UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)

प्रश्न 1.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 15, 16, 17, 18]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में वर्णित अत्यधिक मार्मिक प्रसंग का निरूपण कीजिए।
या
“‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा महाभारत के द्रौपदी चीर-हरण की संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है”, सिद्ध कीजिए। (2013)
या
“‘सत्य की जीत के आधार पर चीर-हरण प्रसंग का वर्णन कीजिए। [2015]
या
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन एवं विकर्ण के शस्त्र एवं शास्त्र सम्बन्धी विचारों की सम्यक् विवेचना कीजिए। (2010]
या
‘सत्य की जीत’ नामक खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का सारांश लिखिए। [2015] ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी चीर-हरण’ घटना अपने शब्दों में लिखिए। [2018]
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण से सम्बद्ध है। यह कथानक महाभारत के सभापर्व में द्यूतक्रीड़ा की घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघुकाव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। इसकी कथा संक्षेप में अग्रवत् है-

दुर्योधन पाण्डवों को छूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है। पाण्डव उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं और अन्त में अपना सर्वस्व हारने के पश्चात् द्रौपदी को भी हार जाते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दुर्योधन दु:शासन को आदेश देता है कि वह बलपूर्वक द्रौपदी को भरी सभा में लाये। दु:शासन राजमहल से द्रौपदी के केश खींचते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी को यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सिंहनी के समान गरजती हुई दु:शासन को ललकारती है। द्रौपदी की गर्जना से पूरा राजमहल हिल जाता है। और समस्त सभासद स्तब्ध रह जाते हैं–

ध्वंस विध्वंस प्रलय का दृश्य, भयंकर भीषण हा-हाकार।
मचाने आयी हूँ रे आज, खोल दे राजमहल का द्वार ।

इसके पश्चात् द्रौपदी और दु:शासन में नारी पर पुरुष द्वारा किये गये अत्याचार, नारी और पुरुष की सामाजिक समानता और उनके अधिकार, उनकी शक्ति, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शस्त्र और शास्त्र, न्याय-अन्याय आदि विषयों पर वाद-विवाद होता है। अहंकारी दुःशासन भी क्रोध में आ जाता है। ‘भरी सभा में युधिष्ठिर अपना सर्वस्व हार चुके हैं तो मुझे दाँव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार रह गया है’ ? द्रौपदी के इस तर्क से सभी सभासद प्रभावित होते हैं। वह युधिष्ठिर की सरलता और दुर्योधन आदि कौरवों की कुटिलता का भी रहस्य प्रकट करती है। वह कहती है कि सरल हृदय युधिष्ठिर कौरवों की कुटिल चालों में आकर छले गये हैं; अत: सभा में उपस्थित धर्मज्ञ यह निर्णय दें कि क्या वे अधर्म और कपट की विजय को स्वीकार करते हैं अथवा सत्य और धर्म की हार को अस्वीकार करते हैं ?

दुःशासन कहता है कि शास्त्र-बल से बड़ा शस्त्र-बल होता है। कर्ण, शकुनि और दुर्योधन, दुःशासन के इस कथन का पूर्ण समर्थन करते हैं। नीतिवान् विकर्ण दु:शासन की शस्त्र-बल की नीति का विरोध करता। है। वह कहता है कि यदि शास्त्र-बल से शस्त्र-बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण हो जाएगा तो मानवता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा; क्योंकि शस्त्र बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह इस बात पर बल देता है कि द्रौपदी द्वारा प्रस्तुत तर्क पर धर्मपूर्वक और न्यायसंगत निर्णय होना चाहिए। वह कहता है कि द्रौपदी किसी प्रकार भी कौरवों द्वारा जीती हुई नहीं है।

किन्तु कौरव ‘विकर्ण’ की बात को स्वीकार नहीं करते। हारे हुए युधिष्ठिर अपने उत्तरीय वस्त्र उतार देते हैं। दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है। वह कहती है कि मैं किसी प्रकार भी विजित नहीं हूँ और उसके प्राण रहते उसे कोई भी निर्वस्त्र नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दु:शासन द्रौपदी का चीर खींचने के लिए पुन: हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसके दुर्गा-जैसे तेजोद्दीप्त भयंकर रौद्र-रूप को देख दु:शासन घबरा जाता है और उसके वस्त्र खींचने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

द्रौपदी कौरवों को पुन: चीर-हरण करने के लिए ललकारती है। सभी सभासद द्रौपदी के सत्य, तेज और सतीत्व के आगे निस्तेज हो जाते हैं। वे सभी कौरवों की निन्दा तथा द्रौपदी के सत्य और न्यायपूर्ण पक्ष का समर्थन करते हैं। मदान्ध दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण आदि को द्रौपदी पुनः ललकारती हुई कहती है-

और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे कितना लग जाय ॥

वहाँ उपस्थित सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं; क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को आज रोका नहीं गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।

अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और पाण्डवों को मुक्त करने तथा उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को आदेश देते हैं। इसके साथ ही वे द्रौपदी का पक्ष लेते हुए उसका समर्थन करते हैं तथा सत्य, न्याय, धर्म की प्रतिष्ठा तथा संसार का कल्याण करना ही मानव-जीवन का उद्देश्य बताते हैं। वे पाण्डवों की कल्याण-कामना करते हुए कहते हैं-

तुम्हारे साथ तुम्हारा सत्य, शक्ति श्रद्धा, सेवा औ’ कर्म ।
यही जीवन के शाश्वत मूल्य, इन्हीं पर टिका मनुज का धर्म ॥
इन्हीं का लेकर दृढ़ अवलम्ब, चल रहे हो तुम पथ पर अभय ।
तुम्हारा गौरवपूर्ण भविष्य, प्राप्त होगी पग-पग पर विजय ॥

धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किये गये दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं तथा कहते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर-गीत ।।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी बनाया है और युग के अनुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दुहराया है।

प्रश्न 2.
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख पात्रों का संक्षेप में परिचय दीजिए।
या
“‘सत्य की जीत के पात्र पूर्णतः जीवन्त हैं।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख पात्र हैं-द्रौपदी, दु:शासन और धृतराष्ट्र। इनके अतिरिक्त दुर्योधन, विकर्ण, कर्ण और युधिष्ठिर भी उल्लेखनीय पात्र हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(1) द्रौपदी-यह प्रस्तुत खण्डकाव्य की नायिका है। यह द्रुपद राजपुत्री और पाण्डव-कुल की वधू है, जो युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की पत्नी है। यह सशक्त, ओजस्वी, आत्म-सम्मान से युक्त वीरांगना नारी है। इसके चरित्र पर आधुनिक नारी-जागरण का प्रभाव है। इसका व्यक्तित्व अत्यन्त तेजस्वी एवं प्रखर है। इसी के माध्यम से कवि ने अधर्म, अन्याय, असत्य और अत्याचार पर सत्य एवं न्याय की विजय प्रदर्शित की है।
(2) दुःशासन-दु:शासन इस खण्डकाव्य का प्रमुख पुरुष पात्र है। यह अभिमानी, विवेकहीन, अनैतिक, अहंकारी, भौतिक मद में चूर, अशिष्ट, दुराचारी तथा नारी के प्रति अनुदार व्यक्ति है। इसके चरित्र को भौतिकता के मद में चूर साम्राज्यवादी शासकों के चरित्र जैसा दर्शाया गया है।
(3) धृतराष्ट्र-धृतराष्ट्र कौरव नरेश हैं। प्रस्तुत काव्य के अन्तिम भाग में इनका उल्लेख हुआ है। इन्होंने पक्षपात-रहित होकर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य बताकर अपने नीर-क्षीर विवेक को दर्शाया है। कौरवों तथा पाण्डवों के समक्ष वे अपनी उदार और विवेकपूर्ण नीति की घोषणा करते हैं-

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।

धृतराष्ट्र के चरित्र के माध्यम से कवि ने आज के शासनाध्यक्षों को इसी नीति के अनुसरण का सन्देश दिया है। इसमें आपाधापी के इस युग के लिए बड़े कल्याण का भाव छिपा है।
(4) दुर्योधन-दु:शासन के समान ही दुर्योधन को भी असत्य, अन्याय और अनैतिकता का समर्थक कहा गया है। वह ईर्ष्यालु है। उसे छल-कपट में विश्वास है। उसने कपट-चाल से पाण्डवों को जीता और उनके राज्य को हड़प लिया। इस प्रकार उसके चरित्र में वर्तमान साम्राज्यवादी शासकों की लोलुपता की झलक दिखाई गयी है।
(5) विकर्ण और विदर-विकर्ण और विदुर अन्धी शस्त्र-शक्ति के विरोधी हैं। केवल शस्त्रे-बल पर स्थापित शान्ति को वे अनुचित मानते हैं। दोनों पात्र न्यायप्रिय हैं तथा कौरव-कुल के होते हुए भी वे द्रौपदी के सत्य-पक्ष के समर्थक, स्पष्टवादी और निर्भीक हैं।
(6) युधिष्ठिर-युधिष्ठिर के दृढ़ एवं निश्छल चरित्र में कवि ने आदर्श राष्ट्रनायक की झलक प्रस्तुत की है। वे आरम्भ से अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन चरित्र में ही गम्भीरता, शालीनता, सत्यनिष्ठा, न्यायप्रियता, विवेकशीलता और धर्मपरायणता जैसी अमूल्य विशेषताएँ प्रकट की हैं।
(7) कर्ण–कर्ण दुर्योधन का मित्र तथा अंगदेश का राजा है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि कवि ने सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक संस्पर्शों के सहारे पात्रों को पूर्णत: जीवन्त और युगानुकूल चित्रित किया है।

प्रश्न 3.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2015, 16, 18]
या
‘सत्य की जीत के किसी मुख्य नारी-पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए। [2012, 13]
या
‘सत्य की जीत’ में कवि ने द्रौपदी के चरित्र में जो नवीनताएँ प्रस्तुत की हैं, उनका उद्घाटन करते हुए उसके चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
सिद्ध कीजिए कि “द्रौपदी सत्य की अपराजेय आत्मिक शक्ति से ओतप्रोत नारी है।” [2010]
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायिका-द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका है। सम्पूर्ण कथा उसके चारों ओर घूमती है। वह राजा द्रुपद की पुत्री, धृष्टद्युम्न की बहन तथा युधिष्ठिर सहित पाँचों पाण्डवों की पत्नी है। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में अत्यधिक विकट समय होते हुए भी वह बड़े आत्मविश्वास से दु:शासन को अपना परिचय देती हुई कहती है-

जानता नहीं कि मैं हूँ कौन ? द्रौपदी धृष्टद्युम्न की बहन।
पाण्डुकुल वधू भीष्म धृतराष्ट्र, विदुर को कबरे यह सहन ॥

(2) स्वाभिमानिनी सबला-द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपना अपमान नारी-जाति का अपमान समझती है और वह इसे सहन नहीं करती। ‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी महाभारत की द्रौपदी की भाँति असहाय, अबला और संकोची नारी नहीं है। यह द्रौपदी तो अन्यायी, अधर्मी पुरुषों से जमकर संघर्ष व विरोध करने वाली है। इस प्रकार उसका निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है-

समझकर एकाकी, निशंक, दिया मेरे केशों को खींच।
रक्त का पैंट पिये मैं मौन, आ गयी भरी सभा के बीच ॥
इसलिए नहीं कि थी असहाय, एक अबला रमणी का रूप।
किन्तु था नहीं राज-दरबार, देखने मेरा भैरव-रूप ।

(3) विवेकशीला--द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँख बन्द कर चलने वाली नारी नहीं, वरन् विवेक से कार्य करने वाली नारी है। आज की नारी की भाँति वह अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए सजग है। द्रौपदी की स्पष्ट मान्यता है कि नारी में अपार शक्ति और आत्मबल विद्यमान है। पुरुष स्वयं को संसार में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न समझता है, किन्तु द्रौपदी इस अहंकारपूर्ण मान्यता का खण्डन करती हुई कहती हे–

नहीं कलिका कोमल सुकुमार, नहीं रे छुई-मुई-सा गात !
पुरुष की है यह कोरी भूल, उसी के अहंकार की बात ॥

वह केवल दु:शासन ही नहीं वरन् अपने पति को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर स्पष्टीकरण माँगती है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जुए में स्वयं को हारने वाले युधिष्ठिर को मुझे दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं है—-

पूछती हूँ मैं केवल एक प्रश्न, उसका उत्तर मिल जाय।
कसँगी फिर जो हो आदेश, बड़ों का वचन मानकर न्याय ॥
प्रथम महाराज युधिष्ठिर मुझे, या कि थे गये स्वयं को हार।।
स्वयं को यदि तो उनको मुझे, हारने का था क्या अधिकार ?

द्रौपदी के ये वचन सुनकर सम्पूर्ण सभा स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है और द्रौपदी के तर्को पर न्यायपूर्वक विचार करने के लिए विवश हो जाती है। द्रौपदी के ये कथन उसकी वाक्पटुता एवं योग्यता के परिचायक हैं।
(4) साध्वी-द्रौपदी में शक्ति, ओज, तेज, स्वाभिमान और बुद्धि के साथ-साथ सत्य, शील और धर्म का पालन करने की शक्ति भी है। द्रौपदी के चरित्र की श्रेष्ठता से प्रभावित धृतराष्ट्र उसकी प्रशंसा करते हुए। कहते हैं-

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार॥

(5) ओजस्विनी-‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी ओजस्विनी है। वह अपना अपमान होने पर सिंहनी की भाँति दहाड़ती है-

सिंहनी ने कर निडर दहाड़, कर दिया मौन सभा को भंग ।।

दु:शासन द्वारा केश खींचने के बाद वह रौद्र-रूप धारण कर लेती है। कवि कहता है–

खुली वेणी के लम्बे केश, पीठ पर लहराये बन काल।
उगलते ज्यों विष कालिया नाग, खोलकर मृत्यु-कणों का जाल ।

(6) सत्य, न्याय और धर्म की एकनिष्ठ साधिका-द्रौपदी सत्य और न्याय की अजेय शक्ति और असत्य तथा अधर्म की मिथ्या शक्ति का विवेचन बहुत संयत शब्दों में करती हुई कहती है-

सत्य का पक्ष, धर्म का पक्ष, न्याय का पक्ष लिये मैं साथ।
अरे, वह कौन विश्व में शक्ति, उठा सकती जो मुझ पर हाथ।।

(7) नारी-जाति की पक्षधर-‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी आदर्श भारतीय नारी है। भारतीय संस्कृति के आधार वेद हैं और वेदों के अनुसार आदर्श नारी में अपार शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आत्म-सम्मान, सत्य, धर्म, व्यवहार-कुशलता, वाक्प टुता, सदाचार आदि गुण विद्यमान होते हैं। द्रौपदी में भी ये सभी गुण विद्यमान हैं। अपने सम्मान को ठेस लगने पर वह सभा में गरज उठती है-

मौन हो जा मैं सह सकतीन, कभी भी नारी का अपमान ।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ॥

द्रौपदी को पता है कि नारी में अपार शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि और शील विद्यमान हैं। नारी ही मानवजाति के सृजन की अक्षय स्रोत है। वह नारी-जाति को पुरुष के आगे हीन सिद्ध नहीं होने देती है। नारी की गरिमा का वर्णन करती हुई वह कहती है-

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

(8) वीरांगना—वह पुरुष को विवश होकर क्षमा कर देने वाली असहाय अबला नहीं वरन् चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध है–

अरे ओ दुःशासन निर्लज्ज, देख तू नारी का भी क्रोध ।।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं उसका बोध ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानिनी, आत्मगौरवसम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 4.
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2009, 10, 11, 16, 17, 18]
या
“दुःशासन में पौरुष का अहम् और भौतिक शक्ति का दम्भ है।” ‘सत्य की जीत’ के आधार पर इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘सत्य की जीत के एक प्रमुख पुरुष-पात्र (दुःशासन) के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। [2009, 11, 14, 18]
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दु:शासन एक प्रमुख पात्र है जो दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) अहंकारी एवं बुद्धिहीन-दु:शासन को अपने बल पर बहुत अधिक घमण्ड है। विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है तथा पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। सत्य, प्रेम और अहिंसा की अपेक्षा वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है-

शस्त्रे जो कहे वही है सत्य, शस्त्र जो करे वही है कर्म।
शस्त्र जो लिखे वही है शास्त्र, शस्त्र-बल पर आधारित धर्म ।।

इसीलिए परिवारजन और सभासदों के बीच द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में वह तनिक भी लज्जा नहीं मानता है।
(2) नारी का अपमान करने वाला-द्रौपदी के साथ हुए तर्क-वितर्क में दु:शासन का नारी के प्रति पुरातन और रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। दुःशासन नारी को पुरुष की दासी और भोग्या तथा पुरुष से दुर्बल मानता है। नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाते हुए वह कहता है-

कहाँ नारी ने ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम।
जानती है वह केवल पुरुष, भुजदण्डों में करना विश्राम॥

(3) शस्त्र-बल विश्वासी–दुःशासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्म-शास्त्र और धर्मज्ञों में कोई विश्वास नहीं है। इन्हें तो वह शस्त्र के आगे हारने वाले मानता है-

धर्म क्या है और क्या है सत्य, मुझे क्षणभर चिन्ता इसकी न ।
शास्त्र की चर्चा होती वहाँ, जहाँ नर होता शस्त्र-विहीन ।।

(4) दुराचारी-दु:शासन हमारे समक्ष एक दुराचारी व्यक्ति के रूप में आता है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता। वह शास्त्रज्ञों, धर्मज्ञों व नीतिज्ञों पर कटाक्ष करता है और उन्हें दुर्बल बताता है-

लिया दुर्बल मानव ने ढूँढ़, आत्मरक्षा का सरल उपाय ।
किन्तु जब होता सम्मुख शस्त्र, शास्त्र हो जाता निरुपाय ॥

(5) धर्म और सत्य का विरोधी-धर्म और सत्य का शत्रु दुःशासन आध्यात्मिक शक्ति का विरोधी एवं भौतिक शक्ति का पुजारी है। वह सत्य, धर्म, न्याय, अहिंसा जैसे उदार आदर्शों की उपेक्षा करता है।
(6) सत्य व सतीत्व से पराजित–दुःशासन की चीर-हरण में असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती है। कि सत्य की ही जीत होती है। वह शक्ति से मदान्ध होकर तथा सत्य, धर्म एवं न्याय की दुहाई देने को दुर्बलता का चिह्न बताता हुआ जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के शरीर से प्रकट होने वाले सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता है।

दुःशासन के चरित्र की दुर्बलताओं या विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ० ओंकार प्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं कि, “लोकतन्त्रीय चेतना के जागरण के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दु:शासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाये हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में दु:शासन उन्हीं का प्रतीक है।”

प्रश्न 5.
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2011, 12, 13]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र महान गुणों से परिपूर्ण है। स्पष्ट कीजिए। [2013]
या
‘सत्य की जीत’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2015, 16]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2013, 14]
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र धृतराष्ट्र और द्रौपदी के कथनों के माध्यम से उजागर हुआ है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) सत्य और धर्म के अवतार-युधिष्ठिर की सत्य और धर्म में अडिग निष्ठा है। उनके इसी गुण पर मुग्ध धृतराष्ट्र कहते हैं

युधिष्ठिर ! धर्मपरायण श्रेष्ठ, करो अब निर्भय होकर राज्य।

(2) सरल-हृदय व्यक्ति –युधिष्ठिर बहुत सरल-हृदय के व्यक्ति हैं। वे दूसरों को भी सरल-हृदय समझते हैं। इसी सरलता के कारण वे शकुनि और दुर्योधन के कपट जाल में फँस जाते हैं और उसका दुष्परिणाम भोगते हैं। द्रौपदी ठीक ही कहती है-

युधिष्ठिर!धर्मराज थे, सरल हृदय, समझे न कपट की चाल।

(3) सिन्धु-से धीर-गम्भीर-द्रौपदी का अपमान किये जाने पर भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी दुर्बलता नहीं, वरन् उनकी धीरता, गम्भीरता और सहिष्णुता है-

खिंची है मर्यादा की रेखा, वंश के हैं वे उच्च कुलीन।।

(4) अदूरदर्शी-युधिष्ठिर यद्यपि गुणवान हैं, किन्तु द्रौपदी को दाँव पर लगाने जैसा अविवेकी कार्य कर बैठते हैं, जिससे जान पड़ता है कि वह सैद्धान्तिक अधिक किन्तु व्यवहारकुशल कम हैं। वह इस कृत्य का दूरगामी परिणाम दृष्टि से ओझल कर बैठते हैं-

युधिष्ठिर धर्मराज का हृदय, सरल-निर्मल-निश्छल-निर्दोष।
भरा अन्तर-सागर में अमित, भाव-रत्नों का सुन्दर कोष ॥

(5) विश्व-कल्याण के साधक-युधिष्ठिर का लक्ष्य विश्व-मंगल है, यह बात धृतराष्ट्र भी स्वीकार करते हैं-

तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि, तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के ऐसे पात्र हैं, जो आरम्भ से लेकर अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन से ही उनके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ स्पष्ट की हैं।

प्रश्न 6.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुर्योधन का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2011, 12, 14, 17]
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन का चरित्र एक तुच्छ शासक का चरित्र है। वह असत्य, अन्याय तथा अनैतिकता का आचरण करता है। वह छल विद्या में निपुण अपने मामा शकुनि की सहायता से पाण्डवों को छूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है और उनका सारा राज्य जीत लेता है। दुर्योधन चाहता है कि पाण्डव द्रौपदी सहित उसके दास-दासी बनकर रहे। वह द्रौपदी को सभा के बीच में वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहता है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
(1) शस्त्रबल का पुजारी-दुर्योधन सत्य, धर्म और न्याय में विश्वास नहीं रखता। वह शारीरिक तथा तलवार के बल में आस्था रखता है आध्यात्मिक एवं आत्मिक बल की उपेक्षा करता है। दु:शासन के मुख से शस्त्रबल की प्रशंसा और शास्त्रबल की निन्दा सुनकर वह प्रसन्नता से खिल उठता है।।
(2) अनैतिकता का अनुयायी-दुर्योधन न्याय और नीति को छोड़कर अनीति का अनुसरण करता है। भले-बुरे का विवेक वह बिलकुल नहीं करता। अपने अनुयायियों को भी अनीति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना ही उसकी नीति है। जब दु:शासन द्रौपदी का चीरहरण करने में असमर्थ हो जाता है तो दु:शासन की इस असमर्थता को वह सहन नहीं कर पाता है और अभिमान में गरज कर कहता है-

कर रहा क्या, यह व्यर्थ प्रलाप, भय वशं था दुःशासन वीर।
कहा दुर्योधन ने उठ गरज, खींच क्या नहीं खिचेगी चीर॥

(3) मातृद्वेषी-दुर्योधन बाह्य रूप में पाण्डवों को अपना भाई बताता है किन्तु आन्तरिक रूप से उनकी जड़े काटता है। वह पाण्डवों का सर्वस्व हरण करके उन्हें अपमानित और दर-दर का भिखारी बनाना चाहता है। द्रौपदी के शब्दों में-

किन्तु भीतर-भीतर चुपचाप, छिपाये तुमने अनगिन पाश।
फँसाने को पाण्डव निष्कपट, चाहते थे तुम उनका नाश।।

(4) असहिष्णुता-दुर्योधन स्वभाव से बड़ा ईष्र्यालु है। पाण्डवों का बढ़ता हुआ यश तथा सुखशान्तिपूर्ण जीवन उसकी ईर्ष्या का कारण बन जाता है। वह रात-दिन पाण्डवों के विनाश की ही योजना बनाता रहता है। उसके ईष्र्यालु स्वभाव का चित्रण देखिए-

ईष्र्या तुम को हुई अवश्य, देख जग में उनका सम्मान।
विश्व को दिखलाना चाहते, रहे तुम अपनी शक्ति महान् ॥

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि दुर्योधन का चरित्र एक साम्राज्यवादी शासक का चरित्र है।

प्रश्न 7.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर विकर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में विकर्ण को एक विवेकशील व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। कौरवों की विशाल सभा के मध्य जब दुःशासन शस्त्रबल की महत्ता और शास्त्रबल को निर्बलों का शस्त्र कहकर शास्त्रों के प्रति अपनी अश्रद्धा तथा अनास्था प्रकट करता है तो विकर्ण इस अनीति को सहन नहीं कर पाता है। बड़े-बड़े शूरवीरों और धर्मज्ञों की उपस्थिति में द्रौपदी पर किये गये अत्याचार को देखकर विकर्ण क्षुब्ध हो उठता है और कहता है-

बढ़े क्या अरे, यहीं तक आज, सभ्यता के संस्कृति के चरण?
कर रहा रे, मानव ललकार, शास्त्र को छोड़ शस्त्र का वरण ॥

आदि युग की पाशविकता से मुक्त होकर तथा अपने मस्तिष्क और हृदय की शक्ति का आश्रय लेकर मानव आज श्रेष्ठ मानव कहलाता है। किन्तु यदि आज वह पुनः शस्त्रबल को सर्वाधिक महत्ता प्रदान करेगा तो आज तक विकास के पथ पर अग्रसर होने के उसके सभी प्रयत्नों और संघर्षों को व्यर्थ कहा जा सकता है। विकर्ण इस सम्बन्ध में स्पष्ट घोषणा करता है-

शस्त्र सर्वस्व, शास्त्र सब व्यर्थ, धारणा यह विनाश की मूल।
शास्त्र सर्वस्व शस्त्र सब व्यर्थ, अभी कहना यह भी है भूल।

विकर्ण अन्धी शस्त्र-शक्ति का विरोधी है। उसका यह विश्वास है कि संसार की बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान भी प्रेम, शान्ति और सहयोग की भावना से किया जा सकता है। वह कहता है-

शस्त्र बल पर आधारित शान्ति, क्षणिक होती स्थायित्व विहीन ।

शस्त्रों के कारण ही मनुष्य में छिपी दानवता जाग्रत होती है और वह संसार की प्रगति एवं सभ्यता के विनाश का कारण बनती है। विकर्ण कहता है-

मौन है आज सभी क्यों? देख रहा हूँ मैं कैसा यह दृश्य।
सत्य को छिपा रहे हम जान, करेगा हमें क्षमा न भविष्य ॥

सत्य, धर्म एवं न्याय के प्रति भविष्य में मानव की आस्था एवं विश्वास उठ न जाए, उसके लिए वह सभी धर्मज्ञ सभासदों से आग्रह करते हुए कहता है-

अगर हमसे हो गया अधर्म, अगर हमसे हो गयी अनीति।
धर्म में न्याय-सत्य में रह जायेगी किसकी यहाँ प्रतीति।

इस स्पष्टोक्ति से स्पष्ट होता है कि विकर्ण के चरित्र में स्पष्टवादिता, निर्भीकता, न्यायप्रियता, धर्मभीरुता आदि सभी मानवोचित श्रेष्ठ गुणों का समावेश है।

प्रश्न 8.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर धृतराष्ट्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2011]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के जिस पुरुष पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया हो, उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2011]
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने धृतराष्ट्र के चरित्र को काव्य के अन्तिम सर्ग में उपस्थित किया है। वे कौरवों के राज-दरबार में भीष्म, द्रोण, विदुर, विकर्ण जैसे धर्मज्ञों एवं शास्त्रज्ञों के साथ विराजमान हैं। तथा मौन होकर द्रौपदी तथा दु:शासन के तर्को एवं उनके पक्ष-विपक्ष में बोलने वाले सभासदों के विचारों को गम्भीरतापूर्वक सुनते हैं। वे पंच के गौरवपूर्ण पद पर विराजमान होकर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहकर अपने नीर-क्षीर विवेक का परिचय देते हैं। वह लोकमत का आदर करते हुए सभासदों को शान्त करते हुए कहते हैं-

हुई है दुर्योधन से भूल, किया है उसने यह दुष्कर्म ।
पाण्डवों पर छल से आघात, कहा जा सकता न्याय न धर्म ॥

वे धरती पर सुलभ सभी पदार्थों का उपयोग युद्ध के लिए नहीं, अपितु शान्ति-स्थापना के लिए करना चाहते हैं। प्रेम, करुणा, सहानुभूति, क्षमा एवं दया आदि सद्गुणों को ही वे विकास एवं कल्याण का मूल मानते हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि विश्व के सन्तुलित विकास के लिए हृदय और बुद्धि का समन्वित विकास आवश्यक है। वह दुर्योधन को आदेश देते हैं कि पाण्डवों को मुक्त कर दो एवं उन्हें उनका राज्य लौटा दो। वे अपनी नीति की घोषणा करते हुए कहते हैं–

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।
बाँट कर आपस में मिल सभी, धरा का करें बराबर भोग ।।

वे द्रौपदी के पक्ष का समर्थन करते हैं तथा उसे सती, साध्वी और धर्मनिष्ठ बताते हैं। द्रौपदी की प्रशंसा करते हुए धृतराष्ट्र कहते हैं-

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय-सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार ॥

सत्य, धर्म एवं न्याय के मार्ग का अनुसरण करने वाला जीवन में सदा विजयी होता है, इसी बात की। घोषणा वे निम्नलिखित शब्दों में करते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्, दिगन्त में गूंजेंगे स्वर गीत ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धृतराष्ट्र नीति पर चलने वाले, अनीति के विरोधी, नारी का सम्मान करने वाले हैं। उनमें एक श्रेष्ठ राजा के समस्त गुण विद्यमान हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय–हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 ई० में बलिया जिले के दूबे का छपरा नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता श्री अनमोल द्विवेदी ज्योतिष और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे; अत: इन्हें ज्योतिष और संस्कृत की शिक्षा उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। काशी जाकर इन्होंने संस्कृत-साहित्य और ज्योतिष का उच्च स्तरीय ज्ञान प्राप्त किया। इनकी प्रतिभा का विशेष विकास विश्वविख्यात संस्था शान्ति निकेतन में हुआ। वहाँ ये 11 वर्ष तक हिन्दी भवन के निदेशक के रूप में कार्य करते रहे। वहीं इनके विस्तृत अध्ययन और लेखन का कार्य प्रारम्भ हुआ। सन् 1949 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट्० की उपाधि से तथा सन् 1957 ई० में भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्य किया तथा उत्तर प्रदेश सरकार की हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात् ये हिन्दी-साहित्य सम्मेलन प्रयाग के सभापति भी रहे। 19 मई, 1979 ई० को यह वयोवृद्ध साहित्यकार रुग्णता के कारण स्वर्ग सिधार गया।

साहित्यिक योगदान-हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्य के प्रख्यात निबन्धकार, इतिहास-लेखक, अन्वेषक, आलोचक, सम्पादक तथा उपन्यासकार के अतिरिक्त कुशल वक्ता और सफल अध्यापक भी थे। वे मौलिक चिन्तक, भारतीय संस्कृति और इतिहास के मर्मज्ञ, बँगला तथा संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे। इनकी रचनाओं में नवीनता और प्राचीनता का अपूर्व समन्वय था। इनके साहित्य पर संस्कृत भाषा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का स्पष्ट प्रभाव है। इन्होंने ‘विश्वभारती’ और ‘अभिनव भारतीय ग्रन्थमाला का सम्पादन किया। इन्होंने अपभ्रंश और लुप्तप्राय जैन-साहित्य को प्रकाश में लाकर अपनी गहन शोध-दृष्टि का परिचय दिया। निबन्धकार के रूप में विचारात्मक निबन्ध लिखकर भारतीय संस्कृति और साहित्य की रक्षा की। इन्होंने नित्यप्रति के जीवन की गतिविधियों और अनुभूतियों का मार्मिकता के साथ चित्रण किया है। ये हिन्दी ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। द्विवेदी जी की साहित्य-सेवा को डी० लिट्, पद्मभूषण और मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया है।

आलोचक के रूप में द्विवेदी जी ने हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर नवीन दृष्टि से विचार किया। इन्होंने हिन्दी-साहित्य का आदिकाल में नवीन सामग्री के आधार पर शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सूर-साहित्य पर इन्होंने भावपूर्ण आलोचना प्रस्तुत की है। इनके समीक्षात्मक निबन्ध विभिन्न संग्रहों में संग्रहीत हैं।

उपन्यासकार के रूप में द्विवेदी जी ने चार उपन्यासों की रचना की। इनके उपन्यास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। इनमें इतिहास और कल्पना के समन्वय द्वारा नयी शैली और उनकी मौलिक प्रतिभा का परिचय मिलता है।

रचनाएँ-आचार्य द्विवेदी का साहित्य बहुत विस्तृत है। इन्होंने अनेक विधाओं में उत्तम साहित्य की रचना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
(क) निबन्ध-संग्रह-‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘विचार-प्रवाह’, ‘विचार और वितर्क’, ‘आलोक पर्व’, ‘कल्पलता’। इन संग्रहों में द्विवेदी जी के विचारात्मक, भावात्मक और ललित निबन्ध हैं।
(ख) आलोचना-साहित्य–‘सूरदास’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘कबीर’, ‘साहित्य- सहचर’, साहित्य का मर्म’। इनमें द्विवेदी जी की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचनाएँ हैं।।
(ग) इतिहास-‘हिन्दी-साहित्य की भूमिका’, ‘हिन्दी-साहित्य का आदिकाल’, ‘हिन्दी-साहित्य’। इनमें इतिहास का शोधपूर्ण विवेचन है।
(घ) उपन्यास-‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचन्द्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’।
(ङ) सम्पादन-‘नाथ सिद्धों की बानियाँ’, ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’, ‘सन्देश रासक’। इन ग्रन्थों में लेखक की शोध-कला और सम्पादन-कला के दर्शन होते हैं।
(च) अनूदित रचनाएँ–‘प्रबन्ध चिन्तामणि’, ‘पुरातन प्रबन्ध-संग्रह’, ‘प्रबन्धकोश’, ‘विश्वपरिचय’, ‘लाल कनेर’, ‘मेरा बचपन’ आदि।

साहित्य में स्थान–आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी गद्य के प्रतिभाशाली रचनाकार थे। इन्होंने साहित्य के इतिहास-लेखन को नवीन दिशा प्रदान की। वे प्रकाण्ड विद्वान्, उच्चकोटि के विचारक और समर्थ आलोचक थे। गम्भीर आलोचना, विचारप्रधान निबन्धों और उत्कृष्ट उपन्यासों की रचना कर द्विवेदी जी ने निश्चय ही हिन्दी-साहित्य में गौरवपूर्ण स्थान पा लिया है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं। ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था; परन्तु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य का भार लेकर प्रवेश करता है, वह पहले कहाँ था। उस प्रवेश में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है। फिर एकाएक मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-ही-साथ यह मनोहर पुष्प साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार दिया गया। नाम तो लोग बाद में भी लेते थे, पर उसी प्रकार जिस प्रकार बुद्ध, विक्रमादित्य का। अशोक को जो सम्मान कालिदास से मिला, वह अपूर्व था।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक का पुष्प कालिदास के महाकाव्य में किस भाँति शोभा पाता है?
(iv) अशोक के पुष्प को कब साहित्य के सिंहासन से उतार फेंका गया?
(v) लेखक ने किसे विचित्र नाटकीय व्यापार बताया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम– अशोक के फूल।
लेखक का नाम–-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी अशोक के फूल के बारे में बताते हुए कह रहे हैं कि भारतीय साहित्यिक वाङमय और भारतीय जीवन में अशोक के फूल का प्रवेश और फिर विलुप्त हो जाना विचित्र नाटकीय स्थिति के सदृश है। कालिदास ने अपने काव्य में इस पुष्प को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। कालिदास के काव्य में यह पुष्प जिस सुन्दरता और सुकुमारता के साथ वर्णित होता है, वैसा उनके पूर्ववर्ती किसी कवि के काव्य में नहीं होता।
(iii) अशोक का पुष्प कालिदास के महाकाव्य में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा पाता है।
(iv) अशोक का पुष्प मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-साथ ही साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार फेंका गया।
(v) लेखक ने भारतीय साहित्य और भारतीय जीवन में अशोक के पुष्प के प्रवेश और निर्गम को विचित्र नाटकीय व्यापार बताया है।

प्रश्न 2.
कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधा। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक को विस्मृत करने का आधार किसे माना गया है?
(iv) लेखक ने दुनिया का किस तरह का व्यवहार बताया है?
(v) स्वार्थ का अखाड़ा किसे कहा गया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-द्विवेदी जी कहते हैं कि यह संसार बड़ा स्वार्थी है। यह उन्हीं बातों को याद रखता है, जिनसे उसका कोई स्वार्थ सिद्ध होता है, अन्यथा व्यर्थ की स्मृतियों से यह अपने आपको बोझिल नहीं बनाना चाहता। यह उन्हीं वस्तुओं को याद रखता है, जो उसके दैनिक जीवन की स्वार्थ-पूर्ति में सहायता पहुँचाती हैं। बदलते समय की दृष्टि में अनुपयोगी होने से यदि कोई वस्तु उपेक्षित हो जाती है तो यह उसे भूलकर आगे बढ़ जाता है।
(iii) अशोक को विस्मृत करने का आधार स्वार्थवृत्ति को माना गया है।
(iv) लेखक ने दुनिया के व्यवहार को इस तरह का बताया है कि यह केवल उतना ही याद रखती है जितने से इसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है।
(v) सारे संसार को स्वार्थ का अखाड़ा कहा गया है।

प्रश्न 3.
मुझे मानव-जाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवन-धारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नयी शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मनुष्य की जीवन-शक्ति को निर्मम क्यों बताया गया है?
(iv) लेखक ने किसे बाद की बात बताया है?
(v) ग्रहण और त्याग का रूप क्या है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी कह रहे हैं कि मानव-जाति के विकास के हजारों वर्षों के इतिहास के मनन और चिन्तन के परिणामस्वरूप उन्होंने जो अनुभव किया है वह यह है कि मनुष्य में जो जिजीविषा है वह अत्यधिक निर्मम और मोह-माया के बन्धनों से रहित है। सभ्यता और संस्कृति के जो कतिपय व्यर्थ बन्धन या मोह थे, उन सबको रौंदती हुई वह सदैव आगे बढ़ती चली गयी।
(iii) मनुष्य की जीवन-शक्ति को निर्मम इसलिए बताया गया है क्योंकि वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। देश और जाति की अवशुद्ध संस्कृति को बाद की बात बताया है। वर्तमान समाज का रूप न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।

प्रश्न 4.
अशोक का फूल तो उसी मस्ती में हँस रहा है। पुराने चित्त से इसको देखने वाला उदास होता है। वह अपने को पंडित समझता है। पंडिताई भी एक बोझ है—जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबाती है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक को देखकर कौन उदास होता है?
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक विद्वत्ता के बारे में जनसामान्य को क्या सन्देश देना चाहता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पाण्डित्य अर्थात् विद्वत्ता भी एक भार है। यह जितनी भारी होती है, उतनी ही तेजी से मनुष्य को डुबाती है। विद्वत्ता अहंकार को उत्पन्न करती है और अहंकार मनुष्य के विनाश का कारण होता है। जो जितना बड़ा विद्वान् होता है, वह उतना ही बड़ा अहंकारी भी होता है। रावण का उदाहरण हमारे समक्ष है। उस जैसा विद्वान् धरती पर शायद ही पैदा हुआ हो। लेकिन उसके अहंकार ने उसका सर्वनाश कर दिया।
(iii) अशोक को पुराने चित्त से देखने वाला उदास होता है।
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक सन्देश देना चाहता है कि विद्वत्ता को सहज और जीवन का अंग होना चाहिए जिससे वह व्यक्ति को उत्थान की ओर प्रेरित करेगी।
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय यह है कि व्यक्ति को अपने उत्थान से उत्साहित और पतन से निरुत्साहित नहीं होना चाहिए। प्रत्येक स्थिति में समभाव से रहना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ई० में सहारनपुर जिले के देवबन्द कस्बे में, एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता पं० रमादत्त मिश्र पौरोहित्य करते थे, परन्तु उनके विचारों में महानता और व्यक्तित्व में दृढ़ता थी। इनका जीवन अत्यन्त सरल और सात्त्विक था। इनकी माताजी का स्वभाव बड़ा उग्र था। इनकी शिक्षा नगण्य ही हुई। अपनी शिक्षा के विषय में इन्होंने लिखा है कि हिन्दी शिक्षा (सच माने) पहली पुस्तक के दूसरे पाठ ख-ट-म-ल खटमल, ट-म-ट-म टमटम। फिर साधारण संस्कृत। बस हरि ओम्। यानि बाप पढ़े न हम।” जब ये खुर्जा के एक संस्कृत विद्यालय में पढ़ते थे, तब प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता आसफ अली के ओजस्वी भाषण को सुनकर परीक्षा छोड़ दी और स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेने लगे। इसके बाद इन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा में लगा दिया। मिश्र जी सन् 1930 ई० से 1932 ई० तक और सन् 1942 ई० में जेल में रहे और राष्ट्र के उच्च नेताओं के सम्पर्क में आये। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् इन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता में लगा दिया। ये एक सजग पत्रकार थे तथा सहारनपुर से ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक मासिक पत्र निकालने के साथ-साथ साहित्य-सृजन में भी संलग्न रहते थे। इनके लेख राष्ट्रीय जीवन के मार्मिक संस्मरणों की सजीव झाँकियाँ हैं, जिसमें भारतीय स्वाधीनता के इतिहास के महत्त्वपूर्ण पृष्ठ भी हैं। 9 मई, 1995 ई० को इस महान् साहित्यकार की मृत्यु हो गयी।

साहित्यिक योगदान-प्रभाकर जी हिन्दी के लघुकथा, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज एवं ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। ये भारत की स्वतन्त्रता की लालसा लेकर साहित्य-क्षेत्र में अवतीर्ण हुए। इन्होंने अनेक नयी विधाओं पर फुटकर रचनाएँ कीं और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व सफलता प्राप्त की। इन्होंने पत्रकारिता को स्वार्थ-सिद्धि का साधन न बनाकर महान् मानवीय मूल्यों की स्थापना की। इनकी पत्रकारिता में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण देखने को मिलता है। ये एक आदर्श पत्रकार के रूप में हिन्दी जगत् में प्रतिष्ठित हुए। इनके पत्रों में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर इनके निर्भीक और आशावादी विचारों का परिचय मिलता है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय इन्होंने जीवन के मार्मिक संस्मरण लिखे। इनके संस्मरणों में इनके व्यक्तित्व के साथ-साथ भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की झाँकी भी मिलती है। इस प्रकार आदर्श पत्रकार, संस्मरण लेखक और रिपोर्ताज लेखक के रूप में प्रभाकर जी की साहित्य-साधना चिरस्मरणीय है।

रचनाएँ-प्रभाकर जी ने हिन्दी की विविध विधाओं में साहित्य-रचना की। इनके अभी तक नौ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं-
रेखाचित्र-‘महके आँगन चहके द्वार’, ‘जिन्दगी मुसकाई’, ‘माटी हो गयी सोना’, ‘भूले-बिसरे चेहरे’।
लघुकथा—‘आकाश के तारे’, ‘धरती के फूल’।
संस्मरण-‘दीप जले शंख बजे।
ललित निबन्ध-‘क्षण बोले कण मुस्काये’, ‘बाजे पायलिया के चुंघरू।
सम्पादन–आपने ‘नया जीवन’ तथा ‘विकास’, दो पत्रों का सम्पादन भी किया। इन पत्रों में प्रभाकर जी के सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर आशावादी और निर्भीक विचारों का परिचय मिलता है।
साहित्य में स्थान-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ शिल्प और वस्तु दोनों ही दृष्टियों से समर्थ गद्यकार हैं। इनकी लघुकथाएँ भावपूर्ण हैं और संस्मरणों में राष्ट्रीय जीवन की मार्मिक झाँकी है। ये मानव-मूल्यों के सजग प्रहरी के रूप में एक आदर्शवादी पत्रकार थे। देश तथा हिन्दी भाषा की असाधारण सेवा के कारण हिन्दी गद्य-साहित्य में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।

प्रश्न 1.
मैंने बहुतों को रूप से पाते देखा था, बहुतों को धने से और गुणों से भी बहुतों को पाते देखा था पर मानवता के आँगन में समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप आज अपनी ही आँखों देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाये और किसी का उत्सर्ग सदा किसी को पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने समर्पण और प्राप्ति का कौन-सा अदभुतं सौम्य स्वरूप देखा?
(iv) प्रायः गुणी व्यक्ति का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने किसकी झाँकी प्रस्तुत की है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं प्रसिद्ध रिपोर्ताज और संस्मरण लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित राबर्ट नर्सिंग होम में पाठ निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- राबर्ट नर्सिंग होम में।
लेखक का नाम-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि मैंने संसार में ऐसे बहुत-से व्यक्तियों को देखा है, जो अपनी विशिष्ट विशेषताओं से लोगों को अपना बना लेते हैं एवं अपार यश अर्जित करते हैं। कुछ लोग अपने रूप-सौन्दर्य द्वारा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तो कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनके पास अपार धन होता है और वे उसके बल पर लोगों पर अपना प्रभाव जमाते हैं या दूसरों को आत्मीय बना लेते हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिनमें कोई विशिष्ट गुण होता है और वे अपने गुणों द्वारा बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं; परन्तु आज लेखक ने एक ऐसी अद्भुत नारी को देखा, जिसने मानवता के लिए सर्वस्व समर्पित करके दूसरों की श्रद्धा और आदर को प्राप्त किया है।
(iii) लेखक ने समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाए और किसी का उत्सर्ग सदा किसी को पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
(iv) प्राय: गुणी व्यक्ति का लोगों पर यह प्रभाव पड़ता है कि वे अपने गुणों के द्वारा दूसरों को अपना बना लेते
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने विश्वप्रसिद्ध मानव-सेविका मदर टेरेसा की सेवा-भावना एवं आत्म-त्याग की मनोरम झाँकी प्रस्तुत की है।

प्रश्न 2.
यह अनुभव कितना चमत्कारी है कि यहाँ जो जितनी अधिक बूढ़ी है वह उतनी ही अधिक उत्फुल्ल, मुसकानमयी है। यह किस दीपक की जोत है? जागरूक जीवन की! लक्ष्यदर्शी जीवन की! सेवा-निरत जीवन की! अपने विश्वासों के साथ एकाग्र जीवन की। भाषा के भेद रहे हैं, रहेंगे भी, पर यह जोत विश्व की सर्वोत्तम जोत है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा में क्या अन्तर देखने को मिलता है?
(iv) कौन-सी ज्योति विश्व की सर्वोत्तम ज्योति है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किसके मुसकानमय जीवन का चित्रांकन किया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं प्रसिद्ध रिपोर्ताज और संस्मरण लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित राबर्ट नर्सिंग होम में पाठ से अद्भुत है।
अथवा
पाठ का नाम- राबर्ट नर्सिंग होम में।
लेखक का नाम-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–मदर मार्गरेट इन्दौर के नर्सिंग होम की सर्वाधिक वृद्धा नर्स हैं। लेखक ने वहाँ रहकर देखा कि उस नर्सिंग होम में जो जितनी वृद्धा नर्स है, वह उतनी ही अधिक सेवा-परायण, कर्तव्यपरायण, क्रियाशील, प्रसन्न और मुसकानमयी है।
(iii) भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा में भिन्न-भिन्न अन्तर देखने को मिलते हैं।
(iv) सबके हृदय में एक अद्भुत ज्योति प्रज्वलित है, वह है सेवा और प्यार की ज्योति। यही ज्योति विश्व की सर्वोत्तम ज्योति है।
(v) लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में रोबर्ट नर्सिंग होम में समर्पित भाव से सेवारत और सर्वाधिक वृद्धा नर्स मार्गरेट के मुसकानमय जीवन का चित्रांकन किया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)

प्रश्न 1.
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की विशिष्ट (प्रमुख) घटनाओं का वर्णन कीजिए। [2012, 13]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वतन्त्रता-संग्राम का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2017]
या
“‘मुक्तियज्ञ’ सन् 1921 से लेकर सन् 1947 तक के स्वतन्त्रता संग्राम की कहानी है। इस उक्ति पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के कथानक का सार प्रस्तुत कीजिए। [2016]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वाधीनता संग्राम की घटनाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2016]
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है। इस अंश में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की गाथा है। ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु संक्षेप में निम्नवत् है|
गाँधी जी साबरमती आश्रम से अंग्रेजों के नमक-कानून को तोड़ने के लिए चौबीस दिनों की यात्रा पूर्ण करके डाण्डी गाँव पहुँचे और सागरतट पर नमक बनाकर ‘नमक कानून तोड़ा

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

गाँधी जी का उद्देश्य नमक बनाना नहीं था, वरन् इसके माध्यम से वे अंग्रेजों के इस कानून का विरोध करना और जनता में चेतना उत्पन्न करना चाहते थे। यद्यपि उनके इस विरोध के आधार सत्य और अहिंसा थे, किन्तु अंग्रेजों का दमन-चक्र पहले की भाँति ही चलने लगा। गाँधी जी तथा अन्य नेताओं को अंग्रेजों ने कारागार में डाल दिया। जैसे-जैसे दमने-चक्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे ही मुक्तियज्ञ भी तीव्र होता गया। गाँधी जी ने भारतीयों को स्वदेशी वस्तु के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रोत्साहित किया। सम्पूर्ण देश में यह आन्दोलन फैल गया। समस्त देशवासी स्वतन्त्रता आन्दोलन में एकजुट होकर गाँधी जी के पीछे हो गये। इस प्रकार गाँधी जी ने भारतीयों में एक अपूर्व उत्साह एवं जागृति उत्पन्न कर दी।

गाँधी जी ने अछूतों को समाज में सम्मानपूर्ण स्थान दिलवाने के लिए आमरण अनशन आरम्भ किया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष का निर्णय किया। सन् 1927 ई० में साइमन कमीशन भारत आया। भारतीयों द्वारा इस कमीशन का पूर्ण बहिष्कार किया गया। मैक्डॉनल्ड एवार्ड के द्वारा केन्द्र एवं प्रान्त की सीमाओं से सम्पूर्ण भारतवर्ष को विभिन्न साम्प्रदायिक टुकड़ों में विभक्त कर दिया गया। इससे असन्तोष और भी ज्यादा बढ़ गया। काँग्रेस ने विभिन्न प्रान्तों में कुछ नेताओं के समर्थन से मन्त्रिमण्डल बनानी स्वीकार किया। शीघ्र ही विश्वयुद्ध छिड़ गया। काँग्रेस के सहयोग की शर्ते ब्रिटिश सरकार को मान्य नहीं थीं। फलत: गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर दिया। जापान के विश्वयुद्ध में सम्मिलित हो जाने से भारत में भी खतरे की सम्भावनाएँ उत्पन्न होने लगीं। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने भारत की समस्याओं पर विचार करने के लिए ‘क्रिप्स मिशन’ भेजा, जिसका भारतीय जनता ने विरोध किया। सन् 1942 ई० में गाँधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगा दिया। उसी रात्रि में गाँधी जी व अन्य नेतागण बन्दी बना लिये गये और अंग्रेजों ने बालकों, वृद्धों और स्त्रियों तक पर भीषण अत्याचार आरम्भ कर दिये। इन अत्याचारों के कारण भारतीयों में और अधिक आक्रोश उत्पन्न हो उठा। चारों ओर हड़ताल और तालाबन्दी हो गयी। अंग्रेजी शासन इस आन्दोलन से हिल गया। कारागार में ही गाँधी जी की पत्नी कस्तूरबा का देहान्त हो गया। पूरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल आक्रोश एवं हिंसा भड़क उठी थी।

आजाद हिन्द सेना के संगठनकर्ता सुभाषचन्द्र बोस ने भी भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने की योजना बनायी। सन् 1945 ई० में सारे बन्दी बनाये गये नेता छोड़ दिये गये। इससे जनता में उत्साह की लहर पुनः उमड़ने लगी। इसी समय सुभाषचन्द्र बोस का वायुयान दुर्घटना में निधन हो गया।

सन् 1942 ई० में ही भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की गयी थी। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की माँग की। अन्ततः 15 अगस्त, 1947 ई० को अंग्रेजों ने भारत को मुक्त कर दिया। अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन करवा दिया। एक ओर तो देश में स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, दूसरी ओर नोआखाली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच संघर्ष हो गया। गाँधी जी ने इससे दु:खी होकर आमरण उपवास रखने का निश्चय किया।

30 जनवरी, 1948 ई० को नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस दुःखान्त घटना के पश्चात् कवि द्वारा भारत की एकता की कामना के साथ इस काव्य का अन्त हो जाता है।

इस प्रकार इस खण्डकाव्य का आधार-फलक बहुत विराट् है और उस पर कवि पन्त द्वारा बहुत सुन्दर और प्रभावशाली चित्र खींचे गये हैं। इसमें उस युग का इतिहास अंकित है, जब भारत में एक हलचल मची हुई थी और सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की आग सुलग रही थी। इसमें व्यक्त राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है। निष्कर्ष रूप में मुक्तियज्ञ गाँधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

प्रश्न 2.
‘मुक्तियज्ञ’ के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके किसी एक प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014, 15]
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है।” स-तर्क प्रमाणित कीजिए। [2009]
या
राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गाँधी ही ‘मुक्तियज्ञ’ के पुरोधा हैं, खण्डकाव्य की कथावस्तु के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए और उनका चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 14]
या
‘मुक्तियज्ञ’ में कथित उन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार पर गाँधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया।
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ काव्य के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं—

(1) प्रभावशाली व्यक्तित्व-गाँधी जी का आन्तरिक व्यक्तित्व बहुत अधिक प्रभावशाली है। उनकी वाणी में अद्भुत चुम्बकीय प्रभाव था। उनकी डाण्डी यात्रा के सम्बन्ध में कवि ने लिखा है

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन ।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

(2) सत्य, प्रेम और अहिंसा के प्रबल समर्थक-‘मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी के जीवन के सिद्धान्तों में सत्य, प्रेम और अहिंसा प्रमुख हैं। अपने इन तीन आध्यात्मिक अस्त्रों के बल पर ही गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी। इन सिद्धान्तों को वे अपने जीवन में भी अक्षरशः उतारते थे। उन्होंने कठिनसे-कठिन परिस्थिति में भी सत्य, अहिंसा और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ा।
(3) दृढ़-प्रतिज्ञ-‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी ने जो भी कार्य आरम्भ किया, उसे पूरा करके ही छोड़ा। वे अपने निश्चय पर अटल रहते हैं और अंग्रेजी सत्ता दमन चक्र से तनिक भी विचलित नहीं होते। उन्होंने नमक कानून तोड़ने की प्रतिज्ञा की तो उसे पूरा भी कर दिखाया

प्राण त्याग दूंगा पथ पर ही, उठा सका मैं यदि न नमक-कर।
लौट न आश्रम में आऊँगा, जो स्वराज ला सका नहीं घर ॥

(4) जातिवाद के विरोधी-गाँधी जी का मत था कि भारत जाति-पाँति के भेदभाव में पड़कर ही शक्तिहीन हो रहा है। उनकी दृष्टि में न कोई छोटा था, न अस्पृश्य और न ही तुच्छ। इसी कारण वे जातिवाद के कट्टर विरोधी थे-

भारत आत्मा एक अखण्डित, रहते हिन्दुओं में ही हरिजन।
जाति वर्ण अघ पोंछ, चाहते, वे संयुक्त रहें भू जनगण ।।

(5) जन-नेता–‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी सम्पूर्ण भारत में जन-जन के प्रिय नेता हैं। उनके एक संकेत मात्र पर ही लाखों नर-नारी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं; यथा

मुट्ठी-भर हड्डियाँ बुलातीं, छात्र – निकल पड़ते सब बाहर।
लोग छोड़ घर-द्वार, मान, पद, हँस-हँस बन्दी-गृह देते भर ॥

भारत की जनता ने उनके नेतृत्व में ही स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को भगाकर ही दम लिया।

(6) मानवता के अग्रदूत-‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता के कल्याण में ही लगा देते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि मानव-मन में उत्पन्न घृणा, घृणा से नहीं अपितु प्रेम से मरती है। वे आपस में प्रेम उत्पन्न कर घृणा एवं हिंसा को दूर करना चाहते थे। वे हिंसा का प्रयोग करके स्वतन्त्रता भी नहीं चाहते थे; क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा पर टिकी हुई संस्कृति मानवीयता से रहित होगी-

घृणा, घृणा से नहीं मरेगी, बल प्रयोग पशु साधन निर्दय।
हिंसा पर निर्मित भू-संस्कृति, मानवीय होगी न, मुझे भय ॥

(7) लोक-पुरुष-मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी एक लोक-पुरुष के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। इस सम्बन्ध में कवि कहता है-

संस्कृति के नवीन त्याग की, मूर्ति, अहिंसा ज्योति, सत्यव्रत ।
लोक-पुरुष स्थितप्रज्ञ, स्नेह धन, युगनायक, निष्काम कर्मरत ।

(8) साम्प्रदायिक एकता के पक्षधर–स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में भीषण संघर्ष हुआ। इससे गाँधी जी का हृदय बहुत दु:खी हुआ। साम्प्रदायिक दंगा रोकने के लिए गाँधी जी ने आमरण अनशन कर दिया। गाँधी जी सोच रहे हैं

मर्म रुधिर पीकर ही बर्बर, भू की प्यास बुझेगी निश्चय।

(9) समद्रष्टा-गाँधी जी सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में न कोई बड़ा था और न ही कोई छोटा। छुआछूत को वे समाज का कलंक मानते थे। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था—

छुआछूत का भूत भगाने, किया व्रती ने दृढ़ आन्दोलन,
हिले द्विजों के रुद्र हृदय पर, खुले मन्दिरों के जड़ प्रांगण।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी महान् लोकनायक; सत्य, अहिंसा और प्रेम के समर्थक; दृढ़-प्रतिज्ञ, निर्भीक और साहसी पुरुष के रूप में सामने आते हैं। कवि ने गाँधी जी में सभी लोककल्याणकारी गुणों का समावेश करते हुए उनके चरित्र को एक नया स्वरूप प्रदान किया है।

प्रश्न 3.
‘मुक्तियज्ञ’ में निरूपित आजाद हिन्द सेना की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में अपने घर में ही नजरबन्द सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेजों को चकमा । देकर जनवरी सन् 1941 में नजरबन्दी से निकल भागे तथा अफगानिस्तान, जर्मनी होते हुए जापान पहुँच गये। दिसम्बर 1941 में जापान ने विश्वयुद्ध में प्रवेश किया। उस समय मलाया में अमेरिकी, ऑस्ट्रेलियन और अंग्रेजी सैन्य विभागों के साथ लगभग 60,000 भारतीय सैनिक और उच्च पदाधिकारी भी नियुक्त थे। पराधीन देश के सैनिक होने के कारण उनके तथा अन्य देश के सैनिकों में वेतन और अन्य सुविधाओं की दृष्टि से बहुत भेदभाव रखा गया था। जापानियों ने बड़ी आसानी से मलाया पर अधिकार कर लिया। इन्हीं दिनों बंगाल के क्रान्तिकारी नेता श्री रासबिहारी बोस ने जापानी सैन्य अधिकारियों से मिलकर युद्ध में बन्दी भारतीय सिपाहियों की एक देशभक्त सेना बनायी। सितम्बर सन् 1942 में भारतीय सेनानायकों के नेतृत्व में ‘आजाद हिन्द सेना’ बनी। मलाया, बर्मा, हाँगकाँग, जावा आदि देशों के अनेक प्रवासी भारतीय भी उसमें सम्मिलित हुए। सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में ‘आजाद हिन्द सेना’ एक महत्त्वपूर्ण और बलशाली सैन्यसंगठन बन गया। 26 जून, सन् 1945 को भारत के प्रति रेडियो सन्देश भेजते हुए आजाद हिन्द रेडियो से उन्होंने घोषित किया था कि आजाद हिन्द सेना कोई पराधीन और शक्तिहीन सेना नहीं थी। इसके नायक धुरी राष्ट्रों की सहायता से भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने की योजना बना रहे थे।

मई, 1945 में विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और जून में कांग्रेस के बन्दी नेता छोड़ दिये गये। सारे देश में उत्साह की लहर छा गयी। इन्हीं दिनों लाल किले में बन्दी आजाद हिन्द सेना के नायकों पर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे के दौरान जब इन वीरों की शौर्य-गाथाएँ जनता के सामने आयीं, तब समस्त भारतीय जनता का प्यार उन पर उमड़ पड़ा। इसी समय हवाई दुर्घटना में हुई सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के समाचार से सम्पूर्ण भारत पर अवसाद (निराशा) के बादल छा गये। उनके कठिन प्रवास की दु:खद कहानियों को सुन-सुनकर जनता का यह अवसाद क्रोध में बदल गया। इस प्रकार युद्ध समाप्त होते-होते सम्पूर्ण भारत में फिर क्रान्ति की उत्तेजना व्याप्त हो गयी।

प्रश्न 4.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने जिन प्रमुख राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है, उनका संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने निम्नलिखित राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है—

  1. साइमन कमीशन का बहिष्कार,
  2. पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग,
  3. नमक आन्दोलन (डाण्डी यात्रा),
  4. शासन को आतंकित करने का आन्दोलन,
  5. देशभक्तों को फाँसी,
  6. मैक्डोनाल्ड पुरस्कार,
  7. काँग्रेस मन्त्रिमण्डलों की स्थापना,
  8. द्वितीय विश्व युद्ध,
  9. सविनय अवज्ञा आन्दोलन,
  10. सन् 1942 ई० की क्रान्ति (भारत छोड़ो आन्दोलन),
  11. आजाद हिन्द फौज की स्थापना,
  12. स्वतन्त्रता की प्राप्ति,
  13. देश का विभाजन तथा
  14. बापू का बलिदान।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name राजमुकुट (व्यथित हृदय)
Number of Questions 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय)

प्रश्न 1.
श्री व्यथित हृदय द्वारा लिखित ‘राजमुकुट’ नाटक का सारांश लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक का कथा-सार अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए। [2015, 16, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के द्वितीय अंक का कथा-सार लिखिए। [2010, 15]
या
‘राजमुकुट नाटक के तृतीय अंक का कथा-सार संक्षेप में लिखिए। [2009, 12, 13, 14, 16, 17, 18]
या
‘राजमुकुट नाटक के प्रथम अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 16]
या
“राजमुकुट’ नाटक के अन्तिम अंक की कथा संक्षिप्त रूप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के चतुर्थ अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2017, 18]
उत्तर
‘राजमुकुट’ नाटक, नाटककार श्री व्यथित हृदय का एक ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक में महाराणा प्रताप की वीरता, बलिदान और त्याग की कथा अंकित है। कथा का प्रारम्भ महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से तथा कथा का अन्त महाराणा प्रताप की मृत्यु पर होता है। महाराणा प्रताप इस नाटक के नायक हैं।

प्रथम अंक—प्रस्तुत नाटक के प्रथम अंक की कथा मेवाड़ के राणा जगमल के महल से आरम्भ होती है। राणा जगमल एक विलासी और क्रूर शासक है। वह अपनी मर्यादा का निर्वाह करना भूल गया था तथा सुरासुन्दरी में डूबा रहता था। ऐसे ही समय में राष्ट्रनायक कृष्णजी चन्दावत, राजसभा में पहुँचते हैं तथा राणा जगमल को उसके नीचे कर्मों के लिए भला-बुरा कहते हैं। वे जगमल से ‘मेवाड़ का मुकुट’ उचित पात्र को सौंपने के लिए आग्रह करते हैं। जगमल उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं तथा चन्दावत से योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहते हैं। चन्दावत; राणा जगमल से राजमुकुट लेकर प्रताप के शीश पर रख देते हैं। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ जाती है। प्रताप विदेशी शासक से लोहा लेने का प्रण करते हैं तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। यह संकल्प नाटक की कथा को आगे बढ़ाने में सहायक है।।

द्वितीय अंक-प्रताप मेवाड़ के राजा बनते ही अपनी प्रजा के खोये हुए सम्मान की रक्षा करते हैं। वे प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए अनेक आयोजन भी करते हैं। ऐसे ही एक आयोजन के अवसर पर जंगली सूअर के आखेट को लेकर प्रताप तथा उनके भाई शक्तिसिंह में विवाद हो जाता है। विवाद बढ़ जाने पर दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। भावी अनिष्ट की आशंका या राजकुल को संकट से बचाने के लिए राजपुरोहित अपनी कटार से अपना ही प्राणान्त कर लेते हैं। प्रताप शक्तिसिंह को देश से निर्वासित कर देते हैं। शक्तिसिंह अपने को अपमानित अनुभव करते हैं तथा अकबर के साथ मिल जाते हैं।

तृतीय अंक-मानसिंह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थीं। इसलिए राणा ने उससे स्वयं भेट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से चला गया तथा दिल्ली के सम्राट् अकबर से जा मिला। चतुर अकबर अवसर का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप पर आक्रमण कर देता है। हल्दीघाटी के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप को बचाने के लिए कृष्णजी चन्दावत, प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर स्वयं पहन लेते हैं और युद्धभूमि में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। प्रताप बच जाते हैं, परन्तु दो मुगल सैनिक प्रताप का पीछा करते हैं। ऐसे समय पर शक्तिसिंह का भ्रातृ-प्रेम जाग्रत होता है और वे पीछा करके दोनों मुगलों को मार देते हैं। शक्तिसिंह और प्रताप आपस में गले मिलते हैं। इसी समय राणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक अपने प्राण त्याग देता है।

चतुर्थ अंक-हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाता है, परन्तु राणा हार नहीं मानते। अकबर प्रताप की देशभक्ति, त्याग और वीरता का लोहा मानते हैं तथा वे महाराणा प्रताप के प्रशंसक बन जाते हैं। एक दिन प्रताप के पास एक संन्यासी आता है। प्रताप संन्यासी का उचित सत्कार न कर पाने के कारण अत्यधिक व्यथित हैं। इसी समय राणा की पुत्री चम्पा घास की बनी रोटी लेकर आती है, जिसे एक वन-बिलाव छीनकर भाग जाता है। चम्पा गिर जाती है और पत्थर से टकराकर उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ समय पश्चात् अकबर संन्यासी वेश में वहाँ आता है और कहता है कि, “आप उस अकबर से तो सन्धि कर सकते हैं जो भारतमाता को अपनी माँ समझता है, जो आपकी भाँति उसकी जय बोलता है।” इसी समय अकबर राणा को भारतमाता का सपूत’ बताता है और प्रताप के दर्शन करके अपने को धन्य मानता है। संघर्षरत प्रताप रोगग्रस्त हो जाते हैं। वे शक्तिसिंह तथा अपने सभी साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेते हैं। ‘भारतमाता की जय’ घोष के साथ ही महाराणा का देहान्त हो जाता है।
‘राजमुकुट’ की यह कथा भारत के स्वर्णिम इतिहास और एक रणबाँकुरे वीर की अमर कहानी है।

प्रश्न 2.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर उसके प्रमुख पात्र (नायक) महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक में जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो, उसके व्यक्तित्व का परिचय दीजिए। [2009, 14]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 11, 13, 14, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर प्रतापसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के नायक की चरित्रगत विशेषताएँ प्रस्तुत कीजिए। [2018]
उत्तर
महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक महाराणा प्रताप हैं। नाटक में उनके चरित्र का मूल्यांकन करने वाली; राज्याभिषेक से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ हैं। राणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है-

(1) आदर्श भारतीय नायक-भारतीय नाट्यशास्त्र में आदर्श नायक के जिन गुणों के विषय में बताया गया है, महाराणा प्रताप के चरित्र में वे सभी गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र ‘धीरोदात्त नायक’ का आदर्श चरित्र है। वे उच्च कुल में उत्पन्न हुए वीर, साहसी तथा संयमी व्यक्ति हैं।
(2) प्रजा की आशाओं के आधार-मेवाड़ की प्रजा महाराणा प्रताप को इस आशा के साथ मुकुट पहनाती है कि वे उसकी तथा देश की रक्षा करेंगे। प्रजा की आशा के अनुरूप प्रताप उसके सच्चे हितैषी सिद्ध होते हैं। प्रजा प्रताप के मुकुट धारण करने से पूर्व ही यह आशा रखती है कि वह देश में छायी हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा; आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है; उसका पौरुष गेय है। वह महीमाता का पुण्य है। भारतमाता की साधना का फल है; अमरफल
(3) मातृभूमि के अनन्य भक्त-प्रताप मातृभूमि के अनन्य भक्त हैं। वे देश की दासता और प्रजा की दुर्दशा से व्यथित हैं—“सारा देश विदेशियों के अत्याचारों से विकम्पित हो चुका है। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक असन्तोष राग अलाप रहा है।”………” चित्तौड़ का युद्ध भारत का युद्ध होगा।”
(4) दृढ़प्रतिज्ञ तथा कर्त्तव्यनिष्ठ-महाराणा दृढ़ निश्चयी तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान हैं। राजमुकुट धारण करने के अवसर पर प्रताप के शब्द हैं-“मेरा जयनाद ! मुझे महाराणा बनाकर मेरा जयनाद न बोलो साथियो! जय बोलो भारत की, मेवाड़ की। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राणों में साँस रहते हुए प्रजा-प्रभु की दी हुई इस भेंट को मलिन न करूंगा। जब तक सारे भारत को दासता से मुक्त न कर लँगा, सुख की नींद न सोऊँगा।”
(5) स्वतन्त्रता हेतु दृढ़ संकल्प–प्रताप जीवनपर्यन्त स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। वे अकबर से हल्दीघाटी में युद्ध करते हैं। सब कुछ खोकर, भी वे अकबर के सामने झुकते नहीं। बच्चे भूखों मर जाते हैं, फिर भी यह लौह-पुरुष अडिग रहता है। मृत्यु के समय भी राणा को एक ही लगन है, एक ही इच्छा है, एक ही अभिलाषा है, वह है देश की स्वतन्त्रता-“बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”
(6) निरभिमानी एवं सत्ता-लिप्सा से दूर—राणा देशभक्त हैं, स्वतन्त्रता के दीवाने हैं, परन्तु वे राजा बनना नहीं चाहते। राणा प्रताप महान् देशभक्त एवं मेवाड़ के महाराणा हैं, किन्तु उन्हें अभिमान बिल्कुल नहीं है। महान् होकर भी वे स्वयं को महान् नहीं समझते। वे कहते हैं–‘‘मेवाड़ का राणी मैं ! नहीं, नहीं कृष्णजी! आप भूल रहे हैं। मेवाड़ के महाराणा का पद महान् है, बहुत महान् है।”
(7) भारतीय संस्कृति, धर्म तथा मान-मर्यादा के रक्षक-महाराणा भारतीय संस्कृति के पोषक हैं। वे धर्म की रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य समझते हैं। संन्यासी के रूप में अकबर जब उनके पास पहुँचता है तो वे उसका आदर करते हैं, परन्तु खाने के लिए कुछ भी दे पाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें कष्ट होता है। वे कहते हैं-…”आज कई दिनों से बच्चे घास की रोटियों पर निर्वाह कर रहे थे तो क्या संन्यासी अतिथि को भी धास की ही रोटियाँ खिलाऊँ।”
धर्म के प्रति भी राणा के मन में निष्ठा है। पुरोहित का बलिदान देखकर राणा कहते हैं-“देशभक्त पुरोहित तुम धन्य हो! तुमने अपने अनुरूप ही अपनी बलिदान दिया है। ज्ञान और चेतना से दूर हम अधम को तुमने प्रकाश दिखाया है ………….।”
(8) पराक्रमी योद्धा-राणा वीर हैं। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके शौर्य का साक्षी है। प्रताप अपने सैनिकों से कहते हैं—“चलो युद्ध का राग गाते हुए हम सब हल्दीघाटी की युद्धभूमि में चलें और रक्तदान से चण्डी माता को प्रसन्न करके उनसे विजय का शुभ आशीर्वाद लें।”

इस प्रकार राणा का चरित्र अनेक अमूल्य गुणों की खान है। वे आदर्श देशभक्त हैं और त्यागी, साहसी, उदार, वीर, दृढ़निश्चयी तथा उदात्त पुरुष हैं। वे प्रजा को आत्मीय मित्र मानते हैं। मुगल सम्राट् । अकबर भी उनकी प्रशंसा करते हैं-”महाराणा प्रताप भारत के अनमोल रत्न हैं।”

प्रश्न 3.
शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009]
या
‘राजमुकुट के आधार पर शक्तिसिंह की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 15, 16, 17]
उत्तर

शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण

शक्तिसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक मेवाड़ के महाराणा प्रताप का छोटा भाई है। महाराणा के इस सुयोग्य अनुज के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) परम देशभक्त–शक्तिसिंह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमा है। उसके हृदय में अपने भाई के समान देश की दासता, जनता की व्यथा और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध आक्रोश है। वह मेवाड़ के घर-घर में जीवन और जागृति का मन्त्र फेंकना चाहता है। वह अपने देश के मंगल के लिए सब-कुछ करने को तत्पर है-”माता-मही! तू मेरी भुजाओं में शक्ति दे कि मैं जगमल के सिंहासन को उलट सकें। ……………… मेवाड़ में सुख-शान्ति स्थापित कर सकें।”
(2) राज्य-वैभव के प्रति अनासक्त-शक्तिसिंह का चरित्र त्याग भाव से परिपूर्ण है। उसे राज्य-वैभव में कोई आसक्ति नहीं है। अहेरिया उत्सव पर वन-शूकर के वध पर महाराणा से तकरार हो जाने पर दोनों में तलवारें खिंच जाती हैं, जिसमें मध्यस्थता करते हुए पुरोहित की हत्या हो जाती है। इस अपराध में उसे राज्य से निर्वासित कर दिया जाता है, जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
(3) निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता–शक्तिसिंह में निर्भीकता और स्पष्ट बात कहने का साहस द्रष्टव्य है। वह अकबर की सेना में सम्मिलित हो जाता है, किन्तु अकबर द्वारा मेवाड़ का सर्वनाश करने का संकल्प लेने पर वह उसकी सहायता करने को तैयार नहीं होता।
(4) भावुक और प्रकृति-प्रेमी–शक्तिसिंह युवक है। प्राकृतिक सौन्दर्य उसे भाव-विमुग्ध कर देता है। वह उपवन में बैठकर गीत गुनगुनाता है। चन्दावत के पूछने पर वह कहता है-“वन मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे होते हैं।”
(5) भ्रातृ-प्रेमी–शक्तिसिंह के हृदय में अपने भाई महाराणा के प्रति अनन्य प्रेम है। राणा प्रताप और शक्तिसिंह का युद्धभूमि में सामना होता है। युद्ध में ही राणा के घोड़े चेतक की मृत्यु हो जाती है। राणा उसके शव के निकट चिन्तित भाव से बैठे हुए थे, तभी दो मुगल सैनिकों को महाराणा पर प्रहार करते हुए देखकर शक्तिसिंह एक ही बार में दोनों को मौत के घाट उतार देता है और महाराणा से क्षमायाचना करता है वह आया है मेवाड़ के महाराणा से क्षमायाचना करने, उनकी स्नेहमयी गोद में बैठकर पश्चात्ताप करने और उनकी वीरता की पवित्र गंगा में अपने कलुषित-कल्मषों को धोने।”
(6) साम्प्रदायिक सद्भावना तथा राष्ट्रीय एकता का पोषक–शक्तिसिंह यह सोचता है कि अकबर और प्रताप मिलकर ऐसे भारत की रचना कर सकते हैं, जिसमें धर्म और सम्प्रदाय का वैमनस्य नहीं होगा। ऐसा भारत ही अखण्ड राष्ट्र हो सकता है। वह हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों को मिल-जुलकर रहने का सन्देश देता है-“तुम उन्हें विदेशी और विधर्मी समझ रहे हो, क्या वे फिर काबुल, कंधार और ईरान लौट जाएँगे ? ……………. वे अब इसी देश में रहेंगे और उसी प्रकार उसी कण्ठ से भारतमाता की जय बोलेंगे।”
(7) अन्तर्द्वन्द्व से घिरा–शक्तिसिंह उज्ज्वल चरित्र का व्यक्ति है। वह प्रतिशोध की भावना और देशभक्ति के द्वन्द्व से घिर जाता है, किन्तु अन्त में देशभक्ति की भावना की विजय होती है। तब वह सोचता है-‘प्रतिहिंसा की भावना से उत्तेजित होकर दानव बन जाना ठीक नहीं।” इन सहज दुर्बलताओं ने तो उसके चरित्र को यथार्थ का स्पर्श देकर निखार दिया है।

प्रश्न 4.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर मुगल सम्राट अकबर का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014, 15, 16, 18]
उत्तर

अकबर का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक में मुगल सम्राट् अकबर एक प्रमुख पात्र है। वह महाराणा प्रताप का प्रतिद्वन्द्वी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं—

(1) व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति-अकबर व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति है। अपने इसी गुण के कारण वह शक्तिसिंह के हृदय में जगी प्रतिशोध की भावना को तीव्र कर देता है– ‘छलिया संसार को छल और प्रपंचों से परास्त करने का पाठ पढ़ो।……… संसार में भावुकता से काम नहीं चल सकता शक्ति!”
(2) महत्त्वाकांक्षी–सम्राट् अकबर बहुत महत्त्वाकांक्षी है। वह मन-ही-मन मेवाड़-विजय का संकल्प करता है-”मैं अपने जीवन के उस अभाव को पूरा करूंगा, मेवाड़ के गौरवमय भाल को झुकाकर अपने साम्राज्य की प्रभुता बढ़ाऊँगा।”
(3) मानव-स्वभाव का पारखी-अकबर बहुत बुद्धिमान है। वह शक्तिसिंह, मानसिंह और राणा प्रताप के चरित्र का सही मूल्यांकन करता है-”एक प्रताप है, जो मातृभूमि के लिए प्राण हथेली पर लिये फिरता है और एक तुम हो, जो मातृभूमि के सर्वनाश के लिए खाइयाँ खोदते फिरते हो।”
(4) सदगुणों का प्रशंसक-अकबर व्यक्ति के सद्गुणों की प्रशंसा करने से नहीं चूकता, चाहे वे सद्गुण उसके शत्रु में ही क्यों न हों। यह विशेषता उसे महानता प्रदान करती है। वे हृदय से राणा की वीरता और स्वाभिमान की प्रशंसा करता है-*”………….धन्य है मेवाड़! और धन्य हैं मेवाड़ की गोद में पलने वाले महाराणा प्रताप ! प्रताप मनुष्य रूप में देवता हैं, मानवता की अखण्ड ज्योति हैं।”
(5) साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक-अकबर हिन्दू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है। उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही’ मत इसी साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है। वह मानवीय गुणों का आदर करता है। वह महाराणा की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए कहता है- “हमारा और आपका मिलन ! यह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं महाराणा ! दो धर्म-प्रवाहों का मिलन है, जिससे इस देश की संस्कृति सुदृढ़ तथा पुष्ट होगी।”
(6) कूटनीतिज्ञ-अकबर कुशल कूटनीतिज्ञ है। वह प्रत्येक निर्णय कूटनीति से लेता है। उसकी चतुर कूटनीति का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-”प्रताप का भाई शक्तिसिंह स्वयं जादू के जाल में फंसकर माया की तरंगों में डुबकियाँ लगी रहा है। उसी को मेवाड़ के विध्वंस का साधन बनाऊँगा।”

प्रश्न 5.
राजमुकुट के आधार पर प्रमिला का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर सिद्ध कीजिए कि इसमें नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है किन्तु ये अपना-अपना प्रभाव छोड़ने में पूर्णरूपेण सक्षम हैं।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के प्रमुख स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2015)
उत्तर
‘राजमुकुट के नारी-पात्र । श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ में नारी-पात्रों का समावेश नगण्य है। इसमें प्रमिला, प्रजावती, गुणवती और चम्पा प्रमुख नारी पात्र हैं।
प्रमिला नाटक की एक साधारण स्त्री-पात्र है। वह जगमल के चापलूस सरदार हाथीसिंह की पत्नी है। वह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने पति को देश के कल्याण के लिए बलिदान हो जाने का संन्देश देती है। नाटक के तृतीय दृश्य में इसका राष्ट्रप्रेम अभिव्यक्त होता है। वह अपने पति से कहती है-“देश पर जब विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हों, तब देश के नर-नारियों को अधिक परित्याग करना ही चाहिए। यदि देश का कल्याण करने में माँग का सिन्दूर मिट गया, तो चिन्ता की क्या बात।” जब उसका पति कहता है-“खाँडे का नाम सुनकर ही मेरे प्राणों में भूचाल आने लगता है”-तो प्रमिला उस पर व्यंग्य करती हुई कहती है-“तो लहँगा पहनकर हाथों में चूड़ियाँ डाल लो। पूँघट निकालकर घर के कोने में जाकर बैठे रहो।”

प्रजावती निरपराध, पवित्र, जनहित में लगी रहने वाली, स्वाभिमानिनी तथा देशप्रेमी व प्रजावत्सल नारी है। नाटककार ने उसे मंच पर उपस्थित नहीं किया है, वरन् अन्य पात्रों के माध्यम से ही उसके चरित्र की

विशेषताओं को उजागर किया गया है। जगमल का एक सैनिक उसके चरित्र पर प्रकाश डालता हुआ कहता है-“वह विक्षिप्ता है महाराज! दिन भर झाड़ियों और कन्दराओं में छिपी रहती है। जब रात होती है तब बाहर निकलकर अपने जीवनगान से सम्पूर्ण उदयपुर को प्रतिध्वनित कर देती है। वह रात भर अपने गान को मादिनी पर, पाषाणों पर, दीवारों पर लिखती फिरती है। उसका जीवन-गान उदयपुर में धर्म-गीत बन रहा है।” राणा जगमल अपने क्रूर चाटुकारों के कहने से उसका वध करवा देता है। प्रजावती के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए प्रजा का नायक चन्दावत कहता है-“वह कृषकों और श्रमिकों के जीवन को प्रकाश थी; उनके प्राणों की आशा थी; उनकी धमनियों का रक्त थी।”

गुणवती मेवाड़ के राणा प्रताप की पत्नी हैं, जो उनके साथ वनवास के कष्टों को सहर्ष सहन करती हैं। तथा अपने पति का हर संकट में साथ देती हैं।
चम्पा महाराणा की पुत्री है। वह नाटक के अन्त में मंच पर उपस्थित होती है। उसे अपने पिता के साथ वन में भटकते और कष्ट सहन करते हुए दिखाया गया है।
इस प्रकार इस नाटक में नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है, किन्तु भावनात्मक स्तर पर वे पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 6.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर मानसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012]
उत्तर
मानसिंह; श्री व्यथित हृदय द्वारा रचित ‘राजमुकुट’ नाटक का एक प्रमुख पात्र तथा अकबर का सेनापति है। वह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा ने उससे स्वयं भेट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वह वहाँ से लौट गया। वह दिल्ली के सम्राट् अकबर से जाकर मिला और उसके निर्देश और अपने नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ पहुँचा। मुगल और राजपूत दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ।

इस प्रकार मानसिंह एक असंयत मनोवृत्ति का व्यक्ति था, जिसमें सहनशीलता का अभाव था। उसने बदले की भावना से प्रेरित होकर, मुगल सम्राट अकबर की सहायता से राणा पर आक्रमण करके विधर्मी और विश्वासघाती होने का परिचय दिया।

प्रश्न 7.
“राष्ट्रनायक चन्दावत’ राजमुकुट नाटक का एक प्रभावशाली चरित्र है।” इस कथन के आलोक में ‘चन्दावत’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
नाटककार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक में ‘चन्दावत’ नामक पात्र का भी वर्णन किया है जो राष्ट्रनायक है और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भलीभाँति निभाता है, उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कर्त्तव्य के प्रति जागरूक-इस नाटक में ‘चन्दावत’ को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया। गया है। वह मर्यादाओं के पालन में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। जब राणा जगमल अपने राज-कर्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब जाते हैं, इस कारण राष्ट्रनायक चन्दवत बड़े दु:खी हैं। इसलिए वे जगमले को फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हों; अतः राजमुकुट किसी उचित उत्तराधिकारी को सौंप दो।
(2) महान् त्यागी एवं बलिदानी-‘चन्दावत’ महात्यागी एवं बलिदानी व्यक्ति है। युद्ध के मैदान में देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए, उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश पर अपने प्राण बलिदान कर देते हैं।
(3) सच्चा देशभक्त–चन्दावत एक सच्चा देशभक्त है। देशभक्ति की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार जानता है। युद्ध में राणा के प्राण बचाने के लिए उसका मुकुट स्वयं धारण करना देशभक्ति का एक अप्रतिम उदाहरण उसने प्रस्तुत किया है।
(4) दूरदर्शी-चन्दावत दूर की सोचने वाला व्यक्ति है। जब जगमल सुरासुन्दरी का दास होकर रह जाता है। जनता उसका विरोध करती है, तो वह जगमल से उचित उत्तराधिकारी को मुकुट सौंपने को कह देते हैं और स्वयं राणा को राजमुकुट पहनाते हैं जिससे जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि चन्दावत एक त्यागी, बलिदानी, दूरदर्शी और एक सच्चा देशभक्त था।

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