UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 16 Environmental Issues

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 16
Chapter Name Environmental Issues
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 16 Environmental Issues (पर्यावरण के मुद्दे)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
घरेलू वाहितमल के विभिन्न घटक क्या हैं? वाहितमल के नदी में विसर्जन से होने वाले प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर
घरेलू वाहितमल मुख्य रूप से जैव निम्नीकरणीय कार्बनिक पदार्थ होते हैं जिनका अपघटन आसानी से होता है। इसका परिणाम सुपोषण होता है। घरेलू वाहितमल के विभिन्न घटक निम्नलिखित हैं –

  1. निलंबित ठोस – जैसे- बालू, गाद और चिकनी मिट्टी।
  2. कोलॉइडी पदार्थ – जैसे- मल पदार्थ, जीवाणु, वस्त्र और कागज के रेशे।
  3. विलीन पदार्थ जैसे – पोषक पदार्थ, नाइट्रेट, अमोनिया, फॉस्फेट, सोडियम, कैल्शियम आदि।

वाहितमल के नदी में विसर्जन से होने वाले प्रभाव इस प्रकार हैं –

  1. अभिवाही जलाशय में जैव पदार्थों के जैव निम्नीकरण से जुड़े सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन की काफी मात्रा का उपयोग करते हैं। वाहित मल विसर्जन स्थल पर भी अनुप्रवाह जल में घुली ऑक्सीजन की मात्रा में तेजी से गिरावट आती है और इसके कारण मछलियों तथा जलीय जीवों की मृत्युदर में वृद्धि हो जाती है।
  2. जलाशयों में काफी मात्रा में पोषकों की उपस्थिति के कारण प्लवकीय शैवाल की अतिशय वृद्धि होती है, इसे शैवाल प्रस्फुटन कहा जाता है। शैवाल प्रस्फुटन के कारण जल की गुणवत्ता घट जाती है और मछलियाँ मर जाती हैं। कुछ प्रस्फुटनकारी शैवाल मनुष्य और जानवरों के लिए अत्यधिक विषैले होते हैं।
  3. वाटर हायसिंथ पादप जो विश्व के सबसे अधिक समस्या उत्पन्न करने वाले जलीय खरपतवार हैं और जिन्हें बंगाल का आतंक भी कहा जाता है, पादप सुपोषी जलाशयों में काफी वृद्धि करते हैं और इसकी पारितंत्रीय गति को असन्तुलित कर देते हैं।
  4. हमारे घरों के साथ-साथ अस्पतालों के वाहितमल में बहुत से अवांछित रोगजनक सूक्ष्मजीव हो। सकते हैं और उचित उपचार के बिना इनको जल में विसर्जित करने से गम्भीर रोग, जैसे- पेचिश, टाइफाइड, पीलिया, हैजा आदि हो सकते हैं।

प्रश्न 2.
आप अपने घर, विद्यालय या अपने अन्य स्थानों के भ्रमण के दौरान जो अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं, उनकी सूची बनाएँ। क्या आप उन्हें आसानी से कम कर सकते हैं? कौन से ऐसे अपशिष्ट हैं जिनको कम करना कठिन या असम्भव होगा?
उत्तर
अपशिष्टों की सूची इस प्रकार है –

  1. कागज, कपड़ा, पॉलीथिन बैग
  2. डिस्पोजेबल क्रॉकरी
  3. ऐलुमिनियम पन्नी, टिन का डिब्बा
  4. शीशा।

अपशिष्ट जिन्हें कम किया जा सकता है –

  1. कागज
  2. कपड़ा।

अपशिष्ट जिन्हें कम नहीं किया जा सकता है –

  1. ऐलुमिनियम पन्नी, टिन का डिब्बा
  2. डिस्पोजेबल क्रॉकरी
  3. पॉलीथिन बैग
  4. शीशा।

प्रश्न 3.
वैश्विक उष्णता में वृद्धि के कारणों और प्रभावों की चर्चा करें। वैश्विक उष्णता वृद्धि को नियन्त्रित करने वाले उपाय क्या हैं?
उत्तर
वैश्विक उष्णता में वृद्धि के कारण – ग्रीनहाउस गैसों के स्तर में वृद्धि के कारण पृथ्वी की। सतह का ताप काफी बढ़ जाता है जिसके कारण विश्वव्यापी उष्णता होती है। गत शताब्दी में पृथ्वी के तापमान में 0.6°C वृद्धि हुई है। इसमें से अधिकतर वृद्धि पिछले तीन दशकों में ही हुई है। एक सुझाव के अनुसार सन् 2100 तक विश्व का तापमान 1.40 – 5.8°C बढ़ सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान में इस वृद्धि से पर्यावरण में हानिकारक परिवर्तन होते हैं जिसके परिणामस्वरूप विचित्र जलवायु-परिवर्तन होते हैं। इसके फलस्वरूप ध्रुवीय हिम टोपियों और अन्य जगहों, जैसे हिमालय की हिम चोटियों का पिघलना बढ़ जाता है। कई वर्षों बाद इससे समुद्र तल का स्तर बढ़ेगा जो कई समुद्र तटीय क्षेत्रों को जलमग्न कर देगा।
वैश्विक उष्णता के निम्नांकित प्रभाव हो सकते हैं –

  1. अन्न उत्पादन कम होगा
  2. भारत में होने वाली मौसमी वर्षा पूर्ण रूप से बन्द हो सकती है
  3. मरुभूमि का क्षेत्र बढ़ सकता है
  4. एक-तिहाई वैश्विक वन समाप्त हो सकते हैं
  5. भीषण आँधी, चक्रवात तथा बाढ़ की संभावना बढ़ जाएगी
  6. 2050 ई० तक एक मिलियन से अधिक पादपों एवं जन्तुओं की जातियाँ समाप्त हो जाएँगी।

वैश्विक उष्णता को निम्नलिखित उपायों द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है –

  1. जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करना
  2. ऊर्जा दक्षता में सुधार करना
  3. वनोन्मूलन को कम करना
  4. मनुष्य की बढ़ती हुई जनसंख्या को कम करना
  5. जानवरों की विलुप्त हो रही प्रजातियों को संरक्षित करना
  6. वनों का विस्तार करना
  7. वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

प्रश्न 4.
कॉलम अ और ब में दिए गए मदों का मिलान करें –
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 16 Environmental Issues img-1
उत्तर
(क) 2
(ख) 1
(ग) 3
(घ) 4.

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर आलोचनात्मक टिप्पणी लिखें –

  1. सुपोषण (Utrofication)
  2. जैव आवर्धन (Biological Magnification)
  3. भौमजल (भूजल) का अवक्षय और इसकी पुनःपूर्ति के तरीके।

उत्तर
1. सुपोषण (Eutrophication) – अकार्बनिक फॉस्फेट एवं नाइट्रेट के जलाशयों में एकत्र होने की क्रिया को सुपोषण कहते हैं। सुपोषण झील का प्राकृतिक काल-प्रभावन दर्शाता है, यानि झील अधिक उम्र की हो जाती है। यह इसके जल की जैव समृद्धि के कारण होता है। तरुण झील का जल शीतल और स्वच्छ होता है। समय के साथ-साथ इसमें सरिता के जल के साथ पोषक तत्त्व, जैसे-नाइट्रोजन और फॉस्फोरस आते रहते हैं जिसके कारण जलीय जीवों में वृद्धि होती रहती है। जैसे-जैसे झील की उर्वरता बढ़ती है वैसे- वैसे पादप और प्राणी बढ़ने लगते हैं। जीवों की मृत्यु होने पर कार्बनिक अवशेष झील के तल में बैठने लगते हैं। सैकड़ों वर्षों में इसमें जैसे-जैसे सिल्ट एवं जैव मलबे का ढेर लगता है वैसे-वैसे झील उथली और गर्म होती जाती है। उथली झील में कच्छ (marsh) पादप उग आते हैं और मूल झील बेसिन उनसे भर जाता है।

मनुष्य के क्रियाकलापों के कारण सुपोषण की क्रिया में तेजी आती है। इस प्रक्रिया को त्वरित सुपोषण कहते हैं। इस प्रकार झील वास्तव में घुट कर मर जाती है और अन्त में यह भूमि में परिवर्तित हो जाती है।

2. जैव आवर्धन (Biological Magnification) – जैव आवर्धन का तात्पर्य है, क्रमिक पोषण स्तर पर आविषाक्त की सान्द्रता में वृद्धि का होना। इसका कारण है जीव द्वारा संगृहीत आविषालु पदार्थ उपापचयित या उत्सर्जित नहीं हो सकता और इस प्रकार यह अगले उच्चतर पोषण स्तर पर पहुँच जाता है। ये पदार्थ खाद्य श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तरों (trophic levels) के जीवों में धीरे-धीरे संचित होते रहते हैं। खाद्य श्रृंखला में इन्हें सबसे पहले पौधों द्वारा प्राप्त किया जाता है। पौधों से इन पदार्थों को उपभोक्ताओं द्वारा प्राप्त किया जाता है। उद्योगों के अपशिष्ट जल में प्रायः विद्यमान कुछ विषैले पदार्थों में जलीय खाद्य श्रृंखला जैव आवर्धन कर सकते हैं।

यह परिघटना पारा एवं D.D.T. के लिए सुविदित है। क्रमिक पोषण स्तरों पर D.D.T: की सान्द्रता बढ़ जाती है। यदि जल में यह सान्द्रता 0.003 ppb से आरम्भ होती है तो अन्त में जैव आवर्धन के द्वारा मत्स्यभक्षी पक्षियों में बढ़कर 25 ppm हो जाती है। पक्षियों में D.D.T. की उच्च सान्द्रता कैल्शियम उपापचय को नुकसान पहुँचाती है जिसके कारण अंडकवच पतला हो जाता है और यह समय से पहले फट जाता है जिसके कारण। पक्षी-समष्टि की संख्या में कमी हो जाती है।

3. भौमजल का अवक्षय और इसकी पुनः पूर्ति के तरीके (Ground- water Depletion and Ways for its Replenishment) – भूमिगत जल पीने के लिए अधिक शुद्ध एवं सुरक्षित है। औद्योगिक शहरों में भूमिगत जल प्रदूषित होता जा रहा है। अपशिष्ट तथा औद्योगिक अपशिष्ट बहाव जमीन पर बहता रहता है जोकि भूमिगत जल प्रदूषण के साधारण स्रोत हैं। उर्वरक तथा पीड़कनाशी, जिनका उपयोग खेतों में किया जाता है, भी प्रदूषक का कार्य करते हैं। ये वर्षा-जल के साथ निकट के जलाशयों में एवं अन्तत: भौमजल में मिल जाते हैं। अस्वीकृत कूड़े के ढेर, सेप्टिक टंकी एवं सीवेज गड्ढे से सीवेज के रिसने के कारण भी भूमिगत जल प्रदूषित होता है।

वाहितमल जले एवं औद्योगिक अपशिष्टों को जलाशयों में छोड़ने से पहले उपचारित करना चाहिए जिससे भूमिगत जल प्रदूषित होने से बच सकता है।

प्रश्न 6.
अण्टार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र क्यों बनते हैं? पराबैंगनी विकिरण के बढ़ने से हमारे ऊपर किस प्रकार प्रभाव पड़ेंगे?
उत्तर
हालाँकि ओजोन अवक्षय व्यापक रूप से होता है, लेकिन इसका असर अण्टार्कटिक क्षेत्र में खासकर देखा गया है। यहाँ जगह-जगह पर ओजोन परत में इतनी कमी पड़ जाती है कि छिद्र को आभास होने लगता है और इसे ओजोन छिद्र (Ozone hole) की संज्ञा दी जाती है। कुछ सुगन्धियाँ, झागदार शेविंग क्रीम, कीटनाशी, गन्धहारक आदि डिब्बों में आते हैं और फुहारा या झाग के रूप में निकलते हैं। इन्हें ऐरोसोल कहते हैं। इनके उपयोग से वाष्पशील CFC वायुमण्डल में पहुँचकर ओजोन स्तर को नष्ट करते हैं। CFC का व्यापक उपयोग एयरकण्डीशनरों, रेफ्रिजरेटरों, शीतलकों, जेट इंजनों, अग्निशामक उपकरणों, गद्देदार फोम आदि में होता है। ज्वालामुखी, रासायनिक उर्वरक, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, सवाना तथा अन्य वन-वृक्षों के जलने से ओजोन की परत को क्षति होती है। फ्रिऑन सबसे अधिक घातक क्लोरोफ्लोरोकार्बन है जो ओजोन से प्रतिक्रिया कर उसका अवक्षय करता है।

पराबैंगनी- बी की अपेक्षा छोटे तरंगदैर्ध्य युक्त पराबैंगनी विकिरण पृथ्वी के वायुमण्डल द्वारा लगभग पूरा का पूरा अवशोषित हो जाता है। बशर्ते कि ओजोन स्तर ज्यों-का-त्यों रहे लेकिन पराबैंगनी-बी DNA को क्षतिग्रस्त करता है और उत्परिवर्तन को बढ़ाता है। इसके कारण त्वचा में बुढ़ापे के लक्षण दिखते हैं। इससे विविध प्रकार के त्वचा कैंसर हो सकते हैं। इससे हमारी आँखों में कॉर्निया का शोथ हो । जाता है जिसे हिम अंधता, मोतियाबिंद आदि कहा जाता है।

प्रश्न 7.
वनों के संरक्षण और सुरक्षा में महिलाओं और समुदायों की भूमिका की चर्चा करें।
उत्तर
भारत में वन संरक्षण का एक लम्बा इतिहास है। जोधपुर (राजस्थान) के राजा ने 1731 ई० में अपने महल के निर्माण के लिए वृक्षों को काटने का आदेश दिया था। जिस वन क्षेत्र के वृक्षों को काटना था उसके आस-पास कुछ बिश्नोई परिवार रहते थे। इस परिवार की अमृता नामक महिला ने राजा के आदेश का विरोध किया एवं वृक्ष से चिपककर खड़ी हो गई। उसका कहना था कि वृक्ष हमारी जान है। उसके बिना हमारा जिंदा रहना असम्भव है। इसे काटने के लिए पहले आपको हमें काटना होगा। राजा के लोगों ने पेड़ के साथ-साथ महिला एवं उसके बाद उसकी तीन बेटियों तथा बिश्नोई परिवार के सैकड़ों लोगों को वृक्ष के साथ कटवा दिया। भारत सरकार ने इस साहसी महिला, जिसने पर्यावरण की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी, के सम्मान में अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार देना हाल में शुरू किया है।

चिपको आन्दोलन के प्रवर्तक डॉ० सुन्दरलाल बहुगुणा के नाम से ही वन-संरक्षण की संवेदना होने लगती है। 1974 ई० में हिमालय के गढ़वाल में जब ठेकेदारों द्वारा वृक्षों को काटने की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो इससे बचाने के लिए स्थानीय महिलाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया। वे वृक्षों से चिपकी रहीं एवं वृक्षों को काटे जाने से रोकने में सफल रहीं। इसी प्रयास ने आन्दोलन का रूप ले लिया एवं ‘चिपको आन्दोलन’ के रूप में विश्वविख्यात हुआ।

प्रश्न 8.
पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने के लिए एक व्यक्ति के रूप में आप क्या उपाय करेंगे?
उत्तर
पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए हम एक व्यक्ति के रूप में निम्नलिखित उपाय करेंगे –

  1. सीसारहित एवं सल्फररहित पेट्रोल के उपयोग के साथ-साथ इंजन से कम-से-कम धुआँ उत्सर्जित हो, इस पर ध्यान रखेंगे।
  2. बिजली या बैटरी से चालित वाहनों के प्रयोग पर बल देंगे।
  3. उद्योगों की चिमनी हवा में काफी ऊपर हो एवं इसमें फिल्टर लगा होना चाहिए, इस सन्दर्भ में लोगों के माध्यम से प्रयास करेंगे।
  4. उद्योगों एवं परिष्करणशालाओं को आबादी से दूर स्थापित करवाने का प्रयास करेंगे।
  5. वनरोपण के प्रति लोगों को जागरूक एवं प्रोत्साहित करेंगे।
  6. प्रदूषण से होने वाली बीमारियों तथा हानिकारक प्रभावों के बारे में आम लोगों को जानकारी देंगे।
  7. जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग कम-से-कम करेंगे।
  8. जनसंख्या वृद्धि से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में लोगों को बताएँगे।
  9. धूम्रपान से होने वाली हानियों के बारे में लोगों को सलाह देंगे।
  10. मोटर वाहन चलाते समय हॉर्न का प्रयोग कम-से-कम हो, इस बात का ध्यान रखेंगे।
  11. रेडियो, टी०वी०, म्यूजिक सिस्टम आदि का प्रयोग करते समय इस बात का ध्यान रखेंगे कि आवाज बहुत धीमी हो।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित के बारे में संक्षेप में चर्चा करें –
(क) रेडियो सक्रिय अपशिष्ट
(ख) पुराने बेकार जहाज और ई- अपशिष्ट
(ग) नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट
उत्तर
(क) रेडियो सक्रिय अपशिष्ट (Radioactive Wastes) – न्यूक्लियर रिएक्टर से निकलने वाला विकिरण जीवों के लिए बेहद नुकसानदेह होता है क्योंकि इसके कारण अति उच्च दर से विकिरण उत्परिवर्तन होते हैं। न्यूक्लियर अपशिष्ट विकिरण की ज्यादा मात्रा घातक यानि जानलेवा होती है लेकिन कम मात्रा कई विकार उत्पन्न करती है। इसका सबसे अधिक बार-बार होने वाला विकार कैंसर है। इसलिए न्यूक्लियर अपशिष्ट अत्यन्त प्रभावकारी प्रदूषक है।

रेडियो सक्रिय अपशिष्ट का भण्डारण कवचित पात्रों में चट्टानों के नीचे लगभग 500 मीटर की गहराई में पृथ्वी में गाड़कर करना चाहिए। नाभिकीय संयन्त्रों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों जिनमें विकिरण कम हो उसे सीवरेज में छोड़ा जा सकता है। अधिक विकिरण वाले अपशिष्टों का विशेष उपचार, संचय एवं निपटारा किया जाता है।

(ख) पुराने बेकार जहाज और ई-अपशिष्ट (Defunct Ships and E-Wastes) – पुराने बेकार जहाज एक प्रकार के ठोस अपशिष्ट हैं जिनका उचित निपटारा आवश्यक है। विकासशील देशों में इसे तोड़कर धातु को अलग किया जाता है। इसमें सीसा, मरकरी (पारा), ऐस्बेस्टस, टिन आदि पाए जाते हैं जो हानिकारक होते हैं।

ऐसे कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान जो मरम्मत के लायक नहीं रह जाते हैं इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (E-wastes) कहलाते हैं। ई-अपशिष्ट को लैंडफिल्स में गाड़ दिया जाता है या जलाकर भस्म कर दिया जाता है। विकसित देशों में उत्पादित ई-अपशिष्ट का आधे से अधिक भाग विकासशील देशों, खासकर चीन, भारत तथा पाकिस्तान में निर्यात किया जाता है जिससे विकासशील देशों में इसकी समस्या बहुत बढ़ जाती है। इसमें मौजूद वैसे तत्त्व या धातु जिनका पुन:चक्रण किया जा सकता हो, जैसे-लोहा, निकेल, ताँबा आदि का पुन:चक्रण कर पुनः उपयोग किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में विकसित देशों की तरह वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करना चाहिए ताकि, इससे जुड़े कर्मियों पर इनका हानिकारक प्रभाव कम-से-कम हो।

(ग) नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट (Municipal Solid Wastes) – इसके अन्तर्गत घरों, कार्यालयों, भण्डारों, विद्यालयों आदि में रद्दी में फेंकी गई चीजें आती हैं जो नगरपालिका द्वारा इकट्ठी की जाती हैं और उनका निपटारा किया जाता है। इसमें आमतौर पर कागज, खाद्य अपशिष्ट, कॉच, धातु, रबर, चमड़ा, वस्त्र आदि होते हैं। इनको जलाने से अपशिष्ट के आयतन में कमी आती है। खुले में इसे फेंकने से यह चूहों और मक्खियों के लिए प्रजनन स्थल का कार्य करता है। इसका निपटारा सैनिटरी लैंडफिल्स के माध्यम से भी किया जाता है। इन लैंडफिल्स से रसायनों के रिसाव का खतरा है जिससे कि भौम जल संसाधन प्रदूषित हो जाते हैं। खासकर महानगरों में कचरा इतना अधिक होने लगता है कि ये स्थल भी भर जाते हैं। इन सब का मात्र एक हल है कि पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति हम सभी को अधिक संवेदनशील होना चाहिए।

प्रश्न 10.
दिल्ली में वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए क्या प्रयास किए गए? क्या दिल्ली में वायु की गुणवत्ता में सुधार हुआ?
उत्तर
वाहनों की संख्या काफी अधिक होने के कारण दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर देश में सबसे अधिक है। दिल्ली में वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं –

  1. सभी सरकारी वाहनों यानि बसों में डीजल के स्थान पर सम्पीड़ित प्राकृतिक गैस (सी०एन०जी) का प्रयोग किया जाए।
  2. वर्ष 2002 के अन्त तक दिल्ली की सभी बसों को सी०एन०जी० में परिवर्तित कर दिया जाए।
  3. पुरानी गाड़ियों की धीरे-धीरे हटा लिया जाए।
  4. सीसा रहित पेट्रोल या डीजल का प्रयोग किया जाए।
  5. कम गंधक (सल्फर) युक्त पेट्रोल या डीजल का प्रयोग किया जाए।
  6. वाहनों में उत्प्रेरक परिवर्तकों का प्रयोग किया जाए।
  7. वाहनों के लिए यूरो- II मानक अनिवार्य कर दिया जाए।

दिल्ली में किए गए इन प्रयासों के कारण वायु की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। एक आकलन के अनुसार सन् 1997 – 2005 ई० तक दिल्ली में CO और SO2 के स्तर में काफी गिरावट आई है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित के बारे में संक्षेप में चर्चा करें –
(क) ग्रीनहाउस गैस
(ख) उत्प्रेरक परिवर्तक
(ग) पराबैंगनी-बी।
उत्तर
(क) ग्रीनहाउस गैसें (Green House Gases) – कार्बन-डाई-ऑक्साइड, मीथेन, जलवाष्प, नाइट्रसऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन को ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है।

ग्रीनहाउस गैसों के स्तर में वृद्धि के कारण पृथ्वी की सतह का ताप काफी बढ़ जाता है जिसके कारण विश्वव्यापी उष्णता होती है। इन गैसों के कारण ही ग्रीनहाउस प्रभाव पड़ते हैं। ग्रीनहाउस प्रभाव प्राकृतिक रूप से होने वाली परिघटना है जिसके कारण पृथ्वी की सतह और वायुमण्डल गर्म हो जाता है। पृथ्वी का तापमान सीमा से अधिक बढ़ने पर ध्रुवीय हिमटोप के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ने तथा बाढ़ आने की सम्भावना बढ़ जाती है। आने वाली शताब्दी में पृथ्वी का तापमान 0.6°C तक बढ़ जाएगा। औद्योगिक विकास, जनसंख्या वृद्धि एवं वृक्षों की निरन्तर हो रही कमी से वायुमण्डल में CO2 की मात्रा 0.03% से बढ़कर 0.04% हो गई है। अगर यही क्रम जारी रहा तो बहुत सारे द्वीप एवं समुद्री तटों पर बसे शहर समुद्र में समा जाएँगे।

(ख) उत्प्रेरक परिवर्तक (Catalytic Converter) – इसमें कीमती धातु, प्लेटिनम-पैलेडियम और रोडियम लगे होते हैं जो उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। ये परिवर्तक स्वचालित वाहनों में लगे होते हैं जो विषैली गैसों के उत्सर्जन को कम करते हैं। जैसे ही निर्वात उत्प्रेरक परिवर्तक से होकर गुजरता है अग्ध हाइड्रोकार्बन डाइऑक्साइड और जल में बदल जाता है तथा कार्बन मोनोऑक्साइड एवं नाइट्रिक ऑक्साइड क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड एवं नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित हो जाता है। उत्प्रेरक परिवर्तक युक्त मोटर वाहनों में सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग करना चाहिए क्योंकि सीसा युक्त पेट्रोल उत्प्रेरक को अक्रिय कर देता है।

(ग) पराबैंगनी-बी (Ultraviolet-B) – यह DNA को क्षतिग्रस्त करता और उत्परिवर्तन को बढ़ाता है। इससे कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और विविध प्रकार के त्वचा कैंसर उत्पन्न होते हैं। हमारे आँख का स्वच्छमंडल (कॉर्निया) UV- बी विकिरण का अवशोषण करता है। इसकी उच्च मात्रा के कारण कॉर्निया का शोथ हो जाता है, जिसे हिम अंधता, मोतियाबिन्द आदि कहा जाता है। इस प्रकार पराबैंगनी किरणें सजीवों के लिए बेहद हानिकारक हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्राथमिक प्रदूषक है? (2015)
(क) SO2
(ख) CO
(ग) NO2
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
भोपाल गैस त्रासदी किस गैस से हुई थी? (2017)
(क) मेथिल आइसोसायनेट
(ख) एथिल आइसोसायनेट
(ग) मेथेन
(घ) SOx एवं NOx
उत्तर
(क) मेथिल आइसोसायनेट

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सी वायु प्रदूषक गैस है और अम्लीय वर्षा बनाती है? (2011, 12, 14)
(क) सल्फर डाइऑक्साइड
(ख) ऑक्सीजन
(ग) नाइट्रोजन
(घ) हाइड्रोजन
उत्तर
(क) सल्फर डाइऑक्साइड

प्रश्न 4.
ताजमहल को किसके प्रभाव से खतरा बना हुआ है? (2017)
(क) क्लोरीन
(ख) SO2
(ग) ऑक्सीजन
(घ) हाइड्रोजन
उत्तर
(ख) SO2

प्रश्न 5.
यदि किसी जलकाय में लगातार प्रदूषक पदार्थ गिरेंगे तो उसका – (2017)
(क) BOD बढ़ जायेगा
(ख) BOD घट जायेगा
(ग) सभी पौधे मृत हो जायेंगे।
(घ) जन्तु मर जायेंगे परन्तु पौधे जीवित रहेंगे
उत्तर
(क) BOD बढ़ जायेगा।

प्रश्न 6.
यदि वातावरण में CO2 की सान्द्रता लगातार बढ़ती है, तो इसका वातावरण में क्या प्रभाव होगा? (2017)
(क) ओजोन अपक्षरण
(ख) ग्रीनहाउस प्रभाव
(ग) प्रकाश श्वसन का बढ़ना
(घ) घुटन होना
उत्तर
(ख) ग्रीनहाउस प्रभाव

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रदूषण की परिभाषा लिखिए। (2015)
उत्तर
यह जल, वायु तथा थल में होने वाला वह भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तन है जिसके कारण इन स्थानों पर उपस्थित जीवों के जीवन में हानिकारक परिवर्तन आने लगते हैं और इन जीवों का जीवन संकट में आ जाता है।

प्रश्न 2.
प्रदूषक से आप क्या समझते हैं। पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले मुख्य प्रदूषकों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
प्रदूषक – पर्यावरण प्रदूषण उत्पन्न करने वाले पदार्थों को प्रदूषक कहते हैं। पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले मुख्य प्रदूषक ईंधन का जलना, यातायात, रासायनिक क्रियायें, धातु कर्म आदि हैं।

प्रश्न 3.
द्वितीयक वायु प्रदूषक किसे कहते हैं? (2017)
उत्तर
कुछ प्रदूषक वातावरण में आने पर अन्य पदार्थों से क्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों के रूप में अनेक प्रकार के विषैले पदार्थ बना लेते हैं जो स्वास्थ्य पर गम्भीर तथा हानिकारक प्रभाव डालते हैं। जैसे स्मॉग, PAN, ओजोन, ऐल्डिहाइड आदि।

प्रश्न 4.
प्रदूषण उत्पन्न करने में कीटाणुनाशक पदार्थों की भूमिका का वर्णन कीजिए। (2009)
उत्तर
विभिन्न प्रकार के कीटाणुनाशक तथा पीड़कनाशक रसायन मृदा के सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देते हैं। इससे विभिन्न पदार्थों का अपघटन रुक जाता है और मृदा की उर्वरता प्रभावित होती है। ये पदार्थ खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्य में पहुँच कर उन्हें भी हानि पहुँचाते हैं।

प्रश्न 5.
जीवाश्म ईंधन के जलने से जो सामान्य वायु प्रदूषक गैसें उत्पादित होती हैं, उनके नाम बताइए। (2009, 10)
या
किन्हीं दो वायु प्रदूषक गैसों के नाम बताइए। (2010, 14, 16)
उत्तर
SO2, SO3, NO2, CO2 तथा अदग्ध हाइड्रोकार्बन्स।

प्रश्न 6.
स्वचालित वाहनों से शहरी वायुमण्डल क्यों प्रदूषित हो जाता है? (2013)
उत्तर
स्वचालित वाहनों में जीवाश्म ईंधन के दहन के फलस्वरूप हानिकारक गैसें; जैसे- CO2, CO, SO2, NO2, आदि उत्सर्जित होती हैं जिससे वायुमण्डल प्रदूषित हो जाता है।

प्रश्न 7.
स्वचालित वाहन निर्वातक के अतिविषालु धातु प्रदूषक का नाम बताइए। (2010)
उत्तर
स्वचालित वाहन निर्वातक में प्राय: सीसा (Pb = lead) धातु अतिविषालु प्रदूषक होता है।

प्रश्न 8.
अम्ल वर्षा के लिए उत्तरदायी दो मुख्य अम्लों के नाम लिखिए। (2015, 17)
उत्तर

  1. सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) तथा
  2. नाइट्रिक अम्ल (HNO3)।

प्रश्न 9.
ग्रीन हाउस गैसों के चार प्रमुख स्रोतों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर

  1. CO2 – औद्योगीकरण से
  2. मेथेन – खदानों, तेल शोधन कारखानों एवं धान के खेतों से।
  3. CFCs – रेफ्रिजरेटर एवं एयर-कण्डिशनर निर्माण में प्रयुक्त होने वाली गैस से।
  4. नाइट्रस ऑक्साइड – नाइट्रोजनी खादों के प्रयोग से।

प्रश्न 10.
वायुमण्डल के किस भाग में सामान्यतः ओजोन पाया जाता है? (2013)
उत्तर
ओजोन वायुमण्डल के समतापमण्डल भाग में पाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोपाल गैस त्रासदी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2016)
उत्तर
भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) – 3 दिसम्बर, 1984 की मध्यरात्रि में भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कम्पनी के कारखाने के एक संयन्त्र से दुर्घटनावश निकली गैसों के कारण अनेक लोगों की सोते हुए अकारण ही मृत्यु हो गयी तथा बहुत से लोग कई अन्य असाध्य बीमारियों के शिकार हो गये। यह घटना ‘भोपाल गैस त्रासदी’ (Bhopal gas tragedy) के नाम से जानी जाती है। इस कारखाने में मिथाइल आइसो सायनेट (M.I.C.) जैसी विषैली गैस (जिसका उपयोग सीवान नामक कीटनाशक उत्पाद बनाने में किया जाता था) के रिसाव से लगभग 2 हजार व्यक्तियों की जाने गईं तथा हजारों लोग आँख और श्वास के गम्भीर रोगों के शिकार हुए। यह भी अनुमान है कि इस संयन्त्र से निकली गैसों में M.I.C. के साथ एक और बहुत ही विषैली गैस ‘फॉस्जीन’ (phosgene) भी थी।

प्रश्न 2.
अम्लीय वर्षा पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012, 13, 14, 16, 17, 18)
उत्तर
अम्लीय वर्षा
प्राकृतिक ईंधनों के जलने से, अनेक पदार्थों के ऑक्साइड विशेषकर गन्धक, नाइट्रोजन आदि के जल वाष्प के साथ मिलकर अम्ल बना लेते हैं; जैसे

  1. SO2 से SO3 तथा H2SO4, इसी प्रकार
  2. नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO2) से HNO3 आदि बन जाते हैं।

जब ये अम्ल अधिक आर्द्रता में जल के साथ वर्षा के रूप में गिरते हैं, इसे अम्लीय वर्षा (acid rain) कहते हैं।

अम्लीय वर्षा से हानियाँ – अम्लीय वर्षा से जल तथा मृदा की अम्लीयता (acidity) बढ़ती है अतः मृदा की उर्वरता (fertility) कम हो जाती है। साथ ही पेड़-पौधों की पत्तियों को हानि पहुँचती है। जिससे प्रकाश संश्लेषण की गति मन्द पड़ जाती है। इस प्रकार अम्लीय वर्षा विभिन्न प्रकार से हमारी सम्पत्ति को नष्ट करती है। उदाहरण के लिए यह-इमारतों, रेल-पटरियों, स्मारकों, ऐतिहासिक इमारतों, विभिन्न पदार्थों से बनी मूर्तियों तथा अन्य सामान को नष्ट करने वाली होती है।

प्रश्न 3.
जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग पर टिप्पणी लिखिए। (2014, 15, 16, 17)
उत्तर
जैव- रासायनिक ऑक्सीजन माँग (Biochemical Oxygen Demand = BOD) जल में कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों की अधिकता से उनके विघटन की दर व ऑक्सीजन की खपत बढ़ जाती है, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन (dissolve Oxygen =DO) की मात्रा कम हो जाती है। ऑक्सीजन की आवश्यकता का सीधा सम्बन्ध जल में कार्बनिक पदार्थों की बढ़ती मात्रा से है। इसे जैव-रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BiochemicalOxygen Demand =BOD) के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। BOD, ऑक्सीजन की उस मात्रा का मापन है जो जल के एक नमूने में वायवीय जैविक अपघटकों (aerobic decomposers) द्वारा जैव क्षयकारी (biodegradable) कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिए आवश्यक है। घर की गन्दी नाली से निकले गन्दे जल की BOD value 200 – 400 ppm ऑक्सीजन (एक लीटर गन्दे जल के लिये) होती है। औद्योगिक संस्थानों से निकले कचरे के कारण BOD का मान 2500 ppm तक हो जाता है। पीने के स्वच्छ जल की BOD 1 ppm से कम होनी चाहिये।

प्रश्न 4.
रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट प्रबन्धन पर टिप्पणी लिखिए। (2014)
उत्तर
रेडियोऐक्टिव अपशिष्टों को नष्ट करने के लिए सबसे सरल एवं उचित उपाय यह है कि इन अपशिष्टों को भूमि में लगभग 500 मीटर या और अधिक गहराई में गाड़ दिया जाये परन्तु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वह स्थान जहाँ पर अपशिष्ट को गाड़ा जा रहा हो मानव आबादी से बहुत दूर हो।
परमाणु परीक्षण को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो ये परीक्षण भूमि के नीचे गहराई में किये जाने चाहिए।

प्रश्न 5.
ग्रीन हाउस प्रभाव पर टिप्पणी लिखिए। (2010, 11, 12, 13, 14, 16, 18)
उत्तर
वायु प्रदूषण का पृथ्वी के तापक्रम पर प्रभाव
ग्रीन हाउस प्रभाव वायुमण्डल के सामान्य संगठन तथा पर्यावरण के सामान्य अवस्था में होने पर सूर्य की किरणों से गर्म होने वाली पृथ्वी अधिकतर ऊष्मा को वापस लौटा देती है जो बाह्य वायुमण्डल (exosphere) व अन्तरिक्ष में वापस विसरित हो जाती है। इस प्रकार पृथ्वी का जीवमण्डल क्षेत्र ऊष्मा से बचा रहता है। किन्तु पिछले कुछ दशकों से पर्यावरण में कुछ गैसों; विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड आदि की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी पर तापमान बढ़ने लगा है।

पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से बनी हुई परत ग्रीन हाउस के शीशे की परत के समान कार्य करती है अर्थात् यह सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने देने के लिए तो पारदर्शक (transparent) होती है परन्तु पृथ्वी से गर्म वायु जब ऊपर उठती है तो यह उसके लिए अपारदर्शक (opaque) दीवार का काम करती है, फलस्वरूप पृथ्वी का तापक्रम बढ़ जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड का यही प्रभाव ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) कहलाता है। अन्य गैसें; जैसे- क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (CFCs), नाइट्रोजन के ऑक्साइड; जैसे- (NO2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), अमोनिया (NH3), मेथेन (CH4) आदि भी इसी प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करने में सहायक होती हैं।

ग्रीन हाउस प्रभाव के प्रभाव
ग्रीन हाउस प्रभाव त्वचा (skin) तथा फेफड़ों (lungs) के रोगों में वृद्धि करने में सहायक है। इसके अन्य भयंकर प्रभावों में ताप के कारण पर्वतीय चोटियों तथा धुवों (poles) पर बर्फ के पिघलने से समुद्र तल में वृद्धि, तटीय भूमि (coastal land) तथा नगरों आदि के पानी में डूबने की सम्भावना में अत्यधिक वृद्धि होती जाती है।

ग्रीन हाउस प्रभाव से पृथ्वी का ताप बढ़ने अर्थात् भूमण्डलीय ऊष्मायन (global warming) के अतिरिक्त पर्यावरण विभिन्न प्रकार से प्रभावित होता है। इससे पौधों में वाष्पोत्सर्जन में वृद्धि, वर्षा (rainfall) में वृद्धि, किन्तु मृदा नमी (soil moisture) का ह्रास होता है।

प्रश्न 6.
‘पृथ्वी ऊष्मायन पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए। (2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15)
या
वैश्विक तापन अथवा भूमण्डलीय ऊष्मायन के कारण और उसे कम करने के उपाय बताइए। (2015, 17)
उत्तर
पृथ्वी ऊष्मायन या भूमण्डलीय ऊष्मायन
ग्रीन हाउस गैसों (green house gases) के द्वारा उत्पन्न ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) ही पृथ्वी ऊष्मायन (global warming) का कारण है। पृथ्वी पर पहुँचने वाली प्रकाशीय ऊर्जा को तो ये गैसें क्षोभमण्डल में आने में कोई बाधा नहीं डालतीं किन्तु ऊष्मा के रूप में जब यह ऊर्जा वापस विकरित होती है तो उसके कुछ भाग को वायुमण्डल में ही रोके रखती हैं अथवा ये ऊष्मारोधी गैसें पृथ्वी से विसरित होकर आयी ऊष्मा का कुछ भाग अवशोषित कर लेती हैं एवं पुनः धरातल को वापस कर देती हैं। इस प्रक्रिया में वायुमण्डल के निचले भाग में अतिरिक्त ऊष्मा एकत्रित हो जाती है। विगत कुछ वर्षों से मानवीय क्रिया-कलापों के कारण इन ऊष्मारोधी गैसों की मात्रा वायुमण्डल में बढ़ जाने के कारण वायुमण्डल के औसत ताप में वृद्धि हो गयी है। इस प्रकार पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोतरी को पृथ्वी ऊष्मायन या भूमण्डलीय ऊष्मायन या विश्व तापन (global warming) कहते हैं।

विश्व मौसम संगठन के अनुसार भूतल का औसत तापमान पिछली शताब्दी के पूरा होते-होते लगभग 0.60° सेल्सियस तक बढ़ा है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से 1910 से 1945 ई० और 1976 से 2000 ई० के मध्य हुई है।

इस प्रकार लगभग सम्पूर्ण विश्व में 90 का दशक सबसे गर्म दशक और 1961 ई० के बाद क्रमशः 1980,81, 83, 86 एवं 1988 ई० का वर्ष सबसे गर्म वर्ष रहा है। इस दशक तक तुलनात्मक रूप में समुद्री जल का ताप भी बढ़ा है।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से उत्पन्न संकट सम्पूर्ण विश्व के लिए भयंकरतम समस्या है। इसके दुष्प्रभाव तथा दुष्परिणाम पृथ्वी पर उपस्थित जीवन के लिए ही खतरा सिद्ध हो सकते हैं। इस सबका परिणाम है। कि ऊँचे स्थानों पर अधिक वर्षा होने लगी है और उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में वर्षा में कमी आयी है।

पिछली शताब्दी में समुद्री जल स्तर में 15 से 20 सेमी तक बढ़ोतरी हुई है। विश्व के कुछ स्थानों में ग्लेशियर (glaciers) का कुछ नीचे हो जाना भी वायुमण्डल के तापमान में वृद्धि का संकेत है। ग्लोबल वार्मिंग का सबसे भयंकर दुष्परिणाम पर्यावरण में जलवायु तथा मौसम परिवर्तन के रूप में। प्रकट होता है। जैसे-जैसे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो रही है इस प्रकार के परिवर्तन के परिणाम सामने आ भी रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में, लगभग 20 वर्ष पूर्व जहाँ हिमपात होता था, उन स्थानों पर हिमपात होना बन्द हो गया है अथवा इतनी कम मात्रा में होने लगा है कि उसका कोई लाभ नहीं रह गया है।

इस प्रकार के परिवर्तनों के कारण प्रतिवर्ष विभिन्न मौसमों में आकस्मिक तापमान की वृद्धि या कमी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं; जैसे-तूफान, चक्रवात, अतिवृष्टि, सूखा आदि के रूप में सामने आ रही है। 1990 से 2100 ई० तक पृथ्वी के तापमान में वर्तमान गति से 5° सेल्सियस तक बढ़ जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इस प्रकार की तापमान में वृद्धि से वर्षा के प्रारूप में अत्यधिक परिवर्तन आएँगे विशेषकर निचले अक्षांशों (latitudes) पर वर्षा में अधिक कमी हो सकती है। फलस्वरूप सूखा, बाढ़ जैसी आपदाओं में वृद्धि हो सकती है। बढ़ती गर्मी और मानसून की अनिश्चितता से कटिबन्धीय क्षेत्रों में पैदावार में कमी आ सकती है।

संयुक्त राष्ट्र ने अपने पर्यावरण कार्यक्रम में उल्लेख कियां है; आज मानवता के समक्ष भूमण्डलीय ऊष्मायन (ग्लोबल वार्मिंग) सबसे भयावह खतरा है। इसके लिए मनुष्य की आर्थिक विकास की गतिविधियाँ उत्तरदायी हैं। ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव सम्पूर्ण पारिस्थितिक तन्त्र (ecological setup) पर पड़ता है। इससे जीवमण्डल का कोई भी अंश प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है; परिणामस्वरूप पर्वतों से बर्फ पिघलेगी, बाढ़े आयेंगी, समुद्री जल स्तर बढ़ेगा, स्वास्थ्य सम्बन्धी विपदाएँ बढ़ेगी, असमय मौसमी बदलाव होंगे तथा जलवायु में भयंकर परिवर्तनों को बढ़ावा मिलेगा।

एक अध्ययन के अनुसार प्रति 1° सेल्सियस तापमान की वृद्धि से दक्षिण-पूर्वी एशिया में चावल का उत्पादन 5 प्रतिशत कम हो जाएगा।
उपर्युक्त के अतिरिक्त अन्य अनेक दुष्परिणाम; जैसे- अनावृष्टि, अतिवृष्टि आदि की सम्भावनाओं का बढ़ना, विभिन्न प्रकार के रोगों में वृद्धि, क्षोभमण्डल (troposphere) के बाहरी भाग में उपस्थित पृथ्वी के रक्षा कवच अर्थात् ओजोनमण्डल (ozonosphere) अथवा ओजोन परत (ozone layer) की मोटाई में कमी होने की सम्भावना आदि है।

ओजोन परत के क्षीण होने से पृथ्वी पर पराबैंगनी किरणों के प्रभाव में वृद्धि हो जाएगी जिससे त्वचा कैन्सर, मोतियाबिन्द आदि रोगों में वृद्धि होती है, शरीर का प्रतिरोधी तन्त्र हासित होता है, सूक्ष्म जीव; विशेषकर पादपप्लवकों (phytoplanktons) के नष्ट होने से जलीय पारिस्थितिक तन्त्र पूर्णत: नष्ट हो जायेंगे।

भूमण्डलीय ऊष्मायन को कम करने के उपाय पृथ्वी ऊष्मायन (ग्लोबल वार्मिंग) को रोकने के लिए मानवीय क्रिया-कलापों पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है जिनसे ग्रीन हाउस गैसों; जैसे- कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), मेथेन (CH4), क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (CFCs), हैलोजन्स (हैलोकार्बन्स Clx, Fx, Brx) आदि की वृद्धि को रोकने में सहायता मिल सकती है।

प्रश्न 7.
ओजोन परत को हानि पहुँचाने वाले प्रदूषकों का विवरण दीजिए। पृथ्वी पर जीवन के लिए ओजोन परत का क्या महत्त्व है? (2011, 12)
या
ओजोन क्षरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012, 14)
या
ओजोन परत पर एक विवरण लिखिए। (2015, 16)
उत्तर
ओजोन परत
ओजोन परत (ozone layer) जिसे ओजोन मण्डल (ozonosphere) भी कहते हैं, समतापमण्डल के निचले तथा क्षोभमण्डल के ऊपरी (बाहरी) भाग में स्थित है। यह भाग 15 से 30 किमी ओजोन गैस (O3) की एक मोटी परत होती है। यह गैस ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनी हुई होती है। इसमें एक विशेष प्रकार की तीखी गंध होती है तथा इसका रंग नीला होता है। ओजोन सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों प्रमुखतः पराबैंगनी किरणों (ultraviolet rays) को पृथ्वी पर आने से रोककर पृथ्वी और उसके जीवधारियों के सुरक्षा कवच (protection shield) के रूप में कार्य करती है।

ओजोन परत को हानि
वायु प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार के प्रदूषक ओजोन परत या ओजोनमण्डल (ozonosphere) को हानि पहुँचा सकते हैं। उदाहरण के लिए समतापमण्डल में क्लोरीन गैस के पहुंचने से ओजोन की मात्रा में कमी आ जाती है।
क्लोरीन का एक परमाणु 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर देता है। ये क्लोरीन परमाणु क्लोरोफ्लोरोकार्बन (chloroflorocarbon = CFCs) के विघटन से बनते हैं। इनकी रासायनिक क्रिया इस प्रकार है –
Cl + O3 → ClO + O2
ClO + O – Cl + O2

फ्रेऑन (freon) सबसे अधिक घातक क्लोरोफ्लोरोकार्बन है, इसका प्रयोग प्रशीतन (रेफ्रिजरेशन) वातानुकूलन, गद्देदार सीट या सोफों में प्रयुक्त फोम, अग्निशामक प्लास्टिक, ऐरोसॉल स्प्रे आदि में होता है। उद्योगों में CFCs का उत्पादन लगातार होता है। इस प्रकार अत्यधिक औद्योगीकरण, 15 किमी से अधिक ऊँचाई पर उड़ने वाले जेट विमान, परमाणु बमों के विस्फोट आदि से निकली विषैली गैसे जिसमें क्लोरीन यौगिक तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड्स होते हैं, ज्वालामुखी विस्फोट से निकली हाइड्रोजन क्लोराइड तथा फ्लोराइड आदि गैसें ओजोन परत के अवक्षय के लिए जिम्मेदार हैं। इन सभी विषैली गैसों के कारण ओजोन परत की मोटाई लगातार घटती जा रही है और उसमें जगह-जगह पर छिद्र हो रहे हैं।

ओजोन परत का महत्त्व
सूर्य से प्राप्त पराबैंगनी किरणों, जिन्हें ओजोन परत रोकती है, से सीधा सम्पर्क मनुष्य, अन्य जीव- जन्तु, वनस्पति आदि में रोग प्रतिरोधक क्षमता का अवक्षय करता है। मनुष्य में त्वचा का कैन्सर, आँखों में मोतियाबिन्द, अन्धापन आदि रोगों की वृद्धि होती है। समुद्री तथा स्थलीय जीव-जन्तु, कृषि, उपज, वनस्पति एवं खाद्य पदार्थों पर भी इन पराबैंगनी किरणों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनसे भूपृष्ठीय तापमान बढ़ने से विश्वतापन या पृथ्वी ऊष्मायन (global warming) का खतरा है। इससे जलवायु परिवर्तित हो जायेगी अर्थात् ओजोन परत पृथ्वी एवं उसके समस्त जीवधारियों की जीवन सुरक्षा में प्रकृति का अनुपम उपहार है और इसमें कमी (या ओजोन छिद्र) पृथ्वी के पर्यावरण के लिए भयंकर तबाही ला सकता है।

प्रश्न 8.
वनोन्मूलन के कारण क्या हैं और इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है? (2015)
या
वनोन्मूलन क्या है? इसके मुख्य कारण लिखिए। (2015)
उत्तर
वनोन्मूलन – वन क्षेत्र को वन रहित क्षेत्र में परिवर्तित करने की प्रक्रिया वनोन्मूलन कहलाती है।
वनोन्मूलन के कारण
वनोन्मूलन के प्रमुख कारण निम्नवत् हैं –

  1. मानव जनसंख्या का बढ़ना जिससे भवन निर्माण, रेलवे लाइन, सड़कों, इमारतों, शैक्षिक संस्थाओं, उद्योगों आदि को स्थापित करने के लिए भूमि की माँग बढ़ी है।
  2. दावानल (forest fire) के अवसर बढ़ना। दावानल बड़े वृक्षों के साथ-साथ छोटे पौधों और यहाँ तक कि बीजों और अनेक जन्तुओं को भी भस्म कर देती है।
  3. मानव क्रियाओं के कारण जलवायु में परिवर्तन के फलस्वरूप सूखा, तूफान, वर्षा आने के कारण वनों का विनाश हुआ है।
  4. पशुओं के अत्यधिक चारण से, जिससे बड़े पौधों के साथ-साथ छोटे पौधे भी नष्ट हो जाते हैं। तथा मृदा अपरदन भी होता है।

वनोन्मूलन का नियंत्रण
वनोन्मूलन के नियंत्रण के कुछ उपाय निम्नवत् हैं –

  1. चारण समस्या को नियन्त्रित करना।
  2. वन रहित भूमि पर वनारोपण करना।
  3. संरक्षित वन, आरक्षित वन या अन्य वन्य भूमि सहित सभी प्रकार के वनों का संरक्षण करना।
  4. कृषि एवं आधिपत्य के स्थानान्तरण को नियन्त्रित करना।
  5. वनों में केन्द्रीय सरकार की पूर्वानुमति से अवन्य क्रियाओं की अनुमति मिलना।
  6. ऐसे स्थानों पर जहाँ मृदा अपरदन की अधिक सम्भावना है वनोन्मूलन को रोकना।
  7. वनवासियों के पास ईंधन, चारा, वास्तु सामग्री आदि गौण स्रोतों की पहुँच होनी चाहिए जिससे कि वे पेड़ न काटें।
  8. कार्यकारी योजनाओं का वैज्ञानिक अनुसन्धान पर आधारित पर्यावरणीय सार्थक कार्य योजनाओं में रूपान्तरण।
  9. मानवों की सहकारी समिति द्वारा प्रबन्धित गाँव के चारों ओर समुदाय वन लगाना।
  10. खड़े वनों की सुरक्षा करमा।
  11. वृक्षारोपण के कार्य में आम जनता और ऐच्छिक एजेन्सियों को सम्बद्ध करना।

प्रश्न 9.
वन संरक्षण तथा चिपको आंदोलन से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर
मानव एवं अन्य जीवों के समुचित विकास एवं वृद्धि के लिए वन संरक्षण आवश्यक है। इसके लिए सभी लोगों की भागीदारी होनी चाहिए। अगर वन-क्षेत्र के आस-पास के लोग इसे बचाने के लिए सजग रहेंगे तो वर्तमान पीढ़ी की जरूरत पूरी होगी एवं भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति की क्षमता भी बनी रहेगी। भारत में वन संरक्षण में लोगों की भागीदारी सदियों से रही है।

चिपको आन्दोलन (Chipko Movement) – चिपको आन्दोलन डॉ० सुन्दरलाल बहुगुणा की अगुवाई में शुरु हुआ। सन् 1974 में हिमालय के गढ़वाल में जय ठेकेदारों द्वारा वृक्षों को काटने की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो इन्हें बचाने के लिए स्थानीय महिलाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया। वे वृक्षों से चिपकी रहीं एवं वृक्षों को काटे जाने से रोकने में सफल रहीं। इसी प्रयास ने आन्दोलन का रूप लिया एवं चिपको आन्दोलन के रूप में विश्वविख्यात हुआ।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके कारणों तथा इसका नियन्त्रण करने के उपयुक्त उपायों का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर
प्रदूषण
[संकेत-अतिलघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के उत्तर का अध्ययन करें]

प्रदूषण के कारण
प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –
1. वाहितमल (Sewage) – नगरपालिकाओं में भूमिगत नालियों के द्वारा बस्तियों से निकला। मल-मूत्र प्रायः नदी, बड़े तालाबों अथवा झीलों में डाल दिया जाता है। मूत्र में यूरिया होता है। जिसके जलीय-अपघटन द्वारा अमोनिया उत्पन्न होती है। गन्दी नालियों में उपस्थित अन्य नाइट्रोजन यौगिकों के अपघटन से भी अमोनिया उत्पन्न होती रहती है। इस प्रकार जल प्रदूषित हो जाता है और इससे दुर्गन्ध फैलती है। इस प्रकार का जल पीने योग्य नहीं रहता और न ही ऐसे जल का प्रयोग नहाने-धोने के लिए किया जा सकता है, क्योंकि ऐसे जल में नहाने से बहुत से चर्मरोग हो जाते हैं।

2. घरेलू अपमार्जक (Household Detergents) – घरेलू अपमार्जक ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं। जो दुग्धशाला व भोज्य सामग्री में उपयोगी दूसरे सामान, मकानों, अस्पतालों की सफाई तथा नहाने-धोने के काम आते हैं। इनमें बहुत से विभिन्न प्रकार के साबुन, सर्फ, टाइड (tide), फैब (fab) इत्यादि हैं। ये पदार्थ नालियों इत्यादि के द्वारा नदियों, तालाबों, झीलों, इत्यादि में चले। जाते हैं। अपमार्जकों के कार्बनिक पदार्थों का पूर्णरूप से ऑक्सीकरण न हो पाने के कारण कार्बन डाइऑक्साइड, ऐल्कोहॉल, कार्बनिक अम्ल उत्पन्न हो जाते हैं जो जल का प्रदूषण करते हैं और जलीय प्राणियों को हानि पहुँचाते हैं।

3. कीटाणुनाशक पदार्थ (Pesticides) – ये पदार्थ चूहे, कीड़े-मकोड़े, जीवाणुओं, कवकों आदि को मारने के लिए खेतों, उद्यानों, गन्दी नालियों और पौधों पर छिड़के जाते हैं। ये पदार्थ ठोस, द्रव तथा गैस के रूप में होते हैं। डी०डी०टी० (DDT) सफेद रंग का पदार्थ है जो चीटियों, मक्खियों, कीड़े-मकोड़ों तथा मच्छरों को मारने के काम आता है। सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) एक रंगहीन गैस के रूप में मकानों को कीटाणुविहीन करने के लिए प्रयोग में आती है। इसी प्रकार फॉर्मेल्डिहाइड, क्लोरीन, क्रियोसोल, कार्बोलिक अम्ल, फिनाइल, पोटेशियम परमैंगनेट इत्यादि बहुत से कीटाणुओं को मारने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। चूने को, मकानों में, सफेदी के रूप में तथा गन्दी नालियों में पाए जाने वाले कीड़े-मकोड़ों को मारने के लिए प्रयोग किया जाता है। चूने में क्लोरीन गैस को मिलाकर ब्लीचिंग पाउडर बनाया जाता है। यह कुओं तथा जल संग्रहालयों का जल शुद्ध करने के काम आता है।

इन रासायनिक पदार्थों से हमें जितना लाभ होता है उससे कहीं अधिक हानि होती है, जैसे- अनेक जन्तुओं की मृत्यु उन पौधों तथा छोटे कीड़ों के खाने से हो जाती है, जिन पर ये दवाइयाँ छिड़की गई हों। मच्छर इत्यादि मारने के लिए ये पदार्थ हवाई जहाज द्वारा छिड़के जाते हैं जिससे अनेक पौधे व मछलियाँ इत्यादि मर जाती हैं। कीटनाशी दवाइयों के छिड़कने से भूमि में रहने वाले कीड़े, केंचुए तथा कवक, इत्यादि भी मर जाते हैं जिससे मृदा की उर्वरता नष्ट हो जाती है। कीटनाशी रासायनिक पदार्थ के प्रयोग से कभी-कभी सन्तान पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

4. खरपतवारनाशी पदार्थ (Weedicides) – 2,4-D एवं 2,4,5-T तथा दूसरे पदार्थ जिनका प्रयोग खेतों में उत्पन्न खरपतवार (weeds) को नष्ट करने के लिए किया जाता है, मिट्टी में मिलकर भूमि प्रदूषण करते हैं।

5. धुआँ (Smoke) – औद्योगिक चिमनियों, घरों में ईंधन के जलाने तथा स्वचालित वाहनों, जैसे- मोटरकार तथा रेल के इंजन, इत्यादि से धुआँ निकलकर वायु प्रदूषण करता है। धुएँ में कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल की वाष्प मुख्य रूप से होती है। इसके साथ ही कार्बन मोनॉक्साइड, अन्य कार्बनिक यौगिक तथा नाइट्रोजन के यौगिक भी होते हैं। वातावरण में इनकी मात्रा बढ़ जाने पर वायु प्रदूषित हो जाती है, श्वसन में कठिनाई होती है तथा आँखों पर बुरा प्रभाव

6. स्वतः चल-निर्वातक (Automobile Exhaust) – जेट विमान, ट्रैक्टर, मोटरकार, स्कूटर इत्यादि में पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, इत्यादि के जलने से हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं। जो वायु प्रदूषण करती हैं। वायुमण्डल में आने वाली कार्बन डाइऑक्साइड की लगभग 20 प्रतिशत मात्रा मोटर वाहन इंजनों में गैसोलिन के जलने से आती है।

7. औद्योगिक उच्छिष्ट (Chemical Discharge from Industries) – औद्योगिक उच्छिष्टों के जल में मिलने से उसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और उसमें क्लोराइड, नाइट्रेट तथा
सल्फेट आदि की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। कारखानों से निकले अपशिष्ट पदार्थ नदियों में डाले जाने के कारण हमारे देश की अधिकांश नदियों का जल प्रदूषित होता जा रहा है। इन पदार्थों का विषैला प्रभाव मछलियों आदि जलीय जन्तुओं तथा जलीय पौधों के लिए हानिकारक होता है। सीसे (lead), जस्ते (zinc), ताँबे (copper) तथा लौह (iron) के यौगिक जल में मिलकर विशेष रूप से उसका प्रदूषण करते हैं।

विद्युत् उत्पादन के लिए ऊष्मीय शक्ति संयन्त्र (thermal power plant) में कोयले का अधिक मात्रा में दहन होता है। प्रति तीन टन कोयले का दहन करने के लिए आठ टन ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जिसके कारण वायुमण्डल की ऑक्सीजन धीरे-धीरे कम हो रही है। एक सुपर ऊष्मीय संयन्त्र (thermal plant) 100 टन सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) प्रतिदिन उत्पन्न कर रहा है जो कि प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।

8. कूड़े-करकट तथा लाशों का सड़ना (Decay and Putrefaction of Household Waste and Dead Bodies) – विभिन्न जन्तुओं की मृत्यु के बाद बहुत से जीवाणुओं द्वारा उनकी लाशों का अपघटन किया जाता है, इस प्रक्रिया में सड़न उत्पन्न होती है। मृत जन्तुओं की प्रोटीन के अपघटन से उत्पन्न अमोनिया इत्यादि दुर्गन्धमय पदार्थों से वायु प्रदूषित होती है। इसी प्रकार विभिन्न जीवाणुओं द्वारा कूड़े के ढेर का अपघटन करने पर उत्पन्न अनेक दुर्गन्धमय पदार्थ एवं । दूषित गैसें भी वायु को प्रदूषित करती हैं।

9. रेडियोधर्मी प्रबन्धन (Radioactive Management) – अणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध होना चाहिए, इनका प्रयोग केवल मानव कल्याण हेतु होना चाहिए। विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों, चिकित्सीय उपकरणों (रेडियोधर्मी) तथा अन्य सभी अपशिष्ट पदार्थों जिनमें कुछ भी रेडियोधर्मिता है को बस्ती से दूर भूमि में गहराई में दबा देना चाहिए।

10.जैविक प्रदूषक (Bio-Pollutants) – कुछ रोग; जैसे-दमा, जुकाम, एक्जीमा तथा त्वचा सम्बन्धी अन्य दूसरे रोग कुछ जैविकों के कारण होते हैं, जैसेकि कुछ कवकों के बीजाणु (fungal spores), जीवाणु (bacteria) तथा कुछ उच्च वर्ग के पौधों के परागकण (pollen grains), जैसे-कीकर (Acacid), शहतूत (Mulberry), अरण्डी (Ricinus), पार्थेनियम (carrot grass) एवं चिलबिल (Holopteleg)।

प्रदूषण का नियन्त्रण
नगरपालिका वाहितमल (sewage) के जल में शहरों एवं कस्बों से निकली गन्दगी, कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ तथा मानव-मल में उपस्थित बहुत से जीवाणु होते हैं जो रोग फैला सकते हैं। बस्ती के समस्त वाहितमल का एक ही निष्कासन स्थान होना उचित है जो नदी के उस भाग में खुलता हो जो शहर की आबादी के बाहर आता है, यदि बस्ती के पास नदी नहीं हो तब निष्कासन बस्ती से दूर किसी ऐसी झील, तालाब, इत्यादि में किया जा सकता है जिसका जल मनुष्य व उसके पशुओं के काम न आता हो, यदि बस्ती के बाहर काफी मात्रा में खाली भूमि हो तो वहाँ भी गन्दा जल निकाला जा सकता है जिससे कुछ जल जलवाष्प के रूप में उड़ जाता है तथा कुछ भूमिगत हो जाता है।

नदी, तालाब, झीलों में डाले जाने वाले मल-मूत्र से उनके जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे वहाँ रहने वाली मछलियों के मरने की सम्भावना रहती है, जिस कारण यह आवश्यक हो जाता है कि वाहितमल (sewage) को जल में डालने से पूर्व उसे शुद्ध किया जाए। प्रदूषण नियन्त्रण के कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –

1. वाहितमल शुद्धिकरण (Sewage Treatment) – वाहितमल के शुद्धिकरण में पहले गन्दगी को विशेष छन्नों द्वारा छानकर अलग किया जाता है फिर गन्दगी को नीचे बैठने दिया जाता है। (settling)। इस क्रिया से अकार्बनिक पदार्थ एवं कुछ कार्बनिक पदार्थ पृथक् हो जाते हैं तथा शेष कार्बनिक पदार्थ निलम्बित (suspended) और घुली अवस्था में रह जाते हैं। इन पदार्थों का खनिजीकरण (mineralization) किया जाता है जिससे यह पदार्थ अकार्बनिक पदार्थों में परिवर्तित हो जाते हैं। इसमें ऑक्सीजन कृत्रिम विधियों द्वारा जल में प्रविष्ट की जाती है या इसे ऑक्सीजन की अधिकता वाले टैंक में पहुँचाया जाता है जिसमें ऑक्सीय जीवाणु होते हैं। यहाँ से कुछ घण्टे बाद स्लज अन्तिम टैंक में जाता है, जहाँ पर अनॉक्सीय दशाओं में स्लज का विघटन होता है। इस क्रिया में मेथेन गैस मुक्त होती है। यह गैस, पूरा उपकरण चलाने में ईंधन के रूप में प्रयुक्त होती है।

कभी-कभी इस प्रक्रिया में बहुत से हरे शैवालों में उत्पन्न ऑक्सीजन का प्रयोग किया जाता है। यह ऑक्सीजन हरे शैवालों द्वारा प्रकाश-संश्लेषण क्रिया में उत्पन्न होती है। गन्दे जल में प्रायः वे सभी तत्व उपस्थित होते हैं जिनकी शैवालों को अपनी वृद्धि के लिए आवश्यकता होती है, जैसे-कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर, पोटैशियम, इत्यादि, परन्तु ये पदार्थ गन्दे जल में जटिल कार्बनिक पदार्थों के यौगिकों के रूप में उपस्थित रहते हैं। शैवालों द्वारा प्रयोग में लाए जाने के लिए इन पदार्थों में CO2, NH3, SO4, NO3, PO3 के अतिरिक्त ऑक्सीजन का होना आवश्यक है। यह कार्य शैवालों तथा जीवाणुओं की सहजीविता द्वारा किया जाता है। शैवाल जीवाणुओं के लिए ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं तथा जीवाणु इस ऑक्सीजन का प्रयोग करके जटिल पदार्थों से अकार्बनिक पदार्थ बनाते हैं जो शैवालों द्वारा प्रयोग किए जाते हैं।

वाहितमल की गन्दगी का शैवालों द्वारा शुद्धिकरण एक विशेष प्रकार के खुले तालाबों में किया जाता है। ऐसे तालाबों को ऑक्सीकरण ताल (Oxidation ponds) अथवा निरीक्षण ताल (stabilization ponds) कहते हैं। वाहितमल के गन्दे जल को तालाब में एक स्थान पर प्रविष्ट और दूसरी ओर से निष्कासित किया जाता है।

2. घरेलू अपमार्जकों (household detergents) को भी वाहितमल की तरह नदियों, झीलों तथा तालाबों में डाला जाना चाहिए। यह कार्य शहर की आबादी वाले क्षेत्र से आगे की ओर के भागों में किया जाना चाहिए। जिस तालाब अथवा झील का जल पशुओं आदि के पीने के काम आता है उसमें कपड़े व गन्दी वस्तुएँ नहीं धोनी चाहिए। इसी प्रकार जिन खेतों में कीटनाशक पदार्थ और खरपतवारनाशक छिड़के गए हों, उनमें से बहने वाले जल को पीने के जलाशयों में नहीं जाने देना चाहिए। उद्योग-धन्धों से निष्कासित बहुत से रासायनिक पदार्थों को भी पीने के जलाशयों तथा खेतों में न डालकर ऐसे तालाबों व झीलों में डाला जाना चाहिए जिनमें मछलियाँ इत्यादि न हों।

3. रेडियोधर्मी विकिरण के प्रभाव से बचने के लिए परमाणु विस्फोट को कम अथवा पूर्णरूप से रोका जाना चाहिए। रेडियोधर्मी व्यर्थ पदार्थों का निपटान एक गम्भीर समस्या है और अब तक समुद्र ही इसके लिए उपयुक्त स्थान समझा जाता है। विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, चिकित्सीय उपकरणों (रेडियोधर्मी) तथा अन्य सभी ऐसे अपशिष्ट पदार्थों जिनमें कुछ भी रेडियोधर्मिता है, को कंकरीट टैंकों में बन्द करके बस्ती से दूर भूमि में गहराई में दबा देना चाहिए।

4. रहने के लिए मकान सड़कों से कुछ दूरी पर बनाए जाने चाहिए जिससे स्वत: चल-निर्वातकों से निकले धुएँ और धूल का मानव जीवन पर दुष्प्रभाव न पड़े।

5. घरों से निकले गोबर को बस्ती से बाहर कम्पोस्ट गड्ढों (compost pits) में डाला जाना चाहिए जिससे उसके ढेर पर मक्खी इत्यादि को प्रजनन के लिए उपयुक्त स्थान न मिल पाए और इससे बदबू भी उत्पन्न न हो। इस प्रकार से गोबर से अच्छी खाद बन सकती है। गोबर से गोबर गैस संयन्त्र (gobar gas plant) द्वारा गोबर गैस उत्पन्न की जानी चाहिए, जो घरों में ईंधन के रूप में प्रयोग की जा सके। इस विधि में एक बड़े सिलेण्डर (cylinder) में एक ओर 30 सेमी का एक छिद्र होता है जो एक ढक्कन से बन्द रहता है। सिलेण्डर का 3/4 भाग भूमिगत रखा जाता है। छिद्र के द्वारा गोबर और कुछ जल समय-समय पर सिलेण्डर में डाला जाता है। एक-दूसरे छिद्र के द्वारा 2 – 5 सेमी की एक नली सिलेण्डर से रसोई के चूल्हे तक ले जाई जाती है। गोबर में किण्वन (fermentation) से उत्पन्न गैस ईंधन का कार्य करती है।

6. मृत जन्तुओं तथा मकानों के कूड़े-करकट को बस्ती से दूर गड्ढ़ों में रखकर मिट्टी से ढक देना चाहिए।

7. स्वचालित वाहनों (automobiles) में उत्प्रेरक संपरिवर्तक (catalytic converter) का प्रयोग वायुमण्डलीय प्रदूषण (atmospheric pollution) को कम करने के लिए किया जाता है। इस विधि में स्वचालित वाहनों (automobiles) के इंजन से निकलने वाली गैसों को उत्प्रेरक संपरिवर्तक (catalytic converter) में रखे विषमांगी उत्प्रेरक (heterogenous catalyst) के ऊपर से प्रवाहित किया जाता है।

उत्प्रेरक संपरिवर्तक (catalytic converter) में विषमांगी उत्प्रेरक (heterogenous catalyst) के रूप में प्लैटिनम (platinum), पैलेडियम (palladium) एवं होडियम (rhodium) धातुओं के साथ-साथ कॉपर ऑक्साइड (CuO) एवं क्रोमियम ऑक्साइड (Cr2O3) का भी प्रयोग करते हैं।

स्वचालित वाहनों (automobiles) में उत्प्रेरक संपरिवर्तक (catalytic converter) का प्रयोग करते समय सीसा रहित पेट्रोल (unleaded petrol) का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि सीसायुक्त पेट्रोल (leaded petrol) उत्प्रेरक संपरिवर्तक में रखे विषमांगी उत्प्रेरकों (heterogenous catalyst) के लिए विष (poison) का कार्य करता है और उत्प्रेरक संपरिवर्तक की कार्य क्षमता को समाप्त कर देता है।

प्रश्न 2.
वायु प्रदूषण क्या होता है? वायु प्रदूषण के कारणों एवं मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए। वायु प्रदूषण के नियन्त्रण के उपायों का उल्लेख कीजिए। (2010,11,14,16)
या
वायु प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? विभिन्न प्रकार के वायु प्रदूषकों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वातावरण पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों की विवेचना कीजिए। (2010)
या
‘वायु प्रदूषक’ पर टिप्पणी लिखिए। (2015, 17)
उत्तर
वायु प्रदूषण
वायु में विभिन्न प्रकार की गैसें पाई जाती हैं; जैसे- O2 (21%), N2 (78%), आर्गन (1% से कम), CO2 (0.03%) आदि। वायु में किसी भी गैस की मात्रा सन्तुलित अनुपात से अधिक होना अथवा कम होना अथवा अन्य किसी पदार्थ का समावेश वायु प्रदूषण (air pollution) कहलाता है और इस प्रकार की वायु श्वसन के योग्य नहीं रहती। सभी जीव श्वसन में कार्बन डाइऑक्साइड निकालते तथा ऑक्सीजन लेते हैं, किन्तु हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कर ऑक्सीजन वायु में छोड़ते हैं। इस प्रकार इन दोनों गैसों का अनुपात सन्तुलित रहता है। मनुष्य अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ करके इस सन्तुलन को बिगाड़ता है। एक ओर वह वनों इत्यादि को अनियोजित प्रकार से काट डालता है तो दूसरी ओर कल-कारखाने, औद्योगिक संस्थान आदि चलाकर वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को बढ़ाता है, साथ ही नाइट्रोजन, सल्फर आदि अनेक तत्त्वों के ऑक्साइड्स इत्यादि वायुमण्डल में डाल देता है।

वायु प्रदूषक
सामान्यत: दो प्रकार के कारक वायु में प्रदूषक (pollutants) उत्पन्न करने में सहायक हैं। ये हैं, मनुष्य की बढ़ती जनसंख्या (population) तथा बढ़ती हुई उत्पादकता (productivity) जिसमें कृषि प्रक्रियाएँ, ऊर्जा उत्पादन प्रमुखत: परमाणु ऊर्जा तथा अन्य वैज्ञानिक क्रियाएँ सम्मिलित हैं। वायुमण्डल को प्रदूषित करने वाले अनेक स्रोत (sources) इन प्रदूषकों (pollutants) को इन्हीं दो कारकों के आधार पर उत्पन्न करते हैं। सारणी देखिए।

वायु प्रदूषण के स्रोत तथा उनसे उत्पन्न होने वाले प्रदूषक
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वायु प्रदूषण के परिणाम या जन-जीवन पर प्रभाव
वायु प्रदूषण से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं। कुछ भयंकर रोग भी वायु प्रदूषण के द्वारा ही होते हैं –
1. वायु में उपस्थित मिट्टी, धूल के कण, परागकण, बीजाणु आदि श्वास के रोग, जैसे- दमा (asthma), फेफड़ों का कैन्सर, एलर्जी आदि उत्पन्न करते हैं तथा वायुमण्डल को भी दूषित करते हैं।

2. कोयला तथा पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से निकली गैसें मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि फेफड़ों में पहुँचकर नमी से अभिक्रिया कर अम्ल बनाती हैं, जो श्वसन तन्त्र में घाव कर देते हैं। नाइट्रोजन के ऑक्साइड फेफड़ों, हृदय तथा आँखों के रोग पैदा करते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड रुधिर में मिलकर ऑक्सीजन के वाहक हीमोग्लोबिन से अभिक्रिया करके ऑक्सीजन संवहन के कार्य को प्रभावित करती है तथा थकावट व मानसिक विकार पैदा करती है।

3. वातावरण में फ्लुओराइड (fluoride) की मात्रा बढ़ने से पत्तियों के सिरों व किनारों के ऊतक नष्ट होने लगते हैं इस स्थिति को हरिमहीनता (chlorosis) या ऊतक क्षय (necrosis) कहते हैं। फलस्वरूप पत्तियाँ नष्ट होने लगती हैं, प्रकाश संश्लेषण रुक जाता है और ऑक्सीजन की उत्पत्ति पर प्रभाव पड़ता है।

4. कुछ प्रदूषक वातावरण में आने पर अन्य पदार्थों से क्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों (secondary pollutants) के रूप में अनेक प्रकार के विषैले पदार्थ बना लेते हैं जो स्वास्थ्य पर गम्भीर तथा हानिकारक प्रभाव डालते हैं; जैसे- स्वचालित निर्वातक में निकलने वाले अदग्ध हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड सूर्य के प्रकाश में प्रतिक्रिया करके प्रकाश संश्लेषी स्मॉग (photosynthetic smog) का निर्माण करते हैं। इनमें पैरॉक्सी ऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) तथा ओजोन होते हैं। इस प्रकार बनने वाले पदार्थ विषैले होते हैं। इनका प्रभाव विशेषकर आँखों तथा श्वसन पथ पर होता है तथा साँस लेने में कठिनाई हो जाती है। पौधों के लिए PAN अत्यधिक हानिकारक है तथा इसके प्रभाव से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है। दूसरी ओर ओजोन पत्तियों में श्वसन तेज कर देती है। इस प्रकार, भोजन की कमी से पौधे नष्ट हो जाते हैं।

5. विभिन्न प्रकार की धातुओं के कण घातक रोगों को जन्म देते हैं। ये सब विषैले होते हैं। सीसा (lead) तन्त्रिका तन्त्र तथा वृक्कों के रोगों को उत्पन्न करता है। कैडमियम रुधिर चाप बढ़ाता है। और हृदय तथा श्वसन सम्बन्धी रोगों का कारण है। लोहे तथा सिलिका के कण भी फेफड़ों की बीमारियाँ पैदा करते हैं।

6. फ्लुओराइड हड्डियों तथा दाँतों पर प्रभाव डालते हैं। इनसे पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं और पौधों की वृद्धि ठीक नहीं होती है।

पूर्ण या अपूर्ण दहन से उत्पन्न प्रदूषक तथा उनका स्वास्थ्य पर प्रभाव प्रदूषक
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जन्तुओं पर प्रभाव
उपर्युक्त के अनुसार, वायु प्रदूषक अन्य जन्तुओं पर भी अहितकर प्रभाव उत्पन्न करते हैं। पशुओं में फेफड़ों की अनेक बीमारियाँ, धूलकणों, सल्फर डाइऑक्साइड आदि से पैदा होती हैं। इसी प्रकार कार्बन मोनोऑक्साइड से पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है। गाय, बैल तथा भेड़े, फ्लुओरीन के प्रति अत्यधिक संवेदी हैं। फ्लुओरीन घास तथा अन्य चारों में एकत्रित हो जाती है। पशु जब इसको खाते हैं। तो ये पदार्थ उनके शरीर में पहुँचकर अस्थियों तथा दाँतों पर प्रभाव डालते हैं। कैडमियम श्वसन विष है, यह हृदय को हानि पहुँचाता है। सुअर वायु प्रदूषण से कम प्रभावित होता है।

पौधों पर प्रभाव
वायु प्रदूषण का पौधों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सामान्यत: वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों की परतें होने के कारण सूर्य के प्रकाश की पौधों तक पहुँच कम हो जाने से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कमी आती है। धूल तथा अन्य कण पत्तियों पर जमकर उनकी कार्यिकी पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। उनमें श्वसन, प्रकाश संश्लेषण तथा वाष्पोत्सर्जन क्रिया की दर घट जाती है। सल्फर डाइऑक्साइड पत्तियों में क्लोरोफिल (chlorophyll) को नष्ट कर देती है। ओजोन की उपस्थिति से श्वसन तेज हो जाता है, भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाती अतः पौधे की मृत्यु हो सकती है। इसी प्रकार, विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म कण; जैसे- सीसा, कैडमियम, फ्लुओराइड, ऐस्बेस्टस आदि वृद्धि रोकने वाले, ऊतकों को नष्ट करने वाले आदि प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इनके प्रभाव से पत्तियाँ आंशिक रूप से अथवा पूर्ण रूप से झुलस (जलना) जाती हैं।

अन्य आर्थिक प्रभाव
सल्फर डाइऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड आदि से बने अम्ल; जैसे-सल्फ्यूरिक अम्ल, कार्बनिक अम्ल हमारी इमारतों, वस्त्रों आदि पर अत्यन्त हानिकारक प्रभाव डालते हैं। भवनों पर सीसे (lead) का रोगन हाइड्रोजन सल्फाइड के प्रभाव से काला पड़ जाता है। सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स आदि भवनों का संक्षारण भी करते हैं। मथुरा के तेल शोधक कारखाने से निकली हुई गैसें, कहते हैं कि विश्व प्रसिद्ध आगरा के ताजमहल के संगमरमर को काफी हानि पहुँचा रही हैं। इसी प्रकार, दिल्ली के लाल किले के पत्थरों को थर्मल विद्युत गृह से निकली गैसों ने काफी हानि पहुँचायी है।

ओजोन कवच पर प्रभाव
ओजोन कवच जो पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहरी भाग में, क्षोभ मण्डल (troposphere) जिसमें हम रहते हैं, के बाहर व समताप मण्डल (stratosphere) के भीतरी परत के रूप में है तथा समताप मण्डल का ही भाग मानी जाता है, 15 से 30 किमी ओजोन गैस (O3) की मोटी परत के रूप में स्थित है, पृथ्वी की सुरक्षा विशेषकर सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (ultraviolet) किरणों आदि से करता है। वायु प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार के प्रदूषक इस परत को हानि पहुँचा सकते हैं। उदाहरण के लिए समताप मण्डल में क्लोरीन गैस के पहुंचने से ओजोन की मात्रा में कमी आ जाती है। क्लोरीन का एक परमाणु, 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर देता है।

सूर्य से प्राप्त पराबैंगनी किरणों, जिन्हें ओजोन परत रोकती है, से सीधा सम्पर्क मनुष्य, अन्य जीव-जन्तु, वनस्पति आदि में रोग प्रतिरोधक क्षमता का अवक्षय करता है। मनुष्य में त्वचा का कैन्सर, आँखों में मोतियाबिन्द, अन्धापन आदि रोगों की वृद्धि होती है। समुद्री तथा स्थलीय जीव-जन्तु, कृषि उपज, वनस्पति एवं खाद्य पदार्थों पर भी इन पराबैंगनी किरणों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनसे भूपृष्ठीय तापमान बढ़ने से विश्वतापन (global warming) का खतरा है जिससे जलवायु परिवर्तित हो जायेगी।

वायु प्रदूषण की रोकथाम (नियन्त्रण)
मनुष्य ने विभिन्न प्रकार से वायु को सामान्य से अधिक दूषित करना प्रारम्भ कर दिया है। उद्योगों एवं अन्य कारणों से हमारा वायुमण्डल बहुत अधिक दूषित हो रहा है। इस स्थिति में वायुमण्डल को कृत्रिम रूप से प्रदूषण-रहित करने की भी आवश्यकता को अनुभव किया जाने लगा है। वायु को शुद्ध रखने के लिए निम्नलिखित कृत्रिम साधनों को मुख्य रूप से अपनाया जाता है –

  1. आवासों को बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उनमें हवा एवं सूर्य के प्रकाश के आने-जाने की व्यवस्था ठीक रहे तथा उन्हें सड़कों इत्यादि से दूर बनाना चाहिए।
  2. जहाँ कोयला, लकड़ी आदि जलायी जाती है वहाँ से धुआँ निकलने के लिए ऊँची चिमनी आदि की व्यवस्था होनी चाहिये, ताकि धुआँ एवं दूषित गैसें घर के अन्दर एकत्रित न हो पायें।
  3. यदि पशु पालने हों तो उन्हें आवास से दूर ही रखना चाहिये। इनके गोबर इत्यादि को गोबर गैस आदि बनाने में उपयोग में लाना चाहिये।
  4. आबादी क्षेत्रों में काफी संख्या में पेड़-पौधे लगाने चाहिये ये वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को कम करते हैं तथा ऑक्सीजन को बढ़ाते हैं जिससे वायुमण्डल स्वच्छ होता है।
  5. भूमि खाली नहीं छोड़नी चाहिये, धूल उड़कर वायु को दूषित करती है।
  6. औद्योगिक संस्थानों तथा फैक्ट्रियों को आबादी से दूर बनाना चाहिये। इनमें छन्ने लगाये जाने चाहिए तथा धुआँ निकालने वाली चिमनियाँ काफी ऊँची होनी चाहिये जिससे दूषित गैसें काफी दूर ऊँचाई पर वायुमण्डल में चली जाये।
  7. जहाँ अधिक वाहन चलते हैं वहाँ की सड़कें पक्की होनी चाहिये। चूँकि कच्ची सड़कों से धूल उड़ती है।
  8. वनों आदि को सुरक्षित तथा संवर्धित करना आवश्यक है। इन्हें नष्ट होने से बचाना तथा नये वन लगाने चाहिए। यदि वृक्षों को काटना ही आवश्यक हो तो वांछित संख्या में नये पेड़ लगाकर क्षतिपूर्ति पहले ही कर लेनी आवश्यक है।

प्रश्न 3.
जल-प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? यह कितने प्रकार का होता है? जल-प्रदूषण के कारणों तथा मानव-स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव की विवेचना कीजिए। जल-प्रदूषण के नियन्त्रण के उपायों का उल्लेख कीजिए। (2011, 14, 17)
या
नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के समुचित उपाय लिखिए। (2014)
या
क्या कारण है कि औद्योगिक इकाइयों के पास बहने वाली नदियों का जल पीने योग्य नहीं होता है? (2014)
या
गंगा जल प्रदूषण के प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए और इसके नियन्त्रण के उचित उपाय भी लिखिए। (2015, 18)
या
घरेलू अपमार्जक पर टिप्पणी लिखिए। (2017)
उत्तर
जल प्रदूषण
जल पौधों एवं जन्तुओं दोनों के लिए ही अति आवश्यक है। पेड़-पौधे भूमि से जड़ों की सहायता से जल प्राप्त करते हैं, जबकि जन्तु इसे विभिन्न जल स्रोतों से पीते हैं।

जल में होने वाला ऐसा भौतिक तथा रासायनिक या तापीय परिवर्तन जिसके कारण जल जहरीला (poisonous) हो जाता है तथा यह फिर पौधों तथा जन्तुओं के लिए उपयोगी नहीं रहता है, जल प्रदूषण (water pollution) कहलाता है।

जल प्रदूषण के विभिन्न स्रोत या प्रकार

  1. वाहित मल
  2. घरेलू अपमार्जक
  3. कृषि उद्योग के प्रदूषक
  4. औद्योगिक रसायन
  5. रेडियोधर्मी पदार्थ
  6. तापीय प्रदूषण।

1. वाहित मल (Sewage) – नगरों से निकले विभिन्न अपशिष्ट पदार्थ; जैसे- मल-मूत्र, कूड़ा-करकटे आदि नालियों-नालों द्वारा बड़े तालाबों, झीलों तथा नदियों में डाल दिया जाता है जिससे इन जल स्रोतों में अपघटन की क्रिया आदि सामान्य रूप से बढ़ जाती है, इससे जले स्रोतों में दुर्गन्ध फैलने लगती है। अब ऐसा जल पीने योग्य नहीं रह जाता क्योंकि इसमें विभिन्न हानिकारक प्रदूषक मिले हुए होते हैं जो जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसा जल नहाने योग्य भी नहीं रहता है क्योंकि ऐसे प्रदूषित जल में नहाने पर विभिन्न प्रकार के चर्म रोगों के होने का खतरा रहता है। डॉॉफ्नया (Dophnia) तथा ट्राउट (Trout) आदि मछलियाँ जल प्रदूषण के प्रति संवेदनशील होती हैं।

2. घरेलू अपमार्जक (Household Detergents) – घरों में साफ-सफाई के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले रासायनिक पदार्थ; जैसे- विभिन्न प्रकार के सर्फ एवं साबुन आदि आते हैं, घरेलू अपमार्जक (household detergents) कहलाते हैं। इन सभी पदार्थों को घरों से नालियों में बहा दिया जाता है जिससे शैवालों की संख्या में तीव्र वृद्धि होने लगती है। जब इन शैवालों की मृत्यु होती है तो इनके अपघटन के लिए इन्हें फिर तालाबों, झीलों आदि में पहुँचाया जाता है। अपमार्जकों के जल में जमा हो जाने के कारण अधिक O2 की आवश्यकता पड़ती है, जिसके कारण अन्य जलीय जीवों के लिए O2 की मात्रा कम पड़ने लगती है जिससे जलीय जीवों की मृत्यु होने लगती है।

3. कृषि उद्योग के प्रदूषक (Agricultural Pollutants) – विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों; जैसे- 2-4D, 2-4-5 T, DDT, SO2 आर्गेनोक्लोरीन, आर्गेनोफास्फेट आदि का प्रयोग कृषि उद्योग में खरपतवारनाशी (weedicides), शाकनाशी (herbicides), कीटनाशी (insecticides), पेस्टीसाइड्स (pesticides), आदि के रूप में किया जाता है। ये पदार्थ खाद्य श्रृंखला (food chain) से होते हुए मनुष्य (सर्वाहारी) में संचित होते रहते हैं, जिससे मनुष्य में तरह-तरह की बीमारियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। मनुष्य में इस प्रकार के संचय को बायोमैग्नीफिकेशन (biomagnification) कहते हैं। यही रासायनिक पदार्थ जब नालियों तथा नालों द्वारा तालाबों या झीलों में पहुँचते हैं तो तालाब में उपस्थित जन्तुओं एवं पौधों दोनों को हानि पहुँचाते हैं और जल प्रदूषण (water pollution) करते हैं।

4. औद्योगिक रसायन (Industrial Chemicals) – विभिन्न उद्योगों द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्बनिक (organic) तथा अकार्बनिक (inorganic) प्रदूषकों (pollutants) को जल में मुक्त किया जाता है।

पारा, साइनाइड, रबर, रेशे, तेल, धूल, कोयला, अम्ल, क्षार, गर्म जल, कॉपर, जिंक, फिनोल, फेरस लवण (सल्फाइड तथा सल्फाइट), जस्ता, क्लोराइड आदि प्रमुख औद्योगिक प्रदूषक (industrial pollutants) हैं जो जल में मुक्त किये जाते हैं। जल में पहुँचकर ये जलीय वनस्पतियों तथा जन्तुओं को तरह-तरह से हानि पहुँचाते हैं।

सन् 1952 में जापान के मिनामाटा खाड़ी (Minamata bay) में पारे (30 -100 ppm तक) से प्रदूषित (infected) मछलियों को खाने से अनेक लोगों की मृत्यु हो गई थी। यही कारण है कि औद्योगिक इकाइयों के पास बहने वाली नदियों का जल पीने योग्य नहीं होता है।

5. रेडियोधर्मी पदार्थ (Radioactive Substances) – परमाणु केन्द्रों में होने वाले विभिन्न प्रयोगों के फलस्वरूप उत्पन्न विकिरण (radiation) जल में पहुँचकर जलीय जीवों में प्रतिकूल आनुवंशिक प्रभाव (hereditary effect) डालती हैं।

6. तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution) – ऊष्मीय शक्ति संयन्त्रों (thermal power plants) में कोयले की ऊष्मा का उपयोग करके विद्युत उत्पन्न की जाती है। यहाँ अपशिष्ट पदार्थ के रूप में गर्म जल (hot water) को नदी-नालों में बहा दिया जाता है, जहाँ पर पहुँचकर यह जलीय जन्तुओं एवं पौधों को हानि पहुँचाता है।

जल प्रदूषण की रोकथाम के उपाय
जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए –

  1. मानव आबादियों से उत्पन्न विभिन्न अपशिष्ट पदार्थों; जैसे- मल-मूत्र, कूड़ा-करकट आदि को जल में नहीं डालना चाहिए। इन्हें मानव बस्तियों से बाहर गड्ढों में दबा देना चाहिए।
  2. घरों से निकलने वाले गन्दे जल को एकत्रित कर संशोधन संयन्त्रों के पूर्ण उपचार के उपरान्त ही नदी या तालाबों में विसर्जित किया जाना चाहिए।
  3. पेट्रोलियम अवशिष्टों को नदी, नालों आदि में नहीं बहाना चाहिए।
  4. कृषि के लिए न्यूनतम मात्रा में रसायनों तथा जैविक खाद का उपयोग किया जाना चाहिए।
  5. जल के दुरुपयोग को रोकना चाहिए। इसके लिये समाज में जाग्रति पैदा करनी चाहिए।
  6. मृत जीवों को जल में नहीं बहाना चाहिए।
  7. फॉस्फोरस का अवक्षेपण कर उसे जलाशयों से हटा देना चाहिए।
  8. सेफ्टिक टैंक, ऑक्सीकरण तालाब तथा फिल्टर स्तर का प्रयोग कर कार्बनिक पदार्थों की मात्रा को कम किया जा सकता है।
  9. कारखानों द्वारा उत्पन्न गर्म जल को नदियों आदि में नही छोड़ना चाहिए, इससे जलीय जन्तु एवं वनस्पति नष्ट हो जाती है।

प्रश्न 4.
रेडियोधर्मी प्रदूषण क्या है? रेडियोधर्मी प्रदूषण फैलाने वाले किन्हीं दो रेडियोधर्मी पदार्थों के नाम लिखिए। (2015)
या
रेडियोधर्मी प्रदूषण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2016)
उत्तर
रेडियोधर्मी प्रदूषण
परमाणु शक्ति उत्पादन केन्द्रों और परमाणवीय परीक्षणों से जल, वायु तथा भूमि का प्रदूषण होता है जो आज की पीढ़ी के लिए ही नहीं वरन् आने वाली पीढ़ियों के लिए भी हानिकारक सिद्ध होता है। एक नाभिकीय विस्फोट (nuclear explosion) के द्वारा इलेक्ट्रॉन (electrons), प्रोटॉन (protons) के साथ-ही-साथ न्यूट्रॉन (neutrons) तथा α (ऐल्फा) एवं β (बीटा) कण प्रवाहित होते हैं जिनके कारण गुणसूत्रों (chromosomes) पर उपस्थित जीन्स (genes) में उत्परिवर्तन (mutations) उत्पन्न होते हैं जो आनुवंशिक होते हैं। नाभिकीय विस्फोट से विस्फोटन के स्थान पर तथा उसके आस-पास बहुत अधिक जीव हानि होती है और लम्बी अवधि में यह समस्त संसार के लिए भी हानिकारक होता है। इस प्रकार के विस्फोट से लन्दन, न्यूयॉर्क तथा दिल्ली जैसे बड़े शहर भी शीघ्र ही नष्ट किए जा सकते हैं तथा वैज्ञानिकों के पास अभी तक इससे बचाव के कोई साधन नहीं हैं।

प्रायः 16 किमी तक चारों ओर के स्थान में इससे सारी लकड़ी जल जाती है। विस्फोट के स्थान पर तापक्रम इतना अधिक हो जाता है कि धातु तक पिघल जाती हैं। एक विस्फोट के समय उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ वायुमण्डल की बाह्य परतों में प्रवेश कर जाते हैं, जहाँ पर वे ठण्डे होकर संघनित अवस्था में बूंदों का रूप ले लेते हैं और बाद में ठोस अवस्था में बहुत छोटे धूल के कणों के रूप में वायु में विसरित हो जाते हैं और वायु के झोंकों के साथ समस्त संसार में फैल जाते हैं। कुछ वर्षों के पश्चात् ये रेडियोधर्मी बादल धीरे-धीरे पृथ्वी पर बैठने लगते हैं। सभी नाभिकीय विस्फोटों के द्वारा प्राय: 5% रेडियोधर्मी स्ट्रॉन्शियम-90 (strontium-90) मुक्त होता है जिससे जल, वायु तथा भूमि का प्रदूषण होता है।

यह घास तथा शाकों में प्रवेश पा जाता है और इस प्रकार से यह गाय व दूसरे दूध देने वाले पशुओं के द्वारा तथा मांस के द्वारा मनुष्य के शरीर में प्रवेश पा जाता है, जहाँ पर यह हड्डियों में प्रवेश कर, कैन्सर तथा अन्य आनुवंशिक रोग उत्पन्न करता है। बच्चों को यह अधिक हानि पहुँचाता है। आयोडीन131 (Iodine131) थाइरॉइड को उत्तेजित करता है तथा लसिका गाँठों, रुधिर कणिकाओं व अस्थि मज्जा को नष्ट करके ट्यूमर (tumour) उत्पन्न करती है। द्वितीय महायुद्ध में 6 अगस्त सन् 1945 व 9 अगस्त सन् 1945 को क्रमशः नागासाकी तथा हिरोशिमा में हुए परमाणु बम के विस्फोट से लाखों मनुष्यों की मृत्यु के अतिरिक्त बहुत से लोग अपंग हो गए थे और बहुत से रोग उनकी सन्तति में भी उत्पन्न हुए।

पराबैंगनी (UV) किरणें DNA, RNA व प्रोटीनों को प्रभावित करती हैं। पराबैंगनी विकिरणों (UV radiations) के कारण जिरोडर्मा पिगमेण्टोसम (xeroderma pigmentosum) नामक त्वचा का रोग हो जाता है। सीजियम137 (Cs137) उपापचयिक क्रियाओं में बाधा उत्पन्न करता है।

26 अप्रैल सन् 1986 में रूस में चिरनोबिल (Chernobyl) स्थित परमाणु शक्ति केन्द्र से लगभग 1,35,000 व्यक्तियों को वहाँ से तुरन्त हटाया गया और 1.5 लाख को सन् 1991 तक हटाया गया। लगभग 6.5 लाख व्यक्ति इससे प्रभावित हुए हैं जिनमें कैन्सर, थाइरॉइड, मोतियाबिन्द तथा प्रतिरक्षा तन्त्र के क्षीण होने की सम्भावना है। मानवीय भूल के कारण घातक रेडियोधर्मी कण कई किलोमीटर वातावरण में प्रविष्ट हो गए थे जिसके कारण अनेक व्यक्ति हताहत हुए थे।

प्रश्न 5.
प्रदूषण क्या है? ध्वनि प्रदूषण का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर
प्रदूषण
[संकेत–अतिलघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के उत्तर का अध्ययन करें]

ध्वनि प्रदूषण
नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच (Robert Koch) ने शोर (noise) के सम्बन्ध में विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि “एक दिन ऐसा आएगा जब मनुष्य को स्वास्थ्य के सबसे बड़े शत्रु के रूप में निर्दयी शोर (noise) से संघर्ष करना पड़ेगा।” लगता है वह दुखद दिन अब निकट आ गया है। शोर (noise) की गिनती भी अब प्रदूषकों में होने लगी है।

अन्य प्रदूषकों (pollutants) के समाने शोर भी हमारी औद्योगिक प्रगति एवं आधुनिक सभ्यता का प्रतिफल (byproduct) है। अनेक प्रकार के वाहन, जैसे- मोटरकार, बस, जेट विमान, ट्रैक्टर, रेलवे इंजन, जेनरेटर, लाउडस्पीकर, टेलीविजन, रेडियो, बाजे एवं कारखानों के साइरन तथा मशीनों, आदि से ध्वनि प्रदूषण होता है। ध्वनि की लहरें जीवधारियों की उपापचय क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। अधिक तेज ध्वनि से मनुष्य की सुनने की शक्ति का ह्रास होता है और अधिक समय तक शोर में रहने से बहरापन (prebycusis) हो जाता है। शोर के कारण नींद ठीक प्रकार से नहीं आती जिससे नाड़ी-संस्थान सम्बन्धी एवं नींद न आने के रोग उत्पन्न हो जाते हैं, कभी-कभी तो पागलपन का रोग भी हो जाता है। कुछ ध्वनि छोटे-छोटे कीटाणुओं को नष्ट कर देती हैं जिस कारण बहुत से पदार्थों का प्राकृतिक रूप से अपघटन नहीं होता।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के चांसलर डॉ० वर्न नुडसन (Verm Knudson) मानते हैं कि धुएँ के समान ही शोर भी एक धीमी गति वाला मृत्यु दूत है।

ध्वनि की प्रबलता (intensity of noise), शोर की इकाई, डेसीबल (decibel dB) में मापी जाती है। 50 से 60 dB नींद में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए काफी है। 80 डेसीबल (dB) या इससे अधिक का शोर श्रवण-शक्ति को स्थायी हानि पहुँचाने में सक्षम होता है। सामान्य श्रवण-शक्ति वालों के लिए 25 – 30 डेसीबल की ध्वनि पर्याप्त होती है। 5 डेसीबल की ध्वनि अत्यन्त मन्द, 75 dB साधारण तेज, 95 dB अत्यन्त तेज और 120 dB से अधिक की ध्वनि तीव्र कष्टकारक होती है। ध्वनि प्रदूषण को कम करने का उपाय यही है कि हम अपने दैनिक जीवन में धीमी ध्वनि का प्रयोग करें अर्थात् त्योहारों, उत्सवों आदि पर लाउडस्पीकर, म्यूजिक सिस्टम इत्यादि का प्रयोग कम आवाज के साथ करें। वाहनों के हॉर्न अनावश्यक न बजायें। प्रेशर हॉर्न का प्रयोग न करें इत्यादि।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves (वैद्युत चुम्बकीय तरंगें) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves (वैद्युत चुम्बकीय तरंगें).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 8
Chapter Name Electromagnetic Waves (वैद्युत चुम्बकीय तरंगें)
Number of Questions Solved 42
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves (वैद्युत चुम्बकीय तरंगें)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
चित्र 8.1 में एक संधारित्र दर्शाया गया है जो 12 cm त्रिज्या की दो वृत्ताकार प्लेटों को 5.0 cm की दूरी पर रखकर बनाया गया है। संधारित्र को एक बाह्य स्रोत (जो चित्र में नहीं दर्शाया गया है) द्वारा आवेशित किया जा रहा है। आवेशकारी धारा नियत है और इसका मान 0.15 A है।
(a) धारिता एवं प्लेटों के बीच विभवान्तर परिवर्तन की दर का परिकलन कीजिए।
(b) प्लेटों के बीच विस्थापन धारा ज्ञात कीजिए।
(c) क्या किरचॉफ का प्रथम नियम संधारित्र की प्रत्येक प्लेट पर लागू होता है? स्पष्ट कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
हल-
दिया है, प्लेट की त्रिज्या r = 0.12 m, बीच की दूरी d = 0.05 m
आवेशन धारा i = 0.15 A
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves Q15
(c) हाँ, किरचॉफ का प्रथम नियम संधारित्र की प्रत्येक प्लेट पर भी लागू होता है, क्योंकि
प्लेट तक आने वाली चालन धारा = प्लेट से आगे जाने वाली विस्थापन धारा

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प्रश्न 2.
एक समान्तर प्लेट संधारित्र (चित्र 8.2), R = 6.0 cm त्रिज्या की दो वृत्ताकार प्लेटों से बना है। और इसकी धारिता C = 100 pF है। संधारित्र को 230V, 300 rad s-1 की (कोणीय) आवृत्ति के किसी स्रोत से जोड़ा गया है।
(a) चालन धारा का r.m.s. मान क्या है?
(b) क्या चालन धारा विस्थापन धारा के बराबर है?
(c) प्लेटों के बीच, अक्ष से 3.0 cm की दूरी पर स्थित बिन्दु पर B का आयाम ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
हल-
यहाँ R = 6.0 x 10-2 मी, C = 100 x 10-12 F = 10-10 F,
Vrms = 230 वोल्ट, w = 300 रे-से-1
(a) संधारित्र का धारितीय प्रतिघात
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves Q2.2
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 3.
10-10 m तरंगदैर्घ्य की X-किरणों, 6800 Å तरंगदैर्घ्य के प्रकाश तथा 500 m की रेडियो तरंगों के लिए किस भौतिक राशि का मान समान है?
हल-
X-किरणें, लाल प्रकाश तथा रेडियो तरंगें सभी वैद्युत-चुम्बकीय तरंगें हैं। अत: इन सभी की निर्वात् में चाल समान होगी जिसका मान c = 3.0 x 108 मी/से होता है।

प्रश्न 4.
एक समतल विद्युतचुम्बकीय तरंग निर्वात में z-अक्ष के अनुदिश चल रही है। इसके विद्युत तथा चुम्बकीय-क्षेत्रों के सदिश की दिशा के बारे में आप क्या कहेंगे? यदि तरंग की आवृत्ति 30 MHz हो तो उसकी तरंगदैर्घ्य कितनी होगी?
हल-
वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों में संचरण नियतांक (UPBoardSolutions.com) सदिश [latex s=2]\vec { K }[/latex], वैद्युत क्षेत्र सदिश [latex s=2]\vec { E }[/latex] तथा चुम्बकीय क्षेत्र सदिश [latex s=2]\vec { E }[/latex] दायें हाथ की निकाय बनाते हैं।

चूँकि संचरण सदिश [latex s=2]\vec { K }[/latex], Z- दिशा में हैं, वैद्युत क्षेत्र सदिश [latex s=2]\vec { E }[/latex], X-दिशा में तथा चुम्बकीय क्षेत्र सदिश [latex s=2]\vec { B }[/latex], Y- दिशा में होगा।
दिया है आवृत्ति, v = 30 MHz = 30 x 106 Hz
प्रकाश की चाल c = 3 x 108 ms-1
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 7 Alternating Current Q4

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प्रश्न 5.
एक रेडियो 7.5 MHz से 12 MHz बैंड के किसी स्टेशन से समस्वरित हो सकता है। संगत तरंगदैर्घ्य बैंड क्या होगा?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 6.
एक आवेशित कण अपनी माध्य साम्यावस्था के दोनों ओर 10 Hz आवृत्ति से दोलन करता है। दोलक द्वारा जनित विद्युतचुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति कितनी है?
हल-
हम जानते हैं कि त्वरित अथवा कम्पित आवेशित कण कम्पित विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है। यह विद्युत क्षेत्र, कम्पित चुम्बकीय-क्षेत्र उत्पन्न करता है। ये दोनों (UPBoardSolutions.com) क्षेत्र मिलकर वैद्युतचुम्बकीय तरंग उत्पन्न करते हैं; जिसकी आवृत्ति, कम्पित कण के दोलनों की आवृत्ति के बराबर होती है।
तरंगों की आवृत्ति v = 109 Hz

प्रश्न 7.
निर्वात में एक आवर्त विद्युतचुम्बकीय तरंग के चुम्बकीय-क्षेत्र वाले भाग का आयाम B0 = 510 nT है। तरंग के विद्युत क्षेत्र वाले भाग का आयाम क्या है?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 8.
कल्पना कीजिए कि एक विद्युतचुम्बकीय तरंग के विद्युत क्षेत्र का आयाम E0 = 120 N/C है तथा इसकी आवृत्ति v = 50.0 MHz है।
(a) B0, ω, k तथा λ ज्ञात कीजिए,
(b) E तथा B के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 7 Alternating Current Q8
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 9.
विद्युतचुम्बकीय स्पेक्ट्रम के विभिन्न भागों की पारिभाषिकी पाठ्यपुस्तक में दी गई है। सूत्र E = hν (विकिरण के एक क्वांटम की ऊर्जा के लिए : फोटॉन) का उपयोग कीजिए तथा em वर्णक्रम (विद्युतचुम्बकीय स्पेक्ट्रम) के विभिन्न भागों के लिए ev के मात्रक में फोटॉन की ऊर्जा निकालिए। फोटॉन ऊर्जा के जो विभिन्न परिमाण आप पाते हैं वे विद्युतचुम्बकीय विकिरण के स्रोतों से किस प्रकार सम्बन्धित हैं?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves Q9.1
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves Q9.3
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 10.
एक समतल em (विद्युतचुम्बकीय) तरंग में विद्युत क्षेत्र, 2.0 x 1010 Hz आवृत्ति तथा 48 Vm-1 आयाम से ज्यावक्रीय रूप से दोलन करता है।
(a) तरंग की तरंगदैर्घ्य कितनी है?
(b) दोलनशील चुम्बकीय-क्षेत्र का आयाम क्या है?
(c) यह दर्शाइए [latex s=2]\vec { E }[/latex] क्षेत्र का औसत ऊर्जा घनत्व, [latex s=2]\vec { B }[/latex] क्षेत्र के औसत ऊर्जा घनत्व के बराबर है।
(c = 3 x 108 ms-1)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves Q10.1

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 11.
कल्पना कीजिए कि निर्वात में एक विद्युतचुम्बकीय तरंग का विद्युत क्षेत्र
E = {(3.1 N/C) cos [(1.8 rad/m) y + (5.4 x 106 rad/s) t]} [latex s=2]\hat { i }[/latex] है।
(a) तरंग संचरण की दिशा क्या है?
(b) तरंगदैर्घ्य λ कितनी है?
(c) आवृत्ति v कितनी है?
(d) तरंग के चुम्बकीय-क्षेत्र सदिश का आयाम कितना है?
(e) तरंग के चुम्बकीय-क्षेत्र के लिए व्यंजक लिखिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 12.
100 W विद्युत बल्ब की शक्ति का लगभग 5% दृश्य विकिरण में बदल जाता है।
(a) बल्ब से 1 m की दूरी पर,
(b) 10 m की दूरी पर दृश्य विकिरण की औसत तीव्रता कितनी है? यह मानिए कि विकिरण समदैशिकतः उत्सर्जित होता है और परावर्तन की उपेक्षा कीजिए।
हल-
यहाँ दृश्य विकिरण की शक्ति P = 100 वाट का 5% = 100 x ([latex]\frac { 5 }{ 100 }[/latex]) वाट = 5 वाट
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 7 Alternating Current Q12

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प्रश्न 13.
em वर्णक्रम (विद्युतचुम्बकीय स्पेक्ट्रम) के विभिन्न भागों के लिए लाक्षणिक ताप परिसरों को ज्ञात करने के लिए λmT = 0.29 cm K सूत्र का उपयोग कीजिए। जो संख्याएँ आपको मिलती हैं वे क्या बतलाती हैं?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 14.
विद्युतचुम्बकीय विकिरण से सम्बन्धित नीचे कुछ प्रसिद्ध अंक, भौतिकी में किसी अन्य प्रसंग में विद्युतचुम्बकीय दिए गए हैं। स्पेक्ट्रम के उस भाग का उल्लेख कीजिए जिससे इनमें से प्रत्येक सम्बन्धित है।
(a) 21 cm (अन्तरातारकीय आकाश में परमाण्वीय हाइड्रोजन द्वारा उत्सर्जित तरंगदैर्घ्य)
(b) 1057 MHz (लैंब-विचलन नाम से प्रसिद्ध, हाइड्रोजन में, पास जाने वाले दो समीपस्थ ऊर्जा स्तरों से उत्पन्न विकिरण की आवृत्ति)
(c) 2.7 K (सम्पूर्ण अन्तरिक्ष को भरने वाले समदैशिक विकिरण से सम्बन्धित ताप-ऐसा विचार जो विश्व में बड़े धमाके ‘बिग बैंग के उद्भव का अवशेष माना जाता है।)
(d) 5890 Å – 5896 Å (सोडियम की द्विक रेखाएँ)
(e) 14.4 keV [57Fe नाभिक के एक विशिष्ट संक्रमण की ऊर्जा जो प्रसिद्ध उच्च विभेदन की स्पेक्ट्रमी विधि से सम्बन्धित है (मॉसबौर स्पेक्ट्रोस्कॉपी)]
हल-
(a) दी गई तरंगदैर्घ्य 10-2 m क्रम की है, जो लघु रेडियो तरंग क्षेत्र में पड़ती है।
(b) यह आवृत्ति 109 Hz की कोटि की है, जो लघु रेडियो तरंग क्षेत्र में पड़ती है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves Q14
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 15.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दीजिए

  1. लम्बी दूरी के रेडियो प्रेषित्र लघु-तरंग बैंड का उपयोग करते हैं। क्यों?
  2. लम्बी दूरी के TV प्रेषण के लिए उपग्रहों का उपयोग आवश्यक है। क्यों?
  3. प्रकाशीय तथा रेडियो दूरदर्शी पृथ्वी पर निर्मित किए जाते हैं किन्तु X-किरण खगोल विज्ञान का अध्ययन पृथ्वी का परिभ्रमण कर रहे उपग्रहों द्वारा ही सम्भव है। क्यों?
  4. समतापमण्डल के ऊपरी छोर पर छोटी-सी ओजोन की परत मानव जीवन के लिए निर्णायक है। क्यों?
  5. यदि पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं होता तो उसके धरातल का औसत ताप वर्तमान ताप से अधिक होता या कम?
  6. कुछ वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि पृथ्वी पर नाभिकीय विश्व युद्ध के बाद ‘प्रचण्ड नाभिकीय शीतकाल होगा जिसका पृथ्वी के जीवों पर विध्वंसकारी प्रभाव पड़ेगा। इस भविष्यवाणी का क्या आधार है?

उत्तर-

  1. ये तरंगें पृथ्वी के आयनमण्डल से परावर्तित होकर वापस पृथ्वी तल की ओर लौट आती हैं। और इसी कारण बिना ऊर्जा खोए पृथ्वी पर लम्बी दूरियाँ तय कर पाती हैं।
  2. बहुत लम्बी दूरी के सम्प्रेषण के लिए अति उच्च आवृत्ति की तरंगों की आवश्यकता होती है। आयनमण्डल इन तरंगों को पृथ्वी की ओर परावर्तित नहीं कर पाता। अत: ये तरंगें आयनमण्डल से पार निकल जाती हैं। इन्हें वापस पृथ्वी पर भेजने के लिए उपग्रह की आवश्यकता होती है।
  3. चूँकि पृथ्वी का वायुमण्डल X-किरणों को अवशोषित कर लेता है। अत: X-किरण खगोलविज्ञान का अध्ययन वायुमण्डल से ऊपर उपग्रहों द्वारा ही सम्भव है।
  4. यह ओजोन परत सूर्य से (UPBoardSolutions.com) पृथ्वी पर आने वाली मानव जीवन के लिए हानिकारक पराबैंगनी तरंगों को अवशोषित कर लेती है। अतः ओजोन परत, पृथ्वी पर मानव जीवन की सुरक्षा के लिए अति महत्त्वपूर्ण है।
  5. यदि पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं होता तो हरित गृह प्रभाव नहीं होता। इससे पृथ्वी का ताप वर्तमान ताप की तुलना में कम होता।
  6. प्रचण्ड नाभिकीय युद्ध के बाद पृथ्वी धूल तथा गैसों के विशाल बादल से घिर जाएगी जिसके कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाएगी ओर पृथ्वी बहुत अधिक ठण्डी हो जाएगी।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
[latex s=2]\frac { 1 }{ \sqrt { { \mu }_{ 0 }{ \varepsilon }_{ 0 } } }[/latex] का मात्रक है- (2016)
(i) न्यूटन/कूलॉम
(ii) वेबर/मी2
(iii) फैरड
(iv) मीटर/सेकण्ड
उत्तर-
(iv) मीटर/सेकण्ड

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प्रश्न 2.
यदि [latex s=2]\vec { E }[/latex] तथा [latex s=2]\vec { B }[/latex] वैद्युत-चुम्बकीय तरंग के क्रमशः वैद्युत वेक्टर तथा चुम्बकीय वेक्टर हों तब वैद्युत-चुम्बकीय तरंग के संचरण की दिशा अनुदिश होती है- (2015, 18)
(i) [latex s=2]\vec { E }[/latex]
(ii) [latex s=2]\vec { B }[/latex]
(iii) [latex s=2]\vec { E }[/latex] . [latex s=2]\vec { B }[/latex]
(iv) [latex s=2]\vec { E }[/latex] x [latex s=2]\vec { B }[/latex]
उत्तर-
(iv) [latex s=2]\vec { E }[/latex] x [latex s=2]\vec { B }[/latex]

प्रश्न 3.
किसी वैद्युत चुम्बकीय तरंग के वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्र होते हैं- (2016)
(i) परस्पर लम्बवत् तथा समान कला में
(ii) परस्पर समान्तर तथा समान कला में
(iii) परस्पर लम्बवत् तथा विपरीत कला में
(iv) परस्पर समान्तर तथा विपरीत कला में
उत्तर-
(i) परस्पर लम्बवत् तथा समान कला में

प्रश्न 4.
किसी विद्युत चुम्बकीय तरंग में वैद्युत क्षेत्र का आयाम 5 वोल्ट/मीटर है। चुम्बकीय क्षेत्र का आयाम है- (2017, 18)
(i) 5 टेस्ला
(ii) 1.67 x 10-8 टेस्ला
(iii) 1.5 x 10-8 टेस्ला
(iv) 1.67 x 10-10 टेस्ला
उत्तर-
(ii) 1.67 x 10-8 टेस्ला

प्रश्न 5.
वैद्युतशीलता ([latex s=2]{ \varepsilon }_{ 0 }[/latex]) तथा चुम्बकशीलता ([latex s=2]{ \mu }_{ 0 }[/latex]) के माध्यम में विद्युत चुम्बकीय तरंग का वेग होगा (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन विद्युत चुम्बकीय तरंगें नहीं हैं?
(i) गामा किरणे
(ii) एक्स किरणें
(iii) अवरक्त किरणे
(iv) बीटा किरणे
उत्तर-
(iv) बीटा किरणे

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में कौन-सा विद्युत-चुम्बकीय विकिरण है?
(i) α – किरणें
(ii) β – किरणे
(iii) X – किरणे
(iv) धनात्मक किरणे
उत्तर-
(iii) X – किरणे

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प्रश्न 8.
सबसे अधिक आवृत्ति की तरंग है-
(i) पराबैंगनी तरंगें।
(ii) गामा तरंगें
(iii) दृश्य प्रकाश तरंगें
(iv) रेडियो तरंगें
उत्तर-
(ii) गामा तरंगें

प्रश्न 9.
X-किरणें, γ – किरणें तथा सूक्ष्म-तरंगों के निर्वात में चलने पर, उनकी- (2013)
(i) तरंगदैर्घ्य समान परन्तु चाल असमान होती है।
(ii) आवृत्ति समान परन्तु चाल असमान होती है।
(iii) चाल समान परन्तु तरंगदैर्ध्य असमान होती हैं।
(iv) चाल समान तथा आवृत्ति भी समान होती है।
उत्तर-
(iii) चाल समान परन्तु तरंगदैर्घ्य असमान होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विस्थापन धारा का सूत्र लिखिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves VSAQ 1

प्रश्न 2.
निर्वात में वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों के वेग का व्यंजक लिखिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves VSAQ 2

प्रश्न 3.
30, 000 Å तरंगदैर्घ्य की वैद्युत चुम्बकीय तरंग की आवृत्ति ज्ञात कीजिए। यह स्पेक्ट्रम के किस भाग को प्रदर्शित करती है? (2014)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 4.
एक समतल वैद्युत चुम्बकीय तरंग में वैद्युत क्षेत्र के दोलनों की आवृत्ति 2 x 1010 Hz तथा आयाम 30 वोल्ट-मीटर-1 है। तरंग में चुम्बकीय क्षेत्र का आयाम ज्ञात कीजिए। (2014)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 8 Electromagnetic Waves

प्रश्न 5.
वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों के संचरण की तीन विधाएँ लिखिए। (2015)
उत्तर-

  • भू-तरंगों द्वारा संचरण
  • आकाश तरंगों द्वारा संचरण
  • अन्तरिक्ष तरंगों द्वारा संचरण।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सी वैद्युत-चुम्बकीय तरंगें नहीं हैं? कारण बताइए।
गामा किरणें, X-किरणें, रेडियो तरंगें, ध्वनि तरंगें, अवरक्त, पराबैंगनी।
उत्तर-
ध्वनि तरंगें, क्योंकि इनके संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है।

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प्रश्न 7.
दृश्य स्पेक्ट्रम की तरंगदैर्घ्य का परास लगभग कितना होता है?
उत्तर-
3900 Å से 7800 Å.

प्रश्न 8.
विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम का कौन-सा भाग रडार संचालन में प्रयोग होता है? उनके तरंगदैर्ध्य की कोटि बताइए। (2015)
उत्तर-
सूक्ष्म तरंगें या लघु रेडियो तरंगें। तरंगदैर्घ्य परिसर 10-3 मीटर से 3 x 10-1 मीटर होता है।

प्रश्न 9.
निम्न में से किसकी तरंगदैर्घ्य सबसे कम और किसकी सबसे अधिक हैं?
या
वैद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में सबसे छोटी तरंगदैर्घ्य और सबसे बड़ी तरंगदैर्घ्य की तरंगों के नाम लिखिए। (2014)
(i) नीला प्रकाश
(ii) अवरक्त किरणें
(iii) गामा-किरणें
(iv) हरा प्रकाश
उत्तर-
सबसे कम तरंगदैर्घ्य गामा-किरणों की तथा सबसे अधिक अवरक्त किरणों की।

प्रश्न 10.
वैद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में सबसे बड़ी तथा सबसे छोटी तरंगदैर्घ्य की तरंगों के नाम बताइए। (2013, 16)
उत्तर-
रेडियो तरंगें, गामा किरणें।

प्रश्न 11.
प्रकाश स्पेक्ट्रम के हरे, बैंगनी, लाल, पीले रंगों को आवृत्ति के बढ़ते क्रम में लिखिए।
उत्तर-
लाल → पीला → हरा → बैंगनी।

प्रश्न 12.
वैद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के विभिन्न भागों को उनके तरंगदैर्घ्य के बढ़ते क्रम में लिखिए। (2014)
उत्तर-
तरंगदैर्ध्य का बढ़ता क्रम इस प्रकार है- गामा किरणें, एक्स किरणें, पराबैंगनी किरणें, दृश्य विकिरण, अवरक्त किरणें, माइक्रो तरंगें, रेडियो तरंगें, दीर्घ तरंगें।

प्रश्न 13.
10-2 मीटर तरंगदैर्घ्य वाली विद्युत चुम्बकीय तरंग का नाम लिखिए। (2017)
उत्तर-
सूक्ष्म या माइक्रो तरंगें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विस्थापन धारा क्या है? इसका सूत्र लिखिए। ऐम्पियर-मैक्सवेल परिपथीय नियम का सूत्र लिखिए। (2016, 18)
उत्तर-
विस्थापन धारा- किसी परिपथ में समय के साथ परिवर्ती वैद्युत क्षेत्र (अर्थात् वैद्युतीय विस्थापन) के कारण उत्पन्न धारा को विस्थापन धारा (displacement current) कहते हैं। इसे id से प्रदर्शित करते हैं।
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प्रश्न 2.
एक समतल विद्युत-चुम्बकीय तरंग के विद्युत-क्षेत्र का आयाम E0 = 150 न्यूटन प्रति कूलॉम है तथा आवृत्ति v = 50 मेगा हर्ट्ज है। तरंग के दोलनी चुम्बकीय क्षेत्र का आयाम B0 तथा कोणीय आवृत्ति w का मान ज्ञात कीजिए। (2014)
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प्रश्न 3.
विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के स्पेक्ट्रम को आवृत्ति के बढ़ते हुए क्रम में लिखिए। इस स्पेक्ट्रम के विभिन्न क्षेत्रों की उपयोगिता की अत्यन्त संक्षेप में विवेचना कीजिए। (2017)
या
गामा किरणों से रेडियो तरंगों तक सभी विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के नाम तरंगदैर्घ्य के बढ़ते क्रम में लिखिए। (2015, 18)
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प्रश्न 4.
विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के अलग-अलग क्षेत्रों की किन्हीं चार प्रकार की तरंगों के नाम लिखिए। उनकी तरंगदैर्घ्य के औसत मान तथा कोई एक उपयोग लिखिए। (2010)
या
अवरक्त विकिरण तथा गामा किरणों के एक-एक उपयोग लिखिए। (2014)
या
विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के मुख्य भागों को उनकी तरंगदैर्ध्य परास के साथ लिखिए। (2015, 17)
या
निम्न वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों का एक-एक उपयोग लिखिए- (2015)

  1. सूक्ष्म तरंगें,
  2. अवरक्त तरंगें,
  3. पराबैंगनी तरंगें,
  4. X-किरणें

उत्तर-

  1. गामा किरणें- (10-14 मीटर से 10-10 मीटर तक)
    नाभिक की संरचना के सम्बन्ध में सूचना देने में उपयोगी।
  2. एक्स किरणें- (10-11 मीटर से 3 x 10-8 मीटर तक)
    चिकित्सा विभाग में सर्जरी में उपयोगी।
  3. पराबैंगनी किरणें- (10-8 मीटर से 4 x 10-7 मीटर तक)
    खाने की वस्तुओं के संरक्षण में उपयोगी।
  4. अवरक्त किरणें- (8 x 10-7 मीटर से 5 x 10-3 मीटर तक)
    कोहरे व धुन्ध के पार देखने में उपयोगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

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प्रश्न 1.
मैक्सवेल के विद्युत चुम्बकीय तरंग सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। (2017)
या
विद्युत-चुम्बकीय तरंगें क्या हैं? (2010, 15, 17, 18)
या
एक वैद्युत-चुम्बकीय तरंग किसी माध्यम में वेग [latex s=2]\vec { \nu } =\vec { \nu } \hat { i }[/latex] से चल रही है। एक चित्र द्वारा वैद्युत चुम्बकीय तरंग का संचरण वैद्युत व चुम्बकीय क्षेत्रों के कम्पनों की दिशाओं के साथ प्रदर्शित कीजिए। वैद्युत व चुम्बकीय क्षेत्रों के परिमाण, वैद्युत-चुम्बकीय तरंग के वेग से किस प्रकार सम्बन्धित हैं? (2014)
या
विद्युत-चुम्बकीय तरंगों की चार विशेषताओं (अभिलक्षण) का उल्लेख कीजिए। (2014, 15, 17, 18)
या
विद्युत चुम्बकीय तरंगों के किन्हीं दो विशिष्ट गुणों को लिखिए। (2015, 16)
या
मैक्सवेल का प्रकाश के सम्बन्ध में वैद्युत चुम्बकीय तरंग सिद्धान्त लिखिए। (2017, 18)
या
पराबैंगनी तथा अवरक्त किरणों का क्या अर्थ है?
उत्तर-
मैक्सवेल का प्रकाश का विद्युत-चुम्बकीय तरंग सिद्धान्त (Maxwell’s electromagnetic wave theory of light)– ब्रिटिश वैज्ञानिक मैक्सवेल ने सन् 1865 में केवल गणितीय सूत्रों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि जब कभी किसी वैद्युत परिपथ में वैद्युत धारा बहुत उच्च आवृत्ति से बदलती है (अर्थात् परिपथ में उच्च आवृत्ति के वैद्युत दोलन होते हैं) तो उस परिपथ से ऊर्जा, तरंगों के रूप में चारों ओर को प्रसारित होने लगती है। इन तरंगों को विद्युत-चुम्बकीय तरंगें’ कहते हैं। इन तरंगों में वैद्युत क्षेत्र E तथा चुम्बकीय (UPBoardSolutions.com) क्षेत्र B परस्पर लम्बवत् तथा तरंग के संचरण की दिशा के भी लम्बवत् होते हैं (चित्र 8.4)। इन तरंगों के संचरण के लिए माध्यम का होना आवश्यक नहीं है; अर्थात् विद्युत-चुम्बकीय तरंगें निर्वात् में होकर चल सकती हैं। मैक्सवेल ने गणनाओं द्वारा यह स्थापित किया कि विद्युत चुम्बकीय तरंगों की चाल 3.0 x 108 मीटर/सेकण्ड है जो कि निर्वात् में प्रकाश की चाल है। इस आधार पर मैक्सवेल ने अपना यह मत दिया कि प्रकाश विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के रूप में संचरित होता है।
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विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के अभिलक्षण- विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के अभिलक्षण निम्नलिखित हैं-

  1. विद्युत-चुम्बकीय तरंगें त्वरित आवेश द्वारा उत्पन्न की जाती हैं।
  2. इन तरंगों के संचरण के लिए किसी पदार्थक माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
  3. ये तरंगें निर्वात् अथवा मुक्त स्थान में [latex s=2]\nu =\frac { 1 }{ \sqrt { { \mu }_{ 0 }{ \epsilon }_{ 0 } } }[/latex] वेग से चलती हैं जिसका मान प्रकाश की चाल के बराबर होता है।
  4. वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्रों के परिवर्तनों की दिशाएँ परस्पर लम्बवत् होती हैं तथा संचरण की दिशा के भी लम्बवत् होती हैं। इस प्रकार, विद्युत-चुम्बकीय तरंगों की प्रकृति अनुप्रस्थ होती है।
  5. वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्रों में परिवर्तन साथ-साथ होते हैं तथा क्षेत्रों के महत्तम मान E0 व B0 एक ही स्थान पर तथा एक ही समय होते हैं।
  6. निर्वात् में विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्रों के परिमाणों का सम्बन्ध
    E/B = v = c होता है।
  7. वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों में ऊर्जा, औसतन वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्रों में बराबर-बराबर बँटी होती है।
  8. निर्वात् में, औसत वैद्युत ऊर्जा घनर [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } { \varepsilon }_{ 0 }{ E }^{ 2 }[/latex] तथा औसत चुम्बकीय ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) घनत्व [latex s=2]\frac { { B }^{ 2 } }{ 2{ \mu }_{ 0 } }[/latex] होता है।
  9. विद्युत-चुम्बकीय तरंग में प्रकाशिक प्रभाव वैद्युत क्षेत्र वेक्टर के कारण होता है।
    पराबैंगनी किरणें- दृश्य विकिरण के बैंगनी रंग से कम तरंगदैर्घ्य की (10-8 मी से 4 x 10-7 मी तक) किरणें पराबैंगनी किरणें कहलाती हैं।
    अवरक्त किरणें- दृश्य विकिरण के लाल रंग से अधिक तरंगदैर्घ्य (7.8 x 10-7 मी से 15 x 10-3 मी तक) की किरणें अवरक्त किरणें कहलाती हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 15 Biodiversity and Conservation

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 15 Biodiversity and Conservation (जैव विविधता एवं संरक्षण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Biology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 15 Biodiversity and Conservation (जैव विविधता एवं संरक्षण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 15
Chapter Name Biodiversity and Conservation
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 15 Biodiversity and Conservation (जैव विविधता एवं संरक्षण)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जैव विविधता के तीन आवश्यक घटकों (कंपोनेंट) के नाम लिखिए।
उत्तर
जैव विविधता के तीन आवश्यक घटक निम्नवत् हैं –

  1. आनुवंशिक विविधता
  2. जातीय विविधता
  3. पारिस्थितिकिय विविधता प्रश्न

प्रश्न 2.
पारिस्थितिकीविद् किस प्रकार विश्व की कुल जातियों का आकलन करते हैं?
उत्तर
पृथ्वी पर जातीय विविधता समान रूप से वितरित नहीं है, बल्कि एक रोचक प्रतिरूप दर्शाती है। पारिस्थितिकीविद् विश्व की कुल जातियों का आकलन अक्षांशों पर तापमान के आधार पर करते हैं। जैव विविधता साधारणतया, उष्ण कटिबन्ध क्षेत्र में सबसे अधिक तथा ध्रुवों की तरफ घटती जाती है। उष्ण कटिबन्ध क्षेत्र में जातीय समृद्धि के महत्त्वपूर्ण कारण इस प्रकार हैं- उष्ण कटिबन्ध क्षेत्रों (Tropical regions) में जैव जातियों को विकास के लिए अधिक समय मिला तथा इस क्षेत्र को अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त हुई जिससे उत्पादकता अधिक होती है। जातीय समृद्धि किसी प्रदेश के क्षेत्र पर आधारित होती है। पारिस्थितिकीविद् प्रजाति की उष्ण एवं शीतोष्ण प्रदेशों (Temperate regions) में मिलने की प्रवृत्ति, अधिकता आदि की अन्य प्राणियों एवं पौधों से तुलना कर उसके अनुपात की गणना और आकलन करते हैं।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबन्ध क्षेत्रों में सबसे अधिक स्तर की जाति- समृद्धि क्यों मिलती है? इसकी तीन परिकल्पनाएँ दीजिए।
उत्तर
इस प्रकार की परिकल्पनायें निम्नवत् हैं –

  1. जाति उद्भवन (speciation) आमतौर पर समय का कार्य है। शीतोष्ण क्षेत्र में प्राचीन काल से ही बार-बार हिमनद (glaciation) होता रहा है जबकि उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र लाखों वर्षों से
    अबाधित रहा है। इसी कारण जाति विकास तथा विविधता के लिए लम्बा समय मिला है।
  2. उष्ण कटिबन्धीय पर्यावरण शीतोष्ण पर्यावरण (temperate environment) से भिन्न तथा कम मौसमीय परिवर्तन दर्शाता है। यह स्थिर पर्यावरण निकेत (niches) विशिष्टीकरण को।
    प्रोत्साहित करता रहा है जिसकी वजह से अधिकाधिक जाति विविधता उत्पन्न हुई है।
  3. उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में अधिक सौर ऊर्जा उपलब्ध है जिससे उत्पादन अधिक होता है जिससे परोक्ष रूप से अधिक जैव विविधता उत्पन्न हुई है।

प्रश्न 4.
जातीय-क्षेत्र सम्बन्ध में समाश्रयण (रिग्रेशन) की ढलान का क्या महत्त्व है?
उत्तर
जातीय- क्षेत्र सम्बन्ध (Species- area relationship) – जर्मनी के महान् प्रकृतिविद् व भूगोलशास्त्री एलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (Alexander Von Humboldt) ने दक्षिणी अमेरिका के जंगलों में गहन खोज के बाद जाति समृद्धि तथा क्षेत्र के मध्य सम्बन्ध स्थापित किया। उनके अनुसार कुछ सीमा तक किसी क्षेत्र की जातीय समृद्धि अन्वेषण क्षेत्र की सीमा बढ़ाने के साथ बढ़ती है। जाति समृद्धि और वर्गकों की व्यापक किस्मों के क्षेत्र के बीच सम्बन्ध आयताकार अतिपरवलय (rectangular hyperbola) होता है। यह लघुगणक पैमाने पर एक सीधी रेखा दर्शाता है। इस सम्बन्ध को निम्नांकित समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है –
log S = log C + Z log A
जहाँ; S = जाति समृद्धि, A = क्षेत्र, Z = रेखीय ढाल (समाश्रयण गुणांक रिग्रेशन कोएफिशिएंट)
C = Y – अन्त:खण्ड (इंटरसेप्ट)
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 15 Biodiversity and Conservation img-1

पारिस्थितिकी वैज्ञानिकों के अनुसार z का मान 0.1 से 0.2 परास में होता है। यह वर्गिकी समूह अथवा क्षेत्र पर निर्भर नहीं करता है। आश्चर्यजनक रूप से समाश्रयण रेखा (regression line) की ढलान एक जैसी होती है। यदि हम किसी बड़े समूह के जातीय क्षेत्र सम्बन्ध जैसे- सम्पूर्ण महाद्वीप का विश्लेषण करते हैं, तब ज्ञात होता है कि समाश्रयण रेखा की ढलान तीव्र रूप से तिरछी खड़ी होती। है। Z के माने की परास (range) 0.6 से 1.2 होती है।

प्रश्न 5.
किसी भौगोलिक क्षेत्र में जाति क्षति के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर
जाति क्षति के कारण (Causes of Species Loss) – विभिन्न समुदायों में जीवों की संख्या घटती-बढ़ती रहती है। जब तक किसी पारितन्त्र में मौलिक जाति उपस्थित रहती है तब तक प्रजाति के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होती रहती है। मौलिक जाति के विलुप्त होने पर इसके जीनपूल में उपस्थित महत्त्वपूर्ण लक्षण विलुप्त हो जाते हैं। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन मानव हस्तक्षेप के कारण सम्पूर्ण विश्व जाति क्षति की बढ़ती हुई दर का सामना कर रहा है। जाति क्षति के मुख्य कारण निम्नवत् हैं –

(i) आवासीय क्षति तथा विखण्डन (Habitat Loss and Fragmentation) – मानवीय हस्तक्षेप के कारण जीवों के प्राकृतिक आवासों का नाश हुआ है। जिसके कारण जातियों का विनाश गत 150 वर्षों में अत्यन्त तीव्र गति से हुआ है। मानव हितों के कारण औद्योगिक क्षेत्रों, कृषि क्षेत्रों, आवासीय क्षेत्रों में निरन्तर वृद्धि हो रही है जिससे वनों का क्षेत्रफल 18% से घटकर लगभग 9% रह गया है। आवासीय क्षति जन्तु व पौधे के विलुप्तीकरण का मुख्य कारण है।

विशाल अमेजन वर्षा वन को सोयाबीन की खेती तथा जानवरों के चरागाहों के लिए काट कर साफ कर दिया गया है। इसमें निवास करने वाली करोड़ों जातियाँ प्रभावित हुई हैं और उनके जीवन को खतरा उत्पन्न हो गया है। आवासीय क्षति के अतिरिक्त प्रदूषण भी जातियों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। मानव क्रियाकलाप भी जातीय आवासों को प्रभावित करते हैं। जब मानव क्रियाकलापों द्वारा बड़े आवासों को छोटे-छोटे खण्डों में विभक्त कर दिया जाता है, तब जिन स्तनधारियों और पक्षियों को अधिक आवास चाहिए वह बुरी तरह प्रभावित होते हैं जिससे समष्टि में कमी होती है।

(ii) अतिदोहन (Over Exploitation) – मानव हमेशा से भोजन तथा आवास के लिए प्रकृति पर निर्भर रहा है, परन्तु लालच के वशीभूत होकर मानव प्राकृतिक सम्पदा का अत्यधिक दोहन कर रहा है जिसके कारण बहुत-सी जातियाँ विलुप्त हो रही हैं। अतिदोहन के कारण गत 500 वर्षों में अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं। अनेक समुद्री मछलियों की प्रजातियाँ शिकार के कारण कम होती जा रही हैं जिसके कारण व्यावसायिक महत्त्व की अनेक जातियाँ खतरे में हैं।

(iii) विदेशी जातियों का आक्रमण (Alien Species Invasions) – जब बाहरी जातियाँ अनजाने में या जान बूझकर किसी भी उद्देश्य से एक क्षेत्र में लाई जाती हैं, तब उनमें से कुछ आक्रामक होकर स्थानीय जातियों में कमी या उनकी विलुप्ति का कारण बन जाती हैं। गाजर घास (पार्थेनियम) लैंटाना और हायसिंथ ( आइकॉर्निया) जैसी आक्रामक खरपतवार जातियाँ पर्यावरण तथा अन्य देशज जातियों के लिए खतरा बन गई हैं। इसी प्रकार मत्स्य पालन के उद्देश्य से अफ्रीकन कैटफिश क्लेरियस गैरीपाइनस मछली को हमारी नदियों में लाया गया, लेकिन अब ये मछली हमारी नदियों की मूल अशल्कमीन (कैटफिश) जातियों के लिए खतरा पैदा कर रही हैं।

(iv) सहविलुप्तता (Co-extinctions) – एक जाति के विलुप्त होने से उस पर आधारित दूसरी जन्तु व पादप जातियाँ भी विलुप्त होने लगती हैं। उदाहरण के लिए– एक परपोषी मत्स्य जाति विलुप्त होती है, तब उसके विशिष्ट परजीवी भी विलुप्त होने लगते हैं।

(v) स्थानान्तरी अथवा झूम कृषि (Shifting or Jhum Cultivation) – जंगलों में रहने वाली जन जातियाँ विभिन्न जन्तुओं का शिकार करके भोजन प्राप्त करती हैं। इनका कोई निश्चित
आवास नहीं होता। ये जीवनयापन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थानों पर स्थानान्तरित होती रहती हैं। ये जंगल की भूमि पर खेती करते हैं, इसके लिए ये जनजातियाँ प्राय: जंगल के पेड़-पौधों, घास फूस को जलाकर नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार की कृषि को झूम कृषि कहते हैं। इसके कारण वन्य प्रजातियाँ स्थानाभाव के कारण प्रभावित होती हैं।

प्रश्न 6.
पारितन्त्र के कार्यों के लिए जैवविविधता कैसे उपयोगी है?
उत्तर
जैव विविधता की पारितन्त्र के कार्यों के लिए उपयोगिता (Utility of Biodiveristy for Ecosystem Functioning) – अनेक दशकों तक पारिस्थितिकविदों का विश्वास था कि जिस समुदाय में अधिक जातियाँ होती हैं वह पारितन्त्र कम जाति वाले समुदाय से अधिक स्थिर रहता है। डेविड टिलमैन (David Tilman) ने प्रयोगशाला के बाहर के भूखण्डों पर लम्बे समय तक पारितन्त्र के प्रयोग के बाद पाया कि उन भूखण्डों में जिन पर अधिक जातियाँ थीं, साल दर साल कुल जैवभार में कम विभिन्नता दर्शाई। उन्होंने अपने प्रयोगों में यह भी दर्शाया कि विविधता में वृद्धि से उत्पादकता बढ़ती है।

हम यह महसूस करते हैं कि समृद्ध जैव विविधता अच्छे पारितन्त्र के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही मानव को जीवित रखने के लिए भी आवश्यक है। प्रकृति द्वारा प्रदान की गई जैव विविधता की अनेक पारितन्त्र सेवाओं में मुख्य भूमिका है। तीव्र गति से नष्ट हो रही अमेजन वन पृथ्वी के वायुमण्डल को लगभग 20 प्रतिशत ऑक्सीजन, प्रकाश संश्लेषण द्वारा प्रदान करता है। पारितन्त्र की दूसरी सेवा परागणकारियों; जैसे- मधुमक्खी, गुंजन मक्षिका पक्षी तथा चमगादड़ द्वारा की जाने वाली परागण क्रिया है जिसके बिना पौधों पर फल तथा बीज नहीं बन सकते। हम प्रकृति से अन्ये अप्रत्यक्ष सौन्दर्यात्मक लाभ उठाते हैं। पारितन्त्र पर्यावरण को शुद्ध बनाता है। सूखा तथा बाढ़ आदि को नियन्त्रित करने में हमारी मदद करता है।

प्रश्न 7.
पवित्र उपवन क्या हैं ? उनकी संरक्षण में क्या भूमिका है?
उत्तर
अलौकिक ग्रूव्स या पवित्र उपवन पूजा स्थलों के चारों ओर पाये जाने वाले वनखण्ड हैं। ये जातीय समुदायों/राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित किये जाते हैं। पवित्र उपवनों से विभिन्न प्रकार के वन्य जन्तुओं और वनस्पतियों को संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि इनके आस-पास हानिकारक मानव गतिविधियाँ बहुत कम होती हैं। इस प्रकार ये वन्य जीव संरक्षण में धनात्मक योगदान प्रदान करते हैं।

प्रश्न 8.
पारितन्त्र सेवा के अन्तर्गत बाढ़ व भू- अपरदन (सॉयल इरोजन) नियन्त्रण आते हैं। यह किस प्रकार पारितन्त्र के जीवीय घटकों (बायोटिक कम्पोनेंट) द्वारा पूर्ण होते हैं?
उत्तर
पारितन्त्र को संरक्षित कर बाढ़, सूखा व भू-अपरदन (soil erosion) जैसी समस्याओं पर नियन्त्रण पाया जा सकता है। वृक्षों की जड़ें मृदा कणों को जकड़े रहती हैं, जिससे जल तथा वायु प्रवाह में अवरोध उत्पन्न होते हैं। वृक्षों के कटान से यह अवरोध समाप्त हो जाता है। मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत तीव्र वायु या वर्षा के जल के साथ बहकर नष्ट हो जाती है। इसे मृदा अपरदन कहते हैं। पहाड़ों में जल ग्रहण क्षेत्रों के वृक्षों को काटने से मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है और यह अधिक गम्भीर रूप धारण कर लेती है। बाढ़ के समय नदियों का पानी किनारों से तेज गति से टकराता है और इन्हें काटता रहता है। इसके फलस्वरूप नदी का प्रवाह सामान्य दिशा के अतिरिक्त अन्य दिशाओं में भी होने लगता है। वृक्षारोपण, बाढ़ नियन्त्रण तथा मृदा अपरदन को रोकने का प्रमुख उपाय है। वृक्ष मरुस्थलों में वातीय अपरदन (wind erosion) को रोकने में उपयोगी होते हैं। वृक्ष वायु गति की तीव्रता को कम करने में सहायक होते हैं जिससे अपरदन की दर कम हो जाती है।

प्रश्न 9.
पादपों की जाति विविधता (22 प्रतिशत), जन्तुओं (72 प्रतिशत) की अपेक्षा बहुत कम है। क्या कारण है कि जन्तुओं में अधिक विविधता मिलती है?
उत्तर
प्राणियों में अनुकूलन की क्षमता पौधों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। प्राणियों में प्रचलन का गुण पाया जाता है, इसके फलस्वरूप विपरीत परिस्थितियाँ होने पर ये स्थान परिवर्तन करके स्वयं को बचाए रखते हैं। इसके विपरीत पौधे स्थिर होते हैं, उन्हें विपरीत स्थितियों का अधिक सामना करना ही पड़ता है। प्राणियों में तन्त्रिका तन्त्र तथा अन्त:स्रावी तन्त्र पाया जाता है। इसके फलस्वरूप प्राणी वातावरण से संवेदनाओं को ग्रहण करके उसके प्रति अनुक्रिया करते हैं। प्राणी तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्त:स्रावी तन्त्र के फलस्वरूप स्वयं को वातावरण के प्रति अनुकूलित कर लेते हैं। इन कारणों के फलस्वरूप किसी भी पारितन्त्र में प्राणियों में पौधों की तुलना में अधिक जैव विविधता पाई जाती है।

प्रश्न 10.
क्या आप ऐसी स्थिति के बारे में सोच सकते हैं, जहाँ पर हम जान-बूझकर किसी जाति को विलुप्त करना चाहते हैं? क्या आप इसे उचित समझते हैं?
उत्तर
जब बाहरी जातियाँ अनजाने में या जान-बूझकर किसी भी उद्देश्य से एक क्षेत्र में लाई जाती हैं, तब उनमें से कुछ आक्रामक होकर स्थानीय जातियों में कमी या उनकी विलुप्ति का कारण बन जाती हैं। गाजर घास लैंटाना और हायसिंथ (आइकॉर्निया) जैसी आक्रामक खरपतवार जातियाँ पर्यावरण तथा अन्य देशज जातियों के लिए खतरा बन गई हैं। इसी प्रकार मत्स्य पालन के उद्देश्य से अफ्रीकन कैटफिश क्लेरियस गैरीपाइनस मछली को हमारी नदियों में लाया गया, लेकिन अब ये मछली हमारी नदियों की मूल अशल्कमीन (कैटफिश जातियों) के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। इन हानिकारक प्रजातियों को हमें जान-बूझकर विलुप्त करना होगा। इसी प्रकार अनेक विषाणु जैसे-पोलियो विषाणु को विलुप्त करके दुनिया को पोलियो मुक्त करना चाहते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न 
प्रश्न 1.
उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी है – (2015)
(क) मोर
(ख) सारस
(ग) कबूतर
(घ) गौरैया
उत्तर
(ख) सारस

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा स्तनिन संकटग्रस्त नहीं है? (2016)
(क) लाल पाण्डा
(ख) कस्तूरी मृग
(ग) नील गाय
(घ) भारतीय बबर शेर
उत्तर
(ग) नील गाय

प्रश्न 3.
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम किस सन में पारित किया गया था? (2014)
(क) 1942
(ख) 1972
(ग) 1912
(घ) 1991
उत्तर
(ख) 1972

प्रश्न 4.
प्राकृतिक वासस्थान में जीवों का संरक्षण कहलाता है (2017)
(क) उत्थाने संरक्षण
(ख) स्वस्थाने संरक्षण
(ग) (क) व (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) स्वस्थाने संरक्षण

प्रश्न 5.
भारत में अभयारण्यों की कुल संख्या है – (2017)
(क) 515
(ख) 480
(ग) 520
(घ) 490
उत्तर
(ग) 520

प्रश्न 6.
भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान है – (2014)
(क) दुधवा राष्ट्रीय उद्यान
(ख) काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान
(ग) कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान
(घ) कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
उत्तर
(ग) कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

प्रश्न 7.
घाना राष्ट्रीय उद्यान किस प्रदेश में स्थित है? (2016)
(क) सिक्किम
(ख) असम
(ग) राजस्थान
(घ) उत्तराखण्ड
उत्तर
(ग) राजस्थान

प्रश्न 8.
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भारत के किस राज्य में स्थित है? (2016)
(क) असम
(ख) गुजरात
(ग) महाराष्ट्र
(घ) पंजाब
उत्तर
(क) असम

प्रश्न 9.
एशियाई शेरों के लिए एकमात्र प्राकृतिक वास गिर राष्ट्रीय उद्यान कहाँ पर स्थित है। (2018)
(क) उत्तराखण्ड
(ख) राजस्थान
(ग) गुजरात
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(ग) गुजरात

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वन्य जीवन और जैव विविधता में अन्तर बताइए। (2015)
उत्तर
वन्य जीवन में वे सभी प्राणी तथा पादप आते हैं जो मनुष्य के नियन्त्रण और प्रभुत्व से दूर अपने प्राकृतिक वासस्थानों में रहते हैं जबकि जैव विविधता में सभी जीव, जातियाँ, समष्टियाँ, उनके बीच आनुवंशिक विभिन्नताएँ तथा सभी समुदायों के एकत्रित सम्मिश्र व पारिस्थितिक तन्त्र आते हैं।

प्रश्न 2.
वन्य जीवन क्या है? इसके विनाश के दो मुख्य कारण बताइए।
उत्तर
वन्य जीवन– (उपर्युक्त प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।)
विनाश के कारण– 1. वनोन्मूलन 2. वनों में लगने वाली आग

प्रश्न 3.
जैव विविधता की परिभाषा लिखिए। इसके संरक्षण की दो विधियों का उल्लेख कीजिए। (2015, 16, 17)
उत्तर
जैव विविधता (उपर्युक्त प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।)
जैव संरक्षण की विधियाँ- 1. स्वस्थाने संरक्षण 2. बहिस्थाने संरक्षण

प्रश्न 4.
विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष किस दिनांक को मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? (2014)
उत्तर
जैव विविधता एवं पर्यावरण के संरक्षण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

प्रश्न 5.
आइ०यू०सी०एन० (IUCN) तथा डब्लूडब्लू०एफ० (WWF) का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर
IUCN – अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (International Union of Conservation of Nature and Natural Resources)
WWF – World Wide Fund.

प्रश्न 6.
निम्नलिखित प्राणी कहाँ पाये जाते हैं? (2014)

  1. बबर शेर
  2. बाघ

उत्तर

  1. बबर शेर – गुजरात के काठियावाड में स्थित गिर जंगल में।
  2. बाघ – पश्चिम बंगाल में स्थित सुन्दरवन में।

प्रश्न 7.
कौन-सा जन्तु अत्यधिक शिकार के कारण भारत में विलुप्त हो रहा है? (2017)
उत्तर
कस्तूरी मृग।

प्रश्न 8.
भारत के राष्ट्रीय जन्तु का नाम लिखिए। इसके संरक्षण के लिए कौन-सी परियोजना प्रारम्भ की गई है? (2014)
उत्तर
भारत के राष्ट्रीय जन्तु का नाम ‘बाघ’ है। इसके संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर’ परियोजना प्रारम्भ की गई है।

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय पार्क एवं वन्य-जीव सैन्क्चुअरी में अन्तर बताइए। (2015)
या
उस प्रदेश तथा राष्ट्रीय उद्यान का नाम लिखिए जहाँ भारतीय गैंडे संरक्षित हैं। राष्ट्रीय उद्यान और प्राणि विहार में अन्तर बताइए। (2017)
उत्तर
राष्ट्रीय पार्क वन्य जीव एवं पारिस्थितिक तन्त्र दोनों के संरक्षण के लिए सुनिश्चित होते हैं। जबकि वन्य- जीव सैन्क्चुअरी केवल वन्य-जीव का संरक्षण करने के लिए सुनिश्चित होते हैं। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, सिबसागर, जोरहट (असम) एवं मानस प्राणिविहार बारपोटा (असम) में भारतीय गैंडों को संरक्षित किया गया है।

प्रश्न 10.
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित राष्ट्रीय उद्यान का नाम लिखिए। (2014, 17)
उत्तर
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान।

प्रश्न 11.
वन्य जीव क्या है? कॉर्बेट नेशनल पार्क किस राज्य में स्थित है? (2017)
उत्तर
वन्य जीव (प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें)
कॉर्बेट नेशनल पार्क, नैनीताल, उत्तराखण्ड में स्थित है।

प्रश्न 12.
‘तप्त स्थल (हॉट स्पॉट) क्या हैं? भारत में स्थित दो तप्त स्थलों के नाम लिखिए। (2014, 17)
उत्तर
वह भौगोलिक क्षेत्र जहाँ की जैव विविधता संकट में होती है, तप्त स्थल कहलाता है। हिमालय (पूर्वी हिमालय) तथा पश्चिमी घाट भारत में स्थित प्रमुख तप्त स्थल हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वन्य प्राणियों के विनाश के चार प्रमुख कारण लिखिए। (2014)
या
प्राणियों के विलुप्तीकरण के कारण लिखिए। (2016)
उत्तर
वन्य प्राणियों के विनाश के चार प्रमुख कारण निम्नवत् हैं –

  1. तीव्र वनोन्मूलन जिसके कारण वन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास समाप्त होते जा रहे हैं।
  2. गैर-कानूनी रूप से वन्य प्राणियों का शिकार।
  3. मानव की क्रियाओं या भूलवश या प्राकृतिक कारणों से वनों में लगने वाली आग।
  4. प्रदूषण ने विभिन्न प्राणियों के आवासों को विभिन्न प्रकार से दूषित कर दिया है जिससे इनमें रहने वाले जीवों का जीवनकाल कम हो गया है।

प्रश्न 2.
वन्य प्राणी उत्पादों के लिए मनुष्य का लोभ’ शीर्षक पर टिप्पणी लिखिए। (2014)
उत्तर
स्वतन्त्रता के बाद, क्रीड़ा आखेट (game hunting) का स्थान फर, चमड़े, मांस, हाथीदाँत, औषधियों, प्रसाधनों, सुगन्ध-द्रव्यों, साज-सज्जा, स्मृति चिन्हों, संग्रहालयी निदर्शो (museum specimens) आदि के लिए, वन्य प्राणियों के चोरी और सीनाजोरी से शिकार ने ले लिया। इस प्रकार, वन्य प्राणियों का विनाश व्यापक और तीव्र गति से होने लगा। उदाहरणार्थ, एक कामोत्तेजक औषधि (aphrodisiac) के संश्लेषण में प्रयुक्त सींग के लिए गैंडे (rhinoceros) का विगत 40-50 वर्षों में व्यापक वध हुआ है। इसी प्रकार, हाथीदाँत (ivory) के लिए हाथियों का, कस्तूरी (musk-एक अत्यधिक सुगन्धित द्रव्य जो नर की नाभि के निकट स्थित एक पुटी में भरा होता है) के लिए कस्तूरी मृग (musk deer) का, चर्बी, मांस, खाल, आदि के लिए ह्वेल का, फर के लिए हिमालयी हिमचीते (Himalayan snow-leopard) का, चमड़े के लिये बाघों, लोमड़ियों, घड़ियालों, साँभर, साँपों आदि का व्यापक वध हुआ है और अब भी हो रहा है।

प्रश्न 3.
रेड डाटा बुक से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता बताइए। (2014, 15)
या
रेड डाटा बुक किसे कहते हैं। इसमें उल्लिखित किन्हीं चार स्तनियों के नाम लिखिए। (2015)
उत्तर
विश्व संरक्षण संघ (World Conservation Union- WCU) – जिसे अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (International Union of Conservation of Nature and Natural Resources- IUCN या IUCNNR) भी कहा जाता है, के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि जैव विविधता को विश्व के सभी भागों में अति संकट से गुजरना पड़ रहा है। इस सम्बन्ध में wCU ने अध्ययन द्वारा संकटग्रस्त जीवों की सूची लिपिबद्ध की जिसे रेड डाटा बुक कहा जाता है। इस सूची में उन जातियों एवं उपजातियों को सम्मिलित किया गया जो विलोपन के खतरे से गुजर रही हैं। इसका प्रकाशन पहली बार सन् 1963 में स्विट्जरलैण्ड में किया गया जहाँ WCU का मुख्यालय है। WCU ने रेड डाटा बुक में संकटग्रस्त जातियों को विभिन्न श्रेणियों में बाँटकर विभाजित किया और उन्हें सूचीबद्ध किया। रेड डाटा बुक की सहायता से हमें संकटग्रस्त जीवों की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इस जानकारी की सहायता से हम उन संकटग्रस्त जीवों के संरक्षण के लिए प्रयास कर सकते हैं और उन्हें विलुप्त होने से बचा सकते हैं।
इसमें उल्लिखित चार स्तनी इस प्रकार हैं-

  1. काला हिरण
  2. चीतल
  3. चिंकारा तथा
  4. तेन्दुआ।

प्रश्न 4.
“भारत में वन्य प्राणियों की संकटग्रस्त जातियाँ” शीर्षक पर टिप्पणी लिखिए। (2014)
या
संकटग्रस्त जातियाँ किन्हें कहते हैं? कोई दो संकटग्रस्त जातियों के उदाहरण दीजिए। (2015)
या
संकटाग्रस्त जातियों से आप क्या समझते हैं? किन्हीं दो संकटाग्रस्त भारतीय स्तनधारी प्राणियों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
हमारे देश में, इस समय, वन्य स्तनियों की लगभग 81, वन्य पक्षियों की लगभग 30, सरीसृपों और उभयचरों की लगभग 15 तथा अकशेरुकियों की बहुत-सी जातियाँ संकटग्रस्त हैं अर्थात् विलुप्त होने की कगार पर हैं, इन्हें संकटग्रस्त जातियाँ कहा जाता है। इनकी पूर्ण सूची, भारतीय शासन द्वारा प्रसारित “लाल आँकड़े’ (Red Data Book) नामक पुस्तक में दी गई हैं। हमारे संकटग्रस्त स्तनी मुख्यत: हैं—बबर शेर, बाघ, भेड़िये, सियार, लोमड़ियाँ, भालू, गन्ध बिलाव, लोरिस, अधिकांश जातियों के बन्दर, शल्की चींटीखोर, हिमचीता, गैंडा, जंगली गधा, जंगली सुअर, कस्तूरी मृग, कश्मीरी मृग, विविध जातियों के कुरंग, उड़न गिलहरियाँ, गंगों का सँस, सेही, गवले या गौर, जंगली भेड़े और बकरियाँ, गिब्बन, हाथी, जंगली भैंसे आदि।

हमारे संकटग्रस्त पक्षी मुख्यतः हैं- कुछ जातियों की बत्तखें, बाज, समुद्री गरुड़, बाँस तीतर, पहाड़ी बटेर, भारतीय पनचिरा, स्कन्ध मुर्गाबी (spur fowl), धनेश, हुकना, चेड़ (pheasant), सारस आदि।
संकटग्रस्त सरीसृप हैं- कई जातियों के कछुवे, मगरमच्छ, गोह, विषैले सर्प, अजगर इत्यादि।
संकटग्रस्त उभयचर मुख्यत: हैं- जरायुजी (viviparous) टोड तथा हिमालयी सरटिका (newt)।

प्रश्न 5.
जंगली जानवरों को सुरक्षित रखना क्यों आवश्यक है? इसके लिए सरकार द्वारा क्या कदम उठाया गया है? (2013)
या
वन्य जीव संरक्षण क्यों आवश्यक है? इस विषय में सरकार क्या कदम उठा रही है? (2015)
उत्तर
जंगल में जंगली जानवर पारिस्थितिक तन्त्र के जैविक घटक (biotic factors) होते हैं। ये जंगल में विभिन्न जीवों की संख्या को सीमित रखने में सहायक होते हैं। यदि इन्हें नष्ट कर दिया जायेगा तो जंगल में अन्य जीवों की संख्या में अचानक परिवर्तन आ जायेगा, जिससे वहाँ पारिस्थितिक तन्त्र में असन्तुलन की स्थिति आ जायेगी।
जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा उठाये गये कदम निम्नवत् हैं –

  1. ZSI (Zoological Survey of India) – जुलोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया का प्रमुख उद्देश्य जन्तुओं का सर्वेक्षण, अनुसंधान तथा पर्यवेक्षण है।
  2. IBWL (Indian Board for Wildlife) – वन्य जीवन भारतीय परिषद् का गठन भी वन्य जीवों के संरक्षण के लिये ही किया गया। इसका प्रमुख कार्य राष्ट्रीय उद्यानों, जन्तु विहारों तथा चिड़ियाघरों द्वारा जन्तुओं का संरक्षण करना है।
  3. भारतीय संविधान में जंगली जीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाया गया है।
  4. अनाधिकृत रूप से जंगलों को काटने पर रोक लगायी गयी है।
  5. वृक्षारोपण का कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जा रहा है।
  6. भारतीय जन्तु सर्वेक्षण विभाग द्वारा संकटग्रस्त जातियों का अध्ययन किया जा रहा है जिसे लाल आँकड़े की किताब (Red Data Book) में सूचीबद्ध किया जा रहा है।

प्रश्न 6.
“बाघ परियोजना का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
बाघ परियोजना (Project Tiger) – इस परियोजना का आरम्भ सन् 1973 में किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों का संरक्षण करना है। इससे सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यान, कॉर्बेट नेशनल पार्क, नैनीताल (उत्तराखण्ड), रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान, सवाई माधोपुर (राजस्थान) एवं सुन्दरवन चीता अभयारण्य (पं बंगाल) हैं।

प्रश्न 7.
वन्यजीव की परिभाषा लिखिए। इसके संरक्षण की दो प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
वन्यजीव में वे सभी प्राणी तथा पादप आते हैं जो मनुष्य के नियन्त्रण और प्रभुत्व से दूर अपने प्राकृतिक वास स्थानों में रहते हैं। वन्य जीव संरक्षण विस्तृत रूप से दो प्रमुख विधियों द्वारा किया जाता है –
1. स्वस्थाने संरक्षण (In- situ Conservation) – स्वस्थाने संरक्षण वन्य जन्तुओं के प्राकृतिक आवास में किया जाता है। इसके लिए इन प्राकृतिक आवास स्थानों को निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया जाता है। निषेध की सीमा के अनुसार इन क्षेत्रों को निम्न प्रकारों में बाँटा गया है –

  1. राष्ट्रीय उद्यान (National Park)
  2. अभयारण (Sanctuaries)
  3. जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere reserve)
  4. अलौकिक ग्रूव्स तथा झीलें (Sacred grooves and lakes)

2. बहिस्थाने संरक्षण (Ex- situ Conservation) – इस संरक्षण में संकटोत्पन्न पादपों तथा जन्तुओं का उनके प्राकृतिक आवास से अलग एक विशेष स्थान पर अच्छी देखभाल की जाती है और सावधानीपूर्वक संरक्षित किया जाता है। इसके अन्तर्गत जन्तु उद्यान, वानस्पतिक उद्यान, वन्य जीव सफारी पार्क, बीज बैंक एवं जीन बैंक आदि आते हैं।

प्रश्न 8.
प्राणि विहार क्या है? भारत के दो प्राणि विहारों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
अभयारण (प्राणि विहार, Sanctuaries) – अभयारण्यों का उद्देश्य केवल वन्य जीवन का संरक्षण करना होता है। अतः इसमें व्यक्तिगत स्वामित्व, लकड़ी काटने, पशुओं को चराने आदि की अनुमति इस प्रतिबन्ध के साथ दी जाती है कि इन क्रिया-कलापों से वन्य प्राणी प्रभावित न हों। इनकी स्थापना एवं नियन्त्रण सम्बन्धित राज्य सरकार के अधीन होती है। भारत में लगभग 520 अभयारण हैं। भारत के दो प्राणि विहार-

  1. जलदापारा जन्तु विहार, मदारीहाट-पश्चिमी बंगाल
  2. घाना पक्षी विहार, भरतपुर-राजस्थान।

प्रश्न 9.
जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? भारत में कितने जीव-मण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं? (2017)
या
संरक्षित जैवमण्डल क्या है? किन्हीं दो भारतीय संरक्षित जैवमण्डल के नाम लिखिए। (2018)
उत्तर
जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve) – सन् 1971 में यूनेस्को की मनुष्य एवं जीव-मण्डल परियोजना के अन्तर्गत मानव कल्याण हेतु जीवमण्डल के संरक्षण की दृष्टि से जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना का शुभारम्भ किया गया। भारत में कुल 18 जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं जिनमें से हिमालय प्रदेश का शीत मरुस्थल क्षेत्र तथा शेशाचालम प्रमुख हैं।

प्रश्न 10.
सिद्ध कीजिए कि “मानव-कल्याण, वन्य प्राणियों के साथ सहअस्तित्व में छिपा हुआ है।” (2014)
उत्तर
हजारों-लाखों वर्ष पूर्व का आदिमानव (primitive man) स्वयं एक वन्य प्राणि था जो भोजन के लिए अन्य वन्य प्राणियों का शिकार करता था। सभ्यता (civilization) और संस्कृति (culture) के उदय के साथ-साथ, प्रागैतिहासिक (prehistoric) मानव में वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम और इनके साथ सहअस्तित्व की भावना का भी उदय हुआ। प्रारम्भ में प्रागैतिहासिक मानव ने, शिकार में सहायता हेतु, कुत्तों को पाला। भूवैज्ञानिक (geological) प्रमाणों से पता चलता है कि बाद में, लगभग 5000 वर्ष पूर्व की सिन्धु घाटी सभ्यता (Indus valley civilization) तक, गाय एवं बैल, भैंस, हाथी, बकरी, मछलियाँ, मगरमच्छ आदि कई प्रकार के वन्य प्राणी मानव-जीवन से सम्बद्ध हो गये।

इनके अतिरिक्त भी, भित्ति-चित्रणों में और सिक्कों, बर्तनों आदि पर खुदाई में शेर, बाघ, गैंडे, सर्प, बन्दर आदि कुछ ऐसे वन्य प्राणियों का समावेश हो गया जिनसे कि मानव घबराता या डरता था। इसके बाद, ईसापूर्व के धार्मिक दर्शनों (religious philosophies), जैसे कि हिन्दू धर्म (Hinduism), बौद्ध-धर्म (Budhhism), जैन- धर्म (Jainism) आदि में, वन्य प्राणियों के वध को रोकने हेतु, ‘अहिंसा (Ahimsa or non-violence) धार्मिक सिद्धान्त (sacred tenet) के रूप में अपनाया गया। आर्यों (Aryans) ने शेर, मृग, सारस, मोर, हाथी, बकरी, घड़ियाल, बैल, गरुड़ (eagle), बत्तख आदि को देवी-देवताओं की सवारियाँ (mounts) मानकर इनका सम्मान किया।

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से सिद्ध होता है कि मानव-कल्याण वन्य प्राणियों के साथ सहअस्तित्व में छिपा हुआ है अर्थात् यदि मानव वन्य प्राणियों के साथ प्रेमभाव से रहेगा तो उनका कल्याण निश्चित है। परन्तु यदि वह उनका विनाश करता है तो कुछ समय पश्चात्, उनकी हानि परिलक्षित होने लगेगी।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei (नाभिक) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei (नाभिक).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 13
Chapter Name Nuclei (नाभिक)
Number of Questions Solved 121
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei (नाभिक)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

अभ्यास के प्रश्न हल करने में निम्नलिखित आँकड़े आपके लिए उपयोगी सिद्ध होंगे :
e= 1.6 x 10-19C,                                                    N = 6.023 x 1023 प्रति मोल
[latex ]\frac { 1 }{ 4\pi { \varepsilon }_{ 0 } }[/latex] = 9 x 109 Nm/c2                                         k= 1.381 x 1023 J°K-1
1 MeV = 1.6×10-13J                                            1u = 931.5 MeV/c2
1 year = 3.154 x 107s
mH = 1.007825u                                                mn = 1.008665u )
m( [latex]\frac { 4 }{ 2 }[/latex]He) = 4.002603 u                                       me= 0.000548u

UP Board Solutions

प्रश्न 1:
(a) लीथियम के दो स्थायी समस्थानिकों को [latex]_{ 3 }^{ 6 }{ Li }[/latex] एवं [latex]_{ 3 }^{ 7 }{ Li }[/latex] की बहुलता का प्रतिशत
क्रमशः 7.5 एवं 92.5 हैं। इन समस्थानिकों के द्रव्यमान क्रमशः 6.01512 u एवं 7,01600u हैं। लीथियम का परमाणु द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। ।
(b) बोरॉन के दो स्थायी, समस्थानिक [latex]_{ 5 }^{ 10 }{ B }[/latex] एवं [latex]_{ 5 }^{ 11 }{ B }[/latex] हैं। उनके द्रव्यमान क्रमशः 10.01294u एवं 11.00931u एवं बोरॉन का परमाणु भार 10.811u है। [latex]_{ 5 }^{ 10 }{ B }[/latex] एवं [latex]_{ 5 }^{ 11 }{ B }[/latex] की बहुलता ज्ञात कीजिए।
हल:
(a) माना लीथियम के किसी नमूने में 100 परमाणु लिए गए हैं, तब इनमें 7.5 परमाणु [latex]_{ 3 }^{ 6 }{ Li }[/latex] के तथा 92.5 परमाणु [latex]_{ 3 }^{ 7 }{ Li }[/latex] के होंगे।
∴ 100 परमाणुओं का द्रव्यमान = (7.5 x 6.01512+ 92.5 x 7.01600) u
= (45,1134 + 648.98) u= 694.0934u
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei
= [latex]\frac { 694.0934 }{ 100 }[/latex]
= 6.940934u
≈ 6.94lu

(b) माना बोरॉन के दो समस्थानिकों की बहुलता क्रमश: x% तथा y% है, तब
x + y = 100  …….(1)
यदि बोरॉन के 100 परमाणु लिए जाएँ तो इनमें x परमाणु [latex]_{ 5 }^{ 10 }{ B }[/latex] के तथा y परमाणु [latex]_{ 5 }^{ 11 }{ B }[/latex] के होंगे।
∴ बोरॉन का परमाणु द्रव्यमान
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 1
या 10.811 x 100 = 10.01294 x + 11.00931 (100 – x) [∵ x + y = 100
⇒ 1081.1- 1100.931 = 10.012943x – 11.00931x
⇒ – 19.831 = – 0.99637x
∴ x = [latex]\frac { -19.831 }{ – 099837 }[/latex] =19.9
∴  y = 100- x = 100 – 19.9 = 80.1
अत: बोरॉन में [latex]_{ 5 }^{ 10 }{ B }[/latex] तथा [latex]_{ 5 }^{ 11 }{ B }[/latex] समस्थानिकों की बहुलता प्रतिशत क्रमश: 19.9 तथा 80.1 हैं।

प्रश्न 2.
नियॉन के तीन स्थायी समस्थानिकों की बहुलता क्रमशः 90.51%, 0.27% एवं 9.22% है। इन समस्थानिकों के परमाणु द्रव्यमान क्रमशः 19.99u 20.99u एवं 21.99u हैं। नियॉन का औसत परमाणु द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
हल:
यदि नियॉन के 100 परमाणु लिए जाएँ तो उनमें नियॉन के तीन समस्थानिकों के क्रमश: 90. परमाणु, 0.27 परमाणु तथा 9.22 परमाणु होंगे।
∴ नियॉन का औसत परमाणु द्रव्यमान
= [latex]\frac { (90.51x 19.99+ 0.27 x 20.99+ 9.22 x 21.99) u }{ 100 }[/latex]
= [latex]\frac { (1809.2949 + 5.6673 + 202.7478) u }{ 100 }[/latex]
= [latex]\frac { 2017.71 }{ 100 }[/latex]
= 20.177 u ≈ 20.18u

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प्रश्न 3.
नाइट्रोजन नाभिक ([latex]_{ 7 }^{ 14 }{ N }[/latex] ) की बन्धन-ऊर्जा MeV में ज्ञात कीजिए। mN = 14.00307u mH = 1.00783u, mn = 1.00867u]
हल:
[latex]_{ 7 }^{ 14 }{ N }[/latex] में प्रोटॉन = Z = 7 तथा न्यूट्रॉन
= (A – Z) = (14 – 7) = 7
न्यूक्लिऑनों का कुल द्रव्यमान = 7 x mH + 7 x mn
= (7 x 1.00783 +7 x 1.00867) u
= 14.1155 u
∴ द्रव्यमान क्षति
Δm = न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान –  [latex]_{ 7 }^{ 14 }{ B }[/latex] नाभिक का द्रव्यमान
= 14.11550 u – 14.00307 u = 0.11243 u
अतः बन्धन ऊर्जा EB = Δm के तुल्य ऊर्जा
= 0.11243 x 931 MeV
= 104.67 MeV (∵1u = 931 Mev)

प्रश्न 4:
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर [latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex]एवं [latex]_{ 83 }^{ 209 }{ Bi }[/latex] नाभिकों की बन्धन-ऊर्जा MeV
में ज्ञात कीजिए। m([latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex]) = 55.934939u, m ([latex]_{ 83 }^{ 209 }{ Bi }[/latex]) = 208:980388u
हल:
दिया है, प्रोटॉन का द्रव्यमान mH = 1.007825u
न्यूट्रॉन का द्रव्यमान mn= 1.008665u

(i) [latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex] नाभिक का द्रव्यमान mFe= = 55.934939u
इस नाभिक में 26 प्रोटॉन तथा (56 – 26) = 30 न्यूट्रॉन हैं।
∴ न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान = 26 mH + 30mn
= 26 x 1.007825 + 30 x 1.008665
= 26.20345 + 30.25995 = 56.4634u
∴ द्रव्यमान क्षति Δm = न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान – नाभिक का द्रव्यमान
= 56.4634 – 55.934939 = 0.528461u
∴ [latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex] नाभिक की बन्धन-ऊर्जा = Δm x 931 = 0.528461 x 931.5 MeV
= 492.26 MeV
∴ बन्धन-ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन = [latex]\frac { 492.26 }{ 56 }[/latex]
= 8.79 MeV/ न्यूक्लिऑन

(ii) [latex]_{ 83 }^{ 209 }{ Bi }[/latex] नाभिक का द्रव्यमान mBi= 208.980388u
इस नाभिक में 83 प्रोटॉन तथा 126 न्यूट्रॉन हैं।
∴ न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान = 83mH +126mn
= 83 x 1.007825 + 126 x 1.008665
= 83.649475+ 127.091790
= 210.741260 u
∴ नाभिक की द्रव्यमान-क्षति Δm = 210.741260 – 208.980388
= 1.760872u
∴ नाभिक की बन्धन ऊर्जा = Δm x 931.5 MeV
= 1.760872 x 931.5
= 1640.26 MeV
∴ बन्धन-ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन = [latex]\frac { 1640.26 }{ 209 }[/latex]= 7.85 MeV/ न्यूक्लिऑन

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प्रश्न 5:
एक दिए गए सिक्के का द्रव्यमान 3.0 g है। उस ऊर्जा की गणना कीजिए जो इस सिक्के के सभी न्यूट्रॉनों एव प्रोटॉनों को एक-दूसरे से अलग करने के लिए आवश्यक हो। सरलता के | लिए मान लीजिए कि सिक्का पूर्णतः [latex]_{ 29 }^{ 63 }{ Cu }[/latex] परमाणुओं का बना है। ([latex]_{ 29 }^{ 63 }{ Cu }[/latex] का द्रव्यमान = 82,92960u)।
हल:
[latex]_{ 29 }^{ 63 }{ Cu }[/latex] में प्रोटॉन (Z) = 29, न्यूट्रॉन = 63 – 29= 34
∴ न्यूक्लिऑनों का कुल द्रव्यमान
= 29 प्रोटॉनों का द्रव्यमान + 34 न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान
= (29 x 1.00783+ 34 x 1.00867) u = 63.52185 u
∴ द्रव्यमान क्षति Δm = न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान – [latex]_{ 29 }^{ 63 }{ Cu }[/latex] नाभिक का द्रव्यमान
= 63.52185 u – 62.92960 u = 0.59225 u
∴ [latex]_{ 29 }^{ 63 }{ Cu }[/latex] नाभिक की बन्धन ऊर्जा
EB = 0.53225 x 931 MeV = 551.385 MeV
m = 3.0 ग्राम में परमाणुओं (नाभिकों) की संख्या
= [latex]\frac { m }{ M }[/latex] x आवोगाद्रो संख्या
=  [latex]\frac { 3 }{ 63 }[/latex]  x 6.02 x 1023 = 2.86 x 1022
∴  सिक्के के सभी न्यूट्रॉनों तथा प्रोटॉनों को एक-दूसरे से अलग करने के लिए आवश्यक ऊर्जा
= 2.86 x 1022 x EB
= 2.86 x 1022 x 551.385 MeV
= 1.6 x 1025 MeV

प्रश्न 6:
निम्नलिखित के लिए नाभिकीय समीकरण लिखिए
(i) [latex]_{ 88 }^{ 226 }{ Ra }[/latex] का α- क्षय
(ii) [latex]_{ 94 }^{ 242 }{ Pu }[/latex] का α- क्षय
(iii) [latex]_{ 15 }^{ 32 }{ P }[/latex] P का β– – क्षय
(iv) [latex]_{ 210 }^{ 83 }{ Bi }[/latex] का β– -क्षय
(v) [latex]_{ 6 }^{ 11 }{ C }[/latex]  का β+ -क्षय
(vi)  [latex]_{ 43 }^{ 97 }{ Tc }[/latex]  Tc का β+ -क्षय
(vii) [latex]_{ 54 }^{ 120 }{ Xe }[/latex] 120Xe का इलेक्ट्रॉन अभिग्रहण
हल:
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प्रश्न 7:
एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की अर्धायु T वर्ष है। कितने समय के बाद इसकी ऐक्टिवता, प्रारम्भिक ऐक्टिवता की (a) 3.125%, तथा (b) 1% रह जाएगी।
हल:
(a) माना समस्थानिक की प्रारम्भिक रेडियोऐक्टिवता = R0
माना समयान्तराल n अद्धयुकालों के पश्चात् शेष रेडियोऐक्टिवता = R
प्रश्नानुसार, R =R0 का 3.125%
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प्रश्न 8:
जीवित कार्बनयुक्त द्रव्य की सामान्य ऐक्टिवता, प्रति ग्राम कार्बन के लिए 15 क्षय प्रति मिनट है। यह ऐक्टिवता, स्थायी समस्थानिक [latex]_{ 6 }^{ 14 }{ C }[/latex] के साथ-साथ अल्प मात्रा में विद्यमान रेडियोऐक्टिव [latex]_{ 6 }^{ 12 }{ C }[/latex] के कारण होती है। जीव की मृत्यु होने पर वायुमण्डल के साथ इसकी अन्योन्य क्रिया (जो उपर्युक्त सन्तुलित ऐक्टिवता को बनाए रखती है) समाप्त हो जाती है तथा इसकी ऐक्टिवता कम होनी शुरू हो जाती है।[latex]_{ 6 }^{ 14 }{ C }[/latex] की ज्ञात अर्धायु (5730 वर्ष) और (UPBoardSolutions.com) नमूने की मापी गई ऐक्टिवता के आधार पर इसकी सन्निकट आयु की गणना की जा सकती है। यही पुरातत्व विज्ञान में प्रयुक्त होने वाली [latex]_{ 6 }^{ 14 }{ C }[/latex] कालनिर्धारण (dating) पद्धति का सिद्धान्त है। यह मानकर कि मोहनजोदड़ो से प्राप्त किसी नमूने की ऐक्टिवता 9 क्षय प्रति मिनट प्रति ग्राम कार्बन है। सिन्धु घाटी सभ्यता की सन्निकट आयु का आकलन कीजिए।
हल:
दिया है, R0 = 15 क्षय प्रति मिनट
R = 9 क्षय प्रति मिनट, T1/2 = 5730 वर्ष
सूत्र R= R0e-λt से, 9 = 15e-λt
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प्रश्न 9:
8.0 mCi सक्रियता का रेडियोऐक्टिव स्रोत प्राप्त करने के लिए [latex]_{ 27 }^{ 60 }{ Co }[/latex]  की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी? [latex]_{ 27 }^{ 60 }{ Co }[/latex]  की अर्धायु 5.3 वर्ष है।
हल:
दिया है, सक्रियता R = 80 mCi= 80 x 10-3 x 3.7 x 1010 विघटन s-1
= 29.6 x 107 विघटन s-1
T1/2 = 5.3 वर्ष (∵ 1 क्यूरी = 3.7 x 1010 विघटन s-1)
= 5.3 x 365 x 24 x 60 x 60s
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प्रश्न 10:
[latex]_{ 38 }^{ 90 }{ Sr }[/latex] की अर्धायु 28 वर्ष है। इस समस्थानिक के 15 mg की विघटन दर क्या है?
हल:
दिया है, पदार्थ का द्रव्यमान = 15 x 10-3
तथा  T1/2 = 28 वर्ष = 28 x 365 x 24 x 60 x 60 s = 88.3 x 107s
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प्रश्न 11:
स्वर्ण के समस्थानिक [latex]_{ 79 }^{ 197 }{ Au }[/latex] एवं रजत के समस्थानिक [latex]_{ 47 }^{ 107 }{ Ag }[/latex] की नाभिकीय त्रिज्या के अनुपात का सन्निकट मान ज्ञात कीजिए।
हल:
किसी नाभिक की त्रिज्या निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्राप्त होती है
R =  R0A1/3
जहाँ A = परमाणु द्रव्यमान जबकि R0 = नियतांक
यहाँ [latex]_{ 79 }^{ 197 }{ Au }[/latex] के लिए, A1 = 197
तथा [latex]_{ 47 }^{ 107 }{ Ag }[/latex] के लिए, Ag = 107
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प्रश्न 12:
(a) [latex]_{ 88 }^{ 226 }{ Ra }[/latex] एवं (b) [latex]_{ 86 }^{ 220 }{ Rn }[/latex] नाभिकों के α-क्षय में उत्सर्जित -कणों का Q-मान एवं
गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
दिया है : m ([latex]_{ 88 }^{ 226 }{ Ra }[/latex]) = 226.02540u, m([latex]_{ 86 }^{ 220 }{ Rn }[/latex]) = 222.01750u
m([latex]_{ 86 }^{ 220 }{ Rn }[/latex]) = 220.01137u, m([latex]_{ 84 }^{ 216 }{ Po }[/latex]) = 216.00189u
हल:
(a) [latex]_{ 88 }^{ 226 }{ Ra }[/latex] का z-क्षय निम्न अभिक्रिया के अनुसार होगा
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प्रश्न 13:
रेडियोन्यूक्लाइड [latex]_{ 6 }^{ 11 }{ C }[/latex]का क्षय निम्नलिखित समीकरण के अनुसार होता है
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उत्सर्जित पॉजिट्रॉन की अधिकतम ऊर्जा 0.960 Mev है। द्रव्यमानों के निम्नलिखित मान दिए गए हैं
m( [latex]_{ 6 }^{ 11 }{ C }[/latex]) = 11.011434u तथा m( [latex]_{ 6 }^{ 11 }{ B }[/latex]) = 11.009305u
Q-मान की गणना कीजिए एवं उत्सर्जित पॉजिट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा के मान से इसकी तुलना कीजिए।
हल:
दिया गया समीकरण
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उत्सर्जित पॉजिट्रॉन की महत्तम गतिज ऊर्जा 0.960 MeV है जो कि Q-मान के तुल्य है।
∵ उत्पाद नाभिक पॉजिट्रॉन की तुलना में अत्यधिक भारी है; अत: इसकी गतिज ऊर्जा लगभग शून्य होगी, पुन: चूंकि पॉजिट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा Q – मान के तुल्य है; अतः न्यूट्रिनो भी लगभग शून्य ऊर्जा के साथ उत्सर्जित होगा।

प्रश्न 14:
[latex]_{ 10 }^{ 23 }{ Ne }[/latex] का नाभिक, β– उत्सर्जन के साथ क्षयित होता है। इस β-क्षय के लिए समीकरण लिखिए और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
m ([latex]_{ 10 }^{ 23 }{ Ne }[/latex]) = 22.994466 um([latex]_{ 10 }^{ 23 }{ Na }[/latex]) = 22.089770u
हल:
[latex]_{ 10 }^{ 23 }{ Ne }[/latex]  नाभिक के β-क्षय का समीकरण निम्नलिखित है
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∵  [latex]_{ 10 }^{ 23 }{ Ne }[/latex]  नाभिक,  [latex]_{ +1 }^{ 0 }{ \beta }[/latex]  तथा ऐन्टिन्यूट्रिनो की तुलना में अत्यधिक भारी है; अत: इसकी गतिज ऊर्जा लगभग शून्य होगी। β-कण की ऊर्जा अधिकतम होगी यदि ऐन्टिन्यूट्रिनो शून्य ऊर्जा के साथ उत्सर्जित हो। इस (UPBoardSolutions.com) दशा में β-कण की ऊर्जा अधिकतम होगी यदि ऐन्टिन्यूट्रिनो शून्य ऊर्जा के साथ उत्सर्जित हो। इस दशा में β-कण की अधिकतम ऊर्जा ९ मान के बराबर अर्थात् 4.37 MeV होगी।

प्रश्न 15:
किसी नाभिकीय अभिक्रिया A+b→ C+d का Q-मान निम्नलिखित समीकरण द्वारा परिभाषित होता है: Q= [mA +mb – mc – md] c2
जहाँ दिए गए द्रव्यमान, नाभिकीय विराम द्रव्यमान (rest mass) हैं। दिए गए आँकड़ों के आधार पर बताइए कि निम्नलिखित अभिक्रियाएँ ऊष्माक्षेपी हैं या ऊष्माशोषी।
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हल:
(i) दी गई अभिक्रिया निम्नलिखित है
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Q-मान धनात्मक है; अत: यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है।

प्रश्न 16:
माना कि हम [latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex] नाभिक के दो समान अवयवों [latex]_{ 13 }^{ 28 }{ Al }[/latex] में विखण्डन पर विचार करें।
क्या ऊर्जा की दृष्टि से यह विखण्डन सम्भव है? इस प्रक्रम का Q-मान ज्ञात करके अपना तर्क प्रस्तुत करें।
दिया है : m([latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex]) = 55.93494u एवं m([latex]_{ 13 }^{ 28 }{ Al }[/latex]) = 27.98191u
हल:
[latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex]  → [latex]_{ 13 }^{ 28 }{ Al }[/latex] + [latex]_{ 13 }^{ 28 }{ Al }[/latex]+Q
∴ Q = [m( [latex]_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }[/latex]) – 2 x m ([latex]_{ 13 }^{ 28 }{ Al }[/latex])]x 931 MeV
= [55.93494- 2x 27.98191]x 931 MeV
= -26.92 MeV
चूँकि Q का मान ऋणात्मक है अतः विखण्डन सम्भव नहीं है।

प्रश्न 17:
[latex]_{ 94 }^{ 239 }{ Pu }[/latex] के विखण्डन गुण बहुत कुछ [latex]_{ 92 }^{ 235 }{ U }[/latex] से मिलते-जुलते हैं। प्रति विखण्डन विमुक्त औसत ऊर्जा 180 MeV है। यदि 1kg शुद्ध [latex]_{ 94 }^{ 239 }{ Pu }[/latex] के सभी परमाणु विखण्डित हों तो कितनी MeV ऊर्जा विमुक्त होगी?
हल:
यहाँ [latex]_{ 94 }^{ 239 }{ Pu }[/latex]के विखण्डन से मुक्त ऊर्जा = 180 MeV
[latex]_{ 94 }^{ 239 }{ Pu }[/latex] का ग्राम परमाणु द्रव्यमान = 239g
∴ [latex]_{ 94 }^{ 239 }{ Pu }[/latex]प्लूटोनियम में उपस्थित परमाणुओं की संख्या = 6.02 x 1023
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प्रश्न 18:
किसी 1000 MW विखण्डन रिएक्टर के आधे ईधन का 5.00 वर्ष में व्यय हो जाता है। प्रारम्भ में इसमें कितना [latex]_{ 92 }^{ 235 }{ U }[/latex] था? मान लीजिए कि रिएक्टर 80% समय कार्यरत रहता है, इसकी सम्पूर्ण ऊर्जा [latex]_{ 92 }^{ 235 }{ U }[/latex]  के विखण्डन से ही उत्पन्न हुई है; तथा [latex]_{ 92 }^{ 235 }{ U }[/latex] एन्यूक्लाइड केवल विखण्डन प्रक्रिया में ही व्यय होता है।
हल:
रिएक्टर की शक्ति P= 1000 MW = 1000 x 106 Js-1= 109 Js-1
समय t = 5.0 वर्ष = 5 x 365 x 24 x 60 x 60s
= 1.577 x 108 s
∴ 5 वर्ष में रिएक्टर में उत्पन्न ऊर्जा (जबकि यह 80% समय ही कार्य करता है)
E = 80% t x P
= [latex]\frac { 80 }{ 100 }[/latex] x 1.577 x 108 x 169
: = 1.2616 x 1017J
∵ [latex]^{ 235 }{ U }[/latex] के एक परमाणु के विखण्डन से औसतन 200 MeV ऊर्जा उत्पन्न होती है।
∴ 100 MeV ऊर्जा उत्पन्न होती है = 1 परमाणु से
या 200 x 1.6 x 10-13J ऊर्जा उत्पन्न होती है = 1 परमाणु से
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प्रश्न 19:
2.0 kg ड्यूटीरियम के संलयन से एक 100 वाट का विद्युत लैम्प कितनी देर प्रकाशित रखा जा सकता है? संलयन अभिक्रिया निम्नवत् ली जा सकती है।
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हल:
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प्रश्न 20:
दो ड्यूट्रॉनों के आमने-सामने की टक्कर के लिए कूलॉम अवरोध की ऊँचाई ज्ञात कीजिए। (संकेत-कूलॉम अवरोध की ऊँचाई का मान इन ड्यूट्रॉन के बीच लगने वाले उस कूलॉम प्रतिकर्षण बल के बराबर होता है जो एक-दूसरे को सम्पर्क में रखे जाने पर उनके बीच आरोपित होता है। (UPBoardSolutions.com) यह मान सकते हैं कि ड्यूट्रॉन 2.0 fm प्रभावी त्रिज्या वाले दृढ़ गोले हैं।)
हल:
प्रत्येक ड्यूट्रॉन पर आवेश
q1 = q2 = +1.6 x 10-19C
ऊर्जा के पदों में कुलॉम अवरोध (विभव प्राचीर)
माना प्रारम्भ में प्रत्येक ड्यूट्रॉन की गतिज ऊर्जा K है। जब ये दोनों एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तो सम्पूर्ण ऊर्जा विद्युत स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है। ∴ ऊर्जा संरक्षण से,
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प्रश्न 21:
समीकरण R= R0A1/3 के आधार पर, दर्शाइए कि नाभिकीय द्रव्य को घनत्व लगभग अचर है (अर्थात् A पर निर्भर नहीं करता है)। यहाँ R0 एक नियतांक है एवं A नाभिक की द्रव्यमान संख्या है।
हल:
∵  नाभिक की द्रव्यमान संख्या = A
∴ नाभिक का द्रव्यमान m = Au
= A x 1.66 x 10-27kg
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∵ यह घनत्व नाभिक की द्रव्यमान संख्या A से मुक्त है; अत: हम कह सकते हैं कि नाभिकीय द्रव्य का , घनत्व लगभग अचर है।।

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प्रश्न 22:
किसी नाभिक से β+ (पॉजिट्रॉन) उत्सर्जन की एक अन्य प्रतियोगी प्रक्रिया है जिसे इलेक्ट्रॉन परिग्रहण (Capture) कहते हैं (इसमें परमाणु की आन्तरिक कक्षा, जैसे कि K-कक्षा, से नाभिक एक इलेक्ट्रॉन परिगृहीत कर लेता है और एक न्यूट्रिनो, ν उत्सर्जित करता है)।
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दर्शाइए कि यदि β+ उत्सर्जन ऊर्जा विचार से अनुमत है तो इलेक्ट्रॉन परिग्रहण भी आवश्यक रूप से अनुमत है, परन्तु इसका विलोम अनुमत नहीं है।
हल:
पॉजिट्टॉन उत्सर्जन की अभिक्रिया का समीकरण निम्नलिखित है
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समीकरण (3) व (4) से स्पष्ट है। यदि पॉजिट्रॉन उत्सर्जन [अभिक्रिया (1)] ऊर्जा दृष्टि से अनुमत है तो इस अभिक्रिया का Q-मान अर्थात्
Q1 धनात्मक होगी।
अर्थात्   Q1 > 0
Q2 > Q1  अतः Q1 > 0 ⇒ Q1  > 0
अर्थात् तब अभिक्रिया (2) का -मान भी धनात्मक होगा अर्थात् ऊर्जा दृष्टि से इलेक्ट्रॉन परिग्रहण भी अनुमत है।
अब इस अभिक्रिया के विलोम पर विचार कीजिए,
स्पष्ट है कि इस अभिक्रिया का Q-मान – Q2 के बराबर होगा।
∴ Q2> 0; अतः Q3 =-Q2 < 0
∵  इस अभिक्रिया का 2-मान ऋणात्मक है; अतः यह अभिक्रिया ऊर्जा दृष्टि से अनुमत नहीं है।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 23:
आवर्त सारणी में मैग्नीशियम का औसत परमाणु द्रव्यमान 24.312u दिया गया है। यह औसत मान, पृथ्वी पर इसके समस्थानिकों की सापेक्ष बहुलता के आधार पर दिया गया है। मैग्नीशियम के तीनों समस्थानिक तथा उनके द्रव्यमान इस प्रकार हैं
[latex]_{ 12 }^{ 24 }{ Mg }[/latex](28.98504u), [latex]_{ 12 }^{ 25 }{ Mg }[/latex](24.98584) एवं [latex]_{ 12 }^{ 26 }{ Mg }[/latex](25.98259u)। प्रकृति में प्राप्त मैग्नीशियम में [latex]_{ 12 }^{ 24 }{ Mg }[/latex] की (द्रव्यमान के अनुसार) बहुलता 78.99% है। अन्य दोनों समस्थानिकों की बहुलता का परिकलन कीजिए।
हल:
दिया है, मैग्नीशियम का औसत परमाणु द्रव्यमान = 24.312u
[latex]_{ 12 }^{ 24 }{ Mg }[/latex] समस्थानिक की बहुलता = 78.99%
माना समस्थानिक [latex]_{ 12 }^{ 25 }{ Mg }[/latex] की बहुलता a% है।
[latex]_{ 12 }^{ 26 }{ Mg }[/latex] समस्थानिक की बहुलता = 100 – 78.99- a
= (21.01 – a) %
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प्रश्न 24:
न्यूट्रॉन पृथक्करण ऊर्जा (Separation energy), परिभाषा के अनुसार वह ऊर्जा है, जो किसी नाभिक से एक न्यूट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक होती है। नीचे दिए गए  आँकड़ों का इस्तेमाल करके [latex]_{ 20 }^{ 41 }{ Ca }[/latex]एवं [latex]_{ 13 }^{ 27 }{ Al }[/latex] नाभिकों की न्यूट्रॉन पृथक्करण ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
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हल:
[latex]_{ 20 }^{ 41 }{ Ca }[/latex]  की न्यूट्रॉन पृथक्करण ऊर्जा
न्यूट्रॉन पृथक्करण अभिक्रिया का समीकरण निम्नलिखित है
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∴ Qका मान ऋणात्मक है अर्थात् उक्त अभिक्रिया ऊष्माशोषी है।
∴ न्यूट्रॉन पृथक्करण ऊर्जा 8.36 MeV है।

(ii) [latex]_{ 13 }^{ 27 }{ A }[/latex]  की न्यूट्रॉन पृथक्करण ऊर्जा
[latex]_{ 13 }^{ 27 }{ A }[/latex] की न्यूट्रॉन पृथक्करण समीकरण निम्नलिखित है
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∴ Q का मान ऋणात्मक है; अत: उक्त अभिक्रिया ऊष्माशोषी है।
∴ [latex]_{ 13 }^{ 27 }{ A }[/latex] की न्यूट्रॉन पृथक्करण ऊर्जा 13.06 MeV है।

प्रश्न 25:
किसी स्रोत में फॉस्फोरस के दो रेडियो न्यूक्लाइड निहित हैं [latex]_{ 15 }^{ 32 }{ P }[/latex](T1/2 = 14.3d) एवं [latex]_{ 15 }^{ 33 }{ P }[/latex](1/2 = 25.3d)। प्रारम्भ में [latex]_{ 15 }^{ 33 }{ P }[/latex] से 10% क्षय प्राप्त होता है। इससे 90% क्षय प्राप्त करने के लिए कितने समय प्रतीक्षा करनी होगी?
हल:
माना प्रारम्भ में [latex]_{ 15 }^{ 33 }{ P }[/latex] तथा [latex]_{ 15 }^{ 32 }{ P }[/latex] को रेडियोऐक्टिवताएँ R01 व R02 हैं तथा । समय पश्चात् इनकी रेडियोऐक्टिवताएँ R1 व R2 हैं।
तब प्रारम्भ में, पदार्थ की कुल सक्रियता = R01 + R02

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प्रश्न 26:
कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में एक नाभिक, α -कण से अधिक द्रव्यमान वाला एक कण उत्सर्जित करके क्षयित होता है। निम्नलिखित क्षय-प्रक्रियाओं पर विचार कीजिए
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इन दोनों क्षय प्रक्रियाओं के लिएQ-मान की गणना कीजिए और दर्शाइए कि दोनों प्रक्रियाएँ ऊर्जा की दृष्टि से सम्भव हैं।
हल:
दी गई समीकरण निम्नलिखित है
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प्रश्न 27:
तीव्र न्यूट्रॉनों द्वारा [latex]_{ 92 }^{ 238 }{ U }[/latex] के विखण्डन पर विचार कीजिए। किसी विखण्डन प्रक्रिया में प्राथमिक अंशों (Primary fragments) के बीटा-क्षय के पश्चात कोई न्यूट्रॉन उत्सर्जित नहीं होता तथा [latex]_{ 58 }^{ 140 }{ P }[/latex] तथा [latex]_{ 34 }^{ 99 }{ Ru }[/latex] अन्तिम उत्पाद प्राप्त होते हैं। विखण्डन प्रक्रिया के लिए के मान का परिकलन कीजिए। आवश्यक आँकड़े इस प्रकार हैं
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हल:
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प्रश्न 28:
D.T अभिक्रिया (ड्यूटीरियम-ट्राइटियम संलयन), [latex]_{ 1 }^{ 2 }{ H }[/latex]+ [latex]_{ 1 }^{ 3 }{ H }[/latex] → [latex]_{ 2 }^{ 4 }{ He }[/latex] + n पर विचार कीजिए।
(a) नीचे दिए गए आँकड़ों के आधार पर अभिक्रिया में विमुक्त ऊर्जा का मान Mev में ज्ञात कीजिए।
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(b) इयूटीरियम एवं ट्राइटियम दोनों की त्रिज्या लगभग 1.5 fm मान लीजिए। इस अभिक्रिया में, दोनों नाभिकों के मध्य कूलॉम प्रतिकर्षण से पार पाने के लिए कितनी गतिज ऊर्जा की आवश्यकता है? अभिक्रिया प्रारम्भ करने के लिए गैसों (0 तथा 1 गैसें) को किस ताप तक ऊष्मित कि(UPBoardSolutions.com) या जाना चाहिए?
(संकेत : किसी संलयन क्रिया के लिए आवश्यक गतिज ऊर्जा = संलयन क्रिया में संलग्न कणों की औसत तापीय गतिज ऊर्जा = 2 (3KT/2); K:  बोल्ट्ज़मान नियतांक तथा T = परम ताप)
हल:
(a) दी गई अभिक्रिया का समीकरण निम्नलिखित है
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प्रश्न 29:
नीचे दी गई क्षय-योजना में, γ-क्षयों की विकिरण आवृत्तियाँ एवं β-कणों की अधिकतम गतिज ऊर्जाएँ ज्ञात कीजिए। दिया है:
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हल:
चित्र से, E1 = [latex]_{ 80 }^{ 198 }{ Hg }[/latex] की निम्नतम ऊर्जा स्तर में ऊर्जा = 0 MeV
E2 = [latex]_{ 80 }^{ 198 }{ Hg }[/latex] की प्रथम उत्तेजित अवस्था में ऊर्जा = 0.412 MeV
E3 = [latex]_{ 80 }^{ 198 }{ Hg }[/latex] की द्वितीय उत्तेजित अवस्था में ऊर्जा = 1.088 MeV
माना उत्सर्जित γ फोटॉनों (γ1,γ2 व γ3) की आवृत्तियाँ क्रमशः ν1,ν2 व ν3 हैं।
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जबकि इन फोटॉनों की ऊर्जाएँ निम्नलिखित हैं
E (γ1) = E3 – E1 = 1.088 MeV
E (γ2)= E2– E1 = 0.412 Mev
E (γ3) = E3 – E2 = 1.088- 0.412 = 0.676 MeV
[latex]_{ 79 }^{ 198 }{ Au }[/latex] के β–1-क्षय में Au नाभिक पहले एक β कण उत्सर्जित करता है तत्पश्चात् γ1-फोटॉन को । उत्सर्जित करके  [latex]_{ 80 }^{ 198 }{ Hg }[/latex] नाभिक में बदल जाता है; अतः
[latex]_{ 79 }^{ 198 }{ Au }[/latex] के β–1-क्षय का समीकरण निम्नलिखित है
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यहाँ E(β–1) तथा E (γ1) इन कणों की ऊर्जाएँ हैं। स्पष्ट है कि E(β–1) का मान अधिकतम होगा यदि [latex]_{ 80 }^{ 198 }{ Hg }[/latex] की गतिज ऊर्जा शून्य हो। अर्थात् अभिक्रिया की सम्पूर्ण ऊर्जा केवल β-कण तथा γ-कोटॉन की ऊर्जा के रूप में निकलें।।
∴  β -कण की महत्तम गतिज ऊर्जा
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[latex]_{ 79 }^{ 198 }{ Au }[/latex] के β–2क्षय में Au नांभिक पहले β-कण उत्सर्जित करता है तत्पश्चात् γ2 फोटॉन उत्सर्जित करता हुआ [latex]_{ 80 }^{ 198 }{ Hg }[/latex]नाभिक में बदल जाता है।
इसे क्षय का समक्रण निम्नलिखित है
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प्रश्न 30:
सूर्य के अभ्यंतर में (a) 1kg हाइड्रोजन के संलयन के समय विमुक्त ऊर्जा का परिकलन कीजिए। (b) विखण्डन रिएक्टर में 1.0 kg [latex]^{ 235 }{ U }[/latex] के विखण्डन में विमुक्त ऊर्जा का परिकलेन कीजिए। (c) प्रश्न के खण्ड (a) तथा (b) में विमुक्त ऊर्जाओं की तुलना
कीजिए।
हल:
(a) सूर्य के अभ्यन्तर में हाइड्रोजन के 4 परमाणु निम्नलिखित अभिक्रिया के अनुसार संलयित होकर हीलियम परमाणु का निर्माण करते हैं तथा लगभग 26 Mev ऊर्जा उत्पन्न होती है।
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प्रश्न31:
मान लीजिए कि भारत का लक्ष्य 2020 तक200,000 MW विद्युत शक्ति जनन का है। इसका 10% नाभिकीय शक्ति संयंत्रों से प्राप्त होना है। माना कि रिएक्टर की औसत उपयोग दक्षता (ऊष्मा को विद्युत में परिवर्तित करने की क्षमता) 25% है। 2028 के अन्त तक हमारे देश को प्रति वर्ष कितने विखण्डनीय यूरेनियम की आवश्यकता होगी। [latex]^{ 235 }{ U }[/latex] प्रति विखण्डन उत्सर्जित ऊर्जा 200 MeV है।
हल:
कुल ऊर्जा लक्ष्य = 200,000 MW
∴  नाभिकीय संयंत्रों से प्राप्त शक्ति = 10% x 200,000 MW
= [latex]\frac { 10 }{ 100 }[/latex] x 200,000 x 106w
= 2 x 1010w
∴ प्रतिवर्ष नाभिकीय संयंत्रों से प्राप्त ऊर्जा = 2 x 1010Js-1x 1 x 365 x 24 x 60 x 60s
= 6.31 x 1017 J
माना संयंत्रों में विखण्डन हेतु x kg [latex]^{ 235 }{ U }[/latex] की प्रतिवर्ष आवश्यकता होती है।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1:
1 amu के तुल्य ऊर्जा है (2009, 16, 17) 
(i) 190 MeV
(ii) 139 MeV
(iii) 913 MeV
(iv) 931 MeV
उत्तर:
(iv) 931 MeV

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प्रश्न 2:
हीलियम के नाभिक के लिए द्रव्यमान क्षति 0.0303 amu है। इसके लिए Mev में प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा लगभग होगी (2011)
(i) 28
(ii) 7
(ii) 4
(iv) 1
उत्तर:
(i) 28

प्रश्न 3:
हाइड्रोजन नाभिक की बन्धन ऊर्जा है (2017)
(i) -13.6 eV
(ii) 0
(iii) 13.6 eV
(iv) 6.8 eV
उत्तर:
(ii) 0

प्रश्न 4.
न्यूक्लियर बल की प्रकृति है (2011)
(i) विद्युतीय
(ii) चुम्बकीय :
(iii) गुरुत्वीय
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(iv) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5. निम्न में से समन्यूट्रॉनिक युग्म होंगे (2012)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 20
उत्तर:
(i) 6c14 तथा 8016

प्रश्न 6:
दो परमाणुओं के परमाणु क्रमांक समान परन्तु परमाणु द्रव्यमान भिन्न हैं। वे होंगे (2011, 14)
(i) समस्थानिक
(ii) समभारिक
(iii) समन्यूट्रॉनिक
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(i) समस्थानिक

प्रश्न 7:
वे नाभिक जिनके लिए A तथा zभिन्न परन्तु (A-Z) समान होता है, कहलाते हैं
(i) समस्थानिक
(ii) समप्रोटॉनिक
(iii) समन्यूट्रॉनिक
(iv) समभारिक
उतर:
(iii) समन्यूट्रॉनिक

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प्रश्न 8:
दी गई नाभिकीय अभिक्रिया में X प्रदर्शित करता है (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 21
(i) इलेक्ट्रॉन
(ii) न्यूट्रॉन
(iii) न्यूट्रीनो
(iv) प्रोटॉन
उत्तर:
(iii) न्यूट्रीनो

प्रश्न 9:
किसी नाभिक से-किरणें उत्सर्जित होने पर परिवर्तित होती है (2017)
(i) प्रोटॉन संख्या
(ii) न्यूट्रॉन संख्या
(iii) प्रोटॉन व न्यूट्रॉन दोनों की संख्या
(iv) न प्रोटॉन और न ही न्यूट्रॉन की संख्या
उत्तर:
(iv) न प्रोटॉन और न ही न्यूट्रॉन की संख्या

प्रश्न 10:
………… के क्षय के कारण तत्व परिवर्तित नहीं होता है। (2017)
(i) γ -किरण
(ii) β -किरण
(iii) β+ किरण
(iv) α -किरण
उत्तर:
(i) किरण

प्रश्न 11:
कण जो 92U228 के नाभिक में नहीं उपस्थित हैं (2017)
(i) 92 प्रोटॉन
(ii) 92 इलेक्ट्रॉन
(iii) 146 न्यूट्रॉन
(iv) 238 न्यूक्लिऑन
उतर:
(ii) 92 इलेक्ट्रॉन

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प्रश्न 12:
यदि 5 वर्ष अर्द्ध-आयु के पदार्थ का प्रारम्भिक द्रव्यमान N0 है तो 15 वर्ष बाद पदार्थ का अन्तिम द्रव्यमान है (2014)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 22
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 23

प्रश्न 13:
एक रेडियोऐक्टिव पदार्थ अपनी औसत आयु के बराबर समयान्तराल के लिए विघटित होता है। इसका कितना अंश विघटित होगा? (2012)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 24
उतर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 25

प्रश्न 14:
एक रेडियोऐक्टिव नाभिक 81X237  तीन α-कण तथा एक β-कण उत्सर्जित करता है। प्राप्त नाभिक है (2013)
(i) 76Y225
(ii) 78Y225
(ii) 80Y229
(iv) 82Y230
उत्तर:
(i) 76Y225

प्रश्न 15:
रेडियोऐक्टिव पदार्थ उत्सर्जित नहीं करते हैं (2013)
(i) इलेक्ट्रॉन
(ii) प्रोटॉन
(iii) γ -किरणें
(iv) हीलियम नाभिक
उत्तर:
(ii) प्रोटॉन

प्रश्न 16:
Bi20 की अर्द्ध-आयु 5 दिन है। इसके किसी नमूने के 8 भागों में से 7 भागों के क्षय होने में समय लगता है
(i) 3.4 दिन
(ii) 10 दिन
(iii) 15 दिन
(iv) 20 दिन
उत्तर:
(iii) 15 दिन

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प्रश्न 17:
रेडियोऐक्टिव विघटन में 9a0238 का नाभिक giPa234 में बदल जाता है। इस विघटन के दौरान उत्सर्जित कण है (2010)
(i) एक प्रोटॉन एवं एक न्यूट्रॉन
(ii) एक ऐल्फा कण एवं एक बीटा कण
(iii) दो बीटा कण एवं एक न्यूट्रॉन
(iv) दो बीटा कण एवं एक प्रोटॉन
उत्तर:
(ii) एक ऐल्फा कण एवं एक बीटा कण

प्रश्न 18:
प्रकाश तरंगों की प्रकृति समान होती है (2010)
(i) कैथोड किरणों के
(ii) β-किरणों के
(iii) γ-किरणों के
(iv) α-किरणों के
उत्तर:
(iii) γ-किरणों के

प्रश्न 19:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ के निश्चित द्रव्यमान में 20 घण्टे में 75% की कमी हो जाती है। उसकी अर्द्ध-आयु होगी  (2011)
(i) 5 घण्टे
(ii) 10 घण्टे
(iii) 15 घण्टे
(iv) 20 घण्टे
उत्तर:
(ii) 10 घण्टे

प्रश्न 20:
रेडियम की अर्द्ध-आयु 1600 वर्ष है। वह समय जब 100 ग्राम रेडियम से 25 ग्राम, रेडियम अविघटित रह जाता है, है (2010)
(i) 2400 वर्ष
(ii) 3200 वर्ष
(iii) 4800 वर्ष
(iv) 6400 वर्ष
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 21:
एक रेडियोऐक्टिव पदार्थ का क्षय नियतांक 3,465  x 10-4 प्रति वर्ष है। इसकी लगभग अर्द्ध-आयु है (2015)
(i) 2000 वर्ष
(ii) 2400 वर्ष
(iii) 2600 वर्ष
(iv) 6300 वर्ष
उत्तर:
(i) 2000 वर्ष

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प्रश्न 22:
सूर्य की विकिरण ऊर्जा का स्रोत है (2015)
(i) नाभिकीय विखण्डन
(iii) प्रकाश-वैद्युत प्रभाव
(ii) साइक्लोट्रॉन
(iv) नाभिकीय संलयन
उत्तर:
(iv) नाभिकीय संलयन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
हाइड्रोजन के तीनों आइसोटोपों (समस्थानिकों) के नाम व सूत्र लिखिए। (2011)
उत्तर:
हाइड्रोजन (1H1), ड्यूटीरियम (1H2), ट्राइटीयम (1H3)

प्रश्न 2:
उन परमाणुओं को, जिनके नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या समान हो परन्तु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न हो, को क्या नाम दिया गया है ? (2011)
उत्तर:
समस्थानिक अथवा समप्रोटॉनिक।

प्रश्न 3:
समन्यूट्रॉनिक से आप क्या समझते हैं? उदाहरण दीजिए। (2017)
उत्तर:
ऐसे नाभिक जिनमें केवल न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है, समन्यूट्रॉनिक कहलाते
उदाहरणार्थ  1H3, 2He4, 3Li7, 4Be8

प्रश्न 4:
नाभिकीय क्रिया की उस समीकरण को लिखिए जिसका सम्बन्ध प्रोटॉन की खोज से है। या प्रोटॉन की खोज सम्बन्धी समीकरण लिखिए। (2013)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 26

प्रश्न 5:
लीथियम नाभिक का प्रतीक 3Li7 है। इसके नाभिक में कितने प्रोटॉन तथा कितने न्यूट्रॉन हैं ?(2011)
हल:
प्रोटॉनों की संख्या = Z = 3
न्यूट्रॉनों की संख्या = A – Z = 7 – 3= 4

प्रश्न 6:
निम्नलिखित नाभिकीय क्रिया को पूरा कीजिए (2013)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 27
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 28

प्रश्न 7:
7N14 पर -कण की बमबारी करने पर 8O17 बनता है। कौन-सा कण उत्सर्जित होता है? अभिक्रिया लिखकर बताइए। (2013)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 8:
निम्नलिखित नाभिकीय क्रियाओं को पूरा कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 29
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 30
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 9:
यदि प्रकाश की चाल वर्तमान चाल की दोगुनी हो जाए, तो नाभिक की बन्धन ऊर्जा कितनी हो जाएगी? (2012)
उत्तर:
नाभिक की बन्धुन ऊर्जा = द्रव्यमान क्षति x c²
अतः बन्धन ऊर्जा चार गुनी हो जायेगी।

प्रश्न 10:
जब तीन α -कण जुड़कर कार्बन नाभिक 6C12  बनाते हैं तो उत्पन्न ऊर्जा की गणना कीजिए। 2He4 को परमाणु द्रव्यमान 4.002803 amu है।
(2014)
हल:
कार्बन नाभिक 6C12  का द्रव्यमान = 12u
अभिक्रिया 3 ( 2He4 )- 6C12  में निर्गत् ऊर्जा
= [3m (2He4)- m (6C12)] c2
= [3 x 4.002603u – 12u] (931 MeV/4)
= 7.27 MeV/u

प्रश्न 11:
1 मिलीग्राम द्रव्यमान क्षति से कितने जूल ऊर्जा मुक्त होगी? (2013, 15)
हल:
Δm = 1 मिलीग्राम = 1 x 10-6 kg
मुक्त ऊर्जा = Δm x c2= 1 x 10-6 x (3 x 108)2
= 9 x 1010 जूल।

प्रश्न 12:
1.0 किग्रा हाइड्रोजन के हीलियम में परिवर्तन से उत्पन्न ऊर्जा का मान किलोवाट घण्टा में प्राप्त कीजिए। इस प्रक्रिया में द्रव्यमान क्षति 0.4है। (2012)
हल:
m = 1.0 किग्रा ।
द्रव्यमान क्षति Δm= 1 किग्रा का 0.4% = 0.004 किग्रा
उत्पन्न उर्जा ΔE = (Δm) c² = 0.004 x (3 x 108)2
= 0.036 x 1016 = 3.6 x 1014 जूल
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 31

प्रश्न 13:
हीलियम (2He4) नाभिक की प्रति न्यूक्लीऑन बन्धन ऊर्जा 7.0756 Mev है। नाभिक के लिए द्रव्यमान क्षति की गणना कीजिए। (2012)
हल:
नाभिक की कुल बन्धन ऊर्जा = प्रति न्यूक्लीऑन बन्धन ऊर्जा x द्रव्यमान संख्या
= 7.0756 x 4 = 28.3024 MeV
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 14:
यदि प्रकाश की चाल 108 मी/से हो जाए, तो किसी नाभिक की बन्धन ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (2013)
हल:
नाभिक की बन्धन ऊर्जा = द्रव्यमान क्षति x c2
= Δm x (3 x 108)2 मी/से
= 9 x 1016Am जूल   [∵ c = 3×108 मी/से]
जब c = 108 मी/से
तब बन्धन ऊर्जा = Δm x (108) जूल = Δm x 1016 जूल
अर्थात नाभिक की बन्धन ऊर्जा [latex]\frac { 1 }{ 9 }[/latex] हो जायेगी।

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प्रश्न 15:
हीलियम नाभिक की द्रव्यमान क्षति 0.0303 amu है। प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा की गणना कीजिए। (2014)
हल:
हीलियम नाभिक की बन्धन ऊर्जा = 0.0303×931 = 28.20 MeV
प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा = [latex]\frac { 28.20 }{ 4 }[/latex]  = 7.05 MeV

प्रश्न 16:
क्यूरी की परिभाषा दीजिए।
या
क्यूरी किस भौतिक राशि का मात्रक है? क्यूरी का मान कितना है? (2013)
उत्तर:
क्यूरी (Curie): यह रेडियोऐक्टिव पदार्थ की सक्रियता का मात्रक है। इसको इस प्रकार परिभाषित किया जाता है
“यदि किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ में 3.7 x 1010 विघटन प्रति सेकण्ड होते हैं, तो उस पदार्थ की सक्रियता 1 क्यूरी होगी।”
अर्थात् 1 क्यूरी = 3.7 x 1010

प्रश्न 17:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ की अर्द्ध-आयु से क्या तात्पर्य है? (2012, 15)
उत्तर:
अर्द्ध-आयु-वह समय अन्तराल जिसके अन्तर्गत किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ की मात्रा अर्थात् उसके परमाणुओं (नाभिकों) की संख्या रेडियोऐक्टिव क्षय के फलस्वरूप घटकर अपने प्रारम्भिक मान की आधी रह जाती है, उस रेडियोऐक्टिव पदार्थ की अर्द्ध-आयु कहलाता है। इसको T से प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 18:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ के क्षय नियतांक की परिभाषा लिखिए। (2012)
उत्तर:
किसी क्षण रेडियोऐक्टिव पदार्थ के परमाणुओं के क्षय होने की दर [  ([latex]\frac { dN }{ dt }[/latex] ) ]  तथा उस क्षण पदार्थ में विद्यमान परमाणुओं की संख्या (N) के अनुपात को उस रेडियोऐक्टिव पदार्थ का क्षय नियतांक (λ) कहते हैं।

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प्रश्न 19:
रेडियोऐक्टिव क्षय का नियम क्या है? (2014, 17)
उत्तर:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ के परमाणुओं से α- अथवा β- कण तथा γ-किरणें निकलती रहती हैं। इससे परमाणु का भार तथा क्रमांक बदल जाते हैं। इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) प्रारम्भिक रेडियोऐक्टिव परमाणु का क्षय हो जाता है तथा किसी नये तत्त्व के परमाणु का जन्म हो जाता है। इस घटना को रेडियोऐक्टिव क्षय कहते हैं।

प्रश्न 20:
एक रेडियोऐक्टिव परमाणु ZXA पहले β-कण उत्सर्जित करता है तत्पश्चात् एक γ-फोटॉन उत्सर्जित करता है। प्राप्त नये परमाणु का परमाणु क्रमांक एवं परमाणु द्रव्यमान लिखिए। (2017)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 32

प्रश्न 21:
8Po210  एक ऐल्फा-कण उत्सर्जित करके सीसे (Pb) में बदल जाता है। इस रेडियोऐक्टिव क्षय की समीकरण दीजिए।
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 33

प्रश्न 22:
(i) एक रेडियोऐक्टिव तत्त्व की अर्द्ध-आयु 3 घण्टे है। 9 घण्टे पश्चात इसकी सक्रियता की गणना कीजिए।
(ii) चार अर्द्ध-आयुओं के बाद किसी रेडियोऐक्टिव तत्त्व की सक्रियता, प्रारम्भिक सक्रियता के पदों में क्या होगी? (2012)
या
4 अर्द्ध-आयुओं के पश्चात् किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ की कितनी मात्रा अवशेष रह जायेगी ? (2013)
हल:
(i) T = 3 घण्टा तथा t = 9 घण्टा,
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 23:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ का क्षय नियतांक 0.001 प्रतिवर्ष है। इसकी औसत आयु ज्ञात कीजिए। (2011, 15)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 34

प्रश्न 24:
एक रेडियोऐक्टिव पदार्थ की अर्द्ध-आयु 693 वर्ष है। इसका क्षयांक ज्ञात कीजिए।  (2010, 14, 17)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 35

प्रश्न 25:
रेडियम की अर्द्ध-आयु 1600 वर्ष है। कितने समय पश्चात् रेडियम के किसी खण्ड का 25% अविघटित रह जाएगा? (2015)
हल:
अर्द्ध-आयु 1 = 1600 वर्ष
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 26:
5 अर्द्ध-आयुओं के उपरान्त किसी रेडियोऐक्टिव तत्त्व की मात्रा का कितना प्रतिशत अविघटित रहेगा? (2012)
हल:
माना रेडियोऐक्टिव तत्त्व की प्रारम्भिक मात्रा N0 है। तब, n अर्द्ध-आयुओं के पश्चात् बचे पदार्थ की मात्रा
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 27:
एक रेडियोऐक्टिव तत्त्व की अर्द्ध-आयु 8 वर्ष है। कितने समय बाद पदार्थ विघटित होकर प्रारम्भिक मात्रा का एक चौथाई रह जायेगा? (2016)
हल:
अर्द्ध-आयु, T = 8 वर्ष
प्रारम्भिक मात्रा = N0
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 36

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प्रश्न 28:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ की अर्द्ध-आयु 16 घण्टे है। कितने समय बाद प्रारम्भिक द्रव्यमान का 25% भाग अविघटित रह जाएगा? (2017)
हल:
अर्द्ध-आयु, 7 = 16 घण्टे
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 29:
β-किरणों के दो मुख्य गुण लिखिए। (2012)
उत्तर:
β-किरणों या β-कणों के दो मुख्य गुण इस प्रकार हैं
(i) आवेशित होने के कारण ये कण चुम्बकीय-क्षेत्र में विक्षेपित हो जाते हैं। विक्षेप की दिशा से पता चलता है कि ये ऋणावेशित कण हैं। α-कणों की (UPBoardSolutions.com) अपेक्षा इनका विक्षेप बहुत अधिक होता है इससे पता चलता है कि β-कण, α-कण की अपेक्षा बहुत हल्के होते हैं।
(ii) रेडियोऐक्टिव पदार्थों से β-कण अत्यधिक उच्च वेग से उत्सर्जित होते हैं। इनका वेग प्रकाश की चाल के 1% से लेकर 99% तक होता है।

प्रश्न 30:
किसी नाभिक से एक β-कण निकलने पर उसके परमाणु क्रमांक तथा द्रव्यमान संख्या में क्या परिवर्तन होता है ? (2011)
उत्तर:
परमाणु क्रमांक में 1 की वृद्धि होती है तथा द्रव्यमान संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 31:
नाभिकीय श्रृंखला क्रिया में क्रान्तिक द्रव्यमान से क्या अभिप्राय है? (2009, 17)
उत्तर:
नाभिकीय विखण्डन की श्रृंखला-अभिक्रिया चालू रखने के लिए विखण्डनीय पदार्थ का द्रव्यमान सदैव एक निश्चित द्रव्यमान से अधिक होना चाहिए। इस निश्चित द्रव्यमान को ही क्रान्तिक द्रव्यमान कहते है।

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प्रश्न 32:
एक परमाणु द्रव्यमान मात्रक (1 amu) की तुल्य ऊर्जा मिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट (MeV) में बताइए। (2013)
या
आइन्स्टीन के समीकरण से amu की तुल्य ऊर्जा MeV में कितनी होती है?
उत्तर:
1 amu= 931 MeV

प्रश्न 33:
नाभिकीय रिएक्टर में मन्दक की आवश्यकता क्यों होती है?
या
नाभिकीय रिएक्टर में मन्दंक का क्या उपयोग है? (2009)
उत्तर:
न्यूट्रॉन की गति मन्द करने के लिए मन्दक का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 34:
भारी जल का प्रयोग मुख्यतः कहाँ और किसलिए किया जाता है? (2017)
उत्तर:
नाभिकीय रिएक्टर में न्यूट्रॉनों की गति मन्द करने के लिए।

प्रश्न 35:
नाभिकीय रिएक्टर में कैडमियम छड़ों का क्या उपयोग है?
उतर:
विखण्डन क्रिया को नियन्त्रित करने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 36:
नाभिकीय रिएक्टर में प्रयुक्त किये जाने वाले किन्हीं दो मन्दकों के नाम लिखिए।(2013)
उत्तर:
भारी जल तथा ग्रेफाइट।

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प्रश्न 37:
नाभिकीय रिएक्टर में भारी जल एक उपयुक्त मन्दक क्यों है? (2009)
उत्तर:
चूँकि यह हाइड्रोजनीय पदार्थ है इसलिए इसमें न्यूट्रॉनों के टकराने पर इनके वेग में अधिक कमी होती है।

प्रश्न 38:
युग्म उत्पादन से आप क्या समझते हैं? इसका एक उदाहरण दीजिए। (2014)
उत्तर:
जब कोई ऊर्जिते गामा-किरण फोटॉन किसी भारी पदार्थ पर गिरता है तो वह पदार्थ के किसी नाभिक द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है तथा उसकी ऊर्जा से एक इलेक्ट्रॉन व एक पॉजिट्रॉन की उत्पत्ति हो जाती है। इस प्रक्रिया को युग्म-उत्पादन कहते हैं तथा इसे निम्न समीकरण से प्रदर्शित करते हैं
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 37

प्रश्न 39:
यदि एक़ नाभिकीय संलयन प्रक्रिया में द्रव्यमान क्षति 0.3% हो, तो 1 किग्रा द्रव्यमान की नाभिकीय संलयन प्रक्रिया में कितनी ऊर्जा मुक्त होगी? (2009, 11, 12)
हल:
Δm = 1 किग्रा का 0.3% = 0.003 किग्रा
अतः मुक्त ऊर्जा E = Δm x c = 0.003 किग्रा x (3 x 108 मी/से)2
= 0.027 x 1016 जूल
= 2.7 x 1014 जूले

प्रश्न 40:
एक [latex]^{ 235 }{ U }[/latex] नाभिक के विखण्डन से 150 मिलियन इलेक्ट्रॉन-वोल्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है। एक रिएक्टर 4.8 मेगावाट शक्ति दे रहा है। रिएक्टर में प्रति सेकण्ड विखण्डित हो रहे नाभिकों की संख्या की गणना कीजिए।    (2015) 
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

प्रश्न 41:
एक नाभिक ZXA एक α-कण तथा एक β-कण का उत्सर्जन करता है। उत्सर्जन के बाद नयी नाभिक क्या होगा? (2015)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei 38

प्रश्न 42:
नाभिकीय संलयन में 1 ग्राम हाइड्रोजन से 0.993 ग्राम हीलियम प्राप्त होती है। यदि जनित्र की दक्षता 5% हो तो उत्पन्न ऊर्जा की गणना कीजिए। (2017)
हल:
द्रव्यमान क्षति Δm = 1-0.993 = 0.007 ग्राम = 7 x 10-6 किग्रा
अतः उत्पन्न ऊर्जा ΔE = (Δm) x c2
= 7 x 10-6 x 9 x 1016 x 5% जूल = 315 x 108 जूल
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प्रश्न 43:
यदि नाभिक 13Al27 की त्रिज्या 3.6 फर्मी हो तब नाभिक 52Te125 की त्रिज्या ज्ञात (2018)
हल:
सूत्र, R = R0A1/3 से,
जहाँ, R0 = 1.2 x 10-15 m
तथा A = नाभिक की द्रव्यमान संख्या है।
यदि R1 तथा R2 क्रमश: Al वे Te की नाभिकीय त्रिज्याएँ हैं, तो
R1 = R0 (27)1/3 = 3R0 तथा
R = R0(125)1/3 = 5R0
R1 को R2 से भाग देने पर,
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प्रश्न 44:
किसी नाभिक की त्रिज्या (r) तथा नाभिक के परमाणु द्रव्यमान संख्याA) में क्या सम्बन्ध है?  (2018)
हल:
R3 α A
R α A1/3
R = R0 A1/3
जहाँ R0 = फर्मी नियतांक
R= नाभिक की त्रिज्या
A = परमाणु द्रव्यमान त्रिज्या

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अन्त:नाभिकीय बल से क्या तात्पर्य है? इन बलों की प्रकृति के बारे में क्या तथ्य प्राप्त किये गये? (2017)
या
अन्तःनाभिकीय बलों के गुण लिखिए। या नाभिकीय बल किसे कहते हैं? (2012, 17)
उत्तर:
नाभिकीय बल (Nuclear Forces):
किसी भी परमाणु के नाभिक में दो मूल कण, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन होते हैं। समान रूप से आवेशित कण होने के कारण प्रोटॉनों के बीच एक वैद्युत प्रतिकर्षण बल कार्य करता है, जबकि आवेश-रहित न्यूट्रॉनों के बीच इस प्रकार का कोई बल नहीं लगता। ये कण नाभिक के अत्यन्त सूक्ष्म (UPBoardSolutions.com) स्थान (≈ 10-15 मीटर) में एक साथ कैसे रहते हैं? इस तथ्य को समझने के लिए यह परिकल्पना की गयी कि नाभिक के भीतर ऐसे बल कार्यशील रहते हैं। जो कि न्यूक्लिऑनों को परस्पर नाभिक में एक साथ बाँधे रखते हैं। इन बलों को ‘नाभिकीय बल’ (nuclear forces) कहते हैं। इन बलों के विषय में निम्नलिखित तथ्य ज्ञात हुए हैं

  1. ये बल आकर्षण-बल हैं अन्यथा समान आवेश के प्रोटॉन नाभिक जैसे सूक्ष्म स्थान में जमा नहीं रह पाते।
  2.  ये बल अत्यन्त तीव्र (very strong) हैं। मानव जानकारी में अब तक जितने भी बल ज्ञात हैं उनमें सबसे अधिक तीव्र नाभिकीय-बल ही हैं।
  3. ये वैद्युत बल नहीं हैं। यदि ये वैद्युत बल होते, तो इनके कारण प्रोटॉनों के बीच प्रतिकर्षण होता और नाभिक की संरचना सम्भव न हो पाती।
  4.  ये गुरुत्वीय बल भी नहीं हैं। दो न्यूक्लिऑनों के बीच गुरुत्वीय बल बहुत क्षीण होते हैं, जबकि नाभिकीय बल अत्यन्त तीव्र होते हैं।
  5. ये बल आवेश पर किसी प्रकार भी निर्भर नहीं करते अर्थात् विभिन्न न्यूक्लिऑनों के बीच | (जैसे -प्रोटॉन-प्रोटॉन के बीच, न्यूट्रॉन-न्यूट्रॉन के बीच, प्रोटॉन-न्यूट्रॉन के बीच) बल एकसमान (uniform) होते हैं।
  6. ये बल अत्यन्त लघु परिसर (short range) के हैं। अतः ये बहुत कम दूरी (केवल नाभिकीय
    व्यास, 10-15 मीटर के अन्दर) तक ही प्रभावी होते हैं।

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प्रश्न 2:
किसी नाभिक की द्रव्यमान क्षति क्या है? इससे बन्धन ऊर्जा कैसे प्राप्त होती है।
या
द्रव्यमान क्षति किसे कहते हैं? समझाइए। बन्धन ऊर्जा तथा नाभिक के स्थायित्व में क्या सम्बन्ध है?
या
किसी नाभिक की बन्धन ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? (2009, 11, 14, 15)
या
द्रव्यमान क्षति से क्या तात्पर्य है? या नाभिक की द्रव्यमान क्षति एवं बन्धन ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? (2013)
या
नाभिक के द्रव्यमान क्षति से आप क्या समझते हैं? द्रव्यमान क्षति नाभिक की बन्धन ऊर्जा से कैसे सम्बन्धित है? (2014)
या
नाभिकीय बन्धन ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? (2015)
उत्तर:
देव्यमान क्षति: नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों के द्रव्यमानों के योग से सदैव कुछ कम होता है। द्रव्यमानों का यह अन्तर द्रव्यमान क्षति (mass defect) कहलाता है।
द्रव्यमान क्षति = (प्रोटॉनों का द्रव्यमान + न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान) – नाभिक का द्रव्यमान
माना किसी परमाणु B की (UPBoardSolutions.com) द्रव्यमान संख्या A तथा परमाणु क्रमांक Z है, तो इसके नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या Z तथा न्यूट्रॉनों की संख्या (A – Z) होगी। यदि प्रोटॉन का द्रव्यमान mp न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान mn एवं नाभिक का द्रव्यमान M हो, तो द्रव्यमान क्षति Δm = [Zmp + (A -Z)mn]- M द्रव्यमान क्षति Δm को अर्थ है कि जब प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन मिलकर नाभिक का निर्माण करते हैं तो Δm द्रव्यमान लुप्त हो जाता है तथा इसके तुल्य ऊर्जा (Δm) c² मुक्त हो जाती है। इस ऊर्जा के कारण ही प्रोटॉन व न्यूट्रॉन नाभिक में बंधे रहते हैं। इसे नाभिक की बन्धन ऊर्जा कहते हैं।
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 बन्धन ऊर्जा तथा नाभिक के स्थायित्व में सम्बन्ध:
किसी नाभिक की प्रति-न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा जितनी अधिक होती है वह उतना ही अधिक स्थायी होता है।

प्रश्न 3:
6C12 की प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा की गणना कीजिए।
दिया गया है, 6C12 का द्रव्यमान = 12.0038 amu
प्रोटॉन का द्रव्यमान = 1.0081 amu
न्यूट्रॉन का द्रव्यमान = 1.0090 amu (2013)
हल:
6C12 नाभिक में प्रोटॉन = Z = 6
तथा  न्यूट्रॉन = A – Z = 12 – 6 = 6
अतः 6C12 नाभिक में न्यूक्लिऑनों की संख्या = A = 12
∴ 6C12 नाभिक में न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान
= (6 प्रोटॉनों +6 न्यूट्रॉनों) का द्रव्यमान
= 6(1.0081+1.0090) amu
= 6 x 2. 0171 amu = 12.1026 amu
∴ द्रव्यमान क्षति Δm = न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान – नाभिक का द्रव्यमान
= 12.1026 amu-12.0038 amu== 0.0988 amu
कुल बन्धन ऊर्जा EB = Δm द्रव्यमान के तुल्य ऊर्जा
= 0.0988 x 931 MeV= 91.9828 MeV
∴ प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा = [latex]\frac { { E }_{ B } }{ A }[/latex]  = [latex]\frac { 91.9828 }{ 12 }[/latex] MeV
= 7.665 MeV

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प्रश्न 4:
एक 29Cu63 के सिक्के को द्रव्यमान 3.0 ग्राम है। उस ऊर्जा की गणना MeV में कीजिए जो इस सिक्के के सभी न्यूट्रॉनों एवं प्रोटॉनों को एक-दूसरे से अलग करने के लिए आवश्यक हो।
दिया है, 29Cu63 का द्रव्यमान= 62.9296,
mP = 1.0078 amu,
mn = 1,0086 amu,
me = 0.0005 amu,
1 amu = 931.5 MeV (2015)
हल:
29Cu63 नाभिक में प्रोटॉन (Z) = 29
न्यूट्रॉन = 63 – 29= 34
न्यूक्लिऑनों की संख्या (A) = 63
∴ न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान = (29 x 1.0078+ 34 x 1.0086)
= 63.5186 amu
द्रव्यमान क्षति (ΔM) = 63.5186- 62.9296= 0.589 amu
∴ बन्धन ऊर्जा (EB ) = Δm x 931 MeV
= 0.589 x 931 MeV
= 548.359 Mev

प्रश्न 5:
हीलियम नाभिक (2He4) के लिये द्रव्यमान क्षति 0.0304 amu है। इसकी प्रति न्यूक्लिऑन नाभिकीय बन्धन ऊर्जा ज्ञात कीजिए। (2013)
हल:
Δm = 0.0304 amu
कुल वन्धन ऊर्जा = 0.0304 MeV x 931 MeV/amu
= 28.3024 MeV
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प्रश्न 6:
एक न्यूट्रॉन का द्रव्यमान 1.00867amu तथा प्रोटॉन को द्रव्यमान 1.00728 amu है। यदि हीलियम नाभिक (α-कण) का द्रव्यमान 4,00150 amu हो, तो हीलियम की बन्धन ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन eV में ज्ञात कीजिए। (2012, 14)
हल:
हीलियम की बन्धन ऊर्जा E
= [(प्रोटॉनों का द्रव्यमान + न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान) – (He नाभिक का द्रव्यमान)] x 931MeV
= [(2 x 1.00728 + 2 x 1.00867) – (4.00150)] x 931
= 0.0304 x 931= 28.30 MeV= 28.3 x 106MeV

प्रश्न 7:
बन्धन ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? यदि प्रोटॉन, न्यूट्रॉन तथा ऐल्फा (α) कणों के द्रव्यमान क्रमशः 1.00728 amu, 1.00867 amu तथा 4.00150 amu हों, तो α कण की प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा ज्ञात कीजिए। [1 amu= 931 MeV] (2016, 17)
हल:
बन्धन ऊर्जा:
किसी नाभिक की बन्धन ऊर्जा वह न्यूनतम ऊर्जा है जो नाभिक के न्यूक्लिऑनों को अनन्त दूरी तक अलग-अलग करने के लिए आवश्यक है।

प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा:
α कण हीलियम 2He4 का नाभिक है। जिसमें दो प्रोटॉन तथा दो न्यूट्रॉन होते हैं।
∵ दो प्रोटॉनों का द्रव्यमान = 2 x 1.00728 = 2.01456 amu
दो न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान = 2 x 1.00867 = 2.01734 amu
इनका योग = 4.03190 amu
अतः द्रव्यमान क्षति Δm = न्यूक्लिऑनों का द्रव्यमान – α कण का द्रव्यमान
= 4.03190 amu – 4.00150 amu = 0.03040 amu
1 amu के तुल्य ऊर्जा 931 MeV होती है।
अतः 0.03040 के तुल्य ऊर्जा, Δ E = 0.03040 x 931 = 28.3 MeV
यह α कण की बन्धन ऊर्जा है।
α  कण में 4 न्यूक्लिऑन (2 प्रोटॉन व 2 न्यूट्रॉन) होते हैं। अतः प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन ऊर्जा [latex]\frac { \Delta E }{ 4 }[/latex]
= [latex]\frac { 28 }{ 3 }[/latex]  = 7.07 MeV

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प्रश्न 8:
परमाणु द्रव्यमान मात्रक (a.m.u.) की परिभाषा दीजिए। इसका मान किलोग्राम तथा MeV में व्यक्त कीजिए। (2017)
उत्तर:
मूल कणों, नाभिकों तथा परमाणुओं के द्रव्यमान अति सूक्ष्म होते हैं, अत: इनके द्रव्यमानों को व्यक्त करने के लिए एक बहुत छोटा मात्रक चुना गया है, जिसे परमाणु द्रव्यमान मात्रक (a.m.u.) कहते हैं। 1 a.m.u. कार्बन परमाणु के द्रव्यमान के बारहवें भाग के बराबर होता है।
1a.m.u. = 1.66 x 10-27 किग्रा ।
1 a.m.u. = 931 MeV

प्रश्न 9:
निम्नलिखित अभिक्रिया में निर्मुक्त ऊर्जा की गणना कीजिए (2017)
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हल:
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प्रश्न 10:
निम्नलिखित समीकरणों को पूरा कीजिए
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उत्तर:
(i) 2He4
(ii) 6C12
(iii) 290Th234
(iv) 0n1

प्रश्न 11:
प्राकृतिक रेडियोऐक्टिवता में मिलने वाली तीनों प्रकार की किरणों के गुणों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
α-कण, β-कण तथा  γ-किरणों के गुणों की तुलना
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प्रश्न 12:
अर्द्ध-आयु तथा क्षय नियतांक में सम्बन्ध का सूत्र स्थापित कीजिए। (2017)
या
किसी रेडियो-सक्रिय पदार्थ की अर्द्ध-आयु, माध्य आयु तथा क्षय नियतांक के बीच सम्बन्ध का निगमन कीजिए।
या
रेडियोऐक्टिव पदार्थ के लिए अर्द्ध-आयु काल एवं क्षय नियतांक में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2014, 15, 16)
उत्तर:
अर्द्ध-आयु तथा क्षय नियतांक में सम्बन्ध:
यदि प्रारम्भ में (t = 0) किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ की मात्रा (परमाणु की संख्या) N0 तथा इसकी अर्द्ध-आयु T है तथा t समय पश्चात् पदार्थ की मात्रा N रह जाए, तो
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प्रश्न 13:
एक रेडियोऐक्टिव पदार्थ की सक्रियता 32 वर्षों में घटकर अपने प्रारम्भिक मान कारह [latex]\frac { 1 }{ 16 }[/latex] जाती है। पदार्थ की अर्द्ध-आयु की गणना कीजिए। (2009, 12)
हल:
यदि किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ की प्रारम्भिक मात्रा N0 है, तब n अर्द्ध-आयुओं के पश्चात् बचे पदार्थ की मात्रा
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प्रश्न 14:
एक रेडियोऐक्टिव पदार्थ की सक्रियता 33 वर्षों में घटकर अपने प्रारम्भिक मान का  [latex]\frac { 1 }{ 8 }[/latex] रह जाती है। पदार्थ की अर्द्ध-आयु एवं क्षय-नियतांक की गणना कीजिए। (2016)
हल:
माना रेडियोऐक्टिव पदार्थ की प्रारम्भिक मात्रा N0 है, तब n अर्द्ध-आयुओं के पश्चात् बचे पदार्थ की मात्रा
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प्रश्न 15:
रदरफोर्ड-सोडी के रेडियोऐक्टिव क्षय का नियम क्या है? दो रेडियोऐक्टिव स्रोत A तथा B की अर्द्ध-आयु क्रमशः 1 घण्टा तथा 4 घण्टा है। यदि प्रारम्भ में A व B के रेडियोऐक्टिव परमाणुओं की संख्या समान हो तो 4 घण्टे के पश्चात् इन दोनों की सक्रियताओं का अनुपात क्या होगा? (2016)
हल:
रदरफोर्ड सोडी के क्षय नियतांक के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 3 का उत्तर देखें।
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प्रश्न 16:
नाभिकीय संलयन से क्या तात्पर्य है? (2012, 17)
या नाभिकीय संलयन क्या है? (2014)
उत्तर:
नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)-दो हल्के नाभिकों के परस्पर संयुक्त होकर भारी नाभिक बनाने की प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। संलयन से प्राप्त नाभिक का द्रव्यमान, संलयन करने वाले मूल नाभिकों के द्रव्यमानों के योग से कम होता है तथा द्रव्यमान के इस अन्तर के तुल्य (UPBoardSolutions.com) ऊर्जा इस प्रक्रिया में मुक्त होती है।
उदाहरण के लिए, भारी हाइड्रोजन अथवा ड्यूटीरियम ( 1H2) के दो नाभिकों के संलयन को इस समीकरण द्वारा व्यक्त कर सकते है ।
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ड्यूटीरियम ड्यूटीरियम ट्राइटियम हाइड्रोजन ऊर्जा ट्राइटियम पुनः ड्यूटीरियम के नाभिक से संलयित होकर हीलियम नाभिक का निर्माण करता है।
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प्रश्न 17:
नाभिकीय विखण्डन क्या है? इसे प्रदर्शित करने का एक समीकरण दीजिए। नाभिकीय विखण्डन में ऊर्जा कहाँ से उत्सर्जित होती है? (2015, 17)
उत्तर:
नाभिकीय विखण्डन-इस प्रक्रिया में किसी भारी नाभिक पर न्यूट्रॉनों की बमबारी किये जाने पर यह नाभिक दो लगभग बराबर नाभिकों में टूट जाता है।
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नाभिकीय विखण्डन की प्रक्रिया में अपार ऊर्जा उत्पन्न होने का कारण है कि इस प्रक्रिया में प्राप्त नाभिकों तथा न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान मूल नाभिक तथा न्यूरॉन के द्रव्यमान से कुछ कम होता है, अर्थात् इस प्रक्रिया में कुछ द्रव्यमान की क्षति होती है। यह द्रव्यमान क्षति ही आइन्स्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध के अनुसार ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर प्राप्त होती है।

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प्रश्न 18:
क्रान्तिक द्रव्यमान तथा नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं? (2013)
उत्तर:
क्रान्तिक द्रव्यमान (Critical Mass):
किसी विखण्डनीय पदार्थ का उसके क्रान्तिक आकार के संगत वह द्रव्यमान जो श्रृंखला अभिक्रिया को जारी रखने के लिए आवश्यक होता है, क्रान्तिक द्रव्यमान कहलाता है।

नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया (Controlled Chain Reaction):
यह अभिक्रिया कृत्रिम उपायों द्वारा इस प्रकार नियन्त्रित की जाती है कि प्रत्येक विखण्डन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों में से केवल एक ही न्यूट्रॉन विखण्डन कर पाये । इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) अभिक्रिया में नाभिकों के विखण्डन की दर नियन्त्रित रहती है। अतः यह क्रिया धीरे-धीरे होती है तथा इसमें उत्पन्न ऊर्जा लाभदायक कार्यों के लिए प्रयुक्त की जा सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
समभारिक’ तथा ‘समस्थानिक’ पदों के अर्थ समझाइए।   (2013)
या
समस्थानिक तथा समभारिक का अर्थ दो-दो उदाहरण देकर समझाइए।
या
समस्थानिक का अर्थ एक उदाहरण देकर समझाइए। (2015, 7)
या
समभारिक का अर्थ उदाहरण सहित समझाइए। (2015, 17)
उत्तर:
1. समस्थानिक अथवा समप्रोटॉनिक (Isotopes or Isoprotons):
किसी एक ही तत्त्व के ऐसे परमाणु जिनके नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या समान होती है, परन्तु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है, उस तत्त्व के ‘समस्थानिक’ या ‘समप्रोटॉनिक’ कहलाते हैं। इस प्रकार किसी तत्त्व के विभिन्न समस्थानिकों के परमाणु क्रमांक (Z) समान होते हैं, परन्तु द्रव्यमान (UPBoardSolutions.com) संख्या (A) भिन्न-भिन्न होती है। क्योंकि इनके परमाणु-क्रमांक समान हैं, अत: आवर्त सारणी में इनका स्थान समान होता है। इसी कारण इन्हें समस्थानिक भी कहते हैं।
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(2) समभारिक (Isobaric): ऐसे नाभिकों को जिनमें न्यूक्लिऑनों की कुल संख्या समान होती है, परन्तु प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है; समभारिक’ कहते हैं। इन नाभिकों का परमाणु क्रमांक (Z) भिन्न-भिन्न तथा द्रव्यमान संख्या (A) समान होती है। अतः आवर्त सारणी में इनका स्थान भिन्न-भिन्न होता है और इनके रासायनिक गुण भी एक जैसे नहीं होते।
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प्रश्न 2:
विभिन्न नाभिकों की बन्धन ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन का द्रव्यमान संख्या (A) के साथ परिवर्तन, ग्राफ द्वारा निरूपित कीजिए। कारण बताते हुए समझाइए कि क्यों हल्के नाभिकों का सामान्यतः नाभिकीय संलयन होता है?  (2014)
उत्तर:
विभिन्न परमाणुओं के नाभिकों के स्थायित्व की तुलना करने के लिये नाभिकों की ‘प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा’ (binding energy per nucleon) ज्ञात करते हैं। किसी नाभिक की प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा जितनी अधिक होती है; नाभिक उतना ही अधिक स्थायी होता है। (UPBoardSolutions.com) विभिन्न परमाणुओं के नाभिकों के स्थायित्व का अध्ययन करने के लिये इनकी प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा तथा द्रव्यमान-संख्या के बीच ग्राफ खींचा जाता है। प्राप्त वक्र को बन्धन-ऊर्जा वक्र’ कहते हैं (चित्र 13.4)। इस वक़ से निम्न महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होते हैं

  1. द्रव्यमान संख्या लगभग A = 50 से A = 80 तक के बीच वक्र में एक सपाट शिखर (flat maximum) है जिसके संगत औसत प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा लगभग 8.5 MeV है। अतः वे नाभिक जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ 50 व 80 के बीच हैं, अधिक स्थायी हैं। इनमें Fe56, जिसकी प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा अधिकतम (लगभग 8.8 MeV) हैं, सबसे अधिक स्थायी हैं
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  2. 80 से ऊँची द्रव्यमान-संख्या वाले नाभिकों के लिए प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा धीरे-धीरे घटती जाती है तथा यूरेनियम नाभिक (A = 238) के लिए लगभग 7.6 MeV रह जाती है। अत: नाभिकों को स्थायित्व भी घटता जाता है। यही कारण है कि 83Bi209 के आगे वाले भारी नाभिक रेडियोऐक्टिव हैं।
  3. 50 से नीची द्रव्यमाने-संख्या वाले नाभिकों के लिए भी प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा घटने लगती है, तथा 20 से नीचे बहुत तेजी से घट जाती है। उदाहरण के लिए, भारी हाइड्रोजन (A = 2) के लिए यह केवल 1.1 MeV होती है। इससे यह पता चलता है कि 20 से नीचे द्रव्यमान संख्या वाले
    नाभिक अपेक्षाकृत कम स्थायी हैं।
  4. A = 50 से नीचे, वक्र सतत रूप से नहीं गिरता, बल्कि 8O16, 6C12तथा ,2He4नाभिकों पर गौण शिखर प्राप्त होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ये (सम-सम) नाभिक समीप की द्रव्यमान-संख्याओं वाले अन्य नाभिकों से अधिक स्थायी हैं।
  5.  यह वक्र मोटे तौर पर बताता है कि बहुत भारी तथा बहुत हल्के नाभिकों की प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा बाद वाले नाभिकों के सापेक्ष कम होती है। अत: यदि हम किसी बहुत भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम) को किसी विधि द्वारा अपेक्षाकृत हल्के (अर्थात् बीच वाले) नाभिकों में तोड़ लें तो प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा बढ़ जायेगी। अत: इस प्रक्रिया में ऊर्जा बहुत बड़ी मात्रा में मुक्त होगी। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय विखण्डन (nuclear fission) कहते हैं।

इसी प्रकार, यदि हम दो अथवा अधिक बहुत हल्के नाभिकों (जैसे भारी हाइड्रोजन 1H2 के नाभिक) को किसी विधि द्वारा अपेक्षाकृत भारी नाभिक (जैसे-2He4) में संयुक्त कर लें तब भी प्राप्त न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा बढ़ जायेगी। इस प्रक्रिया में भी अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होगी। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय संलयन’ (nuclear fusion) कहते हैं।

प्रश्न 3:
यदि λ क्षय नियतांक है, तो सिद्ध कीजिए कि N = N0e-λt, जहाँ Na और N क्रमशः समय है t= 0 तथा t समय के बाद परमाणुओं की संख्याएँ हैं। (2009, 14)
या
रेडियोऐक्टिव क्षय से सम्बन्धित रदरफोर्ड-सोडी का नियम क्या है? (2012, 16, 17)
या
रदरफोर्ड-सोडी नियम क्या है ? सूत्र N = N0e-λt का व्युत्क्रम कीजिए। (2018)
उत्तर:
रेडियोऐक्टिव क्षय से सम्बन्धित रदरफोर्ड तथा सोडी का नियम: इस नियम के अनुसार, “किसी भी क्षण रेडियोऐक्टिव परमाणुओं के क्षय होने की दर उस क्षण उपस्थित परमाणुओं की संख्या के अनुक्रमानुपाती होती है।” माना किसी क्षण t पर उपस्थित परमाणुओं की (UPBoardSolutions.com) संख्या N है तथा (t + dt) क्षण पर यह संख्या घटकर (N – dN ) रह जाती हो, तो परमाणुओं के क्षय होने की दर = – (dN/dt) तथा रदरफोर्ड-सोडी के नियमानुसार,
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जहाँ N0 व N क्रमशः प्रारम्भ में (t = 0 क्षण पर) तथा t समय पश्चात् किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ में परमाणुओं की संख्याएँ हैं। इसे समीकरण से स्पष्ट है कि किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ का क्षय चर घातांक नियम (exponential law) के अनुसार होता है, अर्थात् क्षय प्रारम्भ में तेजी से होता है तथा फिर इसकी दर लगातार घटती जाती है। अतः किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ को पूर्णतः क्षय होने में अनन्त समय
लगता है।

प्रश्न 4:
किसी रेडियोऐक्टिव पदार्थ के नमूने में किसी समय अविघटित पदार्थ 25% रहता है।
10 सेकण्ड के उपरान्त अविघटित पदार्थ घटकर 12.5% रह जाता है। ज्ञात कीजिए
(i) पदार्थ की माध्य आयु।
(ii) वह समय जब अविघटित पदार्थ घटकर विघटित पदार्थ का 6.25% हो जाए। (2013)
हल:
(i) किसी क्षण अविघटित नाभिकों की संख्या 25% है। 10 सेकण्ड पश्चात् यह 12.5% (आधी) रह जाती है। इसका अर्थ है कि रेडियोऐक्टिव पदार्थ की अर्द्ध-आयु 10 सेकण्ड है अर्थात्
T = 10 सेकण्ड
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प्रश्न 5:
सूर्य से ऊर्जा नाभिकीय संलयन प्रक्रिया से किस प्रकार प्राप्त हो रही है? आवश्यक समीकरण सहित समझाइए। यह अभिक्रिया सामान्य ताप पर क्यों नहीं होती है?
या
सूर्य में ऊर्जा किस प्रकार पैदा होती है ? आवश्यक समीकरण सहित समझाइए। ये अभिक्रियाएँ अति उच्च ताप पर ही क्यों होती हैं? (2009)
या
हम जानते हैं कि हमें लाखों वर्षों से सूर्य से असीमित ऊर्जा प्राप्त हो रही है। सूर्य की इस असीमित ऊर्जा के स्रोत को नाभिकीय समीकरणों की सहायता से स्पष्ट कीजिए (2010)
या
नाभिकीय संलयन के आधार पर सौर ऊर्जा के स्रोत की व्याख्या आवश्यक समीकरणों के साथ कीजिए। (2011)
ताप-नाभिकीय अभिक्रियाओं द्वारा सूर्य में नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया समझाइए। ये अभिक्रियाएँ अति उच्च ताप पर ही क्यों होती हैं? (2013)
या
सूर्य से ऊर्जा नाभिकीय संलयन द्वारा कैसे उत्पन्न होती है? आवश्यक समीकरणों की सहायता से समझाइए। (2014)
उत्तर:
सन् 1939 में अमेरिकी वैज्ञानिक एच० ए० बेथे (H.A. Bethe) ने बताया कि सूर्य पर लगातार नाभिकीय संलयन होता रहता है, जिससे वह अविरत रूप से ऊर्जा का उत्सर्जन कर रहा है। इस विषय में उन्होंने निम्नलिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत कियासूर्य की अपार ऊर्जा का स्रोत हल्के नाभिकों का संलयन (fusion) है। सूर्य के द्रव्य में 90% अंश तो हाइड्रोजन व हीलियम का है तथा शेष 10% अंश में अन्य तत्त्व हैं जिनमें अधिकांश हल्के तत्त्व हैं। सूर्य के बाहरी पृष्ठ का ताप लगभग 8000 K है तथा इसके भीतरी भाग का ताप (UPBoardSolutions.com) लगभग 2 x 107 K है। इतने ऊँचे ताप पर सूर्य में उपस्थित समस्त तत्त्वों के परमाणुओं की कक्षाओं से इलेक्ट्रॉन निकल जाते हैं; अत: वे तत्त्व नाभिकीय अवस्था में रह जाते हैं। ये नाभिक इतने तीव्रगामी होते हैं कि इनकी परस्पर टक्कर से इनका स्वतः ही संलयन होता रहता है और अपार ऊर्जा विमुक्त होती रहती है। वैज्ञानिक बेथे के अनुसार सूर्य पर नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया निम्नलिखित दो प्रकार से पूर्ण होती है

1. कार्बन-साइकिल (Carbon Cycle):
सन् 1939 में अमेरिकन वैज्ञानिक बेथे (Bethe) ने यह बताया कि सूर्य में चार हाइड्रोजन नाभिकों (चार प्रोटॉनों) का एक हीलियम नाभिक में संलयन सीधे न होकर, कई ताप-नाभिकीय अभिक्रियाओं (thermonuclear reactions) की एक साइकिल के द्वारा होता है जिसमें कार्बन एक उत्प्रेरक का कार्य करता है। इस साइकिल को ‘कार्बन-साइकिल’ कहते हैं। इस साइकिल में छ: अभिक्रियाएँ निम्नलिखित क्रमानुसार होती हैं
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इस प्रकार, एक पूरी कार्बन-साइकिल में चार हाइड्रोजन के नाभिक संलयित होकर एक हीलियम नाभिक का निर्माण करते हैं तथा इसके साथ दो (UPBoardSolutions.com) पॉजिट्रॉन (+1β0) व 24.7 MeV ऊर्जा उत्सर्जित होती है। ये पॉजिट्रॉन दो इलेक्ट्रॉनों से विनाशित (annihilate) होकर लगभग 2 MeV ऊर्जा की उत्पत्ति करते हैं। इस प्रकार एक कार्बन-साइकिल में कुल 26.7 Mev ऊर्जा उत्पन्न होती है। चूंकि सूर्य के द्रव्य के 1 ग्राम में लगभग 2 x 1023 प्रोटॉन होते हैं, अतः सूर्य के 1 ग्राम द्रव्य से अपार ऊर्जा की उत्पत्ति हो जाती हैं।

2. प्रोटॉन-प्रोटॉन साइकिल H-H Cycle):

नये नाभिकीय आँकड़ो  के आधार पर अब यह विश्वास किया जाता है कि सूर्य में कार्बन-साइकिल की अपेक्षा एक अन्य साइकिल की अधिक सम्भावना है जिसे ‘प्रोटॉन-प्रोटॉन साइकिल’ कहते हैं। इस साइकिल में भी कई अभिक्रियाओं के द्वारा हाइड्रोजन के नाभिक संलयित होकर हीलियम के नाभिक का निर्माण करते हैं
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स्पष्ट है कि इस साइकिल का नेट परिणाम ठीक वही है जो कार्बन-साइकिल का है। इस साइकिल की तीसरी अभिक्रिया होने के लिए यह आवश्यक है कि पहली दो अभिक्रियाएँ दो-दो बार हों।

सामान्य ताप व दाब पर संलयन असम्भव:
इसका कारण यह है कि जब संलयन होने वाले धनावेशित नाभिक क-;सर के निकट आते हैं तो उनके बीच वैद्युत प्रतिकर्षण बल अति तीव्र हो जाता है। इस बल के (UPBoardSolutions.com) विरुद्ध संलयितं, होने के लिए उन्हें बहुत अधिक ऊर्जा (≈ 0.1 MeV) चाहिए। इन्हें इतनी अधिक ऊर्जा देने के लिए अति उच्च ताप ≈10° K तथा अति उच्च दाब चाहिए। ताप व दाब की ये दशाएँ पृथ्वी पर साधारणतया अंकृतिक रूप में उपलब्ध नहीं हैं।

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प्रश्न 6:
नाभिकीय विखण्डन तथा नाभिकीय संलयन में अन्तर स्पष्ट कीजिए। दी गई संलयन प्रक्रिया में उत्पन्न ऊर्जा की गणना कीजिए (2016)
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उत्तर:
नाभिकीय विखण्डन तथा नाभिकीय संलयन में अन्तर नाभिकीय विखण्डन में एक ‘भारी’ नाभिक न्यूट्रॉनों की बमबारी से दो अपेक्षाकृत हल्के रेडियोऐक्टिव नाभिकों में टूटता है जिनका सम्मिलित द्रव्यमान मूल नाभिक के द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान की यह क्षति ऊर्जा के रूप में (UPBoardSolutions.com) मुक्त होती है।
इसके विपरीत, संलयन में दो अथवा अधिक ‘हल्के’ नाभिक एक अकेले नाभिक में संलयित (fuse) हो जाते हैं जिसका द्रव्यमान संलयित होने वाले नाभिकों के द्रव्यमानों के योग से कम होता है। पुनः, द्रव्यमान की यह क्षति ऊर्जा के रूप में मुक्त होती है। यह प्रक्रिया अत्यन्त उच्च ताप व दाब पर होती है तथा मुक्त ऊर्जा अनियन्त्रित होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 13 Nuclei

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UPSEE Preparation | Tips, Tricks & Best Preparation Books for UPSEE

UPSEE Preparation is the first step to crack in the UPSEE Entrance Exam. UPSEE Entrance Exam is supervised by the Uttar Pradesh Technical University formally known as Dr. A.P.J Abdul Kalam Technical University. It is also known as Uttar Pradesh State Entrance Examination (UPSEE). Only those candidates who meet the declared cutoff will be included in the merit list of UPSEE 2018. This entrance exam is conducted for admission in undergraduate & postgraduate programmes in various field such as engineering, management, etc. As per the UPSEE Exam Pattern, the UPSEE 2019 exam will be conducted offline mode.

Candidates will have to enter the responses on an OMR sheet, using a black or blue ballpoint pen. Questions will be set in both English and Hindi, for all engineering papers except for B.Arch.UPSEE exam is expected to be conducted by April 2019. With the time in hand, you have to start your preparation with sufficient knowledge of UPSEE Syllabus and UPSEE Exam pattern. Today we will be discussing UPSEE Preparation Plan for UPSEE  2019 exam to help you score better in all sections.

UPSEE Exam Pattern

Subject Number of Questions
Paper – 1Physics, Chemistry and Mathematics 50 objective-type questions each of Physics, Chemistry and Mathematics for a total of 150 questions
Paper – 2Physics, Chemistry and Biology 50 objective-type questions each of Physics, Chemistry and Biology
Paper – 3AG -I, AG-II and AG -III 50 objective-type questions each of AG-I, AG-II and AG-III with a total of 150 questions.
Paper – 4Aptitude Test for Architecture & Design Part-A: Mathematics and Aesthetic Sensitivity Part–B: Drawing Aptitude 50 objective-type questions each of Mathematics and Aesthetic Sensitivity with a total of 100 questions and Two questions to test drawing aptitude.

We have mentioned below some important topics for each subject.

UPSEE Preparation | Physics

We are providing the easy but important Topics in Physics for UPSEE Preparation.

  1. Wave Motion
  2. Heat & Thermodynamics
  3. Motion in One Dimension and Solids & Semiconductor devices
  4. Electrostatics
  5. Magnetic Effect of Current & Magnetism
  6. Ray Optics
  7. Rotational Motion

UPSEE Preparation | Physics Exam Study Material

We are providing Study material in Physics for UPSEE Preparation.

  • Class XI and XII UP Board Physics textbook
  • HC VERMA Volume 1 and 2
  • Solved Papers by Arihant Publication
  • Fundamental Physics by Halliday, Resnick, and Walker
  • MCQ Physics by D.Mukerjee for conceptual questions in Physics.

Physics is an important and tricky subject to crack in UPSEE Preparation. Go through the NCERT books for Physics. NCERT books cover all the topics in the syllabus of the exam. However, the physics chapters require comparatively less effort and time to understand completely. Make a complete list of derivations, formulae, and experiments in your syllabus and keep that list it will be handy later during the revision. Revise all the concepts regularly. Particularly in the case of Physics, one finds that topics like Semiconductors, Interference and Waves have some extra theory that should be prepared separately.

UPSEE Preparation | Chemistry

We are providing the easy but important Topics in Chemistry for UPSEE Preparation.

  1. Aldehyde Ketone
  2. Alcohol Phenol Ether and Solutions
  3. Alkanes, Alkenes & Alkynes
  4. General Organic Chemistry
  5. Ionic Equilibrium
  6. s-block elements
  7. p-block elements
  8. Chemical Bonding

UPSEE Preparation | Chemistry Exam Study Material

  • Class XI and XII UP Board Chemistry textbook
  • Numerical Chemistry by R.C. Mukherjee
  • P. Bahadur for Physical Chemistry
  • Organic and Inorganic Chemistry by OP Tondon
  • Pradeep Objective Chemistry
  • Solved Papers by Arihant Publication

Chemistry is one of the easiest subjects if you study it with full concentration and consistency. Learning Inorganic Chemistry equations and reactions by heart can prove to be really helpful. Direct questions based on equations and reactions are bound to be asked, and this to be something that you will continue to remember in your mind will help you save a lot of time during the exam. It is better that, while preparation, you maintain a handbook that contains all the formulae and equations. Most importantly, don’t forget to take mock test/sample papers regularly to improve your time management. It will give you the extra needed mileage to successfully clear competitive exam.

UPSEE Preparation | Mathematics

We are providing the easy but important Topics in Mathematics for UPSEE Preparation.

  1. Vectors, Probability
  2. Theory of Equation
  3. Definite Integration
  4. Matrices Determinants
  5. Dynamics, Complex Numbers

UPSEE Preparation | Mathematics Exam Study Material

We are providing the study material in Mathematics for UPSEE Preparation.

Class XI and XII UP Board Mathematics textbook
Class XI and XII Mathematics textbook by R.D. Sharma

Mathematics exam has been found to be lengthy many a time. Many challenging integration problems can be solved surprisingly quickly by simply knowing the right technique to apply. While finding the right technique can be a matter of ingenuity, there are a dozen or so techniques that permit a more comprehensive approach to solving definite integrals. General Solution for Trigonometric equation is bring the equation in one of the standard forms. This can be done by using factorization formula (i.e. to convert from addition to multiplication). If an equation is asked then substitute the values in the option in the equation . Use Trial and Error Method / Elimination method. For co-ordinate geometry , draw graphs according to equations given and predict the answer. For matrices Do adjoint first or transpose/ square/ other operation first , the answer is same. Try to use the options for finding the answer, rather than solving the entire sum. Use properties of determinants to simplify a given matrix. It is important that you improve your speed-solving skills. Solve as many questions as possible before the exam, and make sure to progressively enhance your speed by timing the working time for each problem.

UPSEE Preparation | Biology

We are providing the important Chapters in Biology for UPSEE Preparation.

  1. Origin of life
  2. Organic evolution
  3. Mechanism of orgamic evolution
  4. Human genetics and eugenic
  5. Applied biology
  6. Plant cell
  7. Ecology
  8. Ecosystem
  9. Genetics
  10. Soil

UPSEE Preparation | Biology Exam Study Material

We are providing the Biology study material for UPSEE Preparation.

  • Class XI and XII UP Board Biology textbook
  • Dinesh Objective Biology
  • Modules of Aakash institutes are really good for UPSEE Biology.
  • Previous years questions from AIPMT, UPSEE, and other Medical Entrance Exams

UPSEE Preparation | B.Arch Exam Study Material

A complete self-study guide by P. K. Mishra

Important tips for UPSEE Preparation Plan

  1. Notes
  2. Make a proper Time Table
  3. Seek Guidance
  4. Practice Mock tests
  5. Time management
  6. Previous Year Question papers
  7. Revision
  8. Negative Marking

1. UPSEE Preparation | Notes

Making short notes has always been a smart way to study and has always helped in revising quickly. These notes can be in the form of flash cards or micro note. Whenever you come across with a new formula, note down in this notes and also to revise these at end of each day. It is very important that with each covered topic and chapter you make small notes or a comprehensive list of formulas which will come in handy at the time of revision. This will require you to be regular with your work but will surely make things easy at the time of revision.

2. UPSEE Preparation | Make a proper Time Table

Aspirants in order to make their UPSEE Preparation more organized and disciplines should prepare a time-table. The first and most prominent is that you make a timetable and stick to it. Make a time-table with both short-term and long-term goals that would help you in timely UPSEE Preparation for the exam. The key point here is to make it completely sure that you remember all the things that you’ve prepared. Since you are preparing for entrance exams you will be required to put in six to eight hours of study time, followed by a 15-20 minute break. Take frequent breaks in between studies so that you are fresh every time you get back to your study routine.

3.UPSEE Preparation | Seek Guidance

In order to save valuable time and attempts, students should seek quality guidance from the best online/offline coaching available. They will provide coaching in all subjects of the UPSEE Exam.
To know which books to read, coaching to join and what strategy to adopt for UPSEE Preparation. It is necessary that you clear your doubts at regular intervals and don’t prolong things for long. Getting into a good coaching class is nothing to be ashamed off.

4.UPSEE Preparation | Practice Mock tests

Mock Tests plays an important role in UPSEE Preparation. Mock tests are trial exams that students take before appearing for the final exam so that they can assess their level of preparation. Mock tests are important because of the practice they provide. Students can appear for series of mock tests and can track their scores in these tests. Furthermore, they can improve their performance to get an extra edge in actual exams. Practice mock test to boost your UPSEE preparations. By practicing mock test, analyze your performance, time management as well as weak points or subjects. Find out your weak points and work on them. Practice, practice and practice. There is no shortcut.

5. UPSEE Preparation | Time management

Manage your time in such a way that you are able to go through all the questions at least once in the exam. Divide the available time equally among all subjects. The reason behind it is there are many questions which are deliberately designed to be complex and end up grabbing the lion’s share of time. A good time management strategy helps you identify questions which are easier and hence, can be solved in less time.

6. UPSEE Preparation| Previous Year Question papers

Previous Year Question papers are the most authentic source of information for exam pattern. Solving these papers give some kind of self-evaluation about the speed and time management. It also helps to gain confidence. It helps us to achieve an idea of the latest exam pattern plus important questions, and figure out how much time one needs to spend on each topic.

7. UPSEE Preparation | Revision

As per the latest UPSEE Syllabus exam questions will be based on State Board of Secondary and higher Secondary education. Preparation is only successful if it gives you result. Result is possibly only when you have a solid and concrete plan. Utilize every resources well. Do not pick up new topics in the last few days. It might leave you clueless. When it comes to UPSEE, more than anything it is essential that you have a clear idea of the formulas and concepts rather than rote learning of things for the papers. While you might require it for memorizing formulas it is important that for other stuff you make sure you clear your basis and concepts before moving on. Last fifteen days before the examination should be used only for revision. At the time of revision you should be more focused on the main exam and refreshing topics. Practice all the topics during the time of revision. The key point here is to make it completely sure that you remember all the things that you’ve prepared.

UPSEE Preparation | Tips During the Exam

1. If you find any particular question difficult, make sure that you don’t waste your time trying to solve it. Instead, you should move to the next question and if time permits come back to this question later.
2. One thing that is crucial is that you have to clear the sectional cut-off of each section an also the overall cut-off.
3. So, if in the Exam, you find any particular section a bit challenging, attempt the minimum number of questions that are required to clear the sectional cut-off of the section.
4. Sometimes, the questions can be very tricky. We advice you to read them very carefully before answering.
5. In the Exam, avoid using any shortcut that you are not completely sure about.
6. Avoid Guesswork in the Exam.