UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति (Water and Food Materials Supply)

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UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोतों को बताइए। गाँवों में इन स्रोतों का किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है?
अथवा
जल क्या है? गाँव में जल प्राप्ति के प्रमुख साधनों को समझाइए।
अथवा
जल का संघटन बताइए। जल प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
जल से आशय (Meaning of Water) –
जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन है। इसका रासायनिक सूत्र H2O है। यही शुद्ध जल होता है। सामान्यत: जल में कई प्रकार के लवण घुले रहते हैं जिसके कारण यह अशुद्ध हो जाता है। जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक होने के कारण अनेक पदार्थों (जैसे अनेक तत्त्वों के लवण इत्यादि) को अपने अन्दर घोल लेता है।

जल प्राप्ति के स्रोत (Sources of Water) –
वर्षा ही जल प्राप्ति का प्रमुख स्रोत है। समुद्र और झीलों का जल, वाष्प बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है। वायुमण्डल में यह ठण्डा होकर बादलों का रूप ले लेता है और वर्षा के रूप में भूमि पर गिरता है।

वर्षा के जल का कुछ भाग पृथ्वी पर बहता है जबकि उसका काफी भाग मिट्टी से होकर भूमि के अन्दर चला जाता है। यह भूमि के अन्दर उपस्थित कच्ची या पक्की चट्टानों के ऊपर एकत्र होता रहता है। इस प्रकार जल स्रोतों को दो भागों में विभाजित किया जाता है – (1) पृष्ठ स्रोत तथा (2) भूमिगत स्रोत। इनका विवरण निम्नवत् है –

1. पृष्ठ स्रोत (Surface water) –
जैसा उपर्युक्त विवरण में बताया गया है, जल के सभी स्रोत वर्षा के जल से ही बनते हैं, इनका हम निम्नलिखित प्रकार से अध्ययन करते हैं –

(क) वर्षा का जल–अनेक स्थानों पर वर्षा के जल को जलरोधी कुण्डों में एकत्र कर लिया जाता है, वैसे भी गड्डे इत्यादि में यह जल एकत्र हो जाता है। यह जल पीने आदि के लिए उपयोगी नहीं होता है, फिर भी यदि जलकुण्ड साफ-सुथरे हों, तो सामान्य क्रिया द्वारा इसे पीने योग्य बनाया जा सकता है।

(ख) जलधाराएँ-पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा का जल, जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। प्रारम्भिक रूप में जल शुद्ध होता है किन्तु मिट्टी इत्यादि मिल जाने के कारण इसमें अनेक अशुद्धियाँ व्याप्त हो जाती हैं।

(ग) नदियाँ-बर्फ के पिघलने तथा जलधाराओं आदि के मिलने से नदियाँ बनती हैं। इनके जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं जो धरातलीय स्रोत अथवा रास्ते में मिलती रहती हैं।

(घ) झीलें-वर्षा और बर्फ के पिघले जल से पहाड़ी क्षेत्रों में झीलें बन जाती हैं। सामान्यतः झीलों का तल जलरोधी होता है। कई बार झीलों में अन्य स्रोत भी मिल जाते हैं। कभी-कभी झरने इत्यादि भी झीलों को भरने में सम्मिलित होते हैं। यह जल भी अनेक कारणों से अशुद्ध होता है।

(ङ) समुद्र-पृथ्वी के सम्पूर्ण तल से बहकर आने वाला जल समुद्र में एकत्रित हो जाता है। यह जल अत्यन्त अशुद्ध एवं खारा होता है। यह न तो पीने योग्य होता है और न ही कृषि-कार्यों के लिए उपयोगी होता है।

(च) परिबद्ध जलाशय-यह एक कृत्रिम झील होती है जो जलधाराओं को रोककर बनाई जाती है। इसको कृत्रिम जलाशय भी कहा जा सकता है। जल की कमी के समय में इनका जल किसी अच्छी विधि द्वारा शुद्ध करके उपयोग में लाया जा सकता है।

2. भूमिगत स्रोत (Ground water) –
वर्षा का जल भूमि के अन्दर धीरे-धीरे समाता रहता है तथा भीतरी भागों में पहुँचकर पक्के स्थानों में, कंकरीली या चट्टानी परतों के ऊपर जमा हो जाता है। इस प्रकार का जल कभी-कभी अपने आप स्रोत के रूप में निकल आता है अन्यथा कृत्रिम विधियों द्वारा इसे बाहर निकाला जाता है। प्रमुख भूमिगत स्रोत – (क) झरने, (ख) कुएँ, (ग) ट्यूबवैल होते हैं।

(क) झरने – यह भूमि द्वारा अवशोषित जल ही है जो किसी स्थान पर जल-स्तर के खुल जाने से बाहर निकल आता है। इसी को झरना (spring) कहते हैं। इसमें भी अनेक पदार्थ घुले हुए हो सकते हैं। विभिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले झरनों के पानी के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।

(ख) कुएँ-यह भूमि द्वारा अवशोषित जल है जो किसी चट्टान पर जाकर रुक जाता है। इसमें भी अनेक विलेय अशुद्धियाँ होती हैं। इसे भूमि को खोदकर निकाला जाता है। कुछ कुएँ उथले होते हैं जो ऊपरी जलधारी स्तर तक ही बनाए जाते हैं। अन्य अधिक नीचे तथा अधिक पक्के जलधारी स्तर तक खोदे जाते हैं। यह जल अच्छा तथा पीने योग्य होता है। कुएँ से रहट, घिरौं या शक्तिचालित पम्प द्वारा जल निकालने की व्यवस्था होती है।

(ग) ट्यूबवैल-भूमिगत जल को प्राप्त करने के लिए ट्यूबवैल भी बनाए जाते हैं। ये अत्यधिक गहरे होते हैं तथा इनसे जल प्राप्त करने के लिए विद्युत-चालित पम्प इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी गहराई 100 मीटर तक भी हो सकती है।

गाँवों में परिस्थितियों के अनुसार नदियों, झीलों तथा वर्षा के जल को उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त भूमिगत जल को भी कुओं. ट्यूबवैल अथवा हैंडपम्प के माध्यम से प्राप्त कर लिया जाता है। इन स्रोतों से प्राप्त जल को सामान्य रूप से किसी घरेलू विधि द्वारा शुद्ध करके ही पीने के काम में लाना चाहिए।

प्रश्न 2.
नगरों में किस प्रकार से पेयजल तैयार किया जाता है?
अथवा
जल को पीने योग्य बनाने की बड़े शहरों में जो व्यवस्था होती है, उसका क्रमवार वर्णन कीजिए।
उत्तरः
नगरों में पेयजल आपूर्ति तथा जल शोधन (Supply of Drinking Water and Purification of Water in Cities) –
नगरों में प्राय: नदियों के जल को जल आपूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह जल वर्षा का तथा प्राकृतिक होता है। प्राकृतिक जल में अनेक अवांछित एवं हानिप्रद अशुद्धियाँ होती हैं जिन्हें दूर करने के लिए जल का शोधन होता है। इसमें नदी का जल विभिन्न हौजों; जैसे-स्कन्दन हौज, तलछटी हौज, निस्यन्दन हौज और क्लोरीनीकरण हौज से होकर निकाला जाता है। जब इन हौजों में होकर पानी निकलता है तो इसकी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। इसके लिए एक निश्चित विधि निश्चित चरणों में अपनाई जाती है –

1. स्कन्दन हौज (Coagulation tank) – जल को पहले इसी हौज में भेजा जाता है। पानी की अशुद्धियों को दूर करने के लिए स्कन्दन पदार्थ जैसे लोहा और ऐलुमिनियम के लवण प्रयोग में आते हैं।
2. तलछटी हौज (Setling tank) – स्कन्दित जल को निस्तारण हेतु इस हौज में भेजा जाता है जहाँ जल स्थिर रहता है और अशुद्धियाँ हौज की तली में नीचे बैठ जाती हैं।
3. निस्यन्दन हौज (Filtration tank) – जल को छानने के लिए बड़े आयताकार टैंकों में बजरी, कंकड़, मोटी रेत, महीन रेत तथा चारकोल से निर्मित फिल्टर बेड्स (Filter Beds) बनाए जाते हैं।
4. वातन तथा क्लोरीनीकरण (Ventilation and Chlorination) – आवश्यकता पड़ने पर जल का क्लोरीनीकरण तथा वातन किया जाता है।
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उपर्युक्त सभी टैंकों से निकालने पर जल की विभिन्न अशुद्धियों और जीवाणुओं का निराकरण हो जाता है। किन्तु जल में अब भी कुछ रोगाणु शेष रह जाते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए द्रव क्लोरीन, ब्लीचिंग पाउडर या ओजोन आदि को निश्चित मात्रा में मिलाया जाता है। ये पदार्थ रोगाणुओं को पूर्णत: नष्ट कर देते हैं।

वातन के लिए जल को फव्वारे के रूप में निकालते हैं। इस प्रकार, जल में वायु के मिलने से इसकी गन्ध इत्यादि दूर हो जाती है तथा कीटाणु आदि को नष्ट करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 3.
शुद्ध जल से क्या तात्पर्य है? जल में किस प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं? दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ बताइए।
अथवा
जल किन कारणों से अशुद्ध होता है? दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ लिखिए।
उत्तरः
शुद्ध जल (Pure Water) –
शुद्ध जल स्वादहीन, गन्धहीन तथा रंगहीन द्रव होता है। यह स्वच्छ एवं पूर्ण रूप से पारदर्शी होता है। इसमें एक प्रकार की प्राकृतिक चमक होती है। जल एक सार्वभौमिक तथा उत्तम विलायक है, इसलिए इसके अशुद्ध होने की अत्यधिक सम्भावना रहती है। यह अनेक वस्तुओं को बिना घुली अवस्था में भी रोके रखता है।

जल की अशुद्धियाँ (Impurities of Water) –
जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ मिलती हैं –

  1. विलेय (घुलित) अशुद्धियाँ तथा
  2. अविलेय (अघुलित) अशुद्धियाँ।

1. विलेय अशुद्धियाँ (Soluble impurities) – जल अनेक पदार्थों के सम्पर्क में आने पर उन्हें घोल लेता है। सामान्य अवस्था में जो जल हम पीते हैं उसमें भी अनेक रासायनिक पदार्थ, विशेषकर लवण आदि थोड़ी मात्रा में घुले रहते हैं। इनकी अधिक मात्रा होने पर ये हानिकारक हो जाते हैं। ये अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं –

  • लवण-अनेक तत्त्वों के लवण जल में घुल जाते हैं और जल को दूषित कर देते हैं। कुछ लवण जल को कठोर बना देते हैं। इनमें कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेट, सल्फेट तथा क्लोराइड्स इत्यादि प्रमुख हैं।
  • सड़े हुए जैविक पदार्थ-अनेक जैविक पदार्थों के मृत भाग जल में घुल जाते हैं तथा उनसे प्राप्त लवण इसी में घुले रहते हैं। इनमें नाइट्राइट्स, नाइट्रेट्स व अमोनिया इत्यादि के लवण हो सकते हैं।
  • गैसें-अनेक गैसें जल में घुलनशील हैं। उदाहरणार्थ-हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया आदि जल में घुलकर उसे दूषित कर देती हैं।

2. अविलेय अशुद्धियाँ (Insoluble impurities) – अशुद्ध जल में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी पायी जाती हैं जो जल में घुलती नहीं परन्तु इनका जल में अस्तित्व ही जल को दूषित एवं हानिकारक बना देता है। इस प्रकार की मुख्य अशुद्धियाँ निम्नलिखित हैं –

  • धूल-मिट्टी के कण एवं विभिन्न प्रकार का कूड़ा-करकट; उदाहरणार्थ–पत्ते, घास, तिनके आदि।
  • विभिन्न रोगों के कीटाणु व बीजाणु। पानी में मुख्य रूप से हैजा, पेचिश, मोतीझरा आदि रोगों के कीटाणु विद्यमान हो सकते हैं।
  • विभिन्न कीटाणुओं के अण्डे तथा छोटे बच्चे।
  • विभिन्न पशुओं द्वारा उत्पन्न गन्दगी; जैसे-मल-मूत्र आदि।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि जल अनेक प्रकार से प्रदूषित हो सकता है। वास्तव में, किसी भी प्रकार से जल में किसी अशुद्धि के समावेश से जल प्रदूषित हो जाता है।

दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ (Methods of Purification of Contaminated Water) –
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए तीन प्रकार की विधियाँ अपनाई जाती हैं –
(क) भौतिक विधि
(ख) यान्त्रिक विधि तथा
(ग) रासायनिक विधि।

(क) भौतिक विधि (Physical method) –
अशुद्ध जल को भौतिक विधि द्वारा निम्नलिखित तीन प्रकार से शुद्ध किया जा सकता है –

1. उबालकर (By boiling) – अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए यह सर्वोत्तम उपाय है। जल को उबालने से उसमें घुलित या अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं। विभिन्न प्रकार के कीटाणु, जीवाणु या रोगाणु इत्यादि मर जाते हैं। अधिक मात्रा में घुले हुए लवण अलग होकर नीचे बैठ जाते हैं। विभिन्न प्रकार की घुली हुई गैसें उबालने से निकल जाती हैं। इस प्रकार अशुद्ध जल को उबालने से उसकी अधिकांश अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। घरेलू स्तर पर पीने के लिए जल को शुद्ध करने के लिए यह विधि सर्वोत्तम है।

2. आसवन द्वारा (By distillation) – आसवन की विधि के अन्तर्गत अशुद्ध जल को भाप में परिवर्तित कर लिया जाता है। इसके बाद जलवाष्प को ठण्डा कर पुन: जल में बदल दिया जाता है। इस क्रिया के लिए एक वाष्पीकरण उपकरण प्रयोग में लाया जाता है जिसका एक भाग भाप बनाने का तथा दूसरा भाग भाप को ठण्डा करने का कार्य करता है।

आसवन से प्राप्त जल आसुत जल कहलाता है। इसमें किसी प्रकार की घुलित या अघुलित अशुद्धियाँ नहीं रह जाती हैं। यह सर्वथा शुद्ध जल है किन्तु सामान्य अवस्था में इस जल का पीने के जल के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि आवश्यक लवण इस जल में उपस्थित नहीं रहते हैं। आसुत जल को दवाइयों आदि के लिए तथा इंजेक्शन को घोलने के उपयोग में लाया जाता है। आसवन विधि द्वारा केवल सीमित मात्रा में ही जल को शुद्ध किया जा सकता है।

3. पराबैंगनी किरणों द्वारा (By Ultraviolet rays) – प्रकाश में उपस्थित पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet rays) जल को शुद्ध कर देती हैं। ये किरणें जल में उपस्थित रोगाणुओं को भी नष्ट कर देती हैं। बड़े पैमाने पर इस प्रकार की किरणों को यन्त्रों द्वारा बनाकर उपयोग में लाया जा सकता है।

(ख) यान्त्रिक विधि (Mechanical method) –
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन भी अपनाए जा सकते हैं जिसमें विभिन्न प्रकार से छानना, निथारना आदि सम्मिलित हैं। पहली विधि में केवल मोटी अघुलित अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। दूसरी विधि में सभी अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं परन्तु इसमें घुलित अशुद्धियों को दूर नहीं कर सकते हैं। विभिन्न परिमाप के कणों (पदार्थों) का उपयोग करके कुछ सीमा तक जल को शुद्ध किया जा सकता है। चार घड़ों द्वारा जल को शुद्ध करने की विधि का प्राचीनकाल से भारत में प्रचलन रहा है। इसके अतिरिक्त, अब विभिन्न प्रकार के वाटर फिल्टर उपलब्ध हैं जो पानी को सूक्ष्मता से छानते हैं तथा शुद्ध जल उपलब्ध हो जाता है। कुछ विद्युत-चालित उपकरण भी जल को शुद्ध करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। एक्वागार्ड इसी प्रकार का एक लोकप्रिय उपकरण है।

(ग) रासायनिक विधि (Chemical method) –
जल में घुलित या अघुलित अशुद्धियों को नष्ट करने के लिए कुछ रासायनिक पदार्थों का प्रयोग भी किया जाता है। ये रासायनिक पदार्थ दो प्रकार से क्रिया करते हैं। पहली क्रिया में ये अघुलित या घुलित अशुद्धियों को अवक्षेपण द्वारा अलग कर देते हैं जिसको छानकर अलग किया जा सकता है, जबकि दूसरी विधि, जल में उपस्थित रोगाणुओं को नष्ट करने के लिए होती है।

1. अवक्षेपण विधि (Dispersal method) – कुछ पदार्थ जल में उपस्थित अशुद्धियों को अलग कर उनके साथ तल में नीचे बैठ जाते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ फिटकरी है। थोड़ी-सी फिटकरी जल के अविलेय तथा विलेय पदार्थों को अवक्षेपित कर जल को शुद्ध करके तल में बैठ जाती है। यद्यपि यह कुछ सीमा तक कीटाणुनाशक भी है किन्तु इसका अधिक प्रभाव नहीं होता। इससे कठोर जल भी मृदु हो जाता है। अवक्षेपण के लिए उपयोगी निर्मली नामक फल का ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है।

2. कीटाणुनाशक पदार्थ (Germicidic substances) – अशुद्ध जल में रहने वाले विभिन्न रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए अनेक रासायनिक पदार्थ प्रयोग किए जाते हैं। इनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं –

(क) लाल दवा – जल को शुद्ध करने के लिए यह उत्तम पदार्थ है। इसका रासायनिक नाम पोटैशियम परमैंगनेट है। इसके प्रयोग से अधिकांश कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। गाँवों में तालाब, कुओं तथा एकत्रित जल में इस दवा का प्रयोग किया जाता है। इसकी थोड़ी-सी मात्रा जल में घोलकर उस जल में डाली जाती है जिसमें कीटाणु उपस्थित होते हैं। इस दवा के प्रभाव से जल में विद्यमान कीटाणु नष्ट हो जाते हैं व जल शुद्ध हो जाता है।

(ख) कॉपर सल्फेट (तूतिया) – यह अत्यन्त अल्पमात्रा में प्रयुक्त किए जाने पर अशुद्ध जल को कीटाणुरहित कर सकता है। इसका रासायनिक नाम कॉपर सल्फेट है। घरेलू रूप में इसका प्रयोग इसलिए वर्जित है क्योंकि थोड़ी भी अधिक मात्रा में यह हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

(ग) ब्लीचिंग पाउडर – ब्लीचिंग पाउडर की बहुत कम मात्रा ही जल को कीटाणुरहित कर सकती है। 2.5 किग्रा ब्लीचिंग पाउडर एक लाख गैलन पानी को रोगाणु-मुक्त कर देता है।

(घ) क्लोरीन – यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कीटाणुनाशक गैस है। सभी बड़े नगरों में जल-आपूर्ति की संस्था होती है जिसके द्वारा क्लोरीन गैस का प्रयोग कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।

पर्वोक्त रासायनिक पदार्थों के अतिरिक्त आयोडीन, ओजोन आदि गैसें भी जल को कीटाणुरहित कर सकती हैं, यद्यपि इनका प्रयोग प्रचलित नहीं है। ऑक्सीजन गैस स्वयं भी बहुत-सी अशुद्धियों का ऑक्सीकरण कर देती है।

प्रश्न 4.
खाद्य-पदार्थों के संग्रह से क्या आशय है? घर पर खाद्य-पदार्थों के उचित संग्रह की व्यवस्था का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
आहार के लिए विभिन्न प्रकार के खाद्य-पदार्थों की निरन्तर आवश्यकता होती है। आहार की नियमित आपूर्ति के लिए घर पर विभिन्न खाद्य-सामग्रियों को संगृहीत करके रखना आवश्यक होता है। बाजार से लाई गई खाद्य-सामग्री को घर में सँभालकर सुरक्षित ढंग से रखना आहार-संग्रह कहलाता है। आहार-संग्रह व्यवस्थित ढंग से तथा खाद्य-सामग्री की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए। घर पर आहार-संग्रह की उचित व्यवस्था को आवश्यक एवं लाभकारी माना जाता है।

इससे रसोईघर के कार्य अर्थात् भोजन तैयार करने में विशेष सुविधा होती है, समय एवं श्रम की बचत होती है तथा आर्थिक लाभ भी होता है। उचित संग्रह से खाद्य-सामग्री नष्ट होने से बची रहती है। उचित संग्रह की समुचित जानकारी होने की दशा में अनाज आदि फसल के अवसर पर एक साथ वर्ष भर की आवश्यकतानुसार ले लिए जाते हैं। इस अवसर पर भाव कम होते हैं जिससे धन की बचत हो जाती है। इसी प्रकार प्याज, आलू, अदरक, लहसुन आदि खाद्य-सामग्रियों को भी एक साथ थोक के भाव खरीदने से आर्थिक लाभ होता है।

खाद्य-सामग्री के संग्रह की विधियाँ (Methods of Food Storage) –
भिन्न-भिन्न प्रकृति वाली खाद्य-सामग्रियों के संग्रह के लिए भिन्न-भिन्न उपाय एवं विधियाँ अपनाई जाती हैं। आहार-संग्रह के दृष्टिकोण से खाद्य-पदार्थों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है। ये वर्ग हैं – नाशवान भोज्य-पदार्थ, अर्द्ध-नाशवान भोज्य-पदार्थ तथा अनाशवान भोज्य-पदार्थ।

खाद्य-सामग्री के नष्ट या विकृत होने के लिए दो प्रकार के कारण जिम्मेदार होते हैं। प्रथम वर्ग के कारणों को आहार को नष्ट करने वाले आन्तरिक कारण कहा जाता है तथा द्वितीय वर्ग के कारणों को बाहरी कारण कहा जाता है। आन्तरिक कारणों में मुख्य रूप से आहार में विद्यमान एन्जाइम उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। बाहरी कारणों में मुख्य हैं-बैक्टीरिया, मोल्ड तथा यीस्ट का प्रभाव। इन सभी कारकों की सक्रियता नमी की उपस्थिति में बढ़ जाती है। इन कारकों के अतिरिक्त विभिन्न घरेलू जीव, कीट एवं पशु-पक्षी भी खाद्य-सामग्री को नष्ट एवं दूषित करते हैं।

नाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of perishable food materials) – नाशवान भोज्य पदार्थों को नष्ट या विकृत होने से बचाने के लिए दो विधियों को अपनाया जा सकता है – प्रथम गर्म अथवा ताप पर आधारित विधि है तथा द्वितीय ठण्डी या प्रशीतन पर आधारित विधि है। गर्म अथवा ताप पर आधारित विधि के अन्तर्गत खाद्य-सामग्री को अधिक ताप पर गर्म करके विकृत होने से बचाया जा सकता है। कच्चे दूध को उबालकर रखने से वह फटने एवं विकृत होने से बच जाता है। ठण्डी अथवा प्रशीतन पर आधारित विधि के अन्तर्गत खाद्य-सामग्री को कम या अति कम तापक्रम पर संगृहीत करने की व्यवस्था की जाती है। घरों में इस विधि को फ्रिज के माध्यम से अपनाया जाता है, जबकि व्यापक स्तर पर यह कार्य कोल्ड स्टोरेज के माध्यम से किया जाता है।

अर्द्ध-नाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of semi perishable food materials) – अर्द्ध-नाशवान भोज्य पदार्थों में नमी की मात्रा कम होती है जैसे कि आलू, प्याज, अदरक, लहसुन आदि। इस प्रकार के भोज्य पदार्थों के संग्रह के लिए किन्हीं विशिष्ट उपायों को अपनाना आवश्यक नहीं होता। इन खाद्य-पदार्थों को मुख्य रूप से आहार को नष्ट करने वाले बाहरी कारकों तथा नमी से बचाकर रखना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ये खाद्य-पदार्थ अधिक गर्म वातावरण में न रखे जाएँ। साथ ही इन्हें जीव-जन्तुओं से बचाकर रखने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

अनाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of imperishable food materials) – अनाशवान भोज्य-पदार्थों के संग्रहण में मुख्य रूप से बाहरी कारकों को नियन्त्रित करना अनिवार्य होता है। इस श्रेणी में मुख्य रूप से अनाजों, दालों आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन भोज्य पदार्थों को संगृहीत करने के लिए दो प्रकार के उपाय किए जाते हैं। प्रथम प्रकार के उपायों के अन्तर्गत अनाजों एवं दालों को बन्द ढक्कनदार पात्रों या डिब्बों में पूर्ण रूप से नमीरहित दशा में रखा जाता है। द्वितीय प्रकार के उपायों के अन्तर्गत अनाजों में कीटनाशक दवाओं, नीम के सूखे पत्ते, नमक, हल्दी या बोरिक अम्ल को रखकर कीड़ों तथा घुन आदि से बचाया जा सकला है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पेयजल के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
शुद्ध जल (पेयजल) के गुण बताइए।
उत्तरः
पेयजल के गुण ऐसा जल, जो उन सभी हानिकारक पदार्थों से मुक्त हो जो स्वास्थ्य को हानि पहुँचा सकते हैं तथा जिसमें शरीर के लिए आवश्यक खनिज पदार्थ मौजूद हों, ‘पेयजल’ कहलाता है। आदर्श पेयजल में निम्नलिखित गुण होते हैं

  • यह स्वच्छ (पारदर्शी), गन्धहीन, रंगहीन तथा कुछ आवश्यक खनिज लवणयुक्त होना चाहिए।
  • यह सुस्वादु होना चाहिए।
  • इसका ताप सामान्यत: 4°-10°C के मध्य होना चाहिए।
  • यह जीवाणुओं, विषाणुओं, रोगाणुओं आदि से मुक्त होना चाहिए।
  • इससे बर्तनों, पाइपों तथा कपड़ों पर धब्बे नहीं लगने चाहिए।
  • यह हानिकारक पदार्थों से मुक्त होना चाहिए।
  • यह मृदु जल होना चाहिए।
  • अधिक देर तक रखने पर भी यह ताजा बना रहना चाहिए।

प्रश्न 2.
जल की कठोरता को कैसे दूर करेंगी?
उत्तरः
जल में दो प्रकार की कठोरता हो सकती है – अस्थायी कठोरता तथा स्थायी कठोरता। जल की अस्थायी कठोरता दो उपायों द्वारा दूर की जा सकती है। ये उपाय हैं –

1. जल को उबालना तथा
2. जल में चूना मिलाना। जल की स्थायी कठोरता को दूर करने के तीन उपाय हैं –

  • कपड़े धोने के सोडे द्वारा
  • सोडे तथा चूने द्वारा तथा
  • परम्यूरिट विधि द्वारा।

प्रश्न 3.
पेयजल तैयार करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
पेयजल तैयार करने के उपाय –
पेयजल सामान्यतः जल को उबालकर, छानकर तैयार किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर विशेषकर शहरों में प्राकृतिक जल से अवांछित एवं हानिप्रद अशुद्धियों को निकालकर जल शोधन किया जाता है, तब यह पीने योग्य होता है। इसके लिए एक निश्चित विधि अपनाई जाती है जिसके निम्नलिखित सोपान होते हैं –

1. स्कन्दन (Coagulation)-इस विधि में अशुद्ध जल को ऐसे हौज में भेजा जाता है जिसमें कुछ स्कन्दन पदार्थ (Coagulants) मिलाए जाते हैं जो सामान्यत: लोहा तथा ऐलुमिनियम के लवण होते हैं। इस प्रकार के लवणों में फिटकरी, फेरस सल्फेट, फेरिक क्लोराइड, चूना आदि प्रमुख हैं। ये पदार्थ जल में घुलकर एक चिपचिपा पदार्थ बना देते हैं जो जल में उपस्थित अशुद्धियों को अपने साथ चिपकाकर भारी बना देते हैं और हौज की तली में बैठ जाते हैं। ये कुछ निलम्बित कणों को उदासीन भी बनाते हैं; अतः वे भारी होकर तली में बैठ जाते हैं और इस प्रकार जल शुद्ध हो जाता है।

2. निथारना-जल में बैठने वाली अशुद्धियों को निकालने का तरीका ‘निथारना’ कहलाता है। इस विधि में जल को कुछ समय के लिए स्थिर रखा जाता है जिससे उसमें उपस्थित अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं। अब ऊपर के साफ जल को निथारकर अलग कर लिया जाता है तथा प्रयोग में लाया जाता है। तली में शेष बचे जल में अशुद्धियाँ रह जाती हैं जिसे विसर्जित कर दिया जाता है।

3. निस्यन्दन-इस विधि में जल को छाना जाता है ताकि छोटी-बड़ी सभी प्रकार की अशुद्धियाँ उसमें से निकल जाएँ।

4. कीटाणुनाशक-जब पानी में से विभिन्न प्रकार की अशुद्धियाँ निकल जाती हैं, तो उसमें कुछ जीवाणु इत्यादि रह जाते हैं जो रोग उत्पन्न कर सकते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए जल में क्लोरीन भेजी जाती है (ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करके)। इस गैस के प्रभाव से सभी प्रकार के रोगाणु पूर्णत: नष्ट हो जाते हैं। सामान्यतः घरों में पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का प्रयोग भी जल को कीटाणु-रहित करने के लिए किया जाता है। कुओं आदि में भी इस दवा को डलवाया जाता है।

प्रश्न 4.
मनुष्य के शरीर के लिए जल की उपयोगिता बताइए।
अथवा
ल की मानव-जीवन में क्या उपयोगिता है?
उत्तरः
शरीर के लिए जल अत्यन्त आवश्यक है। शरीर के अन्दर जल ही अनेक कार्यों को करने के लिए माध्यम तथा क्रियाशीलता प्रदान करता है। जल के निम्नलिखित मुख्य उपयोग हैं –

  • रुधिर का अधिकतम भाग जल ही होता है तथा रुधिर को तरल बनाए रखने का कार्य यही करता है।
  • जल भोजन को पचाने में सहायक है। पचा हुआ भोजन भी इसी के साथ आंत्र की दीवार में और वहाँ से सम्पूर्ण शरीर में घुलित अवस्था में पहुँचता है।
  • जल शरीर के ताप को नियन्त्रित तथा नियमित करता है।
  • हानिकारक, व्यर्थ तथा विषैले पदार्थों को जल ही अपने अन्दर घोलकर उत्सर्जन क्रिया के द्वारा वृक्कों से मूत्र के रूप में तथा त्वचा से पसीने के रूप में निकालता है।
  • जल शरीर के अनेकानेक भागों को कोमल तथा मुलायम बनाए रखता है, मुख्यतः मांसपेशियों, तन्तु तथा त्वचा आदि को।
  • शरीर जिन कोशिकाओं से मिलकर बना है उनमें प्रमुख भाग लगभग 85% से 90% तक जल ही होता है।
  • शरीर के अन्दर होने वाली सभी छोटी-बड़ी, निर्माण या टने-फटने सम्बन्धी क्रियाओं को. जिन्हें सम्मिलित रूप में उपापचय (metabolism) कहते हैं, जल ही आधार प्रदान करता है (बिना जल के ये क्रियाएँ नहीं हो सकती हैं)।
  • प्यास लगने पर जल ही प्यास को शान्त करता (बुझाता) है।

प्रश्न 5.
दैनिक कार्यों के लिए हमें कितने जल की आवश्यकता होती है?
उत्तरः
जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक है। यह हमारे जीवन, रहन-सहन, व्यवसाय, भोजन, जलवायु के निर्माण आदि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कई बार हम यह भी सोच सकते हैं कि जल के बिना हमारा जीवन असम्भव है। यद्यपि व्यक्ति की जल सम्बन्धी आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती है और इस सम्बन्ध में सामान्यत: नियम बनाना उचित प्रतीत नहीं होता। फिर भी एक सामान्य व्यक्ति को औसतन 120-140 लीटर तक जल की आवश्यकता होती है। यद्यपि जीवित रहने भर के लिए 1 – 1.5 लीटर जल ही प्रतिदिन आवश्यक होता है। निम्नांकित सारणी एक व्यक्ति के दिन भर के सामान्य जल-प्रयोग को प्रदर्शित करती है
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जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 145 पूर्वोक्त विभाजन में ग्रीष्मकाल में जल की मात्रा में वृद्धि हो सकती है। इसी प्रकार सामान्यत: गर्म प्रदेशों में ठण्डे प्रदेशों की अपेक्षा निवासियों को अधिक जल की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
अशुद्ध जल क्या है? शुद्ध तथा अशुद्ध जल में अन्तर बताइए।
अथवा
शुद्ध जल तथा अशुद्ध जल में अन्तर लिखिए।
उत्तरः
अशुद्ध जल –
शुद्ध जल एक उत्तम विलायक है, इसी गुण के कारण जल शीघ्र ही विभिन्न लवणों तथा अन्य पदार्थों को घोल लेता है तथा इसके परिणामस्वरूप शीघ्र ही अशुद्ध हो जाता है। कुछ पदार्थ लटकी हुई अवस्था में भी जल को अशुद्ध बनाते हैं। जिस जल में शुद्ध जल के उपर्युक्त गुण नहीं होते वह जल अशुद्ध जल कहलाता है। शुद्ध एवं अशुद्ध जल के अन्तर को निम्नांकित सारणी द्वारा समझा जा सकता है –
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प्रश्न 7.
मृदु जल और कठोर जल में अन्तर लिखिए।
उत्तरः
जल में अनावश्यक लवणों की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर जल के दो प्रकार निर्धारित किए गए हैं जिन्हें क्रमश: मृदु जल (soft water) तथा कठोर जल (hard water) कहा जाता है। मृदु जल तथा कठोर जल की पहचान के लिए मुख्य उपाय है-साबुन द्वारा पानी में झाग बनाना। मृदु जल तथा कठोर जल के अन्तर का विवरण निम्नांकित है –
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प्रश्न 8.
अशुद्ध जल से होने वाली हानियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
अशुद्ध जल से होने वाले रोगों की सूची बनाइए।
उत्तरः
अशुद्ध जल से होने वाली हानियाँ –
अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के हानिकारक पदार्थ हो सकते हैं जिनकी उपस्थिति से ही यह दोषयुक्त होता है। जब ऐसा जल पीने के काम में लाया जाता है तो यह आहारनाल में पहुँचता है। जल में उपस्थित रोगों के जीवाणु इत्यादि आहारनाल के विभिन्न स्थानों में अपनी क्रिया प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रकार शरीर में कुछ ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं जो किसी रोग को उत्पन्न करते हैं।

अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग – अशुद्ध जल से सामान्यतः आहारनाल सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। उदाहरणार्थ – हैजा, टायफॉइड, अतिसार, संग्रहणी, आंत्रक्षय तथा पीलिया आदि।

दूषित जल का स्वास्थ्य पर प्रभाव –
दूषित जल का जन-जीवन पर स्पष्ट रूप से कुप्रभाव पड़ता है। दूषित जल से अनेक प्रकार की महामारियाँ; जैसे-टायफॉइड, पेचिश आदि रोग हो जाते हैं क्योंकि इन रोगों के रोगाणु दूषित जल में उपस्थित रहते हैं। गोलकृमि, सूत्रकृमि आदि आँतों में रहने वाले परजीवी भी दूषित जल द्वारा मनुष्य की आँत में पहुंचते हैं। दूषित जल में ऑक्सीजन की कमी होती है; अत: ऐसे जल में रहने वाली मछलियाँ आदि भी मर जाती हैं। यही नहीं, दूषित जल दुर्गन्ध के कारण वायुमण्डल को अशुद्ध करता है। इस जल का पशुओं को प्रयोग कराना वर्जित होना चाहिए क्योंकि यह उनमें भी रोग पैदा करता है।

दूषित जल, रोगाणु मुक्त होने पर भी अन्य कई प्रकार से स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाला होता है। इससे नज़ला, त्वचा के रोग, उल्टियाँ, हैजा, डायरिया आदि जैसे रोगों के लक्षण भी पैदा होते हैं।

प्रश्न 9.
जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
जल को शुद्ध करने की चार-घड़ों की विधि का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
जल शुद्ध करने की घरेलू विधियाँ

  1. जल किसी भौतिक साधन से शुद्ध किया जा सकता है; जैसे – उबालना, आसवन आदि।
  2. रासायनिक पदार्थों के प्रयोग के द्वारा भी जल शुद्ध किया जा सकता है; जैसे-कीटाणुनाशक पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का प्रयोग संगृहीत जल में किया जाता है।
  3. अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन अपनाए जा सकते हैं, जिसमें कपड़े द्वारा छानना तथा छन्ने कागज द्वारा छानना आदि सम्मिलित हैं। पहली विधि में केवल मोटी अघुलित अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। दूसरी विधि में सभी अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं, परन्तु इसमें सभी घुलित अशुद्धियों को दूर नहीं कर सकते हैं।

घरेलू फिल्टर बेड विधि : चार घड़ों की विधि –
इस विधि में चार घड़े लिए जाते हैं। इनमें से तीन घड़ों की पेंदी में एक छोटा-सा छिद्र कर लिया जाता है जिससे पानी बूंद-बूंद करके निकल सके। इन घड़ों को एक बड़े स्टैण्ड में एक के ऊपर एक करके इस प्रकार रख दिया जाता है कि ऊपर वाले घड़े का जल बूंद-बूंद करके दूसरे घड़े में आ जाए। इसी प्रकार दूसरे घड़े का जल तीसरे में और तीसरे का चौथे में आ सकता है।

इस प्रकार रखे गए घड़ों में सबसे ऊपरी घड़े में अशुद्ध जल रखा जाता है जो बूंद-बूंद करके निचले घड़े में गिरता रहता है। दूसरे घड़े में रखे । लकड़ी के कोयलों पर यह जल गिरकर छनता है और पेंदी से निकलकर चित्र 12.2-जल शुद्ध करने की तीसरे घड़े में पहुँचता है। इस घड़े में पहले से ही रेत (बालू) भरकर रखी जाती है। इस घड़े में जल एक बार और छनता है और अत्यन्त बारीक कण भी रेत के द्वारा छान लिए जाते हैं। इस प्रकार चौथे (सबसे निचले) घड़े में जल निलम्बित अशुद्धियों से रहित होता है।

यह विधि बड़े पैमाने पर जल शुद्ध करने की आधारभूत विधि है।
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प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोत –
मनुष्य ने अपने आहार में असंख्य खाद्य-पदार्थों को सम्मिलित किया है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों के आहार में बहुत अधिक विविधता देखी जा सकती है। इस स्थिति में खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोतों का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए उनका स्पष्ट वर्गीकरण करना आवश्यक है। सामान्य रूप से खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोतों के दो वर्ग निर्धारित किए जाते हैं। खाद्य-प्राप्ति के वनस्पतिजन्य स्रोत तथा खाद्य-प्राप्ति के प्राणिजन्य स्रोत। इन दोनों स्रोतों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है –

1.खाद्य-प्राप्ति के वनस्पतिजन्य स्त्रोत-मनुष्य के खाद्य-पदार्थों की प्राप्ति का एक मुख्य स्रोत वनस्पति-जगत है। वनस्पति-जगत से अनाज, दालें, सब्जियाँ तथा फल प्राप्त होते हैं। ये सभी खाद्य पदार्थ विभिन्न पोषक-तत्त्वों से भरपूर तथा भूख को शान्त करने वाले होते हैं। फलों एवं सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में विटामिन एवं खनिज लवण पाए जाते हैं। अनाज कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं। दालों में प्रोटीन की प्रचुरता होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वनस्पति-जगत से प्राप्त होने वाले खाद्य-पदार्थ हमारी आहार सम्बन्धी सम्पूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं।

2. खाद्य-प्राप्ति के प्राणिजन्य स्रोत-मनुष्य की खाद्य-सामग्री की प्राप्ति का एक स्रोत प्राणि-जगत भी है। प्राणि-जगत से मनुष्य मुख्य रूप से दूध, मांस तथा अण्डे प्राप्त करता है। प्राणि-जगत से प्राप्त खाद्य-पदार्थ भी विभिन्न पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं। दूध एक आदर्श एवं सम्पूर्ण आहार है। इसमें आहार के प्रायः सभी पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। अण्डों में भी प्रायः सभी पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। मांस, प्रोटीन एवं खनिज लवणों की प्राप्ति का उत्तम स्रोत है। मांस में पायी जाने वाली प्रोटीन उत्तम प्रकार की तथा अधिक उपयोगी होती है।

प्रश्न 11.
खाद्य पदार्थों में मिलावट से क्या आशय है?
उत्तरः
खाद्य पदार्थों में मिलावट –
प्रत्येक खाद्य पदार्थ का अपना एक विशेष संघटन होता है। उसमें उपस्थित ये संघटक तत्त्व ही उस खाद्य पदार्थ के पोषक गुणों को निर्धारित करते हैं। किसी खाद्य पदार्थ से, निश्चित मात्रा में उपस्थित उस पोषक तत्त्व को निकाल लिया जाए अथवा अन्य कम मूल्य का या विजातीय कोई पदार्थ मिला दिया जाए तो यह क्रिया मिलावट या अपमिश्रण कहलाती है।

भारत सरकार के खाद्य अपमिश्रण निवारण नियम (Prevention of Food Adulteration Act, 1954) के अनुसार निम्नलिखित स्थितियों में खाद्य पदार्थ को ‘अपमिश्रण’ या ‘मिलावट-युक्त’ कहा जाएगा –

  • खाद्य पदार्थ जब अपने वास्तविक रूप-रंग वाले नहीं रहते हैं।
  • खाद्य पदार्थों में स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाला कोई तत्त्व होता है।
  • खाद्य पदार्थ से कोई पोषक तत्त्व निकाल लिया जाता है।
  • खाद्य पदार्थ में जब कोई घटिया या कम स्तर का कोई पदार्थ मिला दिया जाता है।
  • खाद्य पदार्थ में जब कोई हानिकर या विषैला तत्त्व मिला दिया जाता है या मिल जाता है।
  • जब खाद्य पदार्थ को ऐसे बर्तन (container) में रखा जाता है जिसके सम्पर्क से यह दूषित हो जाता है।
  • जब खाद्य पदार्थ किसी रोगी पशु-पक्षी से प्राप्त किया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थ में कोई वर्जित या न खाने योग्य रासायनिक पदार्थ, रंग आदि मिला दिया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थों के संग्रह करते समय अथवा डिब्बाबन्दी के समय दूषित हाथों या दूषित विधि का उपयोग किया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थ में संरक्षण के लिए प्रयुक्त रंग या संरक्षक पदार्थ निर्धारित सीमा से अधिक मिला दिया गया हो।
  • जब भोज्य पदार्थ के गुणों एवं शुद्धता का गलत विवरण उनके डिब्बे पर दिया गया हो।

इस प्रकार, मिलावट से खाद्य पदार्थ में पोषक तत्त्व या तत्त्वों की कमी हो जाती है अर्थात् उनका पोषक स्तर कम हो जाता है। यही नहीं, वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं और कभी-कभी तो रोग फैलाने वाले या मृत्यु को निमन्त्रण देने वाले भी हो सकते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जल से आप क्या समझती हैं?
अथवा
जल का संघटन लिखिए।।
उत्तरः
जल एक यौगिक है। यह दो तत्त्वों-हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के संयोग से बना है। इसका रासायनिक सूत्र H2O होता है।

प्रश्न 2.
जल का रासायनिक सूत्र लिखिए।
उत्तरः
जल का रासायनिक सूत्र है – H2O.

प्रश्न 3.
जल प्राप्ति के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
जल प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं-समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, कुएँ, झीलें, झरने एवं सोते।

प्रश्न 4
प्राणियों के लिए जल की मुख्य उपयोगिता क्या है?
उत्तरः
प्राणियों के लिए जल की मुख्य उपयोगिता है – प्यास को शान्त करना।

प्रश्न 5.
हमारे रक्त में जल की क्या भूमिका है?
उत्तरः
जल रक्त को आवश्यक तरलता प्रदान करता है।

प्रश्न 6.
शरीर के तापक्रम पर जल का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
जल शरीर के तापक्रम का नियमन करता है।

प्रश्न 7.
शुद्ध जल के मुख्य गुण क्या हैं?
अथवा
शुद्ध जल की पहचान कैसे करेंगी?
उत्तरः
शुद्ध जल रंगहीन, गन्धहीन तथा स्वादहीन होता है। यह पारदर्शी होता है तथा इसमें एक विशेष प्रकार की चमक होती है।

प्रश्न 8.
अशुद्ध जल में कौन-कौन सी अशुद्धियाँ पायी जाती हैं?
उत्तरः
अशुद्ध जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ पायी जाती हैं-

  1. घुलित अशुद्धियाँ तथा
  2. अघुलित अशुद्धियाँ।

प्रश्न 9.
अशुद्ध जल को मुख्य रूप से किन-किन विधियों द्वारा शुद्ध किया जा सकता है?
उत्तरः
अशुद्ध जल को मुख्य रूप से तीन विधियों से शुद्ध किया जाता है –

  1. यान्त्रिक विधि
  2. भौतिक विधि तथा
  3. रासायनिक विधि।

प्रश्न 10.
जल के कीटाणुओं को मारने वाले मुख्य रासायनिक पदार्थ कौन-कौन से हैं?
अथवा
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के मुख्य रासायनिक पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तरः
जल के कीटाणुओं को मारने वाले मुख्य रासायनिक पदार्थ हैं – लाल दवा, कॉपर सल्फेट, ब्लीचिंग पाउडर तथा क्लोरीन।

प्रश्न 11.
मनुष्य अपना आहार मुख्य रूप से किन स्रोतों से प्राप्त करता है?
उत्तरः
मनुष्य अपना आहार मुख्य रूप से दो स्रोतों से प्राप्त करता है –

  1. वनस्पतिजन्य स्रोत तथा
  2. प्राणिजन्य स्रोत।

प्रश्न 12.
वनस्पति-जगत से मुख्य रूप से कौन-कौन से खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं?
उत्तरः
वनस्पति-जगत से मुख्य रूप से अनाज, दालें, सब्जियाँ तथा फल प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 13.
प्राणि-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
प्राणि-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ हैं-दूध, अण्डा तथा मांस।

प्रश्न 14.
खाद्य पदार्थों में मिलावट से क्या आशय है?
उत्तरः
किसी खाद्य पदार्थ से निश्चित मात्रा में उपस्थित उस पोषक तत्त्व को निकाल लिया जाए अथवा अन्य कम मूल्य का या विजातीय कोई पदार्थ मिला दिया जाए तो यह क्रिया मिलावट कहलाती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. जल महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है –
(क) प्यास बुझाने के लिए
(ख) फसलों को सींचने के लिए
ग) दैनिक कार्यों को पूरा करने के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

2. जल का रासायनिक सूत्र है –
(क) H2O2
(ख) H2O
(ग) HO2
(घ) 2HO.
उत्तरः
(ख) H2O

3. हमारे शरीर के लिए जल उपयोगी है –
(क) रक्त को तरलता प्रदान करने में
(ख) पाचन-क्रिया में सहायक के रूप में
(ग) हानिकारक तत्त्वों के विसर्जन में सहायक के रूप में
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।

4. घरेलू स्तर पर जल को शुद्ध करने की उपयुक्त विधि है –
(क) उबालना
(ख) आसवन
(ग) अवक्षेपण
(घ) क्लोरीनीकरण।
उत्तरः
(क) उबालना।।

5. आसवन विधि द्वारा शुद्ध किए गए जल का नाम है –
(क) कठोर जल
(ख) आसुत जल
(ग) प्राकृतिक जल
(घ) मृदु जला
उत्तरः
(ख) आसुत जल।

6. वनस्पति-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ होते हैं –
(क) पोषक तत्त्वों से रहित
(ख) प्रोटीन का नितान्त अभाव होता है
(ग) पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत
(घ) केवल कार्बोहाइड्रेट युक्त।
उत्तरः
(ग) पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत।

7. प्राणि-जगत से प्राप्त खाद्य पदार्थों में भरपूर पाया जाने वाला पोषक तत्त्व है –
(क) कार्बोहाइड्रेट
(ख) जल
(ग) प्रोटीन
(घ) विटामिन ‘C’.
उत्तरः
(ग) प्रोटीन।

8. जो जल साबुन के साथ कम झाग देता है, वह होता है –
(क) मृदु जल
(ख) कठोर जल
(ग) शुद्ध जल
(घ) कठोर या मृदु दोनों में से कोई नहीं।
उत्तरः
(ख) कठोर जल।

9. कुएँ के पानी के शुद्धीकरण हेतु क्या मिलाया जाएगा –
(क) पोटैशियम परमैंगनेट ।
(ख) सोडियम क्लोराइड
(ग) जिंक ऑक्साइड
(घ) सिरका।
उत्तरः
(क) पोटैशियम परमैंगनेट।

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