UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 17
Chapter Name Process of Development (विकास की प्रक्रिया)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development (विकास की प्रक्रिया)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘विकास’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विकास में होने वाले परिवर्तनों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास का अर्थ
(Meaning of Development)

प्रायः विकास का अर्थ आयु में बड़े होने या कद में बड़े होने से लगाया जाता है, परन्तु विकास का यह अर्थ भ्रामक है। विकास का अर्थ है-“वे व्यवस्थित तथा समानुगत परिवर्तन, जो परिपक्वता की प्राप्ति में सहायक होते हैं। यहाँ पर व्यवस्थित का अर्थ है-क्रमबद्धता, अर्थात् शारीरिक और मानसिक परिवर्तन में कोई-न-कोई क्रम अवश्य होता है और प्रत्येक परिवर्तन अपने पूर्व परिवर्तन पर निर्भर रहता है। समुनगत शब्द का अर्थ है, इन परिवर्तनों में परस्पर सामंजस्य होता है अर्थात् ये परिवर्तन सम्बन्धविहीन नहीं होते। कुछ विद्वान् विकास को एक अवधारणा मानते हैं, परन्तु गैसल (Gassel) के अनुसार विकास एक अवधारणा मात्र नहीं है, वरन् विकास एक अवधारणा से कहीं अधिक है। विकास का निरीक्षण किया जा सकता है तथा उसका मूल्यांकन भी किया जा सकता है। विकास व्यक्ति में नवीन योग्यताएँ उत्पन्न करता है, जिससे उसमें नवीन विशेषताओं का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में, विकास निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जन्म से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है।

विकास की परिभाषाएँ
(Definitions of Development)

विकास की कुछ प्रमुख परिभाषाओं का विवरण इस प्रकार है-

  1. जेम्स ड्रेवर (James Drever) के अनुसार, “विकास वह दशा है, जो प्रगतिशील परिवर्तन के रूप में व्यक्ति में निरन्तर प्रकट होती है अर्थात् यह प्रगतिशील परिवर्तन किसी भी व्यक्ति में भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक चलता है और विकासतन्त्र को नियन्त्रण में रखता है। यह दशा प्रगति का मापदण्ड होती है तथा इसका प्रारम्भ शून्य से होता है।”
  2. मुनरो (Munro) के अनुसार, “परिवर्तन श्रृंखला की वह व्यवस्था, जिसमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास के नाम से जानी जाती है।”
  3. हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, “विकास अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है। इसके बजाय उनमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन मान्यताएँ होती हैं।”
  4. इंगलिश (English) के अनुसार, “विकास प्राणी की शरीर अवस्था में एक लम्बे समय तक होने वाले लगातार परिवर्तन का एक क्रम है। यह विशेषतया ऐसा परिवर्तन है, जिसके कारण जन्म से लेकर परिपक्वता और मृत्यु तक प्राणी में स्थायी परिवर्तन होते हैं।’

विकास में परिवर्तन के रूप
(Types of Changes in Development)

विकास में मुख्यतया चार प्रकार के परिवर्तन होते हैं|

1. आकार में परिवर्तन- आयु-वृद्धि के साथ-साथ बालकों के शारीरिक पक्ष में पर्याप्त परिवर्तन दिखलाई पड़ने लगता है। आकार में यह परिवर्तन परिपक्वता तक चलता रहता है। जन्म लेने के पश्चात् आयु के बढ़ने के साथ-साथ बालक की लम्बाई, भार, आकार आदि में भी वृद्धि होने लगती है। इसी प्रकार शरीर के आन्तरिक भाग में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। उदाहरण के लिए-फेफड़े, हृदय तथा आँतों के आकार में वृद्धि हो जाती है। बालक नवीन शब्दों को सीखते हैं, जिससे उनके शब्दकोश का विस्तार होता है। धीरे-धीरे उनमें तर्कशक्ति का भी विकास होता जाता है।

2. अनुपात में परिवर्तन- विकास की प्रक्रिया में बालक के शारीरिक विकास में आनुपातिक परिवर्तन होता है। बालक को एक प्रौढ़ के रूप में समझना भारी भूल है, क्योंकि बालक तथा प्रौढ़ दोनों के शरीर में अनुपात सम्बन्धी विभिन्नता पायी जाती है। लगभग 14 वर्ष की आयु (किशोरावस्था) में जाकर बालक और प्रौढ़ के अनुपात के पुराने लक्षणों की समाप्ति में शारीरिक समानता आने लगती है। प्रारम्भ में शारीरिक विकास के अनुपात में इस प्रकार परिवर्तन होते हैं–सिर के अनुपात में दूनी, शरीर के अनुपात में तीन-गुनी तथा मस्तिष्क और शरीर के ऊपरी अंगों में चार-गुनी वृद्धि हो जाती है।

अनुपात सम्बन्धी परिवर्तन मानसिक रूप से भी दृष्टिगोचर होते हैं। छोटे बालक कल्पना तो करते हैं, परन्तु उनकी कल्पना लक्ष्यहीन होती है। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है, उसकी कल्पना में वास्तविकता का अंश आने लगता है। इसी प्रकार आयु के साथ-साथ बालक की रुचियों में भी परिवर्तन होता है। प्रारम्भ में बालक स्वयं अपने में तथा अपने खिलौनों में रुचि लेता है। जब वह पर्याप्त बड़ा हो जाता है, तब वह आस-पास के साथी बालकों के साथ खेलने में रुचि लेने लगता है।

3. पुराने लक्षणों की समाप्ति- जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है, वैसे-ही-वैसे उसके पुराने लक्षण लुप्त होते जाते हैं। उदाहरणार्थ–एक छोटा शिशु प्रारम्भ में हाथ-पैर चलाता है, सरक-सरक कर चलता है तथा तुतला कर बोलता है, परन्तु वर्ष भर के बाद इनमें से अभिकांश लक्षणों का लोप हो जाता है। इसी प्रकार आयु-वृद्धि के साथ शरीर के अन्दर थाईमस ग्लैण्ड (Thymus Gland) का लोप हो जाता है। दूध के दाँत, जो जन्म के पश्चात् निकलते हैं, कुछ वर्ष बाद गिर जाते हैं और उनके स्थान पर स्थायी दाँत निकल आते हैं।

4. नवीन विशेषताओं की प्राप्ति- विकास क्रम में जहाँ पुराने लक्षणों का लोप हो जाता है, वहीं बालक का शरीर नवीन रूपरेखा ग्रहण करने लगता है। उदाहरण के लिए-तुतलाहट के स्थान पर बालक स्पष्ट बोलने लगता है। किशोरावस्था में तो अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। बालकों के दाढ़ी-मूंछ निकलने लगती है। उनकी आवाज में भारीपन आ जाता है। बालिकाओं के स्तनों में उभार आ जाता है। इन शारीरिक परिवर्तनों के कारण किशोर-किशोरियों की मानसिक क्रियाओं तथा सांवेगिक प्रतिक्रियाओं में पर्याप्त परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। दोनों वर्गों के सदस्यों में परस्पर आकर्षण तथा रुचि अत्यधिक तीव्रता से बढ़ने लगती है।

प्रश्न 2
विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
विकास के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए तथा उनका शैक्षिक महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विकास के सिद्धान्त
(Theories of Development)

विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का व्यक्ति के जीवन में सर्वाधिक महत्त्व है। विकास की प्रक्रिया की समुचित व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। विकास सम्बन्धी मुख्य सिद्धान्तों का विवरण निम्नवर्णित है –

1. निरन्तर विकास का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार, बालक का विकास तभी से प्रारम्भ हो जाता है, जब वह गर्भावस्था में होता है। विकास की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। दूसरे शब्दों में, विकास अचानक नहीं होता, वरन् उसमें निरन्तरता रहती है। स्किनर के अनुसार, “विकास प्रक्रियाओं की निरन्तरता का सिद्धान्त केवल इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई अचानक परिवर्तन नहीं होता।”

2. सामान्य से विशिष्ट की ओर का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार, बालक का विकास सामान्य प्रक्रियाओं से विशिष्ट प्रक्रियाओं की ओर होता है। उदाहरण के लिए प्रारम्भ में बालक अपने सम्पूर्ण हाथ का संचालन करता है, तत्पश्चात् धीरे-धीरे वह अपनी उँगलियों पर नियन्त्रण स्थापित करता है। विकास की समस्त अवस्थाओं में बालक की प्रक्रियाएँ विशिष्ट बनने से पूर्व सामान्य होती हैं।

3. विकास की विभिन्न गति का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार एक ही मापदण्ड से समस्त बालकों के विकास का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। विभिन्न बालकों के विकास की गति में भिन्नता पायी जाती है और यह भिन्नता अन्त तक बनी रहती है।

4. समान प्रतिमान का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार समान प्रजाति (Race) में विकास की गति समान प्रतिमानों से प्रभावित होती है। हरलॉक के अनुसार, “प्रत्येक प्रजाति, वह चाहे मानव जाति हो या पशु जाति, अपनी जाति के अनुरूप विकास का अनुकरण करती है।” मनुष्य चाहे अमेरिका में पैदा हो या भारत में, उसका मानसिक, शारीरिक तथा संवेगात्मक विकास समान रूप से होता है।

5. विकास क्रम का सिद्धान्त- शिरले (Shirley) तथा गैसिल (Gassal) आदि ने परीक्षण करके यह सिद्ध कर दिया है कि बालक का गामक (Motor) तथा भाषा (Language) सम्बन्धी विकास एक निश्चित क्रम में होता है। प्रत्येक बालक जन्म के समय केवल रोना जानता है। तीन माह के पश्चात् वह ध्वनि निकालने लगता है। सात माह के पश्चात् वह मा, मी, पा, पा आदि शब्दों का उच्चारण करने लगता है।

6. विकास दिशा का सिद्धान्त- कुछ विद्वानों के अनुसार बालक के विकास की प्रक्रिया सिर से पैर की दिशा की ओर चलती है। प्रारम्भ में बालक केवल अपना सिर उठा पाता है। तीन माह के बाद वह अपने नेत्रों की गति पर नियन्त्रण कर लेता है। छह माह में उसका अपने हाथों की गतियों पर नियन्त्रण हो जाता है। नौ माह में वह सहारे से बैठने लगता है तथा एक वर्ष में लड़खड़ा कर चलने लगती है।

7. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर सम्बन्ध रहता है। दूसरों शब्दों में, बालक के शारीरिक विकास, मानसिक और संवेगात्मक पक्षों के विकास में परस्पर सम्बन्ध रहता है। जब बालक का शारीरिक विकास होता है तो उसके साथ-साथ उसकी ध्यान केन्द्रित करने की शक्तियों, रुचियों तथा संवेदनाओं में भी परिवर्तन होता रहता है।

8. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त- प्रत्येक बालक के विकास का अपना निजी स्वरूप होता है। ऐसी दशा में वैयक्तिक भिन्नताओं का होना स्वाभाविक है। सम आयु के दो बालकों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि पक्षों के विकास में वैयक्तिक विभिन्नताओं के दर्शन होते हैं।

9. वंशानुक्रमण तथा वातावरण की अन्तःक्रिया का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बालक का विकास वंशानुक्रमण तथा वातावरण की अन्त:क्रिया द्वारा होता है। यदि यह कहा जाए कि केवल वंशानुक्रमण ही बालक के विकास में योग देता है, तो यह बात सर्वथा गलत है। यही बात वातावरण के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।

विकास के सिद्धान्त का शैक्षिक महत्त्व
(Educational Importance of Principle of Development)

विकास की प्रक्रिया का बालक एवं व्यक्ति के जीवन के सभी पक्षों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि विकास के सिद्धान्तों का विशेष शैक्षिक महत्त्व भी है। वास्तव में शिक्षा की प्रक्रिया का विकास की प्रक्रिया से घनिष्ठ एवं अटूट सम्बन्ध है। शिक्षा की प्रक्रिया सदैव विकास की प्रक्रिया के साथ-साथ चलती है। विकास की प्रक्रिया के सुचारु होने की दशा में शिक्षा की प्रक्रिया भी सामान्य एवं सुचारु रूप से चलती है। विकास की प्रक्रिया का मूल्यांकन विकास के सिद्धान्तों के आधार पर ही किया जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विकास के सिद्धान्तों का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3
विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। या विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing the Development)

यह सत्य है कि विकास की प्रक्रिया में एक प्रकार की समरूपता पायी जाती है, परन्तु इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है कि विकास एवं व्यक्तिगत प्रक्रिया भी है। प्रत्येक व्यक्ति का विकास उसके अपने ही ढंग से होता है। इस भिन्नता का मूल कारण यह है कि व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया पर विभिन्न कारक अपना-अपना विशिष्ट प्रभाव डालते हैं। इस स्थिति में विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को जानना भी आवश्यक है। विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. बुद्धि- बालकों के विकास पर प्रभाव डालने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक बुद्धि है। प्रायः तीव्र बुद्धि के बालकों का विकास तेजी से होता है और मन्द बुद्धि के बालकों का धीमी गति से। टरमन (Turman) के अनुसार, कुशाग्र बुद्धि के बालक 13 माह की आयु में चलना सीख जाते हैं, सामान्य बुद्धि के 14 माह में, मूर्ख बालक 22 माह की आयु में तथा मूढ़ बालक 30 माह की आयु में चलना सीखते हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि बुद्धि और विकास में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है।

2. प्रजाति- प्रजातीय भिन्नता बालक के विकास को भी प्रभावित करती है। विभिन्न प्रजातियों की विकास दरें एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। आर्य, द्रविड़, मंगोल आदि के मानसिक तथा शारीरिक विकास में पर्याप्त भिन्नता मिलती है।

3. संस्कृति- जंग (Jung) के अनुसार, “व्यक्ति के विकास में संस्कृति की स्थिति की भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। बालक का विकास जातीय संस्कृति के अनुरूप ही होता है। जो संस्कृति जितनी अधिक उन्नत होगी, बालक उससे उसी मात्रा में गुणों का अर्जन करेगा।” विभिन्न संस्कृतियों के बालकों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सोमान्य.सहज प्रवृत्तियाँ प्रत्येक संस्कृति में पायी जाती हैं, परन्तु उनको अभिव्यक्त करने के ढंग अलग-अलग हैं।

4. यौन- भिन्नता–इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिल चुके हैं कि यौन-भेद बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास में एक विशिष्ट भूमिका रखते हैं। लड़के और लड़कियों के शारीरिक विकास में पर्याप्त अन्तर होता है। लड़के जन्म से लड़कियों से कुछ बड़े होते हैं, परन्तु विकास लड़कियों का अधिक तीव्रता से होता है। वे लड़कों की अपेक्षा पहले युवा हो जाती हैं। इसी प्रकार लड़कियों के मानसिक विकास में भी तीव्रता होती है। लड़कों की अपेक्षा वे शीघ्र बोलना सीख जाती हैं।

5. अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ- अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ भी बालक के विकास को प्रभावित करती हैं। इनका प्रभाव मुख्य रूप से बालक के मानसिक विकास पर पड़ता है। इन ग्रन्थियों का अभाव मांसपेशियों में पर्याप्त उत्तेजना उत्पन्न करता है तथा अस्थियों का विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। गल ग्रन्थियों से निकलने वाला रस सबसे अधिक बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास को प्रभावित करता है। इसकी न्यूनता से बालक को शारीरिक तथा मानसिक विकास रुक जाता है।

6. पौष्टिक भोजन- पौष्टिक आहार का प्रत्येक अवस्था में महत्त्व होता है, परन्तु सबसे अधिक महत्त्व बाल्यावस्था में होता है। यदि बालक को बाल्यावस्था में ही पौष्टिक भोजन मिलना आरम्भ हो जाता है तो उसका विकास उचित दिशा में होता है। भोजन की मात्रा की अपेक्षा खाद्य सामग्री का विटामिन युक्त होना आवश्यक है। जिन बालकों को उचित मात्रा में पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, उनका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता तथा वे विभिन्न रोगों से भी ग्रस्त हो जाते हैं। अत: बालकों के उचित विकास के लिए सन्तुलित भोजन का विशेष महत्त्व है।

7. शुद्ध वायु और प्रकाश- शुद्ध वायु तथा प्रकाश बालक के कद, परिपक्वता तथा सामान्य स्वास्थ्य को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। जिन बालकों का पालन-पोषण पर्याप्त एवं शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश में होता है, उनका शारीरिक विकास उन बालकों की अपेक्षा उत्तम होता है, जो प्रकाशहीन तथा अशुद्ध वायु से परिपूर्ण वातावरण में रहते हैं।

8. रोग तथा चोट- यदि बालक के सिर तथा अन्य कोमल अंगों में चोट लग जाती है तो उसका भी शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार विषैली ओषधियों का भी विकास पर कुप्रभाव पड़ता है।

9. परिवार की स्थिति- परिवार की स्थिति भी बालक के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यदि परिवार में तीन बालक हैं तो उनकी विकास प्रक्रिया में अन्तर मिलेगा। पहले बालक की अपेक्षा तीसरे बालक का विकास अपेक्षाकृत शीघ्र होता है, क्योंकि उसे अपने भाई-बहनों के अनुकरण के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। इसी प्रकार जिन बालकों का परिवार में लाड़-प्यार अधिक होता है, उनका विकास उन बालकों से भिन्न होता है, जिसके साथ डाँट-फटकार तथा उपेक्षा का व्यवहार किया जाता है। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि विकास की प्रक्रिया को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। सन्तुलित विकास के लिए पौष्टिक भोजन तथा स्वास्थ्यवर्द्धक परिस्थितियाँ अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास के मुख्य कारण
(Main Causes of Development)

विकास की प्रक्रिया के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. परिपक्वीकरण- परिपक्वीकरण का अर्थ होता है-स्वाभाविक विकास। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को वंशानुगत रूप से प्राप्त शील गुणों को, जो उसके अन्दर विद्यमान हैं, का विकास ही परिपक्वता है। प्रायः यह देखा गया है कि परिपक्वता के आधार पर बालक में एकाएक शील गुण प्रकट होते हैं। हरलॉक ने परिपक्वता की परिभाषा देते हुए लिखा है-”परिपक्वता से तात्पर्य वंशानुक्रम के प्रभाव के कारण व्यक्ति में शील गुणों के प्रभावी विकास से है, जिनकी व्यक्ति में जन्म के समय क्षमता होती है।” संक्षेप में, बालक के शील गुणों का स्पष्टीकरण ही परिपक्वता है। यह मानव के विकास की अनवरत प्रक्रिया है। आयु के विकास के साथ-साथ जैसे-जैसे बालक परिपक्व होता जाता है, वैसे ही उसमें कुछ विशेषताएँ स्पष्ट होती जाती हैं तथा परिपक्वता के साथ-साथ शरीर में विभिन्न क्रियाओं के लिए क्षमता भी उत्पन्न होती जाती है।

2. सीखना- सीखने को अधिगम (Learning) भी कहा जाता है। जन्म लेने के पश्चात् बालक अपने को एक विशेष प्रकार के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण से घिरा पाता है। बालक की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति इस भौतिक और सामाजिक वातावरण के अन्दर ही होती है, परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को अपने वातावरण में कुछ-न-कुछ संघर्ष अथवा अनुकूलन करना पड़ता है। इस प्रकार के अनुकूलन के लिए वह गत अनुभवों की सहायता से अपने व्यवहार में परिवर्तन लाता है और इस प्रकार सीख जाता है। गेट्स (Gates) के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।’ अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इससे लाभ ” उठाकर व्यक्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है। सीखना एक विकास भी है, जिसका कभी अन्त नहीं होता। जीवन-पथ के प्रत्येक कदम पर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है।

प्रश्न 2
विकास तथा वृद्धि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विकास तथा वृद्धि में अन्तर
(Difference between Development and Growth)

सामान्य अर्थ में विकास और वृद्धि समानार्थी है, परन्तु वास्तविकता यह है कि विकास और वृद्धि में पर्याप्त अन्तर है। शरीर के अंगों में बढ़ोतरी वृद्धि कहलाती है और इस वृद्धि का मापन तथा मूल्यांकन भी किया जा सकता है। इसके विपरीत विकास शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तन का बोध कराता है। उदाहरण के लिए-आयु-वृद्धि के साथ बालक की हड्डियों में वृद्धि होती जाती है तथा इनमें कठोरता और मजबूती आती जाती है। इस प्रकार वृद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यतः शरीर तथा उसके अंगों के भार अथवा आकार में बढ़ोतरी के लिए किया जाता है। इस वृद्धि का मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है, जबकि विकास प्रमुखतया शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तनों को प्रकट करता है। इस प्रकार वृद्धि के बाद विकास होता है। वृद्धि आकार में परिवर्तन है, जबकि विकास गुणों में परिवर्तन है। वृद्धि एक निश्चित आयु आने पर रुक जाती है, किन्तु विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।
संक्षेप में विकास और वृद्धि में अन्तर निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development 1

प्रश्न 3
विकास के मुख्य रूपों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:

विकास के मुख्य रूप
(Main Kinds of Development)

व्यक्ति का विकास अपने आप में समग्रता का विकास है। उसके भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले विकास को विकास के विभिन्न रूप कहा जाता है। विकास के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं|

  1. शारीरिक विकास- शरीर सम्बन्धी विकास को शारीरिक विकास कहा जाता है। विकास के इस रूप के अन्तर्गत मुख्य रूप से शरीर के अंगों में आने वाली परिपक्वता का अध्ययन किया जाता है। शरीर के अंगों में परिपक्वता आने के साथ-ही-साथ उनकी क्रियाशीलता में भी वृद्धि होती है।
  2. मानसिक विकास- व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं में होने वाले विकास को मानसिक विकास के रूप में जाना जाता है।
  3. संवेगात्मक विकास- व्यक्ति के संवेगों में स्थिरता एवं परिपक्वता के गुण के विकास को संवेगात्मक विकास के रूप में जाना जाता है।
  4. सामाजिक विकास-व्यक्ति के समाजीकरण के परिणामस्वरूप कुछ सामाजिक सद्गुणों का आविर्भाव होता है। सामाजिक गुणों के इस विकास को ही सामाजिक विकास के रूप में जाना जाता है।
  5. नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास- नैतिक गुणों के प्रति सचेत होना तथा चरित्र को दृढ़ता प्राप्त होना ही नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास कहलाता है।
  6. भाषागत विकास- भाषा के सीखने, बोलने आदि को भाषागत विकास कहा जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है। विकास की मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित हैं

  1. विकास का तात्पर्य केवल बढ़ने से नहीं है।
  2. विकास- बालक की अवस्था में दीर्घकाल तक होने वाले निरन्तर परिवर्तनों का एक क्रम है।
  3. विकास में परिवर्तन एक दिशा में होते हैं।
  4. यह परिवर्तन आगे की ओर होता है, पीछे की ओर नहीं।
  5. विकास में पूर्व स्तर का आने वाले स्तर से सम्बन्ध होता है।
  6. विकास में निरन्तरता का गुण होता है।
  7. विकास अपने आप में एक संगठित प्रक्रिया है।

प्रश्न 2
स्पष्ट कीजिए कि विकास की प्रक्रिया पर पोषण का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक मुख्य तत्त्व या कारक पोषण है। पोषण का आशय है–सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करना। वास्तव में बालक के सामान्य एवं सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार आवश्यक होता है। उचित पोषण से व्यक्ति का शारीरिक तथा मानसिक विकास भी सामान्य रूप से होता है। उचित पोषण के अभाव में बालक का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

प्रश्न 3
स्पष्ट कीजिए कि विकास जीवन भर चलता रहता है।
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया जीवन भर किसी-न-किसी रूप में अवश्य चलती रहती है। शरीर में परिपक्वता आती है, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास भी सदैव होता रहता है। व्यक्ति के विचारों में जो परिपक्वता प्रौढ़ावस्था के उपरान्त आती है वह बाल्यावस्था अथवा युवावस्था में नहीं होती है। इसी प्रकार वृद्धावस्था में बालों का सफेद होना तथा त्वचा का कठोर होना आदि भी विकास के ही प्रमाण ।

प्रश्न 4
अभिवृद्धि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जीवित प्राणियों के शरीर के अंगों में होने वाली बढ़ोतरी को वृद्धि या अभिवृद्धि (Growth) कहा जाता है। उदाहरण के रूप में शरीर का वजन तथा लम्बाई का बढ़ना वृद्धि कहलाता है। शारीरिक वृद्धि का निर्धारित इकाइयों में मापन एवं मूल्यांकन किया जा सकता है। वृद्धि का सीधा सम्बन्ध आकार से होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास से क्या आशय है?
उत्तर:
विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इसके माध्यम से बालक अथवा व्यक्ति की निहित शक्तियाँ एवं गुण क्रमश: प्रकट होते हैं।

प्रश्न 2
विकास की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“परिवर्तन श्रृंखला की वह व्यवस्था जिसमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है। विकास के नाम से जानी जाती है।”

प्रश्न 3
विकास की प्रक्रिया व्यक्ति के जीवन में कब तक चलती है?
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया व्यक्ति में किसी-न-किसी रूप में जीवन भर चलती रहती है।

प्रश्न 4
क्या बालक एवं बालिकाओं के विकास की प्रक्रिया पूर्ण रूप से एकसमान होती है?
उत्तर:
नहीं, बालक एवं बालिकाओं के विकास की प्रक्रिया में उल्लेखनीय अन्तर होता है।

प्रश्न 5
क्या ‘वृद्धि एवं विकास’ एक ही हैं?
उत्तर:
नहीं, वृद्धि एवं विकास में स्पष्ट अन्तर है।

प्रश्न 6
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. वृद्धि
  2. प्रजाति
  3. यौन-भिन्नता तथा
  4. अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ

प्रश्न 7
बालक के विकास पर वंशानुक्रमण तथा पर्यावरण में से किस कारक का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बालक के विकास पर वंशानुक्रमण तथा पर्यावरण दोनों ही कारकों का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 8
विकास के अन्तर्गत किस प्रकार के परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
विकास के अन्तर्गत गुणात्मक परिवर्तन होते हैं, जैसे कि हड्डियों तथा माँसपेशियों में क्रमश: कठोरता एवं पुष्टता आना।

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विकास तथा वृद्धि में कोई अन्तर नहीं है
  2. वृद्धि परिपक्वता तथा विकास परस्पर सम्बन्धित हैं
  3. विकास की प्रक्रिया का बालक की शिक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
  4. युवावस्था में आकर विकास की प्रक्रिया रुक जाती है
  5. पोषण का विकास की प्रक्रिया पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
विकास की प्रक्रिया है
(क) एक सरल प्रक्रिया
(ख) एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया
(ग) एक अस्पष्ट प्रक्रिया
(घ) एक कृत्रिम प्रक्रिया

प्रश्न 2.
“विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन योग्यताएँ प्रकट होती है।” यह कथन किसका है?
(क) डगलस का
(ख) हरलॉक का
(ग) टरमन का
(घ) गेस्टालर का

प्रश्न 3.
बालक के विकास तथा उसकी शिक्षा के सम्बन्ध में सत्य है
(क) विकास तथा शिक्षा में कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) विकास शिक्षा को प्रभावित नहीं करता
(ग) शिक्षा से विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(घ) विकास तथा शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध है

प्रश्न 4.
बालक के विकास तथा उसकी आयु में क्या सम्बन्ध है?
(क) विकास सदैव आयु के अनुसार होता है
(ख) विकास पर आयु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(ग) आयु विकास की प्रक्रिया में बाधक है
(घ) उपर्युक्त सभी कथन असत्य हैं

प्रश्न 5.
विकास को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है
(क) वृद्धि
(ख) प्रजाति
(ग) उपलब्धि
(घ) संस्कृति

प्रश्न 6.
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कारक है
(क) वृद्धि
(ख) आयु
(ग) पोषण
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
विकास की प्रक्रिया की विशेषता नहीं है
(क) विकास की प्रक्रिया जीवन भर चलती है
(ख) विकास की निश्चित रूप से नाप-तौल की जा सकती है
(ग) विकास में समग्रता का गुण होता है
(घ) अन्तर्निहित गुणों का प्रस्फुटन होता है

उत्तर:

  1. (ख) एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया
  2. (ख) हरलॉक का
  3. (घ) विकास तथा शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध है
  4. (क) विकास सदैव आयु के अनुसार होता है
  5. (ग) उपलब्धि
  6. (घ) उपर्युक्त सभी
  7. (ख) विकास की निश्चित रूप से नाप-तौल की जा सकती है

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 गेहूँ बनाम गुलाब

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कुतियाँ

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साहित्य में स्थान–बेनीपुरी जी ने हिन्दी की विविध विधाओं में साहित्य-सृजन किया है। फिर भी वे ललित निबन्धकार, रेखाचित्रकार, संस्मरण-लेखक तथा पत्रकार के रूप में विशेष उभरकर आये हैं। इन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हिन्दी-साहित्य को मात्रा और गुण दोनों दृष्टियों से समृद्ध किया है और इस प्रकार हिन्दी-साहित्य में अपना प्रमुख स्थान बना लिया है।
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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 10 State: As an Informal Agency of Education

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 10 State: As an Informal Agency of Education (राज्य: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 10 State: As an Informal Agency of Education (राज्य: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 10
Chapter Name State: As an Informal Agency of Education (राज्य: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 10 State: As an Informal Agency of Education (राज्य: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)

वस्तुत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य से आप क्या समझते हैं? राज्य के मुख्य शैक्षिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
शिक्षा के अभिकरण के रूप में राज्य के कार्यों की विवेचना कीजिए।
या
राज्य के शैक्षिक कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के उत्तर:दायित्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

राज्य की परिभाषा

राज्य व्यक्तियों का वह समूह है जो निश्चित भूमि पर रहता है, जिसकी अपनी संगठित सरकार होती है और जो बाह्य नियन्त्रणों से पूर्ण स्वतन्त्र होती है। इस प्रकार से स्पष्ट होता है कि राज्य के चार तत्त्व होते हैं-भूमि या प्रदेश, जनसंख्या, सरकार एवं सम्प्रभुता।

राज्य की परिभाषा देते हुए गार्नर ने लिखा है, “राज्य न्यून संख्यक या बहुसंख्यक व्यक्तियों के समुदाय को कहते हैं जो कि निश्चित भूभाग में रहता है, जो बाहरी नियन्त्रण से पूर्णतया मुक्त है और जिसकी एक ऐसी संगठित सरकार होती है, जिसकी आज्ञा का पालन अधिकांश निवासी स्वाभाविक रूप से करते हैं।’

राज्य के शैक्षिक कार्य

राज्य के शैक्षिक कार्यों का विवेचन निम्नलिखित है
1. राष्ट्रीय शिक्षा योजना का निर्माण-राज्य का सबसे पहला कार्य यह है कि वह देश में एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा योजना का संचालन करे, जिससे समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों के हितों की रक्षा हो सके। इस दृष्टिकोण को सामने रखकर राज्य शिक्षाशास्त्रियों, विचारकों एवं राजनीतिज्ञों के सहयोग से एक शिक्षा योजना बनाता है और उसके द्वारा नागरिकों के सर्वांगीण विकास का। प्रयत्न करता है। इसके अतिरिक्त राज्य शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं माध्यम को निर्धारित करता है। राष्ट्रीय शिक्षा योजना का वास्तविक जीवन के निकट होना अत्यन्त आवश्यक है, जिससे शिक्षा पाने के बाद व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होने में समर्थ हो सके।

2. शिक्षा को अनिवार्य करना-
राज्य को राष्ट्र के सभी बालकों के बौद्धिक और मानसिक विकास की ओर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बौद्धिक विकास होने पर ही वह इसे योग्य बन सकेंगे कि अपने कर्तव्यों और अधिकारों को समझ सकें। इसलिए राज्य को चाहिए कि वह निश्चित स्तर तक शिक्षा को अनिवार्य बनाए। इससे देश के सभी नागरिक शिक्षित होंगे और वे अपना तथा देश का कल्याण कर सकेंगे।

3. विद्यालयों की स्थापना-
वर्तमान समय में प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार के विद्यालयों की स्थापना करे और व्यक्तिगत प्रयासों से खुले हुए विद्यालयों को मान्यता प्रदान करे। राज्य को विद्यालयों के निरीक्षण की भी व्यवस्था करनी चाहिए।

4. शिक्षा हेतु धन का प्रबन्ध-
राज्य का यह एक आवश्यक कर्तव्य हो जाता है कि वह सभी स्तरों की शिक्षा के लिए धन की व्यवस्था करे। इसके साथ-ही-साथ राज्य को सभी प्रकार के विद्यालयों को आर्थिक सहायता देनी चाहिए। राज्य सरकारी विद्यालयों के व्यय का वहन तो करेगा ही, लेकिन गैर-सरकारी विद्यालयों को भी उसे अनुदान देना चाहिए।

5. योग्य शिक्षकों की व्यवस्था-
शिक्षा प्रक्रिया को समुचित रूप से चलाने के लिए कुशल एवं योग्य शिक्षकों की बहुत आवश्यकता होती है, इसलिए राज्य का यह प्रमुख कर्तव्य हो जाता है कि वह विद्यार्थियों के लिए योग्य शिक्षकों की व्यवस्था करे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राज्य स्थान-स्थान पर प्रशिक्षण विद्यालय खोलता है, जो देश के लिए योग्य शिक्षक तैयार करते हैं। इसके साथ-ही-साथ राज्य यह भी व्यवस्था करता है कि प्रशिक्षित अध्यापकों को उनकी योग्यतानुसार विद्यालयों में अध्यापन कार्य का अवसर मिले, ताकि देश की शिक्षा का स्तर ऊँचा उठ सके।

6. सैनिक शिक्षा की व्यवस्था-
उच्च विद्यालयों में सैनिक शिक्षा की व्यवस्था करना राज्य का एक प्रमुख कर्तव्य है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर हमारे देश के नवयुवक बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा कर सकें। इसके लिए राज्य की ओर से स्थान-स्थान पर सैनिक विद्यालयों की स्थापना की जाती है।

7. नागरिकता का प्रशिक्षण-
लोकतन्त्र की प्रगति एवं स्थायित्व योग्य नागरिकों पर निर्भर है। अतः राज्य का कार्य बालकों को नागरिकता का प्रशिक्षण देना है, जिससे वह नागरिक गुणों से सुसज्जित होकर राज्य के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विकास में योगदान दे सके। प्रशिक्षण चार रूपों में होना चाहिए

  • राजनीतिक प्रशिक्षण- राज्य को चाहिए कि वह नवयुवकों के मन में अपनी राजनीतिक विचारधारा को समाविष्ट कर दे। इसके लिए उन्हें राजनीतिक प्रशिक्षण देना चाहिए। इससे नागरिक यह समझने लगेंगे कि उनके कर्तव्य और अधिकार क्या हैं और उनका पालन किस प्रकार करना चाहिए। वह राजनीतिक कार्यों में भी सक्रिय भाग ले सकेंगे। इसके लिए राज्य को रेडियो प्रसारण, राजनीतिक प्रदर्शनी, राजनीतिक उत्सवों आदि का आयोजन करना चाहिए।
  • सामाजिक प्रशिक्षण- राज्य को छात्रों को सामाजिक प्रशिक्षण देना चाहिए जिससे कि वह समाज के महत्त्वपूर्ण सदस्य बन सकें। राज्य को इस प्रकार का सामाजिक वातावरण प्रस्तुत करना चाहिए जिसमें रहकर सामाजिक भावना का विकास हो और व्यक्ति समाज की प्रगति के लिए कार्य करे।
  • आर्थिक प्रशिक्षण- किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों को आर्थिक दृष्टि से प्रशिक्षित किया जाए। इसके लिए राज्य को चाहिए कि वह कृषि, उद्योग, विज्ञान आदि के प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान करे, जिससे कि नवयुवक जीविकोपार्जन का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
  • सांस्कृतिक प्रशिक्षण- राज्य को चाहिए कि वह देश के नवयुवकों को सांस्कृतिक प्रशिक्षण प्रदान करे, जिससे कि वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा तथा उसका विकास कर सकें। इसके लिए राज्य को स्थान-स्थान पर सांस्कृतिक सोसाइटियों, चित्रशालाओं, अजायबघरों, मनोरंजन गृहों इत्यादि की स्थापना करनी चाहिए। इसके साथ-ही-साथ राज्य को चाहिए कि वह सांस्कृतिक मण्डलों, सांस्कृतिक भ्रमणों एवं सामुदायिक केन्द्रों को पर्याप्त आर्थिक सहायता प्रदान करे।

8. शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण-राज्य का कार्य शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करने में सहायता देना है। इसके लिए राज्य के उच्चकोटि के दार्शनिकों, शिक्षा विशेषज्ञों, राजनीतिज्ञों व शिक्षा मन्त्रियों को समाज की आवश्यकताओं का अध्ययन करना चाहिए और फिर इन आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करने चाहिए।

9. परिवार और विद्यालयों में सम्बन्ध स्थापित करना-
राज्य को एक ऐसी संस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें कि अभिभावकों एवं शिक्षकों के प्रतिनिधि और उच्चकोटि के शिक्षा अधिकारी सम्मिलित हों। इस संस्था का कार्य यह विचार करना है कि किस तरह से शिक्षा द्वारा व्यक्ति और समाज का हित सम्भव हो सकता है।

10. शैक्षणिक शोध को प्रोत्साहन- 
शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के शैक्षणिक अन्वेषणों की आवश्यकता है। इन अन्वेषणों के लिए राज्य को धन की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे शिक्षा के नए-नए आदर्श एवं नई-नई विधियाँ निर्मित हो सकें।

11. शिक्षण-संस्थाओं पर आवश्यक नियन्त्रण-
प्रायः यह देखने में आता है कि राजकीय शिक्षण संस्थाओं के अधिकारी अनैतिक कार्य करते हैं, जिससे अध्यापकों एवं विद्यार्थियों के समक्ष अनेक कठिनाइयाँ आती हैं। इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि वह शिक्षण संस्थाओं पर आवश्यक नियन्त्रण रखे, जिससे इन शिक्षण संस्थाओं का विघटन न होने पाए। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि राज्य को अनेक प्रकार के शैक्षिक कार्य करने पड़ते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण एक बुराई है।
उत्तर:

शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण : एक बुराई

शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण हो या शिक्षा राज्य के नियन्त्रण से मुक्त हो, इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। व्यक्तिवादियों के अनुसार राज्य को शिक्षा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि राज्य का कार्य केवल नागरिकों की रक्षा करना है। लॉक (Locke), मिल (Mill), बेन्थम (Benthem) आदि विचारकों ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। व्यक्तिवादियों का कथन है कि यद्यपि कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए व्यक्ति राज्य का अनुशासन स्वीकार करेगा, परन्तु बहुत-से ऐसे कार्य भी हैं जिनमें व्यक्ति पूर्ण स्वतन्त्र है। मिल का कहना है कि “व्यक्ति पवित्र है और उसकी स्वतन्त्रता में राज्य का सहसा हस्तक्षेप सहन नहीं किया जा सकता।”
इस मत के समर्थकों का तर्क है–

  1. राज्य का शिक्षा पर नियन्त्रण रहने से व्यक्तियों में स्वतन्त्र विचारों का प्रसार रुक जाता है और धीरे-धीरे वाणी की स्वतन्त्रता का लोप हो जाता है।
  2. राज्य द्वारा नियन्त्रित शिक्षा-व्यवस्था में बालक के व्यक्तिव के विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता, क्योंकि उनकी रुचियों, सीमाओं और इच्छाओं की पूर्ण अवहेलनी की जाती है और उसे राज्य द्वारा निर्धारित एक निश्चित साँचे के अनुसार अपने को ढालना होता है। प्रश्न 2 स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है।

शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है।

कुछ विद्वान् शिक्षा पर राज्य के नियन्त्रण को अच्छी बताते हैं। इनका मत है कि शिक्षित व्यक्तियों का उपयोग राज्य को ही करना है। शिक्षा पा लेने पर व्यक्ति सुयोग्य नागरिक के रूप में समाज और राज्य की सेवा में जुटेगा। इस सेवा के रूप का निर्धारण करना राज्य का कर्तव्य है। इसलिए राज्य यह अधिक अच्छी तरह समझ सकता है कि शिक्षित व्यक्तियों का उपयोग किस क्षेत्र में और कैसे किया जाए। यदि शिक्षा पर राजकीय नियन्त्रण के समर्थकों का यह तर्क ठीक है तो वस्तुतः राज्य को यह अधिकार है कि वह बालक की शिक्षा के रूप का निर्धारण करे।

इस मत के समर्थकों का यह भी कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत प्रयत्नों को प्रोत्साहन नहीं देना। चाहिए, क्योंकि व्यक्तिगत संस्थाएँ बालकों के हित को सर्वोपरि न रखकर व्यावसायिक दृष्टिकोण से अपना काम करती हैं। इनमें अध्यापकों का वेतन बहुत कम होता है और आवश्यक शैक्षिक उपकरण उपलब्ध नहीं रहते। इस प्रकार समष्टिवादी मत के अनुसार शिक्षा की पूर्ण व्यवस्था राज्य द्वारा ही होनी चाहिए। राज्य को शिक्षा पर पूर्ण नियन्त्रण रखना चाहिए। रूस के साम्यवादी विचारक पिंकविच (Pinckvitch) ने इस मत का समर्थन करते हुए लिखा है, “सार्वजनिक शिक्षा, जिसका उद्देश्य भावी नागरिकों का सुधार करना है, एक ऐसा शक्तिशाली यन्त्र है जो राज्य दूसरों को हस्तान्तरित नहीं कर सकता।

प्रश्न 3.
बालक की शिक्षा में राज्य का अधिक महत्त्व है अथवा समाज का? इस प्रकरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

बालक की शिक्षा में राज्य तथा समाज का महत्त्व

बालक की शिक्षा में राज्य तथा समाज दोनों का ही विशेष योगदान तथा महत्त्व होता है। राज्य द्वारा शिक्षा की नीतियों का निर्धारण किया जाता है, शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना की जाती है तथा उनकी व्यवस्था एवं संचालन किया जाता है। शिक्षा के स्तर का निर्धारण तथा शिक्षण संस्थाओं के निरीक्षण का कार्य भी राज्य द्वारा ही किया जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य की अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे भिन्न बालक के समाजीकरण तथा सद्गुणों के विकास में समाज की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

बालक की अनौपचारिक शिक्षा का एक मुख्य अभिकरण समाज ही है। समाज द्वारा बालक को आजीवन शिक्षित किया जाता है, जब कि राज्य द्वारा की गई शिक्षा की व्यवस्था केवल सीमित समय के लिए ही होती है। राज्य द्वारा प्रदान की गई शिक्षा प्राप्त करके बालक जीविका-उपार्जन के लिए योग्यता का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकता है, जब कि समाज द्वारा प्रदान की गई शिक्षा को प्राप्त करके बालक व्यावहारिक जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बालक की औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का महत्त्व अधिक है, जब कि बालक की अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में समाज का महत्त्व अधिक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य और शिक्षा के सम्बन्ध के विषय में समन्वयवादी दृष्टिकोण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षाशास्त्री न तो पूर्णरूप से व्यक्तिवादी मत को स्वीकार करते हैं और न ही समष्टिवादी मत को, बल्कि उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया है। उनके अनुसार शिक्षा को न तो राज्य के पूर्ण नियन्त्रण में रखा जा सकता है और न ही उसे राज्य के नियन्त्रण से सर्वथा मुक्त किया जा सकता है। उनका कथन है कि शिक्षा जीवन की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। कोई भी एक संस्था सभी के लिए इसकी व्यवस्था नहीं कर सकती। इसलिए शिक्षा पर राज्य के नियन्त्रण के साथ-साथ परिवार एवं धार्मिक संस्थाओं का भी नियन्त्रण होना चाहिए। इस प्रकार हमें राज्य के सीमित हस्तक्षेप तथा सीमित नियन्त्रण की नीति अपनानी चाहिए। राज्य का सीमित हस्तक्षेप केवल मार्गदर्शन के लिए होना चाहिए।

प्रश्न 2.
स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता लाने का कार्य केवल राज्य ही कर सकता है।
उत्तर:
शिक्षा एक सार्वजनिक रूप से सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया है। देश के सभी क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं की शिक्षा का प्रावधान है। इस स्थिति में आवश्यक है कि शिक्षा के स्वरूप में एकरूपता हो। शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता लाने का कार्य राज्य द्वारा ही किया जा सकता है। यदि शिक्षा को राज्य के नियन्त्रण से मुक्त कर दिया जाए तो शिक्षा को संचालित करने वाली विभिन्न संस्थाएँ अपने-अपने दृष्टिकोण से शिक्षा को भिन्न-भिन्न स्वरूप प्रदान कर सकती हैं, परन्तु यदि शिक्षा राज्य के नियन्त्रण में होगी तो देश के सभी क्षेत्रों में शिक्षा का स्वरूप एक ही होगा तथा शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता होगी।

निश्चित उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
‘राज्य’ की एक सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“राज्य एक संगठन है, जो किसी निश्चित भूभाग पर सर्वशक्तिमान सरकार के माध्यम से शासन करता है। यह सामान्य नियमों के द्वारा व्यवस्था बनाए रखता है।” -मैकाइवर

प्रश्न 2.
एक व्यवस्थित संगठन के रूप में राज्य के अनिवार्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
एक व्यवस्थित संगठन के रूप में राज्य के अनिवार्य तत्त्व हैं—

  • भूमि,
  • जनसंख्या,
  • सरकार तथा
  • सत्ता।

प्रश्न 3.
बालकों की शिक्षा के दृष्टिकोण से राज्य का मुख्यतम शैक्षिक कार्य क्या है?
उत्तर:
बालकों की शिक्षा के दृष्टिकोण से राज्य का मुख्यतम शैक्षिक कार्य है-शिक्षा की राष्ट्रीय नीति का निर्धारण तथा उसे लागू करना।

प्रश्न 4.
राज्य शिक्षा का औपचारिक/अनौपचारिक अभिकरण है।
उत्तर:
राज्य शिक्षा का औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 5.
आपके दृष्टिकोण से शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता तथा एक निश्चित स्तर बनाए रखने के लिए शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है।

प्रश्न 6.
अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था कौन कर सकता है?
उत्तर:
अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था केवल राज्य ही कर सकता है।

प्रश्न 7.
राज्य शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है ?
उत्तर:
औपचारिक अभिकरण।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र वाले सत्ता सम्पन्न राजनीतिक संगठन को राज्य कहते हैं।
  2. राज्य द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कोई योगदान नहीं दिया जा सकता।
  3. हमारे देश में शिक्षा की नीति का निर्धारण राज्य द्वारा ही किया जाता है।
  4. शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता लाने का कार्य केवल विभिन्न धार्मिक संस्थाएँ ही कर सकती हैं।
  5. औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का महत्त्व अधिक है, जब कि अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में समाज का महत्त्व अधिक है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
लॉक, मिल तथा बेन्थम आदि व्यक्तिवादी विचारकों की मान्यता है–
(क) शिक्षा पर राज्य का पूर्ण नियन्त्रण होना चाहिए।
(ख) शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण एक बुराई है।
(ग) केवल प्राथमिक शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण होना चाहिए।
(घ) केवल विज्ञान की शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण होना चाहिए।

प्रश्न 2.
सार्वजनिक शिक्षा, जिसका उद्देश्य भावी नागरिकों का सुधार करना है, एक ऐसा शक्तिशाली यन्त्र
है जो राज्य दूसरों को हस्तान्तरित नहीं कर सकता है।” यह कथन किसका है।
(क) बेन्थम का
(ख) पिंकविच का
(ग) लॉक का
(घ) प्लेटो का

प्रश्न 3.
हमारे देश में शैक्षिक नीति का निर्धारण किया जाता है
(क) शिक्षकों के द्वारा
(ख) धर्माचार्यों के द्वारा
(ग) राज्य के द्वारा।
(घ) प्रधानमन्त्री के द्वारा

प्रश्न 4.
राज्य का प्रमुख शैक्षिक दायित्व क्या है?
(क) सुरक्षा का प्रबन्ध करना
(ख) अपने विचारों को जनता तक पहुँचाना
(ग) धर्म का प्रचार करना
(घ) जनशिक्षा का प्रबन्ध करना।

प्रश्न 5.
देश में शिक्षा को एकरूपता प्रदान कर सकता है
(क) समाज
(ख) धर्म
(ग) राज्य
(घ) कोई नहीं

उत्तर:

1. (ख) शिक्षा पर राज्य को नियन्त्रण एक बुराई है,
2. (ख) पिंकविच का,
3. (ग) राज्य के द्वारा,
4. (घ) जनशिक्षा का प्रबन्ध करना,
5. (ग) राज्य।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 21 Development of Language

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 21 Development of Language (भाषा का विकास) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 21 Development of Language (भाषा का विकास).

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Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 21
Chapter Name Development of Language (भाषा का विकास)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 21 Development of Language (भाषा का विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भाषा के विकास से क्या आशय है? भाषा के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
शैशवावस्था में भाषा-विकास के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

भाषा-विकास का आशय
(Meaning of Language Development)

बालकों के मानसिक विकास को समझने के लिए भाषा के विकास का जानना आवश्यक है। भाषा भाव तथा विचार व्यक्त करने का एक साधन है। भाषा के अतिरिक्त हम दूसरी तरह से भी भाव तथा विचार व्यक्त करते हैं, किन्तु जितनी सुविधा से हेम शब्दों द्वारा उन्हें व्यक्त कर सकते हैं, उतनी सुविधा से हम किसी दूसरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकते। भाषा केवल विचार अभिव्यक्ति का ही साधन मात्र नहीं है, वरन् वह हमारी अनेक मानसिक शक्तियों की वृद्धि का भी मुख्य आधार है। प्रो० स्वीट के शब्दों में, “भाषा; ध्वनि तथा वाणी द्वारा विचार की अभिव्यक्ति है।’ बालक जन्म के समय केवल क्रन्दन करता है। वह क्रमश: भाषा सीखता है। इस प्रकार से बालक द्वारा भाषा को सीखने की प्रक्रिया को ही ‘भाषा का विकास’ या ‘भाषागत विकास’, कहते हैं। भाषा के विकास के लिए शिशु का अन्य व्यक्तियों के साथ सम्पर्क स्थापित होना अनिवार्य शर्त है।

भाषा-विकास का स्वरूप
(Nature of Language Development)

क्रो और क्रो (Crow & Crow) के अनुसार भाषा के विकास पर विचार करते समय दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है

  1. संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएँ; जैसे-देखना और सुनना।
  2. संवेदन क्रिया सम्बन्धी अनुक्रियाएँ; जैसे-बोलना, लिखना तथा चित्रांकन।

भाषा-विकास की अवस्थाएँ (चरण)
(Stages of Language Development)

बालक के भाषा-विकास की प्रमुख अवस्थाएँ (चरण) निम्नांकित हैं|

1. चिल्लाना एवं रोना- बालक जन्म लेने के पश्चात् ही रोना और चिल्लाना प्रारम्भ कर देता है। अत: चिल्लाना तथा रोना ही उसकी प्रारम्भिक भाषा मानी जा सकती है। जब शिशु कुछ बड़ा हो जाता है तो उसका मास का शिशु भूख लगने या पेट में दर्द होने पर रोने लग जाता है। रोते समय उसका चेहरा लाल हो जाता है और आँखों में आँसू भी बहने लगते हैं, परन्तु ज्यों-ज्यों बालक बड़ा होने लगता है, उसके रोने में
बलबलाना कमी आ जाती है।
हाव-भाव

2. बलबलाना- बालक का चिल्लाना ही उसके बलबलाने में परिवर्तित हो जाता है और इसी बलबलाने से शब्द उच्चारण का विकास होता है। बलबलाना चिल्लाने की ध्वनियों से अलग होता है। क्रो एवं क्रो के अनुसार बलबलाने की आयु 3 मास से 8 मास तक। होती है। हैवलाक इसे 12 मास मानता है। बालक बलबलाना कब प्रारम्भ करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके स्वर यन्त्रों का विकास कहाँ तक हुआ है। मैकार्थी बलबलाने को एक खेल मानते हैं। बालक इसमें एक आनन्द का अनुभव करता है। प्रायः प्रसन्नता की दशा में ही बालक बलबलाता है। बलबलाने में एक ही ध्वनि की पुनरावृत्ति होती है। बालक प्रथम स्वरों को ही दोहराता है और व्यंजनों का उच्चारण बाद में करता है। अतः सर्वप्रथम अ, इ, उ, ए आदि स्वर दोहराये जाते हैं।

3. हाव-भाव- हाव-भाव भी भाषा विकास में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बालक में हाव-भाव का आविर्भाव बलबलाने के साथ-साथ ही हो जाता है। छोटे बालक शब्दों के उच्चारण के साथ हाव-भाव भी प्रदर्शित करते हैं और इस प्रकार बोले गये शब्दों पर बल देते हैं। वास्तव में छोटे बालकों के साथ हाव-भाव को शब्दों का स्थानापन्न समझना चाहिए।

4. शब्द-भण्डार- ज्यों-ज्यों बालक बड़ा होने लगता है, त्यों-त्यों उसके शब्द-भण्डार में वृद्धि होती जाती है। प्रारम्भ में बालक संज्ञाओं का प्रयोग अधिक करता है। दो वर्ष का बालक लगभग पचास प्रतिशत से अधिक संज्ञाएँ बोलता है। इन संज्ञाओं में मुख्यतया मूल आवश्यकताओं से सम्बन्धित संज्ञाएँ होती हैं। धीरे-धीरे उसकी रुचि खिलौने आदि में होने लगती है। अतः वह उनके नाम भी लेना सीख जाता है। संज्ञाओं के पश्चात् बालक क्रियाओं का प्रयोग करना सीखते हैं। प्रायः साधारण क्रिया-सूचक शब्द; जैसे-लाओ, आओ, लो, दो, पकड़ो आदि का प्रयोग बालक पहले करता है। डेढ़-दो वर्ष का बालक विशेषण शब्दों का प्रयोग करना सीख जाता है। प्रारम्भ में प्रायः गरम, ठण्डा, अच्छा, बुरा आदि विशेषणों का ही प्रयोग करता है। तीन वर्ष का बालक सर्वनामों का भी प्रयोग करना सीख जाता है। स्मिथ, शर्ती, गैसेल, थॉमसन आदि के अनुसार इस अवस्था के बालक लगभग 900 शब्दों का प्रयोग करते हैं। बालक पाँच वर्ष में दो हजार और छह वर्ष में लगभग 2500 शब्दों का प्रयोग करने लग जाते हैं। संक्षेप में उसके शब्द भण्डार में तीव्रता से वृद्धि होती

5. वाक्य-निर्माण- भाषा विकास की एक अन्य अवस्था वाक्य-निर्माण की अवस्था है। 12वें मास में बालक वाक्य प्रयोग करने लग जाता है। प्रारम्भ में बालक एक शब्द के वाक्यों का प्रयोग करते हैं; जैसे-‘पानी’। इसका अर्थ है-‘मुझे पानी दो।’ 18वें मास में दो शब्दों के वाक्यों का प्रयोग करने लगते हैं। इन दो शब्दों में प्राय: एक शब्द संज्ञा होती है और दूसरी क्रिया; जैसे-‘खाना खाऊँ। गैसेल, गैरीसन, मैकार्थी तथा जर्सील्ड का मत है कि ढाई वर्ष के पश्चात् बालक पूरे वाक्यों का प्रयोग करने लग जाता है। प्रारम्भ में बालक सरल वाक्यों का प्रयोग करता है, बाद में लम्बे और मिश्रित वाक्यों का। कुशाग्र और प्रतिभाशाली बालक अपेक्षाकृत लम्बे तथा मिश्रित वाक्यों का प्रयोग सरलता से कर लेता है। 5 वर्ष के बालक छ: से दस शब्दों का प्रयोग अपने वाक्यों में करने लग जाते हैं।

6. शुद्ध उच्चारण- दस मास की आयु तक के बालक की बोली को समझना बहुत कठिन है। केवल परिवार के लोग ही उसकी भाषा या बोली का अर्थ लगा पाते हैं, क्योंकि उसका उच्चारण शुद्ध नहीं होता। लगभग 18 मास के पश्चात् ही उसका उच्चारण सुधर पाता है तथा तीन वर्ष की आयु तक उसमें पर्याप्त सुधार हो जाता है। जरसील्ड के अनुसार, बालकों के उच्चारण में व्यक्तिगत भेद पाये जाते हैं। कुछ छोटे बालके बड़े होने पर भी शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाते। इस भेद का प्रमुख कारण है-स्वर यन्त्रों के विकास में अन्तर, परिवार के सदस्यों द्वारा अशुद्ध उच्चारण, प्रेरणा में अन्तर। उपर्युक्त विवरण द्वारा भाषा के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बालक के भाषागत विकास को विभिन्न कारक या तत्त्व प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के मुख्य कारक हैं-परिपक्वता, शारीरिक स्वास्थ्य, सीखने के अवसर एवं अनुकरण, ” बौद्धिक क्षमता, लिंग-भेद, पारिवारिक सम्बन्ध तथा परिवार का सामाजिक-आर्थिक स्तर।

प्रश्न 2
वे कौन-से कारक हैं, जो बालकों के भाषा-विकास को प्रभावित करते हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:

भाषा-विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing the Language Development)

बालकों के भाषा-विकास को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार हैं|

1. स्वास्थ्य स्वास्थ्य का प्रभाव भाषा- विकास पर भी पड़ता है। जीवन के पहले दो वर्षों में गम्भीर या लम्बी बीमारी होने से बालक का भाषा-विकास ठीक से नहीं हो पाता। रोगी बालक को अन्य बालकों का सम्पर्क नहीं मिलता। बिना बोले ही उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। उसे बोलने की कोई प्रेरणा नहीं मिलती, जिससे उसका भाषा-विकास पिछड़ जाता है। जिन बालकों में श्रवण दोष पाया जाता है उनका भाषा-विकास अवरोधित हो जाता है। दोषयुक्त तालु, कण्ठ, दाँत तथा जबड़ों के कारण भी बालक शुद्ध भाषा की योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता।

2. बुद्धि परीक्षणों के द्वारा यह देखा गया है कि बालक की बुद्धि व उसकी भाषा- योग्यता में गहरा सम्बन्ध है। तीव्रबुद्धि बालक सामान्य बालक की अपेक्षा कम-से-कम चार माह पूर्व बोलना प्रारम्भ कर देता है और मन्दबुद्धि बालक सामान्य बुद्धि वाले बालक से बोलने में तीन वर्ष पिछड़ जाता है। परन्तु सभी मन्दबुद्धि बालकों के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती। ऐसा भी देखा गया है कि जो बालक अपनी प्रारम्भिक कक्षाओं में भाषा में पिछड़े रहते हैं, ऊँची कक्षाओं में काफी आगे बढ़ जाते हैं।

3. सामाजिक-आर्थिक स्थिति बालक के भाषा- विकास पर परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी पड़ता है। शिक्षित परिवार के बालकों का भाषा-विकास अशिक्षित परिवार के बालकों की तुलना में अधिक द्रुतगति से होता है। उच्च सामाजिक स्तर के परिवारों के बालकों का शब्द-भण्डार निर्धन परिवारों के बालकों की अपेक्षा अधिक होता है। मेकार्थी के अनुसार, “उच्च व्यवसाय वाले परिवारों के बालकों पारिवारिक सम्बन्ध की वाक्य-रचना निम्नकोटि के व्यवसाय वाले परिवारों के बालकों की वाक्य-रचना की अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर होती है। इन सबका कारण यही है कि शिक्षित और उच्च सामाजिक व आर्थिक स्तर के परिवारों के बालकों को सीखने और समझने के अधिक अवसर उपलब्ध होते हैं।”

4. पारिवारिक सम्बन्ध- बालक के माता-पिता के साथ क्या सम्बन्ध हैं, माता-पिता बालक के साथ कितना समय व्यतीत करते हैं, माता-पिता बालक से अत्यधिक प्रेम करते हैं या उसे हर समय झिड़कते हैं, इन सब बातों का प्रभाव बालक के भाषा-विकास पर पड़ता है। जिन परिवारों में बालकों की संख्या अधिक होती है, वहाँ माता-पिता बालकों की ओर उचित ध्यान नहीं दे पाते, जिसके परिणामस्वरूप बालकों का भाषा-विकास पिछड़ जाता है। अकेले बालक का विकास जुड़वाँ बालक की तुलना में अधिक अच्छा होता है। क्योंकि जुड़वाँ बालकों को अनुकरण के अवसर नहीं मिलते। सामान्य परिवार में पले बालक का भाषा-विकास अनाथालय में पले बालक की अपेक्षा अच्छा होता है।

5. लिंग-भेद- जीवन के प्रथम वर्ष में शिशु के भाषा-विकास में किसी प्रकार का लिंग-भेद नहीं पाया जाता लेकिन दूसरे वर्ष के आरम्भ से ही यह अन्तर स्पष्ट होने लगता है। लड़कियाँ लड़कों की अपेक्षा शीघ्र बोलना शुरू करती हैं। शब्द-भण्डार, वाक्यों की लम्बाई और उनकी शुद्धता, भाषा की समझ और उच्चारण आदि में लड़कियाँ लड़कों से आगे होती हैं और यह श्रेष्ठता लड़कियों में काफी बड़ी अवस्था तक बनी रहती है लेकिन अन्त में पूर्ण विकास की स्थिति में बहुधा लड़के लड़कियों से आगे हो जाते हैं।}

6. दो भाषाएँ- जहाँ बालक को एक साथ दो भाषाएँ सिखाई जाती हैं वहाँ बालक का भाषा-विकास अवरुद्ध हो जाता है। क्योंकि बालक का ध्यान दोनों ओर रहता है, उसके मस्तिष्क में सन्देह पैदा हो जाता है, उसे एक ही बात के लिए दो-दो शब्द याद करने पड़ते हैं। इससे बालक का शब्द-भण्डार नहीं बढ़ पाता। वह सही उच्चारण नहीं कर पाता। उसमें तनाव पैदा हो जाता है। उसके मस्तिष्क पर व्यर्थ का बोझा लदा रहता है, जिससे उसे समायोजन करने में कठिनाई पैदा होती है। दो भाषाएँ सीखने से केवल भाषा-विकास पर ही नहीं उसके चिन्तन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वह यह निश्चय नहीं कर पाता कि किस समय कौन-सा शब्द बोलना उचित है। अतः शैशवावस्था में बालक को केवल उसकी मातृभाषा ही सिखाई जानी चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भाषा-विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
भाषा का विकास बालक में किस प्रकार सम्भव है? इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

भाषा-विकास के मुख्य सिद्धान्त
(Main Theories of Language Development)

बालक में भाषा का विकास कुछ सिद्धान्तों के अनुसार होता है। इन सिद्धान्तों का विवरण निम्नलिखित है-

1. बोलने के लिए प्रेरणा- बालक को प्रारम्भ में बोलने के लिए किसी-न-किसी प्रकार की प्रेरणा या प्रोत्साहन की आवश्यकता रहती है। वह प्रारम्भ में अपनी मूल आवश्यकताओं के अनुसार ही बोलना सीखता है। दूसरे शब्दों में, बालक भाषा का प्रयोग करके अपने माता-पिता को अपनी विभिन्न आवश्यकताओं से अवगत कराने का प्रयास करता है। संक्षेप में, बालकों में भाषा का विकास प्रेरणाओं पर आधारित होता है।

2. अनुकरण- बालक का भाषा का विकास उसकी अनुकरण-क्षमता पर भी निर्भर करता है। वह अपने परिवारजनों द्वारा बोले गये शब्दों का भी अनुकरण बड़े चाव से करता है। अत: यह आवश्यक है कि बालकों के सम्मुख जिन शब्दों का प्रयोग किया जाए उनको शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण किया जाए।

3. स्वर यन्त्र की परिपक्वता- गले, फेफड़ों और स्वर यन्त्र के द्वारा शब्द उच्चारण का कार्य होता है। इनके अतिरिक्त तालू, होंठ, नाक और दाँत भी शब्दोच्चारण में सहायक होते हैं। ज्यों-ज्यों इन अंगों में परिपक्वता आती है, त्यों-त्यों भाषा विकसित होती है।

4. सम्बद्धता- बालक के भाषा-विकास में सम्बद्धता का अपना विशेष योग रहता है। वह अपने विकास-क्रम में शब्दों और उसके अर्थों का सम्बन्ध तथा साहचर्य समझने लगता है। उदाहरण के लिएबालक के सम्मुख जब ‘कुत्ता’ शब्द बोला जाता है, तो उसके सम्मुख कुत्ता उपस्थित किया जाता है। इस प्रकार कुत्ता शब्द के अर्थ से वह ‘कुत्ते’ नामक जानवर से परिचित हो जाता है। भविष्य में जब कभी ‘कुत्ता’ शब्द बोला जाता है तो बिना कुत्ता देखे ही बालक के मानस पटल पर उसकी प्रतिभा अंकित हो जाती है।

प्रश्न 2
मानव-समाज के लिए भाषा का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

मानव-समाज के लिए भाषा का महत्त्व
(Importance of Language for Human Society)

समस्त प्राणी-जगत् में केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जिसके पास अत्यधिक विकसित भाषा है। विकसित भाषा के ही कारण मनुष्य एक विकसित एवं बहुक्षमतायुक्त प्राणी है। भाषा के ही आधार पर मानव-समाज अत्यधिक संगठित एवं व्यवस्थित है। मानवीय संस्कृति के भरपूर विकास में भी सर्वाधिक योगदान भाषा का ही है। भाषा के अभाव के ही कारण अन्य कोई भी पशु संस्कृति का विकास नहीं कर पाया है। मानव-समाज में सम्पन्न होने वाली समस्त सामाजिक अन्त:क्रियाएँ मुख्य रूप से भाषा के ही माध्यम से परिचालित होती हैं। इस तथ्य को शैरिफ तथा शैरिफ ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “शब्दों के द्वारा व्यक्ति एक-दूसरे के निकट सम्बन्ध में आते हैं। भाषा के माध्यम से व्यक्ति ऐसी योजनाएँ बनाता है जो मनुष्य को भविष्य में उन्नति की ओर ले जाती हैं। भाषा के माध्यम से व्यक्ति संचित ज्ञान को अन्य व्यक्तियों तक पहुँचाता है। मानव-समाज में व्यक्ति के समाजीकरण की प्रक्रिया में भी सर्वाधिक योगदान भाषा का ही होता है। भाषा के माध्यम से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा व्यक्ति पर समाज का नियन्त्रण लागू किया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी आवश्यक है कि समाज में बालकों की शिक्षा की प्रक्रिया भी मुख्य रूप से भाषा के ही माध्यम से सम्पन्न होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालक के सन्दर्भ में भाषा के विकास पर परिपक्वता तथा शारीरिक स्वास्थ्य का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बालक के भाषागत विकास पर उसकी परिपक्वता तथा शारीरिक स्वास्थ्य को अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। बोलना अनेक अंगों पर निर्भर करता है; जैसे–फेफड़े, गला, जीभ, होंठ, दाँत, स्वर यन्त्र तथा मस्तिष्क के बाकी केन्द्र आदि। बालक के ये अंग जब परिपक्व हो जाते हैं, तब ही बालक ठीक से बोल पाता है। इसके अतिरिक्त यदि कोई बालक दीर्घकाले तक बीमार रहता है तो भी उसके बोलने की क्रिया कुछ बिगड़ सकती है। यदि बालक के सुनने की क्षमता कम हो या उसके कानों में कुछ दोष हो तो भी बालक की भाषा का विकास सामान्य नहीं रह पाता। यही कारण है कि बधिर बच्चे मूक या गूंगे भी होते हैं।

प्रश्न 2
भाषागत विकास का बालक की बौद्धिक क्षमता से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर
टरमन, शर्ली, मैकार्थी आदि मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बालक की बौद्धिक क्षमता और उसके भाषा-विकास में विशेष सम्बन्ध है। बालक की बोली सुनकर उसकी बौद्धिक योग्यता का ज्ञान हो जाता है, परन्तु जरसील्ड का कहना है कि बोलने की क्षमता को बौद्धिक योग्यता से कोई सम्बन्ध नहीं है। उनके अनुसार जो बालक शीघ्र बोलना सीख जाता है, वह प्राय: सामान्य बुद्धि का होता है और यह भी आवश्यक नहीं है कि जो बालक देर से बोलना सीखता है, वह मन्दबुद्धि वाला ही हो।

प्रश्न 3
भाषागत विकास पर लिंग-भेद का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
एक वर्ष तक बालक तथा बालिका में भाषा-विकास प्राय: एक-सा होता है, परन्तु दूसरे वर्ष से ही दोनों में अन्तर प्रारम्भ हो जाता है। बालिकाएँ बालकों की अपेक्षा पहले बोलना प्रारम्भ कर देती हैं। बालिकाएँ लम्बे वाक्य सरलता से बोल सकती हैं, परन्तु बालक छोटे-छोटे वाक्य ही बोल पाते हैं। इसी प्रकार बालिकाओं को शब्दोच्चारण बालकों की तुलना में अधिक शुद्ध होता है। मैकार्थी के अनुसार, इस भिन्नता का कारण है, बाल्यावस्था में बालिकाओं का अपनी माँ के साथ अधिक रहना। बालक अपने पिता से अधिक लगाव का अनुभव करते हैं, परन्तु पिता प्रायः जीविका हेतु बाहर जाकर कार्य करते हैं। अत: बालकों का भाषा-विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता।

प्रश्न 4
भाषागत विकास पर सीखने के अवसरों तथा अनुकरण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
वातावरण में अनेक ऐसे तत्त्व होते हैं, जो बालक के भाषा-विकास में सहायक होते हैं। इन तत्त्वों में सीखने के अवसर और अनुकरण प्रमुख हैं। जिन बालकों को भाषा सीखने के पर्याप्त अवसर प्रदान किये जाते हैं, वे शीघ्र ही सीख जाते हैं। बालक का शब्द-भण्डार पड़ोसी बालकों के साथ खेलने से भी पर्याप्त विकसित होता है। माता-पिता के बोलने-चालने का अनुकरण करके भी बालक बहुत-कुछ सीखते हैं। अत: माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चे के सम्मुख शुद्ध और प्रभावमयी भाषा का ही प्रयोग करें। जिन परिवारों के सदस्य आपस में गाली-गलौज और असभ्य शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहाँ बालक भी गाली-गलौज करने लग जाते हैं।

प्रश्न 5
बालक के भाषागत विकास पर पारिवारिक सम्बन्धों का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पारिवारिक सम्बन्ध भाषा-विकास में विशेष योग देते हैं। मैकार्थी और थॉमसन के अनुसार, अनाथालय में रहने वाले बालक बहुत अधिक रोते हैं और कम बलबलाते हैं। ये बालक प्राय: देर से बोलना प्रारम्भ करते हैं। अतः यह सिद्ध होता है कि बालक का भाषा-विकास परिवार में ही समुचित ढंग से होता है। माता-पिता के सम्पर्क और दुलार में बालक शीघ्र बोलना सीख जाता है। डेविस तथा मैकार्थी के अनुसार, बड़े लड़के की भाषा अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होती है, क्योंकि प्रौढ़ लोगों के साथ उसका सम्पर्क अधिक रहता है।

प्रश्न 6
भाषागत विकास पर परिवार के सामाजिक-आर्थिक स्तर का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कुछ मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि जिन परिवारों का सामाजिक तथा आर्थिक स्तर निम्न होता है, उनमें पले बालक देर से बोलना सीखते हैं। जर्सील्ड, गेसेल, डेविस, यंग तथा मैकार्थी के अनुसार, उच्च वर्गों के बालक जल्दी बोलना सीखते हैं तथा अधिक बोलते हैं। इस प्रकार के वातावरण में पले बालकों का उच्चारण भी शुद्ध होता है तथा शब्द-भण्डार बड़ा होता है। इन बच्चों की भाषा अधिक सुसंस्कृत, शिष्ट तथा परिष्कृत होती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भाषा से क्या आशय है?
उत्तर:
पारस्परिक संचार के शाब्दिक रूप को भाषा कहा जाता है।

प्रश्न 2
भाषा की एक संक्षिप्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
‘‘भाषा की परिभाषा व्यक्तियों के बीच परम्परागत प्रतीकों के पाध्यम से विचार-विनिमय की प्रणाली के रूप में की जा सकती है।”

प्रश्न 3
नवजात शिशु की भाषा किस रूप में होती है?
उत्तर:
नवजात शिशु का क्रन्दन या जन्म-रोदन ही उसकी प्रारम्भिक भाषा होती है।

प्रश्न 4
भाषा के विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक क्या है?
उत्तर:
भाषा के विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक है-सामाजिक सम्पर्क।

प्रश्न 5
मानवीय भाषा के मुख्य प्रकारों या रूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानवीय भाषा के मुख्य प्रकार यो रूप हैं-

  1. वाचिक अथवा मौखिक भाषा
  2. अंकित अथवा लिखित भाषा तथा
  3. सांकेतिक भाषा।

प्रश्न 6
संस्कृति के विकास में भाषा के योगदान या महत्त्व को स्पष्ट करने वाला कोई कथन लिखिए।
उत्तर:
“निश्चित रूप से भाषा मानव-संस्कृति की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वस्तु है तथा भाषा के बिना संस्कृति का अस्तित्व और कार्य नहीं हो सकता।”

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. भाषा पारस्परिक संचार का सर्वोत्तम माध्यम है
  2. शिशु की प्रारम्भिक भाषा क्रन्दन के रूप में होती है
  3. भाषा के विकास के अभाव में शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती है
  4. संस्कृति के विकास, संरक्षण एवं हस्तान्तरण में सर्वाधिक योगदान भाषा का ही होता है
  5. सामाजिक सम्पर्क के नितान्त अभाव में भी भाषा को सुचारु रूप से विकास हो सकता है

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
विचारों के आदान-प्रदान का प्रमुख साधन है
(क) भाषा
(ख) संकेत
(ग) प्रतीक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
शिशु की भाषा का प्रारम्भ होता है
(क) बुब्बू शब्द से
(ख) माँ शब्द से
(ग) जन्म-रोदन से
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3.
भाषागत विकास के लिए अनिवार्य शर्त है
(क) नियमित रूप से विद्यालय में जाना
(ख) लिखना-पढ़ना सीखना
(ग) सामाजिक सम्पर्क
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
भाषा के विकास को प्रभावित करने वाले कारक हैं
(क) परिपक्वता
(ख) सामाजिक सम्पर्क
(ग) परिवार का सामाजिक एवं आर्थिक स्तर
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
भाषा तथा शिक्षा का सम्बन्ध है
(क) भाषा तथा शिक्षा में कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) भाषा तथा शिक्षा का सम्बन्ध स्पष्ट नहीं है
(ग) भाषा सीखने के लिए शिक्षा आवश्यक है
(घ) सामान्य रूप से भाषा के माध्यम से ही शिक्षा का आदान-प्रदान होता है

उत्तर:

  1. (क) भाषा
  2. (ग) जन्म रोदन से
  3. (ग) सामाजिक सम्पर्क
  4. (घ) उपर्युक्त सभी
  5. (घ) सामान्य रूप से भाषा के माध्यम से ही शिक्षा का आदान-प्रदान होता है

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties (तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties (तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आवर्त सारणी में व्यवस्था का भौतिक आधार क्या है?
उत्तर
आवर्त सारणी में व्यवस्था का भौतिक आधार समान गुणधर्म (भौतिक तथा रासायनिक गुण) वाले तत्वों को एकसाथ एक ही वर्ग में रखना है। चूंकि तत्वों के ये गुणधर्म मुख्यत: उनके संयोजी कोश के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर निर्भर करते हैं। अत: किसी समूह के तत्वों के परमाणुओं के संयोजी कोश विन्यास समान होते हैं।

प्रश्न 2.
मेंडलीव ने किस महत्त्वपूर्ण गुणधर्म को अपनी आवर्त सारणी में तत्वों के वर्गीकरण का आधार बनाया? क्या वे उस पर दृढ़ रह पाए?
उत्तर
मेंडलीव ने परमाणु भार को, तत्त्वों के वर्गीकरण का आधार माना तथा तत्त्वों को बढ़ते हुए परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित किया। वह अपने आधार पर निष्ठापूर्वक दृढ़ रहे तथा उन्होंने उन तत्त्वों के लिए रिक्त स्थान छोड़ा जो उस समय ज्ञात नहीं थे तथा उनके परमाणु भारों के आधार पर, उनके लक्षणों या गुणों की भविष्यवाणी की। उनकी भविष्यवाणियाँ उन तत्त्वों की खोज होने पर सत्य पायी गयीं।

प्रश्न 3.
मेंडलीव के आवर्त नियम और आधुनिक आवर्त नियम में मौलिक अन्तर क्या है?
उत्तर
मेंडलीव का आवर्त नियम तत्त्वों के परमाणु भारों पर आधारित है, जबकि आधुनिक आवर्त नियम तत्त्वों के परमाणु क्रमांकों पर आधारित है। इस प्रकार मौलिक अन्तर वर्गीकरण का आधार है।

प्रश्न 4.
क्वाण्टम संख्याओं के आधार पर यह सिद्ध कीजिए कि आवर्त सारणी के छठवें आवर्त में 32 तत्व होने चाहिए।
उत्तर
आवर्त सारणी के दीर्घ रूप में प्रत्येक आवर्त एक नई कक्षा के भरने से प्रारम्भ होता है। छठवाँ आवर्त (मुख्य क्वाण्टम संख्या = 6)n = 6 से प्रारम्भ होता है। इस कक्ष के लिए, n= 6 तथा != 0,1, 2 तथा 3 होगा (उच्च मान आदेशित नहीं है)।

इस प्रकार, उपकक्षाएँ 6s, 6p, 6d तथा 6 इलेक्ट्रॉनों के समावेशन के लिए उपलब्ध हैं। किन्तु आँफबाऊ के नियमानुसार 6d तथा 6/-उपकक्षाओं की ऊर्जा 7s-उपकक्षाओं की तुलना में अधिक होती है। इसलिए यह कक्षाएँ 7s उपकक्षाओं के भरने तक नहीं भरती हैं। इसके अतिरिक्त 5d- तथा 4- उपकक्षाओं की ऊर्जाएँ 6p- उपकक्षाओं से कम होती हैं। इसलिए, छठवें आवर्त में, इलेक्ट्रॉन्स केवल 6s, 4,5d तथा 6p- उपकक्षाओं में भरते हैं। इन उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन्स की संख्याएँ क्रमशः 2, 14, 10 तथा 6 होती हैं अर्थात् कुल 32 इलेक्ट्रॉन्स होते हैं। इसी कारण छठवें आवर्त में 32 तत्त्व होते।

प्रश्न 5.
आवर्त और वर्ग के पदों में यह बताइए कि z = 14 कहाँ स्थित होगा?
उत्तर
z=114 तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है-
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-2

यह स्पष्ट है कि दिया तत्त्व एक सामान्य तत्त्व है तथा आवर्त सारणी के p-ब्लॉक से सम्बन्धित है।’ चूँकि इस तत्त्व में n = 7 कक्ष में इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं, अत: यह आवर्त सारणी के सातवें आवर्त में स्थित होगा। इसके अतिरिक्त समूह की संख्या = 10+ संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या
= 10 +4 = 14
अतः दिया गया तत्त्व सातवें आवर्त में तथा समूह 14 में स्थित है।

प्रश्न 6.
उस तत्व का परमाणु क्रमांक लिखिए, जो आवर्त सारणी में तीसरे आवर्त और 17वें वर्ग में स्थित होता है।
उत्तर
तीसरे आवर्त में केवल 3- तथा 3p-कक्षाएँ भरती हैं। अत: आवर्त में केवल दो – तथा छः p-ब्लॉक के तत्त्व होते हैं। तीसरा आवर्त Z=11 से प्रारम्भ होकर Z= 18 पर समाप्त होता है। अतः Z=11 तथा Z= 12 के तत्त्व -ब्लॉक में स्थित होंगे। अगले छः तत्त्व Z = 13 (समूह 13) से Z= 18 (समूह 18)p-ब्लॉक के तत्त्व हैं। इसलिए वह तत्त्व जो 17वें समूह में स्थित है उसका परमाणु क्रमांक Z = 17 होगा।

प्रश्न 7.
कौन-से तत्व का नाम निम्नलिखित द्वारा दिया गया है?
(i) लॉरेन्स बर्कले प्रयोगशाला द्वारा
(ii) सी बोर्ग समूह द्वारा।
उत्तर

  1. लॉरेन्सियम (Lawrencium) (Z=103) तथा बर्केलियम (Berkelium) (Z=97)
  2. सीबोर्गीयम (Seaborgium) (Z = 106)

प्रश्न 8.
एक ही वर्ग में उपस्थित तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुणधर्म समान क्यों होते हैं?
उत्तर
एक ही वर्ग में उपस्थित तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते हैं अर्थात् उनकी संयोजी कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है। इसी कारण से एक ही वर्ग में उपस्थित तत्त्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं।

प्रश्न 9.
परमाणु त्रिज्या’ और ‘आयनिक त्रिज्या से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
परमाणु त्रिज्या से तात्पर्य परमाणु का आकार है, जो परमाणु के नाभिक के केन्द्र से बाह्यतम कक्षा के इलेक्ट्रॉन की दूरी के बराबर मानी जाती है। किसी आयन की ‘आयनिक त्रिज्या’ उसके नाभिक तथा उस बिन्दु के मध्य की दूरी को माना जाता है जिस पर नाभिक का प्रभाव आयन के इलेक्ट्रॉन मेघ पर प्रभावी होता है।

प्रश्न 10.
किसी वर्ग या आवर्त में परमाणु त्रिज्या किस प्रकार परिवर्तित होती है? इस परिवर्तन की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
उत्तर
आवर्त में परमाणु त्रिज्याएँ (Atomic Radii in Periods) किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ चलने पर परमाणु त्रिज्याएँ नियमित क्रम में क्षार धातु से हैलोजेन तक घटती हैं; क्योंकि नाभिकीय आवेश बढ़ने के साथ-साथ बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनों की संख्या भी बढ़ती है, फलस्वरूप बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करने की क्षमता भी बढ़ती है। इस कारण इनकी नाभिक व बाह्यतमं कोशों के बीच की दूरी क्रमशः घटती है; अत: परमाणु त्रिज्या घटती है। (यह ध्यान देने योग्य है कि यहाँ उत्कृष्ट गैसों की परमाणु त्रिज्या पर विचार नहीं किया जा रहा है। एकल परमाणु होने के कारण उनकी आबन्धित त्रिज्या बहुत अधिक है। इसलिए उत्कृष्ट गैसों की तुलना दूसरे तत्वों की सहसंयोजक त्रिज्या से न करके वाण्डरवाल्स त्रिज्या से करते हैं।)

कुछ तत्वों के लिए परमाणु त्रिज्या का मान निम्नांकित सारणी-1 में दिया गया है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-3
द्वितीय आवर्त में परमाणु त्रिज्या में परमाणु क्रमांक के साथ परिवर्तन चित्र-1 में प्रदर्शित वक्र द्वारा और अधिक स्पष्ट होता है। वक्र में स्पष्ट प्रदर्शित है कि नितान्त बाईं ओर स्थित क्षार धातु (Li) की परमाणु त्रिज्या अधिकतम तथा नितान्त दाईं ओर स्थित हैलोजेन (F) की परमाणु त्रिज्या का मान न्यूनतम है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-4
वर्ग में परमाणु त्रिज्याएँ (Atomic radii in Groups)
किसी वर्ग में ऊपर से नीचे चलने पर परमाणु त्रिज्याएँ बढ़ती हैं; क्योंकि जैसे-जैसे नाभिकीय आवेश बढ़ता है, इलेक्ट्रॉनिक कोशों की संख्या बढ़ती जाती है, फलस्वरूप बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करने की क्षमता घटती है; अत: परमाणु त्रिज्या बढ़ती है।
निम्नांकित सारणी-2 में धातुओं तथा हैलोजेन तत्वों के लिए परमाणु त्रिज्याएँ दी गई हैं
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वर्ग में परमाणु क्रमांकों के साथ क्षार धातुओं तथा हैलोजेनों की परमाणु त्रिज्याओं में परिवर्तन चित्र-2 में प्रदर्शित वक्र द्वारा और अधिक स्पष्ट होता है। मानों से यह स्पष्ट है कि लीथियम (Li) की परमाणु त्रिज्या न्यूनतम तथा सीजियम (Cs) की अधिकतम है। इसी प्रकार हैलोजेनों में फ्लुओरीन (F) की परमाणु त्रिज्या न्यूनतम तथा आयोडीन (I) की अधिकतम है।
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प्रश्न 11.
समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज से आप क्या समझते हैं? एक ऐसी स्पीशीज का नाम लिखिए, जो निम्नलिखित परमाणुओं या आयनों के साथ समइलेक्ट्रॉनिक होगी-
(i) F
(ii) Ar
(iii) Mg2+
(iv) Rb+
उत्तर
वे स्पीशीज (विभिन्न तत्त्वों के आयन या परमाणु) जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समने होती है। लेकिन नाभिकीय आवेश भिन्न होता है, समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज कहलाती हैं।
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प्रश्न 12.
निम्नलिखित स्पीशीज पर विचार कीजिए- –
N3-,O2-, F, Na+, Mg2+ तथा Al3+
(क) इनमें क्या समानता है? |
(ख) इन्हें आयनिक त्रिज्या के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
(क) दी गई प्रत्येक स्पीशीज में 10 इलेक्ट्रॉन हैं। अत: ये सब समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज हैं।
(ख) समइलेक्ट्रॉनिक आयनों की आयनिक त्रिज्या, परमाणु आवेश के बढ़ने के साथ घटती है। दी।
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प्रश्न 13.
धनायन अपने जनक परमाणुओं से छोटे क्यों होते हैं और ऋणायनों की त्रिज्या उनके जनक परमाणुओं की त्रिज्या से अधिक क्यों होती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर
जनक परमाणुओं से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के निकलने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है। इस प्रकार बचे हुए इलेक्ट्रॉन अधिक नाभिकीय आकर्षण का अनुभव करते हैं। परिणामस्वरूप त्रिज्या घटती है। इसी कारण धनायन की त्रिज्या उनके जनक परमाणु से छोटी होती है। दूसरी ओर, जनके परमाणुओं में एक या अधिक इलेक्ट्रॉन बढ़ने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश घटता है। इस प्रकार, इलेक्ट्रॉन कम नाभिकीय आकर्षण या खिंचाव अनुभव करते हैं। परिणामस्वरूप त्रिज्या बढ़ती है। इसी कारण से ऋणायनों की त्रिज्या उनके जनक परमाणुओं की त्रिज्या से अधिक होती है।

प्रश्न 14.
आयनन एन्थैल्पी और इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी को परिभाषित करने में विलगित गैसीय परमाणु तथा ‘आद्य अवस्था पदों की सार्थकता क्या है?
उत्तर
किसी परमाणु के नाभिक द्वारा उसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों पर आरोपित बल काफी मात्रा में अणु में उपस्थित अन्य परमाणुओं तथा पड़ौसी परमाणुओं की उपस्थिति पर निर्भर करता है। चूंकि इस बल का परिमाण आयनन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के मानों को निर्धारित करता है, अतः इन्हें विलगित परमाणुओं के लिए परिभाषित करना आवश्यक है। एक अकेले परमाणु को विलगित करना सम्भव नहीं है। चूंकि गैसीय अवस्था में परमाणु (या अणु) काफी अलग होते हैं, आयनन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी गैसीय परमाणुओं के लिए परिभाषित की जाती है तथा यह माना जाता है कि वे विलगित हैं। इसके अतिरिक्त आद्य अवस्था (ground state) निम्नतम ऊर्जा की अवस्था अर्थात् सबसे अधिक स्थाई अवस्था को निर्देशित करती है। यदि परमाणु उत्तेजित अवस्था में है, तो इसकी ऊर्जा का एक निश्चित मान होगा और इस अवस्था में आयनन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के मान भिन्न होंगे। अतः आयनन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी को परिभाषित करते समय एक गैसीय परमाणु को आद्य अवस्था में स्थित होना आवश्यक है।

प्रश्न 15.
हाइड्रोजन परमाणु में आद्य अवस्था में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा -2.18 x 10-18 J है। परमाणविक हाइड्रोजन की आयनन एन्थैल्पी Jmol-1 के पदों में परिकलित कीजिए।
उत्तर
हाइड्रोजन परमाणु की आद्य अवस्था से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा
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प्रश्न 16.
द्वितीय आवर्त के तत्वों में वास्तविक आयनन एन्थैल्पी का क्रम इस प्रकार है
Li< B < Be<C< O< N < F < Ne व्याख्या कीजिए कि
(i) Be की ∆i,H, B से अधिक क्यों है?
(ii) O की ∆iH, N और F से कम क्यों है?
उत्तर
(i) Be तथा B के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नांकित प्रकार हैं
4Be= 2,2 या 1s2 ,2s2
5B= 2, 3 या 1s2 ,2s2 2p1
बोरॉन (B) में, इसके एक 2p कक्षक में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। बेरिलियम (Be) में युग्मित : इलेक्ट्रॉनों वाले पूर्ण-पूरित ls तथा 25 कक्षक हैं।

जब हम एक ही मुख्य क्वाण्टम ऊर्जा स्तर पर विचार करते हैं तो 5-इलेक्ट्रॉन p-इलेक्ट्रॉन की तुलना में नाभिक की ओर अधिक आकर्षित होता है। बेरिलियम में बाह्यतम इलेक्ट्रॉन, जो अलग किया जाएगा, वह 5-इलेक्ट्रॉन होगा, जबकि बोरॉन में बाह्यतम इलेक्ट्रॉन (जो अलग किया जाएगा) p-इलेक्ट्रॉन होगा। उल्लेखनीय है कि नाभिक की ओर 2-इलेक्ट्रॉन का भेदन (penetration) 2p-इलेक्ट्रॉन की तुलना में अधिक होता है। इस प्रकार बोरॉन का 2p-इलेक्ट्रॉन बेरिलियम के 2-इलेक्ट्रॉन की तुलना में आन्तरिक क्रोड इलेक्ट्रॉनों द्वारा अधिक परिरक्षित होता है। चूंकि बेरिलियम के 25-इलेक्ट्रॉन की तुलना में बोरॉन को 2p-इलेक्ट्रॉन अधिक सरलता से पृथक् हो जाता है; अत: बेरिलियम की तुलना में बोरॉन की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (∆iH) का मान कम होगा।

(ii) नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नांकित प्रकार हैं

7N = 2,5 या 1s2, 2s2 2p1x 2p1y 2p1z
8O= 2,6 या 1s2 , 2s2 2p2x 2p1y 2p1z

स्पष्ट है कि नाइट्रोजन में तीनों बाह्यतम 2p-इलेक्ट्रॉन विभिन्न p-कक्षकों में वितरित हैं (हुण्ड का नियम), जबकि ऑक्सीजन के चारों 2p-इलेक्ट्रॉनों में से दो 2p-इलेक्ट्रॉन एक ही 2p-ऑर्बिटल में हैं; फलतः इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बढ़ जाता है। फलस्वरूप नाइट्रोजन के तीनों 2p-इलेक्ट्रॉनों में से एक इलेक्ट्रॉन पृथक् करने की तुलना में ऑक्सीजन के चारों 2p-इलेक्ट्रॉनों में से चौथे इलेक्ट्रॉन को पृथक् करना सरल हो जाता है; अतः 6 की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (∆iH) का मान N से कम होता है। यही स्पष्टीकरण F के लिए भी दिया जा सकता है।

प्रश्न 17.
आप इस तथ्य की व्याख्या किस प्रकार करेंगे कि सोडियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी से कम है, किन्तु इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक है?
उत्तर
Na तथा Mg के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न हैं-
Na (Z= 11): 1s2 2s2 2p6 3s1
Mg (Z= 12): 1s2 2s2 2p6 3s2
चूँकि सोडियम (+11) ; में मैग्नीशियम’ (+12) की तुलना में कम नाभिकीय आवेश है, सोडियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की तुलना में कम होगी।
प्रथम इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद, सोडियम Na+ आयन में परिवर्तित हो जाता है तथा मैग्नीशियम Mg+ में। इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार से होगा-
Na+ : 1s2 2s2 2p6
Mg+ : 1s2 2s2 2p6 3s1
Na+ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निऑन के समान एक बहुत अधिक स्थाई इलेक्ट्रॉनिक विन्यास , है। इसलिए Naआयन से Mg की तुलना में इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। इसी कारण से सोडियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी, मैग्नीशियम की तुलना में अधिक होती है।

प्रश्न 18.
मुख्य समूह तत्वों में आयनन एन्थैल्पी के किसी समूह में नीचे की ओर कम होने के कौन-से कारक हैं?
उत्तर
मुख्य समूह तत्वों में आयनन एन्थैल्पी के किसी समूह में नीचे की ओर कम होने के विभिन्न कारक निम्नलिखित हैं-

  1. समूह में नीचे जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है।
  2. समूह में नीचे जाने पर प्रत्येक तत्व में नए कोश जुड़ जाने के कारण परमाणु आकार बढ़ जाते ।
  3. समूह में नीचे जाने पर आन्तरिक इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है। इससे बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों पर आवरण-प्रभाव घट जाता है।

परमाणु आकार में वृद्धि तथा आवरण-प्रभाव का संयुक्त प्रभाव नाभिकीय आवेश में वृद्धि के प्रभाव से अधिक हो जाता है। ये प्रभाव इस प्रकार कार्य करते हैं कि नाभिक तथा बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण बल कम हो जाता है। परिणामस्वरूप समूह में नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी कम हो जाती है।

प्रश्न 19.
वर्ग 13 के तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मान (kJ mol-1) में इस प्रकार हैं-
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उत्तर
सामान्य परम्परा के अनुसार वर्ग 13 में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी घटती है। लेकिन Ga तथा TI इसके अपवाद हैं। d तथा / इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव (shielding effect) 5 तथा 2 इलेक्ट्रॉनों की तुलना में कम होता है। Ga में 3d इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि T1 में 5d तथा 47 इलेक्ट्रॉन होते हैं। कम परिरक्षण प्रभाव के कारण, Ga तथा T1 परमाणुओं के नाभिक संयोजी इलेक्ट्रॉन को मजबूती से बाँधे रखते हैं। इसी कारण से पड़ौसी तत्त्वों की तुलना में इनकी आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है।

प्रश्न 20.
तत्वों के निम्नलिखित युग्मों में किस तत्व की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होगी?
(i) O या F
(ii) F या Cl
उत्तर

  1. F की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होगी। O से F तक जाने में, परमाणु आकार घटता है तथा नाभिकीय आवेश बढ़ता है। ये दोनों कारक फ्लुओरीन की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के मान को अधिक ऋणात्मक बनाते हैं क्योंकि ये आने वाले इलेक्ट्रॉन के लिए नाभिकीय आकर्षण में वृद्धि करते हैं।
  2. CI की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है।

प्रश्न 21.
आप क्या सोचते हैं कि O की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी प्रथम इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के समान धनात्मक, अधिक ऋणात्मक या कम ऋणात्मक होगी? अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
उत्तर
ऑक्सीजन (O) की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी धनात्मक होती है। उदासीन ऑक्सीजन परमाणु में प्रथम इलेक्ट्रॉन के जुड़ने पर ऊर्जा का निष्कासन होता है तथा प्रथम इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी ऋणात्मक होती है।

O(g)+e → O (g); ∆eg H= -141.0 kJ

और अधिक इलेक्ट्रॉन के जुड़ने के लिए ऊर्जा का अवशोषण आवश्यक है।

O(g)+e → O2-(g); ∆egH = +780.0kJ

इसका कारण यह है कि ऋण आवेशित 0 आयन तथा आने वाले इलेक्ट्रॉन के बीच प्रबल विद्युत स्थैतिक प्रतिकर्षण होता है। इस स्थिति में इलेक्ट्रॉन को जोड़ने के लिए ऊर्जा का अवशोषण आवश्यक है जो विद्युत स्थैतिक प्रतिकर्षण पर विजय प्राप्त करता है। इसी कारण से ऑक्सीजन की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी धनात्मक होती है।

प्रश्न 22.
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी और इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता में क्या मूल अन्तर है?
उत्तर
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी किसी विलगित गैसीय परमाणु की एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति को संदर्भित करती है, जबकि विद्युत ऋणात्मकता किसी परमाणु के द्वारा सहसंयोजक बध में साझे के युग्मित इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर खींचने की प्रवृत्ति है। इस प्रकार ये दोनों गुण एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं, जबकि दोनों एक परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉन को आकर्षित करने की प्रवृत्ति को संदर्भित करते हैं।

प्रश्न 23.
सभी नाइट्रोजन यौगिकों में N की विद्युत ऋणात्मकता पॉलिंग पैमाने पर 3.0 है। आप इस कथन पर अपनी क्या प्रतिक्रिया देंगे?
उत्तर
यह कथन विवादास्पद है क्योंकि एक परमाणु की विद्युत ऋणात्मकता उसके सभी यौगिकों में स्थिर नहीं होती है। यह संकरण अवस्था तथा ऑक्सीकरण अवस्था के साथ बदलती है। उदाहरण के लिए, NO, तथा NO में N की विद्युत ऋणात्मकता, ऑक्सीकरण अवस्थाओं में भिन्नता के कारण, भिन्न होती है।

प्रश्न 24.
उस सिद्धान्त का वर्णन कीजिए, जो परमाणु की त्रिज्या से सम्बन्धित होता है,
(i) जब वह इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है।
(ii) जब वह इलेक्ट्रॉन का त्याग करता है।
उत्तर
(i) जब परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है, तब ऋणायन बनता है। परमाणु के ऋणायन में परिवर्तन के दौरान एक या अधिक इलेक्ट्रॉन परमाणु के संयोजी कोश से जुड़ जाते हैं। नाभिकीय आवेश जनक परमाणु के समान ही रहता है। संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या में वृद्धि, इलेक्ट्रॉनों द्वारा परस्परीय परिरक्षण की अधिकता के कारण, प्रभावी नाभिकीय आवेश को कम कर देती है। परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन-मेघ विस्तृत हो जाता है अर्थात् आयनिक त्रिज्या बढ़ जाती है।
(ii) जब परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का त्याग करता है, तब धनायन बनता है। इस प्रकार प्राप्त धनायन सदैव अपने जनक परमाणु से आकार में छोटा होता है। ऐसा निम्नलिखित कारणों से हो सकता है-

  • संयोजी कोश के विलोपन द्वारा (By elimination of valence shell)-कुछ स्थितियों में, इलेक्ट्रॉन त्यागने पर संयोजी कोश को पूर्णतया विलोपन हो जाता है। बाह्यतम कोश विलुप्त होने के कारण धनायन के आकार में कमी आ जाती है।
  • प्रभावी नाभिकीय आवेश में वृद्धि के द्वारा (By increase in effective nuclear charge)-धनायन में, इलेक्ट्रॉनों की संख्या जनक परमाणु से कम होती है। कुल नाभिकीय आवेश समान रहता है। यह प्रभावी नाभिकीय आवेश को बढ़ा देता है। परिणामस्वरूप, इलेक्ट्रॉन नाभिक से अधिक दृढ़ता से जुड़े रहते हैं जिससे इनके आकार में कमी आ जाती है।

प्रश्न 25.
किसी तत्व के दो समस्थानिकों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी समान होगी या भिन्न? आप क्या मानते हैं? अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
उत्तर
एक तत्त्व के समस्थानिकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या, परमाणु नाभिकीय आवेश तथा आकार समान होता है। इसलिए इनकी प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मान समान होते हैं।

प्रश्न 26.
धातुओं और अधातुओं में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर
धातुएँ विद्युत धनात्मक तत्त्व हैं तथा एक या अधिक संयोजी इलेक्ट्रॉनों को त्यागकर धनायनों का निर्माण करती हैं। ये एक अपचायक के रूप में कार्य करती हैं तथा इनकी आयनन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉनिक लब्धि एन्थैल्पी तथा विद्युत ऋणात्मकता का मान कम होता है। ये बेसिक ऑक्साइड्स बनाती हैं। दूसरी तरफ, अधातुएँ विद्युत ऋणात्मक तत्त्व हैं तथा अपने संयोजी कक्ष में एक या अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन बनाने की प्रवृत्ति दर्शाती हैं। ये ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करती हैं। इनकी आयनन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा विद्युत ऋणात्मकता के मान अधिक होते हैं। ये अम्लीय ऑक्साइड बनाती हैं।

प्रश्न 27.
आवर्त सारणी का उपयोग करते हुए निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(क) उस तंव का नाम बताइए जिसके बाह्य उप-कोश में पाँच इलेक्ट्रॉन उपस्थित हों।
(ख) उस तत्व का नाम बताइए जिसकी प्रवृत्ति दो इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की हो।
(ग) उस तत्व का नाम बताइए जिसकी प्रवृत्ति दो इलेक्ट्रॉनों को प्राप्त करने की हो।
(घ) उस वर्ग का नाम बताइए जिसमें सामान्य ताप पर धातु, अधातु, द्रव और गैस उपस्थित हों।
उत्तर
(क) F(1s2 2s2 2p5)
(ख) Mg (1s2 2s2 2p6 3s2); Mg → Mg2+ +2 e
(ग) O(1s2 2s2 2p4); 0+2e → 02-
(घ) द्रव धातुएँ : Hg (वर्ग 12) तथा Ga (वर्ग 13) हैं।
द्रव अधातुएँ ब्रोमीन (वर्ग 17) हैं। गैसीय अधातुएँ : फ्लुओरीन तथा क्लोरीन (वर्ग 17), ऑक्सीजन (वर्ग 16), नाइट्रोजन (वर्ग 15) इत्यादि।

प्रश्न 28.
प्रथम वर्ग के तत्वों के लिए अभिक्रियाशीलता का बढ़ता हुआ क्रम इस प्रकार है- Li < Na < K < Rb < Cs; जबकि वर्ग 17 के तत्वों में क्रम F > Cl> Br>I है।
इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर
वर्ग 1 के तत्त्व विद्युत धनात्मक तत्त्व होते हैं तथा संयोजी इलेक्ट्रॉन को त्यागकर एकल धनात्मक धनायन बनाते हैं। इनकी क्रियाशीलता आयनन एन्थैल्पी के मान पर निर्भर करती है। यदि आयनन एन्थैल्पी का मान कम है तो क्रियाशीलता अधिक होती है। चूंकि वर्ग में नीचे जाने पर, आयनन एन्थैल्पी का मान घटता है, अतः प्रथम वर्ग के तत्त्वों की क्रियाशीलता वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है। (अर्थात् इस क्रम में, Li Cl > Br> I)

प्रश्न 29.
S-, p-, d और f-ब्लॉक के तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर
(i) s-ब्लॉक तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns1-2 (अर्थात् ns1 या ns2) होता है।
(ii) p-ब्लॉक तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1-6 होता है।
(iii) d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-1) d1-10 ns1-2 होता है।
(iv) f-ब्लॉक तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-2) f1-14 (n-1) 4d0-1ns2 होता है।

प्रश्न 30.
तत्व, जिसका बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित है, का स्थान आवर्त सारणी में बताइए-
(i) ns2np4, जिसके लिए n = 3 है।
(ii) (n-1) d2 ns2, जब n= 4 है तथा
(iii) (n-2)f7 (n-1) d1 ns2, जब n= 6 है।
उत्तर
(i) दिया गया तत्त्व तीसरे आवर्त (n=3) में उपस्थित है तथा इसके संयोजी कक्ष में 6(2+4) इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं। यह एक p-ब्लॉक तत्त्व है क्योंकि विभेदी (differentiating) इलेक्ट्रॉन p-उपकक्ष में प्रवेश करता है।
∴ वर्ग की संख्या = 10+ संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 10+6= 16
इस प्रकार, यह तत्त्व तीसरे आवर्त तथा वर्ग 16 में स्थित है। यह सल्फर (S) है।
(ii) दिया गया तत्त्व चौथे आवर्त (n=4) में स्थित है। यह एक 4-ब्लॉक तत्त्व है क्योंकि d-उपकोश अपूर्ण है।
∴ वर्ग की संख्या = 2+ (n-1)d इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2+2=4
इस प्रकार यह तत्त्व चौथे आवर्त तथा समूह 4 में स्थित है। यह Ti (टाइटेनियम) है।
(iii) दिया गया तत्त्व छठवें आवर्त में स्थित है। यह एक f-ब्लॉक तत्त्व है क्योंकि विभेदी इलेक्ट्रॉन (n-2)f उपकक्ष में प्रवेश करता है। यह तत्त्व वर्ग 3 में स्थित है क्योंकि सभी f-ब्लॉक के तत्त्वों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। यह तत्त्व Gd (gadolinium) है।

प्रश्न 31.
कुछ तत्वों की प्रथम ∆iH1 और द्वितीय ∆iH2 आयनन एन्थैल्पी (kJ mol-1 में) और इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी (∆egH) (kJ mol-1 में) निम्नलिखित है-
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(क) सबसे कम अभिक्रियाशील धातु है?
(ख) सबसे अधिक अभिक्रियाशील धातु है?
(ग) सबसे अधिक अभिक्रियाशील अधातु है?
(घ) सबसे कम अभिक्रियाशील अधातु है?
(ङ) ऐसी धातु है, जो स्थायी द्विअंगी हैलाइड (binary halide), जिनका सूत्र MX, (X= हैलोजेन) है, बनाता है।
(च) ऐसी धातु, जो मुख्यतः MX (X = हैलोजेन) वाले स्थायी सहसंयोजी हैलाइड बनाती है।
उत्तर
(क) तत्त्व V, क्योंकि इस प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान सर्वाधिक है तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान धनात्मक है। यह कर्म क्रियाशील धातु है। यह एक उत्कृष्ट गैस होनी चाहिये।
(ख) तत्त्व II, क्योंकि इसकी प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान न्यूनतम तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान कम है। इसे अधिक क्रियाशील धातु होना चाहिए। यह एक क्षारीय धातु होनी चाहिए।
(ग) तत्त्व III, क्योंकि इसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान उच्च ऋणात्मक तथा प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान पर्याप्त उच्च है। यह एक हैलोजन (halogen) होना चाहिए।
(घ) तत्त्व IV, क्योंकि इसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान उच्च ऋणात्मक तथा प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान काफी कम है। इसे सबसे कम क्रियाशील अधातु होना चाहिए। यह सम्भवतः एक ‘ कम क्रियाशील हैलोजन है।
(ङ) तत्त्व VI, क्योंकि इसकी प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान यद्यपि कम है, लेकिन फिर भी क्षार धातुओं से अधिक है। इसे एक मृदा क्षारीय धातु होना चाहिए। यह MX, प्रकार के द्विअंगी हैलाइड का निर्माण करेगा।
(च) तत्त्व I, क्योंकि इसकी प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान कम है लेकिन द्वितीय आयतन एन्थैल्पी का मान बहुत अधिक है। यह एक क्षारीय धातु है। यह Li होना चाहिए क्योंकि यह सूत्र MX का स्थायी सहसंयोजी हैलाइड बनाता है।

प्रश्न 32.
तत्वों के निम्नलिखित युग्मों के संयोजन से बने स्थायी द्विअंगी यौगिकों के सूत्रों की प्रगुक्ति कीजिए-
(क) लीथियम और ऑक्सीजन
(ख) मैग्नीशियम और नाइट्रोजन
(ग) ऐलुमिनियम और आयोडीन
(घ) सिलिकन और ऑक्सीजन
(ङ) फॉस्फोरस और फ्लुओरीन
(च) 71वाँ तत्व और फ्लुओरीन
उत्तर
(क) लीथियम की संयोजकता (201, वर्ग 1) 1 है, जबकि ऑक्सीजन (2s2 2p4, वर्ग 16) की 2 है। इसलिए, दोनों के मध्य बना द्विअंगी यौगिक Li20 है।
(ख) मैग्नीशियम (3s2, वर्ग 2) की संयोजकता 2 है, जबकि नाइट्रोजन (2s2 2p4, वर्ग 15) की
संयोजकता 3 है। इसलिये दोनों के मध्य बना द्विअंगी यौगिक Mg3N2 है।
(ग) ऐलुमिनियम (3s2 3p1, समूह 13) की संयोजकता 3 है, जबकि आयोडीन (5s2, 5p5, वर्ग 17) की संयोजकता 1 है। इसलिए, दोनों के मध्य बना द्विअंगी यौगिक AII3 है।
(घ) सिलिकॉन (3s2 3p2, वर्ग 14) की संयोजकता 4 है, जबकि ऑक्सीजन (2s2 2p4, वर्ग 17) की संयोजकता 2 है। इसलिए दोनों के मध्य बना द्विअंगी यौगिक SiO2 है।
(ङ) फॉस्फोरस (3s2 3p3, वर्ग 15) की संयोजकता 3 तथा 5 है, जबकि फ्लुओरीन (2s2 2p4, वर्ग 17) की संयोजकता 1 है। इसलिए, दोनों के मध्य बना द्विअंगी यौगिक PF3 अथवा PF5 है।
(च) तत्त्व जिसका परमाणु क्रमांक 71(4f14 5d1 6s2) है, एक लैन्थेनाइड है तथा ल्यूटीशियम : (Lu) है। यह वर्ग 3 में स्थित है। इसकी संयोजकता 3 है। फ्लु ओरीन (2s2 2p5, वर्ग 17) की संयोजकता 1 है। इसलिए, दोनों के मध्य बना द्विअंगी यौगिक LuF, है।

प्रश्न 33.
आधुनिक आवर्त सारणी में आवर्त निम्नलिखित में से किसको व्यक्त करता है?
(क) परमाणु संख्या
(ख) परमाणु द्रव्यमान
(ग) मुख्य क्वाण्टम संख्या
(घ) दिगंशी क्वाण्टम संख्या
उत्तर
(ग) मुख्य क्वाण्टम संख्या
आधुनिक आवर्त सारणी में, प्रत्येक आवर्त एक नवीन कक्ष के भरने के साथ प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 34.
आधुनिक आवर्त सारणी के लिए निम्नलिखित के सन्दर्भ में कौन-सा कथन सही नहीं है।
(क) p-ब्लॉक में 6 स्तम्भ हैं, क्योंकि p-कोश के सभी कक्षक भरने के लिए अधिकतम 6 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है।
(ख) d-ब्लॉक में 8 स्तम्भ हैं, क्योंकि d-उपकोश के कक्षक भरने के लिए अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है।
(ग) प्रत्येक ब्लॉक में स्तम्भों की संख्या उस उपकोश में भरे जा सकने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है।
(घ) तत्व के इलेक्ट्रॉन विन्यास को भरते समय अन्तिम भरे जाने वाले इलेक्ट्रॉन को उपकोश उसके दिगंशी क्वाण्टम संख्या को प्रदर्शित करता है।
उत्तर
कथन (ख) असत्य है। 4-ब्लॉक में 10 स्तम्भ हैं क्योंकि एक d-उपकक्ष में अधिकतम 10 इलेक्ट्रॉन ही व्यवस्थित हो सकते हैं।

प्रश्न 35.
ऐसा कारक, जो संयोजकता इलेक्ट्रॉन को प्रभावित करता है, उस तत्व की रासायनिक , प्रवृत्ति भी प्रभावित करता है। निम्नलिखित में से कौन-सा कारक संयोजकता कोश को
प्रभावित नहीं करता?
(क) संयोजक मुख्य क्वाण्टम संख्या (n)
(ख) नाभिकीय आवेश (z)
(ग) नाभिकीय द्रव्यमान
(घ) क्रोड इलेक्ट्रॉनों की संख्या
उत्तर
(ग) नाभिकीय द्रव्यमान। नाभिकीय द्रव्यमान संयोजकता कोश को प्रभावित नहीं करता है।

प्रश्न 36.
समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज F, Ne और Na+ का आकार इनमें से किससे प्रभावित : होता है?
(क) नाभिकीय आवेश (Z)
(ख) मुख्य क्वाण्टम संख्या (n)
(ग) बाह्य कक्षकों में इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन अन्योन्यक्रिया
(घ) ऊपर दिए गए कारणों में से कोई भी नहीं, क्योंकि उनका आकार समान है।
उत्तर
(क) नाभिकीय आवेश। समइलेक्ट्रॉनिक आयनों की त्रिज्या नाभिकीय आवेश के बढ़ने पर घटती है। दी गई समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज में विभिन्न नाभिकीय आवेश हैं और इस प्रकार उनके आकार भिन्न हैं। इनका आकार निम्न क्रम में घटता है-
F (+9)> Ne(+10)> Na+ (+11)

प्रश्न 37.
आयनन एन्थैल्पी के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा असत्य/गलत है?
(क) प्रत्येक उत्तरोत्तर इलेक्ट्रॉन से आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है।
(ख) क्रोड उत्कृष्ट गैस के विन्यास से जब इलेक्ट्रॉन को निकाला जाता है, तब आयनन एन्थैल्पी का मान अत्यधिक होता है।
(ग) आयनन एन्थैल्पी के मान में अत्यधिक तीव्र वृद्धि संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के विलोपन को व्यक्त करती है।
(घ) कम मान वाले कक्षकों से अधिक n मान वाले कक्षकों की तुलना में इलेक्ट्रॉनों को आसानी से निकाला जा सकता है।
उत्तर
कथन (घ) असत्य है। अधिक » मान वाले कक्षकों से इलेक्ट्रॉनों को आसानी से निकाला जा सकता है, क्योंकि निकलने वाला इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होता है।

प्रश्न 38.
B, AI, Mg, K तत्वों के लिए धात्विक अभिलक्षण का सही क्रम इनमें कौन-सा है?
(क) B > Al> Mg > K
(ख) Al> Mg > B > K
(ग) Mg > Al> K > B
(घ) K > Mg > Al> B
उत्तर
(घ) K> Mg> Al> B
यह क्रम इसलिए सही है क्योंकि धात्विक गुण आवर्त में आगे बढ़ने पर घटता है। इसलिए, Al, Mg तथा K के धात्विक गुण इस क्रम में होंगे-K > Mg > Al। इसके अतिरिक्त धात्विक गुण एक वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते हैं। अत: B को Al की तुलना में कम धात्विक होना चाहिए।

प्रश्न 39.
तत्वों B, C, N, F और Si के लिए अधातु अभिलक्षण का इनमें से सही क्रम कौन-सा है?
(क) B > C> Si> N > F
(ख) Si> C> B > N > F
(ग) F> N > C> B > Si
(घ) F > N > C > Si > B
उत्तर
(ग) F > N >C>B> Si
यह इसलिए है क्योकि अधातु अभिलक्षण एक आवर्त में बायें से । दायें ओर जाने पर बढ़ते हैं तथा वर्ग में नीचे जाने पर घटते हैं।

प्रश्न 40.
तत्वों F, CI, O और N तथा ऑक्सीकरण गुणधर्मों के आधार पर उनकी रासायनिक अभिक्रियाशीलता का क्रम निम्नलिखित में से कौन-से तत्वों में है?
(क) F > Cl> O > N
(ख) F> O> Cl> N
(ग) Cl> F> O > N
(घ) O> F> N > Cl
उत्तर
(ख) F>O>Cl>N
तत्त्वों का ऑक्सीकारक गुणधर्म एक आवर्त में बायें से दायें चलने पर बढ़ता है तथा वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। ऑक्सीजन Cl की तुलना में एक प्रबल ऑक्सीकारक पदार्थ है क्योंकि 0 अधिक विद्युत ऋणात्मक है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक तत्त्व में अन्तिम इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के माने n = 5;1 = 1; m = -1; s = [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex], हैं। तत्त्व है।
(i) आन्तरिक संक्रमण तत्त्व
(ii) संक्रमण तत्त्व
(iii) अक्रिय गैस
(iv) क्षारीय धातु
उत्तर
(iii) अक्रिय गैस

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सी धातु एक से अधिक ऑक्सीकरण अवस्था प्रकट करती है?
(i) Na
(ii) Mg
(iii) Al
(iv) Fe
उत्तर
(iv) Fe

प्रश्न 3.
निम्नलिखित आयनों की त्रिज्या का सही क्रम है ।
(i) F <O2-< Na+<Mg2+
(ii) Mg2+<Na+<F <O2-
(iii) Na+ <Mg2+<O2-<F
(iv) O2-<F < Na+< Mg2+
उत्तर
(ii) Mg2+ <Na+ <F <O2-

प्रश्न 4.
सर्वाधिक धन-विद्युतीय तत्त्व है।
(i) [He]2s1
(ii) [He]2s2
(iii) [Xe]6s1
(iv) [Xe]6s2
उत्तर
(iii) [Xe]6s1

प्रश्न 5.
धन विद्युती लक्षण का सही क्रम है
(i) Cs > Rb >K > Na> Li।
(ii) Rb>Cs >K> Na >Li
(iii) Li> Na> K> Rb>Cs
(iv) K> Na> Rb>Cs>Li
उत्तर
(i) Cs > Rb >K >Na >Li।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित धनायनों की त्रिज्याओं का सही क्रम है।
(i) Li+ > Na+ > Na2+ > Be2+
(ii) Na+ > Mg2+ >Li+ > Be2+
(iii) Na+ > Li+ > Mg2+ > Be2+
(iv) Mg2+ > Na2+ > Li+ > Be2+
उत्तर
(ii) Na+ > Mg2+ > Li+ > Be2+

प्रश्न 7.
ऋण विद्युती लक्षण का सही क्रम है।
(i) I> Br>Cl> F
(ii) Br>Cl> F>I
(iii) F>Cl> Br>I
(iv) Cl> Br>I> F
उत्तर
(iii) F> Cl> Br> I

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से ऋणायनों की त्रिज्याओं का सही क्रम है।
(i) F > Cl > S2- >O2-
(ii) S2- > Cl > O2- > F
(iii) Cl > S2- > O2- > F
(iv) O2- > Cl > F > S2-
उत्तर
(ii) S2- > Cl >O2- > F

प्रश्न 9.
आयन जिसका प्रथम आयनन विभव निम्न समइलेक्ट्रॉनिक आयनों में सबसे अधिक है, .
(i) Ca2+
(ii) Cl
(iiii) K+
(iv) S2-
उत्तर
(i) Ca2+

प्रश्न 10.
निम्नलिखित समइलेक्ट्रॉनिक आयनों में सबसे छोटा आयन है।
(i) Na+
(ii) Mg2+
(iii) Al3+
(iv) Si4+
उत्तर
(iv) Si4+

प्रश्न 11.
प्रथम आयनन ऊर्जा का सही क्रम है।
(i) C> B> Be> Li
(ii) C> Be> B> Li
(iii) B>C> Be> Li
(iv) Be> Li> B>C
उत्तर
(ii)
C> Be> B> Li

प्रश्न 12.
निम्न में से किसकी आयनन ऊर्जा (आयनन विभव) सबसे अधिक है ?
(i) B
(ii) N
(iii) C
(iv) O
उत्तर
(ii) N

प्रश्न 13.
निम्न में किसका आकार सबसे बड़ा है?
(i) Mg
(ii) Ba
(iii) Be
(iv) Ra
उत्तर
(iv) Ra

प्रश्न 14.
इलेक्ट्रॉन बन्धुता अधिकतम होती है।
(i) F की
(ii) CI की
(iii) Br की
(iv) I की
उत्तर
(i) Cl की

प्रश्न 15.
F, Cl, Br तथा I में तत्त्वों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता का घटता क्रम है।
(i) F> Cl> Br>I
(ii) I> Br>Cl> F
(iii) F > Br> Ci>I
(iv) Cl> F > Br>I
उत्तर
(iv) Cl> F > Br>I

प्रश्न 16.
सबसे अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्त्व है।
(i) O
(ii) F
(iii) Cl
(iv) N
उत्तर
(ii) F

प्रश्न 17.
C, N, P और Si तत्त्वों की विद्युत ऋणात्मकता के बढ़ने का क्रम है।
(i) C, N, Si, P
(ii) N, Si, C, P
(iii) Si, P, C, N
(iv) P, Si, N, C
उत्तर
(iii) Si, P, C, N

प्रश्न 18.
निम्न में कौन-सा अम्लीय है ?
(i) Na20
(ii) MgO
(iii) SiO
(iv) FeO
उत्तर
(iii) SiO

प्रश्न 19.
दिए गए अम्लों की अम्लीयता का सही क्रम है
(i) HClO4 < HClO3 < HClO2 < HClO
(ii) HClO< HClO2 < HClO3 < HClO4
(iii) HClO < HClO4 < HClO3 < HClO2
(iv) HCIO4 <HClO2 <HClO3 < HClO
उत्तर
(ii) HClO<HClO2 <HCIO3 <HClO4

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में किस अणुक प्रजाति में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं?
(i) N2
(ii) F2
(iii) O2
(iv) O2-2
उत्तर
(iii) O2

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यूलैण्ड का अष्टक नियम लिखिए।
उत्तर
न्यूलैण्ड (1864) ने ज्ञात किया कि तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भारों के क्रम में व्यवस्थित करने पर प्रत्येक आठवें तत्व के गुण प्रथम तत्वों के गुणों से मिलते हैं। इसे ही न्यूलैण्ड का अष्टक नियम कहते हैं।
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प्रश्न 2.
परमाणु क्रमांक 19 वाले तत्त्व का आवर्त सारणी में स्थान कारण सहित लिखिए।
उत्तर
परमाणु क्रमांक 19 वाले तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2 , 2s2 2p6 , 3s2 3p6 ,4s1 होता है। चूंकि इसमें चार कोश सम्मिलित हैं; अतः यह चौथे आवर्त का तत्त्व है। चूंकि इसके बाह्यतम कोश में एक इलेक्ट्रॉन s कक्षक में है; अतः यह s-ब्लॉक तथा प्रथम समूह का तत्त्व है।

प्रश्न 3.
आवर्त सारणी में अक्रिय गैसों के स्थान की विवेचना कीजिए।
उत्तर
उत्कृष्ट (अक्रिय) गैसों के बाह्यकोश और आन्तरिक कोश पूर्ण भरे होते हैं। हीलियम (He) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 152 तथा अन्य उत्कृष्ट गैसों के बाह्यकोश का विन्यास ns- np है। इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों में समरूपता, रासायनिक निष्क्रियता और मिलते-जुलते अन्य लक्षणों के कारण उत्कृष्ट गैसों को एक साथ आवर्त सारणी के शून्य वर्ग (18वें) में रखा गया है।

प्रश्न 4.
आवर्त सारणी के किन वर्गों के तत्त्वों को p-ब्लॉक तत्त्व कहते हैं और क्यों?
उत्तर
जिन तत्त्वों में अन्तिम इलेक्ट्रॉन बाह्यतम कोश के p-उपकोश में प्रवेश करता है, p-ब्लॉक तत्त्व कहलाते हैं। आवर्त सारणी में IIIA से VIIA तथा शून्य वर्ग के तत्त्व p-ब्लॉक तत्त्व कहलाते हैं।

प्रश्न 5.
d-ब्लॉक तत्त्वों (संक्रमण तत्त्व) को परिभाषित करते हुए उनकी स्थिति बताइए। या संक्रमण तत्त्व किन्हें कहते हैं? दीर्घ आवर्त सारणी में इनको कहाँ रखा गया है? ऐसे किन्हीं चार तत्त्वों के नाम बताइए।
उत्तर
जिन तत्त्वों में अन्तिम इलेक्ट्रॉन बाह्य कोश (n) से पिछले कोश के 4-ऑर्बिटलों में भरते हैं, d-ब्लॉक तत्त्व या संक्रमण तत्त्व कहलाते हैं। 4-ब्लॉक तत्त्वों के बाह्य कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns’ या ns होता है तथा पिछले कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-1)s2 , p6 ,d1से10 होता है। आवर्त सारणी में संक्रमण तत्त्वों को IB से VIIB उपवर्गों तथा VIII उपवर्ग में -तथा p-ब्लॉक के तत्त्वों के बीच 10 ऊर्ध्वाधर खानों में रखा गया है। उदाहरणार्थ-स्कैण्डियम (Sc), टाइटेनियम (Ti), वैनेडियम (V), क्रोमियम (Cr) आदि।

प्रश्न 6.
कारण देते हुए समझाइए कि संक्रमण तत्त्वों में उत्प्रेरक गुण होता है।
उत्तर
संक्रमण तत्त्वों व उनके यौगिकों में उत्प्रेरक गुण होता है। इन धातुओं का यह गुण उनकी परिवर्ती संयोजकता एवं उनके पृष्ठ में स्थित परमाणुओं की मुक्त संयोजकताओं के कारण होता है।

प्रश्न 7.
किसी तत्त्व का परमाणु क्रमांक 25 है। आवर्त सारणी में इसका स्थान निर्धारित कीजिए।
उत्तर
परमाणु क्रमांक 25 वाला तत्त्व मैंगनीज (Mn) है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार है।
Mn (25)= 1s2,2s2 2p6,3s2 3p6 3d5,4s2
इस तत्त्व में कुल चार कोश हैं। अत: यह चौथे आवर्त का तत्त्व है। इसमें अन्तिम इलेक्ट्रॉन अन्तिम से दूसरे कोश के 4-उपकोश में जाता है; अतः यह दीर्घ आवर्त सारणी के d-ब्लॉक में है तथा यह एक संक्रमण तत्त्व है और सातवें समूह में उपस्थित है।

प्रश्न 8.
निम्न में सबसे छोटा आयन कौन-सा है ? कारण सहित समझाइए। )
Na+, Mg2+, Al3+
उत्तर
सबसे छोटा आयन Al3+ है। किसी आवर्त में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर परमाणु त्रिज्याएँ घटती हैं क्योंकि परमाणु क्रमांक वृद्धि से प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है।

प्रश्न 9.
Li+,Mg2+,K+,Al3+ को बढ़ते हुए आयनिक त्रिज्याओं के क्रम में लिखिए।
उत्तर
Li+< Al3+ < Mg2+ < K+

प्रश्न 10.
Ca2+ तथा K+ में किसकी आयनिक त्रिज्या कम है व क्यों ?
उत्तर
Ca2+ तथा K+ के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार हैं।
Ca2+ = 1s2,2s2 2p6,3s2 3p6
K+ = 1s2,2s2 2p6,3s2 3p6

परन्तु Ca2+ के नाभिक में धनावेश 20 इकाई, K+ के नाभिक में उपस्थित धनावेश 19 इकाई से अधिक है। अत: यह बाह्य इलेक्ट्रॉनों को अधिक तीव्र बल से अपनी ओर आकर्षित करता है। फलतः इसकी आयनिक त्रिज्या कम होती है।

प्रश्न 11.
सोडियम प्रबल विद्युत धनात्मक धातु है जबकि क्लोरीन प्रबल विद्युत ऋणात्मक अधातु कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
सोडियम परमाणु के बाह्यतम कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है। अतः यह इसे त्यागकर स्थायी होने की तीव्र प्रवृत्ति रखता है। अतः यह प्रबल वैद्युत धनात्मक है। इसके विपरीत, क्लोरीन परमाणु के ब्राह्यतम कोशे में सात इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः यह एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके स्थायी विन्यास प्राप्त करने की तीव्र प्रवृत्ति रखता है। अर्थात् यह प्रबल वैधुत ऋणात्मक है।

प्रश्न 12.
C, N, 0 तथा F को इनके बढ़ते हुए प्रथम आयनन विभव के अनुसार व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
C, N, 0 तथा F को इनके बढ़ते हुए प्रथम आयनन विभव के अनुसार इस प्रकार व्यवस्थित करेंगे
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-14

प्रश्न 13.
अक्रिय गैसों के आयनन विभव बहुत ऊँचे होते हैं, क्यों ?
उत्तर
आवर्त में उच्चतम आयनन विभव अक्रिय गैस का होता है, क्योंकि उसका संवृत्त कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास बहुत स्थायी होता है।

प्रश्न 14.
बेरीलियम का प्रथम आयनन विभव बोरॉन से अधिक है। समझाइए।
उत्तर
बेरीलियम का प्रथम आयनन विभव बोरॉन से अधिक है क्योंकि Be के बाह्यकोश में s ऑर्बिटल पूर्ण भरे हुए (ns2) हैं। यह एक अधिक स्थायी व्यवस्था है।

प्रश्न 15.
कारण सहित बताइए कि नाइट्रोजन का प्रथम आयनन विभव ऑक्सीजन से अधिक होता है।
उत्तर
7N= 1s2,2s2,2p1x,2p1y, 2p1z;
8O= 1s2, 2s2,2p2x,2p1y, 2p1z
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से स्पष्ट है कि नाइट्रोजन के 2p-ऑर्बिटल आधे भरे हुए हैं। नाइट्रोजन के p-ऑर्बिटल में समदिश चक्रण के 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं जिससे N का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास O की अपेक्षा अधिक स्थायी है। अत: N का प्रथम आयनन विभव O से अधिक होता है।

प्रश्न 16.
तत्त्वों के द्वितीय आयनन विभव का मान सदैव प्रथम आयनन विभव से अधिक क्यों होता है?
उत्तर
परमाणु से प्रथम इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद बने धनायन से दूसरे इलेक्ट्रॉन का निकलना बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि शेष बचे इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ जाता है। अतः द्वितीय आयनन विभव का मान प्रथम आयनन विभवे से अधिक होता है।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित तत्त्वों को बढ़ते हुए आयनन विभव के क्रम में लिखिए
6A12,8B16,8C16,9D18
उत्तर
उपर्युक्त तत्त्वों के आयनन विभव का बढ़ता क्रम निम्नवत् है-
6A12 < 8B16 <8C16 <9D18

प्रश्न 18.
फॉस्फोरस का प्रथम आयनन विभव सल्फर से अधिक होता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चूँकि आवर्त सारणी में किसी वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर चलने पर आयनन विभव घटता है; इसलिए फॉस्फोरस (पंचम वर्ग) का प्रथम आयनन विभव सल्फर (षष्ठम् वर्ग) से अधिक होता

प्रश्न 19.
P, S, Cl तथा F में से किसकी ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैल्पी अधिकतम तथा किसकी न्यूनतम होगी? समझाइए।
उत्तर
हम जानते हैं कि आवर्त में बायीं ओर से दायीं ओर बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैली बढ़ती जाती है, जबकि वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर बढ़ने पर यह घटती जाती है। 3p-कक्षक में इलेक्ट्रॉन प्रवेश कराने की तुलना में जब 2p-कक्षक में इलेक्ट्रॉन जाता है, तब इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अधिक होता है। अतः अधिकतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैल्पी क्लोरीन की होगी तथा सबसे कम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैल्पी फॉस्फोरस की होगी।

प्रश्न 20.
Cu+ आयन प्रतिचुम्बंकीय है, जबकि Cu2+ आयन अनुचुम्बकीय है, क्यों? समझाइए।
उत्तर
Cu+ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार है।
Cu+:1s2,2s2 2p6,3s2 3p6 3d10
Cu+आयन में सभी उपकोश पूर्ण भरे हैं और सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं, अत: Cu+ प्रतिचुम्बकीय है।
Cu2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार है।
Cu2+ : 1s2,2s2 2p6,3s2 3p6 3d9
Cu2+ आयन में 3d उपकोश अपूर्ण है तथा इसमें एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है।
अत: Cu2+ आयन अनुचुम्बकीय है।

प्रश्न 21.
Mg2+,O2-,Na+ तथा F को आकार के घटते हुए क्रम में लिखिए।
उत्तर
O2->F> Na+ > Mg2+

प्रश्न 22.
समझाइए कि क्यों Mg2+ आयन O2- आयन से छोटा है, यद्यपि दोनों की इलेक्ट्रॉनिक संख्या समान है?
उत्तर
Mg2+ आयन में 12 प्रोटॉन तथा 02- आयन में 8 प्रोटॉन हैं, फलत: Mg2+ आयन में उसके इलेक्ट्रॉनों पर लगने वाला नाभिकीय आकर्षण बल O2- से ज्यादा होगा जिससे इसका आकार O2- से छोटा हो जाएगा।

प्रश्न 23.
आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर आयनन ऊर्जा बढ़ती है, किन्तु Al की प्रथम आयनन ऊर्जा Mg से कम होती है। क्यों? समझाइए।
उत्तर
Al: 13 = 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p1
Mg : 12 = 1s2, 2s2 2p6, 3s2
Mg के 3s के इलेक्ट्रॉन की वेधन मात्रा अर्थात् नाभिक से निकटता AI के 3p की तुलना में अधिक है। इसलिए Mg का प्रथम आयनन विभव Al से अधिक है।

प्रश्न 24.
N3-,Na+,F,O2- तथा Mg2+ को आयनिक आकार के बढ़ते क्रम में लिखिए।
उत्तर
Mg2+<Na+ <F <O2- <N3-

प्रश्न 25.
निम्न को समझाइए।
F आयन Na+ आयन से बड़े आकार का होता है।
उत्तर
F में इलेक्ट्रॉन की संख्या = 10 तथा प्रोटॉन की संख्या = 9
Na+ में इलेक्ट्रॉन की संख्या = 10 तथा प्रोटॉन की संख्या =11
Na+ में कार्यरत् प्रभावी नाभिकीय आवेश F से अधिक है इसलिए F का आकार Na+ से बड़ा है।

प्रश्न 26.
अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है, क्यों? समझाइए।
उत्तर
अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है, क्योंकि इनके कक्षों के इलेक्ट्रॉन कक्षक पूर्णतया भरे होने के कारण इनमें अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्रवेश नहीं कर सकता है।

प्रश्न 27.
नाइट्रोजन की इलेक्ट्रॉन बन्धुता कार्बन से कम होती है। कारण दीजिए।
उत्तर
क्योंकि नाइट्रोजन में 5 उपकोश पूर्ण तथा p उपकोश आधा भरा होता है।

प्रश्न 28.
F, CI, Br, I को उनके बढ़ते हुए इलेक्ट्रॉन बन्धुता के क्रम में तथा Li, Na, K, Rb को उनके बढ़ते हुए विद्युत ऋणात्मकता के क्रम में लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-15

प्रश्न 29.
F, O, Cl की इलेक्ट्रॉन बन्धुता घटने का क्रम लिखिए।
उत्तर
F, O, Cl की इलेक्ट्रॉन बन्धुता घटते क्रम में निम्नवत् है–
Cl> F>O

प्रश्न 30.
O, F, Be, C, N को घटती हुई इलेक्ट्रॉन बन्धुता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
O, F, Be, C तथा N की घटती हुई इलेक्ट्रॉन बन्धुता का क्रम निम्नवत् है–
F>O>N>C> Be

प्रश्न 31.
Cl,s2-,ca2+,Ar को आकार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
Cl,s2-,Ca2+ तथा Ar का बढ़ते हुए आकार को क्रम निम्नवत् है-
Ca2+< Ar<Cl,S2-

प्रश्न 32.
F, CI, Br तथा I को बढ़ती हुई ऋण-विद्युतता के अनुसार व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
बढ़ती हुई ऋण-विद्युतता के अनुसार F, CI, Br तथा I की व्यवस्था इस प्रकार है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-16

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आवर्त सारणी के किन-किन वर्गों के तत्त्वों को 5-ब्लॉक तत्त्व कहते हैं और क्यों ? इन तत्वों के किन्हीं चार मुख्य अभिलक्षणों को लिखिए।
उत्तर
तत्त्वों के परमाणु क्रमांक की वृद्धि के साथ जब उनके बाह्यतम कोश के -उपकोश में इलेक्ट्रॉन प्रवेश करते हैं, उन्हें ब्लॉक तत्त्व कहते हैं। इन तत्त्वों के बाह्य कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास या अभिलाक्षणिक इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns’ या nsहोता है तथा (n-1) कोश में प्रायः 8 इलेक्ट्रॉन (H, Li वे Be को छोड़कर) होते हैं।

वर्ग 1-A (Li, Na, K, Rb, Cs, Fr) तथा वर्ग II-A (Be, Mg, Ca, Sr, Ba, Ra) के तत्त्व -ब्लॉक तत्त्व : होते हैं। हाइड्रोजन और हीलियम भी ब्लॉक के तत्त्व हैं। इनमें I-A उपवर्ग के तत्त्वों को क्षारीय धातु (H को छोड़कर) कहते हैं तथा II-A उपवर्ग के तत्त्वों को क्षारीय मृदा धातुएँ कहते हैं।
S-ब्लॉक के तत्त्वों के गुणधर्म

  1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास-इन तत्त्वों के बाह्य कोश के 3-उपकोश में 1 या 2 इलेक्ट्रॉन तथा उससे पहले कोश में सभी उपकोश पूर्ण भरे होते हैं।
  2. संयोजकता—इन तत्त्वों की एक निश्चित संयोजकता होती है, जो उनके बाह्य कोश के इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है; अतः I-A के क्षार धातुओं (जैसे-Li, Na, K आदि) की संयोजकता 1 तथा II-A के क्षारीय मृदा धातुओं (जैसे-Mg, Ca, Sr) की संयोजकता 2 होती है।
  3. परमाणु त्रिज्या–हाइड्रोजन तथा हीलियम को छोड़कर सभी 5-ब्लॉक तत्त्वों की परमाणु त्रिज्या अपेक्षाकृत काफी बड़ी होती है; जैसे-Li (1.23 A), Mg (1.36 A) आदि।।
  4. आयनन विभव-हाइड्रोजन तथा हीलियम को छोड़कर, सभी 5-ब्लॉक तत्त्वों के आयनन विभव निम्न होते हैं; जैसे—Li (5.4 eV), Mg (7.6 ev) आदि। इस कारण ये तत्त्व प्रबल धन-विद्युती (electropositive) हैं तथा बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं।
    उदाहरणार्थ-Na+, K+, Mg2+, Ca2+ आदि।

प्रश्न 2.
d-ब्लॉक तत्त्वों के प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ या गुण क्या हैं?
उत्तर
d-ब्लॉक तत्त्वों को संक्रमण तत्त्व कहते हैं। इनके मुख्य लक्षण/गुण/विशेषताएँ इस प्रकार

  1. इन तत्त्वों में बाह्य कोश (n) से पिछले कोश (n-1) के 4-ऑर्बिटलों में इलेक्ट्रॉन भरते हैं। इन तत्त्वों के बाह्य कोश में 1 या 2 इलेक्ट्रॉन तथा उससे पिछले कोश में 9 से 18 इलेक्ट्रॉन तक होते हैं।
  2. ये परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करते हैं।
  3. ये सभी तत्त्व धातु हैं। इन धातुओं के क्वथनांक, गलनांक तथा घनत्व ऊँचे होते हैं। ये सभी | तत्त्व ऊष्मा तथा वैद्युत के कुचालक होते हैं और मिश्र धातु बनाने का गुण भी व्यक्त करते हैं।
  4. ये तत्त्व अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होते हैं, क्योंकि (n-1) 4-उपकोश में प्रायः अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं।
  5. इन तत्त्वों के जिन आयनों में (n-1)d उपकोश पूरा भरा नहीं होता है उनके आयन तथा यौगिक रंगीन होते हैं; जैसे-Cu2+ आयन (4) तथा क्यूप्रिंक यौगिक नीले रंग के होते हैं।
  6. ये तत्त्व और इनके यौगिक उत्प्रेरक गुण प्रदर्शित करते हैं।
  7. ये संकर आयन बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं।

प्रश्न 3.
आयनन विभव की परिभाषा लिखिए। किसी वर्ग में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ आयनन विभव/ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
किसी तत्त्व के एक विलग, (isolated) गैसीय परमाणु में से एक इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसे तत्त्व का आयनन विभव या प्रथम आयनन विभव कहते हैं। इसी प्रकार दूसरे तथा तीसरे इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालने के लिए प्रयुक्त ऊर्जा को क्रमशः द्वितीय आयनन विभव तथा तृतीय आयनन विभव कहते हैं।
आयनन विभव को इलेक्ट्रॉन वोल्ट (ev) या किलो कैलोरी प्रति मोल (kcal/mol) या किलो जूल प्रति मोल (kJ/mol) में व्यक्त करते हैं। किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर अर्थात् परमाणु क्रमांक में वृद्धि से नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है और परमाणु का आकार कम होने लगता है जिससे परमाणु के आयनीकरण में अधिक ऊर्जा प्रयुक्त होती है जिससे आयनन विभव का मान बढ़ जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-17
किसी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर अर्थात् परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ इनके परमाणु आकार में वृद्धि होती है जिससे नाभिकीय आवेश का बाहरी कक्षाओं के इलेक्ट्रॉन पर आकर्षण कम हो जाता है। और इलेक्ट्रॉनों को निकालने में कम ऊर्जा लगती है जिससे आयनन विभव का मान कम हो जाता है।
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प्रश्न 4.
इलेक्ट्रॉन बन्धुता की परिभाषा दीजिए। क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बन्धुता फ्लोरीन से अधिक है। स्पष्ट कीजिए।
या
आवर्त सारणी में किसी आवर्त तथा वर्ग में इलेक्ट्रॉन बन्धुता में क्या परिवर्तन होता है? समझाइए।
उत्तर
किसी तत्त्व के परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋण आयन बनने में उत्सर्जित ऊर्जा को उस तत्त्व की इलेक्ट्रॉन बन्धुता कहते हैं। ऊर्जा का उत्सर्जन जितना अधिक होगा, इलेक्ट्रॉन बन्धुता उतनी ही अधिक होगी। हैलोजनों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता सबसे अधिक होती है। इलेक्ट्रॉन बन्धुता इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) प्रति परमाणु में व्यक्त की जाती है तथा E या E, अक्षरों द्वारा व्यक्त की जाती है।

Cl+e → Cl + E यहाँ E = 3.61 ev

आवर्त में आगे की ओर जाने पर इलेक्ट्रॉन बन्धुता बढ़ती है तथा वर्ग में नीचे की ओर जाने पर यह घटती है।

क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बन्धुता फ्लोरीन से अधिक है क्योंकि फ्लोरीन परमाणु की त्रिज्या बहुत छोटी एवं इलेक्ट्रॉन घनत्व बहुत उच्च होने के कारण फ्लोरीन परमाणु में इलेक्ट्रॉन डालना ऊर्जा की दृष्टि से क्लोरीन परमाणु की तुलना में कुछ कम अनुकूल होता है। इसलिए फ्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बन्धुता क्लोरीन से कम है।

प्रश्न 5.
वैद्युत ऋणात्मकता किसे कहते हैं? आवर्त सारणी में बाएँ से दाएँ जाने पर वैद्युत ऋणात्मकता किस प्रकार परिवर्तित होती है?
या
वैद्युत ऋणात्मकता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
किसी यौगिक के परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करने की प्रवृत्ति को उस परमाणु की वैद्युत ऋणात्मकता कहा जाता है। वे परमाणु जिनके नाभिक अधिक धनात्मक होते हैं और जिनकी त्रिज्याएँ कम होती हैं, अधिक वैद्युत ऋणात्मक होते हैं।

आवर्त सारणी के किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर अर्थात् परमाणु क्रमांक में वृद्धि से वैद्युत ऋणात्मकता बढ़ती है क्योंकि परमाणु त्रिज्याएँ घटती हैं, जबकि वर्ग में ऊपर से नीचे आने अर्थात् परमाणु क्रमांक बढ़ने से वैद्युत ऋणात्मकता प्राय: घटती है क्योंकि परमाणु त्रिज्याएँ क्रम से बढ़ती हैं। उदाहरणार्थ।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties img-19अक्रिय गैसों (Ar, Ne) इत्यादि में इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करने की प्रवृत्ति नहीं होती है, अत: उनकी वैद्युत ऋणात्मकता शून्य होती है।
उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि फ्लोरीन हैलोजन वर्ग में सबसे ऊपर है अत: इसकी वैद्युत ऋणात्मकता सबसे अधिक है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधुनिक आवर्त नियम के आधार पर बनी दीर्घ आवर्त सारणी की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
दीर्घाकार आवर्त सारणी का निर्माण बोर के परमाणु की कक्षाओं में इलेक्ट्रॉनों के वितरण के सिद्धान्त के आधार पर हुआ है। अतः इसे बोर की आवर्त सारणी भी कहते हैं। इस सारणी के मुख्य लक्षण/विशेषताएँ/गुण इस प्रकार हैं।

  1. दीर्घाकार आवर्त सारणी में मेंडलीव की आवर्त सारणी की भाँति ही क्षैतिज पंक्तियों की संख्या 7 है जिन्हें आवर्त कहते हैं (अर्थात् आवर्तों की कुल संख्या 7 है) जबकि ऊर्ध्वाधर स्तम्भों की कुल संख्या 18 है जिन्हें वर्ग या समूह अथवा परिवार या फेमिलीज कहते हैं, अर्थात् इनमें वर्गों की कुल संख्या 18 है। इस आवर्त सारणी में बाईं ओर से दाईं ओर चलने पर उपर्युक्त वर्गों को निम्नलिखित रूप में व्यवस्थित किया गया है।
    I-A, II-A, III-B, IV-B, V-B, VI-B, VII-B, VIII, VIII, VIII, I-B, II-B, III-A, IV-A, V-A, VI-A, VII-A तथा शून्य। IUPAC पद्धति के अनुसार आजकल ये वर्ग क्रमशः 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17 व 18 तक वर्गों के रूप में भी व्यक्त किए जाते हैं। इन वर्गों को आजकल क्रसश: 1 से 18 वर्गों के रूप में भी व्यक्त किया जाता है। , इनमें VIII वर्ग में तीन ऊर्ध्वाधर स्तम्भ हैं, अर्थात् VIII वर्ग तीन ऊध्र्वाधर स्तम्भों में रखा गया है।
  2. इस सारणी के आवर्गों में पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें तथा छठे आवर्गों में क्रमश: तत्त्वों की संख्याएँ 2, 8, 8, 18 तथा 32 हैं, इनको मैजिक संख्याएँ कहते हैं, जबकि सातवाँ आवर्त अपूर्ण है।
  3. इस सारणी में छठे आवर्त के 14 तत्त्वों, परमाणु क्रमांक 58 से 71 तक को और सातवें आवर्त के 14 तत्त्वों, परमाणु क्रमांक 90 से 103 तक को दो श्रेणियों में क्रमशः लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड के रूप में सारेणी के नीचे रखा गया है।
  4. प्रत्येक आवर्त का प्रथम तत्त्व क्षार धातु तथा अन्तिम तत्त्व अक्रिय गैस है; जैसे-तृतीय आवर्त का पहला तत्त्व Li (क्षार धातु) तथा अन्तिम तत्त्व Ne (अक्रिय गैस) है।
  5. इस सारणी में तत्त्वों को परमाणु क्रमांक के वृद्धि क्रम में उस समय तक श्रेणीबद्ध किया गया है जब तक कि समान गुण वाला तत्त्व पुन: नहीं आ गया है।
  6. इस सारणी में प्रत्येक आवर्त में एक नई मुख्य क्वाण्टम संख्या के साथ बाह्यतम कक्ष में ” इलेक्ट्रॉन भरना शुरू होता है और बाह्यतम कक्ष के पूर्ण होने के साथ आवर्त समाप्त हो जाता है। किसी आवर्त की क्रम संख्या उस आवर्त के तत्त्वों की बाह्यतम कक्ष की मुख्य क्वाण्टम संख्या होती है।
  7. इस सारणी में शून्य वर्ग के तत्त्वों को अक्रिय गैस कहते हैं; क्योंकि इनकी सभी उपकक्षाएँ पूर्ण होती हैं।
  8. इस सारणी में I-A उपवर्ग (H को छोड़कर) के तत्त्वों को क्षारीय धातु तथा II-A उपवर्ग के तत्त्वों को क्षारीय मृदा धातुएँ कहते हैं।
  9. इस सारणी में III-A, IV-A, V-A, VI-A तथा VII-A उपवर्गों या वर्गों में तत्त्वों को सामान्य .तत्त्व कहते हैं, जिसमें धातु, अधातु एवं उपधातु हैं।
  10. इस सारणी में III-B, IV-B, V-B, VI-B, VII-B, VIII, I-B, II-B उपवर्गों या वर्गों के तत्त्वों को | संक्रमण तत्त्व कहते हैं क्योंकि इन तत्त्वों को क्षार धातुओं तथा सामान्य तत्त्वों के बीच में रखा गया
  11.  इस सारणी में उपस्थित किसी उपवर्ग या वर्ग के सभी तत्त्वों की बाह्यतम कक्ष में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्याएँ समान होने के कारण उनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास एकसमान होता है। के कारण उनके गुणों में समानताएँ होती हैं। किसी भी उपवर्ग या वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर चलने पर तत्त्वों के परमाणु क्रमांकों की वृद्धि के साथ, उपकक्षों की संख्या में भी वृद्धि होती है जिसके कारण उन तत्त्वों के गुणों में भी क्रमिक परिवर्तन होता है।
  12.  इस सारणी में तत्त्वों को उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर चार ब्लॉकों में विभक्त किया गया है।
    • s-ब्लॉक
    • p-ब्लॉक,
    • 4-ब्लॉक तथा
    • f-ब्लॉक।

प्रश्न 2.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में तत्त्वों का वर्गीकरण लिखिए। या प्रवर्धित आवर्त सारणी के प्रारूप को 5, p, d व f-ब्लॉक के तत्वों के आधार पर
समझाइए।
उत्तर
तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा आवर्त सारणी किसी परमाणु के कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का वितरण उसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहलाता है। किसी तत्त्व के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उसकी आवर्त सारणी में स्थिति में सीधा सम्बन्ध होता है। किसी तत्त्व की आवर्त सारणी में स्थिति से, भरें जाने वाले अन्तिम कक्ष की मुख्य क्वाण्टम संख्या (n) और दिगंशी, क्वाण्टम संख्या (l) के विषय में भी जानकारी मिलती है।
आवर्त में तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

आवर्त बाह्यतम कोश के लिए n का मान बताता है। आवर्त 1, 2, 3,… आदि का तात्पर्य क्रमशः 1, 2, 3,… आदि मुख्य ऊर्जा स्तरों के भरने से है। प्रत्येक आवर्त में तत्त्वों की संख्या, भरे जाने वाले ऊर्जा स्तर में उपलब्ध परमाणु कक्षकों की संख्या से दोगुनी होती है।

प्रथम आवर्त में इलेक्ट्रॉन प्रथम ऊर्जा स्तर (n=1) में भरते हैं। इस आवर्त में केवल एक कक्षक (ls) होता है और इलेक्ट्रॉन इसी में भरते हैं। इसमें दो तत्त्व हाइड्रोजन (Z= 1) और हीलियम (Z=2) होते हैं। जिनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्रमशः 1s1 तथा 1s2 होते हैं।

दूसरे आवर्त में इलेक्ट्रॉन दूसरे ऊर्जा स्तर (n= 2) में भरते हैं। यह आवर्त लीथियम (z= 3) से शुरू होता है जिसमें दो इलेक्ट्रॉन 1s कक्षक में होते हैं और तीसरा इलेक्ट्रॉन 2s कक्षक में प्रवेश करता है (1s+ 2s1), अगले तत्त्व बेरीलियम (Z = 4) में 1s तथा 2s दोनों कक्षकों में 2-2 इलेक्ट्रॉन होते हैं (1s2 2s2) इसके पश्चात् बोरॉन (Z= 5) से निऑन (Z = 10) तक पहुँचने पर 2p कक्षक पूर्ण रूप से इलेक्ट्रॉनों से भर जाता है। इस तरह L कोश (n=2) निऑन (1s2,2s2 2p6) तत्त्व के साथ पूर्ण हो जाता है।

तीसरे आवर्त में इलेक्ट्रॉन तीसरे ऊर्जा स्तर (n=3) में भरते हैं। यह आवर्त सोडियम (Z= 11) से शुरू होता है। इसमें इलेक्ट्रॉन 3s कक्षक में प्रवेश करता है। इस आवर्त में सोडियम (3s1) से लेकर आर्गन (3s2 3p6) तक उत्तरोतर 3s एवं 3p कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरते हैं। 3d कक्षकों की ऊर्जा 4s कक्षकों से अधिक होती है इसलिए वे 4s कक्षकों के पश्चात् भरते हैं। चौथे आवर्त में इलेक्ट्रॉन चौथे ऊर्जा स्तर (n=4) में भरते हैं। यह आवर्त पोटैशियम (Z=19) से प्रारम्भ होता है और इसमें इलेक्ट्रॉन 4s कक्षक में प्रवेश करता है। कैल्सियम (Z = 20) में 4s कक्षक भर जाता है। चूंकि 3d-कक्षकों की ऊर्जा 4p-कक्षकों से कम होती है इसलिए 4p-कक्षकों से पहले 3d-कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरते हैं। इस प्रकार हमें तत्त्वों की 3d संक्रमण श्रेणी (transition series) प्राप्त होती है। यह स्कैण्डियम (Z=21) से प्रारम्भ होती है। इसको बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d 4s होता है। 3d-कक्षक जिंक (Z= 30) पर पूर्ण रूप से भर जाता है। इसका बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d10 4s2 होता है। इसके पश्चात् गैलियम (z=31) से 4p-कक्षक का भरना प्रारम्भ होता है जो क्रिप्टॉन पर समाप्त होता है। क्रिप्टॉन का बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 4s2 3d10 4p6 होता है। इस आवर्त में 18 तत्त्व होते हैं तथा इसमें 9’कक्षक भरते हैं। 4d और 4f-कक्षकों की ऊर्जा अधिक होने के कारण वे इस आवर्त में नहीं भरते हैं। पाँचवें आवर्त में इलेक्ट्रॉन पाँचवें ऊर्जा स्तर (n = 5) में भरते हैं। यह आवर्त रूबिडियम (Z=37) से प्रारम्भ होता है जिसमें 1 इलेक्ट्रॉन 5s-कक्षक में प्रवेश करता है। 55-कक्षक के भरने के पश्चात् 4d संक्रमण श्रेणी प्रारम्भ हो जाती है जिसमें इलेक्ट्रॉन 4d-कक्षकों में भरते हैं। यह इट्रियम (Z= 39) से प्रारम्भ होकर कैडमियम (Z=48) पर समाप्त होती है। इसके पश्चात् 5p-कक्षक भरते हैं। इनका भरना इंडियम (Z= 49) से प्रारम्भ होकर जीनॉन (Z=54) पर समाप्त होता है। छठे आवर्त में इलेक्ट्रॉन छठे ऊर्जा स्तर (n= 6) में भरते हैं। यह आवर्त सीजियम (Z = 55) से प्रारम्भ होता है जिसमें 1 इलेक्ट्रॉन 6s-कक्षक में प्रवेश करता है। 6s-कक्षक के भरने के पश्चात् अगला इलेक्ट्रॉन La में 5d-कक्षक में प्रवेश करता है। इसके पश्चात् सीरियम (Z= 58) से प्रारम्भ करके ल्यूटीशियम (Z= 71) तक इलेक्ट्रॉन 4f-कक्षकों में भरते हैं। इसे 4 आंतरिक संक्रमण श्रेणी (inner transitional series) या लैन्थेनाइड श्रेणी (lanthanide series) कहते हैं। इसके पश्चात् हैफनियम (Z = 72) से मर्करी (Z = 80) तक इलेक्ट्रॉन 5d-कक्षकों में भरते हैं। इस प्रकार 54 सक्रमण श्रेणी प्राप्त होती है। इसके पश्चात् इलेक्ट्रॉन थैलियम (Z= 81) से रेडॉन (Z= 86) तक 6p-कक्षकों में भरते हैं।

सातवें आवर्त में इलेक्ट्रॉन सातवें ऊर्जा स्तर (n= 7) में भरते हैं। यह आवर्त फ्रैंशियम (Z = 87) से प्रारम्भ होता है जिसमें 7s-कक्षक में 1 इलेक्ट्रॉन प्रवेश करता है। 7s-कक्षक के भरने के पश्चात् ऐक्टिनियम (Z = 89) और थोरियम (Z=90) में इलेक्ट्रॉन 6d-कक्षक में प्रवेश करते हैं और उसके पश्चात् 5f-कक्षकों का भरना शुरू होता है। यह प्रोऐक्टिनियम (Z=91) से लॉरेन्शियम (Z = 103) तक चलता है। इस प्रकार 5f आंतरिक संक्रमण श्रेणी या ऐक्टिनाइड श्रेणी (actinide series) प्राप्त होती है। ऐक्टिनियम (Z= 89) से Uub (Z = 112) तक 6d-कक्षक भरते हैं और हमें 6d संक्रमण श्रेणी प्राप्त होती है। 6d-कक्षकों के भरने के पश्चात् 7p-कक्षक भरते हैं।

वर्गवार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
एक ही वर्ग के सभी तत्त्वों के बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास) समान होते हैं। इनके बाह्य कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या एवं गुणधर्म भी समान होते हैं।
उदाहरणार्थ-Li, Na, K, Rb, Cs और Fr सभी का संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns1 है। तथा वे सभी समान गुण प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी तत्त्व के गुण उसके परमाणु क्रमांक पर निर्भर करते हैं न कि उसके सापेक्षिक परमाणु द्रव्यमान पर।
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तत्त्वों का s, p, a तथा f ब्लॉकों में वर्गीकरण
प्रवर्धित आवर्त सारणी के विभिन्न तत्त्वों को चार ब्लॉकों (s, p, d तथा f) में वर्गीकृत किया गया है। इनका यह वर्गीकरण उनके उस कक्षक के नाम पर किया गया है जिसमें अन्तिम इलेक्ट्रॉन प्रवेश करता है।
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