UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास हिन्दी गद्य के विकास की परीक्षोपयोगी प्रमुख बातें

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास हिन्दी गद्य के विकास की परीक्षोपयोगी प्रमुख बातें
Category UP Board Solutions

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हिन्दी गद्य के विकास की परीक्षोपयोगी प्रमुख बातें

(क) हिन्दी-गद्य का काल-विभाजन

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(ख) विभिन्न विधाओं की प्रथम रचना और रचनाकार

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(ग) विभिन्न गद्य-विधाओं के दो-दो प्रसिद्ध रचनाकार एवं उनकी रचनाएँ

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(घ) युगानुसार प्रमुख विधाओं के दो-दो रचनाकार और उनकी एक-एक रचनाएँ

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(ङ) हिन्दी गद्य-साहित्य का इतिहास : एक दृष्टि में

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विशेष-
(1) भारतेन्दु युग का प्रारम्भ उनकी प्रथम पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ के प्रकाशन से माना गया है।
(2) एक ही लेखक दो विभिन्न युगों में भी लिखते रहे हैं, इसीलिए उनका नाम दोनों युगों में दिया गया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 2 Wildlife and Ecosystem

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 2 Wildlife and Ecosystem (वन्य जीवन एवं पारिस्थितिक तन्त्र) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 2 Wildlife and Ecosystem (वन्य जीवन एवं पारिस्थितिक तन्त्र).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 2
Chapter Name Wildlife and Ecosystem (वन्य जीवन एवं पारिस्थितिक तन्त्र)
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 2 Wildlife and Ecosystem (वन्य जीवन एवं पारिस्थितिक तन्त्र)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पारिस्थितिक-तन्त्र (Ecosystem) से आप क्या समझते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं ?
या
टिप्पणी लिखिए-पारिस्थितिकी-तन्त्र। [2008, 09, 10, 13, 14]
या
पारिस्थितिक-तन्त्र की व्याख्या कीजिए। [2013]
उत्तर

पारिस्थितिकी Ecology

‘पारिस्थितिकी’ शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द ‘OIKOS’ से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘घर’ अथवा ‘आवास’। अतः इस आधार पर पारिस्थितिकी का अर्थ हुआ-जीव का घर या आवास। इस प्रकार जीव विज्ञान का वह भाग जिसके अन्तर्गत जीवों तथा उनके पर्यावरण की पारस्परिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, पारिस्थितिकी विज्ञान कहलाता है। जीव और पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को वातावरणीय जीव विज्ञान (Environmental Biology) भी कहा जाता है। एच० रेटर (H. Reiter) ने ‘इकोलॉजी’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1868 ई० में किया था। जीव और उसका पर्यावरण प्रकृति के जटिल एवं गतिशील घटक हैं। पर्यावरण अनेक घटकों का समूह है। ये घटक जीवों को पारस्परिक क्रियाओं द्वारा प्रभावित करते रहते हैं। पारिस्थितिकी को अनेक विद्वानों ने परिभाषित किया है, जिनमें से कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

ओडम (Odum) के अनुसार, “इकोसिस्टम पारिस्थितिकी की वह आधारभूत इकाई है जिसमें जैविक और अजैविक वातावरण एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हुए पारस्परिक अनुक्रिया से ऊर्जा और रासायनिक पदार्थों के निरन्तर प्रवाह से तन्त्र की कार्यात्मक गतिशीलता बनाये रखते हैं।’
“पारिस्थितिकी प्रकृति की अर्थव्यवस्था तथा प्राणियों के अपने अजैविक तथा जैविक पर्यावरण के साथ समस्त सम्बन्धों का अध्ययन है।”– हैकल
“पारिस्थितिकी पर्यावरण के सन्दर्भ में जीवों के अध्ययन का विज्ञान है।’                -वार्मिग
इस प्रकार उपर्युक्त परिभाषाओं से निष्कर्ष निकलता है कि पारिस्थितिकी जैविक तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन है। वास्तव में पृथ्वीतल पर पाये जाने वाले प्राणियों तथा जैविक एवं अजैविक पर्यावरण की सम्मिलित क्रिया-प्रतिक्रिया पारिस्थितिक-तन्त्र कहलाती है।

पारिस्थितिक-तन्त्र Ecosystem

‘इकोसिस्टम’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1935 में ए०जी० तांसले द्वारा किया गया था। उनके अनुसार, “पारिस्थितिक-तन्त्र पर्यावरण के सभी जीवित एवं निर्जीव कारकों के सम्पूर्ण सन्तुलन के परिणामस्वरूप बनी हुई प्रणाली है।”
विभिन्न विद्वानों द्वारा पारिस्थितिकी एवं पारिस्थितिक-तन्त्र (Ecosystem) के पर्याय शब्दों का प्रयोग –
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कोई भी जैविक तत्त्व पर्यावरण के बिना जीवित नहीं रह सकता। उसका एक निश्चित पारिस्थितिक-तन्त्र होता है। स्वयं में हमारी पृथ्वी एक बहुत बड़ा पारिस्थितिक-तन्त्र है, जिसमें समस्त जीव समुदाय सूर्य से ऊर्जा प्राप्ति पर निर्भर करता है तथा भौतिक पर्यावरण जो भूतल पर पाया जाता है; अर्थात् स्थलमण्डल, वायुमण्डल एवं जलमण्डल में जीवनोपयोगी समस्त तत्त्वों की प्राप्ति करता है। जलवायु जैविक तत्त्वों- प्राणी एवं पौधों के विचरण तथा उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करती है। प्राणी एवं पौधे स्वयं पारस्परिक रूप से पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार पर्यावरण और उसमें निवास करने वाले जीवधारी आपस में एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए एक तन्त्र बना लेते हैं। यही तन्त्र’ पारिस्थितिक-तन्त्र’ (Ecosystem) कहलाता है।

प्रकृति में कोई भी जीवधारी एवं उसका समुदाय अकेले रहकर अपनी क्रियाओं का सम्पादन नहीं कर सकता, बल्कि प्रकृति में पाये जाने वाले एवं विचरण करने वाले सम्पूर्ण जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तथा एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार किसी क्षेत्र में कार्य करने वाले जैविक एवं अजैविक अंशों का सम्पूर्ण योग ही ‘पारिस्थितिक-तन्त्र’ कहलाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि “पारिस्थितिक-तन्त्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है।” इस प्रकार किसी क्षेत्र या प्रदेश विशेष में कार्यरत जैविक एवं अजैविक अंशों का पूर्ण योग ही पारिस्थितिक-तन्त्र कहलाता है। पारिस्थितिक-तन्त्र को वैज्ञानिकों ने निम्नलिखित प्रकार परिभाषित किया है –

“पारिस्थितिक-तन्त्र पर्यावरण तथा समुदाय की क्रियात्मक समक्रिया है।’      -क्लार्क
‘‘पारिस्थितिक-तन्त्र मूल क्रियात्मक इकाई है, जिसमें जैविक तथा अजैविक पर्यावरण सम्मिलित हैं जो परस्पर प्रभावित करते हैं जिससे ऊर्जा प्रवाह-तन्त्र में निश्चित एवं स्पष्ट जैविक विविधता का चक्र बनता है।  -ओडम
इस प्रकार पारिस्थितिक-तन्त्र जैविक एवं पर्यावरण के सभी भागों में तथा उसके बीच पारस्परिक क्रिया का योग है। पारिस्थितिक-तन्त्र में जीवधारियों का समुदाय अनेक प्रकार के जीवों (पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तु) से मिलकर बनता है। पारिस्थितिक-तन्त्र स्थायी अथवा अस्थायी दोनों प्रकार का हो सकता है।

पारिस्थितिक-तन्त्र का वर्गीकरण
Classification of Ecosystem

पारिस्थितिक-तन्त्र को अनेक छोटी इकाइयों में वर्गीकृत किया जा सकता है जिससे उनको आकारिकी, कार्यिकी एवं गति सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त हो सके। इस वर्गीकरण का आधार जलवायु, निवास स्थान एवं पौधों का समुदाय होता है। पारिस्थितिक-तन्त्र निम्नलिखित दो प्रकार का होता है –
1. प्राकृतिक पारिस्थितिक-तन्त्र (Natural Ecosystem) – यह तन्त्र प्रकृति द्वारा सम्पन्न किया जाता है। प्राकृतिक आवास निम्नलिखित दो प्रकार का होता है –

  1. स्थलीय (Terrestrial) – वन, घास के मैदान, मरुस्थलीय आदि।
  2. जलीय (Aquatic) – जलीय पारिस्थितिक-तन्त्र दो प्रकार का होता है –
    1. स्वच्छ जलीय (Fresh Water) – इसके अन्तर्गत, नदी, झील एवं तालाब आदि सम्मिलित किये जाते हैं।
    2. समुद्र जलीय (Sea Water) – इसके अन्तर्गत खारे जल के क्षेत्र अर्थात् महासागर, सागर एवं खारे पानी की झीलें सम्मिलित की जाती हैं।

2. कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित पारिस्थितिक-तन्त्र (Artificial Ecosystem) – यह तन्त्र : मानव एवं उसकी क्रियाओं द्वारा सम्पन्न होता है। मानव अपने क्रिया-कलापों एवं तकनीकी-प्राविधिक ज्ञान द्वारा प्राकृतिक सन्तुलन में गड़बड़ कर देता है; अर्थात् असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। मानव बड़े-बड़े क्षेत्रों को काटकर कृषि-योग्य भूमि, औद्योगिक क्षेत्रों तथा बड़ी-बड़ी बस्तियों का निर्माण करता है। यह मानव द्वारा निर्मित भूदृश्य कहलाता है। मानव भौतिक पर्यावरण को नियन्त्रित करने का प्रयास करता है, परन्तु नियन्त्रण के स्थान पर इसमें असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसे कृत्रिम अथवा अप्राकृतिक पारिस्थितिक-तन्त्र कहा जाता है।

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प्रश्न 2
पारिस्थितिक-तन्त्र में असन्तुलन की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
या
पारिस्थितिक-तन्त्र के असन्तुलन की समस्या की विवेचना कीजिए तथा उसके निराकरण के उपायों को प्रस्तावित कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए-पारिस्थितिक असन्तुलन।
या
टिप्पणी लिखिए-पारिस्थितिक असन्तुलन की समस्या।
या
पारिस्थितिक असन्तुलन की समस्या व उसके निराकरण के किन्हीं दो उपायों का सुझाव दीजिए। [2009]
उत्तर

पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या
Problem of Imbalance Ecology

मानव द्वारा पारिस्थितिक-तन्त्र का शोषण किया जाता है। इनमें प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीव-जन्तु, मत्स्य आदि प्रमुख हैं। अधिकतम खाद्यान्नों की प्राप्ति के लिए पारिस्थितिक-तन्त्र में अनेक
परिवर्तन हुए हैं जिससे सामान्य पारिस्थितिक-तन्त्र का विकास हुआ है। पारिस्थितिकीय असन्तुलन को पर्यावरण प्रदूषण भी कहा जा सकता है। मानव प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करता है; जैसे-खानों से
खनिजों का शोषण, भूगर्भ से खनिज तेल, वनों से लकड़ी की कटाई कर तथा अपने मनोरंजन के लिए। वन्य जीवों का आखेट कर पारिस्थितिकीय सन्तुलन को बिगाड़ता रहता है। पालतू पशुओं से दूध, मांस, ऊन तथा अन्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिससे उसकी भोजन-श्रृंखला छोटी हो गयी है। इससे इन पालतू पशुओं की संख्या में भी कमी होने लगी है तथा पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या ने जन्म ले लिया है।

“पारिस्थितिक-तन्त्र के किसी भी घटक का वांछित एवं आवश्यक मात्रा से कम हो जाना अथवा अधिक हो जाना ही पारिस्थितिकीय असन्तुलन’ कहलाता है तथा प्रत्येक घटक को उस अनुपात में रहना। जिससे इस तन्त्र के अन्य घटकों पर कोई हानिकारक प्रभाव न पड़े’पारिस्थितिक सन्तुलन’ कहलाता है।”
पारिस्थितिक-तन्त्र में असन्तुलन की स्थिति तभी उत्पन्न होती है जब किसी सम्पूर्ण पोषण-स्तर का विनाश हो जाता है। यह स्थिति जीवों की कमी के कारण अथवा वैकल्फ्कि साधनों की कमी के कारण अथवा प्रदूषण के कारण हो सकती है।

1. प्रदूषण की समस्या – कृषि उत्पादन की सफलता फसलों द्वारा अपने पारिस्थितिक-तन्त्र के अनुकूलन पर निर्भर करती है। स्थानीय जलवायु दशाएँ फसलों का निर्धारण करती हैं। रासायनिक उर्वरकों द्वारा पोषक तत्त्वों में वृद्धि कर उत्पादन में भी वृद्धि के प्रयास किये गये हैं तथा अधिक उत्पादन देने वाली फसलें खोज ली गयी हैं। ‘हरित क्रान्ति’ ने खाद्यान्न उत्पादन में तो वृद्धि की है, परन्तु उर्वरकों के उत्पादन से प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है। मानव ने फसलों के क्षेत्रफल में वृद्धि की है जिसके कारण प्रेयरी, टैगा एवं स्टेप्स घास के मैदानों में प्राकृतिक वनस्पति में कमी हो गयी है। पादपों को कीटनाशकों से बचाव के लिए कीटनाशक दवाओं का अधिकाधिक उपयोग किया जाने लगा है, परन्तु । इनका अधिक उपयोग मानव के लिए हानिकारक है। इनसे मानव को दूषित खाद्य सामग्री प्राप्त होती है। इन कीटनाशकों के उत्पादन काल में प्रदूषण की अनेक समस्याएँ जन्म लेती हैं। भोपाल गैस त्रासदी इसका एक मुख्य उदाहरण है जिससे मानवता में अपंगता ने जन्म लिया है।

2. जैव-प्रदूषण की समस्या – आदि काल से लेकर आज़ तक वनों का बड़ी निर्ममता से शोषण किया जाता रहा है। इससे वन-क्षेत्रों का ह्रास हुआ है। प्रारम्भ से ही विश्व के अनेक भागों में स्थानान्तरित अथवा झूमिंग कृषि पद्धति प्रचलित है। इस पद्धति के अन्तर्गत उर्वर भूमि को प्राप्त करने के लिए मानव वन-क्षेत्रों का शोषण कर उस पर कृषि करता है। जब इस भूमि की उर्वरता समाप्त हो जाती है तो इसे परती छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार वनों के निर्दयतापूर्वक शोषण से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई है तथा पारिस्थितिक-तन्त्र भी असन्तुलित हुआ है। वनों की कमी के कारण भू-अपरदन, अनावृष्टि, बाढ़ आदि समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं। अतः आज मानव के समक्ष अनेक प्रदूषण सम्बन्धी समस्याएँ विकराल रूप धारण कर गयी हैं। इसी कारण विश्व में वन-संरक्षण के प्रयास किये जा रहे हैं।

जलीय जीवों के प्राणों की रक्षा करना भी अति आवश्यक है। मत्स्य व्यवसाय पर ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है। मछली से मानव को प्रोटीन की प्राप्ति होती है। यदि मत्स्य व्यवसाय का विकास सुचारु रूप से नहीं हुआ तो खाद्यान्न में प्रोटीन की कमी हो जाएगी। विश्व में 3% मानव का भोजन पूर्ण रूप से मछली पर निर्भर करता है, जबकि नॉर्वे, न्यूफाउण्डलैण्ड एवं जापान सदृश देशों में 10% मानव मछली के ऊपर ही निर्भर करते हैं। इनकी कमी से खाद्य समस्या उत्पन्न हो सकती है। अतः इस ओर ध्यान दिये जाने की, नितान्त आवश्यकता है।

3. जनाधिक्य की समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार – सन् 2010 में विश्व की जनसंख्या 6.9 अरब हो गयी है। सन् 2050 तक इसके 9.10 अरब हो जाने का अनुमान है। जनसंख्या की इस अतिशय वृद्धि के कारण वन क्षेत्रों एवं चरागाहों की कमी होती जा रही है। भोजन की समस्या के समाधान के लिए कृषि-क्षेत्रों का विस्तार किया जा रहा है जिस कारण वन एवं घास क्षेत्रों का विनाश किया जा रहा है जिससे पारिस्थितिक-तन्त्र में अन्तर उपस्थित हुआ है। इसके साथ ही आवास समस्या उत्पन्न हो गयी है। बस्तियों के विकास के लिए उत्पादक भूमि का अधिग्रहण होता जा रहा है।

इस प्रकार जनसंख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण अनेक समस्याएँ विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। भोजन, वस्त्र एवं आवास जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं का अभाव होता जा रहा है। इससे प्रदूषण की अनेक समस्याओं ने जन्म लिया है। वायु, जल व मृदा प्रदूषण वर्तमान युग की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं। यह पारिस्थितिकीय असन्तुलन की स्थिति है। इससे आज मानव समुदाय को अनेक विषमताओं का सामना करना पड़ता है।

पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या का निवारण
Solution of the Problem of Imbalance Ecology

पारिस्थितिक-तन्त्र में असन्तुलन की समस्या के निवारण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए –
1. जनाधिक्य पर नियन्त्रण – आधुनिक युग में विश्व की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होती जा रही है जिस पर नियन्त्रण किया जाना अति आवश्यक है। यदि जनसंख्या-वृद्धि उपलब्ध संसाधनों के अनुसार हो तो अधिक उपयुक्त रहेमा।

2. वन क्षेत्रफल में वृद्धि तथा उनका संरक्षणे – प्रदूषण से बचाव के लिए वन क्षेत्रफल में घृछि किया जा अति आवश्यक है। भारत में सामाजिक वानिकी तथा वन महोत्सव आदि कार्यक्रमों द्वारा वन क्षेत्रफल में वृद्धि के प्रयास किये जा रहे हैं। उत्तराखण्ड में श्री सुन्दर लाल बहुगुणा का ‘चिपको आन्दोलन भी इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
वन एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत है। यह वन्य जीवन के लिए अति आवश्यक है। पर्यावरणीय सन्तुलन को बनाये रखने के लिए वनों को महत्त्वपूर्ण योगदान है। पौधे पर्यावरण से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन नि:सृत करते हैं जिसका उपयोग जन्तुओं द्वारा श्वसन क्रिया में किया जाता है।

3. जल संसाधनों में वृद्धि एवं उनका संरक्षण – जल संसाधनों में वृद्धि किया जाना अति आवश्यक है। जेब जल में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ, कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों तथा गैसों के एक निश्चित अनुपात में अधिक अथवा कम अनावश्यक एवं हानिकारक पदार्थ घुले होते हैं, तब जल का प्रदूषण हो जाता है। प्रदूषित जल का उपयोग करने से प्राणी समुदाय में अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं; अतः ऐसे प्रयास किये जाने चाहिए कि जल का प्रदूषण न होने पाये।

जल संसाधनों में वृद्धि के लिए मत्स्य उत्पादक क्षेत्रों में जलं प्रदूषणरहित होना चाहिए। जल-क्षेत्रों में जिन मछलियों की प्रजाति की कमी है, उनके पकड़ने पर रोक लगा देनी चाहिए; जैसे- सील, खेल आदि। ऐसे प्रयास किये जाने चाहिए कि मछलियों की भोज्य-सामग्री वनस्पति एवं प्लैंकटन पर्याप्त मात्रा में पनपती रहे। इसके लिए इन क्षेत्रों में शुद्ध जल की प्राप्ति होना अति आवश्यक है। यह जल प्रदूषणरहित होना चाहिए। ऐसे क्षेत्र मछलियों के अक्षय भण्डार हो सकते हैं। मछली पकड़ने की विकसित तकनीक होनी चाहिए तथा उन्हें नियमित रूप से ही पकड़ा जाना चाहिए।

4. वन्य-प्राणियों का संरक्षण – वन्य जीवों में लगभग 350 जातियाँ स्तनधारियों की तथा 2,100 पक्षियों की होने के साथ-साथ लगभग 20,000 प्रजातियाँ कीटों की वन्य अवस्था में पायी जाती हैं। अतः पारिस्थितिक-तन्त्र में सन्तुलन बनाये रखने के लिए वन्य प्राणियों का संरक्षण अति आवश्यक है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपायों को कार्यरूप में परिणत किया जाना चाहिए –

  1. वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए अभयारण्यों की स्थापना की जानी चाहिए।
  2. वन्य जीवों के आवासीय स्थलों को संरक्षण दिया जाना चाहिए।
  3. वन्य जीवों की विभिन्न जातियों को संरक्षण दिया जाना चाहिए।
  4. नवीन वन्य जातियों को वन-क्षेत्रों में पालन-पोषण के प्रयास किये जाने चाहिए।
  5. सभी देशों में वन्य जीवों के आखेट पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाएँ तथा इनके अनुपालन के लिए कठोर नियम एवं कानून होने चाहिए। इनका कठोरता से अनुपालन किया जाना चाहिए।

इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से निष्कर्ष निकलता है कि प्राणी-समुदाय के कल्याण एवं उसके पर्यावरण को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए पारिस्थितिक-तन्त्र को सन्तुलित बनाये रखना अति आवश्यक है।

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प्रश्न 3
पर्यावरण प्रदूषण क्या है? प्रदूषण-नियन्त्रण के उपाय बताइए। [2014]
या
पर्यावरण प्रदूषण के नियन्त्रण हेतु उपायों का वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर

पर्यावरण प्रदूषण Environmental Pollution

प्रदूषण का साधारण अर्थ किसी भी वस्तु की भौतिक गुणवत्ता में किसी अवांछित तत्त्व द्वारा होने वाले ह्रास से है। मिट्टी, भूमि, जल, वायु, प्राकृतिक वनस्पति आदि प्राकृतिक संसाधन ऐसे ही पदार्थ हैं जो अनेक प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों से अपनी स्वाभाविक गुणवत्ता खो देते हैं तथा प्रदूषित हो जाते हैं। प्रदूषण,पाँच प्रकार का होता है –

  1. स्थल प्रदूषण
  2. जल प्रदूषण
  3. वायु प्रदूषण
  4. ध्वनि प्रदूषण तथा
  5. आणविक प्रदूषण।

प्राकृतिक कारणों से होने वाले प्रदूषण का प्रभाव बहुत धीमे तथा सीमित स्तर पर होता है और प्रकृति काफी हद तक उसका सन्तुलन भी कर देती है, किन्तु मानवीय कार्यों से इन पदार्थों या संसाधनों में इस प्रकार ह्रास होता है कि उसकी भरपाई सम्भव नहीं होती। उदाहरणार्थ- निरन्तर एकही प्रकार की फसल एक क्षेत्र में बोते रहने से मिट्टी की उर्वरता का ह्रास होता है। यह एक प्रकृतिक-परिघटना है। मानव द्वारा अतिशय सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग, पर्वतीय ढालों पर स्थानान्तरी कृषि आदि कारणों से मिट्टियाँ अनुर्वर हो जाती हैं।

इसी प्रकार जल में अनेक मानवीय क्रिया-कलापों से’या मानव द्वारा अशुद्धियाँ मिला दी जाती हैं जिससे जल संदूषित (contaminated) हो जाती है तथा सेवन योग्य नहीं रहता। ज्वालामुखी के विस्फोट से सीमित स्तर पर वायु का प्रदूषण होता है, किन्तु मानव द्वारा औद्योगिक कारखानों, वाहनों आदि के धुएँ द्वारा व्यापक स्तर पर वायु प्रदूषण होता है जिसके भयंकर दुष्परिणाम हो रहे हैं। इससे वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो रही है जिससे वायुमण्डल में तापमान में वृद्धि हो रही है। इस कारण वैश्विक ऊष्मन’ (global warming) बढ़ रहा है। जो भविष्य में विश्वव्यापी संकट का कारण हो सकता है।

कृषि में रसायनों के प्रयोग से विषैले रसायन जल तथा भूमि के माध्यम से भोजन द्वारा मानव शरीर में पहुँचकर मानवीय जीवन को संकटग्रस्त कर देते हैं। यही नहीं, ये विषैले रसायन वायुमण्डल में पहुँचकर ‘अम्ल वर्षा’ (acid rains) का खतरा पैदा कर रहे हैं, जिसका प्रभाव उत्पत्ति के स्रोत तक सीमित न होकर विश्वव्यापी हो गया है। रेफ्रिजरेटरों के प्रयोग से क्लोरो-फ्लोरो कार्बन तत्त्व वायु में मिलकर उसे प्रदूषित कर रहे हैं जिससे वायुमण्डल की ओजोन परत का क्रमशः क्षय हो रहा है। ओजोन गैस की कमी से मानब तृथा समस्त प्राणियों का जीवन संकटग्रस्त हो जायेगा।

महानगरों में कारखानों के कारण भारी शोर होता है। परिवहन के साधन, लाउडस्पीकर आदि भी शोर पैदा करते हैं। इसे ध्वनि प्रदूषण’ कहा जाता है। मनुष्य एक निश्चित सीमा तक ही शोर सहन कर सकता है। जब यह (शोर) सहन-शक्ति से बाहर हो जाता है तो मनुष्य के लिए कष्टप्रद होता है। इससे बहरेपन तथा अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

आधुनिक युग में परमाणु ऊर्जा का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ रहा है। यही नहीं, परमाणु अस्त्र बनाने की होड़ भी जारी है। परमाणु ऊर्जा का भयंकर रूप द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर जापान के नागासाकी तथा हिरोशिमा नगरों पर बम प्रहार के रूप में अनुभव किया जा चुका है। यही नहीं, परमाणु संयंत्रों से होने वाले रिसाव से भी भयंकर हानि होती है। पूर्व सोवियत संघ के ‘चर्नोबिल संयंत्र में इसी प्रकार की दुर्घटना से भारी दुष्परिणाम हुए थे। यदि अनजाने में या भूलवश भी इन परमाणु संयंत्रों का दुरुपयोग हो जाये तो इससे सम्पूर्ण मानवता का अस्तित्व संकटग्रस्त हो जायेगा।

पर्यावरण का बढ़ता हुआ प्रदूषण किसी एक क्षेत्र या देश की समस्या नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिए गम्भीर चिन्ता का विषय है। इसीलिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इस विषय पर विचार-विमर्श तथा इस संकट से उबरने के प्रयास किये जा रहे हैं। अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन तथा एजेन्सियाँ इस दिशा में कार्यरत हैं।

नियन्त्रण के उपाय Measures of Control

निम्नलिखित उपायों द्वारा पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सकता है –

  1. नगरों तथा महानगरों में मल-मूत्र, गन्दगी, कूड़े-कचरे के निस्तारण (disposal) की उचित व्यवस्था करनी चाहिए, उसे नालों व नदियों में नहीं मिलाना चाहिए। इस कचरे के लिए उपचार संयन्त्र (treatment plants) लगाने चाहिए जिससे ऊर्जा तथा उर्वरक बनाये जा सकते हैं तथा ऐसे जल का सिंचाई में प्रयोग किया जा सकता है।
  2. कृषि में अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा अन्य घातक रसायनों के प्रयोग को नियन्त्रित करना चाहिए जिससे भूमि तथा जल का प्रदूषण कम हो। नियन्त्रित सिंचाई पद्धति अपनानी चाहिए जिससे भूमि का अपरदन तथा उर्वरता ह्रास कम हो।
  3. बस्तियों के निकट कारखानों तथा भट्टों को हटाकर अन्यत्र स्थापित करना चाहिए जिससे वायु प्रदूषण का नियन्त्रण हो सके।
  4. कारखानों में वायु प्रदूषण को रोकने वाले संयंत्र लगाने चाहिए।
  5. वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए वाहनों में उपयुक्त उपकरणों की व्यवस्था होनी चाहिए।
  6. परमाणु संयंत्रों को प्रदूषण मुक्त प्रणाली’ (pollution free devices) से जोड़ना चाहिए।
  7. जनता को प्रदूषण के प्रति सचेत करना तथा पर्यावरण रक्षा की शिक्षा देना आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
एक पारिस्थितिक-तन्त्र के रूप में जैवमण्डल की विवेचना कीजिए।
उत्तर
जैवमण्डल से तात्पर्य पृथ्वीतल के उस संकीर्ण क्षेत्र से है जहाँ स्थलमण्डल, जलमण्डल और वायुमण्डल परस्पर सम्पर्क में आते हैं तथा जहाँ समस्त प्रकार का जीवन पाया जाता है। यहाँ जीवन का आशय समस्त जीवधारियों से है, चाहे वे प्राणी (जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी आदि) हों या पादप (पेड़-पौधे इत्यादि)। सभी जीवधारियों के लिए पारिस्थितिक-तन्त्र आवश्यक होता है जो उनके जन्म तथा विकास के लिए उत्तरदायी होता है। स्थिति के अनुसार पारिस्थितिक-तन्त्र भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इस तन्त्र में भौतिक तथा जैविक घटक परस्पर प्रतिक्रिया करते हैं।

जैवमण्डल पृथ्वी का विशालतम पारिस्थितिक-तन्त्र है। इसमें सूर्य से प्राप्त ऊर्जा समस्त जीवधारियों के लिए प्राणदायी होती है। इस विशाल तन्त्र के भौतिक घटकों में जलवायु के समस्त तत्त्व, धरातल, जलराशियाँ, खनिज पदार्थ आदि सम्मिलित हैं। जैविक घटकों में उत्पादक (पेड़-पौधे) तथा उपभोक्ता (प्राणी-जीव-जन्तु) सम्मिलित हैं, जो शाकाहारी, मांसाहारी तथा सर्वाहारी (मानव) होते हैं।

प्रश्न 2
पर्यावरण की समग्रता की विवेचना कीजिए।
उत्तर
फिटिंग ने पर्यावरण की जिस समग्रता का उल्लेख किया है वह पर्यावरण के चारों क्षेत्रों का ही मिला-जुला प्रभाव है। सभी जीवधारी जीवनयापन के लिए प्रकृति पर आश्रित हैं। मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्यावरण का दोहन करता है। पर्यावरण के तीनों क्षेत्र सामूहिक रूप से जैवमण्डल पर अपना प्रभाव डालते हैं। मनुष्य अजैव, जैव एवं सांस्कृतिक पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने का प्रयास करता है। कहीं उसे प्रकृति का कोपभाजन भी बनना पड़ता है तो कहीं वह पर्यावरण को अपने अनुरूप बदलने का प्रयास करता है। यह बदलाव पर्यावरण का रूपान्तरण कहलाता है। रूपान्तरण में वह प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक कारकों में परिवर्तन लाता है।

कहीं-कहीं उसे प्रकृति के साथ समायोजन (समझौता) भी करना पड़ता है। यह समायोजन मानवे अपनी प्रगति एवं आर्थिक विकास के लिए करता है। इस समायोजन के लिए उसे अपनी क्षमता, कौशल और सूझ-बूझ का प्रयोग करना पड़ता है। पर्यावरण मानव की छाँट के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है और मानव उनका उपयोग एक क्रियाशील जीव के रूप में करता है। पर्यावरण के चारों क्षेत्रों के पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों द्वारा ही नवीन भौगोलिक तथ्य जन्म लेते हैं। इन्हीं तथ्यों द्वारा मानव विनाशकारी और सृजनकारी क्रियाओं को जन्म देती है। भू-क्षरण, बाढ़ तथा प्रदूषण आदि समस्याएँ मानव की विनाशकारी क्रियाओं का ही परिणाम हैं, जो मनुष्य की प्रकृति के प्रति शोषणात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है। प्रकृति की ओर से पर्यावरण के सभी क्षेत्र पारस्परिक अन्तर्निर्भर और सन्तुलित हैं, परन्तु मानव अपने लाभ के कारण इनकी निर्भरता और सन्तुलित स्थिति को भंग करने का प्रयास करता रहता है।

प्रश्न 3
पारिस्थितिक तन्त्र के असन्तुलन की समस्या के निराकरण हेतु कोई दो सुझाव दीजिए। (2015)
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 के अन्तर्गत ‘पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या का निवारण’ शीर्षक देखें।

प्रश्न 4
पारिस्थितिक तन्त्र में असन्तुलन के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2014, 15]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 के अन्तर्गत पारिस्थितिकीय असन्तुलन की समस्या’ शीर्षक में देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पारिस्थितिक-तन्त्र को परिभाषित कीजिए। [2008, 09, 10, 14, 16]
उत्तर
पारिस्थितिक-तन्त्र धरातल की एक ऐसी इकाई है जिसमें पर्यावरण के सभी भौतिक तथा अभौतिक (जैविक) घटक परस्पर अन्त:क्रिया करते हुए एक विशिष्ट तन्त्र का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 2
पारिस्थितिक तन्त्र की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2012]
उत्तर

  1. पारिस्थितिक तन्त्र एक क्रियाशील इकाई है, जिसमें जैव तथा अजैव तत्त्व परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इस तन्त्र की सक्रियता से ही जैव तत्त्व उत्पादित होते हैं।
  2. पारिस्थितिक तन्त्र ऊर्जा (सूर्य ऊर्जा) द्वारा संचालित होता है तथा अपनी कार्यप्रणाली द्वारा अन्य तत्त्वों में ऊर्जा का प्रवाह करता है।

प्रश्न 3
पारिस्थितिकी तन्त्रों के दो प्रमुख घटकों के नाम लिखिए। [2007, 11, 12, 13, 14, 16]
उत्तर
पारिस्थितिकी तन्त्र के दो प्रमुख घटकों के नाम हैं –

  1. अजैविक घटक
  2. जैविक घटक।

प्रश्न 4
स्थलीय पारितन्त्र के घटकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
स्थलीय पारितन्त्र में वन, घास के मैदान, मरुस्थल आदि आते हैं।

प्रश्न 5
स्वच्छ जलीय एवं सागरीय पारितन्त्र में क्या अन्तर है।
उत्तर
स्वच्छ जलीय पारितन्त्र नदी, झील, तालाब आदि से मिलकर बनता है, जो प्राय: मीठे जल को धारण करते हैं। इसके विपरीत सागरीय पारितन्त्र खारे पानी से युक्त सागरों एवं महासागरों से मिलकर बना होता है।

प्रश्न 6
पारिस्थितिक असन्तुलन को परिभाषित कीजिए।
या
पारिस्थितिकीय असन्तुलन क्या है ? [2008, 16]
उत्तर
पारिस्थितिक-तन्त्र के किसी भी घटक का वांछित एवं आवश्यक मात्रा से कम हो जाना। अथवा अधिक हो जाना पारिस्थितिक असन्तुलन कहलाता है। प्रत्येक घटक का उस अनुपात में रहना जिससे इस तन्त्र के अन्य घटकों पर कोई हानिकारक प्रभाव न हो, पारिस्थितिक सन्तुलन कहलाता है।

प्रश्न 7
पारिस्थितिकी को परिभाषित कीजिए। [2012]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत पारिस्थितिकीय शीर्षक में दखें।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
पारिस्थितिक-तन्त्र के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है –
(क) यह एक संवृत तन्त्र है
(ख) सम्पूर्ण जैवमण्डल एक पारिस्थितिक तन्त्र है।
(ग) मानव द्वारा निर्मित कार्यात्मक तन्त्र है।
(घ) प्रदूषण वृद्धि तन्त्र है।
उत्तर
(ख) सम्पूर्ण जैवमण्डल एक पारिस्थितिक तन्त्र है।

प्रश्न 2
निम्नलिखित में से सर्वोच्च या अन्तिम उपभोक्ता है –
(क) चीता
(ख) शेर
(ग) बाज
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

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प्रश्न 3
निम्नलिखित में अपघटक जीव है – (2007)
(क) कवक
(ख) जीवाणु
(ग) मृतोपजीवी
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है –
(क) हैकल-इंकोलॉजी
(ख) ई०पी० ओडम-इकोटोन
(ग) चार्ल्स एल्टन-वैज्ञानिक
(घ) क्लीमेण्ट-समुदाय विज्ञान
उत्तर
(ख) ई०पी० ओडेम-इकोटोन

प्रश्न 5
पारिस्थितिक तन्त्र की कार्यप्रणाली निर्भर करती है – [2014]
(क) उपभोक्ता पर
(ख) स्वपोषित पर
(ग) वियोजक पर
(घ) ऊर्जा प्रवाह पर
उत्तर
(क) उपभोक्ता पर।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अन्य प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ

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Chapter Chapter 6
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अन्य प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ


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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास ‘गद्य गरिमा’ में संकलित लेखक

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‘गद्य गरिमा’ में संकलित लेखक

ध्यातव्य-गद्य गरिमा’ में संकलित सभी लेखकों की प्रमुख रचनाओं और रचना-विधाओं का उल्लेख नीचे किया जा रहा है। प्रथम प्रश्न-पत्र के अन्तर्गत पूछे जा रहे बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर हेतु इनका अध्ययन आवश्यक होगा। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे गद्य गरिमा’ और ‘कथा- भारती पाठ्यपुस्तकों में दी गयी भूमिका, लेखक-परिचय आदि का भी सम्यक् अध्ययन करे। इनमें भी आपको बहुविकल्पीय प्रश्नों से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होगी। 

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर).

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Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)
Number of Questions 4
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)

प्रश्न 1.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) का संक्षेप में परिचय लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘रश्मिरथी’ की कथा (सारांश) अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 16]
या
‘रश्मिरथी’ के प्रथम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2017, 18]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2016, 18]
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2013, 14, 15, 16]
या
‘रश्मिरथी’ के द्वितीय और तृतीय सर्ग में कृष्ण और कर्ण के संवाद में दोनों के चरित्र की कौन-सी प्रमुख विशेषताएँ प्रकट हुई हैं ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु का संक्षेप में सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग में कुन्ती-कर्ण के संवाद का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15]
या
‘रश्मिरथी’ के पाँचवें (पंचम) सर्ग की कथा (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 16]
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर उसके प्रथम और द्वितीय सर्गों की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर सप्तम सर्ग (कर्ण के बलिदान) की कथा संक्षेप में लिखिए। [2011, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘रश्मिरथी’ में वर्णित कर्ण और अर्जुन के युद्ध का सोदाहरण वर्णन कीजिए। [2010, 11]
उत्तर
श्री रामधारीसिंह ‘दिनकर’ द्वारा विरचित खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। इस काव्य में परमवीर एवं दानी कर्ण की कथा है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभाजित है, जो संक्षेप में निम्नवत् है-

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन

प्रथम सर्ग के आरम्भ में कवि ने अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र पुरुषों की पृष्ठभूमि बनाकर कर्ण का परिचय दिया है। कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। कर्ण कुन्ती के गर्भ से कौमार्यावस्था में उत्पन्न हुए थे, इसलिए कुन्ती ने लोकलाज के भय से उस नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे एक निम्न जाति (सूत) के व्यक्ति ने पकड़ लिया और उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण शूरवीर, शीलवान, पुरुषार्थी और शस्त्र व शास्त्र मर्मज्ञ बने।
एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र-कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। सभी लोग अर्जुन की बाण-विद्या पर मुग्ध हो गये, किन्तु तभी धनुष-बाण लिये कर्ण भी सभा में उपस्थित हो गया और उसने अर्जुन को द्वन्द्व-युद्ध के लिए चुनौती दी

आँख खोलकर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार ।
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कारे ॥

कर्ण की इस चुनौती से सम्पूर्ण सभा आश्चर्यचकित रह गयी, तभी कृपाचार्य ने उसका नाम, जाति और गोत्र पूछे। इस पर कर्ण ने अपने को सूत-पुत्र बतलाया। फिर कृपाचार्य ने कहा कि राजपुत्र अर्जुन से समता प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले कहीं का राज्य प्राप्त करना चाहिए। इस पर दुर्योधन ने कर्ण की वीरता से मुग्ध होकर, उसे अंगदेश का राजा बना दिया और अपना मुकुट उतारकर कर्ण के सिर पर रख दिया। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन गया। इधर कौरव कर्ण को ससम्मान अपने साथ ले जाते हैं और उधर कुन्ती भाग्य की दु:खद विडम्बना पर मन मसोसती लड़खड़ाती हुई अपने रथ के पास पहुँचती है।

द्वितीय सर्ग : आश्रमवास

द्वितीय सर्ग का आरम्भ परशुराम के आश्रम-वर्णन से होता है। पाण्डवों के विरोध के कारण द्रोणाचार्य ने जब कर्ण को अपना शिष्य नहीं बनाया तो कर्ण परशुराम के आश्रम में धनुर्विद्या सीखने के लिए जाता है। परशुराम क्षत्रियों को शिक्षा नहीं देते थे। कर्ण के कवच और कुण्डल देखकर परशुराम ने उसे ब्राह्मण कुमार समझा और अपना शिष्य बना लिया।

एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे कि तभी एक विषैला कीट कर्ण की जंघा को काटने लगा। गुरु की निद्रा न खुल जाए, इस कारण कर्ण अपने स्थान से हिला तक नहीं। जंघा से बहते रक्त की धारा के स्पर्श से परशुराम की निद्रा टूट गयी। कर्ण की इस अद्भुत सहनशक्ति को देखकर परशुराम ने कहा कि ब्राह्मण में इतनी सहनशक्ति नहीं होती, इसलिए तू अवश्य ही क्षत्रिय या अन्य जाति का है। कर्ण स्वीकार कर लेता है कि मैं सूत-पुत्र हूँ। क्रुद्ध परशुराम ने उसे तुरन्त अपने आश्रम से चले जाने को कहा और शाप दिया कि मैंने तुझे जो ब्रह्मास्त्र विद्या सिखलायी है, तू अन्त समय में उसे भूल जाएगा-

सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा शाप समय पर, उसे भूल तू जाएगा ।

कर्ण गुरु की चरणधूलि लेकर आँसू भरे नेत्रों से आश्रम छोड़कर चल देता है।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश

कौरवों से जुए में हारने के कारण पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ा। तेरह वर्ष की यह अवधि व्यतीत कर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं। पाण्डवों की ओर से श्रीकृष्ण कौरवों से सन्धि का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाते हैं। श्रीकृष्ण ने कौरवों को बहुत समझाया, परन्तु दुर्योधन ने सन्धि- प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा उल्टे श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का असफल प्रयास किया।

दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया कि अब तो युद्ध निश्चित है, परन्तु उसे टालने का एकमात्र यही उपाय है कि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दो; क्योंकि तुम कुन्ती-पुत्र हो। अब तुम ही इस । भारी विनाश को रोक सकते हो। इस पर कर्ण आहत होकर व्यंग्यपूर्वक पूछता है कि आप आज मुझे कुन्ती–पुत्र बताते हैं। उस दिन क्यों नहीं कहा था, जब मैं जाति-गोत्रहीन सूत-पुत्र बना भरी सभा में अपमानित हुआ था। मुझे स्नेह और सम्मान तो दुर्योधन ने ही दिया था। मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है।

फिर भी आप मेरे जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को मत बताइएगा; क्योंकि मेरे जन्म का रहस्य जानने पर वे ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अपना राज्य मुझे दे देंगे और मैं वह राज्य दुर्योधन को दे डालूंगा-

धरती की तो है क्या बिसात ?
आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ ।
उसको भी न्यौछावर कर दें,
कुरुपति के चरणों पर धर हूँ॥

इतना कहकर और श्रीकृष्ण को प्रणाम कर कर्ण चला जाता है।
इस सर्ग की कथा से जहाँ हमें श्रीकृष्ण के महान् कूटनीतिज्ञ और अलौकिक शक्तिसम्पन्न होने की विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है वहीं कर्ण के अन्दर हमें सच्चे मित्र और मित्र के प्रति कृतज्ञ होने के गुण दिखाई पड़ते हैं।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

इस सर्ग में कर्ण की उदारता एवं दानवीरता का वर्णन किया गया है। कर्ण प्रतिदिन एक प्रहर तक याचकों को दान देता था। श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि जब तक कर्ण के पास सूर्य द्वारा प्रदत्त कवच और कुण्डल हैं, तब तक कर्ण को कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास उसकी दानशीलता की परीक्षा लेने आये और कर्ण से उसके कवच और कुण्डल दान में माँग लिये। यद्यपि कर्ण ने छद्मवेशी इन्द्र को पहचान लिया, तथापि उसने इन्द्र को कवच और कुण्डल भी दान दे दिये। कर्ण की इस अद्भुत दानशीलता को देख देवराज इन्द्र का मुख ग्लानि से मलिन प्रड़ गया–

अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला।
देवराज का मुखमण्डल पड़ गया ग्लानि से काला ॥

इन्द्र ने कर्ण की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कर्ण को महादानी, पवित्र एवं सुधी कहा तथा स्वयं को प्रवंचक, कुटिल व पापी बताया और कर्ण को एक बार प्रयोग में आने वाला अमोघ एकघ्नी अस्त्र प्रदान किया।

पंचम सर्ग : माता की विनती

इस सर्ग का आरम्भ कुन्ती की चिन्ता से होता है। कुन्ती इस कारण चिन्तित है कि रण में मेरे पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। कुन्ती व्याकुल हो कर्ण से मिलने जाती है। उस समय कर्ण सन्ध्या कर रहा था, आहट पाकर कर्ण का ध्यान टूट जाता है। उसने कुन्ती को प्रणामकर उसका परिचय पूछा। कुन्ती ने बताया कि तू सूत-पुत्र नहीं मेरा पुत्र है। तेरा जन्म मेरी कोख से तब हुआ था, जब मैं अविवाहिता थी। मैंने लोक-लज्जा के भय से तुझे मंजूषा (पेटी) में रखकर नदी में बहा दिया था, परन्तु अब मैं यह सहन नहीं कर सकती कि मेरे ही पुत्र एक-दूसरे से युद्ध करें; अतः मैं तुझसे प्रार्थना करने आयी हूँ कि तुम अपने छोटे भ्राताओं के साथ मिलकर राज्य का भोग करो।

कर्ण ने कहा कि मुझे अपने जन्म के विषय में सब कुछ ज्ञात है, परन्तु मैं अपने मित्र दुर्योधन का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। असहाय कुन्ती ने कहा कि तू सबको दान देता है, क्या अपनी माँ को भीख नहीं दे सकता ? कर्ण ने कहा कि माँ! मैं तुम्हें एक नहीं चार पुत्र दान में देता हूँ। मैं अर्जुन को छोड़कर तुम्हारे किसी पुत्र को नहीं मारूंगा। यदि अर्जुन के हाथों मैं मारा गया तो तुम पाँच पुत्रों की माँ रहोगी ही, परन्तु यदि मैंने युद्ध में अर्जुन को मार दिया तो विजय दुर्योधन की होगी और मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तब भी तुम पाँच पुत्रों की ही माँ रहोगी। कुन्ती निराश मन लौट आती है-

हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर, दो बिन्दु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर ।
बेटे का मस्तक सँघ बड़े ही दुःख से, कुन्ती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से ।।

षष्ठ सर्ग : शक्ति-परीक्षण

युद्ध में आहत भीष्म शर-शय्या पर पड़े हुए हैं। कर्ण उनसे युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म पितामह उसे नर-संहार रोकने के लिए समझाते हैं, परन्तु कर्ण नहीं मानता और भीषण युद्ध आरम्भ हो जाता है। कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारता है, किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ कर्ण के सामने ही नहीं आने देते; क्योंकि उन्हें भय है कि कर्ण एकघ्नी का प्रयोग करके अर्जुन को मार देगा। अर्जुन को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने भीम-पुत्र घटोत्कचे को युद्धभूमि में उतार दिया। घटोत्कच ने घमासान युद्ध किया, जिससे कौरव-सेना अहि-त्राहि कर उठी। अन्ततः दुर्योधन ने कर्ण से कहा-

हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का अचिर किसी विधि त्राण करो,
जब नहीं अन्य गति, आँख मूंद एकघ्नी का सन्धान करो ।
अरि का मस्तक है दूर, अभी अपनों के सीस बचाओ तो,
जो मरण-पाश है पड़ा प्रथम, उसमें से हमें छुड़ाओ तो ॥

कर्ण ने भारी नरसंहार करते हुए घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग कर दिया, जिससे घटोत्कच मारा गया। घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से अर्जुन अभय हो गया। आज युद्ध में विजयी होने पर भी कर्ण एकत्री का प्रयोग हो जाने से स्वयं को मन-ही-मन पराजित-सा मान रहा था।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा

‘रश्मिरथी’ का यह अन्तिम सर्ग है। कौरव सेनापति कर्ण ने पाण्डवों की सेना पर भीषण आक्रमण किया। कर्ण की गर्जना से पाण्डव सेना में भगदड़ मच जाती है। युधिष्ठिर युद्धभूमि से भागने लगते हैं तो कर्ण उन्हें पकड़ लेता है, किन्तु कुन्ती को दिये वचन का स्मरण कर युधिष्ठिर को छोड़ देता है। इसी प्रकार भीम, नकुल और सहदेव को भी पकड़-पकड़कर छोड़ देता है। कर्ण का सारथी शल्य उसके रथ को अर्जुन के रथ के निकट ले आता है। कर्ण के भीषण बाण-प्रहार से अर्जुन मूर्च्छित हो जाता है। चेतना लौटने पर श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः कर्ण से युद्ध करने के लिए उत्तेजित करते हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। तभी कर्ण के रथ का पहिया रक्त के कीचड़ में फँस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है। इसी समय श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण-प्रहार करने के लिए कहते हैं

खड़ा है देखता क्या मौन भोले !
शरासन तान, बस अवसर यही है, घड़ी फिर और मिलने की नहीं है।
विशिख कोई गले के पार कर दे, अभी ही शत्रु का संहार कर दे।

कर्ण धर्म की दुहाई देता है तो श्रीकृष्ण उसे कौरवों के पूर्व कुकर्मों का स्मरण दिलाते हैं। इसी वार्तालाप में अवसर देखकर अर्जुन कर्ण पर प्रहार कर देता है और कर्ण की मृत्यु हो जाती है।
अन्त में युधिष्ठिर आदि सभी कर्ण की मृत्यु पर प्रसन्न हैं, किन्तु श्रीकृष्ण दु:खी हैं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि विजय तो अवश्य मिली, पर मिली मर्यादा खोकर। वास्तव में चरित्र की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहा। आप लोग कर्ण को भीष्म और द्रोणाचार्य की भाँति ही सम्मान दीजिए। यहाँ पर इस खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

[विशेष-मुझे इस सर्ग की कथा सर्वाधिक रुचिकर प्रतीत हुई। इस सर्ग में वर्णित कर्ण के शौर्य व साहस की तुलना इतिहास में विरले है। व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किस प्रकार पतित हो जाता है, भले ही वह ‘धर्मराज’ कहलाता हो अथवा ‘भगवान्’। यह यहाँ इतनी कलात्मकता से दर्शाया गया है कि मन नि:स्पन्द हो जाता है। अन्त में कर्ण की मृत्यु को ‘जीवन’ और ‘विजय’ से कहीं ऊँचा सिद्ध करते हुए कृष्ण कहते हैं-

दया कर शत्रु को भी त्राण देकर, खुशी से मित्रता कर प्राण देकर,
गया है कर्ण भू को दीन करके, मनुज-कुल को बहुत बलहीन करके।
x                                          x                                                  x
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए,
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है।

वस्तुत: कर्ण जैसा व्यक्ति और व्यक्तित्व स्रष्टा ने अभी तक कोई अन्य बनाया ही नहीं। वह अपनी तुलना आप है।)

प्रश्न 2.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर नायक (प्रमुख पात्र) कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण की वीरता एवं त्याग का वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव तथा शौर्य का चित्रण है। सिद्ध कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016, 17]
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के माध्यम से कवि ‘दिनकर’ ने महारथी कर्ण के किन गुणों पर प्रकाश डाला है ? अपने शब्दों में लिखिए। [2010]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में वर्णित कर्ण की संवेदना पर प्रकाश डालिए। [2012]
या
“‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में कर्ण के समक्ष अन्य सभी पात्र निस्तेज हो गये हैं।” इस उक्ति के प्रकाश में कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब इसे तोल सकता है धन ?” कथन के आधार पर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2010]
या
‘रश्मिरथी’ के कर्ण के व्यक्तित्व का निरूपण कीजिए। [2010]
उत्तर
‘रश्मिरथी’ कर्ण के चरित्र पर आधारित खण्डकाव्य है। कर्ण का चरित्र शील की प्रतिमूर्ति, शौर्य व पौरुष का अगाध सिन्धु, शक्ति का स्रोत, सत्य-साधना-दान-त्याग का तपोवन तथा आर्य-संस्कृति का आलोकमय तेज है। कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायक—कर्ण ‘रश्मिरथी’ का नायक है। काव्य की सम्पूर्ण कथा कर्ण के ही चारों ओर घूमती है। काव्य का नामकरण भी कर्ण को ही नायक सिद्ध करता है। ‘रश्मिरथी’ का अर्थ है-वह मनुष्य, जिसका रथ रश्मि अर्थात् पुण्य का हो। इस काव्य में कर्ण का चरित्र ही पुण्यतम है। कर्ण के आगे अन्य किसी पात्र का चरित्र नहीं ठहर पाता। कर्ण के सम्बन्ध में कवि के ये शब्द द्रष्टव्य हैं

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी ।
जाति गोत्र का नहीं, शील का पौरुष का अभिमानी ॥

(2) साहसी और वीर योद्धा-इस खण्डकाव्य के आरम्भ में ही कर्ण हमें एक वीर योद्धा के रूप में दिखाई देता है। शस्त्र-विद्या-प्रदर्शन के समय वह प्रदर्शन-स्थल पर उपस्थित होकर अर्जुन को ललकारता है। तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। जब इस पर कृपाचार्य कर्ण से उसकी जाति-गोत्र आदि पूछते हैं तो कर्ण उन्हें सटीक उत्तर देता है–

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुज बल से।
रवि-समान दीपित ललाट से, और कवच कुण्डल से ॥

(3) सच्चा मित्र-दुर्योधन ने जाति-अपमान से कर्ण की रक्षा उसे राजा बनाकर की, तभी से कर्ण दुर्योधन का अभिन्न मित्र बन गया। कृष्ण और कुन्ती के समझाने पर भी कर्ण दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। वह स्पष्ट शब्दों में कह देता है-

धरती की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें, कुरुपति के चरणों पर धर हूँ ॥

और अन्त समय तक कर्ण अपनी मित्रता के प्रति पूर्ण समर्पित रहता है।

(4) सच्चा गुरुभक्त-कर्ण गुरु के प्रति परम विनयी एवं श्रद्धालु है। कीट कर्ण की जाँघ काटकर भीतर घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, पर कर्ण पैर नहीं हिलाता; क्योंकि हिलने से उसकी जाँघ पर सिर रखकर सोये गुरु की नींद खुल जाएगी। आँखें खुलने पर गुरु को वह अपनी जाति-गोत्र बता देता है। तो वे क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, परन्तु कर्ण अपनी विनय नहीं छोड़ता और जाते समय गुरु की चरण-धूलि लेता है-

परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें, अपने हृदय की भक्ति देकर,
निराशा से विकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-शृंग से छूटा हुआ-सा ।।

(5) परम दानवीर-कर्ण के चरित्र की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह धन-सम्पत्ति की लिप्सा से मुक्त है। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या-वन्दन करने के बाद वह याचकों को दान देता है। ब्राह्मण-वेश में आये इन्द्र को वह अपने जीवन-रक्षक कवच और कुण्डल तक दान में दे देता है। अपनी माता कुन्ती को युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को न मारने का अभयदान देता है। कर्ण की दानशीलता के सम्बन्ध में कवि कहता है-

रवि-पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था।
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।

(6) महान् सेनानी–कौरवों की ओर से कर्ण महाभारत के युद्ध में सेनापति है। वह शर-शय्या पर लेटे भीष्म पितामह से युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म उसके विषय में कहते हैं-

अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे। तुम मिले कौरवों को वैसे ॥

युद्ध में कर्ण ने अपने रण-कौशल से पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। उसकी वीरता की प्रशंसा करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-

दाहक प्रचण्ड इसका बल है। यह मनुज नहीं कालानल है॥

(7) जाति-प्रथा का विरोधी-कर्ण को जाति और गोत्र के कारण ही भरी सभा में अपमानित होना पड़ा था। इसी कारण उसके मन में जाति और गोत्र के प्रति गहरा विषाद था। इस सम्बन्ध में कर्ण की तिलमिलाहट बड़ी मार्मिक है-

ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले।
शरमाते हैं नहीं जगत् में, जाति पूछने वाले ॥

(8) कृतज्ञ-कर्ण के चरित्र में कृतज्ञता का बड़ा गुण विद्यमान है। जब उसे यह पता लग जाता है कि उसकी माता राजरानी कुन्ती है तो भी वह निम्न जाति राधा के उपकार को नहीं भुलाता; जिसने उसका पालन-पोषण किया था। दुर्योधन ने उसे अंगदेश का राज्य देकर राजपुत्रों के साथ युद्ध का अधिकारी बनाया था, उसके उपकार को भी वह जीवनभर नहीं भुला पाता।

(9) मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त–आरम्भ से अन्त तक कर्ण को मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से जूझना पड़ता है। जीवन के प्रत्येक पग पर उसके सामने एक ही प्रश्न खड़ा होता है कि वह अब क्या करे ? शस्त्र-कौशल के समय उसका नाम, जाति तथा गोत्र पूछने पर, द्रोण द्वारा अपना शिष्य न बनाये जाने पर, परशुराम की सेवा करते समय अपनी सहनशक्ति के प्रदर्शन पर, गुरु परशुराम द्वारा शाप देने पर वह दुविधाग्रस्त हो जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा उसको उसके जन्म का रहस्य समझाने पर और पाण्डवों के पक्ष में कौरवों का साथ छोड़ देने के लिए कहने पर, माता कुन्ती द्वारा जन्म का रहस्य समझाने तथा कौरवों का साथ छोड़ अपने भाइयों से मिल जाने के लिए कहने आदि अनेक अवसरों पर कर्ण भयंकर अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त हो जाता है; किन्तु वह प्रत्येक अवसर पर विवेक और धैर्य से अपने अन्तर्द्वन्द्व पर विजय प्राप्त कर; अन्तत: सही निर्णय लेकर अपना मार्ग प्रशस्त करता है।

(10) अन्य विशेषताएँ–कर्ण महाभारत के युद्ध में मारा जाता है, किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण उसकी चारित्रिक विशेषताओं का गुणगान करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं-

हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का, दलित हारक, समुद्धारक त्रिया का।
बड़ां बेजोड़ दानी था, सदय था, युधिष्ठिर! कर्ण का अद्भुत हृदय था ।
x                                                   x                                          x
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए ।
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है ॥

इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव एवं शौर्य को चित्रण करना रहा है, जिसके लिए उसने कर्ण को राज्य और विजय की गलत महत्त्वाकांक्षाओं से पीड़ित न दिखाकर षड्यन्त्रों, परीक्षाओं और प्रलोभनों की स्थितियों में उसे अडिग चित्रित किया है। यही स्थिति उसको खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती है।

प्रश्न 3.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘रश्मिरथी के आधार पर कृष्ण के विराट् व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘कृष्ण’ की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2015)
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कृष्ण के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर
रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं—

(1) युद्ध-विरोधी-पाण्डवों के वनवास से लौटने के बाद श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए स्वयं हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध टालने का भरसक प्रयास कर करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। इसके बाद वे कर्ण को भी समझाते हैं, परन्तु कर्ण भी अपने प्रण से नहीं हटता। अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं-

यश मुकुट मान सिंहासन ले, बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तज रण रोक सखे, भू का हर भावी शोक सखे ।

(2) निर्भीक एवं स्पष्टवादी-श्रीकृष्ण केवल अनुनय-विनय ही करना नहीं जानते, वरन् वे निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता भी हैं। जब दुर्योधने समझाने से नहीं मानता तो वे उसे चेतावनी देते हुए कहते हैं-

तो ले मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ ।
याचना नहीं अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।

(3) शीलवान व व्यावहारिक-श्रीकृष्ण के सभी कार्य उनके शील के परिचायक हैं। वास्तव में वे एक सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं। वे शील को ही जीवन का सार मानते हैं-

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है, विभा का सार शील पुनीत में है।

साथ ही वह सांसारिक सिद्धि और सफलता के सभी सूत्रों से भी अवगत हैं।

(4) गुणों के प्रशंसक-श्रीकृष्ण अपने विरोधी के गुणों का भी आदर करते हैं। कर्ण उनके विरुद्ध लड़ता है, परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण का गुणगान करते नहीं थकते-

…………………वीर शत बार धन्य, तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

(5) महान् कूटनीतिज्ञ-श्रीकृष्ण महान् कूटनीतिज्ञ हैं। पाण्डवों की विजय श्रीकृष्ण की कूटनीति के कारण ही हुई। वे पाण्डवों की ओर के कूटनीतिज्ञ की कार्य कर दुर्योधन की बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का प्रमाण कर्ण से कहा गया उनका यह कथन है-

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ, बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम, तेरा अभिषेक करेंगे हम ॥

(6) अलौकिक शक्तिसम्पन्न–कवि ने श्रीकृष्ण के चरित्र में जहाँ मानव-स्वभाव के अनुरूप अनेक साधारण विशेषताओं का समावेश किया है, वहीं उन्हें अलौकिक शक्ति-सम्पन्न रूप देकर लीलापुरुष भी सिद्ध किया हैं। जब दुर्योधन उन्हें कैद करना चाहता है, तब वे अपने विराट स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं-

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।
डगमग डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ाकर साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे।”

इस प्रकार इस खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ, किन्तु महान् लोकोपकारक के रूप में चित्रित करके कवि ने उनके पौराणिक चरित्र को युगानुरूप बनाकर प्रस्तुत किया है। कवि के इस प्रस्तुतीकरण की विशेषता यह है कि इससे कहीं भी उनके पौराणिक स्वरूप को क्षति नहीं पहुंची है। कृष्ण का यह व्यक्तित्व कवि की कविता में युगानुसार प्रकट हुआ है।

प्रश्न 4.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 16, 17, 18]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के किसी नारी पात्र के चरित्र का चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के मातृत्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में प्रस्तुत कुन्ती के मन की घुटन का विवेचन कीजिए।
उत्तर
कुन्ती पाण्डवों की माता है। अविवाहिता कुन्ती के गर्भ से सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छ: पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) वात्सल्यमयी माता–कुन्ती को जब यह ज्ञात होता है कि कर्ण को उसके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है तो वह कर्ण को मनाने उसके पास पहुँच जाती है। उस समय कर्ण सूर्य की उपासना कर रहा था। अपने पुत्र कर्ण के तेजोमय रूप को देख कुन्ती फूली नहीं समाती। सन्ध्या से आँखें खोलने पर कर्ण स्वयं को राधा का पुत्र बताता है तो कुन्ती यह सुनकर व्याकुल हो जाती है-

रे कर्ण! बेध मत मुझे निदारुण शर से।
राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है ॥

कर्ण के पास से निराश लौटती हुई कुन्ती कर्ण को अपने अंक में भर लेती है, जो उसके वात्सल्य का प्रमाण है।

(2) अन्तर्द्वन्द्व ग्रस्त-जेब कुन्ती के ही पुत्र परस्पर शत्रु बने खड़े हैं, तब कुन्ती के हृदय में अन्तर्द्वन्द्र । भीषण आँधी उठ रही थी। वह इस समय बड़ी ही उलझन में पड़ी हुई हैं। पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की हानि हो, पर वह हानि तो कुन्ती की ही होगी। वह अपने पुत्रों का सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख समझती है-

दो में किसका उर फटे, फटॅगी मैं ही।
जिसकी भी गर्दन कटे, कहूँगी मैं ही ॥

(3) समाज-भीरु-कुन्ती लोक-लाज से बहुत अधिक भयभीत एक भारतीय नारी की प्रतीक है। कौमार्यावस्था में सूर्य से उत्पन्न नवजात शिशु (कर्ण) को वह लोक-निन्दा के भय से गंगा की लहरों में बहा देती है। इस बात को वह कर्ण के समक्ष भी स्वीकार करती है–

मंजूषा में धर वज्र कर मन को,
धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को ।

कर्ण को युवा और वीरत्व की प्रतिमूर्ति बने देखकर भी अपनी पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सम्मुख आ जाती है, तो वह कर्ण से अपनी दयनीय स्थिति को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त करती है-

बेटा धरती पर बड़ी दीन है नारी,
अबला होती, सचमुच योषिता कुमारी ।
है कठिन बन्द करना समाज के मुख को,
सिर उठा न पा सकती पतिता निज सुख को ।

(4) निश्छल-कुन्ती का हृदय छलरहित है। वह कर्ण के पास मन में कोई छल रखकर नहीं, वरन् निष्कपट भाव से गयी थी। यद्यपि कर्ण उसकी बातें स्वीकार नहीं करता, किन्तु कुन्ती उसके प्रति अपना ममत्व कम नहीं करती।

(5) बुद्धिमती और वाक्पटु–कुन्ती एक बुद्धिमती नारी है। वह अवसर को पहचानने तथा दूरगामी परिणाम का अनुमान करने में समर्थ है। कर्ण-अर्जुन युद्ध का निश्चय जानकर वह समुचित कदम उठाती है–

सोचा कि आज भी चूक अगर जाऊँगी, भीषण अनर्थ फिर रोक नहीं पाऊँगी।
फिर भी तू जीता रहे, न अपयश जाने, अब आ क्षणभर मैं तुझे अंक में भर लें ॥

इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में कई उच्चकोटि के गुणों के साथ-साथ मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करके, इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

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