UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 7
Chapter Name The p Block Elements
Number of Questions Solved 141
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व)

अभ्यास के अन्तर्गत दिएर गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ट्राइसैलाइडों से पेन्टाहैलाइड अधिक सहसंयोजी क्यों होते हैं?
उत्तर
किसी अणु में केन्द्रीय परमाणु की जितनी उच्च धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था होती है, उसकी ध्रुवण क्षमता उतनी ही अधिक होती है जिसके कारण केन्द्रीय परमाणु और अन्य परमाणु के मध्य बने आबन्ध में सहसंयोजी गुण बढ़ता जाता है।
इस प्रकार चूंकि पेन्टालाइडों में केन्द्रीय परमाणु +5 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है, जबकि ट्राइहैलाइडों में यह +3 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है, इसलिए ट्राइलाइडों से पेन्टाहैलाइड अधिक सहसंयोजी होते हैं।

प्रश्न 2.
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में BiH3 सबसे प्रबल अपचायक क्यों है?
उत्तर
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में BiH3 के प्रबल अपचायक होने का कारण यह है कि इस वर्ग के हाइड्राइडों में Bi-H आबन्ध की लम्बाई सबसे अधिक होती है जिसके कारण BiH3 सबसे कम स्थायी होता है।

प्रश्न 3.
N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील क्यों है?
उत्तर
N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील होती है; क्योंकि प्रबल pπ – pπ अतिव्यापन के कारण त्रिओबन्ध N ≡ N बनता है।

प्रश्न 4.
अमोनिया की लब्धि को बढ़ाने के लिए आवश्यक स्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अमोनिया का निर्माण हेबर प्रक्रम से किया जाता है। इसकी लब्धि बढ़ाने के लिए ला-शातेलिए। सिद्धान्त के अनुसार आवश्यक स्थितियाँ निम्नवत् हैं –

  1. तापमान = 700 K
  2. उच्च दाब 200 x 105 Pa (लगभग 200 वायुमण्डल)
  3. उत्प्रेरक; जैसे- K2O तथा Al2O5 मिश्रित आयरन ऑक्साइड।

प्रश्न 5.
Cu2+ आयन के साथ अमोनिया कैसे क्रिया करती है?
उत्तर
Cu2+ आयन अमोनिया से क्रिया करके गहरे नीले रंग का संकुल बनाते हैं।
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प्रश्न 6.
N2O5 में नाइट्रोजन की सहसंयोजकता क्या है?
उत्तर
सहसंयोजकता इलेक्ट्रॉनों के सहभाजित युग्मों की संख्या पर निर्भर करती है। चूंकि N2O5 में, प्रत्येक नाइट्रोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के चार सहभाजित युग्म उपस्थित हैं जैसा कि निम्नवत् दिखाया गया है –
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इसलिए N2O5 में N की सहसंयोजकता 4 है।

प्रश्न 7.
PH3 से PH+4 ई का आबन्ध कोण अधिक है। क्यों?
उत्तर
PH3 तथा PH+4 दोनों sp3 संकरित हैं। PH+4 में चारों कक्षक आबन्धित होते हैं, जबकि PH3 में P पर इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म उपस्थित होता है जो PH3 में एकाकी युग्म-आबन्ध युग्म प्रतिकर्षण के लिए उत्तरदायी है जिससे आबन्ध कोण 109°28′ से कम हो जाता है।
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प्रश्न 8.
क्या होता है जब श्वेत फॉस्फोरस को CO2 के अक्रिय वातावरण में सान्द्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करते हैं?
उत्तर
श्वेत फॉस्फोरस NaOH से अभिक्रिया करके फॉस्फीन (PH3) बनाता है।UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 4

प्रश्न 9.
क्या होता है जब PCl5 को गर्म करते हैं?
उत्तर
PCl5 में तीन निरक्षीय (equatorial) [202 pm] तथा दो अक्षीय (axial) [240 pm] बन्ध होते हैं। चूंकि अक्षीय बन्ध निरक्षीय बन्धों से दुर्बल होते हैं, इसलिए जब PCl5 को गर्म किया जाता है तो कम स्थायी अक्षीय बन्ध टूटकर PCl3 बनाते हैं।
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प्रश्न 10.
PCl5 की भारी पानी में जल-अपघटन अभिक्रिया का सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर
PCl5 भारी जल (D2O) से अभिक्रिया करके फॉस्फोरस ऑक्सी-क्लोराइड (POCl3) तथा ड्यूटीरियम क्लोराइड (DCl) बनाता है।
PCl5 + D2O → POCl3 + 2 DCl

प्रश्न 11.
H3PO4 की क्षारकता क्या है?
उत्तर
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H3PO4 अणु में तीन -OH समूह उपस्थित हैं, इसलिए इसकी क्षारकता 3 है।

प्रश्न 12.
क्या होता है जब H3PO4 को गर्म करते हैं?
उत्तर
ऑफॉस्फोरस अम्ल या फॉस्फोरस अम्ल (H3PO4) गर्म करने पर असमानुपातित होकर ऑर्थोफॉस्फोरिक अम्ल या फॉस्फोरिक अम्ल तथा फॉस्फीन देता है।
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प्रश्न 13.
सल्फर के महत्त्वपूर्ण स्रोतों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर
भूपर्पटी में सल्फर की मात्रा 0.03 – 0.1% होती है। संयुक्त अवस्था में सल्फर सल्फेट के रूप में—जिप्सम (CaSO4 . 2H2O), एप्सम लवण (MgSO4 . 7H2O), बेराइट (BaSO4) तथा सल्फाइड के रूप में– गैलेना (PbS), जिंक ब्लैण्ड (ZnS), पाइराइट (CuFeS2) में पाया जाता है। कार्बनिक पदार्थों जैसे अण्डा, प्रोटीन, लहसुन, प्याज, सरसों, बाल तथा फर में सल्फर पाया जाता है। ज्वालामुखी में सल्फर के अंश H2S के रूप में पाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
वर्ग 16 के तत्वों के हाइड्राइडों के तापीय स्थायित्व के क्रम को लिखिए।
उत्तर
चूँकि तत्वों का आकार वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ता है, इसलिए E-H बन्ध वियोजन ऊर्जा घटती है। जिससे E-H बन्ध सरलता से टूट जाते हैं। अत: वर्ग 16 के तत्वों के हाइड्रोइडों का ऊष्मीय स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है।
H2O > H2S > H2Se > H2Te > H2Po

प्रश्न 15.
H2O एक द्रव तथा H2S गैस क्यों है?
उत्तर
ऑक्सीजन के छोटे आकार तथा उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण H2O में अन्तराआण्विक हाइड्रोजन बन्ध पाए जाने के परिणामस्वरूप यह कमरे के ताप पर द्रव होता है। H2S सल्फर के बड़े आकार के कारण हाइड्रोजन बन्ध नहीं बनाती है, अतः इसके अणुओं के मध्य दुर्बल वान्डर वाल्स बल कार्य करते हैं। इस कारण कक्ष ताप पर H2S गैस होती है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्व ऑक्सीजन के साथ सीधे अभिक्रिया नहीं करता?
Zn, Ti, Pt, Fe
उत्तर
प्लैटिनम एक उत्कृष्ट धातु है। इसकी पहली चार आयनन एन्थैल्पियों का योग बहुत अधिक होता है, इसलिए यह ऑक्सीजन से सीधे संयोग नहीं करती है। दूसरी ओर Zn, Ti तथा Fe सक्रिय धातुएँ हैं, इसलिए ये ऑक्सीजन से सीधे संयोग करके संगत ऑक्साइड बनाती हैं।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए –

  1. C2H4 + O2 →
  2. 4 Al + 3O2 →

उत्तर

  1. C2H4 + 3O2 [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] 2CO2 ↑ + 2H2O
  2. 4Al + 3O2 [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] 2Al2O3

प्रश्न 18.
O3 एक प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्यों क्रिया करती है?
उत्तर
O3 शीघ्रता से अपघटित होकर नवजात ऑक्सीजन उत्पन्न करती है, जो विभिन्न पदार्थों को ऑक्सीकृत कर देती है। इसलिए यह प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्रिया करती है।
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प्रश्न 19.
O3 का मात्रात्मक आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर
जब ओजोन पोटैशियम आयोडाइड के आधिक्य, जिसे बोरेट बफर (pH 9.2) के साथ बफरीकृत करते हैं, से अभिक्रिया करती है तो आयोडीन उत्पन्न होती है, इसे सोडियम थायोसल्फेट के मानक विलयन के साथ अनुमापित करते हैं। इस प्रकार O3 का मात्रात्मक आकलन किया जाता है।

प्रश्न 20.
तब क्या होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड को Fe(III) लवण के जलीय विलयन में से प्रवाहित करते हैं?
उत्तर
SO2 अपचायक की भाँति कार्य करती है, इसलिए यह आयरन (III) लवण को आयरन (II) लवण में अपचयित कर देती है।
SO2 + 2H2O → SO2-4 + 4H+ + 2e–
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प्रश्न 21.
दो S-O आबन्धों की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए जो SO2 अणु बनाते हैं। क्या SO2 अणु के ये दोनों S-O आबन्ध समतुल्य हैं?
उत्तर
SO2 में बनने वाले दोनों S-O आबन्ध सहसंयोजक (covalent) हैं तथा अनुनादी संरचनाओं के कारण समान रूप से प्रबल होते हैं।

प्रश्न 22.
SO2 की उपस्थिति का पता कैसे लगाया जाता है?
उत्तर
SO2 एक तीक्ष्ण गन्ध वाली गैस है। इसकी उपस्थिति को निम्नलिखित दो परीक्षणों से ज्ञात किया जा सकता है –
(i) SO2 गुलाबी-बैंगनी रंग के अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट (VII) विलयन को MnO–4 के Mn2+ आयन में अपचयन के कारण रंगहीन कर देती है।
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(ii) SO2 अम्लीकृत K2Cr2O7 को Cr2O2-7 के Cr3+ आयनों में अपचयन के कारण हरा कर देती है।
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प्रश्न 23.
उन तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए जिनमें H2SO4 महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर

  1. उर्वरकों; जैसे- अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट के निर्माण में।
  2. पेट्रोलियम शोधन में।
  3. सीसा संचायक बैटरियों में।

प्रश्न 24.
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 की मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों को लिखिए।
उत्तर
H2SO4 के निर्माण में प्रमुख पद SO2 का O2 के साथ उत्प्रेरकीय ऑक्सीकरण है। इसमें V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO3 प्राप्त होती है।
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अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्क्रमणीय है। अग्रगामी अभिक्रिया में आयतन का ह्रास होता है। इसलिए कम ताप तथा उच्च दाब उत्पाद की मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ हैं, परन्तु ताप अत्यधिक कम नहीं होना चाहिए, अन्यथा अभिक्रिया की दर कम हो जाएगी।

प्रश्न 25.
जल में H2SO4 के लिए Ka2 << Ka1 क्यों है?
उत्तर
H2SO4 एक द्विक्षारकीय अम्ल है, यह दो पदों में आयनित होता है, इसलिए इसके दो वियोजन स्थिरांक होते हैं।

  1. H2SO4 (aq) + H2O (l) → H3O+ (aq) + HSO–4 (aq); Ka1 > 10
  2. HSO–4 (aq) + H2O (l) → H3O+ (aq) + SO2-4 (aq); Ka2 = 1.2 x 10-2

Ka1 (>10) के अधिक मान से तात्पर्य यह है कि H2SO4, H3O+ तथा HSO–4 में अधिक वियोजित है।
मुख्यत: H3O+ और H2SO–4 में प्रथम आयनन के कारण H2SO4 जल में प्रबल अम्ल है। HSO–4 का H3O+ तथा SO2-4 आयनों में आयनन लगभग नगण्य होता है;
अत: Ka2 << Ka1

प्रश्न 26.
आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी जैसे प्राचलों को महत्त्व देते हुए F2 तथा Cl2 की ऑक्सीकारक क्षमता की तुलना कीजिए।
उत्तर
ऑक्सीकारक क्षमता F2 से Cl2 तक घटती है। जलीय विलयन में हैलोजेनों की ऑक्सीकारक क्षमता वर्ग में नीचे की ओर घटती है (F से Cl तक)। फ्लुओरीन का इलेक्ट्रोड विभव (+287 V) क्लोरीन (+136 V) की तुलना में उच्च होता है, इसलिए F2 क्लोरीन की तुलना में प्रबल ऑक्सीकारक है। इलेक्ट्रोड विभव निम्नलिखित प्राचलों पर निर्भर करता है –
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अत: Fप्रबल ऑक्सीकारक है।

प्रश्न 27.
दो उदाहरणों द्वारा फ्लुओरीन के असामान्य व्यवहार को दर्शाइए।
उत्तर
फ्लुओरीन का असामान्य व्यवहार इसके-

  1. लघु आकार
  2. उच्च विद्युत ऋणात्मकता
  3. कम F-F आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी तथा
  4. इसके संयोजी कोश में d-कक्षकों की अनुपलब्धता के कारण होता है।

उदाहरणार्थ –

  1. फ्लुओरीन केवल एक ऑक्सोअम्ल बनाती है, जबकि अन्य हैलोजेन अधिक संख्या में ऑक्सो- अम्लों का निर्माण करते हैं।
  2. हाइड्रोजन फ्लुओराइड प्रबल हाइड्रोजन बन्धों के कारण द्रव होता है, जबकि अन्य हाइड्रोजन हैलाइड गैसीय होते हैं।

प्रश्न 28.
समुद्र कुछ हैलोजेन का मुख्य स्रोत है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
समुद्र जल में मैग्नीशियम, कैल्सियम, सोडियम तथा पोटैशियम के क्लोराइड, ब्रोमाइड तथा आयोडाइड पाए जाते हैं जिनमें सोडियम क्लोराइड (द्रव्यमान अनुसार 2.5%) प्रमुख हैं। समुद्री जमाव में सोडियम क्लोराइड तथा कार्नेलाइट [KCI . MgCl2 . 6H2O] प्रमुख होते हैं। कुछ समुद्री जीवधारियों के तन्त्र में आयोडीन पायी जाती है। कुछ समुद्री खरपतवारों ( लेमिनेरिया प्रजाति) में 0.5% आयोडीन तथा चिली साल्टपीटर में 0.2% सोडियम आयोडेट होता है।

प्रश्न 29.
Cl2 की विरंजक क्रिया का कारण बताइए। (2012)
उत्तर
Cl2 की विरंजक क्रिया ऑक्सीकरण के कारण होती है। नमी अथवा जलीय विलयन की उपस्थिति में Cl2 नवजात ऑक्सीजन मुक्त करती है।
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यह नवजात ऑक्सीजन वनस्पतियों तथा कार्बनिक द्रव्यों में उपस्थित रंगीन पदार्थों का ऑक्सीकरण करके उन्हें रंगहीन पदार्थ में परिवर्तित कर देती है।
रंगीन पदार्थ + [O] → रंगहीन पदार्थ
अत: Cl2 की विरंजक क्रिया ऑक्सीकरण के कारण होती है।

प्रश्न 30.
उन दो विषैली गैसों के नाम लिखिए जो क्लोरीन गैस से बनाई जाती हैं?
उत्तर
फॉस्जीन (COCl2) तथा मस्टर्ड गैस (ClCH2CH2SCH2CH2Cl)।

प्रश्न 31.
I2 से ICl अधिक क्रियाशील क्यों है?
उत्तर
I2 से ICl अधिक क्रियाशील होता है क्योंकि I-I आबन्ध से I-Cl आबन्ध दुर्बल होता है। परिणामस्वरूप ICl सरलता से टूटकर हैलोजेन परमाणु देता है जो तीव्रता से अभिक्रिया करते हैं।

प्रश्न 32.
हीलियम को गोताखोरी के उपकरणों में उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर
आधुनिक गोताखोरी के उपकरणों में हीलियम ऑक्सीजन के तनुकारी के रूप में उपयोग में आती है; क्योंकि रुधिर में इसकी विलेयता बहुत कम है।

प्रश्न 33.
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित कीजिए –
XeF6 + H2O →XeO2F2 + HF
उत्तर
XeF6 + 2H2O → XeO2F2 + 4 HF

प्रश्न 34.
रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन क्यों था?
उत्तर
रेडॉन अत्यन्त कम अर्द्धआयुकाल का रेडियोऐक्टिव तत्व है, इस कारण रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन था।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
वर्ग 15 के तत्वों के सामान्य गुणधर्मो की उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था, परमाण्विक आकार, आयनन एन्थैल्पी तथा विद्युत ऋणात्मकता के सन्दर्भ में विवेचना कीजिए।
उत्तर
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) – इन तत्वों के संयोजी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 , np3 होता है। इनमें s-कक्षक पूर्णतया भरे हुए तथा p- कक्षक अर्द्धपूरित होते हैं, जो इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को अधिक स्थायी बनाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation states) – इन तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ -3, +3 तथा +5 हैं। तत्वों द्वारा -3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार तथा धात्विक गुण बढ़ने के कारण घटती है। वस्तुतः अन्तिम तत्व बिस्मथ कठिनता से -3 ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक बनाता है। ऑक्सीकरण अवस्था +5 का स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। इस अवस्था में केवल Bi(V) का यौगिक BiF5 ज्ञात है। ऑक्सीकरण अवस्था +5 तथा ऑक्सीकरण अवस्था +3 का स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर क्रमशः घटता तथा बढ़ता है (अक्रिय युग्म प्रभाव)। नाइट्रोजन +1, +2, +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है, जबकि यह ऑक्सीजन के साथ अभिकृत होता है। फॉस्फोरस कुछ ऑक्सोअम्लों में +1 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है।

(iii) परमाणु आकार (Atomic size) – समूह में नीचे जाने पर सहसंयोजी तथा आयनिक त्रिज्याएँ बढ़ती हैं। N से P तक सहसंयोजी त्रिज्याओं में पर्याप्त वृद्धि होती है, जबकि As से Bi तक सहसंयोजी त्रिज्याओं में सूक्ष्म वृद्धि प्रेक्षित होती है। यह भारी सदस्यों में पूर्णतया भरे हुए d तथा f-कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है।

(iv) आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpy) – वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी में परमाणु आकार में क्रमिक वृद्धि के कारण कमी आती है। इस प्रकार अधिक स्थायी अर्द्धपूरित p-कक्षक के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा छोटे आकार के कारण वर्ग 15 के तत्वों की आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग 14 के तत्वों से सम्बन्धित आवर्गों में अधिक होते हैं। आयनन एन्थैल्पी का उत्तरोत्तर बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
ΔiHi < ΔiH2 < ΔiH3

(v) विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity) – किसी समूह में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के साथ विद्युत ऋणात्मकता सामान्यतः घटती है। यद्यपि भारी तत्वों में इस प्रकार का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।

प्रश्न 2.
नाइट्रोजन की क्रियाशीलता फॉस्फोरस से भिन्न क्यों है?
उत्तर
N2 अणु में उपस्थित N ≡ N बन्ध की अत्यधिक बन्ध वियोजन एन्थैल्पी (941.4 kJ mol-1) के कारण नाइट्रोजन अणु फॉस्फोरस अणु की तुलना में बहुत कम क्रियाशील हैं। फॉस्फोरस अणु (P4) में उपस्थित P-P बन्धों की बन्ध वियोजन एन्थैल्पी काफी कम (201.6 kJ mol-1) होती है।

प्रश्न 3.
वर्ग 15 के तत्वों की रासायनिक क्रियाशीलता की प्रवृत्ति की विवेचना कीजिए।
उत्तर
1. हाइड्राइड (Hydrides) – वर्ग 15 के सभी तत्व MH3 तथा MH4 प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। (M = N, P, As, Sb, Bi)।

  1. क्षारीय गुण (Basic character) – हाइड्राइडों के क्षारीय गुण उनके आकार बढ़ने अर्थात् इलेक्ट्रॉन घनत्व घटने के साथ घटते हैं।
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  2. ऊष्मीय स्थायित्व (Thermal stability) – वर्ग में नीचे जाने पर हाइड्राइडों का ऊष्मीय स्थायित्व घटता है क्योंकि परमाणु आकार बढ़ता है जिससे बन्ध लम्बाई (M – H) बढ़ती है।
  3. अपचायक गुण (Reducing character) – यह वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ता है क्योंकि स्थायित्व घटता है। NH3 के अतिरिक्त सभी प्रबल अपचायक होते हैं।
  4. क्वथनांक (Boiling point) – NH3 का क्वथनांक हाइड्रोजन आबन्ध के कारण PH3 से अधिक होता है। क्वथनांक PH3 से आगे जाने पर बढ़ते हैं क्योंकि आण्विक द्रव्यमान बढ़ने के कारण वान्डर वाल्स बलों में वृद्धि होती है।

अभिक्रियाएँ –

  • Ca3P2 + 6H2O → 2PH3 ↑ + 3 Ca(OH)2
  • P4 + 3 KOH + 3H2O → PH3 ↑ + 3 KH2PO2
  • 2NH3 + NaOCl → N2H4 + NaCl + H2O

2. हैलाइड (Halides) :
(i) ट्राइहैलाइड (Trihalides) – ये सभी प्रकार के हैलोजेनों से सीधे संयोग करके MX3 प्रकार के ट्राइलाइड बनाते हैं। NBr3 तथा NI3 को छोड़कर सभी ट्राइहैलाइड स्थायी तथा पिरैमिडी संरचना के होते हैं। BiF3 के अतिरिक्त सभी ट्राइहैलाइड सहसंयोजी प्रकृति के होते हैं। ट्राइहैलाइडों की सहसंयोजी प्रकृति तत्व के आकार के बढ़ने पर घटती है।
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ट्राइहैलाइड सरलता से जल-अपघटित हो जाते हैं –

  • NCl3 + 3H2O → NH3 ↑ + 3 HOCl
  • PCl3 + 3H2O → H3PO3 + 3 HCl
  • 4 AsCl3 + 6H2O → As4O6 + 12 HCl
  • SbCl3 + H2O → SbOCl + 2 HCl
  • BiCl3 + H2O → BiOCl + 2 HCl

फॉस्फोरस तथा एण्टीमनी के ट्राइहैलाइड लूइस अम्ल की भाँति व्यवहार करते हैं।

  • PF3 + F2 → PF5
  • SbF3 + 2F– → [SbF5]2-

(ii) पेन्टाहैलाइड (Pentahalides) – P, As तथा Sb सूत्र MCl5 के पेन्टालाइड बनाते हैं। N पेन्टाहलाइड नहीं बनाता है; क्योंकि इलेक्ट्रॉन के उत्तेजन के लिए d-कक्षक अनुपस्थित होते हैं। Bi अक्रिय-युग्म प्रभाव के कारण पेन्टाहैलाइड नहीं बनाता। पेन्टाक्लोराइडों में sp3 संकरण होता है तथा इनकी संरचना त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी होती है।

3. ऑक्साइड (Oxides) – ये ऑक्सीजन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़कर अधिक संख्या में ऑक्साइड बनाते हैं।
(i) नाइट्रोजन के ऑक्साइड (Oxides of nitrogen) – नाइट्रोजन ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके कई प्रकार के ऑक्साइड बनाता है। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नांकित रूप में तालिकाबद्ध है –
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(ii) फॉस्फोरस के ऑक्साइड (Oxides of phosphorus) – फॉस्फोरस के दो महत्त्वपूर्ण ऑक्साइड P4O6 (P2O3 का द्विलक) तथा P4O10 (P2O5 का द्विलक) हैं। इन्हें अग्रवत् प्राप्त किया जाता है –
P4 + 6O (सीमित) [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] P4O6
P4 + 5O2 (आधिक्य) → P4O10

(iii) अन्य तत्वों के ऑक्साइड (Oxides of other elements) – As4O6, As2O5, Sb4O6, Sb2O5, Bi2O3 तथा Bi2O5.
N, P तथा As के ट्राइऑक्साइड अम्लीय होते हैं। अम्लीय गुण वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। Sb का ऑक्साइड उभयधर्मी होता है, जबकि Bi का ऑक्साइड क्षारीय होता है। सभी पेन्टाऑक्साइड अम्लीय होते हैं। N2O5 प्रबलतम तथा Bi2O5 दुर्बलतम अम्लीय ऑक्साइड होता है।

(4) ऑक्सी-अम्ल (Oxy-acids) – Bi को छोड़कर अन्य सभी तत्व ऑक्सी-अम्लों (जैसे- HNO3, H3PO4, H3AsO4, तथा H2SbO4) का निर्माण करते हैं। ऑक्सी-अम्लों का सामर्थ्य तथा स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है।
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प्रश्न 4.
NH3 हाइड्रोजन बन्ध बनाती है, परन्तु PH3 नहीं बनाती, क्यों?
उत्तर
नाइट्रोजन की विद्युत ऋणात्मकता (3: O) हाइड्रोजन (2 : 1) से अधिक होती है। अत: N – H आबन्ध ध्रुवीय होता है। इसलिए NH3 में अन्तराआण्विक हाइड्रोजन आबन्ध होते हैं। इसके विपरीत P तथा H दोनों की विद्युत ऋणात्मकता 2 : 1 होती है, इसलिए PH बन्ध ध्रुवीय नहीं होता, अत: इसमें हाइड्रोजन बन्ध नहीं होता है।

प्रश्न 5.
प्रयोगशाला में नाइट्रोजन कैसे बनाते हैं? सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया के रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर
प्रयोगशाला में अमोनियम क्लोराइड के सममोलर जलीय विलयन की सोडियम नाइट्राइट के साथ अभिक्रिया से नाइट्रोजन बनाते हैं। इस अभिक्रिया में द्विअपघटन के परिणामस्वरूप अमोनियम नाइट्राइट बनता है जो अस्थायी होने के कारण अपघटित होकर डाइनाइट्रोजन गैस बनाता है।
NH4Cl(aq) + NaNO2 (aq) → NH4NO2 (aq) + NaCl (aq)
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प्रश्न 6.
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन कैसे किया जाता है?
उत्तर
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन हेबर प्रक्रम से किया जाता है।
N2 (g) + 3H2 (g) [latex]\rightleftharpoons [/latex] 2NH3 (g), ΔfH– = – 46.1 kJ mol-1
शुष्क नाइट्रोजन तथा हाइड्रोजन को 1 : 3 में लेकर उच्च दाब (200 से 300 वायुमण्डल) तथा ताप । (723 K से 773 K) पर Al2O3 मिश्रित आयरन उत्प्रेरक पर प्रवाहित करने पर NH3 प्राप्त होती है। जिसे द्रवित करके तरल रूप में प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
उदाहरण देकर समझाइए कि कॉपर धातु HNO3 के साथ अभिक्रिया करके किस प्रकार भिन्न उत्पाद दे सकती है?
उत्तर
तनु HNO3 कॉपर के साथ अभिक्रिया करके कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है, जबकि सान्द्र HNO3 कॉपर के साथ अभिक्रिया करके कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड बनाता है।
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प्रश्न 8.
NOतथा N2O5 की अनुनादी संरचनाओं को लिखिए।
उत्तर
(i) NO2 की अनुनादी संरचनाएँ –
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(ii) N2O5 की अनुनादी संरचनाएँ –
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प्रश्न 9.
HNH कोण का मान, HPH, HAsH तथा HSbH कोणों की अपेक्षा अधिक क्यों होता है?
(संकेत- NH3 में sp3 संकरण के आधार तथा हाइड्रोजन और वर्ग के दूसरे तत्वों के बीच केवल s-p आबंधन के द्वारा व्याख्या की जा सकती है।)
उत्तर
MH3 प्रकार के हाइड्राइडों में केन्द्रीय परमाणु M इलेक्ट्रॉनों के तीन बन्ध युग्मों (bond pairs) तथा एक एकल युग्म (lone pair) से निम्न प्रकार से घिरा रहता है –
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नाइट्रोजन परमाणु का आकार में बहुत छोटे तथा अधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण NH3 में N परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का मान अधिकतम होता है। इस कारण बन्ध युग्मों के मध्य अधिकतम प्रतिकर्षण होता है और इस कारण HNH बन्ध कोण का मान अधिकतम होता है। परमाणु आकार में वृद्धि होने के कारण N से Bi की ओर जाने पर M की विद्युत ऋणात्मकता घटती है। फलस्वरूप इलेक्ट्रॉन युग्मों के मध्य प्रतिकर्षण कम हो जाता है। यही कारण है कि NH3 से BiH3 की ओर जाने पर H-M-H बन्ध कोण घटता है।

प्रश्न 10.
R3P = O पाया जाता है जबकि R3N = O नहीं, क्यों (R = ऐल्किल समूह)?
उत्तर
d- ऑर्बिटलों की अनुपस्थिति के कारण, N अपनी सहसंयोजकता को 4 से अधिक करने में और dπ – pπ बन्धों का निर्माण करने में असमर्थ है। इस कारण, यह R3N = O प्रकार के यौगिकों का निर्माण नहीं करता है। इसके विपरीत P के पास d- ऑर्बिटल होते हैं और यह dπ – pπ बहुल बन्ध बनाने में सक्षम है। अत: यह अपनी सहसंयोजकता को 5 तक बढ़ाकर R3P = 0 प्रकार के यौगिक बनाता है।

प्रश्न 11.
समझाइए कि क्यों NH3 क्षारकीय है, जबकि BiH3 केवल दुर्बल क्षारक है?
उत्तर
N परमाणु का आकार (70 pm), Bi के परमाणु आकार (148 pm) की तुलना में काफी कम है। इस कारण NH3 में N परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का मान BiH3 में Bi पर इलेक्ट्रॉन घनत्व के मान से काफी अधिक होता है। इस कारण BiH3 की तुलना में NH3 अधिक प्रभावशाली ढंग से इलेक्ट्रॉनों के एकल युग्म को दे सकता है। यही कारण है कि BiH3 की तुलना में NH3 अधिक क्षारीय है।

प्रश्न 12.
नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है तथा फॉस्फोरस P4 के रूप में, क्यों?
उत्तर
छोटे परमाणु आकार तथा अधिक विद्युत ऋणात्मकता के कारण नाइट्रोजन में स्वयं से pπ – pπ बहुल बन्धों को बनाने की प्रबल प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार, यह N ≡ N बन्ध का निर्माण कर एक द्वि-परमाणविक अणु (N2 ) के रूप में पाया जाता है। इसके विपरीत, बड़े परमाणु आकार तथा कम विद्युत ऋणात्मकता के कारण फॉस्फोरस में स्वयं से pπ – pπ बहुल बन्धों को बनाने की प्रवृत्ति नहीं होती है। अत: यह P – P एकल बन्धों को बनाकर एक समचतुष्फलकीय P4 अणु का निर्माण करता है।

प्रश्न 13.
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताओं को लिखिए।
उत्तर
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताएँ निम्नलिखित हैं –
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श्वेत तथा लाल फॉस्फोरस की संरचनाएँ निम्नवत् होती हैं –
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प्रश्न 14.
फॉस्फोरस की तुलना में नाइट्रोजन श्रृंखलन गुणों को कम प्रदर्शित करती है, क्यों?
उत्तर
शृंखलन का गुण तत्व की बन्ध प्रबलता पर निर्भर करता है। चूंकि N-N बन्ध की प्रबलता (159 kJ mol-1), P-P बन्ध की प्रबलता (212 kJ mol-1) से कम होती है, इसलिए नाइट्रोजन फॉस्फोरस की तुलना में कम श्रृंखलन गुणों को दर्शाती है।

प्रश्न 15.
H3PO3 की असमानुपातन अभिक्रिया दीजिए।
उत्तर
गर्म किये जाने पर H3PO3 निम्न प्रकार से असमानुपातन प्रदर्शित करता है –
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प्रश्न 16.
क्या PCl5 ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों का कार्य कर सकता है? तर्क दीजिए।
उत्तर
PCl5 में P की ऑक्सीकरण अवस्था +5 है जो P की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था है। अतः, यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था को +5 से अधिक प्रदर्शित नहीं कर सकता है, अर्थात् इसे और अधिक ऑक्सीकृत नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार यह अपचायक की भाँति व्यवहार नहीं कर सकता है। इसके विपरीत, यह आसानी से एक ऑक्सीकारक की भाँति व्यवहार कर सकता है क्योंकि यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था को +5 से घटाकर +3 कर सकता है।
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प्रश्न 17.
O, Se, Te तथा Po को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था तथा हाइड्राइड निर्माण के सन्दर्भ में आवर्त सारणी के एक ही वर्ग में रखने का तर्क दीजिए।
उत्तर
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration)-इन सभी तत्वों का संयोजी कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान, ns2 np2 (n = 2 से 6 तक) होता है। इससे इन तत्वों को आवर्त सारणी के वर्ग 16 में रखा जाना चरितार्थ होता है।
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(ii) ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation state) – इन्हें समीपवर्ती अक्रिय गैस विन्यास प्राप्त करने के लिए अर्थात् द्विऋणात्मक आयन बनाने के लिए दो अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए इन तत्वों की न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था -2 होनी चाहिए। ऑक्सीजन विशिष्ट रूप से तथा सल्फर कुछ मात्रा में विद्युत ऋणात्मक होने के कारण -2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। इस वर्ग के अन्य तत्व, 0 तथा S से अधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करते हैं। चूंकि इन तत्वों के संयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए ये तत्व अधिकतम +6 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित कर सकते हैं। इन तत्वों द्वारा प्रदर्शित अन्य धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ +2 तथा +4 हैं। यद्यपि ऑक्सीजन 4-कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण +4 तथा +6 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित नहीं करता, अतः न्यूनतम तथा अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आधार पर इन तत्वों को समान वर्ग अर्थात् वर्ग 16 में रखा जाना पूर्णतया न्यायोचित है।

(iii) हाइड्राइडों का निर्माण (Formation of hydrides) – सभी तत्व अपने संयोजी इलेक्ट्रॉनों में से दो इलेक्ट्रॉनों की हाइड्रोजन के 1s-कक्षक के साथ सहभागिता करके अपने-अपने अष्टक पूर्ण कर लेते हैं। तथा सामान्य सूत्र EH, के हाइड्राइड बनाते हैं; जैसे- H2O, H2S, H2Se. H2Te तथा H2Po, इसलिए सामान्य सूत्र EH2 वाले हाइड्राइड बनाने के आधार पर इन तत्वों को समान वर्ग अर्थात् वर्ग 16 में रखा जाना पूर्णतया न्यायोचित है।

प्रश्न 18.
क्यों डाइऑक्सीजन एक गैस है, जबकि सल्फर एक ठोस है?
उत्तर
ऑक्सीजन pπ – pπ बहुल बन्ध बनाता है। छोटे आकार तथा उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन द्विपरमाणुक अणु (O2) के रूप में पाया जाता है। ये अणु परस्पर दुर्बल वाण्डर वाल्स आकर्षण बलों द्वारा जुड़े रहते हैं जो कमरे के ताप पर अणुओं के संघट्टों द्वारा सरलता से हट जाते हैं। अत: O2 कमरे के ताप पर एक गैस होती है।
सल्फर अपने विशाल आकार तथा कम विद्युत ऋणात्मकता के कारण pπ – pπ बहुल बन्ध नहीं बनाता है, अपितु यह S – S एकल बन्ध बनाते हैं। पुनः O – O एकल बन्धों से अधिक प्रबल S – S बन्धों के कारण सल्फर में श्रृंखलन का गुण ऑक्सीजन से अधिक होता है। अत: सल्फर श्रृंखलन की उच्च प्रवृत्ति तथा pπ – pπ बहुल बन्ध बनाने की अल्प प्रवृत्ति के कारण अष्टपरमाणुक अणु (S8) बनाता है जिसकी संकुचित वलय संरचना (puckered ring structure) होती है। विशाल आकार के कारण S8 अणुओं को परस्पर बाँधे रखने वाले आकर्षण बल पर्याप्त प्रबल होते हैं जिन्हें कमरे के ताप पर अणुओं के संघट्टों द्वारा नहीं हटाया जा सकता है। अत: सल्फर कमरे के ताप पर एक ठोस होता है।
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प्रश्न 19.
यदि O → O– तथा O → O2- के इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी मान पता हों, जो क्रमशः 141 तथा 702 kJ mol-1 हैं तो आप कैसे स्पष्ट कर सकते हैं कि O2- स्पीशीज वाले ऑक्साइड अधिक बनते हैं न कि O– वाले?
(संकेत-यौगिकों के बनने में जालक ऊर्जा कारक को ध्यान में रखिए।)
उत्तर
O2- मूलक युक्त ऑक्साइडों (अर्थात् MO प्रकार के ऑक्साइड) की जालक ऊर्जा (lattice energy) का मान O2- मूलक युक्त ऑक्साइडों (अर्थात् M2O प्रकार के ऑक्साइड) की जालक ऊर्जाओं से काफी अधिक होता है क्योंकि O2- तथा M2+ पर आवेश की मात्रा अधिक होती है। इसलिए O → O2- की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान O → O– के सम्बन्धित मान की तुलना में काफी अधिक होने के बाद भी MO का निर्माण M2O के निर्माण की तुलना में ऊर्जा की दृष्टि से अधिक सम्भाव्य है। यही कारण है कि MO प्रकार के ऑक्साइडों की संख्या M2O प्रकार के ऑक्साइडों की तुलना में काफी अधिक है।

प्रश्न 20.
कौन-से ऐरोसॉल्स ओजोन को कम करते हैं?
उत्तर
क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) ऐरोसॉल जैसे-फ्रियोन (CCl2F2) वायुमण्डल के स्ट्रेटोस्फियर : (stratosphere) में उपस्थित ओजोन पर्त को विच्छेदित करते हैं। निहित अभिक्रियाएँ निम्न हैं –
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प्रश्न 21.
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 के उत्पादन का वर्णन कीजिए। (2009, 12, 15, 16)
उत्तर
संस्पर्श विधि द्वारा H2SO4 का उत्पादन
(Production of H2SO4 by Contact Process)
सल्फ्यूरिक अम्ल का उत्पादन संस्पर्श प्रक्रम द्वारा तीन चरणों में सम्पन्न होता है।
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  1. सल्फर अथवा सल्फाइड अयस्कों को वायु में जलाकर सल्फर डाइऑक्साइड का उत्पादन करना।
  2. उत्प्रेरक (V2O5) की उपस्थिति में ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कराकर SO2 का SO3 में परिवर्तन करना।
  3. SO3 को सल्फ्यूरिक अम्ल में अवशोषित करके ओलियम (H2S2O7) प्राप्त करना।

सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन का प्रवाह चित्र, चित्र-7 में दिया गया है।
प्राप्त सल्फर डाइऑक्साइड को धूल के कणों एवं आर्सेनिक यौगिकों जैसी अन्य अशुद्धियों से मुक्त कर शुद्ध कर लिया जाता है।
सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में ऑक्सीजन द्वारा SO2 गैस का V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO3 प्राप्त करने के लिए उत्प्रेरकी ऑक्सीकरण मूल पद है।
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यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्क्रमणीय है एवं अग्र अभिक्रिया में आयतन में कमी आती है। अतः कम ताप और उच्च दाब उच्च लब्धि (yield) के लिए उपयुक्त स्थितियाँ हैं, परन्तु तापक्रम बहुत कम नहीं होना चाहिए अन्यथा अभिक्रिया की गति धीमी हो जाएगी। सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में प्रयुक्त संयन्त्र का संचालन 2 bar दाब तथा 720 K ताप पर किया जाता है। उत्प्रेरकी परिवर्तक से प्राप्त SO3 गैस, सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल,में अवशोषित होकर ओलियम (H2S2O7) बना देती है। जल द्वारा ओलियम का तनुकरण करके वांछित सान्द्रता वाला सल्फ्यूरिक अम्ल प्राप्त कर लिया जाता है। प्रक्रम के सतत संचालन तथा लागत में भी कमी लाने के लिए उद्योग में उपर्युक्त दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ सम्पन्न की जाती हैं।

  • SO3 + H2SO4 → H2S2O7
  • H2S2O7 + H2O → 2 H2SO4

संस्पर्श विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल की शुद्धता सामान्यतः 96 – 98% होती है।

प्रश्न 22.
SO2 किस प्रकार से एक वायु प्रदूषक है?
उत्तर
SO2 एक अत्यन्त हानिकारक गैस है। वायुमण्डल में इसकी उपस्थिति से श्वसन रोग, हृदय रोग, गले तथा आँखों में अनेक परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। यह अम्ल वर्षा (acid rain) का मुख्य कारण है। अम्ल वर्षा जन्तुओं, वनस्पतियों एवं भवनों के लिए अत्यन्त घातक है। अम्ल वर्षा से सम्बन्धित प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्न हैं –

  • SO2 + hv → SO2
  • SO2 + O2 → SO3 + O
  • SO2 + SO2 → SO3 + SO
  • SO + SO2 → SO3 + S
  • SO + H2O → H2SO4

इस प्रकार, SO2 एक घातक वायु प्रदूषक है।

प्रश्न 23.
हैलोजेन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों होते हैं?
उत्तर
हैलोजेनों में अल्प आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, उच्च विद्युत ऋणात्मकता तथा अधिक ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के कारण इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अपचयित होने की प्रबल प्रवृत्ति होती है।
X + e– → X–
अत: हैलोजेन प्रबल ऑक्सीकरण कर्मक या ऑक्सीकारक होते हैं। यद्यपि इनकी ऑक्सीकारक क्षमता F2 से I2 तक घटती है जैसा कि इनके इलेक्ट्रोड विभवों से सत्यापित होता है –
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इसलिए F2 प्रबलतम तथा I2 दुर्बलतम ऑक्सीकारक होता है।

प्रश्न 24.
स्पष्ट कीजिए कि फ्लुओरीन केवल एक ही ऑक्सो-अम्ल, HOF क्यों बनाता है?
उत्तर
फ्लोरीन सर्वाधिक विद्युत ऋणात्मक तत्त्व है और केवल -1 ऑक्सीकरण अवस्था ही प्राप्त कर सकती है। इसका परमाणु आकार भी काफी कम होता है। इस कारण यह उच्च ऑक्सी अम्लों जैसे- HOXO, HOXO2 तथा HOXO3 आदि में केन्द्रीय परमाणु के रूप में स्थित नहीं हो पाती है और केवल एक ही ऑक्सी अम्ल HOF का निर्माण करती है। इस अम्ल में इसकी ऑक्सीकरण अवस्था-1 है।

प्रश्न 25.
व्याख्या कीजिए कि क्यों लगभग एकसमान विद्युत ऋणात्मकता होने के पश्चात् भी नाइट्रोजन हाइड्रोजन आबन्ध निर्मित करता है, जबकि क्लोरीन नहीं।
उत्तर
यद्यपि O तथा Cl दोनों की विद्युत ऋणात्मकताओं के मान लगभग समान हैं, तथापि उनके परमाणु आकार काफी भिन्न होते हैं (O = 66 pm, Cl = 99 pm)। इस कारण Cl परमाणु की तुलना में O परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का मान काफी अधिक होता है। इस कारण ही ऑक्सीजन तो हाइड्रोजन बन्ध बनाने में सक्षम है, लेकिन Cl नहीं।

प्रश्न 26.
ClO2 के दो उपयोग लिखिए।
उत्तर

  1. ClO2 एक शक्तिशाली ऑक्सीकारक तथा क्लोरीनीकारक है। अत: इसका उपयोग जल के शुद्धीकरण में किया जाता है।
  2. यह एक उत्कृष्ट विरंजक (bleaching agent) है और इसका उपयोग कागज की लुगदी तथा वस्त्रों के विरंजन में किया जाता है।

प्रश्न 27.
हैलोजेन रंगीन क्यों होते हैं? (2014)
उत्तर
सभी हैलोजेन रंगीन होते हैं। इसका कारण यह है कि इनके अणु दृश्य क्षेत्र में प्रकाश अवशोषित कर लेते हैं जिसके फलस्वरूप इनके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं, जबकि शेष प्रकाश उत्सर्जित हो जाता है। हैलोजेनों का रंग वास्तव में इस उत्सर्जित प्रकाश का रंग होता है। उत्तेजन के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा परमाणु आकार के अनुसार F से I तक लगातार घटती है, अतः उत्सर्जित प्रकाश की ऊर्जा F से I तक बढ़ती है। दूसरे शब्दों में, हैलोजेन का रंग F2 से I2 तक गहरा होता जाता है।
उदाहरणार्थ– F2 बैंगनी प्रकाश अवशोषित करके हल्का पीला दिखाई देता है, जबकि आयोडीन पीला तथा हरा प्रकाश अवशोषित करके गहरा बैंगनी रंग का प्रतीत होता है। इसी प्रकार हम Cl2 के हरे-पीले तथा ब्रोमीन के नारंगी-लाल रंग की व्याख्या कर सकते हैं।

प्रश्न 28.
जल के साथ F2 तथा Cl2 की अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर
प्रबल ऑक्सीकारक होने के कारण F, जल को 0, या 0; में ऑक्सीकृत कर देता है।

  • 2F2 (g) + 2H2O (l) → 4HF (aq) + O2 (g)
  • 3F2 (g) + 3H2O (l) → 6HF (aq) + O3 (g)

Cl2 जल से क्रिया कर हाइड्रोक्लोरिक तथा हाइपोक्लोरस अम्लों का निर्माण करता है।
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प्रश्न 29.
आप HCl से Cl2 तथा Cl2 से HCl को कैसे प्राप्त करेंगे? केवल अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर

  1. HCl से cl2 :
    • MnO2 (s) + 4HCl (aq) → MnCl2 (aq) + 2H2O (l) + Cl2 (g)
  2. Cl2 से HCl :
    • Cl2 (g) + H2 (g) → 2HCl (g)

प्रश्न 30.
एन-बार्टलेट Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए कैसे प्रेरित हुए?
उत्तर
नील बार्टलेट ने प्रेक्षित किया कि PtF6 की अभिक्रिया O2 से होने पर एक आयनिक ठोस O+2PtF–6 प्राप्त होता है।
O2 (g) + PtF6 (g) → O+2[PtF6]–
यहाँ O2, PtF6 द्वारा O+2 में ऑक्सीकृत हो जाता है।

बार्टलेट ने पाया कि Xe की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (1170 kJ mol-1) O2 अणुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (1175 kJ mol-1) के लगभग समान है, इसलिए PtF6 द्वारा Xe को Xe+ में ऑक्सीकृत करना चाहिए। इस प्रकार वे Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए प्रेरित हुए। जब Xe तथा PtF6 को मिश्रित किया गया, तब एक तीव्र अभिक्रिया हुई तथा सूत्र Xe+PtF–6 का एक लाल ठोस पदार्थ प्राप्त हुआ।
Xe + PtF6 [latex]\underrightarrow { 278K } [/latex] xe+ [PtF6]–

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्या हैं?
(i) H2PO2
(ii) PCl3
(iii) Ca3P2
(iv) Na3PO4
(v) POF3
उत्तर
माना कि फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्था : है –
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प्रश्न 32.
निम्नलिखित के लिए सन्तुलित समीकरण दीजिए –
(i) जब NaCl को MnO2 की उपस्थिति में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है।
(ii) जब क्लोरीन गैस को NaI के जलीय विलयन में से प्रवाहित किया जाता है।
उत्तर
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(ii) Cl2 (g) + 2NaI (aq) → 2NaCl (aq) + I2 (s)

प्रश्न 33.
जीनॉन फ्लुओराइड XeF2, XeF4 तथा XeF6 कैसे बनाए जाते हैं?
उत्तर
जीनॉन फ्लुओराइडों को Xe तथा F2 के मध्य विभिन्न परिस्थितियों में सीधे अभिक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है।

  • Xe (g) + F2 (g) [latex]\underrightarrow { 673K,1bar } [/latex] XeF2 (s)
  • Xe (g) + 2F2 (g) [latex]\underrightarrow { 873K,7bar } [/latex] XeF4 (s)
  • Xe (g) + 3F2 (g) [latex]\underrightarrow { 573K,60-70bar } [/latex] XeF6 (s)

प्रश्न 34.
किस उदासीन अणु के साथ ClO– समइलेक्ट्रॉनी है? क्या यह अणु एक लूइस क्षारक है?
उत्तर
ClO– में कुल 17 + 8 + 1 = 26 इलेक्ट्रॉन हैं। यह ClF अणु से समइलेक्ट्रॉनिक है क्योंकि ClF में भी 17 + 9 = 26 इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं। ClF एक लूइस बेस की भाँति व्यवहार करता है क्योंकि [latex s=2] _{ . }^{ . }{ { \overset { .. }{ \underset { .. }{ Cl } } } } [/latex] – F में क्लोरीन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के तीन एकल युग्म (lone pairs) उपस्थित हैं। यह पुनः F से क्रिया कर ClF3 बना सकती है।

प्रश्न 35.
XeO3 तथा XeF4 किस प्रकार बनाए जाते हैं?
उत्तर
XeF4 तथा XeF6 के जल-अपघटन पर XeO3 बनता है।

  • 6XeF4 + 12H2O → 4Xe + 2XeO3 + 24HF + 3O2 ↑
  • XeF6 + 3H2O → XeO3 + 6HF

जीनॉन तथा फ्लु ओरीन को 1 : 5 अनुपात में लेकर 873 K तथा 7 bar पर अभिक्रिया कराने पर XeF4 बनता है।
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प्रश्न 36.
निम्नलिखित प्रत्येक समुच्चय को सामने लिखे गुणों के अनुसार सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए –

  1. F2, Cl2, Br2, I2 – आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी बढ़ते क्रम में।
  2. HF, HCl, HBr, HI – अम्ल सामर्थ्य बढ़ते क्रम में।
  3. NH3, PH3, AsH3, SbH3, BiH3 – क्षारक सामर्थ्य बढ़ते क्रम में।

उत्तर
1. F2 से I2 तक आबन्ध दूरी बढ़ने पर आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी घटती है क्योंकि F से I की ओर जाने पर परमाणु के आकार में वृद्धि होती है। यद्यपि F-F आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, Cl – Cl की तुलना में कम होती है तथा Br – Br की आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी से भी कम होती है। इसका कारण यह है कि F परमाणु अत्यधिक छोटा होता है तथा प्रत्येक F परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के तीन एकाकी युग्म F2 अणु में F-परमाणुओं को बाँधे रखने वाले आबन्ध युग्मों को प्रतिकर्षित करते हैं। अत: आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी का बढ़ता क्रम इस प्रकार होता है- I2 < F2 < Br2 < Cl2.

2. HF, HCl, HBr, HI की आपेक्षिक अम्ल सामर्थ्य इनकी आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी पर निर्भर करती है। F से I तक परमाणु का आकार बढ़ने पर H-X आबन्ध की आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी H – F से H – I तक घटती है। इसलिए अम्ल सामर्थ्य विपरीत क्रम में इस प्रकार बढ़ता है –
HF < HCl < HBr < HI.

3. NH3, PH3, AsH3, BiH3 में केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्म की उपस्थिति के कारण ये सभी लुईस क्षारों की भाँति व्यवहार करते हैं। यद्यपि NH3 से BiH3 तक जाने पर परमाणु का आकार बढ़ता है, परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म अधिक आयतन घेर लेता है। दूसरे शब्दों में, केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व घटता है तथा क्षारक सामर्थ्य NH3 से BiH3 तेक घटती है, इसलिए क्षारक सामर्थ्य का बढ़ता क्रम है- BiH3 < SbH3 < AsH3 < PH3 < NH3 .

प्रश्न 37.
निम्नलिखित में से कौन-सा एक अस्तित्व में नहीं है?

  1. XeOF4
  2. NeF2
  3. XeF2
  4. XeF6.

उत्तर
NeF2 अस्तित्व में नहीं है। इसका कारण यह है कि फ्लोरीन Ne को Ne+2 में ऑक्सीकृत नहीं कर सकता क्योंकि Ne की प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के योग का मान Xe की तुलना में काफी अधिक है। इसलिए XeF2, XeOF4, तथा XeF6 प्राप्त किये जा सकते हैं, लेकिन NeF2 नहीं।

प्रश्न 38.
उस उत्कृष्ट गैस स्पीशीज का सूत्र देकर संरचना की व्याख्या कीजिए जो कि इनके साथ समसंरचनीय है –

  1. ICl–4
  2. IBr–2
  3. BrO–3

उत्तर
1. ICl–4, XeF4 से समइलेक्ट्रॉनिक है। दोनों वर्ग समतलीय हैं।
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2. IBr–2, XeF2 से समइलेक्ट्रॉनिक है। दोनों रेखीय हैं।
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3. BrO–3, XeO3 से समइलेक्ट्रॉनिक है। दोनों पिरामिडीय आकृति के होते हैं।
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प्रश्न 39.
उत्कृष्ट गैसों के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े क्यों होते हैं?
उत्तर
उत्कृष्ट गैसों की परमाण्विक त्रिज्या अपने सम्बन्धित आवर्गों में सर्वाधिक होती है। इसका कारण यह है कि उत्कृष्ट गैसों की त्रिज्या केवल वाण्डर वाल्स त्रिज्या होती है (क्योंकि ये अणु नहीं बनाती हैं), जबकि अन्यों की सहसंयोजक त्रिज्याएँ होती है। वाण्डर वाल्स त्रिज्या सहसंयोजक त्रिज्या से अधिक होती है, अतः उत्कृष्ट गैसों के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े होते हैं।

प्रश्न 40.
निऑन तथा आर्गन गैसों के उपयोग सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर
निऑन के उपयोग (Uses of Neon) –

  1. निऑन का उपयोग विसर्जन ट्यूब तथा प्रदीप्त बल्बों में विज्ञापन प्रदर्शन हेतु किया जाता है।
  2. निऑन बल्बों का उपयोग वनस्पति उद्यान तथा ग्रीन हाउस में किया जाता है।

आर्गन के उपयोग (Uses of Argon) –

  1. आर्गन का उपयोग उच्चताप धातुकर्मीय प्रक्रमों में अक्रिय वातावरण उत्पन्न करने के लिए किया जाता है ( धातुओं तथा उपधातुओं के आर्क वेल्डिंग में)।
  2. इसका उपयोग विद्युत-बल्ब को भरने के लिए किया जाता है।
  3. प्रयोगशाला में इसका उपयोग वायु सुग्राही पदार्थों के प्रबन्धन में भी किया जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी है – (2017)
(i) AsH3
(ii) SbH3
(iii) pH3
(iv) NH3
उत्तर
(iv) NH3

प्रश्न 2.
सफेद फॉस्फोरस को किस द्रव में रखते हैं? (2012)
(i) जल
(ii) केरोसीन
(iii) एथिल ऐल्कोहॉल
(iv) क्लोरोफॉर्म
उत्तर
(i) जल

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से किसकी अभिक्रिया से फॉस्फोरस से फॉस्फीन बनाया जाता है? (2017)
(i) HCl
(ii) NaOH
(iii) CO2
(iv) CO2
उत्तर
(ii) NaOH

प्रश्न 4.
अमोनिया और फॉस्फीन गैसों के कौन-से निम्नलिखित गुण में भिन्नता है? (2011)
(i) अणु संरचनाओं में
(ii) क्लोरीन के साथ अभिक्रियाओं में
(iii) अपचायक गुण में
(iv) वायु में जलने में
उत्तर
(iv) वायु में जलने में

प्रश्न 5.
SO2 अणु में सल्फर परमाणु का संकरण है – (2017)
(i) sp
(ii) SP2
(iii) sp3
(iv) sp3d
उत्तर
(ii) sp2

प्रश्न 6.
प्रबल विद्युत ऋणात्मक हैलोजन है – (2017)
(i) F2
(ii) Cl2
(iii) Br2
(iv) I2
उत्तर
(i) F2

प्रश्न 7.
सर्वाधिक इलेक्ट्रॉन बन्धुता वाला तत्त्व है –
(i) N
(ii) 0
(iii) Cl
(iv) F
उत्तर
(iii) Cl

प्रश्न 8.
F, Ci, Br तथा I तत्त्वों के इलेक्ट्रॉन बन्धुता का सही क्रम है – (2016)
(i) F > Cl > Br > I
(ii) I > Br > Cl > F
(iii) F > Br > Cl > I
(iv) F > Cl > Br > I
उत्तर
(i) F > Cl > Br > I

प्रश्न 9.
निम्न में से कौन-सा कथन सही है? (2012)
(i) NO2 नाइट्रिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
(ii) CO फॉर्मिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
(iii) Cl2O3 हाइपोक्लोरस अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
(iv) Cl2O7 परक्लोरिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
उत्तर
(iv) Cl2O7 परक्लोरिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है

प्रश्न 10.
निम्न में से विस्फोटक है – (2013)
(i) Hg2Cl2
(ii) PCl3
(iii) NCl3
(iv) SbCl3
उत्तर
(iii) NCl3

प्रश्न11.
क्लोरीन का प्रबलतम ऑक्सी अम्ल है – (2016)
(i) HClO2
(ii) HClO4
(iii) HClO
(iv) HClO3
उत्तर
(ii) HClO4

प्रश्न12.
निष्क्रिय गैसों की खोज का श्रेय जाता है – (2012)
(i) रैले को
(ii) विलियम रैमसे को
(iii) जॉनसन को
(iv) डेवार को
उत्तर
(i) रैले को

प्रश्न 13.
वायुमण्डल में सर्वाधिक पायी जाने वाली गैस है – (2017)
(i) हीलियम
(ii) निऑन
(iii) आर्गन
(iv) क्रिप्टन
उत्तर
(iii) आर्गन

प्रश्न14.
निम्न में से कौन-सी गैस वायुयानों के टायरों में भरी जाती है? (2012)
(i) H,
(ii) He
(iii) Np
(iv) Ar
उत्तर
(ii) He

प्रश्न15.
वायुमण्डल में पायी जाने वाली अक्रिय गैस है – (2011)
(i) He तथा Ne
(ii) He, Ne तथा Ar
(iii) He, Ne, Ar तथा Kr
(iv) Rn को छोड़कर सभी
उत्तर
(iv) Rn को छोड़कर सभी

प्रश्न16.
हीलियम का मुख्य स्रोत है – (2012)
(i) वायु
(ii) मोनाजाइट रेत
(iii) रेडियम
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) मोनोजाइट रेत

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमोनिया की क्लोरीन से क्या अभिक्रिया होती है? (2014)
उत्तर
अमोनिया की क्लोरीन से अभिक्रिया निम्नलिखित दो प्रकार से होती है –

  1. जब अमोनिया आधिक्य में होती है तो N2 तथा NH4Cl प्राप्त होते हैं।
    • 8 NH3 + 3 Cl2 → N2 ↑ + 6 NH4Cl
  2. जब क्लोरीन आधिक्य में होती है तो NCl3 तथा HCl प्राप्त होते हैं।
    • NH3 + 3 Cl2 → NCl3 + 3 HCl

प्रश्न 2.
नाइट्रस अम्ल, ऑक्सीकारक एवं अपचायक दोनों के रूप में कार्य करता है। प्रत्येक को एक-एक उदाहरण देकर समझाइए। (2010, 12)
उत्तर
नाइट्रस अम्ल अपघटित होकर नवजात ऑक्सीजन देता है
2HNO2 → 2NO ↑ + [O] + H2O
नवजात ऑक्सीजन विभिन्न पदार्थों को ऑक्सीकृत कर देती है। इसके विपरीत यह प्रबल ऑक्सीकारकों के प्रति अपचायक का कार्य भी करती है, क्योंकि यह उनमें नवजात ऑक्सीजन ग्रहण करके स्वयं नाइट्रिक अम्ल में बदल जाती है।
HNO2 + [O] → HNO3
उदाहरण –

  1. ऑक्सीकारक गुण – नाइट्रस अम्ल सल्फर डाइऑक्साइड को सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत कर देता है।
    • SO2 + 2HNO2 → H2SO4 + 2NO
  2. अपचायक गुण – नाइट्रस अम्ले H2O2 को H2O में अपचयित कर देता है।
    • H2O2 + HNO2 → HNO3 + H2O

प्रश्न 3.
फॉस्फोरस के अपररूप लिखिए। (2017)
उत्तर
फॉस्फोरस के तीन मुख्य अपररूप निम्नवत् हैं –

  1. सफेद या पीला फॉस्फोरस
  2. लाल फॉस्फोरस
  3. काला फॉस्फोरस

प्रश्न 4.
सफेद फॉस्फोरस से लाल फॉस्फोरस कैसे प्राप्त किया जाता है? (2015)
उत्तर
सफेद फॉस्फोरस को निष्क्रिय वातावरण में 240°C ताप पर गर्म करने से वह लाल फॉस्फोरस में बदल जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 41

प्रश्न 5.
फॉस्फोरस के निम्नलिखित ऑक्सी अम्लों के संरचना सूत्र लिखिए – (2017)
(i) हाइपो फॉस्फोरिक अम्ल
(ii) फॉस्फोरिक अम्ल
(iii) ऑर्थों फॉस्फोरिक अम्ल
(iv) पाइरो फॉस्फोरिक अम्ल
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 42

प्रश्न 6.
एक अभिक्रिया लिखिए जिसमें ओजोन अपचायक हो परन्तु स्वयं भी अपचयित होती है – (2017)
उत्तर
ओजोन हाइड्रोजन परॉक्साइड को जल में अपचयित करती है और स्वयं भी अपचयित हो जाती है।
H2O2 + O3 → 2O2 ↑ + H2O

प्रश्न 7.
सल्फर के किन्हीं चार ऑक्सी अम्लों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर

  1. H2SO4 (सल्फ्यूरिक अम्ल)
  2. H2S2O7 (डाइसल्फ्यूरिक अम्ल)
  3. H2S2O3 (थायोसल्फ्यूरिक अम्ल)
  4. H2S2O6 (डाइथायोनिक अम्ल)

प्रश्न 8.
रासायनिक समीकरण देते हुए SO2 की विरंजक क्रिया का कारण समझाइए। (2012, 17)
उत्तर
SO2 अपचयन के आधार पर विरंजक गुण व्यक्त करती है।
SO2 + 2H2O → H2SO4 + 2[H]
रंगीन पदार्थ + [H] → रंगहीन पदार्थ

प्रश्न 9.
जल की अपेक्षा आयोडीन, KI विलयन में क्यों अधिक विलेय है? (2009)
उत्तर
जल के द्वारा आयोडीन का बिल्कुल भी अपघटन नहीं होता है जबकि आयोडीन KI विलयन में घुलकर भूरे रंग का पोटैशियम ट्राइआयोडाइड (KI3) संकर यौगिक बनाती है।
KI + I2 → KI3

प्रश्न10.
सामान्य ताप एवं दाब पर ब्रोमीन एक द्रव है जबकि आयोडीन ठोस। कारण स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर
आयोडीन का अणुभार तथा आकार दोनों ब्रोमीन से अधिक हैं चूंकि आयोडीन अणु के मध्य लगने वाला आणविक आकर्षण बल ब्रोमीन की तुलना में अधिक है, इसलिए आयोडीन ठोस तथा ब्रोमीन द्रव है।

प्रश्न 11.
हैलोजनों के दो ऑक्सी अम्लों के संरचना सूत्र लिखिए। (2016, 17)
उत्तर
हैलोजनों के दो ऑक्सी अम्लों के संरचना सूत्र निम्नवत् हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 43

प्रश्न 12.
HCl का क्वथनांक HF से कम क्यों होता है? (2016)
उत्तर
हाइड्रोजन हैलाइडों के क्वथनांक HCl से HI तक बढ़ते हैं। HF का क्वथनांक अन्तराअणुक हाइड्रोजन आबन्धन के कारण अपसामान्य रूप से इन सबसे उच्च है।

प्रश्न 13.
उत्कृष्ट प्रैसे क्या होती हैं? उत्कृष्ट गैसों के नाम लिखिए। (2009)
उत्तर
आवर्त सारणी में शून्य वर्ग के तत्त्वों को उत्कृष्ट गैसें कहते हैं, क्योंकि ये तत्त्व रासायनिक रूप से अक्रिय होते हैं। हीलियम, आर्गन, निऑन, रेडॉन, क्रिप्टॉन तथा जीनॉन उत्कृष्ट गैसें हैं।

प्रश्न 14.
अक्रिय गैसों की चार विशेषताएँ/गुण लिखिए। (2009, 10)
उत्तर
अक्रिय गैसों के गुण –

  1. ये रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन गैसें हैं।
  2. इनकी अन्तिम कक्षा का विन्यास ns2np6 (हीलियम को छोड़कर) होता है।
  3. इनकी संयोजकता शून्य होती है।
  4. ये एक परमाणुक गैसें हैं, जिनकी विशिष्ट ऊष्माओं का अनुपात (Cp/Cυ) 1.66 होता है।

प्रश्न15.
अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य क्यों होती है? (2017)
उत्तर
क्योंकि इनके अन्दर और बाहर के सभी कोश पूर्ण रूप से भरे होते हैं।

प्रश्न 16.
उत्कृष्ट गैसें अक्रिय क्यों होती हैं? इनके द्वारा बनाये गये दो यौगिकों के सूत्र लिखिए। (2010, 13, 16)
उत्तर
उत्कृष्ट या अक्रिय गैसों के सभी कक्ष पूर्णतया भरे होने के कारण ये संतृप्त होती हैं और इसी कारण रासायनिक रूप से निष्क्रिय होती हैं। इन तत्त्वों के आयनन विभव स्थायी इलेक्ट्रॉन कक्ष होने के कारण उच्च होते हैं, अतः ये रासायनिक क्रिया में भाग नहीं लेते हैं। इनके द्वारा बनाये गये दो यौगिक क्रमश: WHe2 व Ar6H2O हैं।

प्रश्न 17.
उत्कृष्ट गैसों के आयनन विभव के मान ऊँचे होते हैं? समझाइए। (2013, 15)
उत्तर
उत्कृष्ट गैसों के उच्च आयनन विभव इनके छोटे आकार के कारण होते हैं।

प्रश्न 18.
कारण सहित स्पष्ट कीजिए कि He उत्कृष्ट गैसों में सबसे ज्यादा निष्क्रिय है। (2013)
उत्तर
उत्कृष्ट गैसों की आयनन ऊर्जाओं का क्रम निम्नवत् होता है –
He > Ne > Ar > Kr > Xe > Rn.
इससे स्पष्ट है कि He की आयनन ऊर्जा सर्वोच्च है। अत: इसमें से इलेक्ट्रॉन निष्कासित करना आसान नहीं है। इसी के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि He उत्कृष्ट गैसों में सबसे ज्यादा निष्क्रिय है।

प्रश्न 19.
He और Ne फ्लोरीन के साथ यौगिक नहीं बनाते हैं क्यों? (2017)
उत्तर
He और Ne के फ्लोरीन के साथ यौगिक न बनाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. छोटा आकार
  2. d कक्षक की अनुपस्थिति
  3. उच्च आयनन ऊर्जा

प्रश्न 20.
अक्रिय गैसों में सबसे अधिक यौगिक बनाने वाली अर्थात् सबसे अधिक क्रियाशील गैस का नाम एवं इसके कोई भी दो यौगिकों के सूत्र लिखिए। (2009, 11, 12)
उत्तर
जीनॉन। यौगिक :

  • जीनॉन डाइफ्लुओराइड (XeF2)
  • जीनॉन टेट्राफ्लुओराइड (XeF4)

प्रश्न 21.
हीलियम तथा निऑन के मिश्रण को पृथक् करने की विधि लिखिए। (2011)
उत्तर
हीलियम तथा निऑन के मिश्रण को 180°C पर चारकोल के सम्पर्क में लाने पर He मुक्त हो। जाती है तथा निऑन अधिशोषित हो जाती है। इसको गर्म करने पर निऑन प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 22.
निष्क्रिय वातावरण के लिए किस अक्रिय गैस का प्रयोग किया जाता है और क्यों? (2012)
उत्तर
आर्गन को, क्योंकि यह किसी पदार्थ से क्रिया नहीं करती है।

प्रश्न 23.
रेडॉन की खोज किसने की? इसका किस रोग के उपचार में उपयोग किया जाता है? (2010, 12, 17)
उत्तर
रेडॉन (Rn) की खोज डॉर्न ने की थी। इसका प्रयोग कैंसर के उपचार में किया जाता है।

प्रश्न 24.
88Ra266 से प्राप्त होने वाली अक्रिय गैस का नाम तथा इसका प्रमुख उपयोग लिखिए। (2012)
उत्तर
88Ra266 के रेडियोऐक्टिव विघटन से रेडॉन (Rn) गैस प्राप्त होती है।
88Ra266 → 86Ra222 + 2He4
इसका उपयोग कैंसर के उपचार में तथा रेडियोऐक्टिवता के शोध कार्य में किया जाता है।

प्रश्न 25.
क्लीवाइट खनिज में कौन-सी अक्रिय गैस पाई जाती है? इस गैस का एक उपयोग लिखिए। (2018)
उत्तर
क्लीवाइट खनिज में हीलियम गैस पाई जाती है। यह गैस वायुयान के टायरों में भरी जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
NF5 नहीं बनता है जबकि PF ज्ञात है। समझाइए। (2014)
उत्तर
नाइट्रोजन (N) 1s2,2s2,2p3 में निम्न ऊर्जा का रिक्त d-कक्षक उपलब्ध नहीं होता है इसलिए नाइट्रोजन अपने अष्टक का प्रसार नहीं कर पाता है अर्थात् अपने वाह्य कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं रख सकता है जिसके कारण NF5 नहीं बन पाता है।
चूँकि फॉस्फोरस में निम्न ऊर्जा का रिक्त 3d -कक्षक उपलब्ध है इसलिए यह अपने अष्टक का प्रसार करता है अर्थात् अपने बाह्य कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन रख सकता है जिसके कारण PF5 बनता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 44
PF5 में फॉस्फोरस के पाँच सहसंयोजक हैं तथा फॉस्फोरस के बाह्य कोश में कुल 10 इलेक्ट्रॉन हैं।

प्रश्न 2.
अमोनिया तथा फॉस्फीन बनाने की प्रयोगशाला विधि का रासायनिक समीकरण लिखिए तथा सफेद फॉस्फोरस की क्लोरीन से अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण भी लिखिए। (2016)
उत्तर
अमोनिया गैस बनाने की प्रयोगशाला विधि का रासायनिक समीकरण – प्रयोगशाला में अमोनिया गैस अमोनियम क्लोराइड को बुझे हुए चूने के साथ गर्म करके बनायी जाती है।
2NH4Cl + Ca(OH)2 → CaCl2 + 2NH3 + 2H2O

फॉस्फीन गैस बनाने की प्रयोगशाला विधि का रासायनिक समीकरण – प्रयोगशाला में फॉस्फीन गैस वायु की अनुपस्थिति में सफेद फॉस्फोरस को सान्द्र कास्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करके बनायी जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 45
सफेद फॉस्फोरस की क्लोरीन से अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण – सफेद फॉस्फोरस साधारण ताप पर क्लोरीन गैस में स्वत: जलने लगता है।
P4 + 6Cl2 → 4PCl3
P4 + 10Cl2 → 4PCl5

प्रश्न 3.
फॉस्फीन बनाने की प्रयोगशाला विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसके दो गुण एवं उपयोग लिखिए। (2009, 10, 12, 13, 16, 17, 18)
उत्तर
प्रयोगशाला में फॉस्फीन को सान्द्र सोडियम हाइड्रॉक्साइड को अक्रिय वातावरण में सफेद फॉस्फोरस के साथ उबालकर प्राप्त करते हैं।
P4 + 3NaOH + 3H2O → 3NaH2PO2 + PH3 ↑
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 46
इसके दो प्रमुख गुण निम्नवत् हैं –

  1. यह वायु से भारी तथा जल में अल्प विलेय होती है।
  2. यह विषैली प्रकृति की होती है।

इसके दो प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं –

  1. इसका उपयोग धातुओं के फॉस्फाइड बनाने में किया जाता है।
  2. इसका उपयोग समुद्री यात्राओं में होम्ज सिग्नल के लिए किया जाता है।

प्रश्न 4.
अमोनिया तथा फॉस्फीन के दो रासायनिक विभेदीय परीक्षण लिखिए। (2014)
उत्तर

  1. अमोनिया जलीय कॉपर सल्फेट के साथ गहरा नीला विलयन बनाती है जबकि फॉस्फीन जलीय कॉपर सल्फेट के साथ कॉपर फॉस्फाइड बनाती है।
  2. अमोनिया सान्द्र HCl के साथ सघन श्वेत धूम देती है जबकि फॉस्फीन HCl से क्रिया करके फॉस्फोनियम क्लोराइड बनाती है।

प्रश्न 5.
होम्ज सिग्नल में किस गैस का प्रयोग किया जाता है और कैसे? (2010)
उत्तर
होम्ज सिग्नल में फॉस्फीन गैस का प्रयोग किया जाता है। इस कार्य के लिए कैल्सियम फॉस्फाइड व कैल्सियम कार्बाइड से भरे हुए दो डिब्बे छेद करके समुद्र में डाल दिये जाते हैं। जल के सम्पर्क में आने पर फॉस्फीन तथा ऐसीटिलीन दोनों ही साथ-साथ जलती हैं।

  • Ca3P2 + 6H2O → 3Ca(OH)2 + 2PH3 ↑
  • CaC2 + 2H2O → Ca(OH)2 + C2H2 ↑

फॉस्फीन शीघ्र ज्वलनशील होने के कारण ऐसीटिलीन को जला देती है जिससे प्रकाश उत्पन्न होता है तथा दूर से ऐसा लगता है कि समुद्र में आग लग रही है। इस प्रकार से सूचना समुद्री जहाज के चालकों को मिल जाती है।

प्रश्न 6.
डाइऑक्सीजन के विरचन की प्रमुख विधियाँ तथा इसके रासायनिक गुण एवं उपयोग लिखिए। (2016)
उत्तर
विरचन की विधियाँ

  1. ब्रिन विधि – बेरियम ऑक्साइड वायु में 500°C पर गर्म करने पर बेरियम परॉक्साइड में बदल जाता है तथा बेरियम परॉक्साइड 800°C पर गर्म करने से पुन: BaO और O2 में अपघटित हो जाता है।
    • 2 BaO + O2 [latex]\underrightarrow { { 500 }^{ 0 }C } [/latex] 2BaO2
    • 2BaO2 [latex]\underrightarrow { { 800 }^{ 0 }C } [/latex] 2BaO + O2
  2. प्रयोगशाला विधि – प्रयोगशाला में ऑक्सीजन गैस पोटैशियम क्लोरेट और मैंगनीज डाइऑक्साइड के मिश्रण को 340°C तक गर्म करके बनायी जाती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 47

रासायनिक गुण
ऑक्सीकारक गुण – लगभग सभी तत्त्व ऑक्सीजन से सीधे संयोग करके ऑक्साइड बनाते हैं।

  1. C + O2 → CO2 + ऊष्मा + प्रकाश
  2. S + O2 → SO2 + ऊष्मा + प्रकाश
  3. 4P + SO2 → 2P2O5 + ऊष्मा + प्रकाश
  4. 3Fe + 2O2 → Fe3O4
  5. CH4 + 2O2 → CO2 + 2H2O

उपयोग

  1. ऑक्सीकारक के रूप में
  2. श्वसन में,
  3. रासायनिक उद्योगों में
  4. ऑक्सी-ऐसीटिलीन ज्वाला प्राप्त करने में

प्रश्न 7.
सीमेन्स और हाल्सके ओजोनाइजर द्वारा ओजोन के निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए तथा पोटैशियम फैरोसायनाइड और स्टेनस क्लोराइड पर इसकी अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण लिखिए। (2016)
उत्तर
सीमेन्स और हाल्सके ओजोनाइजर द्वारा ओजोन का औद्योगिक निर्माण – ओजोन का औद्योगिक निर्माण सीमेन्स और हाल्सके (Siemens and Halske) ओजोनाइजर द्वारा किया जाता है। इस ओजोनाइजर की रचना संलग्न चित्र में प्रदर्शित है। यह ओजोनाइजर लोहे का एक बॉक्स होता है जिसमें काँच या पॉर्सिलेने की कई बेलनाकार नलियाँ होती हैं। इन नलियों में ऐलुमिनियम की छड़े लगी होती हैं। जिनका निचला सिरा काँच की प्लेट पर टिका रहता है। ये छड़े इलेक्ट्रोडों का कार्य करती हैं।

उपकरण को ठण्डा रखने के लिए बेलनाकार नलियों के चारों ओर ठण्डा जल लगातार प्रवाहित किया जाता है। लोहे के बॉक्स को भू-सम्पर्कित करके छड़ों को लगभग 10 हजार वोल्ट के विभव पर रखा जाता है। ओजोनाइजर के निचले भाग से शुद्ध और शुष्क ऑक्सीजन गैस की मन्द धारा ओजोनाईजर में प्रवाहित की जाती है। छड़ों और नलियों के बीच के वलयाकार अन्तराल (annular space) में ऑक्सीजन प्रवेश करती है तथा ऊपर की ओर उठती है और ओजोन में परिवर्तित हो जाती है। बाहर निकलने वाली ओजोनित ऑक्सीजन में ओजोन आयतन से 10% तक होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 48
ओजोन की पोटैशियम फैरोसायनाइड से अभिक्रिया
यह पोटैशियम फैरोसायनाइड को पोटैशियम फैरीसायनाड में ऑक्सीकृत करती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 49
ओजोन की स्टेनस क्लोराइड से अभिक्रिया
यह स्टैनस क्लोराइड को स्टैनिक क्लोराइड में ऑक्सीकृत करती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 50

प्रश्न 8.
ओजोन एक ऑक्सीकारक एवं अपचायक पदार्थ है। उदाहरणों द्वारा समीकरण देते हुए इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2012)
उत्तर
ओजोन एक ऑक्सीकारक एवं अपचायक दोनों है। इसे हम निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा समझ सकते हैं –

  1. ऑक्सीकारक गुण – ओजोन जल की उपस्थिति में सल्फर को सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • S + H2O + 3O3 → H2SO4 + 3O2
  2. अपचायक गुण – ओजोन बेरियम परॉक्साइड को बेरियम मोनोऑक्साइड में अपचयित कर देती है।
    • BaO2 + O3 → BaO + 2O2 ↑

प्रश्न 9.
ओजोन की मर्करी, शुष्क आयोडीन तथा स्टैनस क्लोराइड से अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2016)
उत्तर

  1. ओजोन की मर्करी से अभिक्रिया का समीकरण
    ओजोन मर्करी को मयूरस ऑक्साइड में ऑक्सीकृत कर देती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 51
  2. ओजोन की शुष्क आयोडीन से अभिक्रिया का समीकरण
    ओजोन शुष्क आयोडीन को पीले रंग के ऑक्साइड (I4O9) में ऑक्सीकृत कर देती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 52
  3. ओजोन की स्टैनस क्लोराइड से अभिक्रिया का समीकरण
    ओजोन स्टैनस क्लोराइड को स्टैनिक क्लोराइड में ऑक्सीकृत कर देती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 53

प्रश्न 10.
‘सल्फर के अपररूप’ पर टिप्पणी लिखिए। (2016)
उत्तर
सल्फर के अनेक क्रिस्टलीय अपररूप ज्ञात हैं; जैसे- रोम्बिक सल्फर (rhombic sulphur or d-sulphur), मोनोक्लाइनिक सल्फर (monoclinic sulphur or B-sulphur), अमॉरफस सल्फर (amorphous sulphur), कोलॉइडी सल्फर (colloidal sulphur), प्लास्टिक सल्फर (plastic sulphur) आदि। रीम्बिक सल्फर और मोनोक्लाइनिक सल्फर, सल्फर के दो मुख्य अपररूप हैं। रोम्बिक और मोनोक्लाइनिक सल्फर दोनों के क्रिस्टल S8 अणुओं से बने होते हैं किन्तु क्रिस्टलों में अणओं की व्यवस्था में अन्तर होता है। साधारण ताप पर सल्फर का स्थायी रूप रोम्बिक सल्फर है। गर्म करने पर 95.6°C पर रोम्बिक सल्फर धीरे-धीरे मोनोक्लाइनिक सल्फर में बदल जाती है। 95.6°C से ऊपर के किसी ताप से ठण्डा करने पर मोनोक्लाइनिक सल्फर 95.6°C पर पुन: रोम्बिक सल्फर में बदल जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 54
95.6°C से नीचे सल्फर का स्थायी रूप रोम्बिक रूप और 95.6°C से ऊपर मोनोक्लाइनिक रूप विद्यमान होता है।

प्रश्न 11.
सल्फर डाइऑक्साइड के निर्माण की प्रयोगशाला विधि का वर्णन कीजिए। इसके ऑक्सीकारक और अपचायक गुण देते हुए इसके उपयोग भी दीजिए। (2016, 17)
उत्तर
प्रयोगशाला विधि – प्रयोगशाला में सल्फर डाइऑक्साइड गैस कॉपर धातु की छीलन को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करके बनाई जाती है।
Cu + 2H2SO4 → CuSO4 + 2H2O + SO2
ऑक्सीकारक गुण – सल्फर डाइऑक्साइड अनेक क्रियाओं में ऑक्सीकारक का कार्य करती हैं; जैसे-

  1. H2S का S में ऑक्सीकरण
    • 2H2S + SO2 → 3S + 2H2O
  2. आयरन का फेरस ऑक्साइड में ऑक्सीकरण
    • 3Fe + SO2 → 2FeO + FeS

अपचायक गुण – सल्फर डाइऑक्साइड अनेक क्रियाओं में अपचायक का कार्य करती हैं; जैसे-

  1. K2Cr2O7 का Cr2(SO4)3 में अपचयन
    • K2Cr2O7 + H2SO4 + 3SO2 → K2SO4 + Cr2(SO4)3 + H2O
  2. Cl को HCl में अपचयन
    • Cl2 + 2H2O + SO2 → H2SO4 + 2HCl

उपयोग

  1. ऑक्सीकारक के रूप में
  2. अपचायक के रूप में
  3. कीटाणु और रोगाणुनाशक के रूप में
  4. चीनी उद्योग में

प्रश्न 12.
सीसा कक्ष विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल के निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। संयंत्र के प्रत्येक भाग में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी दीजिए। (2016, 18)
उत्तर
सीसा कक्ष विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करने में सल्फर डाइऑक्साइड, वायु और नाइट्रिक ऑक्साइड (उत्प्रेरक) मिश्रण के भाग से क्रिया कराने पर सल्फ्यूरिक अम्ल प्राप्त होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 55
इस विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करने में प्रयुक्त संयंत्र संलग्न चित्र में प्रदर्शित है। इस संयंत्र के गुणक भाग और उनमें होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण निम्नवत् हैं –
1. पाइराइट बर्नर –

  • 4FeS2 + 11O2 → 2Fe2O3 + 8SO2
  • S +O2 → SO2

2. धूल कक्ष – पाइराइट बर्नर में प्राप्त सल्फर डाइऑक्साइड गैस और वायु के मिश्रण को धूल कक्ष में भेजा जाता है। इस कक्ष में गैसीय मिश्रण भाप के सम्पर्क में आता है और उसमें उपस्थित धूल के कण भारी होकर कक्ष की पेंदी में बैठ जाते हैं।
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3. नाइटर पात्र 
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4. ग्लोवर टावर 

  • SO2 + NO2 + H2O → H2SO4 + NO
  • 2(NO . HSO4) + H2O → 2H2SO4 + NO2 + NO

5. सीसा कक्ष 

  • 2SO2 + O2 + 2NO + 2H2O → 2H2SO4 + 2NO

6. गे-लुसैक टावर

  • 2H2SO4 + NO + NO2 → 2(NO . HSO4) + H2O

प्रश्न 13.
सल्फ्यूरिक अम्ल एक ऑक्सीकारक एवं निर्जलीकारक है। इसके एक-एक उदाहरण दीजिए। (2009, 10, 11, 12, 16, 18)
उत्तर
1. ऑक्सीकारक गुण – गर्म करने पर सान्द्र H2SO4 अपघटित होकर ऑक्सीजन परमाणु देता है और ऑक्सीकारक का कार्य करता है।
H2SO4 → SO2 + H2O + O

(i) HBr तथा HI को क्रमश: Br2 और I2 में ऑक्सीकृत कर देता है।

  • 2HBr + H2SO4 → Br2 ↑ + SO2 ↑ + 2H2O
  • 2HI + H2SO4 → I2 ↑ + SO2 ↑ + 2H2O

(ii) कार्बन को CO2 में तथा सल्फर को SO2 में ऑक्सीकृत करता है।

  • C + 2 H2SO4 → CO2 ↑ + 2SO2 ↑ + 2H2O
  • S + 2 H2SO4 → 3SO2 ↑ + 2H2O

2. निर्जलीकारक गुण – यह कार्बनिक यौगिकों; जैसे–चीनी, फॉर्मिक अम्ल तथा ऑक्लैलिक अम्ल से जल का शोषण कर लेता है। अतः चीनी काली पड़ जाती है।
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प्रश्न 14.
क्लोरीन, ब्रोमीन तथा आयोडीन के फ्लोरीन से बने किन्हीं चार अन्तरा हैलोजन यौगिकों के बनाने का रासायनिक समीकरण दीजिए। (2016)
उत्तर
अन्तरा हैलोजन यौगिक दो भिन्न हैलोजनों के सीधे संयोग द्वारा या निम्न अन्तरा हैलोजन यौगिक की हैलोजन से क्रिया द्वारा बनाए जाते हैं।

  • Cl2 + F2 [latex]\underrightarrow { { 250 }^{ 0 }C } [/latex] 2ClF
  • Cl2 + 3F2 (आधिक्य) [latex]\underrightarrow { { 500 }^{ 0 }C } [/latex] 2ClF3
  • Br2 + 5F2 (आधिक्य) [latex]\underrightarrow { { 500 }^{ 0 }C } [/latex] 2BrF5
  • IF5 + F2 → IF7

प्रश्न 15.
अन्तरा हैलोजन यौगिक क्या हैं? उदाहरण द्वारा समझाइए। AB3 प्रकार के क्लोरीन तथा फ्लोरीन के अन्तरा हैलोजन यौगिक बनाने का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2014, 16)
या
ClF3 के बनाने की विधि का ताप तथा दाब की परिस्थितियों को दिखाते हुए रासायनिक समीकरण लिखिए। (2017)
उत्तर
दो भिन्न हैलोजन परमाणु X तथा X’ से बने यौगिक अन्तरा हैलोजन यौगिक कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र XX’ और XX’n है। (जहाँ n = 3 से 7 तक)
IF को छोड़कर सभी XX’ प्रकार के अन्तराहैलोजन यौगिक बनाये गए हैं।
AB3 प्रकार के क्लोरीन तथा फ्लोरीन के अन्तरा हैलोजन यौगिक
Cl2 + 3F2 [latex]\underrightarrow { { 300 }^{ 0 }C } [/latex] 2ClF3

प्रश्न16.
आवर्त सारणी में अक्रिय गैसों के स्थान की विवेचना कीजिए। (2015)
उत्तर
आवर्त सारणी में अक्रिय गैसों को दायीं ओर शून्य समूह (वर्ग-18) में रखा गया है। इन तत्त्वों को इनके गुणों में समानता होने के कारण एक साथ रखा गया है। He को छोड़कर सभी अक्रिय गैसों के बाह्य कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। रेडॉन को छोड़कर सभी अक्रिय गैसें वायुमण्डल में मौजूद हैं। आन्तरिक और बाह्य सभी कोश पूर्ण होने के कारण ये रासायनिक रूप से निष्क्रिय होती हैं। अत: इन्हें अक्रिय गैस कहा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर नाइट्रोजन वर्ग (पाँचवे वर्ग) के तत्त्वों की आवर्त सारणी में स्थिति की विवेचना कीजिए। (2009, 10, 11, 12, 15)
उत्तर
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, आर्सेनिक, ऐण्टिमनी तथा बिस्मथ को आवर्त सारणी के V-A उपसमूह में रखा गया है। इन तत्त्वों को नाइट्रोजन परिवार के तत्त्व कहते हैं। इन्हें प्रायः निक्टोजन (Pnictogen) भी कहते हैं। ये तत्त्व p-ब्लॉक के तत्त्व हैं। इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार है –
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सभी तत्त्वों के बाहरी कोश में 5 इलेक्ट्रॉन हैं और बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np3 है। भीतर के सभी उपकोश पूर्ण हैं। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में समानता होने के कारण इनको एक ही उपसमूह में रखा जाना उचित है।
इनके गुणों में समानता तथा उनमें क्रमिक परिवर्तन तत्त्वों को एक ही उपवर्ग में रखे जाने की पुष्टि करते हैं।
गुणों में समानता

  1. इन तत्त्वों की मुख्य संयोजकता 3 तथा 5 है।
  2. ये (N2 को छोड़कर) स्वतन्त्र अवस्था में नहीं पाये जाते हैं।
  3. N2 के अतिरिक्त सभी ठोस हैं।
  4. N2 को छोड़कर सभी अपररूपता प्रदर्शित करते हैं।
  5. ये सभी हाइड्राइड बनाते हैं और सभी सहसंयोजक यौगिक हैं; जैसे- NH3, PH3, AsH3, SbH3 तथा BiH3.
  6. ये सभी बहु-परमाणुकता प्रकट करते हैं।
  7. ये सभी M2O3 तथा M2O5 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं। नाइट्रोजन N2O, NO, NO2 प्रकार के भी ऑक्साइड बनाती है।
  8. ये सभी MX3 प्रकार के हैलाइड बनाते हैं, जिनका जल-अपघटन हो जाता है।
    • NCl3 +3 H2O → NH3 ↑ + 3HOCl
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गुणों में क्रमिक परिवर्तन – परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ ऊपर से नीचे की ओर चलने पर

  1. परमाणु त्रिज्या तथा इलेक्ट्रॉन बन्धुता बढ़ती है।
  2. आयनन विभव तथा ऋण-विद्युतता घटती है।
  3. धात्विक लक्षण बढ़ता है।
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  4. इनके क्वथनांक तथा घनत्व क्रमशः बढ़ते हैं।
  5. इनके ऑक्साइडों का अम्लीय लक्षण घटता है।
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  6. जबकि नाइट्रोजन के ऑक्साइडों में अम्लीय प्रकृति का क्रम इस प्रकार है –
    • N2O < NO < N2O3 < N2O4 < N2O5
  7. हाईड्राइडों का स्थायित्व घटता है, विषैलापन बढ़ता है और क्षारीय गुण घटता है, जबकि अम्लीय गुण बढ़ता है।
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 64
  8. इनके गलनांक व क्वथनांक NH3 से SbH3 तक घटते हैं, जबकि अपचायक क्रम इस प्रकार है –
    • BiH3 > SbH3 > AsH3 > PH3
  9. इन सभी में sp3 -संकरण होता है और पिरेमिड ज्यामिति होती है, परन्तु बन्ध कोण NH3 से BiH तक घटता है।
  10. इनके ऑक्सी-अम्लों की प्रबलता घटती है।
    • HNO3 > H3PO4 > H3AsO4 > H3SbO4 > H3BiO4
  11. इनके हैलाइडों का स्थायित्व N से Bi तक बढ़ता है तथा वाष्पशीलता घटती है। अतः ये ट्राइहैलाइड बनाते हैं।
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 65

नाइट्रोजन को छोड़कर अन्य सभी तत्त्व पेण्टाहैलाइड भी बनाते हैं।

प्रश्न 2.
हेबर विधि द्वारा अमोनिया के औद्योगिक निर्माण का नामांकित चित्र सहित वर्णन कीजिए। इसके दो प्रमुख गुण एवं दो उपयोग लिखिए। इस विधि में ला-शातेलिए नियम का क्या महत्त्व है ? (2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 17)
उत्तर
हेबर विधि का सिद्धान्त–यदि शुद्ध नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के 1 : 3 अनुपात के मिश्रण को गर्म किया जाए तो अमोनिया बनती है।
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यह एक ऊष्माक्षेपी उत्क्रमणीय अभिक्रिया है और क्रिया के पश्चात् आयतन में कमी होती है, इसलिए ला-शातेलिए के नियमानुसार कम ताप और अधिक दाब पर अमोनिया अधिक उत्पन्न होगी। कम ताप पर अभिक्रिया का वेग बढ़ाने के लिए एक उत्प्रेरक प्रयोग किया जाता है। इस अभिक्रिया का उत्प्रेरक की उपस्थिति में अनुकूलतम ताप 450°-500°C तथा उच्च दाब 200 वायुमण्डल है; क्योंकि अभिक्रिया उत्क्रमणीय है, इसलिए अमोनिया को बराबर क्रिया क्षेत्र से हटाने के बाद, अमोनिया गैस अधिक बनेगी। इस अभिक्रिया में लोहे का बारीक चूर्ण (उत्प्रेरक) तथा मॉलिब्डेनम (उत्प्रेरक वर्धक) की सूक्ष्म मात्रा प्रयुक्त होती है। इसमें गैसीय मिश्रण शुद्ध होना चाहिए जिससे उत्प्रेरक विषाक्त न हो।
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विधि- शुद्ध N2 तथा H2 को 1 : 3 अनुपात में मिलाकर 200 वायुमण्डल दाब पर तप्त लोहे के बारीक चूर्ण (उत्प्रेरक) को, जिसमें मॉलिब्डेनम (उत्प्रेरक वर्धक) मिला होता है, 500°C ताप पर गर्म करते हैं। इस विधि में 10 – 15% अमोनिया बनती है, जिसे संघनित्र में प्रवाहित करके द्रवित कर लेते हैं। शेष गैसों को फिर से उत्प्रेरक कक्ष में प्रवाहित करते हैं जिससे N2 व H2 के संयोजन द्वारा NH3 का लगातार उत्पादन होता रहता है।
रासायनिक गुण
1. क्षारीय गुण – यह क्षारीय गैस है तथा लाल लिटमस को नीला कर देती है। यह अम्लों से क्रिया करके लवण बनाती है।
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2. धातु ऑक्साइडों का अपचयन – यह धातु ऑक्साइडों को अपचयित कर देती है।
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उपयोग

  1. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।
  2. बर्फ बनाने तथा कोल्ड स्टोरेज में प्रशीतक के रूप में; क्योंकि इसके वाष्पन की गुप्त ऊष्मा 327 कैलोरी/ग्राम (उच्च) होती है।

प्रश्न 3.
प्रयोगशाला में नाइट्रस ऑक्साइड बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। नाइट्रस ऑक्साइड के दो प्रमुख रासायनिक गुण एवं दो उपयोग लिखिए। (2009, 11)
उत्तर
प्रयोगशाला में नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) को सोडियम नाइट्रेट तथा अमोनियम सल्फेट के मिश्रण को अथवा केवल अमोनियम नाइट्रेट को गर्म करके बनाया जाता है।
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अमोनियम सल्फेट व सोडियम नाइट्रेट के मिश्रण को एक गोल पेंदे के फ्लास्क में लेकर गर्म किया जाता है। इस क्रिया से N2O बनती है, जिसमें Cl2, NO व NH3 की अशुद्धियाँ होती हैं। अत: इस गैस को क्रमशः NaOH विलयन, FeSO4 विलयन व सान्द्र H2SO4 में से प्रवाहित किया जाता है जहाँ क्रमशः Cl2, NO व NH3 एवं जल-वाष्प आदि अशुद्धियाँ अवशोषित हो जाती हैं। N2O ठण्डे जल में अत्यन्त विलेय है; अतः इसे गर्म पानी के ऊपर गैस जार में एकत्रित कर लेते हैं।
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रासायनिक गुण

  1. सोडामाइड से अभिक्रिया होने पर सोडियम ऐजाइड बनता है।
    • NaNH2 + N2O → NaN3 + H2O
  2. KMnO4 इसको नाइट्रिक ऑक्साइड में ऑक्सीकृत कर देता है।
    • N2O + [O] [latex]\xrightarrow [ { KMnO }_{ 4 } ]{ { H }_{ 2 }{ SO }_{ 4 } } [/latex] 2NO ↑

उपयोग

  1. ऑक्सीजन के साथ इसका मिश्रण दाँतों की शल्य चिकित्सा (dental surgery) में निश्चेतक (anaesthetic) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  2. सोडियम ऐजाइड बनाने में।

प्रश्न 4.
ओस्टवाल्ड विधि द्वारा नाइट्रिक अम्ल के औद्योगिक निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। सम्बन्धित अभिक्रियाओं का समीकरण दीजिए। तनु नाइट्रिक अम्ल (20%) की लेड पर अभिक्रिया लिखिए। (2011, 14, 15, 16, 17)
या
अमोनिया से नाइट्रिक अम्ल के निर्माण की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए तथा अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी दीजिए। Cu पर इस अम्ल की क्रिया किस प्रकार होती है? यदि अम्ल (i) गर्म और सान्द्र हो (ii) ठण्डा और तनु हो। सभी अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए। (2009, 11, 13)
उत्तर
ओस्टवाल्ड विधि- इसमें अमोनिया गैस वायु से ऑक्सीकृत होकर नाइट्रिक ऑक्साइड बनाती है जो फिर ऑक्सीकृत होकर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड देती है। यह जल से क्रिया करके नाइट्रिक अम्ल में परिवर्तित हो जाती है।

  • 4NH3 + 5O2 [latex]\underrightarrow { Pt } [/latex] 4NO + 6H2O
  • 2NO + O2 → 2NO2
  • 3NO2 + H2O → 2HNO3 + NO ↑

शुद्ध NH3 व वायु का मिश्रण 1 : 9 के अनुपात में परिवर्तक में प्रवाहित किया जाता है। यहाँ प्लेटिनम की जाली 650° – 800°C पर गर्म रखी जाती है जो उत्प्रेरक का कार्य करती है। यहाँ NH3 का 90% भाग ऑक्सीकृत होकर नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है। अब गैसों का मिश्रण ऑक्सीकारक स्तम्भ में पहुँचाया जाता है, जहाँ NO ऑक्सीकृत होकर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड देती है। NO2 अवशोषण स्तम्भ में जल में अवशोषित होकर नाइट्रिक अम्ल बनाती है।
इस प्रकार प्राप्त नाइट्रिक अम्ल तनु होता है। इसका आसवन करने पर एक निश्चित क्वथनांक का मिश्रण प्राप्त होता है, जिसे साधारण सान्द्र नाइट्रिक अम्ल कहते हैं।
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तनु नाइट्रिक अम्ल की लेड पर अभिक्रिया– इस अभिक्रिया के फलस्वरूप लेड नाइट्रेट, NO व जल बनता है।
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Cu पर क्रिया

  1. गर्म और सान्द्र HNO3 कॉपर से क्रिया करके Cu (NO3)2, N2 और जल देता है।
    • 5Cu + 12HNO3 → 5Cu (NO3)2 + N2 ↑ + 6H2O
  2. ठण्डा और तनु HNO, कॉपर से क्रिया करके Cu(NO3)2 N2O और जल देता है।
    • 4Cu + 10HNO3 → 4Cu (NO3)2 + N2O ↑ + 5H2O

प्रश्न 5.
हड्डी की राख से फॉस्फोरस प्राप्त करने की आधुनिक विधि का वर्णन कीजिए। फॉस्फोरस से फॉस्फीन गैस कैसे बनाओगे? (2009, 10, 11)
उत्तर
हड्डियों की राख या खनिज कैल्सियम फॉस्फेट [Ca3(PO4)2] को कोक एवं रेत के साथ मिलाकर हॉपर मार्ग से पेचदार चालक की सहायता से विद्युत भट्ठी में गिराते हैं। इस भट्ठी में दो कार्बन इलेक्ट्रोड होते हैं जिनके बीच विद्युत आर्क उत्पन्न किया जाता है। जिसके फलस्वरूप 1500°C ताप उत्पन्न हो जाता है। सर्वप्रथम कैल्सियम फॉस्फेट [Ca3(PO4)2], रेत (SiO2) के साथ क्रिया कर कैल्सियम सिलिकेट (CaSiO3) और फॉस्फोरस पेन्टॉक्साइड (P2O5) बनाता है। फिर P2O5 कार्बन द्वारा अपचयित होकर फॉस्फोरस की वाष्प देता है। यह वाष्प ऊपर के द्वार से निकलकर जल में ठोस रूप में एकत्रित हो जाती है। कैल्सियम सिलिकेट (धातुमल) नीचे के द्वार से निकाल लिया जाता है।
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2P2O5 + 10C → P4 + 10CO ↑

शुद्धिकरण– इस प्रकार प्राप्त फॉस्फोरस में कुछ अशुद्धियाँ होती हैं। इनको पृथक् करने के लिए एक टैंक में अशुद्ध फॉस्फोरस को क्रोमिक अम्ल (K2Cr2O7 + सान्द्र H2SO4) में डालकर पिघलाते हैं। इससे अशुद्धियाँ ऑक्सीकृत होकर मल के रूप में द्रव के ऊपर तैरने लगती हैं और फॉस्फोरस एक निर्मल और रंगहीन द्रव के रूप में टैंक के पेंदे में बैठ जाता है। पिघले हुए फॉस्फोरस को एक लम्बी नली में से प्रवाहित करते हैं जिसमें वह ठण्डा होकर जम जाता है। नली में जल डालकर ठोस फॉस्फोरस को जल में एकत्रित करते हैं।
फॉस्फोरस से फॉस्फीन गैस बनाना – फॉस्फोरस को निष्क्रिय वातावरण में NaOH के सान्द्र विलयन के साथ गर्म करने पर फॉस्फीन गैस बनती है।
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प्रश्न 6.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में ऑक्सीजन एवं सल्फर तत्त्वों की स्थिति की विवेचना कीजिए। (2010)
या
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में ऑक्सीजन परिवार (VI-A वर्ग के तत्त्वों) के तत्त्वों की स्थिति की विवेचना कीजिए। (2012)
उत्तर
मेंडलीव की आवर्त सारणी के VI-A समूह में पाँच तत्त्व हैं। तत्त्वों का यह परिवार ‘ऑक्सीजन परिवार’ कहलाता है। इस समूह के प्रथम चार तत्त्वों को सामूहिक रूप में ‘कैल्कोजन’ (chalcogen) के रूप में पुकारा जाता है। इस समूह में परमाणु भार की वृद्धि के साथ धात्विक या धन विद्युतीय गुण बढ़ता है तथा घनत्व, क्वथनांक और गलनांक में वृद्धि होती है। इस समूह में O, S अधातु हैं, जबकि Se व Te उपधातुएँ हैं और Po धातु है।
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रासायनिक गुणों में ऑक्सीजन, परिवार के अन्य तत्त्वों से भिन्न है, परन्तु अन्य सभी तत्त्वों के गुणों में समानता पाई जाती है।

  1. 1. ऑक्सीजन, सल्फर व सेलीनियम परमाणु के बाह्यतम संयोजी कक्ष में 6 इलेक्ट्रॉन हैं।UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 77
    अतः इन तीनों तत्त्वों के परमाणु रासायनिक अभिक्रिया में अन्य परमाणुओं से 2 इलेक्ट्रॉन लेकर अथवा 2 इलेक्ट्रॉन के जोड़े साझा करके अपनी बाह्यतम कक्ष में अधिकतम इलेक्ट्रॉन (8) प्राप्त करने हेतु संयोग करते हैं।
  2. तीनों ही अधातु हैं (Se धात्विक गुण भी रखती है) जो प्रकृति में स्वतन्त्र व संयुक्त अवस्था में पाये जाते है।
  3. तीनों समान यौगिक बनाते हैं।
    • CO2, H2O, P2O5, As2O5,
    • SO2, H2S, P2S5, As2S5,
    • SeO2, H2Se, P2Se3,
    • C2H2OH तथा C2H2SH; C2H2-O-C2H5 तथा C2H5-S-C2H5
  4. तीनों ही हाइड्रोजन के साथ संयोग कर लेते हैं।
    • H2O, H2S, H2S3, H2Se,
    • H2O2, H2S2, H2S4
  5. तीनों ही RO2 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं; जैसे- O3,SO2, SeO2 आदि। O3 ऑक्सीजन का ऑक्साइड माना जाता है।
  6. तीनों ही कार्बन के साथ संयोग करके क्रमश: CO2, CS2 व CSe2 बनाते हैं।
  7. तीनों ही अपररूपती प्रदर्शित करते हैं।
  8. तीनों तत्त्व ऑक्सीजन, सल्फर व सेलीनियम शृंखलन गुण भी व्यक्त करते हैं।
  9. धातु से क्रिया– ये Na, Cu, Zn, Fe आदि धातुओं के साथ क्रिया करके क्रमश: ऑक्साइड, सल्फाइड व सेलिनाइड बनाते हैं।
  10. ऑक्साइड व ऑक्सी अम्ल– ये तत्त्व ऑक्सीजन से संयोग करके डाई ऑक्साइड बनाते हैं। (सल्फर ट्राइ ऑक्साइड) भी बनाते हैं; जैसे- SO2, SeO2 आदि। ये जल में घुलकर ऑक्सी अम्ल बनाते हैं।
    • SO2 + H2 → H2SO3
    • SeO2 + H2O → H2SeO3
      इनकी प्रबलता का क्रम H2SO3 > H2SeO3 है।

अतः स्पष्ट है कि ऑक्सीजन, सल्फर व सेलीनियम तीनों को ही आवर्त सारणी के षष्ठम् समूह में एक साथ रखना औचित्यपूर्ण है।

प्रश्न 7.
शुद्ध ओजोन किस प्रकार प्राप्त करते हैं? Sncl2, FeSO2 और KI के साथ इसकी अभिक्रियाएँ लिखिए। (2009, 11, 14)
या
ओजोन बनाने की प्रयोगशाला विधि का वर्णन कीजिए। प्रयुक्त उपकरण का नामांकित रेखाचित्र दीजिए तथा इसके दो ऑक्सीकारक गुण दीजिए। समीकरण भी लिखिए। (2011, 13)
या
ब्रॉडी के ओजोनाइजर द्वारा ओजोन बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसके दो मुख्य उपयोग भी लिखिए। (2009)
या
ब्रॉडी ओजोनाइजर का नामांकित चित्र बनाइए। (2018)
उत्तर
प्रयोगशाला में ओजोन, ऑक्सीजन के नीरव विद्युत विसर्जन विधि द्वारा प्राप्त की जाती है।
3O2 → 2O3 ↑
नीरव विद्युत विसर्जन के लिए सीमेन्स का ओजोनाइजर या ब्रॉडी का ओजोनाइजर प्रयोग किया जाता है।
ब्रॉडी का ओजोनाइजर – यह एक U आकार की नली का बना होता है जिसका एक सिरा काफी चौड़ा होता है। इस सिरे में एक पतली परखनली को डालकर ऊपर वाले भाग को बन्द कर दिया जाता है। परखनली में तनु H2SO4 भरा होता है और उसमें एक प्लेटिनम का तार लटका देते हैं। सारे उपकरण को तनु H2SO4 में रखते हैं। इस बर्तन में भी एक प्लेटिनम का तार लटका देते हैं। प्लेटिनम के दोनों इलेक्ट्रोडों को चित्रानुसार प्रेरण कुण्डली से जोड़ देते हैं। नली में शुष्क ऑक्सीजन प्रवाहित करते हैं, जिससे 25% ओजोन प्राप्त होती है।
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ऑक्सीकारक गुण

  1. 1. यह स्टेनस क्लोराइड को तनु HCl की उपस्थिति में स्टेनिक क्लोराइड में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • 3SnCl2 +6HCl +O3 → 3SnCl4 +3H2O
  2. 2. यह फेरस सल्फेट को तनु H2SO4 की उपस्थिति में फेरिक सल्फेट में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • 2FeSO2 + O3 + H2SO4 → Fe2(SO4)3 + H2O + O2
  3. KI विलयन में प्रवाहित करने पर I2 में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • 2KI + H2O + O3 → 2KOH + I2 ↑ + O2 ↑

उपयोग

  1. प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में।
  2. जीवाणुनाशक के रूप में।

प्रश्न 8.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर क्लोरीन, ब्रोमीन एवं आयोडीन की आवर्त सारणी में स्थिति स्पष्ट कीजिए (2010)
या
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में हैलोजनों की स्थिति की विवेचना कीजिए। (2010, 12)
उत्तर
क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन को फ्लोरीन तथा ऐस्टैटीन के साथ आवर्त सारणी के VIIA उप-समूह में रखा गया है। VIIA के प्रथम चार तत्त्वों (F, CI, Br, I) को हैलोजन कहते हैं। ‘हैलोजन’ शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों ‘हैल्स’ (Hals) तथा ‘जेन्स’ (Genes) से हुई है, जिसका अर्थ है-समुद्री लवण पैदा करने वाला। ये सभी तत्त्वे अपने लवण के रूप में समुद्री जल में पाये जाते हैं। इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार हैं –
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इन सभी तत्त्वों के बाहरी कोश में 7 इलेक्ट्रॉन होते हैं और बाहरी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np5 है तथा भीतर के सभी कोश पूर्ण हैं। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में समानता होने के कारण इनके गुणों में समानता है और उनमें क्रमिक परिवर्तन पाया जाता है।
गुणों में समानता

  1. ये वैद्युत संयोजकता (-1) तथा सह-संयोजकता दोनों ही प्रकट करते हैं।
  2. इनकी वाष्प रंगीन तथा तीक्ष्ण गन्ध वाली होती है।
  3. गैसीय अवस्था में ये द्वि-परमाणुक होते हैं।
  4. सभी प्रारूपिक अधातु हैं।
  5. हाइड्रोजन से सीधा संयोग कर हाइड्रो अम्ल बनाते हैं; जैसे- HCl, HBr, HI
  6. इनकी धातुएँ वाष्प में जलकर हैलाइड बनाती हैं।
    • 2Na + Cl2 → 2NaCl
    • Mg + Br2 → MgBr2
  7. Cl2 तथा Br2 जल के साथ क्रिया कर O2 निकालती है।
    • 2Cl2 + 2H2O → 4HCl + O2
  8. Cl2, Br2,I2, ऑक्सीकारक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
  9. ये तत्त्व वैद्युत तथा ऊष्मा के कुचालक होते हैं।
  10. क्षारों के साथ समान रूप से क्रिया करते हैं।
  11. सभी प्रबल ऑक्सीकारक हैं।
    • H2S + Cl2 → 2HCl + S
    • SO2 + Cl2 + 2H2O → 2HCl + H2SO4
  12. सभी अम्लीय ऑक्साइड बनाते हैं।

गुणों में क्रमिक परिवर्तन – परमाणु संरचना तथा गुणों की समानता से स्पष्ट है कि इन तत्त्वों को एक ही समूह में रखना न्यायोचित है। इसके अतिरिक्त तत्त्वों के गुणों में श्रेणीबद्ध परिवर्तन परमाणु क्रमांक के परिवर्तन पर निर्भर करता है तथा किसी समूह में तत्त्वों की विभिन्न स्थानों पर स्थिति का निर्णायक भी है। इन तत्त्वों के गुणों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर श्रेणीबद्ध परिवर्तन इस प्रकार हैं –

  1. तत्त्वों की अवस्था में क्रमिक परिवर्तन होता है; जैसे- क्लोरीन गैस है, ब्रोमीन द्रव तथा आयोडीन ठोस है।
  2. गैसों का रंग गहरा होता जाता है। अत: फ्लोरीन हल्की पीली है, क्लोरीन हरी-पीली, ब्रोमीन लाल-भूरी तथा आयोडीन वाष्प गहरी बैंगनी है।
  3. इनकी क्रियाशीलता घटती है।
  4. इनका ऑक्सीकारक स्वभाव भी घटता है।
  5. क्वथनांक बढ़ते हैं तथा आपेक्षिक ताप घटते हैं।
  6. परमाणु त्रिज्याएँ बढ़ती हैं।
  7. आयनन विभव घटते हैं।

इन तत्त्वों के गुणों में समानता तथा परमाणु क्रमांक में क्रमिक वृद्धि के साथ गुणों में श्रेणीबद्ध परिवर्तन इस बात का निर्णायक है कि ये तत्त्व एक समूह में रखे जाने चाहिए। इनके परमाणुओं के बाहरी कोश की ns2 np5 संरचना सह इंगित करती है कि इनकी सातवें समूह में स्थिति न्यायोचित है।

प्रश्न 9.
डीकन विधि द्वारा क्लोरीन के निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। यह निम्नलिखित से किस प्रकार की क्रिया करती है? (2015)
(i) सोडियम आर्सेनाइट विलयन, (ii) गर्म चूने का पानी।
या
डीकन विधि द्वारा क्लोरीन के औद्योगिक निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। इसकी अमोनिया के साथ अभिक्रिया लिखिए। आवश्यक रासायनिक समीकरण भी लिखिए। (2013, 15, 16, 18)
या
क्लोरीन के एक ऑक्सीकारक गुण का रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर
क्लोरीन के औद्योगिक निर्माण की निम्नलिखित तीन विधियाँ हैं-

  1. वेल्डन विधि
  2. डीकन विधि तथा
  3. वैद्युत-अपघटनी विधि।

डीकन विधि या HCl से क्लोरीन के निर्माण की विधि – इस विधि में HCl का ऑक्सीकरण क्यूप्रस क्लोराइड (उत्प्रेरक) की उपस्थिति में वायु की ऑक्सीजन द्वारा निम्न प्रकार किया जाता है –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 80
4HCl + O2 [latex]\underrightarrow { { Cu }_{ 2 }{ Cl }_{ 2 } } [/latex] 2H2O +2Cl2 ↑
उत्प्रेरक कक्ष में झाँबा पत्थर क्यूप्रस क्लोराइड विलयन में भिगोकर रख देते हैं तथा ताप 450°C कर देते हैं। HCl तथा वायु का मिश्रण 4 : 1 के अनुपात में लेकर उत्प्रेरक कक्ष में प्रवाहित किया जाता है। यहाँ क्लोरीन बनती है, पर इसमें HCl, N2,O2 तथा जल-वाष्प मिले होते हैं। इस मिश्रण को स्क्रबर में प्रवाहित करके HCl हटा देते हैं। दूसरे कक्ष में प्रवाहित करने पर सान्द्र H2SO4 द्वारा जल-वाष्प पृथक् कर देते हैं। इस प्रकार N2,O2 मिश्रित क्लोरीन प्राप्त होती है।
उत्प्रेरक की क्रिया निम्न प्रकार होती है –

  • 2Cu2Cl2 + O2 → 2Cu2OCl2
  • 2HCl + Cu2OCl2 → 2CuCl2 + H2O
  • 2CuCl2 → Cu2Cl2 + Cl2 ↑

क्रियाएँ

  1. यह सोडियम आर्सेनाईट को सोडियम आर्सिनेट में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • Na3AsO3 + H2O + Cl2 → Na3AsO4 +2HCl
  2. क्लोरीन गर्म चूने के पानी के साथ कैल्सियम क्लोराइड तथा कैल्सियम क्लोरेट बनाती है।
    • 6Ca(OH)2 + 6Cl2 → 5CaCl2 + Ca(ClO3)2 + 6H2O

ऑक्सीकारक गुण – यह H2S को सल्फर में ऑक्सीकृत कर देती है।
H2S + Cl2 → 2HCl + S ↓
NH3 से अभिक्रिया
NH3 + 3Cl2 → NCl3 + 3HCl

प्रश्न10.
प्रयोगशाला में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विरचन की विधि, प्रमुख रासायनिक गुण तथा उपयोग का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विरचन की प्रयोगशाला विधि – प्रयोगशाला में हाइड्रोजन क्लाराइड गैस सोडियम क्लोराइड (नमक) को सान्द्र H2SO4 के सार्थ गर्म करके बनाई जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 81
हाइड्रोजन क्लोराइड गैस को जल में अवशोषित करने पर हाइड्रोक्लोरिक अम्ल प्राप्त होता है। हाइड्रोजन क्लोराइड गैस के जलीय विलयन को हाइड्रोक्लोरिक अम्ल कहते हैं।
हाइड्रोजन क्लोराइड गैस एवं हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाने में प्रयुक्त उपकरण संलग्न चित्र में प्रदर्शित है।

1. हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनाने की विधि – एक गोल पेंदे के फ्लास्क में कुछ सोडियम क्लोराईड (ठोस) लो और थिसेल फनल द्वारा सावधानी से सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल फ्लास्क में डालो जिससे फनल का निचला सिरा अम्ल में डूब जाए। फ्लास्क को गर्म करो। गर्म करने पर हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनती हैं और निकास नली से बाहर निकलने लगती है। गैस को वायु के उपरिमुखी विस्थापन द्वारा एक गैस जार में एकत्रित कर लो।। शुष्क HCl गैस प्राप्त करने के लिए निकास नली को सान्द्र H2SO4 की बोतल से जोड़ दो जिससे कि नम HCl गैस सान्द्र H2SO4 में से प्रवाहित होकर शुष्क हो जाए। सान्द्र H2SO4 युक्त बोतल में लगी दूसरी निकास नली से निकल रही शुष्क HCl गैस को अब जार में एकत्रित कर लो।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 82

2. हाइड्रोजन क्लोराइड गैस से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाने की विधि – चित्र में प्रदर्शित फ्लास्क में लगी हुई निकास नली के बाहर निचले सिरे पर रबर की नली के द्वारा एक साधारण फनल (छोटे स्तम्भ की) जोड़ दो। फनल का कुछ भाग एक पात्र में भरे जल में डुबा दो। निकास नली से फनल के द्वारा HCl गैस जल में पहुँचेगी और जल में विलेय हो जाएगी। इस प्रकार HCl गैस का जलीय विलयन अर्थात् हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बन जाएगा।

रासायनिक गुण
1. धातुओं से क्रिया – कॉपर, मरकरी, सिल्वर, गोल्ड और प्लैटिनम धातुओं को छोड़कर लगभग सभी धातुएँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से क्रिया करती हैं। क्रिया में धातु क्लोराइड बनता है और हाइड्रोजन गैस निकलती है।

  • 2Na + 2HCl → 2NaCl + H2
  • Mg + 2HCl → MgCl2 + H2
  • Zn + 2HCl → ZnCl2 + H2
  • Fe + 2HCl → FeCl2 + H2
  • 2Al + 6HCl → 2AlCl2 + 3H2

सान्द्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के आयतन से 3 : 1 मिश्रण को ‘ऐक्वारेजिया’ (aquaregia) कहते हैं। इस मिश्रण में गोल्ड (Au), प्लेटिनम (Pt) आदि धातुएँ घुल जाती हैं।
3HCl + HNO3 → NOCl + Cl2 + 2H2O
Au + Cl2 + NOCl → AuCl3 + NO
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 83

2. क्षारों से क्रिया – क्षार और अम्ल के परस्पर क्रिया करने से लवण और जल बनता है। इस क्रिया को उदासीनीकरण कहते हैं।

  • NaOH + HCl → NaCl + H2O
  • Ba(OH)2 + 2HCl → BaCl + 2H2O

3. धातु ऑक्साइडों से क्रिया – धातु ऑक्साइड और अम्ल की परस्पर क्रिया कराने पर लवण और जल बनता है।

  1. MgO + 2HCl → MgCl2 + H2O
  2. CuO + 2HCl → CuCl2 + H2O
  3. ZnO + 2HCl → ZnCl2 + H2O

4. अमोनिया से क्रिया – अमोनिया और HCl गैस की परस्पर क्रिया से अमोनियम क्लोराइड के सफेद धूम (fumes) बनते हैं।
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अमोनियम के जलीय विलयन की HCl विलयन से क्रिया कराने पर अमोनियम क्लोराइड और जल बनता है।
NH4OH + HCl → NH4Cl+ H2O

5. धातु कार्बोनेट से क्रिया – धातु कार्बोनेट की हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से क्रिया कराने पर लवण, जल और कार्बन डाइऑक्साइड बनते हैं।

  • Na2CO3 + 2HCl → 2NaCl + H2O + CO2
  • CaCO3 + 2HCl → CaCl2 + H2O + CO2

उपयोग

  1. धातुओं के क्लोराइड बनाने में।
  2. अम्ल के रूप में।
  3. ऐक्वारेजिया (आयतन से 1 भाग सान्द्र HNO3 +3 भाग सान्द्र HCl) बनाने में।
  4. क्लोरीन गैस बनाने में।
  5. गाई, चमड़े और अन्य उद्योगों में।

प्रश्न 11.
विरंजक चूर्ण क्या है? विरंजक चूर्ण के निर्माण की विधि का वर्णन नामांकित चित्र के साथ कीजिए तथा इसका एक ऑक्सीकारक गुण भी लिखिए। (2016)
उत्तर
यह एक मिश्रित लवण है जिसको कैल्सियम क्लोरोहाइपोक्लोराइट भी कहते हैं। विरंजक चूर्ण के एक अणु में एक कैल्सियम आयन (Ca2+), एक क्लोराइड आयन (Cl–) तथा एक हाइपोक्लोराइट आयन (OCl–) होते हैं, जिसको Ca2+ (Cl–) (OCl–) रूप में भी व्यक्त कर सकते हैं। विरंजक चूर्ण का निर्माण बैचमान विधि द्वारा किया जाता है। इसके अन्तर्गत शुष्क बुझे हुए चूने पर क्लोरीन की अभिक्रिया करायी जाती है।
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विधि- यह विधि विरंजक चूर्ण (CaOCl2) बनाने की आधुनिक विधि है। इसमें लोहे का बना हुआ एक टॉवर होता है जिसमें खाने बने होते हैं। संयंत्र के ऊपरी भाग से हॉपर द्वारा बुझा हुआ चूना [Ca(OH2)] डाला जाता है। टॉवर में नीचे से गर्म वायु और क्लोरीन की धारा प्रवाहित की जाती है। Ca(OH)2 व Cl2 गैस की क्रिया से विरंजक चूर्ण बनता है, जिसे संयंत्र के निचले भाग से बाहर निकाल लेते हैं। व्यर्थ गैसें संयंत्र के ऊपरी भाग से बाहर निकल जाती हैं।

ऑक्सीकारक गुण – यह तनु अम्ल की अभिक्रिया से ऑक्सीजन देता है, अत: यह एक ऑक्सीकारक है।

    1. यह PbO को PbO2 में ऑक्सीकृत कर देता है।
      • 2CaOCl2 + 2PbO → 2CaCl2 + 2PbO2
  1. यह अम्लीय माध्यम में KI को I2 में ऑक्सीकृत कर देता है।
    • CaOCl2 + 2CH3COOH + 2KI → (CH3COO)2Ca + 2KCl + I2 ↑ + H2O

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 86

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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State (ठोस अवस्था) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State (ठोस अवस्था).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 1
Chapter Name The Solid State
Number of Questions Solved 105
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State (ठोस अवस्था)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ठोस कठोर क्यों होते हैं?
उत्तर
ठोस कठोर होते हैं, क्योंकि इनके अवयवी कण अत्यन्त निविड संकुलित होते हैं। इनमें कोई स्थानान्तरीय गति नहीं होती है तथा ये केवल अपनी माध्य स्थिति के चारों ओर कम्पन कर सकते हैं।

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प्रश्न 2.
ठोसों का आयतन निश्चित क्यों होता है?
उत्तर
ठोस के अवयवी कणों की स्थिति नियत होती है तथा वे गति के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। इसलिए इनका आयतन निश्चित होता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित को अक्रिस्टलीय तथा क्रिस्टलीय ठोसों में वर्गीकृत कीजिए पॉलियूरिथेन, नैफ्थेलीन, बेन्जोइक अम्ल, टेफ्लॉन, पोटैशियम नाइट्रेट, सेलोफेन, पॉलिवाइर्निल क्लोराइड, रेशा काँच, ताँबा।
उत्तर
अक्रिस्टलीय ठोस – पॉलियूरिथेन, फ्लॉन, सेलोफेन, पॉलिवाइनिल, क्लोराइड, रेशा काँच।
क्रिस्टलीय ठोस – नैफ्थेलीन, बेन्जोइक अम्ल, पोटैशियम नाइट्रेट, ताँबा।

प्रश्न 4.
काँच को अतिशीतित द्रव क्यों माना जाता है?
उत्तर
क्योंकि यह ठोस होते हुए भी द्रवों के कुछ गुण प्रदर्शित करता है। द्रवों के समान इसमें प्रवाहित होने का गुण होता है। इसका यह गुण पुरानी इमारतों के काँच में देखा जा (UPBoardSolutions.com) सकता है जो तली पर कुछ मोटा होता है। यह केवल तभी सम्भव है जबकि यह अत्यन्त मन्द गति से द्रवों के समान प्रवाहित हो।

प्रश्न 5.
एक ठोस के अपवर्तनांक का मान सभी दिशाओं में समान प्रेक्षित होता है। इस ठोस की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए। क्या यह विदलन गुण प्रदर्शित करेगा?
उत्तर
चूँकि ठोस के अपवर्तनांक का मान सभी दिशाओं में समान है। अत: यह समदेशिक प्रकृति का है। अतः यह अक्रिस्टलीय ठोस है। यह स्वच्छ विदलने गुण प्रदर्शित नहीं करेगा।

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प्रश्न 6.
उपस्थित अन्तराआण्विक बलों की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित ठोसों को विभिन्न संवर्गों में वर्गीकृत कीजिए-पोटैशियम सल्फेट, टिन, बेंजीन, यूरिया, अमोनिया, जल, जिंक सल्फाइड, ग्रेफाइट, रूबिडियम, आर्गन, सिलिकन कार्बाइड।
उत्तर
पोटैशियम सल्फेट = आयनिक, टिन = धात्विक, बेंजीन = आण्विक (अध्रुवीय), यूरिया = आण्विक (ध्रुवीय), अमोनिया = आण्विक (हाइड्रोजन आबन्धित), जल = आण्विक (हाइड्रोजन आबन्धित), जिंक सल्फाइड = आयनिक, ग्रेफाइट = सहसंयोजी, रूबिडियम = धात्विक, आर्गन = आण्विक (अध्रुवीय), सिलिकन कार्बाइड = सहसंयोजी या नेटवर्क।

प्रश्न 7.
ठोस A, अत्यधिक कठोर तथा ठोस एवं गलित अवस्थाओं में विद्युतरोधी है और अत्यन्त उच्च दाब पर पिघलता है। यह किस प्रकार का ठोस है?
उत्तर
सहसंयोजी अथवा नेटवर्क ठोस, जैसे- SiC

प्रश्न 8.
आयनिक ठोस गलित अवस्था में विद्युत चालक होते हैं, परन्तु ठोस अवस्था में नहीं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर
गलित अवस्था में आयनिक यौगिक वियोजित होकर मुक्त आयन देते हैं तथा विद्युत चालन करते हैं। ठोस अवस्था में आयन गति करने के लिए मुक्त नहीं होते हैं। अत: ये ठोस अवस्था में विद्युत चालन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
किस प्रकार के ठोस विद्युत चालक, आघातवर्थ्य और तन्य होते हैं?
उत्तर
धात्विक ठोस।

प्रश्न 10.
‘जालक बिन्द’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
प्रत्येक जालक बिन्दु ठोस के एक अवयवी कण को प्रदर्शित करता है। अवयवी कण परमाणु, अणु या आयन हो सकते हैं। किसी विशेष क्रिस्टलीय ठोस की आकृति के लिए जालक बिन्दु उत्तरदायी होते हैं।

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प्रश्न 11.
एकक कोष्ठिका को अभिलक्षणित करने वाले पैरामीटरों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. एकक कोष्ठिका की कोर की विमाएँ (a, b,c) – परस्पर लम्बवत् हो सकती हैं अथवा नहीं।
  2. कोरों के मध्य के कोण (a,B तथा γ)

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में विभेद कीजिए –

  1. षट्कोणीय और एकनताक्ष एकक कोष्ठिका
  2. फलक केन्द्रित तथा अंत्य-केन्द्रित एकक कोष्ठिका।

उत्तर

  1. षट्कोणीय एकक कोष्ठिका में,
    a = b ≠ c; α = β = 90° तथा γ = 120°
    एकनताक्ष एकक कोष्ठिका में
    a ≠ b ≠ c तथा α = γ = 90° तथा β = 90°
  2. fcc में अवयवी कण सभी 8 कोनों एवं सभी 6 फलकों के केन्द्रों पर व्यवस्थित होते हैं। अंत्य- केन्द्रित एकक कोष्ठिका में अवयवी कण सभी 8 कोनों तथा दो विपरीत फलकों के केन्द्रों पर स्थित होते हैं।

प्रश्न 13.
स्पष्ट कीजिए कि एक घनीय एकक कोष्ठिका के

  1. कोने और
  2. अन्तःकेन्द्र पर उपस्थित परमाणु का कितना भाग सन्निकट कोष्ठिका से सहभाजित होता है?

उत्तर

  1. कोने पर उपस्थित परमाणु 8 एकक कोष्ठिकाओं से सहभाजित होता है। अतः एक एकक कोष्ठिका के लिए इसका योगदान 1/8 होता है।
  2. अन्त:केन्द्र पर उपस्थित परमाणु किसी भी अन्य एकक कोष्ठिका द्वारा सहभाजित नहीं होता है।

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प्रश्न 14.
एक अणु की वर्ग निविड संकुलित परत में द्विविमीय उप-सहसंयोजन संख्या क्या होगी?
उत्तर
द्विविमीय निविड संकुलित परत में परमाणु 4 सन्निकट परमाणुओं को स्पर्श करता है अत: इसकी उप-सहसंयोजन संख्या 4 होगी।

प्रश्न 15.
एक यौगिक षट्कोणीय निविड़ संकुलित संरचना बनाता है। इसके 0.5 मोल में रिक्तियों की संख्या कितनी होगी? उनमें से कितनी रिक्तियाँ चतुष्फलकीय हैं?
हल
यौगिक के 0.5 मोल में परमाणुओं की संख्या = 0.5 x 6.022 x 1023
= 3.011 x 1023
अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = संकुलन में परमाणुओं की संख्या
= 3.011 x 1023
चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2 x संकुलन में परमाणुओं की संख्या
= 2 x 3.011 x 1023 = 6.022 x 1023
∴ रिक्तियों की कुल संख्या = (3.011 + 6.022) x 1023
= 9.033 x 1023

प्रश्न 16.
एक यौगिक दो तत्त्वों M तथा N से बना है। तत्त्व N, ccp संरचना बनाता है और M के परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों के 1/3 भाग को अध्यासित करते हैं। यौगिक का सूत्र क्या है।
हल
माना ccp में N परमाणु = n
∴ चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2n
चूँकि M परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों का 1/3 भाग घेरते हैं।
अतः M परमाणुओं की संख्या = [latex s=2]\frac { 2n }{ 3 }[/latex]
M : N = [latex s=2]\frac { 2n }{ 3 }[/latex] : n = 2 : 3
अत: सूत्र M2N2 होगा।

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प्रश्न 17.
निम्नलिखित में से किस जालक में उच्चतम संकुलन क्षमता है?

  1. सरल घनीय,
  2. अन्तः केन्द्रित घन और
  3. षट्कोणीय निविड संकुलित जालक।

उत्तर
संकुलन क्षमताएँ निम्न हैं –

  1. सरल घनीय = 52.4%,
  2. अन्तः केन्द्रित घनीय = 68%,
  3. षट्कोणीय निविड संकुलित = 74%

अतः षट्कोणीय निविड संकुलित व्यवस्था में अधिकतम संकुलन क्षमता होती है।

प्रश्न 18.
एक तत्त्व का मोलर द्रव्यमान 2.7 x 10-2 kg mol-1 है। यह 405 pm लम्बाई की भुजा वाली घनीय एकक कोष्ठिका बनाता है। यदि उसका घनत्व 2.7 x 103 kg m-3 हो तो घनीय एकक कोष्ठिका की प्रकृति क्या होगी?
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 1
चूँकि प्रति एकक कोष्ठिका में तत्त्व के चार परमाणु हैं, अत: घनीय एकक कोष्ठिका फलक-केन्द्रित (fcc) या घनीय निविड संकुलित होगी।

प्रश्न 19.
जब एक ठोस को गर्म किया जाता है तो किस प्रकार का दोष उत्पन्न हो सकता है? इससे कौन-से भौतिक गुण प्रभावित होते हैं और किस प्रकार?
उत्तर
रिक्तिका दोष; गर्म करने पर ठोस के कुछ परमाणु अथवा आयन जालक स्थल को पूर्णतः छोड़ देते। हैं। परमाणुओं अथवा आयनों के क्रिस्टल को पूर्णतः छोड़ने के कारण पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित किस प्रकार का स्टॉइकियोमीट्री दोष दर्शाते हैं?

  1. ZnS
  2. AgBr

उत्तर

  1. फ्रेंकेल दोष
  2. फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष दोनों।

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प्रश्न 21.
समझाइए कि एक उच्च संयोजी धनायन को अशुद्धि की तरह मिलाने पर आयनिक ठोस में रिक्तिकाएँ किस प्रकार प्रविष्ट होती हैं?
उत्तर
विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए उच्च संयोजकता वाले धनायन द्वारा निम्न संयोजकता वाले दो या अधिक धनायन प्रतिस्थापित होते हैं। अत: कुछ धनायन रिक्तियाँ जनित होती हैं, जैसे- यदि आयनिक ठोस Na+ cl– में Sr2+ की अशुद्धि मिलाई जाती है तब दो Na+ जालक बिन्दु रिक्त हो जाते हैं तथा इनमें से एक Sr2+ आयन द्वारा घिर जाती है तथा अन्य रिक्त रहती हैं।

प्रश्न 22.
जिन आयनिक ठोसों में धातु आधिक्य दोष के कारण ऋणायनिक रिक्तिका होती हैं, वे रंगीन होते हैं। उपयुक्त उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर
इसको सोडियम क्लोराइड (Na+ cl–) का उदाहरण लेकर समझा सकते हैं। जब इसके क्रिस्टलों को सोडियम वाष्प की उपस्थिति में गर्म करते हैं तब कुछ Cl– आयन अपने जालक स्थलों को छोड़कर सोडियम से संयुक्त होकर NaCl बना लेते हैं। इस अभिक्रिया के होने के लिए सोडियम (UPBoardSolutions.com) परमाणु इलेक्ट्रॉन खोकर Na+ आयन बनाते हैं। ये इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल में विसरित होकर Cl– आयनों द्वारा जनित ऋणायनिक रिक्तिकाओं को घेर लेते हैं। क्रिस्टल में अब सोडियम का आधिक्य होता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा घेरे गए स्थल F- केन्द्र कहलाते हैं। ये क्रिस्टल को पीला रंग प्रदान करते हैं, क्योंकि वे दृश्य प्रकाश की ऊर्जा का अवशोषण करके उत्तेजित हो जाते हैं।

प्रश्न 23.
वर्ग 14 के तत्त्व को n- प्रकार के अर्द्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपान्तरित करना है। यह अशुद्धि किस वर्ग से सम्बन्धित होनी चाहिए?
उत्तर
अशुद्धि वर्ग 15 से सम्बन्धित होनी चाहिए।

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प्रश्न 24.
किस प्रकार के पदार्थों से अच्छे स्थायी चुम्बक बनाए जा सकते हैं-
लौहचुम्बकीय अथवा फेरीचुम्बकीय? अपने उत्तर का औचित्य बताइए।
उत्तर
लौहचुम्बकीय पदार्थ श्रेष्ठ स्थायी चुम्बक बनाते हैं क्योंकि इनमें धातु आयन छोटे क्षेत्रों में व्यवस्थित होते हैं, जिन्हें डोमेन कहते हैं। प्रत्येक डोमेन सूक्ष्म चुम्बक के रूप में (UPBoardSolutions.com) कार्य करता है। ये डोमेन अनियमित रूप में व्यवस्थित होते हैं। जब इन पर चुम्बकीय क्षेत्र आरोपित किया जाता है तब वे चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में व्यवस्थित हो जाते हैं तथा प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र बनाते हैं। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र के हटा लेने पर भी डोमेन व्यवस्थित रहते हैं। इस प्रकार लौहचुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक में परिवर्तित हो जाता है।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
‘अक्रिस्टलीय पद को परिभाषित कीजिए। अक्रिस्टलीय ठोसों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
ऐसे ठोस जिनका निश्चित ज्यामितीय आकार या विन्यास नहीं होता है अर्थात् इनके अवयवी कण निश्चित क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं, अक्रिस्टलीय ठोस (amorphous solids) कहलाते हैं। इनका कोई निश्चित गलनांक नहीं होता है तथा ये समदैशिक (isotropic) होते हैं; जैसे, प्लास्टिक, काँच आदि।

प्रश्न 2.
काँच, क्वार्टज जैसे ठोस से किस प्रकार भिन्न है? किन परिस्थितियों में क्वार्टज को काँच में रूपान्तरित किया जा सकता है?
उत्तर
काँच अक्रिस्टलीय ठोस है। इसमें अवयवी कणों (SiO4 चतुष्क) की केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। दूसरी ओर क्वार्ट्ज में अवयवी कणों (SiO4 चतुष्क) की लघु और दीर्घ (दोनों) परासी व्यवस्थाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, क्वार्ज क्रिस्टलीय होता है।
क्वार्ट्ज़ को पिघलाकर उसे शीघ्रता से ठंडा करने पर काँच प्राप्त होता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित ठोसों का वर्गीकरण आयनिक, धात्विक, आण्विक, सहसंयोजक या अक्रिस्टलीय में कीजिए।

  1. टेट्राफॉस्फोरस डेकॉक्साइड (P4O10)
  2. अमोनियम फॉस्फेट (NH4)3 PO4
  3. SiC
  4. I2
  5. P4
  6. प्लास्टिक
  7. ग्रेफाइट
  8. पीतल
  9. Rb
  10. LiBr
  11. Si

उत्तर

  1. आयनिक (Ionic) : अमोनियम फॉस्फेट (NH4)3 PO4, LiBr
  2. धात्विक (Metallic) : पीतल, Rb
  3. आण्विक (Molecular) : टेट्राफॉस्फोरस डेकॉक्साइड (P4O10), I2, P4
  4. सहसंयोजक (Covalent) : ग्रेफाइट, SiC, Si
  5. अक्रिस्टलीय (Amorphous) : प्लास्टिक

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प्रश्न 4.

  1. उपसहसंयोजन संख्या का क्या अर्थ है?
  2. निम्नलिखित में परमाणुओं की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
    1. एक घनीय निविड संकुलित संरचना
    2. एक अन्त:केन्द्रित घनीय संरचना।

उत्तर

  1. उप-सहसंयोजन संख्या – यदि परमाणुओं को गोलों के रूप में प्रदर्शित किया जाए, तब किसी विशेष गोले के सन्निकट उपस्थित अन्य गोलों की संख्या उसकी उप-सहसंयोजन संख्या कहलाती है। आयनिक क्रिस्टलों में किसी आयन के चारों ओर उपस्थित विपरीत आवेशित गोलों की संख्या उसकी उप-सहसंयोजन संख्या कहलाती है।।
    1. 12
    2. 8.

प्रश्न 5.
यदि आपको किसी अज्ञात धातु का घनत्व एवं एकक कोष्ठिका की विमाएँ ज्ञात हैं तो क्या आप उसके परमाण्विक द्रव्यमान की गणना कर सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
परमाण्विक द्रव्यमान, M = [latex s=2]\frac { \rho \times { a }^{ 3 }\times { N }_{ A } }{ Z } [/latex]
किसी अज्ञात धातु का घनत्व एवं एकक कोष्ठिका की विमाएँ ज्ञात होने पर उपर्युक्त सूत्र की सहायता से उसके परमाण्विक द्रव्यमान की गणना की जा सकती है।

प्रश्न 6.
‘किसी क्रिस्टल की स्थिरता उसके गलनांक के परिमाण द्वारा प्रकट होती है।’ टिप्पणी कीजिए। किसी आँकड़ा पुस्तक से जल, एथिल ऐल्कोहॉल, डाइएथिल ईथर तथा मेथेन के गलनांक एकत्र करें। इन अणुओं के मध्य अन्तराआण्विक बलों के बारे में आप क्या कह सकते हैं?
उत्तर
किसी पदार्थ का गलनांक जितना उच्च होता है उसके अवयवी कणों के मध्य आकर्षण बल उतना ही अधिक होता है और पदार्थ भी उतना ही अधिक स्थायी होता है। जल, एथिल ऐल्कोहॉल, डाइएथिल ईथर और मेथेन के गलनांक क्रमशः 273 K, 155.7 K, 156.8 K और 90.5 K हैं। जल और एथिल ऐल्कोहॉल में अंतराआण्विक बल हाइड्रोजन आबंधन होते हैं। जल के अणुओं के मध्य हाइड्रोजन आबंधन एथिल ऐल्कोहॉल (UPBoardSolutions.com) के अणुओं की तुलना में प्रबल होता है जोकि उनके गलनांकों से भी स्पष्ट होता है। डाइएथिल ईथर के अणुओं के बीच द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण होता है तथा मेथेन अणुओं के मध्य यह दुर्बल वाण्डरवाल्स बल होता है जो कि इनके गलनांकों से स्पष्ट है।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित युगलों के पदों (शब्दों) में कैसे विभेद करोगे?

  1. षट्कोणीय निविड संकुलन एवं घनीय निविड संकुलन
  2. क्रिस्टल जालक एवं एकक कोष्ठिका
  3. चतुष्फलकीय रिक्ति एवं अष्टफलकीय रिक्ति।

उत्तर
1. षट्कोणीय निविड संकुलन एवं घनीय निविड संकुलन
(Hexagonal Close Packing and Cubic Close Packing)
ये दोनों त्रिविमीय निविड संकुलित संरचनाएँ द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परतों को एक-दूसरे पर रखकर जनित की जा सकती हैं।

षट्कोणीय निविड संकुलन – जब तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखा जाता है, तब उत्पन्न एक सम्भावना के अन्तर्गत द्वितीय परत की चतुष्फलकीय रिक्तियों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्थिति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूर्णत: (UPBoardSolutions.com) संरेखित होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटर्न एकान्तर परतों में पुनरावृत्त होता है। इस पैटर्न को प्रायः ABAB….पैटर्न लिखा जाता है। इस संरचना को षट्कोणीय निविड संकुलित (hcp) संरचना कहते हैं (चित्र-1)। इस प्रकार की परमाणुओं की व्यवस्था कई धातुओं; जैसे- मैग्नीशियम और जिंक में पायी जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 2
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घनीय निविड संकुलन – इसके लिए तीसरी परत दूसरी परत के ऊपर इस प्रकार रखते हैं कि उसके गोले अष्टफलकीय रिक्तियों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तीसरी परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेखित नहीं होते। इस व्यवस्था को ‘C’ प्रकार का (UPBoardSolutions.com) कहा जाता है। केवल चौथी परत रखने पर उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेखित होते हैं। जैसा चित्र-1 व 2 में दिखाया गया है। इस प्रकार के पैटर्न को प्रायः ABCABC… लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संकुलित संरचना (ccp) अथवा फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना कहा जाता है। धातु; जैसे- ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में क्रिस्टलीकृत होते हैं।
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उपर्युक्त दोनों प्रकार के निविड़ संकुलन अति उच्च क्षमता वाले होते हैं और क्रिस्टल का 74% स्थान सम्पूरित रहता है। इन दोनों में प्रत्येक गोला बारह गोलों के सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार इन दोनों संरचनाओं में उपसहसंयोजन संख्या 12 है।

2. क्रिस्टल जालक एवं एकक कोष्ठिका
(Crystal Lattice and Unit Cell)
क्रिस्टल जालक – क्रिस्टलीय ठोसों का मुख्य अभिलक्षण अवयवी कणों का नियमित और पुनरावृत्त पैटर्न है। यदि क्रिस्टल में अवयवी कणों की त्रिविमीय व्यवस्था को (UPBoardSolutions.com) आरेख के रूप में निरूपित किया जाए, जिसमें प्रत्येक बिन्दु को चित्रित किया गया हो तो व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं। इस प्रकार, “द्विकस्थान (space) में बिन्दुओं की नियमित त्रिविमीय व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं।”
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क्रिस्टल जालक के एक भाग को चित्र- 3 में दिखाया गया है। केवल 14 त्रिविमीय जालक सम्भव हैं।
एकक कोष्ठिका – एकक कोष्ठिका क्रिस्टल जालक का लघुतम भाग है (चित्र-3)। जब इसे विभिन्न दिशाओं में पुनरावृत्त किया जाता है तो पूर्ण जालक की उत्पत्ति होती है।

3. चतुष्फलकीय रिक्ति एवं अष्टफलकीय रिक्ति
(Tetrahedral Void and Octahedral Void)
चतुष्फलकीय रिक्ति – ये रिक्तियाँ चार गोलों द्वारा घिरी रहती हैं जो एक नियमित चतुष्फलक के शीर्ष पर स्थित होते हैं। इस प्रकार जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम (UPBoardSolutions.com) परत की रिक्ति के ऊपर होता है, तब एक चतुष्फलकीय रिक्ति बनती है। इन रिक्तियों को चतुष्फलकीय रिक्तियाँ इसलिए कहा जाता है। क्योंकि जब इन चार गोलों के केन्द्रों को मिलाया जाता है, तब एक चतुष्फलक बनता है। चित्र-4 में इन्हें “T’ से अंकित किया गया है। ऐसी एक रिक्ति को अलग से चित्र-5 में दिखाया गया है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 6

अष्टफलकीय रिक्ति – ये रिक्तियाँ सम्पर्क में स्थित तीन गोलों द्वारा संलग्नित रहती हैं। इस प्रकार द्वितीय परत की त्रिकोणीय रिक्तियाँ प्रथम परते की त्रिकोणीय रिक्तियों (UPBoardSolutions.com) के ऊपर होती हैं और इनकी त्रिकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होतीं। उनमें से एक में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्तियों को चित्र-4 में ‘O’ से अंकित किया गया है। ऐसी रिक्तियाँ छह गोलों से घिरी होती हैं। ऐसी एक रिक्ति को अलग से चित्र- 5 में दिखाया गया है।
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित जालकों में से प्रत्येक की एकक कोष्ठिका में कितने जालक बिन्दु होते हैं?

  1. फलक-केन्द्रित घनीय,
  2. फलक-केन्द्रित चतुष्कोणीय,
  3. अन्तःकेन्द्रित।

उत्तर

  1. फलक-केन्द्रित घनीय संरचना (fcc) में जालक बिन्दु
    = 8 (कोनों पर) + 6 (फलक केन्द्र पर) = 14
  2. फलक-केन्द्रित चतुष्कोणीय संरचना में जालक बिन्दु
    = 8 (कोनों पर) + 6 (फलक केन्द्र पर) = 14
  3. अन्त:केन्द्रित घनीय (bcc) संरचना में जालक बिन्दु
    = 8 (कोनों पर) + 1 (अन्त:केन्द्र पर) = 9

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प्रश्न 9.
समझाइए –

  1. धात्विक एवं आयनिक क्रिस्टलों में समानता एवं विभेद का आधार।
  2. आयनिक ठोस कठोर एवं भंगुर होते हैं।

उत्तर
1. समानताएँ (Similarities) – (1) आयनिक तथा धात्विक दोनों क्रिस्टलों में स्थिर विद्युत आकर्षण बल विद्यमान होता है। आयनिक क्रिस्टलों में यह विपरीत आवेशयुक्त आयनों के मध्य होता है। धातुओं में यह संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनैल (kernels) के मध्य होता है। इसी कारण से इन दोनों के गलनांक उच्च होते हैं।
(2) दोनों स्थितियों में बन्ध अदैशिक (non-directional) होता है।

विभेद (Differences) – (1) आयनिक क्रिस्टलों में आयन गति के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। अत: ये ठोस अवस्था में विद्युत का चालन नहीं करते। ये ऐसा केवल गलित अवस्था या जलीय विलयन में करते हैं। धातुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन बँधे नहीं होते, अपितु मुक्त रहते हैं। अत: ये ठोस (UPBoardSolutions.com) अवस्था में भी विद्युत का चालन करते हैं।
(2) आयनिक बन्ध स्थिर विद्युत आकर्षण के कारण प्रबल होते हैं। धात्विक बन्ध दुर्बल भी हो सकता है। या प्रबल भी, यह संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा करनैल के आकार पर निर्भर करता है।

2. आयनिक क्रिस्टल कठोर होते हैं क्योंकि इनमें विपरीत आवेशयुक्त आयनों के मध्य प्रबल स्थिर विद्युत आकर्षण बल उपस्थित होता है। ये भंगुर होते हैं क्योंकि आयनिक बन्ध अदिशात्मक होता है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित के लिए धातु के क्रिस्टल में संकुलन क्षमता की गणना कीजिए।

  1. सरल घनीय,
  2. अन्त:केन्द्रित घनीय,
  3. फलक-केन्द्रित घनीय।

(यह मानते हुए कि परमाणु एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं।)

उत्तर
1. सरल घनीय जालक में संकुलन क्षमता
(Packing Efficiency in Simple Cubic Lattice)
सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर उपस्थित होते हैं। घन के किनारों (कोरों) पर कण एक-दूसरे के सम्पर्क में होते हैं (चित्र-6)। इसलिए घन के कोर अथवा भुजा की लम्बाई ‘a’ और प्रत्येक कण का अर्द्धव्यास r निम्नलिखित प्रकार से सम्बन्धित होता है –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 8
a = 2r
घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन = a3 = (2r)3 = 8r3
चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु होता है।
अतः अध्यासित दिक्स्थान का आयतन = 4/3 πr3
∴ संकुलन क्षमता
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2. अन्तः केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता
(Packing Efficiency in Body-centred Cubic Lattice)
संलग्न चित्र से यह स्पष्ट है कि केन्द्र पर स्थित परमाणु विकर्ण पर व्यवस्थित अन्य दो परमाणुओं के सम्पर्क में है।
Δ EFD में,
b2 = a2 + a2 = 2a2
b = √2a

अब Δ AFD में,
c2 = a2 + b2 = a2 + 2a2 = 3a2
c= √3a
काय विकर्ण 4r की लम्बाई 47 के बराबर है, जहाँ r गोले (परमाणु) का अर्द्धव्यास है क्योंकि विकर्ण पर उपस्थित तीनों गोले एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं। अतः
√3a = 4r
a = [latex s=2]\frac { 4 }{ \sqrt { 3 } } [/latex] r
अतः यह भी लिख सकते हैं कि r = [latex s=2]\frac { \sqrt { 3 } }{ 4 } [/latex] a
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 10
इस प्रकार की संरचना में परमाणुओं की कुल संख्या 2 है तथा उनका आयतन 2 x (4/3) πr3 है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image image 11

3. फलक-केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता
(Packing Efficiency in Face-centred Cubic Lattice)
संलग्न चित्र से, Δ ABC में,
AC2 = b2 = BC2 + AB2
= a2 + a2 = 2a2
या  b = √2a
यदि गोले का अर्द्धव्यास r हो तो
b= 4r = √2a
या  a = [latex s=2]\frac { 4r }{ \sqrt { 2 } } [/latex] = 2√2r
या  r = [latex s=2]\frac { a }{ 2\sqrt { 2 } } [/latex]
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 12
इस प्रकार की संरचना में परमाणुओं की कुल संख्या चार होती है तथा उनका आयतन 4 x [latex]\frac { 4 }{ 3 } [/latex] πr3 है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 13
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 14

प्रश्न 11.
चाँदी का क्रिस्टलीकरण fcc जालक में होता है। यदि इसकी कोष्ठिका के कोरों की लम्बाई 4.07 x 10-8 cm तथा घनत्व 10.5 g cm-3 हो तो चाँदी का परमाण्विक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
हल
fcc जालक के लिए Z = 4
कोर की लम्बाई, a = 4.077 x 10-8 cm, घनत्व ρ = 10.5 g cm-3
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 15
=107.14 g mol-1
अतः चाँदी का परमाण्विक द्रव्यमान = 107.14 g mol-1 होगा।

प्रश्न 12.
एक घनीय ठोस दो तत्वों P एवं Q से बना है। घन के कोनों पर Q परमाणु एवं अन्तःकेन्द्र पर P परमाणु स्थित हैं। इस यौगिक का सूत्र क्या है? P एवं Q की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
हल
घन में परमाणु Q, 8 कोनों पर स्थित हैं।
Q परमाणुओं की संख्या = 1/8 x 8= 1
परमाणु P अन्त: केन्द्र पर स्थित है,
अतः P परमाणुओं की संख्या = 1
अतः यौगिक का सूत्र = PQ
P तथा Q की उप-सहसंयोजन संख्या = 8

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प्रश्न 13.
नायोबियम का क्रिस्टलीकरण अन्तःकेन्द्रित घनीय संरचना में होता है। यदि इसका घनत्व 8.55 g cm-3 हो तो इसके परमाण्विक द्रव्यमान 93u का प्रयोग करके परमाणु त्रिज्या की गणना कीजिए।
हल
अन्त: केन्द्रित घनीय संरचना (bcc) में Z = 2, घनत्व ρ = 8.55 g cm-3, परमाण्विक द्रव्यमान,
M = 92.9 g mol-1
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 16
∴ a = (36.1 x 10-24 cm3)1/3 = 3.3 x 10-8 cm
bcc एकक कोष्ठिका के लिए,
विकर्ण = 4 x नायोबियम परमाणु की त्रिज्या
√3a = 4 x नायोबियम परमाणु की त्रिज्या
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 17
= 1.43 x 10-8 cm

प्रश्न 14.
यदि अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या हो तथा निविड संकुलन में परमाणुओं की त्रिज्या हो तो r एवं R में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
हल
अष्टफलकीय रिक्ति में स्थित गोला चित्र 9 में छायांकित वृत्त द्वारा प्रदर्शित है। रिक्ति के ऊपर तथा नीचे उपस्थित गोले चित्र-9 में प्रदर्शित नहीं हैं। अब चूंकि ABC एक समकोण त्रिभुज है, अत: पाइथागोरस सिद्धान्त लागू करने पर,
AC2 = AB2 + BC2
(2R)2 = (R + r)2 + (R + r)2
= 2(R + r)2
4R2 = 2(R + r)2
(√2R)2 = (R + r)2
√2R = R + r
r = √2R – R
r = (√2 – 1)R
r = (1.414 – 1)R
r = 0.414 R
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 18

प्रश्न 15.
कॉपर fcc जालक के रूप में क्रिस्टलीकृत होता है जिसके कोर की लम्बाई 3.61 x 10-8 cm है। यह दर्शाइए कि गणना किए गए घनत्व के मान तथा मापे गए घनत्व 8.92 g cm-3 में समानता है।
हल
fcc जालक में Z = 4, कोर की लम्बाई, a = 3.61 x 10-8 cm, घनत्व ρ = ?
कॉपर का परमाण्विक द्रव्यमान, M = 63.5 g mol-1
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 19
= 8.97 g cm-3
अतः घनत्व का गणनात्मक मान 8.97 g cm-3 तथा मापे गये घनत्व का मान 8.92 g cm-3 लगभग समान हैं।

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प्रश्न 16.
विश्लेषण द्वारा ज्ञात हुआ कि निकिल ऑक्साइड का सूत्र Ni0.98 O1.00 है। निकिल आयनों का कितना अंश Ni2+ और Ni3+ के रूप में विद्यमान है?
हल
Ni0.98 O1.00 नॉन- स्टॉइकियोमीटी यौगिक है। Ni आयन तथा ऑक्साइड आयनों का संघटन 98 : 100 है। माना Ni में x Ni2+ आयन तथा (98 – x) Ni3+ आयन हैं।
Ni2+ तथा Ni3+ पर उपस्थित धनावेश ऑक्साइड आयनों पर उपस्थित ऋणावेश के बराबर होगा, अतः
x × 2 + (98 – x )3 = 100 x 2
2 + 294 – 3x = 100 × 2
∴ x = 94
अत: 98 Ni आयनों में 94 Ni2+ आयन तथा 4 Ni3+ आयन होंगे।
∴ Ni2+ आयनों का प्रतिशत = [latex]\frac { 94 }{ 98 } [/latex] x 100= 96%
Ni3+ आयनों का प्रतिशत = 4%

प्रश्न 17.
अर्द्धचालक क्या होते हैं? दो मुख्य अर्द्धचालकों का वर्णन कीजिए एवं उनकी चालकता क्रियाविधि में विभेद कीजिए।
उत्तर
अर्द्धचालक (Semiconductors) – वे ठोस जिनकी चालकता 10-6 से 104 ohm-1 m-1 तक के मध्यवर्ती परास में होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं।
अर्द्धचालकों में संयोजक बैण्ड एवं चालक बैण्ड के मध्य ऊर्जा- अन्तराल कम होता है। अतः कुछ इलेक्ट्रॉन चालक बैण्ड में लाँघ सकते हैं और अल्प- चालकता प्रदर्शित कर सकते हैं। ताप बढ़ने के साथ अर्द्धचालकों में विद्युत- चालकता बढ़ती है, क्योंकि अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन चालक बैण्ड में देखे जा सकते हैं। सिलिकन एवं जर्मेनियम जैसे पदार्थ इस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इनमें उचित अशुद्धि को (UPBoardSolutions.com) उपयुक्त मात्रा में मिलाने से इनकी चालकता बढ़ जाती है। इस आधार पर दो प्रकार के अर्द्धचालक तथा उनकी चालकता- क्रियाविधि का वर्णन निम्नवत् है –
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(i) n- प्रकार के अर्द्धचालक (n-type semiconductors) – सिलिकन तथा जर्मेनियम आवर्त सारणी के वर्ग 14 से सम्बन्धित हैं और प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन हैं। क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटस्थ परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बन्ध बनाता है [चित्र-11 (a)]। जब वर्ग 15 के तत्व; जैसे- P अथवा As, जिनमें पाँच संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं, को अपमिश्रित किया जाता है तो ये (UPBoardSolutions.com) सिलिकन अथवा जर्मेनियम के क्रिस्टल में कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं [चित्र-11 (b)]। P अथवा As के पाँच में से चार इलेक्ट्रॉनों का उपयोग चार सन्निकट सिलिकन परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बन्ध बनाने में होता है। पाँचवाँ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थानित (delocalised) हो जाता है। यह विस्थानित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित सिलिकन (अथवा जर्मेनियम) की चालकता में वृद्धि करता है। यहाँ चालकता में वृद्धि ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन के कारण होती है, अत: इलेक्ट्रॉन-धनी अशुद्धि से अपमिश्रित सिलिकन को n-प्रकार का अर्द्धचालक कहा जाता है।
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(ii) p- प्रकार के अर्द्धचालक (p-type semiconductors) – सिलिकन अथवा जर्मेनियम को वर्ग 13 के तत्वों; जैसे- B, Al अथवा Ga के साथ भी अपमिश्रित किया जा सकता है जिनमें केवल तीन संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं। वह स्थान जहाँ चौथा इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इलेक्ट्रॉन रिक्ति या इलेक्ट्रॉन छिद्र कहलाता है [चित्र-11 (c)]। निकटवर्ती परमाणु से इलेक्ट्रॉन आकर इलेक्ट्रॉन छिद्र को भर सकता है, परन्तु ऐसा करने पर वह अपने मूल स्थान पर इलेक्ट्रॉन छिद्र छोड़ जाता है। यदि ऐसा हो तो यह प्रतीत होगा जैसे कि (UPBoardSolutions.com) इलेक्ट्रॉन छिद्र जिस इलेक्ट्रॉन द्वारा यह भरा गया है, उसके विपरीत दिशा में चल रहा है। विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में इलेक्ट्रॉन, इलेक्ट्रॉन छिद्रों में से धनावेशित प्लेट की ओर चलेंगे, परन्तु ऐसा प्रतीत होगा; जैसे इलेक्ट्रॉन छिद्र धनावेशित हैं और ऋणावेशित प्लेट की ओर चल रहे हैं। इस प्रकार के अर्द्धचालकों को p- प्रकार के अर्द्धचालक कहते हैं।

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प्रश्न 18.
नॉनस्टॉइकियोमीट्री क्यूप्रस ऑक्साइड, Cu2O प्रयोगशाला में बनाया जा सकता है। इसमें कॉपर तथा ऑक्सीजन का अनुपात 2 : 1 से कुछ कम है। क्या आप इस तथ्य की व्याख्या कर सकते हैं कि यह पदार्थ p- प्रकार का अर्द्धचालक है?
उत्तर
Cu2O में Cu तथा O का 2 : 1 से कम अनुपात यह प्रदर्शित करता है कि इसमें धनायनिक रिक्ति के कारण धातु न्यूनता (metal deficiency) है। धातु न्यून यौगिक धनायन छिद्रों के द्वारा विद्युत चालन करते हैं। अतः p- प्रकार के अर्द्धचालक (p- type semiconductors) होते हैं।

प्रश्न 19.
फेरिक ऑक्साइड में ऑक्साइड आयन के षट्कोणीय निविड़ संकुलन में क्रिस्टलीकृत होता है जिसकी तीन अष्टफलकीय रिक्तियों में से दो पर फेरिक आयन उपस्थित होते हैं। फेरिक ऑक्साइड का सूत्र ज्ञात कीजिए।
हल
माना निविड संकुलित संरचना में ऑक्साइड (O2-) आयनों की संख्या = x
∴ अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = x
∴ इन रिक्तियों का 2/3 भाग फेरिक आयनों (Fe3+) द्वारा भरा है।
अत: उपस्थित Fe3+ आयनों की संख्या 2/3 × x = 2x/3
Fe3+ : O2- = 2x/3 : x = 2 : 3
अतः फेरिक ऑक्साइड का सूत्र Fe2O3 होगा।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित को p-प्रकार या n-प्रकार के अर्द्धचालकों में वर्गीकृत कीजिए –

  1. In से डोपित Ge,
  2. Si से डोपित B

उत्तर

  1. p- प्रकार का अर्द्धचालक,
  2. n- प्रकार का अर्द्ध-चालक।

प्रश्न 21.
सोना (परमाणु त्रिज्या= 0.144 nm) फलक-केन्द्रित एकक कोष्ठिका में क्रिस्टलीकृत होता है। इसकी कोष्ठिका के कोर की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
हल
fcc संरचना के लिए यदि r परमाणु की त्रिज्या हो तो
फलक विकर्ण = 4r
यदि कोष्ठिका की कोर की लम्बाई a हो तो फलक विकर्ण = √2a
अतः √2a = 4r
∴ a = [latex]\frac { 4 }{ \sqrt { 2 } } [/latex] × 0.144
0.407 nm

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प्रश्न 22.
बैण्ड सिद्धान्त के आधार पर

  1. चालक एवं रोधी
  2. चालक एवं अर्द्धचालक में क्या अन्तर होता है?

उत्तर

  1. चालक एवं रोधी में अन्तर (Difference between conductor and insulator) – अचालक अथवा रोधी में संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के मध्य ऊर्जा-अन्तर बहुत अधिक होता है, जबकि चालक में ऊर्जा-अन्तर अत्यन्त कम होता है या संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के बीच अतिव्यापन होता है।
  2. चालक एवं अर्द्धचालक में अन्तर (Difference between conductor and semiconductor) – चालक में संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के बीच ऊर्जा-अन्तर अत्यन्त कम होता है। अथवा अतिव्यापन होता है, जबकि अर्द्धचालकों में ऊर्जा अन्तर सदैव कम ही होता है, कभी भी अतिव्यापन नहीं होता।

प्रश्न 23.
उचित उदाहरणों द्वारा निम्नलिखित पदों को परिभाषित कीजिए

  1. शॉट्की दोष
  2. फ्रेंकेल दोष
  3. अन्तराकाशी
  4. F-केन्द्र।

उत्तर
1. शॉट्की दोष (Schottky defect) – यह आधारभूत रूप से आयनिक ठोसों का रिक्तिका दोष है। जब एक परमाणु अथवा आयन अपनी सामान्य (वास्तविक) स्थिति से लुप्त हो जाता है तो एक जालक रिक्तता निर्मित हो जाती है; इसे शॉकी दोष कहते हैं। विद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए लुप्त होने वाले धनायनों और ऋणायनों की संख्या बराबर होती है। शॉट्की दोष उन आयनिक पदार्थों द्वारा दिखाया जाता है जिनमें धनायन और ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं। उदाहरण के लिए– NaCl, KCl, CsCl और AgBr शॉट्की दोष दिखाते हैं।

2. फ्रेंकेल दोष (Frenkel defect) – यह दोष आयनिक ठोसों द्वारा दिखाया जाता है। लघुतर आयन (साधारणतया धनायन) अपने वास्तविक स्थान से विस्थापित होकर अन्तराकाश में चला जाता है। यह वास्तविक स्थान पर रिक्तिका दोष और नए स्थान पर अन्तराकाशी दोष उत्पन्न करता है। (UPBoardSolutions.com) फ्रेंकेल दोष को विस्थापन दोष भी कहते हैं। यह ठोस के घनत्व को परिवर्तित नहीं करता। फ्रेंकेल दोष उन आयनिक पदार्थ द्वारा दिखाया जाता है जिनमें आयनों के आकार में अधिक अन्तर होता है। उदाहरण के लिए– ZnS, AgCl, AgBr और AgI में यह दोष Zn2+ और Ag+ आयन के लघु आकार के कारण होता है।

3. अन्तराकाशी दोष (Interstitial defect) – जब कुछ अवयवी कण (परमाणु अथवा अणु) अन्तराकोशी स्थल पर पाए जाते हैं तब उत्पन्न दोष अन्तराकाशी दोष कहलाता है। यह दोष पदार्थ के घनत्व को बढ़ाता है। अन्तराकाशी दोष अनआयनिक ठोसों में पाया जाता है। आयनिक ठोसों में सदैव विद्युत उदासीनता बनी रहनी चाहिए। इससे इनमें यह दोष दिखाई नहीं देता है।

4. F-केन्द्र (F-centre) – जब क्षारकीय हैलाइड; जैसे- NaCl को क्षार धातु (जैसे- सोडियम) की वाष्प के वातावरण में गर्म किया जाता है तो सोडियम परमाणु क्रिस्टल की सतह पर जम जाते हैं। Cl– आयन क्रिस्टल की सतह में विसरित हो जाते हैं और Na+ आयनों के साथ जुड़कर NaCl देते हैं। Na+ आयन बनाने के लिए Na परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकल जाता है। निर्मुक्त इलेक्ट्रॉन विसरित होकर क्रिस्टल के (UPBoardSolutions.com) ऋणायनिक स्थान को अध्यासित करते हैं, परिणामस्वरूप अब क्रिस्टल में सोडियम का आधिक्य होता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा भरी जाने वाली इन ऋणायनिक रिक्तिकाओं को F-केन्द्र कहते हैं। ये NaCl क्रिस्टलों को पीला रंग प्रदान करते हैं। यह रंग इन इलेक्ट्रॉनों द्वारा क्रिस्टल पर पड़ने वाले प्रकाश से ऊर्जा अवशोषित करके उत्तेजित होने के परिणामस्वरूप दिखता है।

प्रश्न 24.
ऐलुमिनियम घनीय निविड संकुलित संरचना में क्रिस्टलीकृत होता है। इसका धात्विक अर्द्धव्यास 125 pm है।

  1. एकक कोष्ठिका के कोर की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
  2. 1.0 cm3 ऐलुमिनियम में कितनी एकक कोष्ठिकाएँ होंगी?

हल
घनीय निविड संकुलित संरचना में fcc संरचना होती है।
अतः फलक विकर्ण a√2 = 4r

1. ऐलुमिनियम की एकक कोष्ठिका की कोर की लम्बाई
a = [latex]\frac { 4 }{ \sqrt { 2 } } [/latex] × 125 pm = 353.5 pm
2. Al के 1 cm3 में एकक कोष्ठिकाओं की संख्या
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प्रश्न 25.
यदि NaCl को SrCl2 के 10-3 मोल % से डोपित किया जाए तो धनायनों की रिक्तियों का सान्द्रण क्या होगा?
हल
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प्रश्न 26.
निम्नलिखित को उचित उदाहरणों से समझाइए –

  1. लौहचुम्बकत्व
  2. अनुचुम्बकत्व
  3. फेरीचुम्बकत्व
  4. प्रतिलौहचुम्बकत्व
  5. 12 – 16 और 13 – 15 वर्गों के यौगिक।

उत्तर
1. लौहचुम्बकत्व (Ferromagnetism) – कुछ पदार्थ; जैसे-लोहा, कोबाल्ट, निकिल, गैडोलिनियम और CrO2 बहुत प्रबलता से चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे पदार्थों को लौहचुम्बकीय पदार्थ कहा जाता है। प्रबल आकर्षणों के अतिरिक्त ये स्थायी रूप से चुम्बकित किए जा सकते हैं। ठोस अवस्था में लौहचुम्बकीय पदार्थों के धातु आयन छोटे खण्डों में एकसाथ समूहित हो जाते हैं, इन्हें डोमेन कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक डोमेन एक छोटे चुम्बक की भाँति व्यवहार करता है। लौहचुम्बकीय पदार्थ के अचुम्बकीय (UPBoardSolutions.com) टुकड़े में डोमेन अनियमित रूप से अभिविन्यसित होते हैं और उनकी चुम्बकीय आघूर्ण निरस्त हो जाता है। पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यसित हो जाते हैं (चित्र-12 (a)] और प्रबल चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होती है। चुम्बकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी डोमेनों का क्रम बना रहता है और लौहचुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बन जाते हैं। चुम्बकीय पदार्थों की यह प्रवृत्ति लौहचुम्बकत्व कहलाती है।
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2. अनुचुम्बकत्व (Paramagnetism) – वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों की यह प्रवृत्ति अनुचुम्बकत्व कहलाती है। अनुचुम्बकीय पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र की ओर दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। ये चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में ही चुम्बकित हो जाते हैं तथा चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में अपना चुम्बकत्व खो देते हैं। अनुचुम्बकत्व का कारण एक अथवा (UPBoardSolutions.com) अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है, जो कि चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। O2, Cu2+, Fe3+, Cr3+ ऐसे पदार्थों के कुछ उदाहरण हैं।

3. फेरीचुम्बकत्व (Ferrimagnetism) – जब पदार्थ में डोमेनों के चुम्बकीय आघूर्णो का संरेखण समान्तर एवं प्रतिसमान्तर दिशाओं में असमान होता है, तब पदार्थ में फेरीचुम्बकत्व देखा जाता है। [चित्र-12 (c)]। ये लोहचुम्बकत्व की तुलना में चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। Fe3O4 (मैग्नेटाइट) और फेराइट जैसे MgFe2O4, ZnFe2O4, ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं। ये पदार्थ गर्म करने पर फेरीचुम्बकत्व खो देते हैं और अनुचुम्बकीय बन जाते हैं।

4. प्रतिलौहचुम्बकत्व (Antiferromagnetism) – प्रतिलौहचुम्बकत्व प्रदर्शित करने वाले पदार्थ जैसे MnO में डोमेन संरचना लोहचुम्बकीय पदार्थ के समान होती है, परन्तु उनके डोमेन एक-दूसरे के विपरीत अभिविन्यसित होते हैं तथा एक-दूसरे के चुम्बकीय आघूर्ण को निरस्त कर (UPBoardSolutions.com) देते हैं [चित्र-12 (b)]। जब चुम्बकीय आघूर्ण इस प्रकार अभिविन्यासित होते हैं कि नेट चुम्बकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है, तब चुम्बकत्व प्रतिलौहचुम्बकत्व कहलाता है।

5. 12 – 16 और 13 -15 वर्गों के यौगिक (Compounds of group 12-16 and 13-15) – वर्ग 12 के तत्वों और वर्ग 16 के तत्वों से बने यौगिक 12 – 16 वर्गों के यौगिक कहलाते हैं; जैसे- ZnS, HgTe आदि।
वर्ग 13 के तत्वों और वर्ग 15 के तत्वों से बने यौगिक 13 – 15 वर्गों के यौगिक कहलाते हैं; जैसे- GaAs, AlP आदि।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

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बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
एक विशेष ठोस अति कठोर है तथा इसका गलनांक अति उच्च है। ठोस अवस्था में यह अचालक है तथा प्रगलन पर यह विद्युत चालक हो जाता है। ठोस है।
(i) धात्विक
(ii) आण्विक
(iii) नेटवर्क
(iv) आयनिक
उत्तर
(iv) आयनिक

प्रश्न 2.
किस प्रकार के ठोस विद्युत चालक, आघातवर्धनीय और तन्य होते हैं?
(i) आणिवक
(ii) आयनिक
(iii) धात्विक
(iv) सहसंयोजक
उत्तर
(iii) धात्विक

प्रश्न 3.
ठोस Aएक अति कठोर ठोस तथा गलित अवस्था में विद्युतरोधी है और बहुत उच्च ताप पर पिघलता है। यह किस प्रकार का ठोस है?
(i) आण्विक
(ii) आयनिक
(iii) धात्विक
(iv) सहसंयोजक
उत्तर
(iv) सहसंयोजक

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प्रश्न 4.
ग्रेफाइट है –
(i) आयनिक ठोस
(ii) धात्विक ठोस
(iii) सहसंयोजी ठोस
(iv) आण्विक ठोस
उत्तर
(iii) सहसंयोजी ठोस

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन-सा सहसंयोजक क्रिस्टल है?
(i) रॉक साल्ट
(ii) बर्फ
(iii) क्वार्ट्ज
(iv) शुष्क बर्फ
उत्तर
(iii) क्वार्ट्ज

प्रश्न 6.
प्लास्टिक है –
(i) आयनिक ठोस
(ii) धात्विक ठोस
(iii) सहसंयोजी ठोस
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(iv) इनमें से कोई नही

प्रश्न 7.
सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना है –
(i) फलक केन्द्रित घनीय
(ii) मोनोक्लीनिक
(iii) ऑर्थोरोम्बिक
(iv) चतुष्कोणीय
उत्तर
(i) फलक केन्द्रित घनीय

प्रश्न 8.
फलक केन्द्रित घनीय जालक में एक एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या होगी –
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5
उत्तर
(iii) 4

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प्रश्न 9.
58.5 g NaCl में एकक कोष्ठिकाओं की लगभग संख्या होगी –
(i) 1.5 x 1023
(ii) 6 x 1023
(iii) 3 x 1022
(iv) 0.5 x 1024
उत्तर
(i) 1.5 x 1023

प्रश्न 10.
Zn अपनी गलित अवस्था से ठोस अवस्था में परिवर्तित होता है जिसकी संरचना hcp प्रकार की है। समीपस्थ परमाणुओं की संख्या होगी –
(i) 6
(ii) 8
(iii) 12
(iv) 4
उत्तर
(iii) 12

प्रश्न11.
एक ठोस AB, जिसकी संरचना NaCl प्रकार की है, में A परमाणु घनीय एकक कोष्ठिका के सभी कोनों को घेरते हैं। यदि एक अक्ष के सभी फलक केन्द्रित परमाणु निष्कासित हो जायें तो ठोस की स्टॉइकियोमीट्री होगी –
(i) AB2
(ii) A2B
(iii) A4B3
(iv) A3B4
उत्तर
(iv) A3B4

प्रश्न12.
एक एकक कोष्ठिका जिसमें परमाणुओं की संख्या 2 है तथा जो ABC ABC….. संकुलन क्रम प्रदर्शित करती है, में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या होगी –
(i) Z
(ii) 2Z
(iii) Z/2
(iv) Z/4
उत्तर
(ii) 2Z

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प्रश्न 13.
सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल में Na’ आयन की समन्वय संख्या है –
(i) 6
(ii) 8
(iii) 4
(iv) 1
उत्तर
(i) 6

प्रश्न 14.
एक धातु फलक केन्द्रित घनीय जालक में क्रिस्टलित होता है। एकक कोष्ठिका की कोर की लम्बाई 408 pm है। धातु परमाणु का व्यास है
(i) 288 pm
(ii) 408 pm
(iii) 144 pm
(iv) 204 pm
उत्तर
(i) 288 pm

प्रश्न 15.
सरल घन में उपस्थित परमाणुओं द्वारा घेरे गये कुल आयतन का प्रभाव है –
(i) [latex s=2]\frac { \pi }{ 4 } [/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 6 } [/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 3\sqrt { 2 } } [/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { \pi }{ 4\sqrt { 2 } } [/latex]
उत्तर
(ii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 6 } [/latex]

प्रश्न 16.
एक ठोस यौगिक XY की NaCl संरचना है। यदि धनायन की त्रिज्या 100 pm है तो ऋणायन (Y–) की त्रिज्या होगी –
(i) 275.1 pm
(ii) 322.5 pm
(iii) 241.5 pm
(iv) 165.7 pm
उत्तर
(iii) 241.5 pm

प्रश्न17.
फ्रेंकेल दोष के कारण आयनिक क्रिस्टल का घनत्व –
(i) घटता है।
(ii) बढ़ता है।
(iii) परिवर्तित होता है।
(iv) अपरिवर्तित रहता है।
उत्तर
(iv) अपरिवर्तित रहता है।

प्रश्न 18.
फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष होते हैं –
(i) नाभिकीय दोष
(ii) क्रिस्टल दोष
(iii) परमाणु दोष
(iv) अणु दोष
उत्तर
(ii) क्रिस्टल दोष

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प्रश्न 19.
शॉटकी दोष किसके जालक की अपूर्णताएँ परिभाषित करता है?
(i) गैस की
(ii) प्लाज्मा की
(iii) द्रव की
(iv) ठोस की
उत्तर
(iv) ठोस की

प्रश्न 20.
Fe3O4 का क्रिस्टल है –
(i) प्रतिचुम्बकीय
(ii) लौहचुम्बकीय
(iii) अनुचुम्बकीय
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) लौहचुम्बकीय

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्रिस्टलीय ठोस क्या हैं?
उत्तर
वे ठोस जिनमें घटक कणों की दीर्घ परास व्यवस्था होती है, क्रिस्टलीय ठोस कहलाते हैं।  उदाहरणार्थ– चाँदी, ताँबा, सोडियम क्लोराइड आदि।

प्रश्न 2.
अक्रिस्टलीय ठोस को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
एक ठोस अक्रिस्टलीय कहलाता है, जब इसके अवयवी कणों की लघु परास व्यवस्था होती है।

प्रश्न 3.
आण्विक ठोस से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक सरल विविक्त अणुओं से बने होते हैं, वे आण्विक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ– आयोडीन, सल्फर, सफेद फास्फोरस आदि।

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प्रश्न 4.
आयनिक ठोस की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक धनायनों और ऋणायनों से बने होते हैं, वे आयनिक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ– सोडियम क्लोराइड, धातु ऑक्साइड, धातु सल्फाइड आदि।

प्रश्न 5.
धात्विक ठोस को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जो ठोस धातुओं के गुण प्रकट करते हैं, धात्विक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ– सोना, चाँदी, ताँबा आदि।

प्रश्न 6.
सह-संयोजक ठोस से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक परमाणुओं से बने होते हैं, वे सह-संयोजक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ -हीरा, ग्रेफाइट, सिलिका आदि।

प्रश्न 7.
सोडियम क्लोराइड का टुकड़ा सोडियम धातु से कठोर होता है। क्यों?
उत्तर
NaCl (सोडियम क्लोराइड) में Na+ तथा Cl– के मध्य आयनिक बन्ध होता है जिसके कारण ये अपेक्षाकृत कठोर होते हैं। सोडियम धातु में धात्विक बन्ध होता है जो आयनिक बन्ध की तुलना में कमजोर होता है, इसलिए सोडियम धातु NaCl की तुलना में नर्म होता है।

प्रश्न 8.
रॉक साल्ट प्रकार की संरचना में प्रत्येक आयन की उपसहसंयोजन संख्या क्या होती है?
उत्तर
रॉक साल्ट प्रकार की संरचना में प्रत्येक आयन की उपसहसंयोजन संख्या 6 होती है।

प्रश्न 9.
आयनिक क्रिस्टलों में 12 उप-सहसंयोजन संख्या क्यों नहीं पायी जाती है?
उत्तर
घनीय रिक्तिको के निर्माण के लिए त्रिज्या अनुपात परास 0.732 से 1.0 होता है। अतः उप-सहसंयोजन संख्या 8 से अधिक नहीं हो सकती है।

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प्रश्न 10.
क्या किसी दिये गये तत्त्व के षट्कोणीय निविड संकुलन तथा घनीय निविड संकुलन संरचना के घनत्व समान हो सकते हैं? समझाइए।
उत्तर
दोनों प्रकार की संरचना में घेरा गया कुल आयतन समान (74%) होता है एवं दोनों संरचनाओं में उप-सहसंयोजन संख्या 12 होती है। अतः दोनों संरचनाओं में घनत्व समान होंगे।

प्रश्न 11.
एक क्रिस्टलीय ठोस में ऑक्साइड आयन घनीय निविड संकुलन संरचना में व्यवस्थित है। धनायन A समान रूप से अष्टफलकीय तथा चतुष्फलकीय रिक्तियों में वितरित है। यदि सभी अष्टफलकीय रिक्तियाँ भरी हों तब ठोस का सूत्र क्या है?
उत्तर
ऑक्साइड आयनों की घनीय निविड संकुलन संरचना में प्रति एकक कोष्ठिका 4 ऑक्साइड आयन होने चाहिए। प्रत्येक ऑक्साइड आयन 2 चतुष्फलकीय रिक्तियों तथा एक अष्टफलकीय रिक्तियों से सम्बन्धित होता है। अत: 4 अष्टफलकीय तथा 8 चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होनी चाहिए। (UPBoardSolutions.com) चूंकि सभी अष्टफलकीय रिक्तियाँ A द्वारा घेरी जाती हैं। अत: अष्टफलेकीय रिक्तियों में 4 धनायन A होंगे तथा समान संख्या में धनायन A चतुष्फलकीय रिक्तियों में होंगे। अत: 4 ऑक्साइड आयन तथा 8 धनायन A होंगे। अतः ठोस का सूत्र A 80,या A20 होगा।

प्रश्न 12.
घनीय निविड संकुलन संरचना युक्त 1 मोल यौगिक में अष्टफलकीय रिक्तियाँ कितनी होंगी?
उत्तर
अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = संकुलन में परमाणुओं की संख्या
= 1 मोल = 6.023 × 1023

प्रश्न 13.
संकुलन दक्षता (क्षमता) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
क्रिस्टल में उपलब्ध कुल स्थान का परमाणुओं द्वारा घेरा हुआ अंश संकुलन दक्षता कहलाता है। यह प्रायः प्रतिशत में व्यक्त की जाती है।
यदि किसी क्रिस्टल संरचना की एकक कोष्ठिका में उपस्थित परमाणुओं द्वारा कोष्ठिका का घेरा हुआ, आयतन Voccu और एकक कोष्ठिका का कुल आयतन Vcell है, तो
संकुलन क्षमता = [latex s=2]\frac { { V }_{ occu } }{ { V }_{ cell } } [/latex] x 100

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प्रश्न 14.
किसी तत्त्व x की परमाणु त्रिज्या 3.6Å है। इसकी एकक कोष्ठिका में सन्निकट पड़ोसी कण की दूरी क्या होगी?
हल
d = 2r = 2 x 3.6 Å = 7.2 Å.

प्रश्न 15.
फ्रेंकेल दोष AgCl क्रिस्टलों के घनत्व को परिवर्तित क्यों नहीं करता है?
उत्तर
चूँकि फ्रेंकेल दोषयुक्त क्रिस्टल में आयनों की संख्या समान रहती है इसलिए यह दोष क्रिस्टलों के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं करता है।

प्रश्न 16.
क्रिस्टलों में कौन-सा बिन्दु दोष सम्बन्धित ठोस के घनत्व को परिवर्तित नहीं करता है?
उत्तर
फ्रेंकेल दोष।

प्रश्न 17.
फ्रेंकेल दोष उपस्थित होने पर भी क्रिस्टल के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है, क्यों?
उत्तर
फ्रेंकेल दोष में धनायन अपने जालक बिन्दुओं से हटकर अन्तराकाशी स्थानों में आ जाते हैं, इसलिए क्रिस्टल के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 18.
शॉटकी तथा फ्रेंकेल दोषों का क्रिस्टल की उदासीनता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
शॉटकी तथा फ्रेंकेल दोष उपस्थित होने पर क्रिस्टल उदासीन (neutral) बने रहते हैं।

प्रश्न 19.
CaCl2, AgCI क्रिस्टल में मिलाने पर शॉटकी दोष उत्पन्न करता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर
विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए 2Ag2+ आयन 1 Ca2+ द्वारा प्रतिस्थापित होंगे। अत: प्रत्येक Ca2+ आयन के प्रवेश पर जालक स्थल में एक छिद्र उत्पन्न होता है।

प्रश्न20.
F- केन्द्र क्या है?
उत्तर
वह स्थान जहाँ ऋणायन रिक्तिका में इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है, F- केन्द्र कहलाता है।

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प्रश्न 21.
रिक्तिका को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
धातु परमाणुओं अथवा आयनों को जब क्रिस्टल में संकुलित किया जाता है, तब इनके मध्य उपस्थित स्थान रिक्तिका कहलाता है।

प्रश्न 22.
एक लवण का नाम लिखिए जिसे AgCl में मिलाकर धनायन रिक्तियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं।
उत्तर
CdCl2 अथवा SrCl2

प्रश्न 23.
क्षारीय धातु हैलाइडों के रंग के लिए उत्तरदायी नॉन-स्टॉइकियोमिट्री बिन्दु दोष का नाम लिखिए।
उत्तर
धातु आधिक्य अथवा ऋणायनिक रिक्तिकाएँ अथवा F- केन्द्र।

प्रश्न 24.
आप किस प्रकार NaCl संरचना को CsCl प्रकार की संरचना में एवं CsCl को NaCl प्रकार की संरचना में परिवर्तित करेंगे?
उत्तर
CsCl प्रकार की संरचना को NaCl प्रकार की संरचना में गर्म करके तथा NaCI पर उच्च दाब आरोपित करके CSCl प्रकार की संरचना प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 25.
साधारण नमक शुद्ध सफेद के स्थान पर कभी-कभी पीला दिखाई देता है? क्यों?
उत्तर
ऐसा जालक स्थलों में ऋणायनों के स्थान पर इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होता है। ये स्थल F- केन्द्रों की तरह कार्य करते हैं।

प्रश्न 26.
जिंक ऑक्साइड सफेद होता है लेकिन गर्म करने पर यह पीला पड़ जाता है। समझाइए।
उत्तर
जब जिंक ऑक्साइड को गर्म किया जाता है तब यह निम्न समीकरण के अनुसार ऑक्सीजन खोता है।
ZnO → Zn2+ + 1/2 O2 + 2e–
Zn2+ अन्तराकाशी रिक्तिकाओं में व्यवस्थित हो जाते हैं तथा इलेक्ट्रॉन विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए पड़ोसी अन्तराकाशी रिक्तियों में व्यवस्थित हो जाते हैं। इससे धातु आधिक्य दोष उत्पन्न होता है। अन्तराकाशी रिक्तियों में इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह पीला होता है क्योंकि इलेक्ट्रॉनों द्वारा श्वेत प्रकाश के अन्य रंगों को अवशोषित कर लिया जाता है।

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प्रश्न 27.
अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता पर ताप का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ताप वृद्धि से अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 28.
गर्म करने पर चुम्बकीय पदार्थ अनुचुम्बकीय हो जाते हैं, क्यों?
उत्तर
गर्म करने पर इलेक्ट्रॉन चक्रण अनियमित रूप से अभिविन्यसित (aligned) हो जाने के कारण लौहचुम्बकीय पदार्थ अनुचुम्बकीय हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
58.5 ग्राम NaCl में इकाई सेलों की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 2.
एक आयनिक ठोस के फलक केन्द्रित घनीय सेल के कोर की लम्बाई 508 pm है। यदि धनायन की त्रिज्या 110 pm हो, तो ऋणायन की त्रिज्या की गणना कीजिए।
हल
दिया गया है, कोर की लम्बाई = 508 pm,
धनायन की त्रिज्या (r+)= 110 pm, ऋणायन की त्रिज्या (r–)= ?
सूत्र कोर की लम्बाई = 2(r+ + r–) से,
508 /2 = r+ + r–
r+ + r– = 254
110 + r– = 254
r– = 254 – 110
r– = 144 pm

प्रश्न 3.
चाँदी घनीय संवृत संकुलन (ccp) जालक बनाती है। इसके क्रिस्टल की x – किरण जाँच से ज्ञात हुआ कि इसके एकक सेल के कोर की लम्बाई 408.6 pm है। चाँदी के घनत्व की गणना कीजिए। (चाँदी का परमाणु द्रव्यमान = 107.9)
हल
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प्रश्न 4.
बैण्ड सिद्धान्त के आधार पर चालक और अर्द्धचालक पदार्थों के विद्युत गुणों को समझाइए।
उत्तर
बैन्ड सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक तत्व में दो प्रकार के बैन्ड उपस्थित होते हैं, संयोजक बैन्ड तथा आगामी उच्च रिक्त बैन्ड (चालकता बैन्ड)। इन दोनों बैन्डों के मध्य की दूरी को ऊर्जा अन्तराल कहते हैं। चालकों (धातुओं) में संयोजकता बैन्ड आंशिक रूप से भरा होता है, या रिक्त (UPBoardSolutions.com) चालकता बैन्ड के साथ अतिव्यापन करता है जिससे विद्युत क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन आसानी से प्रवाहित हो सकते हैं और धातुएँ चालकता दर्शाती हैं।

अर्द्धचालकों में ऊर्जा अन्तराल कम होता है। इस कारण कुछ इलेक्ट्रॉन संयोजक बैन्ड से चालकता बैन्ड में चले जाते हैं। इस प्रकार अर्द्धचालक अल्पचालकता दर्शाते हैं। ताप बढ़ने पर अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता बढ़ जाती है।
विद्युतरोधियों में ऊर्जा अन्तराल इतना अधिक होता है, कि इलेक्ट्रॉन इसे नहीं लाँघ सकते। अतः चालकता नहीं दर्शाते हैं।
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दीर्थ शरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ठोसों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है? प्रत्येक प्रकार के अवयवी कण के बारे में समझाइए तथा उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
ठोसों का वर्गीकरण (Classification of Solids) – ठोसों को दो वृहत् प्रकारों- क्रिस्टलीय तथा अक्रिस्टलीय में वर्गीकृत किया जा सकता है। क्रिस्टलीय ठोसों में अवयवी कणों (परमाणु, आयन अथवा अणु) का क्रम सुव्यवस्थित होता है। क्रिस्टलीय ठोस साधारणत: लघु क्रिस्टलों की (UPBoardSolutions.com) अत्यधिक संख्या से बना होता है, उनमें प्रत्येक का निश्चित अभिलक्षणिक जयामितीय आकार होता है। इसमें दीर्घ परासी व्यवस्था होती है अर्थात् कणों की व्यवस्था का पैटर्न नियमित होता है जिसकी सम्पूर्ण क्रिस्टल में एक से अन्तराल पर पुनरावृत्ति होती है। सोडियम क्लोराइड और क्वार्ट्ज क्रिस्टलीय ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं।

अक्रिस्टलीय ठोस (ग्रीक अमोरफोस= आकृति नहीं होना) असमाकृति के कणों से बने होते हैं। इन ठोसों में अवयवी कणों (परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनों) की व्यवस्था केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। ऐसी व्यवस्था में नियमित और आवर्ती पुनरावृत्त पैटर्न केवल अल्प दूरियों तक देखा जाता है। ऐसे भाग बिखरे होते । हैं और इनके बीच व्यवस्था-क्रम अनियमित होते हैं। क्वार्ट्ज (क्रिस्टलीय) और क्वार्ट्ज काँच (अक्रिस्टलीय) की संरचनाएँ क्रमश: चित्र-14 (a) और (b) में दर्शाई गई हैं।

यद्यपि दोनों संरचनाएँ लगभग समरूप हैं, फिर भी अक्रिस्टलीय क्वार्ट्ज काँचे में दीर्घ परासी व्यवस्था नहीं है। अक्रिस्टलीय ठोसों की संरचना द्रवों के सदृश होती है। अवयवी कणों की व्यवस्था में अन्तर के कारण दोनों प्रकार के ठोसों के गुण भिन्न होते हैं।

अधिकतर ठोस पदार्थ (तत्त्व तथा यौगिक) क्रिस्टलीय प्रकृति के होते हैं। उदाहरण के लिए – सभी धात्विक तत्व; जैसे- लोहा, ताँबा और चाँदी; अधात्विक तत्व; जैसे-सल्फर, फॉस्फोरस और आयोडीन एवं यौगिक; जैसे सोडियम क्लोराइड, जिंक सल्फाइड और नैफ्थेलोन क्रिस्टलीय ठोस हैं। (UPBoardSolutions.com) काँच, रबर और प्लास्टिक अक्रिस्टलीय ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं। कुछ पदार्थ विभिन्न स्थितियों में भिन्न- भिन्न संरचनात्मक व्यवस्थाएँ प्राप्त करते हैं। ये व्यवस्थाएँ बहुरूप (polymorph) कहलाती हैं।
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उदाहरणार्थ– डायमण्ड तथा ग्रेफाइट कार्बन के दो भिन्न बहुरूप हैं। इन भिन्न संरचनाओं के गुण; जैसे-गलनांक, घनत्व आदि भिन्न-भिन्न होते हैं। उदाहरणार्थ- ग्रेफाइट कोमल तथा विद्युत का अच्छा चालक होता है, जबकि डायमण्ड कठोर तथा विद्युत का दुर्बल चालक होता है। क्रिस्टलीय ठोसों को उनमें परिचालित अन्तराआण्विक बलों की प्रकृति के आधार पर चार वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इनका वर्णन निम्नलिखित है –

(1) आण्विक ठोस (Molecular Solids)
आण्विक ठोसों के अवयवी कण अणु होते हैं। इन्हें निम्नलिखित उपवर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(i) अधुवी आण्विक ठोस (Non-polar molecular solids) – इनके अन्तर्गत वे ठोस आते हैं जो या तो परमाणुओं उदाहरणार्थ– निम्न ताप पर ऑर्गन और हीलियम अथवा अध्रुवी सहसंयोजक बन्धों से बने अणुओं; उदाहरणार्थ– निम्न ताप पर H2, Cl2, और I2 द्वारा बने होते हैं। इन (UPBoardSolutions.com) ठोसों में परमाणु अथवा अणु दुर्बल परिक्षेपण बलों अथवा लण्डन बलों द्वारा बँधे रहते हैं। ये ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक निम्न कोटि के होते हैं और ये सामान्यत: कमरे के ताप और दाब पर द्रव अथवा गैसीय अवस्था में होते हैं।

(ii) ध्रुवीय-आण्विक ठोस (Polar molecular solids) – HCl, SO2 आदि पदार्थों के अणु ध्रुवीय सहसंयोजक बन्धों से बने होते हैं। ऐसे ठोसों में अणु अपेक्षाकृत प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाओं (dipole-diple interactions) से एक-दूसरे के साथ बँधे रहते हैं। ये ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक अध्रुवी आण्विक ठोसों से अधिक होते हैं, फिर भी इनमें से अधिकतर कमरे के ताप और दाब पर गैस अथवा द्रव हैं। ठोस SO2 और ठोस NH3 ऐसे ठोसों के उदाहरण हैं।

(iii) हाइड्रोजन आबन्धित आण्विक ठोस (Hydrogen bonded molecular solids) – ऐसे ठोसों के अणुओं में H और F, O अथवा N परमाणुओं के मध्य ध्रुवीय-सहसंयोजक बन्ध होते हैं। प्रबल हाइड्रोजन आबन्धन ऐसे ठोसों के अणुओं; जैसे-H2O (बर्फ) बंधित करते हैं। ये विद्युत के अचालक हैं। सामान्यतः ये कमरे के ताप और दाब पर वाष्पशील द्रव अथवा मुलायम ठोस होते हैं।

(2) आयनिक ठोस (Ionic Solids)
आयनिक ठोसों के अवयवी कण आयन होते हैं। ऐसे ठोसों का निर्माण धनायनों और ऋणायनों के त्रिविमीय विन्यासों में प्रबल कूलॉमी (स्थिर विद्युत) बलों से बँधने पर होता है। ये ठोस कठोर और भंगुर प्रकृति के होते हैं। इनके गलनांक और क्वथनांक उच्च होते हैं। चूंकि इनमें आयन गमन (UPBoardSolutions.com) के लिए स्वतन्त्र नहीं होते; अतः ये ठोस अवस्था में विद्युतरोधी होते हैं। यद्यपि गलित अवस्था में अथवा जल में घोलने पर आयन गमन के लिए मुक्त हो जाते हैं और वे विद्युत का संचालन करते हैं।

(3) धात्विक ठोस (Metallic Solids)
धातुएँ मुक्त इलेक्ट्रॉनों के समुद्र से घिरे और उनसे जुड़े धनायनों के सुव्यवस्थित संग्रह हैं। ये इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं और क्रिस्टल में सर्वत्र समरूप से विस्तारित होते हैं। प्रत्येक धात्विक परमाणु इन गतिशील इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉनों का योगदान देता है। ये मुक्त और गतिशील इलेक्ट्रॉन, धातुओं की उच्च विद्युत और ऊष्मीय चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। (UPBoardSolutions.com) विद्युत क्षेत्र प्रयुक्त करने पर ये इलेक्ट्रॉन धनायनों के नेटवर्क में सतत प्रवाह करते हैं। इसी प्रकार जब धातु के एक भाग में ऊष्मा संचरित की जाती है तो ऊष्मीय ऊर्जा मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा सर्वत्र एकसमान रूप से विस्तारित हो जाती है। धातुओं की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ कुछ स्थितियों में उनकी चमक और रंग हैं। ये भी उनमें उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण होती हैं। धातुएँ अत्यधिक आघातवर्धनीय और तन्य होती हैं।

(4) सहसंयोजक अथवा नेटवर्क ठोस (Covalent or Network Solids)
अधात्विक क्रिस्टलीय ठोसों की विस्तृत बहुरूपता (polymorphism) सम्पूर्ण क्रिस्टल में निकटवर्ती परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक बन्धों के बनने के कारण होती है। इन्हें विशाल अणु (giant molecule) भी कहा जाता है। सहसंयोजक बन्ध प्रबल और दिशात्मक प्रकृति के होते हैं; इसीलिए परमाणु अपनी स्थितियों पर अति प्रबलता से बँधे रहते हैं। ऐसे ठोस अत्यधिक कठोर और भंगुर होते हैं। इनका गलनांक अत्यन्त उच्च होता है और गलन से पूर्व ये विघटित भी हो सकते हैं। ये विद्युत का संचालन नहीं करते; अतः ये विद्युतरोधी होते हैं। हीरा और सिलिकन कार्बाइड ऐसे ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं।

ग्रेफाइट मुलायम और विद्युत चालक है। इसके अपवादात्मक गुण इसकी विशिष्ट संरचना के कारण होते हैं। इसमें कार्बन परमाणु विभिन्न परतों में व्यवस्थित होते हैं और प्रत्येक परमाणु उसी परत के तीन निकटवर्ती परमाणुओं से सहसंयोजक बन्धन में होता है। प्रत्येक परमाणु का चौथा (UPBoardSolutions.com) संयोजकता इलेक्ट्रॉन अलग परतों के मध्य उपस्थित होता है और यह गमन के लिए मुक्त होता है। यही मुक्त इलेक्ट्रॉन ग्रेफाइट को विद्युत का उत्तम चालक बनाते हैं। विभिन्न परतें एक-दूसरे पर फिसल सकती हैं। ये ग्रेफाइट को मुलायम ठोस और उत्तम ठोस-चिकनाई (Solid lubricant) बनाते हैं।

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प्रश्न 2.
क्रिस्टल तन्त्र के प्रकारों की विस्तृत विवेचना कीजिए। उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
क्रिस्टल तन्त्र के प्रकार (Types of Crystal System) – सामान्यतया दो प्रकार की एकक कोष्ठिकाएँ मिलकर विभिन्न क्रिस्टल तन्त्र बनाती हैं। ये एकक कोष्ठिकाएँ निम्नलिखित हैं –
(1) आद्य एकक कोष्ठिकाएँ (Primitive unit cells) – जब अवयवी कण एकक कोष्ठिका के केवल कोनों पर उपस्थित हों तो उसे आद्य एकक कोष्ठिका कहा जाता है।

(2) केन्द्रित एकक कोष्ठिकाएँ (Centred unit cells) – जब एकक कोष्ठिका में एक अथवा अधिक अवयवी कण कोनों के अतिरिक्त अन्य स्थितियों पर भी उपस्थित होते हैं तो उसे केन्द्रित एकक कोष्ठिका कहते हैं। केन्द्रित एकक कोष्ठिकाएँ निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं –

  1. अन्त:केन्द्रित एकक कोष्ठिका (Body-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में एक अवयवी कण (परमाणु, अणु अथवा आयन) कोनों में उपस्थित कणों के अतिरिक्त उसके अन्त:केन्द्र में होता है।
  2. फलक-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (Face-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में कोनों पर उपस्थित अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण प्रत्येक फलके के केन्द्र पर भी होता है।
  3. अंत्य-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (End-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में कोनों पर उपस्थित अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण किन्हीं दो विपरीत फलकों के केन्द्र में पाया जाता है।

सात क्रिस्टल तन्त्र (Seven Crystal System) – जब क्रिस्टल जालक में एकक कोष्ठिका के जालक स्थल केवल कोनों पर स्थित होते हैं, तब यह सरल अथवा आद्य एकक कोष्ठिका कहलाती है। क्रिस्टलों के सभी प्रकारों में सात प्रकार की सरल अथवा आद्य एकक कोष्ठिकाएँ होती हैं। (UPBoardSolutions.com) ये एकक कोष्ठिकाएँ लम्बाई a, b तथा c और कोण α, β तथा γ द्वारा अभिलक्षणित होती हैं। यह सात क्रिस्टल तन्त्र कहलाता है (चित्र-15)। सभी क्रिस्टलों को इनमें से किसी एक के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। ये सात प्रकार अग्रलिखित हैं –

(1) घनीय (Cubic) – इसमें तीनों अक्ष समान लम्बाई की एवं परस्पर समकोण पर होती हैं (a = b = c, सभी कोण = 90°)। इस प्रकार की एकक कोष्ठिका से बने क्रिस्टल घनीय क्रिस्टल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- NaCl, KCl, CaF2, ZnS, हीरा, CsSl आदि।

(2) चतुष्कोणीय या द्विसमलम्बाक्ष (Tetragonal or Dirhombic) – तीनों अक्ष परस्पर समकोण पर होती हैं, परन्तु केवल दो अक्ष समान लम्बाई की होती हैं (a = b ≠ c, सभी कोण = 90°)। इन क्रिस्टलों के उदाहरण SnO2, TiO2, Sn, यूरिया आदि हैं।

(3) विषमलम्बाक्ष (Orthorhombic) – इसमें तीन असमान अक्ष होती हैं जो परस्पर समकोण पर होती हैं (a ≠ b ≠ c, सभी कोण = 90°)। BaSO4, KNO3 आदि इस प्रकार के क्रिस्टलों के उदाहरण हैं।

(4) एकनताक्ष (Monoclinic) – इसमें असमान लम्बाई की तीन अक्ष होती हैं तथा दो कोण 90° के होते हैं (a ≠ b ≠ c, दो कोण = 90° तथा एक कोण ≠ 90°)। कैल्सियम सल्फेट (CaSO4.2H2O), पोटैशियम मैग्नीशियम सल्फेट [K2Mg(SO4)2.6H2O] आदि एकनताक्ष क्रिस्टलों के कुछ उदाहरण हैं।
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(5) त्रिसमनताक्ष अथवा त्रिकोणी (Rhombohedral or Trigonal) – इस प्रकार के क्रिस्टलों में तीनों अक्षों की भुजाएँ समान होती हैं। तीनों अन्तराअक्षीय (interfacial) कोण भी समान होते हैं; परन्तु कोणों का मान 90° नहीं होता है। उदाहरणार्थ- कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3), सोडियम नाइट्रेट (NaNO3), क्वार्ट्ज (SiO2), कैल्साइट आदि।

(6) त्रिनताक्ष (Triclinic) – इस प्रकार के क्रिस्टलों की संरचना में तीनों अक्षों की तीनों भुजाएँ। असमान होती हैं। तीनों कोण भी असमान होते हैं। कोई भी कोण 90° (UPBoardSolutions.com) का नहीं होता है (a ≠ b ≠ c, α ≠ β ≠ γ ≠ 90°)। उदाहरण- कॉपर सल्फेट (CuSO4), पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7), बोरिक अम्ल (H3BO3) आदि।

(7) षट्कोणीय (Hexagonal) – दो अक्षों की भुजाएँ (a तथा b) समान और तीसरे अक्ष की भुजा (c) इन दोनों से भिन्न होती है। दो अक्षीय कोण समान एवं 90° के तथा तीसरा कोण 120° का होता है। (d = b # c, दो कोण = 90° तथा एक कोण = 120°)। उदाहरण– कैल्सियम (Ca), जिंक (Zn), मैग्नीशियम (Mg), मर्करी सल्फाइड (HgS), बर्फ, ग्रेफाइट आदि।

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प्रश्न 3.
निविड संकुलित संरचनाओं से आप क्या समझते हैं? एकविमा, द्विविमा तथा त्रिविमा में निविड संकुलन को समझाइए।
उत्तर
निविड संकुलित संरचनाएँ
(Close-packed Structures)
ठोसों में अवयवी कण निविड संकुलित होते हैं तथा उनके मध्य न्यूनतम रिक्त स्थान होता है। ये संरचनाएँ निविड संकुलित संरचनाएँ कहलाती हैं (यदि हम अवयवी कणों को समरूप कठोर गोले मानें जो एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं)।
एकविमा में निविड संकुलन (Close Packing in One Dimension) जब कणों को प्रदर्शित करने वाले गोले एक पंक्ति में एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए व्यवस्थित किए जाते हैं, तब यह एकविमा में निविड का संकुलन कहलाता है।
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द्विविमा में निविड संकुलन (Close Packing in Two Dimension)
द्विविमीय निविड संकुलित संरचना निविड संकुलित गोलों की पंक्तियों को एकसाथ व्यवस्थित करके प्राप्त की जा सकती है। इसे निम्नलिखित दो भिन्न प्रकार से किया जा सकता है –
(1) प्रथम विधि के अन्तर्गत द्वितीय पंक्ति को प्रथम के सम्पर्क में इस प्रकार रखा जा सकता है कि द्वितीय पंक्ति के गोले प्रथम पंक्ति के गोलों के ठीक ऊपर हों तथा दोनों (UPBoardSolutions.com) पंक्तियों के गोले क्षैतिजीय तथा साथ ही ऊध्र्वाधर रूप से संरेखित हों। यदि प्रथम पंक्ति को ‘A’ प्रकार की पंक्ति माना जाए तो द्वितीय पंक्ति प्रथम पंक्ति के ठीक समान होने के कारण, वह भी ‘A’ प्रकार की होगी। इसी प्रकार से अधिक पंक्तियों को रखकर AAA…. प्रकार की व्यवस्था प्राप्त की जा सकती है।

इसे चित्र-17 (a) में दिखाया गया है। स्पष्ट है कि इस व्यवस्था में प्रत्येक गोला चार निकटवर्ती गोलों के सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या चार है। साथ ही यदि इन सन्निकट चार गोलों के केन्द्रों को जोड़ा जाए तो एक वर्ग प्राप्त होता है। अतः इस संकुलन को द्विविमा में वर्ग निविड संकुलन (square close packing in two dimension) कहा जाता है।
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(2) द्वितीय विधि के अन्तर्गत द्वितीय पंक्ति को प्रथम के ऊपर एकसमान रूप से इस प्रकार रखा जा सकता है कि उसके गोले प्रथम पंक्ति के अवनमनों में भली-भाँति व्यवस्थित हो जाएँ। यदि प्रथम पंक्ति के गोलों की व्यवस्था को ‘A’ प्रकार कहा जाए तो द्वितीय पंक्ति जो कि भिन्न है, उसे ‘B’ (UPBoardSolutions.com) प्रकार कहा जा सकता है। जब तृतीय पंक्ति को द्वितीय के निकट एकसमान रूप से रखा जाता है तो उसके गोले प्रथम तल के गोलो से संरेखित होते हैं, अत: यह तल भी ‘A’ प्रकार का है। इसी प्रकार से रखे गए चौथी पंक्ति के गोले द्वितीय पंक्ति (‘B’ प्रकार) से संरेखित होते हैं, अत: यह व्यवस्था ABAB…. प्रकार की है।

इस व्यवस्था में मुक्त स्थान कम होता है और इसमें संकुलन, वर्ग निविड संकुलन से अधिक दक्ष है। प्रत्येक गोला छह निकटवर्ती गोलों के सम्पर्क में रहता है और द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या छह है। इन छह गोलों के केन्द्र सम-षट्कोण के कोनों पर हैं [चित्र-17 (b)]। इस प्रकार इस संकुलन को द्विविमा में षट्कोणीय निविड संकुलन कहा जाता है। चित्र-17 (b) में स्पष्ट परिलक्षित होता है कि इस तल में कुछ रिक्तियाँ हैं। जो त्रिकोणीय आकृति की हैं। इन्हें त्रिकोणीय रिक्तियाँ कहते हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पंक्ति में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और अगली पंक्ति में अधोमुखी होता है।

त्रिविमा में निविड संकुलन (Close Packing in Three Dimension)
सभी वास्तविक संरचनाएँ त्रिविम संरचनाएँ होती हैं। इन्हें द्विविमीय परतों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर प्राप्त किया जा सकता है। वर्ग निविड संकुलित तथा षट्कोणीय निविड संकुलित संरचनाओं से त्रिविमीय संरचना निम्नवत् प्राप्त की जा सकती है –

(1) द्विविम वर्ग निविड़ संकुलित परतों से त्रिविम निविड़ संकुलन (Three dimensional close packing from two dimensional square close packed layers) – इसके अन्तर्गत द्वितीय परत को प्रथम परत के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि ऊपरी परत के गोले प्रथम परत के गोलों के ठीक ऊपर रहें। इस व्यवस्था में दोनों परतों के गोले पूर्णतया क्षैतिज तथा साथ ही ऊर्ध्वाधर रूप से सीध में होते हैं (चित्र-18), इसी प्रकार से हम और परतों को एक-दूसरे के ऊपर रख सकते हैं। यदि प्रथम परत के गोलों की (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था को ‘A’ प्रकार कहा जाए तो सभी परतों में समान व्यवस्था होती है। इस प्रकार इस जालक में AAA…. प्रकार का पैटर्न है। इस प्रकार उत्पन्न होने वाला जालक सरल घनीय जालक (simple cubic lattice) और उसकी एकक कोष्ठिका आद्य- घनीय एकक कोष्ठिका (primitive- cubic unit cell) है।
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(2) द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परतों से त्रिविम निविड संकुलन (Three dimensional close packing from two dimensional-hexagonal close packed layers) – इसमें परतों को एक-दूसरे पर रखकर त्रिविमीय निविड संकुलित संरचना निम्नलिखित प्रकार से प्राप्त की जा सकती है –
(i) द्वितीय परंत को प्रथम परत के ऊपर रखना (Placing the second layer on the first layer) – एक द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परत ‘A’ पर समान परत इस प्रकार रखते हैं कि द्वितीय परत के गोले प्रथम परत के अवनमनों में आ जाएँ। चूंकि दो परतों के गोले भिन्न प्रकार से संरेखित हैं, अतः द्वितीय परत को हम B परत कहते हैं। यह चित्र-19 में देखा जा सकता है कि प्रथम परत की (UPBoardSolutions.com) सभी त्रिकोणीय रिक्तियाँ द्वितीय परत के गोलों से आवृत नहीं हैं। इससे अलग-अलग व्यवस्थाओं की उत्पत्ति होती है। जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम परत की रिक्ति के ऊपर होता है, तब एक चतुष्फलकीय रिक्ति बनती है। चित्र-19 में इन्हें ‘T’ से दर्शाया गया है।

अन्य स्थानों पर द्वितीय परत की त्रिकोणीय रिक्तियाँ प्रथम परत की त्रिकोणीय रिक्तियों के ऊपर हैं और इनकी त्रिकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होती हैं। उनमें से एक में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्तियों को चित्र-19 में ‘O’ से दर्शाया गया है। ये रिक्तियाँ छह गोलों से घिरी होती हैं तथा इन्हें अष्टफलकीय रिक्तियाँ कहा जाता है।

(ii) तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखना (Placing the third layer on the second layer) – इस स्थिति में दो सम्भावनाएँ होती हैं –
(क) द्वितीय परत की चतुष्फलकीय रिक्तियों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्थिति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूर्णत: संरेखित होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटर्न एकान्तर परतों में पुनरावृत्त होता है। इस पैटर्न को प्राय: ABAB… पैटर्न लिखा जाता है तथा इस संरचना को षट्कोणीय निविड संकुलित (hcp) संरचना कहते हैं। अनेक धातुओं; जैसे- मैग्नीशियम और जिंक में परमाणुओं की व्यवस्था hcp प्रकार की होती है।
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(ख) तृतीय परत को द्वितीय परत पर इस प्रकार रखा जा सकता है कि गोले अष्टफलकीय रिक्तियों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तृतीय परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेखित नहीं होते। इस व्यवस्था को ‘C’ प्रकार कहा जाता है। केवल चौथी (UPBoardSolutions.com) परत रखने पर उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेखित होते हैं। इस प्रकार के पैटर्न को प्राय: ABCABC…. लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संकुलित संरचना (ccp) अथवा फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना कहा जाता है। कुछ धातुएँ जैसे ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में क्रिस्टलीकृत होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems (संचार व्यवस्था) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems (संचार व्यवस्था).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 15
Chapter Name Communication Systems (संचार व्यवस्था)
Number of Questions Solved 45
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems (संचार व्यवस्था)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1:
व्योम तरंगों के उपयोग द्वारा क्षितिज के पार संचार के लिए निम्नलिखित आवृत्तियों में से कौन-सी आवृत्ति उपयुक्त रहेगी?
(a) 10 kHz
(b) 10 MHz
(c) 1 GHz
(d) 1000 GHz
उत्तर:
(b) 10 MHz
3 MHz से 30 MHz आवृत्ति तक की तरंगें व्योम तरंगों की श्रेणी में आती हैं। इससे उच्च आवृत्ति की तरंगें (जैसे-1GHz, 1000 GHz) आयन मण्डल को भेदकर पार निकल जाती हैं जबकि 10 kHz आवृत्ति की तरंगें ऐन्टीना की ऊँचाई अधिक होने के कारण उपयोगी नहीं हैं।

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प्रश्न 2:
UHF परिसर की आवृत्तियों का प्रसारण प्रायः किसके द्वारा होता है?
(a) भू-तरंगें
(b) व्योम तरंगें
(c) पृष्ठीय तरंगें
(d) आकाश तरंगें
उत्तर:
(d) आकाश तरंगें। UHF परिसर में प्रसारण आकाश तरंगों द्वारा ही होता है।

प्रश्न 3:
अंकीय सिगनल :
(i) मानों का संतत समुच्चय प्रदान नहीं करते।
(ii) मानों को विविक्त चरणों के रूप में निरूपित करते हैं।
(iii) द्विआधारी पद्धति का उपयोग करते हैं।
(iv) दशमलव के साथ द्विआधारी पद्धति का भी उपयोग करते हैं। उपरोक्त प्रकथनों में कौन-से सत्य ?
(a) केवल (i) तथा (ii)
(b) केवल (ii) तथा (iii)
(c) (i), (ii) तथा (iii) परन्तु (iv) नहीं
(d) (i), (ii), (iii) तथा (iv) सभी
उत्तर:
(c) (i), (ii) तथा (iii) सत्य हैं परन्तु (iv) सत्य नहीं है।
अंकीय सिगनल द्विआधारी पद्धति (अंकों 0 तथा 1) का उपयोग करते हैं। अत: मानों का सतत समुच्चय प्रदान करने के स्थान पर उन्हें विविक्त चरणों में निरूपित करते हैं।

प्रश्न 4:
दृष्टिरेखीय संचार के लिए क्या यह आवश्यक है कि प्रेषक ऐन्टीना की ऊँचाई अभिग्राही ऐन्टीना की ऊँचाई के बराबर हो? कोई TV प्रेषक ऐन्टीना 81m ऊँचा है। यदि अभिग्राही ऐन्टीना भूस्तर पर है तो यह कितने क्षेत्र में सेवाएँ प्रदान करेगा?
हल:
नहीं, प्रायः ग्राही ऐन्टीना की ऊँचाई प्रेषी ऐन्टीना से अधिक होती है।
प्रेषी को रेडियो-क्षितिज, dT = [latex]\sqrt { 2{ R }_{ e }{ \quad h }_{ T } }[/latex]
जिसमें Re पृथ्वी की त्रिज्या है।
सेवा-क्षेत्रफल (service area),
A = π[latex]{ d }_{ T }^{ 2 }[/latex]
= π. 2RhT
दिया है, hT = 81 m,
Re = 6.4 x 106 m ।
= 3.14 x 2 x 6.4 x 106 x 81 m2
= 3258 x 106 m2 = 3258 km2

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प्रश्न 5:
12v शिखर वोल्टता की वाहक तरंग का उपयोग किसी संदेश सिगनल के प्रेषण के लिए किया गया है। माडुलन सूचकांक 75% के लिए माडुलक सिगनल की शिखर वोल्टता कितनी होनी चाहिए?
हल:
माडुलन सूचकांक, ma= [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } } [/latex]
a E. माडुलक सिगनल का शिखर मान, Em = ma Ea
दिया है, ma = 75% = 0.75,
Ec = 12V
∴ Em = 0.75 x 12V = 9V

प्रश्न 6:
चित्र 15.1 में दर्शाए अनुसार कोई माडुलक सिगनल वर्ग तरंग है।
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दिया गया है कि वाहक तरंग c(t) = 2 sin (8πt)V
(i) आयाम माडुलित तरंग रूप आलेखित कीजिए।
(ii) माडुलन सूचकांक क्या है?
हल:
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प्रश्न 7:
किसी माडुलित तरंग का अधिकतम आयाम 10V तथा न्यूनतम आयाम 2V पाया जाता है। माडुलन सूचकांक μ का मान निश्चित कीजिए।
यदि न्यूनतम आयाम शून्य वोल्ट हो तो माडुलन सूचकांक क्या होगा?
हल:
दिया है, Emax = 10 V, Emin = 2V
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प्रश्न 8:
आर्थिक कारणों से किसी AM तरंग का केवल ऊपरी पाश्र्व बैंड ही प्रेषित किया जाता है, परन्तु ग्राही स्टेशन पर वाहक तरंग उत्पन्न करने की सुविधा होती है। यह दर्शाइए कि यदि कोई ऐसी युक्ति उपलब्ध हो जो दो सिगनलों की गुणा कर सके तो ग्राही स्टेशन पर माडुलक सिगनल की पुनःप्राप्ति सम्भव है।
हल:
माना वाही तरंग , ec = Ec cos ωc t …(1)
यदि सूचना माडुलक सिगनल की कोणीय आवृत्ति ωmt हो, तो ग्रहण किया गया सिगनल होगा है
er = Er cos (ωc +ωm) t …(2)
समीकरण (1) व (2) को गुणा करने पर,
e= Ec Ercos ωct t cos (ωc + ωm)t
सूत्र 2 cos A cos B = cos (A + B) + cos (A – B) का प्रयोग करने पर,
e = [latex]\frac { { E }_{ c }{ E }_{ r } }{ 2 }[/latex] [cos (2ωc +ωm) t + cos ωmt ]
यदि इस सिगनल को लो-पास फिल्टर (low pass filter) में से गुजारा जाए, तो उच्च आवृत्ति (2ωc +ωm ) का सिगनले रुक जाएगा तथा केवल ωm आवृत्ति को सिगनल ही गुजरेगा।
अत: हमें माडुलक सिगनल, em = [latex]\frac { { E }_{ c }{ E }_{ r } }{ 2 }[/latex]cos ωmt प्राप्त हो जायेगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

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प्रश्न 1:
वाहक तरंग की आवृत्ति fc के साथ श्रव्य तरंग आवृत्ति fm के मॉड्यूलेशन से प्राप्त बैण्ड चौड़ाई का मान होगा (2015, 17)
(i) 2fc
(ii) 2fm
(iii) fm +fc
(iv) fm – fc
उत्तर:
(ii) 2fm

प्रश्न 2:
200 KHz की वाहक आवृत्ति और 10 kHz के मॉडुलन संकेत के लिए आयाम मॉडुलित (AM) सिगनल की बैण्ड चौड़ाई होगी (2016)
(i) 20 kHz
(ii) 210 kHz
(iii) 400 kHz
(iv) 190 kHz
उत्तर:
(iii) 400 kHz

प्रश्न 3:
आयर्न मण्डल से निम्न में से कौन-सी आवृत्ति परावर्तित हो सकती है? (2018)
(i) 5 KHz
(ii) 5 MHz
(iii) 5 GHz
(iv) 500 MHz
उत्तर:
(ii) 5 MHz

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प्रश्न 4:
UHF परास की आवृत्तियाँ सामान्यतः संचरित होती हैं
(i) भू-तरंगों द्वारा
(i) व्योम तरंगों द्वारा
(iii) पृष्ठ तरंगों द्वारा
(iv) आकाश तरंगों द्वारा
उत्तर:
(iv) आकाश तरंगों द्वारा

प्रश्न 5:
निम्न में से कौन विद्युत चुम्बकीय तरंग नहीं है? (2017)
(i) प्रकाश तरंगें
(ii) रेडियो तरंगें
(iii) X-किरणें
(iv) ध्वनि तरंगें
उत्तर:
(iv) ध्वनि तरंगें

प्रश्न 6:
उच्च आवृत्ति तरंगों पर संदेश संकेत के अध्यारोपण की प्रक्रिया कहलाती है (2016)
(i) संचरण
(ii) मॉड्यूलन
(iii) संसूचन
(iv) अभिग्रहण
उत्तर:
(ii) मॉड्यूलन

प्रश्न 7:
यदि संप्रेषी ऐण्टीना की ऊँचाई h1 तथा अभिग्राही ऐण्टीना की ऊँचाई h2 हो तब दृष्टिरेखीय (LOS) संचरण विधि में संतोषजनक संचरण के लिए दोनों ऐण्टीनों के बीच की अधिकतम दूरी होती है। (पृथ्वी की त्रिज्या = R) (2016)
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उत्तर:
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
संचार व्यवस्था की तीन मूल इकाइयाँ (तत्त्व) क्या हैं?
उत्तर:

  1.  प्रेषित्र,
  2.  संचार चैनल,
  3.  अभिग्राही।

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प्रश्न 2:
ट्रांसड्यूसर क्या है?
उत्तर:
यह वह युक्ति है जिसका उपयोग ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 3:
दिए गए ब्लॉक आरेख में संचार व्यवस्था के X तथाY भागों को पहचानिए  (2017)
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उत्तर:
X-सूचना स्रोत, Y-चैनल

प्रश्न 4:
सूचना सिगनल किसे कहते हैं?
उत्तर:
सूचना, भाषण, संगीत आदि को किसी उचित ट्रांसड्यूसर द्वारा विद्युत सिगनल में परिवर्तित किया जाता है। यह सिगनल ही सूचना (संदेश) सिगनल कहलाता है।

प्रश्न 5:
सिगनल की बैण्ड-चौड़ाई से आप क्या समझते हैं? (2014, 17)
या
बैण्ड चौड़ाई को परिभाषित कीजिए। (2017)
उत्तर:
किसी सिगनल में अधिकतम तथा न्यूनतम आवृत्तियों के अन्तर को आवृत्ति परास कहते हैं। यही बैण्ड-चौड़ाई भी कहलाती है।

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प्रश्न 6:
व्योम तरंग संचरण (sky wave propagation) क्या है? इनकी आवृत्ति बताइए। (2014, 17, 18)
उत्तर:
वह संचरण प्रक्रिया जिसमें वाहक तरंगों का संचरण आयन मण्डल से तरंगों के परावर्तन से होता है, व्योम तरंग संचरण कहलाती है। व्योम तरंगों की आवृत्ति 1.5 मेगाहर्ट्ज से 30 मेगाहर्ट्ज तक होती है।

प्रश्न 7:
आकाश तरंगें क्या हैं? इनकी आवृत्ति बताइए। (2017)
उत्तर:
अति उच्च आवृत्ति (30 मेगाहर्ट्ज़ से 300 मेगाहर्ट्ज), परा उच्च आवृत्ति (300 मेगाहर्ट्ज से 3000 मेगाहर्ट्ज) तथा 3000 मेगाहर्ट्ज से उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगें आकाश तरंगें कहलाती हैं।

प्रश्न 8:
आकाश तरंग संचरण से आप क्या समझते हैं? इन तरंगों का संचरण किन विधियों के द्वारा किया जाता है? (2014, 17)
उत्तर:
वह तरंग संचरण जिसमें आकाश तरंगें प्रेषण ऐण्टीना से अभिग्राही ऐण्टीना तक दृष्टि रेखा पथ पर गमन करती हैं।
इन तरंगों का संचरण निम्न दो प्रकार से किया जा सकता है

  1.  भू-स्थिर संचार उपग्रहों के द्वारा।
  2. सीधे प्रेषित ऐण्टीना के द्वारा।

प्रश्न 9:
मॉड्यूलेशन (modulation) से क्या तात्पर्य है?
या
मॉड्यूलेशन से आप क्या समझते हैं? (2015, 16, 18)
उत्तर:
यह वह क्रिया है जिसमें उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के आयाम, आवृत्ति अथवा कला को निम्न आवृत्ति के सूचना सिगनल के तात्क्षणिक मानों के अनुकूल परस्पर इनके अध्यारोपण के माध्यम से बदला जाता है ।

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प्रश्न 10:
मॉड्यूलित तरंग क्या है? (2014)
उत्तर:
मॉड्यूलेशन की क्रिया में सूचना सिगनल अर्थात् निम्न आवृत्ति की वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों को उच्च आवृत्ति की वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों पर अध्यारोपित किया जाता है। इनमें सूचना सिगनल को मॉड्यूलक या मॉड्यूलेटिंग तरंगें, उच्च आवृत्ति की वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों को वाहक तरंगें तथा इन दोनों के अध्यारोपण के फलस्वरूप प्राप्त परिणामी तरंगों को मॉड्यूलित तरंगें कहते हैं।

प्रश्न 11:
ऐण्टीना का क्या कार्य है? इसकी न्यूनतम लम्बाई कितनी होती है? (2017)
उत्तर:
ऐण्टीना एक प्रकार का ट्रान्सड्यूसर है जो वैद्युत चुम्बकीय तरंगों को प्रसारित करने या ग्रहण करने के काम आता है। ऐण्टीना की न्यूनतम लम्बाई 75 मीटर होती है जो कि व्यावहारिक है।

प्रश्न 12:
3 x 108 Hz आवृत्ति की वाहक तरंगों के लिए द्विध्रुव ऐण्टीना की लम्बाई क्या होनी चाहिए? (2014)
हल:
वांछित लम्बाई
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प्रश्न 13:
एक दूरदर्शन टॉवर की ऊँचाई 75 मीटर है। अधिकतम दूरी क्या है जो यह दूरदर्शन प्रसारण ग्रहण कर सकती है? (Re = 6.4 x 106 मीटर) (2015, 18) हल:
दिया है, h= 75 मीटर, d = ? , Re = 6.4 x 106 मीटर
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प्रश्न 14:
एक टी.वी. टॉवर की ऊँचाई एक दिए गए स्थान पर 500 मी है। यदि पृथ्वी की त्रिज्या 6400 किमी हो तो इसके प्रसारण परास की गणना कीजिए। (2017, 18)
हल:
दिया है, h = 500 मी, Re = 6400 किमी = 6.4 x 106 मी
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प्रश्न 15:
एक वाहक तरंग जिसकी शिखर वोल्टता 12 वोल्ट है किसी संदेश सिगनल को प्रेषित करने के लिए उपयोग की जाती है। मॉडयूलित सिगनल की शिखर वोल्टता क्या होनी चाहिए? (2014)
हल:
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प्रश्न 16:
आयाम मॉड्यूलन क्या है? (2014)
उत्तर:
मॉड्यूलन की वह प्रक्रिया जिसमें वाहक तरंग के आयाम को मॉड्यूलक या मॉड्यूलेटिंग तरंग (सूचना संकेत) के तात्क्षणिक मान द्वारा परिवर्तित किया जाता है, जबकि वाहक तरंग के अन्य दो प्राचल आवृत्ति तथा कला अपरिवर्तित रहते हैं, आयाम मॉड्यूलन कहलाती है।

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प्रश्न 17:
आयाम मॉड्यूलेशन संचार व्यवस्था की बैण्ड-चौड़ाई का सूत्र लिखिए। (2017)
उत्तर:
बैण्ड-चौड़ाई = 2 x मॉड्यूलक सिगनल की आवृत्ति।

प्रश्न 18:
मॉड्यूलन सूचकांक क्या है? इसकी क्या महत्ता है? (2017)
उत्तर:
मॉड्यूलक तरंग के आयाम तथा वाहक तरंग के आयाम के अनुपात को मॉड्यूलन सूचकांक कहते हैं। यह उस सीमा को प्रदर्शित करता है जहाँ तक वाहक तरंग का आयाम सूचना सिगनल द्वारा परावर्तित होता है।

प्रश्न 19:
आवृत्ति मॉड्यूलन (FM) से आप क्या समझते हैं? (2016)
उत्तर:
जब उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों की आवृत्ति को श्रव्य संकेतों के संगत आयामों के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है, तो उनके परस्पर अध्यारोपण की प्रक्रिया आवृत्ति मॉड्यूलन कहलाती है।

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प्रश्न 20:
एक वाहक तरंग प्रदर्शित की जाती है।
c(t) = 4 sin (8πt) volt यदि मॉडुलक सिगनल तरंग का आयाम 1.0 volt हो तब मॉडुलन सूचकांक का मान क्या है? (2017)
हल:
दिया है, Em = 1.0V
Ec = 4V
मॉडुलन सूचकांक, ma = [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] = 0.25

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
संचार व्यवस्था के मुख्य अवयव कौन-कौन से हैं? ब्लॉक आरेख खींचकर समझाइए। (2017)
या
रेडियो संचार व्यवस्था का नामांकित ब्लॉक आरेख बनाइए। (2014, 16, 17)
उत्तर:
संचार व्यवस्था के अवयव
ऐसी व्यवस्था जिसके द्वारा सन्देशों अथवा सूचनाओं को एक स्थान से किसी विधि द्वारा (जैसे केबल्स द्वारी अथवा विद्युत-चुम्बकीय तरंगों द्वारा) सम्प्रेषित किया जाता है तथा दूसरे स्थान पर इनको ग्रहण किया जाता है, संचार व्यवस्था कहते हैं। संचार व्यवस्था के निम्नलिखित तीन अवयव होते हैं

1. प्रेषित्र (Transmitter):
यह मूल सन्देश (सूचना, भाषण) सिगनल को एक उचित सिगनल में बदलता है, जिसे उचित माध्यम से गुजारा जा सके; इसे  सम्प्रेषण चैनल कहते हैं। जब वक्ता तथा श्रोता के बीच बहुत अधिक दूरी होती है। ३) मॉड्यूलेटर प्रवर्धक तो केबल्स (cables) सम्प्रेषण चैनल  का कार्य नहीं कर सकतीं (UPBoardSolutions.com) ऐसी स्थिति में ध्वनि को माइक्रोफोन द्वारा विद्युत सिगनलों में बदला जाता है, उनकी शक्ति, प्रवर्धक द्वारा बढ़ायी जाती है। अभिग्राही तत्पश्चात् इसको रेडियो आवृत्ति की  वाहक तरंगों (carrier waves) के साथ मॉड्यूलित किया जाता है और अन्त में ऐण्टीना द्वारा विद्युत-चुम्बकीय तरंगों  के रूप में अन्तरिक्ष (space) में प्रेषित  किया जाता है।
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 2. संचार चैनल (Transmission Channel):
वह माध्यम जिसके द्वारा प्रेषित्र से भेजी गई विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के रूप में सूचना अथवा भाषण अभिग्राही के ऐण्टीना तक पहुँचती हैं, संचार चैनल कहलाता है। यह तारों का एक युग्म अथवा केबल, बेतार अर्थात् मुक्त आकाश हो सकता है।

3. अभिग्राही (Receiver):
यह प्रेषित्र द्वारा भेजे गये परावर्द्धित सिगनल को वास्तविक सन्देश अथवा सूचना में परिवर्तित करता है। यह प्रक्रिया डिमॉड्यूलेशन (demodulation) कहलाती है। जब अभिग्राही के ऐण्टीना पर मॉड्यूलित तरंग पहुँचती है तो वहाँ श्रव्य तरंगें उनसे अलग कर . ली जाती हैं। इनको प्रवर्धित करके लाउडस्पीकर में भेजा जाता है। जहाँ इन्हें पुन: ध्वनि तरंगों में परिवर्तित कर लेते हैं। संचार व्यवस्था का योजनाबद्ध ब्लॉक आरेख चित्र 15.4 में प्रदर्शित है।

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प्रश्न 2:
वायुमण्डल में आकाश तरंगों के संचरण को स्पष्ट कीजिए।
या
सिद्ध कीजिए कि आकाश तरंगों के संचरण हेतु एक टी.वी.प्रेषी ऐण्टीना जो पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर है, का प्रसारण परास d = [latex]\sqrt { 2Rh }[/latex] है, जहाँ पृथ्वी की त्रिज्या है? (2015, 17)
या
आकाश तरंगों के संचरण को समझाइए। इन तरंगों के संचरण के लिए प्रयुक्त आवृत्ति परास क्या है? (2015)
या
तरंग संचरण में दृष्टि रेखा पक्ष (LOS)’ से क्या तात्पर्य है? किन तरंगों में इसका प्रयोग होता है? (2018)
उत्तर:
आकाश तरंगों का संचरण (Propagation of space waves or tropospherical waves):
रेडियो तरंग संचरण की अन्य विधा आकाश तरंग है। आकाश तरंग, प्रेषण ऐण्टीना से अभिग्राही ऐण्टीना तक दृष्टि रेखा पथों (line of sight : LOS) पर गमन करती है। (UPBoardSolutions.com) 40 MHz से ऊँची आवृत्तियों के लिये संचार मुख्यत: दृष्टि रेखा पथों तक ही सीमित रहता है। इन आवृत्तियों पर ऐण्टीना का साइज अपेक्षाकृत छोटा होता है तथा इसे पृथ्वी के पृष्ठ से कई तरंगदैर्यो की ऊँचाई पर स्थापित किया जा सकता है।
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टी०वी० सिगनलों (80-200 MHz) को न तो भू-तरंगों द्वारा (पृथ्वी के समीप वायुमण्डल द्वारा उनके उच्च अवशोषण के कारण) संचरित किया जा सकता है और न व्योम तरंगों द्वारा (आयनमण्डल से उनके परावर्तन न होने के कारण)। इन सिगनलों को केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब ग्राही ऐण्टीना प्रेषक ऐण्टीना से चलने वाले सिगनल के मार्ग में पड़े। टी०वी० का अधिक क्षेत्र विस्तार प्राप्त करने के (UPBoardSolutions.com) लिये प्रसारण ऊँचे ऐण्टीना से करना चाहिए।
टी०वी० ऐण्टीना की ऊँचाई है तथा वह दूरी d जहाँ तक सिगनल प्रेषित किये जा सकते हैं, सम्बन्ध ज्ञात करने के लिये, माना ST टी०वी० का है ऊँचाई को प्रेषित्र ऐण्टीना है तथा पृथ्वी का  केन्द्र O एवं त्रिज्या R है (चित्र 15.5)। पृथ्वी की वक्रता के कारण पृथ्वी की सतह के बिन्दुओं P तथा २ के परे सिगनल प्राप्त नहीं किये जा सकते। यहाँ PT तथ QT क्रमशः P तथा Q पर स्पर्श रेखाएँ हैं। माना d (= SP अथवा SQ) ऐण्टीना के आधार से पृथ्वी की दूरी है, जहाँ तक सिगनल प्राप्त होते हैं। समकोण त्रिभुज OPT में,
(OT)2 = (OP)2 + (TP)2 जहाँ
OT = R+h,OP= R तथा
TP = SP= d (क्योंकि h<<R )
इस प्रकार (R+h)2 = R2+a2
h2+2Rh = d2
चूंकि h<<R अत: हम h2 को 2Rh के सापेक्ष उपेक्षणीय मान सकते हैं। इस प्रकार
2Rh = d2
अथवा  d = [latex]\sqrt { 2Rh }[/latex]
टी०वी० प्रसारण में क्षेत्र विस्तार A= πd2 =2πRh
संचार परास (Range of communication) अथवा दृष्टि रेखा दूरी (Line of sight – distance)-प्रेषी ऐण्टीना तथा ग्राही ऐण्टीना के बीच सरल रेखीय दूरी को संचार परास अथवा दृष्टि रेखा दूरी कहते हैं। इसको । अथवा d से प्रदर्शित करते हैं। यह प्रेषक ऐण्टीना की परास तथा ग्राही ऐण्टीना की परास के योग के बराबर होती है।

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यदि प्रेषक ऐटीना की ऊँचाई hT तथा ग्राही ऐण्टीना की ऊँचाई hR हो एवं इनसे क्षैतिज दूरियाँ अर्थात् इनकी परास क्रमश: dT व dR हो, तो
dT = [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ T } }[/latex] तथा dr = [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ R } }[/latex];
जहाँ, Re= पृथ्वी की वक्रता त्रिज्या।
दोनों ऐण्टीनाऔं के बीच की रेखीय दू्री r = dm = dT + dR =  [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ T } }[/latex] +  [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ R } }[/latex]
इस तरंग संचरण का प्रयोग टेलीविजन प्रसारण, माइक्रोवेव-लिंक तथा सैटेलाइट संचार आदि संचार प्रणालियों में किया जाता है।

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प्रश्न 3:
निम्नलिखित आवृत्तियों की वाहक तरंगों के लिए ऐण्टीना की आवश्यक ऊँचाई ज्ञात कीजिए
(i) 30 MHz
(ii) 300 MHz
(iii) 6 x 108 Hz
प्राप्त परिणामों से किस फल को प्राप्त करोगे?
हल:
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प्रश्न 4:
आयाम मॉडुलन से आप क्या समझते हैं? एक आयाम मॉडलित तरंग प्राप्त करने का नामांकित परिपथ बनाइए। (2017)
उत्तर:
जब उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के आयाम को निम्न आवृत्ति के श्रव्य सिगनलों के संगत आयामों के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है तो उनके परस्पर अध्यारोपण की (UPBoardSolutions.com) प्रक्रिया आयाम मॉडुलन कहलाती है। चित्र 15.7 में परिणामी आयाम मॉडुलित तरंग प्रदर्शित है
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प्रश्न 5:
एक मॉड्यूलित तरंग का अधिकतम आयाम 11 वोल्ट तथा न्यूनतम आयाम 3 वोल्ट है। मॉड्यूलन सूचकांक का मान ज्ञात कीजिए। (2014)
हल:
दिया है, Emax = 11 V, Emin = 3V
∴ Ec + Em = 11V      …(1)
तथा Ec – Em = 3V …(2)
समी० (1) व समी० (2) को हल करने पर,
Ec = 7 v तथा
Em = 4V
मॉड्यूलन सूचकांक ma=[latex]\frac { 4 }{ 7 }[/latex] = 0.57

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प्रश्न 6:
मॉड्यूलित वाहक तरंग के अधिकतम एवं न्यूनतम आयाम क्रमशः 900 mV तथा 300 mV हैं। मॉड्यूलन सूचकांक की गणना कीजिए। (2015)
हल:
दिया है, Emax = 900 mV, Emin = 300 mV
∴ Ec + Em = 900 mV  ……….(1)
तथा Ec – Em = 300 mV ………..(2)
समी० (1) वे समी० (2) को हल करने पर,
Ec = 600 mV, Em = 300 mV
∴ मॉड्यूलन सूचकांक ma = [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } }[/latex] = [latex]\frac { 300mV }{ 600mV }[/latex]  = 0.5

प्रश्न 7:
2 x 105 हर्ट्ज आवृत्ति तथा अधिकतम वोल्टेज 60 वोल्ट की वाहक तरंग को श्रव्य तरंग  em = 30 sin 2π x 2500t वोल्ट द्वारा मॉडुलित किया जाता है। ज्ञात कीजिए
(i) मॉडुलन प्रतिशतता
(ii) मॉडुलित तरंग के घटक की आवृत्ति (2017)
उत्तर:
दिया है, Ec = 60 वोल्ट तथा fc = 2 x 105 हज
श्रव्ये तरंग em = 30 sin 2π x 2500t वोल्ट
अतः Em = 30 वोल्ट तथा fm = 2500 वोल्ट
(i) मॉडुलन गुणक (ma) = [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } }[/latex] = [latex]\frac { 30 }{ 60 }[/latex]   = 0.5
अतः मॉडुलन प्रतिशतता = 0.5 x 100 = 50%
(ii) मॉडुलित तरंग के घटक की आवृत्ति = fc +fm
= 2 x 105 + 2500 = 202500 हर्ट्ज
= 202.5 किलोहर्ट्ज

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
उपग्रह संचार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उतर:
उपग्रह संचार (Satellite communication):
अन्तरिक्ष तरंग संचरण विधि द्वारा पृथ्वी के सम्पूर्ण क्षेत्र को आवरित नहीं किया जा सकता, क्योंकि विषम भौगोलिक परिस्थितियों (जैसे, मध्य में कई महासागर आदि) के कारण निरन्तर पुनरावर्तक (repeater) लगाना सम्भव नहीं है। अतः इसके लिए आवश्यक है कि संचार उच्च आवृत्ति पर हो। 30 MHz से अधिक आवृत्ति की तरंगें परम्परागत विधियों द्वारा संचारित नहीं की जा सकतीं। इसके लिए संचार उपग्रहों का प्रयोग किया जाता है।

संचार उपग्रह एक ऐसा उपग्रह है जो पृथ्वी के चारों ओर पश्चिम से पूर्व की ओर वृत्ताकार कक्षा में इस प्रकार परिक्रमण करता है कि इसका आवर्त काल पृथ्वी के अपनी (UPBoardSolutions.com) अक्ष के परितः घूर्णन काल के बराबर अर्थात् 24 घण्टे हो। इसलिए यह उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष सदैव स्थिर प्रतीत होता है। इस प्रकार लम्बी दूरी के संचरण के लिए इन संचार उपग्रहों का प्रयोग किया जाता है। इनको भूस्थिर उपग्रह अथवा तुल्यकालिक उपग्रह भी कहते हैं।

इस प्रकार के संचार उपग्रहों में माइक्रो तरंग सिगनल के अभिग्रहण तथा प्रेषण के लिए आवश्यक उपकरण (रेडियो ट्रॉन्सपोंडर) लगे रहते हैं। पृथ्वी के प्रेषित्र स्टेशन से एक आवृत्ति (अपलिंक) के माइक्रो तरंग सिगनल उपग्रह की ओर प्रेषित किये जाते हैं। ये सिगनल उपग्रह पर लगे उपकरणों द्वारा ग्रहण कर संशोधित एवं प्रवर्धित किये जाते हैं तथा तत्पश्चात् एक अन्य आवृत्ति (डाउनलिंक) पर पृथ्वी पर ग्राही स्टेशन की ओर प्रेषित कर दिये जाते हैं। अपलिंक तथा डाउनलिंक की दोनों भिन्न आवृत्तियाँ सूक्ष्म तरंग अथवा UHF क्षेत्र में पड़ती हैं। इतनी उच्च आवृत्ति की तरंगें आयन मण्डल को पार कर जाती हैं। अत: पृथ्वी पर प्रेषित (UPBoardSolutions.com) तथा ग्राही ऐण्टीनों को निश्चित झुकाव कोणों पर रखा जाता है। उपग्रह संचार प्रणाली की आवृत्ति परास 1GHz से 10 GHz होती है। इस संचार प्रणाली की विशेषता यह है कि उपग्रह संचार बिना किसी विक्षोभ के काफी बड़ी दूरियों को आवंटित करता है। यह लम्बी दरियों, दरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के लिए संचार का आसान तथा अपव्ययी संचार माध्यम है। यह टेलीविजन, टेलीफोन तथा मोबाइल फोन सेवाओं के लिए उपयुक्त संचार माध्यम है। गोपनीयता की दृष्टि से यह संचार माध्यम उपयुक्त नहीं है।
चित्र 16.8 में वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों, के संचरण की विभिन्न विधियों को दर्शाया गया है।
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प्रश्न 2:
मॉड्यूलेशन से क्या तात्पर्य है? इसकी आवश्यकता संचार निकाय में क्यों पड़ती है? (2014, 18)
या
दो कारणों को लिखिए जिससे किसी सिगनल के मॉड्यूलन की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
या
सिगनल संचरण के लिए मॉड्यूलेशन की आवश्यकता क्यों है? (2015, 16, 18)
उत्तर:
सामान्यतः भेजे जाने वाले डिजिटल एवं एनालॉग सिगनलों को इनके मूलरूप में नहीं भेजा जा सकता है, चूंकि इन सिगनलों की आवृत्ति बहुत कम होती है। इस तरह के (UPBoardSolutions.com) सिगनलों को भेजने के लिए वाहक की आवश्यकता होती है। ये वाहक उच्च आवृत्ति की तरंगें (संकेत या सिगनल) होती हैं। मॉड्यूलेशन को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है ।
“अल्प आवृत्ति के संकेत (सिगनल) को उच्च आवृत्ति के संकेते पर लंदना ‘भाँड्यूलेशन’ कहलाता है।”

मॉड्यूलेशन की आवश्यकता
(Need of Modulation):
संचार निकाय में संदेश सिगनलों को (जिन्हें आधार बैण्ड सिगनल भी कहते हैं) दूरस्थ स्थानों को प्रेषित करना होता है। संदेश सिगनल श्रव्य आवृत्ति (UPBoardSolutions.com) परास (20 Hz से 20000 Hz) में होते हैं। इनको पहले माइक्रोफोन द्वारा वैद्युत सिगनल में बदला जाता है जिनकी आवृत्ति परास भी (20 Hz से 20000 Hz) ही होती है। इन सिगनलों को अधिक दूरी तक संप्रेषित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसमें निम्नलिखित कठिनाइयाँ आती हैं

1. ऐण्टीना का आकार (Size of antenna):
किसी सिगनल के सम्प्रेषण के लिए आवश्यक है। कि ऐण्टीना का आकार प्रेषित किये जाने वाले सिगनल की तरंगदैर्ध्य की कोटि का होना चाहिए।
अतः
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अत: इन तरंगों को प्रेषित करने के लिए 100 मीटर लम्बाई के ऐण्टीना की आवश्यकता होगी जिसको आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। अतः प्रेषण से पूर्व न्यून आवृत्ति आधार बैण्ड सिगनल में निहित सूचना को उच्च रेडियो आवृत्तियों में रूपान्तरित करने की आवश्यकता होती है।

2. कम शक्ति का प्रभावी विकिरण (Effect low power radiation):
विकिरण के सैद्धान्तिक अध्ययन के आधार पर l लम्बाई के रेखीय ऐण्टीना द्वारा विकरित शक्ति P तरंगदैर्घ्य λ के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। चूंकि P α (1/λ)2अत: । के नियत मान के लिए P α 1/λ2
अतः स्पष्ट है कि लम्बी तरंगदैर्घ्य (निम्न आवृत्ति) के आधार बैण्ड सिगनल द्वारा प्रभावी शक्ति विकिरण कम होगा। परन्तु अच्छे प्रेषण के लिए उच्च शक्ति चाहिए जो कम तरंगदैर्घ्य (उच्च आवृत्ति) के आधार बैण्ड सिगनल से सम्भव है। इस प्रकार यह तथ्य प्रेषण के लिए उच्च आवृत्ति के उपयोग की आवश्यकता दर्शाता है।

3. विभिन्न प्रेषित्रों से प्राप्त सिगनलों का मिश्रण: आधार बैण्ड सिगनलों के सीधे प्रेषण के विरूद्ध निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण तर्क अधिक व्यावहारिक हैं जब एक ही क्षण कई आधार बैण्ड सिगनल प्रेषित किये जा रहे होते हैं तो ये परस्पर मिल जाते हैं। तथा उनमें विभेद करने का कोई सरल उपाय नहीं है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए सिगनलों को उच्च आवृत्ति पर प्रेषित करते हैं तथा प्रत्येक प्रसारण स्टेशन को एक बैण्ड आवंटित करते हैं। उपरोक्त सभी बिन्दुओं से यह स्पष्ट होता है कि न्यून आवृत्ति के मूल आधार बैण्ड (UPBoardSolutions.com) अर्थात् सूचना सिगनल को प्रेषण से पूर्व किसी उच्च आवृत्ति तरंग में रूपान्तरित करना आवश्यक है। यह रूपान्तरण क्रिया इस प्रकार की होनी चाहिए कि रूपान्तरित सिगनल में उन सभी सूचनाओं का समावेश रहे जो मूल सिगनल में समाहित थे। ऐसा करने के लिए हम किसी उच्च आवृत्ति सिगनल की सहायता लेते हैं। इस सिगनल को वाहक तरंग (carrier wave) कहते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त सभी बिन्दु मॉड्यूलेशन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं।

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प्रश्न 3:
मॉड्यूलन तथा विमॉड्यूलन से क्या अभिप्राय है? एक आयाम मॉड्यूलित तरंग को प्राप्त करने व संसूचित करने को परिपथ आरेख द्वारा समझाइए। (2015, 17)
या
आयाम मॉड्यूलन की व्याख्या कीजिए तथा किसी आयाम मॉड्यूलन को परिपथ आरेख बनाइए। (2015)
या
मॉड्यूलन से आप क्या समझते हैं? आयाम मॉड्यूलित तरंग के उत्पादन हेतु आवश्यक नामांकित परिपथ आरेख बनाइए। (2015, 16, 18)
उत्तर:
मॉडयलन: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 के उत्तर के अन्तर्गत देखिए।
विमॉड्थूलिन : मॉड्यूलित तरंग से श्रव्य सिगनल (audio signal) अर्थात् सूचना सिगनल को पुनः प्राप्त करने की क्रिया संसूचन अथवा विमॉड्यूलन (Demodulation) कहलाती है।
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आयाम मॉड्यूलित (मॉड्यूलेटिड) तरंग प्राप्त करना

आयाम मॉड्यूलित तरंग के उत्पादन के लिए आवश्यक परिपथ आरेख  चित्र 15.9 में दर्शाया गया है। यह परिपथ वाहक तरंग सिगनल के लिए
सामान्यतः एक उभयनिष्ठ उत्सर्जक वाहक प्रवर्धक है। मॉड्यूलक सिगनल  [em = Em sinωm .t] आधार पर आरोपित किया जाता है। इस प्रकार निर्गम आधार (UPBoardSolutions.com) बायसिंग वोल्टता नियत d.c वोल्टता नहीं है, बल्कि यह नियत d.c. वोल्टता VBB तथा मॉड्यूलक वोल्टता a.c [em = Em sinωm.t] का योग है।
चित्र 15.9 अत: आधार वोल्टता नियत न रहकरे । मॉड्यूलक सिगनल के तात्कालिक मान के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार प्रवर्धन भी परिवर्तित होता है। अतः निर्गम वोल्टता भी उसी के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार निर्गम में आयाम मॉड्यूलित तरंग प्राप्त हो जाती है। उत्पादन प्रक्रिया को ब्लॉक चित्र 15.10 में प्रदर्शित है।
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आयाम मॉड्यूलित तरंग का संसूचन
आयाम मॉड्यूलेटिड तरंग को संसूचित करने में निम्नलिखित दो क्रियाएँ होती हैं
(i) मॉड्यूलित तरंग (UPBoardSolutions.com) का दिष्टीकरण (Rectification),
(ii) मॉझ्यालित तरंग से वाहक तरंग (रेडियो आवृत्ति) घटक को अलग करना। आयाम मॉड्यूलित तरंग के संसूचन अर्थात् विमॉड्यूलेशन के लिए आवश्यक परिपथ आरेख चित्र 15.11 में दर्शाया गया है।
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निवेशी परिपथ स्वप्रेरकत्व L1 तथा परिवर्ती संधारित्र C1 का समान्तर संयोजन है। इसको ट्यून्ड परिपथ (tuned circuit) कहते हैं। ग्राही के ऐण्टीना पर प्राप्त विभिन्न (UPBoardSolutions.com) सिगनलों से वांछित मॉड्यूलित रेडियो सिगनल C1 की आवृत्ति को व्यवस्थित करके अनुनाद के आधार पर चयनित कर लिया जाता है।
डायोड D इस सिगनल को दिष्टीकृत कर देता है। अतः डायोड का निर्गम, रेडियो आवृत्ति की धारा स्पन्दों के धनात्मक आधे वक्रों की चेन है। इन सिगनलों के शिखर श्रव्य सिगनलों के अनुसार परिवर्तित होते हैं। श्रव्य सिगनलों को पुनः प्राप्त करने के लिए डायोड दिष्टीकृत निर्गम को कम मान के (UPBoardSolutions.com) संधारित्र C2 तथा एक लोड प्रतिरोध RL के समान्तर संयोजन पर आरोपित किया जाता है। संधारित्र C2 उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के लिए निम्न प्रतिघात ( Xc= [latex]\frac { 1 }{ 2\pi f{ C }_{ 2 } }[/latex]) तथा निम्न आवृत्ति की श्रव्य तरंगों के लिए उच्च प्रतिघात उत्पन्न करता है। अत: उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगें इस संधारित्र से निकल जाती हैं। तथा निम्न आवृत्ति की श्रव्य तरंगें लोड प्रतिरोध RLपर प्राप्त हो जाती हैं। अत: यह हैडफोन में धारा भेजता है जिससे कि मूल श्रव्य सिगनल पुन: प्राप्त हो जाता है।।

संसूचन प्रक्रिया (विमॉड्यूलेशन) का ब्लॉक आरेख
संसूचन के लिए संतोषजनक प्रतिबन्ध: फिल्टर परिपथ से जुड़े संधारित्र की धारिता इतनी होनी चाहिए कि रेडियो आवृत्ति fc के लिए इसका प्रतिघात ( Xc =[latex]\frac { 1 }{ { \omega }_{ c }C }[/latex] )प्रतिरोध R की तुलना में बहुत कम हो अर्थात्
Xc  <<R अथवा    [latex]\frac { 1 }{ 2\pi { f }_{ c }C }[/latex] << R
जबकि श्रव्य-आवृत्ति f के लिए इसका प्रतिघात, प्रतिरोध है की तुलना में बहुत अधिक हो अर्थात्
[latex]\frac { 1 }{ { \omega }_{ m }C }[/latex]  >> R या  [latex]\frac { 1 }{ 2\pi { f }_{ m }C }[/latex]  >> R

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments (किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments (किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 9
Chapter Name Ray Optics and Optical Instruments (किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र)
Number of Questions Solved 172
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments (किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
2.5 cm साइज़ की कोई छोटी मोमबत्ती 36 cm वक्रता त्रिज्या के किसी अवतल दर्पण से 27 cm दूरी पर रखी है। दर्पण से किसी परदे को कितनी दूरी पर रखा जाए कि उसका सुस्पष्ट प्रतिबिम्ब परदे पर बने। प्रतिबिम्ब की प्रकृति और साइज़ का वर्णन कीजिए। यदि मोमबत्ती को दर्पण की ओर ले जाएँ, तो परदे को किस ओर हटाना पड़ेगा?
हल-
दिया है, u = -27 सेमी, O = 2.5 सेमी
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अत: प्रतिबिम्ब वास्तविक, उल्टा तथा 5 सेमी ऊँचा है। यदि मोमबत्ती को पर्दे की ओर ले जायें, तो पर्दे को दर्पण से दूर ले जाना होगा। यदि मोमबत्ती को 18 सेमी से कम दूरी तक खिसकायें, तो प्रतिबिम्ब आभासी बनेगा तथा पर्दे पर प्राप्त नहीं होगा।

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प्रश्न 2.
4.5 cm साइज़ की कोई सुई 15 cm फोकस दूरी के किसी उत्तल दर्पण से 12 cm दूर रखी है। प्रतिबिम्ब की स्थिति तथा आवर्धन लिखिए। क्या होता है जब सुई को दर्पण से दूर ले जाते हैं? वर्णन कीजिए।
हल-
यहाँ सुई का आकार O = 4.5 सेमी; उत्तल दर्पण की फोकस दूरी f = 15 सेमी। दर्पण से वस्तु (सुई) की दूरी u = -12 सेमी
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अर्थात् प्रतिबिम्ब सीधा (आभासी) तथा 2.5 सेमी लम्बा (ऊँचा) बनेगा।
जब सुई को दर्पण से दूर ले जाते हैं तो इसका प्रतिबिम्ब दर्पण से दूर फोकस की ओर खिसकेगा तथा इसका आकार घटता जायेगा।

प्रश्न 3.
कोई टैंक 12.5 cm ऊँचाई तक जल से भरा है। किसी सूक्ष्मदर्शी द्वारा बीकर की तली पर पड़ी किसी सुई की आभासी गहराई 9.4 cm मापी जाती है। जल का अपवर्तनांक क्या है? बीकर में उसी ऊँचाई तक जल के स्थान पर किसी 1.63 अपवर्तनांक के अन्य द्रव से प्रतिस्थापन करने पर सुई को पुनः फोकसित करने के लिए सूक्ष्मदर्शी को कितना ऊपर/नीचे ले जाना होगा?
हल-
सुई की वास्तविक गहराई h = 12.5 सेमी
आभासी गहराई h’ = 9.4 सेमी
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पहले सूक्ष्मदर्शी 9.4 सेमी पर फोकस था अतः इसका नीचे की ओर विस्थापन = (9.4 – 1.7) सेमी = 1.7 सेमी

प्रश्न 4.
चित्र 9.1 (a) तथा (b) में किसी आपतित किरण का अपवर्तन दर्शाया गया है जो वायु में क्रमशः काँच-वायु तथा जल-वायु अन्तरापृष्ठ के अभिलम्ब से 60° का कोण बनाती है। उस आपतित किरण का अपवर्तन कोण ज्ञात कीजिए, जो जल में जल-काँच अन्तरापृष्ठ के अभिलम्ब से 45° का कोण बनाती है [चित्र 9.1(c)]
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q4.1

प्रश्न 5.
जल से भरे 80 cm गहराई के किसी टैंक की तली पर कोई छोटा बल्ब रखा गया है। जल के पृष्ठ का वह क्षेत्र ज्ञात कीजिए जिससे बल्ब का प्रकाश निर्गत हो सकता है। जल का अपवर्तनांक 1.33 है। (बल्ब को बिन्दु प्रकाश स्रोत मानिए)
हल-
टैंक की तली में रखे बल्ब से निकलने वाली प्रकाश किरणें जल के पृष्ठ से तभी निर्गत होंगी, जबकि आपतन कोण जल-वायु अन्तरापृष्ठ के लिए क्रान्तिक कोण C से कम (UPBoardSolutions.com) अथवा उसके बराबर हो। यदि उसे पृष्ठ के क्षेत्रफल की त्रिज्या हो जिससे बल्ब का प्रकाश निकल रहा है, तो यह स्थिति चित्र 9.2 की भाँति होगी जहाँ h बल्ब की जल के तल से गहराई है।
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प्रश्न 6.
कोई प्रिज्म अज्ञात अपवर्तनांक के काँच का बना है। कोई समान्तर प्रकाश-पुंज इस प्रिज्म के किसी फलक पर आपतित होता है। प्रिज्म का न्यूनतम विचलन कोण 40° मापा गया। प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक क्या है? प्रिज्म का अपवर्तन कोण 60° है। यदि प्रिज्म को जल (अपवर्तनांक 1.33) में रख दिया जाए तो प्रकाश के समान्तर पुंज के लिए नए न्यूनतम विचलन कोण का परिकलन कीजिए।
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प्रश्न 7.
अपवर्तनांक 1.55 के काँच से दोनों फलकों की समान वक्रता त्रिज्या के उभयोत्तल लेन्स निर्मित करने हैं। यदि 20 cm फोकस दूरी के लेन्स निर्मित करने हैं तो अपेक्षित वक्रता त्रिज्या क्या होगी?
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प्रश्न 8.
कोई प्रकाश-पुंज किसी बिन्दु P पर अभिसरित होता है। कोई लेन्स इस अभिसारी पुंज के पथ में बिन्दु P से 12 cm दूर रखा जाता है। यदि यह
(a) 20 cm फोकस दूरी का उत्तल लेन्स है,
(b) 16 cm फोकस दूरी का अवतल लेन्स है तो प्रकाश-पुंज किस बिन्दु पर अभिसरित होगा?
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प्रश्न 9.
3.0 cm ऊँची कोई बिम्ब 21 cm फोकस दूरी के अवतल लेन्स के सामने 14 cm दूरी पर रखी है। लेन्स द्वारा निर्मित प्रतिबिम्ब का वर्णन कीजिए। क्या होता है जब बिम्ब लेन्स से दूर हटती जाती है?
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अतः प्रतिबिम्ब 1.8 cm लम्बा आभासी तथा सीधा होगा, जो लेन्स के बायीं ओर उससे 8.4 cm की दूरी पर बनेगा। जैसे-जैसे बिम्ब लेन्स से दूर हटती है, (u → ∞) वैसे-वैसे प्रतिबिम्ब फोकस के समीप खिसकता जाता है (v → f)।

प्रश्न 10.
किसी 30 cm फोकस दूरी के उत्तल लेन्स के सम्पर्क में रखे 20 cm फोकस दूरी के अवतल लेन्स के संयोजन से बने संयुक्त लेन्स (निकाय) की फोकस दूरी क्या है? यह तन्त्र अभिसारी लेन्स है अथवा अपसारी? लेन्सों की मोटाई की उपेक्षा कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q10

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प्रश्न 11.
किसी संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में 2.0 cm फोकस दूरी का अभिदृश्यक लेन्स तथा 6.25 cm फोकस दूरी का नेत्रिका लेन्स एक-दूसरे से 15 cm दूरी पर लगे हैं। किसी बिम्ब को अभिदृश्यक से कितनी दूरी पर रखा जाए कि अन्तिम प्रतिबिम्ब
(a) स्पष्ट दृष्टि की अल्पतम दूरी (25 cm), तथा
(b) अनन्त पर बने? दोनों स्थितियों में सूक्ष्मदर्शी की आवर्धन क्षमता ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, अभिदृश्यक लेन्स की फोकस दूरी fe = 2.0 सेमी
नेत्रिका लेन्स की (UPBoardSolutions.com) फोकस दूरी f0 = 6.25 सेमी।
दोनों लेन्सों के बीच की दूरी L = 15 सेमी
स्पष्ट दृष्टि की अल्पतम दूरी D = 25 सेमी
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q11.1
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प्रश्न 12.
25 cm के सामान्य निकट बिन्दु को कोई व्यक्ति ऐसे संयुक्त सूक्ष्मदर्शी जिसका अभिदृश्यक 8.0 mm फोकस दूरी तथा नेत्रिका 2.5 cm फोकस दूरी की है, का उपयोग करके अभिदृश्यक से 9.0 mm दूरी पर रखे बिम्ब को सुस्पष्ट फोकसित कर लेता है। दोनों लेन्सों के बीच पृथक्कन दूरी क्या है? सूक्ष्मदर्शी की आवर्धन क्षमता क्या है?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q12
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प्रश्न 13.
किसी छोटी दूरबीन के अभिदृश्यक की फोकस दूरी 144 cm तथा नेत्रिका की फोकस दूरी 6.0 cm है। दूरबीन की आवर्धन क्षमता कितनी है? अभिदृश्यक तथा नेत्रिका के बीच पृथक्कन दूरी क्या है?
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प्रश्न 14.
(a) किसी वेधशाला की विशाल दूरबीन के अभिदृश्यक की फोकस दूरी 15 m है। यदि 1.0 cm फोकस दूरी की नेत्रिका प्रयुक्त की गयी है तो दूरबीन का कोणीय आवर्धन क्या है?
(b) यदि इस दूरबीन का उपयोग चन्द्रमा का अवलोकन करने में किया जाए तो अभिदृश्यक लेन्स द्वारा निर्मित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का व्यास क्या है? चन्द्रमा का व्यास 3.48 x 106 m तथा चन्द्रमा की कक्षा की त्रिज्या 3.8 x 108 m है।
हल-
दिया है, दूरबीन के अभिदृश्यक लेन्स की फोकस दूरी f0 = 15 मीटर
नेत्रिका की फोकस दूरी fe = 1.0 सेमी = 1.0 x 10-2 मीटर
(a) कोणीय आवर्धन
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q14
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प्रश्न 15.
दर्पण-सूत्र का उपयोग यह व्युत्पन्न करने के लिए कीजिए कि
(a) किसी अवतल दर्पण के हैं तथा 2f के बीच रखे बिम्ब का वास्तविक प्रतिबिम्ब 2f से दूर बनता है।
(b) उत्तल दर्पण द्वारा सदैव आभासी प्रतिबिम्ब बनता है जो बिम्ब की स्थिति पर निर्भर नहीं करता।
(c) उत्तल दर्पण द्वारा सदैव आकार में छोटा प्रतिबिम्ब, दर्पण के ध्रुव व फोकस के बीच बनता
(d) अवतल दर्पण के ध्रुव तथा फोकस के बीच रखे बिम्ब का आभासी तथा बड़ा प्रतिबिम्ब बनता है।
[नोट: यह अभ्यास आपकी बीजगणितीय विधि द्वारा उन प्रतिबिंबों के गुण व्युत्पन्न करने में सहायता करेगा जिन्हें हम किरण आरेखों द्वारा प्राप्त करते हैं।]
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q15.3

प्रश्न 16.
किसी मेज के ऊपरी पृष्ठ पर जड़ी एक छोटी पिन को 50 cm ऊँचाई से देखा जाता है। 15 cm मोटे आयताकार काँच के गुटके को मेज के पृष्ठ के समान्तर पिन व नेत्र के बीच रखकर उसी बिन्दु से देखने पर पिन नेत्र से कितनी दूर दिखाई देगी? काँच की अपवर्तनांक 1.5 है। क्या उत्तर गुटके की अवस्थिति पर निर्भर करता है?
हल-
काँच का अपवर्तनांक
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अतः पिन का विस्थापन x = H – h = 15 सेमी -10 सेमी = 5 सेमी
अर्थात् पिन 5 सेमी उठी प्रतीत होगी।
उत्तर गुटके की अक्ष की स्थिति पर निर्भर नहीं करता।

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प्रश्न 17.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(a) चित्र 9.5 में अपवर्तनांक 1.68 के तन्तु काँच से बनी किसी प्रकाश नलिका (लाइट पाइप) का अनुप्रस्थ परिच्छेद दर्शाया गया है। नलिका का बाह्य आवरण 1.44 अपवर्तनांक के ‘पदार्थ का बना है। नलिका के अक्ष से आपतित किरणों के कोणों का परिसर, जिनके लिए चित्र में दर्शाए अनुसार नलिका के भीतर पूर्ण परावर्तन होते हैं, ज्ञात कीजिए।
(b) यदि पाइप पर बाह्य आवरण न हो तो क्या उत्तर होगा?
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प्रश्न 18.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(a) आपने सीखा है कि समतल तथा उत्तल दर्पण सदैव आभासी प्रतिबिम्ब बनाते हैं। क्या ये दर्पण किन्हीं परिस्थितियों में वास्तविक प्रतिबिम्ब बना सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
(b) हम सदैव कहते हैं कि आभासी प्रतिबिम्ब को परदे पर केन्द्रित नहीं किया जा सकता। यद्यपि जब हम किसी आभासी प्रतिबिम्ब को देखते हैं तो हम इसे स्वाभाविक रूप में अपनी आँख की स्क्रीन (अर्थात् रेटिना) पर लेते हैं। क्या इसमें कोई विरोधाभास है?
(c) किसी झील के तट पर खड़ा मछुआरा झील के भीतर किसी गोताखोर द्वारा तिरछा देखने पर अपनी वास्तविक लम्बाई की तुलना में कैसा प्रतीत होगा-छोटा अथवा लम्बा?
(d) क्या तिरछा देखने पर किसी जल के टैंक की आभासी गहराई परिवर्तित हो जाती है? यदि हाँ, तो आभासी गहराई घटती है अथवा बढ़ जाती है।
(e) सामान्य काँच की तुलना में हीरे का अपवर्तनांक काफी अधिक होता है? क्या हीरे को तराशने वालों के लिए इस तथ्य का कोई उपयोग होता है?
उत्तर-
(a) यह सही है कि समतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण अपने सामने स्थित बिम्ब का आभासी प्रतिबिम्ब बनाते हैं। परन्तु ये दर्पण अपने पीछे स्थित किसी बिन्दु (UPBoardSolutions.com) (आभासी बिम्ब) की ओर अभिसरित किरण पुंज को परावर्तित करके अपने सामने स्थित किसी बिन्दु पर अभिसरित कर सकते हैं अर्थात् आभासी बिम्ब का वास्तविक प्रतिबिम्ब बना सकते हैं (देखें चित्र)।
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(b) जब किसी दर्पण से परावर्तन अथवा लेन्स से अपवर्तन के पश्चात् किरणें अपसरित होती हैं तो प्रतिबिम्ब को आभासी कहा जाता है। इस प्रतिबिम्ब को परदे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि इन अपसारी किरणों के मार्ग में कोई अन्य दर्पण अथवा लेन्स रखकर इन्हें किसी बिन्दु पर (UPBoardSolutions.com) अभिसरित किया जा सकता तो वहाँ वास्तविक प्रतिबिम्ब बनेगा जिसे परदे पर प्राप्त किया जा सकता है। नेत्र लेन्स वास्तव में यही कार्य करता है। यह आभासी प्रतिबिम्ब बनाने वाली अपसारी किरणों को रेटिना पर अभिसरित कर देता है, जहाँ वास्तविक प्रतिबिम्ब बन जाता है। अतः इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।

(c) चूंकि इस दशा में अपवर्तन वायु (विरल माध्यम) से पानी (सघन माध्यम) में होता है। अत: झील में डूबे हुए गोताखोर को मछुआरे की लम्बाई अधिक प्रतीत होगी।

(d) हाँ, परिवर्तित हो जाती है। आभासी गहराई घट जाती है।

(e) वायु के सापेक्ष हीरे का अपवर्तनांक 2.42 (काफी अधिक) है तथा क्रान्तिक कोण 24° (बहुत कम) है। हीरा तराशने में दक्ष कारीगर इस तथ्य का उपयोग करते हुए (UPBoardSolutions.com) हीरे को इस प्रकार तराशता है, कि एक बार हीरे में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरण हीरे के विभिन्न फलकों पर बार-बार परावर्तित होने के बाद ही किसी फलक से बाहर निकल पाए। इसके लिए हीरे की आन्तरिक सतह पर आपतन कोण 24° से अधिक होना चाहिए। इससे हीरा अत्यधिक चमकीला दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 19.
किसी कमरे की एक दीवार पर लगे विद्युत बल्ब का किसी बड़े आकार के उत्तल लेन्स द्वारा3 m दूरी पर स्थित सामने की दीवार पर प्रतिबिम्ब प्राप्त करना है। इसके लिए उत्तल लेन्स की अधिकतम फोकस दूरी क्या होनी चाहिए?
हल-
माना किसी उत्तल लेन्स की फोकस दूरी f है तथा यह बल्ब का प्रतिबिम्ब दूसरी दीवार पर बनाता है।
माना बल्ब की लेन्स से दूरी u (आंकिक मान) तथा दूसरी दीवार की लेन्स से दूरी v है, तब
u + v = 3 ⇒ u = 3 – v
लेन्स के सूत्र में चिह्न सहित मान रखने पर,
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प्रश्न 20.
किसी परदे को बिम्ब से 90 cm दूर रखा गया है। परदे पर किसी उत्तल लेन्स द्वारा उसे एक-दूसरे से 20 cm दूर स्थितियों पर रखकर, दो प्रतिबिम्ब बनाए जाते हैं। लेन्स की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।
हल-
माना बिम्ब की लेन्स से दूरी u (आंकिक मान) है तथा प्रतिबिम्ब (परदे) की लेन्स से दूरी v है।
u + v = 90 ⇒ v = 90 – u
लेन्स के सूत्र में चिह्न सहित मान रखने पर,
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प्रश्न 21.
(a) प्रश्न 10 के दो लेन्सों के संयोजन की प्रभावी फोकस दरी उस स्थिति में ज्ञात कीजिए जब उनके मुख्य अक्ष संपाती हैं तथा ये एक-दूसरे से 8 cm दूरी पर रखे हैं। क्या उत्तर आपतित समान्तर प्रकाश पुंज की दिशा पर निर्भर करेगा? क्या इस तन्त्र के लिए प्रभावी फोकस दूरी किसी भी रूप में उपयोगी है ?
(b) उपर्युक्त व्यवस्था (a) में 1.5 cm ऊँचा कोई बिम्ब उत्तल लेन्स की ओर रखा है। बिम्ब की उत्तल लेन्स से दूरी 40 cm है। दो लेन्सों के तन्त्र द्वारा उत्पन्न आवर्धन तथा प्रतिबिम्ब का आकार ज्ञात कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q21.3

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प्रश्न 22.
60° अपवर्तन कोण के प्रिज्म के फलक पर किसी प्रकाशकिरण को किस कोण पर आपतित कराया जाए कि इसका दूसरे फलक से केवल पूर्ण आन्तरिक परावर्तन ही हो? प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक 1.524 है।
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प्रश्न 23.
आपको विविध कोणों के क्राउन काँच व फ्लिंट काँच के प्रिज्म दिए गए हैं। प्रिज्मों का कोई ऐसा संयोजन सुझाइए जो
(a) श्वेत प्रकाश के संकीर्ण पुंज को बिना अधिक परिक्षेपित किए विचलित कर दे।
(b) श्वेत प्रकाश के संकीर्ण पुंज को अधिक विचलित किए बिना परिक्षेपित (तथा विस्थापित)। कर दे।
उत्तर-
हम जानते हैं कि फ्लिण्ट काँच, क्राउन काँच की तुलना में अधिक विक्षेपण उत्पन्न करता है।
(a) बिना विक्षेपण के विचलन (UPBoardSolutions.com) उत्पन्न करने हेतु क्राउन काँच का एक प्रिज्म लीजिए तथा एक फ्लिण्टे काँच का प्रिज्म लीजिए जिसका अपवर्तक कोण अपेक्षाकृत कम हो। अब इन्हें एक-दूसरे के सापेक्ष उल्टा रखते हुए सम्पर्क में रखिए। इस प्रकार बना संयोजन श्वेत प्रकाश को बिना अधिक परिक्षेपित किए विचलित कर देगा।

(b) पुराने संयोजन में लिए गए फ्लिण्ट काँच के प्रिज्म के अपवर्तक कोण में वृद्धि कीजिए (परन्तु अभी भी यह कोण दूसरे प्रिज्म की तुलना में कम ही रहेगा)। यह व्यवस्था पुंज को बिना अधिक विचलित किए परिक्षेपण उत्पन्न करेगी।

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प्रश्न 24.
सामान्य नेत्र के लिए दूर बिन्दु अनन्त पर तथा स्पष्ट दर्शन का निकट बिन्दु नेत्र के सामने लगभग 25 cm पर होता है। नेत्र का स्वच्छ मण्डल (कॉर्निया) लगभग 40 डायोप्टर की अभिसरण क्षमता प्रदान करता है तथा स्वच्छ मण्डल के पीछे नेत्र लेन्स की अल्पतम अभिसरण क्षमता लगभग 20 डायोप्टर होती है। इस स्थूल आँकड़े से सामान्य नेत्र के परास (अर्थात नेत्र लेन्स की अभिसरण क्षमता का परिसर) का अनुमान लगाइए।
हल-
दिया है, कॉर्निया की अभिसरण क्षमता = +40 D
नेत्र लेन्स की अभिसरण क्षमता = +20 D
अत: कॉर्निया तथा नेत्र लेन्स की कुल अभिसरण क्षमता
P = (40 + 20) D = 60 D
अनन्त पर स्थित वस्तुओं के लिए नेत्र न्यूनतम अभिसरण क्षमता का प्रयोग करता है।
अत: उपर्युक्त क्षमता न्यूनतम अभिसरण क्षमता होगी। इसलिए नेत्र लेन्स की अधिकतम फोकस दूरी
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प्रश्न 25.
क्या निकट दृष्टिदोष अथवा दीर्घ दृष्टिदोष आवश्यक रूप से यह ध्वनित होता है कि नेत्र ने अपनी समंजन क्षमता आंशिक रूप से खो दी है? यदि नहीं, तो इन दृष्टिदोषों का क्या कारण हो सकता है?
हल-
यह आवश्यक नहीं है कि निकट दृष्टिदोष अथवा दूर दृष्टिदोष केवल नेत्र के आंशिक रूप से अपनी समंजन क्षमता खो देने के कारण ही उत्पन्न होता है। यह नेत्र गोलक के सामान्य आकार से बड़ा अथवा छोटा होने के कारण भी उत्पन्न हो सकता है।

प्रश्न 26.
निकट दृष्टिदोष का कोई व्यक्ति दूर दृष्टि के लिए -1.0 D क्षमता का चश्मा उपयोग कर रहा है। अधिक आयु होने पर उसे पुस्तक पढ़ने के लिए अलग से +2.0 D क्षमता के चश्मे की आवश्यकता होती है। स्पष्ट कीजिए ऐसा क्यों हुआ?
हल-
– 1.0 D क्षमता के संगत फोकस दूरी
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अत: प्रारम्भ में नेत्र की स्वस्थ अवस्था में व्यक्ति 1.00 मीटर दूरी तक की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है।
अधिक आयु होने पर नेत्र की समंजन (UPBoardSolutions.com) क्षमता कम हो जाने के कारण नेत्र लेन्स का निकट बिन्दु और दूर विस्थापित हो जाता है। अत: व्यक्ति में जरा दृष्टि दोष है। इस दशा में प्रयुक्त उत्तल लेन्स की क्षमता
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चूँकि निकट बिन्दु 25 सेमी से 50 सेमी पर विस्थापित हो गया है, अतः जरी दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति 50 सेमी से 100 सेमी तक के बीच की वस्तु देख सकता है।

प्रश्न 27.
कोई व्यक्ति ऊर्ध्वाधर तथा क्षैतिज धारियों की कमीज पहने किसी दूसरे व्यक्ति को देखता है। वह क्षैतिज धारियों की तुलना में ऊर्ध्वाधर धारियों को अधिक स्पष्ट देख पाता है। ऐसा किस दृष्टिदोष के कारण होता है? इस दृष्टिदोष का संशोधन कैसे किया जाता है?
हल-
यह घटना अबिन्दुकता नामक दृष्टिदोष के कारण होती है। सामान्य नेत्र पूर्णतः गोलीय होता है। तथा इसके विभिन्न तलों की वक्रता सर्वत्र समान होती है। परन्तु अबिन्दुकता दोष में कॉर्निया पूर्णतः गोलीय नहीं रह जाता तथा इसके विभिन्न तलों की वक्रताएँ समान नहीं रह पातीं। प्रश्नानुसार व्यक्ति (UPBoardSolutions.com) ऊध्र्वाधर धारियों को स्पष्ट देख पाता है परन्तु क्षैतिज धारियों को नहीं। इससे स्पष्ट है कि नेत्र में ऊर्ध्वाधर तल में पर्याप्त वक्रता है जिसके कारण ऊर्ध्वाधर रेखाएँ दृष्टि पटल पर स्पष्ट फोकस हो रही हैं। परन्तु क्षैतिज तल की वक्रता पर्याप्त नहीं है। इस दोष को सिलिण्डरी लेन्स की सहायता से दूर किया जा सकता है।

प्रश्न 28.
कोई सामान्य निकट बिन्दु (25 cm) का व्यक्ति छोटे अक्षरों में छपी वस्तु को 5 cm फोकस दूरी के पतले उत्तल लेन्स के आवर्धक लेन्स का उपयोग करके पढ़ता है।
(a) वह निकटतम तथा अधिकतम दूरियाँ ज्ञात कीजिए जहाँ वह उस पुस्तक को आवर्धक लेन्स द्वारा पढ़ सकता है।
(b) उपर्युक्त सरल सूक्ष्मदर्शी के उपयोग द्वारा संभावित अधिकतम तथा न्यूनतम कोणीय आवर्धन (आवर्धन क्षमता) क्या है?
हल-
(a) वस्तु को निकटतम दूरी से देखने के लिए वस्तु का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी अर्थात् निकट बिन्दु पर बनना चाहिए। अत: v = -25 सेमी
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q28.1

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प्रश्न 29.
कोई कार्ड शीट जिसे 1 mm2 साइज़ के वर्गों में विभाजित किया गया है, को 9 cm दूरी पर रखकर किसी आवर्धक लेन्स (10 cm फोकस दूरी का अभिसारी लेन्स) द्वारा उसे नेत्र के निकट रखकर देखा जाता है।
(a) लेन्स द्वारा उत्पन्न आवर्धन (प्रतिबिम्ब-साइज़/वस्तु-साइज़) क्या है? आभासी प्रतिबिम्ब में प्रत्येक वर्ग का क्षेत्रफल क्या है?
(b) लेन्स का कोणीय आवर्धन (आवर्धन क्षमता) क्या है?
(c) क्या (a) में आवर्धन क्षमता (b) में आवर्धन के बराबर है? स्पष्ट कीजिए।
हल-
(a) दिया है, u = -9 सेमी, f = +10 सेमी
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(c) बराबर नहीं है; क्योंकि लेन्स द्वारा उत्पन्न ‘आवर्धन तथा लेन्स की आवर्धन क्षमता अलग-अलग भौतिक राशियाँ हैं। ये तभी बराबर होंगी यदि प्रतिबिम्ब नेत्र के निकट बिन्दु (= 25 सेमी) पर बने।

प्रश्न 30.
(a) प्रश्न 29 में लेन्स को चित्र से कितनी दूरी पर रखा जाए ताकि वर्गों को अधिकतम संभव आवर्धन क्षमता के साथ सुस्पष्ट देखा जा सके।
(b) इस उदाहरण में आवर्धन (प्रतिबिम्ब-साइज़/वस्तु-साइज़) क्या है?
(c) क्या इस प्रक्रम में आवर्धन, आवर्धन क्षमता के बराबर है? स्पष्ट कीजिए।
हल-
(a) अधिकतम आवर्धन क्षमता के लिए, v = D = -25 cm, f = 10 सेमी
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q30.1
हाँ, इस स्थिति में आवर्धन, आवर्धन क्षमता के बराबर है, क्योंकि प्रतिबिम्ब नेत्र के निकट बिन्दु D = 25 सेमी पर बनता है।

प्रश्न 31.
प्रश्न 30 में वस्तु तथा आवर्धक लेन्स के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए ताकि आभासी प्रतिबिम्ब में प्रत्येक वर्ग 6.25 mm क्षेत्रफल का प्रतीत हो? क्या आप आवर्धक लेन्स को नेत्र के अत्यधिक निकट रखकर इन वर्गों को सुस्पष्ट देख सकेंगे।
[नोट: अभ्यास 9.29 से 9.31 आपको निरपेक्ष साइज में आवर्धन तथा किसी यन्त्र की आवर्धन क्षमता (कोणीय आवर्धन) के बीच अन्तर को स्पष्टतः समझने में सहायता करेंगे।]
हल-
दिया है, f = 10 सेमी, वस्तु के प्रत्येक वर्ग को क्षेत्रफल A0 = 1 मिमी2
प्रतिबिम्ब के प्रत्येक वर्ग का क्षेत्रफल, Al = 6.25 मिमी2
क्षेत्रीय आवर्धन,
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चूंकि आभासी प्रतिबिम्ब 15 सेमी पर है तथा स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी 25 सेमी है। अत: प्रतिबिम्ब नेत्र को सुस्पष्ट दिखाई नहीं देगा।

प्रश्न 32.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(a) किसी वस्तु द्वारा नेत्र पर अन्तरित कोण आवर्धक लेन्स द्वारा उत्पन्न आभासी प्रतिबिम्ब द्वारा नेत्र पर अन्तरित कोण के बराबर होता है। तब.फिर किन अर्थों में कोई आवर्धक लेन्स कोणीय आवर्धन प्रदान करता है?
(b) किसी आवर्धक लेन्स से देखते समय प्रेक्षक अपने नेत्र को लेन्स से अत्यधिक सटाकर रखता है। यदि प्रेक्षक अपने नेत्र को पीछे ले जाए तो क्या कोणीय आवर्धन परिवर्तित हो जाएगा?
(c) किसी सरल सूक्ष्मदर्शी की आवर्धन (UPBoardSolutions.com) क्षमता उसकी फोकस दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है। तब हमें अधिकाधिक आवर्धन क्षमता प्राप्त करने के लिए कम-से-कम फोकस दूरी के उत्तल लेन्स का उपयोग करने से कौन रोकता है?
(d) किसी संयुक्त सूक्ष्मदर्शी के अभिदृश्यक लेन्स तथा नेत्रिका लेन्स दोनों ही की फोकस दूरी कम क्यों होनी चाहिए?
(e) संयुक्त सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखते समय सर्वोत्तम दर्शन के लिए हमारे नेत्र, नेत्रिका पर स्थित न होकर उससे कुछ दूरी पर होने चाहिए। क्यों? नेत्र तथा नेत्रिका के बीच की यह अल्प दूरी कितनी होनी चाहिए?
उत्तर-
(a) आवर्धक लेन्स के बिना वस्तु को देखते समय उसे नेत्र से 25 cm से कम दूरी पर नहीं रखा जा सकता, परन्तु लेन्स की सहायता से वस्तु को देखते समय वस्तु को अपेक्षाकृत नेत्र के अधिक समीप रखा जा सकता है जिससे कि अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बने। इस प्रकार कोणीय साइज में वृद्धि वस्तु को नेत्र के समीप रखने के कारण होती है।

(b) हाँ, क्योंकि इस स्थिति में प्रतिबिम्ब द्वारा नेत्र पर बना दर्शन कोण, उसके द्वारा लेन्स पर बने दर्शन कोण से कुछ छोटा हो जाएगा।

(c) एक-तो अत्यन्त कम फोकस दूरी के लेन्सों (मोटे लेन्सों) को बनाने की प्रक्रिया आसान नहीं है, दूसरे फोकस दूरी घटने के साथ लेन्सों में विपथन का दोष बढ़ने (UPBoardSolutions.com) लगती है। इससे उनके द्वारा बने प्रतिबिम्ब अस्पष्ट हो जाते हैं। व्यवहार में किसी एकल उत्तल लेन्स द्वारा 3 से अधिक आवर्धन प्राप्त करना सम्भव नहीं है परन्तु विपथन के दोष से मुक्त लेन्स द्वारा कहीं अधिक आवर्धन (लगभग 10) प्राप्त किया जा सकता है।
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(e) संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में वस्तु से चलने वाला प्रकाश अभिदृश्यक से गुजरने के बाद नेत्रिका से गुजरकर आँख तक पहुँचता है। वस्तु का प्रतिबिम्ब स्पष्ट देखने के लिए (UPBoardSolutions.com) आवश्यक है कि वस्तु से चलने वाला अधिकतम प्रकाश नेत्र में पहुँचे। वस्तु से चलने वाले प्रकाश को अधिकतम मात्रा में ग्रहण करने के लिए ही नेत्र को नेत्रिका से अत्यल्प दूरी पर रखा जाता है। यह अत्यल्प दूरी यन्त्र की संरचना पर निर्भर करती है तथा उस पर लिखी गई होती है।

प्रश्न 33.
1.25 cm फोकस दूरी का अभिदृश्यक तथा 5 cm फोकस दूरी की नेत्रिका का उपयोग करके वांछित कोणीय आवर्धन (आवर्धन क्षमता) 30X होता है। आप संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का समायोजन कैसे करेंगे?
हल-
जब अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनता है तो यह संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का सामान्य समायोजन होता है। इसमें
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q33
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अतः संयुक्त सूक्ष्मदर्शी के समायोजन में अभिदृश्यक तथा नेत्रिका को परस्पर 11.67 सेमी दूरी पर रखना होगा तथा वस्तु को अभिदृश्यक के सामने इससे 1.5 सेमी की दूरी पर रखना होगा।

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प्रश्न 34.
किसी दूरबीन के अभिदृश्यक की फोकस दूरी 140 cm तथा नेत्रिका की फोकस दूरी 5.0 cm है। दूर की वस्तुओं को देखने के लिए दूरबीन की आवर्धन क्षमता क्या होगी जब-
(a) दूरबीन का समायोजन सामान्य है (अर्थात अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्त पर बनता है)।
(b) अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी (25 cm) पर बनता है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q34

प्रश्न 35.
(a) प्रश्न 34 (a) में वर्णित दूरबीन के लिए अभिश्यक लेन्स तथा नेत्रिका के बीच पृथक्कन दूरी क्या है?
(b) यदि इस दूरबीन का उपयोग 3 km दूर स्थित 100 m ऊँची मीनार को देखने के लिए किया जाता है तो अभिदृश्यक द्वारा बने मीनार के प्रतिबिम्ब की ऊँचाई क्या है?
(c) यदि अन्तिम प्रतिबिम्ब 25 cm दूर बनता है तो अन्तिम प्रतिबिम्ब में मीनार की ऊँचाई क्या है?
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प्रश्न 36.
किसी कैसेग्रेन दूरबीन में चित्र 9.9 में दर्शाए अनुसार दो दर्पणों का प्रयोग किया। द्वतीयक गया है। इस दूरबीन में दोनों दर्पण एक-दूसरे से 20 mm दूर रखे गए हैं। यदि बड़े दर्पण की वक्रता त्रिज्या 220 mm हो तथा छोटे दर्पण की वक्रता त्रिज्या 140 mm हो तो अनन्त पर रखे चित्र 9.9 किसी बिम्ब का अन्तिम प्रतिबिम्ब कहाँ बनेगा?
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q36.1
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प्रश्न 37.
किसी गैल्वेनोमीटर की कुण्डली से जुड़े समतल दर्पण पर लम्बवत आपतित प्रकाश (चित्र 9.11) दर्पण से टकराकर अपना पथ पुनः अनुरेखित करता है। गैल्वेनोमीटर की कुण्डली में प्रवाहित कोई धारा दर्पण में 3.5° का परिक्षेपण उत्पन्न करती है। दर्पण के सामने 1.5 m की दूरी पर रखे परदे पर प्रकाश के परावर्ती चिह्न में कितना विस्थापन होगा?
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प्रश्न 38.
चित्र 9.12 में कोई समोत्तल लेन्स (अपवर्तनांक 1.50) किसी समतल दर्पण के फलक पर किसी द्रव की परत के सम्पर्क में दर्शाया गया है। कोई छोटी सुई जिसकी नोक मुख्य अक्ष पर है, अक्ष के अनुदिश ऊपर-नीचे गति कराकर इस प्रकार समायोजित की जाती है कि सुई की नोक का उल्टा प्रतिबिम्ब सुई की स्थिति पर ही बने। इस स्थिति में सुई की लेन्स से दूरी 45.0 cm है। द्रव को हटाकर प्रयोग को दोहराया जाता है। नयी दूरी 30.0 cm मापी जाती है। द्रव का काम अपवर्तनांक क्या है?
हुल-
द्रव को हटाकर प्रयोग करते समय इस स्थिति में सुई से चलने वाली किरणें काँच के लेन्स से अपवर्तित होकर समतल दर्पण पर अभिलम्बवत् आपतित होती हैं। दर्पण इन किरणों को वापस उन्हीं के मार्ग पर लौटा देता है जिससे किरणें वापस सुई की स्थिति में ही प्रतिबिम्ब बनाती हैं।
यह स्पष्ट है कि दर्पण की अनुपस्थिति में लेन्स से अपवर्तित किरणें अनन्त पर मिलती हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments Q38
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अपवर्तन की घटना में निम्न में से कौन-सी राशि अपरिवर्तित रहती है? (2012)
(i) प्रकाश की चाल
(ii) प्रकाश की तीव्रता
(iii) प्रकाश की तरंगदैर्घ्य
(iv) प्रकाश की आवृत्ति
उत्तर-
(iv) प्रकाश की आवृत्ति

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प्रश्न 3.
आकाश नीला दिखाई देता है- (2014, 17)
(i) प्रकीर्णन के कारण
(ii) परावर्तन के कारण
(iii) अपवर्तन के कारण
(iv) पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के कारण
उत्तर-
(i) प्रकीर्णन के कारण

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प्रश्न 4.
निरपेक्ष अपवर्तनांक का मान है-
(i) n < 1
(ii) n > 1
(iii) 1 > n > 0
(iv) ∞ > n > 0
उत्तर-
(ii) n > 1

प्रश्न 5.
एक उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 20 सेमी है। एक वस्तु दर्पण के सामने ध्रुव से 20 सेमी की दूरी पर रखे जाने पर प्रतिबिम्ब की दूरी ध्रुव से होती है- (2014)
(i) 40 सेमी
(ii) 10 सेमी
(iii) 20 सेमी
(iv) अनन्त पर
उत्तर-
(ii) 10 सेमी

प्रश्न 6.
यदि किसी माध्यम से निर्वात में सम्पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के लिए क्रान्तिक कोण 30° है, तो माध्यम में प्रकाश का वेग है- (2015, 17)
(i) 3 x 108 भी/से
(ii) 1.5 x 108 मी/से।
(iii) 6 x 108 मी/से
(iv) 4.5 x 108 मी/से
उत्तर-
(ii) 1.5 x 108 मी/से

प्रश्न 7.
यदि सघन माध्यम में आपतन कोण, क्रान्तिक कोण के बराबर हो, तो अपवर्तन कोण होगा- (2016, 17)
(i) 0°
(ii) 45°
(iii) 90°
(iv) 180°
उत्तर-
(iii) 90°

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प्रश्न 8.
यदि विरल तथा सघन माध्यम में प्रकाश की चाल क्रमशः v1 तथा v2 हों तथा सघन माध्यम में क्रांतिक कोण C है, तब (2016)
(i) v1 = v2 sinC
(ii) v1 = v2 cosC
(iii) v1 = v2 tanC
(iv) v1 = v2 cosec C
उत्तर-
(iv) v1 = v2 cosec C

प्रश्न 9.
वायु के सापेक्ष जल और काँच के अपवर्तनांक क्रमशः एवं हैं। काँच का जल के सापेक्ष अपवर्तनांक होगा- (2017)
(i) [latex]\frac { 1 }{ 3 }[/latex]
(ii) [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex]
(iii) [latex]\frac { 5 }{ 4 }[/latex]
(iv) [latex]\frac { 20 }{ 9 }[/latex]
उत्तर-
(iii) [latex]\frac { 5 }{ 4 }[/latex]

प्रश्न 10.
वायु में प्रकाश की चाल 3.0 x 108 मीटर/सेकण्ड है। 1.5 अपवर्तनांक वाले काँच में प्रकाश की चाल होगी- (2017)
(i) 1.5 x 108 मी/से।
(ii) 2.0 x 108 मी/से
(iii) 1.8 x 108 मी/से
(iv) 2.5 x 108 मी/से
उत्तर-
(ii) 2.0 x 108 मी/से

प्रश्न 11.
किसी गोलीय दर्पण की फोकस दूरी (f) एवं वक्रता त्रिज्या (R) में सम्बन्ध है- (2017)
(i) R = [latex]\frac { f }{ 2 }[/latex]
(ii) f = 3R
(ii) f = [latex]\frac { R }{ 2 }[/latex]
(iv) f = [latex]\frac { R }{ 4 }[/latex]
उत्तर-
(iii) [latex]\frac { R }{ 2 }[/latex]

प्रश्न 12.
दो लेन्स जिनकी क्षमताएँ 5D तथा -3D हैं, सम्पर्क में रखे हैं। संयुक्त लेन्स की फोकस दूरी है- (2012, 13, 15)
(i) 50 सेमी
(ii) 75 सेमी
(iii) 25 सेमी
(iv) 20 सेमी
उत्तर-
(i) 50 सेमी

प्रश्न 13.
4 डायोप्टर और -2 डायोप्टर क्षमता के दो लेन्स सम्पर्क में रखे हैं। संयुक्त लेन्स की फोकस दूरी होगी- (2013, 16, 17)
(i) 50 सेमी
(ii)-50 सेमी
(iii) 25 सेमी
(iv) -25 सेमी
उत्तर-
(i) 50 सेमी

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प्रश्न 14.
एक समतल-उत्तल लेन्स में उत्तल पृष्ठ की वक्रता-त्रिज्या 10 सेमी और लेन्स की फोकस दूरी 30 सेमी है। लेन्स के पदार्थ का अपवर्तनांक है- (2011)
(i) 1.5
(ii) 1.66
(iii) 1.33
(iv) 0.3
उत्तर-
(iii) 1.33

प्रश्न 15.
सम्पर्क में रखे दो पतले लेन्सों की फोकस दूरियाँ 25 सेमी तथा -40 सेमी हैं। इस संयोजन की क्षमता होगी- (2010)
(i) -6.67 D
(ii) -2.5 D
(iii) +1.5 D
(iv) +4 D
उत्तर-
(iii) + 1.5 D

प्रश्न 16.
सम्पर्क में रखे उत्तल एवं अवतल लेन्स की फोकस दूरियाँ क्रमशः 12 सेमी और 18 सेमी हैं। संयुक्त लेन्स की फोकस दूरी होगी- (2014)
(i) 50 सेमी
(ii) 45 सेमी
(iii) 36 सेमी
(iv) 18 सेमी
उत्तर-
(iv) 18 सेमी

प्रश्न 17.
0.5 मी फोकस दूरी के एक उत्तल लेन्स को 1 मी फोकस दूरी के अवतल लेन्स के सम्पर्क में रखा गया है। संयुक्त लेन्स की फोकस दूरी है- (2010)
(i) 1 मी।
(ii) -1 मी
(iii) 0.5 मी
(iv) -0.5 मी
उत्तर-
(i) 1 मी

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प्रश्न 18.
एक पदार्थ जिसका अपवर्तनांक n = 1.51 है, से एक पतला लेन्स बना है। लेन्स की दोनों सतह उत्तल हैं। इसे जल (n = 1.33) में डुबोया गया है। यह लेन्स व्यवहार करेगा- (2010)
(i) एक अभिसारी लेन्स की तरह
(ii) एक अपसारी लेन्स की तरह
(iii) काँच के एक आयताकार टुकड़े की तरह
(iv) एक प्रिज्म की तरह
उत्तर-
(i) एक अभिसारी लेन्स की तरह

प्रश्न 19.
यदि 1.5 अपवर्तनांक के समोत्तल लेन्स की वक्रता-त्रिज्या 10 सेमी, हो तो इस लेन्स की क्षमता होगी- (2011)
(i) 10D
(ii) 5D
(iii) -10D
(iv) -5D
उत्तर-
(ii) 5D

प्रश्न 20.
एक उत्तल लेन्स की क्षमता 2 डायोप्टर है। इसकी फोकस-दूरी होगी- (2015)
(i) 20 सेमी
(ii) 50 सेमी
(iii) 40 सेमी
(iv) 60 सेमी
उत्तर-
(ii) 50 सेमी

प्रश्न 21.
एक उत्तल लेन्स मुख्य अक्ष पर रखी बिन्दु वस्तु का वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाता है। यदि लेन्स के ऊपरी अर्द्ध भाग को काला कर दिया जाए, तो (2012)
(i) प्रतिबिम्ब नीचे की ओर खिसक जायेगा।
(ii) प्रतिबिम्ब ऊपर की ओर खिसक जायेगा
(iii) प्रतिबिम्ब की लम्बाई आधी हो जायेगी
(iv) प्रतिबिम्ब की तीव्रता घट जायेगी
उत्तर-
(iv) प्रतिबिम्ब की तीव्रता घट जायेगी।

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प्रश्न 22.
+3D तथा -5D क्षमता के दो पतले लेन्स सम्पर्क में रखे गये हैं। इस संयोजन की फोकस दूरी होगी- (2009, 16)
(i) -40 सेमी
(ii) +40 सेमी
(iii) +20 सेमी
(iv) -50 सेमी
उत्तर-
(iv) -50 सेमी

प्रश्न 23.
R वक्रता त्रिज्या तथा n अपवर्तनांक का एक समतल-उत्तल लेन्स R वक्रता त्रिज्या n1 तथा n2 अपवर्तनांक के समतल-अवतल लेन्स के सम्पर्क में चित्रानुसार रखे जाते हैं। संयुक्त लेन्स की क्षमता है- (2017)
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उत्तर-
(i) 0

प्रश्न 24.
दो लेन्स जिनकी शक्तियाँ 4D और -2D हैं, सम्पर्क में रखे हैं। संयुक्त लेन्स की शक्ति- (2017)
(i) 6 D
(ii) 2 D
(iii) -2 D
(iv) 4 D
उत्तर-
(ii) 2 D

प्रश्न 25.
एक प्रिज्म का अपवर्तक कोण 60° है। जब प्रकाश की एक किरण 50° पर आपतित होती है तो इसमें अल्पतम विचलन होता है। अल्पतम विचलन कोण का मान है- (2013)
(i) 40°
(ii) 45°
(iii) 55°
(iv) 60°
उत्तर-
(i) 40°

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प्रश्न 26.
एक समबाहु प्रिज्म न्यूनतम विचलन की स्थिति में है। यदि आपतन कोण प्रिज्म कोण का 4/5 गुना हो, तो न्यूनतम विचलन कोण का मान होगा- (2011)
(i) 72°
(ii) 60°
(iii) 48°
(iv) 36°
उत्तर-
(iv) 36°

प्रश्न 27.
प्रिज्म से गुजरने पर निम्नलिखित में से किस रंग के प्रकाश का विचलन अधिकतम होगा?
(i) लाल रंग
(ii) बैंगनी रंग
(iii) नीला रंग
(iv) हरा रंग
उत्तर-
(ii) बैंगनी रंग

प्रश्न 28.
जिस भौतिक घटना के लिए सर सी० वी० रमन को नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था, वह है प्रकाश का- (2014)
(i) ध्रुवण
(ii) व्यतिकरण
(ii) विवर्तन
(iv) प्रकीर्णन
उत्तर-
(iv) प्रकीर्णन

प्रश्न 29.
निम्नलिखित में से किस रंग के प्रकाश की चाल जल में सर्वाधिक होगी?
(i) लाल
(ii) पीला
(iii) हरा
(iv) बैंगनी
उत्तर-
(i) लाल

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प्रश्न 30.
उदय व अस्त होते समय सूर्य का ताम्र वर्ण (रक्ताभ) दिखना सम्बन्धित है, प्रकाश के
(i) प्रकीर्णन से
(ii) परिक्षेपण से
(iii) अपवर्तन से
(iv) व्यतिकरण से
उत्तर-
(i) प्रकीर्णन से

प्रश्न 31.
एक व्यक्ति +2D क्षमता का चश्मा प्रयोग करता है। उसका दृष्टि दोष है- (2014)
(i) निकट दृष्टि दोष ।
(ii) दूर दृष्टि दोष,
(ii) जरा दूर दृष्टि दोष ।
(iv) अबिन्दुकता
उत्तर-
(ii) दूर दृष्टि दोष

प्रश्न 32.
सामान्य नेत्र के लिए स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी है- (2015)
(i) अनन्त
(ii) 50 सेमी
(iii) 25 सेमी
(iv) 75 सेमी
उत्तर-
(iii) 25 सेमी

प्रश्न 33.
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी की अपेक्षा अधिक होती है- (2011)
(i) 5 गुनी
(ii) 50 गुनी
(iii) 500 गुनी
(iv) 5000 गुनी
उत्तर-
(iv) 5000 गुनी

प्रश्न 34.
नेत्र लेन्स की प्रकृति होती है- (2016)
(i) अभिसारी
(ii) अपसारी.
(iii) अभिसारी तथा अपसारी दोनों
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(i) अभिसारी

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प्रश्न 35.
निकट दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता है
(i) अवतल लेन्स
(ii) अवतल दर्पण
(iii) उत्तल दर्पण
(iv) उत्तल लेन्स
उत्तर-
(i) अवतल लेन्स

प्रश्न 36.
दूर दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता है
(i) अवतल लेन्स
(ii) अवतल दर्पण
(iii) उत्तल दर्पण
(iv) उत्तल लेन्स
उत्तर-
(iv) उत्तल लेन्स

प्रश्न 37.
किसी दूरदर्शी के अभिदृश्यक लेन्स का व्यास D है। यदि प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ हो, तो इसकी विभेदन क्षमता होगी- (2010, 12, 13)
(i) λ/D
(ii) 1.22λ/D
(iii) D/1.22λ
(iv) λD
उत्तर-
(iii) D/1.22λ

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प्रश्न 38.
दूर-दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का निकट बिन्दु स्थित होगा- (2014)
(i) 25 सेमी दूरी पर
(ii) 25 सेमी से कम दूरी पर
(iii) 25 सेमी से अधिक दूरी पर
(iv) अनन्त पर
उत्तर-
(iii) 25 सेमी से अधिक दूरी पर

प्रश्न 39.
एक खगोलीय दूरदर्शी की आवर्धन क्षमता 10 तथा नेत्रिका की फोकस दूरी 20 सेमी है। अभिदृश्यक लेन्स की फोकस दूरी है- (2017)
(i) 2 सेमी
(ii) 200 सेमी
(ii) 100 सेमी
(iv) 0.5 सेमी
उत्तर-
(ii) 200 सेमी

प्रश्न 40.
एक दूरदर्शी के अभिदृश्यक लेन्स का व्यास 0.1 मीटर है तथा प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 600 नैनोमीटर है। दूरदर्शी की विभेदन सीमा होगी लगभग- (2017)
(i) 7.32 x 10-4 रेडियन
(ii) 6.0 x 10-5 रेडियन
(iii) 7.32 x 10-6 रेडियन
(iv) 6 x 10-2 रेडियन
उत्तर-
(iii) 7.32 x 10-6 रेडियन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आवर्धन का सूत्र
(i) v व u के पदों में
(ii) u वीं के पदों में,
(iii) v तथा f के पदों में लिखिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 1

प्रश्न 2.
अपवर्तनांक की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
आपतन कोण की ज्या तथा अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात एक नियतांक होता है। जिसे पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक कहते हैं।
[latex]\frac { sin i }{ sin r }[/latex] – नियतांक [latex s=2]{ _{ 1 }{ n }_{ 2 } }[/latex]

प्रश्न 3.
प्रकाश के वेग के पदों में अपवर्तनांक का सूत्र लिखिए।
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प्रश्न 4.
क्रान्तिक कोण की परिभाषा लिखिए। (2017)
उत्तर-
सघन माध्यम में बना वह आपतन कोण जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90° हो, क्रान्तिक कोण कहलाता है।

प्रश्न 5.
उस भौतिक सिद्धान्त का नाम लिखिए जिस पर प्रकाशिक तन्तु का कार्य सिद्धान्त आधारित है। (2018)
उत्तर-
पूर्ण आन्तरिक परावर्तन।

प्रश्न 6.
विरल माध्यम के सापेक्ष सघन माध्यम के अपवर्तनांक तथा क्रान्तिक कोण में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर-
[latex s=2]{ _{ r }{ n }_{ d } }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ sinC }[/latex]
जहाँ, C = क्रान्तिक कोण तथा । विरल और d सघन माध्यम का संकेत है।

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प्रश्न 7.
यदि प्रकाश की एक किरण हवा से काँच के पृष्ठ पर 45° पर आपतित हो तो यह 15° विचलित होती है। काँच-हवा पृष्ठ के लिए क्रान्तिक कोण की गणना कीजिए। (2014)
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प्रश्न 8.
अवतल दर्पण के उपयोग लिखिए।
उत्तर-

  1. हजामत करने में,
  2. डॉक्टर द्वारा शरीर के सूक्ष्म भागों की जाँच करने में,
  3. कार की हेडलाइट में, टॉर्च में तथा टेबल लैम्पों के शेड में परावर्तक के रूप में।

प्रश्न 9.
अवतल दर्पण द्वारा अनन्त पर स्थित वस्तु के प्रतिबिम्ब को किरण आरेख द्वारा दर्शाइए। (2014)
उत्तर-
अवतल दर्पण द्वारा अनन्त पर स्थित वस्तु के प्रतिबिम्ब को चित्र 9.14 में प्रदर्शित किया गया है।
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प्रश्न 10.
किसी समतल परावर्ती तल पर 5000 Å का प्रकाश आपतित है। परावर्तित प्रकाश की आवृत्ति ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 11.
गोलीय दर्पण की फोकस दूरी की परिभाषा दीजिए। एक अवतल दर्पण अपने सामने से 10 सेमी दूरी पर रखी वस्तु का 3 गुना वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाता है। दर्पण की वक्रता त्रिज्या ज्ञात कीजिए। (2016)
उत्तर-
दर्पण के ध्रुव से मुख्य फोकस तक की दूरी को गोलीय दर्पण की फोकस दूरी कहते हैं।
यहाँ, u = -10 सेमी
माना O = x होगी।
I = 3x सेमी
हम जानते हैं कि,
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प्रश्न 12.
15 सेमी फोकस दूरी वाले एक अवतल दर्पण के सामने दर्पण से 10 सेमी दूरी पर 8 सेमी ऊँचाई की वस्तु रखी है। दर्पण द्वारा बने प्रतिबिम्ब की स्थिति ज्ञात कीजिए। (2016)
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प्रश्न 13.
वायु के सापेक्ष पानी तथा काँच के अपवर्तनांक क्रमशः [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex] तथा [latex]\frac { 3 }{ 2 }[/latex] हैं। काँच से पानी पर आपतित प्रकाश किरण के लिए क्रान्तिक कोण का मान ज्ञात कीजिए। (2017)
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प्रश्न 14.
किसी लेन्स के लिए न्यूटन का सूत्र लिखिए तथा प्रतीकों के अर्थ बताइए। (2013, 14, 17)
उत्तर-
x’x = ff’, जहाँ x’ तथा x क्रमश: प्रथम एवं द्वितीय फोकस से वस्तु की दूरियाँ एवं f’ तथा f क्रमशः लेन्स की प्रथम तथा द्वितीय फोकस दूरियाँ हैं।

प्रश्न 15.
लेन्स की फोकस दूरी का सूत्र लिखिए, जबकि लेन्स के दोनों ओर के माध्यम भिन्न-भिन्न हैं। (2013)
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प्रश्न 16.
एक लेन्स की क्षमता + 2.5 डायोप्टर है? लेन्स की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए। (2014)
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प्रश्न 17.
किसी उत्तल लेन्स की फोकस दूरी f, अपवर्तनांक n एवं लेन्स की वक्रता त्रिज्याओं R1 और R2 के बीच सम्बन्ध का सूत्र लिखिए। (2012)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 17

प्रश्न 18.
एक उभयोत्तल लेन्स की दोनों वक्रता-त्रिज्याएँ 20 सेमी हैं तथा लेन्स के काँच का अपवर्तनांक 1.5 है। लेन्स की फोकस दूरी क्या होगी ? (2010)
उत्तर-
जब उभयोत्तल लेन्स की वक्रता त्रिज्याएँ समान होती हैं तब उसकी फोकस दूरी वक्रता त्रिज्या के समान होती है। अत: f = R = 20 सेमी।

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प्रश्न 19.
यदि एक उत्तल लेन्स की वायु में फोकस दूरी 20 सेमी है, तो जल में उसकी फोकस दूरी क्या होगी ? (2010)
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प्रश्न 20.
वायु के सापेक्ष काँच एवं जल का अपवर्तनांक क्रमशः [latex]\frac { 3 }{ 2 }[/latex] एवं [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex] है। जल के सापेक्ष काँच का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 20

प्रश्न 21.
एक पतले समतल-उत्तल लेन्स की फोकस दूरी 20.0 सेमी है। इस लेन्स के वक्र पृष्ठ की वक्रता त्रिज्या ज्ञात कीजिए। लेन्स के पदार्थ का अपवर्तनांक 1.5 है। (2013)
उत्तर-
R1 = ?, R2 = ∞, f = 20 सेमी तथा n = 1.5
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प्रश्न 22.
किस दशा में लेन्स की प्रथम फोकस दूरी का मान उसकी द्वितीय फोकस दूरी के मान के बराबर नहीं होता है? (2009, 10)
उत्तर-
जब लेन्स के दोनों ओर माध्यम भिन्न-भिन्न होता है।

प्रश्न 23.
20 सेमी फोकस दूरी वाले दो पतले उत्तल लेन्स सम्पर्क में रखे गये हैं। इससे 20 सेमी की दूरी पर रखी गयी वस्तु के लिए वस्तु एवं उसके प्रतिबिम्ब के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 24.
सम्पर्क में रखे दो पतले लेंसों के संयोजन की फोकस दूरी एवं क्षमता का सूत्र लिखिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 24

प्रश्न 25.
दो उत्तल लेंस जिनमें प्रत्येक की फोकस दूरी 20 सेमी है सम्पर्क में रखे हैं। संयुक्त लेंस की क्षमता की गणना कीजिए। (2017)
हल-
दिया है, P1 = P2 = 20 सेमी
P = P1 + P2 = 20 + 20 = 40 सेमी

प्रश्न 26.
एक लेन्स जिसकी क्षमता +2D है -1D क्षमता वाले दूसरे लेन्स के साथ युग्म बनाता है। युग्म की तुल्य फोकस दूरी क्या होगी? (2017)
हल-
दिया है, P1 = + 2D, P2 = -1D
P = P1 + P2 = +2D + (-1D) = +1D
फोकस दूरी = [latex]\frac { 100 }{ P }[/latex] = [latex]\frac { 100 }{ 1 }[/latex] = 100 सेमी

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प्रश्न 27.
प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक का सूत्र लिखिए। प्रयुक्त प्रतीकों का अर्थ बताइए। (2013, 14, 17)
या
किसी प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक का सूत्र अल्पतम विचलन कोण एवं प्रिज्म कोण के पदों में व्यक्त कीजिए। (2013, 16)
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प्रश्न 28.
किसी प्रिज्म के लिये आपतन कोण तथा विचलन कोण के बीच का ग्राफ दिखाइए। विचलन कोण कब न्यूनतम होगा ? (2010, 12)
उत्तर-
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जब आपतन कोण तथा निर्गत कोण बराबर होते हैं, अर्थात् प्रिज्म के अन्दर अपवर्तित किरण प्रिज्म के आधार के समान्तर होती है; तब विचलन कोण न्यूनतम होगा।

प्रश्न 29.
किसी प्रकाशिक माध्यम की वर्ण विक्षेपण क्षमता का सूत्र लिखिए। (2014)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 29

प्रश्न 30.
किसी पतले प्रिज्म द्वारा उत्पन्न न्यूनतम विचलन तथा कोणीय विक्षेपण के लिये सूत्र लिखिए। (2015, 17)
उत्तर-
न्यूनतम विचलन कोण δm = 2i – A
कोणीय विक्षेपण के लिए सूत्र θ = (nV – nR) A
जहाँ nV तथा nR क्रमशः लाल व बैंगनी रंगों के प्रकाश के लिए प्रिज्म के काँच के अपवर्तनांक हैं तथा A प्रिज्म का कोण है।

प्रश्न 31.
न्यूनतम विचलन की क्या सार्थकता है? (2010)
उत्तर-
न्यूनतम विचलन की सार्थकता- अल्पतम (न्यूनतम) विचलन की स्थिति में प्रिज्म के अन्दर अपवर्तित किरण प्रिज्म के आधार के समान्तर होती है तथा आपतन कोण व निर्गत कोण बराबर होते हैं।

प्रश्न 32.
किसी पदार्थ के लाल, बैंगनी तथा पीले रंग के प्रकाश के लिए अपवर्तनांक क्रमशः 1.52, 1.62 तथा 1.60 हैं। पदार्थ की वर्ण-विक्षेपण (परिक्षेपण) क्षमता ज्ञात कीजिए। (2011, 14)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 32

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प्रश्न 33.
लाल और नीले प्रकाश की किरणें एक दिये गये प्रिज्म पर डाली जाती हैं। किसके लिए अल्पतम विचलन कोण 6, का मान अधिक होगा? व्याख्या कीजिए। (2011)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 33

प्रश्न 34.
काँच के एक प्रिज्म का कोण 60° है तथा अल्पतम विचलन कोण 39° है। काँच का अपवर्तनांक क्या है? दिया है, sin 49.5° = 0.76. (2012)
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प्रश्न 35.
काँच से निर्मित एक पतले प्रिज्म से उत्पन्न न्यूनतम विचलन कोण 4° है। प्रिज्म कोण ज्ञात कीजिए। (काँच का अपवर्तनांक 1.5 है)। (2012)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 35

प्रश्न 36.
एक पतले प्रिज्म का प्रिज्म कोण 4° है तथा इसके पदार्थ का अपवर्तनांक 1.5 है। प्रिज्म द्वारा उत्पन्न न्यूनतम विचलन कोण ज्ञात कीजिए। (2013)
हल-
δm = (n – 1) A = (1.5 – 1) 4° = 0.5 x 4° = 2°

प्रश्न 37.
न्यूनतम विचलन अवस्था में एक प्रकाश किरण एक समकोणिक प्रिज्म पर इस प्रकार आपतित होती है कि आपतन कोण, प्रिज्म कोण का [latex]\frac { 3 }{ 4 }[/latex] है। न्यूनतम विचलन कोण ज्ञात कीजिए। (2014)
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प्रश्न 38.
किसी पतले प्रिज्म से उत्पन्न न्यूनतम विचलन कोण 10° है। प्रिज्म कोण ज्ञात कीजिए। प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक 1.5 है। (2016)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 38

प्रश्न 39.
63° कोण वाले प्रिज्म का पीले प्रकाश के लिए विचलन कोण 29° है। आपतन कोण ज्ञात कीजिए। (2016)
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प्रश्न 40.
किसी प्रिज्म के पदार्थ की वर्ण विक्षेपण क्षमता से क्या तात्पर्य है? (2017)
उत्तर-
जब सूर्य का श्वेत प्रकाश एक पतले प्रिज्म में से गुजरता है, तो बैंगनी तथा लाल रंगों की निर्गत किरणों के बीच उत्पन्न कोणीय परिक्षेपण तथा मध्यवर्ती (अर्थात् पीले रंग की किरण के लिए विचलन कोण के अनुपात को प्रिज्म के पदार्थ की वर्ण विक्षेपण क्षमता कहते हैं। इसे ग्रीक अक्षर w (ओमेगा) से प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 41.
फ्लिन्ट काँच के लिए बैंगनी एवं लाल रंगों के प्रकाश हेतु अपवर्तनांक क्रमशः 1.632 तथा 1.613 हैं। प्रिज्म के पदार्थ की विक्षेपण क्षमता की गणना कीजिए। (2017)
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प्रश्न 42.
नेत्र की समंजन क्षमता से आप क्या समझते हैं ? (2017, 18)
उत्तर-
नेत्र की वह क्षमता जिसके कारण नेत्र लेन्स की फोकस दूरी में परिवर्तन कर नजदीक व दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, नेत्र की समंजन क्षमता कहलाती है।

प्रश्न 43.
एक व्यक्ति को पुस्तक पढ़ने के लिए पुस्तक को आँख से 35 सेमी दूर रखना पड़ता है। इस व्यक्ति के नेत्र में कौन-सा दोष है?
उत्तर-
दूर-दृष्टि दोष।

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प्रश्न 44.
मनुष्य की आँख के रेटिना के कार्य का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर-
रेटिना प्रकाश- शिराओं की एक फिल्म होती है, जो वस्तुओं के प्रतिबिम्बों के रूप-रंग और आकार का ज्ञान मस्तिष्क तक पहुँचाती है। जिस स्थान पर प्रकाश-शिरा (UPBoardSolutions.com) रेटिना को छेदकर मस्तिष्क में जाती है, उस स्थान पर प्रकाश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस स्थान को अंध-बिन्दु कहते हैं। रेटिना के बीचों-बीच एक पीत-बिन्दु होता है।

प्रश्न 45.
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी, प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी से उत्तम क्यों माना जाता है? (2013)
उत्तर-
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी, प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी की तुलना में किसी वस्तु का लगभग 5000 गुना आवर्धित प्रतिबिम्ब बनाता है, इसलिए यह प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी से उत्तम माना जाता है।

प्रश्न 46.
किसी प्रकाशिक यन्त्र की विभेदन क्षमता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
किसी प्रकाशिक यन्त्र की दो पास-पास रखी वस्तुओं के प्रतिबिम्बों को अलग-अलग करने की क्षमता को विभेदन क्षमता (resolving power) कहते हैं।

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प्रश्न 47.
आँख पर चन्द्रमा का दर्शन कोण 0.6° है। दूरदर्शी के अभिदृश्यक एवं नेत्रिका की फोकस दूरियाँ क्रमशः 200 सेमी एवं 10 सेमी हैं। दूरदर्शी से देखने पर चन्द्रमा का दर्शन कोण कितना होगा?
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प्रश्न 48.
दूरदर्शी के अभिदृश्यक का द्वारक बड़ा क्यों बनाया जाता है? (2018)
उत्तर-
दूरदर्शी की विभेदन क्षमता तथा प्रतिबिम्ब की तीव्रता बढ़ाने के लिए इसके अभिदृश्यक का द्वारक बड़ा बनाया जाता है।

प्रश्न 49.
50 सेमी द्वारक के अभिदृश्यक लेन्स वाले दूरदर्शी की विभेदन सीमा कितनी होगी? अभिदृश्यक लेन्स में आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ = 6000 Å है।(2014)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 49UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 49.1

प्रश्न 50.
सूक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा हेतु व्यंजक लिखिए। प्रयुक्त संकेतों के अर्थ लिखिए। (2015, 17)
उत्तर-
सूक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा = [latex s=2]\frac { \lambda }{ 2\mu sin\theta }[/latex]
जहाँ, λ = प्रकाश की तरंगदैर्घ्य,
μ = वस्तु एवं अभिदृश्यक लेन्स के बीच उपस्थित माध्यम का अपवर्तनांक,
θ = वस्तु एवं अभिदृश्यक के बीच बने प्रकाश शंकु का अर्द्धशीर्ष कोण।

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प्रश्न 51.
परावर्ती दूरदर्शी में परवलयाकार दर्पण के द्वारक का मान अधिक क्यों रखा जाता है।
उत्तर-
जिससे दूरदर्शी में अधिक प्रकाश प्रवेश कर सके तथा प्रतिबिम्ब चमकीला बने।

प्रश्न 52.
-2D क्षमता वाले लेन्स का उपयोग करने वाले व्यक्ति को दूर बिन्दु कितनी दूरी पर होगा?
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प्रश्न 53.
निकट दृष्टि दोष वाला व्यक्ति 15 सेमी दूर की वस्तु स्पष्ट देख सकता है। 25 सेमी दूर वस्तु को स्पष्ट देखने के लिए आवश्यक लेंस की फोकस दूरी निकालिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments VSAQ 53

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश के अपवर्तन से आप क्या समझते हैं? इसके नियम लिखिए।
उत्तर-
प्रकाश का अपवर्तन- जब प्रकाश एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में प्रवेश करता है, तो दूसरे माध्यम में जाने पर इसका वेग तथा दिशा बदल जाती है। इस घटना को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।
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अपवर्तन के नियम-
प्रकाश का अपवर्तन निम्न दो नियमों के अनुसार होता है-
(i) आपतित किरण, अपवर्तित किरण और आपतन बिन्दु पर अभिलम्ब तीनों एक ही तल में होते हैं।
(ii) किन्हीं दो माध्यमों के लिए तथा एक निश्चित रंग (तरंगदैर्ध्य) के प्रकाश के लिए आपतन कोण की ज्या तथा अपवर्तन कोण की ज्या की निष्पत्ति एक नियतांक होती है। यदि आपतन कोण i व अपवर्तन कोण r हैं, तो
[latex]\frac { sin i }{ sin r }[/latex] = नियतांक
इस नियम को स्नेल का नियम (Snell’s Law) कहते हैं तथा इस नियतांक को पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक (refractive index) कहते हैं। यदि पहले व दूसरे माध्यम : को 1 व 2 से निरूपित करें, तो माध्यम 2 का 1 के सापेक्ष अपवर्तनांक 17 से प्रदर्शित करते हैं।
इस प्रकार
[latex]\frac { sin i }{ sin r }[/latex] = [latex s=2]{ _{ 1 }{ n }_{ 2 } }[/latex]
किसी पदार्थ का अपवर्तनांक (i) माध्यम की प्रकृति, (ii) माध्यम की भौतिक अवस्था, (iii) प्रकाश के रंग तथा (iv) माध्यम के ताप पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 2.
किसी अवतल दर्पण के लिए सूत्र [latex s=2]\frac { 1 }{ f } =\frac { 1 }{ u } +\frac { 1 }{ v }[/latex] की स्थापना कीजिए, जहाँ संकेतों के सामान्य अर्थ हैं। (2017)
हल-
माना कि M1 M2 एक अवतल दर्पण है जिसका ध्रुव P है, फोकस F है तथा व्रकता केन्द्र C है (चित्र 9.17)। इसकी मुख्य अक्ष के किसी बिन्दु पर एक वस्तु AB रखी है। वस्तु के सिरे A से मुख्य अक्ष के समानान्तर चलने वाली आपतित किरण AM दर्पण के बिन्दु M से टकराती है। परावर्तन के पश्चात् यह किरण दर्पण के फोकस F से होकर गुजरती है। दूसरी किरण AO दर्पण के वक्रता केन्द्र से होकर जाती है तथा परावर्तन के पश्चात् उसी मार्ग से वापस लौट जाती है। दोनों परावर्तित किरणें बिन्दु A’ पर काटती हैं। (UPBoardSolutions.com) इस बिन्दु A’ से मुख्य अक्ष पर डाला गया लम्ब A’ B’, वस्तु AB की प्रतिबिम्ब है। अब, माना कि वस्तु AB की दर्पण के ध्रुव से दूरी PB = -u, प्रतिबिम्ब A’B’ की दूरी PB’ = -v, दर्पण की वक्रता त्रिज्या PC = -R तथा दर्पण की फोकस दूरी PF = -f है। (ये सभी दूरियाँ चूंकि आपतित किरण के चलने की दिशा के विपरीत दिशा में नापी जाती हैं अर्थात् दर्पण के बायीं ओर हैं; अत: चिह्न परिपाटी के अनुसार ये दूरियाँ ऋणात्मक हैं।)
ΔABC तथा ΔA’B’C समकोणिक हैं।
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प्रश्न 3.
परस्पर सम्पर्क में रखे दो पतले लेन्सों के संयोजन की फोकस दूरी के लिए सूत्र की स्थापना कीजिए। (2011, 15, 16, 17)
या
परस्पर सम्पर्क में रखे दो पतले उत्तल लेन्सों के संयोजन की फोकस दूरी F के लिए सूत्र [latex s=2]\frac { 1 }{ F } =\frac { 1 }{ { f }_{ 1 } } +\frac { 1 }{ { f }_{ 2 } }[/latex] की स्थापना कीजिए, जहाँ f1 तथा f2 क्रमशः दोनों लेन्सों की फोकस दूरियाँ हैं।
या
f1 फोकस दूरी को उत्तल लेन्स f2 फोकस दूरी के अवतल लेन्स के सम्पर्क में रखा है। संयुक्त लेन्स की फोकस दूरी एवं प्रकृति ज्ञात कीजिए, जबकि f1 < f2.
उत्तर-
चित्र 9.18 के अनुसार दो पतले उत्तल लेन्सों L1 व L2 को सम्पर्क में रखकर एक संयुक्त लेन्स बनाया गया है। माना इनकी फोकस दूरियाँ क्रमशः f1 व f2 हैं तथा इस संयुक्त (UPBoardSolutions.com) लेन्स द्वारा बिन्दु-वस्तु O का प्रतिबिम्ब I पर बनता है। प्रतिबिम्ब बनने की प्रक्रिया को निम्न प्रकार समझा जा सकता है-
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यदि L2 लेन्स न हो तो वस्तु O का प्रतिबिम्ब लेन्स L1 द्वारा I’ पर बनता। यदि I’ की L1 से दूरी v’ हो तथा L1 से O की दूरी u हो, तो लेन्स के सूत्र से
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 3.1
अब, प्रतिबिम्ब I’ लेन्स L2 के लिए आभासी वस्तु का कार्य करता है जो इसका प्रतिबिम्ब I पर बनाता है। प्रतिबिम्ब I की L2 से दूरी । हो, तो लेन्स के सूत्र से,
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 3.2
समी० (1) व समी० (2) को जोड़ने पर
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 3.3
यदि इन दोनों लेन्सों के स्थान पर एक ऐसे पतले लेन्स का प्रयोग करें जो u दूरी पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब v दूरी पर बनाये, तो लेन्स की फोकस दूरी F के लिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 3.4
समी० (3) व समी० (4) की तुलना करने पर
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 3.5
इस सूत्रे से संयुक्त लेन्स की फोकस दूरी की गणना की जा सकती है।
समीकरण (5) प्राप्त करने के लिए दो उत्तल लेन्सों को सम्पर्क में रखा हुआ माना गया है, परन्तु यह समीकरण ऐसे संयुक्त लेन्स के लिए भी सही है जो एक उत्तल एवं एक (UPBoardSolutions.com) अवतल लेन्स से बना हो, अथवा दो अवतल लेन्सों से बना हो। समीकरण (5) का उपयोग करते समय इस बात को ध्यान में रखते हैं कि उत्तल लेन्स के लिए फोकस दूरी धनात्मक एवं अवतल लेन्स की फोकस दूरी ऋणात्मक लेते हैं। यदि L1 उत्तल लेन्स एवं L2 अवतल लेन्स हो, तो
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 3.6

  • यदि f1 > f2, तब F ऋणात्मक होगा और संयुक्त लेन्स अवतल लेन्स की भाँति कार्य करेगा।
  • यदि f1 < f2, तब F धनात्मक होगा और संयुक्त लेन्स उत्तल लेन्स की भाँति कार्य करेगा।
  • यदि f1 = f2, तब F अनन्त होगा और संयुक्त लेन्स समतल प्लेट की भाँति कार्य करेगा।

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प्रश्न 4.
एक लेन्स जिसकी फोकस दूरी f है, एक दीप्त वस्तु का चित्र पर्दे पर m गुना बड़ा बनाता है। सिद्ध कीजिए कि पर्दे की लेन्स से दूरी (m + 1) f है। (2011, 13)
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परन्तु पर्दे पर प्राप्त चित्र वास्तविक होता है जिसके लिए m ऋणात्मक होता है।
अत: समी० (1) में .m के स्थान पर (-m) रखने पर पर्दे की लेन्स से दूरी v = f (1 + m) = (m + 1) f.

प्रश्न 5.
एक उत्तल लेन्स 20 सेमी फोकस दूरी का तथा एक अवतल लेन्स 25 सेमी फोकस दूरी का, सम्पर्क में रखे गये हैं। इस युग्म से 2 मी दूरी पर रखी वस्तु के प्रतिबिम्ब की स्थिति तथा प्रकृति ज्ञात कीजिए। (2013)
हल-
प्रश्नानुसार, उत्तल लेन्स की फोकस-दूरी f1 = +20 सेमी तथा अवतल लेन्स की फोकस-दूरी f2 = -25 सेमी। यदि इन लेसों को परस्पर सम्पर्क में रखने पर बने लेन्स युग्म की फोकस-दूरी F हो, तो
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परन्तु प्रतिबिम्ब के आकार तथा वस्तु के आकार का अनुपात आवर्धन (m) होता है। अतः प्रतिबिम्ब का आकार वस्तु के आकार के बराबर होगा। आवर्धन (m) का (UPBoardSolutions.com) ऋणात्मक चिह्न इस बात का प्रतीक है कि प्रतिबिम्ब उल्टा बनेगा। इस प्रकार प्रतिबिम्ब युग्म से 2 मीटर दूरी पर वस्तु की दिशा की विपरीत दिशा में अर्थात् युग्म के पीछे उल्टा, वास्तविक तथा आकार में वस्तु के बराबर बनेगा।

प्रश्न 6.
दो पतले लेन्स सम्पर्क में रखे हैं। एक लेन्स की फोकस दूरी 30.0 सेमी है। यदि संयोजन की फोकस दूरी 15.0 सेमी हो, तो दूसरे लेन्स की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए। यदि एकसमान फोकस दूरी के विपरीत प्रकृति वाले दो लेन्सों को सम्पर्क में रखा जाए, तो संयोजन की. क्षमता क्या होगी? (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments SAQ 6
एकसमान फोकस दूरी एवं विपरीत प्रकृति वाले दो लेन्सों को सम्पर्क में रखने पर, संयोजन की फोकस दूरी अनन्त होगी।
अतः संयोजन की क्षमता शून्य होगी।

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प्रश्न 7.
एक उभयोत्तल लेन्स 1.5 अपवर्तनांक के काँच से बना है। इसके दोनों पृष्ठों की वक्रता त्रिज्याएँ 20 सेमी हैं। लेन्स की क्षमताओं का अनुपात ज्ञात कीजिए जब इसे हवा में रखा जाए और जब इसे 1.25 अपवर्तनांक के द्रव में डुबाया जाए। (2014)
हल-
वायु के लिए लेन्स की क्षमता
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प्रश्न 8.
एक वस्तु से पर्दा 75 सेमी की दूरी पर है। इनके बीच में 12 सेमी फोकस दूरी वाले उत्तल लेन्स को कहाँ रखा जाए, जिससे पर्दे पर वस्तु का वास्तविक प्रतिबिम्ब बन जाए। (2016)
हल-
दिया है, u = 75 सेमी, f = 12 सेमी
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अतः उत्तल लेन्स को 10.3 सेमी की दूरी पर रखा जाएगा।

प्रश्न 9.
एक 10 सेमी वक्रता त्रिज्या वाले काँच (ng = [latex]\frac { 3 }{ 2 }[/latex]) के द्वि-उत्तल लेन्स AB को तल के अनुदिश दो बराबर भागों में काटा जाता है। लेन्स के किसी एक भाग (nω = [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex]) में डुबाने पर उस भाग की फोकस दूरी की गणना कीजिए। (2017)
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प्रश्न 10.
प्रकाश के दो बिन्दु स्रोतों के बीच की दूरी 30 सेमी है। एक स्रोत से 20 सेमी दूर एक उत्तल लेन्स रखने पर दोनों स्रोतों के प्रतिबिम्ब एक ही बिन्दु पर बनते हैं। उसे उत्तल लेन्स की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए तथा संगत किरण आरेख भी बनाइए। (2017)
उत्तर-
चित्रानुसार, O1 व O2 दो प्रकाश स्रोत हैं जिनके बीच की दूरी 30 सेमी है। लेन्स, स्रोत O1 से 20 सेमी की दूरी पर रखा है तथा O2 का (वास्तविक) प्रतिबिम्ब I (UPBoardSolutions.com) बनाता है। स्रोत O2 से लेन्स की दूरी 10 सेमी है तथा प्रश्नानुसार O2 का आभासी प्रतिबिम्ब भी 1 पर ही बनता है।
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प्रश्नानुसार, दोनों वस्तुओं के प्रतिबिम्ब एक ही बिन्दु पर (लेन्स के एक ही ओर) बनते हैं, अत: इनमें से एक वास्तविक तथा दूसरा आभासी होगा अर्थात् लेन्स के समीप वाली वस्तु फोकस से पहले रखी होगी।
स्रोत O1 के लिए, u = -20 सेमी
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प्रश्न 11.
प्रकाश के वर्ण-विक्षेपण से आप क्या समझते हैं? एक प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश का वर्णविक्षेपण किस प्रकार होता है? समझाइए।
उत्तर-
श्वेत प्रकाश विभिन्न रंगों के प्रकाश का मिश्रण होता है। जब श्वेत प्रकाश की किरण प्रिज्म पर आपतित होती है तो विभिन्न रंगों की अनेक किरणों में विभाजित हो जाती है। इस प्रक्रिया को प्रकाश को ‘वर्ण-विक्षेपण’ (dispersion) कहते हैं। वर्ण-विक्षेपण का कारण किसी पदार्थिक माध्यमं में भिन्न-भिन्न रंगों में प्रकाश की चाल का भिन्न-भिन्न होना है। अत: किसी पदार्थ का अपवर्तनांक n भिन्न-भिन्न रंगों में प्रकाश के लिए भिन्न-भिन्न होता है। काँच का अपवर्तनांक बैंगनी प्रकाश के लिए सबसे अधिक होता है। अत: सूत्र δm = (n – 1) A (UPBoardSolutions.com) के अनुसार, बैंगनी प्रकाश का विचलन कोण लाल प्रकाश के विचलन कोण से बड़ा होता है। भिन्न-भिन्न रंगों के लिए भिन्न-भिन्न विचलन कोण होने के कारण, श्वेत प्रकाश के प्रिज्म में प्रवेश करने पर इसमें से भिन्न रंगों की किरणें भिन्न-भिन्न दिशाओं में निकलती हैं। बैंगनी रंग के प्रकाश की किरण प्रिज्म के आधार की ओर सबसे अधिक तथा लाल प्रकाश की ओर सबसे कम झुकती है। अत: श्वेत प्रकाश विभिन्न रंगों की किरणों में विभाजित हो जाता है। इसी को वर्ण-विक्षेपण कहते हैं।

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प्रश्न 12.
काँच ([latex s=2]{ _{ a }{ n }_{ g } }=\frac { 3 }{ 2 }[/latex]) पतले प्रिज्म द्वारा प्रकाश किरण का अल्पतम विचलन कोण 60° है। यदि पप्रिज्म को जल ([latex s=2]{ _{ a }{ n }_{ w } }=\frac { 4 }{ 3 }[/latex]) में डुबो देया जाए तो विचलन कोण कितना हो जायेगा? (2012)
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प्रश्न 13.
एक पतले प्रिज्म के पदार्थ के लिए लाल एवं बैंगनी रंगों के अपवर्तनांक 1.65 हैं। पदार्थ की विक्षेपण क्षमता 0.08 है। प्रकाश के पीले रंग के लिए प्रिज्म का विचलन कोण 5.0° है। प्रिज्म कोण की गणना कीजिए। (2011)
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प्रश्न 14.
किसी प्रिज्म के पदार्थ के लिए लाल, बैंगनी, पीले रंग के प्रकाश के अपवर्तनांक क्रमशः 1.51, 1.61 तथा 1.59 हैं। पदार्थ की वर्ण-विक्षेपण क्षमता ज्ञात कीजिए। यदि माध्य विचलन 5° हो, तो कोणीय वर्ण-विक्षेपण कितना होगा? (2012)
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प्रश्न 15.
किसी प्रिज्म से अल्पतम-विचलन कोण 30°, प्रिज्म के प्रथम अपवर्तक पृष्ठ पर अपवर्तन कोण 30° है। प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए। (2011, 16)
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प्रश्न 16.
A प्रिज्म कोण वाले प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक Cosec ([latex]\frac { A }{ 2 }[/latex]) है। न्यूनतम विचलन कोण का मान ज्ञात कीजिए। (2014)
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प्रश्न 17.
प्रकाश का प्रकीर्णन क्या है? प्रकीर्णन पर आधारित रमन प्रभाव क्या है? (2016, 18)
हल-
प्रकाश का प्रकीर्णन- माध्यम के कणों द्वारा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर अन्य दिशाओं में पुनः विकरित करने की क्रिया को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। बेन्जीन जैसे कार्बनिक द्रव पर प्रकाश के तीव्र किरण पुंज को डालकर उससे प्रकीर्णित प्रकाश का अध्ययन करते हुए देखा कि प्रकीर्णित प्रकाश में आपतित प्रकाश की आवृत्ति v की रेखा के अतिरिक्त उससे कम आवृत्ति (v – v1) (v – v2)… तथा उससे अधिक आवृत्ति (v + v1) (v + v2) …. की भी रेखाएँ प्राप्त होती हैं, जिन्हें स्टोक रेखाएँ तथा प्रतिस्टोक रेखाएँ कहते हैं। इस स्पेक्ट्रम को रमन स्पेक्ट्रम तथा इस प्रभाव को रमन प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 18.
फ्लिण्ट काँच के लिए बैंगनी, पीले तथा लाल रंगों के प्रकाश के लिए अपवर्तनांक क्रमशः 1.632, 1.620 तथा 1.613 है। फ्लिट काँच के पदार्थ की विक्षेपण क्षमता ज्ञात कीजिए। (2016)
हल-
फ्लिण्ट काँच के पदार्थ की विक्षेपण क्षमता
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प्रश्न 19.
(a) 25.0 सेमी तथा 2.5 सेमी फोकस दूरी वाले दो उत्तल लेन्स दिए गए हैं। दूरदर्शी बनाने हेतु इनको किस प्रकार समायोजित करेंगे? एक स्वच्छ चित्र द्वारा प्रतिबिम्ब के बनने को प्रदर्शित कीजिए। इस दूरदर्शी की आवर्धन क्षमता कितनी होगी?
(b) खगोलीय दूरदर्शक के अभिदृश्यक तथा नेत्रिका की फोकस दूरियाँ क्रमशः 250 सेमी व 10 सेमी हैं। अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की (i) न्यूनतम दूरी पर बनता है, (ii) अनन्तता पर बनता है। दोनों दशाओं में दूरदर्शक की आवर्धक क्षमता की गणना कीजिए। (2015)
हल-
(a) 25.0 सेमी फोकस दूरी वाला उत्तल लेन्स अभिदृश्यक O, तथा 2.5 सेमी वाला नेत्रिका E के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। श्रांत आँख (relaxed eye) से देखने के लिए अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्तता पर बनना चाहिए। इसके लिए नेत्रिका E तथा अभिदृश्यक O के बीच दूरी इतनी (UPBoardSolutions.com) रखते हैं कि दूर-स्थित वस्तु AB का अभिदृश्यक द्वारा बना प्रतिबिम्ब A’B’, नेत्रिका E के फोकस पर पड़े (चित्र 9.21)। स्पष्ट है कि इसके लिए दोनों लेन्सों के बीच दूरी (f0 + fe) के बराबर होगी, जहाँ f0 अभिदृश्यक की तथा fe नेत्रिका की फोकस दूरी है।
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प्रश्न 20.
सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता से आप क्या समझते हैं? इसका सूत्र लिखिए तथा बताइए कि यह किस प्रकार बढ़ाई जा सकती है? या किसी सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता से क्या तात्पर्य है? (2013)
या
सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता के लिए व्यंजक लिखिए। सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता कैसे बढ़ायी जा सकती है? (2015)
उत्तर-
किसी सूक्ष्मदर्शी की विभेदन- क्षमता उसकी दो समीपवर्ती वस्तुओं के प्रतिबिम्बों को अलग-अलग करने की क्षमता है। सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य (λ) के व्युत्क्रमानुपाती तथा सूक्ष्मदर्शी में प्रवेश करने वाली प्रकाश-किरणों के शंकु-कोण के अनुक्रमानुपाती होती है।
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जहाँ λ प्रकाश की तरंगदैर्घ्य है, n वस्तु तथा अभिदृश्यक के बीच माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक तथा α = अर्द्ध शंकु-कोण।
सूक्ष्मदर्शी का उपयोग समीप की वस्तुओं को देखने में होता है; जैसे – सूक्ष्म कण, स्लाइडे इत्यादि। इन वस्तुओं को किसी प्रकाश-स्रोत से प्रकाशित करते हैं। इसकी विभेदन-सीमा घटाने के लिए (अथवा विभेदन-क्षमता बढ़ाने के लिए) शंकु-कोण का मान अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है, (UPBoardSolutions.com) परन्तु छोटे तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का प्रयोग करके λ का मान घटाया जा सकता है। अतः साधारण प्रकाश के स्थान पर नीला प्रकाश प्रयुक्त करके सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

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प्रश्न 21.
किसी दूरदर्शी की विभेदन-क्षमता से क्या तात्पर्य है? इसका सूत्र लिखिए। दूरदर्शी की विभेदन-क्षमता कैसे बढ़ायी जाती है? (2017)
या
दूरदर्शी की विभेदन-क्षमता का सूत्र लिखिए तथा प्रयुक्त संकेतों के अर्थ लिखिए। यह किन-किन बातों पर निर्भर करती है? (2009)
या
दूरदर्शी की विभेदन क्षमता का सूत्र लिखिए तथा प्रयुक्त प्रतीकों के अर्थ बताइए। इसको . कैसे बढ़ाया जा सकता है? (2011, 12)
उत्तर-
दो समीपवर्ती वस्तुओं को दूरदर्शी द्वारा देखने पर प्रतिबिम्बों को अलग-अलग करने की क्षमता को दूरदर्शी. की ‘विभेदन-क्षमता’ कहते हैं।
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स्पष्ट है कि दूरदर्शी की विभेदन-क्षमता, दूरदर्शी के अभिदृश्यक लेन्से का व्यास (d) बढ़ाकर बढ़ायी जा सकती है अर्थात्, विभेदन-क्षमता अभिदृश्यक के द्वारक तथा प्रकाश की तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करती है।

प्रश्न 22.
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का नामांकित किरण आरेख बनाइए जब अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्तता पर बनता है। इसकी विभेदन क्षमता कैसे बढ़ायी जा सकती है? (2015)
उत्तर-
श्रांत आँख के लिए अन्तिम प्रतिबिम्ब A”B” अनन्तता पर बनता है। इस दशा में प्रतिबिम्ब A’B’, नेत्रिका E के फोकस F’e पर होगा। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता के लिए उपर्युक्त प्रश्न (20) देखिए।
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प्रश्न 23.
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता प्रकाशीय इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की तुलना में अधिक क्यों होती है? (2011, 13)
या
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की उपयोगिता बताइए। (2010)
या
समझाइए कि किसी इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता, प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अधिक क्यों होती है? (2013)
उत्तर-
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी- आजकल अतिसूक्ष्म वस्तुओं के चित्र लेने के लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (electron microscope) काम में लाया जाता है। इसमें प्रकाश पुंज के स्थान पर तीव्रगामी इलेक्ट्रॉन पुंज को प्रयुक्त करते हैं। इलेक्ट्रॉन पुंज तरंग की तरह व्यवहार करता है जिसकी तरंगदैर्घ्य (UPBoardSolutions.com) डी-ब्रॉगली के सिद्धान्तानुसार λ = (h/mυ) बहुत छोटी अर्थात् 1 Å की कोटि (order) की होती है। यह दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्ध्य से लगभग 5000 गुना छोटी होती है। परन्तु विभेदन-क्षमता तरंगदैर्घ्य के व्युत्क्रमानुपाती होती है। अतः इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता, प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी की तुलना में लगभग 5000 गुना अधिक होती है। यही इस सूक्ष्मदर्शी की उपयोगिता है।

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प्रश्न 24.
एक दूर-दृष्टि दोष वाले मनुष्य का निकट बिन्दु आँख से 150 सेमी पर है। यदि वह 25 सेमी दूर स्थित पुस्तक को पढ़ना चाहता है तो उसे कैसा तथा कितनी फोकस दूरी का लेन्स लगाना होगा? (2014, 17)
हल-
इस व्यक्ति की आँख का निकट-बिन्दु 150 सेमी पर है। उसे एक ऐसा लेन्स चाहिए जो 25 सेमी की दूरी पर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब 150 सेमी पर बना दे। इस प्रकार लेन्स के लिए u = -25 सेमी तथा v = -150 सेमी
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प्रश्न 25.
एक निकट दृष्टि दोष वाला व्यक्ति 30 सेमी से अधिक दूर की वस्तु को स्पष्ट नहीं देख सकता है। अनन्त पर स्थित वस्तु को देखने के लिए कितनी फोकस दूरी के तथा किस प्रकार के लेन्स की आवश्यकता होगी? (2016)
हल-
दिया है, u = -∞, v = -30 सेमी, f = ?
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अत: व्यक्ति को अनन्त पर स्थित वस्तु को देखने के लिए 30 सेमी फोकस-दूरी के अवतल लेन्स की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 26.
दूरदृष्टि दोष वाले व्यक्ति का निकट बिन्दु आँख से 100 सेमी है। आँख से 25 सेमी की दूरी पर रखी किताब को स्पष्ट पढने के लिए कितनी क्षमता का लेन्स आवश्यक है? इसके लिए किस प्रकार के लेन्स का प्रयोग किया जाएगा? (2017)
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प्रश्न 27.
एक दूरदर्शी में अभिदृश्यक एवं नेत्रिका की फोकस दूरियाँ क्रमशः 100 सेमी और 50 सेमी हैं। दूरदर्शी की अधिकतम लम्बाई और आवर्धन क्षमता की गणना कीजिए। (2017)
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्रान्तिक कोण तथा पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से क्या अभिप्राय है ? सिद्ध कीजिए कि [latex s=2]n=\frac { 1 }{ sinC }[/latex] , जहाँ संकेतों के सामान्य अर्थ हैं।
या
सिद्ध कीजिए कि सघन माध्यम का अपवर्तनांक क्रान्तिक कोण की ज्या (sine) का व्युत्क्रमानुपाती होगा। (2015, 17)
या
पूर्ण आन्तरिक परावर्तन की व्याख्या कीजिए तथा क्रान्तिक कोण के महत्त्व को रेखांकित कीजिए। (2015)
या
पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यक शर्ते लिखिए। (2015)
उत्तर-
जब कोई प्रकाश-किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है तो इसका अधिकांश भाग अपवर्तित हो जाता है तथा शेष भाग परावर्तित हो जाता है। इस दशा में प्रकाश-किरण अभिलम्ब से दूर हटती है, अत: अपवर्तन कोण का मान आपतन कोण से बड़ा होता है।
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अब यदि सघने माध्यम में आपतन कोण (i) को बढ़ाते जायें तो विरल माध्यम में अपवर्तन कोण (r) का मान भी बढ़ता जाता है। एक विशेष आपतन कोण के लिए अपवर्तन कोण 90° हो जाता है। इस आपतन कोण को ‘क्रान्तिक कोण’ कहा जाता है तथा ‘C’ से प्रदर्शित करते हैं। अतः क्रान्तिक कोण को निम्न प्रकारे से परिभाषित किया जाता है-
“सघन माध्यम में बना वह आपतन कोण जिसके लिए विरले माध्यम में बना अपवर्तन कोण समकोण अर्थात् 90° होता है, दोनों माध्यमों के अन्तरापृष्ठ के लिए क्रान्तिक कोण कहलाता है।”
जब यदि माध्यम में आपतन कोण का मान क्रान्तिक कोण से आगे थोड़ा-सा ही बढ़ाया जाता है, तो सम्पूर्ण आपतित प्रकाश, परावर्तन के नियमों के अनुसार (UPBoardSolutions.com) परावर्तित होकर सघन माध्यम में ही वापस लौट आता है। इस घटना को प्रकाश का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन कहते हैं। अतः पूर्ण आन्तरिक परावर्तन की घटना होने के लिए अग्रलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है-

  1. प्रकाश सघनं माध्यम से विरल माध्यम में जाना चाहिए।
  2. सघन माध्यम में आपतन कोण का मान क्रान्तिक कोण से बड़ा होना चाहिए।

अपवर्तनांक तथा क्रान्तिक कोण में सम्बन्ध- यदि विरल माध्यम को माध्यम -1 तथा सघन माध्यम को माध्यम -2 से प्रदर्शित करें तो स्नेल के नियम के अनुसार,
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इस प्रकार क्रान्तिक कोण की ज्या (sin) को व्युत्क्रम विरल माध्यम के सापेक्ष सघन माध्यम के अपवर्तनांक के बराबर होता है।

प्रश्न 2.
प्रकाशिक तन्तु क्या होते हैं? इनकी रचना, कार्य सिद्धान्त तथा अनुप्रयोग लिखिए। इसमें किस घटना का उपयोग होता है? (2015)
या
प्रकाशिक तन्तु नलिका में पूर्ण आन्तरिक परावर्तन की प्रक्रिया चित्र द्वारा समझाइए तथा आवश्यक सूत्र भी लिखिए। (2018)
उत्तर-
प्रकाशिक तन्तु- प्रकाशिक तन्तु पूर्ण आन्तरिक परावर्तन की घटना पर आधारित वह युक्ति है। जिसकी सहायता से एक प्रकाश सिग्नल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना ऊर्जा-ह्रास के प्रक्षेपित किया जा सकता है। रचना-इसको चित्र 9.24 में दर्शाया गया है। यह उच्च कोटि के काँच (क्वार्ट्ज अपवर्तनांक 1.7) के अत्यधिक लम्बे तथा पतले हजारों तन्तुओं (fibers) से मिलकर बना होता है। प्रत्येक (UPBoardSolutions.com) रेशे (तन्तु) की मोटाई लगभग माइक्रो मीटर (10-6 मी) कोटि की होती है। तन्तु (क्वार्ट्ज के रेशे के चारों ओर अपेक्षाकृत कम अपवर्तनांक (n = 1.5) वाले पदार्थ की पतली तह लेपित कर दी जाती है। पाइप के भीतरी भाग को क्रोड (core) तथा लेपित भाग को अधिपट्टन (cladding) कहते हैं। क्रोड के पदार्थ का अपवर्तनांक अधिपट्टन के अपवर्तनांक की तुलना में अधिक होता है।
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इस प्रकार के पाइपों की बड़ी संख्या के समूह को एक पाइप में डाल दिया जाता है जिसे प्रकाश पाइप (light pipe) कहते हैं तथा इसे प्रकाश सिग्नलों के प्रेक्षण में प्रयुक्त किया जाता है।
कार्य सिद्धान्त- जब प्रकाश किरण तन्तु के एक सिरे पर अल्प कोण बनाती हुई आपतित होती है तो यह इसके अन्दर अपवर्तित होकर तन्तु तथा तन्तु के ऊपर किये गये लेप के अन्तरापृष्ठ पर क्रान्तिक कोण से बड़े कोण पर आपतित होती है। अतः यह किरण यहाँ से पूर्ण परावर्तित (UPBoardSolutions.com) होकर इसके सम्मुख वाले अन्तरापृष्ठ पर टकराती है। यहाँ पर यह पुनः क्रान्तिक कोण से बड़े कोण पर आपतित होती है। इसलिए यह पुनः पूर्ण आन्तरिक परावर्तित हो जाती है। इस प्रकार यह किरण बार-बार पूर्ण आन्तरिक परावर्तित होती हुई प्रकाशिक तन्तु के दूसरे सिरे पर पहुँच जाती है। तन्तु के इस सिरे पर यह किरण वायु में अपवर्तित होकर अभिलम्ब से दूर हटती हुई तीव्रता के कम हुए बिना बाहर निकल जाती है।

अनुप्रयोग- इनके अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं-
1. संचार प्रणाली में प्रकाशिक तन्तु से संदेशों को मॉडुलन (modulation) द्वारा एक साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सकता है। संदेशों की अधिक संख्या उच्च आवृत्ति वाली वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों द्वारा मॉडुलित करके एक साथ संचारित की जा सकती है। प्रकाश अति उच्च आवृत्ति वाली वैद्युत-चुम्बकीय तरंग है। इनका संचरण सुचालक तार के स्थान पर प्रकाशिक तन्तु द्वारा किया जा सकता है। आधुनिक युग में प्रकाशिक तन्तुओं का उपयोग टेलीफोन व संचार लाइनों के रूप (UPBoardSolutions.com) में हो रहा है।
2. प्रकाशीय तन्तु विद्युत संकेतों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरित करने में काम आते हैं। ये विद्युत संकेत परांतरित्र (transducer) द्वारा प्रकाश में परिवर्तित कर दिये जाते हैं। अब इन प्रकाशीय संकेतों को प्रकाश तन्तुओं द्वारा दूरस्थ स्थानों तक भेज दिया जाता है।
3. प्रकाशीय तन्तुओं द्वारा वस्तुओं के प्रतिबिम्बों को दूरस्थ स्थानों पर भेजा जा सकता है।
4. इनका प्रयोग सजावट करने वाले लैम्पों में किया जाता है। फव्वारों में जल की धारा को प्रकाशित करने में इनका प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 3.
किसी गोलीय पृष्ठ पर अपवर्तन का सूत्र, प्रयुक्त चिह्नों का अर्थ बताते हुए लिखिए तथा इसकी सहायता से पतले लेन्स के लिए सम्बन्ध [latex s=2]\frac { 1 }{ f } =\left( n-1 \right) \left( \frac { 1 }{ { R }_{ 1 } } -\frac { 1 }{ { R }_{ 2 } } \right)[/latex] सिद्ध कीजिए। (2009, 15)
या
किसी लेन्स की फोकस दूरी के लिये उसके दोनों पृष्ठों की वक्रता त्रिज्याओं तथा उसके पदार्थ के अपवर्तनांक के पदों में एक व्यंजक का निगमन कीजिए। यदि काँच के लेन्स को ऐसे व्रव में डुबा दिया जाये जिसका अपवर्तनांक काँच के अपवर्तनांक से अधिक हो, तो इसकी फोकस दूरी में क्या परिवर्तन हो जाएगा? (2010)
या
किसी गोलीय पृष्ठ पर प्रकाश के अपवर्तन का सूत्र लिखिए। इसकी सहायता से किसी पतले लेन्स की फोकस दूरी के लिए सूत्र [latex s=2]\frac { 1 }{ f } =\left( n-1 \right) \left( \frac { 1 }{ { R }_{ 1 } } -\frac { 1 }{ { R }_{ 2 } } \right)[/latex] स्थापित कीजिए। (2012, 14, 16, 17)
या
यदि एक लेन्स के दोनों ओर माध्यम एक ही हो, तो पतले लेन्स की फोकस दूरी के लिए अपवर्तनांक और वक्रता त्रिज्याओं के पदों में सूत्र व्युत्पन्न कीजिए। यदि एक काँच लेन्स, काँच की अपेक्षा अधिक अपवर्तनांक के एक द्रव में डुबोया जाये तो इसकी फोकस दूरी एवं प्रकृति कैसे परिवर्तित होगी?
उत्तर-
गोलीय पृष्ठ पर अपवर्तन का सूत्र
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments LAQ 3
जहाँ n पृष्ठ के पदार्थ का वायु के सापेक्ष अपवर्तनांक है, u वस्तु की ध्रुव से दूरी है, v प्रतिबिम्ब की ध्रुव से दूरी है तथा R पृष्ठ की वक्रता-त्रिज्या है।
पतले लेन्स के लिए अपवर्तन का सूत्र- चित्र 9.25 में एक पतला लेन्स L वायु में रखा है। लेन्स के पदार्थ का वायु के सापेक्ष अपवर्तनांक n है तथा इसके पहले व दूसरे (UPBoardSolutions.com) पृष्ठों की वक्रता-त्रिज्याएँ क्रमशः R1 व R2 हैं। माना लेन्स की मोटाई t है। एक बिन्दु-वस्तु O लेन्स की मुख्य अक्ष पर लेन्स के प्रथम पृष्ठ के ध्रुवे P1 से u दूरी पर रखी है। यह पृष्ठ O का प्रतिबिम्ब I’ बनाता है।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments LAQ 2.2
यही पतले लेन्स के अपवर्तन का सूत्र है। यदि काँच के लेन्स को ऐसे द्रव में डुबो दिया जाये जिसका अपवर्तनांक काँच के अपवर्तनांक से अधिक है, तो लेन्स की फोकस दूरी बढ़ जायेगी तथा इसके साथ-साथ फोकस दूरी का चिह्न भी उलट जायेगा अर्थात् लेन्स की प्रकृति उलट जायेगी।

प्रश्न 4.
एक 25 सेमी फोकस दूरी का उत्तल लेन्स 20 सेमी फोकस दूरी के अवतल लेन्स के सम्पर्क में रखा जाता है। इस संयोजन की क्षमता तथा प्रकृति ज्ञात कीजिए। संयोजन को 1.6 अपवर्तनांक वाले द्रव में रखे जाने पर फोकस दूरी तथा प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? लेन्सों के पदार्थ का अपवर्तनांक 1.5 है। (2014)
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प्रश्न 5.
एक वस्तु किसी पर्दे से 60.0 सेमी की दूरी पर स्थित है। एक उत्तल लेन्स को इनके बीच दो भिन्न स्थानों पर रखने से पर्दे पर दो बार वास्तविक प्रतिबिम्ब बनते हैं। यदि प्रतिबिम्बों की लम्बाइयाँ 9.0 सेमी तथा 4.0 सेमी हों तो वस्तु की लम्बाई तथा लेन्स की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।
हल-
हम जानते हैं कि, विस्थापन विधि में
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प्रश्न 6.
लेन्स द्वारा प्रकाश के अपवर्तन के लिए न्यूटन का सूत्र xx’ = ff’ स्थापित कीजिए। (2017)
उत्तर-
सूत्र की उपपत्ति- माना एक लेन्स का प्रकाशिक केन्द्र C है। F व F’ इसके फोकस बिन्दु तथा OCI मुख्य अक्ष है। O एक वस्तु है जिसका लेन्स द्वारा निर्मित प्रतिबिम्ब I है। इस प्रकार O तथा I संयुग्मी बिन्दु (conjugate points) हैं। O’ से चलने वाली आपतित किरण O’A जो मुख्य अक्ष के (UPBoardSolutions.com) समान्तर है, अपवर्तन के पश्चात् लेन्स के फोकस F से होकर जाती है। दूसरी किरण O’B प्रथम फोकस बिन्दु से गुजरती हुई लेन्स से अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के समान्तर हो जाती है। दोनों निर्गत किरणें I’ पर मिलती हैं, जो O’ का वास्तविक प्रतिबिम्ब है। I’ से मुख्य अक्ष पर खींचा गया लम्ब II’ वस्तु OO’ का प्रतिबिम्ब है।
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प्रश्न 7.
किसी उत्तल या अवतल गोलीय पृष्ठ पर आपतित प्रकाश के अपवर्तन के लिए सूत्र [latex s=2]\frac { n }{ v } -\frac { 1 }{ u } =\frac { n-1 }{ R }[/latex] स्थापित कीजिए। n पदार्थ का वायु के सापेक्ष अपवर्तनांक तथा R गोलीय तल की त्रिज्या है। (2017)
उत्तर-
माना कि SPS’ एक उत्तल गोलीय पृष्ठ है जो निरपेक्ष अपवर्तनांक n1 के विरल माध्यम को निरपेक्ष अपवर्तनांक n2 के सघन माध्यम से पृथक् करता है। इस पृष्ठ का वक्रता केन्द्र C है तथा ध्रुव P है।

इसके मुख्य अक्ष PC पर (पीछे बढ़ाने पर) एक बिन्दु वस्तु O स्थित है। O से एक आपतित किरण OA, पृष्ठ पर बिन्दु A पर आपतित होती है, जहाँ CAN अभिलम्ब है। अपवर्तन के नियमानुसार, अपवर्तित किरण AB, अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है। दूसरी आपतित किरण OP पृष्ठ पर अभिलम्बवत् (UPBoardSolutions.com) गिरती है, अतः बिना विचलित हुए सीधी चली जाती है। ये दोनों अपवर्तित किरणें पीछे बढ़ाये जाने पर बिन्दु I पर मिलती हैं। अतः वस्तु 0 का आभासी प्रतिबिम्ब बिन्दु I है।
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प्रश्न 8.
प्रिज्म के पदार्थ के लिए अपवर्तनांक का सूत्र अल्पतम विचलन कोण तथा प्रिज्म कोण के पदों में निगमित कीजिए। (2009, 10, 11)
या
[latex s=2]n=\frac { sin\left( \frac { A+{ \delta }_{ m } }{ 2 } \right) }{ sin\left( \frac { A }{ 2 } \right) }[/latex] का निगमन कीजिए। यहाँ n प्रिज्म का अपवर्तनांक, A प्रिज्म का कोण तथा अल्पतम विचलन है। या किसी प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक के लिये, प्रिज्म के कोण तथा न्यूनतम विचलन कोण के पदों में एक व्यंजक निकालिए। (2012)
उत्तर-
प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक का सूत्र- चित्र 9.28 में, ABC प्रिज्म का मुख्य परिच्छेद है। प्रिज्म का अपवर्तन कोण A है। माना एक प्रकाश किरण RS, प्रिज्म के अपवर्तक पृष्ठ AB पर तिरछी आपतित होती है जो अभिलम्ब MSE की ओर झुक जाती है और ST दिशा में अपवर्तित हो जाती है। इस पृष्ठ पर आपतन कोण i1 वे अपवर्तन कोण r1 है। अपवर्तित किरण ST’ पृष्ठ AC पर अभिलम्ब NTE से दूर हटती हुई वायु (UPBoardSolutions.com) में TU दिशा में निकल जाती है। पृष्ठ AC पर आपतन कोण, तथा निर्गत कोण i2 है। आपतित किरण RS तथा निर्गत किरण TU को पीछे की ओर बढ़ाने पर ये बिन्दु D पर मिलती हैं। आपतित किरण तथा निर्गत किरणों के बीच बना कोण δ विचलन कोण कहलाता है।
ΔDST में δ बहिष्कोण है, अत:
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प्रश्न 9.
किसी प्रकाशिक माध्यम की ‘वर्ण-विक्षेपण क्षमता की परिभाषा दीजिए। किसी प्रिज्म के पदार्थ के लिए वर्ण-विक्षेपण क्षमता का सूत्र अपवर्तनांक के पदों में प्राप्त कीजिए। या किसी प्रकाशिक माध्यम की विक्षेपण क्षमता की परिभाषा लिखिए। (2016)
या
किसी प्रकाशिक माध्यम की वर्ण-विक्षेपण क्षमता का सूत्र लिखिए। क्या वर्ण-विक्षेपण क्षमता प्रिज्म के कोण पर निर्भर करती है? या किसी प्रिज्म की वर्ण-विक्षेपण क्षमता की परिभाषा दीजिए। (2010)
या
वर्ण-विक्षेपण क्षमता की परिभाषा दीजिए। (2013)
उत्तर-
जब श्वेत प्रकाश एक पतले प्रिज्म में से गुजरता है तो बैंगनी तथा लाल रंगों की निर्गत किरणों के बीच उत्पन्न कोणीय वर्ण-विक्षेपण तथा मध्यवर्ती (अर्थात् पीले रंग की) (UPBoardSolutions.com) किरण के लिए विचलन कोण के अनुपात को प्रिज्म के पदार्थ की’वर्ण-विक्षेपण क्षमता’ (dispersive power) कहते हैं। इसे ω (ओमेगा) से प्रदर्शित करते हैं। अपवर्तनांक के पदों में वर्ण-विक्षेपण क्षमता सूत्र
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प्रश्न 10.
उपयुक्त किरण आरेख द्वारा प्रिज्म के कोणीय वर्ण-विक्षेपण का सूत्र निकालिए। (2014)
उत्तर-
कोणीय वर्ण-विक्षेपण (परिक्षेपण) (Angular dispersion)- “दो रंगों की निर्गत किरणों के बीच का कोण उन रंगों के लिए कोणीय वर्ण-विक्षेपण (angular dispersion) कहलाता है।”
यदि δR व δv क्रमश: लाल तथा बैंगनी रंग की किरणों के लिए (अल्पतम) विचलन कोण हों तो उनके बीच कोणीय वर्ण-विक्षेपण θ = δV – δR
माना कि प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक A है तथा nR व nV क्रमशः लाल व बैंगनी रंगों के लिए प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक हैं। तब, पतले प्रिज्म से उत्पन्न विचलन के लिए
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प्रश्न 11.
निकट दृष्टि दोष क्या है ? इसके क्या कारण हो सकते हैं? इसका निवारण किस प्रकार किया जाता है ? (2017)
या
निकट दृष्टि दोष क्या है? इसका निवारण किस प्रकार किया जाता है? (2014)
या
निकट दृष्टि दोष क्या है? (2016)
उत्तर-
निकट-दृष्टि दोष (Myopia or shortsightedness)- निकट दृष्टि दोष वाले व्यक्ति को पास की वस्तुएँ तो स्पष्ट दिखायी देती हैं; परन्तु अधिक दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखायी नहीं देतीं अर्थात् नेत्र का दूर बिन्दु अनन्त पर न होकर कम दूरी पर आ जाता है। इस दोष के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

  1. नेत्र लेन्स की वक्रता बढ़ जाए जिससे उसकी फोकस दूरी कम हो जाए।
  2. नेत्र लेन्स और रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाए अर्थात् नेत्र के गोले में लम्बापन आ जाए।

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इस दोष के कारण दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बेनकर उससे आगे बनने लगता है (चित्र 9.30) अर्थात् प्रतिबिम्ब रेटिना व नेत्र लेन्स के बीच P पर बन जाने से वस्तु स्पष्ट नहीं दिखती। ऐसे मनुष्य का दूर बिन्दु अनन्त पर न होकर आँख के काफी पास बनता है तथा निकट बिन्दु भी 25 सेमी से कम दूरी पर बनता है। दोष का निवारण-इस दोष में नेत्र का लेन्स अधिक अभिसारी (converging) (UPBoardSolutions.com) हो जाता है; अत: इस दोष को दूर करने के लिए ऐसा लेन्स प्रयुक्त करना चाहिए जो नेत्र लेन्स को कम अभिसारी कर दे। इसलिए इस दोष को दूर करने के लिए उचित फोकस दूरी के अवतल लेन्स का प्रयोग करते हैं, ताकि इसे लेन्स तथा नेत्र लेन्स की संयुक्त फोकस दूरी बढ़कर इतनी हो जाए कि प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनने लगे।
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यदि निकट दृष्टि दोष वाले व्यक्ति का आँख के लिए दूर बिन्दु O हो, तो प्रयुक्त अवतल लेन्स अनन्त से आने वाली समान्तर किरणों का प्रतिबिम्ब O पर बनाएगा। यह प्रतिबिम्ब नेत्र लेन्स के लिए वस्तु का कार्य करेगा, जिससे अन्तिम प्रतिबिम्ब (I) रेटिना पर बनने लगेगा (चित्र 9.31)। स्पष्टतः प्रयुक्त लेन्स की फोकस दूरी नेत्र से नेत्र के दूर बिन्दु के बीच की दूरी के बराबर होगी।

प्रश्न 12.
दूर दृष्टि दोष क्या है ? इसके क्या कारण हो सकते हैं ? इसका निवारण किस प्रकार किया जाता है? (2017)
या
आँख का दूर दृष्टि दोष क्या है? इसका निवारण कैसे किया जाता है? (2014)
उत्तर-
दूर-दृष्टि दोष (Hypermetropia or longsightedness)- दूर दृष्टि दोष मनुष्य की आँख को वह दोष है, जिसमें मनुष्य दूर की वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है; परन्तु पास की वस्तुएँ स्पष्ट दिखायी नहीं पड़तीं। इसके निम्न दो कारण हो सकते हैं-

  1. नेत्र लेन्स की फोकस दूरी अधिक हो जाए अर्थात् लेन्स पतला हो जाए।
  2. आँख के गोले का व्यास कम हो जाए अर्थात् नेत्र लेन्स व रेटिना के बीच की दूरी कम हो जाए।

इन कारणों से पास की वस्तुओं के प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर उसके पीछे बनते हैं (चित्र 9.32)। दूसरे शब्दों में, नेत्र का निकट बिन्दु 25 सेमी से अधिक दूर हो जाता है।
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दोष का निवारण- चूँकि इस दोष में नेत्र लेन्स की फोकस दूरी बढ़ जाती है जिससे नेत्र लेन्स कम अभिसारी (converging) हो जाता है; अतः इस दोष को दूर करने के लिए एक-ऐसा लेन्स प्रयुक्त करना चाहिए जिससे वह अधिक अभिसारी हो जाए। इस दोष को दूर करने के लिए उपयुक्त फोकस दूरी का उत्तल लेन्स प्रयुक्त करते हैं ताकि इस लेन्स तथा नेत्र-लेन्स की संयुक्त फोकस दूरी इतनी हो जाये कि प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनने लगे।

माना सामान्य आँख का निकट बिन्दु N तथा दूर दृष्टि से पीड़ित आँख का निकट बिन्दु O पर है। प्रयुक्त उत्तल लेन्स N पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब O पर बनाने लगे, (UPBoardSolutions.com) तब प्रतिबिम्ब O नेत्र लेन्स के लिए वस्तु का कार्य करेगा तथा नेत्र लेन्स अन्तिम प्रतिबिम्ब रेटिना पर बना देगा। इस प्रकार उचित फोकस दूरी का उत्तल लेन्स प्रयुक्त करने पर सामान्य निकट बिन्दु N पर रखी वस्तु भी आँख को स्पष्ट दिखाई देगी (चित्र 9.33)।
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प्रश्न 13.
एक अपवर्तनी खगोलीय दूरदर्शी का किरण आरेख खींचिए जब अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनता है। इसकी आवर्धन क्षमता के लिए व्यंजक भी स्थापित कीजिए। (2016, 17)
या
खगोलीय दूरदर्शी का किरण आरेख बनाइए। जब अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्तता पर बन रहा है। दूरदर्शी में अभिदृश्यक लेन्स का द्वारक बड़े आकार का क्यों लिया जाता है? (2015)
या
खगोलीय दूरदर्शी द्वारा अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनने का किरण आरेख बनाइए। (2017)
उत्तर-
खगोलीय दूरदर्शी (Astronomical Telescope)- खगोलीय दूरदर्शी एक ऐसा प्रकाशिक यन्त्र है जिसके द्वारा उना दूर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब का आँख पर बड़ा दर्शन कोण बनाता है जिससे कि वह वस्तु आँख को बड़ी दिखायी पड़ती है।

रचना- इसमें धातु की एक लम्बी बेलनाकार नली होती है जिसके एक सिरे पर बड़ी फोकस-दूरी तथा बड़े द्वारक का अवर्णक उत्तल लेन्स लगा होता है, जिसे ‘अभिदृश्यक लेन्स’ कहते हैं। नली के दूसरे सिरे पर एक अन्य छोटी नली फिट होती है जो दन्तुर दण्ड-चक्र (रैक-पिनयन) व्यवस्था द्वारा बड़ी नली में आगे-पीछे खिसकाई जा सकती है। छोटी नली के बाहरी सिरे पर एक छोटी फोकस-दूरी तथा छोटे द्वारकं को अवर्णक उत्तल लेन्स लगा रहता है जिसे अभिनेत्र लेन्स अथवा नेत्रिका कहते हैं। नेत्रिका के फोकस पर क्रॉस-तार लगे रहते हैं।

समायोजन- सबसे पहले नेत्रिको को छोटी नली में आगे-पीछे खिसकाकर क्रॉस-तार पर फोकस करे लेते हैं। फिर जिस वस्तु को देखना हो उसकी ओर अभिदृश्यक लेन्स को दिष्ट कर देते हैं। दन्तुर-दण्ड-चक्र व्यवस्था द्वारा छोटी नली को लम्बी नली में आगे-पीछे खिसकाकर (UPBoardSolutions.com) अभिदृश्यक लेन्स की क्रॉस-तार से दूरी इस प्रकार समायोजित करते हैं कि वस्तु के प्रतिबिम्ब और क्रॉस-तार में लम्बन न रहे। इस स्थिति में वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दिखाई देगा। यह प्रतिबिम्ब लेन्सों द्वारा प्रकाश के अपवर्तन से बनता है। अतः यह दूरदर्शी अपवर्तक’ दूरदर्शी है।

प्रतिबिम्ब का बनना- चित्र 9.34 में दूरदर्शी का अभिदृश्यक लेन्स O तथा नेत्रिका E। दिखाये गये हैं। AB एक दूर-स्थित वस्तु है। जिसका A सिरा दूरदर्शी की अक्ष पर है। लेन्स -14 0 के द्वारा AB का वास्तविक, उल्टा व छोटा प्रतिबिम्ब A’B’, लेन्स के द्वितीय फोकस F0 पर बनता है। यह प्रतिबिम्ब नेत्रिका E के प्रथम फोकस Fe के भीतर है तथा नेत्रिका के लिए वस्तु का कार्य करता है। अतः नेत्रिका, A’B’ का आभासी, सीधा तथा बड़ा प्रतिबिम्ब A”B” बनाती है। B” की स्थिति ज्ञात करने के लिए, B’ से दो विछिन्न किरणें (………) ली गई हैं। एक किरण जो E के प्रकाशिक-केन्द्र में से जाती है, सीधी चली जाती है तथा दूसरी किरण जो मुख्य अक्ष से समान्तर ली गई है, E के दूसरे फोकस F, से होकर जाती है। ये किरणें पीछे बढ़ाने पर बिन्दु B” पर मिलती हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments LAQ 13आवर्धन-क्षमता- दूरदर्शी की आवर्धन-क्षमता (कोणीय आवर्धन)
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 9 Ray Optics and Optical Instruments LAQ 13.2
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प्रश्न 14.
किसी परावर्ती दूरदर्शी का किरण आरेख खींचकर उसमें प्रतिबिम्ब का बनना प्रदर्शित कीजिए। (2009, 16, 17)
या
परावर्ती दूरदर्शी का किरण आरेख खींचिए तथा इसकी आवर्धन-क्षमता का सूत्र लिखिए जब प्रतिबिम्ब (i) अनन्त पर बन रहा हो। (ii) स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बन रहा हो। (2011)
या
परावर्ती दूरदर्शी में प्रतिबिम्ब का बनना किरण-आरेख द्वारा समझाइए। अपवर्ती दूरदर्शी की तुलना में परावर्ती दूरदर्शी का क्या लाभ है? (2009, 10, 11)
या
परावर्ती दूरदर्शी का किरण आरेख खींचिए तथा इसकी कार्यविधि समझाइए। किसी दूरदर्शी की विभेदन क्षमता कैसे बढ़ाई जा सकती है? (2012)
या
परावर्ती दूरदर्शी की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2017)
या
किसी परावर्ती दूरदर्शी से प्रतिबिम्ब का बनना किरण आरेख द्वारा समझाइए। अपवर्ती दूरदर्शी की अपेक्षा परावर्ती दूरदर्शी क्यों अच्छी होती है? (2017)
उत्तर-
परावर्ती दूरदर्शी की रचना एवं उसके द्वारा प्रतिबिम्ब बनने की किरण आरेख चित्र 9.36 में प्रदर्शित किया गया है। इसमें अभिदृश्यक एक बड़े आकार तथा बड़ी फोकस दूरी का अवतल दर्पण M1 होता है जो एक चौड़ी नली के एक सिरे पर। लगा रहता है। नली का खुला सिरा दूर स्थित वस्तु की (UPBoardSolutions.com) ओर करके रखा जाता है। नली में अवतल दर्पण के फोकस से कुछ पहले एक समतल दर्पण M2 मुख्य अक्ष से 45° कोण पर झुका हुआ रखा जाता है। दूरदर्शी की इस चौड़ी नली के बगल में एक पतली नली लगी होती है जिसमें कम फोकस दूरी तथा छोटी द्वारक का एक अवर्णक उत्तल लेन्स E लगा रहता है, जिसे नेत्रिका कहते हैं।
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अवतल दर्पण M1 दूर स्थित वस्तु AB से आने वाली समान्तर किरणों को अपने फोकस पर केन्द्रित करता है। परन्तु ये किरणें फोकस पर केन्द्रित होने से पूर्व फोकस से पहले 45° कोण पर झुके समतल दर्पण M2 पर आपतित होती हैं। समतल दर्पण इन किरणों को परावर्तित (UPBoardSolutions.com) करके AB का छोटा, वास्तविक, उल्टा प्रतिबिम्बे A1B1 बनाता है। नेत्रिका E द्वारा A1B1 का वास्तविक, सीधा तथा बड़ा प्रतिबिम्ब A2B2 स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी तथा अनन्त के बीच में बन जाता है। जब प्रतिबिम्ब A1B1 नेत्रिका के फोकस पर बन जाता है, तो अन्तिम प्रतिबिम्ब A2B2 अनन्त पर बनेगा।
आवर्धन क्षमता सूत्र
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अपवर्ती दूरदर्शी की तुलना में परावर्ती दूरदर्शी के लाभ- अपवर्ती दूरदर्शी की तुलना में परावर्ती दूरदर्शी के निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. परावर्ती दूरदर्शक में प्रकाश अवशोषण बहुत कम होता है; अत: इससे निर्मित प्रतिबिम्ब, समान द्वारक के अपवर्ती दूरदर्शक की अपेक्षा अधिक चमकीला होता है।
  2. परावर्ती दूरदर्शक से बना अन्तिम प्रतिबिम्ब वर्ण-विपथन दोष से पूर्णतः मुक्त होता है।
  3. इसमें परवलयाकार दर्पणों के प्रयोग (UPBoardSolutions.com) से गोलीय विपथन दोष भी स्वतः दूर हो जाता है जिससे प्रतिबिम्ब टेढ़े दिखायी नहीं देते।
  4. दूरदर्शी से दूर-स्थित वस्तु को चमकीला प्रतिबिम्ब बनाने के लिए उसके अभिदृश्यक का द्वारक बड़ा (large) होना आवश्यक है। तकनीकी दृष्टि से बड़े द्वारक के लेन्स को ढालने (casting) की क्रिया में उसके पदार्थ में विकृति आ जाती है, क्योंकि बड़े आकार के गर्म काँच को एकसमान (uniformly) ठण्डा करना कठिन होता है। फलस्वरूप इनसे निर्मित प्रतिबिम्ब भी विकृत हो जाते हैं। चूँकि दर्पण से परावर्तन द्वारा प्रतिबिम्ब निर्मित होते हैं, प्रकाश की किरण केवल दर्पण के पृष्ठ को स्पर्श करती है, उसके पदार्थ में होकर नहीं गुजरती है। अत: दर्पण के पदार्थ में कोई विकृति होने पर उसका प्रतिबिम्ब पर प्रभाव नहीं पड़ता।
  5. दूरदर्शी की विभेदन क्षमता = d/1.22 λ अतः अभिदृश्यक का द्वारक d बढ़ाकर दूरदर्शी की विभेदन क्षमता बढ़ायी जा सकती है।
  6. परावर्ती दूरदर्शी में परवलयाकार दर्पण के उपयोग से प्रतिबिम्ब में गोलीय विपथन के दोष को दूर किया जा सकता है।

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प्रश्न 15.
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का नामांकित किरण आरेख बनाइए तथा इसकी आवर्धन क्षमता का सूत्र ज्ञात कीजिए, जब अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनता है। (2016)
उत्तर-
आवर्धन-क्षमता- माना कि अन्तिम प्रतिबिम्ब A” B” नेत्रिका E पर β कोण बनाता है। आँख नेत्रिका के समीप है, अतः A” B” द्वारा आँख पर बनने वाले कोण को भी β मान सकते हैं। माना कि यदि वस्तु AB आँख से स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी D पर हो, तो वह आँख पर α कोण बनाती है। अब, सूक्ष्मदर्शी की आवर्धन-क्षमता
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 14 Semiconductor Electronics: Materials, Devices and Simple Circuits

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 14 Semiconductor Electronics: Materials, Devices and Simple Circuits (अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 14 Semiconductor Electronics: Materials, Devices and Simple Circuits (अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 14
Chapter Name Semiconductor Electronics: Materials, Devices and Simple Circuits (अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ)
Number of Questions Solved 122
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 14 Semiconductor Electronics: Materials, Devices and Simple Circuits (अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ)

 अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1:
किसी प्रकार के सिलिकॉन में निम्नलिखित में से कौन-सा प्रकथन सत्य है?
(a) इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
(b) इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
(c) होल (विवर) अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
(d) होल (विवर) बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
उत्तर:
(c) प्रकथन सत्य है।

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प्रश्न 2:
प्रश्न 1 में दिए गए कथनों में से कौन-सी p-प्रकार के अर्द्धचालकों के लिए सत्य है?
उत्तर:
(d) प्रकथन सत्य है।

प्रश्न 3:
कार्बन, सिलिकॉन और जर्मोनियम, प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन हैं। इनकी विशेषता ऊर्जा बैड अन्तराल द्वारा पृथक्कृत संयोजकता और चालन बैंड द्वारा दी गई हैं, जो क्रमशः
(Eg)c, (Eg)s; तथां (Eg) Ge के बराबर हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा प्रकथन सत्य है?
(a) (Eg)si <(Eg) Ge <(Eg)c
(b) (Eg)c <(Eg) Ge > (Eg)st
(c) (Eg)c > (Eg)s >(Eg) Ge
(d) (Eg)c = (Eg)si = (Eg)Ge
उत्तर:
चालन बैंड तथा संयोजकता बैंड के बीच ऊर्जा अन्तराल कार्बन के लिए सबसे अधिक, सिलिकॉन के लिए उससे कम तथा जर्मेनियम के लिए सबसे कम होता है; अतः (c) प्रकथन सत्य है।

प्रश्न 4:
बिना बायस p-n सन्धि में, होल क्षेत्र में n-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं, क्योंकि
(a) n-क्षेत्र में मुक्त इलेक्ट्रॉन उन्हें आकर्षित करते हैं।
(b) ये विभवान्तर के कारण सन्धि के पार गति करते हैं।
(c) p-क्षेत्र में होल-सान्द्रता, n-क्षेत्र में उनकी सान्द्रता से अधिक है।
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(c) प्रकथन सत्य है।

प्रश्न 5:
जब p- n सन्धि पर अग्रदिशिक बायस अनुप्रयुक्त किया जाता है, तब यह
(a) विभव रोधक बढ़ाता है।
(b) बहुसंख्यक वाहक धारा को शून्य कर देता है।
(c) विभव रोधक को कम कर देता है।
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) प्रकथन सत्य है।

प्रश्न 6. ट्रांजिस्टर की क्रिया हेतु निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं
(a) आधार, उत्सर्जक और संग्राहक क्षेत्रों की आमाप और अपमिश्रण सान्द्रता समान होनी  चाहिए।
(b) आधार क्षेत्र बहुत बारीक और कम अपमिश्रित होना चाहिए।
(c) उत्सर्जक सन्धि अग्रदिशिक बायस है और संग्राहक सन्धि पश्चदिशिक बायस है।
(d) उत्सर्जक सन्धि संग्राहक सन्धि दोनों ही अग्रदिशिक बायस हैं।
उत्तर:
(b) तथा (c) प्रकथन सत्य हैं।

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प्रश्न 7:
किसी ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए वोल्टता लब्धि
(a) सभी आवृत्तियों के लिए समान रहती है।
(b) उच्च और निम्न आवृत्तियों पर उच्च होती है तथा मध्य आवृत्ति परिसर में अचर रहती है।
(e) उच्च और निम्न आवृत्तियों पर कम होती है और मध्य आवृत्तियों पर अचर रहती है।
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) प्रकथन सत्य है।

प्रश्न 8:
अर्द्ध-तरंगी दिष्टकरण में, यदि निवेश आवृत्ति 50Hz है तो निर्गम आवृत्ति क्या है? समान निवेश आवृत्ति हेतु पूर्ण तरंग दिष्टकारी की निर्गम आवृत्ति क्या है? उत्तर:
अर्द्ध-तरंग दिष्टकारी के लिए निर्गम आवृत्ति 50Hz ही रहेगी परन्तु पूर्ण-तरंग दिष्टकारी के लिए निर्गम आवृत्ति दोगुनी अर्थात् 100 Hz होगी।

प्रश्न 9:
उभयनिष्ठ उत्सर्जक (CE-ट्रांजिस्टर) प्रवर्धक हेतु, 2Ω के संग्राहक प्रतिरोध के सिरों पर ध्वनि वोल्टता 2V है। मान लीजिए कि ट्रांजिस्टर का धारा प्रवर्धन गुणक 100 है। यदि आधार प्रतिरोध 1kΩ है तो निवेश संकेत (signal) वोल्टता और आधार धारा परिकलित कीजिए।
हल:
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प्रश्न 10:
एक के पश्चात् एक श्रेणीक्रम सोपानित में दो प्रवर्धक संयोजित किए गए हैं। प्रथम प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि 10 और द्वितीय की वोल्टता लब्धि 20 है। यदि निवेश संकेत 0.01 वोल्ट | है तो निर्गम प्रत्यावर्ती संकेत का परिकलन कीजिए।
हल:
यहाँ A1 = 10 तथा A2 = 20 Vi = 0.01 वोल्ट
अतः कुल वोल्टता लाभ A = A1 x A2 = 10 x 20 = 200
परन्तु A =  [latex]\frac { { V }_{ 0 } }{ { V }_{ i } }[/latex] ⇒  निर्गत वोल्टता V0 = A x Vi
V0 = (200 x 0.01) वोल्टे = 2 वोल्ट

प्रश्न 11:
कोई p-n फोटोडायोड 2.8eV बैंड अन्तराल वाले अर्द्धचालक से संविरचित है। क्या यह 6000 nm की तरंगदैर्ध्य का संसूचन कर सकता है?
हल:
λ = 6000 nm = 6000 x 10-9 मी तरंगदैर्घ्य के संगत फोटॉन की ऊर्जा
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= 3.3 x 10-20 जूल
= (3.3 x 10-20 1.6 x 10-19) eV
≈ 0.2 eV
यह फोटॉन ऊर्जा (0.2 eV) बैण्ड रिक्ति (28eV) से काफी कम है। अतः फोटो डायोड दी गयी तरंगदैर्घ्य का संसूचन नहीं कैर सकता है।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 12:
सिलिकॉन परमाणुओं की संख्या 5 x 1028 प्रति m3 है। यह साथ ही साथ आर्सेनिक के 5 x 1022 परमाणु प्रति m3 और इंडियम के 5 x 1020 परमाणु प्रति m3 से अपमिश्रित किया गया है। इलेक्ट्रॉन और होल की संख्या का परिकलन कीजिए। दिया है क ni = 1.5 x 1016 m-3 दिया गया पदार्थ n-प्रकार का है या p-प्रकार का?
हल:
यहाँ दाता परमाणुओं की सान्द्रता ND = 5 x 1022 m-3
ग्राही परमाणुओं की सान्द्रत NA = 5 x 1020 m-3
= 0.05 x 1022 m-3
नैज वाहक सान्द्रता ni = 1.5 x 1016 m-3
नैज परमाणु सान्द्रता N = 5 x 1028 m-3
माना अर्द्धचालक में होलों तथा मुक्त इलेक्ट्रॉनों की सान्द्रता क्रमशः nh तथा ne है।
अब ND – NA = (5 – 0.05) x 1022 = 4.95 x 1042 m-3
अर्द्धचालक की विद्युत उदासीनता के लिए
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स्पष्ट है कि ne >> nh अतः इस अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक हैं तथा होल अल्पसंख्यक आवेश वाहक हैं।
इससे ज्ञात होता है कि यह n-प्रकार का अर्द्धचालक है।

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प्रश्न 13:
किसी नैज अर्द्धचालक में ऊर्जा अन्तराल Eg का मान 1.2 eV है। इसकी होल गतिशीलता इलेक्ट्रॉन गतिशीलता की तुलना में काफी कम है तथा ताप पर निर्भर नहीं है। इसकी 600 K तथा 300 K पर चालकताओं का क्या अनुपात है? यह मानिए की नैज वाहक सान्द्रता n की ताप निर्भरता इस प्रकार व्यक्त होती है
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जहाँ n0 एक स्थिरांक है।
हल:
नैज अर्द्धचालक को ऊर्जा अन्तराल E = 1.2 eV
तथा परमताप T1 = 600K व T2 = 300K
माना उक्त तापों पर (UPBoardSolutions.com) अर्द्धचालक की चालकताएँ क्रमशः σ1 वे σ2
अर्द्धचालक की चालकता निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्राप्त होती है
σ = [neμe + nhμh}]
जहाँ μe तथा  μh क्रमशः इलेक्ट्रॉनों तथा होलों की गतिशीलताएँ हैं।
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प्रश्न 14:
किसी p-n सन्धि डायोड में धारी I को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है
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जहाँ I0 को उत्क्रमित संतृप्त धारा कहते हैं, V डायोड के सिरों पर वोल्टता है तथा यह अग्रदिशिक बायस के लिए धनात्मक तथा पश्चदिशिक बायस के लिए ऋणात्मक है। V डायोड से प्रवाहित धारा है, KB बोल्ट्जमान नियतांक (8.6 x 10-5 eV/K) है तथा T परम ताप है। यदि किसी दिए गए डायोड के लिए I0 = 5 x 10-12 A तथा T= 300K है, तब
(a) 0.6 अग्रदिशिक वोल्टता के लिए अग्रदिशिक धारा क्या होगी?
(b) यदि डायोड के सिरों पर वोल्टता को बढ़ाकर 0.7V कर दें तो धारा में कितनी वृ जाएगी?
(c) गतिक प्रतिरोध कितना है?
(d) यदि पश्चदिशिक वोल्टता को 1 से 2V कर दें तो धारा का मान क्या होगा?
हल:
दिया है, KB = 8.6 x 10-5 eCK-1 = 1.6 x 10-19 x 86 x 10-5 JK-1
I0 = 5 x 10-12A, T = 300K
(a) V= + 0.6V के लिए अग्र धारा I = ?
अभीष्ट धारा
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अतः उत्क्रम वोल्टता के लिए धारा उत्क्रमित संतृप्त धारा के बराबर बनी रहती है।
इससे ज्ञात होता है कि पश्चदिशिक बायस के लिए डायोड का गतिक प्रतिरोध अनन्त होता है।

प्रश्न 15:
आपको चित्र 14.1 में दो परिपथ दिए गए हैं। यह दर्शाइए कि परिपथ (a) OR गेट की भाँति व्यवहार करता है जबकि परिपथ (b) AND गेट की भाँति कार्य करता है।
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हल:
चित्र 14.1(a) में पहला गेट NOR गेट है तथा इसके निर्गम ४’ को दूसरे गेट (NOT गेट) का निवेश बनाया गया है जिसका निर्गम Y है। अतः इसकी सत्यता सारणी निम्न प्रकार लिखी जा सकती है
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यहाँ से स्पष्ट है Y = A + B
अतः दिया गया परिपथ (a) OR गेट की भाँति कार्य करेगा।
चित्र 14.1 (b) में दो NOT गेटों के निर्गमों को NOR गेट के निवेश बनाये गये हैं जिसका निर्गम Y है। अतः इसकी सत्यता सारणी निम्न प्रकार लिखी जा सकती है
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यहाँ से स्पष्ट है कि Y = A : B, अत: दिया गया परिपथ (b) AND गेट की भाँति कार्य करेगा।

प्रश्न 16:
नीचे दिए गए चित्र 14.2 में संयोजित NAND गेट संयोजित परिपथ की सत्यमान सारणी बनाइए।
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अतः इस परिपथ द्वारा की जाने वाली यथार्थ तर्क संक्रिया का अभिनिर्धारण कीजिए।
हल:
यहाँ NAND गेट के दोनों निवेशी टर्मिनल एक साथ जोड़ दिये गये हैं। इस प्रकार एक निवेश के लिए एक ही निर्गम Y है। अतः दिए गये परिपथ की सत्यता सारणी निम्न प्रकार लिखी जा सकती है
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अत: Y = Ā इसलिए दिया गया परिपथ NOT तर्क संक्रिया पर कार्य करेगा।

प्रश्न 17:
आपको निम्न चित्र 14.3 में दर्शाए अनुसार परिपथ दिए गए हैं जिनमें NAND गेट जुड़े हैं। इन दोनों परिपथों द्वारा की जाने वाली तर्क संक्रियाओं का अभिनिर्धारण कीजिए।
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हल:
चित्र 14.3 (a) में पहला गेट NAND गेट है जिसके निर्गम को NAND गेट से बनाये गये NOT गेट का निर्वेशं बनाया गया है। अतः सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
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स्पष्ट है कि निर्गम Y = A : B, अतः दिये गये परिपथ में AND संक्रिया अनुपालित है।
दिये गये चित्र 14.3 (b) में NAND गेटों से बने दो NOT गेटों के निर्गमों को तीसरे NAND गेट का निवेश बनाया गया है। जिसका निर्गम Y है। अतः सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
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अतः स्पष्ट है कि यहाँ निर्गम Y = A+ B, अत: दिये गये परिपथ में OR संक्रिया अनुपालित है।

प्रश्न 18:
चित्र 14.4 में दिए गए NOR गेट युक्त परिपथ की सत्यमान सारणी लिखिए और इस परिपथ द्वारा अनुपालित तर्क संक्रियाओं (OR, AND, NOT) को अभिनिर्धारित कीजिए। (संकेत : A = 0, B=1 तब दूसरे NOR गेट के निवेश A और B, 0 होंगे और इस प्रकार Y = 1 होगा। इसी प्रकार A और B के दूसरे संयोजनों के लिएY के मान प्राप्त कीजिए। OR, AND, NOT द्वारों की सत्यमान सारणी से तुलना कीजिए और सही विकल्प प्राप्त कीजिए।)
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हल:
पहला गेट NOR गेट है तथा दूसरा गेट भी NOR गेट है जिसके दोनों निवेशी सिगनलों को एक साथा जोड़ा गया है। पहले गेट का निर्गम दूसरे गेट का निवेश बनाया गया है। अत: सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
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यहाँ से स्पष्ट है कि Y =[latex]\overline { A\quad +\quad B }[/latex] = A+B, अतः दिया गया परिपथ OR संक्रिया अनुपालित करेगा।

प्रश्न 19:
चित्र 14.5 में दर्शाएंगैकवल NOR गेटों से बने परिपथ की सत्यमान सारणी बनाइए। दोनों परिपथों द्वारा अनुपालित तर्क संक्रियाओं (OR, AND, NOT) को अभिनिर्धारित कीजिए।
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हल:
चित्र 14.5 (a) में दिया गया परिपथ NOR गेट है जिसके दोनों निवेशी टर्मिनले एक साथ जोड़ दिये गए हैं।
अत: इसकी सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
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स्पष्ट है कि Y = [latex]\overline { A\quad +\quad B }[/latex] = Ā, अत: दिया गया परिपथ NOT संक्रिया को निरूपित करता है। चित्र 14.5 (b) में NOR गेट से बने दो NOT गेटों द्वारा दोनों निवेशी A व B को उत्क्रम करके उनको तीसरे NOR गेट के निवेश बनाया गया है जिसका निर्गम Y है। अतः सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
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यहाँ से स्पष्ट है कि Y = [latex]\overline { \begin{matrix} \bar { A } + & \bar { B }  \end{matrix} }[/latex] = A .B, अतः चित्र 14.5 (b) में प्रदर्शित परिपथ AND संक्रिया का अनुपालन करेगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1:
तीन पदार्थों के ऊर्जा बैण्ड चित्रों में दिए गए हैं, जहाँ V संयोजी बैण्ड तथा C चालन बैण्ड हैं। ये पदार्थ क्रमशः हैं (2014)
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(i) चालक, अर्द्धचालक, कुचालक
(ii) अर्द्धचालक, कुचालक, चालक
(iii) कुचालक, चालक, अर्द्धचालक
(iv) अर्द्धचालक, चालक, कुचालक
उत्तर:
(iv) अर्द्धचालक, चालक, कुचालक

प्रश्न 2:
अर्द्धचालक में वैद्युत चालन होता है (2010, 17)
(i) कोटरों से
(ii) इलेक्ट्रॉनों से
(iii) कोटरों तथा इलेक्ट्रॉनों से
(iv) न कोटरों से, न इलेक्ट्रॉनों से
उत्तर:
(iii) कोटरों तथा इलेक्ट्रॉनों से

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प्रश्न 3:
अर्द्धचालकों की चालकता
(i) ताप पर निर्भर नहीं करती
(ii) ताप बढ़ने पर घटती है
(iii) ताप बढ़ने पर बढ़ती है
(iv) ताप घटने पर घटती है
उत्तर:
(iii) ताप बढ़ने पर बढ़ती है।

प्रश्न 4:
परम शून्य ताप पर शुद्ध जर्मेनियम का क्रिस्टल व्यवहार करता है  (2010, 12)
(i) पूर्ण चालक की भाँति
(ii) पूर्ण अचालक की भाँति
(iii) अर्द्धचालक की तरह
(iv) इनमें से किसी भी तरह का नहीं
उत्तर:
(ii) पूर्ण अचालक की भाँति

प्रश्न 5:
किसी n-प्रकार के अर्द्धचालक में आवेश वाहक होते हैं (2011)
(i) केवल इलेक्ट्रॉन
(ii) केवल कोटर (होल)
(iii) दोनों, अल्प संख्या में इलेक्ट्रॉन तथा अधिक संख्या में कोटर (होल)
(iv) दोनों, अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन तथा अल्प संख्या में कोटर (होल)
उत्तर:
(iv) दोनों, अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन तथा अल्प संख्या में कोटर (होल)

प्रश्न 6:
n-प्रकार के अर्द्धचालक में अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं (2010)
(i) इलेक्ट्रॉन
(ii) होल
(iii) इलेक्ट्रॉन तथा होल
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ii) होल

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प्रश्न 7:
शुद्ध सिलिकॉन के n-टाइप अर्द्धचालक बनाने के लिए इसमें अपद्रव्य पदार्थ मिलाते हैं (2014)
(i) ऐलुमिनियम
(ii) लोहा
(iii) बोरॉन
(iv) ऐण्टीमनी
उत्तर:
(iv) ऐण्टीमनी

प्रश्न 8:
n-टाइप अर्द्धचालक में वैद्युत चालन का कारण है (2016)
(i) इलेक्ट्रॉन
(ii) कोटर
(iii) प्रोटॉन
(iv) पॉजिट्रॉन
उत्तर:
(i) इलेक्ट्रॉन

प्रश्न 9:
कोटर (छिद्र) अधिसंख्य आवेश वाहक होते हैं (2017)
(i) नैज अर्द्धचालकों में
(ii) n-प्रकार के अर्द्धचालकों में
(iii) p-प्रकार के अर्द्धचालकों में
(iv) धातुओं में
उत्तर:
(iii) p-प्रकार के अर्द्धचालकों में

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प्रश्न 10:
p-प्रकार का अर्द्धचालक बनाने के लिए शुद्ध जर्मेनियम में मिलाया जाने वाला अपद्रव्य होता है (2011, 15, 17)
(i) फॉस्फोरस
(ii) ऐण्टीमनी
(iii) ऐलुमिनियम
(iv) आर्सेनिक
उत्तर:
(iii) ऐलुमिनियम

प्रश्न 11:
p-n सन्धि डायोड में उत्क्रम संतृप्ति धारा का कारण है केवल (2009)
(i) अल्पसंख्यक वाहक
(ii) बहुसंख्यक वाहक
(iii) ग्राही आयन
(iv) दाता आयन
उत्तर:
(i) अल्पसंख्यक वाहक

प्रश्न 12:
p-n सन्धि डायोड के अवक्षय परत में होते हैं (2012, 17)
(i) केवल कोटर
(ii) केवल इलेक्ट्रॉन
(iii) इलेक्ट्रॉन तथा कोटर दोनों
(iv) न इलेक्ट्रॉन तथा न कोटर
उत्तर:
(iv) न इलेक्ट्रॉन तथा न कोटर

प्रश्न 13:
जर्मेनियम डायोड की प्राचीर विभव लगभग है (2009)
(i) 0.1 वोल्ट
(ii) 0.3 वोल्ट
(iii) 0.5 वोल्ट
(iv) 0.7 वोल्ट
उत्तर:
(ii) 0.3 वोल्ट

प्रश्न 14:
एक n-p-n ट्रांजिस्टर में संग्राहक धारा 24 mA है। यदि संग्राहक की ओर 80% इलेक्ट्रॉन पहुँचते हों तो आधार धारा है (2014)
(i) 3 mA
(ii) 16 mA
(iii) 6 mA
(iv) 36 mA
उत्तर:
(iii) Ic = 24 mA, α = 80% = 0.8, IB = ?
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प्रश्न 15:
एक ट्रांजिस्टर की आधार धारा 100 μA और संग्राहक धारा 2.15 mA है। β का मान होगा (2009)
(i) 21.5
(ii) 0.0465
(iii) 2.15 x 105
(iv) 10
उत्तर:
(i) 21.5

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प्रश्न 16:
दो निवेशी टर्मिनलों वाले OR गेट का निर्गत केवल तब 0 होता है जब (2013,15)
(i) कोई एक निवेशी 1 हो
(ii) दोनों निवेशी 1 हों
(ii) कोई एक निवेशी 0 हो
(iv) इसके दोनों निवेशी 0 हों
उत्तर:
(iv) इसके दोनों निवेशी 0 हों।

प्रश्न 17:
दो निवेश A तथा B वाले ORगेट का निर्गत शून्य होने के लिए यह आवश्यक है कि  (2011)
(i) A = 0, B = 0
(ii) A = 1, B = 0
(iii) A = 0, B = 1
(iv) A = 1, B = 1
उत्तर:
(i) A = 0, B = 0

प्रश्न 18:
OR गेट में एक निवेश 0 एवं दूसरा 1 है, निर्गत होगा (2017)
(i) 0
(ii) 1
(iii) 0 या 1
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ii) 1

प्रश्न 19:
निम्नांकित लॉजिक निकाय निरूपित करता है (2016)
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(i) NAND गेट
(ii) OR. गेट
(iii) AND गेट
(iv) NOT गेट
उत्तर:
(ii) OR गेट

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प्रश्न 20:
AND गेट में उच्च निर्गत प्राप्त करने के लिए निवेशी A व B होने चाहिए (2011)
(i) A = 0, B = 0
(ii) A = 1, B = 0
(iii) A = 0, B = 1
(iv) A = 1, B = 1
उत्तर:
(iv) A = 1, B = 1

प्रश्न 21:
AND गेट में एक निवेशी 0 तथा दूसरा 1 है। निर्गत होगा (2015)
(i) 0
(ii) 1
(iii) अनन्त
(iv) इनमें से कोई न
उतर:
(i) 0

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प्रश्न 22:
बूलियन व्यंजक Y = A[latex]\overline { B }[/latex] + B[latex]\overline { A }[/latex] दिया गया है। यदि A= 1 तथा B= 1 हो, तो Y का मान होगा (2012)
(i) 0
(ii) 1
(iii) 11
(iv) 10
उत्तर:
(i) 0
[ सिंकेत A = 1 ⇒ Ā = 0 तथा B = 1 ⇒ [latex]\overline { B }[/latex] = 0
A. [latex]\overline { B }[/latex]= 1.0= 0. तथा B. [latex]\overline { A }[/latex] = 1.0 = 0
∴ A. [latex]\overline { B }[/latex] + B. [latex]\overline { A }[/latex] = 0 +0= 0]

प्रश्न 23:
चिंध्र 14.8 में प्रदर्शित गेटों के संयोजन से निर्गतY = 1 प्राप्त करने के लिए    [2015, 16]
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(i) A = 1, B = 0, C = 1
(ii) A = 1, B = 1 C = 0
(iii) A = 0, B = 1, C =0
(iv) A = 1 B = 0, C = 0
उत्तर:
(i) A = 1, B = 0, C = 1

प्रश्न 24:
बाइनरी संख्याओं 1011 व 110 का योग है  (2012, 13)
(i) 10001
(ii) 10011
(iii) 11011
(iv) 11101
उत्तर:
(i) 10001

प्रश्न 25:
निम्नलिखित में से कौन-सा बाइनरी योग नियमानुसार नहीं है? (2013) 
(i) 0 + 0= 0
(ii) 0 + 1 = 1
(iii) 1 +0 = 1
(iv) 1 + 1 = 1
उत्तर:
(iv) 1 + 1 = 1

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
ऊर्जा बैण्ड किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी निश्चित लघु ऊर्जा परिसर में अत्यन्त निकट रूप से स्थित ऊर्जा स्तरों की एक बड़ी संख्या का समूह ऊर्जा बैण्ड कहलाता है।

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प्रश्न 2:
ठोसों में उपस्थित ऊर्जा बैण्डों के नाम लिखिए। (2014, 15, 17)
उत्तर:
चालन बैण्ड तथा संयोजी बैण्ड।

प्रश्न 3:
सिलिकॉन में वर्जित बैण्ड की ऊर्जा कितनी होती है?
उत्तर:
1.1 eV लगभग।

प्रश्न 4:
अर्द्धचालक क्या होता है? किसी एक अर्द्धचालक का नाम लिखिए। (2009)
उत्तर:
वे ठोस पदार्थ जिनकी वैद्युत चालकता, चालकों से कम; परन्तु अचालकों से अधिक होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं। उदाहरण–जर्मेनियम।।

प्रश्न 5:
ताप बढ़ाने पर अर्द्धचालक के प्रतिरोध में क्या परिवर्तन होता है? (2011)
या
किसी अर्द्धचालक का ताप बढाने से उसकी वैद्युत चालकता क्यों बढ़ जाती है?
उत्तर:
ताप बढ़ाने पर सहसंयोजक बन्ध टूट जाने के कारण अर्द्धचालक के मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है जिससे अर्द्धचालक की चालकता बढ़ जाती है, अर्थात् उसका प्रतिरोध कम हो जाता है।

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प्रश्न 6:
जर्मेनियम को किस प्रकार से p-टाइप का अर्द्धचालक बनाया जाता है?
उत्तर:
इसमें त्रिसंयोजी अपद्रव्य (ऐलुमिनियम) मिलाकर।

प्रश्न 7:
p-क्रिस्टल तथा n- क्रिस्टल में बहुसंख्यक आवेश वाहकों के नाम बताइए। (2013)
उत्तर:
p-क्रिस्टल में बहुसंख्यक आवेश वाहक कोटर तथा n-क्रिस्टल में बहुसंख्यक आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं।

प्रश्न 8:
शुद्ध अर्द्धचालक में जब कोई अपद्रव्य मिलाया जाता है, तो क्या होता है? (2009)
उत्तर:
चालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 9:
n-टाइप सिलिकॉन अर्द्धचालक बनाने के लिए शुद्ध सिलिकॉन में कौन-सा अपद्रव्य मिलाना चाहिए? इस अपद्रव्य तत्व की संयोजकता क्या होगी? (2017) उत्तर:
आर्सेनिक (अथवा ऐन्टिमनी), संयोजकता-5

प्रश्न 10:
p-प्रकार का अर्द्धचालक क्या है? (2012)
उत्तर:
शुद्ध जर्मेनियम अर्द्धचालक क्रिस्टल में त्रिसंयोजी अपद्रव्य मिलाने से बना वह बाह्य अर्द्धचालक जिसमें आवेश वाहक धनावेशित कोटर होते हैं, p-प्रकार का अर्द्धचालक कहलाता है।

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प्रश्न 11:
सन्धि डायोड में अवक्षय परत से आप क्या समझते हैं? (2010)
या
p – n डायोड में अवक्षय परत से आप क्या समझते हैं? (2011)
या
p – n संधि डायोड में अवक्षय परत का अर्थ समझाइए। (2017)
उत्तर:
अक्षय परत-सन्धि डायोड में p – n सन्धि के निकट दोनों ओर वह क्षेत्र जिसमें कोई स्वतन्त्र आवेश वाहक उपलब्ध नहीं होते हैं, अवेक्षय परत कहलाती है।

प्रश्न 12:
अवक्षय परत की चौड़ाई पर क्या प्रभाव पड़ेगा यदि अग्र-अभिनत विभव बढ़ा दिया जाए? (2013)
उत्तर:
कम हो जाएगी।

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प्रश्न 13:
उत्क्रम अभिनत p – n सन्धि डायोड में ऐवेलांश भंजन का क्या अर्थ है? (2012)
उत्तर:
ट्रैवेलांश भंजन:
उत्क्रम अभिनति वोल्टेज के बहुत अधिक हो जाने पर, अल्पसंख्यक वाहक काफी अधिक गतिज ऊर्जा अर्जित कर लेते हैं जिससे कि सन्धि के समीप सह-संयोजक बन्ध टूट जाते हैं। तथा इलेक्ट्रॉन- कोटर युग्म मुक्त हो जाते हैं। ये आवेश वाहक भी त्वरित होकर उसी प्रकार से अन्य इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्मों को मुक्त करते हैं। यह प्रक्रिया संचयी होती है तथा इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म बहुत बड़ी संख्या में मुक्त हो जाते हैं। तब उत्क्रम (UPBoardSolutions.com) धारा का मान एकाएक बहुत बढ़ जाता है। इस स्थिति को ‘ऐवेलांश भंजन’ कहते हैं तथा इसमें धारा के कारण उत्पन्न ऊष्मा से सन्धि के क्षतिग्रस्त होने की आशंका रहती है। वह उत्क्रम वोल्टेज जिस पर उत्क्रम धारा एकाएक बढ़ जाती है, ‘भंजक वोल्टता’ कहलाता है।

प्रश्न 14:
दिए गये चित्र 14.9 में संन्थि डायोड D अग्र अभिनत है अथवा उत्क्रम-अभिनत है?  (2014)
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उतर:
दिय गये चित्र में सन्धि डायोड D उत्क्रम अभिनत है।

प्रश्न 15:
एक p-n सन्धि डायोड का अग्र अभिनति में प्रतिरोध 20 ओम है। यदि अग्र वोल्टेज में 0.025 वोल्ट का परिवर्तन करें, तो डायोड धारा में कितना परिवर्तन होगा ?
हल:
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प्रश्न 16:
जेनर डायोड का प्रतीक चिन्ह बनाइए। (2017)
उत्तर:
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प्रश्न 17:
फोटो-डायोड में pen सन्धि डायोड किस प्रकार से संयोजित किया जाता है। इसका क्या उपयोग है?  (2016)
उत्तर:
फोटो डायोड प्रकाश संवेदनशील अर्द्धचालक से बना p – n सन्धि डायोड है, जो उत्क्रम अभिनति में कार्य करता है।
फोटो डायोड का उपयोग प्रकाश संसूचक के रूप में प्रकाश संचालित कुंजियों तथा कम्प्यूटर पंच का आदि के पढ़ने में किया जाता है।

प्रश्न 18:
LED का पूरा नाम लिखिए। (2015)
उत्तर:
Light Emitting Diode (प्रकाश उत्सर्जक डायोड)

प्रश्न 19:
p-n-p तथा n-p-n ट्रांजिस्टरों के नामांकित प्रतीक चिह्न (परिपथ प्रतीक) बनाइए। (2010, 12, 16, 17)
हल:
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प्रश्न 20:
n-p-n ट्रांजिस्टर से आप्त क्या समझते हैं? (2012)
उत्तर:
वह ट्रांजिस्टर जिसमें 2-टाइप अर्द्धचालक की एक बहुत महीन तराश (slice) को n-टाइप अर्द्धचालकों के दो छोटे-छोटे गुटकों के बीच दबाकर बनाया जाता है,n-p-n ट्रांजिस्टर कहलाता है।

प्रश्न 21:
समझाइए कि ट्रांजिस्टर एक धारा संचालित युक्ति है, जबकि ट्रायोड वाल्व वोल्टता संचालित युक्ति है।
या
ट्रायोड वाल्व तथा ट्रांजिस्टर में अन्तर बताइए। (2010)
उत्तर:
ट्रायोड में कैथोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन, ग्रिड में से होकर संग्राहक प्लेट (ऐनोड) पर पहुँचते हैं। ट्रांजिस्टर में उत्सर्जक से प्राप्त इलेक्ट्रॉन (अथवा कोटर) आधार में से होकर संग्राहक पर पहुँचते हैं। परन्तु इन दोनों युक्तियों में प्रयुक्त भौतिक प्रक्रियाएँ भिन्न-भिन्न हैं। ट्रायोड में धारा का नियन्त्रण ग्रिड तथा कैथोड के बीच के वैद्युत-क्षेत्र से होता है। अत: धारा ग्रिड-वोल्टता (कैथोड के सापेक्ष) पर निर्भर करती है तथा (UPBoardSolutions.com) काफी बड़े परिसर में धारा में परिवर्तन ग्रिड-वोल्टता में परिवर्तन के लगभग अनुक्रमानुपाती होता है। अतः ट्रायोड वोल्टता-संचालित युक्ति है।
इसके विपरीत, ट्रांजिस्टर में संग्राहक-धारा आधार-धारा से नियन्त्रित होती है जो उत्सर्जक-धारा से प्राप्त की जाती है। संग्राहक-धारा में परिवर्तन आधार-धारा में परिवर्तन के अनुक्रमानुपाती होता है (न कि आधार-विभव में परिवर्तन के)। अतः ट्रांजिस्टर ‘धारा-संचालित युक्ति है।

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प्रश्न 22:
ट्रांजिस्टर की संग्राहक धारा, आधार धारा तथा उत्सर्जक धारा में क्या सम्बन्ध होता है? (2013, 16)
उत्तर:
उत्सर्जक धारा = आधार धारा + संग्राहक धारा
अर्थात् iE = iB + iC

प्रश्न 23:
n-p-n तथाp-n-p ट्रांजिस्टरों में कौन-सा ट्रांजिस्टर अधिक श्रेष्ठ है और क्यों ? (2010, 17)
उत्तर:
n-p-n ट्रांजिस्टर में आवेश वाहक मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा p-n-p ट्रांजिस्टर में आवेश वाहक कोटर होते हैं। परन्तु कोटरों की गतिशीलता से मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता अधिक होती है। इसीलिए p-n-p की तुलना में n-p-n ट्रांजिस्टर अधिक उपयोगी है।

प्रश्न 24:
एक उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक में निर्गत परिपथ का लोड प्रतिरोध 600Ω तथा निवेशी परिपथ का प्रतिरोध 150Ω है। यदि धारा प्रवर्धन 0.90 हो, तो वोल्टता प्रवर्धन की गणना  कीजिए। (2010)
हल:
∵ वोल्टता प्रवर्धन A = α x प्रतिरोध लाभ =  α x [latex]\frac { { R }_{ l } }{ { R }_{ i } }[/latex]
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प्रश्न 25:
एक ट्रांजिस्टर परिपथ की उत्सर्जक धारा में 1.8 मिली-ऐम्पियर का परिवर्तन करने पर संग्राहक धारा में 1.6 मिली-ऐम्पियर का परिवर्तन होता है। इसके लिए परिपथ की आधार धारा में परिवर्तन का मान ज्ञात कीजिए। (2012)
हल:
ΔiE = 1.8 मिली ऐम्पियर, ΔiC= 1.6  मिली ऐम्पियर
आधार धारा में परिवर्तन ΔiB = ΔiE – ΔiC
= 1.8-1.6
= 0.2 मिली ऐम्पियर

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प्रश्न 26:
उभयनिष्ठ आधार परिपथ में किसी ट्रांजिस्टर का धारा लाभ 0.98 है। यदि उत्सर्जक धारा में 5.0 मिली ऐम्पियर का परिवर्तन हो तो संग्राहक धारा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए। (2015)
हल:
α  = 0.98, ΔiE = 5.0 मिलीऐम्पियर, ΔiC = ?
∴ ΔiC  = α .ΔiE = 0.98 x 5
= 4.9 मिली ऐम्पियर

प्रश्न 27:
एक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए β = 30, लोड प्रतिरोध RL = 4kΩ तथा निवेशी प्रतिरोध Ri = 400 2 है। इसका वोल्टता प्रवर्धन ज्ञात कीजिए।
हल:
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प्रश्न 28:
डिजिटल संकेत में कितने मान होते हैं?
उत्तर:
डिजिटल संकेत में केवल दो मान होते हैं।

प्रश्न 29:
बाइनरी संख्याओं 1001 तथा 101 का योग एवं अन्तर ज्ञात कीजिए  (2011)
हल:
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प्रश्न 30:
(a) बाइनरी संख्याओं 11011 तथा 1101 का योग बाइनरी पद्धति में ज्ञात कीजिए। (2013)
(b) बाइनरी संख्याओं 11010 तथा 1001का योग ज्ञात कीजिए। (2009, 12)
हल:
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प्रश्न 31:
दशमलव संख्याओं 21 तथा 43 को उनके तुल्य बाइनरी संख्याओं में रूपान्तरित कीजिए। (2011)
हल:
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प्रश्न 32:
मूल लॉजिक गेटों के नाम लिखिए।
उत्तर:
OR, AND तथा NOT गेट।।

प्रश्न 33:
AND, NOT, 08 गेट को लॉजिक गेट क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि इनके निर्गम तथा निवेश के बीच एक तर्कपूर्ण सम्बन्ध होता है।

प्रश्न 34:
‘न’ द्वार को अन्य किस नाम से जाना जाता है तथा क्यों?
उत्तर:
“प्रतिलोमक द्वार’ क्योंकि यह निवेशी अवस्था का प्रतिलोम कर देता है।

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प्रश्न 35:
NOT गेट का परिपथ चिह्न बनाइए।  (2010, 17)
उत्तर:
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प्रश्न 36:
NOT गेट में कितने निवेश तथा कितने निर्गम होते हैं?
उत्तर:
1 निवेश तथा 1 निर्गमा

प्रश्न 37:
NOT गेट की सत्यता सारणी दीजिए।
उतर:
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प्रश्न 38:
OR गेट का तर्क प्रतीक (लॉजिक प्रतीक) दीजिए। (2009, 10, 15, 17)
उत्तर:

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प्रश्न 39:
OR गेट की सत्यती सारणी दीजिए। (2009, 10, 11, 15, 17)
उत्तर:
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प्रश्न 40:
OR गेट का बूलियन व्यंजक लिखिए। (2017)
उत्तर:
A + B = Y

प्रश्न 41:
नीचे दिये गये लॉजिक परिपथ में लॉजिक गेटों 1 व 2 को पहचानिए   (2009)
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उत्तर:
(1) OR गेट तथा (2) NOT गेट।

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प्रश्न 42:
AND गेट का लॉजिक प्रतीक बनाइए।  (2009, 10, 17)
उत्तर:
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प्रश्न 43:
AND गेट की सत्यता सारणी दीजिए। (2010, 12)
उत्तर:
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प्रश्न 44:
AND गेट के लिए बूलियन व्यंजक तथा सत्यता सारणी लिखिए। (2009)
या
AND गेट का बूलियन एक्सप्रेशन लिखिए।
या
AND गेट का प्रतीक चिह्न, बूलियन व्यंजक एवं सत्यता सारणी बनाइए। (2016, 18)
उत्तर:
बूलियन व्यंजक   Y = A : B
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प्रश्न 45:
NAND गेट का प्रतीक चिह्न बनाइए तथा इसका बूलियन व्यंजक लिखिए। (2015)
उत्तर:
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प्रश्न 46:
NOR गेट का लॉजिक प्रतीक बनाइए।
उतर:
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प्रश्न 47:
निम्न प्रदर्शित सत्यता सारणी किस गेट को व्यक्त करती है?
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उत्तर:
NOR गेट।

प्रश्न 48:
बूलियन व्यंजक Y = A[latex]\overline { B }[/latex]+ B[latex]\overline { A }[/latex] दिया गया है। यदि A = 1 तथा B = 1 हो, तो Y का
मान ज्ञात कीजिए।
हल:
यदि A = 1
तथा B = 1
तब [latex]\overline { A }[/latex] = 0
तथा [latex]\overline { B }[/latex] = 0
∴ Y = 1(0) + 1(0) = 0+0= 0

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
ऊर्जा बैण्ड के आधार पर चालक, अचालक एवं अर्द्धचालकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर:
चालक (Conductors)-“वे पदार्थ जिनमें वैद्युत आवेश आसानी से प्रवाहित हो सके तथा जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन बड़ी संख्या में उपस्थित रहते हों, चालक कहलाते हैं। (UPBoardSolutions.com) जैसे-चाँदी, ताँबा, ऐलुमिनियम, सोना, पारा इत्यादि। चालकों का प्रतिरोध ताप-गुणांक धनात्मक होता है इसीलिए ताप के बढ़ने पर इनका वैद्युत प्रतिरोध बढ़ता है, परन्तु वैद्युत चालकता कम होती है।
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अचालक (Insulators):
“वे पदार्थ जिनमें वैद्युत आवेश कठिनता चालन से प्रवाहित हो तथा जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते अथवा कम संख्या में होते हैं, अचालक कहलाते हैं। इन पदार्थों के बाहरी कक्षा के (UPBoardSolutions.com) वजित ऊर्जा अन्तराल इलेक्ट्रॉन दृढ़तापूर्वक नाभिक से बँधे रहते हैं इसलिए। पर इनमें वैद्युत आवेशों का प्रबंह कठिनता से होता है। इनकी प्रतिरोधकता बहुत अधिक अर्थात् लगभग अनन्त होती है; जैसे—लकड़ी, ऐबोनाइट, काँच, अभ्रक आदि।
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अर्द्ध-चालक (Semi-conductors)–“वे पदार्थ जिनकी वैद्युत-चालकता चालकों एवं अचालकों के मध्ये होती है, अर्द्ध-चालक कहलाते हैं। जैसे-कार्बन, सिलिकॉन (Silicon) तथा जर्मेनियम अर्द्ध-चालक हैं। ये पदार्थ न तो पूर्ण रूप से चालक ही होते हैं और न ही पूर्ण रूप से अचालक। अर्द्ध-चालकों में बाहरी इलेक्ट्रॉन न तो परमाणु से इतनी दृढ़ता से बँधे होते हैं जितने कि अचालकों में
और ने इतने ढीले बँधे होते हैं जितने कि चालकों में इनका प्रतिरोध ताप-गुणांक ऋणात्मक होता है। इसीलिए ताप के बढ़ने पर इनका वैद्युत प्रतिरोध घटता है, परन्तु इनकी वैद्युत-चालकता ताप बढ़ने पर बढ़ती है तथा ताप घटने पर घटती है। परम शून्य ताप पर अर्द्ध-चालक एक आदर्श अचालक की भाँति व्यवहार करता है।
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प्रश्न 2:
किसी अर्द्धचालक को मादित करने से क्या तात्पर्य है? इस क्रिया से अर्द्धचालक की चालकता पर पड़ने वाले प्रभाव की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
एक ‘शुद्ध’ अर्द्धचालक, जिसमें कोई अपद्रव्य न मिला हो, ‘निज अर्द्धचालक’ कहलाता है। इस प्रकार, शुद्ध जर्मेनियम तथा सिलिकॉन अपनी प्राकृतिक अवस्था में निज़ अर्द्धचालक हैं। निज अर्द्धचालकों की वैद्युत चालकता अति अल्प होती है। परन्तु यदि किसी ऐसे पदार्थ की बहुत थोड़ी-सी मात्रा, जिसकी संयोजकता 5 अथवा 3 हो, शुद्ध जर्मेनियम (अथवा सिलिकॉन) क्रिस्टल में अपद्रव्य के रूप में मिश्रित कर (UPBoardSolutions.com) दें तो क्रिस्टल की चालकता काफी बढ़ जाती है। मिश्रित करने की क्रिया को ‘अपमिश्रण’ । या ‘मादित करना’ कहते हैं। उदाहरणार्थ, 108 जर्मोनियम परमाणुओं में 1 अपद्रव्य परमाणु मिश्रित कर देने पर, जर्मोनियम की चालकता 16 गुना तक बढ़ जाती है। ऐसे अर्द्धचालकों को बाह्य अथवा अपद्रव्य अथवा अपमिश्रित अर्द्धचालक कहते हैं। इन अर्द्धचालकों में मिश्रित किये जाने वाले अपद्रव्य की मात्रा को नियन्त्रित करके इच्छानुसार चालकता अर्जित की जा सकती है।

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प्रश्न 3:
n-प्रकार का अर्द्धचालक क्या है? इसकी रचना समझाइए। (2010)
या
n-टाइप अर्द्धचालक से क्या तात्पर्य है? (2012)
उत्तर:
n-टाइप अर्द्धचालक (n-Type Semi-conductor)-जब 5 संयोजकता वाला (अर्थात् पंच संयोजी) कोई अपद्रव्य; जैसे—आर्सेनिक, फॉस्फोरस, ऐण्टीमनी आदि शुद्ध जर्मेनियम अर्द्धचालक में मिला दिया जाता है, तो इस अशुद्ध अर्द्धचालक में अपद्रव्य पदार्थ के परमाणु के पाँच संयोजक इलेक्ट्रॉनों (UPBoardSolutions.com) में से चार इलेक्ट्रॉन इसके निकटतम चार जर्मेनियम परमाणुओं में प्रत्येक के एक-एक इलेक्ट्रॉन के साथ साझेदारी करके सह-संयोजक बन्ध बना लेते हैं तथा शेष पाँचवाँ संयोजक इलेक्ट्रॉन अशुद्ध क्रिस्टल में गति करने के लिए स्वतन्त्र रह जाता है (चित्र 14.22)। यह ऋण आवेश वाहक ही अर्द्धचालक में वैद्युत चालन के लिए उत्तरदारी है।
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इस प्रकार शुद्ध जर्मेनियम में पंच संयोजी अपद्रव्य मिलाने से मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है। जिससे अर्द्धचालक की वैद्युत चालकता भी बढ़ जाती है।
अशुद्ध अर्द्धचालक के सिरों के बीच वैद्युत विभवान्तर स्थापित करने से अर्द्धचालक में वैद्युत-क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इसके कारण मुक्त इलेक्ट्रॉन, क्षेत्र की विपरीत दिशा में गति करने लगते हैं, जिससे अर्द्धचालक में धारा प्रवाह होने लगता है।
इस प्रकार के अपद्रव्य मिले अशुद्ध (UPBoardSolutions.com) अर्द्धचालक में आवेशवाहक ऋणावेशित मुक्त इलेक्ट्रॉन ही होते हैं, इसीलिए इस प्रकार के अशुद्ध अर्द्धचालक को  n-टाइप अर्द्धचालक कहते हैं।
n-टाईप अर्द्धचालक में मिला पंच संयोजी अपद्रव्य परमाणु मुक्त इलेक्ट्रॉन देता है। अत: इस प्रकार के अपद्रव्य परमाणुओं को दाता परमाणु (donor atoms) कहते हैं तथा n-टाइप शुद्ध अर्द्धचालक को दाता प्रकार का (donor type) अर्द्धचालक भी कहते हैं।
n-प्रकार अर्द्धचालक क्रिस्टल में जितने चलनशील इलेक्ट्रॉन होते हैं उतनी ही संख्या में स्थिर धनात्मक अपद्रव्यदाता आयन होते हैं।

प्रश्न 4:
एक Pnp सन्धि डायोड का अग्र अभिनत की स्थिति में प्रतिरोध 25Ω है। अग्र अभिनत विभव में कितना परिवर्तन किया जाए कि धारा में 2 मिली ऐम्पियर का परिवर्तन हो जाए ?
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हल:
अग्र अभिनत स्थिति में p-n सन्धि डायोड का प्रतिरोध R = 25Ω तथा धारा में परिवर्तन ΔI = 2 मिली ऐम्पियर = 2 x 10-3 ऐम्पियर।।
माना अग्र अभिनत विभव में परिवर्तन ΔVहै।
R =  [latex]\frac { \Delta V }{ \Delta I }[/latex]
ΔV= R x ΔI = 25 ओम x 2 मिली ऐम्पियर
= 50 मिली ऐम्पियर

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प्रश्न 5:
फोटो डायोड प्रकाश संसूचक के रूप में कार्य करता है। इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2017)
उत्तर:
फोटो-डायोड एक प्रकाश संवेदनशील अर्द्धचालक से बनी ऐसी p – n सन्धि है जो पश्च दिशिक होती है। यह डायोड सन्धि प्रकाश-प्रभाव (junction photo effect) अर्थात् किसी p-0 सन्धि पर आपतित प्रकाश के प्रभाव पर आधारित है।
फोटो-डायोड का निर्माण करने हेतु एक p-m सन्धि जिसका p-क्षेत्र काफी पतला (thin) व पारदर्शी हो, को एक काँच या प्लास्टिक के आवरण में इस प्रकार रखते हैं कि सन्धि के ऊपरी भाग पर प्रकाश सरलता से पहुँच सके। आवरण में प्रयुक्त प्लास्टिक के शेष बचे भागों पर कालिख अथवा काला (UPBoardSolutions.com) पेन्ट कर देते हैं। कभी-कभी इन भागों को धातु की चादरों से भी ढक दिया जाता है। यह सम्पूर्ण इकाई (unit) काफी सूक्ष्म लगभग 2 से 3 मिमी की कोटि की होती है।
फोटो-डायोड का कार्यकारी विद्युतीय परिपथ चित्र 14.24 प्रकाश (hν) में प्रदर्शित है। जब p-n सन्धि पर बिना प्रकाश डाले । पर्याप्त वोल्टेज (लगभग 0.1 वोल्ट) लगाकर पश्च दिशिक किया जाता है, तो सन्धि के दोनों ओर के अल्पसंख्यक वाहक सन्धि को पार करते हैं (क्योंकि पश्च दिशिक सन्धि अल्पसंख्यक वाहकों को सन्धि पार करने में सहयोग करती है)। जिसके फलस्वरूप एक संतृप्त (saturated) परन्तु लघु धारा (कुछ μ A की) प्रवाहित होने लगती है।
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जिसकी दिशा सन्धि पर n-क्षेत्र से p-क्षेत्र की ओर होती है। इस धारा को अदीप्त धारा (dark current) कहते हैं। अब यदि इसी समय p-n सन्धि पर इतनी ऊर्जा का प्रकाश जिसका परिमाण सन्धि के निषिद्ध ऊर्जा-अन्तराल Eg से अधिक (hν > Eg) हो, डाला जाये, तो p-n सन्धि पर आपतित फोटॉन अर्द्धचालक पदार्थ के सहसंयोजी बन्धों (covalent bonds) को तोड़कर इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म उत्पन्न करने में सक्षम हो (UPBoardSolutions.com) जाते हैं। अत: सन्धि के समीप अल्पसंख्यक वाहकों का घनत्व बढ़ जाने के कारण सन्धि के पश्च दिशिक होने के फलस्वरूप भी जब ये वाहक सन्धि को पार करेंगे तो यह सन्धि पर पश्च दिशिक के कारण उत्पन्न धारा की प्रबलता को बढ़ा देंगे। जिसके परिणामस्वरूप परिपथ की कुल धारा का मान बढ़ जायेगा। इस धारा को प्रकाश-धारा (photo current or photoconductive current) कहते हैं तथा यह आपतित प्रकाश के फ्लक्स के साथ लगभग समानुपात में बढ़ती है। फोटो-डायोडं की सन्धि को प्रदीप्त करने के पश्चात् । सन्धि पर पहले से ही उपलब्ध संतृप्त धारा के मान में हुए परिवर्तन को ज्ञात करके सन्धि पर आपतित प्रकाश की तीव्रता की गणना की जा सकती है। इस प्रकार यह डायोड प्रकाश संसूचक (light detector) की भॉति व्यवहार करता है। इस डायोड का उपयोग प्रकाश संचालित कुंजियों (light operated switches), कम्प्यूटर पंच का (computer punched cards) आदि को पढ़ने में किया जाता है।

प्रश्न 6:
प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) क्या है। एक परिपथ आरेख खींचिए और इसकी क्रियाविधि समझाइए। प्रचलित लैम्पों की तुलना में इसके लाभ बताइए।
या
LED क्या है? परिपथ बनाकर इसके (V-I) अभिलाक्षणिक को प्रदर्शित कीजिए। (2016)
उत्तर:
‘LED’ एक ऐसी युक्ति है जो बायसिंग बैटरी की विद्युतीय ऊर्जा का विकिरण ऊर्जा (दृश्य व अदृश्य प्रकाश व अवरक्त विकिरण) में परिवर्तन करती है। क्रियाविधि: जब LED को अग्र दिशिक किया जाता है, तो n-क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन कोटर सन्धि के पार करके p-क्षेत्र में तथा p-क्षेत्र के बहुसंख्यक वाहक n-क्षेत्र में पहुँच जाते हैं। इस प्रकार सन्धि सीमा पर अल्पसंख्यक वाहकों का सान्द्रण साम्यावस्था से अधिक (UPBoardSolutions.com) हो जाता है। अतः पुनः साम्य स्थापित करने के लिए सन्धि सीमा के दोनों ओर ये अतिरिक्त अल्पसंख्यक वाहक बहुसंख्यक वाहकों से संयोजित हो जाते हैं। संयोजन की इस प्रक्रिया में मुक्त हुई ऊर्जा, विद्युत चुम्बकीय तरंगों (फोटॉनों) के रूप में बाहर आती है। अब ऐसे फोटॉन जिनकी ऊर्जा LED के पदार्थ के निषिद्ध ऊर्जा-बैण्ड की ऊर्जा के बराबर या उससे थोड़ी कम (hν < Eg) होती है, डायोड के बाहर आ जाते हैं। जैसे-जैसे अग्र धारा (forward current) का मान बढ़ता है उत्सर्जित प्रकाश की तीव्रता भी धीरे-धीरे बढ़कर महत्तम मान प्राप्त कर लेती है।
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वे डायोड जिनका उपयोग संसूचन तथा शक्ति दिष्टकरण के लिए किया जाता है, अर्द्धचालकों, जैसे : जर्मेनियम व सिलिकॉन के बने होते हैं। परन्तु इन अंर्द्धचालकों से बने LED दृश्य क्षेत्र (visible region) के विकिरणों का उत्सर्जन करने में असमर्थ होते हैं। दृश्य प्रकाश उत्सर्जित करने वाले LED का निषिद्ध ऊर्जा-अन्तराल कम से कम 1.8 eV का होना चाहिए। जो कि अर्द्धचालकों में जर्मेनियम या सिलिकॉन किसी का भी नहीं होता।
प्रचलित लैम्पों की तुलना में लाभ
प्रचलित लैम्पों की तुलना में इसके निम्नलिखित लाभ हैं

  1.  LED की दक्षता प्रचलित लैम्पों से कई गुना अधिक होती है, क्योंकि इनके संचालन हेतु काफी कम वैद्युत शक्ति की आवश्यकता होती है।
  2. आकार में ये अपेक्षाकृत काफी छोटे होते हैं, अतः ये अधिक स्थान नहीं घेरते।
  3.  प्रचलित लैम्पों की तुलना में इनका (UPBoardSolutions.com) जीवन काल काफी अधिक होता है।
  4.  इनके पूर्ण प्रदीपन (full illumination) के लिए लगभग नगण्य समय की आवश्यकता होती है।
  5. अन्य प्रचलित लैम्पों की तुलना में LED से उत्सर्जित प्रकाश में ऊष्मीय ऊर्जा लगभग नगण्य होती | हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि LED ठण्डा प्रकाश (cool light) देता है। साथ-ही-साथ
    यह पर्यावरण तथा पारिस्थितिक तन्त्र (ecosystem) को भी अधिक क्षति नहीं पहुंचाता है।

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प्रश्न 7:
एक n-p-n ट्रांजिस्टर में 10-6 सेकण्ड में 1010 इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में प्रवेश करते हैं।
2% इलेक्ट्रॉन आधार में क्षय हो जाते हैं। उत्सर्जक धारा (IE), आधार धारा (IB) तथा संग्राहक धारा (IC) के मान ज्ञात कीजिए।
हल:
यहाँ t=10-6 सेकण्ड में उत्सर्जक में प्रवेश करने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या n=1010 तथा इलेक्ट्रॉन पर आवेश e=1.6 x 10-19
कूलॉम
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प्रश्न 8:
एक n-p-n ट्रांजिस्टर को उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में जोड़ा गया है। इसमें संग्राहक संभरण 8 वोल्ट है तथा 8002 के लोड प्रतिरोध के ऊपर जो संग्राहक परिपथ में जोड़ा (UPBoardSolutions.com) गया है वोल्टता पात 0.8 वोल्ट है। यदि धारा प्रवर्धन गुणांक 25 हो, तो संग्राहक उत्सर्जक वोल्टता और आधार धारा ज्ञात कीजिए। यदि ट्रांजिस्टर का आन्तरिक प्रतिरोध 200Ω है. तो वोल्टता लाभ एवं शक्ति लाभ की गणना कीजिए। परिपथ आरेख भी खींचिए।
हल:
परिपथ आरेख चित्र 14.27 में प्रदर्शित है।
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प्रश्न 9:
उभयनिष्ठ उत्सर्जक धारा-लाभ (β) एवं उभयनिष्ठ आधार धारा-लाभ (α) के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
β तथा α के बीच सम्बन्ध
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प्रश्न 10:
एक उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक में आधार धारा में 50 माइक्रो-ऐम्पियर की वृद्धि होने पर संग्राहक धारा में 1.0 मिली-ऐम्पियर की वृद्धि हो जाती है। धारा लाभ β की गणना कीजिए। उत्सर्जक धारा में परिवर्तन भी ज्ञात कीजिए। (2017)
उत्तर:
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प्रश्न 11:
किसी उभयनिष्ठ उत्सर्जक ट्रांजिस्टर का निवेशी प्रतिरोध 1000Ω है। इसकी आधार धारा में 10 μA का परिवर्तन करने से संग्राहक धारा में 2mA की वृद्धि हो जाती है। यदि परिपथ में प्रयुक्त लोड प्रतिरोध 5kΩ हो, तो प्रवर्धक के लिए गणना कीजिए
(a) धारा लाभ (Current gain)
(b) वोल्टता लाभ (Voltage gain)
हल:
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प्रश्न 12:
उभयनिष्ठ उत्सर्जक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए धारा लाभ 59 है। यदि उत्सर्जक धारा 6.0mA हो तो ज्ञात कीजिए (a) संग्राहक धारा, (b) आधार धारा।
हल:
यहाँ, B = 59; IE= 6.0mA
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प्रश्न 13:
उभयनिष्ठ उत्सर्जक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए 2.0 kΩ संग्राहक प्रतिरोध के सिरों पर ऑडियो सिगनल वोल्टता 2.0 वोल्ट है। धारा प्रवर्धन गुणांक 100 मानते हुए 2.0V की VBB  सप्लाई के साथ श्रेणीबद्ध प्रतिरोध RB का मान क्या होना चाहिए ताकिd.c. आधार धारा सिगनल धारा की 10 गुनी हो। संग्राहक प्रतिरोध के सिरों पर भी d.c, विभव पतन ज्ञात कीजिए।(VBE = 0.6 वोल्ट)
हल:
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प्रश्न 14:
तर्क (लॉजिक) गेट से आप क्या समझते हैं? (2012)
या
लॉजिक गेट क्या होते हैं ? (2013, 15)
या
निम्नलिखित सत्यता सारणी एक-एक निवेशी लॉजिक गेट के निर्गम को दिखाती है। प्रयुक्त तर्क गेट को पहचानिए तथा इसका तर्क प्रतीक बनाइए।
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उत्तर:
तर्क (लॉजिक) गेट: “वह डिजिटल परिपथ जो निवेश (input) तथा निर्गम (output) के बीच तर्कपूर्ण सम्बन्धों के अनुसार कार्य करता है, लॉजिक गेट कहलाता है।”
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दी गयी सत्यता सारणी AND गेट की है। इसका तर्क प्रतीक चित्र 14.28 में दिखाया गया है।

प्रश्न 15:
नीचे दिये गये लॉजिक परिपथ के लिए सत्यता सारणी बनाइए।
या
दिए गए चित्र में लॉजिक परिपथ के लिए सत्यता सारणी बनाइए तथा इर का बुलियन व्यंजक लिखिए। (2012)
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उत्तर:
चित्र 14.29 में दिया गया लॉजिक परिपथ तीन निवेश A, B, C वाले OR गेट तथा NOT गेट का संयोजन है। अतः यह लॉजिक परिपथ तीन निवेश वाले NOR गेट को व्यक्त करेगा। इसकी सत्यता सारणी प्राप्त करने के लिए
(a) यदि तीन निवेश A, B, C वाले OR गेट का निर्गम Y”हो तो इसकी सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
जहाँ Y’ = A+ B+ c (बूलियन व्यंजक)
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(b) उपर्युक्त निर्गम Y’ को NOT गेट का निवेश बनाया गया है; जिसका निर्गम Y है, अत: इसकी
सत्यता सारणी निम्नवत् होगी । जहाँ
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इस प्रकार दिये गये लॉजिक परिपथ की सम्पूर्ण सत्यता सारणी निम्नवत् होगी
जहाँ Y = ([latex]\overline { A+B+C }[/latex]) (बूलियन व्यंजक)
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प्रश्न 16:
चित्र में प्रदर्शित Pव ९ गेटों के संयोजन से किस प्रकार का गेट प्राप्त होता है? (2017)
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उत्तर:
NAND गेट
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प्रश्न 17:
निम्नलिखित दशमलव संख्याओं के संगत तुल्य बाइनरी संख्याएँ ज्ञात कीजिए
(a) 17
(b) 25
(c) 556
(d) 255
हल:
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
किसी सन्धि डायोड की अग्र-अभिनति तथा उत्क्रम-अभिनति की अवस्थाओं में धारा प्रवाह की व्याख्या कीजिए। (2009, 11)
या
उत्क्रम अभिनत सन्धि डायोड द्वारा अल्प धारा क्यों प्रवाहित होती है? (2014)
या
p – n सन्धि डायोड के लिए अग्र-अभिनति तथा उत्क्रम-अभिनति अवस्था में परिपथ चित्र खींचिए। (2012)
या
उपयुक्त परिपथों की सहायता से pm सन्धि डायोड में विद्युत धारा प्रवाह की व्याख्य कीजिए। (2013)
या
p – n सन्धि डायोड के लिए अग्र-दिशिक तथा पश्च-दिशिक अवस्था में परिपथ आरेख खींचिए। दो अवस्थाओं हेतु प्राप्त अभिलक्षण वक्रों को समझाइए। (2015, 17)
या
p-n संधि डायोड के लिए अग्र-दिशिक परिपथ आरेख बनाइए। (2017)
उत्तर:
सन्धि डायोड को बाह्य बैटरी से दो विभिन्न प्रकारों से जोड़ा जा सकता है, जिन्हें अग्र- अभिनति तथा उत्क्रम-अभिनति’ कहते हैं।
अग्र-अभिनति (Forward Biasing)—जब सन्धि डायोड केp-क्षेत्र को बाह्य बैटरी के धन सिरे से, तथा n-क्षेत्र को ऋण सिरे से जोड़ा जाता है तो सन्धि ‘अग्र-अभिनत’ (forward biased) कहलाती है [चित्र 14.31 (a)]। इस स्थिति में डायोड में एक बाह्य वैद्युत-क्षेत्र Ei स्थापित हो जाता है। जोकि p-क्षेत्र से n-क्षेत्र की ओर को दिष्ट होता है। क्षेत्र E, आन्तरिक वैद्युत-क्षेत्र E; से कहीं अधिक प्रबल होता है। अतः p-क्षेत्र में (धन) कोटर तथा n-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन दोनों ही सन्धि की ओर को चलने लगते हैं। (कोटर क्षेत्र E की दिशा में तथा इलेक्ट्रॉन E की (UPBoardSolutions.com) विपरीत दिशा में चलते हैं। ये कोटर तथा इलेक्ट्रॉन सन्धि के समीप पहुँचकर परस्पर संयोग करके विलुप्त हो जाते हैं। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन- कोटर संयोग (combination) के लिए, -क्षेत्र में बैटरी के धन सिरे के समीप एक सह-संयोजक बन्ध टूट जाता है। इससे उत्पन्न कोटर तो सन्धि की ओर चलता है, जबकि इलेक्ट्रॉन, जोड़ने वाले तार (connecting wire) में से होकर बैटरी के धन सिरे में प्रवेश कर जाता है। ठीक इसी समय बैटरी के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन मुक्त होकर n-क्षेत्र में प्रवेश करता है तथा सन्धि के समीप संयोग द्वारा विलुप्त हुए इलेक्ट्रॉन का स्थान ले लेता है।

इस प्रकार, बहुसंख्यक वाहकों की गति से सन्धि डायोड में वैद्युत धारा स्थापित हो जाती है। इसे ‘अग्र-धारा’ (forward current) कहते हैं। (इस बड़ी धारा के अतिरिक्त, अल्पसंख्यक वाहकों की गति से भी एक अल्प उत्क्रम-धारा स्थापित होती है, परन्तु यह लगभग नगण्य ही होती है।) जैसा कि चित्र 14.31 (a) से स्पष्ट है, बाह्य परिपथ में धारा केवल इलेक्ट्रॉनों की गति से स्थापित होती है। सन्धि पर आरोपित अग्र वोल्टेज तथा प्राप्त अग्र-धारा का ग्राफ चित्र 14.31 (b) में दिखाया गया है।
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उत्क्रम-अभिनत (Reverse Biasing):
जब सन्धि डायोड के p-क्षेत्र को बाह्य बैटरी के ऋण सिरे से, तथा क्षेत्र को धन सिरे से जोड़ा जाता है तो सन्धि’उत्क्रम-अभिनत’ (reverse biased)
कहलाती है।
[चित्र 14.32 (a)]। इस स्थिति में बाह्य वैद्युत-क्षेत्र E, n-क्षेत्र से p-क्षेत्र की ओर को दिष्ट होता है, तथा इस प्रकार यह आन्तरिक प्राचीर क्षेत्र Eiकी सहायता करता (UPBoardSolutions.com) है। अब, p-क्षेत्र में कोटर तथा n-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन दोनों ही सन्धि से दूर जाने लगते हैं। अतः वे कभी भी सन्धि के समीप संयोग नहीं कर सकते (cannot combine)। स्पष्ट है कि डायोड में बहुसंख्यक वाहकों के कारण कोई धारा नहीं होती।
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परन्तु जब सन्धि उत्क्रम-अभिनत होती है तब सन्धि के आर-पार एक अति अल्प उत्क्रम धारा (≈ कुछ माइक्रोऐम्पियर) बहती है। यह ऊष्मीय-जनित (thermally generated) अल्पसंख्यक वाहकों (p-क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन तथा n-क्षेत्र में कोटर) से उत्पन्न होती है जोकि वैद्युत क्षेत्र E के अन्तर्गत सन्धि को (UPBoardSolutions.com) पार करते हैं। चूंकि अल्पसंख्यक वाहकों की संख्या ऊष्मीय विक्षोभ पर निर्भर करती है, अतः उत्क्रम-धारा ताप पर बहुत अधिक निर्भर करती है तथा सन्धि का ताप बढ़ने पर बढ़ती है। उत्क्रम वोल्टेज तथा उत्क्रम-धारा के बीच ग्राफ चित्र 14.32 (b) में दिखाया गया है।

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प्रश्न 2:
p-n सन्धि डायोडों का प्रयोग करते हुए पूर्ण-तरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र बनाइए। इसकी कार्यविधि समझाइए। (2009, 10, 11, 15, 18)
या
p-n सन्धि डायोड का प्रयोग कर पूर्ण तरंग दिष्टकारी का परिपथ आरेख बनाइए। निर्गत तरंग-रूपों को भी दर्शाइए। (2014)
या
p-n सन्धि डायोड किसे कहते हैं? दो p – nसन्धि डायोडों को पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयुक्त किया जाता है? निवेशी व निर्गत वोल्टताओं के तरंग रूपों को देते हुए, सरल  परिपथ आरेख बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइए। (2010, 14, 17)
या
परिपथ आरेख खींचकर समझाइए कि किस प्रकार प्रत्यावर्ती धारा को दिष्टधारा में परिवर्तित किया जाता है ? (2010)
या
परिपथ आरेख खींचकर समझाइए कि एक सन्धि डायोड पूर्ण तरंग दिष्टकारी की भाँति  कैसे कार्य करता है ? (2011)
या
p – n सन्धि डायोड का उपयोग पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में समझाइए। सम्बन्धित परिपथ भी खींचिए। (2013, 18)
या
परिपथ आरेख खींचकर pm सन्धि डायोड की पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में कार्यविधि समझाइए।  (2013, 14, 18)
या
दो p-n संधि डायोडों का उपयोग करके पूर्ण तरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र बनाइए तथा इसकी कार्य-विधि समझाइए। निवेशी तथा निर्गत तरंग रूप भी प्रदर्शित कीजिए। (2017)
उत्तर:
p-n सन्धि डायोड: “जब एक p-प्रकार के अर्द्धचालक क्रिस्टल को किसी विशेष विधि द्वारा
-प्रकार के अर्द्धचालक क्रिस्टल के साथ जोड़ दिया जाता है, तो जिस स्थान पर क्रिस्टल एक-दूसरे से जुड़ते हैं, वह सन्धि कहलाती है। इस संयोजन के वैद्युत लक्षण डायोड वाल्व की (UPBoardSolutions.com) भाँति होते हैं, अतः इस संयोजन को सन्धि डायोड कहते हैं।
पूर्ण-तरंग दिष्टकरण में निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दोनों अर्द्ध-चक्रों के दौरान निर्गत धारा प्राप्त होती
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इसमें दो सन्धि डायोड इस तरह प्रयुक्त किये जाते हैं कि पहला डायोड धारा के पहले आधे चक्र का दिष्टकरण करता है। और दूसरा डायोड दूसरे आधे चक्र का। निवेशी । इसका परिपथ चित्र 14.33 में दिखाया गया A.C. है। A.C. स्रोत को एक ट्रांसफॉर्मर की १ निर्गत प्राथमिक कुण्डली से (UPBoardSolutions.com) जोड़ते हैं तथा
वोल्ट्रता द्वितीयक कुण्डली के सिरों A व B के बीच दोनों डायोड़ों 1 तथा 2 के p-क्षेत्रों को जोड़ा जाता है तथा n-क्षेत्रों को आपस में जोड़ दिया जाता है। लोड प्रतिरोध RL को द्वितीयक कुण्डली के केन्द्रीय निष्कास (centre tap) T तथा n-क्षेत्रों के बीच जोड़ते हैं। निवेशी वोल्टेज के पहले आधे चक्र के दौरान जब ट्रांसफॉर्मर काA सिरा, T के, सापेक्ष धनात्मक तथा B सिरा T के सापेक्ष ऋणात्मक होता है तब डायोड
(b) अग्र-अभिनत होता है और धारा प्रवाहित  होने देता है, जबकि डायोड 2 उत्क्रम-अभिनत होता है और धारा प्रवाहित नहीं होने देता। अतः लोड-प्रतिरोध RL में (UPBoardSolutions.com) धारा C से D की ओर बहती है। दूसरे आधे चक्र के दौरान A सिरा T के सापेक्ष ऋणात्मक होता है तथा B सिरा धनात्मक होता है। अतः अब डायोड 1 उत्क्रम-अभिनत तथा डायोड 2 अग्र-अभिनत होता है। अब धारा डायोड 2 में से प्रवाहित होती है तथा R,, में पुन: धारा C से D की ओर को बहती है। RL में धारा की दिशा दोनों अर्द्धचक्रों में एक ही ओर रहती है; अतः R. पर निर्गत वोल्टता की दिशा एक ही प्राप्त होती है तथा पूर्ण-तरंग के लिए वोल्टता प्राप्त होती रहती है।

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प्रश्न 3:
p-n सन्धि डायोड का उपयोग करके अर्द्धतरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र खींचिए तथा इसकी कार्यविधि समझाइए।  (2009, 11, 17) 
या
p-n सन्धि का उपयोग करके अर्द्धतरंग दिष्टकारी का परिपथ चित्र खींचिए। निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं के तरंगरूप दिखाइए। क्या निर्गत वोल्टता शुद्ध दिष्ट वोल्टता होती है? (2016)
या
p – n सन्धि डायोड को अर्द्धतरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयोग में लाया जाता है? सरल परिपथ आरेख बनाकर कार्यविधि समझाइए। निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं के तरंग-रूप दिखाइए। (2014)
या
p-n सन्धि डायोड क्या होता है? परिपथ आरेख खींचकर p-n सन्धि डायोड का अर्द्ध तरंग दिष्टकारी के रूप में कार्यविधि समझाइए। निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं के तरंग रूपों को दर्शाइए। (2016)
उत्तर:
p-n सन्धि डायोड:
“जब एक p प्रकार के अर्द्धचालक क्रिस्टल को किसी विशेष विधि द्वारा 71-प्रकार के अर्द्धचालक क्रिस्टल के साथ जोड़ दिया जाता है, तो जिस स्थान पर क्रिस्टल एक-दूसरे से जुड़ते हैं, वह सन्धि कहलाती है। इस संयोजन के वैद्युत लक्षण डायोड वाल्व की भाँति होते हैं, अत: इस संयोजन को pen सन्धि डायोड कहते हैं।
p-n सन्धि डायोड एक अर्द्धतरंग दिष्टकारी (Half wave rectifier) के रूप में:
p-n सन्धि डायोड का अर्द्धतरंग दिष्टकारी परिपथ चित्र 14.34 (a) में तथा निवेशी (input) एवं निर्गत (output) तरंग रूपों को चित्र 14.34 (b) में प्रदर्शित किया गया है।
इसमें जिस प्रत्यावर्ती वोल्टता को दिष्टीकृत करना सन्धि डायोड होता है, उसे एक ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली के सिरों के बीच जोड़ देते हैं। ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली का एक सिरा सन्धि डायोड के p-प्रकार के निवेशी निर्गत क्रिस्टल अर्थात् p-क्षेत्र से तथा दूसरा सिरा लोड वोल्टता वोल्टता प्रतिरोध RL के द्वारा सन्धि डायोड के n-प्रकार के क्रिस्टल अर्थात् n-क्षेत्र से जोड़ दिया जाता है। दिष्ट निर्गत वोल्टेज लोड RL के सिरों के बीच प्राप्त किया जाता है।
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कार्यविधि (Working):
जब निवेशी AC वोल्टेज के आधे चक्र में ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयंक कुण्डली का निवेशी प्रत्यावर्ती सिगनल A सिरा B सिरे के सापेक्ष धनात्मक होता है, तो सन्धि डायोड अग्र-अभिनत (forward biased) होता है। इसके परिणामस्वरूप लोड प्रतिरोध RL .में प्राप्त दिष्टकृत निर्गत सिगनल निर्गत वोल्टता में केवल धन भाग ही प्राप्त होते हैं। इस  स्थिति में लोड़ प्रतिरोध में धारा C से D की ओर प्रवाहित होती है। निवेशी AC वोल्टेज के अगले आधे चक्र में ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली का A सिरा B सिरे के सापेक्ष ऋणात्मक होता है, तो (UPBoardSolutions.com) सन्धि डायोड उत्क्रम-अभिनत (reverse biased) हो जाता है। इस दशा में प्रतिरोध RL में धारा शून्य रहती है। इस प्रकार मुख्यतः धारा निवेशी वोल्टता के पहले आधे चक्र में ही प्रवाहित होती है तथा शेष आधे चक्र कट जाते हैं। इस प्रकार उच्चावचित (fluctuating) दिष्टधारा लोड प्रतिरोध के आर-पार (across) प्राप्त होती रहती है। चित्र 14.34 (b) के निचले भाग में धारा को तरंग रूप दर्शाया गया है जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर (अर्थात् थोड़ी-थोड़ी देर में) धारा के एकदिशीय स्पन्द (pulses) दिखाई देते हैं। इस प्रकारे सन्धि डायोड एक अर्द्धतरंग दिष्टकारी की भाँति कार्य करता है। निर्गत वोल्टता शुद्ध दिष्ट वोल्टता नहीं होती है बल्कि एक दिशीय स्पन्दों के रूप में होती है।

प्रश्न 4:
जेनर डायोड क्या है? जेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज रेगुलेटर के रूप में परिपथ आरेख की सहायता से समझाइए।  (2014)
या
जेनर डायोड क्या होता है? इसका प्रतीक चिन्ह प्रदर्शित कीजिए। जेनर डायोड का वोल्टता नियंत्रक के रूप में प्रयोग परिपथ बनाकर समझाइए। (2015, 16, 17)
या
जेनर डायोड क्या होता है? इसको वोल्टेज रेगुलेशन में किस प्रकार प्रयोग करते हैं? परिपथ आरेख बनाकर समझाइए। (2018)
उत्तर:
जेन्प डायोड उत्क्रम अभिनत गहन अपमिश्रित सिलिकॉन अथवा जर्मेनियम p–n सन्धि डायोड होता है जो भंजक क्षेत्र में कार्य करता है। इसका यह नाम इसके आविष्कारक वैज्ञानिक क्लारेन्स जेनर (Clarence Zener) के नाम पर ही रखा गया है। इसके परिपथ में पश्च धारा (reverse current) को (UPBoardSolutions.com) बाहरी प्रतिरोध और डायोड के ऊर्जा क्षय द्वारा सीमित किया  जाता है। इसमें सिलिकॉन को उसके उच्च ताप स्थायित्व और धारा क्षमता के बैटरी प्रतिरोध कारण जर्मेनियम की तुलना में वरीयता दी जाती है। इसका परिपथ चित्र एवं संकेत चित्र 14.35 में दर्शाया गया है।
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जेनर डायोड एक ऐसा डायोड है, जो सामान्य डायोडों की भाँति अग्र दिशिक होने पर अग्रधारा (forward current) को अपने में से प्रवाहित  होने की अनुमति (UPBoardSolutions.com) प्रदान तो करता ही है इसके साथ ही उत्क्रम अभिनति होने पर भी पश्च धारा आसानी से बह सकती है यदि आरोपित वोल्टता एक निश्चित मान से अधिक हो।

वोल्टता नियन्त्रक के रूप में जेनर डायोड
सिद्धान्त:
जब जेनर डायोड को उत्क्रम अभिनत भंजक क्षेत्र में प्रचालित करते हैं तो धारा में अधिक परिवर्तन के लिए इसके सिरों पर वोल्टता नियत बनी रहती है। यह भंजक विभवान्तर VZ के बराबर होती है। यही विभव नियन्त्रक (नियामक) के रूप में इसके प्रयोग का सिद्धान्त है।
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परिपथ आरेख एवं कार्यविधि: चित्र 14.36 में जेनर डायोड को विभव नियामक के रूप में प्रयुक्त करने का परिपथ आरेख दर्शाया गया है। अनियन्त्रित
नियन्त्रित यह लोड प्रतिरोध R,, के सिरों के बीच उत्क्रम निवेश । अभिनति अवस्था में जोड़ा जाता है। इसके प्रतिरोध श्रेणीक्रम में प्रतिरोध R जोड़ते हैं। यदि निवेशी चित्र 14.36 वोल्टता बढ़ती है तो R तथा जेनर डायोड में धारा बढ़ेगी। इससे R के सिरों की वोल्टता बढ़ती है, जबकि जेनर डायोड की वोल्टता में कोई परिवर्तन नहीं होता क्योंकि भंजक क्षेत्र में होने के कारण इसकी जेनर वोल्टता नियत रहती है, भले ही (UPBoardSolutions.com) इसमें धारा बढ़ती हो। इसी प्रकार यदि निवेशी वोल्टता घटती है तो R के सिरों की वोल्टता घटेगी तथा जेनर डायोड की वोल्टता में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा। इस प्रकार निवेशी वोल्टता में किसी भी प्रकार का परिवर्तन R की वोल्टती में वैसा ही परिवर्तन कर देता है जबकि जेनर डायोड की वोल्टता नियत रहती है। इस प्रकार जेनर डायोड एक विभव नियामक (voltage regulator) के रूप में कार्य करता है। चित्र 14.37 में,
V0 = VZ = IZ .RZ = ILRL
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तथा VZ =  Vin – IR
चित्र 14.37 में जेनर डायोड विभव नियामक के लिए निर्गत वोल्टता तथा निवेशी वोल्टता के बीच ग्राफ प्रदर्शित किया गया है। ग्राफ से स्पष्ट है कि उत्क्रम भंजक वोल्टता VZ के पश्चात् निर्गत वोल्टता नियत रहती है।

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प्रश्न 5:
ट्रांजिस्टर क्या होता है? आवश्यक चित्र बनाकर p-n-p ट्रांजिस्टर की रचना तथा कार्यविधि समझाइए।
या
p- n-p ट्रांजिस्टर में विद्युत चालन की क्रिया को समझाइए। इसमें आधार पतला क्यों रखा जाता है ? (2011)
या
उभयनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की कार्यविधि परिपथ आरेख खींचकर समझाइए। (2014, 17)
या
p-n-p ट्रांजिस्टर की संरचना का वर्णन कीजिए तथा परिपथ चित्र देते हुए समझाइए कि यह उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में वोल्टता प्रवर्धक का कार्य कैसे करता है? (2017)
उत्तर:
ट्रांजिस्टर: दो p-n सन्धियों को सम्पर्क में रखकर बनायी गयी वह युक्ति जो एक ट्रायोड वाल्व की भाँति व्यवहार करती है, ट्रांजिस्टर कहलाती है।

p-n-p ट्रांजिस्टर
रचना: इसमें n-टाइप अर्द्धचालक की एक पतली परत दो p-टाइप अर्द्धचालकों के छोटे-छोटे क्रिस्टलों के बीच में दबाकर रखी होती है [चित्र 14.38 (a)]। इस पतली परत को ‘आधार’ (base) कहते हैं तथा इसके बायें तथा दायें वाले क्रिस्टलों को क्रमशः ‘उत्सर्जक’ (emitter) और ‘संग्राहक (collector) कहते हैं। आधार के सापेक्ष उत्सर्जक को धन-विभव पर तथा संग्राहक को ऋण-विभव पर रखा जाता है। (UPBoardSolutions.com) स्पष्ट है कि उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि अग्र-अभिनत अर्थात् अल्प प्रतिरोध वाली सन्धि है, जबकि आधार-संग्राहक (n-p) सन्धि उत्क्रम-अभिनत अर्थात् उच्च प्रतिरोध वाली सन्धि है। चित्र 14.38 (b) में ट्रांजिस्टर का प्रतीक प्रदर्शित है। इसमें बाण की दिशा वैद्युत धारा (अर्थात् कोटरों की गति) की दिशा बताती है।
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कार्यविधि: चित्र 14.39 में एक p-n-p ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ प्रदर्शित है। उत्सर्जक-आधार (p-n) सन्धि अग्र-अभिनत विभव VEB (1 वोल्ट से कम) पर रखते हैं और आधार-संग्राहक (n-p) सन्धि को । कुछ अधिक उत्क्रम-अभिनत विभव VCB (कुछ वोल्ट) पर रखते हैं। चूँकि उत्सर्जक (p-क्षेत्र) अग्र-अभिनत है; ।अत: इसमें उपस्थित धन ‘कोटर’ आधार की ओर चलते हैं। और ‘आधार’ (n-क्षेत्र) में उपस्थित इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक की ओर चलते हैं।
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आधार के पतला होने के कारण इसमें प्रवेश करने वाले कोटरों में अधिकांश (लगभग 98%) इसे पार करके संग्राहक तक पहुँच जाते हैं, जबकि अवशेष (लगभग 2%) कोटर आधार में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों से  संयोग कस्ते हैं। कोटर के इलेक्ट्रॉन से संयोग करते ही एक नया इलेक्ट्रॉन बैटरी VEB के ऋण (UPBoardSolutions.com) सिरे से निकलकर आधार में प्रवेश करता है। ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में से टर्मिनल E के द्वारा निकलकर VCB के धन सिरे पर पहुँचता है। इससे उत्सर्जक E में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है जो आधार की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है। स्पष्ट है कि आधार-उत्सर्जक परिपथ में एक क्षीण-धारा बहने लगती है।

संग्राहक (उत्क्रम-अभिनत है तथा कोटरों के चलने में सहायक है) में प्रवेश कर जाने वाले कोटर C टर्मिनल तक पहुँच जाते हैं। किसी कोटर के C पर पहुँचते ही, बैटरी VEB के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन आकर इसे उदासीन कर देता है। पुनः ठीक इसी क्षण एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में से टर्मिनल E के द्वारा निकलकर, बैटरी VCBके धन सिरे पर पहुँचता है। इससे उत्सर्जक में एक कोटर उत्पन्न हो जाती है जो आधार की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है। स्पष्ट है कि संग्राहक-उत्सर्जक परिपथ में वैद्युत धारा बहती है। अतः p-n-p ट्रांजिस्टर (UPBoardSolutions.com) के भीतर धारा-प्रवाह कोटरों के उत्सर्जक से संग्राहक की ओर चलने के कारण होता है और बाह्य परिपथ में इलेक्ट्रॉनों के चलने के कारण होता है। टर्मिनल B से चलने वाली धारा को ‘आधार-धारा’ iB तथा टर्मिनल C से बाहर जाने वाली धारा को ‘संग्राहक-धारा’ iC कहते हैं। iB तथा iC मिलकर टर्मिनले E में प्रवेश करती हैं; अतः इसे ‘उत्सर्जक-धारा’ iE कहते हैं। स्पष्ट है कि
iE = iB +iC
अतः p-n-p ट्रांजिस्टर के अन्दर धारा-प्रवाह कोटरों के उत्सर्जक से संग्राहक की ओर चलने के कारण होता है।
आधार के बहुत पतला होने के कारण इसमें संयुक्त होने वाले कोटर-इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत कम होती है। इस कारण लगभग सभी कोटर जो उत्सर्जक से आधार (UPBoardSolutions.com) में प्रवेश करते हैं, संग्राहक तक पहुँच जाते हैं। अतः iC (संग्राहक-धारा), iE (उत्सर्जक-धारा) से कुछ ही कम होती है। आधार को पतला लिये जाने का कारण है कि कोटर तथा इलेक्ट्रॉन इसमें कम-से-कम संयोग कर सके।

प्रश्न 6:
n-p-n ट्रांजिस्टर की रचना एवं कार्यविधि समझाइए। (2015, 16, 18)
या
नामांकित परिपथ आरेख बनाकर n-p-n ट्रांजिस्टर की कार्यविधि समझाइए। (2011)
या
उपयुक्त परिपथ की सहायता से n-p-n ट्रांजिस्टर की कार्यविधि का उल्लेख कीजिए। (2012)
उत्तर:
n-p-n ट्रांजिस्टर की रचना: इसमें p-टाइप अर्द्धचालक की एक पतली परत दो n-टाइप अर्द्धचालकों के छोटे-छोटे क्रिस्टलों के बीच में दबाकर रखी जाती है, [चित्र 14.40 (a)]] आधार के सापेक्ष उत्सर्जक को ऋण-विभव पर तथा संग्राहक को धन-विभव पर रखा जाता है। (UPBoardSolutions.com) स्पष्ट है कि उत्सर्जक-धारा (n-p) सन्धि अग्र-अभिनत है और आधार-संग्राहक (p-n) सन्धि उत्क्रम- अभिनत है। {चित्र 14.40 (b) में ट्रांजिस्टर का प्रतीक प्रदर्शित है जिसमें बाण की दिशा वैद्युत धारा अर्थात् इलेक्ट्रॉनों की गति के विपरीत की दिशा बताती है।

कार्यविधि: चित्र 14.41 में n-p-n ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ प्रदर्शित किया गया है। इसके दोनों n- क्षेत्रों में चलनशील इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि बीच के पतले p-क्षेत्र में +ve कोटर होते हैं। इसमें बायीं ओर के उत्सर्जक आधार (n-p) सन्धि को बैटरी से अग्र-अभिनत -विभव Ve अल्प मात्रा में दिया जाता है, जबकि दायीं ओर के आधार संग्राहक (p-n) सन्धि को बैटरी से उत्क्रम-अभिनत विभव
VC अधिक मात्रा में दिया जाता है।
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अग्र-अभिनत होने के कारण उत्सर्जक (n-क्षेत्र) से इलेक्ट्रॉन आधार की ओर गति करते हैं, जबकि आधार से कोटर उत्सर्जक की ओर। आधार के पतले होने के कारण अधिकतर इलेक्ट्रॉन, जो इसमें प्रवेश करते हैं, संग्राहक C तक पहुँच जाते हैं। इनमें से कुछ ही इलेक्ट्रॉन आधार में उपस्थित (UPBoardSolutions.com) कोटरों से। संयोग करते हैं। जैसे ही कोई इलेक्ट्रॉन किसी कोटर से संयोग करता है वैसे ही एक नया इलेक्ट्रॉन बैटरी ve के -ve सिरे से निकलकर टर्मिनल E के द्वारा उत्सर्जक में प्रवेश करता है। ठीक इसी समय Ve का +ve सिरा आधार से एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है। इससे आधार में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है तथा संयोग के कारण नष्ट हुए कोटर की क्षतिपूर्ति हो जाती है। इस प्रकार आधार उत्सर्जक परिपथ में धारा प्रवाहित होने लगती है।
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जो इलेक्ट्रॉन संग्राहक में प्रवेश कर जाते हैं वे उत्क्रम-अभिनत के कारण टर्मिनल C को छोड़कर बैटरी VC के धन सिरे में प्रवेश करता है वैसे ही बैटरी Ve के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में प्रवेश करता है। इस प्रकार संग्राहक-उत्सर्जक परिपथ में भी धारा प्रवाहित होने लगती है। (UPBoardSolutions.com) आधार टर्मिनल B में प्रवेश करने वाली क्षीण धारा को आधार-धारा iB तथा संग्राहक टर्मिनल C में प्रवेश करने वाली धारा को संग्राहक-धारा iC कहा जाता है। ये दोनों धाराएँ मिलकर उत्सर्जक टर्मिनल E से निकलती हैं जो कि उत्सर्जक-धारा iE है।
अतः  iE = iB +iC
अत: n-p-n ट्रांजिस्टर के अन्दर तथा बाह्य परिपथ में धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के कारण ही होता है।

प्रश्न 7:
n-p-n ट्रांजिस्टर स्विच के रूप में कैसे कार्य करता है? आवश्यक परिपथ चित्र द्वारा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए।  (2015)
उत्तर:
हम जानते हैं कि अग्र दिशिक (p-n) सन्धि डायोड से धारा आसानी से प्रवाहित हो सकती है। परन्तु एक पश्च दिशिक (reverse biased) डायोड धारा के प्रवाह में सार्थक व्यवधान उत्पन्न करता है। डायोड का यह आचरण एक स्विच के समतुल्य है। इसी प्रकार यदि एक ट्रांजिस्टर को उसकी संस्तब्ध (cut off) व संतृप्तावस्था (Satruation state) में उपयोग करें तो ट्रांजिस्टर भी एक इलेक्ट्रॉनिक स्विच (switch) की भाँति प्रयोग किया जा सकता है।
ट्रांजिस्टर को स्विच की तरह प्रयोग करने का सरल परिपथ चित्र 14.42 (a) में प्रदर्शित है। चित्र 14.42 में प्रयुक्त ट्रांजिस्टर n-p-n ट्रांजिस्टर है जो उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में (UPBoardSolutions.com) जुड़ा हुआ है। RB व RC क्रमशः आधार व संग्राहक प्रतिरोध हैं जो ट्रांजिस्टर को दिशिक करने हेतु प्रयोग किये गये हैं।Vi निवेशी संकेत/विभव (input signal) है जो आधार-उत्सर्जक टर्मिनलों के बीच आरोपित है तथा निर्गत संकेत (output signal) V0 संग्राहक उत्सर्जक टर्मिनलों के बीच के विभवान्तर VCE का मापन एक वोल्टमीटर V की सहायता से प्राप्त किया जा सकता है। संग्राहक प्रतिरोध RC के बीच बह रही संग्राहक-धारा iC का मापन RC के श्रेणी क्रम में लगे मिलीअमीटर mA की सहायता से किया जा सकता है।
चित्र 14.42 (a) से किरचॉफ के नियमानुसार,
Vi= iBRB + VB …….(1)
…(1) VCC = iCRC + VCE
अथवा  VCE = VCC – iCRC
VCE = V0
अतः V0 = VCC – iCRC ……….(2)
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(i) अब, यदि निवेशी विभव Vi का मान आधार-उत्सर्जक (B – E) सन्धि के विभव-प्राचीर (barrier voltage) जो जर्मेनियम तथा सिलिकॉन से बने ट्रांजिस्टर के लिए लगभग 0.6V – 0.7V के बीच होता है, से कम हो, तो B – E सन्धि के अवदिशिक (unbiased) होने के कारण ट्रांजिस्टर की तीनों धाराएँ (iB,iC व iE) शून्य होंगी। अत: संग्राहक-धारा iC के शून्य होने के कारण संग्राहक-प्रतिरोध RC के सिरों पर कोई विभव पतन नहीं होगा। जिससे ट्रांजिस्टर के संग्राहक-टर्मिनल का विभव veer व समीकरण (2) से टर्मिनल C व (UPBoardSolutions.com) E के बीच उपलब्ध विभवान्तर VCE = (= V0) VCC के बराबर ही होगा। ट्रांजिस्टर की यह अवस्था उसकी संस्तब्ध अवस्था (cut off state) कहलाती है। चूंकि इस अवस्था में ट्रांजिस्टर से होकर कोई धारा प्रवाहित नहीं होती, अत: ट्रांजिस्टर की यह अवस्था किसी स्विच की खुली-स्थिति (off state) के तुल्य है [चित्र 14.42 (b)]
(ii) अब यदि निवेशी विभव V को इस प्रकार समायोजित करें कि ट्रांजिस्टर संस्तब्ध अवस्था से सीधे संतृप्तावस्था (saturation state) में पहुँच जाये तो ऐसी दशा में संतृप्त संग्राहक-धारा
iC(= [latex]\frac { { V }_{ CC } }{ { R }_{ C } }[/latex] )के संग्राहक-प्रतिरोध Re में बहने के कारण बैटरी का सम्पूर्ण विभव VCC, RC
के सिरों पर ही पतित हो जाता है। जिससे संग्राहक-टर्मिनल C पर उपलब्ध विभव शून्य तथा उत्सर्जक-टर्मिनल E के भू-सम्पर्कित होने के कारण उसका विभव भी शून्य होता है। इस प्रकार ट्रांजिस्टर के संग्राहक व उत्सर्जक (C-E) टर्मिनल समान विभव पर होते हैं। यह स्थिति किसी विद्युतीय परिपथ के संयोजक तार के तुल्य है। इस स्थिति में ट्रांजिस्टर में धारा प्रवाह सुगमता से हो जाता है। यह अवस्था किसी स्विच की बन्द-स्थिति के समतुल्य मानी जा सकती है।

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प्रश्न 8:
n-p-ट्रांजिस्टर की प्रवर्धक के रूप में कार्यों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए। (2015, 16, 17)
या
उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में n-p-n ट्रांजिस्टर का अभिलाक्षणिक वक्र प्राप्त करने हेतु आवश्यक परिपथ आरेख बनाइए। निवेशी एवं निर्गत अभिलाक्षणिक वक्रों से प्राप्त निष्कर्षों का उल्लेख कीजिए।  (2017)
उत्तर:
n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ-उत्सर्जक प्रवर्धक की भाँति: इसका परिपथ आरेख चित्र 14.43 में दर्शाया गया है। आधार-उत्सर्जक (B-E) परिपथ को अग्र दिशिक तथा संग्राहक-उत्सर्जक (C-E) परिपथ को उत्क्रम अभिनत करने के लिये, बैटरियों VBE; तथा VCC की ध्रुवताएँ (polarities), p-n-p ट्रांजिस्टर परिपथ के सापेक्ष विपरीत हैं।
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n-p-n ट्रांजिस्टर परिपथ का मूल सिद्धान्त,,प्रतिरोध तथा विभिन्न लाभ वही हैं जो कि p-n-p ट्रांजिस्टर परिपथ के हैं।
उभयनिष्ठ-उत्सर्जक n-p-n ट्रांजिस्टर प्रवर्धक परिपथ में भी निर्गत वोल्टेज सिगनल तथा निवेशी वोल्टेज सिगनल के बीच 180° का कलान्तर हैं। इसे निम्न प्रकार समझाया (UPBoardSolutions.com) जा सकता है
माना कि निवेशी वोल्टेज सिगनल का पहला अर्द्ध-चक्र धनात्मक है। चूंकि आधार उत्सर्जक के सापेक्ष धनात्मक है, अत: पहले अर्द्ध-चक्र के दौरान, आधार-उत्सर्जक परिपथ का अग्र दिशिक वोल्टेज बढ़ता है। इससे उत्सर्जक-धारा iE, और इस कारण संग्राहक-धारा iC बढ़ती हैं। iC के बढ़ने से संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज VE घटता है (क्योंकि VCE = VCC-iCRL)। चूँकि संग्राहक बैटरी VCC के धन टर्मिनल से जुड़ा है, अत: संग्राहक वोल्टेज के घटने का अर्थ है कि संग्राहक कम धनात्मक हो जाता है। इस प्रकार, निवेशी a.c, वोल्टेज सिगनल के धनात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान संग्राहक पर प्राप्त निर्गत वोल्टेज सिगनल का अर्द्ध-चक्र ऋणात्मक होता है।
निवेशी वोल्टेज सिगनल के ऋणात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान आधार-उत्सर्जक परिपथ का अग्र दिशिक वोल्टेज घटता है। इससे उत्सर्जक-धारा iE , और इस कारण संग्राहक-धारा iC घटती है। iC के घटने से संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज VCE बढ़ता है, अर्थात् संग्राहक अधिक धनात्मक हो जाता है। इस प्रकार, निवेशी a.c. वोल्टेज सिगनल के ऋणात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान संग्राहक पर प्राप्त निर्गत वोल्टेज सिगनल का अर्द्ध-चक्र धनात्मक होता है।
स्पष्ट है कि उभयनिष्ठ-उत्सर्जक प्रवर्धक में, निर्गत वोल्टेज सिगनल तथा निवेशी वोल्टेज सिगनल में 180° का कलान्तर होता है।

प्रश्न 9:
परिपथ चित्र की सहायता से n-p-n ट्रांजिस्टर की दोलनी क्रिया समझाइए। (2014)
या
n-p-n ट्रांजिस्टर का दोलित्र के रूप में प्रयोग परिपथ बनाकर समझाइए। (2017)
उत्तर:
चित्र 14.44 में उभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में एक n-p-n ट्रांजिस्टर के एक दोलित्र की तरह उपयोग का परिपथ आरेख प्रदर्शित है।
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चित्र 14.44 चित्र में L1C1 एक टैंक परिपथ तथा L2 एक पुनर्भरण कुण्डली है। संधारित्र C2 दोलन के लिए एक निम्न प्रतिघात पथ (low reactance path) प्रदान करता है। श्रेणी क्रम में जुड़े प्रतिरोधों R1 व  R2 है, की सहायता से ट्रांजिस्टर को आवश्यक अभिनति (necessary biasing) प्रदान की जाती है। RE उत्सर्जक प्रतिरोध है जो ट्रांजिस्टर सन्धि के ताप को नियन्त्रित करता है। CE एक संधारित्र है जो प्रवर्धित संकेतों का आधार-उत्सर्जक परिपथ में ऋणात्मक पुनर्भरण (negative feedback) (UPBoardSolutions.com) रोकता है। बैटरी VCC पूरे परिपथ को d.c. शक्ति प्रदान करती है। परिपथ में उत्पन्न दोलनों को प्रेरण कुण्डली L3 के सिरों पर प्राप्त किया जाता है।
कार्य प्रणाली: जैसे ही कुन्जी (Switch) S को बन्द किया जाता है टैंक परिपथ का संधारित्र C1 आशित होना शुरू हो जाता है। जब यह पूर्णावेशित हो जाती है तो यह प्रेरण कुण्डली L1 के कारण अनावेशित होना शुरू कर देता है जिसके परिणामस्वरूप L1C1 टैंक परिपथ में अवमन्दित दोलन प्रारम्भ हो जाते हैं। यह दोलन पुनर्भरण कुण्डली L2 में (जोकि L1 के ही साथ उभयनिष्ठ लौह क्रोड पर लपेटी है चित्र 14.44 में बिन्दुवत् चाप का यही अभिप्राय है) L1C1 परिपथ के ही समान आवृत्ति का एक विद्युत वाहक बल (फैराडे के नियमानुसार) उत्पन्न कर देती है। L2 में उत्पन्न इस वि० वी० बल का परिमाण इस कुण्डली में फेरों की संख्या तथा इस कुण्डली का कुण्डली L के सापेक्ष कपलिंग (coupling) पर निर्भर करता है। अब L2 के सिरों पर उत्पन्न इस विभवान्तर को ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के आधार व उत्सर्जक (B – E) टर्मिनलों के बीच लगा देते हैं जहाँ यह प्रवर्धित होकर (UPBoardSolutions.com) पुनर्भरण की प्रक्रिया के माध्यम से टैंक परिपथ L1C1 को पुनः प्राप्त हो जाता है जिससे जो भी क्षतियाँ हुई होती हैं उनकी पूर्ति हो जाती है।
इस प्रकार परिपथ बिना अवमन्दित हुए दोलन करता रहता है जिसकी आवृत्ति समीकरण    f = [latex]\frac { 1 }{ 2\pi \sqrt { { L }_{ 1 }{ C }_{ 1 } } }[/latex]  से दी जाती है। यहाँ ज्ञात हो कि पुनर्भरण की क्रिया में टैंक परिपथ को प्राप्त फीडबैक विभव निवेशी विभव के साथ समान कला में होता है।

व्याख्या:
फैराडे के नियमानुसार (e=-L [latex]\frac { di }{ dt }[/latex] )  L1  व L2  के बीच उत्पन्न वि० वा० बल के विपरीत कलाओं (180° का कलान्तर) में होते हैं। पुन: L2  के सिरों पर उत्पन्न यह विभवान्तर उभयनिष्ठ उत्सर्जक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के आधार व उत्सर्जक सन्धियों के बीच प्रवर्धन के लिए लगा दिया जाता है। इस प्रकार ट्रांजिस्टर के निर्गत विभव व निवेशी विभव में पुनः 180° का कलान्तर हो जाता  है। अत: प्रवर्धक से निर्गत विभव को टैंक परिपथ का निवेशी विभव बनने तक इसमें हुआ कुल कलान्तर = 180° + 180° = 360° का हो जाता है। अर्थात् टैंक परिपथ को पुनर्भरित विभव टैंक परिपथ के निवेशी विभव के साथ समान कला में होता है।

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प्रश्न 10:
NOT गेट की परिभाषा दीजिए। इसके बूलियन व्यंजक तथा सांकेतिक रूप लिखिए। इस गेट को व्यवहार में किस प्रकार प्रयुक्त किया जाता है? इसका तर्क प्रतीक एवं सत्यता-सारणी दीजिए।  (2011, 18)
या
NOT गेट के लिए लॉजिक प्रतीक, सत्यता सारणी एवं बूलियन व्यंजक लिखिए तथा बताइए कि व्यवहार में यह गेट किस प्रकार प्रयुक्त होता है ?
(2010, 12, 18)
या
NOT गेट का प्रतीक चिह्न बनाइए तथा इसका बूलियन व्यंजक लिखिए।(2012, 14, 17)
या
NOT गेट की उपयुक्त आरेख की सहायता से सत्यता सारणी बनाइए। (2013) 
या
NOT गेट का लॉजिक चिह्न, बूलियन व्यंजक एवं सत्यता सारणी दीजिए। (2014, 15)
या
NOT गेट का संकेत चिह्न बनाकर इसकी सत्यता सारणी भी बनाइए। (2016)
उत्तर:
NOT गेट-इसमें केवल एक निवेश (input) तथा एक निर्गत (output) होता है। इसका बूलियन व्यंजक इस प्रकार है
Ā = Y।
जिसे ‘NOT A equalsY’ पढ़ा जाता है। इसका अर्थ है कि Y,A का ऋणक्रमण (negation) अथवा उत्क्रमण (inversion) है। चूंकि बाइनरी पद्धति में केवल दो अंक 0 तथा 1 होते हैं, अतः Y = 0 यदि = 1 तथा Y = 1 यदि A = 0. NOT गेट का लॉजिक प्रतीक चित्र 14.45 (a) में दर्शाया गया है।
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व्यवहार में NOT गेट प्राप्त करना (Realisation of NOT Gate): व्यवहार में, हम NOT गेट को डायोडों को प्रयुक्त करके प्राप्त नहीं कर सकते। इसके लिए ट्रांजिस्टर प्रयुक्त करना होगा। चित्र 14.46 में NOT गेट का वैद्युत परिपथ दर्शाया गया है जिसमें n-p-n ट्रांजिस्टर प्रयुक्त किया (UPBoardSolutions.com) गया है। ट्रांजिस्टर के आधार B को एक प्रतिरोधक Bp के द्वारा निवेशी टर्मिनल A से जोड़ा गया है तथा उत्सर्जक E को भू-सम्पर्कित कर दिया गया है। संग्राहक C को एक अन्य प्रतिरोधक R तथा 5y बैटरी के द्वारा भू-सम्पर्कित किया गया है। निर्गत Y, संग्राहक C का पृथ्वी के सापेक्ष वोल्टेज है। NOT गेट की कार्यप्रणाली की दो सम्भव स्थितियाँ निम्न प्रकार हैं

  1. जब निवेशी टर्मिनल A भू-सम्पर्कित होती है (A = 0), तब ट्रांजिस्टर का. आधार B भी  भू-सम्पर्कित हो जाता है। इसका अर्थ है कि आधार-उत्सर्जक (B ~ E) सन्धि अवअभिनत । (unbiased) रहती है परन्तु आधार-संग्राहक (B-C) सन्धि उत्क्रम-अभिनत हो जाती है। चूंकि उत्सर्जक-धारा शून्य है तथा आधार-धारा भी शून्य है, अतः संग्राहक-धारा भी शून्य होगी। इस स्थिति में, (UPBoardSolutions.com) ट्रांजिस्टर संस्तब्ध (cut-off) अवस्था में होता है। अत: संग्राहक C पर वोल्टेज, पृथ्वी के सापेक्ष, +5v होगा जो कि संग्राहक परिपथ में जुड़ी बैटरी का वोल्टेज है। अत: Y = 1. यह स्थिति सत्यता सारणी [चित्र 14.45 (b)] की पहली पंक्ति में व्यक्त की गयी है।
  2.  जब निवेशी टर्मिनल A को 5V बैटरी के धन टर्मिनल से जोड़ा जाता है (A = 1), तब आधार-उत्सर्जक (B-E) सन्धि अग्र-अभिनत हो जाती है। इस दशा में उत्सर्जक-धारा, आधार-धारा तथा संग्राहक-धारा तीनों विद्यमान होती हैं। प्रतिरोधक RB व RC इस प्रकार चुने जाते हैं कि इस व्यवस्था में बड़ी संग्राहक-धारा प्राप्त हो। इस स्थिति में ट्रांजिस्टर संतृप्तता (saturation) की अवस्था में होता है। अग्र-अभिनति के कारण, RC में विभव-पतन ठीक 5V होता है, जो कि संग्राहक-परिपथ में जुड़ी 5V बैटरी के कारण होने वाले विभव-पतन के ठीक बराबर तथा विपरीत है। इस प्रकार C पर वोल्टेज शून्य है। अत: Y = 0, यह स्थिति सत्यता सारणी [चित्र 14.45 (b)] की दूसरी पंक्ति में व्यक्त की गयी है।
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स्पष्ट है कि NOT गेट में यदि निवेशी 0 है, तो निर्गत 1 है तथा इसका उल्टा। इसकी सत्यता सारणी चित्र 14.45 (b) में प्रदर्शित है।

प्रश्न 11:
बूलियन बीजगणित में AND गेट को किस प्रकार प्रकट किया जाता है? इसका लॉजिक संकेत बताइए। इसे व्यवहार में किस प्रकार प्रयुक्त किया जाता है?  (2011)
या
AND गेट के लिए लॉजिक प्रतीक, सत्यता सारणी बनाइए तथा बूलियन व्यंजक लिखिये एवं बताइये कि इसे व्यवहार में दो penसन्धि डायोडों से प्रयुक्त करके कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? (2010)
या
‘AND’ गेट का लॉजिक प्रतीक, बूलियन व्यंजक एवं सत्यता-सारणी बनाइए। (2012, 14, 17)
या
‘AND’ गेट के लिए सत्यता सारणी बनाइए। यह गेट व्यवहार में सन्धि डायोड प्रयुक्त करके किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है । (2013)
या
AND गेट का प्रतीक चिन्ह एवं सत्यता सारणी बनाइए। (2017)
उत्तर:
AND गेट: यह एक द्वि-निवेशी (two-input) तथा एकल-निर्गत (one-output) लॉजिक गेट है। यह दो निवेशी चरों A तथा B को संयुक्त करके एक निर्गत चर Y देता है। इसका बुलियन व्यंजके इस प्रकार है
A . B=Y
जिसे ‘A AND B equals Y’ पढ़ा जाता है। इसका लॉजिक संकेत चित्र 14.47 (a) में दर्शाया गया है।
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व्यवहार में AND गेट प्राप्त करना (Realisation of AND Gate): व्यवहार में, AND गेट दो p- n सन्धि डायोडों D1  व D2 से निर्मित वैद्युत परिपथ से प्राप्त किया जा सकता है (चित्र 14.48)। प्रतिरोधक R एक 5V बैटरी के धन टर्मिनल से स्थायी रूप से जुड़ा है। निवेशी टर्मिनल A व B एक अन्य 5V बैटरी की सहायता से 0 V (स्तर 0) अथवा 5V (स्तर 1) पर रखे जा सकते हैं। इस बैटरी का ऋण टर्मिनल भू-सम्पर्कित है।
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निवेशियों A व B के चार सम्भव संयोग हैं

  1.  जब निवेशी टर्मिनल A व B दोनों भू-सम्पर्कित हैं (A = 0, B = O), तब दोनों डायोड D1 व D2 अग्र-अभिनत होने के कारण चालित होते हैं। यदि डायोड आदर्श हैं, तब इनमें कोई विभव-पतन नहीं होता। अतः प्रतिरोधक R में 5V का विभव-पतन होता है तथा इसका सिरा C, पृथ्वी के सापेक्ष शून्य विभव पर होता है। इस प्रकार, निर्गत Y, जो कि प्रतिरोधक R के सिरे C पर वोल्टेज है, शून्य होता है (Y = 0)। यह स्थिति सत्यता सारणी [चित्र 14.47 (b)] की पहली
    पंक्ति में व्यक्त की गयी है।
  2. जब निवेशी टर्मिनल A भू-सम्पर्कित है तथा B, 5V बैटरी के धन टर्मिनल से जुड़ा है। (A = 0, B = 1), तब डायोड D1 चालित होता है परन्तु D2 चालित नहीं होता (क्योकि यह अग्र-अभिनत नहीं है)। यदि D1 आंदर्श है, तब इसमें कोई विभव-पतन नहीं होता। अत: प्रतिरोधक R में 5V का (UPBoardSolutions.com) विभव-पतन होता है तथा इसका सिरा C पृथ्वी के सापेक्ष, शून्य विभव पर होता है। अतः निर्गत Y पुन: शून्य होता है (Y = 0)। यह स्थिति सत्यता सारणी [चित्र 14.47 (b)] की दूसरी पंक्ति में व्यक्त की गयी है।
  3. जब निवेशी टर्मिनल A. 5V बैटरी के धन टर्मिनल से जुड़ा है तथा B भू-सम्पर्कित है। (A = 1, B = 0), तब डायोड D2 चालित होता है। यदि यह डायोड आदर्श है, तब इसमें कोई विभव-पतन नहीं होता। अत: पुन: प्रतिरोधक R में 5V का विभव-पतन होता है तथा इसका सिरा C पृथ्वी के सापेक्ष, शून्य विभव पर होता है। अतः निर्गत Y अब भी शून्य होता है (Y = 0)। यह स्थिति सत्यता सारणी [चित्र 14.47 (b)] की तीसरी पंक्ति में व्यक्त की गयी है।
  4.  जब टर्मिनल A व B दोनों 5V बैटरी के धन टर्मिनल से जोड़े जाते हैं (A = 1, B = 1), तब कोई भी डायोड चालित नहीं होता तथा प्रतिरोधक R में धारा नहीं होती। (UPBoardSolutions.com) अत: प्रतिरोधक का ऊपरी सिरा C उसी विभव पर होता है जिस पर कि उसका निचला सिरा होता है, अर्थात् पृथ्वी के सापेक्ष, +5 V पर। इस प्रकार, अब निर्गत सिरा Y भी + 5V पर होता है (Y = 1)। यह स्थिति सत्यता सारणी । [चित्र 14.47 (b)] की अन्तिम पंक्ति में व्यक्त की गयी है।
    स्पष्ट है कि AND गेट में, यदि दोनों निवेशी 1 हैं तभी निर्गत भी 1 होता है, अन्यथा निर्गत 0 होता है।

प्रश्न 12:
NAND गेट और NOR गेट क्या हैं? इनके लॉजिक प्रतीक तथा सत्यता सारणी दीजिए। (2017)
या
NOR गेट का लॉजिक प्रतीक बनाइए और इसका बूलियन व्यंजक लिखिए। (2014, 16, 17)
या
NOR गेट का लॉजिक चिह्न, बुलियन व्यंजक एवं सत्यता सारणी दीजिए। (2014, 17)
उत्तर:
NAND गेट तथा NOR गेट को सार्वत्रिक गेट भी कहते हैं। इनका प्रयोग करके पुनः मूल लॉजिक गेट (OR, AND तथा NOT) भी प्राप्त किये जा सकते हैं।
1. NAND गेट:
यह मूल लॉजिक गेट AND गेट तथा NOT गेट का संयोजन है। इसमें AND
गेट के निर्गम को NOT गेट का निवेश बना दिया जाता है [चित्र 14.49 (a)]। इसका तर्क प्रतीक [चित्र 14.49 (b)} में प्रदर्शित है।
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2. NOR गेट:
यह मूल लॉजिक गेट OR गेट तथा NOT गेट का संयोजन है। इसमें OR गेट के निर्गम को NOT गेट का निवेश बना दिया जाता है [चित्र 14.50 (a)]इसका तर्क प्रतीक [चित्र 14.50 (b)] में प्रदर्शित है।
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प्रश्नं 13:
A व B, OR गेट तथा NAND गेट के निवेशी तरंग प्रतिरूपचित्र में प्रदर्शित हैं। दोनों गेटों के निर्गत प्रतिरूप (Y) अपनी उत्तर पुस्तिका में दर्शाइए।
(2014)
या
नीचे दिखाए गए निवेश A तथा B के लिए NAND गेट के निर्गत तरंग रूप को स्केच कीजिए। (2016)
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हल:
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