UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name भोजस्यौदार्यम्
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

अवतरणों का ससदर्भ अनुवाद

(1) ततः कदाचिद् …………………………………… पुनरुद्धमुचितः।।
अये लाजानुच्चैः ……………………………….. पुनरुद्धर्तुमुचितः। [2010, 15]

[ कौपीनावशेषो (कौपीन + अवशेषः) = जिसके पास एकमात्र लँगोटी ही बच रही है (अति दरिद्र)। हर्षाभूणि (हर्ष + अश्रूणि) = हर्ष के आँसू। लाजानुच्चैः (लाजान् + उच्चैः) = खीलें (लेने का) उच्च (शब्द)। सुपिहितवती = अच्छी तरह बन्द कर दिये। दीनवदना = दीन मुख वाली (अर्थात् जिसके मुख से ही दीनता प्रकट हो रही है वह)। क्षीणोपाये (क्षीण + उपाये) = हीन साधन वाले (धनहीन) पर। दृशावश्रुबहुले (दृशौ + अश्रुबहुले) = आँसुओं से भरी दृष्टि। यदकृत (यत् + अकृत) = जो की (कर डाली)। (अकृत’ कृ धातु के परस्मैपद के सामान्यभूत या लङ् के प्रथम पुरुष एकवचन का रूप है)। तदन्तःशल्यम् (तत् + अन्तःशल्यम्) = हृदय में गड़े उस काँटे को। उद्धर्तुम् उचितः = निकालने में समर्थ।].

सन्दर्भ-यह गद्यखण्ड हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘भोजस्यौदार्यम्’ पाठ से उधृत है।
[ विशेष—इस पाठ के सभी अवतरणों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
अनुवाद-इसके बाद तभी द्वारपाल ने आकर महाराज भोज से कहा, “देव, केवल लँगोटी पहने (अति दरिद्र) एक विद्वान् द्वार पर खड़े हैं।” (राजा बोले)-“प्रवेश कराओ। तब प्रविष्ट होकर उस कवि ने भोज को देखकर ‘आज मेरी दरिद्रता का नाश हो जाएगा यह मानकर (विश्वास कर) प्रसन्न हो खुशी के आँसू बहाये। राजा ने उसे देखकर कहा—“हे कवि, रोते क्यों हो ?” तब कवि बोला, “राजन् मेरे घर की दशा सुनिए’’
“(घर से बाहर) रास्ते पर (खील बेचने वाले के द्वारा) ऊँचे स्वर से ‘अरे, खीले लो’ की आवाज सुनकर मेरी दीन मुख वाली पत्नी ने बच्चों के कानों को सँभालकर बन्द कर दिया (जिससे कि वे सुनकर खोलें दिलवाने का हठ न करें) और मुझे दरिद्र पर जो आँसुओं से भरी दृष्टि डाली, वह मेरे हृदय में काँटे की तरह गड़ गयी, जिसे निकालने में आप ही समर्थ हैं।”

(2) राजा शिव, शिव ……………………………… भिक्षाटनम् ।।

[ उदीरयन् = कहते हुए। शिवसन्निधौ = शिवजी के समीप दानववैरिणा = भगवान विष्णु द्वारा। गिरिजयाप्यर्द्धम् (गिरिजया + अपि + अर्द्धम्) = पार्वती जी द्वारा भी आधा। शिवस्याहतम् (शिवस्य + आहृतम्) = शिवजी का ले लिया। देवेत्थम् (देव + इत्थम्) = हे देव! इस। पुरहराभावे (पुरहर + अभावे) = त्रिपुरारि शिव के अभाव में। समुन्मीलति = प्रकाशित करती है (सुशोभित करती है)। गङ्गासागरम् = गंगा सागर को। अम्बरं शशिकला = चन्द्रकला आकाश को। नागाधिपः = नागों के राजा (शेषनाग)। क्षपातलम् = पृथ्वीतल को (यहाँ, पृथ्वी के नीचे पाताल को)। सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत् (सर्वज्ञत्वम् + अधीश्वरत्वम् + अगमत्) = सर्वज्ञता और ईश्वरत्व
(शक्तिमत्ता, प्रभुता) प्राप्त हुई। भिक्षाटनम् = भिक्षा के लिए घूमते फिरना। ]

अनुवाद–राजा ने ‘शिव शिव’ कहते हुए (अर्थात् अत्यधिक करुणा प्रकट करते हुए) प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक लाख (रुपये) देकर कहा, “तुरन्त घर जाओ। तुम्हारी पत्नी दु:खी हो रही होगी।” दूसरे दिन (अन्य किसी दिन) भोज शिवजी को प्रणाम करने शिवालय गये। वहाँ किसी ब्राह्मण ने शंकर के समीप जाकर कहा-
भगवान् शंकर की आधी देह दानव वैरी अर्थात् भगवान् विष्णु ने ले ली, आधी पार्वती जी ने। (तब) हे देव ? इस पृथ्वीतल पर गंगा भगवान् शिव के देहरहित हो जाने पर सागर को सुशोभित करने लगीं (सागर को चली गयीं), चन्द्रकला आकाश को, शेषनाग पृथ्वीतल से नीचे (पाताल को), सर्वज्ञता और ईश्वरता (शक्तिमत्ता या प्रभुता) आपको प्राप्त हुई और भीख माँगते फिरना मुझे (इस प्रकार भगवान् शंकर के समस्त गुण विभिन्न स्थानों पर बँट गये)।

(3) राजा तुष्टः ……………………….. लक्ष्मीनुद्यमिनामिव ।।
विरलविरला: ………………………………………… लक्ष्मीनुद्यमिनामिव। [ 2013]

[ स्थूलास्ताराः = बड़े तारे। विरलविरलाः = थोड़े-थोड़े। कलाविव (कलो + इव) = जैसे कलियुग में। प्रसन्नमभून्नभः (प्रसन्नम् + अभूत् + नभः) = आकाश निर्मल हो गया। ध्वान्तम् – अन्धकार। चित्तात्सतामिव (चित्तात् + सताम् + इव) = जैसे सज्जनों के चित्त से। लक्ष्मीनुद्यमिनामिव (लक्ष्मीः + अनुद्यमिनाम् + इव) = उद्यमरहित (आलसी या पुरुषार्थहीन) लोगों की सम्पदा के समान।]

अनुवाद–राजा ने सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्येक अक्षरे पर एक-एक लाख (रुपये) दिये। अन्य किसी दिन राजा ने पास में स्थित सीता (नाम की किसी कवयित्री) से कहा, “देवि ! प्रभात का वर्णन करो।’ सीता ने कहा-(इस प्रभात बेला में) बड़े तारे कलियुग में सज्जनों के समान बहुत कम हो गये हैं, मुनियों के मन (या अन्त:करण) के सदृश आकाश सर्वत्र निर्मल (स्वच्छ) हो गया है, अन्धकार सज्जनों के चित्त से दुर्जनों (के कुकृत्यों की स्मृति) के समान दूर हो गया है और रात्रि उद्योगरहित (पुरुषार्थहीन) व्यक्ति की समृद्धि के समान शीघ्र समाप्त होती जा रही है (अर्थात् जो व्यक्ति धन कमाने में उद्योग न करके पहले से जमा धन ही व्यय किये जाता है, जिस प्रकार उसकी समृद्धि शीघ्रतापूर्वक घटती जाती है, उसी प्रकार रात भी शीघ्रता से समाप्त होती जा रही है)।

(4) राजा तस्यै लक्षं …………………………………………….. लक्षं दद।
अभूत् प्राची ………………………………………… द्रविणरहितानामिव गुणाः। [2011, 14]

[ प्राची = पूर्व दिशा। पिङ्गा = पीली। रसपतिरिव (रसपतिः + इव) = पारे के समान। गतच्छायश्चन्द्रः = चन्द्रमा कान्तिमान हो गया। ग्राम्यसदसि = आँवारों की सभा में। द्रविणरहितानाम् इव = धनहीनों के समान।]

अनुवाद-राजा ने उसे एक लाख (रुपये) देकर कालिदास से कहा, “मित्र तुम भी प्रभात का वर्णन करो।’ तब कालिदास ने कहा-
पूर्व दिशा उसी प्रकार पीली हो गयी है जैसे सुवर्ण के संयोग से पारा (पीला हो जाता है), चन्द्रमा उसी प्रकार कान्तिहीन ((फीका) दिख पड़ता है जैसे गॅवारों (मूर्खा) की सभा में विद्वान्। तारे क्षणभर में ((सहसा) उसी प्रकार क्षीण हो गये हैं जैसे उद्योगरहित राजागण की राज्यश्री (क्षीण हो जाती है) और दीपक उसी प्रकार शोभा नहीं पाते जैसे धनहीन व्यक्तियों के गुण। (निर्धन व्यक्ति चाहे कितना भी गुणी हो, समाज में उसके गुणों का उचित मूल्यांकन या आदर नहीं होता और धनी व्यक्ति गुणहीन हो, तो भी समाज उसे आदर देता है।)
राजा ने अति सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्येक अक्षर पर एक लाख (रुपये) दे दिये।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 8
Chapter Name Infrastructure (आधारिक संरचना)
Number of Questions Solved 44
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure (आधारिक संरचना)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर 

प्रश्न 1.
आधारित संरचना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
आधारित संरचना से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा सेवाओं से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं। ये समाज के दैनिक जीवन में भी सहायक होती हैं। इन सेवाओं में सड़क, रेल, बन्दरगाह, हवाई अड्डे, बाँध, बिजली-घर, तेल व गैस पाइप लाइन, दूरसंचार सुविधाएँ, शिक्षण संस्थान, अस्पताल के स्वास्थ्य व्यवस्था, सफाई, पेयजल और बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाएँ तथा मुद्रा प्रणाली सम्मिलित हैं।

प्रश्न 2.
आधारित संरचना को विभाजित करने वाले दो वर्गों की व्याख्या कीजिए। दोनों एक-दूसरे पर कैसे निर्भर हैं?
उत्तर
आधारित संरचना निम्न दो प्रकार की होती है
1. सामाजिक आधारित संरचना- सामाजिक आधारित संरचना से अभिप्राय सामाजिक परिवर्तन 
जैसे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, नर्सिंग होम; के मूल तत्त्वों से है जो किसी देश के सामाजिक विकास की प्रक्रिया के लिए आधारशिला का कार्य करते हैं। इस प्रकार की संरचना आदमी की कुशलता एवं उत्पादकता को बढ़ाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवास मुख्य रूप से सामाजिक आधारित संरचना के भाग हैं। ये अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक क्रियाओं में सहयोग करते हैं।

2. आर्थिक आधारित संरचना– आर्थिक आधारित संरचना से अभिप्राय आर्थिक परिवर्तन के उन सभी तत्त्वों (जैसे शक्ति, परिवहन तथा संचार) से है जो आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया के लिए एक आधारशिला का कार्य करते हैं। इस प्रकार की संरचना उत्पादन पर सीधा प्रभाव डालती है। शक्ति, ऊर्जा, परिवहन एवं दूरसंचार आदि को आर्थिक आधारिक संरचना में सम्मिलित किया जाता है। आर्थिक आधारिक संरचना संवृद्धि की प्रक्रिया में वृद्धि लाती है जबकि सामाजिक आधारिक संरचना मानव विकास की प्रक्रिया में वृद्धि लाती है इसीलिए आर्थिक तथा सामाजिक आधारिक संरचना एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों एक-दूसरे के प्रभाव को प्रबल बनाती हैं एवं सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
आधारिक संरचना उत्पादन का संवर्द्धन कैसे करती है?
उत्तर
आधारिक संरचना ऐसी सहयोगी प्रणाली है, जिस पर एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की कार्यकुशल प्रणाली निर्भर करती है। संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।

प्रश्न 4.
किसी देश के आर्थिक विकास में आधारिक संरचना योगदान करती है। क्या आप सहमत| हैं? कारण बताइए।
उत्तर
आधारिक संरचना कसी देश के आर्थिक विकास की आधारशिला है। यह औद्योगिक व कृषि उत्पादन, घरेलू व विदेशी व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख क्षेत्रों में सहयोगी सेवाएँ उपलब्ध कराती है। इस संरचना से विकास के लिए उपयुक्त एवं पर्याप्त वातावरण तैयार होता है। इस संरचना की भूमिका निम्न प्रकार है

  1. संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।
  2. जलापूर्ति और सफाई में सुधार से प्रमुख जल संक्रमित बीमारियों में अस्वस्थता में कमी आती है। | और बीमारी के होने पर भी उसकी गम्भीरता कम होती है।
  3. परिवहन और संचार के साधनों से कच्चा माल व तैयार माल आसानी से एक जगह से दूसरी जगह | पहुँचाया जा सकता हैं।
  4. अर्थव्यवस्था की वित्त-प्रणाली सभी क्रियाकलापों के लिए मौद्रिक आपूर्ति करती है। मौद्रिक आपूर्ति जितनी अधिक मात्रा में सुगमता से उपलब्ध होती है, उतनी ही जल्दी आर्थिक परियोजनाएँ सफल होती हैं।
  5. किसी भी देश की औद्योगिक प्रगति बिजली उत्पादन, परिवहन व संचार के विकास पर निर्भर करती है।
  6. मानव संसाधन की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 5.
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की क्या स्थिति है?
उत्तर
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की स्थिति ग्रामीण भारत आर्थिक व सामाजिक दोनों ही आधारिक संरचनाओं में बहुत पिछड़ा हुआ है। सन् 2001 की जनगणना के आँकड़े यह बताते हैं कि ग्रामीण भारत में केवल 56 प्रतिशत परिवारों के लिए ही बिजली की सुविधा है जबकि 43 प्रतिशत परिवारों में आज भी मिट्टी के तेल का प्रयोग होता है। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 90 प्रतिशत परिवार खाना बनाने में जैव ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। केवल 24 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में लोगों को नल का पानी उपलब्ध है। लगभग 76 प्रतिशत लोग पानी के खुले स्रोतों से पानी पीते हैं। गाँव में टेलीफोन घनत्व बहुत कम है। ग्रामीण साक्षरता का स्तर भी निम्न है। इस प्रकार सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्र अभी भी अविकसित हैं।

प्रश्न 6.
‘ऊर्जा का महत्त्व क्या है? ऊर्जा के व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक स्रोतों में अन्तर कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा का महत्त्व

आर्थिक आधारित संरचना का बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण संघटक ऊर्जा है। किसी राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है, साथ ही यह उद्योगों के लिए भी अनिवार्य है। आज ऊर्जा का कृषि और उससे सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों के उत्पादन और यातायात; में उपयोग भारी स्तर पर हो रही है। इस प्रकार प्रत्येक गतिविधि को सम्पन्न करने हेतु ऊर्जा आवश्यक है। ऊर्जा के उपभोग स्तर से सामाजिक एवं आर्थिक संवृद्धि निर्धारित होती है।

आधार व्यावसायिक ऊर्जा गैर-व्यावसायिक ऊर्जा
1 घटक  कोयला, बिजली, प्राकृतिक गैस व पेट्रोलियम पदार्थ।। ईंधन की लकड़ी, पशु व कृषि अपशिष्ट।
2 प्रयोग  मुख्यतः वाणिज्यिक व औद्योगिक उद्देश्यों के लिए। मुख्यतः घरेलू तथा उपभोग उद्देश्यों के लिए।
3 प्रकृति  वाणिज्यिक ऊर्जा वाली वस्तुओं का कीमत होती है है और इन वस्तुओं की प्राप्त हो जाती हैं। ये सामान्यतः ग्रामवासियों को नि:शुल्क प्राप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 7.
विद्युत के उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
विद्युत के उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत इस प्रकार हैं

  1. तापीय विद्युत (कोयला),
  2. जलविद्युत (जल) तथा
  3. आणविक ऊर्जा (नाभिकीय विखण्डन)।

प्रश्न 8.
संचारण और वितरण हानि से आप क्या समझते हैं? उन्हें कैसे कम किया जा सकता है?
उत्तर
संचारण और वितरण हानि से आशय संचारण और वित्: नि से आशय विद्युत की चोरी से है। यह हानि विद्युत के कुछ भाग में तकनीकी खराबी के कारण तथा कुछ बिजली कर्मचारियों की सहायता से होने वाली बिजली चोरी के कारण होती है। आज विद्युत संचारण एवं वितरण से होने वाले घाटे सर्वविदित हैं।।
 नियन्त्रण के उपाय संचारण और वितरण हानि को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए

  1. उत्पादक क्रियाओं के लिए बिजली की दर ऊँची कर देनी चाहिए।
  2. संचारण एवं वितरण की हानि को तकनीकी में सुधार करके कम कर देना चाहिए।
  3. वितरण का निजीकरण करके बिजली चोरी को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
ऊर्जा के विभिन्न गैर-व्यावसायिक स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
ऊर्जा के गैर-व्यावसायिक स्रोतों में जलाऊ लकड़ी, कृषि का कूड़ा-कचरा और सूखा गोबर आते हैं। ये गैर-व्यावसायिक हैं, क्योंकि ये हमें प्रकृति/जंगलों में मिलते हैं।

प्रश्न 10.
इस कथन को सही सिद्ध कीजिए कि ऊर्जा के पुनर्नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है?
उत्तर
पुनर्नवीनीकृत (गैर-परम्परागत) ऊर्जा संसाधन है-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि। नव्यकरणीय साधन होने के नाते, ये ऊर्जा के विश्वसनीय संसाधन हैं। यह सही है कि उनके प्रयोग से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा 
सकते हैं

  1. अनव्यीकृतं साधन (परम्परागत साधन) क्षयशील हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इसके विपरीत पुनर्नवीनीकृत साधनों को पूर्णत: कभी भी क्षय नहीं होगा; उदाहरण के लिए सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। जब तक ब्रह्माण्ड में सूर्य विद्यमान रहेगा, सौर ऊर्जा प्राप्त की जाती रहेगी।
  2. वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ-साथ इन संसाधनों का भी विकास किया जाता रहेगा।
  3. इनको निरन्तर उपयोग किया जाना सम्भव है।
  4. ये ऊर्जा के अक्षयी संसाधन हैं। अत: इनसे अनवरत ऊर्जा की आपूर्ति होती रहेगी।
  5. ऊर्जा के ये साधन प्रदूषण नहीं फैलाते। अत: इनका मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं| पड़ता।

स्पष्ट है कि इन संसाधनों के अधिकाधिक उत्पादन एवं प्रयोग से हम ऊर्जा संकट को समाप्त कर सकते हैं। परन्तु आधुनिक तकनीक के अभाव में, इनकी पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद हम इनका व्यापक उपभोग नहीं कर पा रहे हैं। अतः ऊर्जा संकट से छुटकारा पाने के लिए इस ओर अधिकाधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 11.
पिछले वर्षों के दौरान ऊर्जा के उपभोग प्रतिमानों में कैसे परिवर्तन आया है?
उत्तर
1953-54 में ऊर्जा के कुल उपभोग के 55 प्रतिशत में कोयले का प्रयोग होता था। पेट्रोलियम तथा विद्युत ऊर्जा का उपभोग क्रमशः 16.7 प्रतिशत व 3.2 प्रतिशत था। इस समय प्राकृतिक गैस का प्रयोग नहीं किया जाता था। 1960-61 ई० में ऊर्जा स्रोत के रूप में कोयले के उपभोग में कमी हुई। इसके विपरीत पेट्रोलियम तथा विद्युत ऊर्जा के उपभोग में मामूली-सी वृद्धि हुई। सत्तर के दशक में यह वृद्धि 1953-54 की तुलना में दो गुनी हो गई तथा कोयले का उपभोग 56.1 प्रतिशत रह गया। इसी दशक में प्राकृतिक गैस का भी ऊर्जा के रूप में उपयोग होने लगा। यही वृद्धि अस्सी वे नब्बे के दशक में भी जारी रही। वर्तमान में भारत में कुल ऊर्जा उपभोग का 65 प्रतिशत व्यावसायिक ऊर्जा से पूरा होता है। इसमें कोयले का अंश सर्वाधिक (55 प्रतिशत) है। इसके अतिरिक्त इसमें तेल (31 प्रतिशत), प्राकृतिक गैस (11 प्रतिशत) और जल ऊर्जा (3 प्रतिशत) सम्मिलित हैं। जलाऊ लकड़ी, गाय का गोबर और कृषि का कूड़ा-कचरा आदि गैर-व्यावसायिक ऊर्जा स्रोतों का उपभोग भारत में कुल ऊर्जा उपभोग का 30 प्रतिशत से ज्यादा है।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के उपभोगे और आर्थिक संवृद्धि की दरें कैसे परस्पर सम्बन्धित हैं?
उत्तर
किसी राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्थान है, साथ ही यह उद्योगों के लिए भी अनिवार्य है। आज ऊर्जा का उपभोग कृषि और उससे सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों के उत्पादन और यातायात में भारी स्तर पर हो रहा है। घरों में इसकी आवश्यकता भोजन बनाने, घरों को प्रकाशित करने और गर्म करने के लिए होती है। संक्षेप में ऊर्जा के अधिक इस्तेमाल का मतलब अधिक आर्थिक विकास होता है। ऊर्जा के नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से धारणीय आर्थिक विकास होता

प्रश्न 13.
भारत में विद्युत क्षेत्रक किन समस्याओं का सामना कर रहा है?
उत्तर
भारत में विद्युत क्षेत्रक में उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली पर सरकार का एकाधिकार है। राज्य विद्युत बोर्ड, जो बिजली का वितरण करते हैं, वित्तीय घाटा उठा रहे हैं। इस वित्तीय घाटे के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. विभिन्न पॉवर स्टेशनों द्वारा जनित बिजली का पूरा उपभोग उपभोक्ता नहीं करते।
2. बिजली के सम्प्रेषण में विद्युत का क्षय होता है।
3. किसानों व लघु उद्योगों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता कम है।

इस वित्तीय घाटे को कम करने के लिए सरकार निजी व विदेशी क्षेत्रक को विद्युत उत्पादन व वितरण में सहभागिता बढ़ाने को प्रोत्साहित कर रही है। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत में बिजली से जुड़ी कुछ और समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1. भारत की वर्तमाने बिजली उत्पादन क्षमता 7 प्रतिशत की प्रतिवर्ष आर्थिक क्षमता अभिवृद्धि के लिए | पर्याप्त नहीं है।
  2. राज्य विद्युत बोर्ड जो विद्युत वितरण करते हैं, की लाइन हानि पाँच सौ मिलियन से ज्यादा है। | इसका कारण सम्प्रेषण और वितरण में क्षय, बिजली की अनुचित कीमतें और अकार्यकुशलता है।
  3. बिजली के क्षेत्र में निजी व विदेशी क्षेत्रक की भूमिका बहुत कम है।
  4. भारत के विभिन्न भागों में बिजली की ऊँची दरें और लम्बे समय तक बिजली गुल होने से आमतौर | पर जनता में असन्तोष है।
  5. तापीय संयन्त्रों में कच्चे माल एवं कोयले की आपूर्ति कम है।

प्रश्न 14.
भारत में ऊर्जा संकट से निपटने के लिए किए गए सुधारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर
निरन्तर आर्थिक विकास और जनसंख्या वृद्धि से भारत में ऊर्जा की माँग में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। यह माँग वर्तमान में देश में उत्पन्न हो रही ऊर्जा की तुलना में बहुत अधिक है। अत: भारत ऊर्जा के संकट खे गुजर रहा है।

ऊर्जा संकट से बचाव के उपाय

इस संकट से बचने के लिए निम्नलिखित सुधार किए गए हैं

  1. भारत ने निजी व विदेशी क्षेत्रकों को बिजली उत्पादन तथा वितरण के लिए अनुमति दे दी है।
  2. सरकार गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के उपभोग को प्रोत्साहन दे रही है।
  3. सरकार विद्युत वितरण में होने वाली हानि (लाइन लॉस) को कम करने का प्रयास कर रही है।
  4.  विद्युत उत्पादन की समस्या से बचने के लिए केन्द्रीय विद्युत अथॉरिटी एवं केन्द्रीय नियमन आयोग की स्थापना की गई है।

प्रश्न 15.
हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर
स्वास्थ्य सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की अवस्था है। इसका अर्थ केवल बीमारी का न होना ही नहीं है, बल्कि इससे अभिप्राय एक व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक अवस्था  से है। स्वास्थ्य राष्ट्र की समग्र संवृद्धि और विकास से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। एक देश की स्वास्थ्य की स्थिति को शिशु मृत्यु दर, मातृत्व मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, पोषण स्तर, छूत एवं अछूत की बीमारियों के आधार पर आँका जाता है। हमारे देश भारत में कुछ स्वास्थ्य सूचक निम्नलिखित तालिका में दर्शाए गए हैं

क्र०सं० सूचक
1 शिशु मृत्यु दर/प्रति 1000 शिशु 68
2 पाँच वर्ष के नीचे मृत्यु दर/प्रति 1000 शिशु 87
3 प्रशिक्षित परिचारिका द्वारा जन्म 43
4 पूर्ण प्रतिरक्षित 67
5 सकल घरेलू उत्पाद में स्वास्थ्य पर व्यय (%) 4.8
6 कुल व्यय में सरकारी हिस्सेदारी 21.3
7 कुल स्वास्थ्य व्यय में सरकारी हिस्सेदारी।।
8 स्वास्थ्य पर व्यय (अन्तर्राष्ट्रीय डॉलर में प्रति व्यक्ति आय) 96

प्रश्न 16.
रोग वैश्विक भार (GDB) क्या है?
उत्तर
विश्व रोग भार (GDB) एक सूचक है जिसका प्रयोग विशेषज्ञ किसी विशेष रोग के कारण असमय मरने वाले लोगों की संख्या के साथ-साथ रोगों के कारण असमर्थता में बिताए सालों की संख्या जानने के लिए करते हैं।

प्रश्न 17.
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ क्या हैं?
उत्तर
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ इस प्रकार हैं

1. यद्यपि देश की 72 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है परन्तु ग्रामीण जनसंख्या की तुलना में शहरी जनसंख्या को अधिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
2. अधिकतर सरकारी अस्पताल शहरों में स्थित हैं।
3. गाँवों में कुल अस्पताल को 30 प्रतिशत तथा बिस्तर का 25 प्रतिशत से अधिक नहीं है।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक 1 लाख लोगों पर 0.36 अस्पताल हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 3.6 । अस्पतालों की है।
5. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में एक्स-रे या खून की जाँच करने जैसी | सुविधाएँ नहीं हैं।
6. ग्रामीणों को शिशु चिकित्सा, स्त्री रोग चिकित्सा, संवेदनाहरण तथा प्रसूति विद्या जैसी विशिष्ट 
चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
7. गाँवों में चिकित्सक का हमेशा अभाव रहता है।
8. भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले निर्धनतमे लोग अपनी आय का 12 प्रतिशत स्वास्थ्य 
सुविधाओं पर व्यय करते हैं जबकि धनी केवल 2 प्रतिशत व्यय करते हैं।

प्रश्न 18.
महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता का विषय कैसे बन गया है?
उत्तर
भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग महिलाओं का है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी, पुरुषों की अपेक्षा काफी कम है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश में शिशु-लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएँ 943 हैं। 15 वर्ष से कम आयु वर्ग की लगभग 3 लाख लड़कियाँ न केवल शादीशुदा हैं बल्कि कम-से-कम एक बच्चे की माँ भी हैं। विवाहित महिलाओं में 50 प्रतिशत से ज्यादा रक्ताभाव एवं रक्तक्षीणता से पीड़ित हैं। इसी कारण महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता बन गया है।

प्रश्न 19.
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ बतलाइए। राज्य द्वारा रोगों पर नियन्त्रण के लिए उठाए गए प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बताइए।
उत्तर
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ सार्वजनिक स्वास्थ्य से आशय देश के समस्त लोगों के स्वास्थ्य से है। किसी देश के लोगों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं

  1. माँ का स्वास्थ्य उत्तम हो ताकि बच्चे भी नीरोगी व स्वस्थ पैदा हों।
  2. बच्चों को भयानक बीमारियों; जैसे-मलेरिया, तपेदिक, चेचक, पोलियो आदि; से बचाव के लिए | उन्हें समय पर उचित टीके लगाए जाने चाहिए।
  3. लोगों को खाने के लिए पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन प्राप्त होना चाहिए। सन्तुलित भोजन से बच्चों | की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  4. बीमारी के समय उचित उपचार की सुविधा होनी चाहिए, इससे रोग संक्रामक नहीं हो पाएँगे।

रोगों के नियन्त्रण सम्बन्धी कार्यक्रम

राज्य द्वारा रोगों को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए गए हैं

1. मलेरिया नियन्त्रण-यह मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारी के विरुद्ध विश्व का सबसे बड़ा स्वास्थ्य कार्यक्रम है।
2. राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम-कुष्ठ प्रभावित व्यक्तियों की दृष्टि से विश्व के कुल प्रभावित 
व्यक्तियों का लगभग 67% भारत में है। इसे दूर करने के लिए सन् 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम आरम्भ किया गया।
3. तपेदिक नियन्त्रण कार्यक्रम-अनुमान है कि देश में लगभग 64 मिलियन लोग सक्रिय तपेदिक  से प्रभावित हैं। इस कार्यक्रम के द्वारा तपेदिक अब लाइलाज बीमारी नहीं रह गई है।
4. अन्धता नियन्त्रण–देश में अन्धता नियन्त्रण पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने के कारण अब अन्धता | दर में निरन्तर कमी आ रही है। 5. एच०आई०वी०/एड्स नियन्त्रण-सन् 1987 से प्रारम्भ इस कार्यक्रम के अन्तर्गत इस रोग से 
ग्रसित रोगियों का पता लगाने, रोग के संक्रमण को नियन्त्रित करने तथा रोगियों का समुचित उपचार करने के लिए, सरकार बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम चला रही है।
6. पोलियो नियन्त्रण-पोलियो की प्रभावदर को शून्य करने के लिए 5 वर्ष तक के बच्चों को 
प्रतिमाह पोलियो की खुराक पिलाई जा रही है।

प्रश्न 20.
चिकित्सा की छ: भारतीय प्रणालियों की सूची बनाइए।
उत्तर
चिकित्सा की भारतीय प्रणाली में निम्नलिखित छः व्यवस्थाएँ हैं

1. आयुर्वेद।
2. योग।
3. यूनानी।
4. सिद्ध।
5. प्राकृतिक चिकित्सा।
6. होम्योपैथी।

प्रश्न 21.
हम स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर
किसी व्यक्ति के काम करने की योग्यता एवं क्षमता काफी सीमा तक उसके स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का निर्धारण शिशु एवं मातृ मृत्युदर, जीवन प्रत्याशा, पोषण स्तर, छूत एवं अछूत बीमारियों के स्तर से होता है। उपर्युक्त सूचकों के स्तर के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को बढ़ाने की आवश्यकता है। इसे निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

1. स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी व्यय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 5 प्रतिशत है। यह अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है। स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की सफलता के लिए सरकार को स्वास्थ्य व्यय बढ़ाना चाहिए।
2. बच्चों को भयानक बीमारियों; जैसे—मलेरिया, क्षयरोग (TB), चेचक, पोलियो आदि; से बचाव 
के लिए उन्हें उचित टीके लगाए जाने चाहिए।

  1. गरीब लोगों को खाने के पर्याप्त एवं सन्तुलित भोजन की आपूर्ति करनी चाहिए जिससे कुपोषण से होने वाली बीमारियों को रोका जा सके।
  2. स्वास्थ्य व सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा की जानी चाहिए।
  3. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ विकेन्द्रित होनी चाहिए।
  4. स्वास्थ्य सुविधाओं का शहरों एवं गाँवों में स्पष्ट विभाजन होना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
विद्युत के उत्पादन का बुनियादी स्रोत है
(क) तापीय विद्युत
(ख) जलविद्युत
(ग) आणविक ऊर्जा
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
सन् 2011 की जनगणना के अनुसर शिशु लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएँ
(क) 900
(ख) 943
(ग) 950
(घ) 955
उत्तर
(ख) 943

प्रश्न 3.
खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र नहीं है
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) गुजरात
(घ) डिगबोई
उत्तर
(क) उत्तर प्रदेश ।

प्रश्न 4.
विश्व में सम्भाव्ये जल-शक्ति की दृष्टि से भारत का कौन-सा स्थान है?
(क) पहला
(ख) दूसरा
(ग) तीसरा
(घ) पाँचवाँ
उत्तर
(घ) पाँचवाँ,

प्रश्न 5.
भारत में सर्वप्रथम परमाणु ऊर्जा केन्द्र कहाँ स्थापित किया गया?
(क) तारापुर में
(ख) रावतभाटा में
(ग) काकरापाड़ा में
(घ) नरौरा में
उत्तर
(क) तारापुर में ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधारिक संरचना क्या है?
उत्तर
किसी अर्थव्यवस्था के पूँजी स्टॉक के उस भाग को जो विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने की दृष्टि से अनिवार्य होता है, आधारिक संरचना कहा जाता है।

प्रश्न 2.
आधारिक संरचना के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
आधारिक संरचना के कुछ उदाहरण हैं-परिवहन सुविधाएँ प्रदान करने वाली सड़कें, बसें, रेलवे, स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने वाले अस्पताल, सिंचाई की सुविधा प्रदान करने वाली नहरें, कुएँ आदि पूँजी स्टॉक आधारिक संरचना हैं।

प्रश्न 3.
आर्थिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
आर्थिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं जो उत्पादन तथा वितरण की प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक दूसरा सहयोगी ढाँचा प्रदान करती हैं। इसके मुख्य घटक हैं
1. परिवहन एवं संचार तन्त्र,
2. विद्युत और सिंचाई तथा
3. मौद्रिक व वित्तीय संस्थाएँ।

प्रश्न 4.
सामाजिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
सामाजिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं जो आर्थिक सुविधाओं को अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली को बाहर से अपना योगदान करती हैं। ये सेवाएँ अर्थव्यवस्था के  एक महत्त्वपूर्ण सहायक ढाँचे का निर्माएँ करती हैं। इसके प्रमुख घटक हैं
1. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान,
2. स्वास्थ्य,
3. आवास,
4. नागरिक सुविधाएँ तथा
5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।।

प्रश्न 5.
संरचनात्मक सुविधाओं का देश के आर्थिक विकास में क्या महत्त्व है?
उत्तर
संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन व गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।

प्रश्न 6.
जलापूर्ति एवं सफाई में सुधार का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
जलापूर्ति एवं सफाई में सुधार से प्रमुख जल संक्रमित बीमारियों से अस्वस्थता में कमी आती है। और बीमारी के हो जाने पर भी उसकी गम्भीरता कम होती है।

प्रश्न 7.
आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
उत्तर
आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए सरकार को आधारिक संरचना सुविधाओं में निवेश को बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 8.
आय में वृद्धि के साथ आधारिक संरचना में क्या महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आते हैं?
उत्तर
अल्प आय वाले देशों के लिए सिंचाई, परिवहन व बिजली अधिक महत्त्वपूर्ण है जबकि उच्च आय वाले देशों में बिजली और दूरसंचार अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार आधारिक संरचना का विकास और आर्थिक विकास साथ-साथ होते हैं।

प्रश्न 9.
आर्थिक आधारिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक क्या है?
उत्तर
आर्थिक आधारिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक ‘ऊर्जा’ है क्योंकि इसके बिना औद्योगिक उत्पादन सम्भव नहीं है।

प्रश्न 10.
वाणिज्यिक और गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक बताइए।
उत्तर
1. वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक– कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद, प्राकृतिक गैस तथा बिजली।
2. गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक– ईंधन की लकड़ी, कृषि अवशिष्ट (भूसा) और पशु अवशिष्ट (गोबर)।

प्रश्न 11.
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत क्या हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत वे हैं जिनकी हमें जानकारी है और जिनका प्रयोग हम बहुत लम्बे समय से कर रहे हैं; जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और बिजली।।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत क्या हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत वे हैं जिनकी खोज हाल ही के वर्षों में की गई है और जिनकी लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ रही है; जैसे—सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा, बायोमास।

प्रश्न 13.
भारतीय कोयले का मुख्य दोष क्या है?
उत्तर
भारतीय कोयले का मुख्य दोष यह है कि इसमें राख बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है और उष्णता कम मात्रा में इसका तापविद्युत स्टेशनों की कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 14.
प्राकृतिक गैस का प्रयोग किस रूप में होता है? इसके भण्डार कहाँ हैं?
उत्तर
प्राकृतिक गैस का प्रयोग उर्वरक तथा पेट्रोलियम पदार्थों में कच्चे माल के रूप में होता है। इसके मुख्य भण्डार मुम्बई, गुजरात, त्रिपुरा, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान में पाए जाते हैं।

प्रश्न 15.
भारत में बिजली प्राप्ति के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर
भारत में बिजली प्राप्ति के तीन मुख्य स्रोत हैं-

  1. तापविद्युत स्टेशन,
  2. जल विद्युत स्टेशन तथा
  3. आणविक शक्ति स्टेशन।

प्रश्न 16.
भारत में आणविक शक्ति स्टेन के कुछ प्रमुख स्थान बताइए।
उत्तर
भारत में आणविक शक्ति स्टेशन के कुछ प्रमुख स्थान हैं-

  1. मुम्बई के पास, तारापुर में,
  2. कोटा (राजस्थान) के पास राणाप्रताप सागर बाँध,
  3. चेन्नई (तमिलनाडु) के समीप कलपक्कम में,
  4. बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) के पास नरौरा में।।

प्रश्न 17.
पर्यावरण की दृष्टि से ऊर्जा के परम्परागत और गैर-परम्परागत स्रोतों के बीच मुख्य अन्तर
| क्या है?
उत्तर
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत (विशेष रूप से कोयला और पेट्रोलियम) पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। जबकि ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करते।

प्रश्न 18.
बायो ऊर्जा से क्या आशय है?
उत्तर
बायो ऊर्जा जीव तथा जैव पदार्थ से प्राप्त की जाती है। यह दो प्रकार की होती है-
1. बायो गैस–इसे गोबर गैस प्लाण्ट में गोबर डालकर प्राप्त किया जाता है।
बायो मास-इसे पौधों तथा वृक्षों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 19.
ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत क्या हैं?
उत्तर
ऊर्जा के प्राथमिक वे स्रोत हैं जो प्रकृति से नि:शुल्क उपहार के रूप में प्राप्त होते हैं। इनका प्रत्यक्ष प्रयोग होता है; जैसे—कोयला, लिग्नाइट, पेट्रोलियम आदि।

प्रश्न 20.
ऊर्जा के अन्तिम स्रोत क्या हैं?
उत्तर
ऊर्जा के अन्तिम स्रोत वे हैं जिनका प्रयोग अन्तिम उत्पाद के रूप में किया जाता है जैसे विद्युत शक्ति ।

प्रश्न 21.
प्राकृतिक गैस के उपयोग बताइए।
उत्तर
प्राकृतिक गैस तरल पदार्थ के रूप में होती है। इसका प्रयोग अधिकतर घरों में ईंधन के रूप में किया जाता है। वर्तमान में इसंका व्यावसायिक उपयोग भी बढ़ता जा रहा है; जैसे-स्टील निर्माण में, हल्के वाहनों को चलाने आदि में।।

प्रश्न 22.
स्वास्थ्य से क्या आशय है?
उत्तर
स्वास्थ्य सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की अवस्था है। इसका आशय एक व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक तथा मानसिक अवस्था से है।

प्रश्न 23.
अच्छे स्वास्थ्य का क्या महत्त्व है?
उत्तर
अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि लाता है। यह मानव संसाधन विकास का एक महत्त्वपूर्ण घटक है और राष्ट्र की एक परिसम्पत्ति है।

प्रश्न 24.
बिजली के संचालन तथा वितरण में होने वाली हानि के क्या कारण हैं?
उत्तर
बिजली के संचालन तथा वितरण में होने वाली हानि के कारण हैं
1. पारेषण की पिछड़ी तकनीक तथा
2. बिजली कर्मचारियों की सहायता से बिजली की चोरी। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक आधारिक संरचना एवं आर्थिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
आधारिक संरचना दो प्रकार की होती है-
1. सामाजिक आधारिक संरचना एवं
2. आर्थिक आधारिक संरचना।
1. सामाजिक आधारिक संरचना– सामाजिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं, जो आर्थिक प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली को बाहर से अपना योगदान प्रदान करती हैं। ये सेवाएँ अर्थव्यवस्था के एक महत्त्वपूर्ण सहायक ढाँचे का निर्माण करती हैं । सामाजिक आधारिक संरचना के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं

  • सामाजिक शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान,
  • सामाजिक स्वास्थ्य,
  • सामाजिक आवास,
  • सामाजिक नागरिक सुविधाएँ तथा
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली।।

2. आर्थिक आधारिक संरचना– आर्थिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं, जो उत्पादन तथा वितरण की प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ये सेवाएँ बाहर स्थित न होकर उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली के अन्दर ही स्थित होती हैं। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक दूसरा सहयोगी ढाँचा प्रदान करती हैं।

आर्थिक आधारिक संरचना के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं

  1.  परिवहन और संचार तन्त्र,
  2. विद्युत और सिंचाई तथा
  3. मौद्रिक और वित्तीय संस्थाएँ।

प्रश्न 2.
ऊर्जा संसाधन से क्या तात्पर्य है? इन्हें कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर
जिन पदार्थों से मनुष्य को कृषि, उद्योग तथा परिवहन साधनों हेतु ऊर्जा की प्राप्ति होती है, उन्हें ऊर्जा संसाधन (Energy Resources) कहा जाता है। प्राचीन काल में मानव ऊर्जा के लिए मानव शक्ति, पशु शक्ति तथा लकड़ी आदि पर निर्भर करता था, परन्तु आज वह जिन पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त कर रहा है, उनमें कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम), प्राकृतिक गैस, पनविद्युत, परमाणु खनिज, सूर्यातप, पवन, भू-गर्भीय ताप, ज्वारीय तरंगें, गन्ने की खोई एवं कूड़ा-कचरा आदि का प्रमुख स्थान है।
ऊर्जा संसाधनों का वर्गीकरण – उपलब्धता के आधार पर ऊर्जा संसाधनों को दो भागों में विभाजित किया जाता है1. परम्परागत ऊर्जा संसाधन–इनमें कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम), प्राकृतिक गैस एवं

  1. परमाणु खनिज सम्मिलित किए जाते हैं जो भू- गर्भ से निकाले जाते हैं। इन ऊर्जा संसाधनों के भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं अर्थात् ये अविश्वसनीय ऊर्जा संसाधन हैं।
  2. गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधन– इनके अन्तर्गत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में ये ऊर्जा के नव्यकरणीय संसाधन हैं। इसी कारण इन्हें ऊर्जा के विश्वसनीय संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
जीवाश्मीय ईंधनों में कौन-से अवगुण पाए जाते हैं?
उत्तर
कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम) तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैव पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) भी कहा जाता है। जीवाश्मीय ईंधनों में निम्नलिखित अवगुण पाए जाते हैं

  1. ये ऊर्जा के क्षयी संसाधन हैं अर्थात् इनके भण्डार कभी भी समाप्त हो सकते हैं।
  2. जीवाश्मीय ईंधन के प्रयोग से राख, धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न होती है जिनसे पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है।
  3. एक बार उपभोग करने के बाद ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अर्थात् इनका नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है (पनविद्युत को छोड़कर)।
  4. इनके आवागमन में भारी व्यय करना पड़ता है, परन्तु इनसे ताप शक्ति की प्राप्ति अधिक होती है।
  5. जीवाश्मीय ईंधनों के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती जा रही है जो आधुनिक युग की सबसे ज्वलन्त समस्या है जिसका सामना विश्व के सभी देश कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस को जीवाश्मीय ईंधन क्यों कहते हैं? इनके दो
। विशेष अवगुण कौन-से हैं?
उत्तर
कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैव पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्मीय ईंधन कहा जाता है। कोयले की उत्पत्ति प्राचीन काल (कार्बोनिफेरस युग) में प्राकृतिक वनस्पति के भू-गर्भ में दबकर कालान्तर में रूपान्तरित और कठोर हो जाने के फलस्वरूप हुई है। दबाव के कारण इसे वनस्पति की

जलवाष्प समाप्त हो गई तथा वह कोयले में परिणत हो गई। कोयला जितने समय तक भू-गर्भ में दबा रहता है, उतना ही उत्तम और कार्बनयुक्त होता जाता है। इस प्रकार खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति भी भू-गर्भ में दबी हुई वनस्पति तथा जलजीवों के रासायनिक परिवर्तनों के कारण हुई आसवन क्रिया का परिणाम है। भू-गर्भ से निकलने के कारण इनमें अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं, अत: उपभोग करने से पूर्व इन्हें परिष्करणशालाओं में रासायनिक क्रियाओं द्वारा साफ किया जाता है।

जीवाश्मीय ईंधन के अवगुण

कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस के दो विशेष अवगुण इस प्रकार हैं

  1. एक बार उपभोग करने के उपरान्त ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अर्थात् इनका नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है।
  2. कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस, ऊर्जा के ऐसे संसाधन हैं; जिनके उपयोग से राख, धुआँ, | गन्दगी आदि पदार्थ निकलते हैं, जिनसे पर्यावरण प्रदूषित होता है।

प्रश्न 5.
परमाणु ऊर्जा के निर्माण में किन खनिजों को प्रयुक्त किया जाता है? भारत के ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
परमाणु ऊर्जा के निर्माण में प्रयुक्त खनिज परमाणु ऊर्जा के निर्माण में यूरेनियम, थोरियम, जिरकेनियम, बेरियम, जिरकॉन, एण्टीमनी, बेरीलियम, प्लूटोनियम, चेरोलिट, इल्मेनाइट तथा ग्रेफाइट नामक खनिज प्रयुक्त किए जाते हैं। इनमें यूरेनियम, थोरियम तथा प्लूटोनियम प्रमुख परमाणु खनिज हैं।

भारत में परमाणु ऊर्जा का महत्त्व

भारत में परमाणु ऊर्जा के महत्त्व को निम्नलिखित तथ्यों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है

  1. भारत में ऊर्जा के आपूर्ति संसाधनों; यथा—उत्तम कोटि के कोयले, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की पर्याप्त कम है। इनके भण्डार सीमित हैं। अत: हमें जल शक्ति अथवा परमाणु ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ेगा।
  2. परमाणु शक्ति केन्द्र ऐसे क्षेत्रों में सरलता से स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ शक्ति के अन्य संसाधन या तो हैं ही नहीं अथवा उनकी अत्यधिक कमी है।
  3. अन्य ऊर्जा संसाधनों की अपेक्षा परमाणु खनिजों के विघटन से अत्यधिक ऊर्जा शक्ति की प्राप्ति होती है।
  4. चिकित्सा तथा कृषि जैसे क्षेत्रों में परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग में भारत विश्व में अग्रणी स्थान रखता है।

प्रश्न 6.
भारत में परमाणु ऊर्जा केन्द्र कहाँ-कहाँ स्थापित किए गए हैं?
उत्तर
भारत में परमाणु ऊर्जा के केन्द भारत में परमाणु शक्ति बोर्ड द्वारा देश के विभिन्न भागों में परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थापित किए गए हैं। यहाँ सव्रप्रथम सन् 1960 में मुम्बई के निकट तारापुर में परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थापित किया गया था। इसके पश्चात् राजथान में कोटा के निकट रावतभाटा नामक स्थान पर, चन्नई के निकट कलपक्कम नामक स्थान पर, उत्तर प्रदेश में बुलन्दशहर के निकट नरौरा नामक स्थान पर तथा गुजरात में काकरापाड़ा नामक स्थान पर परमाणु ऊर्जा केन्द्रों की स्थापना की गई है। इस प्रकार से भारत में छः स्थानों;

  1. तारापुर एवं ट्रॉम्बे (महराष्ट्र),
  2. रावतभाटा (कोटा-राजस्थान),
  3. कलपक्कम (चेन्नई- तमिलनाडु),
  4. नरौरा (बुलन्दशहर-उत्तर प्रदेश),
  5. काकरापाड़ा (गुजरात),
  6. कैगा (कर्नाटक) में परमाणु ऊर्जा के केन्द्र स्थापित किए गए हैं। वर्तमान में देश में 14 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर्स काम कर रहे हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 2,720 मेगावाट है। देश में अन्य परमाणु ऊर्जा के रिएक्टर्स निर्माणाधीन हैं जिनकी स्थापना के बाद देश की परमाणु विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़कर 7300 मेगावाट हो जाएगी।

प्रश्न 7.
जलविद्युत शक्ति, कोयला एवं खनिज तेल की तुलना में अधिक सुविधाजनक है। क्यों?
उत्तर
जलविद्युत शक्ति, कोयले एवं खनिज तेल की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक है; क्योंकि

  1. जलविद्युत, शक्ति का अक्षय एवं अविरल स्रोत है, जबकि कोयला एवं खनिज तेल कभी भी | समाप्त हो सकते हैं।
  2. जलविद्युत उत्पादक परियोजना (बहुउद्देशीय परियोजना) का एक बार विकास हो जाने पर उसका उपयोग सदैव तथा सतत रूप में किया जा सकता है।
  3. तारों (केबिल्स) के माध्यम से जलविद्युत शक्ति को कम खर्च में दुर्गम एवं दूरवर्ती स्थानों तक ले जाया जा सकता है, जबकि कोयला या खनिज तेल का परिवहन व्यय बहुत अधिक होता है।
  4. जलविद्युत के उपयोग में धुआँ एवं गन्दगी आदि न उत्पन्न होने से यह स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त । रहती है, जबकि कोयला तथा खनिज तेल धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न कर पर्यावरण को प्रदूषित करते
  5. कोयला एवं खनिज तेल के भण्डारण में पर्याप्त व्यय करना पड़ता है, जबकि जलविद्युत में इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है।
  6. खनिज तेल की प्राप्ति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा किए हैं, जबकि जलविद्युत शक्ति के साथ ऐसा कोई तथ्य नहीं है। इसका प्रमुख उदाहरण इराक-अमेरिकी युद्ध है।

प्रश्न 8.
ऊर्जा के परम्परागत एवं गैर-परम्परागत साधनों की तुलना कीजिए। अथवा गैर-पारम्परिक ऊर्जा के साधन अनन्त काल तक प्रयोग में लाए जा सकते हैं।” उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा के परम्परागत तथा गैर-परम्परागत साधनों की तुलना

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure 1

प्रश्न 9.
जलविद्युत, ऊर्जा के गैर-पारम्परिके साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर
जलविद्युत, ऊर्जा के गैर-पारम्परिक साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि

  1. जलविद्युत, ऊर्जा का अक्षय एवं अविरल स्रोत है अर्थात् जलविद्युत नव्यकरणीय ऊर्जा संसाधन है, जबकि ऊर्जा के अन्य पारम्परिक साधन कभी भी समाप्त हो सकते हैं अर्थात् उनका नवीनीकरण | नहीं किया जा सकती है।
  2. जलविद्युत उत्पादक शक्तिगृह का एक बार विकास हो जाने पर उसका उपयोग सदैव एवं सतत | रूप में किया जा सकता है अर्थात् उसे परे बार-बार व्यय नहीं करना पड़ता है।
  3. जलविद्युत शक्ति का उत्पादन जल से किया जाता है तथा जल ऊर्जा को स्थायी स्रोत है। अतः जलविद्युत शक्ति के उत्पादन में पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता है, जबकि ऊर्जा के अन्य पारम्परिक साधन; यथा-कोयला, खनिज तेल आदि; धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न कर वायु प्रदूषण को जन्म देते
  4. जलविद्युत, ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है, जिसे तारों (केबिल्स) के माध्यम से दुर्गम क्षेत्रों में भी उपभोक्ताओं को सुलभ कराया जा सकता है, जबकि पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को दूरवर्ती उपभोक्ताओं तक भेजने में बार-बार परिवहन व्यय करना पड़ता है।
  5. जलविद्युत, शक्ति के विकास के लिए एक बार ही व्यय करना पड़ता है, जबकि पारम्परिक ऊर्जा | संसाधनों के दोहन में बार-बार पर्याप्त व्यय करना पड़ता है।
  6.  पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों के उपभोग से पूर्व भण्डारण, निस्तारण तथा परिवहन में अत्यधिक व्यय करना पड़ता है, जबकि जलविद्युत शक्ति के उपभोग हेतु इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है।
  7. पारम्परिक ऊर्जा संसाधन (खनिज तेल) ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव उत्पन्न किए हैं, जैसा कि दक्षिण-पश्चिमी एशिया में, जबकि जलविद्युत शक्ति के साथ ऐसा कोई तथ्य नहीं है।
  8. जलविद्युत शक्ति के उत्पादन के बाद जो जल शेष बचता है, उसके भौतिक एवं रासायनिक गुणों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अत: इस जल का उपयोग सिंचन तथा अन्य कार्यों में आसानी से किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के सन्दर्भ में बताइए।
उत्तर

भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ

स्वास्थ्य सेवाएँ सामाजिक आधारिक संरचना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। अच्छा स्वास्थ्य लोगों को अधिक कार्य कुशल बनाता है। इसके लिए एक उपयुक्त स्वास्थ्य ढाँचे का होना आवश्यक है। इस ढाँचे का निर्माण करते समय हमारे पास दो विकल्प होते हैं-

  1. बीमारियों को रोकथाम पर ध्यान देना तथा
  2. अस्पताल/समुदाय आधारित स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान देना। भारत में अस्पताल आधारित स्वास्थ्य सेवाएँ केवल देश के बड़े शहरों तक ही सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, समुदाय आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से विस्तार हो रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, उपकेन्द्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बड़ी मात्रा में स्थापित किए जा रहे हैं; किन्तु हमें बीमारियों की रोकथाम पर भी विशेष ध्यान देना होगा।

प्रश्न 11.
देश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर
देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँची उस देश की सामाजिक प्राथमिकताओं को प्रकट करता है। अच्छा स्वास्थ्य लोगों को अधिक कार्यकुशल व उत्पादक बनाता है। अत: यह आवश्यक है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं के उपयुक्त ढाँचे का निर्माण हो। इसके लिए सीमित साधनों की दशा में हमें सुविचारित ढंग से स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश करना होगा। सर्वप्रथम हमें बीमारियों की रोकथाम पर ध्यान देना होगा। देश के सभी लोगों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, अधिक अच्छी जन-सुविधाएँ तथा स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करनी होगी। प्राथमिक केन्द्रों एवं उपकेन्द्रों के साथ ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का भी तेजी से विस्तार होगा तथा परिवार कल्याण कार्यक्रम को अधिक सफल बनाना होगा।

प्रश्न 12.
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था भारत की स्वास्थ्य आधारिंक संरचना और स्वास्थ्य सुविधाओं की त्रिस्तरीय व्यवस्था है—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। प्राथमिक क्षेत्रक सुविधाओं में प्रचलित स्वास्थ्य समस्याओं का ज्ञान तथा उन्हें पहचानने, रोकने तथा नियन्त्रित करने की विधि, खाद्य पूर्ति और उचित पोषण और जल की पर्याप्त पूर्ति तथा मूलभूत स्वच्छता, शिशु एवं मातृत्व देखभाल, प्रमुख संक्रामक बीमारियों और चोटों से प्रतिरोध तथा मानसिक स्वास्थ्य का संवर्द्धन और आवश्यक दवाओं का प्रावधान सम्मिलित है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र और उपकेन्द्र स्थापित किए गए हैं। द्वितीयक क्षेत्रक में वे अस्पताल आते हैं जिनमें शल्य चिकित्सा, एक्स-रे, ई०सी०जी० जैसी बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इन्हें माध्यमिक चिकित्सा संस्थाएँ कहते हैं। ये प्राथमिक चिकित्सा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ दोनों ही प्रदान करते हैं। ये प्रायः जिला मुख्यालय और बड़े कस्बों में पाए जाते हैं। तृतीय क्षेत्रक में, उच्चस्तरीय उपकरणों से युक्त अस्पताल, मेडिकल कॉलेज व अन्य संस्थान आते हैं। जो मेडिकल शिक्षा के साथ-साथ विशिष्ट स्वास्थ्य सेवाएँ भी प्रदान करते हैं। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधारिक संरचना से क्या आशय है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर

आधारिक संरचना से आशय

किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन करने के लिए अनेक वस्तुओं तथा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है। ये वस्तुएँ तथा सेवाएँ ही आधारिक संरचना (Infrastructure) कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में—“आधारिक संरचना के अन्तर्गत ने वस्तुएँ, सुविधाएँ तथा सेवाएँ सम्मिलित की जाती हैं जो आर्थिक क्रियाओं को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान प्रदान करती हैं।” उत्पादन उत्पत्ति के साधनों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है अर्थात् उत्पादक को उत्पादन क्रिया के लिए विभिन्न उपादानों की आवश्यकता पड़ती है; उदाहरण के लिए उत्पादन के लिए सर्वप्रथम भूमि चाहिए, फिर पूँजी चाहिए जिससे हल, ट्रैक्टर, मशीनें व औजार क्रय किए जा सकें; कार्य करने के लिए श्रमिक चाहिए, उत्पादन व्यवस्था के प्रबन्धक चाहिए और उत्पादन कार्य में निहित जोखिम वहन करने के लिए उद्यमी। केवल इन साधनों की समुचित उपलब्धि ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उत्पादित वस्तुओं को उपभोक्ता क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए परिवहन, परिवहन के साधन-टूक, रेलगाड़ी आदि चाहिए। पत्र-व्यवहार व अद्यतन सूचनाओं के लिए संचार के साधन (डाक, तार व टेलीफोन आदि) चाहिए। धन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बैंक व वित्तीय संस्थाएँ चाहिए। अनिश्चितता और जोखिमों के भार को वहन करने के लिए बीमा कम्पनियाँ चाहिए। वस्तुओं की बिक्री को बढ़ाने के लिए विज्ञापन के साधन भी महत्त्वपूर्ण हैं।

संक्षेप में, वस्तुओं के उत्पादन व वितरण के लिए दो चीजें चाहिए-1. वस्तु व 2. सेवाएँ। आधारिक संरचना से आशय उन सेवाओं से है जिनका वस्तु के उत्पादन व वितरण के दौरान प्रयोग होता है जैसे कच्चा माल व निर्मित उत्पादों को लाने व ले जाने के लिए परिवहन सेवाएँ अथवा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन सेवाएँ। ये सेवाएँ उत्पादन व वितरण प्रक्रिया में सहायता पहुँचाती हैं और वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि करती हैं, इसलिए इन्हें ‘उत्पादक सेवाएँ’ कहा जाता है। कुछ ऐसी सेवाएँ होती हैं जिन्हें हम एक वस्तु की तरह खरीदते हैं तथा उनका प्रयोग करते हैं। जब हम एक सेवा वस्तु की भाँति खरीदते हैं जैसे यात्रियों द्वारा परिवहन के साधनों का प्रयोग, मरीजों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अस्पतालों एवं चिकित्सालयों का उपयोग तो वह उपभोक्ता सेवा कहलाती है। उपर्युक्त दोनों ही प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने के लिए कुछ सुविधाओं (जैसे सड़कें, बस, विद्यालय, अस्पताल आदि) का निर्माण करना आवश्यक होता है। ये अर्थव्यवस्था के पूँजी ढाँचे का उसी प्रकार से एक भाग होती हैं जिस प्रकार से वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियाँ और मशीनें तथा खेत पर

आधारित उद्योगों का विस्तार होता है और नए-नए उद्योगों की स्थापना होती है। इसके फलस्वरूप उत्पादन में वृद्धि होती है, राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, उपभोग स्तर एवं जीवन-स्तर में वृद्धि होती है तथा निर्धनता एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान होता है। इस प्रकार आधारित संरचना का विकास देश के आर्थिक विकास में सहायक होता है।

प्रश्न 3.
पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों से क्या अभिप्राय है? प्रमुख पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर
पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों से आशय कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु शक्ति ऊर्जा के प्रमुख खनिज संसाधन हैं। ये सभी संसाधन भू-गर्भ से निकाले जाते हैं तथा इनके भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इन्हें ‘परम्परागत ऊर्जा संसाधन’ भी कहा जाता है। अतः इन संसाधनों का उपयोग बड़ी मितव्ययिता से किया जाना चाहिए। भू-गर्भ से निकाले जाने के कारण इन्हें ऊर्जा के खनिज संसाधन कहा जाता है। कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्म ईंधन’ भी कहा जाता है।
पारम्परिक ऊर्जा संसाधन प्रमुख पारम्परिक ऊर्जा संसाधन हैं-

  1. कोयला,
  2. पेट्रोलियम,
  3. प्राकृतिक गैस तथा
  4. बिजली। 

1. कोयला
कोयला औद्योगिक ऊर्जा का प्रमुख साधन है। लोहा, इस्पात तथा रासायनिक उद्योगों के लिए कोयला अनिवार्य है। भारत में व्यावसायिक शक्ति का 67% से भी अधिक भाग कोयले एवं लिग्नाइट के द्वारा पूरा होता है।
भारत का 98% कोयला शोण्डवानायुगीन है। यहाँ 75% कोयला भण्डार दामोदर नदी घाटी क्षेत्र में स्थित है। यहाँ रानीगंज, झरिया गिरिडीह, बोकारो तथा कर्णपुरा में कोयले की प्रमुख खाने हैं। गोदावरी, महानदी, सोन तथा वर्धा नदियों को घाटियों में भी कोयले के भण्डार पाए जाते हैं। सतपुड़ा पर्वतश्रेणी तथा छत्तीसगढ़ के मैदानों में कोयले के विशाल भण्डार हैं। कोयले के संचित भण्डार की दृष्टि से भारत का विश्व में छठा स्थान है। देश में कोयले के सुरक्षित भण्डार 24,784.7 करोड़ टन आँके गए हैं। जिसका 29.6% झारखण्ड, 24.6% ओडिशा, 11.3 पश्चिम बंगाल, 23.4% छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश तथा शेष 11.1% अन्य राज्यों में पाया जाता है।

2. पेट्रोलियम
(खनिज तेल) खनिज तेल ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण संसाधन है। कृषि व औद्योगिक मशीनों एवं वाहनों में खनिज तेल चालकशक्ति के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यह भू-गर्भीय चट्टानों से निकाला जाता है। भू-गर्भ से निकले हुए कच्चे तेल में अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं। अतः तेल शोधनशालाओं में इन अशुद्धियों को रासायनिक क्रियाओं द्वारा शुद्ध किया जाता है जिससे पेट्रोल, मिट्टी का तेल, मोबिल ऑयल, ग्रीस, डीजल आदि अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। खनिज तेल का उपयोग वायुयान, जलयान, रेलगाड़ियों, मोटर तथा अन्य वाहनों के संचालन में किया जाता है। इससे निकले पदार्थों से फिल्म, प्लास्टिक, वार्निश, पॉलिश, मोमबत्ती, वैसलीन आदि अनेक पदार्थ प्राप्त होते हैं। खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र–भारत के प्रमुख खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. असम तेल क्षेत्र—

(क) डिगबोई तेल क्षेत्र,
(ख) नहरकटिया तेल क्षेत्र तथा
(ग) सुरमा घाटी 
तल क्षेत्र–मसीपुर, बदरपुर एवं पथरिया।

2. गुजरात तेल क्षेत्र—

(क) अंकलेश्वर तेल क्षेत्र,
(ख) लुनेज तेल क्षेत्र (खम्भात तेल क्षेत्र),
(ग) अहमदाबाद-कलोल तेल क्षेत्र तथा
(घ) वड़ोदरा तेल क्षेत्र 

3. अरब सागर-अपतटीय तेल क्षेत्र-

(क) बॉम्बे हाई तेल क्षेत्र तथा
(ख) अलियाबेट तेल 
क्षेत्र।

 4. अन्य तेल क्षेत्र- राजस्थान, हिमाचल प्रदेश तथा अरुणाचल प्रदेश।
5. नवीन सम्भावित,तेल क्षेत्र- गंगा नदी की घाटी, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा और महनदी के डेल्टाई भागों के समीप गहरे सागरीय क्षेत्र तथा असम राज्य।

3. प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस ऊर्जा का संसाधन होने के साथ-साथ पेट्रो-रसायन उद्योगों के लिए कच्चा माल भी है। वर्तमान में प्रकृतिक गैस का उत्पादन लगभग 30 अरब घन मीटर हो गया है तथा इसका उपयोग रासायनिक उर्वरकों के निर्माण में भी किया जाने लगा है। इसके अनुमानित भण्डार 638 अरब घन मीटर है। वास्तव में, ऊर्जा संसाधनों की कमी वाले देशों में प्राकृतिक गैस की उपलब्धि एक अनमोल उपहार है। प्राकृतिक गैस के भण्डार प्रायः खनिज तेल के साथ ही पाए जाते हैं। परन्तु खनिज तेल क्षेत्रों से अलग केवल प्राकृतिक गैस के भण्डार त्रिपुरा एवं राजस्थान राज्यों में पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश तथा ओडिशा के तटों से दूर गहरे सागर में भी प्राकृतिक गैस के भण्डार पाए गए हैं। प्राकृतिक गैस का संरक्षण कठिन होता है। इसे सिलिण्डरों में भरकर रसोई ईंधन के रूप में सुरक्षित तो रखा जा सकता है, परन्तु अधिक समय तक उसे सँभालकर रखने में आग लगने की आशंका बनी रहती है। अतः प्राकृतिक गैस का तुरन्त उपयोग करना ही श्रेयस्कर रहता है। पेट्रो-रसायन एवं रासायनिक उर्वरक उद्योगों द्वारा इसके अधिक उपयोग से इसका संरक्षण सम्भव हो पाया है। 4. विद्युत (बिजली) विश्व में सम्भाव्य जल शक्ति की दृष्टि से भारत का पाँचवाँ स्थान है। वर्ष 2010-11 की अवधि में 811-14 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ जिसमें 665.01 अरब यूनिट ताप बिजली, 114.26 अरब यूनिट पनबिजली, 2627 अरब यूनिट परमाणु बिजली और 5.61 अरब यूनिट भूटान से आयातित बिजली शामिल है। जलविद्युत भारत में ऊर्जा का सबसे उपयोगी एवं सुविधाजनक साधन है। भारत में बिजली के तीन स्रोत हैं

  1. ताप विद्युत (Thermal Power),
  2. जल विद्युत (Hydro-electricity),
  3. आणविक शक्ति (Atomic Power)।

प्रश्न 4.
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधन से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक को संक्षेप में समझाइए। आधुनिक समय में इन साधनों का क्या महत्त्व है?
उत्तर
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधन से आशय सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा तथा कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा एवं आदि ऊर्जा के गैर-परम्परागत संसाधन कहलाते हैं। ये नव्यकरणीय (अक्षय) ऊर्जा स्रोत हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है-

1. पवन ऊर्जा- नौ-परिवहन पवन और प्रवाहित जल का उपयोग प्राचीनकाल से होता चला आ रहा है। प्राचीनकाल में अनाज (आटा) पीसने के लिए पवनचक्कियों का उपयोग किया जाता था। भू-गर्भ से जल खींचने में भी पवनचक्कियों का प्रचलन था। वास्तव में, ऊर्जा के ये ऐसे संसाधन हैं। जिनको बार-बार नवीनीकरण किया जा सकता है। अन्य संसाधनों की अपेक्षा इनसे ऊर्जा प्राप्त करने में व्यय कम करना पड़ता है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि पवन के उपयोग से 200 मेगावाट तक विद्युत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है।

2. ज्वारीय ऊर्जा– भारत की समुद्री सीमा लगभग 6,100 किमी लम्बी है। तटीय क्षेत्रों में ज्वार-भाटे की प्रक्रिया द्वारा ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन सुगमता से किया जा सकता है। यदि ज्वार-भाटे के समय किसी संयन्त्र के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त कर ली जाए तो प्राप्त ऊर्जा शक्ति का उत्पादन बहुत ही सस्ता पड़ता है। यह ऊर्जा का अक्षय संसाधन है। भारत में कच्छ एवं खम्भात की खाड़ियाँ ज्वारीय ऊर्जा के उत्पादन में ओदर्श दशाएँ प्रस्तुत करती हैं, क्योंकि यहाँ सँकरी खाड़ियों में ज्वारीय जल बहुत-ही तीव्रता से ऊपर उठता है।।

3. भू-तापीय ऊर्जा- भूताषीय ऊर्जा केवल उन्हीं क्षेत्रों में सम्भव है जहाँ गर्म जल के स्रोत उपलब्ध हैं। वास्तव में गर्म जल के स्रोत ज्वालामुखी क्षेत्रों में ही उपलब्ध हो सकते हैं। भारत इस संसाधन में धनी नहीं है। हिमाचल प्रदेश में मणिकरण नामक गर्म जल स्रोत से ऊर्जा प्राप्ति के प्रयास चल रहे हैं।

4. जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा- बंजर भूमि तथा कृषि अयोग्य अपरदित भूमि का उपयोग वृक्षारोपण के लिए किया जा सकता है। इन पर ऐसे वृक्ष रोपे जा सकते हैं जिनकी वृद्धि शीघ्र हो सके तथा उनमें तापजन्य गुण भी हों। इनसे ईंधन की लकड़ी, काष्ठ कोयला और शक्ति प्राप्त की जा सकती है। भारत में इन वृक्षों का उपयोग करके लगभग 1.5 मेगावाट शक्ति का उत्पादन किया जाता है।

5. अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा- बड़े-बड़े नगरों एवं महानगरों में लाखों टन कूड़ा-कचरा एकत्र होता है, जिसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। दिल्ली महागनर में ठोस पदार्थों के रूप में प्राप्त कूड़े-कचरे से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए परीक्षण के रूप में एक संयन्त्र कार्यशील है। जिससे प्रतिवर्ष 4 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। इससे प्रोत्साहित होकर अन्य नगरों एवं महानगरों में ऐसे संयन्त्रों की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं।

6. कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा– वर्तमान में भारत में चीनी मिलों से भारी मात्रा में खोई (बैगास) की प्राप्ति होती है। अतः गन्ने के पेराई मौसम में इस खोई से 2000 मेगावाट विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जा सकता है। कृषि, पशुओं तथा मानव के अपशिष्टों द्वारा उत्पादित ऊर्जा ग्रामीण क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकता में प्रयुक्त की जा सकती है। इस दिशा में बायो गैस संयन्त्रों का संचालन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

7. सौर ऊर्जा- सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इससे विपुल मात्रा में अनवरत रूप से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। वास्तव में, सौर ऊर्जा भविष्य के लिए ऊर्जा का सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन सिद्ध हो सकता है क्योंकि ऊर्जा संसाधन जैसे कोयला एवं खनिज तेल आदि; जीवाश्मीय ईधन कभी भी पूर्ण रूप से समाप्त हो सकते हैं। परन्तु ब्रह्माण्ड में जब तक सूर्य विद्यमान रहेगा, उससे भारी मात्रा में सौर ऊर्जा प्राप्त की जाती रहेगी। इस प्रकार उपर्युक्त ऊर्जा संसाधनों की विशेषताओं का ध्यान में रखते हुए नि:सन्देह कहा जा सकता है कि हमारा भविष्य ऊर्जा के लिए इन्हीं गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधनों पर निर्भर रहेगा।

ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का महत्त्व

अधुनिक समय में, गैर परम्परागत ऊर्जा संसाधनों के महत्त्व को निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है

1. सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायो ऊर्जा (कूड़-कचरा, मल-मूत्र एवं गोबर आदि से निर्मित) ऊर्जा के प्रमुख गैर-परम्परागत संसाधन हैं।
2. ऊर्जा के गैर परम्परागत साधनों का विकास वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ-साथ किया जा | सर्केता है।
3. ऊर्जा के गैर परम्परागत साधन नव्यकरणीय होते हैं। इनका निरन्तर उपयोग किया जाता रहेगा; 
जैसे—जब तक बाह्माण्ड में सूर्य विद्यमान रहेगा, सौर ऊर्जा अनवरत रूप से प्राप्त होती रहेगी।
4. इन्हें ऊर्जा के ‘अक्षीय संसाधन’ कहा जाता है।
5. वर्तमान में ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों की उपलब्धता तो पर्याप्त मात्रा में है परन्तु तकनीकी । विकास की कमी के कारण उनका उपभोग व्यापक नहीं हो पाया है।
6. ऊर्जा के ये साधन पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से मुक्त हैं अर्थात् इनसे प्रदूषण नहीं होता है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि ऊर्जा साधनों की प्राप्ति के लिए भारत का भविष्य गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों में ही सुरक्षित है। हमें इसी ओर अधिकाधिक प्रयास करने की आवश्यकता

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 7
Chapter Name Major Tribes of India (भारत की प्रमुख जनजातियाँ)
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India (भारत की प्रमुख जनजातियाँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
नागा जनजाति के निवास-क्षेत्र एवं अर्थव्यवस्था का वर्णन कीजिए। [2008]
या
नागा जनजाति के निवास-क्षेत्र और आर्थिक क्रियाकलाप का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए-नागा जनजाति।
उत्तर

नागा Nagas

यह जनजाति मुख्यत: भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित नागालैण्ड राज्य में निवास करती है। नागा राष्ट्र की उत्पत्ति कुछ विद्वानों के अनुसार संस्कृत में प्रचलित ‘नग’ (पर्वत) शब्द से हुई। डॉ० एल्विन के मतानुसार, नागा की उत्पत्ति नाक अथवा लोंग से हुई। ये इण्डो-मंगोलॉयड प्रजाति से सम्बन्ध रखते हैं।

निवास-क्षेत्र – नागा जाति का मुख्य निवास-क्षेत्र नागालैण्ड है। पटकोई पहाड़ियों, मणिपुर के पठारी भाग, असम व अरुणाचल प्रदेश में भी कुछ नागा वर्ग निवास करते हैं।
प्राकृतिक वातावरण – नागालैण्ड के पूर्व में पटकोई तथा दक्षिण में मणिपुर व अराकान पर्वतश्रेणियाँ स्थित हैं। यहाँ उच्च एवं विषम धरातल, उष्णार्द्र जलवायु तथा अधिक वर्षा (200 से 250 सेमी) पायी जाती है। यहाँ सघन वनों में साल, टीक, बाँस, ओक, पाइन तथा आम, जैकफूट (कटहल), केले, अंजीर एवं जंगली फल भी प्रचुरता से पाये जाते हैं। इन वनों में हाथी, भैंसे, हिरण, सूअर, रीछ, तेंदुए, चीते, बैल (बिसन), साँभर, भेड़िये, लकड़बग्घे आदि तथा वन्य जन्तु चूहे, साँप, गिलहरियाँ, गिद्ध आदि पाये जाते हैं।

शारीरिक लक्षण – नागाओं के शारीरिक लक्षणों में मंगोलॉयड तत्त्व की अधिकता है, किन्तु डॉ० हट्टन इन्हें ऑस्ट्रेलॉयड मानते हैं। इनकी त्वचा का वर्ण हल्के पीले से गहरा भूरा, बाल काले व सुंघराले तथा लहरदार, आँखें गहरी भूरी, गालों की हड्डियाँ उभरी हुईं, सिर मध्यम चौड़ा, नाक मध्यम चौड़ी, कद मध्यम व छोटा होता है। नागाओं के अनेक उपवर्ग पाये जाते हैं। नागाओं के पाँच बड़े उपवर्ग निम्नवत् हैं –

  1. उत्तरी क्षेत्र में रंगपण व कोन्याक नागा;
  2. पश्चिम में अंगामी, रेंगमा व सेमा;
  3. मध्य में आओ, ल्होटा, फीम, चेंग, सन्थम;
  4. दक्षिण में कचा व काबुई तथा
  5. पूर्वी क्षेत्र में टेंगरखुल व काल्पो-केंगु नागा।

निवास – अधिकांश नागा पाँच-सात झोंपड़े बनाकर ग्रामों में रहते हैं। एक ग्राम में एक कुटुम्ब ही निवास करता है। झोंपड़ियों का निर्माण करने के लिए यहाँ के वनों में उगने वाले बाँस एवं लकड़ी का प्रयोग अधिक किया जाता है। नागा लोग अपने गृहों का निर्माण ऊँचे भागों में करते हैं, जहाँ वर्षा के जल से रक्षा हो सके। ये लोग अपने घरों को हथियारों एवं नरमुण्डों से सजाते हैं। सामान्यतः एक गाँव में 200 से 250 मकान तक होते हैं। एक मकान में बहुधा दो छप्पर होते हैं।

जिस स्थान पर नागा लोग नृत्य करते हैं, वहाँ वृत्ताकार ईंटों का घेरा बना होता है। मारम नागा अपने मकानों के दरवाजे पश्चिम दिशा की ओर नहीं बनाते, क्योंकि पश्चिम दिशा से शीतल वायु प्रवाहित होती है। अंगामी नागाओं में प्रत्येक गाँव कई भागों में बँटा होता है। इनके आपसी झगड़ों को निपटाने वाले मुखिया को टेबो कहते हैं।

वेशभूषा – सामान्यत: नागा बहुत कम वस्त्र पहनते हैं। आओ नागा एक फीट चौड़ा कपड़ा कमर पर लपेटते हैं तथा स्त्रियाँ ऊँचे लहँगे पहनती हैं। पुरुष सिर पर रीछ या बकरी की खाल की टोपी, हार्नबिल के पंख व सींग तथा हाथी-दाँत व पीतल के भुजबन्ध पहनते हैं। स्त्रियाँ उत्सवों तथा पर्यों पर पीतल के गहने, कौड़ियों, मँगे व मोती की मालाएँ तथा आकर्षक रंग-बिरंगे वस्त्र पहनती हैं। नागाओं में शरीर गुदवाने (Tattooing) का अधिक प्रचलन है।

भोजन – चावले नागाओं का प्रिय भोजन है, परन्तु यह कम मात्रा में प्राप्त होता है। इसी कारण ये लोग शिकार एवं जंगलों से प्राप्त होने वाले कन्दमूल-फल आदि पर निर्भर करते हैं। नागा लोग बकरी, गाय, बैल, साँप, मेंढक आदि का मांस खाते हैं। चावल से निकाली गयी शराब का उपयोग विशेष उत्सवों पर करते हैं। भोजन के सम्बन्ध में इनके यहाँ कुछ निषेध भी हैं; जैसे–मारम नागाओं में सूअर का मांस खाना वर्जित है, जबकि तेंडुल नागा बकरी के मांस का सेवन नहीं करते। बिल्ली का मांस सभी के लिए वर्जित है। कपड़ा-बुनकर नागाओं में नर-पशु का मांस कुंआरी लड़कियों को नहीं परोसा जाता। नागा लोग बिना दूध की चाय का सेवन करते हैं।

आर्थिक विकास एवं अर्थव्यवस्था – भारत की सभी जनजातियों में नागाओं ने पर्याप्त आर्थिक विकास किया है। इनके मुख्य व्यवसाय आखेट तथा झूमिंग कृषि करना है। इनके आर्थिक व्यवसाय निम्नलिखित हैं –
1. आखेट – पहाड़ी एवं मैदानी नागाओं की शिकार करने की विधियाँ भिन्न-भिन्न हैं। जंगली पशुओं को खदेड़कर नदी-घाटियों में लाकर भालों से उन्हें मारना सभी नागाओं में प्रचलित है। शिकार करने के लिए ये तीरकमान, भालों, दाव आदि का प्रयोग करते हैं। विष लगे तीरों का प्रयोग करना मणिपुर के मारम नागाओं में प्रचलित है। आखेट के नियमों का पालन सभी नागा कठोरता से करते हैं।

2. मछली पकड़ना – मछली पकड़ने का कार्य पर्वतों के निचले भागों, नदियों एवं तालाबों के किनारे जालों, टोकरों एवं भालों की सहायता से किया जाता है।

3. कृषि-कार्य – मणिपुर एवं नागा पहाड़ियों में निवास करने वाली आदिम नागी जाति ने। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि-कार्य में काफी प्रगति कर ली है, परन्तु उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्रों में झूमिंग पद्धति से कृषि की जाती है, अर्थात् वनों को आग लगाकर साफ करे प्राप्त की गयी भूमि पर, दो या तीन वर्षों तक खेती की जाती है, फिर इसे परती छोड़ दिया जाता है। ये लोग बाग भी लगाते हैं। यहाँ पर प्रमुख फसलें धान, मॅडवा, कोट तथा मोटे अनाज हैं। चाय की झाड़ियाँ प्राकृतिक रूप से उगती हैं। कुछ भागों में कपास भी उगायी जाती है।

4. कुटीर उद्योग-धन्धे – उत्तरी-पूर्वी भारत की अधिकांश आदिम जातियों में छोटे करघों पर बुनाई की कला उन्नत अवस्था में है। यहाँ मुख्य रूप से मोटा कपड़ा बुना जाता है। नागाओं द्वारा मिट्टी के बर्तन भी तैयार किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त सभी नागा टोकरियाँ एवं चटाई बनाने का व्यवसाय करते हैं। लोहार द्वारा गाँव में ही शिकार के लिए औजार तथा कृषि के उपकरण बनाये जाते हैं। नागा लोग टोकरियाँ, चटाइयाँ, मछली, पशु, लकड़ी का कोयला आदि वस्तुओं का व्यापार करते हैं।

सामाजिक व्यवस्था – अधिकांश नागाओं में संयुक्त परिवार-प्रथा तथा प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था लागू है। इनके गाँव में एक मुखिया या पुरोहित होता है, जो धार्मिक संस्थाओं का संचालन करता है। कोन्यक नागाओं में सामन्तवादी व्यवस्था प्रचलित है, वहाँ मुखिया शासक के रूप में होता है जो वंशानुगत होता है। नागाओं में किसी व्यक्ति का विवाह अपने गोत्र में नहीं हो सकता।
नागा युवकों के सोने के लिए ‘मोरूग’ (कुमार गृह) बने होते हैं, जहाँ सभी कुंआरे युवक तथा युवतियाँ होते हैं। इनमें समगोत्री विवाह वर्जित है; अत: एक मोरूग में निवास करने वाला लड़का, दूसरे मोरूग में प्रवासित लड़कियों से शादी कर सकता है। मोरूंग में नाच-गाने एवं मनोरंजन की सभी सुविधाएँ होती हैं।

धार्मिक विश्वास – नागाओं का विश्वास है कि खेतों, पेड़ों, नदियों, पहाड़ियों, भूत-प्रेतों आदि विभिन्न रूपों में आत्माएँ पायी जाती हैं। आत्मा की शक्ति क्षीण होने पर बाढ़, दुर्भिक्ष, तूफान, बीमारियों आदि के प्राकृतिक प्रकोप होते हैं। फसलें नष्ट हो जाती हैं, स्त्रियों में बाँझपन होता है, पशु नष्ट हो जाते हैं, शिकार उपलब्ध नहीं होता। अतएव आत्मा की तुष्टि के लिए पशु बलि, मदिरा, मछली आदि की भेंट चढ़ाई जाती है। जादू-टोने में इनका बहुत विश्वास है। ईसाई मिशनरियों के सम्पर्क में आने से अधिकांश नागाओं ने ईसाई धर्म अपना लिया।

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प्रश्न 2
भोटिया जनजाति के निवास-क्षेत्र, आर्थिक व्यवसाय एवं सामाजिक रीति-रिवाजों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

भोटिया Bhotia

क्रुक के अनुसार, ‘भोटिया’ शब्द की उत्पत्ति ‘भोट’ अथवा ‘भूट’ से हुई है। उत्तराखण्ड राज्य में तिब्बत व नेपाल की सीमा से संलग्न त्रिभुजाकार पर्वतीय क्षेत्र ‘भूट’ या ‘भोट’ नाम से विख्यात है। इसके अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले में उत्तर-पूर्व में स्थित आसकोट व दरमा तहसीलें, पिथौरागढ़ तथा चमोली जिले सम्मिलित हैं।

शारीरिक रचना – शारीरिक रचना की दृष्टि से भोटिया मंगोलॉयड प्रजाति से सम्बन्धित हैं। यह मध्यम व छोटे कद, सामान्य चपटी वे चौड़ी नाक, चौड़ा चेहरा, उभरी हुई गाल की हड्डियों, बादामी आकारयुक्त आँखें, शरीर पर कम बाल, त्वचा का प्रायः गोरा वर्ण आदि शारीरिक लक्षणों वाली जनजाति है।

प्राकृतिक वातावरण – भोट क्षेत्र समुद्रतल से 3,000 से 4,000 मीटर ऊँचा है। इस क्षेत्र में गंगा व शारदा की सहायक नदियाँ-कृष्णा, गंगा, धौली, गौरी, दरमा व काली प्रवाहित होती हैं। समतल भूमि केवल सँकरी घाटियों में उपलब्ध होती है। निचली घाटियों में उष्णार्द्र जलवायु पायी जाती है, किन्तु पर्वतीय ढालों पर ठण्डी जलवायु मिलती है।

अर्थव्यवस्था – प्राकृतिक साधनों के अभाव में भोटिया लोगों ने पशुचारण को आजीविका का मुख्य साधन बनाया है। सँकरी घाटियों के समतल भागों में बिखरे क्षेत्रों में तथा पर्वतीय ढालों पर सँकरी सोपानी पट्टियों में मोटे खाद्यान्नों व आलू की खेती होती है।

कृषि – पर्वतीय ढालों पर शीतकाल में हिमपात होने के कारण केवल ग्रीष्मकाल में 4 माह की अवधि में कृषि की जाती है। यहाँ गेहूँ, जौ, मोटे अनाज व आलू मुख्यत: उगाये जाते हैं। पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाये जाते हैं। यहाँ पर झूम प्रणाली की तरह ‘काटिल’ विधि से वनों को आग लगाकर भूमि को साफ करके बिना सिंचाई खेती कर ली जाती है। नदियों के किनारे सिंचाई द्वारा खेती की जाती है।

पशुचारण : मौसमी प्रवास – भोटिया लोगों की अर्थव्यवस्था पशुचारण पर आधारित है। इस क्षेत्र में 3,000 से 4,000 मीटर की ऊँचाई तक मुलायम घास आती है। यहाँ भोटिया लोग भेड़, बकरियाँ व ‘जीबू’ (गाय की भाँति पशु) चराते हैं। भेड़-बकरियों से मांस, दूध व ऊन की प्राप्ति होती है तथा जीबू बोझा ढोने के काम आता है। पशुचारण मौसमी-प्रवास पर आधारित है। ग्रीष्मकाल में निचली घाटियों में तापमान काफी ऊँचे हो जाते हैं तब उच्च ढालों पर पशुचारण किया जाता है। अक्टूबर (शीत ऋतु के आरम्भ) में पुन: ये निचले ढालों व घाटियों में उतर आते हैं।

कुटीर-शिल्प – पशुचारण से ऊन, खाल आदि पशु पदार्थ बड़ी मात्रा में प्राप्त होते हैं। भोटिया स्त्रियाँ सुन्दर डिजाइनदार कालीन, दुशाले, दरियाँ, कम्बल आदि बनाती हैं। इसके अतिरिक्त वे ऊनी मोजे, बनियान, दस्ताने, मफलर, टोपे, थैले आदि भी बुनती हैं। भोटिया स्त्रियाँ अत्यन्त मेहनती व कुशल कारीगर होती हैं। वे गेहूँ, जौ, मंडुए के भूसे से चटाइयाँ व टोकरे भी बनाती हैं।

व्यापार – भोटिया अपने तिब्बती पड़ोसियों से शताब्दियों से परस्पर लेन-देन का व्यापार करते रहे हैं। ये तिब्बत से ऊन लेकर उन्हें बदले में वस्त्र, नमक खाद्यान्न आदि देते हैं। किन्तु राजनीतिक कारणों से भारत व तिब्बत के मध्य सम्पर्क प्रायः ठप्प हो जाने के कारण अब भोटिया लोग ऊनी वस्त्र, सस्ते सौन्दर्य आभूषण, जड़ी-बूटियों का व्यापार मैदानी भागों में करते हैं तथा अपनी आवश्यकता की सामग्री नमक, शक्कर, तम्बाकू, ऐलुमिनियम के बर्तन आदि खरीदते हैं।

भोजन – भोटिया लोगों का मुख्य भोजन भुने हुए गेहूं का आटा (‘सत्तू’) है। मंडुआ व जौ भी इनका प्रिय खाद्यान्न है। भेड़-बकरी का मांस व दूध एवं विशेष अवसरों पर मदिरा का प्रयोग व्यापक रूप से होता है।

वेशभूषा – ठण्डी जलवायु के कारण पशुओं की खाल व ऊन से निर्मित वस्त्र अधिक प्रचलित हैं। पुरुष ऊनी पाजामा, कमीज व टोपी पहनते हैं। स्त्रियाँ पेटीकोट की तरह का ऊनी घाघरा तथा कन्धों से कमर तक लटकता हुआ ‘लवा’ नामक विशिष्ट वस्त्र पहनती हैं। शिक्षित वर्गों में बाह्य सम्पर्को व आर्थिक समृद्धि के कारण आधुनिक फैशन के वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया है। भोटिया स्त्रियाँ आभूषणप्रिय होती हैं। ये ताबीज, हँसुली, मँगे, पुरानी चौवन्नियों की माला, बेसर, नाथ, अँगूठियाँ आदि पहनती हैं। कलाई व ठोड़ी पर गुदना भी कराती हैं।

बस्तियाँ व मकान – मौसमी प्रवास पर आधारित पशुचारण अपनाने के कारण भोटिया लोगों के आवास अर्द्ध-स्थायी होते हैं। प्रायः प्रत्येक परिवार के दो घर होते हैं। ग्रीष्मकाल में ये उच्च ढालों पर एवं शीतकाल में घाटियों में निर्मित घरों में रहते हैं। मकान में दो या तीन कमरे होते हैं। ये पत्थर, मिट्टी, घास-फूस, स्लेट आदि से निर्मित होते हैं। इनकी छतें ढालू होती हैं। ये मकान प्रायः जल के निकट बनाये जाते हैं। मकानों में प्रायः खिड़की, दरवाजे नहीं होते।

समाज – भोटिया लोग हिन्दू रीति-रिवाजों को अपनाते हैं। इनमें एकपत्नी प्रथा (Monogamy) प्रचलित है। विवाह सम्बन्ध माता-पिता द्वारा तय किये जाते हैं। विवाह के अवसर पर नृत्य, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद, मदिरा आदि का आयोजन होता है। भोटिया लोग अन्धविश्वासी भूत-प्रेत के पूजक होते। हैं। घुमक्कड़ कठोर जीवन के बावजूद ये हँसमुख, साहसी, परिश्रमी, निष्कपट, सहनशील एवं धार्मिक प्रकृति के होते हैं, किन्तु शारीरिक स्वच्छता के प्रति लापरवाह होते हैं।

प्रश्न 3
“संथाल जनजाति के पर्यावरण, व्यवसाय तथा संस्कृति की भिन्नता उनके निवास-गृहों और रीति-रिवाजों से स्पष्ट हो जाती है।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
या
भारत में संथाल जनजाति के निवास-क्षेत्र (वितरण), अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को वर्णन कीजिए। [2010, 15]
उत्तर

संथाल अथवा गोंड
Santhal or Gond

संथाल भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। इनका प्रमुख क्षेत्र बिहार के छोटा नागपुर के पठार का पूर्वी भाग (संथाल परगना) है। यह पश्चिमी बंगाल के वीरभूमि, बांकुड़ा, माल्दा, मिदनापुर व चौबीस परगना, ओडिशा के मयूरभंज जिले तथा असम में भी पाये जाते हैं। ये लोग ऑस्ट्रिक वर्ग की मुण्डा भाषा बोलते हैं। बंगाल, असम व अन्य क्षेत्रों में सम्पर्को के कारण बिहारी, बंगाली व असमी भी बोलते हैं; अतः ये बहुभाषी हो गये हैं। गुहा के अनुसार, इनमें प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति तत्त्व की प्रधानता है। मध्यम कद, गहरा भूरा वर्ण, काली आँखें, काले सीधे घंघराले बाल, लम्बा सिर, मध्यम, चौड़ी व चपटी नाक, मोटे होंठ, शरीर पर कम बाल इनके प्रमुख शारीरिक लक्षण हैं।

प्राकृतिक वातावरण – संथाल परगना विषम तथा निम्न पठारी क्षेत्र है जिसे मौसमी नदी-नालों ने बहुत काट-छाँट दिया है। यहाँ शीतकाल में 30°C व ग्रीष्मकाल में 45°C तापमान पाये जाते हैं। वार्षिक वर्षा का औसत 150 सेमी रहता है। साल, महुआ, कदम, पीपल, कुसुम, पलास आदि के सघन वन पाये जाते हैं। इनमें सूअर, गीदड़, तेंदुए, हिरण, चीता आदि वन्य जन्तु पाये जाते हैं।
अर्थव्यवस्था– संथाल मूलतः कृषक हैं। ये वनों से आखेट एवं वस्तु-संग्रह, नदियों, पोखरों आदि से मछली पकड़ने का कार्य व मजदूरी भी करते हैं।

कृषि – कृषि इनका प्रमुख व्यवसाय है। ये वनों को साफ करके एक ही खेत को लगातार बोते हैं। धान, मोटे अनाज, दालें व कपास उगाते हैं। सिंचाई, उर्वरक, फसलों के हेर-फेर पर ध्यान न देने के कारण भूमि की उर्वरता नष्ट हो जाती है। मकान के पिछवाड़े खुली जगह में ये शाक-सब्जियाँ, फली, चारा आदि उगाते हैं।
वस्तु-संग्रह – वनों से महुआ फल, छालें, जड़, गाँठे, फल-फूल, कोंपले आदि एकत्रित करके संथाले लोग भोजन की पूर्ति करते हैं। मकान बनाने के लिए सामग्री भी एकत्रित करते हैं।

आखेट – जंगली सूअर का शिकार संथाल लोगों का प्रिय मनोरंजन तथा भोजन का अतिरिक्त साधन है। ये लोग जाल, फन्दे, तीर आदि के द्वारा तालाब, नदी व पोखर से मछली भी पकड़ते हैं।
पशुपालन – भोजन पूर्ति के लिए संथाल लोग गाय, बैल, सूअर, बकरी, मुर्गी व कबूतर पालते हैं।
मजदूरी – प्राकृतिक साधनों से पर्याप्त आजीविका प्राप्त न होने के कारण ये लोग असम के चाय के बागानों, बंगाल की जूट व कपड़ा-मिलों, बिहार व ओडिशा की खानों में श्रमिकों का भी कार्य करते हैं।

भोजन – उबला हुआ चावल व उसकी शराब, महुए का आटा व पशु का मांस संथाल लोगों का प्रिय भोजन है। मछली, वनों से एकत्रित फल, जड़े, गाँठे, फूल, कोंपल आदि तथा पक्षियों का मांस भी उनके भोजन में सम्मिलित है। ये तम्बाकू के बहुत शौकीन होते हैं।
वेशभूषा – संथाल पुरुष कमर से ऊपर प्रायः नग्न रहते हैं। कमरे के नीचे लँगोटीमात्र पहनते हैं। स्त्रियाँ धोती-ब्लाउज पहनती हैं। बालों के जूड़े में फूल व पक्षियों के पंख आदि लगाती हैं। पुरुष भी बालों में पक्षियों के पंख, फूल-पत्तियाँ, गाय की पूँछ के बाल आदि लगाते हैं। स्त्रियाँ चाँदी व पीतल के आभूषण, हँसली, कर्धनी, कड़े, झुमके, अँगूठी आदि पहनती हैं। स्त्रियाँ शरीर पर गुदना कराती हैं।

बस्तियाँ व मकान – प्राय: 20 या 25 परिवारों का एक गाँव होता है। किसी सड़क मार्ग के सहारे रेखीय प्रतिरूप में गाँव बसते हैं। झोंपड़ी बनाने में साल के शहतीर, बाँस, पत्तियों, मिट्टी व गोबर का प्रयोग होता है। इनमें खिड़कियाँ नहीं होतीं, केवल एक प्रवेशद्वार होता है। दीवारों को मिट्टी व गोबर से लीपकर चित्रकारी व माँडने बनाये जाते हैं। प्रत्येक गाँव में एक मांझी स्थान होता है, जो गाँव के संस्थापक का स्थान होता है।

समाज – संथाल परिवार पितृसत्तात्मक होते हैं। इनमें संयुक्त परिवार प्रणाली पायी जाती है। प्राय: एक पत्नी प्रथा प्रचलित है, किन्तु सन्तान न होने पर बहुपत्नी विवाह होते हैं। विधवा विवाह भी प्रचलित है। इनके समाज में माता-पिता द्वारा तय विवाह का अधिक प्रचलन है। इनमें विवाह की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें बपला, घर्दी जवाई, इतुत, नीरबोलोक, किरिन जवाई, संगा आदि प्रमुख हैं।

संथाल लोग अनेक देवी-देवताओं को पूजते हैं। ठाकुर इनका सबसे बड़ा देवता, सृष्टि, प्रकृति एवं जीवन का नियन्त्रक है। ये लोग वनों, पहाड़ों, नदियों आदि में देवताओं व आत्माओं का वास मानते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए बलि देते हैं व पूजा करते हैं। अशिक्षा व अज्ञान के कारण जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि में विश्वास करते हैं। रोगों व प्राकृतिक प्रकोपों को शान्त करने के लिए झाड़-फूक, जादू-टोना करते हैं। संथाल लोग अब हिन्दू देवी-देवताओं को भी मानते हैं। बाह्य, सोहरई तथा सकरात इनके प्रमुख त्योहार हैं।

संथाल समाज में ‘टोटम’ (Totem–प्राकृतिक प्रतीक) व्यवस्था प्रचलित है। प्रत्येक उपवर्ग का एक निश्चित प्रतीक होता है। समान प्रतीकों में परस्पर विवाह निषिद्ध होते हैं। संथालों का प्रादेशिक संगठन ‘परहा’ प्रणाली पर आधारित है, जिसमें गाँव के मुखिया द्वारा प्रशासन होता है। बड़े गाँवों में पंचायत व्यवस्था पायी जाती है।

प्रश्न 4
टोडा जनजाति के प्राकृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जनजीवन पर एक सारगर्भित निबन्ध लिखिए।
उत्तर

टोडा Todas

टोडा दक्षिणी भारत में नीलगिरी पर्वतीय क्षेत्र में निवास करने वाली एक प्रमुख जनजाति है। गोरी व सुन्दर मुखाकृति, सुगठित शरीर, पतले होंठ, लम्बी नाक, बड़े नेत्र, लम्बा कद, काले लहरदार बालों वाली यह जनजाति अन्य दक्षिण भारतीय वर्गों से अलग दिखाई देती है।
प्राकृतिक वातावरण – नीलगिरी के पूर्वी ढालों पर समुद्रतल से लगभग 2,000 मीटर ऊँची पहाड़ियों से घिरे 200 वर्ग किमी क्षेत्र में टोडा जनजाति का निवास पाया जाता है। यह क्षेत्र ‘टोडरनाद कहलाता है। इस वृष्टिछाया प्रदेश में वर्षा का औसत 100 सेमी से कम रहता है। उच्च प्रदेश होने के कारण तापमान कम रहते हैं। यहाँ घास प्रमुख वनस्पति है। वनों में हिरन, सांभर, तेंदुए, चीते, सूअर, जंगली कुत्ते आदि भी पाये जाते हैं।

अर्थव्यवस्था – टोडा जनजाति स्वयं को टोडरनाद प्रदेश का ‘भूस्वामी मानती है। ये कृषि व्यवसाय को नीचा समझते हैं। आखेट, वनोद्योग और मजदूरी भी इन्हें पसन्द नहीं है; अतः इन्होंने पशुपालन को अपनाया है। ये केवल भैंस पालते हैं। अपनी आवश्यकता के लिए पड़ोसी बदागा वर्ग से कृषि कराते हैं। आवश्यक शिल्प (बढ़ईगिरि व लोहारी) भी अन्य वर्गों से कराते हैं।

भोजन – टोडा लोग विशुद्ध शाकाहारी होते हैं। इनके भोजन में दुग्ध पदार्थों की प्रधानता है। उत्सव तथा विशेष पर्वो को छोड़कर ये कभी भी मांस-मछली का सेवन नहीं करते। विशेष पर्वो पर ये भैंसे की बलि देते हैं तथा उसको प्रसाद-रूप में ग्रहण करते हैं। बदागा जनजाति से प्राप्त चावल, कोराली, थिनई आदि खाद्यान्न, शहद, फल, शाक-सब्जियाँ इनका प्रमुख भोजन है।।

वेशभूषा – टोडा स्त्री व पुरुष ढीला लम्बा, बिना सिला चोगानुमा वस्त्र पहनते हैं जो कन्धों से पैर तक शरीर को ढकता है। नये सम्पर्को के कारण अब स्त्रियों में धोती-ब्लाउज एवं पुरुषों में कमीज, कुते का प्रचलन हो गया है। वृद्ध-पुरुष अब भी नंगे सिर एवं बिना सिले वस्त्र पहनते हैं। स्त्रियाँ कौड़ी व चाँदी की मालाएँ, नथ, झुमके आदि पहनती हैं। ठोड़ी, बॉह व शरीर पर गुदना कराती हैं।

बस्तियाँ व मकान – टोडा लोगों की बस्तियाँ ‘मण्ड’ कहलाती हैं। तमिल भाषा में ‘मण्ड’ का अर्थ ‘मध्य स्थिति है। ये बस्तियाँ सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों एवं चरागाहों के मध्य स्थापित की जाती हैं। प्राय: एक बस्ती में आठ या दस परिवारों के झोंपड़े होते हैं, जो ‘अर्स’ कहलाते हैं। ये ‘अर्स’ अर्द्ध-ढोलक के आकार के (Half barrel shaped) होते हैं। इन्हें बनाने में बाँस, खजूर व घास का प्रयोग होता है। मकानों में खिड़की व रोशनदान नहीं होते, छोटा-सा प्रवेशद्वार होता है। 6 x 3 मीटर आकार के कमरे के भीतर ही शयनकक्ष, रसोई व अग्नि स्थान की व्यवस्था होती है। निवास-कक्ष से पृथक् एक ‘दुग्ध मन्दिर बनाया जाता है। इस दुग्ध मन्दिर की देखभाल एक अविवाहित पुरुष करता है, जिसे पलोल कहते हैं।

सामाजिक जीवन – टोडा लोगों को सम्पूर्ण जीवन एवं दिनचर्या भैसपालने में व्यतीत होती है। समस्त कार्य पुरुषों द्वारा किये जाते हैं। टोडा परिवार पितृसत्तात्मक एवं बहुपति प्रणाली पर आधारित होता है। राजनीतिक व धार्मिक समारोहों, उत्सवों, पर्वो आदि में स्त्री का सक्रिय भाग लेना वर्जित होता है। भूमि एवं पशु-सम्पत्ति पर बड़े लड़के का अधिकार होता है। टोडा लोग आदिवासी धर्म का पालन करते हैं। इनके देवी-देवताओं में ‘तैकिर जी’ व ‘ओन’ प्रमुख हैं। नदियों, पहाड़ों व दुग्ध गृह के भी देवता होते हैं। प्राकृतिक प्रकोप, बीमारी, भैंसों के दूध सूखने को देवता का प्रकोप माना जाता है। पशुबलि देकर देवताओं को प्रसन्न किया जाता है।

प्रश्न 5
भारत की थारू प्रजाति के निवासस्थान, अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक जीवन का विवरण लिखिए।
उत्तर
सामान्य परिचय – उत्तर प्रदेश व बिहार में नेपाल की सीमा से संलग्न 25 किमी चौड़ी व 600 किमी लम्बी तराई व भाबर की सँकरी पट्टी में थारू जनजाति निवास करती है। इस क्षेत्र में नैनीताल जिले के किच्छा, खटिमा, रामपुरा, सितारगंज, नानक-भट्टा, बनवासा आदि क्षेत्र, पीलीभीत व खीरी जिलों से लेकर बिहार में मोतीहारी जिले तक के क्षेत्र सम्मिलित हैं।

‘थारू’ शब्द की उत्पत्ति काफी विवादास्पद है। कुछ विद्वानों के अनुसार, ये पहले ‘अथरु कहलाते थे, बाद में थारू कहलाये। थारू’ का अर्थ है ‘ठहरे हुए’–कठिन भौगोलिक वातावरण के बावजूद ये सदियों से इस क्षेत्र में विद्यमान हैं, कदाचित इसलिए थारू कहलाते हैं। एक अन्य मतानुसार, ‘थारू’ नामक मदिरा का सेवन करने तथा ‘थारू’ नामक अपहरण विवाह प्रथा अपनाने के कारण भी इन्हें ‘थारू’ कहा जाता है।
इनके शारीरिक लक्षण मंगोलॉयड प्रजाति से मिलते हैं। तिरछे नेत्र, उभरी गालों की हड्डियाँ, पीली त्वचा, शरीर वे चेहरे पर कम बाल, सीधे सपाट केश, मध्यम नाक व कद इनके प्रमुख लक्षण हैं। वास्तव में इनमें मंगोलॉयड व अन्य प्रजातियों का मिश्रण हो गया है।

प्राकृतिक वातावरण – हिमालय की तलहटी में स्थित इस क्षेत्र में पर्वतीय ढालों से उतरते हुए नदी-नालों तथा अधिक वर्षा के कारण यत्र-यत्र बाढ़ व दलदल उत्पन्न होती है। इसलिए मच्छरों का अधिक प्रकोप रहता है। प्राय: ये क्षेत्र मलेरियाग्रस्त रहते हैं। यहाँ ग्रीष्मकाल में 38°C से 44°C एवं शीतकाल में 12°C से 15°C ताप पाये जाते हैं। मानसूनी वर्षा का औसत 125 से 150 सेमी रहता है। यहाँ सघने मानसूनी वनों में हल्दू, ढाक, तनु, शीशम, सेमल, खैर, तेन्दू आदि की प्रधानता रहती है। नरकुल, बैंत, मुंज घास की भी प्रचुरता होती है। वनों में चीता, भेड़िया, तेन्दुआ, हिरण, सूअर, सियार, लकड़बग्घा आदि जन्तु पाये जाते हैं।

जलवायु – सामान्यतः इस क्षेत्र की जलवायु तथा प्राकृतिक वातावरण अस्वास्थ्यकर हैं, किन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् वनों को साफ कर कृषि-फार्म बना लिये गये। दलदलों को सुखाकर कृषि योग्य बनाया गया। मलेरिया उन्मूलन के भी प्रयास किये गये। वनों पर आधारित लघु उद्योगों की भी स्थापना की गयी।
अव्यदध – थारु लोग स्थायी कृषक हैं। यहाँ भूमि अपरदन की बहुत समस्या है, तथापि विभिन्न उपायों द्वारा थारूः लोग चावल, मक्का, गेहूँ, चना, दालें, आलू, प्याज, शाक-सब्जियाँ आदि उगाते हैं। कृषि-कार्य में स्त्रियाँ भी सक्रिय योग देती हैं।

सामाजिक व्यवस्था – थारुओं में स्त्रियों की प्रतिष्ठा पुरुषों से अधिक है तथा वे पर्याप्त स्वतन्त्र हैं। स्त्रियाँ अपने को रानी तथा पुरुषों को सेवक या सिपाही समझती हैं। विवाह तय करते समय लड़के एवं लड़की की सहमति आवश्यक होती है। विवाह-संस्कार चार चरणों में सम्पन्न होता है, जो क्रमश: अपना-पराया, बटकाही, भाँवर तथा चाल हैं।

थारुओं में विवाह पूर्व यौन स्वच्छन्दता पायी जाती है। पत्नी के विनिमय तथा तलाक प्रथा का प्रचलन है। धार्मिक दृष्टिकोण से थारू हिन्दुओं के अधिक निकट हैं। ये स्वयं को सूर्यवंशी राजपूतों के वंशज समझते हैं तथा सीता एवं राम की आदरपूर्वक पूजा करते हैं। ये जादू-टोनों में विश्वास करते हैं। इसी कारण इनमें व्यवस्थित धर्म नहीं मिलता। इनमें पशुओं की बलि देने की प्रथा भी पायी जाती है।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 7 Major Tribes of India

प्रश्न 6
भील जनजाति के निवास-क्षेत्र, अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक व्यवस्था (रीति रिवाजों) का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए- भारत की भील जनजाति।
उत्तर

भील Bhils

भील एक प्राचीन ऐतिहासिक जनजाति है। परम्परा से आखेटक व तीरन्दाज जनजाति का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, किन्तु अब ये स्थायी कृषक के रूप में जाने जाते हैं। वास्तव में यह जनजाति विकास के विभिन्न चरणों में है। मध्य प्रदेश के भील घुमक्कड़ जरायमपेशा हैं। खान देश के भील स्थायी कृषक हैं। गुजरात के भील आखेटक व कृषक हैं। राजस्थान व महाराष्ट्र के भील घुमक्कड़, आखेटक, स्थायी कृषक अथवा श्रमिक हैं।

भील’ शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा के ‘विल्लवर’ (धनुर्धारी) शब्द से बतायी जाती है। विभिन्न मानवशास्त्रियों के अनुसार, यह प्राक्द्रविड़ या मेडिटरेनियन प्रजाति से सम्बद्ध है। अधिक मान्य मतानुसार, भील भारत के मूल निवासी हैं। औसत मध्यम कद, मध्यम चौड़ी नाक, भूरे से गहरा काला त्वचा वर्ण, काले बाल, मध्यम मोटे होंठ, शरीर पर कम बाल तथा सुगठित शरीर इस जनजाति के मुख्य शारीरिक लक्षण हैं।

निवास-क्षेत्र – भील लोगों का निवास-क्षेत्र मध्य प्रदेश के धार, झाबुआ, रतलाम व निमाड़ जिले; राजस्थान के डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर व चित्तौड़गढ़ जिले, गुजरात के पंचमहल, साबरकांठा, बनासकाठा व बड़ोदरा जिले हैं। भीलों का निवास-क्षेत्र ‘भीलवाड़ा’ के रूप में विख्यात है। इसके अतिरिक्त बिखरे हुए रूप में यह जनजाति महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व कर्नाटक के अन्य भागों में भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वातावरण – भीलों का निवास ऊँचे (1,000 मीटर) असमतल पठारी व पहाड़ी प्रदेश में है, जहाँ अनेक बरसाती नदी-नाले प्रवाहित होते हैं। यहाँ माही, ताप्ती व नर्मदा ने पठारों को काटकर गहरी घाटियाँ बनायी हैं। यहाँ वर्ष भर उच्च तापमान एवं 50 से 125 सेमी वार्षिक वर्षा के कारण महुआ, आम, सागौन, बाँस वे पलास के सघन वन उगते हैं। वनों में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी पाये जाते हैं।

अर्थव्यवस्था – परम्परागत रूप से भील घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करते हैं। आखेट उनकी आजीविका का प्रमुख साधन रहा है। वातावरण के अनुरूप अब भी अरावली, विन्ध्या तथा सतपुड़ा पहाड़ियों के भील निवासी आखेटक हैं। ये तीर-कमान, फन्दे, जाल, गोफन आदि द्वारा जंगली सूअर व पशु-पक्षियों का शिकार करते हैं। कई भील वर्ग अब स्थायी कृषक हो गये हैं। मैदानी क्षेत्रों में भूमि साफ करके चावल, मक्का, गेहूँ, मोटे अनाज, रतालू, कद्दू व शाक-सब्जियाँ बोते हैं। इस प्रकार की कृषि ‘दजिआ’ कहलाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में वनों को जलाकरे वर्षाकाल में खाद्यान्न, दालें व सब्जियाँ उगाई जाती हैं।

इस प्रकार की कृषि ‘चिमाता’ कहलाती है। तीन-चार फसलें प्राप्त करने के पश्चात् इस भूमि को परती छोड़ दिया जाता है। स्थायी कृषि के साथ-साथ भील लोग पशुपालन भी करने लगे हैं। ये गाय, बैल, भैंस, भेड़-बकरियाँ तथा मुर्गी पालते हैं। इनसे दूध, मांस व अण्डे प्राप्त करते हैं। कुछ भील वनोपज एकत्रण द्वारा भी आजीविका प्राप्त करते हैं। मानसूनी वनों से विविध प्रकार की व्यावसायिक महत्त्व की गौण उपजे तथा खाद्य-पदार्थ प्राप्त होते हैं।

बच्चे व स्त्रियाँ वनों से खाने योग्य जड़े, वृक्षों की पत्तियाँ, फल, कोंपलें, गाँठे, शहद, गोंद, छाले, जड़ी-बूटियाँ व अन्य पदार्थ एकत्रित करते हैं। तालाबों, पोखरों व नदियों से मछलियाँ भी प्राप्त की जाती हैं। आजीविका के इन विविध साधनों के अतिरिक्त कुछ भील खानों, कारखानों तथा सड़क निर्माण आदि कार्यों में श्रमिक के रूप में भी कार्य करते हैं। ये वनों में लकड़ी काटने का कार्य तथा शहरों में मजदूरी भी करते हैं।

भोजन – भील लोग मुख्यत: शाकाहारी हैं। गेहूँ, चावल, मक्का, कोदो, दाल, सब्जियाँ इनका प्रमुख भोजन हैं। विशेष पर्वो तथा उत्सवों के अवसरों पर अथवा शिकार प्राप्त होने पर ये बकरे या भैंस का मांस, मछली, अण्डा आदि भी खाते हैं। महुए की शराब, ताड़ी का रस, तम्बाकू व गाँजा इन्हें विशेष रुचिकर है। वनों से एकत्रित जंगली बेर, आम, महुआ फल व शहद भी इनके भोजन में सम्मिलित हैं।

वेशभूषा – उष्ण जलवायु एवं निर्धनता के कारण भील लोग अल्प व सूती वस्त्र पहनते हैं। भील पुरुष लँगोटी या घुटनों तक लम्बा वस्त्र, अंगोछा, कमीज व साफा पहनते हैं। स्त्रियाँ लहँगा, कुर्ती व चोली पहनती हैं। चाँदी की हँसुली, बालियाँ, छल्ले, पैजनियाँ इनके प्रिय आभूषण हैं। पुरुष भी कड़ा, बालियाँ व हँसुली पहनते हैं। मुंह व हाथ पर गुदना कराने का प्रचलन है।

बस्तियाँ व मकान – 20 से 200 झोंपड़ियों की भील बस्तियाँ किसी नियोजित क्रम में नहीं बसायी जातीं। गाँव की सीमा के बाहर ‘देवरे’ (पूजा-स्थल) होते हैं। मकान या आयताकार झोंपड़ियाँ ऊँचे चबूतरे पर निर्मित होती हैं। यह पत्थर, बाँस, मिट्टी, खपरैल, घास-फूस से निर्मित होती हैं। खपरैल या छप्पर पर कद्दू, तोरी या लौकी की बेलें चढ़ायी जाती हैं। झोंपड़ी के भीतर खाना पकाने के बर्तन, अन्न भण्डार, चटाइयाँ, टोकरी, डलिया आदि सामान की व्यवस्था होती है।

समाज – भील समाज अत्यन्त संगठित है। ये अपने विशिष्ट रीति-रिवाज अपनाते हैं। ये बहुत साहसी, निर्भीक, मेहनती, आदर-सत्कार करने वाले, सहृदय व ईमानदार होते हैं। घर का बुजुर्ग व्यक्ति ही महत्त्वपूर्ण निर्णय लेता है। प्रायः एक गाँव में एक ही वंश के लोग रहते हैं। प्रत्येक गाँव का निजी पण्डित, पुजारी, चरवाहा, कोतवाल आदि होता है। एक ही उपसमूह में अन्तर्विवाह निषिद्ध माना जाता है। प्रत्येक उपसमूह का एक निश्चित प्रतीक (Totem) होता है। इनमें बाल-विवाह जैसी कुरीति नहीं है। गन्धर्व विवाह, अपहरण विवाह तथा विधवा विवाह इनमें प्रचलित हैं। ‘गोल गाथेड़ो’ नामक विशिष्ट विवाह-प्रथा के अनुसार किसी युवक को वीरतापूर्ण साहसिक कार्य करके अपनी पसन्द की वधू छाँटने का अधिकार होता है।

ये अनेक हिन्दू देवी-देवताओं को पूजते हैं। जादू-टोने में भी बहुत विश्वास करते हैं। रोगों व कष्टों को दूर करने के लिए झाड़-फूक, टोना-टोटका आदि का सहारा लेते हैं। बलि भी चढ़ाते हैं। हिन्दुओं के समान अपने मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं।
भील एक विकासोन्मुख जनजाति है। भारत सरकार ने इनके विकास के लिए शिक्षा, शिल्प, रोजगार, अस्पताल आदि की सुविधाएँ प्रदान की हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
नागा जनजाति के निवास क्षेत्र एवं आर्थिक क्रियाओं का वर्णन कीजिए। [2008]
उत्तर
निवास क्षेत्र – नागा जनजाति का निवास क्षेत्र मुख्य रूप से नागालैण्ड है। इसके अतिरिक्त यह लोग असम, मेघालय, मिजोरम, राज्य के पठारी भागों तथा अरुणाचल प्रदेश में भी निवास करते हैं। नागालैण्ड राज्य में लगभग 80% नागा निवास करते हैं। इनका सम्बन्ध इण्डो-मंगोलॉयड प्रजाति से है।

आर्थिक क्रियाएँ – भारत की अन्य आदिम जातियों की अपेक्षा नागाओं ने आर्थिक क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा सरकार ने इन लोगों के आर्थिक विकास के लिए सामुदायिक विकास खण्डों की स्थापना की है। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएँ कृषि उत्पादन एवं उद्योग-धन्धों के विकास पर अधिक ध्यान दिया गया है। नागा लोगों की आय के प्रमुख स्रोत-जंगली पशुओं का आखेट, मछली पकड़ना, कृषि करना तथा कुटीर उद्योग; जैसे मोटा कपड़ा, चटाई तथा टोकरियाँ आदि बनाने का कार्य है।

प्रश्न 2
भारत में थारू के वास्य क्षेत्र का वर्णन कीजिए। [2008]
उत्तर

भारत में थारू के वास्य क्षेत्र

थारू जनजाति के लोग भारत के उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्यों के तराई और भाबर क्षेत्रों में निवास करते हैं। यह क्षेत्र एक संकरी पट्टी के रूप में शिवालिक हिमालय के नीले भाग में पूर्व से पश्चिम दिशी तक फैला है। पश्चिम में इस क्षेत्र का विस्तार नैनीताल जिले के दक्षिण-पूर्व से लेकर पूर्व में गोरखपुर और नेपाल की सीमा के सहारे-सहारे लगभग 600 किमी लम्बी और 25 किमी चौड़ाई में है, थारु जनजाति के अधिकांश लोग उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ भाग में रहते हैं जिसमें ऊधमसिंहनगर जिले के किच्छा, खटीमा, सितारगंज व बनबसा क्षेत्र सम्मिलित हैं। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, खीरी, गोरखपुर, गोण्डा एवं बस्ती जिलों से लेकर बिहार में मोतीहारी जिले के उत्तरी भाग तक थारू जनजाति का निवास क्षेत्र है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में कौन-कौन-सी जनजातियाँ निवास करती हैं?
उत्तर
भारत में नागा, संथाले, भील, भोटिया, थारू, टोडा आदि प्रमुख जनजातियाँ निवास करती हैं।

प्रश्न 2
भील शब्द से क्या आशय है?
उत्तर
भील शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा के ‘विल्लावर’ शब्द से हुई है, जिसका आशय धनुष-बाण धारण करने वाला, आखेटक या धनुर्धारी होता है।

प्रश्न 3
नागाओं के प्रमुख देवता कौन हैं?
उत्तर
नागाओं के प्रमुख देवता लकीजुंगवा तथा गवांग हैं। अनेक नागा बौद्ध एवं ईसाई धर्म भी मानने लगे हैं।

प्रश्न 4
संथालों का निवास-क्षेत्र कौन-सा है?
उत्तर
संथालों का निवास-क्षेत्र झारखण्ड राज्य का संथाल परगना जनपद है।

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प्रश्न 5
संथालों की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर
संथालों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें बहुपत्नी अथवा बहुपति विवाह प्रथा नहीं है।

प्रश्न 6
संथालों द्वारा मनाये जाने वाले त्योहार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
संथालों द्वारा मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहार हैं- बाह्य, सोहरई तथा सकरात।

प्रश्न 7
भारत में नागा जनजाति का मुख्य निवास-क्षेत्र कहाँ है तथा इनका मुख्य व्यवसाय क्या है?
उत्तर
भारत में नागा जनजाति का मुख्य निवास-क्षेत्र नागालैण्ड है; पटकोई पहाड़ियों, मणिपुर के पठारी भाग, असम व अरुणाचल प्रदेश में भी कुछ नागा वर्ग निवास करते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय आखेट तथा झूमिंग कृषि करना है।

प्रश्न 8
थारू समाज में स्त्रियों की दशा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर
थारुओं में स्त्रियों की प्रतिष्ठा पुरुषों से अधिक है तथा वे पर्याप्त रूप से स्वतन्त्र हैं। स्त्रियाँ अपने को रानी तथा पुरुषों को सिपाही या सेवक समझती हैं।

प्रश्न 9
भारत की सबसे बड़ी जनजाति के नाम का उल्लेख कीजिए। इसका निवास-क्षेत्र भी बताइए।
उत्तर
संथाल भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। इसकी जनसंख्या 25 लाख से अधिक है। इसका प्रमुख निवास-क्षेत्र झारखण्ड के छोटा नागपुर के पठार को पूर्वी भाग, सन्थाल परगना है।

प्रश्न 10
भील जनजाति भारत के किन क्षेत्रों में निवास करती है?
उत्तर
भील जनजाति के लोगों के निवास-क्षेत्र मध्य प्रदेश के धार, झाबुआ, रतलाम व निमाड़ जिले; राजस्थान के डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर व चित्तौड़गढ़ जिले; गुजरात के पंचमहल, साबरकाठा, बनासकांठा व बड़ोदरा जिले हैं।

प्रश्न 11
उत्तर भारत की किन्हीं दो जनजातियों के नाम लिखिए। [2007, 08, 11]
उत्तर

  1. नागा जनजाति (नागालैण्ड)।
  2. भील जनजाति (मध्य प्रदेश, राजस्थान)।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 किस जनजाति के लोग घर को ‘कू’ के नाम से पुकारते हैं?
(क) संथाल
(ख) नागा
(ग) भील
(घ) थारू
उत्तर
(ग) भील।

प्रश्न 2
किस जनजाति के लोग प्रकृतिपूजक होते हैं और मारन बुरू नामक देवता की पूजा करते हैं?
(क) थारू
(ख) संथाल
(ग) नागा
(घ) भील
उत्तर
(ख) संथाले।

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प्रश्न 3
निम्नांकित में से कौन गोंड जनजाति का निवास-क्षेत्र है? [2010, 13, 15]
(क) झारखण्ड
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) ओडिशा
(घ) बिहार
उत्तर
(ख) छत्तीसगढ़

प्रश्न 4
‘अर्स किस जनजाति के निवास-क्षेत्र हैं?
(क) बढू
(ग) टोडा
(ग) टोडा
(घ) नागा
उत्तर
(ग) टोडा।

प्रश्न 5
वह जनजाति जो मौसमी स्थानान्तरण करती है –
(क) नागा
(ख) संथाल
(ग) भील
(घ) भोटिया
उत्तर
(घ) भोटिया।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से थारू जनजाति किस देश में निवास करती है?
(क) दक्षिण अफ्रीका
(ख) भारत
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) दक्षिण अमेरिका
उत्तर
(ख) भारत।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से थारू जनजाति कहाँ निवास करती है? [2009, 10, 11, 12, 14, 15, 16]
(क) थार मरुस्थल में
(ख) नीलगिरि की पहाड़ियों में
(ग) तराई प्रदेश में
(घ) सुन्दरवन में
उत्तर
(ग) तराई प्रदेश में।

प्रश्न 8
निम्नांकित में से किसमें टोडा जनजाति का निवास है? [2012, 16]
(क) आन्ध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर
(घ) तमिलनाडु।

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से संथाल जनजाति कहाँ निवास करती है? [2008, 10, 11, 14]
(क) ब्राजील
(ख) ऑस्ट्रेलिया
(ग) भारत
(घ) दक्षिण अफ्रीका
उत्तर
(ग) भारत।

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प्रश्न 10
भोटिया जनजाति निम्नलिखित में से कहाँ निवास करती है? [2010, 11, 13, 14, 15]
(क) छत्तीसगढ़
(ख) बिहार
(ग) उत्तराखण्ड
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(ग) उत्तराखण्ड।

प्रश्न 11
किस जनजाति के प्रत्येक उप-समूह एक या एक निश्चित प्रतीक (Totem) होता है?
(क) भोटिया
(ख) भील
(ग) टोडा
(घ) संथाल
उत्तर
(ख) भील।

प्रश्न 12
किस जनजाति के लोग विशुद्ध शाकाहारी होते हैं तथा इनके भोजन में दुग्ध पदार्थों की प्रधानता होती है?
(क) भोटिया
(ख) संथाल
(ग) टोडा
(घ) भील
उत्तर
(ग) टोडा।

प्रश्न 13
किस जनजाति के लोगों का मुख्य भोजन भुने हुए गेहूँ (जौ) का आटा (सत्) है?
(क) एस्किमो
(ख) भोटिया
(ग) टोडा
(घ) भील
उत्तर
(ख) भोटिया।

प्रश्न 14
निम्नलिखित में से किस प्रदेश में भील जनजाति का निवास-क्षेत्र है? [2016]
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) बिहार
(ग) राजस्थान
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(घ) मध्य प्रदेश।

प्रश्न 15
निम्नलिखित में से कौन-सा थारू जनजाति का प्रमुख निवास क्षेत्र है ? [2009]
(क) मेघालय
(ख) उत्तरी बंगाल
(ग) उत्तर प्रदेश व बिहार
(घ) नागालैण्ड
उत्तर
(ग) उत्तर प्रदेश व बिहार।

प्रश्न 16
निम्नलिखित में से कौन भारत की जनजाति है? [2016]
(क) एस्किमो
(ख) पिग्मी
(ग) बद्दू
(घ) टोडा
उत्तर
(घ) टोडा।

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प्रश्न 17
संथाल जनजाति निवास करती है – [2010, 11, 13, 14]
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) असम में
(ग) झारखण्ड में
(घ) आन्ध्र प्रदेश में
उत्तर
(ग) झारखण्ड में।

प्रश्न 18
टोडा जनजाति निवास करती है – [2012, 16]
(क) अरावली पहाड़ियों में
(ख) कुमाऊँ पहाड़ियों में
(ग) नीलगिरि पहाड़ियों में
(घ) विन्ध्य पहाड़ियों में
उत्तर
(ग) नीलगिरि पहाड़ियों में।

प्रश्न 19
निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में गोंड जनजाति के लोग पाए जाते हैं? [2013]
(क) बिहार
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) नागालैण्ड
(घ) पश्चिम बंगाल
उत्तर
(ख) छत्तीसगढ़।

प्रश्न 20
भोटिया जनजाति निवास करती है – [2013]
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) बिहार में
(ग) उत्तराखण्ड में
(घ) हिमाचल प्रदेश में
उत्तर
(ग) उत्तराखण्ड में।

प्रश्न 21
खासी जनजाति निवास करती है – [2013]
(क) छत्तीसगढ़ में
(ख) झारखण्ड में
(ग) मणिपुर में
(घ) मेघालय में
उत्तर
(घ) मेघालय में।

प्रश्न 22
निम्नलिखित में से कौन-सी जनजाति छोटा नागपुर पठार पर पायी जाती है? [2014]
(क) भोटिया
(ख) संथाल
(ग) टोडा
(घ) भील
उत्तर
(ख) संथाल

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name काव्य-साहित्यका विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

प्रायः परीक्षा में अतिलघु उत्तरीय अथवा बहुविकल्पीय प्रश्नों के रूप में प्रमुख काव्यकृतियों के नाम देकर उनके रचनाकार कवि का नाम पूछा जाता है अथवा किसी कवि का नाम देकर उसकी रचना का नाम पूछा जाता है। निम्नांकित तालिका विद्यार्थियों के लिए दोनों रूपों में सहायक सिद्ध होगी।
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल)
Number of Questions 9
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल)

प्रश्न 1:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘दशरथ खण्ड (पञ्चम सर्ग) की कथा का सार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में प्रयुक्त सर्गों का उल्लेख करते हुए किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के ‘श्रवण’ शीर्षक सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के अभिशाप’ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के ‘निर्वाण’ (अष्टम) सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के आखेट सर्ग की कथा संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार के कथानक के विशेष प्रसंगों को अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ की कथावस्तु के परिप्रेक्ष्य में अयोध्या के परिवेश पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में वर्णित ‘आश्रम’ शीर्षक सर्ग की प्रमुख विशेषताओं पर अपने विचार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में वर्णित बाणविद्ध श्रवणकुमार के करुण विलाप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अयोध्या’ और ‘आश्रम’ खण्ड की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग ‘सन्देश सर्ग’ का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य श्रवणकुमार’ की कथा ‘वाल्मीकि रामायण’ के ‘अयोध्याकाण्ड’ के श्रवणकुमार प्रसंग पर आधारित है। इस खण्डकाव्य का सर्गानुसार कथानक अग्रवत् है

प्रथम सर्ग : अयोध्या

प्रथम सर्ग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कथानक की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है। इसमें अयोध्या नगरी की स्थापना, उसका नामकरण, राज्यकुल के वैभव एवं उसकी गौरवमयी विशेषताओं का वर्णन किया गया है; यथा

सरि सरयू के पावन तट पर है साकेत नगर छविमान।
जिसमें श्री शोभा वैभव के कभी तने थे विपुल वितान॥
मनु-वंशज इक्ष्वाकु भूप की कीर्ति-पताका लोक-ललाम।
अनुपम शोभाधाम अयोध्या चित्ताकर्षक अति अभिराम ॥

कवि ने यह भी बताया कि अयोध्या में सर्वत्र नैतिकता और सदाचार विद्यमान है। इस नगरी में सभी वस्तुओं का विक्रय उचित मूल्य पर होता है। यहाँ के नर-नारी परस्पर यथोचित सम्मान करते हैं। इस प्रकार अयोध्या का जीवन सहज और आनन्द से परिपूर्ण है। इस सर्ग में अयोध्या की रम्य-प्रकृति का चित्रण भी किया गया है।

ऐसी अयोध्या के शब्द-वेध-निपुण राजकुमार दशरथ एक दिन शिकार करने की योजना बनाते हैं

ऐसे वातावरण भव्य में दशरथ-उर में उठी उमंग।
देखें सरयू-वन में मृगया आज दिखाती है क्या रंग ॥

द्वितीय सर्ग : आश्रम

द्वितीय सर्ग के आरम्भ में सरयू नदी के वन-प्रान्तर के रमणीक आश्रम का मनोहारी चित्रण हुआ है, जिसमें श्रवणकुमार और उसके नेत्रहीन माता-पिता सानन्द निवास कर रहे हैं। इस आश्रम में सर्वत्र सुख-शान्ति है जहाँ सदैव शरद् एवं वसन्त का वैभव व्याप्त रहता है। स्वच्छ जल से भरे तालाबों में कमल खिले हुए हैं। यहाँ मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग सब परस्पर सहज प्रेम-भाव से रहते हैं। यहाँ द्वेष और कटुता नाममात्र को भी नहीं है। आश्रम के वर्णन में कवि ने भारतीय दर्शन का चिन्तन प्रस्तुत किया है। आश्रम के शान्त-सौन्दर्यमय प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में ही युवक श्रवणकुमार के चरित्र का विकास होता है। वह माता-पिता की आज्ञानुसार ही नित्य-प्रति कार्य करता है तथा उनकी सेवा में लगा रहता है

जननी और जनक को श्रद्धा-सहित नवाकर शीश।
आह्निक-क्रिया निवृत्ति-हेतु जाता सरयू-तट पी आशीष ॥

तृतीय सर्ग : आखेट

तृतीय सर्ग में एक ओर दशरथ मृग-शावक के वध का स्वप्न देखते हैं। दूसरी ओर श्रवणकुमार जब जल लेने जाता है तो उसकी बायीं आँख फड़कने लगती है। शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार से दोनों ही अशुभ हैं। स्वप्न में मृग-शावक-वध से दशरथ व्याकुल हो जाते हैं। वे ब्रह्म-मुहूर्त में जागकर आखेट हेतु वन की ओर चल देते हैं।

दूसरी ओर; उसी समय श्रवणकुमार के माता-पिता को बहुत अधिक प्यास लगती है और वह माता-पिता की आज्ञानुसार नदी से जले लेने चल देता है। जल में पात्र डूबने की ध्वनि को किसी हिंसक पशु की ध्वनि समझकर दशरथ शब्दभेदी बाण चला देते हैं, जो सीधे श्रवणकुमार के हृदय में जाकर लगता है। श्रवणकुमार का चीत्कार सुनकर दशरथ विस्मय, चिन्ता और शोक में डूब जाते हैं। उन्हें हतप्रभ एवं किंकर्तव्यविमूढ़ देख उनका सारथी उन्हें सान्त्वना देता है।

प्रस्तुत सर्ग में श्रवणकुमार की मातृ-पितृ-भक्ति, शकुन-अपशकुन तथा दशरथ की आखेट-रुचि पर प्रकाश डाला गया है।

चतुर्थ सर्ग : श्रवण

चतुर्थ सर्ग का आरम्भ श्रवणकुमार के मार्मिक विलाप से होता है। उसकी समझ में यह नहीं आता कि उसका कोई शत्रु नहीं, फिर भी उस पर किसने बाण छोड़ दिया ? बाण लगने पर भी उसे अपनी चिन्ता नहीं, वरन्। अपने वृद्ध एवं प्यासे माता-पिता की चिन्ता है

मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है॥

दशरथ आहत श्रवणकुमार को देखकर तथा उसके मार्मिक क्रन्दन को सुनकर व्याकुल हो जाते हैं। श्रवणकुमार के आँखें खोलने पर सारथी बताता है कि ये अजपुत्र दशरथ हैं और मृगया (शिकार) के भ्रम में आज इनसे यह भयंकर भूल हो गयी है। श्रवणकुमार कहता है कि राजन्! मुझे मारकर आपने एक नहीं वरन् एक साथ तीन प्राणियों के प्राण लिये हैं। मेरे अन्धे माता-पिता आश्रम में प्यासे बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप यह जल का पात्र लेकर वहाँ जाइए और उन्हें मेरे प्राण-त्यागे की सूचना दे दीजिए। यह कहकर श्रवणकुमार प्राण त्याग देता है। उसके शव को सारथी की देखभाल में छोड़ अत्यन्त दु:खी मन से दशरथ जलपात्र लेकर आश्रम की ओर चल देते हैं।

इस सर्ग में कवि ने श्रवणकुमार के सात्त्विक जीवन, उसके कारुणिक अन्त और दशरथ के मन में उत्पन्न आत्मग्लानि एवं शोकाकुलता का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है।

पंचम सर्ग : दशरथ

पंचम सर्ग का आरम्भ दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व, विषाद, आत्मग्लानि और अपराध-भावना से होता है। दशरथ दु:खी एवं चिन्तित भाव से सिर झुकाये आश्रम की ओर जा रहे थे और सोच रहे थे कि इस घटना के कारण हृदय पर लगे घाव का प्रायश्चित्त वे किस प्रकार करें

होय चलेगी युग-युगान्त तक अब मेरी यह पाप कथा।
जो मुझको ही नहीं वंशजों को भी देगी मर्म व्यथा ॥

इसी प्रकार के मानसिक उद्वेगों से आकुल-व्याकुल दशरथ आश्रम पहुँच जाते हैं।

षष्ठ सर्ग : सन्देश

षष्ठ सर्ग में श्रवणकुमार के माता – पिता की असहाय दशा तथा दशरथ के क्षोभ का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है। श्रवणकुमार के माता-पिता उसके आने की प्रतीक्षा में व्याकुल हैं। दशरथ की पदचाप सुनकर वे पूछते हैं

(1) मौलिकतापूर्ण प्रस्तुतीकरण – यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य का मूल कथानक वाल्मीकि-रामायण से लिया गया है, परन्तु भावात्मकता से प्रेरित होकर कवि ने उसमें कई स्थानों पर कल्पना का प्रयोग भी किया है; यथा-सारथी की कल्पना, दिव्य चमत्कार एवं देवत्व का प्रतिपादन।

(2) भारतीय संस्कृति का अंकन – कवि ने युगानुरूप वर्ण-व्यवस्था, छुआछूत, समता आदि नवीनताओं का भी समावेश किया है, किन्तु भारतीय संस्कृति के मूल आधार का ध्यान सभी स्थानों पर रखा गया है। भावों और जीवन-मूल्यों का अंकन भी उसी के अनुरूप किया गया है। श्रवण की मातृ-पितृ-भक्ति, दशरथ को अपयश के भय से वन में घटित दुर्घटना का किसी को न बताना, शाप देने के पश्चात् श्रवण के पिता का आत्मबोध कि प्रारब्धवश हुई गलती पर उन्हें अपराधी को दण्ड रूप में शाप नहीं देना चाहिए था। ये सभी बातें भारतीय संस्कृति की संवाहक बनकर आयी हैं।

(3) आदर्श-सृजन – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने मानवीय आदर्शों का सृजन किया है। श्रवणकुमार, उसके अन्धे माता-पिता तथा दशरथ के चरित्र आदर्श एवं महान् हैं।

(4) व्यवस्थित – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का कथानक पूर्णत: व्यवस्थित है। उसमें कहीं भी भावात्मक अथवा भाषागत असन्तुलन नहीं दिखाई देता।

(5) सर्गबद्धता – प्रस्तुत खण्डकाव्य में नौ सर्ग हैं, जिनमें भावात्मकता को पर्याप्त स्थान दिया गया है। इनमें प्रथम सर्ग मंगलाचरण और अन्तिम उपसंहार है। सर्ग-संयोजना उपयुक्त एवं सुन्दर है।

(6) विषयानुरूपता – इस खण्डकाव्य में विषयानुरूप भाषा-शैली आदि का सफल निर्वाह हुआ है। इसमें रस, छन्द, अलंकार, गुण आदि जहाँ काव्य-सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक हुए हैं, वहीं भावात्मकता की वाहकता में भी पूर्णरूपेण सफल हुए हैं।

(7) स्वाभाविकता – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में पात्र, घटना, वातावरण आदि नितान्त स्वाभाविक लगते हैं। कहीं भी इनके बलपूर्वक थोपे जाने का संकेत नहीं मिलता। पात्रों के चिन्तन में तो सहृदयी भावुकता सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है, चाहे वह चिन्तन श्रवणकुमार का हो, चाहे दशरथ का अथवा श्रवण के अन्धे माता-पिता का।

(8) भारतीयता – इस खण्डकाव्य में भारतीय दर्शन के आदर्श-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, सन्तोष, तप, संयम, प्रेम, कर्तव्यपरायणती आदि के निर्वाह पर बल दिया गया है, जो कवि की भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा के प्रतीक हैं। एक कथन द्रष्टव्य है

दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार॥

(9) मातृ-पितृभक्ति – श्रवण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भावात्मक मातृ-पितृभक्ति है। मातृ-पितृभक्ति का एक ऐसा आदर्श, जिससे युग-युगान्तरे तक बालक प्रेरणा प्राप्त कर सकें, अन्यत्र दुर्लभ है। इस प्रकार ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की भावात्मक कथावस्तु सुसम्बद्ध, प्रभावशाली, मानवीय आदश तथा भारतीय संस्कृति की प्रेरणा देने वाली है।

प्रश्न 3:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण करते हुए बताइए कि वह किन आदर्शों का प्रतीक है?
या
“चरित्र ही व्यक्ति को महान् बनाता है।” इस कथन के सन्दर्भ में श्रवणकुमार के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में वर्णित आदर्श चरित्र से आज के परिप्रेक्ष्य में क्या शिक्षा मिलती है ?
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रवणकुमार के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्रवणकुमार प्रस्तुत खण्डकाव्य का प्रमुख पात्र है। ‘श्रवणकुमार’ की कथा आरम्भ से अन्त तक उसी से सम्बद्ध है; अतः इस खण्डकाव्य का नायक श्रवणकुमार है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) मातृ-पितृभक्त – श्रवण कुमार का नाम ही मातृ-पितृभक्ति का पर्याय बन चुका है। श्रवणकुमार अपने माता-पिता का एकमात्र आदर्श पुत्र है। वह प्रात:काल से सायंकाल तक अपने वृद्ध एवं नेत्रहीन माता- पिता की सेवा में लगा रहता है। दशरथ के बाण से बिद्ध होकर भी श्रवणकुमार को अपने प्यासे माता-पिता की ही चिन्ता सता रही है

मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है।

(2) निश्छल एवं सत्यवादी – श्रवणकुमार के पिता वैश्य वर्ण के और माता शूद्र वर्ण की थीं। जब दशरथ ब्रह्म-हत्या की सम्भावना व्यक्त करते हैं तो श्रवणकुमार उन्हें सत्य बता देता है

वैश्य पिता माता शूद्रा थी मैं यों प्रादुर्भूत हुआ।
संस्कार के सत्य भाव से मेरा जीवन पूत हुआ।

श्रवणकुमार स्पष्टवादी है। वह किसी से कुछ नहीं छिपाता। वह सत्यकाम, जाबालि आदि के समान ही अपने कुल, गोत्र आदि का परिचय देता है।

(3) क्षमाशील एवं सरल स्वभाव वाला – श्रवणकुमार का स्वभाव बहुत ही सरल है। उसके मन में किसी के प्रति ईष्र्या, द्वेष, क्रोध एवं वैर नहीं है। दशरथ के बाण से बिद्ध होने पर भी वह अपने समीप आये सन्तप्त दशरथ का सम्मान ही करता है।

(4) भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रेमी – श्रवणकुमार भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रेमी है। चार वेद और छ: दर्शन ही भारतीय संस्कृति के आधार हैं। धर्म के दस लक्षणों को वह अपने जीवन में धारण किये है

दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार ॥

वेद के अनुसार माता, पिता, गुरु, अतिथि तथा पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति ये पाँच ‘देवता’ कहलाते हैं। तथा ये ही पूजा के योग्य हैं। श्रवणकुमार भी माता, पिता, गुरु और अतिथि की देवतुल्य पूजा करता है।

(5) आत्मसन्तोषी – श्रवणकुमार को किसी वस्तु के प्रति लोभ-मोह नहीं है। उसे भोग एवं ऐश्वर्य की तनिक भी चाह नहीं है। वह तो सन्तोषी स्वभाव का है

वल्कल वसन विटप देते हैं, हमको इच्छा के अनुकूल।
नहीं कभी हमको छू पाती, भोग ऐश्वर्य वासन्न-धूल ॥

(6) संस्कारों को महत्त्व देने वाला – श्रवणकुमार संमदर्शी है। वह किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं रखता तथा कर्म, शील एवं संस्कारों को महत्त्व देता है। उसके जीवन में पवित्रता संस्कारों के प्रभाव के कारण ही है

विप्र द्विजेतर के शोणित में अन्तर नहीं रहे यह ध्यान।
नहीं जन्म के संस्कार से, मानव को मिलता सम्मान ॥

(7) अतिथि-सत्कारी – भारतीय परम्परा के अनुसार अतिथि का स्वागत-सत्कार महापुण्य का कार्य है। श्रवण कुमारे इस गुण से युक्त है। वह बाण द्वारा घायल पड़ा है, जब दशरथ उसके पास पहुँचते हैं। वह दशरथ को अपना अतिथि मानता है, क्योंकि वह उसके वन में आये हैं। वह देशरथ का स्वागत करना चाहता है। वह उनसे हर प्रकार की कुशल-मंगल पूछता है और अपने नेत्रों के जल से दशरथ के चरण धो लेना चाहता है।

इस प्रकार श्रवणकुमार उदार, परोपकारी, सर्वगुणसम्पन्न तथा खण्डकाव्य का नायक है।

प्रश्न 4:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्रों में देवोपम गुणों के साथ-साथ मानव-सुलभ दुर्बलता भी दिखाई देती हैं। इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्र-चित्रण में काव्यकार डॉ० शिवबालक शुक्ल ने अपनी अनुपम रचनाधर्मिता का परिचय दिया है। उनके द्वारा गढ़े चरित्र जहाँ एक ओर देवोपम हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें मानव-सुलभ दुर्बलताएँ भी दृष्टिगत होती हैं। यही उनके चरित्रों की सर्वप्रमुख विशेषता है। पात्र चाहे श्रवणकुमार हो या उसके अन्धे माता-पिता अथवा अयोध्या नरेश दशरथ, सभी पात्रों का चरित्रांकन बड़े मनोयोग से किया गया है।

श्रवणकुमार में सत्यवादिता, संस्कारों को महत्ता देने की प्रवृत्ति, क्षमाशीलता और आत्मसन्तोष जैसे गुण उसे देवोपम बनाते हैं, वहीं माता-पिता से अत्यधिक मोह, मृत्यु से भय आदि दुर्बलताएँ उसे साधारण मानव सिद्ध करते हैं।

दशरथ के चरित्र में भी जहाँ न्यायप्रियता, सत्यवादिता, उदारता और कर्तव्यनिष्ठा जैसे देवोपम गुण विद्यमान हैं, वहीं स्वप्न को देखकर मन में शंकित होना; श्रवण के अन्धे माता-पिता द्वारा शापित होने पर शाप की परिणति के विषय में सोचकर दु:खी होना और इस घटना के लोक में प्रचलित हो जाने पर कुल-परम्परा पर लगने वाले कलंक की चिन्ता करना आदि उनके चरित्र की ऐसी दुर्बलताएँ हैं, जो उन्हें साधारणजन के समकक्ष ला खड़ी करती हैं।

इसी प्रकार श्रवण के पिता का चरित्र भी गुणों एवं दुर्बलताओं से युक्त है। वे जहाँ पुत्र-मृत्यु का समाचार सुनकर अपना विवेक खो बैठते हैं और दशरथ को शाप दे डालते हैं, वहीं बाद में अपने किये पर पश्चात्ताप करते हैं कि मैंने दशरथ को व्यर्थ ही शाप दे डाला। इनका पहला कार्य जहाँ मानव-सुलभ दुर्बलता को परिचायक है, वहीं उस पर पश्चात्ताप करना उनके देवोपम-चरित्र का।

प्रश्न 5:
‘श्रवणकुमार’ के आधार पर दशरथ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अभिशाप’ सर्ग के आधार पर राजा दशरथ का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर:
रघुवंशी राजा अज के पुत्र दशरथ ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में आरम्भ से अन्त तक विद्यमान हैं। मूल रूप से दशरथ इस खण्डकाव्य के प्राण हैं। दशरथ की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) उत्तम-कुलोत्पन्न – राजा दशरथ उत्तम-कुलोत्पन्न हैं। उनका वंश ‘इक्ष्वाकु’ नाम से प्रसिद्ध है। पृथु, त्रिशंकु, सगर, दिलीप, रघु, हरिश्चन्द्र और अज; दशरथ के इतिहासप्रसिद्ध पूर्वज रहे हैं। उन्हें अपने वंश पर गर्व है

क्षत्रिय हूँ मम शिरा जाल में रघुवंशी है रक्त प्रवाह ।
हस्ति पोत अथवा मृगेन्द्र के पाने की है उत्कट चाह॥

(2) लोकप्रिय-शासक – राजा दशरथ प्रजावत्सल एवं योग्य शासक हैं। उनके राज्य में सबको न्याय मिलता है, चोरी कहीं नहीं होती है, प्रजा सब प्रकार से सुखी व सन्तुष्ट है तथा विद्वज्जनों का यथोचित सत्कार होता है

सुख समृद्धि आमोदपूर्ण था कौशलेश का शुभ शासन।
दुःख था केवल एक दुःख को, जिसे मिला था निर्वासन ।

(3) धनुर्विद्या में निपुण –  कुमार दशरथ धनुर्विद्या में निपुण और शब्दभेदी बाण चलाने में पारंगत हैं। आखेट में उनकी विशेष रुचि है

शब्द-भेद के निपुण अहेरी, रविकुल के भावी भूपाल ।
लक्ष्य करें मृग महिष नाग वृक, शूकर सिंह व्याघ्र विकराल ॥

इसीलिए श्रावण मास में वर्षा के अनन्तर जब चारों ओर हरियाली छाई रहती है, तब वे आखेट का निश्चय करते हैं।

(4) विनम्र एवं दयालु – दशरथ में तनिक भी अहंकार नहीं है। दूसरे का दुःख देखकर वे बहुत अधिक व्याकुल हो जाते हैं। स्वप्न में मृग-शावक के वध से ही वे दु:खी हो उठते हैं

करने को गये समुद्यत, ढाढ मार करके रोदन।
नेत्र खुल गये स्वप्न समझकर किया पाश्र्व का परिवर्तन ।।

(5) संवेदनशील एवं पश्चात्ताप करने वाले – दशरथ अपने किये अनुचित कार्य पर आत्मग्लानि से भर उठते। हैं तथा उसका प्रायश्चित्त करते रहते हैं। श्रवणकुमार की हत्या पर उनके प्रायश्चित्त एवं आत्मग्लानि उनके सच्चे पश्चात्ताप पर किया गया आर्तनाद है

मलहम कौन भयंकर व्रण पर जिसका लेप करूं जाकर।
भू में धसँ गि गिरिवर से सरि में डूब मरूं जाकर ॥

(6) आत्म-तपस्वी – दशरथ न्यायप्रिय होने के साथ-साथ आत्म-तपस्वी भी हैं। वे अपने अपराध को स्वयं
अक्षम्य मानते हैं

करें मुनीश क्षमा वे होंगे, निस्पृह करुणा सिन्धु अगाध ।
पर मेरे मन न्यायालय में क्षम्य नहीं है यह अपराध ॥

(7) अपराध-बोध से ग्रसित – श्रवणकुमार के पिता द्वारा शाप दिये जाने पर दशरथ काँप उठते हैं। वे अयोध्या लौटकर यद्यपि लोकनिन्दा के भय से किसी को भी यह दुर्घटना नहीं बताते, किन्तु अपने अपराध की वेदना उनके हृदय में कसकती ही रहती है। वे जानते हैं कि समस्त प्राणियों को अपने कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है। इसलिए वे किसी से कुछ कहे बिना भी अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं। कवि कहता है

रही खरकती हाय शूल-सी पीड़ा उर में दशरथ के।।
ग्लानि-त्रपा, वेदना विमण्डित शाप-कथा वे कह न सके।

(8) तेजस्वी – दशरथ एक तेजस्वी राजकुमार हैं। जब वह श्रवण कुमार के पास पहुँचते हैं तो वह उनके रूप से प्रभावित हो उठता है। उनके प्रत्येक अंग से मानो तेज फूट पड़ता है। श्रवण उनसे निवेदन करता है

रूपवान् है तेज आपका, अंग-अंग से फूट रहा।
परिचय दें उर उत्सुकता है, सचमुच धीरज छूट रहा ॥

(9) शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार में आस्था – रात्रि में सोते समय दशरथ मृग-शावक के वध का स्वप्न देखते हैं, दूसरी ओर श्रवणकुमार जब जल लेने जाता है तो उसकी बायीं आँख फड़कने लगती है। शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार से दोनों ही अशुभ हैं।

(10) उदारमना – श्रवणकुमार के माता-पिता दशरथ को शाप देते हैं। उदार मन वाले दशरथ श्रवण के माता-पिता से शाप पाकर भी कुछ नहीं कहते और सोचते हैं कि इस पाप का फल तो भोगना ही है। इसलिए वे बिना कुछ कहे ही अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं और किसी को भी इस घटना के बारे में नहीं बताते।

(11) निरभिमानी – दशरथ का चरित्र महान् है। उच्चकुल में उत्पन्न होने पर भी उनमें लेशमात्र भी अभिमान नहीं था। उनका शासन उत्तम और उनके कार्य महान् थे। प्रायश्चित और आत्मग्लानि की अग्नि में तपकर वे शुद्ध हो जाते हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि दशरथ का चरित्र महान् गुणों से विभूषित है जो कि प्रायश्चित्त और आत्म-ग्लानि की अग्नि में तपकर और भी शुद्ध हो गया है। कवि दशरथ का चरित्र-चित्रण करने में पूर्ण सफल रहा है।

प्रश्न 6:
पंचम एवं सप्तम सर्ग के आधार पर दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व का व्यापक चित्रण है।” इस कथन को सोदाहरण प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:

दशरथ का अन्तर्द्वन्द्व

‘श्रवणकुमार’ के पंचम सर्ग में दशरथ की मानसिकता, पश्चात्ताप तथा आत्मग्लानि से पूर्ण आन्तरिक दशा को व्यापक अभिव्यक्ति दी गयी है। दशरथ के हाथों श्रवणकुमार का प्राणान्त हो चुका है, जिससे वे दुःख, ग्लानि, भय एवं करुणा के भाव में भरे सोच रहे हैं कि क्या श्रवणकुमार के माता-पिता भी श्रवणकुमार की तरह उदार-हृदय होंगे और उन्हें क्षमा कर देंगे अथवा वे उन्हें कठोर शाप दे देंगे। दशरथ के मन में अपने कुल के दुर्भाग्य पर भी भावावेग उमड़ता है। वे सोचते हैं कि क्या उनके कुल के सभी सदस्यों के भाग्य में शापित होना ही लिखा है तथा क्या उनको भी अपने पूर्वजों की तरह (दशरथ के पूर्वज भी विभिन्न कारणों से शापित होते रहे थे) शापित होना पड़ेगा

रघुकुल में शापित होने की, परम्परागत परिपाटी।
पार पड़ेगी करनी ही हाँ, दुःख की यह दुर्गम घाटी ॥

इस सर्ग में लज्जा, ग्लानि, चिन्ता, शंका, भय आदि से ग्रस्त दशरथ के संकल्प-विकल्प प्रकट हुए हैं।
‘श्रवणकुमार’ के सप्तम सर्ग में भी दशरथ के अन्तर्मन में निहित भावों का मार्मिक चित्रण किया गया है। श्रवणकुमार के शव को उठाकर उसके माता-पिता के सामने लाते हुए दशरथ स्वयं भी जीवित लाश के समान ही हैं। वे ग्लानि, पश्चात्ताप, विवशता और करुणा के आधिक्य के कारण अपना विवेक खो बैठे हैं, जिससे उन्हें दिशा और दुर्गम-पथ की कठिनाइयों का ज्ञान नहीं हो रहा है। वे चेतनाशून्य से उस शव को उठाकर श्रवणकुमार के माता-पिता के पास लाते हैं

अनुभव-दिग्सूक्ति का नहीं थी बेचारे दशरथ के पास,
दिग्भ्रम हुआ, पाथ-पथ दुर्गम, हृदय क्षुब्ध, मन हुआ उदास।

किसी के पुत्र को मृत्यु की गोद में सुलाने के पश्चात् उसके शव को लेकर उसके माता-पिता के पास जाने वाले संवेदनशील-सहृदय व्यक्ति की मानसिकता क्या होती है, इसको कवि शिवबालक शुक्ल ने दशरथ के अन्तर्मन की दशा के सजीव चित्रण में भली प्रकार दर्शाया है।

[ संकेत-इस सामग्री के अतिरिक्त दशरथ की मानसिकता में विनम्रता, दयालुता, उदारता तथा आत्मतपस्विता का समन्वय दृष्टिगत होता है। दशरथ के चरित्र-चित्रण से इन गुणों की सामग्री ग्रहण कर उसका यहाँ उल्लेख करना चाहिए।]

प्रश्न 7:
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘श्रवणकुमार’ की विवेचना (समीक्षा) कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के रचना-शिल्प का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के काव्य-सौन्दर्य को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के काव्य-सौन्दर्य की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में अभिव्यक्त करुण रस की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ एक पौराणिक कथानक पर आधारित है। इस रचना में कवि ने अपनी काव्यात्मक प्रतिभा का कुशलता से प्रयोग किया है। इस खण्डकाव्य की विशेषताओं को विवेचन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है

कथानक – इस खण्डकाव्य का कथानके अत्यन्त लघु है। इसमें श्रवणकुमार को दशरथ का बाण लगना एवं उसके माता-पिता के द्वारा दशरथ को शाप देना-यही मुख्य दो प्रसंग वर्णित हैं। इसके कथानक में दशरथ या श्रवणकुमार के पूर्ण जीवन की कथा नहीं है। किसी खण्डकाव्य के कथानक के रूप में इसका कथानक अत्यन्त उपयुक्त है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण – इस खण्डकोव्य में मात्र चार पात्र हैं-श्रवणकुमार, दशरथ एवं श्रवण कुमार के माता-पिता। इन चारों के चरित्र-चित्रण में ही कवि ने खण्डकाव्य के उदात्त उद्देश्यों को अभिव्यक्ति दी है। पात्रों का चरित्र-चित्रण स्वाभाविक रूप में हुआ है। उनके अन्तर्द्वन्द्वों की अभिव्यक्ति में कवि ने अपनी काव्य-प्रतिभा का परिचय दिया है।

काव्यगत विशेषताएँ – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(क) भावगेत विशेषताएँ

(1) श्रेष्ठ विषयवस्तु – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की मूल कथा वाल्मीकि-रामायण के अयोध्याकाण्ड की श्रवणकुंमार-वध-कथा पर आधारित है। खण्डकाव्य का आरम्भ, विकास, चरमसीमा, नियताप्ति तथा अन्त प्रभावशाली हैं। कथा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं शिथिलता नहीं है।
(2) सुन्दर प्रकृति-चित्रण – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने प्रकृति के बड़े ही मोहक चित्र खींचे हैं। नगर, वन, आश्रम, पेड़-पौधे, नदी, पशु-पक्षी आदि के चित्रण बड़े ही स्वाभाविक एवं मनोहारी हैं। कवि ने प्रकृति के आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण आदि रूपों को बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित किया है; उदाहरणार्थ

पड़ी फुहार प्रथम पावस की बनी ग्रीष्म की अन्तिम श्वास।
जल प्रियतम से मिली विरहिणी धरा छोड़ती मिलनोच्छ्वास ॥

(3) अन्तर्मुखी भावों की अभिव्यक्ति – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में मानवीय संवेदनाओं एवं अनुभूति के आन्तरिक स्वरूप की कुशल अभिव्यक्ति की गयी है। स्वप्न में श्रवणकुमार को अपने तीर से मरते देखकर उसकी मृत्यु के बाद और अभिशाप सर्ग’ में दशरथ की आन्तरिक संवेदना एवं पश्चात्ताप को अभिव्यक्ति दी गयी है। तीर लगने के बाद श्रवणकुमार की मन:स्थिति का आन्तरिक भाव कुशलता के साथ अभिव्यक्त हुआ है।

(4) भारतीय संस्कृति के गौरव-भाव की कुशल अभिव्यक्ति – कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में भारतीय संस्कृति के प्राचीन स्वरूप का गौरव भावात्मक रूप से अभिव्यक्त किया है। सांस्कृतिक गौरव एवं मानवाद की प्राचीन स्थिति का दर्शन कराना ही इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य रहा है और इसे अभिव्यक्ति में कवि ने अपनी प्रतिभा का पूर्ण परिचय दिया है

हो सकते हैं क्या अभियन्ता भूप-भगीरथ के सम आज।
जिनके श्रम-जल गंगा द्वारा सजें देश के युग-युग साज॥

(5) रस (करुण) का निरूपण – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का प्रधान रस करुण है। इसके सातवें सर्ग ‘अभिशाप सर्ग’ में इसका सांगोपांग वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इस खण्डकाव्य में रौद्र, वीभत्स, भयानक, वात्सल्य और शान्त रस का भी मंजुल प्रयोग बन पड़ा है। करुण रस का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है

कर स्पर्श से उन दोनों ने लेकर अवलोकन का काम।
सुत-शव के सन्निकट बैठकर मचा दिया भीषण कुहराम ॥

(6) वातावरण चित्रण – प्रस्तुत खण्डकाव्य में प्रकृति-चित्रण के साथ-साथ कवि ने अयोध्या नगरी एवं आश्रम आदि को भी बड़ी मनोरम वर्णन किया है।

(ख) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा पात्र, विषय तथा समयानुकूल है। इस खण्डकाव्य की भाषा में प्रभावात्मकता, प्रवाहमयता, संगीतात्मकता आदि विशेषताएँ विद्यमान हैं; यथा

पड़े हुए सैकत-शय्या पर, मौन तोड़ मुनि हुए मुखर।
आती करुणा को भी करुणा, उनके दीन वचन सुनकर ॥

(2) शैली –  इस खण्डकाव्य में कवि ने इतिवृत्तात्मक शैली को अपनाया है। साथ ही इसमें आलंकारिक, चित्रात्मक, छायावादी और संवादात्मक शैली के भी दर्शन होते हैं। छायावादी शैली पर आधारित मानवीकरण भी प्रयुक्त हुआ है-इठलाई संगीत कक्ष में मृदुल मूच्र्छना सुमधुर भीड़। प्रयोगवादी शैली में दिनरूपी विद्यालय के बन्द हो जाने पर उसके सूर्य रूपी विद्यार्थी को अपना बस्ता किरणरूपी रज्जु से बाँधकर ले जाता हुआ दिखाया गया है।

(3) छन्द-विधान – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने 16-15 मात्राओं पर यति और अन्त में गुरु- लघु वाले ‘वीर’ छन्द का प्रयोग किया है। काव्य-प्रवाह में कहीं-कहीं 30 मात्राओं वाले मात्रिक छन्द, ताटंक,, कुकुभ, लावनी आदि का भी प्रयोग किया गया है। छन्द-रचना में कहीं भी अस्वाभाविकता नहीं दिखाई देती।

(4) अलंकार-योजना – कवि ने यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक, सन्देह, अर्थान्तरन्यास, परिकर, प्रतीप, वक्रोक्ति, यथासंख्य, परिसंख्या, उदाहरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। रूपक का एक उदाहरण दर्शनीय है – मेघ-मृदंग संग संगति कर लगे नाचने प्रमुदित मोर। इस खण्डकाव्य में उपमान-विधान के लिए एक विस्तृत भावभूमि का भी चयन किया गया है।

निष्कर्ष-इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य में मात्र श्रवणकुमार के सम्पूर्ण जीवन का चित्रण ही नहीं, वरन् उसकी चारित्रिक विशेषताओं के महत्त्वपूर्ण पक्ष का चित्रांकन भी किया गया है। इसकी कथावस्तु भी लघु है और वह सुसम्बद्ध एवं सुसंगठित है। वर्णन-विस्तार को इस खण्डकाव्य में स्थान नहीं दिया गया है; किन्तु इसकी कथावस्तु में क्रमिक विकास विद्यमान है। इसका नायक उदात्त गुणों से युक्त है।

एक निश्चित एवं आदर्शोन्मुख उद्देश्य के लिए प्रवाहपूर्ण शैली में लिखा गया यह भावनाप्रधान काव्य, खण्डकाव्य की उपर्युक्त सभी मुख्य विशेषताओं से परिपूर्ण है; अतः यह एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 8:
‘श्रवणकुमार’ के रचना-उद्देश्य पर आलोचनात्मक प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की रचना किस उद्देश्य को दृष्टि में रखकर की गयी है ? विस्तृत विवेचन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि युवकों को क्या प्रेरणा और सन्देश देना चाहता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की रचना जीवन में नैतिक आदर्शों की प्राण-प्रतिष्ठा हेतु की गयी है।” इस मत की समीक्षा कीजिए।
या
चारित्रिक पतन के इस युग में ‘श्रवणकुमार’ की सार्थकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के उद्देश्य का वर्तमान युग में क्या महत्त्व है? अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
वर्तमान युग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की क्या प्रासंगिकता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य एक सोद्देश्य रचना है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
खण्डकाव्य की रचना में ‘डॉ० शिवबालक शुक्ल’ का उद्देश्य राष्ट्र की समृद्धि के लिए देश की किशोर और युवा पीढ़ी को अनैतिकता, उद्दण्डता और अनुशासनहीनता जैसे भयानक रोगों से बचाना एवं करुणा और प्रेम जैसे महत्त्वपूर्ण मनोभावों को जाग्रत करने की आवश्यकता रही है। साथ ही उनमें त्याग, तितिक्षा, सेवा, सहिष्णुता, क्षमाशीलता, भावात्मक एकता, उच्च संस्कार, जातीय अभेदता, नैतिकता और आत्मालोचन जैसे नैतिक आदर्शों एवं उच्च जीवन-मूल्यों की प्राण-प्रतिष्ठा करना भी है। कवि का उद्देश्य रहा है कि श्रवण की शील की रेखाओं के प्रकाश में आज का किशोर और युवा पीढ़ी ‘मातृ देवो भव पितृ देवो भव’ के उदात्त आदर्श पहचान सके, उसके मूल्य और महत्त्व को जान सके। श्रवण कुमार से प्रेरणा लेता हुआ वह इन आदर्शों को अपने आचरण में भी उतार सके तथा श्रवण की तरह कह सके

मुझे बाण की चिन्ता सम्प्रति, उतनी नहीं सताती है,
पितरों के भविष्य की चिन्ता, जितनी व्यथा बढ़ाती है।

शीर्षक की सार्थकता – प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ में मुख्य पात्र श्रवणकुमार ही है और इस मुख्य पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करना ही कवि का उद्देश्य रहा है। अत: इसका शीर्षक ‘श्रवणकुमार’ रखा गया है, जो इसके कथानक के अनुसार पूर्णत: उपयुक्त है।

यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मार्मिक प्रसंग दशरथ का श्रवणकुमार के पिता द्वारा शापित होना है, तथापि इन सभी प्रसंगों की अभिव्यक्ति का भाव श्रवणकुमार के व्यक्तित्व से ही जुड़ा हुआ है। दशरथ की भूमिका कथावस्तु में सक्रियता के दृष्टिकोण से सबसे अधिक है; किन्तु दशरथ के चरित्र का उपयोग भी श्रवणकुमार के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने की दृष्टि से ही हुआ है। श्रवणकुमार के माता-पिता का चरित्र भी श्रवणकुमार की ही चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करता है। अतः इस खण्डकाव्य का मुख्य पात्र श्रवणकुमार ही है और इस दृष्टिकोण से उक्त शीर्षक सबसे उपयुक्त है।

किसी भी काव्य का शीर्षक उसके मुख्य भाव को प्रकट करने वाला होना चाहिए। इस खण्डकाव्य का मुख्य भाव श्रवणकुमार की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करना है; इसलिए इसका शीर्षक ‘श्रवणकुमार’ के अतिरिक्त कुछ और रखा जाना उपयुक्त नहीं प्रतीत होता।

प्रश्न 9:
‘श्रवणकुमार’ के ‘अभिशाप’ सर्ग का काव्य-वैशिष्ट्य लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग (अभिशाप) की कथावस्तु की उद्धरण देते हुए समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कारुणिक प्रसंगों ने जनमानस को बहुत अधिक प्रभावित किया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के मार्मिक स्थलों का सोदाहरण निदर्शन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के अभिशाप सर्ग में करुण रस का सांगोपांग वर्णन है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
रस की दृष्टि से ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में करुणा और प्रेम की विह्वल मन्दाकिनी प्रवाहित होती है।”
इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ की कथा वाल्मीकि-रामायण के ‘अयोध्याकाण्ड’ के श्रवणकुमार-प्रसंग पर आधारित है। कवि ने इस कथा को युगानुरूप परिवर्तित कर सर्वथा नये रूप में प्रस्तुत किया है। श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथा नौ सर्गों में विभक्त है, जिनमें अन्तिम छ: सर्गों में करुण रस की पवित्र धारा प्रवाहित हुई है। बाण लगने पर श्रवण को मार्मिक क्रन्दन, दशरथ की आत्मग्लानि, श्रवण के माता-पिता का करुण-विलाप, उनका दशरथ को शाप देना, श्रवण के माता-पिता का पुत्र-शोक में प्राण त्यागना और दशरथ का दुःखी मन से अयोध्या लौटना ऐसे कारुणिक प्रसंग हैं जिन्हें पढ़कर किसी भी सहृदय पाठक का मन करुणा से आप्लावित हो उठता है। इस कारुणिकता का ही यह प्रभाव है कि यह कथानक भारतीय जनमानस की स्मृति में अमिट हो गया है और श्रवणकुमार का नाम मातृ-पितृ-भक्ति का पर्याय बन गया है। यही इस सर्ग का वैशिष्ट्य है और इसीलिए यह पाठकों को सबसे अधिक प्रभावित भी करता है।

अभिशाप’ इस खण्डकाव्य का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण सर्ग है, जिसमें वात्सल्य की गंगा और करुण रस की-यमुना का सुन्दर संगम हुआ है। इसमें करुण रस के सभी अंगों की सहज अभिव्यक्ति हुई है। यही इस सर्ग का वैशिष्ट्य भी है। श्रवण का शव, उसके माता-पिता के मनोभावों, पूर्व स्मृतियों एवं शव-स्पर्श, शीशपटकना, रोना आदि में आलम्बन, उद्दीपन एवं अनुभाव के दर्शन होते हैं। प्रलाप, चिन्ता, स्मरण, गुणकथन और अभिलाषा आदि वृत्तियों की सहायता से शोक की करुण रस में परिणति इस सर्ग में द्रष्टव्य है। इसके साथ ही, कथावस्तु का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश भी इसी सर्ग में है। इसके अतिरिक्त इस सर्ग में श्रवण के पिता का चरित्र देवत्व और मनुष्यत्व के बीच संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ऋषि होकर भी वे क्रोध को रोक न सके और पुत्र-वध से उत्पन्न रोष के कारण, दशरथ को शाप दे दिया

पुत्र-शोक में कलप रहा हूँ, जिस प्रकार मैं अजनन्दन ।
सुत-वियोग में प्राण तजोगे, इसी भाँति करके क्रन्दन ॥

श्रवण की माता के विलाप में भी करुण रस का स्रोत निम्नवत् फूट पड़ता है

मणि खोये भुजंग-सी जननी, फन-सा पटक रही थी, शीश।
अन्धी आज बनाकर मुझको, किया न्याय तुमने जगदीश ?

तो उधर वात्सल्य रस की गंगा भी प्रवाहित होती दिखाई देती है।

धरा स्वर्ग में रहो कहीं भी ‘माँ’ मैं रहूँ सदा अय प्यार।
रहो पुत्र तुम, ठुकराओ मत मुझ दीना का किन्तु दुलार ॥

इस सर्ग के अन्त में ऋषि दम्पति में मानवीय दुर्बलता भी दिखाई गयी है। भले ही उन्होंने क्रोधवश दशरथ को शाप दे दिया गया, किन्तु दशरथ की निरपराध पत्नी के प्रति सहानुभूति भी दिखाई गयी है कि बेचारी नारी गेहूं के साथ घुन की भाँति पिसेगी। अपने पुत्रहन्ता और उसकी पत्नी के प्रति यह संवेदनात्मक भाव, वह भी उस समय जब पुत्र का शव सामने हो, मानवादर्श की चरम सीमा को दर्शाता है।

इस सर्ग में दशरथ की आन्तरिक अनुभूति एवं उनके अन्तर्मन का द्वन्द्व भी अपनी विशिष्टता रखती है। श्चात्ताप और अपराध-बोध से दबा हुआ एक राजेश्वर; श्रवण के माता-पिता के सामने उनके पुत्र के शव के साथ जिस मन:स्थिति में खड़ा है, वह कवि की कल्पना-शक्ति की अनुभवात्मक संवेदना का परिचय देता है और उसकी उस स्थिति की अभिव्यक्ति में रसों का जो अद्भुत समन्वय हुआ है, वह सराहनीय है।

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