UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 9 Indian Educationist: Ravindranath Tagore

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 9
Chapter Name  Indian Educationist: Ravindranath Tagore (भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 9 Indian Educationist: Ravindranath Tagore (भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
टैगोर के शिक्षा-दर्शन की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
टैगोर के अनुसार शिक्षा के अर्थ एवं उद्देश्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
टैगोर के शिक्षा-दर्शन की विशेषताएँ टैगोर के शिक्षा-दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना ही शिक्षा है।
  2. शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक को अनुभव की पूर्णता द्वारा पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित करना
  3. बालकों को प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा देनी चाहिए, जिससे उन्हें अधिक आनन्द का अनुभव हो।
  4. भारतीय विश्वविद्यालयों में भारतीय दर्शन के प्रमुख विचारों की शिक्षा दी जानी चाहिए।
  5. राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचलन होना चाहिए और उसमें भारत के भूत एवं भविष्य का ध्यान रखना चाहिए।
  6. प्रत्येक विद्यार्थी में संगीत, चित्रकला व अभिनय की योग्यता का विकास होना चाहिए।
  7. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए।
  8. शिक्षा की प्रक्रिया में बालकों को पूर्ण स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए।
  9. शिक्षा का वास्तविक जीवन से सम्बन्ध होना चाहिए।
  10. शिक्षा के द्वारा बालकों में धार्मिक भावना का विकास करना चाहिए, जिससे उनमें मानवता का कल्याण करने की क्षमता का विकास हो।
  11. शिक्षा के द्वारा बालकों में सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् के शाश्वत मूल्यों का विकास करना चाहिए।
  12. शिक्षा को गतिशील एवं सजीव बनाने के लिए सामाजिक जीवन से उसका सम्बन्ध जोड़ना चाहिए।

शिक्षा का अर्थ

” टैगोर ने शिक्षा को विकास की एक प्रक्रिया माना है और शिक्षा के व्यापक अर्थ को स्वीकार किया है। टैगोर का विचार है कि शिक्षा विकास का ऐसा साधन है जिससे व्यक्ति की मानसिक, भावात्मक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इस प्रकार शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति की आन्तरिक क्षमताएँ बाह्य रूप में अभिव्यक्त होती हैं। टैगोर के शब्दों में, “सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमारे जीवन का समस्त सृष्टि से सामंजस्य स्थापित करती है।”

शिक्षा के उद्देश्य

टैगोर के अनुसार शिक्षा के निम्नांकित उद्देश्य होने चाहिए ।

  1. शारीरिक विकास-टैगोर शिक्षा के लिए स्वस्थ शरीर को अधिक महत्त्व देते थे। अत: उन्होंने शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास माना है। शारीरिक विकास हेतु उन्होंने खेलकूद, व्यायाम एवं पौष्टिक भोजन आदि को आवश्यक बताया है।
  2. मानसिक या बौद्धिक विकास शारीरिक विकास के साथ-साथ उन्होंने बौद्धिक विकास पर भी बल दिया और शिक्षा का उद्देश्य बौद्धिक विकास करना बताया, परन्तु बौद्धिक विकास के लिए उन्होंने पुस्तकीय शिक्षा का विरोध किया और प्रकृति, तथा जीवन से प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक बताया। उनका कथन था कि इस प्रकार की शिक्षा से स्वतन्त्र चिन्तन एवं ज्ञानार्जन करने की क्रिया को प्रोत्साहन मिलता है। उनका विश्वास था कि बौद्धिक विकास तभी सम्भव हो सकता है, जब कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त किया जाए।
  3. संवेगात्मक विकास-टैगोर का मत था कि कविता, संगीत, चित्रकला, नृत्यकला इत्यादि के द्वारा बालकों को संवेगात्मक प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए, जिससे उनमें सौन्दर्य प्रेम, सहानुभूति आदि की स्वस्थ भावनाओं का विकास हो।
  4. सामाजिक विकास-टैगोर व्यक्तिवादी होने के साथ-साथ समाजवादी भी थे। वे शिक्षा द्वारा व्यक्ति को एक ऐसे सामाजिक बन्धन में बाँधना चाहते थे जिससे व्यक्ति में सामाजिक गुणों का विकास हो और वह सामाजिक विकास हेतु प्रयत्नशील रहे।
  5. सामंजस्य की क्षमता का विकास-टैगोर के अनुसार बालकों को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और सामाजिक वातावरण का ज्ञान कराना चाहिए, जिससे उसमें सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता का विकास हो सके।
  6. नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास-टैगोर आदर्शवादी थे। इसलिए उन्होंने शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के अन्दर नैतिक तथा आध्यात्मिक गुणों का विकास करना माना है। अपने लेखों में उन्होंने अनेक नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की विवेचना की है और इसकी प्राप्ति हेतु आन्तरिक स्वतन्त्रता, आन्तरिक शक्ति, आत्मानुशासन एवं ज्ञान आवश्यक बताया है।
  7. व्यावसायिक उद्देश्य-शिक्षा व्यक्ति को इस योग्य भी बनाए कि वह अपनी जीविका स्वयं कमा सके और आत्मनिर्भर बनकर अपना जीवन व्यतीत कर सके।
  8. सांस्कृतिक उद्देश्य-शिक्षा का उद्देश्य देश की संस्कृति की सुरक्षा और विकास करना है।
  9. अन्तर्राष्ट्रीयता का उद्देश्य-टैगोर समस्त विश्व में शान्ति स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने शिक्षा का एक उद्देश्य यह भी बताया कि वह व्यक्तियों में अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुत्व की भावना का विकास करे। उनका नारा था-‘वसुधैव कुटुम्बकम्’।

प्रश्न 2
रवीन्द्रनाथ टैगोर के शैक्षिक प्रयोग का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपना विद्यालय 1901 में स्थापित किया था। इसमें बालक थे। उस समय उन्होंने शिक्षण सम्बन्धी विचारधाराओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। सुनील चन्द्र सरकार के अनुसार–“टैगोर रूसी तथा फ्रोबेल के विचारों से अवश्य प्रभावित थे, यह प्रभाव उन पर अपना विद्यालय चलाने से पूर्व था और उस समय तक जब तक कि उन्होंने अपने प्रयोग किये, वे डीवी के शिक्षाशास्त्र के प्रभाव क्षेत्र में आ चुके थे।” शिक्षा के बारे में टैगोर की धारणा इस प्रकार है-“शिक्षा जीवन का स्थायी साहस है। यह अस्पताल की पीड़ायुक्त चिकित्सा की नीति नहीं है, जिससे उनका (छात्रों का) इलाज हो सके, उनकी अज्ञानता का निरोध हो सके, अपितु यह तो स्वास्थ्य की एक क्रिया है जो स्वाभाविक रूप, में मस्तिष्क को उपयोगी बनाती है।”

टैगोर के शिक्षा-दर्शन में-

  1. स्वतन्त्रता
  2. रचनात्मक आत्माभिव्यक्ति
  3. प्रकृति तथा मनुष्य के रचनात्मक सम्बन्ध पाये जाते हैं।

स्वतन्त्रता के विषय में टैगोर ने कहा है-“शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य स्वतन्त्रता में है। यह स्वतन्त्रता विश्व के नियमों की अज्ञानता के प्रति होनी चाहिए, यह स्वतन्त्रता पूर्वाग्रहों एवं हठधर्मी के प्रति हो जो कि हमारे मानव समाज में हैं।’ मनुष्य आमने-सामने अपनी एकान्त प्रकृति के कारण प्रकृति के साथ सहयोग करता है। प्रकृति के रहस्यों का शोषण करता है और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए सभी सुविधाओं का उपयोग करता है।

उन्होंने कहा भी है कि प्रकृति को जानना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसमें रहना भी आवश्यक है। उनके शिक्षा-दर्शन में मानवता यथा अन्तर्राष्ट्रीयता दोनों ही पाये जाते हैं। उनका विचार है कि विश्व में मानव ही ईश्वर की श्रेष्ठ कृति है। हर व्यक्ति रचनात्मक एवं विद्वान् होना चाहिये। टैगोर मानव मात्र की एकता में विश्वास करते थे। उन्होंने कहा भी है, “मानव मात्र के उदाहरण में एकता अनुभव करनी चाहिए। जो संवेदनाओं में गहन हो, सत्ता में पहले की अपेक्षा शक्तिशाली हो।”

शिक्षा के उद्देश्य

[संकेत-इस शीर्षक का अध्ययन विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 1 के अन्तर्गत कीजिए।]

पाठ्यक्रम

रवीन्द्र ने अपने शिक्षा-दर्शन में ऐसा पाठ्यक्रम लिया है जो जीवन के सभी पक्षों का विकास करे। उन्होंने इतिहास, विज्ञान, प्रकृति अध्ययन, भूगोल, साहित्य आदि को पाठ्य विषय बनाया और नाटक, भ्रमण, बागवानी, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रयोगशाला कार्य, ड्राइंग, मौलिक रचनाएँ, संग्रहालय आदि क्रियाओं के साथ लिया। खेलकूद, समाज सेवा आदि पर पर्याप्त बल दिया है।

शिक्षण विधि

टैगोर ने शिक्षण विधि में दण्ड व्यवस्था समाप्त की और पठन विधि के दबा देने वाली प्रथा को अन्त करके सहज स्वाभाविक रूप से क्रिया द्वारा सीखना, भ्रमण द्वारा, वाद-विवाद, प्रयोग विधि आदि को शिक्षण का माध्यम बनाया। रवीन्द्र शिक्षा-दर्शन का मूल्यांकन इस प्रकार किया जा सकता है

  1. रवीन्द्र शिक्षा-दर्शन का आधार प्रकृतिवादी है और उद्देश्य आदर्शवादी।
  2. मानव एकता में विश्वास करता है।
  3. जीवन के लिए शिक्षा की व्यवस्था है और शिक्षा का उद्देश्य है जीवन को पूर्णता प्रदान करना।
  4. सभी पूर्वाग्रहों से विमुक्ति।
  5. सांस्कृतिक विकास पर बल।
  6. पूर्व तथा पश्चिम का समन्वय।
  7. आदर्श पाठ्यक्रम का निर्माण एवं संचालन।
  8. जीवन पद्धति से मिलती-जुलती शिक्षण विधि।

आज रवीन्द्रनाथ टैगोर की संस्थाएँ विश्व शिक्षण पद्धति में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। उनका शिक्षा के क्षेत्र में यह योगदान उनके काव्य की भाँति ही अपूर्व है। उनकी मृत्यु के समय कलकत्ता विश्वविद्यालय की सीनेट ने कहा था-“उनके द्वारा भारत ने मानव मात्र को, उनके साहित्य दर्शन, शिक्षा तथा कला के अध्ययन से संदेश दिया है। उनके द्वारा अमर कीर्ति प्राप्त की है और भारत के स्तर को। विश्व में ऊँचा उठाया है।

प्रश्न 3
विद्यालय के आधार पर रबीन्द्रनाथ टैगोर के शैक्षिक विचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
मेरा विद्यालय (My School) निबन्ध में उन्होंने शान्ति निकेतन में स्थापित अपने विद्यालय के कार्यक्रम और उसकी योजना का वर्णन किया है। आश्रम में रहकर आवासी शिक्षा, प्रकृति में और प्रकृति के द्वारा शिक्षा की व्यवस्था और आध्यात्मिक शिक्षा के सम्बन्ध में उनके विचार इस निबन्ध में दुहराए गए हैं। उन्होंने बताया है कि स्कूल में आदर्श वातावरण का श्रेय ‘‘मेरे किसी नए शिक्षा सिद्धान्त को नहीं अपितु मेरे स्कूली दिनों की स्मृति को ही है।” टैगोर ने महले किसी सिद्धान्त का प्रचार करके उसके आधार पर विद्यालय की स्थापना नहीं की थी। उन्होंने अनुभव किया कि कुछ किया जाना आवश्यक है। उन्हें सूझा और इसको रूप दे दिया। उनका कहना था कि बच्चों को वास्तविक सुख, स्वतन्त्रता, स्नेह और सहानुभूति से अब और अधिक देर तक वंचित नहीं रखना चाहिए, शैशवकाल में शिशु को जीवन की पूरी बँट पिलानी चाहिए इसके लिए इसकी प्यास अनन्त है। शिशु के मन को इस विचार से पूरा भर देना चाहिए।

टैगोर ने अपने विद्यालय में निम्नलिखित तत्त्वों पर बल दिया

  1. विद्यालय प्राकृतिक वातावरण में स्थापित किया जाए।
  2. विद्यालय का संचालन प्राचीन तपोवनों की व्यवस्था पर किया जाए।
  3. विद्यालय में छात्रों को आध्यात्मिक मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जाए।
  4. विद्यालय में प्रकृति तथा प्राकृतिक तत्त्वों के प्रति संवेदना की भावना का विकास किया जाए।
  5. विद्यालय में छात्रों के लिए स्वतन्त्रता का वातावरण प्रदान किया जाए।
  6. विद्यालय छात्रों में वातावरण के लिए जागरूकता का विकास करें।
  7. विद्यालय छात्रों को इस प्रकार के वातावरण में शिक्षित करे जो जीता-जागता हो तथा अध्यापक वे छात्र के परस्पर प्रभावी सम्पर्क पर आधारित हो।
  8. विद्यालय छात्रों को उनकी मातृभाषा में शिक्षण दे।
  9. प्रभावी आत्मीय छात्र-अध्यापक सम्पर्क के लिए आवश्यक है कि कक्षा में छात्रों की संख्या कम हो।
  10. विद्यालय में शारीरिक श्रम के लिए प्रावधान किया जाए।
  11. विद्यालय में समृद्ध पुस्तकालय हो।
  12. विद्यालय में कई शिल्पों (Crafts); जैसे–सिलाई, जिल्दसाजी, बुनाई तथा बढ़ईगीरी के सिखाने की व्यवस्था की जाए।
  13. विद्यालय में ड्राइंग, कला तथा संगीत को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया जाए।
  14. विद्यालय में छात्रों के चुनाव के लिए अनेक पाठान्तर क्रियाओं की व्यवस्था की जाए।
  15. विद्यालय में किसी भी प्रकार से जाति तथा धर्म के आधार पर भेद-भाव न किया जाए।
  16. विद्यालय स्वशासित संस्था के आधार पर चलाया जाए जिसमें डेरी फार्म, डाकघर, अस्पताल तथा कार्यशाला हो।
  17. विद्यालय में छात्र स्वयं न्यायालय का संचालन करें।
  18. अध्यापक अपने व्यक्तित्व से छात्रों को प्रभावित करें।

प्रश्न 4
शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीय तथा प्रकृतिवाद पर टैगोर के विचार दीजिए।
उत्तर
शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीयता पर विचार

शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीयता पर टैगोर ने अपने विचार इस प्रकार प्रस्तुत किए –
टैगोर ने बालक के सामाजिक विकास पर भी यथेष्ठ बल दिया है। इनका कहना है कि बालक में सामाजिक गुणों का विकास करना शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। अपने अन्दर सामाजिक गुणों को विकसित करके ही बालक अपनी स्वयं की और समाज की प्रगति में सहयोग कर सकता है। वे समाज और समाज-सेवा को उतना ही महत्त्वपूर्ण मानते हैं जितना व्यक्ति और व्यक्तित्व को। वे संकीर्ण राष्ट्रवाद की भावना के विरुद्ध हैं और अन्तर्राष्ट्रीय समाज के समर्थक हैं और संसार में एकता स्थापित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि शिक्षा के द्वारा बालक में अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण को विकसित किया जाए और उसे अन्तर्राष्ट्रीय समाज के बन्धन में बाँधा जाए।

टैगोर के प्रकृतिवाद पर विचार

टैगोर के प्रकृतिवाद पर निम्नलिखित विचार हैं-
टैगोर ने अपने बाल्यकाल में प्रकृति के वास्तविक स्वरूप का दर्शन किया था और उसका इनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। इन्होंने लिखा है-“मेरे अन्तस में छिपी हुई एक अतीतकालीन स्मृति हृदय में एक ऐसी वेदना उत्पन्न करती थी कि ऐसी इच्छा होती थी कि एक बार पुन: मैं अपने शैशव में पहुँच जाऊँ और पुनः खेल के मैदान, वायु और जल में विचरण करूं-वे वृक्ष, मनुष्य तथा वृक्षों के शाश्वत सम्बन्ध का परिचय मुझे प्रदान करते थे। वे सौन्दर्यपूर्ण बल का निमन्त्रण देकर मेरे हृदय में सिहरन उत्पन्न करते थे। टैगोर का मत है कि प्रकृति सृष्टिकर्ता के दर्शन कराती है और प्रकृति के द्वारा ही विश्व में एकता को भाव उत्पन्न होता है। उनके शब्दों में-“बालक अपनी इच्छा एवं ताजी इन्द्रियों से प्रकृति के सम्पर्क में आते हैं। यह प्रकृति की प्रथम देन है। इसे स्वीकार कर प्रकृति से तात्कालिक सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।”

टैगोर ने प्रकृति को महान शिक्षक और जीवित शिक्षक माना है। सीखने का सबसे अच्छा वातावरण प्रकृति में ही पाया जाता है। प्रकृति की शिक्षा में सामाजिक हित भी छिपा हुआ है। जिस प्रकार प्रकृति के प्रत्येक वृक्ष एक-दूसरे को बिना क्षति पहुँचाए अपना विकास करते हैं उसी प्रकार मानव समाज की प्रमुख इकाई मनुष्य भी सामाजिक हित को ध्यान में रखकर बिनी दूसरे के हितों को हानि पहुँचाए, अपना विकास कर सकता है। टैगोर का कहना है कि सजीव प्रकृति का अध्ययन करके बालक, किशोर, वयस्क, प्रौढ़ और वृद्ध सभी अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। बालकों की कल्पना की पूर्ण अभिव्यक्ति । और किशोरों की जिज्ञासा व कल्पना की पूर्ति के प्रांगण में होती है, वयस्क प्रकृति से स्फूर्ति और प्रेरणा प्राप्त करते हैं, प्रौढ़ को सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि मिलती है तथा वृद्ध को स्वास्थ्य, शान्ति एवं सन्तोष प्राप्त होता है और अन्त में, आध्यात्म की ओर प्रकृति ही ले जाती है। डॉ० राधाकृष्णन ने लिखा है-“इसमें आश्चर्य नहीं है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रतिपादित किया कि प्रकृति आध्यात्मिक विकास का सर्वश्रेष्ठ साधन है क्योंकि प्रकृति में रहते हुए धार्मिक चक्षु, फैले तथा मुस्कराते हुए शान्त वातावरण में ईश्वर के दर्शन करेंगे।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रबीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन-परिचय संक्षेप में लिखिए।
उत्तर
रबीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय मनीषा के आकाश के एक देदीप्यमान नक्षत्र थे। मूलत: एक कवि और संगीतज्ञ होते हुए भी वे एक नाटककार, उपन्यासकार, कहानी लेखक, चित्रकार, अभिनेता, एक शिक्षाशास्त्री तथा उच्चकोटि के विचारक थे। उनका जन्म 6 मई, 1861 ई० को हुआ था। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक कविता लिखकर अपनी अलौकिक प्रतिभा का परिचय दिया। 1878 ई० में उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड को प्रस्थान किया और वहाँ से 1880 ई० में ये स्वदेश लौटे। 1901 ई० में इन्होंने शान्ति निकेतन में एक विद्यालय स्थापित किया, जिसने आज विश्वभारती विश्वविद्यालय का रूप धारण कर लिया है। सन् 1913 में इन्होंने अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक कृति ‘गीतांजलि’ पर नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। सन् 1927 में इन्होंने ‘संध्या गीत’ नामक पुस्तक की रचना की। 17 अगस्त, 1941 में इनका स्वर्गवास हो गया। साहित्यकार के रूप में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के कारण इन्होंने संगीत, कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता आदि में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। ये न केवल एक साहित्यकार वरन् एक कर्मठ शिक्षाशास्त्री भी थे।

प्रश्न 2
सामान्य शिक्षा के लिए टैगोर द्वारा प्रतिपादित शिक्षण पद्धतियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
टैगोर ने तत्कालीन शिक्षण पद्धतियों का विरोध करके नवीन शिक्षण पद्धतियों का प्रतिपादन किया। ये शिक्षण पद्धतियाँ अग्रलिखित हैं

  1. स्व-प्रयास व स्व-चिन्तन की विधि-टैगोर का विचार है कि जो ज्ञान स्व-प्रयास एवं स्व-चिन्तन द्वारा प्राप्त किया जाता है, वही ज्ञान स्थायी रूप से बालों के मस्तिष्क में रह सकता है।
  2. क्रिया द्वारा सीखना टैगोर के अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया में बालक को अधिक-से-अधिक क्रियाशील रखने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए उन्होंने विद्यालय में किसी हस्तकार्य या दस्तकारी को आवश्यक बताया।
  3. भ्रमण द्वारा शिक्षा-टैगोर का मत था कि भ्रमण के समय पढ़ाना शिक्षण की सर्वोत्तम विधि है। भ्रमण के समय बालक की मानसिक शक्तियाँ जागरूक रहती हैं, जिसके परिणामस्वरूप बालक प्रत्यक्ष की जाने वाली बातों को सरलता से समझ लेते हैं।
  4. वाद-विवाद तथा प्रश्नोत्तर विधि-टैगोर ने पुस्तकीय शिक्षा का विरोध करके वाद-विवाद तथा प्रश्नोत्तर विधि को महत्त्वपूर्ण बताया है। इससे बालक दैनिक जीवन की समस्याओं पर विचार-विमर्श कर सकते हैं।
  5. प्रयोग विधि-टैगोर ने क्रियात्मक विषयों और विद्वानों के लिए इस विधि को आवश्यक बताया है, क्योंकि इन विषयों का ज्ञान प्रयोग के बिना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 3
गुरुदेव टैगोर के शैक्षिक योगदान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
टैगोर ने शिक्षा के क्षेत्र में निम्नलिखित योगदान दिया है

  1. जीवन को पूर्णता प्रदान करना-टैगोर ने शिक्षा के द्वारा जीवन को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया। उन्होंने व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक विकास पर बल दिया, जिससे व्यक्ति का सम्पूर्ण रूप से विकास हो सके।
  2. शिक्षा को उपयोगी और व्यावहारिक बनाना-टैगोर ने अपनी शिक्षा-व्यवस्था में उपयोगिता, तार्किकता तथा व्यावहारिकता का समावेश किया। उन्होंने राजनीतिक, आर्थिक, शारीरिक, सौन्दर्यात्मक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय आदि सभी प्रकार के सुन्दरतम उपयोगी सिद्धान्तों का प्रयोग किया और ‘विश्वभारती’, नामक संस्था स्थापित करके उन्हें क्रियात्मक रूप दिया।
  3. सौन्दर्य बोध की शिक्षा-टैगोर ने सौन्दर्य बोध कराने के लिए भारतीय कलाओं को पुनर्जीवित किया और पाश्चात्य कला तत्त्व को भी स्वीकार किया।
  4. राष्ट्रीय शिक्षा का समर्थन-टैगोर ने अपनी शिक्षा-व्यवस्था में राष्ट्रीय शिक्षा को भी स्वीकार किया है। उनका मत था कि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना रखते हुए हम राष्ट्रीयता की भावना का पूर्ण विकास करें।
  5. भारतीय तथा पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालियों का समन्वय–टैगोर ने विश्वभारती के रूप में भारतीय तथा पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालियों का अपूर्व समन्वय प्रस्तुत किया है, जिसके स्वरूप से प्रभावित होकर उसी के आदर्श पर अनेक शिक्षा संस्थाओं का निर्माण हुआ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
टैगोर के शिक्षा में अनुशासन सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
टैगोर बाह्य अनुशासन तथा दमनात्मक अनुशासन का विरोध करते थे और आत्म-अनुशासन तथा आन्तरिक अनुशासन को स्वाभाविक मानते थे। उनका मत था कि जब बालकों की स्वतन्त्र क्रिया में बाधा पहुँचती है, तभी वे अनुशासनहीनता से कार्य करते हैं। टैगोर के अनुसार, “वास्तविक अनुशासन का अर्थ है, अपरिपक्व एवं स्वाभाविक आवेगों की अनुचित उत्तेजना और अनुचित दिशाओं में विकास से सुरक्षा। स्वाभाविक अनुशासन की इस स्थिति में रहना छोटे बालकों के लिए सुखदायक है। यह उनके पूर्ण विकास में सहायक होता है।”

प्रश्न 2
टैगोर के शिक्षा के पाठ्यक्रम सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
टैगोर ने भारतीय विद्यालयों के तत्कालीन पाठ्यक्रम को दोषपूर्ण क्ताया और एक व्यापक पाठ्यक्रम बनाने का सुझाव दिया। उनका मत था कि पाठ्यक्रम इतना व्यापक होना चाहिए कि वह बालक के सभी पक्षों का विकास कर सके। इस दृष्टि से उन्होंने पाठ्यक्रम के अन्य विषयों के साथ-साथ क्रियाओं को भी स्थान दिया। उनका विश्वभौरती का पाठ्यक्रम क्रिया-प्रधान पाठ्यक्रम था। विश्वभारव्री के पाठ्यक्रम में आज भी इतिहास, भूगोल, विज्ञान, साहित्य, प्रकृति अध्ययन आदि विषयों के साथ विभिन्न क्रियाओं; जैसे-अभिनय, नृत्य, संगीत, भ्रमण, बागवानी, समाज-सेवा आदि विषय सम्मिलित

प्रश्न 3
स्त्री-शिक्षा के विषय में टैगोर के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अन्य सभी आधुनिक शिक्षा-विचारकों के ही समान टैगोर भी स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार स्त्री-पुरुष हर प्रकार से समान हैं। अत: स्त्रियाँ भी उन सभी विषयों की शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं जिनकी शिक्षा पुरुष प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि टैगोर बालिकाओं के लिए अलग से पाठ्यक्रम के निर्धारण के पक्ष में नहीं थे परन्तु उनके अनुसार बालिकाओं के लिए गृह-विज्ञान का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए। टैगोर सैद्धान्तिक रूप से सह-शिक्षा के समर्थक थे।

प्रश्न 4
धार्मिक शिक्षा के विषय में टैगोर के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
टैगोर किसी एक धर्म की शिक्षा देने के विरोधी थे, क्योंकि वह धर्म को साम्प्रदायिकता और अन्धविश्वास से दूर रखना चाहते थे। उनका विचार था कि प्रकृति और मानवीय भावना ही हमारे पूजा-स्थल हैं और स्वार्थरहित अच्छे कार्य ही हमारी वास्तविक पूजा है। इसलिए विश्व धर्म की स्थापना करके मानव कल्याण में विश्वास रखना चाहिए। स्पष्ट है कि टैगोर संकीर्ण धार्मिक शिक्षा के विरुद्धःथे परन्तु व्यापक दृष्टिकोण से उन्होंने इसका समर्थन किया है।

प्रश्न 5
टैगोर के ‘जन-शिक्षा सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारतीयों की निरक्षरता से दु:खी होकर टैगोर ने जन-शिक्षा का विचार प्रस्तुत किया। वे चाहते थे कि सभी बालकों के लिए प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क कर दी जाए। इसके साथ-ही-साथ प्रौढ़ों को भी जीवनोपयोगी ज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे वे प्राचीन रूढ़ियों व अन्धविश्वासों से मुक्त होकर अपना स्वतन्त्र विकास कर सकें।

प्रश्न 6
ग्रामीण शिक्षा के विषय में टैगोर के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
टैगोर ने ग्रामीण शिक्षा पर भी विशेष बल दिया, क्योंकि भारत की ग्रामीण जनता अशिक्षित है। ग्रामीण शिक्षा के अन्तर्गत उन्होंने कीर्तन, भजन, हरिसभा, धर्म-चर्चा, लोकगीत आदि व्यवस्था पर बल दिया। इसके साथ-ही-साथ इसमें ग्रामीण उद्योगों, सफाई, कृषि एवं उपयोगी व्यवसायों को भी सम्मिलित करने का सुझाव दिया। उनके अनुसार ग्रामीण जनता शिक्षित होकर ही जीवन में प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकती है।

प्रश्न 7
टैगोर के अनुसार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
टैगोर ने राष्ट्रीय शिक्षा का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षा प्रक्रिया में प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रीयता की परम्पराओं को सम्मिलित करना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे राष्ट्रीयता के तत्त्वों का विकास हो सके। इसके साथ ही टैगोर ने विश्वबन्धुत्व को सन्देश दिया है और विश्व-शान्ति के लिए सभी को सहयोग से रहना आवश्यक बताया है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए, जिसके द्वारा अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हो।

प्रश्न 8
एक शिक्षाशास्त्री के रूप में टैगोर का तटस्थ मूल्यांकन प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
वास्तव में टैगोर एक युग-प्रवर्तक शिक्षाशास्त्री थे। उनकी मौलिक दूरदर्शिता से भारतीय शिक्षा को एक नयी दिशा मिली। डॉ० एच०वी० मुकर्जी के अनुसार, “टैगोर के शिक्षा सम्बन्धी विचार एवं प्रयोग बिल्कुल नवीन एवं मौलिक जान पड़ते हैं। यद्यपि उनमें से अधिकांश को प्राचीन समय के शिक्षाशास्त्रियों ने किसी-न-किसी रूप में विकसित कर लिया था और तत्कालीन शिक्षाशास्त्री कम या अधिक मात्रा में उनका प्रयोग कर रहे थे, किन्तु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बीसवीं शताब्दी के प्रथम भाग के भारतीय शिक्षाशास्त्रियों में टैगोर का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। वे आधुनिक भारत में शैक्षिक पुनरुत्थान के सबसे बड़े पैगम्बर थे।”

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न1
आधुनिक शिक्षाशास्त्री रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म कब हुआ थोर उनके पिता का क्या नाम था?
उत्तर
आधुनिक शिक्षाशास्त्री रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 6 मई, 1861 में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर था।

प्रश्न 2
टैगोर मूल रूप से क्या थे?
उत्तर
टैगोर मूल रूप से कवि एवं साहित्यकार थे।

प्रश्न 3
टैगोर को किस अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था?
उत्तर
टैगोर को नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था।

प्रश्न 4
टैगोर को नोबेल पुरस्कार उनकी किस पुस्तक पर प्रदान किया गया था?
उत्तर
टैगोर को ‘गीतांजलि’ नामक पुस्तक पर नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

प्रश्न 5
टैगोर किस प्रकार के अनुशासन के विरुद्ध थे तथा किस प्रकार के अनुशासन के समर्थक थे?
उत्तर
टैगोर दमनात्मक अनुशासन के विरुद्ध थे तथा आत्मानुशासन के समर्थक थे।

प्रश्न 6
टैगोर द्वारा स्थापित अति प्रसिद्ध शिक्षण संस्था का नाम क्या है?
उत्तर
टैगोर द्वारा स्थापित अति प्रसिद्ध शिक्षण संस्था का नाम है–विश्वभारती।

प्रश्न 7
विश्वभारती संस्था के जन्मदाता कौन थे ?
उत्तर
विश्वभारती नामक संस्था के जन्मदाता रबीन्द्रनाथ टैगोर थे।

प्रश्न 8
विश्वभारती में किस स्तर की शिक्षा दी जाती है?
उत्तर
विश्वभारती में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा दी जाती है।

प्रश्न 9
टैगोर द्वारा दिया गया मानवतावादी नारा क्या है?
उत्तर
टैगोर द्वारा दिया गया मानवतावादी नारा है-वसुधैव कुटुम्बकम्।

प्रश्न 10
रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘सर’ की उपाधि ब्रिटिश सरकार को क्यों लौटा दी थी?
उत्तर
रबीन्द्रनाथ टैगोर ब्रिटिश सरकार द्वारा की गयी जलियाँवाला बाग की दुर्घटना से अत्यधिक दु:खी थे। अत: उन्होंने अपना रोष प्रकट करने के लिए ‘सर’ की उपाधि ब्रिटिश सरकार को लौटा दी थी।

प्रश्न 11
कौन-सा भारतीय विश्वविद्यालय पूरब और पश्चिम के बीच जीवित सम्बन्धों की खोज और पारस्परिक सांस्कृतिक सौहार्द तथा विवेक को प्रोत्साहन देता है?
उत्तर
विश्वभारती विश्वविद्यालय।

प्रश्न 12
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का तात्पर्य बताइए।
उत्तर
टैगोर के अनुसार, शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य शिक्षार्थी को आत्मनिर्भर बनाना है जिससे वह अपनी जीविका स्वयं अर्जित कर सके तथा अपने परिवार का जीवन-यापन भी कर सके।

प्रश्न 13
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. टैगोर शिक्षा के क्षेत्र में स्वतन्त्रता के समर्थक थे।
  2. टैगोर ने ढाका विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
  3. टैगोर शिक्षा में ललित कलाओं को सम्मिलित करने के विरुद्ध थे।
  4. टैगोर क्रिया और स्व-प्रयास द्वारा शिक्षा प्राप्त करने को प्राथमिकता देते थे।
  5. टैगोर स्त्री-शिक्षा को आवश्यक नहीं मानते थे।
  6. टैगोर शिक्षा के क्षेत्र में कठोर अनुशासन के पक्ष में थे।

उत्तर

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1
रबीन्द्रनाथ का शिक्षा-दर्शन किस विचारधारा से प्रभावित है?
(क) आदर्शवाद
(ख) प्रकृतिवाद
(ग) प्रयोजनवाद
(घ) व्यवहारवाद
उत्तर
(ख) प्रकृतिवाद

प्रश्न 2
शिक्षण की किस विधि को टैगोर उचित मानते थे?
(क) क्रिया द्वारा शिक्षण
(ख) भ्रमण द्वारा शिक्षण
(ग) स्व-प्रयास द्वारा शिक्षण
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 3
शान्ति निकेतन का वर्तमान नाम है
(क) विश्वभारती
(ख) शान्ति विद्यापीठ
(ग) टैगोर विश्वविद्यालय
(घ) केन्द्रीय विश्वविद्यालय
उत्तर
(क) विश्वभारती

प्रश्न 4
रबीन्द्रनाथ टैगोर ने किस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी?
(क) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(ख) विश्वभारती विश्वविद्यालय
(ग) दिल्ली विश्वविद्यालय
(घ) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
उत्तर
(ख) विश्वभारती विश्वविद्यालय

प्रश्न 5
“सर्वोत्तम शिक्षा वह है, जो हमारे जीवन का समस्त सृष्टि से सामंजस्य स्थापित करती है।” यह शैक्षिक मान्यता किसकी है?
(क) महात्मा गाँधी,
(ख) श्री अरविन्द
(ग) डॉ० राधाकृष्णन्
(घ) रबीन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर
(घ) रबीन्द्रनाथ टैगोर

प्रश्न 6
टैगोर द्वारा स्थापित संस्था का नाम है
(क) शान्ति निकेतन
(ख) बाल निकेतन
(ग) शिक्षा निकेतन
(घ) शिशु निकेतन
उत्तर
(क) शान्ति निकेतन

प्रश्न 7
शान्ति निकेतन की स्थापना किसने की ?
(क) मालवीय ने
(ख) टैगोर ने
(ग) गांधी जी ने
(घ) एनी बेसेण्ट ने
उत्तर
(ख) टैगोर ने

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