UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 8
Chapter Name Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण)
Number of Questions Solved 65
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Test) से आप क्या समझते हैं ? एक अच्छे मनोवैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यक विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए। (2018)
या
मनोवैज्ञानिक परीक्षण किसे कहते हैं ? अच्छे मनोवैज्ञानिक परीक्षण (टेस्ट) की विशेषताएँ बताइए।
या
एक अच्छे परीक्षण की कसौटियों का वर्णन कीजिए। (2011)
उत्तर.

मनोवैज्ञानिक परीक्षण का अर्थ
(Meaning of Psychological Test)

मनोवैज्ञानिक परीक्षण के अर्थ को दो प्रकार से समझा जा सकता है –
(1) सामान्य अर्थ तथा
(2) वास्तविक या विश्लेषणात्मक अर्थ।

(1) सामान्य अर्थ – अपने सामान्य अर्थ में मनोवैज्ञानिक परीक्षण से तात्पर्य उन विधियों तथा साधनों से है जिन्हें मनोवैज्ञानिकों द्वारा मानव-व्यवहार के अध्ययन हेतु खोजा गया है।

(2) वास्तविक या विश्लेषणात्मक अर्थ–प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि, अभिरुचि, अभिवृत्ति तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विभिन्न मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ पायी जाती हैं। इन विशेषताओं में से किसी खास विशेषता पर परीक्षण करने की दृष्टि से कुछ उद्दीपकों को चुनकर संगठित किया जाता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण के अन्तर्गत ये उद्दीपक परीक्षण पद (Test Item) कहे जाते हैं। व्यक्ति (विषय) सीमित या असीमित समयावधि में पहले से प्रदान किये गये आदेशों/निर्देशों के अनुसार उद्दीपकों के प्रति अनुक्रियाएँ व्यक्त करता है। समस्याओं के उत्तर देने में लगे समय तथा सही उत्तरों की संख्या के आधार पर व्यक्ति (विषय) की मनोवैज्ञानिक विशेषता ज्ञात होती है। यही एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य होता है।

मनोवैज्ञानिक परीक्षण की परिभाषा
(Definition of Psychological Test)

मनोवैज्ञानिक परीक्षण का अर्थ स्पष्ट करने की दृष्टि से कुछ विद्वानों ने इसे परिभाषित करने का प्रयास किया हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) मरसेल के अनुसार, “एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण उद्दीपकों का एक प्रतिमान है, जिन्हें ऐसी अनुक्रियाओं को उत्पन्न करने के लिए चुना और संगठित किया जाता है जो कि परीक्षण देने वाले व्यक्ति की कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को व्यक्त करेंगे।”

(2) फ्रीमैन के शब्दों में, “मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक मानकीकृत यन्त्र है जो इस प्रकार बनाया गया है कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व के एक या एक से अधिक अंगों का वस्तुपरक रूप से मापन कर सके, इसके लिए वह शाब्दिक या अशाब्दिक या अन्य प्रकार के व्यवहार के नमूनों का साधन अपनाता है।”

(3) क्रॉनबेक के मतानुसार, “एक परीक्षण दो या अधिक व्यक्तियों के व्यवहार की तुलना करने हेतु व्यवस्थित पद्धति है।’
निष्कर्षतः, मनोवैज्ञानिक परीक्षण उस व्यवस्थित पद्धति को कहा जाएगा जिसके माध्यम से व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के किन्हीं बौद्धिक या अबौद्धिक गुणों का मापन किया जा सके और उनके द्वारा प्राप्त किये गये परिणामों पर विश्वास किया जा सके।

एक अच्छे मनोवैज्ञानिक परीक्षण की विशेषताएँ
(Characteristics of Good Psychological Test)

मनोवैज्ञानिक परीक्षण की सोद्देश्यता तथा उपयोगिता तभी सिद्ध हो सकती है जब उससे ‘विषय (अर्थात् परीक्षार्थी) को मनोवांछित लाभ प्राप्त हो। निस्सन्देह एक अच्छा परीक्षण ही लाभकारी परीक्षण होता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण में निम्नलिखित विशेषताओं का होना आवश्यक है|

(1) विश्वसनीयता (Reliability)-एक अच्छा परीक्षण अनिवार्य रूप से विश्वसनीय होता है। विश्वसनीयता से अभिप्राय परीक्षण के उस गुण से है जिसके कारण कोई परीक्षण जितनी बार भी किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह पर प्रयोग किया जाएगा, प्रत्येक बार वह एक ही परिणाम देगा। विश्वसनीयता के कारण परीक्षण प्रतिपन्न (Accurate) और समरूप (Consistent) परिणाम देता है; अतः हर बार के परीक्षण के परिणामों में कोई अन्तर नहीं आता। मान लीजिए, कोई परीक्षार्थी एक परीक्षण को बार-बार हल करके 45 अंक ही प्राप्त करता है, तो उस दशा में वह परीक्षण विश्वसनीय कहलाएगा।

(2) वैधता या प्रामाणिकता (Vaidity)- जिस गुण अथवा योग्यता के मापने हेतु परीक्षण को तैयार किया गया है, यदि वह परीक्षण उसका यथार्थपूर्वक मापन करता है तो उसे पूर्ण रूप से वैध (Valid) कहा जाएगा। बुद्धिमापन के लिए निर्मित एक वैध बुद्धि परीक्षण सिर्फ बुद्धि का ही मापन करेगा, रुचि अथवा अभियोग्यता का नहीं। वैध परीक्षण के लिए अपने उद्देश्य की सफलता आवश्यक है।

(3) वस्तुनिष्ठता (Objectivity)- वस्तुनिष्ठता का तात्पर्य परीक्षण की उस विशेषता से है जिसके कारण, परीक्षण के परिणाम पर परीक्षक की इच्छा, रुचि तथा पूर्वाग्रह आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस गुण के अन्तर्गत किसी परीक्षण का मूल्यांकन भले ही कोई भी परीक्षक क्यों न करे, उसके परिणाम (प्राप्तांकों) में कोई अन्तर नहीं आएगा। वस्तुनिष्ठता के लिए आवश्यक है कि परीक्षण के हर एक पद का उत्तर इतना निश्चित तथा सुस्पष्ट हो कि उसका अन्य कोई उत्तर ही न हो और न इस बारे में कोई मतभेद ही उभर सके।

(4) प्रमापीकरण (Standardization)- प्रमापीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत परीक्षण के समस्त निर्देश, प्रश्नों का स्वरूप, परीक्षण की विधि, मूल्यांकन का तरीका आदि पहले से ही निश्चित तथा निर्धारित कर दिये जाते हैं। प्रमापीकरण के माध्यम से किसी परीक्षण की विश्वसनीयता तथा वैधता ज्ञात की जाती है। परीक्षण के प्रमापीकरण के अन्तर्गत विभिन्न व्यक्तियों के परिणामों सम्बन्धी मानक (Norms) तैयार करके विभिन्न समय तथा स्थानों पर उनकी तुलना करना सम्भव होता है।

(5) व्यावहारिकता (Practicability)- एक अच्छे मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए आवश्यक है कि उसे सरलतापूर्वक प्रयोग किया जा सके तथा उसे व्यवहार में लाने में कोई कठिनाई न हो। परीक्षण के सफल प्रशासन हेतु सरल आदेश दिये जाएँ तथा जाँचने की विधि भी सुविधाजनक हो। प्राप्त परिणामों का भली प्रकार अर्थ समझाने की दृष्टि से सम्बन्धित विवरण पुस्तिका पूर्ण होनी चाहिए। इससे सभी बातों की समुचित तथा पूरी व्याख्या सुलभ हो सकेगी।

(6) व्यापकता (Comprehensiveness)-व्यापक परीक्षण उसे कहा जाएगा जिसे बनाते समय इस बात को पूरा ध्यान रखा गया हो कि ‘विषय’ की जिस योग्यता का मापन करना हो उसके सभी पक्षों से सम्बन्धित परीक्षण पद उसमें शामिल किये गये हों तथा उसका मापन पूर्ण रूप से किया जाए। पाठ्यक्रम के थोड़े-से भाग से प्रश्न पूछना यथेष्ट नहीं कहा जा सकता और न ही उससे परीक्षण में व्यापकता का गुण ‘ही समाविष्ट होगा।

(7) विभेदकारी शक्ति (Discriminating Power)— किसी परीक्षण में ‘विषय’ की उत्कृष्टता तथा निम्न योग्यता में सही अन्तर स्पष्ट एवं व्यक्त करने की उचित क्षमता होनी चाहिए। यही परीक्षण की विभेदकारी शक्ति कही जाएगी। इस शक्ति के कारण अच्छे शिक्षार्थी को अधिक अंक तथा कमजोर शिक्षार्थी को कम अंक प्राप्त होने चाहिए। दोनों शिक्षार्थियों के मध्य यह अन्तर जितने सूक्ष्म रूप से प्रकट होगा, उतनी ही अधिक परीक्षण की विभेदकारी शक्ति कही जाएगी।

(8) रोचक (Interesting)-अच्छे मनोवैज्ञानिक परीक्षण की एक विशेषता उसका रोचक होना भी है। परीक्षक तथा परीक्षार्थी दोनों के लिए रुचिदायक परीक्षण ही अपने उद्देश्य में सफल कहा जा सकता है। परीक्षण की रोचकता परीक्षक के कार्य को भली प्रकार सम्पादित करने तथा परीक्षार्थी (विषय) को अपना भरपूर सहयोग देने में सहायक होती है। रुचिपूर्वक हल किये गये उत्तरों का ठीक-ठीक मूल्यांकन परिणाम को अधिकाधिक शुद्धता प्रदान करता है।

(9) मितव्ययिता (Economy)-परीक्षण के संचालन में न्यूनतम समय, धन व शक्ति का व्यय उसकी विशिष्टता का द्योतक है। भारत सदृश देश के लिए परीक्षण की मितव्ययिता का विचार अपना विशेष महत्त्व रखता है।

(10) भविष्यकथन (Predictability)—किसी परीक्षण के निर्माण, संचालन तथा परिणामों की व्याख्या सम्बन्धी प्रक्रिया का अन्तिम बिन्दु है-‘विषय’ की उस योग्यता के सम्बन्ध में भविष्यवाणी करना। एक अच्छा और सफल मनोवैज्ञानिक परीक्षण परिणाम के आधार पर विषय को बुद्धि, रुचि, अभियोग्यता, मानसिक योग्यता तथा व्यक्तित्व के विषय में सत्य भविष्य कथन घोषित करता है।

प्रश्न 2.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की उपयोगिता को विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.

मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की उपयोगिता
(Utility of Psychological Tests)

मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण मानव जाति के कल्याण के लिए किया गया है। इनकी उपयोगिता या लाभों का विवेचन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है|

(1) शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance)-मनोवैज्ञानिक परीक्षण का मुख्य उपयोग शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान हेतु निर्देशया प्रदान करने में किया जाता है। आठवीं कक्षा के पश्चात् बालक के सामने साहित्यिक, वैज्ञानिक, वाणिज्यिक, रचनात्मक तथा कलात्मक–विभिन्न वर्गों में से किसी एक पाठ्यवर्ग के चुनाव की समस्या आती है। बालक की बुद्धि, रुचियों, अभिरुचियों तथा मानसिक योग्यताओं का मापन करके इन परीक्षणों के आधार पर यह निर्णय लिया जा सकता है कि कौन-सा वर्ग बालक के भावी जीवन को सफल बनाने में सहायक होगा। शैक्षिक कार्यों में पिछड़ने वाले बालकों के पिछड़ेपन का कारण जानने में बुद्धि परीक्षण, रुचि परीक्षण तथा अभियोग्यता परीक्षण हमारी सहायता करते हैं। पिछड़ेपन को कारण ज्ञात होने पर उसका आसानी से सही समाधान करना सम्भव है। इसी प्रकार तीव्र बुद्धि के उत्कृष्ट बालकों की रुचि तथा विशिष्ट योग्यताओं का मूल्यांकन करके उन्हें उचित निर्देशन प्रदान किया जाता है।

(2) व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance)- मनोवैज्ञानिक परीक्षण व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसाय चुनने में मदद देते हैं। आधुनिक युग में जीवनयापन सम्बन्धी व्यवसाय अथवा रोजगार चुनने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत व्यवसाय विश्लेषण (Job Analysis) की प्रक्रिया द्वारा यह ज्ञात कर लिया जाता है कि अमुक व्यवसाय के लिए किस बौद्धिक स्तर, किन मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं, की आवश्यकता होगी। इसके लिए बड़े-बड़े शहरों में मनोवैज्ञानिक परीक्षण केन्द्र स्थापित किये गये हैं जिनके विशेषज्ञों की सहायता से युवक-युवतियाँ व्यावसायिक निर्देशन प्राप्त कर अपने लिए उपयुक्त रोजगार चुन सकते हैं।

(3) व्यक्तिगत निर्देशन (Individual Guidance)- मनोवैज्ञानिक परीक्षण, व्यक्तिगत निर्देशन में भी लाभकारी सिद्ध होते हैं। वर्तमान समाज जटिलता की ओर बढ़ रहा है। अधिकतर लोग व्यक्तिगत समस्याओं के कारण तनावग्रस्त, चिन्तित, दु:खी और निराश रहते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने घर-परिवार, पास-पड़ोस तथा समाज से समायोजन नहीं रख पाते। इस कुसमायोजन से कभी-कभी व्यक्ति को बड़ी भारी हानि होती है। इस कार्य के लिए व्यक्तित्व परीक्षण तथा व्यक्तित्व परिसूचियों का प्रयोग किया जाता है। स्पष्टत: मनोवैज्ञानिक परीक्षण व्यक्तिगत निर्देशन में हमारी सहायता करते हैं।

(4) चयन एवं नियुक्तियाँ (Selection and Appointment)- आजकल निजी एवं सार्वजनिक हर प्रकार के व्यवसाय या उद्यम में विशेषज्ञ (Experts) भर्ती किये जाते हैं। ऐसे विशेषज्ञ कर्मचारी कर्मचारी को नियुक्त करके जहाँ सेवायोजक अधिक लाभ कमाते हैं, वहीं कर्मचारी भी अपनी अभिरुचि व क्षमता के अनुसार कार्य पाकर सन्तोष का अनुभव करता है। इसी कारण, आजकल ज्यादातर चयन एवं नियुक्तियाँ मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर होती हैं। प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रत्याशियों, बैंक-अधिकारी, उद्योग-कर्मचारी, पुलिस, सेना तथा प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति । में इन परीक्षणों का उपयोग होता है।

(5) अनुसन्धान कार्य (Research)– ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अनुसन्धान कार्य उन्नति पर है। मनोविज्ञान, निर्देशन तथा शिक्षा से जुड़े अनुसन्धान कार्यों में विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयेग औजार (Tool) के रूप में किया जाता है। मनोविज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्यों अर्थात् बुद्धि, मानसिक योग्यता, अभिरुचि, रुचि तथा व्यक्तित्व आदि से सम्बन्धित विषयों के अनुसन्धानों में तो इन परीक्षणों के बिना काम न नहीं चल सकता। सभी प्रकार के मापनों तथा शोध-कार्यों में मनोवैज्ञानिक परीक्षण उपयोगी सिद्ध होते हैं।

(6) निदान एवं उपचार (Diagnosis and Treatment)-‘निदान’ वह क्रिया है जिसमें किसी समस्या के मूल कारणों का पता लगाया जाता है तथा उपचार’ इन कारणों से निराकरण द्वारा समस्याओं के समाधान की क्रिया है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण मानसिक रोगों, शैक्षणिक, व्यक्तिगत, व्यावसायिक, व्यक्तित्व सम्बन्धी तथा अन्य समस्याओं के निदान व उपचार की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(7) चिकित्सा (Treatment)- मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का चिकित्सा के क्षेत्र में भी अपूर्व योगदान है। मनोविश्लेषणवादियों के मतानुसार, मनुष्य की अनेक शारीरिक-मानसिक व्याधियों के मूल में उसकी कुण्ठाएँ तथा भावना ग्रन्थियाँ होती हैं। इन मानसिक एवं सांवेगिक गुत्थियों को सुलझाने में मनोवैज्ञानिक परीक्षण, उपकरण की भाँति सहायता करते हैं तथा जटिल-से-जटिल व्याधि का निदान प्रस्तुत कर उसकी चिकित्सा को सुलभ कर देते हैं।

(8) पूर्वानुमान अथवा भविष्यवाणी (Prediction)-पूर्वानुमान का कार्य निर्देशन में कार्य का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है। भिन्न-भिन्न पाठ्य-विषयों तथा व्यवसायों में व्यक्ति की सफलता का पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करने में मनोवैज्ञानिक परीक्षण लाभकारी सिद्ध होते हैं। मानव व्यवहार की भविष्यवाणी के लिए भी इन परीक्षणों को बहुतायत से प्रयोग होता है। यह उल्लेखनीय है कि मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में पूर्वानुमान की शक्ति उनकी वैधता के अनुपात में होती है। | इस प्रकार मनोवैज्ञानिक परीक्षण हमारे जीवन की विविध समस्याओं के समाधान में हमारी सहायता करते हैं तथा मानव-जीवन के लिए अत्यधिक उपयोगी व लाभप्रद सिद्ध होते हैं।

बुद्धि-परीक्षण
(Intelligence Test)

प्रश्न 3.
बुद्धि-परीक्षण (Intelligence Test) से आप क्या समझते हैं ? बुद्धि-परीक्षणों का वर्गीकरण तथा उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
या
बुद्धि को परिभाषित करें। (2013)
या
बुद्धि की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए बुद्धि-परीक्षण के अर्थ, प्रकार तथा उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बुद्धि-परीक्षण के प्रकारों को बताइए। (2017)
उत्तर.

बुद्धि-परीक्षण का अर्थ
(Meaning of Intelligence Test)

बुद्धि के वास्तविक स्वरूप को निर्धारित करने का प्रयास बुद्धि सम्बन्धी परीक्षण के आधार पर किया जाता है। प्राचीनकाल में बुद्धि और ज्ञान में कोई अन्तर नहीं समझा जाता था, किन्तु बाद में लोग इस भिन्नता से परिचित हुए और परीक्षा के माध्यम से बुद्धि का मापन करने लगे। आधुनिक युग में विश्व के प्रायः सभी देशों में बुद्धि-परीक्षण को महत्त्व प्रदान किया जाता है। बुद्धि-परीक्षण को इस रूप में परिभाषित कर सकते हैं –
“बुद्धि-परीक्षण वे मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं जो मानव व्यक्तित्व के सर्वप्रमुख तत्त्व एवं उसकी प्रधान मानसिक योग्यता ‘बुद्धि’ का अध्ययन तथा मापन करते हैं।”

बुद्धि की संकल्पना एवं परिभाषा
(Concept of Intelligence and Definition)

मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है, उसके व्यवहार में पशुओं की अपेक्षा जो विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है उसका प्रमुख कारण ‘बुद्धि’ (Intelligence) है। एफ० एस० फ्रीमैन नामक मनोवैज्ञानिक ने विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत बुद्धि की परिभाषाओं को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया है –
प्रथम वर्ग – बर्ट, स्टर्न तथा क्रूज आदि विद्वानों के अनुसार, “बुद्धि वातावरण के प्रति अभियोजन की योग्यता है।”
द्वितीय वर्ग – मैक्डूगल तथा बकिंघम के अनुसार, “बुद्धि सीखने की योग्यता है।”
तृतीय वर्ग – टरमन तथा बिने के अनुसार, “बुद्धि अमूर्त चिन्तने की योग्यता है।”
चतुर्थ वर्ग – समन्वयवादी विचारधारा तीनों वर्गों का समन्वय करती है जिसके अनुसार, “बुद्धि मनुष्य की एक जन्मजात विशेषता या गुण है जो अनेक मानसिक योग्यताओं का समन्वित रूप है तथा जो मनुष्य के पुराने अनुभवों के आधार पर नवीन परिस्थितियों तथा वातावरण से समायोजन स्थापित करने में एवं नवीन समस्याओं को सुलझाने में सहायता करती है।”
उपर्युक्त सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए वैशलर ने बुद्धि की परिभाषा इस प्रकार की है, “बुद्धि व्यक्ति की सम्पूर्ण शक्तियों का योग या सार्वभौमिक योग्यता है; जिसके द्वारा वह उद्देश्यपूर्ण कार्य करता है, तर्कपूर्ण ढंग से सोचता है तथा प्रभावपूर्ण ढंग से वातावरण के साथ सम्पर्क स्थापित करता है।”

बुद्धि-परीक्षणों के प्रकार (वर्गीकरण)
(Kinds of Intelligence Tests)

बुद्धि के मापन हेतु जितने भी बुद्धि-परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है, उनमें निहित क्रियाओं के आधार पर बुद्धि-परीक्षणों को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है
(A) शाब्दिक परीक्षण (Verbal Tests) तथा
(B) अशाब्दिक परीक्षण (Non – verbal Tests)

(A) शाब्दिक परीक्षण (Verbal Tests)
ये बुद्धि-परीक्षण शब्द अथवा भाषा युक्त होते हैं। इस प्रकार के परीक्षणों में प्रश्नों के उत्तर भाषा के माध्यम से लिखित रूप में दिये जाते हैं। इन परीक्षणों को व्यक्तिगत तथा सामूहिक दो उपवर्गों में बाँटा जा सकता है। इस भाँति शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण दो प्रकार के होते हैं –

  1. शाब्दिक व्यक्ति बुद्धि-परीक्षण (Verbal Individual Intelligence Tests)- शाब्दिक व्यक्ति बुद्धि-परीक्षण ऐसे बुद्धि-परीक्षण हैं जिनमें भाषा का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग करके किसी एक व्यक्ति की बुद्धि-परीक्षा ली जाती है। उदाहरणार्थ – बिने-साइमन बुद्धि-परीक्षण।
  2. शाब्दिक समूह बुद्धि-परीक्षण (Verbal Group Intelligence Tests)-इस परीक्षण में किसी एक व्यक्ति की नहीं अपितु समूह की बुद्धि परीक्षा ली जाती है। इस प्रकार के परीक्षणों के अन्तर्गत भी भाषागत प्रश्न-उत्तर होते हैं। उदाहरणार्थ-आर्मी ऐल्फा और बीटा परीक्षण।

(B) अशाब्दिक व निष्पादन परीक्षण (Non-verbal Tests)
इन बुद्धि-परीक्षणों के पदों में भाषा का कम-से-कम प्रयोग किया जाता है तथा चित्रों, गुटकों या रेखाओं द्वारा काम कराया जाता है। व्यक्तिगत तथा सामूहिक आधार पर ये परीक्षण भी दो उपवर्गों में बाँटे जा सकते हैं |

  1. अशाब्दिक व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण (Non-verbal Individual Intelligence Tests)- अशाब्दिक व्यक्ति बुद्धि-परीक्षण में भाषा सम्बन्धी योग्यता की कम-से-कम आवश्यकता पड़ती है। ये परीक्षण प्रायः अशिक्षित (बेपढ़े-लिखे लोगों पर लागू किये जा सकते हैं जिनके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के क्रियात्मक परीक्षण आयोजित किये जाते हैं और भाँति-भाँति के यान्त्रिक कार्य कराये जाते हैं। उदाहरणार्थ-घड़ी के पुर्जे खोलना-बाँधना।
  2. अशाब्दिक समूह बुद्धि-परीक्षण (Non-verbal Group Intelligence Tests)अशाब्दिक समूह बुद्धि-परीक्षण, ऊपर वर्णित व्यक्ति परीक्षण से मिलते-जुलते हैं। समय, धन एवं शक्ति के अपव्यय को रोकने के लिए एक समूह को एक साथ परीक्षण किया जाता है।

बुद्धि-परीक्षणों की उपयोगिता
(Utility of Intelligence Tests)

बुद्धि-परीक्षण मानव-जीवन के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुए हैं। शाब्दिक एवं अशाब्दिक सभी प्रकार के बुद्धि-परीक्षणों के लाभों या उपयोगिता के मुख्य बिन्दुओं पर अग्रलिखित प्रकार से प्रकाश डाला जा सकता है –

  1. बुद्धि-परीक्षण एवं शैक्षिक निर्देशन – बालकों को शैक्षिके निर्देशन प्रदान करने में बुद्धि-परीक्षण अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है, बुद्धि-परीक्षण की सहायता से शिक्षार्थी की। बुद्धि-लब्धि का मापन किया जाता है, जिसके आधार पर सामान्य, मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा प्रतिभाशाली बालकों के मध्य विभेदीकरण हो जाता है। परीक्षण के परिणामों के आधार पर निर्देशन प्रदान किया। जाता है। इसी से उनकी समस्याओं का निदान व उपचार करना सम्भव हो पाता है।
  2. बुद्धि-परीक्षण एवं व्यावसायिक निर्देशन – व्यक्ति के बौद्धिक स्तर तथा उसकी मानसिक योग्यताओं के अनुकूल व्यवसाय तलाश करने तथा नियुक्ति के सम्बन्ध में बुद्धि-परीक्षण सहायक सिद्ध होता है। व्यावसायिक निर्देशन से जुड़े दो पहलुओं–प्रथम, व्यक्ति विश्लेषण जिसमें व्यक्ति की बुद्धि, योग्यता, रुचि तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी जानकारी आती है तथा द्वितीय, व्यवसाय विश्लेषण जिसमें विशेष व्यवसाय के लिए विशेष गुणों की आवश्यकता का ज्ञान आवश्यक है-में बुद्धि-परीक्षण उपयोगी है।
  3. नियुक्ति – विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थान व्यक्ति को रोजगार प्रदान करने से पूर्व उसके बौद्धिक स्तर का मूल्यांकन करते हैं। आजकल विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित नियुक्ति से पूर्व की प्रायः सभी प्रतियोगिताओं में बुद्धि-परीक्षण लागू होते हैं।
  4. वर्गीकरण – शिक्षक अपने शिक्षण को अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाने के लिए। कक्षा के छात्रों को विभिन्न वर्गों; यथा-प्रखर बुद्धि, मन्द बुद्धि तथा औसत बुद्धि में विभाजित कर पढ़ाना चाहता है। अलग वर्ग के लिए अलग एवं विशिष्ट शिक्षण विधि आवश्यक होती है। इस वर्गीकरण का आधार बुद्धि-परीक्षण होते हैं।
  5. शोध – आजकल मनोवैज्ञानिक तथा शैक्षिक शोध-कार्यों में विषय-पात्रों के बौद्धिक स्तर तथा मानसिक योग्यता का मापन एक आम बात है। इसके लिए बुद्धि-परीक्षण काम में आते हैं।

व्यक्तिगत एवं सामूहिक परीक्षण
(Individual and Group Tests)

प्रश्न 4.
व्यक्तिगत एवं सामूहिक बुद्धि-परीक्षणों का सामान्य परिचय दीजिए तथा गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

बुद्धि-परीक्षण के दो रूप
(Two Types of Intelligence)

यदि मनोवैज्ञानिक परीक्षण के प्रशासन की विधि के आधार पर देखा जाये तो बुद्धि-परीक्षणों को प्रशासन दो प्रकार से सम्भव है—प्रथम, व्यक्तिगत रूप से परीक्षा लेकर एवं द्वितीय, सामूहिक रूप से परीक्षा संचालित करके। इसी दृष्टि से बुद्धि-परीक्षणों के दो भाग किये जा सकते हैं–
(1) व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण तथा
(2) सामूहिक बुद्धि-परीक्षण। अब हम बारी-बारी से इन दोनों के परिचय एवं गुण-दोषों का वर्णन करेंगे|

(1) व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण (Individual Intelligence Test) — व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण उन परीक्षणों को कहा जाता है जिनमें एक बार में एक ही व्यक्ति अपनी बुद्धि की परीक्षा दे सकता है। ये परीक्षण लम्बे तथा गहन अध्ययन के लिए प्रयोग किये जाते हैं। व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण दो प्रकार के होते हैं

(अ) शाब्दिक परीक्षण – शाब्दिक व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण में भाषा का प्रयोग किया जाता है। तथा परीक्षार्थी को लिखकर कुछ प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं।

(आ) क्रियात्मक परीक्षण – इन बुद्धि परीक्षणों में परीक्षार्थी को कुछ स्थूल वस्तुएँ या उपकरण प्रदान किये जाते हैं तथा उससे कुछ सुनिश्चित एवं विशेष प्रकार की क्रियाएँ करने को कहा जाता है। उन्हीं क्रियाओं के आधार पर उनकी बुद्धि का मापन होता है।
व्यक्तिगत बुद्धि – परीक्षण के गुण-दोष व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण के गुण-दोष अग्रवर्णित हैं –
गुण – 

  1. व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण छोटे बालकों के लिए, सर्वाधिक उपयुक्त है। छोटे बालकों की चंचल प्रवृत्ति के कारण उनका ध्यान जल्दी भंग होने लगता है। परीक्षण की ओर ध्यान केन्द्रित करने के लिए व्यक्तिगत परीक्षा लाभकारी हैं।
  2. इन परीक्षणों में परीक्षार्थी परीक्षण के व्यक्तिगत सम्पर्क में रहता है। उसकी बुद्धि का मूल्यांकन करने में उसके व्यवहार से भी सहायता ली जा सकती है। और अधिक विश्वसनीय सूचनाएँ प्राप्त हो सकती है।
  3. परीक्षा प्रारम्भ होने से पूर्व परीक्षार्थी से भाव-सम्बन्ध (Rapport) स्थापित करके उसकी मनोदशा को परीक्षण के प्रति केन्द्रित किया जा सकता है। इससे वह उत्साहित होकर परीक्षा देता है।
  4. आदेश/निर्देश सम्बन्धी कठिनाई का तत्काल निराकरण किया जाना सम्भव है।
  5. इन परीक्षणों का निदानात्मक महत्त्व अधिक होता है; अत: इसके माध्यम से व्यक्तिगत निर्देशन ‘कार्य को सुगम बनाया जा सकता है।

दोष-

  1. व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षा केवल विशेषज्ञ द्वारा सम्भव होती है।
  2. इसके माध्यम से सामूहिक बुद्धि का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
  3. समय तथा धन दोनों की अधिक आवश्यकता पड़ती है।
  4. प्रयोग की जाने वाली सामग्री अपेक्षाकृत काफी महँगी पड़ती है; अतः ये परीक्षण बहुत खर्चीले हैं।
  5. विभिन्न परीक्षार्थियों की परीक्षा भिन्न-भिन्न समय पर लेने के कारण परिस्थितियों में बदलाव आ जाता है। सभी परीक्षार्थियों की परीक्षा के प्रति एक समान रुचि नहीं रहती जिसकी वजह से परीक्षण की वस्तुनिष्ठता कम हो जाती है।

(2) सामूहिक बुद्धि-परीक्षण (Group Intelligence Test)-व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण की परिसीमाओं के कारण, कुछ समय बाद एक ऐसी पद्धति की माँग की जाने लगी जिसमें कम समय में ही कुछ व्यक्तियों की बुद्धि-परीक्षा सम्पन्न हो सके। जब वर्ष 1947-48 में अमेरिका ने युद्ध में प्रवेश किया तो लाखों की संख्या में कुशल सैनिकों तथा सैन्य-अधिकारियों की आवश्यकता पड़ी। इस दिशा में टरमन, थॉर्नडाइक तथा पिण्टर आदि मनोवैज्ञानिकों ने प्रयास करके दो प्रकार के सामूहिक परीक्षण तैयार किये आर्मी ऐल्फा तथा आर्मी बीटा। इन परीक्षणों के माध्यम से बहुत कम समय में बड़ी संख्या में सैनिक, तथा सैन्य अधिकारियों का चयन सम्भव हो सका। इस प्रकार, सामूहिक बुद्धि परीक्षण वे परीक्षण हैं जिनकी सहायता से एक साथ एक समय में बड़े समूह की बुद्धि परीक्षा ली जा सके। ये भी दो प्रकार के होते हैं –

(अ) शाब्दिक परीक्षण – शाब्दिक सामूहिक परीक्षणों में भाषा का प्रयोग होता है; अत: ये शिक्षित व्यक्तियों पर ही लागू हो सकते हैं।

(ब) अशाब्दिक परीक्षण – अशाब्दिक सामूहिक परीक्षणों में आकृतियों तथा चित्रों का प्रयोग किया जाता है। ये अनपढ़, अर्द्ध-शिक्षित या विदेशी लोगों के लिए होते हैं।

सामूहिक बुद्धि-परीक्षण के गुण-दोष – सामूहिक बुद्धि-परीक्षण के गुण-दोष निम्नलिखित हैं
गुण – 

  1. सामूहिक बुद्धि परीक्षण में यह जरूरी नहीं होता कि परीक्षक विशेषज्ञ या विशेष रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति हो।
  2. समय तथा धन दोनों की काफी बचत होती है।
  3. जाँच का कार्य तो आजकल मशीनों द्वारा होने लगा है।
  4. विभिन्न स्थानों पर एक साथ एक ही प्रकार की परीक्षा का संचालन सम्भव है। परिक्षार्थियों का तुलनात्मक मूल्यांकन भी सुविधापूर्वक किया जा सकता है।
  5. ये परीक्षण अधिक वस्तुनिष्ठ हैं, क्योंकि एक ही परीक्षक पूरे समूह को एक समान आदेश देता है जिसके परिणामतः भाव सम्बन्ध की स्थापना तथा परीक्षार्थियों की परीक्षा में रुचि सम्बन्धी भेद उत्पन्न नहीं होता।
  6. शैक्षणिक तथा व्यावसायिक निर्देशन में सामूहिक परीक्षणों से बड़ा लाभ पहुँचा है।

दोष-

  1. सामूहिक बुद्धि-परीक्षण में परीक्षक परीक्षार्थी की मनोदशा से परिचित नहीं हो पाता; अत: व्यक्तिगत सम्पर्क व भाव सम्बन्ध की स्थापना का अभाव रहता है।
  2. परीक्षार्थी आदेश भली प्रकार नहीं समझ पाते, जिसके परिणामस्वरूप अधिक गलतियाँ होती हैं।
  3. यह ज्ञात नहीं हो पाता। कि परीक्षार्थी, अभ्यास से/रटकर या सोच-समझकर, कैसे परीक्षण पदों को हल कर रहे हैं।
  4. इन परीक्षणों का निदान तथा उपचार में सापेक्षिक दृष्टि से कम महत्त्व होता है।
  5. ये परीक्षण अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय, कम प्रामाणिक तथा बालक के लिए बहुत कम उपयोगी सिद्ध होते हैं।

शाब्दिक एवं अशाब्दिक परीक्षण
(Verbal and non-Verbal Tests)

प्रश्न 5.
शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? विभिन्न शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
मुख्य व्यक्तिगत एवं सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों को सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
किन्हीं दो बुद्धि-परीक्षणों के बारे में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर.
भाषा के आधार पर बुद्धि-परीक्षणों के तीन प्रकार हैं-एक, शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण (Verbal Intelligence Test); दो, अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण (Non-verbal Intelligence Test) तथा तीन, मिश्रित बुद्धि-परीक्षण (Mixed Intelligence Test)। यहाँ हमारी सम्बन्ध केवल ‘शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण’ से है। सर्वप्रथम हम शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण का अर्थ जानने का प्रयास करेंगे।

शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण का अर्थ
(Meaning of Verbal Intelligence Tests)

शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों से अभिप्राय उन परीक्षणों से है जिनमें शब्दों अर्थात् भाषा एवं संख्याओं के माध्यम से परीक्षण-पदों (Test Items) का निर्माण किया जाता है। ये परीक्षण सिर्फ शिक्षित एवं उच्च प्रकार की बुद्धि वाले लोगों के लिए अधिक सफल होते हैं।
गेट्स एवं अन्य विद्वानों ने शाब्दिक परीक्षण को इस प्रकार से परिभाषित किया है, “जब विषय-पात्र (परीक्षार्थी) को शब्दों में अभ्यास पढ़ने की अथवा दी गयी समस्या का समाधान करने की आवश्यकता पड़नी है तो उस परीक्षण को शाब्दिक परीक्षण कहते हैं।’
बिने और रमन द्वारा निर्मित प्रारम्भिक काल के बुद्धि-परीक्षण, शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों के उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश की मनोविज्ञानशाला इलाहाबाद ने ‘टरमन-मैरिल स्केल का हिन्दी अनुशीलन प्रकाशित किया है।
शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण, प्रशासन विधि के आधार पर दो प्रकार के हैं –
(1) व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण तथा
(2) सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण।
इनका विवेचन निम्नवर्णित है –

(1) व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण (Individual Verbal Intelligence Test)
व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण, वे परीक्षण हैं जिनमें भाषा का प्रयोग किया जाता है। ये पढ़े-लिखे लोगों की बुद्धि मापने के काम आते हैं तथा इनकी सहायता से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति की बुद्धि का मापन किया जा सकता है।

प्रशासन की प्रक्रिया – व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के प्रशासन हेतु परीक्षा के लिए परीक्षार्थी या विषय-पात्र (अभीष्ट व्यक्ति) को परीक्षण-कक्ष में बुलाकर सुविधापूर्वक बैठाया जाता है। परीक्षक पहले से ही कक्ष में आवश्यक सामग्री को यथास्थान रख देता है जिसमें एक विराम घड़ी तथा फलांक-पत्र (Scoring-sheet) भी सम्मिलित होते हैं। कक्ष का वातावरण परीक्षा की दृष्टि से अनुकूलित कर लिया जाता है, अर्थात् कक्ष में कोई व्यवधान पैदा नहीं किया जाता; पूर्ण शान्ति रखी जाती है। सर्वप्रथम परीक्षक परीक्षार्थी से इधर-उधर की बातें करके भाव-सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। जिससे परीक्षार्थी के मन में परीक्षा देते समय कोई झिझक बाकी न रहे। स्थिति सामान्य हो जाने पर वास्तविक परीक्षण शुरू किया जाता है। परीक्षार्थी कागज पर उत्तर लिखता है। परीक्षक स्वयं भी परीक्षार्थी के उत्तर नोट कर सकता है। परीक्षण समाप्त होने पर उत्तरों की, शुद्धता की जाँच की जाती है। और फलांकों के आधार पर बौद्धिक स्तर का निर्धारण कर लिया जाता है।

व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों का विकास एवं इनके उदाहरण
(Development of Individual Verbal Intelligence Tests and Their Examples)

(A) बिने-साइमन स्केल (Binet-Simon Scale)-प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान समय तक, बुद्धि के सम्बन्ध में विभिन्न अवधारणाओं के साथ, बुद्धि-परीक्षण को प्रारम्भ करने का श्रेय अल्फ्रेड बिने को जाता है। 1904 ई० में फ्रांस में अधिक संख्या में बालक अनुत्तीर्ण हो गये। इससे शिक्षाधिकारियों के सम्मुख यह प्रबल समस्या उपस्थित हुई कि किस भाँति पेरिस के विद्यालयों में पढ़ने वाले कमजोर बुद्धि के बालकों को सामान्य बुद्धि के बालकों से अलग किया जाए और उन्हें विशेष विद्यालयों में शिक्षा के लिए भेजा जाए। यह कार्य बिने को सौंपा गया। बिने ने 1905 ई० में साइमन (Simon) के सहयोग से एक बुद्धि-परीक्षण का निर्माण किया। इसे ‘बिने-साइमन स्केल’ कहा गया। इस स्केल में कुल मिलाकर 30 परीक्षण-पद थे, जिन्हें कठिनाई के क्रम में व्यवस्थित किया गया था।

संशोधन – बिने एवं साइमन ने 1908 ई० में अपने 1905 ई० के बुद्धि-परीक्षण को संशोधित करके प्रकाशित कराया, जिसमें परीक्षणों की संख्या 30 की जगह 59 हो गयी। इस बार परीक्षण-पदों को आयु-स्तर के अनुसार व्यवस्थित किया गया था। यह आयु सीमा 3 वर्ष से लेकर 13 वर्ष तक की थी। इस दौरान बालक की बुद्धि को मानसिक आयु (Mental Age) के माध्यम से व्यक्त किया जाने लगा था। सन् 1911 ई० में बिने-साइमन स्केल का पुनः संशोधन तथा पुनर्गठन किया गया।

उपयोग – आगे चलकर बिने-साइमन स्केल शिक्षा और मनोविज्ञान की दुनिया में उपयोगी सिद्ध हुआ और उसका विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद भी किया गया। अमेरिका में हैरिंग, कॉलमैन तथा गोडार्ड आदि विद्वानों ने इस स्केल के संशोधित वे परिवद्धित रूप का प्रकाशन किया। इस स्केल को देश-काल एवं परिस्थितियों के अनुसार संशोधित करके ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अधिकाधिक अपनाया गया।

(B) स्टैनफोर्ड-बिने-साइमन स्केल (Stanford-Binet-Simon Scale)-1916 ई० में टरमन तथा उसके सहयोगियों द्वारा ‘बिने-साइमन स्केल’ का स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संशोधिके संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसका पूरा नाम ‘बिने-साइमन स्केल का स्टैनफोर्ड रिवीजन’ था। इसमें 90 परीक्षण-पदों को निर्धारित एवं आयु स्तरों के अनुसार पुनः विभाजित किया गया था। 1000 बालकों तथा 400 प्रौढ़ों के ऊपर प्रमापीकृत किये गये इस परीक्षण में बालकों की आयु सीमा 3 से लेकर 14 वर्ष तक निर्धारित थी।

(C) संशोधित स्टैनफोर्ड-बिने स्केल (Revised Stanford-Binet Scale)- 1937 ई० में ट्रमन एवं मैरिल द्वारा ‘स्टैनफोर्ड-बिने-साइमन स्केल, 1916’ का पुनः संशोधन किया गया–

  1. यह परीक्षण 2 से लेकर 14 वर्ष तक की आयु सीमा वाले बालकों के लिए था।
  2. एक समान कठिनाई वाले दो रूपों-‘ल एवं म’ (L & M) में समस्त परीक्षण-पदों को प्रस्तुत किया गया जिनमें से प्रत्येक रूप में 129 पद नियुक्त किये गये।
  3. 2 से 5 वर्ष तक की आयु के लिए छ:-छ: परीक्षण-पद हैं जो छ:-छ: महीने के अन्तर पर बनाये गये हैं। इनमें से प्रत्येक आयु के लिए एक अतिरिक्त परीक्षण-पद की व्यवस्था है।
  4. 6 से 14 वर्ष तक प्रत्येक अवस्था के लिए 6 परीक्षण-पद, औसत प्रौढ़ के लिए 8 पद तथा प्रौढ़ के बाद की अवस्था के लिए 6 परीक्षण-पद शामिल हैं।
  5. छोटी आयु के बालकों के लिए अशाब्दिक एवं क्रियात्मक परीक्षण-पद भी सम्मिलित किये गये हैं।
    परीक्षण-पदों के कुछ नमूने (Some Specimen of Test Items)-संशोधित स्टैनफोर्ड-बिने स्केल के परीक्षण-पदों के कुछ नमूने निम्नलिखित रूप में हैंदो वर्ष के लिए।
  • तीन छिद्रों वाले आकृति-पटल के दो छिद्रों में उपयुक्त लकड़ी के टुकड़ों को फिट करना।
  • दिये गये स्थूल या मूर्त पदार्थों; जैसे-थाली, गिलास, छुरी, बटन, चम्मच, लोटा आदि को पहचानना।
  • कागज से बनी गुड़ियों के शारीरिक अंगों की पहचान करना।
  • लकड़ी के गुटकों की सहायता से मीनार तैयार करना।
  • चित्र में प्रदर्शित वस्तुओं को पहचानना।
  • कम-से-कम दो शब्दों को मिलाकर सफलतापूर्वक उच्चारण करना।

पाँच से आठ वर्ष के लिए

  1. दी हुई शब्द-सूची में से आठ शब्दों के अर्थ निकालना।
  2. किसी कहानी की स्मृति।
  3. दिये हुए कथनों में मूर्खतापूर्ण बात को ढूंढ़ निकालना।
  4. नाम ली गयी वस्तुओं में समानता और अन्तर ज्ञात करना।
  5. किसी परिस्थिति-विशेष में परीक्षार्थी क्या करेगा, यह बताना।

दस वर्ष के लिए

  1. दी हुई शब्द-सूची के 11 शब्दों के अर्थ बताना।
  2. प्रस्तुत चित्र में असंगत बातों की तरफ संकेत करना।
  3. किसी गद्यांश को निश्चित समय में पढ़कर उसके विचारों की स्मृति द्वारा पुनरावृत्ति।
  4. कुछ घटनाओं तथा क्रियाओं के कारणों की व्याख्या करना।
  5. निर्धारित समय में परीक्षार्थी द्वारा उच्चारित शब्दों की संख्या नोट करना।
  6. सुनकर छ: अंकों को दोहराना।

हमारे देश भारत के विभिन्न भागों में ‘मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद’ द्वारा स्टैनफोर्ड-बिने बुद्धि-परीक्षण के विभिन्न रूपान्तरों का प्रयोग आजकल बहुतायत से किया जा रहा है। मौलिक स्वरूप को बनाये रखने की दृष्टि से इस परीक्षण का भारतीकरण कर दिया गया है। भारत में सर्वप्रथम 1982 में एच०सी० राइस द्वारा ‘हिन्दुस्तानी बिने परफार्मेस प्वाइंट स्केल’ विकसित किया। गया था।

(2) सामूहिक शब्दिक बुद्धि-परीक्षण
सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण वे परीक्षण हैं जिनसे एक साथ मनुष्यों के एक समूह की बुद्धि का मापन होता है। इन परीक्षणों में शब्दों अर्थात् भाषा का प्रयोग होता है तथा ये सिर्फ शिक्षित लोगों के लिए होते हैं।

परीक्षण की प्रयोग विधि – सामूहिक परीक्षण, व्यक्तिगत परीक्षणों से सर्वथा भिन्न, एक पुस्तिका के रूप में होता है, जिसे पेन या पेन्सिल की मदद से हल किया जाता है। परीक्षार्थियों के एक बड़े समूह को शान्त कक्ष में बैठाकर परीक्षा सम्बन्धी एक-एक पुस्तिका दे दी जाती है। प्रश्नों का हल शुरू करने का संकेत पाकर परीक्षा प्रारम्भ होती है। निर्धारित समय के पूरा होने तक बीच में कुछ भी पूछना मना होता है। तथा समय समाप्त होने पर पुस्तिका ले ली जाती है। पुस्तिका के उत्तरों को जाँचने की कुंजी होती है। इसके अतिरिक्त मशीनों के माध्यम से भी उत्तरों की जाँच की जा सकती है। ये सभी परीक्षण प्रमाणीकृत होते हैं। परीक्षार्थियों के फलांकों को ज्ञात करके उन्हें मानकों के अनुसार प्रामाणिक फलांकों में बदल लिया जाता है या बुद्धि-लब्धि ज्ञात कर ली जाती है। इस भाँति सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण की मदद से प्रत्येक परीक्षार्थी का बौद्धिक स्तर तुलनात्मक रूप से ज्ञात किया जा सकता है।

सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों में प्रयुक्त परीक्षण-पदों के नमूने
इन परीक्षणों में निम्नलिखित प्रकार के पद होते हैं

(1) तुलना (Comparison) – इस तरह के पदों में परीक्षार्थी को तुलना करनी पड़ती है; जैसे—राम श्याम से बड़ा है, किन्तु मोहन से छोटा है। कैलाश मोहन से बड़ा है तो बताइए कि –

  1. सबसे बड़ा कौन है? (कैलाश)
  2. सबसे छोटा कौन है? (श्याम)

(2) समानता व भिन्नता (Similarities and Differences) – इन पदों के अन्तर्गत समानता की तलाश की जाती है और उसी के साथ भिन्नता भी ज्ञात हो जाती है; जैसे—निम्नलिखित पाँच शब्दों में चार तो किसी-न-किसी दृष्टि से एक-दूसरे के समान हैं, किन्तु एक अन्य से भिन्न है। भिन्न शब्द के नीचे रेखा खींचिए- मन्दिर, मस्जिद, चिकित्सालय, चर्च, गुरुद्वारा।

(3) पर्याय (Synonyms) -पर्याय के अन्तर्गत किसी दिये गये शब्द के समानार्थी शब्द को बताना होता है; जैसे-कोष्ठक के बाहर एक शब्द लिखा है तथा कोष्ठक के भीतर पाँच शब्द दिये गये हैं। अन्दर के पाँचों शब्दों में जो शब्द बाहर के शब्द के समान अर्थ वाला हो उसके नीचे रेखा खींचिए- सुबह (किरण, प्रात:, चन्द्रमा, सूर्य, दिवस)

(4) विलोम (Opposites) – विलोम में दिये हुए शब्द का विलोम बताना होता है; जैसे-कोष्ठक के अन्दर के शब्दों में से उसे शब्द के नीचे रेखा खींचिए जो बाहर वाले शब्द का | विलोम हो- काला (आदमी, गोरा, केश, पानी)

(5) दिशा-बोध (Orientation) – वर्णन के आधार पर किसी वस्तु की किसी स्थान से दिशा बतानी पड़ती है; जैसे-सीता का घर मेरे घर से 2 किलोमीटर उत्तर में है तथा मीना का घर 2 किलोमीटर पूर्व में है और यदि सुशीला का घर सीता के घर से 2 किलोमीटर पूर्व में है तो वह सुशीला के घर से किस दिशा में होगा? (उत्तर दिशा में) ।

(6) अंकगणितीय तर्क (Arithmetical Reasoning) – उदाहरणार्थ, माना 2 रुपये में 8 टॉफी आती हैं और एक टॉफी का मूल्य 4 गुब्बारों के मूल्य के बराबर है तो 50 पैसे में कितने गुब्बारे मिलेंगे ? (8 गुब्बारे)

(7) संख्याओं का क्रम (Number Series) – इस वर्ग के परीक्षण- पदों की कुछ संख्याएँ एक निश्चित क्रम में लिखी होती हैं तथा उनके क्रम को समझकर उस क्रम के बीच में या अन्त में छूटे हुए स्थान में उपयुक्त संख्या लिखनी होती है; जैसे—निम्नलिखित संख्याओं के क्रम को देखिए और बताइए कि इन संख्याओं के आगे कोष्ठक में कौन-सी संख्या आएगी
1, 4, 6, 9, 11, 14, 16, (19)

(8) परमावश्यक (Essentials) – उदाहरणार्थ, कोष्ठक के भीतर वाले उस शब्द के नीचे रेखा खींचिए जो कोष्क के बाहर वाले शब्द के लिए परमावश्यक हो
सूर्य (पूरब, प्रकाश, ग्रह, उपग्रह, अन्धकार)

(9) सादृश्य (Analogy) – नीचे कुछ परीक्षण-पद दिये गये हैं। इनमें कोष्ठक के बाहर 3 तथा कोष्ठक के भीतर 6 शब्द हैं। कोष्ठक के बाहर पहले दो शब्दों में जो एक प्रकार का सम्बन्ध है वैसा तीसरे शब्द का कोष्ठक के भीतर के 6 शब्दों में से किसी एक शब्द से है, उसके नीचे रेखा खींचिए –
बिस्तर, चारपाई, सिर, (हाथ, पैर, घड़ी, साफा, कोट, पतलून) ।

प्रश्न 6.
अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण से आप क्या समझते हैं? व्यक्तिगत अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण तथा सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण का वर्णन कीजिए।
उत्तर.
शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण की यह विशेषता कि उन्हें परीक्षण की भाषा जानने वाले शिक्षित लोगों पर ही लागू किया जा सकता है, उसकी एक बड़ी परिसीमा भी बन गयी। अतः ऐसी बुद्धि परीक्षाओं का प्रबल होकर मनोवैज्ञानिकों द्वारा अशाब्दिक/क्रियात्मक या निष्पादन बुद्धि परीक्षाएँ निर्मित की गयीं।

अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण का अर्थ
(Meaning of Non-Verbal Intelligence Test)

अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण का ‘क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण अथवा ‘निष्पादन बुद्धि परीक्षण (Performance Tests of Intelligence) के रूप में भी अध्ययन किया जा सकता है। इन परीक्षणों में शब्दों या भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता अपितु इनके अन्तर्गत क्रियाओं पर जोर दिया जाता है तथा परीक्षार्थी से कुछ विशिष्ट प्रकार की क्रियाएँ करायी जाती हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मन (Munn) के अनसार, “क्रिया शब्द का प्रयोग आमतौर से ऐसे परीक्षण में किया जाता है जिसमें समझ और भाषा के प्रयोग की कम-से-कम आवश्यकता होती है।” फ्रीमैन (Frank S. Freeman) के शब्दों में, क्रियात्मक परीक्षण बहरे, अशिक्षित और अंग्रेजी न बोलने वाले परीक्षार्थियों की परीक्षा के लिए बिने-स्केल्स’ के स्थापन या पूरक के रूप में प्रथम साधन है।”

प्रकार-अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के प्रशासन के दृष्टिकोण से दो प्रकार हैं —
(1) व्यक्तिगत अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण तथा
(2) सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण।

(1) व्यक्तिगत अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण
(Individual Non-verbal Intelligence Test)

व्यक्तिगत विभिन्नता के आधार पर हर एक व्यक्ति की मानसिक योग्यता एवं बुद्धि का स्तर दूसरे व्यक्तियों से भिन्न होता है। किसी ऐसे व्यक्ति की बुद्धि का मापन करने के लिए जो परीक्षण की भाषा से परिचित नहीं है, व्यक्तिगत अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण की सहायता ली जाती है। इनमें परीक्षण-पद पूर्ण रूप से क्रिया पर आधारित होते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न स्थानों पर मनोवैज्ञानिकों ने अलग-अलग क्रियात्मक परीक्षण बनाये हैं। इस प्रकार के कुछ मुख्य परीक्षणों का संक्षिप्त परिचय नहीं दिया जा रहा है –

(i) पोर्टियस का व्यूह-परीक्षण (Porteus Maze Test) – इसे पोर्टियस भूल-भुलैया परीक्षण भी कहते हैं। पोर्टियस द्वारा निर्मित इस परीक्षण में व्यूह, रेखाओं से घिरी हुई एक ऐसी आकृति होती है जिसमें प्रवेश-द्वार से बाहर निकलने के विभिन्न मार्ग बने होते हैं। कुछ मार्ग बीच में ही अवरुद्ध हो जाते हैं और कुछ मार्ग बाहर निकलते हैं। परीक्षार्थी को पेन्सिल द्वारा व्यूह के प्रवेश-द्वार से लेकर इसके निकलने के द्वार तक पेन्सिल बिना उठाये हुए मार्ग खींचना पड़ता है। पेन्सिल सबसे छोटे मार्ग से गुजरनी चाहिए और उसमें कोई भूल भी नहीं होनी चाहिए। रेखा द्वारा मार्ग खींचते समय किसी रेखा के कट जाने यो पेन्सिल किसी अवरुद्ध मार्ग में चले जाने से गलती मानी जाती है। गलती होने पर परीक्षार्थी से वह कागज लेकर उसे दूसरे कागज पर बना हुआ उसी प्रकार का दूसरा व्यूह दे दिया जाता है। यदि दूसरे व्यूह पर भी कोई गलती हो जाती है तो परीक्षार्थी का प्रयास असफल अंकित कर दिया जाता है।

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(ii) पिण्टनर-पैटर्सन क्रियात्मक परीक्षण मान (Pintner-Paterson Scale of Performance Test) – पिण्टनर तथा पैटर्सन द्वारा 1917 ई० में प्रस्तुत यह पहली क्रियात्मक परीक्षण माना गया है। इसे 4 वर्ष में 15 वर्ष तक के बालकों के लिए बनाया गया था जिसमें 15 क्रियात्मक परीक्षण सम्मिलित किये गये। इनमें से मुख्य हैं—सैग्युइन आकार पटल, चित्रपूर्ति, चित्र पहेलियाँ तथा अनुकरण परीक्षण आदि।

(iii) मैरिल-पामर गुटका निर्माण परीक्षण (Merrill-Palmer Block Building Test) — विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त इस बुद्धि-परीक्षण में लकड़ी के कुछ गुटकों का प्रयोग किया जाता है। इन गुटकों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर भाँति-भाँति के नमूने (ढाँचे) तैयार किये जा सकते हैं। परीक्षण के अन्तर्गत सर्वप्रथम परीक्षक बच्चों के सम्मुख एक मॉडर्न नमूना प्रस्तुत

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करता है। बच्चों से निर्धारित समय में उसी प्रकार का नमूना स्वयं बनाने के लिए निर्देश दिया जाता है। बच्चे क्रिया के माध्यम से प्रयास करते हैं और परीक्षक उनके प्रयासों का मूल्यांकन करता है। इस भॉति बच्चों के क्रियात्मक प्रयास उनके बुद्धि-परीक्षाण के माध्यम बनते हैं।

(iv) सेग्युइन आकार-पटल परीक्षण (Seguin Form-Board Test) – सेग्युइन द्वारा मन्द बुद्धि बालकों की परीक्षा हेतु निर्मित यह एक अत्यन्त प्राचीन एवं सरल परीक्षण है। इसमें लकड़ी का एक पटल (Board) होता है जिसमें से विभिन्न आकार के दस टुकड़े काटकर अलग कर दिये जाते हैं। परीक्षार्थी के सम्मुख छिद्रयुक्त पटल तथा ये दस टुकड़े रख दिये जाते हैं। अब परीक्षार्थी से इन टुकड़ों को बोर्ड में कटे हुए उपयुक्त स्थानों में फिट करने के लिए कहा जाता है। इस प्रकार के तीन प्रयास (Trial) लिये जाते हैं। जिस प्रयास में परीक्षार्थी को सबसे कम समय लगता है, उसी को आधार मानकर फलांक (Score) प्रदान कर बुद्धि का निर्धारण किया जाता है।

(v) भाटिया की निष्पादन परीक्षण माला (Bhatia’s Battery of Performance Tests) – इस परीक्षण माला को उत्तर प्रदेश मनोविज्ञानशाला के भूतपूर्व निदेशक डॉ० चन्द्र मोहन

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भाटिया द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें पाँच क्रियात्मक उप-परीक्षण हैं। इन क्रियात्मक परीक्षणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है |

(A) कोह का ब्लॉक डिजाइन परीक्षण (Koh’s Block Design Test) – इस परीक्षण में 2.5 घन सेण्टीमीटर के 16 लकड़ी के चौकोर रंगीन टुकड़े प्रयुक्त होते हैं। इनमें से 14 टुकड़े चारों तरफ से लाल-पीले तथा नीले-सफेद होते हैं, जबकि शेष दो टुकड़े नीले-पीले तथा लाल-सफेद होते हैं। इसके अतिरिक्त कार्ड पर निर्मित 10 रंगीन डिजाइन होते हैं। परीक्षा के समय परीक्षार्थी के सम्मुख कठिनाई के क्रम में डिजाइन तथा उन्हें बनाने के लिए आवश्यक लकड़ी के टुकड़े रख दिये जाते हैं। परीक्षार्थी को निर्देश दिया जाता है कि वह डिजाइनों को देखकर टुकड़ों की सहायता से क्रमानुसार डिजाइनों को तैयार करे। हर एक डिजाइन के लिए समय तथा फलांक पूर्व निर्धारित होते हैं।

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(B) अलेक्जेण्डर का पास-एलाँग परीक्षण (Alexander’s Pass-Along Test)-यह प्रसिद्ध क्रियात्मक परीक्षण बालक की क्रियात्मक योग्यता का मापन करता है। परीक्षा के समय बालक के सम्मुख कुछ नीले एवं लाल रंग के लकड़ी के टुकड़े एक विशेष क्रम से लकड़ी के ढाँचे के अन्दर रख दिये जाते हैं। बालक एक निश्चित समयावधि के भीतर लकड़ी के टुकड़ों को उठाकर नहीं बल्कि उन्हें खिसकाकर दिये गये डिजाइनों से नमूने तैयार करता है। इस परीक्षण में कठिनाई के क्रम से आठ
डिजाइनों की श्रेणी होती है। बालक द्वारा इस क्रिया में लगे समय को अंकित कर लिया जाता है। उसी के अधिार पर फलांक प्रदान कर बुद्धि निर्धारित की जाती है।

(C) पैटर्न ड्राइंग परीक्षण (Pattern Drawing Test)-इस परीक्षण में कठिनाई के क्रम से आठ कार्ड्स होते हैं, जिन पर आठ प्रतिरूप या रेखाकृतियाँ बनी होती हैं। परीक्षार्थी कागज पर बिना पेन्सिल उठाये हुए और बिना लाइन दोहराये हुए ये आकृतियाँ बनाता है। गलती करने पर वह पुनः प्रयास करता है। इसमें भी समय के आधार फलांक प्रदान किये जाते हैं।

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(D) तात्कालिक स्मृति परीक्षण (Immediate Memory Test)- तात्कालिक स्मृति परीक्षण शिक्षितों तथा अशिक्षितों के लिए अलग-अलग निर्मित किये गये हैं। शिक्षितों को सीधे तथा उल्टे क्रमों में अंक सुनकर मौखिक रूप से दोहराने होते हैं। सीधे क्रम में 9 अंक तथा उल्टे क्रम में 6 अंक दोहराने होते हैं। अशिक्षित परीक्षार्थियों को अर्थहीन अक्षर समूहों को सीधे तथा उल्टे क्रम में दोहराने के लिए कहा जाता है।

(E) चित्रपूर्ति परीक्षण (Picture Completion Test)-इस परीक्षण में पाँच चित्र अलग-अलग टुकड़ों में कटे हुए होते हैं। पहले चित्र में 2, दूसरे में 4, तीसरे में 6, चौथे में 8 तथा पाँचवें में 12 टुकड़ों को मिलाकर चित्र तैयार करना पड़ता है। परीक्षार्थी निर्धारित समय सीमा के भीतर इन टुकड़ों को जोड़कर सम्पूर्ण चित्र तैयार करता है।

(2) सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण
(Group Non-verbal Intelligence Test)

सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण भाषा से अनभिज्ञ, कम पढ़े-लिखे बालक और अशिक्षित लोगों की बुद्धि परीक्षा के लिए प्रयोग किये जाते हैं। स्पष्टतः इनके परीक्षण-पदों में शब्दों तथा भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि विभिन्न प्रकार के रेखाचित्रों तथा आकृतियों का ही प्रयोग होता है। इन परीक्षणों में जिन पदों का प्रयोग होता है, वे इस प्रकार हैं

(i) समानता (Similarity) — किसी व्यक्ति के बुद्धि-परीक्षण के लिए किन्हीं बातों में समानता प्रदर्शित करने वाली आकृतियों को बायीं और एक क्रम में व्यवस्थित कर दिया जाता है और कोई एक स्थान रिक्त रखा जाता है। दायीं ओर कुछ असमान गुणों वाली आकृतियाँ होती हैं जिनमें से रिक्त स्थान के लिए समान गुण वाली आकृति’ का चयन करना होता है।

(ii) भिन्नता (Differences)- भिन्नता से सम्बन्धित परीक्षण-पदों में कुछ ऐसी आकृतियाँ दी जाती हैं जिनमें एक को छोड़कर अन्य सभी कुछ-न-कुछ बातों में एक-दूसरे से मिलती हैं। जो आकृति अन्य आकृतियों से भिन्नता रखती है, उसकी पहचान कर निशान लगाना होता है।

(iii) आकृति क्रम (Series)– आकृति क्रम से सम्बन्धित चित्रावली में बायीं तथा दायीं तरफ आकृतियाँ बनी होती हैं। बायीं ओर की आकृतियाँ एक विशेष क्रम में होती है, लेकिन उनके मध्य में एक स्थान रिक्त होता है। दायीं ओर की आकृतियों को देख-समझकर उनमें से दायीं ओर रिक्त खाने के लिए उपयुक्त आकृति का चुनाव किया जाता है।

(iv) सादृश्यता (Analogy)- इस परीक्षण के लिए बनायी गयी आकृतियों में आपसी सादृश्यता का सम्बन्ध पाया जाता है। किसी एक विशिष्ट आकृति के सादृश्य दूसरी आकृति को अलग से प्रदर्शित अनेक आकृतियों में से चुना जाता है।
सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण में उपर्युक्त प्रकार के अनेकानेक परीक्षण-पद होते हैं। कोई परीक्षार्थी निर्धारित समयाविधि के भीतर जितनी अधिक-से-अधिक समस्याओं का सही-सही समाधान प्रस्तुत कर पाता है, वह उतने ही अधिक फलांक प्राप्त कर लेता है। फलांक के आधार पर उसकी बुद्धि-लब्धि का निर्धारण कर लिया जाता है।

विशेष योग्यता का मापन
(Measurement of Mental Ability)

प्रश्न 7.
बुद्धि-लब्धि से आप क्या समझते हैं? इसे कैसे ज्ञात करेंगे?
उत्तर.

बुद्धि-लब्धि का अर्थ व मापन
(Meaning and Measurement of Intelligence Quotient)

बुद्धि-परीक्षणों के माध्यम से ‘बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient या I.O.) का मापन किया जाता है। अपने संशोधित स्केल (1908 ई०) में बिने ने बुद्धि मापन के लिए मानसिक आयु की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके आधार पर टरमन ने 1916 ई० में बुद्धि-लब्धि का विचार प्रस्तुत किया। आजकल मनोवैज्ञानिक लोग बुद्धि मापन में बुद्धि-लब्धि का प्रयोग करते हैं। बुद्धि-लब्धि वास्तविक आयु और मानसिक आयु का पारस्परिक अनुपात है; अतः सर्वप्रथम वास्तविक आयु और मानसिक आयु के निर्धारण का तरीका समझना आवश्यक है।

वास्तविक आयु (Chronological Age या C.A.)- वास्तविक आयु से अभिप्राय व्यक्ति की यथार्थ आयु है, जिसका निर्धारण जन्मतिथि के आधार पर किया जाता है।

मानसिक आयु (Mental Age या M.A:)-मानसिक आयु निर्धारित करने के लिए पहले व्यक्ति की वास्तविक आयु पर ध्यान देना होगा। मान लीजिए, किसी बालक की वास्तविक आयु 9 वर्ष है और 9 वर्ष के लिए निर्धारित प्रश्नों को सही-सही हल कर देता है तो उसकी मानसिक आयु 9 वर्ष ही मानी जाएगी ओर इस दृष्टि से वह बालक सामान्य बुद्धि का बालक कहा जाएगा। किन्तु यदि वह 9 वर्ष और 10 वर्ष के लिए निर्धारित प्रश्नों को सही-सही हल कर देता है तो उसकी मानसिक आयु 16 वर्ष समझी जाएगी और इस दृष्टि से बालक तीव्र बुद्धि का कहा जाएगा। इस भाँति, यदि वही बालक 8 वर्ष के लिए निर्धारितं सभी प्रश्नों को तो हल कर दे किन्तु 9 वर्ष के लिए निर्धारित किसी प्रश्न को हल न कर पाये तो उसकी मानसिक आयु 8 वर्ष होगी और इस आधार पर उसे मन्द बुद्धि का बालक कहा जाएगा। व्यावहारिक रूप में आमतौर पर यह देखा जाता है कि कोई बालक किसी आयु-स्तर के सभी प्रश्नों का तो उत्तर सही-सही दे ही देता है, इसके अतिरिक्त कुछ दूसरे आयु-स्तर के कुछ प्रश्नों को भी वह हल कर लेता है। ऐसे मामलों में गणना हेतु बिने-साइमन स्केल में 2 वर्ष से 5 वर्ष तक के प्रत्येक परीक्षण-पद के लिए 1 महीना, 5 वर्ष का औसत प्रौढ़ तक के प्रत्येक परीक्षण-पद के लिए 2 महीने और प्रौढ़ 1, 2 और 3 के हर एक परीक्षण-पद हेतु क्रमशः 4, 5 और 6 महीने की मानसिक आयु प्रदान करने का निर्देश दिया गया है।

बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient) निकालने का सूत्र – बालक की वास्तविक आयु और मानसिक आयु के आनुपातिक स्वरूप को ‘बुद्धि-लब्धि’ कहा जाता है। बुद्धि-लब्धि की यह अवधारणा सर्वप्रथम प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एम० एल० टरमन (M.L. Terman) द्वारा प्रस्तुत की गयी थी, जिसकी गणना के अन्तर्गत व्यक्ति की मानसिक आयु में वास्तविक आयु से भाग देकर उसे 100 से गुणा कर दिया जाता है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

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उदाहरणस्वरूप – यदि किसी बालक की वास्तविक आयु 5 वर्ष है और उसकी मानसिक आयु
7 वर्ष है तो उसकी बुद्धि-लब्धि इस प्रकार निकाली जायेगी –

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अतः बालक की बुद्धि-लब्धि 140 होगी।
निष्कर्षतः बुद्धि-लब्धि मानसिक योग्यता का मात्रात्मक व तुलनात्मक रूप प्रस्तुत करती है। 5 वर्ष की आयु से लेकर 14 वर्ष की आयु तक बुद्धि-लब्धि ज्यादातर स्थिर रहती है। वस्तुतः मानसिक आयु में वास्तविक आयु के साथ-साथ वृद्धि होती है, किन्तु 14 वर्ष के आस-पास यह प्रायः रुक जाती है। परिवेश में परिवर्तन लाकर बुद्धि-लब्धि में परिवर्तन करना सम्भव है। गैरेट का मत है कि अच्छा या बुरा परिवेश होने से बुद्धि-लब्धि में 20 पाइण्ट तक वृद्धि या कमी पायी जाती है। यह सामाजिक अथवा आर्थिक स्तर के साथ-साथ घट-बढ़ सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि बुद्धि-लब्धि कभी शून्य नहीं होती, क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से बुद्धिहीन नहीं होता।

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व्यक्तित्व परीक्षण (Personality Test)

प्रश्न 8.
व्यक्तित्व से आप क्या समझते हैं ? व्यक्तित्व के मापने की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए।
या
व्यक्तित्व मापन की प्रक्षेपण प्रविधियों के बारे में बताइए। इनमें से किसी एक प्रविधि का वर्णन कीजिए। (2011)
या
व्यक्तित्व मापन की प्रमुख विधियों का उल्लेख कीजिए। (2017)
उत्तर.

व्यक्तित्व का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Personality)

व्यक्तिगत, शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यक्तित्व मापन का विशेष महत्त्व है। व्यक्तित्व व्यक्ति के सम्पूर्ण वातावरण से सम्बन्धित उन विभिन्न गुणों या लक्षणों का समूह है जिनके कारण विभिन्न व्यक्तियों में भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। वस्तुतः ‘व्यक्तित्व (Personality) व्यक्ति की समस्त विशेषताओं/विलक्षणताओं या बाह्य व आन्तरिक पहलुओं का एक अनूठा एवं गत्यात्मक संगठन (Dynamic Organisation) है, जिसका विकास वातावरण के सम्पर्क में आने से होता है।
व्यक्तित्व के सामान्य अर्थ को जान लेने के उपरान्त विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाओं का उल्लेख करना भी आवश्यक है

(1) बीसेन्ज तथा बीसेन्ज के अनुसार, “व्यक्तित्व मनुष्य की आदतों, दृष्टिकोणों और लक्षणों का संगठन है जो प्राणिशास्त्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक कारकों के संयुक्त कार्य करने से उत्पन्न होता है।”

(2) म्यूरहेड के मतानुसार, “व्यक्तित्व से तात्पर्य पूर्ण रूप से विचार किये हुए सम्पूर्ण व्यक्ति की रचनाओं, रुचियों के तरीकों, व्यवहार, क्षमताओं, योग्यताओं और दृष्टिकोणों का एक अति विशिष्ट संगठन है।”

(3) आलपोर्ट के अनुसार, “व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोदैहिक गुणों का गत्यात्मक संगठन है जो परिवेश के प्रति होने वाले अपूर्व अभियोजनों का निर्णय करते हैं।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर व्यक्तित्व के बाह्य एवं आन्तरिक पक्षों को समझाया जा सकता है। बाह्य पक्ष से अभिप्राय व्यक्ति की शारीरिक विशेषताओं; जैसे—मुखाकृति, रंग-रूप, डील-डौल आदि से है। आन्तरिक पक्ष के अन्तर्गत पायी जाने वाली विशेषताओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. बौद्धिक विशेषताएँ; जैसे—बुद्धि, रुचि, मानसिक योग्यताएँ इत्यादि तथा ।
  2. अबौद्धिक विशेषताएँ; जैसे—संवेगात्मक, प्रेरणात्मक, सामाजिक, नैतिक इत्यादि।

व्यक्तित्व के मूल्यांकन (मापन) की विधियाँ
(Methods of Assessment of Personality)

व्यक्तित्व का मूल्यांकन एक कठिन समस्या है जिसके लिए किसी एक विधि को प्रमाणित नहीं माना जा सकता। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व के परीक्षण/मूल्यांकन या मापन की विभिन्न विधियों का निर्माण किया है। इन विधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है –
(1) वैयक्तिक विधियाँ,
(2) वस्तुनिष्ठ विधियाँ,
(3) मनोविश्लेषण विधियाँ तथा
(4) प्रक्षेपण विधियाँ। इन विधियों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) वैयक्तिक विधियाँ (Subjective Methods)
वैयक्तिक विधियों के अन्तर्गत व्यक्तित्व का परीक्षण स्वयं परीक्षक द्वारा किया जाता है। इसमें जाँच कार्य किसी व्यक्ति-विशेष या उसके परिचित से पूछताछ द्वारा सम्पन्न होता है। प्रमुख वैयक्तिक विधियाँ चार हैं –

  1. प्रश्नावली,
  2. व्यक्ति इतिहास या जीवन वृत्त,
  3. भेंट या साक्षात्कार तथा
  4. आत्म-चरित्र लेखन।

(i) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method)-प्रश्नावली विधि के अन्तर्गत प्रश्नों की एक तालिका बनाकर उसे व्यक्ति को दी जाती है जिसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाना है। प्रश्नावलियों के चार प्रकार हैं — बन्द प्रश्नावली जिसमें हाँ या ‘ना’ से सम्बन्धित प्रश्न होते हैं, खुली प्रश्नावली जिसमें व्यक्ति को पूरा उत्तर लिखना होता है, सचित्र प्रश्नावली जिसके अन्तर्गत चित्रों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दिये जारी हैं तथा मिश्रित प्रश्नावली जिसमें सभी प्रकार के मिले-जुले प्रश्न होते हैं। प्रश्नावली विधि का प्रमुख दोष यह है कि व्यक्ति अक्सर प्रश्नों का गलत उत्तर देते हैं या सही उत्तर छिपा । लेते हैं। अनेक व्यक्तियों की एक साथ परीक्षा से इस विधि में धन व समय की बचत होती है।

(ii) व्यक्ति इतिहास विधि (Case History Method)—विशेष रूप से समस्यात्मक बालकों के व्यक्तित्व का अध्ययन करने के लिए प्रयुक्त इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं; यथा—उसका शारीरिक स्वास्थ्य, संवेगात्मक स्थिरता, सामाजिक जीवन आदि। माता-पिता, अभिभावक, सगे-सम्बन्धी, मित्र-पड़ोसी तथा चिकित्सकों से प्राप्त इन सभी सूचनाओं, बुद्धि-परीक्षण तथा रुचि-परीक्षण के आधार पर व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है। |

(iii) भेंट या साक्षात्कार विधि (Interview Method) — व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की यह विधि सरकारी नौकरियों में चुनाव के लिए सर्वाधिक प्रयोग की जाती है। भेटे या साक्षात्कार के दौरान परीक्षक परीक्षार्थी से प्रश्न पूछता है और उसके उत्तरों के आधार पर उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकॅन करता है। बालक के व्यक्तित्व का अध्ययन करने के लिए उसके अभिभावक, माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों आदि से भी भेंट या साक्षात्कार किया जा सकता है। इस विधि का सबसे बड़ा दोष आत्मनिष्ठता का है।

(iv) आत्म-चरित्र लेखन विधि (Autobiography Method)— इस विधि में परीक्षक जीवन के किसी पक्ष से सम्बन्धित एक शीर्षक पर परीक्षार्थी को अपने जीवन से जुड़ी ‘आत्मकथा’ लिखने को कहता है। इस विधि का दोष यह है कि प्रायः व्यक्ति स्मृति के आधार पर ही लिखता है जिसमें उसके मौलिक चिन्तन का ज्ञान नहीं हो पाता। कई कारणों से वह व्यक्तिगत जीवन की बातों को छिपा भी लेता है। इस भाँति यह विधि अधिक विश्वसनीय नहीं कही जा सकती है।

(2) वस्तुनिष्ठ विधियाँ (Objective Methods)
व्यक्तित्व परीक्षण की वस्तुनिष्ठ विधियों के अन्तर्गत व्यक्ति के बाह्य आचरण तथा व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसमें अग्रलिखित चार विधियाँ सहायक होती हैं-

  1. निर्धारण मान विधि,
  2. शारीरिक परीक्षण,
  3. निरीक्षण विधि तथा,
  4. समाजमिति विधि।

(i) निर्धारण मान विधि (Rating Scale Method)- किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के मूल्यांकन हेतु प्रयुक्त इस विधि में अनेक सम्भावित उत्तरों वाले कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं तथा प्रत्येक उत्तर के अंक निर्धारित कर लिये जाते हैं। इस विधि का प्रयोग ऐसे निर्णायकों द्वारा किया जाता है जो उस व्यक्ति से भली-भाँति परिचित होते हैं जिसके व्यक्तित्व का मापन करना है। इस विधि से सम्बन्धित दो प्रकार के निर्धारण मानदण्ड प्रचलित हैं

(अ) सापेक्ष निर्धारण मानदण्ड (Relative Rating Scale)- इस विधि के अन्तर्गत अनेक व्यक्तियों को एक-दूसरे के सापेक्ष सम्बन्ध में श्रेष्ठता क्रम में रखकर तुलना की जाती है। माना 10 व्यक्तियों की ईमानदारी के गुण का मूल्यांकन करना है तो सबसे अधिक ईमानदार व्यक्ति को पहला तथा सबसे कम ईमानदार को दसवाँ स्थान प्रदान किया जाएगा तथा इनके मध्य में शेष लोगों को श्रेष्ठता क्रम में स्थान दिया जाएगा।

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(ब) निरपेक्ष निर्धारण मानदण्ड (Absolute Rating Scale)- इस विधि में किसी विशेष गुण के आधार पर व्यक्तियों की तुलना नहीं की जाती अपितु उन्हें विभिन्न विशेषताओं की निरपेक्ष कोटियों में रख लिया जाता है। कोटियों की संख्या 3, 5, 7, 11, 15 या उससे अधिक भी सम्भव है। ईमानदारी के गुण को निम्नलिखित मानदण्ड पर प्रदर्शित किया गया है|

(ii) शारीरिक परीक्षण विधि (Physiological Test Method)- इस विधि में व्यक्तित्व के निर्माण में सहभागिता रखने वाले शारीरिक लक्षणों के मापन हेतु निम्नलिखित यन्त्रों का प्रयोग किया जाती है –
नाड़ी की गति नापने के लिए स्फिग्मोग्राफ, हृदय की गति एवं कुछ हृदय-विकारों को ज्ञात करने के लिए-इलेक्ट्रो-कार्डियोग्राफ, फेफड़ों की गति के मापन हेतु-न्यूमोग्राफ, त्वचा में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों के अध्ययन हेतु–साइको गैल्वैनोमीटर तथा रक्तचाप के मापन हेतुप्लेन्धिस्मोग्राफ।

(iii) निरीक्षण विधि (Observation Method)- इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति के आचरण का निरीक्षण करके उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है। यहाँ परीक्षक देखकर व सुनकर व्यक्तित्व के विभिन्न शारीरिक, मानसिक तथा व्यावहारिक गुणों को समझने का प्रयास करता है। जिसके लिए निरीक्षण-तालिका का प्रयोग किया जाता है। निरीक्षण के पश्चात् तुलना द्वारा निरीक्षित गुणों का मूल्यांकन किया जाता है।

(iv) समाजमिति विधि (Sociometric Method)– समाजमिति विधि के अन्तर्गत व्यक्ति की सामाजिकता का मूल्यांकन किया जाता है। बालकों को किसी सामाजिक अवसर पर अपने सभी साथियों के साथ किसी खास स्थान पर उपस्थित होने के लिए कहा जाता है, जहाँ वे अपनी सामर्थ्य और क्षमताओं के अनुसार कार्य करते हैं। अब यह देखा जाता है कि प्रत्येक बालक का उसके समूह में क्या स्थान है। संगृहीत तथ्यों के आधार पर एक सोशियोग्राम (Sociogram) तैयार किया जाता है और उसका विश्लेषण किया जाता है। इसी के आधार पर बालक के व्यक्तित्व की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है।

(3) मनोविश्लेषण विधियाँ (Psycho-Analystic Methods)
मनोविश्लेषण विधियों के अन्तर्गत अचेतन मन के रहस्यों का उद्घाटन किया जाता है। वैसे तो मनोवैज्ञानिकों ने कई प्रकार की मनोविश्लेषण विधियों का निर्माण किया है। प्रमुख मनोविश्लेषण विधियाँ इस प्रकार हैं-

  1. स्वतन्त्र साहचर्य तथा
  2. स्वप्न विश्लेषण |

(i) स्वतन्त्र साहचर्य (Free Association) – इस विधि में 50 से लेकर 100 तक उद्दीपक शब्दों की एक सूची प्रयोग की जाती है। परीक्षक परीक्षार्थी को सामने बैठाकर सूची का एक-एक शब्द उसके सामने बोलता है। परीक्षार्थी शब्द सुनकर जो कुछ उसके मन में आता है, कह देता है जिन्हे लिख लिया जाता है और उन्हीं के आधार पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है।

(ii) स्वप्न विश्लेषण (Dream Analysis) – यह मनोचिकित्सा की एक महत्त्वपूर्ण विधि है। मनोविश्लेषणवादियों के अनुसार, स्वप्न मन में दमित भावनाओं को उजागर करता है। इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अपने स्वप्नों को नोट करता जाता है और परीक्षक उसका विश्लेषण करके व्यक्ति के व्यक्तित्व की व्याख्या प्रस्तुत करता है।

(4) प्रक्षेपण विधियाँ (Projective Techniques)
प्रक्षेपण (Projection) अचेतन मन की वह सुरक्षा प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी अनुभूतियों, विचारों, आकांक्षाओं तथा संवेगों को दूसरों पर थोप देता है। प्रक्षेपण विधियों द्वारा व्यक्ति-विशेष के व्यक्तित्व सम्बन्धी उन पक्षों को ज्ञान हो जाता है जिनसे वह व्यक्ति स्वयं ही अनभिज्ञ होता है। प्रमुख प्रक्षेपण विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. कथा प्रसंग परीक्षण,
  2. बाल सम्प्रत्यक्ष परीक्षण,
  3. रोर्णा स्याही धब्बा परीक्षण तथा
  4. वाक्य-पूर्ति या कहानी-पूर्ति परीक्षण।

(i) कथा प्रसंग परीक्षण (Thematic Apperception Test or TAT Method)- कथा प्रसंग विधि, जिसे प्रसंगात्मक बोध परीक्षण या टी० ए० टी० टेस्ट भी कहते हैं, के निर्माण का । श्रेय मॉर्गन तथा मरे (Morgan and Murray) को जाता है। परीक्षण में 30 चित्रों का संग्रह है जिनमें से 10 चित्र पुरुषों के लिए, 10 स्त्रियों के लिए तथा 10 स्त्री व पुरुष दोनों के लिए होते हैं। परीक्षण के समय व्यक्ति के सम्मुख 20 चित्र प्रस्तुत किये जाते हैं। इनमें से एक चित्र खाली रहता है। अब व्यक्ति को एक-एक चित्र दिखलाया जाता है और उस चित्र से सम्बन्धित कहानी बनाने के लिए कहा जाता है जिसमें समय का कोई बन्धन नहीं रहता। चित्र दिखलाने के साथ ही यह आदेश दिया जाता है-“चित्र को देखकर बताइए कि पहले क्या घटना हो गयी है, इस समय क्या हो रहा है, चित्र में जो लोग हैं उनमें क्या विचार या भाव उठ रहे हैं। तथा कहानी का अन्त क्या होगा ?” व्यक्ति द्वारा कहानी बनाने पर उसका विश्लेषण किया जाता है, जिसके आधार पर उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है।

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(ii) बाल सम्प्रत्यक्ष परीक्षण (Children Apperception Test or CAT Method)- इसे बालकों का बोध परीक्षण या सी० ए० टी० टेस्ट भी कहते हैं। इसमें किसी-न-किसी पशु से सम्बन्धित 10 चित्र होते हैं जिनके माध्यम से बालकों की विभिन्न समस्याओं; जैसे-पारस्परिक या भाई-बहन की प्रतियोगिता, संघर्ष आदि; के विषय में सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। इन उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर बालक के व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है।

(iii) रोर्णा स्याही धब्बा परीक्षण (Rorshachs Ink Blot Test)— इस परीक्षण का निर्माण स्विट्जरलैण्ड के प्रसिद्ध मनोविकृति चिकित्सक हरमन रोर्शा ने 1921 ई० में किया था। इसके अन्तर्गत विभिन्न कार्डों पर बने स्याही के दस धब्बे होते हैं जिन्हें इस प्रकार से बनाया जाता है कि बीच की रेखा के दोनों ओर एक जैसी आकृति दिखाई पड़े। पाँच कार्डों के धब्बे काले-भूरे, दो कार्डों में काले-भूरे के अलावा लाल रंग के भी होते हैं तथा शेष तीन कार्डों में अनेक रंग के धब्बे होते हैं। अब परीक्षार्थी को आदेश दिया जाता है कि “चित्र देखकर बताओ कि यह किसके समान प्रतीत होता है ? यह क्या हो सकता है?” आदेश देने के बाद एक-एक कार्ड परीक्षार्थी के सामने प्रस्तुत किये जाते हैं, जिन्हें देखकर वह धब्बों में निहित आकृतियों के विषय में बताता है। परीक्षक, परीक्षार्थी द्वारा कार्ड देखकर दिये गये उत्तरों का वर्णन, उनका समय, कार्ड घुमाने का तरीका एवं परीक्षार्थी के व्यवहार, उद्गार और भावों को नोट करता जाता है। अन्त में, परीक्षक द्वारा परीक्षार्थी के उत्तरों के विषय में उससे पूछताछ की जाती है। रोर्शा परीक्षण में इन चार बातों के आधार पर अंक दिये जाते हैं —

    1. स्याही के धब्बों का क्षेत्र,
    2. धब्बों की विशेषताएँ (रंग, रूप, आकार आदि),
    3. विषय-पेड़-पौधे, मनुष्य आदि तथा
    4. मौलिकता। अंकों के आधार पर परीक्षक परीक्षार्थी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। इस परीक्षण को व्यक्तिगत निर्देशन तथा उपचारात्मक निदान के लिए सर्वाधिक उपयोगी माना जाता है।

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(iv) वाक्य-पूर्ति या कहानी-पूर्ति परीक्षण (Sentence or Story-completion Method)- इस विधि के अन्तर्गत परीक्षण-पदों के रूप में अधूरे वाक्ये तथा अधूरी कहानियों को परीक्षार्थी के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है जिसकी पूर्ति करके वह अपनी इच्छाओं, अभिवृत्तियों, विचारधारा तथा भय आदि को अप्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त कर देता है।

व्यक्तित्व मूल्यांकन सम्बन्धी अन्य विधियाँ

इनके अतिरिक्त निम्नलिखित विधियाँ भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं

(1) परिस्थिति परीक्षण विधि (Situation Test Method)- इसे वस्तु-स्थिति परीक्षण भी कहते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के किसी गुण की माप करने के लिए उसे उससे सम्बन्धित किसी वास्तविक परिस्थिति में रखा जाता है तथा उसके व्यवहार के आधार पर गुण का मूल्यांकन किया जाता है। इस परीक्षण में परिस्थिति की स्वाभाविकता बनाये रखना आवश्यक है।

(2) व्यावहारिक परीक्षण विधि (Performance Test Method)—इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति को वास्तविक परिस्थिति में ले जाकर उसके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। परीक्षार्थी को कुछ व्यावहारिक कार्य करने को दिये जाते हैं। इन कार्यों की परिलब्धियों तथा व्यवहार सम्बन्धी लक्षणों के आधार पर परीक्षार्थी के व्यक्तित्व से सम्बन्धित निष्कर्ष प्राप्त किये जाते हैं।

(3) व्यक्तित्व परिसूचियाँ (Personality Inventores)— ये कथनों की लम्बी तालिकाएँ होती हैं जिनके कथन व्यक्तित्व एवं जीवन के विविध पक्षों से सम्बन्धित होते हैं। परीक्षार्थी के सामने परिसूची रख दी जाती है जिन पर वह ‘हाँ/नहीं’,‘अथवा’,‘(✓)/(✗)’ के माध्यम से अपना मत प्रकट करता है। इन उत्तरों का विश्लेषण करके व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया जाता है। ये परिसूचियाँ व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों रूपों में प्रयुक्त होती हैं। भारत में मनोविज्ञानशाला, उ० प्र०, इलाहाबाद द्वारा भी एक व्यक्तित्व परिसूची का निर्माण किया गया है, जिसे चार भागों में विभाजित किया गया है –

  1. तुम्हारा घर तथा परिवार,
  2. तुम्हारा स्कूल,
  3. तुम और तुम्हारे लोग तथा
  4. तुम्हारा स्वास्थ्य तथा अन्य समस्याएँ।

रुचि परीक्षण 
(Interest Tests)

प्रश्न 9.
रुचि से आप क्या समझते हैं? रुचि के मूल्यांकन में प्रयुक्त प्रमुख रुचि परीक्षणों पर प्रकाश डालिये।
या
रुचि परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? (2011)
उत्तर.

रुचि का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Interest)

किसी कार्य की सफलता या असफलता के लिए उत्तरदायी मानवे व्यक्तित्व के कुछ गुणों; जैसे—बुद्धि, मानसिक योग्यता एवं अभिरुचि के अलावा व्यक्ति की उस कार्य के प्रति रुचि भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। रुचि का गुण व्यक्ति को उस कार्य में रस एवं आनन्द की स्थिति प्रदान करता है। रुचि का अभिप्राय एक ऐसी मानसिक व्यवस्था है जिसके कारण से कोई व्यक्ति किसी वस्तु अथवा विचार को पसन्द या नापसन्द करता है। ये मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्धित एक प्रवृत्ति है जो व्यक्ति को वातावरण के कुछ विशेष तत्त्वों की ओर ध्यान देने की प्रेरणा प्रदान करती है। हम रुचिकर कार्यों को करने की इच्छा रखते हैं तथा उन्हें करने में हमें सुख व सन्तोष का अनुभव भी होता है।
रुचि का मानसिक योग्यता तथा अभिरुचि से गहरा सम्बन्ध है। प्रायः अनुभव किया जाता है कि जिन कार्यों को करने की हमारे पास मानसिक योग्यता और अभिरुचि होती है, उन कार्यों को हम विशेष लगाव तथा रुचि के साथ करते हैं। रुचि की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं |

  1. गिलफोर्ड के अनुसार, “रुचि वह प्रवृत्ति है जिसमें हम किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की ओर ध्यान देते हैं, उससे आकर्षित होते हैं या सन्तुष्टि प्राप्त करते हैं।”
  2. बिंघम के शब्दों में, “रुचि वह मानसिक क्रिया है जो किसी अनुभव में एकाग्रचित्त हो जाने । पर बनी रहती है।”
    देश, काल एवं पात्र के अनुसार रुचियों में परिवर्तन होता रहता है तथा आयु बढ़ने पर यह स्थिरता को प्राप्त हो जाती है।

मुख्य रुचि परीक्षण
(Main Interest Tests)

मनोविज्ञान में रुचि का शुद्ध व वैज्ञानिक मापन करने के लिए अनेक परीक्षणों का निर्माण किया गया है। रुचि परीक्षणों का पहला रूप ‘रुची’ (Check list) होता है जिसमें परीक्षार्थी के सम्मुख विभिन्न व्यवसायों की सूची प्रस्तुत की जाती है। परीक्षार्थी अपनी पसन्द के व्यवसायों पर निशान लगाता है, जो उसकी पसन्दगी का क्रम भी बताते हैं। प्रमुख रुचि परीक्षण निम्नलिखित हैं|

(1) स्ट्राँग का व्यावसायिक रुचि-पत्र (The Strong Vocational Interest Check List)-इस ‘कागज-पेन्सिल परीक्षण’ (Paper-Pencil Test) के दो रूप हैं—पहला, पुरुषों के लिए तथा दूसरा, स्त्रियों के लिए प्रत्येक में 400 परीक्षण-पद होते हैं तथा 263 परीक्षण-पद ऐसे हैं जो दोनों में शामिल है। इस रुचि परीक्षण के पहले भाग में कुछ व्यवसाय हैं, शेष अन्य दोनों भागों में क्रमानुसार विद्यालय के पाठ्य-विषय, मनोविज्ञानों की क्रियाएँ (खेलकूद, पत्र-पत्रिकाएँ आदि), अनेक प्रकार के व्यक्तियों की विशेषताएँ इत्यादि। अन्तिम भाग में परीक्षार्थी को कुछ युगल परीक्षण-पदों की परस्पर तुलना करनी पड़ती है तथा उसे स्वयं अपनी मानसिक योग्यताओं, व्यक्तित्व की विशेषताओं तथा परीक्षण में निहित क्रियाओं का श्रेणीकरण करना पड़ता है। परीक्षण-पद में उल्लिखित कथन के विषय में परीक्षार्थी अपनी पसन्द, नापसन्द तथा उदासीनता व्यक्त करता है। हालांकि, परीक्षण हल करते समय परीक्षार्थी पर समय का कोई बन्धन नहीं रहता, किन्तु प्राय: सामान्य तथा तीव्र बुद्धि वाले व्यक्ति इसे 30 मिनट में, असन्तुलित मस्तिष्क या बुद्धि की कमी वाले लोग 1 से 2 घण्टे में उसे हल कर लेते हैं। सूक्ष्म विचारों तथा कठिन शब्दावली की उपस्थिति ने इस परीक्षण का प्रयोग कॉलेज के विद्यार्थियों तथा शिक्षित प्रौढ़ों तक सीमित कर दिया है। यह परीक्षण व्यावसायिक निर्देशन के लिए सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। अलग-अलग व्यवसायों के लिए कुंजियाँ अलग-अलग बनी होती हैं। पुरुषों के व्यवसाय के लिए 47 कुंजियाँ तथा स्त्रियों के व्यव्साय के लिए 27 कुंजियाँ इसमें मौजूद हैं। इन कुंजियों के आधार पर व्यक्ति की रुचियों को ज्ञात किया जाता है और यह पता लगाया जाता है कि अमुक व्यक्ति किस व्यवसाय के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रहेगा। व्यावसायिक निर्देशन में स्ट्राँग द्वारा निर्मित यह रुचि परीक्षण अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है।

(2) क्यूडर का व्यावसायिक पसन्द लेख (Cudor Vocational Preference Record)हाईस्कूल स्तर तक के बालकों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध होने वाला यह रुचि परीक्षण क्यूडर द्वारा बनाया गया। इसमें कुल मिलाकर 168 पद-समूह सम्मिलित हैं। प्रत्येक पद-समूह में तीन-तीन पद होते हैं एवं तीनों में से प्रत्येक पद अलग-अलग व्यवसाय की ओर इशारा करता है। इन पदों में से परीक्षार्थी को अपनी सबसे अधिक पसन्द के तथा सबसे कम पसन्द के पदों को बताना पड़ता है। परीक्षण को बनाते समय दस प्रकार की व्यावसायिक रुचियों को आधार बनाया गया है, जो इस प्रकार हैं –

  1. बाह्य,
  2. यान्त्रिक,
  3. यान्त्रिक रुचि,
  4. गणनात्मक रुचि,
  5. संगीतात्मक रुचि,
  6. संगीतात्मक,
  7. गणनात्मक,
  8. लिपिक सम्बन्धी,
  9. लिपिक रुचि तथा
  10. समाज-सेवा सम्बन्धी रुचि।

हाईस्कूल तथा इण्टरमीडिएट स्तर के विद्यार्थियों की व्यावसायिक रुचियों का पता लगाने के लिए यह रुचि-मापी अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। इस परीक्षण का उपयोग हमारे प्रदेश अर्थात् उत्तर प्रदेश में शैक्षिक व्यावसायिक निर्देशन एवं परामर्श में विशेष रूप से किया जाता है।
निष्कर्षतः, रुचि के अनुकूल कार्य एवं व्यवसाय पाने वाले लोग जीवन में सुख, सन्तोष, उत्साह तथा सफलता प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग स्वयं को हर प्रकार की परिस्थितियों से आसानी से अनुकूलित कर लेते हैं, लेकिन रुचि के प्रतिकूल कार्य मिलने पर लोगों का उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। वे सदैव दु:खी, असन्तुष्ट तथा असफल देखे जाते हैं। यही कारण है कि आज की दुनिया में, खासतौर पर व्यवसाय के क्षेत्र में रुचि-मापी परीक्षणों का विशेष महत्त्व बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 10.
परीक्षण की विश्वसनीयता और वैधता से आप क्या समझते हैं? मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की विश्वसनीयता और वैधता किस प्रकार ज्ञात की जाती है?
उत्तर.
आधुनिक युग में मनोवैज्ञानिकों द्वारा अनेकानेक प्रकार के मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण किया गया है। किसी भी परीक्षण को तभी अच्छा और उपयोगी कहा जा सकता है जब उसमें किन्हीं अपेक्षित विशेषताओं का समावेश हो। व्यक्ति में अन्तर्निहित शक्तियों, क्षमताओं तथा विशेषताओं का मापन करने से पूर्व उनसे सम्बन्धित परीक्षण का उपयुक्तता की जाँच करना परमावश्यक है। इस दृष्टि से विश्वसनीयता (Reliability) तथा वैधता (Validity) इन दोनों गुणों का यथोचित ज्ञान होना अपरिहार्य है।

विश्वसनीयता
(Reliability)

मनोवैज्ञानिक परीक्षण में विश्वसनीयता का तात्पर्य किसी परीक्षण की उस विशेषता से है जिसके अनुसार यदि एक ही परीक्षण किसी व्यक्ति को समान परिस्थितियों में जितनी बार हल करने के लिए दिया जाता है तो उतनी ही बार उस व्यक्ति को उतने ही अंक प्राप्त होते हैं जितने कि उसे पहली बार प्राप्त हुए थे। फलांकों की यह समानता जितनी अधिक होती है, उतनी ही उस परीक्षण में विश्वसनीयता भी अधिक होगी और ऐसे मनोवैज्ञानिक परीक्षण को विश्वसनीय परीक्षण (Reliable Test) कहा जाएगा।
विश्वसनीयता की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

(1) फ्रेन्क फ्रीमैन के अनुसार, “विश्वसनीयता शब्द से तात्पर्य उस सीमा से है जिस तक कोई परीक्षण आन्तरिक रूप से समान होता है और उस सीमा से जिस तक वह परीक्षण और पुनर्परीक्षण के समान फल प्रदान करता है।

(2) अनास्टेसी के शब्दों में, “विश्वसनीयता से तात्पर्य स्थायित्व अथवा स्थिरता से है।”

(3) चार्ल्स ई० स्किनर के मतानुसार, “यदि कोई परीक्षण समान रूप से मापन करे तो वह विश्वसनीय होता है।”
विश्वसनीयता के अर्थ को स्पष्ट करने की दृष्टि से एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। मान लीजिए एक व्यक्ति दिनेश’ की एक बुद्धि-परीक्षण द्वारा 120 बुद्धि-लब्धि (1.0.) प्राप्त होती है। कुछ समय के उपरान्त, समान परिस्थितियों में उसी बुद्धि-परीक्षण से उसकी बुद्धि-लब्धि 120 ही निकलती है। इसी भाँति, तीसरी, चौथी और पाँचवीं बार सामान्य परिस्थितियों में उसी परीक्षण से उसकी बुद्धि-लब्धि 120 ही प्राप्त होती है तो इस प्रकार की परीक्षा पूर्णत: विश्वसनीय परीक्षा कहलाएगी। यह परीक्षण, विश्वसनीय परीक्षण तथा परीक्षणों की विशेषता विश्वसनीयता कही जाएगी।

विश्वसनीय परीक्षण के आवश्यक गुण (Essential Merits of Reliable Test)
किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण के विश्वसनीय होने के लिए उसमें दो मुख्य गुणों का समावेश परमावश्यक है। ये निम्नलिखित हैं –

(1) वस्तुनिष्ठता (Objectivity)- एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण तभी विश्वसनीय कहा जाएगा जब उसमें ‘वस्तुनिष्ठता’ का गुण विद्यमान हो। वस्तुनिष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि परीक्षण के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर निश्चित एवं स्पष्ट हो और उसके उत्तरों के बारे में परीक्षकों में आपसी मतभेद न हो। मूलयांकन के समय परीक्षक के व्यक्तिगत विचारों का भी प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यदि कई परीक्षक परीक्षार्थी के उत्तरों का मूल्यांकन करें तो सभी एकसमान अंक प्रदान करें।

(2) व्यापकता (Comprehensiveness)- उत्तम परीक्षण की एक विशेषता व्यापकता भी है। व्यापकता का एक दूसरा नाम ‘समग्रता है। इस गुण के अनुसार परीक्षण को जिस तत्त्व की जाँच के लिए बनाया गया है वह उससे जुड़े सभी पहलुओं की जाँच करे। इसके लिए परीक्षण में तत्त्व से सम्बन्धित सभी प्रश्न सम्मिलित किये जाने चाहिए।

विश्वसनीयता ज्ञात करने की विधियाँ
(Methods of Determining the Reliability of the Test)
किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षण की विश्वसनीयता ज्ञात करने के लिए चार प्रमुख विधियों का प्रयोग किया जाता है —
(1) परीक्षण-पुनर्परीक्षण विधि,
(2) समानान्तर-परीक्षण विधि,
(3) अर्द्ध-विच्छेदित परीक्षण विधि तथा
(4) अन्तरपदीय एकरूपता |

(1) परीक्षण-पुनर्परीक्षण विधि (Test-Retes Method)- इस विधि के माध्यम से परीक्षण की विश्वसनीयता ज्ञात करने के लिए परीक्षार्थियों के किसी समूह-विशेष को कोई परीक्षण हल करने हेतु दिया जाता है जिसके उत्तरों पर अंक प्रदान किये जाते हैं। इस प्रकार दोनों बार के प्राप्तांकों का सांख्यिकीय गणना द्वारा सहसम्बन्ध (Correlation) निकाला जाता है, जिसके फलस्वरूप ‘सह-सम्बन्ध गुणांक (Coefficient of Correlation) का मान प्राप्त होता है। यदि यह सह-सम्बन्ध गुणांक + 100 आता है तो परीक्षण की विश्वसनीयता ‘पूर्ण’ मानी जाती है (हालांकि यह एक काल्पनिक स्थिति है)। इसका मान + 0.5 और + 1.00 के बीच प्राप्त होने पर भी अच्छी विश्वसनीयता का संकेत मिलता है, किन्तु यदि यह इसमें कम होता है तो परीक्षण को विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता।

दोष – परीक्षण-पुनर्परीक्षण विधि विश्वसनीयता ज्ञात करने की अत्यन्त सरल विधि होते हुए भी कुछ दोषों से युक्त है। जैसे –

  1. परीक्षण को एक बार हल करने से परीक्षार्थी को उसका कुछ-न-कुछ अभ्यास अवश्य हो जाता है, जो उसी परीक्षण को दुबारा हल करने में सहायक सिद्ध होता है। इसके परिणामस्वरूप दूसरी बार उसे पहले की अपेक्षा जयादा अंक प्राप्त होते हैं और इससे दोनों के फलांकों में पर्याप्त अन्तर आ जाता है।
  2. स्मृति तथा अभ्यास का प्रभाव सभी परीक्षार्थियों पर एक-सा नहीं पड़ता जिससे दोनों बार के प्राप्तांक एक-दूसरे से काफी भिन्न हो जाते हैं।
  3. इस विधि के अन्तर्गत यदि दोनों परीक्षाओं के बीच समय का काफी अन्तर रहेगा तो उस बीच में परीक्षार्थियों का मानसिक विकास होने तथा उनके ज्ञान में वृद्धि होने से भी दोनों बार के परिणामों में अन्तर स्वाभाविक है। निष्कर्षत: इन दोषों के कारण परीक्षण की विश्वसनीयता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(2) समानान्तर-परीक्षण विधि (Parallel-Form Method)— समानान्तर-परीक्षण विधि द्वारा विश्वसनीयता ज्ञात करने के लिए एक प्रकार के दो परीक्षणों का निर्माण किया जाता है। इन परीक्षणों के पद या प्रश्न अलग-अलग होने के बावजूद भी रूप (Form), विषय-वस्तु (Content) तथा कठिनाई (Difficulty) में एकसमान होते हैं। परीक्षण दिया जाता है। दोनों परीक्षणों के अंकों के बीच सह-सम्बन्ध गुणांक का मान ज्ञात करके व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। विश्वसनीयता बताने के लिए उपर्युक्त सिद्धान्त का ही पालन किया जाता है।
दोष-पहली विधि के समस्त दोषों के साथ उसमें एक नया दोष आ जाता है कि एक ही प्रकार के दो परीक्षणों का निर्माण अत्यन्त दुष्कर कार्य है।

(3) अर्द्ध-विच्छेदित विधि (Split-Half Method)—इस विधि के अन्तर्गत केवल एक बार एक ही परीक्षण का उपयोग किया जाता है। परीक्षार्थियों को पहले एक परीक्षण हल करने के लिए दिया जाता है और उसके उत्तरों पर अंक प्रदान कर दिये जाते हैं। अब परीक्षण को अर्द्ध-विच्छेदित (अर्थात् दो बराबर भागों में बाँटना) कर दिया जाता है। इसके लिए ‘सम संख्या’ (Even Number) वाले प्रश्नों; यथा-दूसरा, चौथा, छठा, आठवाँ, दसवाँ ……. आदि; तथा ‘विषम संख्या’ (Odd Number) वाले प्रश्नों; यथा-तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ, नवाँ, ग्यारहवाँ ………. आदि; को अलग-अलग करके दो श्रेणियाँ तैयार कर ली जाती हैं। इस प्रकार निर्मित दोनों परीक्षणों के बारे में होती है, जिसे सांख्यिकीय विधियों द्वारा संशोधित कर लिया जाता है। परीक्षण निर्माण के समय यह सावधानी अवश्य रखी जाए कि सभी परीक्षण-पद कठिनाई के क्रम में ही व्यवस्थित हों।

(4) अन्तरपदीय एकरूपता (Inter-Item Consistency)— इस विधि में भी एक परीक्षण सिर्फ एक बार ही प्रयुक्त होता है। सर्वप्रथम परीक्षार्थियों को परीक्षण हल करने के लिए देकर उसके उत्तरों पर अंक प्रदान कर दिये जाते है। इसके बाद प्रत्येक परीक्षण-पद में प्राप्त अंक का परस्पर तथा पूरे परीक्षण में प्राप्त अंकों में सह-सम्बन्ध ज्ञात किया जाता है, जिसकी गणना के लिए क्यूडर तथा रिचर्डसन (Cuder and Richardson) के विश्वसनीयता निकालने के सूत्रों का प्रयोग किया जाता है।
वस्तुतः किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षण की भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा ज्ञात की गयी विश्वसनीयता का अर्थ भी भिन्न-भिन्न ही होता है; अतः इन विधियों को आवश्यकतानुसार ही प्रयोग में लाना चाहिए तथा परीक्षण की विश्वसनीयता का उल्लेख करते समय उस विधि का नाम भी बता देना चाहिए जिसके माध्यम से उसे ज्ञात किया गया है।

वैधता (Validity)

वैधता या प्रामाणिकता किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण की एक आवश्यक शर्त एवं विशेषता है। यदि कोई परीक्षण उस योग्यता अथवा विशेषताओं का यथार्थ मापन करे जिन्हें मापने के लिए उसे बनाया गया है, तो उस परीक्षण को वैध कहा जाएगा। उदाहरणार्थ-मान लीजिए, कोई परीक्षण बुद्धि मापन के लिए निर्मित किया गया है और प्रयोग करने पर वह बालक की बुद्धि का ही मापन करता है तो उसे वैध या ‘प्रामाणिक परीक्षण’ कहा जाएगा और उसका वह गुण वैधता या प्रामाणिकता कहलाएगा।
कुछ विद्वज्जनों ने वैधता को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है –

(1) बोरिंग एवं अन्य विद्वानों के मतानुसार, “जिस वस्तु के मापन का प्रयत्न कोई परीक्षण करता है, उसकी जितनी सफलता से वह मापन कर लेता है यही उसकी वैधता कहलाती है।”

(2) गेट्स एवं अन्य विद्वानों के अनुसार, “कोई भी परीक्षण प्रामाणिक होता है जब वह जिस गुण की हम परीक्षा करना चाहते हैं उसे वास्तविक रूप से और सही-सही मापता है।”

(3) गुलिकसन के अनुसार, “किसी कसौटी के साथ परीक्षण का सहसम्बन्ध उसकी वैधता कहलाता है।”

वैधता या प्रामाणिकता के प्रकार (Kinds of Validity)
किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षण में कई प्रकार की वैधता पायी जाती है। वैधता के मुख्य प्रकारों को उल्लेख नीचे किये जा रहा है –

(1) रूप-वैधता (Face Validity)- रूप-वैधता के अनुसार परीक्षण देखने मात्र से वैध प्रतीत होता है। यहाँ परीक्षण के वास्तविक उद्देश्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता अर्थात् यह नहीं देखा जाता कि उसे क्या मापने के लिए बनाया गया है, मात्र यह देखा जाता है कि परीक्षण बाह्य दृष्टि से क्या माप रहा है। अतः कोई भी परीक्षण बाहरी रूप से जो मापता हुआ प्रतीत होता है, वह उसकी रूप-वैधता कहलाती है।

(2) विषय-वस्तु वैधता (Content Validity)— इसे पारिभाषिक वैधता या तार्किक वैधता के नाम से भी जाना जाता है। इस वैधता को सम्बन्ध व्यापकता के गुण से है। इसके अनुसार, परीक्षण जिस विशेषता या योग्यता का मापन कर रहा है, उसकी विषय-वस्तु के समस्त पक्षों से सम्बन्धित प्रश्न यदि उसमें मौजूद होंगे तो उसमें विषय-वस्तु वैधता कही जाएगी।

(3) तात्त्विक या रचना सम्बन्धी वैधता (Construct of Factorial Validity)-तत्त्व या रचना से सम्बन्धित इस वैधता को ज्ञात करने के लिए तत्त्व विश्लेषण’ (Factor Analysis) नामक सांख्यिकी विधि प्रयोग की जाती है। यहाँ परीक्षण के उस तत्त्व से सहसम्बन्ध ज्ञात किया जाता है जो कि अनेकानेक परीक्षणों में उभयनिष्ठ होता है।

(4) सामयिक या पद की वैधता (Concurrent of Status Validity)-सामायिक या पद। की वैधता में दिये गये परीक्षण का सह-सम्बन्ध किसी मानदण्ड (Criterion) से ज्ञात करना होता है। परीक्षण की सफलता का वर्तमान समय में ही मूल्यांकन किया जाता है। यदि इस प्रक्रिया में सफलता मिल जाती है तो कहा जा सकता है कि परीक्षण में सामयिक वैधता है।

(5) पुर्वानुमान सम्बन्धी वैधता (Predictive validity)-इस प्रकार की वैधता के माध्यम से परीक्षण की भावी सफलता के बारे में पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करने की सामर्थ्य ज्ञात की जाती है। इसके लिए प्रदत्त परीक्षण या किसी मानदण्ड से सहसम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार की शिक्षा या व्यवसाय की सफलता को भी मानदण्ड स्वीकार किया जा सकता है।
वैधता के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोई भी परीक्षण किसी खास प्रयोजन या किसी विशेष आयु-वर्ग के बच्चों हेतु ही वैध होता है, अन्यों के लिए नहीं। अत: किसी परीक्षण की वैधता ज्ञात करते समय यह भी ज्ञात कर लेना चाहिए कि वह किस प्रयोजन या वर्ग-विशेष के लोगों के लिए प्रयोग में लाया गया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए। (2003)
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण अपने आप में एक विस्तृत अवधारणा है, जिसका सम्बन्ध व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के विभिन्न गुणों एवं विशेषताओं के व्यवस्थित मापन से होता है। वर्तमान समय में मनोवैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के मनोवैज्ञानिक परीक्षण तैयार कर लिए हैं। इस स्थिति में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का वर्गीकरण मुख्य रूप से चार आधारों पर किया गया है। ये आधार हैं क्रमशः परीक्षण का उद्देश्य, परीक्षण का माध्यम, परीक्षण की विधि तथा समय। इन चारों आधारों पर किये गये वर्गीकरण का विवरण निम्नलिखित है –

(1) उद्देश्य के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकार-उद्देश्य के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के मुख्य रूप से पाँच प्रकार निर्धारित किये गये हैं। ये प्रकार हैं-

  1. बुद्धि-परीक्षण,
  2. मानसिक योग्यता परीक्षण,
  3. रुचि परीक्षण,
  4. अभिरुचि परीक्षण तथा
  5. व्यक्तित्व परीक्षण।

(2) माध्यम के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकार – मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का एक वर्गीकरण माध्यम के आधार पर भी किया गया है। इस आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के तीन प्रकार हैं –

  1. शाब्दिक परीक्षण,
  2. अशाब्दिक परीक्षण तथा
  3. सामूहिक परीक्षण।

(3) परीक्षण विधि के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकार –  परीक्षण विधि के आधार पर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक परीक्षण के दो प्रकार निर्धारित किये गये हैं। ये प्रकार हैं –

  1. वैयक्तिक परीक्षण या व्यक्तिगत परीक्षण तथा
  2. सामूहिक परीक्षण।

(4) समय के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकार – मनोवैज्ञानिक परीक्षण में लगने वाले समय के आधार पर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक परीक्षण के दो प्रकार निर्धारित किये गये हैं। ये प्रकार हैं –

  1. गति-परीक्षण तथा
  2. शक्ति-परीक्षण।

प्रश्न 2.
उद्देश्य के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
परीक्षण के उद्देश्यों के अनुसार मनोवैज्ञानिक परीक्षा निम्नलिखित प्रकार के होते हैं
(1) बुद्धि परीक्षण (Intelligence Test) – बुद्धि प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग मात्रा में पायी जाती है, जिसके अध्ययन एवं मापन के लिए बुद्धि परीक्षणों का निर्माण किया जाता है। बुद्धि परीक्षण के दो प्रकार के होते हैं – वैयक्तिक बुद्धि परीक्षण तथा सामूहिक बुद्धि परीक्षण। ये दोनों प्रकार के परीक्षण शिक्षा एवं निर्देशन की दृष्टि से अत्यधिक उपयोगी हैं।

(2) मानसिक योग्यता परीक्षण (Mental Ability Test)- मनोवैज्ञानिकों ने कई प्रकार की मानसिक योग्यताओं का उल्लेख किया है-सांख्यिकी, शाब्दिक, तार्किक, शब्द प्रवाह, आन्तरीक्षक, स्मृति सम्बन्धी एवं प्रत्यक्ष सम्बन्धी योग्यताएँ। इन मानसिक योग्यताओं के पृथक्-पृथक् मापन के लिए विभिन्न प्रकार के परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है।

(3) रुचि परीक्षण (Interest Inventry or Test)– लोगों की रुचियों में विभिन्नता पायी जाती है, व्यक्ति की क्षमताओं, योग्यताओं तथा समय का सदुपयोग करने की दृष्टि से आवश्यक है कि उसे उसकी रुचि के अनुसार कार्य सौंपा जाए। इसी कारण आजकल शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्णयों में रुचि परीक्षणों का महत्त्व बढ़ गया है।

(4) अभिरुचि परीक्षण (Aptitude Test)-मानसिक योग्यता परीक्षणों तथा रुचि-परीक्षणों को मिलाकर बनाये गये अभिरुचि परीक्षणों द्वारा ज्ञात होता है कि कोई व्यक्ति सम्बन्धित कार्य को करने या सीखने की किस सीमा तक योग्यता, कुशलता तथा रुचि रखता है। अभिरुचि परीक्षण के उदाहरणों में-कलात्मक परीक्षण, लिपित अभिरुचि परीक्षण, यान्त्रिक अभिरुचि परीक्षण, गत्यात्मक योग्यता परीक्षण तथा आन्तरीक्षिक परीक्षण मुख्य रूप से शामिल हैं।

(5) व्यक्तित्व परीक्षण (Personality Test)-व्यक्तित्व के अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, चारित्रिक, सामाजिक, नैतिक आदि सभी प्रकार के गुण सम्मिलित किये जाते हैं। शिक्षा, निर्देशन, मानसिक स्वास्थ्य तथा अपराध निरोध आदि ऐसे बहुत-से क्षेत्र हैं जिनमें इन गुणों को समझने की आवश्यकता होती है। व्यक्तियों के व्यक्तित्व को जानने के उद्देश्य से बनाये गये परीक्षण व्यक्तित्व परीक्षण कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
माध्यम के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
या
अशाब्दिक परीक्षण किसे कहते हैं?
या
शाब्दिक, अशाब्दिक व निष्पादन बुद्धि-परीक्षण क्या होते हैं?
या
शाब्दिक एवं अशाब्दिक परीक्षणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2018)
उत्तर.
‘विषय’ और ‘परीक्षण’ के मध्यम विचार-विनिमये तथा पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए किसी ‘माध्यम’ का होना अपरिहार्य है। वस्तुतः माध्यम की सहायता से ही विषय’ अपनी अन्तर्निहित शक्तियों को व्यक्त करता है। परीक्षण निम्नलिखित प्रकार के हैं |

(1) शाब्दिक परीक्षण (Verbal Test) – जिन परीक्षणों में शब्दों’ या ‘भाषा का प्रयोग किया जाता है, उन्हें शाब्दिक परीक्षण कहा जाता है। इन परीक्षणों में उत्तर लिखकर देना होता है। इसी कारण ये शिक्षित लोगों के लिए ही उपयोगी कहे जा सकते हैं।

(2) अशाब्दिक परीक्षण (Non-verbal Test) – इन परीक्षणों में शब्दों और भाषा को प्रयोग नहीं किया जाता। इनमें परीक्षण पद के रूप में विभिन्न प्रकार की आकृतियों तथा चित्रों का प्रयोग किया जाता है। ये परीक्षण मुख्यतः भाषा से अनभिज्ञ, अशिक्षित या कम पढ़े-लिखे तथा छोटे बालकों के परीक्षण हेतु प्रयुक्त होते हैं।

(3) क्रियात्मक परीक्षण (Performance Test) – जिन परीक्षणों में अशाब्दिक परीक्षणों की भाँति कागज-पेन्सिल का बिल्कुल प्रयोग नहीं किया जाता तथा जिनको माध्यम सिर्फ क्रियाएँ होती हैं, उन्हें क्रियात्मक परीक्षण कहा जाता है। क्रियात्मक परीक्षणों में ठोस पदार्थों या सामग्री, जैसे लकड़ी के गुटके, ठोस घा, टुकड़े या पटल इस्तेमाल किये जाते हैं। विषय इन्हीं की सहायता से निश्चित प्रकार के प्रतिरूप (Pattern) तैयार करता है। ये परीक्षण भी अशिक्षित तथा छोटे बच्चों के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 4.
परीक्षण विधि के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकारों को उल्लेख कीजिए।
या
वैयक्तिक परीक्षण (टेस्ट) से आप क्या समझते हैं? (2018)
उत्तर.
परीक्षण विधि के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निम्नलिखित दो प्रकार निर्धारित किये गये हैं –

(1) व्यक्तिगत या वैयक्तिक परीक्षण (Individual Test)- जब कोई मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक समय में एक परीक्षक द्वारा केवल एक ही व्यक्ति पर लागू किया जाता है तो उसे व्यक्तिगत या वैयक्तिक मनोवैज्ञानिक परीक्षण कहते हैं। व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक परीक्षण प्रायः छोटे बालकों के लिए उपयुक्त रहते हैं। बालक तथा परीक्षक का व्यक्तिगत सम्पर्क होने की वजह से दोनों के बीच अच्छा भाव-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। व्यक्तिगत परीक्षणों में विशेष योग्यता वाले परीक्षक की आवश्यकता होती है। इनमें प्रश्न या परीक्षण-पद कठिन स्तर के होते हैं तथा प्रश्नों के निर्धारण में भी कठिनाई आती है। परीक्षणों में भाषा, ज्ञान तथा व्यावहारिकता का खासे प्रभाव देखने में आता है। यद्यपि ये परीक्षण सामूहिक परीक्षणों की तुलना में कम यथार्थ तथा अधिक खर्चीले होते हैं, तथापि इनमें विश्वसनीयता एवं वैधता अधिक पायी जाती है और ये परीक्षण व्यक्तिगत निर्देशन के लिए विशिष्ट रूप से उपयोगी हैं। सभी क्रियात्मक परीक्षण (Performance Tests), व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक परीक्षण होते हैं। इसके अतिरिक्त इन परीक्षणों के अन्तर्गत ऐसी परीक्षाएँ भी सम्मिलित होती हैं जिनमें शाब्दिक योग्यताओं की आवश्यकता पड़ती है; जैसे – स्टैनफोर्ड-बिने बुद्धि-परीक्षण, टी० ए० टी० परीक्षण, कोह का ब्लॉक डिजाइन परीक्षण, रोर्शा का स्याही धब्बा परीक्षण, वैश्लर-बेलेव्यु बुद्धि- परीक्षण आदि।

(2) सामूहिक परीक्षण (Group Test)- सामूहिक परीक्षणों से तात्पर्य उन परीक्षणों से है। जिनका व्यवहार एक ही समय में एक से अधिक व्यक्तियों पर सामूहिक रूप से किया जाता है। इन परीक्षणों की खास बात यह है कि इनमें धन व समय की बचत होती है और साधारण ज्ञान वाला परीक्षक भी इन्हें संचालित कर सकता है। सामूहिक परीक्षणों में प्रायः प्रश्न सरल होते हैं और उनके निर्धारण में कठिनाई नहीं आती। अल्प समय में ही प्रखर, सामान्य तथा मन्द बुद्धि के बालकों का ज्ञान हो जाता है। हालाँकि सामूहिक मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में परीक्षार्थी तथा परीक्षक के बीच भाव-सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाता और ये परीक्षण शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन में भी अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, तथापि इनमें सर्वाधिक यथार्थता पायी जाती है। सामूहिक परीक्षणों के अन्तर्गत व्यक्तित्व परिसूचियाँ, रुचि परिसूचियाँ, व्यावसायिक रुचि-पत्र तथा उ० प्र० मनोविज्ञानशाला के सामूहिक बुद्धि परीक्षण सम्मिलित हैं। कर्मचारियों, सैनिकों तथा शिक्षार्थियों के चयन से सम्बन्धित विभिन्न परीक्षाओं के लिए ये परीक्षण अत्यधिक लाभप्रद सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 5.
व्यक्तिगत एवं सामूहिक परीक्षणों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या , वैयक्तिक तथा सामूहिक परीक्षणों के किन्हीं चार अन्तरों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.
व्यक्तिगत एवं सामूहिक परीक्षणों के अन्तर का विवरण निम्नलिखित है –

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) 12
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) 13
प्रश्न 6.
शाब्दिक एवं अशाब्दिक परीक्षणों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2016)
उतर.
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) 14
प्रश्न 7.
सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के कुछ मुख्य उदाहरण दीजिए।
उत्तर.
सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के मुख्य उदाहरणों का सामान्य परिचय निम्नलिखित

  1. सबसे पहले सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण प्रथम विश्व के दौरान आर्मी बीटा परीक्षण के नाम से अमेरिका में बनाया गया था।
  2. 5 वर्ष से लेकर 12 वर्ष तक के बालकों के लिए उपयुक्त डीयरबोर्न सामूहिक परीक्षण-1′ (Dearborn Group Tests Series-1) में अनेक अशाब्दिक परीक्षण-पदों का समावेश है।
  3. शिकागो अशाब्दिक परीक्षण 6 वर्ष के बच्चों से लेकर प्रौढ़ों तक के लिए है, जिसमें प्रयुक्त मुख्य परीक्षण-पद ये हैं — वस्तुओं का वर्गीकरण, कागज पर चित्रित आकार पटल तथा लकड़ी के घनाकार टुकड़ों को गिनना, अंक-प्रतीक, आकृतियों की तुलना एवं चित्र विन्यास आदि।
  4. इंग्लैण्ड का एक पिजन का अशाब्दिक परीक्षण, दूसरा परीक्षण ‘नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डस्ट्रियल साइकोलॉजी लन्दन (N.I.I. 70/23) को तथा तीसरा परीक्षण रैवन का प्रोग्रेसवि मैट्रीसेज है।
    भारत में पिजन का अशाब्दिक परीक्षण, N. I. I. 70/23 तथा प्रोग्रेसिव मैट्रीसेज ही प्रयुक्त हो रहा है।

प्रश्न 8.
अभिरुचि (Aptitude) से क्या आशय है? मुख्य अभिरुचि परीक्षणों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर.
व्यक्ति की एक विशिष्ट योग्यता को अभिरुचि (Aptitude) कहा जाता है। अभिरुचि से आशय है — किसी कार्य को सीखने की योग्यता तथा उसके प्रति रुचि को होना। अभिरुचि में दो तत्त्व निहित होते हैं। ये तत्त्व हैं – सम्बन्धित कार्य को करने या सीखने की क्षमता तथा उनके प्रति रुचि। यदि किसी व्यक्ति की किसी कार्य के प्रति रुचि हो, परन्तु उसमें उस कार्य को सीखने की क्षमता या योग्यता न हो तो हम यह नहीं कह सकते कि उस व्यक्ति की सम्बन्धित कार्य में अभिरुचि है। इसी प्रकार; भले ही व्यक्ति किसी कार्य को सीखने या करने की क्षमता रखता हो, परन्तु यदि उसकी उस कार्य के प्रति रुचि न हो तो भी हम यह नहीं कह सकते कि व्यक्ति की अमुक कार्य के प्रति अभिरुचि है।
व्यक्ति की अभिरुचियों को जानने एवं उनके मापन के लिए विभिन्न परीक्षण तैयार किये गये हैं। इन परीक्षणों को अभिरुचि परीक्षण कहा जाता है। मुख्य अभिरुचि परीक्षणों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है |

(1) कैलिफोर्निया मानसिक परिपक्वता परीक्षण – एक मुख्य अभिरुचि परीक्षण है। ‘कैलिफोर्निया मानसिक परिपक्वता परीक्षण’। यह परीक्षण विभिन्न मानसिक शक्तियों के मापन के लिए तैयार किया गया है। इस परीक्षण के माध्यम से व्यक्ति के शब्द-ज्ञान तथा सह-सम्बन्ध ज्ञान आदि को जाना जाता है। व्यवहार में इस परीक्षण के माध्यम से महाविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की मानसिक परिपक्वती का मापन किया जाता है।

(2) मिनेसोटा यान्त्रिक संग्रह अभिरुचि परीक्षण – इस अभिरुचि परीक्षण के माध्यम से सम्बन्धित व्यक्ति की यान्त्रिक कार्यों के प्रति अभिरुचि को ज्ञात किया जाता है तथा उसका मापन किया जाता है। इस परीक्षण के अन्तर्गत व्यक्ति की यान्त्रिक अभिरुचि को जानने के लिए उससे कुछ सूक्ष्म यान्त्रिक कार्य करवाये जाते हैं तथा उसी के आधार पर व्यक्ति की यान्त्रिक अभिरुचि का निर्धारण किया जाता है।

(3) मिनेसोटा लिपिक अभिरुचि परीक्षण — यह अभिरुचि परीक्षण सम्बन्धित व्यक्ति की बौद्धिक योग्यता को ज्ञात करके उसकी अभिरुचि का मापन करता है। इस परीक्षण को भिन्न-भिन्न आयु-वर्ग के व्यक्तियों पर लागू किया जा सकता है।

(4) गिलफोर्ड-जिमरमैन अभिरुचि परीक्षण – यह अभिरुचि परीक्षण द्वितीय विश्व युद्ध के काल में तैयार किया गया था तथा इसका उपयोग सैनिकों की अभिरुचि को जानने के लिए किया जाता था। इस परीक्षण के माध्यम से व्यक्ति की विभिन्न अभिरुचियों को जाना जा सकता है।

(5) कुछ अन्य अभिरुचि परीक्षण – व्यक्ति की अभिरुचियों के मापन के लिए तैयार किये गये उपर्युक्त मुख्य अभिरुचि परीक्षणों के अतिरिक्त कुछ अन्य अभिरुचि परीक्षण भी तैयार किये गये हैं, जिन्हें प्रायः मनोवैज्ञानिकों द्वारा अभिरुचि मापन के लिए अपनाया जाता है। इस वर्ग के कुछ उल्लेखनीय अभिरुचि परीक्षण हैं-फ्रांफार्ड सूक्ष्म अंग-दक्षता परीक्षण, स्टाबर्ग अंग-दक्षता परीक्षण, मिलर का कला-निर्णय परीक्षण, जटिल-समन्वय परीक्षण, ओंकनूर अंगुलि-दक्षता परीक्षण तथा मैकवरी का मानसिक योग्यता परीक्षण।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा मनोवैज्ञानिक प्रयोग में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा मनोवैज्ञानिक प्रयोग दो भिन्न प्रक्रियाएँ हैं जिनमें कुछ समानताएँ भी हैं। ये दोनों ही प्रक्रियाएँ अधिक-से-अधिक वस्तुनिष्ठ होने का प्रयास करती हैं। दोनों में ही मानव-व्यवहार की व्याख्या के लिए कुछ उद्दीपक प्रस्तुत किये जाते हैं, जिनके प्रति प्राणी की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इन समानताओं के होने के साथ-साथ इन दोनों में कुछ स्पष्ट अन्तर भी हैं। प्रथम अन्तर उद्देश्य से सम्बन्धित है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य है व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, गुणों की मात्रा एवं स्वरूप का मूल्यांकन करना। इससे भिन्न, मनोवैज्ञानिक प्रयोग का मुख्य उद्देश्य प्राणी की मानसिक क्रियाओं, उनके सिद्धान्तों तथा नियमों का अध्ययन करना है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य व्यावहारिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रयोग का उद्देश्य सैद्धान्तिक होता है।

प्रश्न 2.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा सामान्य परीक्षाओं में क्या अन्तर है?
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा शिक्षण-संस्थाओं द्वारा संचालित सामान्य परीक्षाओं में स्पष्ट अन्तर है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य व्यक्ति की अभिवृत्तियों, क्षमताओं, रुचियों तथा व्यक्तित्व के लक्षणों को मापना है। इससे भिन्न शैक्षणिक परीक्षाओं का उद्देश्य किसी विशेष परिस्थिति में सिखाये गये ज्ञान या कौशल का मापना है। मनोवैज्ञानिक के पद पाठ्य-विषयों अर्थात् पाठ्यक्रम “पद” (Items) सामान्य जीवन से जुड़े होते हैं। इससे भिन्न शैक्षणिक परीक्षाओं के पद पाठ्य-विषयों अर्थात् पाठ्यक्रम पर आधारित होते हैं। इस प्रकार मनोवैज्ञानिक परीक्षण का क्षेत्र अनिश्चित, किन्तु व्यापक होता है तथा शैक्षिक परीक्षा का क्षेत्र अपेक्षाकृत निश्चित तथा सीमित होता है।

प्रश्न 3.
सर्मस के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का एक वर्गीकरण उनमें लगने वाले समय के आधार पर भी किया गा है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक परीक्षण के दो मुख्य प्रकारों का उल्लेख किया गया है। ये प्रकार निम्नलिखित हैं

  1. गति परीक्षण (Speed Test)- गति परीक्षण व्यक्ति के कार्य की गति का मापन करते हैं; उदाहरण के लिए टाइप-टेस्ट।
  2. शक्ति परीक्षण (Power Test)-जिन परीक्षणों में बिना समय के प्रतिबन्ध के किसी भी क्षेत्र में ‘विषय’ की शक्ति का मापन किया जाता है, उन्हें शक्ति परीक्षण कहते हैं। ऐसे परीक्षणों में समस्याओं/प्रश्नों को कठिनाई के क्रम में रखकर हल करने के लिए देते हैं।

प्रश्न 4.
अशाब्दिक परीक्षण किसे कहते हैं?
या
निष्पादन बुद्धि-परीक्षण से आप क्या समझते हैं? (2017)
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के प्रकार की अशाब्दिक परीक्षण कहा जाता है। इन परीक्षणों को क्रियात्मक परीक्षण अथवा निष्पादन परीक्षण को भी कहा जाता है। इन परीक्षणों में शब्दों या भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता, अपितु इनके अन्तर्गत क्रियाओं पर बल दिया जाता है तथा परीक्षार्थियों द्वारा कुछ विशिष्ट प्रकार की क्रियाएँ करायी जाती हैं। सामान्य रूप से किन्हीं विशेष भाषाओं को न समझ सकने वाले अथवा निरक्षण करने व्यक्तियों की योग्यताओं की मापन के लिए अशाब्दिक परीक्षणों को ही अपनाया जाता है।

प्रश्न 5.
परीक्षण की वैधता (Validity) को परिभाषित कीजिए।   (2010)
उत्तर.
वैधता या प्रामाणिकता किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण की एक आवश्यक शर्त एवं विशेषता है। यदि कोई परीक्षण उस योग्यता अथवा विशेषताओं का यथार्थ मापन करें, जिन्हें मापन के लिए उसे बनाया गया है, तो वह परीक्षण वैध (Valid) माना जायेगा। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कोई परीक्षण बुद्धि मापन के लिए अर्जित किया गया है और प्रयोग करने पर वह बुद्धि का ही मापन करता है तो उसे वैध या प्रामाणिक परीक्षण कहा जायेगा और उसका यह गुण वैधता या प्रामाणिकता कहलाएगा।

प्रश्न 6.
बुद्धि-परीक्षणों की विश्वसनीयता से क्या आशय है?
उत्तर.
यदि बुद्धि-परीक्षण किसी व्यक्ति-विशेष की बुद्धि का एकरूपता से मापन करता है तो उसे विश्वसनीय (Reliable) कहा जाएगा। अनास्टेसी का कथन है कि, “विश्वसनीयता से तात्पर्य स्थायित्व अथवा स्थिरता से है।” उदाहरण के लिए मान लीजिए, ‘स्टैनफोर्ड-बिने बुद्धि-परीक्षण द्वारा एक बालक ‘रोहित’ की बुद्धि का मापन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी बुद्धि-लब्धि 108 आती है। कुछ समय के पश्चात् साधारण परिस्थितियों में स्टैनफोर्ड-बिने बुद्धि-परीक्षण’ द्वारा रोहित की बुद्धि का पुनः मापन किया गया, जिसका परिणाम वही बुद्धि-लब्धि 108 निकला।

तीन-चार-पाँच बार जब परीक्षण द्वारा रोहित की बुद्धि मापी गयी तो भी उसकी बुद्धि-लब्धि 108 ही प्राप्त हुई। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि स्टैनफोर्ड-बिने बुद्धि-परीक्षण पूर्ण रूप से विश्वसनीय बुद्धि-परीक्षण है। एक विश्वसनीय बुद्धि-परीक्षण में वस्तुनिष्ठता तथा व्यापकता का गुण अनिवार्य रूप से होना चाहिए। एक बुद्धि-परीक्षण उस समय वस्तुनिष्ठ कहा जाएगा जब वह परीक्षण के व्यक्तिगत विचारों से प्रभावित न हो और उसकी व्यापकता से अभिप्राय है कि वह बुद्धि के सभी पक्षों का मूल्यांकन करेगा। एक बुद्धि-परीक्षण में विश्वसनीयता का गुण उसे प्रामाणिक बनाने में सहायता देता है।

प्रश्न 7.
सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों के मुख्य उदाहरण लिखिए।
उत्तर. सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों के मुख्य उदाहरण निम्नलिखित हैं

(1) प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका में सेना में नियुक्ति के लिए बनाया गया ‘आर्मी ऐल्फा परीक्षण, शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण का पहला उदाहरण था।

(2) इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध के समय युद्ध तथा नौ-सेना विभागों की ओर से सेना के वर्गीकरण हेतु मनोवैज्ञानिकों ने जिन दो परीक्षणों का निर्माण किया, वे सामूहिक शाब्दिक परीक्षण ही थे। ये थे –

  1. नौ-सेना सामान्य वर्गीकरण-परीक्षण तथा
  2. सैन्य सामान्य वर्गीकरण परीक्षण।

(3) वाक्यपूर्ति, अंकगणित तर्क, शब्द भण्डार तथा आदेश–इन परीक्षणों से सम्बन्धित D.A.V.D. नामक एक समूह परीक्षण थॉर्नडाइक तथा सहयोगियों द्वारा कोलम्बिया विश्वविद्यालय में तैयार किया गया था।’

(4) इसी प्रकार सूचना, पर्याय, तार्किक, चयन, वर्गीकरण, सादृश्य, विलोम तथा सर्वोत्कृष्ट उत्तर-इन परीक्षण-पदों से सम्बन्धित ‘टरमन मैक-नीमर परीक्षण ‘ (Terman MC Nemar Test) भी एक विख्यात परीक्षण रहा है।

(5) हमारे देश भारत में भी कुछ सामूहिक शाब्दिक बुद्धि परीक्षण बनाये गये जिनमें जलोटा बुद्धि-परीक्षण तथा ‘मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद’ द्वारा निर्मित बुद्धि परीक्षाएँ-B.P.T.- 8, B.P.T.- 7 तथा B.P.T.-13 क्रमशः 14, 13 व 12 वर्ष के बच्चों को बुद्धि परीक्षण करती हैं। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी इस दिशा में सफल प्रयास किये गये हैं।

प्रश्न 8.
सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों की मुख्य कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के सम्बन्ध में निम्नलिखित मुख्य कठिनाइयाँ दृष्टिगोचर होती हैं –

  1. सामूहिक शाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों में यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है कि परीक्षार्थी परीक्षण के संचालन/प्रशासन में पूर्ण सहयोग प्रदान कर रहा है अथवा नहीं।
  2. यह ज्ञात करना भी कठिन है कि परीक्षार्थी द्वारा लिखित उत्तर उसकी स्वयं की बुद्धि की उपज हैं या उसने किसी निकटस्थ व्यक्ति की नकल कर ली है।
  3. इन परीक्षणों व परीक्षार्थियों के शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक सन्तुलन की दशा को नहीं पहचाना जा सकता।
  4. यह जानना भी दूभर है कि परीक्षार्थी को परीक्षा देते समय कठिनाई अनुभव हो रही है या सुविधा।

प्रश्न 9.
सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
सामूहिक अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों की कुछ विशेष बातों को इस प्रकार उल्लेख किया जा सकता है –

  1. इन बुद्धि-परीक्षणों की सहायता से अनपढ़ या अन्य-भाषा-भाषी व्यक्तियों की बुद्धि का भी मापन सम्भव है।
  2. अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों द्वारा विभिन्न भाषाओं तथा संस्कृतियों से सम्बन्धित कई प्रकार के समूहों के बौद्धिक-स्तर की तुलना की जा सकती है।
  3. क्योंकि बालकों को परीक्षण की भाषा का उचित ज्ञान नहीं होता; अत: उनकी बुद्धि की परीक्षा के लिए शाब्दिक परीक्षण की अपेक्षा अशाब्दिक परीक्षण ही उपयुक्त समझा जाता है।
  4. जो बालक रोगग्रस्त या मानसिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं उनके लिए अशाब्दिक परीक्षण ही ठीक रहता है।
  5. इन परीक्षणों के माध्यम से निरक्षर लोगों में अपेक्षित बुद्धि का ज्ञान होने से उन्हें व्यवसाय-विशेष के लिए छाँटने में सुविधा रहती है।

प्रश्न 10.
अभिरुचि परीक्षणों की मुख्य उपयोगिता क्या है?
उत्तर.
अभिरुचि परीक्षण अपने आप में विशेष उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण होते हैं। इन परीक्षणों की सर्वाधिक उपयोगिता व्यक्ति द्वारा व्यवसाय के चुनाव के सन्दर्भ में होती है। अभिरुचि के अनुकूल व्यवसाय के चुनाव से व्यक्ति व्यावसायिक क्षेत्र में एवं व्यक्तिगत जीवन में सन्तुष्ट रहता है तथा प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है। अभिरुचि के अनुकूल व्यवसाय के वरण के लिए अभिरुचि परीक्षण विशेष रूप से सहायक सिद्ध होते हैं। अभिरुचि परीक्षण के आधार पर व्यक्ति के व्यवसाय के निर्धारण एवं नियुक्ति से जहाँ एक ओर व्यक्ति लाभान्वित होता है, वहीं दूसरी ओर सम्बन्धित संस्थान अथवा कार्यालय भी लाभान्वित होता है, क्योंकि अभिरुचि के अनुकूल कार्य मिल जाने पर व्यक्ति अधिक कुशलता एवं क्षमता से कार्य करता है तथा उत्पादन की दर एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि अभिरुचि परीक्षणों से व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र सभी लाभान्वित होते हैं।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –
1. व्यक्तिगत योग्यताओं एवं क्षमताओं के शुद्ध मापन की प्रविधि को ……… कहा जाता है।
2. किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए उसकी वैधता एवं ………. का होना अनिवार्य विशेषताएँ है।
3. क्रॉनबैक के अनुसार मनोवैज्ञानिक ………… दो या अधिक व्यक्तियों के व्यवहार के तुलनात्मक अध्ययन की व्यवस्थित प्रक्रिया है।
4. किसी व्यक्ति पर कोई परीक्षण बार-बार प्रशासित करने पर पायी जाने वाली प्राप्तांकों की लगभग समानता से परीक्षण की …….. का पता चलता है।  (2011)
5. गुलिकसन के अनुसार, किसी कसौटी के साथ परीक्षण का सह-सम्बन्ध उसकी ……….. कहलाता है।
6. विभिन्न आकृतियों एवं चित्रों के माध्यम से व्यक्ति की योग्यता का मापन करने वाले परीक्षण को ……….. कहते हैं ।
7. भाषा के माध्यम से अथवा लिखित रूप से आयोजित किये जाने वाले परीक्षणों को ………….. कहते हैं।
8. विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति की योग्यता का मापन करने वाले परीक्षण को …………. कहते हैं।
9. एक समय में केवल एक ही व्यक्ति की योग्यताओं एवं क्षमताओं का मापन करने वाला परीक्षण ………. कहलाता है।
10. एक ही समय में व्यक्तियों के एक समूह की योग्यताओं एवं क्षमताओं का मापन करने वाला परीक्षण ………… कहलाता है। (2018)
11. टरमन के अनुसार “……” चिन्तन की योग्यता ही बुद्धि है।” (2017)
12. व्यक्तिगत परीक्षणों से प्राप्त निष्कर्ष ……….. होते हैं।
13. शाब्दिक व्यक्ति बुद्धि-परीक्षण का मुख्य उदाहरण ………… है।
14. स्टैनफोर्ड-बिने-साइमन स्केल एक …………… बुद्धि-परीक्षण है।
15. आर्मी ऐल्फा परीक्षण एक ……….. बुद्धि-परीक्षण है।
16. पोर्टियस का व्यूह-परीक्षण एक ……….. बुद्धि-परीक्षण है।
17. भाटिया की निष्पादन परीक्षण माला मूल रूप से । …….. बुद्धि-परीक्षण है। (2009)
18. भाटिया निष्पादन बुद्धि-परीक्षण माला (बैटरी) के निर्माता को पूरा नाम ………. है।
19. भाटिया निष्पादन बुद्धि-परीक्षण में उप परीक्षणों की संख्या ……….. है। (2013)
20. मानसिक आयु तथा वास्तविक आयु के बीच के अनुपात को ……….. कहते हैं।
21. बुद्धि-लब्धि की गणना का सूत्र ……. है। (2008)
22. गैरेट के अनुसार 140 से अधिक बुद्धि-लब्धि वाले व्यक्ति को ……… कहा जाता है।
23. प्रतिभाशाली बालकों की बुद्धि-लब्धि ……… या अधिक होती है। (2017)
24. यदि बालक की मानसिक आयु शारीरिक आयु से अधिक होगी तो बालक की बुद्धि-लब्धि ……… से अधिक होगी। (2018)
25.गैरेट के अनुसार 70 से कम बुद्धि-लब्धि वाले व्यक्ति को ……… माना गया है।
26. स्वतन्त्र साहचर्य तथा स्वप्न-विश्लेषण का व्यक्तित्व मापन की ………………. विधि से सम्बन्ध है।
27. रोर्णा स्याही-धब्बा परीक्षण एक ………… परीक्षण है। (2010, 15)
28. रोर्णा स्याही-धब्बा परीक्षण व्यक्तित्व मापन की एक ……….. है।
29. अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी परीक्षण ……….. का परीक्षण करता है। (2008)
30. टी०ए०टी० (TATC) का निर्माण …………. ने किया है। (2009)
31. प्रसंगात्मक बोध परीक्षण (टी०ए०टी०) ……………. का परीक्षण है। (2014)
32. प्रक्षेपण विधियाँ …………. मापन हेतु प्रयुक्त की जाती हैं। (2013)
33. शब्द साहचर्य परीक्षण एक ……….. व्यक्तित्व परीक्षण है। (2012)
34. व्यावसायिक वरण एवं चुनाव में …………… परीक्षण सहायक होता है।

उत्तर -1. मनोवैज्ञानिक परीक्षण, 2. विश्वसनीयता, 3. परीक्षण, 4 विश्वसनीयता, 5, वैधता, 6. अशाब्दिक परीक्षण, 7. शाब्दिक परीक्षण, 8. क्रियात्मक परीक्षण, 9. व्यक्तिगत या वैयक्तिक परीक्षण, 10. सामूहिक परीक्षण, 11. अमूर्त, 12. अधिक विश्वसनीय, 13. बिने-साइमन बुद्धि-परीक्षण, 14. व्यक्तिगत शाब्दिक, 15. सामूहिक शाब्दिक, 16. व्यक्तिगत अशाब्दिक, 17. व्यक्तिगत अशाब्दिक, 18. डॉ० चन्द्र मोहन भाटिया, 19. 5, 20, बुद्धि-लब्धि, 21 imageee.22.अत्यन्त श्रेष्ठ, 23. 120. 24 100. 25. दुर्बल बुद्धि, 26. मनोविश्लेषण, 27. व्यक्तित्व, 28. प्रक्षेपण विधि, 29. व्यक्तित्व, 30. मॉर्गन तथा मरे, 31. व्यक्तित्व, 32. व्यक्तित्व, 33. प्रक्षेपण, 34. अभिरुचि,

प्रश्न II
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –
प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का सामान्य अर्थ क्या है?
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण से आशय उन विधियों तथा साधनों से है जिन्हें मनोवैज्ञानिकों द्वारा मानव-व्यवहार के अध्ययन हेतु खोजा गया है।

प्रश्न 2.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण की कोई सुस्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर.
फ्रीमैन के अनुसार, “मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक मानकीकृत यन्त्र है जो इस प्रकार बनाया गया है कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व के एक या एक से अधिक अंगों का वस्तुपरक रूप से मापन कर सकें।”

प्रश्न 3.
एक अच्छे मनोवैज्ञानिक परीक्षण की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। यो मनोवैज्ञानिक परीक्षण के कोई दो आवश्यक गुण बताइए।
(2008)
उत्तर.

  1. विश्वसनीयता,
  2. वैधता या प्रामाणिकता,
  3. वस्तुनिष्ठता तथा
  4. व्यावहारिकता ।

प्रश्न 4.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा मनोवैज्ञानिक प्रयोग में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य है-व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की मात्रा तथा उनके स्वरूप को मूल्यांकन करना। इससे भिन्न मनोवैज्ञानिक प्रयोग का मुख्य उद्देश्य प्राणी की मानसिक क्रियाओं, उनके सिद्धान्तों तथा नियमों का अध्ययन करना है।

प्रश्न 5.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा शिक्षण संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षा में क्या अन्तर है?
उत्तर.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य व्यक्ति की अभिवृत्तियों, क्षमताओं, रुचियों तथा व्यक्तित्व के लक्षणों को मापना है, जबकि शिक्षण संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षा का उद्देश्य किसी विशेष परिस्थिति में सिखाये गये ज्ञान या कौशल को मापना है।

प्रश्न 6.
उद्देश्य के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से निर्धारित किये
उत्तर.

  1. बुद्धि-परीक्षण,
  2. मानसिक योग्यता परीक्षण,
  3. रुचि परीक्षण,
  4. अभिरुचि परीक्षण तथा
  5. व्यक्तित्व परीक्षण।

प्रश्न 7.
माध्यम के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से है?
उत्तर.

  1. शाब्दिक परीक्षण,
  2. अशाब्दिक परीक्षण तथा
  3. क्रियात्मक परीक्षण।

प्रश्न 8.
बुद्धि-परीक्षण से क्या आशय है?
उत्तर.
बुद्धि-परीक्षण वे मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं जो मानव-व्यक्तित्व के सर्वप्रमुख तत्त्व एवं उसकी प्रधान मानसिक योग्यता ‘बुद्धि’ का अध्ययन तथा मापन करते हैं।

प्रश्न 9.
बुद्धि-परीक्षण के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
बुद्धि-परीक्षण के मुख्य प्रकार हैं-शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण तथा अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण ।

प्रश्न 10.
व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के मुख्य स्वरूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण के मुख्य स्वरूप हैं – बिने-साइमन-स्केल, स्टैनफोर्ड-बिने-साइमन स्केल तथा संशोधित स्टैनफोर्ड-बिने-स्केल।

प्रश्न 11.
मुख्य व्यक्तिगत अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

  1. पोर्टियस का व्यूह-परीक्षण,
  2. पिण्टनर-पैटर्सन क्रियात्मक परीक्षण मान,
  3. मैरिल-पामर गुटका निर्माण परीक्षण,
  4. सेग्युईन आकार-पटल परीक्षण तथा
  5. भाटिया की निष्पादन परीक्षण माला।

प्रश्न 12.
सामूहिक बुद्धि-परीक्षणों के नाम लिखिए।
उत्तर.
मुख्य सामूहिक बुद्धि-परीक्षण है — आर्मी-ऐल्फा’ परीक्षण, आर्मी बीटा परीक्षण तथा नौसेना और सेना सामान्य वर्गीकरण परीक्षण।

प्रश्न 13.
बुद्धि-लब्धि ज्ञात करने का सूत्र क्या है? (2013)
उत्तर.
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) 15

प्रश्न 14.
भाटिया की निष्पादन परीक्षण माला में कौन-कौन से परीक्षण सम्मिलित हैं?
उत्तर.

  1. कोह को ब्लॉक डिजाइन परीक्षण,
  2. अलेक्जेन्डर का पास-एलॉग परीक्षण,
  3. पैटर्न ड्राइंग परीक्षण,
  4. तात्कालिक स्मृति परीक्षण तथा
  5. चित्रपूर्ति परीक्षण।

प्रश्न 15.
अल्फ्रेड बिने ने किस क्षेत्र में अग्रणी कार्य किया?
उत्तर.
अल्फ्रेड बिने ने बुद्धि-परीक्षण के क्षेत्र में अग्रणी कार्य किया।

प्रश्न 16.
व्यक्तित्व-मापन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ कौन-कौन सी हैं? या व्यक्तित्व मापन के दो प्रक्षेपी परीक्षण लिखिए। (2011)
उत्तर.
व्यक्तित्व-मापन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ हैं –

  1. वैयक्तिक विधियाँ,
  2. वस्तुनिष्ठ विधियाँ,
  3. मनोविश्लेषण विधियाँ तथा
  4. प्रक्षेपण विधियाँ।

प्रश्न 17.
व्यक्तिगत-मापन की मुख्य वैयक्तिक विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर.
व्यक्तित्व-मापन की मुख्य वैयक्तिक विधियाँ हैं —

  1. प्रश्नावली विधि,
  2. व्यक्ति इतिहास विधि,
  3. भेंट या साक्षात्कार विधि तथा
  4. आत्म-चरित्र लेखन विधि।।

प्रश्न 18.
व्यक्तित्व-परीक्षण की मुख्य प्रक्षेपण विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर.
व्यक्तित्व-परीक्षण की मुख्य प्रक्षेपण विधियाँ हैं —

  1. कथा-प्रसंग परीक्षण,
  2. बाल सम्प्रत्यक्षण परीक्षण,
  3. रोर्णा स्याही धब्बा परीक्षण तथा
  4. वाक्य-पूर्ति या कहानी-पूर्ति परीक्षण।

प्रश्न 19.
कुछ मुख्यरुचि-परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

  1. स्ट्राँग का व्यावसायिक रुचि-पत्र,
  2. क्यूडर का व्यावसायिक पसन्द लेखा तथा
  3. मनोविज्ञानशाला का व्यावसायिक रुचि-मापी।

प्रश्न 20.
मुख्य अभिरुचि परीक्षण कौन-कौन से हैं?
उत्तर.
मुख्य अभिरुचि परीक्षण हैं –

  1. कैलिफोर्निया मानसिक परिपक्वता परीक्षण,
  2. गिलफोर्ड-जिमरमैन अभिरुचि परीक्षण,
  3. मिनेसोटा यान्त्रिक-संग्रह अभिरुचि परीक्षण तथा
  4. मिनेसोटा लिपिक अभिरुचि परीक्षण।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
किसी व्यक्ति की योग्यता एवं प्रतिभा को जानने का मनोवैज्ञानिक उपाय है –
(क) उसकी डिग्रियों का विश्लेषण
(ख) उसका मनोवैज्ञानिक परीक्षण
(ग) उसके व्यवहार का विश्लेषण
(घ) इन उपायों में से कोई नहीं
उतर.
(ख) उसका मनोवैज्ञानिक परीक्षण,

प्रश्न 2.
व्यक्ति की विभिन्न योग्यताओं की माप की प्रविधि को कहते हैं (2007)
(क) व्यवस्थित अध्ययन ।
(ख) मनोवैज्ञानिक निर्देशन
(ग) मनोवैज्ञानिक परीक्षण
(घ) वैज्ञानिक मापन
उतर.
(ग) मनोवैज्ञानिक परीक्षण

प्रश्न 3.
“एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण उद्दीपकों का एक प्रतिमान है जिन्हें ऐसी अनुक्रियाओं को उत्पन्न करने के लिए चुना और संगठित किया जाता है जो कि परीक्षण देने वाले व्यक्ति की कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को व्यक्त करेंगे।” – यह परिभाषा किसके द्वारा प्रतिपादित है?
(क) फ्रीमैन
(ख) क्रॉनबेक
(ग) मरसेल
(घ) इनमें से कोई नहीं
उतर.
(ग) मरसेल

प्रश्न 4.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा मनोवैज्ञानिक प्रयोग में अन्तर है
(क) मनोवैज्ञानिक परीक्षण विद्वानों द्वारा किये जाते हैं तथा मनोवैज्ञानिक प्रयोग छात्रों द्वारा।
(ख) मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उद्देश्य व्यावहारिक होता है, जबकि मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का उद्देश्य सैद्धान्तिक होता है।
(ग) मनोवैज्ञानिक प्रयोग सिद्धान्तों पर आधारित होते हैं, जबकि मनोवैज्ञानिक प्रयोग अनुमान पर आधारित होते हैं।
(घ) दोनों में कोई अन्तर नहीं है।
उतर.
(ख) मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उद्देश्य व्यावहारिक होता है, जबकि मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का उद्देश्य सैद्धान्तिक सेता है

प्रश्न 5.
प्रथम बुद्धि-परीक्षण का निर्माण किया|
(क) वैशलर ने
(ख) फ्रॉयड ने
(ग) बिने ने
(घ) भाटिया ने
उतर.
(ग) बिने ने,

प्रश्न 6.
व्यक्ति की बुद्धि सम्बन्धी योग्यता को जानने के लिए किये जाने वाले परीक्षण को कहते हैं |
(क) बौद्धिक परीक्षण
(ख) बुद्धि-लब्धि परीक्षण
(ग) अभिरुचि परीक्षण
(घ) शाब्दिक परीक्षण
उतर.
(क) बौद्धिक परीक्षण

प्रश्न 7.
किसी विशेष भाषा को न समझ सकने वाले अथवा निरक्षर व्यक्तियों की योग्यता के मापन के लिए किस प्रकार के परीक्षण होते हैं?
(क) शाब्दिक परीक्षण
(ख) अशाब्दिक अथवा क्रियात्मक परीक्षण
(ग) व्यक्तिगत परीक्षण
(घ) ये सभी
उतर.
(ख) अशाब्दिक अथवा क्रियात्मक | परीक्षण

प्रश्न 8.
जिन बुद्धि-परीक्षणों में लकड़ी के गुटकों आदि पर आधारित पदों को करने में हाथों से बर्ताव (क्रिया) करना होता है, उसे कहते हैं
(क) व्यक्तिगत बुद्धि-परीक्षण
(ख) निष्पादन बुद्धि-परीक्षण
(ग) शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण
(घ) मिश्रित बुद्धि-परीक्षण
उतर.
(ख) निष्पादन बुद्धि-परीक्षण

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में कौन सामूहिक परीक्षण है? (2012)
(क) भाटिया बैटरी
(ख) बिने बुद्धि-परीक्षण
(ग) बी०पी०टी०-13
(घ) रोर्शा टेस्ट
उतर.
(ग) बी०पी०टी०-13

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-सा बुद्धि-परीक्षण है ?
(क) चित्र कथानक परीक्षण (टी० ए० टी०)
(ख) हाईस्कूल पर्सनैलिटी क्वेश्चेनेयर (एच० एस० पी० क्यू०)
(ग) भाटिया निष्पादन परीक्षण-माला ।
(घ) रोर्शा टेस्ट
उतर.
(ग) भाटिया निष्पादन परीक्षण माला

प्रश्न 11.
उत्तम मनोवैज्ञानिक परीक्षण की विशेषताएँ हैं
(क) व्यापकता
(ख) विश्वसनीयता तथा वैधता
(ग) वस्तुनिष्ठता
(घ) ये सभी विशेषताएँ
उतर.
(घ) ये सभी विशेषताएँ

प्रश्न 12.
भाटिया बुद्धि निष्पादन परीक्षण माला है (2009)
(क) शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण
(ख) सामूहिक बुद्धि-परीक्षण
(ग) अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण
(घ) वैयक्तिक बुद्धि-परीक्षण
उतर.
(ग) अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षण,

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन-सा शाब्दिक परीक्षण है? (2017)
(क) रेवेन्स प्रोग्रेसिव मैट्रिसेज
(ख) बी०पी०टी०-12
(ग) पिण्टनर-पैटर्सन परीक्षण
(घ) अलैक्जेण्डर पास-एलांग परीक्षण
उतर.
(ख) बी०पी०टी०-12

प्रश्न 14.
अलेक्जेण्डर पास-एलांग परीक्षण है-    (2015)
(क) शाब्दिक व्यक्तिगत परीक्षण
(ख) अशाब्दिक व्यक्तिगत परीक्षण
(ग) शाब्दिक सामूहिक परीक्षण
(घ) अशाब्दिक सामूहिक परीक्षण
उतर.
(ख) अशाब्दिक व्यक्तिगत परीक्षण

प्रश्न 15.
आर्मी ऐल्फा तथा बीटा परीक्षण किस श्रेणी के मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं?
(क) क्रियात्मक बुद्धि-परीक्षण
(ख) शाब्दिक व्यक्ति बुद्धि-परीक्षण
(ग) शाब्दिक समूह-बुद्धि-परीक्षण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उतर.
(ग) शाब्दिक समूह बुद्धि-परीक्षण,

प्रश्न 16.
पिण्टनर तथा पैटर्सन नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा तैयार किया गया परीक्षण किस श्रेणी का परीक्षण है?
(क) क्रियात्मक व्यक्ति बुद्धि-परीक्षण
(ख) क्रियात्मक समूह बुद्धि-परीक्षण
(ग) शाब्दिक बुद्धि-परीक्षण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उतर.
(क) क्रियात्मक व्यक्ति बुद्धि परीक्षण

प्रश्न 17.
बुद्धि-लब्धि की अवधारणा के विषय में सत्य है
(क) यह व्यक्ति की बुद्धि की मात्रा नहीं है।
(ख) यह बुद्धि की एक ऐसी क्षमता है जो समय-समय पर परिवर्तित हो सकती है।
(ग) यह मानसिक आयु तथा वास्तविक आयु के बीच अनुपात है।
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्य सत्य हैं।
उतर.
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्य सत्य हैं

प्रश्न 18.
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) 16a
(क) निष्पादन लब्धि
(ख) सृजनात्मक लब्धि
(ग) बुद्धि-लब्धि
(घ) शिक्षा लब्धि
उतर.
(ग) बुद्धि-लब्धि

प्रश्न 19.
बुद्धि-लब्धि ज्ञात करने का सूत्र है|    (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 8 Psychological Tests (मनोवैज्ञानिक परीक्षण) 17
उतर.
(क) मानसिक आयु

प्रश्न 20.
यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक आयु 20 वर्ष है तथा उसकी मानसिक आयु 30 वर्ष हो तो उसकी बुद्धि-लब्धि क्या होगी?
(क) 150
(ख) 100
(ग) 200
(घ) 125
उतर.
(क) 150

प्रश्न 21.
बिने-साइमन परीक्षण द्वारा मापन किया जाता है
(क) बुद्धि-लब्धि का
(ख) व्यक्तित्व का
(ग) अभिरुचि का
(घ) रुचि का
उतर.
(क) बुद्धि-लब्धि का

प्रश्न 22.
भारत में सर्वप्रथम 1922 में ‘हिन्दुस्तानी बिने परफॉर्मेंस प्वाइंट स्केल को विकसित किया गया (2016)
(क) यू०एन० पारीख द्वारा
(ख) एम० सी० जोशी द्वारा
(ग) एच० सी० राईस द्वारा
(घ) सी० एम० भाटिया द्वारा
उतर.
(ग) एच० सी० राईस द्वारा, वास्तविक आयु

प्रश्न 23.
यदि एक हाईस्कूल के विद्यार्थी की बुद्धि-लब्धि 100 है, तो उसका बौद्धिक स्तर होगा
(क) उच्च
(ख) सामान्य
(ग) निम्न
(घ) मन्द बुद्धि
उतर.
(ख) सामान्य

प्रश्न 24.
मेरिल के अनुसार 142 बुद्धि-लब्धि वाला बालक किस श्रेणी में आता है? (2013)
(क) औसत
(ख) प्रतिभाशाली
(ग) बॉर्डर लाईन
(घ) उत्तम
उतर.
(ख) प्रतिभाशाली,

प्रश्न 25.
व्यक्तित्व परीक्षण के लिए मनोविश्लेषणात्मक विधि का प्रतिपादन किया था
(क) सिग्मण्ड फ्रॉयड ने
(ख) हरमन रोर्शा ने
(ग) एडलर ने
(घ) मन ने
उतर.
(क) सिग्मण्ड फ्रॉयड ने

प्रश्न 26.
व्यक्तित्व-मापन की उस विधि को क्या कहते हैं, जिसके अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति के पत्रों, डायरियों तथा व्यक्तिगत प्रलेखों का विश्लेषण किया जाता है तथा उसके विषय में उसके मित्रों एवं रिश्तेदारों से बातचीत की जाती है?
(क) परिस्थिति परीक्षण विधि
(ख) मनोविश्लेषणात्मक विधि
(ग) प्रश्नावली विधि
(घ) जीवन-वृत्त विधि
उतर.
(घ) जीवन-वृत्त विधि

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में कौन-सा व्यक्तित्व परीक्षण है?(2013)
(क) क्यूडर का प्राथमिकता प्रपत्र
(ख) कैटिल का संस्कृति युक्त परीक्षण
(ग) बेलक का बालके बोध परीक्षण
(घ) पिण्टनर-पैटर्सन निष्पादन परीक्षण
उतर.
(घ) पिण्टनर’पैटर्सन निष्पादन परीक्षण

प्रश्न 28.
निम्नलिखित में से किसका मापन प्रक्षेपण विधियों द्वारा होता है? (2011)
(क) रुचि
(ख) बुद्धि
(ग) व्यक्तित्व
(घ) अभिक्षमता
उतर.
(ग) व्यक्तित्व

प्रश्न 29.
चित्र कथानक परीक्षण (TAT) व्यक्तित्व मापन की कैसी विधि है?
(क) प्रक्षेपण विधि
(ख) निरीक्षण विधि
(ग) वाक्यपूर्ति विधि
(घ) प्रश्नावली विधि
उतर.
(क) प्रक्षेपण विधि

प्रश्न 30.
निम्नलिखित में कौन चित्र कथानक सम्बन्धी परीक्षण है? (2018)
(क) स्याही धब्बा परीक्षण
(ख) एम०एम०पी०आई०
(ग) प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण
(घ) वाक्य पूर्ति परीक्षण
उतर.
(ग) प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण

प्रश्न 31.
रोर्णा स्याही धब्बा परीक्षण में काड की संख्या होती है। (2008)
(क) 10
(ख) 8
(ग) 5
(घ) 12
उतर.
(क) 10

प्रश्न 32.
‘रोर्णा स्याही धब्बा परीक्षण है – (2008)
(क) बुद्धि-परीक्षण
(ख) उपलब्धि परीक्षण
(ग) रुचि परीक्षण
(घ) व्यक्तित्व परीक्षण
उतर.
(घ) व्यक्तित्व परीक्षण

प्रश्न 33.
“रुचि वह प्रवृति है जिसमें हम किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की ओर ध्यान देते हैं, उससे आकर्षिल होते हैं या सन्तुष्टि प्राप्त करते हैं।” यह कथन है – (2013)
(क) जे०पी० गिलफोर्ड का
(ख) इ०के०स्ट्राँग का
(ग) क्यूडर का
(घ) एच० जीस्ट का
उतर.
(क) जे०पी० गिलफोर्ड का

प्रश्न 34.
निम्नलिखित में से कौन रुचि-परीक्षण है? (2012)
(क) अलेक्जेण्डर पास-एलांग परीक्षण,
(ख) क्यूडर प्राथमिकता प्रपत्र
(ग) रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण
(घ) मिनेसोटा असेम्बली परीक्षण
उतर.
(ख) क्यूडर प्राथमिकता प्रपत्र

प्रश्न 35.
एक समय में एक ही व्यक्ति को दिया जाने वाला बुद्धि-परीक्षण कहलाता है- (2008)
(क) सामूहिक बुद्धि-परीक्षण
(ख) वैयक्ति बुद्धि-परीक्षण
(ग) क्रियात्मक बुद्धि-परीक्षण
(घ) सामाजिक बुद्धि-परीक्षण
उतर.
(ख) वैयक्तिक बुद्धि-परीक्षण

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 20 Industrialization and Urbanization: Effects on Indian Society

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 20 Industrialization and Urbanization: Effects on Indian Society (औद्योगीकरण तथा नगरीकरण : भारतीय समाज पर प्रभाव) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 20 Industrialization and Urbanization: Effects on Indian Society (औद्योगीकरण तथा नगरीकरण : भारतीय समाज पर प्रभाव).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 20
Chapter Name Industrialization and Urbanization: Effects on Indian Society (औद्योगीकरण तथा नगरीकरण : भारतीय समाज पर प्रभाव)
Number of Questions Solved 35
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 20 Industrialization and Urbanization: Effects on Indian Society (औद्योगीकरण तथा नगरीकरण : भारतीय समाज पर प्रभाव)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं ? औद्योगीकरण की परिभाषा दीजिए तथा औद्योगीकरण की विशेषताएँ भी बताइए।
या
औद्योगीकरण किसे कहते हैं ? औद्योगीकरण के सामाजिक प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2007, 09, 10]
या
भारत में औद्योगीकरण के सामाजिक और आर्थिक परिणामों का वर्णन कीजिए। [2010]
या
भारत में औद्योगीकरण के परिणामों की विवेचना कीजिए। [2015, 16]
या
औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं ? औद्योगीकरण के भारतीय समाज पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए। [2007, 11, 12, 13, 15, 16]
या
औद्योगीकरण किस प्रकार भारत की निर्धनता को दूर कर सकता है ? मत दीजिए। उद्योग समुदाय को निर्मित करता है।” विवेचना कीजिए। [2010]
या
भारतीय समाज पर औद्योगीकरण के कुप्रभावों की विवेचना कीजिए। [2012]
या
औद्योगीकरण क्या है? स्पष्ट कीजिए। [2014]
उत्तर:
औद्योगीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

धन कमाना मनुष्य की एक प्रमुख क्रिया है। आजीविका जुटाने के लिए प्रकृति के साथ सतत संघर्ष करना ही मानव-विकास की कहानी है। मनुष्य आखेट, पशुपालन व मछली पकड़ने से लेकर धीरे-धीरे औद्योगिक युग तक पहुँच गया है। औद्योगीकरण दो शब्दों के मेल से बना है-उद्योग + करण’। ‘उद्योग’ का अर्थ ‘कारखाने’ तथा ‘करण’ का अर्थ है–‘स्थापित करना। इस प्रकार औद्योगीकरण का शाब्दिक अर्थ हुआ ‘कारखाने स्थापित करना।

क्लार्क केर के अनुसार, “औद्योगीकरण से अभिप्राय एक ऐसी स्थिति से है जिसमें पहले का कृषक अथवा व्यापारिक समाज एक औद्योगिक समाज की दिशा की ओर परिवर्तित होने लगता है।”
संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) के अनुसार, “औद्योगीकरण से तात्पर्य बड़े-बड़े उद्योगों के विकास तथा छोटे और कुटीर उद्योग-धन्धों के स्थान पर बड़े पैमाने की मशीनों की व्यवस्था से है। औद्योगीकरण आर्थिक विकास की व्यापक प्रक्रिया का अंग मात्र है, जिसका उद्देश्य उत्पादन के साधनों की क्षमता में वृद्धि करके जनजीवन के स्तर को ऊँचा उठाना है।”
अतः औद्योगीकरण उद्योगों के विकास की एक प्रक्रिया है, जिसमें बड़े पैमाने पर उद्योग लगाये जाते हैं तथा हाथ से किया जाने वाला उत्पादन मशीनों से किया जाने लगता है।

औद्योगीकरण की विशेषताएँ
औद्योगीकरण में मुख्य रूप से निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं.

  1. औद्योगीकरण उत्पादन की एक प्रक्रिया है, जिसका विकास धीरे-धीरे होता है।
  2. औद्योगीकरण के कारण राष्ट्र में नये-नये उद्योगों की स्थापना तीव्र गति से होती है।
  3. औद्योगीकरण मानवीय शक्ति की अपेक्षा मशीनी शक्ति पर बल देता है।
  4. औद्योगीकरण में मशीनों का संचालन कोयला, खनिज तेल अथवा विद्युत-शक्ति द्वारा किया जाता है।
  5. औद्योगीकरण की प्रमुख विशेषता श्रम-विभाजन और विशिष्टीकरण है।
  6. औद्योगीकरण तीव्र गति से सस्ते और बड़े पैमाने के उत्पादन पर बल देता है।
  7. औद्योगीकरण की प्रमुख विशेषता नवीनतम वैज्ञानिक विधियों तथा उत्पादन की नवीनतम तकनीक के प्रयोग पर बल देना है।
  8. औद्योगीकरण प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम तथा योजनाबद्ध दोहन पर बल देता है।
  9. औद्योगीकरण के फलस्वरूप प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है, जो आर्थिक विकास की परिचायक है।
  10. औद्योगीकरण राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन करता है।
  11. औद्योगीकरण के कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होने से प्राचीन मान्यताएँ ध्वस्त हो जाती हैं।
  12. औद्योगीकरण पूँजीवाद का जनक है। इसके फलस्वरूप श्रमिक वर्ग और पूँजीपति वर्ग जन्म लेते हैं।
  13. औद्योगीकरण की एक प्रमुख विशिष्टता राष्ट्रीय व्यापार और उद्योगों में होने वाली भारी वृद्धि
  14. औद्योगीकरण का क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय बाजार होने के कारण यह अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की स्थापना करने में सक्षम होता है।
  15. औद्योगीकरण के कारण राष्ट्र को समूचा विनिर्माण, उद्योगों तथा अर्थव्यवस्था को परिवेश परिवर्तित हो जाता है।

औद्योगीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव

औद्योगीकरण का भारतीय समाज के सभी पक्षों पर गहरा प्रभाव पड़ा है, जिस पर हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत विचार करेंगे

(क) भारतीय पारिवारिक जीवन पर प्रभाव
औद्योगीकरण का भारतीय पारिवारिक जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा है

1. संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन – संयुक्त परिवार भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता रही है। एक परिवार के सभी नये-पुराने सदस्य एक ही स्थान पर रहते हुए खेती का कार्य करते रहे हैं, किन्तु उद्योगों के विकास के साथ-साथ लोग कारखानों में काम करने के लिए गाँव छोड़कर शहरों की ओर भागे। एक ही परिवार का कोई सदस्य कहीं पहुँच गया, कोई कहीं। कारखानों की मजदूर कॉलोनी में या अन्य छोटे-छोटे आवासों में लोग जा बसे, जहाँ मुश्किल से एक छोटे-से परिवार को ही गुजारा होता है। इस प्रकार संयुक्त परिवार को विघटन होने लगा और यह क्रिया काफी व्यापक पैमाने पर हुई है। इस प्रकार के स्थानों पर जिन परिवारों की नींव पड़ी, वे भी छोटे थे; क्योंकि पति-पत्नी तथा बच्चों के अतिरिक्त अन्य किसी का वहाँ गुजारा नहीं हो सकता था।

2. पारिवारिक कार्य-क्षेत्र का सीमित होना – संयुक्त परिवार में परिवार के सदस्यों की अधिकांश आवश्यकताएँ अन्य सदस्यों द्वारा पूरी हो जाती थीं। औद्योगीकरण के प्रभाव से परिवार के अनेक कार्य विशिष्ट संस्थाओं द्वारा होने लगे हैं। औद्योगीकरण के फलस्वरूप कपड़े धोने का काम लॉण्ड्री में, कपड़े सिलने का काम दर्जी की दुकानों में, आटा पीसने का काम आटा पीसने की शक्ति-चालित चक्कियों में, खेत जोतने, बोने, काटने, माँड़ने का काम विभिन्न मशीनों से होने लगा। इस प्रकार परिवार का कार्य-क्षेत्र सीमित हो गया है।

3. स्त्रियों का नौकरी करना – औद्योगीकरण के फलस्वरूप घर के अनेक कार्य मशीनों द्वारा होने लगे और स्त्रियों के पास समय बचने लगा। अतः महँगाई और अभाव से ग्रस्त परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए स्त्रियाँ नौकरी करने लगीं। औद्योगीकरण के फलस्वरूप सघन कॉलोनी में रहने के कारण पर्दा-प्रथा भी कम हो गयी और नौकरी पर जाने में स्त्रियों की हिचक समाप्त हो गयी।

4. स्त्रियों की स्थिति में सुधार – धन कमाने के कारण स्त्रियाँ स्वावलम्बिनी होने लगीं। अपने पैरों पर खड़े होने के कारण उनका आत्मविश्वास बढ़ा। वे अधिक स्वतन्त्र हुईं। उनमें शिक्षा का प्रसार हुआ और इस प्रकार उनकी स्थिति में सुधार हुआ।

5. विवाह के रूप में परिवर्तन – पहले धर्म-विवाह होते थे, जो संयुक्त परिवार के बुजुर्गों द्वारा कर दिये जाते थे। औद्योगीकरण के प्रभाव में प्रेम-विवाह और अन्तर्जातीय विवाहों की संख्या बढ़ी है, क्योंकि सघन औद्योगिक बस्तियों में युवक और युवतियों के सम्पर्क बढ़े तथा बड़े बुजुर्गों के नियन्त्रण का अभाव हो गया। इसके साथ-ही-साथ अपने पैरों पर खड़े होने के प्रयास में विवाह की आयु बढ़ी और इस प्रकार विलम्ब विवाह होने लगे। वैवाहिक जीवन पर नियन्त्रण घटने से तलाक भी बढ़े हैं।

6. पारिवारिक नियन्त्रण का घटना – पहले संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों पर परिवार के मुखिया का कठोर नियन्त्रण रहता था। हर व्यक्ति परिवार के रीति-रिवाज, आस्थाओं, मान्यताओं आदि से प्रभावित रहता था। औद्योगीकरण के प्रभावस्वरूप परिवारों का आकार छोटा हो गया और व्यक्ति पर पारिवारिक नियन्त्रण घट गया है।

(ख) भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव
औद्योगीकरण ने भारतीय सामाजिक जीवन को निम्न प्रकार प्रभावित किया

1. रहन-सहन में कृत्रिमता – औद्योगीकरण के फलस्व रूप लोगों का जीवन अप्राकृतिक हो गया। है। तंग घरों, अँधेरी गलियों, धुएँ से भरा हुआ आकाश, ट्रामें, बसें, रेलें, ऊँचे-नीचे मकान व मशीनों का शोर औद्योगीकरण की ही देन है। इस प्रकार मनुष्य प्रकृति से दूर होती जा रही है।

2. गन्दी तथा तंग बस्तियों का विकास –
हर औद्योगिक नगर में जनसंख्या का घनत्व बढ़ने के कारण रहने के स्थान का अभाव हो जाता है। घनी तंग बस्तियों में दिन में भी सूर्य के दर्शन नहीं होते। कमरे धुएँ से भरे रहते हैं। मल-मूत्र की बदबू असह्य होती है, फिर भी लोग अपने को उसका आदी बना लेते हैं। मुम्बई में ‘चाल’, चेन्नई में ‘चेरी’ और कानपुर में ‘अहाता’ आदि इस प्रकार की गन्दी बस्तियों के उदाहरण हैं।।

3. जाति-प्रथा को कमजोर होना –
औद्योगीकरण के फलस्वरूप और बढ़ती हुई बेकारी के कारण हर जाति के लोग कारखानों में काम पाने का प्रयास करते हैं। काम करते समय और सामान्य जीवन में एक-दूसरे के इतने नजदीक आ जाते हैं कि उन्हें प्रतिबन्धों और निषेधों की उपेक्षा करनी पड़ती है। उन्हें मानकर वे कोई कार्य नहीं कर सकते। अन्तर्जातीय विवाह भी
ऐसे स्थानों पर जाति-प्रथा को ढहाने में सहायक होते हैं।

4. नैतिकता का ह्रास –
मशीनों के बीच काम करते-करते मनुष्य की संवेदनशीलता का लोप हो जाता है। उसमें अपने बन्धु-बान्धवों के प्रति सद्भाव का लोप होने लगता है। कारखानों में काम करने वाला व्यक्ति स्वार्थप्रिय हो जाता है और उसमें मूल्यों के प्रति आस्था समाप्त हो जाती है। औद्योगिक बस्तियों में इसीलिए चोरी, बेईमानी, ईष्र्या-द्वेष, मद्यपान, जुआ, हत्याएँ सामान्य घटनाएँ होती रहती हैं। इससे भ्रष्टाचार का व्यापक प्रसार हुआ है। अपराधों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है।

5. प्रतिद्वन्द्विता और संघर्ष –
उद्योगों में अस्वस्थ प्रतिद्वन्द्विता के कारण पारस्परिक संघर्ष उत्पन्न हुआ है, जिससे प्रभावित होकर एक व्यक्ति दूसरे को गला काटने से भी नहीं चूकता।

6. बाल-अपराधों में वृद्धि –
औद्योगीकरण के फलस्वरूप भारत की औद्योगिक बस्तियों में बाल-अपराधों की भी वृद्धि हुई है। माता-पिता दिन में अधिकांश समय कारखानों में काम करते हैं, उनकी अनुपस्थिति में बच्चे हर तरह से संसर्ग में आते हैं। नैतिक शिक्षा का अभाव पहले से होता है। माता-पिता द्वारा नैतिक आदर्श रखे नहीं जाते; अस्तु बच्चे हर तरह के
अपराध करने लगते हैं।

7. सामुदायिक जीवन का ह्रास –
मानवीय सम्बन्धों के ह्रास के कारण समाज में वैयक्तिकता अधिक पनपी है। पारस्परिक सद्भाव, सहयोग और सहानुभूति के अभाव के कारण सामुदायिक जीवन का ह्रास होता है।

8. चिन्ता एवं तनाव में वृद्धि – बढ़ती हुई जनसंख्या और रहन-सहन की सुविधाओं के अभाव के कारण तथा नौकरी की तनावपूर्ण दशाएँ, शोषण, ईष्र्या, द्वेष, प्रतिद्वन्द्विता आदि के कारण औद्योगिक बस्ती में रहने वाले लोगों में चिन्ता एवं तनावों में अत्यधिक वृद्धि हो गयी है। इससे व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन अशान्त हो गया है।

(ग) भारतीय आर्थिक जीवन पर प्रभाव
भारतीय आर्थिक जीवन को औद्योगीकरण ने व्यापक रूप से प्रभावित किया है, जो निम्न प्रकार है।

1. पूँजीवाद का विकास बड़े – बड़े उद्योग चलाने के लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता होती है, जो पूँजीपतियों से प्राप्त होता है या सरकार द्वारा लगाया जाता है। भारत में भी औद्योगीकरण के विकास के साथ पूँजीपतियों को बढ़ावा मिला है। उनका धन उद्योगों के खोलने में लगा है और उद्योगों के लाभ से उनके कोष भरे पड़े हैं। इसके साथ-ही-साथ श्रमिकों का शोषण भी हुआ है।

2. बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं व्यापार –  भारत में औद्योगीकरण के फलस्वरूप नये-नये कारखाने खोले गये हैं, जिनसे विभिन्न वस्तुओं का व्यापार भी बड़े पैमाने पर होने लगा है। कई उद्योगों के लिए कच्चा माल बाहर से आने लगा है और शक्ति के कुछ साधनों का भी आयात किया गया है। इस प्रकार औद्योगीकरण से उत्पादन एवं व्यापार को काफी बढ़ावा मिला है।

3. उच्च जीवन-स्तर – औद्योगीकरण से देश में उत्पादन बढ़ता है और निर्यात द्वारा जो धनोपार्जन होता है वह जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक होता है। हमारे देश में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद जो तीव्र गति से औद्योगिक विकास हुआ है, उससे देशवासियों के
जीवन-स्तर में कुछ-न-कुछ वृद्धि तो हुई ही है।

4. श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण – कुटीर उद्योगों में तो उद्योग खोलने वाला व्यक्ति सभी काम स्वयं कर लेता है, किन्तु बड़े उद्योगों में कारखानों में काम कई भागों में बाँट दिये जाते हैं और उन्हें विशिष्ट प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति अत्यधिक तीव्र गति और दक्षता से करते हैं। इस प्रकार श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण द्वारा उत्पादन में वृद्धि होती है। औद्योगीकरण का यह एक अनिवार्य परिणाम है।

5. काला धन, चोर-बाजारी एवं आयकर की चोरी – औद्योगीकरण के साथ लोगों की आमदनी बढ़ती है। आमदनी पर कर देना होता है, इसलिए उत्पादन ही छिपा लिया जाता है। इस प्रकार कुल आमदनी के एक अंश आयकर की चोरी की जाती है। अवैध रूप से दबाये हुए उत्पादन की वस्तुओं की बिक्री करके चोर-बाजारी पनपती है। भारत में यह सभी कुछ हो रहा है।

(घ) भारतीय राजनीतिक जीवन पर प्रभाव

औद्योगीकरण का प्रभाव भारतीय राजनीतिक जीवन पर भी पड़ा है, जो निम्नवत् है

  1. राज्य का उत्तरदायित्व बढ़ना – औद्योगीकरण विकास की योजनाओं के अन्तर्गत होता है। उसे कार्यान्वित करने के लिए राज्य को विधिवत् योजनाएँ बनाना होता है और कारखाने खोलने के लिए धने का प्रबन्ध करना होता है। औद्योगीकरण के द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है, अन्य देशों से लेन-देन बढ़ा है और उनकी व्यवस्था से सम्बन्धित अनेक जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं।
  2. राजनीतिक समस्याओं में वृद्धि – औद्योगीकरण से देश में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जैसे–हड़ताल, तालाबन्दी, श्रमिकों एवं पूँजीपतियों के पारस्परिक संघर्ष, श्रमिक-कल्याण, दुर्घटनाएँ आदि। इन सभी समस्याओं को राज्य की ओर से हल करने की कोशिश की जाती है।

(ङ) भारतीय धार्मिक जीवन पर प्रभाव

औद्योगीकरण का किसी देश के धार्मिक जीवन पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। भारत में औद्योगीकरण का धार्मिक मान्यताओं पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा है

1. समाज में धर्म का महत्त्व कम होना – औद्योगीकरण के फलस्वरूप भारत में ईश्वर पर से लोगों की आस्था कम होती जा रही है। लोगों का ध्यान भौतिक सुखों की ओर अधिक बढ़ने लगा है।

2. नैतिकता का ह्रास – नैतिकता की भावना, जो धर्म का एक आवश्यक अंग है, भारतीय जीवन से तिरोहित होती जा रही है। स्वार्थों की टकराहट में मानवता का हनन हो रहा है। मनुष्य ने मनुष्य को पहचानना तक छोड़ दिया है।

3. आदर्शों का अभाव – औद्योगीकरण के फलस्वरूप व्यक्ति का दृष्टिकोण भौतिकवादी हो गया है। अपने को वह केवल वर्तमान से ही जोड़कर रखने की कोशिश करता है। भौतिक सुखों की उपलब्धि उसके जीवन का लक्ष्य है। जीवन के आदर्शों का उसके लिए कोई महत्त्व नहीं रहा है, क्योंकि उसकी निगाह भविष्य पर टिकी नहीं होती।

औद्योगीकरण के दुष्प्रभावों को रोकने के उपाय

औद्योगीकरण के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  1. देश में उद्योगों का विकेन्द्रीकरण किया जाए जिससे राष्ट्र का सन्तुलित विकास हो सके।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग-धन्धों की पुनः स्थापना की जाए।
  3. कृषि एवं उद्योगों में बढ़ती हुई यन्त्रीकरण की प्रवृत्ति पर रोक लगायी जाए।
  4. तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगायी जाये। इर के लिए परिवार कल्याण कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए।
  5.  नगरों में आवास सुविधाएँ बढ़ायी जाएँ, प्रदूषण तथा गन्दगी का विनाश किया जाए।
  6.  अपराध वृत्ति पर रोक लगायी जाए तथा अपराध निरोध के लिए उपाय किये जाएँ।
  7. जनसुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं में आवश्यकतानुसार वृद्धि की जाए।
  8.  नैतिक आदर्शों एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति लोगों की आस्था बढ़ायी जाए।
  9. सामाजिक न्याय एवं सामाजिक कल्याण में वृद्धि की जाए।
  10.  उद्योगों में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए तथा उनकी सुविधाएँ बढ़ायी जाएँ।
  11.  वर्ग-संघर्ष कम करने के लिए समाज में धन का उचित वितरण किया जाए।
  12. बेरोजगारी तथा निर्धनता पर रोक लगायी जाए।
  13. पारिवारिक विघटन की प्रक्रिया को कम किया जाए।
  14. समाज में मनोरंजन के स्वस्थ साधनों का विकास किया जाए।
  15. समाज-सुधार एवं समाज-कल्याण की योजनाएँ चलायी जाएँ।
  16.  उद्योगों का विकास बस्तियों से दूर कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में किया जाए।
  17.  समाज में सहयोग, प्रेम तथा एकता को वातावरण तैयार किया जाए जिससे तनाव और संघर्षों को रोका जा सके।
  18.  श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रम-कल्याणकारी कानूनों का निर्माण किया जाए।
  19.  सामाजिक समस्याओं के निराकरण हेतु प्रशासन को अधिक चुस्त बनाया जाए।
  20. राष्ट्र में कुशल नेतृत्व का विकास किया जाए तथा प्रजातान्त्रिक मूल्यों की स्थापना की जाए।

प्रश्न 2
नगरीकरण किसे कहते हैं ? भारतीय समाज पर नगरीकरण के प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2011]
या
भारतीय समाज पर नगरीकरण के प्रभावों की विस्तृत विवेचना कीजिए। [2007, 11, 12, 13]
या
नगरीकरण को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं को संक्षेप में लिखिए। नगरीकरण के भारतीय जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए। [2009, 12]
या
भारत में नगरीकरण के दुष्परिणामों को रोकने के कुछ उपाय सुझाइए। [2011]
या
नगरीकरण के दो दुष्प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2015]
उत्तर:
नगरीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘नगरीकरण’ शब्द नगर से ही बना है। सामान्यत: नगरीकरण का अर्थ नगरों के उद्भव, विकास, प्रसार एवं पुनर्गठन से लिया जाता है। वर्तमान औद्योगिक नगर औद्योगीकरण की ही देन हैं। जब एक स्थान पर एक विशाल उद्योग स्थापित हो जाता है तो उस स्थान पर कार्य करने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं और धीरे-धीरे वह स्थान नगर के रूप में विकसित हो जाता है। नगरीकरण को परिभाषित करते हुए ब्रीज लिखते हैं, “नगरीकरण एक प्रक्रिया है जिसके कारण लोग नगरीय कहलाने लगते हैं, शहरों में रहने लगते हैं, कृषि के स्थान पर अन्य व्यवसायों को अपनाते हैं जो नगर में उपलब्ध हैं और अपने व्यवहार-प्रतिमान में अपेक्षाकृत परिवर्तन का समावेश करते हैं।’

डेविस के अनुसार, “नगरीकरण एक निश्चित प्रक्रिया है, परिवर्तन का वह चक्र है जिससे कोई समाज कृषक से औद्योगिक समाज में परिवर्तित होता है।” बर्गेल के अनुसार, “ग्रामीण क्षेत्रों को नगरीय क्षेत्र में बदलने की प्रक्रिया को ही हम नगरीकरण कहते हैं।”

नगरीकरण की विशेषताएँ

  1.  नगरीकरण ग्रामों के नगरों में बदलने की प्रक्रिया का नाम है।
  2.  नगरीकरण में लोग कृषि व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसाय करने लगते हैं।
  3. नगरीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें लोग गाँव छोड़कर शहरों में निवास करने लगते हैं जिससे शहरों का विकास, प्रसार एवं वृद्धि होती है।
  4. नगरीकरण जीवन जीने की एक विधि है, जिसका प्रसार शहरों से गाँवों की ओर होता है। नगरीय जीवन जीने की विधि को नगरीयता या नगरवाद कहते हैं। नगरवाद केवल नगरों तक ही सीमित नहीं होता वरन् गाँव में रहकर भी लोग नगरीय जीवन विधि को अपना सकते हैं।

उद्योगों की स्थापना के साथ-साथ ही भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया भी तीव्र हुई है। ग्रामीण लोग देश के विभिन्न भागों में स्थित कारखानों में काम करने के लिए गमन करने लगे हैं, फलस्वरूप महानगरीय एवं नगरीय जनसंख्या में वृद्धि हुई है। | भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया ने यहाँ के समाज और जनजीवन को बहुत कुछ प्रभावित किया है। इसके परिणामस्वरूप एक तरफ अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं तो दूसरी ओर कई सामाजिकआर्थिक परिवर्तनों एवं समस्याओं को भी पनपने का मौका मिला है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि नगरीकरण का अर्थ केवल ग्रामीण जनसंख्या का शहर में आकर बसना या भूमि से सम्बन्धित कार्यों के स्थान पर अन्य कार्यों में अपने को लगाना ही नहीं है। लोगों के नगर में आकर बस जाने मात्र से ही उनका नगरीकरण नहीं हो जाता। ग्रामीण व्यक्ति भी जो कि ग्रामीण व्यवसाय और आदतों को त्यागते नहीं हैं, नगरीय हो सकते हैं, यदि वे नगरीय जीवन-शैली, मनोवृत्ति, मूल्य, व्यवहार एवं दृष्टिकोण को अपना लेते हैं।

नगरीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव

नगरीकरण की प्रक्रिया ने, जो भारतवर्ष में पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध से चल रही है, देश में अनेकानेक परिवर्तन उत्पन्न कर दिये हैं और जनजीवन को गहराई से प्रभावित किया है, जिस पर अग्रलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत विचार करेंगे

(क) नगरीकरण का पारिवारिक जीवन पर प्रभाव
नगरीकरण की भारत के पारिवारिक जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा है

1. संयुक्त परिवार का विघटन – गाँवों में संयुक्त परिवार पाये जाते हैं। शहरों में स्थानाभाव के कारण तथा गाँवों से एकाकी रूप से स्थानान्तरित होने के कारण संयुक्त परिवार का स्थान एकाकी छोटे परिवारों ने ले लिया है।

2. पारिवारिक नियन्त्रण का अभाव – गाँवों में संयुक्त परिवार के मुखिया का परिवार पर काफी नियन्त्रण रहता है। नगरों में छोटे परिवार तथा उन्मुक्तता के कारण पारिवारिक नियन्त्रण इतना कठोर नहीं होता।

3. नयी प्रथाएँ एवं परम्पराएँ – नगरीकरण के प्रभाव से भारत के गाँवों के परिवार की प्रथाएँ एवं परम्पराएँ भी बदलती जा रही हैं; जैसे – माँ-बाप को माता-पिता कहने के स्थान पर मम्मी-डैडी कहना, रसोई में पीढ़े पर खाने के बजाय मेज-कुर्सी पर खाना, भाषा में अंग्रेजी का अधिक प्रयोग करना आदि।

4. पारिवारिक जीवन में अस्थिरता – गाँवों में पति-पत्नी के सम्बन्ध अधिक स्थिर एवं स्थायी होते हैं। शहरों में स्त्रियों को पर-पुरुषों से मिलने-जुलने का काफी अवसर मिलता रहता है। और अधिक स्वतन्त्रता रहती है; इसलिए पति-पत्नी के सम्बन्धों में कुछ कम स्थिरता होती है। नगरों में तलाक की घटनाएँ अधिक होती हैं।

5. वैवाहिक आदशों में परिवर्तन – नगरों में युवक-युवतियाँ उच्च स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने में लगे रहते हैं। फिर अपने पैरों पर खड़े होने के लिए नौकरी ढूंढ़ते हैं। स्वावलम्बन प्राप्त करने के इस प्रयास में विवाह की अवस्था बढ़ जाती है, जिससे विलम्ब विवाह नगरों में सामान्य हो गये हैं। कुछ लोग विवाह के चक्कर में नहीं फंसना चाहते, अत: वे अविवाहित रहते हैं। इनके अतिरिक्त नगरों में प्रेम-विवाहों की परम्परा भी प्रचलित है और विधवा-विवाह बुरे नहीं माने जाते।

6. स्त्रियों की स्थिति में सुधार – नगरीकरण के साथ-साथ भारत में स्त्रियों में स्वावलम्बन “और स्वतन्त्रता की तरंग अधिक व्याप्त होती जा रही है। वे पुरुषों के दबाव में और पर्दे में नहीं रहतीं। वे पुरुष के समकक्ष शिक्षा प्राप्त करती हैं और नौकरियाँ करती हैं। इस प्रकार उनकी दशा में काफी सुधार हुआ है और होता जा रहा है।

(ख) नगरीकरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव

नगरीकरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा है

1. शिक्षा का प्रसार – भारत में शिक्षितों की संख्या बढ़ रही है, क्योंकि स्थान-स्थान पर विद्यालय खुलते जा रहे हैं। शिक्षा के इस व्यापक प्रसार से अन्धविश्वास में कमी, सामाजिक जीवन की अधिक गहरी समझ, विचारों का आदान-प्रदान, उद्योगों का विकास, कृषि की उन्नति, व्यापार में विकास आदि सभी कुछ हो रहा है।

2. सभ्यताओं का संगम – नगरों में विभिन्न जातियों, प्रदेशों, सम्प्रदायों आदि के लोग रहते हैं। विदेशों से भी लोगों का आवागमन होता रहता है। इस प्रकार रहन-सहन के तरीकों, भाषाओं और विचारों के मिश्रण से रहन-सहन में परिवर्तन होता रहता है। भारत के अनेक भागों में यह लक्षण परिलक्षित हो रहा है। फलस्वरूप स्थाने-विशेष की मूल संस्कृति में भी परिवर्तन हो जाती है।

3. संचार के साधनों का प्रसार – नगरीकरण के साथ संचार के साधनों में भी परिवर्तन होता
है। भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में रेलों, बसों, तार, टेलीफोन आदि की सुविधाओं का व्यापक प्रसार हुआ। इससे नये विचारों का प्रसार एवं विभिन्न विचारधाराओं का तीव्र मिश्रण सम्भव हो सका है।

4. अपराध-प्रवृत्ति का प्रसार – शहर में आवास की सुविधाओं का अभाव रहता है, जनसंख्या अधिक रहती है, धनलोलुपता अधिक पायी जाती है, इसलिए लोगों में नैतिकता का अभाव होता है। झूठ, घूस, चोरी, छल-कपट, मिलावट, शराबखोरी, जुआ, डकैती, हत्या आदि भाँतिभाँति के अपराध सामाजिक जीवन पर हावी होते जा रहे हैं और उसे नारकीय बना रहे हैं। नगरीकरण के साथ-साथ मानव को मूल्य कम और धन का महत्त्व अधिक बढ़ता जा रहा है।

5. बीमारियों का प्रसार – स्वास्थ्य-विभाग की व्यवस्थाओं के बावजूद भी घनी जनसंख्या, तंग, अँधेरी, बदबू तथा सीलन से युक्त बस्तियों, खुली हवा का अभाव, खाद्य पदार्थों में तरह-तरह की मिलावट, अवैध एवं मुक्त यौनसम्बन्ध तथा अनियमित रहन-सहन से नगरीकरण के साथ रोगों का भी काफी प्रसार होता है।

6. रहन-सहन में कृत्रिमता – नगरीकरण के प्रभाव से गाँवों का स्वाभाविक एवं प्राकृतिक जीवन कृत्रिम रूप ग्रहण करने लगता है। कोल्ड स्टोरेज की सब्जियाँ, दवाओं से युक्त गेहूँ, पॉलिश किया हुआ चावल, रँगी हुई दाल, कृत्रिम वनस्पति घी एवं मक्खन, सेन्ट डाला हुआ कडूवा तेल, टिन में बन्द अन्य खाद्य सामग्रियों का प्रयोग करते हैं। वस्त्रों में सूती, ऊनी व रेशमी वस्तुओं के स्थान पर बनावटी रेशों के वस्त्र; जैसे-टेरीलीन, नायलॉन आदि; का प्रयोग किया जाता है।

7. स्वास्थ्य में गिरावट, किन्तु जीवनावधि में वृद्धि-रहन – सहन की अनियमितता तथा अशुद्ध वस्तुओं के सेवन आदि के कारण नगरीकरण से लोगों के सामान्य स्वास्थ्य में गिरावट आती है। किन्तु चिकित्सा की उत्तम पद्धतियों में रोगों का निराकरण भी हो जाता है, और नगर में रहने वाला भारतीय कमजोर, किन्तु अधिक लम्बा जीवन जीता है।

8. नशीले द्रव्यों के सेवन में वृद्धि – नगरीकरण के प्रभाव से लोगों में शराब, अफीम, एल० एस० डी०, मारिजुआना, हीरोइन, भाँग आदि के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ती है, क्योकि नगरीय जीवन में तनाव से शान्ति प्राप्त करने हेतु नशीले द्रव्यों का सेवन आवश्यक बन जाता है। इनके साथ-साथ नींद प्राप्त करने के लिए सोने की गोलियों का प्रयोग भी बढ़ता है।

9. भौतिकवाद की प्रधानता – नागरिक प्रभाव के कारण भारतीय समाज के आदर्शवादी सिद्धान्त तिरोहित होने लगे हैं। लोगों का ध्यान आत्मिक विकास के स्थान पर भौतिक सुख सम्पन्नता प्राप्त करने पर अधिक रहने लगा है। इससे पारस्परिक संघर्ष, ईष्र्या-द्वेष, वैमनस्य, प्रतियोगिता को बढ़ावा मिला है और तनाव-चिन्ता में वृद्धि हुई है।

(ग) नगरीकरण का भारतीय आर्थिक जीवन पर प्रभाव

नगरीकरण के प्रभाव से भारतीय आर्थिक जीवन भी काफी प्रभावित है, जिसका विवरण निम्न प्रकार है

1. पूँजीवाद का विकास – उद्योगों और व्यापारिक कार्यों से थोड़े-से लोगों के हाथ में धन का केन्द्रीकरण होने लगा है और शेष जनता शोषण का शिकार हुई है। जिनके पास साधनसुविधाएँ हैं, वे अधिकाधिक धन कमा रहे हैं तथा जिनके पास इनका अभाव है, उनकी दशा गिरती जाती है।

2. महँगाई में वृद्धि – जनसंख्या में अधिक वृद्धि एवं उत्पादन में कमी की वृद्धि के कारण मूल्यों में वृद्धि होती है, वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं जिससे मध्यम और निम्न वर्ग त्रस्त हो रहा है।

3. कुटीर उद्योगों का ह्रास – नगरीकरण के साथ बड़े उद्योग-धन्धों का प्रसार तेजी से हुआ है। और कुटीर उद्योगों का उसी अनुपात में ह्रास हुआ है। फलस्वरूप नगरीकरण के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था असन्तुलित होती जा रही है।

4. बेकारी में वृद्धि – नगरीकरण के साथ-साथ बेकारी में वृद्धि होती है, क्योंकि बड़े उद्योगों में मशीनें मानवीय श्रम का स्थान ले लेती हैं, जिससे बेकारी बढ़ जाती है। व्यवसाय के अभाव से निर्धनता बढ़ती है। नगरीकरण से ऐसे शिक्षित नवयुवकों की संख्या बढ़ती है, जो केवल पढ़ने-लिखने से सम्बन्धित काम करना चाहते हैं। इस तरह के नवयुवक गाँवों से भी नगर में नौकरी की तलाश में आकर इकट्ठे होने लगते हैं और बेकारी की संख्या में वृद्धि करते हैं।

 5. वाणिज्य और व्यापार का विस्तार – नगरीकरण के साथ संचार के साधनों का विस्तार और प्रसार होता है। पक्के वातानुकूलित गोदामों का निर्माण होता है, जो वस्तुओं को संग्रहीत करने की सुविधा प्रदान करते हैं। दूर-दूर से व्यापारी आकर इकट्ठे होते हैं और इस प्रकार वाणिज्य और व्यापार का विस्तार होता है।

(घ) नगरीकरण का भारतीय राजनीतिक जीवन पर प्रभाव

नगरीकरण का देश के राजनीतिक जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है

  1.  राजनीतिक दलों की क्रियाशीलता में वृद्धि – नगरीकरण के साथ-साथ नये-नये राजनीतिक दलों की स्थापना होती है और राजनीतिक ऊट-पटॉग और दाँव-पेचों में वृद्धि होती है। इस प्रकारे बस्तियाँ राजनीति के अखाड़े बन जाते हैं।
  2. राजनीतिक जागृति – नगरों में राजनीतिक दल बहुत अधिक क्रियाशील होते हैं, जिससे नागरिकों में राजनीतिक ज्ञान की वृद्धि होती है।
  3. प्रशासनिक समस्याओं में वृद्धि – नगरीकरण के साथ-साथ अनेक नयी प्रशासनिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं; जैसे–नागरिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, अपराधों पर नियन्त्रण, शिक्षा का संगठन, व्यापार का संगठन, उद्योगों का संचालन एवं व्यवस्था, हड़ताल वे तालाबन्दी। इनसे अशान्ति बढ़ती है।

(ङ) नगरीकरण का भारतीय धार्मिक जीवन पर प्रभाव

नगरीकरण की प्रक्रिया ने भारत के धार्मिक जीवन को निम्नलिखित रूप से प्रभावित किया है

  1. लोगों में धार्मिक भावना का ह्रास दिखाई पड़ता है। लोगों को ईश्वर में विश्वास घट रहा है।
  2. लोगों का ध्यान आत्मिक विकास से हटकर भौतिक सुख-सम्पन्नता प्राप्त करने पर अधिक केन्द्रित होता जा रहा है।
  3. लोगों में जीवन के उच्च मूल्यों के प्रति विश्वास कम होता जा रहा है।
  4. नगरीकरण के साथ नैतिक भावना व नैतिक मूल्यों में आस्था समाप्त होती जा रही है। अनैतिक मूल्य और अपराध बढ़ रहे हैं।
  5.  भारत में नगरीकरण के प्रभाव में साम्प्रदायिक संकीर्णता भी उत्पन्न हुई है।नगरीकरण को रोकने के उपाय – भारत में औद्योगीकरण अधिकतर नगरों में हुआ है। साथ ही, अनेक उद्योग खुलने से नवीन नगरों का जन्म हुआ है; अत: नगरीकरण रोकने के उपाय भी वही होंगे जो औद्योगीकरण के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए हैं।

प्रश्न 3
भारतीय समाज पर औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के संयुक्त प्रभाव की विवेचना कीजिए।
या
नगरीकरण एवं औद्योगीकरण की प्रक्रियाओं ने किस प्रकार भारतीय सामाजिक संगठन को प्रभावित किया है ? [2009]
उत्तर:
भारतीय समाज पर औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के संयुक्त प्रभाव

भारतीय समाज पर नगरीकरण एवं औद्योगीकरण के प्रभावों का अनेक विद्वानों ने अध्ययन किया है, जिनमें एम० एस० गोरे, एलन डी० रॉस, एम० एन० श्रीनिवास आदि प्रमुख हैं। इन्होंने भारतीय ग्रामीण सामाजिक संरचना, संयुक्त परिवार, विवाह एवं जाति-प्रथा पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया है। भारतीय समाज पर औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के प्रभावों का उल्लेख निम्नवत् है

1. यातायात के साधनों का विकास – उद्योगों का यन्त्रीकरण हुआ तो उत्पादन की गति तीव्र हुई। कारखानों में कच्चे माल को तथा निर्मित माल को मण्डियों में पहुँचाने के लिए तीव्रगामी यातायात के साधनों की आवश्यकता महसूस हुई। परिणामस्वरूप रेल, मोटर, ट्रक, वायुयान, जहाज आदि का आविष्कार हुआ, पक्की सड़कें बनीं और यातायात के साधनों का जाल बिछ गया।

2. श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण – ग्रामीण कुटीर व्यवसायों में एक परिवार के व्यक्ति मिलकर ही सम्पूर्ण निर्माण की प्रक्रिया में हाथ बंटाते थे, किन्तु जंब उत्पादन मशीनों की सहायता से होने लगा तो सम्पूर्ण उत्पादन प्रक्रिया को अनेक छोटे-छोटे भागों में बाँट दिया गया। इसी कारण श्रम-विभाजन का उदय हुआ। एक व्यक्ति सम्पूर्ण उत्पादन प्रक्रिया के मात्र एक भाग को ही कर सकता था, जिसके कारण विशेषीकरण ने जन्म लिया।

3. उत्पादन में वृद्धि – औद्योगीकरण में श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण के कारण व मशीनों के प्रयोग से उत्पादन बड़े पैमाने पर तीव्र मात्रा में होने लगा। अधिक उत्पादन के कारण माल की खपत के क्षेत्र में वृद्धि हुई, पूँजी में वृद्धि हुई और स्थानीय आवश्यकताओं के लिए ही नहीं वरन् विश्वव्यापी मॉग के लिए उत्पादन होने लगा।

4. बैंक, बीमा एवं साख – व्यवस्था का उदय-उद्योगों को सुविधाएँ देने, उनके लिए पूँजी जुटाने एवं माल की सुरक्षा के लिए बैंक, बीमा एवं साख-व्यवस्था का उदय हुआ। आज हजारों लोग बैंकों एवं बीमा कार्यालयों में काम करते हैं।

5. आर्थिक प्रतिस्पर्धा – औद्योगीकरण ने आर्थिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया। इस प्रतिस्पर्धा में अधिक पूँजी वाला कम पूँजी वाले के व्यवसाय को नष्ट कर देता है और अपना एकाधिकार स्थापित कर लेता है। एकाधिकार कायम होने पर वह माल को अपनी मनचाही कीमत पर बेचता है।

6. सांस्कृतिक सम्पर्क – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण ही यातायात एवं सन्देशवाहन के साधनों का विकास हुआ। नवीन साधनों ने विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को एक-दूसरे के नजदीक ला दिया। यही कारण है कि शहरों में जो औद्योगिक केन्द्र हैं, उनमें हम विभिन्न संस्कृतियों को साथ-साथ फलते-फूलते देख सकते हैं।

7. विवाह पर प्रभाव – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के प्रभाव के कारण परम्परात्मक भारतीय विवाह संस्था में भी अनेक परिवर्तन हुए हैं। अब जीवन-साथी के चयन में स्वयं लड़के व लड़कियों की राय को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। नगर में ही हमें प्रेम-विवाह, अन्तर्जातीय विवाह, कोर्ट मैरिज, विधवा पुनर्विवाह, तलाक आदि अधिक दिखाई देते हैं। नगर के लोग विवाह को अब एक धार्मिक संस्कार न मानकर एक सामाजिक समझौता मानने लगे हैं जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। अब विवाह का उद्देश्य धार्मिक कार्यों की पूर्ति न मानकर सन्तानोत्पत्ति एवं रति-आनन्द माना जाने लगा है।

8. जाति-प्रथा पर प्रभाव – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण भारतीय जाति-प्रथा में भी परिवर्तन हुआ है। परम्परागत जाति-प्रथा में संस्तरण की एक प्रणाली पायी जाती है, जिसमें जातियों की स्थिति ऊँची और नीची होती है। प्रत्येक जाति का इस संस्तरण में एक स्थान निश्चित होता है। किन्तु औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण जाति-प्रथा की उपर्युक्त विशेषताओं में परिवर्तन हुआ है। अब व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति के बजाय उसके गुणों के आधार पर होने लगा है। जातीय संस्तरण में भी परिवर्तन हुआ है और उन जातियों की सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है, जो संख्या की दृष्टि से अधिक हैं, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं और जिन्हें राजनीतिक सत्ता प्राप्त है। खान-पान के सम्बन्धों एवं छुआछूत में भी शिथिलता आयी है।

9. ग्रामीण समुदाय पर प्रभाव – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रिया का प्रभाव ग्रामीण समुदायों पर भी पड़ा। यद्यपि गाँवों में आज भी संयुक्त परिवार प्रथा, जाति-प्रथा व कुछ मात्रा में जजमानी प्रथा का प्रचलन है, फिर भी नगरों के प्रभाव से ग्राम बच नहीं पाये हैं। ग्रामीणों में वस्तु के स्थान पर मुद्रा विनिमय का प्रचलन बढ़ा है। उनके दृष्टिकोण एवं मूल्यों में परिवर्तन हुआ है और नयी आकांक्षाएँ पैदा हुई हैं। गाँवों में जजमानी प्रथा कमजोर हुई है और कई ग्रामीण लोग नगरों में जाकर अपना जातीय व्यवसाय करने लगे हैं। गाँवों में नगरीय संस्कृति एवं अर्थव्यवस्था पनपने लगी है।

10. राजनीतिक क्षेत्र पर प्रभाव – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रिया ने राजनीतिक क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। नगरों में यातायात एवं संचार के साधनों एवं समाचार-पत्रों आदि की सुविधा होने के कारण राजनीतिक दल अपने विचारों और सिद्धान्तों को सरलता से जनता तक पहुँचा देते हैं। नगरीकरण ने लोगों में राजनीतिक जागृति पैदा की है और नवीन प्रजातन्त्रीय मूल्यों से लोगों को परिचित कराया है।
11. धार्मिक क्षेत्र में परिवर्तन – नगरों में धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है। वहाँ लोग भाग्य तथा ईश्वर में कम विश्वास करते हैं और अपने श्रम पर अधिक भरोसा रखते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि नगरों में धर्म का कोई महत्त्व और प्रभाव नहीं है। कई धर्म गुरुओं ने तो धर्म की नयी व्याख्या भी प्रस्तुत की है।

12. स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन  – नगरों में स्त्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। वहाँ लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलायी जाती है। अतः वे पढ़-लिखकर स्वयं धन अर्जन करने लगी हैं और पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता समाप्त हुई है। नगरों में स्त्रियाँ डॉक्टर, इन्जीनियर, प्राध्यापक, प्रशासक, विधायक, मन्त्री और अन्य पदों पर कार्य करने लगी हैं। प्रेम-विवाह एवं विधवा पुनर्विवाह के कारण स्त्रियों की पारिवारिक प्रस्थिति भी ऊँची उठी है। वर्तमान में परिवारों में पत्नी को पति के समकक्ष दर्जा प्राप्त है।

13. सामाजिक गतिशीलता – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि हुई है। एक व्यक्ति अच्छे अवसर होने पर एक से दूसरे स्थान पर जाने तथा अपने पद, वर्ग, व्यवसाय को बदलने के लिए तैयार रहता है।

14. व्यापारिक मनोरंजन – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण मनोरंजन का व्यापारीकरण हुआ है। अनेक संस्थाएँ आज मनोरंजन प्रदान करने का कार्य करती हैं। सिनेमा, क्लब, नाटक, टेलीविजन, रेडियो आदि के संचालन में पर्याप्त मात्रा में पैसों की जरूरत नहीं होती है। ग्रामीण जीवन में मनोरंजन, त्योहारों व उत्सवों के अवसर पर होने वाले नृत्यों द्वारा उपलब्ध होता था, किन्तु आज इन सबके लिए पर्याप्त पैसा खर्च करना होता है।

15. अन्य प्रभाव – उपर्युक्त प्रभावों के अतिरिक्त औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कुछ अन्य प्रभाव इस प्रकार हैं

  1. औद्योगीकरण के कारण मानव की शक्ति में वृद्धि हुई है। उसने अनेक आविष्कारों एवं वैज्ञानिक खोजों के द्वारा ऐसी मशीनों का आविष्कार किया है, जो ऐसे कार्य कर सकती हैं जो मानव की शक्ति से परे हैं।
  2. औद्योगीकरण में उत्पादन का कार्य मशीनों से होने लगा। कम समय में अधिक उत्पादन होने से समय की बचत हुई, साथ ही समय की पाबन्दी और समय का महत्त्व बढ़ा।
  3. औद्योगीकरण के कारण अनेक ऐसी वस्तुओं का उत्पादन हुआ जिन्होंने मानव के सुख एवं ऐश्वर्य में वृद्धि की।
  4.  औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण मानव को प्राप्त होने वाली सुख-सुविधाओं में वृद्धि एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी के कारण उसके जीवन-स्तर में वृद्धि हुई।
  5. प्राथमिक सम्बन्धों का ह्रास हुआ और द्वितीयक सम्बन्ध’ पनपे।
  6. आवश्यकताओं में वृद्धि हुई।
  7. शिक्षा में वृद्धि हुई।
  8.  विचारों में विविधता पनपी।
  9. भीड़-भाड़ में वृद्धि हुई।
  10. औद्योगिक केन्द्रों में स्त्री-पुरुषों के अनुपात में अन्तर बढ़ा। वहाँ स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक पाये जाते हैं।
  11. कृषि में यन्त्रीकरण हुआ।
  12.  मजदूरों की समस्याओं एवं शहर की भीड़-भाड़ युक्त स्थिति से निपटने के लिए प्रशासकीय समस्याएँ खड़ी हुईं।
  13. नैतिक मूल्यों में ह्रास हुआ और लोग पैसे के लिए उचित व अनुचित सभी प्रकार के कार्य करने को तैयार होने लगे।

प्रश्न 4
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कुप्रभावों की विवेचना कीजिए। [2008]
या
औद्योगीकरण के चार दुष्परिणाम बताइए।
या
औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के दोषों को दूर करने के उपाय बताइए।
उत्तर:
औद्योगीकरण व नगरीकरण के कुप्रभाव या दोष

1. पूँजीवाद का जन्म – औद्योगीकरण से पूर्व जीवन-यापन का प्रमुख साधन कृषि एवं कुटीर व्यवसाय थे, जो छोटे पैमाने पर होते थे और जिनमें अधिक पूँजी की आवश्यकता नहीं होती थी, किन्तु जब औद्योगीकरण हुआ तो सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन हुआ। जिसके पास पूँजी थी, उसने कारखाना लगाया। धीरे-धीरे पूँजी में वृद्धि हुई। श्रमिकों के श्रम का लाभ पूँजीपतियों को मिला। वे अधिक धनी बने। औद्योगीकरण ने ही पूँजीपति एवं मजदूर, दो प्रमुख वर्गों को जन्म दिया।

2. मजदूर समस्याओं एवं मजदूर संगठनों का जन्म – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण अनेक मजदूर समस्याओं ने जन्म लिया। मजदूरों के स्वास्थ्य की समस्या, काम के घण्टे, भर्ती की समस्या, शिक्षा, बीमा, चिकित्सा, मकान, बोनस आदि से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का जन्म हुआ। इन्हें हल करने के लिए उन्होंने मजदूर संगठनों का निर्माण किया। कुटीर व्यवसाय से सम्बन्धित कोई श्रम समस्याएँ नहीं थी, क्योंकि उनमें काम करने वालों में परस्पर सहयोग और घनिष्ठ सम्बन्ध थे। अतः शोषण का प्रश्न ही नहीं था।

3. बेकारी – उद्योगों में मशीनों ने मनुष्य का स्थान लिया। अभिनवीकरण में ऐसी मशीनों का प्रयोग किया जाता है, जिनके द्वारा कम श्रम से अधिक उत्पादन होता है तथा इससे मजदूरों की छंटनी होती है। भारत जैसे देश में, जहाँ पहले से ही बेकारी है, मशीनीकरण से अनेक श्रमिक बेकार हो गये।

4. कुटीर उद्योगों का ह्रास – औद्योगीकरण से पूर्व उत्पादन कुटीर उद्योगों द्वारा होता था, किन्तु जब मशीनों की सहायता से उत्पादन होने लगा जो कि हाथ से बने माल की अपेक्षा सस्ता, साफ व टिकाऊ होता था तो उसके सामने गृह उद्योग द्वारा निर्मित माल टिक नहीं सका। धीरे-धीरे कुटीर व्यवसाय समाप्त होने लगे और उनमें काम करने वाले तथा उनके मालिक कारखानों में श्रमिकों के रूप में सम्मिलित हुए। इस प्रकार औद्योगीकरण से ग्रामीण कुटीर उद्योगों एवं गृह-कला का ह्रास हुआ।

5. आर्थिक संकट व पराश्रितता – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण गाँवों में आत्मनिर्भरता समाप्त हुई। एक गाँव की दूसरे गाँव पर ही नहीं वरन् एक राष्ट्र की दूसरे राष्ट्र पर निर्भरता बढ़ी। कच्चा माल खरीदने एवं बने हुए माल को बेचने के लिए दो देशों में समझौते हुए एवं पारस्परिक निर्भरता बढ़ी। आज एक देश के आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष अंथवा परोक्ष रूप में दूसरे देशों का भी योगदान है। यदि अरब राष्ट्र भारत को तेल देना बन्द कर दें, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

6. मकानों की समस्या –
उद्योगों में काम करने के लिए गाँवों से लोग हजारों की संख्या में आते हैं। परिणामस्वरूप उनके निवास की समस्या पैदा होती है। शहरों में हवा व रोशनी वाले मकानों का अभाव होता है। औद्योगिक केन्द्रों में मकान, भीड़-भाड़ युक्त, सीलन भरे एवं बीमारियों के घर होते हैं। औद्योगीकरण ने गन्दी बस्तियों की समस्या को प्रमुखतः जन्म दिया है।

7. दुर्घटनाओं में वृद्धि –
कारखानों में चौबीसों घण्टे काम चलता रहता है। थोड़ी-सी असावधानी या थकान से निद्रा आने पर हाथ-पाँव कटने एवं स्वयं को मृत्यु के मुख में धकेलने के अवसर बढ़ जाते हैं। ट्रकों, बसों एवं रेलों की दुर्घटनाएँ आए दिन होती ही रहती हैं।

8. सामाजिक नियन्त्रण का अभाव –
ग्रामीण जीवन में व्यक्ति पर परिवार, जाति पंचायत, ग्राम पंचायत, प्रथाओं एवं धर्म का नियन्त्रण था। औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण बड़े नगरों में यह सब असम्भव हो गया। नियन्त्रण के अभाव के कारण ही औद्योगिक केन्द्रों एवं बड़े नगरों में उच्छृखलता दिखाई देती है।

9. व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन –
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण ने व्यक्तिवाद को प्रोत्साहित किया। व्यक्तिवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर जोर देता है तथा वह सरकार एवं राज्य का हस्तक्षेप नहीं चाहता, किन्तु नियन्त्रण के अभाव में व्यक्ति में कई बुराइयाँ जन्म लेती हैं।

10. सामाजिक विघटन एवं अपराध –
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण समाज-विरोधी कार्यों एवं अपराधों में वृद्धि हुई। नगरों में नियन्त्रण के अभाव में सामाजिक नियमों की अवहेलना की जाती है जिससे समाज में विघटनकारी प्रवृत्तियाँ प्रबल होती हैं। औद्योगिक केन्द्रों एवं बड़े नगरों में वेश्यावृत्ति, शराबखोरी, जुआ, बाल-अपराध, हत्याएँ, आत्महत्याएँ, चोरी, डकैती, गबन एवं अन्य अपराधी व्यवहारों की बहुलता पायी जाती है।

11. संयुक्त परिवार का विघटन –
परम्परागत भारतीय परिवार संयुक्त प्रकृति के होते थे। परिवार के सभी कार्यों पर वयोवृद्ध व्यक्ति का नियन्त्रण होता था। औद्योगीकरण एवं नुगरीकरण के प्रभाव के कारण परम्परात्मक संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ। परिणामस्वरूप नगरों में छोटे-छोटे एकाकी परिवार बनने लगे। संयुक्त परिवार के ढाँचे एवं कार्यों में अनेक परिवर्तन हुए।

12. स्वास्थ्य की समस्या –
शहर में स्वच्छ वातावरण का अभाव होता है। मकानों में भीड़-भाड़, वायु प्रदूषण, मिल, फैक्ट्री का धुआँ, स्थान की कमी, रोशनी एवं स्वच्छ हवा का अभाव, गड़गड़ाहट एवं बहरा कर देने वाला शोरगुल, खटमल, मच्छर आदि की अधिकता, छूत के रोग, बदबूदार एवं सीलन भरे कमरे आदि सभी मिलकर स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। शहरों में मृत्यु-दर गाँव की अपेक्षा अधिक होने का यही प्रमुख कारण है। स्वच्छ वातावरण । प्रदान करने एवं मनोरंजन हेतु वहाँ पार्क, बगीचों एवं खेलकूद की सुविधाएँ जुटायी जाती हैं।

औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के दोषों को दूर करने के उपाय

जहाँ औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण लोगों को अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं, वहाँ इनके प्रभाव के कारण अनेक समस्याएँ भी पैदा हुई हैं। औद्योगीकरण के इन दोषों को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रभावी होंगे

  1.  नियोजित नगरों का निर्माण किया जाए, जिनमें मानव-जीवन से सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति उचित प्रकार से की जाए। यहाँ व्यवसाय सम्बन्धी सुविधाएँ भी समुचित मात्रा में उपलब्ध
    करायी जाएँ।
  2. जहाँ तक सम्भव हो उद्योगों को विकेन्द्रीकरण किया जाए तथा बड़े-बड़े उद्योगों के स्थान पर छोटे-छोटे उद्योग स्थापित किये जाएँ।
  3. ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाए, जिससे गाँव से नगरों की ओर रोजगार की खोज में लोगों का आना बन्द हो।
  4. श्रमिकों की समस्याओं को हल करने तथा उनके हितों की रक्षा के लिए श्रम-कानून एवं कल्याणकारी कदम उठाये जाएँ।
  5. उद्योगों के वातावरण को स्वस्थ बनाया जाए।
  6. श्रमिकों के निवास, जल, बिजली एवं मनोरंजन के साधनों की उचित व्यवस्था की जाए।
  7. गन्दी बस्तियों के निर्माण पर रोक लगायी जाए तथा सरकार स्वयं भवन-निर्माण का कार्य करे। तथा भवन बनाने हेतु अधिकाधिक ऋण की व्यवस्था करे।
  8. उद्योगों की स्थापना नगरों से दूर हो।
  9.  श्रम संगठनों को कुशल, उपयोगी एवं मजबूत बनाया जाए। उनके आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ होने के लिए उन्हें आर्थिक सहायता दी जाए।
  10.  श्रमिकों में कुशल नेतृत्व का विकास किया जाए। अधिकांश मजदूर संगठनों का नेतृत्व श्रमिकों के हाथ में न होकर राजनेताओं के हाथ में है। इसे उनके प्रभावों से मुक्त किया जाए।
  11. श्रमिकों को सस्ते दामों पर वस्तुएँ दिलाने के लिए सरकारी उपभोक्ता भण्डार तथा चिकित्सा के लिए अस्पताल आदि की सुविधाएँ जुटायी जाएँ।

प्रश्न 5
औद्योगीकरण को परिभाषित कीजिए तथा पर्यावरण पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए।
या
नगरीकरण द्वारा पर्यावरण पर पड़ रहे दो दुष्प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
औद्योगीकरण का पर्यावरण पर प्रभाव लिखिए। [2009]
उत्तर:
औद्योगीकरण की परिभाषा

विभिन्न विद्वानों द्वारा औद्योगीकरण की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

एम० एस० गोरे के अनुसार, “औद्योगीकरण उस प्रक्रिया से सम्बन्धित है जिसमें वस्तुओं का उत्पादन हाथ से न होकर विद्युतशक्ति द्वारा चालित मशीनों से किया जाता है।”
गैराल्ड ब्रीज के अनुसार, “किसी समाज में औद्योगीकरण का प्रथम चरण छोटी-छोटी मशीनों के विकास पर बल देता है, जबकि अन्तिम चरण बड़ी-बड़ी मशीनों के विकास पर केन्द्रित होता है।”
फेयरचाइल्ड के शब्दों में, “औद्योगीकरण विज्ञान द्वारा प्रौद्योगिक विकास की प्रक्रिया है; इसमें शक्ति-चालित यन्त्रों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। अतः एक व्यापक बिक्री के लिए उत्पादन एवं उपयोग में आने वाली सामग्री को तैयार किया जाता है। इस बड़े पैमाने का उत्पादन श्रम-विभाजन द्वारा होता है।”
विलबर्ट ई० मूर के शब्दों में, “औद्योगीकरण से अभिप्राय आर्थिक उत्पादन के लिए अमानवीय शक्तियों को अधिक प्रयोग तथा संचार संगठन एवं अन्य व्यवस्थाओं में परिवर्तन से है।”

पी-कांग-चांग के अनुसार, “औद्योगीकरण से अर्थ उस प्रक्रिया से है जिसके अन्तर्गत उत्पादन के कार्यों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते रहते हैं। इनमें वे आधारभूत परिवर्तन भी सम्मिलित किये जाते हैं जिनका सम्बन्ध किसी औद्योगिक उपक्रम के यन्त्रीकरण, नवीन उद्योगों का निर्माण, नये बाजारों की स्थापना तथा किसी नवीन क्षेत्र के विकास से है। वह एक प्रकार से पूँजी को गहन तथा व्यापक बनाने की विधि है।”

ऊपर वर्णित परिभाषाओं से स्पष्ट है कि औद्योगीकरण उद्योगों के विकास की एक प्रक्रिया है, जिसमें बड़े पैमाने पर उद्योग लगाए जाते हैं तथा हाथ से किया जाने वाला उत्पादन मशीनों से किया जाने लगता है। औद्योगीकरण शब्द का प्रयोग व्यापक एवं संकुचित दो अर्थों में हुआ है। संकुचित अर्थ में औद्योगीकरण से तात्पर्य निर्माता-उद्योगों की स्थापना एवं विकास से है। इस अर्थ में औद्योगीकरण आर्थिक विकास की प्रक्रिया का ही एक भाग है जिसका उद्देश्य उत्पादन के साधनों की कुशलता में वृद्धि करके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना है। व्यापक अर्थ में, “औद्योगीकरण के द्वारा देश की सम्पूर्ण आर्थिक संरचना को परिवर्तित किया जा सकता है।”

औद्योगीकरण एवं नगरीकरण का पर्यावरण पर प्रभाव

औद्योगीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें लघु एवं कुटीर उद्योगों का स्थान बड़े पैमाने के उद्योग ले लेते हैं। उद्योगों में जड़ शक्ति का प्रयोग किया जाता है और उत्पादन मशीनों की सहायता से होता है। फलस्वरूप उत्पादन तीव्र गति से तथा विशाल मात्रा में होता है। औद्योगीकरण के विकास में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी ने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अन्तर्गत कोयला, विद्युत शक्ति, खनिज पदार्थ आदि की अधिकाधिक प्राप्ति तथा उनके प्रयोग पर बल दिया जाता है। छोटेछोटे उद्योगों के स्थान पर बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना अथवा बड़े पैमाने पर उद्योगों की स्थापना जिनमें प्राकृतिक संसाधनों का अधिकाधिक प्रयोग किया जाता हो तथा उत्पादन कार्य मशीनों की सहायता से होता हो, उसे औद्योगीकरण कहा जाता है।

1. प्रदूषित मकानों का जन्म – उद्योगों में काम करने के लिए गाँवों से लोग हजारों की संख्या में आते हैं। परिणामस्वरूप उनके निवास की समस्या पैदा होती है। शहरों में हवा वे रोशनी वाले मकानों का अभाव होता है। मकान महँगे होने के कारण कई व्यक्ति मिलकर एक ही कमरे में रहने लगते हैं। औद्योगिक केन्द्रों में मकान, भीड़-भाड़युक्त, सीलन भरे एवं बीमारियों के घर होते हैं। औद्योगीकरण एवं नगरीकरण ने गन्दी बस्तियों की समस्या को प्रमुखत: जन्म दिया है।

2. प्रदूषित वातावरण – शहर में स्वच्छ वातावरण का अभाव होता है। मकानों में भीड़-भाड़, वायु प्रदूषण, मिल-फैक्ट्री का धुआँ, स्थान की कमी, बन्द मकान, रोशनी एवं स्वच्छ हवा का अभाव, गड़गड़ाहट एवं बहरा कर देने वाला शोरगुल, खटमल, मच्छर, आदि की अधिकता, छूत के रोग, बदबूदार एवं सीलन भरे कमरे, आदि सभी मिलकर स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। शहरों में मृत्यु-दर गाँव की अपेक्षा अधिक होने का यही प्रमुख कारण है। स्वच्छ वातावरण प्रदान करने एवं मनोरंजन हेतु वहाँ पार्क, बगीचों एवं खेलकूद की सुविधाएँ जुटायी जाती हैं।

3. सांस्कृतिक पर्यावरण पर प्रभाव – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण ही यातायात एवं सन्देशवाहन के साधनों का विकास हुआ। नवीन साधनों ने विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को एक-दूसरे के नजदीक ला दिया, उनमें पारस्परिक समझ बढ़ी, पारस्परिक आदान-प्रदान हुआ, एक-दूसरे की फैशन, वस्त्र प्रणाली, धर्म, रीति-रिवाज, जीवन विधि आदि को अपनाना सम्भव हुआ। यही कारण है कि शहरों में जो औद्योगिक केन्द्र हैं, उनमें हम विभिन्न संस्कृतियों को साथ-साथ फलते-फूलते देख सकते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
“औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मजदूर समस्याओं एवं मजदूर संगठनों का जन्म होता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण अनेक मजदूर समस्याओं ने जन्म लिया। मजदूरों के स्वास्थ्य, काम के घण्टे, भर्ती, शिक्षा, बीमा, चिकित्सा, मकान, बोनस आदि से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का जन्म हुआ। इन्हें हल करने के लिए उन्होंने मजदूर संगठनों को निर्माण किया। इन समस्याओं के उचित तरीके से समाधान नहीं होने पर मजदूरों द्वारा काम रोक दिया जाता है और सम्पूर्ण आर्थिक जगत को इससे हानि होती है। हड़ताल, तालाबन्दी, तोड़फोड़, आगजनी, घेराव एवं हिंसात्मक उपद्रव होने लगे। कभी-कभी तो मजदूरों की समस्याओं को हल करने हेतु श्रम-कल्याण योजनाएँ बनायी गयीं। कुटीर व्यवसाय से सम्बन्धित कोई श्रम समस्याएँ नहीं थी, क्योंकि उनमें काम करने वाले एक ही परिवार व पड़ोस के व्यक्ति अथवा रिश्तेदार होते थे। उनमें परस्पर सहयोग और घनिष्ठ सम्बन्ध थे। अतः शोषण का प्रश्न ही नहीं था। सूर्योदय एवं सूर्यास्त होने के साथ-साथ काम के घण्टे तय होते थे, किन्तु औद्योगीकरण ने अनेक श्रम-समस्याओं को जन्म दिया है। इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत सरकार ने 1948 ई० में कारखाना अधिनियम पारित किया।

प्रश्न 2
“औद्योगीकरण कुटीर उद्योगों का ह्रास करते हैं।” इस कथन की सत्यता बताइए।
उत्तर:
औद्योगीकरण से पूर्व उत्पादन कुटीर उद्योगों द्वारा होता था, किन्तु जब मशीनों की सहायता से उत्पादन होने लगा जो कि हाथ से बने माल की अपेक्षा सस्ता, साफ व टिकाऊ होता था, तो उसके सामने गृह-उद्योग द्वारा निर्मित माल टिक नहीं सका। धीरे-धीरे कुटीर व्यवसाय समाप्त होने लगे और उनमें काम करने वाले तथा उनके मालिक कारखानों में श्रमिकों के रूप में सम्मिलित हुए। कुटीर व्यवसायों में व्यक्ति को काम करने के बाद जो मानसिक आनन्द मिलता था, वह कारखानों में समाप्त हो गया, क्योंकि अब वह सम्पूर्ण उत्पादन की प्रक्रिया का एक छोटा-सा भाग ही पूर्ण करने में सहयोग देता है। इस प्रकार औद्योगीकरण से ग्रामीण कुटीर उद्योगों एवं गृह-कला का ह्रास हुआ।

प्रश्न 3
औद्योगीकरण व नगरीकरण में चार अन्तर बताइए।
उत्तर:
औद्योगीकरण व नगरीकरण में गहरा सम्बन्ध है, फिर भी इनमें अन्तर पाये जाते हैं। इनमें चार अन्तर निम्नलिखित हैं

1. औद्योगीकरण गाँव एवं नगर दोनों ही स्थानों पर हो सकता है। इसके लिए गाँव छोड़कर नगर जाने की आवश्यकता नहीं है। ग्रामों में भी यदि बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना कर दी जाए अथवा उत्पादन शक्ति-चालित मशीनों से होने लगे तो वहाँ भी औद्योगीकरण हो जाएगा, किन्तु नगरीकरण में ग्रामीण जनसंख्या को ग्राम छोड़कर नगरों में जाना होता है।

2. औद्योगीकरण में कृषि व्यवसाय को छोड़ना होता है और उसके स्थान पर अन्य व्यवसायों में लगना होता है, जब कि नगरीकरण का सम्बन्ध कृषि, उद्योग, व्यापार, नौकरी एवं छोटे-छोटे व्यवसायों
से भी है। इस प्रकार नगरीकरण में कृषि और गैर-कृषि दोनों ही प्रकार के व्यवसाय किये जाते हैं।

3. औद्योगीकरण का सम्बन्ध उत्पादन की प्रणाली से है, जिसमें उत्पादन का कार्य मशीनों की सहायता से किया जाता है। आर्थिक वृद्धि से इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः मूलत: यह एक आर्थिक प्रक्रिया है, किन्तु नगरीकरण नगरीय बनने की एक प्रक्रिया है, जिसका सम्बन्ध एक विशेष प्रकार की जीवन-शैली, खान-पान, रहन-सहन, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक जीवन से है, जो नगर में निवास करने वाले लोगों में पाया जाता है।

4. सामान्यतः औद्योगीकरण नगरीकरण अथवा नगरों पर आधारित है; क्योंकि उद्योगों की स्थापना के लिए सुविधाओं; जैसे-बैंक मुद्रा, साख, श्रम, यातायात एवं संचार के साधन, पानी, बिजली, बाजार, कच्चा माल आदि की आवश्यकता होती है, वे सभी नगरों में उपलब्ध होती हैं। अतः कहा जाता है कि औद्योगिक समाज नगरीय समाज ही है, जब कि नगरीकरण औद्योगीकरण के बिना भी सम्भव है। प्राचीन समय में जब उत्पादन कार्य बिना मशीनों की सहायता से नहीं किया जाता था तब भी नगर मौजूद थे। उस समय नगर धार्मिक, राजनीतिक, शैक्षणिक एवं व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थल थे। तीर्थस्थान, राजधानियाँ, शिक्षा व संस्कृति के केन्द्र तथा व्यापारिक मण्डियाँ ही तब नगर कहलाते थे।

प्रश्न 4
नगरीकरण के समाज पर चार प्रभावों को समझाइए। [2007, 09]
उत्तर:
नगरीकरण के समाज पर चार प्रभाव निम्नलिखित हैं

1. सम्बन्धों में औपचारिकता – जीवन का क्षेत्र नगरीकरण के कारण विस्तृत होता है। नगरों की जनसंख्या अधिक होती है। अतः आमने-सामने के घनिष्ठ एवं औपचारिक सम्बन्ध, जो कि लघु समुदायों में सम्भव होते हैं, नगरों में सम्भव नहीं होते। सम्बन्धों में औपचारिकता बढ़ जाती है।

2. एकाकी परिवारों में वृद्धि – भारत में नगरों का विकास हो जाने से संयुक्त परिवारों का विघटन होता जा रहा है। नगरों में व्यावसायिक विजातीयता से एकाकी परिवारों को प्रोत्साहन मिलता है। अब एकाकी परिवारों में वृद्धि के कारण व्यक्तियों में सामाजिक सम्बन्धों की घनिष्ठ ता समाप्त हो चली है तथा साथ-ही पारिवारिकता की भावना का अन्त हो गया है।

3. फैशन का बोलबाला – नगरों में सामाजिक जीवन में बनावट आ गयी है। नगरों में चमके दमक, सजावट तथा आकर्षण का महत्त्व बढ़ गया है। चारों ओर फैशन का बोलबाला हो रहा है तथा सामाजिक रहन-सहन के स्तर में भारी अन्तर आ गया है। साथ ही जीवन के प्रति दृष्टिकोण में भी अन्तर आ गया हैं।

4. सामाजिक विजातीयता – नगरों में विभिन्न जातियों, पेशों तथा संस्कृति के लोग पाये जाते हैं। एक ही जाति एवं धर्म के लोगों के सामूहिक निवास का नगरों में अभाव होता है। अतः नगर के लोग स्थायी सम्बन्धों की स्थापना करने में असफल रहे हैं। नगर के लोगों में पीढ़ीदर-पीढ़ी चलने वाले सम्बन्धों का अभाव पाया जाता है; क्योंकि नगरों में विभिन्न प्रकार के व्यक्ति निवास करते हैं, जो उद्देश्यों तथा संस्कृति में समान नहीं होते हैं, इसलिए नगरीकरण के कारण सम्बन्धों में विजातीयता बढ़ गयी है।

प्रश्न 5
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण ने भारत में संयुक्त परिवार को किस प्रकार प्रभावित किया है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में हजारों वर्षों से चली आ रही संयुक्त परिवार-प्रणाली भी प्रभावित हुई है। संयुक्त परिवार पर इसके प्रमुख रूप से निम्नलिखित प्रभाव पड़े हैं

1. सीमित आकार – इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप परिवार के आकार में कमी हुई है। नगरों व औद्योगिक केन्द्रों में शिक्षा के प्रसार तथा परिवार नियोजन के कारण परिवार के सदस्यों की कमी हुई है और संयुक्त परिवार का आकार पहले की तुलना में सीमित हो गया है।

2. कार्यों में परिवर्तन – परम्परागत रूप से परिवार अपने सदस्यों के लिए शिक्षा, मनोरंजन, स्वास्थ्य बीमा तथा अन्य सभी प्रकार के कार्य करता था, परन्तु आज इसके सभी परम्परागत कार्य अन्य विशेषीकृत समितियों ने ले लिये हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा का कार्य शिक्षा संस्थाओं तथा स्वास्थ्य सुरक्षा का कार्य अस्पतालों ने ले लिया है।

3. पारिवारिक नियन्त्रण में कमी – परिवार के परम्परागत कार्यों में कमी के साथ ही परिवार का व्यक्ति पर नियन्त्रण कम हुआ है। आज पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ परिवार के कठोर नियन्त्रण को पसन्द नहीं करते हैं। अतः सामाजिक नियन्त्रण में इनका महत्त्व कम हो गया है।

4. एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ है तथा एकल परिवारों की संख्या में वृद्धि हुई है। आज नगरीय तथा औद्योगिक क्षेत्रों में इसी कारण एकल परिवारों की संख्या संयुक्त परिवारों की संख्या से कहीं अधिक है।

5. संरचना में परिवर्तन – संयुक्त परिवार की परम्परागत संरचना में काफी परिवर्तन हुआ है। कर्ता की स्थिति, स्त्रियों की स्थिति तथा विधवाओं की स्थिति में परिवर्तन हुआ है।

6. सम्बन्धों में परिवर्तन – औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण व्यक्तिवादिता में वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप परिवार के सदस्यों के सम्बन्धों में औपचारिकता आती जा रही है। स्त्रियों के बाहर काम करने से भी सम्बन्ध प्रभावित हुए हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
औद्योगीकरण क्या है?
उत्तर:
‘औद्योगीकरण’ शब्द एक प्रकार से यन्त्रीकरण का पर्यायवाची है। जब मशीनों का अधिकाधिक प्रयोग करके किसी वस्तु का उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जाता है तो उसे औद्योगीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। इस प्रकार ‘औद्योगीकरण’ उस प्रक्रिया को कहा जा सकता है, जिसके अन्तर्गत उत्पादन की आधुनिक व्यवस्था एवं सम्बन्धित संस्थाओं का विकास एवं प्रसार होता है। समाजशास्त्र में इसका अर्थ उद्योगों के विकास एवं उत्पादन की आधुनिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप समाज के विभिन्न पक्षों में होने वाले परिवर्तनों के लिए किया जाता है।

प्रश्न 2
औद्योगीकरण का अर्थ बताते हुए उसकी चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
औद्योगीकरण का अर्थ-औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आधुनिक उद्योगों एवं सम्बन्धित संस्थाओं का विकास व प्रसार होता है। इसमें आर्थिक उत्पादन हेतु अमानवीय शक्ति (मशीनों आदि) का अधिकाधिक प्रयोग होता है। औद्योगीकरण की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. यह मानवीय शक्ति की अपेक्षा मशीनी शक्ति पर बल देता है।
  2.  इसकी प्रमुख विशेषता श्रम-विभाजन और विशिष्टीकरण है।
  3.  इसके कारण प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।
  4. यह प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम तथा योजनाबद्ध दोहन पर बल देता है।

प्रश्न 3
औद्योगीकरण के चार उद्देश्य लिखिए। [2008, 10, 13, 15]
उत्तर:
औद्योगीकरण के चार उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. नवीन उद्योगों की स्थापना करना,
  2.  हाथ की अपेक्षा मशीनों द्वारा उत्पादन करना,
  3. मानव-शक्ति व पशु-शक्ति के स्थान पर जड़ शक्ति; जैसे – कोयला, डीजल आदि का प्रयोग करना तथा ।
  4.  उत्पादन को तीव्र गति से विशाल पैमाने पर करना।

प्रश्न 4
भारत में औद्योगीकरण के कोई दो आर्थिक प्रभाव बताइए। [2009]
उत्तर:
1. आर्थिक आधार पर स्तरीकरण-भारत में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप उत्पादन कार्य बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा बड़े-बड़े कारखानों व मिलों में किया जाने लगा है। इससे समाज दो भागों में वर्गीकृत हो गया है-पूँजीपति और श्रमिक।
2. कुटीर व लघु उद्योगों पर प्रभाव-भारत में औद्योगीकरण का प्रत्यक्ष प्रभाव कुटीर एवं लघु उद्योगों पर पड़ा है। वे लगभग नष्ट हो गये हैं तथा उनसे सम्बन्धित व्यक्ति बेकार हो गये हैं।

प्रश्न 5
भारत में औद्योगीकरण के चार सामाजिक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में औद्योगीकरण के चार सामाजिक प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1.  नगरीकरण एवं गन्दी बस्तियों की स्थापना,
  2.  जनसंख्या का स्थानान्तरण,
  3.  कुटीर उद्योगों का पतन तथा ।
  4.  श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण।

प्रश्न 6
नगरीकरण की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
नगरीकरण की चार विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1. नगरीकरण ग्रामों के नगरों में बदलने की प्रक्रिया का नाम है।
  2. नगरीकरण में लोग कृषि व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसाय करने लगते हैं।
  3. नगरीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें लोग गाँव छोड़कर शहरों में निवास करने लगते हैं जिससे शहरों का विकास, प्रसार एवं वृद्धि होती है।
  4. नगरीकरण जीवन जीने की एक विधि है, जिसका प्रसार शहरों से गाँवों की ओर होता है। नगरीय जीवन जीने की विधि को नगरीयता या नगरवाद कहते हैं। नगरवाद केवल नगरों तक ही सीमित नहीं होता वरन् गाँव में रहकर भी लोग नगरीय जीवन विधि को अपना सकते हैं।

प्रश्न 7
पश्चिमीकरण से आप क्या समझते हैं? [2012, 15]
उत्तर:
विश्व को संस्कृति के आधार पर दो भागों में विभाजित किया गया है। एक भाग पूर्वी विश्व और दूसरा भाग पश्चिमी विश्व के नाम से पुकारा जाता है। पूर्व में अध्यात्मवादी संस्कृति का बोलबाला है और पश्चिमी विश्व में भौतिकवादी संस्कृति का महत्त्व है। जब पूर्व के देशों में पश्चिम की भौतिकवादी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने लगा है और इसके परिणामस्वरूप गैर पश्चिमी देशों में परिवर्तन होने लगते हैं, तो हम उसको पश्चिमीकरण के नाम से पुकारते हैं। एम० एन० श्रीनिवास के अनुसार, “150 वर्षों के अंग्रेजी राज्य के फलस्वरूप भारतीय समाज में संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों को पश्चिमीकरण से सम्बोधित किया जा सकता है। यह शब्द प्रौद्योगिकी, संस्थाएँ, विचारधारा और मूल्य आदि विभिन्न स्तरों पर आधारित होने वाले परिवर्तनों को आत्मसात् करता है।

प्रश्न 8
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के परिणाम के रूप में सामाजिक विघटन तथा अपराधों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण समाज-विरोधी कार्यों एवं अपराधों में वृद्धि हुई। नगरों में नियन्त्रण के अभाव में सामाजिक नियमों की अवहेलना की जाती है, जिससे समाज में विघटनकारी प्रवृत्तियाँ प्रबल होती हैं। औद्योगिक केन्द्रों एवं बड़े नगरों में वेश्यावृत्ति, शराबखेरी, जुआ, बाल-अपराध, हत्याएँ, आत्महत्याएँ, चोरी, डकैती, गबन एवं अन्य अपराधी व्यवहारों की बहुलता पायी जाती है। इन्हें हम अपराध के केन्द्र कह सकते हैं।

प्रश्न 9
ब्रीज के अनुसार नगरीकरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
ब्रीज के अनुसार, “नगरीकरण एक प्रक्रिया है जिसके कारण लोग नगरीय कहलाने लगते हैं, कृषि के स्थान पर अन्य व्यवसायों को अपनाते हैं, जो नगर में उपलब्ध हैं और अपने व्यवहार प्रतिमान में अपेक्षाकृत परिवर्तन का समावेश करते हैं।”

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
नगरीकरण क्या है ? [2013]
उत्तर:
नगरीकरण का अर्थ है-नगरों का उद्भव, विकास, प्रसार एवं पुनर्गठन। नगरीकरण में लोग आसपास के स्थानों से आकर नगरों में बस जाते हैं।

प्रश्न 2
भारत के तीन बड़े उद्योगों के नाम बताइए।
उत्तर:
भारत के तीन बड़े उद्योगों के नाम हैं – सूती वस्त्र, लौह-इस्पात एवं चीनी उद्योग।

प्रश्न 3
नगरीय जनसंख्या में वृद्धि की प्रक्रिया को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
नगरीय जनसंख्या में वृद्धि की प्रक्रिया को नगरीकरण कहते हैं।

प्रश्न 4
भारत नगर-प्रधान देश है। उत्तर हाँ अथवा नहीं में दीजिए।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 5
“ग्रामीण क्षेत्रों को नगरीय क्षेत्रों में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को ही हमें नगरीकरण कहना चाहिए।” यह कथन किसने दिया? [2012]
उत्तर:
बगैल ने।

प्रश्न 6
प्राथमिक उद्योगों में कार्यरत जनसंख्या में आनुपातिक वृद्धि औद्योगीकरण को परिचायक है। सत्य/असत्य।। [2011]
उत्तर:
असत्य।

प्रश्न 7
नगरीकरण और औद्योगीकरण एक-दूसरे के पर्याय हैं। सत्य/असत्य। [2011]
उत्तर:
सत्य।

प्रश्न 8
श्रम कल्याण का अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2015]
उत्तर:
श्रम कल्याण का अर्थ श्रमिकों के सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए उपलब्ध की जाने वाली दशाओं से है।

प्रश्न 9
‘मृत्यु-दर’ से आप क्या समझते हैं? [2015]
उत्तर:
किसी एक वर्ष में प्रति 1,000 जनसंख्या पर मृतकों की संख्या को मृत्यु-दर कहा जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निम्नलिखित में कौन-सा औद्योगीकरण का परिणाम है ?
(क) स्त्रियों को मतदान का अधिकार मिलना
(ख) विशेष विवादों को प्रोत्साहन मिलना
(ग) संयुक्त परिवार का विघटन होना ।
(घ) जोत की अधिकतम सीमा तय होना

प्रश्न 2
कारखाना अधिनियम भारत में किस वर्ष पास हुआ था ?
(क) 1947 ई० में
(ख) 1948 ई० में
(ग) 1950 ई० में
(घ) 1976 ई० में

प्रश्न 3
‘दि डिवीजन ऑफ लेबर’ नामक पुस्तक के लेखक कौन है ? [2009]
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) इमाइल दुर्चीम
(ग) मैक्स वेबर
(घ) एच० एम० जॉनसन

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से कौन-सा विराट नगर नहीं है ?
(क) मुम्बई
(ख) कोलकाता
(ग) चेन्नई
(घ) अहमदाबाद

प्रश्न 5
औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम कहाँ हुई ? [2011]
(क) अमेरिका में
(ख) फ्रांस में
(ग) इटली में
(घ) इंग्लैण्ड में

प्रश्न 6
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम किस वर्ष लागू किया गया ? [2011]
(क) 1950 ई० में
(ख) 1956 ई० में
(ग) 1976 ई० में
(घ) 1986 ई० में

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन एक शहर की विशेषता है? [2015]
(क) बड़ा आकार
(ख) जनसंख्या का उच्च घनत्व
(ग) गैर-कृषि व्यवसाय
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (ग) संयुक्त परिवार का विघटन होना,
2. (ख) 1948 ई० में,
3. (क) कार्ल मार्क्स,
4. (घ) अहमदाबाद,
5. (घ) इंग्लैण्ड में,
6. (घ) 1986 ई० में,
7. (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 4 Memory and Forgetting

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 4 Memory and Forgetting (स्मृति एवं विस्मरण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Psychology Chapter 4 Memory and Forgetting(स्मृति एवं विस्मरण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Memory and Forgetting
(स्मृति एवं विस्मरण)
Number of Questions Solved 35
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 4 Learning (अधिगम या सीखना)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्मृति (Memory) से आप क्या समझते हैं? परिभाषा दीजिए तथा स्मृति की प्रक्रिया के 
मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
या
स्मृति को परिभाषित कीजिए। 
(2009)
या
स्मृति से आप क्या समझते हैं? स्मृति के अंशों (तत्त्वों) को स्पष्ट कीजिए। (2016)
या
स्मृति की प्रक्रिया को विस्तार से समझाइए। 
(2018)
उत्तर
‘स्मृति’ मनुष्य में निहित एक विशिष्ट शक्ति का नाम है। यह ऐसी योग्यता है जिसमें व्यक्ति सीखी गयी विषय-सामग्री को धारण करता है तथा धारणा से सूचना को एकत्रित कर सूचना को उत्तेजनाओं के प्रत्युत्तर में पुनः उत्पादित कर अधिगम सामग्री को पहचानता है। स्मृति का मानव-जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। प्राचीन भारत में वेदों को स्मृति के माध्यम से संचित तथा हस्तान्तरित किया गया था।

‘स्मृति का अर्थ

सामान्यतः स्मृति का अर्थ है किसी ज्ञान या अनुभव को याद करना। स्मृति के सम्बन्ध में प्रचलित ‘अनोखी शक्ति विषयक धारणा धीरे-धीरे मानसिक प्रक्रिया में परिवर्तित हो गयी; अतः स्मृति का अर्थ समझने के लिए इस प्रक्रिया का सार तत्त्व समझना आवश्यक है।

मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से अर्जित उत्तेजना (अथवा अनुभव या ज्ञान) उसके मस्तिष्क में संस्कार के रूप में अंकित हो जाती है और इस भाँति वातावरण की प्रत्येक उत्तेजना का मानव-मस्तिष्क में एक संस्कार बन जाता है। ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त विभिन्न संस्कार आगे चलकर संगठित स्वरूप धारण कर लेते हैं और चेतन मन से अर्द्ध-चेतन मन में चले जाते हैं। ये संस्कार/अनुभव या ज्ञान, वहीं अर्द्ध-चेतन मन में संगृहीत रहते हैं तथा समयानुसार चेतन मन में प्रकट भी होते रहते हैं। अतीत काल के किसी विगत अनुभव के अर्द्ध-चेतन मन से चेतन मन में आने की इस प्रक्रिया को ही स्मृति कहा जाता है। उदाहरणार्थ-बहुत पहले कभी मोहन ने नदी के एक घाट पर व्यक्ति को डूबते हुए देखा था। आज पुनः नदी के उस घाट पर स्नान करते समय उसे डूबते हुए व्यक्ति को स्मरण हो आया और भूतकाल की घटना का पूरा चित्र उसकी आँखों के सामने आ गया।

विद्वानों के मतानुसार सीखने की क्रियाओं को स्मृति की क्रियाओं से पृथक् नहीं किया जा सकता। अच्छी स्मृति या स्मरण शक्ति से हमारा अर्थ-सीखना, याद करना अथवा पुनःस्मरण (recall) से है।

स्मृति की परिभाषा

अनेक मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. स्टाउद के अनुसार, “स्मृति एक आदर्श पुनरावृत्ति है जिसमें अनुभव की वस्तुएँ यथासम्भव मौलिक घटना के क्रम तथा ढंग से पुनस्र्थापित हैं।”
  2. वुडवर्थ के शब्दों में, “बीते समय में सीखी हुई बातों को याद करना ही स्मृति है।”
  3. जे० एस० रॉस के अनुसार, “स्मृति एक नवीन अनुभव है जो उन मनोदशाओं द्वारा निर्धारित होता है जिनका आधार एक पूर्व अनुभव है, दोनों के बीच का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से समझा जाता है।”
  4. मैक्डूगल के मतानुसार, “घटनाओं की उस भाँति कल्पना करना जिस भाँति भूतकाल में उनका अनुभव किया गया था तथा उन्हें अपने ही अनुभव के रूप में पहचानना स्मृति है।”
  5. चैपलिन के अनुसार “पूर्व में अधिगमित विषय के स्मृति-चिह्नों को धारण करने और उन्हें वर्तमान चेतना में लाने की प्रक्रिया को स्मरण कहते हैं।”
  6. रायबर्न के अनुसार, “अनुभवों को संचित रखने तथा उन्हें चेतना के केन्द्र में लाने की प्रक्रिया को स्मृति कहा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन एवं विश्लेषण से ज्ञात होता है कि स्मृति यथावत् प्राप्त पूर्व-अनुभवों को उसी क्रम से पुनः याद करने से सम्बन्धित है। यह एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। जिसके अन्तर्गत संस्कारों को संगठित करके धारण करना तथा हस्तान्तरित अनुभवों को पुन:स्मरण करना शामिल है जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के पुराने अनुभव उसकी चेतना में आते हैं। दूसरे शब्दों में, “पूर्व अनुभवों को याद करने, दोहराने या चेतना के स्तर पर लाने की मानसिक क्रिया स्मृति कहलाती है।”

स्मृति के तत्त्व

स्मृति के चार प्रमुख तत्त्व हैं-सीखना, धारणा, पुन:स्मरण या प्रत्यास्मरण तथा प्रत्यभिज्ञा या पहचान। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

(1) सीखना (Learming)-‘सीखना या अधिगम’ स्मृति का आधारभूत तत्त्व है। स्मृति की क्रियाएँ सीखने से उत्पन्न होती हैं। वुडवर्थ ने स्मृति को सामान्य रूप से सीखने का एक अंग माना है ,तथा स्मरण को सीखे गये तथ्यों का सीधा, उपयोग बताया है। जब तक कोई ज्ञान, अनुभव यर तथ्य मस्तिष्क में पहुँचकर अपना संस्कार नहीं बनायेगा तब तक स्मरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो ही नहीं सकती। सीखी हुई बातें पहले अवचेतन मन में एकत्र होती हैं और बाद में याद की जाती हैं; अतः। सीखना स्मरण के लिए सबसे पहली शर्त है।

(2) धारणा (Retention)- सीखने के उपरान्त किसी ज्ञान या अनुभव को मस्तिष्क में धारण कर लिया जाता है। किसी समय-विशेष में जो कुछ सीखा जाता है, मनुष्य के मस्तिष्क में वह स्मृति चिह्नों या संस्कारों के रूप में स्थित हो जाता है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से आये सभी संस्कार एक संगठित अवस्था में अवचेतन मन में संगृहीत होते हैं। वस्तुतः स्मृति-चिह्नों या संस्कारों के संगृहीत होने की क्रिया ही धारणा है। आवश्यकतानुसार इन संगृहीत संस्कारों को पुनः दोहराया जा सकता है।

(3) पुनःस्मरण या प्रत्यास्मरण (Recall)- सीखे गये अनुभवों को पुनः दोहराने या चेतना में लाने की क्रिया पुन:स्मरण या प्रत्यास्मरण कहलाती है। यह क्रिया निम्नलिखित चार प्रकार की होती है-

  1. प्रत्यक्ष पुनःस्मरण- प्रत्यक्ष पुन:स्मरण में विगत की कोई सामग्री, बिना किसी दूसरे साधन अथवा अनुभव का सहारा लिये, हमारे चेतन मन में आ जाती है।
  2. अप्रत्यक्ष पुनःस्मरण- अप्रत्यक्ष पुन:स्मरण में विगत की कोई सामग्री, किसी अन्य वस्तु या अनुभव के माध्यम से, हमारे चेतन मन में उपस्थित हो जाती है; जैसे-मित्र के पुत्र को देखकर हमें अपने मित्र की याद आ जाती है।
  3. स्वतः पुनःस्मरण- स्वतः पुन:स्मरण में व्यक्ति को बिना किसी प्रयास के अनायास ही किसी सम्बन्धित वस्तु, घटना या व्यक्ति का स्मरण हो आता है; जैसे-बैठे-ही-बैठे स्मृति पटल पर मित्र-मंण्डली के साथ नैनीताल की झील में नौकाविहार का दृश्य उभर आना।
  4. प्रयासमय पुनःस्मरण- जब भूतकाल के अनुभवों को विशेष प्रयास करके चेतन मन में लाया जाता है तो वह प्रयासमय पुन:स्मरण कहलाएगा।

(4) प्रत्यभिज्ञा या पहचान (Recognition)- प्रत्यभिज्ञा या पहचान, स्मृति का चतुर्थ एवं अन्तिम तत्त्व है जिसका शाब्दिक अर्थ है-‘किसी पहले से जाने हुए विषय को पुनः जानना या पहचानना। जब कोई भूतकालीन अनुभव, चेतन मन में पुन:स्मरण या प्रत्याह्वान के बाद, सही अथवा गलत होने के लिए पहचान लिया जाता है तो स्मृति का यह तत्त्व प्रत्यभिज्ञा या पहचान कहलाएगा। उदाहरणार्थ–राम और श्याम कभी लड़कपन में सहपाठी थे। बहुत सालों बाद वे एक उत्सव में मिले। राम ने श्याम को पहचान लिया और अतीतकाल के अनुभवों की याद दिलायी जिनका प्रत्यास्मरण करके श्याम ने भी राम को पहचान लिया।

प्रश्न 2
स्मृति के तत्त्वों (सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण तथा प्रत्यभिज्ञा) को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
या 
स्मृति प्रक्रिया के लिए कौन-कौन सी अनुकूल परिस्थितियाँ हैं? विस्तार से बताइए। 
(2010)
या
धारणा को प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2009)
उत्तर

स्मृति की अनुकूल परिस्थितियाँ 

हम जानते हैं कि स्मृति के चार तत्त्व हैं-सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण तथा प्रत्यभिज्ञा। स्मृति की अनुकूल परिस्थितियों अथवा प्रभावित करने वाले तत्त्वों को जानने के लिए इन चारों कारकों को प्रभावित करने वाले कारकों को जानना अभीष्ट होगा।

प्रथम तत्त्व ‘अधिगम या सीखना’ का वर्णन हम पिछले अध्याय में कर चुके हैं; अत: यहाँ हम इन चार तत्त्वों में से सिर्फ धारणा, प्रत्यास्मरण तथा प्रत्यभिज्ञा की अनुकूल परिस्थितियों का वर्णन करेंगे।

धारणा को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ

बहुत-सी शारीरिक एवं मानसिक परिस्थितियाँ धारणा की प्रक्रिया में सहायक और अनुकूल सिद्ध होती हैं। इन परिस्थितियों का संक्षिप्त विवेचन अग्र प्रकार है-

(1) सामग्री का स्वरूप- धारणा पर याद की जाने वाली विषय-सामग्री के स्वरूप का कफी प्रभाव पड़ता है। धारणा की प्रक्रिया से सम्बन्धित विषय-सामग्री के स्वरूप में निम्नलिखित विशेषताओं की प्रभावपूर्ण भूमिका रहती है-

(i) उत्तेजना का अर्थ- मनोवैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर किये गये प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि सार्थक उत्तेजनाओं को व्यक्ति का मस्तिष्क लम्बे समय तक धारण करता है जबकि निरर्थक उत्तेजनाओं को धारण करने की प्रवृत्ति बहुत कम पायी जाती है। याद किये जाने वाला विषय सार्थक होना चाहिए अर्थात् याद करने वाला व्यक्ति उसका अर्थ भली-भाँति समझता हो।

(ii) उत्तेजना की स्पष्टता- उत्तेजना की स्पष्टता भी धारणा की सहायक दशा है। स्पष्ट उत्तेजनाओं को मस्तिष्क अधिक देर तक धारण रख पाता है, किन्तु अस्पष्ट उत्तेजनाएँ मस्तिष्क में अधिक समय तक नहीं रुक पातीं। किसी वाक्य का जितना अधिक अर्थ स्पष्ट होगा उतने ही अधिक समय तक वह स्मृति में भी रहेगा।

(iii) उत्तेजना की तीव्रता- तीव्र उत्तेजनाओं का स्मृति की धारण-शक्ति पर गहरा प्रभाव होता है। तीव्र प्रकाश, सौन्दर्य की तीव्र अनुभूति, तीव्र मादक सुगन्ध तथा दुर्घटना का तीखा अनुभव लम्बे समय तक स्मृति में बने रहते हैं।

(iv) उत्तेजना का काल- विषय-सामग्री से सम्बन्धित उत्तेजना जितने अधिक समय तक उपस्थित रहती है, मस्तिष्क में उसकी धारणा भी उतनी ही अधिक गहरी होती है।।

(v) उत्तेजना की ताजगी- ताजा या हाल की उत्तेजना मस्तिष्क पर नये संस्कार छोड़ती है और उसकी धारणा अधिक होती है। पुरानी होती जाती उत्तेजना के संस्कार पुराने पड़ते जाते हैं। जिससे धारण-शक्ति कम होती जाती है।

(vi) उत्तेजना की पुनरावृत्ति- बार-बार मस्तिष्क के सामने आने वाली उत्तेजना का प्रभाव गहरा तथा दीर्घकालीन होता है। इसी कारण पाठ की पुनरावृत्ति (बार-बार दोहराना) पर बल दिया जाता है।

(2) सामग्री की मात्रा– सामग्री की मात्रा, धारणा को प्रभावित करने वाली एक महत्त्वपूर्ण दशा है। अधिक मात्रा वाली सामग्री को याद करने में व्यक्ति को अधिक श्रम करना होता है तथा वह उससे सम्बन्धित विभिन्न भागों के बीच अच्छी तरह सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। परिणामतः याद की गई विषय-सामग्री स्थायी होती है। क्योंकि कम मात्रा वाली सामग्री मस्तिष्क के सामने कम समय तक रहती है; अतः उसकी धारणा अधिक समय तक स्थिर नहीं रह पाती।

(3) सीखने की विधियाँ- सीखने की विधियाँ भी मस्तिष्क की धारण शक्ति को प्रभावित करती हैं। प्रभावपूर्ण स्मृति के लिए मनोवैज्ञानिक विधियों की सहायता ली जाती है। सक्रिय, व्यवधान एवं पूर्ण विधि के माध्यम से सीखना श्रेयस्कर माना जाता है। सीखने की विधियों में अभिरुचि का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(4) सीखने की मात्रा- अधिक मात्रा में सीखी गई सामग्री अधिक समय तक तथा कम मात्रा में सीखी गई सामग्री कम समय तक प्रभाव रखती है। इसी कारणवश लोग अच्छी स्मृति के लिए विषय-सामग्री के अतिशिक्षण (Over learning) पर जोर देते हैं। लुह, ठूगर तथा एबिंगहास नामक मनोवैज्ञानिकों के प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि अतिशिक्षण अच्छी स्मृति एवं स्थायी धारणा के लिए अनुकूल व सहायक दशा है।

(5) सीखने की गति- सीखने की गति धारणा को प्रभावित करती है। तीव्र गति से सीखे जाने वाले ज्ञान अथवा विषय की धारण-शक्ति, मन्दगामी सीखने की क्रिया से कम होती है; अतः सीखने की तीव्र गति धारण के लिए एक अनुकूल दशा है।

(6) प्रयोजन या उद्देश्य- याद करने का कोई न कोई प्रयोजन या उद्देश्य अवश्य होता है। उद्देश्य के साथ याद की जाने वाली विषय-सामग्री न केवल शीघ्र ही याद हो जाती है अपितु देर तक याद भी रहती है। उदाहरणार्थ-परीक्षा या प्रतियोगिता की दृष्टि से याद किये गये. पाठ अधिक स्थायी होते हैं। इसके विपरीत निरुद्देश्य सीखे गये विषयों को मस्तिष्क अधिक समय तक नहीं सँजो पाता।

(7) मानसिक तत्परता- मानसिक तत्परता का धारण-शक्ति पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। अच्छी तैयारी और रुचि के साथ यदि व्यक्ति विषय को सीखने के लिए तत्पर है तो धारणा अधिक होगी। किन्तु बिना तैयारी और रुचि के अनायास ही सीखी गई सामग्री के संस्कार जल्दी ही विलुप्त हो जाते हैं।

(8) स्वास्थ्य- शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का धारणा से गहरा सम्बन्ध है। शरीर या मन के अस्वस्थ होने पर धारण-शक्ति कम हो जाती है, किन्तु स्वस्थ, श्रमरहित तथा ताजा मस्तिष्क किसी पाठ को अधिक सीख सकता है, धारण कर सकता है। शाम को थका हुआ विद्यार्थी विषय को उतना अच्छा याद नहीं कर पाता जितना कि प्रातःकाल के समय।

(9) नींद- नींद धारणा के लिए अनुकूल परिस्थिति है। नींद की अवस्था में मन शान्त रहता है; अत: किसी पाठ को याद करने के उपरान्त यदि तत्काल ही नींद ले ली जाए तो अर्जित ज्ञान स्थायी हो जाता है।

(10) मस्तिष्क की संरचना– मस्तिष्क की संरचना (बनावट) भी धारणा को प्रभावित करती है। विकसित मस्तिष्क स्मृति-चिह्नों को आसानी से ग्रहण कर लेता है तथा उन्हें स्थायी रूप से धारण कर लेता है। छोटा, कम संवेदनशील और अविकसित मस्तिष्क सीखी गई बातों को देर तक धारण नहीं कर पाता।

(11) अवधान- सीखने या याद करने की क्रिया में सामग्री पर जितना अधिक अवधान (ध्यान) दिया जाएगा, उतनी ही देर तक वह याद रहेगा। कम अवधान के साथ सीखी गई अथवा याद की गई सामग्री की धारणा भी कम स्थायी होती है।

(12) चिन्तन– चिन्तनविहीन अवस्था में याद की गई सामग्री की मस्तिष्क पर अच्छी पकड़ नहीं होती। किन्तु चिन्तन और मनन के साथ याद की जाने वाली सामग्री की धारणा अधिक स्थायी होती है।

(13) अनुभूति– प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी फ्रॉयड के अनुसार, व्यक्ति सुखद अनुभूति वाली सामग्री को, दुःखद अनुभूति वाली सामग्री की अपेक्षा, लम्बे समय तक धारण करता है। इस प्रकार सुख या दुःख की अनुभूति स्मृति को प्रभावित करती है। | (14) अनुभव की व्यापकता-अनुभव जितना अधिक व्यापक या अधिक महत्त्व वाला होगा, मस्तिष्क भी उसे उतने ही अधिक समय तक धारण करेगा। मस्तिष्क में किसी अनुभव की धारण शक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि उस अनुभव का मूल्य कितना है। मूल्यवान अनुभवों की अपेक्षा कम मूल्य के अनुभव मस्तिष्क से असर खोते रहते हैं।

(15) लैगिक विकास- समझा जाता है कि चौदह वर्ष तक की लड़कियों का विकास लड़कों की तुलना में अधिक तेजी से होता है और इसी कारण उनकी धारण शक्ति भी अपेक्षाकृत अधिक ही होती है।

प्रत्यास्मरण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ

स्मृति के तीसरे प्रमुख तत्त्व प्रत्यस्मरण या पुन:स्मरण को प्रभावित करने वाली कुछ सहायक परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं-

(1) धारणा की प्रकृति- धारणा की प्रकृति, प्रत्यस्मरण की सम्भावनाओं को प्रभावित करती है। अच्छी एवं स्थायी धारणा से उत्तम प्रत्यास्मरण की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं। वस्तुतः धारणा की। अनुकूल परिस्थितियाँ प्रत्यास्मरण पर भी अच्छा प्रभाव डालती हैं।

(2) अनुकूल शारीरिक-मानसिक अवस्था– व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक-मानसिक अवस्था शीघ्र, सही एवं यथार्थ प्रत्यास्मरण में सहायता करती है। अस्वस्थ तथा थकी हुई अवस्था में स्फूर्ति कम हो जाती है जिसका प्रत्यास्मरण की क्रियाओं पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(3) साहचर्य संकेत- सहकारी संकेतों की प्रत्यास्मरण की क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। प्रत्यास्मरण के दौरान विषय-वस्तु की वास्तविक उत्तेजनाएँ तो उपस्थित नहीं होतीं किन्तु ये संकेत ही प्रत्यास्मरण के उत्तेजक बनते हैं। परीक्षा देते समय परीक्षार्थी को पुनःस्मरण किये जाने वाले पाठ की पहली लाइन, शीर्षक या शब्द याद आ जाए तो पूरी सामग्री याद आ जायेगी। वस्तुतः मस्तिष्क में ज्ञान तथा विचार सम्बन्धित होकर रहते हैं। इन सम्बन्धों या साहचर्यों की प्रबलता प्रत्यास्मरण के लिए अनुकूल दशा है।

(4) प्रसंग- प्रसंग से बीते काल के विचारों की श्रृंखला प्रारम्भ होती हैं। अनुकूल प्रसंग के आने पर उससे सम्बन्धित घटनाएँ स्मरण हो आती हैं। यही कारण है कि अक्सर पुन:स्मरण के समय लोग तत्सम्बन्धी प्रसंग पर ध्यान केन्द्रित करते हैं।

(5) प्रयास- प्रत्यास्मरण काफी कुछ प्रयास पर भी आधारित है। अधिक प्रयास से अधिक प्रत्यास्मरण तथा कम प्रयास से कम प्रत्यास्मरण होता है।

(6) प्रेरणाएँ- प्रेरणाएँ प्रत्यास्मरण को प्रभावित करती हैं। किसी विशेष प्रकार की प्रेरणा से तत्सम्बन्धी घटनाओं का पुन:स्मरण होता है अर्थात् जैसी प्रेरणा होगी वैसी-ही बातें व्यक्ति को याद आएँगी। शब्द-साहचर्य परीक्षण के अन्तर्गत प्रयोगों से ज्ञात होता है कि जैसे-जैसे शब्द बोले गये वैसी ही प्रेरित बातें याद आती गयीं।

(7) मनोवृत्ति- व्यक्ति की मनोवृत्ति का प्रत्यास्मरण पर भी प्रभाव है। वैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को विज्ञान सम्बन्धी बातें तथा धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को धार्मिक विषयों का पुनःस्मरण जल्दी होगा। दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति को क्रीड़ा से सम्बन्धी बातों का शीघ्र स्मरण नहीं होगा।

(8) अवरोध- अवरोध प्रत्यास्मरण की क्रिया में बाधा पहुँचाते हैं। क्रोध, चिन्ता, भय तथा निराशा जैसी मानसिक अवस्थाएँ याद की जाने वाली विषय-सामग्री के लिए अवरोध बनती हैं तथा प्रत्यास्मरण को मन्द करती हैं। अवरोध की अनुपस्थिति में प्रत्यास्मरण अच्छा होता है।

(9) अनुभूति– जीवन में सुख-दुःख की अनुभूति अनिवार्य है और इनको प्रत्यास्मरण पर प्रभाव पड़ता है। उदासीन अनुभवों की अपेक्षा सुख-दुःख के रंग में रंगे अनुभव जल्दी याद आते हैं।

प्रत्यभिज्ञा को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ

प्रत्यभिज्ञा को भी अधिकांशतः वही परिस्थितियाँ प्रभावित करती हैं जो सामान्यतः धारणा एवं प्रत्यास्मरण में भी सहायक होती हैं। अतः सभी का विवेचन न करके सिर्फ उन परिस्थितियों को दिया जा रहा है, जो अपरिहार्य हैं|

(1) मानसिक तत्परता- मानसिक तत्परता प्रत्यभिज्ञा में एक महत्त्वपूर्ण सहायक परिस्थिति है। जिस मनुष्य की जिस ओर अधिक मानसिक तत्परता होती है, वह उसी प्रकार की वस्तुओं की पहचान भी करता है। रात हो गयी, किन्तु मोहन के पापा ऑफिस से लौटकर नहीं आये, प्रतीक्षारत मोहन ने। दरवाजे पर आहट होते ही पापा के आगमन को पहचान लिया। किन्तु इसमें त्रुटिपूर्ण प्रत्यभिज्ञा भी हो सकती है।

(2) आत्म-विश्वास-आत्म- विश्वास प्रत्यभिज्ञा के लिए एक अनुकूल दशा है, क्योंकि आत्म-विश्वास खोकर सही पहचान नहीं की जा सकती। इसका अभाव सन्देह को जन्म देता है, किन्तु अतीव (यानी आवश्यकता से अधिक) भी अनुचित ही कहा जायेगा।

प्रश्न 3
कण्ठस्थीकरण अथवा स्मरण करने की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

कण्ठस्थीकरण अथवा स्मरण कण्ठस्थीकरण

अथवा स्मरण करना एक मानसिक प्रवृत्ति है। मानव की स्मरण शक्ति यद्यपि प्रकृति की उसे एक अनुपम देन है, किन्तु यदि इसे समुचित रूप से प्रयोग में लाया जाए तो समय एवं शक्ति, दोनों की ही पर्याप्त रूप से बचत की जा सकती है। किसी विषय-सामग्री को स्मरण करने में लाघव तथा मितव्ययिता लाने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिकों ने सतत प्रयास किये हैं। इसके परिणामस्वरूप स्मरण करने की कुछ मितव्ययी विधियों की खोज सम्भव हुई, जिनकी सहायता से कम समय में अधिक-से-अधिक सामग्री याद की जा सकती है।

कण्ठस्थीकरण या स्मरण की मितव्ययी विधियाँ

स्मरण या कण्ठस्थीकरण की मितव्ययी विधियाँ निम्नलिखित हैं।

(1) पुनरावृत्ति अथवा दोहराना (Repetition)- स्मरण करने की यह एक पुरानी तथा प्रचलित विधि है। सरल होने के कारण यह लोकप्रिय भी है। इस विधि में याद की जाने वाली सामग्री या पाठ को अनेक बार दोहराया जाता है। बार-बार दोहराने से वह पाठ स्मृति में गहराता जाता है। जितनी ही अधिक बार उसे दोहराया जायेगा, उतने ही गहरे स्मृति-चिह्न या संस्कार मस्तिष्क पर बन जाते हैं। आवृत्ति अर्थात् विषय-सामग्री को मन-ही-मन दोहराने से उसे स्थायित्व प्राप्त होता है; अतः कण्ठस्थीकरण करने वाले को चाहिए कि वह पाठ को कई बार पढ़े तथा अनेक बार मन-ही-मन दोहराए। इस विधि से कोई भी विषय-सामग्री कम-से-कम समय में दीर्घकाल के लिए याद हो जाती है। पुनरावृत्ति विधि का प्रयोग करते समय ध्यान रहे कि सामग्री सार्थक हो, तभी उसके वांछित परिणाम सामने आएँगे। छोटे बालकों को कविताएँ, दोहे तथा पहाड़े याद करने में यह विधि बहुत लाभप्रद है।

(2) पूर्ण विधि (Whole Method)- पूर्ण विधि में सम्पूर्ण विषय या पाठ को एक ही बार में एक साथ याद किया जाता है। यदि बालक किसी कविता या कहानी को कण्ठस्थ करना चाहता है तो पूर्ण विधि के अनुसार वह समूची सामग्री को एक ही बार में याद करेगा। समय-समय पर होने वाले प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि कठिन एवं लम्बे पाठों की तुलना में सरल एवं छोटे पाठ पूर्ण विधि से सुगमतापूर्वक याद किये जा सकते हैं। इसके अलावा यह विधि मन्द-बुद्धि के बालकों की अपेक्षा तीव्र-बुद्धि के बालकों के लिए अधिक लाभप्रद मानी जाती है। यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि सीखने की अल्पकालीन अवधि में इस विधि के परिणाम अधिक अच्छे नहीं आते, इसके लिए लम्बा समय उपयुक्त है। पूर्ण विधि के अन्तर्गत याद की जाने वाली सामग्री के अधिक लम्बा होने पर उसे खण्डों में बाँटेकर याद किया जा सकता है, किन्तु इससे पहले समूची सामग्री को आदि से अन्त तक भली-भाँति पढ़ लेना आवश्यक है।

(3) आंशिक या खण्ड विधि (Part Method)- स्मरण की आंशिक या खण्ड विधि के अन्तर्गत पहले पाठ अथवा सामग्री को पृथक्-पृथक् अंशों/खंडों में विभाजित कर लिया जाता है, फिर एक-एक खण्ड को याद करके समूची विषय-सामग्री को कण्ठस्थ कर लिया जाता है। इस प्रकार यह विधि पूर्ण विधि के एकदम विपरीत है। मान लीजिए, बालक को एक लम्बी कविता याद करनी है तो वह पहले उसके एक पद को याद करेगा तब बारी-बारी से कविता के दूसरे तीसरे :: :: चौथे पदों पर ध्यान केन्द्रित करता जायेगा।

(4) मिश्रित विधि (Mixed Method)– मिश्रित विधि में विशेषकर जब विषय-सामग्री काफी लम्बी हो, पूर्ण एवं आंशिक दोनों विधियों को एक साथ लागू किया जाता है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत एक बार समूची याद की जाने वाली सामग्री को पूर्ण विधि की सहायता से याद करने का प्रयास किया जाता है, फिर उसे छोटे-छोटे खण्डों में करके याद किया जाता है। स्मरण के दौरान विभिन्न खण्डों का सम्बन्ध एक-दूसरे से जोड़ना श्रेयस्कर है। बहुधा देखने में आया है कि पूर्ण एवं आंशिक विधि की अपेक्षा मिश्रित विधि अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है।

(5) व्यवधान सहित या सान्तर विधि (Spaced Method)- व्यवधान सहित या सान्तर जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, स्मरण करने की इस विधि में विषय-सामग्री को कई बैठकों में याद किया जाता है। दिन में थोड़े-थोड़े समय का व्यवधान (अन्तर) देकर पाठ को दोहराकर कंठस्थ किया जाता है। यह विधि स्थायी स्मृति के लिए काफी उपयोगी है।।

(6) व्यवधान रहित या निरन्तर विधि (Unspaced Method)– सान्तर विधि के विपरीत निरन्तर या व्यवधान रहित विधि में विषय-सामग्री को एक ही बैठक में कंठस्थ करने का प्रयास किया जाता है। इसमें पाठों को बिना किसी व्यवधान के दोहराकर याद किया जाता है।

(7) सक्रिय विधि (Active Method)– सक्रिय विधि का दूसरा नाम उच्चारण विधि है। इसमें किसी विषय-सामग्री को बोलकर, आवाज के साथ पढ़कर याद किया जाता है। एबिंगहास तथा गेट्स आदि मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से यह निष्कर्ष निकाला कि कण्ठस्थीकरण की सक्रिय विधि अत्यधिक उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण विधि है। इस विधि द्वारा स्मरण करने से व्यक्ति के मस्तिष्क में याद की जाने वाली सामग्री का ढाँचा तैयार हो जाता है, विषय का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है, सामग्री के विविध खण्डों का लयबद्ध समूहीकरण होता है, उनके बीच सार्थक सम्बन्ध स्थापित होते हैं तथा याद की गई सामग्री का आभास होता रहता है। उच्चारण के साथ याद करने में व्यक्ति रुचि लेकर प्रयास करता है तथा उसकी सक्रियता में वृद्धि होती है। बहुधा सक्रिय विधि के दौरान शरीर के अंगों में गति (हिलना-डुलना) देखा जाता है।

(8) निष्क्रिय विधि (Passive Method)- निष्क्रिय विधि में किसी विषय-सामग्री को बिना बोले मन-ही-मन याद किया जाता है। सक्रिय विधि के लाभों को जानकर यह निष्कर्ष नहीं निकाल लेना चाहिए कि निष्क्रिय विधि अनुपयोगी या कुछ कम उपयोगी है। उच्च कक्षाओं में जहाँ शिक्षार्थियों को अधिक पढ़ना पड़ता है, सिर्फ सक्रिय विधि से काम नहीं चल सकता-वहाँ तो निष्क्रिय विधि ही उपयोगी सिद्ध होती है। निष्क्रिय विधि में शरीर के अंगों में गति नहीं होती और विषय को शान्तिपूर्वक गहन अवधान के साथ पढ़ा जाता है। इस विधि की न केवल गति तीव्र होती है अपितु इसमें थकान भी अपेक्षाकृत काफी कम महसूस होती है।

विद्वानों का मत है कि नवीन सामग्री को याद करने की प्रक्रिया में पहले उसे निष्क्रिय विधि से एक बार मन-ही-मन पढ़ लिया जाये, फिर उच्चारण सहित कंठस्थ कर लिया जाये तो स्मृति (ज्ञान) स्थायी होगी।

(9) बोधपूर्ण विधि (Intelligence Method)- बोधपूर्ण विधि में विषय-सामग्री या पाठ को सप्रयास समझ-बूझकर याद किया जाता है। इस विधि से याद की हुई सामग्री के स्मृति-चिह्न या संस्कार मस्तिष्क पर स्थायी होते हैं। सामग्री पुष्ट होकर स्मृति में लम्बे समय तक बनी रहती है।

(10) यान्त्रिक या बोधरहित विधि (Rote Method)– यान्त्रिक या बोधरहित विधि के माध्यम से बिना समझे विषय-सामग्री को कंठस्थ किया जाता है। विषय को समझे बिना तोते की तरह रटने के कारण याद की हुई सामग्री अधिक समय तक मस्तिष्क में नहीं टिक पाती है। इसका कारण स्पष्ट है। कि प्रस्तुत सामग्री की मन के विचारों से साहचर्य स्थापित नहीं हो पाता है। शिक्षार्थी यन्त्र के समान पाठ को रटकर याद कर लेता है।

(11) समूहीकरण तथा लय (Grouping and Rhythm)- समूहीकरण तथा लय के माध्यम से भी कण्ठस्थीकरण में सहायता मिलती है। याद की जाने वाली सामग्री को समूहों में बाँट देने से स्मरण की क्रिया आसान हो जाती है। इसी प्रकार पद्यात्मक सामग्री को लयबद्ध करके तीव्र गति एवं सुगमतापूर्वक याद किया जाता है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की सामग्री को कविता के रूप में बच्चों को सुविधापूर्वक याद कराया जाता है।

(12) साहचर्य (Association)- कण्ठस्थीकरण की क्रिया में साहचर्य का बड़ा योगदान है। साहचर्य बनाकर स्मरण करने से धारणा स्थायी होती है। साहचर्य बनाने के लिए व्यक्ति स्वतन्त्र है, स्वयं के बनाये हुए साहचर्य अधिक लाभकारी व सहायक होते हैं। इसके लिए याद करते समय सामग्री से सम्बन्धित विभिन्न बातों का अन्य बातों से सम्बन्ध स्थापित करके उसे याद कर लिया जाता है।

प्रश्न4
साहचर्य (Association) से क्या आशय है? साहचर्य के प्राथमिक एवं गौण नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

साहचर्य का अर्थ एवं परिभाषा

स्मृति की प्रक्रिया में साहचर्य (Association) का विशेष महत्त्व है। साहचर्य से स्मरण करने की प्रक्रिया में पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है। साहचर्य में किन्हीं दो विषय-वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्ध को ध्यान में रखा जाता है तथा उस सम्बन्ध के आधार पर स्मृति की प्रक्रिया को सुचारु रूप प्रदान किया जाता है। व्यवहार में हम प्राय: देखते हैं कि किसी एक व्यक्ति या वस्तु को देखकर किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु की याद आ जाती है तो याद आने की यह क्रिया साहचर्य के कारण ही होती है। उदाहरण के लिए दो सदैव साथ-साथ रहने वाली सहेलियों में से किसी एक को देखकर दूसरी की

भी याद आ जाना साहचर्य का ही परिणाम है। इसी प्रकार एक विधवा को देखकर उसके स्वर्गीय पति की याद आ जाना भी साहचर्य का ही परिणाम है। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्मृति की प्रक्रिया में साहचर्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। साहचर्य के अर्थ को जान लेने के उपरान्त साहचर्य को परिभाषित करना भी आवश्यक है।

प्रो० बी०एन०झा ने साहचर्य को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “विचारों का साहचर्य एक विख्यात सिद्धान्त है, जिसके द्वारा कुछ विशिष्ट सम्बन्धों के कारण एक विचार दूसरे से सम्बन्धित हाने की प्रवृत्ति रखता है।”

साहचर्य की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि साहचर्य मस्तिष्क में स्थापित होने वाली एक प्रक्रिया है। वास्तव में, व्यक्ति के मस्तिष्क में एक विशेष क्षेत्र होता है, जिसे साहचर्य-क्षेत्र कहते हैं। मस्तिष्क का यह क्षेत्र व्यक्ति के विभिन्न संस्कारों को परस्पर जोड़ने का कार्य करता है। इस प्रकार विभिन्न संस्कारों या विचारों का परस्पर सम्बद्ध होना ही साहचर्य है।

साहचर्य के प्राथमिक एवं गौण नियम

साहचर्य अपने आप में एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। विचारों में साहचर्य की स्थापना कुछ नियमों के आधार पर होती है। साहचर्य की प्रक्रिया का सम्बन्ध अनेक नियमों से है। इन समस्त नियमों को दो वर्गों में बाँटा जाता है। ये वर्ग हैं-क्रमशः साहचर्य के प्राथमिक नियम तथा साहचर्य के गौण नियम। साहचर्य के दोनों वर्गों के नियमों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है–

(1) साहचर्य के प्राथमिक नियम– साहचर्य की स्थापना में सहायक मुख्य नियमों को साहचर्य के प्राथमिक नियम कहा गया है। कुछ विद्वानों ने साहचर्य के इन नियमों को साहचर्य के मौलिक नियम माना है। साहचर्य के चार प्राथमिक नियमों का उल्लेख किया गया है। ये नियम हैं-समीपता का नियम, सादृश्यता का नियम, विरोध का नियम तथा क्रमिक रुचि का नियम। साहचर्य के इन चारों प्राथमिक नियमों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है

(i) समीपता का नियम– साहचर्य का प्रथम प्राथमिक नियम है–‘समीपता का नियम’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है; साहचर्य के इस नियम में विषय-वस्तुओं की स्वाभाविक समीपता को साहचर्य स्थापना का आधार माना जाता है। इस नियम के अनुसार सामान्य रूप से एक-दूसरे के समीप पायी जाने वाली विषय-वस्तुओं का ज्ञान हमें एक साथ प्राप्त होता है। वास्तव में, एक साथ पायी जाने वाली विषय-वस्तुओं में समीपता का साहचर्य सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तथा इसी सम्बन्ध के आधार पर हम उनका ज्ञान प्राप्त करने लगते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि समीपता भी दो प्रकार की हो सकती है अर्थात् कालिक समीपता तथा देशिक समीपता। कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो एक के बाद एक क्रमिक रूप से प्रस्तुत होती हैं, इन घटनाओं में पायी जाने वाली समीपता को कालिक समीपता कहते हैं। उदाहरण के लिए, बादल के गरजने तथा वर्षा होने में कालिक समीपता पायी जाती है। इसी प्रकार कुछ वस्तुओं में देशिक समीपता भी पायी जाती है; जैसे कि कप एवं प्लेट या मेज एवं कुर्सी में पायी जाने वाली समीपता। दोनों ही प्रकार की समीपता के कारण सम्बन्धित विषय-वस्तुओं में साहचर्य की स्थापना की जाती है।

(ii) सादृश्यता का नियम– साहचर्य का एक प्राथमिक नियम ‘सादृश्यता का नियम’ कहलाता है। इस नियम के अनुसार कुछ विषय-वस्तुओं में पायी जाने वाली सादृश्यता के कारण उनमें साहचर्य की स्थापना हो जाती है। वास्तव में, जब हम दो समान दिखाई देने वाली वस्तुओं का प्रत्यक्षीकरण करते हैं तो हमारा मस्तिष्क उन वस्तुओं के बीच में एक प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। इस प्रकार की सम्बन्ध-स्थापना के उपरान्त यदि व्यक्ति उन दोनों वस्तुओं में से किसी एक को कहीं देखता है तो उसे तुरन्त उसके सदृश अन्य वस्तु की भी याद आ जाती है। हम जानते हैं कि जुड़वा बहनों अथवा भाइयों में अत्यधिक सादृश्यता पायी जाती है। इस स्थिति में उनमें से किसी एक को देखते ही दूसरी बहन की याद आ ही जाती है। यह क्रिया सादृश्यता का ही परिणाम है। रूप की सादृश्यता के अतिरिक्त प्रायः नामों की सादृश्यता भी स्मृति का एक कारण बन जाया करती है।

(iii) विरोध का नियम–साहचर्य को एक अन्य प्राथमिक नियम विरोध के नियम के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अनुसार सम्बन्धित वस्तुओं में पाया जाने वाला स्पष्ट विरोध भी प्रायः साहचर्य-स्थापना का कारण बना जाता है। प्रायः गोरे एवं काले रंगों, सुख एवं दु:ख के भावों, मिलन एवं वियोग आदि में पाये जाने वाले विरोध के कारण उनमें एक प्रकार का साहचर्य सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। विरोध के नियम के अनुसार, परस्पर विरोधी गुण-धर्म वाले एक तत्त्व के प्रत्यक्षीकरण के साथ-ही-साथ दूसरे तत्त्व की भी याद आ जाती है।

(iv) क्रमिक रुचि का नियम- साहचर्य का एक अन्य प्राथमिक नियम है ‘क्रमिक रुचि का नियम’। इस नियम के अनुसार व्यक्ति की रुचि भी उसकी स्मृति को प्रभावित करती है। रुचि के अनुसार प्राप्त होने वाले अनुभव परस्पर सम्बद्ध हो जाते हैं तथा इन अनुभवों से व्यक्ति के मानसिक संस्कार निर्मित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए-शास्त्रीय संगीत में रुचि रखने वाला व्यक्ति यदि किसी राग का नाम सुनता है तो उसे तुरन्त उस राग के गायक का नाम याद आ जाता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा साहचर्य के चारों प्राथमिक नियमों का परिचय प्राप्त हो जाता है। हम कह सकते हैं कि साहचर्य के इन चारों प्राथमिक नियमों में पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा ये नियम एक-दूसरे पर किसी-न-किसी रूप में आश्रित भी हैं।

(2) साहचर्य के गौण नियम- साहचर्य के द्वितीय वर्ग के नियमों को साहचर्य के गौण नियम कहा गया है। साहचर्य के गौण नियम पाँच हैं—प्राथमिकता का नियम, नवीनता का नियम, पुनरावृत्ति का नियम, स्पष्टता का नियम तथा प्रबलता का नियम। साहचर्य के इन गौण नियमों का सामान्य परिचय निम्नलिखित हैं

(i) प्राथमिकता का नियम- प्राथमिकता के नियम के अनुसार, हमारे स्मृति पटल पर जिस विषय-वस्तु के संस्कार सर्वप्रथम पड़ते हैं, वे सामान्य रूप से प्रबल तथा अधिक स्थायी होते हैं। इसी नियमको आधार मानते हुए कहा जाता है कि बाल्यावस्था में याद किये गये विषयों की स्मृति अधिक स्पष्ट स्थायी होती है।

(ii) नवीनता का नियम– साहचर्य के इस नियम के अनुसार, हम जिस विषय के निकट भूतकाल में सीखते या याद करते हैं, उसकी धारण प्रबल होती है। यही कारण है कि देखी गयी फिल्म का अन्त प्रायः याद रहता है।

(iii) पुनरावृत्ति का नियम– साहचर्य के एक गौण नियम को पुनरावृत्ति का नियम कहा गया है। इस नियम की मान्यता यह है कि यदि किसी विषय को सीखने या याद करने में अधिक आवृत्ति होती अर्थात् उसे बार-बार दोहराया जाता है तो उस विषय की स्मृति उत्तम एवं स्थायी होती है।

(iv) स्पष्टता का नियम- इस नियम के अनुसार अस्पष्ट विषय की तुलना में स्पष्ट विषय की धारणा प्रबल होती है तथा ऐसा विषय अधिक दिनों तक याद रहता है।

(v) प्रबलता का नियम- कुछ विषयों का सम्बन्ध किसी प्रबल संवेग से होता है। इन विषयों के गहरे संस्कार हमारे मस्तिष्क पर पड़ जाते हैं तथा इन विषयों को अधिक समय तक याद रखा जाता है।

प्रश्न 5
स्मृति के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं?
या
संवेदी, अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन स्मृति के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
या
अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन स्मृति को स्पष्ट कीजिए।(2015)
उत्तर
स्मृति के मुख्य प्रकार
व्यक्ति एवं समाज के सन्दर्भ में स्मृति का अत्यधिक महत्त्व है। स्मृति के आधार पर ही जीवन की निरन्तरता बनी रहती है। स्मृति की प्रक्रिया का मनोविज्ञान में व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन के अन्तर्गत स्मृति के प्रकारों का भी निर्धारण भिन्न-भिन्न आधारों पर किया गया है। स्मृति के एक प्रकार को संवेदी स्मृति (Sensory Memory) के रूप में वर्णित किया गया है। संवेदी स्मृति से आशय उस स्मृति से है जिसके अन्तर्गत ज्ञानेन्द्रियों के स्तर पर पंजीकृत सूचनाओं को कुछ क्षणों के 

लिए ज्यों-का-त्यों भण्डारित किया जाता है। इसके अतिरिक्त स्मृति के प्रकारों का निर्धारण धारणा के आधार पर भी किया गया है। इस आधार पर स्मृति के दो प्रकार निर्धारित किये गये हैं। ये प्रकार हैं-क्रमशः अल्पकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति। जब किसी विषय को याद करने के अल्प समय अर्थात् कुछ मिनट के उपरान्त धारणा को परीक्षण द्वारा ज्ञात किया जाता है तो धारणा की उस मात्रा को अल्पकालीन स्मृति के रूप में जाना जाता है। जब किसी विषय को याद करने के कुछ अधिक समय अर्थात् कुछ घण्टों या कुछ दिनों के उपरान्त धारणा का मापन किया जाता है, तब प्राप्त निष्कर्ष अर्थात् धारणा की मात्रा को दीर्घकालीन स्मृति के रूप में जाना जाता है। सामान्य रूप से अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन स्मृति में स्पष्ट अन्तर होता है। वैसे कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन स्मृति में केवल मात्रा का अन्तर होता है। उनमें किसी प्रकार का मौलिक अन्तर नहीं होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्मृति के तीन प्रकार हैं—संवेदी स्मृति, अल्पकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति। स्मृति के इन तीनों प्रकारों का सामान्य परिचय एवं विवरण निम्नलिखित है–

(1) संवेदी स्मृति (Sensory Memory)- स्मृति के एक प्रकार को संवेदी स्मृति के नाम से जाना जाता है। जब स्मृति की प्रक्रिया के दैहिक सक्रियता के स्तर को ध्यान में रखा जाता है, तब स्मृति को संवेदी स्मृति कहा जाता है। संवेदी स्मृति के अन्तर्गत उस स्मृति को स्थान दिया जाता है जो विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों के स्तर पर पंजीकृत सूचनाओं को ज्यों-का-त्यों कुछ क्षण के लिए भण्डारित किया जाता हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनसारे, व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों के स्तर पर बाहरी उद्दीपकों के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं के पंजीकरण एवं इस प्रकार से पंजीकृत सूचनाओं के ज्ञानेन्द्रियों में अल्प समय के लिए रुके रहने को प्रत्यक्षीकरण का आधार माना गया है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि सांवेदिक भण्डार में पंजीकृत सूचनाएँ अपने मौलिक रूप में केवल अल्प समय अर्थात् कुछ क्षणों के लिए ही संचित रहती। हैं। कुछ विद्वानों ने तो इस अवधि को मात्र एक सेकण्ड ही माना है। संवेदी स्मृति के स्वरूप के स्पष्टीकरण के लिए हम एक उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

जब किसी ठोस धातु पर किसी अन्य ठोस वस्तु से प्रहार किया जाता है तो इस प्रहार के परिणामस्वरूप एक तीव्र ध्वनि उत्पन्न होती है। इस ध्वनि की गूंज हमारे कानों में कुछ समय तक बनी रहती है। इसी को हम संवेदी स्मृति के रूप में जानते हैं। प्रस्तुत उदाहरण में पायी जाने वाली संवेदी स्मृति को श्रवण सम्बन्धी संवेदी स्मृति माना जाएगा। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न प्रकार की संवेदी स्मृति भी पायी जाती है। जहाँ तक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों का प्रश्न है, उनमें सामान्य रूप से चाक्षुष संवेदी स्मृति तथा श्रवणात्मक संवेदी स्मृति का ही मुख्य रूप से व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। नाइस्सेर नामक मनोवैज्ञानिक ने चाक्षुष संवेदी स्मृति को प्रतिचित्रात्मक स्मृति (Iconic Memory) तथा श्रवणात्मक संवेदी स्मृति की। प्रतिध्वन्यात्मक स्मृति (Echoic Memory) कहा है। |

(2) अल्पकालीन स्मृति (Short-term Memory)- धारणा के आधार पर किये गये स्मृति के वर्गीकरण में स्मृति के एक प्रकार को अल्पकालीन स्मृति कहा गया है। सामान्य रूप से व्यक्ति द्वारा सम्बन्धित विषय को सीखने अथवा स्मरण करने के अल्प समय के उपरान्त यदि उसकी धारणा का परीक्षण किया जाए तो उस दशा में धारणा की जो मात्रा ज्ञात होती है, उसी को मनोविज्ञान की भाषा में अल्पकालीन स्मृति कहा जाता है। यहाँ अल्पकाल से आशय एक या कुछ मिनट ही होता है। इस प्रकार की स्मृति का सम्बन्ध एक बार के अनुभव यो सीखने से संचित होने वाली सामग्री से होता है। अल्पकालीन स्मृति को मनोवैज्ञानिकों ने एक प्रकार की जैव-वैद्युतिक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने इसका स्थायित्व अधिक-से-अधिक 30 सेकण्ड माना है।

(3) दीर्घकालीन स्मृति (Long-term Memory)- धारणा के आधार पर किये गये स्मृति के वर्गीकरण के अन्तर्गत स्मृति के दूसरे प्रकार को दीर्घकालीन स्मृति कहा गया है। दीर्घकालीन स्मृति से आशय उस पुन:स्मरण से है जो किसी विषय के स्मरण के दीर्घकाल के उपरान्त होता है। यह काल या. अवधि कुछ मिनट, कुछ घण्टे, कुछ दिन या कुछ वर्ष भी हो सकती है। दीर्घकालीन स्मृति के अन्तर्गत धारणा के ह्रास की दर कम होती है। हम कह सकते हैं कि इस स्मृति के सन्दर्भ में विस्मरण देर से तथा अपेक्षाकृत रूप से कम होता है। इस तथ्य का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि स्मरण

की गयी विषय-सामग्री का व्यक्ति के मन में होने वाला संचय, जैव-रसायन प्रतिमानों पर आधारित होता है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि दीर्घकालीन स्मृति का सम्बन्ध मस्तिष्क के सेरिबेलट काटेंक्स के भूरे पदार्थ के गैगलिओनिक कोशों से होता है। यहाँ यह भी उल्लेख कर देना आवश्यक है कि जैसे-जैसे अधिगम में अभ्यास की वृद्धि होती है, वैसे-वैसे व्यक्ति की धारणा में होने वाला ह्रास घटता जाता है। इसका कारण यह है कि अभ्यास के परिणामस्वरूप व्यक्ति की धारणा क्रमशः सब होती रहती है।

प्रश्न 6
स्मृति अर्थात् धारणा के मापन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। या स्मृति मापन की विधियाँ बताइए। (2017)
उत्तर
यह सत्य है कि सभी व्यक्तियों की स्मरण-क्षमता समान नहीं होती। कुछ व्यक्ति सीखे गये विषयों को ज्यों-का-त्यों याद रखते हैं, जबकि कुछ व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाते। वास्तव में, इस भिन्नता का कारण व्यक्तियों की धारणा (Retention) शक्ति का भिन्न-भिन्न होना है। प्रबल धारणा वाले व्यक्ति सीखे गये विषय को अधिक समय तक ज्यों-का-त्यों याद रखते हैं। इससे भिन्न यदि व्यक्ति की धारणा-क्षमता कमजोर होती है तो वह सम्बन्धित विषय को अधिक समय तक याद नहीं रख पाता है। ऐसे व्यक्तियों की स्मृति प्रायः उत्तम भी नहीं होती है। स्मृति के मापन के लिए धारणा को मापने करना ही अभीष्ट होता है। स्मृति अथवा धारणा के मापन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का विवरण निम्नलिखित है

स्मृति अर्थात् धारणा के मापन की विधियाँ स्मृति के मापन के लिए अर्थात् धारणा-मापन के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है।

(1) धारणामापन की पहचान विधि- धारणा-मापन के लिए अपनायी जाने वाली एक मुख्य विधि है-‘पहचान विधि’ (Recognition Method)। इस विधि द्वारा धारणा के मापन के लिए सम्बन्धित व्यक्ति द्वारा स्मरण किये गये विषयों में कुछ अन्य ऐसे विषयों को भी सम्मिलित कर दिया जाता है, जिनसे उनको पूर्व-परिचय नहीं होता। इसके उपरान्त व्यक्ति के सम्मुख नये जोड़े गये विषयों तथा पूर्व-परिचित विषयों को सम्मिलित रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

इन समस्त विषयों को एक साथ प्रस्तुत करने के उपरान्त व्यक्ति को कहा जाता है कि वह उनमे से पूर्व-परिचित विषयों को पहचान कर बताये। सामान्य रूप से बाद में सम्मिलित किये गये विषय भी पूर्व-परिचित विषयों से मिलते-जुलते ही होते हैं। इस परीक्षण के अन्तर्गत यह जानने का प्रयास किया जाता है कि व्यक्ति कुल विषयों में सम्मिलिते पूर्व-परिचित विषयों में से कुल कितने विषयों को ठीक रूप में पहचान लेता है। इन निष्कर्षों के आधार पर व्यक्ति की धारणा को मापन कर लिया जाता है। धारणा के मापन के लिए निम्नलिखित सूत्र को अपनाया जाता है
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 4 Memory and Forgetting 1
(2) धारणा- मापन की पुनःस्मरण विधि- स्मृति (धारणा) मापन की एक अन्य विधि है। ‘पुन:स्मरण विधि।’ इस विधि को धारणा-मापन की अन्य विधियों की तुलना में एक सरल विधि माना जाता है; अतः यह विधि अधिक लोकप्रिय भी है। धारणा-मापन की इस विधि को सक्रिय पुनःस्मरण विधि भी कहा जाता है। धारणा-मापन की इस विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति को किसी विषय को याद करने के लिए कहा जाता है तथा याद कर लेने के कुछ समय उपरान्त याद किये गये विषय को सुनाने के लिए कहा जाता है। अब यह देखा जाता है कि वह व्यक्ति पहले याद किये गये विषय के कितने भागों को ज्यों-का-त्यों सुना पाया। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को 20 भिन्न-भिन्न देशों की राजधानियों के नाम याद करवाये गये तथा एक सप्ताह के उपरान्त उसे यही नाम सुनाने के लिए कहा गया, परन्तु वह व्यक्ति केवल 12 देशों की राजधानियों के ही नाम सुना पाया। इस स्थिति में कहा जाएगा कि व्यक्ति की धारणा 60% है।

(3) धारणा-मापन की पुनर्रचना विधि- धारणा के मापन के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि ‘पुनर्रचना विधि’ भी है। इस विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति को पहले कोई एक विषय दिया जाता है जिसे समग्र रूप से सीखना या स्मरण करना होता है। व्यक्ति अभीष्ट विषय को भली-भाँति याद कर लेता है। व्यक्ति द्वारा विषय को समग्र रूप से याद कर लेने के उपरान्त उसके सम्मुख उसी विषय को मूल क्रम को भंग करके विभिन्न अंशों में अस्त-व्यस्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके उपरान्त व्यक्ति को कहा जाता है कि वह इस प्रकार के अक्रमित रूप से उपलब्ध सामग्री को उसके मूल रूप में व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करे। वह अपनी धारणा के आधार पर विषय को व्यवस्थित करता है। व्यक्ति जिस अनुपात में विषय को मूल रूप में प्रस्तुत करने में सफल होता, उसी के आधार पर धारणा की माप कर ली जाती है।

(4) धारणा-मापन की बचत विधि- धारणा (स्मृति) मापन के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि को ‘बचत, विधि’ (Saving Method) के नाम से जाना जाता है। धारणा-मापन की इस विधि को पुनः अधिगंम विधि’ भी कहा जाता है। धारणा के मापन के लिए इस विधि के अन्तर्गत प्रथम चरण में व्यक्ति को चुने गये विषय को भली-भाँति स्मरण करवाया जाता है। इस प्रकार से विषय को याद करने में व्यक्ति द्वारा किये गये कुल प्रयासों को लिख लिया जाता है। द्वितीय चरण कुछ समय (काल) उपरान्त प्रारम्भ किया जाता है। इस चरण में व्यक्ति को वही विषय पुन:स्मरण करने के लिए दिया जाता है। इस चरण में अभीष्ट विषय को भली-भाँति स्मरण करने के लिए जितने प्रयास करने पड़े हों उन्हें भी लिख लिया जाता है। यह स्वाभाविक है कि द्वितीय चरण में उसी विषय को याद करने में कम प्रयास करने पड़ते हैं। दोनों चरणों में किये गये प्रयासों के अन्तर को ज्ञात करके लिख लिया जाता है। इन समस्त तथ्यों के आधार पर धारणा को मापन कर लिया जाता है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र को अपनाया जाता है
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 4 Memory and Forgetting 2

प्रश्न 7
विस्मरण से आप क्या समझते हैं? विस्मरण के कारणों को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (2011)
या
विस्मरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। ‘विस्मरण’ के मुख्य सामान्य कारणों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
विस्मरण के कारणों पर विस्तार से प्रकाश डालिए। (2015, 17)
या
विस्मरण के तिन्हीं दो कारणों को स्पष्ट कीजिए। 
(2018)
उत्तर
विस्मरण का अर्थ यदि भूतकालीन अनुभव या याद की गई सामग्री का वर्तमान चेतना में पुन: प्रकट होना ‘स्मरण है, तो उसके प्रकट न होने की मानसिक प्रक्रिया ‘विस्मरण’ कही जाएगी। समय व्यतीत होने के साथ ही व्यक्ति का स्मरण की हुई वस्तु से धीरे-धीरे सम्पर्क कम होता जाता है, फलस्वरूप विस्मृति की क्रिया सक्रिय होती है जिससे स्मृति-चिह्न कमजोर होने लगते हैं; अन्ततः सीखने की क्रिया में ह्रास होता है। और व्यक्ति उस वस्तु को भूल जाता है। विस्मरण की यह महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति प्रत्येक व्यक्ति में पायी जाती है।

विस्मरण (भूलना) से अभिप्राय स्मरण की गई विषय-सामग्री को चेतना में पूर्ण या आंशिक रूप से न ला सकने से है। यदि चेतना में विद्यमान वस्तु की पहचान नहीं हो पा रही है तो भी विस्मरण कहलाएगा। यह एक विरोधी एवं नकारात्मक मानसिक क्रिया है। व्यक्ति के लिए स्मरण जितना आवश्यक है, विस्मरण भी ठीक उतना ही आवश्यक है, क्योंकि जीवन के अरुचिकर एवं दु:खद प्रसंगों को भूलने में ही भलाई है। मनुष्य का मन ऐसी बातों से हटता है जो उसे पीड़ा देती हैं। वह तो केवल सुखद, रुचिकर एवं उपयोगी बातों से सम्बन्ध रखना चाहता है। स्पष्टत: विस्मरण ऐसी अप्रिय बातों से मानव-मन को सुरक्षा प्रदान करता है, किन्तु, आवश्यक एवं उपयोगी बातों को समय पड़ने पर भूल जाना किसी भी दशा में हितकर नहीं कहा जा सकता।

विस्मरण की परिभाषाएँ

विस्मरण की प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं

  1. मन के अनुसार, “जो कुछ अर्जित (सीखा) किया गया है, उसे धारण न कर सकना ही विस्मरण है।”
  2. फ्रॉयड के अनुसार, “जो कुछ अप्रिय है, उसे स्मृति से दूर करने की प्रवृत्ति ही विस्मरण है।”
  3. जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “प्रयास करने के पश्चात् भी पूर्व-अनुभवों का स्मरण न हो पाना ही विस्मरण है।”
  4. इंगलिश एवं इंगलिश के अनुसार, “विस्मरण वह स्थायी या अस्थायी हानि है जिसका सम्बन्ध पूर्व सीखी गई सामग्री से रहता है। यह पुन:स्मरण एवं पहचान-जैसी योग्यताएँ नष्ट कर देता है।

 निष्कर्षत: विस्मरण या भूलना वह मानसिक प्रक्रिया है जिसमें स्मरण या सीखने की प्रक्रिया के अन्तर्गत बने सम्बन्ध क्षीण हो जाते हैं।

विस्मरण के दो प्रकार हैं-सक्रिय विस्मरण एवं निष्क्रिय विस्मरण। सक्रिय विस्मरण में व्यक्ति स्मरण की गई सामग्री को भूलने के लिए प्रयास करता है, जबकि निष्क्रिय विस्मरण में वह बिना प्रयास के ही भूल जाता है।

विस्मरण के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए एबिंगहास ने लिखा है, “जब अभ्यास के अभाव में किसी पूर्व सीखी हुई सामग्री या घटना के स्मृति-चिह्न धुंधले एवं अस्पष्ट हो जाते हैं, जिसके फलस्वरूप किसी सीखी हुई सामग्री का विस्मरण हो जाता है। इस प्रकार एबिंगहास के अनुसार, विस्मरण एक निष्क्रिय प्रक्रिया है। इससे भिन्न फ्रॉयड ने विस्मरण को एक सक्रिय प्रक्रिया माना है तथा माना है कि व्यक्ति कुछ विषयों को जान-बूझकर तथा सप्रयास ही भूल जाया करता है।

विस्मरण या भूलने के सामान्य कारण

कोई मनुष्य अवसर पड़ने पर, प्रयास करने के बावजूद भी किसी पूर्व अनुभव को याद करने में क्यों असफल रह जाता है? इसका उत्तर आसानी से नहीं दिया जा सकता, क्योंकि विस्मरण के लिए

कोई एक नहीं, बल्कि अनेकानेक कारकै जिम्मेदार होते हैं। इनमें से अनेक कारकों की तो खोज भी काफी कठिन है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा विस्मरण के सम्बन्ध में पर्याप्त अध्ययन से, विस्मरण के निम्नलिखित सामान्य कारणों का पता चलता है|

(1) अभ्यास का अभाव– विस्मरण का एक प्रमुख कारण अनभ्यास अर्थात् अभ्यास का न होना है। यदि सीखी गई वस्तुओं का समुचित एवं निरन्तर अभ्यास नहीं किया जाता है तो वे शनैः-शनैः विस्मृत हो जाती हैं।

(2) समय का प्रभाव प्रत्येक अनुभव मस्तिष्क में एक स्मृति- चिह्न या संस्कार का निर्माण करता है। समय बीतने के साथ-साथ नये अनुभव तथा तथ्य प्रकट होते रहते हैं जिनके प्रभाव से पुराना संस्कार धूमिल पड़ जाता है। दीर्घकाल में इसका पूरी तरह लोप भी हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार विस्मरण की क्रिया समय द्वारा प्रभावित अवश्य होती है, किन्तु स्मृति को प्रमस्तिष्क के सीधे उद्दीपन द्वारा फिर से जीवित किया जा सकता है।

(3) नींद का अभाव- प्रयोगों से ज्ञात होता है कि नींद और आराम के अभाव में सीखी हुई सामग्री द्वारा निर्मित-चिह्नों के संयोजक दुर्बल पड़ जाते हैं और धीरे-धीरे टूट जाते हैं। इसके विपरीत नींद एवं आराम की अवस्था में स्मृति-चिह्नों में मजबूती आती है और विस्मरण का कम प्रभाव पड़ता है।

(4) संवेग- संवेगावस्था में मनुष्य को स्नायु-संस्थान उत्तेजित होकर असामान्य स्वरूप धारण कर लेता है जिसका शारीरिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि किसी सामग्री को याद करने के उपरान्त व्यक्ति संवेगावस्था का शिकार हो जाए तो सीखा गया विषय विस्मृत हो सकता है।

(5) दमन- प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी फ्रॉयड के अनुसार, किसी बात को मनुष्य इसलिए भूलता है क्योंकि वह उसे भूलना चाहता है। हमें ज्ञात है कि मनुष्य, अचेतन मन की क्रियाओं को प्रत्यावाहित नहीं कर पाता और इसी कारण ये क्रियाएँ याद नहीं आतीं। मनुष्य के अप्रिय तथा कष्टदायी अनुभव उसके अचेतन मन की ओर ठेल दिये जाते हैं, जहाँ वे जाकर दमित तथा विस्मृत हो जाते हैं।

(6) सीखने की मात्रा तथा विषय का आकार- जब सीखने की मात्रा कम होती है तथा विषय का आकार छोटा होता है तो विस्मरण जल्दी होता है। मनुष्य अधिक मात्रा तथा लम्बे आकार वाली विषय-सामग्री को जल्दी नहीं भूल पाता।

(7) सीखने की गति- द्रुतगति से सीखा हुआ ज्ञान शीघ्र विस्मृत नहीं होता, किन्तु धीरे-धीरे और मन्दगति से सीखा गया ज्ञान शीघ्र एवं अधिक विस्मृत होता है।

(8) दोषपूर्ण पद्धति- यदि सीखने की पद्धति दोषपूर्ण है तो स्मृति पटल पर सीखी गई वस्तु को दुर्बल संस्कार बनता है और वह जल्दी ही लुप्त हो जाता है। सीखने की मनोवैज्ञानिक पद्धति शीघ्र एवं स्थायी स्मरण में सहायक होती है।

(9) अर्थहीन विषय-सामग्री- याद की जाने वाली अर्थहीन विषय-सामग्री के स्मृति-चिह्न मस्तिष्क पर गहरे नहीं बनते; अतः ऐसी सामग्री को भूलने की गति भी तीव्र होती है।

(10) मानसिक तत्परता का अभाव- सीखने की प्रक्रिया के दौरान मानसिक तत्परता एवं रुचि का योग रहने से स्मरण को स्थायित्व मिलता है। मानसिक तत्परता का अभाव रहने से मस्तिष्क पर संस्कार कम स्थायी होता है जिससे भूलने की क्रिया में वृद्धि होती है।

(11) मस्तिष्क आघात- बहुधा देखने में आता है कि मस्तिष्क पर आघात या चोट लगने से स्मृति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे या तो स्मृति कम हो जाती है या लुप्त हो जाती है। गहरी चोट के कारण विस्मरण की मात्रा बढ़ जाती है।

(12) चिन्तन एवं मनन की कमी- सीखने की प्रक्रिया में मानसिक चिन्तन एवं मनन की कमी के कारण सीखे गये तथ्यों के हल्के स्मृति-चिह्न बनते हैं जिसके परिणामतः विस्मृति अधिक होती है।

(13) भावना ग्रंथियाँ– सीखते समय व्यक्ति के अचेतन मन की भावना ग्रन्थियाँ संस्कारों के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती हैं जिससे व्यक्ति भूलने लगता है।

(14) वृद्धावस्था– वृद्धावस्था में व्यक्ति के शरीर के अंग कमजोर होने लगते हैं तथा उसको विविध क्षमताएँ दुर्बल हो जा हैं जिसके फलस्वरूप उसकी स्मरण शक्ति भी क्षीण पड़ जाती है।

(15) मादक पदार्थ– मादक पदार्थों का सेवन भी विस्मरण का एक कारण है। शराब, अफीम, गाँजा, भाँग, चरस आदि का नशा करने वाले लोगों की स्नायु क्षीण हो जाती हैं। इसके फलस्वरूप वे बातों को अधिक समय तक स्मरण नहीं रख पाते तथा उन्हें भूल जाते हैं।

(16) गम्भीर रोग- गम्भीर शारीरिक एवं मानसिक रोग; जैसे-टाईफॉइड, मनोविदलता आदि स्मरण शक्ति पर बुरा प्रभाव डालते हैं। इनसे पीड़ित व्यक्ति में विस्मरण तेजी से होता है।

(17) पूर्वोन्मुख अवरोध- इसे आन्तरिक या भूताभिमुख अवरोध (Retroactive Inhibition) भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत हर नया ज्ञान पुराने ज्ञान के प्रत्यास्मरण में रुकावट डालता है। प्रयोगों से पता चलता है कि सीखी गयी नई क्रियाएँ पुरानी क्रियाओं के मार्ग में तुरन्त अवरोध (रुकावट) पैदा करने लगती हैं जिससे पूर्व ज्ञान का स्मरण कठिन हो जाता है।

(18) अग्रोन्मुख अवरोध- अग्रोन्मुख अवरोध (Proactive Inhibition) में पुरानी क्रियाएँ नई सीखी क्रियाओं के प्रत्यास्मरण के मार्ग को बाधित करती हैं। इस भाँति नये ज्ञान का प्रत्यास्मरण पुरानी सीखी क्रियाओं की उत्तेजना से रुक जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
अच्छी स्मृति की मुख्य विशेषताओं अथवा लक्षणों का उल्लेख कीजिए। या अच्छी स्मृति की दो विशेषताएँ बताइए। (2015, 17) उत्तर
अच्छी स्मृति की मुख्य विशेषताओं अथवा लक्षणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

(1) तीव्र गति से सीखना-सीखना (Learning) स्मृति का प्रथम एवं महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। स्मृति का ज्ञान सीखने की तीव्रता से होता है। अच्छी स्मृति वाला व्यक्ति शीघ्रता से सीखता है और उसके मस्तिष्क पर सीखी गई सामग्री को शीघ्र प्रभाव पड़ता है।

(2) स्थायी धारण शक्ति– अच्छी स्मृति की दूसरी विशेषता विषय-सामग्री का देर तक धारण करना है। किसी सामग्री को लम्बे समय तक धारण करने के लिए दो बातें आवश्यक हैं-एक, व्यक्ति की मानसिक संरचना (बनावट) तथा दो, सामग्री के विषय में बार-बार सोचना। इससे मस्तिष्क में स्थित संस्कार जल्दी नहीं मिटते।

(3) व्यर्थ बातों का विस्मरण- अच्छी स्मृति के लिए व्यर्थ की बातों का विस्मरण (भूलना) भी आवश्यक है। जितना आवश्यक एवं उपयोगी बातों को मस्तिष्क में सँजोकर रखना है उतना ही आवश्यक व्यर्थ बातों को भूल जाना भी है।

(4) यथार्थ पुनःस्मरण- अच्छी स्मृति में यथार्थ पुन:स्मरण पाया जाता है अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर भूतकालीन अनुभव ठीक-ठीक तथा पूरी तरह याद आ जाने चाहिए। एक शिक्षक के व्याख्यान की सफलता उसके यथार्थ एवं शीघ्र पुन:स्मरण पर निर्भर करती है।

(5) स्पष्ट एवं शीघ्र पहचान- अच्छी स्मृति के लिए वस्तु के स्पष्ट एवं शीघ्र पहचान की पर्याप्त आवश्यकता होती है।

(6) उपादेयता– सीखा गया ज्ञान तभी उत्पादक या उपादेय होगा जब कि वह समय पड़ने तथा उपयुक्त अवसर पर याद आ जाए। अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता के अवसर पर यदि याद की गई कविताएँ सही समय पर याद न आयें तो वे अनुपयोगी ही कहलाएँगी।

प्रश्न 2
कण्ठस्थीकरण (याद करने) की कौन-सी विधि को आप सर्वोत्तम मानते हैं? लम्बी कविता को किस विधि द्वारा याद करना चाहिए?
उत्तर
हम जानते हैं कि कण्ठस्थीकरण अथवा याद करने की विभिन्न विधियाँ हैं। विभिन्न विधियों को ध्यान में रखते हुए स्मरण की क्रिया के सम्बन्ध में निष्कर्षतः हम कह सकते हैं-एक, स्मरण एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है तथा दो, स्मरण पर विषय की प्रकृति का प्रभाव पड़ता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से

व्यक्तिगत भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की रुचि, अभिरुचि, बुद्धि, मनोवृत्ति, योग्यता एवं क्षमता अलग होती है। इसी प्रकार कुछ विषय सरल तो कुछ कठिन, ‘कुछ छोटे तो कुछ लम्बे, कुछ रुचिकर तो कुछ अरुचिकर हो सकते हैं। किस व्यक्ति के लिए स्मरण की कौन-सी विधि सर्वोत्तम होगी, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः स्मरण की सभी विधियों का सापेक्षिक (ग्नि) महत्त्व दृष्टिगोचर होता है। याद करने वाला व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं तथा विषय की प्रकृति के अनुसार किसी भी एक उपयुक्त विधि या दो को मिलाकर मिश्रित विधि का उपयोग कर सकता है।

एक लम्बी कविता को कण्ठस्थ करने के लिए सबसे पहले समूची कविता को एक साथ याद किया जाना चाहिए। कुछ अन्तर से थोड़े समय बाद, कविता को इसके पदों में खण्डित करके अलग-अलग कण्ठस्थ किया जाएगा, किन्तु विभिन्न खण्डों या अंशों को परस्पर एक-दूसरे से अवश्य जोड़ते जाना चाहिए। इसकी स्मृति सर्वोत्तम समझी जाती है। स्पष्टत: इसके लिए पूर्ण एवं आंशिक खण्ड विधि को मिलाकर मिश्रित विधि का उपयोग किया जाएगा।

प्रश्न 3
विस्मरण को रोकने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विस्मरण की जीवन में विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है, किन्तु सीमा से अधिक भूल/विस्मृति का होना हानिकारक है और उस समय इसे रोकना अपरिहार्य हो जाता है। विस्मरण को रोकने के उपाय निम्नलिखित से हैं

(1) दोहरांना— याद की जाने वाली किसी विषय-सामग्री को स्थायी करने की दृष्टि से, उसे याद करने के एक घण्टे के भीतर अवश्य दोहरा लेना चाहिए।

(2) स्वास्थ्य– विस्मरण से बचने के लिए शरीर और मन के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना आवश्यक है। जिन लोगों का मस्तिष्क दुर्बल हो जाता है, उन्हें मानसिक दुर्बलता दूर करने के लिए पौष्टिक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

(3) विश्राम- विषय को याद करने के उपरान्त कुछ देर विश्राम करना अच्छा है, इससे स्मृति दृढ़ हो जाती है तथा विस्मरण नहीं होगा।

(4) अर्तिशिक्षण– विषय को आवश्यकता से अधिक याद कर लेने तथा पुन: उसे बार-बार दोहराने से भूलने पर नियन्त्रण रहता है। इसे अतिशिक्षण कहते हैं।

(5) इच्छा-शक्ति– विषय को इच्छा-शक्ति के साथ याद करना चाहिए। इससे वह मस्तिष्क में स्थायी होगा तथा विस्मृति कम होगी।

(6) साहचर्य स्थापना- विचार साहचर्य के नियम का पालन करने से स्मरण को स्थायित्व मिलता है। इस नियम के अनुसार याद करते समय नवीन ज्ञान को पुराने ज्ञान से जोड़ते हुए चलना चाहिए।

(7) सस्वर पाठन- बोल-बोलकर (सस्वर) पाठ याद करने से विस्मरण की प्रवृत्ति कम। होती है।

(8) निद्रा— याद करने के उपरान्त थोड़ी देर तक सो लेने से विषय का संस्कार मस्तिष्क में * गहरा हो जाता है तथा भूलना कम हो जाता है।

(9) नशे से बचाव- नशाखोर लोगों को नशीले पदार्थों का सेवन छोड़ देना चाहिए। इससे विस्मरण की मात्रा कम होगी।

(10) लम्बी छुट्टियों में अध्ययन– बहुत-से विद्यार्थी लम्बी छुट्टियों में अध्ययन कार्य बन्द कर देते हैं। परिणामतः वे सीखा गया ज्ञान भूल जाते हैं। अत: लम्बी छुट्टियों (जैसे—ग्रीष्मावकाश) में भी अध्ययन की प्रवृत्ति बनाये रखनी चाहिए।विस्मरण के उपर्युक्त उपाय अपनाने पर भूलने की अस्वाभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है।

प्रश्न 4
अल्पकालीन स्मृति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
स्मृति के एक मुख्य प्रकार के रूप में अल्पकालीन स्मृति की मुख्य विशेषताओं को संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है

(1) धारणा के ह्रास की दर अधिक— अल्पकालीन स्मृति की धारणा को ह्रास तीव्र गति से होता है अर्थात् धारणा के पास की दर अधिक होती है। हम यह भी कह सकते हैं कि अल्पकालीन स्मृति के सन्दर्भ में सम्बन्धित विषय का विस्मरण तीव्र गति से होता है। इस विषय में पीटरसन एवं पीटरसन ने कुछ परीक्षण किये तथा निष्कर्ष स्वरूप बताया कि अल्पकालीन स्मृति के सन्दर्भ में विषय को याद करने के उपरान्त 12 सेकण्ड में प्रायः याद किये गये विषय का 75% विस्मरण हो जाता है। तथा 18 सेकण्ड के उपरान्त लगभग 90% विस्मरण हो जाती है।

(2) अधिगम की मात्रा कम होती है— अल्पकालीन स्मृति के सन्दर्भ में अधिगम कम मात्रा में होता है। अधिगम की मात्रा कम होने का मुख्य कारण यह होता है कि इस विधि में अनुभव की मात्रा भी कम होती है।

(3) अग्रोन्मुखी तथा पृष्ठोन्मुखी व्यतिकरण- अल्पकालीन स्मृति पर सामान्य रूप से अग्रोन्मुखी तथा पृष्ठोन्मुखी दोनों प्रकार के व्यतिकरणों का प्रभाव अवश्य पड़ता है।

प्रश्न 5
अल्पकालीन स्मृति के अध्ययन की प्रविधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अल्पकालीन स्मृति के अध्ययन के लिए विभिन्न प्रविधियों को अपनाया जाता है, जिनमें से मुख्य इस प्रकार हैं

(1) अध्ययन की विक्षेप प्रविधि तथा
(2) अध्ययन की छानबीन प्रविधि। इन दोनों प्रविधियों का सामान्य विवरण अग्रलिखित है|

(1) अल्पकालीन स्मृति के अध्ययन की विक्षेप प्रविधि– पीटरसन एवं पीटरसन नामक मनोवैज्ञानिकों ने अल्पकालीन स्मृति के अध्ययन के लिए ‘विक्षेप प्रविधि’ (Distraction Technique) को अपनाया था। इस विधि के अन्तर्गत स्मृति के अध्ययन के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के सम्मुख अभीष्ट विषय को एक बार प्रस्तुत किया जाता है अर्थात् विषय को सीखने या याद करने का एक अवसर प्रदान किया जाता है तथा उसके उपरान्त व्यक्ति को तुरन्त कोई अन्य विषय सीखने में लगा दिया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था के कारण व्यक्ति को पूर्व स्मरण किये गये विषय को मन-ही-मन दोहराने का अवसर प्राप्त नहीं होता। द्वितीय विषय में संलग्न रहने के उपरान्त व्यक्ति को पुन: पहले स्मरण किये गये विषय को सुनाने के लिए कहा जाता है अर्थात् उसकी धारणा के मापन का कार्य किया जाता है। पीटरसन एवं पीटरसन ने अपने परीक्षणों के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप बताया कि 18 सेकण्ड के व्यवधान के उपरान्त पूर्व स्मरण किये गये विषय की धारणा केवल 10% रह जाता है।

(2) अल्पकालीन स्मृति के अध्ययन की छानबीन प्रविधि- अल्पकालीन स्मृति के अध्ययन की एक विधि छानबीन प्रविधि’ (Probe Technique) भी है। इस प्रविधि के अन्तर्गत व्यक्ति के सम्मुख कुछ सार्थक, निरर्थक या युग्मित सहचर पद क्रमिक ढंग से प्रस्तुत किये जाते हैं। कुछ समय के उपरान्त उन्हीं क्रमिक ढंग से प्रस्तुत किये गये पदों में से किसी एक पद को प्रस्तुत किया जाता है। तथा व्यक्ति को कहा जाता है कि पहले प्रस्तुत की गयी पद-श्रृंखला में उस पद के उपरान्त आने वाला पुद बतायें। इस प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति की धारणा को ज्ञात कर लिया जाता है।

प्रश्न 6
टिप्पणी लिखिए–असामान्य स्मृतियाँ उत्तर सामान्य या अच्छी स्मृति से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है, परन्तु कुछ स्मृतियाँ असामान्य स्मृतियाँ (Abnormal Memories) भी होती हैं। असामान्य स्मृति के मुख्य रूप से तीन प्रकार या स्वरूप हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है|
(1) स्मृति हास- असामान्य स्मृति का एक रूप स्मृति ह्रास (Amnesia) है। इस स्थिति में स्मृति नष्ट हो जाती है। प्राय: सभी सीखी गई क्रियाओं या विषयों का विस्मरण होने लगता है। गम्भीर स्मृति ह्रास के व्यक्ति के व्यक्तित्व का भी विघटन हो सकता है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार मुख्य कारक हैं-ध्यान, प्रत्यक्षीकरण संवेग तथा सीखने की कमी। अनेक बार शारीरिक आघात, व्यक्तिगत संघर्ष तथा मानसिक रोगों के कारण भी स्मृति हास की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

(2) तीव्र स्मृति- असामान्य स्मृति का एक रूप तीव्र स्मृति (Hypermnesia) भी है। ऐसा देखा गया है कि किसी २ किस्मिक घटना के कारण व्यक्ति में स्मृति की प्रबलता आ जाती है। इस स्थिति में विभिन्न घटनाएँ क्रमबद्ध होकर याद आती हैं। प्रायः सम्मोहन अथवा सन्निपात की अवस्था में तीव्र स्मृति हो जाती है।

(3) मिथ्या स्मृति- असामान्य स्मृति का तीसरा रूप मिथ्या स्मृति (Paramnesia) है। इस असामान्य स्थिति में व्यक्ति उन घटनाओं का पुन:स्मरण करता हुआ देखा गया है, जो घटनाएँ पहले कभी घटित हुई ही नहीं थीं। इसी प्रकार कभी-कभी व्यक्ति पुरानी घटनाओं को नई कल्पनाओं से जोड़कर एक भिन्न रूप में प्रस्तुत करता है। यह मिथ्या स्मृति ही है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्मरण करने की पूर्ण तथा आंशिक विधियों में से कौन-सी विधि अच्छी मानी जाती है?
उत्तर
पूर्ण और आंशिक दोनों विधियों में से कौन-सी विधि अधिक अच्छी है, इस समस्या को सुलझाने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने समय-समय पर विभिन्न प्रयोग किये हैं। पेखस्टाइन (Pechstein) नामक विद्वान् ने अपने प्रयोग से निष्कर्ष निकाला कि आंशिक विधि, पूर्ण विधि से बेहतर है, किन्तु एल० स्टीफेन्स (L. Steffens) के प्रयोगों से सिद्ध होता है कि स्मरण की क्रिया में आंशिक विधि की तुलना में पूर्ण विधि में 12% समय की बचत होती है। पिनर एवं साइण्डर (Pyner and Synder) के प्रयोगों से ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण रूप से याद करने वाली विधि 240 लाइनों वाली कविता के लिए अत्यन्त प्रभावकारी है लेकिन इससे लम्बी कविता को खण्डों या उप-समग्रों में बाँटकर याद किया जा सकता है।

वस्तुतः याद की जाने वाली सामग्री के लिए विधि का चयन; विषय की मात्र, प्रकार तथा याद करने वाले की बुद्धि व क्षमता पर आधारित है। जहाँ पूर्ण विधि सरल, छोटी सामग्री तथा तीव्र बुद्धि के बालकों के लिए उपयुक्त है; वहीं दूसरी ओर, आंशिक विधि कठिन, लम्बी सामग्री तथा मन्द बुद्धि के बालकों के लिए बेहतर समझी जाती है।

प्रश्न 2
स्मरण करने की व्यवधान सहित तथा व्यवधान रहित विधियों में से कौन-सी विधि अच्छी मानी जाती है?
उत्तर
किसी विषय को स्मरण करने के लिए व्यवधान सहित तथा व्यवधान रहित विधियों को प्रायः अपनाया जाता है। इन दोनों विधियों को लेकर मनोवैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोग किये हैं। एबिंगहास के प्रयोगों के निष्कर्ष बताते हैं कि व्यवधान सहित विधि निरर्थक पदों को याद करने की एक अच्छी विधि है। बेलवार्नर तथा विलियम ने इसे पद्य एवं गद्य याद करने की मितव्ययी विधि कहा है। इसके विपरीत कुक नामक विद्वान् ने व्यवधान रहित विधि का समर्थन किया है। सच्चाई यह है कि स्थायी स्मृति के लिए व्यवधान सहित विधि तथा सरल एवं छोटी सामग्री, जिसे तात्कालिक स्मृति के लिए धारण करना हो, के लिए व्यवधान रहित विधि उपयुक्त होती है। वैसे व्यवधान सहित विधि को आमतौर पर इस कारण मान्यता दी जाती है क्योकि व्यवधान या अन्तर से थकान तथा अरुचि समाप्त हो जाती है एवं मानसिक चिन्तन तथा ताजगी के अवसर प्राप्त हो जाते हैं। अन्तर के कारण त्रुटिपूर्ण प्रयासों से अवधान हट जाता है और उन्हें दोहराया नहीं जाता।।

प्रश्न 3
स्मृति में प्रत्याह्वान (Recall) का क्या स्थान है?
उत्तर
प्रत्याह्वान स्मृति की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। गत सीखे गये विषय या अनुभवों को चेतना के स्तर पर लाने की क्रिया को प्रत्याह्वान या पुन:स्मरण कहा जाता है। प्रत्याह्वान के अभाव में या त्रुटिपूर्ण होने पर स्मृति सम्भव ही नहीं है। व्यवहार में देखा जाता है कि अधिकांश विषयों का प्रत्यास्मरण प्रायः अधूरा या आंशिक ही होता है। जितना अधिक एवं शुद्ध प्रत्याह्वान होगा उतनी ही अच्छी स्मृति होगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्मृति की प्रक्रिया में प्रत्याह्वान का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 4
विस्मरण के २ नुप्रयोग सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विस्मरण के कारणों के स्पष्टीकरण के लिए एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया जाता है जिसे अनुप्रयोग का सिद्धान्त कहते हैं। यह एक जीवशास्त्रीय सिद्धान्त है। इस जीवशास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार विस्मरण का अनुपयोगिता (Disuse) से गहरा सम्बन्ध है और इसी कारण विस्मृति, मस्तिष्क की एक निष्क्रिय मानसिक क्रिया’ कही जाती है। यदि याद किये गये अनुभवों, तथ्यों या पाठ को समय-समय पर दोहराया नहीं जाएगा तो मस्तिष्क में उनके स्मृति-चिह्न धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हैं। और हम उन्हें भूल सकते हैं। अतः सीखी गयी वस्तुओं को बार-बार दोहराकर उन्हें प्रयोग में लाना आवश्यक है, अन्यथा अनुप्रप्रयोग के कारण उनकी स्मृति दुर्बल या नष्ट हो सकती है।

प्रश्न 5
विस्मरण के बाधा सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विस्मरण के कारणों के स्पष्टीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया एक सिद्धान्त बाधा को सिद्धान्त है। बाधा के सिद्धान्त के अनुसार विस्मरण एक ‘सक्रिय मानसिक क्रिया है। यह सिद्धान्त बताता है कि मस्तिष्क में लगातार एवं क्रमशः बनने वाले नये स्मृति-चिह्नों की तह पुराने स्मृति-चिह्नों की तरह को ढकती जाती है जिससे नये स्मृति-चिह्न पुराने स्मृति-चिह्न के पुन:स्मरण में बाधा उत्पन्न करते हैं। परिणामस्वरूप वे अपनी मूल और वास्तविक स्थिति में नहीं रह पाते। उदाहरण के लिए-नींद की अवस्था में नये संस्कारों का जन्म न होने से बहुत कम बाधा उत्पन्न होती है; अतः सोने से पूर्व याद किया गया पाठ जागने पर तत्काल ही याद आ जाता है।

प्रश्न 6
विस्मरण के दमन सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विस्मरण की प्रक्रिया की समुचित व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है, जिसे दर्मन का सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक फ्रॉयड हैं। फ्रॉयड के अनुसार, “विस्मरिण एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है। हम भूलते हैं, क्योंकि हम भूलना चाहते हैं।” विस्मरण की प्रक्रिया को इस रूप में स्वीकार करते हुए विस्मरण के दमन सिद्धान्त के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है कि हम अपने अप्रिय तथा दु:खद अनुभवों को चेतन मन से दमित कर देते हैं तथा उन्हें अचेतन मन में पहुँचा देते हैं। इसी प्रकार मानसिक संघर्ष के कारण भी पुराने अनुभवों को भुला दिया जाता है। फ्रॉयड के द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त की अनेक मनोवैज्ञानिकों ने आलोचना की है। उनका कहना है कि व्यवहार में व्यक्ति प्रायः उन विषयों को भी भूल जाता है जो उसके लिए अप्रिय तथा दु:खद नहीं होते तथा जिन्हें वह भूलना चाहता भी नहीं।।

प्रश्न 7
विस्मरण के महत्त्व का उल्लेख कीजिए। या मानव-जीवन में विस्मृति की क्या उपयोगिता है? (2009, 12)
उत्तर
विस्मरण एक जटिल मानसिक क्रिया है, जिसका मानव-जीवन में विशेष महत्त्व है। विस्मरण के कारण ही मनुष्य दु:खद घटनाओं को समय बीतने के साथ-ही-साथ विस्मृत ( भूलता) करता जाता है। यदि यह क्रिया न होती तो मनुष्य का जीवन अशान्त तथा विक्षिप्त बना रहता और वह अनेक प्रकार के मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है। लेकिन अतिशय विस्मरण भी घातक होता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में मनुष्य की स्मृति लुप्त हो जाती है और उसे अपने विगत जीवन का कोई ज्ञान नहीं रहता। इस प्रकार विस्मरण और स्मरण दोनों ही क्रियाएँ मानव-जीवन के लिए आवश्यक हैं। व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी विस्मरण का विशेष महत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ शत्रुतापूर्ण, अप्रिय तथा जघन्य घटनाएँ घटित होती रहती हैं। व्यक्ति इन्हें समय के साथ भुला देता है। तथा सामान्य जीवन व्यतीत करता रहता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए

1. अतीत काल के किसी विगत अनुभव के अर्द्ध-चेतन मन से चेतन मन में आने की प्रक्रिया को……………. कहते हैं।
2. स्मृति अपने आप में एक जटिल……. है।
3. पूर्व अनुभवों को याद करना, दोहराना या चेतना के स्तर पर लाने की मानसिक क्रिया: …….कहलाती है।
4. स्मृति-चिह्नों या संस्कारों के संगृहीत होने की क्रिया को हैं……………।
5. स्मृति में क्रमशः चार मानसिक प्रक्रियाएँ अधिगम, …………….पुनः स्मरण एवं ……………..
सम्मिलित हैं।
6. स्मृति की प्रक्रिया में अधिगम …………….और ……………धारणा के पश्चात् और की प्रक्रियाएँ होती हैं।
7. स्मरण करने के लिए किसी विषय को सीखने के बाद बार-बार दोहराने की प्रक्रिया को…………
कहते हैं ।
8. अच्छी स्मृति की मुख्यतम विशेषता है………… ।
9. सदैव साथ रहने वाली सहेलियों में से किसी एक को देखकर दूसरी की याद आ जाना ………के नियम का परिणाम है।
10. ज्ञानेन्द्रियों के स्तर पर पंजीकृत सूचनाओं को कुछ क्षणों के लिए ज्यों-का-त्यों भण्डारित कर 
लेना …………कहलाता है।
11. किसी विषय को सीखने के कुछ सेकण्ड उपरान्त पायी जाने वाली धारणा को …….के रूप 
में जाना जाता है।
12. किसी विषय को सीखने के कुछ माह उपरान्त पायी जाने वाली धारणा को ………कहते हैं।
13. किसी सीखे गये या स्मरण किये गये विषय का प्रत्यास्मरण न हो पाना ………. कहलाता है।
14. धारण की गई विषय-वस्तु का प्रत्याह्वान और पहचान नहीं कर पाना ………..कहलाता है।
15. स्मरण किये गये विषय का अभ्यास न होने पर विस्मरण की गति…जाती है।
16. फ्रॉयड के अनुसार विस्मरण का मुख्य कारण ………है।
17. दोषपूर्ण पद्धति से सीखे गये विषय का विस्मरण…………हो जाता है।
18. याद किये गये विषय को बार-बार दोहराने से ………को रोका जा सकता है।
19. विस्मरण के नितान्त अभाव में व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य …….सकता है।
20………….. का सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि इसके फलस्वरूप व्यक्ति अपनी दु:खद स्मृतियों से 
मुक्त होता है तथा नई बातों को सीखकर याद कर सकता है।
उत्तर
1. स्मृति, 2. मानसिक प्रक्रिया, 3. स्मृति, 4. धारणा, 5. धारणा, प्रत्यभिज्ञा, 6. प्रत्यास्मरण, प्रत्यभिज्ञा, 7. अभ्यास, 8. यथार्थ पुन:स्मरण, 9. साहचर्य, 10. संवेदी स्मृति, 11. अल्पकालीन स्मृति, 12. दीर्घकालीन स्मृति, 13. विस्मरण, 14. विस्मरण, 15. बढ़, 16. दमन, 17. शीघ्र, 18. विस्मरण, 19. बिगड़, 20. विस्मरण

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए
प्रश्न 1.
स्मृति से क्या आशय है?
उत्तर
पूर्व अनुभवों को याद करने, दोहराने या चेतना के स्तर पर लाने की मानसिक क्रिया ‘स्मृति’ कहलाती है।

प्रश्न 2.
स्मृति के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर
स्मृति के प्रमुख तत्त्व हैं-सीखना, धारणा, पुन:स्मरण या प्रत्यास्मरण तथा प्रत्यभिज्ञा या पहचान।

प्रश्न 3.
अच्छी स्मृति की मुख्य विशेषताओं या लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अच्छी स्मृति की मुख्य विशेषताएँ या लक्षण निम्नवत्: हैं–

  1. तीव्र गति से सीखना
  2. स्थायी धारण शक्ति
  3. व्यर्थ बातों का विस्मरण
  4. यथार्थ पुन:स्मरण
  5. स्पष्ट एवं शीघ्र पहचान तथा
  6. उपादेयता।।

प्रश्न 4.
प्रत्यभिज्ञा को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर
प्रत्यभिज्ञा को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक निम्नवत् हैं

  1.  मानसिक तत्परता तथा
  2. आत्म-विश्वास।

प्रश्न 5.
स्मृति के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
स्मृति के मुख्य प्रकार हैं—

  1. संवेदी स्मृति
  2. अल्पकालीन स्मृति तथा
  3. दीर्घकालीन स्मृति।

प्रश्न 6.
स्मृति अर्थात् धारणा के मापन की मुख्य विधियाँ कौन-कौन सी हैं? ।
उत्तर
स्मृति अर्थात् धारणा के मापन की मुख्य रूप से निम्न चार विधियाँ हैं

  1. धारणा-मापन की पहचान विधि
  2. धारणा-मापन की पुन:स्मरण विधि
  3. धारणा-मापन की पुनर्रचना विधि तथा
  4. धारणा-मापन की बचत विधि।

प्रश्न 7.
साहचर्य से क्या आशय है?
उत्तर
साहचर्य में किन्हीं दो विषय-वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्ध को ध्यान में रखा जाता है तथा उस सम्बन्ध के आधार पर स्मृति की प्रक्रिया को सुचारु रूप प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 8.
साहचर्य की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर
बी०एन० झा के अनुसार, “विचारों का साहचर्य एक विख्यात सिद्धान्त है, जिसके द्वारा कुछ विशिष्ट सम्बन्धों के कारण एक विचार दूसरे से सम्बन्धित होने की प्रवृत्ति रखता

प्रश्न 9.
साहचर्य के प्राथमिक नियम कौन-कौन से हैं?
उत्तर
साहचर्य के प्राथमिक नियम हैं-

  1.  समीपता का नियम
  2. सादृश्यता का नियम
  3. विरोध का नियम तथा
  4. क्रमिक रुचि का नियम

प्रश्न 10.
साहचर्य के गौण नियम कौन-कौन से हैं?
उत्तर
साहचर्य के गौण नियम हैं-

  1. प्राथमिकता का नियम
  2. नवीनता का नियम
  3. पुनरावृत्ति का नियम
  4. स्पष्टता का नियम तथा
  5. प्रबलता का नियम।

प्रश्न 11.
विस्मरण से क्या आशय है?
उत्तर
किसी याद किये गये या सीखे गये विषय के चेतना के स्तर पर न आ पाने की दशा को विस्मरण कहते हैं।

प्रश्न 12.
विस्मरण के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विस्मरण के दो प्रकार हैं-सक्रिय विस्मरण तथा निष्क्रिय विस्मरण। सक्रिय विस्मरण में व्यक्ति स्मरण की गयी सामग्री को भूलने के लिए प्रयास करता है, जबकि निष्क्रिय विस्मरण में यह बिना प्रयास के ही भूल जाता है।

प्रश्न 13.
किस मनोवैज्ञानिक ने विस्मरण को मुख्य रूप से एक निष्क्रिय मानसिक प्रक्रिया माना है?
उत्तर
ऐबिंगहॉस ने मुख्य रूप से विस्मरण को एक निष्क्रिय मानसिक प्रक्रिया माना है।

प्रश्न 14.
फ्रॉयड ने विस्मरण को किस प्रकार की प्रक्रिया माना है तथा क्यों?
उत्तर
फ्रॉयड ने विस्मरण को एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया माना है। उसके अनुसार, क्योंकि व्यक्ति किसी विषय को भूलना चाहता है; अतः वह उसे भूल जाता है। इस प्रकार विस्मरण एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 15.
विस्मरण को रोकने का सर्वोत्तम उपाय क्या है?
उत्तर
विस्मरण को रोकने का सर्वोत्तम उपाय है—याद किये गये विषय को । समय-समय पर दोहराते रहना।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
भूतकालीन अनुभवों एवं सीखे गये विषयों का चेतना के स्तर पर आना कहलाता है
(क) सृजनात्मक चिन्तन
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) यथार्थ ज्ञान
(घ) स्मृति
उत्तर
(घ) स्मृति

प्रश्न 2.
“घटनाओं की उस भॉति कल्पना करना जिस भाँति भूतकाल में उनका अनुभव किया गया था तथा उन्हें अपने ही अनुभव के रूप में पहचानना स्मृति है।” यह कथन किसका है?
(क) वुडवर्थ
(ख) जे०एस०रॉस
(ग) मैक्डूगल
(घ) स्टाउट
उत्तर
(ग) मैक्डूगल

प्रश्न 3.
स्मृति को ऐसी प्रक्रिया कहते हैं, जिसमें
(क) परिवर्तन होता है।
(ख) तन्त्रिको-तन्त्र प्रभावित होता है।
(ग) किसी आवश्यकतानुसार सूचना पुनर्परित की जाती है।
(घ) किसी आवश्यकता की पूर्ति होती है
उत्तर
(ग) किसी आवश्यकतानुसार सूचना पुनर्परित की जाती है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन स्मृति-प्रक्रिया का अंग है ?
(क) गैस्टाल्ट
(ख) अन्तर्दर्शन
(ग) पहचान
(घ) कल्पना
उत्तर
(ग) पहचान

प्रश्न 5.
स्मृति का तत्त्व नहीं है|
(क) सीखना
(ख) पुन:स्मरण
(ग) प्रत्यभिज्ञा
(घ) चिन्तन
उत्तर
(घ) चिन्तन

प्रश्न 6.
उत्तम स्मृति का लक्षण नहीं है
(क) स्थायी धारण-शक्ति
(ख) यथार्थ पुन:स्मरण
(ग) स्पष्ट एवं शीघ्र पहचान ।
(घ) अनावश्यक काल्पनिक तत्त्वों का समावेश
उत्तर
(घ) अनावश्यक काल्पनिक तत्त्वों का समावेश

प्रश्न 7.
स्मृति प्रक्रिया का सही क्रम है (2009)
(क) सीखना, पहचान, धारणा, स्मरण
(ख) सीखना, प्रत्यास्मरण, धारणा, पहचान
(ग) सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण, पहचान
(घ) सीखना, धारणा, पहचान, प्रत्यास्मरण
उत्तर
(ग) सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण, पहचान

प्रश्न 8.
स्मृति के प्रकार हैं
(क) संवेदी स्मृति
(ख) अल्पकालीन समृति
(ग) दीर्घकालीन स्मृति
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
ताजमहल को देखकर मुमताज की याद आ जाने का कारण होता है
(क) स्मृति
(ख) कल्पना
(ग) साहचर्य
(घ) धारणा
उत्तर
(ग) साहचर्य

प्रश्न 10.
पूर्व सीखे गये विषय को धारण न कर सकना कहलाता है
(क) अल्प स्मरण
(ख) कल्पना
(ग) विस्मरण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) विस्मरण

प्रश्न 11.
दमन को विस्मरण का मुख्यतम कारण किसने माना है?
(क) मफ
(ख) वुडवर्थ
(ग) फ्रॉयड
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) फ्रॉयड

प्रश्न 12.
विस्मरण को रोकने का उपाय है–
(क) विषय को बार-बार दोहराना।
(ख) विषय को याद करने के बाद आराम करना अथवा सो जाना
(ग) विभिन्न प्रकार के नशों से बचना
(घ) उपर्युक्त सभी उपाय।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी उपाय।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 26 Problems of Scheduled Castes and Tribes

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 26 Problems of Scheduled Castes and Tribes (अनुसूचित जातियों और जनजातियों की समस्याएँ) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 26 Problems of Scheduled Castes and Tribes (अनुसूचित जातियों और जनजातियों की समस्याएँ).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 26
Chapter Name Problems of Scheduled Castes and Tribes (अनुसूचित जातियों और जनजातियों की समस्याएँ)
Number of Questions Solved 54
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 26 Problems of Scheduled Castes and Tribes (अनुसूचित जातियों और जनजातियों की समस्याएँ)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
अनुसूचित जाति से क्या आशय है ? इनकी समस्याओं का उल्लेख करते हुए भारत सरकार द्वारा किये गये निराकरण के प्रयास बताइए। [2010, 15]
या
भारत में अनुसूचित जातियों की दशाओं का वर्णन कीजिए। [2016]
या
अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्याओं को स्पष्ट कीजिए। [2007, 08, 09, 10, 11, 12, 13]
या
अनुसूचित जातियों की प्रगति के लिए चार सुझाव दीजिए। [2011]
या
भारत में अनुसूचित जनजातियों को समस्याओं की व्याख्या कीजिए। [2015]
या
भारत में अनुसूचित जातियों की स्थिति सुधारने के प्रमुख उपायों को लिखिए। [2010, 11]
या
अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्याओं के उन्मूलन के लिए किए गये प्रयासों को बताइए। [2011, 12]
या
अनुसूचित जनजातियों के विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों का मूल्यांकन कीजिए। भारत में अनुसूचित जातियों की मुख्य समस्याएँ बताइए। [2014]
या
भारत में अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए। [2015, 16]
या
अनुसूचित जातियों की प्रगति के लिए प्रमुख उपायों का सुझाव दें। [2015, 16]
या
जनजातियों की समस्याओं को दूर करने के महत्त्वपूर्ण उपायों का वर्णन कीजिए। [2016]
या
भारत में अनुसूचित जनजातियों की प्रमुख समस्याओं का विवेचन कीजिए। [2016]
उत्तर:
अनुसूचित जाति का अर्थ एवं परिभाषाएँ
भारत अनेक धर्मों और जातियों का देश है। समाज में व्याप्त विसंगतियों के कारण यहाँ की कुछ जातियाँ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में पिछड़ गयीं। इन जातियों की नियोग्यताओं के कारण इन्हें अछूत या अस्पृश्य कहा गया। 2011 ई० की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ राष्ट्र की कुल जनसंख्या का लगभग एक-चौथाई भाग थीं। आर्थिक-धार्मिक नियोग्यताएँ लाद देने के कारण अनुसूचित जातियाँ राष्ट्र की मुख्य धारा से कट गयीं। सुख-सुविधाओं से वंचित रह जाने के कारण ये जातियाँ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में पिछड़ गयीं। इन्हें समाज से बहिष्कृत कर दूर एक कोने में रहने के लिए बाध्य कर दिया गया। भारतीय संविधान में इन पिछड़ी और दुर्बल जातियों को सूचीबद्ध किया गया तथा इन्हें अनुसूचित जाति कहकर सम्बोधित किया गया। अनुसूचित जाति को विभिन्न विद्वानों ने निम्नवत् परिभाषित किया है|

डॉ० जी० एस० घुरिये के अनुसार, “मैं अनुसूचित जातियों को उस समूह के रूप में परिभाषित कर सकता हूँ जिनका नाम इस समय अनुसूचित जातियों के अन्तर्गत आदेशित है।”

डॉ० डी० एन० मजूमदार के अनुसार, “वे सभी समूह जो अनेक सामाजिक एवं राजनीतिक निर्योग्यताओं से पीड़ित हैं तथा जिनके प्रति इन निर्योग्यताओं को समाज की उच्च जातियों ने परम्परागत तौर पर लागू किया था, अस्पृश्य जातियाँ कही जा सकती हैं।”
“संविधान की धारा 341 और 342 में सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से जिन जातियों को सूचीबद्ध करके राष्ट्रपति द्वारा विज्ञप्ति जारी करके अनुसूचित घोषित किया है, अनुसूचित जातियाँ कहलाती हैं।”

संविधान की पाँचवीं अनुसूची में विशेष कार्यक्रम के लिए जिन जातियों का चुनाव किया गया है, उन्हें अनुसूचित जाति कहा जाता है। भारतीय संविधान में उत्तर प्रदेश की 66 जातियों को सूचीबद्ध करके अनुसूचित जाति घोषित किया गया है। इनमें घुसिया, जाटव, वाल्मीकि, धोबी, पासी और खटीक मुख्य हैं।

अनुसूचित जातियों की समस्याएँ
भारत की अनुसूचित जातियाँ अनेक समस्याओं और कठिनाइयों से ग्रसित हैं। ये समस्याएँ इनके विकास-मार्ग की प्रमुख बाधाएँ हैं। अनुसूचित जातियों की मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं

1. अस्पृश्यता की समस्या – भारत में अनुसूचित जातियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या अस्पृश्यता की रही है। उच्च जाति के व्यक्ति कुछ व्यवसायों; जैसे-चमड़े का काम, सफाई का काम, कपड़े धोने का काम आदि करने वाले व्यक्तियों को अपवित्र मानते थे। उनके साथ भोजन-पानी का सम्बन्ध नहीं रखते थे। इन्हें लोग अछूत कहते थे। अनुसूचित जाति अर्थात् नीची जाति की छाया पड़ना तक बुरा माना जाता था। पूजा-पाठ के स्थानों पर इनके जाने पर प्रतिबन्ध था, कहीं-कहीं पर तो अन्तिम-संस्कार के लिए भी इनका स्थान अलग निर्धारित किया जाता था। अत: अनुसूचित जातियों को अस्पृश्यता की समस्या का सामना करना पड़ता था।

2. निर्धनता की समस्या – अनुसूचित जाति के लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत अधिक पिछड़ी स्थिति में रहे हैं। इनके पास स्वयं के साधन (खेती, व्यापार आदि) नहीं थे। अत: अधिकांशतः। इन्हें किसानों के यहाँ अथवा अन्य स्थानों पर मजदूरी करनी पड़ती थी। कृषि-क्षेत्र में इन्हें फसल का बहुत ही कम भाग मिल पाता था तथा मजदूरी भी नाम-मात्र की मिल पाती थी। आज भी अनुसूचित जाति के लोग निर्धनता की रेखा के नीचे अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। निर्धनता के कारण अनुसूचित जाति के सदस्य ऋणों के भार से दब गये हैं। निर्धनता इनके लिए एक अभिशाप बनी हुई है।

3. अशिक्षा की समस्या – अनुसूचित जाति के लोग अज्ञानी व अशिक्षित हैं। सामान्य जनसंख्या के अनुपात में इनमें साक्षरता भी आधी है। परिवार के छोटे-छोटे बच्चों को ही काम पर लगा दिया जाता है, वे स्कूल से दूर रहते हैं और यदि स्कूल जाते भी हैं तो उनमें से आधे प्राथमिक स्तर पर ही रुक जाते हैं। अशिक्षा और अज्ञानता सभी बुराइयों का आधार होती है। इस कारण अनुसूचित जाति के लोगों में अनेक प्रकार की बुराइयों ने घर बना लिया है। अशिक्षा इनके विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।।

4. ऋणग्रस्तता की समस्या – अनुसूचित जाति के लोग निर्धन हैं, इसलिए ऋणग्रस्तता से पीड़ित हैं। ऋणग्रस्तता के कारण ये जिस किसान के यहाँ एक बार काम पर लग जाते हैं, पूरे जीवन वहीं पर बन्धक बने रहते हैं तथा जीवन भर ऋण-मुक्त नहीं हो पाते हैं। ऋण चुकाने का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है, परन्तु उन्हें ऋण से मुक्ति ही नहीं मिल पाती। ऋणों से छुटकारा न मिल पाना इनकी नियति बन जाती है।

5. रहन-सहन का स्तर नीचा – अनुसूचित जाति के लोगों का जीवन-स्तर निम्न है। वे आधा पेट खाकर व अर्द्ध-नग्न रहकर जीवन व्यतीत करते हैं। निर्धनता और बेरोजगारी इनके रहनसहन के नीचे स्तर के लिए उत्तरदायी हैं।

6. आवास की समस्या – अनुसूचित जाति के निवास स्थान भी बहुत ही शोचनीय दशा में हैं। ये लोग गाँव के सबसे गन्दे और खराब भागों में ऐसी झोंपड़ियों में रहते हैं जहाँ सफाई का नामोनिशान नहीं होता। बरसात में ये झोंपड़े चूने लगते हैं। कच्चा फर्श और वर्षा का जल मिलकर इनके जीवन को नारकीय बना देता है। धन के अभाव में ये लोग कच्ची मिट्टी के घास-फूस के ढके आवास ही बना पाते हैं।

7. शोषण की समस्या – अनुसूचित जाति के लोगों को बेगार करनी पड़ती है। उच्च जाति के लोग उन्हें बिना मजदूरी दिये अनेक प्रकार के कार्य कराते हैं, इन लोगों के पास ऋण लेते समय गिरवी रखने के लिए भी कुछ नहीं होता। इसलिए वे ऋण के बदले में अपने परिवार के स्त्री तथा बच्चों की स्वतन्त्रता को गिरवी रख देते हैं। यह दोसती पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। शोषण इनके जीवन को अभावमय और खोखला बना देता है। शोषण की समस्या के कारण इनका जीवन दुःखपूर्ण हो जाता है।

8. बेरोजगारी की समस्या – अनुसूचित जाति के सामने बेकारी और अर्द्ध-बेकारी की समस्या भी गम्भीर है। रोजगार के अभाव में अनुसूचित जाति के लोग अपना गाँव छोड़कर अपने परिवार के सदस्यों के साथ नगरीय क्षेत्रों की ओर पलायन कर जाते हैं, जिसके कारण उनके बच्चों की शिक्षा नहीं हो पाती तथा उनका चारित्रिक व नैतिक पतन भी होता है। बेरोजगारी के कारण निर्धनता का जन्म होता है, जो उनके जीवन में विष घोल देती है।

भारत सरकार द्वारा निराकरण (विकास) के लिए किये गये प्रयत्न (सुविधाएँ)

सरकार द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति की समस्याओं का निराकरण कर उन्हें सामान्य सामाजिक स्तर तक लाने के लिए अनेक प्रयत्न किये जा रहे हैं, जो निम्नवत् हैं

1. लोकसभा व विधानमण्डलों में स्थान आरक्षित – अनुसूचित जातियों के लिए लोकसभा में 545 सीटों में से 79 सीटें और 41 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। विधानसभाओं में भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित हैं।

2. सरकारी सेवाओं में स्थान सुरक्षित –
सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों के लिए 15 प्रतिशत स्थान सुरक्षित रखे गये हैं।

3. पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था –
अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्यों के लिए जनसंख्या के अनुपात में तीनों स्तरों की पंचायतों (अर्थात् ग्राम-पंचायतों, क्षेत्र-समितियों तथा जिला परिषदों) में आरक्षण की व्यवस्था की गयी है, जिससे सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

4. अनुसूचित जातियों के लिए अस्पृश्यता निवारण सम्बन्धी कानून –
संविधान में भी अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया गया है। अस्पृश्यता अपराध अधिनियम, 1955 को और अधिक प्रभावशाली बनाने एवं दण्ड-व्यवस्था कठोर करने के लिए इसमें संशोधन कर 19 नवम्बर, 1976 से इसका नाम नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम, 1955 कर दिया गया है। इस अधिनियम के अनुसार किसी भी प्रकार से अस्पृश्यता के बारे में प्रचार करना या ऐतिहासिक व धार्मिक आधार पर अस्पृश्यता को व्यवहार में लाना अपराध माना जाएगा। इस अधिनियम का उल्लंघन करने पर जेल और दण्ड दोनों का प्रावधान है।

5. शैक्षिक कार्यक्रम –
अनुसूचित जाति/जनजातियों के छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा, छात्रवृत्ति तथा पुस्तकीय सहायता दी जाती है। इन जातियों के छात्र-छात्राओं के लिए छात्रावासों की व्यवस्था के अतिरिक्त इनके लिए नि:शुल्क प्रशिक्षण की भी व्यवस्था है। मेडिकल कॉलेजों, इन्जीनियरिंग कॉलेजों व अन्य प्राविधिक शिक्षण-संस्थानों में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के छात्रों के लिए स्थान सुरक्षित हैं।

6. आर्थिक उत्थान योजना –
अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के आर्थिक उत्थान और कुटीर उद्योगों व कृषि आदि के लिए सरकार द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। अनुसूचित जनजाति के बहुलता वाले क्षेत्रों में विशेष विकास खण्ड खोले जा रहे हैं, जहाँ सामान्य से दोगुनी धनराशि विकास कार्यों के लिए व्यय की जाती है। मेडिकल, इन्जीनियरिंग तथा कानून के स्नातकों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु निजी व्यवसाय करने के लिए राज्य द्वारा आर्थिक अनुदान प्रदान किया जाता है। भारत सरकार ने कुछ ऐसे आर्थिक कार्यक्रम प्रारम्भ भी किये हैं जिनका उद्देश्य अनुसूचित जातियों के लिए विशेष ऋण की सुविधा उपलब्ध कराना है।

7. स्वास्थ्य, आवास एवं रहन –
सहन के उत्थान की योजनाएँ – अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों की दीन दशा के कारण सरकार द्वारा इन्हें भूमि और अंनुदान प्रदान किया जाता है। भूमिहीन श्रमिकों को नि:शुल्क कानूनी सहायता भी दी जाती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1993 में निर्णय लिया था कि अनुसूचित जाति बाहुल्य क्षेत्रों में 47 और अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में 5 राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय स्थापित किये जाएँगे। अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्यों की जमीन जिलाधिकारी के पूर्वानुमोदन के बिना गैरअनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य को हस्तान्तरित करने सम्बन्धी नियम का कड़ाई के साथ पालन कराया जाएगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्बल वर्ग आवास-निर्माण तथा इन्दिरा आवास निर्माण और मलिन बस्ती सुधार कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। यही नहीं, भूमिहीनों को सीलिंग भूमि का आवंटन किया जा रहा है। एकीकृत ग्राम्य विकास कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, लघु औद्योगिक इकाइयों की स्थापना, समस्याग्रस्त ग्रामों में पेयजल व्यवस्था, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना के माध्यम से अनुसूचित जाति-जनजाति के स्वास्थ्य, रहन-सहन एवं आवास आदि के उत्थान के लिए सरकार द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं।

8. अन्य उपाय – अनुसूचित जाति में सामाजिक चेतना जाग्रत करने के भी प्रयास किये जा रहे हैं। विभिन्न उत्सवों पर सामूहिक भोज, सांस्कृतिक कार्यक्रमों व प्रचार के अन्य माध्यमों द्वारा समानता का सन्देश पहुँचाया जा रहा है। राष्ट्रीय पर्वो को सामूहिक रूप से मनाने, सार्वजनिक खान-पान तथा अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देकर अनुसूचित जातियों की समस्याओं का निराकरण किया जा रहा है।

प्रश्न 2
भारत में जनजातियों की समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2016]
या
भारतीय जनजातियों की मुख्य समस्याएँ क्या हैं? उनके निवारण के सुझाव दीजिए। [2014]
या
अनुसूचित जनजातियों की मुख्य आर्थिक समस्याएँ बताइए। [2007]
या
जनजातियों की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डालिए। [2013, 15]
या
अनुसूचित जनजातियों की चार मुख्य समस्याएँ लिखिए। [2015]
उत्तर:
जनजातीय नर – नारी भारतीय समाज के अभिन्न अंग हैं। भारत की जनजातियों की समस्याएँ बहुत ही जटिल और विस्तृत हैं, क्योंकि आधुनिक विज्ञान और प्रगति से दूर रहने के कारण ये भारतीय समाज के पिछड़े हुए वर्ग हैं। भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में जनजातियों को उल्लेख है। उन्हें अनुसूचित जनजातियाँ कहा गया है। भारतीय जनजातियों की समस्याएँ निम्नवत् हैं

(अ) सांस्कृतिक समस्याएँ – भारतीय जनजातियाँ बाहरी संस्कृतियों के सम्पर्क में आती जा रही हैं, जिसके कारण जनजातियों के जीवन में अनेक गम्भीर सांस्कृतिक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं और उनकी सभ्यता के सामने एक गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो गयी है। मुख्य सांस्कृतिक समस्याएँ निम्नलिखित हैं

1. भाषा सम्बन्धी समस्या – भारतीय जनजातियाँ बाहरी संस्कृतियों के सम्पर्क में आ रही हैं, जिसके कारण दो भाषावाद’ की समस्या उत्पन्न हो गयी है। अब जनजाति के लोग अपनी भाषा बोलने के साथ-साथ सम्पर्क भाषा भी बोलने लगे हैं। कुछ लोग तो अपनी भाषा के प्रति इतने उदासीन हो गये हैं कि वे अपनी भाषा को भूलते जा रहे हैं। इससे विभिन्न जनजातियों के लोगों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान में बाधा उपस्थित हो रही है। इस बाधा के उत्पन्न होने से जनजातियों में सामुदायिक भावना में कमी आती जा रही है तथा सांस्कृतिक मूल्यों और आदतों का पतन होता जा रहा है।

2. जनजाति के लोगों में सांस्कृतिक विभेद, तनाव और दूरी की समस्या – जनजाति के कुछ लोग ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में आकर ईसाई बन गये हैं तथा कुछ लोगों ने हिन्दुओं की जाति-प्रथा को अपना लिया है, परन्तु ऐसा सभी लोगों ने नहीं किया है, जिसके कारण जनजाति के लोगों में आपसी सांस्कृतिक विभेद, तनाव और सामाजिक दूरी या विरोध उत्पन्न हुआ है। अन्य संस्कृति को अपनाने वाले व्यक्ति अपने जातीय समूह और संस्कृति से दूर होते गये, साथ-ही-साथ वे उस संस्कृति को भी पूरी तरह नहीं अपना पाये जिस संस्कृति को उन्होंने ग्रहण किया था।

3. युवा-गृहों का नष्ट होना-जनजातियों की अपनी संस्थाएँ व युवा – गृह, जो कि जनजातीय सामाजिक जीवन के प्राण थे, धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं; क्योंकि जनजातीय लोग ईसाई तथा हिन्दू लोगों के सम्पर्क में आते जा रहे हैं, जिससे युवा-गृह’ नष्ट होते जा रहे हैं।

4. जनजातीय ललित कलाओं का ह्रास – ओज जैसे-जैसे जनजातियों के लोग बाहरी संस्कृतियों के प्रभाव में आते जा रहे हैं, उससे जनजातीय ललित कलाओं का ह्रास होता जा रहा है। नृत्य, संगीत, ललित कलाएँ, कलाएँ. वे लकड़ी पर नक्काशी आदि का काम दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है। जनजातियों के लोग अब इन ललित कलाओं के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं।

(ब) धार्मिक समस्याएँ – जनजातियों के लोगों पर ईसाई धर्म व हिन्दू धर्म का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। राजस्थान के भील लोगों ने हिन्दू धर्म के प्रभाव के कारण एक आन्दोलन चलायो, जिसका नाम था ‘भगत आन्दोलन’ और इस आन्दोलन ने भीलों को भगृत तथा अभगत दो वर्गों में विभाजित कर दिया। इसी प्रकार बिहार और असम की जनजातियाँ ईसाई धर्म से प्रभावित हुईं, जिसके परिणामस्वरूप एक ही समूह में नहीं, वरन् एक ही परिवार में धार्मिक भेद-भाव दिखाई पड़ने लगा। आज जनजातीय लोगों में धार्मिक समस्या ने विकट रूप धारण कर लिया है, क्योंकि नये धार्मिक दृष्टिकोण के कारण सामुदायिक एकता और संगठन टूटने लगे हैं और परिवारिक तनाव, भेद-भाव व लड़ाई-झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। इसी के साथ-साथ जनजाति के लोग अपनी अनेक आर्थिक व सामाजिक समस्याओं का समाधान अपने धर्म के द्वारा कर लेते थे, परन्तु नये धर्मों के नये विश्वास और नये संस्कारों ने उन पुरानी मान्यताओं को भी समाप्त कर दिया है, जिसके कारण जनजातियों में असन्तोष की भावना व्याप्त होती जा रही है।

(स) सामाजिक समस्याएँ – जनजातियाँ सभ्य समाज के सम्पर्क में आती जा रही हैं, जिनके कारण उनके सम्मुख अनेक सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं, जो निम्नलिखिते हैं

1. कन्या-मूल्य – हिन्दुओं के प्रभाव में आने के कारण जनजातियों में कन्या-मूल्य रुपये के रूप में माँगा जाने लगा है। दिन-प्रतिदिन यह मूल्य अधिक तीव्रता के साथ बढ़ता जा रहा है, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि सामान्य स्थिति के पुरुषों के लिए विवाह करना कठिन हो गया है। इस कारण जनजातीय समाज में ‘कन्या-हरण’ की समस्या बढ़ती जा रही है।

2. बाल-विवाह – जनजातीय समाज में बाल-विवाह की समस्या भी उग्र रूप धारण करती जा रही है। जिस समय से जनजाति के लोग हिन्दुओं के सम्पर्क में आये हैं, तभी से बाल-विवाह की प्रथा भी बढ़ी है।

3. वैवाहिक नैतिकता का पतन –
जैसे- जैसे जनजातियों के लोग सभ्य समाज के सम्पर्क में
आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे विवाह-पूर्व और विवाह के पश्चात् बाहर यौन सम्बन्ध बढ़ते जा रहे हैं, जिससे विवाह-विच्छेद की संख्या भी बढ़ रही है।

4. वेश्यावृत्ति, गुप्त रोग आदि –
जनजातीय समाज में वेश्यावृत्ति, गुप्त रोग आदि से सम्बन्धित सामाजिक समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। जनजातीय लोगों की निर्धनता से लाभ उठाकर विदेशी व्यापारी, ठेकेदार, एजेण्ट आदि रुपयों का लोभ दिखाकर उनकी स्त्रियों के साथ अनुचित यौन-सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। इन्हीं औद्योगिक केन्द्रों में काम करने वाले जनजातीय श्रमिक वेश्यागमन आदि में फंस जाते हैं और गुप्त रोगों के शिकार हो जाते हैं।

(द) आर्थिक समस्याएँ – आज भारत की जनजातियों में सबसे गम्भीर आर्थिक समस्या है, क्योंकि उनके पास पेटभर भोजन, तन ढकने के लिए वस्त्र और रहने के लिए अपना मकान नहीं है। कुछ प्रमुख आर्थिक समस्याएँ निम्नलिखित हैं

1. स्थानान्तरित खेती सम्बन्धी समस्या – जनजातीय व्यक्ति प्राचीन ढंग की खेती करते हैं, ‘ जिसे स्थानान्तरित खेती कहते हैं। इस प्रकार की खेती से किसी प्रकार की लाभप्रद आय उन्हें प्राप्त नहीं होती है। इस प्रकार की खेती से केवल भूमि का दुरुपयोग ही होता है। अत: खेती में अच्छी पैदावार नहीं होती है, जिससे वे खेती करना छोड़ देते हैं और भूखे मरने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
2. भूमि-व्यवस्था सम्बन्धी समस्या – पहले जनजातियों का भूमि पर एकाधिकार था, वे मनमाने ढंग से उसका उपयोग करते थे। अब भूमि सम्बन्धी नये कानून आ गये हैं, अब वे मनमाने ढंग से जंगल काटकर स्थानान्तरित खेती नहीं कर सकते।

3. वनों से सम्बन्धित समस्याएँ – पहले जनजातियों को वनों से पूर्ण एकाधिकार प्राप्त था। वे जंगल की वस्तुओं, पशु, वृक्ष आदि का उपयोग स्वेच्छापूर्वक करते थे, परन्तु अब ये सब वस्तुएँ सरकारी नियन्त्रण में हैं।
4. अर्थव्यवस्था सम्बन्धी समस्याएँ – जनजाति के लोग अब मुद्रा-रहित अर्थव्यवस्था से मुद्रा-युक्त अर्थव्यवस्था में आ रहे हैं; अत: उनके सम्मुख नयी-नयी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।
5. ऋणग्रस्तता की समस्या – सेठ, साहूकार, महाजन उनकी अशिक्षा, अज्ञानता तथा निर्धनता का लाभ उठाकर उन्हें ऊँची ब्याज दर पर ऋण देते हैं, जिससे वे सदैव ऋणी ही बने रहते हैं।
6. औद्योगिक श्रमिक समस्याएँ – चाय बागानों, खानों और कारखानों में काम करने वाले जनजातीय श्रमिकों की दशा अत्यन्त दयनीय है। उन्हें उनके कार्य के बदले में उचित मजदूरी नहीं मिलती है, उनके पास रहने के लिए मकान नहीं हैं, काम करने की स्थिति एवं वातावरण भी ठीक नहीं है। जनजाति के श्रमिकों को अपने अधिकारों के विषय में भी ज्ञान नहीं है, वे पशुओं की भाँति कार्य करते हैं और उनके साथ पशुओं जैसा ही व्यवहार होता है।

(य) स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ – जनजाति के लोगों के सम्मुख स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक. समस्याएँ हैं, जो निम्नवत् हैं

1. खान-पान – निर्धनता के कारण जनजाति के लोगों को सन्तुलित व पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है। वे शराब आदि मादक पदार्थों का सेवन करते हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है।

2. वस्त्र – जनजाति के लोग अब नंगे (वस्त्रहीन) न रहकर वस्त्र धारण करने लगे हैं, परन्तु निर्धनता के कारण उनके पास पर्याप्त वस्त्र उपलब्ध नहीं होते हैं। वस्त्रों के अभाव में वे लगातार एक ही वस्त्र को धारण किये रहते हैं, जिससे अनेक प्रकार के चर्म रोग आदि हो जाते हैं तथा वे बीमार भी हो जाते हैं।

3. रोग व चिकित्सा का अभाव – अनुसूचित जनजाति के लोग हैजा, चेचक, तपेदिक आदि अनेक प्रकार के भयंकर रोगों से ग्रस्त रहते हैं। इसके अतिरिक्त चाय बागानों व खानों में काम करने वाले स्त्री-पुरुष श्रमिकों में व्यभिचार बढ़ता जा रहा है। वे अनेक प्रकार के गुप्त रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हैं। निर्धनता व चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में जनजाति के लोगों के सम्मुख स्वास्थ्य सम्बन्धी गम्भीर समस्याएँ हैं।

4. शिक्षा सम्बन्धी समस्याएँ – जनजातियाँ आज भी अशिक्षा तथा अज्ञानता के वातावरण में रह रही हैं। कुछ लोग ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में आकर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। अशिक्षा समस्त समस्याओं का आधार है। अशिक्षा के कारण ही जनजातीय समाज में आज भी अनेक प्रकार के अन्धविश्वास पनप रहे हैं। (निवारण के सुझाव-इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखें।

प्रश्न 3
भारत में अल्पसंख्यकों अर्थात् अल्पसंख्यक वर्गों की कुछ समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारत एक विभिन्नताओं वाला देश है। इस देश में विभिन्न प्रकार की भूमि, विभिन्न प्रकार की जलवायु, विभिन्न धर्म, विभिन्न जातियाँ, विभिन्न भाषाएँ एवं विभिन्न प्रकार के रीतिरिवाज पाये जाते हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि यहाँ के लोग विभिन्न आधारों पर अनेक समूहों में विभाजित रहते हैं। यह विभाजन धर्म, सम्प्रदाय, जाति, व्यवसाय, आयु, लिंग, शिक्षा आदि किसी भी आधार पर हो सकता है। इन सभी समूहों की सदस्य संख्या समान नहीं है। किसी समूह में अधिक लोग रहते हैं और किसी में सदस्यों की संख्या बहुत कम होती है।

इस प्रकार किसी विशेष आधार पर बने सामाजिक समूहों में, जिनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है, उन्हें हम अल्पसंख्यक समूह अथवा अल्पसंख्यक (Minorities) कहते हैं। भारत में मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, बौद्ध, जैन, पारसी आदि धर्मावलम्बियों तथा जनजातियों को अल्पसंख्यकों की श्रेणी में रखा जाता है। भारतीय समाज में पाया जाने वाला सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह मुस्लिम है। दूसरा प्रमुख अल्पसंख्यक सम्प्रदाय ईसाइयों का है। सिक्खों का भी अल्पसंख्यक वर्गों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अतिरिक्त बौद्ध, जैन, पारसी एवं जनजातियाँ अन्य अल्पसंख्यक समूह हैं।

अल्पसंख्यकों की समस्या

भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक समूहों की अनेक समस्याएँ हैं। यद्यपि संविधान द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार दिया गया है, किन्तु संविधान में तथा प्रचलित कानूनों में उपलब्ध संरक्षणों के बावजूद भी अल्पसंख्यकों में यह भावना बनी हुई है कि उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं किया जाता। यहाँ हम भारत के प्रमुख अल्पसंख्यकों की कुछ प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डालेंगे

1. मुसलमानों की समस्याएँ – समकालीन भारत में मुसलमानों की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1.  यद्यपि संविधान में कहा गया है कि धार्मिक आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता, किन्तु सामान्य मुसलमान स्वयं को मानसिक दृष्टि से असुरक्षित समझता है।
  2. मुस्लिम समुदाय का अधिकांश भाग अपने रूढ़िवादी विचारों के कारण अशिक्षित रह गया है जिसके कारण उन्हें विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अशिक्षी एवं रूढ़िवादिता के कारण उन्हें आर्थिक विकास के पूर्ण अवसर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। आमतौर पर वे परम्परागत व्यवसायों को ही अपनाते हैं तथा सरकारी नौकरियों व श्वेतवसन व्यवसायों में नहीं जा पाते।।
  3.  मुस्लिम समाज सांस्कृतिक दृष्टि से भी स्वयं को बहुसंख्यक वर्गों से भिन्न समझता है। उनकी यह भावना पृथकता के भाव को प्रोत्साहित करती है।
  4. स्वाधीन भारत का मुस्लिम सम्प्रदाय राजनीतिक दृष्टि से दिशाहीन प्रतीत होता है। योग्य मुस्लिम नेतृत्व का अभाव दिखायी देता है। जिन नेताओं ने स्वयं को राजनीतिक मंच पर प्रतिष्ठित किया है, वे कठिनता से ही मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।

2. ईसाइयों की समस्याएँ – ईसाइयों की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1.  ईसाइयों का रहन-सहन, मौज-मस्ती को होता है। यह प्रवृत्ति उनमें ऋणग्रस्तता को जन्म देती है।
  2.  यद्यपि ईसाई लोग स्वयं को अंग्रेजों से सम्बन्धित मानते हैं, किन्तु वे किसी निश्चित जीवन शैली (अंग्रेजी अथवा भारतीय) को नहीं अपना पाते। एक से उनका लगाव नहीं है, तो दूसरा उनके लिए सम्भव नहीं है।
  3.  चूंकि ईसाइयों में विवाह-विच्छेद (Divorce) एक आम-बात है, इसलिए इसका बुरा प्रभाव स्त्रियों की स्थिति और आश्रितों पर पड़ता है।

3. सिक्खों की समस्याएँ – सिक्खों की प्रमुख समस्याएँ निम्न प्रकार हैं

  1. सिक्खों का एक वर्ग अधिक सम्पन्न है, तो दूसरा वर्ग दरिद्र भी है।
  2.  सिक्खों के साथ भारत के अन्य भागों के लोग अन्त:क्रिया के पक्ष में नहीं हैं।
  3.  सिक्खों के एक वर्ग द्वारा धर्म को राजनीति से जोड़ने का प्रयत्न किया गया है। अतः
    उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती धर्म को राजनीति से पृथक् करने की है।

प्रश्न 4
भारत में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के विकास के लिए सामाजिक चेतना संवैधानिक आरक्षण से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अनुसूचित जातियाँ तथा जनजातियाँ भारत के एक विशाल वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। समाज के इतने बड़े वर्ग की उपेक्षा करके उन्हें मानवोचित अधिकारों से वंचित रखकर, दीन-हीन और दासों के समान जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करके सामाजिक प्रगति और राष्ट्र को समृद्ध एवं वैभवशाली बनाने की कल्पना नहीं की जा सकती।
यद्यपि शासकीय स्तर पर इन जातियों व जनजातियों के उत्थान के लिए आरक्षण जैसे कदम उठाये जा रहे हैं, तथापि आवश्यकता इस बात की है कि इनकी समस्याओं के प्रति जनसाधारण को जाग्रत किया जाए।

अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विकास हेतु यह आवश्यक है कि अधिकांश हिन्दुओं के हृदय परिवर्तित हों। हमें सही रूप से इनकी वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए तथा निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हमने तथा हमारे पूर्वजों ने क्यों इनके प्रति अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया? हमें इनके प्रति पाली गयी सभी भ्रान्तियों से अपने-आप को मुक्त करना चाहिए। यह एक वास्तविकता है कि इनके प्रति अस्पृश्यता का भाव रखने का सम्बन्ध हिन्दू धर्म के मौलिक ग्रन्थों से नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे भी हमारी तरह इन्सान हैं तथा केवल शोर मचाने, नारे लगाने, हरिजन दिवस मनाने तथा आरक्षण से इनका विकास नहीं हो सकता। इनके विकास के लिए जनसाधारण में इनके प्रति न्यायपूर्ण एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार होना अति आवश्यक है।

विश्लेषकों का कहना है कि अनुसूचित जाति व जनजातियों की समस्याएँ प्रमुखतः आर्थिक व सामाजिक हैं। यदि इन्हें गन्दे पेशों से मुक्त होने का अवसर दिया जाए, इनके लिए विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ, सवर्णो की बस्तियों में मकान बनाने और रहने की सुविधा दी जाए तो सवर्णो तथा इन जातियों के बीच भेदभाव को कम किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण भी इनके विकास में सहायक सिद्ध होगा। जनसाधारण का इनके प्रति समझदारी तथा प्रेम से भरा व्यवहार इन लोगों में सामाजिक सुरक्षा की भावना का विकास करेगा जिससे इनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा तथा जागृति आएगी।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1:
राष्ट्रीय जीवन में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
‘भारतीय जनजातीय जीवन का बदलता दृश्य पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।[2010]
या
राष्ट्रीय जीवन में जनजातियों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों का राष्ट्रीय जीवन में योगदान निम्नलिखित रूपों में दर्शाया जा सकता है
1. भारतीय राजनीति में प्रभावक भूमिका – संसद और राज्य विधानमण्डलों में अनुसूचित जनजातियों की सदस्य संख्या, विभिन्न चुनावों में उनकी सक्रिय भागीदारी तथा उच्च राजनीतिक पदों पर उनकी नियुक्ति से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश के राष्ट्रीय जीवन में इनका सक्रिय सहभाग अर्थात् योगदान बढ़ रहा है और इनमें राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में लोकसभा में अनुसूचित जातियों के 79 एवं जनजातियों के 41 स्थान तथा राज्यों की विधानसभाओं में क्रमशः 557 तथा 527 सीटें आरक्षित की गयी हैं। पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में जनसंख्या के अनुपात में इनकी सीटें आरक्षित की गयी हैं।

2. राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं में वृद्धि – अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को आरक्षण एवं संवैधानिक रियायतें प्राप्त हैं जिनका एक परिणाम यह सामने आया है कि इनके नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं में वृद्धि हुई है। अब वे राजनीतिक और प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर ऊँची जातियों के लोगों से प्रतिस्पर्धा करने एवं आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं।

3. दबाव समूहों के रूप में संगठित होने की प्रवृत्ति – आरक्षण के परिणामस्वरूप जाति का राजनीति में प्रभाव बढ़ा है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद बनने वाले जातीय समुदायों में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों द्वारा निर्मित दबाव गुटों का विशेष महत्त्व है। जिला स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक इन जातियों एवं जनजातियों के संगठन पाये जाते हैं। इन्हीं संगठनों की माँग एवं संगठित प्रयासों के फलस्वरूप आरक्षण की अवधि सन् 2020 तक के लिए बढ़ा दी गयी थी।

4. निर्वाचनों में संगठित भूमिका – यह माना जाता है कि विभिन्न आम चुनावों में कांग्रेस दल के विजयी होने और सत्ता में आने का मुख्य कारण इन्हें हरिजनों, अन्य अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को मिलने वाला समर्थन है। इन जातियों ने अपनी संख्या की शक्ति को पहचाना है और राजनीति में संगठित रूप में भूमिका निभाते हैं। इससे राष्ट्रीय जीवन में इनकी भूमिका बढ़ी है। आज तो सभी राजनीतिक दल यह महसूस करने लगे हैं कि सत्ता में आने के लिए इन जातियों का समर्थन प्राप्त करना आवश्यक है।

5. भारतीय राजनीति में सन्तुलनकर्ता की भूमिका – अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की देश में कुल जनसंख्या 25 करोड़ है, जो देश की कुल जनसंख्या का 24.35 प्रतिशत है। इस संख्या के बल पर ही ये जातियाँ भारतीय राजनीति में शक्ति-सन्तुलन की स्थिति में हैं। जिस राजनीतिक दल को इनका समर्थन प्राप्त हो जाता है, उसकी राजनीतिक स्थिति काफी मजबूत हो जाती है।

6. अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के कई लोगों ने स्वतन्त्रता – आन्दोलन में भाग लिया। उन्होंने महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में योग दिया। इससे उनमें राजनीतिक चेतना बढ़ी है। अनेक नेताओं ने अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की स्थिति को उन्नत करने और उन्हें राष्ट्रीय जीवन-धारा में सम्मिलित करने हेतु प्रयास किये हैं।

7. देश के आर्थिक विकास में भी अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों का काफी योगदान रहा है। खेतों, कारखानों, चाय-बागानों एवं खानों में इन जातियों के लोग ही उत्पादन के कार्य में प्रमुख भूमिका निभाते रहे हैं। हाथ से काम करने वाले या मेहनतकश लोगों में अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों का योगदान ही सर्वाधिक रहा है। वर्तमान में अनेक अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लोग व्यापारी एवं उद्यमी के रूप में आगे बढ़ने लगे हैं।

प्रश्न 2:
अनुसूचित जाति व जनजाति की भारतीय राजनीति में सन्तुलनकर्ता के नाते क्या भूमिका है ?
उत्तर:
अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की देश में कुल जनसंख्या वर्तमान में 25 करोड़ है, जो देश की कुल जनसंख्या का 24.35 प्रतिशत है। इस संख्या के बल पर ही ये जातियाँ भारतीय राजनीति में शक्ति-सन्तुलन की स्थिति में हैं। जिस राजनीतिक दल को इनका समर्थन प्राप्त हो जाता है, उसकी राजनीतिक स्थिति पर्याप्त मजबूत हो जाती है। इन जातियों ने अपने हितों को ध्यान में रखकर पहले कांग्रेस दल को समर्थन दिया था। वर्तमान में कांग्रेस के अलावा अन्य राजनीतिक दलों ने भी अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों में अपना नाम बढ़ाया है और अपने जनाधार को मजबूत किया है। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है वर्तमान समय में भारतीय राजनीति में अनुसूचित जाति और जनजाति की सन्तुलनकर्ता के रूप में एक प्रभावशाली भूमिका है, जिसके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।

प्रश्न 3:
सीमाप्रान्त जनजातियों की समस्याएँ बताइए।
उत्तर:
उत्तर-पूर्वी सीमाप्रान्तों में निवास करने वाली जनजातियों की समस्याएँ देश के विभिन्न भागों की समस्याओं से कुछ भिन्न हैं। देश के उत्तर-पूर्वी प्रान्तों के नजदीक चीन, म्याँमार एवं बाँग्लादेश हैं। चीन से हमारे सम्बन्ध पिछले कुछ वर्षों से मधुर नहीं रहे हैं। बाँग्लादेश, जो पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था, भारत का कट्टर शत्रु रहा है। चीन एवं पाकिस्तान ने सीमाप्रान्तों की जनजातियों में विद्रोह की भावना को भड़काया है, उन्हें अस्त्र-शस्त्रों से सहायता दी है एवं विद्रोही नागा और अन्य जनजातियों के नेताओं को भूमिगत होने के लिए अपने यहाँ शरण दी है। शिक्षा एवं राजनीतिक जागृति के कारण इस क्षेत्र की जनजातियों ने स्वायत्त राज्य की माँग की है। इसके लिए उन्होंने आन्दोलन एवं संघर्ष किये हैं। आज सबसे बड़ी समस्या सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों की स्वायत्तता की माँग से निपटना है। ।

प्रश्न 4
जनज़ातियों की प्रगति के लिए प्रमुख उपायों का सुझाव दीजिए। [2009, 13]
उत्तर:
जनजातियों की प्रगति के लिए निम्नलिखित प्रमुख उपाय किये जा सकते हैं
1. जनजातियों के पेशे गन्दे होते हैं। इनको पेशों से मुक्त होने का अवसर दिया जाए।
2. विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।
3. कुटीर उद्योग लगाने के लिए ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाए।
4. भूमिहीन किसानों को भूमि उपलब्ध करायी जाए तथा फसल को बोने के लिए उत्तम बीज व खाद उपलब्ध करायी जाए।
5. इन्हें सवर्णो के साथ बस्तियों में मकान बनाने की सुविधा उपलब्ध करायी जाए।
6. अन्य जातियों के साथ उत्पन्न होने वाले मतभेदों को दूर किया जाए।
7. जनजातियों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाया जाए।
8. इन्हें शिक्षित बनाने के लिए मुफ्त शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाया जाए।
9. सरकारी सेवाओं में इनके लिए कुछ स्थान सुरक्षित किये जाएँ।
10. जनजातियों की प्रगति के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना चलाने की भी आवश्यकता है।

प्रश्न 5
अनुसूचित जनजातियों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए किये गये उपायों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार रोकने के प्रभावी उपाय के लिए, भारत सरकार ने अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989′ 30 जनवरी, 1990 से लागू किया। इसमें अत्याचार की श्रेणी में आने वाले अपराधों के उल्लेख के साथ-साथ उनके लिए कड़े दण्ड की भी व्यवस्था की गयी। वर्ष 1995 में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अन्तर्गत व्यापक नियम भी बनाये गये, जिनमें अन्य बातों के अतिरिक्त प्रभावित लोगों के लिए राहत और पुनर्वास की भी व्यवस्था है।

राज्यों से कहा गया कि वे इस तरह के अत्याचारों की रोकथाम के उपाय करें और पीड़ितों के आर्थिक तथा सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था करें। अरुणाचल प्रदेश और नागालैण्ड को छोड़कर अन्य सभी राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों में इस तरह के मामलों में इस कानून के तहत मुकदमा चलाने के लिए विशेष अदालतें बनायी गयी हैं। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लोगों पर अत्याचारों की रोकथाम के कानून के तहत आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में विशेष अदालतें गठित की जा चुकी हैं।
केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजना के अन्तर्गत इस कानून को लागू करने पर आने वाले खर्च का आधा राज्य सरकारें और आधा केन्द्र सरकार वहन करेंगी। केन्द्रशासित प्रदेशों को इसके लिए शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता दी जाती है।

प्रश्न 6
अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु अपने सुझाव लिखिए। [2016]
उत्तर:
अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं ।
अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु सुझाव
अनुसूचित जातियों की प्रगति हेतु निम्न कदम उठाए जा सकते हैं।

  1. अनुसूचित जातियों में शिक्षा के स्तर में सुधार करके उनके दृष्टिकोण व आर्थिक स्थिति को सुधारा जाना चाहिए।
  2. इनके जीवन स्तर को उठाना चाहिए जिससे इन्हें बेहतर अवसरों की प्राप्ति हो सके।
  3. अस्पृश्यता निवारण के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग कर जनमत का निर्माण किया जाना चाहिए।
  4. समाज में इनके विरुद्ध असमान नीति अपनाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए।
  5. सरकार द्वारा विभिन्न नीतियों के माध्यम से अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
  6. इन्हें अन्य जातियों के समान धार्मिक व सामाजिक स्वतन्त्रता और समानता व्यावहारिक रूप में प्रदान करनी चाहिए।
  7. सभी जाति के बच्चों को एक समान व्यवहार व शिक्षा प्रदान कर उनमें आपसी सद्भाव की भावना का विकास किया जाना चाहिए।
  8. राजनीतिक स्तर पर सरकार द्वारा इनको प्रोत्साहन प्रदान करना इनकी राजनीतिक निम्न स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 7
अनुसूचित जातियों की चार समस्याएँ बताइए। [2007, 09, 11]
या
अनुसूचित जातियों की दो समस्याएँ बताइए। [2009, 16]
उत्तर:
अनुसूचित जातियों की चार समस्याएँ निम्नवत् हैं

  1. अस्पृश्यता की समस्या – अनुसूचित जातियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या अस्पृश्यता कीरही है। उच्च जाति के कुछ व्यक्ति कुछ व्यवसायों; जैसे-चमड़े का काम, सफाई का काम, कपड़े धोने का काम आदि करने वालों को आज भी अपवित्र मानते हैं।
  2. अशिक्षा की समस्या – अनुसूचित जाति के अधिकांश लोग अशिक्षित तथा अज्ञानी हैं। इस कारणे अनेक बुराइयों ने इन लोगों में घर कर लिया है। निर्धनता के कारण इनके बालक भी शिक्षा शुरू कर पाने में असमर्थ होते हैं।
  3. रहन-सहन का नीचा स्तर – इनका जीवन स्तर निम्न होता है तथा वे आधा पेट खाकर तथा अर्द्धनग्न रहकर जीवन व्यतीत करते हैं। निर्धनता तथा बेरोजगारी इनके रहन-सहन के निम्न स्तर के लिए उत्तरदायी हैं।
  4. आवास की समस्या – इनके आवास की दशा भी शोचनीय होती है। ये ऐसे स्थानों में रहते हैं जहाँ सफाई का नामोनिशान भी नहीं होता। बरसात में इनकी दशा दयनीय हो जाती है। ये लोग बहुधा झोंपड़ी या कच्चे मकानों में रहते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
संविधान के अनुच्छेद 46 में समाज के दलित, दुर्बल और कमजोर वर्गों के लोगों के सम्बन्ध में क्या कहा गया है ?
उत्तर:
संवैधानिक दृष्टि से कमजोर, दुर्बल या दलित वर्ग के अन्तर्गत अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ तथा कुछ अन्य पिछड़े हुए समूह आते हैं। इसमें समाज के साधन-हीन वर्ग को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संविधान भ्रातृत्व एवं समानता पर जोर देता है। अतः संविधाननिर्माताओं ने सोचा कि यदि समानता को एक वास्तविक रूप प्रदान करना है, तो समाज के इन दलित, दुर्बल और कमजोर वर्गों को ऊँचा उठाना होगा और उन्हें विकास की सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। संविधान के अनुच्छेद 46 में इस सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि राज्य जनता के दुर्बलतर अंगों के, विशेषतः अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के, शिक्षा तथा अर्थ सम्बन्धी (आर्थिक) हितों की विशेष सावधानी से रक्षा करेगा और सामाजिक अन्याय तथा सभी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा।

प्रश्न 2
अनुसूचित जाति से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
भारतीय संविधान में अछूत, दलित, बाहरी जातियों, हरिजन आदि लोगों को कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान करने की दृष्टि से एक अनुसूची तैयार की गयी जिसमें विभिन्न अस्पृश्य जातियों को सम्मिलित किया गया। इस अनुसूची के आधार पर वैधानिक दृष्टिकोण से इन जातियों के लिए अनुसूचित जाति (Schedule Caste) शब्द को काम में लिया गया। वर्तमान में सरकारी प्रयोग में इनके लिए ‘अनुसूचित जाति’ शब्द को ही काम में लिया जाता है। इनके लिए तैयार की गयी सूची में जिन अस्पृश्य जातियों को रखा गया उन्हें अनुसूचित जातियाँ कहा गया।

प्रश्न 3
अस्पृश्यता को दूर करने एवं अनुसूचित जातियों के कल्याण की दृष्टि से कार्य कर रहे चार ऐच्छिक संगठनों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अस्पृश्यता को दूर करने एवं अनुसूचित जातियों के कल्याण की दृष्टि से अनेक ऐच्छिक संगठन कार्य कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं

  1. अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ, दिल्ली;
  2. भारतीय दलित वर्ग लीग, दिल्ली;
  3. ईश्वर सरन आश्रम, इलाहाबाद तथा
  4. भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी, दिल्ली।।

प्रश्न 4
अनुसूचित जातियों के लोगों को कौन-सी शिक्षा सम्बन्धी सुविधाएँ दी गयी हैं ?
उत्तर:
अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लोगों को अन्य लोगों के समान स्तर पर लाने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने में सहायता करने के उद्देश्य से शिक्षा का विशेष प्रबन्ध किया गया। देश की सभी सरकारी शिक्षण संस्थाओं में इन जातियों के विद्यार्थियों के लिए नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गयी है। वर्ष 1944-45 से अस्पृश्य जातियों के छात्रों को छात्रवृत्तियाँ देने की योजना प्रारम्भ की गयी तथा इनके लिए पृथक् छात्रावासों की व्यवस्था भी की गयी है। बुक बैंक के माध्यम से इनके छात्रों के लिए पाठ्य-पुस्तकें भी उपलब्ध करायी जाती हैं।

प्रश्न 5
अनुसूचित जातियों की मुख्य आर्थिक समस्याएँ बताइए।
उत्तर:
गरीबी, बेरोजगारी, स्थानान्तरित खेती, ऋणग्रस्तता तथा आधारभूत संरचना का अभाव आदि अनुसूचित जातियों की मुख्य आर्थिक समस्याएँ हैं।।

प्रश्न 6
अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लोगों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व कैसे दिया गया है ?
उत्तर:
अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लोगों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने, अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार करने तथा उच्च जाति के लोगों के सम्पर्क में आने को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित रखे गये हैं। खुली प्रतियोगिता द्वारा अखिल भारतीय आधार पर की जाने वाली नियुक्तियों में इनके लिए क्रमश: 15 एवं 7.5 प्रतिशत स्थान सुरक्षित रखे गये हैं।

प्रश्न 7
डॉ० अम्बेडकर ने अनुसूचित जाति परिसंघ की स्थापना क्यों की तथा इसका क्या लक्ष्य था ?
उत्तर:
राजनीति में अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा के लिए डॉ० अम्बेडकर ने अनुसूचित जाति परिसंघ’ की स्थापना की थी। इसका लक्ष्य अनुसूचित जातियों के राजनीतिक आन्दोलन को आगे बढ़ाना था। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद अम्बेडकर के नेतृत्व में इस दल का उद्देश्य यह देखना रह गया था कि संविधान में वर्णित आरक्षण के प्रावधानों का समुचित रूप से क्रियान्वयन किया जा रहा है या नहीं।

प्रश्न 8
जनजाति क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जनजाति एक ऐसा क्षेत्रीय मानव समूह है जिसकी एक सामान्य संस्कृति, भाषा, राजनीतिक संगठन एवं व्यवसाय होता है तथा जो सामान्यतः अन्तर्विवाह विवाह के नियमों का पालन करता है। गिलिन और गिलिन के अनुसार, “स्थानीय आदिम समूहों के किसी भी संग्रह को जोकि एक सामान्य क्षेत्र में रहता हो, एक सामान्य भाषा बोलता हो और एक सामान्य संस्कृति का अनुसारण करता हो, एक जनजाति कहते हैं।”

प्रश्न 9
जनजातियों की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जनजातियों की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. अन्तर्विवाही – एक जनजाति के सदस्य केवल अपनी ही जनजाति में विवाह करते हैं, जनजाति के बाहर नहीं।
  2. सामान्य संस्कृति – एक जनजाति में सभी सदस्यों की सामान्य संस्कृति होती है, जिससे उनके रीति-रिवाजों, खान-पान, प्रथाओं, नियमों, लोकाचारों, धर्म, कला, नृत्य, जादू, संगीत, भाषा, रहन-सहन, विश्वासों, विचारों, मूल्यों आदि में समानता पायी जाती है।

प्रश्न 10
जनजातीय परिवार की दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जनजातीय परिवार की दो मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. जनजातीय परिवार में बाल-विवाह का प्रचलन होता है तथा कन्या-मूल्य की प्रथा भी है। विवाह के समय वर-पक्ष कन्या-पक्ष को कन्या-मूल्य देता है।
  2. जनजातीय परिवारों में वेश्यावृत्ति आम बात है। जनजातीय परिवार निर्धन होने के कारण अपनी स्त्रियों को अनुचित यौनसम्बन्ध स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 11
अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा सम्बन्धी क्या समस्याएँ हैं ?
उत्तर:
जनजातियों में शिक्षा का अभाव है और वे अज्ञानता के अन्धकार में पल रही हैं। अशिक्षा के कारण वे अनेक अन्धविश्वासों, कुरीतियों एवं कुसंस्कारों से घिरी हुई हैं। आदिवासी लोग वर्तमान शिक्षा के प्रति उदासीन हैं, क्योंकि यह शिक्षा उनके लिए अनुत्पादक है। जो लोग आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर लेते हैं, वे अपनी जनजातीय संस्कृति से दूर हो जाते हैं और अपनी मूल संस्कृति को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। आज की शिक्षा जीवन-निर्वाह का निश्चित साधन प्रदान नहीं करती; अतः शिक्षित व्यक्तियों को बेकारी को सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 12
दुर्गम निवासस्थान में रहने के कारण अनुसूचित जनजातियों को क्या हानि है ?
या
जनजातियों में ‘दुर्गम निवास स्थल : एक समस्या विषय पर प्रकाश डालिए।[2007]
उत्तर:
लगभग सभी जनजातियाँ पहाड़ी भागों, जंगलों, दलदल-भूमि और ऐसे स्थानों में निवास करती हैं, जहाँ सड़कों का अभाव है और वर्तमान यातायात एवं संचार के साधन अभी वहाँ उपलब्ध नहीं हो पाये हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि उनसे सम्पर्क करना एक कठिन कार्य हो गया है। यही कारण है कि वैज्ञानिक आविष्कारों के मधुर फल से वे अभी अपरिचित ही हैं और उनकी आर्थिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी एवं राजनीतिक समस्याओं का निवारण नहीं हो पाया है।

प्रश्न 13
पर-संस्कृतिग्रहण के परिणामस्वरूप जनजातियों के सामने कौन-सी समस्या उत्पन्न हुई है ?
उत्तर:
पर-संस्कृतिग्रहण के परिणामस्वरूप जनजातियों के सामने निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं
भाषा की समस्या, सांस्कृतिक विभेद, तनाव और दूरी की समस्या, जनजातीय ललित कलाओं का ह्रास, बाल-विवाह, वेश्यावृत्ति एवं गुप्त रोग की समस्या, स्थानान्तरित खेती सम्बन्धी समस्या, खान-पान व वस्त्रों की समस्या, धार्मिक समस्याएँ आदि।

प्रश्न 14
अनुसूचित जाति विकास निगम क्यों बनाये गये ?
उत्तर:
वर्तमान में अनुसूचित जातियों के विकास एवं कल्याण हेतु विभिन्न राज्यों में अनुसूचित जाति विकास निगम’ बनाये गये हैं, जो अनुसूचित जातियों के परिवारों तथा वित्तीय संस्थाओं के बीच सम्बन्ध स्थापित कराने तथा उन्हें आर्थिक साधन उपलब्ध कराने में सहयोग देते हैं।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
भारत में अनुसूचित जातियों के लोगों की वर्तमान में कितनी संख्या है ?
उत्तर:
भारत में अनुसूचित जातियों के लोगों की वर्तमान में संख्या अनुमानतः 17 करोड़ हो गयी है।

प्रश्न 2
डॉ० भीमराव अम्बेडकर की जन्मतिथि क्या है ?
उत्तर:
डॉ० भीमराव अम्बेडकर की जन्मतिथि है-14 अप्रैल, 1891।

प्रश्न 3
अनुसूचित जातियों के लोगों के लिए कितने प्रतिशत स्थान नौकरियों में आरक्षित है?
उत्तर:
अनुसूचित जातियों के लोगों के लिए नौकरियों में 22.5 प्रतिशत स्थान आरक्षित है।

प्रश्न 4
‘हरिजन सेवक संघ कहाँ स्थित है ?
उत्तर:
‘हरिजन सेवक संघ दिल्ली में स्थित है।

प्रश्न 5
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम किस वर्ष पारित किया गया था? [2011]
उत्तर:
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 ई० में पारित किया गया था।

प्रश्न 6
जनजाति को परिभाषित कीजिए। [2007, 08, 11, 13, 14]
उत्तर:
जनजाति एक ऐसा क्षेत्रीय मानव-समूह है, जिसकी एक सामान्य संस्कृति, भाषा, राजनीतिक संगठन एवं व्यवसाय होता है तथा जो सामान्यत: अन्तर्विवाह के नियमों का पालन करता है।

प्रश्न 7
किन्हीं दो जनजातियों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर:
दो जनजातियों के नाम हैं
(1) मुण्डा (बिहार) तथा
(2) नागा (नागालैण्ड)।

प्रश्न 8
अनुसूचित जनजातियों के लिए नौकरियों में कितने प्रतिशत स्थान सुरक्षित है?
उत्तर:
अनुसूचित जनजातियों के लिए नौकरियों में 7.5 प्रतिशत स्थान सुरक्षित है।

प्रश्न 9
राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए कब तक स्थान सुरक्षित रखे गये हैं ?
उत्तर:
राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए सन् 2020 तक स्थान सुरक्षित रखे गये हैं।

प्रश्न 10
1951 ई० की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या कितनी थी ? [2011]
उत्तर:
लगभग 1 करोड़ 91 लाख।

प्रश्न 11
संविधान के कौन-से अनुच्छेद अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए लोकसभा, विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों में स्थान सुरक्षित करने पर जोर देते हैं ? [2007]
उत्तर:
अनुच्छेद 243, 330 एवं 332 अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए लोकसभा विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों में स्थान सुरक्षित करने पर जोर देते हैं।

प्रश्न 12
जनजातियों की समस्याओं के समाधान हेतु ‘राष्ट्रीय उपवन की अवधारणा किसने दी ? [2007]
उत्तर:
यह अवधारणा रॉय तथा एल्विन ने दी।

प्रश्न 13
जनजातियों में जीवन-साथी चुनने के तरीके का उल्लेख कीजिए। [2007, 13]
उत्तर:
जनजातियों में ‘टोटम बहिर्विवाह’ का प्रचलन है जो कि बहिर्विवाह का ही एक रूप

प्रश्न14
सन 1980 में मण्डल कमीशन की रिपोर्ट पर आधारित अन्य पिछड़े वर्ग को कितने प्रतिशत आरक्षण दिया गया है ? [2007]
उत्तर:
27 प्रतिशत।

प्रश्न 15
क्या केरल के नायर एक जनजाति हैं ? [2007]
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न16
निम्नलिखित पुस्तकों से सम्बन्धित लेखकों/विचारकों के नाम लिखिए
(क) सामाजिक मानवशास्त्र,
(ख) एन इण्ट्रोडक्शन टू सोशल ऐन्थ्रोपोलॉजी,
(ग) मैन इन प्रिमिटिव वर्ल्ड।
उत्तर:
इन पुस्तकों के लेखक के नाम हैं
(क) मजूमदार एवं मदान,
(ख) मजूमदार एवं मदान,
(ग) हॉबेल।

प्रश्न 17
अनुसूचित नामक शब्द किसके द्वारा बनाया गया था ?
उत्तर:
अनुसूचित नामक शब्द साइमन कमीशन द्वारा 1927 ई० में बनाया गया था।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
‘ओरिजिन ऑफ स्पीसीज’ (Origin of Species) किसके द्वारा लिखी गयी ?
(क) चार्ल्स डार्विन के
(ख) हरबर्ट स्पेन्सर के
(ग) कार्ल मॉनहीन के
(घ) जॉर्ज सिमैल के।

प्रश्न 2
खासी जनजातीय समाज किस प्रकार का कार्य करता है ?
(क) पौध-उत्पादक का
(ख) खेती का
(ग) पशुपालन का
(घ) कुटीर उद्योग का

प्रश्न 3
हिमाचल प्रदेश की किस जनजाति के पुरुष अपनी पत्नियों के वेश में रहते हैं ?
(क) संथाल के
(ख) थारू के
(ग) नागी के
(घ) कोटा के

प्रश्न 4
निम्नलिखित में कौन-सी जनजाति उत्तराखण्ड के गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र की है ?
(क) लुसाई
(ख) बिरहोर
(ग) भोटिया
(घ) गारो

प्रश्न 5
निम्नलिखित में कौन-सी जनजातीय समाज की एक विशेषता है ?
(क) जटिल सामाजिक सम्बन्ध
(ख) क्षेत्रीय समूह
(ग) औपचारिकता
(घ) व्यक्तिवादिता

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से किसको भारतीय संविधान द्वारा एक जनजाति को अनुसूचित जनजाति के रूप में निर्दिष्ट करने का अधिकार है ?
(क) उस राज्य का राज्यपाल जहाँ जनजाति निवास करती है।
(ख) भारत का राष्ट्रपति
(ग) आयुक्त अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति
(घ) समाज कल्याण मन्त्रालय

प्रश्न 7
भारतीय संविधान की कौन-सी धारा किसी भी प्रकार की अस्पृश्यता पर रोक लगाती है ?
(क) धारा 17
(ख) धारा 22
(ग) धारा 45
(घ) धारा 216

प्रश्न 8
‘नागरिक अधिकार संरक्षण कानून’ किस वर्ष में लागू किया गया ?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1956 ई० में
(ग) 1970 ई० में
(घ) 1986 ई० में

प्रश्न 9
लोकसभा के कुल 542 स्थानों में से कितने स्थान अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित हैं ?
(क) 30 स्थान
(ग) 50 स्थान
(ख) 40 स्थान
(घ) 60 स्थान

प्रश्न 10
जनजातियों को ‘पिछड़े हिन्दू किसने कहा है ?
(क) जी० एस० घुरिए
(ख) एस० सी० दुबे
(ग) एस० सी० राय
(घ) जे० एच० हट्टन

प्रश्न 11
‘अस्पृश्य वे जातियाँ हैं जो अनेक सामाजिक और राजनीतिक निर्योग्यताओं की शिकार हैं। इसमें से अनेक निर्योग्यताएँ उच्च जातियों द्वारा परम्परात्मक तौर पर निर्धारित और सामाजिक तौर पर लागू की गई हैं।” यह परिभाषा किसने दी है ? [2011]
(क) जी० एस० घुरिये
(ख) डी० एन० मजूमदार
(ग) जे० एन० हट्टन
(घ) एम० एन० श्रीनिवासन

प्रश्न 12
ओ० बी० सी० का अर्थ है [2015]
(क) अन्य पिछड़ा वर्ग
(ख) अन्य पिछड़ी जातियाँ
(ग) सभी पिछड़ी जातियाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर:
1. (क) चार्ल्स डार्विन के, 2. (क) पौध-उत्पादक का, 3. (ख) थारू के, 4. (ग) भोटिया, 5, (ख) क्षेत्रीय समूह, 6. (ख) भारत का राष्ट्रपति, 7. (क) धारा 178. (ख) 1956 ई० में, 9. (ख) 40 स्थान, 10. (क) जी० एस० घुरिये, 11. (ख) डी० एन० मजूमदार, 12. (क) अन्य पिछड़ा वर्ग। .

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 2 Nervous System

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 2 Nervous System (तन्त्रिका-तन्त्र या स्नायु-संस्थान) are part of UP Board Solutions for Class 12 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Psychology Chapter 2 Nervous System (तन्त्रिका-तन्त्र या स्नायु-संस्थान).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 2
Chapter Name Nervous System
(तन्त्रिका-तन्त्र या स्नायु-संस्थान)
Number of Questions Solved 38
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 2 Nervous System (तन्त्रिका-तन्त्र या स्नायु-संस्थान)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
तन्त्रिका-तन्त्र अथवा स्नायु-संस्थान से आप क्या समझते हैं? केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
केन्द्रीय स्नायु-संस्थान के भागों का उल्लेख कीजिए तथा मस्तिष्क की रचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
मस्तिष्क की रचना व कार्य बताइए। (2012, 14, 17)
या
केन्द्रीय स्नायु-संस्थान की संरचना व कार्य बताइए। (2011, 13,15)
उत्तर

तन्त्रिका-तन्त्र अथवा स्नायु-संस्थान

प्राणियों के शरीर की रचना एवं कार्य-पद्धति अत्यधिक जटिल एवं बहुपक्षीय है। शरीर के विभिन्न कार्यों के सम्पादन के लिए भिन्न-भिन्न संस्थान हैं। शरीर के एक अति महत्त्वपूर्ण एवं जटिल संस्थान को स्नायु-संस्थान अथवा तन्त्रिका-तन्त्र (Nervous System) कहते हैं। शरीर के इस संस्थान का एक मुख्य कार्य है-व्यवहार का संचालन एवं परिचालन। शरीर का यही संस्थान वातावरण से मिलने वाली समस्त उत्तेजनाओं के प्रति समुचित प्रतिक्रियाएँ प्रकट करता है। स्नायु-संस्थान की रचना अत्यधिक जटिल है। इसका आकार एक व्यवस्थित जाल के समान होता है।

तथा इसकी इकाई को स्नायु या न्यूरॉन कहते हैं। स्नायु-संस्थान का मुख्य केन्द्र मस्तिष्क होता है। सम्पूर्ण स्नायु-संस्थान को तीन भागों में बाँटा जाता है

  1. केन्द्रीय स्नायु-संस्थान (Central Nervous System)
  2. स्वत:चालित स्नायु-संस्थान (Automatic Nervous System) तथा
  3. संयोजक स्नायु-संस्थान (Peripheral Nervous System)।
    केन्द्रीय स्नायु-संस्थान की रचना एवं कार्यों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है

केन्द्रीय स्नायु-संस्थान

केन्द्रीय स्नायु-संस्थान उच्च मानसिक क्रियाओं का केन्द्र है। यह मनुष्य की ऐच्छिक क्रियाओं का केन्द्र समझा जाता है तथा मनुष्य में पशुओं की अपेक्षा अधिक विकसित और जटिल पाया जाता है। इसी कारण से पशुओं से मनुष्यों की मानसिक क्रियाएँ उच्चस्तर की होती हैं। केन्द्रीय स्नायु-संस्थान को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है—
(1) मस्तिष्क तथा
(2) सुषुम्ना नाड़ी।

(I) मस्तिष्क की संरचना एवं कार्य (Structure and work of Brain)

मनुष्य का मस्तिष्क; खोपड़ी के नीचे तथा सुषुम्ना के ऊपर अवस्थित एक कोमल और अखरोट की मेंगी से मिलती-जुलती रचना है। विकसित मानव का मस्तिष्क 3 पाउण्ड (लगभग 1.4 किलोग्राम) भार वाला दस खरब स्नायुकोशों से बना होता है। इसमें 50% भूरा पदार्थ (Grey Matter) तथा 50% सफेद पदार्थ (White Matter) मिलता है।

मस्तिष्क के भाग- मानव मस्तिष्क के चार भाग होते हैं—

  1. वृहद् मस्तिष्क
  2. लघु मस्तिष्क
  3. मध्य मस्तिष्क या मस्तिष्क शीर्ष एवं
  4. सेतु। इनका वर्णन निम्नवत् है

(1) वृहद् मस्तिष्क (Cerebrum)- यह मस्तिष्क का सबसे ऊँचा व सबसे बड़ा भाग होने के कारण ‘वृहद् मस्तिष्क’ कहलाता है। इस भाग पर सम्पूर्ण क्रियाओं के केन्द्र स्थित होते हैं। वृहद् मस्तिष्क का बाह्य भग भूरे रंग तथा आन्तरिक भाग श्वेत रंग के पदार्थ से निर्मित है। बाह्य भूरे रंग के पदार्थ ‘प्रान्तस्था (Cortex) में भूरे रंग के स्नायुकोशों के समूह उपस्थित हैं जो मस्तिष्क के बोध एवं कर्मक्षेत्र बनाते हैं। आन्तरिक श्वेत पदार्थ आन्तरिक भाग में स्थित श्वेत रंग के स्नायु-तन्तुओं के कारण श्वेत दिखाई पड़ता है। वृहद् मस्तिष्क एक दरार से दो गोलाद्ध (Hemispheres) में विभाजित होता है–दायाँ तथा बायाँ गोलार्द्ध। दोनों गोलाद्ध का परस्पर गहरा सम्बन्ध है।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 2 Nervous System 1
दायाँ गोलार्द्ध शरीर के बाएँ भाग तथा बायाँ गोलार्द्ध शरीर के दाएँ भाग से सम्बन्धित होता है। वृहद् मस्तिष्क : खण्डे, दरारें एवं अधिष्ठान वृहद् मस्तिष्क के बाह्य भाग में सतह पर विद्यमान छोटी-छोटी सिकुड़नें दरारों के माध्यम से अलग की जाती हैं। यद्यपि ये दरारें आन्तरिक द्रव तक पहुँचती हैं तथापि इनसे मस्तिष्क विभक्त नहीं होता। वस्तुतः सतह के नीचे मस्तिष्क के विभिन्न भाग आपस में जुड़े रहते हैं। वृहद् मस्तिष्क में दो

बड़ी दरारें हैं। मध्य में स्थित केन्द्रीय दरार (Central Sulcus) या फिशर ऑफ रोलेण्डो (Fissure of Rolando) कहलाती है। लम्बाई में स्थित एक अन्य दरार लेटरल सलेकंस (Lateral Sulcus) या फिशर ऑफ सिल्वियस (Fissure of Silvious) कहलाती है। मस्तिष्क का यह भाग चार खण्डों में

बँटा होता है, जो निम्न प्रकार वर्णित है-

(1) अग्र खण्ड (Frontal lobe)- वृहद् मस्तिष्क के अग्र भाग में स्थित इस खण्ड में क्रियात्मक अधिष्ठान या क्षेत्र (Motor Areas) पाये जाते हैं। अग्र खण्ड चेष्टात्मक क्रियाओं को पूरा करने में सहायता करता है।

(2) मध्य खण्ड (Pariental lobe)- अग्र खण्ड के नीचे स्थित इस खण्ड में त्वचा तथा मांसपेशियों के अधिष्ठान या क्षेत्र (Somaesthetic Areas) मिलते हैं। यह खण्ड त्वचा एवं मांसपेशियों की संवेदनाओं के लिए उत्तरदायी है।

(3) पृष्ठ खण्ड (Occipital lobe)- मस्तिष्क के पिछले भाग में विद्यमान इस खण्ड में दृष्टि अधिष्ठान या क्षेत्र (Visual Areas) पाया जाता है, देखने की सम्पूर्ण क्रियाएँ इसी खण्ड के सहयोग से होती हैं।

(4) शंख खण्ड (Temporal lobe)- यह खण्ड मस्तिष्क के निचले भाग में है जिसके ऊपरी भाग में श्रवण अधिष्ठान या क्षेत्र (Auditory Areas) पाये जाते हैं। यहाँ से हमारी सुनने

की सभी क्रियाओं का संचालन होता है। उपर्युक्त अधिष्ठानों या कार्यात्मक क्षेत्रों के अतिरिक्त वृहद् मस्तिष्क में कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं। जिन पर आघात या चोट लगने से मस्तिष्क की क्रिया प्रभावित होती है। ये ‘साहचर्य क्षेत्र (Association Areas) हैं जो दो बड़े-बड़े भागों में बँटे हैं। ये क्षेत्र अगणित साहचर्य-सूत्रों से बने होते हैं। इन सूत्रों पर चोट लगने से मस्तिष्क में किसी-न-किसी संवेदना के क्षेत्र पर बुरा असर पड़ता है। उदाहरण के लिए-दृष्टि अधिष्ठान या क्षेत्र के नष्ट होने पर लिखी हुई भाषा को समझना सम्भव नहीं होता एवं कार्यकारी प्रान्तस्था के निकटस्थ क्षेत्र के नष्ट होने से व्यक्ति को सीखा हुआ ज्ञान विस्मृत हो जाता है।
इसी प्रकार मस्तिष्क के अग्र भागों पर अधिक आघात पहुँचने के परिणामस्वरूप बाल्यावस्था की घटनाएँ तो याद रह जाती हैं, जबकि हाल की घटनाएँ विस्मृत हो जाती हैं। |

(2) लघु मस्तिष्क (Cerebellum)- लघु मस्तिष्क; वृहद् मस्तिष्क के पिछले भाग के नीचे स्थित तथा दो भागों में विभाजित एक छोटे बल्ब या अण्डे जैसी संरचना है। अनेक स्नायु तन्तुओं द्वारा यह एक ओर तो सुषुम्ना शीर्ष से सम्बन्ध रखता है तथा दूसरी ओर सेतु के माध्यम से वृहद् मस्तिष्क से सम्बन्धित होता है। इसका मुख्य कार्य शारीरिक सन्तुलन में सहायता पहुँचाना तथा शारीरिक क्रियाओं के मध्य समन्वय स्थापित रखना है। यह शरीर की मांसपेशियों की क्रियाओं के मध्य सहयोग भी बनाये रखता है।

(3) मध्य मस्तिष्क या मस्तिष्क शीर्ष (Mid Brain or Medulla Oblongata)- सुषुम्ना के ऊपर स्थित तन्तुओं के इस पुंज को मस्तिष्क पुच्छ भी कहते हैं। यह कॉरपस कॉलोसम (Corpus Collosum) से शुरू होकर सुषुम्ना तक पहुँचता है तथा मस्तिष्क एवं सुषुम्ना में सम्बन्ध स्थापित करता है। सुषुम्ना से मस्तिष्क की ओर जाने वाली नाड़ियाँ इसी भाग से होकर गुजरती हैं। इसमें भूरा पदार्थ श्वेत पदार्थ के अन्दर स्थित होता है तथा स्नायु-तन्तु श्वेत पदार्थ से निकलकर भूरे पदार्थ में जाते हैं। यह भाग सुषुम्ना के साथ मिलकर स्नायु-संस्थान की धुरी (Axis of Nervous System) कहलाता है। इसका कार्य शरीर की प्राण-रक्षा सम्बन्धी समस्त क्रियाओं का संचालन तथा नियन्त्रण करना है; यथा—साँस लेना, रक्त-संचार, श्वसन, निगलना तथा पाचन आदि। शरीर सन्तुलन में सहायता देने के अतिरिक्त यह अपने क्षेत्र की सहज क्रियाओं पर भी नियन्त्रण रखता है। इसके समस्त कार्य अचेतन रूप से होते हैं।

(4) सेतु (Pons Varoli)– सुषुम्ना शीर्ष के ऊपर स्थित यह स्नायु सूत्रों का सेतु (पुल) है जो लघु मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धा को जोड़ता है। वृहद् मस्तिष्क से निकलने वाले स्नायु इसमें से होकर

गुजरते हैं। बाएँ तथा दाएँ गोलार्द्धा से जो स्नायु आते हैं, वे सेतु पर ही एक-दूसरे को पार करते हैं। बाएँ गोलार्द्ध से आने वाले स्नायु इस स्थान पर मार्ग बदलकर शरीर के दाएँ भाग में जाते हैं तथा दाएँ गोलार्द्ध के स्नायु मार्ग बदलकर यहीं से शरीर के बाएँ भाग की पेशियों में जाते हैं। इसी कारण से, शरीर के दाएँ या बाएँ भाग में जब भी कोई अव्यवस्था होती है तो इसका प्रभाव तत्काल ही विपरीत भाग पर पड़ता है। सेतु शरीर तथा वातावरण के बीच उचित सामंजस्य बनाने में भी सहायक सिद्ध होता है।

(II) सुषुम्ना नाड़ी (Spinal Cord)
सुषुम्ना नाड़ी मेरुदण्ड के मध्य में स्थित केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का प्रमुख भाग है। यह मस्तिष्क से नीचे की तरफ कूल्हों तक फैली रहती है। विभिन्न नाड़ी तन्तुओं से बनी यह मुलायम मोटी रस्सी की। तरह गोल तथा लम्बी होती है। यही कारण है कि इसका एक नाम ‘मेरुरज्जु’ भी है। इसमें स्नायु तन्तुओं के लगभग 31 जोड़े सुषुम्ना के दोनों तरफ जुड़े रहते हैं तथा वहीं से निकलकर सारे शरीर में फैल जाते। हैं। सुषुम्ना में दो प्रकार की नाड़ियाँ हैं– प्रथम, संवेदना स्नायु जो संवेदना को संग्राहक से स्नायुकेन्द्र तक ले जाती है तथा द्वितीय, क्रियावाहक स्नायु जो स्नायुकेन्द्र से मांसपेशियों तक समाचार ले जाती है।

प्रश्न 2
स्वतःचालित स्नायुमण्डल क्या है? इसके मुख्य अंगों और उनके कार्यों का उदाहरण|सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर

स्वतःचालित स्नायुमण्डल या स्वतन्त्र स्नायु-संस्थान

स्वत:चालित स्नायुमण्डल (संस्थान), जिसे स्वतन्त्र स्नायु-संस्थान भी कहते हैं, स्नायु-संस्थान । का द्वितीय महत्त्वपूर्ण भाग है। इसकी क्रियाओं पर केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का नियन्त्रण नहीं होता। यह स्वतन्त्र रूप से कार्य करता है तथा इसके आंगिक भाग आत्म-नियन्त्रित होते हैं। वातावरण की ऐसी अनेक उत्तेजनाएँ होती हैं जिन पर तत्काल प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। ऐसी उत्तेजनाओं के प्रति अनुक्रिया करने का आदेश यह स्नायुमण्डल स्वतः ही प्रदान कर देता है। दूसरे शब्दों में, स्वत:चालित स्नायुमण्डल के अन्तर्गत किये जाने वाले कार्य सुषुम्ना नाड़ी से संचालित होते हैं तथा उनमें वृहद् मस्तिष्क को कोई कार्य नहीं करना पड़ता है। इस मण्डल या संस्थान की क्रियाओं में पाचन-क्रिया, श्वसन-क्रिया, फेफड़ों का कार्य, हृदय का धड़कना तथा रक्त-संचार जैसी अनैच्छिक क्रियाएँ सम्मिलित हैं।

स्वतःचालित स्नायुमण्डल के भाग तथा कार्य 

स्वत:चालित स्नायुमण्डल को दो भागों में बाँटा गया है-
(1) अनुकम्पित स्नायुमण्डल तथा
(2) परा-अनुकम्पित स्नायुमण्डल।

(1) अनुकम्पित स्नायुमण्डल (Sympathetic Nervous System)- अनुकम्पित स्नायु-मण्डल का प्रमुख कार्य, सामान्य या शान्त अवस्था में, शरीर को खतरों से बचाने के लिए तैयार करना है। इसमें स्नायुकोश समूह या तो सुषुम्ना के अन्दर होता है या उन आन्तरिक अंगों के समीप होता है जिन्हें वे उत्तेजित करते हैं। यह स्नायुमण्डल शरीर को क्रियाशील बनाता है तथा संवेग की। अवस्था में अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। शरीर को खतरे का आभास होते ही यह सक्रिय होकर कुछ शारीरिक एवं आन्तरिक परिवर्तनों को जन्म देता है। खतरे की दशा में नेत्रों की पुतलियाँ फैल जाती हैं, मस्तिष्क तथा मांसपेशियों में रक्त-संचार तेज हो जाता है, रक्तचाप बढ़ जाता है, आमाशय में रक्त का संचार कम होने से पाचन-शक्ति कमजोर पड़ जाती है और भूख लगनी बन्द हो जाती है।

इसके अतिरिक्त कुछ संवेगों की अवस्था में हृदय की गति तेज हो जाती है, लार-ग्रन्थियों से लार का स्राव नहीं होता जिससे मुंह और गला सूख जाता है, साँस लेने की गति बढ़ जाती है तथा व्यक्ति हाँफने । लगता है। भय एवं क्रोध की संवेगावस्था में ये परिवर्तन देखने को मिलते हैं। निष्कर्षतः संवेगावस्था में अनुकम्पित स्नायुमण्डल की सक्रियता के कारण व्यक्ति अपने शरीर में अधिक बल एवं स्फूर्ति का अनुभव करता है और उसका शरीर भावी खतरे के लिए अपनी रक्षा हेतु तत्पर हो जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 2 Nervous System 2
(2) परा-अनुकम्पित स्नायुमण्डल (Para-Sympathetic Nervous System)- परा-अनुकम्पित स्नायुमण्ड़ल का मुख्य कार्य शारीरिक शक्ति को संचित रखना तथा शरीर को पुष्ट बनाना है। इसमें स्नायुकोश समूह सुषुम्ना के अन्दर न होकर बाहरी अंगों के पास स्थित होता है। इस मण्डल की सक्रियता के कारण हृदय की धड़कन कम हो जाती है, रक्तचाप घट जाता है, लार-ग्रन्थियों से अधिक लार निकलती है जिससे भोजन का पाचन शीघ्रता से होता है तथा नेत्रों की पुतलियाँ कम फैलती हैं या सिकुड़ जाती हैं। इसके अतिरिक्त शरीर से मल-मूत्र तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थ बाहर निकलते रहते हैं और गुर्दे, आँतें एवं आमाशय स्वस्थ रहते हैं।

विद्वानों का मत है कि अनुकम्पित और परा-अनुकम्पित स्नायुमण्डल एक-दूसरे के परस्पर विरोधी कार्य करते हैं, किन्तु खोजों से पता चला है कि ये दोनों मण्डल एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करते हैं तथा परस्पर समन्वय और सहयोग के साथ काम करते हैं। इसका उदाहरण यह है। कि अनुकम्पित भाग की क्रियाशीलता के कारण हृदय की गति बढ़ जाने की अवस्था में परा-अनुकम्पित भाग ही हृदय की गति को सामान्य करता है। जैसा कि मॉर्गन नामक मनोवैज्ञानिक का कथन है, “ये दोनों संस्थान कभी एक-दूसरे से स्वतन्त्र होकर कार्य नहीं करते, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न मात्राओं में सहयोग से काम करते हैं।” यह दोनों संस्थानों का सहयोग ही है कि मानव-शरीर काम और आराम की दो विपरीत परिस्थितियों में भी सन्तुलन बना लेता है। इस तरह के सन्तुलन को स्वायत्त सन्तुलन (Automatic Balance) कहा जाता है।

प्रश्न 3
संयोजक स्नायुमण्डल का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। संयोजक स्नायुमण्डल की नाड़ियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

संयोजक स्नायुमण्डल

संयोजक स्नायुमण्डल; स्नायु संस्थान का तीसरा भाग है और संयोजन का कार्य करता है। संयोजक के रूप में यह मानव मस्तिष्क से शरीर के बाह्य तथा आन्तरिक भागों का सम्पर्क स्थापित करता है। वस्तुतः संयोजक स्नायुमण्डल दो प्रकार से सम्बन्ध स्थापित करता है—
(1) यह मस्तिष्क को ज्ञानेन्द्रियों से सम्बद्ध करता है तथा
(2) ग्रन्थियों को मांसपेशियों से सम्बद्ध करता है। इसके साथ ही इसकी भूमिका सन्देशवाहक के समान भी समझी जाती है; क्योंकि यह संग्राहकों से प्राप्त सन्देशों को केन्द्रीय स्नायुमण्डल तक पहुँचाता है और यहाँ से प्राप्त आदेशों को प्रभावकों तक पहुँचाता है। इस भूमिका के कारण ही इसे संयोजक स्नायुमण्डल (Peripheral Nervous System) कहा जाता है।

संयोजक स्नायुमण्डल के बिना केन्द्रीय स्नायुमण्डल कोई कार्य नहीं कर सकता। कार्य-संचालन के लिए यह शरीर के बाह्य त्वचीय भाग एवं शरीर के आन्तरिक भाग वे मस्तिष्क केन्द्रों के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है।

संयोजक स्नायुमण्डल की नाड़ियाँ

संयोजक स्नायुमण्डल की नाड़ियाँ मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से चलकर शरीर के बाहरी भाग पर आकर रुक जाती हैं। इन नाड़ियों के कुल 43 जोड़े होते हैं जो कपाल तथा सुषुम्ना से सम्बन्ध रखते हैं। इस भाँति ये दो प्रकार की नाड़ियाँ निम्नलिखित हैं

(1) कापालिक नाड़ियाँ (Cranial Nerves)– कापालिक नाड़ियों के 12 जोड़े होते हैं जो मस्तिष्क से प्रारम्भ होते हैं। कापालिक नाड़ियाँ सिर व गर्दन के अधिकांश भाग में फैली रहती हैं या तो ये कार्यवाही होती हैं या ज्ञानवाही या कुछ मिश्रित होती हैं। इनमें दृष्टि, श्रवण, स्वाद व सुगन्ध की नाड़ियाँ शामिल रहती हैं।

(2) सुषुम्ना नाड़ियाँ (Spinal Nerves)- 31 जोड़े सुषुम्ना नाड़ियों के सुषुम्ना से प्रारम्भ होते हैं, जो रीढ़ की पेशियों तथा शरीर के विभिन्न अंगों में फैल जाते हैं। ये नाड़ियाँ त्वचा व कर्मवर्ती मांसपेशियों, अस्थियों तथा जोड़ों को उत्तेजित करती हैं।

संयोजक स्नायु-संस्थान में संचालक तथा सांवेदनिक नाड़ियाँ भी पायी जाती हैं। ये निम्न प्रकार हैं

  • संचालक नाड़ियाँ (Motor Nerves)—ये नाड़ियाँ मस्तिष्क से बाहर की ओर लौटती हैं। और इसी कारण ये बहिर्गामी नाड़ियाँ (Outgoing Nerves) कहलाती हैं। इनके स्नायु तन्तुओं की लम्बाई सांवेदनिक नाड़ियों के तन्तुओं से काफी कम होती है। ये संख्या में भी कम होते हैं। ये नाड़ियाँ मस्तिष्क तथा सुषुम्ना से आदेश प्राप्त करती हैं।
  • सांवेदनिक नाड़ियाँ (Sensory Nerves)-सांवेदनिक नाड़ियों को अन्तर्गामी नाड़ियाँ भी कहा जाता है। ये नाड़ियाँ वातावरण से ज्ञानात्मक उत्तेजनाओं को लेकर मस्तिष्क की ओर जाती हैं। इन नाड़ियों के तन्तु प्रत्येक संग्राहक में पाये जाते हैं जो प्रत्येक केन्द्र तक जाते हैं। इन स्नायु तन्तुओं की लम्बाई काफी होती है और ये बारीक भी होते हैं। कुछ तन्तु इतने बारीक और कई फीट लम्बे होते हैं। कि इन्हें नंगी आँखों से देखा ही नहीं जा सकता।

उपर्युक्त संरचनाओं की मदद से संयोजक स्नायुमण्डल एक ओर तो शरीर की ज्ञानेन्द्रियों से सन्देश ग्रहण कर उसे केन्द्रीय स्नायु-संस्थान तक पहुँचाता है तथा दूसरी ओर केन्द्रीय स्नायु-संस्थान से प्राप्त आदेशों को प्रभावकों तक प्रेषित करता है।

प्रश्न 4
नलिकाविहीन अथवा अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के नाम और कार्यों का वर्णन कीजिए। या नलिकाविहीन ग्रन्थियों की रचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
मनुष्य के पूरे शरीर में भिन्न-भिन्न स्थानों पर कोशाओं की विशिष्ट संरचनाएँ पायी जाती हैं। जिनका प्रमुख कार्य अनेक प्रकार के रासायनिक रसों का स्राव करना है। ग्रन्थियों की क्रिया के कारण उत्पन्न रस-स्राव हमारे व्यवहार में अनेकानेक परिवर्तनों को जन्म देता है। यही कारण है कि ग्रन्थियों को प्रभावक अंग (Effectors) के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। ग्रन्थियाँ दो प्रकार की होती हैं

  1. प्रणालीयुक्त या बहिःस्रावी ग्रन्थियाँ (Extero or Duct Glands) तथा ।
  2. नलिकाविहीन या अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ (Ductless or Endocrine Glands)।

नलिकाविहीन या अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ अनेक ऐसी ग्रन्थियों का समूह है जिनके द्वारा न केवल हमारे शरीर की बहुत-सी आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, अपितु ये हमारे व्यवहारों पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। इनमें किसी प्रकार की नलिका नहीं पायी जाती, इसलिए ये नलिकाविहीन कहलाती हैं। इन ग्रन्थियों द्वारा उत्पन्न रासायनिक रस-स्राव सीधे रक्त की धारा में मिश्रित हो जाता है। यह मिश्रण एक निश्चित आनुपातिक ढंग से होता है। रासायनिक रस-स्राव को हॉर्मोन्स (Hormones) कहते हैं, क्योंकि नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ संवेगों के अभिप्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं; अत: इन्हें ‘संवेगात्मक या व्यक्तित्व ग्रन्थियों के नाम से भी जाना जाता है।

नलिकाविहीन ग्रन्थियों के प्रकार- मनुष्य के शरीर में कई प्रकार की नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ भिन्न-भिन्न स्थानों पर अवस्थित हैं। नाम तथा स्थान आदि के साथ उनका संक्षिप्त परिचय । निम्नलिखित है

(1) शीर्ष ग्रन्थि (Pineal Gland)- शीर्ष या पाइनियल ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में स्थित लाल-भूरे रंग की एक छोटी-सी ग्रन्थि है। यद्यपि शरीर-शास्त्रियों तथा मनोवैज्ञानिकों को अभी तक यह ज्ञात नहीं है कि शरीर को संचालित करने तथा आन्तरिक क्रियाओं को नियन्त्रित करने के लिए यह ग्रन्थि किस भाँति कार्य करती है तथापि अनुमान है कि यह शारीरिक तथा लैंगिक विकास में अपने स्राव द्वारा योग प्रदान करती है। नारी की पतली-मधुर आवाज तथा पुरुष की आवाज का भारीपन, नारी के अंगों की सुडौलता तथा पुरुष के शरीर पर बालों का आधिक्य शीर्ष ग्रन्थि के रासायनिक स्राव का परिणाम है। |

(2) पीयूष ग्रन्थि (Pituitary Gland)- खोपड़ी के आधार पर स्थित छोटे आकार वाली अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पीयूष ग्रन्थि को ‘मास्टर ग्रन्थि (Master Gland) कहा जाता है। इसके दो भाग हैं-

  • अग्र खण्ड तथा
  • पश्च खण्ड। अग्र खण्ड अपेक्षाकृत बड़ा होता है तथा शरीर की वृद्धि को प्रभावित करता है। इस भाग के रस-प्रवाह की अधिकता से व्यक्ति की लम्बाई बढ़ जाती है तथा कमी से व्यक्ति बौना रह जाता है। पश्च खण्ड का सम्बन्ध रासायनिक क्रियाओं से होता है। यह भाग रक्तचाप एवं भूख के बढ़ने-घटने से सम्बन्धित है और गर्भाशय-मूत्राशय तथा पित्ताशय की मांसपेशियों को प्रभावित करता है। इस ग्रन्थि का रस-स्राव अन्य ग्रन्थियों के रसों में उचित अनुपात पैदा करता है। जिससे शरीर में एक रासायनिक आनुपातिक योग्यता’ का निर्माण होता है।

(3) गल ग्रन्थि (Thyroid Gland)– गल (थायरॉइड) ग्रन्थि गले के अग्र भाग में दोनों ओर स्थित होती है। यह थाइरॉक्सिन नामक महत्त्वपूर्ण रस उत्पन्न करती है जो मानव के व्यवहार को एक बड़ी सीमा तक प्रभावित करता है। इस ग्रन्थि का बुद्धि और व्यक्तित्व से गहरा सम्बन्ध है। बाल्यावस्था में यह ग्रन्थि यदि उचित रूप से क्रियाशील न हो पाये और शरीर का उचित विकास भी न हो सके तो बालक का शरीर दुर्बल तथा बुद्धि मन्द हो जाती है। थायरॉइड ग्रन्थि के स्राव की मात्रा अधिक हो जाने पर व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, उसे गर्मी अधिक लगती है तथा वह बेचैनी का अनुभव करता है। ऐसी व्यक्ति पर्याप्त भोजन करके भी कमजोर बना रहता है। शरीर की आन्तरिक क्रियाओं में तेजी आने पर भी भार में कमी आ जाती है।

इसके विपरीत इस ग्रन्थि के स्राव के अभाव में व्यक्ति सुस्ती व आलस्य का । अनुभव करता है तथा उसके शरीर का तापमान गिर जाता है। वह हर समय ऊँघता रहता है। ग्रन्थि रस के कम होने पर बालक को चलना-फिरना, बोलना तथा अन्य अच्छी बातें सिखाना कठिन होता है। एक ओर जहाँ क्रोध या भय की अवस्था में यह ग्रन्थि ठीक प्रकार से कार्य नहीं करती तथा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, वहीं दूसरी ओर प्रेम तथा उत्साह की अवस्था में शरीर में इस रस की अभिवृद्धि होती है, रोगों का विनाश होता है और शरीर को शीघ्रता से विकास होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 2 Nervous System 3
(4) उपगल ग्रन्थि (Para Thyroid Gland)- गल (थायरॉइड) ग्रन्थि के समीप ही उसके पृष्ठ भाग के दोनों तरफ चार उपगल (पैरा-थायरॉइड) ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। संरचना तथा कार्य की दृष्टि से ये ग्रन्थियाँ गल ग्रन्थि से सर्वथा भिन्न हैं। इन ग्रन्थियों से होने वाले रासायनिक स्राव से शरीर शक्तिशाली बनता है, किन्तु स्राव का अभाव मांसपेशियों में ऐंठन तथा मरोड़ पैदा करता है। इसके अतिरिक्त ये ग्रन्थियाँ रक्त में चूने (कैल्सियम) की मात्रा को भी नियन्त्रित करती हैं जिससे हड्डियाँ सबल तथा पुष्ट बनती हैं। स्राव का आधिक्य रक्त में चूने की मात्रा को कम करता है जिससे हड्डियाँ क्षीण होने लगती हैं और स्नायु-संस्थान पर बुरा असर पड़ता है। |

(5) थाइमस ग्रन्थि (Thymus Gland)– मानव-शरीर में थाइमस ग्रन्थि की स्थिति हृदय के ऊपर तथा सीने व फेफड़ों के मध्य होती है। इसके कार्य तथा प्रयोजन के विषय में विद्वान् अभी तक एकमत नहीं हो पाये हैं, तथापि समझा जाता है कि इस ग्रन्थि की लैंगिक विकास एवं उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह काम-इच्छा को भी प्रभावित करती है। इसका विकास बालक की दो वर्ष की आयु तक हो जाता है। जब तक बालक युवावस्था को प्राप्त नहीं होता है तब तक यह ग्रन्थि अपना कार्य सुचारु रूप से करती है। किन्तु युवावस्था आते ही यह अपना कार्य बन्द कर देती है और लुप्त हो जाती है। |

(6) अधिवृक्क ग्रन्थियाँ (Adrenal Glands)- अधिवृक्क (एड्रीनल) ग्रन्थियाँ छोटी और पीलापन लिये हुए दो छोटे त्रिकोण में प्रत्येक वृक्क के समीप अवस्थित हैं। इनसे प्रवाहित स्राव का शरीर और उसके व्यवहारों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं–

  • कॉर्टेक्स (Cortex) तथा
  • मेड्यूला (Medulla) जो संरचना एवं कार्य की दृष्टि से भिन्न होते हैं। कॉर्टेक्स बाहरी भाग है। यह यौन-क्रियाओं से विशिष्ट रूप में सम्बन्धित है। इसकी आवश्यकता से अधिक वृद्धि बालक को अवस्था से पूर्व ही असाधारण रूप से शक्तिशाली तथा यौन व्यवहारों में परिपक्व बना देती है। महिलाओं में इसका आधिक्य पुरुषोचित लक्षणों को जन्म देता है। ऐसी महिलाओं में असामान्य लक्षण; जैसे-अल्पायु में यौन व्यवहारों के लिए परिपक्वता आ जाना, चेहरे परे बाल उगना तथा

पुरुषों के समान भारी आवाज, अंगों की गोलाई का समाप्त होना आदि प्रकट होते हैं। मेड्यूला आन्तरिक भाग है जिससे एड्रीनेलिन (Adrenaline) नामक महत्त्वपूर्ण स्राव की उत्पत्ति होती है। यह वह शक्तिशाली रासायनिक स्राव है जो संवेगों की अवस्था में हमारे रक्त में मिश्रित होकर, हमें शक्ति प्रदान करता है। हृदय को उत्तेजित करने के अतिरिक्त अधिक पसीना आना, नेत्रों की पुतली का फैलना, उच्च रक्तचाप, पेशियों में देर तक थकान न होना आदि संकेत भी अधिवृक्क ग्रन्थि के इसी भाग के परिणाम हैं।

(7) जनन ग्रन्थियाँ (Gonads)- जनन ग्रन्थियाँ आंशिक रूप से नलिकासहित तथा नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ हैं। इन ग्रन्थियों की सहायता से पुरुष व स्त्री का भेद स्पष्ट होता है। अतः इन्हें लैगिक ग्रन्थियाँ प्रजनन ग्रन्थियाँ भी कहते हैं। पुरुष की प्रजनन ग्रन्थियाँ ‘अण्डकोश (Male Testes) हैं जिनमें शुक्रकीट (Spermatozoa) उत्पन्न होते हैं तथा स्त्रियों की प्रजनन ग्रन्थियाँ ‘डिम्ब ग्रन्थि’ (Female Ovary) हैं जिनमें रज-कीट (Ovum) उत्पन्न होते हैं। शारीरिक उत्पत्ति एवं व्यक्तित्व-विकास की दृष्टि से ये ग्रन्थियाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। जनन ग्रन्थियों द्वारा आन्तरिक हॉर्मोन्स का स्राव भी होता है जिनके प्रभाव से पुरुष व स्त्री में यौन प्रौढ़ता की अवधि में सम्बन्धित जननेन्द्रियों का विकास होता है।

यद्यपि ये हॉर्मोन्स शरीर में बालपन से ही मौजूद होते हैं तथापि किशोर अवस्था में विशेष रूप से वृद्धि करते हैं। पुरुषों का भारी स्वर तथा दाढ़ी-मूंछ के बाल और स्त्रियों में मासिक धर्म, स्तनों का विकास तथा गर्भाधान आदि जनन ग्रन्थियों की क्रियाशीलता के कारण होते हैं। इन ग्रन्थियों का अभावं मनुष्य में यौन-चिह्नों को विकसित नहीं होने देता जिसके परिणामस्वरूप नपुंसकता के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

प्रमुख तलिकाविहीन या अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त यह निष्कर्ष निकलता है कि अनुक्रिया प्रक्रम में इन ग्रन्थियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ये ग्रन्थियाँ व्यक्तित्व तथा मानव-व्यबहार पर प्रभाव को स्पष्ट करती हैं। यदि एक ओर पीयूष ग्रन्थि, गल ग्रन्थि, पाइनियल ग्रन्थि तथा जननं ग्रन्थियों का स्राव शारीरिक वृद्धि के विकास पर प्रभाव रखता है तो दूसरी ओर, इन्सुलिन की उत्पत्ति करने वाले कोश ‘लैंगरहेन्स के आइलेट्स (Islets of Langerhans) तथा एड्रीनल आदि ग्रन्थियाँ शरीर की बनावट तथा भोजन के प्रयोग पर पर्याप्त प्रभाव डालती हैं।

प्रश्न 5
सहज या प्रतिक्षेप क्रियाओं से आप क्या समझते हैं? सहज क्रियाओं की विशेषताओं तथा महत्त्व या उपयोगिता का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सहज या प्रतिक्षेप क्रियाओं का अर्थ एवं परिभाषा अर्थ–सहज यो प्रतिक्षेप क्रियाएँ (Reflex Actions) अनर्जित तथा अनसीखी क्रियाएँ हैं। जो स्वत: एवं शीघ्रतापूर्वक घटित होती हैं। ये ऐसी जन्मजात क्रियाएँ हैं जिनमें व्यक्ति की इच्छा के लिए कोई स्थान नहीं होता और न ही उनके घटित होने की अधिक चेतना ही होती है। किसी उद्दीपक से उत्तेजना मिलते ही उसके परिणामस्वरूप तत्काल प्रतिक्रिया हो जाती है; जैसे—आँखों की पलकों का झपकना, प्रकाश पड़ते ही आँख की पुतली का सिकुड़ना, छींक आना, लार बहना, खाँसना तथा अश्रुपात आदि। इस प्रतिक्रिया में मस्तिष्क की कोई भूमिका नहीं होती।

सहज या प्रतिक्षेप क्रियाएँ बाह्य एवं आन्तरिक दोनों प्रकार की उत्तेजनाओं से होती हैं। यहाँ उद्दीपक अनजाने में मिलता है तथा उद्दीपक मिलते ही अविलम्ब प्रतिक्रिया सम्पन्न हो जाती है। पैर में काँटा चुभते ही तुरन्त पैर खिंच जाता है. और आँख के पास कोई वस्तु आने पर आँख झपक जाती है। इस प्रकार की अनुक्रियाओं की गति इतनी तेज होती है कि इनमें न के बराबर समय लगता है। यदि लटकी हुई टॉग पर घुटने के नीचे काँटा चुभा दिया जाए तो टाँग खिंचने में केवल 0.3 सेकण्ड को समय काफी है। किन्तु कुछ अनुक्रियाओं में अपेक्षाकृत अधिक समय भी लगता है; जैसे—प्रकाश पड़ने पर आँख की पुतली का सिकुड़ना, स्वादिष्ट व्यंजन देखकर मुँह में लार आना तथा गर्म वस्तु छूने पर हाथ खींच लेना आदि। सहज या प्रतिक्षेप क्रियाएँ बालक के जन्म से पूर्व गर्भावस्था के पाँचवे-छठे मास में ही प्रारम्भ हो जाती हैं।

परिभाषा- सहज अथवा प्रतिक्षेप क्रियाओं को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है

वुडवर्थ के अनुसार, “सहज (प्रतिक्षेप) क्रिया एक अनैच्छिक और बिना सीखी हुई क्रिया है जो किसी ज्ञानवाही उद्दीपक की मांसपेशीय अथवा ग्रन्थीय प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न होती है।”

आइजैक के अनुसार, “प्रतिवर्ती क्रिया से अभिप्राय प्राणी की अनैच्छिक एवं स्वचालित अनुक्रियाओं से है जो वह वातावरण के परिवर्तनों के फलस्वरूप उत्पन्न हुए उद्दीपकों के प्रति करता है। ये अनुक्रियाएँ प्राय: गत्यात्मक अंगों से सम्बंधित होती हैं तथा इनके फलस्वरूप मांसपेशी, पैर एवं हाथों में सहज गति का आभास होता है।”
आर्मस्ट्रांग एवं जैक्सन के अनुसार, “प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारी चेतनात्मक इच्छाओं के द्वारा उत्पन्न नहीं होतीं, परन्तु वातावरण में उत्पन्न हुई उत्तेजनाओं का परिणाम होती हैं।”

सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाओं की विशेषताएँ

सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाओं की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. सहज क्रियाएँ जन्मजात हैं तथा गर्भावस्था से ही इनकी शुरुआत मानी जाती है। जन्म के तुरन्त बाद से ही बालक इन्हें प्रकट करना शुरू कर देता है।
  2. ये क्रियाएँ स्नायु रचना पर आधारित तथा अनसीखी क्रियाएँ हैं। |
  3. इन्हें अचेतन मन से तुरन्त सम्पन्न होने वाली क्रियाएँ कहा जाता है जिनमें चेतन मानसिक क्रियाओं को सम्मिलित नहीं किया जाता।
  4. सहज क्रियाएँ केन्द्रीय स्नायुमण्डल के नियन्त्रण से मुक्त होती हैं; जैसे छींक आने पर उसे नियन्त्रित नहीं किया जा सकता।
  5. ये अनैच्छिक तथा अचानक उत्पन्न होने वाली क्रियाएँ हैं।।
  6. इनमें अधिक समय नहीं लगता और अल्पकाल में ही पूर्ण होकर ये समाप्त भी हो जाती हैं।
  7. ये स्थानीय हैं जिन्हें करने में शरीर का एक भाग ही क्रियाशील रहता है।
  8. इन क्रियाओं की प्रबलता उद्दीपक की प्रबलता पर निर्भर होती है।
  9. इनसे शरीर को कोई क्षति नहीं होती, क्योंकि इनके करने या मानने का उद्देश्य व्यक्ति की रक्षा है।
  10. बार-बार दोहराने पर भी व्यक्ति सहज क्रियाओं में कोई सुधार नहीं ला पाता। पलक झपकने या छींकने की क्रिया बार-बार दोहराई जाती है, तथापि उसमें कोई सुधार या परिवर्तन सम्भव नहीं होता।

जीवन में सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाओं की उपयोगिता या महत्त्व

सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाएँ न केवल अनियन्त्रित, अनैच्छिक, अनर्जित तथा प्रकृतिजन्य हैं; अपितु जैविक दृष्टि से भी उपयोगी हैं। इन्हें सीखना नहीं पड़ता; इनकी क्षमता तो मनुष्य में जन्म से ही होती है। मानव-जीवन में इनका उपयोग निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत व्यक्त किया जा सकता है।

(1) आकस्मिक घटनाओं से रक्षा- सहज (प्रतिक्षेपी) क्रियाएँ अकस्मात् घटने वाली घटनाओं से मनुष्य की रक्षा करती हैं। ये शरीर को बाह्य खतरों तथा आक्रमणों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती हैं। आँख के निकट जब कोई वस्तु आती है, पलकें तत्काल ही झपक जाती हैं।

(2) स्वेच्छा से कार्य सम्पन्न– सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाएँ अनैच्छिक होती हैं। इनके माध्यम से बहुत-से कार्य स्वतः ही सम्पन्न हो जाते हैं जिससे आवश्यकतानुसार शरीर को सहायता प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए भोजन जब आमाशय में पहुँचता है, स्वत: ही स्राव निकलते हैं जो भोजन के पाचन में सहायता देते हैं।

(3) गतिशीलता- ये क्रियाएँ अचानक ही प्रकट होती हैं तथा कार्य की पूर्णता के साथ ही समाप्त भी हो जाती हैं। ऐच्छिक क्रियाओं की अपेक्षा इनमें गतिशीलता बहुत अधिक पाई जाती है।

(4) वातावरण से अनुकूलन- सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाएँ मनुष्य का उसके वातावरण से अनुकूलन करने में सहायक सिद्ध होती हैं। प्रायः देखा जाता है कि वातावरण में ताप वृद्धि से पसीने की ग्रन्थियाँ पसीना निकालकर शरीर को शीतलता प्रदान करती हैं। परिणामस्वरूप शरीर का तापक्रम कम हो जाता है।

(5) समय एवं आवश्यकतानुसार सहायक- ये क्रियाएँ मनुष्य की उसके जीवनकाल में उचित समय पर तथा आवश्यकतानुसार सहायता करती हैं। मानव-जीवन के विलास-क्रम में विभिन्न सोपानों पर इन क्रियाओं की परिपक्वता स्वाभाविक दृष्टि से सहायता देती है। खाँसने की सहज क्रिया जन्म के कुछ समय उपरान्त लेकिन काम सम्बन्धी सहज क्रिया किशोरावस्था में प्रकट होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
टिप्पणी लिखिए-स्नायु-संस्थान या तन्त्रिका-तन्त्र।
उत्तर
स्नायु संस्थान (तन्त्रिका तन्त्र) स्नायुओं का एक समूह है। यह एक ऐसी नियन्त्रण पद्धति है। जिसका शरीर के विभिन्न अंगों के व्यवहारों तथा क्रियाओं पर नियन्त्रण होता है। स्नायु-संस्थान वातावरण से मिलने वाली उत्तेजनाओं के प्रति समुचित प्रतिक्रियाएँ करने का कार्य करता है। वस्तुतः इसकी जटिल संरचना एवं कार्यविधि आधुनिक एवं स्वचालित दूरभाष केन्द्र (Telephone Exchange) से मिलती-जुलती है। जिस प्रकार सन्देश लाने-ले जाने का काम ‘टेलीफोन के तार करते हैं, उसी प्रकार का काम नाड़ी फाइबर करते हैं। मस्तिष्क एवं सुषुम्ना नाड़ी केन्द्रीय एक्सचेंज’ तथा तन्तुओं तक पहुंचने वाले स्नायुओं के किनारे रिसीवर’ हैं। स्नायु संस्थान को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-

व्यवहारों के शारीरिक आधार (अर्थात् अनुक्रिया प्रक्रम) की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए स्नायु-संस्थान के निम्नलिखित भागों का अध्ययन आवश्यक है-

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    1. केंद्रीय स्नायु-संस्थान (Central Nervous System)
    2. स्वत:चालित स्नायु-संस्थान (Automatic Nervous System) तथा

प्रश्न 2
सुषुम्ना के कार्य बताइए। (2009, 14, 18)
उत्तर
केन्द्रीय स्नायु-संस्थान के एक भाग के रूप में सुषुम्ना (Spinal Cord) के मुख्य कार्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
1. प्रतिक्षेप क्रियाओं का संचालन– सुषुम्ना का एक मुख्य कार्य प्रतिक्षेप अथवा सहज क्रियाओं को संचालन करना है। प्रतिक्षेप क्रियाओं से आशय उन क्रियाओं से है जो मस्तिष्क एवं विचार शक्ति से परिचालित नहीं होतीं तथा इन्हें सीखने की भी आवश्यकता नहीं होती है; जैसे-पलकों का झपकना, काँटा चुभते ही हाथ को खींच लेना, प्रकाश पड़ते ही आँख की पुतली का सिकुड़ना आदि। ये सभी क्रियाएँ जीवन के लिए विशेष उपयोगी होती हैं तथा इनका संचालन सुषुम्ना द्वारा ही किया जाता है।

2. बाहरी उत्तेजनाओं की जानकारी मस्तिष्क को देना– सुषुम्ना नाड़ी का एक उल्लेखनीय कार्य पर्यावरण से प्राप्त होने वाली उत्तेजनाओं की जानकारी मस्तिष्क को प्रदान करना है।

(3) मस्तिष्क द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन- सुषुम्ना द्वारा जहाँ एक ओर बाहरी उत्तेजनाओं की सूचना मस्तिष्क को दी जाती है, वहीं दूसरी ओर सुषुम्ना ही मस्तिष्क द्वारा ग्रहण की गयी उत्तेजनाओं को कार्य रूप में परिणत करने का कार्य भी करती है।

(4) सुषुम्ना के नियन्त्रक कार्य- सुषुम्ना एक नियन्त्रक के रूप में भी कुछ कार्य करती है। पर्यावरण से प्राप्त होने वाली कुछ उत्तेजनाओं को सुषुम्ना मस्तिष्क तक पहुँचने ही नहीं देती तथा स्वयं ही उन उत्तेजनाओं के प्रति तुरन्त आवश्यक प्रतिक्रिया कर देती है।

प्रश्न 3
स्वतःचालित स्नायुमण्डल की रचना स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
स्नायु तन्त्र के एक महत्त्वपूर्ण भाग को स्वतःचालित स्नायुमण्डल या स्वतन्त्र स्नायु-संस्थान (Automatic Nervous System) कहते हैं। इसकी रचना को दो भागों में बाँटकर स्पष्ट किया जा सकता है। प्रथम भाग को बायाँ पक्ष कहते हैं। स्वत:चालित स्नायुमण्डल की रचना के बाएँ पक्ष के तीन भाग हैं–
(1) कापालिक
(2) माध्यमिक स्नायु तन्त्र तथा
(3) अनुतन्त्रिका। सबसे ऊपर के सिरे पर कापालिक है जिससे सम्बन्धित स्नायुओं को कापालिक स्नायु कहते हैं। इसके नीचे सुषुम्ना है और उससे सम्बन्धित स्नायुओं को सुषुम्ना स्नायु कहते हैं। सुषुम्ना वाला भाग माध्यमिक स्नायु तन्त्र (Thoraco Lumber) कहलाता है, क्योंकि इस भाग के स्नायु सुषुम्ना से चलकर थोरेक्स तक पहुँचते हैं। तीसरा भाग अनुतन्त्रिका कहलाता है। यह सुषुम्ना को अन्तिम भाग है। स्वत:चालित स्नायुमण्डल के दाएँ पक्ष से निकलने वाले स्नायु तथा स्नायुकोश-समूह शरीर के विभिन्न भागों से सम्बन्ध रखते हैं। ये स्नायु नेत्र, हृदय, फेफड़े, यकृत, आमाशय, क्लोम, आँत, वृक्के, पसीने की ग्रन्थियों तथा जननेन्द्रियों तक फैले होते हैं।

प्रश्न 4
प्रतिक्षेप चाप के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर
प्रतिक्षेप चाप का सम्बन्ध प्रतिक्षेप अथवा सहज क्रियाओं से है। प्रतिक्षेप चाप (Reflex Arc) एंक़ मार्ग है जिसका उन ज्ञानवाही तथा कर्मवाही स्नायुओं द्वारा अनुसरण किया जाता है। जो सहज (प्रतिक्षेप) क्रियाओं के सम्पन्न होने में भाग लेते हैं।

वुडवर्थ ने उचित ही कहा है- “वह मार्ग जो एक ज्ञानेन्द्रिय से प्रारम्भ होकर स्नायु केन्द्र से होते हुए एक मांसपेशी तक पहुँचता है, प्रतिक्षेप चाप कहलाता है।”

वस्तुतः सहज (प्रतिक्षेप) क्रिया के होने से मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों तक ज्ञानवाही स्नायुओं को सूचना ले जाने की आवश्यकता नहीं होती और सुषुम्ना या मस्तिष्क के निम्न केन्द्रों से ही कार्यवाही स्नायुओं को आदेश मिल जाता है। वह प्रभावक अंग तक इसे प्रेषित करती है जो प्रतिक्रिया करता है। सहज क्रिया का मार्ग एक चाप के रूप में होता है जिसे प्रतिक्षेप चाप कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि पैर में कॉटी चुभ जाए तो पैर की त्वचा से संवेदना स्पर्शेन्द्रिये से शुरू होकर सांवेदनिक स्नायुओं के मार्ग द्वारा स्नायु केन्द्र तक जाती है। कार्यवाही स्नायुओं द्वारा पैर की मांसपेशियों को पैर हटा लेने का आदेश मिलता है जिससे पैर हटा लिया जाता है। प्रतिक्षेप क्रिया का यह मार्ग ही प्रतिक्षेप चाप है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
मानवीय क्रियाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
व्यक्ति द्वारा किसी उद्दीपन के प्रति की जाने वाली प्रतिक्रिया को मानवीय क्रिया कहते हैं। मानवीय – संवेदी तंत्रिका क्रियाएँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती सुषुम्ना का एक अंश हैं-
1. ऐच्छिक क्रियाएँ तथा
2. या ज्ञानेन्द्रिय अनैच्छिक क्रियाएँ । ऐच्छिक क्रियाएँ साहचर्य व्यक्ति की इच्छा-शक्ति पर निर्भर एवं गति तंत्रिका जान-बूझकर की गयी क्रियाएँ हैं। इन मांसपेशियाँ पर केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का नियन्त्रण होता है। इस प्रकार की क्रियाओं के उदाहरण हैं—किसी भयानक वस्तु को देखकर भाग जाना, संकट से बचने के उपाय खोजना, किसी के वियोग में रो पड़ना आदि। इनसे भिन्न अनैच्छिक क्रियाएँ उन क्रियाओं को कहते हैं जो व्यक्ति की इच्छा शक्ति से मुक्त होती हैं तथा उन पर केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का कोई नियन्त्रण नहीं होता।
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इस वर्ग की क्रियाएँ तीन प्रकार की होती हैं-

  • स्वतःसंचालित क्रियाएँ,
  • आकस्मिक क्रियाएँ तथा 
  • सहज या प्रतिक्षेप क्रियाएँ।

प्रश्न 2
सहज अथवा प्रतिक्षेप क्रियाओं के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सहज अथवा प्रतिक्षेप क्रियाएँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

(1) शारीरिक प्रतिक्षेप (Physiological Reflexes)- ये वे सहज क्रियाएँ हैं जो स्वयं घटित होती हैं। इनके सम्पन्न होने में व्यक्ति को किसी प्रकार का प्रयास नहीं करना पड़ता और न ही इनके होने का ज्ञान ही होता है; जैसे—आँख पर चौंध पड़ते ही बिना किसी चेतना या ज्ञान के हमारी आँख की पुतली स्वत: सिकुड़ जाती है और आमाशय में भोजन पहुँचने के साथ-ही वहाँ ग्रन्थियों से स्राव होने लगता है।

(2) सांवेदनिक प्रतिक्षेप (Sensation Reflexes)- इन सहज क्रियाओं का ज्ञान व्यक्ति को हो जाता है; उदाहरणार्थ-आँख में धूल पड़ने पर पलक का चेतन होकर झपकना, नाक में तिनका आदि छूने से छींक आना तथा गले में खराश होने पर खाँसी उठना। सांवेदनिक प्रतिक्षेप को चेष्टा या इच्छा-शक्ति द्वारा कुछ क्षणों के लिए रोक पाना सम्भव है, किन्तु नियन्त्रण हटते ही सहज क्रिया अधिक आवेग से होने लगती है। आवश्यकता पड़ने पर खाँसी को कुछ समय के लिए इच्छा शक्ति से रोका जा सकता है, किन्तु नियन्त्रण हटते ही अधिक बल से खाँसी आती है।

प्रश्न 3
संयोजक़ स्नायुमण्डल से क्या आशय है?
उत्तर
हमारे स्नायु-संस्थान के एक भाग को संयोजक स्नायु-संस्थान (Peripheral Nervous System) कहते हैं। स्नायुमण्डल के इस भाग का मुख्य कार्य मस्तिष्क का शरीर के बाहरी तथा 
आन्तरिक भागों से सम्पर्क स्थापित करना होता है। संयोजक के रूप में इसके दो मुख्य कार्य हैं—प्रथम; यह मस्तिष्क तथा शरीर की ज्ञानेन्द्रियों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है तथा द्वितीय; शरीर की ग्रन्थियों का मांसपेशियों से सम्बन्ध स्थापित करता है। संयोजक स्नायुमण्डल एक प्रकार से सन्देशवाहक की भूमिका भी निभाता है। यह संग्राहकों से प्राप्त सन्देशों को केन्द्रीय स्नायुमण्डल तक पहुँचाता है तथा केन्द्रीय स्नायुमण्डल से प्राप्त आदेशों को प्रभावकों तक पहुँचाता है। 

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न :I निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए

  1. व्यक्ति के व्यवहार के संचालन एवं नियन्त्रण का कार्य करने वाला संस्थान …………….  कहलाता है।
  2. स्नायु-संस्थान की रचना……………..
  3.  ………………. और …………… दोनों केन्द्रीय स्नायु तन्त्र के भाग हैं। (2018)
  4. स्नायु संस्थान का मुख्य केन्द्र …………….होता है।
  5. विभिन्न इन्द्रियाँ ही हमारे ……………….. हैं।
  6. संग्राहकों का कार्य बाह्य वातावरण से ……………… ग्रहण करना होता है। (2008)
  7. रासायनिक ग्राहकों द्वारा हमें …………..एवं …………. की संवेदना प्राप्त होती है।
  8. वृहद् मस्तिष्क के अग्र खण्ड में ……………क्षेत्र पाये जाते हैं।
  9. वृहद् मस्तिष्क के मध्य खण्ड में ………….. के अधिष्ठान या केन्द्र पाये जाते हैं।
  10. वृहद् मस्तिष्क के पृष्ठ खण्ड में ………….. अधिष्ठान या क्षेत्र पाया जाता है।
  11. वृहद् मस्तिष्क के शंख खण्ड में …………….. अधिष्ठान या क्षेत्रं पाया जाता है।
  12. शारीरिक सन्तुलन को बनाये रखने में ………… द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है।
  13. साँस लेना, रक्त-संचार, श्वसन, निगलना तथा पाचन आदि क्रियाओं का संचालन ….. द्वारा किया जाता है।
  14. शरीर तथा वातावरण के बीच उचित सामंजस्य बनाये रखने का कार्य मस्तिष्क के …….. नामक भाग द्वारा किया जाता है।
  15. सुषुम्ना…………. का एक भाग है।
  16. सुषुम्ना शरीर के बाह्य अंगों को …………….से जोड़ती है।
  17. अनुकम्पित तथा परा-अनुकम्पित स्नायुमण्डल …………..कार्य करते हैं।
  18. मानव मस्तिष्क तथा शरीर के बाहरी एवं आन्तरिक भागों में सम्पर्क की स्थापना……….. द्वारा होती है।
  19. प्रतिक्षेप या सहज क्रियाओं का केन्द्र ……………. है।
  20. अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले स्राव को ……….कहते हैं। (2010)

उत्तर
1. स्नायु संस्थान, 2. अत्यधिक जटिल, 3. मस्तिष्क, सुषुम्ना नाड़ी, 4. मस्तिष्क, 5. संग्राहक अंग, 6. उत्तेजनाएँ, 7. स्वाद, गन्ध, 8. क्रियात्मक अधिष्ठान या क्षेत्र, 9. त्वचा तथा मांसपेशियों, 10. दृष्टि, 11. श्रवण, 12. लघु मस्तिष्क, 13. मध्य मस्तिष्क, 14. सेतु, 15. केन्द्रीय स्नायु-संस्थान, 16. मस्तिष्क, 17. परस्पर सहयोग से, 18. संयोजक स्नायु मण्डल, 19. सुषुम्ना नाड़ी, 20. हॉर्मोन्स।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए-

प्रश्न 1.
सम्पूर्ण स्नायु-संस्थान को किन-किन भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर
सम्पूर्ण स्नायु-संस्थान को तीन भागों में बाँटा जाता है—

  1. केन्द्रीय स्नायु संस्थान
  2. स्वत:चालित स्नायु-संस्थान तथा
  3. संयोजक स्नायु-संस्थान।

प्रश्न 2.
केन्द्रीय स्नायु संस्थान को किन-किन भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर
केन्द्रीय स्नायु-संस्थान को दो भागों में बाँटा जाता है—

  1. मस्तिष्क तथा
  2. सुषुम्ना नाड़ी।

प्रश्न 3.
मानव मस्तिष्क को कुल कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर
मानव-मस्तिष्क को चार भागों में बाँटा जाता है-

  1. वृहद् मस्तिष्क
  2. लघु मस्तिष्क
  3. मध्य मस्तिष्क या मस्तिष्क शीर्ष तथा
  4. सेतु।

प्रश्न 4.
वृहद मस्तिष्क किन-किन खण्डों में बँटा होता है?
उत्तर
वृहद् मस्तिष्क चार खण्डों में बँटा होता है-

  1. अग्र खण्ड,
  2. मध्य खण्ड,
  3. पृष्ठ खण्ड तथा
  4. शंख खण्ड।

प्रश्न 5.
लघु मस्तिष्क का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर
लघु मस्तिष्क का मुख्य कार्य शारीरिक सन्तुलन में सहायता पहुँचाना तथा शारीरिक क्रियाओं के मध्य समन्वय स्थापित रखना है।

प्रश्न 6.
मध्य मस्तिष्क का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर
मध्य मस्तिष्क का मुख्य कार्य शरीर की प्राण-रक्षा सम्बन्धी समस्त क्रियाओं का संचालन तथा नियन्त्रण करना है; जैसे कि साँस लेना, रक्त-संचार, निगलना तथा पाचन आदि।

प्रश्न 7.
स्वतःचालित स्नायुमण्डल द्वारा संचालित मुख्य क्रियाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
स्वत:चालित स्नायुमण्डल द्वारा संचालित होने वाली मुख्य क्रियाएँ हैं–पाचन क्रिया, श्वसन क्रिया, फेफड़ों का कार्य, हृदय का धड़कना तथा रक्त-संचार जैसी अनैच्छिक क्रियाएँ।

प्रश्न 8.
संयोजक स्नायुमण्डल के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
संयोजक स्नायुमण्डल एक ओर तो शरीर की ज्ञानेन्द्रियों से सन्देश ग्रहण कर उसे केन्द्रीय स्नायु-संस्थान तक पहुँचाता है तथा दूसरी ओर केन्द्रीय स्नायु-संस्थान से प्राप्त आदेशों को प्रभावकों तक प्रेषित करता है।

प्रश्न 9.
मानवीय क्रियाएँ मुख्य रूप से कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर
मानवीय क्रियाएँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं-ऐच्छिक क्रियाएँ तथा अनैच्छिक क्रियाएँ।

प्रश्न 10.
प्रतिक्षेप चाप से क्या आशय है?
उत्तर
वह मार्ग जो ज्ञानेन्द्रिय से प्रारम्भ होकर स्नायु-केन्द्र से होते हुए एक मांसपेशी तक पहुँचता है, प्रतिक्षेप चाप कहलाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
शरीर के व्यवहार के संचालन एवं नियन्त्रण के कार्य को सम्पन्न करने वाले संस्थान को कहते हैं
(क) अस्थि-संस्थान
(ख) स्नायु-संस्थान
(ग) पेशी-संस्थान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) स्नायु-संस्थान

प्रश्न 2.
स्नायु-संस्थान को भाग है
(क) केन्द्रीय स्नायु-संस्थान ।
(ख) संयोजक स्नायु-संस्थान
(ग) स्वत:चालित स्नायु-संस्थान
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 3.
मस्तिष्क तथा सुषुम्ना, स्नायु संस्थान के किस भाग से सम्बन्धित है?
(क) केन्द्रीय स्नायु-संस्थान
(ख) स्वत:चालित स्नायु-संस्थान
(ग) संयोजक स्नायु-संस्थान
(घ) ये सभी
उत्तर
(क) केन्द्रीय स्नायु-संस्थान

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन मस्तिष्क का भाग है? (2014)
(क) सुषुम्ना।
(ख) सेतु ।
(ग) थायरॉइड
(घ) स्वत:संचालित स्नायु-संस्थान
उत्तर
(ख) सेतु ।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन मस्तिष्क का भाग नहीं है? (2010)
(क) सेतु
(ख) सुषुम्ना
(ग) थैलेमस
(घ) हाइपोथैलेमस
उत्तर
(ख) सुषुम्ना

प्रश्न 6.
दौड़ते समय शारीरिक सन्तुलन बनाये रखने के लिए मुख्य रूप से मस्तिष्क का कौन-सा भाग जिम्मेदार होता है?
(क) वृहद् मस्तिष्क
(ख) लघु मस्तिष्क
(ग) थैलेमस
(घ) सुषुम्ना शीर्ष
उत्तर
(घ) सुषुम्ना शीर्ष

प्रश्न 7.
स्मृति, कल्पना, चिन्तन आदि उच्च मानसिक क्रियाओं का नियन्त्रण करता है- (2018)
(क) सुषुम्ना शीर्ष
(ख) लघु मस्तिष्क
(ग) सेतु
(घ) वृहद् मस्तिष्क
उत्तर
(घ) वृहद् मस्तिष्क

प्रश्न 8.
थैलेमस
(क) सुषुम्ना का एक भाग है।
(ख) मस्तिष्क का एक भाग है।
(ग) नलिकाविहीन ग्रन्थियों का एक भाग है
(घ) आमाशय को एक भाग है।
उत्तर
(ख) मस्तिष्क का एक भाग है।

प्रश्न 9.
सुषुम्ना भाग है (2016)
(क) मस्तिष्क का
(ख) स्नायुकोश का ।
(ग) केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का
(घ) नलिकाविहीन ग्रन्थियों का
उत्तर
(ग) केन्द्रीय स्नायु-संस्थान का

प्रश्न 10.
ज्ञानवाही व क्रियावाही स्नायुओं के कितने जोड़े सुषुम्ना से होकर शरीर के विभिन्न भागों में जाते हैं?
(क) 10
(ख) 16
(ग) 24
(घ) 31
उत्तर
(घ) 31

प्रश्न 11.
प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन करता है (2010, 12)
(क) थैलेमस
(ख) सुषुम्ना
(ग) मस्तिष्क
(घ) सेतु ।
उत्तर
(ख) सुषुम्ना

प्रश्न 12.
सहज अथवा प्रतिक्षेप क्रियाओं की विशेषता है
(क) जन्मजात होती है तथा गर्भावस्था से ही प्रारम्भ हो जाती है।
(ख) सीखने की आवश्यकता नहीं होती।
(ग) इनका उद्देश्य व्यक्ति की रक्षा होता है।
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन नलिकाविहीन ग्रन्थि नहीं है।
(क) गल ग्रन्थि
(ख) पीयूष ग्रन्थि
(ग) लार ग्रन्थि
|
(घ) शीर्ष ग्रन्थि
उत्तर
(ग) लार ग्रन्थि|

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से कौन मास्टर ग्रन्थि कहलाती है? (2010)
(क) एड्रीनल
(ख) पीनियल
(ग) थायरॉइड
(घ) पीयूष
उत्तर
(घ) पीयूष

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