UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 6
Chapter Name Rural Development (ग्रामीण विकास)
Number of Questions Solved 60
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development (ग्रामीण विकास)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों का स्पष्ट करें।
उत्तर
ग्रामीण विकास से आशय ग्रामीण विकास एक व्यापक शब्द है। यह मूलतः ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर बल देता है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं। ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं

  1. साक्षरता, विशेषतः नारी शिक्षा,
  2. स्वास्थ्य एवं स्वच्छता,
  3. भूमि सुधार,
  4. समाज के हर वर्ग के लिए उत्पादक संसाधनों का विकास,
  5. आधारिक संरचना का विकास जैसे—बिजली, सड़कें, अस्पताल, सिंचाई, साख, विपणन आदि तथा
  6. निर्धनता उन्मूलन, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के जीवन-स्तर में सुधार।

प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास में साख के महत्त्व पर चर्चा करें।
उत्तर
कृषि साख से अभिप्राय कृषि उत्पादन के लिए आवश्यक भौतिक आगतों को खरीदने की क्षमता से है। ग्रामीण विकास में साख का महत्त्व निम्नलिखित है

  1. किसान को अपनी दैनिक कृषि संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साख की आवश्यकता होती है।
  2. भारतीय किसानों को अपने पारिवारिक निर्वाह, खर्च, शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए | भी साख की आवश्यकता पड़ती है।
  3. किसानों को मशीनरी खरीदने, बाड़ लगवाने, कुआँ खुदवाने जैसे कार्यों के लिए भी साख की । आवश्यकता होती है।
  4. साख की मदद से किसान एवं गैर-किसान मजदूर ऋणजाल से मुक्त हो जाते हैं।
  5. साख की सहायता से कृषि फसलों एवं गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में विविधता उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3.
गरीबों की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने में अतिलघु साख व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या| करें।
उत्तर
औपचारिक साख व्यवस्था में रह गई कमियों को दूर करने के लिए स्वयं सहायता समूहों (एच०एच०जी०) का भी ग्रामीण साख में प्रादुर्भाव हुआ है। स्वयं-सहायता समूहों ने सदस्यों की ओर से न्यूनतम योगदान की सहायता से लघु बचतों को प्रोत्साहित किया है। इन लघु बचतों से एकत्र राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। उस ऋण की राशि छोटी-छोटी किस्तों में आसानी से लौटायी जाती है। ब्याज की दर भी उचित व तर्कसंगत रखी जाती है। इस प्रकार की साख उपलब्धता को अतिलघु साख कार्यक्रम भी कहा जाता है। इस प्रकार से स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं के सशक्तीकरण में 
सहायता की है। किंतु अभी तक इन ऋण सुविधाओं का प्रयोग किसी-न-किसी प्रकार के उपयोग के लिए। ही हो रहा है व कृषि कार्यों के लिए बहुत कम राशि ली जा रही है।

प्रश्न 4.
सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयासों की व्याख्या करें।
उत्तर
ग्रामीण बाजारों के विकास हेतु सरकारी प्रयास सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयास इस प्रकार हैं

1. व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन की दशाओं का निर्माण करने के लिए बाजार का नियमन करना-इस नीति से कृषक और उपभोक्ता दोनों ही लाभान्वित हुए हैं, परंतु अभी भी लगभग 27,000 ग्रामीण क्षेत्रों में अनियत मंडियों को विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
2. सड़कों, रेलमार्गों, भण्डारगृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाइयों के रूप में भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान–वर्तमान आधारिक सुविधाएँ बढ़ती हुई माँग को देखते हुए अपर्याप्त हैं और उनमें पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है।
3. सरकारी विपणन द्वारा किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ करना।
4. नीतिगत साधन को अपनाना, जैसे

(क) 24 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करना।।
(ख) भारतीय खाद्य निगम द्वारा गेहूँ और चावल के सुरक्षित भंडारों का रख-रखाव।
(ग) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्नों और चीनी का वितरण। इन नीतिगत साधनों का उद्देश्य क्रमशः किसानों को उनकी उपज के उचित दाम दिलाना तथा गरीबों को सहायिकी युक्त कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध कराना रहा है।

प्रश्न 5.
आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर
कृषि विविधीकरण के दो पहलू हैं1. प्रथम पहलू फसलों के उत्पादन के विविधीकरण से संबंधित है। 2. दूसरा पहलू श्रमशक्ति को खेती से हटाकर अन्य संबंधित कार्यों जैसे–पशुपालन, मुर्गी और मत्स्य पालन आदि; तथा गैर-कृषि क्षेत्र में लगाना है। इस विविधीकरण की इसलिए आवश्यकता है क्योंकि सिर्फ खेती के आधार पर आजीविका कमाने में जोखिम बहुत अधिक होती है। विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल हो सकते हैं बलिक ग्रामीण जन-समुदाय के लिए उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की उत्पादक और लाभप्रद गतिविधियों में प्रसार के माध्यम से ही हम ग्रामीण जनसमुदाय को अधिक आय कमाकर गरीबी तथा अन्य विषम परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ बना सकते हैं।

प्रश्न 6.
भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
उत्तर
भारत में ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुसंस्था व्यवस्था अपनाई गई है। इसके बाद 1982 ई० में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की गई। यह बैंक सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त व्यवस्था के समन्वय के लिए एक शीर्ष संस्थान है। ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में आप निम्नलिखित संस्थाएँ शामिल हैं

  1. व्यावसायिक बैंक,
  2. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक,
  3. सहकारी बैंक और
  4. भूमि विकास बैंक।

इसे बहु-संस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य सस्ती ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की पूर्ति करना है। परंतु यह औपचारिक साख व्यवस्था अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में विफल रही है। इससे समन्वित ग्रामीण विकास नहीं हो पाया है। चूंकि इसके लिए ऋणाधार की आवश्यकता थी, अत: बहुसंख्य ग्रामीण परिवारों का एक बड़ा अनुपात इससे अपने आप वंचित रह गया। अतः अर्तिलघु साख प्रणाली को लागू करने के लिए स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया। किंतु अभी भी हमारी बैंकिंग व्यवस्था उचित नहीं बन पायी है। इसका प्रमुख कारण औपचारिक साख संस्थाओं का चिरकालिक निम्न निष्पादन और किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर किस्तों को न चुका पाना है।

प्रश्न 7.
कृषि विपणन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देश भर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रह, भण्डारुण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण और वितरण आदि किया जाता है।

प्रश्न 8.
कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताइए।
उत्तर
कृषि विपणन प्रक्रिया की निम्नलिखित बाधाएँ हैं

  1. तोल में हेरा-फेरी।
  2. खातों में गड़बड़ी।
  3. बाजार में प्रचलित भावों का पता न होना।
  4. अच्छी भण्डारण सुविधाओं का अभाव।
  5. किसानों में जागरूकता का अभाव।
  6. किसानों की आय का निम्न स्तर।।
  7. साख विस्तार का अभाव।

प्रश्न 9.
कृषि विपणन के कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों की उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर
आज यह बात सभी सोच रहे हैं कि यदि किसान प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता को अपने उत्पाद बेचते हैं। तो इससे उपभोक्ताओं द्वारा अदा की गई कीमत में उसकी हिस्सेदारी बढ़ जाती है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अपनी मण्डी, पुणे की हाड़पसार मण्डी, आंध्र प्रदेश की राययूबाज नामक फल-सब्जी मण्डियाँ तथा तमिलनाडु की उझावर के कृषक बाजार आदि वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के कुछ उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त आजकल अनेक देशी एवं बहुराष्ट्रीय खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनियाँ भी किसानों के साथ सीधा अनुबंध कर रही हैं। ये कम्पनियाँ कृषि उपज एवं उसकी गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु पूर्व-निर्धारित कीमतों पर किसानों से अनुबंध करती हैं।

प्रश्न 10.
‘स्वर्णिम क्रान्ति की व्याख्या करें।
उत्तर
हम 1991-2003 ई० की अवधि को ‘स्वर्णिम क्रांति के प्रारम्भ का काल मानते हैं। इसी दौरान बागवानी में सुनियोजित निवेश बहुत ही उत्पादक सिद्ध हुआ और इस क्षेत्र में एक धारणीय वैकल्पिक रोजगार का रूप धारण किया। प्रमुख बागवानी फसलें हैं-फल-सब्जियाँ, रेशेदार फसलें, औषधीय तथा सुगन्धित पौधे, मसाले, चाय, कॉफी इत्यादि।

प्रश्न 11.
सरकार द्वारा कृषि विपणन सुधार के लिए अपनाए गए चार उपायों की व्याख्या करें।
उत्तर
लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखिए।

प्रश्न 12.
ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व समझाइए।
उत्तर
कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या के अत्यधिक बोझ को खत्म करने के लिए ऋणशक्ति को अन्य गैर-कृषि कार्यों में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है। गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व इस प्रकार है

  1. इसके द्वारा हमें सिर्फ खेती के आधार पर आजीविका कमाने का जोखिम कम होगा।
  2. इससे निर्धन किसानों की आय में वृद्धि होती है।
  3. यह ग्रामीण क्षेत्रों से निर्धनता उन्मूलन का अच्छा स्रोत है।
  4. गैर-कृषि क्षेत्र में वर्ष भर आय कमाने का रोजगार मिल जाता है।
  5. ये कृषि क्षेत्र में श्रमशक्ति का भार कम करने में सहायक होते हैं।
  6. कृषि कार्यबल को धारणीय जीवन-स्तर जीने के लिए अच्छे स्रोत हैं।

प्रश्न 13.
विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्त्व पर टिप्पणी करें।
उत्तर
पशुपालन का महत्त्व

1. मवेशियों के पालन से परिवार की आय में स्थिरता आती है।
2. इससे खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण पूरे परिवार के लिए हासिल हो जाते हैं और खाद्य 
उत्पादन की अन्य क्रियाओं पर भी प्रभाव नहीं पड़ता है।
3. यह भूमिहीन कृषकों तथा छोटे व सीमान्त किसानों को आजीविका कमाने का वैकल्पिक साधन है।
4. इस क्षेत्र में महिलाएँ भी बहुत बड़ी संख्या में रोजगार पा रही हैं।
5. यह क्षेत्र अधिशेष कार्यबल को समायोजित कर रहा है।

मत्स्य पालन का महत्त्व

  1. प्रत्येक जलागार; सागर, झीलें, प्राकृतिक तालाब; मत्स्य उद्योग से जुड़े समुदाय के लिए निश्चित जीवन उद्दीपक स्रोत है।
  2. मत्स्य उत्पादन सकल घरेलू उत्पाद का 1.4% है।
  3. समुद्र, झीलों, नदियों, तालाबों के आस-पास रहने वाले लोगों के लिए गैर-कृषि क्रियाकलाप आय का अच्छा स्रोत है।

बागवानी का महत्त्व

  1. बागवानी फसलों से रोज़गार मिलता है।
  2. बागवानी फसलों से भोजन एवं पोषण प्राप्त होता है।
  3. यह क्षेत्र में अधिशेष कार्यबल समायोजित कर रहा है।
  4.  पुष्पारोपण, पौधशाला की देखभाल, फल-फूलों का संवर्द्धन और खाद्य प्रसंस्करण ग्रामीण महिलाओं के लिए अधिक आय वाले रोजगार बन गए हैं।
  5. देश की 19% श्रम शक्ति को इस समय इन्हीं कार्यों से रोजगार मिला हुआ है।

प्रश्न 14.
सूचना प्रौद्योगिकी धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।टिप्पणी करें।
उत्तर
आज सूचना प्रौद्योगिकी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। धारणीय विकास एवं खाद्य सुरक्षा को हासिल करने में सूचना प्रौद्योगिकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सूचना प्रौद्योगिकी का योगदान निम्नलिखित है

  1. सूचनाओं और उपयुक्त सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका | वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है।
  2. इस प्रौद्योगिकी द्वारा उदीयमान तकनीकों, कीमतों, मौसम तथा विभिन्न फसलों के लिए मृदा की दशाओं की उपयुक्तता की जानकारी का प्रसारण हो सकता है।
  3. ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन की इसमें क्षमता है।
  4. यह लोगों के लिए ज्ञान एवं क्षमता का सृजन करती है।

प्रश्न 15.
जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
उत्तर
जैविक कृषि एक धारणीय कृषि प्रणाली है जो भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है तथा उच्चकोटि के पौष्टिक खाद्य का उत्पादन करने के लिए भूमि के सीमित संसाधनों का कम उपयोग करती है। भारत में परम्परागत कृषि पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों पर आधारित है। ये विषाक्त तत्त्व हमारी खाद्य पूर्ति व जल स्रोतों में नि:सरित हो जाते हैं और हमारे पशुधन को हानि पहुँचाते हैं। साथ ही इसके कारण मृदा की उर्वरता भी क्षीण हो जाती है और हमारे प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश हो जाता है। दूसरी ओर जैविक कृषि में रसायनों का प्रयोग प्रतिबंधित होता है। इसमें कृषि में महँगे बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाइयों की जगह स्थानीय आगतों का प्रयोग किया जाता है। अतः इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है और नवीन तकनीक के प्रयोग को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 16.
जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर

जैविक कृषि के लाभ

1. जैविक कृषि महँगे आगतों के स्थान पर स्थानीय रूप से बने जैविक आगतों के प्रयोग पर निर्भर होती है।
2. परम्परागत फसलों की तुलना में जैविक फसलों में अधिक मात्रा में गौण मेटाबोलाइट्स पाए जाते
3. जैविक खेतों की मिट्टी में अधिक पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं।
4. निवेश पर अच्छा प्रतिफल प्राप्त होता है।
5. जैविक कृषि में अधिक जैव सक्रियता तथा अधिक जैव विविधता पाई जाती है।
6. यह पद्धति हानिरहित एवं पर्यावरण के लिए मित्र हैं।

जैविक कृषि की सीमाएँ

1. जैविक कृषि अत्यधिक श्रमगहन होती है।
2. जैविक उत्पादन गैर-जैविक से अधिक महँगा होता है।
3. भारतीय किसान जैविक कृषि से अनभिज्ञ हैं तथा उसके प्रति उत्सुक भी नहीं है।
4. इसके लिए आधार संरचना अपर्याप्त है।
5. जैविक उत्पादों के लिए बाजार की कमी है।
6. परम्परागत कृषि की तुलना में जैविक कृषि का उत्पादन औसतन 20% कम होता है।
7. बिना मौसम के फसल उगाने के कम विकल्प हैं।

प्रश्न 17.
जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारम्भिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर
जैविक कृषि में संलग्न कृषकों की समस्याएँ जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारम्भिक वर्षों में निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है

  1. प्रारम्भिक वर्षों में जैविक कृषि की उत्पादकता रासायनिक कृषि की तुलना में कम रहती है।
  2. छोटे और सीमांत किसानों के लिए बड़े स्तर पर इसे अपनाना कठिन होता है।
  3. जैविक उत्पाद रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा शीघ्र खराब हो जाते हैं।
  4. गैर-मौसमी फसलों का जैविक कृषि में उत्पादन बहुत सीमित होता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किस अवधि को ‘स्वर्णिम क्रान्ति के प्रारम्भ का काल माना जाता है?
(क) 1990-2002
(ख) 1991-2003
(ग) 1992-2004
(घ) 1993-2005
उत्तर
(ख) 1991-2003

प्रश्न 2.
“भारत गाँवों का देश है और इसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है।”—यह कथन किनका  है?
(क) राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का
(ख) डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम का
(ग) आर० एन० आजाद का ।
(घ) रॉबर्ट चैम्बर्स का
उत्तर
(क) राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना कब की गई?
(क) सन् 1882 में
(ख) सन् 1780 में
(ग) सन् 1982 में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) सन् 1982 में

प्रश्न 4.
जैविक कृषि
(क) भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है।
(ख) भूमि की उपजाऊ शक्ति को नष्ट कर देती है।।
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा श्रमिकों की साख सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किन बैंकों की स्थापना की गई है?
(क) स्टेट बैंकों की ।
(ख) पंजाब नेशनल बैंकों की
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की ।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की |

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन क्या है?
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविकों का प्रमुख साधन कृषि है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय विकास का केन्द्र-बिन्दु क्या है?
उत्तर
राष्ट्रीय विकास का केन्द्रबिन्दु ‘ग्रामीण विकास’ है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण विकास को इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया जा रहा है?
उत्तर
आज भारत की लगभग 64% जनसंख्या कृषि पर आधारित है और कृषि की उत्पादकता का स्तर अत्यधिक निम्न हैं यही कारण है कि वह अत्यधिक निर्धन है। अतः भारत की वास्तविक उन्नति के लिए ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति आवश्यक है।

प्रश्न 4.
ग्रामीण विकास से क्या आशय है?
उत्तर
ग्रामीण विकास से आशय है—ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और उनके विकास-क्रम को आत्मपोषित बनाना।

प्रश्न 5.
गैर-कृषि उत्पादक क्रियाकलापों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
गैर-कृषि उत्पादक क्रियाकलापों के कुछ उदाहरण हैं—खाद्य प्रसंस्करण, स्वास्थ्य सुविधाओं की अधिक उपलब्धता, घर और कार्यस्थल पर स्वच्छता संबंधी सुविधाएँ, सभी के लिए शिक्षा आदि।

प्रश्न 6.
सकल घरेलू उत्पाद में किस क्षेत्र का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है?
उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद में ‘कृषि-क्षेत्र’ का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है।

प्रश्न 7.
ग्रामीण विकास में मुख्य बाधाएँ क्या हैं?
उत्तर
ग्रामीण विकास में मुख्य बाधाएँ हैं-कृषि की संवृद्धि दर में ह्रास, अपर्याप्त आधारिक संरचना, वैकल्पिक रोजगार के अवसरों का अभाव, अनियत रोजगार में वृद्धि।।

प्रश्न 8.
कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि मुख्य रूप से किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर
कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि समय-समय पर कृषि और गैर-कृषि कार्यों में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए पूँजी के प्रयोग पर निर्भर करती है।

प्रश्न 9.
किसानों को किन उद्देश्यों के लिए ऋण लेने पड़ते हैं?
उत्तर
किसानों को उत्पादक (बीज, उर्वरक, यंत्र आदि खरीदने) तथा अनुत्पादक (पारिवारिक, निर्वाह व्यय, शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों) कार्यों के लिए ऋण लेने पड़ते हैं।

प्रश्न 10.
सन् 1969 में ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किस प्रकार की व्यवस्था| अपनाई गई?
उत्तर
ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सन् 1969 में बहुसंस्था व्यवस्था अपनाई गई थी।

प्रश्न 11.
नाबार्ड क्या है?
उत्तर
सन् 1982 में स्थापित नाबार्ड सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त व्यवस्था के समन्वय के लिए एक शीर्ष संस्थान

प्रश्न 12.
ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में क्या सम्मिलित हैं?
उत्तर
ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में अनेक बहुएजेन्सी संस्थान जैसे-व्यावसायिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी तथा भूमि विकास बैंक सम्मिलित हैं।

प्रश्न 13.
बहुसंस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
बहुसंस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य सस्ती ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की पूर्ति करना है।

प्रश्न 14.
‘कुटुम्ब श्री क्या है?
उत्तर
‘कुटुम्ब श्री’ एक बचत बैंक है जिसकी स्थापना सरकारी बचत एवं साख सोसायटी के रूप में गरीब महिलाओं के लिए की गई थी।

प्रश्न 15.
अतिलघु साख कार्यक्रम क्या है?
उत्तर
इसमें प्रत्येक सदस्य न्यूनतम अंशदान करता है। इस राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को उचित ब्याज दर पर ऋण दिया जाता है।

प्रश्न 16.
कृषि उपज को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का माध्यम क्या है?
उत्तर
कृषि उपज को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का माध्यम ‘बाजार व्यवस्था है।

प्रश्न 17.
कृषि विपणन से क्या आशय है?
उत्तर
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देशभर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रहण, भण्डारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण, वितरण आदि किया जाता है।।

प्रश्न 18.
किसान को अपनी उपज की कीमत का अधिक अंश कैसे प्राप्त हो सकता है?
उत्तर
यदि किसान स्वयं ही उपभोक्ता को कृषि उत्पाद बेचे तो उसे उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत को अधिक अंश प्राप्त होगा।

प्रश्न 19.
वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर
वैकल्पिक क्रय-विक्रय के माध्यम हैं-
1. पुणे की हाड़पसार मण्डी,
2. तमिलनाडु की उझावर मण्डी के कृषक बाजार।

प्रश्न 20
उत्पादक गतिविधियों के विविधीकरण के दो पक्ष कौन-कौन से हैं?
उत्तर
उत्पादक-गतिविधियों के ऐसे दो पक्ष हैं-
1. फसलों के उत्पादन की विविधीकरण।
2. श्रमशक्ति को कृषि से हटाकर गैर कृषि क्षेत्रकों में लगाना।

प्रश्न 21.
विविधीकरण से क्या लाभ होगा?
उत्तर
विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल होंगे बल्कि ग्रामीण जनसमुदाय को उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो पाएँगे।

प्रश्न 22.
गैर-कृषि अर्थतंत्र में कुछ गतिशील उपघटकों के नाम बताइए।
उत्तर
ऐसे कुछ उदाहरण हैं—कृषि प्रसंस्करण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, चर्म उद्योग, पर्यटन आदि।

प्रश्न 23.
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों को क्या लाभ हैं?
उत्तर
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों की आय में अधिक स्थिरता आती है। इसके अतिरिक्त खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण आदि की व्यवस्था भी हो जाती है।

प्रश्न 24.
स्वर्णिम क्रान्ति से क्या आशय है?
उत्तर
बागवानी में सुनियोजित निवेश के फलस्वरूप तीव्र उत्पादकता एवं वैकल्पिक रोजगार की उपलब्धि को ‘स्वर्णिम क्रान्ति’ कहते हैं।

प्रश्न 25.
खाद्य सुरक्षा और धारणीय विकास में सूचना प्रौद्योगिकी का क्या महत्त्व है?
उत्तर
सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है और विपदाओं के दुष्प्रभावों को कम करने में सफल हो सकती है।

प्रश्न 26.
रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों के प्रयोग से क्या हानि है?
उत्तर
ये विषाक्त तत्त्व हमारी खाद्य पूर्ति व जल स्रोतों में नि:सरित हो जाते हैं, हमारे पशुधन को हानि पहुँचाते हैं, मृदा की उर्वरता को कम करते हैं और प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश करते हैं।

प्रश्न 27.
जैविक कृषि क्या है?
उत्तर
जैविक कृषि खेती करने की वह विधि है जो पर्यावरणीय सन्तुलन को पुनः स्थापित करके उसका संवर्द्धन और संरक्षण करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास से क्या आशय है?
उत्तर
भारत को गाँवों का देश कहा जाता है। अत: भारत के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है। कि गाँवों के विकास पर समुचित ध्यान दिया जाए। ग्रामीण विकास से अभिप्राय है-“ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और उनके विकास के क्रम को आत्मपोषित बनाना।” यह एक ऐसी व्यूह-रचना है, जो लोगों के एक विशिष्ट समूह (निर्धन ग्रामीण) के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को उन्नत बनाने के लिए बनाई गई है। इसका उद्देश्य विकास के लाभों को ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन-यापन की तलाश में लगे निर्धनतम लोगों तक पहुँचाना है। इसके अंतर्गत एक निश्चित ग्रामीण क्षेत्र में, ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग आता है।

प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास के अंतर्गत किन-किन बातों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर
ग्रामीण विकास के अंतर्गत वे व्यापक क्रियाएँ आती हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं से संबंधित होती हैं तथा जिनमें सभी ग्रामीण वर्गों को सम्मिलित किया जाता है जैसे—कृषक, भूमिहीन श्रमिक, ग्रामीण दस्तकार आदि। इस आधार पर ग्रामीण विकास कार्यक्रम निम्नलिखित घटकों पर आधारित होते हैं

  1. क्षेत्र में उपलब्ध संसाधन एवं उनमें अन्तर्सम्बंध।
  2. क्षेत्र के निवासी एवं उनमें पूरक प्रतिस्पर्धात्मक संबंध। |
  3. आत्मनिर्भरता के उद्देश्य की प्राप्ति की क्षमता।
  4. आवश्यक अवसंरचना।
  5. उचित तकनीक जो उत्पादकता एवं रोजगार में वृद्धि कर सके।
  6. संस्थाएँ, प्रेरणाएँ एवं नीतियाँ जो समन्वित प्रयास के लिए आवश्यक है।

वर्तमान में ग्रामीण विकास के अंतर्गत कृषि एवं सम्बद्ध क्रियाओं; बागवानी, लघु सिंचाई, भूमि विकास, मिट्टी एवं जल संरक्षण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गीपालन, सूअर पालन, मत्स्यपालन, खद्दर एवं खादी उद्योग, सामाजिक वानिकी तथा कृषि एवं वन; पर आधारित उद्योगों की स्थापना पर विशेष बल दिया जाता है। इस प्रकार ग्रामीण विकास में उन नीतियों एवं कार्यक्रमों को अपनाया जाता है, जो ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करें तथा कृषि, वानिकी, मत्स्य, ग्रामीण शिल्प एवं उद्योग तथा सामाजिक एवं आर्थिक अवसंरचना के निर्माण आदि क्रियाओं को प्रोन्नत करें।

प्रश्न 3.
भारत में साहूकारों व महाजनों की वित्त व्यवस्था के दोष बताइए।
उत्तर
भारत में पारम्परिक वित्त व्यवस्था के दोष साहूकारों व महाजनों की पारम्परिक कृषि वित्त व्यवस्था के निम्नलिखित दोष रहे हैं

  1. साहूकार की कार्य-पद्धति लोचदार होती है और वह समय, परिस्थिति तथा व्यक्ति के अनुसार उनमें परिवर्तन करता रहता है।
  2. साहूकार अपने ऋणों पर ब्याज की उच्च दर वसूल करता है।
  3. साहूकार मूलधन देते समय ही पूरे वर्ष का ब्याज अग्रिम रूप में काट लेते हैं और इसकी कोई | रसीद भी नहीं देते हैं।
  4. अनेक साहूकार ऋण देते समय कोरे कागजों पर हस्ताक्षर या अँगूठे की निशानी ले लेते हैं और बाद में उनमें अधिक रकम भर लेते हैं।
  5. बहुत-से स्थानों पर ऋण देते समय ऋण की रकम में से अनेक प्रकार के खर्चे काट लेते हैं। कभी-कभी यह रकम 5% से 10% तक हो जाती है।
  6. साहूकार कृषकों को अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण देकर उन्हें फिजूलखर्ची बना देते हैं।
  7. साहूकार समय-समय पर हिसाब-किताब में भी गड़बड़ करती रहती है।
  8. साहूकार कृषकों को ऋण देने के बाद उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर बेचने के लिए विवश| करते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था को सुधारने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
कृषि उपजों के विपणन में सुधार के उपाय कृषि उपज की विक्रम व्यवस्था को निम्नलिखित उपाय अपनाकर सुधारा जा सकता है

  1. कृषक को महजन-साहूकार के चंगुल से निकालने के लिए सस्ती ब्याज दर पर वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  2. परिवहन के सस्ते व पर्याप्त साधन विकसित किए जाएँ ताकि कृषक अपनी उपजों को मण्डी में ले | जाकर उचित कीमतों पर बेच सकें।
  3. नियंत्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।
  4. मण्डी में बाटों का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाए।
  5. व्यापक स्तर पर भण्डार वे गोदाम बनाए जाएँ।
  6. कृषि उपज की बिक्री के लिए स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
  7. किसानों में शिक्षा का पर्याप्त प्रचार-प्रसार किया जाए। 

प्रश्न 5.
छोटे खेतों के विविधीकरण के पक्ष में उपयुक्त तर्क दीजिए।
उत्तर
छोटे खेतों के विविधीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  1. निर्वाह खेती व्यापारिक खेती में बदलेगी। इससे उनकी आय में वृद्धि होगी।
  2. वे खाली समय में पशुपालन, मत्स्य पालन, कृषि वानिकी व बागवानी आदि गैर-कृषि उत्पादक | कार्यों में लग जाएँगे।
  3. उत्पादन की अनिश्चितता तथा कीमत उच्चावचनों की जोखिम कम हो जाएगी।
  4. फसल-पशुधन, विविधीकृत खेत, चारे, फसल अवशेष तथा अन्य फसल चक्रानुक्रम के निम्न| मूल्य वाले घटकों को अधिक कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकेंगे और खाद का लाभ उठा सकेंगे।

प्रश्न 6.
भारत में जैविक कृषि की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
कुछ दशक पहले, कृषि उत्पादन की मात्रा, किस्म व समय संबंधित क्षेत्र की जलवायु द्वारा निर्धारित होते थे, जबकि वर्तमान में यह बाजार की शक्तियों द्वारा निर्धारित होते हैं। आज पौष्टिकता के स्थान पर उत्पादन मात्रा पर अधिक ध्यान दिया जाता है। कृषि में कीटनाशक दवाइयों और अन्य रासायनिक अवशेषों के अधिकाधिक प्रयोग के कारण विभिन्न प्रकार के रोगों में वृद्धि हुई है। कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से पर्यावरण भी प्रदूषित हुआ है। मिट्टी, पानी व वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं जिसका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे कृषि अधारणीय (unsustainable) हुई है तथा अल्प पोषण व कुपोषण बढ़ा है।। उपर्युक्त सभी समस्याओं का समाधान जैविक कृषि में निहित है। यह पर्यावरण व खाद्य की गुणक्ता बढ़ाती है, उत्पादन लागतों को घटाती है और लोगों को पौष्टिक, सुरक्षित तथा स्वास्थ्यप्रद खाद्य उपलब्ध कराती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास के उद्देश्य बताइए।
उत्तर
ग्रामीण विकास का अर्थ एवं परिभाषाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रप्रधान अर्थव्यवस्था है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में कहा था–“भारत गाँवों का देश है और इसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है। अतः ग्रामीण विकास भारतीय आर्थिक नियोजन का केन्द्रबिन्दु बन गया है। ग्रामीण विकास से आशय ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास से है। इसका अर्थ है ग्रामीण क्षेत्र में निवास कर रही जनता का आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्थान करके उसके जीवन-स्तर में सुधार लाना।
इसे विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है
आर०एन० आजाद के शब्दों में- “ग्रामीण विकास का अर्थ है-आर्थिक विकास की प्रक्रिया हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक अवसंरचनात्मक विकास करना, जिसमें लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास तथा विपणन जैसी द्वितीयक एवं तृतीयक सेवाओं का विकास सम्मिलि है।”

उमा लैली के अनुसार- ग्रामीण विकास से अभिप्राय ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय स्तर के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना और उनके विकास के क्रम को आत्मपोषित बनाना है।”

रॉबर्ट चैम्बर्स के अनुसार-“ग्रामीण विकास का तात्पर्य जनसंख्या के उस विशेष वर्ग के विकास करने की रणनीति है, जिसमें निर्धन ग्रामीण पुरुष, महिलाएँ व बच्चे सम्मिलित हैं। इनकी इच्छा और जरूरतों को पूरा करना है ताकि इनका जीवन-स्तर ऊपर उठ सके। इनमें ग्रामीण किसान, कारीगर, भूमिहीन कृषक भी सम्मिलित होते हैं जो अपने जीवन-यापन हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे हैं।” संक्षेप में, “ग्रामीण विकास से तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे निर्धन लोगों के जीवन-स्तर में सुधार कर, उन्हें आर्थिक विकास की धारा में प्रवाहित करना है जिसके लिए इनकी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ उन्हें पर्याप्त मात्रा में सामाजिक उपरिव्यय सुविधाएँ भी उपलब्ध करानी होंगी।”

ग्रामीण विकास के उद्देश्य


ग्रामीण विकास के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं उद्योगों की उत्पादकता में वृद्धि करके कुल उत्पादन को बढ़ाना।
  2. सभी ग्रामीणों के लिए लाभदायक रोजगार पैदा करना।
  3. गाँवों को आत्मनिर्भर एवं आत्मपोषित बनाना।
  4. प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखते हुए मानव एवं प्रकृति के मध्य पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना।
  5. देश के आर्थिक विकास में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाना।
  6. स्वार्थरहित नेतृत्व को प्रोत्साहित करना।

प्रश्न 2.
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ग्रामीण विकास के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भारत गाँवों का देश है। भारत के समग्र विकास के लिए ग्रामीण क्षेत्रों का समग्र विकास भी अनिवार्य है। अत: ग्रामीण विकास का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास करना है। इसमें सभी क्षेत्रों (कृषि, उद्योग व सेवा) का विकास सम्मिलित है। 
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रामीण विकास के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है

1. निर्धनता निवारण में सहायक- ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में विकास संबंधी गतिविधियाँ बढ़ी हैं। इससे ग्रामीण निर्धन लोग भी उत्पादक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे हैं। फलस्वरूप उनकी निर्धनता का अनुपात गिर रहा है।

2. बेरोजगारी को दूर करने में सहायक– भारत में निर्धनता का एक प्रमुख कारण व्यापक बेरोजगारी को पाया जाना है। ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक लोग कृषि कार्यों में लगे रहते हैं। ग्राम विकास कार्यक्रमों में बेरोजगार लोगों को रोजगार सुलभ कराने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना पर बल दिया जा रहा है।

3. कृषि उत्पादकता में वृद्धि कारक- ग्रामीण विकास के फलस्वरूप कृषि कार्यों में सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक, मशीन आदि का प्रयोग बढ़ने से कृषि उत्पादकता में वृद्धि और उसको तीव्र विकास हुआ है। गत वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृषि क्षेत्र के इस विकास में ग्रामीण विकास रणनीति की उल्लेखनीय भूमिका रही है।

4. आधुनिक तकनीकी का प्रसारक-  ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से विकास कार्यों को चलाए जाने के कारण कृषि, उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों में परम्परागत एवं रूढ़िवादी तकनीकी के स्थान पर नई एवं आधुनिक तकनीक का प्रयोग बढ़ा है। इससे ग्रामीण विकास में तेजी आई है।

5. आय एवं धन के वितरण की विषमताओं का नियंत्रक- भारत में ग्रामीण विकास की प्रक्रियाके फलस्वरूप आय और सम्पत्ति की असमानता में कुछ कमी आई है, इसके बावजूद आज भी आय एवं सम्पत्ति की असमानता पर्याप्त रूप में विद्यमान है। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के फलस्वखर्प शीघ्र ही इन विषमाताओं में भी कमी होने की आशा है।

6. ग्रामीण क्षेत्र के संसाधनों का विदोहन- गाँवों में परिवहन, संचार, बैंक, विपणन आदि सुविधाओं का विस्तार होने से प्राकृतिक संसाधनों का उचित विदोहन सम्भव हुआ है। इससे ग्रामीण जनता को रोजगार के अवसर सुलभ हुए हैं तथा उनके जीवन-स्तर में भी अपेक्षित सुधार हुआ है।

7. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं तकनीकी का विस्तारक- गत वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, प्रशिक्षण एवं तकनीकी सुविधाएँ बढ़ी हैं। इसके फलस्वरूप साक्षरता की दर भी बढ़ी है।।

8. राष्ट्र-निर्माण में भागीदार- ग्रामीण विकास के परिणामस्वरूप ग्रामीण लोगों में राष्ट्र-निर्माण के प्रति भागीदारी बढ़ी है। आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र में भी इनके नेतृत्व का क्षेत्र बढ़ा है।

9. ग्रामीण विकास का चक्रीय प्रवाहक- ग्रामीण विकास कार्यक्रमों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार-परक उद्योगों की स्थापना की गई है, रोजगार बढ़ा है, निर्धनता में कमी आई है,जीवन-स्तर में सुधार हुआ है तथा आय की असमानताएँ घटी हैं।

प्रश्न 3.
किसान को किस प्रकार की आवश्यकताओं के लिए साख की आवश्यकता होती है? भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में साख व्यवस्था पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर
ग्रामीण विकास के लिए वित्त एक अनिवार्य आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएँ इतनी विशाल हैं कि पर्याप्त वित्तीय सुविधाओं के अभाव में यहाँ विकास नहीं हो सकता। भारत में कृषि कार्य में लिप्त किसान प्राय: एक निर्धन व्यक्ति होता है, इसके पास सम्पत्ति के नाम पर भूमि का छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं होता। भूमि, हल, बैल, बीज, खाद तथा सिंचाई सुविधाओं की व्यवस्था के लिए उसे समय पर वित्तीय साधनों की आवश्यकता होती है। ग्रामीण समुदाय की निर्धनता, कृषि उत्पादन की लम्बी प्रक्रिया और उसकी अनिश्चितता आदि तत्त्वों ने वित्त की समस्या को और भी जटिल बना दिया है। कृषि की प्रकृति ऐसी विचित्र है कि कृषक को केवल उत्पादक ऋणों की ही नहीं अपितु अनुत्पादक ऋणों की भी आवश्यकता होती है।

भारतीय कृषकों की साख संबंधी आवश्यकताएँ

सामान्य रूप से किसानों की साख संबंधी आवश्यकताएँ तीन प्रकार की होती हैं-
1. अल्पकालीन ऋण- ये ऋण प्रायः 15 माह की अवधि तक के होते हैं। ये ऋण मुख्यतः बीज, | खाद आदि के खरीदने तथा पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लिए जाते हैं।

2. मध्यमकालीन ऋण- ये ऋण प्राय: 15 माह से अधिक परंतु 5 वर्ष से कम की अवधि हेतु लिए जाते हैं। इस प्रकार के ऋणों की आवश्यकता प्रायः पशु व कृषि उपकरणों को खरीदने, कुआँ खुदवाने व भूमि-सुधार के लिए पड़ती है।

3. दीर्घकालीन ऋण- इन ऋणों की अवधि प्रायः 6 वर्ष से 20 वर्ष तक की होती है। ये ऋण सामान्यतः पुराने कर्जा को चुकाने, भूमि खरीदने, ट्रैक्टर खरीदने, भूमि पर स्थायी सुधार करने आदि के लिए किसान प्राप्त करता है। जब से कृषि विकास की नई नीति को अपनाया गया है, देश में अल्पकालीन, मध्यमकालीन और दीर्घकालीन सभी प्रकार की साख में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में साख व्यवस्था

ग्रामीण क्षेत्रों में साख के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं
1. महाजन, साहूकार एवं देशी बैंक– महाजन एवं साहूकार कृषि के साथ-साथ लेन-देन का 
कार्य भी करते हैं। ये लोग कृषि के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी पैसा उधार देते हैं, किन्तु साख के इस स्रोत के अनेक दोष हैं जैसे—उसकी ब्याज दर ऊँची होती है, वह ब्याज मूलधन देने से पूर्व ही काट लेता है, अनेक प्रकार के खर्चे काट लिए जाते हैं। देशी बैंकर बैंकिंग एवं गैर-बैंकिंग दोनों ही प्रकार के कार्य सम्पन्न करते हैं। ये भी ऋणों पर ऊँची ब्याज दर वसूल करते

2. बहुसंस्था व्यस्था का विकास- ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुसंस्था व्यवस्था का सहारा लिया गया है। इसमें निम्नलिखित संस्थाएँ सम्पिलित हैं

  • व्यापारिको बैंक- व्यापारिक बैंक कृषि विस्तार के लिए अल्पकालीन एवं मध्यमकालीन दोनों प्रकार के ऋण प्रदान करते हैं। अब इनकी अधिकांश शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में ही खोली जा रही हैं। राष्ट्रीयकरण के उपरांत कृषि विकास के क्षेत्र में वाणिज्यिक बैंकों की प्रगति संतोषजनक रही है।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा भूमिहीन श्रमिकों की साख संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई है।
  • सहकारी साख समितियाँ– सहकारी साख समितियों का प्रमुख उद्देश्य किसानों को साख प्रदान करना है। भारत में सहकारी साख व्यवस्था स्तूपाकार है–ग्रामीण स्तर पर सहकारी साख समितियाँ, जिला स्तर पर केन्द्रीय सहकारी समितियाँ तथा राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक। ये कृषि विकास के लिए कम ब्याज दर पर पर्याप्त साख सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
  • भूमि बन्धक अथवा भूमि विकास बैंक—ये बैंक भूमि की जमानत पर किसानों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं। भारत में राज्य स्तर पर केन्द्रीय भूमि बन्धक बैंकों की तथा जिला स्तर पर प्राथमिक भूमि बन्धक बैंकों की स्थापना की गई है।
  • नाबार्ड– सन् 1982 में सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त के समन्वयन के लिए एक शीर्ष संस्थान-राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की गई। नाबार्ड द्वारा दिए जाने वाले ऋणों के प्रमुख क्षेत्र हैं-लघु सिंचाई, भूमि विकास, कार्य यन्त्रीकरण, बागान, मुर्गीपालन, भेड़-पालन, सूअर पालन, मत्स्य पालन, दुग्धशालाओं का विकास व संग्रहण आदि।

  • स्वयं सहायता समूह- होल ही में ग्रामीण साख व्यवस्था में स्वयं सहायता समूहों का प्रादुर्भाव हुआ है। इसके अंतर्गत प्रत्येक सदस्य न्यूनतम अंशदान करता है। एकत्रित राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। इस ऋण की राशि छोटी-छोटी किस्तों में लौटायी जाती है। ब्याज की दर भी उचित रखी जाती है। इसे अति लघु साख कार्यक्रम कहते हैं।

प्रश्न 4.
अपनी उपज को बेचने के लिए एक किसान को किस प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता| पड़ती है? सरकार की ओर से क्षेत्र में क्या सहायता दी जा रही है?
उत्तर
एक किसान विभिन्न माध्यमों से अपनी उपज को बेचता है। इसके लिए किसान को एक उत्तम विपणन प्रणाली की आवश्यकता होती है, एक ऐसी प्रणाली जो उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों दोनों के हितों की रक्षा कर सके साथ ही विपणन व्यय भी न्यूनतम हो।।

कृषि उपज के विपणन की अनिवार्य सुविधाएँ

कृषि उपज को बेचने के लिए एक किसान के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ अपेक्षित हैं

  1. उत्पादन एवं विक्रय के मध्यान्तर में उपज़ के संग्रहण की सुविधा।
  2. कृषि उपज को विपणन केन्द्र तक ले जाने के लिए पर्याप्त एवं मितव्ययी यातायात के साधन।
  3. कमीशन लेने वाले व विभिन्न प्रकार की कटौती काटने वाले वे धोखेबाज मध्यस्थों का उन्मूलन।।
  4. बाजार मूल्यों के बारे में निरंतर जानकारी प्राप्त करने के लिए संचार माध्यमों की उपलब्धि।
  5. कृषि उपज की विभिन्न किस्मों के मूल्यों में अंतर होना चाहिए ताकि अच्छी किस्म के कृषि उत्पादों | का यथोचित मूल्य मिल सके।
  6. यदि वह अतिरेक माल को भण्डारण करना चाहता है, तो साख सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।

कृषि उपज के विपणन में सुधार लाने के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं

  1. नियमित मर्पियों की स्थापना की गई है तथा उनकी गतिविधियों का मानकीकरण किया गया है।
    ताकि उन्हें मध्यस्थों के शोषण से बचाया जा सके और कृषि उपज को नियमित रूप से मण्डियों में बेचेन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  2. कृषि उपज का श्रेणीकरण (grading) तथा मानकीकरण किया जाता है ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
  3. सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया है।
  4. भण्डारण सुविधाओं का विस्तार किया गया है। खाद्यान्नों को गोदामों में रखने का काम भारतीय खाद्य निगम (FCI) करता है।
  5. देश में माप-तौल की मीट्रिक प्रणाली आरम्भ की गई है।
  6. बेहतर एवं सस्ती परिवहन सुविधाएँ प्रदान की गई हैं।
  7. विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा महत्त्वपूर्ण कृषि वस्तुओं की बाजार में प्रचलित कीमतों की सूचना किसानों को उपलब्ध कराई जाती है।
  8. देश में कृषि पदार्थों के मूल्यों में अनावश्यक, उतार-चढ़ाव न आए तथा किसानों के हित सुरक्षित | रहें इस दृष्टि से ‘कृषि कीमत एवं लागत आयोग की स्थापना की गई है। इसका मुख्य कार्य ‘न्यूनतम समर्थित मूल्य’ (MSP) की संस्तुति करना है।

प्रश्न 5.
जैविक कृषि क्या है? जैविक कृषि के लाभ व हानियाँ भी बताइए।
उत्तर

जैविक कृषि अर्थ

जैविक कृषि एक धारणीय कृषि प्रणाली है। यह वह प्रणाली है जो पर्यावरणीय संतुलन को पुनः स्थापित करके उसका संरक्षण एवं संवर्द्धन करती है। यह भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है, अति पौष्टिक भोजन का उत्पादन करने में सहायक होती है तथा भूमि के सीमित संसाधनों का न्यूनतम उपयोग करती है। इसमें फसल-चक्र, पशु खाद तथा कूड़ा-करकट खाद का उपयोग, यांत्रिक कृषि तथा प्राकृतिक पदार्थों से बने कीटनाशकों से कीट नियंत्रण किया जाता है ताकि भूमि की उपजाऊ शक्ति को नियमित बनाए रखा जा सके, पौधों को उनकी आवश्यकतानुरूप पोषकों की पूर्ति की जा सके। जैविक कृषि के लाभ व हानियाँ लाम–

जैविक कृषि के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है

  1. जैविक कृषि करने वाले किसान पेट्रोलियम आधारित संसाधन (जो एक अनव्यीकरण संसाधन है) का प्रयोग नहीं करते।
  2. परम्परागत फसलों की तुलना में जैविक फसलों में अधिक मात्रा में गौण मेटाबोलाइट्स पाए जाते | हैं जिससे पौधों की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है।
  3. जैविक कृषि से मिट्टी की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
  4. इसमें अधिक जैव सक्रियता व जैव विविधता पाई जाती है।
  5. फलोत्पाद अधिक मीठे, स्वादिष्ट व पौष्टिक होते हैं।
  6. जैविक फसलों की उत्पादन दरों में बहुत अधिक उच्चावचन नहीं होते।
  7. जैविक मिट्टी अधिकाधिक उर्वर होती जाती है।
  8. जैविक फसलोत्पाद अधिक पौष्टिक होते हैं। इनमें विटामिन्स के उच्च स्तर पाए जाते हैं।

हानि- जैविक कृषि की प्रमुख हानियाँ निम्नलिखित हैं
1. अजैविक कृषि की तुलना में जैविक कृषि एक महँगी प्रणाली है। इसमें प्रति हैक्टेयर लागत अधिक आती है।
2. यह अधिक श्रम गहन होती है।
3. इसमें पशु खाद का प्रयोग किया जाता है; जिसमें घातक जीवाणु पलते रहते हैं।
4. जैविक खेती के प्रति हेक्टेयर उत्पादन तुलनात्मक रूप से कम होता है।
5. नाशक जीव फसलों को शीघ्र नष्ट कर सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 1 Natural Vegetation

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 1
Chapter Name Natural Vegetation (प्राकृतिक वनस्पति)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 1 Natural Vegetation (प्राकृतिक वनस्पति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्राकृतिक वनस्पति से आप क्या समझते हैं? उसके प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
या
संसार में कोणधारी वनों का वितरण बताइए तथा उनकी आर्थिक उपयोगिता का वर्णन कीजिए। [2007]
या
विश्व के प्रमुख वन प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

प्राकृतिक वनस्पति Natural Vegetation

विश्व के प्रत्येक भाग में किसी-न-किसी प्रकार की वनस्पति अवश्य ही पायी जाती है, चाहे वह झाड़ियों या घास के रूप में हो अथवा सघन वनों के रूप में हो। ये सभी प्राकृतिक रूप से उगते हैं। वास्तव में यह प्रकृति द्वारा मानव को दिये गये अमूल्य उपहार हैं। भूतल पर पेड़-पौधे आदिकाल से ही उगते आ रहे हैं; अतः तभी से मानव का सम्बन्ध उनसे स्थापित हुआ है। मानव प्राचीन काल से ही इनका शोषण करतो आयो है।
प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार – सामान्यतया धरातल पर तीन प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं-

  1. वन,
  2. घास के मैदान तथा
  3. झाड़ियाँ।

उपर्युक्त तीनों में से वन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। विश्व के कुल क्षेत्रफल के 25,620 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर वनों का विस्तार है जिनमें से 59% पहुँच योग्य हैं, जिन्हें काटकर लकड़ियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। शेष वन मानव की पहुँच से बाहर हैं। ये वन रूस के भीतरी भागों, कनाडा, अलास्का, एशिया तथा दक्षिणी अमेरिका के अनेक भागों में विस्तृत हैं।

विश्व में वनों के प्रकार
Types of Forests in World

वनों को उनमें पाये जाने वाले वृक्षों एवं उनकी जातियों के आधार पर निम्नलिखित पाँच प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है –
(1) उष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले सदापर्णी वन (Tropical Evergreen Forests) – इन वनों का विस्तार विषुवत् रेखा के दोनों ओर 5°उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य है। उष्ण कटिबन्धीय भागों में अत्यधिक वर्षा एवं भीषण गर्मी पड़ने के कारण सघन वन आसानी से उग आते हैं। इन प्रदेशों में शीत एवं ग्रीष्म काल का तापान्तर बहुत ही कम होता है, जिससे वृक्षों में पतझड़ का कोई निश्चित समय नहीं होता।

इसी कारण वृक्षों में हर समय नयी पत्तियाँ निकलती रहती हैं जिससे इन्हें सदाबहार वन कहा जाता है। इनकी औसत ऊँचाई 60 से 100 मीटर तक होती है। इनके नीचे लताओं एवं झाड़ियों के फैले रहने के कारण सदैव अन्धकार छाया रहता है तथा सूर्य का प्रकाश भी धरातल तक नहीं पहुंच पाता जिससे यहाँ दलदल मिलती है। इन वनों की लकड़ी बड़ी कठोर होती है; अतः इन्हें काटने में भी बड़ी असुविधा रहती है। इन वनों के वृक्षों में आबनूस, महोगनी, बाँस, रोजवुड, लॉगवुड, रबड़, नारियल, केला, ग्रीन हार्ट, सागौन, सिनकोना, बेंत आदि मुख्य हैं।

वितरण – धरातल पर इन वनों का विस्तार 145 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है। इनमें से 54.5% दक्षिणी अमेरिका में, 20% अफ्रीका में, 18% एशिया में, 7.5% ऑस्ट्रेलिया में तथा अन्य देशों में पाये जाते हैं। ये वन विशेषतः अमेजन बेसिन, अफ्रीका के पश्चिमी भागों तथा दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों में मिलते हैं, जहाँ वर्ष भर तापमान काफी ऊँचे तथा वर्षा का औसत 200 सेमी से अधिक रहता है।

(2) उष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती के पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forests) – विश्व के जिन भागों में 100 से 200 सेमी वार्षिक वर्षा का औसत रहता है, वहाँ सदाबहार वनों के स्थान पर मानसूनी वनों की अधिकता पायी जाती है। इन वनों से बहुमूल्य लकड़ी प्राप्त होती है जो फर्नीचर एवं इमारती कार्यों में प्रयुक्त की जाती है। इन वनों के प्रसिद्ध वृक्ष सागवान, बॉस, साल, ताड़, चन्दन, शीशम, आम, जामुन, नारियल आदि हैं।

वितरण – इन प्रदेशों में इस प्रकार के वन भारत, उत्तरी म्यांमार, थाईलैण्ड, लाओस, उत्तरी वियतनाम, मध्य अमेरिकी देशों, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका, मलेशिया आदि देशों में मिलते हैं। इन वनों के वृक्ष की पत्तियाँ ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में गिर जाती हैं। केवल ग्रीष्म ऋतु में ही वर्षा होने के कारण विताने वाले वृक्ष उत्पन्न होते हैं जो वर्षा एवं शीत ऋतु में तो हरे रहते हैं, परन्तु ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ में भीतरी जल का विनाश रोकने के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।

(3) शीतोष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले शुष्क सदापर्णी वन (Temperate Deciduous Dry Forests) – ये वनं उत्तरी गोलार्द्ध में 30° से 45° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में 40°अक्षांश से सुदूर दक्षिण तक पाये जाते हैं। इस प्रदेश की वनस्पति को मुख्य रूप से दो कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है- शीत ऋतु में ठण्ड तथा ग्रीष्म ऋतु में जल का अभाव। इसी कारण केवल वसन्त ऋतु में ही यहाँ की वनस्पति भली-भाँति वृद्धि कर सकती है। ऐसा भूमध्यसागरीय जलवायु वाले प्रदेशों में होता है।

इन प्रदेशों में सदैव हरे-भरे रहने वाले वृक्ष मिलते हैं जो कम वर्षा तथा अनुपजाऊ मिट्टी के कारण कँटीली झाड़ियों में बदल गये हैं। यहाँ वृक्षों के हरे-भरे रहने का कारण शीतकाल की नमी का होना है जिससे इनकी पत्तियाँ झड़ नहीं पातीं। ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से बचने के लिए इन वृक्षों में कुछ विशेषताएँ होती हैं। इन वृक्षों की जड़े लम्बी, मोटी, तने मोटे और खुरदरी छाल वाले होते हैं जिनमें काफी जल भरा रहता है। इनकी पत्तियाँ मोटी, चिकनी तथा लसदार होती हैं जिससे इनका जल वाष्प बनकर नहीं उड़ने पाता। इन वनों के मुख्य वृक्षों में ओक, जैतून, अंजीर, पाइन, फर, साइप्रस, कॉरीगम, यूकेलिप्टस, चेस्टनट, लारेल, शहतूत, वालनट आदि हैं। यहाँ पर रस वाले फलदार वृक्षों में नींबू, नारंगी, अंगूर, अनार, नाशपाती, शहतूत आदि मुख्य हैं।

वितरण – पृथ्वी पर इस प्रकार के वनों का विस्तार 47 केरोड़ हेक्टेयर भूमि पर है, जिसमें से 47.5%एशिया महाद्वीप में, 14.1% उत्तरी अमेरिका में, 16.2% यूरोप में, 9.6% दक्षिणी अमेरिका में, 9.4% अफ्रीका में तथा 1.2% ऑस्ट्रेलिया में पाये जाते हैं। इन वनों का विस्तार चीन, जापान, कोरिया, मंचूरिया, पश्चिमोत्तर यूरोप, पश्चिमी कनाडा, पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के सेण्ट लॉरेंस प्रदेश में विशेष रूप से है।

(4) शीतोष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती वन (Temperate Deciduous Forests) – भूतल पर सामान्यतया ये वन शीत-प्रधान, सम-शीतोष्ण या पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु वाले प्रदेशों में उगते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनका विस्तार भीतरी महाद्वीपीय शुष्क भागों के पूर्व में 40°से 60° अक्षांश तथा दक्षिणी गोलार्द्ध के पूर्वी तटीय भागों में 35° अक्षांश से तथा पश्चिमी तटीय भागों में 40° अक्षांशों से सुदूर दक्षिण तक है।

ग्रीष्म ऋतु में साधारण गर्मी, शीत ऋतु में कठोर सर्दी तथा वर्ष भर अच्छी वर्षा के कारण कठोर लकड़ी वाले वृक्ष उगते हैं। इनकी पत्तियाँ कड़ी ठण्ड से बचने के लिए शीत ऋतु में झड़ जाती हैं। इनके मुख्य वृक्ष ओक, मैपिल, बीच, एल्म, हैमलॉक, अखरोट, चेस्टनट, पॉपलर, एश, चेरी, हिकोरी, बर्च आदि हैं। ये वृक्ष इमारती लकड़ियों के भण्डार माने जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में इन वनों को काटकर अबे कृषि की जाने लगी है।

वितरण – पृथ्वी पर इस प्रकार के वनों का विस्तार 47 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है, जिसमें से 47.5% एशिया महाद्वीप में, 14 1% उत्तरी अमेरिका में, 16.2% यूरोप में, 9.6% दक्षिणी अमेरिका में, 9.4% अफ्रीका में तथा 12% ऑस्ट्रेलिया में पाये जाते हैं। इन वनों का विस्तार चीन, जापान, कोरिया, मंचूरिया, पश्चिमोत्तर यूरोप, पश्चिमी कनांडा, पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के सेण्ट लॉरेंस प्रदेश में विशेष रूप से है।

(5) शीत कटिबन्धीय शंकुल सदापर्णी वन या टैगा वन (Temperate Coniferous Forests or Taiga Forests) – इन्हें टैगा या बोरियल वनों के नाम से जाना जाता है। एशिया महाद्वीप में इनकी दक्षिणी सीमा 55° उत्तरी अक्षांश है, जब कि उत्तरी पश्चिमी यूरोप में 60° उत्तरी अक्षांश तक है। उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के पूर्व में इन वनों की दक्षिणी सीमा 45° उत्तरी अक्षांश तक है, जब कि दक्षिणी गोलार्द्ध में ये वन अधिक नहीं मिलते हैं।
उत्तरी गोलार्द्ध में इन वनों का विस्तार शीतोष्ण कटिबन्ध के उत्तरी भागों में है। ग्रीष्म ऋतु में 10° सेग्रे तापमान तथा जल का अभाव वृक्षों की पत्तियों को नुकीली बना देता है जिससे पत्तियों के द्वारा वायु के साथ अधिक जल वाष्प बनकर नहीं उड़ पाता।

उपयोगिता – इन वनों में झाड़-झंखाड़ नहीं मिलते हैं। अत: इनका शोषण सरलता से किया जा सकता है। ये कोमल एवं उपयोगी होते हैं।
वितरण – इन वनों का विस्तार लगभग 106 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर है। इसमें से 30.5% उत्तरी अमेरिका में, 40% एशिया में, 215% यूरोप में, 5% दक्षिणी अमेरिका में तथा 3% अफ्रीका में हैं। ये वन मुख्यत: उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया के उत्तरी भागों में पाये जाते हैं। पूर्व सोवियत संघ में साइबेरिया के वनों को टैगा कहते हैं, जो बहुत बड़े क्षेत्र पर विस्तृत हैं।
इन वनों में चीड़, स्पूस, हेमलॉक, फर, लार्च, सीडर, साइप्रस आदि उपयोगी वृक्ष उगते हैं, जो वर्ष भर हरे-भरे रहते हैं। ये हिम्न, पाला एवं कठोर शीत को सहने में सक्षम होते हैं। हिमावरण के कारण इने वनों का पूर्ण शोषण नहीं हो पाया है।

कोणधारी वनों की आर्थिक उपयोगिता – कोणधारी वन आर्थिक दृष्टि से बहुत उपयोगी होते हैं। हिमावरण एवं कठोर शीत में उगने के पश्चात् भी प्रकृति ने इन वनों को आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण बनाया है। कोणधारी वनों का आर्थिक महत्त्व निम्नवत् है –

  1. उपयोगी मुलायम लकड़ी की प्राप्ति – कोणधारी वनों से उपयोगी तथा मुलायम लकड़ी प्राप्त होती है। इस लकड़ी से कागज की लुग्दी, पेटियाँ तथा अन्य फर्नीचर बनाये जाते हैं। दियासलाई बनाने का उद्योग भी इन्हीं वनों पर निर्भर है। उपयोगी लकड़ी की दृष्टि से ये वन प्राकृतिक वरदान हैं।
  2. उपयोगी पशुओं की उपलब्धि – इन वनों में लम्बे बाल और कोमल खाल वाले समूरधारी पशु पाये जाते हैं। ये समूरधारी पशु उपयोगी खाल प्रदान करते हैं। इस खाल से मानवोपयोगी वस्त्र तथा मूल्यवान वस्तुएँ बनायी जाती हैं।
  3. मांस की प्राप्ति – कोणधारी वनों में रहने वाले पशु, आखेटकों को स्वादिष्ट मांस उपलब्ध कराते हैं। मांस यहाँ के निवासियों के जीवन का आधार है। ये लोग इन पशुओं को मारकर उनका मांस बर्फ में दबा देते हैं तथा समय-समय पर इसे निकालकर अपनी उदर-पूर्ति करते रहते हैं।
  4. उद्योग-धन्धों का आधार – इने वनों से अनेक उद्योग-धन्धों को कच्चे माल प्राप्त होते हैं। ये वन कागज उद्योग, फर्नीचर तथा दियासलाई उद्योग को पर्याप्त मात्रा में लकड़ी प्रदान करते हैं, जब कि खाल के वस्त्र बनाने वाले उद्योग के लिए ये समूर वाली खाले प्रदान करते हैं। इस प्रकार कोणधारी वन अनेक उद्योगों को कच्चा माल जुटाकर उन्हें सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।

वनों का आर्थिक महत्त्व
Economic importance of Forests

वन प्रकृति प्रदत्त निःशुल्क उपहारों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। मानव का नाता वृक्षों से चिर-प्राचीन है। पं० जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, “उगता हुआ वृक्ष, प्रगतिशील राष्ट्र का प्रतीक होता है।” वृक्षों की उपयोगिता को के० एम० मुंशी ने निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया है, ”वृक्षों का अर्थ है-जल, जल का अर्थ है-रोटी और रोटी ही जीवन है।” मत्स्यपुराण में वृक्षों का महत्त्व इस प्रकार व्यक्त किया गया है, “एक पौधा रोपना दस गुणवान पुत्र उत्पन्न करने के समान है।”
वास्तव में वन किसी भी राष्ट्र की अमूल्य निधि होते हैं, जो मानव की तीनों प्राथमिक आवश्यकताओं-भोजन, वस्त्र एवं आवास की आपूर्ति करते हैं। वन राष्ट्र की समृद्धि की नींव हैं।

इनसे प्रति व्यक्ति आय एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। वन राष्ट्रीय सौन्दर्य में भी वृद्धि करते हैं। वर्तमान पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या का हल वनों द्वारा ही सम्भव है। वनों से ढकी भूमि तथा प्राकृतिक वनस्पति युक्त पर्वतीय ढाल बड़े ही रमणीक तथा सुरम्य प्रतीत होते हैं। वनों के आर्थिक महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –
(1) वनों के प्रत्यक्ष लाभ – इसके अन्तर्गत वनों के वे लाभ सम्मिलित हैं जिनका अनुभव हमें प्रत्यक्ष रूप से होता है। इसके अन्तर्गत वनों के आर्थिक लाभों को सम्मिलित किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. बहुमूल्ये लकड़ी की प्राप्ति –
    • फर्नीचर बनाने के लिए,
    • ईंधन के लिए,
    • व्यावसायिक उपभोग के लिए; जैसे-कागज, दियासलाई तथा पेटियाँ बनाने के लिए,
  2. विभिन्न उद्योग-धन्धों के लिए कच्चे मालों की प्राप्ति,
  3. पशुपालन एवं पशुचारण के लिए उत्तम चरागाह,
  4. फल-फूलों की प्राप्ति,
  5. वन्य पशुओं की प्राप्ति तथा उनका आखेट,
  6. जड़ी-बूटियों एवं ओषधियों की प्राप्ति,
  7. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि,
  8. राष्ट्रीय आय में वृद्धि,
  9. वनों से प्राप्त निर्यातक वस्तुओं द्वारा विदेशी मुद्रा का अर्जन।

(2) वनों के अप्रत्यक्ष लाभ – वनों से हमें निम्नलिखित अप्रत्यक्ष लाभ भी होते हैं –

  1. वर्षा कराने में सहायक,
  2. बाढ़ों की रोकथाम में सहायक,
  3. मरुस्थल के प्रसार पर रोक,
  4. मिट्टी का अपक्षय एवं अपरदन रोकने में सहायक,
  5. भूमिगत-जल का स्तर ऊँचा बनाये रखने में सहायक,
  6. वायुमण्डल को प्रदूषण मुक्त करने में सहायक,
  7. प्राकृतिक सौन्दर्य का भण्डार,
  8. कृषि-कार्यों में सहायक,
  9. वन्य पशु-पक्षियों को आश्रय स्थल,
  10. वायुमण्डल की आर्द्रता में वृद्धि तथा
  11. पारिस्थितिक तन्त्र को सन्तुलित बनाये रखना।

प्रश्न 2
जीव-जन्तुओं, वनस्पति एवं जलवायु के पारस्परिक सम्बन्धों की समीक्षा कीजिए।
या
वनस्पति पर जलवायु कारकों के प्रभाव की विवेचना कीजिए। [2012, 15]
या
जलवायु तथा वनस्पति के जीव-जन्तुओं से सह-सम्बन्ध की सोदाहरण विवेचना कीजिए। [2012, 13]
उत्तर
पृथ्वी पर जलवायु एकमात्र ऐसा तत्त्व है जिसके व्यापक प्रभाव से पेड़-पौधों से लेकर छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े तथा हाथी जैसे विशालकाय पशु भी नहीं बच पाते। जलवायु का जीव पर समग्र प्रभाव पारिस्थितिकी तन्त्र कहलाता है। पारिस्थितिकी तन्त्र जैव जगत् के जैवीय सम्मिश्रण का ही दूसरा नाम है। ओडम के शब्दों में, “पारिस्थितिकी तन्त्र पौधों और पशुओं की परस्पर क्रिया करती हुई वह इकाई है जिसके द्वारा ऊर्जा का मिट्टियों से पौधों और पशुओं तक प्रवाह होता है तथा इस तन्त्र के जैव व अजैव तत्त्वों में पदार्थों का विनिमय होता है।”

हम जानते हैं कि प्रत्येक जीवोम अपने पारिस्थितिकी तन्त्र का परिणाम होता है। सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक जैव विकास की एक लम्बी कहानी है। सृष्टि के प्रारम्भ में जो जीवधारी उत्पन्न हुए प्राकृतिक पर्यावरण के साथ-साथ उनका स्वरूप भी बदलता गया। रीढ़विहीन प्राणी बाद में रीढ़ वाले प्राणी के रूप में विकसित हुए। डायनासोर से लेकर वर्तमान ऊँट और जिराफ तक सभी प्राणी जलवायु दशाओं के ही परिणाम हैं।

वनस्पति जगत् के जीवन-वृत्त में झाँकने से स्पष्ट हो जाता है कि अब तक पेड़-पौधे जलवायु दशाओं के फलस्वरूप नया आकार, प्रकारे और कलेवर धारण करते रहे हैं। काई से लेकर विशाल वृक्षों के निर्माण में लम्बा युग बीता है।

आइए निरीक्षण करें कि पेड़-पौधे और जीव-जन्तु जलवायु के साथ किस प्रकार के सह-सम्बन्ध बनाये हुए हैं –
(1) वनस्पति पर जलवायु को प्रभाव अथवा पेड़ – पौधों और जलवायु का सह-सम्बन्ध – प्राकृतिक वनस्पति अपने विशिष्ट पर्यावरण की देन होती है। यही कारण है कि पेड़-पौधों और जलवायु के मध्य सम्बन्धों की प्रगाढ़ता पायी जाती है। विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों का पाया जाना यह स्पष्ट करता हैं कि जलवायु और वनस्पति का अटूट सम्बन्ध है। टुण्ड्रा प्रदेश में कठोर शीत, तुषार और हिमावरण के कारण वृक्ष कोणधारी होते हैं। ढालू वृक्षों पर हिमपात का कोई प्रभाव नहीं होता। इन प्रदेशों में स्थायी तुषार रेखा पायी जाने तथा भूमि में वाष्पीकरण कम होने के कारण पेड़-पौधों का विकास कम होता है। टुण्ड्रा और टैगा प्रदेशों में वृक्ष बहुत धीरे-धीरे बढ़ते हैं। इनकी लकड़ी मुलायम होती है।

उष्ण मरुस्थलीय भागों में वर्षा की कमी तथा उष्णता के कारण वृक्ष छोटे-छोटे तथा काँटेदार होते हैं। वृक्षों की छाल मोटी तथा पत्तियाँ छोटी-छोटी होती हैं। अनुपजाऊ भूमि तथा कठोर जलवायु दशाएँ वृक्षों के विकास में बाधक बन जाती हैं।
मानसूनी प्रदेशों में वृक्ष ग्रीष्म ऋतु की शुष्कता से बचने के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। वर्षा ऋतु में यहाँ वृक्षों का विकास सर्वाधिक होता है।
भूमध्यसागरीय प्रदेशों में जाड़ों में वर्षा होती है; अतः वृक्ष लम्बी गाँठदार जड़ों में जल एकत्र करके ग्रीष्म की शुष्कता से अपना बचाव कर लेते हैं। जाड़ों की गुलाबी धूप तथा हल्की ठण्ड ने यहाँ रसदार फलों के उत्पादन में बहुत सहयोग दिया है।
घास बहुल क्षेत्रों में वर्षा की कमी के कारण वृक्ष नहीं उगते। यहाँ लम्बी-लम्बी हरी घास उगती है। घास ही यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति होती है।
भूमध्यरेखीय प्रदेशों में अधिक गर्मी तथा अधिक वर्षा के कारण घने तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्ष उगते हैं। इन वृक्षों को काटना सुविधाजनक नहीं है। वृक्षों के नीचे छोटे वृक्ष तथा लताएँ उगती हैं। ये वृक्ष सदाबहार होते हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में ऊँचाई के साथ जलवायु में बदलाव आने के साथ ही वनस्पति के प्रकार एवं स्वरूप में भी अन्तर उत्पन्न होता जाता है। उच्च अक्षांशों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ बर्फ पड़ती है, वहाँ नुकीली पत्ती वाले कोणधारी वन पाये जाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी स्थान की जलवायु ही वहाँ की वनस्पति की नियन्त्रक होती है। इसके विपरीत जलवायु पर वनस्पति जगत् का प्रभाव भी पड़ता है। वनस्पति जलवायु को स्वच्छ करती है। पेड़-पौधे भाप से भरी पवनों को आकर्षित कर वर्षा कराते हैं। वृक्ष वायुमण्डल में नमी छोड़कर जलवायु को नम रखते हैं। वृक्ष पर्यावरण के प्रदूषण को रोककर जलवायु के अस्तित्व को बनाये रखते हैं। इस प्रकार पेड़-पौधे तथा जलवायु का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहाँ पेड़-पौधे जलवायु को प्रभावित करते हैं, वहीं जलवायु पेड़-पौधों पर अपनी अमिट छाप छोड़ती है।

(2) जीव-जन्तुओं और जलवायु का सह-सम्बन्ध – किसी भी स्थान के जैविक तन्त्र की रचना जलवायु के द्वारा ही होती है। जीव-जगत् जलवायु पर उतना ही निर्भर करता है जितना वनस्पति जगत्। जीव-जन्तुओं के आकार, प्रकार, रंग-रूप, भोजन तथा आदतों के निर्माण में जलवायु सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
टुण्ड्रा और टैगी प्रदेश में शीत-प्रधान जलवायु के कारण ही समूरधारी जानवर उत्पन्न होते हैं। प्रकृति द्वारा दिये गये उनके लम्बे तथा मुलायम बाल ही उन्हें हिमपात तथा कठोर शीत से बचाते हैं। ये पशु इस क्षेत्र के पौधों के पत्ते खाकर जीवित रहते हैं। रेण्डियर, श्वेत ‘भालू तथा मिन्क इस क्षेत्र की जलवायु की ही देन हैं।

उष्ण मरुस्थलीय क्षेत्रों में ऊँट तथा भेड़-बकरियाँ ही पनप पाती हैं। ये पशु शुष्क जलवायु में रह सकते हैं। ऊँट रेगिस्तान का जहाज कहलाता है। ये सभी पशु मरुस्थलीय क्षेत्रों में उगी वनस्पतियों के पत्ते खाकर जीवित रहते हैं। ऊँची-ऊँची झाड़ियों के पत्ते खाने में भी ऊँट सक्षम है। मरुस्थलीय प्रदेशों में दूरदूर तक पेड़-पौधों तथा जल के दर्शन तक नहीं होते। यही कारण है कि यहाँ का मुख्य पशु ऊँट बगैर कुछ खाये-पिये. हफ्तों तक जीवित रह सकता है। इन क्षेत्रों के जीवों को पानी की कम आवश्यकता होती है।
मानसूनी प्रदेश के वनों में शाकाहारी तथा मांसाहारी पशुओं की प्रधानता है। शाकाहारी पशु वृक्षों के पत्ते खाकर तथा मांसाहारी पशु शाकाहारी पशुओं को खाकर जीवित रहते हैं।

घास बहुल क्षेत्रों में घास खाने वाले पशु ही अधिक विकसित हो पाते हैं। जेबरां तथा जिराफ सवाना तुल्य जलवायु के मुख्य पशु हैं। जिराफ ऊँची-से-ऊँचीं डाल की पत्तियाँ खाने का प्रयास करता है; अतः उसकी गर्दन लम्बी हो जाती है।
विषुवतेरेखीय प्रदेश की उष्ण एवं नम जलवायु में मांसाहारी पशुओं से लेकर वृक्षों की शाखाओं पर रहने वाले बन्दर, गिलहरी तथा साँप एवं जल में पाये जाने वाले मगरमच्छ तथा दरियाई घोड़े पाये जाते हैं। उष्ण जलवायु ने यहाँ के मक्खी और मच्छरों को विषैला बना दिया है।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि किसी भी स्थान पर पाये जाने वाले जीव-जन्तु उस स्थान की जलवायु का परिणाम हैं। जलवायु का प्रभाव जीव-जन्तुओं के आकार, रंग-रूप, भोजन, स्वभाव आदि सभी गुणों पर देखने को मिलती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जैवमण्डल का अर्थ एवं उसके मुख्य तत्त्व बताइए। [2009, 16]
उत्तर
जैवमण्डल का अर्थ जैवमण्डल में पृथ्वी के निकट का वह कटिबन्ध सम्मिलित है जो किसी-न-किसी रूप में जैव विकास के लिए अनुकूल पड़ता है। इसका निर्माण स्थलमण्डल, जलमण्डल और वायुमण्डल तीनों के सम्पर्क क्षेत्र से होता है। इन तीनों के संयोग से ऐसा पर्यावरण बन जाता है जो वनस्पति जगत, जीव-जन्तु और मानव शरीर के विकास के लिए अनुकूल दशाएँ प्रदान करता है। पृथ्वी तेल के निकट स्थित यह क्षेत्र ही जैवमण्डल (Biosphere) कहलाता है। विद्वानों ने जैवमण्डल को तीन पर्यावरणीय उपविभागों में बाँटा है-

  1. महासागरीय,
  2. ताजे जल एवं
  3. स्थलीय जैवमण्डल।

इनमें स्थलीय जैवमण्डल अधिक महत्त्वपूर्ण है।
जैवमण्डल के तत्त्व जैवमण्डल के तीन प्रमुख तत्त्व हैं-

  1. वनस्पति के विविध प्रकार,
  2. जन्तुओं के विविध प्रकार,
  3. मानव समूह।

वनस्पति – जगत में समुद्री पेड़-पौधों से लेकर पर्वतों की उच्च श्रेणियों तक पाए जाने वाले वनस्पति के विविध प्रकार सम्मिलित हैं। जन्तु-जगत में समुद्रों में पाए जाने वाले विविध जीव, मिट्टियों को बनाने वाले बैक्टीरिया और स्थल पर पाए जाने वाले विविध जीव-जन्तु सम्मिलित हैं। जैवमण्डल के तत्त्व-वायु, जल, सूर्य के प्रकाश और मिट्टियों पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं। जैवमण्डल के तत्त्वों में परस्पर गहरा सम्बन्ध होता है। किसी तत्त्व में कमी या अवरोध उत्पन्न होने पर जैवमण्डल पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 2
वनों के संरक्षण से आप क्या समझते हैं? [2016]
उत्तर
वन किसी भी देश की अमूल्य सम्पदा होते हैं। ये प्राकृतिक संसाधन ही नहीं, भौगोलिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। वनों को जलवायु का नियन्त्रक’ कहा जाता है। ये तापमानों की वृद्धि रोकते हैं तथा वर्षा कराने में उपयोगी होते हैं। ये बाढ़ों की आवृत्ति तथा भूमि अपरदन को भी रोकते हैं। वनों में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु रहते हैं जो पारिस्थितिकीय सन्तुलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही नहीं, वनों में अनेक मानवे वर्ग (जनजातियाँ) भी निवास करते हैं। इन सब कारणों से वन बहुत उपयोगी हैं।

इनके विनाश को रोकना अनिवार्य है। विभिन्न देश वनों के संरक्षण के अनेक उपाय अपनाते हैं, जिनमें-अतिशय कटाई । पर नियन्त्रण, वैज्ञानिक विधि से लकड़ी काटना, वनों का वैज्ञानिक प्रबन्धन, वन-रोपण आदि प्रमुख उपाय हैं। वनों के संरक्षण के लिए विभिन्न देश अनेक कार्यक्रम अपनाते हैं। विश्व के प्राय: सभी देशों में वर्ष के किसी-न-किसी दिन या सप्ताह में वृक्षारोपण उत्सव (वन महोत्सव) मनाया जाता है। संयुक्त राज्य, फिलीपीन्स तथा कम्बोडिया में ‘ArborDay’, जापान में ‘Green Week’, इजराइल में ‘NewYear’s Day of Tree’, आइसलैण्ड में ‘Student’s Afforestation Day’ तथा भारत में ‘वन महोत्सव मनाया जाता है। देशों के स्तर पर ही नहीं अपितु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी वनों का संरक्षण एक चिन्तनीय विषय है।

प्रश्न 3
वनों से होने वाले प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभ बताइए। [2011, 15, 16]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 के अन्तर्गत ‘वनों का आर्थिक महत्त्व’ शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जैवमण्डल को परिभाषित कीजिए। [2008, 09, 10, 11, 16]
उत्तर
जैवमण्डल धरातल से ऊपर कुछ ऊँचाई तक तथा समुद्रों, महासागरों एवं अन्य जलराशियों में कुछ गहराई तक विस्तृत वह संकीर्ण परत है जिसमें समस्त प्रकार का जीवन (वनस्पति, जीव-जन्तु, प्राणी, मानव, कीड़े-मकोड़े, पक्षी आदि) पाया जाता है।

प्रश्न 2
विश्व में वनों के विस्तार का कुल क्षेत्रफल कितना है और उसमें से कितना मनुष्य की पहुँच के योग्य है?
उत्तर
विश्व में वनों के विस्तार का कुल क्षेत्रफल 25,620 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से 59% मनुष्य की पहुँच के योग्य है।

प्रश्न 3
वनस्पति को प्रभावित करने वाले मुख्य घटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर
वनस्पति को प्रभावित करने वाले मुख्य घटक हैं-

  1. तापमान
  2. जल-पूर्ति
  3. प्रकाश
  4. पवन और
  5. मिट्टी।

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प्रश्न 4
दक्षिण अमेरिका के दो घास के मैदानों के नाम लिखिए।
उत्तर
दक्षिण अमेरिका के दो घास के मैदानों के नाम हैं-

  1. मानोज एवं
  2. सवाना।

प्रश्न 5
पृथ्वी पर ऐसा कौन-सा तत्त्व है जिसके प्रभाव से कोई नहीं बच सकता?
उत्तर
पृथ्वी पर जलवायु एकमात्र ऐसा तत्त्व है जिसके व्यापक प्रभाव से पेड़-पौधे से लेकर : छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े तथा हाथी जैसे विशालकाय पशु भी नहीं बच पाते।

प्रश्न 6
प्राकृतिक वनस्पति के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्राकृतिक वनस्पति तीन प्रकार की होती हैं-

  1. वन
  2. घास के मैदान तथा
  3. झाड़ियाँ।

प्रश्न 7
भूमध्यरेखीय प्रदेशों में घने तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्ष क्यों उगते हैं तथा इन वृक्षों की क्या विशेषता होती है?
उत्तर
भूमध्यरेखीय प्रदेशों में अधिक गर्मी तथा अधिक वर्षा के कारण घने तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्ष उगते हैं। ये वृक्ष सदाबहार होते हैं।

प्रश्न 8
मानसूनी प्रदेशों में वृक्ष अपनी पत्तियाँ क्यों गिरा देते हैं? इनका विकास किस ऋतु में सर्वाधिक होता है?
उत्तर
मानसूनी प्रदेशों में वृक्ष ग्रीष्म ऋतु की शुष्कता से बचने के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। वर्षा ऋतु में इनका विकास सर्वाधिक होता है।

प्रश्न 9
सवाना तुल्य. जलवायु के मुख्य पशु कौन-से हैं?
उत्तर
सवाना तुल्य जलवायु के मुख्य पशु हैं—जेबरा तथा जिराफ।

प्रश्न 10
सिनकोना का महत्त्व लिखिए। यह कहाँ पाया जाता है?
उत्तर
सिनकोना नामक वृक्ष की छाल से कुनैन बनाया जाता है। यह वृक्ष 200 सेमी से 300 सेमी वर्षा वाले भागों में भारत, श्रीलंका, मैलागासी और जावा में पाया जाता है।

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प्रश्न 11
वन-संरक्षण हेतु कोई दो उपाय सुझाइए। [2013, 14]
उत्तर

  1. व्यापक वृक्षारोपण और सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के द्वारा वन और वृक्ष के आच्छादन में महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी की जाए।
  2. वन उत्पादों के उचित उपयोग को बढ़ावा देना और लकड़ी के अनुकूलतम विकल्पों की खोज की जाए।

प्रश्न 12
शंकुल सदापर्णी वनों के प्रमुख वृक्षों के नाम लिखिए।
उत्तर
शंकुल सदापर्णी वनों के प्रमुख वृक्षों के नाम हैं-चीड़, स्पूहै, हैमलॉक, लार्च, सीडर, फर, साइप्रस आदि।

प्रश्न 13
चिपको आन्दोलन का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
भारत में वनों की अन्धाधुन्ध कटाई को रोकने के लिए उत्तराखण्ड में श्री सुन्दरलाल बहुगुणा द्वारा चिपको आन्दोलन वनों की सुरक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

प्रश्न 14
वन-विनाश के किन्हीं दो कारणों की विवेचना कीजिए। [2012]
या
वनों का संरक्षण क्यों आवश्यक हो गया है? दो कारण बताइए [2016]
उत्तर

  1. जनसंख्या वृद्धि के कारण भूमि की बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिए वनों का अधिक मात्रा में काटा जाना।
  2. प्राकृतिक कारणों, जैसे भूस्खलन एवं वृक्षों को परस्पर घर्षण से वनाग्नि के कारण वनों का विनाश होना।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
जैव-प्रदूषण समस्या का कारण है –
(क) झूमिंग कृषि
(ख) वनों का कटान
(ग) जलीय जीवों का संहार
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी।

प्रश्न 2
सामान्यतया धरातल पर प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती है –
(क) वनों के रूप में
(ख) घास के रूप में
(ग) झाड़ियों के रूप में
(घ) इन सभी रूपों में
उत्तर
(घ) इन सभी रूपों में।

प्रश्न 3
प्रेयरी घास के मैदान निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में पाये जाते हैं? [2007]
(क) दक्षिणी अमेरिका
(ख) उत्तरी अमेरिका
(ग) अफ्रीका
(घ) यूरोप
उत्तर
(ख) उत्तरी अमेरिका।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 1 Natural Vegetation

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से किस जलवायु प्रदेश में कोणधारी वन पाए जाते हैं ? [2008, 10]
(क) मानसून
(ख) भूमध्यसागरीय
(ग) भूमध्यरेखीय
(घ) टेगा
उत्तर
(घ) टैगा।

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से पतझड़ वन किस जलवायु प्रदेश में पाये जाते हैं –
(क) भूमध्यरेखीय जलवायु प्रदेश
(ख) टैगा जलवायु प्रदेश
(ग) टुण्ड्रा जलवायु प्रदेश :
(घ) मानसूनी जलवायु प्रदेश
उत्तर
(घ) मानसूनी जलवायु प्रदेश।

प्रश्न 6
सदाबहार वन निम्नलिखित में से किस प्रदेश में पाये जाते हैं?
(क) भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश
(ख) विषुवत्रेखीय जलवायु प्रदेश
(ग) रेगिस्तानी जलवायु प्रदेश
(घ) टैगा जलवायु प्रदेश
उत्तर
(ख) विषुवत्रेखीय जलवायु प्रदेश।

प्रश्न 7
लानोज घास के मैदान निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में पाये जाते हैं? [2009]
(क) अफ्रीका
(ख) दक्षिणी अमेरिका
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) उत्तरी अमेरिका
उत्तर
(ख) दक्षिणी अमेरिका।

प्रश्न 8
वेल्ड्स घास के मैदान कहाँ पाए जाते हैं? [2013, 14, 15]
(क) ब्राजील में
(ख) दक्षिण अमेरिका में
(ग) ऑस्ट्रेलिया में
(घ) मध्य एशिया में
उत्तर
(ख) दक्षिण अमेरिका में

प्रश्न 9
सवाना घास के मैदान कहाँ पाए जाते हैं? [2015, 16]
(क) अमेजन बेसिन में
(ख) सूडान में
(ग) मध्य एशिया में
(घ) टैगा प्रदेश में
उत्तर
(ख) सूडान में

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 4 भाषा और आधुनिकता

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 4 भाषा और आधुनिकता (जी० सुन्दर रेड्डी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 4 भाषा और आधुनिकता (जी० सुन्दर रेड्डी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name भाषा और आधुनिकता (जी० सुन्दर रेड्डी)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 4 भाषा और आधुनिकता (जी० सुन्दर रेड्डी)

लेखक का साहित्यिक परिवय और कृतिया

प्रश्न 1.
जी० सुन्दर रेड्डी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2010]
या
प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं (कृतियों) का उल्लेख कीजिए। [2016, 17]
उत्तर
जीवन-परिचय–प्रोफेसर रेड्डी का जन्म आन्ध्र प्रदेश में सन् 1919 ई० में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा यद्यपि संस्कृत और तेलुगू में हुई, लेकिन ये हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान् हैं। 30 वर्षों से भी अधिक समय तक ये आन्ध्र विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। ये वहाँ के स्नातकोत्तर अध्ययन एवं अनुसन्धान विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर भी रहे। इनके निर्देशन में हिन्दी और तेलुगू साहित्यों के विविध पक्षों के तुलनात्मक अध्ययन पर पर्याप्त शोधकार्य हुए हैं। साहित्यिक योगदान–जी० सुन्दर रेड्डी ने दक्षिण भारत की चारों भाषाओं तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम तथा उनके साहित्य का इतिहास प्रस्तुत करते हुए उनकी आधुनिक गतिविधियों को सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया है। इनके साहित्य में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है। तेलुगूभाषी होते हुए भी हिन्दी-भाषा में रचना करके इन्होंने एक श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है। ऐसा करके आपने दक्षिण भारतीयों को हिन्दी और उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारतीय भाषाओं के अध्ययन की प्रेरणा दी है। आपके निबन्ध हिन्दी, तेलुगू और अंग्रेजी भाषा की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। भाषा की समस्याओं पर अनेक विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है, किन्तु भाषा और आधुनिकता पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने वालों में प्रोफेसर रेड्डी सर्वप्रमुख हैं।

रचनाएँ-अब तक प्रोफेसर रेड्डी के कुल 8 ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं(1) साहित्य और समाज, (2) मेरे विचार, (3) हिन्दी और तेलुगू : एक तुलनात्मक अध्ययन, (4) दक्षिण की भाषाएँ और उनका साहित्य, (5) वैचारिकी, (6) शोध और बोध, (7) तेलुगू वारुल (तेलुगू ग्रन्थ), (8) लैंग्वेज प्रॉब्लम इन इण्डिया (सम्पादित अंग्रेजी ग्रन्थ)।

साहित्य में स्थान-प्रोफेसर रेड्डी एक श्रेष्ठ विचारक, समालोचक और निबन्धकार हैं। अहिन्दी भाषी प्रदेश के निवासी होते हुए भी हिन्दी भाषा के ये प्रकाण्ड विद्वान् हैं। शोधकार्य एवं तुलनात्मक अध्ययन इनके प्रमुख विषय हैं। अहिन्दी क्षेत्र में आपका हिन्दी-रचना कार्य, हिन्दी-साहित्य के लिए वरदानस्वरूप है। गैर हिन्दी भाषी होते हुए भी प्रो० रेड्डी हिन्दी-साहित्य में एक आदर्श उदाहरण बने हुए हैं।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
भाषा स्वयं संस्कृति का एक अटूट अंग है। संस्कृति परम्परा से नि:सृत होने पर भी, परिवर्तनशील और गतिशील है। उसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रभाव के कारण उद्भूत नयी सांस्कृतिक हलचलों को शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा के परम्परागत प्रयोग पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए नये प्रयोगों की, नयी भाव-योजनाओं को व्यक्त करने के लिए नये शब्दों की खोज की महती आवश्यकता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत अवतरण के माध्यम से लेखक ने किस बात पर बल दिया है?
(iv) संस्कृति का एक अटूट अंग क्या है?
(v) किसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा श्रेष्ठ विचारक वे निबन्धकार जी० सुन्दर रेड्डी द्वारा लिखित ‘भाषा और आधुनिकता’ शीर्षक शोधपरक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- भाषा और आधुनिकता।
लेखक का नाम-प्रो०जी० सुन्दर रेड्डी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-भाषा में जो प्रयोग प्राचीनकाल से चले आ रहे हैं, वे नये सांस्कृतिक परिवर्तनों को व्यक्त करने में समर्थ नहीं हैं। नित्यप्रति संस्कृति में हुए परिवर्तनों को भाषा द्वारा व्यक्त करने के लिए भाषा में नये-नये प्रयोगों, नये-नये शब्दों की खोज का कार्य होना बहुत आवश्यक है, जिससे बदलते हुए नये भावों को उचित रूप से व्यक्त किया जा सके।
(iii) प्रस्तुत गद्यावतरण में लेखक ने विज्ञान की प्रगति के कारण जो सांस्कृतिक परिवर्तन होता है, उसे शब्दों द्वारा व्यक्त करने के लिए भाषा में नये प्रयोगों की आवश्यकता पर बल दिया है।
(iv) संस्कृति का एक अटूट अंग भाषा है।।
(v) संस्कृति की गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है।

प्रश्न 2.
विज्ञान की प्रगति के कारण नयी चीजों का निरंतर आविष्कार होता रहता है। जब कभी नया आविष्कार होता है, उसे एक नयी संज्ञा दी जाती है। जिस देश में उसकी सृष्टि की जाती है वह देश उस आविष्कार के नामकरण के लिए नया शब्द बनाता है; वही शब्द प्रायः अन्य देशों में बिना परिवर्तन के वैसे ही प्रयुक्त किया जाता है। यदि हर देश उस चीज के लिए अपना-अपना अलग नाम देता रहेगा, तो उस चीज को समझने में ही दिक्कत होगी। जैसे रेडियो, टेलीविजन, स्पुतनिक।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कौन-सा देश किसी आविष्कृत चीज के नामकरण के लिए नया शब्द देता है?
(iv) यदि हर देश आविष्कृत चीजों को अपना-अपना अलग नाम देता रहे तो क्या होगा?
(v) नई चीजों के आविष्कार होने का क्या कारण है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा श्रेष्ठ विचारक वे निबन्धकार जी० सुन्दर रेड्डी द्वारा लिखित ‘भाषा और आधुनिकता’ शीर्षक शोधपरक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- भाषा और आधुनिकता।।
लेखक का नाम-प्रो०जी० सुन्दर रेड्डी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि यदि कोई विदेशी शब्द अपने भाव का सम्प्रेषण करने में सक्षम है तो उसमें परिवर्तन नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए-आज प्रत्येक देश में विज्ञान के क्षेत्र में भिन्न-भिन्न आविष्कार हो रहे हैं और उन्हें नये-नये नाम दिये जा रहे हैं। प्रत्येक देश अपने द्वारा आविष्कृत वस्तु का अपनी भाषा के अनुसार नामकरण कर रहा है और दूसरे देशों में भी वही नाम प्रचलित होता जा रहा है।
(iii) जिस देश में किसी चीज की सृष्टि की जाती है वही देश उस आविष्कृत चीज के नामकरण के लिए नया शब्द देता है।
(iv) यदि हर देश आविष्कृत चीजों को अपना-अपना अलग नाम देता रहे तो उस चीज को समझने में दिक्कत होगी।
(v) नई चीजों के आविष्कार होने का कारण विज्ञान की प्रगति है।

प्रश्न 3.
नये शब्द, नये मुहावरे एवं नयी रीतियों के प्रयोगों से युक्त भाषा को व्यावहारिकता प्रदान करना ही भाषा में आधुनिकता लाना है। दूसरे शब्दों में केवल आधुनिक-युगीन विचारधाराओं के अनुरूप नये शब्दों के गढ़ने मात्र से ही भाषा का विकास नहीं होता; वरन् नये पारिभाषिक शब्दों को एवं नूतन शैली-प्रणालियों
को व्यवहार में लाना ही भाषा को आधुनिकता प्रदान करना है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसके गढ़ने मात्र से भाषा का विकास नहीं होता?
(iv) किन चीजों को व्यवहार में लाना ही भाषा को आधुनिकता प्रदान करना है?
(v) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक ने कौन-सी बात बताई है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा श्रेष्ठ विचारक व निबन्धकार जी० सुन्दर रेड्डी द्वारा लिखित ‘भाषा और आधुनिकता’ शीर्षक शोधपरक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम – भाषा और आधुनिकता।
लेखक का नाम – प्रो०जी० सुन्दर रेड्डी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-किसी भाषा में आधुनिकता का समावेश तभी हो सकता है, जब उसमें नये-नये जनप्रचलित शब्दों, मुहावरों तथा लोकोक्तियों को समाहित कर लिया जाए। इन बातों के समावेश से भाषा व्यावहारिक हो जाती है।
(iii) आधुनिक युगीन विचारधाराओं के अनुरूप नये शब्दों के गढ़ने मात्र से भाषा का विकास नहीं होता।
(iv) नये पारिभाषिक शब्दों को एवं नूतन शैली प्रणालियों को व्यवहार में लाना ही भाषा को आधुनिकता प्रदान करना है।
(v) उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने भाषा को आधुनिक बनाने के उपाय बताए हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)

प्रश्न 1:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में बताइए।
या
‘आलोकवृत्त की कथावस्तु (कथानक) पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ का कौन-सा सर्ग आपको सर्वोत्तम प्रतीत होता है और क्यों ? सोदाहरण समझाइए।
या
‘आलोकवृत्त’ के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त के आधार पर महात्मा गांधी के जीवनवृत्त की किसी प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर सन् 1942 ई० की जनक्रान्ति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ काव्य में वर्णित स्वतन्त्रता-प्राप्ति की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के तृतीय सर्ग के आधार पर गांधी जी के अफ्रीका-प्रवास के जीवन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग के आधार पर गांधी जी का जीवन-परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर स्वाधीनता की ऐतिहासिक यात्रा की संक्षिप्त समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर देश के स्वतन्त्रता संग्राम में गांधी जी के योगदान का वर्णन कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य आधुनिक भारत के महान संघर्ष का जीता-जागता सच्चा इतिहास है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की पंचम एवं षष्ठ सर्ग की कथा पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“आलोकवृत्त’ के कथानक में आठ सर्ग हैं, जिनकी कथावस्तु संक्षेप में निम्नलिखित है

प्रथम सर्ग : भारत का स्वर्णिम अतीत

प्रथम सर्ग में कवि ने भारत के अतीत के गौरव तथा तत्कालीन पराधीनता का वर्णन किया है। कवि ने बताया है। कि भारत वेदों की भूमि रही है। भारतवर्ष ने ही संसार को सर्वप्रथम ज्ञान की ज्योति दी थी, किन्तु दुर्भाग्यवश एक समय ऐसा आया कि भारतवासी यह भूल गये कि हम कितने गौरवमण्डित थे ? इसका परिणाम यह हुआ कि भारतवर्ष सैंकड़ों वर्ष तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। सन् 1857 ई० की क्रान्ति के पश्चात् गुजरात के ‘पोरबन्दर’ नामक स्थान पर एक दिव्य ज्योतिर्मय विभूति मोहनदास करमचन्द गांधी के रूप में प्रकट हुई, जिसने हमें विदेशियों की दासता से मुक्त करवाया।

द्वितीय सर्ग : गांधी जी का प्रारम्भिक जीवन

द्वितीय सर्ग में गांधी जी के जीवन के क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला गया है। वे बचपन में कुसंगति में फैंस गये थे, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने पिता के समक्ष अपनी त्रुटियों पर पश्चात्ताप किया और दुर्गुणों को सदैव के लिए छोड़ने की प्रतिज्ञा की और आजीवन उसका निर्वाह किया। इसके बाद कस्तूरबा के साथ गांधी जी का विवाह हुआ। इसके कुछ समय बाद उनके पिताजी का देहान्त हो गया। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड गये। उनकी माँ ने विदेश में रहकर मांस-मदिरा का प्रयोग न करने के लिए समझाया

मद्य-मांस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर।
माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल तिलक लगाकर।।

इंग्लैण्ड में सात्त्विक जीवन व्यतीत करते हुए भी वे एक दिन एक कलुषित स्थान पर पहुँच गये, लेकिन उन्होंने अपने चरित्र को कलुषित होने से बचा लिया। वहाँ से वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत आने पर उन्हें उनकी माता के देहान्त का दुःखद समाचार मिला। यहीं पर द्वितीय सर्ग की कथा समाप्त हो जाती है।

तृतीय सर्ग : गांधी जी का अफ्रीका-प्रवास

तृतीय सर्ग में गांधी जी के अफ्रीका में निवास का वर्णन है। एक बार रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक गोरे अंग्रेज ने उन्हें काला होने के कारण अपमानित करके रेलगाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस कुटिल नीति से गांधी जी के हृदय को बहुत दु:ख पहुँचा। वे भारतीयों की दुर्दशा से चिन्तित हो उठे। यहाँ पर कवि ने गांधी जी के मन में उत्पन्न अन्तर्द्वन्द्व का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का सहारा लेकर असत्य और हिंसा का सामना करने का दृढ़ निश्चय किया। अपनी जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर उन्होंने मानवता के उद्धार का प्रण लिया

पशु-बल के सम्मुख आत्मा की शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की आग बुझानी होगी।

सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया। दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष-समाप्ति के साथ ही तृतीय सर्ग समाप्त हो जाता है।

चतुर्थ सर्ग : गांधी जी का भारत आगमन

चतुर्थ सर्ग में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आते हैं। भारत आकर गांधी जी ने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। उन्होंने साबरमती नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया। अनेक लोग गांधी जी के अनुयायी हो गये, जिनमें डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, ‘राजगोपालाचारी’, सरोजिनी नायडू, ‘दीनबन्धु’, मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस आदि प्रमुख थे। अंग्रेज देश की जनता पर भारी अत्याचार कर रहे थे। गांधी जी ने चम्पारन में नील की खेती को लेकर आन्दोलन आरम्भ किया; जिसमें वे सफल हुए। एक अंग्रेज द्वारा अपनी पत्नी के हाथों गांधी जी को विष देने तक का प्रयास किया गया, परन्तु वह स्त्री गांधी जी के दर्शन कर ऐसा ने कर सकी। इसके विपरीत उन दोनों को हृदय-परिवर्तन हो गया। इसी सर्ग में ‘खेड़ा-सत्याग्रह का वर्णन भी हुआ है। कवि ने इस सत्याग्रह में सरदार वल्लभभाई पटेल को चरित्र-चित्रण विशेष रूप से किया है।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

इस सर्ग में कवि ने यह चित्रित किया है कि गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेजों की दमन-नीति भी बढ़ती गयी। गांधी जी के नेतृत्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों का समूह नागपुर पहुँचता है। नागपुर के कांग्रेस-अधिवेशन में गांधी जी के ओजस्वी भाषण ने भारतवर्ष के लोगों में नयी स्फूर्ति भर दी, किन्तु अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने हिन्दुओं-मुसलमानों में साम्प्रदायिक दंगे करवा दिये। गांधी जी को बन्दी बना लिया गया। उन्होंने सत्याग्रह का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। कारागार से छूटने के बाद उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजनोत्थान, खादी-प्रचार आदि रचनात्मक कार्यों में अपना सम्पूर्ण समय लगाना आरम्भ कर दिया। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा

आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन, यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के, अनशन का संकल्प सुनाया।

फिर लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रस्ताव के साथ ही पाँचवाँ सर्ग समाप्त हो जाता है।

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

इस सर्ग में गांधी जी द्वारा चलाये गये नमक-सत्याग्रह का वर्णन हुआ है। गांधी जी ने समुद्रतट पर बसे ‘डाण्डी नामक स्थान की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया। अंग्रेज सरकार ने लन्दन में ‘गोलमेज सम्मेलन बुलाया, जिसमें गांधी जी को आमन्त्रित किया गया। इसके परिणामस्वरूप सन् 1937 ई० में ‘प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना हुई। इसके साथ ही षष्ठ सर्ग समाप्त हो जाता है।

सप्तम सर्ग : सन् 1942 की जनक्रान्ति

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज सरकार भारतीयों का सहयोग तो चाहती थी, किन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद 1942 ई० में गांधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा दिया। सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इसका वर्णन कवि ने बड़े ही सजीव रूप से किया है

थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे।
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुथल में थी ज्वाला घर-घर ॥

कवि ने इस आन्दोलन का वर्णन अत्यधिक ओजस्वी भाषा में किया है। बम्बई अधिवेशन के बाद गांधी जी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिये जाते हैं। पूरे देश में इसकी विद्रोही प्रतिक्रिया होती है। कवि के शब्दों में,

जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं।

इस सर्ग में कवि ने गांधी जी एवं कस्तूरबा के मध्य हुए एक वार्तालाप का भी भावपूर्ण चित्रण किया है जिसमें गांधी जी के मानवीय स्वभाव और कस्तूरबा की सेवा-भावना, मूक त्याग और बलिदान का सम्यक् निरूपण किया है।

अष्टम सर्ग : भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

अष्टम सर्ग का आरम्भ भारत की स्वतन्त्रता से किया गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् देशभर में हिन्दू-मुस्लिम-साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हैं। गांधी जी को इससे बहुत दुःख हुआ। वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं

प्रभो ! इस देश को सत्पथ दिखाओ, लगी जो आग भारत में बुझाओ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दें, लपट में रोष की निज शीश धर दें।

इस कल्याण-कामना के साथ ही यह खण्डकाव्य समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
कवि ने ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना सोद्देश्य की है। इस कथन को समझाइट।
या
” ‘आलोकवृत्त’ मनुष्य के जीवन में आशा और आस्था का आलोक विकीर्ण करता हुआ उसे मानवता के उच्चतम शिखरों की ओर उन्मुख करता है।” इस कथन की सार्थकता सोदाहरण सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का सन्देश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का उद्देश्य महात्मा गांधी के आदर्शों का निदर्शन है। प्रमाणित कीजिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ में स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की झाँकी के दर्शन होते हैं।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ में जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों का उद्घोष है। सिद्ध कीजिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ पीड़ित मानवता को सत्य और अहिंसा का शाश्वत सन्देश देता है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ?
या
“‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में भारत के सांस्कृतिक-ऐतिहासिक इतिहास को वाणी दी गयी है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त में युग-युग तक मानवता को सत्य, प्रेम और अहिंसा के दिव्य सन्देश से अनुप्राणित करने की भावना है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के उद्देश्य (सन्देश) को स्पष्ट कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित जीवन के अनुकरणीय मूल्यों पर अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य राष्ट्रीय चेतना का एक प्रतीक है। सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का कथानक देश-प्रेम और मानव-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में ऐसे चिरंतन आदर्शों और सार्वभौम मूल्यों का प्रतिपादन है, जो मानव समाज को प्रेरणा देता है।” इस दृष्टि से ‘आलोकवृत्त’ पर अपना विचार प्रस्तुत कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित गांधी जी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
शीर्षक की सार्थकता – कवि गुलाब खण्डेलवाल ने आलोकवृत्त’ में महात्मा गांधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से आलोकित व्यक्तित्व को चित्रित किया है। इस खण्डकाव्य का विषय, उद्देश्य एवं मूल भावना यही है। महात्मा गांधी के जीवन को हम आलोक स्वरूप कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सद्गुणों एवं सविचारों से आलोकित किया है। विश्व में सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का आलोक उनके द्वारा ही फैलाया गया; इसलिए उनके जीवन-वृत्त को ‘आलोक-वृत्त’ कहना युक्तियुक्त ही है। इस दृष्टिकोण से यह शीर्षक उपयुक्त है। यह शीर्षक महात्मा गांधी के जीवन, उनके चरित्र, गुणों, सिद्धान्तों एवं दर्शन को पूर्णरूपेण परिभाषित करने में सफल हुआ है। प्रत्येक साहित्यिक रचना के पीछे लेखक का कोई-न-कोई उद्देश्य अवश्य होता है। ‘आलोकवृत्त’ में भी कवि का उद्देश्य निहित है। इसका उद्देश्य या सन्देश निम्नवत् है

(1) स्वदेश-प्रेम की प्रेरणा – इस खण्डकाव्य का सर्वप्रथम उद्देश्य देशवासियों के हृदय में स्वदेश-प्रेम की भावना जाग्रत करना है। कवि ने भारत के गौरवमय अतीत का वर्णन कर लोगों को अपने महान् देश का । वास्तविक स्वरूप दिखाया है

जिसने धरती पर मानवता का, पहला जयघोष किया था।
बर्बर जग को सत्य-अहिंसा का, पावन सन्देश दिया था।

इस प्रकार कवि भारत के अतीत का वर्णन करके भारत की वर्तमान अधोगति के प्रति भारतीय जनता के हृदय में टीस, आक्रोश एवं चेतना जाग्रत करना चाहता है।

(2) सत्य-अहिंसा का महत्त्व – आलोकवृत्त के माध्यम से कवि ने सत्य और अहिंसा को प्रतिष्ठित किया है। कवि ने देश की स्वाधीनता हेतु सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देकर लोगों को श्रेष्ठ आचरणवान् बनने की शिक्षा दी है। कवि ने गांधी जी का उदाहरण प्रस्तुत करके यह सिद्ध किया है कि हम सत्य और अहिंसा के द्वारा अपने प्रत्येक संकल्प को पूरा कर सकते हैं

अहिंसा ने अजब जादू दिखाये।
विरोधी हैं खड़े कन्धा मिलाये ॥

(3) सहयोग एवं राष्ट्रीय एकता – कवि यह अनुभव करता है कि अंग्रेज शासकों ने हमारे देश में तरह-तरह की फूट डालकर देश को विघटित करने का प्रयास किया है। उसका मानना है कि हमारे देश की स्वतन्त्रता, एकता एवं सहयोग की भावना के आधार पर ही सुरक्षित रह सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए आलोकवृत्त’ खण्डकाव्यं में यह सन्देश दिया गया है कि हमें साम्प्रदायिक एवं प्रान्तीय भेदभाव को भूलकर राष्ट्र की एकता बनाये रखनी है

यदि मिलकर इस राष्ट्र-यज्ञ में, सब कर्तव्य निभायें अपना।
एक वर्ष में हो पूरा, मेरा रामराज्य का सपना ॥

(4) मानवमात्र का कल्याण – कवि ने मात्र भारत के ही कल्याण की कामना नहीं की है, वरन् वह तो सम्पूर्ण मानवता का कल्याण चाहता है

जुड़ता जब सम्बन्ध हृदय का, भेदभाव मिट जाता है।
देश-जाति रंगों से गहरा, मानवता का नाता है।

(5) मानवीय-मूल्यों की प्रतिष्ठा-आलोकवृत्त’ के रचनाकार का उद्देश्य यह रहा है कि सर्वत्र सत्य, प्रेम,
सदाचार, न्याय, सहिष्णुता आदि मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हो; उदाहरणार्थ

प्रेम सृष्टि का मूल्य धर्म, चेतना का नियम सनातन ।
इसके कारण ही विनाश से, बचो आज तक जीवन ॥
X                          X                     X
लोकतन्त्र का रथ समता के, पहियों पर चलता है।

(6) त्याग तथा बलिदान की भावना का सन्देश – कवि का एक सन्देश देश के लिए त्याग एवं बलिदान से सम्बन्धित है। गांधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए बड़े से बड़ा बलिदान किया तथा अनेक कष्ट सहे। कवि ने गांधी जी के उदाहरण को प्रस्तुत करके देश के युवकों को देश के लिए त्याग एवं बलिदान का सन्देश दिया है।

(7) पवित्र साधन अपनाने का सन्देश – गांधी जी का विचार था कि उत्तम साध्यों की प्राप्ति के लिए पवित्र साधनों को ही अपनाना चाहिए। गांधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए प्रेम, सत्य तथा अहिंसा को ही साधन के रूप में अपनाया था। गांधी जी के जीवन के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कवि ने प्रत्येक को केवल पवित्र साधनों को ही अपनाने का महान् सन्देश दिया है।
इस प्रकार आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य गांधी जी के जीवन-चरित को माध्यम बनाकर राष्ट्रप्रेम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, न्याय, समता, सदाचार आदि की प्रेरणा देने के अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल रहा है।

प्रश्न 3:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के संवाद-सौष्ठव की निदर्शना कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘आलोकवृत्त’ का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ एक सफल खण्डकाव्य है। इस उक्ति की सप्रमाण पुष्टि कीजिए।
या
इतने बड़े कथानक को ‘आलोकवृत्त’ में समेटकर कवि ने अपनी प्रबन्ध पदता का परिचय दिया है। इस कथन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। कवि ने कल्पना का पुट देकर कथा को सरस तथा हृदयस्पर्शी बना दिया है। कवि ने भारत के अतीत के गौरव का स्मरण करते हुए तत्कालीन स्थिति का वर्णन किया है। आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावपूर्ण चित्रण और सुगठित घटनाक्रम – ‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु के माध्यम से कवि ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया है। आरम्भ के चार सर्गों में स्वाधीनता-आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है और अन्तिम चार सर्गों में दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी के भारत-आगमन, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, स्वतन्त्रता-प्राप्ति और स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में हुए साम्प्रदायिक दंगों का इतिहास रोचक शैली में कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया है।

(2) सफल चरित्रांकन : गांधी जी की जीवनी – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य वास्तव में गांधी जी की संक्षिप्त जीवन-कथा है। कवि ने गांधी जी के जन्म; शैशवकालीन घटनाओं; पिता की मृत्यु; कस्तूरबा से विवाह; इंग्लैण्ड-यात्रा; दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटना; चम्पारन-खेड़ा सत्याग्रह; कलकत्ता, कानपुर, लाहौर के कांग्रेस-अधिवेशन; नमक सत्याग्रह; गोलमेज सम्मेलन; 1942 ई० में भारत छोड़ो आन्दोलन; कस्तूरबा की मृत्यु; साम्प्रदायिक संघर्ष; इक्कीस दिनों का अनशन तथा स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गांधी जी के मन की चिन्ता का क्रमबद्ध वर्णन प्रस्तुत किया है। वास्तव में यह गांधी जी की काव्यात्मक संक्षिप्त जीवनी है।

(3) कथा-संगठन – आलोकवृत्त’ का आरम्भ भारत के गौरवमये अतीत से होता है। इसके साथ ही । गांधीकालीन भारत की दुर्दशा का वर्णन किया गया है, जो बहुत ही प्रेरणाप्रद है। गांधी जी का शिक्षा ग्रहण करने इंग्लैण्ड जाना; वहाँ से बैरिस्टर बनकर दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करना तथा तत्पश्चात् कथा का उतारे दिखाया गया है। इसके बाद भारतवर्ष तथा विश्व की मंगल-कामना के साथ कथावस्तु का अन्त हो जाता है।

विषमता, फूट, मिथ्याचार भागे, सभी का हो उदय, नव ज्योति जागे।
विजित हों प्यार से तक्षक विषैले, दयामय! विश्व में सद्भाव फैले ॥

इस प्रकार कथावस्तु पाँचों कार्यावस्थाओं की दृष्टि से पूर्ण सफल है।
खण्डकाव्य के शिल्प के अनुसार ‘आलोकवृत्त’ को आठ सर्गों में विभक्त किया गया है। सर्गों का क्रम कवि की रचनात्मक प्रतिभा का द्योतक है। कवि ने इस खण्डकाव्य में महात्मा गांधी के समग्र जीवन-वृत्त को इस रूप में चित्रित किया है कि भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के पूरे इतिहास के साथ-साथ गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्त भी पूरी तरह प्रतिपादित होते हैं।

(4) संवाद-योजना – कथावस्तु के विस्तार के कारण इस खण्डकाव्य में संवाद-योजना को प्रमुखता प्रदान नहीं की गयी है। यद्यपि यह खण्डकाव्य प्रधान रूप से वर्णनात्मक ही है; तथापि विभिन्न स्थानों पर महात्मा गांधी के संक्षिप्त संवाद भी प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ अन्य पात्रों द्वारा भी संवादों का प्रयोग हुआ है, किन्तु इसे नगण्य ही कहा जाएगा।

(5) पात्र एवं चरित्र-चित्रण – आलोकवृत्त’ में गांधी जी का चरित्र धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें मानवोचित दुर्बलताएँ हैं; परन्तु अपनी ईमानदारी, सरलता, सत्यनिष्ठा और लगन के बल पर वे उन दुर्बलताओं पर सहज विजय प्राप्त कर लेते हैं। गांधी जी में दम्भ और पाखण्ड का लेशमात्र अंश भी नहीं है। वे अपने प्रेम से विरोधियों तक के हृदय को जीत लेते हैं। मानवता में उनकी अखण्ड आस्था है और इसी आस्था के बल पर वे देश, जाति और भेदभाव पर आधारित सीमाओं का अतिक्रमण करके मानव-एकता को प्रतिष्ठित करते हैं। मानव-हृदय की एकता और सभी के प्रति पारस्परिक समानता का भाव उनके अहिंसा-सिद्धान्त की आधारशिला है। इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य में गांधी जी को चरितनायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी दी गयी है। अन्य पात्रों का समावेश नायक के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु प्रसंगवश ही किया गया है। वे कवि के उद्देश्य को अभिव्यक्ति देने में सहायकमात्र हैं।

(6) वर्णन में भावात्मकता – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु का आरम्भ बड़ा ही रोचक है। मध्य की घटनाएँ कौतूहल बढ़ाने वाली हैं। कथा का अन्त बड़ा ही मार्मिक एवं प्रभावशाली है। खण्डकाव्य के शिल्प के अनुसार ‘आलोकवृत्त’ की कथा वर्णनात्मक है। वर्णनात्मक स्थलों को भावात्मक स्वरूप प्रदान करने में कवि ने अपना पूरा-पूरा प्रयास किया है। मार्मिक स्थलों के चयन में कवि की प्रतिभा एवं सहृदयता भी पूर्णरूपेण परिलक्षित होती है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आलोकवृत्त’ में गांधी जी जैसे महान् लोकनायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य-रचना की गयी है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है, किन्तु कवि ने गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने हेतु आवश्यक प्रसंगों का चयनकर उसे इस प्रकार संगठित एवं विकसित किया है कि वह खण्डकाव्य के उपर्युक्त बन गयी है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है। आदर्शपूर्ण भावनाओं की स्थापना हेतु रचित इस काव्य-ग्रन्थ में यद्यपि रसों एवं छन्दों की विविधता है; तथापि इससे खण्डकाव्य के उद्देश्य एवं उसके विधा सम्बन्धी तत्त्वों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। अतः इस काव्यग्रन्थ को एक आदर्श सफल खण्डकाव्य कहना उपयुक्त होगा।

प्रश्न 4:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) गांधी जी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर गांधी जी के जीवन और आदर्शों का उल्लेख कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ में गांधी जी धीरोदात्त नायक और लोकनायक के रूप में चित्रित किये गये हैं।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्कयुक्त उत्तर दीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ में गांधी जी का कृतित्व ही नहीं उनका जीवन-दर्शन और चिन्तन भी अभिव्यक्त हुआ है।” इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी के चरित्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवतु हैं

(1) सामान्य मानवीय दुर्बलताएँ – गांधी जी का आरम्भिक जीवन एक साधारण मनुष्य की भाँति मानवीय दुर्बलताओं वाला रहा है। उन्होंने एक बार अपने गुरु से छुपकर मांस-भक्षण किया था; उदाहरणार्थ

करने लगे मांस-भक्षण, गुरुजन की आँख बचाकर।।

किन्तु बाद में उन्होंने अपनी इन दुर्बलताओं पर अपनी आत्मिक शक्ति के बल पर पूर्ण विजय पा ली।

(2) देश-प्रेमी – आलोकवृत्त’ में गांधी जी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता उनका देशप्रेम है। वे देशप्रेम के कारण अनेक बार कारागार जाते हैं, जहाँ उन्हें अंग्रेजों के अपमान-अत्याचार सहने पड़ते हैं। उन्होंने अपना सर्वस्व देश के लिए न्योछावर कर दिया। भारत के लिए उनका कहना था

तू चिर प्रशान्त, तू चिर अजेय,
सुर-मुनि-वन्दित, स्थित,’ अप्रमेय
हे सगुण ब्रह्म, वेदादि-गेय,
हे चिर अनादि हे चिर अशेष
मेरे भारत, मेरे स्वदेश।

(3) सत्य और अहिंसा के प्रबल समर्थक – गांधी जी देश की स्वतन्त्रता केवल सत्य और अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त करना चाहते हैं। असत्य और हिंसा का मार्ग उन्हें अच्छा नहीं लगता। वे कहते हैं

पशुबल के सम्मुख आत्मा की, शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की, आग बुझानी होगी।

अहिंसा व्रत का पूर्ण रूप से पालन उनके जैसा कोई विरला व्यक्ति ही कर सकता है।

(4) दृढ़ आस्तिक – गांधी जी पुरुषार्थी हैं तो भी वे ईश्वर की सत्ता में अटूट विश्वास रखते हैं। उनका मानना है। कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। वे प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। यही कारण है कि वे मात्र पवित्र साधनों को प्रयोग ही उचित समझते हैं

क्या होगा परिणाम सोच हूँ, पर क्यों सोचें, वह तो।
मेरा क्षेत्र नहीं, स्रष्टा का, जो प्रभु करे वही हो ।।

(5) स्वतन्त्रता-प्रेमी – गांधी जी के जीवन का मूल उद्देश्य भारत को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारतमाता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। देशंवासियों को परतन्त्रता की बेड़ियाँ काटने के लिए प्रेरित करते हुए वे कहते हैं

जाग तुझे तेरी अतीत, स्मृतियाँ धिक्कार रही हैं।
जाग-जाग तुझे भावी, पीढ़ियाँ पुकार रही हैं।

(6) मानवतावादी – गांधी जी मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते। वे सबके लिए समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उन्होंने जीवन भर ऊँच-नीच, जाति-पाँति और रंग-भेद का डटकर विरोध किया। अछूत कहे जाने वाले भारतीयों के उद्धार के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहे। इस भेदभाव से उन्हें बहुत दुःख होता था

जिसने मारा मुझे, कौन वह, हाथ नहीं क्या मेरी।
मानवता तो एक, भिन्न बस उसका-मेरा घेरा॥

(7) भावात्मक, राष्ट्रीय और हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक – गांधी जी ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी व समृद्ध देखना चाहते थे। इन्होंने भारत की समग्र जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए जीवन-पर्यन्त प्रयास किया और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा दी। उनका कहना था

यदि मिलकर इस राष्ट्रयज्ञ में सब कर्तव्य निभायें अपना,
एक वर्ष में ही पूरा हो मेरा रामराज्य का सपना।

(8) आत्मविश्वासी – गांधी जी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे, उन्होंने जो कुछ भी किया पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी हुए। उनका मानना था

शासित की स्वीकृति न मिले तो शासक क्या कर लेगा
यदि आधार मिटे भय का तो एकतन्त्र ठहरेगा।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एक श्रेष्ठ मानव में जितने भी मानवोचित गुण हो सकते हैं वे सभी महात्मा गांधी में विद्यमान थे।

प्रश्न 5:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के काव्य-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के काव्य-वैभव (काव्य-सौन्दर्य) की समीक्षा कीजिए।
या
“काव्य-कला की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ एक श्रेष्ठ रचना है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
किसी भी रचना के काव्य-सौन्दर्य के अन्तर्गत उसके भावपक्ष और कलापक्ष के सौन्दर्य की समीक्षा की जाती है। ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का काव्य-सौन्दर्य अथवा इसकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) कथावस्तु-वर्णन – ‘आलोकवृत्त काव्य में आठ सर्ग हैं। इन सर्गों में कवि ने गांधी जी के सम्पूर्ण जीवन के साथ भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का इतिहास भी प्रस्तुत किया है। कवि ने इतिहास एवं जीवन-गाथा के साथ-साथ श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की स्थापना भी की है।

(2) रस-योजना – आलोकवृत्त’ में कवि ने विभिन्न मानव मन:स्थितियों के साथ-साथ वीर, शान्त और करुण रसों को निरूपित किया है; उदाहरणार्थ

वीर रस – जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं।
शान्त रस – पर कैसे प्रतिकार असत् का, हिंसा का पशुबल का ।
कैसे सम्भव शमन द्वेष के, इस नरमेध-अनल का ॥
करुण रस – चीत्कार हुआ ज्यों सहसा डूबे रहे जन का
दौड़ा पति सुनकर शब्द प्रिया के क्रन्दन का।
देखा कि साश्रु वह अतिथि-पदों में पड़ी हुई।
सिसकियाँ विकल भरती थी भू में गड़ी हुई।

(3) प्रकृति-चित्रण – कवि ने ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में प्रकृति-चित्रण कम ही किया है। कुछ स्थलों पर प्रकृति को पृष्ठभूमि के रूप में चित्रित किया गया है; उदाहरणार्थ

पद-प्रान्त में सागर गरजता सिंह-सा, झलमल गले से हीरकों के हार-सी।
गंगा तरुणिजा, गोमती, गोदावरी, कृष्णादिका, सिर पर मुकुट हिमवान का ॥

(ब) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा सरल, सुबोध, परिमार्जित एवं रोचक खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण विद्यमान हैं। कवि ने अनेक प्रचलित मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है ।

कट जाता शासन का पत्ता। मुँह के बल गिर पड़ती सत्ता।

इस खण्डकाव्य की भाषा अत्यन्त सरल और बिम्बमय है। सीधे-सादे शब्दों में बड़ी बातें कहने में कवि की । कला सराहनीय है। भाषा की बिम्बमयता का एक उदाहरण देखिए

हँस हँसकर अंगारे चुगते शशि की ओर चकोर चले।
जैसे घन पाहन-वर्षण में पर फैलाये मोर चले।।

ओज गुण का निर्वाह तो खण्डकाव्य में आद्योपान्त किया गया है। प्रसाद गुण तो इसकी प्रत्येक पंक्ति में देखा जा सकता है। जिन प्रसंगों में माधुर्य की अपेक्षा है, वहाँ भाषा अत्यन्त मधुर रूप ग्रहण कर लेती है।

(2) शैली – प्रबन्ध शैली में लिखे गये आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की घटनाओं के वर्णन में वर्णनात्मक शैली की चित्रोपमता और प्रतीकात्मकता के दर्शन होते हैं। यंत्र-तत्र संवादात्मकता भी है, किन्तु शैली का स्वरूप वर्णनात्मक ही है। वर्णनात्मक शैली में भावात्मकता को स्थान देकर इन्होंने अपने भावों को कुशल अभिव्यक्ति दी है।

(3) छन्द-विधान – आलोकवृत्त’ में छन्दों की विविधता है। 16 मात्राओं के छोटे छन्द से लेकर 32 मात्राओं के लम्बे छन्दों का प्रयोग इसमें सफलतापूर्वक किया गया है। प्रथम सर्ग में मुक्त छन्द का प्रयोग हुआ है। सर्गों के मध्य में गीत-योजना भी की गयी है, जिससे राष्ट्रीय भावनाओं की वृद्धि में सहयोग मिला है।

(4) अलंकार-योजना – आलोकवृत्त’ काव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, यमक, अनुप्रास, श्लेष आदि अलंकारों का सफल प्रयोग किया है। अलंकार-प्रयोग में स्वाभाविकता है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं

रूपक    –      कैसे सम्भव शमन द्वेष के,
इस नरमेध-अनल का।।
उपमा     –    पद-प्रान्त में सागर गरजता सिंह-सा।
पद-प्रान्त म साग
यमक     –        मन्मथ धन्य प्रथम नायक का,
जिसने मन मथ डाला।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना महान् लोकनायक गांधी जी के गुणों को आधार बनाकर की गयी है। गौण पात्रों का चरित्रांकन नायक गांधी जी के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु ही किया गया है। यद्यपि इस खण्डकाव्य में रसों एवं छन्दों की विविधता है तथापि इससे उद्देश्य एवं विधा से सम्बद्ध तत्त्वों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अत: इसे एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है।

प्रश्न 6:
‘आलोकवृत्त’ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की सही झाँकी मिलती है ? पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
या
आलोकवृत्त’ नाटक में वर्णित घटनाओं को अपने शब्दों में लिखिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य आधुनिक भारत के संघर्षों की झाँकी प्रस्तुत करने में सफल है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु आठ सर्गों में विभक्त है। प्रथम सर्ग में भारत के गौरवशाली अतीत का, उसके बाद पराधीनता का और सन् 1857 ई० की क्रान्ति के बाद नयी ज्योति के रूप में गांधी जी के उदय का वर्णन है। द्वितीय सर्ग में गांधी जी के प्रारम्भिक जीवन और फिर इंग्लैण्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौटने तथा उनकी माता की मृत्यु का वर्णन है। तृतीय सर्ग में गांधी जी द्वारा अफ्रीका में रंग-भेद से दु:खी भारतीयों का वर्णन है, जिन्हें दुर्दशा से मुक्ति दिलाने के लिए गांधी जी ने उनका नेतृत्व किया और सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। चतुर्थ सर्ग में गांधी जी भारत लौट आये और उन्होंने देशवासियों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए जगाया। इसमें चम्पारन और खेड़ा के आन्दोलन का वर्णन है। पंचम सर्ग में अंग्रेजों के दमन, साम्प्रदायिक दंगे भड़कने, गांधी जी को बन्दी बनाने और फिर जेल से छूटने के बाद गांधी जी द्वारा हिन्दी-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजन-उत्थान, खादी-प्रचार आदि कार्यक्रमों का वर्णन है और लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रस्ताव के वर्णन के साथ यह सर्ग समाप्त हो जाता है। इसी सर्ग में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी के 21 दिनों के उपवास का भी वर्णन है

आत्म शुद्धि का यज्ञ कठिन यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के अनशन का संकल्प सुनाया ।।

छठे सर्ग में नमक आन्दोलन, लन्दन के गोलमेज सम्मेलन और 1937 के प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना का वर्णन है। सातवें सर्ग में 1942 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन का और आठवें सर्ग में भारतीय स्वतन्त्रता के अरुणोदय के साथ-साथ विभाजन के कारण भड़के दंगों से दु:खी गांधी जी की कल्याण-कामना का वर्णन है, जिसमें उन्होंने कहा है

प्रभो इस देश को सत्पथ दिखाओ।
लगी जो आग भारत में बुझाओ ॥

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ‘आलोकवृत्त’ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की सही झाँकी मिलती है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास मिश्रित बहुविकल्पीय प्रश्न

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास मिश्रित बहुविकल्पीय प्रश्न are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास मिश्रित बहुविकल्पीय प्रश्न.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास मिश्रित बहुविकल्पीय प्रश्न
Number of Questions 108
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास मिश्रित बहुविकल्पीय प्रश्न

मिश्रित बहुविकल्पीय प्रश्न

[ध्यान दें: नीचे दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्नों के विकल्पों में सामान्य से अधिक काले छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।]

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘साहित्यालोचन’ और ‘हिन्दी साहित्य निर्माता’ इनकी प्रमुख रचनाएँ हैंया’साहित्यालोचन’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) श्यामसुन्दर दास

(2) ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना में इनका सराहनीय योगदान रहा है–
या
‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना किसने की ? [2009, 12, 13, 14]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) श्यामसुन्दर दास
(घ) डॉ० सम्पूर्णानन्द

(3) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीयुगीन गद्य लेखक/लेखिका हैं ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) यशपाल
(घ) भगवतीचरण वर्मा

(4) ‘रूपक रहस्य’ के लेखक कौन हैं ? यह किस विधा की रचना है ?
(क) वियोगी हरि–नाटक
(ख) रामचन्द्र शुक्ल-निबन्ध
(ग) श्यामसुन्दर दास-आलोचना
(घ) प्रतापनारायण मिश्र-निबन्ध

(5) श्यामसुन्दर दास द्वारा किस पत्रिका का सम्पादन किया गया ?
(क) हिन्दी प्रदीप
(ख) माधुरी
(ग) इन्दु
(घ) नागरी प्रचारिणी पत्रिका

(6) ‘नासिकेतोपाख्यान’ शीर्षक से श्यामसुन्दर दास के अतिरिक्त किस लेखक ने गद्य-रचना की है? [2014]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) सदल मिश्र
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(7) श्यामसुन्दर दास का जन्म-काल है–
(क) सन् 1875 ई०
(ख) सन् 1884 ई०
(ग) सन् 1892 ई०
(घ) सन् 1907 ई०

(8) मुंशी प्रेमचन्द का जन्म-काल है
(क) 1870 ई०
(ख) 1875 ई०
(ग) 1880 ई०
(घ) 1879 ई०

(9) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन का जन्म-काल है
(क) 1892 ई०
(ख) 1907 ई०
(ग) 1911 ई०
(घ) 1920 ई०

(10) इनके द्वारा ‘भारत कला भवन’ नाम के एक विशाल संग्रहालय की स्थापना की गयी
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) राय कृष्णदास

(11) इन्होंने हिन्दी में गद्यगीत विधा का प्रवर्तन किया–
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) राय कृष्णदास

(12) ‘भारत की चित्रकला’ तथा ‘भारतीय मूर्तिकला’ इनके प्रामाणिक ग्रन्थ हैं
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) राहुल सांकृत्यायन
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) राय कृष्णदास

(13) ‘साधना’ नामक गद्यगीतों के संग्रह के रचयिता कौन हैं ?
(क) वृन्दावनलाल वर्मा
(ख) मोहन राकेश
(ग) राय कृष्णदास
(घ) विनय मोहन शर्मा

(14) राय कृष्णदास का लेखन-युग है
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावाद युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(15) प्रेमचन्दोत्तर युग के श्रेष्ठ कथाकार के रूप में जाने जाते हैं-
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(16) जैनेन्द्र कुमार की कौन-सी रचना उपन्यास नहीं है ?
(क) कल्याणी
(ख) जयवर्धन
(ग) मुक्तिबोध
(घ) वातायन

(17) निम्नलिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना नाटक है ?
(क) मजदूरी और प्रेम
(ख) रस-मीमांसा
(ग) पाप और प्रकाश
(घ) भारत की एकता

(18) जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित निबन्ध-संग्रह है-
(क) पृथिवी-पुत्र और वाग्धारा
(ख) पूर्वोदय और प्रस्तुत प्रश्न
(ग) कुली
(घ) पथ के साथी

(19) ‘त्यागपत्र’ किस लेखक की उपन्यास-विधा की रचना है ?
(क) प्रेमचन्द
(ख) यशपाल
(ग) जैनेन्द्र कुमार
(घ) मोहन राकेश

(20) ‘साहित्य का श्रेय और प्रेय’ किस विधा की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) आलोचना
(ग) निबन्ध
(घ) संस्मरण

(21) ‘अज्ञेय’ का वास्तविक नाम ( पूरा नाम) है—
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) कन्हैयालाल मिश्र
(घ) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(22) ‘विशाल भारत’, ‘सैनिक’, ‘प्रतीक’, ‘वाक्’ तथा ‘दिनमान’ पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया [2012]
(क) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने
(ख) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी ने
(घ) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने

(23) उत्तर प्रियदर्शी’ नाटक के लेखक हैं-
(क) मोहन राकेश
(ख) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी
(घ) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’

(24) अरे यायावर रहेगा याद’ किस विधा की रचना है ? [2010]
(क) उपन्यास
(ख) नाटक
(ग) कहानी
(घ) यात्रा-साहित्य

(25) अज्ञेय जी द्वारा रचित निम्नलिखित में से कौन-सी रचना निबन्ध विधा की रचना नहीं है ?
(क) विपथगा,
(ख) आत्मनेपद
(ग) त्रिशंकु
(घ) लिखि कागद कोरे

(26) इन्होंने भाषा सम्बन्धी विविध प्रयोग किये और शैली के क्षेत्र में भी नये प्रतिमान स्थापित किये
(क) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) श्रीराम शर्मा

(27) अज्ञेय जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार से किस रचना के लिए सम्मानित किया गया था ?
(क) जयदोल
(ख) कितनी नावों में कितनी बार
(ग) एक बूंद सहसा उछली
(घ) अरी ओ करुणा प्रभामय

(28) ‘सन्नाटा’ के रचनाकार हैं [2013]
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) राय कृष्णदास
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(29) ‘हरिऔध’ का पूरा नाम क्या है ? [2010]
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) अयोध्यासिंह उपाध्याय
(घ) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन

(30) ‘कामायनी’ की रचना विधा क्या है ?
(क) खण्डकाव्य
(ख) नाटिका
(ग) उपन्यास
(घ) महाकाव्य

(31) ‘भाषा योग-वाशिष्ठ’ के रचयिता हैं [2010, 18]
(क) रामप्रसाद निरंजनी
(ख) सदासुख मुंशीलाल ‘नियाज’
(ग) सदल मिश्र
(घ) इंशाअल्ला खाँ

(32) डॉ० रघुवीर सिंह का लेखन-युग है
(क) छायावाद युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) भारतेन्दु युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(33) द्विवेदी युग का ख्याति प्राप्त तिलिस्मी उपन्यास है-
(क) आत्मदाह
(ख) गबन
(ग) नूतन ब्रह्मचारी
(घ) चन्द्रकान्ता सन्तति

(34) ‘भारतेन्दु युग’ की कालावधि मानी जाती है-
(क) 1900 से 1922 ई०
(ख) 1919 से 1938 ई०
(ग) 1868 से 1900 ई०
(घ) 1868 ई० तेक

(35) ‘द्विवेदी युग’ की कालावधि मानी जाती है|
(क) 1900 से 1922 ई०
(ख) 1919 से 1938 ई०
(ग) 1868 से 1900 ई०
(घ) 1938 ई० से अब तक

(36) ‘तितली’ उपन्यास के रचनाकार हैं [2013, 16]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) प्रेमचन्द
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) जयशंकर प्रसाद

(37) ‘शुक्ल युग’ ( छायावाद युग) की कालावधि मानी जाती है|
(क) 1900 से 1922 ई०
(ख) 1919 से 1938 ई०
(ग) 1938 से 1947 ई०
(घ) 1947 ई० से अब तक

(38) ‘शुक्लोत्तर युग’ ( छायावादोत्तर युग) की कालावधि मानी जाती है-
(क) 1900 से 1922 ई०
(ख) 1919 से 1938 ई०
(ग) 1938 से 1947 ई०
(घ) 1947 ई० से अब तक

(39) ‘द्विवेदी युग’ और ‘छायावादी युग’ दोनों युगों में लेखन-कार्य करने वाले लेखक-द्वय हैं [2014]
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी व गुलाबराय
(ख) प्रतापनारायण मिश्र व प्रेमचन्द
(ग) गुलाबराय व जयशंकर प्रसाद
(घ) जयशंकर प्रसाद व जैनेन्द्र कुमार

(40) ‘छायावाद युग’ और ‘छायावादोत्तर युग’ दोनों युगों में अपनी रचनाधर्मिता से हिन्दी साहित्य में विशेष योगदान करने वाले लेखक हैं-
(क) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) डॉ० नगेन्द्र

(41) किस युग की रचनाएँ मार्क्सवाद से सर्वाधिक प्रभावित हुई हैं ?
(क) छायावादी युग
(ख) छायावादोत्तर युगे
(ग) शुक्ल युग
(घ) द्विवेदी युग

(42) गद्य की विधा जो नहीं है
(क) निबन्ध
(ख) आलोचना
(ग) उपन्यास
(घ) गद्यकाव्य

(43) हिन्दी की गद्य और पद्य विधाओं में समान रूप से लिखने वाले विद्वान् हैं-
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) विष्णु प्रभाकर
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) तीनों में से कोई नहीं

(44) छायावादी युग के लेखक कौन नहीं हैं ?
(क) वियोगी हरि
(ख) भगवतीचरण वर्मा
(ग) नन्ददुलारे वाजपेयी
(घ) डॉ० रघुवीर सिंह

(45) निम्नलिखित में से कौन-सा साहित्यकार छायावादी नहीं है ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(46) ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किस युग की रचना है ?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावादोत्तर युग
(घ) छायावाद युग

(47) ‘हमीर हठ’ किस प्रकार की रचना है ?
(क) निबन्ध
(ख) कथा-साहित्य
(ग) आलोचना
(घ) इतिहास

(48) ‘खड़ी बोली’ गद्य के विकास का प्रारम्भिक युग कौन-सा है ?
(क) द्विवेदी युग
(ख) छायावाद युग।
(ग) भारतेन्दु युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(49) निम्नलिखित में से किस निबन्धकार को ललित निबन्धकार माना जाता है ? [2009]
(क) कुबेरनाथ राय
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(50) निम्नलिखित में असत्य कथन है
(क) गद्य व्याकरण सम्मत वाक्यबद्ध रचना है।
(ख) गद्य प्रधानतया विचार, तर्क चिन्तन एवं विश्लेषण प्रधान होता है।
(ग) गद्य में लय, यति एवं गति आदि का महत्त्व होता है।
(घ) आज का युग गद्य प्रधान है।

(51) कौन-सा युग हिन्दी गद्य के उत्कर्ष का सूर्योदय-काल था ?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावाद युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(52) छायावादोत्तर युग के लेखक नहीं हैं [2009]
(क) भीष्म साहनी
(ख) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
(ग) वासुदेवशरण अग्रवाल
(घ) बालकृष्ण भट्ट

(53) ‘द्विवेदी पत्रावली’ के संकलनकर्ता हैं-
(क) बैजनाथ सिंह
(ख) बनारसी दास चतुर्वेदी
(ग) पद्मसिंह शर्मा
(घ) वियोगी हरि

(54) हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल को गद्य काल की संज्ञा किसने दी ?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) बाबू श्यामसुन्दर दास

(55) ‘बड़ों के प्रेरणादायक पत्र’ पत्र संकलन किसने प्रकाशित कराया? [2010]
(क) बैजनाथ सिंह
(ख) बनारसीदास चतुर्वेदी
(ग) वियोगी हरि
(घ) हरिवंशराय बच्चन

(56) ‘नूतन ब्रह्मचारी’ किस विधा की रचना है ? [2010]
(क) नाटक
(ख) उपन्यास
(ग) जीवनी
(घ) आलोचना

(57) ‘हिन्दी प्रगतिशील लेखक संघ’ का प्रथम अधिवेशन हुआ [2011]
या
प्रेमचन्द की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ’ का अधिवेशन हुआ । [2014]
(क) सन् 1932 में
(ख) सन् 1936 में
(ग) सन् 1938 में
(घ) सन् 1940 में

(58) प्रारम्भिक गद्य लेखकों में दो राजाओं में से एक हैं [2012]
(क) सदासुख लाल
(ख) सदल मिश्र
(ग) शिवप्रसाद सितारेहिन्द
(घ) लल्लूलाल

(59) ‘दि मैड मैन’ का ‘पगला’ नाम से हिन्दी में अनुवाद किया है [2012]
(क) वासुदेवशरण अग्रवाल ने
(ख) रायकृष्ण दास ने
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द ने।
(घ) जी० सुन्दर रेड्डी ने

(60) निम्नलिखित में से सदल मिश्र की रचना है [2013]
(क) रानी केतकी की कहानी
(ख) नासिकेतोपाख्यान
(ग) राजा भोज का सपना
(घ) सत्यार्थ प्रकाश

(61) कौन-सी रचना धर्मवीर भारती की है ? (2013)
(क) अणिमा
(ख) अपरा।
(ग) अन्धा-युग
(घ) अर्चना

(62) ‘भारत-भारती’ की रचना-विधा है– [2014]
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) काव्य

(63) निम्नलिखित में असत्य कथन है [2014]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी निबन्धकार एवं उपन्यासकार हैं।
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक थे।
(ग) रामचन्द्र शुक्ल ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ ग्रन्थ के लेखक हैं।
(घ) प्रतापनारायण मिश्र हिन्दी प्रदीप’ के सम्पादक थे।

(64) ‘खड़ी बोली गद्य’ की प्रथम रचना है [2015]
(क) कविवचन सुधा।
(ख) गोरा बादल की कथा
(ग) कामायनी
(घ) चिदम्बरा

(65) ‘त्यागपत्र’ विधा की दृष्टि से रचना है [2015]
(क) कहानी
(ख) निबन्ध
(ग) उपन्यास
(घ) नाटक

(66) ‘अतिचार’ रचना के सम्पादक हैं [2015]
(क) बालमुकुन्द गुप्त
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) किशोरीलाल गोस्वामी
(घ) नाभादास

(67) ‘श्रृंगार-रस-मंडन’ के रचनाकार हैं [2015]
(क) नाभादास
(ख) चतुर्भुज दास
(ग) बिट्ठलनाथ
(घ) ज्योतिरीश्वर ठाकुर

(68) ‘चिन्तामणि’ के रचनाकार हैं [2016, 18]
(क) प्रेमचन्द
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) गुलाब राय

(69) सरस्वती पत्रिका है [2016]
(क) शुक्ल युग की
(ख) द्विवेदी युग की
(ग) भारतेन्दु युग की
(घ) छायावादी युग की

(70) चन्द्रकांता सन्तति’ रचना है [2016]
(क) भारतेन्दु युग की
(ख) द्विवेदी युग की।
(ग) छायावादी युग की
(घ) छायावादोत्तर युग की

(71) ‘कालिदास की निरंकुशता’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) नन्द दुलारे वाजपेयी

(72) ‘राधाकृष्णदास’ लेखक थे [2015]
(क) भारतेन्दु युग के
(ख) द्विवेदी युग के
(ग) छायावाद युग के
(घ) छायावादोत्तर युग के

(73) ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ के लेखक हैं [2015]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) डॉ० नगेन्द्र
(घ) डॉ० रामकुमार वर्मा

(74) गद्य विधा की संख्या है [2016]
(क) तीन
(ख) सात
(ग) ग्यारह
(घ) पन्द्रह

(75) ‘नूतन ब्रह्मचारी’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) सदल मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) लल्लू लाल
(घ) मोहन राकेश

(76) ‘ग्यारह वर्ष का समय’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) मुंशी इंशा अल्ला खाँ
(ख) राजेन्द्र बाला घोस
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) जयशंकर प्रसाद

(77) गोरा बादल की कथा’ के लेखक हैं [2016]
(क) कवि गंग
(ख) जटमले
(ग) पं० दौलत राम
(घ) रामप्रसाद निरंजनी

(78) ‘मुद्रा राक्षस’ के लेखक हैं [2016]
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) जयशंकर प्रसाद

(79) रसज्ञ-रंजन’ कृति के लेखक हैं [2016]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(80) सरदार पूर्णसिंह द्वारा लिखित निबन्ध नहीं है [2016]
(क) सच्ची वीरता
(ख) कन्यादान
(ग) पवित्रता
(घ) कालिदास की निरंकुशता

(81) ‘चिद्विलास’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ख) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(82) ‘पन्दहा’ (आजमगढ़, उत्तर प्रदेश) जन्म-स्थान है [2016]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी को
(ख) राहुल सांकृत्यायन को
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का
(घ) मोहन राकेश का

(83) ‘पैरों में पंख बाँधकर’ यात्रावृत्तान्त कृति है [2016]
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी की।
(ख) डॉ० सम्पूर्णानन्द की
(ग) मोहन राकेश की
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल की

(84) आधुनिक काल के प्रारम्भिक डायरी-लेखक हैं [2016]
(क) घनश्याम दास बिड़ला
(ख) त्रिलोचन
(ग) शमशेर बहादुर सिंह
(घ) बच्चन

(85) ‘भारत दुर्दशा’ रचना है [2016]
(क) जयशंकर प्रसाद की
(ख) रामकुमार वर्मा की
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की
(घ) श्यामसुन्दर दास की.

(86) ‘वर्ण रत्नाकर’ के रचनाकार हैं [2017]
(क) मथुरानाथ शुक्ल
(ख) दौलतराम
(ग) रामप्रसाद निरंजनी
(घ) ज्योतिरीश्वर

(87) सरदार पूर्णसिंह किस युग के लेखक हैं? [2017]
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावाद युग
(घ) प्रगतिवाद युग

(88) डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी की रचना है [2017]
(क) चिन्तामणि
(ख) पंच परमेश्वर
(ग) कुटज
(घ) चन्द्रकान्ता

(89) वासुदेवशरण अग्रवाल की रचना है [2017]
(क) अन्तराल
(ख) त्रिशंकु
(ग) तट की खोज
(घ) वाग्धारा

(90) संस्मरण विधा की रचना है– [2017]
(क) दीप जले शंख बजे
(ख) बाजे पायलिया के घंघरू
(ग) अरे यायावर रहेगा याद
(घ) तब की बात और थी

(91) आलोचनात्मक कृति ‘कालिदास की लालित्य-योजना’ के लेखक हैं [2017]
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) मोहन राकेश
(ग) डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(92) ‘वारिस’ कहानी-संग्रह है [2017]
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का
(ख) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी का
(ग) मोहन राकेश का
(घ) “अज्ञेय’ का

(93) हरिशंकर परसाई की रचना है [2017]
(क) कल्पवृक्ष
(ख) धरती के फूल
(ग) तब की बात और थी
(घ) मेरे विचार

(94) डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखे गए निम्न ग्रन्थों में से हिन्दी साहित्य के इतिहास से सम्बन्धित ग्रन्थ नहीं है– [2017]
(क) हिन्दी साहित्य की भूमिका
(ख) हिन्दी साहित्य का आदिकाल
(ग) हिन्दी-साहित्य
(घ) चारुचन्द्र-लेख

(95) ‘भूले-बिसरे चेहरे’ रेखाचित्र के रचयिता हैं [2018]
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ख) अमृत राय
(ग) महावीरप्रसार द्विवेदी
(घ) राजेन्द्र यादव

(96) ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के लेखक हैं|
(क) मोहन राकेश
(ख) अज्ञेय
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) हरिशंकर परसाई

(97) निम्नलिखित में से किस निबन्ध-संग्रह की रचना हरिशंकर परसाई द्वारा की गई है? [2018]
(क) पगडण्डियों का जमाना
(ख) क्षण बोले कण मुस्काए
(ग) चिन्तामणि
(घ) बाजे पायलिया के मुँघरू

(98) ‘परीक्षा-गुरु’ के लेखक हैं [2018]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) सदल मिश्र
(ग) लक्ष्मण सिंह
(घ) लाला श्रीनिवास दास

(99) ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक के लेखक हैं [2018]
(क) प्रेमचन्द
(ख) लक्ष्मीनारायण मिश्र
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) धर्मवीर भारती

(100) ‘शेखर एक जीवनी’ के लेखक हैं [2018]
(क) भीष्म साहनी
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(घ) प्रेमचन्द

(101) ‘नासिकेतोपाख्यान’ के लेखक हैं– [2018]
(क) लल्लूलाल
(ख) सदासुखलाल
(ग) सदल मिश्र
(घ) इंशाअल्ला खाँ

(102) बालमुकुन्द गुप्त किस युग के लेखक थे? [2018]
(क) भातेन्दु युग के
(ख) द्विवेदी युग के
(ग) छायावादी युग के
(घ) प्रगतिवादी युग के

(103) श्यामसुन्दर दास की शैली है [2018]
(क) व्यास
(ख) समास
(ग) भावात्मक
(घ) व्यंग्यात्मक

(104) किसके गद्य में करुण संवेदना की प्रधानता है? [2018]
(क) माखनलाल चतुर्वेदी के
(ख) पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के
(ग) जयशंकर प्रसाद के
(घ) महादेवी वर्मा के

(105) निबन्ध प्रौढ़तम स्तर तक पहुँचा [2018]
(क) द्विवेदी युग में
(ख) शुक्ल युग में
(ग) शुक्लोत्तर युग में
(घ) प्रयोगवादी युग में

(106) किस रचना के लेखक प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी हैं? [2018]
(क)’वैचारिकी, शोध और बोध
(ख) “भारत की मौलिक एकता’
(ग) विचार और वितर्क’
(घ) आत्मनेपद

(107) मोहन राकेश की रचना नहीं है [2018]
(क) “लहरों के राजहंस’
(ख) ‘बकलमखुद
(ग) ‘तट की खोज’
(घ), ‘समय-सारथी

(108) ‘शिकायत मुझे भी है’ निबन्ध-संग्रह है– [2018]
(क) धर्मवीर भारती का
(ख) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का
(घ) हरिशंकर परसाई का

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