।
नीला अनन्त नभ निर्मल हो गया था।
थी छा गई कंकुभ में, अमिता सिताभा।
उत्फुल-सी प्रकृति थी, प्रतिभात होती।।”
उपर्युक्त पद्यांश में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) मालिनी
(ख) इन्द्रवज्रा
(ग) वसन्ततिलका
(घ) उपेन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ग) वसन्ततिलका।

प्रश्न 30.
“सुख शान्ति रहे सब ओर सदा, अविवेक तथा अघ पास न आवै।
गुणशील तथा बल बुद्धि बढ़े, हठ बैर विरोध घटै मिटि जावै।
कहे मंगल दारिद दूर भगे, जग में अति मोद सदा सरसावै।।
कवि पण्डित शूरन वीरन से, विलसे यह देश सदा सुख पावै।।”
उपरोक्त पद्य में कौन-सा छन्द है? (2011, 10)
(क) सुन्दरी
(ख) मत्तगयन्द
(ग) कवित्त मनहर
(घ) कुण्डलिया
उत्तर:
(क) सुन्दरी

प्रश्न 31.
आदि में एक दोहा जोड़कर और बाद में एक रोला जोड़कर कौन-सा छन्द बनता है?
अथवा
रोला छन्द के प्रारम्भ में एक दोहा जोड़ने पर जो छन्द बन जाता है, उसका नाम लिखिए (2008)
(क) हरिगीतिका
(ख) कुण्डलिया
(ग) बरवै।
(घ) वसन्ततिलका
उत्तर:
(ख) कुण्डलिया

प्रश्न 32.
“सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखी सासु आन अनुसारी।” उपरोक्त पद में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) रोला
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) चौपाई
उत्तर:
(घ) चौपाई

प्रश्न 33.
चौपाई छन्द में कुल मात्राएँ होती हैं। (2007)
(क) 15
(ख) 16
(ग) 64
(घ) 32
उत्तर:
(ग) 64

प्रश्न 34.
दोहा छन्द में कुल मात्राएँ होती हैं। (2007)
(क) 24
(ख) 48
(ग) 38
(घ) 32
उत्तर:
(ख) 48

प्रश्न 35.
इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में कुल वर्ण होते हैं। (2007)
(क) 10
(ख) 12
(ग) 11
(घ) 14
उत्तर:
(ग) 11

प्रश्न 36.
वसन्ततिलका छन्द के एक चरण में कुल कितने वर्ण होते हैं? (2011)
(क) 16
(ख) 18
(ग) 28
(घ) 14
उत्तर:
(घ) 14

प्रश्न 37.
जहाँ पहले और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 7-7 मात्राएँ होती हैं और चरण के अन्त में लघु होता है, वहाँ छन्द होता है।
(क) कुण्डलिया
(ख) बरवै
(ग) इन्द्रवज्रा,
(घ) सवैया
(घ) 32
उत्तर:
(ख) बरवै

प्रश्न 38.
जिस छन्द में प्रत्येक चरण में क्रमशः जगण, तगण, जगण और दो गुरु वर्ण के क्रम से होते हैं, वह कहलाता है।
अथवा
इस छन्द में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में ग्यारह वर्ण होते हैं। वर्गों में जगण, तगण, जगण और गुरु-गुरु का क्रम होता है। चरण के अन्त में यति होती है। इस छन्द का नाम है। (2008)
(क) इन्द्रवज्रा
(ख) उपेन्द्रवज्रा
(ग) सवैया
(घ) वसन्ततिलका
उत्तर:
(ख) उपेन्द्रवज्रा

प्रश्न 39.
“राधा नागरि सोइ, मेरी भवबाधा हौं।
श्याम हरित दुति होड़, जा तन की झाई परै।।”
इस पद में छन्द है (2008)
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ख) सोरठा

प्रश्न 40.
माटी कहे कुम्हार से तु क्यों रौंदे मोय।।
एक दिन ऐसा होयगा, मैं दूंगी तोय।।
इसमें छन्द है।
(क) सरोठा
(ख) चौपाई
(ग) दोहा
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ग) दोहा

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए ।
कुन्द इन्दु सम देह, उमा रमण करुणा अयन।
जाहि दीन पर नेह, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन।।। (2016)
उत्तर:
यहाँ अर्द्ध सम छन्द सोरठा है। सोरठा के विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में 11.11 और सम चरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। तुक विषम चरणों में होता है, जबकि विषम चरणों के अंत में जगण (|ऽ|) का निषेध रहता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
“मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झांई परे, श्याम हरित दुति होय।।” (2014)
उत्तर:
यहाँ अर्द्ध सम मात्रिक दोहा छन्द है।। दोहा छन्द के प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसके सम चरणों के अन्त में गुरु-लघु आते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सप्रमाण स्पष्ट कीजिए
“देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहि सुखारे।।” (2012)
उत्तर:
यहाँ सम मात्रिक चौपाई छन्द हैं, क्योंकि इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ और अन्त में दो गुरु वर्ण हैं। साथ ही चरण के अन्त में जगण (15) एवं तगण (55) नहीं हैं।’

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सप्रमाण स्पष्ट कीजिए।
सुनत सुमंगल बैन, मन प्रमोद तन पुलक भर।।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह जल।। (2016, 15, 14, 12, 09)
उत्तर:
यह अर्द्ध सम मात्रिक छन्द हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 11 (ग्यारह) दूसरे और चौथे चरण में 13 (तेरह) मात्राएँ हैं। इसमें चार चरण हैं। सोरठा छन्द है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
खग वृंद सोता है अतः कल, कल नहीं होता वहाँ।
बस मन्द मारुत का गमन ही, मौन है खोता जहाँ।।
इस भौति धीरे से परस्पर, कह सजगता की कथा।।
यों दीखते हैं वृक्ष ये हों, विश्व के प्रहरी यथा।।।
उत्तर:
यह सम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसमें प्रत्येक चरण में 16 और 12 पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण के अन्त में रगण (IऽI) आता हैं। इस आधार पर इन पंक्तियों में हरिगीतिका छन्द है।।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सप्रमाण स्पष्ट कीजिए।
कृतघन कतहुँ न मानहीं, कोटि करौ जो कोय।
सरबस आगे राखिए, तऊ न अपनो होय।।।
तऊ न अपनो होय, भले की भली न मौने।।
काम काठि चुप रहे, फेरि तिहि नहिं पहचानै।।
कह ‘गिरिधर कविराय’ रहत नित ही निर्भय मन।
मित्र शुत्र ना एक, दाम के लालच कृतघन।।
उत्तर:
यह एक विषम मात्रिक छन्द हैं। इसमें छः चरण होते हैं। एक दोहे और एक रोले के योग से बनता है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रथम चरण के प्रथम शब्द की अन्तिम चरण के अन्तिम शब्द के रूप में तथा द्वितीय चरण के अन्तिम अर्द्ध-चरण की तृतीय चरण के प्रारम्भिक अर्द्धचरण के रूप में आवृत्ति होती है। अत: यह कुण्डलिया छन्द हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है। उसका लक्षण लिखिए।
अवधि शिला का इर पर, था गुरु भार।
तिल तिल काट रही थी, दृग जल धार।।
उत्तर:
यह अर्थ सम मात्रिक बरवै छन्द है। इसके पहले और तीसरे चरणों में 12-12 मात्राएँ होती हैं, दूसरे और चौथे चरणों में 7-7 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अन्त में जगण (|ऽ|) आवश्यक होता है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
थे दीखते परमवृद्ध नितान्त रोगी,
या थी नवागत वधू गृह में दिखाती।
कोई न और इनको तज़ के कहीं था,
सूने सभी सदन गोकुल के हुए थे।।। (2016, 13, 12)
उत्तर:
यह समवृर्णवृत्त वसन्ततिलका नामक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं और प्रत्येक चरण में एक तगण (ऽऽ|), एक भगण (ऽ||), दो जगण (|ऽ|) और अन्त में दो गुरु होते हैं। इसमें 8, 6 वर्षों पर यति होती है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
भागीरथी रूप अनूपकारी, चन्द्राननी लोचन कंजधारी।
वाणी बखानी सुख तत्व सोध्यौ, रामानुजै आनि प्रबोध बोध्यौ। (2016, 15, 14, 13, 12)
उत्तर:
यह समवर्णवृत्त इन्द्रवज्रा छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में दो तगण (ऽऽ|), एक जगण (|ऽ|) और दो गुरु होते हैं। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में कुल 11 वर्ण होते हैं।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण भी लिखिए।
बंदऊँ गुरु पद पदुम पागा, सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।
अमिय मूरिमय चूरन चारु, समन सकल भव रुज परिमारु।।
उत्तर:
यह सम मात्रिक छन्द चौपाई है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण (|ऽ|) और तगण (ऽऽ|) के प्रयोग का निषेध होता है अर्थात् चरण के अन्त में गुरु (ऽ) लघु (|) नहीं होने चाहिए। दो गुरु (ऽऽ), दो लघु (||), लघु-गुरु (|ऽ) हो सकते हैं।

प्रश्न 11.
यति का प्रयोग कहाँ किया जाता है?
उत्तर:
कभी कभी छन्द का पाठ करते समय, कहीं-कहीं क्षण भर को रुकना पड़ता है, उसे यति कहते हैं।

प्रश्न 12.
गण किसे कहते हैं? गण कितने हैं?
उत्तर:
लघु-गुरु क्रम से तीन वर्षों के समुदाय को गण कहते हैं। गणों की संख्या आठ है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण भी लिखिए। (2014, 13, 12, 11, 10)
नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन।।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीर सागर सयन।।
उत्तर:
यह अर्द्ध सम मात्रिक छन्द सोरठा है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। पहले और तीसरे चरण के अन्त में गुरु-लघु आते हैं और कहीं-कहीं तुक भी मिलती है। यह दोहा छन्द का उल्टा होता है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
लसत मंजु मुनि मण्डली, मध्य सीय रघुचन्दु।
ग्यान सभा जनु तनु धरें, भगति सच्चिदानन्दु।।
उत्तर:
यह अर्द्ध सम मात्रिक छन्द दोहा है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ, दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरणों के शुरू में जगण (|ऽ|) नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अन्त में गुरु (ऽ) और लघु (|) नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा ऊन्द है? उसका लक्षण भी लिखिए।
प्रिय पति वह मेरा प्राण-प्यारा कहाँ है?
दुःख-जलनिधि-डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आज लौ जी सकी हैं।
वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है?
उत्तर:
यह समवर्णवृत्त मालिनी छन्द है। इसमें 15 वर्ण होते हैं और इसके . प्रत्येक चरण में नगण (|||), मगण (ऽऽऽ), यगण (|ऽऽ) होते हैं और 8-7 वर्गों पर यति होती है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
चले बली पावन पादुका लै,
प्रदक्षिणा राम सियाहु को है।
गए ते नन्दीपुर बास कीन्हों,
सबन्धु श्रीरामहिं चित्त दीन्हों।।
उत्तर:
यह समवर्ण-वृत्त छन्द उपेन्द्रवज्रा है। इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं और वे जगण (|ऽ|), तगण (ऽऽ|), जगण और दो गुरु के क्रम से होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 8 हम और हमारा आदर्श

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name हम और हमारा आदर्श
Number of Questions Solved 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 8 हम और हमारा आदर्श

हम और हमारा आदर्श – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2017, 16, 14, 13, 12, 11)

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता है। | इस प्रश्न में किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ
भारत रत्न अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम अर्थात् ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को धनुषकोडी गाँव, रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ था। इनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन था, जो मछुवारों को किराए पर नाव दिया करते थे।

कलाम जी की आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम में ही पंचायत प्राथमिक विद्यालय में हुई, इसके पश्चात् इन्होंने मद्रास इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अन्तरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। स्नातक होने के पश्चात् इन्होंने हायराफ्ट परियोजना पर काम करने के लिए भारतीय रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। वर्ष 1962 में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन में आने के पश्चात् इन्होंने कई परियोजनाओं में निदेशक की भूमिका निभाई। इन्होंने एस. एल. बी. 3 के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, इसी कारण इन्हें मिसाइल मैन भी कहा गया। इसरो के निदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात्, ये वर्ष 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे, जिसके पश्चात् इन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य किया। अपने अन्तिम क्षणों में भी ये शिलांग में प्रबन्धन संस्थान में पढ़ा रहे थे। वहीं पढ़ाते हुए 27 जुलाई, 2015 में इनका निधन हो गया। इन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों से मानद (मान-प्रतिष्ठा देने वाला) उपाधियों प्राप्त होने के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा वर्ष 1981 व 1990 में क्रमशः पद्म भूषण व पद्म विभूषण से तथा 1997 से भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्यिक सेवाएँ
कलाम जी ने अपनी रचनाओं के द्वारा विद्यार्थियों में युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। इन्होंने अपने विचारों को विभिन्न पुस्तकों में समाहित किया है।

कृतियाँ
इण्डिया 2020, ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम, माई जर्नी, इग्नाइटेड माइण्डस, विंग्स ऑफ फायर, भारत की आवाज, टर्निग प्लॉइण्टेज, हम होंगे कामयाब इत्यादि।

भाषा-शैली
कलाम जी ने मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में लेखन कार्य किया है, जिसका अनुदित रूप पाठ्यक्रम में संकलित किया गया है। उनकी शैली लाक्षणिक प्रयोग से युक्त है।

योगदान
डॉ. कलाम एक बहुआयामों व्यक्तित्व के धनी थे। विज्ञान प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्क को प्रज्जवलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ-साथ वे पर्यावरण की चिन्ता भी बहुत करते हैं। डॉ. कलाम ने भारत के विकास स्तर को 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की। वे भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे।

हम और हमारा आदर्श – पाठ का सार

परीक्षा में पाठ का सार” से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता हैं। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।

नागरिकों में समृद्ध राष्ट्र की इच्छा होना
‘हम और हमारा आदर्श’ अध्याय में कलाम जी ने राष्ट्र की प्रगति के लिए स्वयं लोगों द्वारा सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन जीने की इच्छा रखने और पूर्ण करने हेतु हदय से प्रयास करने के लिए कहा है। साथ ही वे भौतिकता व यात्मिकता को परस्पर एक दूसरे का पूरक भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

प्रगति के लिए स्वयं के महत्त्व को पहचाना।
लेखक कलाम जी स्वयं की युवा छात्रों से मिलने की प्रवृत्ति पर विचार करते हुए, स्वयं के रामेश्वरम द्वीप से निकलकर जीवन में प्राप्त की गई अपनी उपलब्धियों पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। इन उपलब्धियों के मूल में वे अपनी महत्त्वाकांक्षा की प्रवृत्ति पर विचार-विमर्श करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उनके द्वारा समाज के प्रति दिए गए योगदान के अनुसार अपना मूल्यांकन करना ही महत्त्वपूर्ण था।

वे कहते हैं कि मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त सभी वस्तुओं का उपभोग करने का अधिकार है और जब तक मनुष्य के भीतर स्वयं समृद्ध भारत में जीने की इच्छा एवं विश्वास नहीं होगा, वह अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। विकसित अर्थात् जी-8 देशों के नागरिकों का समृद्ध राष्ट्र में जीने का विश्वास ही उनके विकास का रहस्य हैं।

जीवन में भौतिक वस्तुओं का महत्त्व
कलाम जी भौतिकता और आध्यात्मिकता को न तो एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं। और न ही भौतिकतावादी मानसिकता को गलत। वे स्वयं अपना उदाहरण देते हुए न्यूनतम वस्तुओं का उपभोग करने की अपनी प्रवृत्ति के विषय में बताते हैं और कहते हैं कि समृद्धि मनुष्य में सुरक्षा व विश्वास के भाव को संचारित करती है, जो उनमें स्वतन्त्र होने के भाव को पैदा करती है। कलाम जी ब्रह्माण्ड का व बगीचे में खिले फूलों का उदाहरण देते हुए प्रकृति द्वारा प्रत्येक कार्य को पूर्णता से करने के गुण को उद्धारित करते हैं। वे महर्षि अरविन्द द्वारा प्रत्येक वस्तु को ऊर्जा का अंश मानने का उदाहरण देते हुए कहते है कि आत्मा व पदार्थ सभी का अस्तित्व शीनों परस्पर जुड़े हुए हैं। अतः भौतिकता कोई बुरी चीज नहीं है।

स्वेच्छा पूर्ण कार्य ही आनन्द का साधन
कलाम जी कहते हैं कि भौतिकता को सदैव निम्न स्तरीय माना गया है और न्यूनतम में जीवन व्यतीत करने को श्रेयस्कर कहा जाता है। वे कहते हैं कि स्वयं गाँधी जी ने ऐसा जीवन व्यतीत किया, क्योंकि यह उनकी इच्छा थी। मनुष्य को सदैव अपने भीतर से उपजी इलाओं के अनुरूप जीवन शैली को अपनाना चाहिए, अनावश्यक रूप से त्याग की प्रतिमूर्ति बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि युवा छात्रों से मिलने का मूल उद्देश्य उन्हें इसी गुण से परिचित कराते हुए उन्हें सुख-सुविधाओं से पूर्ण जीवन के सपने देखने और उन्हें पूर्ण करने के लिए शुद्ध भाव से प्रयास करने के लिए प्रेरित करना है। ऐसा करने के उपरान्त ही वे अपने चारों ओर खुशियों का प्रसार कर पाएँगे।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

प्रश्न 1.
मैं खासतौर से युवा छात्रों से ही क्यों मिलता हूँ? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं अपने छात्र जीवन के दिनों के बारे में सोचने लगा। रामेश्वरम के द्वीप से बाहर निकलकर यह कितनी लम्बी यात्रा रही। पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो विश्वास नहीं होता। आखिर वह क्या था, जिसके कारण यह सम्भव हो सका? महत्त्वाकांक्षा? कई बातें मेरे दिमाग में आती हैं। मेरा ख्याल है कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि मैंने अपने योगदान के मुताबिक ही अपना मूल्य आँका। बुनियादी बात जो आपको समझनी चाहिए, वह यह है कि आप जीवन की अच्छी चीजों को पाने का हक रखते हैं, उनका जो ईश्वर की दी हुई हैं। जब तक हमारे विद्यार्थियों और युवाओं को यह भरोसा नहीं होगा कि वे विकसित भारत के नागरिक बनने के योग्य हैं, तब तक वे जिम्मेदार और ज्ञानवान नागरिक भी कैसे बन सकेंगे। विकसित देशों की समृद्धि के पीछे कोई रहस्य नहीं छिपा है। ऐतिहासिक तथ्य बस इतना है कि इन राष्ट्रों, जिन्हें जी-8 के नाम से पुकारा जाता है, के लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस विश्वास को पुख्ता किया कि मजबूत और समृद्ध देश में उन्हें अच्छा जीवन बिताना है। तब सच्चाई उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप ढल गई।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक अपने छात्र जीवन के विषय में क्यों सोचने लगता है?
उत्तर:
लेखक को युवा छात्रों से मिलना, उनसे बातें करना अत्यधिक रुचिकर लगता था। वह स्वयं की युवा छात्रों से मिलने की प्रवृत्ति पर प्रश्न अंकित करता है कि उसे यह क्यों अच्छा लगता है? और इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढते हुए वह अपने छात्र जीवन के विषय में सोचने लगता है।

(ii) लेखक के अनुसार मनुष्य जीवन में बड़ा बनने का मूल कारण क्या है?
उत्तर:
कलाम जी के अनुसार, मनुष्य का जीवन में बड़ा बनने का मूल कारण उसकी महत्त्वाकांक्षा है। मनुष्य महत्त्वाकांक्षा के बल पर ही अपने जीवन में आगे बढ़ पाता है।

(iii) किसी राष्ट्र के युवा कब तक राष्ट्र की उन्नति में अपनी भूमिका नहीं निभा सकते?
उत्तर:
किसी राष्ट्र के नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं व विद्यार्थियों में जब तक यह विश्वास नहीं होगा कि वे स्वयं विकसित राष्ट्र के नागरिक बनने के योग्य हैं, तब तक वे राष्ट्र के विकास एवं उन्नति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सकते, क्योंकि राष्ट्र के विकास के लिए उन्हें स्वयं जिम्मेदारियों को उठाते हुए अपना योगदान देना होगा।

(iv) लेखक के अनुसार विकसित देशों की समृद्धि के पीछे क्या तथ्य है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार विकसित देशों की समृद्धि के पीछे कोई रहस्य नहीं छिपा, अपितु इसके पीछे छिपा ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इन देशों के नागरिक समृद्ध राष्ट्र में जीने का विश्वास रखते हैं।

(v) ‘महत्त्वाकांक्षा एवं विद्यार्थी शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम भी लिखिए।
उत्तर:
महत्त्व + आकांक्षा = महत्त्वाकांक्षा (दीर्घ सन्धि)
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (दीर्घ सन्धि)

प्रश्न 2.
मैं यह नहीं मानता कि समृद्धि और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी हैं। या भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना कोई गलत सोच है। उदाहरण के तौर पर, मैं खुद न्यूनतम वस्तुओं को भोग करते हुए जीवन बिता रहा हूँ, लेकिन में सर्वत्र समृद्धि की कद्र करता हूँ, क्योकि यह अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो अन्ततः हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है। आप आस-पास देखेंगे, तो पाएँगे कि खुद प्रकृति भी कोई काम आधे-अधूरे मन से नहीं करती। किसी बगीचे में जाइए। मौसम में आपको फूलों की बहार देखने को मिलेगी अथवा ऊपर की तरफ ही देखें, यह ब्रह्माण्ड आपके अनन्त तक फैला दिखाई देगा, आपके यकीन से भी परे।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया हैं तथा इसके लेखक कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश ‘हम और हमारा आदर्श’ से लिया गया है। इसके लेखक ‘ए. पी. जे. अब्दुल कलाम’ हैं।।

(ii) लेखक अध्यात्म एवं भौतिकता को एक-दूसरे के समान मानने के विषय में क्या तर्क देता है।
उत्तर:
लेखक अध्यात्म एवं भौतिकता को एक-दूसरे के समान मानने के विषय में तर्क देते हैं कि समृद्धि अर्थात् धन, वैभव व सम्पन्नता को आध्यात्म के समान महत्त्व देते हुए उन्हें एक-दूसरे का विरोधी मानने से इनकार करते हैं। तथा साथ ही वे भौतिकतावादी मानसिकता रखने वालों को गलत मानने के पक्षधर नहीं हैं।

(iii) भौतिक समृद्धि के महत्व के विषय में लेखक का मत स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक मनुष्य के जीवन में धन-वैभव, सम्पन्नता आदि को महत्वपूर्ण मानते हुए स्पष्ट करते हैं कि भौतिक सुख-सुविधाएँ मनुष्य में सुरक्षा एवं विश्वास का भायं उत्पन्न करती हैं, जो उनकी स्वतन्त्रता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं तथा मनुष्य में आत्मबल का संचार करती हैं।

(iv) लेखक के अनुसार मनुष्य को जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक वस्तुओं को किस प्रकार स्वीकार करना चाहिए?
उत्तर:
लेखक के अनुसार जिस प्रकार प्रकृति अपने सभी कार्य पूरे समभाव से करती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन में वस्तुओं को भौतिक एवं आध्यामिक दो वर्गों में विभाजित नहीं करना चाहिए, अपितु उन्हें सहज माव से एक स्वरूप स्वीकारते हुए जीवन को जीना चाहिए।

(v) ‘समृद्धि’ शब्द के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
समृद्धि सम्पन्नता, धन।

प्रश्न 3.
न्यूनतम में गुजारा करने और जीवन बिताने में भी निश्चित रूप से कोई हर्ज नहीं है। महात्मा गाँधी ने ऐसा ही जीवन जिया था, लेकिन जैसा कि उनके साथ था, आपके मामले में भी यह आपकी पसन्द पर निर्भर करता है। आपकी ऐसी जीवन-शैली इसलिए है, क्योंकि इससे वे तमाम जरूरतें पूरी होती हैं, जो आपके भीतर की गहराइयों से उपजी होती हैं, लेकिन त्याग की प्रतिमूर्ति बनना और जोर-जबरदस्ती से चुनने-सहने का गुणगान करना अलग बातें हैं।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार किस प्रकार का जीवन व्यतीत करने में परेशानी नहीं है?
उत्तर:
लेखक स्पष्ट करते हैं कि भौतिकता को सदैव निम्न स्तरीय माना गया और न्यूनतम में जीवन व्यतीत करने को श्रेयस्कर कहा जाता है अर्थात् यदि हमें कम में भी जीवन व्यतीत करने को कहा जाए, तो इसमें कोई परेशानी नहीं है।

(ii) लेखक महात्मा गाँधी के जीवन का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट करना चाहता है ?
उत्तर:
लेखक महात्मा गाँधी के जीवन का उदाहरण देकर यह स्पष्ट करना चाहता है। कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्हें दूसरों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने हेतु इच्छा के विपरीत त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं बनना चाहिए।

(iii) मनुष्य को सदैव किस प्रकार की जीवन-शैली को अपनाना चाहिए?
उत्तर:
मनुष्य को सदैव अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए, क्योंकि इससे हमारी वे सारी जरूरतें पूरी होती हैं, जो स्वयं हमारे अन्तर्मन की गहराइयों से निःसृत होती हैं अर्थात् मनुष्य को सदैव अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीवन-शैली को अपनाना चाहिए। अनावश्यक रूप से त्याग करने का प्रयास ठीक नहीं होता।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक भौतिकता या भौतिकता रहित जीवन दोनों में से किसी एक को महत्व न देकर यह सन्देश देना चाहते हैं कि हमें अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए।

(v) ‘हज’ एवं ‘तमाम’ शब्दों का पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
हर्ज-हानि, नुकसान; तमाम-सारा, सम्पूर्ण

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