UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ई० में सहारनपुर जिले के देवबन्द कस्बे में, एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता पं० रमादत्त मिश्र पौरोहित्य करते थे, परन्तु उनके विचारों में महानता और व्यक्तित्व में दृढ़ता थी। इनका जीवन अत्यन्त सरल और सात्त्विक था। इनकी माताजी का स्वभाव बड़ा उग्र था। इनकी शिक्षा नगण्य ही हुई। अपनी शिक्षा के विषय में इन्होंने लिखा है कि हिन्दी शिक्षा (सच माने) पहली पुस्तक के दूसरे पाठ ख-ट-म-ल खटमल, ट-म-ट-म टमटम। फिर साधारण संस्कृत। बस हरि ओम्। यानि बाप पढ़े न हम।” जब ये खुर्जा के एक संस्कृत विद्यालय में पढ़ते थे, तब प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता आसफ अली के ओजस्वी भाषण को सुनकर परीक्षा छोड़ दी और स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेने लगे। इसके बाद इन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा में लगा दिया। मिश्र जी सन् 1930 ई० से 1932 ई० तक और सन् 1942 ई० में जेल में रहे और राष्ट्र के उच्च नेताओं के सम्पर्क में आये। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् इन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता में लगा दिया। ये एक सजग पत्रकार थे तथा सहारनपुर से ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक मासिक पत्र निकालने के साथ-साथ साहित्य-सृजन में भी संलग्न रहते थे। इनके लेख राष्ट्रीय जीवन के मार्मिक संस्मरणों की सजीव झाँकियाँ हैं, जिसमें भारतीय स्वाधीनता के इतिहास के महत्त्वपूर्ण पृष्ठ भी हैं। 9 मई, 1995 ई० को इस महान् साहित्यकार की मृत्यु हो गयी।

साहित्यिक योगदान-प्रभाकर जी हिन्दी के लघुकथा, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज एवं ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। ये भारत की स्वतन्त्रता की लालसा लेकर साहित्य-क्षेत्र में अवतीर्ण हुए। इन्होंने अनेक नयी विधाओं पर फुटकर रचनाएँ कीं और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व सफलता प्राप्त की। इन्होंने पत्रकारिता को स्वार्थ-सिद्धि का साधन न बनाकर महान् मानवीय मूल्यों की स्थापना की। इनकी पत्रकारिता में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण देखने को मिलता है। ये एक आदर्श पत्रकार के रूप में हिन्दी जगत् में प्रतिष्ठित हुए। इनके पत्रों में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर इनके निर्भीक और आशावादी विचारों का परिचय मिलता है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय इन्होंने जीवन के मार्मिक संस्मरण लिखे। इनके संस्मरणों में इनके व्यक्तित्व के साथ-साथ भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की झाँकी भी मिलती है। इस प्रकार आदर्श पत्रकार, संस्मरण लेखक और रिपोर्ताज लेखक के रूप में प्रभाकर जी की साहित्य-साधना चिरस्मरणीय है।

रचनाएँ-प्रभाकर जी ने हिन्दी की विविध विधाओं में साहित्य-रचना की। इनके अभी तक नौ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं-
रेखाचित्र-‘महके आँगन चहके द्वार’, ‘जिन्दगी मुसकाई’, ‘माटी हो गयी सोना’, ‘भूले-बिसरे चेहरे’।
लघुकथा—‘आकाश के तारे’, ‘धरती के फूल’।
संस्मरण-‘दीप जले शंख बजे।
ललित निबन्ध-‘क्षण बोले कण मुस्काये’, ‘बाजे पायलिया के चुंघरू।
सम्पादन–आपने ‘नया जीवन’ तथा ‘विकास’, दो पत्रों का सम्पादन भी किया। इन पत्रों में प्रभाकर जी के सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर आशावादी और निर्भीक विचारों का परिचय मिलता है।
साहित्य में स्थान-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ शिल्प और वस्तु दोनों ही दृष्टियों से समर्थ गद्यकार हैं। इनकी लघुकथाएँ भावपूर्ण हैं और संस्मरणों में राष्ट्रीय जीवन की मार्मिक झाँकी है। ये मानव-मूल्यों के सजग प्रहरी के रूप में एक आदर्शवादी पत्रकार थे। देश तथा हिन्दी भाषा की असाधारण सेवा के कारण हिन्दी गद्य-साहित्य में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।

प्रश्न 1.
मैंने बहुतों को रूप से पाते देखा था, बहुतों को धने से और गुणों से भी बहुतों को पाते देखा था पर मानवता के आँगन में समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप आज अपनी ही आँखों देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाये और किसी का उत्सर्ग सदा किसी को पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने समर्पण और प्राप्ति का कौन-सा अदभुतं सौम्य स्वरूप देखा?
(iv) प्रायः गुणी व्यक्ति का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने किसकी झाँकी प्रस्तुत की है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं प्रसिद्ध रिपोर्ताज और संस्मरण लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित राबर्ट नर्सिंग होम में पाठ निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- राबर्ट नर्सिंग होम में।
लेखक का नाम-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि मैंने संसार में ऐसे बहुत-से व्यक्तियों को देखा है, जो अपनी विशिष्ट विशेषताओं से लोगों को अपना बना लेते हैं एवं अपार यश अर्जित करते हैं। कुछ लोग अपने रूप-सौन्दर्य द्वारा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तो कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनके पास अपार धन होता है और वे उसके बल पर लोगों पर अपना प्रभाव जमाते हैं या दूसरों को आत्मीय बना लेते हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिनमें कोई विशिष्ट गुण होता है और वे अपने गुणों द्वारा बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं; परन्तु आज लेखक ने एक ऐसी अद्भुत नारी को देखा, जिसने मानवता के लिए सर्वस्व समर्पित करके दूसरों की श्रद्धा और आदर को प्राप्त किया है।
(iii) लेखक ने समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाए और किसी का उत्सर्ग सदा किसी को पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
(iv) प्राय: गुणी व्यक्ति का लोगों पर यह प्रभाव पड़ता है कि वे अपने गुणों के द्वारा दूसरों को अपना बना लेते
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने विश्वप्रसिद्ध मानव-सेविका मदर टेरेसा की सेवा-भावना एवं आत्म-त्याग की मनोरम झाँकी प्रस्तुत की है।

प्रश्न 2.
यह अनुभव कितना चमत्कारी है कि यहाँ जो जितनी अधिक बूढ़ी है वह उतनी ही अधिक उत्फुल्ल, मुसकानमयी है। यह किस दीपक की जोत है? जागरूक जीवन की! लक्ष्यदर्शी जीवन की! सेवा-निरत जीवन की! अपने विश्वासों के साथ एकाग्र जीवन की। भाषा के भेद रहे हैं, रहेंगे भी, पर यह जोत विश्व की सर्वोत्तम जोत है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा में क्या अन्तर देखने को मिलता है?
(iv) कौन-सी ज्योति विश्व की सर्वोत्तम ज्योति है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किसके मुसकानमय जीवन का चित्रांकन किया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं प्रसिद्ध रिपोर्ताज और संस्मरण लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित राबर्ट नर्सिंग होम में पाठ से अद्भुत है।
अथवा
पाठ का नाम- राबर्ट नर्सिंग होम में।
लेखक का नाम-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–मदर मार्गरेट इन्दौर के नर्सिंग होम की सर्वाधिक वृद्धा नर्स हैं। लेखक ने वहाँ रहकर देखा कि उस नर्सिंग होम में जो जितनी वृद्धा नर्स है, वह उतनी ही अधिक सेवा-परायण, कर्तव्यपरायण, क्रियाशील, प्रसन्न और मुसकानमयी है।
(iii) भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा में भिन्न-भिन्न अन्तर देखने को मिलते हैं।
(iv) सबके हृदय में एक अद्भुत ज्योति प्रज्वलित है, वह है सेवा और प्यार की ज्योति। यही ज्योति विश्व की सर्वोत्तम ज्योति है।
(v) लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में रोबर्ट नर्सिंग होम में समर्पित भाव से सेवारत और सर्वाधिक वृद्धा नर्स मार्गरेट के मुसकानमय जीवन का चित्रांकन किया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)

प्रश्न 1.
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की विशिष्ट (प्रमुख) घटनाओं का वर्णन कीजिए। [2012, 13]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वतन्त्रता-संग्राम का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2017]
या
“‘मुक्तियज्ञ’ सन् 1921 से लेकर सन् 1947 तक के स्वतन्त्रता संग्राम की कहानी है। इस उक्ति पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के कथानक का सार प्रस्तुत कीजिए। [2016]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वाधीनता संग्राम की घटनाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2016]
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है। इस अंश में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की गाथा है। ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु संक्षेप में निम्नवत् है|
गाँधी जी साबरमती आश्रम से अंग्रेजों के नमक-कानून को तोड़ने के लिए चौबीस दिनों की यात्रा पूर्ण करके डाण्डी गाँव पहुँचे और सागरतट पर नमक बनाकर ‘नमक कानून तोड़ा

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

गाँधी जी का उद्देश्य नमक बनाना नहीं था, वरन् इसके माध्यम से वे अंग्रेजों के इस कानून का विरोध करना और जनता में चेतना उत्पन्न करना चाहते थे। यद्यपि उनके इस विरोध के आधार सत्य और अहिंसा थे, किन्तु अंग्रेजों का दमन-चक्र पहले की भाँति ही चलने लगा। गाँधी जी तथा अन्य नेताओं को अंग्रेजों ने कारागार में डाल दिया। जैसे-जैसे दमने-चक्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे ही मुक्तियज्ञ भी तीव्र होता गया। गाँधी जी ने भारतीयों को स्वदेशी वस्तु के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रोत्साहित किया। सम्पूर्ण देश में यह आन्दोलन फैल गया। समस्त देशवासी स्वतन्त्रता आन्दोलन में एकजुट होकर गाँधी जी के पीछे हो गये। इस प्रकार गाँधी जी ने भारतीयों में एक अपूर्व उत्साह एवं जागृति उत्पन्न कर दी।

गाँधी जी ने अछूतों को समाज में सम्मानपूर्ण स्थान दिलवाने के लिए आमरण अनशन आरम्भ किया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष का निर्णय किया। सन् 1927 ई० में साइमन कमीशन भारत आया। भारतीयों द्वारा इस कमीशन का पूर्ण बहिष्कार किया गया। मैक्डॉनल्ड एवार्ड के द्वारा केन्द्र एवं प्रान्त की सीमाओं से सम्पूर्ण भारतवर्ष को विभिन्न साम्प्रदायिक टुकड़ों में विभक्त कर दिया गया। इससे असन्तोष और भी ज्यादा बढ़ गया। काँग्रेस ने विभिन्न प्रान्तों में कुछ नेताओं के समर्थन से मन्त्रिमण्डल बनानी स्वीकार किया। शीघ्र ही विश्वयुद्ध छिड़ गया। काँग्रेस के सहयोग की शर्ते ब्रिटिश सरकार को मान्य नहीं थीं। फलत: गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर दिया। जापान के विश्वयुद्ध में सम्मिलित हो जाने से भारत में भी खतरे की सम्भावनाएँ उत्पन्न होने लगीं। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने भारत की समस्याओं पर विचार करने के लिए ‘क्रिप्स मिशन’ भेजा, जिसका भारतीय जनता ने विरोध किया। सन् 1942 ई० में गाँधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगा दिया। उसी रात्रि में गाँधी जी व अन्य नेतागण बन्दी बना लिये गये और अंग्रेजों ने बालकों, वृद्धों और स्त्रियों तक पर भीषण अत्याचार आरम्भ कर दिये। इन अत्याचारों के कारण भारतीयों में और अधिक आक्रोश उत्पन्न हो उठा। चारों ओर हड़ताल और तालाबन्दी हो गयी। अंग्रेजी शासन इस आन्दोलन से हिल गया। कारागार में ही गाँधी जी की पत्नी कस्तूरबा का देहान्त हो गया। पूरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल आक्रोश एवं हिंसा भड़क उठी थी।

आजाद हिन्द सेना के संगठनकर्ता सुभाषचन्द्र बोस ने भी भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने की योजना बनायी। सन् 1945 ई० में सारे बन्दी बनाये गये नेता छोड़ दिये गये। इससे जनता में उत्साह की लहर पुनः उमड़ने लगी। इसी समय सुभाषचन्द्र बोस का वायुयान दुर्घटना में निधन हो गया।

सन् 1942 ई० में ही भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की गयी थी। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की माँग की। अन्ततः 15 अगस्त, 1947 ई० को अंग्रेजों ने भारत को मुक्त कर दिया। अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन करवा दिया। एक ओर तो देश में स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, दूसरी ओर नोआखाली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच संघर्ष हो गया। गाँधी जी ने इससे दु:खी होकर आमरण उपवास रखने का निश्चय किया।

30 जनवरी, 1948 ई० को नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस दुःखान्त घटना के पश्चात् कवि द्वारा भारत की एकता की कामना के साथ इस काव्य का अन्त हो जाता है।

इस प्रकार इस खण्डकाव्य का आधार-फलक बहुत विराट् है और उस पर कवि पन्त द्वारा बहुत सुन्दर और प्रभावशाली चित्र खींचे गये हैं। इसमें उस युग का इतिहास अंकित है, जब भारत में एक हलचल मची हुई थी और सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की आग सुलग रही थी। इसमें व्यक्त राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है। निष्कर्ष रूप में मुक्तियज्ञ गाँधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

प्रश्न 2.
‘मुक्तियज्ञ’ के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके किसी एक प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014, 15]
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है।” स-तर्क प्रमाणित कीजिए। [2009]
या
राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गाँधी ही ‘मुक्तियज्ञ’ के पुरोधा हैं, खण्डकाव्य की कथावस्तु के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए और उनका चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 14]
या
‘मुक्तियज्ञ’ में कथित उन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार पर गाँधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया।
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ काव्य के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं—

(1) प्रभावशाली व्यक्तित्व-गाँधी जी का आन्तरिक व्यक्तित्व बहुत अधिक प्रभावशाली है। उनकी वाणी में अद्भुत चुम्बकीय प्रभाव था। उनकी डाण्डी यात्रा के सम्बन्ध में कवि ने लिखा है

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन ।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

(2) सत्य, प्रेम और अहिंसा के प्रबल समर्थक-‘मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी के जीवन के सिद्धान्तों में सत्य, प्रेम और अहिंसा प्रमुख हैं। अपने इन तीन आध्यात्मिक अस्त्रों के बल पर ही गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी। इन सिद्धान्तों को वे अपने जीवन में भी अक्षरशः उतारते थे। उन्होंने कठिनसे-कठिन परिस्थिति में भी सत्य, अहिंसा और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ा।
(3) दृढ़-प्रतिज्ञ-‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी ने जो भी कार्य आरम्भ किया, उसे पूरा करके ही छोड़ा। वे अपने निश्चय पर अटल रहते हैं और अंग्रेजी सत्ता दमन चक्र से तनिक भी विचलित नहीं होते। उन्होंने नमक कानून तोड़ने की प्रतिज्ञा की तो उसे पूरा भी कर दिखाया

प्राण त्याग दूंगा पथ पर ही, उठा सका मैं यदि न नमक-कर।
लौट न आश्रम में आऊँगा, जो स्वराज ला सका नहीं घर ॥

(4) जातिवाद के विरोधी-गाँधी जी का मत था कि भारत जाति-पाँति के भेदभाव में पड़कर ही शक्तिहीन हो रहा है। उनकी दृष्टि में न कोई छोटा था, न अस्पृश्य और न ही तुच्छ। इसी कारण वे जातिवाद के कट्टर विरोधी थे-

भारत आत्मा एक अखण्डित, रहते हिन्दुओं में ही हरिजन।
जाति वर्ण अघ पोंछ, चाहते, वे संयुक्त रहें भू जनगण ।।

(5) जन-नेता–‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी सम्पूर्ण भारत में जन-जन के प्रिय नेता हैं। उनके एक संकेत मात्र पर ही लाखों नर-नारी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं; यथा

मुट्ठी-भर हड्डियाँ बुलातीं, छात्र – निकल पड़ते सब बाहर।
लोग छोड़ घर-द्वार, मान, पद, हँस-हँस बन्दी-गृह देते भर ॥

भारत की जनता ने उनके नेतृत्व में ही स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को भगाकर ही दम लिया।

(6) मानवता के अग्रदूत-‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता के कल्याण में ही लगा देते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि मानव-मन में उत्पन्न घृणा, घृणा से नहीं अपितु प्रेम से मरती है। वे आपस में प्रेम उत्पन्न कर घृणा एवं हिंसा को दूर करना चाहते थे। वे हिंसा का प्रयोग करके स्वतन्त्रता भी नहीं चाहते थे; क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा पर टिकी हुई संस्कृति मानवीयता से रहित होगी-

घृणा, घृणा से नहीं मरेगी, बल प्रयोग पशु साधन निर्दय।
हिंसा पर निर्मित भू-संस्कृति, मानवीय होगी न, मुझे भय ॥

(7) लोक-पुरुष-मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी एक लोक-पुरुष के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। इस सम्बन्ध में कवि कहता है-

संस्कृति के नवीन त्याग की, मूर्ति, अहिंसा ज्योति, सत्यव्रत ।
लोक-पुरुष स्थितप्रज्ञ, स्नेह धन, युगनायक, निष्काम कर्मरत ।

(8) साम्प्रदायिक एकता के पक्षधर–स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में भीषण संघर्ष हुआ। इससे गाँधी जी का हृदय बहुत दु:खी हुआ। साम्प्रदायिक दंगा रोकने के लिए गाँधी जी ने आमरण अनशन कर दिया। गाँधी जी सोच रहे हैं

मर्म रुधिर पीकर ही बर्बर, भू की प्यास बुझेगी निश्चय।

(9) समद्रष्टा-गाँधी जी सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में न कोई बड़ा था और न ही कोई छोटा। छुआछूत को वे समाज का कलंक मानते थे। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था—

छुआछूत का भूत भगाने, किया व्रती ने दृढ़ आन्दोलन,
हिले द्विजों के रुद्र हृदय पर, खुले मन्दिरों के जड़ प्रांगण।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी महान् लोकनायक; सत्य, अहिंसा और प्रेम के समर्थक; दृढ़-प्रतिज्ञ, निर्भीक और साहसी पुरुष के रूप में सामने आते हैं। कवि ने गाँधी जी में सभी लोककल्याणकारी गुणों का समावेश करते हुए उनके चरित्र को एक नया स्वरूप प्रदान किया है।

प्रश्न 3.
‘मुक्तियज्ञ’ में निरूपित आजाद हिन्द सेना की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में अपने घर में ही नजरबन्द सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेजों को चकमा । देकर जनवरी सन् 1941 में नजरबन्दी से निकल भागे तथा अफगानिस्तान, जर्मनी होते हुए जापान पहुँच गये। दिसम्बर 1941 में जापान ने विश्वयुद्ध में प्रवेश किया। उस समय मलाया में अमेरिकी, ऑस्ट्रेलियन और अंग्रेजी सैन्य विभागों के साथ लगभग 60,000 भारतीय सैनिक और उच्च पदाधिकारी भी नियुक्त थे। पराधीन देश के सैनिक होने के कारण उनके तथा अन्य देश के सैनिकों में वेतन और अन्य सुविधाओं की दृष्टि से बहुत भेदभाव रखा गया था। जापानियों ने बड़ी आसानी से मलाया पर अधिकार कर लिया। इन्हीं दिनों बंगाल के क्रान्तिकारी नेता श्री रासबिहारी बोस ने जापानी सैन्य अधिकारियों से मिलकर युद्ध में बन्दी भारतीय सिपाहियों की एक देशभक्त सेना बनायी। सितम्बर सन् 1942 में भारतीय सेनानायकों के नेतृत्व में ‘आजाद हिन्द सेना’ बनी। मलाया, बर्मा, हाँगकाँग, जावा आदि देशों के अनेक प्रवासी भारतीय भी उसमें सम्मिलित हुए। सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में ‘आजाद हिन्द सेना’ एक महत्त्वपूर्ण और बलशाली सैन्यसंगठन बन गया। 26 जून, सन् 1945 को भारत के प्रति रेडियो सन्देश भेजते हुए आजाद हिन्द रेडियो से उन्होंने घोषित किया था कि आजाद हिन्द सेना कोई पराधीन और शक्तिहीन सेना नहीं थी। इसके नायक धुरी राष्ट्रों की सहायता से भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने की योजना बना रहे थे।

मई, 1945 में विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और जून में कांग्रेस के बन्दी नेता छोड़ दिये गये। सारे देश में उत्साह की लहर छा गयी। इन्हीं दिनों लाल किले में बन्दी आजाद हिन्द सेना के नायकों पर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे के दौरान जब इन वीरों की शौर्य-गाथाएँ जनता के सामने आयीं, तब समस्त भारतीय जनता का प्यार उन पर उमड़ पड़ा। इसी समय हवाई दुर्घटना में हुई सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के समाचार से सम्पूर्ण भारत पर अवसाद (निराशा) के बादल छा गये। उनके कठिन प्रवास की दु:खद कहानियों को सुन-सुनकर जनता का यह अवसाद क्रोध में बदल गया। इस प्रकार युद्ध समाप्त होते-होते सम्पूर्ण भारत में फिर क्रान्ति की उत्तेजना व्याप्त हो गयी।

प्रश्न 4.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने जिन प्रमुख राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है, उनका संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने निम्नलिखित राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है—

  1. साइमन कमीशन का बहिष्कार,
  2. पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग,
  3. नमक आन्दोलन (डाण्डी यात्रा),
  4. शासन को आतंकित करने का आन्दोलन,
  5. देशभक्तों को फाँसी,
  6. मैक्डोनाल्ड पुरस्कार,
  7. काँग्रेस मन्त्रिमण्डलों की स्थापना,
  8. द्वितीय विश्व युद्ध,
  9. सविनय अवज्ञा आन्दोलन,
  10. सन् 1942 ई० की क्रान्ति (भारत छोड़ो आन्दोलन),
  11. आजाद हिन्द फौज की स्थापना,
  12. स्वतन्त्रता की प्राप्ति,
  13. देश का विभाजन तथा
  14. बापू का बलिदान।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट

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Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name राजमुकुट (व्यथित हृदय)
Number of Questions 7
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय)

प्रश्न 1.
श्री व्यथित हृदय द्वारा लिखित ‘राजमुकुट’ नाटक का सारांश लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक का कथा-सार अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए। [2015, 16, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के द्वितीय अंक का कथा-सार लिखिए। [2010, 15]
या
‘राजमुकुट नाटक के तृतीय अंक का कथा-सार संक्षेप में लिखिए। [2009, 12, 13, 14, 16, 17, 18]
या
‘राजमुकुट नाटक के प्रथम अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 16]
या
“राजमुकुट’ नाटक के अन्तिम अंक की कथा संक्षिप्त रूप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के चतुर्थ अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2017, 18]
उत्तर
‘राजमुकुट’ नाटक, नाटककार श्री व्यथित हृदय का एक ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक में महाराणा प्रताप की वीरता, बलिदान और त्याग की कथा अंकित है। कथा का प्रारम्भ महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से तथा कथा का अन्त महाराणा प्रताप की मृत्यु पर होता है। महाराणा प्रताप इस नाटक के नायक हैं।

प्रथम अंक—प्रस्तुत नाटक के प्रथम अंक की कथा मेवाड़ के राणा जगमल के महल से आरम्भ होती है। राणा जगमल एक विलासी और क्रूर शासक है। वह अपनी मर्यादा का निर्वाह करना भूल गया था तथा सुरासुन्दरी में डूबा रहता था। ऐसे ही समय में राष्ट्रनायक कृष्णजी चन्दावत, राजसभा में पहुँचते हैं तथा राणा जगमल को उसके नीचे कर्मों के लिए भला-बुरा कहते हैं। वे जगमल से ‘मेवाड़ का मुकुट’ उचित पात्र को सौंपने के लिए आग्रह करते हैं। जगमल उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं तथा चन्दावत से योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहते हैं। चन्दावत; राणा जगमल से राजमुकुट लेकर प्रताप के शीश पर रख देते हैं। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ जाती है। प्रताप विदेशी शासक से लोहा लेने का प्रण करते हैं तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। यह संकल्प नाटक की कथा को आगे बढ़ाने में सहायक है।।

द्वितीय अंक-प्रताप मेवाड़ के राजा बनते ही अपनी प्रजा के खोये हुए सम्मान की रक्षा करते हैं। वे प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए अनेक आयोजन भी करते हैं। ऐसे ही एक आयोजन के अवसर पर जंगली सूअर के आखेट को लेकर प्रताप तथा उनके भाई शक्तिसिंह में विवाद हो जाता है। विवाद बढ़ जाने पर दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। भावी अनिष्ट की आशंका या राजकुल को संकट से बचाने के लिए राजपुरोहित अपनी कटार से अपना ही प्राणान्त कर लेते हैं। प्रताप शक्तिसिंह को देश से निर्वासित कर देते हैं। शक्तिसिंह अपने को अपमानित अनुभव करते हैं तथा अकबर के साथ मिल जाते हैं।

तृतीय अंक-मानसिंह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थीं। इसलिए राणा ने उससे स्वयं भेट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से चला गया तथा दिल्ली के सम्राट् अकबर से जा मिला। चतुर अकबर अवसर का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप पर आक्रमण कर देता है। हल्दीघाटी के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप को बचाने के लिए कृष्णजी चन्दावत, प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर स्वयं पहन लेते हैं और युद्धभूमि में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। प्रताप बच जाते हैं, परन्तु दो मुगल सैनिक प्रताप का पीछा करते हैं। ऐसे समय पर शक्तिसिंह का भ्रातृ-प्रेम जाग्रत होता है और वे पीछा करके दोनों मुगलों को मार देते हैं। शक्तिसिंह और प्रताप आपस में गले मिलते हैं। इसी समय राणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक अपने प्राण त्याग देता है।

चतुर्थ अंक-हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाता है, परन्तु राणा हार नहीं मानते। अकबर प्रताप की देशभक्ति, त्याग और वीरता का लोहा मानते हैं तथा वे महाराणा प्रताप के प्रशंसक बन जाते हैं। एक दिन प्रताप के पास एक संन्यासी आता है। प्रताप संन्यासी का उचित सत्कार न कर पाने के कारण अत्यधिक व्यथित हैं। इसी समय राणा की पुत्री चम्पा घास की बनी रोटी लेकर आती है, जिसे एक वन-बिलाव छीनकर भाग जाता है। चम्पा गिर जाती है और पत्थर से टकराकर उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ समय पश्चात् अकबर संन्यासी वेश में वहाँ आता है और कहता है कि, “आप उस अकबर से तो सन्धि कर सकते हैं जो भारतमाता को अपनी माँ समझता है, जो आपकी भाँति उसकी जय बोलता है।” इसी समय अकबर राणा को भारतमाता का सपूत’ बताता है और प्रताप के दर्शन करके अपने को धन्य मानता है। संघर्षरत प्रताप रोगग्रस्त हो जाते हैं। वे शक्तिसिंह तथा अपने सभी साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेते हैं। ‘भारतमाता की जय’ घोष के साथ ही महाराणा का देहान्त हो जाता है।
‘राजमुकुट’ की यह कथा भारत के स्वर्णिम इतिहास और एक रणबाँकुरे वीर की अमर कहानी है।

प्रश्न 2.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर उसके प्रमुख पात्र (नायक) महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक में जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो, उसके व्यक्तित्व का परिचय दीजिए। [2009, 14]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 11, 13, 14, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर प्रतापसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के नायक की चरित्रगत विशेषताएँ प्रस्तुत कीजिए। [2018]
उत्तर
महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक महाराणा प्रताप हैं। नाटक में उनके चरित्र का मूल्यांकन करने वाली; राज्याभिषेक से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ हैं। राणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है-

(1) आदर्श भारतीय नायक-भारतीय नाट्यशास्त्र में आदर्श नायक के जिन गुणों के विषय में बताया गया है, महाराणा प्रताप के चरित्र में वे सभी गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र ‘धीरोदात्त नायक’ का आदर्श चरित्र है। वे उच्च कुल में उत्पन्न हुए वीर, साहसी तथा संयमी व्यक्ति हैं।
(2) प्रजा की आशाओं के आधार-मेवाड़ की प्रजा महाराणा प्रताप को इस आशा के साथ मुकुट पहनाती है कि वे उसकी तथा देश की रक्षा करेंगे। प्रजा की आशा के अनुरूप प्रताप उसके सच्चे हितैषी सिद्ध होते हैं। प्रजा प्रताप के मुकुट धारण करने से पूर्व ही यह आशा रखती है कि वह देश में छायी हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा; आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है; उसका पौरुष गेय है। वह महीमाता का पुण्य है। भारतमाता की साधना का फल है; अमरफल
(3) मातृभूमि के अनन्य भक्त-प्रताप मातृभूमि के अनन्य भक्त हैं। वे देश की दासता और प्रजा की दुर्दशा से व्यथित हैं—“सारा देश विदेशियों के अत्याचारों से विकम्पित हो चुका है। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक असन्तोष राग अलाप रहा है।”………” चित्तौड़ का युद्ध भारत का युद्ध होगा।”
(4) दृढ़प्रतिज्ञ तथा कर्त्तव्यनिष्ठ-महाराणा दृढ़ निश्चयी तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान हैं। राजमुकुट धारण करने के अवसर पर प्रताप के शब्द हैं-“मेरा जयनाद ! मुझे महाराणा बनाकर मेरा जयनाद न बोलो साथियो! जय बोलो भारत की, मेवाड़ की। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राणों में साँस रहते हुए प्रजा-प्रभु की दी हुई इस भेंट को मलिन न करूंगा। जब तक सारे भारत को दासता से मुक्त न कर लँगा, सुख की नींद न सोऊँगा।”
(5) स्वतन्त्रता हेतु दृढ़ संकल्प–प्रताप जीवनपर्यन्त स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। वे अकबर से हल्दीघाटी में युद्ध करते हैं। सब कुछ खोकर, भी वे अकबर के सामने झुकते नहीं। बच्चे भूखों मर जाते हैं, फिर भी यह लौह-पुरुष अडिग रहता है। मृत्यु के समय भी राणा को एक ही लगन है, एक ही इच्छा है, एक ही अभिलाषा है, वह है देश की स्वतन्त्रता-“बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”
(6) निरभिमानी एवं सत्ता-लिप्सा से दूर—राणा देशभक्त हैं, स्वतन्त्रता के दीवाने हैं, परन्तु वे राजा बनना नहीं चाहते। राणा प्रताप महान् देशभक्त एवं मेवाड़ के महाराणा हैं, किन्तु उन्हें अभिमान बिल्कुल नहीं है। महान् होकर भी वे स्वयं को महान् नहीं समझते। वे कहते हैं–‘‘मेवाड़ का राणी मैं ! नहीं, नहीं कृष्णजी! आप भूल रहे हैं। मेवाड़ के महाराणा का पद महान् है, बहुत महान् है।”
(7) भारतीय संस्कृति, धर्म तथा मान-मर्यादा के रक्षक-महाराणा भारतीय संस्कृति के पोषक हैं। वे धर्म की रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य समझते हैं। संन्यासी के रूप में अकबर जब उनके पास पहुँचता है तो वे उसका आदर करते हैं, परन्तु खाने के लिए कुछ भी दे पाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें कष्ट होता है। वे कहते हैं-…”आज कई दिनों से बच्चे घास की रोटियों पर निर्वाह कर रहे थे तो क्या संन्यासी अतिथि को भी धास की ही रोटियाँ खिलाऊँ।”
धर्म के प्रति भी राणा के मन में निष्ठा है। पुरोहित का बलिदान देखकर राणा कहते हैं-“देशभक्त पुरोहित तुम धन्य हो! तुमने अपने अनुरूप ही अपनी बलिदान दिया है। ज्ञान और चेतना से दूर हम अधम को तुमने प्रकाश दिखाया है ………….।”
(8) पराक्रमी योद्धा-राणा वीर हैं। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके शौर्य का साक्षी है। प्रताप अपने सैनिकों से कहते हैं—“चलो युद्ध का राग गाते हुए हम सब हल्दीघाटी की युद्धभूमि में चलें और रक्तदान से चण्डी माता को प्रसन्न करके उनसे विजय का शुभ आशीर्वाद लें।”

इस प्रकार राणा का चरित्र अनेक अमूल्य गुणों की खान है। वे आदर्श देशभक्त हैं और त्यागी, साहसी, उदार, वीर, दृढ़निश्चयी तथा उदात्त पुरुष हैं। वे प्रजा को आत्मीय मित्र मानते हैं। मुगल सम्राट् । अकबर भी उनकी प्रशंसा करते हैं-”महाराणा प्रताप भारत के अनमोल रत्न हैं।”

प्रश्न 3.
शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009]
या
‘राजमुकुट के आधार पर शक्तिसिंह की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 15, 16, 17]
उत्तर

शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण

शक्तिसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक मेवाड़ के महाराणा प्रताप का छोटा भाई है। महाराणा के इस सुयोग्य अनुज के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) परम देशभक्त–शक्तिसिंह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमा है। उसके हृदय में अपने भाई के समान देश की दासता, जनता की व्यथा और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध आक्रोश है। वह मेवाड़ के घर-घर में जीवन और जागृति का मन्त्र फेंकना चाहता है। वह अपने देश के मंगल के लिए सब-कुछ करने को तत्पर है-”माता-मही! तू मेरी भुजाओं में शक्ति दे कि मैं जगमल के सिंहासन को उलट सकें। ……………… मेवाड़ में सुख-शान्ति स्थापित कर सकें।”
(2) राज्य-वैभव के प्रति अनासक्त-शक्तिसिंह का चरित्र त्याग भाव से परिपूर्ण है। उसे राज्य-वैभव में कोई आसक्ति नहीं है। अहेरिया उत्सव पर वन-शूकर के वध पर महाराणा से तकरार हो जाने पर दोनों में तलवारें खिंच जाती हैं, जिसमें मध्यस्थता करते हुए पुरोहित की हत्या हो जाती है। इस अपराध में उसे राज्य से निर्वासित कर दिया जाता है, जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
(3) निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता–शक्तिसिंह में निर्भीकता और स्पष्ट बात कहने का साहस द्रष्टव्य है। वह अकबर की सेना में सम्मिलित हो जाता है, किन्तु अकबर द्वारा मेवाड़ का सर्वनाश करने का संकल्प लेने पर वह उसकी सहायता करने को तैयार नहीं होता।
(4) भावुक और प्रकृति-प्रेमी–शक्तिसिंह युवक है। प्राकृतिक सौन्दर्य उसे भाव-विमुग्ध कर देता है। वह उपवन में बैठकर गीत गुनगुनाता है। चन्दावत के पूछने पर वह कहता है-“वन मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे होते हैं।”
(5) भ्रातृ-प्रेमी–शक्तिसिंह के हृदय में अपने भाई महाराणा के प्रति अनन्य प्रेम है। राणा प्रताप और शक्तिसिंह का युद्धभूमि में सामना होता है। युद्ध में ही राणा के घोड़े चेतक की मृत्यु हो जाती है। राणा उसके शव के निकट चिन्तित भाव से बैठे हुए थे, तभी दो मुगल सैनिकों को महाराणा पर प्रहार करते हुए देखकर शक्तिसिंह एक ही बार में दोनों को मौत के घाट उतार देता है और महाराणा से क्षमायाचना करता है वह आया है मेवाड़ के महाराणा से क्षमायाचना करने, उनकी स्नेहमयी गोद में बैठकर पश्चात्ताप करने और उनकी वीरता की पवित्र गंगा में अपने कलुषित-कल्मषों को धोने।”
(6) साम्प्रदायिक सद्भावना तथा राष्ट्रीय एकता का पोषक–शक्तिसिंह यह सोचता है कि अकबर और प्रताप मिलकर ऐसे भारत की रचना कर सकते हैं, जिसमें धर्म और सम्प्रदाय का वैमनस्य नहीं होगा। ऐसा भारत ही अखण्ड राष्ट्र हो सकता है। वह हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों को मिल-जुलकर रहने का सन्देश देता है-“तुम उन्हें विदेशी और विधर्मी समझ रहे हो, क्या वे फिर काबुल, कंधार और ईरान लौट जाएँगे ? ……………. वे अब इसी देश में रहेंगे और उसी प्रकार उसी कण्ठ से भारतमाता की जय बोलेंगे।”
(7) अन्तर्द्वन्द्व से घिरा–शक्तिसिंह उज्ज्वल चरित्र का व्यक्ति है। वह प्रतिशोध की भावना और देशभक्ति के द्वन्द्व से घिर जाता है, किन्तु अन्त में देशभक्ति की भावना की विजय होती है। तब वह सोचता है-‘प्रतिहिंसा की भावना से उत्तेजित होकर दानव बन जाना ठीक नहीं।” इन सहज दुर्बलताओं ने तो उसके चरित्र को यथार्थ का स्पर्श देकर निखार दिया है।

प्रश्न 4.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर मुगल सम्राट अकबर का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014, 15, 16, 18]
उत्तर

अकबर का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक में मुगल सम्राट् अकबर एक प्रमुख पात्र है। वह महाराणा प्रताप का प्रतिद्वन्द्वी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं—

(1) व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति-अकबर व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति है। अपने इसी गुण के कारण वह शक्तिसिंह के हृदय में जगी प्रतिशोध की भावना को तीव्र कर देता है– ‘छलिया संसार को छल और प्रपंचों से परास्त करने का पाठ पढ़ो।……… संसार में भावुकता से काम नहीं चल सकता शक्ति!”
(2) महत्त्वाकांक्षी–सम्राट् अकबर बहुत महत्त्वाकांक्षी है। वह मन-ही-मन मेवाड़-विजय का संकल्प करता है-”मैं अपने जीवन के उस अभाव को पूरा करूंगा, मेवाड़ के गौरवमय भाल को झुकाकर अपने साम्राज्य की प्रभुता बढ़ाऊँगा।”
(3) मानव-स्वभाव का पारखी-अकबर बहुत बुद्धिमान है। वह शक्तिसिंह, मानसिंह और राणा प्रताप के चरित्र का सही मूल्यांकन करता है-”एक प्रताप है, जो मातृभूमि के लिए प्राण हथेली पर लिये फिरता है और एक तुम हो, जो मातृभूमि के सर्वनाश के लिए खाइयाँ खोदते फिरते हो।”
(4) सदगुणों का प्रशंसक-अकबर व्यक्ति के सद्गुणों की प्रशंसा करने से नहीं चूकता, चाहे वे सद्गुण उसके शत्रु में ही क्यों न हों। यह विशेषता उसे महानता प्रदान करती है। वे हृदय से राणा की वीरता और स्वाभिमान की प्रशंसा करता है-*”………….धन्य है मेवाड़! और धन्य हैं मेवाड़ की गोद में पलने वाले महाराणा प्रताप ! प्रताप मनुष्य रूप में देवता हैं, मानवता की अखण्ड ज्योति हैं।”
(5) साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक-अकबर हिन्दू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है। उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही’ मत इसी साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है। वह मानवीय गुणों का आदर करता है। वह महाराणा की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए कहता है- “हमारा और आपका मिलन ! यह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं महाराणा ! दो धर्म-प्रवाहों का मिलन है, जिससे इस देश की संस्कृति सुदृढ़ तथा पुष्ट होगी।”
(6) कूटनीतिज्ञ-अकबर कुशल कूटनीतिज्ञ है। वह प्रत्येक निर्णय कूटनीति से लेता है। उसकी चतुर कूटनीति का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-”प्रताप का भाई शक्तिसिंह स्वयं जादू के जाल में फंसकर माया की तरंगों में डुबकियाँ लगी रहा है। उसी को मेवाड़ के विध्वंस का साधन बनाऊँगा।”

प्रश्न 5.
राजमुकुट के आधार पर प्रमिला का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर सिद्ध कीजिए कि इसमें नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है किन्तु ये अपना-अपना प्रभाव छोड़ने में पूर्णरूपेण सक्षम हैं।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के प्रमुख स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2015)
उत्तर
‘राजमुकुट के नारी-पात्र । श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ में नारी-पात्रों का समावेश नगण्य है। इसमें प्रमिला, प्रजावती, गुणवती और चम्पा प्रमुख नारी पात्र हैं।
प्रमिला नाटक की एक साधारण स्त्री-पात्र है। वह जगमल के चापलूस सरदार हाथीसिंह की पत्नी है। वह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने पति को देश के कल्याण के लिए बलिदान हो जाने का संन्देश देती है। नाटक के तृतीय दृश्य में इसका राष्ट्रप्रेम अभिव्यक्त होता है। वह अपने पति से कहती है-“देश पर जब विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हों, तब देश के नर-नारियों को अधिक परित्याग करना ही चाहिए। यदि देश का कल्याण करने में माँग का सिन्दूर मिट गया, तो चिन्ता की क्या बात।” जब उसका पति कहता है-“खाँडे का नाम सुनकर ही मेरे प्राणों में भूचाल आने लगता है”-तो प्रमिला उस पर व्यंग्य करती हुई कहती है-“तो लहँगा पहनकर हाथों में चूड़ियाँ डाल लो। पूँघट निकालकर घर के कोने में जाकर बैठे रहो।”

प्रजावती निरपराध, पवित्र, जनहित में लगी रहने वाली, स्वाभिमानिनी तथा देशप्रेमी व प्रजावत्सल नारी है। नाटककार ने उसे मंच पर उपस्थित नहीं किया है, वरन् अन्य पात्रों के माध्यम से ही उसके चरित्र की

विशेषताओं को उजागर किया गया है। जगमल का एक सैनिक उसके चरित्र पर प्रकाश डालता हुआ कहता है-“वह विक्षिप्ता है महाराज! दिन भर झाड़ियों और कन्दराओं में छिपी रहती है। जब रात होती है तब बाहर निकलकर अपने जीवनगान से सम्पूर्ण उदयपुर को प्रतिध्वनित कर देती है। वह रात भर अपने गान को मादिनी पर, पाषाणों पर, दीवारों पर लिखती फिरती है। उसका जीवन-गान उदयपुर में धर्म-गीत बन रहा है।” राणा जगमल अपने क्रूर चाटुकारों के कहने से उसका वध करवा देता है। प्रजावती के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए प्रजा का नायक चन्दावत कहता है-“वह कृषकों और श्रमिकों के जीवन को प्रकाश थी; उनके प्राणों की आशा थी; उनकी धमनियों का रक्त थी।”

गुणवती मेवाड़ के राणा प्रताप की पत्नी हैं, जो उनके साथ वनवास के कष्टों को सहर्ष सहन करती हैं। तथा अपने पति का हर संकट में साथ देती हैं।
चम्पा महाराणा की पुत्री है। वह नाटक के अन्त में मंच पर उपस्थित होती है। उसे अपने पिता के साथ वन में भटकते और कष्ट सहन करते हुए दिखाया गया है।
इस प्रकार इस नाटक में नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है, किन्तु भावनात्मक स्तर पर वे पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 6.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर मानसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012]
उत्तर
मानसिंह; श्री व्यथित हृदय द्वारा रचित ‘राजमुकुट’ नाटक का एक प्रमुख पात्र तथा अकबर का सेनापति है। वह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा ने उससे स्वयं भेट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वह वहाँ से लौट गया। वह दिल्ली के सम्राट् अकबर से जाकर मिला और उसके निर्देश और अपने नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ पहुँचा। मुगल और राजपूत दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ।

इस प्रकार मानसिंह एक असंयत मनोवृत्ति का व्यक्ति था, जिसमें सहनशीलता का अभाव था। उसने बदले की भावना से प्रेरित होकर, मुगल सम्राट अकबर की सहायता से राणा पर आक्रमण करके विधर्मी और विश्वासघाती होने का परिचय दिया।

प्रश्न 7.
“राष्ट्रनायक चन्दावत’ राजमुकुट नाटक का एक प्रभावशाली चरित्र है।” इस कथन के आलोक में ‘चन्दावत’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
नाटककार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक में ‘चन्दावत’ नामक पात्र का भी वर्णन किया है जो राष्ट्रनायक है और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भलीभाँति निभाता है, उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कर्त्तव्य के प्रति जागरूक-इस नाटक में ‘चन्दावत’ को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया। गया है। वह मर्यादाओं के पालन में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। जब राणा जगमल अपने राज-कर्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब जाते हैं, इस कारण राष्ट्रनायक चन्दवत बड़े दु:खी हैं। इसलिए वे जगमले को फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हों; अतः राजमुकुट किसी उचित उत्तराधिकारी को सौंप दो।
(2) महान् त्यागी एवं बलिदानी-‘चन्दावत’ महात्यागी एवं बलिदानी व्यक्ति है। युद्ध के मैदान में देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए, उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश पर अपने प्राण बलिदान कर देते हैं।
(3) सच्चा देशभक्त–चन्दावत एक सच्चा देशभक्त है। देशभक्ति की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार जानता है। युद्ध में राणा के प्राण बचाने के लिए उसका मुकुट स्वयं धारण करना देशभक्ति का एक अप्रतिम उदाहरण उसने प्रस्तुत किया है।
(4) दूरदर्शी-चन्दावत दूर की सोचने वाला व्यक्ति है। जब जगमल सुरासुन्दरी का दास होकर रह जाता है। जनता उसका विरोध करती है, तो वह जगमल से उचित उत्तराधिकारी को मुकुट सौंपने को कह देते हैं और स्वयं राणा को राजमुकुट पहनाते हैं जिससे जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि चन्दावत एक त्यागी, बलिदानी, दूरदर्शी और एक सच्चा देशभक्त था।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक
Number of Questions 48
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

वासुदेवशरण अग्रवाल

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) निम्नलिखित में कौन-सा निबन्ध-संग्रह नहीं है ?
(क) भारत की एकता
(ख) पृथिवी-पुत्र
(ग) कल्पवृक्ष
(घ) पाणिनिकालीन भारतवर्ष

(2) पाणिनिकालीन भारतवर्ष’ किस विधा की रचना है ?
(क) पत्र-पत्रिका
(ख) निबन्ध
(ग) आलोचन
(घ) शोध – निबन्ध

(3) ‘कल्पवृक्ष’ निबन्ध के रचनाकार हैं-
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) मोहन राकेश
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल

(4) निम्नलिखित में से कौन छायावादोत्तर युग के लेखक हैं ? [2013]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) राय कृष्णदास
(ग) बाबू गुलाबराय
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल

(5) ‘पृथिवी-पुत्र’ और ‘माता-भूमि’ नामक निबन्ध-संग्रह के रचनाकार हैंया ‘पृथिवी-पुत्र’ निबन्ध-संग्रह है- [2015, 17]
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर

(6) ‘राष्ट्र का स्वरूप’ निबन्ध के रचयिता हैं-
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) रायकृष्ण दास
(ग) वासुदेवशरण अग्रवाल
(घ) मोहन राकेश

(7) ‘राष्ट्र का स्वरूप’ निबन्ध संकलित है [2018]
(क) “कल्पलता’ में
(ख) “पृथिवी-पुत्र’ में
(ग) “कल्पवृक्ष’ में
(घ) “मातृभूमि’ में

उत्तर (1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) ख, (6) ग, (7) ख।

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) लघुकथा, संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताजविधाओं का इन्होंने प्रवर्तन और पोषण किया-
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) जैनेन्द्र कुमार
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर

(2) ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ पत्र के सम्पादक थे-
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) मोहन राकेश
(ग) जैनेन्द्र कुमार
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर

(3) ‘क्षण बोले कण मुसकाये’ और ‘बाजे पायलिया के हुँघरू’ दोनों ललित-निबन्ध विधा की रचनाएँ हैं; इनके रचनाकार हैं-
(क) विद्यानिवास मिश्र
(ख) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(4) ‘दीप जले शंख बजे’ किस लेखक द्वारा रचित संस्मरण विधा की रचना है ?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(5) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित कौन-सी रचना रेखाचित्र है ?
(क) नयी पीढ़ी के विचार
(ख) धरती के फूल
(ग) आकाश के तारे
(घ) क्षण बोले कण मुसकाये

(6) इनमें से किस लेखक ने अपनी सर्वाधिक रचनाएँ रेखाचित्र विधा में की हैं ?
(क) विद्यानिवास मिश्र
(ख) जैनेन्द्र कुमार।
(ग) मोहन राकेश
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर

(7) देवबन्द(सहारनपुर) जन्म-स्थान है [2015]
(क) मोहन राकेश का
(ख) श्यामसुन्दर दास का
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द का
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का

(8) ‘भूले बिसरे चेहरे’ के रचनाकार हैं (2018)
(क) रामधारीसिंह ‘दिनकर’
(ख) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

उत्तर (1) घ, (2) घ, (3) ख, (4) ग, (5) के, (6) घ, (7) घ, (8) ख।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ।

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) निम्नलिखित रचनाओं में कौन-सी रचना आलोचना विधा की रचना है ?
(क) अशोक के फूल
(ख) हिन्दी-साहित्य
(ग) पुनर्नवा
(घ) साहित्य का मर्म

(2) निम्नलिखित में कौन-सी रचना ‘इतिहास’ नहीं है ?
(क) हिन्दी-साहित्य की भूमिका
(ख) हिन्दी-साहित्य
(ग) हिन्दी-साहित्य का आदिकाल
(घ) बाणभट्ट की आत्मकथा

(3) ‘अशोक के फूल’ तथा ‘विचार-प्रवाह’ निबन्ध-संग्रह के लेखक हैं-
(क) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(घ) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

(4) ‘कुटज’ किस विधा की रचना है?
(क) कहानी
(ख) संस्मरण
(ग) उपन्यास
(घ) ललित निबन्ध

(5) इनमें से कौन-सी रचना उपन्यास नहीं है ?
(क) अनामदास का पोथा
(ख) चारु चन्द्रलेख
(ग) आलोक पर्व
(घ) बाणभट्ट की आत्मकथा

(6) ‘कालिदास की लालित्य योजना’ किस विधा की रचना है ?
(क) आलोचना
(ख) संस्मरण
(ग) नाटक
(घ) निबन्ध

(7) हिन्दी के उच्च स्तरीय ललित-निबन्धकारों में इनका मूर्धन्य स्थान है-
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) जयशंकर प्रसाद

(8) निम्नलिखित में कौन छायावादी युग के गद्य-लेखक हैं ?
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) नन्ददुलारे वाजपेयी

(9) हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म-काल है–
(क) 1907 ई०
(ख) 1906 ई०
(ग) 1902 ई०
(घ) 1905 ई०

(10) हजारीप्रसाद द्विवेदी का लेखन-युग है
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावाद युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(11) हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध किस श्रेणी में आते हैं ? [2009]
(क) ऐतिहासिक निबन्ध
(ख) मनौवैज्ञानिक निबन्ध
(ग) ललित निबन्ध
(घ) वस्तुप्रधान निबन्ध

(12) सन् 1957 में पद्मभूषण से अलंकृत हुए [2013]
(क) रायकृष्ण दास
(ख) विद्यानिवास मिश्र
(ग) अज्ञेय
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(13) ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ विधा की रचना है [2014]
(क) उपन्यास
(ख) जीवनी
(ग) आत्मकथा
(घ) रिपोर्ताज

(14) डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का उपन्यास है [2015]
(क) त्याग
(ख) भूले-बिसरे चित्र
(ग) अनामदास का पोथा
(घ) सूरज का सातवाँ घोड़ा।

उत्तर(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) ग, (6) क, (7) ग, (8) घ, (9) क, (10) घ, (11) ग, (12) घ, (13) के, (14) ग।

प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) हिन्दीतर प्रदेश के निवासी होते हुए भी इनका हिन्दी भाषा पर अच्छा अधिकार है-
(क) राय कृष्णदास
(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी।
(ग) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(घ) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी

(2) भाषा और आधुनिकता’ किस विधा की रचना है ? (2012)
(क) नाटक
(ख) कहानी
(ग) उपन्यास
(घ) निबन्ध

(3) “लेखन में वैज्ञानिक शब्दावली को ज्यों का त्यों लेना चाहिए।” यह सुझाव है
(क) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का
(ख) राय कृष्णदास का
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी का
(घ) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी का

(4) ‘मेरे विचार’ और ‘वैचारिकी’ नामक निबन्ध-संग्रह किस लेखक के द्वारा रचित हैं ?
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) जैनेन्द्र कुमार।
(ग) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

(5) ‘साहित्य और समाज’ नामक कृति किस विधा की रचना है ?
(क) नाटक
(ख) निबन्ध
(ग) आलोचना
(घ) कहानी

(6) ‘शोध और बोध’ नामक शोध-कृति के रचनाकार हैं-
(क) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) जैनेन्द्र कुमार।
(घ) मोहन राकेश

उत्तर (1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) ग, (5) ख, (6) क।

हरिशंकर परसाई

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना उपन्यास है ?
(क) और अन्त में
(ख) भूत के पाँव पीछे
(ग) सदाचार का तावीज
(घ) रानी नागफनी की कहानी

(2) वसुधा’ साहित्यिक पत्रिका के प्रकाशक एवं सम्पादक थेया ‘वसुधा’ मासिक पत्रिका का सम्पादन किया था [2016]
(क) राय कृष्णदास
(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ग) अज्ञेय
(घ) हरिशंकर परसाई

(3) समाज की कमजोरियों एवं राजनीति के फरेबों पर करारे व्यंग्य लिखने में सिद्धहस्त थे-
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी ।
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ग) प्रोफेसर जी० सुन्दर रेड्डी
(घ) हरिशंकर परसाई

(4) इनकी शैली व्यंग्यप्रधान है और इन्होंने हिन्दी में व्यंग्य-लेखन को नयी दिशा दी
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) हरिशंकर परसाई
(ग) मोहन राकेश
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(5) इनमें से कौन-सी रचना ‘निबन्ध’ विधा की रचना नहीं है ?
(क) तट की खोज
(ख) भूत के पाँव पीछे
(ग) सदाचार का तावीज ।
(घ) शिकायत मुझे भी है।

(6) इनमें से कौन-सी ‘निबन्ध’ विधा की रचना परसाई द्वारा रचित नहीं है ?
(क) तब की बात और थी।
(ख) बेईमानी की परत
(ग) बकलमखुद
(घ) पगडण्डियों का जमाना

(7) निम्नलिखित में से छायावादोत्तर गद्यकार हैं-
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) श्यामसुन्दर दास

(8) निन्दा रस’ निबन्ध के रचनाकार हैं [2011, 13, 16, 17, 18]
(क) हेजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) प्रेमचन्द
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) जैनेन्द्र कुमार

उत्तर (1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) ख, (5) क, (6) ग, (7) ग, (8) ग।

डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम

उचित विकल्प का चयन कीजिए–

(1) डॉ० अब्दुल कलाम का जन्मस्थान है
(क) बनारस
(ख) फर्रुखाबाद
(ग) तमिलनाडु
(घ) दिल्ली

(2) भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति कौन थे?
(क) डॉ० अब्दुल कलाम ।
(ख) डॉ० राधाकृष्णन
(ग) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(घ) इनमें से कोई नहीं

(3) डॉ० अब्दुल कलाम को इनमें से किस सम्मान से सम्मानित किया गया?
(क) पद्मभूषण
(ख) पद्मविभूषण
(ग) भारतरत्न
(घ) इनमें से कोई नहीं

(4) ‘मिशन इण्डिया’ पुस्तक के लेखक हैं-
(क) पं० जवाहरलाल नेहरू
(ख) प्रणब मुखर्जी
(ग) अब्दुल कलाम
(घ) गांधी जी

(5) डॉ० अब्दुल कलाम का निधन हुआ-
(क) 27 जुलाई, 2015 को
(ख) 15 जुलाई, 2017 को
(ग) 27 जुलाई, 2014 को
(घ) 15 अगस्त, 2015 को

उत्तर (1) ग, (2) क, (3) ख, (4) ग, (5) क।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास  अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Number of Questions 173
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
गद्य एवं पद्य का अन्तर दो पंक्तियों में लिखिए।
उत्तर
वाक्यबद्ध विचारात्मक रचना को गद्य कहते हैं। दैनिक जीवन की बोलचाल में गद्य को ही प्रयोग होता है, जब कि छन्दबद्ध, भावपूर्ण और गेय रचनाएँ पद्य कहलाती हैं।

प्रश्न 2
हिन्दी की आठ बोलियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर

  1. ब्रज,
  2. अवधी,
  3. बुन्देली,
  4. बघेली,
  5. छत्तीसगढ़ी,
  6. हरियाणवी,
  7. कन्नौजी तथा
  8. खड़ी बोली।

प्रश्न 3
हिन्दी गद्य के प्राचीनतम प्रयोग किन भाषाओं में मिलते हैं ?
उत्तर
हिन्दी गद्य के प्राचीनतम प्रयोग राजस्थानी और ब्रज भाषाओं में मिलते हैं।

प्रश्न 4
प्राचीन ब्रज भाषा गद्य की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
गोकुलनाथ कृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ और बैकुण्ठमणि कृत ‘अगहन माहात्म्य’; प्राचीन ब्रज भाषा गद्य की रचनाएँ हैं।

प्रश्न 5
खड़ी बोली गद्य की प्रथम प्रामाणिक रचना तथा उसके लेखक का नाम व समय लिखिए।
उत्तर
रचना–गोरा बादल की कथा। लेखक–जटमल। समय–सन् 1623 ई०।

प्रश्न 6
खड़ी बोली गद्य की सबसे प्राचीन रचना कौन-सी है ?
उत्तर
खड़ी बोली गद्य की सबसे प्राचीन रचना कवि गंग द्वारा लिखित ‘चंद छंद बरनन की महिमा’ है।

प्रश्न 7
खड़ी बोली गद्य के दो प्रारम्भिक उन्नायकों के नाम लिखिए।
उत्तर
खड़ी बोली गद्य के दो प्रारम्भिक उन्नायक हैं—

  1. सदल मिश्र तथा
  2. पं० लल्लूलाल।

प्रश्न 8
‘अष्टयाम’ की कौन-सी भाषा है ? [2010]
उत्तर
‘अष्टयाम’ शीर्षक से चार लोगों-खुमान, हितहरिवंश, देव, नाभादास–ने रचनाएँ की हैं। ‘अष्टयाम’ की भाषा ब्रजभाषा है।

प्रश्न 9
भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य के चार प्रवर्तकों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
या
कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम कॉलेज के उन दो हिन्दी-शिक्षकों के नाम लिखिए, जिन्हें खड़ी बोली गद्य का प्रारम्भिक उन्नायक माना जाता है।
या
लल्लूलाल किस कॉलेज में हिन्दी-अध्यापक थे ? उनकी प्रसिद्ध रचना का नाम लिखिए।
या
खड़ी बोली के प्रारम्भिक उन्नायकों में विशेष रूप से जिन चार लेखकों का उल्लेख किया जाता है, उनमें से किन्हीं दो की एक-एक रचना का नाम लिखिए। [2009, 10]
उत्तर
भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य के चार प्रवर्तकों और उनकी एक-एक रचनाओं के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. इंशा अल्ला खाँ-रानी केतकी की कहानी।।
  2. सदासुखलाल-सुखसागर।
  3. लल्लूलाल–प्रेमसागर।
  4. सदल मिश्र-नासिकेतोपाख्यान।।

इनमें सदल मिश्र तथा लल्लूलाल कलकत्ता के ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ में अध्यापक थे।

प्रश्न 10
भारतेन्दु युग के किन्हीं दो लेखकों की दो-दो कृतियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर
(1) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-

  • वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति तथा
  • अकबर और औरंगजेब।

(2) प्रतापनारायण मिश्र–

  • हठी हम्मीर तथा
  • देशी कपड़ा।

प्रश्न 11
भारतेन्दु युग से पूर्व किन दो राजाओं ने हिन्दी गद्य के निर्माण में योग दिया ?
या
हिन्दी गद्य की उर्दूप्रधान तथा संस्कृतप्रधान शैलियों के पक्षधर दो राजाओं के नाम लिखिए।
या
भारतेन्दु के उदय से पूर्व की खड़ी बोली के दो भिन्न शैलीकार गद्य-लेखकों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर
भारतेन्दु युग से पूर्व राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द’ ने अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी लिखकर तथा राजा लक्ष्मण सिंह ने संस्कृत मिश्रित खड़ी बोली को अपनाकर हिन्दी गद्य के निर्माण में योगदान दिया।

प्रश्न 12
हिन्दी गद्य के विकास में ईसाई धर्म-प्रचारकों के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
ईसाई पादरियों ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए ‘बाइबिल’ एवं अन्य धार्मिक पुस्तकों का साधारण बोलचाल की हिन्दी भाषा में अनुवाद करवाया।

प्रश्न 13
भारतीय जागरण को देशव्यापी बनाने में किन संस्थाओं ने विशेष योगदान दिया ?
उत्तर

  1. आर्य समाज,
  2. प्रार्थना समाज,
  3. ब्रह्म समाज,
  4. रामकृष्ण मिशन एवं
  5. थियोसॉफिकल सोसाइटी।।

प्रश्न 14
भारतेन्दु के समकालीन या भारतेन्दु युग के चार गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. पं० बालकृष्ण भट्ट,
  2. प्रतापनारायण मिश्र,
  3. किशोरीलाल गोस्वामी,
  4. लाला श्रीनिवास दास।

प्रश्न 15
खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास कब हुआ ?
उत्तर
खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास भारतेन्दु युग में हुआ।

प्रश्न 16
भारतेन्दु युग की दो पत्रिकाओं एवं उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
या
भारतेन्दु युग की दो प्रसिद्ध पत्रिकाओं के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर

  1. ‘ब्राह्मण’–प्रतापनारायण मिश्र तथा
  2. हिन्दी प्रदीप’-पं० बालकृष्ण भट्ट्ट।

प्रश्न 17
भारतेन्दु युग के गद्य की मुख्य विशेषताएँ बताइट।
उत्तर
भारतेन्दु युग के गद्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. भारतेन्दु युग का गद्य सरल-सरस है,
  2. इसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का अधिक प्रयोग हुआ है,
  3. इसमें तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है तथा
  4. इसमें व्याकरण की त्रुटियाँ हैं।

प्रश्न 18
भारतेन्दु युग में किन गद्य-विधाओं का विकास हुआ ?
उत्तर
भारतेन्दु युग में नाटक, कहानी, उपन्यास एवं निबन्ध गद्य-विधाओं का विकास हुआ।

प्रश्न 19
निम्नलिखित में से किन्हीं दो पत्रिकाओं के सम्पादकों के नाम लिखिए
(1) आनन्द कादम्बिनी,
(2) हरिश्चन्द्र चन्द्रिका,
(3) नया जीवन।
या
‘आनन्द कादम्बिनी’ के सम्पादक कौन थे? [2017]
उत्तर
(1) आनन्द कादम्बिनी – सम्पादक : बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’।
(2) हरिश्चन्द्र चन्द्रिका – सम्पादक : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।
(3) नया जीवन – सम्पादक : कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।

प्रश्न 20
द्विवेदी युग के दो प्रमुख लेखकों की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
द्विवेदी युग के दो प्रसिद्ध निबन्धकारों (लेखकों) के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. बाबू श्यामसुन्दर दास-साहित्यालोचन।
  2. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी–रसज्ञ-रंजन।

प्रश्न 21
द्विवेदी युग में प्रकाशित चार पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. सरस्वती,
  2. मर्यादा,
  3. माधुरी तथा
  4. इन्दु।।

प्रश्न 22
22 द्विवेदी युग का समय बताइए और उस व्यक्ति का पूरा नाम बताइए, जिसके कारण इसे ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है।
उत्तर
द्विवेदी युग का समय सन् 1900 ई० से 1920 ई० तक है। इस युग को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है।

प्रश्न 23
द्विवेदी युग के हिन्दी गद्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
द्विवेदी युग का हिन्दी गद्य व्याकरण-सम्मत, परिमार्जित तथा पद-विन्यास व वाक्य-विन्यास से युक्त है। इसमें औदात्य, पाण्डित्य एवं प्रवाह है। इसकी भाषा-शैली अत्यन्त परिष्कृत, सामासिक तथा प्रवाहपूर्ण है।

प्रश्न 24
‘शुक्ल युग’ को यह नाम क्यों दिया गया है ?
या
हिन्दी-काव्य के छायावाद युग’ के समय को हिन्दी गद्य-साहित्य में शुक्ल युग’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर
सन् 1919 ई० से 1938 ई० तक के काल को हिन्दी गद्य-साहित्य में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के महत्त्वपूर्ण योगदान के कारण ‘शुक्ल युग’ अथवा ‘छायावाद युग’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 25
आलोचना, नाटक, उपन्यास एवं कहानी के क्षेत्र में प्रसिद्ध शुक्ल युग के तीन गद्य रचनाकारों के नाम बताइए।
उत्तर
शुक्ल युग के तीन प्रमुख गद्य-रचनाकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचन्द हैं, जो क्रमश: आलोचना, नाटक एवं उपन्यास तथा कहानी के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 26
शुक्ल युग के प्रमुख गद्यकारों के नाम बताइट। उत्तर जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, नन्ददुलारे वाजपेयी, महादेवी वर्मा, राय कृष्णदास, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि शुक्ल युग के प्रमुख गद्यकार हैं।

प्रश्न 27
‘शुक्ल युग’ को अन्य किन नामों से जाना जाता है ?
उत्तर
शुक्ल युग को ‘छायावाद युग’, ‘प्रसाद युग’ एवं ‘प्रेमचन्द युग’ नामों से जाना जाता है।

प्रश्न 28
छायावाद युग के किन्हीं दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. चन्द्रगुप्त तथा
  2. अजातशत्रु।।

प्रश्न 29
छायावाद युग में गद्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख लेखकों एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
जयशंकर प्रसाद (चन्द्रगुप्त), प्रेमचन्द ( गबन, गोदान), बाबू गुलाबराये ( मेरी असफलताएँ) तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (चिन्तामणि) आदि छायावाद युग में गद्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख लेखक हैं।।

प्रश्न 30
छायावादयुगीन किन्हीं दो ऐसे गद्य-लेखकों के नाम बताइए जो कवि न हों।
उत्तर
छायावादयुगीन गद्य-लेखक राहुल सांकृत्यायन एवं बाबू गुलाबराय कवि नहीं थे।

प्रश्न 31
ऐसे तीन गद्य-लेखकों के नाम लिखिए, जिन्होंने द्विवेदी युग तथा छायावाद युग दोनों में लेखन-कार्य किया।
उत्तर
द्विवेदी युग और छायावाद युग दोनों में लेखन-कार्य करने वाले तीन गद्य-लेखक हैं-

  1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,
  2. बाबू गुलाबराय तथा
  3. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी।

प्रश्न 32
छायावादोत्तर युग की प्रमुख गद्य-विधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
नाटक, कहानी, उपन्यास, समालोचना, जीवनी, गद्य-गीत, एकांकी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, संस्मरण एवं रेखाचित्र आदि छायावादोत्तर युग की प्रमुख गद्य-विधाएँ हैं।

प्रश्न 33
छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरिशंकर परसाई, यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, धर्मवीर भारती, विद्यानिवास मिश्र, कमलेश्वर आदि छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखक हैं।

प्रश्न 34
मुंशी सदासुखलाल की भाषा की विशेषताएँ बताइट।
उत्तर

  1. भाषा में अस्पष्टता अधिक है तथा
  2. वाक्य-रचना पर फारसी शैली का प्रभाव है।

प्रश्न 35
हिन्दी खड़ी बोली गद्य-साहित्य के विकास में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान बताइट।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के गद्य की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लोक-प्रचलित शब्दावली, कहावतों, लोकोक्तियों और मुहावरों के प्रभावपूर्ण प्रयोग से अपनी भाषा को अधिकाधिक सशक्त एवं सजीव बनाया तथा नाटक, कहानी, निबन्ध आदि अनेक गद्य-विधाओं में रचनाएँ कीं। इसलिए इन्हें ‘हिन्दी खड़ी बोली गद्य का जनक’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 36
छायावादी युग के गद्य की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर

  1. छायावादी युग का गद्य कलात्मक है तथा
  2. उसमें विशिष्ट अभिव्यंजना शक्ति, कल्पना की प्रधानता, स्वच्छन्द चेतना, अनुभूति की सघनता और भावुकता विद्यमान है।

प्रश्न 37
किन्हीं दो छायावादी पद्य-लेखकों की एक-एक गद्य रचना का नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जयशंकर प्रसाद – चन्द्रगुप्त (नाटक)।
  2. महादेवी वर्मा – स्मृति की रेखाएँ (संस्मरण)।

प्रश्न 38
छायावादोत्तर हिन्दी गद्य (प्रगतिवादी गद्य) की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
छायावादोत्तर काल का हिन्दी गद्य सहज, व्यावहारिक और अलंकारविहीन था। उसमें भावुकतापूर्ण अभिव्यक्ति का स्थान चुटीली उक्तियों ने ले लिया था।

प्रश्न 39
छायावादोत्तर युग के दो कहानी लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2. अज्ञेय।।

प्रश्न 40
छायावादोत्तर युग के दो लेखकों की एक-एक गद्य-रचना का नाम लिखिए।
उत्तर

  1. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ –– अर्द्धनारीश्वर।
  2. धर्मवीर भारती – गुनाहों के देवता।

प्रश्न 41
छायावादोत्तरयुगीन साहित्यकारों की दोनों पीढ़ियों के एक-एक साहित्यकार का नाम लिखिए।
उत्तर

  1. पहली पीढ़ी – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
  2. दूसरी पीढ़ी – विद्यानिवास मिश्र।

प्रश्न 42
स्वातन्त्र्योत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
स्वातन्त्र्योत्तर युग में विद्यानिवास मिश्र, हरिशंकर परसाई, फणीश्वरनाथ रेणु’, धर्मवीर भारती, प्रभाकर माचवे, रजनी पणिक्कर, मोहन राकेश, मन्नू भण्डारी, शिवानी, नागार्जुन आदि प्रमुख गद्य-लेखक हुए।

प्रश्न 43
निम्नलिखित गद्य-लेखकों की एक-एक प्रसिद्ध गद्य-रचना का नाम लिखिए
(1) राजेन्द्र यादव तथा
(2) धीरेन्द्र वर्मा।
उत्तर
(1) लेखक-राजेन्द्र यादव, रचना-चेखव : एक इण्टरव्यू, विधा-भेटवार्ता (काल्पनिक)।
(2) लेखक-धीरेन्द्र वर्मा, रचना-मेरी कॉलेज डायरी, विधा-डायरी।

प्रश्न 44
निम्नलिखित लेखकों की एक-एक प्रसिद्ध गद्य-रचना का नाम लिखिए–
(1) महादेवी वर्मा तथा
(2) लक्ष्मीचन्द्र जैन।
उत्तर
(1) लेखिका-महादेवी वर्मा, रचना–पथ के साथी; अतीत के चलचित्र; स्मृति की रेखाएँ, विधा-संस्मरण; संस्मरण/रेखाचित्र।।
(2) लेखक-लक्ष्मीचन्द्र जैन, रचना-भगवान् महावीर : एक इण्टरव्यू, विधा-भेटवार्ता (काल्पनिक)।

प्रश्न 45
निम्नलिखित लेखकों की एक-एक रचना का नाम लिखिए–
(1) विद्यानिवास मिश्र,
(2) डॉ० नगेन्द्र,
(3) हजारीप्रसाद द्विवेदी,
(4) रघुवीर सिंह।
उत्तर
(1) लेखक-विद्यानिवास मिश्र, रचना-मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, विधा-निबन्ध।
(2) लेखक-डॉ० नगेन्द्र, रचना-हिन्दी साहित्य का बृहद् इतिहास, विधा-आलोचना।
(3) लेखक-हजारीप्रसाद द्विवेदी, रचना-कल्पलता (निबन्ध-संग्रह), विधा-निबन्ध।
(4) लेखक-रघुवीर सिंह, रचना–शेष स्मृतियाँ, विधा-संस्मरण।

प्रश्न 46
निम्नलिखित कृतियों में से किन्हीं दो कृतियों के रचनाकार और उनकी विधाओं के नाम लिखिए
(1) अतीत के चलचित्र,
(2) लहरों के राजहंस,
(3) श्रद्धा-भक्ति।
उत्तर
(1) कृति-अतीत के चलचित्र, रचनाकार-महादेवी वर्मा, विधा-रेखाचित्र।
(2) कृति-लहरों के राजहंस, रचनाकार-मोहन राकेश, विधा-नाटक।

प्रश्न 47
हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
निबन्ध, नाटक, कहानी, उपन्यास, एकांकी तथा आलोचना हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाएँ हैं।

प्रश्न 48
छायावादोत्तर युग में प्रारम्भ एवं समृद्ध होने वाली प्रकीर्ण गद्य-विधाओं में से किन्हीं दो विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, गद्यकाव्य, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, डायरी, भेटवार्ता, पत्र-साहित्य आदि हिन्दी की गौण या प्रकीर्ण गद्य-विधाएँ हैं।

प्रश्न 49
प्रकीर्ण गद्य-विधाओं का अभूतपूर्व विकास किस युग में हुआ ?
उत्तर
प्रकीर्ण गद्य-विधाओं का अभूतपूर्व विकास छायावादोत्तर युग में हुआ।

प्रश्न 50
(1) भारतेन्दु युग के निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(2) द्विवेदी युग के निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(3) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और उनके बाद के युग के दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(4) स्वातन्त्र्योत्तर युग के दो निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
(1) भारतेन्दु युग-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट।
(2) द्विवेदी युग-आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, पद्मसिंह शर्मा, अध्यापक पूर्णसिंह।
(3) शुक्ल युग-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, गुलाबराय, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल। शुक्लोत्तर युग–डॉ० नगेन्द्र, श्रीमती महादेवी वर्मा, वासुदेवशरण अग्रवाल।
(4) स्वातन्त्र्योत्तर युग-विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय।

प्रश्न 51
विषय और शैली की दृष्टि से निबन्ध के प्रमुख कितने भेद हैं ? उनके नाम लिखिए।
उत्तर
विषय और शैली की दृष्टि से निबन्ध के प्रमुख चार भेद हैं-

  1. विचारात्मक निबन्ध,
  2. भावात्मक निबन्ध,
  3. वर्णनात्मक निबन्ध तथा
  4. विवरणात्मक निबन्ध।

प्रश्न 52
निबन्ध की परिभाषा लिखिए तथा उसके चारे भेदों में से किसी एक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
निबन्ध उस गद्य-रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के अन्तर्गत किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन; एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता और सम्बद्धता के साथ किया गया हो। निबन्ध का एक भेद, वर्णनात्मक निबन्ध है।

प्रश्न 53
हिन्दी में निबन्ध-रचना का आरम्भ किस युग में माना जाता है ? दो युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी में निबन्ध-रचना का आरम्भ भारतेन्दु युग से माना जाता है। हिन्दी के दो युग-प्रवर्तक निबन्धकार आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं।

प्रश्न 54
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किस प्रकार के निबन्धों की रचना की ?
उत्तर
शुक्ल जी ने विचारप्रधान, समीक्षात्मक तथा मनोवैज्ञानिक निबन्धों की रचना की।

प्रश्न 55
हिन्दी के प्रमुख भावात्मक निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी के भावात्मक निबन्ध लिखने वालों में वियोगी हरि, सरदार पूर्णसिंह, राय कृष्णदास, रघुवीर सिंह, महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा विद्यानिवास मिश्र प्रमुख हैं।

प्रश्न 56
हिन्दी के दो युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखकों और उनकी एक-एक निबन्ध पुस्तक के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. श्यामसुन्दर दास-साहित्यिक लेख।
  2. रामचन्द्र शुक्ल–चिन्तामणि (दो भागों में)।

प्रश्न 57
प्रमुख ललित निबन्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, विद्यानिवास मिश्र आदि ललित निबन्धों के प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 58
कहानी अथवा आधुनिक कहानी किस उद्देश्य से लिखी जाती है ?
उत्तर
कहानी का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ व्यक्ति या समाज के महत्त्वपूर्ण अनुभवों, अनुभूतियों एवं यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति करना है, जब कि मानव-जीवन की कुण्ठाओं, भटकाव, संत्रास, दिशाहीनता और यान्त्रिक जड़ता का यथार्थ और मार्मिक चित्रण करना आधुनिक कहानी के अन्यतमे उद्देश्य हैं।

प्रश्न 59
कहानी के कौन-कौन से तत्त्व होते हैं ?
उत्तर
कहानी के सात तत्त्व होते हैं—

  1. शीर्षक,
  2. कथावस्तु या कथानक,
  3. पात्र और चरित्र-चित्रण,
  4. कथोपकथन या संवाद,
  5. देशकाल या वातावरण,
  6. भाषा-शैली तथा
  7. उद्देश्य।

प्रश्न 60
कहानी की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर

  1. लघु कथानक,
  2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण,
  3. मुख्य रूप से एक ही विषय, भाव अथवा संवेदना का प्रस्तुतीकरण तथा
  4.  निश्चित उद्देश्य-कहानी की मुख्य विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 61
नयी कहानी की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर
नयी कहानी जीवन के किसी मार्मिक तथ्य को नाटकीय प्रभाव के साथ व्यक्त करती है तथा उसमें यथार्थता एवं मनोवैज्ञानिकता होती है।

प्रश्न 62
हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी का नाम बताइए। [2009]
उत्तर
कहानी-कला की दृष्टि से किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ हिन्दी-साहित्य की प्रथम मौलिक कहानी है।

प्रश्न 63
आधुनिक युग की किन्हीं दो महिला कथाकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. मन्नू भण्डारी तथा
  2. उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 64
द्विवेदी युग के किन्हीं दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. रामचन्द्र शुक्ल तथा
  2. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी।

प्रश्न 65
हिन्दी के प्रमुख कहानीकारों के नाम बताइट।
उत्तर
मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र कुमार, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, चतुरसेन शास्त्री, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, शैलेश मटियानी, मन्नू भण्डारी, अज्ञेय आदि हिन्दी के प्रमुख कहानीकार हैं।

प्रश्न 66
प्रेमचन्द जी की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर
मन्त्र, ईदगाह, कफन, पंच परमेश्वर, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा आदि प्रेमचन्द की प्रमुख कहानियाँ हैं।

प्रश्न 67
जयशंकर प्रसाद की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर
आकाशदीप, पुरस्कार, ममता, आँधी, इन्द्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि आदि जयशंकर प्रसाद की प्रमुख कहानियाँ हैं।

प्रश्न 68
प्रेमचन्दोत्तर किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में यशपाल एवं जैनेन्द्र कुमार प्रमुख हैं।

प्रश्न 69
हिन्दी के दो कहानी-संग्रहों और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी कहानियों के दो संग्रहों के नाम हैं-‘आकाशदीप’ तथा ‘ज्ञानदान’। इनके लेखकों के नाम क्रमशः हैं—जयशंकर प्रसाद तथा यशपाल।

प्रश्न 70
प्रेमचन्द के समकालीन कहानीकारों में से किन्हीं दो के नाम लिखिए।
उत्तर
राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह एवं विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ प्रेमचन्द के समकालीन कहानीकार थे। इनकी कहानियों में क्रमशः ‘कानों में कॅगना’ एवं ‘कलाकार का दण्ड’ लोकप्रिय हैं।

प्रश्न 71
आधुनिक युग के किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
या
प्रेमचन्द के बाद के किन्हीं दो प्रमुख कहानीकारों के नाम लिखिए।
या
छायावादोत्तर युग के किन्हीं दो कहानी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
जैनेन्द्र कुमार, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय आदि आधुनिक युग के प्रसिद्ध कहानीकार हैं।

प्रश्न 72
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध कहानीकार का नाम लिखिए।
उत्तर
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध कहानीकार जयशंकर प्रसाद थे।

प्रश्न 73
स्वतन्त्रता के पश्चात् के प्रमुख कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
स्वतन्त्रता के पश्चात् के प्रमुख कहानीकारों में विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 74
हिन्दी के कहानी लेखकों में से किन्हीं दो की एक-एक कहानी का नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी के कहानी लेखकों में प्रेमचन्द एवं जयशंकर प्रसाद की एक-एक कहानियाँ क्रमशः ‘नमक का दारोगा’ एवं ‘पुरस्कार’ हैं।

प्रश्न 75
हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम बताइए।
उत्तर
प्रेमचन्द, भगवतीचरण वर्मा, वृन्दावनलाल वर्मा, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार, चतुरसेन शास्त्री, सुदर्शन, इलाचन्द्र जोशी, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, राजेन्द्र यादव, उदयशंकर भट्ट, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि।

प्रश्न 76
हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यास एवं उसके लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर
लाला श्रीनिवास दास द्वारा लिखित परीक्षा-गुरु’ नामक उपन्यास, हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास है।

प्रश्न 77
द्विवेदी युग के दो प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
द्विवेदी युग के दो प्रमुख उपन्यासकार हैं—

  1. किशोरीलाल गोस्वामी तथा
  2. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।।

प्रश्न 78
प्रेमचन्द युग के दो उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. प्रेमचन्द तथा
  2. पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’।

प्रश्न 79
मुंशी प्रेमचन्द के प्रमुख उपन्यासों के नाम लिखिए। या प्रेमचन्द के दो प्रसिद्ध उपन्यासों के नाम लिखिए। [2010, 12]
उत्तर
मुंशी प्रेमचन्द ने गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम, सेवासदन, निर्मला आदि उपन्यासों की रचना की।

प्रश्न 80
जयशंकर प्रसाद के दो उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर
‘कंकाल’ और ‘तितली’।

प्रश्न 81
आधुनिक काल की दो महिला उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. शिवानी तथा
  2. उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 82
प्रमुख आंचलिक उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
फणीश्वरनाथ रेणु’, रांगेय राघव, हिमांशु जोशी, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, देवेन्द्र सत्यार्थी और शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 83
प्रेमचन्द के बाद होने वाले आधुनिक युग के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
या
आधुनिक युग के किन्हीं दो उपन्यासकारों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, जैनेन्द्र कुमार, उपेन्द्रनाथ अश्क’, मोहन राकेश, इलाचन्द्र जोशी, डॉ० धर्मवीर भारती, अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, रांगेय राघव, भगवतीचरण वर्मा आदि प्रेमचन्द के पश्चात् होने वाले प्रमुख उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 84
‘उपन्यास’ और ‘कहानी’ का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कहानी का रचना-फलक आकार में छोटा होता है, जबकि उपन्यास का पर्याप्त विस्तृत। कहानी में प्राय: किसी एक घटना अथवा मनोदशा का वर्णन होता है, जबकि उपन्यास में समग्र मानव-जीवन से सम्बन्धित विविध घटनाओं का समावेश किया जाता है।

प्रश्न 85
उपन्यास का शाब्दिक अर्थ बताइए।
उत्तर
उपन्यास का शाब्दिक अर्थ है-सामने रखना। इसमें ‘प्रसादन’ अर्थात् प्रसन्न करने का भाव भी निहित है। अत: किसी घटना को इस प्रकार सामने रखना कि दूसरों को प्रसन्नता हो, उपन्यस्त करना कहा जाएगा।

प्रश्न 86
उपन्यास की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
हिन्दी में उपन्यास को अंग्रेजी के नॉवेल शब्द का पर्याय माना जाता है। उपन्यास गद्य की वह विधा है, जिसमें जीवन का व्यापक चित्रण रोचक एवं सजीव शैली में किया गया हो।

प्रश्न 87
उपन्यास को कितने भागों में विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर
विषय के आधार पर हिन्दी उपन्यासों को निम्नलिखित आठ भागों में विभाजित किया जा सकता है—

  1. सामाजिक,
  2. राजनीतिक,
  3. ऐतिहासिक,
  4. पौराणिक,
  5. मनोवैज्ञानिक,
  6. आंचलिक,
  7.  तिलिस्मी/जासूसी,
  8.  क्रान्तिकारी आदि।

प्रश्न 88
हिन्दी के दो प्रसिद्ध उपन्यासकारों एवं उनके उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी के दो उपन्यासकारों एवं उनके उपन्यासों के नाम निम्नलिखित हैं

  1. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी–बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचन्द्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा।
  2. श्री भगवतीचरण वर्मा–चित्रलेखा, भूले-बिसरे चित्र, तीन वर्ष, टेढ़े-मेढ़े रास्ते।

प्रश्न 89
हिन्दी के प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी के प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार एवं उनके उपन्यासों के नाम निम्नलिखित हैं

  1. जैनेन्द्र कुमार-परख, सुनीता, त्यागपत्र आदि।।
  2. इलाचन्द्र जोशी–जहाज का पंछी, घृणापथ आदि।
  3. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’–शेखर : एक जीवनी (दो भाग), नदी के द्वीप आदि।

प्रश्न 90
भारतीय और पाश्चात्य दृष्टि से नाटक के तत्त्व बताइए।
उत्तर
भारतीय आचार्यों ने नाटकों के पाँच तत्त्व माने हैं—

  1. वस्तु,
  2. नेता,
  3. रस,
  4. अभिनय एवं
  5. वृत्ति।

पाश्चात्य विद्वानों ने नाटक के छः तत्त्व स्वीकार किये हैं—

  1. कथावस्तु,
  2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण,
  3. कथोपकथन,
  4. देशकाल,
  5. भाषा-शैली एवं
  6. उद्देश्य।।

प्रश्न 91
नाटक श्रव्य-काव्य है अथवा दृश्य-काव्य ?
उत्तर
नाटक दृश्य-काव्य है।

प्रश्न 92
हिन्दी के प्रथम नाटक एवं उसके रचयिता का नाम लिखिए। [2014]
उत्तर
गोपालचन्द्र गिरिधरदास द्वारा रचित ‘नहुष’ को हिन्दी का प्रथम नाटक माना जाता है।

प्रश्न 93
हिन्दी के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, वृन्दावनलाल वर्मा, लक्ष्मीनारायण मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सेठ गोविन्ददास, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ आदि हिन्दी के प्रमुख नाटककार हैं।

प्रश्न 94
भारतेन्दु युग के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर
भारतेन्दु युग के प्रमुख नाटककारों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अतिरिक्त बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, लाला श्रीनिवास दास आदि के नाम प्रमुख हैं।।

प्रश्न 95
जयशंकर प्रसाद के समकालीन प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर
जयशंकर प्रसाद के समकालीन नाटककारों में प्रमुख हैं—

  1. हरिकृष्ण ‘प्रेमी’,
  2. लक्ष्मीनारायण मिश्र,
  3. गोविन्दवल्लभ पन्त,
  4. सेठ गोविन्ददास आदि।

प्रश्न 96
जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर
चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, राज्यश्री तथा अजातशत्रु-जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक हैं।

प्रश्न 97
प्रसादोत्तर (छायावादोत्तर) युग के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
या
आधुनिक काल के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. डॉ० रामकुमार वर्मा,
  2. सेठ गोविन्ददास,
  3. मोहन राकेश,
  4. विष्णु प्रभाकर,
  5. उपेन्द्रनाथ अश्क’,
  6. डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल एवं
  7. धर्मवीर भारती।

प्रश्न 98
हिन्दी के ऐतिहासिक नाटककारों एवं उनके एक-एक नाटक का नाम लिखिए।
या
हिन्दी के किसी प्रसिद्ध नाटककार एवं उसके द्वारा रचित नाटक का नाम बताइट।
उत्तर
हिन्दी के ऐतिहासिक नाटककार और उनके एक-एक नाटक का नाम निम्नलिखित है-

  1. जयशंकर प्रसाद-चन्द्रगुप्त,
  2. हरिकृष्ण प्रेमी–रक्षाबन्धन,
  3. गोविन्दवल्लभ पन्त-राजमुकुट,
  4. सेठ गोविन्ददास–हर्ष,
  5.  वृन्दावनलाल वर्मा–झाँसी की रानी,
  6. लक्ष्मीनारायण मिश्र-वत्सराज।

प्रश्न 99
हिन्दी एकांकी का जनक किसे माना जाता है ? [2011, 17]
उत्तर
हिन्दी एकांकी का आरम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘अँधेर नगरी’, ‘प्रेमयोगिनी’ आदि रचनाओं से हुआ; अत: भारतेन्दु जी ही हिन्दी एकांकी के जनक हैं, किन्तु आधुनिक हिन्दी एकांकी का जनक डॉ० रामकुमार वर्मा को माना जाता है।

प्रश्न 100
हिन्दी के प्रमूख एकांकीकारों के नाम बताइए।
उत्तर
डॉ० रामकुमार वर्मा, विष्णु प्रभाकर, सेठ गोविन्ददास, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, विनोद रस्तोगी, जगदीशचन्द्र माथुर, उदयशंकर भट्ट, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर आदि हिन्दी के प्रमुख एकांकीकार हैं।।

प्रश्न 101
छायावादोत्तर युग के किन्हीं दो एकांकीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
डॉ० धर्मवीर भारती एवं डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल छायावादोत्तर युग के प्रमुख एकांकीकार

प्रश्न 102
आलोचना विधा के चार प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुन्दर दास तथा डॉ० नगेन्द्र आलोचना विधा के प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 103
हिन्दी गद्य की विविध विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर

  1.  नाटक,
  2. उपन्यास,
  3. एकांकी,
  4. कहानी,
  5. निबन्ध,
  6. आलोचना,
  7. आत्मकथा,
  8. जीवनी,
  9. यात्रावृत्त,
  10. रेखाचित्र,
  11. संस्मरण,
  12. गद्यकाव्य,
  13. रिपोर्ताज,
  14. डायरी,
  15.  रेडियो-रूपक,
  16.  भेटवार्ता आदि।

प्रश्न 104
द्विवेदी युग के प्रमुख आलोचना-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
द्विवेदी युग के प्रमुख आलोचना-लेखकों में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, मिश्रबन्धु, बाबू श्यामसुन्दर दास, पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, लाला भगवानदीन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 105
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध आलोचना-लेखक (आलोचक) कौन थे ?
उत्तर
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध आलोचना-लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल थे।

प्रश्न 106
हिन्दी के दो प्रसिद्ध आलोचकों के नाम बताइए।
उत्तर
हिन्दी के दो प्रसिद्ध आलोचक हैं—

  1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और
  2. बाबू श्यामसुन्दर दास।

प्रश्न 107
आधुनिक युग के किसी प्रसिद्ध गद्य-आलोचक का नाम लिखिए।
उत्तर
आधुनिक युग में डॉ० नगेन्द्र हिन्दी के एक प्रसिद्ध गद्य-आलोचक हैं।

प्रश्न 108
शुक्लोत्तर युग के आलोचना-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
डॉ० रामकुमार वर्मा, डॉ० नगेन्द्र, डॉ० रामविलास शर्मा आदि शुक्लोत्तर युग के प्रसिद्ध आलोचना-लेखक हैं।

प्रश्न 109
‘समालोचक’ पत्र किस युग में प्रकाशित हुआ था ?
उत्तर
समालोचक’ पत्र, द्विवेदी युग में प्रकाशित हुआ था।

प्रश्न 110
व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात आलोचकों के नाम लिखिए।
उत्तर
व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात प्रमुख आलोचक हैं-आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ० विनय मोहन शर्मा, डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत आदि।

प्रश्न 111
माक्र्सवादी समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात आलोचकों के नाम लिखिए।
उत्तर
मार्क्सवादी समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात प्रमुख आलोचक हैं-डॉ० रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, डॉ० विश्वम्भरनाथ उपाध्याय आदि।

प्रश्न 112
जीवनी किसे कहते हैं? हिन्दी में जीवनी-लेखन का कार्य किस युग में प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर
किसी व्यक्ति विशेष के जीवन की जन्म से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं के क्रमबद्ध विवरण को ‘जीवनी’ कहा जाता है। हिन्दी में जीवनी-लेखन का कार्य भारतेन्दु युग में प्रारम्भ हो चुका था।

प्रश्न 113
जीवनी लिखने वाले किसी एक लेखक तथा उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर
लेखक–अमृतराय। रचना-‘कलम का सिपाही’।

प्रश्न 114
प्रसिद्ध जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
बनारसीदास चतुर्वेदी, बाबू गुलाबराय, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय आदि प्रमुख जीवनी-लेखक हैं।

प्रश्न 115
द्विवेदी युग के प्रमुख जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में किस प्रकार की जीवनियाँ लिखी गयीं ?
उत्तर
द्विवेदी युग के जीवनी-लेखकों में लक्ष्मीधर वाजपेयी, डॉ० सम्पूर्णानन्द, नाथूराम प्रेमी, मुकुन्दीलाल वर्मा उल्लेखनीय हैं। इस युग में ऐतिहासिक पुरुषों और धार्मिक नेताओं की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 116
छायावाद युग के प्रमुख जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में कैसी जीवनियाँ लिखी गयीं ?
उत्तर
छायावाद युग के जीवनी-लेखकों में रामनरेश त्रिपाठी, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचन्दउल्लेखनीय हैं। इस युग में राष्ट्रीय महापुरुषों की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 117
छायावादोत्तर युग के प्रमुख जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में किस प्रकार की जीवनियाँ लिखी गयीं ?
उत्तर
छायावादोत्तर युग के जीवनी-लेखकों में काका कालेलकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, बनारसीदास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन-विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस युग में लोकप्रिय नेताओं, सन्त-महात्माओं, विदेशी महापुरुषों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और साहित्यकारों की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 118
निम्नलिखित जीवनियों के लेखक कौन हैं-
(1) सुमित्रानन्दन पन्त : जीवन और साहित्य,
(2) निराला की साहित्य-साधना।
उत्तर
(1) शान्ति जोशी एवं
(2) डॉ० रामविलास शर्मा।

प्रश्न 119
छायावादोत्तर युग के दो प्रसिद्ध जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2. काका कालेलकर।

प्रश्न 120
आत्मकथा का अर्थ बताइए और इसकी परिभाषा दीजिए। हिन्दी में प्रथम आत्मकथा का नाम बताइट।
उत्तर
आत्मकथा का शाब्दिक अर्थ होता है-अपनी कहानी। यह लेखक का अपने जीवन से सम्बद्ध वर्णन है। अतः आत्मकथा किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा लिखा गया वह आख्यान या वृत्तान्त है जो वह बड़ी बेबाकी से अपने जीवन के बारे में प्रस्तुत करता है। जैन कवि बनारसीदास की ‘अर्द्धकथा’ को हिन्दी के आत्मकथा साहित्य की प्रथम आत्मकथा कहा जाता है।

प्रश्न 121
हिन्दी के प्रमुख आत्मकथा-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
बाबू श्यामसुन्दर दास (मेरी आत्मकहानी), वियोगी हरि (मेरा जीवन प्रवाह), डॉ० राजेन्द्र प्रसाद (मेरी आत्मकथा) आदि प्रमुख आत्मकथा लेखकों के अतिरिक्त डॉ० हरिवंशराय ‘बच्चन’, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ तथा गुलाबराय आदि श्रेष्ठ आत्मकथाकार हैं।

प्रश्न 122
निम्नलिखित आत्मकथाओं के लेखकों के नाम लिखिए
(1) अपनी कहानी एवं
(2) मेरी असफलताएँ।
उत्तर
(1) वृन्दावनलाल वर्मा एवं
(2) बाबू गुलाबराय।

प्रश्न 123
आत्मकथा विधा की प्रमुख रचनाओं और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
आत्मकथा विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक हैं—

  1. कुछ आप बीती, कुछ जग बीती (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र),
  2. निज वृत्तान्त (अम्बिकादत्त व्यास),
  3. कल्याण का पथिक (स्वामी श्रद्धानन्द),
  4. मुझमें दैवी जीवन का विकास (स्वामी सत्यानन्द अग्निहोत्री),
  5. आपबीती ( भाई परमानन्द),
  6. तरुण स्वप्न (सुभाषचन्द्र बोस),
  7. मेरी कहानी (जवाहरलाल नेहरू),
  8. सत्य की खोज (एस० राधाकृष्णन),
  9. आधे रास्ते और सीधी चट्टान (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी),
  10.  मेरी आत्मकथा (डॉ० राजेन्द्र प्रसाद),
  11.  प्रवासी की आत्मकथा (स्वामी भवानीदयाल संन्यासी),
  12.  स्वतन्त्रता की खोज (सत्यदेव परिव्राजक),
  13. साठ वर्ष : एक रेखांकन (सुमित्रानन्दन पन्त),
  14. परिव्राजक की प्रजा (शान्तिप्रिय द्विवेदी) आदि।

प्रश्न 124
रेखाचित्र अथवा आत्मकथा की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
रेखाचित्र—

  1. रेखाचित्र में कम-से-कम शब्दों के प्रयोग द्वारा किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेषता को उभारा जाता है।
  2. रेखाचित्र में लेखक पूर्णत: तटस्थ होकर, किसी वस्तु या व्यक्ति का चित्रात्मक शैली में सजीव तथा भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है।

आत्मकथा—

  1. महापुरुषों द्वारा लिखी गयी आत्मकथाएँ पाठकों को उनके जीवन के आत्मीय पहलुओं से परिचय कराती हुई मार्गदर्शन करती हैं और प्रेरणा देती हैं।
  2. लेखक स्वयं अपने जीवन के प्रसंगों को पूर्ण निजता के साथ भावात्मक एवं रोचक शैली में प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 125
रेखाचित्र किसे कहते हैं ? इसको परिभाषित कीजिए।
उत्तर
रेखाचित्र साहित्य की वह गद्यात्मक विधा है, जिसमें किसी विषय-विशेष का, उसकी बाह्य विशेषताओं को उभारते और तत्सम्बन्धित विभिन्न संक्षिप्त घटनाओं को समेटते हुए शब्द-रेखाओं के माध्यम से सजीव, सरस, मर्मस्पर्शी एवं प्रभावशाली चित्र उभारा जाता है।

प्रश्न 126
किन्हीं दो रेखाचित्रकारों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर
(1) महादेवी वर्मा तथा
(2) रामवृक्ष बेनीपुरी।

प्रश्न 127
रेखाचित्र विधा में किसने लेखन प्रारम्भ किया ?
उत्तर
कुछ विद्वान् पद्मसिंह शर्मा को रेखाचित्र विधा का जनक मानते हैं, परन्तु इस विधा के नाम से इस विधा में लेखन प्रारम्भ करने का श्रेय श्रीराम शर्मा को है।

प्रश्न 128
छायावादोत्तर युग के प्रमुख रेखाचित्र विधा के लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
रेखाचित्र विधा में लिखने वाले छायावादोत्तर युग के लेखकों में उल्लेखनीय हैं—प्रकाशचन्द्र गुप्त, बनारसीदास चतुर्वेदी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विनयमोहन शर्मा, सत्यवती मलिक, रघुवीर सहाय और डॉ० नगेन्द्र।

प्रश्न 129
संस्मरण की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
संस्मरण का शाब्दिक अर्थ होता है सम्यक् स्मरण, जिसके मूल में गम्भीर चिन्तन का भाव निहित होता है। मानव-जीवन की कटु, तिक्त एवं मधुर स्मृतियाँ अनुभूति और संवेदना का संसर्ग प्राप्त करके जब हृदय से निकलती हैं तब वे संस्मरण का रूप धारण कर लेती हैं।

प्रश्न 130
संस्मरण और रेखाचित्र का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
संस्मरण में साहित्यकार अपने जीवन में आये किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित घटना को रोचक शैली में, यथार्थ रूप में और अपने व्यक्तित्व में रंगकर प्रस्तुत करता है; जैसे–महादेवी वर्मा कृत ‘प्रणाम। रेखाचित्र में लेखक कम-से-कम शब्दों का प्रयोग करके किसी वस्तु या व्यक्ति का चित्रात्मक शैली में सजीव भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है; जैसे–महादेवी वर्मा कृत ‘गिल्लू’।

प्रश्न 131
‘संस्मरण’ की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. संस्मरण में व्यक्तियों, घटनाओं अथवा दृश्यों को स्मृति के सहारे पुन: कल्पना में मूर्त किया जाता है।
  2. संस्मरण में लेखक तटस्थ रहने के बाद भी स्वयं को चित्रित कर देता है।
  3. संस्मरण व्यक्ति, वस्तु अथवा घटना के वैशिष्ट्य को लक्षित करने वाला होता है।

प्रश्न 132
हिन्दी के दो संस्मरण लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. महादेवी वर्मा तथा
  2. काका कालेलकर।

प्रश्न 133
हिन्दी के प्रथम संस्मरण लेखक का नाम बताइए। [2010]
उत्तर
बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने पं० प्रतापनारायण मिश्र के संस्मरण (1907 ई०) में लिखकर इस विधा का सूत्रपात किया; परन्तु डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत संस्मरण का प्रथम लेखक सत्यदेव परिव्राजक को स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 134
महादेवी वर्मा के कुछ संस्मरण-ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर
महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘पथ के साथी’ (संस्मरण), ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘स्मारिका’ (रेखाचित्रनुमा संस्मरण) आदि संस्मरण-ग्रन्थ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

प्रश्न 135
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित संस्मरणात्मक रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
‘जिन्दगी मुसकाई’, ‘माटी हो गयी सोना’ तथा ‘दीप जले शंख बजे’ प्रभाकर जी की प्रमुख संस्मरणात्मक रचनाएँ हैं।

प्रश्न 136
संस्मरण विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाओं और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
संस्मरण विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक निम्नलिखित हैं—

  1. मण्टो मेरा दुश्मन,
  2. ज्यादा अपनी कम परायी (उपेन्द्रनाथ अश्क’);
  3. कुछ शब्द कुछ रेखाएँ। (विष्णु प्रभाकर);
  4. बचपन की स्मृतियाँ,
  5. जिनका मैं कृतज्ञ,
  6. मेरे असहयोग के साथी (राहुल सांकृत्यायन);
  7. दस तस्वीरें,
  8.  जिन्होंने जीना सीखा (जगदीशचन्द्र माथुर);
  9. स्मृति-कण,
  10.  चेहरे जाने-पहचाने (सेठ गोविन्ददास);
  11.  चेतना के बिम्ब (डॉ० नगेन्द्र);
  12.  समय के पाँव (माखनलाल चतुर्वेदी);
  13.  लोकदेव नेहरू,
  14.  संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ (रामधारी सिंह ‘दिनकर’);
  15.  नये-पुराने झरोखे (डॉ० हरिवंशराय बच्चन’) ।।

प्रश्न 137
‘यात्रावृत्त’ किसे कहते हैं ?
उत्तर
जब कोई यात्री अपनी यात्रा के अन्तर्गत मार्ग में आने वाले विविध व्यक्तियों, स्थानों, व्यवस्थाओं आदि के अपने हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का सूक्ष्म और सजीव वर्णन करता है, तब उसे यात्रावृत्त कहते हैं।

प्रश्न 138
हिन्दी में यात्रावृत्त लिखने का क्रम किस लेखक से प्रारम्भ हुआ तथा सर्वाधिक यात्रावृत्त किस गद्य-युग में लिखे गये ?
उत्तर
यात्रावृत्त लिखने का क्रम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ हुआ तथा सर्वाधिक यात्रावृत्त छायावाद और छायावादोत्तर युग में लिखे गये।

प्रश्न 139
हिन्दी के यात्रा-साहित्य के दो प्रमुख लेखकों और उनकी एक-एक रचना के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. राहुल सांकृत्यायन-घुमक्कड़शास्त्र तथा
  2. मोहन राकेश-आखिरी चट्टान तक।

प्रश्न 140
यात्रावृत्त के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
यात्रा से जुड़ी निजी स्मृतियाँ, सहजता, सत्यता, रोचकता और सरसता यात्रावृत्त के मुख्य तत्त्व

प्रश्न 141
छायावाद युग के यात्रावृत्त विधा के प्रमुख लेखक और उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
छायावाद युग की यात्रावृत्त विधा के प्रमुख लेखक और उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नवत् हैं-

  1. रामनारायण मिश्र – यूरोप यात्रा के छ: मास तथा
  2. राहुल सांकृत्यायन – मेरी यूरोप यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा।

प्रश्न 142
छायावादोत्तर युग की यात्रावृत्त विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
छायावादोत्तर युग की प्रमुख रचनाएँ एवं उनके लेखक इस प्रकार हैं—

  1. घुमक्कड़शास्त्र,
  2. किन्नर देश में,
  3. हिमालय परिचय (राहुल सांकृत्यायन);
  4. पैरों में पंख बाँधकर,
  5. उड़ते चलो, उड़ते चलो (रामवृक्ष बेनीपुरी);
  6. वह दुनिया (भगवतशरण उपाध्याय);
  7. अरे यायावर रहेगा याद,
  8. एक बूंद सहसा उछली (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’);
  9. तन्त्रालोक से यन्त्रालोक तक (डॉ० नगेन्द्र);
  10. पृथ्वी-परिक्रमा,
  11.  सुदूर दक्षिण में (सेठ गोविन्ददास);
  12. धरती गाती है (देवेन्द्र सत्यार्थी);
  13.  तूफानों के बीच (रांगेय राघव);
  14. आखिरी चट्टान तक (मोहन राकेश);
  15. आज का जापान (भदन्त आनन्द कौसल्यायन);
  16.  लोहे की दीवार के दोनों ओर (यशपाल);
  17.  सुबह के रंग (अमृतराय);
  18.  भू-स्वर्ग कश्मीर (हंसकुमार तिवारी) आदि।

प्रश्न 143
‘रिपोर्ताज’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘रिपोर्ताज’ का सम्बन्ध अंग्रेजी के ‘रिपोर्ट’ शब्द से है। रिपोर्ट सामान्य रूप में समाचार-पत्रों में प्रकाशित करने तथा रेडियो-दूरदर्शन पर प्रसारित करने के लिए पत्रकार द्वारा तैयार की जाती है। यही कार्य जब सौन्दर्यचेता साहित्यकार द्वारा किया जाता है तो उसमें उसके व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ, प्रतिक्रियाएँ और व्याख्याएँ भी समाहित हो जाती हैं। इस प्रकार साहित्यकार द्वारा विरचित घटना-विवरण ‘रिपोर्ताज’ कहलाता

प्रश्न 144
हिन्दी में रिपोर्ताज लिखने का प्रचलन किस युग में हुआ ? प्रमुख रिपोर्ताज लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी में रिपोर्ताज लिखने का प्रचलन छायावादोत्तर युग में हुआ। प्रमुख रिपोर्ताज लेखक हैं—

  1. धर्मवीर भारती,
  2. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’,
  3. रांगेय राघव,
  4. विष्णुकान्त शास्त्री आदि।

प्रश्न 145
रिपोर्ताज विधा की हिन्दी में प्रथम रचना का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
डॉ० शिवदानसिंह चौहान विरचित ‘लक्ष्मीपुरा’ (1938 ई०) को हिन्दी गद्य-साहित्य का प्रथम रिपोर्ताज माना जाता है।

प्रश्न 146
प्रमुख रिपोर्ताज रचनाएँ और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
रिपोर्ताज विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक हैं–

  1. पहाड़ों में प्रेममयी संगीति (उपेन्द्रनाथ अश्क’);
  2. एक तस्वीर के दो पहलू,
  3. क्षण बोले कण मुसकाये,
  4. दिल्ली की यात्रा-स्मृतियाँ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’);
  5. वे लड़ेंगे हजार साल (शिवसागर मिश्र);
  6. युद्ध-यात्रा (धर्मवीर भारती);
  7.  प्लाट का मोर्चा (शमशेर बहादुर सिंह)।

प्रश्न 147
हिन्दी में डायरी विधा का आरम्भ किस युग से हुआ ? किसी डायरी लेखक की डायरी का नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी में डायरी विधा का आरम्भ छायावाद युग से हुआ। डायरी लेखक-धीरेन्द्र वर्मा, रचना-मेरी कॉलेज डायरी।।

प्रश्न 148
हिन्दी की दो नवीन गद्य विधाओं व उन विधाओं के एक-एक प्रमुख लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर

  1. रिपोर्ताज’ हिन्दी गद्य की एक नयी विधा है। इस विधा के प्रमुख लेखक- कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं।
  2. ‘डायरी’ हिन्दी की दूसरी नवीन गद्य विधा है। इस विधा के प्रमुख लेखक-धीरेन्द्र वर्मा हैं।

प्रश्न 149
डायरी विधा की प्रथम रचना का नामोल्लेख कीजिए। (2009)
उत्तर
नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ को प्रथम डायरी-लेखक माना जाता है। उनकी डायरी “नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ की जेल डायरी” का प्रकाशन 1930 ई० के आसपास माना जाता है।

प्रश्न 150
डायरी विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी गद्य की डायरी विधा के अन्तर्गत घनश्यामदास बिड़ला की डायरी के पन्ने, सुन्दरलाल त्रिपाठी की ‘दैनन्दिनी’, धीरेन्द्र वर्मा की ‘मेरी कॉलेज डायरी’ जैसी कुछ गिनी-चुनी रचनाएँ ही उपलब्ध हैं।

प्रश्न 151
छायावादोत्तर युग में डायरी विधा में लेखन करने वाले लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
छायावादोत्तर युग में इलाचन्द्र जोशी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शमशेर बहादुर सिंह, मोहन राकेश, लक्ष्मीकान्त वर्मा, नरेश मेहता, अजित कुमार, प्रभाकर माचवे आदि की डायरियाँ प्रकाशित हुई हैं।

प्रश्न 152
‘गद्यगीत’ विधा को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘गद्यगीत’ में गद्य के माध्यम से किसी भावपूर्ण विषय की काव्यात्मक अभिव्यक्ति होती है। उदाहरण–“मित्र! यहाँ तो सुख के साथ दु:ख लगा है, और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में भी एक सुख है।” (राय कृष्णदास)

प्रश्न 153
‘गद्यगीत’ अथवा ‘गद्यकाव्य’ की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
‘गद्यगीत’ अथवा ‘गद्यकाव्य’ गद्य और काव्य के बीच की विधा है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं–

  1. इसमें अनुभूति की सघनता होती है,
  2. इसमें संक्षिप्तता और रहस्यमय सांकेतिकता होती है।

प्रश्न 154
गद्यगीतों का आरम्भ किस लेखक के किस ग्रन्थ से माना जाता है ?
उत्तर
गद्यगीतों का आरम्भ राय कृष्णदास के ‘साधना-संग्रह’ नामक ग्रन्थ से माना जाता है।

प्रश्न 155
‘तरंगिणी’ के लेखक तथा उसकी गद्य विधा का नाम लिखिए।
उत्तर
लेखक-वियोगी हरि तथा विधा-गद्यकाव्य ।।

प्रश्न 156
हिन्दी में गद्यकाव्य की रचना करने वाले किन्हीं दो लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. राय कृष्णदास तथा
  2. वियोगी हरि।

प्रश्न 157
गद्यकाव्य विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
गद्यकाव्य विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके रचनाकारों के नाम हैं—

  1. शारदीया,
  2. दुपहरिया,
  3. वंशीरव,
  4. उन्मन,
  5. स्पन्दन (दिनेशनन्दिनी चौरडया);
  6. चिन्ता (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’);
  7. शुभ्रा (रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’);
  8. आराधना (राजनारायण मेहरोत्रा ‘रजनीश’);
  9. श्रद्धाकण,
  10. तरंगिणी (वियोगी हरि);
  11. मरी खाल की हाय,
  12. जवाहर (आचार्य चतुरसेन शास्त्री);
  13. साहित्य देवता (माखनलाल चतुर्वेदी);
  14. शेष स्मृतियाँ (डॉ० रघुवीर सिंह) आदि।

प्रश्न 158
‘भेटवार्ता’ अथवा ‘साक्षात्कार’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर
जब रचनाकार किसी विशिष्ट व्यक्ति से मुलाकात करके उसके व्यक्तित्व, भावों, क्रिया-कलापों आदि से सम्बन्धित साहित्य की रचना प्रश्न-उत्तर रूप में करता है, तो यह रचना ‘भेटवार्ता या साक्षात्कार कहलाती है। यह विधा वस्तुत: पत्रकारिता की देन है। यह वास्तविक भी हो सकती है और काल्पनिक भी।

प्रश्न 159
चेखव : एक इण्टरव्यू’ तथा ‘भगवान् महावीर : एक इण्टरव्यू किस विधा की रचनाएँ हैं ? इनके लेखक कौन हैं ?
उत्तर
उक्त दोनों ‘काल्पनिक भेटवार्ता’ विधा की रचनाएँ हैं। इनके लेखक क्रमश: राजेन्द्र यादव एवं लक्ष्मीचन्द जैन हैं।

प्रश्न 160
हिन्दी में भेटवार्ता विधा में लेखन का प्रारम्भ किसने किया ?
उत्तर
हिन्दी में भेटवार्ता विधा का श्रीगणेश बनारसीदास चतुर्वेदी ने जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ और प्रेमचन्द से भेंट करने के उपरान्त उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में लिखकर किया।

प्रश्न 161
भेटवार्ता विधा की प्रमुख रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
भेटवार्ता विधा की प्रमुख रचनाएँ हैं—

  1. कवि दर्शन (बेनी माधव शर्मा),
  2. मैं इनसे मिला (दो भाग) (डॉ० पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’),
  3. कला के हस्ताक्षर (देवेन्द्र सत्यार्थी),
  4. सृजन की मनोभूमि (डॉ० रणवीर रांग्रा),
  5. हिन्दी कहानी और फैशन (डॉ० सुरेश सिन्हा) आदि।

प्रश्न 162
छायावादोत्तर युग में भेटवार्ता विधा में लेखन करने वालों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
छायावादोत्तर युग में भेटवार्ता लिखने वालों के नाम हैं—

  1. प्रभाकर माचवे,
  2. शिवदानसिंह चौहानं,
  3. रामचरण महेन्द्र,
  4. कैलाश कल्पित,
  5. राजेन्द्र यादव,
  6. लक्ष्मीचन्द्र जैन आदि।

प्रश्न 163
सन् 1947 के बाद प्रकाशित दो साहित्यिक पत्रों के संकलन के नाम तथा उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. ‘बड़ों के कुछ प्रेरणादायक पत्र’ – वियोगी हरि।
  2.  “निराला के पत्र’ – जानकीवल्लभ शास्त्री।

प्रश्न 164
हिन्दी-साहित्य में पत्र-साहित्य की प्रथम रचना कौन-सी है ?
उत्तर
हिन्दी-साहित्य में प्रथम पत्र-साहित्य का प्रकाशन 1904 ई० (द्विवेदी युग) में महात्मा मुंशीराम के द्वारा ‘स्वामी दयानन्द से सम्बद्ध पत्रों के संकलन’ से हुआ था।

प्रश्न 165
छायावाद युग की पत्र-साहित्य की रचना का नाम लिखिए।
उत्तर
छायावाद युग में रामकृष्ण आश्रम, देहरादून से ‘विवेकानन्द पत्रावली’ का प्रकाशन हुआ था।

प्रश्न 166
छायावादोत्तर युग की उल्लेखनीय पत्र-साहित्य रचनाओं को लिखिए।
उत्तर
छायावादोत्तर युग में प्रकाशित प्रमुख पत्र-साहित्य हैं—

  1. द्विवेदी पत्रावली (बैजनाथ सिंह ‘विनोद’),
  2. पद्मसिंह शर्मा के पत्र (बनारसीदास चतुर्वेदी),
  3. बड़ों के प्रेरणादायक पत्र (वियोगी हरि),
  4. पन्त के दो सौ पत्र बच्चन के नाम (हरिवंशराय बच्चन),
  5. भिक्षु के पत्र (भाग 1-2) (भदन्त आनन्द कौसल्यायन),
  6. यूरोप के पत्र (डॉ० धीरेन्द्र वर्मा),
  7. सोवियत रूस : पिता के पत्रों में (डॉ० जगदीशचन्द्र),
  8. लन्दन के पत्र (ब्रजमोहन लाला),
  9. बन्दी की चेतना (कमलापति त्रिपाठी),
  10. बापू के पत्र (काका कालेलकर) आदि।।

प्रश्न 167
हिन्दी के नयी पीढ़ी के चार साहित्यिक रचनाकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
कमलेश्वर, हृदयेश, मनोहरश्याम जोशी तथा सुदीप नयी पीढ़ी के रचनाकार हैं।

प्रश्न 168
हिन्दी गद्य के विकास में सबसे अधिक योगदान करने वाली अथवा द्विवेदी युग की सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रिका तथा उसके सम्पादक का नाम लिखिए।
या
द्विवेदी युग की सर्वप्रथम पत्रिका और उसके सम्पादक का नाम लिखिए। (2011)
उत्तर
पत्रिका-सरस्वती (सन् 1903 से प्रारम्भ)।।
सम्पादक–आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

प्रश्न 169
हिन्दी की दो प्राचीन साहित्यिक पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी की दो प्राचीन साहित्यिक पत्रिकाओं के नाम हैं—

  1. चरित्र एवं
  2. वचनिका।

प्रश्न 170
हिन्दी गद्य के विकास में ‘सरस्वती’ पत्रिका के योगदान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से हिन्दी गद्य में व्याप्त व्याकरण सम्बन्धी भूलों को दूर किया गया, वाक्य-विन्यास को सुव्यवस्थित किया गया तथा लेखकों और कवियों को प्रेरणा देकर लेखन-कार्य के लिए प्रोत्साहित किया गया।

प्रश्न 171
द्विवेदी युग के दो प्रसिद्ध सम्पादकों के नाम लिखिए।
उत्तर
द्विवेदी युग के दो प्रसिद्ध सम्पादकों के नाम हैं—

  1. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा
  2. श्री गणेश शंकर विद्यार्थी।

प्रश्न 172
स्वतन्त्रता के बाद प्रकाशित किन्हीं दो साहित्यिक पत्रिकाओं और उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
उत्तर
स्वतन्त्रता के बाद प्रकाशित होने वाली हिन्दी की दो साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं-कादम्बिनी तथा ‘धर्मयुग’। इनके सम्पादकों के नाम हैं-राजेन्द्र अवस्थी तथा धर्मवीर भारती। वर्तमान में केवल ‘कादम्बिनी’ का प्रकाशन ही हो रहा है।

प्रश्न 173
निम्नलिखित में से किन्हीं दो सम्पादकों की पत्रिकाओं के नाम लिखिए-
(1) महावीरप्रसाद द्विवेदी,
(2) श्यामसुन्दर दास,
(3) महादेवी वर्मा,
(4) धर्मवीर भारती।। [2011]
उत्तर
सम्पादक                                                 पत्रिका
(1) महावीरप्रसाद द्विवेदी             –           सरस्वती
(2) श्यामसुन्दर दास                     –             नागरी प्रचारिणी पत्रिका
(3) महादेवी वर्मा                          –                            चाँद
(4) धर्मवीर भारती                          –                     धर्मयुग
ध्यातव्य-हिन्दी-साहित्य की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं को युगानुसार सारणीबद्ध रूप में नीचे दिया जा रहा है-
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण img 2
विशेष—इस सूची में दिये गये पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक उनकी प्रकाशनावधि के दौरान बहुधा परिवर्तित होते रहते थे। प्रस्तुत सूची में रचना-धर्मिता के कारण बहुचर्चित सम्पादकों के नामों का ही उल्लेख किया जा रहा है। प्रस्तुत सूची की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन वर्तमान में बाधित है। आजकल मात्र ‘कादम्बिनी’ तथा ‘हंस’ ही नियमित प्रकाशित हो रही हैं।

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