UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो
Number of Questions 120
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

[ ध्यान दें: नीचे दिये गये बहुविकल्पीय प्रश्नों के विकल्पों में सामान्य से अधिक काले छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।]
उचित विकल्प का चयन करें-

(1) ‘झरना’ काव्य-ग्रन्थ के रचयिता हैं [2010, 13]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त
(ग) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(घ) महादेवी वर्मा

(2) ‘श्रीकृष्णगीतावली’, ‘विनयपत्रिका’ और ‘कवितावली’ के रचयिता हैं- [2015]
(क) तुलसीदास
(ख) सूरदास
(ग) भूषण
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(3) ‘द्वापर’ के रचयिता हैं-
(क) महादेवी वर्मा
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(4) कौन-सी रचना भूषण की नहीं है ? [2013]
(क) शिवी बावनी
(ख) छत्रसाल दशक
(ग) शिवराज भूषण
(घ) रामचन्द्रिका

(5) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है-
(क) युगाधार
(ख) युगान्त
(ग) लोकायतन
(घ) वीणा

(6) अज्ञेय की रचना नहीं है–
(क) हरी घास पर क्षण भर
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) आँगन के पार-द्वार
(घ) दूध-बताशी

(7) कौन-सी रचना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की नहीं है ?
(क) प्रेम-फुलवारी
(ख) प्रेम-प्रलाप
(ग) प्रिय-प्रवास
(घ) प्रेम-सरोवर

(8) कौन-सी रचना महादेवी वर्मा की नहीं है ?
(क) सान्ध्यगीत
(ख) यामा
(ग) उर्वशी
(घ) नीरजा

(9) कौन-सी रचना सूरदास की नहीं है ?
(क) सूरसागर
(ख) सबद
(ग) सूरसारावली
(घ) साहित्य-लहरी

(10) कौन-सी रचना मैथिलीशरण गुप्त की नहीं है ?
(क) यशोधरा
(ख) पंचवटी
(ग) रसकलश
(घ) भारत-भारती

(11) धर्मवीर भारती ने लिखा है–
(क) अणिमा
(ख) अपरा
(ग) अन्धा-युग
(घ) अर्चना

(12) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है–
(क) परिमल
(ख) पल्लव
(ग) रश्मिबन्ध
(घ) स्वर्णधूलि

(13) ‘बहुत रात गये’ किस कवि का संकलन है ?
(क) नरेन्द्र शर्मा
(ख) भवानी प्रसाद मिश्र
(ग) गजानन माधव मुक्तिबोध’
(घ) गिरिजाकुमार माथुर

(14) ‘साहित्य-लहरी’ के रचनाकार हैं [2011]
(क) तुलसीदास
(ख) कबीरदास
(ग) सूरदास
(घ) मीरा

(15) कला और बूढ़ा चाँद’ के रचनाकार हैं-
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(16) ‘रस-विलास’ के रचनाकार हैं
(क) बिहारी
(ख) पद्माकर
(ग) आचार्य चिन्तामणि
(घ) सेनापति

(17) ‘पार्वतीमंगल’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) सूर
(ख) भूषण
(ग) तुलसी
(घ) रत्नाकर

(18) भूषण की रचना है
(क) रामचन्द्रिका
(ख) शिवा शौर्य
(ग) गीतावली
(घ) प्रेम सरोवर

(19) ‘कुरुक्षेत्र’ के रचयिता हैं
(क) अज्ञेय
(ख) प्रसाद
(ग) दिनकर
(घ) रत्नाकर

(20) मैथिलीशरण गुप्त की रचना है-
(क) सिद्धराज
(ख) नीरजा
(ग) उर्वशी
(घ) पारिजात

(21) ‘आँगन के पार द्वार’ के रचयिता हैं [2018]
(क) प्रसाद
(ख) रत्नाकर
(ग) अज्ञेय
(घ) दिनकर

(22) ‘अज्ञेय’ को ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ [2016]
(क) कितनी नावों में कितनी बार’ पर
(ख) ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ पर
(ग) ‘आँगन के पार द्वार पर।
(घ) ऐसा कोई घर आपने देखा है पर

(23) सुमित्रानन्दन पन्त को ज्ञानपीठ पुरस्कार उनकी रचना पर मिला था- [2015, 18]
(क) लोकायतन
(ख) युगान्त
(ग) कला और बूढ़ा चाँद
(घ) चिदम्बरा

(24) ‘भारत-भारती’ के कवि हैं [2012, 14]
(क) रामधारीसिंह ‘दिनकर’
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) महादेवी वर्मा

(25) महाकवि भूषण की वीर रस प्रधान रचना है [2011]
(क) चिदम्बरा
(ख) दीपशिखा
(ग) शिवा बावनी
(घ) कीर्तिलता

(26) ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता हैं [2012, 14]
(क) तुलसीदास
(ख) केशवदास
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) जयशंकर प्रसाद

(27) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना है– [2010]
(क) दोहावली
(ख) झरना
(ग) जूही की कली
(घ) पल्लव

(28) ‘उद्धवशतक’ के कवि का नाम है– [2011]
(क) सूरदास
(ख) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ग) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(29) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचना है [2012]
(क) उर्वशी
(ख) गुंजन
(ग) आँगन के पार द्वार
(घ) झरना

(30) ‘ग्राम्या’ के रचयिता हैं
(क) स० ही० वा० अज्ञेय
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(31) महादेवी वर्मा की रचना है [2010]
(क) रसवन्ती
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) भस्मांकुर
(घ) यामा

(32) ‘यामा’ रचना है [2010, 16]
(क) “अज्ञेय’ की
(ख) ‘दिनकर’ की
(ग) महादेवी वर्मा की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(33) ‘श्रावकाचार’ के रचयिता हैं
(क) देवसेन
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) विजयसेनसूरि
(घ) जिनधर्मसूरि

(34) निम्नलिखित में कौन-सी अज्ञेय की रचना नहीं है ?
(क) पूर्वा,
(ख) बावरा अहेरी
(ग) शैवाल
(घ) पल्लव

(35) ‘तुलसीदास’ के रचयिता हैं-
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) गोस्वामी तुलसीदास
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’

(36) ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ के कवि का नाम है–
(क) दलपत विजय
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) देवसेन
(घ) कुक्कुरिया

(37) ‘भक्तमाल’ के रचयिता हैं
(क) कुम्भनदास
(ख) नाभादास
(ग) नन्ददास
(घ) सुन्दरदास

(38) ‘कितनी नावों में कितनी बार’ रचना के कवि हैं [2015]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) स० ही० वा० ‘अज्ञेय’
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) धर्मवीर भारती

(39) निम्नलिखित में कौन-सा कवि राष्ट्रीय काव्यधारा का नहीं है ?
(क) दिनकर
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) अज्ञेय

(40) जयशंकर प्रसाद की रचना है-
(क) युगवाणी
(ख) अनामिका
(ग) लहर
(घ) साकेत

(41) निम्नलिखित में कौन प्रगतिवादी कवि नहीं हैं ?
(क) नागार्जुन
(ख) त्रिलोचन
(ग) केदारनाथ अग्रवाल
(घ) नेमिचन्द जैन

(42) ‘जयन्द्र प्रकाश’ किसकी रचना है ?
(क) दरबरदायी
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) भट्ट केदार
(घ) विद्यापति

(43) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ रीतिकाल का है ?
(क) साकेत
(ख) उद्धवशतक
(ग) रामचरितमानस
(घ) बिहारी सतसई

(44) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ भक्तिकाल का है ?
(क) पृथ्वीराज रासो
(ख) साकेत
(ग) कामायनी
(घ) विनयपत्रिका

(45) ‘आँसू’ की रचना किस कवि ने की ? (2010, 16)
(क) बिहारी
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) अज्ञेय

(46) निम्नलिखित में से रीतिकालीन कवि कौन-सा है ? [2016]
(क) मीराबाई
(ख) रसखान
(ग) घनानन्द
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(47) प्रयोगवाद के प्रवर्तक हैं [2012, 14]
(क) निराला
(ख) अज्ञेय
(ग) जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(48) निम्नलिखित में से कौन-सी भूषण की रचना नहीं है ? [2009]
(क) शिवा-बावनी
(ख) छत्रशाल दशक
(ग) शिवराज भूषण
(घ) रामचन्द्रिका

(49) निम्नलिखित में से किस कवि को राष्ट्र कवि को सम्मान प्राप्त हुआ ? [2009]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(50) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि रामभक्ति शाखा से सम्बन्धित नहीं है? [2009]
(क) तुलसीदास
(ख) नन्ददास
(ग) अग्रदास
(घ) नाभादास

(51) सही ( सुमेलित ) कीजिए [2010]
(क) भारत-भारती – महाकाव्य
(ख) प्रणभंग – चरितकाव्य
(ग) गीतिका – वीर काव्य
(घ) रश्मिरथी – खण्डकाव्य

(52) कबीर के दोहों को नाम से जाना जाता है [2012]
(क) दूहा
(ख) सबद
(ग) साखी
(घ) पद

(53) नवधा भक्ति के प्रकार हैं [2012]
(क) एक
(ख) तीन
(ग) आठ
(घ) नौ

(54) ‘साकेत’ की नायिका है [2012]
(क) यशोधरा
(ख) उर्मिला
(ग) राधा
(घ) द्रौपदी

(55) ‘दिनकर’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है
(क) ‘कुरुक्षेत्र’ पर
(ख) रश्मिरथी’ पर
(ग) ‘उर्वशी’ पर
(घ) ‘हुंकार’ पर

(56) ‘कामायनी’ में श्रद्धा सर्ग’ किस सर्ग के बाद है? [2012]
(क) आशा सर्ग
(ख) चिन्ता सर्ग
(ग) काम सर्ग
(घ) लज्जा सर्ग

(57) ‘संसद से सड़क तक’ किस कवि की रचना है ? [2012, 15]
(क) “मुक्तिबोध’
(ख) ‘नागार्जुन’
(ग) ‘धूमिल’
(घ) “अज्ञेय’

(58) निम्नलिखित में से किस काव्य-कृति पर ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला है ? [2012]
(क) चिदम्बरा
(ख) कितनी नावों में कितनी बार
(ग) उर्वशी
(घ) प्रियप्रवास

(59) ‘दोहाकोश’ के रचनाकार हैं [2014]
(क) शबरपा
(ख) लुइपा
(ग) सरहपा
(घ) कण्हपा

(60) रामधारीसिंह ‘दिनकर’ की रचना नहीं है [2016]
(क) रश्मिरथी
(ख) चक्रवाल
(ग) परशुराम की प्रतीक्षा
(घ) सुनहले शैवाल

(61) तुलसीदास की रचना नहीं है [2014]
(क) रामलला नहछु
(ख) पार्वती मंगल
(ग) कवितावली
(घ) रामचन्द्रिका

(62) ‘खालिक बारी’ के रचयिता हैं (2015, 16)
(क) कुशलनाथ
(ख) भट्ट केदार
(ग) मलिक मुहम्मद जायसी
(घ) अमीर खुसरो

(63) ‘नौका-विहार’ कविता अवतरित है [2015]
(क) ‘गुंजन’ से
(ख) वीणा’ से
(ग) “पल्लव’ से
(घ) युगान्त’ से

(64) ‘क्या भूलें क्या याद करू’ रचना की विधा है [2015]
(क) जीवनी
(ख) यात्रा वृत्तान्त
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण

(65) चन्दबरदाई की रचना है [2015]
(क) पृथ्वीराजरासो
(ख) खुमाणरासो
(ग) राउल वेल
(घ) जय मंयक जस चन्द्रिका

(66) अष्टछाप के कवि नहीं हैं [2015]
(क) सूरदास
(ख) कुम्भनदास
(ग) तुलसीदास
(घ) कृष्णदास

(67) रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि नहीं हैं [2015]
(क) जसवंत सिंह
(ख) याकूब खाँ
(ग) दलपति राय वंशीधर
(घ) घनानन्द

(68) ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष हैं [2015, 16]
(क) 1943 ई०
(ख) 1951 ई०
(ग) 1959 ई०
(घ) 1976 ई०

(69) ‘विद्यापति’ कवि हैं [2015]
(क) भक्तिकाल के
(ख) रीतिकाल के
(ग) आदिकाल के
(घ) आधुनिक काल के

(70) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की रचना है [2015]
(क) साकेत
(ख) पल्लव
(ग) प्रियप्रवास
(घ) गीत

(71) छायावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं [2015]
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(72) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्रदान किया गया (2015)
(क) कुरुक्षेत्र पर
(ख) उर्वशी पर
(ग) रेणुका पर
(घ) हुँकार पर

(73) हिन्दी प्रदीप के सम्पादक हैं [2016]
(क) प्रताप नारायण मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(74) ‘रामभक्ति शाखा’ के कवि नहीं हैं [2016]
(क) तुलसीदास
(ख) अग्र दास
(ग) नन्ददास
(घ) नाभादास

(75) बिहारी सतसई’ में दोहों की संख्या है– [2016]
(क) 719
(ख) 713
(ग) 719
(घ) 724

(76) ‘गंगावतरण’ काव्यकृति के रचयिता हैं [2016]
(क) अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’
(ख) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(77) कबीर के गुरु का नाम था [2016]
(क) वल्लभाचार्य
(ख) नरहरिदास
(ग) रामानन्द
(घ) रामकृष्ण परमहंस

(78) ‘सूरसागर’ के वय॑विषय का आधार है [2016]
(क) श्रीमद्भागवत
(ख) विष्णुपुराण
(ग) केनोपनिषद्
(घ) मनुस्मृति

(79) विद्यापति के पदों में कहीं-कहीं पुट है [2016]
(क) श्रृंगार का
(ख) भक्ति का
(ग) नीति का
(घ) प्रशास्त का

(80) ‘हरिवंशपुराण’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) देवसेन
(ख) विमलदेव सूरि
(ग) पुष्पदन्त
(घ) स्वयंभू

(81) वीरगाथाकाल की विशेषता है [2017]
(क) नारी का रूप-सौन्दर्य चित्रण
(ख) प्रकृति-चित्रण
(ग) युद्धों का सजीव चित्रण
(घ) मुक्तक काव्य-रचना

(82) अज्ञेय जी को निम्नलिखित में से किस वाद का प्रतीक माना जाता है?
(क) छायावाद
(ख) प्रगतिवाद
(ग) हालावाद
(घ) प्रयोगवाद

(83) निम्नलिखित में से रीतिबद्ध धारा के कवि कौन नहीं हैं? [2017]
(क) चिन्तामणि
(ख) मतिराम
(ग) द्विजदेव
(घ) पद्माकर

(84) हिन्दी साहित्य के आदिकाल के लिए ‘सिद्ध सापन्तकाल’ नाम दिया है [2017]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ग) रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(85) हिन्दी साहित्य के किस काल को स्वर्ण युग कहा जाता है? [2017]
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(86) ‘पारिजात’ किस कवि के गीतों का संकलन है? [2017]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(87) ‘अज्ञेय’ द्वारा सम्पादित सप्तकों की संख्या है [2017]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार

(88) किस कवि को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ नहीं मिला? [2017]
(क) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त को
(ग) जयशंकर प्रसाद को
(घ) महादेवी वर्मा को

(89) ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना हुई थी [2017]
(क) सन् 1935 में
(ख) सन् 1936 में
(ग) सन् 1938 में
(घ) सन् 1943 में

(90) मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कृति है [2017]
(क) प्रदक्षिणा’
(ख) “दानलीला’
(ग) “रसकलश’
(घ) “अतिमा

(91) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है [2017]
(क) पल्लव
(ख) स्वर्णधूलि
(ग) ग्रंथि
(घ) रसवन्ती

(92) अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ की रचना है– [2017]
(क) रसकलश
(ख) युगान्तर
(ग) ग्राम्य
(घ) हुंकार

(93) ‘प्रसाद’ की निम्न कृतियों में से एक कृति के नायक मनु हैं। वह कृति है
(क) प्रेम पथिक
(ख) झरना
(ग) कामायनी
(घ) कानन-कुसुम

(94) निम्न में से कौन मैथिलीशरण गुप्त की एक अनूदित रचना है [2017]
(क) मेघनाद वध
(ख) यशोधरा
(ग) प्रदक्षिणा
(घ) सिद्धराज

(95) कवि ‘हरिऔध’ का रस है [2017]
(क) करुण
(ख) श्रृंगार
(ग) भक्ति
(घ) वीर

(96) चित्राधार’ काव्य की भाषा है
(क) अवधी
(ख) ब्रज
(ग) कन्नौजी भोजपुरी
(घ) भोजपुरी

(97) कवि पन्त समाजवाद की ओर उन्मुख हुए [2017]
(क) ग्राम्या में
(ख) स्वर्णधूलि में
(ग) चिदम्बरा में
(घ) ग्रन्थि में

(98) ‘दिनकर’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। [2017]
(क) वर्ष 1970 में
(ख) वर्ष 1971 में
(ग) वर्ष 1972 में
(घ) वर्ष 1974 में

(99) निम्नलिखित में कौन प्रेमश्रयी शाखा के कवि नहीं हैं? [2017]
(क) जायसी
(ख) सूरदास
(ग) मंझन
(घ) कुतुबन

(100) कौन-सी रचना ‘अज्ञेय’ की नहीं है? [2017]
(क) बावरा अटेरी
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) इत्यलप्
(घ) रेणूका

(101) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ग्रन्थ है [2017]
(क) हुँकार
(ख) धूप के धान
(ग) कालजयी
(घ) चित्राधार

(102) ‘कामायनी’ में सर्गों की संख्या है [2017]
(क) बारह
(ख) चौदह
(ग) पन्द्रह
(घ) सत्रह

(103) जयशंकर प्रसादकृत ‘कामायनी’ किस प्रकार का काव्य है? [2018]
(क) खण्डकाव्य
(ख) महाकाव्य
(ग) मुक्तक काव्य
(घ) इनमें से कोई नहीं

(104) पन्त जी की किस रचना पर ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है? [2018]
(क) लोकायतन
(ख) पल्लव
(ग) चिदम्बरा
(घ) वीणा

(105) ‘आँगन के पार-द्वार’ रचना है [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद की
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) अज्ञेय की
(घ) सुमित्रानन्दन पंत की

(106) हिन्दी साहित्य के आदिकाल के लिए चारण काल नाम दिया है [2018]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ग) रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(107) ‘लहर’ के रचनाकार है [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) गिरिजा कुमार माथुर
(ग) हरिवंशराय बच्चन
(घ) सुमित्रानन्दन पंत

(108) निम्नलिखित में नई कविता’ के कवि हैं [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ग) जगन्नाथदास रत्नाकार
(घ) सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(109) हिन्दी साहित्य के किस काल को ‘पूर्व-मध्य काल कहा जाता है?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(110) ‘कामायनी’ रचना है (2018)
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” की।
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) जयशंकर प्रसाद की
(घ) मोहन अवस्थी की

(111) हिन्दी साहित्य के ‘आदिकाल’ के लिए बीज वपन’ नाम दिया है (2018)
(क) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ख) रामकुमार वर्मा ने
(ग) आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(112) कितनी नावों में कितनी बार’ काव्यकृति है (2018)
(क) सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की
(ख) हरिवंशराय बच्चन’ की
(ग) गिरिजा कुमार माथुर की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(113) कविता में चार चाँद लगाने वाली शक्ति है
(क) अभिधा
(ख) लक्षणा
(ग) व्यंजना
(घ) तात्पर्या

(114) ‘खुमान रासो’ के रचयिता हैं
(क) नरपति नाल्ह
(ख) दलपति विजय
(ग) चन्दबरदाई
(घ) जगनिक

(115) ‘रसिकप्रिया’ रचना है-
(क) मतिराम की
(ख) केशवदास की
(ग) नरपति नाल्ह की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(116) अग्रदास किस काव्यधारा के कवि हैं?
(क) कृष्ण काव्यधारा के
(ख) सूफी काव्यधारा के
(ग) वीर काव्यधारा के
(घ) राम काव्यधारा के

(117) पपीहों की वह पीन पुकार’ किसकी पंक्ति है?
(क) भारतेन्दु की
(ख) जयशंकर प्रसाद की
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त की
(घ) महादेवी की

(118) ‘प्रिय प्रवास’ काव्यकृति का मुख्य रस है
(क) संयोग श्रृंगार
(ख) करुण
(ग) वियोग श्रृंगार
(घ) शान्त

(119) ‘धर्म के प्रति अनास्था’ तथा ‘शोषक-वर्ग के प्रति घृणा’ प्रमुख विशेषता है
(क) “छायावाद’ की
(ख)’प्रगतिवाद’ की
(ग) ‘प्रयोगवाद’ की
(घ) “नयी कविता’ की

(120) ‘महाभारत’ के ‘शान्तिपर्व’ के कथानक पर आधारित ‘दिनकर’ की काव्यकृति है-
(क) रेणुका
(ख) ‘कुरुक्षेत्र
(ग) “सामधेनी
(घ) “हारे को हरिनाम

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल)

प्रश्न 1:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) को संक्षेप में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ काव्यग्रन्थ की प्रमुख घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के पंचम सर्ग की कथा अपनी भाषा में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के अन्तिम सर्ग की कथावस्तु की आलोचना कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में उल्लिखित दिवाकर मित्र की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में वर्णित किसी प्रेरणाप्रद घटना का सोदाहरण उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल द्वारा रचित ‘त्यागपथी ऐतिहासिक खण्डकाव्य की कथा पाँच सर्गों में विभाजित है। इसमें छठी शताब्दी के प्रसिद्ध सम्राट हर्षवर्धन के त्याग, तप और सात्विकता का वर्णन किया गया है। सम्राट हर्ष की वीरता का वर्णन करते हुए कवि ने इस खण्डकाव्य में राजनीतिक एकता और विदेशी आक्रान्ताओं के भारत से भागने का भी वर्णन किया है। इस खण्डकाव्य का सर्गानुसार कथानक अग्रवत् है

प्रथम सर्ग

थानेश्वर के राजकुमार हर्षवर्द्धन वन में आखेट हेतु गये थे। वहीं उन्हें अपने पिता प्रभाकरवर्द्धन के विषम ज्वर-प्रदाह का समाचार मिलता है। कुमार तुरन्त लौट आते हैं। वे पिता के रोग का बहुत उपचार करवाते हैं, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। हर्षवर्द्धन के बड़े भाई राज्यवर्द्धन उत्तरापथ पर हूणों से युद्ध करने में लगे थे। हर्षवर्द्धन ने दूत के साथ अपने अग्रज को पिता की अस्वस्थता का समाचार पहुँचाया। इधर हर्षवर्द्धन की माता अपने पति की दशा बिगड़ती देख आत्मदाह के लिए तैयार हो जाती हैं। हर्ष ने उन्हें बहुत समझाया, पर वे नहीं मानीं और हर्ष के पिता की मृत्यु से पूर्व ही वे आत्मदाह कर लेती हैं। कुछ समय पश्चात् राजा प्रभाकरवर्द्धन की भी मृत्यु हो जाती है। पिता को अन्तिम संस्कार कर हर्षवर्द्धन शोकाकुल मन से राजमहल में लौट आते हैं। उन्हें इस बात की बड़ी चिन्ता है कि पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर अनुजा (बहन) राज्यश्री तथा अग्रज (भाई) राज्यवर्द्धन की क्या दशा होगी ?

द्वितीय सर्ग

राज्यवर्द्धन हूणों को परास्त कर सेनासहित अपने नगर सकुशल लौट आते हैं। शोकविह्वल हर्षवर्द्धन की दशा देख वे बिलख-बिलखकर रोते हैं। माता-पिता की मृत्यु से शोकाकुल राज्यवर्द्धन वैराग्य लेने का निश्चय कर लेते हैं, किन्तु तभी उन्हें समाचार मिलता है कि मालवराज ने उनकी छोटी बहन राज्यश्री के पति गृहवर्मन को मार डाला है तथा राज्यश्री को कारागार में डाल दिया है। राज्यवर्द्धन वैराग्य को भूल मालवराज का विनाश करने चल देते हैं। राज्यवर्द्धन गौड़ नरेश को पराजित कर देते हैं, परन्तु गौड़ नरेश छलपूर्वक उनकी हत्या करवा देता है। हर्षवर्द्धन को जब यह समाचार मिलता है तो वे विशाल सेना लेकर मालवराज से युद्ध करने के लिए चल पड़ते हैं। मार्ग में हर्षवर्द्धन को समाचार मिलता है कि उनकी छोटी बहन राज्यश्री बन्धनमुक्त होकर; विन्ध्याचल की ओर वन में चली गयी है। यह समाचार पाकर हर्षवर्द्धन बहन को खोजने वन की ओर चल देते हैं। वन में दिवाकर मित्र के आश्रम में उन्हें एक भिक्षुक से यह समाचार मिलता है कि राज्यश्री आत्मदाह करने वाली है। वे शीघ्र ही पहुँचकर राज्यश्री को आत्मदाह करने से बचा लेते हैं। वे दिवाकर मित्र और राज्यश्री को अपने साथ ले कन्नौज लौट आते हैं।

तृतीय सर्ग

हर्षवर्द्धन अपनी बहन के छीने हुए राज्य को पुन: प्राप्त करने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ कन्नौज पर आक्रमण कर देते हैं। वहाँ अनीतिपूर्वक अधिकार जमाने वाला मालव-कुलपुत्र भाग जाता है। राज्यवर्द्धन का हत्यारा गौड़पति-शशांक भी अपने गौड़-प्रदेश को भाग जाता है। सभी लोग हर्षवर्द्धन से कन्नौज का राजा बनने की प्रार्थना करते हैं, परन्तु हर्ष अपनी बहन का राज्य लेने से मना कर देते हैं। वे अपनी बहन से सिंहासन पर बैठने को कहते हैं, परन्तु बहन भी राज-सिंहासन ग्रहण करने से मना कर देती है। फिर हर्षवर्द्धन ही कन्नौज के संरक्षक बनकर अपनी बहन के नाम से वहाँ का शासन चलाते हैं।

इसके बाद छह वर्षों तक हर्षवर्द्धन का दिग्विजय-अभियान चलता है। उन्होंने कश्मीर, पञ्चनद, सारस्वत, मिथिला, उत्कल, गौड़, नेपाल, वल्लभी, सोरठ आदि सभी राज्यों को जीतकर तथा यवन, हूण और अन्य विदेशी शत्रुओं का नाश करके देश को अखण्ड और शक्तिशाली बनाकर एक सुसंगठित राज्य बनाया। अपनी बहन के स्नेहवश वे अपनी राजधानी भी कन्नौज को ही बनाते हैं और अनेक वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी तथा धर्म, संस्कृति और कला की भी पर्याप्त उन्नति हो रही थी।

चतुर्थ सर्ग

राज्यश्री एक बड़े राज्य की शासिका होकर भी दुःखी है। वह सब कुछ छोड़कर गेरुए वस्त्र धारण कर भिक्षुणी बनना चाहती है। वह हर्षवर्द्धन से संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा माँगने जाती है तो हर्षवर्द्धन उसे समझाते हैं कि तुम तो मन से संन्यासिनी ही हो। यदि तुम गेरुए वस्त्र ही धारण करना चाहती हो तो अपने वचनानुसार मैं भी तुम्हारे साथ ही संन्यास ले लूंगा। तभी दिवाकर मित्र आकर उन्हें समझाते हैं कि वास्तव में आप दोनों भाई-बहन का मन संन्यासी है, किन्तु आज देश की रक्षा एवं सेवा संन्यास-ग्रहण करने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। दिवाकर मित्र के समझाने पर दोनों संन्यास का विचार त्याग देशसेवा में लग जाते हैं।

पंचम सर्ग

हर्षवर्द्धन एक आदर्श सम्राट के रूप में शासन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा सब प्रकार से सुखी है, विद्वानों की पूजा की जाती है। सभी प्रजाजन आचरणवान्, धर्मपालक, स्वतन्त्र तथा सुरुचिसम्पन्न हैं। महाराज हर्षवर्द्धन सदैव जन-कल्याण एवं शास्त्र-चिन्तन में लगे रहते हैं। अपने भाई के ऐसे धर्मानुशासन को देखकर राज्यश्री भी प्रसन्न रहती है। सम्पूर्ण राज्य एकता के सूत्र में बँधा हुआ है। एक बार हर्षवर्द्धन तीर्थराज प्रयाग में सम्पूर्ण राजकोष को दान कर देने की घोषणा करते हैं

हुई थी घोषणा सम्राट की साम्राज्य भर से,
करेंगे त्याग सारा कोष ले संकल्प कर में।

सब कुछ दान करके वे अपनी बहन से माँगकर वस्त्र पहनते हैं। इसके पश्चात् प्रत्येक पाँच वर्ष बाद वे इसी प्रकार अपना सर्वस्व दान करने लगे। इस दान को वे प्रजा-ऋण से मुक्ति का नाम देते हैं। अपने जीवन में वे छह बार इस प्रकार के सर्वस्व-दान का आयोजन करते हैं। हर्षवर्द्धन संसारभर में भारतीय संस्कृति का प्रसार करते हैं। इस प्रकार कर्तव्यपरायण, त्यागी, परोपकारी, परमवीर, महाराज हर्षवर्द्धन का शासन सब प्रकार से सुर्खकर तथा कल्याणकारी सिद्ध होता है।

प्रश्न 2:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की विवेचना (समीक्षा) कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ नाटक की विशेषता लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ में वर्णित भारत की राजनीतिक उथल-पुथल एवं सांस्कृतिक वैभव का उल्लेख कीजिए। यह भारत के राजनीतिक संघर्ष का एक दस्तावेज है।” सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) इतिहास और कल्पना का समन्वय – ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल ने इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय किया है। इस खण्डकाव्य में हर्षवर्द्धन, राज्यश्री, प्रभाकरवर्द्धन, राज्यवर्द्धन, शशांक आदि सभी पात्र ऐतिहासिक हैं।
हर्षवर्द्धन के माता-पिता, भाई, बहनोई की मृत्यु, राज्यश्री की खोज, राज्यश्री के नाम पर हर्षवर्द्धन की दिग्विजय, राजधानी थानेश्वर से कन्नौज ले जाना, प्रयाग में हर पाँचवें वर्ष सर्वस्व-दान, हर्षवर्द्धन का धर्मानुशासन आदि सभी ऐतिहासिक तथ्य हैं।
इनके अतिरिक्त यशोमती का चिता-प्रवेश, शोकाकुल हर्षवर्द्धन की व्यथा, राज्यश्री को खोजते-खोजते हर्षवर्द्धन का दिवाकर मित्र के आश्रम में पहुँचना और वहाँ एक भिक्षुक से राज्यश्री के आत्मदाह करने की सूचना प्राप्त करना बाणभट्ट की प्रमुख रचना ‘हर्षचरित’ पर आधारित हैं।
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में माता-पिता और भाई-बहन के प्रति हर्षवर्द्धन की प्रेम-भावाभिव्यक्ति में तथा बौद्ध श्रमण आचार्य दिवाकर मित्र, राज्यश्री, हर्षवर्द्धन के चरित्र-चित्रण में कवि ने कल्पना का प्रयोग किया है। कवि ने इस खण्डकाव्य में ऐतिहासिक एवं काल्पनिक घटनाओं का इतना सुन्दर और सजीव समन्वय किया है। कि सभी घटनाएँ एवं चरित्र बहुत अधिक प्रभावशाली बन गये हैं।

(2) कथा-संगठन की श्रेष्ठता – कुमार हर्षवर्द्धन पर किशोरावस्था में ही दु:खों के पहाड़ टूटने लगते हैं। यहीं से कथानक का आरम्भ होता है। कथा का आरम्भ बहुत ही रोचक एवं प्रभावशाली है। कन्नौज के राजा की मृत्यु का बदला लेने के लिए हर्षवर्द्धन द्वारा ससैन्य प्रयाण तथा उन्हीं पर सम्पूर्ण राज्यभार आ पड़ना कथा का विकास है। हर्षवर्द्धन द्वारा दिग्विजय के बाद तीर्थराज प्रयाग में सर्वस्व त्याग कथानक की चरम सीमा है। यहाँ आकर त्यागपथी हर्षवर्द्धन का लोककल्याण अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है। इसके पश्चात् हर्षवर्द्धन के सुशासन का वर्णन कथानक का उतार है और उनकी मृत्यु तथा उनके महान् चरित्र से प्रेरणा लेने की कामना के साथ ‘त्यागपथी’ के कथानक का अन्त हो जाता है। इस प्रकार इस खण्डकाव्य का सम्पूर्ण कथानक सुगठित और सुविकसित है। प्रसंगों में प्रवाह है और कथा की तारतम्यता कहीं भी शिथिल या बाधित नहीं होती है।

(3) कौतूहलवर्द्धक – ‘त्यागपथी’ की कथावस्तु कौतूहलवर्द्धक है। आखेट के समय हर्षवर्द्धन को पिता के भयंकर ज्वर-दाह की सूचना, माता यशोमती का आत्मदाह, कन्नौज की घटनाएँ, राज्यवर्द्धन की हत्या, राज्यश्री की खोज तथा कन्नौज का शासन ग्रहण करने की समस्या आदि सभी घटनाएँ पाठकों के मन में कौतूहल जगाती

(4) मार्मिकता – प्रस्तुत काव्य में कवि ने मार्मिक घटनाओं का चयन करने में बड़ी सावधानी से काम लिया है। यशोमती को चितारोहण, राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन का वैराग्य लेने को तैयार होना, राज्यश्री के वैधव्य का समाचार पाकर हर्ष की व्याकुलता, आत्मदाह के लिए उद्यत राज्यश्री का हर्ष से मिलना इत्यादि ऐसी मार्मिक घटनाएँ हैं, जिनके वर्णन को पढ़कर पाठक का हृदय द्रवित हो जाता है। इस प्रकार ‘त्यागपथी’ की कथावस्तु वास्तव में अत्यन्त मार्मिक, सुसम्बद्ध, इतिहास और कल्पना के सुन्दर समन्वय से रमणीय और प्रेरणाप्रद है।

प्रश्न 3:
‘त्यागपथी’ के नायक अथवा प्रमुख पात्र (हर्षवर्धन) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
” ‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन का चरित्र देशप्रेम का प्रखरतम (आदर्श) उदाहरण है।” उपयुक्त उदाहरण देते हुए इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर हर्ष की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
” ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नायक हर्षवर्द्धन का सम्पूर्ण जीवन सदाचार, उन्नत मानवीय जीवन के प्रति निष्ठा, सहयोग और सदभावना के प्रति जीवन्त आस्था का एक महान् उदाहरण है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘हर्षवर्द्धन मानवीय आदर्शों का प्रतीक है।”त्यागपंथी’ खण्डकाव्य के आधार कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘सोदाहरण सिद्ध कीजिए कि त्यागपथी खण्डकाव्य हर्षवर्द्धन की देशभक्ति, राष्ट्र-रचना और लोक-कल्याणकारी सदवृत्तियों का सम्यक उद्घाटन करता है।’
या
‘हर्षवर्द्धन के चरित्र में लोकमंगल की कामना निहित है। इस कथन के आलोक में ‘त्यागपथी’ के नायक हर्षवर्द्धन का चरित्रांकन कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य महाराजा हर्षवर्द्धन की दानवीरता और राष्ट्रीयता का द्योतक है, कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
थानेश्वर के महाराज प्रभाकरवर्द्धन के छोटे पुत्र हर्षवर्द्धन के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) नायक – हर्षवर्द्धन ‘त्यागपथी’ के नायक हैं। इस खण्डकाव्य की सम्पूर्ण कथा का केन्द्र वही हैं। सम्पूर्ण घटनाचक्र उन्हीं के चारों ओर घूमता है। कथा आरम्भ से अन्त तक हर्षवर्द्धन से ही सम्बद्ध रहती है।

(2) आदर्श पुत्र एवं भाई – इस खण्डकाव्य में हर्षवर्द्धन एक आदर्श पुत्र एवं आदर्श भ्राता के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। अपने पिता के रुग्ण होने का समाचार पाकर वे आखेट से तुरन्त लौट आते हैं और यथासामर्थ्य उनकी चिकित्सा करवाते हैं। पिता के स्वस्थ न होने तथा माता द्वारा आत्मदाह करने की बात सुनकर वे भाव-विह्वल हो जाते हैं। वे अपनी माता से कहते हैं

मुझ मन्द पुण्य को छोड़ न माँ तुम भी जाओ।
छोड़ो विचार यह, मुझे चरण से लिपटाओ।।

आदर्श पुत्र के समान ही वे आदर्श भाई का कर्तव्य भी पूरा करते हैं। वे अपनी बहन राज्यश्री को अग्निदाह करने एवं संन्यास लेने से रोकते हैं

दोनों करों से घेरकर छोटी बहिन के भाल को।
भूल खड़े थे निकट जलती चिता की ज्वाल को ।।

(3) देश-प्रेमी – हर्षवर्द्धन सच्चे देश-प्रेमी हैं। उन्होंने छोटे राज्यों को एक साथ मिलाकर विशाल राज्य की स्थापना की। देश की एकता एवं रक्षा हेतु वे बड़े-से-बड़ा युद्ध करने से भी नहीं हिचकते थे। उन्होंने एक बड़े राज्य की स्थापना ही नहीं की, वरन् धर्मपूर्वक शासन भी किया। देश-सेवा ही उनके जीवन का व्रत है।

(4) अजेय योद्धा – हर्षवर्द्धन एक अजेय योद्धा हैं। विद्रोही उनके तेजबल के आगे ठहर नहीं पाता। कोई भी राजा उन्हें पराजित नहीं कर सका। भारत के इतिहास में महाराज हर्षवर्द्धन की दिग्विजय, उनका युद्ध-कौशल और उनकी अनुपम वीरता आज भी स्वर्णाक्षरों में लिखी है। उनकी वीरता एवं कुशल शासन का ही यह परिणाम था कि ”उठा पाया न सिर कोई प्रवंचक।”

(5) श्रेष्ठ शासक – महाराज हर्षवर्द्धन एक श्रेष्ठ शासक हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रजा के हितार्थ ही समर्पित है। उनका शासन धर्म-शासन है। उनके शासन में सब जनों को समान न्याय एवं सुख उपलब्ध है।

वे सदैव प्रजा के कल्याण में लगे रहते थे और स्वयं को प्रजा का सेवक समझते थे। उनका मत था

नहीं अधिकार नृप को पास रखे धन प्रजा का,
करे केवल सुरक्षा देश-गौरव की ध्वजा का।

(6) महान् त्यागी – हर्षवर्द्धन महान् त्यागी एवं आत्म संयमी हैं। आत्म संयम एवं सर्वस्व त्याग करने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ के नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई के अधिकार को ग्रहण करना नहीं चाहते। इसी प्रकार कन्नौज का राज्य भी वे अपनी बहन के नाम पर चलाते हैं। प्रयाग में छः बार अपना सर्वस्व प्रजा के लिए दे देना उनके महान् त्याग को प्रमाण है। वे राजकोष को प्रजा की सम्पत्ति मानते हैं। इसीलिए वे उसे प्रजा को ही दान कर देते हैं।

(7) धर्मपरायण – हर्षवर्द्धन के जीवन में धर्मपरायणता कूट-कूटकर भरी हुई है। वे जन-सेवा में ही अपना जीवन लगा देते हैं

रहे कल्याण मानवमात्र का ही धर्म मेरा,
रहे सर्वस्व-त्यागी पुण्य पर विश्वास मेरा।

उन्होंने शैव, शाक्त, वैष्णव और वेद-मत को एक साथ रखा। उन्होंने किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं बरता।

(8) कर्त्तव्यनिष्ठ एवं दृढनिश्चयी – सम्राट हर्ष ने आजीवन अपने कर्तव्य का पालन किया। प्रारम्भ में इच्छा न होते हुए भी इन्होंने अपने भाई के कहने पर राज्य सँभाला और प्रत्येक संकटापन्न स्थिति में भी अपने कर्तव्य को निभाया। बहन राज्यश्री को वनों में खोजकर वे अपनी कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं। भाई की छल से की गयी हत्या का समाचार सुनकर उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उससे उनके दृढ़निश्चय का पता चलता है

लेकर चरण रज आर्य की करता प्रतिज्ञा आज मैं,
निर्मूल कर दूंगा धरा से अधर्म गौड़ समाज मैं।

(9) महादानी – त्यागपथी के हर्षवर्द्धन आत्मसंयमी तथा महादानी हैं। महान् त्यागी होने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई का अधिकार ग्रहण नहीं करना चाहते। कन्नौज विजय के बाद भी वे कन्नौज का सिंहासन राज्यश्री को देना चाहते हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि हर्ष का चरित्र एक महान् राजा, आदर्श भाई, आदर्श पुत्र और महान् त्यागी का चरित्र है, जिसके लिए प्रजा की सुख-सुविधा ही सर्वोपरि है और वह अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति भी निष्ठावान् है।

प्रश्न 4:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर राज्यश्री का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ में निरूपित राज्यश्री की चारित्रिक छवि पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राज्यश्री सम्राट् हर्षवर्द्धन की छोटी बहन है। हर्षवर्द्धन के चरित्र के बाद राज्यश्री का चरित्र ही ऐसा है, जो पाठकों के हृदय एवं मस्तिष्क पर छा जाता है। राज्यश्री के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है

(1) माता-पिता की लाडली – राज्यश्री अपने माता-पिता को प्राणों से भी प्यारी है। कवि कहता है

माँ की ममता की मूर्ति राज्यश्री सुकुमारी।
थी सदा पिता को, माँ को प्राणोपम प्यारी ॥

(2) आदर्श नारी – राज्यश्री आदर्श पुत्री, आदर्श बहन और आदर्श पत्नी के रूप में हमारे समक्ष आती है। वह यौवनावस्था में विधवा हो जाती है तथा गौड़पति द्वारा बन्दिनी बना ली जाती है। भाई राज्यवर्द्धन की मृत्यु के बाद वह कारागार से भाग जाती है और वन में भटकती हुई एक दिन आत्मदाह के लिए उद्यत हो जाती है; किन्तु अपने भाई हर्षवर्द्धन द्वारा बचा लेने पर वह तन-मन-धन से प्रजा की सेवा में ही अपना जीवन अर्पित कर देती है। हर्ष द्वारा राज्य सौंपे जाने पर भी वह राज्य स्वीकार नहीं करती। यही है उसका आदर्श रूप, जो सबको आकर्षित करता है

विपुल साम्राज्य की अग्रज सहित वह शासिका थी,
अभ्यन्तर से तथागत की अनन्य उपासिका थी।

(3) देश-भक्त एवं जन-सेविका – राज्यश्री के मन में देशप्रेम और लोक-कल्याण की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। हर्ष के समझाने पर वह अपने वैधव्य का दुःख झेलती हुई भी देश-सेवा में लगी रहती है। देशप्रेम के कारण राज्यश्री संन्यासिनी बनने का विचार भी छोड़ देती है तथा शेष जीवन को देश-सेवा में ही लगाने का । व्रत लेती है।

(4) करुणामयी नारी – राज्यश्री ने माता-पिता की मृत्यु तथा पति और बड़े भाई की मृत्यु के अनेक दु:ख झेले। इन दु:खों ने उसे करुणा की मूर्ति बना दिया। अपने अग्रज हर्षवर्द्धन से मिलते समय उसकी कारुणिक दशा अत्यन्त मार्मिक प्रतीक होती है

सतत बिलखती थी बहिने माता-पिता की याद कर।
ले नाम सखियों का, उमड़ती थी नदी-सी वारि भर ॥
था सास्तु अग्रज धैर्य देता माथ उसका ढाँपकर।
रोती रही अविरल बहिन बेतस लता-सी काँपकर ॥

(5) त्यागमयी नारी – राज्यश्री का जीवन त्याग की भावना से आलोकित है। भाई हर्षवर्द्धन द्वारा कन्नौज का राज्य दिये जाने पर भी वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह कहती है

स्वीकार न मुझको कान्यकुब्ज सिंहासन।
बैठो उस पर तुम करो शौर्य से शासन ।

वह राज्य-कार्य के बन्धन में पड़ना नहीं चाहती; क्योंकि वह मन से संन्यासिनी है। हर्षवर्द्धन के समझाने पर भी वह नाममात्र की ही शासिका बनी रहती है। प्रयाग महोत्सव के समय हर्षवर्द्धन के साथ राज्यश्री भी अपना सर्वस्व प्रजा के हितार्थ त्याग देती है।

(6) सुशिक्षिता एवं ज्ञान – सम्पन्न राज्यश्री सुशिक्षिता एवं शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न है। जब आचार्य दिवाकर मित्र संन्यास धर्म का तात्त्विक विवेचन करते हुए उसे मानव-कल्याण के कार्य में लगने का उपदेश देते हैं तब राज्यश्री इसे स्वीकार कर लेती है और आचार्य की आज्ञा का पूर्णरूपेण पालन करती है।
इस प्रकार राज्यश्री का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी का चरित्र है। उसके पातिव्रत-धर्म, देश-धर्म, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श निश्चय ही अनुकरणीय हैं।

प्रश्न 5:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के भावपक्ष एवं कलापक्ष की विशेषताएँ बताइए।
या
‘त्यागपथी’ की काव्यगत विशेषताओं (काव्य-सौष्ठव) पर प्रकाश डालिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से त्यागपथी की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ एक ऐतिहासिक खण्डकाव्य है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
काव्य-शिल्प की दृष्टि से त्यागपथी’ खण्डकाव्य की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की काव्य-शैली की विवेचना कीजिए।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों (तत्त्वों) के आधार पर ‘त्यागपथी’ के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की काव्य-गुणों की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली की समीक्षा कीजिए।
या
कथावस्तु और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से त्यागपथी खण्डकाव्य का मूल्यांकन कीजिए।
या
“त्यागपथी एक सफल खण्डकाव्य है’, इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के संवाद शिल्प पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की भाषा कथावस्तु के अनुकूल है।” उचित उदाहरण देते हुए सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल’ द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘त्यागपथी’ एक ऐतिहासिक कथानक पर आधारित खण्डकाव्य है। इस रचना में कवि ने अपनी काव्यात्मक प्रतिभा का प्रयोग अत्यधिक कुशलता से किया है। इस खण्डकाव्य की विशेषताओं का विवेचन अग्रवत् किया जा सकता है।

कथानक की ऐतिहासिकता – ‘त्यागपथी’ में सातवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध सम्राट हर्षवर्द्धन की कथा का वर्णन हुआ है। कवि ने हर्षवर्द्धन के माता-पिता की मृत्यु, भाई और बहनोई की हत्या, कन्नौज में राज्य सँभालना, मालवराज शशांक से युद्ध, दिग्विजय करके धर्म-शासन की स्थापना और हर पाँचवें वर्ष तीर्थराज प्रयाग में सर्वस्व दान करने की ऐतिहासिक घटनाओं को बड़े ही सरल और सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण – ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में प्रभाकरवर्द्धन तथा उनकी पत्नी यशोमती; उनके दो पुत्र राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन; एक पुत्री राज्यश्री; कन्नौज, मालव, गौड़ प्रदेश के राजाओं के अतिरिक्त आचार्य दिवाकर, सेनापति भण्ड आदि पात्र हैं। इस खण्डकाव्य का नायक हर्षवर्द्धन है तथा इसकी नायिका होने का गौरव उसकी बहन राज्यश्री को प्राप्त है।

‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(क) भावगत विशेषताएँ

(1) मार्मिकता – इस खण्डकाव्य में कवि ने हर्षवर्द्धन की माता यशोमती का चितारोहण, राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन का वैराग्य लेने को तैयार होना, राज्यश्री के विधवा होने की सूचना पाकर हर्षवर्द्धन की व्याकुलता, राज्यश्री द्वारा आत्मदाह के समय हर्षवर्द्धन के मिलन का वर्णन अतीव मार्मिक है।

(2) रस-निरूपण – ‘त्यागपंथी’ में कवि ने करुण, वीर, रौद्र, शान्त आदि रसों का सुन्दर निरूपण किया है।
करुण रस का निम्नलिखित उदाहरण द्रष्टव्य है

मुझ मन्द पुण्य को छोड़ न माँ तुम भी जाओ।
छोड़ो विचार यह, मुझे चरण से लिपटाओ ।
सँवरो देवि ! यह रूप नहीं देखा जाता।
हो पिता अदय, पर सतत वत्सला है माता॥

(3) प्रकृति-चित्रण – ‘त्यागपथी’ में कवि ने प्रकृति के विभिन्न रूपों का सुन्दर चित्रण किया है। आखेट के समय जब हर्षवर्द्धन को राजा के गम्भीर रूप से रोगग्रस्त होने का समाचार मिलता है तो वे तुरन्त राजमहल को लौट आते हैं। उस समय के वन का चित्रण द्रष्टव्य है

वन-पशु अविरत, खर-शर-वर्णन से अकुलाये।
फिर गिरि-श्रेणी में खोहों से बाहर आये ॥

(ख) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – भारतीय इतिहास में गुप्तकाल स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। उस काल में भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की भाषा भी वैसी ही गरिमामयी है। इस खण्डकाव्य की भाषा प्रभावशाली, भावानुकूल और समयानुकूल है। इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण विद्यमान हैं। प्रारम्भ के दो सर्गों में ओज गुण अधिक है, जब कि अन्त के सर्गों में चित्त की दीप्ति और विस्तार के कारण माधुर्य और प्रसाद गुण अधिक हैं।

उदाहरण(i) था वस्त्र-कर्मान्तिक सजल-दृग आ गया वल्कल लिए।
(ii) जन-जन वहाँ था साश्रु, जब वल्कल उन्होंने ले लिया।

(2) शैली – त्यागपथी में वर्णनप्रधान चित्रात्मकता लिये हुए संवादात्मक और सुललित सूक्ति-शैली का प्रयोग किया गया है। शब्दों के क्रम और ध्वनियों के संयोजन से जिस लय की रचना होती है, वह लय पूरे खण्डकाव्य में समान रूप से निहित है। अर्थ के साथ-साथ यह लय स्वर के आरोह-अवरोह के कारण और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। पाँचवें सर्ग के अन्त में शैली में एक प्रकार की तीव्रता और आवेग है। इस खण्डकाव्य की शैली में आकर्षण और कौतूहल उत्पन्न करने की क्षमता है, जो खण्डकाव्य के लिए अनिवार्य है।

(3) अलंकार-योजना – ‘त्यागपथी’ में कवि ने स्थान-स्थान पर विभिन्न अलंकारों का प्रयोग किया है। अलंकार-योजना सर्वत्र स्वाभाविक रूप में है। भावोत्कर्ष में अलंकारों का प्रयोग विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा है। कवि ने उपमा, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग किया है।

(4) छन्द-विधान – रामेश्वर शुक्ल अञ्चल ने ‘त्यागपथी’ में 26 मात्राओं के ‘गीतिका’ छन्द का प्रयोग किया है। अन्त में आकर कवि ने 34 मात्राओं वाले घनाक्षरी छन्द भी लिखे हैं। अन्त में घनाक्षरी छन्द का प्रयोग रचना की समाप्ति का सूचक ही नहीं, वरन् वर्णन की दृष्टि से प्रशस्ति का भी सूचक है। कवि की छन्द-योजना निस्सन्देह प्रशंसनीय है।
निष्कर्षतः ‘त्यागपथी’ काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 6:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के रचयिता का मुख्य उद्देश्य अथवा सन्देश क्या है ? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
या
“सच्ची राष्ट्रधर्मिता को उद्भासित करना ‘त्यागपथी’ का प्रमुख उद्देश्य है।” इस उक्ति की दृष्टि से त्यागपथी की आलोचना कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय जीवन-शैली और सामाजिक व्यवस्था का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्षकालीन भारतीय समाज एवं जन-जीवन का उदात्त चित्रण मिलता है, सिद्ध कीजिए।
या
“त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्षकालीन जीवन व समाज का उदात्त चित्रण मिलता है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्षकालीन भारत सजीव हो उठा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
खण्डकाव्य ‘त्यागपथी’ के नामकरण की सार्थकता एवं उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नाम की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर:
[ संकेत- ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं के स्पष्टीकरण के लिए प्रश्न सं० 1 के उत्तर का अध्ययन करें और उसे संक्षेप में लिखें। ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में कविवर रामेश्वर शुक्ल ‘अञ्चल’ ने अनेक प्रयोजनों को पल्लवित किया है। इसके मुख्य उद्देश्य या सन्देश निम्नवत् हैं

(1) प्राचीन भारत का गौरवमय चित्र प्रस्तुत करना – अञ्चल जी ने अपने प्रस्तुत काव्य में प्राचीन भारत के गौरवमय चित्र को प्रस्तुत किया है। उस समय समाज में सभी को समान न्याय और सभी प्रकार के सुख उपलब्ध थे। उन्होंने यह दर्शाया है कि प्राचीन भारत धर्म, संस्कृति, सभ्यता, विद्या, अर्थ और सभी दृष्टियों से वैभवसम्पन्न था।

(2) सम्राट् हर्ष के त्यागमय जीवन का आदर्श प्रस्तुत करना – हर्षवर्द्धन ‘त्यागपथी’ के नायक हैं। प्रजा की सेवा और उसका कल्याण ही सम्राट हर्ष के लिए सर्वोपरि था। सम्पूर्ण घटनाचक्र उन्हीं के चारों ओर घूमता है। कवि ने हर्ष के त्यागमय उज्ज्वल चरित्र के माध्यम से यह प्रस्तुत करना चाहा है कि आज के शासक भी उन्हीं की भॉति त्यागमय और सरल जीवन अपनाकर प्रजा के सम्मुख एक आदर्श उपस्थित करें।

(3) मानवीय गुणों की स्थापना करना – कवि ने प्रस्तुत काव्य में बड़ों के प्रति आदर, छोटों से स्नेह, उदारता, विनम्रता के साथ-साथ सांसारिक गरिमा आदि मानवीय गुणों को व्यक्त किया है। उसने हर्षवर्द्धन के माध्यम से सत्य, अहिंसा, त्याग, शान्ति, परोपकार और निष्काम कर्म जैसे गांधीवादी जीवन-मूल्यों की स्थापना की है।

(4) धर्मनिरपेक्षता पर बल देना – अञ्चल जी ने ‘त्यागपथी’ के माध्यम से सर्व-धर्म समभाव की सशक्त अभिव्यंजना की है। कवि ने दिखाया है कि सम्राट हर्ष के समय में सभी धर्मों को अपने प्रचार और प्रसार का समान अवसर प्राप्त था। सभी धर्मावलम्बियों के साथ समान व्यवहार होता था, जिस कारण सर्वत्र सुख और समृद्धि व्याप्त थी।

(5) राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति करना – प्रस्तुत काव्य में कवि ने राष्ट्रप्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति की है। सम्राट् हर्ष सच्चे देशप्रेमी हैं। उन्होंने छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर विशाल राज्य की स्थापना की। वे देश की एकता और रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे। उन्होंने अपनी बहन राज्यश्री को भी आत्मदाह करने से रोककर; देश-सेवा करने को प्रेरित किया।

(6) मानवतावाद का प्रसार करना – प्रस्तुत खण्डकाव्य की रचना में कवि ने मानवता के प्रसार को सन्देश दिया है। कवि ने युद्ध और हिंसा के स्थान पर प्रेम को बढ़ावा दिया है, जिससे आज शोषित और उत्पीड़ित मानवता दमन-चक्र से मुक्त हो सके।

शीर्षक की सार्थकता – उपर्युक्त सभी सन्देश काव्यकार ने सम्राट हर्षवर्द्धन के चरित्र के माध्यम से दिये हैं। हर्ष ने सर्वस्व त्याग करके ही इन सभी आदर्शों की स्थापना की। उनका त्याग क्षणिक नहीं है और न ही वह भावावेग में लिया हुआ निर्णय है, वरन् उन्होंने इस त्याग-पथ का चयन भली प्रकार सोच-समझकर किया है। प्रति पाँचवें वर्ष अपना सर्वस्व दान कर देने वाले त्याग-पथ के इस अमर पथिक के लिए ‘त्यागपथी’ के अतिरिक्त और कौन नाम उपयुक्त हो सकता है ? इस प्रकार खण्डकाव्य के नायक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने वाला खण्डकाव्य का शीर्षक ‘त्यागपथी’ सर्वथा उपयुक्त और सार्थक है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi पद्य-साहित्य का विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name पद्य-साहित्य का विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Number of Questions 152
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi पद्य-साहित्य का विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1:
हिन्दी-काव्य-साहित्य के विविध कालों का समय बताइट।
या
हिन्दी काव्य के इतिहास को कितने काल-खण्डों में विभाजित किया जाता है? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  आदिकाल (वीरगाथाकाल) – सन् 993 ई० से सन् 1318 ई० तक।
  2. पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल) – सन् 1318 ई० से सन् 1643 ई० तक।
  3. उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल) – सन् 1643 ई० से सन् 1843 ई० तक।
  4. आधुनिककाल (गद्यकाल) – सन् 1843 ई० से अब तक।

प्रश्न 2:
कविता के बाह्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  लय,
  2. तुक,
  3.  छन्द,
  4. शब्द-योजना,
  5. चित्रात्मक भाषा तथा
  6.  अलंकार।

प्रश्न 3:
कविता के आन्तरिक तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1.  अनुभूति की व्यापकता,
  2.  कल्पना की उड़ान,
  3.  रसात्मकता और सौन्दर्य बोध तथा
  4.  भावों का उदात्तीकरण।

प्रश्न 4:
प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध काव्य में ऐसी धारावाहिक कथा होती है, जिसमें किसी घटना या कार्य का काव्यात्मक वर्णन होता है, किन्तु मुक्तक काव्य में प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है, उनका कथा रूप में सूत्रबद्ध होना अनिवार्य नहीं।

प्रश्न 5:
हिन्दी पद्य-साहित्य के इतिहास के विभिन्न कालों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. वीरगाथाकाल ( आदिकाल),
  2.  भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल),
  3. रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) एवं
  4.  आधुनिककाल।

प्रश्न 6:
काव्य के कितने भेद होते हैं?
उत्तर:
काव्य के दो भेद होते हैं

  1. श्रव्य काव्य और
  2.  दृश्य काव्य।

प्रश्न 7:
प्रबन्ध काव्य के कितने भेद होते हैं?
उत्तर:
प्रबन्ध काव्य के दो भेद होते हैं

  1.  महाकाव्य और
  2.  खण्डकाव्य।

प्रश्न 8:
महाकाव्य और खण्डकाव्य में अन्तर बताइट।
उत्तर:
महाकाव्य की कथा में जीवन की सर्वांगीण झाँकी होती है, जब कि खण्डकाव्य में जीवन के एक पक्ष का चित्रण होता है। महाकाव्य की विस्तृत कथावस्तु पर अनेक खण्डकाव्य लिखे जा सकते हैं।

प्रश्न 9:
दो महाकाव्यों के नाम लिखिए ।
उत्तर:
दो महाकाव्यों के नाम हैं

  1.  श्रीरामचरितमानस और
  2. कामायनी।

प्रश्न 10:
दो खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
दो खण्डकाव्यों के नाम हैं

  1. जयद्रथ-वध और
  2. हल्दीघाटी।

प्रश्न 11:
हिन्दी का प्रथम महाकाव्य किसे माना जाता है? उसका रचनाकार कौन है?
उत्तर:
श्रीरामचरितमानस – तुलसीदास।

आदिकाल (वीरगाथाकाल)

प्रश्न 12:
हिन्दी-साहित्य का आदिकाल किस साम्राज्य की समाप्ति के समय से प्रारम्भ होता है?
उत्तर:
वर्द्धन साम्राज्य की समाप्ति के समय से हिन्दी साहित्य का आदिकाल प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 13:
हिन्दी के आदिकाल का समय निर्देश कीजिए और हिन्दी के प्रथम कवि का नाम बताइट।
उत्तर:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार आदिकाल का समय 993 ई० से 1318 ई० तक माना जाता है। सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है।

प्रश्न 14:
हिन्दी का प्रथम कवि किसे माना जाता है? उनका रचना-काल कब से प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है। उनका रचना-काल 769 ई० से प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 15:
आदिकाल (वीरगाथाकाल) की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
आदिकालीन हिन्दी-साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।
या
आदिकाल (वीरगाथाकाल) की किन्हीं दो प्रमुख काव्य-प्रवृत्तियाँ लिखिए।
या
आदिकाल के योगदान की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विशेषताएँ – (1) आदिकाल में अधिकांश रासो ग्रन्थ लिखे गये; जैसे–पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो आदि। इनमें आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा है। (2) वीर और श्रृंगार रस की प्रधानता है। (3) युद्धों का सुन्दर और सजीव वर्णन किया गया है। (4) काव्यभाषा के रूप में डिंगल और पिंगल का प्रयोग हुआ है। (5) काव्य-शैलियों में प्रबन्ध और गीति शैलियों का प्रयोग मिलता है। (6) सामूहिक राष्ट्रीयता की भावना को अभाव रहा है।

प्रश्न 16:
आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवियों और उनकी कृतियों के नाम बताइए।
या
वीरगाथाकाल के किन्हीं दो प्रमुख काव्यों (रचनाओं) के नाम लिखिए।
उत्तर:
आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं – चन्दबरदायी (पृथ्वीराज रासो), नरपति-नाल्ह (बीसलदेव रासो), दलपति विजय (खुमान रासो), जगनिक (परमाल रासो या आल्हखण्ड), विद्यापति (पदावली), अब्दुल रहमान (सन्देश रासक), स्वयंभू (पउमचरिउ), धनपाल (भविसयत्तकहा), जोइन्दु (परमात्मप्रकाश), पुष्पदन्त (उत्तरपुराण) एवं अमीर खुसरो की फुटकर रचनाएँ।

प्रश्न 17:
वीरगाथाकाल (आदिकाल) में साहित्य रचना की प्रमुख धाराओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
इस काल की तीन प्रमुख काव्यधाराएँ निम्नलिखित हैं

  1.  संस्कृत काव्यधारा,
  2.  प्राकृत एवं अपभ्रंश काव्यधारा तथा
  3.  हिन्दी काव्यधारा।

प्रश्न 18:
आदिकाल के विभिन्न नाम बताइए।
या
‘वीरगाथाकाल के लिए प्रयुक्त दो अतिरिक्त नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वीरगाथाकाल, अपभ्रंशकाल, सन्धिकाल, आविर्भावकाल, चारणकाल, बीजवपनकाल एवं सिद्ध-सामन्त युग आदि।

प्रश्न 19:
वीरगाथाकाल के चार प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
या
आदिकाल के किन्हीं दो कवियों (रचनाकारों) के नाम लिखिए।
उत्तर:
चन्दबरदायी, नरपति नाल्ह, दलपति विजय एवं जगनिक।

प्रश्न 20:
आदिकाल की चार प्रमुख कृतियों के नाम बताइए।
या
दो रासो काव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, परमाल रासो (आल्हखण्ड) एवं विद्यापति पदावली।

प्रश्न 21:
वीरगाथाकाल में रचनाएँ कौन-कौन-से काव्य रूपों में लिखी गयीं?
उत्तर:
प्रबन्धकाव्य और वीर गीतों के रूप में।

प्रश्न 22:
वीरगाथाकाल की रचनाओं में कौन-सी भाषा प्रयुक्त हुई है?
या
रासो ग्रन्थों में किन दो भाषाओं का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
डिंगल और पिंगल।

प्रश्न 23:
वीरगाथाकाल (आदिकाल) की दो प्रमुख रचनाओं एवं उनके कवियों के नाम लिखिए।
या
‘पृथ्वीराज रासो’ की रचना किस काल में हुई और उसके रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदायी), परमाल रासो या आल्हखण्ड (जगनिक) ये वीरगाथाकाल (आदिकाल) की दो प्रमुख रचनाएँ हैं।

प्रश्न 24:
आदिकाल के साहित्य को कितने वर्गों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर:
पाँच वर्गों में – (1) सिद्ध साहित्य, (2) जैन साहित्य, (3) नाथ साहित्य, (4) रासो साहित्य, (5) लौकिक साहित्य,

प्रश्न 25:
जैन साहित्य का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप किन ग्रन्थों में मिलता है?
उत्तर:
जैन साहित्य को सर्वाधिक लोकप्रिय रूप ‘रास ग्रन्थों में मिलता है।

प्रश्न 26:
नाथ साहित्य के प्रणेता कौन थे? नाथ साहित्य के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नाथ साहित्य के प्रणेता मत्स्येन्द्र नाथ थे। इस साहित्य के दो प्रमुख कवियों के नाम हैं – गोरखनाथ, तथा जलन्धर।।

प्रश्न 27:
रासो साहित्य से सम्बन्धित किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज रासो-चन्दबरदायी। बीसलदेव रासो-नरपति नाल्ह।

प्रश्न 28:
आदिकाल के सिद्ध साहित्य और जैन साहित्य के एक-एक प्रमुख कवि का नाम लिखिए।
उत्तर:
सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि हैं – सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा आदि जैन साहित्य के प्रमुख कवि हैं-आचार्य देवसेन, मुनिंशमलिभद्र सूरि, विजयसेन सूरि, जिनधर्म सूरि आदि।

प्रश्न 29:
गोरखनाथ के गुरु का क्या नाम था?
उत्तर:
गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ (मछन्दरनाथ) था।

भक्तिकाल

प्रश्न 30:
भक्तिकाल की सभी प्रमुख काव्यधाराओं का परिचय दीजिए।
उत्तर:
भक्तिकाल में हिन्दी कविता दो’ धाराओं में प्रवाहित हुई – निर्गुण भक्ति-धारा और सगुण भक्ति-धारा निर्गुणवादियों में भी जिन्होंने ज्ञान को अपनाया, वे ज्ञानमार्गी और जिन्होंने प्रेम को अपनाया, वे मार्गी कहलाये। सगुणवादी जिन कवियों ने भगवान् के दुष्टदलनकारी-लोकरक्षक रूप को सामने रखा, वे शभक्ति शाखा से सम्बद्ध माने गये और जिन्होंने भगवान् के लोकरंजक रूप को सामने रखा, वे कृष्णभक्ति शाखा के कवि कहलाये।

प्रश्न 31:
भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं के नाम बताइए।
या
निर्गुण भक्ति की दो शाखाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
भक्तिकाल में दो प्रकार की काव्य-रचना हुई –
(1) निर्गुणमार्गीय तथा
(2) सगुणमार्गीय।

  1. निर्गुण काव्य की दो धाराएँ हैं – (क) ज्ञानाश्रयीं-काव्यधारा तथा (ख) प्रेमाश्रयी काव्यधारा।
  2. सगुण काव्य की भी दो धाराएँ हैं – (क) कृष्णभक्ति-काव्यधारा तथा (ख) रामभक्ति-काव्यधारा।

प्रश्न 32:
सन्तकाव्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इस धारा के प्रमुख कवि का नाम भी लिखिए।
उत्तर:
सन्तकाव्य से आशय निर्गुण ज्ञानाश्रयी-शाखा से है। ये भक्त निर्गुण-निराकार की उपासना करते हैं। और ज्ञान को उसकी प्राप्ति का साधन मानते हैं। इस धारा के प्रमुख कवि हैं—कबीर, रैदास, नानक, दादू , मलूकदास आदि।

प्रश्न 33:
भक्तिकाल की निर्गुण तथा सगुण भक्ति-धारा का परिचय दीजिए।
या
भक्तिकाल की एक प्रमुख काव्यधारा का परिचय लिखिए।
उत्तर:
जिस धारा में भगवान् के निर्गुण-निराकार रूप की आराधना पर बल दिया गया, वह निर्गुण धारा कहलायी और जिसमें सगुण-साकार रूप की आराधना पर बल दिया गया, वह सगुण धारा कहलायी। निर्गुणवादियों में जिन्होंने भगवत्-प्राप्ति के साधन-रूप में ज्ञान को अपनाया, वे ज्ञानमार्गी और जिन्होंने प्रेम को अपनाया, वे प्रेममार्गी कहलाये। ज्ञानमार्गी शाखा के सबसे प्रमुख कवि कबीर और प्रेममार्गी (सूफी) शाखा के मलिक मुहम्मद जायसी हुए।

प्रश्न 34:
भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
या
ज्ञानाश्रयी भक्ति-शाखा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। या भक्तिकाल की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  सद्गुरु का महत्त्व सर्वाधिक; सत्संग पर भी बल।
  2. निर्गुण की उपासना एवं अवतारवाद का खण्डन।
  3. भगवान् के नाम-स्मरण तथा भजन पर बल।
  4. धर्म के क्षेत्र में रूढ़िवाद, बाह्याचार एवं आडम्बर का विरोध तथा सामाजिक क्षेत्र में विषमता, ऊँच-नीच एवं छुआछूत का खण्डन।
  5. आन्तरिक शुद्धि एवं प्रेम साधना पर बल।
  6.  ईश्वर की एकता पर बल; अर्थात् राम-रहीम अभिन्न हैं।

प्रश्न 35:
ज्ञानाश्रयी शाखा के किसी एक कवि द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कवि-कबीर; रचित ग्रन्थ-बीजक, साखी।

प्रश्न 36:
प्रेमाश्रयी भक्ति-शाखा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ) लिखिए।
या
निर्गुण-पन्थ की प्रेमाश्रयी-शाखा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
या
निर्गुण भक्ति की प्रेमाश्रयी-शाखा का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर:

  1. मुसलमान होकर भी हिन्दू प्रेमगाथाओं का वर्णन, जिनमें हिन्दू संस्कृति का चित्रण मिलता है।
  2. सूफी सिद्धान्तों का निरूपण।
  3.  रहस्यवाद की चरम अभिव्यक्ति।
  4.  लौकिक वर्णनों के माध्यम से अलौकिकता की व्यंजना।
  5. मसनवी शैली का प्रयोग।
  6.  पूर्वी अवधीभाषा तथा दोहा-चौपाई छन्दों का प्रयोग।

प्रश्न 37:
प्रेमाश्रयी शाखा की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पद्मावत् तथा
  2.  मृगावती।

प्रश्न 38:
कृष्ण-काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. श्रीमद्भागवत का आधार लेकर कृष्णलीला-गान।
  2.  सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य भाव की उपासना एवं लोकपक्ष की उपेक्षा।
  3. काव्य में श्रृंगार एवं वात्सल्य रसों की प्रधानता; मूल आधार कृष्ण के बाल और किशोर रूप का लीला वर्णन।
  4. ब्रज भाषा में मुक्तक काव्य-शैली की प्रधानता, जिसमें अद्भुत संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।

प्रश्न 39:
कृष्णभक्ति-काव्य में वर्णित प्रमुख रसों का नामोल्लेख करते हुए उस रचना का नाम भी बताइए, जिसमें उन सभी रसों का सर्वश्रेष्ठ चित्रण हुआ है।
उत्तर:
कृष्णभक्ति-काव्य में श्रृंगार रस का सांगोपांग एवं वात्सल्य और भक्ति रसों का प्रयोग प्रमुखता से हुआ है। सूरदास के ‘सूरसागर’ में इन सभी रसों का सर्वश्रेष्ठ चित्रण है।

प्रश्न 40:
कृष्ण-काव्यधारा के दो प्रमुख कवियों के नाम बताइट।
या
अष्टछाप के किन्हीं दो कवियों का नाम लिखिए।
या
वल्लभाचार्य के किन्हीं दो शिष्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अष्टछाप के कवि ही कृष्ण-काव्यधारा के प्रमुख कवि थे। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के चार शिष्यों एवं अपने चार शिष्यों को मिलाकर महाप्रभु के सुपुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ जी ने अष्टछाप की स्थापना की, जिसके आठ कवि थे – सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविन्ददास, चतुर्भुजदास, नन्ददास। इनके अतिरिक्त अन्य प्रमुख कवि हैं-मीरा, रसखान, हितहरिवंश और नरोत्तमदास।

प्रश्न 41:
राम-काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ बताइट।
उत्तर:

  1.  लोकसंग्रह (लोकहित) की भावना के कारण मर्यादा की प्रबल भावना।
  2. राम का परब्रह्मत्व
  3.  दास्य भाव की उपासना।
  4. समन्वय की विराट् चेष्टा।
  5.  स्वान्त:सुखाय काव्य-रचना
  6.  अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं, प्रबन्ध और मुक्तक दोनों काव्य-शैलियों एवं विविध छन्दों का प्रयोग।

प्रश्न 42:
रामाश्रयी शाखा के दो प्रमुख कवियों का नाम दीजिए।
या
राम को नायक मानकर रचना करने वाले दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
गोस्वामी तुलसीदास और आचार्य केशवदास रामाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि हैं। इन दोनों ने राम को नायक मानकर अपने काव्यों की रचना की है।

प्रश्न 43:
भक्तिकालीन काव्य को ‘हिन्दी कविता का स्वर्णयुग’ क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भावों की उदात्तता, महती प्रेरकता, अनुभूति-प्रवणता, लोकहित का मुखरित स्वर, भारतीय संस्कृति का मूर्तिमान रूप, समन्वय की विराट् चेष्टा तथा कलापक्ष की समृद्धि इस काल की ऐसी विशेषताएँ हैं, जो किसी अन्य काल के काव्य में इतनी उच्चकोटि की नहीं मिलतीं। इसीलिए भक्तिकाल को हिन्दी काव्य का स्वर्णयुग कहा जाता है।

प्रश्न 44:
निम्नलिखित वाक्यों में से भक्ति-काल की दो सही प्रवृत्तियों को लिखिए
(क) श्रृंगार रस की प्रधानता
(ख) स्वान्तः सुखाय की भावना
(ग) राजप्रशस्ति की अभिव्यक्ति
(घ) भाव-पक्ष एवं कला-पक्ष का समन्वय तर
उत्तर:
(ख) स्वान्तः सुखाय की भावना तथा
(घ ) भाव-पक्ष एवं कला पक्ष को समन्वय

प्रश्न 45:
भक्तिकाव्य की दो प्रमुख शाखाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  निर्गुण – भक्तिशाखा और
  2. सगुण – भक्तिशाखा।।

प्रश्न 46:
भक्तिकाल के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कबीरदास, मलिक मुहम्मद जायसी, सूरदास और तुलसीदास।

प्रश्न 47:
भक्तिकालीन विभिन्न काव्यधाराओं में किस धारा का काव्य सर्वश्रेष्ठ है और उसका सर्वश्रेष्ठ कवि कौन है?
उत्तर:
सर्वश्रेष्ठ काव्यधारा-रामाश्रयी काव्यधारा तथा सर्वश्रेष्ठ कवि–गोस्वामी तुलसीदास।

प्रश्न 48:
भक्तिकाल की चार प्रमुख काव्यकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बीजके, पद्मावत, सूरसागर तथा श्रीरामचरितमानस।

प्रश्न 49:
तुलसीदास एवं कबीरदास किस भक्तिधारा के कवि हैं?
उत्तर:
तुलसीदास भक्तिकाल क़ी सगुण भक्तिधारा की रामभक्ति-शाखा के कवि हैं तथा कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण भक्तिधारा के ज्ञानमार्गी शाखा के कवि हैं।

प्रश्न 50:
निर्गुण-काव्यधारा की कोई एक प्रमुख विशेषता बताइए और उसके प्रमुख कवि का नामोल्लेख कीजिए।
या
निर्गुण भक्ति-काव्यधारा के दो प्रसिद्ध कवियों के नाम बताइट।
उत्तर:
निर्गुण काव्य में परम ब्रह्म के निराकार स्वरूप की उपासना हुई तथा ज्ञान एवं प्रेम तत्त्व की प्रधानता रही। कबीर एवं मलिक मुहम्मद जायसी इस धारा के प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 51:
सन्त काव्यधारा के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कबीरदास, रैदास, दादू तथा नानक।

प्रश्न 52:
प्रेममार्गी निर्गुण (सूफी) काव्यधारा के प्रमुख कवि का नाम तथा उनकी प्रमुख रचना की उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कवि-मलिक मुहम्मद जायसी। रचना–पद्मावत (महाकाव्य)।

प्रश्न 53:
सूफी काव्यधारा की कुछ प्रमुख कृतियों के नाम लिखिए।
या
सूफी काव्य के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पद्मावत, मृगावती (कुतुबन), मधुमालती (मंझन), चित्रावली (उसमान) आदि।

प्रश्न 54:
“महिका सेसि कि कोहरंहिँ” कहने वाले कवि का नाम क्या था?
उत्तर:
प्रश्न में उल्लिखित पंक्ति कहने वाले कवि का नाम मलिक मुहम्मद जायसी था।

प्रश्न 55:
सगुण कृष्णभक्ति-शाखा के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सूरदास, मीरा, रसखान, कुम्भनदास, गोविन्ददास, नरोत्तमदास एव परमानन्ददास।

प्रश्न 56:
कृष्णाश्रयी शाखा के दो प्रमुख कवियों के नाम तथा उनकी एक-एक कृति का उल्लेख कीजिए।
या
महाकवि सूरदास की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
या
कृष्ण को नायक मानकर रचना करने वाले दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सूरदास-सूरसागर व साहित्यलहरी तथा
  2.  मीराबाई- नरसीजी का मायरा।

प्रश्न 57:
निम्नलिखित में से कौन-सी दो रचनाएँ भक्तिकाल की नहीं हैं?
(क) सूरसागर
(ख) बिहारी सतसई
(ग) बीजक
(घ) आँस
उत्तर:
‘बिहारी सतसई’ (रीतिकाल) और ‘आँसू (छायावाद) भक्तिकाल की रचनाएँ नहीं हैं।

प्रश्न 58:
राम-काव्यधारा के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास राम-काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं। अन्य प्रमुख कवि हैं – केशवदास, नाभादास एवं सेनापति।

प्रश्न 59:
राम-काव्यधारा की रचना किन भाषाओं में हुई है?
उत्तर:
राम-काव्यधारा की रचना प्रमुख रूप से अवधी तथा ब्रजभाषा में हुई है।

प्रश्न 60:
ब्रजभाषा तथा अवधी भाषा के मध्यकालीन एक-एक प्रसिद्ध महाकाव्य का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. ब्रजभाषा – सूरसागर तथा
  2. अवधी भाषा – श्रीरामचरितमानस।

प्रश्न 61:
रामाश्रयी एवं कृष्णाश्रयी शाखा के एक-एक प्रमुख काव्य का नाम लिखिए
उत्तर:
रामाश्रयी शाखा का प्रमुख महाकाव्य ‘श्रीरामचरितमानस तथा कृष्णाश्रयी शाखा का प्रमुख महाकाव्य ‘सूरसागर’ है।

प्रश्न 62:
सगुण भक्ति काव्यधारा के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सगुण भक्ति काव्य-धारा के दो प्रमुख कवियों के नाम हैं – (1) सूरदास (कृष्णाश्रयी काव्यधारा) तथा (2) गोस्वामी तुलसीदास (रेरामाश्रयी काव्यधारा)।

प्रश्न 63:
रामभक्ति-शाखा के किसी एक कवि तथा उसके द्वारा रचित ग्रन्थों के नाम लिखिए।
या
सगुण भक्तिधारा की रामाश्रयी शाखा के किसी एक कवि द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
या
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
या
‘गीतावली’ और ‘दोहावली भक्तिकाल के किस कवि की रचनाएँ हैं?
उत्तर:
तुलसीदास जी के चार ग्रन्थों के नाम हैं – (1) श्रीरामचरितमानस, (2) विनयपत्रिका, (3) कवितावली, (4) गीतावली, (5) दोहावली, (6) बरवै रामायण आदि।

प्रश्न 64:
भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी शाखा के एक कवि और उनकी एक रचना का नाम लिखिए।
या
निर्गुण भक्ति-शाखा की दो प्रमुख रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
या
मलिक मुहम्मद जायसी प्रणीत दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कवि – मलिक मुहम्मद जायसी और उनकी रचना का नाम है – पद्मावत और अखरावट।

प्रश्न 65:
भक्तिकाल की तीन सामान्य प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. जीव की नश्वरता का समान रूप से वर्णन है।
  2. प्रभु के नाम-स्मरण तथा गुरु की महत्ता का वर्णन सभी कवियों ने किया है।
  3. कवियों के नामोल्लेख की प्रवृत्ति रही है।

प्रश्न 66:
हिन्दी-साहित्य के विकास में भक्तिकाल के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भक्त कवियों ने हृदय सागर का मन्थन कर मनोरम भावों का नवनीत प्रदान किया है। भाव, भाषा । और शैली की समृद्धि के कारण ही भक्तिकाल को हिन्दी-साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है।

प्रश्न 67:
तुलसीदास के रचना काल का युग बताते हुए उनके द्वारा विरचित दो प्रसिद्ध काव्यकृतियों के नाम लिखिए जिनमें एक अवधी तथा दूसरी ब्रजभाषा की हो।
या
तुलसीदास किस काल के कवि हैं। उनकी एक प्रमुख रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास का रचना काल पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) में पड़ता है। इनकी कृतियाँ

  1. श्रीरामचरितमानस-अवधी भाषा तथा
  2.  विनय-पत्रिका–ब्रजभाषा।।

प्रश्न 68:
अवधी भाषा में लिखे गये दो प्रमुख महाकाव्यों और उनके रचनाकारों का नाम लिखिए।
उत्तर:
अवधी भाषा में लिखे गये दो प्रमुख महाकाव्यों के नाम हैं

  1.  ‘पद्मावत’ (मलिक मुहम्मद जायसी) तथा
  2. श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास)।

प्रश्न 69:
द्वैतवाद के प्रवर्तक का नाम लिखिए।
उत्तर:
द्वैतवाद के प्रवर्तक श्री मध्वाचार्य हैं।

रीतिकाल

प्रश्न 70:
रीतिकाल का यह नाम क्यों पड़ा?
उत्तर:
संस्कृत काव्य – शास्त्र में रीति शब्द काव्यांश विशेष का सूचक रहा है। हिन्दी आचार्यों ने रीति का प्रयोग कवित्त – रीति, कवि – रीति, काव्य – रीति, अलंकार-रीति, रस – रीति, मुक्तक-रीति आदि के लिए किया है। सामान्यतया रीति शब्द काव्य – रचना की पद्धति के लिए प्रयुक्त होता है। रीति – निरूपण के निमित्त रचना में प्रवृत्त होने के कारण इसे ‘रीतिकाल’ की संज्ञा दी गयी।

प्रश्न 71:
रीतिकाल की प्रमुख साहित्यिक विशेषताएँ बताइए।
या
रीतिकालीन काव्य की प्रमुख विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) लिखिए।
उत्तर:

  1.  राज्याश्रित कवियों द्वारा लक्षण-लक्ष्य पद्धति पर काव्य-रचना की गयी (इस प्रकार की रचना करने वाले कवि रीतिबद्ध कहलाए)।
  2. कुछ कवियों ने उपर्युक्त पद्धति; अर्थात् रीति पद्धति का तिरस्कार क़र स्वतन्त्र काव्य-रचना की (ऐसे कवि रीतिमुक्त कहलाए)।
  3. श्रृंगार रस की प्रधानता, परन्तु वीर रस का भी ओजस्वी वर्णन।
  4.  मुख्यत: मुक्तक शैली एवं ब्रज भाषा का प्रयोग।
  5. भाव पक्ष की अपेक्षा कला पक्ष पर बल।

प्रश्न 72:
रीतिबद्ध काव्य के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए इस प्रवृत्ति की किन्हीं दो रचनाओं और उसके रचयिताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जिस काव्य में काव्य-तत्त्वों का लक्षण देकर उदाहरण रूप में काव्य-रचनो प्रस्तुत की जाती है,
उसे रीतिबद्ध काव्य’ कहते हैं। इस प्रवृत्ति की रचनाओं और उनके रचयिताओं के नाम हैं

  1. रस-विलास – आचार्य चिन्तामणि तथा
  2. कविप्रिया-आचार्य केशवदास।

प्रश्न 73:
हिन्दी में रीतिबद्ध और रीतिमुक्त कविता का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
या
रीतिकाव्य कितनी धाराओं में विभाजित है? किन्हीं दो काव्यधाराओं के एक-एक प्रमुख कवि का नाम लिखिए।
या
रीतिकालीन साहित्य को किन दो वर्गों में विभाजित किया गया है?
उत्तर:
रीतिकाव्य मुख्य रूप से दो धाराओं – रीतिबद्ध और रीतिमुक्त – में विभाजित है। एक अन्य गौण विभाजन रीतिसिद्ध भी है। रीतिबद्ध काव्य के अन्तर्गत वे ग्रन्थ आते हैं, जिनमें काव्य-तत्त्वों के लक्षण देकर उदाहरण के रूप में काव्य – रचनाएँ की जाती हैं, जब कि रीतिमुक्त काव्यधारा की रचनाओं में रीति-परम्परा के साहित्यिक बन्धनों एवं रूढ़ियों से मुक्त; स्वच्छन्द रचनाएँ। रीतिमुक्त काव्यधारा के कवियों में घनानन्द का और रीतिबद्ध काव्यकारों में आचार्य चिन्तामणि को प्रमुख स्थान है।

प्रश्न 74:
रीतिकाल के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
रीतिकाल के दो महत्त्वपूर्ण कवियों के नाम बताइए।
उत्तर:
केशवदास, बिहारीलाल, देव एवं घनानन्द।

प्रश्न 75:
रीतिकाल में वीर रस का प्रमुख कवि कौन था? उसकी एक रचना का नाम लिखिए।
या
रीतिकाल के किस कवि ने वीर रस की रचना लिखी है? यी भूषण किस रस के कवि थे?
उत्तर:
रीतिकाल में वीर रस में रचना करने वाले प्रमुख कवि ‘भूषण’ थे। उनकी प्रमुख रचना का नाम है-‘शिवराज भूषण’।।

प्रश्न 76:
केशवदास की दो प्रमुख काव्य-रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  रामचन्द्रिका तथा
  2.  कविप्रिया।।

प्रश्न 77:
रीतिकाल की दो काव्यकृतियों और उनके रचनाकारों के नाम लिखिए।
या
रीतिकाल के किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए और उनकी एक-एक रचना भी लिखिए।
या
रीतिकाल के एक प्रमुख कवि तथा उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  सतसई-बिहारी तथा
  2.  रामचन्द्रिका केशवदास।

प्रश्न 78:
रीतिकाल के चार रीतिबद्ध कवियों के नाम लिखिए।
या
रीतिकाल की रीतिबद्ध काव्यधारा के किन्हीं दो कवियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. चिन्तामणि,
  2. मतिराम,
  3. भूषण तथा,
  4. देवा ।

प्रश्न 79:
रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  घनानन्द,
  2.  ठाकुर,
  3.  बोधा,
  4.  आलम।

प्रश्न 80:
रीतिमुक्त काव्यधारा की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रीतिमुक्तरीतिमुक्त काव्य की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1.  रीतिमुक्त काव्यों में हृदय की शुचिता और पावनता की ही अभिव्यक्ति हुई है।
  2.  रीतिमुक्त काव्यों में भावपक्ष की प्रधानता है, अलंकारादि की बाह्य अतिरंजक प्रवृत्ति नहीं हुई है।

प्रश्न 81:
रीतिकाव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा।
  2.  श्रृंगार और वीर रस की प्रधानता।
  3. रीतिकाल की कविता का प्रमुख स्वर श्रृंगार का था।
  4.  रीतिकाल के कवियों ने नारी को भोग्या रूप में प्रस्तुत किया।

प्रश्न 82:
रीतिकाल के किन्हीं दो आचार्य कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. आचार्य केशव-रामचन्द्रिका तथा
  2. आचार्य चिन्तामणि-रस-विलास।।

प्रश्न 83:
रीतिकाल में काव्य-रचना जिन छन्दों में की गयी है उनमें से दो प्रमुख छन्दों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कवित्त तथा
  2.  सवैया।।

प्रश्न 84:
बिहारी तथा घनानन्द्र ‘रीतिकाल की किस धारा के कवि हैं?
उत्तर:
बिहारी रीतिबद्ध काव्यधारा के तथा घनानन्द रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं।

प्रश्न 85:
निम्नलिखित कृतियों में कौन-सी दो रीतिकाल की रचनाएँ नहीं हैं
(क) उद्धवशतक,
(ख) शिवराजभूषण,
(ग) ललित ललाम,
(घ) गीतिका।
उत्तर:
उद्धवशतक तथा गीतिको।

प्रश्न 86:
‘कठिन काव्य का प्रेत’ किस कवि को कहा जाता है? उस कवि द्वारा रचित महाकाव्यात्मक कृति का नाम लिखिए
उत्तर:
कठिन काव्य का प्रेत ‘रीतिकालीन कवि आचार्य केशवदास को कहा जाता है। इनकी महाकाव्यात्मक कृति का नाम ‘रामचन्द्रिका’ है।

प्रश्न 87:
“सिवा को सराह, के सराह छत्रसाल को” उक्ति किसने कही थी?
उत्तर:
प्रश्न में उल्लिखित उक्ति महाकवि भूषण ने कही थी।

प्रश्न 88:
किस काल को गद्यकाल की संज्ञा दी गयी हैं।
उत्तर:
कविता के आधुनिककाल को गद्यकाल की संज्ञा दी गयी है।

आधुनिककाल

प्रश्न 89:
कविता के आधुनिककाल के प्रथम युग का नाम लिखिए तथा उस युग के एक प्रमुख कवि (प्रवर्तक कवि) का नाम बताइट।
उत्तर:
कविता के आधुनिककाल का प्रथम युग – भारतेन्दु युग। प्रमुख कवि – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।

प्रश्न 90:
‘नवजागरण का अग्रदूत’ किस कवि को कहा जाता है? उसके द्वारा सम्पादित किसी एक पत्रिका का नाम लिखिए।
उत्तर:
नवजागरण का अग्रदूत आधुनिक युग के प्रवर्तक कवि-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को कहा जाता है। इनके द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ है।

प्रश्न 91:
पुनर्जागरण काल (भारतेन्दु युग) का समय लिखिए।
उत्तर:
सन् 1857 से 1900 ई० तक।

प्रश्न 92:
हिन्दी काव्य में आधुनिक युग कब से माना जाता है?
उत्तर:
हिन्दी काव्य में आधुनिक युग सन् 1843 से माना जाता है।

प्रश्न 93:
भारतेन्दु युग के दो कवियों के नाम उनकी एक-एक रचना सहित लिखिए।
या
पुनर्जागरण काल की एक काव्यकृति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ – प्रेमघन सर्वस्व तथा
  2.  प्रतापनारायण मिश्र – प्रताप लहरी।

प्रश्न 94:
निम्नलिखित में से किन्हीं दो की एक-एक प्रसिद्ध काव्य-रचना का नाम लिखिए
(1) महादेवी वर्मा,
(2) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’,
(3) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,
(4) केशवदास।
उत्तर:

  1. महादेवी वर्मा – ‘दीपशिखा’।
  2. सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ – ‘परिमल’।
  3.  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र  –  ‘प्रेम-फुलवारी’।
  4.  केशवदास  –  ‘रामचन्द्रिका’।

प्रश्न 95:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
आधुनिककाल के दो महाकाव्यों और उनके रचयिताओं के नाम बताइए।
या
द्विवेदी युग के किसी एक महाकाव्य का नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) साकेत – मैथिलीशरण गुप्त।
(2) प्रियप्रवास  – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।

प्रश्न 96:
द्विवेदीयुगीन कविता की दो प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों) का वर्णन कीजिए।
या
द्विवेदी युग के काव्य की दो विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के काव्य की दो विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) निम्नलिखित हैं

  1.  काव्य में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली की प्रतिष्ठा हुई।
  2. स्वदेश प्रेम तथा स्वदेशी गौरव पर काव्य-रचनाएँ की गयीं।

प्रश्न 97:
कविता के आधुनिकंकाल के द्वितीय युग का नाम तथा उस युग के एक प्रमुख कवि तथा एक रचनों का नाम लिखिए।
उत्तर:
आधुनिककाल के द्वितीय’ युग का नाम ‘द्विवेदी युग’ है। कवि-मैथिलीशरण गुप्त; रचना–साकेत।

प्रश्न 98:
द्विवेदी युग की समयसीमा बताइए।
उत्तर:
द्विवेदी युग की समय-सीमा 1900 ई० से 1918 ई० तक है।।

प्रश्न 99:
छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों) का उल्लेख करते हुए किन्हीं दो छायावादी कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  मूलतः सौन्दर्य और प्रेम का काव्य,
  2.  प्रकृति का मानवीकरण,
  3.  अज्ञात के प्रति जिज्ञासा (रहस्यवादी प्रवृत्ति),
  4.  नारी की महिमा का वर्णन,
  5. राष्ट्रीयता की भावना,
  6.  वैराग्य, वेदना और पलायनवादिता,
  7. प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता,
  8.  चित्रात्मकता,
  9.  प्रगतिमयता तथा
  10.  खड़ी बोली का अतिशय परिमार्जन।।

दो छायावादी कवियों के नाम – (1) जयशंकर प्रसाद तथा (2) सुमित्रानन्दन पन्त।

प्रश्न 100:
छायावादी कविता के हास के कारण लिखिए।
उत्तर:
विदेशी शासन के दमन के कारण जनसाधारण की निरन्तर बढ़ती पीड़ा छायावाद के ह्रासं का मुख्य कारण बनी। इस दमन को देखकर कविगण कल्पना लोक से उबरकर यथार्थ के कठोर धरातल पर आ गये। संक्षेप में, छायावादी कविता के ह्रास के कारण इस प्रकार हैं

  1. (1) छायावादी कविता में सूक्ष्म और वायवीय कल्पनाओं की अधिकता थी।
  2. (2) स्थूल जगत् की कठोर वास्तविकता से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था।
  3. (3) समाज में पूँजी के विरुद्ध आवाज उठ रही थी, इसलिए अतिशय कल्पना को छोड़ रोटी, कपड़ा और मकान कविता का विषय बनने लगे थे।

प्रश्न 101:
छायावाद काल की समय-सीमा बताइए।
उत्तर:
सन् 1918 से 1938 ई० तक का समय, छायावाद के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 102:
छायावाद के चार कवि और उनकी दो-दो रचनाएँ लिखिए।
या
छायावाद युग के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
छायावाद के दो कवियों के नाम बताइए और उनकी एक-एक रचना का उल्लेख कीजिए।
या
जयशंकर प्रसाद की दो काव्य-कृतियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  जयशंकर प्रसाद कामायनी; आँसू,
  2. सुमित्रानन्दन पन्ते – पल्लव; ग्राम्या,
  3. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ – परिमल; गीतिका,
  4.  महादेवी वर्मा – दीपशिखा; सान्ध्य – गीत।

प्रश्न 103:
गुसाईंदत्त को कवि के रूप में किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
गुसाईंदत्त को कवि के रूप में “सुमित्रानन्दन पन्त” के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 104:
दो रहस्यवादी कवि और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सुमित्रानन्दन पन्त कृत ‘पल्लव’ तथा
  2. महादेवी वर्मा कृत ‘दीपशिखा’।

प्रश्न 105:
निम्नलिखित कवियों की एक-एक प्रमुख रचना का नाम लिखिए-जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, सुमित्रानन्दन पन्त।
उत्तर:

  1. जगन्नाथदास रत्नाकर’, रचना – गंगावतरण।
  2. सुमित्रानन्दन पन्त, रचना – चिदम्बरा।

प्रश्न 106:
निम्नलिखित कवियों में से किन्हीं दो द्वारा रचित एक-एक प्रमुख काव्यग्रन्थ का नाम लिखिए –
(1) सुमित्रानन्दन पन्त,
(2) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’,
(3) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,
(4) रामधारी सिंह “दिनकर।
उत्तर:

  1.  चिदम्बरा,
  2.  कितनी नावों में कितनी बार,
  3.  प्रियप्रवास तथा
  4.  कुरुक्षेत्र।

प्रश्न 107:
आधुनिक युग के किसी एक महाकाव्य और उसके रचनाकार का नाम लिखिए।
या
‘कामायनी’ महाकाव्य के रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर:
महाकाव्य-कामायनी; रचनाकार – जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 108:
प्रगतिवादी कविता की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
प्रगतिवादी काव्य की दो प्रमूख प्रवृत्तियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. साम्यवाद का काव्यात्मक रूपान्तर (अर्थात् मार्क्स और रूस को गुणगान, पूँजीवाद का विरोध एवं कृषक-मज़दूर-राज्य की स्थापना का स्वप्न),
  2. यथार्थवाद,
  3.  परम्पराओं और रूढ़ियों का विरोध,
  4.  धर्म और ईश्वर में अविश्वास,
  5.  श्रम की महत्ता की स्थापना,
  6. शोषितों के प्रति सहानुभूति,
  7.  वेदना और निराशा,
  8.  नारी के प्रति आधुनिक यथार्थवादी दृष्टिकोण,
  9. जन-भाषा का आग्रह तथा
  10.  छन्दों और अलंकारों का बहिष्कार।

प्रश्न 109:
प्रगतिवाद के प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
नागार्जुन (युगधारा), केदारनाथ अग्रवाल (युग की गंगा), शिवमंगल सिंह ‘सुमन (प्रलय-सृजन), त्रिलोचन शास्त्री (धरती)।

प्रश्न 110:
‘प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता मुंशी प्रेमचन्द ने कहाँ और कब की थी?
उत्तर:
सन् 1936 ईसवी में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन’ के समय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। मुंशी प्रेमचन्द ने इस संस्था के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

प्रश्न 111:
प्रगतिवादी युग के दो कवियों तथा उनकी एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
छायावादोत्तर काल के किसी एक कवि तथा उनकी रचना का नाम-निर्देश कीजिए।
उत्तर:

  1.  रामधारी सिंह ‘दिनकर’-उर्वशी तथा
  2. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’–विन्ध्य हिमालय से।

प्रश्न 112:
छायावादोत्तर काल की कविता का काल-विभाजन लिखिए।
उत्तर:

  1. प्रगतिवाद, प्रयोगवाद (1938 – 1959 ई०);
  2.  नयी कविता का काल (1959 ई० से वर्तमान तक)।

प्रश्न 113:
प्रयोगवादी कविता की दो मुख्य विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) बताइए।
या।
छायावादोत्तर काल की काव्य-प्रवृत्तियाँ लिखिए।
उत्तर:

  1. अति वैयक्तिकता,
  2. निराशा, कुण्ठा और घुटन,
  3.  फ्रायड के प्रभाववश नग्न यौन-चित्रण,
  4. अतियथार्थवाद (नग्न यथार्थ),
  5.  पराजय, पलायन और वेदना,
  6. बौद्धिकता,
  7.  क्षण का महत्त्व,
  8.  अवचेतन के यथावत् प्रकाशन का आग्रह,
  9. अनगढ़ भाषा का प्रयोग एवं
  10. नया शिल्पविधान (नये उपमानों, बिम्बों, प्रतीकों का प्रयोग तथा छन्दहीनता का आग्रह)।

प्रश्न 114:
प्रयोगवाद से आप क्या समझते हैं? ‘नयी कविता’ क्या है?
उत्तर:
सन् 1943 में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ की कविताओं में नये बिम्ब-विधानों, नये अलंकारों और नयी भावाभिव्यक्ति को अपनाया गया। काव्य की इसी नयी विधा को ‘प्रयोगवादी काव्य’ के नाम से अभिहित किया गया। नयी कविता इस प्रयोगवादी कविता का ही विकसित रूप है।

प्रश्न 115:
प्रयोगवादी काव्यधारा का नेतृत्व करने वाले कवि का नामोल्लेख कीजिए और उनके एक प्रमुख प्रकाशन का नाम लिखिए।
या
अज्ञेय का पूरा नाम लिखिए। उन्हें किस काव्य-कृति पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था?
उत्तर:
प्रयोगवादी काव्यधारा का नेतृत्व करने वाले कवि सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हैं। इन्होंने ‘तारसप्तक’ नामक एक काव्य-संकलन सन् 1943 ई० में प्रकाशित किया। ‘कितनी नावों में कितनी बार इनकी एक प्रमुख रचना है, जिस पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार की प्राप्ति हुई है।

प्रश्न 116:
तारसप्तक के कवियों के नाम लिखिए।
या
हिन्दी में प्रयोगवादी काव्यधारा के किन्हीं चार कवियों के नाम लिखिए।
या
किन्हीं दो प्रयोगवादी कवियों के नाम लिखिए।
या
सप्तक परम्परा के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, गजानन माधव मुक्तिबोध’, गिरिजाकुमार माथुर, प्रभाकर माचवे, नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण और रामविलास शर्मा। सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने। इन सात कवियों की रचनाएँ ‘तारसप्तक’ के नाम से सन् 1943 ई० में प्रकाशित कीं।

प्रश्न 117:
‘तारसप्तक’ का प्रकाशन किसने और किस समय किया? इसके सम्पादक कौन थे?
या
‘तारसप्तक का सम्पादन प्रथम बार कब और किसने किया?
उत्तर:
श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने सन् 1943 ई० में अपनी पीढ़ी के अन्य छह कवियों के सहयोग से ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन किया। इसके सम्पादक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ स्वयं थे।

प्रश्न 118:
‘तारसप्तक’ की कविताएँ किस काव्यधारा से सम्बन्धित हैं?
उत्तर:
‘तारसप्तक’ की कविताएँ प्रयोगवादी काव्यधारा से सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 119:
दूसरा सप्तक में संकलित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
दूसरा सप्तक सन् 1951 ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित कवियों के नाम हैं-भवानी प्रसाद मिश्र, शकुन्त माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती।

प्रश्न 120:
तीसरा सप्तक कब प्रकाशित हुआ? संकलित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तीसरा सप्तक सन् 1959 ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित कवियों के नाम हैंप्रयागनारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विजय देवनारायण साही तथा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

प्रश्न 121:
चौथा सप्तक कब प्रकाशित हुआ? इसमें संकलित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सन् 1979 में चौथा सप्तक प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित कवियों के नाम हैं-अवधेश कुमार, राजकुमार कुम्भज, स्वदेश भारती, नन्दकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा तथा राजेन्द्र किशोर।

प्रश्न 122:
गजानन माधव मुक्तिबोध’ किस सप्तक में संकलित हैं?
उत्तर:
गजानन माधव मुक्तिबोध’ सन् 1943 में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ में संकलित हैं।

प्रश्न 123:
प्रयोगवादी काव्य की पाँच रचनाओं और रचयिताओं के नाम लिखिए।
या
प्रयोगवादी काव्यधारा के किन्हीं दो कवियों की एक-एक रचना का उल्लेख कीजिए।
या
गजानन माधव मुक्तिबोध की किसी एक काव्य-कृति का नाम लिखिए।
उत्तर:
भग्नदूत (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय’), चाँद का मुंह टेढा (गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’); ओ अप्रस्तुत मन (भारतभूषण अग्रवाल), धूप के धान (गिरिजाकुमार माथुर), गीतफरोश (भवानीप्रसाद मिश्र)।

प्रश्न 124:
आधुनिक युग की कविता की चार मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1.  यथार्थ का उन्मुक्त चित्रण,
  2. नारी-मुक्ति का आह्वान,
  3. लघुता के प्रति सजगता और
  4. गेय तत्त्व की अवहेलना।।

प्रश्न 125:
आधुनिक कविता के प्रमुख वादों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, हालावाद, स्वच्छन्दतावाद आदि आधुनिक कविता के प्रमुख वाद हैं।

प्रश्न 126:
नयी कविता से आप क्या समझते हैं?
या
‘नयी कविता’ पत्रिका के सम्पादक का नाम लिखिए तथा इस पत्रिका का सर्वप्रथम प्रकाशन वर्ष लिखिए।
उत्तर:
नयी कविता का आरम्भ सन् 1954 ई० में जगदीश गुप्त और डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादन में नयी कविता के प्रकाशन से हुआ। यह कविता किसी वाद से बँधकर नहीं चलती।

प्रश्न 127:
नयी कविता को अकविता क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
नयी कविता परम्परागत कविता के स्वरूप से नितान्त भिन्न हो गयी है। यह किसी वाद या दर्शन से जुड़ी नहीं है, इसलिए इसे अकविता कहा जाता है।

प्रश्न 128:
नयी कविता की किन्हीं दो प्रमुख रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  युग की गंगा-केदारनाथ अग्रवाल तथा
  2. बूंद एक टपकी-भवानीप्रसाद मिश्र।

प्रश्न 129:
‘नयी कविता’ से सम्बन्धित किन्हीं दो पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कल्पना’ तथा
  2. ज्ञानोदय’।

प्रश्न 130:
नयी कविता के पाँच प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
उत्तर:
जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, लक्ष्मीकान्त वर्मा तथा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

प्रश्न 131:
नयी कविता की विंडोषताओं (प्रवृत्तियों) का उल्लेख करते हुए किन्हीं दो प्रतिनिधि कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर;
नयी कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं

  1. यथार्थता,
  2. वर्जनाओं से मुक्ति (अर्थात् सामाजिक मर्यादाओं एवं बन्धनों का तिरस्कार करके नि:संकोच अश्लील चित्रण),
  3.  हृदयपक्ष की अपेक्षा बुद्धिपक्ष की प्रधानता,
  4. निराशा तथा अवसाद (खिन्नता), की प्रबलता,
  5. खिचड़ी भाषा, जिसमें हिन्दी की विभिन्न बोलियों, प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी आदि के शब्दों का घालमेल,
  6.  प्रतीकों, बिम्बों एवं मुक्त छन्द पर बल। नयी कविता के दो प्रतिनिधि कवि हैं – जगदीश गुप्त और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

प्रश्न 132:
नवगीत’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
नवगीत’ छायावादी एवं प्रगतिवादी दोनों ही काव्यों की कई विशेषताओं से युक्त ऐसा काव्य है, जिसमें आधारभूत चेतना, जीवन-दृष्टि, भाव-भूमि एवं अभिव्यंजना शैली की व्यापकता, सूक्ष्मता, विविधता, यथार्थता एवं लौकिकता का एकान्तिक संयोग हैं।

प्रश्न 133:
‘नवगीत’ की किन्हीं दो आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नवगीत की दो आधारभूत विशेषताएँ हैं

  1.  सर्वत्र भावानुकूल भाषा का प्रयोग तथा
  2.  स्वस्थ बिम्ब एवं प्रतीक विधान।

प्रश्न 134:
‘नवगीत’ के दो महत्त्वपूर्ण गीतकारों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
नवगीत के दो महत्त्वपूर्ण गीतकार और उनकी रचनाएँ हैं

  1.  शम्भूनाथ सिंह (‘उदयाचल’, ‘दिवालोक’, ‘समय की शिला पर’, ‘जहाँ दर्द नील हैं’ आदि।) तथा
  2.  वीरेन्द्र मिश्र (‘गीतम’, ‘लेखनी बेला’, ‘अविराम चल मधुवन्ति’ आदि।)

प्रश्न 135:
नवगीतधारा के प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
उत्तर:
रमानाथ अवस्थी, डॉ० शम्भूनाथ सिंह, श्रीपाल सिंह ‘क्षेम’, गुलाब खण्डेलवाल, सुमित्राकुमारी सिन्हा, शान्ति मेहरोत्रा, हंसकुमार तिवारी, सोम ठाकुर, गोपालदास नीरज’, वीरेन्द्र मिश्र तथा डॉ० कुँवर बेचैन।

प्रश्न 136:
साठोत्तरी कविता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
साठोत्तरी कविता मोह-भंग, आक्रोश, अस्वीकार, तनाव और विद्रोह की कविता है। इसका मुहावरा नया है, शैली बेपर्द है और इसमें जिजीविषा का गहरा रंग है।

प्रश्न 137:
साठोत्तरी कविता की किन्हीं दो आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साठोत्तरी कविता की दो आधारभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1.  अन्याय के विरुद्ध और शासन द्वारा कही जाने वाली चिकनी-चुपड़ी बातों की आक्रोशयुक्त स्वर में अभिव्यक्ति तथा
  2. व्यक्ति और उसके परिवेश की हर परत की बेपर्द अभिव्यक्ति।

प्रश्न 138:
साठोत्तरी कविता के किन्हीं दो प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साठ्येत्तरी कविता के दो महत्त्वपूर्ण कवि और उनकी रचनाएँ हैं

  1. धूमिल (‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’, ‘सुदामा पाण्डे का प्रजातन्त्र आदि) तथा
  2.  रामदरश मिश्र (‘पथ के गीत’, बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ’, ‘पक गयी है धूप’, ‘कन्धे पर सूरज’ आदि)।

प्रश्न 139:
‘नया दोहा’ के प्रमुख संकलनों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नया दोहा’ के प्रमुख संकलनों के नाम हैं

  1.  अमलतास की छाँव (पाल भसीन),
  2. आँखों खिले पलाश (पं० देवेन्द्र शर्मा इन्द्र’),
  3.  बटुक सतसई (विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक’),
  4. कालाय तस्मै नमः (भारतेन्दु मिश्र) आदि।

प्रश्न 140:
वर्तमान युग के पाँच जीवित कवियों के नाम लिखिए।
या
वर्तमान युग के किन्हीं दो जीवित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान युग के पाँच जीवित कवियों के नाम हैं-पं० देवेन्द्र शर्मा इन्द्र’, पाल भसीन, विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक’, भारतेन्दु मिश्र और दिवाकर आदित्य शर्मा।।

प्रश्न 141:
रीतिकाल के किसी एक भक्त कवि का नामोल्लेख करते हुए उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा का नाम लिखिए।
उत्तर:
बिहारी-परिमार्जितः ब्रजभाषा।

प्रश्न 142:
हिन्दी साहित्य के आधुनिक काव्य की दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. यथार्थपरक तथा मानक्तावादी दृष्टि तथा
  2.  जीवन के नए प्रतिमानों की स्थापना।

प्रश्न 143:
अवधी भाषा के किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास तथा मलिक मुहम्मद जायसी।

प्रश्न 144:
‘पद्मावत’ में जायसी द्वारा प्रयुक्त भाषा और शैली का नामोल्लेख कीजिए।
या
जायसी का ‘पद्मावत’ किस भाषा में लिखा गया है?
उत्तर:
भाषा-अवधी, शैली – प्रबन्ध शैली।

प्रश्न 145:
दो प्रमुख प्रयोगवादी कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
  2.  गजानन माधव मुक्तिबोध’।

प्रश्न 146:
छायावादोत्तर काल के किसी एक कवि तथा उनकी एक रचना का नाम निर्देश कीजिए।
उत्तर:
सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ -गीतिका।

प्रश्न 147:
‘कवितावर्धिनी सभा’ के संस्थापक तथा उसके मुखपत्र का नाम लिखिए।
उत्तर:
कवितावर्धिनी’ सभा के संस्थापक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे। इस सभा के मुखपत्र का नाम ‘कविवचन सुधा’ था।

प्रश्न 148:
जनवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जनवाद कला, साहित्य और जीवन के प्रति विशिष्ट दृष्टिकोण है, जो जनसामान्य को महत्त्व देता है। जनवाद मोटे तौर पर मार्क्सवाद से प्रेरित साहित्य है जिसका मूलाधार भौतिक दर्शन पर टिका हुआ है। कार्ल मार्स ने जो समाज और उसके विविध रूपों और विचारों की ऐतिहासिक व्याख्याएँ कीं, वे कला और साहित्य पर भी लागू होती हैं। ऐसे साहित्य की जो मार्क्सवादी विवेचना हुई, उसी से जनवाद का प्रादुर्भाव हुआ।

प्रश्न 149:
जनवादी कविता से आप क्या समझते हैं? इसकी आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जनवादी कविता में मानव के सामूहिक भावों की अभिव्यक्ति होती है। व्यक्ति-वैचित्र्य के लिए उसमें स्थान नहीं होता। रचनाकार में शक्ति जनता से आती है, जनता के साथ उसको सम्बन्ध जितना घनिष्ठ होता है, उसमें उतनी ही अधिक रचना-शक्ति आती है और उसकी रचना में उतना ही अधिक सौन्दर्य बढ़ता है। जिस कवि की दृष्टि मात्र अन्तर्मुखी न हो, जिस कवि की विषय-वस्तु में सिर्फ व्यक्ति-निष्ठ भावनाओं का चित्रण न हो। और जिस कवि के काव्य को सम्पर्क जनता के व्यापक जीवन से हो वही कवि जनवादी कवि होता है।

प्रश्न 150:
प्रमुख जनवादी कवियों और उनकी कतिपय रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
या
जनवादी कविता की वृहत्-त्रयी के लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जनवादी कविता के लेखकों की वृहतत्रयी नहीं है। वृहत्-त्रयी छायावादी रचनाकारों की मानी जाती है। प्रमुख जनवादी कवि और उनकी कतिपय रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. नागार्जुन – ‘युगधारा’, ‘सतरंगे पंखों वाली’, ‘प्यासी पथराई आँखें’, ‘भस्मांकुर’, ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’ आदि।
  2.  केदारनाथ अग्रवाल –  ‘नींद के बादल’, ‘युग की गंगा’, ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’, ‘गुल मेंहदी’, ‘कहै केदार खरी-खरी’, ‘आत्म-गंध’ आदि।
  3. धूमिल –  ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’, ‘मोचीराम’ आदि।
  4. त्रिलोचन – ‘मिट्टी की बारात’, ‘ताप के ताए हुए दिन’, उस जनपद का कवि हूँ’, ‘अरधान’, ‘धरती’, ‘तुम्हें सौपता हूँ’, ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’ आदि। इनके अतिरिक्त आलोक धन्वा, विनोद कुमार शुक्ल, कुमार विकल आदि भी जनवादी कवि हैं।

प्रश्न 151:
जायसी की दो काव्यकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पद्मावत तथा
  2. आखरी कलाम।

प्रश्न 152:
‘रसवन्ती के रचनाकार को नाम लिखिए।
उत्तर:
रामधारीसिंह ‘दिनकर’।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 12
Chapter Name Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय)
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
दुग्ध उद्योग के अनुकूल भौगोलिक सुविधाओं का वर्णन कीजिए। यह उद्योग विश्व में कहाँ-कहाँ होता है?
या
संसार में डेयरी उद्योग के प्रमुख देशों का उल्लेख कीजिए।
या
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग के विकसित होने के उत्तरदायी कारकों की समीक्षा कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए-न्यूजीलैण्ड का डेयरी उद्योग।
या
टिप्पणी लिखिएडेनमार्क का डेयरी उद्योग।
या
डेनमार्क में दुग्ध-व्यवसाय की समीक्षा उपयुक्त भौगोलिक दशाओं तथा उत्पादन के परिप्रेक्ष्य में कीजिए।
उत्तर

दुग्ध व्यवसाय Dairying

दुग्ध व्यवसाय पालतू पशुओं पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण उद्योग है। दूध की गणना सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार के रूप में की जाती है। दूध का उपयोग मक्खन, घी, पनीर आदि बनाने में किया जाता है। दूध को सुखाकर उससे दुग्ध-चूर्ण भी बनाया जाता है। शाकाहारी लोगों के भोजन का यह मुख्य एवं आवश्यक अंग है। जिन देशों के निवासी मांसाहारी नहीं होते, वे अपने आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति दूध एवं उससे निर्मित पदार्थों से करते हैं। शीत भण्डारण व्यवस्था प्रारम्भ हो जाने के बाद इस उद्योग ने बहुत प्रगति की है। अब यह व्यवसाय उपभोक्ता केन्द्रों से दूरवर्ती स्थानों पर भी किया जाने लगा है। दूध मुख्य रूप से भेड़, बकरी, गाय तथा भैंसों से प्राप्त किया जाता है। दूध को गाढ़ा करके जमाकर या सुखाकर डिब्बों में बन्द कर विदेशों को भी निर्यात किया जाता है। इसे डेयरी उद्योग के नाम से पुकारा जाता है।

दुग्ध उद्योग के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ
Favourable Geographical Conditions for Dairying

दुग्ध उद्योग केवल उन्हीं देशों में किया जाता है, जहाँ इस उद्योग के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ उपलब्ध हैं। इस उद्योग के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाएँ होनी चाहिए –
(1) समशीतोष्ण जलवायु – दुग्ध उद्योग के लिए शीतशीतोष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। यह उद्योग शीतकाल में 10° से 17°सेग्रे ताप वाले प्रदेशों या आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में अधिक विकसित होता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. आर्द्र जलवायु में पशु अधिक हृष्ट-पुष्ट रहते हैं।
  2. यह जलवायु मुलायम एवं हरी घास को उपजाने में सहायक होती है।
  3. इस जलवायु में दूध तथा उससे निर्मित पदार्थ बहुत समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं, क्योंकि शीतशीतोष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु इन्हें खराब होने से बचाती है।
  4. समुद्री नम जलवायु पशुओं की वृद्धि एवं विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है, क्योंकि ऐसी जलवायु में पशु वर्ष भर खुले मैदानों एवं चरागाहों में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते रहते हैं तथा उनके रख-रखाव पर अधिक व्यय नहीं करना पड़ता।

(2) उत्तम नस्ल के पशु – दुग्ध उद्योग पालतू पशुओं पर आधारित है। पशु जितनी अच्छी नस्ल के एवं दुधारू होंगे, दुग्ध उद्योग उतनी ही तीव्रगति से विकसित होगा। भारत में कम दूध देने वाले पशुओं के कारण ही दुग्ध उद्योग अभी तक बहुत अच्छी दशा में विकसित नहीं हो पाया है, जबकि डेनमार्क एवं न्यूजीलैण्ड में दुधारू गायों के कारण यह उद्योग बहुत अधिक विकसित हुआ है। इन देशों में एक गाय प्रतिदिन 40 से 50 लीटर दूध दे देती है।

(3) उत्तम चरागाह – हरी घास पशुओं का प्रिय खाद्य पदार्थ है। पशु चरागाहों में स्वच्छन्द रूप से घास चरते एवं विचरण करते रहते हैं। यही कारण है कि जिन देशों में उत्तम तथा विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं, वहाँ दुग्ध उद्योग बहुत उन्नत दशा में है। डेनमार्क, नार्वे, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड आदि देश इसके उत्तम उदाहरण हैं।

(4) पौष्टिक चारा – हरी घास के अतिरिक्त पशुओं को हरा चारा (गाजर, शलजम, चुकन्दर), भूसा, खली आदि पौष्टिक तत्त्व भी पर्याप्त मात्रा में मिलने चाहिए। पशुओं से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए उन्हें जौ, जई तथा मक्का आदि खाद्य पदार्थ खिलाये जाते हैं। पौष्टिक चारा खाकर पशु अधिक दूध देने लग जाते हैं। भारत में पौष्टिक चारे के अभाव के कारण चौपाये कम दूध देते हैं।

(5) खपत – दूध एवं दूध से बने पदार्थों की माँग अर्थात् खपत, दूध उत्पादक क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में ही होनी चाहिए जिससे यथाशीघ्र दुग्ध पदार्थों को बाजारों में भेजा जा सके। डेनमार्क, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं न्यूजीलैण्ड में दुग्ध उद्योग की उन्नति का यह महत्त्वपूर्ण कारण है।

(6) आवागमन के सुलभ साधन – दूध एवं दूध से बने पदार्थों को उत्पादन केन्द्रों से उनके बाजार एवं खपत केन्द्रों तक भेजने के लिए सस्ते, द्रुतगामी एवं सुलभ परिवहन के साधन होने चाहिए। जिन देशों में यह सुविधा उपलब्ध है, वहाँ दुग्ध उद्योग उन्नत दशा में है। विदेशों को दूध से बने पदार्थ । निर्यात करने के लिए जल यातायात सुलभ होना चाहिए; क्योंकि यह अन्य साधनों से सस्ता एवं सुगम रहता है।

(7) शीत भण्डारों की व्यवस्था – दूध एवं दूध से बने पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए देश में ही पर्याप्त शीत भण्डारों की व्यवस्था होनी चाहिए। डेनमार्क में शीत भण्डारों की पर्याप्त व्यवस्था की गयी है।

(8) स्वच्छ पेयजल की उपलब्धि – पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में पीने तथा उनसे सम्बन्धित अन्य कार्यों के लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। यह जल नदियों एवं झीलों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है; अत: दुग्ध व्यवसाय के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धि का होना अत्यावश्यक है।

(9) सहायक उद्योगों की स्थापना – दुग्ध उद्योग उन क्षेत्रों में शीघ्रता से विकसित हो जाता है, जहाँ पशुओं पर आधारित मांस, चमड़ा, खाद, घी, मक्खन एवं पनीर बनाने के उद्योग केन्द्रित हो जाते हैं। सहायक उद्योगों के विकसित होने पर दुग्ध पदार्थों की लागत व्यय घट जाती है। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा डेनमार्क में सहायक उद्योगों की स्थापना के कारण डेयरी उद्योग का तीव्रगामी विकास हुआ है।

विश्व के प्रमुख दुग्ध उत्पादक देश
Main Milk Producing Countries in the World

दुग्ध उत्पादन एवं उसके उपभोग में भारी विषमता पायी जाती है। इसका उत्पादन विरल आबाद क्षेत्रों में एवं उपभोग सघन आबाद क्षेत्रों में अधिक होता है। मोटे तौर पर सम्पूर्ण विश्व के दुग्ध उत्पाद का 34.5% यूरोप से, 30% एंग्लो-अमेरिका से, 20% CIS देशों से, 12.8% एशियाई देशों से, 3.7% ओशेनिया व 2.1% अफ्रीका से प्राप्त होता है।

(1) भारत – 1966 के बाद से भारत दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लि० प्रयास कर रहा था परन्तु इस देश को सफलता 1970 में लागू श्वेत क्रान्ति के बाद मिली। वर्तमान समय में यह विश्व का प्रथम दुग्ध उत्पादक देश है। भारत में गुजरात एवं उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्य हैं। सार्वजनिक एवं सहकारी क्षेत्र में यह व्यवसाय निरन्तर उन्नति कर रहा है।

(2) संयुक्त राज्य अमेरिका – यहाँ विश्व का 15% दूध, 8% मक्खन एवं 18% से अधिक पनीर उत्पादन किया जाता है। देश में 2.5 करोड़ से अधिक गाय हैं। विस्कांसिन, मिनीसोटा, न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क, पेन्सिलवेनिया, ओहियो, मिशिगन, मैरीलैण्डे तथा डेलावेयर राज्यों में दुग्ध उत्पादन विशेष विकसित है। यहाँ विस्तृत चरागाह, खाद्यान्नों को चारे के रूप में उपयोग, उत्तम पशु नस्लों का विकास, उत्तम वैज्ञानिक साधन एवं प्राविधिकी का प्रयोग, दुग्ध पदार्थों के निर्यात की सुविधाएँ आदि सुलभ होने के कारण दुग्ध व्यवसाय उन्नत है। यहाँ कुल दूध का 45% ताजे दूध, 35% मक्खन, 6% पनीर, 5% पाउडर, 6% संघनित (Condensed) रूप एवं आइसक्रीम बनाने में तथा शेष 3% पशुओं को पिलाने में प्रयुक्त होता है।

(3) पूर्व सोवियत संघ – यहाँ विश्व का 20% से अधिक दुग्ध, 18% से अधिक मक्खन एवं 13% से अधिक पनीर उत्पादन होता है। विशाल दुग्ध संयन्त्रों में क्रीम, दही, मक्खन, पनीर, गाढ़ा दूध एवं पाउडर दूध बनाये जाते हैं। यूक्रेन, अजरबैजान, जार्जिकया, एस्टोनिया आदि देशों में दुग्ध व्यवसाय विशेषत: प्रचलित है। पुगाचेव तथा कुइबी शेव में दुग्ध पाउडर बनाने के संयन्त्र स्थापित हैं।

(4) फ्रांस – यहाँ विश्व का 5% दूध तथा मक्खन एवं 10% पनीर उत्पादन होता है। औद्योगिक व सघन आबाद देश होने के कारण यहाँ दूध की बहुत माँग रहती है। शीतोष्ण जलवायु गो-पालन के लिए उपयुक्त है।
(5) जर्मनी – इस औद्योगिक, सघन आबाद देश में भी दूध की भारी माँग रहती है। वैज्ञानिक ढंग से गो-पालन करने से अधिक मात्रा में दूध उत्पादन होता है। यहाँ समस्त विश्व का लगभग 6% दूध प्राप्त होता है।
(6) पोलैण्ड – शीतोष्ण जलवायु तथा स्टेपी घास के प्रदेश होने के कारण यह देश गौ-पालन में यूरोप में तृतीय तथा दूध उत्पादन में (विश्व का 2.5% दूध) विश्व का दसवाँ देश है।

(7) हॉलैण्ड – प्राचीन काल से ही यहाँ रेतीली व दलदली पोल्डर भूमि में चरागाहों की प्रचुरता के कारण दुग्ध व्यवसाय विकसित है। इस देश का ‘एडाम पनीर’ विश्व विख्यात है। यहाँ विश्व का 2% दूध उत्पादन होता है। रॉटरडम के उत्तर में गोदा स्थान पर पनीर व्यवसाय उन्नत है। मक्खन, पनीर व संघनित दूध देश के प्रमुख निर्यात हैं।

(8) डेनमार्क – यूरोपीय देशों में डेनमार्क का दुग्ध व्यवसाय विख्यात है। यहाँ पदार्थों की मात्रा के बजाय गुण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ डेयरी व्यवसाय सहकारिता पर आधारित है। अनुर्वर भूमि होने के कारण यहाँ कृषि अविकसित है, खनिज संसाधनों का भी अभाव है; अतएव देश की अर्थव्यवस्था में दुग्ध व्यवसाय का विशेष महत्त्व है। मक्खन व पनीर के निर्यात से राष्ट्रीय आय का बड़ा भोग प्राप्त होता है। कुल दूध उत्पादन का 88% मक्खन तथा 10% पनीर बनाने व शेष की घरेलू खपत है।”
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग की उन्नति के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  1. डेनमार्क की समशीतोष्ण जलवायु दुग्ध उद्योग एवं पशुधन विकास के लिए बहुत श्रेष्ठ एवं अनुकूल है। ऐसी जलवायु में दूध एवं उससे निर्मित पदार्थ शीघ्र खराब नहीं होते।
  2. डेनमार्क में हरी घास के विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं, क्योकि डेनमार्क का पहाड़ी-पठारी धरातल घास उत्पादन के अधिक अनुकूल है तथा वहाँ घास उगाने की पूर्ण व्यवस्था कर ली गयी है।
  3. यहाँ पर छोटे-छोटे खेत कृषि-कार्य के लिए अनुपयुक्त हैं; अतः उन पर चारे वाली फसलें ही अधिक उगायी जाती हैं। इस प्रकार पशुओं को पौष्टिक चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाता है।
  4. डेनमार्क में उत्तम नस्ल की अधिक दूध देने वाली गायें पाली जाती हैं। एक गाय औसतन एक दिन में 40-50 लिटर दूध देती है। इन गायों का दूध मशीनों से दूहा जाता है।
  5. डेनमार्क में दुग्ध उद्योग का 90% कार्य 9 हजार सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है; अतः यहाँ उत्पादन की श्रेष्ठता पर विशेष ध्यान रखा जाता है।।
  6. डेनमार्क में दुग्ध उत्पादित मक्खन एवं पनीर की माँग विदेशों में बहुत अधिक रहती है, जिससे इस उद्योग को बहुत प्रोत्साहन मिला है।
  7. यहाँ का लगभग 80% दूध मक्खन बनाने में तथा 10% दूध पनीर में प्रयुक्त किया जाता है।

(9) ऑस्ट्रेलिया – ऑस्ट्रेलिया में विक्टोरिया व न्यू साउथ वेल्स प्रान्तों में व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक विधियों द्वारा गौ-पालन किया जाता है। यहाँ विस्तृत पशु फार्म, उत्तम नस्लें, प्रशीतन सुविधाओं तथा विस्तृत कृषि द्वारा चारा उगाने की व्यवस्था है। इसी कारण दुग्ध पदार्थों के निर्यात में ऑस्ट्रेलिया को विश्व में चतुर्थ स्थान प्राप्त है।

(10) न्यूजीलैण्ड – न्यूजीलैण्ड में दूध व्यवसाय का विकास उत्तरी द्वीप के आर्द्र भागों में हुआ है। टारानाकी मैदान, जिसबोर्न तथा ऑकलैण्ड क्षेत्र में, विशेष रूप से दुग्ध व्यवसाय विकसित है। इस द्वीपीय देश की आर्द्र शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, उत्तम नस्लों की गाय, विरल जनसंख्या, ब्रिटिश पूँजी तथा संरक्षण का लाभ प्राप्त होने के कारण यह व्यवसाय उन्नत हो गया है। दुग्ध पदार्थों के निर्यात से राष्ट्रीय आय की प्राप्ति होती है।

(11) दक्षिणी अमेरिका के देशों में प्रतिवर्ष 2 करोड़ 46 लाख मीट्रिक टन दूध उत्पादन होता है। महाद्वीप के कुल उत्पादन का 35% ब्राजील में तथा 30% के लगभग अर्जेण्टाइना में होता है। अधिक जनसंख्या के कारण ब्राजील में स्थानीय उपभोग अधिक होता है। अर्जेण्टाइना विश्व में दुग्ध पदार्थों के व्यापार में प्रमुख देश है। यहाँ पम्पा के समशीतोष्ण धारा के प्रदेशों में बड़े-बड़े पशु फार्मों पर व्यवस्थित ढंग से पशुपालन किया जाता है।
अन्य देशों में चीन, टर्की, मलेशिया, मैक्सिको, युगाण्डा, केन्या, तन्जानिया आदि में दुग्ध व्यवसाय विकसित किया जा रहा है।

प्रश्न 2
विश्व में मांस व्यवसाय के लिए आवश्यक दशाओं तथा उत्पादक देशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

गोमांस Beef

विश्व में कुल मांस का 47% गाय व बछड़ों से प्राप्त होता है। गोमांस उत्पादन के लिए वे सभी भौगोलिक दशाएँ उपयुक्त होती हैं जो दुग्ध व्यवसाय के लिए आवश्यक हैं; संयुक्त राज्य, पूर्व सोवियत संघ, अर्जेण्टाइना, ब्राजील, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया एवं पश्चिमी जर्मनी प्रमुख गोमांस उत्पादक देश हैं।

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – यहाँ विश्व का 20.7% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है। गो-पालन का पूर्वारम्भ यहाँ देश के उत्तरी-पूर्वी (न्यू-इंग्लैण्ड) राज्यों में किया गया, जो क्रमशः पश्चिमी मैदान की ओर स्थानान्तरित हुआ। मक्का की पेटी एवं टैक्सास राज्य में मांस वाले मवेशियों की संख्या अधिक है। शिकागो विश्व की सबसे बड़ी मांस की मी हाँ प्रति घण्टे 2,500 पशु वध की व्यवस्था है। ओमाहा, कन्सास फ्टिी, साउथ सेन्टपॉल, डेनवर आदिनमर गोमांस के प्रमुख केन्द्र हैं।

(2) ब्राजील – गौमांस उत्पादन में ब्राज़ील विश्व में द्वितीय स्थान पर है, यद्यपि कुल मांस उत्पादन में कालस्थान है।हाँ विश्व का लगभग 12.2% गोमांस प्राप्त होता है। देश के दक्षिणी भाग, ब्राजीलिया पठारावे, तटीय-भाग मुख्य पशुपालक प्रदेश हैं। रायोग्रान्डे में पैकिंग संयन्त्र स्थापित हैं तथा अधिकांश निर्यात अहीसे होता है।

(3) चीन – यहाँ विश्व को 11.4% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है। अधिकांश उत्पादन यहाँ स्थानीय उपभोग के लिए होता है।
(4) भारत – विश्व के गोमांस उत्पादकों में भारत चौथे स्थान पर है। यद्यपि भारत में गायों की संख्या अधिक है तथापि धार्मिक कारणों से यहाँ विश्व का लगभग 4.6% गोमांस ही उत्पादित होता है।

(5) अर्जेण्टाइना – मांस उत्पादन में विश्व का पाँचवाँ गोमांस उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 4.6% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है जो देश के कुल मांस का 80% है। यहाँ मांस वाले मवेशी अधिक संख्या में पाले जाते हैं। अधिक मांस प्रदान करने वाली उत्तम नस्लों को प्राथमिकता दी जाती है। चाको व पम्पा प्रदेश की शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, अल्प जनसंख्या, अल्फाल्फा चारे का उत्पादन आदि उत्तम भौगोलिक सुविधाएँ ही मांस उत्पादन के लिए प्रेरक हैं। यह देश संसार के कुल मांस का 30% निर्यात व्यापार करता है। ब्यूनस आयर्स तथा रोजारियो मांस की प्रमुख मण्डियाँ हैं।

(6) ऑस्ट्रेलिया – यह गोमांस उत्पादन में विश्व में सातवें स्थान पर है। यहाँ विश्व का % गोमांस उत्पादन होता है। क्वीन्सलैण्ड राज्य के पूर्वी तटीय भाग, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया एवं पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में विस्तृत पशु फार्म पाये जाते हैं। एक फार्म में प्राय: 50 हजार पशु रखे जाते हैं। विन्ढम तथा टाउन्स विले प्रमुख गोमांस की मण्डियाँ हैं। जनसंख्या अल्प होने के कारण मांस के निर्यात व्यापार में ऑस्ट्रेलिया का विशेष योगदान है।

(7) CIS देश – यहाँ विश्व का 4% गोमांस उत्पादन होता है। यूरोपीय रूस में क्रास्नोदर, विन्नित्सा, ब्रियांस्क, लेनिनग्राड, मास्को आदि एवं एशिया में कारागण्डा, अल्माटुआटा, दुशानबे, फुन्जे, खाबरोव्स्क, अशखाबाद, इर्कुट्स्क, ओमस्क, पेट्रोपावलोव्स्क, सेमि-पलातिंस्क, ओर्क, स्वर्डलोव्स्क, लेनिनाबाद, बाकू आदि प्रमुख गोमांस केन्द्र हैं। यहाँ मांस हिमीकरण (freezing), डिब्बाबन्दी (canning), तथा पैकिंग के संयन्त्र स्थित हैं।

(8) फ्रांस – यहाँ विश्व का लगभग 3% गोमांस प्राप्त होता है।
(9) जर्मनी – यहाँ विश्व का 2.5% गोमांस प्राप्त होता है।
(10) न्यूजीलैण्ड – यहाँ गो-पालन मांस के उद्देश्य से अधिक किया जाता है। उत्तरी द्वीप की जलवायु गायों के लिए उपयुक्त है। ऑकलैण्ड एवं वेलिंगटन मांस की प्रमुख मण्डियाँ व पत्तन हैं।
अन्य उत्पादकों में कनाडा, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान आदि हैं।

विश्व व्यापार World Trade
गोमांस के निर्यातक देशों में अर्जेण्टाइना प्रथम है। न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, डेनम, संयुक्त राज्य अन्य निर्यातक देश हैं। यूरोपीय देश मांस के प्रमुख आयातक हैं। जर्मनी, फ्रांस, इटली व ब्रिटेन प्रमुख आयातक हैं।

सूअर का मांस Pork

विश्व के कुल मांस उत्पादन में लगभग 44% सूअर का मांस ही है। धार्मिक कारणों से मुस्लिम देशों को छोड़कर विश्व में सर्वत्र सूअर पालन होता है। प्रायः सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में सूअर पालन अधिक प्रचलित है, क्योंकि इसकी प्रजनन शक्ति तीव्र होती है, यह सड़े-गले फेंके गये भोजन, विष्ठा, मलआदि से पेट भर लेता है। डेयरी व्यवसाय वाले क्षेत्रों में मक्खन-रहित दूध तथा मक्का खिलाकर व्यवस्थित रूप से सूअर पालन किया जाता है।
सूअर पालन के क्षेत्र – विश्व के प्रमुख सूअरपालक देश चीन, सोवियत रूस, संयुक्त राज्य, यूरोपीय देश एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील तथा अर्जेण्टाइना हैं।

  1. चीन – विश्व में सूअर मांस उत्पादकों में चीन का प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व का लगभग 47% सूअर मांस उत्पादन होता है। देश का 80% मांस सूअर से ही प्राप्त होता है। चीन के सभी प्रान्तों में सूअर पालन होता है, किन्तु अनाहवेई, क्वांगतुंग, जेचवान तथा होपे प्रान्तों में विशेष रूप से सूअर पाले जाते हैं। प्राय: प्रत्येक कृषक परिवार अपनी खाद्य आवश्यकता की पूर्ति के लिए सूअर पालता है।
  2. संयुक्त राज्य – मक्का की पेटी के क्षेत्र में सूअरपालन अधिक किया जाता है। ओहियो का सिनसिनाती नगर सूअर मांस की विश्व प्रसिद्ध मण्डी है। आयोवा, इलीनोयस, कन्सास, नेब्रास्का व इण्डियाना राज्य भी सूअर मांस उत्पादन में उल्लेखनीय हैं। मांस पैकिंग के प्रमुख केन्द्र सिनसिनाती, शिकागो, सेंट लुई, कन्सास सिटी, ओकलाहीमा तथा मिलबँकी हैं। यहाँ से चर्बी (lard) का भी निर्यात किया जाता है। लार्ड हॉग केन्द्र से संयुक्त राज्य का 30% तथा विश्व का 9.5% सूअर मांस प्राप्त होता है।
  3. रूस – यह विश्व का द्वितीय सूअर मांस उत्पादक देश है। यहाँ से विश्व का 14% सूअर मांस प्राप्त होता है जो देश के कुल मांस उत्पादन का 40% है। यूरोपीय रूस में सूअर पालन अधिक प्रचलित है।

यूरोपीय देशों में जर्मनी, ब्रिटेन, पोलैण्ड, फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन व यूगोस्लाविया आदि देश सूअर पालन में उल्लेखनीय हैं। जर्मनी के दक्षिणी-पश्चिमी वन प्रदेशों में, यूगोस्लाविया के ओक तथा बीच के वनों में, बाल्टिक तटवर्ती जौ उत्पादक क्षेत्रों में, दक्षिणी-पश्चिमी फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, दक्षिणी इंग्लैण्ड तथा वेल्स में सूअर मांस उत्पादन होता है।
अन्य उत्पादकों में ब्राजील, मैक्सिको, दक्षिणी अफ्रीका, अर्जेण्टाइना, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड हैं। भारत में भी सूअर पालन किया जाता है।

विश्व व्यापार World Trade
सूअर-मांस के मुख्य निर्यातक देश संयुक्त राज्य, जर्मनी, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना व ऑस्ट्रेलिया हैं। आयातक देशों में ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम व अन्य यूरोपियन देश हैं। सूअर के बालों के निर्यात में चीन तथा पूर्व सोवियत संघ महत्त्वपूर्ण देश हैं।

भेड़ व बकरी का मांस Mutton

भेड़ तथा बकरीपालन के तीन उद्देश्य होते हैं-

  1. दूध
  2. ऊन तथा
  3. मांस प्राप्ति।

बकरी से दूध व मांस तथा भेड़ से मांस व ऊन प्राप्त होती है। विभिन्न उद्देश्यों के लिए भिन्न किस्म की भेड़े पाली जाती हैं। 90% मांस (Mutton) भेड़ से प्राप्त होता है। भेड़पालन का कार्य मुख्य रूप से विश्व के शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क मरुस्थलीय पठार एवं पर्वतीय भागों में किया जाता है। प्रायः विरल जनसंख्या तथा विस्तृत क्षेत्रफल वाले देशों में भेड़पालन किया जाता है। भेड़ का मांस गोमांस तथा सूअर के मांस की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण होता है।

संसार में मांस उत्पादन के क्षेत्र
Production Areas of Mutton in World

मांस तथा ऊन वाली भेड़े पृथक् नस्लों की होती हैं, किन्तु अब दोगली नस्लें विकसित की गयी हैं। जिनसे ऊन व मांस दोनों ही प्राप्त होते हैं। मटन उत्पादक देशों में न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेण्टाइना, संयुक्त राज्य, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, दक्षिणी अफ्रीका संघ तथा उरुग्वे प्रमुख हैं। भेड़पालन विरल आबाद क्षेत्रों में प्रचलित है, क्योंकि-

  1. भेड़ शुष्क, अनुर्वर, असमतल तथा बीहड़ क्षेत्रों में भी रह सकती है।
  2. अत्यन्त छोटी व कठोर घास पर भी यह गुजर कर लेती है।
  3. ये तीव्र पहाड़ी ढालों पर भी चर सकती हैं। भेड़ के अतिरिक्त केवल बकरी ही ऐसे क्षेत्रों में चर सकती है।
  4. भेड़ के लिए प्राकृतिक चारा ही पर्याप्त होता है। इसे अन्न नहीं खिलाना पड़ता।
  5. इसे चराने में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता नहीं है।
  6. फाकलैण्ड, आइसलैण्ड, पैटेगोनिया और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में कृषि या अन्य व्यवसाय पनप नहीं सके, भेड़पालन ही आजीविका को मुख्य साधन है।

CIS देश – यूरोपीय भाग में काकेशियाई प्रदेश तथा एशियाई भाग में रूसी तुर्किस्तान में दोगली नस्लों द्वारा मांस तथा ऊन प्राप्त किया जाता है। कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किरगिजस्तान, जार्जिया, अजरबैजान एवं साइबेरिया के दक्षिणी भाग तथा यूराल प्रदेश भेड़पालन के मुख्य क्षेत्र हैं।

  1. चीन – यहाँ विश्व का 56% भेड़-मांस प्राप्त किया जाता है। चीनी-तुर्किस्तान, भीतरी मंगोलिया, मंचूरिया तथा युन्नान के पठार पर भेड़पालन अधिक किया जाता है।
  2. ऑस्ट्रेलिया – यहाँ विश्व की सर्वाधिक भेड़े पाली जाती हैं, किन्तु यहाँ भेड़पालन का मुख्य उद्देश्य ऊन प्राप्ति है। अतः यहाँ मांस उत्पादन कम होता है। फिर भी यहाँ विश्व का लगभग 9% भेड़-मांस उत्पन्न किया जाता है जो यहाँ के कुल मांस उत्पादन का 21% है। यहाँ पश्चिमी अर्द्ध-मरुस्थल एवं ग्रेट डिवाइडिंग रेंज के पर्वतीय भाग पर पशुपालन किया जाता है।
  3. न्यूजीलैण्ड – यह छोटा सा द्वीपीय देश संसार में मटन उत्पादन में तृतीय स्थान पर है। यहाँ विश्व का 7% से अधिक मटन उत्पन्न होता है, जो इस देश के कुल मांस उत्पादन को 53% है। यह विश्व के प्रमुख मटन निर्यातक देशों में से है। दक्षिणी द्वीप के केन्टरबरी मैदान में उत्तम चरागाहों में मटने वाली एवं उत्तरी द्वीप के दक्षिणी भाग में भी ऊन वाली भेड़े पाली जाती हैं।
  4. संयुक्त राज्य – यहाँ विश्व का लगभग 2% भेड़ मांस प्राप्त किया जाता है। यहाँ पश्चिमी पर्वतीय तथा पठारी भागों पर भेड़े चराई जाती हैं। टैक्सास राज्य का एडवर्ड पठार भी भेड़ चारण के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। संयुक्त राज्य में भेड़पालन मुख्यतः ऊन प्राप्ति के लिए होता है। यहाँ भेड़ों को मक्का, जौ, विशिष्ट घासे खिलाकर हृष्ट-पुष्ट किया जाता है। भेड़ मांस उत्पादन में इलिनोयस, ओहियो, इण्डियाना, आयोवा, टैक्सास, कैलीफोर्निया तथा कोलोरेडो राज्य महत्त्वपूर्ण हैं।

अन्य उत्पादकों में अर्जेण्टाइना, दक्षिणी अफ्रीका, भारत, बोलीविया, मैक्सिको, पीरू, टर्की, पाकिस्तान, ईरान आदि हैं। यूरोपीय देशों में, ग्रीस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल व रोमानिया मुख्य भेड़पालक देश हैं।
विश्व व्यापार World Trade
मटन के निर्यातक देशों में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना, दक्षिणी अफ्रीका व संयुक्त राज्य हैं। आयातक देशों में फ्रांस व ब्रिटेन आदि यूरोपीय देश प्रमुख हैं।

प्रश्न 3
विश्व में ऊन व्यवसाय का वर्णन कीजिए।
या
ऑस्ट्रेलिया के भेड़-पालन का वर्णन कीजिए। [2007, 13]
उत्तर
ऊन – पशुओं से अनेक प्रकार के रेशेदार पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनमें ऊन सबसे महत्त्वपूर्ण है। ऊन से वस्त्र, कम्बल, कालीन, गलीचे, शाल-दुशाले, नमदे आदि बनाये जाते हैं। ऊन प्रदान करने वाले पशुओं में भेड़, बकरी, ऊँट, याक, अल्पाका, लामा तथा विकुना आदि हैं। संसार की 90% से अधिक ऊन भेड़ से ही प्राप्त होती है।

भेड़पालन का कार्य अनेक प्रकार की जलवायु में किया जाता है। उत्तम ऊन वाली भेड़ों के लिए चूना पत्थरयुक्त भूमि तथा शुष्क उपोष्ण अथवा शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। इनके लिए 10°C शीतकालीन तापमान, 20°C से 40°C ग्रीष्मकालीन तापमान, 50 से 75 सेमी वर्षा उपयुक्त रहती है। 25 सेमी से कम वर्षा होने पर घास सूख जाती है तथा 75 सेमी से अधिक वर्षा होने पर भेड़ को खुरपका नामक रोग लग जाता है। उत्तम ऊन इंग्लिश, मेरिनो एवं दोगली नस्ल की भेड़ों से प्राप्त होती है।

ऊन के उत्पादक क्षेत्र
Production Areas of Wool

विश्व के समस्त ऊन उत्पादन का 30% अकेले ऑस्ट्रेलिया से प्राप्त होता है। अन्य प्रमुख ऊन उत्पादक देश चीन, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना, ब्रिटेन, यूक्रेन, रूस, दक्षिणी अफ्रीका, उरुग्वे, तुर्की, भारत आदि हैं।

विश्व में ऊन का वार्षिक उत्पादन
Annual Production of Wool in the World

दक्षिणी गोलार्द्ध के देश संसार का लगभग 2/3 ऊन उत्पादन करते हैं। यहाँ शीतोष्ण व शुष्क पठारी भागों की जलवायु भेड़पालन के लिए उपयुक्त है। यहाँ विस्तृत चरागाह एवं विरल जनसंख्या के कारण कृषि या अन्य व्यवसायों की अपेक्षा पशुचारण विकसित है। इन देशों में यूरोपीय उपनिवेशकों द्वारा वैज्ञानिक तथा प्राविधिक ज्ञान एवं पूँजी की सहायता से व्यवस्थित सबसे अधिक पशुचारण का विकास हुआ है।

(1) ऑस्ट्रेलिया – यहाँ विस्तृत फार्मों पर भेड़पालन किया जाता है। भेड़ों की सुरक्षा के लिए फार्मों पर लोहे के तार तथा जालियाँ लगाई जाती हैं। यहाँ अधिकांश भेड़े ग्रेट डिवाइडिंग रेन्ज के पश्चिम की ओर एक अर्द्ध-चन्द्राकार क्षेत्र में केन्द्रित हैं। यहाँ अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ऊन उद्योग पर्याप्त विकसित है। ऑस्ट्रेलिया में अधिकांश भेड़े उत्तम ऊन-प्राप्ति के उद्देश्य से पाली जाती हैं। न्यूसाउथ वेल्स, विक्टोरिया तथा क्वीन्सलैण्ड राज्यों में भेड़पालन अधिक होता है। ऊन उत्पादन के मुख्य केन्द्र सिडनी, मेलबोर्न, जीलॉग, एलबरी, ब्रिस्बेन आदि हैं। समस्त उत्पादन का 85% ऊन निर्यात कर दिया जाता है, जिसका आधा भाग ब्रिटेन आयात करता है।

(2) न्यूजीलैण्ड – यहाँ विश्व की 16.4% ऊन प्राप्त होती है। दक्षिणी द्वीप के केन्टरबरी मैदान तथा दक्षिणी आल्प्स के पूर्वी ढलानों पर भेड़े चराई जाती हैं। विरल जनसंख्या, शीतोष्ण जलवायु एवं विषम धरातल के कारण यहाँ पशुचारण व्यवसाय समुन्नत है। यहाँ अंग्रेज रोमनीमार्श तथा लीसेस्टर नस्लें लाये थे। तदुपरान्त मेरिनो व इंग्लिश नस्लों के मिश्रण से दोगली नस्लें विकसित की गयीं। अधिकांश ऊन ब्रिटेन को निर्यात होती है।

(3) चीन – यहं विश्व का तीसरा बड़ा ऊन उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का लगभग 11.2% ऊन प्राप्त किया जाता है। सीक्यांग, आन्तरिक मंगोलिया, मंचूरिया, शांतुंग एवं युन्नान प्रान्तों में भेड़पालन अधिक किया जाता है।

(4) यूनाइटेड किंगडम – यहाँ भेड़पालन तथा ऊन उत्पादन बहुत प्राचीन समय से प्रचलित रहा है। पिनाइन प्रदेश, वेल्स पर्वत, दक्षिणी-पूर्वी इंग्लैण्ड के खड़िया (Chalk) तथा चूना-पत्थर (Limestone) के प्रदेश एवं स्कॉटिश उच्च प्रदेश पर भेड़पालन किया जाता है। यहाँ की इंग्लिश नस्लों की भेड़े विश्वविख्यात हैं। यहाँ विश्व की 2.5% ऊन प्राप्त होती है।

(5) अर्जेण्टाइना – यह विश्व का पाँचवाँ प्रमुख ऊन उत्पादक देश है। यहाँ विश्व की 2.3% ऊन प्राप्त होती है। पैटेगोनिया के पठारी भाग भेड़पालन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र हैं।

(6) दक्षिणी अफ्रीकां – यहाँ विश्व की लगभग 4% ऊन प्राप्त होती है। यहाँ मेरिनो जाति की उत्तम भेड़े पाली जाती हैं। ड्रेकन्सबर्ग पर्वतों की तलहटी तथा कास के शुष्क पठारी भागों में भेड़पालन किया जाता है। केप प्रान्त, ट्रांसवाल, ऑरेन्ज फ्री-स्टेट आदि राज्यों में ऊन उत्पादन किया जाता है। केपटाउन, डरबन तथा पोर्ट एलिजाबेथ पत्तनों से ऊन निर्यात की जाती है।

(7) तुर्की – यहाँ विश्व की 1.3% ऊन प्राप्त होती है। यहाँ भी उत्तम किस्म की मेरिनो भेड़े पाली जाती हैं। एशिया माइनर के पठारी भाग भेड़ चराने के लिए उत्तम हैं।

प्रश्न 4
मत्स्याखेट के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए तथा विश्व में मछली पकड़ने वाले प्रमुख क्षेत्र भी बताइए। [2007]
या
उत्तरी गोलार्द्ध के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का विवरण लिखिए।
या
विश्व में मत्स्य उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(i) दो प्रमुख मत्स्य उद्योग क्षेत्र,
(ii) उत्पादन,
(iii) व्यापार। [2010]
या
उत्तरी प्रशान्त महासागर के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का विवरण लिखिए। [2008]
या
विश्व के मत्स्य संसाधनों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) अनुकूल दशाएँ
(ख) विश्व के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।
उत्तर

मत्स्याखेट के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ
Favourable Geographical Conditions for Fishing

मछली-व्यवसाय के लिए निम्नलिखित भौगोलिक (दशाएँ) सुविधाएँ आवश्यक होती हैं –

  1. समशीतोष्ण जलवायु – समशीतोष्ण जल मछलियों का प्रमुख निवास स्थान है तथा इस जल- राशि की मछलियाँ अधिक पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होती हैं। पश्चिमी यूरोपीय तट इसका मुख्य उदाहरण है।
  2. सागर का उथला होना – महाद्वीपीय मग्न तट पर, जिनकी गहराई 180 मीटर तक होती है, मछलियों की उत्पत्ति के सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र होते हैं। विश्व में ऐसे सागर तटों पर सबसे अधिक मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।
  3. ताजे जल की प्राप्ति – जिन भागों में नदियाँ सागरों से मिलती हैं, वहाँ सदैव ताजे जल का स्रोत बना रहता है। इस क्षेत्र के जल में फॉस्फेट तथा नाइट्रोजन की काफी मात्रा मिली रहती है। ये क्षेत्र मछलियों के अण्डे देने के प्रमुख क्षेत्र होते हैं; अतः यहाँ पर मछलियों को पकड़ना बड़ा ही सुविधाजनक होता है।
  4. खाद्य सामग्री की उपलब्धि – ‘प्लैंकटन’ (Plankton) एक प्रकार की काई है, जो मछली का प्रिय भोजन होता है। छिछले सागरीय जल में जहाँ सूर्य की किरणें नीचे तल तक (180 मीटर की गहराई तक) पहुँच जाती हैं, वहाँ प्लैंकटने भारी मात्रा में उत्पन्न होती है। यह नदियों के मुहानों पर अधिक मिलती है। अत: इन भागों में मछलियों को अधिक पकड़ा जाता है।
  5. सूर्य के प्रकाश की प्राप्ति – सूर्य का प्रकाश जल में 180 मीटर की गहराई तक ही पहुँच पाता है; अत: इस भाग में ‘प्लैंकटन’ की उत्पत्ति पर्याप्त मात्रा में होती है। यही कारण है कि छिछले सागर तटों पर मछलियाँ अधिक पकड़ी जाती हैं।
  6. गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं का मिलन-स्थल – गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं के मिलन-स्थल मछली पकड़ने के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन गये हैं। इनके मिलन से मछलियों के भोज्य पदार्थ-‘प्लैंकटन’- की पर्याप्त मात्रा में उत्पत्ति होती है। उदाहरणार्थ-जापान के तट पर क्यूरोसिवो की गर्म एवं क्यूराइल की ठण्डी जलधाराओं के मिलने से कोहरे की उत्पत्ति होती है। इस वातावरण में मछलियाँ पर्याप्त विकसित होती हैं तथा ये क्षेत्र मछलियों के अक्षय भण्डार बन गये हैं।
  7. कटे-फटे तट का होना – व्यापारिक रूप से बड़े-बड़े स्टीमर तथा जलयानों को ठहराने के लिए कटे-फटे तटों पर सुरक्षित पोताश्रयों एवं प्राकृतिक पत्तनों का निर्माण बड़ा ही सुविधाजनक रहता है। सुरक्षित एवं प्राकृतिक पत्तनों का विकास ऐसे ही भागों में किया जा सकता है। अतः इन भागों में सुविधापूर्वक मछलियों को एकत्रित किया जा सकता है।
  8. कुशल एवं साहसिक नाविक कला का विकास – मछलियों को पकड़ने के लिए कुशल एवं साहसिक नाविकों एवं मछुआरों का होना अति आवश्यक है जो जोखिम उठाकर भी दूरवर्ती भागों से मछलियाँ पकड़ सकें। जापानी नाविक बड़े ही साहसी होते हैं, जो दूरवर्ती भागों में जाकर गहरे सागरों से भी मछलियाँ पकड़ लेते हैं।
  9. स्थानीय एवं विदेशी माँग – मछलियाँ पकड़ने वाले क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में पर्याप्त खपत क्षेत्रों का होना अति आवश्यक है, क्योंकि मछली शीघ्र खराब होने वाली वस्तु है; अत: स्थानीय माँग का बने रहना मछली व्यवसाय को प्रोत्साहन देती रहता है।
  10. नवीन वैज्ञानिक विधियों एवं उपकरणों का विकास – मछलियों को भारी मात्रा में पकड़ने के लिए आधुनिक नवीन विधियों-नावें, स्टीमर, ट्रालर, ड्रिफ्टर्स एवं जाल आदि–की सहायता से पकड़ा जाना चाहिए। इन उपकरणों के न होने से दूरवर्ती एवं गहरे सागरों से मछलियाँ पकड़ना सम्भव नहीं हो पाता।

इनके अतिरिक्त शीत-भण्डारण व्यवस्था, तीव्र परिवहन साधनों की सुलभता, सहायक उद्योगों का विकास, मछली खाने में धार्मिक बाधाओं को न होना आदि तथ्य मछली व्यवसाय को सुचारु रूप से गति प्रदान करने के लिए अति आवश्यक होते हैं।

विश्व के प्रधान मछली उत्पादक क्षेत्र
Main Fishing Areas of the World

व्यापार के लिए अधिकांश मछलियाँ शीतोष्ण कटिबन्धीय सागरों से पकड़ी जाती हैं। औद्योगिक क्रान्ति से प्रभावित देशों ने मत्स्य-व्यवसाय में विशेष प्रगति की है, परन्तु भौगोलिक सुविधाओं के कारण यह व्यवसाय कुछ सीमित क्षेत्रों में ही पनप सका है। विश्व के मछली उत्पादन का 88% भाग सागरों से प्राप्त होता है जो व्यापारिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है।

विश्व में 25,000 से 30,000 तक मछली की किस्में पायी जाती हैं, जिनमें सालमन, सारडाइन, कॉड, हैडाक, मैकेरैल, बोनिटो, कटल फिश, विलिण्डसटर, टूना, यलोटेल, सोलब्रीम, ह्वेल आदि मुख्य हैं। कुल मछली उत्पादन का 73% भाग (24° उत्तरी अक्षांश से 664° उत्तरी अक्षांश तक) उच्च कटिबन्धीय क्षेत्रों से प्राप्त होता है। मध्य अक्षांशों में 20° से 40° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलाद्ध में मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। कुल मछली उत्पादन का 12% भाग आन्तरिक महाद्वीपीय भागों से प्राप्त होता है। मछली उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र मुख्य स्थान रखते हैं –

(1) उत्तरी-पूर्वी एशियाई देश – उत्तरी-पूर्वी प्रशान्त महासागर का तटीय क्षेत्र विश्व के मछली उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है, जहाँ विश्व की 34% मछली का उत्पादन किया जाता है। इस प्रदेश का विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण में दक्षिणी चीन तक विस्तृत है। इसके अन्तर्गत जापान, चीन, कोरिया, पूर्वी सोवियत संघ एवं सखालीन द्वीप के क्षेत्र सम्मिलित हैं। सालमन, सारडाइने, टूना, बोनिटो, मैकेरैल, कॉड तथा सील पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं।

जापान प्रतिवर्ष लगभग 60 लाख टन मछली पकड़ता है जो विश्व उत्पादन का लगभग 20% भाग है। जापान की 10% जनसंख्या इसी व्यवसाय में लगी हुई है। यहाँ से विदेशों को मछलियाँ निर्यात की जाती हैं। जापान के उत्तरी क्षेत्र में हेल मछली पकड़ी जाती है। यहाँ मछलियों को सुखाने, तेल निकालने एवं खाद बनाने के अनेक कारखाने हैं। जापान के बाद चीन, दक्षिणी कोरिया एवं ताईवान मछली पकड़ने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस प्रदेश को मत्स्याखेट के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. क्यूरोसिवो एवं क्यूराइल की गर्म व ठण्डी जलधाराओं का मिलन-स्थल,
  2. प्रारम्भ से कुशल एवं विकसित नाविक कला,
  3. अधिकांश नदियों का पूर्वी ढालों पर गिरना, जिससे भारी मात्रा में प्लैंकटने की उत्पत्ति होती है,
  4. समशीतोष्ण जलवायु,
  5. औद्योगीकरण के साथ-साथ मछली की माँग में वृद्धि, तथा
  6. तकनीकी एवं परिवहन के विकसित साधन।।

जापान का मत्स्य उत्पादन – उत्तर-पूर्वी एशिया के तटीय या उत्तर-पूर्वी प्रशान्त क्षेत्र में जापान मत्स्य उत्पादन की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ विश्व की लगभग 13% मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। जापान में मछुआरों की बस्तियाँ कटी-फटी, समुद्री तट रेखा के किनारे-किनारे बसी हुई हैं। क्यूराइले की ठण्डी व क्यूरोसिवो की गर्म जलधारा जापान के पश्चिमी तट पर मिलती है तथा मत्स्य विकास में सहायक हुई है। जापान में मत्स्य उद्योग के विकास हेतु निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

  1. जापान एक द्वीपीय देश है तथा चारों तरफ से जल से घिरा है, जिसमें बहुतायत में मछलियाँ पनपती हैं।
  2. जापान की तट रेखा कटी-फटी है।
  3. जापान में कृषि-योग्य भूमि का अभाव है; अतः जापानियों को प्रमुख भोजन मछली है।
  4. जापान में स्वचालित नौकाएँ हैं तथा तकनीकी विकास भी अधिक है जिस कारण मछली की माँग अधिक रहती है।
  5. विस्तृत स्थानीय बाजार की सुविधा उपलब्ध है।
  6. जापान में मत्स्य उद्यम को सरकारी सहयोग व संरक्षण प्राप्त है।
  7. यहाँ की जलवायु शीतोष्ण है; अत: मछलियाँ शीघ्र नष्ट नहीं होती हैं तथा भण्डारण की भी पर्याप्त सुविधा है।

(2) उत्तरी-पश्चिमी यूरोपीय देश – यह विश्व का महत्त्वपूर्ण मत्स्य संग्रहण क्षेत्र है, जो पुर्तगाल से लेकर श्वेत सागर तक विस्तृत है। यह क्षेत्र विश्व की 25% मछली उत्पन्न करता है। यहाँ पर मछली पकड़ने के अनेक चबूतरे (Banks) स्थापित हुए हैं। इनमें उत्तरी सागर का डॉगर बैंक, बिस्के की खाड़ी, बाल्टिक सागर, बैरेण्ट सागर, इंग्लिश चैनल आदि महत्त्वपूर्ण हैं। ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, आइसलैण्ड, डेनमार्क, हॉलैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस आदि प्रमुख मछली-उत्पादक देश हैं।

यहाँ का वार्षिक उत्पादन 80 लाख मीट्रिक टन है। हैरिंग, कॉड, हेक, स्कैट, प्रॉन, टूना, मैकेरैल, हेलीबुट, सालमन, सारडाइन आदि पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं। इस प्रदेश में ब्रिटेन एवं नार्वे मुख्य मत्स्य उत्पादक देश हैं। विश्व की 66% कॉड मछलियाँ इसी क्षेत्र से पकड़ी जाती हैं। प्रमुख देशों का उत्पादन इस प्रकार है-ब्रिटेन- 23%, नार्वे-22%, स्पेन-11%, आइसलैण्ड-8%, जर्मनी–7%, फ्रांस-6%, पुर्तगाल-6%, नीदरलैण्ड–5%, डेनमार्क-4% एवं स्वीडन–4%। मछली पकड़ने के लिए इन क्षेत्रों को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. उथला सागरीय क्षेत्र होने के कारण मछली पकड़ने के सागरीय चबूतरों (Sea banks) की अधिकता है।
  2. औद्योगिक क्षेत्रों में सघन जनसंख्या होने के कारण मछली की माँग अधिक रहती है।
  3. मछली का उपभोग खाद्यान्नों के विकल्प के रूप में किया जाता है।
  4. सागरीय तट कटा-फटा है।
  5. उत्तरी अटलाण्टिक उष्ण जलधारा का इस प्रदेश के ठण्डे जल से मिलना।
  6. पूर्व से ही सागरीय सम्पर्क के कारण कुशल एवं साहसी नाविक।
  7. मछलियों के लिए भोजन के रूप में पर्याप्त ‘प्लैंकटन की उत्पत्ति।
  8. शीत भण्डार-गृहों का विकास।
  9. मछली पर आधारित सहायक उद्योगों का विकास; जैसे–नार्वे में विश्व को 50% ह्वेल मछली का तेल निकाला जाता है।

(3) उत्तरी-पूर्वी अमेरिकी तटीय क्षेत्र – मछली पकड़ने वाला यह क्षेत्र कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट के सहारे-सहारे न्यूफाउण्डलैण्ड से संयुक्त राज्य के कैरोलिना राज्य तक, विस्तृत है। इस प्रदेश का महाद्वीपीय मग्न-तट काफी विस्तृत एवं चौड़ा है, जहाँ मछली पकड़ने के अनेक बैंक स्थित हैं। ग्राण्ड बैंक इस प्रदेश का मुख्य मछली संग्रहण केन्द्र है। इसका क्षेत्रफल 92,000 वर्ग किमी है। सालमन, कॉड, हैरिंग, मैकेरैल, लोबस्टर, आयस्टर, सारडाइन पकड़ी जाने वाली प्रमुख मछलियाँ हैं। कनाडा से डिब्बों में बन्द कर सालमन मछली का निर्यात किया जाता है। कॉड से तेल निकाला जाता है। न्यूफाउण्डलैण्ड में लोगों का यह मुख्य व्यवसाय है। सैण्टजॉन यहाँ को मछली पकड़ने का सबसे बड़ा केन्द्र है। इस प्रदेश को मछली पकड़ने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. कनाडा के अधिकांश भूभाग का पठारी होना।
  2. औद्योगीकरण के कारण मछली की बढ़ती हुई माँग।
  3. विकसित उच्च तकनीकी।
  4. ठण्डी लैब्रेडोर एवं गर्म गल्फस्ट्रीम जलधाराओं का मिलने।
  5. सागरीय तट का कटा-फटा होना।
  6. गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं के मिलने से प्लैंकटन की उत्पत्ति।
  7. मछलियों पर आधारित सहायक उद्योगों का विकास।

(4) उत्तरी-पश्चिमी अमेरिकी तटीय क्षेत्र – यह क्षेत्र उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पश्चिमी तटीय क्षेत्र में प्रशान्त तट के सहारे-सहारे विस्तृत है। इस क्षेत्र का विस्तार बेरिंग जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण में संयुक्त राज्य के कैलीफोर्निया तट तक है। इस प्रदेश में अलास्का, ब्रिटिश-कोलम्बिया, वाशिंगटन तथा कैलीफोर्निया तट मुख्य हैं। सालमन, हैरिंग, पिलकार्ड, कॉड, हैलीबुट पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं। फ्रेजर एवं कोलम्बिया नदियों के मुहानों पर सर्वाधिक मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। सिएटल तथा प्रिंस-रूपर्ट मछली उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। इस प्रदेश को सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। यहाँ मछलियों को सुखाकर डिब्बों में बन्द कर विदेशों को निर्यात किया जाता है।

इन प्रदेशों के अतिरिक्त मध्य अक्षांशों में दक्षिणी-उत्तरी अमेरिकी देश, भूमध्यसागरीय देश, ताईवान एवं चीन तटीय क्षेत्र एवं उत्तरी कैलीफोर्निया प्रदेश; उच्च अक्षांशों में केरेबियन सागरीय प्रदेश, चिली को तटवर्ती प्रदेश, मध्य अफ्रीका के तटवर्ती प्रदेश एवं दक्षिणी भारत और पूर्वी द्वीप समूह प्रमुख हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – मछली शीघ्र खराब होने वाली वस्तु है; अतः इसकी स्थानीय खपत अधिक है। आधुनिक युग में शीतगृहों तथा वैज्ञानिक विधियों की खोज ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की वस्तु बना दिया है।
निर्यातक देश – न्यूफाउण्डलैण्ड, कनाडा, जापान, नार्वे, चिली, कोरिया, आइसलैण्ड, डेनमार्क आदि।
आयातक देश – ब्रिटेन, सं० रा० अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, चीन, पुर्तगाल आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
न्यूजीलैण्ड के डेयरी उद्योग पर एक टिप्पणी लिखिए।
उतर
आधुनिक युग में दुग्ध उद्योग के क्षेत्र में इस देश ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। यहाँ की शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, पहाड़ी भूमि, उत्तम नस्ल के दुधारू पशु, वैज्ञानिक प्रगति तथा विदेशी मॉग ने दुग्ध उद्योग के विकास में बहुत योगदान दिया है। यहाँ दुग्ध उद्योग तरांकी के मैदान, थेम्स, ओटागो के पठार तथा ऑकलैण्ड प्रायद्वीप में फैला हुआ है। डेनमार्क के बाद मक्खन और पनीर बनाने में इसका विश्व में दूसरा स्थान है। न्यूजीलैण्ड से भारी मात्रा में मक्खन, पनीर तथा दुग्ध चूर्ण को विदेशों को निर्यात किया जाता है। दुग्ध उत्पादों का निर्यात न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है। ग्लैक्सो मार्का दूध पाउडर न्यूजीलैण्ड का ही उत्पाद है।

प्रश्न 2
विश्व के किन्हीं दो प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 15]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 4 के अन्तर्गत देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व के पालतू पशुओं को कितने वर्गों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर
विश्व के पालतू पशुओं को निम्नलिखित दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. चौपाये – पालतू गाय, भैंस, बकरी, सूअर आदि जो मनुष्य के भोजन के साधन हैं।
  2. लद्दू – घोड़ा, खच्चर, बैल, गधे, रेण्डियर, याक, लामा, ऊँट, हाथी जो मनुष्य की सवारी और बोझा लादने के काम आते हैं।

प्रश्न 2
दुग्ध उत्पादन के लिए आवश्यक सहायक तत्त्व बताइए।
उत्तर
दुग्ध उद्योग के लिए शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, पहाड़ी भूमि, उत्तम नस्ल के दुधारू पशु, वैज्ञानिक प्रगति तथा विदेशी मॉग आवश्यक तत्त्व हैं।

प्रश्न 3
डेनमार्क में एक गाय औसतन प्रतिदिन कितना दूध देती है?
उत्तर
डेनमार्क में एक गाय औसतन 40-50 किग्रा दूध प्रतिदिन देती है।

प्रश्न 4
विश्व में मांस-प्राप्ति के लिए किन पशुओं को पाला जाता है?
उतर
विश्व में मांस-प्राप्ति के लिए मुख्यतः गाय, बछड़े, सूअर, भैंस, भेड़, बकरी को पाला जात है।

प्रश्न 5
कोई एक कारण बताइए कि आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में डेयरी उद्योग क्यों पनपता है?
उत्तर
आर्द्र जलवायु में पशु अधिक हृष्ट-पुष्ट रहते हैं तथा यह जलवायु मुलायम व हरी घास को उपजाने में सहायक होती है। इसलिए आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में डेयरी उद्योग पनपता है।

प्रश्न 6
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग की उन्नति के दो कारण बताइए।

  1. डेनमार्क की समशीतोष्ण जलवायुदुग्ध उद्योग एवं पशुधन विकास के लिए श्रेष्ठ व अनुकूल है।
  2. डेनमार्क में हरी घास के विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं।

प्रश्न 7
विश्व के प्रमुख सूअरपालक देशों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के प्रमुख सूअरपालक देश चीन, रूस, संयुक्त राज्य, यूरोपीय देश एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील तथा अर्जेण्टाइना हैं।

प्रश्न 8
भेड तथा बकरीपालन के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर
भेड़ तथा बकरीपालन के तीन उद्देश्य हैं- दूध, ऊन तथा मांस-प्राप्ति।

प्रश्न 9
विश्व के दो प्रमुख ऊन उत्पादक देशों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के दो प्रमुख ऊन उत्पादक देश हैं-ऑस्ट्रेलिया तथा चीन।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
विश्व का सर्वोत्तम मक्खन उत्पादक देश है –
(क) ऑस्ट्रेलिया
(ख) न्यूजीलैण्ड
(ग) नीदरलैण्ड
(घ) डेनमार्क
उत्तर
(घ) डेनमार्क।

प्रश्न 2
ग्लैक्सो मार्क दूध-पाउडर उत्पाद है –
(क) ऑस्ट्रेलिया का
(ख) न्यूजीलैण्ड का
(ग) डेनमार्क का
(घ) नीदरलैण्ड का
उत्तर
(ख) न्यूजीलैण्ड का।

प्रश्न 3
विश्व में दुग्ध उत्पादन में कौन-सा देश प्रथम स्थान रखता है?
(क) भारत
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) कनाडा
(घ) डेनमार्क
उत्तर
(क) भारत।

प्रश्न 4
निम्नांकित देशों में से किसका पनीर उत्पादन में प्रथम स्थान है?
(क) डेनमार्क
(ख) न्यूजीलैण्ड
(ग) कनाडा
(घ) सं० रा० अमेरिका
उत्तर
(घ) सं० रा० अमेरिका।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations

प्रश्न 5
विश्व में मांस की सबसे बड़ी मण्डी कौन-सी है? [2008]
(क) सिडनी
(ख) ओटावा
(ग) शिकागो
(घ) मास्को
उत्तर
(ग) शिकागो।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेकार्थी शब्द

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name अनेकार्थी शब्द
Number of Questions 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेकार्थी शब्द

अनेकार्थी शब्द

नवीनतम पाठ्यक्रम में अनेकार्थी शब्दों को भी सम्मिलित किया गया है, जिसके लिए 2 अंक निर्धारित हैं। प्रत्येक भाषा में ऐसे बहुत-से शब्द होते हैं, जो एकाधिक अर्थों का बोध कराते हैं। प्रसंग के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थलों पर इनके भिन्न-भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। भाषा को समझने और समझाने में इस प्रकार के शब्दों को ज्ञान बहुत उपयोगी होता है। इस प्रकार के शब्दों को ‘अनेकार्थी’ शब्द कहते हैं। हिन्दी भाषा में भी इस प्रकार के अनेकानेक शब्द हैं। अध्ययन में सुगमता की दृष्टि से हिन्दी भाषा के ऐसे कुछ एक शब्द और उनके एकाधिक अर्थ दिये जा रहे हैं। छात्रों को इन्हें याद कर लेने का प्रयास करना चाहिए।

बहुविकल्पीय प्रश्न

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (क) निम्नलिखित प्रश्नों के सही विकल्प चुनकर उत्तर लिखिए-

(1) ‘गो’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) गाय,
(ख) किरण
(ग) पृथ्वी
(घ) हाथी

(2) ‘वर्ण’ शब्द का अर्थ नहीं है–
(क) अक्षर
(ख) रंग
(ग) काला

(3) ‘कर’ शब्द के अन्य अर्थ हैं-
(क) सोना
(ख) हाथ
(ग) घोड़ा
(घ) किरण
(ङ) चन्द्रमा
(च) सँड़

(4) ‘अंक’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) गोद
(ख) संख्या
(ग) नाटक का एक अंश
(घ) अन्य

(5) ‘हार’ शब्द के सही अर्थों को चुनकर लिखिए
(क) गले का आभूषण
(ख) पराजय
(ग) घबराना
(घ) दु:ख

(6) द्विज का अर्थ है
(क) ब्राह्मण
(ख) पशु
(ग) सिंह
(घ) क्षत्रिय

(7) ‘अम्बर’ शब्द का कौन-सा अर्थ नहीं है ?
(क) आकाश
(ख) वस्त्र
(ग) आम
(घ) केसर

(8) ‘अकाल’ शब्द का अर्थ नहीं है
(क) दुर्भिक्ष
(ख) मृत्यु
(ग) कमी
(घ) असमय

(9) ‘तारा’ शब्द का अर्थ है–
(क) नक्षत्र
(ख) चन्द्र
(ग) लेखनी
(घ) रश्मि

(10) ‘उदधि’ शब्द का कौन-सा अर्थ सही नहीं है?
(क) उत्तम दधि
(ख) समुद्र
(ग) सागर
(घ) जलधि

(11) ‘करि’ शब्द के सही अर्थों को चुनकर लिखिए
(क) हाथी
(ख) सँड़ वाला
(ग) करने वाला
(घ) चोर

(12) ‘अमृत’ शब्द का अर्थ नहीं है
(क) अमर होना
(ख) जल
(ग) दूध; अन्न
(घ) स्वर्ग

(13) ‘ईश्वर’ का अर्थ है|
(क) राजा
(ख) प्रेम
(ग) ईर्ष्या
(घ) जलन

(14) ‘बाण’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) तीर
(ख) आदत
(ग) महाकवि बाण
(घ) चतुर

उत्तर-1. (घ), 2. (ग), 3. (ख), (घ), (च), 4. (घ), 5. (क), (ख), 6. (क), 7. (ग), 8. (ग), 9. (क), 10. (क), 11. (ख), 12. (ख), 13. (ख), 14, (ख)

प्रश्न (ख)
निम्नलिखित में से किन्हीं दो के दो-दो अर्थ लिखिए-
(क) अक्षत
(ख) हार
(ग) द्विज
(घ) काल
उत्तर-
(क) अक्षत                  अखण्डित, क्षतहीन।
(ख) हार                     गले का आभूषण, पराजय।
(ग) द्विज                     ब्राह्मण, दाँत।।
(घ) काल                    समय, मृत्यु।

प्रश्न (ग)
निम्नलिखित शब्दों में से कोई एक शब्द चुनिए और उसके एकाधिक अर्थ लिखिए-
(क) अम्बर
(ख) पत्र
(ग) वर
उत्तर
(क) अम्बर                    आकाश, वस्त्र, केसर।
(ख) पत्र पत्ता,                 चिट्ठी, पंख।।
(ग) वर                           दूल्हा, श्रेष्ठ, वरदान।

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