UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सन्धि-प्रकरण

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name सन्धि-प्रकरण
Number of Questions 65
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सन्धि-प्रकरण

सन्धि -प्रकरण

नवीनतम पाठ्यक्रम में स्वर सन्धि के दीर्घ, गुण, यण तथा अयादि भेद, ही निर्धारित हैं। इससे सामान्यतया बहुविकल्पीय प्रश्न ही पूछे जाते हैं। इसके लिए कुल 3 अंक निर्धारित हैं।
सन्धि–सन्धि का अर्थ है ‘मेल’ या ‘जोड़। जब दो शब्द पास-पास आते हैं तो पहले शब्द का अन्तिम वर्ण और दूसरे शब्द का आरम्भिक वर्ण कुछ नियमों के अनुसार आपस में मिलकर एक हो जाते हैं। दो वर्गों के इस एकीकरण को ही ‘सन्धि’ कहते हैं। उदाहरणार्थ-देव + आलये = देवालय। यहाँ ‘देव’ (द् + ए + व् + अ) शब्द का अन्तिम ‘अ’ और ‘आलय’ शब्द का प्रारम्भिक ‘आ’ मिलकर ‘आ’ बन गये।
प्रकार–सन्धियाँ तीन प्रकार की होती हैं—(अ) स्वर सन्धि, (ब) व्यञ्जन सन्धि और (स) विसर्ग सन्धि।

स्वर सन्धि

स्वर के साथ स्वर के मेल को स्वर सन्धि कहते हैं। उपर्युक्त ‘देवालय’ स्वर सन्धि का ही उदाहरण है। कुछ स्वर सन्धियाँ (पाठ्यक्रम में निर्धारित) नीचे दी जा रही हैं-
(1) दीर्घ सन्धि
सूत्र-अकः सवर्णे दीर्घः।
नियम-जब अ, इ, उ, ऋ, लू ( ह्रस्व या दीर्घ) के बाद समान स्वर (अ, इ, उ, ऋ, –ह्रस्व या दीर्घ) आता है तो दोनों के स्थान पर आ, ई, ऊ, ऋ, ऋ( लू नहीं )( दीर्घस्वर ) हो जाता है; जैसे–
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[विशेष-‘ऋ’ और ‘लू’ सवर्ण संज्ञक हैं, अत: समान स्वर माने जाते हैं। ‘ऋ’ और ‘लू’ में किसी भी स्वर के पूर्व या पश्चात् होने पर सन्धि होने पर दोनों के स्थान पर ‘ऋ’ ही होता है; क्योंकि संस्कृत में दीर्घ ‘लु’ (लू) नहीं होता है। ]

(2) गुण सन्धि
सूत्र-आद्गुणः।
नियम-यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद इ-ई, उ-ऊ, ऋ, लू आएँ तो दोनों के स्थान पर क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’, ‘अर्’ तथा ‘अल्’ हो जाता है; जैसे-
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(3) यण् सन्धि
सूत्र-इको यणचि।
नियम-यदि इ, उ, ऋ, लू (ह्रस्व या दीर्घ) के बाद कोई असमान स्वर आता है तो इ-ई, उ-ऊ, ऋ-ऋ, लू के स्थान पर क्रमशः य, व, र, ल्हो जाता है; अर्थात् इ-ई का य्, उ-ऊ का व्,ऋ-ऋ कार्, लू का लु हो जाता है; जैसे–
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(4) अयादि सन्धि
सूत्र–एचोऽयवायावः।
नियम-जब एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के आगे कोई स्वर आये तो इन ए, ओ, ऐ, औ के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय् और आव् हो जाता है; जैसे-
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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न निम्नलिखित के सही विकल्प चुनकर उत्तर पुस्तिका में लिखिए-

(1) ‘देवालयः’शब्द का सन्धि-विच्छेद है [2012, 17
(क) देवा + लयः
(ख) देवि + आलयः
(ग) देव + आलयः
(घ) दे + वालयः

(2) गिरीशः’ शब्द का सन्धि-विच्छेद है
(क) गिरी + शः
(ख) गि + रीशः
(ग) गिरि + ईशः
(घ) गिरी + ईश:

(3) ‘साधूवाच’ शब्द का सन्धि-विच्छेद है
(क) साधू + वाच
(ख) साधु + उवाच
(ग) साधू + उवाच
(घ) सा + धूवाच

(4) परमेश्वरः’ शब्द को सन्धि-विच्छेद है
(क) पर + मेश्वरः
(ख) परमेश + वरः
(ग) परम + ईश्वरः
(घ) परमे + श्वरः

(5) ‘महर्षिः’ शब्द का सन्धि-विच्छेद है [2010, 13, 14, 16]
(क) मह + र्षिः
(ख) म + हर्षिः
(ग) महा + ऋषिः
(घ) महा + रिषिः।

(6) ‘मध्वरिः’शब्द का सन्धि विच्छेद है– [2010, 13, 18]
(क) मधु + अरिः
(ख) मधु + वरिः
(ग) म + ध्वरिः
(घ) मध्व + रिः

(7) ‘स्वागतम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2011,14,17]
(क) स्वा + गतम्
(ख) स्वागत + म्
(ग) सु + आगतम्
(घ) स्वाग + तम्।

(8) ‘प्रत्युत्तर’ का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) प्रत्यु + त्तर
(ख) प्रति + उत्तर
(ग) प्र + त्युत्तर
(घ) प्रती + उत्तर

(9) ‘पवनम्’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) पव + नम्
(ख) पवन् +अम्।
(ग) पो + अनम्।
(घ) पवन + म्।

(10) ‘नयनम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2010, 13, 18]
(क) ने + अनम्
(ख) नये + नम्।
(ग) नै + अनम्
(घ) नयन + म्।

(11) ‘पुस्तकालय:’ का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) पुस्त + कालय:
(ख) पुस्तका + लय:
(ग) पुस्तक + आलय:
(घ) पुस्तक + लय:

(12) ‘रमेश:’ का सन्धि-विच्छेद है- [2011, 14, 16]
(क) रम + एशः।
(ख) रम + इशः
(ग) रमा + एशः।
(घ) रमा + ईशः।

(13) ‘इत्यादि’ का सन्धि-विच्छेद है– [2014, 16, 18]
(क) इति + आदि
(ख) इत्य + आदी
(ग) इत + आदि
(घ) इती + आदि।

(14) नदीशः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) नदि + ईशः
(ख) नदी + शः
(ग) नदी + ईशः
(घ) ना + दोशः

(15) ‘यद्यपि’ का सन्धि-विच्छेद है [2014]
(क) यद्य + अपि
(ख) य + द्यपि
(ग) यद्या + अपि
(घ) यदि + अपि

(16) ‘सूर्योदय:’ का सन्धि-विच्छेद है [2011, 15, 17]
(क) सूर्य + उदयः.
(ख) सूयों + दयः
(ग) सूर + ओदय:
(घ) सूर + उदय:

(17) ‘कवीश्वरः’का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) कवि + ईश्वरः
(ख) कवि + श्वरः
(ग) कवि + इश्वरः
(घ) कवी + ईश्वरः

(18) ‘उपेन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) उपे + इन्द्रः
(ख) उप + ईन्द्रः
(ग) उप + इन्द्रः
(घ) उपा + इन्द्रः

(19) विद्यार्थी’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) विद्य + अर्थी
(ख) विद्या + अर्थी
(ग) विद्य + आर्थी
(घ) विदि + आर्थी।

(20) ‘देवर्षिः’का सन्धि-विच्छेद है
(क) देवः + ऋषि
(ख) देवा + ऋषि:
(ग) देव + ऋषिः
(घ) देव + अर्षि:

(21) ‘परमार्थः’ का सन्धि-विच्छेद है [2016, 18]
(क) परम + अर्थः
(ख) पर + मर्थः
(ग) पर + मार्थः
(घ) परमा + अर्थ:

(22) ‘महोत्सवः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012, 15, 17]
(क) महो + उत्सवः
(ख) महा + उत्सर्वः
(ग) मह + ओत्सवः
(घ) महोत + सवः

(23) ‘भवनम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2012, 15, 17, 18]
(क) भव + नम्।
(ख) भव् + अनम्।
(ग) भो + अनम्
(घ) भ + वनम्

(24) ‘रवीन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है [2016]
(क) रवी + इन्द्रः
(ख) रवि + ईन्द्रः
(ग) रवि + इन्द्रः
(घ) रवी + ईन्द्रः

(25) ‘मुरारिः’ को सन्धि-विच्छेद है
(क) मुर + अरिः
(ख) मुरा + अरिः
(ग) मुर + आरिः
(घ) मु + रारि:

(26) ‘अन्विति’ का सन्धि-विच्छेद है–
(क) अन्वि + ति
(ख) अनु + इति
(ग) अन्वि + इति.
(घ) अन् + इति

(27) ‘भू’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) भू + उर्ध्व
(ख) भु + ऊर्ध्व
(ग) भू + ऊर्ध्व
(घ) भू + र्ध्व

(28) ‘अम्बूर्मिः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) अम्बू + उर्मिः
(ख) अम्बु + उर्मि:
(ग) अम्बू + ऊर्मि
(घ) अम्बु + ऊर्मिः

(29) ‘रामाशीषः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) रामः + आशीषः
(ख) रामाः + शीषः
(ग) रामाः + आशीषः
(घ) रामाश् + ईष:

(30) ‘क्षीरनिधाविव’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) क्षीरनिधा + विव
(ख) क्षीरनिध + आविव
(ग) क्षीरनिधौ + इव
(घ) क्षीरनिध् + आविव

(31) ‘देशाभिमान’ को सन्धि-विच्छेद है [2012]
(क) देशा + भिमान
(ख) देश + अभिमान
(ग) देशा + अभिमान
(घ) देश + भिमान

(32) ‘सतीशः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012]
(क) सत + ईशः
(ख) सत् + ईशः
(ग) सति + इशः
(घ) सती + ईशः

(33) ‘सुखार्थिनः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012]
(क) सुख + अर्थिनः
(ख) सुखा + अर्थिनः
(ग) सुख + आर्थिन:
(घ) सुखार् + थिन:

(34) ‘सुरेन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012, 16]
(क) सुरा + इन्द्रः
(ख) सुर + एन्द्रः
(ग) सुरे + न्द्रः
(घ) सुर + इन्द्रः

(35) ‘उपोषति’ का सन्धि-विच्छेद है– [2013)
(क) उप + ओषति
(ख) उपो + षति
(ग) उ + पोषति
(घ) उपोष + ति

(36) ‘सज्जनः’ का सन्धि-विच्छेद है– [2013]
(क) सद् + जनः
(ख) सत् + जनः
(ग) सद् + अजन:
(घ) सतो + जनः

(37) ‘रामस्तरति’ का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) राम + तरति
(ख) रामः + तरति
(ग) राम + स्तरति
(घ) राम + रति

(38) ‘भावुकः’ का सन्धि-विच्छेद है [2013, 15]
(क) भौ + उकः
(ख) भाऊ + अक:
(ग) भौ + उक:
(घ) भाव + उक:

(39) ‘मधुराक्षरम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2014]
(क) मधुरा + क्षरम्
(ख) मधुर + आक्षरम्
(ग) मधुर + अक्षरम
(घ) मधु + राक्षरम्

(40) ‘अन्वर्थः’ का सन्धि-विच्छेद है [2014]
(क) अ + न्वर्थः
(ख) अन्व + वर्थ:
(ग) अनु + अर्थः
(घ) अनु + वर्थः

(41) ‘शायकः’ को सन्धि-विच्छेद है [2014, 16, 17]
(क) शाय + यक:
(ख) शायि + अर्कः
(ग) शै + अकः
(घ) शाय् + अकः

(42) ‘जयति’ का सन्धि-विच्छेद है- [2014, 15] (ग) जे + अति
(क) जा + यति
(ख) जो + अति
(ग) जे + अति
(घ) जय + ति

(43) ‘कमलोदयः’ का सन्धि-विच्छेद है– [2014]
(क) कमलो + दयः
(ख) कमल + ओदयः
(ग) कमल + उदयः
(घ) कम + लोदय:

(44) ‘शुक्लाम्बरम्’ का सन्धि-विच्छेद है (2015)
(क) शु + क्लाम्बरम्।
(ख) शुक्ला + अम्बरम्
(ग) शुक्ल + अम्बरम्।
(घ) शुक्ल + आम्बरम्

(45) ‘महीशः’ का सन्धि-विच्छेद है [2015]
(क) महा + ईशः
(ख) मही + शः
(ग) महे + ईशः
(घ) मही + ईश

(46) ‘पवनः’ का सन्धि-विच्छेद है [2016]
(क) पो + नः
(ख) पव + नः
(ग) पो + अनः
(घ) पू + वनः

(47) ‘वसन्तोत्सव’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016, 18]
(क) वसन्ते + तत्सवः
(ख) वसन्तो + उत्सव
(ग) वसन्त + उत्सवः
(घ) वसं + तोत्सवः

(48) ‘तथैव’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) तथ + एव
(ख) तथा + वेव
(ग) तथा + एव
(घ) तथै + एव

(49) ‘अखिलेशः’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) अखिल + एशः
(ख) अखिल + ईशः
(ग) अखिला + ईशः
(घ) अखल + ईशः

(50) ‘कदापि’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) कद + अपि
(ख) कत् + अपि
(ग) कत + अपि
(घ) कदा + अपि

(51) ‘रामायण’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) रामा + अयण
(ख) राम + आयण
(ग) राम + अयण
(घ) रा + मायण

(52) ‘लाकारः’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) ला + कारः
(ख) + अकार:
(ग) ला + आकार:
(घ) लृ + आकार:

(53) ‘पद्मेशः’ का सन्धि-विच्छेद है– [2016)
(क) पद्मा + ईशः
(ख) पद्म + एशः
(ग) पद्मा + इशः
(घ) पद + मेशः

(54) ‘वागीशः’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017)
(क) वाग् + ईशः
(ख) वाक् + ईश:
(ग) वागी + शः
(घ) वा + गीशः

(55) ‘तल्लीन’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017)
(क) तद् + लीनः
(ख) त + लीन:
(ग) तदली + नः
(घ) तदी + लीन:

(56) ‘रामेश:’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017, 18)
(क) राम् + ईशः
(ख) राम + एशः
(ग) राम + ईश:
(घ) राम + इशः

(57) ‘प्रगल्भापकारः’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017)
(क) प्रगल्भ + उपकारः
(ख) प्रगल्भा + पकारः
(ग) प्रगल्भ + अपकारः
(घ) प्रगल्भ् + अपकारः

(58) ‘रामावतारः’ का सन्धि-विच्छेद है (2017)
(क) रामा + वतार
(ख) रामाव + तारः
(ग) राम + अवतार:
(घ) रम + वतार:

(59) ‘पद्माशयः’ का सन्धि-विच्छेद है– (2017)
(क) पद्म + आश्रयः
(ख) पद्मा + अश्रयः
(ग) पद्मा + श्रयः
(घ) पद्मा + आश्रयः

(60) शैलजेशः’ का सन्धि-विच्छेद है— (2017)
(क) शैलज + एशः
(ख) शैलजा + ईशः
(ग) शैल + जैश
(घ) शैलजा + इशः

(61) ‘प्रभृत्येव’ का सन्धि-विच्छेद है (2017)
(क) प्रभृती + एव
(ख) प्रभृति + एव
(ग) प्रभृ + त्येव
(घ) प्रभृति + इव

(62) ‘ग्रामोदय’ का सन्धि-विच्छेद है (2018)
(क) ग्राम + ओदयः
(ख) ग्रामो + दयः
(ग) ग्राम + उदयः
(घ) ग्रा + मोदयः

(63) देवेन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है (2018)
(क) देव + इन्द्रः
(ख) देवे + इन्द्रः
(ग) दे + वेन्द्रः
(घ) देव + इन्द्रः

(64) ‘प्रत्यर्पण’ को सन्धि-विच्छेद है (2018)
(क) प्रति + अर्पण
(ख) प्रती + पर्ण
(ग) प्र + अतिपर्ण
(घ) प्रत्य + पर्ण

(65) कलाविव’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) कला + विवे
(ख) कल् + अविवे
(ग) कलौ + इव
(घ) कलो + ईव

उत्तर
(1) ग, (2) ग, (3) ख, (4) ग, (5) ग, (6) क, (7) ग, (8) ख, (9) ग, (10) क, (11) ग, (12) घ, (13) क, (14) ग, (15) घ, (16) क, (17) के, (18) ग, (19) ख, (20) ग, (21) के, (22) खे, (23) ग, (24) ग, (25) क, (26) ख, (27) ग, (28) घ, (29) क, (30) ग, (31) ख, (32) घ, (33) क, (34) घ, (35) के, (36) ख, (37) ख, (38) क, (39) ग, (40) ग, (41) ग, (42) ग, (43) ग, (44) ग, (45) क, (46) ग, (47) ग, (48) ग, (49) ख, (50) घ, (51) ग, (52) घ, (53) क, (54) क, (55) क, (56) ग, (57) ग, (58) ग, (59) क, (60) के, (61) ख, (62) ग, (63) क, (64) क, (65) ग।।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 17
Chapter Name International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार)
Number of Questions Solved 11
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व के प्रमुख निर्यात एवं आयात व्यापार का वर्णन कीजिए।
उत्तर
एक देश का अन्य देशों से किया जाने वाला आयात एवं निर्यात (व्यापार) विश्व व्यापार या विदेशी व्यापार अथवा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहलाता है।

विश्व : निर्यात व्यापार (World : Export Trade)

पिछले 25-30 वर्षों में ऐंग्लो-अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोपीय देश विश्व का दो-तिहाई व्यापार करते थे, परन्तु अनेक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक संघ एवं सन्धियाँ बन जाने के कारण व्यापार के इस प्रारूप में अन्तर आ गया है। इसके अतिरिक्त शेष व्यापार एशियाई देशों-जापान एवं भारतद्वारा किया जाता है। रूस, कनाडा एवं पूर्वी यूरोपीय देशों के व्यापार में भी वृद्धि हुई है। अफ्रीकी देश, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड भी अन्तर्राष्ट्रीय मानचित्र पर व्यापारिक दृष्टिकोण से उभरने लगे हैं, परन्तु विश्व व्यापार में अभी भी यूरोपीय एवं अमेरिकी देशों का ही प्रभुत्व है।
विश्व निर्यात व्यापार की संरचना निम्नलिखित है-

  1. प्रमुखतया विकासशील देशों से खाद्यान्न, पेय-पदार्थ, कृषिगत अन्य उपजें, खनिज एवं धात्विक अयस्क, तम्बाकू, चाय, कहवा, चमड़ा और खालें आदि पदार्थ विकसित देशों को भेजे जाते हैं। प्रमुख निर्यातक देशों में इण्डोनेशिया, श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, संयुक्त अरब गणराज्य, मॉरीशस, घाना, कोलम्बिया, इक्वेडोर आदि प्रमुख हैं।
  2. मिलों एवं कारखानों में निर्मित विभिन्न वस्तुएँ- भारी मशीनें, इन्जीनियरिंग का सामान, सीमेण्ट, कागज, रसायन, रेशमी-ऊनी वस्त्र, मोटरगाड़ियाँ एवं धातुएँ-टिन, ताँबा, सीसा, जस्ता आदि विकसित देशों- संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली एवं जापान आदि-से मध्य-पूर्वी एवं एशियाई देशों, दक्षिणी अमेरिकी एवं अफ्रीकी देशों को निर्यात किये जाते हैं।
  3. वर्तमान समय में परम्परागत वस्तुओं के निर्यात की अपेक्ष कच्चा माल, निर्मित पदार्थ, मशीनें, पेट्रोलियम पदार्थों आदि का व्यापार अधिक होने लगा है।
  4. विश्व के निर्यात व्यापार की दिशा में भी अब परिवर्तन आ गया है। अनेक विकसित देश अब विश्व के विभिन्न देशों से विकासशील देशों की अपेक्षा अधिक निर्यात करने लगे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय निर्यात व्यापार की संरचना एवं उसकी दिशा
Structure and Direction of International Export Trade

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade 2

विश्व : आयात व्यापार (World : Import Trade)

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयात व्यापार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. वर्तमान समय में विश्व के सभी देशों के आयात में विनिर्मित माल, यन्त्र एवं उपकरण तथा मशीनों का भाग अधिक होता है। कनाडा, क्यूबा, मैक्सिको, कोलम्बिया, पीरू, नार्वे आदि देशों का आयात इसी प्रकार का है।
  2. विश्व में अधिकांश देश औद्योगीकरण में स्वावलम्बी बनने के लिए अधिकाधिक आधारभूत खनिजों एवं यान्त्रिक उपकरणों तथा पूँजीगत सामान का आयात अधिक करते हैं।
  3. जनाधिक्य वाले देशों एवं विकसित देशों में खाद्यान्नों के आयात में वृद्धि हो रही है।
  4. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी सदृश देशों में कच्चे माल के आयात में वृद्धि हो रही है।
  5. ब्रिटेन तथा पश्चिमी यूरोपीय देश-फ्रांस एवं जर्मनी आदि-महत्त्वपूर्ण आयातक देश हैं। इन देशों के आयात यूरोपीय तथा दक्षिणी अमेरिकी देशों से पूर्ण होते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय आयात व्यापार की संरचना एवं उसकी दिशा
Structure and Direction of International Import Trade

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade 3
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade 4
व्यापार के दृष्टिकोण से विश्व के देशों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. वे देश जहाँ आयात एवं निर्यात व्यापार प्रायः बराबर होता है। ऐसे देशों में कम्पूचिया, सूडान, फिनलैण्ड एवं उरुग्वे आदि हैं। इन देशों से प्राथमिक वस्तुओं (कृषि, पशु एवं वन) से सम्बन्धित वस्तुओं का निर्यात तथा अन्य निर्मित वस्तुओं का आयात किया जाता है।
  2. वे देश जहाँ निर्यात, आयात की अपेक्षा अधिक होता है, वहाँ इनका व्यापार अधिक अनुकूल रहता है। वेनेजुएला, अर्जेण्टीना, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, इण्डोनेशिया, चेक एवं स्लोवाकिया, कनाडा, संयुक्त राज्य, सऊदी अरब, इराक, ईरान, रूस, फ्रांस, मलेशिया आदि देशों से विशिष्ट वस्तुओं, अर्थात् रबड़, खनिज तेल, चाय, निर्मित पदार्थ आदि का निर्यात होता है।
  3. वे देश जहाँ आयात, निर्यात की अपेक्षा अधिक होता है, वहाँ इन देशों का व्यापार अधिक प्रतिकूल रहता है। ब्रिटेन, भारत, जापान, इटली, नार्वे तथा अधिकांश यूरोपीय देश इसी श्रेणी में आते हैं। इन देशों द्वारा खाद्यान्न, अन्य कच्चे माल तथा मशीनी उपकरणों का आयात किया जाता है।

प्रश्न 2
चाय तथा खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वर्णन कीजिए।
या
खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वर्णन कीजिए। (2014)
या
टिप्पणी लिखिए-खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।
उत्तर

चाय का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार
(International Trade of Tea)

चाय एक महत्त्वपूर्ण पेय पदार्थ है। इसका उत्पादने उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में ही किया जाता है, जबकि इसकी माँग संसार के अधिकांश देशों में रहती है। संसार के विकसित राष्ट्रों में चाय का उत्पादन बिल्कुल नहीं होता, परन्तु उनकी ऊँची क्रयशक्ति तथा अधिक खपत के कारण वे राष्ट्र चाय के प्रमुख आयातक बन गए हैं।

चाय के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की विशेषताएँ
(Characteristics of International Trade of Tea)
चाय के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. चाय का 90% उत्पादन उष्णार्द्र जलवायु के देशों में किया जाता है, जबकि उसका.90% उपभोग
    शीतप्रधान जलवायु के देश करते हैं।
  2. चाय की अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी बहुत महत्त्वपूर्ण है।
  3. संसार में लगभग 26 लाख टन चाय का उत्पादन होता है जिसमें से लगभग 47% (12.2 लाख टन) विश्व व्यापार में प्रयुक्त होगी। अत: चाय का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार विकासशील देशों की निर्यात आय की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है।
  4. यूरोपीय साझा बाजार के सभी देशों का मुख्य आयात चाय ही होती है।
  5. चाय के कुल निर्यात का लगभग 13.3% भारत, 12.2% श्रीलंका, 12% चीन, 11% कीनिया (अफ्रीका), 5% इण्डोनेशिया और 3.8% अर्जेण्टीना द्वारा किया जाता है।
  6. कुल चाय आयात का 70% भाग ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, पाकिस्तान, इराक, ईरान एवं मिस्र द्वारा किया जाता है तथा 5% जापान, 3% पोलैण्ड तथा 3% सऊदी अरब द्वारा किया जाता है।
  7. चाय विकासशील एवं खेतिहर देशों की आय का मुख्य स्रोत बनी हुई है। इसे निर्यात कर ये देश ‘पर्याप्त विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं।
  8. भारत और श्रीलंका के निर्यात व्यापार में चाय महत्त्वपूर्ण स्थान रहती है।
  9. चाय की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत में ग्रेट ब्रिटेन का स्थान सर्वप्रथम है, अतः यह चाय का सबसे बड़ा ग्राहक है।
  10. विश्व के कुल चाय व्यापार में भारत का योगदान लगभग 13% है।
  11. चाय के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत के प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी श्रीलंका, इण्डोनेशिया, कीनिया तथा चीन हैं।

खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार
(International Trade of Mineral Oil)

आधुनिक युग में खनिज तेल एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन है। अत: इसके संचित भण्डार एवं उत्पादन क्षेत्रों पर आर्थिक या राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दाँव-पेंच चलते रहते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु है। विश्व में ऐसे गिने-चुने देश हैं जो खनिज तेल के उत्पादन में स्वावलम्बी हैं और निर्यात करने की स्थिति में भी हैं। ऊर्जा संकट को ध्यान में रखते हुए खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है।

खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की विशेषताएँ
(Characteristics of International Trade of Mineral Oil)
खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. खनिज तेल का निर्यात करने वाले देश बहुत कम हैं, जबकि इसके आयातक देशों की सूची बहुत लम्बी है।
  2. खनिज तेल का शोधन करने पर इससे अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। इन पदार्थों पर बहुत-से महत्त्वपूर्ण उद्योग-धन्धे आधारित होते हैं, अतः सभी देश आवश्यकतानुसार खनिज तेल के आयात पर बल देते हैं।
  3. खनिज तेल उत्पादकः खाड़ी देशों में कृषि, उद्योग तथा व्यापार पिछड़ी हुई दशा में हैं, अत: ये खनिज तेल का निर्यात कर अपनी अन्य आवश्यकता की वस्तुएँ आयात करने में सक्षम हो पाए हैं।
  4. सभी औद्योगिक राष्ट्र खनिज तेल का भारी मात्रा में आयात करते हैं।
  5. खनिज तेल को यदि भूमि से न निकाला जाए तो वह स्वत: ही स्थानान्तरित हो जाता है; अतः खनिज तेल उत्पादक देश इसके निर्यात द्वारा ही उत्पादन कर पाते हैं।
  6. विकसित होते हुए परिवहन साधनों ने खनिज तेल के उपभोग को कई गुना बढ़ा दिया है; अत: सभी राष्ट्र खनिज तेल के आयात में वृद्धि कर रहे हैं।
  7. विश्व में प्रतिवर्ष कुल लगभग 3 अरब टन खनिज तेल का उत्पादन होता है जिसके लगभग एक-तिहाई भाग (103 करोड़ टन) का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार होता है। तेल के बड़े आयातकों में संयुक्त राज्य अमेरिका (विश्व का 17%), जापान (14%) और पश्चिमी यूरोपीय देश (30%) हैं।
  8. खनिज तेल के बड़े निर्यातकों में सऊदी अरब (18%), रूस (16%), मैक्सिको (6%), इराक (6%), ईरान (5.5.%), नाइजीरिया (5.2%), संयुक्त अरब अमीरात (52%), वेनेजुएला (4%), लीबिया (3.8%) और इण्डोनेशिया (3.7%) प्रमुख हैं।
  9. संयुक्त राज्य अमेरिका खनिज तेल का संसार सबसे अधिक उपभोग करने वाला देश है। 46 करोड़ टन घरेलू उत्पादन के अतिरिक्त यह प्रतिवर्ष लगभग 18 करोड़ टन तेल का आयात करता है। रूस अपने 31.5 करोड़ टन उत्पादन में से लगभग 8 करोड़ टन खनिज तेल का निर्यात कर देता है। जापान एक महान औद्योगिक देश होने के कारण संसार का दूसरा बड़ा तेल आयातक देश बन गया है।
  10. पश्चिमी यूरोप में केवल ब्रिटेन के अतिरिक्त सभी देशों का घरेलू उत्पादन न होने के कारण तथा इन विकसित राष्ट्रों में पेट्रोलियम की अधिक माँग होने के कारण खाड़ी देशों से खनिज तेल का बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है।

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से किसी एक के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का विवरण दीजिए –
(1) गेहूँ
(2) चावल
(3) लौह-अयस्क
(4) कोयला।
उत्तर

(1) गेहूँ का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

गेहूँ विश्व का सबसे अधिक बोया जाने वाला खाद्यान्न है। विश्व की अधिकांश सभ्य जातियाँ खाद्यान्नों में गेहूँ पर ही आश्रित हैं। इसका उत्पादन क्षेत्र इतना विस्तृत है कि विश्व के अनेक जलवायु प्रदेशों में यह उगाया जाता है तथा वर्ष भर इसकी खेती कहीं-न-कहीं होती रहती है। इसके उपरान्त भी अनेक देशों में गेहूं का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता है, फलतः वे अपनी माँग की आपूर्ति के लिए अन्य देशों पर निर्भर करत हैं। इस तथ्य का लाभ उठाने के लिए संसार के कम जनसंख्या वाले और विस्तृत कृषि-भूमि वाले देश मशीनों से गेहूं की विस्तृत खेती करते हैं, जैसे-कनाड़ा, अर्जेण्टीना, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका।

इन देशों द्वारा अपनी आवश्यकता से इतना अधिक गेहूं उत्पन्न किया जाता है कि उसे निर्यात करना भी कभी-कभी उनके लिए समस्या हो जाती है। इन देशों में बड़े-बड़े फार्मों में बड़े पैमाने पर खेती किए जाने के कारण गेहूं की उत्पादन लागत भी कम आती है। इसी कारण विश्व व्यापार में इनकी वे देश प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते जहाँ गेहूं की सघन कृषि करने में अपेक्षाकृत लागत अधिक आती है।

विश्व के प्रायः अधिक जनसंख्या वाले देश अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए गेहूं का आयात करते हैं। विश्व के कुल निर्यात का लगभग 84% भाग संयक्त राज्य अमेरिका, कनाड़ा, अर्जेण्टीना, पश्चिमी एशियाई ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस एवं जर्मनी का है। इनके अतिरिक्त रूस, हंगरी, रूमानिया, इटली, टर्की आदि भी गेहूँ के निर्यातक देश हैं। भारत भी अपने समीपवर्ती देशों को गेहूं का निर्यात करने लगा है। गेहूं के आयातक देशों में चीन, यूरोपीय देश, ब्राजील, जापान, मिस्र, अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश, ब्रिटेन आदि प्रमुख हैं।

(2) चावल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

चावल संसार की आधी से अधिक जनसंख्या का मुख्य भोजन है। वस्तुतः शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों के निवासियों के लिए गेहूँ जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों के निवासियों के लिए-चावल आवश्यक है। व्यापारिक दृष्टि से चावल, गेहूं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

संसार के कुल चावल उत्पादन का केवल 10% भाग ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रयुक्त होता हैं, क्योंकि अधिकांश बड़े चावल उत्पादक देश ही अत्यधिक जनसंख्या वाले देश होने के कारण चावल के बड़े उपभोक्ता भी हैं। विश्व का कुल चावल उत्पादन लगभग 61 करोड़ मीट्रिक टन है जिसमें से केवल 2.5 करोड़ टन चावल का ही विश्व व्यापार किया जाता है। थाईलैण्ड, म्यांमार, ताइवान, पाकिस्तान, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, मिस्र, ब्राजील, जापान, कम्बोडिया, वियतनाम और स्पेन संसार के प्रमुख चावल निर्यातक देश हैं। ये देश चावल के बड़े उत्पादक नहीं हैं। अपनी माँग से अधिक चावल उत्पादन के कारण ही ये चावल के निर्यातक बने हुए हैं। आवश्यकता से कम उत्पादन होने के कारण बांग्लादेश, इण्डोनेशिया, खाड़ी के देश, जापान, रूस, श्रीलंका, मलेशिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका आदि देश चावल का आयात करते हैं।

(3) लौह-अयस्क का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

लौह-अयस्क लोहा व इस्पात उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। इस्पात उद्योग का विकास करने के लिए संभी राष्ट्र यथाशक्ति प्रयत्नशील हैं क्योंकि यह सभी मशीनों, परिवहन उपकरणों, इंजीनियरी उद्योगों का आधार होता है। इसीलिए इसे ‘आधुनिक सभ्यता का जनक’ कहा जाता है। यह भारी और कम मूल्य वाला खनिज पदार्थ है, अत: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में इसका महत्त्व कम है। इसी कारण इसका व्यापार सामान्यतः पड़ोसी देशों के बीच ही किया जाता है।

संसार के कुल 99.44 करोड़ टन लौह-अयस्क उत्पादन को लगीग एक-तिहाई अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रयुक्त किया जाता है। संसार के बड़े लौह-अयस्क निर्यातक देश ब्राजील (24%), ऑस्ट्रेलिया (19%), रूस (16%), कनाड़ा (12%), भारत (7%), स्वीडन (4.4%), लाइबेरिया (3.5%) एवं वेनेजुएला (3.3%) हैं। लौह-अयस्क के बड़े आयातक देशों में जापान (विश्व का लगभग एक-तिहाई), जर्मनी (15%), संयुक्त राज्य (6.4%), इटली (4.5%), फ्रांस (4%), चीन (3.9%) एवं बेल्जियम (3.9%) प्रमुख हैं।

ब्राजील में उत्पादित लौह-अयस्क के प्रमुख ग्राहक संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान हैं। ऑस्ट्रेलिया और भारत का अधिकांश लौह-अयस्क जापान को निर्यात किया जाता है। अफ्रीका के लौह-अयस्क उत्पादक देश और वेनेजुएला मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका को लौह-अयस्क निर्यात करते हैं। कनाडा से लौह-अयस्क का निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों के लोहा-इस्पात उत्पादक देशों को किया जाता है।

(4) कोयले का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

कोयला आज भी महत्त्वपूर्ण ऊर्जा का स्रोत है और अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करता है। भारी होने के कारण इसका व्यापार अधिकतर जलमार्गो (नाव्य नहरों, नाव्य नदियों और महासागरीय मार्गों) द्वारा किया जाता है। इसका व्यापार अधिकतर निकटस्थं देशों के साथ किया जाता है। क्योंकि लम्बी दूरियों तक़ इसका परिवहन करने पर यह महँगा हो जाता है। वस्तुत: विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 10% (45.6 करोड़ टन) कोयला ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में व्यापारिक दृष्टिकोण से प्रयुक्त किया जाता है।

यूरोप के देश अधिकतर आपस में ही जलमार्गों द्वारा इसका व्यापार कर लेते हैं। और साथ-ही-साथ वापसी में वही जलयान लौह-अयस्क को ढोते हैं। इसीलिए कोयले और लौह-अयस्क की खानों के निकट ही लोहा-उत्पादक केन्द्र स्थापित किए गए हैं। पोलैण्ड से नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, आस्ट्रिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और इटली को कोयला निर्यात किया जाता है। संसार के बड़े कोयला निर्यातक देश ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, पोलैण्ड, यूक्रेन, भारत, दक्षिणी अफ्रीका आदि हैं। जापान संसार का सबसे बड़ा कोयला आयातक देश है। (विशेषतः कोकिंग कोयले का)। जापान आज निकटता के आधार पर ही चीन के कोयला क्षेत्रों का विकास अपने आयात के लिए कर रहा है। संसार के बड़े कोयला आयातक देश जापान, फ्रांस कनाडा, बेल्जियम, इटली, डेनमार्क, स्पेन, नार्वे, स्वीडन, अर्जेण्टीना आदि हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के दोष बताइए।
उत्तर
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा बहुधा किसी देश के क्षयशील खनिज संसाधन शीघ्र ही समाप्त हो जाते हैं। उन संसाधनों की पूर्ति सम्भव नहीं होती।
  2. कभी-कभी विदेशी व्यापार से देशवासियों को हानिकारक मादक वस्तुओं के उपयोग का अतिशय अभ्यास हो जाता है, उदाहरणार्थ-चीनवासियों को मदिरा तथा अफीम की लत पड़ गई थी।
  3. प्रत्येक देश में कुछ विशेष वस्तुओं के उत्पादन का विशेषीकरण होता है तथा अन्य क्षेत्र अविकसित रह जाते हैं। इस प्रकार देश का एकपक्षीय विकास ही होता है, जो इस देश की अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होता है।
  4. देशी बाजारों में विदेशी माल आने पर देश के उद्योग-धन्धे प्रायः चौपट हो जाते हैं तथा पनप नहीं पाते। स्वतन्त्रता के पूर्व भारत के बाजारों में विदेशी वस्त्रों के कारण स्वदेशी वस्त्र व्यवसाय ठप हो गया था।
  5. जो देश अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विदेशी व्यापार (आयात) पर निर्भर करते हैं, युद्धकाल या अन्य किसी संकट काल में व्यापार बन्द होने पर उसका आर्थिक ढाँचा अस्त-व्यस्त हो जाता है।
  6. विदेशी व्यापार से उपजे आर्थिक तथा औद्योगिक असन्तुलन का प्रभाव एक ही देश पर सीमित नहीं रहता, अन्य सम्बन्धित देश भी उसके शिकार होते हैं।

प्रश्न 2
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के गुण बताइए।
उत्तर
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. खाद्य संकट के समय विदेशों से अन्न के आयात से देश की भुखमरी से रक्षा होती है। इस प्रकार देशवासियों के स्वास्थ्य एवं जीवन की रक्षा होती है।
  2. प्रायः देशों में उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन होता है जिनके लिए परिस्थितियाँ अनुकूलतम होती हैं। इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से प्रादेशिक श्रम-विभाजन का विकास होता है।
  3. जिन वस्तुओं का देश में उत्पादन नहीं होता, आयात द्वारा उपभोक्ताओं को वे सहज उपलब्ध हो जाती हैं।
  4. यदि किसी देश में किसी उद्योग के लिए कच्चा माल उपलब्ध नहीं है, किन्तु अन्य सभी सुविधाएँ प्राप्त हैं तो कच्चे माल के आयात द्वारा उस उद्योग का विकास सम्भव है। जिन देशों के पास कच्चा माल अधिक है, किन्तु अन्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं, तो वे कच्चे माल का निर्यात करके बदले में आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कर सकते हैं।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से देशों के मध्य व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। अतएव वे उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता के प्रति सतर्क रहते हैं तथा मूल्य भी कम रखने की चेष्टा करते हैं।

प्रश्न 3
राष्ट्रमण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
राष्ट्रमण्डल (Commonwealth Nation) सदस्य संख्या (53) तथा क्षेत्रीय व्यापार की दृष्टि से यह व्यापार संगठन संयुक्त राष्ट्र के बाद सबसे बड़ा है, किन्तु यह प्रभावी संगठन नहीं है। इसके सदस्य वे सभी देश हैं जो कभी ब्रिटेन के नियन्त्रण में थे। भारत, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैपड, श्रीलंका, मलेशिया, घाना, नाइजीरिया, साइप्रस, सियरालिओन, तंजानिया, जमैका, ट्रिनिडाड, तोबेगो, युगाण्डा, जंजीबार, केन्या, सिंगापुर व बांग्लादेश इसके सदस्य हैं। ब्रिटेन की रंगभेद नीति के कारण दक्षिणी अफ्रीका, रोडेशिया, जाम्बिया तथा 1971 ई० में पाकिस्तान इससे अलग हो गए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर
कोई भी देश अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं की पूर्ति स्वयं नहीं कर सकता; अतः उसे अन्य देशों से व्यापार द्वारा अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ मँगानी पड़ती हैं। इसे ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं।

प्रश्न 2
भारत के विदेशी व्यापार की दो नवीन प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
नब्बे के दशक से लागू आर्थिक उदारवादी नीति के कारण हमारे विश्व के सभी देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई है। विश्व-व्यापारीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण भारत के निर्यात व्यापार में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन आए हैं।

प्रश्न 3
भारत की दो निर्यातक वस्तुओं का वर्णन कीजिए। [2010, 12, 13, 15]
उत्तर

  1. चाय – भारत चाय का प्रमुख निर्यातक देश है। ब्रिटेन भारतीय चाय का मुख्य ग्राहक है। इसके अतिरिक्त कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरान, संयुक्त अरब गणराज्य, रूस, जर्मनी तथा सूडान आदि देश प्रमुख ग्राहक हैं।
  2. सूती वस्त्र – भारत सूती-वस्त्र, विशेष रूप से सिले-सिलाए परिधानों के निर्यात में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह निर्यात मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, मलेशिया, सूडान, म्यांमार, अदन, अफगानिस्तान आदि देशों को किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
यूरोपीय संघ का मुख्यालय है।
(क) जेनेवा
(ख) न्यूयॉर्क
(ग) ब्रुसेल्स
(घ) ओस्लो
उत्तर
(ग) ब्रुसेल्स।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade

प्रश्न 2
आसियान का सदस्य नहीं है।
(क) ब्राजील
(ख) सिंगापुर
(ग) थाईलैण्ड
(घ) मलेशिया
उत्तर
(क) ब्राजील

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi साहित्यिक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name साहित्यिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi साहित्यिक निबन्ध

साहित्यिक निबन्ध

1. साहित्य और समाज

सम्बद्ध शीर्षक

  • साहित्य समाज का दर्पण है
  • साहित्य और मानव-जीवन
  • साहित्य समाज की अभिव्यक्ति

प्रमुख विचार-बिन्दु:

  1. साहित्य क्या है?
  2. साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ,
  3.  समाज क्या है?
  4.  साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध : साहित्य समाज का दर्पण,
  5. साहित्य की रचनाप्रक्रिया,
  6.  साहित्य का समाज पर प्रभाव,
  7.  उपसंहार।

साहित्य क्या है? – साहित्य’ शब्द ‘सहित’ से बना है। ‘सहित’ का भाव ही साहित्य कहलाता है ( सहितस्य भावः साहित्यः)। ‘सहित’ के दो अर्थ हैं – साथ एवं हितकारी (स + हित = हितसहित) या कल्याणकारी। यहाँ ‘साथ’ से आशय है—शब्द और अर्थ का साथ अर्थात् सार्थक शब्दों का प्रयोग। सार्थक शब्दों का प्रयोग तो ज्ञान-विज्ञान की सभी शाखाएँ करती हैं। तब फिर साहित्य की अपनी क्या विशेषता है? वस्तुत: साहित्य का ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाओं से स्पष्ट अन्तर है

  1.  ज्ञान-विज्ञान की शाखाएँ बुद्धिप्रधान या तर्कप्रधान होती हैं जब कि साहित्य हृदयप्रधान।
  2.  ये शाखाएँ तथ्यात्मक हैं जब कि साहित्य कल्पनात्मक।
  3. ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का मुख्य लक्ष्य मानव की भौतिक सुख-समृद्धि एवं सुविधाओं का विधान करना है, पर साहित्य का लक्ष्य तो मानव के अन्त:करण का परिष्कार करते हुए, उसमें सद्वृत्तियों का संचार करना है। आनन्द प्रदान कराना यदि साहित्य की सफलता है, तो मानव-मन का उन्नयन उसकी सार्थकता।
  4. ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं में कथ्य (विचार-तत्त्व) ही प्रधान होता है, कथन-शैली गौण। वस्तुतः भाषा-शैली वहाँ विचाराभिव्यक्ति की साधनमात्र है। दूसरी ओर साहित्य में कथ्य से अधिक शैली का महत्त्व है।

उदाहरणार्थ                                                                              जल उठा स्नेह दीपक-सा
                                                                                            नवनीत हृदये था मेरा,
                                                                                             अब शेष धूमरेखा से
                                                                                            चित्रित कर रहा अँधेरा।

कवि का कहना केवल यह है कि प्रिय के संयोगकाल में जो हृदय हर्षोल्लास से भरा रहता था, वही अब उसके वियोग में गहरे विषाद में डूब गया है। यह एक साधारण व्यापार है, जिसका अनुभव प्रत्येक प्रेमी-हृदय करता है, किन्तु कवि ने दीपक के रूपक द्वारा इसी साधारण-सी बात को अत्यधिक चमत्कारपूर्ण ढंग से कहा है, जो पाठक के हृदय को कहीं गहरी छू लेता है।

स्पष्ट है कि साहित्य में भाव और भाषा, कथ्य और कथन-शैली (अभिव्यक्ति) दोनों का समान महत्त्व है। यह अकेली विशेषता ही साहित्य को ज्ञान-विज्ञान की शेष शाखाओं से अलग करने के लिए पर्याप्त है।

साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ – प्रेमचन्द जी साहित्य की परिभाषा इन शब्दों में देते हैं, “सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है-एक जिज्ञासा का, दूसरा प्रयोजन का और तीसरा आनन्द का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और आनन्द का सम्बन्ध केवल साहित्य का विषय है। सत्य जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है।” इस बात को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर इन शब्दों में कहते हैं, “जिस अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य प्रयोजन के रूप को व्यक्त करना नहीं, अपितु विशुद्ध आनन्द रूप को व्यक्त करना है, उसी को मैं साहित्य कहता हूँ।’ प्रसिद्ध अंग्रेज समालोचक द क्विन्सी (De Quincey) के अनुसार साहित्य का दृष्टिकोण उपयोगितावादी न होकर मानवतावादी है। “ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का लक्ष्य मानव का ज्ञानवर्द्धन करना है, उसे शिक्षा देना है। इसके विपरीत साहित्य मानव का अन्त:विकास करता है, उसे जीवन जीने की कला सिखाता है, चित्तप्रसादन द्वारा उसमें नूतन प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संचार करता है।”

समाज क्या है? – एक ऐसा मानव-समुदाय, जो किसी निश्चित भू-भाग पर रहता हो, समान परम्पराओं, इतिहास, धर्म एवं संस्कृति से आपस में जुड़ा हो तथा एक भाषा बोलता हो, समाज कहलाता है।

साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध : साहित्य समाज का दर्पण – समाज और साहित्य परस्पर घनिष्ठ रूप से आबद्ध हैं। साहित्य का जन्म वस्तुत: समाज से ही होता है। साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही घटक होता है। वह अपने समाज की परम्पराओं, इतिहास, धर्म, संस्कृति आदि से ही अनुप्राणित होकर साहित्य-रचना करता है और अपनी कृति में इनका चित्रण करता है। इस प्रकार साहित्यकार अपनी रचना की सामग्री किसी समाज विशेष से ही चुनता है तथा अपने समाज की आशाओं-आकांक्षाओं, सुखों-दुःखों, संघर्षों, अभावों और उपलब्धियों को वाणी देता है तथा उसका प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। उसकी समर्थ वाणी का सहारा पाकरे समाज अपने स्वरूप को पहचानती है और अपने रोग का सही निदान पाकर उसके उपचारे को तत्पर होता है। इसी कारण किसी साहित्य विशेष को पढ़कर उस काल के समाज का एक समग्र-चित्र मानसपटल पर अंकित हो सकता है। इसी अर्थ में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है।

साहित्य की रचना-प्रक्रिया – समर्थ साहित्यकार अपनी अतलस्पर्शिनी प्रतिभा द्वारा सबसे पहले अपने समकालीन सामाजिक जीवन को बारीकी से पर्यवेक्षण करता है, उसकी सफलताओं-असफलताओं, उपलब्धियों-अभावों, क्षमताओं-दुर्बलताओं तथा संगतियों-विसंगतियों की गहराई तक थाह लेता है। इसके पश्चात् विकृतियों और समस्याओं के मूल कारणों का निदान कर अपनी रचना के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन करता है और फिर इस समस्त बिखरी हुई, परस्पर असम्बद्ध एवं अति साधारण-सी दीख पड़ने वाली सामग्री को सुसंयोजित कर उसे अपनी ‘नवनवोन्मेषशालिनी कल्पना के साँचे में ढालकर ऐसा कलात्मक रूप एवं सौष्ठव प्रदान करता है कि सहृदय अध्येता रस-विभोर हो नूतन प्रेरणा से अनुप्राणित हो उठता है। कलाकार का वैशिष्ट्य इसी में है कि उसकी रचना की अनुभूति एकाकी होते हुए भी सार्वदेशिक-सार्वकालिक बन जाये तथा अपने युगे की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए चिरन्तन मानव-मूल्यों से मण्डित भी हो। उसकी रचना न केवल अपने युग, अपितु आने वाले युगों के लिए भी नवस्फूर्ति का अजस्र स्रोत बन जाये और अपने देश-काल की उपेक्षा न करते हुए देश-कालातीत होकर मानवमात्र की अक्षय निधि बन जाये। यही कारण है। कि महान् साहित्यकार किसी विशेष देश, जाति, धर्म एवं भाषा-शैली के समुदाय में जन्म लेकर भी सारे विश्व का अपना बन जाता है; उदाहरणार्थ-वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसीदास, होमर, शेक्सपियर आदि किसी देश विशेष के नहीं मानवमात्र के अपने हैं, जो युगों से मानव को नवचेतना प्रदान करते आ रहे हैं।

साहित्य का समाज पर प्रभाव – साहित्यकार अपने समकालीन समाज से ही अपनी रचना के लिए आवश्यक सामग्री का चयन करता है; अतः समाज पर साहित्य का प्रभाव भी स्वाभाविक है। जैसा कि ऊपरे संकेतित किया गया है कि महान् साहित्यकार में एक ऐसी नैसर्गिक या ईश्वरदत्त प्रतिभा होती है, एक ऐसी अतलस्पर्शिनी अन्तर्दृष्टि होती है कि वह विभिन्न दृश्यों, घटनाओं, व्यापारों या समस्याओं के मूल तक तत्क्षण पहुँच जाता है, जब कि राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री उसका कारण बाहर टटोलते रह जाते हैं। इतना ही नहीं, साहित्यकार रोग का जो निदान करता और उपचार सुझाता है, वही वास्तविक समाधान होता है। इसी कारण प्रेमचन्द जी ने कहा है कि “साहित्य राजनीति के आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है, राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं।” अंग्रेज कवि शेली ने कवियों को विश्व के अघोषित विधायक’ (unacknowledged legislators of the world) कहा है।

प्राचीन ऋषियों ने कवि को विधाता और. द्रष्टा कहा है – ‘कविर्मनीषी धाता स्वयम्भूः।‘ साहित्यकार कितना बड़ा द्रष्टा होता है, इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। आज से लगभग 70-75 वर्ष पूर्व श्री देवकीनन्दन खत्री ने अपने तिलिस्मी उपन्यास ‘रोहतासमठ’ में यन्त्रमानव (robot) के कार्यों का विस्मयकारी चित्रण किया था। उस समय यह सर्वथा कपोल-कल्पित लगा; क्योंकि उस काल में यन्त्रमानव की बात किसी ने सोची तक न थी, किन्तु आज विज्ञान ने उस दिशा में बहुत प्रगति कर ली है, यह देख श्री खत्री की नवनवोन्मेष- शालिनी प्रतिभा के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। इसी प्रकार आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व पुष्पक विमान के विषय में पढ़ना कल्पनामात्र लगता होगा, परन्तु आज उससे कहीं अधिक प्रगति वैमानिकी ने की है।

साहित्य द्वारा सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियों के उल्लेखों से तो विश्व का इतिहास भरा पड़ा है। सम्पूर्ण यूरोप को गम्भीर रूप से आलोड़ित कर डालने वाली फ्रांस की राज्य क्रान्ति (1789 ई०), रूसो की ‘ला कोंत्री सोसियल’ (La Contract Social–सामाजिक-अनुबन्ध) नामक पुस्तक के प्रकाशने का ही परिणाम थी। आधुनिक काल में चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों ने इंग्लैण्ड से कितनी ही घातक सामाजिक एवं शैक्षिक रूढ़ियों का उन्मूलन कराकर नूतन स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात कराया।

आधुनिक युग में प्रेमचन्द के उपन्यासों में कृषकों पर जमींदारों के बर्बर अत्याचारों एवं महाजनों द्वारा उनके क्रूर शोषण के चित्रों ने समाज को जमींदारी-उन्मूलन एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की स्थापना को प्रेरित किया। उधर बंगाल में शरत्चन्द्र ने अपने उपन्यासों में कन्याओं के बाल-विवाह की अमानवीयता एवं विधवाविवाह-निषेध की नृशंसता को ऐसी सशक्तता से उजागर किया कि अन्तत: बाल-विवाह को कानून द्वारा निषिद्ध घोषित किया गया एवं विधवा-विवाह का प्रचलन हुआ।

उपसंहार – निष्कर्ष यह है कि समाज और साहित्य का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। साहित्य समाज से ही उद्भूत होता है; क्योंकि साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही अंग होता है। वह इसी से प्रेरणा ग्रहणकर साहित्य-रचना करता है एवं अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हुआ समकालीन समाज का मार्गदर्शन करता है, किन्तु साहित्यकार की महत्ता इसमें है कि वह अपने युग की उपज होने पर भी उसी से बँधकर नहीं रह जाये, अपितु अपनी रचनाओं से चिरन्तन मानवीय आदर्शों एवं मूल्यों की स्थापना द्वारा देशकालातीत बनकर सम्पूर्ण मानवता को नयी ऊर्जा एवं प्रेरणा से स्पन्दित करे। इसी कारण साहित्य को विश्व-मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि माना गया है, जिसकी समकक्षता संसार की मूल्यवान्-से-मूल्यवान् वस्तु भी नहीं कर सकती; क्योंकि संसार का सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान मानवता के शरीर का ही पोषण करता है, जब कि एकमात्र साहित्य ही उसकी आत्मा का पोषक है। एक अंग्रेज विद्वान् ने कहा है कि “यदि कभी सम्पूर्ण अंग्रेज जाति नष्ट भी हो जाये, किन्तु केवल शेक्सपियर बचा रहे तो अंग्रेज जाति नष्ट नहीं हुई मानी जाएगी। ऐसे युगस्रष्टा और युगद्रष्टा कलाकारों के सम्मुख सम्पूर्ण मानवता कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होकर उन्हें अपने हृदय-सिंहासन पर प्रतिष्ठित करती है एवं उनके यश को दिग्दिगन्तव्यापी बना देती है। अपने पार्थिव शरीर से तिरोहित हो जाने पर भी वे अपने यशरूपी शरीर से इस धराधाम पर सदा अजर-अमर बने रहते हैं

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजे भयम् ॥

2. मेरा प्रिय ग्रन्थ (श्रीरामचरितमानस)

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरी प्रिय पुस्तक
  • तुलसी और उनका काव्य
  • हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय, अमर साहित्यिक कृति

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व,
  2.  श्रीरामचरितमानस की महत्ता,
  3.  कथा संगठन,
  4.  चरित्र-चित्रण,
  5.  भक्ति-भावना,
  6.  भाव-व्यंजना,
  7. भाषा-शैली,
  8.  आदर्श की स्थापना,
  9. भारत पर तुलसी का ऋण,
  10.  उपसंहार।

प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व – किसी विद्वान् ने लिखा है कि व्यक्ति को अपने यौवन में ही किसी लेखक या पुस्तक को अपना प्रिय अवश्य बना लेना चाहिए, जिससे वह उससे आजीवन सोत्साह जीने का सम्बल प्राप्त कर सके। पुस्तकों से अच्छा साथी दूसरा नहीं। वे व्यक्ति को सहारा देती हैं, उससे सहारा नहीं माँगती। हर समय व्यक्ति के पास उपस्थित रहती हैं, किन्तु अपनी उपस्थिति से उसका ध्यान नहीं बँटातीं। एक सन्मित्र की भाँति सदा परामर्श को तत्पर रहती हैं, फिर भी अपनी राय उस पर नहीं थोपतीं।

पुस्तकों की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर मैंने उनमें विशेष रुचि ली और ग्रन्थों का अध्ययन किया, जिसके फलस्वरूप मैंने अनुभव किया कि गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ एक सर्वांगपूर्ण रचना है, जो हर दृष्टि से असाधारण है एवं महत्तम मानवीय मूल्यों तथा आदर्शों से स्पन्दित है।

श्रीरामचरितमानस की महत्ता – वाल्मीकि रामायण के काल से लेकर आज तक समस्त रामकाव्यों की यदि तुलसीकृत ‘श्रीरामचरितमानस से तुलना की जाए तो यह स्पष्टतः दीख पड़ेगा कि आदिकाव्य से उद्भूत रामकाव्य-परम्परा ‘मानस में आकर पूर्ण परिणति को प्राप्त हुई है। चाहे वस्तु संघटन कौशल की दृष्टि से देखें, चाहे पात्रों के चरित्र-चित्रण के चरमोत्कर्ष की दृष्टि से और चाहे महाकाव्य एवं नाटकीयता के अद्भुत सामंजस्य द्वारा प्राप्त शैली की विमुग्धकारिणी प्रौढ़ता की दृष्टि से; यह निष्कर्ष तर्कसंगत और साधारे प्रतीत होगा, न कि मात्र भावुकताप्रेरित। फलत: क्या आश्चर्य, यदि ‘मानस’ संसार के कला-पारखियों का हृदयहार रहा है, जिसका ज्वलन्त प्रमाण यह है कि किसी भी रामचरित-विषयक काव्य के विश्व की विभिन्न भाषाओं में इतने अनुवाद उपलब्ध नहीं होते, जितने ‘श्रीरामचरितमानस’ के। एक ओर यदि अमरीकी पादरी ऐटकिन्स ने अपनी आयु के श्रेष्ठ आठ वर्ष लगाकर ‘मानस’ का अंग्रेजी में पद्यानुवाद किया (जब कि इससे पूर्व उस भाषा में इसके कई अनुवाद विद्यमान थे), तो दूसरी ओर अनीश्वरवादी रूस के मूर्धन्य विद्वान् प्रोफेसर वरान्नीकोव ने अपने अमूल्य जीवन का एक बड़ा भाग लगाकर तथा द्वितीय विश्वयुद्ध की भीषण परिस्थिति में कजाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में रहकर भी रूसी भाषा में इसका पद्यानुवाद किया। उपर्युक्त मनीषियों के अतिरिक्त गार्साद तासी (फ्रेंच); ग्राउज़, ग्रियर्सन, ग्रीव्ज, कारपेण्टर, हिल (आंग्लभाषी विद्वान) आदि न जाने कितने काव्यमर्मज्ञ तुलसी की प्रतिभा पर मुग्ध हैं।

कथा-संगठन – यदि मानस पर कथावस्तु की दृष्टि से विचार करें तो हम पाएँगे कि इसमें गोस्वामी जी ने पुराने प्रसंगों को नया रूप देकर, कई को अधिक उपयुक्त स्थल पर रखकर, कुछ को संक्षिप्त और कुछ को विस्तृत कर तथा कुछ नये प्रसंगों की उद्भावना कर कथावस्तु को सर्वथा मौलिक बना दिया है। उनके बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड का अधिकांश तो मौलिक है ही, पर अयोध्याकाण्ड में तो उनकी कुशलता देखते ही बनती है। इसके पूर्वार्द्ध के संघर्षमय वातावरण की उन्होंने जिस कलानिपुणता से सृष्टि की है, उस पर उनकी मौलिकता की छाप है और उत्तरार्द्ध को भरत-चरित्र तो उनकी सर्वथा अनूठी रचना है। भरत के माध्यम से उन्होंने अपनी भक्ति-भावना को साकार रूप प्रदान किया है। आरम्भ से अन्त तक ‘मानस’ की कथावस्तु में असाधारण प्रवाह है।

चरित्र-चित्रण – श्रीरामचरितमानस में प्रस्तुत चरित्र-चित्रण अपनी मौलिकता में वाल्मीकीय ‘रामायण’ और अध्यात्म’ को बहुत पीछे छोड़ जाता है। सामान्यतः इसके सभी चरित्र नये साँचे में ढलकर नयी गरिमा से मण्डित हुए हैं, पर राम के चरित्र को इस ग्रन्थ में जिन मौलिक उपादानों से गढ़ा गया है, वे सर्वथा अभूतपूर्व हैं। इस ग्रन्थ में पहली बार राम में नरत्व के साथ परब्रह्म का सामंजस्य स्थापित किया गया है। राम में शक्ति, शील तथा सौन्दर्य की पराकाष्ठा दिखाकर राम के शील का जैसा दिव्य-चित्रण किया गया है, वह सर्वथा अभूतपूर्व और अतुलनीय है।

भक्ति-भावना – ‘श्रीरामचरितमानस में तुलसी की भक्ति सेवक-सेव्य भाव की होते हुए भी परम्परागत भक्ति से भिन्न है। गोस्वामी जी की भक्ति साधन नहीं, स्वयं साध्य है और ज्ञानादि उसके चाकरमात्र हैं। इस ग्रन्थ में गोस्वामी जी ने भरत के रूप में अपनी भक्ति का आदर्श खड़ा किया है और भरत अपनी तन्मयता में राधाभाव के समीप पहुँच जाते हैं; अतः उनके विषय में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि “माधुर्य भाव की उपासना में जो स्थान राधा का है, दास्य भाव की उपासना में वही स्थान भरत का है। इस प्रकार तुलसी की उपासना में जो स्थान राधा की है। स्वीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। भक्ति का स्वरूप सर्वथा मौलिक बन पड़ा है जिसमें छुटपन-बड़प्पन या ऊँच-नीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। इस भक्तिरूपी रसायन द्वारा श्रीरामचरितमानस के माध्यम से गोस्वामी जी ने मृतप्रायः हिन्दू जाति को नवजीवन प्रदान किया।

भाव-व्यंजना – गोस्वामी जी रससिद्ध कवीश्वर थे, भाव और भाषा के अप्रतिम सम्राट् थे। उन्होंने ‘मानस’ में शास्त्रोक्त नव रसों को तो साकार किया ही, अपनी अलौकिक प्रतिभा से भक्ति-रस नामक एक नूतन रस की भी सृष्टि कर डाली। गोस्वामी जी ने रस-परिपाक के अतिरिक्त संचारी भावों एवं अनुभावों की अलग से भी ऐसी कुशल योजना की है कि उनकी काव्य-प्रतिभा पर दंग रह जाना पड़ता है। श्रीरामचरितमानस’ से संचारियों एवं अनुभावों का लिखित, योजनाबद्ध समग्र चित्र खड़ा करने का कौशल द्रष्टव्य है

उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥

भरत के आगमन पर प्रेमजन्य अधीरता एवं हर्षजन्य आवेग के कारण राम जो अति वेगपूर्वक ऊठते हैं, उससे जहाँ एक ओर उनका भरत के प्रति अनुराग साकार हो उठा है, वहीं उनकी मानव सुलभ अधीरता भी चित्रित से जाती है।
‘श्रीरामचरितमानस’ में उपमाओं की सादगी एवं मार्मिकता पर सारा सहृदय समाज मुग्ध है। एक उदाहरण पर्याप्त होगा–सम्पूर्ण लंका में एकमात्र विभीषण ही सन्त-स्वभाव के थे। शेष सारा समाज दुर्जन और परपीड़क था। ऐसों के बीच में रहकर जीने के लिए विवश विभीषण अपनी दशा का वर्णन करते हुए हनुमान जी से कहते हैं

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्ह महँ जीभ बिचारी॥

अर्थात् हे पवनपुत्र! लंका में मैं वैसा ही विवश जीवन जी रहा हूँ, जैसा बत्तीस दाँतों के बीच में रहकर जीने को विवश बेचारी जीभ न दाँतों का संग छोड़ सकती है, न उनसे निश्चिन्त हो सकती है। इसी प्रकार काव्य के समस्त अंगों-उपांगों कर ‘श्रीरामचरितमानस में चित्रण इसे एक नयी अर्थवत्ता प्रदान करता है।

भाषा-शैली – मानस में महाकवि तुलसी ने संस्कृत की महत्ता एवं एकछत्र साम्राज्य के उस युग में अनगढ़ लोकभाषा को अपनाकर उसे बड़े मनोयोग से सजाया-सँवारा। इस ग्रन्थ में इन्होंने अपनी असामान्य प्रतिभा के बल पर रस को रसात्मकता, अलंकार को अलंकरण तथा छन्द को नयी गति-भंगिमा और संगीतात्मकता प्रदान की तथा हमारे आस-पास के सुपरिचित जीवन से उपमानों का चयनकर उनमें नयी अर्थवत्ता और व्यंजकता भर दी। काव्य में नाटकीयता के मणिकांचन योग द्वारा नयी शैली को जन्म दिया, जिसने एक ही ग्रन्थ को श्रव्य-काव्य और दृश्य-काव्य दोनों बना दिया।

आदर्श की स्थापना – ‘मानस’ की रामकथा – एक आदर्श मानव की, एक आदर्श परिवार की, एक आदर्श एवं पूर्ण जीवन की कथा है। तुलसी ने वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक प्रत्येक क्षेत्र में जिन आदर्शों की स्थापना की, वे व्यक्ति के इहलौकिक और पारलौकिक-दोनों ही जीवनों को सँवारने वाले हैं। इसी कारण ‘मानस’ पारिवारिक जीवन का महाकाव्य कहलाता है; क्योंकि परिवार ही व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है और पारिवारिक जीवन की सुदृढ़ता शेष समस्त क्षेत्रों को भी सुदृढ़ बनाती है। आदर्श राज्य के रूप में तुलसी के रामराज्य की कल्पना आरम्भ से ही भारतीय जन-मानस को प्रेरणा देती रही है और देती रहेगी।

भारत पर तुलसी का ऋण – इस सम्बन्ध में डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी लिखते हैं कि “अपनी भक्ति के साथ-साथ समाज की रक्षा के लिए उनका अपरिसीम आग्रह था और इसी भक्ति और समाज-रक्षा की चेष्टा के फलस्वरूप ‘श्रीरामचरितमानस’ नामक महाग्रन्थ रचित हुआ, जिसकी पूतधारी ने आज तक उत्तर भारत की हिन्दू जनता के चित्त को सरस और शक्तिमान बनाये रखा है और उसके चरित्र को सामाजिक सद्गुणों के आदर्श की ज्योति से सदा आलोकित कर रखा है।”

उपसंहार – अस्तु, मौलिकता का श्रेष्ठतम सम्बल पाकर ही तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस’ लोक-मानस बन सका है, यह तुलसी की कवि-प्रतिभा और उनकी जागरूक कलाकारिता का प्रमाण है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में-“तुलसीदास कवि थे, भक्त थे, समाज-सुधारक थे, लोकनायक थे और भविष्य के स्रष्टा थे। इन रूपों में उनका कोई भी रूप किसी से घटकर नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने सब ओर से समता (balance) की रक्षा करते हुए एक अद्वितीय काव्य की सृष्टि की, जो अब तक उत्तर भारत का मार्गदर्शक रहा है और उस दिन भी रहेगा, जिस दिन नवीन भारत का जन्म हो गया होगा।’

तुलसी कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ का मूल्यांकन करते हुए डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल लिखते हैं कि, श्रीरामचरितमानस विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी का सबसे अधिक प्रभावशाली ग्रन्थ है।” भारतीय वाङ्मय के समुद्र से अनेक विचार-मेघ उठे और बरसे। उनके अमृत-तुल्य जल की जिस मात्रा में जनता को आवश्यकता थी, उसे समेटकर मानो गोसाईं जी ने श्रीरामचरितमानस में भर दिया है। जो अन्यत्र था, वह साररूप से यहाँ आ गया है। तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस’ विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी के साहित्याकाशे का खुला नेत्र है, उसे ही तत्कालीन लोक की दर्शनक्षमता या आँख कह सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi वर्णनात्मक निबन्ध

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 11
Chapter Name वर्णनात्मक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi वर्णनात्मक निबन्ध

वर्णनात्मक निबन्ध

किसी रोचक यात्रा का वर्णन

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरे जीवन की अविस्मरणीय घटना
  • किसी तीर्थस्थल का वर्णन
  • कोई यात्रा संस्मरण
  • किसी रोमांचकारी यात्रा का वर्णन
  • किसी अविस्मरणीय यात्रा का वर्णन

प्रमुख विचार-विन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. यात्रा की योजना,
  3. यात्रा की पूर्व सन्ध्या,
  4.  मार्ग का वर्णन,
  5. बद्रीनाथ धाम का वर्णन,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना – ‘यात्रा’ शब्द इतना आकर्षक है कि ऐसा कौन है, जिसका हृदय इसे सुनकर उत्साह-उमंग से न भर जाए। सच बात तो यह है कि आजीविका हेतु धन अर्जन करते दैनन्दिन जीवन एक ही बँधे-बँधाये ढर्रे पर बिताते-बिताते मन इतना ऊब जाता है कि वह अपने जीवन-चक्र में बदलाव चाहता है। यात्रा इसी इच्छित परिवर्तन का सुखद अवसर प्रस्तुत करती है। साथ ही नये स्थान देखने, नये व्यक्तियों से मिलने एवं नयी भाषा . सुनने का आकर्षण भी कुछ कम प्रबल नहीं होता।

यात्रा की योजना – उत्तर में बदरिकाश्रम हिन्दुओं का अति पवित्र तीर्थस्थल है। नर और नारायण नामक महर्षियों ने यहाँ हजारों वर्षों तक तपस्या करके इस स्थान को विशेष गरिमा प्रदान की है। फिर भगवान् बादरायण (वेदव्यास) ने यहीं गुफा में बैठकर वेदान्त-सूत्रों की रचना की थी। अत: बदरिकाश्रम के दर्शनों की अभिलाषा बहुत दिनों से मन में थी, परन्तु समुद्र से बारह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान अति दुर्गम है। अभी कुछ दशक पूर्व तक यहाँ की यात्रा पैदल ही करनी पड़ती थी। पर आज खास मन्दिर के निकट तक बस या मोटर जाती है; अतः हम मित्रों ने हिम्मत करके बदरिकाश्रम-यात्रा का विचार बनाया।

यात्रा की पूर्व-सन्ध्या – हम लोग बस द्वारा ऋषिकेश पहुँचे। वहाँ मैंने अपने एक सम्बन्धी को पत्र डालकर टैक्सी तय करने का निर्देश पहले ही दे दिया था; अतः ऋषिकेश पहुँचते ही टैक्सी की व्यवस्था पक्की थी। अगले दिन प्रात: ही निकलना था; क्योंकि मालूम हुआ कि लगातार 14 घण्टे की मोटर-यात्रा के बाद ही गन्तव्य स्थल तक उसी दिन पहुँचा जा सकता है, अन्यथा मार्ग में एक दिन रुकना पड़ेगा। इसका एक कारण यह भी है : कि जोशीमठ से ‘वन वे ट्रैफिक’ (एकमार्गीय यातायात) शुरू हो जाता है। ऐसा अवरोध तीन स्थानों पर है, जिससे पर्याप्त समय लग जाता है; अतः एक ही दिन में बदरिकाश्रम पहुँचना तय रहा।

मार्ग का वर्णन – यद्यपि टैक्सी वाले ने पहले ही दिन आकर सुझाव दिया था कि प्रातः 4 बजे निकल पड़ना अच्छा रहेगा, पर हमें निकलते-निकलते छः बज गये, किन्तु नेपाली टैक्सी-ड्राइवर बहुत कुशल था, इसलिए लगातार चढ़ाई के बावजूद उसने हम लोगों को समय पर श्रीनगर पहुँचा दिया। श्रीनगर ऋषिकेश से 96 किलोमीटर दूर है। एक तो प्रातः का समय, दूसरे श्रीनगर तक दोनों ओर के पर्वतों पर पर्याप्त वनस्पति दीख पड़ती है। बीच-बीच में पर्वत से बहकर आने वाले जलस्रोत बड़ा ही मनोरम दृश्य उपस्थित करते हैं। ये जलस्रोत अक्सर मोटर-मार्ग को काटते हुए लगभग तीन हजार फीट नीचे अलकनन्दा नदी में गिरते हैं। इतनी ऊँचाई से अलकनन्दा एक छोटी नहर-जैसी दीख पड़ती है, पर पहाड़ी नदी होने के कारण उसमें दुर्धर्ष वेग है। विशाल शिलाखण्डों से टकराकर उछलता हुआ उसको जल भीषण-ध्वनि उत्पन्न करके हृदयों को भयकम्पित करता है। शीतल वायु, पर्वतीय पुष्पों की सुगन्ध एवं पक्षियों का कलरव; यात्रियों की थकान को मिटाने के साथ-साथ उनका मन मोह लेता है। इस सारे सुरम्य वातावरण के बावजूद एक ऐसी बात भी थी, जो मेरे लिए अतीव कष्टकर थी और वह यह कि टैक्सी बहुत जल्दी-जल्दी मोड़ ले रही थी। कहीं चढ़ाई तो कहीं सीधा उतार। पेट में उथल-पुथल-सी मचने लगी। जैसे-तैसे श्रीनगर पहुँचकर सभी लोगों ने चाय-नाश्ता लिया और तत्काल चल पड़े; क्योकि अभी हमारे सामने लगभग 11 घण्टे की यात्रा शेष थी। टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि यदि हम लोग जोशीमठ’ चार बजे तक नहीं पहुँच पाये तो पुलिस वहीं रोक लेगी; क्योंकि जोशीमठ से आगे का मार्ग अत्यधिक दुर्गम और चढ़ाई एकदम खड़ी है; इसलिए चार बजे तक जोशीमठ पहुँचने वाले यात्रियों को ही आगे बढ़ने की अनुमति दी जाती है।

हम लोग श्रीनगर से लगभग साढ़े दस बजे निकल सके। दुर्गम पहाड़ी मार्गों पर भी हमारा कुशल ड्राइवर टैक्सी को उड़ाता ले चला, पर गन्तव्य दूर से दूरतर होता प्रतीत हुआ। इस समय प्रचण्ड धूप सर्वत्र छा गयी थी। 30 जून सन् 2010 ई० का दिन था। भयंकर गर्मी बढ़ती ही जा रही थी, किन्तु श्रीनगर से आगे बढ़ने पर जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर चढ़ते गये। हमें गर्मी से तो राहत मिली ही, साथ ही दोनों ओर पहाड़ों की ढालों पर उगी घनी वनस्पति ने हमारा अभिनन्दन भी किया। विशाल वृक्षों की सान्द्र छाया हमारे मार्ग को शीतल, सुखद और सुरम्ये बना रही थी तथा स्थान-स्थान पर हिरनों के झुण्ड और मयूरों के दल हमारे चित्त को आकर्षित कर रहे थे। श्रीनगर से आगे पहाड़ी रास्ता बहुत जल्दी-जल्दी मोड़ ले रहा था। इससे हमारी गति बहुत बाधित हुई, पर साधुवाद है टैक्सी-ड्राइवर को, जिसने चार बजते-बजते हमें जोशीमठ पहुँचा दिया। यदि हमें पाँच मिनट का भी। विलम्ब हो जाता तो रात वहीं बितानी पड़ती।।

अस्तु, जोशीमठ से एकमार्गीय यातायात के कारण हम रुकते-रुकते जैसे-तैसे हनुमान्-चट्टी पहुंचे। यहाँ क़ी शीतले-पवन के स्पर्श से मन प्रफुल्लित हो उठा था। समय भी लगभग छ: का हो गया था। लोगों ने बताया कि यह अन्तिम बस्ती है। यहाँ पर यात्रियों ने गर्म कपड़े पहन लिये; क्योंकि आगे भीषण ठण्ड की आशंका थी। सभी लोग स्तब्ध भाव से बैठे बहुत सँकरी सड़क पर बड़ी तीव्रगति से चढ़ती-उतरती, मोड़ लेती टैक्सी को देख रहे थे, जिसको अनुभवी और कुशल चालक आत्मविश्वासपूर्वक उस झुटपुटे में भी अविराम गति से दौड़ा रहा था। बायीं ओर से पर्वतों की ढालों पर बर्फ की पतली-चौड़ी धाराएँ पिघली चाँदी का भ्रम उत्पन्न करतीं व धीरे-धीरे बहती हुई अलकनन्दा में गिर रही थीं। वायु में ठण्डक बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही थी, जिससे गर्म कपड़ों के बावजूद शरीर ठण्ड से काँप रहा था। यह चढ़ाई यात्री के धैर्य और श्रद्धा की अन्तिम परीक्षा है, जिसमें उत्तीर्ण होने पर ही भगवान् बद्रीनाथ के दिव्य-दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। ढाई घण्टे की स्तब्ध करने वाली भीषण चढ़ाई के बाद दिव्य बद्रीनाथ धाम की बिजली की बत्तियाँ चमकती हुई दिखाई दीं। हमें ऐसा प्रतीत हुआ मानो अन्धकार में भटकते प्राणी को प्रकाश दिख गया हो अथवा मृत्यु के मुख से निकलकर कोई सदेह स्वर्ग पहुँच गया हो। हम लोग लम्बी अविराम, किन्तु सुखद यात्रा के बाद गन्तव्य पर पहुँचने के सन्तोष के साथ भारी थकान का अनुभव करते हुए एक होटल के सुविधाजनक कमरे में रुके।

बद्रीनाथ धाम का वर्णन – कमरे की खिड़की को जरा खोलकर देखा तो झिलमिल आलोक में सामने भगवान् के विशाल मन्दिर को उत्तुंग-शिखर अपनी भव्यता से मण्डित दीख पड़ा। साथ ही अत्यधिक शीतल पवन का झोंको रोम-रोम को थरथरा गया, जिससे तत्काल खिड़की बन्द करनी पड़ी। अगले दिन प्रात: मन्दिर के दर्शनों को चले। इससे पूर्व हम लोगों ने गर्म जल से स्नान किया। यह गर्म जल वहाँ के स्थानीय मजदूर बद्रीनाथ-मन्दिर के निकटस्थ गर्म पानी के एक विशाल-कुण्ड से लाकर आठ रुपये पीपे की दर से दे रहे थे। बहुत-से नर-नारी उस कुण्ड में ही स्नान करके मन्दिर के दर्शन कर रहे थे। यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पास ही बहती अलकनन्दा यद्यपि बर्फ की मोटी चादर से ढकी थी, चारों ओर के हिमशिखरों पर बर्फ के अम्बार लगे थे, हवा की शीतलता से हड्डियाँ तक कॅप-कॅपा रही थीं, पर उस कुण्ड का जल इतना अधिक गर्म था कि उसे शरीर पर सहन करना भी एक समस्या थी। ऐसी मान्यता है कि इसमें स्नान करने वाले व्यक्ति के चर्मरोग दूर हो जाते हैं। बद्रीनाथ धाम में बड़ी भीड़ थी। भारत के कोने-कोने से आये यात्री भक्तिपूर्ण हृदयों से भगवान् बद्रीविशाल का स्तवन कर रहे थे। भगवान् बद्रीनाथ की प्रतिमा बड़ी दिव्य है। घण्टों के घोष, भक्तों के स्तवन, गन्ध-धूप के आमोद (सुगन्ध) एवं दीपों के आलोक से सम्पूर्ण वातावरण गहरी भक्ति-भावना में डूबा लग रहा था। मन्दिर अत्यधिक ऊँचाई पर है, जहाँ तक पत्थर का सोपानमार्ग जाता है। यहाँ एक विशेष बात यह अनुभव हुई कि चार कदम चलने पर ही पैर इतने भारी हो जाते थे, मानो पत्थर के हों। कुछ लोग थोड़ा चलते ही हाँफने लगते थे। इसका कारण बारह हजार फीट की ऊँचाई पर मिलने वाली वायु में ऑक्सीजन की कमी थी। मन्दिर के पास एक विशाल जन-समूह अपने पूर्वजनों का श्राद्ध करने में संलग्न था। शास्त्रों के अनुसार बद्रीनाथ धाम का श्राद्ध सर्वोत्तम है।

उपसंहार – उसी दिन दोपहर को हम लोग वापसी यात्रा पर चल पड़े, जिसमें कोई विशेष असुविधा न हुई। उतार के कारण टैक्सी ने भी मार्ग 11 घण्टे में पूरा कर रात्रि 10 बजे ऋषिकेश पहुँचा दिया। मन सीमा-सड़क संगठन के अभियन्ताओं के लिए प्रशंसा से भर उठा, जिन्होंने ऐसे दुर्गम स्थान पर सड़क बनाकर अपने अद्भुत कौशल का परिचय देते हुए असम्भव को सम्भव कर दिखाया है। यह यात्रा मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय घटना बन गयी है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi उपयोगितापरक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 10
Chapter Name उपयोगितापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi उपयोगितापरक निबन्ध

उपयोगितापरक निबन्ध

 मानव-जीवन में वनों की उपयोगिता

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत की वन-सम्पदा और पर्यावरण
  • वन-संरक्षण की आवश्यकता
  • वन-संरक्षण का महत्त्व
  • मनुष्य और वृक्ष : पारस्परिक सम्बन्ध
  • वन महोत्सव की उपादेयता
  • वृक्ष हमारे जीवन-साथी
  • वन-सम्पदा और स्वास्थ्य

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. वनों का प्रत्यक्ष योगदान
    (क) मनोरंजन का साधन;
    (ख) लकड़ी की प्राप्ति;
    (ग) विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति;
    (घ) प्रचुर फलों की प्राप्ति;
    (ङ) जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियां;
    (च) वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण;
    (छ) बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति;
    (ज) आध्यात्मिक लाभ,
  3.  वनों का अप्रत्यक्ष योगदान
    (क) वर्षा;
    (ख) पर्यावरण सन्तुलन (शुद्धीकरण);
    (ग) जलवायु पर नियन्त्रण;
    (घ) जल के स्तर में वृद्धि;
    (ङ) भूमि – कटाव पर रोक;
    (च) रेगिस्तान के प्रसार पर रोक;
    (छ) बाढ़ – नियन्त्रण में सहायक,
  4. भारतीय वन – सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ,
  5. वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास,
  6.  उपसंहार

प्रस्तावना – वन मानव-जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं, किन्तु सामान्य व्यक्ति इसके महत्त्व को नहीं समझ पा रहा है। जो व्यक्ति वनों में रहते हैं या जिनकी जीविका वनों पर आश्रित है, वे तो वनों के महत्त्व को समझते हैं, लेकिन जो लोग वनों में नहीं रह रहे हैं वे तो इन्हें प्राकृतिक शोभा का साधन ही मानते हैं। पर वनों का मनुष्यों के जीवन से कितना गहरा सम्बन्ध है, इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में उसका योगदान क्रमिक रूप से द्रष्टव्य है।

वनों का प्रत्यक्ष योगदान

(क) मनोरंजन का साधन – वन, मानव को सैर-सपाटे के लिए रमणीक क्षेत्र प्रस्तुत करते हैं। वृक्षों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। वृक्ष स्वयं सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। ग्रीष्मकाल में बहुत बड़ी संख्या में लोग पर्वतीय-क्षेत्रों की यात्रा करके इस प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं।

(ख) लकड़ी की प्राप्ति – वनों से हम अनेक प्रकार की बहुमूल्य लकड़ियाँ प्राप्त करते हैं। ये लकड़ियाँ हमारे अनेक प्रयोगों में आती हैं। इन्हें ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। ये लकड़ियाँ व्यापारिक दृष्टिकोण से भी बहुत उपयोगी होती हैं, जिनमें साल, सागौन, देवदार, चीड़, शीशम, चन्दन, आबनूस आदि की लकड़ियाँ मुख्य हैं। इनका प्रयोग फर्नीचर, इमारती सामान, माचिस, रेल के डिब्बे, स्लीपर, जहाज आदि बनाने के लिए किया जाता है।

(ग) विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति – वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी सहायक वस्तुओं की प्राप्ति होती है, जिनका अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। इनमें गोंद, शहद, जड़ी-बूटियाँ, कत्था, लाख, चमड़ा, बाँस, बेंत, जानवरों के सींग आदि मुख्य हैं। इनका कागज उद्योग, चमड़ा उद्योग, फर्नीचर उद्योग, दियासलाई उद्योग, टिम्बर उद्योग, औषध उद्योग आदि में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है।

(घ) प्रचुर फलों की प्राप्ति – वन प्रचुर मात्रा में फलों को प्रस्तुत करके मानव का पोषण करते हैं। ये फल अनेक बहुमूल्य खनिज लवणों व विटामिनों का स्रोत हैं।

(ङ) जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ – वन अनेक जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियों के भण्डार हैं। वनों में ऐसी अनेक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, जिनसे अनेक असाध्य रोगों का निदान सम्भव हो सका है। विजयसार की लकड़ी मधुमेह की अचूक औषध है। लगभग सभी आयुर्वेदिक ओषधियाँ वृक्षों से ही विविध तत्त्वों को एकत्र कर बनायी जाती हैं।

(च) वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण – वन्य पशु-पक्षियों की सौन्दर्य की दृष्टि से अपनी उपयोगिता है। वन अनेक वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। वे हिरन, नीलगाय, गीदड़, रीछ, शेर, चीता, हाथी आदि वन्य पशुओं की क्रीड़ास्थली हैं। ये पशु वनों में स्वतन्त्र विचरण करते हैं, भोजन प्राप्त करते हैं और संरक्षण पाते हैं। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ आदि पालतू पशुओं के लिए भी वन विशाल चरागाह प्रदान करते हैं।

(छ) बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति – वनों से हमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। हाथी दाँत, मृग-कस्तूरी, मृग-छाल, शेर की खाल, गैंडे के सींग आदि बहुमूल्य वस्तुएँ वनों की ही देन हैं। वनों से प्राप्त कुछ वनस्पतियों से तो सोना और चाँदी भी निकाले जाते हैं। तेलियाकन्द’ नामक वनस्पति से प्रचुर मात्रा में स्वर्ण प्राप्त होता है।

(ज) आध्यात्मिक लाभ – भौतिक जीवन के अतिरिक्त मानसिक एवं आध्यात्मिक पक्ष में भी वनों का महत्त्व कुछ कम नहीं है। सांसारिक जीवन से क्लान्त मनुष्य यदि वनों में कुछ समय निवास करते हैं तो उन्हें सन्तोष तथा मानसिक शान्ति प्राप्त होती है। इसीलिए हमारी प्राचीन संस्कृति में ऋषि-मुनि वनों में ही निवास करते थे। इस प्रकार हमें वनों का प्रत्यक्ष योगदान देखने को मिलता है, जिनसे सरकार को राजस्व और वनों के ठेकों के रूप में करोड़ों रुपये की आय होती है। साथ ही सरकार चन्दन के तेल, उसकी लकड़ी से बनी कलात्मक वस्तुओं, हाथी दाँत की बनी वस्तुओं, फर्नीचर, लाख, तारपीन के तेल आदि के निर्यात से प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करती है।

वनों का अप्रत्यक्ष योगदान

(क) वर्षा – भारत एक कृषिप्रधान देश है। सिंचाई के अपर्याप्त साधनों के कारण यह अधिकांशतः मानसून पर निर्भर रहता है। कृषि की मानसून पर निर्भरता की दृष्टि से वनों का बहुत महत्त्व है। वन वर्षा में सहायता करते हैं। इन्हें वर्षा का संचालक कहा जाता है। इस प्रकार वनों से वर्षा होती है और वर्षा से वन बढ़ते हैं।

(ख) पर्यावरण सन्तुलन (शुद्धीकरण) – वन-वृक्ष वातावरण से दूषित-वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) ग्रहण करके अपना भोजन बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने में सहायक होते हैं। इस प्रकार वन पर्यावरण में सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं।

(ग) जलवायु पर नियन्त्रण – वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियन्त्रित होता है, जिससे जलवायु में सन्तुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषण उष्णता को सामान्य बनाये रखते हैं। ये आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं। ये सारे देश की जलवायु को प्रभावित करते हैं तथा गर्म व तेज हवाओं को रोककर देश की जलवायु को समशीतोष्ण बनाये रखते हैं।

(घ) जल के स्तर में वृद्धि – वने वृक्षों की जड़ों के द्वारा वर्षा के जल को सोखकर भूमि के नीचे के जल-स्तर को बढ़ाते रहते हैं। इससे दूर-दूर तक के क्षेत्र हरे-भरे रहते हैं। साथ ही कुओं आदि में जल का स्तर घटने नहीं पाता है। पहाड़ों पर बहते चश्मे वनों की पर्याप्तता के ही परिणाम हैं। वनों से नदियों के सतत प्रवाहित होते रहने में भी सहायता मिलती है।

(ङ) भूमि-कटाव पर रोक – वनों के कारण वर्षा का जल मन्द गति से प्रवाहित होता है; अत: भूमि का कटाव कम होता है। वर्षा के अतिरिक्त जल को वन सोख लेते हैं और नदियों के प्रवाह को नियन्त्रित करके भूमि के कटाव को रोकते हैं, जिसके फलस्वरूप भूमि ऊबड़-खाबड़ नहीं हो पाती तथा मिट्टी की उर्वरा-शक्ति भी बनी रहती है।

(च) रेगिस्तान के प्रसार पर रोक – वन तेज आँधियों को रोकते हैं तथा वर्षा को आकर्षित भी करते हैं, जिससे मिट्टी के कण उनकी जड़ों में बँध जाते हैं। इससे रेगिस्तान का प्रसार नहीं होने पाता।

(छ) बाढ़-नियन्त्रण में सहायक – वृक्ष की जड़े वर्षा के अतिरिक्त जल को सोख लेती हैं, जिनके कारण नदियों का जल-प्रवाह नियन्त्रित रहता है। इससे बाढ़ की स्थिति में बचाव हो जाता है।

वनों को हरा सोना इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इन जैसा मूल्यवान, हितैषी व शोभाकारक मनुष्य के लिए कोई और नहीं। आज भी सन्तप्त मनुष्य वृक्ष के नीचे पहुँचकर राहत का अनुभव करता है। सात्विक भावनाओं के ये सन्देशवाहक प्रकृति का सर्वाधिक प्रेमपूर्ण उपहार हैं। स्वार्थी मनुष्य ने इनसे निरन्तरे दुर्व्यवहार किया है, जिसको प्रतिफल है- भयंकर उष्णता, श्वास सम्बन्धी रोग, हिंसात्मक वृत्तियों का विस्फोट आदि।

भारतीय वन-सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ – वनों के योगदान से स्पष्ट है कि वन हमारे जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से बहुत उपयोगी हैं। वनों में अपार सम्पदा पायी जाती है, किन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वनों को मनुष्य के प्रयोग के लिए काटा जाने लगा। अनेक अद्भुत और घने वन आज समाप्त हो गये हैं और हमारी वन-सम्पदा का एक बहुत बड़ा भाग नष्ट हो गया है। वन-सम्पदा के इस संकट ने व्यक्ति और सरकार को वन संरक्षण की ओर सोचने पर विवश कर दिया है। यह निश्चित है कि वनों के संरक्षण के बिना मानव-जीवन दूभर हो जाएगा। आज हमारे देश में वनों का क्षेत्रफल केवल 22.7 प्रतिशत ही रह गया है, जो कम-से-कम एक-तिहाई होना चाहिए था। वनों के असमान वितरण, वनों के पर्याप्त दोहन, नगरीकरण से वनों की समाप्ति, ईंधन व इमारती सामान के लिए वनों की अन्धाधुन्ध कटाई ने भारतीय वन-सम्पदा के लिए अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास – सरकार ने वनों के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए समय-समय पर वनों के संरक्षण और विकास के लिए अनेक कदम उठाये हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण अग्रवत् है

  1. सन् 1956 ई० में वन महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य नारा था-‘अधिक वृक्ष लगाओ।’ तभी से यह उत्सव प्रति वर्ष 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाता है।
  2. सन् 1965 ई० में सरकार ने केन्द्रीय वन आयोग की स्थापना की, जो वनों से सम्बन्धित आँकड़े और सूचनाएँ एकत्रित करके वनों के विकास में लगी हुई संस्थाओं के कार्य में ताल-मेल बैठाता है।
  3.  वनों के विकास के लिए देहरादून में ‘वन अनुसन्धान संस्थान (Forest Research Institute) की स्थापना की गयी, जिसमें वनों के सम्बन्ध में अनुसन्धान किये जाते हैं और वन अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता है।
  4. विभिन्न राज्यों में वन निगमों की रचना की गयी है, जिससे वनों की अनियन्त्रित कटाई को रोका जा सके। व्यक्तिगत स्तर पर भी अनेक आन्दोलनों का संचालन करके समाज-सेवियों द्वारा समय-समय पर सरकार को वनों के संरक्षण और विकास के लिए सचेत किया जाता रहा है। इनमें चिपको आन्दोलन प्रमुख रहा है, जिसका श्री सुन्दरलाल बहुगुणा ने सफल नेतृत्व किया।

उपसंहार – नि:सन्देह वन हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं। इसलिए वनों का संरक्षण और संवर्द्धन बहुत आवश्यक है। इसके लिए जनता और सरकार का सहयोग अपेक्षित है। बड़े खेद का विषय है कि एक ओर तो सरकार वनों के संवर्द्धन के लिए विभिन्न आयोगों और निगमों की स्थापना कर रही है तो दूसरी ओर वह कुछ स्वार्थी तत्त्वों के हाथों में खेलकर केवल धन के लाभ की आशा से अमूल्य वनों को नष्ट भी कराती जा रही है। आज मध्य प्रदेश में केवल 18% वन रह गये हैं, जो कि पहले एक-तिहाई हुआ करते थे। इसलिए आवश्यकता है कि सरकार वन-संरक्षण नियमों को कड़ाई से पालन कराकर भावी प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा करे। इसके लिए सरकार के साथ-साथ सामान्य जनता का सहयोग भी अपेक्षित है। इसके लिए यदि प्रत्येक व्यक्ति वर्ष में एक बार एक वृक्ष लगाने और उसका भली प्रकार संरक्षण करने का संकल्प लेकर उसे क्रियान्वित भी करे तो यह राष्ट्र के लिए आगे आने वाले कुछ एक वर्षों में अमूल्य योगदान हो सकता है।

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