UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 3 सदाचारोपदेशः

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name सदाचारोपदेशः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 3 सदाचारोपदेशः

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) सं गच्छध्वं ………………… उपासते।।

[सं गच्छध्वम्-मिलकर चलो। संवदध्वम् = मिलकर बोलो। वः मनांसि-अपने मनों को। सं जानताममिलकर जानो। पूर्वे सञ्जनानां देवाः – प्राचीनकाल में एक मत में रहने वाले देवगण| भागम् = (अपने) कर्तव्य कर्म के अंशों को। उपासते = करते थे।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘सदाचारोपदेशः’ नामक पाठ से अवतरित है।
[ विशेष – इस पाठ के समस्त श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – मिलकर चलो (अर्थात् मिलकर कार्य करो)। मिलकर बोलो (अर्थात् काम करने से पहले परस्पर परामर्श करो) तुम सब लोग अपने मनों को मिलकर जानो (अर्थात् आपस में विचारों की एकता स्थापित करो)। जिस प्रकार प्राचीनकाल में देवगण आपस में मिल-जुलकर तथा एक स्थान पर बैठकर (अर्थात् परस्पर परामर्शपूर्वक) अपने-अपने कर्तव्ये कर्म के अंश को करते थे (वैसे ही मिल-जुलकर तुम लोग भी करो)।

(2) कुर्वन्नेवेह ……………………. लिप्यते नरे।।

[कुर्वन्नेवेह (कुर्वन् + एद + इह) – (शास्त्रविहित) कर्म करते हुए। एव = ही। इह = इस संसार में। जिजीविषेच्युतम (जिजीविषेत +शतम्) = सौ (वर्ष तक) जीने की इच्छा करे। समाः = वर्ष! एवम् = इस प्रकार। नान्यथेतोऽस्ति (न +अन्यथा +इतः +अस्ति) = इससे (इतः) भिन्न अन्य कोई उपाय (अन्यथा) नहीं है (न अस्ति)]

अनुवाद – (मनुष्य को) इस संसार में (शास्त्रानुकूल) त्यागपूर्वक कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार (धर्मानुसार त्यागपूर्वक कर्म करने से मनुष्य कमों में लिप्त नहीं होता। इसे छोड़ (कर्म-बन्धन से बचने का) अन्य कोई (उपाय) नहीं है।

(3) मधुमन्मे …………………….. मधुसदृशः।।

[ में- मेरा। निष्क्रमणम् = निकलना, जाना (निकटता स्थापित करना)| मधुमत् = माधुर्ययुक्त। परायणं = दूर हटना (किसी से सम्बन्ध तोड़ना)| वाचा = वाणी से। मधुसदृशः = मधुरूप (या सर्वत्र मधु को ही देखने वाला)| भूयासम् = हो जाऊँ।]

अनुवाद – मेरा (किसी व्यक्ति के) निकट जाना (मित्रता स्थापित करना) माधुर्ययुक्त हो अर्थात् किसी के साथ मित्रता आदि का परिणाम मधुर हो। मेरा (किसी से) दूर हटना (सम्बन्ध तोड़ना) भी माधुर्यपूर्ण हो। मैं मीठी बोली बोलू और मधुरूप (सर्वत्र मधु को ही देखने वाला) हो जाऊँ। (आशय यह है कि मेरे कारण कहीं कोई कटुता उत्पन्न न होकर सर्वत्र मधुरता का ही संचार हो और मेरे सम्बन्ध मधुर हों।)

(4) आचाराल्लभते ………………………….. चेह च।।

[ आचारात -सदाचार से। लभते = प्राप्त करता है। ह्यायुः (हि +आयुः) = आयु को। श्रियम् = धन को। प्रेत्य = मरकर परलोक में। चेह (च +इह) – और इस लोक में।]

अनुवाद – सदाचार से मनुष्य (लम्बी) आयु प्राप्त करता है, सदाचार से लक्ष्मी (धन) प्राप्त करता है, सदाचार से इसे लोक और परलोक में कीर्ति (यश) प्राप्त करता है।

(5) ये नास्तिका …………… गतायुषः।।

[नास्तिकाः = ईश्वर को न मानने वाले (मूलतः नास्तिक’ का अर्थ है ‘वेद को न मानने वाला’-नास्तिको वेदनिन्दकः)| निष्क्रियाः = आलसी। गुरुशास्त्रातिलङ्घिनः (गुरुशास्त्र +अतिलङ्घिनः)= गुरु और शास्त्रों (की आज्ञा) का उल्लंघन करने वाले। गतायुषः (गत +आयुषः) = क्षीण आयु वाले। ]

अनुवाद – जो मनुष्य ईश्वर को न मानने वाले, आलसी, गुरु और शास्त्रों के वचनों का उल्लंघन करने वाले, धर्मविहीन एवं दुराचारी होते हैं, उनकी आयु कम हो जाती है और वे मरे हुए के समान होते हैं।

(6) ब्राह्म मुहूर्ते ……………………… कृताञ्जलिः ||

[बुध्येत = जाग जाना चाहिए। धर्मार्थी (धर्म + अथौ) च = धर्म और धन को। अनुचिन्तयेत – चिन्तन करना चाहिए। आचम्य = आचमन (कुल्ला) करके कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर।]

अनुवाद – (मनुष्य को) ब्राह्ममुहूर्त में (सूर्योदय के समय के एक घण्टे पूर्व) जाग जाना चाहिए, धर्म (कर्तव्य) और धन (आय के साधनों) का चिन्तन करना चाहिए। (फिर शय्या से) उठकर तथा आचमन (कुल्ला) करके, हाथ जोड़कर पूर्व सन्ध्या (प्रातः सन्ध्या) के लिए बैठ जाना चाहिए।

(7) अक्रोधनः …………………………. वर्षाणि जीवति।।

[अक्रोधनः = क्रोध न करने वाला भूतानामविहिंसकः (भूतानाम +अविहिंसकः) = जीवों की हिंसा न करने वाला| अनसूयुः = दूसरों से असूया (ईष्र्या, द्वेष) न करने वाला| अजिह्मः = जो जिह्म (कुटिल) न हो,
सरलचित्त।]

अनुवाद – क्रोध न करने वाला, सत्य बोलने वाला, जीवों की हिंसा न करने वाला, दूसरों से ईष्र्या न करने वाला एवं कुटिलता से रहित (सरलचित्त) व्यक्ति सौ वर्ष तक जीता है (अर्थात् दीर्घायु होता है)।

(8) अकीर्तिम् ………….. हन्त्य लक्षणम्।।

[ अनर्थम् = आपत्ति। अलक्षणम् = अशुभ।]

अनुवाद – विनम्रती अपयश को नष्ट करती है, पराक्रम (पुरुषार्थ) अनर्थ (आपत्ति) को नष्ट करता है, क्षमाशीलता सदा क्रोध को नष्ट करती है और सदाचरण (समस्त) अशुभों को नष्ट कर देता है।

(9) अभिवादनशीलस्य ………………… बलम्।।

[अभिवादनशीलस्य = (बड़ों को) प्रणाम करने वाले का। वृद्धोपसेविनः (वृद्ध+उपसेविनः) = बड़े-बूढ़ों की सेवा करने वाला। वर्द्धन्ते = बढ़ते हैं।]

अनुवाद – (अपने से बड़ों को) प्रणाम करने वाले तथा नित्य बड़े-बूढ़ों की सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल-इन चारों की (उत्तरोत्तर) वृद्धि होती है।

(10) वृत्तं यत्नेन ……………….. हतो हतः।।

[वृत्तम् – चरित्र। वित्तमायाति (वित्तम् + आयाति) – धन आता है। याति = चला जाता है। अक्षीणः हानि न होना।]

अनुवाद – चरित्र की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, (क्योंकि) धन तो आता-जाता रहता है। धन नष्ट होने से व्यक्ति की कोई (विशेष) हानि नहीं होती, किन्तु चरित्र नष्ट होने से व्यक्ति मरे हुए के समान हो जाता है। विशेष – अंग्रेजी की सूक्ति से तुलनीय-If wealth is lost nothing is lost, if health is lost something is lost, if character is lost everything is lost.

(11) सत्येन …………………… रक्ष्यते।।

[योगेन – (निरन्तर) प्रयोग से। मृजया = स्वच्छता, सफाई से। वृत्तेन = चरित्र से। ]

अनुवाद – सत्य से धर्म की रक्षा होती है, प्रयोग (निरन्तर अभ्यास) से विद्या की रक्षा होती है, स्वच्छता से रूप की रक्षा होती है, (और) चरित्र से कुल की रक्षा होती है।

(12) श्रूयतां …………………… समाचरेत् ।

[ धर्मसर्वस्वम् = धर्म के सार को। चाप्यवधार्यताम् (च +अपि +अवधार्यताम्) – च-और, अपि – भी, अवधार्यतां = धारण करो। परेषां – दूसरों का। ]

अनुवाद – धर्म का सार सुनो और सुनकर (मन में) धारण करो (कि) जो कार्य अपने विरुद्ध हो, उसका आचरण दूसरों के साथ न करो (अर्थात् जिस बात को तुम अपने लिए हानिकर समझते हो, उससे दूसरों को भी हानि पहुँचेगी, ऐसा समझकर वैसा कार्य दूसरों के प्रति न करो)।

 

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन).

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Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 10
Chapter Name Resources (संसाधन)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसाधन से आपका क्या अभिप्राय है? संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए। [2009]
या
विभिन्न प्रकार के संसाधनों का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए–संसाधनों के प्रकार। [2010]
या
संसाधनों के वर्गीकरण के आधारों को बताइए। [2012]
उत्तर

संसाधन का अर्थ
Meaning of Resources

संसाधनों का अध्ययन आर्थिक भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। किसी देश या प्रदेश में स्थित संसाधन आर्थिक विकास को आधार एवं गति प्रदान करते हैं। संसाधन आधुनिक धात्विक सभ्यता में। आधार-स्तम्भ माने जाते हैं। मानव अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोगी संसाधनों का शोषण कर अपना जीवन-यापन करता है तथा उनसे अधिकाधिक उपयोगिता प्राप्त करने का भरसक प्रयास करता है। ‘संसाधन’ शब्द के अर्थ को निम्नलिखित रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है –

  1. जिस पर कोई सहायता, पोषण तथा आपूर्ति के लिए आश्रित हो;
  2. दिये गये साधनों के प्राप्त करने के ढंग एवं
  3. अनुकूल परिस्थितियों से लाभ उठाने की क्षमता।

स्पष्ट है कि कोई भी वह वस्तु जो मानव की कठिनाइयों को दूर करने में समर्थ हो अथवा वह उसे आवश्यकताओं की पूर्ति करके सन्तुष्ट करती हो अथवा किसी प्रकार की उपयोगिता प्रदान करती हो, संसाधन कहलाती है। यह वस्तु प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक या मानवीय किसी भी प्रकार की हो सकती है, परन्तु यहाँ संसाधनों से आशय प्राकृतिक संसाधनों से ही लगाया जाता है। भूगोलवेत्ताओं की कथन है। कि संसाधनों से अभिप्राय, उन सभी भौतिक तत्त्वों तथा मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित पर्यावरण से समझा जाता है जो भूतल से लगभग 20 किमी ऊपर तथा 7 किमी धरातल के नीचे तक पाये जाते हैं। स्थलाकृति, मिट्टी, जलवायु, वनस्पति, वन्य प्राणी, जलराशियाँ, खनिज पदार्थ आदि सभी को प्राकृतिक संसाधनों के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है, परन्तु ये सभी अवयव तब तक संसाधन नहीं बन सकते जब तक मानव अपने तकनीकी ज्ञान के आधार पर इन्हें अपने लिए उपयोगी नहीं बना लेता। अत: कोई भी वह पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मानव की कुछ उपयोगिता करता हो, संसाधन कहलाता है।

कोई भी पदार्थ संसाधन तभी कहा जा सकता है जब वह मानव को किसी भी प्रकार की उपयोगिता प्रदान करता हो। इस तथ्य को दृष्टिगत करते हुए प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता ई०डब्ल्यू० जिम्मरमैन (E.W. zimmermann) ने कहा है, “मानव के विभिन्न उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा किसी कठिनाई का निवारण करने वाले या निवारण में योग देने वाले स्रोत को संसाधन कहा जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि संसाधन होते नहीं, बल्कि उन्हें बनाया जाता है। जिस देश या समाज में जितना अधिक तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास होगा, वहाँ संसाधनों का विकास भी उतना ही अधिक होगा। अतः संसाधन मानव से सम्बन्धित क्रियाओं में उपयोगी होते हैं।

संसाधनों का वर्गीकरण
Classification of Resources
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources 1
मानवीय संसाधन – मानवीय शक्ति किसी भी देश के लिए बहुत ही आवश्यक साधन है। उसके द्वारा ही प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सम्भव होता है; अत: मानव संसाधन के विकास में मानव ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। मानवीय संसाधनों के तीन मुख्य पक्ष निम्नवत् हैं –

  1. जनसंख्या – इसमें न केवल मानवं की संख्या वरन् उसकी शारीरिक शक्ति, मानसिक क्षमता, स्वास्थ्य, वितरण, जनघनत्व, वृद्धि दर, स्त्री-पुरुष अनुपात, आयु-वर्ग, शिक्षा आदि भी सम्मिलित किये जाते हैं।
  2. जनता का सामाजिक संगठन – इस पक्ष के द्वारा संसाधन उपयोग प्रभावित होता है तथा समाज के सब वर्गों को उसकी उपलब्धता एवं उपयोग की सीमा निर्धारित होती है। ये प्रादेशिक आर्थिक उन्नति के लिए बनाये गये सामाजिक राजनीतिक संगठन होते हैं; जैसे- पूँजीवादी व्यवस्था, समाजवादी व्यवस्था और साम्यवादी व्यवस्था।
  3. संस्कृति की अवस्था – किसी प्रदेश में तकनीकी एवं विज्ञान का जो स्तर होता है उससे उस प्रदेश की संस्कृति की अवस्था निर्धारित होती है। आज संसार के विकसित और विकासशील राष्ट्रों में यही अन्तर चल रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों को मुख्यत: निम्नलिखित दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1) भौतिक संसाधन (Physical Resources) – भौतिक संसाधनों के अन्तर्गत चट्टानें, धरातल, मिट्टी, खनिज सम्पदा व जलीय तत्त्वों आदि को सम्मिलित किया जाता है। ये सभी पदार्थ मानव को प्रकृति की ओर से नि:शुल्क उपहार के रूप में प्राप्त हुए हैं। इन पर सभी व्यक्तियों का समान अधिकार है, परन्तु विश्व के उन भागों में जहाँ मानव ने अत्यधिक तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वहाँ इन संसाधनों का अधिक उपयोग किया जा सका है। इसके विपरीत जिन प्रदेशों से प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य स्थापित नहीं किया गया है, वहाँ पर इनका उपयोग नहीं किया जा सका है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका महाद्वीप में प्राकृतिक संसाधनों के पर्याप्त भण्डार भरे पड़े हैं, परन्तु तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण इनका उपयोग एवं उपभोग नहीं किया जा सका है।

इन संसाधनों के अन्तर्गत खनिज पदार्थ, जल, भूमि, वन, वायु, मिट्टी, धरातल आदि का स्थान मुख्य है। इनमें से कुछ संसाधन तो ऐसे हैं जो प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध होते हैं, जिन्हें सर्वत्र सुलभ संसाधन कहते हैं; जैसे-वायु एवं धरातल। कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जो कम ही स्थानों पर उपलब्ध होते हैं, अर्थात् धरातल पर समान रूप से विकसित नहीं हैं; जैसे-लौह-अयस्क, ताँबा, अभ्रक, मैंगनीज
आदि खनिज तथा कोयला एवं पेट्रोलियम आदि शक्ति संसाधन। इस प्रकार धरातल पर संसाधनों का वितरण समान नहीं है।

(2) जैविक संसाधन (Biotic Resources) – जैविक संसाधन मानव की आर्थिक क्रियाओं को लम्बे समय तक प्रभावित करते हैं। इन संसाधनों में कमी अथवा वृद्धि हो सकती है। वनस्पति की उत्पत्ति तथा पशुपालन जैविक संसाधनों के अन्तर्गत आते हैं। इन संसाधनों पर मानवीय क्रियाकलापों का प्रभाव तो पड़ता है, परन्तु इनके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। वनों के शोषण पर वर्षा तथा तापमान के प्रभाव के कारण प्राकृतिक वनस्पति स्वत: ही उग आती है। जैविक संसाधन गतिशील होते हैं। इन संसाधनों का उपयोग करने पर इनका कुछ भाग शेष रह जाता है, जिससे वे पुन: अपना रूप धारण कर लेते हैं। मत्स्य उत्पादक क्षेत्रों से सभी मछलियों को पकड़ने के उपरान्त भी वहाँ मछलियों की उत्पत्ति धीरे-धीरे होती रहती है। विश्व में जैविक संसाधनों के वितरण में भी भिन्नता पायी जाती है। शीत कटिबन्धीय प्रदेशों में पायी जाने वाली प्राकृतिक वनस्पति तथा मरुस्थलीय वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। इन संसाधनों में कठोरता कम होती है। कभी-कभी जैविक संसाधनों का पूर्णतः उपयोग कर लेने पर इनकी मात्रा समाप्त हो जाती है।

उपयोगिता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
Classification of Resources on the Basis of Utility

उपयोगिता के आधार पर संसाधनों को निम्नलिखित दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1) क्षयी संसाधन – वे संसाधन जिनका उपयोग मानव की इच्छा-शक्ति पर निर्भर रहता है, क्षयी संसाधन होते हैं। कभी-कभी अधिकतम उपयोग करने से यह संसाधन समाप्त भी हो जाते हैं। इन्हें निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. नव्यकरणीय संसाधन – ग्लोब पर कुछ संसाधन ऐसी प्रकृति के पाये जाते हैं कि उनका अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। ऐसा मानव के तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करता है। ये संसाधन पुनः विकसित हो जाते हैं अथवा उनका नवीनीकरण करने के उपरान्त उन्हें उपयोग में लाया जा सकता है। जलवायु, सौर ऊर्जा, जल विद्युत शक्ति आदि इसी प्रकार के संसाधंन हैं।
  2. अनव्यकरणीय संसाधन – इस प्रकार के संसाधन एक बार उपयोग करने के उपरान्त सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अथवा वे नष्ट हो जाते हैं। कोयला, खनिज तेल, अनेक प्रकार के धात्विक खनिज आदि इन संसाधनों के प्रमुख उदाहरण हैं।

(2) अक्षयी संसाधन – ये कभी समाप्त न होने वाले संसाधन हैं। इन्हें बार-बार उपयोग किया जाता रहता है। एक बार उपयोग करने के बाद वे स्वयं विकसित हो जाते हैं तथा उनका पुन: उपयोग कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है, परन्तु इनका पुनः उत्पादन रासायनिक एवं भौतिक उपकरणों की सहायता से किया जा सकता है। वनस्पति, मिट्टी, जल, वायु, सौर ऊर्जा, वन्य प्राणी, मानवआदि कभी न समाप्त होने वाले संसाधनों की श्रेणी में आते हैं। इस प्रकार ये संसाधन मानव उपभोग के लिए असीम एवं चिरस्थायी संसाधन हैं।

प्रश्न 2
संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।
या
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।
या
‘संसाधन संरक्षण से आप क्या समझते हैं?’ इसके लिए उपयुक्त उपाय समझाइए। (2011)
उत्तर

संसाधनों के संरक्षण का अर्थ एवं आवश्यकता
Meaning and Need of Conservation of Resources

धरातल पर संसाधन सीमित ही उपलब्ध हैं; अतः उनका अधिकतम एवं सुरक्षित उपयोग ही ‘संसाधन संरक्षण’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, “प्राकृतिक संसाधनों का कम-से-कम मात्रा में अधिकतम उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है।” संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता 20वीं शताब्दी की देन है, क्योंकि इस सदी में संसाधनों का बड़ी निर्ममता से उपयोग किया गया है। विज्ञान एवं तकनीकी विकास के साथ-साथ संसाधनों का दोहन तीव्र गति से किया गया है जिस कारण उनमें से कुछ संसाधन समाप्ति की,ओर अग्रसर हुए हैं। अत: संसाधनों को सुरक्षित बनाये रखने के लिए संसाधनों के संरक्षण की भावना बलवती हुई है। पिछली दो शताब्दियों से विश्व पटल पर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, जिसके अग्रलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं –

  1. कुछ देशों में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि का होना।
  2. तकनीकी एवं औद्योगिक क्रान्ति के कारण औद्योगिक उत्पादों में तीव्र वृद्धि का होना।
  3. मानव का जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण पनपना।

उपर्युक्त कारणों के फलस्वरूप संसाधनों का बड़े ही अविवेकपूर्ण ढंग से दोहन किया गया है। इसी कारण बहुत से जैविक एवं अजैविक संसाधनों को तीव्र गति से ह्रास होता जा रहा है अथवा वे पूर्ण । रूप से विनष्ट हो गये हैं। इसके फलस्वरूप इस तथ्य को बल मिलने लगा है कि संसाधनों का अधिकतम उपयोग मानवहित में नहीं हो सकेगा। अत: संसाधनों का मितव्ययिता के साथ सदुपयोग किया जाए तथा जो संसाधन अल्पमात्रा में शेष रह गये हैं, उनका संरक्षण अवश्य ही किया जाए जिससे भावी जनसंख्या को भी ये संसाधन मिल सकें। इस सम्बन्ध में सिरीयसी वाण्ट्रप ने कहा है कि “संसाधनों का उपयोग कब, किस प्रकार होगा, इसका विश्लेषण करते हुए उपयोग को समय के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।’

वर्तमान समय में विश्व की जनसंख्या में द्रुत गति से वृद्धि होती जा रही है जिससे उसकी संसाधनों की आवश्यकता में भी वृद्धि हुई है तथा संसाधनों का अविवेकपूर्ण ढंग से विनाश किया जाने लगा है। इस पर तत्काल रोक लगाना आवश्यक है, अन्यथा ये संसाधन किसी भी समय समाप्त हो सकते हैं। इस प्रकार जनसंख्या की अपरिमित वृद्धि, उत्पादन प्रक्रिया में तकनीकी विकास से क्रान्ति आने तथा मानव का जीवन-स्तर उच्च होने से संसाधनों में कमी आयी है। इससे मानवीय क्रियाकलापों एवं प्रकृति में असन्तुलन होने लगा है। अतः मानवीय क्रियाकलापों एवं उपभोग के मध्य अनुकूलन एवं सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए जो संसाधनों के संरक्षण का मूल उद्देश्य है।

संसाधन संरक्षण के उपाय
Remedies of Conservation of Resources

  1. किसी भी राष्ट्र के कुल संसाधनों की संख्या, मात्रा, प्रकार, गुण एवं उपलब्धि के विषय में पूर्ण जानकारी होना अति आवश्यक है, जिससे आवश्यकतानुसार उनका व्यावहारिक उपयोग किया जा सके।
  2. संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सम्भाव्यता के आधार पर ही उनका उपयोग निर्धारित किया जाना चाहिए।
  3. जो संसाधन शीघ्र समाप्त होने वाले हैं, उनका उपयोग अधिकतम उपयोगिता प्रदान करने वाले कार्यों में ही किया जाना चाहिए।
  4. संसाधनों की वृद्धि एवं गुणवत्ता बनाये रखने के लिए उनकी विशेषताओं को वैज्ञानिक-तकनीकी ज्ञान के सहारे विकसित किया जाना चाहिए।
  5. जो संसाधन अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं, उनका उपयोग अधिकतम मात्रा में करना चाहिए।
  6. संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए उनके सही विकल्पों को खोज लिया जाना चाहिए, जिससे अधिक समय तक उनकी उपलब्धता बनी रह सके।
  7. संसाधनों के उपयोग की ऐसी पद्धतियाँ एवं प्रणालियाँ विकसित की जानी चाहिए कि राष्ट्र सदैव के लिए आत्मनिर्भर बना रह सके।
  8. राष्ट्र के संसाधनों का सर्वेक्षण करा लिया जाना चाहिए जिससे उनके उपभोग की मात्रा सुनिश्चित की जा सके।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से निष्कर्ष निकलता है कि देश के प्रत्येक नागरिक को वहाँ उपलब्ध संसाधनों को अमूल्य निधि समझना चाहिए। इन संसाधनों का भविष्य के लिए संरक्षण करना अति
आवश्यक है, जिससे कि वर्तमान एवं भावी सन्तति उनसे लाभान्वित हो सके तथा धीरे-धीरे अधिकतम उपयोगिता प्राप्त होती रहे।

प्रश्न 3
विश्व में लकड़ी काटने का उद्योग (Lumbering) किन भौगोलिक परिस्थितियों पर आधारित है? लकड़ी काटने एवं चीरने वाले प्रमुख देशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

लकड़ी काटने Lumbering

वन- व्यवसाय का महत्त्वपूर्ण उपयोग लकड़ी काटने एवं चीरने का है। लकड़ी काटना एवं उनकी चिराई एक प्राथमिक व्यवसाय है। वनों से कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार की लकड़ी काटी जाती है, जिसका उपयोग निम्नवत् किया जाता है –

  1. ईंधन में 40 प्रतिशत।
  2. इमारती कार्यों में- भवन-निर्माण, पुल निर्माण, नावें, रेल के डिब्बे एवं स्लीपर, मोटर, टूक, फर्नीचर तथा पैकिंग आदि कार्यों में 40 प्रतिशत।
  3. निर्माण उद्योगों में- कागज की लुग्दी, दियासलाई, कृत्रिम रेशम आदि में-10 प्रतिशत।
  4. अन्य फुटकर कार्य- बल्लियों, सीढ़ियों, खानों आदि में-10 प्रतिशत।
    जेड० एस० हॉक ने विश्व में प्राप्त लकड़ी को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है –

    • शीत कटिबन्धीय वनों (कोणधारी) से (कोमल लकड़ी)-35 प्रतिशत;
    • शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों से (मिश्रित लकड़ी)-49 प्रतिशत एवं
    • उष्ण कटिबन्धीय वनों से (कठोर लकड़ी)-16 प्रतिशत।

लकड़ी काटने के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियाँ
Necessary Geographical Conditions for Lumbering

  1. उत्तम लकड़ी की प्राप्ति – लकड़ी काटने एवं चीरने के लिए काफी मात्रा में कठोर एवं कोमल लकड़ी के वन होने चाहिए। कठोर लकड़ी में महोगनी, सीडार एवं टीक तथा कोमल लकड़ी में देवदार, कैल, फर, चीड़ एवं यूकेलिप्टस प्रमुख हैं।
  2. सस्ते एवं कुशल श्रमिक – वृक्षों को सघन वनों से काटने के लिए काफी संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की उपलब्धता अति आवश्यक है। साइबेरिया एवं कनाडा में टैगा वनों की कटाई के लिए सस्ते एवं पर्याप्त श्रमिक मिल जाते हैं जो ग्रीष्म ऋतु में कृषि-कार्य करते हैं एवं शीत ऋतु में हिम अधिक पड़ने के कारण वनों को काटने का कार्य करते हैं।
  3. यातायात एवं परिवहन साधनों की सुलभता – लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठों को बहाकर ले जाने के लिए जल-परिवहन सबसे सस्ता साधन है तथा अन्य साधनों में रेल, मोटर आदि का होना अति आवश्यक है। म्यांमार एवं थाईलैण्ड में यह कार्य हाथियों द्वारा किया जाता है।
  4. जल-विद्युत शक्ति का विकास – कारखानों को चलाने के लिए जल-विद्युत शक्ति सबसे सस्ती पड़ती है। इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए नदियों के मार्ग में कृत्रिम जल-प्रपात या बाँध बनाये जा सकते हैं।
  5. बाजार की समीपता-वनों के समीपवर्ती प्रदेशों में लकड़ी का उपभोग करने के लिए कागज़ मिल, दियासलाई, पैकिंग, कृत्रिम रेशम आदि उद्योगों की स्थापना की जानी अति आवश्यक है।
  6. सघन वनों का न होना- वने सघन नहीं होने चाहिए, अन्यथा लकड़ी काटना बड़ा ही कठिन हो जाता है। विरल वनों से लकड़ी सावधानीपूर्वक काटी जा सकती है।

सम्पूर्ण विश्व में 425 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल पर वन फैले हैं, जिसमें से लगभग आधे भाग पर उष्ण कटिबन्धीय कठोर, मिश्रित एवं अवर्गीकृत वनों का विस्तार है। शंकुधारी या टैगो वनस्पति का विस्तार 136 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर है, जब कि शीतोष्ण कटिबन्धीय कठोर लकड़ी के वनों का विस्तार केवल 66 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है। विश्व में लकड़ी का उत्पादन करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका औद्योगिक लकड़ी का 76% भाग पूरा करता है।

लकड़ी का उत्पादन करने वाले प्रमुख देश
Main Wood Producing Countries

समशीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में लकड़ी काटने एवं चीरने का व्यवसाय प्रमुख है। इन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अलास्का, रूस, नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, जापान, चीन, म्यांमार एवं भारत आदि देश मुख्य हैं।
(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – इस देश का लकड़ी काटने एवं चीरने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ पर लगभग एक-तिहाई भूमि पर वन-सम्पदा फैली है जिनमें से दो-तिहाई क्षेत्रफल व्यापारिक लकड़ियों का है। इस देश में कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। पाइन, डगलस, फर, येलोपाइन, स्पूस आदि वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं जिनसे लुग्दी, कागज, गत्ता, बिरोजा, तारपीन का तेल एवं अखबारी कागज बनाये जाते हैं। अमेरिका में उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, महान् झील क्षेत्र, अप्लेशियन पर्वतीय क्षेत्र, मध्यवर्ती क्षेत्र, रॉकी पर्वतीय क्षेत्र एवं पश्चिमी तटीय क्षेत्र लकड़ी काटने एवं चीरने में मुख्य स्थान रखते हैं।

(2) कनाडा – इस देश के 45% भाग पर वन-सम्पदा फैली है। यहाँ कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। ब्रिटिश कोलम्बिया, उत्तरी प्रेयरी प्रान्त, ओण्टेरियो, क्यूबेक एवं न्यू ब्रिन्सविक मुख्य लकड़ी उत्पादक क्षेत्र हैं। कुल वन क्षेत्रों का 51% भाग व्यापारिक है। यहाँ 65% कोमल, 24% मिश्रित एवं 11% कठोर लकड़ी के वन हैं। इस देश में 150 से भी अधिक किस्मों की लकड़ी पायी जाती है जिनमें नुकीली पत्ती वाले वृक्ष 47 प्रकार के हैं। स्यूस, बालसम, पाइन, डगलस, फर, हेमलॉक, सीडार, मैपिल, बीच, रेड पाइन आदि मुख्य वृक्ष हैं। इनसे लकड़ी चीरने, कागज एवं लुग्दी बनाने, फर्नीचर, वस्त्रों के कृत्रिम धागे एवं प्लास्टिक बनायी जाती है। वन उत्पादन का 95% भाग लट्ठों, लुग्दी एवं ईंधन का होता है। कुल उत्पादन का 10% भाग निर्यात कर दिया जाता है। लकड़ी का कुल उत्पादन 402 लाख घन मीटर है। जिसमें 9 लाख घन मीटर कठोर एवं 393 लाख घन मीटर कोमल लकड़ी है।।

(3) रूस – रूस में 91 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर वन-सम्पदा का विस्तार है। यहाँ पर शंकुल वृक्षों की अधिकता है जिनमें स्पूस, एल्डर, विलो, लिंडन, हार्डब्रीम, फर, लार्च, सीडार एवं पाइन मुख्य हैं। इनकी लकड़ी कागज एवं लुग्दी बनाने के काम आती है। शंकुल वनों का विस्तार 60° उत्तरी अक्षांश से टुण्ड्रा प्रदेश तक है। यह वन क्षेत्र बाल्टिक सागर से पूर्व में ओखोटस्क सागर तक विस्तृत है। ओनेगा, लेनिनग्राड, मरमास्क, मेजेनई, गरका एवं आरकेंजल लकड़ी की चिराई के प्रमुख केन्द्र हैं। रूस के समस्त वन भाग का 80% एशियाई रूस में है। साइबेरिया के इस वन प्रदेश की सबसे बड़ी सुविधा ट्रांस-साइबेरियन रेलवे है। विश्व लकड़ी भण्डार का 21% भाग साइबेरिया से प्राप्त होता है।

(4) यूरोपीय देश – यूरोप महाद्वीप का एक-तिहाई भाग वनों से आच्छादित है, जहाँ विश्व की 10% लकड़ी प्राप्त होती है। इनमें कोमल लकड़ी की अधिकता है। इसका विस्तार 50° से 70° उत्तरी अक्षांशों तक है, जो नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड होती हुई उत्तरी रूस तक चली गयी है। लकड़ी में निम्नलिखित देश प्रमुख उत्पादक हैं –

  1. नार्वे – इस देश के 25% भाग पर वन फैले हैं। उत्तरी एवं दक्षिणी तट को छोड़कर शेष पर्वतीय ढालों एवं नदी घाटियों में वनों का विस्तार पाया जाता है। यहाँ पर पाये जाने वाले प्रमुख वृक्षों में फर 50%, चीड़ 34% तथा शेष पर बीच एवं ओक आदि के वृक्ष हैं। यहाँ अखबारी कागज, सैलूलोज, गत्ता, दियासलाई तथा उत्तम किस्म का कागज बनाया जाता है।
  2. स्वीडन – यहाँ 60% भाग पर वन-सम्पदा फैली है। उत्तर एवं मध्य में कोमल तथा दक्षिण में कठोर लकड़ी के वनों की अधिकता है। यहाँ पर पाइन, स्पूस, फर आदि वृक्षों की प्रधानता है। इस देश में कागज, लुग्दी, प्लाईवुड एवं दियासलाई बनायी जाती है। निर्यात व्यापार में भी इन्हीं वृक्षों की लकड़ियों की अधिकता है।
  3. फिनलैण्ड – फिनलैण्ड के 70% भाग पर वन-सम्पदा का विस्तार है। यहाँ स्पूस, पाइन एवं फर वृक्षों की अधिकता है। यहाँ के निर्यात में 88% भाग वन वस्तुओं का है। चीरी हुई लकड़ी की वस्तुएँ, प्लाईवुड, अखबारी कागज तथा लकड़ी का रेशा यहाँ भी मुख्य उत्पादक वस्तुएँ हैं। तटीय भाग में लकड़ी चीरने के केन्द्र स्थापित हुए हैं।

मध्य यूरोपीय देशों में फ्रांस–22%, जर्मनी-21%, स्विट्जरलैण्ड-25% तथा जर्मनी में 27% भाग पर वन फैले हैं, परन्तु सभी देशों में लकड़ी का अभाव पाया जाता है। इन देशों में केवल अपने उपभोग के लिए ही लकड़ी का उत्पादन किया जाता है।

(5) एशियाई देश – एशिया महाद्वीप में जापान, चीन, म्यांमार एवं भारत प्रमुख लकड़ी उत्पादक देश हैं, जिनका विवरण निम्नवत् है –

  1. जापान – इस देश के लगभग 50% भाग पर वन फैले हैं। मध्य होकेड़ो एवं हाँशू के भीतरी पर्वतीय क्षेत्रों में इनका विस्तार है। फर, स्पूस, हिकोरी, सुगी-नुकीली पत्ती वाले; मैपिल, बूना, पॉपलर, ओक-चौड़ी पत्ती के वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं। शंकुल वनों का विस्तार 60,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर है। इन वृक्षों को चीरकर विभिन्न वस्तुएँ तथा कागज उद्योग के लिए लुग्दी बनायी जाती है।
  2. चीन – चीन में केवल 40% भाग पर ही वन छाये हुए हैं। जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण कृषि के विकास के लिए भारी पैमाने पर वनों का विनाश किया गया है। केवल पश्चिमी एवं दक्षिणी पहाड़ी भागों पर ही वन मिलते हैं। फर, स्थूस, हेमलॉक, ओक, चेस्टनट आदि मुख्य वृक्ष हैं।
  3. म्यांमार – यहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में सदापर्णी एवं 100 से 200 सेमी वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन मिलते हैं। इरावदी नदी के बेसिन में विश्वविख्यात सागौन के वृक्ष पाये जाते हैं। यहाँ से लकड़ी काटकर हाथियों द्वारा ढोयी जाती है। रंगून नगर से सागौन की लकड़ी विदेशों को निर्यात की जाती है।
  4. भारत – भारत में 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में, प्रमुख रूप से असम के पहाड़ी ढालों एवं पश्चिमी घाट पर, सदापर्णी वन मिलते हैं। 100 से 200 सेमी वर्षा वाले भागों में मानसूनी वन मिलते हैं जिनकी लकड़ी फर्नीचर एवं इमारती कार्यों में प्रयुक्त की जाती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं छोटा-नागपुर का पठार इन लकड़ियों के लिए प्रसिद्ध हैं। रेल विभाग द्वारा यहीं से लकड़ी डिब्बों एवं स्लीपरों के लिए मँगायी जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों से ईंधन की लकड़ी प्राप्त होती है। यहीं से कुछ कोमल प्रकार की लकड़ी कागज एवं दियासलाई बनाने में प्रयुक्त की जाती है।

(6) ऑस्ट्रेलिया – इस महाद्वीप के केवल 4% भाग पर वन मिलते हैं। वनों का 50% भाग शीतोष्ण कटिबन्धीय है। कॉरीगम वृक्ष मुख्य है जो 50 मीटर से 90 मीटर तक ऊँचा होता है। दक्षिणी-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया द्वीप में वन अधिक मिलते हैं। आर्द्र भागों में यूकेलिप्टस के वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं।

न्यूजीलैण्ड द्वीप का 20% भाग वनों से आच्छादित है। यहाँ के प्रमुख वृक्ष कॉरीगम, पाइन, टोटोरा, तवा एवं बीच हैं।
उपर्युक्त आधार पर विश्व में लकड़ी की कटाई एवं चिराई का कार्य निम्नलिखित प्रदेशों में उल्लेखनीय है –

  1. मानसूनी प्रदेशों के पतझड़ वाले वनों में साल, सागौन, शीशम, साखू आदि सुन्दर एवं टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष भारी संख्या में पाये जाते हैं।
  2. सामान्य गर्मी वाले समशीतोष्ण प्रदेशों में यूकेलिप्टस, ओक आदि दीमकों से नष्ट न होने वाले वृक्ष मिलते हैं।
  3. सामान्य शीत वाले समशीतोष्ण प्रदेशों में टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष-मैपिल, बर्च, बीच, बलूत, पोपलर आदि वृक्षों की अधिकता होती है।
  4. शंकुल वनों में कागज की लुग्दी, कागज, दियासलाई, तारपीन का तेल आदि के लिए उपयुक्त चीड़, देवदार, स्पूस, फर आदि कोमल लकड़ी के वृक्ष बहुतायत में पाये जाते हैं।
  5. भूमध्यरेखीय वनों में जहाँ सघनता कम है एवं नदियाँ उपलब्ध हैं, वहाँ महोगनी, एबोनी, रोजवुड, ग्रीनवुड, हार्डवुड, रबड़ आदि की मजबूत एवं टिकाऊ लकड़ियों के वृक्ष मिलते हैं।

यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में वन क्षेत्रफल उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा न केवल कम है, बल्कि ये क्षेत्र विश्व के औद्योगिक क्षेत्रों एवं बाजारों से दूर पड़ते हैं। अत: इन प्रदेशों की लकड़ियाँ बिना काटे ही रह जाती हैं। इसीलिए आर्थिक दृष्टिकोण से इन वनों की लकड़ी महत्त्व नहीं रखती।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
क्षयी और अक्षयी संसाधन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
पृथ्वी से प्राप्त विभिन्न प्रकार की धातुएँ खनिज क्षयी संसाधनों की श्रेणी में आती हैं। वास्तव में खनिज भण्डार इतनी तेजी से घट रहे हैं कि भविष्य में उनके अभाव से एक विकट समस्या उत्पन्न हो जाएगी। अतः ऐसे खनिज पदार्थ जो धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, उन्हें क्षयी संसाधन कहा जाता है। इसके विपरीत वे पदार्थ जो बहुत अधिक समय तक रहेंगे; जैसे-सौर ऊर्जा, वायु, जल, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव आदि को अक्षयी संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 2
नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय संसाधनों के बारे में आप क्या जानते हैं?
या
नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय संसाधनों के बीच विभेद कीजिए। [2011, 13, 16]
उत्तर
ऐसे संसाधन जो एक बार प्रयोग करने के पश्चात् फिर प्रयोग किये जा सकें, नव्यकरणीय संसाधन कहे जाते हैं; जैसे-जल, पवन, सूर्य-ऊर्जा आदि ऐसे संसाधन हैं जो सतत उपयोग करने पर फिर उत्पन्न होते रहते हैं; परन्तु कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जिसका एक बार उपयोग करने पर फिर उन्हें प्रयोग में नहीं लाया जा सकता; जैसे-कोयला। ऐसे संसाधनों को अनव्यकरणीय संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 3
संसाधनों के ‘संरक्षण’ पर टिप्पणी लिखिए। [2010]
उत्तर
संसाधनों के संरक्षण से अभिप्राय यह है कि जिन पदार्थों व वस्तुओं के प्रयोग के विषय में मानव को ज्ञान है, उनसे वह अधिकाधिक उपयोगिता हासिल करे। इस दिशा में संसाधनों का ऐसा प्रबन्ध किया जाए, जिससे वे अधिक लम्बे समय तक अधिकाधिक मनुष्यों की अधिकतम आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। एली के अनुसार, “संरक्षण वर्तमान पीढ़ी या भावी पीढ़ी के लिए त्याग है।” डॉ० मैकनाल के अनुसार, “संरक्षण का आशय किसी संसाधन का ऐसा उपयोग है जिससे मनुष्य जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम रीति से हो सके।” संरक्षण का महत्त्व निम्नलिखित रूप से स्पष्ट होता है –

  1. बचत की भावना का विकास होता है।
  2. संरक्षण से बरबादी या दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
  3. विवेकपूर्ण उपयोग भविष्य के लिए संसाधनों में बचत को प्रोत्साहित करता है।
  4. भविष्य में संसाधनों के नष्ट होने पर गहरा संकट केवल संरक्षण द्वारा ही दूर किया जा सकता है।
  5. पारिस्थितिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए भी संरक्षण आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसाधन से क्या तात्पर्य है? (2007)
या
संसाधन को परिभाषित कीजिए। [2012, 16]
उत्तर
कोई भी वह पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मानव की कुछ उपयोगिता करता हो, संसाधन कहलाता है।

प्रश्न 2
प्राकृतिक संसाधन किन्हें कहते हैं? [2007, 08, 10, 11, 16]
या
प्राकृतिक संसाधन को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए। [2014, 16]
उत्तर
वे संसाधन जो प्रकृति द्वारा मनुष्य को नि:शुल्क प्रदान किये जाते हैं और जो मानव के लिए उपयोगी होते हैं, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं; जैसे-वायु, जल, सौर ऊर्जा, खनिज, जीव-जन्तु आदि।

प्रश्न 3
क्या मानव स्वयं भी एक संसाधन है?
उत्तर
वास्तव में मानव स्वयं में एक बहुत बड़ा संसाधन है, जो प्रकृति की विभिन्न वस्तुओं को अपने ज्ञान और क्षमता के द्वारा उपयोगी बनाता है।

प्रश्न 4
विश्व के कुछ प्रमुख संसाधनों के नाम बताइए।
उत्तर
विश्व के कुछ प्रमुख संसाधन हैं- मानव, कोयला, खनिज तेल, जल, खनिज, पशु-सम्पदा, मत्स्य आदि।

प्रश्न 5
वर्तमान काल में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत क्या है?
उत्तर
वर्तमान काल में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत ‘खनिज तेल है, क्योंकि ऊर्जा के अतिरिक्त खनिज तेल से 8,000 अन्य प्रकार की उपवस्तुएँ भी प्राप्त की जाती हैं।

प्रश्न 6
संसार के चार प्रमुख मछली उत्पादक देशों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. चीन,
  2. जापान,
  3. भारत तथा
  4. संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 7
दो नव्यकरणीय संसाधनों का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर

  1. जल तथा
  2. पवन-दो नव्यकरणीय संसाधन हैं। ये संसाधन निरन्तर बने रहते हैं। अथवी चक्रीय स्वरूप में प्राप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 8
लकड़ी उत्पादन के चार प्रमुख देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
लकड़ी उत्पादन के चार प्रमुख देश हैं-संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, रूस व नावें।

प्रश्न 9
एशिया में लकड़ी उत्पादन वाले चार देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
एशिया में लकड़ी उत्पादन वाले चार देश हैं-जापान, चीन, म्यांमार तथा भारत।

प्रश्न 10
मानव संसाधन किसी भी देश के लिए आवश्यक साधन क्यों है?
उत्तर
मानवीय शक्ति द्वारा ही प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सम्भव होता है; अत: मानव संसाधन किसी भी देश के लिए एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रश्न 11
मुख्य भौतिक संसाधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
मुख्य भौतिक संसाधन हैं-खनिज पदार्थ, जल, भूमि, वन, वायु, मिट्टी, धरातल आदि।

प्रश्न 12
चार अक्षयी संसाधनों का नामोल्लेख कीजिए। [2007, 08]
उत्तर
चार अक्षयी संसाधन हैं-मिट्टी, जल, वायु तथा सौर ऊर्जा।

प्रश्न 13
विश्व में लकड़ी का उत्पादन करने वाले उस देश के नाम का उल्लेख कीजिए जो औद्योगिक लकड़ी का 76% भाग पूरा करता है।
उत्तर
संयुक्त राज्य अमेरिका।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
“मनुष्य का ज्ञान ही सबसे बड़ा संसाधन है।” यह कथन है –
(क) मैकनाल का
(ख) जिम्मरमैन का
(ग) कु० सैम्पुल का
(घ) डॉ० डेविस का
उत्तर
(ख) जिम्मरमैन का।

प्रश्न 2
निम्न में से कौन जैविक संसाधन है? [2011, 12, 15, 16]
(क) मिट्टी
(ख) जस्ता
(ग) वनस्पति
(घ) वायु
उत्तर
(ग) वनस्पति।

प्रश्न 3
वायु, जल, सौर ऊर्जा, भूमि व धरातल, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति, खनिज पदार्थ एवं जीव-जन्तु हैं –
(क) मानवीय संसाधन
(ख) प्राकृतिक संसाधन
(ग) (क) व (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) प्राकृतिक संसाधन।

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प्रश्न 4
विश्व के कुल मछली उत्पादन का सागरों से प्राप्त होने वाला भाग है –
(क) 70 प्रतिशत
(ख) 90 प्रतिशत
(ग) 88 प्रतिशत
(घ) 84 प्रतिशत
उत्तर
(ग) 88 प्रतिशत।

प्रश्न 5
ऊर्जा के निम्नलिखित स्रोतों में से कौन-सा स्रोत नवीकरणीय नहीं है?
(क) ज्वार ऊर्जा
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) जल-विद्युत
(घ) ताप-विद्युत
उत्तर
(घ) ताप-विद्युत।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा का नव्यकरणीय स्रोत नहीं है ? (2009)
(क) भू-ताप
(ख) वायु
(ग) जल
(घ) खनिज तेल
उत्तर
(घ) खनिज तेल।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन अक्षय संसाधन है? (2014)
(क) कोयला
(ख) लौह-अयस्क
(ग) सौर ऊर्जा
(घ) मैंगनीज
उत्तर
(क) सौर ऊर्जा।

प्रश्न 8
निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है? (2014)
(क) ज्वारीय ऊर्जा
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) ताप विद्युत
(घ) जल-विद्युत
उत्तर
(क) तापविद्युत।

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से कौन-सा नव्यकरणीय संसाधन है? (2015)
(क) पेट्रोलियम
(ख) लौह-अयस्क
(ग) जल
(घ) कोयला
उत्तर
(ग) जल

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 2 प्रयाग:

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name प्रयाग:
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 2 प्रयाग:

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) भारतवर्षस्य …………………… प्रत्यगच्छत् ।
गङ्गायमुनयोः ……………… आत्मान पावयान्ता ।
भारतवर्षस्य ………………… आत्मानं पावयन्ति।

[ ब्रह्मणः = ब्रह्मा का। प्रकृष्टयागकरणात् = उत्तम यज्ञ करने से। सितासितजले (सित + असित + जले) – श्वेत और श्याम जल में (अर्थात गंगा और यमुना के जल में)। विगतकल्मषाः = पापरहित] अमायाम् =अमावस्या में | सम्मर्दः = भीड़। उषित्वा =रहकर। पावयन्ति=पवित्र करते हैं। प्रत्यगच्छत् = लौट जाता था।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘प्रयागः’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इसमें तीर्थराज प्रयाग का वर्णन किया गया है।
[ विशेष – इस पाठ के समस्त अवतरणों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
अनुवाद – भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य में प्रयाग का विशेष स्थान है। यहाँ ब्रह्मा द्वारा किये गये श्रेष्ठ यज्ञ के कारण इसका नाम प्रयाग (प्र + याग = प्रकृष्ट यज्ञ) पड़ा। गंगा-यमुना के संगम पर श्वेत-श्याम जल में स्नान करके मनुष्य पापरहित हो जाते हैं, ऐसा लोगों का विश्वास है। अमावस्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति पर यहाँ स्नान करने वालों की बड़ी भीड़ होती है। प्रति वर्ष माघ-मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर यहाँ लाखों लोग आते हैं और एक महीने (तक) रहकर संगम के पवित्र जल से एवं विद्वानों-महात्माओं के उपदेशरूपी अमृत से अपने आपको पवित्र करते हैं। इसी पर्व (त्योहार) पर महाराज श्रीहर्ष (हर्षवर्द्धन) प्रत्येक पाँचवें वर्ष यहाँ आकर माँगने वालों को अपना सर्वस्व (सब कुछ) दान में देकर मेघ (बादल) के सदृश पुनः (धन) इकट्ठा करने के लिए अपनी राजधानी को लौट जाते थे।

(2) ऋषेः भरद्वाजस्य …………………… अगच्छत् ।

[दशसहसमिताः = दस हजार) अधीतिनः आसन् = पढ़ते थे, अध्ययन करते थे। वस्तव्यम् = रहना चाहिए, निवास करना चाहिए। प्रष्टुम् – पूछने को। त्वन्निवासयोग्यम् (त्वत् + निवासयोग्यम्) = तुम्हारे रहने योग्य। तेनादिष्टः (तेन +आदिष्टः) =उनसे आज्ञा पाकर। ]

अनुवाद – भरद्वाज ऋषि का आश्रम भी यहीं है। यहाँ प्राचीनकाल में दस हजार विद्यार्थी पढ़ते थे। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए पुरुषोत्तम (पुरुषों में श्रेष्ठ) श्रीराम अयोध्या से वन को जा रहे थे तो मुझे कहाँ निवास करना चाहिए’ यह पूछने के लिए (वे) यहीं भरद्वाज (ऋषि) के पास आये। चित्रकूट ही तुम्हारे रहने योग्य उपयुक्त स्थान है’, ऐसी उनसे आज्ञा पाकर सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीराम चित्रकूट गये।

(3) पुरा वत्सनामकमेकं ……………………….. दुर्गे सुरक्षितः) ।
पूरा वत्सनामकमेकं ……………………. स्वशिलालेखमकारयत्।

[ इतः = यहाँ से। नातिदूरेऽवर्तत (न + अतिंदरे + अवर्तत) = बहुत दूर नहीं (अर्थात् पास ही) थी। ललितकलाभिज्ञश्चासीत् (ललितकला +अभिज्ञः +च+आसीत्) =और ललित कलाओं के जानकार थे। ध्वंसावशेषाः = खण्डहर। ख्यापयन्ति = प्रकट करते हैं। स्वशिलालेखमकारयत् (स्वशिलालेखम् + अकारयत्) – अपना शिलालेख लिखवाया। योऽधुना (यः + अधुना) = जो अब।]

अनुवाद – प्राचीनकाल में वत्स नाम का एक समृद्ध (धन-धान्य सम्पन्न) राज्य था। इसकी राजधानी ‘कौशाम्बी यहाँ से थोड़ी ही दूर थी। इस राज्य के शासक महाराज उदयनवीर, अत्यधिक सुन्दर और ललित कलाओं के मर्मज्ञ (पारखी) थे। यमुना के किनारे आधुनिक सुजावन’ (नामक) ग्राम में उनके सुयामुन (नामक) महल के खण्डहर उनके सौन्दर्य-प्रेम को प्रकट करते हैं। प्रियदर्शी सम्राट अशोक ने कौशाम्बी में ही अपना शिलालेख लिखवाया था, जो अब कौशाम्बी से लाकर प्रयाग के किले में सुरक्षित (रखा गया) है।

(4) गङ्गायाः पूर्वं …………………… अतिमहत्त्वपूर्णमस्ति।
इतिहासप्रसिद्धः ……………………………. स्थितोऽस्ति।
इतिहासप्रसिद्धः ……………………..……… इत्यकरोत् ।

[ पुरूरवसः =पुरूरवा की। झूसीत्याधुनिकनाम्ना (झूसी +इति +आधुनिक+नाम्ना) = आजकल कँसी के नाम से प्रतिष्ठा=सम्मान। विदुषाम-विद्वानों के स्थित्या = रहने से, निवास से। अक्षुण्णैव (अक्षुण्ण + एव) =अखण्डित ही है। दुष्करम् = कठिन। विज्ञाय = जानकर। परिवृतम् = घिरा हुआ। दुर्गमकारयत (दुर्गम् + अकारयत्) – किला बनवाया। बन्धमप्यकारयत् (बन्धम् + अपि + अकारयत्) = बाँध भी
बनवाया। ]

अनुवाद – गंगा के पूर्व की ओर पुराणों में प्रसिद्ध महाराज पुरूरवा की राजधानी प्रतिष्ठानपुर, आजकल झुंसी नाम से प्रसिद्ध है। इसका गौरव आज भी विद्वानों और महात्माओं के निवास से अखण्डित है (अर्थात् कम नहीं हुआ है)।

इतिहास में प्रसिद्ध, नीतिकुशल अकबर नामक मुगल शासक ने दिल्ली से बहुत दूर पूर्व दिशा में स्थित कड़ा और जौनपुर नामक धन-धान्यसम्पन्न राज्यों की देखभाल कठिन जानकर, उन दोनों (राज्यों) के बीच प्रयाग में गंगा और यमुना से घिरा हुआ एक दृढ़ (मजबूत) किला बनवाया और गंगा के प्रवाह (धारा) से उसकी रक्षा के लिए एक विशाल बाँध का भी निर्माण कराया, जो आज भी नगर (प्रयाग) और गंगा के बीच में सीमा के सदृश स्थित है। इसी (अकबर) ने अपने इलाही’ धर्म के अनुसार प्रयाग का नाम (बदलकर) इलाहाबाद कर दिया। यह किला अत्यधिक विशाल, मजबूत और सुरक्षा की दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है।

(5) भारतस्य …………………… कर्मभूमिश्च।।

[ आजादोपनामकश्चन्द्रशेखरः (आजाद +उपनामकः + चन्द्रशेखरः) = आजाद उपनामधारी चन्द्रशेखर अर्थात् चन्द्रशेखर आजाद उषित्वा = रहकर।]

अनुवाद – यह नगर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र था। श्री मोतीलाल नेहरू, महामना मदनमोहन मालवीय, चन्द्रशेखर आजाद तथा स्वतन्त्रता संग्राम के अन्य सैनिकों ने इसी पवित्र भूमि पर निवास करके आन्दोलन का संचालन किया था। राष्ट्रनायक पण्डित जवाहरलाल नेहरू की यह क्रीड़ा-स्थली एवं कर्मभूमि है।

(6) राष्ट्रभाषा …………………… वर्द्धयति।।
अत्रैव च ………………………… वर्द्धयति।
राष्ट्रभाषा ………………………… शोभते।

अनुवाद – राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार में लगा हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन यहीं स्थित है और हजारों की संख्या में देशी-विदेशी छात्रों से घिरा, विविध-विद्याओं में निष्णात, श्रेष्ठ विद्वानों से सुशोभित, प्रयाग विश्वविद्यालय भरद्वाज (ऋषि) के प्राचीन गुरुकुल के नवीन रूप की भाँति शोभित है। इस स्वतन्त्र भारत में प्रत्येक नागरिक के न्याय-प्राप्ति के अधिकार की मानो घोषणा करता हुआ उच्च न्यायालय इस नगर की प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है।

(7) एवं …………………… शरीरबन्धः ।।
समुद्रपन्योर्जल ……… नास्ति शरीरबन्धः।।

[महिमानं वर्णयन = महिमा का वर्णन करते हुए। समुद्रपन्योः = समुद्र की दो पत्नियों (नदियों) के (यहाँ गंगा और यमुना के)| जलसन्निपाते = संगम पर। किल = निश्चय ही। अभिषेकात = स्नान से। तत्त्वावबोधेन (तत्त्व +अवबोधेन) -तत्त्वज्ञान की प्राप्ति से। विनापि (विन + अपि) – बिना ही। भूयस = पुनः, फिर। तनुत्यजाम् =शरीर त्यागने वालों को। शरीरबन्धः =शरीर का बन्धन (पुनः जन्म लेना)।]

अनुवाद – इस प्रकार गंगा-यमुना-सरस्वती के पवित्र संगम पर स्थित, भारतीय संस्कृति के केन्द्र (इस नगर) की महिमा का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने सत्य ही कहा था
निश्चय ही यहाँ समुद्र की पत्नियों ( अर्थात् गंगा-यमुना) के जल-संगम में स्नान करने से पवित्र आत्मा वाले मनुष्यों को शरीर त्यागने पर तत्त्वज्ञान के बिना भी पुनः शरीर के बन्धन में नहीं बँधना पड़ता (अर्थात् उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है)।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 वन्दना

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name वन्दना
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 वन्दना

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) विश्वानि ……………………. आसुव।

[ विश्वानि = सम्पूर्ण देव सवितर् = हे सूर्यदेव! दुरितानि = पापों को परासुव= दूर करो, नष्ट करो। यद् (यत्) = जो कुछ। भद्रं = कल्याणकारी (हो)। तन्नः (तत् + नः) = वह हमें। आसुव = प्रदान करो।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत वैदिक मन्त्र हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘वन्दना’ नामक पाठ से अवतरित
अनुवाद – हे सूर्यदेव! हमारे समस्त पापों को नष्ट करो (और) जो कल्याणकारी हो, वह हमें प्रदान करो।

(2) ईशावास्यमिदं …………………. धनम्

[ ईशा = ईश्वर से। वास्यम् = व्याप्त है। इदम् – यह। यत् किञ्च= जो कुछ भी। जगत्यां = अखिल ब्रह्माण्ड में। जगत्-जड़-चेतनरूप जगत्। त्यक्तेन = त्यागपूर्वक। भुञ्जीथाः = (इसे) भोगते रहो। मा गृधः = (इसमें) आसक्त मत होओ (मा = मत, नहीं)। कस्य स्विद् – किसका हैं ? (अर्थात किसी का नहीं)।]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।।
अनुवाद – इस अखिल ब्रह्माण्ड में (स्थित) जो यह चराचर जगत् है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है, (इसलिए) उस ईश्वर को साथ रखते हुए (उसका सदा-सर्वदा स्मरण करते हुए) त्यागपूर्वक (इसे) भोगो, (इसमें) आसक्त मत होओ, (क्योंकि) धन (भोग्य पदार्थ) किसका है (अर्थात् किसी का भी नहीं है) ? [ अथवा, किसी के भी (कस्य स्वित्) धन पर (धनम्) ललचाओ मत—किसी के धन को मत ग्रहण करो (मा गृधः)।]
विशेष – आशय यह है कि सांसारिक पदार्थ नाशवान् हैं, इसलिए उनमें आसक्त न होकर ईश्वर का सदा स्मरण करते हुए त्यागपूर्वक उनका भोग करो।

(3) सह नाववतु ………………………… विद्विषावहै।

[ सह = साथ-साथ। नाववतु (नौ + अवतु) = ईश्वर हम दोनों (गुरु-शिष्य) की रक्षा करें। भुनक्तु – पालन करें। वीर्यम = शक्ति को करवावहै – (हम दोनो) प्राप्त करें। तेजस्वि- तेजोमयी। नौ – हम दोनों की। अधीतम-पढ़ी हुई विद्या! अस्त-हो। मा विद्विषावहे = हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।]

सन्दर्भ – हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका के ‘वन्दना’ नामक पाठ से अवतरित कठोपनिषद् (शान्तिपाठ) के इस मन्त्र में, ईश्वर से गुरु-शिष्य के कल्याणार्थ प्रार्थना की गयी है।
अनुवाद – हे ईश्वर! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें, साथ-साथ पालन करें, हम दोनों साथ-साथ बल प्राप्त करें, हम दोनों की अध्ययन की हुई विद्या तेजोयुक्त हो (हम कहीं किसी से विद्या में परास्त न हों), हम दोनों परस्पर (कभी) द्वेष न करें।

(4) उत्तिष्ठत ……………………………… वरान्निबोधत।

[ उत्तिष्ठत = उठो। प्राप्य = प्राप्त करो। वरान् = श्रेष्ठ मनुष्यों को। निबोधत = ज्ञान प्राप्त करो। ]

सन्दर्भ – कठोपनिषद् (1/3/14) की यह पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘वन्दना नामक पाठ से अवतरित है।
अनुवाद – (हे मनुष्यो!) उठो (उद्यम करो), जागो (सावधान रहो), श्रेष्ठ मनुष्यों के समीप जाकर उनसे ज्ञान प्राप्त करो ( श्रेष्ठ अनुभवी विद्वानों के पास जाकर उनसे ज्ञान अर्जित करो)।

(5) यतो यतः …………………………… पशुभ्यः ।

[यतो यतः = जहाँ-जहाँ से। समीहसे= चाहते हो। ततः = वहाँ से। नः = हमें। शन्नः (शं+नः) = हमारा (नः) कल्याण (शं)| प्रजाभ्यः = प्रजाओं (सन्तान) का। पशुभ्यः = पशुओं से (भय के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है)।]

सन्दर्भ – हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘वन्दना’ नामक पाठ से अवतरित यजुर्वेद (36/22) के इस मन्त्र में भगवान् से रक्षा करने की प्रार्थना की गयी है।
अनुवाद – हे प्रभो! तुम जहाँ-जहाँ से उचित समझो (अर्थात् जहाँ-जहाँ से हम पर संकट आने वाला हो) वहाँ से हमें निर्भय करो (अर्थात् हमारी रक्षा करो), हमारी सन्तान का कल्याण करो और हमें पशुओं से निर्भय करो।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी)
Number of Questions 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी)

प्रश्न 1.
सूत-पुत्र’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2016,17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथा-सार संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
उत्तर
[ संकेत-नाटक के सारांश के लिए आगे दिये प्रश्न 2, 3, 4, 5 के उत्तरों को एक साथ क्रम से संक्षेप में लिखें।]
या
‘सूत-पुत्र’ में कर्ण के जीवन से सम्बन्धित मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
[ संकेत–प्रश्न संख्या 2, 3, 4, 5 से चार मार्मिक प्रसंगों को लेकर संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें।]

प्रश्न 2.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के प्रथम अंक की कथा को संक्षेप में लिखिए। [2009,11,12,13,15]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक अंक की कथा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
‘सूत-पुत्र’ नाटक के लेखक डॉ० गंगासहाय प्रेमी हैं। इस नाटक के कथासूत्र ‘महाभारत से लिये गये हैं। परशुराम जी उत्तराखण्ड के आश्रम में निवास करते हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि वह केवल ब्राह्मणों को ही धनुष चलाना सिखाएँगे, क्षत्रियों को नहीं। ‘कर्ण’ एक महान् धनुर्धर बनना चाहते हैं; अतः वे स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम जी से धनुर्विद्या सीखने लगते हैं। एक दिन परशुराम जी, कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सोये हुए होते हैं कि एक कीड़ा कर्ण की जंघा को काटने लगता है, जिससे रक्तस्राव होने लगता है। रक्तस्त्राव होने पर भी ‘कर्ण’ दर्द सहन कर जाते हैं। कर्ण की सहनशीलता को देखकर परशुराम जी को उसके क्षत्रिय होने का सन्देह होता है। पूछने पर कर्ण उन्हें सत्य बता देते हैं। परशुराम जी क्रुद्ध होकर शाप देते हैं कि अन्त समय में तुम हमारे द्वारा सिखाई गयी विद्या को भूल जाओगे। कर्ण वहाँ से वापस चले
आते हैं।

प्रश्न 3.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार संक्षेप में लिखिए।[2012, 16, 17]
या
द्रौपदी स्वयंवर की कथा ‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर लिखिए। [2013]
या
द्रौपदी स्वयंवर का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2013,17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर ‘द्रौपदी-स्वयंवर’ का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के दूसरे अंक में द्रौपदी के विवाह का वर्णन है। पांचाल-नरेश द्रुपद के यहाँ उनकी अद्वितीया सुन्दरी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होता है। स्वयंवर की शर्त के अनुसार प्रतिभागी को खौलते तेल की कड़ाही में ऊपर लगे खम्बे पर एक घूमते चक्र में बंधी मछली की आँख बेधनी थी। अनेक राजकुमार इसमें असफल हो जाते हैं। कर्ण अपनी विद्या पर विश्वास कर मछली की आँख बेधने आते हैं, लेकिन अपने परिचय से राजा द्रुपद को सन्तुष्ट नहीं कर पाते और द्रुपद उन्हें प्रतियोगिता के लिए अयोग्य घोषित कर देते हैं।

कर्ण के तेजस्वी रूप तथा विद्रोही स्वभाव से प्रसन्न होकर दुर्योधन ने उसे अपने राज्य के एक प्रदेश ‘अंग देश’ का राजा घोषित कर दिया, किन्तु ऐसा करके भी दुर्योधन, कर्ण की पात्रता और क्षत्रियत्व को पुष्ट नहीं कर पाता। यह प्रसंग ही दुर्योधन व कर्ण की मित्रता का सेतु सिद्ध होता है। ब्राह्मण वेश में अर्जुन और भीम सभा-मण्डप में आते हैं। अर्जुन मछली की आँख बेधकर द्रौपदी से विवाह कर लेते हैं। अर्जुन तथा भीम को दुर्योधन पहचान लेता है। दुर्योधन द्रौपदी को बलपूर्वक छीनने के लिए कर्ण से कहता है, परन्तु कर्ण इस अनैतिक कार्य के लिए तैयार नहीं होते। दुर्योधन अर्जुन से संघर्ष करता है, परन्तु घायल होकर वापस आ जाता है और कर्ण को बताता है कि ब्राह्मण वेशधारी और कोई नहीं अर्जुन और भीम ही हैं। इस बात में भी कोई सन्देह नहीं रह जाता है कि पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाकर मार डालने की उसकी योजना असफल हो गयी है। कर्ण पाण्डवों को बड़ा भाग्यशाली बताता है।

प्रश्न 4.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 13, 14, 15]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक में कर्ण-इन्द्र अथवा कर्ण-कुन्ती संवाद का सारांश लिखिए। [2010]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के तीसरे अंक में कर्ण के तपोस्थान का वर्णन है। कर्ण सूर्य भगवान् की उपासना करते हैं। सूर्य भगवान् साक्षात् दर्शन देकर उसे कवच तथा कुण्डल देते हैं और उनके जन्म का सारा रहस्य उन्हें बताते हैं। साथ ही आशीर्कद देते हैं कि जब तक ये कवच-कुण्डल तुम्हारे शरीर पर रहेंगे, तब तक तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं होगा। सूर्य भगवान् कर्ण को आगामी भारी संकटों से सचेत करते हैं और कहते हैं कि इन्द्र तुमसे इन कवच और कुण्डल की माँग करेंगे। कर्ण के पिछले जीवन की कथा भी सूर्य भगवान् उन्हें बता देते हैं, लेकिन माता का नाम नहीं बताते। कुछ समय बाद इन्द्र; अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण वेश में आकर दानवीर कर्ण से कवच व कुण्डल का दान ले लेते हैं। कर्ण की दानशीलता से प्रसन्न होकर वे उन्हें एक अमोघ शक्ति प्रदान करते हैं, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। इन्द्र कर्ण को यह रहस्य भी बता देते हैं कि कुन्ती से, सूर्य के द्वारा, कुमारी अवस्था में उनका जन्म हुआ है। इस जानकारी के कुछ समय बाद कुन्ती कर्ण के आश्रम में आती है और कर्ण को बताती है कि वे उनके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वह कर्ण से रणभूमि में पाण्डवों को न मारने का वचन चाहती है; परन्तु कर्ण ऐसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं। वे कुन्ती को आश्वासन देते हैं कि वे अर्जुन के अतिरिक्त अन्य किसी पाण्डव को नहीं मारेंगे। कुन्ती कर्ण को आशीर्वाद देकर चली जाती है। नाटक का तीसरा अंक यहीं समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
‘सूत-पुत्र के चतुर्थ अंक के कर्ण और अर्जुन के संवाद के आधार पर सिद्ध कीजिए कि कर्ण युद्धवीर होने के साथ-साथ दानवीर भी था।
या
‘सूत-पुत्र’ के सर्वाधिक रोचक और प्रेरणास्पद कथांश को लिखिए।
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के चतुर्थ अंक की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 14, 16, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के अंतिम अंक का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2016, 17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के चतुर्थ अंक में वर्णित श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद के माध्यम से दानवीर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2010]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक के चौथे (अन्तिम) अंक में अर्जुन तथा कर्ण के युद्ध का वर्णन है। यह अंक नाटक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और प्रभावित करने वाला अंक है। इसमें नाटक के नायक कर्ण की दानवीरता, बाहुबल और दृढ़प्रतिज्ञता जैसे गुणों का उद्घाटन हुआ है। कर्ण और अर्जुन का युद्ध होता है। कर्ण अपने बाणों के प्रहार से अर्जुन के रथ को युद्ध-क्षेत्र में पीछे हटा देते हैं। कृष्ण कर्ण की प्रशंसा करते हैं, जो अर्जुन को अच्छी नहीं लगती। कृष्ण अर्जुन को बताते हैं। कि तुम्हारी पताका पर ‘महावीर’, रथ के पहियों पर ‘शेषनाग और तीनों लोकों का भार लिये मैं रथ पर स्वयं प्रस्तुत हूँ, फिर भी कर्ण ने रथ को पीछे हटा दिया, निश्चय ही वह प्रशंसा का पात्र है। युद्धस्थल में कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फँस जाता है। अर्जुन निहत्थे कर्ण को बाण-वर्षा करके घायल कर देते हैं। कर्ण मर्मान्तक रूप से घायल हो गिर पड़ते हैं और सन्ध्या हो जाने के कारण युद्ध बन्द हो जाता है। श्रीकृष्ण कर्ण की दानवीरता एवं प्रतिज्ञा-पालन की प्रशंसा करते हैं। कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन घायल कर्ण के पास सोने का दान माँगने जाते हैं। कर्ण अपने सोने का दाँत तोड़कर देता है, परन्तु रक्त लगा होने के कारण अशुद्ध बताकर कृष्ण उन्हें लेना स्वीकार नहीं करते। तब रक्त लगे दाँतों की शुद्धि के लिए कर्ण बाण मारकर धरती से जल निकालता है और दाँतों को धोकर ब्राह्मण वेषधारी कृष्ण को दे देता है। अब श्रीकृष्ण और अर्जुन वास्तविक रूप में प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण से लिपट जाते हैं और अर्जुन कर्ण के चरण पकड़ लेते हैं। यहीं पर ‘सूत-पुत्र नाटक की कथा का मार्मिक व अविस्मरणीय अन्त होता है।

प्रश्न 6.
सूत-पुत्र नाटक के आधार पर कर्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या
‘सूत-पुत्र’ के प्रमुख पात्र (नायक) कर्ण का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2010, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2016]
या
‘सूत-पुत्र’ के प्रमुख पात्र कर्ण के जीवन से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ? नाटक के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। [2009]
या
“कर्ण वीर एवं दानी दोनों था।” सिद्ध कीजिए। [2009]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी के सूत-पुत्र’ नाटक का नायक कर्ण है। कर्ण के महान् चरित्र को प्रस्तुत कर उसकी महानता का सन्देश देना ही नाटककार का अभीष्ट है। कर्ण का जन्म कुन्ती द्वारा कौमार्य अवस्था में किये गये सूर्यदेव के आह्वान का परिणाम था। लोकलाज के भय से उसने कर्ण को एक घड़े में रखकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। वहीं से कर्ण सूत-पत्नी राधा को मिला तथा राधा ने ही उसका पालन-पोषण किया। राधा द्वारा पालन-पोषण किये जाने के कारण कर्ण ‘राधेय’ या ‘सूत-पुत्र’ कहलाया। असवर्ण परिवार में पालन-पोषण होने के कारण उसे पग-पग पर अपमान सहना पड़ा। अन्यायी और दुराचारी दुर्योधन की मित्रता भी उसकी असफलता का कारण बनी; क्योंकि मित्रता निभाने के लिए उसे अन्याय में भी उसका साथ देना पड़ा और अन्याय की अन्त में पराजय होती है तथा अन्यायी का साथ देने वाला भी बच नहीं पाता। कर्ण वीर, साहसी, दानवीर, क्षमाशील, उदार, बलशाली तथा सुन्दर था। यह सब होते हुए भी पग-पग पर अपमानित होने के कारण वह आजीवन तिल-तिल कर जलता रहा। उसका जीवन फूलों की शय्या नहीं, वरन् काँटों का बिछौना ही रहा।

कर्ण का चरित्र-चित्रण

कर्ण के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ थीं–
(1) सुन्दर आकर्षक युवक-नाटककार ने कर्ण के रूप के विषय में लिखा है-“कर्ण तीसपैंतीस वर्ष का हृष्ट-पुष्ट सुदर्शन युवा है। उसका शरीर लम्बा-छरहरा किन्तु भरा हुआ, रंग उज्ज्वल, गोरा, नाक ऊँची, नुकीली और आँखें बड़ी-बड़ी हैं।” इस प्रकार कर्ण एक सुन्दर आकर्षक युवक है।
(2) तेजस्वी तथा प्रतिभाशाली–कर्ण का व्यक्तित्व प्रतिभाशाली है। वह अपने पिता सूर्य के समान तेजस्वी है। कर्ण ऐसा पहला व्यक्ति है, जिसके तेजस्वी रूप से दुर्योधन जैसा अभिमानी व्यक्ति भी प्रभावित हुआ। द्रौपदी-स्वयंवर में कर्ण को पहली बार देखकर ही दुर्योधन उससे प्रभावित होता है और अपना मित्र बनाने के लिए वह उसे अंगदेश का अधिपति बना देता है।
(3) सच्चा गुरुभक्त-कर्ण गुरुभक्त शिष्य है। गुरु परशुराम उसकी जंघा पर सिर रखकर सोते हैं, तभी एक कीड़ा उसकी जंघा को काटने लगता है। कीड़े के काटने पर उसकी जंघा से रक्तस्राव होता रहा, परन्तु कष्ट सहकर भी वह गुरु-निद्रा भंग नहीं होने देता। गुरु उसे शाप देते हैं, परन्तु वह किसी से कभी भी उनकी निन्दा नहीं सुन सकता- ‘मेरे गुरु की निन्दा में आपने अब यदि एक भी शब्द कहा तो यह स्वयंवर-मण्डप युद्धस्थल में बदल जाएगा।” गुरु में कर्ण की अटूट श्रद्धा और भक्ति है। कर्ण की गुरु-भक्ति की प्रशंसा स्वयं गुरु परशुराम भी करते हैं-”विद्याभ्यास के प्रति तुम्हारी तन्मयता से मैं सदा प्रभावित रहा हूँ। मेरे लिए तुम प्राण भी दे सकते हो।”
(4) धनुर्विद्या में प्रवीण-कर्ण ने धनुष चलाने की शिक्षा परशुराम जी से प्राप्त की। कर्ण अपने समय का सर्वश्रेष्ठ बाण चलाने वाला है। अनुपम धनुर्धारी अर्जुन भी उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होता। साधारण योद्धाओं से युद्ध करना तो कर्ण अपनी शान के विरुद्ध समझता है।।
(5) नारी के प्रति श्रद्धाभाव-कर्ण के प्रति सबसे बड़ा अन्याय स्वयं नारीस्वरूपा उसकी माँ ने किया है, परन्तु फिर भी वह नारी के प्रति श्रद्धाभाव रखता है-“नारी विधाता का वरदान है। नारी सभ्यता, संस्कृति की प्रेरणा है। नारी का अपहरण कभी भी सह्य नहीं हो सकता।”
(6) दानवीर-कर्ण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी दानवीरता है। उसके सामने से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। अपनी रक्षा के अमोघ साधन कवच और कुण्डल भी वह इन्द्र के माँगने पर दान कर देता है। इस सम्बन्ध में अपने पिता सूर्य की सलाह भी वह नहीं मानता। वह इन्द्र से कहता है“मुझे जितना कष्ट हो रहा है, उससे कई गुना सुख भी मिल रहा है।”
(7) विश्वासपात्र मित्र-वह एक सच्चा मित्र है। दुर्योधन कर्ण को अपना मित्र बनाता है और कर्ण जीवन भर उसकी मित्रता का निर्वाह करता है। कुन्ती के कहने पर भी वह दुर्योधन से मित्रता के बन्धनों को तोड़कर विश्वासघाती नहीं बनना चाहता।
(8) प्रबल नैतिकता–कर्ण उच्च कोटि के संस्कारों से युक्त है, अत: वह नैतिकता को अपने जीवन में विशेष महत्त्व प्रदान करता है। द्रौपदी के अपहरण की बात पर वह दुर्योधन से कहता है-“दूसरे अनुचित करते हैं इसलिए हम भी अनुचित करें, यह नीति नहीं है। किसी की पत्नी का अपहरण परम्परा से निन्दनीय है।’

कुन्ती ने जब कर्ण से उसके जन्म की वास्तविकता बतायी और उसे अपने भाइयों के पास आ जाने के लिए कहा, तब भी कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। कर्ण का यह कार्य नैतिकता से परिपूर्ण है। किसी व्यक्ति को आश्वासन देकर बीच में छोड़ना नैतिकता नहीं है। यदि भीष्म पितामह और कर्ण के व्यवहार को इस कसौटी पर परखें तो कर्ण को ही उत्तम कहना पड़ेगा। भीष्म पितामह जहाँ परिस्थितियाँ न बदलने पर भी बदल गये वहाँ कर्ण परिस्थितियाँ बदलने पर भी नहीं बदला। कुन्ती ने कर्ण को ममता में फाँसने के साथ-साथ राज्य प्राप्ति का लालच भी दिया था, पर कर्ण सभी आकर्षणों से अप्रभावित रहा। जब कुन्ती ने बार-बार मातृत्व की दुहाई दी तो उसने युद्धस्थल में अर्जुन के अतिरिक्त अन्य किसी भी पाण्डव का वध न करने की शपथ ली।

जन्म एवं पालन-पोषण सम्बन्धी अपवाद के कारण कर्ण को चाहे जो कह लिया जाए, वैसे उसके चरित्र में कहीं भी कोई भी कालिमा नहीं है। कर्ण स्वनिर्मित व्यक्ति था। उसने किसी को न कभी धोखा दिया और न अकारण किसी से बैर-विरोध मोल लिया। ‘महाभारत के सभी पात्रों पर कुछ-न-कुछ लांछन लगा हुआ है, पर कर्ण इस दृष्टि से सभी प्रकार से उज्ज्वल है। उसने जीवन में केवल एक बार झूठ बोला और वह भी धनुर्विद्या सीखने के लिए। किसी को धोखा देने अथवा हानि पहुँचाने वाले असत्य भाषण से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।

इन सबके अतिरिक्त कर्ण सच्चा मित्र, अद्वितीय दानी, निर्भीक, दृढ़प्रतिज्ञ तथा महान् योद्धा है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कर्ण उदात्त स्वभाव वाला धीर-वीर नायक है।

प्रश्न 7.
‘सूत-पुत्र के आधार पर श्रीकृष्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2014, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2010, 15, 16]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014]
उत्तर

श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण

डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक संस्कृत के महाकाव्य ‘महाभारत’ पर आधारित है। यद्यपि इस नाटक का कथानके पूर्ण रूप से कर्ण को केन्द्रबिन्दु मानकर ही अग्रसर होता है, परन्तु श्रीकृष्ण भी एक प्रभावशाली पात्र के रूप में उपस्थित हुए हैं।
प्रस्तुत नाटक में श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नवत् प्रस्तुत किया गया है-

(1) वीरता के प्रशंसक-यद्यपि श्रीकृष्ण अर्जुन के मित्र हैं और उसके सारथी भी, परन्तु वे कर्ण की वीरता एवं शक्ति के प्रशंसक हैं। उन्हें इस बात पर प्रसन्नता होती है कि कर्ण सभी प्रकार से सुरक्षित अर्जुन के रथ को पीछे हटा देता है। वे कहते हैं—“धन्य हो कर्ण ! तुम्हारे समान धनुर्धर सम्भवतः पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।”
(2) कुशल राजनीतिज्ञ-कर्ण के पास, सूर्य के द्वारा दिये गये कवच-कुण्डलों को इन्द्र को दान कर देने पर, इन्द्र से प्राप्त एक अमोघ शक्ति थी जिसे कर्ण अर्जुन के वध के लिए सुरक्षित रखना चाहता है; परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण की उस शक्ति का प्रयोग घटोत्कच पर करा देते हैं। यह श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता एवं कुशल राजनीति का ही परिणाम था।
(3) कुशल-वक्ता-श्रीकृष्ण कुशल वक्ता के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण नहीं चलाना चाहता था। श्रीकृष्ण उसके भावों को उत्तेजित करते हैं और इस तरह बात करते हैं कि अर्जुन को धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए विवश होना पड़ता है।
(4) अवसर को न चूकने वाले–कर्ण के ऊपर बाण छोड़ने के लिए वे अर्जुन से कहते हैं”अगर तुम इस अवस्था में कर्ण पर बाण नहीं चलाओगे तो दूसरी अवस्था में वह तुम्हें बाण चलाने नहीं देगा।” वे अर्जुन से कहते हैं—“यही समय है, जब तुम कर्ण को अपने बाणों का लक्ष्य बनाकर सदा के लिए युद्ध-भूमि में सुला सकते हो। ………… शीघ्रता करो ! अवसर का लाभ उठाओ।”
(5) महाज्ञानी–श्रीकृष्ण ज्ञानी पुरुष के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। वे अर्जुन से कहते हैं-“मृत्यु को देखकर बड़े-बड़े योद्धा, तपस्वी और ज्ञानी तक व्याकुल हो उठते हैं।” वे अर्जुन को समझाते हैं—‘‘शरीर के साथ आत्मा का बन्धन बहुत दृढ़ होता है। इस प्रकार उनके ज्ञान और विद्वत्ता का स्पष्ट आभास मिलता है।
(6) पश्चात्ताप की भावना-श्रीकृष्ण को इस बात का पश्चात्ताप है कि कर्ण का वध न्यायोचित ढंग से नहीं हुआ। वे मानते हैं-”हमने अपनी विजय-प्राप्ति के स्वार्थवश कर्ण के साथ जो कुछ अन्याय किया है, हम इस प्रकार यश दिलाकर उसे भी थोड़ा हल्का कर सकेंगे।”

अस्तु; श्रीकृष्ण रंगमंच पर यद्यपि कुछ देर के लिए नाटक के अन्त में ही आते हैं, तथापि इतने से ही उनके व्यक्तित्व की झलक स्पष्ट रूप से मिल जाती है।

प्रश्न 8.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर दुर्योधन की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक संस्कृत के महाकाव्य ‘महाभारत पर आधारित है। यद्यपि इस नाटक का कथानक पूर्ण रूप से कर्ण को केन्द्र-बिन्दु मानकर ही अग्रसर होता है। परन्तु नाटक में दुर्योधन भी एक प्रभावशाली पात्र के रूप में उपस्थित हुए हैं, जो राजनीति के गुणोंसाम, दाम, दण्ड, भेद का खुलकर प्रयोग करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अन्त तक प्रयासरत रहते हैं। उनके चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सच्चा मित्र-दुर्योधन एक सच्चा मित्र है। वह कर्ण को अपना मित्र बनाता है। आजीवन मित्रता का निर्वाह करता है। मित्र होने के कारण कर्ण की हर सम्भव मदद करने को तत्पर रहता है।
(2) गुणों का पारखी—दुर्योधन गुणों का भी पारखी है। द्रौपदी के स्वयंवर में जब सूत-पुत्र होने के कारण कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने के अयोग्य घोषित करते हुए अपमानित किया गया तो दुर्योधन ने कर्ण में वीरता, धीरता, ओज आदि गुणों को देखते हुए तुरन्त उसको अंगदेश का राजा बनाकर अपना मित्र बना लिया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दुर्योधन गुणों का पारखी ही नहीं बल्कि दूरदर्शी भी था।
(3) उचित-अनुचित का विचार न करने वाला–जब ब्राह्मण वेषधारी अर्जुन द्रौपदी को स्वयंवर से जीतकर ले जा रहा था तो दुर्योधन ने कर्ण को अर्जुन से द्रौपदी को छीनने के लिए उकसाया, किन्तु कर्ण ने उसकी यह अनुचित बात नहीं मानी। इस प्रकार दुर्योधन उचित-अनुचित का विचार न करने वाला, घोर स्वार्थी एवं दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति था।
(4) ईष्र्यालु व्यक्ति–दुर्योधन वीर है लेकिन उसके अन्दर ईर्ष्या का अवगुण भी है। वह भीम से प्रबल ईष्र्या करता है।
(5) अनीतिज्ञ–दुर्योधन अनीतिज्ञ व्यक्ति है। यह नहीं है कि वह नीति को जानता नहीं है, लेकिन स्वार्थवश वह अनीति का कार्य करने के लिए भी उद्यत रहता है। नीति सम्बन्धी तथ्यों को वह नहीं मानता है। और द्रौपदी का अपहरण कर लेना चाहता है।
(6) वीर और महत्त्वाकांक्षी—दुर्योधन वीर और महत्त्वाकांक्षी तो है, परन्तु विचारवान नहीं है। कर्ण के रथ का सारथी शल्य को बनाते समय वह उसकी प्रकृति के सम्बन्ध में नहीं सोचता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि नाटककार ने दुर्योधन के रूप में ऐसे व्यक्तियों की ओर इंगित किया है जो समाज और राष्ट्र से ऊपर अपने हित को ही सर्वोपरि मानते हैं। ऐसे व्यक्ति नेता हों। अथवा अधिकारी सर्वथा समाज द्वारा त्याज्य हैं, जो किंचित भी राष्ट्र को कदापि हित नहीं कर सकते।

प्रश्न 9.
सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2009, 10, 12, 13, 15, 16]
उत्तर
कुन्ती का चरित्र-चित्रण डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक की प्रमुख नारी-पात्र है कुन्ती। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) मातृ-भावना—-कुन्ती का हृदय मातृ-भावना से परिपूर्ण है। युद्ध का निश्चय सुनते ही वह अपने पुत्रों के कल्याण के लिए व्याकुल हो उठती है। यद्यपि उसने कर्ण का परित्याग कर दिया था और किसी के सामने भी उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार नहीं किया था; किन्तु अपने मातृत्व के बल पर ही वह उसके पास जाती है और कहती है–”तुम मेरी पहली सन्तान हो कर्ण ! मैंने लोकापवाद के भय से ही तुम्हारा । त्याग किया था।”

(2) कुशल नीतिज्ञ-कुन्ती अपने पुत्रों की विजय और कुशल-क्षेम के लिए अपने त्यक्त-पुत्र कर्ण (जिसे असवर्ण घोषित कर दिया गया था) को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। जब कर्ण यह कहता है कि पाण्डव यदि मुझे सार्वजनिक रूप में अपना भाई स्वीकार करें तब ही उनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य हो सकता है, तो कुन्ती तत्काल ही कह देती है-“कर्ण तुम्हारे पाँचों अनुज सार्वजनिक रूप से तुम्हें अपना अग्रज स्वीकार करने को प्रस्तुत हैं।” जब कि पाण्डवों को उस समय तक यह भी नहीं मालूम हो पाया था कि कर्ण हमारे बड़े भाई हैं। कुन्ती उसे राज्य एवं द्रौपदी के पाने का भी लालच दिखाती है, जो स्वयंवर के समय उसे असवर्ण कहकर अस्वीकार कर चुकी थी। इस प्रकार उसमें राजनीतिक कुशलता भी पूर्ण रूप से विद्यमान थी।

(3) स्पष्टवादिता–स्पष्टवादिता कुन्ती के चरित्र का सबसे बड़ा गुण है। वह माता होकर भी अपने पुत्र कर्ण के सामने अपने कौमार्य में उसे जन्म देने के प्रसंग और उसे अपना पुत्र होने की बात कहते नहीं हिचकती। कर्ण द्वारा यह पूछे जाने पर कि तुमने किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सूर्यदेव से सम्पर्क स्थापित किया, वह कहती है-”पुत्र! तुम्हारी माता के मन में वासना का भाव बिल्कुल नहीं था।”जब कर्ण उससे यह पूछता है कि विवाह के बाद तुमने देव-आह्वान मन्त्र का क्यों उपयोग किया; तब कुन्ती अपने पति की शापजन्य असमर्थता का उल्लेख करती है और बताती है कि वे-पाण्डु तथा धृतराष्ट्र-भी अपने पिताओं की सन्तान नहीं, मात्र माताओं की सन्तान हैं।”

(4) वाक्पटु-कुन्ती बातचीत में भी बहुत कुशल है। वह अपनी बातें इतनी कुशलता से कहती है कि कर्ण एक नारी, एक माँ की विवशता को समझकर उसकी भूलों पर ध्यान न दे तथा उसकी बात मान ले। वह कर्ण की बातों में निहित भावों को समझ जाती है और उनका तत्काल तर्कपूर्ण उत्तर देती है। वह कर्ण को पहले पुत्र और बाद में कर्ण कहकर अपने मनोभावों को प्रदर्शित कर देती है और इस प्रकार अपनी वाक्पटुता का परिचय देती है। वह कहती है-”चलती हूँ पुत्र ! नहीं, नहीं, कर्ण ! मुझे तुम्हारे आगे याचना करके भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।”

(5) सूक्ष्म दृष्टि–कुन्ती में प्रत्येक विषय को परखने और तदनुकूल कार्य करने की सूक्ष्म दृष्टि थी। कर्ण जब उससे कहता है कि तुम यह कैसे जानती हो कि मैं तुम्हारा वही पुत्र हूँ जिसको तुमने गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया था; तब कुन्ती उससे कहती है-”क्या तुम्हारे पैरों की अँगुलियाँ मेरे पैरों की अँगुलियों से मिलती-जुलती नहीं हैं।”

इस प्रकार नाटककार ने थोड़े ही विवरण में कुन्ती के चरित्र को कुशलता से दर्शाया है। नाटककार ने विभिन्न स्थलों पर कुन्ती के कथनों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि एक माता द्वारा पुत्रों के कल्याण की कामना करना उसका स्वार्थ नहीं, वरन् उसकी सहज प्रकृति का परिचायक है।

प्रश्न 10.
परशुराम का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 13]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर ‘परशुराम’ का चरित्रांकन कीजिए| [2015, 16]
या
‘सूत-पुत्र के आधार पर परशुराम की चारित्रिक विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर
परशुराम का चरित्र-चित्रण डॉ० गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक में परशुराम को ब्राह्मणत्व एवं क्षत्रियत्व के गुणों से समन्वित महान् तेजस्वी और दुर्धर्ष योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। परशुराम कर्ण के गुरु हैं। इनके पिता का नाम जमदग्नि है। परशुराम अपने समय के धनुर्विद्या के अद्वितीय ज्ञाता थे। नाटक के अनुसार इनकी चारित्रिक विशेषताओं का विवेचन निम्नवत् है

(1) ओजयुक्त व्यक्तित्व–परशुराम का व्यक्तित्व ओजयुक्त है। नाटककार ने उनके व्यक्तित्व का चित्रण इस प्रकार किया है-”परशुराम की अवस्था दो सौ वर्ष के लगभग है। वे हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले सुदृढ़ व्यक्ति हैं। चेहरे पर सफेद, लम्बी-घनी दाढ़ी और शीश पर लम्बी-लम्बी श्वेत जटाएँ हैं।”
(2) महान् धनुर्धर-परशुराम अद्वितीय धनुर्धारी हैं। सुदूर प्रदेशों से ब्राह्मण बालक इनके पास हिमालय की घाटी में स्थित आश्रम में शस्त्र-विद्या ग्रहण करने आते हैं। इनके द्वारा दीक्षित शिष्यों को उस समय अद्वितीय माना जाता था। भीष्म पितामह भी इन्हीं के प्रिय शिष्यों में से एक थे।
(3) मानव-स्वभाव के पारखी-परशुराम मानव-स्वभाव के अचूक पारखी हैं। वे कर्ण के क्षत्रियोचित व्यवहार से जान जाते हैं कि यह ब्राह्मण न होकर क्षत्रिय-पुत्र है। वे उससे निस्संकोच कहते हैं-”तुम क्षत्रिय हो कर्ण! तुम्हारे माता-पिता दोनों ही क्षत्रिय रहे हैं।”
(4) आदर्श गुरु-परशुराम एक आदर्श गुरु हैं। वे शिष्यों को पुत्रवत् स्नेह करते हैं और उनके कष्ट-निवारण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। कर्ण की जंघा में कीड़ा काट लेता है और मांस में प्रविष्ट हो जाता है, जिससे रक्त की धारा प्रवाहित होने लगती है। इससे परशुराम का हृदय द्रवित हो उठता है। वे तुरन्त उसके घाव पर नखरचनी का प्रयोग करते हैं और कर्ण को सान्त्वना देते हैं। यह घटना गुरु परशुराम के सहृदय होने को प्रमाणित करती है।
(5) श्रेष्ठ ब्राह्मण-परशुराम एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। वे विद्यादान को ब्राह्मण का सर्वप्रमुख कार्य मानते हैं। जो ब्राह्मण धनलोलुप हैं, परशुराम की दृष्टि में वे नीच तथा पतित हैं, इसीलिए वे द्रोणाचार्य को निम्नकोटि का ब्राह्मण मानते हैं और कहते हैं—”द्रोणाचार्य तो पतित ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय का गुरु हो सकता है, सेवक अथवा वृत्तिभोगी नहीं।”
(6) उदारमना–परशुराम सहृदय तथा उदारमना हैं। वे अपने कर्तव्यपालन में वज्र के समान कठोर हैं, लेकिन दूसरों की दयनीय दशा को देखकर द्रवीभूत भी हो जाते हैं। ब्राह्मण का छद्म रूप धारण करने के कारण वे कर्ण को शाप दे देते हैं, लेकिन जब कर्ण की शोचनीय तथा दु:ख-भरी दशा का अवलोकन करते हैं तो वे उसके प्रति सहृदय हो जाते हैं। वे कहते हैं—“जिस माता से तुम्हें ममता और वात्सल्य मिलना चाहिए था, उससे तुमने कठोर निर्मम निर्वासन पाया।जिस गुरु से तुम्हें वरदान मिलना चाहिए था, उसी ने तुम्हें शाप दिया।” उनके इस कथन से उनके उदारमना होने की पुष्टि होती है।
(7) कर्तव्यनिष्ठ–परशुराम एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। कर्तव्यपालन में वे बड़ी-से-बड़ी बाधाओं को सहर्ष स्वीकार करने को उद्यत रहते हैं। उनकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित होकर कर्ण उनसे कहता है-“आपके हृदय में कोई कठोरता अथवा निर्ममता नहीं रही है। आपने जिसे कर्तव्य समझा है, जीवन भर उसी का पालन निष्ठापूर्वक किया है।”
(8) महाक्रोधी—यद्यपि परशुराम जी में अनेक गुण हैं, तथापि क्रोध पर अभी उन्होंने पूर्णतया विजय नहीं पायी है। क्रोध में आकर वे अपने महान् त्यागी शिष्य कर्ण को भी जब शाप दे देते हैं तो संवेदनशील पाठक का हृदय हाहाकार कर उठता है। वह मानव मन के इस विकराल विकार को, ऋषियों तक को अपना शिकार बनाते देखता है।।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि परशुराम तपोनिष्ठ तेजस्वी ब्राह्मण हैं। वे एक आदर्श शिक्षक तथा उदार हृदय के स्वामी हैं। उनमें ब्राह्मणत्व तथा क्षत्रियत्व दोनों के गुणों का अद्भुत समन्वय है।

प्रश्न 11.
सूत-पुत्र’ नाटक के नायक कर्ण के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कर्ण की व्यथा-कथा का सारांश लिखिए। [2016]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक कर्ण का मानसिक अन्तर्द्वन्द्व कई स्थानों पर उसके संवादों के माध्यम से प्रकट होता है। प्रथम चरण में वह अपने गुरु परशुराम के सामने इस द्वन्द्व को प्रकट करता है। वह जानना चाहता है कि क्या उसकी अयोग्यता मात्र इसलिए है कि वह किसी विशेष जाति से सम्बन्धित है। दूसरी बार द्रौपदी स्वयंवर में वह द्रुपद-नरेश से इस प्रश्न का उत्तर चाहता है। वह उनसे पूछता है कि जब स्वयंवर में योग्यता का निर्धारण धनुर्विद्या की कसौटी पर किया जाना है तो कुल-शील, जाति अथवा वर्ण सम्बन्धी प्रतिबन्धों का क्या औचित्य है ? उसका यही अन्तर्द्वन्द्व इन्द्र, सूर्य एवं कुन्ती के समक्ष भी प्रकट होता है। वह सामाजिक मान्यताओं एवं व्यवस्थाओं की विसंगतियों के उत्तर चाहता है। वह प्रत्येक को अपनी विचारात्मक तर्कशक्ति के आधार पर इन विसंगतियों के प्रति सहमत कर लेता है, किन्तु उसे क्षोभ इस बात का है कि सभी अपनी विवशता प्रकट करते हुए इस लक्ष्मण-रेखा.का अतिक्रमण करने से डरते हैं। कर्ण की व्यथा प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के अन्तर्मन को गहराई से झकझोर देती है। नाटककार ने कर्ण के अन्तर्मन में उत्पन्न इन प्रश्नों के माध्यम से वर्तमान समय के जाति-वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी रूढ़ियों से ग्रस्त भारतीय समाज के विचारों पर चोट की है। कर्ण के प्रति हुए अन्याय की मूल समस्या अनेक महापुरुषों द्वारा प्रयास किये जाने के बाद भी हमारे देश में आज तक समाधान नहीं पा सकी है।।

प्रश्न 12.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थल पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक में कर्ण की जीवन-लीला का अन्त; इस नाटक का सर्वाधिक मार्मिक स्थल है। कर्ण युद्धभूमि में आहत होकर मरणासन्न अवस्था में पड़ा है। शरीर के छिन्न-भिन्न होने से वह अत्यन्त पीड़ा का अनुभव कर रहा है। इसी समय कृष्ण उसकी दानवीरता एवं साहस की परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। वे उससे ब्राह्मण-वेश में जाकर सुवर्ण को दान माँगते हैं। युद्ध-भूमि में कर्ण के पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। वह उनसे अपने दो सोने के दाँत उखाड़ लेने का निवेदन करता है। कृष्ण के ऐसा करने से मना कर देने पर वह उनसे पत्थर देने का आग्रह करता है, जिससे वह अपने दाँत तोड़कर उन्हें दान दे सके। कृष्ण जब इससे भी मना कर देते हैं, तब वह घायलावस्था में घिसटते हुए पत्थर उठाती है। और अपने दाँत तोड़कर उन्हें देता है। कृष्ण उन रक्तरंजित दाँतों को अपवित्र बताकर दान लेने से मना कर देते हैं। इस पर वह बड़ी कठिनाई से अपनी धनुष उठाता है और धरती पर बाण का प्रहार करके जल की धारा प्रवाहित करता है तथा उस जलधारा में अपने टूटे हुए दाँत धोकर कृष्ण को देता है। प्रसन्न होकर कृष्ण उसके सामने अपने रूप को प्रकट करके उसे साधुवाद देते हैं।

नाटककार ने कर्ण के अन्तिम समय में कृष्ण द्वारा ली गयी इस परीक्षा का चित्रण करके कर्ण के चरित्र को महान् दानी के रूप में प्रतिष्ठित किया है। कृष्ण ने स्वयं अपनी परीक्षा का उद्देश्य भी यही बताया है।

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