UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 9 Solar Radiation, Heat Balance and Temperature

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 9 Solar Radiation, Heat Balance and Temperature (सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?
(क) विषुवत् वृत्त पर
(ख) 23.5° उ०
(ग) 66.5° द०
(घ)66.5° उ०
उत्तर-(ख) 23.5° उ०।

प्रश्न (ii) निम्न में से किस शहर में दिन ज्यादा लम्बा होता है?
(क) तिरुवनन्तपुरम
(ख) हैदराबाद
(ग) चण्डीगढ़
(घ) नागपुर
उत्तर-(ग) चण्डीगढ़।

प्रश्न (iii) निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल मुख्यतः गर्म होता है?
(क) लघु तरंगदैर्घ्य वाले सौर विकिरण से
(ख) लम्बी तरंगदैर्घ्य वाले स्थलीय विकिरण से
(ग) परावर्तित सौर विकिरण से।
(घ) प्रकीर्णित सौर विकिरण से।
उत्तर-(ख) लम्बी तरंगदैर्घ्य वाले स्थलीय विकिरण से।।

प्रश्न (iv) निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ
1. सूर्यातप (अ) सबसे कोष्ण और सबसे शीत महीनों के मध्य तापमान का अन्तर
2. एल्बिडो (ब) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा।
3. समताप रेखा (स) आने वाला सौर विकिरण ।
4. वार्षिक तापान्तर (द) किसी वस्तु के द्वारा परावर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत।
उत्तर-(1) (स), 2. (द) 3. (ब), 4. (अ)।।

प्रश्न (v) पृथ्वी के विषुवत वृत्तीय क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता है, इसका मुख्य कारण है
(क) विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में कम बादल होते हैं।
(ख) उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लम्बाई विषुवत्तीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।
(ग) उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में ग्रीनहाउस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा होता है।
(घ) उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्रों के ज्यादा करीब है।
उत्तर—(क) विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में कम बादल होते हैं।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस प्रकार जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?
उत्तर-पृथ्वी पर कुछ स्थान शीत जलवायु वाले हैं तथा कुछ स्थान उष्ण मरुस्थलीय हैं जबकि कुछ शीतोष्ण जलवायु के अन्तर्गत सम्मिलित हैं। वास्तव में इसका मुख्य कारण पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण है। इतना ही नहीं पृथ्वी के उच्च पर्वतीय भागों में हिम के रूप में वर्षा होती है और मैदानी भागों में जल के रूप में। इसका कारण भी यही है क्योंकि उच्च पर्वतीय भागों पर तापमान कम और मैदानी भागों में तापमान अधिक रहता है। अत: पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण जलवायु और मौसम को सबसे अधिक प्रभावित करता है। जहाँ तापमान अधिक पाया जाता है वहाँ उष्ण जलवायु मिलती है किन्तु जहाँ तापमान निम्न रहता है वहाँ शीत जलवायु रहती है। वस्तुत: तापमान जलवायु व मौसम का निर्धारक तत्त्व है, इसीलिए पृथ्वी के सभी स्थान तापमान भिन्नता के कारण असमान जलवायु प्रदेशों के रूप में पहचाने जाते हैं।

प्रश्न (ii) वे कौन-से कारक हैं जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं?
उत्तर-पृथ्वी पर तापमान वितरण में पर्याप्त असमानताएँ मिलती हैं। इस असमानता के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं। 1. अक्षांश, 2. समुद्रतल से ऊँचाई, 3. समुद्रतल से दूरी, 4. पवनों की दिशा, 5. स्थानीय कारक।

प्रश्न (iii) भारत में मई में तापमाने सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?
उत्तर-भारत में मुख्य रूप से मार्च के बाद गर्मी ऋतु प्रारम्भ हो जाती है। मई एवं जून देश में प्रचण्ड गर्मी के महीने होते हैं, इनमें भी मई मौसम में अधिक तापमान अंकित किया जाता है। किन्तु उत्तर अयनांत के बाद तापमान में गिरावट आरम्भ हो जाती है, क्योंकि दिन की अवधि में परिवर्तन आ जाता है।

प्रश्न (iv) साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है। क्यों?
उत्तर-साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है। इसका मुख्य कारण यहाँ जलवायु पर समुद्री धाराओं का विशेष प्रभाव है। इस भाग में कोष्ण महासागरीय धारा गल्फस्ट्रीम तथा उत्तरी अटलांटिक महासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति से उत्तरी अन्ध महासागर अधिक गर्म हो जाता है जो यूरेशिया के मैदानी भागों के तापमान में परिवर्तन कर देता है। इसलिए साइबेरिया के मैदानी भाग जो अन्ध महासागर के अधिक निकट हैं वहाँ वार्षिक तापान्तर अधिक पाया जाता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (1) अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर-पृथ्वी पर सूर्यातप की प्राप्ति अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष के झुकाव द्वारा निर्धारित होती है। पृथ्वी का अक्ष सूर्य के चारों ओर परिक्रमण की समतल कक्षा से [latex s=2]66\frac { { 1 }^{ o } }{ 2 } [/latex] का कोण बनाता है, इसके कारण सभी अक्षांशों पर सूर्य की किरणों का नति कोण समान नहीं होता है। यह कोण उच्च अक्षांशों अर्थात् ध्रुवों पर कम होता है तथा निम्न अक्षांशों अर्थात् भूमध्य रेखा पर अधिक होता है। यही कारण है कि भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों पर तापमान कम होता जाता है। चित्र 9.1 को देखने से स्पष्ट होता है कि ध्रुवों पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने से वह अधिक क्षेत्र परे फैलती हैं; अतः इन किरणों को पृथ्वी का अधिक स्थान घेरना पड़ता है, इसलिए कम ताप की प्राप्ति होती है जबकि भूमध्यरेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। इन किरणों का घनत्व कम क्षेत्र को अधिक तापमान प्रदान करता है। अतः पृथ्वी का गोलाकार स्वरूप, उसका अपने अक्ष पर झुकाव और अक्षांश ऐसे तथ्य हैं जो पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरणों की मात्रा से प्रभावित होते हैं और पृथ्वी के तापमान वितरण में असमानता उत्पन्न करते हैं।

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प्रश्न (ii) पृथ्वी और वायुमण्डल किस प्रकार ताप को सन्तुलित करते हैं? इसकी व्याख्या करें।
उत्तर–वास्तव में पृथ्वी तापमान (ऊष्मा) का न तो संचय करती है न ही ह्रास, बल्कि यह अपने तापमान को स्थिर रखती है। ऐसा तभी सम्भव है, जब सूर्य विकिरण द्वारा सूर्यातप के रूप में प्राप्त उष्मा एवं पार्थिव विकिरण द्वारा अन्तरिक्ष में संचलित ताप बराबर हो। चित्र 9.2 से स्पष्ट है कि यदि यह मान लें कि वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर प्राप्त सूर्यातप 100 प्रतिशत है तो 100 इकाइयों में से 35 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल पर पहुँचने से पहले ही अन्तरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं। शेष 65 इकाइयाँ अवशोषित होती हैं। इनमें 14 वायुमण्डल में तथा 51 पृथ्वी के धरातल को प्राप्त होती हैं। पृथ्वी द्वारा अवशोषित ये 51 इकाइयाँ पुनः पार्थिव विकिरण के रूप में लौटा दी जाती हैं। इनमें से 17 इकाइयाँ तो सीधे अन्तरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा अवशोषित होती हैं। (देखिए चित्र 9.2 अ) (6 इकाइयाँ स्वयं वायुमण्डल द्वारा, 9 इकाइयाँ संवहन द्वारा और 19 इकाइयाँ संघनन की गुप्त उष्मा के रूप में चित्र 9.2 ब) वायुमण्डल द्वारा 48 इकाइयों का अवशोषण होता है। इनमें 14 इकाइयाँ सूर्यापत की ओर 34 इकाइयाँ पार्थिव विकिरण की होती हैं। वायुमण्डल विकिरण द्वारा इनको भी अन्तरिक्ष में वापस लौटा देता है। अतः पृथ्वी के धरातल तथा वायुमण्डल से अन्तरिक्ष में वापस लौटने वाली विकिरण की इकाइयाँ क्रमश: 17 और 48 हैं, जिनका योग 65 होता है (चित्र 9.2 ब)। वापस लौटने वाली ये इकाइयाँ उन 65 इकाइयों को सन्तुलन कर देती हैं जो सूर्य से प्राप्त होती हैं। यही पृथ्वी का 100 इकाइयों का ऊष्मा बजट है।
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यही कारण है कि पृथ्वी पर ऊष्मा के इतने बड़े स्थानान्तरण के होते हुए भी उष्मा सन्तुलन बना रहता है। इसीलिए पृथ्वी न तो बहुत गर्म होती है न ही अधिक ठण्डी, बल्कि मानव एवं जीव-जंतुओं के अनुकूल तापमान रखती है।

प्रश्न (iii) जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।
उत्तर-जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना जनवरी के भू-पृष्ठीय वायु तापक्रम समदाब रेखा मानचित्र 9.3 द्वारा स्पष्टत: समझी जा सकती है। इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में समदाब रेखाएं महासागरों की ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में महाद्वीपों की ओर विचलित हो जाती हैं। मानचित्र से स्पष्ट है कि भूमध्य रेखा से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर तापमान तेजी से घटते हुए उत्तरी अटलाण्टिक महासागर में शून्य तक तथा इसके बाद उत्तर की ओर -25° तक पहुँच जाता है। इसका मुख्य कारण कोष्ण महासागरीय धारा गल्फस्ट्रीम तथा उत्तरी अटलाण्टिक महासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति है, इसके कारण उत्तरी अन्ध महासागर गर्म हो जाता है। अत: यहाँ तापमान उत्तरी ध्रुव की अपेक्षा अधिक ही रहता है, जबकि इसके उत्तर की ओर जाने पर तापमान -25° से भी अधिक गिर जाता है।
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दक्षिणी गोलार्द्ध इस समय उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा अधिक गर्म रहता है। मानचित्र 9.3 पर अंकित समदाब रेखाओं से स्पष्ट है कि यहाँ दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका तथा ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के मध्य भाग पर 20° एवं 30° समदाब रेखाएँ प्रवाहित होती हैं। केवल दक्षिण की ओर जाने पर इस गोलार्द्ध में तापमान गिरता है। फिर भी यहाँ दक्षिणी भाग का तापमान 10°C के आस-पास ही रहता है। जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में तापमान हिमांक बिन्दु से भी नीचे पहुँच जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. विषुवत रेखा पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं|
(क) तिरछी
(ख) लम्बवत्
(ग) समानान्तर
(घ) इनमें से किसी प्रकार की नहीं
उत्तर-(ख) लम्बवत्।

प्रश्न 2. ध्रुवीय प्रदेशों में तापमान बहुत ही कम होता है, इसका कारण है
(क) सूर्य की किरणों का लम्बवत् पड़ना ।
(ख) सूर्योदय न होना
(ग) सूर्य की किरणों का तिरछा पड़ना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ग) सूर्य की किरणों का तिरछा पड़ना।

प्रश्न 3. पृथ्वी की सूर्य से लगभग दूरी है
(क) 24.96 करोड़ किमी
(ख) 19.46 करोड़ किमी
(ग) 14.69 करोड़ किमी
(घ) 14.96 करोड़ किमी
उत्तर-(घ) 14.96 करोड़ किमी।

प्रश्न 4. तापमान को नापते हैं
(क) फारेनहाइट से
(ख) सेण्टीग्रेड से
(ग) रियूमर से
(घ) इन सभी से
उत्तर-(घ) इन सभी से।।

प्रश्न 5. उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान में अन्तर पाया जाता है, क्योंकि
(क) वर्षा में अन्तर है।
(ख) जल तथा स्थल के वितरण में असमानता है।
(ग), वाष्पीकरण की दर में अन्तर
(घ) सूर्यातप का वितरण असमान है।
उत्तर-(घ) सूर्यातप का वितरण असमान है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सूर्यामिताप या सूर्यातप से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-पृथ्वी को प्राप्त होने वाले सूर्य के ताप को सूर्यातप कहते हैं।

प्रश्न 2. पृथ्वी तक सूर्य का प्रकाश पहुँचने में कितना समय लगता है?
उत्तर-सूर्य से पृथ्वीतल तक प्रकाश पहुँचने में 8 मिनट 22 सेकण्ड का समय लगता है।

प्रश्न 3. सूर्यातप को प्रभावित करने वाले दो प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. सूर्य की किरणों का सापेक्ष तिरछापन तथा 2. सूर्य में प्रकाश की अवधि।

प्रश्न 4. धरातल पर तापमानों के क्षैतिज वितरण को प्रभावित करने वाले दो कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  • अक्षांशीय स्थिति तथा
  • समुद्रतल से ऊँचाई।

प्रश्न 5. भूमण्डल पर तापीय कटिबन्धों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  • उष्ण कटिबन्ध,
  • शीतोष्ण कटिबन्ध एवं
  • शीत कटिबन्ध।

प्रश्न 6. तापमान की सामान्य ह्रास दर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-औसत रूप से वायुमण्डल में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1°C तापमान कम हो जाता है, जिसे तापमान की सामान्य ह्रास दर कहते हैं।

प्रश्न 7. तापमान विलोम क्या है?
या तापमान की विलोमता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-ऐसी अवस्था जिसमें धरातल के निकट कम तापमान तथा ऊपर अधिक तापमान हो, उसे ताप की विलोमता कहते हैं।

प्रश्न 8. ताप की विलोमता के लिए दो आवश्यक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  • लम्बी रातें तथा
  • मेघरहित आकाश।

प्रश्न 9. तापमान विलोमता के लिए प्रमुख अनुकूल दशा क्या होनी चाहिए?
उत्तर-तापमान विलोमता मुख्यतः अन्तरापर्वतीय घाटियों में उत्पन्न होती है, क्योंकि यहाँ जाड़े की ठण्डी । रातों में आकाश साफ तथा वायु शुष्क एवं शान्त होती है।

प्रश्न 10. समताप रेखाओं से क्या अभिप्राय है? ।
उत्तर-समताप रेखाएँ वे कल्पित रेखाएँ हैं जो मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों को मिलाकर खींची जाती हैं।

प्रश्न 11. पार्थिव विकिरण का क्या अर्थ है?
उत्तर-सूर्यातप का पृथ्वी की सतह से होने वाले विकिरण को पार्थिव विकिरण कहते हैं। यह विकिरण लम्बी तरंगों के रूप में होता है। इसी विकिरण प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है।

प्रश्न 12. सूर्य की तिरछी किरणों का पृथ्वी पर क्या परिणाम होता है?
उत्तर-पृथ्वी पर सूर्य की तिरछी किरणें शीत और शीतोष्ण कटिबन्ध पर पड़ती हैं। इन किरणों के कारण दोनों कटिबन्धों पर ग्रीष्म एवं शीत ऋतु के दौरान ताप की अधिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं अर्थात् कम ताप प्राप्त होता है।

प्रश्न 13. पृथ्वी पर तापमान वितरण में भूमि के ढाल का प्रभाव बताइए।
उत्तर-स्थलाकृतियों के जो ढाल सूर्य की किरणों के सम्मुख पड़ते हैं, उन पर ताप अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। इसी कारण उत्तरी गोलार्द्ध में पर्वतों के दक्षिणी ढालों पर, उत्तरी ढालों की अपेक्षा अधिक तापमान पाया जाता है।

प्रश्न 14, पृथ्वी के तापमान को प्रभावित करने वाली वायुदाब घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-तूफान, आँधी, बादल, वर्षा, ओस, कुहरा, तुषार व हिमपात आदि सभी परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से तापमान को प्रभावित करते हैं। मेघों का आवरण सूर्य की किरणों को धरातल तक पहुँचने एवं पार्थिव ऊष्मा के पुनः विकिरण में अवरोध पैदा करता है जिससे तापमान प्रभावित होता है।

प्रश्न 15. तापान्तर क्या है?
उत्तर-अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान के अन्तर को ‘तापान्तर’ कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है—(1) दैनिक तापान्तर तथा (2) वार्षिक तापान्तर।

प्रश्न 16. पृथ्वी का एल्बिडो किसे कहते हैं?
उत्तर-पृथ्वी के धरातल पर पहुँचने से पहले ही विकिरण की परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं। यह परावर्तित मात्रा 49 इकाई के रूप में होती है।

प्रश्न 17, क्या कारण है कि तापमान उत्तुंगता बढ़ने के साथ घटता है?
उत्तर-उत्तुंगता या ऊँचाई (Altitude) बढ़ने के साथ तापमान वास्तव में घटता है। हम जानते हैं कि वायुमण्डल पार्थिव विकिरण द्वारा नीचे की परतों में पहले गर्म होता है। यही कारण है कि समुद्र तल के स्थानों पर तापमान अधिक तथा ऊँचे भाग में स्थित स्थानों पर तापमान कम होता है।

प्रश्न 18. समताप रेखाओं की दिशा अधिकतर पूर्व-पश्चिम क्यों रहती है?
उत्तर-जनवरी तथा जुलाई माह के समताप मानचित्रों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि समताप रेखाओं की दिशा मुख्यतः पूर्व-पश्चिम होती है, क्योंकि समान अक्षांशों पर स्थित अनेक स्थानों पर तापमान समान पाया जाता है। अतः जब इन समान तापमान वाले स्थानों को मिलाकर रेखाएँ खींची जाती हैं तो उन रेखाओं की दिशा पूर्व-पश्चिम की ओर होती है।

प्रश्न 19. निम्नलिखित के लिए एक उपयुक्त शब्द चुनिए
(i) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा,
(ii) लघु तरंगों में सूर्य से आने वाला विकिरण,
(iii) ऊष्मा का आने वाला एवं जाने वाला तापान्तर,
(iv) सूर्य की किरणों का कोण जब वे पृथ्वी पर आती हैं।
उत्तर-(i) समताप रेखा, (i) सूर्यातप, (ii) ऊष्मा सन्तुलन, (iv) आपतन कोण।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सूर्यातप एवं भौमिक विकिरण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-सूर्यातप–सूर्य से पृथ्वी तक पहुँचने वाली विकिरण ऊर्जा को सूर्यातप कहते हैं। यह ऊर्जा लघु तरंगों के रूप में सूर्य से पृथ्वी पर पहुँचती है। यह पृथ्वी पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। यहाँ होने वाली अधिकांश भौतिक एवं जैविक घटनाएँ इसी ऊर्जा से नियन्त्रित होती हैं।

भौमिक विकिरण-पृथ्वी द्वारा विकिरित ऊर्जा को भौमिक या पार्थिव विकिरण कहते हैं। वायुमण्डल भौमिक विकिरण द्वारा ही गर्म होता है। यह प्रक्रिया लम्बी तरंगों द्वारा पूरी होती है।

प्रश्न 2. अभिवहन तथा संवहन की तुलनात्मक व्याख्या कीजिए।
उत्तर-अभिवहन–अभिवहन ऊष्मा का क्षैतिज दिशा में स्थानान्तरण है। इस प्रक्रिया में जब ठण्डे प्रदेशों में गर्म वायुराशि जाती है तो उनको गर्म कर देती है। इससे ऊष्मा का संचार निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों से उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में भी होता है। इसके अतिरिक्त वायु द्वारा संचालित समुद्री धाराएँ भी उष्ण कटिबन्धों से ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊष्मा का संचार करती हैं।

संवहन-जब पृथ्वी को स्पर्श करके वायु के कणगर्म होते हैं तो वह हल्के होकर ऊपर उठते हैं और फिर ऊपर से ठण्डे होकर नीचे आते हैं। इस प्रक्रिया से संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन धाराओं की प्रकृति गैसीय या तरल पदार्थों में जाने की होती है। इससे ऊष्मा का संचार होता है जो संवहन कहलाता है।

प्रश्न 3. यान्त्रिक प्रतिलोमन क्या है? इसकी उत्पत्ति के क्या कारण हैं?
उत्तर-यह प्रतिलोमन धरातल से ऊपर वायुमण्डल में होता है। इसकी उत्पत्ति मूलतः वायुमण्डल में वायु के ऊपर-नीचे (लम्बवत्) गतिशील होने से होती है। इसकी उत्पत्ति में निम्न दो प्रक्रियाएँ महत्त्वपूर्ण हैं—(अ) कभी-कभी नीचे की गर्म वायु तीव्र गति से ऊपर उठ जाती है तथा ऊपर की ठण्डी व भारी वायु नीचे धरातल की ओर आ जाती है और प्रतिलोमन की दशा पैदा करी देती है। (ब) मध्य अक्षांशों चक्रवातों के कारण भी यान्त्रिक प्रतिलोमन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 4. लम्बवत तापमान या तापमान विलोमता की क्या आर्थिक उपयोगिता है?
उत्तर-वस्तुतः तापमान का लम्बवत् वितरण एवं तापमान की विलोम दशाएँ वायुमण्डलीय देशाओं और आर्थिक दृष्टि से क्शेिष महत्त्व रखती हैं। मेघों का स्वरूप, वर्षा की मात्रा, वायुमण्डल की दृश्यता आदि पर तापमान विलोमता का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। पर्वतीय ढालों पर कृषि तथा मानव बसाव की आदर्श दशाएँ भी तापमान विलोमता के कारण ही उत्पन्न होती हैं। तापमान विलोमती के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में एक ही ऋतु में विभिन्न प्रकार की कृषि उपजें उत्पन्न होती हैं। जो वर्तमान में आर्थिक दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण है। अतः लम्बवत् तापमान की असमानताएँ प्राकृतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से उपयोगी हैं।

प्रश्न 5. सूर्यातप पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-‘सूर्यातप’ अंग्रेजी भाषा के Insolation शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है। Insolation से तात्पर्य In Coming Solar Radiation है। वास्तव में, सूर्य से निरन्तर तरंगों के रूप में ताप शक्ति प्रसारित होती रहती है। यही ताप शक्ति धरातल तक पहुँचकर उसे ऊष्मा प्रदान करती है। सूर्य से प्राप्त होने वाली यही ऊर्जा सूर्यातप कहलाती है। सूर्यातप विद्युत चुम्बकीय तरंगों द्वारा वायुमण्डल की 32,000 किमी मोटी परत को पार कर लघु तरंगों के रूप में धरातल पर आती हैं, जिसे सौर विकिरण (Solar Radiation) की प्रक्रिया कहते हैं। अत: वायुमण्डल अधिकतर सीधे सूर्य की किरणों से ऊष्मा प्राप्त नहीं कर पाता है। वह इन किरणों से केवल 19% ताप ही जल-वाष्प एवं धूलकणों के माध्यम से प्राप्त कर पाता है। वस्तुत: गर्म होती हुई पृथ्वी को स्पर्श करके ही वायुमण्डल गर्म हो जाता है, जिसे वायुमण्डल का परोक्ष रूप से गर्म होना कहते हैं।

प्रश्न 6. पृथ्वी पर तापमान वितरण को प्रदर्शित करने के लिए अक्षांश रेखाओं की भाँति समदाब रेखाओं का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर-वायुमण्डल एवं भूपटल पर ताप एवं ऊर्जा का प्रधान स्रोत सूर्य है। पृथ्वी पर तापमान की मात्रा सर्वत्र एक-समान नहीं पाई जाती है। भूमण्डल पर ताप का क्षैतिज वितरण प्रदर्शित करने के लिए विषुवत् रेखा को आधार माना जाता है। धरातल पर तापमान का क्षैतिज वितरण समताप रेखाओं (Isotherms) द्वारा प्रकट किया जाता है। समताप रेखाएँ वे काल्पनिक रेखाएँ होती हैं जो मानचित्रों में समान ताप वाले स्थानों को मिलाते हुए खींची जाती हैं। इन रेखाओं के सिरों पर तापमान सेल्सियस या फारेनहाइट में अंकित कर दिया जाता है। ये रेखाएँ किसी स्थान-विशेष पर केवल औसत तापमान को ही प्रकट करती हैं। भूपटल पर तापमान का क्षैतिज वितरण दिखाने के लिए इन्हीं रेखाओं के आधार पर मानचित्र बनाए जाते हैं। हम जानते हैं कि पृथ्वी अपने क्षैतिज अक्ष पर लम्बवत् अक्ष से [latex s=2]23\frac { 1^{ o } }{ 2 } [/latex] झुकी हुई है। इसी झुकाव तथा दैनिक गति के कारण पृथ्वी की सूर्य से सापेक्ष दूरियाँ परिवर्तित होती रहती हैं। अतः भूमध्य रेखा से उत्तर एवं दक्षिण की ओर की दूरी बढ़ने के साथ-साथ तापमान में उत्तरोत्तर कमी आती जाती है। यही कारण है कि ताप कटिबन्यों को अक्षांश रेखाओं की भाँति निर्धारित किया जाता है।

प्रश्न 7. दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अधिक अनियमित क्यों होती
उत्तर-हम जानते हैं कि उत्तरी गोलार्द्ध में महाद्वीप अधिक हैं तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में महासागर अधिक है। महाद्वीप या स्थलखण्ड शीघ्र गर्म होते हैं तथा शीघ्र ही ठण्डे हो जाते हैं। इसके विपरीत महासागर देर से गर्म होते हैं और देर में ही ठण्ड़े होते हैं। इसलिए समताप रेखाएँ महाद्वीपों की अपेक्षा महासागरों की ओर अधिक नियमित रहती हैं। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान परिवर्तन बहुत कम रहता है और उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाओं की अनियमितता बनी रहती है।

प्रश्न 8. पृथ्वी की सतह पर कुल ऊष्मा बजट में भिन्नता क्यों होती है?
या पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों में ताप अतिरेक क्यों पाया जाता है?
उत्तर-पृथ्वी की सतह पर प्राप्त विकिरण की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है। वास्तव में पृथ्वी के कुछ भागों में विकिरण सन्तुलन में अधिशेष (Surplus) पाया जाता है, जबकि कुछ भागों में ऋणात्मक सन्तुलन होता है। चित्र 9.4 से स्पष्ट है कि शुद्ध विकिरण में अधिशेष 40° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों में अधिक है, परन्तु ध्रुवों के पास इसमें कमी (Deficit) है। ऐसा उष्ण कटिबन्ध ताप संचयन के कारण बहुत अधिक गर्म नहीं होता और न के कारण है। फलस्वरूप उष्ण कटिबन्ध ताप संचयन के कारण बहुत अधिक गर्म नहीं होता और न ही उच्च अक्षांश ताप की अत्यधिक कमी के कारण पूरी तरह जमे हुए हैं। इस प्रकार पृथ्वी के उष्ण कटिबन्ध एवं शीत कटिबन्ध में मानव एवं जीव-जन्तु के लिए तापमान लगभग अनुकूल बना रहता है।
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प्रश्न 9. तापमान के ऊध्र्वाधर वितरण से आप क्या समझते हैं?
या तापमान की सामान्य ह्रास दर का क्या अर्थ है?
उत्तर-तापमान का ऊर्ध्वाधर अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण विषय है। सामान्यतः ऊँचाई के साथ-साथ तापमान कम होता जाता है। तापमान में इस गिरावट की दर एक डिग्री सेल्सियस प्रति 165 मीटर है। इसे सामान्य ह्रास दर कहते हैं। इस प्रकार ऊध्र्वाधर तापमान की सबसे बड़ी विशेषता है ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में होने वाली कमी। किन्तु इसमें ऊँचाई के साथ तापमान घटने की कोई समान गति नहीं होती है। यह मौसम, स्थिति एवं दिन की अवधि के अनुसार कम व अधिक होता रहता है, परन्तु औसतन प्रति किमी की ऊँचाई पर 6.5 सेल्सियस कम होता है। सन् 1899 ई० में टेसेराइन व 1902 ई० में आसमन (Asman) नामक वैज्ञानिकों ने बताया है कि लगभग 12 किमी की ऊँचाई पर तापमान कम होना प्रायः रुक जाता है। फिर भी तापमान के ऊध्र्वाधर वितरण में यह एक मान्य तथ्य है कि वायुमण्डल की सबसे निचली परत (क्षोभमण्डल) जो धरातले के सम्पर्क में रहती हैं, सबसे अधिक गर्म होती है। यहीं से वायु की अन्य परतें गर्म होनी शुरू होती हैं। अतः हम जैसे-जैसे वायुमण्डल में ऊपर आते हैं। तापमान क्रमशः घटता जाता है।

प्रश्न 10. तापमान विलोमता के क्या कारण हैं? वर्णन कीजिए।
या तापमान विलोमता उत्पन्न करने वाली दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-तापमान की विलोमता में निम्नलिखित करण/दशाएँ सहायक होती हैं
1. लम्बी रात्रि-रात्रि के समय वायुमण्डल से ताप का विकिरण होता है तथा धीरे-धीरे वायुमण्डल ठण्डा होता रहता है। रात्रि जितनी लम्बी होगी, विकिरण भी उतना ही अधिक होगा। रात्रि के अन्तिम पहर में पृथ्वी तल का तापमान वायुमण्डल की अपेक्षा कम हो जाता है। इस प्रकार ऊपरी वायुमण्डल में ताप अधिक तथा धरातल के निकटवर्ती भागों मे ताप कम हो जाता है। फलतः विलोमता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

2. स्वच्छ वायुमण्डल-रात्रि के समय जब आकाश अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ रहता है तो धरातल से विकिरित तापमान को वह नहीं रोक पाता जिससे विकिरित ताप शीघ्र ही वायुमण्डल में नष्ट हो जाता है। इस प्रकार लगातार विकिरण से धरातल ठण्डा होता जाता है, जबकि वायुमण्डल के उच्च भागों में अधिक तापमान पाया जाता है।

3. शीतल एवं शुष्क वायु-शीतल एवं शुष्क वायु में पृथ्वी से विकिरित ताप को ग्रहण करने की अधिक क्षमता होती है अतः धरातल ठण्डा ही रहता है, जबकि पृथ्वी से विकिरित तापमान ऊपरी भागों में एकत्रित हो जाती है तथा वायुमण्डल का ऊपरी भाग अधिक गर्म हो जाता है। इससे । विलोमता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

4. शान्त वायु-जिन क्षेत्रों में रात्रि को वायु शान्त पाई जाती है, वहाँ धरातल से तापमान के विकिरण की प्रक्रिया निरन्तर होती रहने के कारण धरातल शीघ्र ही ठण्डी हो जाता है। फलतः धरातल के निकटवर्ती भाग में वायु की परतें भी शीतल हो जाती हैं। इसके साथ ही वायुमण्डल के ऊपरी भागों में ताप के एकत्रीकरण द्वारा तापमान बढ़ जाता है। इस प्रकार विलोमता की स्थिति पैदा हो जाती है।

5. हिमाच्छादित प्रदेश-जिन शीतप्रधान क्षेत्रों में हिम जमी रहती है, वहाँ धरातल पर निम्न तापमान पाए जाते हैं। क्योंकि हिम सूर्य की किरणों को शीघ्र की परावर्तित कर देती है। इस प्रकार धरातल तापमान ग्रहण नहीं कर पाता तथा ने ही गर्म हो पाता है। अत: ताप विलोमता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 11. वायुमण्डल किस प्रकार गर्म होता है? विकिरण की इस प्रक्रिया के कारण एवं महत्त्व बताइए।
उत्तर-सूर्य द्वारा विकिरित सौर ऊर्जा को सूर्यापत कहते हैं। पृथ्वी पर यह लघु तरंगों के रूप में आता है। पृथ्वी द्वारा विकिरित ऊर्जा ही भौमिक या पार्थिव विकिरण कहलाती है। वायुमण्डल पार्थिव विकिरण एवं शोषित विकिरण द्वारा गर्म होता है, किन्तु इसके गर्म होने में पार्थिव या भौतिक विकिरण का विशेष योगदान होता है। इसका मुख्य कारण निम्नलिखित है-

वायुमण्डल लघु तरंगों को अवशोषित नहीं कर पाता। फिर भी वायुमण्डल को बहुत कम ऊर्जा प्राप्त होती है। किन्तु लम्बी तरंगों को वायुमण्डल शीघ्र अवशोषित कर लेता है, क्योंकि वायुमण्डल में व्याप्त गैस, जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड अधिक ऊष्मा ग्रहण करने में सहयोग प्रदान करते हैं। इससे वायुमण्डल की निचली परतें ऊपरी परतों की अपेक्षा अधिक गर्म होती हैं।

प्रश्न 12. समपात रेखाओं के खिसकने की प्रवृत्ति किस ओर होती है-स्थल की ओर या जल की ओर? व्याख्या कीजिए।
उत्तर-उत्तरी गोलार्द्ध में जनवरी की समताप रेखाएँ ध्रुवों पर महासागरों की ओर तथा भूमध्य रेखा पर महाद्वीपों की ओर झुकी हुई होती है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में इनकी प्रवृत्ति विपरीत होती है अर्थात् भूमध्यरेखा पर महासागरों की ओर तथा ध्रुवों पर महाद्वीपों की ओर जुलाई महीने में समपात रेखाओं की प्रवृत्ति स्थल से समुद्र पर करते हुए भूमध्यरेखा की ओर तथा स्थलखण्ड को पार करते हुए ध्रुवों की ओर होती है। अतः तापमान प्रवणता ग्रीष्म ऋतु में शीत ऋतु की अपेक्षा मन्द होती है।

इस प्रकार समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में अधिक नियमित होती हैं। वस्तुत: समताप रेखाओं की प्रवृत्ति अधिकतर स्थलखण्ड की ओर खिसकने की होती है क्योंकि स्थल का स्वभाव ऊष्मा को शीघ्रता से ग्रहण करने का होता है जबकि सागर या जलीय क्षेत्र देर में ऊष्मा ग्रहण करते हैं तथा देर में ही ठण्डे होते हैं। अतः ग्रीष्मकाल में समदाब रेखाएँ ध्रुवों की ओर तथा शीतकाल में भूमध्य रेखा की ओर खिसकती हैं।

प्रश्न 13. तापमान असंगति क्या है? यह कितने प्रकार की होती है? ।
उत्तर-तापमान असंगति-समुद्र तल से विभिन्न स्थलों की ऊँचाई, जल एवं स्थल की विषमता, प्रचलित पवन तथा समुद्री धाराओं के कारण एक ही अक्षांश पर स्थित विभिन्न स्थानों के तापमान में अन्तर पाया जाता है। किसी स्थान के औसत तापमान और उस अक्षांश के औसत तापमान के अन्तर को ‘तापमान असंगति’ कहते हैं। यह तापमान के औसत से विचलन की मात्रा और दिशा को प्रदर्शित करती है। तापमान असंगति उत्तरी गोलार्द्ध में अधिकतम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में न्यूनतम पाई जाती है। तापमाने असंगति के प्रकार–तापमान असंगति दो प्रकार की होती है-(i) ऋणात्मक तथा (ii) धनात्मक।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. तापमान के क्षैतिज वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए तथा पृथ्वी
को ताप कटिबन्धों में विभाजित कीजिए। |
या तापमान के क्षैतिज वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिए।
या भूमण्डल को प्रमुख ताप कटिबन्धों में विभक्त कर वर्णन कीजिए।
उत्तर- वायुमण्डल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक
धरातल पर तापमान का वितरण जलवायु को निर्धारित करता है। इसके अतिरिक्त वनस्पति, जीव-जन्तुओं एवं मानव तथा उसके क्रियाकलाप तापमान द्वारा प्रभावित होते हैं। वायुमण्डल का ताप निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता है

1. अक्षांशीय स्थिति-सूर्यातप अक्षांशीय स्थिति पर निर्भर करता है। विषुवत् रेखा पर सूर्यातप की . “अधिकतम मात्रा होती है। विषुवत् रेखा से उच्च अक्षांशों (उत्तर एवं दक्षिण) की ओर बढ़ने पर। ताप में कमी होती जाती है, क्योंकि सूर्य की किरणों के सापेक्ष तिरछेपन का प्रभाव पड़ता है। विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर औसत तापमान क्रमशः घटता जाता है, परन्तु अधिकतम तापमान विषुवत् रेखा पर न होकर कर्क रेखा (ग्रीष्म ऋतु) तथा मकर रेखा (शीत ऋतु) पर होता है, क्योंकि सूर्य की स्थिति उत्तरायण एवं दक्षिणायण क्रमश: 6-6 माह में बदलती रहती है।

2. समुद्र-तल से ऊँचाई-समुद्र तल से लम्बवत् दूरी बढ़ने के साथ-साथ ताप में कमी होती जाती है। धरातल के समीप वाली वायु सबसे अधिक गर्म होती है तथा इसकी परतें भी मोटी होती हैं, जबकि ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ वायु की परतें हल्की होती चली जाती हैं तथा वायु का तापमान भी कम होता जाता है। समुद्र-तल से प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेग्रे ताप में कमी होती जाती है, जिस कारण उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हिमपात होता है।

3. थल एवं जल का वितरण-स्थल की यह प्रकृति होती है कि वे सूर्यातप के प्रभाव से शीघ्र ही गर्म हो जाते हैं तथा शीघ्र ही ठण्डे हो जाते हैं। इसके विपरीत जल क्षेत्र देर से गर्म एवं देर से ही ठण्डे होते हैं। इसी कारण धरातलीय ताप में भिन्नता पायी जाती है। जल के प्रभाव से उनके निकटवर्ती भागों की जलवायु समकारी होने की प्रवृत्ति रखती है, जबकि महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में थल की अधिकता के कारण जलवायु में विषमता उत्पन्न हो जाती है।

4. समुद्र से दूरी-समुद्रतटीय भागों का तापमान समान रहता है, क्योंकि इन भागों में दैनिक तापान्तर बहुत ही कम होता है, परन्तु जैसे-जैसे सागरीय तटों से स्थल भागों की दूरी बढ़ती जाती है, | तापान्तर भी बढ़ता जाता है।

5. सागरीय धाराएँ-विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर गर्म जलधाराएँ प्रवाहित होती हैं, जो शीतोष्ण एवं शीत कटिबन्धीय प्रदेशों के तटीय भागों के तापमान में वृद्धि कर देती हैं। इसके विपरीत ध्रुवीय प्रदेशों से विषुवतीय प्रदेशों की ओर शीतल जलधाराएँ प्रवाहित होती हैं, जो उष्ण कटिबन्ध के तटीय प्रदेशों के तापमान में कमी कर देती हैं। दो विपरीत धाराओं के मिलने से कोहरे की उत्पत्ति होती है।

6. प्रचलित पवनें-निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर प्रवाहित उष्ण पवनें तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि ध्रुवों की ओर से प्रवाहित पवनें निम्न अक्षांशों के तापमान में कमी कर देती हैं। प्रचलित पवनों के कारण ही जलधाराओं का प्रभाव तटवर्ती क्षेत्रों तक पहुँचता है। जल भागों से स्थल भागों की ओर प्रवाहित पवनें तापान्तर में कमी कर देती हैं। इसी प्रकार चक्रवातों के आगमन के समय तापमान बढ़ जाता है तथा समाप्ति पर घट जाता है।

7. धरातलीय विषमता-सामान्य रूप से किसी स्थान के तापमान पर धरातल के ढाल तथा उसकी प्रकृति का प्रभाव पड़ता है। हिमाच्छादित प्रदेशों में सूर्यातप के परावर्तन के कारण तापमान कम हो जाता है। मरुस्थलीय भागों में बलुई मिट्टी के द्वारा ताप का अधिक अवशोषण करने के फलस्वरूप तापमान में एकाएक वृद्धि हो जाती है। पर्वतीय भागों के जो ढाल सूर्य की किरणों के सामने पड़ते हैं, वे अधिक सूर्यातप ग्रहण कर लेते हैं। शीतल पवनों के मार्ग में पर्वतीय अवरोध आ जाने के कारण यह किसी प्रदेश के तापमान को कम करने से रोकता है।

8. मिट्टी की प्रकृति-अधिक गहरे रंग की मिट्टियाँ ताप का अधिक अवशोषण कर लेती हैं जिससे तापमान में वृद्धि हो जाती है। इसके विपरीत हल्के रंग की मिट्टियाँ कम मात्रा में ताप का अवशोषण करती हैं, जिससे तापमान में वृद्धि नहीं हो पाती। काली मिट्टी के प्रदेशों में 8 से 14 प्रतिशत तक ताप का परावर्तन हो जाता है। बालू-प्रधान क्षेत्रों में चीका मिट्टी की अपेक्षा ताप का अधिक अवशोषण होता है।

9. मेघाच्छादन-सूर्य की किरणों को पृथ्वी तक पहुँचने में बादलों द्वारा बाधा उत्पन्न होती है, क्योंकि ये ताप को परावर्तित कर देते हैं। बादलरहित क्षेत्रों में तापमान अधिक होता है। ऐसे प्रदेशों में जहाँ पर हर समय बादल छाये रहते हैं, तापमान अधिक नहीं हो पाता है।

तापमान का क्षैतिजीय वितरण

सामान्य रूप से धरातल पर तापमान का वितरण समताप रेखाओं (Isotherms) द्वारा प्रदर्शित किया। जाता है। समुद्र-तल से समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाओं को ‘समताप रेखा’ कहा जाता है। ये रेखाएँ पूर्व से पश्चिम दिशा में मानचित्रों पर निर्मित की जाती हैं, जो प्रायः अक्षांश रेखाओं के समानान्तर ही होती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि तापमान के क्षैतिजीय वितरण पर अक्षांशों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। स्थल एवं जलखण्डों के मिलन-स्थलों पर समताप रेखाओं में झुकाव आ जाता है। इसका प्रमुख कारण जल एवं थल भागों के गर्म एवं ठण्डा होने की प्रकृति में पर्याप्त अन्तर होना है। दक्षिणी गोलार्द्ध में जल की अधिकता के कारण समताप रेखाएँ दूर-दूर तथा सपाट होती हैं। इसके विपरीत उत्तरी गोलार्द्ध में थल भाग की अधिकता के कारण समताप रेखाएँ पास-पास तथा तापमान की भिन्नता के कारण अधिक झुकाव वाली होती हैं। समताप रेखाएँ समीप होने से तापमान की तीव्रता को. प्रकट करती हैं।

तापमान को प्रादेशिक वितरण भी क्षैतिजीय वितरण को ही प्रकट करता है। ताप वितरण की समानता तथा उनकी विशेषताओं को आधार मानकर सम्पूर्ण ग्लोब को कुछ मण्डलों में विभाजित कर लिया जाता है। इन मण्डलों का विभाजन तथा सीमांकन अक्षांशीय आधार पर किया जाता है। इस आधार पर ग्लोब को निम्नलिखित तीन कटिबन्धों में विभाजित किया जा सकता है
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1. उष्ण कटिबन्ध
पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण कर्क तथा मकर रेखाओं (23 1/2%° उत्तरी एवं 23 1/2° दक्षिणी अक्षांश) के मध्य सूर्य की किरणें वर्ष में दो बार लम्बवत् चमकती हैं। इसीलिए भूमध्य रेखा के आस-पास वाले भागों में उच्चतम तापमान रहने के कारण शीत ऋतु नाममात्र को भी नहीं होती, जबकि कर्क तथा मकर रेखाओं के समीपवर्ती भागों में ग्रीष्म एवं शीत ऋतुएँ क्रमशः आरम्भ हो जाती हैं। अत: विषुवत् रेखा के समीप दोनों ओर शीत ऋतु रहित इस कटिबन्ध को उष्ण कटिबन्ध

2. शीतोष्ण कटिबन्ध ।
इस कटिबन्ध का विस्तार 23 1/2° से.66 1/2%° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों (ध्रुव वृत्तों) के मध्य है। यहाँ पर सूर्य की किरणों के सापेक्ष तिरछापन प्रारम्भ हो जाता है। इस कटिबन्ध में दिन तथा रात की अवधि ऋतु के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है, परन्तु यह अवधि 24 घण्टे से अधिक नहीं हो पाती है। तापमान में घट-बढ़ के कारण ही इसे शीतोष्ण कटिबन्ध कहते हैं। स्थिति के अनुसार इसे निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है

(अ) उत्तरी शीतोष्ण कटिबन्ध-इस कटिबन्ध का विस्तार कर्क रेखा से उत्तरी ध्रुव वृत्त तक है। सूर्य की उत्तरायण स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है। इसी कारण यहाँ ग्रीष्म तथा शीतकाल : का तापान्तर भी अधिक होता है।

(ब) दक्षिणी शीतोष्ण कटिबन्ध-इस कटिबन्ध का विस्तार मकर रेखा से दक्षिणी ध्रुव वृत्त तक है। सूर्य की दक्षिणायण स्थिति में दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु हो जाती है; अत: ऋतुओं के क्रमशः परिवर्तन के कारण ग्रीष्म एवं शीतकाल में तापान्तर अधिक होता है।

3. शीत कटिबन्ध
इस कटिबन्ध का विस्तार दोनों गोलार्डो में 66 1/2° से उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव केन्द्रों तक है। इन क्षेत्रों में सूर्य की किरणों के सापेक्ष तिरछेपन का व्यापक प्रभाव पड़ता है जिससे औसत तापमान निम्न रहता है। दिन-रात की अवधि 24 घण्टे से अधिक हो जाती है। ध्रुवों पर छ: महीने के दिन तथा क्रमशः छः महीने की रातें होती हैं। सूर्य की किरणें कभी भी लम्बवत् नहीं चमकती हैं। इसीलिए यह कटिबन्ध हिम से ढका रहता है। इसे दो निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है

(अ) उत्तरी शीत कटिबन्ध-इस कटिबन्ध का विस्तार उत्तरी ध्रुव वृत्त से उत्तरी ध्रुव तक है। यहाँ पर कठोर शीत पड़ती है तथा वर्ष भर ये भाग हिम से ढके रहते हैं।
(ब) दक्षिणी शीत कटिबन्ध-इस ताप कटिबन्ध का विस्तार दक्षिणी ध्रुव वृत्त से दक्षिणी ध्रुव तक है। सूर्य की किरणों के सापेक्ष तिरछेपन के कारण छ: माह के दिन तथा छ: माह की रातें होती हैं। यह कटिबन्ध सदैव बर्फ से ढका रहता है। यहाँ पर कठोर शीत पड़ती है।

प्रश्न 2. ताप की विलोमता या व्युत्क्रमण से आप क्या समझते हैं? यह कितने प्रकार की होती है?
या वायुमण्डल में तापमान विलोम का वर्णन कीजिए।
उत्तर-तापमान का विलोम अथवा ताप का व्युत्क्रमण
वायुमण्डल में ऊँचाई के अनुसार तापमान कम होता जाता है। ऐसा मुख्य रूप से 8 किमी से 18 किमी की ऊँचाई तक ही होता है। सामान्य रूप से प्रति किमी की ऊँचाई पर 65° सेग्रे ताप कम हो जाता है, परन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में तापमान घटने के स्थान पर बढ़ जाता है, जिसे ऋणात्मक ताप-पतन दर (Negative Lapse Rate of Temperature) कहते हैं। इससे तापमान की ऊर्ध्वाधर प्रवणता बदल जाती है। इस अवस्था में वायु की गर्म परतें ऊपर पहुँच जाती हैं तथा शीतल परतें नीचे आ जाती हैं। तापमान की इस दशा को तापमान का विलोम या तापमान का प्रतिलोमन अथवा ताप का व्युत्क्रमण कहा जाता है।
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ताप का यह प्रतिलोमन धरातल के निकट भी हो सकता है तथा ऊँचाई पर भी। परन्तु धरातल के निकट होने वाला प्रतिलोमन अस्थायी होता है, जबकि ऊँचाई पर होने वाला प्रविंलोमन स्थायी होता है; क्योंकि अधिक ऊँचाई पर वायु की परतों को ठण्डा होने में अधिक समय लग जाता है। तापीय प्रतिलोमन ध्रुवीय प्रदेशों, हिमाच्छादित प्रदेशों एवं घाटियों में अधिक होता है। गर्म एवं ठण्डी धाराओं के मिलन-स्थल पर भी इस प्रकार की अवस्थाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। तापमान के सम्बन्ध में ट्रिवार्था ने कहा है कि “ऐसी अवस्था जिसमें शीत-प्रधान वायु धरातल के चित्र निकट व उष्ण वायु ऊपर पायी जाती है, तापमान का व्युत्क्रमण कहलाता है।”

तापीय विलोमता के प्रकार

ताप की विलोमता के निम्नलिखित प्रकार हैं
1. धरातलीय विलोमता (Surface Inversion)-इस प्रकार की ताप विलोमता पृथ्वी के विकिरण द्वारा अधिक ऊर्जा के प्रवाहित होने से होती है। विपरीत अर्थात् शीतल एवं उष्ण वायुराशियों के आगमन से भी धरातलीय विलोमता उत्पन्न हो जाती है।

2. उच्च धरातलीय विलोमता (Upper Surface Inversion)-धरातल से कुछ ऊँचाई पर वायु-राशियों के अवतलन से इस प्रकार की विलोमता उत्पन्न होती है। यह प्रतिचक्रवातों पर निर्भर करता है। वायु की उष्ण परतें ऊपर तथा शीतल परतें नीचे हो जाती हैं। इससे वायुमण्डल में स्थिरता आ जाती है।

वायुमण्डल की ओजोन परत के ऊपर सर्वाधिक ताप तथा निचली परत में कम ताप मिलता है। यह भी उच्च धरातलीय विलोमता का उदाहरण है।

3. वाताग्री विलोमता (Frontal Inversion)-जब उष्ण एवं शीत प्रधान वायुराशियाँ पास-पास होती हैं, तो उष्ण वायु शीतल वायु के ऊपर फैल जाती है। जिस ओर इन वायुराशियों का ढालें होता है, उसे वाताग्र (Front) कहते हैं। तापक्रम एवं आर्द्रता के कारण यह विलोमता उत्पन्न होती है।

तापीय विलोमता का महत्त्व

मानव तथा आर्थिक विकास पर तापीय विलोमती का प्रभाव महत्त्वपूर्ण है। इसके द्वारा मौसम तथा जलवायु दोनों ही प्रभावित होते हैं। मेघों की बनावट, वर्षा तथा वायुमण्डल की पारदर्शकता पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इससे कोहरे की उत्पत्ति होती है। गर्म एवं ठण्डी धाराओं के मिलने से भी कोहरे की उत्पत्ति होती है। यह मछली व्यवसाय के लिए भी उपयोगी है। कहीं-कहीं पर कोहरा फसलों के लिए लाभदायक होता है। कोहरे के कारण अरब में यमन की पहाड़ियों पर कहवे की खेती सम्भव हो पायी है, क्योंकि यह सूर्य की किरणों के तीक्ष्ण प्रभाव को कम कर देता है, परन्तु कोहरे के प्रभाव से फसलों को सूर्य का प्रकाश नहीं मिल पाता, जिससे नाइट्रोजन की कमी हो जाती है तथा फसलें पीली पड़ जाती हैं। पहाड़ी ढालों पर फलों की खेती में ताप का व्युत्क्रमण सहायक होता है।

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