UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 3 पवन-दूतिका

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name पवन-दूतिका
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 3 पवन-दूतिका

पवन-दूतिका – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 16, 14, 13, 12, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता हैं। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
तिवेदी युग के प्रतिनिधि कवि और लेखक अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 1866 ई. में उत्तर: प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में निजामाबाद नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम पण्डित भोलासिंह उपाध्याय तथा माता का नाम रुक्मिणी देवी था। स्वाध्याय से इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी भाषा का अ ज्ञान प्राप्त कर लिया। इन्होंने लगभग 20 वर्ष तक कानूनगो के पद पर कार्य किया। इनके जीवन का ध्येय अध्यापन ही रहा। इसलिए उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अवैतनिक रूप से अध्यापन कार्य किया। इनकी रचना “प्रियप्रवास’ पर इन्हें हिन्दी के सर्वोत्तम पुरस्कार ‘मंगला प्रसाद पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1947 में इनका देहावसान हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ
प्रारम्भ में ‘हरिऔध’ जी ब्रज भाषा में काव्य रचना किया करते थे, परन्तु बाद में महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी में काव्य रचना की। हरिऔध जी के काव्य में लोकमंगल का स्वर मिलता है।

कृतियाँ
हरिऔध जी की 15 से अधिक लिखी रचनाओं में तीन रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है प्रियप्रवास’, ‘पारिजात’ तथा ‘वैदेही वनवास’। ‘मियप्रयास’ खड़ी बोली। में लिखा गया पहला महाकाव्य है, जो 17 सर्गों में विभाजित है। इसमें राधा-कृष्ण को सामान्य नायक-नायिका के स्तर से उठाकर विश्व-सेवी एवं विश्व प्रेमी के रूप में चित्रित । किया गया है। प्रबन्ध कायों के अतिरिक्त इनकी मुक्तक कविताओं के अनेक संग्रह-‘चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’, ‘प-प्रसून’, ‘ग्राम-गीत’, ‘कल्पलता आदि उल्लेखनीय हैं।

नाट्य कृतियाँ ‘प्रद्युम्न विजय’, ‘रुक्मिणी परिणय’।
उपन्यास ‘प्रेमकान्ता’, ‘ठेत हिन्दी का ठाठ’ तथा ‘अधखिली फूल’

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. वयं विषय की विविधता हरिऔध जी की प्रमुख विशेषता है। इनके काव्य में प्राचीन कथानकों में नवीन उदभावनाओं के दर्शन होते हैं। इनकी रचनाओं में इनके आराध्य भगवान मात्र न होकर जननायक एवं जनसेवक हैं। उन्होंने कृष्ण-राधा, राम सीता से सम्बन्धित विषयों के साथ-साथ आधुनिक समस्याओं को लेकर उन पर नवीन ढंग से अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
  2. वियोग और वात्सल्य वर्णन हरिऔध जी के काव्य में वियोग एवं वात्सल्य को वर्णन मिलता है। उन्होंने प्रियप्रवास में कृष्ण के मथुरा गमन तथा उसके बाद ब्रज की दशा का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है। हरिऔध जी ने कृष्ण के वियोग में दु:खी सम्पूर्ण ब्रजवासियों का तथा पुत्र वियोग में व्यभित यशोदा का करुण चित्र भी प्रस्तुत किया है।
  3. लोक-सेवा की भावना हरिऔध जी ने कृष्ण को ईश्वर के रूप में न देखकर | आदर्श मानव एवं लोक सेवक के रूप में अपने काव्य में चित्रित किया है।
  4. प्रकृति-चित्रण हरिऔध जी की प्रकृति चित्रण सराहनीय है। उन्हें काव्य में जहाँ भी अवसर मिला, उन्होंने प्रकृति को चित्रण किया है, साथ ही उसे विविध रूपों में भी अपनाया है। हरिऔध जी का प्रकृति चित्रण सजीव एवं परिस्थितियों के अनुकूल है। प्रकृति सम्बन्धित प्राणियों के सुख में सुखी एवं दुःख में दुखी दिखाई देती है। कृष्ण के वियोग में ब्रज के वृक्ष भी रोते हैं
    फूलों-पत्तों सकल पर हैं वादि-बूंदें लखातीं,
    रोते हैं या विपट सब यो आँसुओं को दिखा के

कला पक्ष

  1. भाषा काव्य के धोत्र में भाव, भाषा, शैली, छन्द एवं अलंकारों की दृष्टि से हरिऔध जी की काव्य साधना महान् है। इनकी रचनाओं में कोमलकान्त पदावलीयुक्त ब्रजभाषा (“सकलश’) के साथ संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग (“प्रियप्रवास’, ‘वैदेही वनवास’) द्रष्टव्य है। इन्होंने मुहावरेदार बोलचाल की खड़ी बोली (चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’) का प्रयोग किया। इसलिए आचार्य शुक्ल ने इन्हें ‘द्विकलात्मक कला’ में सिद्धहस्त कहा है। एक ओर सरल एवं प्रांजल हिन्दी का प्रयोग, तो दूसरी और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ-साथ सामासिक एवं आलंकारिक शब्दावली का प्रयोग भी है।
  2. शैली इन्होंने प्रबन्ध एवं मुक्तक दोनों शैलियों का सफल प्रयोग अपने काव्य में किया। इसके अतिरिक्त इनके काव्यों में इतिवृत्तात्मक, मुहावरेदार, संस्कृत-काव्यनिष्ठ, चमत्कारपूर्ण एवं सरल हिन्दी शैलियों का अभिव्यंजना शिल्प की दृष्टि से सफल प्रयोग मिलता है।
  3. छन्द सवैया, कवित्त, छप्पय, दोहा आदि इनके प्रिय छन्द हैं और इन्द्रवज्रा, शार्दूलविक्रीडित, शिखरिणी, मालिनी, वसन्ततिलका, द्रुतविलम्वित आदि संस्कृत वर्णवृत्तों का प्रयोग भी इन्होंने किया।
  4. अलंकार इन्होंने शब्दालंकार एवं अर्थालंकार दोनों का भरपूर एवं स्वाभाविक प्रयोग किया है। इनके काव्यों में उपमा के अतिरिक्त रूपक, उत्प्रेक्षा, अपहृति, व्यतिरेक, सन्देह, स्मरण, प्रतीप, दृष्टान्त, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का भावोत्कर्षक प्रयोग मिलता है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
हरिऔध जी अपने जीवनकाल में ‘कवि सम्राट’, ‘साहित्य वाचस्पति’ आदि उपाधियों से सम्मानित हुए। हरिऔध जी अनेक साहित्यिक सभाओं एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलनों के सभापति भी रहे। इनकी साहित्यिक सेवाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। निःसन्देह ये हिन्दी साहित्य की एक महान् विभूति हैं।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

प्रश्न 1.
बैठी खिन्ना यक दिवस वे गेह में थीं अकेली।
आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते।।
आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गन्ध को ले।
प्रात:वाली सुपवन इसी काल वातयनों से।।।
सन्तापों को विपुल बढ़ता देख के दु:खिता हो।
धीरे बोली स-दुख उससे श्रीमती राधिका यों।।
प्यारी प्रातः पवन इतना क्यों मुझे है सताती।
क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से।।

उपर्युक्त पद्यांश पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने राधा की किस स्थिति का वर्णन किया है?
उत्तर:
प्ररतुत पद्यांश में कवि ने विरहावस्था के कारण दुःखी नायिका का वर्णन किया है। जिसके नयनों से अश्रुओं की धारा बह रही है तथा मन को हर्षित एवं आनन्दित करने वाली प्रातःकालीन पवन भी नायिका को दुःखी करती हैं। नायिका की इसी स्थिति का वर्णन कवि ने किया है।

(ii) नायिका ने पवन को क्रूर क्यों कहा?
उत्तर:
नायिका का मन खिन्न एवं उदास था। उसके नयन अश्रुओं से भरे हुए थे। नायिका की इस दैन्य दशा में प्रातःकालीन पवन जब सभी में उमंग एवं उत्साह । का संचार कर रही थी, तब वह नायिका के लिए हृदय विदारक बनकर उसके दुःख को बढ़ा रही थी, इसलिए नायिका ने उसे क्रूर कहा।

(iii) नायिका ने पवन से क्या कहा?
उत्तर:
नायिका ने पवन से कहा कि वह इतनी क्रूर, निर्दयी व उसकी पीड़ा को बढ़ाने वाली क्यों बनी हुई है? क्या वह भी उसी के समान किसी पीड़ा से व्यथित है?

(iv) प्रस्तुत पद्यांश की रस योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में वियोग श्रृंगार रस है। इस पद्यांश में कवि ने नायिका की विरहावस्था का वर्णन किया है।

(v) ‘सदगन्ध’ व ‘क्लर’ शब्दों के विपरीतार्थी शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द विपरीतार्थी शब्द
सद्गन्ध दुर्गन्ध
क्रूर दयालु

प्रश्न 2.
लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आए।
होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को।।
जो थोड़ी भी श्रमित वह हो, गोद ले श्रान्ति खोना।
होठों की औ कमल-मुख की म्लानताएँ मिटाना।।
कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे।
धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना।।
जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला।
छाया द्वारा सुखित करना तप्त भूतांगना को।।

उपर्युक्त पद्यांश पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने नायिका के द्वारा पवन को कही गई बातों के माध्यम से परोपकार की भावना को महत्त्व दिया है। नायिका द्वारा स्वयं की पीड़ा से पहले दूसरों की पीड़ा एवं कष्टों को दूर करने का सन्देश दिया गया है।

(ii) नायिका पवन से लज्जाशील महिला के प्रति कैसा आचरण अपनाने के लिए कहती हैं?
उत्तर:
नायिका पवन से लज्जाशील महिला के प्रति स्नेह एवं प्रेम का आचरण अपनाने के लिए कहते हुए कहती हैं कि यदि उसे मार्ग में कोई लज्जाशील महिला मिले तो वह उसके वस्त्रों को न उड़ाए। यदि वह उसे थोड़ी थकी हुई लगे तो उसे अपनी गोद में लेकर उसकी थकान और मुख की मलिनता को हर लेना।

(iii) नायिका पवन से किस प्रकार कृषक महिला की सहायता करने के लिए कहती है?
उत्तर:
नायिका पवन से कहती है कि यदि उसे मथुरा जाते समय तुम्हें कोई कृषक महिला खेतों में काम करते हुए दिखाई दे, तो उसके पास जाकर अपने स्पर्श से उसकी थकान को मिटा देना। साथ ही आकाश में छाए बादलों को अपने वेग से उड़ाकर उनकी छाया के द्वारा उसे शीतलता प्रदान करना और उसकी सहायता करना।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश के शिल्प सौन्दर्य का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है। कवि ने प्रबन्ध शैली में नायिका की वियोगावस्था का वर्णन किया हैं। कवि ने रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश व मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग करके पद्यांश के भाव-सौन्दर्य में वृद्धि कर दी है।

(v) ‘जलद’ व ‘व्योम’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द विपरीतार्थी शब्द
जलद बादल मेघ
व्योम आकाश, गगन

प्रश्न 3.
साँचे ढाला सकल वपु है दिव्य सौन्दर्यशाली।
सत्पुष्पों-सी सुरभि उसकी प्राण-सम्पोषिका है।
दोनों कन्धे वृषभ-वर-से हैं बड़े ही सजीले।।
लम्बी बांहें कलभ-कर-सी शक्ति की पेटिका हैं।
राजाओं-सा शिर पर लसा दिव्य आपीड़ होगा।
शोभा होगी उभय श्रुति में स्वर्ण के कुण्डलों की।
नाना रत्नाकलित भुज में मंजु केयूर होंगे।
मोतीमाला लसित उनका कम्बु-सा कण्ठ होगा।

उपर्युक्त पद्यांश पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने किसे प्राण पोषिका के समान बताया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में नायिका अर्थात् राधा, पवन को श्रीकृष्ण के विषय में बताते हुए कहती है कि उनका सुडौल शरीर साँचे में ढला हुआ प्रतीत होता है। उनके तन से आने वाली सुगन्ध प्राणों को पोषित करने वाली है अर्थात् वह मन को आह्लादित करने वाली है।

(ii) नायिका ने श्रीकृष्ण की क्या-क्या विशेषताएँ बताई हैं?
उत्तर:
नायिका श्रीकृष्ण की विशेषताएँ बताते हुए कहती है कि उनका शरीर सुडौल है, उनके कन्धे वृषभ के समान बलिष्ठ हैं, उनकी भुजाएँ हाथी की सुंड के समान बलशाली हैं, उनके मस्तिष्क पर राजाओं के समान अपूर्व सौन्दर्य से युक्त मुकुट विराजमान है। उनकी गर्दन सुन्दर एवं सुडौल है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने नायिका की विरहावस्था एवं श्रीकृष्ण के प्रति उनके प्रेम को उद्घाटित किया है। नायिका कृष्ण से दूर ब्रज प्रदेश में हैं, किन्तु उसके मन मस्तिष्क में उनकी छवि विद्यमान है। वह कृष्ण रूप, बेल आदि से अत्यधिक आकर्षित है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है। कवि ने प्रबन्धात्मक शैली में नायिका की विरह व्यथा को प्रस्तुत किया है। भाषा में तुकान्तता एवं लयात्मकता का गुण विद्यमान है। अभिधा शब्दशक्ति व प्रसाद गुण के प्रयोग से काव्य की भाषा अधिक प्रभावशाली हो गई है।

(v) ‘स्वर्ण’ व ‘सुरभि शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:

शब्द विपरीतार्थी शब्द
स्वर्ण कनक, कुन्दन
सुरभि सुगंध, खुशबू

प्रश्न 4.
जो प्यारे मंजु उपवन या वाटिका में खड़े हों।
छिद्रों में जा क्वणित करना वेणु-सा कीचकों को।
यों होवेगी सुरति उनको सर्व गोपाँगना की।
जो हैं वंशी श्रवण-रुचि से दीर्घ उत्कण्ठ होती।
ला के फूले कमलदल को श्याम के सामने ही।
थोड़ा-थोड़ा विपुल जल में व्यग्र हो-हो डुबाना।
यों देना ऐ भगिनी जतला एक अम्भोजनेत्रा।।
आँखों को ही विरह-विधुरा वारि में बोरती है।

उपर्युक्त पद्यांश पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) राधा श्रीकृष्ण को अपना सन्देश देने के लिए पवन से क्या कहती है?
उत्तर:
राधा पवन को उसकी विरहावस्था से श्रीकृष्ण को अवगत कराने के लिए बाँसों एवं कमल के खिले हुए फूल को माध्यम बनाने के लिए कहती है।

(ii) श्रीकृष्ण को गोपियों का स्मरण कराने के लिए राधा पवन से क्या कहती हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण को गोपियों का स्मरण कराने के लिए राधा पवन से कहती है कि अगर तुम्हें कृष्ण उपवन में दिखाई दें, तो तुम बॉस में प्रवेश करके उसे बाँसुरी की तरह बजाना, जिससे श्रीकृष्ण को उनकी बाँसुरी की मधुर आवाज सुनने के लिए लालायित गोपियों की याद आ जाए।

(iii) राधा स्वयं विरहावस्था से श्रीकृष्ण को अवगत कराने के लिए पवन को क्या उपाय सुझाती है।
उत्तर:
राधा श्रीकृष्ण को स्वयं की विरहायस्था एवं पीड़ा से अवगत कराने हेतु पवन से कहती है कि श्रीकृष्ण के समक्ष उपस्थित कमल के पत्तों को पानी में डुबोना, ताकि उस दृश्य को देखकर श्रीकृष्ण कमल से नयनों वाली राधा की वियोगावस्था को पहचान लें।

(iv) पद्यांश की रस योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पशि में श्रीकृष्ण के मथुरा से द्वारका आ जाने के कारण ब्रज की गोपियों व राधा की विरहावस्था का वर्णन किया गया है। अतः पद्यांश में पियो गार रस की प्रधानता विद्यमान है।

(v) ‘कमलदल’ का समास-विग्रह करते हुए समास का भेद बताइए।
उत्तर:
‘कमलदल’ का समास विग्रह ‘कमल का दल’ होगा। यह तत्पुरुष समास का उदाहरण हैं।

प्रश्न 5.
यों प्यारे को विदित करके सर्व मेरी व्यथाएँ।
धीरे-धीरे वहन कर के पाँव की धूलि लाना।
थोड़ी-सी भी चरण-रज जो ला न देगी हमें तू।
हा ! कैसे तो व्यथित चित को बोध में दे सकेंगी।
पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी।
तो तू मेरी विनय इतनी मान ले औ चली जा।
छ के प्यारे कमल-पग को प्यार के साथ आ जा।
जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तुझी को लगाके।।

उपर्युक्त पद्यांश पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
पशि में नायक के प्रति नायिका के असीम प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है। नायिका पवन से श्रीकृष्ण को अपनी व्यथा बताने और ऐसा न कर पाने की स्थिति में उनके चरणों की धूल लाने अथवा उनके चरणों को स्पर्श करके आने के लिए कहती हैं।

(ii) नायिका श्रीकृष्ण की चरण रज लाने के लिए क्यों कहती है?
उत्तर:
नायिका पवन से श्रीकष्ण को अपनी व्यथा सुनाने और ऐसा न कर पाने पर उनके चरणों की धूल लाने के लिए कहती हैं, ताकि वह उसे पाकर ही अपने दुःखी मन को समझा ले।

(iii) जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तुझी को लगा।” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से राधा पवन से कहती है कि यदि वह श्रीकृष्ण की चरण रज को न ला पाए और केवल उनके चरणों का स्पर्श करके भी आ जाए तो वह भी इसके लिए काफी हैं, क्योंकि वह पवन को ही हृदय से लगाकर अपने मियत की पूर्ण अनुभूति प्राप्| कर लेगी और स्वयं में नव जीवन का संचार कर लेगी।

(iv) पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पशि में कवि ने पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास, रूपक व मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग किया है। पद्यांश में धीरे-धीरे वहन कर के’ में पुनरुक्तिप्रकाश, ‘जी जाऊँगी हृदयतल’ में अनुप्रास अलंकार, ‘प्यारे कमल-पग को’ में रूपक अलंकार तथा सम्पूर्ण काव्य रचना में मानवीकरण अलंकार है।

(v) ‘कमल-पग’ का समास-विग्रह करके समास का भेद भी बताइए।
उत्तर:
‘कमल पग’ का समास-विग्रह ‘कमल के समान पग’ है, जोकि कर्मधारय समास का उदाहरण है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

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Chapter Chapter 1
Chapter Name भोजस्यौदार्यम्
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

गद्यांश 1
ततः कदाचिद् द्वारपाल आगत्य महाराजं भोजं प्राह–’देव, कौपीनावशेषो विद्वान् द्वारि वर्तते’ इति। राजा ‘प्रवेशय’ इति प्राह। ततः प्रविष्टः सः कविः भोजमालोक्य अद्य में दारिद्रयनाशो भविष्यतीति मत्वा तुष्टो हर्षाश्रूणि मुमोच। राजा तमालोक्य प्राह–’कवे, किं रोदिषि” इति। ततः कविराह-राजन्! आकर्णय मद्गृहस्थितिम्।।
सन्दर्म प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘भोजस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद तत्पश्चात् द्वारपाल ने आकर महाराज भोज से कहा, “देव! द्वार पर ऐसा विहान् खड़ा है जिसके तन पर केवल लँगोटी ही शेष है।” राजा बोले, “प्रवेश कराओं।” तब उस कवि ने भोज को देखकर यह मानकर कि आज मेरी दरिद्रता दूर हो जाएगी, प्रसन्नता के आँसू बहाए। राजा ने उसे देखकर कहा, “कवि! रोते क्यों हो?” तब कवि ने कहा-‘राजन्! मेरे घर की स्थिति को सुनिए।”

गद्यांश 2
राजा शिव, शिव इति उदीरयन् प्रत्यक्षरं लक्ष दत्त्वा प्राह–’त्वरितं गच्छ गेहम्, त्वद्गृहिणी खिन्ना वर्तते।’ अन्यदा भोजः श्रीमहेश्वरं नमितुं शिवालयमभ्यगच्छत्। तदा कोऽपि ब्राह्मणः राजानं शिवसन्निधौ प्राह–देव!
सन्दर्म पूर्ववत्।।
अनुवाद ‘शिव, शिव’ कहते हुए प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ देकर राजा ने। कहा, ”शीघ्र घर जाओ। तुम्हारी पत्नी दु:खी है।’ भोज अगले दिन श्री महेश्वर (भगवान शंकर) को नमन करने के लिए शिवालय गए। तब शिव के समीप राजा से किसी ब्राह्मण ने कहा- हे राजन्।

गद्यांश 3
राजा तस्यै लक्ष दत्वा कालिदासं प्राह–‘सखे, त्वमपि प्रभातं वर्णय’ इति।
ततः कालिदासः प्राह
अभूत् प्राची पिङ्गा रसंपतिरिव प्राप्य कनुर्क।
गतच्छायश्चन्द्रो बुधजन इव ग्राम्यसदसि।।
क्षणं क्षीणस्तारा नृपतय इवानुद्यम्पराः।
न दीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः।।
राजातितुष्टः तस्मै प्रक्षरं लक्षं ददौ। (2014, 18, 11, 06)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद राजा ने उसे एक लाख (रुपये) देकर कालिदास से कहा-“मित्र तुम भी प्रभात का वर्णन करो।” तब कालिदास ने कहा-पूर्व दिशा सुवर्ण (सूर्य की पहली किरण) को पाकर पारे-सी पीली (सुनहरी) हो गई है। चन्द्रमा वैसे ही कान्तिहीन हो गया है, जैसे अज्ञानियों (गॅवारों) की सभा में विद्वान्। तारे उद्यमहीन राजाओं की भाँति क्षणभर में क्षीण हो गए हैं। निर्धनों (धनहीनों) के गुणों के सदृश दीपक भी नहीं चमक रहे हैं। कहने का अर्थ है जिस प्रकार दरिद्रता व्यक्ति के गुणों को ढक लेती है उसी प्रकार सवेरा होने पर दीपक व्यर्थ हो जाता है। राजा ने सन्तुष्ट होकर उसको प्रत्येक शब्द पर लाख मुद्राएँ दीं।।

श्लोकों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

श्लोक 1
अये लाजानुच्चैः पथि वचनमाकण्यं गृहिणीं।
शिशोः कर्णी यत्नात् सुपिहितवती दीनवदना।।
मयि क्षीणोपाये यदकृतं दृशावश्रुबहुले।
तदन्तः शल्यं मे त्वमसि पुनरुद्धमुचितः ।। (2017, 16, 13, 10)
सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘भोजस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद मार्ग पर ऊँचे स्वर में ‘अरे, खील लो’ सुनकर दीन मुख वाली (मेरी पत्नी ने बच्चों के कान सावधानीपूर्वक बन्द कर दिए और मुझ दरिद्र पर जो अश्रुपूर्ण दृष्टि डाली, वह मेरे हृदय में काँटे सदृश गड़ गई, जिसे निकालने में आप ही समर्थ हैं।

श्लोक 2
अर्द्ध दानववैरिणा गिरिजयाप्यर्द्ध शिवस्याहृतम्।
देवेत्थं जगतीतले पुरहराभावे समुन्मीलति।।
गङ्गा सागरमम्बरं शशिकला नागाधिपः मातलम्।।
सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत् त्वां मां तु भिक्षाटनम्।। (2013)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद शिव का अद्भुभाग दान-वैरी अर्थात् विष्णु ने तथा अर्द्ध भाग पार्वती ने हर लिया। इस प्रकार भू-तल पर शिव की कमी होने से गंगा सागर में, चन्द्रकला आकाश में तथा नागराज (शेषनाग) भू-तल में समा गए। सर्वज्ञता और अधीश्वरता आपमें तथा भिक्षाटन मुझमें आ गया।

श्लोक 3
विरलविरलाः स्थूलास्ताराः कलाविव सज्जुनाः।
मुन इव मुनेः सर्वत्रैव प्रसन्नमभून्नभः।।
अपसरति च ध्यान्तं चित्तात्सतामिव दुर्जनः।।
ब्रजति च निशा क्षित्रं लक्ष्मीरनुघमिनामिव।। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद आकाश में बड़े तारे उसी प्रकार गिने-चुने (बहुत कम) । दिखाई दे रहे हैं, जैसे कलियुग में सज्जन। सारा आकाश मुनि के सदृश प्रसन्न (निर्मल) हो गया है। आकाश से अँधेरा वैसे ही मिटता जा रहा है, जैसे सज्जनों के चित्त से दुर्जन और उद्यमहीनों की लक्ष्मी तीव्रता से भागी जा रही हो।

श्लोक 4
अभूत् प्राची पिङ्गा रसपतिरिव प्राप्य कनकं।
गतच्छायश्चन्द्रो बुधजन इव ग्राम्यसदसि।।
क्षणं क्षीणस्तारा नृपतय इवानुद्यमपराः ।।
न दीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः ।। (2017, 14, 13, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद पूर्व दिशा सुवर्ण (सूर्य की पहली किरण) को पाकर पारे-सी पीली (सुनहरी) हो गई है। चन्द्रमा वैसे ही कान्तिहीन हो गया है, जैसे अज्ञानियों (गॅवारों) की सभा में विद्वज्जन। तारे उद्यमहीन राजाओं की भाँति क्षणभर में क्षीण हो गए हैं। निर्धनों (धनहीनों) के गुणों के सदृश दीपक भी नहीं चमक रहे हैं। कहने का अर्थ है, जिस प्रकार दरिद्रता व्यक्ति के गुणों को ढक लेती है, उसी प्रकार संवेरा होने पर दीपक व्यर्थ हो जाता है।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) में से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाएँगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित है।

प्रश्न 1.
द्वारपालः भोजं किम् अकथयत्? (2017, 13, 11)
उत्तर:
द्वारपालः भोजम् अकथयत् यत् कौपीनावशेषः कोऽपि विद्वान् द्वारि वर्तते’ इति।

प्रश्न 2.
भोजं दृष्ट्वा कविः किम् अचिन्तयत?
उत्तर:
भोजं दृष्ट्वा कविः अचिन्तयत् ‘अद्य मम दरिद्रतायाः नाशः भविष्यति’ इति।

प्रश्न 3.
भोजः कविम् किम् अपृच्छतु? (2017, 16)
उत्तर:
भोजः कविम् अपृच्छत् ‘कवे! किं रोदिषि?’ इति।

प्रश्न 4.
राजा भोजः कालिदासं किं कर्तुं प्राह? (2018)
उत्तर:
राजा भोजः कालिदास प्रभातवर्णन कर्तुं प्राह।

प्रश्न 5.
भोजस्य सभायां कः कविः प्रभातम् अवर्णयत्? (2012)
उत्तर:
भोजस्य सभायां कवि: कालिदासः प्रभातम् अवर्णयत्।

प्रश्न 6.
कवि कथम् अरोदी? (2017)
उत्तर:
कवेः रोदनस्य कारणं तस्य दरिद्रता आसीत्।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 2 उद्धव-प्रसंग / गंगावतरण

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name उद्धव-प्रसंग / गंगावतरण
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 2 उद्धव-प्रसंग / गंगावतरण

उद्धव-प्रसंग / गंगावतरण – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 13, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता हैं। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
आधुनिक काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में 1866 ई. (विक्रम सम्वत् 1923) में हुआ था। ‘रत्नाकर’ जी के पिता श्री पुरुषोत्तमदास भारतेन्दु जी के समकालीन, फारसी भाषा के विद्वान् और हिन्दी काव्य के मर्मज्ञ थे।

स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद 1891 ई. में वाराणसी के सीन्स कॉलेज से बी. ए. की डिग्री प्राप्त करके वर्ष 1902 में अयोध्या-नरेश के निजी सचिव नियुक्त हुए और वर्ष 1928 तक इसी पद पर रहे। राजदरबार से सम्बद्ध होने के कारण इनका रहन-सहन सामन्ती था, लेकिन इनमें प्राचीन धर्म, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी आस्था थी। इन्हें प्राचीन भाषाओं का अच्छा ज्ञान था तथा ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं में गति भी थी। वर्ष 1932 में इनकी मृत्यु हरिद्वार में हुई।

साहित्यिक गतिविधियाँ
इन्होंने ‘साहित्य-सुधानिधि’ और ‘सरस्वती’ के सम्पादन, ‘रसिक मण्डल’ के संचालन तथा ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना एवं उसके विकास में योगदान दिया।

कृतियाँ
गद्य एवं परा दोनों विधाओं में साहित्य सृजन करने वाले रत्नाकर जी मूलतः कवि थे। इनकी प्रमुख कृतियों में हिण्डोला, समालोचनादर्श, हरिश्चन्द्र, गंगालहरी, शृंगारलहरी, विष्णुलहरी, रत्नाष्टक, गंगावतरण तथा उद्धव शतक उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने सुधाकर, कविकुलकण्ठाभरण, दीप-प्रकाश, सुन्दर श्रृंगार, हमीर हठ, प्रकीर्ण गधावली, रस-विनोद, हिम-तरंगिणी, बिहारी-रत्नाकर आदि ग्रन्थों का सम्पादन भी किया।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष
जगन्नाथ रत्नाकर भावों के कुशल चितेरे होने के कारण उन्होंने मानव के हृदय के सभी कोनों को झाँककर अपने काव्य में ऐसे चित्र प्रस्तुत किए हैं कि पाठक उन्हें पढ़ते ही भाव-विभोर हो जाते हैं।

  1. काव्य का विशुद्ध शुद्ध रूप रत्नाकर जी के काव्य का पण्र्य विषय भक्ति काल के अनुरूप, भक्ति, श्रृंगार, भ्रमर गीत आदि से सम्बन्धित है और उनके वर्णन करने की शैली रीतिकाल के समरूप ही है। अतः उनके विषय में यह सत्य ही कहा गया है कि रत्नाकर जी ने भक्तिकाल की आत्मा को रीतिकाल के ढाँचे में अवतरित कर दिया है। उनके काव्य का विषय शुद्ध से पौराणिक है। उन्होंने उद्ववशतक, गंगावतरण, हरिश्चन्द्र आदि रचनाओं में पौराणिक कथाओं को ही अपनाया है। रत्नाकर जी के काव्य में धार्मिक भावना के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना भी मिलती है।
  2. भाव चित्रण रत्नाकर जी भाव-लौक के कुशल चितेरे थे। उन्होंने अपने काव्य में क्रोध, प्रसन्नता, उत्साह, शोक, प्रेम, घृणा आदि मानवीय व्यापारों के सुन्दर चित्र उपस्थित किए हैं;
    जैसे टूक-टूट हुवै है मन मुकुर हमारे हाय,
    चूंकि हूँ कठोर बैन-पाहन चलावौना।
    एक मनमोहन तौ बसि के उजारयौ मोहिं,
    हिय में अनेक मन मोहन बसावी ना।।
  3.  प्रकृति चित्रण रत्नाकार जी ने अपने काव्य में प्रकृति का अत्यन्त ही मनोहारी वर्णन किया है। उनके प्रकृति-चित्रण पर रीतिकालीन प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
  4. रस इनके काव्य में लगभग सभी रसों को समुचित स्थान प्राप्त है, किन्तु संयोग श्रृंगार की अपेक्षा विप्रलम्भ श्रृंगार में अधिक सजीवता व मार्मिकता है। तथा वीर, रौद्र व भयानक रसों का भी सुन्दर वर्णन है।

कला पक्ष

  1. भाषा रत्नाकर जी भाषा के मर्मज्ञ तथा शब्दों के आचार्य थे। सामान्यतया इन्होंने काव्य में प्रौद साहित्यिक ब्रजभाषा को ही अपनाया, लेकिन उनकी भाषा में जहाँ तहाँ बनारसी बोली का भी समावेश देखने को मिलता है। भाषा व्याकरणसम्मत, मधुर एवं प्रवाहयुक्त है। वाक्य-विन्यास सुगठित एवं प्रवाहपूर्ण है। कहावतों एवं मुहावरों का भी कुशल प्रयोग किया है।
  2. छन्द योजना इन्होंने मुख्यतः रोला, छप्पय, दोहा, कवित्त एवं संवैया को अपनाया। उद्धव शतक और श्रृंगारलहरी में रत्नाकर जी ने अपना सर्वाधिक प्रिय छन्द कविता का प्रयोग किया।
  3. अलंकार योजना अलंकारों का समावेश अत्यन्त स्वाभाविक तरीके से हुआ है, इन्होंने मुख्यतः रूपक, उपेक्षा, उपमा, असंगति, स्मरण, प्रतीप, अनुप्रास, श्लेध, यमक आदि अलंकारों का प्रयोग किया। इनकी रचनाओं में प्राचीन और मध्ययुगीन समस्त भारतीय साहित्य का सौष्ठव बड़े स्वस्थ, समुज्ज्वल एवं मनोरम रूप में उपलब्ध होता है।
  4. शैली रत्नाकर जी के काव्य में चित्रात्मक, आलंकारिक व चामत्कारिक शैली का प्रयोग किया गया हैं।

हिन्दी साहित्य में स्थान
रत्नाकर जी हिन्दी के उन जगमगाते रत्नों में से एक हैं, जिनकी आभा चिरकाल तक बनी रहेगी। अपने व्यक्तित्व तथा अपनी मान्यताओं को इन्होंने काव्य में सफल वाणी प्रदान की है। उसकी छाप इनकी साहित्यिक रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

उद्धव-प्रसंग

प्रश्न 1.
भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की
सुधि ब्रज-गाँवनि मैं पावन जबै लगीं।
कहै ‘रतनाकर’ गुवालिनि की झौरि-झौरि
दौरि-दौरि नन्द-पौरि आवन तबै लगीं।
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पैं
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं।
मकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
हमकौं लिख्यौ है कहा कहन सबै लगीं।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से उदधृत है तथा इसके कवि कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘उद्धव प्रसंग’ कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ जी हैं।

(ii) गोपियों के अत्यन्त व्याकुल होने के कारण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि कहते हैं कि जब गोपियों को यह ज्ञात हुआ कि उद्धव उनके प्रिय श्रीकृष्ण का कोई सन्देश लेकर आए हैं, तो वे अपने प्रियतम का सन्देश जानने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो उठती हैं।

(iii) श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए सन्देश के आगमन पर गोपियों का चित्रण कवि ने किस प्रकार किया है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए सन्देश को उनके दूत उद्धव लाते हैं। इसकी सूचना मिलते ही सभी गोपियाँ समूह में दौड़-दौड़कर अपने प्रियतम (कृष्ण) के दूत (उद्धव) से मिलने हेतु नन्द के द्वार पर आने लगी और अपने कमलपी चरणों के पंजों पर उचक-उचककर में श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए सन्देश को देखने लगीं। यहाँ कवि ने गोपियों की व्याकुलता को उजागर किया है।

(iv) “हम लिख्यौ है कहा कहन सबै लगीं।” इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि सभी गोपियाँ अपने प्रियतम द्वारा भेजे गए सन्देश को जानने हेतु उत्कण्ठित हो उठी हैं। वे सभी उद्धव से जानना चाहती हैं कि उनके प्रियतम में उनके लिए क्या-क्या सन्देश भेजे हैं। वे सभी अपने-अपने सन्देश को सुनने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो चुकी हैं।

(v) प्रस्तुत पद्यांश के अलंकार सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘झौरि-झौरि’, ‘दौरि-दौरि’, ‘उझकिझकि’, ‘पेखि पेखि’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है, ‘छाती छोहिन छदै’ में अनुप्रास अलंकार है, ‘पद-कंजनि’ में ‘रूपक अलंकार’ है।

प्रश्न 2.
कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत हैं पधारे आप
धारे प्रन फेरन कौ मति ब्रजबारी की।
कहै ‘रतनाकर’ पै प्रीति-रीति जानत ना।
ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की।
मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम
तौहूँ हमें भावति ना भावना अन्यारी की।
जैहै बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि कौं
बूंदता बिलैहे बूंद बिबस बिचारी की।

उपर्युक्त पह्मांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) गोपियों ने उद्धव के आगमन पर क्या प्रश्न किया?
उत्तर:
गोपियों ने उद्धव के आगमन पर प्रश्न किया कि आप जमण्डल में हमारी बुद्धि बदलने का प्रण लेकर कृष्ण के दूत बनकर आए हैं या बह्म के दूत बनकर आए हैं?

(ii) “धारे प्रन फेरन को मति ब्रजबारी की।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से उद्धव गोपियों का ध्यान कृष्ण प्रेम से हटाना चाहते हैं। उद्धव गोपियों को निर्गुण उपासना के प्रति उपदेश देकर कृष्ण की सगुण उपासना का विरोध गोपियों के समक्ष करते हैं, जिससे गोपियों का हृदय परिवर्तन हो जाए और वे कृष्ण को अपने मन से विस्मृत कर दें।

(iii) कवि ने उद्धव को अनारी क्यों कहा हैं?
उत्तर:
कवि के अनुसार उद्धव को प्रीति की रीति का ज्ञान नहीं हैं और वे बुद्धिहीनों जैसा व्यवहार करके गोपियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। वे गोपियों के प्रेमी कृष्ण के स्थान पर ब्रह्म की बातों का उपदेश दे रहे हैं। यही कारण है कि कवि ने उद्धव को अनारी कहा है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में ब्रह्म की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में ब्रह्म की तुलना गोपियों ने अथाह समुद्र से करते हुए कहा है कि ब्रह्म अथाह समुद्र की तरह है एवं वे जल की बूंदों के समान हैं। समुद्र में जल की कुछ बूंदें मिलें या नहीं मिलें, इससे समुद्र के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु बूंद समुद्र में मिल जाए तो उसका अस्तित्व अवश्य की समाप्त हो जाता है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में वियोग श्रृंगार रस है। यहाँ गोपियों एवं कृष्ण के वियोग का वर्णन

प्रश्न 3.
धाई जित तित हैं बिदाई-हेत ऊधव की
गोपी भरीं आरति सँभारति न साँसुरी।।
कहें ‘रतनाकर’ मयूर-पच्छ कोऊ लिए।
कोऊ गुंज-अंजली उमाहे प्रेम आँसुरी।।
भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी।
पीत पट नन्द जसुमति नवनीत नयौ
कीरति-कुमारी सुरबारी दई बाँसुरी।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किस प्रसंग का वर्णन किया गया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने उद्धव के मथुरा लौटने के समय राधा, यशोदा, नन्द और गोपियों के द्वारा उन्हें कृष्ण के लिए विभिन्न उपहार दिए जाने से सम्बन्धित प्रसंग का वर्णन किया गया है।

(ii) इस पद्यांश में ब्रजवासियों की कैसी दशा का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
इस पद्यांश में कवि ने कृष्ण के प्रेम में विह्वल एवं उद्धव की विदाई से दुःखी ब्रजवासियों की भावपूर्ण दशा का चित्रण किया है।

(ii) गोपियाँ कृष्ण के लिए क्या-क्या उपहार देना चाहती हैं?
उत्तर:
गोपियाँ अपनी शक्ति के अनुसार कृष्ण को कुछ-न-कुछ उपहार अवश्य देना चाहती हैं। कोई गोपी मोर पंख लेकर आती है, तो कोई मुँघची की माला, कोई गोपी मलायुक्त दही, और कोई मट्ठा लेकर आती है। यह सभी उपहार गोपियों द्वारा कृष्ण के प्रति प्रेम-भाव को प्रकट करते हैं।

(iv) ब्रजवासियों का कृष्ण के साथ कैसा सम्बन्ध था?
उत्तर:
ब्रजवासियों का कृष्ण से अथाह प्रेम था। वे उनके दर्शन के लिए एवं उनके सान्निध्य के लिए सदैव व्याकुल रहते थे। ब्रज की गोपियाँ अपने से दूर रहने वाले अपने प्रियतम के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहती थीं।

(v) “पीत पट नन्द जसुमति नवीन नयौ।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार हैं ?
उत्तर:
‘पीत पट’ में ‘प’ वर्ण की आवृत्ति तथा ‘नवीन नयौं’ में ‘न’ वर्ण की | आवृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 4.
ब्रज-रज-रंजित सरीर सुभ ऊधव को
धाइ बलबीर है अधीर लपटाए लेत।
कहै ‘रतनाकर’ सु प्रेम-मद-माते हेरि
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत।।
कीरति कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत।
परन न देत एक बूंद पुहुमी की कॉछि
पोछि-पछि पट निज नैननि लगाए लेत।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किस प्रसंग का वर्णन है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गोपियों की भक्ति भावना से विल उद्धव जी के मथुरा लौट आने के पश्चात् उनकी दशा को देखकर कृष्ण जी की भाव विह्वलता की रिथति का वर्णन किया है।

(ii) श्रीकृष्ण के मन में गोपियों की मधुर-स्मृति कैसे जागृत हुई?
उत्तर:
जब उद्धव ब्रज से लौटकर मथुरा आए तब उनका शरीर भूल से भरा हुआ था। ब्रज की पवित्र मिट्टी में लिप्त उद्धव को देख श्रीकृष्ण भाव-विह्वल हो उठे और उन्होंने शव को अपनी बाँहों में ले लिया। उद्धव का धूल भरा शरीर तथा गोपियों के प्रति उनका प्रेम-भाव देखकर ही श्रीकृष्ण के मन में गोपियों एवं ब्रजवासियों की मधुर-स्मृति जागृत

(iii) “कहें ‘रत्नाकर’ सु प्रेम-मद-माते हेरि
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत।।”
प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत काव्य पंक्तियों से कवि का आशय है कि उद्धव को प्रेम-मर्द में लीन देखकर श्रीकृष्ण उनकी काँपती भुजा को थाम लेते हैं और अपने मन में गोपियों के उस पवित्र प्रेम को याद करके वे काँपते हुए हाथों से उद्धव को स्थिर करने का प्रयास करते हैं।

(iv) श्रीकृष्ण को उद्धव के आँसुओं का स्वरूप कैसा लगता है?
उत्तर:
श्रीकृष्ण को उच के आँसुओं का स्वरूप राधा के समान दिखाई पड़ता है। राधा के दर्शन से पवित्र हुई उद्धव की आँखों से जब गोपियों के वियोग में आँसू निकल आते हैं तो श्रीकृष्ण उन आँसुओं को पृथ्वी पर गिरने से पूर्व ही एक-एक बूंद को अपने दुपट्टे से पोंछकर अपनी आँखों से लगा लेते हैं, क्योंकि ये आँसू जिन आँखों से निकले थे वे आँखें राधा के दर्शन करके आई थीं।

(v) ”पछि-पछि पट निज नैननि लगाए लेत” प्रस्तुत पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
पछि-पछि में पछि शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्तिप्रकाश तथा ‘निज नैननि लगाए लेत’ में ‘न’ और ‘ल’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

गंगावतरण

प्रश्न 5.
निकसि कमण्डल तें उमण्डि नभ-मण्डल खण्डति।
धाई धार अपार बेग सौं बायु बिहण्डति।।
भयौ घोर अति शब्द धमक सौं त्रिभुवन तरजे।
महामेघ मिलि मनहु एक संगहिं सब गरजे।।
निज दरेर सों पौन-पटल फारति फहरावति।।
सुर-पुर के अति सघन घोर धन घसि धहरावति।।
चली धार धुधकारि धरा-दिसि काटति कावा।
सगर-सुतनि के पाप-ताप पर बोलत धावा।।
स्वाति-घटा घराति मुक्ति-पानिप सौं पूरी।
कैधों आवति झुकति सुभ्र आभा रुचि रूरी।।
मीन-मकर-जलव्यालनि की चल चिलक सुहाई।।
सो जनु चपला-चमचमति चंचल छबि छाई।।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से अवतरित हैं तथा इसके रचनाकार कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों ‘गंगावतरण’ कविता से अवतरित है तथा इसके रचनाकार आधुनिक काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ जी हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में किस प्रसंग का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ब्रह्मा जी के कमण्डल से अवतरित हुई गंगा के स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर आने के क्रम में उसकी स्वाभाविक दशा का वर्णन किया है। गंगावतरण स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए हुआ था। इसी भाव की अभिव्यक्ति कवि ने प्रस्तुत पद्यांश में की है।

(iii) गंगा के स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक तक आने के क्रम को कवि ने किस प्रकार वर्णित किया है?
उत्तर:
स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक तक आने के क्रम में गंगा के तीव्र वेग से अति भयंकर शब्द ध्वनित होते हैं, जिसकी धमक से तीनों लोक काँप उठते हैं। पृथ्वी पर गंगा के अवतरण का वेग अत्यधिक प्रचण्ड है, उससे उत्पन्न ध्वनि सुनकर ऐसा प्रतीत हो। रहा है जैसे प्रलयकाल के बादल एक साथ मिलकर गरज रहे हों।

(iv) गंगा की श्वेत धारा को देखकर कैसा प्रतीत हो रहा है?
उत्तर:
आकाश से धरती पर उतरती हुई गंगा की श्वेत धारा को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मोतियों की कान्ति से परिपूर्ण स्वाति नक्षत्र के मेघों का समूह आकाश में उमड़ रहा हो या सुन्दर श्वेत प्रकाशमान ज्योति पृथ्वी की ओर झुकती हुई चली आ रही हो।

(v) ‘त्रिभुवन’ शब्द का समास विग्रह करते हुए उसका भेद बताइए।
उत्तर:
त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार (द्विगु समास)।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi साहित्यिक निबन्ध

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1. रामचरितमानस की प्रासंगिकता (2018)
प्रस्तावना आज हर तरफ मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं परम्पराओं का ह्रास होता जा रहा है। वर्तमान पीढ़ी आज गुणों की अपेक्षा दुर्गुणों को अपनाती जा रही है। आज जन्म देने वाले माता-पिता का सम्मान, अपनी संस्कृति के अनुसार दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। इसलिए पुन: रामचरितमानस में वर्णित आदर्शो, मान्यताओं और मर्यादाओं की रक्षा के लिए भावी पीढ़ी को रामचरित का ज्ञान होना आवश्यक है।

रामचरितमानस पुस्तक की उपयोगिता किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति के संरक्षण एवं उसके प्रचार-प्रसार में पुस्तके विशेष भूमिका निभाती हैं। पुस्तकें ज्ञान का संरक्षण भी करती हैं। यदि हम प्राचीन इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, तो इसका अच्छा स्रोत भी पुस्तकें ही हैं। उदाहरण के तौर पर, वैदिक साहित्य से हमें उस काल के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पहलुओं की जानकारी मिलती है। पुस्तके इतिहास के अतिरिक्त विज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार में भी सहायक होती हैं। विश्व की हर सभ्यता के विकास में पुस्तकों का प्रमुख योगदान रहा है अर्थात् हम कह सकते हैं कि सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान को भावी पीढ़ी को हस्तान्तरित करने में पुस्तकों की विशेष भूमिका रही है।

पुस्तकें शिक्षा का प्रमुख साधन तो हैं ही, इसके साथ ही इनसे अच्छा मनोरंजन भी होता है। पुस्तकों के माध्यम से लोगों में सद्वृत्तियों के साथ-साथ सृजनात्मकता का विकास भी किया जा सकता है। पुस्तकों की इन्हीं विशेषताओं के कारण इनसे मेरा विशेष लगाव रहा है। पुस्तकों ने हमेशा अच्छे मित्रों के रूप में मेरा साथ दिया है। मुझे अब तक कई पुस्तकों को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इनमें से कई पुस्तकें मुझे प्रिय भी हैं, किन्तु सभी पुस्तकों में ‘रामचरितमानस’ मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। इसे हिन्दू परिवारों में धर्म-ग्रन्थ का दर्जा प्राप्त है। इसलिए ‘राम चरित मानस’ हिन्दू संस्कृति का केन्द्र है।

जॉर्ज ग्रियर्सन ने कहा है—“ईसाइयों में बाइबिल का जितना प्रचार है, उससे कहीं अधिक प्रचार और आदर हिन्दुओं में रामचरितमानस का है।”

रामचरितमानस का स्वरूप रामचरितमानस’ अवधी भाषा में रचा गया महाकाव्य है, इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने सोलहवीं सदी में की थी। इसमें भगवान राम के जीवन का वर्णन है। यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत के महाकाव्य ‘रामायण’ पर आधारित है। तुलसीदास ने इस महाकाव्य को सात काण्डों में विभाजित किया है। इन सात काण्डों के नाम हैं- ‘बालकाण्ड’, ‘अयोध्याकाण्ड’, ‘अरण्यकाण्ड’, ‘किष्किन्धाकाण्ड’, ‘सुन्दरकाण्ड’, ‘लंकाकाण्ड’ एवं ‘उत्तरकाण्ड’।

‘रामचरितमानस में वर्णित प्रभु श्रीराम के रामराज्य का जो भावपूर्ण चित्रण तुलसीदास जी ने किया है, उसे पढ़कर या सुनकर पाठक अथवा श्रोतागण भावविभोर हो जाते हैं। जैसे कि कहा गया है- दैहिक, दैविक, भौतिक तापा रामराज्य में काहु ने व्यापा।।

रामचरितमानस की प्रासंगिकता “रामचरितमानस में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चन्द्र जी के उत्तम चरित्र का विषद वर्णन है। जिसका अध्ययन पाश्चात्य सभ्यता की अन्धी दौड़ में भटकती वर्तमान पीढ़ी को मर्यादित करने के लिए आवश्यक है, क्योंकि भगवान रामचन्द्र जी ने कदम-कदम पर मर्यादाओं का पालन करते हुए अपने सम्पूर्ण जीवन को एक आदर्श जीवन की श्रेणी में पहुंचा दिया है। ‘रामचरितमानस’ में वर्णित रामचन्द्र जी का सम्पूर्ण जीवन शिक्षाप्रद है।

‘रामचरितमानस’ में सामाजिक आदर्शों को बड़े ही अनूठे ढंग से व्यक्त किया गया है। इसमें गुरु-शिष्य, माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन इत्यादि के आदर्शों को इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि ये आज भी भारतीय समाज के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। वैसे तो इस ग्रन्थ को ईश्वर (भगवान राम) की भक्ति प्रदर्शित करने के लिए लिखा गया काव्य माना जाता है, किन्तु इसमें तत्कालीन समाज को विभिन्न बुराइयों से मुक्त करने एवं उसमें श्रेष्ठ गुण विकसित करने की पुकार सुनाई देती है। यह धर्म-ग्रन्थ उस समय लिखा गया था, जब भारत में मुगलों का शासन था और मुगलों के दबाव में हिन्दुओं को इस्लाम धर्म स्वीकार करना पड़ रहा था।

समाज में अनेक प्रकार की बुराइयाँ अपनी जड़े जमा चुकी थीं। समाज ही नहीं परिवार के आदर्श भी एक-एक कर खत्म होते जा रहे थे। ऐसे समय में इस ग्रन्थ ने जनमानस को जीवन के सभी आदशों की शिक्षा देकर समाज सुधार एवं अपने धर्म के प्रति आस्था बनाए रखने के लिए प्रेरित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन पंक्तियों को देखिए।

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।

काव्य-शिल्प एवं भाषा के दृष्टिकोण से भी ‘रामचरितमानस’ अति समृद्ध है। यह आज तक हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य बना हुआ है। इसके छन्द और चौपाइयाँ आज भी जन-जन में लोकप्रिय हैं। अधिकतर हिन्दू घरों में इसका पावन पाठ किया जाता है। रामचरितमानस की तरह अब तक कोई दूसरा काव्य नहीं रचा जा सका है, जिसका भारतीय जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा हो। आधुनिक कवियों ने अच्छी कविताओं की रचना की है, किन्तु आम आदमी तक उनके काव्यों की उतनी पहुँच नहीं है, जितनी तुलसीदास के काव्यों की हैं।

चाहे ‘हनुमान चालीसा’ हो या ‘रामचरितमानस’ तुलसीदास जी के काव्य भारतीय जनमानस में रच बस चुके हैं। इन ग्रन्थों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी सरलता एवं गेयता है, इसलिए इन्हें पढ़ने में आनन्द आता है। तुलसीदास की इन्हीं अमूल्य देनों से प्रभावित होकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है-“यह (तुलसीदास) अकेला कवि ही हिन्दी को एक प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।”

जीवन के सभी सम्बन्धों पर आधारित ‘रामचरितमानस’ के दोहे एवं चौपाइयाँ आम जन में अभी भी कहावतों की तरह लोकप्रिय हैं। लोग किसी भी विशेष घटना के सन्दर्भ में इन्हें उद्धृत करते हैं। लोगों द्वारा प्रायः रामचरितमानस से उद्धृत की जाने वाली इन पंक्तियों को देखिए

सकल पदारथ ऐहि जग माहिं, करमहीन नर पावत नाहिं।

‘रामचरितमानस’ को भारत में सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ माना जाता है। विदेशी विद्वानों ने भी इसकी खूब प्रशंसा की है। रामचरितमानस में वर्णित प्रभु रामचन्द्र जी के जीवन से प्रेरित होकर ही अनेक पाश्चात्य विद्वानों द्वारा इसका अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में कराया गया है, किन्तु अन्य भाषाओं में अनूदित ‘रामचरितमानस’ में वह काव्य सौन्दर्य एवं लालित्य नहीं मिलता, जो मूल ‘रामचरितमानस’ में है। इसको पढ़ने का अपना एक अलग आनन्द है। इसे पढ़ते समय व्यक्ति को संगीत एवं भजन से प्राप्त होने वाली शान्ति का आभास होता है, इसलिए भारत के कई मन्दिरों में इसका नित्य पाठ किया जाता है।

उपसंहार हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में ‘रामचरितमानस’ की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही है। इस कालजयी रचना के साथ-साथ इसके रचनाकार तुलसीदास की प्रासंगिकता भी सर्वदा बनी रहेगी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में-“लोकनायक यही हो सकता है, जो समन्वय कर सके। गीता में समन्वय की चेष्टा है। बुद्धदेव समन्वयवादी थे और तुलसीदास समन्वयकारी थे। लोकशासकों के नाम तो भुला दिए जाते हैं, परन्तु लोकनायकों के नाम युग-युगान्तर तक स्मरण किए। जाते हैं।”

2. राष्ट्रभाषा की समस्या और हिन्दी (2016)
संकेत विन्दु
भूमिका, हिन्दी राजभाषा के रूप में, हिन्दी देश की सम्पर्क भाषा, हिंग्लिश का प्रचलन, देश की एकता व अखण्डता में सहायक, उपसंहार।

भूमिका “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गुंगा है। अगर हम भारत को राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हिन्दी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है। यह बात राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कही है। किसी भी राष्ट्र की सर्वाधिक प्रचलित एवं स्वेच्छा से आत्मसात् की गई भाषा को राष्ट्रभाषा’ कहा जाता है। हिन्दी, बांग्ला, उर्दू, पंजाबी, तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, उड़िया इत्यादि भारत के संविधान द्वारा राष्ट्र की मान्य भाषाएं हैं।

इन सभी भाषाओं में हिन्दी का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि यह भारत की राजभाषा भी है। राजभाषा वह भाषा होती है, जिसका प्रयोग किसी देश में राज-काज को चलाने के लिए किया जाता है। हिन्दी को 14 सितम्बर, 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया गया। इसके बावजूद सरकारी कामकाज में अब तक अपेणी का व्यापक प्रयोग किया जाता है। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की राजभाषा तो है, किन्तु इसे यह सम्मान सिर्फ सैद्धान्तिक रूप में प्राप्त है, वास्तविक रूप में राजभाषा का सम्मान प्राप्त करने के लिए इसे अंग्रेजी से संघर्ष करना पड़ा रहा है।

हिन्दी राजभाषा के रूप में संविधान के अनुच्छेद-343 के खण्ड-1 में कहा गया है कि भारत संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संप के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाले अंकों का रूप, भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा। खण्ड-2 में यह उपबन्ध किया गया था कि संविधान के प्रारम्भ से पन्द्रह वर्ष की अवधि तक अर्थात् 26 जनवरी, 1965 तक संघ के सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा जैसा कि पूर्व में होता था।

वर्ष 1965 तक राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग का प्रावधान किए जाने का कारण यह था कि भारत वर्ष 1947 से पहले अंग्रेजों के अधीन था और तत्काल ब्रिटिश शासन में यहाँ इसी भाषा का प्रयोग राजकीय प्रयोजनों के लिए होता था।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद अचानक राजकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी का प्रयोग कर पाना व्यावहारिक रूप से सम्भव नहीं था, इसलिए वर्ष 1950 में संविधान के लागू होने के बाद से अंग्रेजी के प्रयोग के लिए पन्द्रह वर्षों का समय दिया गया और यह तय किया गया कि इन पन्द्रह वर्षों में हिन्दी का विकास कर इसे राजकीय प्रयोजनों के उपयुक्त कर दिया जाएगा, किन्तु ये पन्द्रह वर्ष पूरे होने के पहले ही हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने का दक्षिण भारत के कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञों ने व्यापक विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। जिस कारण वर्तमान समय तक अंग्रेजी हिन्दी के साथ राजभाषा के रूप में प्रयोग की जा रही है। देश की सर्वमान्य भाषा हिन्दी को क्षेत्रीय लाभ उठाने के ध्येय से विवादों में घसीट लेने को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

हिन्दी देश की सम्पर्क भाषा देश की अन्य भाषाओं के बदले हिन्दी को । राजभाषा बनाए जाने का मुख्य कारण यह है कि यह भारत में सर्वाधिक बोली जाने चाली भाषा के साथ-साथ देश की एकमात्र सम्पर्क भाषा भी है।

ब्रिटिशकाल में पूरे देश में राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था। पूरे देश के अलग अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती है, किन्तु स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय राजनेताओं ने यह महसूस किया कि हिन्दी एकमात्र ऐसी भारतीय भाषा है, जो दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर पूरे देश की सम्पर्क भाषा है और देश के विभिन्न भाषा भाषी भी आपस में विचार विनिमय करने के लिए हिन्दी का सहारा लेते हैं।

हिन्दी की इसी सार्वभौमिकता के कारण राजनेताओं ने हिन्दी को राजभाषा का | दर्जा देने का निर्णय लिया था। हिन्दी, राष्ट्र के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है, इसकी लिपि देवनागरी है, जो अत्यन्त सरल हैं। पण्डित राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में-“हमारी नागरी लिपि दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है।” हिन्दी में आवश्यकतानुसार देशी-विदेशी भाषाओं के शब्दों को तरलता से आत्मसात् करने की शक्ति है। यह भारत की एक ऐसी राष्ट्रभाषा है, जिसमें पूरे देश में भावात्मक एकता स्थापित करने की पूर्ण क्षमता है।

हिंग्लिश का प्रचलन आजकल पूरे भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा के रूप में हिन्दी एवं अंग्रेजी के मिश्रित रूप हिंग्लिश का प्रयोग बढ़ा है। इसके कई कारण हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में व्यावसायिक शिक्षा में प्रगति हुई है। अधिकतर व्यावसायिक पाठ्यक्रम अंग्रेजी भाषा में ही उपलब्ध हैं और विद्यार्थियों के अध्ययन का माध्यम अंग्रेजी भाषा ही है। इस कारण से विद्यार्थी हिन्दी में पूर्णतः निपुण नहीं हो पाते। वहीं अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त युवा हिन्दी में बात करते समय अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने को बाध्य होते हैं, क्योंकि भारत में हिन्दी आम जन की भाषा हैं। इसके अतिरिक्त आजकल समाचार-पत्रों एवं टेलीविजन के कार्यक्रमों में भी ऐसी ही मिश्रित भाषा प्रयोग में लाई जा रही हैं, इन सबका प्रभाव आम आदमी पर पड़ता है।

भले ही हिंग्लिश के बहाने हिन्दी बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है, किन्तु हिंग्लिश का बढ़ता प्रचलन हिन्दी भाषा की गरिमा के दृष्टिकोण से गम्भीर चिन्ता का विषय है। कुछ वैज्ञानिक शब्दों; जैसे—मोबाइल, कम्प्यूटर, साइकिल, टेलीविजन एवं अन्य शब्दों; जैसे-स्कूल, कॉलेज, स्टेशन इत्यादि तक तो ठीक है, किन्तु अंग्रेजी के अत्यधिक एवं अनावश्यक शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सही नहीं है।

हिन्दी, व्याकरण के दृष्टिकोण से एक समृद्ध भाषा है। यदि इसके पास शब्दों का अभाव होता, तब तो इसकी स्वीकृति दी जा सकती थी। शब्दों का भण्डार होते हुए भी यदि इस तरह की मिश्रित भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो यह निश्चय ही भाषायी गरिमा के दृष्टिकोण से एक बुरी बात है। भाषा संस्कृति की संरक्षक एवं वाहक होती हैं। भाषा की गरिमा नष्ट होने से उस स्थान की सभ्यता और संस्कृति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

देश की एकता व अखण्डता में सहायक हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के सन्दर्भ में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था-“भारत की सारी प्रान्तीय बोलियाँ, जिनमें सुन्दर साहित्यों की रचना हुई है, अपने घर या प्रान्त में रानी बनकर रहे, प्रान्त के जन-गण के हार्दिक चिन्तन की प्रकाश-भूमि स्वरूप कविता की भाषा होकर हे और आधुनिक भाषाओं के हार की मध्य-मणि हिन्दी भारत भारती होकर विराजती रहे।” प्रत्येक देश की पहचान का एक मजबूत आधार उसकी अपनी भाषा होती है, जो अधिक-से-अधिक व्यक्तियों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा के रूप में व्यापक विचार विनिमय का माध्यम बनकर ही राष्ट्रभाषा (यहाँ राष्ट्रभाषा का तात्पर्य है-पूरे देश की भाषा) का पद ग्रहण करती है। राष्ट्रभाषा के द्वारा आपस में सम्पर्क बनाए रखकर देश की एकता एवं अखण्डता को भी अक्षुण्ण रखा जा सकता है।

उपसंहार हिन्दी देश की सम्पर्क भाषा तो है ही, इसे राजभाषा का वास्तविक सम्मान भी दिया जाना चाहिए, जिससे कि यह पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँधने वाली भाषा बन सके। देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की कही यह बात आज भी प्रासंगिक है-“जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। अतः आज देश के सभी नागरिकों को यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि वे हिन्दी को सस्नेह अपनाकर और सभी कार्य क्षेत्रों में इसका । अधिक-से-अधिक प्रयोग कर इसे व्यावहारिक रूप से राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करेंगे।”

3. साहित्य के संवर्द्धन में सिनेमा का योगदान (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, साहित्य सिनेमा के लोकदूत रूप में, समाज पर साहित्य व सिनेमा का प्रभाव, हिन्दी साहित्य से प्रभावित भारतीय सिनेमा, साहित्य व भाषा का बढ़ता वर्चस्व, उपसंहार।

भूमिका साहित्य समाज की चेतना से उपजी प्रवृत्ति है। समाज व्यक्तियों से बना है। तथा साहित्य समाज की सृजनशीलता का नमूना है। साहित्य का शाब्दिक अर्थ है जिसमें हित की भावना सन्निहित हो। कवि या लेखक अपने समय के वातावरण में व्याप्त विचारों को पकड़कर मुखरित कर देता है। कवि और लेखक अपने समाज का मस्तिष्क और मुख भी हैं। कवि की पुकार समाज की पुकार है। समाज की समस्त शोभा, उसकी समृद्धि, मान-मर्यादा सब साहित्य पर अवलम्बित हैं। आचार्य शुक्ल के शब्दों में प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब है।”

साहित्य समाज का दर्पण है तथा सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है। चाहे साहित्य हो या सिनेमा इनका स्वरूप समाज के यथार्थ की पृष्ठभूमि से सम्बद्ध होता है। साहित्य जो कभी पाठ्य सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, परन्तु आज सिनेमा के माध्यम से उसका संवर्द्धन दिनों-दिन चरमोत्कर्ष पर है।

सिनेमा लोकदूत रूप में भाषा-प्रसार उसके प्रयोक्ता समूह की संस्कृति और जातीय प्रश्नों को साथ लेकर चला करता है। भारतीय सिनेमा निश्चय ही हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपनी विश्वव्यापी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। उसकी यह प्रक्रिया अत्यन्त सहज, बोधगम्य, रोचक, सम्प्रेषणीय और पास है। हिन्दी यहाँ भाषा, साहित्य और जाति तीनों अर्थों में ली जा सकती है। जब हम भारतीय सिनेमा पर दृष्टि डालते हैं, तो भाषा का प्रचार-प्रसार, साहित्यिक कृतियों का फिल्म रूपान्तरण, हिन्दी गीतों की लोकप्रियता, हिन्दी की उपभाषाओं, बोलियों का सिनेमा और सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में भारतीय सिनेमा का योगदान जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण ढंग से सामने आते हैं। हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैली, वैज्ञानिक अध्ययन, जन सम्प्रेषणीयता, पटकथात्मकता के निर्माण, संवाद लेखन, दृश्यात्मकता, कोड निर्माण, संक्षिप्त कथन, बिम्ब धर्मिता, प्रतीकात्मकता एवं भाषा-दृश्य की अनुपातिकता आदि मानकों को भारतीय सिनेमा ने गढ़ा है। भारतीय सिनेमा हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर इन तक पहुँचने की दिशा में अग्रसर है।

समाज पर साहित्य व सिनेमा का प्रभाव यद्यपि हमेशा यह कहना कठिन होता है कि समाज और साहित्य सिनेमा में प्रतिबिम्बित होता है या सिनेमा से समाज प्रभावित होता है। दोनों ही बातें अपनी-अपनी सीमाओं में सही हैं। कहानियाँ कितनी भी काल्पनिक क्यों न हों कहींन-कहीं वे इसी समाज से जुड़ी होती हैं। यही सिनेमा में भी अभिव्यक्त होती है, लेकिन अनेक बार ऐसा भी हुआ है कि सिनेमा का प्रभाव हमारे युवाओं और बच्चों दोनों पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव डालता है। अतः प्रत्येक माध्यम से समाज पर विशेष प्रभाव पड़ते हैं।

भारतीय सिनेमा के आरम्भिक दशकों में जो फिल्में बनती थीं, उनमें भारतीय संस्कृति की झलक (बस) होती थी तथा विभिन्न आयामों से भारतीयता को उभारा जाता था। बहुत समय बाद पिछले दो वर्षों में ऐसी ही दो फिल्में देखी हैं, जिनमें हमारी संस्कृति की झलक थी। देश के आतंकवाद पर भी कुछ अच्छा सकारात्मक हल खोजती फिल्में आई हैं।

हिन्दी साहित्य से प्रभावित भारतीय सिनेमा भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ थी। प्रारम्भिक दौर में भारत में पौराणिक एवं रोमाण्टिक फिल्मों का बोल-चाला रहा, किन्तु समय के साथ ऐसे सिनेमा भी बनाए गए जो हिन्दी साहित्य पर आधारित थे एवं जिन्होंने समाज पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। उन्नीसवीं सदी के साठ-सत्तर एवं उसके बाद के कुछ दशकों में अनेक ऐसे भारतीय फिल्मकार हुए जिन्होंने सार्थक एवं समाजोपयोगी फिल्मों का निर्माण किया। सत्यजीत राय (पाथेर पांचाली, चारुलता, शतरंज के खिलाड़ी), ऋत्विक घटक (मेघा ढाके तारा), मृणाल सेन (ओकी उरी कथा),अडूर गोपाल कृष्णन् (स्वयंवरम्) श्याम बेनेगल (अंकुर, निशान्त, सूरज का सातवाँ घोड़ा), बासु भट्टाचार्य (तीसरी कसम), गुरुदत्त (प्यासा, कागज के फूल, साहब, बीवी और गुलाम), विमल राय (दो बीघा जमीन, बिन्दिनी, मधुमती) भारत के कुछ ऐसे ही फिल्मकार हैं। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानी—मारे गए गुलफाम पर आधारित तीसरी कसम, धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता पर आधारित श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित ‘द सेम नाम’, प्रेमचन्द के उपन्यास सेवासदन व गोदान तथा भीष्म साहनी के उपन्यास तमस पर आधारित सिनेमा निर्मित किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त कृष्णा सोबती की ज़िन्दगीनामा पर आधारित सिनेमा ‘ट्रेन ? पाकिस्तान’ तथा यशपाल के ‘झूठा सच पर आधारित ‘खामोश पानी’ जैसी प्रचलित सिनेमा का निर्माण किया जा चुका है। इस प्रकार यह कहा जा सकता हैं कि सिनेमा का जन्म समाज व साहित्य से हुआ है।

साहित्य व भाषा का बढ़ता वर्चस्व आज हॉलीवुड के फिल्म निर्माता भी भारत में अपनी विपणन नीति बदल चुके हैं। वे जानते हैं कि यदि उनकी फिल्में हिन्दी में रूपान्तरित की जाएँगी तो यहाँ से वे अपनी मूल अंग्रेजी में निर्मित चित्रों के प्रदर्शन से कहीं अधिक मुनाफा कमा सकेंगे। हॉलीवुड की आज की वैश्विक बाजार की परिभाषा में हिन्दी जानने वालों का महत्त्व सहसा बढ़ गया है। भारत को आकर्षित करने का उनको अर्थ अब उनकी दृष्टि में हिन्दी भाषियों को भी उतना ही महत्त्व देना है, परन्तु आज बाजार की भाषा ने हिन्दी को अंग्रेजी की अनुचरी नहीं सहचरी बना दिया है। आज टी. बी, देखने वालों की कुल अनुमानित संख्या जो लगभग १ 10 करोड़ मानी गई है, उसमें हिन्दी का ही वर्चस्व है। आज हम स्पष्ट देख रहे हैं कि आर्थिक सुधारों व उदारीकरण के दौर में निजी पहल का जो चमत्कार हमारे सामने आया है इससे हम माने या न मानें हिन्दी भारतीय सिनेमा के माध्यम से दुनिया भर के दूरदराज के एक बड़े भू-भाग में समझी जाने वाली भाषा स्वतः बन गई हैं।

उपसंहार आधुनिक भारतीय फिल्मकारों ने कुछ सार्थक सिनेमा का भी निर्माण किया है। ‘नो वन किल्ड जेसिका’, नॉक आउट’ एवं ‘पीपली लाइव’ जैसी 2010 में निर्मित फिल्में इस बात का उदाहरण हैं। नो वन किल्ड जेसिका’ में मीडिया के प्रभाव, कानून के अन्धेपन एवं जनता की शक्ति को चित्रित किया गया, तो ‘नॉक आउट’ में विदेशों में जमा भारतीय धन का कच्चा चिट्ठा खोला गया और ‘पीपली लाइव’ ने पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बढ़ी पीत पत्रकारिता को जीवन्त कर दिखाया। ऐसी फिल्मों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है एवं लोग सिनेमा से शिक्षा ग्रहण कर समाज सुधार के लिए कटिबद्ध होते हैं।

4. साहित्य समाज का दर्पण (2015, 14, 12, 11, 10)
अन्य शीर्षक साहित्य और समाज (2018, 17, 14, 13, 12, 11,10), साहित्य और जीवन (2018, 17, 13, 10), साहित्य और समाज का सम्बन्ध (2012)
संकेत विन्द साहित्य का तात्पर्य, साहित्य समाज का दर्पण, साहित्य विकास का उद्गाता, उपसंहार

साहित्य का तात्पर्य साहित्य समाज की चेतना से उपजी प्रवृत्ति है। समाज व्यक्तियों से बना है तथा साहित्य समाज की सृजनशीलता का प्रतिरूप है। साहित्य का शाब्दिक अर्थ है जिसमें हित की भावना सन्निहित हो। साहित्य और समाज के सम्बन्ध कितने पनिष्ठ है, इसका परिचय साहित्य शब्द की व्युत्पत्ति, अर्थ एवं उसकी विभिन्न परिभाषाओं से प्राप्त हो जाता है। ‘हितं सन्निहितं साहित्यम्’। हित का भाव जिसमें विद्यमान हो, वह साहित्य कहलाता है।

अंग्रेज़ी विद्वान् मैथ्यू आर्नल्ड ने भी साहित्य को जीवन की आलोचना माना है-“Poetry in the bottom criticism of life,” वर्सफोल्ड नामक पाश्चात्य विद्वान् ने साहित्य का रूप स्थिर करते हुए लिखा है-“Literature is the brain of humanity.” अर्थात् साहित्य मानवता का मस्तिष्क है।

जिस प्रकार बेतार के तार का ग्राहम यन्त्र आकाश मण्डल में विचरती हुई विद्युत तरंगों को पकड़कर उनको भाषित शब्द का आधार देता है, ठीक उसी प्रकार कवि या | लेखक अपने समय में प्रचलित विचारों को पकड़कर मुखरित कर देता है। कवि और लेखक अपने समाज के मस्तिष्क हैं और मुख भी। कवि की पुकार समाज की पुकार | है। वह समाज के भावों को व्यक्त कर सजीव और शक्तिशाली बना देता है। उसकी भाषा में समाज के भावों की झलक मिलती है।

साहित्य समाज का दर्पण साहित्य और समाज के बीच अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है। जनजीवन के धरातल पर ही साहित्य का निर्माण होता है। समाज की समस्त शोभा, उसकी समृद्धि, मान-मर्यादा सय साहित्य पर अवलम्बित हैं।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब है। समाज की क्षमता और सजीवता यदि कहीं प्रत्यक्ष देखने को मिल सकती है, तो निश्चित रूप से साहित्य रूपी दर्पण में ही। कतिपय विद्वान् साहित्य की उत्पत्ति का मूल कारण कामवृत्ति को मानते हैं। ऐसे लोगों में फ्रायड विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कालिदास, सूर एवं तुलसी पर हमें गर्व है, क्योंकि उनका साहित्य हमें एक संस्कृति और एक जातीयता के सूत्र में बाँधता है, इसलिए साहित्य केवल हमारे समाज का दर्पण मात्र न रहकर उसका नियामक और उन्नायक भी होता है। वह सामाजिक अन्धविश्वासों और बुराइयों पर तीखा प्रहार करता है। समाज में व्याप्त रूढ़ियों | और आडम्बरों को दूर करने में साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ मार्गदर्शक भी होता है, जो समाज को दिशा प्रदान करता है।

साहित्य विकास का उद्गाता साहित्य द्वारा सम्पन्न सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियों के उल्लेखों से तो विश्व इतिहास भरा पड़ा है। सम्पूर्ण यरोप को गम्भीर रूप से आलोकित कर डालने वाली ‘फ्रांस की राज्य क्रान्ति’ (1789 ई.), काफी हद तक रूसो की सामाजिक अनुबन्ध’ नामक पुस्तक के प्रकाशन का ही परिणाम थी। इन्हीं विचारों का पोषण करते हुए कवि त्रिलोचन के उद्गार उल्लेखनीय हैं-

“बीज क्रान्ति के बोता हूँ मैं,
अक्षर दाने हैं।
घर-बाहर जन समाज को
नए सिरे से रच देने की रुचि देता हूँ।”

आधुनिक काल में चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों ने इंग्लैण्ड से कई सामाजिक एवं नैतिक रूढ़ियों का उन्मूलन कर नूतन स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात कराया। यदि अपने देश के साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो एक ओर बिहारी के ‘नहि पराग नहिं मधुर मधु’ जैसे दोहे ने राजा जयसिंह को नारी-मोह से मुक्त कराकर कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित किया, तो दूसरी ओर कबीर, तुलसी, निराला, प्रेमचन्द जैसे साहित्यकारों ने पूरी सामाजिक व्यवस्था को एक नई सार्थक एवं रचनात्मक दिशा दी। रचनाकारों की ऐसी अनेक उपलब्धियों की कोई सीमा नहीं।

उपसंहार वास्तव में, समाज और साहित्य का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। इन्हें एक-दूसरे से अलग करना सम्भव नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यकार सामाजिक कल्याण हेतु सद्साहित्य का सृजन करें। साहित्यकार को उसके उत्तरदायित्व का बोध कराते हुए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा है कि

“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।

सुन्दर समाज निर्माण के लिए साहित्य को माध्यम बनाया जा सकता है। यदि समाज स्वस्थ होगा, तभी राष्ट्र शक्तिशाली बन सकता है।

5. मेरा प्रिय कवि (साहित्यकार) (2018, 15, 13, 12, 11, 10)
अन्य शीर्षक मेरे प्रिय कवि गोस्वामी तुलसीदास,’ महाकवि गोस्वामी तुलसीदास (2017, 14, 13, 12)
संकेत बिन्द्र प्रस्तावना, आरम्भिक जीवन परिचय, काव्यगत विशेषताएँ, उपसंहार

प्रस्तावना संसार में अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार हुए हैं, जिनकी अपनी अपनी विशेषताएँ हैं। मेरा प्रिय साहित्यकार महाकवि तुलसीदास हैं। यद्यपि तुलसीदास जी के काव्य में भक्ति-भावना की प्रधानता है, परन्तु इनका काव्य कई सौ वर्षों के बाद भी भारतीय जनमानस में रचा-बसा हुआ है और उनका मार्गदर्शन कर रहा है, इसलिए तुलसीदास मेरे प्रिय साहित्यकार हैं।

आरम्भिक जीवन परिचय प्राय: प्राचीन कवियों और लेखकों के जन्म के बारे में सही-सही जानकारी नहीं मिलती। तुलसीदास के विषय में भी ऐसा ही है, किन्तु माना जाता है कि तुलसीदास का जन्म सम्वत् 1589 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनके ब्राह्मण माता-पिता ने इन्हें अशुभ मानकर जन्म लेने के बाद ही इनका त्याग कर दिया था। इस कारण इनका बचपन बहुत ही कठिनाइयों में बीता। गुरु नरहरिदास ने इनको शिक्षा दी। तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नाम की कन्या से हुआ था। विवाह उपरान्त उसकी एक कटु उक्ति सुनकर इन्होंने रामभक्ति को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। इन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग सैतीस ग्रन्थों की रचना की, परन्तु इनके बारह ग्रन्थ ही प्रामाणिक माने जाते हैं। इस महान् भक्त कवि का देहावसान सम्वत् 1680 में हुआ।

काव्यगत विशेषताएँ तुलसीदास का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब हिन्दू समाज मुसलमान शासकों के अत्याचारों से आतंकित था। लोगों का नैतिक चरित्र गिर रहा था और लोग संस्कारहीन हो रहे थे। ऐसे में समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करने की आवश्यकता थी ताकि लोग उचित-अनुचित का भेद समझकर सही आचरण कर सके। यह भार तुलसीदास ने सँभाला और ‘रामचरितमानस’ नामक महान् काव्य की रचना की। इसके माध्यम से इन्होंने अपने प्रभु श्रीराम का चरित्र-चित्रण किया। हालाँकि रामचरितमानस एक भक्ति भावना प्रधान काव्य है, परन्तु इसके माध्यम से जनता को अपने सामाजिक कर्तव्यों का बोध हुआ। इसमें वर्णित विभिन्न घटनाओं और चरित्रों ने सामान्य जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला। रामचरितमानस के अतिरिक्त इन्होंने कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका, जानकीमंगल, रामलला नहङ्, बरवें, रामायण, वैराग्य सन्दीपनी, पार्वती मंगल आदि ग्रन्थों। की रचना भी की है, परन्तु इनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार रामचरितमानस ही है।

तुलसीदास जी वास्तव में एक सच्चे लोकनायक थे, क्योंकि इन्होंने कभी किसी सम्प्रदाय या मत का खण्डन नहीं किया वरन् सभी को सम्मान दिया। इन्होंने निर्गुण एवं सगुण, दोनों धाराओं की स्तुति की। अपने काव्य के माध्यम से इन्होंने कर्म, ज्ञान एवं भक्ति की प्रेरणा दी। रामचरितमानस के आधार पर इन्होंने एक आदर्श भारतवर्ष की कल्पना की थी, जिसका सकारात्मक प्रभाव हुआ।. इन्होंने लोकमंगल को सर्वाधिक महत्त्व दिया। साहित्य की दृष्टि से भी तुलसी का काव्य अद्वितीय है। इनके काव्य में सभी रसों को स्थान मिला है। इन्हें संस्कृत के साथ-साथ राजस्थानी, भोजपुरी, बुन्देलखण्डी, प्राकृत, अवधी, ब्रज, अरबी आदि भाषाओं का ज्ञान भी था, जिसका प्रभाव इनके काव्य में दिखाई देता है।

इन्होंने विभिन्न छन्दों में रचना करके अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन किया है। तुलसी ने प्रबन्ध तथा मुक्त दोनों प्रकार के काव्यों में रचनाएँ कीं। इनकी प्रशंसा में कवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा-

प्रभु का निर्भय सेवक था, स्वामी था अपना,
जाग चुका था, जग था, जिसके आगे सपना।
प्रबल प्रचारक था, जो उस प्रभु की प्रभुता का,
अनुभव था सम्पूर्ण जिसे उसकी विभुता का।।
राम छोड़कर और की, जिसने कभी न आस की,
रामचरितमानस-कमल, जय हो तुलसीदास की।”

उपसंहार तुलसीदास जी अपनी इन्हीं सब विशेषताओं के कारण हिन्दी साहित्य | के अमर कवि हैं। नि:सन्देह इनका काव्य महान् है। तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व, व्यक्ति और समाज सभी के लिए महत्वपूर्ण सामी दी है। अत: ये मेरे प्रिय कवि हैं। अन्त में इनके बारे में यही कहा जा सकता है-

“कविता करके तुलसी न लसे,
कविता लसी पा तुलसी की कला।”

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विविध निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 9
Chapter Name विविध निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विविध निबन्ध

1. जो चढ़ गए राष्ट्रवेदी पर (2018)

“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।’

मैथिलीशरण गुप्त की इन काव्य पंक्तियों का अर्थ यह है कि देश-प्रेम के अभाव में मनुष्य जीवित प्राणी नहीं, बल्कि पत्थर के ही समान कहा जाएगा। हम जिस देश या समाज में जन्म लेते हैं, उसकी उन्नति में समुचित सहयोग देना हमारा परम कर्तव्य बनता है। स्वदेश के प्रति यही कर्तव्य-भावना, इसके प्रति प्रेम अर्थात् स्वदेश-प्रेम ही देशभक्ति का मूल स्रोत है।

कोई भी देश सांधारण एवं निष्प्राण भूमि का केवल ऐसा टुकड़ा नहीं होता, जिसे मानचित्र द्वारा दर्शाया जाता है। देश का निर्माण उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों एवं उनके सांस्कृतिक पहलुओं से होता है। लोग अपनी पृथक सांस्कृतिक पहचान एवं अपने जीवन-मूल्यों को बनाए रखने के लिए ही अपने देश की सीमाओं से बँधकर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि देश-प्रेम की भावना देश की उन्नति का परिचायक होती है।

स्वदेश प्रेमः एक उच्च भावना वास्तव में देश-प्रेम की भावना मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भावना है। इसके सामने किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक ऐसा पवित्र व सात्विक भाव है, जो मनुष्य को निरन्तर त्याग की प्रेरणा देता है, इसलिए कहा गया है-“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। मानव की हार्दिक अभिलाषा रहती है कि जिस देश में उसका जन्म हुआ, जहाँ के अन्न-जल से उसके शरीर का पोषण हुआ एवं जहाँ के लोगों ने उसे अपना प्रेम एवं सहयोग देकर उसके व्यक्तित्व को निखारा, उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन वह सदा करता रहे। यही कारण है। कि मनुष्य जहाँ रहता है, अनेक कठिनाइयों के बावजूद उसके प्रति उसका मोह कभी खत्म नहीं होता, जैसा कि कवि रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी कविता में कहा है।

“विषुवत् रेखा का वासी जो जीता है नित हाँफ-हाँफ कर,
रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर।
हिमवासी जो हिम में, तम में जी लेता है काँप-काँपकर,
वह भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर।”

स्वदेश प्रेम की अभिव्यक्ति के प्रकार स्वदेश प्रेम यद्यपि मन की एक भावना है तथापि इसकी अभिव्यक्ति हमारे क्रिया-कलापों से हो जाती है। देश प्रेम से | ओत-प्रोत व्यक्ति सदा अपने देश के प्रति कर्तव्यों के पालन हेतु न केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने से भी पीछे | नहीं हटता। सच्चा देशभक्त आवश्यकता पड़ने पर अपना तन, मन, धन सब कुछ देश को समर्पित कर देता है।

यह स्मरण रहे कि स्वदेश प्रेम को किसी विशेष क्षेत्र एवं सीमा में नहीं बघा जासकता। हमारे जिस कार्य से देश की उन्नति हो, वही स्वदेश प्रेम की सीमा में आता है। अपने प्रजातन्त्रात्मक देश में, हम अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए ईमानदार एवं देशभक्त जनप्रतिनिधि का चयन कर देश को जाति, सम्प्रदाय तथा प्रान्तीयता की राजनीति से मुक्त कर इसके विकास में सहयोग कर सकते हैं। जाति प्रथा, दहेज प्रथा, अन्धविश्वास, आढ़त इत्यादि कुरीतियाँ देश के विकास में बाधक है। हम इन्हें दूर करने में अपना योगदान कर देश सेवा का फल प्राप्त कर सकते है। अशिक्षा, निर्धनता, बेरोजगारी, व्याभिचार एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेकर हम अपने देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकते हैं। हम समय पर टैक्स का भुगतान कर देश की प्रगति में सहायक हो सकते हैं। इस तरह किसान, मजदूर, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, चिकित्सक, सैनिक और अन्य सभी पेशेवर लोगों के साथ-साथ देश के हर नागरिक द्वारा अपने कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना भी देशभक्ति ही है।

उपसंहार नागरिकों में स्वदेश प्रेम का अभाव राष्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है, जबकि राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और घाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना तब ही सम्भव है, जब हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।

2. यदि मैं रक्षा मंत्री होता (2018)
भूमिका एवं रक्षामन्त्री बनने की प्रबुद्ध इच्छा का कारण सेना राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा दिवस का पावन पर्व और मैं सेना मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के बाद देश के जवानों को सम्बोधित करते हुए भाषण दे रहा था। इस भाषण में देश की रक्षा के लिए मेरे द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन तो था ही, साथ ही आने वाले वर्षों में मेरे द्वारा किए जाने वाले सम्भावित कार्यों का भी वर्णन था। मैं अभी भाषण दे ही रहा था कि अचानक मेरी नींद खुल गई और मैंने अपने आपको बिस्तर पर पाया। मैं वास्तव में रक्षा मन्त्री होने का खूबसूरत सपना देख रहा था।

रक्षा मन्त्री के रूप में प्राथमिकताएँ भारत के रक्षा मन्त्री के रूप में मेरी निम्नलिखित प्राथमिकताएँ होंगी।

1. सेना का उचित प्रसार देश के रक्षामन्त्री के रूप में सबसे पहले मैं भारत में सेना के उचित प्रसार पर ध्यान देता। किसी भी देश की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितने सुरक्षित, सजग एवं सतर्क प्रहरी हैं। समय के अनुसार विज्ञान एवं रक्षा मन्त्री के रूप में प्राथमिकता प्रौद्योगिकी में परिवर्तन को देखते हुए भारतीय सेना प्रणाली में भी इनको प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है। मैं सेना द्वारा सुरक्षा बढ़ाने के लिए विज्ञान की शिक्षा कार्यानुभव एवं व्यावसायिक शिक्षा पर बल देता।।

2. आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए प्रयास एक देश तब ही प्रगति की राह पर अग्रसर रह सकता है, जब उसके नागरिक अपने देश में सुरक्षित हों। असुरक्षा की भावना न केवल नागरिकों का जीना दूभर कर देती हैं, बल्कि इससे देश की शान्ति एवं सुव्यवस्था के साथ-साथ इसकी प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज भारत निःसन्देह बहुत तेज़ी से प्रगति कर रहा है, किन्तु इसकी आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष ऐसी चुनौतियाँ हैं, जो इसकी शान्ति एवं सुव्यवस्था पर प्रश्न-चिह्न लगा रही हैं। साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, भाषावाद, नक्सलवाद इत्यादि भारत को आन्तरिक, बाह्य सुरक्षा के समक्ष ऐसी ही कुछ खतरनाक चुनौतियाँ हैं। मैं इन समस्याओं का समाधान कर आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने का प्रयास करता।

3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने का प्रयास भारत में कई धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं, जिनके रहन-सहन एवं आस्था में अन्तर तो है ही साथ ही, उनकी भाषाएँ भी अलग-अलग हैं। इन सबके बावजूद पूरे भारतवर्ष के लोग भारतीयता की जिस भावना से ओत-प्रोत रहते हैं, उसे राष्ट्रीय एकता का विश्वभर में सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए तो अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे, इसलिए मैं भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता’ को महत्त्व देते हुए भारत की राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने का प्रयास करता।

4. सामाजिक समस्याओं का समाधान धार्मिक कट्टरता, जातिप्रथा, अन्धविश्वास, नारी-शोषण, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, गरीबी इत्यादि हमारी प्रमुख सामाजिक समस्याएँ हैं। ऐसा नहीं है कि ये सभी सामाजिक समस्याएँ हमेशा से हमारे समाज में विद्यमान रही हैं। कुछ समस्याओं की जड़ धार्मिक कुरीतियाँ हैं, तो कुछ ऐसी समस्याएँ भी हैं, जिन्होंने सदियों की गुलामी के बाद समाज में अपनी जड़ें स्थापित कर ली, जबकि कुछ समस्याओं के मूल में दूसरी पुरानी समस्याएँ रही हैं। देश एवं समाज की वास्तविक प्रगति के लिए इन समस्याओं का शीघ्र समाधान आवश्यक है। एक रक्षा मन्त्री के रूप में मैं रक्षा सेनाओं की समस्याओं का समाधान करने के लिए व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रोजगारोन्मुखी NCC, शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर देश के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करता।

5. रक्षा नीति में सुधार अन्तर्राष्ट्रिीय राजनीति के क्षेत्र में किसी भी देश की स्थिति तब ही सुदृढ़ हो सकती है, जब उसकी रक्षा नीति सही हो। भारत एक शान्तिप्रिय देश है। दुनिया भर में शान्ति को बढ़ावा देने एवं परस्पर सहयोग के लिए मैं भारतीय विदेश नीति में सुधार करता। राष्ट्रीय सीमा सुरक्षा बलों का विकास करता तथा मैं सम्पूण सेना के अंगों को प्रशिक्षित एवं अत्याधुनिक निक हथियारों, वायुयानों, रडारों एवं अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों से सुसज्जित कर देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करता।

उपसंहार इस तरह स्पष्ट है कि यदि मैं भारत का रक्षा मन्त्री होता तो देश एवं देश की जनता को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षिक सुरक्षा के स्तर पर सुदृढ़ कर भारत को पूर्णतः विकसित ही नहीं, खुशहाल शान्तिप्रिय एवं सुरक्षित देश बनाने का सपना साकार करता।

3. जीवन में खेल की उपयोगिता (2018)
प्रस्तावना सभी प्राणियों में मानव का मस्तिष्क सर्वाधिक विकसित है। अपने मस्तिष्क के बल पर मानव ने पूरी दुनिया पर अधिकार पा लिया है और दिनों-दिन प्रगति के पथ पर अग्रसर है, किन्तु मानव का मस्तिष्क तभी स्वस्थ रह सकता है, जब उसका शरीर तन्दुरुस्त रहे। इसलिए कहा गया है-‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है और खेल व्यायाम का एक ऐसा रूप है जिसमें व्यक्ति को शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक विकास भी होता है।

शरीर और मस्तिष्क का पारस्परिक सम्बन्ध इस प्रकार मस्तिष्क के शरीर से और शरीर के मस्तिष्क से पारस्परिक सम्बन्ध को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि खेल-कूद व्यक्ति के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक है। जॉर्ज बर्नाड शॉ का कहना है-“हमें खेलना बन्द नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम बूढ़े इसलिए होते हैं कि हम खेलना बन्द कर देते हैं।”

जीवन में खेल कूद के लाभ स्वास्थ्य की दृष्टि से खेल कूद के कई लाभ हैं-इससे शरीर की मांसपेशियाँ एवं हड्डियाँ मज़बूत रहती हैं, रक्त का संचार सुचारु रूप से होता है। पाचन क्रिया सुदृढ़ रहती है, शरीर को अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है और फेफड़े भी मज़बूत रहते हैं। खेलकूद के दौरान शारीरिक अंगों के सक्रिय रहने के कारण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। इस तरह, खेल मनुष्य के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक हैं। खेल केवल मनुष्य के शारीरिक ही नहीं, मानसिक विकास के लिए भी आवश्यक है। इससे मनुष्य में मानसिक तनावों को झेलने की क्षमता में वृद्धि होती है। खेल-कूद की इसी महत्ता को स्वीकारते हुए ‘स्वामी विवेकानन्द’ ने कहा था-“यदि तुम गीता के मर्म को समझनी चाहते हो, तो खेल के मैदान में जाकर फुटबॉल खेलो।” कहने का तात्पर्य यह है कि खेल-कूद द्वारा शरीर को स्वस्थ करके ही मानसिक प्रगति हासिल की जा सकती हैं।

शिक्षा एवं रोजगार मे खेल-कूद की उपयोगिता शिक्षा एवं रोज़गार की दृष्टि से भी खेल-कूद अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होंगे खराब’ जैसी कहावत अब बीते दिनों की बात हो गई है। खेल अब व्यक्ति के कैरियर को नई ऊंचाइयों दे रहे हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर आए दिन होने वाली तरह-तरह की खेल स्पर्धाओं के कारण खेल, खिलाड़ी और इससे जुड़े लोगों को पैसा, वैभव और पद हर प्रकार के लाभ प्राप्त हो रहे हैं। खेल-कूद के व्यवसायीकरण के कारण यह क्षेत्र रोज़गार का एक अच्छा माध्यम बन गया है। खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य, राष्ट्रीय एवं अन्तरष्ट्रिीय स्तर के खिलाड़ियों को निजी एवं बैंक, रेलवे जैसी सरकारी कम्पनियाँ ऊँचे वेतन वाले पदों पर नियुक्त करती हैं।

जब खेल-कूद के महत्त्व की बात आती है तो लोग कहते हैं, कि क्रिकेट, बैडमिण्टन, हॉकी, फुटबॉल जैसे मैदान में खेले जाने वाले खेल ही हमारे लिए मानसिक एवं शारीरिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तथा शतरंज, कैरम, लुडो जैसे घर के अन्दर खेले जाने वाले खेलों से सिर्फ हमारा मनोरंजन होता है, इसलिए ये खेल समय की बर्बादी हैं, किन्तु ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।

खेल-कूद जीवन का अभिन्न अंग जीवन में जिस तरह शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, उसी तरह मनोरंजन के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता। काम की थकान के बाद हमारे मस्तिष्क को मनोरंजन की आवश्यकता होती है। नियमित दिनचर्या में यदि खेल-कूद का समावेश कर लिया जाए, तो व्यक्ति के जीवन में उल्लास-ही-उल्लास छा जाता है। अवकाश के समय घर के अन्दर खेले जाने वाले खेलों से न केवल स्वस्थ मनोरंजन होता है, बल्कि ये आपसी मेल-जोल को बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं। खेल कोई भी हो यदि व्यक्ति पेशेवर खिलाड़ी नहीं है, तो उसके लिए इस बात का ध्यान रखना अनिवार्य हो जाता है कि खेल को खेल के समय ही खेला जाए, काम के समय नहीं।।

उपसंहार भारत के ये महान् खिलाड़ी देश की नई पौध को खेल-कूद की ओर आकर्षित कर रहे हैं। क्रिकेट की दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेन्दुलकर के कीर्तिमानों को तोड़ने वाला विश्व में कोई खिलाड़ी नहीं। उन्हें वर्ष 2014 में भारत का सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रल’ से भी सम्मानित किया गया है। इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मनुष्य के सर्वांगीण एवं सन्तुलित विकास के लिए खेल कूद को जीवन में पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए। अल्बर्ट आइंस्टाइन का कहना था-“खेल सबसे उच्चकोटि को अनुसन्धान है।”

4. ग्राम्य जीवन का आनन्द/ग्रामीण जीवन (2018)
प्रस्तावना यद्यपि आज भारत विकाशील देशों की श्रेणी में खड़ा हुआ है। फिर भी आज शहरों की अपेक्षा भारत वर्ष में गाँवों की संख्या अधिक है। एक सर्वे के अनुसार भारत वर्ष की कुल जनसंख्या का 75% भाग ग्रामीण परिवेश में ही निवास करता है। गाँवों का जीवन शान्त, हरियाली एवं प्रदूषण मुक्त होता है। गाँवों के खेतों की सुन्दरता और हरियाली बरबस ही मन को हर लेती है।

गाँव की शिक्षा व्यवस्था भारतवर्ष के अधिकांश गाँवों में मूलभूत सुविधाओं की प्रायः कमी पाई जाती है। आज भी इस आधुनिक युग में गाँव का जीवन शहरों से बहुत अलग है। गाँव में पूर्ण रूप से शिक्षा की सुविधाएँ आज भी उपलब्ध नहीं हो पाई हैं। आज भी ज्यादातर गाँवों में मात्र प्राइमरी स्कूलों की सुविधा है और कुछ बड़े गाँवों में मात्र हाई स्कूल की सुविधा है। कॉलेज या उच्च शिक्षा के लिए आज भी गाँव के बच्चों को बड़े शहरों में जाना पड़ता है। ऐसे में जिन लोगों के घर अपने बच्चों को शहर भेजने के लिए पैसे नहीं होते हैं, वह उनकी शिक्षा वहीं रोक देते हैं। इस प्रकार ज्यादातर लोग गाँव में अशिक्षित रह जाते हैं।

ग्रामीण आवासीय व्यवस्था भारतवर्ष में आज भी अधिकांश जनसंख्या कच्चे घास फूस के मकानों अथवा झोपड़ियों में निवास करती है। पहले भारत के सभी गाँव में बाँस और भूसे से बने छप्पर हुआ करते थे और घर भी, मिट्टी के बने होते थे, परन्तु अब प्रधानमंत्री आवास योजना की मदद से गाँव में गरीब लोगों को मुफ्त में पक्के घर मिल रहे हैं।

ग्रामीण लोगों का मुख्य व्यवसाय लगभग सभी गाँवों के लोग खेती-किसानी करते हैं और अपने घरों में मुर्गियाँ, गाय-भैंस, बैल और बकरियाँ पालते हैं। साथ ही गाँव के लोग शहरी लोगों की तरह सब्जी मण्डी से सब्जियाँ खरीदने नहीं जाते हैं। हर कोई अपने खेतों और बगीचों में सब्जियाँ लगाते हैं और खुद के घर की सब्जियाँ खाते हैं। गांव के लोगों का मुख्य कार्य खेती होता है। आज भी शहरों में जिस अनाज को लोग खाते हैं, वह गांव के खेतों से ही आता है।

गाँवों में परिवहन की सुविधाएँ आज भी इस 21 वीं सदी में कई ऐसे गाँव हैं, जहाँ तक पहुँचने के लिए अच्छी सड़क तक नहीं है। हालाँकि प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना के अनुसार ज्यादातर गाँव को अब पक्की सड़कों से जोड़ा जा चुका है, परन्तु फिर भी कुछ ऐसे गाँव हैं, जहाँ पर सड़क न होने के कारण वहाँ जाना तक बहुत मुश्किल होता है। उन जगहों पर सड़क न होने के कारण बारिश के महीने में सड़कों व गड्ढों में पानी भर जाता है व कीचड़ को जाती है, जिसके कारण आना-जाना मुश्किल हो जाता है।

शहर के मुकाबले गाँव में बहुत कम लोग रहते हैं। गाँव में लोगों के घर के आस पास बहुत खुली जगह होती है और हर किसी व्यक्ति के पास मोटरसाइकिल या कार नहीं होती है। गाँव में ज्यादातर लोगों के पास वाहन के रूप में बैलगाड़ी होती है। परन्तु कुछ गाँव में अभी भी लोगों के पास मोटर गाड़ी की सुविधाएँ हैं।

गाँव की स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएँ अब गाँव के पास भी सरकार की ओर से प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र जगह-जगह खोले जा चुके हैं, जिससे गाँव के लोगों को भी चिकित्सा के क्षेत्र में सुविधाएँ मिल रही हैं। इमरजेंसी के समय के लिए सरकार ने अब ज्यादातर प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में मुफ्त 108 एम्बुलेंस सर्विस प्रदान की है, जो बहुत मददगार साबित हुई हैं। गाँव में साप्ताहिक छोटे बाजार लगते हैं, जहाँ लोग कपड़े, खाने का समान, बिजली का सामान और अन्य जरूरी समान खरीदने जाते हैं। अगर उन्हें कुछ बड़ी चीजें खरीदनी होती हैं, तो वे पास के शहर चले जाते हैं।

गाँव का वातावरण गांव में मौसम बहुत ही सुहाना और वातावरण बहुत स्वच्छ होता है। आज शहरी इलाकों में प्रदूषण के कारण साँस लेना तक मुश्किल हो गया है। परन्तु गाँव में ऐसा नहीं है। गाँव में कम वाहन चलने के कारण प्रदूषण ना के बराबर होता है, इसलिए वहाँ वातावरण भी स्वच्छ होता है।

ग्रामीण लोगों की जीवन शैली जिन क्षेत्रों में कुछ प्राकृतिक कारणों से खेती-किसानी सही प्रकार से नहीं हो पा रही हैं, उन क्षेत्रों के गांव में ज्यादातर लोग गरीबी रेखा (BPL – Below poverty line) के नीचे होते हैं। उनके पास खेत न होने या खेतों में पानी की सुविधा सही प्रकार से ना हो पाने के कारण उनके पास एक वक्त का खाना खाने के लिए भी अनाज नहीं होता है। ज्यादातर राज्यों की सरकार के द्वारा इन गरीबी रेखा के लोगों के लिए जन धन योजना’ बैंक अकाउण्ट प्रदान किया जाता है और साथ ही परिवार के अनुसार 2 किलो वाला चावल प्रदान किया जा रहा है और साथ ही प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के अनुसार, घर पर गैस कनेक्शन दिए जा रहे हैं।

ग्रामीण परिवेश में प्रकाश की व्यवस्था पहले कुछ वर्ष गाँव का जीवन रात होते ही अंधकार में डूब जाता था, क्योंकि ज्यादातर गाँव में बिजली की सुविधा नहीं थी। आज लगभग ज्यादातर गांव में बिजली की सुविधा पहुँच चुकी है। अब गांव के बच्चे भी मेहनत कर रहे हैं और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सफलताएँ प्राप्त कर रहे हैं।

गाँव के पारम्परिक त्योहार और संस्कृति आज भले ही शहरी क्षेत्रों में लोग भारत की संस्कृति और परम्परा को काफी हद तक भुला चुके हैं, लेकिन आज भी ग्रामीण लोगों के दिल में हमारे देश की परम्परा और संस्कृति कूट-कूटकर भरी हुई हैं। गाँव के त्योहारों में शहरों के जितनी आतिशबाजी और रोशनी तो नहीं होती है, परन्तु उनमें सभी लोग नियम से और मिल-जुल कर त्योहार का आनन्द उठाते हैं।

उपसंहार संक्षेप में कहें तो ग्रामीण परिवेश में ही आनन्द की अनुभूति होती है, क्योंकि जहां शहरी व्यक्ति स्वार्थी हो गए हैं, वहाँ वे स्वयं के लिए ही केन्द्रित हो गए हैं, जबकि गांवों के लोग मिलनसार, परस्पर सहयोगी तथा खुश दिखाई देते हैं। सरकार की पहल पर आज गाँवों के जीवन में शहरी जीवन की तरह की आमूलचूल परिवर्तन होता जा रहा है। फिर भी आज जिन गाँवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है, उनमें कम-से-कम मूलभूत सुविधाएँ तो अवश्य ही होनी चाहिए, ताकि ग्रामीण जीवन तथा गाँवों के लोगों का जीवन और अधिक सरल हो सके।

5. रोग वद्धि कारण एवं निवारण/स्वास्थ्य/आरोग्य (2018)
प्रस्तावना हम सब ने स्वास्थ्य से सम्बन्धित अनेक कहावतें तथा श्लोगन सुन रखे हैं; जैसे-जान है तो जहान है। एक तन्तुरूस्ती हजार नियामत तथा संस्कृत भाषा में भी कालिदास द्वारा उक्त शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् यह बिल्कुल सत्य है कि, ” स्वास्थ्य ही धन है। क्योंकि, हमारा शरीर ही हमारी सभी अच्छी और बुरी सभी तरह की परिस्थितियों में हमारे साथ रहता है। इस संसार में कोई भी हमारे बुरे समय में मदद नहीं कर सकता है। इसलिए, यदि हमारा स्वास्थ्य ठीक है, तो हम अपने जीवन में कितनी भी बुरी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ नहीं है, तो वह अवश्य ही जीवन का आनन्द लेने के स्थान पर जीवन में स्वास्थ्य सम्बन्धी या अन्य परेशानियों से पीड़ित ही होगा।

स्वास्थ्य से तात्पर्य स्वस्थ शरीर से तात्पर्य है कि मानव या किसी भी प्राणी की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को उसके द्वारा सुचारु रूप से उपयोग करना। यदि चर ऐसा नहीं कर पा रहा है तो निश्चित है कि वह किसी-न-किसी शारीरिक अथवा मानसिक रोग से ग्रस्त है। आए दिन नई-नई बीमारियां सामने आती रहती हैं; जैसे बुखार, चेचक, हैजा, कैन्सर, एड्स नजला, जुकाम, जोड़ों का दर्द, अल्जाइमर सियाटिका, अल्सर दाद, खाज, खुजली, मधुमेह, हृदय रोग एवं विभिन्न पातक रोग आदि में से संसार का हर व्यक्ति किसी-न-किसी छोटी-बड़ी बीमारी से अवश्य ही रोग प्रस्त होता है। कुछ रोगों का तो हमें सामान्य रूप से ही पता चल जाता है, परन्तु कुछ रोगों की जाँच के लिए हमें चिकित्सीय उपकरणों /मशीनों आदि की सुविधाएँ लेनी पड़ती है।

रोग वृद्धि के कारण किसी भी रोग की वृद्धि का प्रमुख कारण है, हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आना। दूसरा प्रमुख मूल कारण है, विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के स्तर में वृद्धि होना, जिसके कारण कुछ रोग तो मनुष्य के खान-पान तथा पेय जल की अशुद्धता से फैलते हैं तथा कुछ रोग वायु की अशुद्धता अर्थात् ऑक्सीजन की कमी तथा विभिन्न जहरीली गैसों के वातावरण में वृद्धि के कारण फैलते हैं। कुछ रोगों की वृद्धि का कारण मानव की अज्ञानता है, तो कुछ रोगों की वृद्धि का कारण मनुष्य की लापरवाही भी होती है।

रोग वृद्धि के दुष्परिणाम सर्वप्रथम तो रोग ग्रस्त व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। उसका न तो खान-पान में हो मन लगता है और न ही किसी भी अन्य कार्यों में, वह घर के किसी अन्य सदस्य पर निर्भर रहने लगता है, क्योंकि वह स्वयं के कार्यों को भी ठीक से करने में असमर्थ हो जाता है।

संसार का कोई भी शारीरिक और आन्तरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति जीवनभर में बहुत-सी चुनौतियों का सामना करता है, यहाँ तक कि उसे अपनी नियमित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी और पर निर्भर रहना पड़ता है। यह स्थिति उस व्यक्ति के लिए बहुत शर्मनाक होती है, जो इन सब का सामना करता है। इसलिए, अन्त में सभी प्रकार से खुश रहने के लिए और अपने सभी कार्यों को स्वयं करने के लिए अपने स्वास्थ्य को बनाए रखना अच्छा होता है। यह सत्य है कि धन और स्वास्थ्य एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए हमें धन की आवश्यकता होती है और धन कमाने के लिए अच्छे स्वास्थ्य की, लेकिन यह भी सत्य है, कि हमारा अच्छा स्वास्थ्य हर समय हमारी मदद करता है और हमें केवल धन कमाने के स्थान पर अपने जीवन में कुछ बेहतर करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है।

स्वास्थ्य प्राप्ति एवं रोग निवारण के उपाय आजकल अच्छा स्वास्थ्य भगवान के दिए हुए एक वरदान की तरह है। यह बिल्कुल वास्तविक तथ्य है, कि स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है। अच्छा स्वास्थ्य एक व्यक्ति के लिए जीवनभर में कमाई जाने वाली सबसे कीमती आय होती है। यदि कोई अपना स्वास्थ्य खोता है, तो वह जीवन के सभी आकर्षण को खो देता है। अच्छा धन, अच्छे स्वास्थ्य का प्रयोग करके कभी भी कमाया जा सकता है, हालाँकि एक बार अच्छा स्वास्थ्य खो देने पर इसे दोबारा किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमें नियमित शारीरिक व्यायाम, योग, ध्यान, सन्तुलित भोजन, अच्छे विचार, स्वच्छता, व्यक्तिगत स्वच्छता, नियमित चिकित्सकीय जाँच, पर्याप्त मात्रा में सोना और आराम करना आदि की आवश्यकता होती है। यदि कोई स्वस्थ है, तो उसे अपने स्वास्थ्य के लिए दवा खरीदने या डॉक्टरों से मिलने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इतना ही नहीं अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करना स्वच्छता का मुख्य घटक है। इसलिए माननीय प्रधानमन्त्री महोदय जी द्वारा स्वच्छता अभियान/आन्दोलन सम्बन्धी विभिन्न योजनाओं को लागू किया गया तथा उन्हें बढ़ावा दिया गया है।

उपसंहार हमारे ग्रन्थों में स्वास्थ्य का मूल मन्त्र बताते हुए कहा गया है कि जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठना व्यक्ति को सर्वप्रथम स्वस्थ बनाता है, उसे | धनवान बनाता है तथा इतना ही नहीं, उसे बुद्धिमान भी बनाता है। अतः हमें अपने आस-पास की साफ-सफाई के साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी उपरोक्त मन्त्र के अनुसार अपनी दिनचर्या में बदलाव लाना चाहिए, तभी हम स्वस्थ, समृद्ध तथा खुशहाल जीवन जी सकते हैं।

6. मेरा प्रिय खेल-हॉकी (2018)
प्रस्तावना संसार का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हैं जिसे कोई न कोई खेल । प्रिय न हो। सभी को कोई-न-कोई खेल अपनी रुचि के अनुरूप अवश्य ही प्रिय होता है। किसी को शारीरिक, तो किसी को मानसिक विकास को प्रबल करने वाले खेल प्रिय होते हैं। मुझे हॉकी का खेल अतिप्रिय है, क्योंकि हॉकी खेल के कारण ही हमारा भारत देश प्रसिद्ध है। यह हमारा राष्ट्रीय खेल भी है।

हॉकी खेल का इतिहास भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी विश्व के लोकप्रिय खेलों में से एक हैं। इसकी शुरूआत कब हुई? यह तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता, किन्तु ऐतिहासिक साक्ष्यों से सैकड़ों वर्ष पहले भी इस प्रकार का खेल होने के प्रमाण मिलते हैं। आधुनिक हॉकी खेलों का जन्मदाता इंग्लैण्ड को माना जाता है। भारत में भी आधुनिक हॉकी की शुरूआत का श्रेय अंग्रेज़ों को ही जाता है।

हॉकी के अन्तर्राष्ट्रीय मैचों की शुरूआत 19वीं शताब्दी में हुई थी। इसके बाद 20वीं शताब्दी में वर्ष 1924 में अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी संघ की स्थापना पेरिस में हुई। विश्व के सबसे बड़े अन्तर्राष्ट्रीय खेल आयोजन ‘ओलम्पिक’ के साथ-साथ ‘राष्ट्रमण्डल खेल’ एवं ‘एशियाई खेलों में भी हॉकी को शामिल किया जाता है। वर्ष 1971 में पुरुषों के हॉकी विश्वकप की एवं वर्ष 1971 में महिलाओं के हॉकी विश्वकप की शुरूआत हुई। न्यूनतम निर्धारित समय में परिणाम देने में सक्षम होना इस खेल की प्रमुख विशेषता है।

हॉकी खेल का स्वरूप हॉकी मैदान में खेला जाने वाला खेल है। बर्फीले क्षेत्रों में बर्फ के मैदान पर खेली जानी वाली आइस हॉकी भारत में लोकप्रियता अर्जित नहीं कर सकी है। दो दलों के बीच खेले जाने वाले खेल हॉकी में दोनों दलों के 11-11 खिलाड़ी भाग लेते हैं। आजकल हॉको के मैदान में कृत्रिम घास का प्रयोग भी किया जाने लगा है। इस खेल में दोनों टीमें स्टिक को सहायता से रबड़ या कठोर प्लास्टिक की गेंद को विरोधी टीम के नेट या गोल में डालने का प्रयास करती हैं। यदि विरोधी टीम के नेट में गेंद चली जाती है, तो उसे एक गोल कहा जाता हैं। जो टीम विपक्षी टीम के विरुद्ध अधिक गोल बनाती है, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। मैच में विभिन्न प्रकार के निर्णय एवं खेल पर नियन्त्रण के लिए रेफरी को तैनात किया जाता है। मैच बराबर रहने की दशा में परिणाम निकालने के लिए विशेष व्यवस्था भी होती है।

भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा राष्ट्रीय खेल हॉकी की बात आते ही तत्काल मेजर ध्यानचन्द का स्मरण हो आता है, जिन्होंने अपने करिश्माई प्रदर्शन से पूरी दुनिया को अचम्भित कर खेलों के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवा लिया। हॉकी के मैदान पर जब वह खेलने उतरते थे, तो विरोधी टीम को हारने में देर नहीं लगती थी। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे किसी भी कोण से गोल कर सकते थे। यही कारण है कि सेण्टर फॉरवर्ड के रूप में उनकी तेज़ी और जबरदस्त फु को देखते हुए उनके जीवनकाल में ही उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा था। उन्होंने इस खेल को नवीन ऊँचाइयाँ दीं।

भारतीय हॉकी का स्वर्णिम इतिहास मेजर ध्यानचन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। वे बचपन में अपने मित्रों के साथ पेड़ की डाली की स्टिक और कपड़ों की गेंद बनाकर हॉकी खेला करते थे। 23 वर्ष की उम्र में ध्यानचन्द वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक में पहली बार भाग ले रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य चुने गए थे। उनके प्रदर्शन के दम पर भारतीय हॉकी टीम ने तीन बार; वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक, वर्ष 1932 के लॉस एंजिल्स ओलम्पिक एवं वर्ष 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में स्वर्ण पदक प्राप्त कर राष्ट्र को गौरवान्वित किया था। यह भारतीय हॉकी को उनका अविस्मरणीय योगदान है।

ध्यानचन्द की उपलब्धियों को देखते हुए ही उन्हें विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया। वर्ष 1956 में 51 वर्ष की आयु में जब वे भारतीय सेना के मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए, तो उसी वर्ष भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया। उनके जन्मदिन 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाने को घोषणा की गई। मेजर ध्यानचन्द के अतिरिक्त धनराज पिल्ले, दिलीप टिकी, अजीतपाल सिंह, असलम शेर खान, परगट सिंह इत्यादि भारत के अन्य प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी रहे है।

भारतीय हॉकी का विकास एवं शानदार प्रदर्शन देश में राष्ट्रीय खेल हॉकी को विकास करने के लिए वर्ष 1925 में ग्वालियर में अखिल भारतीय हॉकी संघ की स्थापना की गई थी। यदि ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीमों के प्रदर्शन की बात की जाए, तो वर्ष 2014 तक देश को कुल 24 पदक प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 11 पदक अकेले भारतीय हॉकी टीम ने ही हासिल किए हैं। हॉकी में प्राप्त 11 पदकों में से 8 स्वर्ण, 1 रजत एवं 2 काँस्य पदक शामिल हैं। वर्ष 1928 से लेकर वर्ष 1956 तक लगातार छ: बार भारत ने ओलम्पिक खेलों में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतने में सफलता पाई। इसके अतिरिक्त, भारत ने वर्ष 1964 एवं 1980 में भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया। हॉकी के विश्वकप में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलम्पिक जैसा नहीं रहा है। वर्ष 1971 में हुए पहले हॉकी विश्वकप में भारत तीसरे स्थान पर, जबकि वर्ष 1973 में हुए दूसरे विश्वकप में दूसरे स्थान पर रहा। वर्ष 1975 में हुए तीसरे हॉकी विश्वकप में भारतीय खिलाड़ियों ने शीर्ष स्थान प्राप्त कर इतिहास रच दिया।

उपसंहार इधर विगत तीन चार दशकों से भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रदर्शन भी अच्छा होने लगा है। इसने राष्ट्रमण्डल खेल, 2002 और एशियन गेम्स, 1982 में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया है। इसके अलावा एशियन गेम्स, 1998 और राष्ट्रमण्डल खेल, 2006 में यह टीम उपविजेता घोषित हुई। इतना ही नहीं वर्ष 1986 एवं 2006 में हुए एशियन गेम्स में कांस्य पदक हासिल करने के पश्चात् इसने वर्ष 2014 का एशियन गेम्स हॉकी काँस्य पदक भी अपनी झोली में डाला। इस प्रकार भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ-साथ भारतीय महिला हॉकी टीम ने भी अन्तरष्ट्रिीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान कायम करने में सफलता पाई है। आशा है आने वाले वर्षों में ये दोनों टीमें नए-नए कीर्तिमान गढ़कर भारत को गौरवान्वित करने में पूर्ण सहयोग देगी

7. व्यायाम और योगासन का महत्त्व (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, स्वस्थ शरीर की आवश्यकता, स्वस्थ रहने में योग की भूमिका, व्यायाम और योग के लाभ, उपसंहार।।

भूमिका प्रकृति ने संसार के सभी जीव-जन्तुओं को पनपने एवं बढ़ने के अवसर प्रदान किए हैं। सभी प्राणियों में श्रेष्ठ होने के कारण मानव ने अनुकूल-प्रतिकूल, सभी परिस्थितियों में अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग कर स्वयं को स्वस्थ बनाए रखने में सफलता हासिल की है। विश्व की सभी सभ्यता-संस्कृतियों में न सिर्फ स्वास्थ्य रक्षा को प्रश्रय दिया गया है, अपितु स्वस्थ रहने की तरह-तरह की विधियों का शास्त्रगत बखान भी किया गया हैं।

भगवान बुद्ध ने कहा था-“हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएंगे।

आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में इनसान को फुर्सत के दो पल भी नसीब नहीं हैं। घर से दफ्तर, दफ्तर से घर, तो कभी घर ही दफ़्तर बन जाता है यानी इनसान के काम की कोई सीमा नहीं है। वह हमेशा खुद को व्यस्त रखता है। इस व्यस्तता वे कारण आज मानव शरीर तनाव, थकान, बीमारी इत्यादि का घर बनता जा रहा है। आज उसने हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ तो अर्जित कर ली हैं, किन्तु उसके सामने शारीरिक एवं मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने की चुनौती आ खड़ी हुई है।

स्वस्थ शरीर की आवश्यकता यद्यपि चिकित्सा एवं आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में मानव ने अनेक प्रकार की बीमारियों पर विजय हासिल की है, किन्तु इससे इसे पर्याप्त मानसिक शान्ति भी मिल गई हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। तो क्या मनुष्य अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहा है? यह ठीक है कि काम ज़रूरी है, लेकिन काम के साथ साथ स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जाए, तो यह सोने-पे-सुहागा वाली बात ही होगी। महात्मा गांधी ने कहा भी हैं-

“स्वास्थ्य ही असली धन है, सोना और चाँदी नहीं।”

सचमुच यदि व्यक्ति स्वस्थ न रहे तो उसके लिए दुनिया की हर खुर्श निरर्थक होती है। रुपये के ढेर पर बैठकर आदमी को तब ही आनन्द मिल सकते है, जब वह शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। स्वास्थ्य की परिभाषा के अन्तर्गत केवरु शारीरिक रूप से स्वस्थ होना ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी शामिल हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ हो, किन्तु मानसिक परेशानियों से जुड़ रहा हो, तो भी उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। उसी व्यक्ति को स्वस्थ कहा जा सकता है, जो शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ हो। साइरस ने ठीक ही कहा है कि “अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ, जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।”

स्वस्थ रहने में योग की भूमिका योग प्राचीन समय से ही प्रारतीय संस्कृति का अंग रहा हैं। हमारे पूर्वजों ने बहुत समय पहले ही इसका आविष्कार कर लिया था और इसके महत्व को पहचान लिया था। इसीलिए योग पद्ध। सदियों बाद भी जीवित है। योग प्रत्येक दृष्टिकोण से लाभदायक हैं। योग करने 3 व्यक्ति का शरीर सुगठित तथा सुडौल बनता है।

वह क्रियाशील बना रहता है। योग से न केवल तन की थकान दूर होती है, बल्कि मन की थकान भी दूर हो जाती है। योग करने वाला व्यक्ति अपने अंग प्रत्यंग में एक नए उत्साह एवं स्फूर्ति का अनुभव करता है। योग करने से शरीर के प्रत्येक अंग में रक्त का संचार सुचारु रूप से होता रहत हैं तथा शरीर रोगमुक्त रहता है। योग से पाचन-तन्त्र भी ठीक रहता है। ध्यान रहे कि पाचन-तन्त्र के अनियमित होने पर ही अधिकांश बीमारियाँ जन्म लेती हैं।

यह आश्चर्यजनक तथ्य है, परन्तु उतना ही सत्य भी है कि नियमित रूप से योग करने से शरीर स्वस्थ तो रहता ही है, साथ ही यदि कई रोग है तो योग के द्वारा उसका उपचार भी किया जा सकता है। कुछ रोगों में दो दवा से अधिक लाभ योग करने से होता हैं।
इसीलिए कहा गया है-

“आसनं विजितं येनल जितं तेन जगत्र्यम्
अनेन विधिनायु तः प्राणायाम सदा कुरू

अर्थात् जिसने आसन को जीत लिया है, उसने तीनों लोकों को जीत लिया। इसीलिए विधि-विधान से प्राणायाम और योग का अभ्यास करना चाहिए।

व्यायाम और योग के लाभ मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही योग का विकास किया गया था। यह हमारे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। इसका उद्देश्य शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। यह मन को शान्त एवं स्थिर रखता है, तनाव को दूर कर सोचने की क्षमता, आत्मविश्वास तथा एकाग्रता को बढ़ाता है। यह विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है, जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त के प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन तन्त्र को मज़बूत बनाता है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों यथा- अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को अधिक ऊर्जावान बनाता है। हमारे शास्त्र में कहा भी गया है-“व्यायामान्पुष्ट गात्राणि” अर्थात् व्यायाम से शरीर मजबूत होता हैं।

व्यायाम से होने वाले मानसिक स्वास्थ्य के लाभ पर गौर करें, तो पता चलता है। कि यह मन को शान्त एवं स्थिर रखता है, तनाव को दूर कर सोचने की क्षमता, अमविश्वास तथा एकाग्रता को बढ़ाता है। विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिा व्यायाम विशेष रूप से लाभदायक है, क्योकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ती है, जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है। कलियुगी भीम की उपाधि से विभूप्ति विश्वप्रसिद्ध पहलवान राममूर्ति कहते हैं-“मैंने व्यायाम के बल पर अपने दमे तग शरीर की कमजोरी को दूर किया तथा विश्व के मशहूर पहलवानों में अपनी गिनती राई, ये है व्यायाम की महत्ता।

उपहार वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण में इसकी सार्थकता पर भी बढ़ गई हैं। योगाभ्यास की जटिलताओं को देखते हुए इसे अनुभवी योग प्रशिक्षक की देखरेख में ही करना चाहिए अन्यथा इससे लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकी है। एक महत्त्वपूर्ण बात और कुछ लोग इसे धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं और लोगों के मन में साम्प्रदायिकता की भावना फैलाने की कोशिश करते हैं, जोकि सर्वथा अनुचित हैं। अतः हमें इसकी महत्ता समझते हुए, इसके कल्याणकारी स्वरूप को अपनाने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

8. यदि मैं प्रधानाचार्य होता (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, प्रधानाचार्य बनने पर किए जाने वाले कार्य, विद्यार्थियों का सर्वागीण विकस, विद्यालय को बेहतर बनाने का प्रयास, उपसंहार।

भूमिका विद्यलय एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है, जहाँ से शिक्षा प्राप्त करके विद्यार्थी अफार, प्रशासनिक अधिकारी, नेता, मन्त्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति आदि बनाते हैं। विद्यार्थियों के जीवन के निर्माण के लिए अच्छे अध्यापक की आवश्यकता होती है तथा उन्हें व्यास्थित तथा उत्तम वातावरण देना प्रधानाचार्य की दायित्व होता है। प्रत्येक विद्यार्थी अपने जीवन में निम्न कल्पनाएँ करता है; जैसे—डॉक्टर बनना, इंजीनियर बनना, IAS ऑफिसर बनना इत्यादि। उसी प्रकार मेरी कल्पना भी एक प्रधानाचार्य बनने की है।

प्रधानाचार्य बनने र किए जाने वाले कार्य अपने कार्यकाल में मैं विद्यालय की व्यवस्था को आकर्षक बनाने का प्रयास करूंगा। प्रधानाचार्य बनने पर मैं सर्वप्रथम विद्यालय के भवनों की रफाई का निरीक्षण करके दिशा-निर्देश जारी करूंगा। विद्यालय के पुस्तकालय को समृद्धशाली बनाऊँगा।

पुस्तकालय में ज्ञान-विज्ञन के सभी प्रकार के साधनों को उपलब्ध कराने का प्रयास करूंगा। मैं विद्यार्थियों के प्रत्येक क्षेत्र में विकास करने का प्रयास करूंगा। मैं विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई, खेलकुद तथा सांस्कृतिक सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करूंगा।।

विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास अपने विद्यालय में विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करने के लिए हर सम्भव प्रयास करूंगा। अनेक विषयों पर वाद-विवाद, संगीत, चित्रकला आदि की प्रतियोगिताएँ आयोजित करवाऊँगा तथा इन सभी से सम्बन्धित राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करूंगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए कुशल अध्यापकों को नियुक्त करूंगा जिससे हमारा विद्यालय पढ़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी आगे बढ़ सके।

विद्यालय को बेहतर बनाने का प्रयास विद्यालय का स्तर ऊपर उठाने के लिए मैं कम्प्यूटर प्रणाली लागू करूंगा जिससे प्रत्येक विद्यार्थी तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ सके। मैं प्रत्येक कक्षा को शैक्षिक भ्रमण पर ले जाऊँगा साथ ही शारीरिक शिक्षा के अध्यापक से मिलकर एक परामर्श समिति बनाऊँगा तथा तद्नुरूप खेलकूद और व्यायाम आदि की व्यवस्था करवाऊंगा।

विद्यार्थियों में नियम पालन, संयम, विनय, कर्तव्यनिष्ठा आदि सद्गुणों के विकास के लिए सदैव प्रयत्नशील रहूंगा तथा मैं स्वयं ही अनुकरणीय आचरण करते हुए अध्यापकों एवं विद्यार्थियों के बीच में प्रस्तुत रहूंगा।

उपसंहार मेधावी गरीब छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें आर्थिक, पुस्तकीय, शत्रवृत्ति के रूप में सहायता प्रदान करने का प्रयास करूंगा। विद्यालय में प्रयोगशाला के स्वरूप में भी सुधार करवाऊँगा, जिससे विद्यार्थियों की विज्ञान के प्रति अधिक रुचि जागृत होगी तथा विद्यार्थी विज्ञान के प्रति हीन-भावना का अनुभव नहीं करेंगे। कर्मचारियों और अध्यापकों को अच्छे कार्य हेतु पारितोषिक प्रदान करते हुए विद्यार्थियों को भी पुरस्कार प्रदान करूंगा। इस प्रकार प्रधानाचार्य बनकर में अपने सभी कर्तव्यों का उचित प्रकार से निर्वाह करूंगा।

9. आज का आदर्श नेता (2017, 16)
संकेत विन्द भूमिका, अरविंद केजरीवाल का समाज सेवा के लिए प्रेरित होना, भ्रष्टाचार का विरोध, ‘आम आदमी पाटी’ की धारणा, उपसंहार।।

भूमिका लोकतन्त्र में आम आदमी होने के मायने क्या होते हैं, ‘आम’ होने के बावजूद वह कितना खास होता है, इसकी एक मिसाल कायम की है अरविन्द केजरीवाल ने इसलिए अरविन्द केजरीवाल को आज का आदर्श नेता माना जाता है। दो साल पहले तक अरविन्द केजरीवाल एक आम भारतीय थे, परन्तु आज वही ‘आम आदमी’ लाखों लोगों की आवाज है। एक आम आदमी से दिल्ली के मुख्यमन्त्री तक का सफर तय करने वाले अरविन्द केजरीवाल का महज दो वर्ष में भारतीय राजनीति में एक अहम जगह बना लेना एक साधारण राजनीतिक घटना नहीं है वरन् भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय जुड़ने के समान है, जिसे किसी भी हाल में अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अरविन्द केजरीवाल का समाज सेवा के लिए प्रेरित होना सरकारी नौकरी करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने सरकारी तन्त्र में फैले हुए भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को करीब से महसूस किया, जिससे उन्हें समाज-सेवा के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली। वर्ष 2000 में अरविन्द केजरीवाल ने अपने सहयोगी मनीष सिसोदिया के साथ | मिलकर ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना था।

वर्ष 2005 में केजरीवाल ने ‘कबीर’ नाम से एक नए एन जी ओ की स्थापना की, जो मूल रूप से परिवर्तन’ का ही बदला हुआ रूप था। इनके कामकाज का मुख्य तरीका आर टी आई के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कार्य करना था। उल्लेखनीय है कि सूचना का अधिकार’ को कानूनी रूप देने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा एक देशव्यापी आन्दोलन चलाया गया था, जिसमें अरुणा राय, शेखर सिंह, प्रशान्त भूषण आदि सहित केजरीवाल ने भी अपना सक्रिय योगदान दिया था। इन सबके सम्मिलित प्रयासों से ही भारत के नागरिकों को वर्ष 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ मिल पाया था।

अपने गाँधीवादी तरीकों के कारण गाँधीवादी नेता के रूप में पहचाने जाने वाले केजरीवाल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके आदर्श महात्मा गांधी नहीं बल्कि मदर टेरेसा हैं। वह वर्ष 1990 में मदर टेरेसा से मिले भी थे। उनसे मिलने के बाद ही उनके मन में समाज-सेवा के प्रति रुचि जागी। अपना पूरा समय समाज-सेवा को देने के उद्देश्य से केजरीवाल ने फरवरी, 2006 में आयकर विभाग के संयुक्त आयुक्त पद से इस्तीफा दे दिया। इसी वर्ष इन्हें परिवर्तन’ और ‘कबीर’ के द्वारा समाज-सुधार के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाएं देने के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिसम्बर 2006 में इन्होंने मनीष सिसोदिया, अभिनन्दन शेखरी, प्रशान्त भूषण और किरण बेदी के साथ मिलकर पब्लिक कॉज़ रिसर्च फाउण्डेशन’ की स्थापना की, जिसके लिए इन्होंने मैग्सेसे पुरस्कार में मिली धनराशि दान कर दी।

भ्रष्टाचार का विरोघ वर्ष 2010 में अरविंद केजरीवाल ने उस वर्ष हुए। दिल्ली राष्ट्रमण्डल खेलों में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार की आशंका जताई। केजरीवाल ने यह अनुभव किया कि केबोर’ और ‘परिवर्तन’ जैसे गैर सरकारी संगठनों की सफलता की अपनी सीमाएँ हैं। इसलिए इन्होंने दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने वर्ष 2011 में जनलोकपाल बिल को माँग कर रहे और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अन्ना हजारे का भी समर्थन किया। इस दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

वर्ष 2012 तक केजरीवाल अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए गए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके थे। बाद में, केन्द्र सरकार ने आन्दोलन से प्रभावित होते हुए जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार किया, लेकिन केजरीवाल सहित अन्य कार्यकर्ता ‘कमजोर’ लोकपाल बिल से खुश नहीं हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में आने का फैसला किया और नवम्बर 2012 में उन्होंने औपचारिक रूप से ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) की स्थापना की। केजरीवाल ने न केवल राजनीति में प्रवेश किया बल्कि वर्ष 2018 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

‘आम आदमी पार्टी की धारणा ‘आम आदमी पार्टी ने अपने नाम से ही दिल्ली की आम जनता को आकर्षित किया। भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उपजी यह पाटी आम आदमी को सीधे-सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दों जैसे-भ्रष्टाचार, महँगाई, सुरक्षा आदि पर खड़ी हुई थी, जिसमें युवाओं ने भरपूर समर्थन दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि दिसम्बर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनावों में उतरी। दिल्ली के ये चुनाव निकट भविष्य में एक बड़े बदलाव की आहट थे।

एक साल के राजनीतिक अनुभव वाली नई पार्टी ने दिल्ली में 15 वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस को महज 8 सीटों पर सीमित कर दिया। यहाँ तक की केजरीवाल ने नई दिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हुए तीन बार दिल्ली की मुख्यमन्त्री रहीं शीला दीक्षित को उन्हीं की सीट ‘नई दिल्ली से उनको भारी अन्तर से पराजित किया। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 31 सीटों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन 28 सीटों के साथ आप भी अधिक पीछे नहीं थीं। अंततः आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के सहयोग से गठबन्धन की सरकार बनाई। इस दौरान आपने अपने वादों के अनुरूप थोड़े-बहुत काम अवश्य किए, लेकिन दिल्ली की जनता को तब बड़ा झटका लगा जब केवल 49 दिन के बाद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमन्त्री पद से यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सत्ताधारी पार्टी से सहयोग नहीं कर रही हैं और इसीलिए उनकी पार्टी जन लोकपाल बिल पारित नहीं करा सकी।

इसके बाद उनकी लोकप्रियता में बहुत कमी आ गई। दिल्ली की जनता ने उन्हें उनके वादों के आधार पर वोट दिया था, लेकिन उनके इस्तीफे से लोगों में यह सन्देश गया कि वह अपने वादों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। आप ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भी पूरे देश में 400 सीटों पर चुनाव लड़ा पर वहाँ भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यह वक्त पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल के लिए काफी मुश्किल था। उनकी पार्टी का भविष्य दाँव पर था, लेकिन कहते हैं न कि इनसान की परीक्षा कठिन समय में ही होती है। उन्होंने साहस बनाए रखा और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी नया उत्साह भरा। अपनी कमियों को पहचानते हुए गलतियों के लिए जनता से माफी माँगी। भ्रष्टाचार मुक्त शासन का सपना देखने वाली जनता पर इसका असर हुआ और फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में वह ऐतिहासिक जीत आप की झोली में आई, जिसकी खुद आप नेताओं को भी उम्मीद नहीं थी।

उपसंहार इन चुनावों में आप पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिली जबकि राष्ट्रपति शासन लगने से पूर्व हुए चुनावों में पार्टी को बहुमत भी नहीं मिला था। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा महज 3 सीटों पर सिमट गई तो सबसे अधिक अनुभवी पार्टी कांग्रेस को पूरी दिल्ली में एक भी सोट नसीब नहीं हुई। यह पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी को 54% वोट मिले हों और वह 95% से ज्यादा सीटों पर जीती हो। अरविन्द केजरीवाल न केवल जनता का भरोसा जीता बल्कि बड़ी राजनीतिक पार्टियों को भी आईना दिखा दिया। इस प्रकार आज अरविन्द केजरीवाल सभी के लिए आदर्श नेता बन गए हैं।

10. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (2016)
संकेत विन्दु भूमिका, विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियाँ, डॉ. कलाम को सम्मानित किए गए सम्मान, राष्ट्रपति के रूप में, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, उपसंहार।

भूमिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, जिनका पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम हैं, का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य में स्थित रामेश्वरम् के धनुषकोडी नामक स्थान में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। वे अपने पिता के साथ मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते हुए रास्ते में पड़ने वाले शिव मन्दिर में भी माथा नवाते। इसी गंगा-जमुनी संस्कृति के बीच कलाम ने धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने एवं घर के खर्चे में योगदान के लिए अखबार बेचने पड़ते थे।

इसी तरह, संघर्ष करते हुए प्रारम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राथमिक स्कूल से प्राप्त करने के बाद उन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ज हाईस्कूल से मैट्रिकलेशन किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए तिरुचिरापल्ली चले गए। वहाँ के सेंट जोसेफ कॉलेज से उन्होंने बीएससी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1957 में एम आई टी से वैमानिकी इंजीनियरी में डिप्लोमा प्राप्त किया। अन्तिम वर्ष में उन्हें एक परियोजना दी गई, जिसमें उन्हें 30 दिनों के अन्दर विमान का एक डिज़ाइन तैयार करना था, अन्यथा उनकी छात्रवृत्ति रुक जाती। कलाम ने इसे निर्धारित अवधि में पूरा किया।

उन्होंने तमिल पत्रिका ‘आनन्द विकटन’ में अपना विमान स्वयं बनाएँ’ शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसे प्रथम स्थान मिला। बीएससी के बाद वर्ष 1958 में उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की।

विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियाँ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. कलाम ने हावरक्राफ्ट परियोजना एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। इसके बाद वर्ष 1962 में वे भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन में आए, जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ रहकर उन्होंने थुम्बा में रॉकट इंजीनियरी डिविजन की स्थापना की। उनको उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें ‘नासा’ में प्रशिक्षण हेतु भेजा गया।

नासा से लौटने के पश्चात् वर्ष 1963 में उनके निर्देशन में भारत का पहला रॉकेट ‘नाइक अपाची’ छोड़ा गया। 20 नवम्बर, 1967 को ‘रोहिणी-75’ रॉकिट का सफल प्रक्षेपण उन्हीं के निर्देशन में हुआ। परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 के निर्माण में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी प्रक्षेपण यान से जुलाई, 1980 में रोहिणी उपग्रह का अन्तरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया। वर्ष 1982 में वे भारतीय रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन में वापस निदेशक के तौर पर आए तथा अपना सारा ध्यान गाइडेड मिसाइल के विकास पर केन्द्रित किया। अग्नि मिसाइल एवं पृथ्वी मिसाइल के सफल परीक्षण का श्रेय भी काफी हद तक उन्हीं को जाता हैं।

जुलाई, 1992 में वे भारतीय रक्षा मन्त्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए। उनकी देख-रेख में भारत ने 11 मई, 1998 को पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ। वैज्ञानिक के रूप में कार्य करने के दौरान अलग-अलग प्रणालियों को एकीकृत रूप देना उनकी विशेषता थी। उन्होंने अन्तरिक्ष एवं सामरिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर नए उपकरणों का निर्माण भी किया।

डॉ. कलाम को सम्मानित किए गए सम्मान डॉ. कलाम की उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 1981 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया, इसके बाद वर्ष 1990 में उन्हें पद्म विभूषण’ भी प्रदान किया गया

उन्हें विश्वभर के 30 से अधिक विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित किया। वर्ष 1997 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रल’ से सम्मानित किया। उन्हें एस्ट्रोनॉटिकल सोसायटी ऑफ़ इण्डिया का आर्यभट्ट पुरस्कार तथा राष्ट्रीय एकता के लिए इन्दिरा गाँधी पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। वे ऐसे तीसरे राष्ट्रपति हैं, जिन्हें यह सम्मान राष्ट्रपति बनने से पूर्व ही प्राप्त हुआ है। अन्य दो राष्ट्रपति हैं—सर्वपल्ली राधाकृष्णन एवं डॉक्टर जाकिर हुसैन।

राष्ट्रपति के रूप में वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन सरकार ने डॉक्टर कलाम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी उनका समर्थन किया और 18 जुलाई, 2002 को उन्हें 90% बहुमत द्वारा भारत का राष्ट्रपति चुना गया।

इस तरह उन्होंने 25 जुलाई, को ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया। उन्होंने इस पद को 25 जुलाई, 2007 तक सुशोभित किया। वे राष्ट्रपति भवन को सुशोभित करने वाले प्रथम वैज्ञानिक हैं, साथ ही वे प्रथम ऐसे राष्ट्रपति भी हैं, जो अविवाहित रहे। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने कई देशों का दौरा किया एवं भारत का शान्ति का सन्देश दुनियाभर को दिया। इस दौरान उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया एवं अपने व्याख्यानों द्वारा देश के नौजवानों का मार्गदर्शन करने एवं उन्हें प्रेरित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी सीमित संसाधनों एवं कठिनाइयों के होते हुए भी उन्होंने भारत को अन्तरिक्ष अनुसन्धान एवं प्रक्षेपास्त्रों के क्षेत्र में एक ऊँचाई प्रदान की। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने तमिल भाषा में अनेक कविताओं की रचना भी की है, जिनका अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में हो चुका है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने कई प्रेरणास्पद पुस्तकों की भी रचना की है। भारत 2020 : नईं सहस्राब्दि के लिए एक दृष्टि’, ‘इग्नाइटेड माइण्ड्स : अनलीशिंग द पावर विदिन इण्डिया’, ‘इण्डिया मोइ ड्रीम’, ‘विंग्स ऑफ फायर’, ‘माइ जन’, ‘महाशक्ति भारत’, ‘अदम्य साहस’, ‘छुआ आसमान’, ‘भारत की आवाज’, ‘टर्निग प्वाइण्ट’ आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ उनकी आत्मकथा है, जिसे उन्होंने भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अन्दाज में लिखा है।

उनकी पुस्तकों का कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनका मानना है कि भारत तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ जाने के कारण ही अपेक्षित उन्नति शिखर पर नहीं पहुँच पाया है, इसलिए अपनी पुस्तक “भारत 2020 : नई सहस्राब्दि  के लिए एक दृष्टि’ के द्वारा उन्होंने भारत के विकास स्तर को वर्ष 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए देशवासियों को एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान |किया। यही कारण है कि वे देश को नई पीढ़ी के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं।

उपसंहार 80 वर्ष से अधिक आयु के होने के बावजूद वे समाज सेवा एवं अन्य कार्यों में खुद को व्यस्त रखते थे। शिक्षकों के प्रति डॉ. कलाम के हृदय में बहुत सम्मान था।

राष्ट्रपति के पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् वे देशभर में अनेक शिक्षण संस्थानों में ज्ञान बाँटते रहे, यहाँ तक कि 27, जुलाई, 2015 की शाम को भी उन्होंने अपनी अन्तिम साँस शिलांग में इण्डियन इंस्टीटयट ऑफ मैनेजमेण्ट के विद्यार्थियों से बात करते ली अर्थात् अन्तिम साँस में भी वह शिक्षक के रूप में रहे। वे भारत के सर्वधर्मसद्भावना के साक्षात् प्रतीक हैं। वे कुरान एवं भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते थे।

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भारतवासी उनके जीवन एवं उनके कार्यों से प्रेरणा प्रहण कर वर्ष 2020 तक भारत को सम्पन्न देशों की श्रेणी में ला खड़ा करने के उनके सपने को साकार करेंगे। उनके द्वारा कही निम्न पंक्तियों सभी को प्रेरणा देती

“सपने वह नहीं होते जो आप नींद में देखते हैं।
सपने तो वह हैं जो आपको सोने नहीं देते।”

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