UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name वाक्यों में त्रुटि-मार्जन
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

नवीनतम पाठ्यक्रम में वाक्यों में त्रुटि-मार्जन अर्थात् वाक्य-संशोधन को सम्मिलित किया गया है। इसमें लिंग, वचन, कारक, काल तथा वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियों के संशोधन कराये जाते हैं। इसके लिए कुल 2 अंक निर्धारित है।

वाक्ये भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई होती है। यदि वाक्य-रचना निर्दोष हो तो वक्ता/लेखक का आशय श्रोता/पाठक को समझने में कठिनाई नहीं होती। दोषपूर्ण वाक्य से आशय स्पष्ट नहीं हो पाता; अत: वाक्य-रचना का निर्दोष होना अत्यन्त आवश्यक है। वाक्य-रचना में दोष अनेक कारणों से हो सकते हैं। यदि वाक्य में लिंग, वचन, पुरुष, काल, वाच्य, विभक्ति, शब्दक्रम आदि में कोई भी दोषपूर्ण हुआ तो वाक्य सदोष हो जाता है। शुद्ध वाक्य-रचना के लिए व्याकरण-ज्ञान परमावश्यक है। वाक्य-रचना की अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं-

  1. अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  2. पदक्रम सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  3. वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  4. पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  5. पदों की अनुपयुक्तता सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  6. वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ।

(1) अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाक्यों में पदों की एकरूपता (लिंग, वचन, पुरुष आदि) के साथ क्रिया की भी अनुरूपता होनी चाहिए। हिन्दी में पदों की क्रिया के साथ इसी अनुरूपता अर्थात् अन्विति के कुछ विशेष नियम हैं-
(क) कर्ता-क्रिया की अन्विति
(1) विभक्तिरहित कर्ता वाले वाक्य की क्रिया सदा कर्ता के अनुसार होती है। यदि कर्ता के साथ ‘ने’ विभक्ति चिह्न जुड़ा हो तो सकर्मक क्रिया कर्म के लिंग, वचन के अनुसार होती है; जैसे-

  • लड़का पुस्तक पढ़ता है। (कर्ता के अनुसार
  • लड़की पत्र पढ़ती है। (कर्ता के अनुसार)
  • लड़के ने पुस्तक पढ़ी। (कर्म के अनुसार)
  • लड़की ने पत्र पढ़ा। (कर्म के अनुसार)

(2) कर्ता और कर्म दोनों विभक्ति-चिह्नसहित हों तो क्रिया पुंल्लिग एकवचन में होती है; जैसे

  • प्रधानाचार्य ने अध्यापिका को बुलाया।
  • नेताओं ने किसानों को समझाया।

(3) यदि समान लिंग के विभक्ति-चिह्नरहित अनेक कर्ता पद ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया उसी लिंग की तथा बहुवचन में होती है; जैसे

  • स्वाति, चित्रा और मधु आएँगी।
  • डेविड, नीरज और असलम खेल रहे हैं।

(4) ‘या’ से जुड़े विभक्तिरहित कर्ता पदों की क्रिया अन्तिम कर्ता के अनुसार होती है; जैसेभाई या बहन आएगी।
(5) विभिन्न लिंगों के अनेक कर्ता यदि ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया पुंल्लिग बहुवचन में होती है; जैसेगणतन्त्र दिवस की परेड को लाखों बालक, वृद्ध और नारी देख रहे थे।
(6) यदि कर्ता भिन्न-भिन्न पुरुषों के हों तो उनका क्रम होगा—पहले मध्यम पुरुष, फिर अन्य पुरुष और अन्त में उत्तम पुरुष। क्रिया अन्तिम कर्ता के लिंग के अनुसार बहुवचन में होगी; जैसे

  • तुम, गीता और मैं नाटक देखने चलेंगे।
  • तुम, विकास और मैं टेनिस खेलेंगे।

(7) कर्ता का लिंग अज्ञात हो तो क्रिया पुंल्लिग में होगी; जैसे–

  • देखो, कौन आया है ?
  • तुम्हारा पालन-पोषण कौन करता है ?

(8) आदर देने के लिए एकवचन कर्ता के लिए भी क्रिया बहुवचन में प्रयुक्त होती है; जैसे

  • मुख्यमन्त्री भाषण दे रहे हैं।
  • महात्मा गाँधी राष्ट्रपिता माने जाते हैं।

(9) सम्बन्ध कारक का लिंग उसके सम्बन्धी के लिंग के अनुसार होता है-यदि ये लोग भिन्न-भिन्न लिंग के हों तथा ‘और’ से जुड़े हों तो संज्ञा-सर्वनाम को लिंग प्रथम सम्बन्धी के अनुसार होगा; जैसे–

  • मेरा बेटा और बेटी दिल्ली गये हैं।
  • मेरे भाई-बहन पढ़ रहे हैं।
  • तुम्हारे भाई और बहन आजकल क्या कर रह

(ख) कर्म और क्रिया की अन्विति
(1) यदि कर्ता ‘को’ प्रत्यय से जुड़ा हो तथा कर्म के स्थान पर कोई क्रियार्थक संज्ञा प्रयुक्त हुई हो तो क्रिया सदैव एकवचन, पुंल्लिग तथा अन्य पुरुष में होगी; जैसे

  • उसे (उसको) पुस्तक पढ़ना नहीं आता।
  • तुम्हें (तुमको) बात करने नहीं आता।।

(2) यदि वाक्य में कर्ता ‘ने’ विभक्ति से युक्त हो तथा कर्म की ‘को’ विभक्ति प्रयुक्त नहीं हुई हो तो वाक्य की क्रिया कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार प्रयुक्त होगी; जैसे-

  • श्याम ने पुस्तक पढ़ी।
  • श्यामा ने क्षमा माँगी।

(3) यदि एक ही लिंग और वचन के अनेक अप्रत्यय कर्म एक साथ एक वचन में आयें तो क्रिया एक वचन में होगी; जैसे

  • राघव ने एक घोड़ा और एक ऊँट खरीदा।।
  • रमेश ने एक पुस्तक और एक कलम खरीदी।

(4) यदि एक ही लिंग और वचन के अनेक प्राणिवाचक अप्रत्यय कर्म एक साथ प्रयुक्त हों तो क्रिया उसी लिंग में तथा बहुवचन में प्रयुक्त होगी; जैसे

  • महेश ने गाय और बकरी मोल लीं।
  • लक्ष्मण ने दूध के लिए गाय और भैंस खरीदीं।

(5) यदि वाक्य में भिन्न-भिन्न लिंग के एकाधिक अप्रत्यय कर्म प्रयुक्त हों तथा वे ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया-अन्तिम कर्म के लिंग और वचन के अनुसार प्रयुक्त होगी; जैसे

  • रमेश ने चावल, दाल और रोटी खायी।
  • सुरेश ने रोटी, दाल और चावल खाया।

(ग) विशेषण और विशेष्य की अन्विति
(1) विशेषण का लिंग और वचन अपने विशेष्य के अनुसार होता है; जैसे

  • यहाँ उदार और परिश्रमी लोग रहते हैं।
  • गोरे मुखड़े पर काला तिल अच्छा लगता है।

(2) यदि एक से अधिक विशेषण हों, तब भी उपर्युक्त नियम का ही पालन होता है; जैसे– वह गिरती-उठती, ऊँची-ऊँची लहरों को निहारती रही।
(3) अनेक समासरहित विशेष्यों को विशेषण निकटवर्ती विशेष्य के अनुरूप होता है; जैसे

  • भोले-भाले बालक और बालिकाएँ।
  • भोली-भाली बालिकाएँ और बालक।

(घ) सर्वनाम और संज्ञा की अन्विति
(1) सर्वनाम उसी संज्ञा के लिंग-वचन का अनुसरण करता है, जिसके स्थान पर वह आया है; जैसे–

  • मैंने सुमन को देखा, वह आ रही थी।
  • मैन विजय को देखा, वह आ रहा था।

(2) आदर के लिए बहुवचन सर्वनाम का प्रयोग होता है; जैसे

  • दादाजी आये हैं। वे एक महीना रुकेंगे।
  • कथावाचक व्यास जी आ चुके हैं। अब वे नियमित पन्द्रह दिन तक प्रवचन करेंगे।

(3) वर्ग का प्रतिनिधि अपने लिए ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग करता है; जैसे–

  • शिक्षामन्त्री ने कहा कि हमें अपने देश से अशिक्षा दूर करनी है।
  • शिक्षक ने कहा कि हमें अपने देश का गौरव बढ़ाना है।

अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियों के उदाहरण

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(2) पदक्रम सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाक्य पदों और पदबन्धों से बनता है। वाक्य के साँचे में पदों का क्या क्रम हो, इसके कुछ निश्चित नियम हैं–
(1) प्रायः कर्त्तापद वाक्य में सबसे पहले आता है और क्रियापद सबसे अन्त में; जैसे|

  • भिखारी आ रहा है।
  • सूर्योदय हो गया।

(2) सम्बोधन और विस्मयसूचक पद वाक्य के प्रारम्भ में कर्ता से भी पहले आते हैं; जैसे

  • अरे ! भिखारी आ रहा है।
  • अहा ! सूर्योदय हो गया।

(3) कर्मपद कर्ता और क्रियापदों के बीच रहता है; जैसे-

  • राजेश पाठ पढ़ाता है।
  • बच्चे ने गीत सुनाया।

(4) सम्बन्धकारक अपने सम्बन्धी शब्द से पूर्व आता है; जैसे

  • भिखारी के बच्चे ने रहीम का पद सुनाया।
  • वह तुम्हारा नाम पूछ रहा था।

(5) प्रश्नवाचक पद प्रश्न के विषय से पूर्व आता है; जैसे

  • कौन खड़ा है ? (कर्ता पर प्रश्न)
  • तुम क्या खा रही हो ? (कर्म पर प्रश्न)
  • वह कैसे आया ? (रीति पर प्रश्न)

(6) कर्ता और कर्म को छोड़कर शेष सभी कारक कर्ता-कर्म के बीच आते हैं। एक से अधिक कारक रूप होने पर ये उल्टे क्रम में (पहले अधिकरण) रखे जाते हैं; जैसे

  • मजदूर खेत में रहट से सिंचाई कर रहे थे।
  • छात्र मैदान में अपने मित्रों के साथ हॉकी खेलने लगे।

(7) पूर्वकालिक क्रिया, मुख्य क्रिया से पहले आती है; जैसे-

  • कल पढ़कर आइए।
  • कल मुंह धोकर आना।

(8) “न” या “नहीं” का प्रयोग निषेध के अर्थ में हो तो क्रिया से पूर्व और आग्रह के अर्थ में हो तो क्रिया के बाद होता है; जैसे–

  • मैं नहीं जाऊँगा।
  • तुम आओ न।

(9) पदक्रमों में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वाक्य के विभिन्न पदों में ऐसी तर्कसंगत निकटता होनी चाहिए, जिससे कि वाक्य द्वारा अपेक्षित अर्थ स्पष्ट हो। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्य देखें-

  • फल बच्चे को काटकर खिलाओ।
  • गर्म गाय का दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।
    उपर्युक्त दोनों वाक्यों का अर्थ अटपटा और हास्यास्पद है। इन वाक्यों का उचित क्रम होगा
  • बच्चे को फल काटकर खिलाओ।
  • गाय का गर्म दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।

अन्य उदाहरण
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(3) वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियों से भाषा का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। इस प्रकार की अशुद्धियों से अर्थ का अनर्थ होने का भय प्रायः कम ही रहता है। इस प्रकार की अशुद्धियों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
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(4) पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ

पीछे दिये गये तीन भेदों के अतिरिक्त वाक्य में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी मिलती हैं, जिनके मूल में एक ही घटक को दो भिन्न रीतियों से एक साथ उद्धृत किया गया होता है; जेस–

  • मुझे केवल दस रुपये मात्र मिले। (अशुद्ध)
  • मुझे केवल दस रुपये मिले। (शुद्ध)
  • मुझे दस रुपये मात्र मिले। (शुद्ध)

यहाँ प्रथम वाक्य अशुद्ध है; क्योंकि केवल’ शब्द के अर्थ को दो विभिन्न रीतियों के माध्यम से एक साथ प्रयुक्त कर दिया गया है। ऐसी अशुद्धियों के मूल में पुनरावृत्ति या पुनरुक्ति की भावना रहती है। आगे कुछ उदाहरणों की सहायता से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा रहा है-
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(5) पदों की अनुपयुक्तता सम्बन्धी अशुद्धियाँ

कई बार लिखते समय हम वाक्यों में पदों के अनुपयुक्त रूपों का प्रयोग करके उन्हें अशुद्ध बना देते हैं। इस प्रकार की अशुद्धियों से बचने के लिए व्याकरण का ज्ञान होना अति आवश्यक है। पद-भेदों के अनुसार इस प्रकार की अशुद्धियों के भी अनेक भेद हैं, जिन्हें उदाहरणसहित यहाँ समझाया जा रहा है। दिये गये उदाहरणों में अनुपयुक्त पद को मोटे अक्षरों में अंकित किया गया है और उनके उपयुक्त (शुद्ध) रूप को वाक्य के सम्मुख कोष्ठक में दिया गया है।
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(6) वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वर्तनी का शाब्दिक अर्थ है-वर्तन यानि अनुवर्तन करना अर्थात् पीछे-पीछे चलना। लेखन-व्यवस्था में वर्तनी शब्द-स्तर पर शब्द की ध्वनियों का अनुवर्तन करती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शब्द-विशेष के लेखन में शब्द की एक-एक करके आने वाली ध्वनियों के लिए लिपि-चिह्नों के क्या रूप हों और उनका कैसा संयोजन हो यह वर्तनी (वर्ण-संयोजन) का कार्य है।

वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ प्रायः निम्नलिखित कारणों से होती हैं
(1) असावधानी अथवा शीघ्रता – वर्तनी सम्बन्धी अधिकांश अशुद्धियाँ असावधानी व शीघ्रता के कारण ही होती हैं। बहुत बार अच्छी तरह से ज्ञात शब्द के लिखने में भी अशुद्धि हो जाती है; जैसे—गौण का गौड़, धन का घन, पत्ता का पता आदि। ऐसी भूलों के निवारण के लिए यही सलाह दी जा सकती है कि लेखन-कार्य अत्यधिक सावधानी से करना चाहिए।
(2) उच्चारण—हिन्दी भाषा की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह जैसे बोली जाती है, वैसे ही लिखी जाती है और जैसे लिखी जाती है वैसे ही पढ़ी या बोली भी जाती है। उच्चारण अवयव में दोष, बोलने में असावधानी, शुद्ध उच्चारण का ज्ञान न होने आदि कारणों से उच्चारण में अन्तर आ जाता है और इस भूल का निराकरण न होने तक वर्तनी से सम्बन्धित अशुद्धियाँ होती ही रहती हैं।
(3) स्थानिक प्रभाव-भाषा को सौन्दर्य और सौष्ठव उसके गठन और उच्चारण की शुद्धता पर आधारित होता है। शुद्ध उच्चारण से ही भाषा का लिखित रूप (वर्तनी) शुद्ध होता है। अंग्रेजी बोलने वाला कितना ही अभ्यास कर ले, जब भी वह हिन्दी बोलेगा, उसके उच्चारण में अंग्रेजी का पुट जाने-अनजाने आ ही जाएगा। यही स्थिति हिन्दी में भी होती है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, दिल्ली व हरियाणा के निवासी ‘क, ख, ग’ को ‘कै, खै, गै, बोलते हैं, जबकि पूर्वी अंचल में इसका अभ्यास ‘क, ख, ग’ का ही विकसित होता है। स्वाभाविक है कि क्षेत्र-विशेष के उच्चारण का प्रभाव लिखने पर भी पड़ता है; परिणामस्वरूप वर्तनी में भी ऐसी ही भूलें दिखाई देती हैं। हिन्दी भाषा में वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की होती हैं-

  • स्वर (मात्रा) सम्बन्धी,
  • व्यंजन सम्बन्धी,
  • सन्धि सम्बन्धी,
  • समास सम्बन्धी,
  • विसर्ग सम्बन्धी तथा,
  • हलन्त सम्बन्धी।

वर्तनी से सम्बन्धित उपर्युक्त समस्त बिन्दुओं पर विवरण देना यहाँ नितान्त अप्रासंगिक है और परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी भी नहीं है। विद्यार्थियों से तो इतनी ही अपेक्षा है कि वे हिन्दी को अधिक-से-अधिक शुद्ध रूप में लिखें। इसके लिए उन्हें अधिकाधिक हिन्दी लिखने का अभ्यास करना चाहिए। हिन्दी की स्तरीय पुस्तकों का अध्ययन, इसमें सहायक सिद्ध होगा।

अशुद्धियों के बहु-प्रचलित कुछ उदाहरण

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UP Board Time Table 2020 Class 12 (Released) | Detailed UP Board Class 12 Date Sheet

UP Board Time Table Class 12

UP Board Time Table Class 12: The board of Uttar Pradesh i.e UPMSP (Uttar Pradesh Madhyamika Shiksha Parishad) has released the board Exam dates for Intermediate class. There are about 2200 secondary schools which are registered with the UP board. For Intermediate class, the Exam will be held in the month of February-March across the various districts of UP State.

Download UP Board Class 12 Time Table 2020

Although the board officials of UPMSP has released the UP Board Time Table for Class 12 in their official website. If there is any change in the UP Board Time Table for Class 12, we will update it here. Meanwhile, students can download UP Board Time Table for Class 12 from the official website of UPMSP i.e.,upmsp.edu.in.We too will provide you with detailed information regarding UP Board Time Table for Class 12 and how to download the sAMe. Read on to find out.

UP Board Time Table Class 12 Overview

Before getting into the detailed UP Board Time Table for Class 12, let’s have an overview of the Exam

Name of the Exam Uttar Pradesh Intermediate (Class 12) Exams
Conducting Body Uttar Pradesh Madhyamika Shiksha Parishad (UPMSP)
Exam Mode Offline
Exam Timings Morning Shift – 8:00 AM to 11:15 AM and Afternoon Shift – 2:00 pm to 5:15 pm
Exam Start Date 18th February 2020
Exam End Date 5th March 2020
Official Website upmsp.edu.in

UP Board Time Table for Class 12 2020

UP Board Date Sheet for Class 12 is available on the official website of the UP Board, that is upsmp.edu.in. Students of Class 12 can also check out the UP Board Time Table for Class 12 as under

Date and Day Subject Timings
18 फरवरी मंगलवार Hindi/हिंदी 2:00 – 5:15 pm
20 फरवरी बृहस्पतिवार Painting/चित्रकला,
Geography/भूगोल, Physics/भौतिक विज्ञान
8:00 – 11:15 AM
2:00 – 5:15 PM
22 फरवरी शनिवार Military Science/सैन्य विज्ञान
Home Science/गृह विज्ञान, Business organizations and correspondence/व्यापारिक संगठन एवं पत्र व्यवहार
8:00 – 11:15 AM
2:00 – 5:15 PM
22 फरवरी सोमवार Civics/नागरिक शास्त्र, Chemistry/रसायन विज्ञान, Economics Commerce geography/अर्थशास्त्र तथा वाणिज्य भूगोल (For Commerce Students)/वाणिज्य छात्रों के लिए 2:00 – 5:15 PM
25 फरवरी मंगलवार Computer/कंप्यूटर 2:00 – 5:15 PM
26 फरवरी बुधवार English/अंग्रेजी 2:00 – 5:15 PM
28 फरवरी शुक्रवार History/इतिहास 2:00 – 5:15 PM
29 फरवरी शनिवार Biology/जीव विज्ञान, Maths/गणित 2:00 – 5:15 PM
2 मार्च सोमवार Psychology/मनोविज्ञान 2:00 – 5:15 PM
3 मार्च मंगलवार Economics/अर्थशास्त्र 2:00 – 5:15 PM
4 मार्च बुधवार Sanskrit/संस्कृत 2:00 – 5:15 PM
5 मार्च बृहस्पतिवार Maths (for Commerce students)/गणित (वाणिज्य वर्ग के लिए)
Sociology/समाजशास्त्र
8:00 – 11:15 AM
2:00 – 5:15 PM

UP Board Time Table for Class 12th Science 2020

Exam Date Subject Name Timings
18 फरवरी मंगलवार Hindi/हिंदी 2:00 PM to 5:15 PM
20 फरवरी सोमवार Physics/भौतिक विज्ञान 2:00 PM to 5:15 PM
22 फरवरी सोमवार Chemistry/रसायन विज्ञान 2:00 PM to 5:15 PM
26 फरवरी बुधवार English/अंग्रेजी 2:00 PM to 5:15 PM
29 फरवरी शनिवार Biology/जीव विज्ञान, Maths/गणित 2:00 PM to 5:15 PM

UP Board Time Table for Class 12th Arts 2020

Exam Date Subject Name Timings
18 फरवरी मंगलवार Hindi/हिंदी 2:00 PM to 5:15 PM
20 फरवरी बृहस्पतिवार Geography/भूगोल 2:00 PM to 5:15 PM
22 फरवरी सोमवार Civics/नागरिक शास्त्र 2:00 PM to 5:15 PM
26 फरवरी बुधवार English/अंग्रेजी 2:00 PM to 5:15 PM
28 फरवरी शुक्रवार History/इतिहास 2:00 PM to 5:15 PM
3 मार्च मंगलवार Economics/अर्थशास्त्र 2:00 PM to 5:15 PM
5 मार्च बृहस्पतिवार Sociology/समाजशास्त्र 2:00 PM to 5:15 PM

UP Board Time Table for Class 12th Commerce 2020

Exam Date Subject Name Timings
18 फरवरी मंगलवार Hindi/हिंदी 2:00 PM to 5:15 PM
20 फरवरी बृहस्पतिवार Accountancy/बही खाता तथा लेखाशास्त्र 2:00 PM to 5:15 PM
22 फरवरी शनिवार Business Organizations and correspondence/व्यापारिक संगठन एवं पत्र व्यवहार 2:00 PM to 5:15 PM
22 फरवरी सोमवार Economics Commerce geography/अर्थशास्त्र तथा वाणिज्य भूगोल (For Commerce Students)/वाणिज्य छात्रों के लिए 2:00 PM to 5:15 PM
26 फरवरी बुधवार English/अंग्रेजी 2:00 PM to 5:15 PM
5 मार्च बृहस्पतिवार Maths (for Commerce students)/गणित (वाणिज्य वर्ग के लिए) 2:00 PM to 5:15 PM

How To Check UP Board Time Table for Class 12 On Official Website?

Students of Class 12 under UP Board can check their Date Sheet/Time Table from the official website by following the steps as under:

  1. Visit the official website of UP Board: upmsp.edu.in
  2. Click on the “Dashboard” under “Important Login”.
  3. Click on “Timeline of the Year 2020” from the list.
  4. Your UP Board Time Table for Class 12 will be displayed.

UP Board Class 12 Hall Ticket/Admit Card

The UP Board Class 12 Hall Tickets will be released at least a month before the Exam and the UP Board Admit Card / Hall Ticket will be dispatched to their respective schools by the board officials of UpmSP. Students can also download their UP Board Hall Ticket from the official website: upmsp.edu.in. The Admit Card will provide information regarding the Exam, such as Exam date, Exam time, venue, important instructions, etc. Candidates are advised to read the instructions carefully and keep the Admit Card safe.

UP Board Time Table for Class 12 | Important Key Notes To Remember

  1. Understand your syllabus thoroughly that is going through each and every chapters and concept.
  2. Practice previous year question papers. This will help you to score good marks as you will know what to expect in the actual Exam.
  3. Take mock tests which in turn helps you to identify your weak areas, so that you can work on that.
  4. Create a time table and follow it strictly.
  5. Note down important formulas, equations, theorems, etc. which will be helpful in last-minute preparation.

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi शब्द रूप

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi शब्द रूप part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi शब्द रूप.

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Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name शब्द रूप
Number of Questions Solved 70
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi शब्द रूप

शब्द की परिभाषा
वर्गों के सार्थक समूह को ‘शब्द’ कहते हैं, जैसे-राम, मोहन, विचित्रा, सुनीता आदि। इन शब्दों से कुछ न कुछ अर्थ अवश्य निकलता है। अतः ये सभी शब्द हैं। संस्कृत में शब्द के दो भेद होते हैं।

  1. विकारी शब्द जिस शब्द में विकार पैदा होता है अर्थात् जो शब्द लिंग, वचन, कारक के अनुसार परिवर्तित हो जाता है, उसे ‘विकारी शब्द’ कहते हैं। विकारी शब्द लिंग, वचन, कारक आदि के प्रयोग से अनेक भागों में बँट जाता है; जैसे- देव, मोहन, लता आदि।
  2. अविकारी शब्द जिस शब्द में विकार पैदा नहीं होता है, उसे ‘अविकारी शब्द कहते हैं; जैसे-अत्र, तत्र, कुत्र, च, अपि आदि। ये सभी शब्द हमेशा इसी अवस्था में रहते हैं।

शब्दों के प्रकार
संस्कृत के सभी शब्द दो प्रकार के होते हैं।

  1. स्वरान्त जिस शब्द के अन्त में स्वर वर्ण (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ आदि वर्गों में से कोई एक वर्ण) हो, उसे ‘स्वरान्त वर्ण’ कहते हैं; जैसे- देव, मुनि, लता, नदी, साधु, वधू आदि। इन सभी शब्दों के अन्त में क्रमशः अ, इ, आ, ई, उ, ऊ स्वर वर्ण हैं। अतः ये सभी शब्द स्वरान्त हैं।
  2. व्यंजनान्त जिस शब्द के अन्त में व्यंजन हो, उसे ‘व्यंजनान्। शब्द’ कहते हैं; जैसे-बलवत्, जगत्, भगवत् आदि। इन सभी शब्दों के अन्त में व्यंजन वर्ण है। तथा स्वर न होने के कारण हलन्त (,) का चिह्न लगा हुआ है।

नोट नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार पाठ्यक्रम में लिंगों के अन्तर्गत संज्ञा व सर्वनाम का चयन किया गया है।

बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जगत्सु’ रूप हैं ‘जगत्’ शब्द का (2018)
(क) तृतीया विभक्ति एकवचन
(ख) चतुर्थी विभक्ति, द्विवचन
(ग) सप्तमी विभक्ति, बहुवचन
(घ) द्वितीया विभक्ति, बहुवचन

प्रश्न 2.
‘यस्मै रूप है ‘यत्’ शब्द का (2018)
(क) पंचमी विभक्ति, बहुवचन
(ख) चतुर्थी विभक्ति एकवचन
(ग) सप्तमी विभक्ति, द्विवचन
(घ) तृतीया विभक्ति, बहुवचन

प्रश्न 3.
‘यस्मात् (2018)
(क) तृतीया,. द्विवचन
(ख) पंचमी, एकवचन
(ग) चतुर्थी एकवचन
(घ) द्वितीया, एकवचन

प्रश्न 4.
येषाम् (2018)
(क) तृतीया, द्विवचन
(ख) षष्ठी, बहुवचन
(ग) चतुर्थी, एकवचन
(घ) द्वितीया, एकवचन

प्रश्न 5.
‘नाम्ना (2018)
(क) तृतीया, एकवचन
(ख) तृतीया, बहुवचन
(ग) चतुर्थी, बहुवचन
(घ) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 6.
‘सरिति (2018)
(क) षष्ठी, एकवचन
(ख) षष्ठी, बहुवचन
(ग) सप्तमी, एकवचन
(घ) पंचमी, एकवचन

प्रश्न 7.
‘अस्मै (2018)
(क) चतुर्थी, एकवचन
(ख) चतुर्थी, द्विवचन
(ग) पंचमी, बहुवचन
(घ) पंचमी, एकवचन

प्रश्न 8.
‘आत्मनि’ रूप है ‘आत्मन’ शब्द का (2018)
(क) प्रथमा, एकवचन
(ख) चतुर्थी, एकवचन
(ग) सप्तमी, एकवचन

प्रश्न 9.
‘सर्वस्यै’ रूप है ‘सर्व’ (स्त्रीलिंग) का (2018)
(क) द्वितीया, एकवचन
(ख) चतुर्थी, एकवचन
(ग) पंचमी, एकवचन प्रश्न

प्रश्न 10.
येषाम् रूप है ‘यत्’ शब्द (पुल्लिग) का (2018, 17)
(क) षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
(ख) पंचमी विभक्ति, एकवचन
(ग) तृतीया, बहुवचन प्रश्न

प्रश्न 11.
‘जगते’ रूप है जगत् का (2017)
(क) सप्तमी, एकवचन
(ख) द्वितीय, द्विवचन
(ग) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 12.
‘इदम्’ स्त्रीलिंग तृतीया बहुवचन का रूप है। (2017)
(क) आभिः
(ख) एभिः
(ग) अनया

प्रश्न 13.
‘आत्मानः’ रूप है ‘आत्मन्’ शब्द का (2017)
(क) पंचमी विभक्ति, एकवचन
(ख) द्वितीया विभक्ति, बहुवचन
(ग) प्रथमा विभक्ति, बहुवचन

प्रश्न 14.
‘यस्यै’ रूप है यत् (स्त्रीलिंङ्ग) का (2017)
(क) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
(ख) पंचमी विभक्ति एकवचन
(ग) तृतीया विभक्ति एकवचन

प्रश्न 15.
‘सरिति’ रूप है सरिता का (2017)
(क) द्वितीय द्विवचन
(ख) चतुर्थी एकवचन
(ग) सप्तमी एकवचन

प्रश्न 16.
सर्वस्य रूप है सर्व (पुल्लिग) का
(क) पंचमी, एकवचन
(ख) षष्ठी, एकवचन
(ग) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 17.
‘एषाम् (2017)
(क) षष्ठी, बहुवचन
(ख) चतुर्थी, एकवचन
(ग) चतुर्थी, द्विवचन
(घ) तृतीया, द्विवचन

प्रश्न 18.
सर्वस्मै शब्द (नपुंसकलिंग) रूप है (2016)
(क) तृतीया, द्विवचन।
(ख) पंचमी, एकवचन
(ग) चतुर्थी, एकवचन
(घ) द्वितीया, बहुवचन

प्रश्न 19.
राजा (राजन्-पुल्लिंग) शब्द के द्वितीया, एकवचन का रूप है (2016)
(क) राज्ञा’
(ख) राज्ञः
(ग) राजानम्
(घ) राजभिः

प्रश्न 20.
अस्मै रूप है ‘इदम्’ पुल्लिग शब्द का (2016)
(क) षष्ठी, द्विवचन
(ख) सप्तमी, एकवचन
(ग) द्वितीया, बहुवचन
(घ) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 21.
राजा शब्द के पुल्लिग, तृतीया एकवचन में रूप है (2016)
(क) राज्ञो
(ख) राज्ञः
(ग) राज्ञा
(घ) राज्ञोः

प्रश्न 22.
नाम्ने रूप है ‘नाम’ शब्द के (2016)
(क) चतुर्थी, एकवचन
(ख) प्रथम, द्विवचन
(ग) सप्तमी, एकवचन
(घ) पंचमी, एकवचन

प्रश्न 23.
सर्व पुल्लिग, पंचमी एकवचन का रूप होगा (2016)
(क) सर्वात्
(ख) सर्वस्मात्
(ग) सर्वस्य
(घ) सर्वस्मिन्

प्रश्न 24.
‘आत्मने’ रूप है आत्मन् (आत्मा) का (2017, 06)
(क) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
(ख) प्रथमा विभक्ति, द्विवचन
(ग) तृतीया विभक्ति, एकवचन
(घ) सप्तमी विभक्ति, बहुवचन

प्रश्न 25.
सरितु (नदी) स्त्रीलिंग, सप्तमी विभक्ति एकवचन का रूप होगा (2016)
(क) सरितौ
(ख) सरिते
(ग) सरिति
(घ) सरिता

प्रश्न 26.
‘आत्मभिः’ रूप है आत्मन् का (2016)
(क) द्वितीया विभक्ति, द्विवचन
(ख) सप्तमी विभक्ति एकवचन
(ग) तृतीया विभक्ति, बहुवचन
(घ) चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन

प्रश्न 27.
‘सर्व’ स्त्रीलिंग, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन का रूप है (2016)
(क) सर्वासु
(ख) सर्वाभ्यः
(ग) सवस्यै
(घ) सर्वभ्य

प्रश्न 28.
‘सरिते’ रूप है सरित् शब्द का (2017, 16)
(क) सम्बोधन एकवचन
(ख) प्रथमा एकवचन
(ग) द्वितीया एकवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन

प्रश्न 29.
‘इदम्’ स्त्रीलिंग, सप्तमी बहुवचन का रूप होगा। (2018, 16)
(क) एषु
(ख) आसु
(ग) अस्मासु
(घ) अस्याम्

प्रश्न 30.
‘आत्मना’ आत्मन् शब्द रूप का है- (2018, 16)
(क) तृतीया, एकवचन
(ख) द्वितीया, द्विवचन
(ग) तृतीया, बहुवचन
(घ) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 31.
‘राजनि’ शब्द रूप का है। (2016)
(क) प्रथम, द्विवचन
(ख) तृतीया, बहुवचन
(ग) सप्तमी, एकवचन
(घ) षष्ठी, द्विवचन

प्रश्न 32.
सर्व (स्त्रीलिंग) का तृतीया एकवचन का रूप है। (2016)
(क) सर्वम्
(ख) सर्वया
(ग) सर्वामिः
(घ) सर्वस्मै

प्रश्न 33.
‘सर्व’ पुल्लिङ्ग चतुर्थी एकवचन का रूप होगा (2015, 14, 13, 10)
(क) सर्वाम्
(ख) सर्वस्मिन्
(ग) सर्वस्मै
(घ) सर्वस्यै

प्रश्न 34.
‘सर्वस्मिन्’ शब्द रूप है, सर्व (पुल्लिङ्ग) का (2018, 12)
(क) द्वितीया, द्विवचन
(ख) तृतीया, एकवचन
(ग) चतुर्थी, द्विवचन
(घ) सप्तमी, एकवचन

प्रश्न 35.
‘नाम्नि’ रूप है ‘नामन्’ का (2013, 12)
(क) तृतीया, एकवचन
(ख) सप्तमी, एकवचन
(ग) चतुर्थी, बहुवचन
(घ) द्वितीया, बहुवचन

प्रश्न 36.
‘राज्ञाम्’ रूप है ‘राजन्’ का (2014, 11)
(क) सप्तमी, बहुवचन
(ख) पञ्चमी, एकवचन
(ग) तृतीया, द्विवचन
(घ) षष्ठी, बहुवचन

प्रश्न 37.
‘इदम्’ पुल्लिङ्ग द्वितीया बहुवचन का रूप होगा (2012)
(क) इमाः
(ख) इमान्
(ग) इमानि
(घ) इमाम

प्रश्न 38.
‘आत्मनु’ शब्द का षष्ठी बहुवचन रूप होगा (2014, 13)
(क) आत्मनि
(ख) आत्मनेः
(ग) आत्मनाम्
(घ) हे आत्मन्

प्रश्न 39.
‘राज्ञा’ शब्द रूप है, ‘राजन्’ शब्द का (2012)
(क) चतुर्थी, एकवचन
(ख) तृतीया, एकवचन
(ग) पञ्चमी, एकवचन
(घ) द्वितीया, द्विवचन

प्रश्न 40.
‘राज्ञि’ शब्द रूप है ‘राजन’ का (2011)
(क) तृतीया, बहुवचन
(ख) सप्तमी, एकवचन
(ग) षष्ठी, द्विवचन
(घ) द्वितीया, द्विवचन

प्रश्न 41.
‘सरिते’ शब्द रूप है ‘सरित्’ (नदी) शब्द के (2013, 12, 11)
(क) तृतीया, एकवचन
(ख) चतुर्थी, द्विवचन
(ग) चतुर्थी, एकवचन
(घ) पञ्चमी, द्विवचन

प्रश्न 42.
यत् (स्त्रीलिङ्ग) सप्तमी बहुवचन का रूप होगा (2014, 13)
(क) यस्यै
(ख) याभिः
(ग) यासाम्
(घ) यासु

प्रश्न 43.
‘राजभिः’ रूप है ‘राजन’ का (2010)
(क) षष्ठीं. द्विवचन
(ख) पञ्चमी, एकवचन
(ग) तृतीया, बहुवचन
(घ) सप्तमी बहुवचन

प्रश्न 44.
‘जगति’ रूप है ‘जगत्’ का (2015, 14, 13, 12, 10)
(क) सप्तमी, एकवचन
(ख) पंचमी, एकवचन
(ग) चतुर्थी, एकवचन
(घ) षष्ठी, एकवचन

प्रश्न 45.
‘सरिताम्’ शब्द रूप है ‘सरित’ शब्द का (2012)
(क) द्वितीया, एकवचन
(ख) सप्तमी, बहुवचन
(ग) तृतीया, द्विवचन
(घ) षष्ठी, बहुवचन

प्रश्न 46.
‘यत्’ (स्त्रीलिङ्ग) षष्ठी, बहुवचन का रूप होगा (2011)
(क) येषाम्
(ख) यासाम्
(ग) यस्याः
(घ) यस्यै

प्रश्न 47.
‘इदम्’ (पुल्लिङ्ग) शब्द का चतुर्थी विभक्ति एकवचन का रूप है। (2018, 14, 13, 11)
(क) इमे
(ख) अस्य
(ग) एषु
(घ) अस्मै

प्रश्न 48.
‘सर्व’ (स्त्रीलिङ्ग) शब्द के चतुर्थी एकवचन का रूप होगा (2014, 12, 11, 10)
(क) सर्वस्यै
(ख) सर्वस्मै
(ग) सर्वस्मिन्
(घ) सर्वेण

प्रश्न 49.
‘यत्’ (पुल्लिङ्ग) शब्द सप्तमी एकवचन का रूप होगा। (2012)
(क) यस्यै
(ख) यस्मात्
(ग) येन
(घ) यस्मिन्

प्रश्न 50.
‘सर्व’ (सब) (पुल्लिङ्ग) तृतीया बहुवचन का रूप होगा (2010)
(क) सर्वान्
(ख) सर्वेषु
(ग) सर्वेः
(घ) सर्वेभ्यः

प्रश्न 51.
‘अदस्’ (पुल्लिङ्गः तृतीया एकवचन का रूप होगा । (2010)
(क) अमुना
(ख) अमूभ्याम्
(ग) अभून्
(घ) अमुष्मै

प्रश्न 52.
‘अनेन’ रूप है ‘इदम्’ (पुल्लिङ्ग) का (2013, 11, 10)
(क) तृतीया, एकवचन
(ख) चतुर्थी, द्विवचन
(ग) द्वितीया, बहुवचन
(घ) पञ्चमी, द्विवचन

प्रश्न 53.
‘अयम्’ शब्द रूप है ‘इदम्’ (पुल्लिङ्ग) का (2014)
(क) द्वितीया, एकवचन
(ख) प्रथमा, एकवचन
(ग) पंचमी, द्विवचन
(घ) सप्तमी, एकवचन

प्रश्न 54.
‘नाम्ने’ रूप है ‘नाम’ का (2014, 12)
(क) द्वितीया, बहुवचन
(ख) चतुर्थी, एकवचन
(ग) षष्ठी, द्विवचन
(घ) सप्तमी, एकवचन

प्रश्न 55.
‘येभ्यः’ रूप है ‘यद्’ (नपुंसकलिङ्ग) का (2011)
(क) चतुर्थी, बहुवचन
(ख) प्रथम, द्विवचन
(ग) तृतीया, एकवचन
(घ) सप्तमी, एकवचन

प्रश्न 56.
‘हरीणाम् रूप है ‘हरि’ का (2013, 12)
(क) प्रथम, द्विवचन्
(ख) षष्ठी, बहुवचन
(ग) सप्तमी, एकवचन
(घ) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 57.
‘इदम्’ (पुल्लिङ्ग) तृतीया एकवचन का रूप है (2018, 14)
(क) अनया
(ख) अनेन
(ग) अस्य
(घ) आसु

प्रश्न 58.
‘राज्ञः’ शब्द रूप है ‘राजन’ का (2014, 12)
(क) द्वितीया, बहुवचन
(ख) तृतीया, एकवचन
(ग) पंचमी/धष्ठी, एकवचन
(घ) सप्तमी, बहुवचन

प्रश्न 59.
‘राजन’ शद का द्वितीया द्विवचन का रूप होगा (2014)
(क) राज्ञोः
ख) राज्ञः
(ग) राज्ञाम्
(घ) राजानौ

प्रश्न 60.
‘सर्व’ (पुल्लिङ्ग) सप्तमी द्विवचन का रूप होगा (2013)
(क) सर्वाभ्याम्
(ख) सर्वैः
(ग) सर्वस्य
(घ) सर्वयोः

प्रश्न 61.
‘सरित्’ (नदी) स्त्रीलिङ्ग चतुर्थी एकवचन का रूप होगा (2017)
(क) सरिति
(ख) सरिते
(ग) सरितम्
(घ) सरितः

प्रश्न 62.
‘सरिता’ रूप है ‘सरित्’ का (2018, 15, 14, 13, 12)
(क) प्रथमा, एकवचन
(ख) द्वितीया, एकवचन
(ग) तृतीया, एकवचन
(घ) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 63.
‘नामसु’ शब्द रूप है ‘नामन्’ को (2013, 06)
(क) द्वितीया, एकवचन
(ख) सप्तमी, बहुवचन
(ग) षष्ठी, द्विवचन
(घ) पंचमी, बहुवचन

प्रश्न 64.
‘रा’ शब्द रूप है ‘राजन्’ शब्द का (2015, 13, 12, 11)
(क) तृतीया, एकवचन
(ख) चतुर्थी, एकवचन
(ग) पंचमी, बहुवचन
(घ) सप्तमी, एकवचन

प्रश्न 65.
‘अदस्’ (पुल्लिङ्ग) षष्ठी बहुवचन का रूप होगा। (2011)
(क) अमुष्मै
(ख) अभूभ्याम्
(ग) अमुष्मिन्
(घ) अमीषाम्

प्रश्न 66.
‘यद्’ (पुल्लिङ्ग) द्वितीया बहुवचन का रूप है। (2012)
(क) याः
(ख) यानि
(ग) यान्
(घ) यै

प्रश्न 67.
‘आत्मने’ शब्द रूप है ‘आत्मन्’ का (2014, 13, 12, 11, 10)
(क) पंचमी, एकवचन
(ख) चतुर्थी, एकवचन
(ग) तृतीया, एकवचन
(घ) षष्ठी, एकवचन

प्रश्न 68.
सर्वस्यै (2012)
(क) प्रथमा, बहुवचन
(ख) पञ्चमी, एकवचन
(ग) षष्ठी, द्विवचन
(घ) चतुर्थी, एकवचन

प्रश्न 69.
‘एभिः’ रूप है ‘इदम्’ शब्द का (2018, 19)
(क) पंचमी, एकवचन
(ख) तृतीया, बहुवचन
(ग) द्वितीया, द्विवचन
(घ) सप्तमी, बहुवचन

प्रश्न 70.
‘यत् स्त्रीलिङ्गा प्रथमा, एकवचन का रूप होगा। (2013)
(क) यः
(ख) या
(ग) ये
(घ) यौ

उत्तर
1. (ग), 2. (ख), 3. (ख), 4. 5. (क), 6. (ग), 7. (क) 8. (ग), 9. (ख), 10. (क), 11. (ग),12. (क), 13. (ग), 14. (क), 15. (ग), 16. (ख), 17. (क), 18. (ग), 19. (ग), 20. (घ), 21. (ग), 22. (क), 23. (ख), 24. (क), 25. (ग), 26. (ग), 27. (ग), 28. (घ), 29. (ख) , 30. (क), 31. (ग), 32. (ग), 33. (ग), 34. (घ), 35. (ख), 36. (घ) , 37. (ख), 38. (ग), 39. (ख), 40. (ख), 41. (ग), 42. (घ), 43. (ग), 44. (क), 45. (घ), 46. (ख), 47. (घ), 48. (क), 49. (घ), 50. (ग), 51. (क), 52. (क), 53. (ख), 54. (ख), 55. (क), 56. (ख), 57. (ख), 58. (ग), 59. (घ), 60. (घ), 61. (ख), 62. (ग), 63. (ख), 64. (ख), 65. (घ), 66. (ग), 67. (ख), 68. (घ), 69. (ख), 70. (ख)

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 5 प्रगति के मानदण्ड

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Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name प्रगति के मानदण्ड
Number of Questions Solved 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 5 प्रगति के मानदण्ड

प्रगति के मानदण्ड – जीवन/साहित्यिक परिचय

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से के पाठों के लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता है। इस प्रश्न में किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ
पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर, 1916 को मथुरा (उत्तर प्रदेश) के नगला चन्द्रभान में हुआ था। इनके पिता श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय और माता श्रीमती रामप्यारी एक धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। इनके पिता भारतीय रेलवे में नौकरी करते थे, इसलिए इनका अधिकतर समय बाहर ही बीतता था।

पण्डित जी अपने ममेरे भाइयों के साथ खेलते हुए बड़े हुए। जब इनकी आयु 3 वर्ष की थी, तब इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। पिता की मृत्यु के बाद इनकी माता बीमार रहने लगी थी। कुछ समय पश्चात् इनकी माता की भी मृत्यु हो गई। इन्होंने पिलानी, आगरा तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की। बी. एस. सी., बी. टी. करने के बाद भी इन्होंने नौकरी नहीं की और अपना सारा जीवन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में लगा दिया। अपने छात्र जीवन में ही ये इस आन्दोलन में चले गए थे। बाद में ये राष्ट्रीय स्वयं सेवक के लिए प्रचार-प्रसार करने लगे।

वर्ष 1961 में अखिल भारतीय जन संघ के बनने पर, इन्हें संगठन मन्त्री बनाया गया। उसके बाद वर्ष 1953 में ये अखिल भारतीय जनसंघ के महामन्त्री बनाए गए। महामन्त्री के तौर पर पार्टी में लगभग 15 सालों तक इस पद पर रहकर अपनी इस पार्टी को एक मजबूत आधारशिला दी। कालीकट अधिवेशन वर्ष 1967 में ये अखिल भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 11 फरवरी, 1968 को एक रेल यात्रा के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने रात को मुगलसराय, उत्तर प्रदेश के आस-पास उनकी हत्या कर दी थी और मात्र 52 साल की आयु में पण्डित जी ने अपने प्राण देश को समर्पित कर दिए।

साहित्यिक सेवाएँ
पण्डित दीनदयाल उपाध्याय महान् चिन्तक और संगठनकर्ता तथा एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने जीवनपर्यन्त अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी व सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य में भी इनकी गहरी अभिरुचि थी। इनके हिन्दी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न प-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। केवल एक बैठक में ही इन्होंने ‘चन्द्रगुप्त ‘नाटक’ लिख डाला था।

कृतियाँ
इनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें इस प्रकार हैं-दो योजनाएँ, राष्ट्र जीवन की दिशा, सम्राट चन्द्रगुप्त, राजनैतिक डायरी, जगत् गुरु शंकराचार्य, एकात्मक मानवतावाद, एक प्रेम कथा, लोकमान्य तिलक की राजनीति, राष्ट्र धर्म, पाँचजन्य।

भाषा-शैली
पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी पत्रकार तो थे ही, साथ में चिन्तक और लेखक भी थे। जनसंघ के राष्ट्र जीवन दर्शन के निर्माता दीन दयाल जी का उद्देश्य स्वतन्त्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्त्व दृष्टि प्रदान करना था। इन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को ‘एकात्म मानवतावाद’ जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी।

प्रगति के मानदण्ड – पाठ का सार

परीक्षा में ‘पाठ का सार’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।

राजनीतिक दलों के विषय में लेखक के विचार
लेखक के अनुसार, भारत के अधिकांश राजनीतिक दल पाश्चात्य विचारों को लेकर हीं चलते हैं। वे पश्चिम की किसी-न-किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हुए तथा वहाँ के दलों की नकल मात्र हैं। वे भारत की इच्छाओं को पूर्ण नहीं कर सकते और न ही चौराहे पर खड़े विश्वमानव का मार्गदर्शन कर सकते हैं।

मनुष्य के विकास में समाज का दायित्व
लेखक ने मनुष्य के विकास में समाज के दायित्व को महत्वपूर्ण माना है। लेखक के अनुसार इस संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भरण-पोषण, शिक्षण, स्वस्थ एवं क्षमता की अवस्था तथा अस्वस्थ एवं अक्षमता की अवस्था में उचित अवकाश की व्यवस्था करने और जीविकोपार्जन की जिम्मेदारी समाज की है। प्रत्येक सभ्य समाज किसी-न-किसी रूप में इसका पालन भी करता है। लेखक ने समाज द्वारा मनुष्य का उचित ढंग से निर्वाह करने को प्रगति का मानदण्ड माना है, इसलिए लेखक का मानना है कि न्यूनतम जीवन स्तर की गारण्टी, शिक्षा, जीविकोपार्जन के लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को हमें मूलभूत अधिकार के रूप में स्वीकार करना होगी।

‘मानव सामाजिक व्यवस्था का केन्द्र
एकात्म मानववाद मानव जीवन व सम्पूर्ण सृष्टि के एकमात्र सम्बन्ध का दर्शन है। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी ने इसका वैज्ञानिक विवेचन किया। उनके अनुसार | हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्र मानव होना चाहिए, ‘जो’ जहाँ मनुष्य हैं, वहाँ ब्रह्माण्ड है’, के न्याय के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि का जीवमान प्रतिनिधि एवं उसका उपकरण है। जिस व्यवस्था में पूर्ण मानव के स्थान पर एकांगी मानव पर विचार किया जाए, वह अधूरी है। लेखक के अनुसार, भारत ने सम्पूर्ण सृष्टि रचना में एकत्व देखा है। हमारा आधार एकात्म मानव है, इसलिए एकात्म मानववाद के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा। “सिद्धान्त और नीति” से सम्पादित ‘प्रगति के मानदण्ड” अध्याय में लेखक ने मनुष्य को सामाजिक व्यवस्था के केन्द्र में रखा है और मनुष्य द्वारा अपने भरण-पोषण में असमर्थ होने पर समाज को उसका दायित्व सौंपा है। साथ ही समाज में व्याप्त कुरीतियों को परम्परा का नाम देकर अपनाए रखने की संकीर्ण मानसिकता व भारतीय एवं पाश्चात्य समाज के सैद्धान्तिक विभेदों को प्रकट करते हुए मनुष्य को अपना बल बदाने तथा विश्व की प्रगति में सहायक भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है।

भारतीय संस्कृति के प्रति संकीर्ण मानसिकता
लेखक के अनुसार, भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा लेकर चलने वाले कुछ राजनीतिक दल हैं, लेकिन वे भारतीय संस्कृति की सनातनता (प्राचीनता) को उसकी गतिहीनता समझ बैठे हैं, इसलिए ये दल पुरानी रूदियों का समर्थन करते हैं। भारतीय संस्कृति के क्रान्तिकारी तत्त्व की ओर उनकी दृष्टि नहीं जाती। समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियों; जैसे छुआछूत, जाति-भेद दहेज, मृत्युभोज, नारी-अवमानना आदिको लेखक ने भारतीय संस्कृति और समाज के लिए रोग के लक्षण माना है। भारत के कई महापुरुष, जो भारतीय परम्परा और संस्कृति के प्रति निष्ठा रखते थे, वे इन बुराइयों के विरुद्ध लड़ें। अन्त में लेखक ने स्पष्ट किया है कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के क्षीण होने का कारण रूदियों हैं। एकात्म मानव विचार भारतीय और भारत के बाहर की सभी चिन्ताधाराओं का समान आकलन करके चलता है। उनकी शक्ति और दुर्बलताओं को परखता है और एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करता है, जो मानव को अब तक के उसके चिन्तन, अनुभव और उपलब्धि की मंजिल से आगे बढ़ा सके।

स्वयं की शक्ति बढ़ाने पर बल देना
लेखक के अनुसार, पाश्चात्य जगत् ने भौतिक उन्नति तो की, लेकिन उसकी आध्यात्मिक अनुभूति पिछड़ गई अर्थात् वह आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाया। वहीं दूसरी ओर’ भारत भौतिक दृष्टि से पिछड़ गया, इसलिए भारत की आध्यात्मिकता शब्द मात्र रह गई। शक्तिहीन व्यक्ति को आत्मानुभूति नहीं हो | सकती। बिना स्वयं को प्रकाशित किए सिद्धि (सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है। अतः आवश्यक है कि बल की उपासना के आदेश के अनुसार हम अपनी शक्ति को बढ़ाए और स्वयं की उन्नति करने के लिए प्रयत्नशील बनें, जिससे हम अपने रोगों को दूर कर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकें तथा विश्व के लिए भार न बनकर | उसकी प्रगति में साधक की भूमिका निभाने में सहायक हो सकें।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर:::: देने होंगे।

प्रश्न 1.
जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भरण-पोषण की, उसके शिक्षण की, जिससे वह समाज के एक जिम्मेदार घटक के नाते अपना योगदान करते हुए अपने विकास में समर्थ हो सके, उसके लिए स्वस्थ एवं क्षमता की अवस्था में जीविकोपार्जन की और यदि किसी भी कारण वह सम्भव न हो, तो भरण-पोषण की तथा उचित अवकाश की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी समाज की है। प्रत्येक सभ्य समाज इसका किसी-न-किसी रूप में निर्वाह करता है। प्रगति के यही मुख्य मानदण्ड हैं। अतः न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी, शिक्षा, जीविकोपार्जन के लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को हमें मूलभूत अधिकार के रूप में स्वीकार करना होगा।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार मनुष्य के विकास में समाज की क्या भूमिका है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार मनुष्य के विकास में समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि समाज में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पालन-पोषण, शिक्षण, जीविका के लिए रोजी रोटी का उचित प्रबन्ध करना समाज की जिम्मेदारी है।

(ii) मनुष्य की प्रगति का मानदण्ड क्या हैं?
उत्तर:
जब समाज मनुष्य के प्रति अपने सभी दायित्वों का निर्वाह पूरी निष्ठा से करता है, तो मनुष्य की प्रगति होती है। समाज द्वारा मनुष्य का पोषण करना ही
प्रगति और विकास का मुख्य मानदण्ड है।

(iii) लेखक के अनुसार व्यक्ति के मूल अधिकार क्या होने चाहिए?
उत्तर:
लेखक के अनुसार मनुष्य के न्यूनतम जीवन स्तर की गारण्टी, शिक्षा, जीवन-यापन के लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण हमारे मूल अधिकार होने चाहिए।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में मनुष्य को उसके मूलभूत अधिकारों के प्रति सचेत करना तथा मनुष्य के विकास में समाज के दायित्व का बोध कराना ही लेखक का मूल उद्देश्य है।

(v) ‘न्यूनतम’ व ‘व्यवस्था’ शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:
न्यूनतम् – उच्चतम, व्यवस्था – अव्यवस्था।

प्रश्न 2.
हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्र मानव होना चाहिए, जो (‘यत् पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे’) के न्याय के अनुसार समष्टि का जीवमान प्रतिनिधि एवं उसका उपकरण है। (भौतिक उपकरण मानव के सुख के साधन हैं, साध्य नहीं।) जिस व्यवस्था में भिन्नरुचिलोक का विचार केवल एक औसत मानव से अथवा शरीर-मन-बुद्धि-आत्मायुक्त, अनेक एषणाओं से प्रेरित पुरुषार्थचतुष्टयशील, पूर्ण मानव के स्थान पर एकांगी मानव का ही विचार किया जाए, वह अधूरा है। हमारा आधार एकात्म मानव है, जो अनेक एकात्म मानववाद (Integral Humanism) के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार सामाजिक व्यवस्था के केन्द्र में कौन होना चाहिए?
उत्तर:
लेखक के अनुसार हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था के मध्य अर्थात् केन्द्र में मनुष्य होना चाहिए। मनुष्य ही ब्रह्माण्ड का आधार है तथा पृथ्वी पर जीव का प्रतिनिधित्व करने वाला तथा उसका साधन मनुष्य ही है।

(ii) मनुष्य का लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
टी.वी., इण्टरनेट आदि भौतिक उपकरण मनुष्य को सुख पहुँचाने के साधन हैं, उसका लक्ष्य नहीं हैं। मनुष्य इन साधनों से सुख तो प्राप्त कर सकता है, परन्तु इन्हें अपना लक्ष्य नहीं मान सकता है, क्योंकि मनुष्य का लक्ष्य निरन्तर प्रगति करनी है।

(iii) लेखक के अनुसार कौन-सी व्यवस्था अधूरी कहलाती हैं?
उत्तर:
लेखक के अनुसार जिस व्यवस्था में सम्पूर्ण मानव जाति के स्थान पर अकेले मानव पर विचार किया जाए अर्थात् केवल एक ही मनुष्य के विकास पर बले दिया जाए, वह व्यवस्था अधूरी कहलाती है।

(iv) भारतीय संस्कृति का आधार क्या है?
उत्तर:
भारतीय संस्कृति का महत्त्वपूर्ण आधार एकात्म मानव है। भारत की सम्पूर्ण * सृष्टि में एकत्व दृष्टिगत होता है, इसलिए हमें एकात्म मानवता के आधार पर जीवन में विकास करना होगा।

(v) ‘समष्टि व ‘पूर्ण’ शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:
समष्टि – व्यष्टि, पूर्ण – अपूर्ण।

प्रश्न 3.
भारत के अधिकांश राजनीतिक दल पाश्चात्य विचारों को लेकर ही चलते हैं। वे वहाँ किसी-न-किसी राजनीतिक विचारधारा से सम्बद्ध एवं वहाँ के दलों की अनुकृति मात्र हैं। वे भारत की मनीषा को पूर्ण नहीं कर सकते और न चौराहे पर खड़े विश्वमानव का मार्गदर्शन कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा लेकर चलने वाले भी कुछ राजनीतिक दल हैं, किन्तु वे भारतीय संस्कृति की सनातनता को उसकी गतिहीनता समझ बैठे हैं और इसलिए बीते युग की रूढ़ियों अथवा यथास्थिति का समर्थन करते हैं। संस्कृति के क्रान्तिकारी तत्त्व की ओर उनकी दृष्टि नहीं जाती।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) भारतीय राजनीतिक दलों के विषय में लेखक के क्या विचार हैं?
उत्तर:
लेखक भारतीय राजनीतिक दलों के विषय में विचार व्यक्त करते हुए कहता है कि भारत के अधिकतर राजनीतिक दल पश्चिमी देशों के विचारों से प्रभावित होकर उन्हें ही आधार मानकर चलते हैं। भारतीय दल पश्चिम के राजनीतिक दलों की नकल मात्र है।

(ii) लेखक के अनुसार, भारतीय राजनीतिक दल विकासशील भारत का मार्गदर्शन क्यों नहीं कर सकते?
उत्तर:
लेखक के अनुसार, भारत के अधिकांश राजनीतिक दल, विकासशील भारत का मार्गदर्शन नहीं कर सकते, क्योंकि वे पाश्चात्य विचारों का ही अनुसरण करते हैं। वे भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा का दिखावा मात्र करते हैं।

(iii) पुरानी रूढ़ियों का समर्थन करने वाले दलों के विषय में लेखक का क्या मत है?
उत्तर:
पुरानी रूदियों का समर्थन करने वाले कुछ राजनीतिक दल भारतीय संस्कृति की प्राचीनता और गौरव को विकास के मार्ग की रुकावट समझकर पुरानी रूदियों का समर्थन करते हैं। भारतीय संस्कृति के क्रान्तिकारी तत्वों की ओर इनकी दृष्टि ही नहीं जाती।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में अधिकतर राजनीतिक दलों की पाश्चात्य विचारधाराओं से संचालित होने तथा राजनीतिक दलों की भारतीय संस्कृति के प्रति संकीर्ण मानसिकता को प्रकट करना ही लेखक का मुख्य उद्देश्य है।

(v) ‘राजनीतिक’, व ‘अनुकृति’ शब्दों में क्रमशः प्रत्यय तथा उपसर्ग अँटकर लिखिए।
उत्तर:
राजनीतिक – इक (प्रत्यय), अनुकृति – अनु (उपसर्ग)।

प्रश्न 4.
आज के अनेक आर्थिक और सामाजिक विधानों की हम जाँच करें, तो पता चलेगा कि वे हमारी सांस्कृतिक चेतना के क्षीण होने के कारण युगानुकूल परिवर्तन और परिवर्द्धन की कमी से बनी हुई रूढ़ियों, परकीयों के साथ संघर्ष की परिस्थिति से उत्पन्न माँग को पूरा करने के लिए अपनाए गए उपाय अथवा परकीयों द्वारा थोपी गई या उनका अनुकरण कर स्वीकार की गई व्यवस्थाएँ मात्र हैं। भारतीय संस्कृति के नाम पर उन्हें जिन्दा रखा जा सकता।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश ‘प्रगति के मानदण्ड पाठ से लिया गया है। इसके लेखक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय है।

(i) लेखक के अनुसार भारतीय सांस्कृतिक चेतना के कमजोर होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार भारतीय सांस्कृतिक चेतना के कमजोर होने का मुख्य कारण युग के अनुकूल परिवर्तन न करके पुरानी प्रथाओं, रूढियों को अधिक महत्त्व देना है।

(iii) युगानुरूप परिवर्तन एवं विकास नहीं होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
युगानुरूप परिवर्तन एवं विकास नहीं होने का मुख्य कारण हमारी प्राचीन रूढ़ियाँ, परम्पराएँ, कुप्रथाएँ हैं, जिन्हें समकालीन समय में मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक महत्त्व देने के कारण हमारी प्रगति रुक गई।

(iv) भारतीय नीतियाँ एवं सिद्धान्त किस प्रकार विदेशियों की नकल मात्र बनकर रह गए हैं?
उत्तर:
भारतीय नीतियाँ एवं सिद्धान्त विदेशियों की नकल मात्र बनकर रह गए हैं, क्योंकि विदेशियों के साथ होने वाले संघर्ष तथा उन परिस्थितियों से उत्पन्न माँग को पूरा करने के लिए अपनाए गए तरीके या तो विदेशियों द्वारा जबरदस्ती थोपे गए हैं या स्वयं हमने उनकी नकल करके नीतियों एवं सिद्धान्त निर्मित कर लिए हैं।

(v) ‘परिस्थिति’, व सांस्कृतिक’ शब्दों में क्रमशः उपसर्ग एवं प्रत्यय आँटकर लिखिए।
उत्तर:
परिस्थिति – परि (उपसर्ग), सांस्कृतिक – इक (प्रत्यय)

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name सन्धि
Number of Questions Solved 39
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि

परिभाषा
दो शब्दों के पास आने पर पहले शब्द के अन्तिम वर्ण और दूसरे शब्द के प्रथम वर्ण अथवा दोनों में आए विकार अर्थात् परिवर्तन को सन्धि कहते हैं।
जैसे- हिम + आलय = हिमालय
सत् + जनः = सज्जनः आदि।

सन्धि के भेद
सन्धि के तीन भेद होते हैं, जो निम्न हैं

1. स्वर सन्धि

परिभाषा स्वर का स्वर के साथ मेल को स्वर सन्धि कहते हैं। इसके निम्नलिखित भेद हैं।
1. दीर्घ सन्धि (सूत्र अकः सवर्णे दीर्घः) इस सन्धि में पूर्व पद का अन्तिम और उत्तर पद का प्रथम वर्ण समान होने पर दोनों मिलकर दीर्घ स्वर हो जाता है।
जैसे-
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि img 1

ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-अकः सवर्ण दीर्घः

2. गुण सन्धि (सुत्र आदगुणः) इस सन्धि में पूर्व पद के अन्त में अ/आ तथा उत्तर पद का प्रथम वर्ण इ/ई, ऊ, ऋ, कोई हो, तो दोनों के स्थान पर क्रमशः ए, ओ, अर्, अल् हो जाता है।
जैसे-
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि img 2
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है- आद्गुणः।

3. वृद्धि सन्धि (सूत्र वृदिरेचि) इस सन्धि में पूर्व पद का अन्तिम वर्ण अ/आ तथा उत्तर पद का प्रथम वर्ण ए/ए, ओ हो, तो दोनों वर्गों के स्थान पर क्रमशः है। • तथा औं हो जाता है।
जैसे-
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि img 3
⇒  ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है- वृद्धिरेचि।

4. यण सन्धि (सूत्र इकोयणचि) इस सन्धि में इ/ई, उऊ, ऋ/लू किसी भी वर्ण के बाद असमान वर्ण आने पर दोनों मिलकर क्रमशः य, व, र, ल हो जाते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि img 8
UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सन्धि img 4
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-इकोयणचि।

5. अयादि सन्धि (सूत्र एचोऽयवायावः) इस सन्धि में ए, ओ, ऐ, औं में से किसी भी वर्ण के बाद कोई स्वर आए तो ये वर्ण क्रमशः अय्, अव्, आयू, आद् में बदल जाते हैं।
जैसे-
हरे + ए = (हर् + ए + ए) = हर् + अय् + ए = हरये
ने + अनम् = (न् + ए + अनम्) = न् + अय् + अनम् = नयनम् (2018, 10)
शे + अनम् = (श् + ए + अनम्) = श् + अय् +अनम् = शयनम् (2015, 12)
नै + अकः = (न् + ऐ + अकः) + न् + आय् + अकः = नायकः (2013, 12, 10)
पौ + अकः = (प् + आ + अकः) = प् + आ + अकः = पावकः (2018, 13, 12, 10)
पो + अनः = (प् + आ + अनः) = प् + अय् + अनः = पवनः (2018, 14)
नौ + इकः = (न् + औ + इकः) = _ + आ + इकः = नाविकः (2014, 13, 12)
गै + अकः = (गु + ऐ + अकः) = ग् + आय् + अकः = गायकः (2013, 10)
पौ + अनम् = (१ + औ + अनम्) = १ + आ + अनम् = पावनम् (2018, 14)
भों + अनम् = (भू + ओ + अनम्) = + + अ + अनम् = भवनम् (2014)
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम हैं-एचोऽयवायावः।

6. पूर्वरूप सन्धि (सूत्र एङ पदान्तादति) इस सन्धि के अन्तर्गत पूर्व पद के अन्त में एड् = ‘ए’ अथवा ‘ओ’ रहने तथा दूसरे पद के प्रारम्भ में ‘अ’ के आने पर ‘अ’ का लोप हो जाता है और पूर्वरूप हुए ‘अ’ को दर्शाने के लिए अवग्रह (5) का प्रयोग किया जाता है।
जैसे-
ग्राम + अपि = ग्रामेऽपि (इस ग्राम में भी) (2014, 12)
देवो + अपि = देवोऽपि (देवता भी) (2018, 02)
हरे + अत्र = हरेऽत्र (हे हरि! रक्षा कीजिए)। (2012)
विष्णो + अव = विष्णोऽब (हे विष्णु! रक्षा कीजिए) (2013, 12, 11)
हरे + अव = हरेऽव (हे हरि! रक्षा कीजिए) (2013, 12, 11)
पुस्तकालये + अस्मिन् = पुस्तकालयेऽस्मिन् (इस पुस्तकालय में) विद्यालये + अस्मिन = विद्यालयेऽस्मिन् (2018)
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-एङ पदान्तादति।
विशेष

  1. पद से तात्पर्य धातु के लकार एवं शब्द के विभक्ति में बने रूप से है।
  2. पूर्वरूप सन्धि अयादि सन्धि का अपवाद है।

7. पररूप सन्धि (सूत्र एङि पररूपम्) इस सन्धि के अन्तर्गत अकारान्त उपसर्ग के बाद ए = ए अथवा ओं से प्रारम्भ होने वाली धातुओं के आने पर उपसर्ग का अ अपने बाद वाले ए अथवा ओं में बदल जाता है।
जैसे-
प्र + एजते = प्रेजत (अधिक काँपता है) (2018, 14, 13, 12)
उप + औषति = उपौषति (जलता है) (2018, 14, 13, 19)
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में प्रयुक्त नियम है-एड़ि पररूपम्।
विशेष पररूप सन्धि वृद्धि सन्धि का अपवाद है।

2. व्यंजन सन्धि
परिभाषा व्यंजन का स्वर अथवा व्यंजन के साथ मेल को व्यंजन सन्धि कहते हैं। इसके निम्नलिखित भेद हैं, जो निम्न हैं।

1. श्चुत्व सन्धि (सूत्र स्तोः श्चुना श्चुः) इस सन्धि के अन्तर्गत सकार या तवर्ग (त्, थ, ६, ७, न्) के बाद शकार अथवा चवर्ग (चु, छ, ज, झू, ,) के आने पर सकार शकार में और तवर्ग क्रम से चवर्ग में बदल जाता है।
जैसे-
निस् + छलम् = निश्छलम् (2011)
निस् + चय = निश्चय हरिस् + शेते = हरिश्शेते (2013, 12, 11, 10)
सत् + चित् = सच्चित् (2014, 13)
सत् + चयनम् = सच्चयनम् (2012, 11, 10)
कस् + चित् = कश्चित् सत् + चरितम् = सच्चरितम् (2018)
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियाँ स्तोः बुना श्वुः नियम पर आधारित हैं।।

2. ष्टुत्व सन्धि (सूत्र ष्टुनाष्टुः) इस सन्धि के नियमानुसार सकार (स्) अथवा तवर्ग (त्, थ, द, ध, न ) के बाद षकार (७) अथवा वर्ग (द्, ठ, ड, ढ, ण ) के आने पर सकार धकार में और तवर्ग क्रमशः टबर्ग में बदल जाता है।
जैसे–
रामस् + धष्ठः = रामष्य: (2014, 12)
रामस् + टीकते = रामष्टीकते (2018, 11)
पैष् + ता = पेष्टा तत् + टीका = तट्टीका (2014, 13, 12)
चक्रिन + दौकसे = चक्रिण्ढौकसे (2012)
उत् + ड्यनम् = उड्डयनम्
⇒ ध्यान दें उपर्युक्त सन्धियाँ ष्टुनाष्टुः नियम पर आधारित हैं।

3. जश्त्व सन्धि (सूत्र झलां जश् झशि) इस सन्धि के नियमानुसार झल् वर्णो अर्थात् अन्तःस्थ (य, र्, ल्, व्), शल् (श, ष, स, ह) तथा अनुनासिक व्यंजन के अतिरिक्त आए अन्य व्यंजन के बाद झश् (किसी वर्ग का तीसरा अथवा चौथा वर्ण) के आने पर प्रथम व्यंजन झल्, जश् (उसी वर्ग का तीसरा वर्ण ज्, ग्, ड्, द्, ब्) में बदल जाता है।
जैसे-
सिध् + धिः = सिद्धिः (2018, 14, 12)
दध् + धा = दोग्ध। (2015, 13, 12, 11)
योध् + धा = योद्धा (2014, 12)
लभ् + धः = लब्धः (2014, 12)
दुधः + धम् = दुग्धम्।
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-झलां जश् झशि।

4. घर्त्य सन्धि (सूत्र खरि च) इस सन्धि के नियमानुसार झलू प्रत्याहार वर्णो (य्, र्, ल्, व्, ड्, ञ्, ण्, न्, म् के अतिरिक्त अन्य व्यंजन अर्थात् वर्ग के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ वर्ण तथा श्, धू, स्, इ) के पश्चात् खर् प्रत्याहार वर्ण (वर्ग के प्रथम, द्वितीय वर्ण तथा शू, धू, सू) के आने पर प्रथम व्यंजन झलू प्रत्याहार, घर प्रत्याहार (वर्ग के प्रथम वर्ण अर्थात् क्, च्, ट्, त्, प्) में बदल जाता है।
जैसे-
सम्पद् + समयः = सम्पत्समयः (2018, 13)
विपद् + काल = विपत्काल (2014, 12)
ककुभ् + प्रान्तः = ककुप्रान्तः (2012)
उद् + साहः = उत्साहः
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-खरि च।

5. लत्व सन्धि (सूत्र तोलिं) इस सन्धि के नियमानुसार तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) के पश्चात् ल के आने पर तंवर्ग परसवर्ण ल में बदल जाता है। उल्लेखनीय है। कि न के पश्चात् ल के आने पर न् अनुनासिक लै में बदल जाता है।
जैसे-
उत् + लेखः = उल्लेख: (2018, 14, 12, 11, 10)
उद् + लिखितम् = उल्लिखितम् (2012)
तत् + लयः = तल्लयः विद्वान् + लिखति = विद्वान्लिखति (2012)
⇒  ध्यान दें उक्त सन्धियाँ तोर्लि नियम पर आधारित हैं।

6. अनुस्वार सन्धि (सूत्र मोऽनुस्वारः) इस सन्धि के नियमानुसार पदान्त म् (विभक्तियुक्त शब्द के अन्त का मू) के पश्चात् किसी व्यंजन के आने पर म् अनुस्वार (-) में बदल जाता है।
जैसे-
गृहम् + गच्छ = गृहंगच्छ (2018)
गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति (2013)
धनम् + जय = धनञ्जय (2014)
हरिम् + वन्दे = हरि बन्दै (2000)
दुःखम् + प्राप्नोति = दुःखं प्राप्नोति
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-मोऽनुस्वारः।

7. परसवर्ण सन्धि (सूत्र अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः) इस सन्धि के नियमानुसार पद के मध्य अनुस्वार के पश्चात् श्, ष्, स्, हू के अतिरिक्त किसी व्यंजन के आने पर अनुस्वार आने वाले वर्ग के पाँचवें वर्ण में बदल जाता है।
जैसे-
सम् + धिः = सन्धिः
त्वम् + करोषि = त्वङ्करोषि = त्वं करोषि (2012)
नगरम् + चलति = नगरचलति = नगरं चलति
रामम् + नमामि = रामन्नमामि = रामं नमामि
सम् + नद्ध = सन्नद्धः (2018)
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है– अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।

3. विसर्ग सन्धि

परिभाषा विसर्ग का स्वर अथवा व्यंजन के साथ मेल को विसर्ग सन्धि कहते हैं। इसके निम्नलिखित भेद हैं-
1. सत्व सन्धि (सूत्र विसर्जनीयस्य सः) इस सन्धि में विसर्ग के पश्चात् खर् प्रत्याहार वर्गों के प्रथम वर्ण, द्वितीय वर्ण तथा शु, ष, स् के आने पर विसर्ग स् में बदल जाता है।
जैसे-
नमः + ते = नमस् + ते = नमस्ते
गौः + चरति = गौस् + चरति = गौश्चरति (2014, 12)
पूर्णः + चन्द्रः = पूर्णस् + चन्द्रः = पूर्णश्चन्द्रः (2018, 13, 12)
हरिः + चन्द्रः = हरिस् + चन्द्रः = हरिश्चन्द्रः (2014, 10)
हरिः + चरति = हरिस् + चरति = हरिश्चरति (2013, 10)
⇒ ध्यान दें उक्त सन्धियों में निर्दिष्ट नियम है-विसर्जनीयस्य सः।
विशेष उपर्युक्त प्रथम उदाहरण को छोड़कर शेष सभी उदाहरण स् और चवर्ग का मेल होने से श्चुत्व सन्धि के ‘स्तोः श्चुनी श्चुः’ नियम पर भी आधारित है।’

2. रुत्व सन्धि (सूत्र 1 ससजुषोः रुः) इस सन्धि के नियमानुसार पदान्त सू एवं सजु शब्द का ष् रू ()र् में बदल जाता है। (सूत्र 2 खरवसानयोर्विसर्जनीय) पदान्त र के पश्चात् खर् प्रत्याहार के किसी वर्ण के आने अथवा न आने पर है विसर्ग में बदल जाता है।
जैसे-
सजु = सजुर् = सजुः।
कवेः + आभावात् = कवेरभावात् (2013)
रामस् = राम = रामः
रामस् + पठति = राम + पठति = रामः पठति

3. उत्त सन्धि (सूत्र 1 अतोरोरप्लुतादप्लुते) स् के स्थान पर आए र के पूर्व अ एवं पश्चात् में अ अथवा (सूत्र 2 हशि च) हश् प्रत्याहार के किसी वर्ण (वर्ग तृतीय, चतुर्थ, पंचम के वर्षों एवं य, र, ल, व, ह) के आने पर १ छ में बदल जाता है।
जैसे- सस् + अपि = सर् + अपि = स + उ + अपि = सो + अपि = सोऽपि (2013)
शिवस् + अर्थ्यः = शिबर् + अर्व्यः = शिव + उ + अर्व्यः = शिव + अर्ध्यः = शिवोऽर्थ्यः (2012)
रामस् + अस्ति = रामर् + अस्ति = राम + उ + अस्ति = राम + अस्ति = रामोऽस्ति
बालकस् + अति = बालक + अपि = बालक + उ । अपि = बालको + अपि = बालकोऽपि

4. विसर्ग लोप (सुत्र 1 रोरि) विसर्ग अथवा र बाद र के आने पर प्रथम र् का लोप हो जाता है। (सूत्र 2 ठूलोपे पूर्वस्य दीर्घाs:) पूर्ववर्ती र के पहले अ, इ, उ के आने पर वे दीर्घ हो जाते हैं।
जैसे-
गौः + रम्भते = गौर् + रम्भते = गौरम्भते (2012)
हरेः + रमणम् = हरेर् + रमणम् = हरेरमणम् (2012)
हरिः + रम्यः = हरिर् + रम्यः = रम्यः (2012)
पुनः + रमते = पुनर् + रमते = पुनारमते (2014, 12)
भानुः + राजते = भानुर् + राजते = भानुराजते।

बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नयनम्’ का सन्धि विच्छेद होगा। (2018)
(क) ने + अन्नम्।
(ख) नय + नम्।
(ग) नै + अनम्
(घ) नय + अनम् प्रश्न

प्रश्न 2.
‘पावनः’ का सन्धि विच्छेद होगा। (2018)
(क) पाव + अनः
(ख) पो + अनः
(ग) पौ + अनमः
(घ) पद + अनः प्रश्न

प्रश्न 3.
उत् + लेख’ की सन्धि होगी। (2018)
(क) उत्लेख
(ख) उद्लेख
(ग) उज्लेख
(घ) उल्लेख प्रश्न

प्रश्न 4.
‘प्रेजतेः’ में सन्धि है। (2018)
(क) गुण सन्धि
(ख) पररूप सन्धि
(ग) पूर्वरूप सन्धि
(घ) अयादि सन्धि

प्रश्न 5.
‘नायक’ का सन्धि विच्छेद होगा (2018, 16)
(क) नै + अकः
(ख) नाय + अकः
(ग) नाय + क
(घ) नौ + अक:

प्रश्न 6.
‘तद् + लीन’ की सन्धि होगी। (2016)
(क) तल्लीनः
(ख) तलीनः
(ग) तल्लिनः
(घ) तद्दीनः

प्रश्न 7.
‘रमयागच्छ’ का सन्धि विच्छेद होगा। (2016)
(क) रमें + आगछ
(ख) रमा + आगच्छ
(ग) राम + आगच्छ
(घ) रमया + गछ

प्रश्न 8.
‘नश्चलति’ का सन्धि विच्छेद होगा
(क) नरस् + चलति
(ख) नरश् + चलति
(ग) नर् + सचलि
(घ) न + चलति

प्रश्न 9.
‘विद्वान् + लिखति’ की सन्धि है। (2016)
(क) विद्वन्लिखति।
(ख) विद्वांलिखति
(ग) विद्वाल्लिखति
(घ) विद्वांलिखति

प्रश्न 10.
‘पुनारमते’ में सन्धि है। (2016)
(क) रोरि
(ख) खरि च
(ग) विसर्जनीयस्य सः
(घ) ष्टुना ष्टुः

प्रश्न 11.
‘पौ + इत्रम्” की सन्धि है। (2016)
(क) पवित्र
(ख) पवित्रम्
(ग) परित्राण
(घ) परित्रम्

प्रश्न 12,
‘विष्णोऽव’ का सन्धि विच्छेद होगा (2016)
(क) विष्णु + अव
(ख) विष्णु + इव
(ग) विष्णो + अव
(घ) विष्णों + आव

प्रश्न 13.
‘इत्यादि का सन्धि विच्छेद होगा (2017, 16)
(क) इति + आदि
(ख) इत्य + आदि
(ग) इत्या + दि
(घ) इत् + यदि

प्रश्न 14.
‘पौ + अकः’ की सन्धि है (2018, 17, 16)
(क) पोअकः
(ख) पावकः
(ग) पावाकः
(घ) पौवाकः

प्रश्न 15.
‘गुरो + अनु’ की सन्धि हैं। (2016)
(क) गुरवनु
(ख) गुरोऽनु
(ग) गुरावनु
(घ) गुरोरनु

प्रश्न 16.
‘पशवश्चरन्ति’ में सन्धि हैं। (2016)
(क) हशि च
(ख) रोरि
(ग) विसर्जनीयस्य सः
(घ) खर च

प्रश्न 17.
ससजुषोः रुः सन्धि है (2015)
(क) अरिस् + गच्छति
(ख) प्रभुः + चलति
(ग) बालकः + याति
(घ) शिवः + अपि

प्रश्न 18.
‘पुत्रस् + षष्ठः’ की सन्धि है। (2015)
(क) पुत्रस्षष्ठः
(ख) पुत्रोषष्ठः
(ग) पुत्रर्षष्ठः
(घ) पुत्रष्षष्ठः

प्रश्न 19.
‘दोग्धा’ का सन्धि-विच्छेद होगा (2015, 12, 11)
(क) दोग् + धा
(ख) दो + ग्धा
(ग) दोध् + धा
(घ) दोक + धा।

प्रश्न 20.
‘सज्जनः’ का सन्धि-विच्छेद होगा (2018, 13, 12, 11)
(क) सत् + जनः
(ख) सद् + जनः
(ग) सज्ज + नः
(घ) सज़ + जनः

प्रश्न 21.
‘उज्ज्वल’ का सन्धि-विच्छेद है (2014)
(क) उद् + ज्वल
(ख) उर् + ज्वल
(ग) उज् + ज्वल
(घ) उस् + ज्वल

प्रश्न 22.
विसर्जनीयस्य सः सन्धि है (2014)
(क) शिया + अस्ति
(ख) रामः + गच्छति
(ग) हरिः + भाति
(घ) चन्द्रः + चकोर:

प्रश्न 23.
‘निस + छलम्’ की सन्धि है (2011)
(क) निस्छलम्
(ख) निष्छलम्
(ग) निश्छलम्
(घ) निलम्

प्रश्न 24.
‘तत् + चौरः’ की सन्धि हैं। (2018, 11)
(क) तदचौरः
(ख) तचौरः
(ग) तच्छौरः
(घ) तच्चौरः

प्रश्न 25.
‘एचोऽयवायावः’ सन्धि है। (2014)
(क) उप + ओषति
(ख) नौ + इकः
(ग) रामस् + च
(घ) तत् + टीका

प्रश्न 26.
अयादि सन्धि है। (2011)
(क) ने + अनम्
(ख) नय + नम
(ग) यदि + अपि
(घ) सत् + चित्

प्रश्न 27.
‘विष्णो + अत्र’ की सन्धि होगी
(क) विष्ण्वत्र
(ख) विष्णवत्र
(ग) विष्पावत्र
(घ) विष्णोऽत्र

प्रश्न 28.
‘प्रभुश्चलति’ का सन्धि-विच्छेद है। (2011)
(क) प्रभुः + चलति
(ख) प्रभु + चलति
(ग) प्रभो + चलति
(घ) प्रभा + चलति

प्रश्न 29.
‘झलां जशु झशि’ सन्धि है। (2011)
(क) लब्धम्
(ख) रामष्षष्ठः
(ग) सत्कारः
(घ) रामश्च

प्रश्न 30.
पररूप सन्धि है। (2011)
(क) प्रभो + अत्र
(ख) प्र + एजते
(ग) देव + आलयः
(घ) प्रति+ उदारः।

प्रश्न 31.
विसर्ग सन्धि है। (2011)
(क) समस्तरति
(ख) सिद्धिः
(ग) पुस्तकालयः
(घ) नयनम्

प्रश्न 32.
‘रामावग्रतः’ का सन्धि-विच्छेद है।
(क) राम + अग्रतः
(ख) रामौ + अग्रतः
(ग) राम + अग्रतः
(घ) रामे + अग्न

प्रश्न 33.
‘पूर्णश्चन्द्रः’ में कौन-सी सन्धि है? (2018, 15)
(क) रोरि
(ख) वृद्धिरेचि
(ग) वीसर्जनीयस्य सः
(घ) पररूपम्

प्रश्न 34.
‘विष्णवे’ का सन्धि-विच्छेद होगा (2018, 13, 12)
(क) विष्णु + वे
(ख) विष्णोः + ए
(ग) विष्णु+ए
(घ) विष्णो +ए।

प्रश्न 35.
अयादि सन्धि है
(क) सत् + चित्त
(ख) प्र + एजते
(ग) पौ + अकः
(घ) योघ् + धा।

प्रश्न 36.
‘सः + अक्षरः’ की सन्धि होगी। (2015)
(क) साक्षरः
(ख) सोऽक्षरः
(ग) साक्षरः
(घ) सःक्षर

प्रश्न 37.
‘लू + आकृतिः’ की सन्धि होगी (2015)
(क) लाकृतिः
(ख) लुकृति
(ग) अकृतिः
(घ) लआकृति

प्रश्न 38.
‘वधूत्सवः’ में सन्धि है। (2015)
(क) यण्
(ख) पूर्वरूप
(ग) अयादि
(घ) दीर्घ

प्रश्न 39.
चर्व सन्धि (खरि च) है। (2011)
(क) दोघ् + धा
(ख) उद् + कीर्णः
(ग) मत् + चित्ते
(घ) हरिम् + वन्दै

उत्तर
1. (क) 2. (ग) 3. (घ) 4. (ख) 5. (क) 6. (क) 7. (क) 8. (क) 9. (घ) 10. (ख) 11. (ख) 12. (ग) 13. (क) 14. (ख) 15. (ख) 16. (ग) 17. (क) 18. (घ) 19. (ग) 20. (क) 21. (ख) 22. (घ) 23. (ग) 24. (घ) 25. (ख) 26. (क) 27. (घ) 28. (क) 29. (क) 30. (ख) 31. (क) 32. (ख) 33. (ग) 34. (घ) 35. (ग) 36. (ग) 37. (क) 38. (घ) 39. (ख)

सूत्रों की व्याख्या पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘एचायवायाव: सूत्र का सादाहरण| व्याख्या ||जए!
उत्तर:
यदि ए, ओ, ऐ, औ में से किसी भी वर्ण के बाद कोई स्वर आए तो ये वर्ण क्रमशः अय्, अ, आयु, आव् में बदल जाते हैं;
जैसे–
ने + अनम् = नयनम्: पौ + अकः = पावकः, कलौ + इव = कलाविव (2018)

प्रश्न 2.
‘एछ पदान्तादति’ (अथवा पूर्वरूप) सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि पूर्व पद के अन्त में ए और ओ में से कोई वर्ण रहे और उसके बाद दूसरे पद में अ आए तो अ का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अवग्रह (5) लिखा जाता है।
जैसे—विष्णो + अव = विष्णोऽव; देवो + अपि = देवोऽपि

प्रश्न 3.
‘एहि पररूपम्’ सूत्र की सोदाहरण परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
यदि अकारान्त उपसर्ग के पश्चात् ए अथवा ओ से प्रारम्भ होने वाली धातु आए तो उपसर्ग का अ अपने बाद वाले ए अथवा ओ में बदल जाता हैं ।
जैसे—प्र + एजते = प्रेजते, उप + ओषति = उपोषति

प्रश्न 4.
‘स्तोः श्चुना श्चुः सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि सकार या तवर्ग के बाद शकार अथवा चवर्ग का कोई वर्ण आए तो। सकार (स्) शकार (श) में तथा तवर्ग क्रमानुसार चवर्ग में बदल जाता है।
जैसे-सत् + चरितम् = सच्चरितम्, हरिस् + शेते = हरिश्शेते

प्रश्न 5.
‘टुनाष्टुः सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि सकार अथवा तवर्ग के किसी वर्ण के बाद षकार अथवा वर्ग का कोई वर्ण आए तो सकार (स्) षकार (७) में तथा तवर्ग क्रमशः टवर्ग में बदल जाता है;
जैसे—रामस् + टीकते = रामष्टीकते, तत् + टीका = तट्टीका

प्रश्न 6.
‘झलां जश् झशि’ सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि झल् वर्षों (य्, र, ल, व्, श, ष, स्, ह तथा अनुनासिक व्यंजनों को छोड़कर आए अन्य व्यंजन) के बाद झश् (वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण) आए तो प्रथम व्यंजन झलू जश् (उसी वर्ग का तीसरा वर्ण जु, बु, गु, डू, ६) में बदल जाता है;
जैसे—योध् + धा = योद्धा, दुधः + धम् = दुग्धम्।

प्रश्न 7.
‘तोर्लि’ सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि तवर्ग के किसी वर्ण के पश्चात् ल आए तो तवर्ग परसवर्ण ले में बदल जाता है;
जैसे-उत् + लेखः = उल्लेखः, तद् + लयः = तल्लयः

प्रश्न 8.
‘मोऽनुस्वारः सूत्र की सोदाहरण परिभाषा लिखिए। (2013, 10)
उत्तर:
यदि पदान्त म् के पश्चात् कोई व्यंजन आए तो म् अनुस्वार हो जाता है;
जैसे—कृष्णाम् + बन्दे = कृष्णं वन्दे, गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति।

प्रश्न 9.
‘विसर्जनीयस्य सः’ सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए। (2013, 10)
उत्तर:
यदि विसर्ग के पश्चात् खर् प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गों का प्रथम, द्वितीय एवं श्, ५, स्) आए तो विसर्ग स् में बदल जाता है;
जैसे—नमः + ते = नमस्ते, नर: + चलति = नरश्चलति

प्रश्न 10.
‘रोरि’ सूत्र की सोदाहरण व्याख्या कीजिए। (2010)
उत्तर:
यदि विसर्ग अथवा के पश्चात् र आए तो विसर्ग अथवा प्रथम र का लोप हो जाता है तथा प्रथम र के पूर्व अ, इ, उ में से किसी के रहने पर वह दीर्घ हो जाता है;
जैसे-हरि + रम्यः = हरिर् + रम्यः = हरीरम्यः
पुन + रमते = पुनर् + रमते = पुनारमते

प्रश्न 11.
निम्नलिखित शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि के नियम/नाम का उल्लेख कीजिए।
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