UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 4 समय

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name समय (यशपाल)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 4 समय (यशपाल)

प्रश्न 1:
श्री यशपाल द्वारा लिखित ‘समय’ कहानी का सारांश (कथानक) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘समय’ कहानी की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध कहानीकार यशपाल की ‘समय’ कहानी बड़ी रोचक है। एक अधिकारी को रिटायर होने से डेढ़-दो वर्ष पहले से ही चिन्ता होने लगी कि उसका समय कैसे कटेगा ? जब वे नौकरी करते थे तब अवकाश के दिन कितने अच्छे लगते थे। गिन-गिन कर अवकाश के दिनों की प्रतीक्षा करते थे। लेकिन पूर्ण अवकाश होने पर व्यक्ति निरुत्साहित क्यों हो जाता है ? उसको इसे तो अपने श्रम का अर्जित फल मानकर, उससे पूरी लाभ उठाना चाहिए और सन्तोष करना चाहिए। आराम और अपनी इच्छा से श्रम करने में तो कोई बाधा नहीं डालेगा। अध्ययन का मन चाहा अवसर होगा और पर-आदेश पालन से मुक्ति मिलेगी। इससे बड़ा सन्तोष दूसरा क्या चाहिए?

सर्विस के समय गर्मियों में महीने दो महीने हिल स्टेशनों पर रह लेने का पापा को बहुत शौक था। मितव्ययिता के कारण रिटायर होने पर उन्होंने पहाड़ जाना छोड़ दिया है। रिटायर होने पर उन्होंने लखनऊ आवास बनाया तथा सन्ध्या के समय टहलने जाने का नियम भी। पहले टहलने या शॉपिंग के लिए वे स्वयं व पत्नी को लेकर जाते थे, बच्चों को साथ नहीं ले जाते थे। बच्चों को मम्मी-पापा के साथ बाजार जाने की उत्सुकता रहती थी। जब कभी बच्चों को बाजार साथ ले जाते तो बच्चे जो भी चीज माँगते, वह खरीद देते। बाजार में पापा बच्चों को डराते-धमकाते नहीं थे। मम्मी-पापा जब बाजार जाने को तैयार होते तो बच्चों को नौकर के साथ इधर-उधर टहला देते थे। वे अपने साथ बच्चों को बाजार में ले जाकर स्वयं को बुजुर्ग सिद्ध करना नहीं चाहते थे।

समय बीतने पर पापा के स्वभाव और, व्यवहार में कुछ परिवर्तन और आया। पहले उन्हें अपनी पोशाक चुस्त-दुरुस्त रखने और व्यक्तिगत उपयोग में बढ़िया चीजों का शौक था। अब पापा अपने शौक और रुचियों को बच्चों द्वारा पूरा होते देखकर सन्तोष पाते हैं; मानो उन्होंने अपने व्यक्तित्व को न्यास बच्चों में कर लिया है। धीरे-धीरे समय के गुजरने के साथ-साथ पापा के स्वभाव में पर्याप्त परिवर्तन हो गया। पत्नी अस्वस्थ एवं वृद्ध होने के कारण टहलने में असमर्थ हो गयी। इसलिए पापा हजरतगंज बाजार टहलने जाने के लिए बच्चों को साथ ले जाने लगे। कभी मण्टू को, कभी पुष्पा को और कभी किसी एक बच्चे को साथ ले जाते। हजरतगंज टहलने के बाद पापा स्वयं ही प्रस्ताव कर देते – कहो, क्या पसन्द है? कॉफी या आइसक्रीम।

बच्चों को साथ ले जाने के दो ही प्रयोजन होते थे। एक तो बूढ़ों या बुजुर्गों की अपेक्षा नवयुवकों का साथ और दूसरे बुढ़ापे के कारण, कमजोर नजर का प्रभाव। अकेले चलने में वे ठोकर खा जाते हैं और प्रकाश की चकाचौंध से परेशानी का भी अनुभव करते हैं। इसलिए जब वे सन्ध्या समय बाहर जाते, तो किसी न किसी को साथ ले जाते थे।

पापा की बाहर जाने की तैयारी अनेक घोषणाओं और पुरस्कारों के साथ होती, जिससे सब जान जाएँ कि वे बाहर जा रहे हैं और कोई उनके साथ हो ले। एक बार उन्होंने हमेशा की तरह आवाज लगायी, पुष्पा दीदी आवाज सुनकर मण्ट्र से साथ जाने को कहती हैं। लेकिन मण्टू ने उत्तर दिया कि मुझे बुङ्कों के साथ जाने में बोरियत होती है। पापा ने इस बात को सुन लिया और चिन्ता में डूब गये। मुझे भी बचपन की स्मृति आ गयी। सोचने लगा समय के साथ सब बदल जाते हैं। पापा ने माँ से अपनी छड़ी माँगी और टहलने चल दिये।। सम्भवतः उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि समय के साथ सब बदल जाता है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला की दृष्टि से यशपाल द्वारा लिखित ‘समय’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
पात्र-योजना की दृष्टि से ‘समय’ कहानी का विवेचन कीजिए।
या
‘वातावरण’ एवं ‘भाषा-शैली के आधार पर ‘समय’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘समय’ कहानी की समीक्षा देश-काल के आधार पर कीजिए।
या
कथावस्तु की दृष्टि से ‘समय’ कहानी की विशेषताएँ बताइए।
या
‘समय’ का कथानक लिखिए तथा उसके उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
या
कहानी के तत्त्वों के आधार पर ‘समय’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर ‘समय’ कहानी की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘समय’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘समय’ कहानी के पात्रों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
यथार्थवादी प्रगतिशील कहानीकारों में यशपाल जी का विशिष्ट स्थान है। यशपाल जी समाजवादी विचारधारा के प्रबुद्ध कहानीकार हैं। उनकी प्रस्तुत कहानी का कथानक मध्यमवर्गीय जीवन से लिया गया है। उनकी यह कहानी सत्य और यथार्थ पर आधारित समाजवादी विचारधारा की सुन्दर रचना है। कहानी-शिल्प की दृष्टि से इस कहानी की विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) शीर्षक – प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘समय’ एक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। सम्पूर्ण कहानी में समय की ही प्रमुखता को दर्शाया गया है। अपने जीवन के शीर्ष समय में शीर्ष पर स्थित व्यक्ति समय बदल जाने; अर्थात् नौकरी से अवकाश प्राप्त कर लेने अथवा बुजुर्ग हो जाने पर कितना बदल जाता है, उसके आस-पास की स्थितियों में कितना परिवर्तन हो जाता है, उसे इस कहानी में अच्छी तरह से दर्शाया गया है। शीर्षक में प्रतीकात्मकती, कौतूहल, सरलता और सजीवता है। ‘समय’ सम्पूर्ण कहानी के कथानक का प्राण है।

(2) कथावस्तु – इस कहानी के माध्यम से एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार का चित्र खींचा गया है, जिसका मुखिया उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी है। अपनी नौकरी के समय में कार्यालय से घर वापस आने पर इनको अधिकांश समय; चाहे वह बाजार जाने का हो या टहलने का; पत्नी के साथ ही व्यतीत होता था। इसमें बच्चों की सहभागिता न्यूनतम होती थी। अवकाश-प्राप्ति के बाद लखनऊ में स्थापित होने पर इन्हें बच्चों के साहचर्य की आवश्यकता महसूस होने लगी। पहले तो ये पत्नी के साथ ही घूमने चले जाया करते थे, लेकिन पत्नी के असमर्थ होने और कुछ अपनी भी कमजोरियों के कारण अब वे अपने युवा हो चुके बच्चों पर निर्भर होने लगे। लेकिन युवा मानसिकता की अपनी रुचि, अपनी व्यस्तता। एक दिन मण्टू ने तो स्पष्ट रूप से कह दिया कि बुड्डों के साथ जाने में बोरियत होती है। पापा ने यह सब कुछ सुना, समझा और छड़ी उठाकर अकेले ही टहलने के लिए चल दिये। सम्भवतः उन्होंने भी अन्तर्मन से इस सत्य को स्वीकार कर लिया।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कहानी का कथानक संगठित है। लेखक ने यथार्थवादी दृष्टि से एक मध्यमवर्गीय तथाकथित शिक्षित परिवार की वास्तविक तसवीर प्रस्तुत की है। कथानक में संक्षिप्तता, सजीवता, रोचकता, कुतूहल आदि गुण विद्यमान हैं। कहानी मर्मस्पर्शी तो नहीं है, लेकिन विचारों को आन्दोलित अवश्य करती है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण – इस कहानी के सभी पात्र यथार्थवादी हैं। कहानी में पात्रों की संख्या कम है। सभी पात्र एक परिवार के सदस्य और भाई-बहन हैं। परिवार के मुखिया अर्थात् पापा ही कहानी के मुख्य पात्र हैं और शेष सभी पात्र; जिसमें गृह-स्वामिनी भी सम्मिलित है; गौण हैं। ये सभी मुख्य पात्र पापा की चारित्रिक विशेषताओं को उजागर करने के लिए ही कहानी में प्रयुक्त हुए हैं। कहानी में यशपाल ने पात्रों को चरित्र-चित्रण अत्यधिक स्वाभाविकता और मनोवैज्ञानिकता के साथ किया है।

(4) कथोपकथन या संवाद – ‘समय’ कहानी के संवाद जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति में सक्षम हैं। सम्पूर्ण कहानी लेखक द्वारा अपनी पूर्व स्मृति और बचपन की घटनाओं को समायोजित करते हुए लिखी गयी है। कहानी में लेखक के स्वयं के कथन और उठाये गये प्रश्न हैं। इन प्रश्नों के उत्तर भी लेखक ने स्वयं ही दिये हैं। कहानी में संवाद-योजना अति अल्प है, लेकिन जहाँ कहीं भी है, पूर्णता के साथ मुखर हुई है। एक उदाहरण द्रष्टव्य हैमण्टू ने मुझे रोककर कहा-”सुनो, अम्मी पापा के साथ बाजार जा रही हैं। हम भी उनके साथ बाजार जाएँगे।”

मण्टू ने हुबिया को सम्बोधित किया, “हुबिया, हमारी सैण्डल में कील लग रही है। हम दूसरी सैण्डल पहनकर आते हैं।” हम दोनों घर की ओर भाग आये। मण्टू का अनुमान ठीक था। हम लौटे तो ड्योढ़ी में पहुँचते ही अम्मी की पुकार सुनायी दी – ”जी, आइए, मैं चल रही हैं।” अम्मी बाहर जाने के लिए साड़ी बदले और जूड़े में पिनें खोंसती हुई आ रही थीं। मण्टू अम्मी की कमर से लिपट गयी और डबडबाई आँखें अम्मी के मुँह की ओर उठाकर आँसू-भरे स्वर में हिचक-हिचककर गिड़गिड़ाने लगी – ‘कभी कभी कभी बच्चों को भी ” तो “साथ ले जाना
चाहिए।”
तब तक पापा भी आ गये थे। उन्होंने पूछा–“क्या है, क्या है?” वे समझ गये थे, बोले- “अच्छा बच्चो, एकदम तैयार हो जाओ।”

इस प्रकार ‘समय’ कहानी के संवाद पात्रों के मनोभावों को भली-भाँति अभिव्यक्त करते हैं। वे संक्षिप्त तथा प्रभावशाली हैं।

(5) देश-काल तथा वातावरण – यशपाल जी एक यथार्थवादी कहानीकार हैं और उनकी कहानी ‘समय’ एक, यथार्थपरक कहानी है। इसमें देश-काल तथा वातावरण का वर्णन कहानी को पूर्णता प्रदान करने के उद्देश्य से ही किया गया है। एक उदाहरण देखिएहम लोग उनकी संगति के लिए बचपन के दिनों की तरह लालायित नहीं रह सकते। कारण यह है कि अठारह-बीस पार कर लेने पर हम लोग भी अपना व्यक्तित्व अनुभव करने लगे हैं।

हम लोगों की अपनी वैयक्तिक रुझानें, अपने काम और अपने क्षेत्र भी हो गये हैं और उनके आकर्षण और आवश्यकताएँ भी रहती हैं। कभी-कभी पापा की आवश्यकता और हमारी संगति के लिए उनकी इच्छा और हमारी अपनी आवश्यकताओं और आकर्षणों में द्वन्द्व की स्थिति आ जाना अस्वाभाविक नहीं है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि देश-काल तथा वातावरण का वर्णन सीमित रूप से होते हुए भी कहानी की सफलता में अपना योगदान करता है।

(6) भाषा-शैली – प्रस्तुत कहानी के पात्र समाज के शिक्षित और मध्यम वर्ग से सम्बन्धित हैं। इसलिए कहानी की भाषा सरल, सुबोध और व्यावहारिक खड़ी बोली है। कहानी में तत्सम शब्दों का प्रयोग प्रचुरता से हुआ है। सम्पूर्ण कहानी की भाषा कहीं पर भी स्तर से नीचे नहीं होने पायी है। आजकल का युवा वर्ग बात-चीत में अंग्रेजी शब्दों का खुलकर प्रयोग करता है। इसी उद्देश्य से लेखक ने अपनी भाषा में भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बिना किसी संकोच के खुलकर किया है। इसके प्रयोग से कहीं भी भाषा की गतिमयता बाधित होती नहीं दीखती। कहीं-कहीं पर स्थानीय बोली में प्रयुक्त शब्द भी आये हैं। कहानी में विचारात्मक-विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। एक उदाहरण देखिए

पापा की अवचेतना में रिटायर हो जाने के डेढ़-दो वर्ष पूर्व से ही चिन्ता सिर उठाने लगी थी-रिटायर हो जाने पर अवकाश का बोझ कैसे सँभलेगा? अपनी इस चिन्ता का निराकरण करने के लिए प्राय: ही कहने लगते लोग बाग रिटायर होकर निरुत्साह क्यों हो जाते हैं? सोचिए नौकरी करते समय अवकाश के दिनों की प्रतीक्षा की जाती है। जब दीर्घ श्रम के पुरस्कार में पूर्ण अवकाश का अवसर आ जाये तो निरुत्साह होने का क्या कारण? इसे तो अपने श्रम का अर्जित फल मानकर, उससे पूरा लाभ उठाना और सन्तोष पाना चाहिए।

(7) उद्देश्य –  यशपाल प्रगतिशील साहित्यकार हैं। प्रस्तुत कहानी में यशपाल जी ने यह दर्शाया है कि प्रत्येक व्यक्ति को समय का महत्त्व समझना चाहिए और समय के परिवर्तन के साथ-साथ अपने में भी परिवर्तन ले आना चाहिए। यह सत्य है कि अधिक उम्र का व्यक्ति युवा के साथ रहकर स्वयं को भी युवावत अनुभव करता है। लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि युवा स्न्नयं को उम्रदराज के साथ कैसा अनुभव करता होगा। अत: सभी को समय के साथ स्वयं में परिवर्तन ले आना चाहिए। लेखक ने इस बात को कहानी के अन्त में स्पष्ट भी कर दिया है-“हाँ, यह तो बहुत अच्छी बात है।” पापा ने छड़ी की मूठ पर हाथ फेरकर कहा और छड़ी. टेकते हुए किसी की ओर देखे बिना घूमने के लिए चले गये; मानो हाथ की छड़ी को टेककर उन्होंने समय को स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 3:
‘समय’ कहानी के माध्यम से लेखक क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
‘समय’ कहानी के माध्यम से लेखक यशपाल यह सन्देश देना चाहते हैं कि जब बच्चे युवा हो जाएँ, अपना हित-अहित सोचने में सक्षम हो जाएँ, औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करने में समर्थ हो जाएँ तो बुजुर्गों को उनके व्यक्तिगत कार्यों या व्यस्तताओं में न तो हस्तक्षेप करना चाहिए, न ही उसे अपने अनुसार परिवर्तित करना चाहिए और न ही उनमें स्वयं को समायोजित करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी स्थिति अनावश्यक रूप से कटुता को जन्म देती है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को समय के अनुसार अपने आचार-विचारव्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिए। यही विचार सुखी जीवन की आधारशिला है।

प्रश्न 4:
‘समय’ कहानी का प्रमुख पात्र कौन है? उसका चरित्र-चित्रण कीजिए अथवा उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘समय’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘समय’ कहानी का प्रमुख पात्र एक अवकाश प्राप्त अधिकारी है। कहानी में इन्हें ‘पापा’ की संज्ञा दी गयी है। इनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) सम्भावित भविष्य के प्रति चिन्तित – ‘पापा’ अपनी नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के पूर्व से ही चिन्तित थे कि अवकाश का बोझ कैसे सँभलेगा और जीवन का अधिकांश समय कैसे व्यतीत होगा?

(2) व्यवस्थित दिनचर्या के व्यक्ति – ‘पापा’ व्यवस्थित दिनचर्या वाले व्यक्ति हैं। अवकाश प्राप्त होने पर उन्हें कार्यालयीय भार से मुक्ति मिल जाएगी। अतः उस समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने पहले से ही योजना बना ली थी कि वे अपने शासन-कार्य के अनुभव पर एक पुस्तक लिखेंगे। अब वे इस पर अध्ययन करते हैं और नोट्स भी बनाते हैं। शाम को वे विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी भी करते हैं।

(3) शौकीन मिजाज – पापा बहुत ही शौकीन मिजाज के व्यक्ति थे। उनकी पोशाक हमेशा चुस्त-दुरुस्त रहती थी। अपने उपयोग में आने वाली अच्छी और स्तरीय वस्तुओं का उन्हें शौक था। नौकरी के दौरान वे खर्चीले स्वभाव के थे। गरमियों के दिनों में पर्वतीय स्थानों पर घूमने व रहने का उन्हें बड़ा शौक था। घर में हमेशा दो-तीन नौकर रहा करते थे।

(4) जीवन से सन्तुष्ट – पापा अपनी नौकरी के समय में अपने जीवन से सन्तुष्ट थे और अब अवकाश के समय में भी सन्तुष्ट हैं। अपने जिन शौक और रुचियों से उन्हें अब सन्तुष्टि नहीं होती, उन शौक और रुचियों को अपने बच्चों द्वारा पूरा होते देखकर वे सन्तुष्ट हो जाते हैं।

(5) युवा दिखने की चाहत – पापा को शुरू से ही युवा दीखने की चाहत थी। इसीलिए मम्मी के साथ घूमने जाते समय वे बच्चों को अपने साथ नहीं ले जाते थे; क्योंकि इससे उन्हें अपने बुजुर्ग होने का अनुभव होता था।

(6) समय के साथ परिवर्तित – अवकाश प्राप्त होने के बाद पापा मितव्ययी हो गये। दूसरे वे बच्चों को भी अपने साथ ले चलना चाहते हैं; क्योंकि बच्चे भी अब कद में उनसे ऊँचे, जवान, स्वस्थ और सुडौल हो गये हैं। इससे उन्हें अब गर्व का अनुभव होता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एक पढ़े-लिखे, सभ्य और सुशिक्षित युवक और कालान्तर में परिवर्तित प्रौढ़ व्यक्ति के चरित्र में जो गुण होने चाहिए, वे सभी गुण पापा में निहित हैं। लेखक यशपाल जी ने कहानी में इनका चरित्र-चित्रण अत्यधिक गरिमापूर्ण और स्वाभाविक ढंग से ऐसे ही किया है, जैसे वे स्वयं अपने पिता का चरित्र-चित्रित कर रहे हों।

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