UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name भोजस्यौदार्यम्
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

अवतरणों का ससदर्भ अनुवाद

(1) ततः कदाचिद् …………………………………… पुनरुद्धमुचितः।।
अये लाजानुच्चैः ……………………………….. पुनरुद्धर्तुमुचितः। [2010, 15]

[ कौपीनावशेषो (कौपीन + अवशेषः) = जिसके पास एकमात्र लँगोटी ही बच रही है (अति दरिद्र)। हर्षाभूणि (हर्ष + अश्रूणि) = हर्ष के आँसू। लाजानुच्चैः (लाजान् + उच्चैः) = खीलें (लेने का) उच्च (शब्द)। सुपिहितवती = अच्छी तरह बन्द कर दिये। दीनवदना = दीन मुख वाली (अर्थात् जिसके मुख से ही दीनता प्रकट हो रही है वह)। क्षीणोपाये (क्षीण + उपाये) = हीन साधन वाले (धनहीन) पर। दृशावश्रुबहुले (दृशौ + अश्रुबहुले) = आँसुओं से भरी दृष्टि। यदकृत (यत् + अकृत) = जो की (कर डाली)। (अकृत’ कृ धातु के परस्मैपद के सामान्यभूत या लङ् के प्रथम पुरुष एकवचन का रूप है)। तदन्तःशल्यम् (तत् + अन्तःशल्यम्) = हृदय में गड़े उस काँटे को। उद्धर्तुम् उचितः = निकालने में समर्थ।].

सन्दर्भ-यह गद्यखण्ड हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘भोजस्यौदार्यम्’ पाठ से उधृत है।
[ विशेष—इस पाठ के सभी अवतरणों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
अनुवाद-इसके बाद तभी द्वारपाल ने आकर महाराज भोज से कहा, “देव, केवल लँगोटी पहने (अति दरिद्र) एक विद्वान् द्वार पर खड़े हैं।” (राजा बोले)-“प्रवेश कराओ। तब प्रविष्ट होकर उस कवि ने भोज को देखकर ‘आज मेरी दरिद्रता का नाश हो जाएगा यह मानकर (विश्वास कर) प्रसन्न हो खुशी के आँसू बहाये। राजा ने उसे देखकर कहा—“हे कवि, रोते क्यों हो ?” तब कवि बोला, “राजन् मेरे घर की दशा सुनिए’’
“(घर से बाहर) रास्ते पर (खील बेचने वाले के द्वारा) ऊँचे स्वर से ‘अरे, खीले लो’ की आवाज सुनकर मेरी दीन मुख वाली पत्नी ने बच्चों के कानों को सँभालकर बन्द कर दिया (जिससे कि वे सुनकर खोलें दिलवाने का हठ न करें) और मुझे दरिद्र पर जो आँसुओं से भरी दृष्टि डाली, वह मेरे हृदय में काँटे की तरह गड़ गयी, जिसे निकालने में आप ही समर्थ हैं।”

(2) राजा शिव, शिव ……………………………… भिक्षाटनम् ।।

[ उदीरयन् = कहते हुए। शिवसन्निधौ = शिवजी के समीप दानववैरिणा = भगवान विष्णु द्वारा। गिरिजयाप्यर्द्धम् (गिरिजया + अपि + अर्द्धम्) = पार्वती जी द्वारा भी आधा। शिवस्याहतम् (शिवस्य + आहृतम्) = शिवजी का ले लिया। देवेत्थम् (देव + इत्थम्) = हे देव! इस। पुरहराभावे (पुरहर + अभावे) = त्रिपुरारि शिव के अभाव में। समुन्मीलति = प्रकाशित करती है (सुशोभित करती है)। गङ्गासागरम् = गंगा सागर को। अम्बरं शशिकला = चन्द्रकला आकाश को। नागाधिपः = नागों के राजा (शेषनाग)। क्षपातलम् = पृथ्वीतल को (यहाँ, पृथ्वी के नीचे पाताल को)। सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत् (सर्वज्ञत्वम् + अधीश्वरत्वम् + अगमत्) = सर्वज्ञता और ईश्वरत्व
(शक्तिमत्ता, प्रभुता) प्राप्त हुई। भिक्षाटनम् = भिक्षा के लिए घूमते फिरना। ]

अनुवाद–राजा ने ‘शिव शिव’ कहते हुए (अर्थात् अत्यधिक करुणा प्रकट करते हुए) प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक लाख (रुपये) देकर कहा, “तुरन्त घर जाओ। तुम्हारी पत्नी दु:खी हो रही होगी।” दूसरे दिन (अन्य किसी दिन) भोज शिवजी को प्रणाम करने शिवालय गये। वहाँ किसी ब्राह्मण ने शंकर के समीप जाकर कहा-
भगवान् शंकर की आधी देह दानव वैरी अर्थात् भगवान् विष्णु ने ले ली, आधी पार्वती जी ने। (तब) हे देव ? इस पृथ्वीतल पर गंगा भगवान् शिव के देहरहित हो जाने पर सागर को सुशोभित करने लगीं (सागर को चली गयीं), चन्द्रकला आकाश को, शेषनाग पृथ्वीतल से नीचे (पाताल को), सर्वज्ञता और ईश्वरता (शक्तिमत्ता या प्रभुता) आपको प्राप्त हुई और भीख माँगते फिरना मुझे (इस प्रकार भगवान् शंकर के समस्त गुण विभिन्न स्थानों पर बँट गये)।

(3) राजा तुष्टः ……………………….. लक्ष्मीनुद्यमिनामिव ।।
विरलविरला: ………………………………………… लक्ष्मीनुद्यमिनामिव। [ 2013]

[ स्थूलास्ताराः = बड़े तारे। विरलविरलाः = थोड़े-थोड़े। कलाविव (कलो + इव) = जैसे कलियुग में। प्रसन्नमभून्नभः (प्रसन्नम् + अभूत् + नभः) = आकाश निर्मल हो गया। ध्वान्तम् – अन्धकार। चित्तात्सतामिव (चित्तात् + सताम् + इव) = जैसे सज्जनों के चित्त से। लक्ष्मीनुद्यमिनामिव (लक्ष्मीः + अनुद्यमिनाम् + इव) = उद्यमरहित (आलसी या पुरुषार्थहीन) लोगों की सम्पदा के समान।]

अनुवाद–राजा ने सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्येक अक्षरे पर एक-एक लाख (रुपये) दिये। अन्य किसी दिन राजा ने पास में स्थित सीता (नाम की किसी कवयित्री) से कहा, “देवि ! प्रभात का वर्णन करो।’ सीता ने कहा-(इस प्रभात बेला में) बड़े तारे कलियुग में सज्जनों के समान बहुत कम हो गये हैं, मुनियों के मन (या अन्त:करण) के सदृश आकाश सर्वत्र निर्मल (स्वच्छ) हो गया है, अन्धकार सज्जनों के चित्त से दुर्जनों (के कुकृत्यों की स्मृति) के समान दूर हो गया है और रात्रि उद्योगरहित (पुरुषार्थहीन) व्यक्ति की समृद्धि के समान शीघ्र समाप्त होती जा रही है (अर्थात् जो व्यक्ति धन कमाने में उद्योग न करके पहले से जमा धन ही व्यय किये जाता है, जिस प्रकार उसकी समृद्धि शीघ्रतापूर्वक घटती जाती है, उसी प्रकार रात भी शीघ्रता से समाप्त होती जा रही है)।

(4) राजा तस्यै लक्षं …………………………………………….. लक्षं दद।
अभूत् प्राची ………………………………………… द्रविणरहितानामिव गुणाः। [2011, 14]

[ प्राची = पूर्व दिशा। पिङ्गा = पीली। रसपतिरिव (रसपतिः + इव) = पारे के समान। गतच्छायश्चन्द्रः = चन्द्रमा कान्तिमान हो गया। ग्राम्यसदसि = आँवारों की सभा में। द्रविणरहितानाम् इव = धनहीनों के समान।]

अनुवाद-राजा ने उसे एक लाख (रुपये) देकर कालिदास से कहा, “मित्र तुम भी प्रभात का वर्णन करो।’ तब कालिदास ने कहा-
पूर्व दिशा उसी प्रकार पीली हो गयी है जैसे सुवर्ण के संयोग से पारा (पीला हो जाता है), चन्द्रमा उसी प्रकार कान्तिहीन ((फीका) दिख पड़ता है जैसे गॅवारों (मूर्खा) की सभा में विद्वान्। तारे क्षणभर में ((सहसा) उसी प्रकार क्षीण हो गये हैं जैसे उद्योगरहित राजागण की राज्यश्री (क्षीण हो जाती है) और दीपक उसी प्रकार शोभा नहीं पाते जैसे धनहीन व्यक्तियों के गुण। (निर्धन व्यक्ति चाहे कितना भी गुणी हो, समाज में उसके गुणों का उचित मूल्यांकन या आदर नहीं होता और धनी व्यक्ति गुणहीन हो, तो भी समाज उसे आदर देता है।)
राजा ने अति सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्येक अक्षर पर एक लाख (रुपये) दे दिये।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India (भारत की प्रमुख जनजातियाँ) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India (भारत की प्रमुख जनजातियाँ).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 7
Chapter Name Major Tribes of India (भारत की प्रमुख जनजातियाँ)
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India (भारत की प्रमुख जनजातियाँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
नागा जनजाति के निवास-क्षेत्र एवं अर्थव्यवस्था का वर्णन कीजिए। [2008]
या
नागा जनजाति के निवास-क्षेत्र और आर्थिक क्रियाकलाप का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए-नागा जनजाति।
उत्तर

नागा Nagas

यह जनजाति मुख्यत: भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित नागालैण्ड राज्य में निवास करती है। नागा राष्ट्र की उत्पत्ति कुछ विद्वानों के अनुसार संस्कृत में प्रचलित ‘नग’ (पर्वत) शब्द से हुई। डॉ० एल्विन के मतानुसार, नागा की उत्पत्ति नाक अथवा लोंग से हुई। ये इण्डो-मंगोलॉयड प्रजाति से सम्बन्ध रखते हैं।

निवास-क्षेत्र – नागा जाति का मुख्य निवास-क्षेत्र नागालैण्ड है। पटकोई पहाड़ियों, मणिपुर के पठारी भाग, असम व अरुणाचल प्रदेश में भी कुछ नागा वर्ग निवास करते हैं।
प्राकृतिक वातावरण – नागालैण्ड के पूर्व में पटकोई तथा दक्षिण में मणिपुर व अराकान पर्वतश्रेणियाँ स्थित हैं। यहाँ उच्च एवं विषम धरातल, उष्णार्द्र जलवायु तथा अधिक वर्षा (200 से 250 सेमी) पायी जाती है। यहाँ सघन वनों में साल, टीक, बाँस, ओक, पाइन तथा आम, जैकफूट (कटहल), केले, अंजीर एवं जंगली फल भी प्रचुरता से पाये जाते हैं। इन वनों में हाथी, भैंसे, हिरण, सूअर, रीछ, तेंदुए, चीते, बैल (बिसन), साँभर, भेड़िये, लकड़बग्घे आदि तथा वन्य जन्तु चूहे, साँप, गिलहरियाँ, गिद्ध आदि पाये जाते हैं।

शारीरिक लक्षण – नागाओं के शारीरिक लक्षणों में मंगोलॉयड तत्त्व की अधिकता है, किन्तु डॉ० हट्टन इन्हें ऑस्ट्रेलॉयड मानते हैं। इनकी त्वचा का वर्ण हल्के पीले से गहरा भूरा, बाल काले व सुंघराले तथा लहरदार, आँखें गहरी भूरी, गालों की हड्डियाँ उभरी हुईं, सिर मध्यम चौड़ा, नाक मध्यम चौड़ी, कद मध्यम व छोटा होता है। नागाओं के अनेक उपवर्ग पाये जाते हैं। नागाओं के पाँच बड़े उपवर्ग निम्नवत् हैं –

  1. उत्तरी क्षेत्र में रंगपण व कोन्याक नागा;
  2. पश्चिम में अंगामी, रेंगमा व सेमा;
  3. मध्य में आओ, ल्होटा, फीम, चेंग, सन्थम;
  4. दक्षिण में कचा व काबुई तथा
  5. पूर्वी क्षेत्र में टेंगरखुल व काल्पो-केंगु नागा।

निवास – अधिकांश नागा पाँच-सात झोंपड़े बनाकर ग्रामों में रहते हैं। एक ग्राम में एक कुटुम्ब ही निवास करता है। झोंपड़ियों का निर्माण करने के लिए यहाँ के वनों में उगने वाले बाँस एवं लकड़ी का प्रयोग अधिक किया जाता है। नागा लोग अपने गृहों का निर्माण ऊँचे भागों में करते हैं, जहाँ वर्षा के जल से रक्षा हो सके। ये लोग अपने घरों को हथियारों एवं नरमुण्डों से सजाते हैं। सामान्यतः एक गाँव में 200 से 250 मकान तक होते हैं। एक मकान में बहुधा दो छप्पर होते हैं।

जिस स्थान पर नागा लोग नृत्य करते हैं, वहाँ वृत्ताकार ईंटों का घेरा बना होता है। मारम नागा अपने मकानों के दरवाजे पश्चिम दिशा की ओर नहीं बनाते, क्योंकि पश्चिम दिशा से शीतल वायु प्रवाहित होती है। अंगामी नागाओं में प्रत्येक गाँव कई भागों में बँटा होता है। इनके आपसी झगड़ों को निपटाने वाले मुखिया को टेबो कहते हैं।

वेशभूषा – सामान्यत: नागा बहुत कम वस्त्र पहनते हैं। आओ नागा एक फीट चौड़ा कपड़ा कमर पर लपेटते हैं तथा स्त्रियाँ ऊँचे लहँगे पहनती हैं। पुरुष सिर पर रीछ या बकरी की खाल की टोपी, हार्नबिल के पंख व सींग तथा हाथी-दाँत व पीतल के भुजबन्ध पहनते हैं। स्त्रियाँ उत्सवों तथा पर्यों पर पीतल के गहने, कौड़ियों, मँगे व मोती की मालाएँ तथा आकर्षक रंग-बिरंगे वस्त्र पहनती हैं। नागाओं में शरीर गुदवाने (Tattooing) का अधिक प्रचलन है।

भोजन – चावले नागाओं का प्रिय भोजन है, परन्तु यह कम मात्रा में प्राप्त होता है। इसी कारण ये लोग शिकार एवं जंगलों से प्राप्त होने वाले कन्दमूल-फल आदि पर निर्भर करते हैं। नागा लोग बकरी, गाय, बैल, साँप, मेंढक आदि का मांस खाते हैं। चावल से निकाली गयी शराब का उपयोग विशेष उत्सवों पर करते हैं। भोजन के सम्बन्ध में इनके यहाँ कुछ निषेध भी हैं; जैसे–मारम नागाओं में सूअर का मांस खाना वर्जित है, जबकि तेंडुल नागा बकरी के मांस का सेवन नहीं करते। बिल्ली का मांस सभी के लिए वर्जित है। कपड़ा-बुनकर नागाओं में नर-पशु का मांस कुंआरी लड़कियों को नहीं परोसा जाता। नागा लोग बिना दूध की चाय का सेवन करते हैं।

आर्थिक विकास एवं अर्थव्यवस्था – भारत की सभी जनजातियों में नागाओं ने पर्याप्त आर्थिक विकास किया है। इनके मुख्य व्यवसाय आखेट तथा झूमिंग कृषि करना है। इनके आर्थिक व्यवसाय निम्नलिखित हैं –
1. आखेट – पहाड़ी एवं मैदानी नागाओं की शिकार करने की विधियाँ भिन्न-भिन्न हैं। जंगली पशुओं को खदेड़कर नदी-घाटियों में लाकर भालों से उन्हें मारना सभी नागाओं में प्रचलित है। शिकार करने के लिए ये तीरकमान, भालों, दाव आदि का प्रयोग करते हैं। विष लगे तीरों का प्रयोग करना मणिपुर के मारम नागाओं में प्रचलित है। आखेट के नियमों का पालन सभी नागा कठोरता से करते हैं।

2. मछली पकड़ना – मछली पकड़ने का कार्य पर्वतों के निचले भागों, नदियों एवं तालाबों के किनारे जालों, टोकरों एवं भालों की सहायता से किया जाता है।

3. कृषि-कार्य – मणिपुर एवं नागा पहाड़ियों में निवास करने वाली आदिम नागी जाति ने। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि-कार्य में काफी प्रगति कर ली है, परन्तु उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्रों में झूमिंग पद्धति से कृषि की जाती है, अर्थात् वनों को आग लगाकर साफ करे प्राप्त की गयी भूमि पर, दो या तीन वर्षों तक खेती की जाती है, फिर इसे परती छोड़ दिया जाता है। ये लोग बाग भी लगाते हैं। यहाँ पर प्रमुख फसलें धान, मॅडवा, कोट तथा मोटे अनाज हैं। चाय की झाड़ियाँ प्राकृतिक रूप से उगती हैं। कुछ भागों में कपास भी उगायी जाती है।

4. कुटीर उद्योग-धन्धे – उत्तरी-पूर्वी भारत की अधिकांश आदिम जातियों में छोटे करघों पर बुनाई की कला उन्नत अवस्था में है। यहाँ मुख्य रूप से मोटा कपड़ा बुना जाता है। नागाओं द्वारा मिट्टी के बर्तन भी तैयार किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त सभी नागा टोकरियाँ एवं चटाई बनाने का व्यवसाय करते हैं। लोहार द्वारा गाँव में ही शिकार के लिए औजार तथा कृषि के उपकरण बनाये जाते हैं। नागा लोग टोकरियाँ, चटाइयाँ, मछली, पशु, लकड़ी का कोयला आदि वस्तुओं का व्यापार करते हैं।

सामाजिक व्यवस्था – अधिकांश नागाओं में संयुक्त परिवार-प्रथा तथा प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था लागू है। इनके गाँव में एक मुखिया या पुरोहित होता है, जो धार्मिक संस्थाओं का संचालन करता है। कोन्यक नागाओं में सामन्तवादी व्यवस्था प्रचलित है, वहाँ मुखिया शासक के रूप में होता है जो वंशानुगत होता है। नागाओं में किसी व्यक्ति का विवाह अपने गोत्र में नहीं हो सकता।
नागा युवकों के सोने के लिए ‘मोरूग’ (कुमार गृह) बने होते हैं, जहाँ सभी कुंआरे युवक तथा युवतियाँ होते हैं। इनमें समगोत्री विवाह वर्जित है; अत: एक मोरूग में निवास करने वाला लड़का, दूसरे मोरूग में प्रवासित लड़कियों से शादी कर सकता है। मोरूंग में नाच-गाने एवं मनोरंजन की सभी सुविधाएँ होती हैं।

धार्मिक विश्वास – नागाओं का विश्वास है कि खेतों, पेड़ों, नदियों, पहाड़ियों, भूत-प्रेतों आदि विभिन्न रूपों में आत्माएँ पायी जाती हैं। आत्मा की शक्ति क्षीण होने पर बाढ़, दुर्भिक्ष, तूफान, बीमारियों आदि के प्राकृतिक प्रकोप होते हैं। फसलें नष्ट हो जाती हैं, स्त्रियों में बाँझपन होता है, पशु नष्ट हो जाते हैं, शिकार उपलब्ध नहीं होता। अतएव आत्मा की तुष्टि के लिए पशु बलि, मदिरा, मछली आदि की भेंट चढ़ाई जाती है। जादू-टोने में इनका बहुत विश्वास है। ईसाई मिशनरियों के सम्पर्क में आने से अधिकांश नागाओं ने ईसाई धर्म अपना लिया।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India

प्रश्न 2
भोटिया जनजाति के निवास-क्षेत्र, आर्थिक व्यवसाय एवं सामाजिक रीति-रिवाजों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

भोटिया Bhotia

क्रुक के अनुसार, ‘भोटिया’ शब्द की उत्पत्ति ‘भोट’ अथवा ‘भूट’ से हुई है। उत्तराखण्ड राज्य में तिब्बत व नेपाल की सीमा से संलग्न त्रिभुजाकार पर्वतीय क्षेत्र ‘भूट’ या ‘भोट’ नाम से विख्यात है। इसके अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले में उत्तर-पूर्व में स्थित आसकोट व दरमा तहसीलें, पिथौरागढ़ तथा चमोली जिले सम्मिलित हैं।

शारीरिक रचना – शारीरिक रचना की दृष्टि से भोटिया मंगोलॉयड प्रजाति से सम्बन्धित हैं। यह मध्यम व छोटे कद, सामान्य चपटी वे चौड़ी नाक, चौड़ा चेहरा, उभरी हुई गाल की हड्डियों, बादामी आकारयुक्त आँखें, शरीर पर कम बाल, त्वचा का प्रायः गोरा वर्ण आदि शारीरिक लक्षणों वाली जनजाति है।

प्राकृतिक वातावरण – भोट क्षेत्र समुद्रतल से 3,000 से 4,000 मीटर ऊँचा है। इस क्षेत्र में गंगा व शारदा की सहायक नदियाँ-कृष्णा, गंगा, धौली, गौरी, दरमा व काली प्रवाहित होती हैं। समतल भूमि केवल सँकरी घाटियों में उपलब्ध होती है। निचली घाटियों में उष्णार्द्र जलवायु पायी जाती है, किन्तु पर्वतीय ढालों पर ठण्डी जलवायु मिलती है।

अर्थव्यवस्था – प्राकृतिक साधनों के अभाव में भोटिया लोगों ने पशुचारण को आजीविका का मुख्य साधन बनाया है। सँकरी घाटियों के समतल भागों में बिखरे क्षेत्रों में तथा पर्वतीय ढालों पर सँकरी सोपानी पट्टियों में मोटे खाद्यान्नों व आलू की खेती होती है।

कृषि – पर्वतीय ढालों पर शीतकाल में हिमपात होने के कारण केवल ग्रीष्मकाल में 4 माह की अवधि में कृषि की जाती है। यहाँ गेहूँ, जौ, मोटे अनाज व आलू मुख्यत: उगाये जाते हैं। पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाये जाते हैं। यहाँ पर झूम प्रणाली की तरह ‘काटिल’ विधि से वनों को आग लगाकर भूमि को साफ करके बिना सिंचाई खेती कर ली जाती है। नदियों के किनारे सिंचाई द्वारा खेती की जाती है।

पशुचारण : मौसमी प्रवास – भोटिया लोगों की अर्थव्यवस्था पशुचारण पर आधारित है। इस क्षेत्र में 3,000 से 4,000 मीटर की ऊँचाई तक मुलायम घास आती है। यहाँ भोटिया लोग भेड़, बकरियाँ व ‘जीबू’ (गाय की भाँति पशु) चराते हैं। भेड़-बकरियों से मांस, दूध व ऊन की प्राप्ति होती है तथा जीबू बोझा ढोने के काम आता है। पशुचारण मौसमी-प्रवास पर आधारित है। ग्रीष्मकाल में निचली घाटियों में तापमान काफी ऊँचे हो जाते हैं तब उच्च ढालों पर पशुचारण किया जाता है। अक्टूबर (शीत ऋतु के आरम्भ) में पुन: ये निचले ढालों व घाटियों में उतर आते हैं।

कुटीर-शिल्प – पशुचारण से ऊन, खाल आदि पशु पदार्थ बड़ी मात्रा में प्राप्त होते हैं। भोटिया स्त्रियाँ सुन्दर डिजाइनदार कालीन, दुशाले, दरियाँ, कम्बल आदि बनाती हैं। इसके अतिरिक्त वे ऊनी मोजे, बनियान, दस्ताने, मफलर, टोपे, थैले आदि भी बुनती हैं। भोटिया स्त्रियाँ अत्यन्त मेहनती व कुशल कारीगर होती हैं। वे गेहूँ, जौ, मंडुए के भूसे से चटाइयाँ व टोकरे भी बनाती हैं।

व्यापार – भोटिया अपने तिब्बती पड़ोसियों से शताब्दियों से परस्पर लेन-देन का व्यापार करते रहे हैं। ये तिब्बत से ऊन लेकर उन्हें बदले में वस्त्र, नमक खाद्यान्न आदि देते हैं। किन्तु राजनीतिक कारणों से भारत व तिब्बत के मध्य सम्पर्क प्रायः ठप्प हो जाने के कारण अब भोटिया लोग ऊनी वस्त्र, सस्ते सौन्दर्य आभूषण, जड़ी-बूटियों का व्यापार मैदानी भागों में करते हैं तथा अपनी आवश्यकता की सामग्री नमक, शक्कर, तम्बाकू, ऐलुमिनियम के बर्तन आदि खरीदते हैं।

भोजन – भोटिया लोगों का मुख्य भोजन भुने हुए गेहूं का आटा (‘सत्तू’) है। मंडुआ व जौ भी इनका प्रिय खाद्यान्न है। भेड़-बकरी का मांस व दूध एवं विशेष अवसरों पर मदिरा का प्रयोग व्यापक रूप से होता है।

वेशभूषा – ठण्डी जलवायु के कारण पशुओं की खाल व ऊन से निर्मित वस्त्र अधिक प्रचलित हैं। पुरुष ऊनी पाजामा, कमीज व टोपी पहनते हैं। स्त्रियाँ पेटीकोट की तरह का ऊनी घाघरा तथा कन्धों से कमर तक लटकता हुआ ‘लवा’ नामक विशिष्ट वस्त्र पहनती हैं। शिक्षित वर्गों में बाह्य सम्पर्को व आर्थिक समृद्धि के कारण आधुनिक फैशन के वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया है। भोटिया स्त्रियाँ आभूषणप्रिय होती हैं। ये ताबीज, हँसुली, मँगे, पुरानी चौवन्नियों की माला, बेसर, नाथ, अँगूठियाँ आदि पहनती हैं। कलाई व ठोड़ी पर गुदना भी कराती हैं।

बस्तियाँ व मकान – मौसमी प्रवास पर आधारित पशुचारण अपनाने के कारण भोटिया लोगों के आवास अर्द्ध-स्थायी होते हैं। प्रायः प्रत्येक परिवार के दो घर होते हैं। ग्रीष्मकाल में ये उच्च ढालों पर एवं शीतकाल में घाटियों में निर्मित घरों में रहते हैं। मकान में दो या तीन कमरे होते हैं। ये पत्थर, मिट्टी, घास-फूस, स्लेट आदि से निर्मित होते हैं। इनकी छतें ढालू होती हैं। ये मकान प्रायः जल के निकट बनाये जाते हैं। मकानों में प्रायः खिड़की, दरवाजे नहीं होते।

समाज – भोटिया लोग हिन्दू रीति-रिवाजों को अपनाते हैं। इनमें एकपत्नी प्रथा (Monogamy) प्रचलित है। विवाह सम्बन्ध माता-पिता द्वारा तय किये जाते हैं। विवाह के अवसर पर नृत्य, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद, मदिरा आदि का आयोजन होता है। भोटिया लोग अन्धविश्वासी भूत-प्रेत के पूजक होते। हैं। घुमक्कड़ कठोर जीवन के बावजूद ये हँसमुख, साहसी, परिश्रमी, निष्कपट, सहनशील एवं धार्मिक प्रकृति के होते हैं, किन्तु शारीरिक स्वच्छता के प्रति लापरवाह होते हैं।

प्रश्न 3
“संथाल जनजाति के पर्यावरण, व्यवसाय तथा संस्कृति की भिन्नता उनके निवास-गृहों और रीति-रिवाजों से स्पष्ट हो जाती है।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
या
भारत में संथाल जनजाति के निवास-क्षेत्र (वितरण), अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को वर्णन कीजिए। [2010, 15]
उत्तर

संथाल अथवा गोंड
Santhal or Gond

संथाल भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। इनका प्रमुख क्षेत्र बिहार के छोटा नागपुर के पठार का पूर्वी भाग (संथाल परगना) है। यह पश्चिमी बंगाल के वीरभूमि, बांकुड़ा, माल्दा, मिदनापुर व चौबीस परगना, ओडिशा के मयूरभंज जिले तथा असम में भी पाये जाते हैं। ये लोग ऑस्ट्रिक वर्ग की मुण्डा भाषा बोलते हैं। बंगाल, असम व अन्य क्षेत्रों में सम्पर्को के कारण बिहारी, बंगाली व असमी भी बोलते हैं; अतः ये बहुभाषी हो गये हैं। गुहा के अनुसार, इनमें प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति तत्त्व की प्रधानता है। मध्यम कद, गहरा भूरा वर्ण, काली आँखें, काले सीधे घंघराले बाल, लम्बा सिर, मध्यम, चौड़ी व चपटी नाक, मोटे होंठ, शरीर पर कम बाल इनके प्रमुख शारीरिक लक्षण हैं।

प्राकृतिक वातावरण – संथाल परगना विषम तथा निम्न पठारी क्षेत्र है जिसे मौसमी नदी-नालों ने बहुत काट-छाँट दिया है। यहाँ शीतकाल में 30°C व ग्रीष्मकाल में 45°C तापमान पाये जाते हैं। वार्षिक वर्षा का औसत 150 सेमी रहता है। साल, महुआ, कदम, पीपल, कुसुम, पलास आदि के सघन वन पाये जाते हैं। इनमें सूअर, गीदड़, तेंदुए, हिरण, चीता आदि वन्य जन्तु पाये जाते हैं।
अर्थव्यवस्था– संथाल मूलतः कृषक हैं। ये वनों से आखेट एवं वस्तु-संग्रह, नदियों, पोखरों आदि से मछली पकड़ने का कार्य व मजदूरी भी करते हैं।

कृषि – कृषि इनका प्रमुख व्यवसाय है। ये वनों को साफ करके एक ही खेत को लगातार बोते हैं। धान, मोटे अनाज, दालें व कपास उगाते हैं। सिंचाई, उर्वरक, फसलों के हेर-फेर पर ध्यान न देने के कारण भूमि की उर्वरता नष्ट हो जाती है। मकान के पिछवाड़े खुली जगह में ये शाक-सब्जियाँ, फली, चारा आदि उगाते हैं।
वस्तु-संग्रह – वनों से महुआ फल, छालें, जड़, गाँठे, फल-फूल, कोंपले आदि एकत्रित करके संथाले लोग भोजन की पूर्ति करते हैं। मकान बनाने के लिए सामग्री भी एकत्रित करते हैं।

आखेट – जंगली सूअर का शिकार संथाल लोगों का प्रिय मनोरंजन तथा भोजन का अतिरिक्त साधन है। ये लोग जाल, फन्दे, तीर आदि के द्वारा तालाब, नदी व पोखर से मछली भी पकड़ते हैं।
पशुपालन – भोजन पूर्ति के लिए संथाल लोग गाय, बैल, सूअर, बकरी, मुर्गी व कबूतर पालते हैं।
मजदूरी – प्राकृतिक साधनों से पर्याप्त आजीविका प्राप्त न होने के कारण ये लोग असम के चाय के बागानों, बंगाल की जूट व कपड़ा-मिलों, बिहार व ओडिशा की खानों में श्रमिकों का भी कार्य करते हैं।

भोजन – उबला हुआ चावल व उसकी शराब, महुए का आटा व पशु का मांस संथाल लोगों का प्रिय भोजन है। मछली, वनों से एकत्रित फल, जड़े, गाँठे, फूल, कोंपल आदि तथा पक्षियों का मांस भी उनके भोजन में सम्मिलित है। ये तम्बाकू के बहुत शौकीन होते हैं।
वेशभूषा – संथाल पुरुष कमर से ऊपर प्रायः नग्न रहते हैं। कमरे के नीचे लँगोटीमात्र पहनते हैं। स्त्रियाँ धोती-ब्लाउज पहनती हैं। बालों के जूड़े में फूल व पक्षियों के पंख आदि लगाती हैं। पुरुष भी बालों में पक्षियों के पंख, फूल-पत्तियाँ, गाय की पूँछ के बाल आदि लगाते हैं। स्त्रियाँ चाँदी व पीतल के आभूषण, हँसली, कर्धनी, कड़े, झुमके, अँगूठी आदि पहनती हैं। स्त्रियाँ शरीर पर गुदना कराती हैं।

बस्तियाँ व मकान – प्राय: 20 या 25 परिवारों का एक गाँव होता है। किसी सड़क मार्ग के सहारे रेखीय प्रतिरूप में गाँव बसते हैं। झोंपड़ी बनाने में साल के शहतीर, बाँस, पत्तियों, मिट्टी व गोबर का प्रयोग होता है। इनमें खिड़कियाँ नहीं होतीं, केवल एक प्रवेशद्वार होता है। दीवारों को मिट्टी व गोबर से लीपकर चित्रकारी व माँडने बनाये जाते हैं। प्रत्येक गाँव में एक मांझी स्थान होता है, जो गाँव के संस्थापक का स्थान होता है।

समाज – संथाल परिवार पितृसत्तात्मक होते हैं। इनमें संयुक्त परिवार प्रणाली पायी जाती है। प्राय: एक पत्नी प्रथा प्रचलित है, किन्तु सन्तान न होने पर बहुपत्नी विवाह होते हैं। विधवा विवाह भी प्रचलित है। इनके समाज में माता-पिता द्वारा तय विवाह का अधिक प्रचलन है। इनमें विवाह की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें बपला, घर्दी जवाई, इतुत, नीरबोलोक, किरिन जवाई, संगा आदि प्रमुख हैं।

संथाल लोग अनेक देवी-देवताओं को पूजते हैं। ठाकुर इनका सबसे बड़ा देवता, सृष्टि, प्रकृति एवं जीवन का नियन्त्रक है। ये लोग वनों, पहाड़ों, नदियों आदि में देवताओं व आत्माओं का वास मानते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए बलि देते हैं व पूजा करते हैं। अशिक्षा व अज्ञान के कारण जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि में विश्वास करते हैं। रोगों व प्राकृतिक प्रकोपों को शान्त करने के लिए झाड़-फूक, जादू-टोना करते हैं। संथाल लोग अब हिन्दू देवी-देवताओं को भी मानते हैं। बाह्य, सोहरई तथा सकरात इनके प्रमुख त्योहार हैं।

संथाल समाज में ‘टोटम’ (Totem–प्राकृतिक प्रतीक) व्यवस्था प्रचलित है। प्रत्येक उपवर्ग का एक निश्चित प्रतीक होता है। समान प्रतीकों में परस्पर विवाह निषिद्ध होते हैं। संथालों का प्रादेशिक संगठन ‘परहा’ प्रणाली पर आधारित है, जिसमें गाँव के मुखिया द्वारा प्रशासन होता है। बड़े गाँवों में पंचायत व्यवस्था पायी जाती है।

प्रश्न 4
टोडा जनजाति के प्राकृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जनजीवन पर एक सारगर्भित निबन्ध लिखिए।
उत्तर

टोडा Todas

टोडा दक्षिणी भारत में नीलगिरी पर्वतीय क्षेत्र में निवास करने वाली एक प्रमुख जनजाति है। गोरी व सुन्दर मुखाकृति, सुगठित शरीर, पतले होंठ, लम्बी नाक, बड़े नेत्र, लम्बा कद, काले लहरदार बालों वाली यह जनजाति अन्य दक्षिण भारतीय वर्गों से अलग दिखाई देती है।
प्राकृतिक वातावरण – नीलगिरी के पूर्वी ढालों पर समुद्रतल से लगभग 2,000 मीटर ऊँची पहाड़ियों से घिरे 200 वर्ग किमी क्षेत्र में टोडा जनजाति का निवास पाया जाता है। यह क्षेत्र ‘टोडरनाद कहलाता है। इस वृष्टिछाया प्रदेश में वर्षा का औसत 100 सेमी से कम रहता है। उच्च प्रदेश होने के कारण तापमान कम रहते हैं। यहाँ घास प्रमुख वनस्पति है। वनों में हिरन, सांभर, तेंदुए, चीते, सूअर, जंगली कुत्ते आदि भी पाये जाते हैं।

अर्थव्यवस्था – टोडा जनजाति स्वयं को टोडरनाद प्रदेश का ‘भूस्वामी मानती है। ये कृषि व्यवसाय को नीचा समझते हैं। आखेट, वनोद्योग और मजदूरी भी इन्हें पसन्द नहीं है; अतः इन्होंने पशुपालन को अपनाया है। ये केवल भैंस पालते हैं। अपनी आवश्यकता के लिए पड़ोसी बदागा वर्ग से कृषि कराते हैं। आवश्यक शिल्प (बढ़ईगिरि व लोहारी) भी अन्य वर्गों से कराते हैं।

भोजन – टोडा लोग विशुद्ध शाकाहारी होते हैं। इनके भोजन में दुग्ध पदार्थों की प्रधानता है। उत्सव तथा विशेष पर्वो को छोड़कर ये कभी भी मांस-मछली का सेवन नहीं करते। विशेष पर्वो पर ये भैंसे की बलि देते हैं तथा उसको प्रसाद-रूप में ग्रहण करते हैं। बदागा जनजाति से प्राप्त चावल, कोराली, थिनई आदि खाद्यान्न, शहद, फल, शाक-सब्जियाँ इनका प्रमुख भोजन है।।

वेशभूषा – टोडा स्त्री व पुरुष ढीला लम्बा, बिना सिला चोगानुमा वस्त्र पहनते हैं जो कन्धों से पैर तक शरीर को ढकता है। नये सम्पर्को के कारण अब स्त्रियों में धोती-ब्लाउज एवं पुरुषों में कमीज, कुते का प्रचलन हो गया है। वृद्ध-पुरुष अब भी नंगे सिर एवं बिना सिले वस्त्र पहनते हैं। स्त्रियाँ कौड़ी व चाँदी की मालाएँ, नथ, झुमके आदि पहनती हैं। ठोड़ी, बॉह व शरीर पर गुदना कराती हैं।

बस्तियाँ व मकान – टोडा लोगों की बस्तियाँ ‘मण्ड’ कहलाती हैं। तमिल भाषा में ‘मण्ड’ का अर्थ ‘मध्य स्थिति है। ये बस्तियाँ सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों एवं चरागाहों के मध्य स्थापित की जाती हैं। प्राय: एक बस्ती में आठ या दस परिवारों के झोंपड़े होते हैं, जो ‘अर्स’ कहलाते हैं। ये ‘अर्स’ अर्द्ध-ढोलक के आकार के (Half barrel shaped) होते हैं। इन्हें बनाने में बाँस, खजूर व घास का प्रयोग होता है। मकानों में खिड़की व रोशनदान नहीं होते, छोटा-सा प्रवेशद्वार होता है। 6 x 3 मीटर आकार के कमरे के भीतर ही शयनकक्ष, रसोई व अग्नि स्थान की व्यवस्था होती है। निवास-कक्ष से पृथक् एक ‘दुग्ध मन्दिर बनाया जाता है। इस दुग्ध मन्दिर की देखभाल एक अविवाहित पुरुष करता है, जिसे पलोल कहते हैं।

सामाजिक जीवन – टोडा लोगों को सम्पूर्ण जीवन एवं दिनचर्या भैसपालने में व्यतीत होती है। समस्त कार्य पुरुषों द्वारा किये जाते हैं। टोडा परिवार पितृसत्तात्मक एवं बहुपति प्रणाली पर आधारित होता है। राजनीतिक व धार्मिक समारोहों, उत्सवों, पर्वो आदि में स्त्री का सक्रिय भाग लेना वर्जित होता है। भूमि एवं पशु-सम्पत्ति पर बड़े लड़के का अधिकार होता है। टोडा लोग आदिवासी धर्म का पालन करते हैं। इनके देवी-देवताओं में ‘तैकिर जी’ व ‘ओन’ प्रमुख हैं। नदियों, पहाड़ों व दुग्ध गृह के भी देवता होते हैं। प्राकृतिक प्रकोप, बीमारी, भैंसों के दूध सूखने को देवता का प्रकोप माना जाता है। पशुबलि देकर देवताओं को प्रसन्न किया जाता है।

प्रश्न 5
भारत की थारू प्रजाति के निवासस्थान, अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक जीवन का विवरण लिखिए।
उत्तर
सामान्य परिचय – उत्तर प्रदेश व बिहार में नेपाल की सीमा से संलग्न 25 किमी चौड़ी व 600 किमी लम्बी तराई व भाबर की सँकरी पट्टी में थारू जनजाति निवास करती है। इस क्षेत्र में नैनीताल जिले के किच्छा, खटिमा, रामपुरा, सितारगंज, नानक-भट्टा, बनवासा आदि क्षेत्र, पीलीभीत व खीरी जिलों से लेकर बिहार में मोतीहारी जिले तक के क्षेत्र सम्मिलित हैं।

‘थारू’ शब्द की उत्पत्ति काफी विवादास्पद है। कुछ विद्वानों के अनुसार, ये पहले ‘अथरु कहलाते थे, बाद में थारू कहलाये। थारू’ का अर्थ है ‘ठहरे हुए’–कठिन भौगोलिक वातावरण के बावजूद ये सदियों से इस क्षेत्र में विद्यमान हैं, कदाचित इसलिए थारू कहलाते हैं। एक अन्य मतानुसार, ‘थारू’ नामक मदिरा का सेवन करने तथा ‘थारू’ नामक अपहरण विवाह प्रथा अपनाने के कारण भी इन्हें ‘थारू’ कहा जाता है।
इनके शारीरिक लक्षण मंगोलॉयड प्रजाति से मिलते हैं। तिरछे नेत्र, उभरी गालों की हड्डियाँ, पीली त्वचा, शरीर वे चेहरे पर कम बाल, सीधे सपाट केश, मध्यम नाक व कद इनके प्रमुख लक्षण हैं। वास्तव में इनमें मंगोलॉयड व अन्य प्रजातियों का मिश्रण हो गया है।

प्राकृतिक वातावरण – हिमालय की तलहटी में स्थित इस क्षेत्र में पर्वतीय ढालों से उतरते हुए नदी-नालों तथा अधिक वर्षा के कारण यत्र-यत्र बाढ़ व दलदल उत्पन्न होती है। इसलिए मच्छरों का अधिक प्रकोप रहता है। प्राय: ये क्षेत्र मलेरियाग्रस्त रहते हैं। यहाँ ग्रीष्मकाल में 38°C से 44°C एवं शीतकाल में 12°C से 15°C ताप पाये जाते हैं। मानसूनी वर्षा का औसत 125 से 150 सेमी रहता है। यहाँ सघने मानसूनी वनों में हल्दू, ढाक, तनु, शीशम, सेमल, खैर, तेन्दू आदि की प्रधानता रहती है। नरकुल, बैंत, मुंज घास की भी प्रचुरता होती है। वनों में चीता, भेड़िया, तेन्दुआ, हिरण, सूअर, सियार, लकड़बग्घा आदि जन्तु पाये जाते हैं।

जलवायु – सामान्यतः इस क्षेत्र की जलवायु तथा प्राकृतिक वातावरण अस्वास्थ्यकर हैं, किन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् वनों को साफ कर कृषि-फार्म बना लिये गये। दलदलों को सुखाकर कृषि योग्य बनाया गया। मलेरिया उन्मूलन के भी प्रयास किये गये। वनों पर आधारित लघु उद्योगों की भी स्थापना की गयी।
अव्यदध – थारु लोग स्थायी कृषक हैं। यहाँ भूमि अपरदन की बहुत समस्या है, तथापि विभिन्न उपायों द्वारा थारूः लोग चावल, मक्का, गेहूँ, चना, दालें, आलू, प्याज, शाक-सब्जियाँ आदि उगाते हैं। कृषि-कार्य में स्त्रियाँ भी सक्रिय योग देती हैं।

सामाजिक व्यवस्था – थारुओं में स्त्रियों की प्रतिष्ठा पुरुषों से अधिक है तथा वे पर्याप्त स्वतन्त्र हैं। स्त्रियाँ अपने को रानी तथा पुरुषों को सेवक या सिपाही समझती हैं। विवाह तय करते समय लड़के एवं लड़की की सहमति आवश्यक होती है। विवाह-संस्कार चार चरणों में सम्पन्न होता है, जो क्रमश: अपना-पराया, बटकाही, भाँवर तथा चाल हैं।

थारुओं में विवाह पूर्व यौन स्वच्छन्दता पायी जाती है। पत्नी के विनिमय तथा तलाक प्रथा का प्रचलन है। धार्मिक दृष्टिकोण से थारू हिन्दुओं के अधिक निकट हैं। ये स्वयं को सूर्यवंशी राजपूतों के वंशज समझते हैं तथा सीता एवं राम की आदरपूर्वक पूजा करते हैं। ये जादू-टोनों में विश्वास करते हैं। इसी कारण इनमें व्यवस्थित धर्म नहीं मिलता। इनमें पशुओं की बलि देने की प्रथा भी पायी जाती है।

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प्रश्न 6
भील जनजाति के निवास-क्षेत्र, अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक व्यवस्था (रीति रिवाजों) का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए- भारत की भील जनजाति।
उत्तर

भील Bhils

भील एक प्राचीन ऐतिहासिक जनजाति है। परम्परा से आखेटक व तीरन्दाज जनजाति का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, किन्तु अब ये स्थायी कृषक के रूप में जाने जाते हैं। वास्तव में यह जनजाति विकास के विभिन्न चरणों में है। मध्य प्रदेश के भील घुमक्कड़ जरायमपेशा हैं। खान देश के भील स्थायी कृषक हैं। गुजरात के भील आखेटक व कृषक हैं। राजस्थान व महाराष्ट्र के भील घुमक्कड़, आखेटक, स्थायी कृषक अथवा श्रमिक हैं।

भील’ शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा के ‘विल्लवर’ (धनुर्धारी) शब्द से बतायी जाती है। विभिन्न मानवशास्त्रियों के अनुसार, यह प्राक्द्रविड़ या मेडिटरेनियन प्रजाति से सम्बद्ध है। अधिक मान्य मतानुसार, भील भारत के मूल निवासी हैं। औसत मध्यम कद, मध्यम चौड़ी नाक, भूरे से गहरा काला त्वचा वर्ण, काले बाल, मध्यम मोटे होंठ, शरीर पर कम बाल तथा सुगठित शरीर इस जनजाति के मुख्य शारीरिक लक्षण हैं।

निवास-क्षेत्र – भील लोगों का निवास-क्षेत्र मध्य प्रदेश के धार, झाबुआ, रतलाम व निमाड़ जिले; राजस्थान के डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर व चित्तौड़गढ़ जिले, गुजरात के पंचमहल, साबरकांठा, बनासकाठा व बड़ोदरा जिले हैं। भीलों का निवास-क्षेत्र ‘भीलवाड़ा’ के रूप में विख्यात है। इसके अतिरिक्त बिखरे हुए रूप में यह जनजाति महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व कर्नाटक के अन्य भागों में भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वातावरण – भीलों का निवास ऊँचे (1,000 मीटर) असमतल पठारी व पहाड़ी प्रदेश में है, जहाँ अनेक बरसाती नदी-नाले प्रवाहित होते हैं। यहाँ माही, ताप्ती व नर्मदा ने पठारों को काटकर गहरी घाटियाँ बनायी हैं। यहाँ वर्ष भर उच्च तापमान एवं 50 से 125 सेमी वार्षिक वर्षा के कारण महुआ, आम, सागौन, बाँस वे पलास के सघन वन उगते हैं। वनों में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी पाये जाते हैं।

अर्थव्यवस्था – परम्परागत रूप से भील घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करते हैं। आखेट उनकी आजीविका का प्रमुख साधन रहा है। वातावरण के अनुरूप अब भी अरावली, विन्ध्या तथा सतपुड़ा पहाड़ियों के भील निवासी आखेटक हैं। ये तीर-कमान, फन्दे, जाल, गोफन आदि द्वारा जंगली सूअर व पशु-पक्षियों का शिकार करते हैं। कई भील वर्ग अब स्थायी कृषक हो गये हैं। मैदानी क्षेत्रों में भूमि साफ करके चावल, मक्का, गेहूँ, मोटे अनाज, रतालू, कद्दू व शाक-सब्जियाँ बोते हैं। इस प्रकार की कृषि ‘दजिआ’ कहलाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में वनों को जलाकरे वर्षाकाल में खाद्यान्न, दालें व सब्जियाँ उगाई जाती हैं।

इस प्रकार की कृषि ‘चिमाता’ कहलाती है। तीन-चार फसलें प्राप्त करने के पश्चात् इस भूमि को परती छोड़ दिया जाता है। स्थायी कृषि के साथ-साथ भील लोग पशुपालन भी करने लगे हैं। ये गाय, बैल, भैंस, भेड़-बकरियाँ तथा मुर्गी पालते हैं। इनसे दूध, मांस व अण्डे प्राप्त करते हैं। कुछ भील वनोपज एकत्रण द्वारा भी आजीविका प्राप्त करते हैं। मानसूनी वनों से विविध प्रकार की व्यावसायिक महत्त्व की गौण उपजे तथा खाद्य-पदार्थ प्राप्त होते हैं।

बच्चे व स्त्रियाँ वनों से खाने योग्य जड़े, वृक्षों की पत्तियाँ, फल, कोंपलें, गाँठे, शहद, गोंद, छाले, जड़ी-बूटियाँ व अन्य पदार्थ एकत्रित करते हैं। तालाबों, पोखरों व नदियों से मछलियाँ भी प्राप्त की जाती हैं। आजीविका के इन विविध साधनों के अतिरिक्त कुछ भील खानों, कारखानों तथा सड़क निर्माण आदि कार्यों में श्रमिक के रूप में भी कार्य करते हैं। ये वनों में लकड़ी काटने का कार्य तथा शहरों में मजदूरी भी करते हैं।

भोजन – भील लोग मुख्यत: शाकाहारी हैं। गेहूँ, चावल, मक्का, कोदो, दाल, सब्जियाँ इनका प्रमुख भोजन हैं। विशेष पर्वो तथा उत्सवों के अवसरों पर अथवा शिकार प्राप्त होने पर ये बकरे या भैंस का मांस, मछली, अण्डा आदि भी खाते हैं। महुए की शराब, ताड़ी का रस, तम्बाकू व गाँजा इन्हें विशेष रुचिकर है। वनों से एकत्रित जंगली बेर, आम, महुआ फल व शहद भी इनके भोजन में सम्मिलित हैं।

वेशभूषा – उष्ण जलवायु एवं निर्धनता के कारण भील लोग अल्प व सूती वस्त्र पहनते हैं। भील पुरुष लँगोटी या घुटनों तक लम्बा वस्त्र, अंगोछा, कमीज व साफा पहनते हैं। स्त्रियाँ लहँगा, कुर्ती व चोली पहनती हैं। चाँदी की हँसुली, बालियाँ, छल्ले, पैजनियाँ इनके प्रिय आभूषण हैं। पुरुष भी कड़ा, बालियाँ व हँसुली पहनते हैं। मुंह व हाथ पर गुदना कराने का प्रचलन है।

बस्तियाँ व मकान – 20 से 200 झोंपड़ियों की भील बस्तियाँ किसी नियोजित क्रम में नहीं बसायी जातीं। गाँव की सीमा के बाहर ‘देवरे’ (पूजा-स्थल) होते हैं। मकान या आयताकार झोंपड़ियाँ ऊँचे चबूतरे पर निर्मित होती हैं। यह पत्थर, बाँस, मिट्टी, खपरैल, घास-फूस से निर्मित होती हैं। खपरैल या छप्पर पर कद्दू, तोरी या लौकी की बेलें चढ़ायी जाती हैं। झोंपड़ी के भीतर खाना पकाने के बर्तन, अन्न भण्डार, चटाइयाँ, टोकरी, डलिया आदि सामान की व्यवस्था होती है।

समाज – भील समाज अत्यन्त संगठित है। ये अपने विशिष्ट रीति-रिवाज अपनाते हैं। ये बहुत साहसी, निर्भीक, मेहनती, आदर-सत्कार करने वाले, सहृदय व ईमानदार होते हैं। घर का बुजुर्ग व्यक्ति ही महत्त्वपूर्ण निर्णय लेता है। प्रायः एक गाँव में एक ही वंश के लोग रहते हैं। प्रत्येक गाँव का निजी पण्डित, पुजारी, चरवाहा, कोतवाल आदि होता है। एक ही उपसमूह में अन्तर्विवाह निषिद्ध माना जाता है। प्रत्येक उपसमूह का एक निश्चित प्रतीक (Totem) होता है। इनमें बाल-विवाह जैसी कुरीति नहीं है। गन्धर्व विवाह, अपहरण विवाह तथा विधवा विवाह इनमें प्रचलित हैं। ‘गोल गाथेड़ो’ नामक विशिष्ट विवाह-प्रथा के अनुसार किसी युवक को वीरतापूर्ण साहसिक कार्य करके अपनी पसन्द की वधू छाँटने का अधिकार होता है।

ये अनेक हिन्दू देवी-देवताओं को पूजते हैं। जादू-टोने में भी बहुत विश्वास करते हैं। रोगों व कष्टों को दूर करने के लिए झाड़-फूक, टोना-टोटका आदि का सहारा लेते हैं। बलि भी चढ़ाते हैं। हिन्दुओं के समान अपने मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं।
भील एक विकासोन्मुख जनजाति है। भारत सरकार ने इनके विकास के लिए शिक्षा, शिल्प, रोजगार, अस्पताल आदि की सुविधाएँ प्रदान की हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
नागा जनजाति के निवास क्षेत्र एवं आर्थिक क्रियाओं का वर्णन कीजिए। [2008]
उत्तर
निवास क्षेत्र – नागा जनजाति का निवास क्षेत्र मुख्य रूप से नागालैण्ड है। इसके अतिरिक्त यह लोग असम, मेघालय, मिजोरम, राज्य के पठारी भागों तथा अरुणाचल प्रदेश में भी निवास करते हैं। नागालैण्ड राज्य में लगभग 80% नागा निवास करते हैं। इनका सम्बन्ध इण्डो-मंगोलॉयड प्रजाति से है।

आर्थिक क्रियाएँ – भारत की अन्य आदिम जातियों की अपेक्षा नागाओं ने आर्थिक क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा सरकार ने इन लोगों के आर्थिक विकास के लिए सामुदायिक विकास खण्डों की स्थापना की है। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएँ कृषि उत्पादन एवं उद्योग-धन्धों के विकास पर अधिक ध्यान दिया गया है। नागा लोगों की आय के प्रमुख स्रोत-जंगली पशुओं का आखेट, मछली पकड़ना, कृषि करना तथा कुटीर उद्योग; जैसे मोटा कपड़ा, चटाई तथा टोकरियाँ आदि बनाने का कार्य है।

प्रश्न 2
भारत में थारू के वास्य क्षेत्र का वर्णन कीजिए। [2008]
उत्तर

भारत में थारू के वास्य क्षेत्र

थारू जनजाति के लोग भारत के उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्यों के तराई और भाबर क्षेत्रों में निवास करते हैं। यह क्षेत्र एक संकरी पट्टी के रूप में शिवालिक हिमालय के नीले भाग में पूर्व से पश्चिम दिशी तक फैला है। पश्चिम में इस क्षेत्र का विस्तार नैनीताल जिले के दक्षिण-पूर्व से लेकर पूर्व में गोरखपुर और नेपाल की सीमा के सहारे-सहारे लगभग 600 किमी लम्बी और 25 किमी चौड़ाई में है, थारु जनजाति के अधिकांश लोग उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ भाग में रहते हैं जिसमें ऊधमसिंहनगर जिले के किच्छा, खटीमा, सितारगंज व बनबसा क्षेत्र सम्मिलित हैं। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, खीरी, गोरखपुर, गोण्डा एवं बस्ती जिलों से लेकर बिहार में मोतीहारी जिले के उत्तरी भाग तक थारू जनजाति का निवास क्षेत्र है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में कौन-कौन-सी जनजातियाँ निवास करती हैं?
उत्तर
भारत में नागा, संथाले, भील, भोटिया, थारू, टोडा आदि प्रमुख जनजातियाँ निवास करती हैं।

प्रश्न 2
भील शब्द से क्या आशय है?
उत्तर
भील शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा के ‘विल्लावर’ शब्द से हुई है, जिसका आशय धनुष-बाण धारण करने वाला, आखेटक या धनुर्धारी होता है।

प्रश्न 3
नागाओं के प्रमुख देवता कौन हैं?
उत्तर
नागाओं के प्रमुख देवता लकीजुंगवा तथा गवांग हैं। अनेक नागा बौद्ध एवं ईसाई धर्म भी मानने लगे हैं।

प्रश्न 4
संथालों का निवास-क्षेत्र कौन-सा है?
उत्तर
संथालों का निवास-क्षेत्र झारखण्ड राज्य का संथाल परगना जनपद है।

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प्रश्न 5
संथालों की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर
संथालों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें बहुपत्नी अथवा बहुपति विवाह प्रथा नहीं है।

प्रश्न 6
संथालों द्वारा मनाये जाने वाले त्योहार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
संथालों द्वारा मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहार हैं- बाह्य, सोहरई तथा सकरात।

प्रश्न 7
भारत में नागा जनजाति का मुख्य निवास-क्षेत्र कहाँ है तथा इनका मुख्य व्यवसाय क्या है?
उत्तर
भारत में नागा जनजाति का मुख्य निवास-क्षेत्र नागालैण्ड है; पटकोई पहाड़ियों, मणिपुर के पठारी भाग, असम व अरुणाचल प्रदेश में भी कुछ नागा वर्ग निवास करते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय आखेट तथा झूमिंग कृषि करना है।

प्रश्न 8
थारू समाज में स्त्रियों की दशा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर
थारुओं में स्त्रियों की प्रतिष्ठा पुरुषों से अधिक है तथा वे पर्याप्त रूप से स्वतन्त्र हैं। स्त्रियाँ अपने को रानी तथा पुरुषों को सिपाही या सेवक समझती हैं।

प्रश्न 9
भारत की सबसे बड़ी जनजाति के नाम का उल्लेख कीजिए। इसका निवास-क्षेत्र भी बताइए।
उत्तर
संथाल भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। इसकी जनसंख्या 25 लाख से अधिक है। इसका प्रमुख निवास-क्षेत्र झारखण्ड के छोटा नागपुर के पठार को पूर्वी भाग, सन्थाल परगना है।

प्रश्न 10
भील जनजाति भारत के किन क्षेत्रों में निवास करती है?
उत्तर
भील जनजाति के लोगों के निवास-क्षेत्र मध्य प्रदेश के धार, झाबुआ, रतलाम व निमाड़ जिले; राजस्थान के डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर व चित्तौड़गढ़ जिले; गुजरात के पंचमहल, साबरकाठा, बनासकांठा व बड़ोदरा जिले हैं।

प्रश्न 11
उत्तर भारत की किन्हीं दो जनजातियों के नाम लिखिए। [2007, 08, 11]
उत्तर

  1. नागा जनजाति (नागालैण्ड)।
  2. भील जनजाति (मध्य प्रदेश, राजस्थान)।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 किस जनजाति के लोग घर को ‘कू’ के नाम से पुकारते हैं?
(क) संथाल
(ख) नागा
(ग) भील
(घ) थारू
उत्तर
(ग) भील।

प्रश्न 2
किस जनजाति के लोग प्रकृतिपूजक होते हैं और मारन बुरू नामक देवता की पूजा करते हैं?
(क) थारू
(ख) संथाल
(ग) नागा
(घ) भील
उत्तर
(ख) संथाले।

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प्रश्न 3
निम्नांकित में से कौन गोंड जनजाति का निवास-क्षेत्र है? [2010, 13, 15]
(क) झारखण्ड
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) ओडिशा
(घ) बिहार
उत्तर
(ख) छत्तीसगढ़

प्रश्न 4
‘अर्स किस जनजाति के निवास-क्षेत्र हैं?
(क) बढू
(ग) टोडा
(ग) टोडा
(घ) नागा
उत्तर
(ग) टोडा।

प्रश्न 5
वह जनजाति जो मौसमी स्थानान्तरण करती है –
(क) नागा
(ख) संथाल
(ग) भील
(घ) भोटिया
उत्तर
(घ) भोटिया।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से थारू जनजाति किस देश में निवास करती है?
(क) दक्षिण अफ्रीका
(ख) भारत
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) दक्षिण अमेरिका
उत्तर
(ख) भारत।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से थारू जनजाति कहाँ निवास करती है? [2009, 10, 11, 12, 14, 15, 16]
(क) थार मरुस्थल में
(ख) नीलगिरि की पहाड़ियों में
(ग) तराई प्रदेश में
(घ) सुन्दरवन में
उत्तर
(ग) तराई प्रदेश में।

प्रश्न 8
निम्नांकित में से किसमें टोडा जनजाति का निवास है? [2012, 16]
(क) आन्ध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर
(घ) तमिलनाडु।

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से संथाल जनजाति कहाँ निवास करती है? [2008, 10, 11, 14]
(क) ब्राजील
(ख) ऑस्ट्रेलिया
(ग) भारत
(घ) दक्षिण अफ्रीका
उत्तर
(ग) भारत।

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प्रश्न 10
भोटिया जनजाति निम्नलिखित में से कहाँ निवास करती है? [2010, 11, 13, 14, 15]
(क) छत्तीसगढ़
(ख) बिहार
(ग) उत्तराखण्ड
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(ग) उत्तराखण्ड।

प्रश्न 11
किस जनजाति के प्रत्येक उप-समूह एक या एक निश्चित प्रतीक (Totem) होता है?
(क) भोटिया
(ख) भील
(ग) टोडा
(घ) संथाल
उत्तर
(ख) भील।

प्रश्न 12
किस जनजाति के लोग विशुद्ध शाकाहारी होते हैं तथा इनके भोजन में दुग्ध पदार्थों की प्रधानता होती है?
(क) भोटिया
(ख) संथाल
(ग) टोडा
(घ) भील
उत्तर
(ग) टोडा।

प्रश्न 13
किस जनजाति के लोगों का मुख्य भोजन भुने हुए गेहूँ (जौ) का आटा (सत्) है?
(क) एस्किमो
(ख) भोटिया
(ग) टोडा
(घ) भील
उत्तर
(ख) भोटिया।

प्रश्न 14
निम्नलिखित में से किस प्रदेश में भील जनजाति का निवास-क्षेत्र है? [2016]
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) बिहार
(ग) राजस्थान
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(घ) मध्य प्रदेश।

प्रश्न 15
निम्नलिखित में से कौन-सा थारू जनजाति का प्रमुख निवास क्षेत्र है ? [2009]
(क) मेघालय
(ख) उत्तरी बंगाल
(ग) उत्तर प्रदेश व बिहार
(घ) नागालैण्ड
उत्तर
(ग) उत्तर प्रदेश व बिहार।

प्रश्न 16
निम्नलिखित में से कौन भारत की जनजाति है? [2016]
(क) एस्किमो
(ख) पिग्मी
(ग) बद्दू
(घ) टोडा
उत्तर
(घ) टोडा।

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प्रश्न 17
संथाल जनजाति निवास करती है – [2010, 11, 13, 14]
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) असम में
(ग) झारखण्ड में
(घ) आन्ध्र प्रदेश में
उत्तर
(ग) झारखण्ड में।

प्रश्न 18
टोडा जनजाति निवास करती है – [2012, 16]
(क) अरावली पहाड़ियों में
(ख) कुमाऊँ पहाड़ियों में
(ग) नीलगिरि पहाड़ियों में
(घ) विन्ध्य पहाड़ियों में
उत्तर
(ग) नीलगिरि पहाड़ियों में।

प्रश्न 19
निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में गोंड जनजाति के लोग पाए जाते हैं? [2013]
(क) बिहार
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) नागालैण्ड
(घ) पश्चिम बंगाल
उत्तर
(ख) छत्तीसगढ़।

प्रश्न 20
भोटिया जनजाति निवास करती है – [2013]
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) बिहार में
(ग) उत्तराखण्ड में
(घ) हिमाचल प्रदेश में
उत्तर
(ग) उत्तराखण्ड में।

प्रश्न 21
खासी जनजाति निवास करती है – [2013]
(क) छत्तीसगढ़ में
(ख) झारखण्ड में
(ग) मणिपुर में
(घ) मेघालय में
उत्तर
(घ) मेघालय में।

प्रश्न 22
निम्नलिखित में से कौन-सी जनजाति छोटा नागपुर पठार पर पायी जाती है? [2014]
(क) भोटिया
(ख) संथाल
(ग) टोडा
(घ) भील
उत्तर
(ख) संथाल

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name काव्य-साहित्यका विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

प्रायः परीक्षा में अतिलघु उत्तरीय अथवा बहुविकल्पीय प्रश्नों के रूप में प्रमुख काव्यकृतियों के नाम देकर उनके रचनाकार कवि का नाम पूछा जाता है अथवा किसी कवि का नाम देकर उसकी रचना का नाम पूछा जाता है। निम्नांकित तालिका विद्यार्थियों के लिए दोनों रूपों में सहायक सिद्ध होगी।
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान (हरिकृष्ण प्रेमी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान (हरिकृष्ण प्रेमी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name आन का मान (हरिकृष्ण प्रेमी)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान (हरिकृष्ण प्रेमी)

प्रश्न 1
‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु (सारांश अथवा कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2010, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘आन का मान’ नाटक का कथासार अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
या
‘आन का मान’ नाटक के मार्मिक स्थलों का वर्णन कीजिए। [2009]
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रथम अंक की कथा (सारांश) संक्षेप में लिखिए। [2010, 11, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘आन का मान’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए। (2015)
या
‘आन का मान’ नाटक के तीसरे अंक की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। [2015, 16, 18]
उत्तर

‘आन का मान’ नाटक का सारांश

प्रथम अंक-श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक का आरम्भ रेगिस्तान के एक मैदान से हुआ है। यह काल भारत में औरंगजेब की सत्ता का है। इस समय जोधपुर में महाराजा जसवन्त सिंह का राज्य था। वीर दुर्गादास उन्हीं के कर्तव्यनिष्ठ सेवक हैं जो कि महाराजा की मृत्यु के उपरान्त उनके अवयस्क पुत्र अजीत के संरक्षक बनते हैं। नाटक का कथानक दुर्गादास के चारों ओर घूमता है। अकबर द्वितीय के पुत्र बुलन्द अख्तर और पुत्री सफीयतुन्निसा हैं। दोनों भाई-बहन औरंगजेब की राष्ट्र-विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं। उनकी बातों से यह भी आभास होता है कि अकबर द्वितीय ने औरंगजेब के अत्याचारों के विरोध में वीर दुर्गादास से मित्रता कर ली थी। दुर्गादास ने अकबर द्वितीय को बादशाह घोषित कर दिया था, परन्तु औरंगजेब की एक चालवश उसे ईरान भाग जाना पड़ा।

सफीयत और बुलन्द दुर्गादास के पास ही रह जाते हैं। अजीतसिंह युवक होकर जोधपुर का शासन सँभाल लेता है। अजीतसिंह सफीयत से प्रेम करता है। सफीयत जानती है कि हिन्दू युवक और मुसलमान युवती का विवाह कठिन होगा। दुर्गादास भी अजीत को राजपूत धर्म की मर्यादा का ध्यान दिलाता है-”मान रखना राजपूत की आन होती है और इस आन का मान रखना उसके जीवन का व्रत होता

द्वितीय अंक-इस नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थलों से सम्बन्धित कथा दूसरे अंक की कथा है। कथा का प्रारम्भ भीमनदी के तट पर स्थित ब्रह्मपुरी से प्रारम्भ होता है। औरंगजेब ने इस नगरी का नाम ‘इस्लामपुरी’ रख दिया है। औरंगजेब की भी दो पुत्रियाँ हैं-मेहरुन्निसा तथा जीनतुन्निसा। मेहरुन्निसा औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों का विरोध करती है। जीनत पिता की समर्थक है। औरंगजेब अपनी पुत्रियों की बात सुनता है तथा मेहरुन्निसा द्वारा बताये गये अत्याचारों के लिए पश्चात्ताप करता है। औरंगजेब अपने पुत्रों को जनता के साथ उदार व्यवहार करने के लिए कहता है। औरंगजेब अपने अन्तिम समय में अपनी वसीयत करता है कि उसका अन्तिम संस्कार सादगी से किया जाए। इस समय ईश्वरदास; दुर्गादास को बन्दी बनाकर औरंगजेब के पास लाता है। औरंगजेब अपने पौत्र-पौत्री बुलन्द तथा सफीयत को पाने के लिए दुर्गादास से सौदेबाजी करता है, परन्तु दुर्गादास इसके लिए तैयार नहीं होते।

तृतीय अंक-नाटक के तीसरे और अन्तिम अंक में अजीतसिंह पुनः सफीयत से जीवन-साथी बनने का निवेदन करता है, परन्तु सफीयत अजीत को लोकहित के लिए स्वहित का त्याग करने का परामर्श देती है। वह कहती है-”महाराज ! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।” बुलन्द तथा दुर्गादास के विरोध की अजीत परवाह नहीं करता तथा सफीयत को अपने साथ चलने के लिए कहता है। दुर्गादास पालकी में सफीयत को ले जाना चाहते हैं। अजीत नाराज होकर पालकी को रोककर कहते हैं-“दुर्गादास जी ! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहूँगा” दुर्गादास मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम करके चले जाते हैं। नाटक की कथा यहीं समाप्त हो जाती है।

उपर्युक्त कथा, कथा-संघटन की दृष्टि से सुगठित और व्यवस्थित है। ऐतिहासिक घटना को कल्पना के सतरंगी रंगों में रँगकर रोचक और प्रभावपूर्ण बना दिया गया है। प्रथम अंक में कथा की प्रस्तावना या आरम्भ है। द्वितीय अंक में अजीत व दुर्गादास के टकराव के समय विकास की अवस्था के उपरान्त कथा अपनी चरमसीमा पर आ जाती है। राज्य-निष्कासन के आदेश और सफीयत के पालकी में बैठने के साथ ही कथा को उतार आ जाता है। सफीयत की विदा के साथ ही कथानक समाप्त हो जाता है। राज्य-निष्कासन को हँसकर स्वीकार कर ‘आन का मान रखने वाले दुर्गादास से सम्बन्धित यह कथा अत्यन्त संक्षिप्त है।

प्रश्न 2
‘आन का मान’ के आधार पर वीर दुर्गादास का चरित्र-चित्रण कीजिए अथवा चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) को चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
“दुर्गादास का चरित्र ‘आन का मान’ नाटक को प्राणतत्त्व है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। [2009]
या
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर उस प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो। (2015)
उत्तर
दुर्गादास का चरित्र-चित्रण श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक के नायक वीर दुर्गादास राठौर हैं। दुर्गादास उच्च मानवीय गुणों से युक्त वीर पुरुष हैं। नाटक का सम्पूर्ण घटनाक्रम इनके चारों ओर ही घूमता है। इनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) मानवतावादी दृष्टिकोण-दुर्गादास एक सच्चा व उच्च श्रेणी का मानव है। वह ऐसे किसी भी सिद्धान्त को आदर्श नहीं मानता, जो मानवता के विरुद्ध हो। औरंगजेब के बेटे को मुसलमान होते हुए भी वह अपना मित्र बनाता है। प्राणों की बाजी लगाकर वह अकबर द्वितीय की बेटी सफीयत की रक्षा करता है। दुर्गादास कहता है-”मानवता का मानव के साथ जो नाता है, वह स्वार्थ का नाता नहीं, शाहजादा हुजूर!”
(2) हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति का समन्वयवादी–दुर्गादास धार्मिक भेदभाव को नहीं मानता है। वह हिन्दू और मुस्लिम एकता का प्रबल पोषक है। वह इन संस्कृतियों की पारस्परिक भेदभाव की दीवार को तोड़ना चाहता है। उसकी दृष्टि में मानवता ही श्रेष्ठ धर्म है। वह कहता है-“न केवल मुसलमान ही भारत हैं, और न केवल हिन्दू ही। दोनों को यहीं जीना है, यहीं मरना है।”
(3) आन का पक्का राजपूत–दुर्गादास अपने वचनों के प्रति निष्ठावान है। उसका मत है-”मान रखना राजपूत की आन होती है और इस आन का मान रखना उसके जीवन का व्रत होता है।”
(4) सत्य, न्याय व देश का प्रेमी-दुर्गादास सत्य का प्रतीक है, न्याय में विश्वास रखता है तथा सच्चा देशभक्त है। वह कहता है-”राजपूतों की तलवार सदा सत्य, न्याय, स्वाभिमान और स्वदेश की रक्षक होकर रही है।”
(5) स्वामिभक्त और निश्छल-वह स्वामिभक्त और निश्छल है। अपने गुणों को दाँव पर लगाकर वह कुँवर अजीतसिंह की रक्षा करता है तथा उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देता है। कासिम उसके विषय में कहता है-“संसार भर में हाथ में दीपक लेकर घूम आएँगे, तब भी दुर्गादास जैसा शुभचिन्तक, वीर, स्वामिभक्त और निश्छल व्यक्ति न पाएँगे।”
(6) कर्त्तव्यपरायण–दुर्गादास कर्तव्यपरायण व्यक्ति है। वह सदैव अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देता है। औरंगजेब भी वीर दुर्गादास के कर्तव्यपरायण होने की बात ईश्वरदास से कहता है।
(7) सच्चा मित्र-वीरवर दुर्गादास एक सच्चा मित्र है। औरंगजेब का पुत्र अकबर द्वितीय उसका मित्र है। वह मित्रता का ईमानदारी व सच्चाई के साथ पालन करता है। अकबर द्वितीय के सभी साथी उसका साथ छोड़ देते हैं, परन्तु दुर्गादास सच्चे मित्र की तरह उसका साथ देता है। वह अकबर द्वितीय को औरंगजेब के हाथों से बचाने के लिए उसे ईरान भेज देता है।
(8) राष्ट्रीयता-दुर्गादास के हृदय में राष्ट्रीयता कूट-कूटकर भरी है। वह भारत को न मुसलमानों का देश मानता है, न हिन्दुओं का। वह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटकर नये समाज का निर्माण करना चाहता है।
(9) सुशासन का समर्थक–दुर्गादास सदैव अच्छे शासन एवं सुव्यवस्था का समर्थक रहा है। वह कहता है-”सुशासन को प्रजा; राजा का प्यार और भगवान का वरदान मानती है।”

इस प्रकार वीर दुर्गादास उच्च आदर्शों वाला मानव है। वह स्वामिभक्त, कर्तव्यपरायण, मानवता में विश्वास रखने वाला, सच्चा मित्र तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक है। उसके ये सभी मानवीय गुण उसके उदात्त चरित्र के प्रमाण हैं। वही इस नाटक का नायक अर्थात् प्रमुख पात्र है।

प्रश्न 3
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 14, 15, 16, 17]
या
‘आन का मान’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2013)
उत्तर
औरंगजेब का चरित्र-चित्रण श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक में औरंगजेब; वीर दुर्गादास का प्रतिद्वन्द्वी है तथा उसे खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह पूरे भारत पर एकछत्र राज्य की कामना करने वाला मुगल सम्राट् है। वह जीवन भर हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के अस्तित्व को खत्म करने के लिए कुचक्र रचता रहता है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कट्टर धार्मिक और संकीर्ण हृदय व्यक्ति—औरंगजेब संकीर्ण हृदय वाला कट्टर सुन्नीमुसलमान है। इस्लाम के आगे सभी धर्म उसकी दृष्टि में हेय हैं। मानव-मात्र के लिए वह इस्लाम को ही श्रेयस्कर मानता है। वह जोधपुर के कुमार अजीतसिंह को भी मुसलमान बनाना चाहता है।
(2) नृशंस और निर्दयी-औरंगजेब सत्ता-प्राप्ति के लिए सब-कुछ करने को तैयार हो जाता है। वह अपने भाई दारा और शुजा की हत्या तक कर देता है तथा अपने पिता शाहजहाँ, पुत्र कामबख्श और पुत्री जेबुन्निसा को बन्दी बना लेता है। उसे किसी पर भी दया नहीं आती।
(3) सादा जीवन-औरंगजेब विलासिता से दूर रहकर सादा जीवन व्यतीत करने को पक्षपाती है। वह अपना निजी व्यय सरकारी खजाने से नहीं, वरन् टोपी सिलकर और कुरान की आयतें लिखकर उनकी बिक्री से प्राप्त आय से चलाता है।
(4) आत्मग्लानि से युक्त-औरंगजेब को अपने द्वारा किये गये नृशंस कार्यों के प्रति वृद्धावस्था में ग्लानि होती है। उन्हें सोचकर वह दु:खी होता है। अपनी वसीयत में वह अपने पुत्रों से स्वयं को क्षमा करने की बात लिखता है तथा पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर वह अपने पुत्र अकबर द्वितीय को छाती से लगाने के लिए आतुर हो जाता है। मेहरुन्निसा से वह कहता है कि “औरंगजेब बातों के जहर से मरने वाला नहीं है।” मेहर के दण्ड देने की बात सुनकर वह कहता है—“हाथ थक गये हैं बेटी! सिर काटते-काटते।”
(5) स्नेहसिक्त पिता-औरंगजेब जवानी में अपने पिता और सन्तान दोनों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करता है, किन्तु बुढ़ापे में आकर उसके हृदय में वात्सल्य का संचार होता है। वह अपने पुत्र अकबर द्वितीय, जो ईरान चला गया है, को हृदय से लगाने के लिए बेचैन है तथा अन्य स्वजनों से मिलने के लिए भी व्याकुल है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि औरंगजेब एक कठोर शासक के रूप में चित्रित किया गया है। अन्तिम समय में उसके चरित्र में परिवर्तन आता है और वह दयालु एवं स्नेही व्यक्ति के रूप में बदल जाता है।

प्रश्न 4
सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2013, 14] ‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की नायिका के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। [2013,17]
या
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर स्त्री पात्र ‘सफीयतुन्निसा’ का चरित्रांकन कीजिए। [2015]
उत्तर
सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण | सफीयतुन्निसा; श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक की प्रमुख नारी-पात्र है। वह औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय की पुत्री है। अकबर द्वितीय अपने पिता की राष्ट्रविरोधी नीतियों का विरोधी है। दुर्गादास राठौर द्वारा उसे ही सम्राट् घोषित कर दिया जाता है, परन्तु औरंगजेब की एक चाल से उसे ईरान भागना पड़ता है। इस स्थिति में दुर्गादास ही उसके पुत्र बुलन्द अख्तर और सफीयतुन्निसा का पालन-पोषण करता है। सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है

(1) अत्यन्त रूपवती–सफीयतुन्निसी की आयु 17 वर्ष है और वह अत्यन्त आकर्षक रूप वाली है। नाटक के सभी पात्र उसके रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध हैं।
(2) वाक्-पटु-सफीयतुन्निसा विभिन्न परिस्थितियों में अपनी वाक्-पटुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन करती है। उसके व्यंग्यपूर्ण कथन तर्क पर आधारित और मर्मभेदी हैं।
(3) संगीत में रुचि-वह एक उच्चकोटि की संगीत-साधिका है। उसका मधुर स्वर सहज ही दूसरों का हृदय जीत लेता है।
(4) त्याग एवं देशप्रेम की भावना-उसमें त्याग एवं बलिदान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। राष्ट्रहित में वह अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर दिखाई देती है।
(5) कर्तव्यनिष्ठ-सफीयतुन्निसा देश के प्रति अपनी अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देती है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के उद्देश्य से ही वह अपने भाई के हाथ में राखी बाँधकर उसे युद्धभूमि में प्राणोत्सर्ग के लिए भेज देती है।
(6) शान्तिप्रिय एवं हिंसा-विरोधी–सफीयत की कामना है कि उसके देश में सर्वत्र शान्ति को वातावरण रहे तथा सभी देशवासी सुखी और समृद्ध हों। किसी भी प्रकार के हिंसापूर्ण कार्यों का वह प्रबल विरोध करती है।
(7) आदर्श प्रेमिका-सफीयत जोधपुर के युवा शासक अजीतसिंह से सच्चा प्रेम करती है, किन्तु प्रेम की उद्वेगपूर्ण स्थिति में भी वह अपना सन्तुलन बनाये रखती है। वह अजीतसिंह को भी धीरज बँधाती है। और उसे लोकहित के लिए आत्महित का त्याग करने की सलाह देती हुई कहती है-”महाराज ! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।”

इस प्रकार सफीयतुन्निसा ‘आन का मान’ नाटक की एक आदर्श नारी-पात्र है। नाटक में उसके चरित्र को विशेष रूप से इस दृष्टि से उभारा गया है कि वह अजीतसिंह से प्रेम करते हुए भी राज्य व अजीतसिंह के कल्याणार्थ अपने विवाह के लिए तैयार नहीं होती।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution (जनसंख्या की समस्याएँ एवं उनका निराकरण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution (जनसंख्या की समस्याएँ एवं उनका निराकरण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 5
Chapter Name Population Problems and Their Solution (जनसंख्या की समस्याएँ एवं उनका निराकरण)
Number of Questions Solved 13
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution (जनसंख्या की समस्याएँ एवं उनका निराकरण)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनाधिक्य की समस्या एवं उसके निराकरण के उपायों की विवेचना कीजिए।
या
जनसंख्या-वृद्धि के मुख्य कारण बताते हुए उसे रोकने के उपाय प्रस्तावित कीजिए।
या
विश्व की जनसंख्या-वृद्धि के कारण बताइए तथा वृद्धि को कम करने के उपाय सुझाइए।
या
जनसंख्या का घनत्व क्या है? जनाधिक्य के मानव-जीवन पर पड़ने वाले चार प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
या
जनाधिक्य की समस्याओं की विवेचना कीजिए तथा इसके समाधान हेतु सुझाव दीजिए।
या
जनसंख्या अतिरेक की समस्याओं की विवेचना कीजिए और इसमें समाधान के उपाय सुझाइए।
या
जनसंख्या की द्रुत वृद्धि की अवस्थाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

जनसंख्या का घनत्व
Density of Population

जनसंख्या का घनत्व एक ऐसा सूचकांक है जिसके द्वारा मनुष्य और भूमि के निरन्तर परिवर्तनशील सम्बन्ध की सूचना मिलती है। यह जनसंख्या बसाव की दर होती है, जो कि निम्नलिखित प्रकार की होती है –
(i) गणितीय घनत्व – किसी प्रदेश के क्षेत्रफल तथा वहाँ निवास करने वाली जनसंख्या को अनुपात गणितीय घनत्व कहलाता है। जनसंख्या में क्षेत्रफल से भाग देने पर प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व प्राप्त हो जाता है।
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(ii) आर्थिक घनत्व – प्रदेश के आर्थिक संसाधनों की क्षमता तथा वहाँ के सम्पूर्ण जनसंख्या अनुपात को आर्थिक घनत्व कहते हैं।
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(iii) कृषि क्षेत्रीय घनत्व – किसी क्षेत्र की कृषिगत भूमि तथा सम्पूर्ण जनसंख्या का अनुपात कृषि क्षेत्रीय घनत्व होता है।
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(iv) कृषि घनत्व – प्रदेश की कृषिगत भूमि के क्षेत्रफल तथा वहाँ कृषि-कार्य में लगी जनसंख्या के अनुपात से यह घनत्व निकाला जाता है।
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विश्व में जनसंख्या की समस्या
Problem of Population in the World

दिन-प्रतिदिन विश्व की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण कुछ प्रदेशों में भूमि पर मानव का भार बढ़ता जा रहा है। सन् 2010 में विश्व की जनसंख्या लगभग 6.90 अरब है। विश्व की यह जनसंख्या 135 करोड़ वर्ग किमी क्षेत्रफल पर निवास करती है। जहाँ एक ओर उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का क्षेत्रफल विश्व का 16% है, वहाँ विश्व की केवल 7% जनसंख्या ही निवास करती है तथा विश्व की 45% आय का उपभोग होता है। दूसरी ओर एशिया महाद्वीप का क्षेत्रफल विश्व का 18% है, जबकि यहाँ विश्व की 60.8% जनसंख्या का निवास है तथा यह महाद्वीप विश्व की 12% आय का उपभोग करता है। अतः स्पष्ट है कि अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं।

इन क्षेत्रों के निवासियों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता और जो भोजन मिलता है वह भी पौष्टिक नहीं होता। इस दृष्टि से विश्व की लगभग 60% जनसंख्या अधनंगी, भूखी, अस्वस्थ, अशिक्षित, दरिद्र एवं कुपोषण की शिकार हो गयी है, जो विश्व-शान्ति के लिए स्थायी खतरा बन गयी है। कुछ देशों की विस्तारवादी नीति इसी तथ्य की प्रतिफल है। इसके परिणामस्वरूप जनसंख्या एवं उपलब्ध संसाधनों में असन्तुलन की स्थिति बन गयी है। अत: जनसंख्या-वृद्धि पर रोक लगाना नितान्त आवश्यक हैं।
जनसंख्या को यह असहनीय भार विश्व के निम्नलिखित चार क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ती है –

1. दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देश – इसके अन्तर्गत चीन, भारत, पाकिस्तान एवं जापान सम्मिलित हैं। भारत के अतिरिक्त ये देश अपनी विस्तारवादी नीति में उलझकर रह गये हैं। ये प्रयास बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैण्ड, लाओस, कम्पूचिया एवं वियतनाम, भारत और रूस जैसे देशों की सीमा सम्बन्धी विवादों के रूप में प्रकट हुए हैं। फिलीपीन्स, इण्डोनेशिया एवं मलेशिया की राजनीतिक हलचलें स्थिति को और भी अस्थिर बनाये हुए हैं।

2. मध्य एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका – यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र विश्व का दूसरा बड़ा अस्थिर क्षेत्र है। यहाँ पर आन्तरिक हलचलें विश्व के लिए सदैव खतरे की सूचना देती रहती हैं। इराक एवं ईरान युद्ध इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

3. दक्षिणी अमेरिका – यद्यपि दक्षिणी अमेरिका विरल जनसंख्या रखने वाला महाद्वीप है, परन्तु यह विश्व के लिए खतरे की घण्टी कहा जा सकता है। यहाँ जनसंख्या-वृद्धि के साथ-साथ नगरीकरण तीव्र गति से बढ़ रहा है जिससे लोगों का जीवन-स्तर घट रहा है एवं नागरिक जीवन में अस्थिरता उत्पन्न हो गयी है।

4. अफ्रीका – इस महाद्वीप के सहारा प्रदेश में, विशेष रूप से मध्यवर्ती अफ्रीका जहाँ जन्म-दर अधिक तथा मृत्यु दर कम है, तीव्र जनसंख्या वृद्धि हो रही है।
पाश्चात्य विद्वानों ने इन प्रदेशों को जनसंख्या के विस्फोटक क्षेत्रों की संज्ञा प्रदान की है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमानों के अनुसार इन प्रदेशों में न केवल भूतकाल में ही जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई है, बल्कि भविष्य में भी ये प्रदेश तीव्र जनसंख्या वृद्धि के लिए उत्तरदायी होंगे।

विद्वानों की धारणा है कि विकासशील देशों में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि विकसित देशों के लिए खतरे की घण्टी है। जनसंख्या की यह वृद्धि विश्व-शान्ति के लिए एटमबम से भी अधिक खतरनाक है। अतः इस स्थिति पर नियन्त्रण लगाने के लिए आवश्यक है कि मानव की जन्म-दर पर रोक लगायी जाए, क्योंकि प्रकृति के पास इस बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए न तो पर्याप्त खाद्य भण्डार हैं एवं न ही उद्योगों के लिए पर्याप्त खनिज एवं ऊर्जा संसाधन। स्थिति अधिक गम्भीर न होने पाये, इसलिए इस वृद्धि को पहले ही रोकने के प्रयास किये जाने चाहिए और विश्व की जनसंख्या को सीमित कर दिया जाना चाहिए।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण
Causes of Population Growth

विश्व में तीव्र जनसंख्या वृद्धि के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं –
1. ऊँची जन्म – दर तथा कम मृत्यु-दर-पिछड़े एवं विकासशील देशों में जन्म-दर बहुत ऊँची है। एशिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका आदि महाद्वीपों में जन्म-दर 40 से 50 प्रति हजार तक है। इन महाद्वीपों में मृत्यु-दर पर्याप्त नीची है। सामाजिक सुरक्षा, पौष्टिक आहार तथा स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो जाने से एशिया, अफ्रीको तथा दक्षिणी अमेरिका में मृत्यु-दर अत्यन्त नीची हो गयी है। जन्म-दर की अपेक्षा मृत्यु-दर कम होने से विश्व में जनाधिक्य तेज़ी से हो गया है।

2. गर्म जलवायु – एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के देशों में गर्म जलवायु पायी जाती है। गर्म जलवायु में स्त्री-पुरुष की प्रजनन-शक्ति अधिक होती है। शीघ्र विवाह सूत्र में बँधकर नवदम्पति सन्तानोत्पत्ति में लगकर जनसंख्या बढ़ाते हैं।

3. अशिक्षा और रूढ़िवादिता – अशिक्षा और रूढ़िवादिता भी जनाधिक्य का प्रमुख कारण है। अशिक्षित व्यक्ति जनसंख्या बढ़ाने में बहुत योग देते हैं। वे सन्तान को भाग्य और ईश्वरीय देन मानकर जनसंख्या बढ़ाते रहते हैं। अशिक्षित और रूढ़िवादी लोग प्रजनन-शक्ति का भरपूर उपयोग करके जनाधिक्य में सहायक बन जाते हैं।

4. बहुपत्नी प्रथा – जिन देशों में एक से अधिक स्त्रियों के साथ विवाह करने की प्रथा है, वहाँ जनाधिक्य के द्वार स्वत: खुले हुए हैं। बहुपत्नी प्रथा वाले देशों में कई पत्नियों के अधिक सन्ताने जन्म लेती हैं, जो जनसंख्या को बढ़ाने में बहुत योग देती हैं।

5. सामाजिक एवं धार्मिक अन्धविश्वास – पिछड़े हुए समाजों में सामाजिक संकीर्णता एवं धार्मिक कठोरता अधिक सन्तान उत्पत्ति को बढ़ावा देते हैं। इस्लाम धर्मानुयायी सन्तति को धर्म के विरुद्ध मानकर सन्तान उत्पत्ति में लगे रहते हैं। भारत में पुत्र मोह में कई कन्याएँ होने पर भी सन्तानोत्पादन का प्रचलन है, जो जनाधिक्य का कारण बनता है।

6. निम्न जीवन-स्तर – निर्धनता के कारण व्यक्ति का जीवन-स्तर निम्न होता है। अविकसित तथा पिछड़े देशों में लोग निर्धन होते हुए भी जीवन-स्तर के सुधार की ओर ध्यान न देकर सन्तानोत्पत्ति में लगे रहते हैं। उच्च जीवन-स्तर के लोग अपेक्षाकृत कम सन्तान पैदा करते हैं।

7. मनोरंजन के साधनों का अभाव – निर्धन और पिछड़े देशों के लोगों के पास मनोरंजन के स्वस्थ साधन नहीं हैं। उनके पास स्त्रियाँ ही मनोरंजन का साधनमात्र हैं, जिसका परिणाम होता है. अधिक सन्तानं। इस प्रकार मनोरंजन के साधनों का अभाव तीव्र जनसंख्या वृद्धि का कारण बन जाता है।

8. उपजाऊ भूमि – समतल तथा उपजाऊ भूमि कृषि की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। उपजाऊ भूमि में वर्ष भर कृषि कार्य होता रहता है। यह अधिक जनसंख्या को भोजन देने में सक्षम है। एशिया की उपजाऊ तथा चावल उत्पादक भूमि घनी जनसंख्या को भोजन प्रदान करके जनाधिक्य में सहायक हो जाती है।

9. उद्योग-धन्धे-उद्योग – धन्धे जनसंख्या को पर्याप्त आजीविका के साधन उपलब्ध कराते हैं। उत्तरी-पश्चिमी यूरोप में उद्योग-धन्धों का पर्याप्त विकास होने से ही यह क्षेत्र सघन जनसंख्या को क्षेत्र बन गया है। इस प्रकार उद्योग-धन्धों का विकास तीव्र जनाधिक्य का एक प्रमुख कारण है।

10. सरकार की नीति – सरकार की उदार नीतियाँ भी जनाधिक्य का मुख्य कारण हैं। जिन देशों में सरकार ने जनसंख्या के सम्बन्ध में कोई निश्चित नीति तय नहीं की है तथा परिवार कल्याण कार्यक्रमों की ओर ध्यान नहीं दिया है, वहाँ जनसंख्या का संकेन्द्रण हो गया है। सरकार की ढुलमुल नीतियाँ भी जनसंख्या-वृद्धि में सहायक रही हैं। भारत, पाकिस्तान, चीन तथा जापान देश इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

जनसंख्या-वृद्धि की समस्याएँ
Problems of Population Growth

सामान्यत: तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या की निम्नलिखित समस्याएँ हैं –

  1. विश्व में पिछले कई दशकों से जनसंख्या बड़ी तीव्र गति से बढ़ रही है और भविष्य में भी इसके और अधिक बढ़ने की सम्भावनाएँ हैं, जो अविकसित भागों में अधिक हो सकती हैं।
  2. इसी असीमित वृद्धि के फलस्वरूप विकासशील देशों में राजनीतिक उथल-पुथल, आन्तरिक अस्थिरता एवं युद्ध की सम्भावनाएँ प्रकट हुई हैं। ये देश अन्य देशों के लिए संकट बन गये हैं।
  3. जिस गति से जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उसी अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पायी है। फलस्वरूप विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या का जीवन-स्तर निम्न, कुपोषण और दरिद्रता से भरा हुआ है।
  4. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए उपलब्ध भूमि बहुत ही सीमित है।

जनसंख्या-वृद्धि के दुष्परिणाम या प्रभाव
Effects or Demerits of Population-Growth

जनसंख्या की वृद्धि या जनाधिक्य किसी देश के लिए अनेक दुष्प्रभाव उत्पन्न करती है, जो संक्षेप में निम्नलिखित हैं –

  1. विकासशील देशों में जनाधिक्य की समस्या बढ़ रही है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण दुष्परिणाम यह हुआ है कि कृषि उपयोगी भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ गया है, क्योंकि विकासशील देशों के भूमि तथा अन्य संसाधन सीमित हैं, जबकि जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। भारत, चीन तथा बांग्लादेश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  2. जनसंख्या की तीव्र वृद्धि से खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न होती है। प्रति व्यक्ति भोजन के लिए आवश्यक कैलोरी तक प्राप्त नहीं होती। इससे निवासियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे कुपोषण के शिकार होते हैं।
  3. जनसंख्या की वृद्धि होने से रोजगार के अवसरों में कमी आती है। बेरोजगारों की संख्या बढ़ जाती है। लोगों का जीवन-स्तर गिर जाता है।
  4. जनाधिक्य से किसी भी देश के अर्थतन्त्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उसका विदेशी व्यापार असन्तुलित हो जाता है। इससे देश का विकास रुक जाता है।

जनसंख्या वृद्धि की समस्या का निवारण 
Remedies to solve the Problem of Population-Growth

बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या का निवारण शीघ्र हो जाना अति आवश्यक है। इसके लिए सभी बड़े राष्ट्र प्रयत्नशील हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने जनसंख्या विशेषज्ञों की एक समिति बनाई हुई है, जिसमें जनसंख्या के सभी पक्षों का अध्ययन किया जाता है तथा उनके निवारण के उपाय सुझाये जाते हैं। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि को रोकने के लिए निम्नलिखित उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए –
1. परिवार नियोजन – सुदृढ़ राष्ट्र के लिए उसके निवासियों को स्वस्थ होना अति आवश्यक है। आधुनिक गर्भ निरोधक ओषधियों अथवा नसबन्दी द्वारा परिवार कल्याण कार्यक्रमों को अपनाया जाना चाहिए। ऐसी नीति अपनानी चाहिए कि एक परिवार में 2 या 3 से अधिक बच्चे न हो।

2. विवाह की आयु में वृद्धि – लड़के एवं लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाई जानी चाहिए। यह कम-से-कम लड़कियों के लिए 20 वर्ष तथा लड़कों के लिए 30 वर्ष तक हो सकती है। उष्ण जलवायु के देशों में यह उम्र क्रमशः 18 एवं 25 वर्ष हो सकती है। विवाह जितनी देर से किया जाएगा, वैवाहिक जीवन में उतने ही कम बच्चे उत्पन्न हो सकेंगे।

3. सन्तति सुधार – जनसंख्या में गुणात्मक सुधार करना भी आवश्यक है। सन्तति-सुधार कार्यक्रम में छूत या संक्रामक रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों के विवाह और सन्तानोत्पत्ति पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए।

4. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार – देशवासियों की आर्थिक क्षमता बनाये रखने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सफाई आदि पर ध्यान देना अति आवश्यक है। यद्यपि चिकित्सा विज्ञान ने कई असाध्य रोगों पर नियन्त्रण पा लिया है, परन्तु उष्ण कटिबन्धीय देशों में अभी भी बहुत-से रोगों पर नियन्त्रण पाया जाना आवश्यक है।

5. शिक्षा का प्रचार-प्रसार – परिवार के आकार को सीमित बनाये रखने के लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत आवश्यक है। शिक्षित मानव अधिक उत्तरदायी एवं विवेकपूर्ण हो जाता है। उसकी दृष्टि एवं विचार विस्तृत हो जाते हैं। उसे परिवार के आकार एवं गर्भ निरोधक विधियों के प्रसार का ज्ञान भली-भाँति हो जाता है।

6. भूमि का सर्वोत्तम उपयोग – बढ़ती हुई जनसंख्या के भार को कम करने का एक कारगर उपाय भूमि का वैज्ञानिक एवं उचित उपयोग करना अति आवश्यक है। भूमि के उचित उपयोग से आशय उपलब्ध भूमि का सर्वोत्तम उपयोग करना है अर्थात् अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करना है।

7. औद्योगीकरण – जनाधिक्य वाले देशों में औद्योगीकरण एक आवश्यक प्रक्रिया है। इसके लिए अधिकतर लघु एवं घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाहिए, क्योंकि लघु उद्योग़ जब व्यवस्थित हो जाते हैं तो कृषि एवं वृहत् उद्योगों के बीच एक आवश्यक समन्वय स्थापित कर लेते हैं। इससे मानव की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि मानव अधिकांश समय अपने खाद्यान्न-प्राप्ति तथा सामाजिक कार्यों में ही लगा रहता है। इन देशों के निवासियों को यौन सम्बन्धों के अतिरिक्त भी मानसिक सन्तुष्टि के अन्य साधन उपलब्ध हो जाते हैं। आर्थिक उन्नति और शिक्षा के उच्च स्तर तक पहुँचने पर नगरीय-औद्योगिक सभ्यता के प्रसार के साथ-साथ यह वृद्धि कम हो जाती है; अर्थात् पहले मृत्यु-दर में कमी होती है तथा उसके बाद जन्म-दर भी तेजी से घट जाती है।

8. प्रवास या स्थानान्तरण – आज भी विश्व में अनेक देश ऐसे हैं, जहाँ पृथ्वी पर मानव-भार असह्य होता जा रहा है; जैसे- चीन, भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, इण्डोनेशिया आदि। यहाँ पर अधिकांश मानवता अर्द्ध-वस्त्रधारी एवं भूखी रहती है। इसके अतिरिक्त विश्व में ऐसे भी विस्तृत क्षेत्र हैं जहाँ जनशक्ति के अभाव में स्वच्छन्दता से भेड़-बकरी आदि पशु पाले जाते हैं; जैसे-ऑस्ट्रेलिया, अर्जेण्टाइना, उत्तरी-पश्चिमी अफ्रीका एवं अमेरिका, कनाडा तथा दक्षिणी अमेरिकी देशों में। इस प्रकार आर्थिक एवं सामाजिक विषमताएँ विश्व-शान्ति के लिए बाधा के रूप में हैं। इन बाधाओं के कारण नये देशों की प्रगति अवरुद्ध हो गयी है तथा मानव उनसे वंचित हो गया है। इस समस्या के निवारण हेतु अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों द्वारा प्रवास को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution

प्रश्न 2
जनसंख्या के स्थानान्तरण (प्रवास) को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। (2016)
या
जनसंख्या स्थानान्तरण के विभिन्न प्रकारों की विवेचना कीजिए। उदाहरण सहित उनके कारणों की व्याख्या कीजिए। [2008, 16]
या
जनसंख्या स्थानान्तरण के प्रकार एवं कारणों की विवेचना कीजिए। [2014]
उत्तर
प्रागैतिहासिक काल से ही मानव एक स्थान से दूसरे स्थान को एक समूह के रूप में प्रवास करता रहा है। ”पृथ्वी के विभिन्न भागों में एक प्रदेश से दूसरे स्थान को मानव-वर्गों का प्रवसन होता रहा है, इसे हम जनसंख्या का स्थानान्तरण कहते हैं।” स्थानान्तरण के निम्नलिखित दो भेद हैं –
1. प्रवास (Emigration) – इसके द्वारा मानव वर्ग एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हैं; जैसे- यूरोपियन उत्तरी अमेरिकी, दक्षिणी अमेरिकी, ऑस्ट्रेलिया आदि को गये। यह प्रवास कठोर जलवायु, बाढ़, सूखा, जीवन-निर्वाह अथवा अन्य कोई सामाजिक या राजनीतिक कठिनाई के कारण होता है।

2. आवास (Immigration) – बाह्य स्थानों से मानव किसी प्रदेश या स्थान के अन्दर आते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तरी अमेरिका में ब्रिटेन, इटली, फ्रांस आदि देशों से मानव-वर्गों का आवास होता रहा है। जिन देशों में आजीविका तथा मानवीय मूल्यों की सुविधाएँ अधिक होती हैं, वे विदेशियों के आवास को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मध्य एशिया से अनेक बार जनसंख्या का आवास चीन, भारत एवं यूरोपीय देशों को होता रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में जो जनसंख्या है, उसकी वृद्धि एवं विकास यूरेशिया महाद्वीप से बार-बार हुए मानव-वर्गों के स्थानान्तरण से हुआ है।

स्थानान्तरण के पक्ष
Aspects of Migration

देश, काल, संख्या और स्थिरता के विचार से स्थानान्तरण के अग्रलिखित भेद होते हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution 5

जनसंख्या के स्थानान्तरण (प्रवास) के कारण
Causes of Migration of Population

जनसंख्या के स्थानान्तरण में निम्नलिखित दो प्रकार की शक्तियों या क्रियाओं का प्रभाव पड़ता है –
(i) प्रवासकारी शक्तियाँ (Emigrating Forces) – इन शक्तियों के द्वारा किसी प्रदेश का मानव-वर्ग बाहर की ओर स्थानान्तरित हो जाता है। जब किसी प्रदेश में बाढ़, अकाल आदि कोई भौतिक आपदा आती है तो उस प्रदेश से बाहर की ओर मानव-प्रवास होता है। उदाहरण के लिए, मध्य एशिया की शुष्क एवं विषम जलवायु तथा जीवन-यापन की कठिनाइयों के कारण मानव-वर्ग बाहर की ओर प्रवास कर गये थे।

(ii) आवासकारी शक्तियाँ (Immigrating Forces) – इन शक्तियों के कारण किसी प्रदेश में अन्दर की ओर मानव-वर्गों का आवास होता है। अमेरिका की विस्तृत कृषि भूमि ने पश्चिमी यूरोप के सघन प्रदेशों से मानव-वर्गों को आवास के लिए आकर्षित किया था। | उपर्युक्त स्थानान्तरणकारी शक्तियों को उत्पन्न करने वाले निम्नलिखित चार कारक प्रमुख हैं –
(1) भौतिक कारक (Physical Factors) – भौतिक कारकों में जलवायु सबसे प्रभावशाली है। हिमयुग में जलवायु के परिवर्तन से मानव-जातियों के स्थानान्तरण बड़े पैमाने पर होते रहे थे। शीत-प्रधान टुण्ड्रा प्रदेशों एवं हिमाच्छादित प्रदेशों से मानव-वर्ग शीत ऋतु में गर्म प्रदेशों की ओर प्रवास कर जाते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु आने पर पुनः इन ठण्डे प्रदेशों में चले आते हैं। हिमालय प्रदेश में इस प्रकार के मौसमी स्थानान्तरण प्रतिवर्ष नियमित रूप से होते रहते हैं।
अन्य भौतिक कारकों में नदियों की बाढ़ एवं मार्ग परिवर्तन, अतिवर्षा, वर्षा का न होना, अकील, भूकम्प, ज्वालामुखी उद्गार, हिमराशियों का घटना-बढ़ना, मिट्टियों का अनुपजाऊ होना, समुद्री तटों का ऊपर उठना या नीचे धंसना मुख्य स्थान रखते हैं।

(2) आर्थिक कारक (Economic Factors) – आर्थिक कारकों में जीविकोपार्जन की सुविधाएँ । सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। जिन प्रदेशों में जीवन-निर्वाह के साधन उपलब्ध नहीं होते या उनमें कठिनाइयाँ होती हैं, वहाँ से मानव-वर्ग उन प्रदेशों को प्रवास कर जाते हैं जहाँ आर्थिक संसाधन पर्याप्त मात्रा में सुलभ होते हैं। निम्नलिखित आर्थिक कारक प्रमुख स्थान रखते हैं –

  1.  सघन जनसंख्या एवं उनके निवास क्षेत्रों में जीविकोपार्जन के साधनों की कमी
  2. बाह्य प्रदेशों में कृषि-कार्यों के लिए नयी भूमि की प्राप्ति
  3. अधिक उपजाऊ भूमि का आकर्षण
  4. सिंचाई के साधनों की सुविधा
  5. खनिज-पदार्थों की प्राप्ति
  6. वन-संसाधनों की प्राप्ति
  7. यातायात एवं परिवहन के साधनों की सुलभता
  8. औद्योगीकरण एवं औद्योगिक केन्द्रों का आकर्षण
  9. व्यापारिक सुविधाएँ।

पश्चिमी यूरोप, मध्य एशिया, पूर्वी चीन आदि क्षेत्रों की अत्यधिक जनसंख्या दूसरे देशों को प्रवास करती रही है। उदाहरण के लिए, सन् 1920 से 1940 तक जापान में जनसंख्या अधिक हो जाने के कारण बहुत-से जापानी कोरिया, मंचूरिया एवं ब्राजील आदि देशों में जा बसे थे। पूर्वी चीन से लोग मलेशिया, इण्डोनेशिया और वियतनाम में जाकर बस गये थे। नदियों के बेसिनों; जैसे–सिन्धु-गंगा का मैदान, यांगटिसीक्यांग बेसिन तथा समुद्रतटीय मैदानों में उपजाऊ भूमि के कारण अन्य प्रदेशों से जनसंख्या आकर बस गयी थी।

ऑस्ट्रेलिया में कालगूर्ती एवं कूलगर्जी सोने की खाने उष्ण मरुस्थल में स्थित हैं। और 560 किमी लम्बी पाइप लाइन द्वारा जल ले जाकर वहाँ मानवीय बस्तियाँ बसाई गयी हैं। दक्षिणी अफ्रीका एवं एण्डीज पर्वत पर खनिज पदार्थों के आकर्षण के कारण मानव के निवास खानों के समीप विकसित हुए हैं। मध्य एशिया में तेल के कुओं के समीप सघन जनसंख्या खनिज तेल के आकर्षण द्वारा विकसित हुई है। औद्योगिक केन्द्रों के समीप आर्थिक उन्नति की सुलभता के कारण जनसंख्या आकर्षित होती है।

3. सामाजिक-सांस्कृतिक कारक (Socio-cultural Factors) – सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों से भी जनसंख्या का स्थानान्तरण होता है। निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा इसकी पुष्टि होती है –

  1. भारत से हजारों व्यक्ति अपना धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रचार करने के लिए म्यांमार, श्रीलंका, हिन्द चीन, मलेशिया, थाईलैण्ड, जावा, बाली आदि देशों को पाँचवीं शताब्दी तक स्थानान्तरण कर गये थे।
  2. अरब से बाहर की ओर प्रवास करने वाले इस्लाम धर्मावलम्बियों ने अपनी सभ्यता को मिस्र, सूडान, ईरान, अफगानिस्तान, तुर्की, सीरिया, इराक, ओमान, यमन, मालदीव, सुमात्रा, मलाया एवं पूर्वी द्वीप समूह तक फैला दिया था।
  3. धार्मिक भावनाओं के कारण स्पेन के लोग मैक्सिको में जाकर बसे तथा फ्रांसीसी कनाडा में जाकर बसे। धार्मिक स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए यहूदी लोग जर्मनी एवं रूस से भागकर अमेरिकी देशों को चले गये थे।
  4. सन् 1947 में भारत-विभाजन के समय भारत से लाखों मुसलमान पाकिस्तान चले गये तथा पाकिस्तान से करोड़ों हिन्दू भागकर भारत आ गये थे।
  5. अरब में मक्का-मदीना में हज के लिए प्रत्येक वर्ष हजारों मुस्लिम व्यक्ति भारत, पाकिस्तान, जावा, ईरान, मिस्र आदि देशों से अरब को जाते हैं और हज के बाद अपने देशों को वापस लौट आते हैं।
  6. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि देशों के निवासी भारत की सामाजिक अवस्था और संस्कृति को समझने में रुचि रखने लगे हैं। भारत से भी प्रतिवर्ष हजारों विद्यार्थी, वैज्ञानिक, शिक्षक-प्रशिक्षक आदि उच्च अध्ययन के लिए विदेशों को जाते रहते हैं। विदेशों से भी बहुत-से लोग इन कार्यों की प्राप्ति के लिए भारत में आते रहते हैं।
  7. पर्यटक, खिलाड़ी, कलाकार, संगीतज्ञ, नाटककार, राजनीतिज्ञ, व्यापारी आदि लोगों का एक देश से दूसरे देशों को आना-जाना बना रहता है तथा उनमें से कुछ स्थायी रूप से भी वहीं बस जाते हैं। | (viii) कुछ देशों; जैसे-जर्मनी, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका आदि ने भारत के विभिन्न आर्थिक विकास कार्यक्रमों में सहयोग दिया है तथा वे अस्थायी रूप से यहाँ पर निवास कर रहे हैं। इस प्रकार सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों से अन्तर्राष्ट्रीय स्थानान्तरण दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है।

4. राजनीतिक कारक (Political Factors) – इस प्रकार का स्थानान्तरण निम्नलिखित चार प्रकार की क्रियाओं द्वारा होता है –

  1. आक्रमण एवं उसके परिणाम
  2. विजय
  3. उपनिवेशन तथा
  4. स्वतन्त्र स्थानान्तरण।

आक्रमण द्वारा मानव – वर्ग के स्थानान्तरण के उदाहरण सिकन्दर, महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी, बाबर, चंगेज खाँ, तैमूर आदि शासकों के समय में हुए हैं, जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया तथा उनके साथ आये बहुत-से सैनिक भारत में बस गये थे।
जब अंग्रेज लोग भारत आये तो वे मात्र व्यापारी थे। इस कम्पनी ने धीरे-धीरे भारतीय राजाओं के आपसी झगड़ों का लाभ उठाकर भारत में अंग्रेजी राज्य की नींव डाल दी। धीरे-धीरे इन्होंने राजाओं एवं नवाबों को परास्त कर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। तब ब्रिटेन से बहुत-से लोग प्रशासन चलाने के लिए भारत में बस गये थे।

इसी प्रकार चीन ने मंचूरिया प्रदेश को जीतकर अपनी बढ़ती जनसंख्या को मंचूरिया में बसा दिया था। द्वितीय महायुद्ध से पूर्व जापान ने कोरिया एवं मंचूरिया पर अपना आधिपत्य जमाकर इनमें अपनी जनसंख्या बसा दी थी। उपनिवेश के द्वारा फ्रांसीसी एवं अंग्रेजों ने अफ्रीका महाद्वीप में नयी बस्तियों को बसाया था। इसी प्रकार उन लोगों ने इण्डोनेशिया में तथा स्पेनी एवं पुर्तगालियों ने 16वीं शताब्दी में दक्षिणी अमेरिका में अपने उपनिवेश बनाये थे। 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में अफ्रीका से बहुत-से नीग्रो लोगों को पकड़कर जबरदस्ती दास बनाकर संयुक्त राज्य अमेरिका में मजदूरी करने के लिए भेजा गया था। स्वतन्त्र स्थानान्तरण में लोगों को प्रवास करने में अपनी छाँट बनी रहती है। यह आर्थिक लाभ की प्राप्ति तथा सम्पन्न जीवन व्यतीत करने के लिए किया जाता है।

क्या स्थानान्तरण से जनाधिक्य की समस्या का समाधान हो सकता है?
जनाधिक्य की समस्या के निराकरण के लिए प्रवास एक उपाय के रूप में सुझाया जाता है। जनाधिक्य के सम्बन्ध में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस का यह कथन सत्य है कि ”जनसंख्या में ज्यामितीय दर से तथा उत्पादन में गणितीय दर से वृद्धि होती है। अतः जनाधिक्य की समस्या तब उत्पन्न होती है। जब किसी देश की जनसंख्या एवं उत्पादन में असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है; अर्थात् जनसंख्या की अपेक्षा उत्पादन कम होता है। विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जहाँ पर जनसंख्या-वृद्धि आदर्श बिन्दु को पार कर गयी है। वास्तव में आदर्श जनसंख्या वह होती है जो उस देश के संसाधनों के साथ सन्तुलन बनाये रखती है।

जनसंख्या एवं संसाधनों में सन्तुलन बनाये रखने के लिए प्रवास या स्थानान्तरण आवश्यक हो जाता है। अतः कम संसाधन होने पर जनसंख्या का स्थानान्तरण किया जा सकता है। ऐसा देखने में आता है कि प्रवास आर्थिक आकर्षण के कारण होता है, जबकि उस स्थान पर पोषण शक्तियों का शोषण पूर्ण रूप से नहीं हुआ हो। ऐसी स्थिति में जनसंख्या प्रवास को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए।

प्रवास द्वारा जनाधिक्य की समस्या का समाधान पूर्ण रूप से नहीं किया जा सकता । इसके लिए जनसंख्या के आदर्श बिन्दु की खोज करना नितान्त आवश्यक है। यदि आदर्श बिन्दु प्राप्त नहीं हुआ है तो देश की पोषण शक्ति के शोषण के लिए नवीनतम योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाना चाहिए। स्थानान्तरण तो एक अस्थायी साधन है। इसे रोकने के लिए बहुत-से देशों की सरकारों ने कड़े प्रतिबन्ध, नियम ऍवं कानूनों को बना दिया है जिससे जनसंख्या का प्रवास तुरन्त न हो सके।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या की द्रुत गति से वृद्धि की दो समस्याओं का उल्लेख कीजिए। (2010, 11, 14, 15)
उत्तर
जनसंख्या की द्रुत गति से वृद्धि की दो समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. खाद्य पदार्थों की समस्या – जिस गति से जनसंख्या की वृद्धि हुई है, उसी अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पायी है। फलस्वरूप विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या का जीवन-स्तर निम्न, कुपोषण और दरिद्रता से भरा हुआ है।
  2. बेरोजगारी एवं सामाजिक अव्यवस्था – जनसंख्या में द्रुत गति से वृद्धि के कारण सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा है, जिससे बेरोजगारी के साथ-ही-साथ समाज में असन्तोष भी बढ़ रहा है। कानून और प्रशासन की समस्या उत्पन्न हो गयी है। आर्थिक और सामाजिक अपराधों में वृद्धि हुई है तथा उग्रवाद प्रबल हुआ है। मदिरापान और जानलेवा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन भी बढ़ी है।

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प्रश्न 2
टिप्पणी लिखिए-जनसंख्या का स्थानान्तरण।
या
जनसंख्या के अन्तर्राष्ट्रीय स्थानान्तरण के कारणों की विवेचना कीजिए। [2007]
उत्तर
जनसंख्या के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में प्रवसन को जनसंख्या का स्थानान्तरण कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है –

  1. प्रवास अर्थात् मानव को एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना तथा
  2. आवास अर्थात् मानव को बाहर से किसी प्रदेश के अन्दर आना। किसी क्षेत्र से जनसंख्या का प्रवास निम्नलिखित कारणों से होता है –
    1. बाढ़, अकाल, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण किसी क्षेत्र की जनसंख्या अन्यत्र स्थानान्तरण करती है।
    2. प्राचीन काल में बड़े पैमाने पर हिमानीकरण होने पर भी जनसंख्या का स्थानान्तरण हुआ।
    3. जब किसी क्षेत्र में जीविकोपार्जन के साधनों की कमी हो जाती है तो वहाँ के लोग अन्य क्षेत्रों में प्रवास करते हैं।
    4. धार्मिक कारणों से भी मिशनरी लोग अन्य देशों में प्रवास करते हैं।
    5. किसी देश के विभाजन के फलस्वरूप भी जनसंख्या का स्थानान्तरण होता है।
    6. पर्यटक, खिलाड़ी, कलाकार, संगीतज्ञ आदि भी किसी दूसरे देश से आकर्षित होकर प्रवास करते हैं और वहीं बस जाते हैं।
    7. प्राचीन तथा मध्य युग में अनेक आक्रान्ताओं ने दूसरे देशों पर आक्रमण किये और वहीं बस गये।
    8. व्यापार के उद्देश्य से अंग्रेज, डच, फ्रांसीसी आदि लोगों ने एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में प्रवास किया।

जनसंख्या का आवास भी अनेक कारणों से होता है, जिनमें मुख्य हैं –

  1. प्राकृतिक रूप से सुरक्षित स्थानों पर जनसंख्या का बसना।
  2. किसी क्षेत्र में उपलब्ध आर्थिक सुविधाओं का आकर्षण।
  3. धर्म-प्रचार के लिए किसी देश में स्थायी रूप से बस जाना।
  4. राजनीतिक कारणों से किसी देश में लोगों का शरण लेना।

उपर्युक्त प्रवास या आवास अनेक प्रकार के होते हैं –

  1. दीर्घकालिक और अल्पकालिक
  2. अन्तर्महाद्वीपीय, अन्तर्देशीय, अन्तर्राज्यीय तथा स्थानीय
  3. स्थायी और अस्थायी तथा
  4. बड़े पैमाने पर और छोटे पैमाने पर।

प्रश्न 3
जनाधिक्य के चार प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत ‘जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम या प्रभाव शीर्षक देखें।

प्रश्न 4
तीव्र जनसंख्या वृद्धि की दो समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2010, 12]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत ‘जनसंख्या वृद्धि की समस्याएँ’ शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या के स्थानान्तरण को कौन-सी दो शक्तियाँ प्रभावित करती हैं?
उत्तर
जनसंख्या के स्थानान्तरण को प्रवासकारी एवं आवासकारी शक्तियाँ प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 2
जनसंख्या के स्थानान्तरण के किन्हीं दो कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

  1. किसी देश के विभाजन के कारण जनसंख्या स्थानान्तर सर्वविदित है; जैसे कि भारतपाकिस्तान बनने पर हुआ था।
  2. प्राकृतिक आपदा, जैसे बाढ़ व अकाल में भी जनसंख्या स्थानान्तर कर जाता है।

प्रश्न 3
जनसंख्या का स्थानान्तरण किसे कहते हैं?
उत्तर
कठोर जलवायु, बाढ़, सूखा, जीवन-निर्वाह, सामाजिक या राजनीतिक कठिनाई के कारण पृथ्वी के विभिन्न भागों में एक प्रदेश से दूसरे स्थान को मानव वर्गों का प्रवसन होता रहा है। इसे ही जनसंख्या का स्थानान्तरण कहते हैं।

प्रश्न 4
किन राजनीतिक कारकों से स्थानान्तरण होता है?
उत्तर
निम्नलिखित चार क्रियाएँ स्थानान्तरण के राजनीतिक कारक हैं –

  1. आक्रमण एवं उसके परिणाम
  2. विजय
  3. उपनिवेश तथा
  4. स्वतन्त्र स्थानान्तरण।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
स्थानीय स्थानान्तरण है –
(क) गाँवों से शहरों की ओर
(ख) शहरों से गाँवों की ओर
(ग) अन्तक्षेत्रीय प्रवसन
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी।

प्रश्न 2
अन्तक्षेत्रीय स्थानान्तरण किसके बीच होता है?
(क) ग्रामीण क्षेत्र से नगर की ओर
(ख) नगर से उपनगर की ओर
(ग) नगर से महानगर की ओर
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 5 Population Problems and Their Solution

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से स्थानीय प्रवसन का प्रकार कौन-सा है –
(क) नगर से गाँव की ओर
(ख) अन्तक्षेत्रीय प्रवसन
(ग) गाँव से नगर की ओर
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी।

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