UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 4 अशोक के फूल

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name अशोक के फूल
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 4 अशोक के फूल

अशोक के फूल – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2017, 16, 14, 13, 12, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता है। इस प्रश्न में किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन-परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ
हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक एवं भारतीय संस्कृति के युगीन व्याख्याता आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म वर्ष 1907 में बलिया जिले के ‘दूबे का छपरा’ नामक ग्राम में हुआ था। संस्कृत एवं ज्योतिष का ज्ञान इन्हें उत्तराधिकार में अपने पिता पण्डित अनमोल दूबे से प्राप्त हुआ। वर्ष 1930 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद वर्ष 1940 से वर्ष 1950 तक ये शान्ति निकेतन में हिन्दी भवन के निदेशक के रूप में रहे। विस्तृत स्वाध्याय एवं साहित्य सृजन का शिलान्यास यहीं हुआ। वर्ष 1950 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने। वर्ष 1980 से वर्ष 1966 तक पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने। वर्ष 1967 में इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। अनेक गुरुतर दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने वर्ष 1979 में रोग-शय्या पर ही चिरनिद्रा लीं।

साहित्यिक सेवाएँ
आधुनिक युग के गद्यकारों में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी गद्य के धोत्र में इनकी साहित्यिक सेवाओं का आकलन निम्नवत् किया जा सकता है–

  1. निबन्धकार के रूप में आचार्य द्विवेदी के निबन्धों में जहाँ साहित्य और संस्कृति की अखण्ड धारा प्रवाहित होती है, वहीं प्रतिदिन के जीवन की विविध गतिविधियों, क्रिया-व्यापारों, अनुभूतियों आदि का चित्रण भी अत्यन्त सजीवता और मार्मिकता के साथ हुआ है।
  2. आलोचक के रूप में आलोचनात्मक साहित्य के सृजन की दृष्टि से द्विवेदी जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी आलोचनात्मक कृतियों में विद्वत्ता और अध्ययनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। ‘सूर-साहित्य’ उनकी प्रारम्भिक आलोचनात्मक कृति है।
  3. उपन्यासकार के रूप में द्विवेदी जी ने चार महत्त्वपूर्ण उपन्यासों की रचना की है। ये हैं-‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचन्द्र लेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’। सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित ये उपन्यास द्विवेदी जी की गम्भीर विचार-शक्ति के प्रमाण
  4. ललित निबन्धकार के रूप में द्विवेदी जी ने ललित निबन्ध के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण लेखन कार्य किए हैं। हिन्दी के ललित निबन्ध को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले निबन्धकार के रूप में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अग्रणी हैं। निश्चय ही ललित निबन्ध के क्षेत्र में वे युग-प्रवर्तक लेखक रहे हैं।

कृतियाँ
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की, जिनको निम्नलिखित वर्गों में प्रस्तुत किया गया है-

  1. निबन्ध संग्रह अशोक के फूल, कुटज, विचार-प्रवाह, विचार और वितर्क, आलोक पर्व, कल्पलता।
  2. आलोचना साहित्य सूर-साहित्य, कालिदास की लालित्य योजना, कबीर, साहित्य-सहचर, साहित्य का मर्म।
  3. इतिहास हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, हिन्दी साहित्यः उद्भव और विकास
  4. उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा, अरुचन्द्र लेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा।
  5. सम्पादन नाथ-सिद्धों की बानियाँ, संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, सन्देश-रासका।
  6. अनूदित रचनाएँ प्रबन्ध चिन्तामणि, पुरातन प्रबन्ध संग्रह, प्रबन्धकोश, विश्व परिचय, लाल कनेर, मेरा बचपन आदि।

भाषा-शैली
द्विवेदी जी ने अपने साहित्य में संस्कृतनिष्ट, साहित्यिक तथा सरल भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने संस्कृत के साथ-साथ अंग्रेजी, उर्दू तथा फारसी भाषा के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी किया है।

इनकी भाषा में मुहावरों का प्रयोग प्रायः कम हुआ है। इस प्रकार द्विवेदी जी की भाषा शुद्ध, परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ी बोली है। उनकी गद्य-शैली प्रौद एवं गम्भीर है। इन्होंने विवेचनात्मक, गवेषणात्मक, आलोचनात्मक, भावात्मक तथा आत्मपरक शैलियों का प्रयोग अपने साहित्य में किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी की कृतियाँ हिन्दी साहित्य की शाश्वत निधि हैं। उनके निबन्धों एवं आलोचनाओं में उच्च कोटि की विचारात्मक क्षमता के दर्शन होते हैं। हिन्दी साहित्य जगत में उन्हें एक विद्वान् समालोचक, निबन्धकार एवं आत्मकथा लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है। वस्तुतः वे एक महान् साहित्यकार थे। आधुनिक युग के गद्यकारों में उनका विशिष्ट स्थान है।

अशोक के फूल – पाठ का सार

परीक्षा में ‘पाठ का सार’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।

सामन्तीय सभ्यता एवं परिष्कृत रुचि का प्रतीक : अशोक
‘अशोक के फूल’ नामक निबन्ध आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सामाजिक एवं सांस्कृतिक चिन्तन की परिणति है। भारतीय परम्परा में अशोक के फूल दो प्रकार के होते हैं-श्वेत एवं लाल पुष्प। श्वेत पुष्प तान्त्रिक क्रियाओं की सिद्धि के लिए उपयोगी हैं, जबकि लाल पुष्प स्मृतिवर्धक माना जाता है। द्विवेदी जी का मानना है कि मनोहर, हस्यमय एवं अलंकारमय दिखने वाला अशोक का वृक्ष विशाल सामन्ती सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक है। यही कारण है कि सामन्ती व्यवस्था के ढह जाने के साथ-साथ अशोक के वृक्ष की महिमा एवं गरिमा दोनों नष्ट होने लगी। इससे अशोक के वृक्ष का सामाजिक महत्त्व भी कम होने लगा।

अशोक वृक्ष की पूजा: गन्धर्वो एवं यक्षों की देन
प्राचीन साहित्य के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि अशोक के वृक्ष में कन्दर्प देवताओं का वास है। वास्तव में पूजा अशोक की नहीं, बल्कि उसके अधिष्ठाता कन्दर्प देवता की होती थी। इसे ही ‘मदनोत्सव’ कहते थे। लेखक का मानना है कि अशोक के स्तवकों में वह मादकता आज भी है। भारतवर्ष का सुवर्ण युग इस पुष्प के प्रत्येक दल में लहरा रहा है।

मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा
लेखक का मानना है कि दुनिया की सारी चीजें मिलावट से पूर्ण हैं। कोई भी वस्तु अपने विशुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद, केवल एक ही चीज विशुद्ध है। और वह है मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा।

वह गंगा की अबाधित-अनाहत धारा के समान सबकुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है। मानव-जाति की दुर्दम, निर्मम धारा के हजारों वर्षों का रूप देखने से स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य की जीवन-शक्ति बड़ी ही निर्मम हैं, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही हैं। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती हुई यह जीवन धारा आगे बदी है।

अशोक के वृक्ष की मौज
लेखक कहता है कि अशोक का वृक्ष आज भी अपनी उसी स्थिति में विद्यमान है, जिसमें वह दो हजार वर्ष पहले था। उसका कहीं से भी कुछ नहीं बिगड़ा है। वह उसी मस्ती में हँस रहा है, वह उसी मस्ती में झूम रहा है। इससे सभी को रस यानी आनन्द लेने की शिक्षा लेनी चाहिए। उदास या निराश होना व्यर्थ है।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर::: देने होंगे।

प्रश्न 1.
पुष्पित अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है। इसलिए नहीं कि सुन्दर वस्तुओं को हतभाग्य समझने में मुझे कोई विशेष रस मिलता है। कुछ लोगों को मिलता है। वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अन्तिम मुहूर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृष्टि इतनी दूर तक नहीं जाती। फिर भी मेरा मन इस फूल को देखकर उदास हो जाता है। असली कारण तो मेरे अन्तर्यामी ही जानते होंगे, कुछ थोड़ा-सा में भी अनुमान कर सकता हूँ।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) किस पुष्प को देखकर लेखक उदास हो जाते हैं?
उत्तर:
अशोक के खिले हुए पुष्य को देखकर लेखक उदास हो जाते हैं। वे उसकी सुन्दरता के कारण नहीं, बल्कि उसकी कमियों का अन्वेषण कर दुःखी हो रहे हैं।

(ii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या बताना चाहता है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक बताना चाहता है कि संसार में सुन्दर वस्तुओं को दुर्भाग्यशाली या कम समय के लिए भाग्यवान समझकर ईष्र्थावश उससे आनन्द की प्राप्ति करने वाले लोगों की कमी नहीं है।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने स्वयं के विषय में क्या कहा है?
उत्तर:
लेखक ने स्वयं को अन्य लोगों से कम दूरदर्शी बताकर अपनी उदारता एवं महानता का परिचय दिया है। लेखक अशोक के फूल के सम्बन्ध में अपनी मनः स्थिति एवं सोच को स्पष्ट कर रहा है।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश के लेखक व पाठ का नाम स्पष्ट कीजिए। लेखक ने इस पाठ में किस शैली का प्रयोग किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश के लेखक हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हैं तथा पाठ का नाम अशोक के फूल है। इस निबन्ध में लेखक ने वर्णनात्मक, विवेचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है।

(v) निम्न शब्दों के अर्थ लिखिए।
उत्तर:
हतभाग्य – भाग्यहीन, अभागा दूरदर्शी – भविष्य की घटनाओं को समझने वाला।

प्रश्न 2.
अशोक को जो सम्मान कालिदास से मिला, वह अपूर्व था। सुन्दरियों के आसिंजनकारी नूपुरवाले चरणों के मृदु आघात से वह फूलता था, कोमल कपोलों पर कर्णावतंस के रूप में झूलता था और चंचल नील अलकों की अचंचल शोभा को सौ गुना बढ़ा देता था। वह महादेव के मन में क्षोभ पैदा करता था, मर्यादा पुरुषोत्तम के चित्त में सीता का भ्रम पैदा करता था और मनोजन्मा देवता के एक इशारे पर कन्धों पर से ही फूट उठता था।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) संस्कृत के किस कवि ने अशोक को सम्मानित किया?
उत्तर:
संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अशोक को जो सम्मान दिया. वह अपूर्व था। उससे पहले किसी भी कवि ने अशोक का वर्णन नहीं किया।

(ii) किस फूल की सुन्दरता के कारण सुन्दरियाँ उन्हें अपने कानों का आभूषण बनाती हैं?
उत्तर:
अशोक के फूलों की सुन्दरता के कारण सुन्दरियाँ उन्हें अपने कानों का आभूषण बनाती हैं। यह कर्णफूल जब उनके गलों पर झूलता है तो वे और अधिक सुन्दर लगने लगती हैं।

(iii) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का उददेश्य क्या हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने अशोक के फूल का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। यहाँ लेखक कहना चाहता है कि साहित्यकारों में मुख्य रूप से संरकृत के महान् कवि कालिदास ने अशोक के फूल का जो मादकतापूर्ण वर्णन किया है, ऐसा किसी अन्य ने नहीं किया है।

(iv) अशोक पर फूल आने के सम्बन्ध में लेखक को क्या विचार है?
उत्तर:
लेखक का विचार है कि अशोक पर तभी पुष्प आते हैं जब कोई अत्यन्त सुन्दर युवती अपने कोमल और संगीतमय नूपुरवाले चरणों से उस पर प्रहार करती है।

(v) निम्न शब्दों का अर्थ लिखिए – आसिजनकारी तथा कर्णावतंस।
उत्तर:
आसिंजनकारी – अनुरागोत्पादक
कर्णावतंस – कर्णफूल।

प्रश्न 3.
कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधा। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश में किस प्रसंग की चर्चा की गई है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक आचार्य द्विवेदी जी ने रचनाकारों अर्थात् साहित्यकारों द्वारा अशोक के फूल को भूल जाने की आलोचना की है।

(ii) लेखक ने गद्यांश में किस प्रकार के लोगों को स्वार्थी कहा है?
उत्तर: मस्त गद्यांश में लेखक आचार्य द्विवेदी ने रचनाकारों अर्थात् साहित्यकारों द्वारा ‘अशोक के फूल’ के भूल जाने की आलोचना की है कि यह संसार बड़ा स्वार्थी है। यह केवल उन्हीं बातों को याद रखता है जिससे उसके स्वार्थ की सिद्धि होती है।

(iii) “सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।” से लेखक का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
लेखक कहना चाहता है कि यह संसार स्वार्थी व्यक्तियों से भरा पड़ा है। यह हर व्यक्ति अपने ही स्वार्थ को साधने में लगा हुआ है। उसे अपने ही स्वार्थ को सिद्ध करने से फुरसत नहीं है, तो वह अशोक के फूल की क्या परवाह करेगा, जो शायद उसके लिए किसी काम का नहीं है।

(iv) ‘फूल’ शब्द के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
फूल- पुष्य, कुसुम, प्रसून आदि।

(v) स्वार्थ शब्द का विलोम लिखिए।
उत्तर:
स्वार्थ शब्द का विलोम निःस्वार्थ होगा।

प्रश्न 4.
मुझे मानव-जाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती सी जीवन-धारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नई शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है। सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। शुद्ध केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा (जीने की इच्छा) है। वह गंगा की अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र हैं। सभ्यता और संस्कृति का मोह क्षण-भर बाधा उपस्थित करता है, धर्माचार का संस्कार थोड़ी देर तक इस धारा से टक्कर लेता है, पर इस दुर्दम धारा में सब कुछ बह जाता है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने किस ओर संकेत किया हैं?
उत्तर:
मानव सभ्यता एक प्रवाहमान धारा के समान है। हमारी सभ्यता और संस्कृति भी अनेक सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का मिला-जुला रूप है। इन्हीं तथ्यों की ओर लेखक ने संकेत किया है।

(ii) मानव जाति किस मोह को रौंदती चली आ रही है?
उत्तर:
मनुष्य की जीवन शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही हैं। अब तक न जाने उसने कितनी जातियों एवं संस्कृतियों को अपने पीछे छोड़ दिया है।

(iii) मानव का व्यवहार किस प्रकार परिवर्तित होता है?
उत्तर:
मानव कभी भी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट नहीं रहता। अतः हमेशा ही उसके व्यवहार एवं संस्कृति में परिवर्तन होता रहता है। इसके लिए वह हमेशा प्रयत्नशील रहा है।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किन बातों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक मनुष्य की जीने की इच्छा के बारे में ध्यान आकृष्ट कराना चाहता है। वह बताना चाहता है कि मनुष्य की जीने की इच्छा इतनी प्रबल है कि अब तक न जाने कितनी सभ्यताओं और संस्कृतियों का उत्थान और पतन हुआ है। न जाने कितनी जातियाँ और संस्कृतियाँ पनपी और नष्ट हो गईं, परन्तु आज तक जो शुद्ध और जीवित है, वह है मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा अर्थात् उसकी जीने की इच्छा।

(v) ‘दुर्दम’ और ‘निर्मम’ शब्दों में से उपसर्ग और मूल शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
दुर्दम = ‘दुर्’ (उपसर्ग), दम (मूल शब्द)
निर्मम = ‘निर् ‘ (उपसर्ग), मम (मूल शब्द)

प्रश्न 5.
आज जिसे हम बहुमूल्य संस्कृति मान रहे हैं, वह क्या ऐसी ही बनी रहेगी? सम्राटों-सामन्तों ने जिस आचार-निष्ठा को इतना मोहक और मादक रूप दिया था, वह लुप्त हो गई; धर्माचार्यों ने जिस ज्ञान और वैराग्य को इतना महार्घ समझा था, वह लुप्त हो गया; मध्ययुग के मुसलमान रईसों के अनुकरण पर जो रस-राशि उमड़ी थी, वह वाष्प की भाँति उड़ गई, क्या यह मध्ययुग के कंकाल में लिखा हुआ व्यावसायिक युग को कमले ऐसा ही बना रहेगा? महाकाल के प्रत्येक पदाघात में धरती धसकेगी। उसके कुंठनृत्य की प्रत्येक चारिका कुछ-न-कुछ लपेटकर ले जाएगी। सब बदलेगा, सब विकृत होगा—सब नवीन बनेगा।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का उद्देश्य यह बताना है कि सभ्यता एवं संस्कृति निरन्तर परिवर्तनशील हैं। उसे समय के प्रहार से कोई नहीं बच सकता।

(ii) धर्माचार्यों के महार्घ ज्ञान-वैराग्य का क्या हुआ?
उत्तर:
लेखक कहता है कि संसार का नियम है, जो आज जिस रूप में है, कल वह अवश्य नए रूप में परिवर्तित होगा। अतः धर्म के आचार्यों ने जिस ज्ञान और वैराग्य को कीमती व प्रतिष्ठित समझा था, आज उसका अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

(iii) मध्ययुगीन रस-राशि से लेखक का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मध्ययुगीन रस-राशि से लेखक का तात्पर्य मध्ययुग में मुस्लिम शासकों के अनुकरण से समाज में उमड़ी रसिक संस्कृति से है। लेखक कहता है कि वह संस्कृति भी भाप बनकर कहाँ लुप्त हो गई अर्थात् समाप्त हो गई।

(iv) निम्न शब्दों का अर्थ लिखिए मोहक, विकृत, बहुमूल्य।
उत्तर:
मोहक – आकर्षक, मोहने वाला
विकृत – खण्डित
बहुमूल्य – कीमती

(v) निम्न शब्दों के विलोम लिखिए – वैराग्य, नवीन।
उत्तर:
वैराग्य – अनुराग
नवीन – प्राचीन

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विभक्ति

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Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name विभक्ति
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विभक्ति

परिभाषा
हिन्दी भाषा में कारकों में लगने वाले चिह्नों का प्रयोग किया जाता है। संस्कृत भाषा में इसके स्थान पर विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है। विभक्तियों की कुल संख्या सात है।

विभिक्त के भेद
विभक्ति दो प्रकार की होती है

1. कारक विभक्ति जो विभक्ति हिन्दी के वाक्य में प्रयोग किए गए कारकों के चिह्नों के अनुसार लगती हैं, उसे कारक विभवित कहते हैं, जैसे-सा लतां पश्यति/वह लता को देखती हैं। इस वाक्य में ‘वह’ देखने वाली है। अतः ‘वह’ का प्रयोग कर्ता कारक एकवचन में ‘सा’ हुआ। इस वाक्य का दूसरा शब्द ‘लता को’ है। यहाँ कारक का चिह्न को ।। ‘को’ यह चिह्न कर्म कारक का है। इसमें द्वितीया विभक्ति है। अतः ‘लता’ शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन में लताशब्द प्रयोग किया गया है। यही कारक विभक्ति होती हैं।

2. उपपद विभक्ति ‘उपपद’ यह शब्द दो शब्दों उप + पद के मेल से बना है। ‘उप’ का अर्थ ‘योग’ अथवा ‘पास’ होता है और पद का अर्थ शब्द होता है। इस प्रकार जो विभक्ति कारक के चिह्न के अनुसार न लगकर किसी शब्द या धातु के योग में प्रयोग होती है, उसे ‘उपपद’ विभक्ति कहते हैं; जैसे-पुत्र माता के साथ जाता है। पुत्रः मात्रा सह गच्छति।

इस वाक्य में कारक के चिह्न को देखा जाए तो का, के, की षष्ठी विभक्ति के चिह्न हैं। इस आधार पर इस वाक्य के ‘माता’ शब्द में षष्ठी विभक्ति लगक ‘मातः’ रूप होना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि संस्कृत में ‘के साथ ‘सह’ शब्द का प्रयोग किया जाता है और ‘उपपद’ विभक्ति के नियम के अनुसार ‘सह’ शब्द के योग में जिसके साथ कोई क्रिया की जाती है (जाने की, पढ्ने आदि की) उसमें तृतीया विभक्ति होती है। अतः ‘माता’ में ‘सह’ शब्द के साथ तृतीया विभक्ति होकर ‘मात्रा’ रूप बना। यही ‘उपपद’ विभक्ति है।

1. प्रथमा विभक्ति
(सूत्र-प्रातिपदिकार्थ-लिङ्ग-परिमाण-वचनमात्रे प्रथमा) प्रातिपदिकार्थमात्र में, लिंगमात्र की अधिकता में, परिमाणमात्र (मापमात्र) में तथा वचनमात्र (संख्यामात्र) में प्रथमा विभूति होती है। प्रातिपदिकार्थ से सम्बोधन अर्थ की अधिकता में भी प्रथमा विभयित होती हैं।

उदाहरण
प्रातिपदिकार्थमात्र उच्चैः (ऊँचा), नीचैः (नीचा), कृष्णः (कृष्ण), श्री (लक्ष्मी), ज्ञानम् (ज्ञान, जानना।।
लिंगमात्र तटः, तटी, तटम्।।
परिमाणमात्र द्रोणो व्रीहिः (द्रोण परिमाण से मापा हुआ धन)।
संख्यामात्र एक, द्वौ बहवः।
सम्बोधन में हे राम! हे अर्जुन!

2. द्वितीय विभक्ति
(सूत्र-अमितः परितः समय निकषा-हा-प्रतियोगेऽपि) अभितः (चारों ओर), परितः | (सब और), निकषा (समीप), हा, प्रति (और, तरफ) के साथ द्वितीया विभक्ति होती है।। उदाहरण
मंजरी विद्यालयं प्रति याति। (2018)
विद्यालयं परितः क्षेत्राणि सन्ति। (2018)
गृहं परितः उद्यानम् अस्ति। (2018)
मम ग्रामम् निकषा नदी वहति (2017)
बिलग्रामं निकषा गंगा प्रवहति (2016)
विद्यालयम् परितः (2016)
ग्रामम् परितः क्षेत्राणि सन्ति (2016)
कार्यालयम् अभितः भवनानि सन्ति (2016)
ग्रामम् अमितः वृक्षा सन्ति (2016)
विद्यालयं निकषा जलाशयः अस्ति। (2017, 16, 13, 12, 10)
ग्रामम् समया नदी अस्ति।   (2013, 10)
गुरु शिष्यान् प्रति कृपालु अस्ति।   (2014, 10)
ग्रामं परितः उपवनानि सन्ति।   (2014, 10)
नदी अभितः क्षेत्राणि सन्ति।   (2014)
विद्यालयं उभयतः हरिताः वृक्षाः सन्ति।   (2011, 10)
ग्रामं अभितः वृक्षाः सन्ति।   (2014, 12, 11)
हा ! कृष्णाभक्तम्।
ग्रामं निकषा नदी वहति।   (2018, 10)
ग्रामं निकषा वाटिका अस्ति।   (2010)
पुष्पं परितः भ्रमराः सन्ति।
वणिक धनं प्रति आसक्तः अस्ति।
माधवी विद्यालयं प्रति याति।
कूपं परितः जनाः तिष्ठन्ति।   (2012)
बुभुक्षितं न प्रति भाति किञ्चित्।
नदीं समया पशवः सन्ति।
विद्यालयं परितः वनम् अस्ति।   (2011)
विद्यालयं परितः उद्यान्नमस्ति।   (2018, 13, 10)
आश्रमम् अभितः वनम् अस्ति।   (2011)
लंकाम् निकषा।
हा! दुष्टम्।   (2012)
तडागम् परितः वृक्षाः सन्ति।
राधा नगरं प्रति गछति।   (2011)
सीता भवनं प्रति गच्छति।
कृष्णं परितः गावः सन्ति।   (2013)
मन्दिरम् निकषा वाटिका अस्ति।
साण्डी दुर्गम् अमितः परिखा अस्ति।
हा! शठम्।। हा! हा! गताः किल वनम्।
शिक्षकः कक्षाम् प्रति गच्छति।   (2015)

3. तृतीया विभक्ति
(सूत्र 1 येनाङ्गविकारः) शरीर के अंगों में विकृति दिखाई पड़ने पर विकृत अंग के वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण
इयं बालिका पार्दन खजः अस्ति।   (2018)
सः कर्णेन बधिरः अस्ति।   (2018)
सुशीलाः कर्णाभ्याम् बधिशः अस्ति।   (2018)
भिक्षुकः कर्णेन बधिरः अस्ति।   (2018)
उपाध्यायः छात्रैः समं स्नाति।   (2018)
मोहनः कर्णाश्याम बधिरः अस्ति   (2017)
सः पार्दन खः   (2016)
दिलीपः शिरसा खल्वाटः   (2016)
अक्ष्णा काणः   (2016)
नेत्रेण काण:   (2016)
सः पादेन खञ्जः अस्ति।   (2018, 16, 15)
भिक्षुकः पादेन खजः अस्ति।   (2017, 16, 15)
भिक्षुकः नेत्रेण काणः अस्ति।   (2014)
सः शिरसा खल्वाटः अस्ति।   (2018, 14, 13, 12, 10)
सुरेशः शिरसा खल्वार्टः अस्ति।   (2015)
मन्थरा कट्या कुब्ज़ा आसीत्।   (2013)
दिनेशः पादेन खजः अस्ति।   (2013, 12, 11, 10)
देवदतः अक्ष्णाः काणः।     (204, 13, 10)
राजकुमारः कर्णेन वधिरः। (2012, 11, 10)
मोहनः शिरसा खल्वाटोऽस्ति।   (2012)
गिरिधरः कर्णेन वधिरः अस्ति।   (2012)
अयं छात्र पादेन खञ्जः अस्ति।
सुरेशः पृष्ठेन कुब्जः अस्ति।
सा वृद्धा कर्णाभ्याम् बघिरा अस्ति।
रमेशः नेत्रेण काणः।।   (2013, 12, 11, 10)
कट्या वक्रः   (2016)

(सूत्र 2 सहयुक्तेऽप्रधाने) सह, साकम्, सार्धम्, समम् के साथ वाले शब्दों में तृतीया विभक्ति होती हैं।
उदाहरण
छात्रा; अध्यापकैन सह क्रीडन्ति   (2016)
अहमपि त्वया साधं यास्यामि   (2016)
रामेण सह सीता वनं अगच्छत्।   (2015)
माता पुत्रेण साकं श्वः आगमिष्यति।   (2014, 12, 11)
सः बालिकाभिः सह कन्दुकं क्रीडति।   (2010)
गुरुणा सह शिष्यः अपि आगच्छति।   (2013, 12)
सः पुत्रेण सह आगतः।   (2011)
रामेण सह मोहनः गच्छति।   (2014)
रामः लक्ष्मणेन सह वनम् अगच्छत्।   (2012)
पित्रा सह पुत्रः गच्छति।   (2014)
पुत्रेण सह पिता गच्छति।   (2013, 12, 11)
बालिकाभिः सह जननी गृहं गच्छति।   (2010)
सः मया सह कदापि न गच्छति।
पुत्री मात्रा सह आपणं गच्छति।   (2010)
हरिणा सह राधा नृत्यति।   (2013)
शिक्षकैः समम्।
लक्ष्मणोऽपि रामेण सह वनम् गतवान्।

(सूत्र 3 प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्) प्रकृति (स्वभाव) आदि क्रिया-विशेषण शब्दों में तृतीया वि-भक्ति होती है। उदाहरण-
अस्माकं प्रधानाचार्यः प्रकृत्या सज्जनः अस्ति।   (2011)
देवदत्तः जलैन मुखं प्रक्षालयति।   (2011)
प्रकृत्या साधुः।

4. चतुर्थी विभक्ति
(सूत्र-नमः स्वरितस्वाहास्वधाऽलंवषयोगाच्य) नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम्, वषट् शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण
खलाः सदा सज्जनेभ्यः असूयन्ति।   (2018)
विष्णवे नमः।   (2018)
प्रजाभ्य स्वस्ति।   (2018)
हनुमते नमः सीतायै नमः   (2017, 16)
श्री गुरवे नमः कृष्णाय नमः   (2016)
दानार्थे चतुर्थी   (2016)
माता पुत्राय फलानि यच्छन्ति   (2016)
श्री गणेशाय नमः।   (2018, 15, 14, 13, 11, 10)
इन्द्राय वषट्।   (2013, 10)
आग्नये स्वाहा।   (2014, 12, 10)
रामाय नमः।   (2014, 12, 11, 10)
कृष्णाय नमः।   (2016, 14, 12, 11, 10)
गुरुवे नमः।   (2017, 16, 12)
पितृभ्यः स्वधा।   (2013, 11)
प्रजाभ्यः स्वस्ति।   (2013, 12, 11)
दैत्येभ्यः हरिः अलम्।
स्वस्ति तुम्यम्।   (2012)
नमो भगवते वासुदेवाय।   (2013, 12, 10)
इन्द्राय स्वाहा।   (2013, 12, 11)
तस्मै श्रीगुरुवे नमः।   (2012)
देवेभ्यः स्वाहा।
राधावल्लभाय नमः।   (2011)
पुत्राय स्वस्ति।   (2013)
अलं मल्लो मल्लाया
सूर्याय स्वाहा।
स्वस्ति भवते।
गुरुभ्यः नमः।   (2011)
हनुमते नमः।   (2014)
दुर्गादेव्यै नमः।
नमः शिवाय।
वाह्मणाय नमः।
नाः व्यासाय।
गणपतये स्वाहा।   (2012, 11)
दुग्धं बालकाय अस्ति।
तस्मै स्वधा।
हरये नमः।

5. पञ्चमी विभक्ति
(सूत्र ध्रुवमपायेऽपादानम्) किसी वस्तु का ध्रुव (निश्चित) वस्तु से स्थायी अलगाव अपादान कहलाता है। ‘अपादाने पञ्चमी’ सूत्रानुसार अपादान में पञ्चमी विभक्ति होती है।
उदाहरण
सः कूपात जलम आनयति।   (2018)
सः अद्य सौपानात् अपतत्।   (2018)
वृक्षात् फलानि पतन्ति।   (2014)
वृक्षात् फलं पतति।।   (2014)
वृक्षात् पतितं फलं आनेय।
दिनेशः विद्यालयात् आगच्छति।

6. षष्ठी विभक्ति
(सूत्र षष्ठी शेषे) कारक एवं प्रातिपदिकार्थ से भिन्न स्वस्यामिभाव आदि सम्बन्ध ‘शेष’ होने पर धष्ठी विभक्ति होती हैं।
उदाहरण
कवीनां कालिदासः श्रेष्ठ   (2018)
सुग्रीवः रामस्य सखा आसीत्।   (2016)
रामायणस्य कथा   (2016)
रामस्य गृहं अस्ति।   (2015)
कृष्णस्य पिता वासुदेवः।   (2014, 11)
सुदामा कृष्णस्य मित्रं आसीत्।   (2013)
छात्रस्य पुस्तकम् अस्ति।।   (2014)
सुवर्णस्य आभूषणम् बहुमूल्यम् अस्ति।   (2015)
सुग्रीवस्य भ्राता बालिः आसीत्।   (2010)
गङ्गायाः उदकम् ।।   (2013)
राज्ञः पुत्रः।।

7. सप्तमी विभक्ति/घष्ठी विभक्ति
(सूत्र 1 यतश्च निर्धारणम्) किसी वस्तु की अपने समुदाय से किसी विशेषण द्वारा कोई विशिष्टता दिखाई जाने पर समुदायवाचक शब्द में घष्ठी अथवा सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण
छत्रेषु रामः श्रेष्ठः।।   (2018)
छात्रासु मंजरी श्रेष्ठा   (2016)
नगरेषु प्रयागः श्रेष्ठ अस्ति।  (2016)
छात्रेषु रामः श्रेष्ठतम्ः अस्ति।
छात्रेषु आशीष श्रेष्ठः।
बालकेषु अरविन्दः श्रेष्ठः।।   (2014, 13, 12, 11, 10)
छात्रासु रत्ना श्रेष्ठा।   (2010)
पुस्तकेषु गीता श्रेष्ठा।   (2017)
कविषु कालिदासः श्रेष्ठः।
काव्येषु नाटकं रम्यम्।   (2014, 12)
गवां वा कृष्णा बहुक्षीरा।   (2014, 12)
रित्सु गङ्गा श्रेष्ठा।   (2011)
बालिकासु लता श्रेष्ठा।   (2014)
छात्रेषु मोहनः बुद्धिमान् अस्ति।   (2011)
ललिताः बालिकानां श्रेष्ठा अस्ति।   (2012)
गवां कपिला श्रेष्ठा।   (2011)
छात्राणां कृष्णः पटुः।
छात्रेषु अनिलः श्रेष्ठः।
छात्रेषु अरविन्दः श्रेष्ठः।   (2017)
छात्राणां वा मैत्रः पटुः।   (2010)
रामः सर्वेषां श्रेष्ठः।
दिलीपः नरेषु श्रेष्ठः आसीत्।
अश्वेषु श्वेतः श्रेष्ठः।

(सूत्र 2 सप्तम्यधिकरणे च) अधिकरण (कारक) में सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण
पात्रे जलम् अस्ति। (2014)

बहविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित में रेखांकित पदों में विभक्ति चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
अहं गृहं गच्छामि।।
(क) प्रथमा
(ख) तृतीया
(ग) चतुर्थी
(घ) द्वितीया

प्रश्न2.
वृक्षात पत्राणि पतन्ति।
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) द्वितीया
(घ) चतुर्थी

प्रश्न 3.
व्याधः मृगं शरेण अघ्नत्।।
(क) द्वितीया
(ख) सप्तमी
(ग) चतुर्थी
(घ) तृतीया

प्रश्न 4.
बालकाय मोदकं देहि।।
(क) तृतीया
(ख) चतुर्थी
(ग) पञ्चमी
(घ) षष्ठी

प्रश्न 5.
सः हस्तेन पत्रं लिखति।।
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) चतुर्थी।
(घ) पञ्चमी

प्रश्न 6.
बालिका उद्यानात पुष्पाणि आनयति।
(क) षष्ठी
(ख) सप्तमी
(ग) चतुर्थी
(घ) पञ्चमी

प्रश्न 7.
रामः पुस्तकं पठति।
(क) प्रथमा
(ख) तृतीया
(ग) षष्ठी
(घ) सप्तमी

प्रश्न 8.
इयं रामस्य पुस्तकम् अस्ति।
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) पञ्चमी

प्रश्न 9.
अयोध्यायाः नृप दशरथः आसीत्।
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) षष्ठीं
(घ) सप्तमी

प्रश्न 10.
पुस्तकं काष्ठपटले अस्ति।
(क) द्वितीया
(ख) तृतीया
(ग) सप्तमी
(घ) षष्ठी

प्रश्न 11.
रमायाः भ्राता विनयः तत्र अस्ति।
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) चतुर्थी

प्रश्न 12.
शिशवे मोदकं रोचते।।
(क) चतुर्थी
(ख) द्वितीया
(ग) तृतीया
(घ) पञ्चमी

प्रश्न 13.
वृक्षे चटकाः सन्ति
(क) षष्ठी
(ख) पञ्चमी
(ग) चतुर्थी
(घ) सप्तमी

प्रश्न 14.
मोहनः आपणात् फलानि आनयति।
(क) द्वितीया
(ख) तृतीया
(ग) पञ्चमी
(घ) षष्ठी

प्रश्न 15.
विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति।
(क) द्वितीया
(ख) तृतीया
(ग) पञ्चमी
(घ) षष्ठी

प्रश्न 16.
बालकाः कन्दुकेन क्रीडन्ति।
(क) प्रथमा
(ख) तृतीया
(ग) द्वितीया
(घ) षष्ठी

प्रश्न 17.
मनोहरः अक्ष्णा काणः अस्ति।
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) द्वितीया
(घ) चतुर्थी

प्रश्न 18.
रजकः गदर्भ दण्डेन ताडयति।
(क) द्वितीया
(ख) पञ्चमी
(ग) तृतीया
(घ) षष्ठी

प्रश्न 19.
त्वं कस्मिन् विद्यालये पठसि?
(क) सप्तमी
(ख) पञ्चमी
(ग) षष्ठी
(घ) चतुर्थी

प्रश्न 20.
महिला कूपात जलम् आनयति।
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) पञ्चमी
(घ) षष्ठी

उत्तर

1. (घ), 2. (ख), 3. (घ), 4. (ख), 5. (क), 6. (घ), 7. (क), 8. (ख), 9. (ग), 10. (ग) , 11. (ख), 12. (क), 13. (घ), 14. (ग), 15. (क), 16. (ख), 17. (क), 18, (ग), 19. (क), 20. (ग)

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi धातु रूप

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name धातु रूप
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi धातु रूप

परिभाषा
क्रिया के मूल रूप को ‘धातु’ कहते हैं; जैसे—पठ, गम्, लिखू, नम् आदि। लकार की परिभाषा संस्कृत भाषा में काल को ‘लकार’ कहते हैं, जैसे-वर्तमान काल-लेट् लकार, भूतकाल-लङ्ग लकार, भविष्यत् काल तृट् लकार आदि।

लकार के भेद
संस्कृत में दस लकार होते हैं।

  1. लट् लकार
  2. लङ्ग लकार
  3. तृट् लकार
  4. लोट् लकार
  5. विधिलिङ्ग लकार
  6. लुट् लकार
  7. लिट् लकार
  8. लुङ्ग लकार
  9. लेट् लकार
  10. नृङ्ग लकार

नोट पाठ्यक्रम के अनुसार पाँच (लट्, लृट्, लोट्, विधिलिङ्ग एवं लङ् लकार) लकारों के बारे में ही चर्चा करेंगे।
संस्कृत में जितने शब्द होते हैं, उन सभी शब्दों को कारक और वचन के अनुसार तो प्रयोग किया ही जाता है, इसके अतिरिक्त संस्कृत के समस्त शब्दों को पुरुष में भी बाँटा (विभाजित) जाता है। ‘पुरुष’ शब्द का अर्थ ‘व्यक्ति से है अर्थात् कर्ता (क्रिया को करने वाला) इस प्रकार संस्कृत के सभी शब्दों को तीन प्रकार के शब्दों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार हैं

  1. प्रथम पुरुष जिसके विषय में बात की जाती है। (जो प्रत्यक्ष न हो) उसे प्रथम पुरुष कहते हैं, जैसे वह, वे दोनों, वे सब/ये ही प्रथम पुरुष के कर्ता हैं।
  2. मध्यम पुरुष जो बात करने का माध्यम होता है, उसे मध्यम पुरुष कहते हैं; जैसे—तुम, तुम दोनों, तुम सब/ये ही मध्यम पुरुष के कर्ता है।
  3. उत्तम पुरुष किसी विषय पर स्वयं बोलने वाले को उत्तम पुरुष कहते हैं; जैसे मैं, हम दोनों, हम सब/ये ही उत्तम पुरुष के कर्ता हैं।

धातु-भेद
अर्थ-भेद के आधार पर धातु के निम्न तीन भेद होते हैं।

  1. परस्मैपदी जिन धातुओं के अन्त में ति, तः, अन्ति आदि प्रत्यय लगते हैं, उन्हें ‘परस्मैपदी’ धातु कहते हैं। नोट पाठ्यक्रम के अनुसार, परस्मैपदी के अन्तर्गत स्था, पा, नी, कृ, चुर एवं दा ‘सम्मिलित किए गए हैं।
  2. आत्मनेपदी जिन धातुओं के अन्त में ते, एते, अन्ते आदि प्रत्यय लगते हैं, उन्हें आत्मनेपदी धातु कहते हैं; जैसे-सेवते, सेवेते, सेवन्ते
  3. भयपदी जिन धातुओं के रूप दोनों पदों (परस्मैपद एवं आत्मनेपद) में चलते हैं, उन्हें उभयपदी धातु कहते हैं, जैसे

‘याच’ धातु परस्मैपद में रूप-याचति याचतः याचन्ति
‘याच’ धातु आत्मनेपदी में रूप-याचते याचेते याचन्ते

प्रश्न 1.
‘दा’ धातु लुट्लकार प्रथम पुरुष, द्विवचन का रूप है।
(क) दास्यतः
(ख) दत्तः
(ग) दास्यावः
(घ) दास्यथः

प्रश्न 2. ‘नेष्यावः’ रूप है ‘नी’ धातु का (2010)
(क) लट्, उत्तम, द्विवचन
(ख) लोट्, मध्यम, द्विवचन
(ग) लृट्, मध्यम, बहुवचन
(घ) लृट्, उत्तम, द्विवचन

प्रश्न 3.
नयतः रूप है ‘नी’ धातु का
(क) लट्, प्रथम, द्विवचन
(ख) लङ्, मध्यम, एकवचन
(ग) विधिलिङ, प्रथम, एकवचन,
(घ) लोट्, उत्तम, एकवचन

प्रश्न 4.
‘तिष्ठ’ रूप है ‘स्था’ धातु का (2015)
(क) लट्, प्रथम पुरुष, एकवचन
(ख) लोट्, मध्यम पुरुष, एकवचन
(ग) विधिलिङ, उत्तम पुरुष, एकवचन
(घ) लङ, उत्तम पुरुष, एकवचन

प्रश्न 5.
‘पास्यामः’ रूप है-‘पिबु धातु का (2011)
(क) लट्, उत्तम, बहुवचन
(ख) लृट्, उत्तम, बहुवचन
(ग) लङ्, मध्यम, एकवचन
(घ) लोट्, प्रथम, बहुवचन

प्रश्न 6.
‘एधि’ रूप है ‘अस्’ धातु का (2010)
(क) लट्, मध्यम, द्विवचन
(ख) लडु, उत्तम, एकवचन
(ग) विधिलिङ, प्रथम, बहुवचन
(घ) लोट्, मध्यम, एकवचन

प्रश्न 7.
‘स्था’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(क) तिष्ठेयुः
(ख) तिष्ठे:
(ग) तिष्ठेव
(घ) तिष्ठेयम्

प्रश्न 8.
‘कृ’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(क) करोतु
(ख) कुरु
(ग) कुरुत
(घ) अकरोत्

प्रश्न 9.
‘स्था’ धातु विधिलिङ्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा
(क) तिष्ठामि
(ख) तिष्ठ
(ग) स्थास्यति
(घ) तिष्ठेम

प्रश्न 10.
‘कृ’ धातु लोट्, मध्यम, द्विवचन का रूप होगा। (2011)
(क) कुरुताम्
(ख) कुरुथः
(ग) कुरुत
घ) कुरुतम्

प्रश्न 11.
‘भविष्यथ’ रूप है ‘अस्’ धातु का (2012)
(क) लोट्, प्रथम, द्विवचन
(ख) विधिलिङ, उत्तम, एकवचन
(ग) लृट्, मध्यम, द्विवचन
(घ) लट्लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन

प्रश्न 12.
‘कृ’ धातु लूट, मध्यम पुरुष, द्विवचन का रूप होगा (2015)
(क) करोति
(ख) करिष्यथ:
(ग) करिष्यामि
(घ) करिष्यत

प्रश्न 13.
‘चोरयाव’ रूप है ‘चुर्’ (चुराना) धातु का (2010)
(क) लट्, प्रथम, द्विवचन
(ख) विधिलिड्., मध्यम, एकवचन
(ग) लोट्, उत्तम, द्विवचन
(घ) लङ्, उत्तम, बहुवचन

प्रश्न 14.
‘स्था’ धातु लुट्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा (2012)
(क) स्थास्यति
(ख) स्थास्यावः
(ग) स्थास्यथ
(घ) स्थास्यामि

प्रश्न 15.
‘अस्’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा (2011)
(क) स्थः
(ख) स्त
(ग) स्थ
(घ) भविष्यथ

प्रश्न 16.
‘अतिष्ठः’ रूप है ‘स्था’ थातु का (2010)
(क) लृट्, प्रथम, एकवचन
(ख) लोट्, मध्यम, बहुवचन
(ग) विधिलङ, उत्तम, एकवचन
(घ) लङ, मध्यम, एकवचन

प्रश्न 17.
‘आदः’ रूप है ‘अद्’ धातु का (2010)
(क) लट्, मध्यम, द्विवचन
(ख) बृद्, प्रथम, एकवचन
(ग) लङ्, मध्यम, एकवचन
(घ) लट्, प्रथम, द्विवचन

प्रश्न 18.
‘चुर्’ धातु लुट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप होगा (2011, 10)
(क) चोरयति
(ख) चोरयिष्यति
(ग) अचोरयत
(घ) चोरयतु

प्रश्न 19.
‘पा’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा (2013)
(क) पिबथ
(ख) पिविष्यथ
(ग) पास्यथ
(घ) पास्यन्ति

प्रश्न 20.
‘दा’ धातु ललकार प्रथम पुरुष बहुवचन का रूप होगा। (2012)
(क) देहि
(ख) अददुः
(ग) दास्यन्ति
(घ) ददाति

प्रश्न 21.
‘कृ’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का रूप होगा (2010)
(क) कुर्याताम्
(ख) कुर्याम्
(ग) कुर्यातम्
(घ) कुर्यात

प्रश्न 22.
‘भू’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा (2013)
(क) भवताम्
(ख) भव
(ग) भवन्तु
(घ) भवानि

प्रश्न 23.
‘पठतु’ रूप है ‘पठ’ (पढ़ना) धातु का (2011)
(क) लट्, प्रथम, एकवचन
(ख) लोट्, प्रथम, एकवचन
(ग) लोट्, मध्यम, द्विवचन,
(घ) लृट्, उत्तम, एकवचन

प्रश्न 24.
‘पा’ (पिब) धातु ललकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन का रूप हैं। (2010)
(क) पिबसि
(ख) पिबामि
(ग) पिबन्ति
(घ) पिबति

प्रश्न 25.
‘स्थास्यथः’ रूप है ‘स्था’ धातु का (2011)
(क) विधिलिङ, मध्यम, बहुवचन
(ख) लोट् प्रथम, एकवचन
(ग) लृट्, मध्यम, द्विवचन
(घ) लट्, प्रथम, बहुवचन

प्रश्न 26.
‘ददाम’ रूप है ‘दा’ धातु का (2012)
(क) लोट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन
(ख) ट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन
(ग) ललकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन
(घ) विधिलिङ्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन

प्रश्न 27.
‘तिष्ठेव’ रूप है ‘स्था’ धातु का (2013)
(क) विधिलिङ्लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन
(ख) विधिलिङ्लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन
(ग) ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन
(घ) लोट्लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन

प्रश्न 28.
‘भू’ (होना) धातु ललकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा (2011)
(क) भवति
(ख) भवसि
(ग) भवामि
(घ) भवामः

प्रश्न 29.
‘नी’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा (2011)
(क) नय
(ख) नयत
(ग) नयतु
(घ) नयति

प्रश्न 30.
‘कुर्मः’ रूप है ‘कृ’ धातु का (2010)
(क) लङ्, उत्तम, बहुवचन
(ख) लृट्, मध्यम, एकवचन
(ग) विधिलिङ, प्रथम, द्विवचन
(घ) लट्, उत्तम, बहुवचन

प्रश्न 31.
‘कृ’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा। (2010)
(क) कुरुथ
(ख) कुरुत
(ग) कुर्यात
(घ) कुर्यात्

प्रश्न 32.
‘पिबामः’ रूप है ‘पा’ (पिब्) धातु का (2009)
(क) लृट्, उत्तम, बहुवचन
(ख) लोट्, मध्यम, बहुवचन
(ग) लङ्, प्रथम, बहुवचन
(घ) लट्, उत्तम, बहुवचन

प्रश्न 33.
‘अकरोत्’ रूप होता है ‘कृ’ धातु का (2011, 10)
(क) लङ्, प्रथम, एकवचन
(ख) विधिलिङ, मध्यम, द्विवचन
(ग) लृट्, उत्तम, बहुवचन
(घ) लट्, प्रथम, एकवचन

प्रश्न 34.
‘नयतम्’ रूप है ‘नी’ धातु का (2014, 12, 11)
(क) लोट्, मध्यम, द्विवचन
(ख) लट्, मध्यम, बहुवचन
(ग) लृद्, प्रथम, एकवचन
(घ) लोट्, प्रथम, द्विवचन

प्रश्न 35.
‘स्युः’ रूप है ‘अस्’ धातु का (2010)
(क) लोट्, मध्यम, एकवचन
(ख) लृट्, उत्तम, द्विवचन
(ग) विधिलिङ्, प्रथम, बहुवचन
(घ) लङ्, प्रथम, एकवचन

प्रश्न 36.
‘नयानि’ रूप है ‘नी’ धातु का
(क) लट्, प्रथम, एकवचन
(ख) लोट्, उत्तम, एकवचन
(ग) लृट्, मध्यम, द्विवचन
(घ) लोट्, मध्यम, बहुवचन

प्रश्न 37.
‘अपिबत’ रूप है ‘पा’ धातु का
(क) लड्, प्रथम, एकवचन
(ख) लङ्, मध्यम, बहुवचन
(ग) विधिलिङ्, उत्तम, एकवचन
(घ) लट्, प्रथम, द्विवचन

प्रश्न 38.
‘अनयः रूप है ‘नी’ धातु का
(क) लट्, मध्यम, द्विवचन
(ख) लङ्, मध्यम, एकवचन
(ग) लङ, प्रथम, बहुवचन
(घ) लृट्, प्रथम, एकवचने

प्रश्न 39.
‘स्था’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का रूप होगा (2012, 10)
(क) स्थास्यथः
(ख) स्थास्यतः
(ग) तिष्ठथः
(घ) तिष्ठतम्

प्रश्न 40.
‘अतिष्ठाव’ रूप है ‘स्था’ धातु का
(क) लोट्, मध्यम, द्विवचन
(ख) लड्, उत्तम, द्विवचन
(ग) विधिलिङ्, प्रथम, बहुवचन
(घ) लृटु, मध्यम, एकवचन

प्रश्न 41.
निम्नलिखित धातुओं के यथानिर्देश रूप लिखिए।
‘पा’ (पिब) धातु ललकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = पिबामः (2018)
‘नी’ धातु लट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = नयामः (2018)
‘पा’ धातु लोटलकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = पिबत (2018)
‘दा’ धातु लुट्लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = दास्यथः (2018)
‘नी’ धातु लोटलकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = नय, नयतात् (2018)
‘दा’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = देहि (2018)
‘कृ’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = अकुतम् (2018)
‘दा’ धातु ललकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन = दत्तः (2018)
‘पा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = पिबावः (2018)
‘नी’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = नयावः। (2018)
‘दा’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = दत्त (2018)
‘चुर’ धातु लङ्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = अचोरयत् (2018)
‘नी’ धातु लोट्लकार’ मध्यम पुरुष, बहुवचने = नयत (2018, 17)
‘कृ’ धातु ‘लोट्लकार’ मध्यम पुरुष, बहुवचन = कुरूत (2018, 17)
‘पा’ धातु ‘लिङ्लकार’ मध्यम पुरुष, द्विवचन
‘दा’ धातु ‘लिङ्लकार’ मध्यम पुरुष, द्विवचन
‘चुर’ धातु ‘ललकार’ मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप लिखिए = चोरयसि (2017)
‘स्था’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = तिष्ठथ (2016)
‘कृ’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = कृथ (2016)
‘नी’ धातु लुट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = नेष्यामः (2016)
‘कृ’ धातु लुट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = करिष्यम् (2016)
‘मा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = अपिषाव (2016)
‘अस्’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = आस्थ (2016)
‘स्था’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = तिष्ठतम् (2017, 16)
‘नी’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = नयतम् (2016)
‘या’ धातु विधिलिङ् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवधन = पिबेतम् (2017, 16)
‘नी’ धातु विधिलिङ् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = नयेतम् (2017, 16)
‘कृ’ धातु लोट्लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन = कुरुताम् (2016)
दा’ धातु लोट्लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन = दत्ताम्। (2016)
‘दा’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = दोहि
‘पा’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = पिब (2018)
‘स्था’ धातु ललकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = अतिष्ठन्। (2013)
‘दा’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = देहि, दत्तात्। (2016, 14, 13)
‘नी’ धातु ललकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = अनयन् । (2013)
‘दा’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = अदम् (2018, 13)
‘स्था’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन = अतिष्ठतम् (2017, 13)
‘चुर्’ धातु ललकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन = चोरयतः (2013)
‘स्था’ धातु लट्लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = तिष्ठन्ति (2014)
‘दा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = दास्यावः (2012)
‘स्था’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = तिष्ठे: (2013)
‘पा’ (पिब) धातु ललकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = पिबन्ति (2014)
‘कृ’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = कुर्यात (2013)
‘ढा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = अढद्म (2012)
‘स्था’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = तिष्ठ (2014)
‘स्था’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = अतिष्ठत (2013)
‘दा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = दाः (2012)
‘नी’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = नयस (2017, 13)
‘स्था’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = स्थास्यावः (2012)
‘नी’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = नयेत (2013)
‘स्था’ धातु लुट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवधन = अतिष्ठाम (2012)
‘दा’ धातु लृट्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = दास्यामः (2012)
‘स्था’ लङ्लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन = अतिष्ठाम (2012)
‘पा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = पिबामि (2014)
‘दा’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = अददाः (2013)
‘नी’ धातु ललकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = नयथ : (2013)
‘चुर्’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = चोरय (2013)
‘स्था’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = तिष्ठामि. (2014)
‘स्था’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = तिष्ठेत (2013)
‘पा’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = पिब (2018, 16, 14, 13)
‘नी’ धातु विधिलिङ्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = नयेः (2013)
‘पा’ धातु लृट्लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन = पास्यथ (2017, 13)
‘दा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = अददाम्। (2013)
‘दा’ धातु ललकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन = अदद्वः (2013)
‘पठ’ धातु लृट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = पठिष्यति (2014)
‘कृ’ धातु लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = कुरु कुरुताम् (2014)

उत्तर
1. (क), 2. (घ), 3. (क), 4. (ख), 5. (ख), 6. (घ), 7. (ख), 8. (ख), 9. (घ), 10. (घ), 11. (ग) 12. (ख), 13. (ग), 14. (ग), 15. (घ), 16. (घ), 17. (घ), 18. (ख), 19. (ग), 20. (ख), 21. (ग), 22. (ख), 23. (ख), 24. (ग), 25. (ग), 26. (क), 27. (ख), 28. (ख), 29. (क), 30. (घ), 31. (ग), 32. (घ), 33. (क), 34. (क), 35. (ग), 36. (ख), 37. (क), 38. (ख), 39. (क), 40. (ख),

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विज्ञान आधारित निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 10
Chapter Name विज्ञान आधारित निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विज्ञान आधारित निबन्ध

1. विज्ञान के बढ़ते कदम (2018, 16, 15)
अन्य शीर्षक विज्ञान और मानव जीवन (2018), विज्ञान : वरदान या अभिशाप (2017), विज्ञान की प्रगति और विश्वशान्ति (2015), जीवन में विज्ञान का महत्त्व (2014), विज्ञान की उपलब्धियाँ (2010)
संकेत बिन्दु वरदान के रूप में विज्ञान, विज्ञान के विषय में भ्रान्ति, मानवीय व्यस्तता, विज्ञान का दुरुपयोग, उपसंहार।

वरदान के रूप में विज्ञान हम अपने आस-पास मानव निर्मित जिन चीज़ों को देखते हैं, उनमें से अधिकाधिक चीजें विज्ञान के बल पर ही आकार पाने में सफल हो पाई हैं। विज्ञान ने मानव जीवन को सुखद व सुगम बना दिया है। पहले लम्बी दूरी की। यात्रा करना मनुष्य के लिए अत्यन्त कष्टदायी होता था। अब विज्ञान ने मनुष्य की हर प्रकार की यात्रा को सुखमय बना दिया है। सड़कों पर दौड़ती मोटरगाड़ियाँ एवं रेलवे स्टेशनों व एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़ इसके प्रमाण हैं। पहले मनुष्य के पास मनोरंजन के लिए विशेष साधन उपलब्ध नहीं थे। अब उसके पास मनोरंजन के हर प्रकार के साधन उपलब्ध हैं। रेडियो, टेपरिकॉर्डर से आगे बढ़कर अब एल सी डी, वी सी डी, डी वी डी एवं डी टी एच का जमाना आ गया है। यही नहीं मनुष्य विज्ञान की सहायता से शारीरिक कमजोरियों एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से पार पाने में अब पहले से कहीं अधिक सक्षम हो गया है और यह सब सम्भव हुआ चिकित्सा क्षेत्र में आई वैज्ञानिक प्रगति से। अब ऐसी असाध्य बीमारियों का इलाज भी सम्भव है, जिन्हें पहले लाइलाज समझा जाता था। अब टीबी सहित कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी को प्रारम्भिक स्तर पर ही खत्म करना सम्भव हुआ है। आज हर हाथ में मोबाइल का दिखना भी विज्ञान के वरदान का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

विज्ञान के विषय में भ्रान्ति कुछ लोग कहते हैं कि विज्ञान ने आदमी को मशीन बना दिया है, किन्तु यह कहना उचित नहीं है। मशीनों का आविष्कार मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधा के लिए किया है। यदि मशीनें नहीं होतीं, तो मनुष्य इतनी तेजी से प्रगति नहीं कर पाता एवं उसका जीवन तमाम तरह के झंझावातों के बीच ही गुम होकर रह जाता। मशीनों से मनुष्य को लाभ हुआ है।

यदि उसे भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं, तो उसमें मशीनों का योगदान प्रमुख है। मशीनों को कार्यान्वित करने के लिए मनुष्य को उन्हें परिचालित करना पड़ता है। इस कार्य में उसे अधिक नहीं परिश्रम करना पड़ता। यदि कोई व्यक्ति मशीन के बिना कार्य करे तो उसे अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता पड़ेगी।

इस दृष्टि से देखा जाए तो मशीनों के कारण मनुष्य का जीवन यन्त्रवत् नहीं हुआ | है, बल्कि उसके लिए हर प्रकार का कार्य करना सरल हो गया है। यह विज्ञान का ही | वरदान है कि अब डेबिट-क्रेडिट कार्ड के रूप में लोगों के पर्स में प्लास्टिक मनी आ गई है एवं वह जब भी चाहे, जहाँ भी चाहे रुपये निकाल सकता है। रुपये निकालने के लिए अब बैंकों में घण्टों लाइन में लगने की जरूरत ही नहीं!

मानवीय व्यस्तता यद्यपि, मशीन का आविष्कार मनुष्य ने अपने कार्यों को आसान करने के लिए किया था, किन्तु कोई भी मशीन मनुष्य के बिना अधूरी है। जैसे-जैसे मनुष्य वैज्ञानिक प्रगति करता जा रहा है, उसकी मशीनों पर निर्भरता भी बढ़ती जा रही हैं। फलतः मशीनों को चलाने के लिए उसे यन्त्रवत् उसके साथ व्यस्त राहना पड़ता है। आधुनिक मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता देता है, इसके लिए वह दिन रात परिश्रम करता है। वह चाहता है कि उसके पास गाड़ी, बंगला, ऐशोआराम की सभी चीजें हों। इसके लिए वह अपने सुख चैन को भी त्यागकर काम में व्यस्त रहता। इस काम के चक्कर में उसने अपनी जीवनशैली अत्यन्त व्यस्त बना ली है। खासकर शहर के लोगों में यह प्रवृत्ति सामान्यतः दिखाई देती है। मनुष्य ने अपने लिए रोबोट का भी आविष्कार कर लिया, फिर भी उसकी आवश्यकता कम नहीं हुई है। वह दिन-रात अन्तरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए परिश्रम कर रहा है।

विज्ञान का दुरुपयोग कहते हैं दुनिया की किसी भी चीज़ का दुरुपयोग बुरा ‘ होता है। विज्ञान के मामलों में भी ऐसा ही है। विज्ञान का यदि दुरुपयोग किया जाए, तो इसका परिणाम भी बुरा ही होगा। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो विज्ञान का सहयोग मनुष्य के लिए एक अभिशाप के रूप में सामने आया है। विज्ञान की सहायता से मानव ने घातक हथियारों का आविष्कार किया। ये हथियार पूरी मानव सभ्यता का विनाश करने में सक्षम हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय परमाणु बमों के प्रयोग से मानव को जो क्षति हुई, उसकी पूर्ति असम्भव है। विज्ञान की सहायता से मनुष्य ने मशीनों का आविष्कार अपने सुख-चैन के लिए किया, किन्तु अफसोस की बात यह है कि मशीनों के साथ-साथ वह भी मशीन होता जा रहा है एवं उसकी जीवन-शैली भी अत्यन्त व्यस्त हो गई है। विज्ञान की सहायता से मशीनों के आविष्कार के बाद छोटे-छोटे एवं सामान्य कार्यों के लिए भी मशीनों पर निर्भरता बढ़ी है।

परिणामस्वरूप जो कार्य पहले मानव द्वारा किया जाते थे, वे अब मशीनों से पूर्ण किए जाते हैं। यही कारण है कि बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। मशीनों के प्रयोग एवं पर्यावरण के दोहन के कारण पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ गया है तथा प्रदूषण के कारण मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। यही नहीं, विज्ञान की सहायता से प्रगति के लिए मनुष्य ने पृथ्वी पर मौजूद संसाधनों का व्यापक रूप से दोहन किया है, जिसके कारण उसके लिए ऊर्जा-संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

उपसंहार विज्ञान के दुरुपयोग के कारण यह मनुष्य के लिए विध्वंसक अवश्य लगा है, किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसके कारण ही मनुष्य का जीवन सुखमय हो सका है और आज हम जो प्रगति एवं विकास की बहार देख रहे हैं, वह विज्ञान के बल पर ही सम्भव हुआ है। इस तरह विज्ञान मानव के लिए सृजनात्मक ही साबित हुआ है। | विज्ञान के दुरुपयोग के लिए विज्ञान को नहीं, बल्कि मनुष्य को दोषी ठहराया जाना चाहिए।

विज्ञान कभी नहीं कहता कि उसका दुरुपयोग किया जाए। इस तरह आज तक विज्ञान की सहायता से तैयार हथियारों के दुरुपयोग के लिए विज्ञान को विध्वंसात्मक कहना विज्ञान के साथ अन्याय करने के बराबर है। विज्ञान को अभिशाप बनाने के लिए मनुष्य दोषी है। अन्ततः देखा जाए तो विज्ञान मनुष्य के लिए वरदान है।

2. मनोरंजन के आधुनिक साधन (2017, 14)
अन्य शीर्षक मनोरंजन के हाई-टेक साधन, मनोरंजन के अत्याधुनिक स्वरूप।।
संकेत बिन्दु भूमिका, टेलीविजन, रेडियो, कम्प्यूटर एवं इण्टरनेट, सिनेमा, उपसंहार।।

भूमिका एक समय था, जब मनोरंजन के लिए लोग शिकार खेला करते थे। सभ्यता में विकास के बाद अन्य खेल लोगों के मनोरंजन के साधन बने। आज भी खेल मनोरंजन के प्रमुख साधन हैं, किन्तु आजकल खेलों को प्रत्यक्ष रूप से देखने के बजाय किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से इन्हें देखने वालों की संख्या बढ़ी है। इस समय टेलीविजन, रेडियो तथा इण्टरनेट एवं कम्प्यूटर मनोरंजन के प्रमुख एवं हाई-टेक साधन हैं।

टेलीविजन टेलीविजन आजकल लोगों के मनोरंजन का एक प्रमुख साधन बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि टेलीविजन पर हर आयु वर्ग के लोगों के लिए कार्यक्रम मौजूद हैं।

गृहिणियाँ भोजन बनाने वाले कार्यक्रमों सहित सास बहुओं पर आधारित टी.वी. शो देख सकती हैं। बच्चे कार्टून कार्यक्रम सहित तमाम तरह के गीत-संगीत पर आधारित रियलिटी शो देख सकते हैं। पुरुष न्यूज चैनलों के साथ-साथ क्रिकेट मैचों का प्रसारण देख सकते हैं। बुजुर्ग लोग समाचारों, धारावाहिकों के अलावा धार्मिक चैनलों पर सत्संग एवं प्रवचन आदि का आनन्द ले सकते हैं।

रेडियो आधुनिक काल में रेडियो मनोरंजन का एक प्रमुख साधन बनकर उभरा है। रेडियो पर गीत-संगीत के अलावा सजीव क्रिकेट कमेटरी श्रोताओं को आनन्दित तो करती ही है, जब से एफ.एम. चैनलों का पदार्पण भारत में हुआ है, रेडियो की उपयोगिता और बढ़ गई है।

आजकल हम लोगों को मोबाइल फोन के माध्यम से विभिन्न एफ.एम, स्टेशनों को सुनते देखते हैं। रेडियो मिर्ची, रेड एफ.एम., रेडियो सिटी, रेडियो म्याऊ इत्यादि चर्चित एफ.एम. स्टेशन हैं। ये श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन कर रहे हैं। आज एफ.एम. प्रसारण दुनियाभर में रेडियो प्रसारण का पसन्दीदा माध्यम बन चुका है।

इसका एक कारण इससे उच्च गुणवत्ता युक्त स्टीरियोफोनिक आवाज की प्राप्ति भी है। शुरुआत में इस प्रसारण की देशभर में कवरेज केवल 30% थी, किन्तु अब इसकी कवरेज बढ़कर 60% से अधिक तक जा पहुंची है।

कम्प्युटर एवं इण्टरनेट आधुनिक मनोरंजन के साधनों में कम्प्यूटर एवं इण्टरनेट का स्थान अग्रणी है। भारतीय युवाओं में इनका प्रयोग तेजी से बढ़ी है। इण्टरनेट को तो कोई जादू, कोई विज्ञान का चमत्कार, तो कोई ज्ञान का सागर कहता हैं।

आप इसे जो भी कहिए, किन्तु इस बात में कोई सन्देह नहीं कि सूचना क्रान्ति की देन यह इण्टरनेट न केवल मानव के लिए अति उपयोगी साबित हुआ है, बल्कि संचार में गति एवं विविधता के माध्यम से इसने दुनिया को बिल्कुल बदल कर रख दिया है।

इण्टरनेट ने सरकार, व्यापार और शिक्षा को नए अवसर दिए हैं। सरकारें अपने प्रशासनिक कार्यों के संचालन, विभिन्न कर प्रणाली, प्रबन्धन और सूचनाओं के प्रसारण जैसे अनेकानेक कार्यों के लिए इण्टरनेट का उपयोग करती हैं। कुछ वर्ष पहले तक इण्टरनेट व्यापार और वाणिज्य में प्रभावी नहीं था, लेकिन आज सभी तरह के विपणन और व्यापारिक लेन-देन इसके माध्यम से सम्भव हैं।

इण्टरनेट पर आज पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं, रेडियो के चैनल उपलब्ध हैं और टेलीविज़न के लगभग सभी चैनल भी मौजूद हैं। इण्टरनेट के माध्यम से मीडिया हाउस ध्वनि और दृश्य दोनों माध्यम के द्वारा ताजातरीन खबरें और मौसम सम्बन्धी जानकारियाँ हम तक आसानी से पहुंचा रहे हैं।
नेता हो या अभिनेता, विद्यार्थी हो या शिक्षक, पाठक हो या लेखक, वैज्ञानिक हो या चिन्तक सबके लिए इण्टरनेट उपयोगी साबित हो रहा है।

सिनेमा बात मनोरंजन के आधुनिक साधनों की हो या पूर्व साधनों की, यह सिनेमा के बिना अधूरी है। सिनेमा पहले भी लोगों के मनोरंजन का एक शक्तिशाली माध्यम था, आज भी है।

आज पारिवारिक एवं हास्य से भरपूर फिल्में दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन कर रही हैं। एक व्यक्ति तनावपूर्ण वातावरण से निकलने एवं मनोरंजन के लिए सिनेमा का रुख करता है, हालाँकि वर्तमान समय में बहुत सी फिल्में हिंसा एवं अश्लीलता का भौण्डा प्रदर्शन भी करती हैं, किन्तु इन जैसी खामियों को दरकिनार कर दें, तो सिनेमा दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन ही करते हैं।

उपसंहार इस प्रकार देखा जाए तो मनोरंजन के इन सभी हाई-टेक साधनों से न सिर्फ हमारा मनोरंजन होता है, बल्कि ये हमारे ज्ञान का विस्तार करने में भी सहायक हैं। इनकी सहायता से हम कठिन से कठिन विषयों को भी बड़ी सुगमता के साथ कम समय में ही ठीक प्रकार से समझ लेते हैं।

अतः हमें जीवन की एकरसता दूर करने व मानसिक स्फूर्ति प्रदान करने हेतु | मनोरंजन के तौर पर सीमित प्रयोग के साथ-साथ इन साधनों का प्रयोग अपने ज्ञान-विज्ञान को परिष्कृत किए जाने में करना चाहिए, तभी हम इनका अधिकाधिक लाभ लेकर अपने समाज तथा देश को उन्नत बना सकेंगे।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संमास

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name संमास
Number of Questions Solved 10
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संमास

परिभाषा
जब दो या दो से अधिक शब्द अपने बीच की विभक्ति को छोड़कर आपस में मिल जाएँ तो उसे समास कहते हैं, जैसे- सूर्यस्य उदयः (सूर्य का उदय) से नया शब्द ‘सूर्योदयः’ बनता है, जिसमें षष्ठी विभक्ति लुप्त हो जाती है। शब्दों के ऐसे मेल से जो एक स्वतन्त्र शब्द बनता है उसे सामासिक पद अथवा समस्त पद कहते हैं। सामासिक पद को अनुसार विभक्तियों सहित तोड़ना समास-विग्रह कहलाता है। जैसे–सामासिक पद श्वेताम्बरम् का विग्रह होगा श्वेतम् अम्बरम्। यहाँ ‘श्वेतम्’ पूर्व पद एवं ‘अम्बरम्’ उत्तर पद हैं।

समास के भेद
समास के छ: भेद हैं।

  1. तत्पुरुष
  2. कर्मधारय
  3. अव्ययीभाव
  4. द्विगु
  5. बहुव्रीहि
  6. द्वन्द्व

आइए, पाठ्यक्र में सम्मिलित तीन समास कर्मधारय, अव्ययीभाव एवं बहुप्रीहि के वारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।

1. कर्मधारय समास
विशेषण विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय वाले समास को कर्मधारय समास कहते हैं। इसमें दोनों शब्द (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रथमा विभक्ति में होते हैं तथा दोनों ही पदों की प्रधानता होती है; जैसे—’कृष्णाश्वः’ में प्रथम पद ‘कृ’:’ अर्थात् काला विशेषण, जबकि अन्तिम पद ‘अश्वः’ अर्थात् घोड़ा विशेष्य है। इसका विग्रह होगा ‘कृष्णः अश्वः’ अर्थात् काला घोड़ा। उदाहरण-
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2. अव्ययीभाव समास
जिस समास में प्रथम पद अव्यय तथा अन्तिम पद संज्ञा हो तथा प्रथम पद अर्थात् अव्यय के ही अर्थ की प्रधानता हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। इस समास के | शब्द हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में ही रहते हैं। इस समास को अपने पदों में विग्रह नहीं होता; जैसे–’निर्धनः’ का विग्रह होगा ‘धनानां अभावः
उदाहरण-
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3. बहुव्रीहि समास
जिस समास में दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) को छोड़कर कोई अन्य पद प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। इस प्रकार इसमें सामासिक अर्थ दोनों पदों से भिन्न होता है; जैसे–’त्रीनेत्र’ का विग्रह ‘त्रीणि नेत्राणि यस्य सः’ (तीन हैं नेत्र जिसके) है, जिससे ‘शंकर’ का बोध होता है।
उदाहरण
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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रामस्य पुत्रः का समस्तपद होगा
(क) रामपुत्रः
(ख) रामेपुत्रः
(ग) रामायपुत्रः
(घ) राममपुत्रः

प्रश्न 2.
‘नीलोत्पलम’ में विग्रह है।
(क) नीलम् उत्पलम्
(ख) निलमुत्पलम्
(ग) नलमोत्पलम्
(घ) नलस्योत्पलम्

प्रश्न 3.
‘यथाशक्ति’ में समास है।
(क) कर्मधारय
(ख) तत्पुरुष
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्विगु

प्रश्न 4.
एकं
एकं प्रति का सामासिक पद होगा
(क) प्रत्येक
(ख) हरेक
(ग) द्विरेकं
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
‘त्रिलोकी में समास है।
(क) द्वन्ट्स
(ख) द्विगु
(ग) तत्पुरुष
(घ) बहुव्रीहि

प्रश्न 6.
‘प्राप्तोदकः’ में समास है।
(क) तत्पुरुष
(ख) बहुव्रीहि
(ग) कर्मधारय
(घ) द्विगु

प्रश्न 7.
‘घनश्यामः’ में समास है।
(क) द्विगु
(ख) अव्ययीभाव
(ग) कर्मधारय
(घ) बहुव्रीहि

प्रश्न 8.
‘रामस्य समीपे’ का सामासिक पद होगा।
(क) उपरामम्
(ख) उपारामम्
(ग) उपेरामम्
(घ) उपोरामम्

प्रश्न 9.
‘चन्द्रशेखरः’ में समास है।
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) बहुव्रीहि
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
‘महान् च असौ देवः’ का सामासिक पद होगा।
(क) महादेव
(ख) महादेवी
(ग) शिवः
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर

1. (क, 2. (क), 3. (ग), 4. (क), 5. (ख), 6. (ख), 7. (ग), 8. (क), 9. (ग), 10. (क)

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