UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 10 Environmental Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 10
Chapter Name Environmental Education (पर्यावरण शिक्षा)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 10 Environmental Education (पर्यावरण शिक्षा)

विस्तृत उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण-शिक्षा से आप क्या समझते हैं। परिभाषा निर्धारित कीजिए तथा इसका स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा का अर्थ
पर्यावरण-शिक्षा एक ऐसी शिक्षा है जो पर्यावरण के माध्यम से, पर्यावरण के सम्बन्ध में, पर्यावरण के हेतु होती है। वास्तव में पर्यावरण जड़ एवं चेतन दोनों को शिक्षा देने वाला है। पर्यावरण व्यक्ति के उन कार्यों को प्रोत्साहित करता है जो उनके अनुकूल होते हैं। पर्यावरण एक महान् शिक्षक है क्योंकि शिक्षा का कार्य छात्रों को उस वातावरण के अनुकूल बनाना है जिससे कि वे जीवित रह सकें तथा अपनी मूल-प्रवृत्तियों को सन्तुष्ट करने हेतु अधिक-से-अधिक सम्भव अवसर प्राप्त कर सकें। शिक्षा व्यक्ति को पर्यावरण से अनुकूलन करना ही नहीं सिखाती वरन् पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाने हेतु उसे प्रशिक्षित भी करती हैं।

पर्यावरण-शिक्षा की परिभाषा
पर्यावरण-शिक्षा के अर्थ को स्पष्ट करते हुए अनेक विद्वानों ने उसे परिभाषित किया है। यहाँ हम कुछ परिभाषाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं

1. संयुक्त राज्य अमेरिका का पर्यावरण-शिक्षा अधिनियम, 1970 ई०
“पर्यावरण-शिक्षा का अर्थ है-वह शैक्षिक प्रक्रिया जो मानव के प्राकृतिक एवं मानव निर्मित वातावरण से सम्बन्धित है। इसमें जनसंख्या प्रदूषण, संसाधनों का विनियोजन एवं नि:शोषण, संरक्षण, यातायात, प्रौद्योगिकी एवं सम्पूर्ण मानवीय पर्यावरण के शहरी एवं ग्रामीण नियोजन का सम्बन्ध भी निहित है।”

2.एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिसर्च
“पर्यावरण-शिक्षा को परिभाषित करना सरल कार्य नहीं है, क्योंकि पर्यावरण-शिक्षा का अधिगम क्षेत्र ही अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाया है। परन्तु यह सर्वसम्मत अवश्य है कि पर्यावरण-शिक्षा की विषय-वस्तु अन्तर्विषयक (Interdisciplinary) प्रकृति की है। इसमें जीव-विज्ञान, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र एवं अन्य लोकोपकारी विषयों की विषय-सामग्री सम्मिलित है। इस विचार से सभी सहमत हैं कि पर्यावरणीय शिक्षा की सम्प्रत्यात्मक विधि सर्वश्रेष्ठ है।”

3. फिनिश नेशनल कमीशन
पर्यावरणशिक्षा पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को लागू करने का एक तरीका है। यह विज्ञान की एक अलग शाखा अथवा कोई अलग अध्ययन विषय नहीं है। इसको जीवन-पर्यन्त एकीकृत शिक्षा के सिद्धान्त के रूप में लागू किया जाना चाहिए।”

4. चैपमैन टेलर
“पर्यावरण-शिक्षा का अभिप्राय अच्छी नागरिकता विकसित करने के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को पर्यावरण मूल्यों तथा समस्याओं पर केन्द्रित करना है जिससे कि अच्छी नागरिकता का विकास हो सके एवं अधिगमकर्ता पर्यावरण के सम्बन्ध में भिज्ञ, प्रेरित एवं उत्तरदायी हो सके।

पर्यावरण-शिक्षा का स्वरूप / प्रकृति

पर्यावरण-शिक्षा को विभिन्न रूपों में स्पष्ट किया जा सकता है, यथा

1. पर्यावरण-शिक्षा का पर्यावरण माध्यम है
मनुष्य का पर्यावरण अकृतिक, सांस्कृतिक (मानव निर्मित. सुन्दर एवं शिक्षाप्रद है। जब बच्चे चिड़ियों अथवा तितलियों को देखकर आकर्षित होते हैं तो उनके विषय में अवगत कराना वातावरण के माध्यम से शिक्षा प्रदान करना है। वास्तव में इस प्रकार की शिक्षा कक्षा-कक्ष की चहारदीवारी में प्रदान की गयी शिक्षा की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। फलस्वरूप, पर्यावरण के माध्यम से व्यक्ति को शिक्षण अधिगम पर्याप्त मात्रा में कराया जाना चाहिए।

2. पर्यावरण-शिक्षा पर्यावरण से सम्बन्धित है
मनुष्य प्रतिदिन अपने अस्तित्व की रक्षा और समृद्धि के हेतु पर्यावरण के सम्पर्क में कार्य करता है। किसी भी स्थिति में वह इससे बच नहीं सकता। परिवार में जन्म लेकर बच्चा परिवार के बाद पड़ोस, समुदाय आदि के सम्पर्क में आता है और उसके क्रिया-कलापों में भाग लेता है, इस तरह वह वातावरण के सम्बन्ध में सीखता है। व्यक्ति को समुदाय में सामाजिक संस्थाओं के विषय में जानकारी मिलती है और इस जानकारी के अभाव में वह अपना जीवन सफलतापूर्वक नहीं व्यतीत कर सकता। यही स्थिति प्राकृतिक पर्यावरण की भी है। उसे अपने प्राकृतिक पर्यावरण से ही यह जानकारी प्राप्त होती है। वह खाद्य सामग्री कहाँ और किस तरह प्राप्त करता है, यह सामग्री किस प्रकार की भूमि से उत्पन्न होनी चाहिए आदि बातें वह स्वयं
ही सीखता है। पर्यावरण के सम्बन्ध में यह जानकारी पर्यावरणीय शिक्षा है।

3. पर्यावरण, शिक्षा का पर्यावरण है
वर्तमान युग में पर्यावरण के क्षेत्र में क्रान्ति हुई है। जनसंख्या विस्फोट के कारण पर्यावरण में परिवर्तन हुआ है। इस विस्फोट के फलस्वरूप प्रौद्योगिकी का विकास हुआ और औद्योगीकरण के फलस्वरूप वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, परिवहन-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण, सामाजिक-प्रदूषण आदि समस्याएँ उत्पन्न हुईं। इनके फलस्वरूप मानव-जीवन अत्यन्त कष्टप्रद हो गया। फलस्वरूप यह आवश्यक हो गया कि उन उपायों की खोज की जाए जिससे पर्यावरण का संरक्षण हो सके। इस तरह पर्यावरण के सुधार तथा संरक्षण से सम्बन्धित जानकारी पर्यावरणीय शिक्षा है। वास्तव में पर्यावरण-शिक्षा, शिक्षा की विषय-वस्तु और शैली दोनों ही है। शैली के रूप में यह पर्यावरण को शिक्षण अधिगम सामग्री के रूप में प्रयुक्त करती है। विषय-वस्तु के रूप में यह पर्यावरण के निर्णायक तत्त्वों के सम्बन्ध में शिक्षण है। पर्यावरण के हेतु शिक्षा के रूप में यह पर्यावरण का नियन्त्रण, पारिस्थितिकी (Ecology) सन्तुलन के स्थापन और पर्यावरणीय प्रदूषण के नियन्त्रण से सम्बन्धित है।

प्रश्न 2
पर्यावरण-शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए। [2007, 09, 14]
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा के उद्देश्य 1975 ई० में बेलग्रेड में पर्यावरण-शिक्षा पर अन्तर्राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में एक घोषणा-पत्र प्रकाशित किया गया जिसे बेलग्रेड घोषणा-पत्र (Belgrade Charter) के नाम से पुकारा जाता है। इस घोषणा-पत्र में पर्यावरण-शिक्षा के लक्ष्य एवं प्राप्ति-उद्देश्यों का निर्धारण किया गया है। यहाँ उन्हें संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है

  1. लक्ष्य: पर्यावरण-शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य है—विश्व जनसंख्या को पर्यावरण एवं उससे सम्बन्धित समस्याओं के सम्बन्ध में जागरूक बनाना।
  2. प्राप्ति उद्देश्य: उक्त घोषणा-पत्र में पर्यावरण-शिक्षा के निम्नलिखित प्राप्ति उद्देश्य निर्धारित किये गये
    • जागरूकता: समग्र वातावरण और उसकी समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता एवं जागरूकता विकसित करने में सहायता करना पर्यावरण-शिक्षा का प्रमुख प्राप्ति उद्देश्य है।
    • ज्ञान: लोगों को सम्पूर्ण वातावरण और उससे सम्बन्धित समस्याओं के विषय में जानकारी प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना इसका दूसरा प्राप्ति उद्देश्य है।
    • अभिवृत्ति: लोगों में सामाजिक मूल्यों, वातावरण के प्रति घनिष्ठ प्रेम की भावना और उसके संरक्षण तथा सुधार हेतु प्रेरणा विकसित करने में सहायता प्रदान करनी पर्यावरण-शिक्षा का एक अन्य प्राप्ति उद्देश्य है।
    • कौशल: पर्यावरण समस्याओं के समाधान हेतु लोगों में कौशलों का विकास करना भी इसका प्राप्ति उद्देश्य है। ‘
    • मूल्यांकन योग्यता: लोगों के पर्यावरण तत्त्वों एवं शैक्षिक कार्यक्रमों को पारिस्थितिकी (Ecology), राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सौन्दर्यात्मक एवं शैक्षिक कारकों के सन्दर्भ में मूल्यांकन करने की योग्यता के विकास में सहायता प्रश्न करना भी इसका एक प्राप्ति उद्देश्य है।

पर्यावरण-शिक्षा के उद्देश्यों को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है-

1. संज्ञानात्मक (Cognitive), 2. भावात्मक (Affective) और 3. क्रियात्मक (Psychomotor)। संज्ञानात्मक क्षेत्र के अन्तर्गत वे प्राप्ति-उद्देश्य आते हैं जो ज्ञान के पुनः स्मरण अथवा पहचान (Recognition) से सम्बन्धित होते हैं। इसके अन्तर्गत बौद्धिक कुशलताएँ और योग्यताएँ भी आती हैं। संज्ञानात्मक क्षेत्र के अन्तर्गत स्मरण करना, समस्या समाधान, अवधारणा निर्माण, सीमित क्षेत्र में सृजनात्मक चिन्तन नामक व्यवहार आते हैं। भावात्मक क्षेत्र के अन्तर्गत वे प्राप्ति उद्देश्य आते हैं जो रुचियों, अभिवृत्तियों और मूल्यों में आये परिवर्तनों का उल्लेख करते हैं। क्रियात्मक अथवा मन:प्रेरित क्रियात्मक पक्ष के अन्तर्गत सम्बन्धित पर्यावरण-शिक्षा के प्राप्ति उद्देश्य निम्नवत् हैं-

  1. अपने क्षेत्र के पर्यावरण को ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना।
  2. दूरस्थ क्षेत्र के पर्यावरण का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना।
  3. जैविक (Biotic) और अजैविक (Abiotic) पर्यावरण को समझने में सहायता प्रदान करना।
  4. जीवन के विभिन्न स्तरों पर पोषण-विषयक (Trophic) अन्योन्याश्रितता को समझने में सहायता प्रदान करना।
  5. भावी-विश्व में अनियन्त्रित जनसंख्या वृद्धि में तथा संसाधन के अनियन्त्रित विदोहन के प्रभावों को समझने में सहायबा प्रदान करना।
  6. जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्तियों की जाँच करने एवं देश के सामाजिक, आर्थिक विकास हेतु उनकी व्याख्या करना।
  7. भौतिक एवं मानवीय संसाधनों के विदोहन का मूल्यांकन करके उसके उपचारात्मक उपायों हेतु सुझाव देना।।
  8. सामाजिक तनावों के कारणों की खोज में सहायता प्रदान करना और उन्हें दूर करने हेतु उपयुक्त उपाय सुझाना।

पर्यावरण-शिक्षा के भावात्मक पक्ष के प्राप्ति उद्देश्य निम्नवत् हैं-

  1.  समीपस्थ एवं दूरस्थ पर्यावरण की वानस्पतिक स्पीशीज एवं जीव-जन्तुओं में रुचि रखने हेतु सहायता प्रदान करना।
  2. समाज और उसके व्यक्तियों को समस्याओं में रुचि रखने हेतु तत्पर बनाना।
  3. विभिन्न जातियों, प्रजातियों, धर्म एवं संस्कृतियों के प्रति सहिष्णुता उत्पन्न करना।
  4. समानता, स्वतन्त्रता, सत्य एवं न्याय को महत्त्व प्रदान करना।
  5. सभी देशों की राष्ट्रीय सीमाओं के प्रति आदर व्यक्त करने की भावना उत्पन्न करना।
  6. प्रकृति की देनों की भूरि-भूरि प्रशंसा करना।
  7. पर्यावरण की स्वच्छता एवं शुद्धता को महत्त्व प्रदान करना।

क्रियात्मक पक्ष से सम्बन्धित पर्यावरणीय शिक्षा के प्राप्ति-उद्देश्य निम्नवत् हैं-

  1. उन कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेना जिनके फलस्वरूप वायु, जल और ध्वनि-प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
  2. पास-पड़ोस की सफाई के कार्यक्रम में भाग लेना।
  3. नगरीय एवं ग्रामीण नियोजन में भाग लेना।
  4. खाद्य पदार्थों में की जाने वाली मिलावट को दूर करने वाले कार्यक्रमों के अन्तर्गत भाग लेना।

प्रश्न 3
पर्यावरण-शिक्षा की शिक्षण विधियों एवं साधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा की शिक्षण-विधियाँ एवं साधन पर्यावरण-शिक्षा हेतु प्रयुक्त की जाने वाली शिक्षण विधियाँ एवं साधन विभिन्न प्रकार के हैं। यहाँ । पर्यावरण-शिक्षा की शिक्षण-विधियों और साधनों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है।

(अ) शिक्षण-विधियाँ
पर्यावरण-शिक्षा की निम्नलिखित शिक्षण विधियाँ हैं-
1. कक्षा वाद: विवाद-इसके अन्तर्गत किसी प्रकरण अथवा समस्या के विषय में कक्षा में विचार-विमर्श किया जाता है। इस विचार-विमर्श के फलस्वरूप पर्यावरण के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट किया जाता है।
2. छोटी सामूहिक प्रयोगशालाएँ: छोटी सामूहिक प्रयोगशालाएँ पर्यावरण-शिक्षा के व्यापक अध्ययन हेतु विशेष उपयोगी हैं। इसके अन्तर्गत कक्षा को छोटे-छोटे समूह में बाँट दिया जाता है तथा प्रत्येक समूह की एक परियोजना निर्धारित कर ली जाती है। यह समूह इस परियोजना पर कार्य करता है। उदाहरण के लिए यदि किसी समूह को स्थानीय तालाब की परियोजना निर्धारित करनी है तो वह समूह इससे सम्बन्धित निम्नलिखित विषयों पर अध्ययन करेगा

  1. तालाब पर कौन-से व्यक्ति निर्भर करते हैं?
  2. सामाजिक जीवन पर तालाब का क्या प्रभाव पड़ता है?
  3. तालाब का क्षेत्र विस्तार कितना है?
  4. तालाब के आस-पास कौन लोग निवास करते हैं?
  5. तालाब और उसके आस-पास कौन-से पौधे हैं?
  6. तालाब के पानी में किस तरह की अशुद्धता है?
  7. तालाब की स्थिति को किस तरह उत्तम बनाया जा सकती है?

3. क्षेत्रीय पर्यटन: क्षेत्रीय पर्यटन पर्यावरण-शिक्षा की एक प्रभावी शिक्षण-विधि है। किसी स्थान विशेष के पर्यावरण के अध्ययन हेतु क्षेत्रीय पर्यटन का आयोजन किया जाता है। इसके फलस्वरूप छात्र प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने हेतु समर्थ होते हैं। क्षेत्रीय पर्यटन का आयोजन सामुदायिक संस्थानों, पोस्ट ऑफिस, फैक्ट्री, स्थानीय बाजार के अध्ययन हेतु किया जा सकता है।

4. बाह्य अध्ययन: बाह्य अध्ययन हेतु नियोजन एवं समन्वय की आवश्यकता होती है। बाह्य अध्ययनों हेतु उसके उद्देश्यों का निर्धारण, कार्यक्रम का निर्धारण, तैयारी, क्षेत्रीय कार्य आदि को पहले से निश्चित कर लिया जाता है। इनमें हम छात्रों को गुफा, नदी आदि के पर्यावरण के अध्ययन हेतु बाहर ले जा सकते हैं।

5. प्रदर्शन का प्रयोग: पर्यावरण-शिक्षा में प्रदर्शन का प्रयोग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जिसके द्वारा उसके विभिन्न प्रकरणों का अध्ययन रोचक ढंग से किया जा सकता है। किसी भी प्रकरण से सम्बन्धित प्रदर्शनियों का आयोजन सम्भव है। इसके आयोजन हेतु छात्रों के सक्रिय सहयोग की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए-पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों से सम्बन्धित प्रदर्शनी का आयोजन किया जा सकता है।

6. अनुकरण एवं खेल: पर्यावरणीय-शिक्षा में अनुकरण एवं खेलों का प्रयोग स्वतन्त्र निर्णयन एवं अभिवृत्तियों के निर्माण में विशेष भूमिका निभाता है।

(ब) साधन
पर्यावरण-शिक्षा के अन्तर्गत निम्नलिखित साधनों का प्रयोग किया जाता है-

  1. स्थानीय साधन–स्थानीय साधनों के अन्तर्गत छात्रों के निवास स्थान का पर्यावरण, जल को .. प्रदूषित करने वाले स्रोत, वायु को प्रदूषित करने वाले स्रोत आदि आते हैं।
  2. राष्ट्रीय संगठन-इसके अन्तर्गत पर्यावरण-शिक्षा की बुलेटिन, आपको वातावरण नामक मैगजीन, टेलीफोन डायरेक्टरी आदि आते हैं।
  3. मुद्रित सामग्री-इसके अन्तर्गत वार्षिक प्रतिवेदन, पुस्तकें, पोस्टर, चार्ट्स, सरकारी प्रकाशन, पीरियोडिकल्स (Periodicals) सरकारी नीति आदि आते हैं।
  4. श्रव्य-दृश्य सामग्री-इसके अन्तर्गत फिल्म, फिल्म खण्ड, सेल टी०वी०; कॉमर्शियल टी०वी० एजुकेशनल टी०वी०, ऑडियो टेप, कॉमर्शियल स्लाइड और व्यक्तिगत स्लाइड आदि आते हैं।
  5. अन्य सामग्री–अन्य सामग्रियों के अन्तर्गत विद्यालय का खेल का मैदान, विद्यालय उद्यान आदि आते हैं।

प्रश्न 4
पर्यावरण-शिक्षा की मुख्य समस्याएँ क्या हैं? इन समस्याओं के समाधान के उपाय भी बताइए। [2009, 10]
या
भारत में पर्यावरण-शिक्षा की क्या समस्याएँ हैं? [2014]
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा की समस्याएँ

1. पर्यावरण के प्रति अनचित दृष्टिकोण
पर्यावरण-शिक्षा की सर्वप्रमुख समस्या अशिक्षा के फलस्वरूप पर्यावरण के प्रति उचित दृष्टिकोण का न होना है। लोग यह समझ ही नहीं पाते कि उनके कार्यों से पर्यावरण कितना दूषित हो रहा है। भारत में वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई हो रही है। नदियों के जल को गन्दा किया जा रहा है और वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। लोग इससे होने वाली हानि से अवगत ही नहीं हैं और इस स्थिति में उन्हें पर्यावरण-शिक्षा किस प्रकार दी जा सकती है? यदि किसी से कहा जाता है कि तुम ऐसा कार्य न करो, तो उसका उत्तर होता है इससे क्या हो जाता है, जब तक जीना है तब तक जिएँगे।

2. भौतिकवादी संस्कृति का अत्यधिक प्रसार
पर्यावरणीय शिक्षा की अन्य समस्या भौतिकवादी संस्कृति का अत्यधिक प्रसार है। जो लोग यह जानते हैं कि पर्यावरण की शुद्धता आवश्यक है वे भी अपने आरामतलबी, अपनी आवश्यकता और अपने भौतिक उपभोग हेतु पर्यावरण को व्यापक मात्रा में दूषित कर रहे हैं।

3. साहित्य की कमी
पर्यावरण-शिक्षा की एक अन्य प्रमुख समस्या इस शिक्षा के हेतु पर्याप्त मात्रा में साहित्य का विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा का उपलब्ध न होना है। सत्य तो यह है कि पर्यावरण के सम्बन्ध में अभी हमारा दृष्टिकोण अत्यन्त संकुचित है और ऐसे साहित्य को निर्माण अत्यन्त अल्प मात्रा में हुआ है जो पर्यावरण-शिक्षा से सम्बन्धित हो।

4. नगरीय सभ्यता का विकास
पर्यावरण-शिक्षा की एक अन्य समस्या नगरीय सभ्यता का अत्यधिक विस्तार है। लोगों का व्यापक मात्रा में गाँव से नगर की ओर पलायन हो रहा है और नगरों का वातावरण अत्यन्त प्रदूषित होता जा रहा है।

5. विद्यालयों में पर्यावरण
शिक्षा का अभाव-पर्यावरण-शिक्षा की एक बहुत बड़ी बाधा यह है कि अभी तक भारत के सभी विद्यालयों में पर्यावरण-शिक्षा को पाठ्यक्रम में स्थान नहीं दिया गया है। अनेक विद्यालय अभी ऐसे हैं जहाँ और सब कुछ तो पढ़ाया जाता है परन्तु पर्यावरण के सम्बन्ध में आदर्शवादी बातें ही बताई जाती हैं, यथार्थ की पृष्ठभूमि में लाकर लोगों को पर्यावरण के सम्बन्ध में शिक्षा प्रदान नहीं की जाती।

पर्यावरण-शिक्षा की समस्याओं का समाधान
यह सत्य है कि पर्यावरण-शिक्षा के मार्ग में विभिन्न समस्याएँ हैं परन्तु इन समस्याओं का निराकरण सम्भव है। इस सन्दर्भ में निम्नलिखित उपायों को अपनाकर सम्बन्धित समस्याओं का समाधान किया जा सकता है

1. उचित दृष्टिकोण का विकास
उक्त समस्या के समाधान हेतु यह अत्यन्त आवश्यक है कि लोगों को पर्यावरण को ठीक रखने हेतु प्रेरित किया जाए। इस क्षेत्र में अंशिक्षा सबसे बड़ी बाधक है।

2. प्राचीन भारतीय आदर्शों का स्थापन
इस भौतिकवादी युग में लोगों का ध्यान प्राचीन भारतीय आदर्शों की ओर उन्मुख किया जाना चाहिए। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि प्राचीनकाल में लोग सादा जीवन उच्च विचार रखते थे और प्रकृति के प्रति अत्यन्त संवदेनशील रहते थे। इसी कारण वे सुखमय जीवन व्यतीत करने में सफल थे। भौतिकवादी संस्कृति से जितनी दूर रहा जाएगा, उतना ही मन को सन्तोष प्राप्त होगा और पर्यावरण को जितना स्वच्छ रखा जाएगा उतना ही हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा।

3. साहित्य का निर्माण
पर्यावरण-शिक्षा से सम्बन्धित पार् साहित्य का निर्माण व्यापक मात्रा में किया जाना चाहिए और उसे विभिन्न स्थानों पर मुफ्त बाँटा जाना चाहिए। इस साहित्य में प्रकृति की देनों की प्रशंसा के साथ ही हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रहने के उपाय भी बतलाए जाने चाहिए।

4. ग्रामीण सभ्यता को प्रोत्साहन
उपर्युक्त समस्या के समाधान हेतु यह आवश्यक है कि देश में । ग्रामीण सभ्यता को प्रोत्साहन दिया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पर्यावरण को प्रदूषित किये बिना जीविका के साधन और सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। ग्रामीण जनता को बताया जाए कि कैसे प्राचीन युग में हमें पर्यावरण की रक्षा करने में समर्थ हुए थे। अधिक-से-अधिक पेड़ लगाए जाएँ और वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई आदि को रोका जाए।

5. पाठ्यक्रम में स्थान
पर्यावरण-शिक्षा को सभी माध्यमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए। उचित तो यह होगा कि पर्यावरण की रक्षा नामक एक विषय ही अलग से निर्धारित कर दिया जाए और सभी को उस पाठ्यक्रम को पढ़ना एवं समझना आवश्यक हो।

अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मानव के अस्तित्व को भौतिक, सामाजिक एवं मानसिक रूप से उन्नत बनाने हेतु जिन तत्त्वों की आवश्यकता होती है वे सभी प्रकृति में हैं। मानव का विकास तभी हो सकता है जब प्रकृति के विभिन्न तत्त्व सन्तुलित हों। प्रकृति में सन्तुलित होने की शक्ति स्वयं में व्याप्त है किन्तु मानव भी उसे सन्तुलित रखने में योगदान देता है।

मानव ने अत्यधिक परिश्रम करके बंजर भूमि को खेती योग्य बनायो, सागर को पाटकर बस्तियाँ बनायी हैं, जल और थल के गर्भ से खनिज निकाले हैं, विज्ञान, विद्या और आधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे कृषि उद्योग एवं पशु-पालन की व्यवस्था में उन्नति की है, तो जिस प्रकृति ने उसे सब कुछ दिया है, उस प्रकृति की चिन्ता यह क्यों नहीं करता? उन्नत विकसित होने के साथ ही हम प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ रहे हैं और यदि यह सन्तुलन बिगड़ गया तो मानव कैसे बचेगा? अतएव हमने प्रकृति के साथ जो कुछ किया है उसके हेतु पुनर्विचार की आवश्यकता है। डॉ० विद्या निवास मिश्र ने लिखा है-“प्रकृति का संरक्षण हम सबका पावन कर्तव्य है। हमें प्रकृति का उतना ही दोहन करना चाहिए जिससे उसका सन्तुलन न बिगड़े। यदि मानव अब भी नहीं चेता तो हमारा विनाश निश्चित है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण-शिक्षा के पाठ्यक्रम अथवा क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
या
पर्यावरण शिक्षा की विषय-वस्तु क्या होनी चाहिए? [2011]
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा का पाठ्यक्रम निम्नवत् हो सकता है।

  1. मानव एवं पर्यावरण
  2. पारिस्थितिकी
  3. जनसंख्या एवं नगरीकरण
  4. नगरीय एवं क्षेत्रीय नियोजन
  5. सामाजिक संसाधन
  6. अर्थशास्त्र एवं पर्यावरण
  7. वृक्ष एवं जल-संसाधन
  8. वायु प्रदूषण
  9. वन्य-जीवन संसाधून
  10. सरकारी नीति एवं नागरिक
  11. बाह्य मनोरंजन एवं नागरिकों की भूमिका

आधुनिक अध्ययनों एवं खोजों से यह स्पष्ट हुआ है कि पर्यावरण-शिक्षा का अन्तर-विषयक क्षेत्र है। इसके साथ ही इसको समग्र रूप में व्यक्त किया गया है। इसके अन्तर्गत पारिस्थितिकी, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं अन्य क्षेत्रों की विशिष्ट समस्याओं को स्थान दिया गया है। पर्यावरण-शिक्षा वास्तविक जीवन के व्यावहारिक समस्याओं से सम्बन्धित है। यह भावी नागरिकों को मूल्यों के निर्माण की ओर अग्रसर करती है।

प्रश्न 2
पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता और महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। [2007, 12, 16]
या
पर्यावरण-शिक्षा वर्तमान समय की एक महत्तम आवश्यकता है।” स्पष्ट कीजिए। [2015]
या
पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए। [2016]
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा की आवश्यकता
वर्तमान आधुनिकी के इस दौर में बढ़ते औद्योगिकीकरण, नगरीकरण एवं उपभोगवाद के कारण अनेक पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा हो गई हैं, जिनके कारण सम्पूर्ण विश्व के सामने पर्यावरणीय संकट पैदा हो गया है। पर्यावरणीय असन्तुलन के कारण आए दिन विश्व में कहीं-न-कहीं दुर्घटनाएँ घटित हो रही हैं। अत: मानव-जीवन पर आए इस संकट के समाधान के लिए पर्यावरण एवं उसकी कार्यप्रणाली के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है, ताकि पर्यावरणीय सन्तुलन की पुन: प्राप्ति की जा सके और यह ज्ञान हमें पर्यावरण शिक्षा द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है। अत: पर्यावरण शिक्षा आज की आवश्यकता है और इसे विद्यालयी पाठ्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। यह आज की माँग है।

पर्यावरण-शिक्षा का महत्त्व
वर्तमान वैज्ञानिक युग में पर्यावरण-शिक्षा का महत्त्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है। पर्यावरण-प्रदूषण ने विश्व को विनाश के निकट ला खड़ा किया है। पर्यावरण असन्तुलन के कारण आए दिन विश्व के किसी भी कोने में दुर्घटना घटित हो रही है। अत: मानव-जीवन की सुरक्षा के लिए पर्यावरण-सम्बन्धी तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है और यह ज्ञान पर्यावरण-शिक्षा द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है। संक्षेप में पर्यावरण-शिक्षा के महत्त्व को निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया जा सकता है

  1. पर्यावरण-शिक्षा द्वारा सम्पूर्ण पर्यावरण का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
  2. पर्यावरण-शिक्षा पर्यावरण-संरक्षण, वन्य-जीव संरक्षण, मृदा संरक्षण आदि की विधियाँ तथा उनकी उपयोगिता बताती है।
  3. पर्यावरण-शिक्षा विद्यार्थियों को नागरिक अधिकारों, कर्तव्यों तथा दायित्व का ज्ञान कराती है।
  4. पर्यावरण-शिक्षा वायु, जल, ध्वनि, मृदा, जनसंख्या आदि प्रदूषणों के कारणों तथा उनके नियन्त्रण की विधियाँ बतलाती है।
  5. पर्यावरण-शिक्षा विद्यालय पर्यावरण को सन्तुलित रखती है तथा नैतिक पर्यावरण को स्वस्थ बनाती है। पर्यावरण-शिक्षा के महत्त्व सम्बन्धी उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण-शिक्षा को विभागीय पाठ्यक्रम में स्थान मिलनी चाहिए। यह आज के युग की माँग है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण-शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. पर्यावरण-शिक्षा मानव के प्राकृतिक और भौतिक पर्यावरण से सम्बन्धित है।
  2. पर्यावरण-शिक्षा पर्यावरण के तत्त्वों का ज्ञान कराती है तथा पर्यावरण असन्तुलन के कारणों की जानकारी देती है।
  3. पर्यावरण-शिक्षा द्वारा हमें विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय प्रदूषणों-वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण के स्वरूपों तथा कारणों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. पर्यावरण-शिक्षा प्रदूषण नियन्त्रण के उपायों का ज्ञान कराती है।
  5. पर्यावरण-शिक्षा का सम्बन्ध जनसंख्या नियन्त्रण, परिवार नियोजन, वन संरक्षण, वनारोपण, वन्य जीव संरक्षण आदि से भी है।

प्रश्न 2
पर्यावरण शिक्षा की विषय-वस्तु क्या होनी चाहिए? [2011]
उत्तर
पर्यावरण शिक्षा के अन्तर्गत पर्यावरण के स्वरूप, पर्यावरण तथा मानव-समाज के सम्बन्ध एवं प्रभावों, पर्यावरण की होने वाली क्षति, पर्यावरण प्रदूषण के कारणों, पर्यावरण प्रदूषण के स्वरूपों तथा पर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करने के उपायों का अध्ययन किया जाता है। अत: पर्यावरण शिक्षा की विषय-वस्तु में निम्नलिखित को शामिल किया जाना चाहिए-

  1. मानव और पर्यावरण के बीच के सम्बन्धों का अध्ययन करना।
  2. पारिस्थितिकी सन्तुलन की व्याख्या करना।
  3. जनसंख्या वृद्धि व नगरीकरण के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का अध्ययन करना।
  4. प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण व अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।
  5. विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय प्रदूषणों का अध्ययन करना।
  6. जैव-विविधता को संरक्षण प्रदान करना।

प्रश्न 3
पर्यावरण शिक्षा के लक्ष्य क्या हैं ? [2009, 14]
उत्तर
पर्यावरण शिक्षा इस युग की प्रबल माँग है। इस उपयोगी शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य समस्त नागरिकों को पर्यावरण तथा पर्यावरण सम्बन्धी विभिन्न समस्याओं के प्रति जागरूक करना है। यह जागरूकता ही पर्यावरण की सुरक्षा में सहायक होगी। पर्यावरण शिक्षा का व्यावहारिक लक्ष्य पर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करना हैं इसके अतिरिक्त पर्यावरण में प्राकृतिक सन्तुलन को बनाये रखने के प्रयास करना भी पर्यावरण शिक्षा का लक्ष्य है।

प्रश्न 4
पर्यावरण-शिक्षा की सफलता के मार्ग में उत्पन्न होने वाली मुख्य समस्याएँ कौन-कौन-सी हैं? [2014]
उत्तर

  1. पर्यावरण के प्रति अनुचित दृष्टिकोण
  2. भौतिकवादी संस्कृति का अत्यधिक प्रसार
  3. उपयोगी साहित्य की कमी
  4. नगरीय सभ्यता का विकास तथा
  5. विद्यालयों में पर्यावरण-शिक्षा-व्यवस्था की कमी।

प्रश्न 5
‘पर्यावरण-शिक्षा की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा का अभिप्राय अच्छी नागरिकता विकसित करने के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को पर्यावरण मूल्यों तथा समस्याओं पर केन्द्रित करना है जिससे कि अच्छी नागरिकता का विकास हो सके एवं अधिगमकर्ता पर्यावरण के सम्बन्ध में भिज्ञ, प्रेरित एवं उत्तरदायी हो सके।”

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘पर्यावरण-शिक्षा से क्या आशय है ?
उत्तर
पर्यावरण के माध्यम से पर्यावरण के विषय में तथा पर्यावरण के लिए दी जाने वाली व्यवस्थित जानकारी को पर्यावरण-शिक्षा कहते हैं।

प्रश्न 2
राष्ट्रीय आधारभूत पाठ्यचर्या के अनुसार पर्यावरण-शिक्षा किस स्तर से प्रारम्भ होती है ? [2007]
उत्तर
राष्ट्रीय आधारभूत पाठ्यचर्या के अनुसार पर्यावरण-शिक्षा प्राथमिक शिक्षा स्तर से ही प्रारम्भ होती है।

प्रश्न 3
पर्यावरण-शिक्षा मुख्य रूप से पर्यावरण के किस रूप या प्रकार से सम्बन्धित है?
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा मुख्य रूप से प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण से सम्बन्धित है।

प्रश्न 4
वर्तमान समय में पर्यावरण-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या है?  [2007]
उत्तर
वर्तमान समय में पर्यावरण-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करनी

प्रश्न 5
पर्यावरण-शिक्षा को सफल बनाने के लिए मुख्य रूप से क्या उपाय किया जाना चाहिए?
उत्तर
पर्यावरण-शिक्षा को सफल बनाने के लिए पर्यावरण के प्रति उचित दृष्टिकोण का विकास करना अति आवश्यक है।

प्रश्न 6
पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से किस समस्या को दूर किया जा सकता है ? [2010]
उत्तर
पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को दूर किया जा सकता है।

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य
(i) पर्यावरण-शिक्षा का सम्बन्ध मुख्य रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण से होता है।
(ii) वर्तमान औद्योगिक सभ्यता के विकास के साथ-साथ पर्यावरण-शिक्षा की आवश्यकता बढ़ गयी है।
उत्तर
(i) असत्य
(ii) सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
पर्यावरण-शिक्षा का मूल उद्देश्य है [2007, 10, 12, 15]
(क) औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को धीमा करना
(ख) शुद्ध पेय जल की व्यवस्था करना
(ग) खाद्य-पदार्थों के उत्पादन में वृद्धि करना
(घ) प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट होने से बचाना
उत्तर
(घ) प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट होने से बचाना

प्रश्न 2
निम्नलिखित में से सभी पर्यावरण-शिक्षा के उद्देश्य हैं, सिवाय
(क) परिवार नियोजन
(ख) जागरूकता
(ग) वृक्षारोपण
(घ) प्राकृतिक स्रोतों का बचाव
उत्तर
(क) परिवार नियोजन

प्रश्न 3
पर्यावरण-शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा गया
(क) 1965 ई० में
(ख) 1970 ई० में
(ग). 1975 ई० में
(घ) 1978 ई० में
उत्तर
(ख) 1970 ई० में

प्रश्न 4
‘अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण-शिक्षा कार्यक्रम कब से प्रारम्भ हुआ?
(क) 1970 ई० में
(ख) 1972 ई० में
(ग) 1975 ई० में
(घ) 1980 ई० में
उत्तर
(ग) 1975 ई० में

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 23 Social Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 23
Chapter Name Social Development (सामाजिक विकास)
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 23 Social Development (सामाजिक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सामाजिक विकास से आप क्या समझते हैं ? सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का भी उल्लेख कीजिए।
या
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। बालक के सामाजिक विकास में पारिवारिक कारक और विद्यालयी कारक की भूमिका का वर्णन कीजिए।
या
सामाजिक विकास क्या है?

सामाजिक विकास का अर्थ
(Meaning of Social Development)

बालक जन्म से सामाजिक नहीं होता। समाज में रहकर ही उसके अन्दर सामाजिकता का विकास होता है। शारीरिक विकास और सामाजिक विकास साथ-साथ चलते हैं। विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ उसके समाजीकरण में योग प्रदान करती हैं। सामाजिक विकास की प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है। सामाजिक विकास के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए हम यहाँ विभिन्न विद्वानों की परिभाषाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. सोरेन्सन (Sorenson) के अनुसार, “सामाजिक विकास का तात्पर्य है अपने तथा दूसरे व्यक्तियों के साथ समायोजन की शक्ति में वृद्धि।”

2. ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति एक सामाजिक मनुष्य में परिवर्तित हो जाता है।” उपर्युक्त विवरण द्वारा सामाजिक विकास का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के द्वारा सामाजिक मान्यताओं के अनुसार अपने व्यवहार को निर्धारित करने की प्रक्रिया को सामाजिक विकास कहते हैं।

सामाजिक विकास की क्रमिक प्रक्रिया से बालक में समाज के अन्य मनुष्यों से सम्पर्क स्थापित करने की योग्यता में वृद्धि होती है। सामाजिक विकास के साथ-साथ व्यक्ति की रुचियों, मनोवृत्तियों तथा आदतों में प्रौढ़ता आती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बालक का पारिवारिक एवं सामाजिक पर्यावरण ही उसके सामाजिक विकास को परिचालित एवं नियन्त्रित करता है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति का व्यवहार एवं दृष्टिकोण समाज-सम्मत बनता है।

सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Social Development)

बालक के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं

1. शारीरिक कारक- जिन बालकों का स्वास्थ्य ठीक नहीं होता, उनका सामाजिक विकास भी सामान्य गति से नहीं होता। शारीरिक दुर्बलता बालक में हीनता लाती है और वह अपने साथियों से अलग रहना पसन्द करता है। हीनता की यह भावना बालक के सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न करती है। बीमार और कमजोर बालक प्रायः जिद्दी और उद्दण्ड बन जाते हैं। इसके विपरीत स्वस्थ बालकों का सामाजिक विकास सामान्य ढंग से होता है। वे अपने साथियों के सम्पर्क में आकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

2. परिवार का वातावरण- परिवार वह स्थान है, जहाँ बालक का सर्वप्रथम समाजीकरण होता है। बालक परिवार के विभिन्न सदस्यों के सम्पर्क में आता है और उनके सम्पर्क में आकर अनेक बातें सीखता है। यह सीखना ही एक प्रकार का समाजीकरण एवं सामाजिक विकास है। परिवार का जैसा वातावरण होता है, वैसा ही बालक सामाजिक आचरण सीखता है। परिचितों को देखकर अभिवादन करना, बड़ों को देखकर खड़े हो जाना तथा शिष्ट एवं संयत स्वर में बोलना, परस्पर सहयोग के लिए तैयार रहना आदि सामाजिक आचरण का शिक्षण-स्थल परिवार है। बालक के सामाजिक विकास में परिवार की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, परिवार में ही रहकर बालक विभिन्न सामाजिक सद्गुणों को सीखता एवं आत्मसात् करता है। परिवार के बड़े सदस्य ही बालक की व्यक्तिगत एवं स्वार्थ सम्बन्धी मनोवृत्तियों को दूर करते हैं तथा सामाजिकता की प्रवृत्ति को पुष्ट करते हैं।

3. पालन- पोषण का स्वरूप-जिस परिवार में समस्त बालकों के साथ सामान्य व्यवहार नहीं होता और पक्षपात का बोलबाला रहता है, उस परिवार के बालकों का सामाजिक विकास ठीक प्रकार से नहीं होता। एक उपेक्षित बालक अपने अन्दर हीनता की भावना अनुभव करता है। इसके विपरीत अधिक लाड़-प्यार में पला बालक अहम् की भावना से ग्रसित हो जाता है और वह अपने को ऊँचा समझने के कारण साथियों से अलग रहने का प्रयास करता है, परन्तु जिन बालकों के साथ समानता का व्यवहार किया जाता है, उनका सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से होता है।

4. पास-पड़ोस- बालक जब बड़ा होता है तो वह अपने पास-पड़ोस के सम्पर्क में आता है। इस प्रकार सामाजिक क्षेत्र बढ़ जाता है। वह पड़ोसियों से मिल-जुलकर अनेक बातें सीखता है। इस प्रकार पास-पड़ोस भी उसके सामाजिक विकास में अपना योगदान प्रदान करता है।

5. आर्थिक स्थिति- परिवार की आर्थिक स्थिति का भी प्रभाव बालक के सामाजिक विकास पर पड़ता है। जिन परिवारों में बालकों को पढ़ने-लिखने व खेलने-कूदने की अनेक सुविधाएँ होती हैं, उन परिवारों में बालक का सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप में होता है। दूसरे, सम्पन्न परिवारों के निवास की दशा तथा पड़ोस उत्तम होते हैं। परिवार के सदस्यों का सम्पर्क भी अच्छे व सुसंस्कृत व्यक्तियों से होता है। निर्धन परिवार इन सुविधाओं से वंचित रहते हैं। आर्थिक संकट परिवार में कलह और तनाव का कारण होता है। इस प्रकार के तनाव का बालक के सामाजिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

6. क्लब और दल- जो बालक किसी क्लब या दल के सदस्य होते हैं, उनमें अन्य बालकों की अपेक्षा सामाजिकता की भावना अधिक पायी जाती है। क्लब और दल के सदस्यों में परस्पर सहयोग की भावना होती है। बालक क्लब या दल के सदस्य के रूप में शिष्टाचार और सद्व्यवहार आदान-प्रदान करते हैं तथा विभिन्न समारोहों का आयोजन करते हैं। ये समस्त क्रियाएँ बालक के सामाजिक विकास में परम सहायक होती हैं।

7. संवेगात्मक विकास- क्रो व क्रो के अनुसार, “संवेगात्मक और सामाजिक विकास साथ-साथ चलते हैं।” जो बालक क्रोधी तथा ईष्र्यालु स्वभाव के होते हैं, उन्हें समाज में आदर नहीं मिलता और न ही वे अन्य व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो पाते हैं। इसके विपरीत एक हँसमुख और उत्साही स्वभाव का बालक शीघ्र ही लोकप्रिय हो जाता है और उसके सम्पर्क में प्रत्येक व्यक्ति आना चाहता है।

8. बालक-बालिका का सम्बन्ध- बालक-बालिकाओं के पारस्परिक सम्बन्ध भी सामाजिक विकास पर प्रभाव डालते हैं। किशोरावस्था में बालक-बालिकाएँ परस्पर मिलने-जुलने में विशेष आनन्द का अनुभव करते हैं। यदि उन्हें मिलने-जुलने की स्वतन्त्रता रहती है, तो उनका सामाजिक विकास स्वाभाविक गति से होता रहता है, अन्यथा अवरोध उत्पन्न हो जाता है। हमारे देश में किशोर-किशोरियों को परस्पर मिलने-जुलने की स्वतन्त्रता नहीं है। इस कारण बालकों का सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से नहीं हो पाता और उनमें अनुशासनहीनता की भावना पायी जाती है।

9. सामाजिक व्यवस्था- समाज का स्वरूप या व्यवस्था का प्रभाव बालक के सामाजिक विकास पर पड़ता है। प्रत्येक बालक अपने समाज के स्वरूप, आदर्श और प्रतिमानों से प्रभावित होता है और उसी के अनुसार उसके जीवन के दृष्टिकोण का निर्धारण होता है। इस कारण ही लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था तथा अधिनायकतन्त्रात्मक व्यवस्था में पलने वाले बालकों के आचरण में पर्याप्त अन्तर होता है।

10. विद्यालय का योगदान- परिवार के बाद बालक के सामाजिक विकास में योगदान देने वाला दूसरा … तत्त्व विद्यालय है।-घर के पश्चात् बालक का अधिकांश समय विद्यालय में ही व्यतीत होता है। जिन विद्यालयों में अध्यापकों का व्यवहार लोकतांत्रिक होता है तथा बालकों को पर्याप्त स्वतन्त्रता मिलती है और खेलकूद तथा समारोहों में भाग लेने के अवसर मिलते हैं, वहाँ बालकों का समाजीकरण स्वाभाविक ढंग से चलता रहता है। यदि विद्यालय में दमन और कठोर अनुशासन को ही महत्त्व दिया जाता है तथा विभिन्न सामूहिक खेलकूद और अन्य क्रियाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है तो वहाँ बालकों का सामाजिक विकास समुचित ढंग से नहीं हो पाता।

विद्यालय में शिक्षक द्वारा किया गया दैनिक व्यवहार बालक के सामाजिक विकास को विशेष रूप से प्रभावित करता है। यदि शिक्षक बालकों की भावनाओं का आदर करता है तथा समय-समय पर उनका सहयोग लेता है। और कक्षा में उन्हें वाद-विवाद के अवसर प्रदान करता है, तो छात्रों में समाजीकरण की प्रक्रिया तीव्रता से होगी। इसके विपरीत यदि शिक्षक शुष्क और निरंकुश प्रवृत्ति का है और बालकों के साथ उसका व्यवहार ताड़नायुक्त तथा उपेक्षा का है तो ऐसे वातावरण में बालकों का सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाएगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में सामाजिक विकास
(Social Development in Infancy)

नवजात शिशु में किसी प्रकार का सामाजिक विकास देखने को नहीं मिलता। क्रो एवं क्रो के अनुसार, “जन्म के समय शिशु न तो सामाजिक प्राणी होता है और न असामाजिक, परन्तु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं बनी रहती। धीरे-धीरे शिशु अपनी माता या परिचारिका के सम्पर्क में आकर अनेक प्रतिक्रियाएँ प्रकट करता है। उसकी यह प्रतिक्रिया विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। उसका हर्ष एवं रुदन इसी के अनेक रूपों में से एक है। प्रथम मास तक शिशु साधारण आवाजें तथा मनुष्य की आवाज में कोई अन्तर नहीं कर पाता। परन्तु दूसरे मास में वह यह अन्तर जान जाता है। माता जब बच्चे को पुचकारती है तो वह मुस्कराने लगता है।

म्यूलर के अनुसार, दो मास के पश्चात् ही शिशु सामाजिक प्रतिक्रियाओं को प्रारम्भ करता है। उसके अनुसार दो मास के 60 प्रतिशत बालक माँ या परिचारिका के हट जाने पर रोने लगते हैं तथा माँ या पिता को देखकर मुस्कराने लगते हैं। चौथे मास तक शिशु उन बालकों तथा व्यक्तियों में रुचि दिखाने लगता है, जो उसके प्रति विशेष प्रेम प्रकट करते हैं। पाँचवें तथा छठे मास तक वह स्नेहपूर्ण व्यवहार तथा ताड़ना में अन्तर करने लगता है। जब उसे देखकर कोई मुस्कराता है तो वह मुस्कराने लग जाता है और यदि कोई डाँटता है तो वह रोने लग जाता है। सात या आठ मास का शिशु परिचित तथा अपरिचित में कुछ-कुछ भेद करने लग जाता है। नौ मास का शिशु प्रौढ़ों की विभिन्न क्रियाओं और शब्दों का अनुकरण करने का प्रयास करता है।

एक वर्ष का शिशु उन कार्यों को नहीं करता, जिनके लिए उसे मना किया जाता है। दो वर्ष की आयु के बालक अन्य व्यक्तियों के साथ किसी कार्य में सहयोग देने में विशेष आनन्द का अनुभव करते हैं। तीसरे वर्ष में बालक अपने साथियों के साथ खेलने में विशेष आनन्द लेता है। चार से छ: वर्ष का बालक अभिभावक के संरक्षण में रहकर कार्य करना चाहता है। अब वह नवीन मित्रों की तलाश में रहता है तथा सामूहिक खेल-कूद में उसे विशेष आनन्द आता है। इस अवस्था के शिशु में सामाजिकता का पर्याप्त विकास हो जाता है।

प्रश्न 2
बाल्यावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास
(Social Development in Childhood)

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास तीव्रता से होता है। प्राय: इस अवस्था के बालक ही विद्यालय में प्रवेश लेते हैं। विद्यालय में बालक अपने जैसे अनेक बालकों के सम्पर्क में आता है। यह सम्पर्क ही उसे सामाजिक प्राणी बनाता है। वह शीघ्रता से नवीन वातावरण के अनुकूल अपने को ढालने का प्रयास करता है। अनुकूलन के पश्चात् ही उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है तथा उसमें उत्तरदायित्व और स्वतन्त्रता की भावना का विकास होता है। इस अवस्था के बालकों का किसी-न-किसी टोली या समूह से सम्बन्ध होता है।

अपनी टोली के प्रति प्रत्येक बालक की अटूट श्रद्धा होती है। टोली की सदस्यता से ही बालक का सामाजिक विकास होता है। इस अवस्था में बालक के सामाजिक विकास पर सहपाठियों एवं मित्रों के अतिरिक्त कक्षा के अध्यापकों का भी गम्भीर प्रभाव पड़ता है। अध्यापकों द्वारा बालकों को अनेक सामाजिक सद्गुणों की जानकारी प्रदान की जाती है। विद्यालय आने-जाने के समय भी बालकों का सम्पर्क रिक्शा अथवा बस के साथियों आदि से होता है। इस सम्पर्क से भी उनके सामाजिक विकास में उल्लेखनीय योगदान प्राप्त होता है।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का उल्लेख कीजिए।
या
बालकों अथवा बालिकाओं में किशोरावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में सामाजिक विकास
(Social Development in Adolescence)

किशोरावस्था में बालक अपने वातावरण के प्रति जागरूक हो जाता है और उसके सामाजिक विकास पर परिवार, साथियों तथा विद्यालय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। इस अवस्था में किशोर अपने को सम्मानित देखना चाहता है। वह चाहता है कि घर के अन्दर और घर के बाहर सब स्थानों पर उसे सम्मान मिले और इस सम्मान की प्राप्ति में वह प्रौढ़ों के समान व्यवहार करने लग जाता है। इस अवस्था में किशोर के सामाजिक व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। अब बाल्यकाल की चंचलता गम्भीरता में परिवर्तित हो जाती है। वह अपने आचरणों में दिखावट का प्रदर्शन करने लगता है। प्रत्येक किशोर अपनी आर्थिक स्थिति को अपने अन्य मित्रों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का प्रयास करता है।

वह मित्रता के महत्त्व को भी समझने लगता है और अपनी रुचि के अनुकूल ही किसी किशोर को ही अपना घनिष्ठ मित्र बनाता है। किशोरावस्था में बालक बालिकाओं के प्रति तथा बालिकाएँ बालकों के प्रति आकर्षित होती हैं। इस आकर्षण के लिए वे अपने वस्त्र, वेशभूषा तथा प्रसाधनों के प्रति विशेष जागरूक रहते हैं। किशोर तथा किशोरियाँ किसी-न-किसी समुदाय के सदस्य बन जाते हैं। इन समुदायों का मूल उद्देश्य पिकनिक, भ्रमण, नाटक खेलना, नृत्य व संगीत द्वारा मनोरंजन करना होता है।

प्रत्येक किशोर अपने समूह या समुदाय के प्रति अटूट श्रद्धा रखता है तथा उसे परिवार और विद्यालय से भी अधिक महत्त्व देता है। इसके साथ-ही-साथ किशोर समुदाय का सदस्य बनकर उसके द्वारा स्वीकृत वेशभूषा, आचरण आदि को भी व्यवहार में लाता है। डॉ० सीताराम जायसवाल के अनुसार, “किशोर में अपने समुदाय की वेशभूषा, व्यवहार शैली और अनुकरण की प्रबल प्रवृत्ति होती है। समुदाय के प्रति सदस्यों की निष्ठा इतनी पक्की होती है कि वे पढ़ाई और परिवार के आवश्यक कार्य भी छोड़कर समुदाय के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। सदस्यों के व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन के मूल्यों पर समुदायों की गहरी छाप । रहती है।’ समुदाय का सदस्य बनकर ही किशोर नेतृत्व की शिक्षा प्राप्त करता है तथा उसमें उत्साह, सहयोग, सहानुभूति आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है।

प्रश्न 4
बालक के उचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षक द्वारा क्या भूमिका निभायी जा सकती है ?
या
बच्चों में सामाजिक विकास करने के लिए स्कूल को क्या करना चाहिए?
या
बच्चों में सामाजिक विकास को उन्नत करने के लिए स्कूल में क्या करना चाहिए?
उत्तर:

सामाजिक विकास के लिए शिक्षक की भूमिका
(Role of Teacher for Social Development)

बालक के सामाजिक विकास में शिक्षा किस प्रकार सहायक हो सकती है, इसके लिए शिक्षक को निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए-

  1. शिक्षक को स्वयं सामाजिक व्यवहार में प्रवीण होना चाहिए। उसे छात्रों के साथ सदा विनम्रता और शिष्टता का व्यवहार करना चाहिए।
  2. विद्यालय में अनुशासन की स्थापना में छात्रों से सहयोग लेना चाहिए तथा उन्हें अनुशासन की स्थापना का उत्तरदायित्व सौंपना चाहिए।
  3. विद्यालय में समय-समय पर विभिन्न प्रकार के उत्सवों, समारोहों तथा संगीत सम्मेलनों का आयोजन किया जाना चाहिए तथा उनकी व्यवस्था में छात्रों का सहयोग लेना चाहिए। आमन्त्रित अतिथियों का स्वागत भी छात्रों द्वारा ही करवाया जाना चाहिए।
  4. छात्रों को श्रमदान द्वारा समाज-सेवा करने को प्रोत्साहित किया जाए तथा साक्षरता प्रसार में भी उनका सहयोग प्राप्त किया जाए।
  5. विद्यालय को समाज का लघु रूप बनाया जाए तथा समाज के सदस्यों को विद्यालय के कार्यक्रमों में आमन्त्रित किया जाए।
  6. बालकों में सामाजिक गुणों का विकास करने के लिए पाठ्यक्रम में सामाजिक शिक्षा को भी स्थान दिया जाए।
  7. स्काउटिंग सामाजिक विकास में विशेष सहायक होती है। अत: विद्यालय में इसका आयोजन प्रभावशाली ढंग से किया जाए।
  8. विद्यालय में विभिन्न सामूहिक़ खेलकूदों का आयोजन हो तथा छात्रों को उसमें भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाए।
  9. बालकों में सामूहिक प्रवृत्ति होती है। वे इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करना चाहते हैं। शिक्षक का कर्तव्य है। कि वे इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करने के लिए विद्यालय में उन कार्यक्रमों का आयोजन करें, जिनसे बालकों की सामूहिक प्रवृत्ति सन्तुष्ट हो सके।
  10. बालकों में समुचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षक को उनकी अनुकरण, संकेत और सहानुभूति की प्रवृत्ति का उचित ढंग से प्रयोग करना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालक के सामाजिक विकास में मित्रों एवं खेल-समूह की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बालक के सामाजिक विकास में उसके मित्रों एवं खेल-समूह द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। सभी बालक अपने मित्रों से अनेक सामाजिक गुणों को सीखते हैं। खेल के दौरान बच्चों में सहयोग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तथा एक-दूसरे की सहायता करने के गुणों का विकास होता है। इन सामाजिक गुणों का बालक के सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बालक के मित्र एवं खेल-समूह सदैव अच्छा होना चाहिए। किसी विकृत बालक की मित्रता प्रायः हानिकारक होती

प्रश्न 2
सामाजिक विकास के मुख्य स्तरों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति अथवा बालक का सामाजिक विकास क्रमिक रूप में होता है। इसके मुख्य रूप से तीन स्तर माने गये हैं। प्रथम स्तर है-दूसरों के प्रति चेतना का स्तर। इस स्तर पर बालक अन्य व्यक्तियों के प्रति सचेत हो जाता है। वह अन्य व्यक्तियों को पहचानने लगता है। द्वितीय स्तर है-मेल-जोल का स्तर। इस स्तर पर बालक में सामूहिकता के गुण का विकास होता है। वह अन्य व्यक्तियों के साथ अन्त:क्रिया करना प्रारम्भ कर देता है। यह बाल्यावस्था का स्तर है। इस स्तर पर खेल-समूह का विशेष महत्त्व होता है। सामाजिक-विकास का तीसरा स्तर है–सम्बन्धों में परिवर्तन का स्तर। इस स्तर पर बालक में लिंग-भेद की जागरूकता आ जाती है तथा उसका प्रभाव उसके व्यवहार पर भी पड़ने लगता है।

प्रश्न 3
सामाजिक विकास का शैक्षिक महत्त्व क्या हो सकता है?
उत्तर:
सामाजिक विकास का समुचित शैक्षिक महत्त्व है। सामाजिक विकास के लिए व्यापक सामाजिक सम्पर्क आवश्यक होता है। इस प्रकार से सामाजिक सम्पर्क की स्थापना से व्यक्ति अनेक प्रकार की जानकारी एवं ज्ञान भी अर्जित करता है अर्थात् उसका शैक्षिक विकास भी होता है। सामाजिक विकास के माध्यम से व्यक्ति विभिन्न सामाजिक सद्गुणों, मान्यताओं, नियमों आदि को आत्मसात् करता है। इस प्रक्रिया का पर्याप्त शैक्षिक महत्त्व है। सामाजिक विकास के परिणामस्वरूप बालक अनुशासन सीखता है। अनुशासन का शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक महत्त्व है। इस दृष्टिकोण से भी सामाजिक विकास का उल्लेखनीय शैक्षिक महत्त्व है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानव-शिशु का एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होना किस प्रकार का विकास कहलाता है ?
उत्तर:
मानव-शिशु का एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होना बालक का सामाजिक विकास कहलाता है।

प्रश्न 2
मानव-शिशु के सामाजिक विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक क्या है?
उत्तर:
मानव-शिशु के सामाजिक विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक है–सामाजिक सम्पर्क।

प्रश्न 3
“समाजीकरण की प्रक्रिया अन्य व्यक्तियों के साथ शिशु के सम्पर्क से प्रारम्भ होती है और जीवन-पर्यन्त चलती रहती हैं।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन गिलफोर्ड का है

प्रश्न 4
शिशु के सामाजिक विकास की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका किस सामाजिक संस्था की होती
उत्तर:
शिशु के सामाजिक विकास की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका ‘परिवार’ नामक सामाजिक संस्था की होती है।

प्रश्न 5
बालक के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. शारीरिक कारक
  2. परिवार का वातावरण
  3. पास-पड़ोस तथा
  4. परिवार की आर्थिक स्थिति

प्रश्न 6
कोई ऐसा उदाहरण दीजिए, जिससे स्पष्ट हो जाए कि सामाजिक सम्पर्क के अभाव में मानव-शिशु का सामाजिक विकास सम्भव नहीं है ?
उत्तर:
एक उदाहरण है-भेड़ियों द्वारा मानव-शिशु के पालन-पोषण करने का। यह मानव-शिशु सामाजिक सम्पर्क के अभाव में रहा तथा उसका सामाजिक विकास बिल्कुल नहीं हो पाया।

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. सामाजिक विकास के परिणामस्वरूप ही मानव-शिशु सामाजिक प्राणी बनती है
  2. सामाजिक विकास के लिए सामाजिक सम्पर्क कोई अनिवार्य शर्त नहीं है
  3. बालक के सामाजिक विकास में उसके मित्रों एवं खेल-समूह का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है
  4. बालक के सामाजिक विकास में शिक्षा का कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं होता
  5. बालक की विकलांगता उसके सामाजिक विकास में बाधक होती है
  6. संवेगात्मक रूप से विकृत बालक का सामाजिक विकासे भी सुचारु नहीं हो पाता

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न  1.
सामाजिक विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति का व्यवहार बनता है
(क) उदार एवं परोपकारी
(ख) सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप
(ग) समाज विरोधी
(घ) स्वच्छन्द एवं मुक्त

प्रश्न  2.
सामाजिक विकास की प्रक्रिया चलती है
(क) शैशवावस्था में
(ख) विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने तक
(ग) जीवन-पर्यन्त
(घ) युवावस्था तक

प्रश्न  3.
बालक के सामाजिक विकास में बाधक कारक है
(क) बुरा स्वास्थ्य
(ख) विकलांगता
(ग) निम्न आर्थिक स्थिति
(घ) ये सभी

प्रश्न  4.
व्यक्ति के सामाजिक विकास में सर्वाधिक योगदान होता है
(क) परिवार का
(ख) व्यवसाय का
(ग) क्लब एवं मनोरंजन संस्थानों का
(घ) कार्यालय का

प्रश्न  5.
बालक का समाजीकरण किस अवस्था में सबसे अधिक होता है ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) युवावस्था

उत्तर:

  1. (ख) सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप
  2. (ग) जीवन-पर्यन्त
  3. (घ) ये सभी
  4. (क) परिवार का
  5. (ग) किशोरावस्था

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 12 Montessori Method

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 12
Chapter Name Montessori Method (मॉण्टेसरी पद्धति)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 12 Montessori Method (मॉण्टेसरी पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मॉण्टेसरी पद्धति के मूल सिद्धान्त क्या हैं? सविस्तार समझाइए।
या
मारिया मॉण्टेसरी के अनुसार शिक्षा के सिद्धान्त क्या हैं?
उत्तर:
मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली छोटे बच्चों की एक लोकप्रिय शिक्षा-प्रणाली है। इस प्रणाली का प्रारम्भ मैडम मारिया मॉण्टेसरी ने किया था। यह प्रणाली बाल-मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर आधारित है।

मॉण्टेसरी पद्धति के सिद्धान्त
(Principles of Montessori Method)

मॉण्टेसरी ने अपनी किसी पुस्तक में अपने शिक्षण सिद्धान्तों की व्याख्या नहीं की है, लेकिन उनकी पद्धति का गहन अध्ययन करके सहज ही हम उनके शिक्षण सिद्धान्तों के विषय में अनुमान लगा सकते हैं। वास्तव में मॉण्टेसरी पद्धति के मुख्य शिक्षण सिद्धान्त वही हैं, जो किण्डरगार्टन पद्धति के हैं। मॉण्टेसरी ने केवल उनमें आंशिक संशोधन करके उनको नया रूप प्रदान किया है। संक्षेप में मॉण्टेसरी पद्धति के सिद्धान्तों को निम्नवत् समझा जा सकता है|

1. विकास हेतु शिक्षा का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी ने शिक्षा को आन्तरिक विकास की प्रक्रिया माना है। उनका मत है कि शिशु एक अविकसित बीज के समान है, जिसमें उनके भावी विकास की समस्त शक्तियाँ निहित होती हैं। शिशुओं के सम्बन्ध में उनका कथन है, “बालक एक मॉण्टेसरी पद्दति के सिद्धान्त ऐसा शरीर है जो बढ़ता है तथा आत्मा है जो विकास प्राप्त करती है। विकास के इन रूपों को हमें न तो कुरूप बनाना चाहिए और न दबाना, विकास हेतु शिक्षा का सिद्धान्त बल्कि उस काल के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए जब किसी शक्ति का । क्रम के अनुसार प्रादुर्भाव हो। उन्होंने आगे कहा है, “यदि शिक्षण की किसी प्रणाली को प्रभावशाली बनाना है तो वह बालक के सम्पूर्ण विकास के लिए। प्रभावशाली होनी चाहिए।’

2. पूर्ण स्वतन्त्रता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल के समान मॉण्टेसरी मांसपेशियों की शिक्षा का का भी यह मत था कि बालक को अपनी शिक्षा ग्रहण करने में पूर्ण स्वतन्त्र होना चाहिए। मॉण्टेसरी का कथन है, “स्वतन्त्रता का अर्थ , आयनिता न इसमें निहित नहीं है कि बालकों से साधारण सेवाएँ कराने के लिए व्यावहारिक शिक्षा का सिद्धान्त दूसरों द्वारा दी गई आज्ञाओं का पालन करवाया जाए, वरन् उन्हें इस व्यक्तित्व के विकास का सिद्धान्त योग्य बनाना है कि वह स्वयं अपने आदेशों का पालन करें। आत्मनिर्भर होना ही स्वतन्त्रता है। 

मॉण्टेसरी के अनुसार, बालकों को इस प्रकार का वातावरण देना चाहिए जिसमें कि वह अपनी रुचि के। अनुसार कार्य कर सके। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में भी बालक को स्वतन्त्रता देना आवश्यक है। शिक्षा में स्वतन्त्रता का अर्थ है कि बालक की मूल तथा सामान्य प्रवृत्तियों को शिक्षा का माध्यम बना दिया जाए। इस सिद्धान्त में बालक को अपनी रुचि के अनुसार खेलने, कूदने, पढ़ने, खाने और पाठ्य-विषयों को चुनने की पूर्ण स्वतन्त्रता रहती है।

3. आत्मशिक्षण का सिद्धान्त- प्रत्येक बालक में अपने आप कार्य करने की कुछ क्षमता होती है। किलपैट्रिक के अनुसार, “बालक जितना अधिक अपने अनुभव से बिना किसी शिक्षक की सहायता से सीखता है, उतना ही अधिक ज्ञान उसको होता है।” इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य के आधार पर मॉण्टेसरी ने भी अपनी शिक्षा-पद्धति में बालकों को स्वयं अपने प्रयत्नों द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इस सम्बन्ध में प्रोफेसर भाटिया ने लिखा है, स्वशिक्षा ही सच्ची शिक्षा है, क्योंकि यहाँ बच्चे को किसी बड़े के हस्तक्षेप से दुःखित नहीं किया जाता, वरन्। वह स्वतः शिक्षा प्राप्त करना सीखता है।”

मॉण्टेसरी ने कुछ शिक्षा उपकरणों का निर्माण किया है, जिनकी सहायता से बालक आत्म-शिक्षण कर सकता है। उन्होंने इस तथ्य पर भी बल दिया है कि बालक अपनी गलती को समझकर स्वयं उसे सुधारे। इससे बालक में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, सहनशीलता, धैर्य आदि गुणों का विकास हो सकता है। इस प्रकार मॉण्टेसरी पद्धति में शिक्षक का कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं है। शिक्षक का कार्य केवल बालक का पथ-प्रदर्शन एवं निरीक्षण करना है।

4. ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी ने अपनी शिक्षा-पद्धति में ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया है। उन्होंने ज्ञानेन्द्रियों को द्वार’ अर्थात् ज्ञान का द्वार’ कहा है, क्योंकि विश्व का अधिकांश ज्ञान मनुष्य को ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ही प्राप्त होता है। अत: बालक की ज्ञानेन्द्रियाँ जितनी अधिक प्रशिक्षित होंगी, उतनी ही सरलता से वह ज्ञान प्राप्त कर सकेगा। यदि ज्ञानेन्द्रियाँ निर्बल रहती हैं तो उसका ज्ञान अस्पष्ट और अपूर्ण रहता है। इसलिए मॉण्टेसरी ने विभिन्न शैक्षिक उपकरण बनाए हैं, जिनके प्रयोग से बालक की ज्ञानेन्द्रियों को प्रशिक्षित किया जाता है।

5. खेल द्वारा शिक्षा का सिद्धान्त- खेल बालक की जन्मजात प्रवृत्ति है। इसलिए अन्य शिक्षाशास्त्रियों की भाँति मॉण्टेसरी ने भी अपनी शिक्षण-पद्धति में खेल द्वारा शिक्षा के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। इस पद्धति में विभिन्न उपकरणों की सहायता से खेलते-खेलते ही बालक को वर्णमाला, भाषा तथा गणित का ज्ञान कराया जाता है। खेलों में बालक को पूर्ण स्वतन्त्रता रहती है और उनके माध्यम से वह तरह-तरह का ज्ञान प्राप्त करते हैं। किलपैट्रिक ने लिखा है, “उसके खेल, खेल न होकर नाममात्र के खेल हैं, जिनसे शिशु खेल तथा ज्ञानार्जन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करता है।”

6. विवेकपूर्ण अनुशासन का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी का विचार था कि जब बालक के सम्मुख शिक्षा सम्बन्धी वातावरण उपस्थित किया जाएगा, तब उसमें स्वत: ही उत्तरदायित्व की भावना जाग उठेगी और इसके परिणामस्वरूप उसके अन्दर एक प्रकार के अनुशासन की भावना उत्पन्न होगी जो कि सच्चा अनुशासन होगा।

7.मांसपेशियों की शिक्षा का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी का विचार था कि जब तक बालक की मांसपेशियों को सुदृढ़ नहीं किया जाएगा तब तक उसे काम करने में कठिनाई होगी और वह अपने अंगों का समुचित प्रयोग नहीं कर सकेगा। अत: बालक की प्रारम्भिक शिक्षा में मांसपेशियों को साधने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे कि बालक भली-भाँति चलना, फिरना, दौड़ना आदि सीख जाए। इससे बालक में आत्मनिर्भरता के गुण का भी विकास होता है।

8. आत्मनिर्भरता का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी ने अपनी शिक्षा-पद्धति में इस बात पर विशेष बल दिया है। कि बालक किसी दूसरे पर निर्भर न रहकर अपना काम स्वयं करे। बालकों में प्रारम्भ से ही यह आदत डाल देनी चाहिए कि वे स्वयं अपना मुँह धोना, कपड़े पहनना, सफाई करना तथा अपना सामान ठीक तरह से रखना सीख लें।।

9. व्यावहारिक शिक्षा का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी ने अपनी शिक्षा-पद्धति में व्यावहारिक शिक्षा पर । विशेष बल दिया है। मॉण्टेसरी विद्यालयों में बालकों को ऐसा ज्ञान दिया जाता है, जिनका जीवन में उपयोग होता है। बालक भोजन करना, बातचीत करना, सोना, हँसना, भोजन परोसना, सफाई करना आदि सभी बातें मनोवैज्ञानिक ढंग से सीख जाते हैं। शिक्षा देते समय बालकों की अवस्था का भी ध्यान रखा जाता है और जो बालक जिस योग्य होता है, उसे उसी प्रकार की शिक्षा दी जाती है।

10. व्यक्तित्व के विकास का सिद्धान्त- मॉण्टेसरी पद्धति में बालक के व्यक्तित्व के विकास पर विशेष बल दिया जाता है और उसके व्यक्तित्व का समुचित आदर किया जाता है। मॉण्टेसरी का विचार था कि प्रत्येक बालक की अपनी व्यक्तिगत विशेषता होती है, क्योंकि सभी बालक एक समान नहीं होते, उनमें कुछ-न-कुछ वैयक्तिक भिन्नता होती है। प्रत्येक बालक अपनी व्यक्तिगत योग्यता, क्षमता, सामर्थ्य, शक्ति

और रुचि के अनुसार विकास करता है। अत: शिक्षक को प्रत्येक बालक का ध्यान रखना चाहिए और उसकी आवश्यकता पूर्ति में उसे सहायता देनी चाहिए। मॉण्टेसरी का मत है कि समूह में रहते हुए बालक को व्यक्तिगत शिक्षा दी जा सकती है।

प्रश्न 2.
मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति के मुख्य गुणों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

मॉण्टेसरी पद्धति के गुण
(Merits of Montessori Method)

मॉण्टेसरी पद्धति की सफलता उसके अनेक गुणों पर आधारित है। इन गुणों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित

1. शिशु-शिक्षा के लिए उपयुक्त- मॉण्टेसरी पद्धति का पहला प्रमुख गुण यह है कि यह पद्धति अल्प आयु के शिशुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी और उपयुक्त है। शिशुओं को छोटे-छोटे विभिन्न शिक्षा उपकरणों के साथ खेलने में बहुत आनन्द मिलता है और वस्तुओं के प्रयोग से | मॉण्टेसरी पद्धति के गुण उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ भी प्रशिक्षित हो जाती हैं। वे इनसे थोड़ी देर के लिए भी अलग नहीं होना चाहते। इस आयु के बालकों को क्रिया एवं खेल। के द्वारा ज्ञान देना उपयुक्त भी है।

2. स्वशिक्षा का महत्त्व- इस पद्धति में स्वयं शिक्षा के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। इसमें बालक अपना सब काम स्वयं करते हैं और काम करने में रुचि भी लेते हैं। बालक वातावरण का उचित लाभ उठाकर अपने स्वयं के अनुभवों एवं निरीक्षणों के द्वारा सीखते हैं। इस प्रकार स्वशिक्षा आत्मनिर्भरता तथा आत्मविश्वास के स्वाभाविक विकास में सहायक होती है।

3. वैज्ञानिक पद्धति- यह शिक्षण-पद्धति वैज्ञानिक है, क्योंकि बालक की वैयक्तिकता को यह अनुभव और परीक्षण पर बल देती है। इसमें बालक पूर्णरूप से महत्त्व क्रियाशील रहता है। अपने अनुभवों के आधार पर वह प्रयत्न और भूल – वैयक्तिक विभिन्नता का महत्त्व के सिद्धान्त पर मूल ज्ञान प्राप्त करता है। एडम्स (Adams) के शब्दों में, “मॉण्टेसरी ने अपनी पद्धति में दूसरे विद्यालयों की विधियों से मित्र के रूप में भिन्न एक नई वैज्ञानिक विधि प्रदान की है। उनकी पद्धति का आधार के अनुशासन की समस्या का बालक द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक निरीक्षण एवं परीक्षण है।’

4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान पर आधारित- यह पद्धति मनोवैज्ञानिक है, क्योंकि इसमें मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों, बालकों की योग्यता, अनुभव, शक्ति आदि के आधार पर व्यावहारिक ढंग से शिक्षा दी जाती है। इसमें प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के स्वरूपों, निष्कर्षों और सिद्धान्तों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। प्रयोगात्मक मनोविज्ञान की तरह इसमें भी बालक को विभिन्न यन्त्र और उपकरण प्रदान किए गए हैं। इन उपकरणों से खेलते हुए ही बालक अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर प्राप्त करते हैं।

5. ज्ञानेन्द्रियों का प्रशिक्षण- मॉण्टेसरी ने बालकों की शिक्षा में ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण पर बल देकर शिक्षा जगत् में एक नई चेतना प्रस्तुत की है। इससे पूर्व की शिक्षा-प्रणालियों में ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा का पूर्णतया अभाव था। इस कमी को पूरा करने का श्रेय मॉण्टेसरी को ही है। मॉण्टेसरी ने ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण द्वारा मन्द तथा हीनबुद्धि बालकों को भी साधारण स्तर पर ला दिया है। लगभग सभी शिक्षाशास्त्री ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा से सहमत हैं। उनका कहना है कि जब तक ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा उचित रूप से न होगी, बालक ज्ञान ग्रहण करने में असमर्थ होंगे।

6. व्यावहारिकता तथा सामाजिकता के गुणों का विकास- मॉण्टेसरी पद्धति में प्रायोगिक कार्यों का सामाजिक महत्त्व है। व्यावहारिक क्रियाओं द्वारा बालकों में व्यावहारिकता तथा सामाजिकता के गुणों का विकास किया जाता है। इस पद्धति वाले विद्यालयों में बालक को सामाजिक जीवन व्यतीत करने के अवसर मिलते हैं, इसलिए इनमें बालक को ऐसा वातावरण मिलता है कि उसके अन्दर सामाजिकता तथा व्यावहारिकता के गुणों का विकास किया जा सके।

7. भाषा-शिक्षण की उत्तम विधिं- मॉण्टेसरी पद्धति में भाषा-शिक्षण की बड़ी उत्तम विधि को अपनाया गया है। लिखना, पढ़ना तथा अंकगणित बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाता है। लिखने व पढ़ने के लिए जो अभ्यास मॉण्टेसरी ने बताए हैं, वे क्रमानुसार एवं एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। इस पद्धति में लेखन क्रिया के द्वारा बालक की मांसपेशियों पर उचित ध्यान दिया जाता है। लिखने और पढ़ने का अभ्यास साथ-साथ किया जाता है, इसलिए बालके बिना सिखाए पढ़ना सीख जाते हैं।

8. बालक की वैयक्तिकता का महत्त्व- मॉण्टेसरी पद्धति में बालक की रुचियों, प्रवृत्तियों, इच्छाओं व स्वभाव का सदैव ध्यान रखा जाता है। इससे बालक के व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास होता है। बालक विभिन्न शिक्षा उपकरणों से काम करते हुए अपने आपको स्वतन्त्र अनुभव करता है और अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति का विकास करता है। मॉण्टेसरी पद्धति के इस गुण की प्रशंसा करते हुए रस्क (Rusk) ने लिखा है, इस पद्धति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता निर्देशन में वैयक्तिकता का स्थान है।”

9. वैयक्तिक विभिन्नता का महत्त्व- इस पद्धति में बालक के व्यक्तित्व को स्वतन्त्र एवं पूर्ण विकास होता है, क्योंकि इसमें व्यक्तिगत विभिन्नता का विशेष ध्यान रखा जाता है और हस्तक्षेप के बिना स्वतन्त्र एवं आदर्श वातावरण में बालकों को रखा जाता है। इस पद्धति में बालकों को उनकी बुद्धिलब्धि, रुचियों, इच्छाओं एवं प्रवृत्तियों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाता है। इसमें प्रत्येक बालक अपनी क्षमता के अनुसार ज्ञान प्राप्त करता है, जोकि सामूहिक शिक्षा में सम्भव नहीं है।

10. शिक्षक का स्थान पथ- प्रदर्शक व मित्र के रूप में इस पद्धति में शिक्षक बालक का सच्चा निर्देशक, मित्र, निरीक्षक, सहायक और पथ-प्रदर्शक होता है न कि आदेशक या अधिकारी। वह बालकों को कार्य करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है तथा कठिनाई आने पर उनकी सहायता भी करता है। मॉण्टेसरी शिक्षक बाल-मनोविज्ञान, प्रयोगात्मक मनोविज्ञान तथा मानवीय गुणों से युक्त होता है।

11. अनुशासन की समस्या का निराकरण- मॉण्टेसरी ने बाह्य अनुशासन का विरोध किया है और वास्तविक आन्तरिक अनुशासन स्थापित करने के नियमों को बताया है। इस पद्धति में कार्य में व्यस्त रहने के कारण बालकों को अनुशासन भंग करने का अवसर नहीं मिलता, जिसके फलस्वरूप उन्हें आत्म-अनुशासन की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न 3.
मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति के मुख्य दोषों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

मॉण्टेसरी पद्धति के दोष
(Defects of Montessori Method)

यद्यपि मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति बालकों की शिक्षा के लिए बड़ी उपयोगी है, तथापि इसमें कुछ दोष और कमियाँ भी हैं, जिनका विवेचन निम्नवत् किया जा सकता है|

1. अमनोवैज्ञानिक- किलपैट्रिक तथा स्टर्न ने मॉण्टेसरी पद्धति को अमनोवैज्ञानिक बताया है, क्योंकि इसमें बालकों से कुछ ऐसे कार्य कराए जाते हैं, जो उनके स्तर से ऊँचे हैं। कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि चार वर्षीय बालक को अधिक लिखना-पढ़ना सिखाना लाभदायक नहीं है।

2. शक्ति मनोविज्ञान का अनुचित आधार- मॉण्टेसरी पद्धति में एक समय में केवल एक ही ज्ञानेन्द्रिय को शिक्षित करने की व्यवस्था की गई है। यह सिद्धान्त शक्ति मनोविज्ञान पर आधारित है और वर्तमान युग में शक्ति मनोविज्ञान को कोई मान्यता नहीं दी जाती है। वास्तव में सभी ज्ञानेन्द्रियाँ एक साथ कार्य करती हैं, इसलिए उनकी शिक्षा भी एक साथ होनी चाहिए।

3. ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा अपर्याप्त- मॉण्टेसरी की यह व्याख्या सही नहीं है कि सात वर्ष के बालकों में। उच्चकोटि की मानसिक क्रियाओं-स्मृति, विचार, कल्पना, तर्क-का अभाव रहता है और उसे केवल इन्द्रिय अनुभव प्राप्त होते हैं। मनोवैज्ञानिक परीक्षण से यह सिद्ध हो चुका है कि तीन वर्ष के बालक में भी मानसिक क्रियाएँ होती हैं। उसमें स्मृति, कल्पना, जिज्ञासा आदि होती हैं। वह प्रत्येक वस्तु के बारे में जानना चाहता है और साथ-साथ अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग भी करता है।

4. गेस्टाल्ट.मनोविज्ञान के विरुद्ध- भाषा की शिक्षा के सम्बन्ध में आधुनिक विचारधारा यह है कि बालकों को पहले वाक्ये, फिर शब्द और बाद में अक्षर ज्ञान कराना चाहिए, लेकिन मॉण्टेसरी ने इसके विपरीत विचारधारा का प्रयोग किया है। उनका कहना है कि बालक को पहले अक्षर और तत्पश्चात् वाक्य का ज्ञान कराना चाहिए, इसलिए इस पद्धति को गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के विरुद्ध माना जाता है।

5. कल्पनात्मक एवं क्रियात्मक खेलों का अभाव- इस पद्धति का सबसे मुख्य दोष है कि यह बालक की कल्पनाशक्ति को अविकसित रखती है। इस पद्धति में कल्पनात्मक तथा क्रियात्मक खेलों का सर्वथा अभाव है। मॉण्टेसरी का विचार है कि बालक स्वयं कल्पनाओं से पूर्ण है, इसलिए उसे और काल्पनिक बनाना वास्तविक जीवन से दूर ले जाना है। इसलिए वे बालक को कला, कहानी, नाटक तथा कलात्मक भावनाओं से दूर रखना चाहती हैं, क्योंकि उनके विचार से व्यावहारिक जीवन की शिक्षा के लिए इनका कोई महत्त्व नहीं है। परन्तु मॉण्टेसरी यह भूल गई हैं कि कल्पना के सहारे । | मॉण्टेसरी पद्धति के दोष ही बालक अपनी मूल-प्रवृत्तियों को सन्तुष्ट करता है तथा अपने मानसिक तनाव को दूर करता है। इसके अभाव में विभिन्न प्रकार की भावना ग्रन्थियाँ बन जाती हैं और बालक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व कुण्ठित हो जाता है। इसलिए कल्पना को स्थान न मिलने के कारण मॉण्टेसरी पद्धति दोषपूर्ण प्रतीत होती है।

6. समय और धन की अधिक आवश्यकता- इस पद्धति में। बालकों का बहुत-सा समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है। सामान्य रूप से जो ज्ञान बालक एक महीने में ग्रहण कर सकता है, इस पद्धति द्वारा उसे। वह ज्ञान एक वर्ष में प्राप्त होता है। ज्ञानेन्द्रियों का अभ्यास मन्दबुद्धि के बालकों के लिए तो ठीक है, किन्तु वह साधारण बालक के लिए प्रशिक्षित अध्यापकों का अभाव निरर्थक है। साधारण बालक से इस प्रकार के अभ्यास कराना समय , शिक्षा उपकरणों पर अधिक बल की बरबादी करना है, क्योंकि घर और बाहर की अनेक वस्तुओं को । चाकचर आर बाहर का अनक वस्तुआ का प्रचार का अभाव देखकर और उनका प्रयोग करके उसकी इन्द्रियों पहले ही शिक्षित हो । प्रतिभाशाली बालकों के लिए जाती हैं।

7. प्रशिक्षित अध्यापकों का अभाव- जनता के अज्ञान के , सीमित स्वतन्त्रता कारण इस पद्धति के लिए प्रशिक्षित अध्यापक नहीं मिल पाते हैं। वातावरण के प्रभाव की उपेक्षा मॉण्टेसरी शिक्षा देने के लिए एक विशेष प्रकार का प्रशिक्षण लेना व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन होता है। हमारे देश में इस प्रकार का कोई प्रशिक्षण विद्यालय नहीं है।

8. शिक्षा उपकरणों पर अधिक बल- इस पद्धति में शिक्षा के उपकरणों को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया जाता है। अमेरिकन शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा उपकरणों की कटु आलोचना की है। उनका कहना है कि अधिक शिक्षा उपकरणों से बालक का बौद्धिक विकास एकांगी रह जाता है। इससे बालक की आत्माभिव्यक्ति का क्षेत्र सीमित रह जाता है। इसके साथ-ही-साथ बालकों को उन क्रियाओं को करने के लिए बाध्य किया जाता है, जिनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

9. प्रचार का अभाव हमारे देश में इस पद्धति के समुचित प्रचार का अभाव है। सामान्य जनता मॉण्टेसरी विद्यालयों के विषय में कुछ नहीं जानती है। प्रचार और प्रोत्साहन के अभाव में मॉण्टेसरी शिक्षा पद्धति हमारे देश में अधिक प्रचलित नहीं हो पाई है।

10. प्रतिभाशाली बालकों के लिए अनुपयुक्त- वास्तव में मॉण्टेसरी पद्धति का आविष्कार मन्दबुद्धि और अपाहिज बालकों के लिए किया गया था। इसके शिक्षण उपकरण भी उन्हीं के लिए उपयुक्त हैं, इसलिए इस पद्धति से मन्दबुद्धि वाले बालक तो लाभ उठा सकते हैं, लेकिन प्रतिभाशाली बालकों को इससे कोई विशेष लाभ नहीं होता।

11. सीमित स्वतन्त्रता- इस पद्धति में बालक की स्वतन्त्रता सीमित होती है, क्योंकि उसे कुछ शिक्षा उपकरण देकर उनसे खेलने के लिए बाध्य किया जाता है। उसे किसी अन्य बालक से बातचीत करने का अधिकार भी नहीं होता।

12. वातावरण के प्रभाव की उपेक्षा- वातावरण के प्रभाव को जितना महत्त्व मिलना चाहिए, उतना महत्त्व इस पद्धति में नहीं मिला है। मॉण्टेसरी का यह मत नितान्त अवैज्ञानिक है कि सब कुछ बालक के ही अन्त:करण में विद्यमान है और उन आन्तरिक शक्तियों को ही विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए। वातावरण के प्रभाव से बालकों में बहुत-सी बुरी आदतें भी फ्ड़ जाती हैं। इसलिए मॉण्टेसरी स्कूलों में अध्यापिका हस्तक्षेप नहीं करेगी तो बालक का चरित्र कैसे बनेगा?

13. व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन- मॉण्टेसरी पद्धति पूर्ण रूप से व्यक्तिवादी है और इसमें बालकों को सामूहिक तथा सामाजिक कार्य करने के लिए कोई अवसर नहीं दिया गया है। इससे बालकों में अभिमान और स्वार्थ की भावना आ जाती हैं, क्योंकि बालक अलग-अलग रहकर शिक्षा उपकरणों से खेलते रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनमें सामाजिकता तथा सहकारिता की भावना का विकास नहीं हो पाता है।

14. राष्ट्रीयता की भावना का अभाव- हमारे देश में राष्ट्रीयता की भावना की कमी के कारण भी मॉण्टेसरी पद्धति को अधिक प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। जिन पर शासन का उत्तरदायित्व है वे अपने स्वार्थ के कारण यह चाहते हैं कि गरीबी-अमीरी का भेदभाव बना रहे। उन्हीं के बच्चे शासक बने, इसलिए वे ही लोग जनता की शिक्षा के प्रति उदार नहीं हैं। | 15. अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का अभाव–अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का अभाव भी मॉण्टेसरी पद्धति के मार्ग में बाधक है। कुछ लोगों का कहना है कि यह एक विदेशी शिक्षा-प्रणाली है और इसकी जड़े हमारे देश की मिट्टी में न होकर अन्यत्र हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मैडम मारिया मॉण्टेसरी का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:

मैडम मारिया मॉण्टेसरी का सामान्य परिचय
(General Introduction of Madam Maria Montessori)

डॉ० मॉण्टेसरी की गणना विश्व के महाम् शिक्षाशास्त्रियों में की जाती है। उन्होंने अपना जीवन एक डॉक्टर के रूप में आरम्भ किया और बाल शिक्षा के क्षेत्र में अपनी मौलिक देन देकर अपना नाम अमर कर लिया। डॉ० मॉण्टेसरी इटली की मूल निवासी थीं। 24 वर्ष की आयु में उन्होंने रोम विश्वविद्यालय से डॉक्टरी पास करके अपाहिज और मन्दबुद्धि के बालकों की चिकित्सा करनी आरम्भ की। उन्होंने अपाहिज और मन्दबुद्धि के बालकों की दयनीय दशा देखकर निर्णय किया कि ऐसे बालकों की शिक्षा की कोई नई व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने अपने अनुभवों से यह निष्कर्ष निकाला कि मन्दबुद्धि वाला बालक भी बुद्धिमान बन सकता है, यदि उसकी शिक्षा-पद्धति पूर्ण मनोवैज्ञानिक हो। इसीलिए उन्होंने प्रयोगात्मक मनोविज्ञान तथा सामाजिक मानवशास्त्र का गहन अध्ययन करके बालकों के लिए एक नवीन शिक्षा-पद्धति को जन्म दिया, जिसे ‘मॉण्टेसरी पद्धति’ के रूप में विश्वभर में ख्याति प्राप्त हुई।

सन् 1907 में मॉण्टेसरी ने अपना स्कूल ‘Children Home’ स्थापित किया। सन् 1939 में वे ‘इण्डियन ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट’ (Indian Training Institute) की डायरेक्टर बनकर भारत आयीं। उन्होंने भारत में अनेक स्थानों पर अपनी पद्धति के सम्बन्ध में भाषण दिए। थियोसोफिकल सोसायटी के माध्यम से उनकी पद्धति के सम्बन्ध में अनेक लेख, व्याख्यान आदि प्रकाशित हुए। इसके परिणामस्वरूप भारत में मॉण्टेसरी पद्धति का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ। भारत में असंख्य मॉण्टेसरी स्कूलों की स्थापना हो गई और ये स्कूल आज भी पूरी सफलता के साथ कार्यरत हैं।

प्रश्न 2.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के विद्यालयों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

मॉण्टेसरी विद्यालय
(Montessori Schools)

मॉण्टेसरी पद्धति में बच्चों को विद्यालय में घर के समान ही वातावरण मिलता है, इसीलिए मॉण्टेसरी ने विद्यालय को ‘बच्चों का घर’ (Children’s Home) कहा है। मॉण्टेसरी स्कूलों का वातावरण बालकों के अनुकूल तथा स्वतन्त्र होता है और उसमें उन्हें खेलने-कूदने तथा अपने व्यक्तित्व को विकसित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है।

बालघर में एक बड़ा कमरा तथा कई छोटे-छोटे कमरे होते हैं। बड़े कमरे में बालक उपकरणों की सहायता से सीखता है तथा छोटे-छोटे कमरे भोजन, व्यायाम, विश्राम, गोष्ठी आदि कार्यो के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। बालकों को घूमने तथा खेलने के लिए छोटे-छोटे पार्क तथा उद्यान होते हैं, जिनमें बालक स्वच्छन्दतापूर्वक खेलता है तथा उसके भूलने-भटकने का भी डर नहीं रहता है। बालक पूर्ण स्वतन्त्र होता है। कि वह चाहे बाग में जाकर सीखे या कमरे में बैठकर सीखें। विद्यालय में नीचे कमरे, नीची खिड़कियाँ, नीची अलमारियाँ एवं छोटी-छोटी मेज-कुर्सियों का प्रबन्ध होता है। खिड़कियों के खोलने, बन्द करने एवं अलमारियों के उपयोग में बालक स्वतन्त्र होता है। आवश्यकतानुसार बालक स्वयं ही अपनी कुर्सी को यत्र-तत्र ले जाता है। छोटे-छोटे प्याले, चम्मच एवं अन्य बर्तन होते हैं, जिन्हें वह अपना समझता है और वास्तविक आनन्द एवं तृप्ति पाता है।

प्रश्न 3.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत कर्मेन्द्रियों की शिक्षा-व्यवस्था का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

कर्मेन्द्रियों की शिक्षा
(Education of Action-Sense)

मॉण्टेसरी ने अपनी शिक्षण-पद्धति में बालक की कर्मेन्द्रियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया है। मॉण्टेसरी स्कूलों का वातावरण ऐसा होता है और बालकों के सम्मुख ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी जाती हैं कि बालक चलने-फिरने के साधारण कार्य से लेकर अपने से सम्बन्धित सभी कार्यों को स्वयं कर लेता है। हाथ-मुँह धोना, कपड़े पहनना और उतारना, मेज तथा कुर्सी को ठीक स्थान पर रखना, कमरा सजाना, चीजों को सँभालकर रखना, भोजन बनाना और परोसना, बर्तन धोना आदि काम बालक स्वयं कर लेते हैं। ऐसे कार्यों को अपने आप करने से बालक प्रसन्नता का अनुभव प्राप्त करता है तथा अन्य कार्यों के लिए उत्साहित होता है। इस प्रकार के शिक्षण का उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का निर्माण करना एवं उनका जीवन सफल बनाना है। इसके द्वारा बालक दैनिक जीवन के सभी आवश्यक कार्यों की शिक्षा प्राप्त कर लेता है। वह शिष्ट तथा सभ्य हो जाता है।

प्रश्न 4.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा-व्यवस्था का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा
(Education of Senses)

ज्ञानेन्द्रियाँ ही हमारे बाह्य संसार के ज्ञान के द्वार हैं तथा ये ही आन्तरिक एवं बाह्य संसार से सम्बन्ध स्थापित करती हैं। इसलिए मॉण्टेसरी ने ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया है। उनके अनुसार बालकों को सूक्ष्म विचारों का ज्ञान देना व्यर्थ है, क्योंकि बालकों में इतनी क्षमता नहीं होती कि वे सूक्ष्म विचारों को समझ सकें। उनका कहना है कि जितने अधिक ज्ञानेन्द्रिय अनुभव बालकों को कराए जाएँ, उतनी ही बालक अधिक शिक्षा ग्रहण कर सकेगा। विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों को प्रशिक्षित करने के लिए मॉण्टेसरी ने विभिन्न शिक्षा उपकरणों का निर्माण किया है। इनकी विशेषता यह है कि एक उपकरण से केवल एक ही काम हो सकता है। इन उपकरणों से खेलते-खेलते बिना शिक्षक की सहायता के बालक स्वयं समझ जाते हैं कि उन्हें क्या करना है। ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा पर बल देते हुए मॉण्टेसरी ने लिखा है, “ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा सम्बन्धी क्रियाओं का यह ध्येय नहीं है कि बालकों को विभिन्न वस्तुओं के रूप, वर्ण और गुण का ज्ञान हो जाए, वरन् उनसे हम उनकी ज्ञानेन्द्रियों को परिष्कृत करना चाहते हैं। इससे उनकी बुद्धि का विकास होता है। उनसे बुद्धि के विकास में वैसी ही सहायता मिलती है, जैसी व्यायाम से शारीरिक विकास में। अतएव ज्ञानेन्द्रियों की साधना एक प्रकार । का बौद्धिक व्यायाम है।”

प्रश्न 5.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत भाषा की शिक्षा-व्यवस्था का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

भाषा की शिक्षा-व्यवस्था
(Education Systems of Language)

बालक की ज्ञानेन्द्रियों को विकसित और प्रशिक्षित करने के बाद उन्हें लिखने, पढ़ने तथा अंकगणित की शिक्षा दी जाती है। भाषा, जीवन के लिए आवश्यक और उपयोगी है। भाषा को वातावरण के माध्यम से अधिक जल्दी सिखाया जा सकता है। मॉण्टेसरी का कथन है कि बालक को पहले लिखना सिखाना चाहिए।

और लिखना सीखते-सीखते वे स्वयं पढ़ना सीख जाएँगे। मॉण्टेसरी का सिद्धान्त है कि पढ़ने से लिखना . सरल है, इसलिए बालक की भाषा की शिक्षा लिखने से प्रारम्भ होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त उच्चारण में लय तथा गति पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। लिखना सिखाने के लिए उँगली फेरते-फेरते बालक की उँगलियाँ सध जाती हैं। वह अक्षर के स्वरूप का ज्ञान सरलता से कर लेता है। इससे बालक में सफलता की भावना बड़ी जल्दी आती है और वह उत्साहित होकर अधिक सीखने का प्रयत्न करता है। इससे उसमें आत्म-गौरव की भावना आती है।

प्रश्न 6.
मॉण्टेसरी प्रणाली और किण्डरगार्टन प्रणाली के संस्थापक कौन थे तथा इन दोनों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
मॉण्टेसरी प्रणाली की संस्थापिका मैडम मारिया मॉण्टेसरी थी तथा किण्डरगार्टन प्रणाली के संस्थापक फ्रॉबेल थे। इन दोनों शिक्षा-प्रणालियों में पर्याप्त समानता होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर हैं

  1. मॉण्टेसरी प्रणाली का आधार वैज्ञानिक है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली का आधार मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक है।
  2. मॉण्टेसरी प्रणाली में व्यक्तिगत शिक्षा पर बल दिया गया है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में सामाजिक शिक्षा पर बल दिया गया है।
  3. मॉण्टेसरी प्रणाली में कक्षा-अध्यापन नहीं होता, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में कक्षा-अध्यापन होता है।
  4. मॉण्टेसरी प्रणाली में शिक्षा की प्रक्रिया बालक की इच्छानुसार संचालित होती है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में शिक्षा की प्रक्रिया कार्यक्रमानुसार संचालित होती है।
  5. मॉण्टेसरी प्रणाली में स्वत: अनुशासन एवं आत्म-निर्भरता के गुणों का विकास होता है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में नेतृत्व एवं सामाजिक गुणों का विकास होता है।
  6. मॉण्टेसरी प्रणाली में व्यावहारिक क्रियाओं पर बल दिया जाता है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में शारीरिक क्रियाओं पर बल दिया जाता है।
  7. मॉण्टेसरी प्रणाली में शिक्षण का कार्य शिक्षा-उपकरणों के माध्यम से किया जाता है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में शिक्षण कार्य खेल के माध्यम से दिया जाता है।
  8. मॉण्टेसरी प्रणाली में कृत्रिम साधनों तथा शैक्षिक उपकरणों के प्रयोग पर बल दिया जाता है, जब कि किण्डरगार्टन प्रणाली में प्राकृतिक शिक्षा, संगीत, गीत एवं भावे पर बल दिया जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मॉण्टेसरी पद्धति की सफलता शिक्षक की योग्यता पर निर्भर करती है। अत: मॉण्टेसरी स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक का होना अनिवार्य है। शिक्षक को बालकों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और उनकी आवश्यकतानुसार उनकी यथोचित सहायता करनी चाहिए। शिक्षक को तानाशाह न होकर एक योग्य निर्देशक एवं पथ-प्रदर्शक होना चाहिए। बालकों की आवश्यकताओं को समझकर उन्हें स्वतन्त्र वातावरण देना चाहिए, जिससे वह अपनी इच्छानुसार प्राकृतिक शक्तियों का विकास कर सके। शिक्षक को बाल-मनोविज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक है। रॉबर्ट रस्क (Robert Rusk) के अनुसार, “मॉण्टेसरी पद्धति के शिक्षक के लिए उन शिक्षकों की ही नियुक्ति करनी चाहिए जिन्होंने बाल-मनोविज्ञान तथा उनके प्रयोग का प्रशिक्षण लिया हो।’

प्रश्न 2.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली का तटस्थ मूल्यांकन प्रस्तुत कीजिए।
या
मॉण्टेसरी प्रणाली की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
यह सत्य है कि अन्य विभिन्न शिक्षा- प्रणालियों के ही समान मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के भी अपने गुण-दोष हैं, परन्तु इस शिक्षा प्रणाली की अपनी कुछ मौलिक विशेषताएँ हैं जिनके कारण इस शिक्षा-प्रणाली को सारे विश्व में पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हुई है। मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली को शिक्षा-जगत की एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा-प्रणाली माना जाता है। इस शिक्षा-प्रणाली का तटस्थ मूल्यांकन मेयर्स ने इन शब्दों में प्रस्तुत किया है, “मॉण्टेसरी की सफलता ने इस धारणा को नवजीवन प्रदान किया है कि परम्परागत 
सामूहिक रटाई पद्धति केवल बालकों को कूपमण्डूक ही नहीं बनाती थी, बल्कि एक वर्ग के सदस्यों के विकास को बाधा पहुँचाती थी। मॉण्टेसरी के वैयक्तिक शिक्षा पर जोर देने के कारण शिक्षाशास्त्री फिर से । अधिक उत्तम पद्धति की खोज में लग गए, जिसमें वे छात्रों की वैयक्तिक आवश्यकताओं एवं योग्यताओं पर ध्यान दे सकें।’

प्रश्न 3.
मॉण्टेसरी प्रणाली की सीमाएँ क्या हैं ?
उत्तर:
मॉण्टेसरी प्रणाली की मुख्य सीमाएँ या दोष इस प्रकार हैं।

  1. मॉण्टेसरी प्रणाली बाल-मनोविज्ञान के अनुकूल नहीं है।
  2. यह शिक्षा प्रणाली अधिक समय तथा व्यय साध्य है।
  3. यह प्रणाली प्रतिभाशाली बालकों के लिए अनुपयुक्त है।
  4. इस प्रणाली में सामूहिक भावना का समुचित विकास नहीं हो पाता।
  5. मॉण्टेसरी प्रणाली में बोल उपयोगी कल्पनात्मक खेलों का प्रायः अभाव ही है।
  6. इस प्रणाली के लिए प्रशिक्षित अध्यापकों की कमी है।

प्रश्न 4.
मॉण्टेसरी प्रणाली की शिक्षण पद्धति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मॉण्टेसरी प्रणाली में शिक्षण पद्धति तीन भागों में विभक्त है। ये भाग हैं क्रमशः कर्मेन्द्रियों की शिक्षा, ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा तथा भाषा एवं गणित की शिक्षा। कर्मेन्द्रियों की शिक्षा का उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का निर्माण करना एवं उनका जीवन सफल बनाना है। ज्ञानेन्द्रियों को प्रशिक्षित करने के लिए मॉण्टेसरी प्रणाली में विभिन्न शिक्षा उपकरणों का निर्माण किया गया है। इनकी विशेषता यह है कि एक उपकरण से केवल एक ही काम हो सकता है। इन उपकरणों से खेलते-खेलते बिना शिक्षक की सहायता के बालक स्वयं समझ जाते हैं कि उन्हें क्या करना है। मॉण्टेसरी प्रणाली में बालक की ज्ञानेन्द्रियों को विकसित और प्रशिक्षित करने के बाद उन्हें लिखने, पढ़ने तथा अंकगणित की शिक्षा दी जाती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
छोटे बच्चों को शिक्षा प्रदात करने वाली मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली को किसने लागू किया था?
उत्तर:
छोटे बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली को लागू करने का श्रेय मैडम मारिया मॉण्टेसरी को था।

प्रश्न 2.
मॉण्टेसरी का जन्म किस देश में हुआ था?
उत्तर:
मैडम मारिया मॉण्टेसरी का जन्म इटली में हुआ था।

प्रश्न 3.
मैडम मॉण्टेसरी ने अपना प्रथम विद्यालय कब तथा किस नाम से स्थापित किया था?
उत्तर:
मैडम मॉण्टेसरी ने अपना प्रथम विद्यालय सन् 1907 ई० में Children Home के नाम से स्थापित किया था।

प्रश्न 4.
मैडम मॉण्टेसरी भारत कब आई थीं तथा वह किस संस्था की डायरेक्टर थीं?
उत्तर:
डम मॉण्टेसरी सन् 1939 में ‘इण्डियन ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट’ की डायरेक्टर बनकर भारत आई थीं।

प्रश्न 5.
मैडम मॉण्टेसरी द्वारा लिखित मुख्य पुस्तकों के शीर्षक क्या हैं?
उत्तर:

  • द मॉण्टेसरी मैथड,
  • रीकन्सट्रक्शन इन एजूकेशन,
  • डिस्कवरी ऑफ दि चाइल्ड,
  • चाइल्ड ट्रेनिंग तथा
  • सीक्रेट ऑफ दि चाइल्डहुड।

प्रश्न 6.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के अनुसार शिक्षा का मुख्यतम उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली के अनुसार शिक्षा का मुख्यतम उद्देश्य बालक के सुचारु विकास में योगदान प्रदान करना है।

प्रश्न 7.
माण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक का क्या स्थान है?
उत्तर:
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक को निर्देशक, मित्र तथा निरीक्षक का स्थान दिया गया है।

प्रश्न 8 मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली में बच्चों को किस प्रकार के खेल खिलाए जाते हैं?
उत्तर:
मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली में बच्चों को मुख्य रूप से कल्पनात्मक खेल खिलाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
मॉण्टेसरी शिक्षा में ज्ञानेन्द्रिय प्रशिक्षण क्या है?
उत्तर:
मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली में ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान का द्वार माना गया है। इस प्रणाली का मानना है। कि यदि ज्ञानेन्द्रियाँ निर्बल रहती हैं तो व्यक्ति का ज्ञान अस्पष्ट तथा अपूर्ण रहता है। अत: इस प्रणाली में विभिन्न शैक्षिक उपकरणों द्वारा बालक की ज्ञानेन्द्रियों को प्रशिक्षित किया जाता है।

प्रश्न 10.
शिक्षा की कौन-सी विधि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है?
उत्तर:
मॉण्टेसरी प्रणाली।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली को मिस हेलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ किया था।
  2. मैडम मॉण्टेसरी जर्मनी की मूल निवासी थीं।
  3. मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली में सैद्धान्तिक एवं पुस्तकीय शिक्षा को प्राथमिकता प्रदान की जाती
  4. मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षिका की भूमिका कठोर नियन्त्रक की है।
  5. मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली में विभिन्न शिक्षण उपकरणों को अपनाया जाता है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न  1.
मॉण्टेसरी प्रणाली की प्रणेता हैं
(क) एनी बेसेण्टं
(ख) मारिया मॉण्टेसरी
(ग) हरबर्ट
(घ) पेस्टालॉजी

प्रश्न  2.
मारिया मॉण्टेसरी किस देश की निवासी थीं?
(क) इटली
(ख) फ्रांस
(ग) जर्मनी
(घ) स्वीडन

प्रश्न  3.
मॉण्टेसरी की शिक्षा सम्बन्धी प्रसिद्ध पुस्तक है
(क) एजूकेशन ऑफ चाइल्ड
(ख) एजूकेशन ऑफ मैन
(ग) एजूकेशन ऑफ वर्ल्ड
(घ) दि मॉण्टेसरी मैथड

प्रश्न  4.
मॉण्टेसरी में किसको विशेष महत्त्व दिया जाता है?
(क) बालक को
(ख) शिक्षक को
(ग) परिवार को
(घ) विद्यालय को

प्रश्न  5.
मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली का सिद्धान्त है
(क) आत्माभिव्यक्ति का सिद्धान्त
(ख) पूर्ण स्वतन्त्रता का सिद्धान्त
(ग) विकास के लिए शिक्षा का सिद्धान्त
(घ) उपर्युक्त सभी सिद्धान्त
उत्तर:

1. (ख) मारिया मॉण्टेसरी,
2. (क) इटली,
3. (घ) दि मॉण्टेसरी मैथड,
4. (घ) विद्यालय को,
5. (घ) उपर्युक्त सभी सिद्धान्त।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 11 Educational Systems: Kindergarten Method

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 11
Chapter Name Educational Systems:
Kindergarten Method
(शिक्षा प्रणालियाँ: किण्डरगार्टन पद्धति)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 11 Educational Systems: Kindergarten Method (शिक्षा प्रणालियाँ: किण्डरगार्टन पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किण्डरगार्टन प्रणाली (पद्धति) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस प्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या
किण्डरगार्टन प्रणाली के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन पद्धति का अर्थ
(Meaning of Kindergarten Method)

किण्डरगार्टन प्रणाली के जन्मदाता प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्रॉबेल थे। उन्होंने छोटे बच्चों को सही ढंग से शिक्षित करने के लिए एक शिक्षण-पद्धति का निर्माण किया, जो किण्डरगार्टन पद्धति के नाम से विख्यात है। किण्डरगार्टन का अर्थ है, ‘बच्चों का बगीचा’। किण्डरगार्टन नामक विद्यालय की स्थापना सन् 1940 में फ्रॉबेल ने की थी। फ्रॉबेल का कहना था, “बालक एक अविकसित पौधा है, जो शिक्षकरूपी माली की देखरेख में अपने आन्तरिक नियमों के अनुसार विकसित होता है।” फ्रॉबेल ने शिक्षक को अधिनायक न मानकर केवल पथप्रदर्शक के रूप में स्वीकार किया है। इस प्रकार के विद्यालयों में समय-सारणी और पाठ्य-पुस्तकों का कोई बन्धन नहीं होता है। बालकों से प्रेम तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार किया जाता है। रस्क (Rusk) ने लिखा है, “किण्डरगार्टन छोटे बच्चों के लिए एक स्कूल है, जिसमें कपड़ों को उचित प्रकार से तह करने, चटाई बुनने, मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने, सांकेतिक खेल तथा क्रियात्मक गाने उचित ढंग तथा क्रम से सिखाए जाते हैं।”

किण्डरगार्टन पद्धति के आधारभूत सिद्धान्त
(Fundamental Principles of Kindergarten Method)

किण्डरगार्टन प्रणाली का क्रियात्मक रूप प्रमुख रूप से फ्रॉबेल की दार्शनिक विचारधारा पर आधारित है। उसकी शिक्षा-पद्धति के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|

1. एकता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ईश्वरवादी था और दैवी एकता के सिद्धान्त में विश्वास रखता था। फ्रॉबेल का विश्वास था कि सभी वस्तुएँ ईश्वर द्वारा निर्मित हैं और सभी में ईश्वर व्याप्त है। वह बालक को शिक्षा के माध्यम से ईश्वर आधारभूत सिद्धान्त द्वारा स्थापित एकता का अनुभव कराना चाहता था। उसका विचार था कि ईश्वर बीज रूप में है और सम्पूर्ण सृष्टि उस बीज के बढ़े हुए वृक्ष के रूप में है। ऊपर से देखने में संसार में विभिन्नताएँ हैं, किन्तु हर जीव में एक आत्मा है। वह आत्मा ईश्वर का अंश है और इस प्रकार संसार की सभी वस्तुओं में एकता है। दूसरे शब्दों में, ईश्वर का साक्षात्कार कराना तथा ईश्वर में स्थित विभिन्न वस्तुओं की एकता को पहचान लेना ही शिक्षा का उद्देश्य है। इसी सिद्धान्त के आधार पर उन्होंने पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों में समन्वय स्थापित करने का सुझाव रखा। इस समन्वय के द्वारा ही बालक सरलतापूर्वक एकता के नियम का अनुभव कर सकते हैं।

2. स्वतः विकास का सिद्धान्त- फ्रॉबेल का कथन था कि इस संसार का प्रत्येक प्राणी विकास की ओर उन्मुख होता है। प्रत्येक वस्तु का विकास उसके आन्तरिक नियमों के अनुसार स्वत: होता है, बाहर से थोपा नहीं जाता। किसी भी प्रकार के बाह्य हस्तक्षेप से बालक का विकास कुण्ठित हो जाता है। उसका विश्वास था कि जिस प्रकार बीज के अन्दर विकास शक्ति निहित होती है और उसे प्रयोग में लाने पर वह अन्दर से बाहर की ओर विकसित होती है, उसी प्रकार से बालक का भी विकास अन्दर से बाहर की ओर होता है। उसके अनुसार, “बालक.ज़ो कुछ भी होगा, वह उसके भीतर है, चाहे उसका कितना ही कम संकेत हमें क्यों न मिले।’

इसी सिद्धान्त के आधार पर फ्रॉबेल ने बालक की उपमा पौधे से, पाठशाला की बगीचे से और शिक्षक की माली से देते हुए कहा है, “पाठशाला एक बाग है, जिसमें बालकरूपी पौधा शिक्षकरूपी माली की देखरेख में बढ़ता है।” फ्रॉबेल का कहना है कि शिक्षक को बालक के आन्तरिक विकास में कम-से-कम हस्तक्षेप करना चाहिए और उसे केवल पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करना चाहिए।

3. स्वक्रिया का सिद्धान्त- फ्रॉबेल की मान्यता थी कि बालकों की आन्तरिक शक्तियों के विकास के लिए क्रियाशीलता अत्यन्त आवश्यक है। इस सिद्धान्त का अर्थ स्वयं सक्रिय होकर कार्य करने से है। फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में इस सिद्धान्त को अत्यधिक महत्त्व दिया है और कहा है कि वास्तविक विकास स्वक्रिया द्वारा ही सम्भव है। क्रियाशील रहने से बालक की मानसिक तथा शारीरिक शक्तियाँ दोनों ही विकसित रहती हैं। स्वयं कार्य करने से बालक परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करता है और स्वयं को वातावरण के अनुकूल बना लेता है, इसलिए बालक की शिक्षा का प्रारम्भ वहीं से होना चाहिए अर्थात् बालक को करके सीखना चाहिए। फ्रॉबेल ने स्वयं लिखा है, “अपनी प्रेरणाओं एवं भावनाओं को पूरा करने के लिए बालक स्वयं अपने मन से सक्रिय होकर काम करे।”

4. खेल का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ने सर्वप्रथम खेल के माध्यम से बालकों को शिक्षा देने का प्रयत्न किया। उसने खेल को बालक की शिक्षा का प्रमुख साधन माना। उनका मत था कि खेल बालक की स्वाभाविक प्रकृति होती है, इसलिए बालकों को खेलों के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए। फ्रॉबेल के शब्दों में, “बचपन के खेल मनुष्य के शुद्ध आध्यात्मिक कार्य हैं और साथ-ही-साथ खेल में मनुष्य का आन्तरिक जीवन प्रकट होता है। इसलिए वह आनन्द, स्वतन्त्रता, सन्तोष, आन्तरिक एवं बाह्य आराम तथा संसार के साथ शान्ति प्रदान करता है। खेल समस्त अच्छाइयों का उद्गम है।”

5. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में स्वतन्त्रता के सिद्धान्त को बहुत अधिक महत्त्व दिया है। जब बालक को पूर्ण स्वतंन्त्रता दी जाएगी तभी बालक स्वक्रिया द्वारा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसीलिए फ्रॉबेल का कहना है कि शिक्षक को बालकों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि उनका निरीक्षण करना चाहिए। इस सिद्धान्त के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए दुग्गन (Duggan) ने लिखा है, शिक्षक को प्रत्येक बालक के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के विकास के लिए अवसर प्रदान करना चाहिए। उसे मार्ग निर्देशन करना चाहिए, अवरोध नहीं उपस्थित करना चाहिए। उसे प्रत्येक बालक के देवत्व के विकास के साथ हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।’

6. सामाजिकता तथा सामूहिकता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना है। उसका विचार था कि बालक मानवीय गुणों को समाज में रहकर ही प्राप्त कर सकता है। इसके लिए फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में सामूहिक खेल, सामूहिक गान और अन्य सामूहिक कार्यों पर बल दिया है। इन सभी कार्यों द्वारा बालकों में सहयोग, सहानुभूति और एकता की भावना का विकास होता है।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति की शिक्षण-सामग्री का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन पद्धति की शिक्षण-सामग्री।
(Device of Teaching in Kindergarten Method)

फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में निम्नलिखित शिक्षण-सामग्री को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है

1. खेल- फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में खेल को विशेष महत्त्व दिया है। इस पद्धति में खेल को शिक्षा का माध्यम स्वीकार किया गया है। विभिन्न प्रकार के खेलों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाती है। सामान्य रूप से चार प्रकार के खेल अपनाए जाते हैं। ये खेल हैं क्रमश: मनोरंजक तथा रचनात्मक खेल सामूहिक भावना की वृद्धि करने वाले खेल, कल्पना-शक्ति का विकास करने वाले खेल तथा चरित्र का विकास करने वाले खेल।।

2. मातृ और शिशु गीत-यह एक लघु पुस्तिका होती है, जिसमें 50 गीतों का संग्रह होता है। इसमें प्रत्येक गीत की अलग-अलग व्याख्यात्मक टिप्पणी होती है। ये गीत बच्चों के खेल, व्यवसाय तथा कार्यों पर आधारित होते हैं। इन खेलों और गीतों का क्रम बालक की आयु और योग्यता के अनुसार रखा गया है। इन खेलों एवं गीतों द्वारा बालक और उसकी माता में एकता स्थापित होती है। इनके द्वारा बालक का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास किया जाता है। इनके द्वारा बालक की विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों व विभिन्न अंगों का विकास किया जाता है।

3. उपहार- फ्रॉबेल ने बालकों के खेलने के लिए उनकी | किण्डरगार्टन पद्धति की। अभिक्रिया को उत्तेजित करने के लिए उनकी ज्ञानेन्द्रियों को शिक्षा के शिक्षण-सामग्री लिए कुछ वस्तुओं की व्यवस्था की, जिन्हें उसने उपहार नाम दिया है। खेल इन उपहारों की संख्या 20 है। इसमें 7 उपहार प्रमुख हैं, जो बेलन, मातृ और शिशु गीत गोला और घन से बने होते हैं। इनका वर्गीकरण और क्रम बालकों की आयु तथा विकास के क्रमानुसार रखा जाता है। इनमें से प्रमुख उपहार व्यापार या कार्य । निम्नलिखित हैं–

  • ऊन की छह गेंदें- ये गेंदें लाल, पीले, हरे, नीले आदि भिन्न-भिन्न रंगों से रंगी होती हैं। इनके प्रयोग द्वारा बालकों को रूप, रंग, स्पर्श, गति, कठोरता, कोमलता एवं दिशा का ज्ञान कराया जाता है। इनसे खेलने में बालक अपनी मांसपेशियों का उपयोग करता है।
  • बेलन, गोले तथा घन- लकड़ी तथा अन्य किसी ठोस वस्तु से बने बेलन, गोले व घन की सहायता से बालक किसी वस्तु की स्थिरता, गतिशीलता, समानता व भिन्नता का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  • आठ छोटे घनों का एक बड़ा घन- यह उपहार एक ऐसे बड़े घन का होता है, जो छोटे-छोटे आठ घनों से मिलकर बनता है। इन छोटे-छोटे टुकड़ों से बालक अपनी रचनात्मक शक्ति का विकास करते हैं और छोटी-छोटी वस्तुएँ बनाते हैं; जैसे–मेज, कुर्सी आदि। इनकी सहायता से बालक को प्रारम्भिक गणित का भी ज्ञान कराया जाता है।
  • आठ आयताकार घनों का ऐक बड़ा घन- इसमें आठ आयताकार घनों का बना हुआ एक बड़ा घन होता है, जिनकी सहायता से बालक विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण करते हैं और उन्हें संख्याओं का भी ज्ञान हो जाता है।
  • सत्ताइस घनों का एक बड़ा घन- यह एक इतना बड़ा घन होता है, जो छोटे-छोटे 27 घनों से मिलकर बनता है। इनकी सहायता से भी बालकं विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण करते हैं और उन्हें संख्याओं का भी ज्ञान हो जाता है।
  • अठारह बड़े और नौ छोटे विषम चतुर्भुजों का एक बड़ा घन- इनकी सहायता से बालक ज्यामिति की भिन्न-भिन्न आकृतियाँ बनाकर ज्यामिति का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  • वर्ग तथा त्रिभुज- इनका प्रयोग भी रेखागणित के विभिन्न चित्रों को बनाने में किया जाता है।

4. व्यापार या कार्य- फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में व्यापार या कार्य को विशेष महत्त्व दिया है। ये कार्य बालक को तब दिए जाते हैं जब उपहारों के प्रयोग द्वारा उनमें विचार-शक्ति विकसित हो जाती है। फ्रॉबेल ने उपहारों तथा कार्यों में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध बताया है। उपहारों के द्वारा बालक में विचार उत्पन्न होते हैं और विचारों के आधार पर बालक कार्य करते हैं। बालक को उपहारों द्वारा बिना वस्तुओं का आकार बदले उन्हें मिलाने तथा क्रमबद्ध करने का अभ्यास कराया जाता है और इससे बालक वस्तुओं के आकार, रूप, रंग इत्यादि का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

5. पाठ्यक्रम- फ्रॉबेल की शिक्षा-पद्धति में बालकों को खेलों तथा कार्यों के अतिरिक्त कुछ विषयों का ज्ञान भी कराया जाता है; जैसे—भाषा, गणित, विज्ञान, कला, धार्मिक निर्देश, बागवानी, इतिहास, भूगोल, संगीत आदि।

प्रश्न 3.
किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
या
किण्डरगार्टन शिक्षा-विधि के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
या
खेल प्रणाली के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उतर:

किण्डरगार्टन पद्धति के गुण
(Merits of Kindergarten Method)

1. शिशु की शिक्षा हेतु उपयोगी- यह पद्धति छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए बड़ी उपयोगी और उपयुक्त है। फ्रॉबेल के अनुसार, “स्कूल की शिक्षा में तभी सफलता प्राप्त हो सकती है, जब शिक्षा में सुधार कर उसकी नींव मजबूत कर दी जाए।”

2. सरल, रुचिपूर्ण और आकर्षक पद्धति- शिक्षा देते समय बालक की आयु, रुचियों, क्षमताओं और योग्यताओं का ध्यान रखा जाता है। वह खेल, गीत, अभिनय, रचना इत्यादि के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करता है। इस प्रकार यह पद्धति सरल है। इसके अन्तर्गत बालक रुचिपूर्ण ढंग से शिक्षा प्राप्त करता है, इस कारण यह पद्धति आकर्षक कही जाती है।

3. इन्द्रियों का प्रशिक्षण- इस पद्धति में बालकों की ज्ञानेन्द्रियों किण्डरगार्टन पद्धति के गुण को प्रशिक्षित होने का अवसर मिलता है, क्योंकि इसके खेल और शिशु की शिक्षा हेतु उपयोगी उपहार इस प्रकार के बने हैं कि बालक की इन्द्रियाँ प्रशिक्षित हो जाती , सरल, रुचिपूर्ण और आकर्षक हैं। इसके साथ-ही-साथ उनकी मानसिक क्रियाओं में तत्परता और पद्धति स्पष्टता आ जाती है। इन्द्रियों का प्रशिक्षण

4. आत्मक्रिया पर बल- इस पद्धति में बालकों को आत्मक्रिया में आत्मक्रिया पर बल के सजीव तथा स्वाभाविक माध्यम से शिक्षा दी जाती है। क्रियाशीलता शिक्षक मित्र व पथप्रदर्शक की प्रधानता के कारण बालक स्वयं कार्य करके सीखते हैं। विभिन्न व्यावसायिक क्रिया को महत्त्व वस्तुओं तथा उपकरणों द्वारा खेलने से बालकों की स्वक्रिया को शारीरिक श्रम पर बल उत्तेजना मिलती है, जिससे उनमें आत्मशक्ति, क्रियाशीलता और » नैतिक तथा सामाजिक गुणों का आत्मविश्वास आदि का विकास होता है। विकास

5. शिक्षक मित्र वे पथप्रदर्शक- यह शिक्षा-पद्धति के आधुनिक शिक्षा का आधार बालकप्रधान है और इसमें शिक्षक का स्थान गौण होता है। इस पद्धति के सौन्दर्यात्मक विकास में शिक्षक का स्थान केवल मित्र, सहायक तथा पथप्रदर्शक के रूप में होता है। शिक्षक केवल बालकों के कार्य-कलापों का निरीक्षण हैं और उन पर दबाव नहीं डालते हैं।

6. व्यावसायिक क्रिया को महत्त्व- फ्रॉबेल ने अपनी मनोवैज्ञानिक पद्धति शिक्षा-पद्धति में कार्य और व्यापारों को अत्यधिक महत्त्व दिया है। ये कार्य बालकों को भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं। इससे उनकी कल्पना तथा रचनात्मक शक्ति का विकास होता है।

7. शारीरिक श्रम पर बल- इस पद्धति में शारीरिक श्रम पर विशेष बल दिया गया है। बालक अनेक शारीरिक कार्यों; जैसे–चटाई बुनना, बागवानी, लकड़ी का काम, सीना-पिरोना आदि को सीखता है। ऐसे कार्य करने से बालकों के मन में शारीरिक श्रम करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है और वे किसी कार्य को निम्न स्तर का नहीं समझते हैं।

8. नैतिक तथा सामाजिक गुणों का विकास- यह पद्धति बालकों के वैयक्तिक विकास के साथ-ही-साथ उनके नैतिक और सामाजिक विकास पर भी बल देती है। फ्रॉबेल ने अपनी पद्धति में सामूहिक क्रियाओं तथा सामूहिक खेलों पर बल दिया है, जिससे बालकों में सामाजिक तथा नैतिक गुणों का विकास होता है।

9. आधुनिक शिक्षा का आधार- किण्डरगार्टन पद्धति ने आधुनिक शिक्षा को कुछ महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी सिद्धान्त प्रदान किए हैं, जिन पर आधुनिक शिक्षा आधारित है; जैसे–स्वतन्त्र अनुशासन का महत्त्व, क्रिया द्वारा शिक्षा आदि। आधुनिक शिक्षा को मनोवैज्ञानिक आधार भी किण्डरगार्टन पद्धति की ही देन है।

10. सौन्दर्यात्मक विकास- इस पद्धति द्वारा संचालित विद्यालयों में बालकों को इस प्रकार के अवसर प्रदान किए जाते हैं, जिससे वह सुन्दर-सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों का निरीक्षण कर सके। इस प्रकार बालकों के अन्दर सौन्दर्यात्मक अनुभूति का विकास होता है। |

11. विद्यालय का आकर्षक वातावरण- किण्डरगार्टन पद्धति ने विद्यालय के नीरस वातावरण का अन्त करके वहाँ पर सरसता और उल्लास का वातावरण उत्पन्न कर दिया है। किण्डरगार्टन स्कूलों में शिक्षण कार्य प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा किया जाता है। वे अपने मृदु व्यवहार और कुशल कार्यों से विद्यालय में भी घर के समान वातावरण उत्पन्न कर देती हैं, जिससे छोटे-छोटे बच्चों को घर जैसा वातावरण मिलने से किसी प्रकार की घबराहट नहीं होती है।

12. आध्यात्मिकता का विकास- इस पद्धति के द्वारा बालकों को विश्व की अनेकता में एकता का अनुभव होता है। इसकी अनुभूति कराने के लिए गीत, खेल व उपहारों का प्रयोग विशिष्ट प्रकार से किया जाता है। विश्व की एकता का ज्ञान होने से बालकों को ईश्वर के अस्तित्व के बारे में जानकारी प्राप्त होती है और उनका आध्यात्मिक विकास भी होता है।

13. खेल द्वारा शिक्षा- यह पद्धति खेल द्वारा शिक्षा पर विशेष बल देती है। बालक खेल-खेल में लिखना, पढ़ना, गणित आदि विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है। रस्क ने लिखा है, ‘फ्रॉबेल ने किण्डरगार्टन में खेल तथा व्यापार की ऐसी विधिवत् व्याख्या की है, जिससे उसको सामान्य रूपों से अपनाया गया। जिस प्रकार जेसुइटो तथा कमेनियस को शिक्षा को एक व्यवस्थित विधिशास्त्र देने का श्रेय है, उसी प्रकार फ्रॉबेलको खेल की विधि प्रदान करने का श्रेय है।”

14. मनोवैज्ञानिक पद्धति- किण्डरगार्टन पद्धति बाल मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर आधारित है। यह बाल-केन्द्रित है। यह पद्धति बालकों के व्यक्तित्व के विकास पर पूरा ध्यान देती है।

किण्डरगार्टन पद्धति के दोष
(Defects of Kindergarten Method)

इस पद्धति के मुख्य दोषों का विवरण निम्नलिखित है

1. अस्पष्ट रहस्यवादी सिद्धान्त- कुछ शिक्षाशास्त्रियों का किण्डरगार्टन पद्धति के दोष विचार है कि फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा प्रणाली में जिन रहस्यवादी सिद्धान्तों को आधार बनाया है, वे अमनोवैज्ञानिक, भ्रामक तथा अस्पष्ट रहस्यवादी सिद्धान्त अस्पष्ट हैं। फ्रॉबेल के रहस्यवाद में कल्पना का बाहुल्य है और उसके 4 सीमित स्वतन्त्रता द्वारा बालक वास्तविक जीवन से बहुत दूर पहुँच जाते हैं। 9 वैयक्तिकता के विकास पर कम

2. सीमित स्वतन्त्रता- यद्यपि इस पद्धति में बालक की ध्यान । स्वतन्त्रता पर बहुत अधिक बल दिया गया है, लेकिन वास्तव में यह विषयों की अन्योन्याश्रितता को स्वतन्त्रता सीमित है। इस पद्धति के द्वारा बालक को निश्चित उपहारों, अभाव कार्यो, गीतों तथा खेलों में बँधना पड़ता है, जिस कारण बालक अपने ५ उपहार बनावटी तथा मनमाने आपको पूर्ण स्वतन्त्र अनुभव नहीं कर पाते हैं। वे उस वातावरण में कुछ गीत और चित्र पुराने कुछ बन्धनों का अनुभव करते हैं। प्रशिक्षित शिक्षकों को अभाव

3. वैयक्तिकता के विकास पर कम ध्यान- इस पद्धति में ज्ञान की प्रक्रिया का गलत अर्थ सामूहिक एकता और सामूहिक जीवन पर इतना अधिक बल दिया उत्तरदायित्व की शिक्षा का अभाव गया है कि बालक की वैयक्तिकता की उपेक्षा की जाती है। अमनोवैज्ञानिक पद्धति मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह उचित नहीं है।

4. विषयों की अन्योन्याश्रितता का अभाव-इस पद्धति में विषय अलग-अलग करके पढ़ाए जाते हैं, इसलिए विभिन्न विषयों में समन्वय स्थापित नहीं किया जा सकता। उत्तम शिक्षण-प्रणाली वही हो सकती है, जिसमें सभी विषय परस्पर अन्योन्याश्रित हों।

5. उपहार बनावटी तथा मनमाने- अधिकांश शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि फ्रॉबेले के उपहार स्वरूप में बनावटी और प्रस्तुत करने के क्रम में मनमाने हैं। इनका प्रयोग स्वेच्छापूर्वक किया गया है। फ्रॉबेल ने इस तथ्य की उपेक्षा कर दी है कि बालक विद्यालय में जाने से पहले ही भिन्न-भिन्न आकृतियों, रूपों और रंगों से परिचित हो जाता है और उसे उपहारों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसीलिए आजकल बहुत-सेविद्यालयों ने इन उपहारों को अनावश्यक समझकर पाठ्यक्रम से निकाल दिया है।

6. कुछ गीत और चित्र पुराने- इस पद्धति में जिन गीतों और चित्रों का समावेश किया गया है, उनमें बहुत-से काफी पुराने हैं। आज जब कि विश्व में बहुत अधिक परिवर्तन हो गया है, लेकिन इस पद्धति के गीतों और चित्रों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। ये सब आज की शैक्षिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं और इनका प्रयोग प्रत्येक देश के प्रत्येक विद्यालय में नहीं किया जा सकता।

7. प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव- इस पद्धति में प्रयुक्त उपहार, व्यापार आदि प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण समस्या उत्पन्न करते हैं और धन की कमी के कारण प्रत्येक विद्यालय में इनकी व्यवस्था नहीं की जा सकती।।

8. ज्ञान की प्रक्रिया का गलत अर्थ- फ्रॉबेल ने ज्ञान की प्रक्रिया के सम्बन्ध में गलत अर्थ निकाला था। फ्रॉबेल का मत था कि विकास एक आन्तरिक क्रिया है। शिक्षा द्वारा जो कुछ बालक के भीतर होता है, वही बाहर निकालता है। परन्तु यह विचार पूर्णतया सत्य प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि विकास तभी होता है, जब बालक वातावरण को समझ लेता है और उसे अपने अनुकूल बनाता है। बहुत-सा ज्ञान और अनुभव बालक में बाहर से अन्दर प्रवेश करता है।

9. उत्तरदायित्व की शिक्षा का अभाव- किण्डरगार्टन पद्धति में पूर्व निश्चित योजना के अनुसार कार्य करना पड़ता है और बालकों को ऐसे अवसर नहीं दिए जाते हैं कि वह स्वयं विचार कर उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से कार्य कर सकें। इस कारण बालकों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास नहीं हो पाता।

10. अमनोवैज्ञानिक पद्धति- कुछ शिक्षाशास्त्री किण्डरगार्टन पद्धति को बाल मनोविज्ञान के विपरीत बताकर उसकी आलोचना करते हैं। इनका मत है कि फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में जिन गोल, बेलन एवं घन आदि आकारों की वस्तुओं का प्रयोग करके अपने दार्शनिक विचारों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है, उनको समझना और प्रयोग करना बालक के लिए असम्भव है। बालकों में उन वस्तुओं का प्रयोग करते समय प्रतीकवाद से सम्बन्धित उन सूक्ष्म भावों का विकास नहीं हो सकता, जिनकी फ्रॉबेल ने कल्पना की है। इसलिए फ्रॉबेल का प्रतीकवाद अमनोवैज्ञानिक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रॉबेल द्वारा प्रतिपादित शिक्षा-प्रणाली किण्डरगार्टन की मुख्य विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ ।
(Main Characteristics of Kindergarten Education Method)

फ्रॉबेल ने रूसो तथा पेस्टालॉजी द्वारा प्रतिपादित मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर एक नवीन शिक्षा-प्रणाली का प्रतिपादन किया, जिसे किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली कहा जाता है। इस शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. स्वाभाविक बाल-विकास को महत्त्व- किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में स्वाभाविक बाल विकास को ध्यान में रखते हुए बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था की जाती है।
  2. बाल-रुचियों के अनुसार उनकी क्रियाओं का विकास- किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में बच्चों को विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती है तथा इन क्रियाओं के चुनाव एवं निर्धारण के लिए। बालक की रुचियों एवं स्वभाव को ध्यान में रखा जाता है। रुचियों से सम्बद्ध होने के कारण शिक्षा प्रदान करना सरल हो जाता है तथा अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
  3. विद्यालय का वातावरण पूर्णरूप से भयमुक्त-इस शिक्षा प्रणाली की एक मुख्य विशेषता यह है कि इस प्रणाली के अन्तर्गत विद्यालय का वातावरण पूर्णरूप से भयमुक्त होता है। भयमुक्त वातावरण में बच्चों का विकास स्वाभाविक रूप में होता है।
  4. खेल के माध्यम से शिक्षा- खेल बच्चों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में खेल को ही शिक्षा का माध्यम बनाया जाता है। खेल के माध्यम से शिक्षा की प्रक्रिया सरल एवं उत्तम बने जाती है। 
  5. शिक्षक: एक पथप्रदर्शक-किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक द्वारा बच्चों पर किसी कार्य या विचार को थोपा नहीं जाता। वह बच्चों का केवल पथ-प्रदर्शन मात्र ही करता है।
  6. नैतिक तथा सामाजिक शिक्षा को प्राथमिकता किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली में बच्चों के नैतिक विकास पर बल दिया जाता है तथा उन्हें सामाजिक सद्गुणों की भी समुचित शिक्षा दी जाती है।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली की शिक्षण-विधि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन प्रणाली की शिक्षण-विधि
(Educational Methods of Kindergarten Method)

फ्रॉबेल ने क्रिया द्वारा बालकों को शिक्षा देने पर विशेष बल दिया। उनका मत था कि क्रिया के द्वारा या खेल के द्वारा बालकों को आत्मविश्वास के अवसर प्राप्त होते हैं, जिससे उनका विकास होता है। इस प्रकार फ्रॉबेल की शिक्षा-पद्धति का उद्देश्य बालकों को कोरा ज्ञान देना नहीं, बल्कि उन्हें आत्माभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करना है। उसने आत्माभिव्यक्ति के साधन माने हैं—(1) गीत, (2) गति और (3) रचना।

यद्यपि देखने पर आत्माभिव्यक्ति के ये तीनों रूप पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये तीनों क्रियाएँ सह-सम्बन्धित हैं और व्यापारिक रूप से एक हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, जब बालक को कहानी सुनाई जाती है तो सुनने के बाद वह उसका गीत गा सकता है। गीत गाते समय भावों को व्यक्त करने के लिए वह अपने अंगों का संचालन करता है तथा नाट्य द्वारा उसे प्रकट करता है। फिर वह उसे रचनात्मक क्रिया द्वारा अथवा लकड़ी की वस्तु, कागज, मिट्टी तथा अन्य किसी पदार्थ से रचना करके प्रकट कर सकता है। इस प्रकार संगीत, गति तथा रचना में एकता स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षक बालक से काम कराए, कामे से सम्बन्धित गाना गवाए, गाने के साथ-साथ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन कराए और गति में वर्णित वस्तुओं का निर्माण कराए।

प्रश्न 3.
भारत में किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति के प्रयोग के विषय में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

भारत में किण्डरगार्टन पद्धति का प्रयोग
(Experiments of Kindergarten Method in India)

किण्डरगार्टन पद्धति के गुण एवं दोषों को ध्यान में रखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि हम देश, काल तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार इसमें परिवर्तन एवं सुधार करके इसका प्रयोग करें। न केवल भारत में, वरन् विश्व के लगभग सभी देशों में किण्डरगार्टन पद्धति कुछ परिवर्तनों के साथ प्रचलित है। भारत में किण्डरगार्टन पद्धति के प्रयोग में कुछ कठिनाइयाँ अवश्य हैं, तथापि इस पद्धति को निम्नांकित संशोधनों के साथ सफलतापूर्वक अपनाया जा सकता है

  1. भारत में शिशु-शिक्षा के विकास के लिए इस पद्धति का प्रयोग बड़ा उपयोगी है, क्योंकि स्कूल की शिक्षा में तभी सफलता प्राप्त हो सकती है जब शिक्षा में सुधार कर उसकी नींव मजबूत कर दी जाए।
  2. इस पद्धति को कम खर्चीली बनाया जाए, ताकि भारत जैसे निर्धन देश के सामान्य बच्चे इस पद्धति का लाभ उठा सकें।
  3. इस पद्धति की शिक्षण-सामग्री में कुछ कमी की जानी चाहिए और उसमें नवीनतम सामग्री का समावेश करना चाहिए।
  4. इस पद्धति के प्रयोग में प्रशिक्षित-प्रशिक्षिकाओं की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। इनकी पूर्ति के लिए प्रशिक्षण विद्यालयों की स्थापना भी आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में अपनाए जाने वाले मुख्य खेलों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली में मुख्य रूप से अग्रलिखित प्रकार के खेलों को अपनाया जाता है

  1. मनोरंजक तथा रचनात्मक खेल-इस प्रकार के खेलों में उन खेलों को सम्मिलित किया जाता है। जो बालकों का मनोरंजन करते हैं और उनमें रचनात्मक प्रतिभा का विकास करते हैं; जैसे-दौड़ना, झूला । झूलना, विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाना।
  2. कल्पना-शक्ति का विकास करने वाले खेल-इस प्रकार के खेलों में वे खेल आते हैं, जिनमें बालक की कल्पना-शक्ति का विकास होता है और उन्हें आत्माभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं। उनसे अवसरों के द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण करने को कहा जाता है। वह अपनी कल्पना शक्ति के सहारे नई-नई आकृतियों का प्रयोग करते हैं।
  3. सामूहिक भावना की वृद्धि करने वाले खेल-इनमें उन खेलों का समावेश होता है, जो बालकों में सामाजिकता तथा सामूहिक भावना को विकास करते हैं। उन्हें एक साथ रहकर सामूहिक रूप से काम करने और जीवन-निर्वाह करने के लिए प्रेरित करते हैं। इस दृष्टि से सामूहिक नृत्य, सामूहिक संगीत, नाटक आदि को महत्त्व दिया जाता है, क्योंकि उनके द्वारा बालकों को सामूहिक रूप से काम करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
  4. चरित्र का विकास करने वाले खेल-विभिन्न प्रकार से शिक्षाप्रद खेलों द्वारा बालक के चरित्र का विकास किया जाता है और उनमें अच्छी-अच्छी आदतें डाली जाती हैं; जैसे-भाषा की शिक्षा के लिए बालू के अक्षरों का बनाना।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली के मुख्य आधारभूत सिद्धान्त हैं—

  • एकता का सिद्धान्त,
  • स्वत: विकास का सिद्धान्त,
  • स्वक्रिया का सिद्धान्त,
  • खेल का सिद्धान्त,
  • स्वतन्त्रता का सिद्धान्त तथा
  • सामाजिकता तथा सामूहिकता का सिद्धान्त।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खेल के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली प्रथम शिक्षा-प्रणाली कौन-सी है?
उत्तर:
खेल के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली प्रथम शिक्षा प्रणाली किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली है।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक कौन थे?
या
खेल शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक फ्रॉबेल थे।

प्रश्न 3.
किस शिक्षा-पद्धति से फ्रॉबेल का नाम जुड़ा हुआ है?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति से फ्रॉबेल का नाम जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 4.
फ्रॉबेल ने किस विद्वान् के विचारों से प्रेरित होकर किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली का प्रतिपादन किया था?
उत्तर:
फ्रॉबेल ने रूसो के विचारों से प्रेरित होकर किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली का प्रतिपादन किया 
था।

प्रश्न 5.
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षा का माध्यम किसे बनाया?
उत्तर:
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में खेल को शिक्षा का माध्यम बनाया है।

प्रश्न 6.
फ्रॉबेल द्वारा अपनाए गए शब्द ‘किण्डरगार्टन’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
फ्रॉबेल द्वारा अपनाए गए शब्द ‘किण्डरगार्टन’ का अर्थ है-‘बच्चों का बगीचा’ या ‘बच्चों का उद्यान’।

प्रश्न 7.
“बालक एक अविकसित पौधा है, जो शिक्षकरूपी माली की देखरेख में अपने आन्तरिक नियमों के अनुसार विकसित होता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन फ्रॉबेल का है।

प्रश्न 8.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार विद्यालय का शैक्षिक वातावरण किस प्रकार का होना चाहिए?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार विद्यालय का शैक्षिक वातावरण पूर्ण रूप से भयमुक्त होना चाहिए।

प्रश्न 9.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में किस प्रकार के अनुशासन को सर्वोत्तम माना गया है?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में स्वतः अनुशासन को सर्वोत्तम माना गया है।

प्रश्न 10.
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक को क्या स्थान प्रदान किया है?
उत्तर:
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक को पथप्रदर्शक का स्थान प्रदान किया है।

प्रश्न 11.
किण्डरगार्टन क्या है?
उत्तर:
किण्डरगार्टन छोटे बच्चों को शिक्षित करने की एक शिक्षा पद्धति है।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य–

  1. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के जन्मदाता किलपैट्रिक थे।
  2. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में शिक्षण-सामग्री को उपहार कहा जाता है।
  3. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली अपने आप में एक अध्यापिका-केन्द्रित शिक्षा प्रणाली है।
  4. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में बाहरी कठोर अनुशासन को अपनाया जाता है।
  5. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में स्वत: विकास के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रण

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
फ्रॉबेल किस शिक्षण-पद्धति का प्रवर्तक था?
(क) मॉण्टेसरी
(ख) डाल्टन
(ग) बुनियादी शिक्षा
(घ) किण्डरगार्टन

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन प्रणाली के जनक हैं
(क) मॉण्टेसरी
(ख) एनीबेसेण्ट
(ग) डीवी
(घ) फ्रॉबेल

प्रश्न 3.
किण्डरगार्टन का क्या अर्थ है?
(क) बच्चों का घर
(ख) बच्चों का बागीचा
(ग) बच्चों की नर्सरी ।
(घ) बच्चों की पाठशाला

प्रश्न 4.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में किसे प्रमुख स्थान दिया गया है?
(क) बालक को
(ख) शिक्षक को
(ग) विद्यालय को
(घ) समाज को

प्रश्न 5.
फ्रॉबेल ने शिक्षक को क्या संज्ञा दी है?
(क) माली
(ख) मास्टर
(ग) रखवाला
(घ) निर्देशक

प्रश्न 6.
किण्डरगार्टन प्रणाली का प्रमुख गुण है
(क) सस्ती प्रणाली
(ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली
(ग) उपहारयुक्त प्रणाली
(घ) व्यक्तिवादी प्रणाली

प्रश्न 7.
किण्डरगार्टन प्रणाली का प्रमुख दोष है
(क) रचनात्मक कार्यों की प्रधानता
(ख) नैतिक व सामाजिक गुणों का विकास
(ग) कृत्रिम वातावरण
(घ) संवेदी अंगों का प्रशिक्षण

प्रश्न 8.
फ्रॉबेल का जन्म हुआ था–
(क) इटली में
(ख) अमेरिका में
(ग) जर्मनी में
(घ) इंग्लैण्ड में

उत्तर:

1. (घ) किण्डरगार्टन,
2. (घ) फ्रॉबेल,
3. (ख) बच्चों का बगीचा,
4. (क) बालक को,
5. (क) माली,
6. (ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली,
7. (ग) कृत्रिम वातावरण,
8. (ग) जर्मनी में।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 2 Shershah Suri: Rule and Achievements

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 2
Chapter Name Shershah Suri: Rule and Achievements (शेरशाह सूरी- शासन एवं उपलब्धियाँ)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 2 Shershah Suri: Rule and Achievements (शेरशाह सूरी- शासन एवं उपलब्धियाँ)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 1540 ई०
2. 1542 ई०
3. 1543 ई० से मई 1544 ई०
4. 1545 ई०
5. 1556 ई०
उतर.
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 36 पर ‘तिथि सार’ का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 36 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-37 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-37 का अवलोकन कीजिए। लघु

उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शेरशाह की प्रमुख विजयों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उतर.
शेरशाह सूरी की प्रमुख विजयों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् हैं

  1. गक्खर प्रदेश की विजय – सन् 1541 ई० में शेरशाह ने गक्खर सरदारों पर चढ़ाई कर उनके प्रदेश को बुरी तरक से रोंद डाला।
  2. बंगाल का विद्रोह और नई व्यवस्था – सन् 1541 ई० में शेरशाह ने खिज्र खाँ को कैद करके बंगाल को जिलों में बाँटकर प्रत्येक को एक छोटी सेना के साथ शिकदारों के नियंत्रण में दे दिया।
  3. मालवा की विजय – सन् 1542 ई० में शेरशाह ने मालवा के शासक कादिरशाह को हराकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया।।
  4. रायसीना की विजय – सन् 1542 ई० में शेरशाह ने रायसीना के शासक पूरनमल को हराया।
  5. मुल्तान व सिंध की विजय – सन् 1543 ई० में शेरशाह के सूबेदार हैबत खाँ ने फतह खाँ जाट को परास्त कर मुल्तान एवं सिंध पर अधिकार कर लिया।
  6. मारवाड़ पर विजय – सन् 1544 ई० में शेरशाह ने मालदेव के सेनापति नैता और कैंपा को हराया।
  7. मेवाड विजय – सन् 1544 ई० में मारवाड़ पर विजय प्राप्त करके वापस लौटते समय शेरशाह ने मेवाड़ को अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।
  8. कालिंजर की विजय – सन् 1544 ई० में शेरशाह ने शासक कीरत सिंह को हराकर कालिंजर पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 2.
शेरशाह की सफलता के चार कारण लिखिए।
उतर.
शेरशाह की सफलता के चार प्रमुख कारण निम्न प्रकार हैं

  1. दृढ़-संकल्पी – शेरशाह दृढ़-संकल्पी व्यक्ति था। हुमायूँ को भारत की सीमा से बाहर निकालकर ही उसने चैन की साँस ली।
  2. हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताएँ – हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताओं का लाभ उठाकर, शेरशाह दिल्ली का सिंहासन अपनी योग्यता के द्वारा छीनने में सफल रहा।।
  3. सैनिक प्रतिभा – शेरशाह ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, जिसमें उसकी सैनिक योग्यता की प्रमुख भूमिका थी।
  4. कूटनीतिज्ञ – चौसा और बिलग्राम के युद्धों में सैनिक प्रतिभा से अधिक शेरशाह ने अपनी कूटनीति से विजय प्राप्त की।

प्रश्न 3.
शेरशाह के शासन-प्रबन्ध की दो प्रमुख विशेषाएँ लिखिए।
उतर.
शेरशाह के शासन-प्रबन्ध की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. न्यायप्रियता – शेरशाह न्याय प्रिय सुल्तान था। उसके राज्य में न्याय निष्पक्ष था तथा नियम भंग करने वाले अपराधी को | कठोर दण्ड मिलता था, चाहे वह कितना ही बड़ा अधिकारी क्यों न हो।
  2. प्रजा का भौतिक एवं नैतिक विकास – शेरशाह हालाँकि निरकुंश सुल्तान था तदापि उसने अपने सम्मुख प्रजाहित का आदर्श रखा। उसका विश्वास था कि सुल्तान को भगवान ने प्रजा का प्रधान बनाकर भेजा है तथा प्रजा का सर्वांगीण विकास करने का भार सुल्तान पर है।

प्रश्न 4.
शेरशाह के द्वारा भू-राजस्व के क्षेत्र में किए गए सुधारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उतर.
शेरशाह राज्य के किसानों की भलाई में ही राज्य की भलाई मानता था। उसकी लगान-व्यवस्था अच्छी मानी जाती थी। शेरशाह की लगान-व्यवस्था मुख्यतया रैवतवाडी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया जाता था। उत्पादन के आधार पर ही भूमि को तीन श्रेणियों- उत्तम, मध्यम और निम्न में बाँटा गया। लगान निश्चित करने की प्रणालियाँ निर्धारित की गई थीं। किसान लगान नकद या जिन्स के रूप में दे सकते थे। यदि युद्ध के अवसर पर कृषि की कोई हानि हो जाती थी तो उसकी पूर्ति कर दी जाती थी।

प्रश्न 5.
शेरशाह के चरित्र पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उतर.
शेरशाह को भारत के इतिहास में उच्चतम् सम्राटों में स्थान दिया जाता है और चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त तथा अकबर महान् के साथ तुलना की जाती है। शेरशाह एक प्रजावत्सल सम्राट था। प्रजा के साथ वह उदारता एवं दयालुता पूर्ण व्यवहार करता था। उसके राज्य में प्रतिदिन भिखारियों का दान दिया जाता था। शेरशाह में उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। शेरशाह मुस्लिम सम्राट था तदापि उसने हिन्दू व मुसलमानों के साथ समानता का व्यवहार किया। शेरशाह कर्तव्यपरायण सुल्तान था। वह अपने कर्तव्य को भली-भाँति जानता था तथा समुचित रूप से उनका पालन करता था। शेरशाह कठोर परिश्रमी था। वह शासन के समस्त विभागों पर नियत्रंण रखता था।

शेरशाह विद्यानुरागी था। सुल्तान बनने के बाद उसने विद्या प्रसार के लिए अनेक पाठशालाएँ एवं मकतब निर्मित करवाए। वह एक कुशल सेनापति एवं कूटनीतिज्ञ था। हुमायूं के साथ उसने उच्चकोटि के सेनापति की तरह युद्ध लड़े। चुनार, रोहतास तथा रायसीन पर उसने कूटनीति द्वारा विजय प्राप्त की। शेरशाह न्यायप्रिय सुल्तान था। न्याय के सम्मुख वह सबको समान समझता था तथा अपने पुत्र तक को साधारण व्यक्ति के समान दण्ड देता था। शेरशाह एक महत्वकांक्षी सुल्तान था, मुगलों को भारत से निकालकर ही उसने चैन की साँस ली।

प्रश्न 6.
शेरशाह को राष्ट्रीय सम्राट कहना कहाँ तक उचित है?
उतर.
शेरशाह को धार्मिक सहिष्णुता का सिद्धान्त अपनाया था। वह ऐसा प्रथम मुस्लिम शासक था, जिसकी दृष्टि में सम्पूर्ण प्रजा एक समान थी, चाहे वह किसी भी धर्म की अनुयायी क्यों न हो। एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते वह इस बात को भली-भाँति समझ चुका था कि हिन्दुओं के देश भारत में, जहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू है, धार्मिक अत्याचारों के आधार पर राज्य को
स्थायी नहीं किया जा सकता इस नीति के आधार पर शेरशाह को राष्ट्रीय सम्राट कहना उचित है।

प्रश्न 7.
अकबर के अग्रगामी के रूप में शेरशाह का स्थान निर्धारित कीजिए।
उतर.
शेरशाह एक प्रजावत्सल सम्राट था। वह प्रजा के साथ उदारता एवं दयालुतापूर्ण व्यवहार करता था। यद्यपि दण्ड देने में वह कठोर एवं अनुदार था। अपनी दरिद्र जनता एवं कृषकों के प्रति वह अत्यन्त उदार था। शेरशाह में उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। यद्यपि कुरान की आयतों का पाठ करता था तथा नमाज अदा करता था, तदापि भारत में हिन्दुओं व मुसलमानों के साथ उसने समानता का व्यवहार किया और उच्च पदों पर हिन्दुओं को भी आसीन किया तथा उनके बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था की और एक सीमा तक उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। इस दृष्टिकोण से हम उसे अकबर का अग्रगामी मान सकते हैं।

प्रश्न 8.
सूर-साम्राज्य के पतन के चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
भारत में दिल्ली पर प्रथम सूर (अफगान) साम्राज्य को लोदी वंश ने स्थापित किया था, किन्तु बाबर ने 1526 ई० में इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली में मुगल साम्राज्य की स्थापना की। शेरशाह सूरी ने 1540 ई० में हुमायूँ को परास्त कर पुनः सूर साम्राज्य स्थापित किया। अफगानों का यह द्वितीय साम्राज्य लगभग 15 वर्षों तक रहा। सन् 1555 ई० में हुमायूँ ने मच्छीवाड़ा और सरहिन्द के युद्धों को जीतकर द्वितीय सूर साम्राज्य का पतन कर दिया। इस प्रकार सूर-साम्राज्य के पतन के चार प्रमुख कारण निम्नवत् हैं

  1. इस्लामशाह के उत्तराधिकारियों को अयोग्य होना।
  2. अफगानों का एक केन्द्रीय शासन-व्यवस्था को स्वीकार न करना।
  3. इस्लामशाह की मृत्यु के पश्चात शासन-व्यवस्था का नष्ट होना।
  4. अफगान सरदारों की महत्वकाक्षाएँ एवं स्वतन्त्र प्रवृत्ति।

प्रश्न 9.
शेरशाह सूरी द्वारा बनवाए गए दो प्रमुख राजमार्गों का वर्णन कीजिए।
उतर.
शेरशाह सूरी का नाम सड़कों और सरायों के निर्माण के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने व्यापार की सुविधा के लिए लम्बी-लम्बी सड़कों का निर्माण कराया तथा देश के प्रमुख नगरों को सड़कों के द्वारा जोड़ दिया। शेरशाह सूरी द्वारा बनवाए गए दो प्रमुख राजमार्ग अग्रलिखित हैं

  1. ग्रांड-ट्रंक रोड़ जो बंगाल के सोनारगाँव से आगरा, दिल्ली और लाहौर होती हुई सिंध प्रांत तक जाती है।
  2. आगरा से बुरहानपुर तक।

प्रश्न 10.
शेरशाह और हुमायूँ के बीच हुए दो प्रमुख युद्धों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
शेरशाह और हुमायूं के बीच हुए दो प्रमुख युद्ध निम्न प्रकार हैं

  1. चौसा का युद्ध- सन् 1539 ई० में शेरशाह ने हुमायूँ को तोपखाने का प्रयोग करने का अवसर दिए बिना ही रणक्षेत्र से भागने को विवश कर दिया।
  2. कन्नौज ( बिलग्राम ) का युद्ध- सन् 1540 ई० में शेरशाह ने कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर उसे भारत से बाहर खदेड़ दिया।

प्रश्न 11.
शेरशाह ने जन-साधारण के लिए क्या-क्या कार्य किए?
उतर.
शेरशाह ने जन-साधारण के लिए निम्नलिखित कार्य किए

  1. उत्तम न्याय व्यवस्था
  2. भूमिकर अथवा लगान में सुधार
  3. जन साधारण के जीवन एवं सम्मान की रक्षा के लिए पुलिस प्रशासन की व्यवस्था
  4. शिक्षा के लिए पाठशालाओं एवं मकतबों का निर्माण
  5. जन साधारण को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना
  6. सड़क एवं सरायों को निर्माण।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शेरशाह की गणना मध्यकाल के महान् शासकों में की जाती है। इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
उतर.
शेरशाह महान् विजेता था। जूलियस सीजर, आगस्टस, हेनरी द्वितीय, एडवर्ड प्रथम, लुई चतुर्दश, अकबर महान् तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ उसकी तुलना की जा सकती है। वह एक महान् साम्राज्य का निर्माता था जिसे उसने अपनी योग्यता से प्राप्त किया था तथा जिसकी सुव्यवस्था के लिए उसने उच्च कोटि की शासन-व्यवस्था स्थापित की थी। पाँच वर्ष के अल्पकाल में उसने अराजकतापूर्ण एवं अव्यवस्थित देश को सुव्यवस्था एवं सुरक्षा प्रदान की थी।

मध्यकाल भारत के इतिहास में शेरशाह का अपना एक स्थान है। वह एक वीर सैनिक, चतुर सेनानायक और कुशल कूटनीतिज्ञ था। वह केवल विजय प्राप्त करने में विश्वास करता था और उसका मानना था कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भले-बुरे सभी साधनों का व्यवहार में लाना उचित है। वह एक सफल शासक था। उसे प्रजा के सुख का पूरा ध्यान था और उसकी भलाई के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करता था। शासन-व्यवस्था के पुनर्गठन, भूमि का बन्दोबस्त, लगान, मुद्रा और व्यापार वाणिज्य में उसके द्वारा किए गये सुधारों के कारण मध्यकाल के महान् शासन-प्रबन्धकों में उसकी गणना की जाती है। शेरशाह 68 वर्ष की आयु में राजा बना था किन्तु यह वृद्धावस्था भी उसके उत्साह और आकाँक्षाओं को ठण्डा नहीं कर सकी। इस राय पर सभी इतिहासकार एकमत हैं कि शेरशाह सोलह घण्टे प्रतिदिन राजकाज में लगाता था।

अशोक, चन्द्रगुप्त मौर्य अथवा अकबर की भाँति उसकी भी यही आदर्श वाक्य था कि महान् व्यक्ति को सदैव चैतन्य रहना आवश्यक है। शेरशाह में एक सैनिक और सेनापति के गुणों का अभाव न था। वह सभी यद्धों में शौर्य के साथ चालाकी का प्रयोग भी करता था। एक धार्मिक मुसलमान की दृष्टि से वह अपने धार्मिक कृत्यों को विषमपूर्वक करता था। डॉ० आर०पी० त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है “कोई भी इतिहासकार अकबर के पहले के मुस्लिम शासकों के मध्य महानता, बुद्धिमानी और कार्यक्षमता के नाते शेरशाह को सर्वोच्च पद से वंचित नही रख सकता।”

प्रश्न 2.
शेरशाह के प्रशासन की विवेचना कीजिए।
उतर.
शेरशाह का शासन-प्रबन्ध- इतिहासकारों ने शेरशाह को अकबर से भी श्रेष्ठ रचनात्मक बुद्धि वाला और राष्ट्र-निर्माता बताया है। सैनिक और असैनिक दोनों ही मामलो में शेरशाह ने संगठनकर्ता की दृष्टि से शानदार योग्यता का परिचय दिया। नि:सन्देह शेरशाह मध्य युग के महान् शासन-प्रबन्धकों में से एक था। उसने किसी नई शासन-व्यवस्था को जन्म नहीं दिया बल्कि उसने पुराने सिद्धान्तों और संस्थाओं को ऐसी कुशलता से लागू किया कि उनका स्वरूप नया दिखाई दिया। इस प्रकार योग्य शासन-प्रबन्ध की दृष्टि से इतिहास में शेरशाह का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। शेरशाह का शासन-प्रबन्ध निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है
(i) प्रान्तीय शासन-प्रबन्ध
(क) इक्ता या सूबा – शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए शेरशाह ने साम्राज्य को अनेक भागों में बाँट रखा था। उस समय राज्य में ‘सरकार’ सबसे बड़ा खण्ड कहलाता था। सरकार ऐसे प्रशासकीय खण्ड थे जो कि प्रान्तों से मिलते-जुलते थे और जो इक्ता कहलाते थे और प्रमुख अधिकारियों के अधीन थे। शेरशाह के समय फौजी गवर्नरों की नियुक्तियाँ भी होती थीं। जिन राज्यों को शासन करने की स्वतन्त्रता दे दी गई थी, उन्हें सूबा या इक्ता कहा जाता था। सूबे का प्रमुख हाकिम अथवा फौजदार होता था। फिर भी शेरशाह के प्रान्तीय प्रशासन का विवरण स्पष्ट नहीं है।

(ख) सरकारें (जिले ) – प्रत्येक इक्ता या सूबा सरकारों में बँटा होता था। शेरशाह की सल्तनत में 66 सरकारें थीं। प्रत्येक सरकार में दो प्रमुख अधिकारी होते थे- ‘शिकदार-ए-शिकदारान’ और ‘मुन्सिफ-ए-मुनसिफान’। शिकदार-ए-शिकदारान सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष होता था तथा विभिन्न परगनों के शिकदारों पर प्रशासनिक अधिकारी होता था। अपनी सरकार में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना करना तथा विद्रोही जमींदारों का दमन करना उसका प्रमुख कर्तव्य था। मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान मुख्यतया न्याय-अधिकारी था। दीवानी मुकदमों का फैसला करना और अपने अधीन मुन्सिफों के कार्यों की देखभाल करना उसका दायित्व था।

(ग) परगने – प्रत्येक सरकार में कई परगने होते थे। शेरशाह ने प्रत्येक परगने में एक शिकदार, एक अमीन (मुन्सिफ), एक फोतदार (खजांची) और दो कारकून (लिपिक) नियुक्त किए गए थे। शिकदार के साथ एक सैनिक दस्ता होता था और उसका कर्तव्य परगने में शान्ति स्थापित करना था। मुन्सिफ का कार्य दीवानी मुकदमों का निर्णय करना और भूमि की नाप एवं लगान-व्यवस्था की देखभाल करना था। फोतदार परगने का खजांची था और कारकूनों का कार्य हिसाब-किताब लिखना था।

(घ) गाँव – शासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। प्रत्येक गाँव में मुखिया, पंचायतें और पटवारी होते थे, जो स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था करते थे। गाँव की अपनी पंचायत होती थी, जो गाँव में सुरक्षा, शिक्षा, सफाई आदि का प्रबन्ध करती थी। शेरशाह ने गाँव की परम्परागत व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया था परन्तु गाँव के इन अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करना पड़ता था। अन्यथा इन्हें दण्ड दिया जाता था।

(ii) भू-राजस्व व्यवस्था – राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर अथवा लगान था। इसके अतिरिक्त लावारिस सम्पत्ति, व्यापारिक कर, टकसाल, नमक-कर, अधीनस्थ राजाओं, सरदारों एवं व्यापारियों द्वारा दिए गए उपहार, युद्ध में लूटे गए माल का 1/5 भाग, जजिया इत्यादि आय के साधन थे। शेरशाह किसानों की भलाई में ही राज्य की भलाई मानता था। उसकी लगान-व्यवस्था बहुत अच्छी मानी जाती है, उसकी लगान-व्यवस्था निम्न प्रकार थी

(क) शेरशाह की लगान – व्यवस्था मुख्यतया रैयतवाड़ी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया जाता था। इस कार्य में शेरशाह को पूर्ण सफलता नहीं मिली और जागीरदारी प्रथा भी चलती रही। मालवा और राजस्थान में यह व्यवस्था लागू नहीं की जा सकी।

(ख) उत्पादन के आधार पर ही भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटा गया था- उत्तम, मध्यम और निम्न।

(ग) खेती योग्य सभी भूमि की नाप की जाती थी और पता लगाया जाता था कि किस किसान के पास कितनी और किस श्रेणी की भूमि है। उस आधार पर पैदावार का औसत निकाला जाता था।

(घ) लगान निश्चित करने की उस समय तीन प्रणालियाँ थीं – (अ) गल्ला बक्सी अथवा बँटाई (खेत बँटाई, लँक बँटाई और रास बँटाई), (ब) नश्क या कनकूत तथा (स) नकद अथवा जब्ती। सामान्यत: किसान बँटाई प्रणाली को ही पसन्द करता था।

(ड.) किसानों को सरकार की ओर से पट्टे दिए जाते थे, जिनमें स्पष्ट किया गया होता था कि उस वर्ष उन्हें कितना लगान देना है। किसान ‘कबूलियत-पत्र के द्वारा इन्हें स्वीकार करते थे।

(च) लगान के अलावा किसानों को जमीन की पैमाइश और लगान वसूल करने में संलग्न अधिकारियों के वेतन आदि के लिए सरकार को ‘जरीबाना’ और ‘महासीलाना’ नामक कर देने पड़ते थे जो पैदावार का 2.5% से 5% तक होता था। किसान को 2.5% अन्य कर भी देना पड़ता था, जिससे अकाल अथवा बाढ़ की दशा में जनता को सहायता मिलती थी।

(छ) शेरशाह का स्पष्ट आदेश था कि लगान लगाते समय किसानों के साथ सहानुभूति का बर्ताव किया जाए लेकिन लगान वसूल करते समय कोई नरमी न बरती जाए।

(ज) किसानों को यह सुविधा थी कि वे लगान नकद या जिन्स के रूप में दे सकते थे, लकिन सरकार नकद के रूप में लेना ज्यादा पसन्द करती थी।

(झ) शेरशाह यह ध्यान रखता था कि युद्ध के अवसर पर कृषि की कोई हानि न हो और जो हानि हो जाती थी, उसकी पूर्ति कर दी जाती थी।

(iii) केन्द्रीय शासन-प्रबन्ध – सुल्तान- दिल्ली सल्तनत के शासकों की भाँति शेरशाह भी एक निरंकुश शासक था और उसकी शक्ति एवं सत्ता अपरिमित थी। शासन नीति और दीवानी तथा फौजदारी मामलों के संचालन की शक्तियाँ उसी के हाथों में केन्द्रित थीं। उसके मन्त्री स्वयं निर्णय नहीं लेते थे बल्कि केवल उसकी आज्ञा का पालन और उसके द्वारा दिए गए कार्यों की पूर्ति करते थे।

इस कारण शासन की सुविधा की दृष्टि से शेरशाह को सल्तनतकाल की व्यवस्था के आधार पर चार मन्त्री विभाग बनाने पड़े थे। ये निम्नलिखित थे
(क) दीवाने वजारत – यह लगान और अर्थव्यवस्था का प्रधान था। राज्य की आय और व्यय की देखभाल करना इसका दायित्व था। इसे मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल का भी अधिकार था।

(ख) दीवाने-आरिज – यह सेना के संगठन, भर्ती, रसद, शिक्षा और नियन्त्रण की देखभाल करता था, परन्तु यह सेना का सेनापति न था। शेरशाह स्वयं ही सेना का सेनापति था और स्वयं सेना के संगठन और सैनिकों की भर्ती आदि में रुचि रखता था।

(ग) दीवाने-रसालत – यह विदेश मन्त्री की भाँति कार्य करता था। अन्य राज्यों से पत्र-व्यवहार करना और उनसे सम्पर्क रखना इसका दायित्व था। कूटनीतिक पत्र-व्यवहार भी इसे ही सम्भालना होता था।

(घ) दीवाने – इंशा- इसका कार्य सुल्तान के आदेशों को लिखना, उनका लेखा रखना, राज्य के विभिन्न भागों में उनकी सूचना पहुँचाना और उनसे पत्र-व्यवहार करना था। इनके अतिरिक्त दो अन्य मन्त्रालय भी थे, ‘दीवाने-काजी’ और ‘दीवाने-बरीद’। दीवाने-काजी सुल्तान के पश्चात् राज्य के मुख्य न्यायाधीश की भॉति कार्य करता था और दीवाने-बरीद राज्य की गुप्तचर व्यवस्था और डाकव्यवस्था की देखभाल करता था। इसके अतिरिक्त बादशाह के महलों तथा नौकर-चाकरों की व्यवस्था के लिए एक अलग अधिकारी होता था।

(iv) सड़कें और सरायें – शेरशाह ने अपने समय में कई सड़कों का निर्माण कराया और पुरानी सड़कों की मरम्मत कराईं। शेरशाह ने मुख्यतया चार प्राचीन सड़कों की मरम्मत और निर्माण कराया। ये सड़कें निम्नलिखित थीं
(क) एक सड़क बंगाल के सोनारगाँव, आगरा, दिल्ली, लाहौर होती हुई पंजाब में अटक तक जाती थी अर्थात् (ग्रांड ट्रंक रोड), जिसे ‘सड़के-आजम’ के नाम से पुकारा जाता था।

(ख) दूसरी, आगरा से बुरहानपुर तक।

(ग) तीसरी, आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक और

(घ) चौथी, लाहौर से मुल्तान तक जाती थी। शेरशाह ने इन सड़कों के दोनों ओर छायादार और फलों के वृक्ष लगवाए थे। उसने इन सभी सड़कों पर प्राय: दोदो कोस की दूरी पर सरायें बनवाई थीं। उसने अपने समय में करीब 1,700 सरायों का निर्माण कराया। इन सभी सरायों में हिन्दू और मुसलमानों के ठहरने के लिए अलग-अलग प्रबन्ध था। व्यापारी, यात्री, डाक-कर्मचारी आदि सभी यहाँ संरक्षण और भोजन प्राप्त करते थे।

(v) मुद्रा व्यवस्था – शेरशाह ने पुराने और घिसे हुए, पूर्व शासकों के प्रचलित सिक्के बन्द करके उनके स्थान पर सोने, चाँदी और ताँबे के नये सिक्के चलाए और उनका अनुपात निश्चित किया। उसके चाँदी के रुपए का वजन 180 ग्रेन था, जिसमें 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी होती थी। सोने के सिक्के 166.4 ग्रेन और 168.5 ग्रेन के ढाले गए थे। ताँबे का सिक्का दाम कहलाता था। सिक्कों पर शेरशाह का नाम, उसकी पदवी और टकसाल का स्थान अरबी या देवनागरी लिपि में अंकित रहता था। शेरशाह के रुपए के बारे में इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है “यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा-प्रणाली का आधार है।”

(vi) पुलिस प्रशासन – शेरशाह के शासनकाल में सेना ही पुलिस का कार्य करती थी। इस विषय में शेरशाह ने स्थानीय उत्तरदायित्व के सिद्धान्त पर कार्य किया था। जिस क्षेत्र में जो अधिकारी था, उसी का उत्तरदायित्व उस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित रखना था। विभिन्न सैनिक अपने-अपने क्षेत्रों में शान्ति स्थापित करते थे, चोरों एवं लुटेरों को पकड़ते थे तथा जनसाधारण के जीवन और सम्मान की रक्षा करते थे।

(vii) व्यापार-वाणिज्य – शेरशाह ने स्थान-स्थान पर दिए जाने वाले करों को समाप्त कर दिया। उसने केवल आयात कर और ‘बिक्री कर लेने के आदेश दिए थे। उसके सभी अधिकारियों को यह भी आदेश था कि व्यापारियों की सुरक्षा की जाए और उनके साथ सद्व्यवहार किया जाए।

(viii) न्याय व्यवस्था – शेरशाह स्वयं राज्य का बड़ा न्यायाधीश था और प्रत्येक बुधवार की शाम को स्वयं न्याय के लिए बैठता था। वह न्यायप्रिय शासक था। शेरशाह कहा करता था कि “न्याय करना सभी धार्मिक क्रियाओं में सर्वोत्तम है। इस बात को मुसलमान और काफिर दोनों के बादशाह मानते हैं।” उसने अत्याचारियों का कभी पक्ष नहीं लिया, चाहे वे उसके रिश्तेदार हों, प्रिय पुत्र हों या उसके प्रमुख सरदार हों। अपराध की गम्भीरता के अनुसार कैद, कोड़े, हाथ-पैर काटना, जुर्माना, फाँसी आदि दण्ड दिए जाते थे। शेरशाह के न्याय का आदर्श था- इंसान से इंसान का बर्ताव। शेरशाह के नीचे काजी होता था, जो न्याय विभाग का प्रमुख होता था। प्रत्येक सरकार में मुख्य शिकदार फौजदारी मुकदमे तथा मुख्य मुन्सिफ दीवानी मुकदमों की सुनवाई करते थे। परगनों में यह कार्य अमीन करते थे।

(ix) शेरशाह की इमारतें – इमारतें बनवाने का शेरशाह को बहुत शौक था। उसने अपनी उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा के लिए ‘रोहतासगढ़’ नाम का एक दुर्ग बनवाया। दिल्ली का पुराना किला शेरशाह का बनवाया हुआ ही माना जाता है। इसी किले में उसने एक ऊँची मस्जिद का निर्माण करवाया, जो भारतीय और इस्लामी कला का मिला-जुला एक अच्छा उदाहरण है। परन्तु शेरशाह की सर्वश्रेष्ठ कृति सासाराम (बिहार) में स्थित उसका स्वयं का मकबरा है। सहसराम (सासाराम) में झील के बीचोंबीच एक चबूतरे पर बना हुआ शेरशाह का यह मकबरा नि:सन्देह भारत की श्रेष्ठतम इमारतों में से एक है।

(x) गुप्तचर और सूचना विभाग – शेरशाह का गुप्तचर और सूचना विभाग बहुत श्रेष्ठ था। प्रजा की रक्षा के लिए वह अपने अमीरों की प्रत्येक टुकड़ी के साथ विश्वासपात्र गुप्तचर भेजता था। प्रत्येक नगर और राज्य के दूर-दूर भागों में भी गुप्तचर एवं समाचार भेजने वालों की नियुक्ति की गई थी। यह विभाग ऐसी कुशलता से कार्य करता था कि उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को घटना का पता लगने से पहले ही शेरशाह को उसका पता चल जाता था। शेरशाह अपने गुप्तचरों और तेज चलने वाले सन्देशवाहकों के माध्यम से अपने सम्पूर्ण राज्य के शासन पर नियन्त्रण रखता था और यह काफी हद तक उनकी शासन-व्यवस्था की सफलता का आधार था।

(xi) शेरशाह का सैनिक-प्रबन्ध – शेरशाह ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था। अलाउद्दीन की भाँति उसने केन्द्र पर एक शक्तिशाली सेना रखी, जो सुल्तान की सेना थी। केन्द्र की सेना में 1,50,000 घुड़सवार, 25,000 पैदल और 5,000 हाथी थे। उसकी घुड़सवार सेना में मुख्यतया अफगान थे। बाकी अन्य वर्गों के मुसलमान और हिन्दू भी उसकी सेना में थे। सैनिकों को वेतन नकद दिया जाता था यद्यपि सरदारों को जागीरें दी जाती थी। बेईमानी रोकने के लिए उसने घोड़ों को दागने और सैनिकों का हुलिया लिखे जाने की प्रथाओं को अपनाया। शेरशाह के पास एक अच्छा तोपखाना भी था। इस प्रकार हम देखते हैं कि शेरशाह ने कम समय में एक अच्छी व्यवस्था की स्थापना की। जो इतिहासकार बाबर की प्रशासकीय अयोग्यता को समय की कमी कहकर माफ कर देते हैं, शेरशाह उनके लिए एक श्रेष्ठ उदाहरण है। इस प्रकार शेरशाह ने अकबर के कार्य को भी सरल कर दिया क्योंकि अपने थोड़े समय में ही शेरशाह ने एक श्रेष्ठ शासन की पृष्ठभूमि का निर्माण किया, जिससे अकबर के लिए एक स्पष्ट रास्ता बन गया।

प्रश्न 3.
शेरशाह के प्रारम्भिक जीवन का उल्लेख कीजिए। वह भारत का शासक कैसे बना?
उतर.
शेरशाह का जन्म सासाराम शहर में हुआ था, जो अब बिहार के रोहतास जिले में है। शेरशाह सूरी के बचपन का नाम फरीद था उसे शेर खाँ के नाम से जाना जाता था क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर कम उम्र में अकेले ही एक शेर को मारा था। उनका कुलनाम ‘सूरी’ उनके गृहनगर ‘सुर’ से लिया गया था। कन्नौज युद्ध में विजय के बाद शेर खाँ ने आगरा पर अधिकार किया ओर तभी से वह शेरशाह सूरी के नाम से भारत का सम्राट बना। शेरशाह सूरी के दादा इब्राहीम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे, जो उस समय के दिल्ली के शासकों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके पिता हसन पंजाब में एक अफगान रईस जमाल खान की सेवा में थे।

शेरशाह के पिता की चार पत्नियाँ और आठ बच्चे थे। हसन अपनी चौथी पत्नी से अधिक प्रभावित था। शेरशाह को बचपन के दिनों में उसकी सौतेली माँ बहुत सताती थी, जिससे अप्रसन्न होकर उन्होंने घर छोड़ दिया और जौनपुर आकर अपनी पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी कर शेरशाह 1522 ई० में जमाल खान की सेवा में चले गए, पर उनकी विमाता को यह पसंद नहीं आया। इसलिए उन्होंने जमाल खान की सेवा छोड़ दी और बिहार के स्वघोषित स्वतन्त्र शासक बहार खान लोहानी के दरबार में चले गए।

अपने पिता की मृत्यु के उपरान्त उनकी जागीर का उत्तराधिकारी बनकर वे पुन: सासाराम वापस आ गए। परन्तु अपने सौतेले भाई के षड्यन्त्र के कारण उन्हें अपनी जागीर पुनः त्यागनी पड़ी। शेर खाँ ने पहले बाबर के लिए एक सैनिक के रूप में काम किया था तथा पूर्व में उसने अफगानों के विरुद्ध बाबर की सहायता भी की थी, जिस कारण से अफगान शेर खाँ से अप्रसन्न हो गए थे। किन्तु इसी समय बहार खाँ की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र जलाल खाँ अभी अल्पव्यस्क था। जलाल खाँ की माता ने शेर खाँ को जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्त कर दिया।

(i) जलाल खाँ के विरुद्ध विजय – शेर खाँ ने बिहार की इतनी अच्छी व्यवस्था की कि वहाँ की दरिद्र जनता पूर्ण रूप से शेर खाँ की समर्थक बन गई थी, परन्तु उसकी इस प्रसिद्धि से चिढ़कर कुछ सरदारों ने युवक जलाल खाँ के कान शेर खाँ के विरुद्ध भरने आरम्भ कर दिए अतः जलाल खा ने शेर खाँ से सत्ता वापस लेने का निश्चय किया, परन्त शेर खाँ वास्तविक शासक था और उसको सरलतापूर्वक दबाया नहीं जा सकता था। जलाल खाँ ने शेर खाँ से बिहार का राज्य प्राप्त करने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया, परन्तु सूरजगढ़ के युद्ध (1534 ई०) में शेर खाँ ने जलाल खाँ को पराजित करके बिहार को पूर्णतया अपने अधिकार में ले लिया।

(ii) बंगाल पर आक्रमण – सूरजगढ़ की विजय से उत्साहित होकर शेर खाँ ने 1535 ई० में बंगाल के सुल्तान महमूद खाँ पर
आक्रमण कर दिया। इस बार महमूद खाँ ने शेर खाँ को धन देकर अपनी प्राण रक्षा की। परन्तु दो वर्ष के उपरान्त 1537 ई० में शेर खाँ ने पुनः बंगाल की राजधानी गौड़ पर घेरा डाल दिया तथा गौड़ पर विजय प्राप्त कर उसने सुल्तान महमूद को हुमायूं की शरण में जाने के लिए बाध्य कर दिया।

(iii) रोहतास के दुर्ग पर अधिकार – गौड़ को अधिकार में लेने के उपरान्त शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग पर अधिकार किया। रोहतास दुर्ग उसने विश्वासघात के द्वारा प्राप्त किया। रोहतास दुर्ग के शासक हिन्दू राजा के साथ शेर खाँ के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, परन्तु रोहतास का राजनीतिक महत्व होने के कारण शेर खाँ उस पर अधिकार करना चाहता था। जब हुमायूँ ने गौड़ का घेरा डाला तब शेर खाँ ने राजा से रोहतास का दुर्ग उधार देने की प्रार्थना की। राजा ने शेर खाँ की शक्ति से भयभीत होकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। शेर खाँ ने दुर्ग में पहुँचकर किले के सरंक्षकों की हत्या करवा दी और सम्पूर्ण राजकोष पर अधिकार कर लिया।

(iv) हुमायूँ के साथ संघर्ष – शेर खाँ तथा हुमायूँ का संघर्ष 1531 ई० से प्रारम्भ हुआ। 1531 ई० में दक्षिण बिहार पर शेर खाँ ने अधिकार करके सुप्रसिद्ध दुर्ग चुनार पर भी अधिकार कर लिया। जब हुमायूँ को यह सूचना मिली तो उसने शेर खाँ से चुनार त्यागने को कहा। लेकिन शेर खाँ ने चुनार दुर्ग का परित्याग नहीं किया, अतः अवज्ञा के कारण उसे दण्ड देने के लिए हुमायूं स्वयं सेना लेकर बिहार पहुँचा। शेर खाँ ने खुशामद के द्वारा हुमायूँ को राजी कर लिया और हुमायूँ ने चुनार उसी को सौंप दिया। ऐसा करने का कारण यह था कि हुमायूँ इस समय बहादुरशाह के साथ संघर्ष में संलग्न था। जब शेर खाँ ने सूरजगढ़ के युद्ध के द्वारा बिहार को पूर्णतया जीत लिया तथा 1537 ई० तक बंगाल पर भी उसका अधिकार हो गया तब हुमायूँ को उससे संघर्ष करना अनिवार्य हो गया। हुमायूँ ने चुनार पर घेरा डालकर उसे जीत लिया, किन्तु इसी बीच शेर खाँ ने गौड़ तथा रोहतास के दुर्गों को अपने अधिकार में ले लिया तथा वह दुर्ग में सुरक्षित पहुँच गया।

(v) चौसा और कन्नौज के युद्धों में विजय – अन्त में चौसा के युद्ध (1539 ई०) में शेर खाँ ने हुमायूँ को तोपखाने का प्रयोग करने का अवसर दिए बिना ही रणक्षेत्र से भागने को विवश कर दिया। चौसा का युद्ध शेर खाँ की शक्ति तथा प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए पर्याप्त था। इस युद्ध में विजय प्राप्त करके उसने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की तथा अगले वर्ष 1540 ई० में कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर उसे भारत से बाहर खदेड़ दिया।

(vi) सूर वंश की स्थापना – 1540 ई० में हुमायूँ को देश निकाला देकर शेरशाह भारत का सम्राट बन गया और भारत में मुगल वंश के स्थान पर उसने सूर वंश की स्थापना की।

प्रश्न 4.
शेरशाह के चरित्र और उपलब्धियों का मूल्याकंन कीजिए तथा सूर-साम्राज्य के पतन के जिम्मेदार महत्वपूर्ण कारणों का भी उल्लेख कीजिए।
उतर.
शेरशाह को भारत के इतिहास में उच्चतम सम्राटों में स्थान दिया जाता है और चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त तथा अकबर महान् के साथ उसकी तुलना की जाती है। शेरशाह के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) उदारता एवं दयालुता – शेरशाह एक प्रजावत्सल सम्राट था। वह प्रजा के साथ उदारता एवं दयालुतापूर्ण व्यवहार करता था। वह दण्ड देने में यद्यपि कठोर एवं अनुदार था, किन्तु उस युग में कठोरता के बिना अपराध समाप्त नहीं किए जा सकते थे। अपनी दरिद्र जनता के लिए उसका व्यवहार बड़ा ही दयापूर्ण था। कृषकों के प्रति वह अत्यन्त उदार था तथा उसके | राज्य में प्रतिदिन भिखारियों को दान दिया जाता था।

(ii) धार्मिक सहिष्णुता – शेरशाह प्रथम मुस्लिम सम्राट था, जिसमें उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। यद्यपि वह प्रतिदिन कुरान की आयतों का पाठ करता था तथा नमाज अदा करता था. तथापि उसने भारत में हिन्दुओं व मसलमानों के साथ समानता का व्यवहार किया और उच्च पदों पर हिन्दुओं को भी आसीन किया तथा उनके बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था की और एक सीमा तक उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। इस दृष्टिकोण से हम उसे अकबर महान् का अग्रज मान सकते हैं।

(iii) कर्तव्यपरायण – शेरशाह कर्तव्यपरायण सुल्तान था। वह अपने कर्तव्यों को भली-भाँति जानता था तथा समुचित रूप से उनका पालन भी करता था। बाल्यकाल से ही उसमें यह गुण विद्यमान था। सुल्तान बनने के उपरान्त भी वह अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहता था। वह दिन में 16 घण्टे कठोर परिश्रम करता था तथा अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था।

(iv) कठोर परिश्रमी – शेरशाह कठोर परिश्रमी था। वह दिन-रात परिश्रम करता था। इसी कारण वह अपने विलासी शत्रु हुमायूँ को पराजित कर सका। जिस समय को हुमायूं ने उत्सव और विलासिता में व्यतीत किया, उसी समय का सदुपयोग करके शेरशाह अपनी शक्ति बढ़ाने में सफल हुआ। वह छोटे-से-छोटे राज-काज की स्वयं देखभाल करता था। शासन के समस्त विभागों पर नियन्त्रण रखता था। इसी कारण वह अपने राज्य में सुव्यवस्था बनाए रखने में सफल रहा।

(v) विद्यानुरागी – शेरशाह को अधिक समय विद्याध्ययन के लिए नहीं मिल सका था तथापि उसे अध्ययन का बड़ा शौक था। जौनपुर में रहकर उसने स्वयं अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया तथा अनेक ऐतिहासिक एवं दार्शनिक पुस्तकों के विषय में उसे पर्याप्त ज्ञान था। सुल्तान बनने के उपरान्त उसने विद्या प्रसार के लिए अनेक पाठशालाएँ एवं मकतब निर्मित करवाए। उसके दरबार में अनेक विद्वानों को भी आश्रय प्राप्त था।

(vi) कुशल सेनापति एवं कूटनीतिज्ञ – वह एक कुशल सेनापति था। हुमायूं के साथ लड़े गए युद्धों में हमें उसके उच्चकोटि के सेनापति होने के गुण दृष्टिगोचर होते हैं। अपनी कूटनीति के कारण चौसा के युद्ध में कौशल प्रदर्शित किए बिना ही वह विजयी बना। बंगाल एवं बिहार के यद्धों में भी उसने अपने रण-कौशल का परिचय दिया। दिल्ली का सल्तान बनने के उपरान्त भी वह निरन्तर युद्धों में संलग्न रहा तथा अनेक छोटे-छोटे राज्यों पर उसने विजय प्राप्त की। युद्ध में वह छल एवं बल दोनों का उचित प्रयोग जानता था। चुनार, रोहतास तथा रायसीन पर उसने कूटनीति द्वारा ही विजय प्राप्त की थी।

(vii) न्यायप्रिय – शेरशाह न्यायप्रिय सुल्तान था। उसके राज्य में न्याय की समुचित व्यवस्था थी। न्याय के सम्मुख वह सबको समान समझता था तथा अपने पुत्र तक को साधारण व्यक्ति के समान दण्ड देता था। वह कठोर दण्ड में विश्वास करता था, जिससे अपराध सदा के लिए समाप्त हो जाएँ।

सूर साम्राज्य के पतन के कारण – भारत में दिल्ली पर प्रथम अफगान सत्ता को लोदी वंश ने स्थापित किया था, किन्तु बाबर ने 1526 ई० में इब्राहीम लोदी को परास्त करके दिल्ली में मुगल वंश की स्थापना की। शेरशाह सूरी ने 1540 ई० में बाबर के उत्तराधिकारी बादशाह हुमायूँ को दो युद्धों में परास्त करके दिल्ली में पुनः द्वितीय अफगान सत्ता स्थापित की। परन्तु अफगानों का यह द्वितीय साम्राज्य लगभग 15 वर्षों तक ही रहा। 1555 ई० में हुमायूँ ने क्रमश: ‘मच्छीवाड़ा’ और ‘सरहिन्द’ के युद्धों को जीतकर द्वितीय अफगान सत्ता को समाप्त कर दिया। इस प्रकार द्वितीय अफगान (सूर) साम्राज्य के पतन के निम्नलिखित कारण हैं

(i) इस्लामशाह के अयोग्य उत्तराधिकारी – इस्लामशाह का उत्तराधिकारी उसका अल्पायु पुत्र फीरोज था, जिसको तीन दिन पश्चात् ही उसके मामा मुबारिज खाँ ने मरवा डाला और आदिलशाह के नाम से स्वयं सुल्तान बन गया। परन्तु वह अयोग्य सिद्ध हुआ। इसी प्रकार इब्राहीम शाह और सिकन्दरशाह भी अयोग्य सिद्ध हुए। इनमें से कोई भी सूर साम्राज्य के विघटन को रोकने में सफल नहीं हुआ और सूर साम्राज्य खण्डित हो गया।

(ii) अफगानों की स्वतन्त्रता की प्रवृत्ति – सूर साम्राज्य की असफलता का मूल कारण अफगानों का एक केन्द्रीय शासन व्यवस्था को स्वीकार न करना था। अफगान आवश्यकता से अधिक अपने अधिकारों की स्वतन्त्रता पर बल देते थे, जिसके कारण वे एक सुल्तान के शासन के अधीन रहना पसन्द नहीं करते थे। इस कारण सुल्तान के दुर्बल या अयोग्य होते ही उनकी स्वतन्त्रता की महत्वाकाँक्षाएँ सम्मुख आ जाती थीं और वे पारस्परिक संघर्ष में फँस जाते थे। इससे साम्राज्य की एकता को क्षति पहुँचती थी, जो किसी भी साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार होती हैं।

(iii) प्रशासकीय कठिनाइयाँ – शेरशाह ने अपने शासनकाल में ही अपने विशाल साम्राज्य में श्रेष्ठ शासन-व्यवस्था स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। किन्त उसकी और उसके उत्तराधिकारी इस्लामशाह की मृत्यु के पश्चात् अफगानों में सिंहासन को प्राप्त करने के लिए पारस्परिक संघर्ष आरम्भ हुआ, जिससे यह व्यवस्था नष्ट हो गई। इसके अतिरिक्त आर्थिक कठिनाइयाँ भी उत्पन्न हो गई थीं। अफगान साम्राज्य के विभाजित हो जाने के कारण दिल्ली के शासक सिकन्दर लोदी के पास पर्याप्त सैनिक साधन भी उलपब्ध नहीं हो सके। फलत: मुगल सेना अफगान सेना से श्रेष्ठ सिद्ध हुई तथा हुमायूँ ने सिकन्दर लोदी को सरलता से परास्त करके दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

(iv) इस्लामशाह का उत्तरदायित्व – इस्लामशाह नि:सन्देह शेरशाह का योग्य उत्तराधिकारी था, परन्तु उसी के शासनकाल में अफगानों में आपस में तीव्र विभाजन हो गया। वह अपने सरदारों के प्रति शंकालु हो गया था और उसने अपने कई सरदारों को मरवा भी दिया। इसी कारण उसके विरुद्ध विद्रोह हो गया। वह विद्रोह को दबाने में तो सफल रहा किन्तु अफगान सरदारों की वफादारी पाने में असफल रहा। उसकी मृत्यु होते ही अफगान सरदारों की व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ और स्वतन्त्र प्रवृत्ति स्पष्ट रूप में सामने आ गई, जिनकी परिणति सूर साम्राज्य के पतन के रूप में हुई।

प्रश्न 5.
शेरशाह एक कुशल विजेता एवं प्रशासक था।प्रस्तुत कथन के आलोक में उसकी उपलब्धियों की समीक्षा कीजिए।
उतर.
कुशल विजेता एवं प्रशासक के रूप में शेरशाह की उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं
(i) गक्खर प्रदेश की विजय (1541 ई०) – शेरशाह का उद्देश्य बोलन दरें और पेशावर से आने वाले मार्गों को मुगलों के आक्रमण से सुरक्षित करना था। अत: झेलम और सिन्धु नदी के उत्तर में स्थित गक्खर प्रदेश पर अधिकार करना आवश्यक था क्योंकि इसकी स्थिति बड़ी ही महत्वपूर्ण थी। शेरशाह ने गक्खर सरदारों पर चढ़ाई की और उनके प्रदेश को बुरी तरह रौंद डाला, परन्तु उनकी शक्ति को समाप्त न कर सका। अनेक गक्खर सरदार इसके बाद भी शेरशाह का विरोध करते रहे। शेरशाह ने वहाँ रोहतासगढ़ नामक एक विशाल दुर्ग बनाया, जिससे उत्तरी सीमा की रक्षा और गक्खों की रोकथाम कर सके। शेरशाह ने वहाँ हैबत खाँ और खवास खाँ के नेतृत्व में 50,000 अफगान सैनिकों की एक शक्तिशाली सेना तैनात की।

(ii) बंगाल का विद्रोह और नई व्यवस्था (1541 ई०) – शेरशाह की एक वर्ष से अधिक की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर बंगाल का गवर्नर खिज्र खाँ स्वतन्त्र शासक बनने के स्वप्न देखने लगा। उसने बंगाल के मृत सुल्तान महमूद की लड़की से शादी कर ली और एक स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करने लगा। शेरशाह शीघ्रता से बंगाल आया और गौड़ पहुँचकर उसने खिज्र खाँ को कैद कर लिया। बंगाल जैसे दूरस्थ और धनवान सूबे में विद्रोह की आशंकाओं को समाप्त करने के लिए शेरशाह ने वहाँ एक अन्य प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित की। उसने बंगाल को सरकारों (जिलों) में बाँटकर उनमें से प्रत्येक को एक छोटी सेना के साथ शिकदारों के नियन्त्रण में दे दिया। इन शिकदारों की नियुक्ति बादशाह ही करता था। इन शिकदारों की देखभाल के लिए फजीलत नामक व्यक्ति को प्रान्त के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया। इस व्यवस्था के अन्तर्गत बंगाल में किसी भी अधिकारी के पास एक बड़ी सेना न रही, जिससे उनमें से कोई भी विद्रोह की स्थिति में न रहा।

(iii) मालवा की विजय( 1542 ई०) – बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात् मालवा के सूबेदार मल्लू खाँ ने 1537 ई० में स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और मालवा पर अधिकार करके कादिरशाह की उपाधि प्राप्त की। सारंगपुर, माण्डू उज्जैन और रणथम्भौर के मजबूत किले उसके अधिकार में थे। उसने शेरशाह के आधिपत्य को मानने से इन्कार कर दिया। शेरशाह ने अपने राज्य की सुरक्षा और एकता के लिए मालवा पर आक्रमण कर दिया। 1542 ई० में कादिरशाह ने डरकर सारंगपुर में आत्मसमर्पण कर दिया। शेरशाह ने मालवा पर अधिकार करके शुजात खाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया और कादिरशाह को लखनौती व कालपी की जागीरें दीं। परन्तु कादिरशाह अपनी जान बचाकर गुजरात भाग गया। वापस आते समय शेरशाह ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर उसे अपनी अधीनता में ले लिया। अतः ग्वालियर, माण्डू, उज्जैन, सारंगपुर, रणथम्भौर आदि शेरशाह के अधिकार में आ गए।

(iv) रायसीन की विजय (1543 ई०) – 1542 ई० में रायसीन के शासक पूरनमल ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी किन्तु शेरशाह को सूचना मिली कि पूरनमल मुस्लिम लोगों से अच्छा व्यवहार नहीं करता। अत: 1543 ई० में शेरशाह ने रायसीन को घेरे में ले लिया। कई माह तक रायसीन के किले का घेरा पड़ा रहा परन्तु शेरशाह को सफलता न मिली। अन्त । में शेरशाह ने चालाकी से काम लिया। उसने कुरान पर हाथ रखकर शपथ ली कि यदि किला उसे सौंप दिया जाए तो वह पूरनमल, उसके आत्मसम्मान एवं जीवन को हानि नहीं पहुंचाएगा। इस पर पूरनमल ने आत्मसमर्पण कर दिया। किन्तु मुस्लिम जनता के आग्रह पर शेरशाह ने राजपूतों के खेमों को चारों ओर से घेर लिया। राजपूत जी-जान से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अनेक राजपूत स्त्रियों ने जौहर (आत्मदाह) कर लिया किन्तु दुर्भाग्य से थोड़ी-सी राजपूत स्त्रियाँ और बच्चे जीवित रह गए, उन्हें गुलाम बना लिया गया। डा० ए०एल० श्रीवास्तव के अनुसार- पूरनमल के साथ शेरशाह का यह विश्वासघात उसके नाम पर बहुत बड़ा कलंक है।

(v) मुल्तान व सिन्धविजय(1543 ई०) – शेरशाह ने खवास खाँ को पंजाब से वापस बुलाकर वहाँ हैबत खाँ को सूबेदार के रूप में नियुक्त किया। हैबत खाँ ने फतह खाँ जाट को परास्त कर मुल्तान पर अधिकार कर लिया। शेरशाह ने हुमायूँ का पीछा करने के दौरान (1541ई०) ही सिन्ध पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार उत्तर-पश्चिम में शेरशाह के राज्य के अन्तर्गत पंजाब प्रान्त के अतिरिक्त मुल्तान और सिन्ध भी सम्मिलित हो गए।

(vi) मारवाड़ विजय( नवम्बर (1543 से मई 1544 ई० ) – मारवाड़ का शासक इस समय राजा मालदेव था। ईष्र्यांवश कुछ राजपूतों ने शेरशाह को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भड़काया तथा इस युद्ध में उसकी सहायता करने का भी वचन दिया। शेरशाह ने तुरंत ही एक सेना लेकर मारवाड़ की ओर कूच किया तथा 1544 ई० में मारवाड़ की राजधानी जोधपुर को घेर लिया। दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ, किन्तु मालदेव के वीर सैनिकों के सम्मुख शेरशाह की एक न चली।। अन्त में बल से विजय प्राप्त करने में असमर्थ शेरशाह ने छल-कपट का आश्रय लिया। शेरशाह अन्त में विजयी रहा। लेकिन इस युद्ध के बाद शेरशाह को यह कहना पड़ा कि मैंने केवल दो मुट्ठी बाजरे के लिए अपना सम्पूर्ण साम्राज्य ही दाँव पर लगा दिया था।

(vii) मेवाड़ विजय (1544 ई०) – मेवाड़ के वीर सम्राट राणा साँगा इस समय मर चुके थे और उनके अल्पव्यस्क पुत्र उदयसिहं मेवाड़ के राजा थे, जिनकी अल्पायु से लाभ उठाकर बनबीर मेवाड़ का सर्वेसर्वा बन बैठा था। ऐसे समय में शेरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

(viii) कालिंजर विजय (1545 ई०) – शेरशाह की अन्तिम विजय कालिंजर पर हुई। कालिंजर का दुर्ग बड़ा सुदृढ़ एवं अभेद्य माना जाता है। नवम्बर 1544 ई० में उसने दुर्ग के चारों ओर घेरा डाल दिया, लेकिन एक वर्ष तक घेरा डाले रखने पर भी शेरशाह उस पर अधिकार न कर सका। तब उसने दुर्ग की दीवारों को गोला-बारूद से उड़ाने का निश्चय किया तथा दुर्ग के चारों ओर मिट्टी एवं बालू के ऊँचे-ऊँचे ढेर लगवा दिए। जब ढेर दुर्ग की दीवारों से भी ऊँचे हो गए तब शेरशाह सूरी की आज्ञानुसार 22 मई, 1545 ई० को अफगान सैनिकों ने इन पर चढ़कर दुर्ग में स्थित राजपूतों का संहार करना आरम्भ कर दिया। इसी समय शेरशाह नीचे से तोपखाने का निरीक्षण कर रहा था, तभी एक गोला फटने से उसे बहुत चोट आई; तथापि उसने आक्रमण को निरन्तर जारी रखने की आज्ञा दी तथा शाम तक दुर्ग पर उसका अधिकार हो गया।

(ix) साम्राज्य का विस्तार – शेरशाह ने अपनी मृत्यु के समय तक असोम, कश्मीर और गुजरात को छोड़कर उत्तर-भारत के प्रायः सम्पूर्ण भू-प्रदेश पर अपनी सत्ता को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। शेरशाह एक विस्तृत साम्राज्य के संस्थापक के अतिरिक्त एक महान शासन-प्रबन्धक भी था, जिसके कारण उसकी गिनती मध्य युग के श्रेष्ठ शासकों में होती है।

प्रश्न 6.
शेरशाह की शासन-व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए। उसे अकबर का पथ-प्रदर्शक क्यों कहा गया?
उतर.
शेरशाह की शासन-व्यवस्था – शेरशाह की शासन-व्यवस्था के लिए विस्तृत उत्तरी प्रश्न संख्या-2 का अवलोकन कीजिए। शेरशाह अकबर का पथ-प्रदर्शक- एक शासन-व्यवस्था की दष्टि से शेरशाह को अकबर का अग्रणी (पथ-प्रदर्शक) माना गया है। शेरशाह के सैनिक प्रबन्ध, सरदारों पर उसके नियन्त्रण, उसकी न्याय की भावना, उसकी प्रजा के हित की भावना और शासन के मूल सिद्धान्त आदि सभी का अकबर ने पूर्ण लाभ उठाया। शेरशाह ने राजपूतों से अधीनता स्वीकार कराकर उनके राज्य उन्हें वापस कर दिये थे। अकबर ने इसको और विस्तार से अपनाया।

शेरशाह की लगान व्यवस्था भी अकबर के लिए मार्गदर्शक बनी। शेरशाह के किसानों, व्यापारियों और जन-हित के कार्यों को अकबर ने यथावत् रूप से स्वीकार कर लिया। नि:सन्देह शेरशाह ने अकबर के शासन की आधारशिला का निर्माण किया और उसका अग्रणी अथवा पथ-प्रदर्शक बना। डॉ० आर०पी० त्रिपाठी ने लिखा है “यदि शेरशाह अधिक समय तक जीवित रहता तो सम्भवतया वह अकबर से महान् हो जाता। नि:सन्देह, वह दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ सुल्तान-राजनीतिज्ञों में से एक था। निश्चय ही उसने अकबर की महान् उदार नीति के मार्ग का निर्माण किया और वह सही अर्थों में उसका अग्रणी था।”

प्रश्न 7.
शेरशाह सूरी के शासन-प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
उतर.
शेरशाह का शासन-प्रबन्ध- इतिहासकारों ने शेरशाह को अकबर से भी श्रेष्ठ रचनात्मक बुद्धि वाला और राष्ट्र-निर्माता बताया है। सैनिक और असैनिक दोनों ही मामलो में शेरशाह ने संगठनकर्ता की दृष्टि से शानदार योग्यता का परिचय दिया। नि:सन्देह शेरशाह मध्य युग के महान् शासन-प्रबन्धकों में से एक था। उसने किसी नई शासन-व्यवस्था को जन्म नहीं दिया बल्कि उसने पुराने सिद्धान्तों और संस्थाओं को ऐसी कुशलता से लागू किया कि उनका स्वरूप नया दिखाई दिया। इस प्रकार योग्य शासन-प्रबन्ध की दृष्टि से इतिहास में शेरशाह का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। शेरशाह का शासन-प्रबन्ध निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है
(i) प्रान्तीय शासन-प्रबन्ध
(क) इक्ता या सूबा – शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए शेरशाह ने साम्राज्य को अनेक भागों में बाँट रखा था। उस समय राज्य में ‘सरकार’ सबसे बड़ा खण्ड कहलाता था। सरकार ऐसे प्रशासकीय खण्ड थे जो कि प्रान्तों से मिलते-जुलते थे और जो इक्ता कहलाते थे और प्रमुख अधिकारियों के अधीन थे। शेरशाह के समय फौजी गवर्नरों की नियुक्तियाँ भी होती थीं। जिन राज्यों को शासन करने की स्वतन्त्रता दे दी गई थी, उन्हें सूबा या इक्ता कहा जाता था। सूबे का प्रमुख हाकिम अथवा फौजदार होता था। फिर भी शेरशाह के प्रान्तीय प्रशासन का विवरण स्पष्ट नहीं है।

(ख) सरकारें (जिले ) – प्रत्येक इक्ता या सूबा सरकारों में बँटा होता था। शेरशाह की सल्तनत में 66 सरकारें थीं। प्रत्येक सरकार में दो प्रमुख अधिकारी होते थे- ‘शिकदार-ए-शिकदारान’ और ‘मुन्सिफ-ए-मुनसिफान’। शिकदार-ए-शिकदारान सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष होता था तथा विभिन्न परगनों के शिकदारों पर प्रशासनिक अधिकारी होता था। अपनी सरकार में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना करना तथा विद्रोही जमींदारों का दमन करना उसका प्रमुख कर्तव्य था। मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान मुख्यतया न्याय-अधिकारी था। दीवानी मुकदमों का फैसला करना और अपने अधीन मुन्सिफों के कार्यों की देखभाल करना उसका दायित्व था।

(ग) परगने – प्रत्येक सरकार में कई परगने होते थे। शेरशाह ने प्रत्येक परगने में एक शिकदार, एक अमीन (मुन्सिफ), एक फोतदार (खजांची) और दो कारकून (लिपिक) नियुक्त किए गए थे। शिकदार के साथ एक सैनिक दस्ता होता था और उसका कर्तव्य परगने में शान्ति स्थापित करना था। मुन्सिफ का कार्य दीवानी मुकदमों का निर्णय करना और भूमि की नाप एवं लगान-व्यवस्था की देखभाल करना था। फोतदार परगने का खजांची था और कारकूनों का कार्य हिसाब-किताब लिखना था।

(घ) गाँव – शासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। प्रत्येक गाँव में मुखिया, पंचायतें और पटवारी होते थे, जो स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था करते थे। गाँव की अपनी पंचायत होती थी, जो गाँव में सुरक्षा, शिक्षा, सफाई आदि का प्रबन्ध करती थी। शेरशाह ने गाँव की परम्परागत व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया था परन्तु गाँव के इन अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करना पड़ता था। अन्यथा इन्हें दण्ड दिया जाता था।

(ii) भू-राजस्व व्यवस्था – राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर अथवा लगान था। इसके अतिरिक्त लावारिस सम्पत्ति, व्यापारिक कर, टकसाल, नमक-कर, अधीनस्थ राजाओं, सरदारों एवं व्यापारियों द्वारा दिए गए उपहार, युद्ध में लूटे गए माल का 1/5 भाग, जजिया इत्यादि आय के साधन थे। शेरशाह किसानों की भलाई में ही राज्य की भलाई मानता था। उसकी लगान-व्यवस्था बहुत अच्छी मानी जाती है, उसकी लगान-व्यवस्था निम्न प्रकार थी

(क) शेरशाह की लगान – व्यवस्था मुख्यतया रैयतवाड़ी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया जाता था। इस कार्य में शेरशाह को पूर्ण सफलता नहीं मिली और जागीरदारी प्रथा भी चलती रही। मालवा और राजस्थान में यह व्यवस्था लागू नहीं की जा सकी।

(ख) उत्पादन के आधार पर ही भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटा गया था- उत्तम, मध्यम और निम्न।

(ग) खेती योग्य सभी भूमि की नाप की जाती थी और पता लगाया जाता था कि किस किसान के पास कितनी और किस श्रेणी की भूमि है। उस आधार पर पैदावार का औसत निकाला जाता था।

(घ) लगान निश्चित करने की उस समय तीन प्रणालियाँ थीं – (अ) गल्ला बक्सी अथवा बँटाई (खेत बँटाई, लँक बँटाई और रास बँटाई), (ब) नश्क या कनकूत तथा (स) नकद अथवा जब्ती। सामान्यत: किसान बँटाई प्रणाली को ही पसन्द करता था।

(ड.) किसानों को सरकार की ओर से पट्टे दिए जाते थे, जिनमें स्पष्ट किया गया होता था कि उस वर्ष उन्हें कितना लगान देना है। किसान ‘कबूलियत-पत्र के द्वारा इन्हें स्वीकार करते थे।

(च) लगान के अलावा किसानों को जमीन की पैमाइश और लगान वसूल करने में संलग्न अधिकारियों के वेतन आदि के लिए सरकार को ‘जरीबाना’ और ‘महासीलाना’ नामक कर देने पड़ते थे जो पैदावार का 2.5% से 5% तक होता था। किसान को 2.5% अन्य कर भी देना पड़ता था, जिससे अकाल अथवा बाढ़ की दशा में जनता को सहायता मिलती थी।

(छ) शेरशाह का स्पष्ट आदेश था कि लगान लगाते समय किसानों के साथ सहानुभूति का बर्ताव किया जाए लेकिन लगान वसूल करते समय कोई नरमी न बरती जाए।

(ज) किसानों को यह सुविधा थी कि वे लगान नकद या जिन्स के रूप में दे सकते थे, लकिन सरकार नकद के रूप में लेना ज्यादा पसन्द करती थी।

(झ) शेरशाह यह ध्यान रखता था कि युद्ध के अवसर पर कृषि की कोई हानि न हो और जो हानि हो जाती थी, उसकी पूर्ति कर दी जाती थी।

(iii) केन्द्रीय शासन-प्रबन्ध – सुल्तान- दिल्ली सल्तनत के शासकों की भाँति शेरशाह भी एक निरंकुश शासक था और उसकी शक्ति एवं सत्ता अपरिमित थी। शासन नीति और दीवानी तथा फौजदारी मामलों के संचालन की शक्तियाँ उसी के हाथों में केन्द्रित थीं। उसके मन्त्री स्वयं निर्णय नहीं लेते थे बल्कि केवल उसकी आज्ञा का पालन और उसके द्वारा दिए गए कार्यों की पूर्ति करते थे।

इस कारण शासन की सुविधा की दृष्टि से शेरशाह को सल्तनतकाल की व्यवस्था के आधार पर चार मन्त्री विभाग बनाने पड़े थे। ये निम्नलिखित थे
(क) दीवाने वजारत – यह लगान और अर्थव्यवस्था का प्रधान था। राज्य की आय और व्यय की देखभाल करना इसका दायित्व था। इसे मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल का भी अधिकार था।

(ख) दीवाने-आरिज – यह सेना के संगठन, भर्ती, रसद, शिक्षा और नियन्त्रण की देखभाल करता था, परन्तु यह सेना का सेनापति न था। शेरशाह स्वयं ही सेना का सेनापति था और स्वयं सेना के संगठन और सैनिकों की भर्ती आदि में रुचि रखता था।

(ग) दीवाने-रसालत – यह विदेश मन्त्री की भाँति कार्य करता था। अन्य राज्यों से पत्र-व्यवहार करना और उनसे सम्पर्क रखना इसका दायित्व था। कूटनीतिक पत्र-व्यवहार भी इसे ही सम्भालना होता था।

(घ) दीवाने – इंशा- इसका कार्य सुल्तान के आदेशों को लिखना, उनका लेखा रखना, राज्य के विभिन्न भागों में उनकी सूचना पहुँचाना और उनसे पत्र-व्यवहार करना था। इनके अतिरिक्त दो अन्य मन्त्रालय भी थे, ‘दीवाने-काजी’ और ‘दीवाने-बरीद’। दीवाने-काजी सुल्तान के पश्चात् राज्य के मुख्य न्यायाधीश की भॉति कार्य करता था और दीवाने-बरीद राज्य की गुप्तचर व्यवस्था और डाकव्यवस्था की देखभाल करता था। इसके अतिरिक्त बादशाह के महलों तथा नौकर-चाकरों की व्यवस्था के लिए एक अलग अधिकारी होता था।

(iv) सड़कें और सरायें – शेरशाह ने अपने समय में कई सड़कों का निर्माण कराया और पुरानी सड़कों की मरम्मत कराईं। शेरशाह ने मुख्यतया चार प्राचीन सड़कों की मरम्मत और निर्माण कराया। ये सड़कें निम्नलिखित थीं
(क) एक सड़क बंगाल के सोनारगाँव, आगरा, दिल्ली, लाहौर होती हुई पंजाब में अटक तक जाती थी अर्थात् (ग्रांड ट्रंक रोड), जिसे ‘सड़के-आजम’ के नाम से पुकारा जाता था।

(ख) दूसरी, आगरा से बुरहानपुर तक।

(ग) तीसरी, आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक और

(घ) चौथी, लाहौर से मुल्तान तक जाती थी। शेरशाह ने इन सड़कों के दोनों ओर छायादार और फलों के वृक्ष लगवाए थे। उसने इन सभी सड़कों पर प्राय: दोदो कोस की दूरी पर सरायें बनवाई थीं। उसने अपने समय में करीब 1,700 सरायों का निर्माण कराया। इन सभी सरायों में हिन्दू और मुसलमानों के ठहरने के लिए अलग-अलग प्रबन्ध था। व्यापारी, यात्री, डाक-कर्मचारी आदि सभी यहाँ संरक्षण और भोजन प्राप्त करते थे।

(v) मुद्रा व्यवस्था – शेरशाह ने पुराने और घिसे हुए, पूर्व शासकों के प्रचलित सिक्के बन्द करके उनके स्थान पर सोने, चाँदी और ताँबे के नये सिक्के चलाए और उनका अनुपात निश्चित किया। उसके चाँदी के रुपए का वजन 180 ग्रेन था, जिसमें 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी होती थी। सोने के सिक्के 166.4 ग्रेन और 168.5 ग्रेन के ढाले गए थे। ताँबे का सिक्का दाम कहलाता था। सिक्कों पर शेरशाह का नाम, उसकी पदवी और टकसाल का स्थान अरबी या देवनागरी लिपि में अंकित रहता था। शेरशाह के रुपए के बारे में इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है “यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा-प्रणाली का आधार है।”

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