UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अन्य प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास अन्य प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास अन्य प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ

अन्य प्रमुख लेखक और उनकी रचनाएँ


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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा)

प्रश्न 1:
‘प्रायश्चित’ कहानी का सारांश या कथानक अपनी भाषा में लिखिए।
उत्तर:
‘प्रायश्चित’ कहानी प्रसिद्ध कथाकार भगवतीचरण वर्मा की यथार्थवादी व्यंग्यात्मक रचना है। इस कहानी का सारांश निम्नवत् है-

कबरी बिल्ली यदि किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से और अगर रामू की बहू घर भर में किसी से घृणा करती थी, तो कबरी बिल्ली से। उसकी अभी नयी-नयी शादी हुई थी और वह मायके से ससुराल आयी थी। चौदह वर्ष की ‘बालिका, कभी भण्डार-घर खुला है, तो कभी वहीं बैठे-बैठे सो गयी। कबरी बिल्ली को मौका मिलता, वह घी-दूध पर जुट जाती। रामू की बहू की जान आफत में और कबरी बिल्ली के मजे। रामू की बहू घी, दूध, दही, खीर छिपाते-छिपाते तंग आ गयी। जो भी बचता कबरी के पेट में। इस तरह रामू की बहू कबरी से पूरी तरह तंग आ गयी थी। उसने अपने मन में ठान लिया कि अब इस घर में या तो कबरी रहेगी या मैं। दोनों में मोरचाबन्दी हो गयी और दोनों सतर्क। कबरी के हौसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे।

एक दिन रामू की पत्नी ने रामू के लिए खीर बनायी। पिस्ता, बादाम, मखाने और तरह-तरह के मेवे दूध में औटाये गये। खीर से भरकर कटोरा कमरे में एक ऐसे ऊँचे स्थान पर रखा गया, जहाँ कबरी न पहुँच सके। उधर कबरी कमरे में आयी, नीचे खड़े होकर उसने ऊपर कटोरे की ओर देखा, सँघा, माल अच्छा है, ताक की ऊँचाई अन्दाजी और छलाँग लगायी। पंजा कटोरे में लगी और कटोरा झनझनाहट की आवाज के साथ फर्श पर गिरा। आवाज सुनकर रामू की बहू दौड़ी, देखा तो कबरी मजे के साथ खीर खा रही है। रामू की बहू को देखकर कबरी भाग गयी। रामू की बहू पर खून सवार हो गया। उसने कुछ सोचा और एक कटोरा दूध कमरे के दरवाजे पर रखकर चली गयी। हाथ में पाटा लेकर लौटी, तो देखती है कि कबरी दूध पर जुटी हुई है। सारा बल लगाकर पाटा उसने कबरी पर पटक दिया। कबरी हिली ने डुली, न चीखी न चिल्लायी, बस एकदम उलट गयी।

घर में मानो मातम छा गया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मिसरानी बोलीं-माँ जी, ‘बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है।’ पण्डित जी बुलवाये गये। काफी भाव-ताव के बाद पण्डित जी ने उपाय में 11 तोले सोने की बिल्ली, 21 दिन के पाठ, 21 रुपये दक्षिणा और 21 दिन दोनों वक्त का भोजन निश्चित किया। दान के लिए दस मन गेहूँ, एक मन चावल, एक मन दाल, मन भर तिल, पाँच मन जौ और पाँच मन चना, चार पसेरी घी, मन भर नमक निश्चित हुआ। ग्यारह तोले सोने की बिल्ली बनवाकर लाने के लिए पण्डित जी ने रामू की माँ से कहा कि अचानक महरी ने आकर कहा कि बिल्ली तो उठकर भाग गयी।

इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि चाहे कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी, सभी को उद्देश्य धन इकट्ठा करना है। इस कहानी में धर्मभीरुता, रूढ़िवादिता एवं पाखण्डवाद को प्रस्तुत करे स्पष्ट किया गया है कि इनके पीछे मूल कारण धन ही है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्वों के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘वातावरण’ एवं ‘भाषा-शैली के आधार पर प्रायश्चित कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
“प्रायश्चित’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी में चरित्र-चित्रण के कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी का शीर्षक कितना सार्थक है ? संक्षेप में लिखिए।
या
कथोपकथन की दृष्टि से ‘प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
श्री भगवतीचरण वर्मा हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार हैं। प्रायश्चित’ कहानी इनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। इस कहानी को स्वर यथार्थवाद है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से आधुनिक समाज में धर्म के नाम पर धन की लोलुपता को प्रस्तुत किया है। कहानी की तात्त्विक समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – इस कहानी का शीर्षक ‘प्रायश्चित है। ‘प्रायश्चित’ शीर्षक वास्तविक कथावस्तु की ओर इंगित करता है। शीर्षक में कौतूहले, सरलती, स्पष्टता, संक्षिप्तता और आकर्षण है। इससे कहानी के केन्द्रीय भाव की, झलक मिलती है, जो पाठक को कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। शीर्षक की दृष्टि से प्रायश्चित’ एक श्रेष्ठ रचना है। कहानी के अन्तर्गत प्रारम्भ से ‘अन्त तक यह जिज्ञासा बनी रहती है कि बिल्ली के मरने पर पण्डित परमसुख द्वारा रामू के परिवार को कितने रुपये का चूना लगाया गया।

(2) कथानक या कथावस्तु – इस कहानी का कथानक मध्यमवर्गीय ग्रामीण समाज से लिया गया है तथा पुरोहितों में धर्म के नाम पर धनं-हरण के प्रति बढ़ते हुए मोह को कहानी का आधार बनाया गया है। कहानी का प्रारम्भ घर में नयी बहू के आगमन और बिल्ली द्वारा दूध के बने व्यंजनों के येन-केन प्रकारेण चट कर जाने से है। बिल्ली के आये दिन के इस कार्य से नयी बहू परेशान हो जाती है और अन्ततः वह बिल्ली को मार देने का निर्णय करती है तथा उसे पर पाटा चला देती है। पण्डित परमसुख बुलाये जाते हैं और वह बिल्ली की हत्या का जो प्रायश्चित बताते हैं, वह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो कई लाख का बैठेगा। परिवारीजन इस बारे में विचार करते ही रहते हैं कि पता चलता है कि बिल्ली भाग गयी।

इस कहानी का कथानक रोचक, सरस, मौलिक, स्वाभाविक, सजीव और प्रभावशाली है। इसमें प्रारम्भ से अन्त तक कौतूहल बना रहता है। कहानी में कहानीकार ने तथाकथित पुरोहित वर्ग और उनके पौरोहित्य कर्म की पोल खोलकर रख दी है तथा सामाजिक रूढ़ियों और धर्मभीरुता के नाम पर शोषण की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त किया है। कहानी का अन्त आकर्षक है, जो पाठक पर अपना स्पष्ट प्रभाव छोड़ता है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण – यह कहानी एक मध्यमवर्गीय हिन्दू ग्रामीण-धर्मभीरु परिवार से सम्बन्धित है। कहानी में पात्रों की संख्या कम है। मुख्य पात्र रामू की बहू, कबरी बिल्ली, पण्डित परमसुख और रामू की माँ हैं। अन्य सभी पात्र–मिसरानी, छन्नू की दादी, महरी, किसनू की माँ आदि गौण पात्र हैं, जो केवल कथावस्तु को विस्तार देने के उद्देश्य से ही प्रयुक्त किये गये हैं। पात्रों के चरित्र-चित्रण में सांकेतिक प्रणाली को अपनाते हुए उनका मूल्यांकन पाठकों पर ही छोड़ दिया गया है। पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(4) कथोपकथन (संवाद-योजना) – कहानी की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण कथोपकथन की सार्थक योजना होती है। लेखक ने इस कहानी में सार्थक संवादों का प्रयोग किया है, जिसके आधार पर एक कुशल कहानीकार अपने पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालता है तथा कहानी की कथावस्तु का विकास करता है। प्रस्तुत कहानी के संवाद अत्यन्त संक्षिप्त और सार्थक हैं, उनमें नाटकीयता और सजीवता है। इस कहानी के संवाद सारगर्भित, संक्षिप्त, कहानी को गति देने वाले, वातावरण की सृष्टि तथा पात्रों की मन:स्थिति को स्पष्ट करने में सहायक है। कबरी के मरने पर जो प्रतिक्रिया पारिवारिक और अन्य लोगों के बीच हुई, वह भी स्वाभाविक है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

महरी बोली-“अरे राम! बिल्ली तो मर गयी, माँ जी, बिल्ली की हत्या बहू से हो गयी, यह तो बुरा हुआ।”
मिसरानी बोली”माँ जी, बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है। हम तो रसोई न बनावेंगी, जब तक बहू के सिर हत्या गुहेगी।”
सास जी बोलीं- “हाँ ठीक तो कहती हो, अब जब तक बहू के सिर से हत्या न उतर जाए, तब तक न तो कोई पानी पी सकता है, न खाना खा सकता है। बहू, यह क्या कर डाला?”

(5) देश-काल और वातावरण – प्रायश्चित कहानी को आधार ग्रामीण-सम्भ्रान्त एवं सम्पन्न परिवार है। ‘प्रायश्चित’ एक व्यंग्यमूलक कहानी है, जिसमें सामाजिक पात्रों की स्वार्थबद्धता पर लेखक ने विनोदपूर्ण एवं चुटीला व्यंग्य किया है तथा वातावरण को प्राणवान एवं प्रभावशाली बनाने के लिए विशेष सजगता का परिचय दिया है। रामू के घर का दृश्य ही पूरे घटनाक्रम के लिए पर्याप्त है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखण्डवाद, रूढ़िवाद और धर्मभीरुता का लेखक ने व्यंग्यपूर्ण वर्णन किया है। कहानी में आधुनिक समाज के वातावरण की सजीव दृष्टि मिलती है। आज के युग में व्यक्ति अत्यन्त स्वार्थी होता जा रहा है। बेईमानी और भ्रष्टाचार चारों ओर व्याप्त हैं। इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में देश-काल और वातावरण का सफलता के साथ चित्रण हुआ है।

(6) भाषा-शैली – इस कहानी की भाषा आम बोल-चाल की-सरल, सरस और स्वाभाविक है। लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग किया गया है। शैली पात्रों के अनुकूल है और उनके भावों को प्रकट करने वाली है, जिसमें व्यंग्यात्मकता का पुट सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

पण्डित परमसुख मुस्कराये, अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा”बिल्ली कितने तोले की बनवायी जाय? अरे रामू की माँ, शास्त्रों में तो लिखा है कि बिल्ली के वजन-भर सोने की बिल्ली बनवायी जाय, लेकिन अब कलियुग आ गया है, धर्म-कर्म को नाश हो गया है, श्रद्धा नहीं रही। सो रामू की माँ, बिल्ली के तोलभर की बिल्ली तो क्या बनेगी, क्योंकि बिल्ली बीस-इक्कीस सेर से कम की क्या होगी। हाँ, कम-से-कम इक्कीस तोले की बिल्ली बनवा के दान करवा दो और आगे तो अपनीअपनी श्रद्धा!”
रामू की माँ ने आँखें फाड़कर पण्डित परमसुख को देखा–“अरे बाप रे, इक्कीस तोला सोना! पण्डित जी यह तो बहुत है, तोलाभर की बिल्ली से काम न निकलेगा?”
पण्डित परमसुख हँस पड़े–’रामू की माँ! एक तोला सोने की बिल्ली! अरे रुपया का लोभ बहू से बढ़ गया? बहू के सिर बड़ा पाप है, इसमें इतना लोभ ठीक नहीं?”
वर्मा जी सफल कथाशिल्पी हैं और उनकी भाषा-शैली भावों तथा पात्रों के अनुकूल है।

(7) उद्देश्य – वर्मा जी की इस कहानी का उद्देश्य इस सत्य को अभिव्यंजित करना है कि वर्तमान में मनुष्य का लगाव मात्र धन में केन्द्रित है, शेष सभी रिश्ते-नाते नगण्य होते जा रहे हैं। कहानी में धर्मान्धता पर भी प्रहार किये गये हैं तथा समाज में व्याप्त रिश्वतखोरी, बेईमानी और मतलबपरस्ती पर भी यथार्थवादी व्यंग्यों का प्रहार करते हुए धर्मान्धता के वशीभूत हुए लोगों को इस पाश से निकालने का प्रयास किया गया है। लेखक को कहानी लिखने के उद्देश्य में पूर्ण सफलता मिली है। इस प्रकार प्रायश्चित’ कहानी लेखक की सफल यथार्थवादी रचना है। कहानी का आरम्भ, मध्य और समापन रोचक व औचित्यपूर्ण है। कहानी में अन्त तक यह कौतूहल बना रहता है कि प्रायश्चित में पण्डित परमसुख को क्या मिलेगा ? अन्त अप्रत्याशित और कलात्मक है। कहानी-कला की कसौटी पर ‘प्रायश्चित’ एक सफल, व्यंग्यात्मक तथा यथार्थवादी सामाजिक कहानी के रूप में खरी उतरती है।।

प्रश्न 3:
‘प्रायश्चित कहानी के आधार पर पण्डित परमसुख के चरित्र और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ के पण्डित परमसुख की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘प्रायश्चित’ कहानी भगवतीचरण वर्मा की एक श्रेष्ठ व्यंग्यप्रधान सामाजिक रचना है, जिसमें मानव के स्वभाव को सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। पण्डित परमसुख कहानी के प्रमुख पात्र हैं। कहानी के प्रारम्भ में बिल्ली की मृत्यु होने के बाद वे सम्पूर्ण कहानी पर छाये हुए हैं। उनके कर्मकाण्ड कम और पाखण्ड के द्वारा वर्मा जी ने उनके चरित्र को उजागर किया है। कहानी के आधार पर उनकी चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कर्मकाण्डी ब्राह्मण – पण्डित परमसुख एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण हैं। वह कर्मकाण्ड के स्थान पर प्रकाण्ड पाखण्ड में अधिक विश्वास रखते हैं। नित्य पूजा-पाठ करना उनको धर्म है। लोगों में उनके प्रति आस्था भी है। इसलिए बहू के द्वारा बिल्ली के मारे जाने पर रामू की माँ उन्हें ही बुलवाती है और प्रायश्चित का उपाय पूछती है।

(2) लालची – पण्डित परमसुख परम लालची हैं। लालच के वशीभूत होकर ही वह रामू की माँ को प्रायश्चित । के लिए पूजा और दान की इतनी अधिक सामग्री बताते हैं, जिससे उनके घर के छ: महीनों के अनाज का खर्च निकल जाए।

(3) पाखण्डी – पण्डित परमसुख कर्मकाण्डी कम पाखण्डी अधिक हैं। वह पाखण्ड के सहारे धन एकत्र करना चाहते हैं। बिल्ली के मरने की खबर सुनकर उन्हें प्रसन्नता होती है। जब उन्हें यह खबर मिली, उस समय वे पूजा कर रहे थे। खबर पाते ही वे उठ पड़े, पण्डिताइन से मुस्कराते हुए बोले–* भोजन न बनाना, लाला घासीराम की पतोहू ने बिल्ली मार डाली, प्रायश्चित होगा, पकवानों पर हाथ लगेगा।”

(4) व्यवहारकुशल और दूरदर्शी – पण्डित परमसुख को मानव-स्वभाव की अच्छी परख है। वे जानते हैं कि दान के रूप में किस व्यक्ति से कितना धन ऐंठा जा सकता है। इसीलिए वे पहले इक्कीस तोले सोने की बिल्ली के दान का प्रस्ताव रखते हैं, लेकिन बात कहीं बढ़ न जाए और यजमान कहीं हाथ से न निकल जाए, वे तुरन्त ग्यारह तोले पर आ जाते हैं।

(5) परम पेट्र – पण्डित परमसुख परम पेटू भी हैं। पाँच ब्राह्मणों को दोनों वक्त भोजन कराने के स्थान पर उन्हीं के द्वारा दोनों समय भोजन कर लेना उनके परम भोजनभट्ट होने का प्रमाण है।

(6) साम-दाम-दण्ड-भेद में प्रवीण – पण्डित परमसुख साम-दाम-दण्ड-भेद में अत्यधिक प्रवीण हैं। पूजा के सामान की सूची के बारे में पहले तो उन्होंने प्रेम से रामू की माँ को समझाया परन्तु जब वह ना-नुकुर करने लगी तो तुरन्त ही बिगड़कर अपना पोथी-पत्रा बटोरने लगे और पैर पकड़े जाने पर पुनः आसन जमाकर भोजनादि की बात करने लगे। इससे स्पष्ट होता है कि पण्डित जी इन चारों विद्याओं में निष्णात थे। स्पष्ट होता है कि पण्डित परमसुख उपर्युक्त वर्णित गुणों के मूर्तिमान स्वरूप थे।

प्रश्न 4:
“जिज्ञासा की उत्तरोत्तर वृद्धि ही अच्छी कहानी की पहचान है।” इस कथन के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक अच्छी कहानी आने वाली घटनाओं के प्रति पाठक के मन में उत्सुकता जगाती चलती है। इससे कहानी में पाठक की रुचि बनी रहती है। इसलिए कहानीकार का यह प्रयास रहता है कि उसकी कहानी में जिज्ञासा का तत्त्व अवश्य विद्यमान रहे, जिससे पाठक उसकी आगामी घटनाओं को जानने के लिए उत्सुक बना रहे। ऐसा होने पर पाठक उसे अन्त तक पढ़ने के लिए बेचैन रहता है। कहानी की इस विशेषता के आधार पर ‘प्रायश्चित’ एक अच्छी कहानी है। कहानी का प्रारम्भ बहुत सुन्दर और आकर्षक ढंग से हुआ है तथा पाठक अन्त तक यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि पण्डित परमसुख ने बिल्ली की मृत्यु के परिहार के लिए रामू की माँ को कितने सोना, अनाज, दक्षिणा और भोजन का चूना लगाया।
इस दृष्टि से ‘प्रायश्चित’ एक श्रेष्ठ कहानी है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास ‘गद्य गरिमा’ में संकलित लेखक

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Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास ‘गद्य गरिमा’ में संकलित लेखक
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास ‘गद्य गरिमा’ में संकलित लेखक

‘गद्य गरिमा’ में संकलित लेखक

ध्यातव्य-गद्य गरिमा’ में संकलित सभी लेखकों की प्रमुख रचनाओं और रचना-विधाओं का उल्लेख नीचे किया जा रहा है। प्रथम प्रश्न-पत्र के अन्तर्गत पूछे जा रहे बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर हेतु इनका अध्ययन आवश्यक होगा। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे गद्य गरिमा’ और ‘कथा- भारती पाठ्यपुस्तकों में दी गयी भूमिका, लेखक-परिचय आदि का भी सम्यक् अध्ययन करे। इनमें भी आपको बहुविकल्पीय प्रश्नों से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होगी। 

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर).

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Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)
Number of Questions 4
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)

प्रश्न 1.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) का संक्षेप में परिचय लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘रश्मिरथी’ की कथा (सारांश) अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 16]
या
‘रश्मिरथी’ के प्रथम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2017, 18]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2016, 18]
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2013, 14, 15, 16]
या
‘रश्मिरथी’ के द्वितीय और तृतीय सर्ग में कृष्ण और कर्ण के संवाद में दोनों के चरित्र की कौन-सी प्रमुख विशेषताएँ प्रकट हुई हैं ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु का संक्षेप में सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग में कुन्ती-कर्ण के संवाद का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15]
या
‘रश्मिरथी’ के पाँचवें (पंचम) सर्ग की कथा (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 16]
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर उसके प्रथम और द्वितीय सर्गों की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर सप्तम सर्ग (कर्ण के बलिदान) की कथा संक्षेप में लिखिए। [2011, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘रश्मिरथी’ में वर्णित कर्ण और अर्जुन के युद्ध का सोदाहरण वर्णन कीजिए। [2010, 11]
उत्तर
श्री रामधारीसिंह ‘दिनकर’ द्वारा विरचित खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। इस काव्य में परमवीर एवं दानी कर्ण की कथा है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभाजित है, जो संक्षेप में निम्नवत् है-

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन

प्रथम सर्ग के आरम्भ में कवि ने अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र पुरुषों की पृष्ठभूमि बनाकर कर्ण का परिचय दिया है। कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। कर्ण कुन्ती के गर्भ से कौमार्यावस्था में उत्पन्न हुए थे, इसलिए कुन्ती ने लोकलाज के भय से उस नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे एक निम्न जाति (सूत) के व्यक्ति ने पकड़ लिया और उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण शूरवीर, शीलवान, पुरुषार्थी और शस्त्र व शास्त्र मर्मज्ञ बने।
एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र-कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। सभी लोग अर्जुन की बाण-विद्या पर मुग्ध हो गये, किन्तु तभी धनुष-बाण लिये कर्ण भी सभा में उपस्थित हो गया और उसने अर्जुन को द्वन्द्व-युद्ध के लिए चुनौती दी

आँख खोलकर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार ।
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कारे ॥

कर्ण की इस चुनौती से सम्पूर्ण सभा आश्चर्यचकित रह गयी, तभी कृपाचार्य ने उसका नाम, जाति और गोत्र पूछे। इस पर कर्ण ने अपने को सूत-पुत्र बतलाया। फिर कृपाचार्य ने कहा कि राजपुत्र अर्जुन से समता प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले कहीं का राज्य प्राप्त करना चाहिए। इस पर दुर्योधन ने कर्ण की वीरता से मुग्ध होकर, उसे अंगदेश का राजा बना दिया और अपना मुकुट उतारकर कर्ण के सिर पर रख दिया। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन गया। इधर कौरव कर्ण को ससम्मान अपने साथ ले जाते हैं और उधर कुन्ती भाग्य की दु:खद विडम्बना पर मन मसोसती लड़खड़ाती हुई अपने रथ के पास पहुँचती है।

द्वितीय सर्ग : आश्रमवास

द्वितीय सर्ग का आरम्भ परशुराम के आश्रम-वर्णन से होता है। पाण्डवों के विरोध के कारण द्रोणाचार्य ने जब कर्ण को अपना शिष्य नहीं बनाया तो कर्ण परशुराम के आश्रम में धनुर्विद्या सीखने के लिए जाता है। परशुराम क्षत्रियों को शिक्षा नहीं देते थे। कर्ण के कवच और कुण्डल देखकर परशुराम ने उसे ब्राह्मण कुमार समझा और अपना शिष्य बना लिया।

एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे कि तभी एक विषैला कीट कर्ण की जंघा को काटने लगा। गुरु की निद्रा न खुल जाए, इस कारण कर्ण अपने स्थान से हिला तक नहीं। जंघा से बहते रक्त की धारा के स्पर्श से परशुराम की निद्रा टूट गयी। कर्ण की इस अद्भुत सहनशक्ति को देखकर परशुराम ने कहा कि ब्राह्मण में इतनी सहनशक्ति नहीं होती, इसलिए तू अवश्य ही क्षत्रिय या अन्य जाति का है। कर्ण स्वीकार कर लेता है कि मैं सूत-पुत्र हूँ। क्रुद्ध परशुराम ने उसे तुरन्त अपने आश्रम से चले जाने को कहा और शाप दिया कि मैंने तुझे जो ब्रह्मास्त्र विद्या सिखलायी है, तू अन्त समय में उसे भूल जाएगा-

सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा शाप समय पर, उसे भूल तू जाएगा ।

कर्ण गुरु की चरणधूलि लेकर आँसू भरे नेत्रों से आश्रम छोड़कर चल देता है।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश

कौरवों से जुए में हारने के कारण पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ा। तेरह वर्ष की यह अवधि व्यतीत कर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं। पाण्डवों की ओर से श्रीकृष्ण कौरवों से सन्धि का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाते हैं। श्रीकृष्ण ने कौरवों को बहुत समझाया, परन्तु दुर्योधन ने सन्धि- प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा उल्टे श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का असफल प्रयास किया।

दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया कि अब तो युद्ध निश्चित है, परन्तु उसे टालने का एकमात्र यही उपाय है कि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दो; क्योंकि तुम कुन्ती-पुत्र हो। अब तुम ही इस । भारी विनाश को रोक सकते हो। इस पर कर्ण आहत होकर व्यंग्यपूर्वक पूछता है कि आप आज मुझे कुन्ती–पुत्र बताते हैं। उस दिन क्यों नहीं कहा था, जब मैं जाति-गोत्रहीन सूत-पुत्र बना भरी सभा में अपमानित हुआ था। मुझे स्नेह और सम्मान तो दुर्योधन ने ही दिया था। मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है।

फिर भी आप मेरे जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को मत बताइएगा; क्योंकि मेरे जन्म का रहस्य जानने पर वे ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अपना राज्य मुझे दे देंगे और मैं वह राज्य दुर्योधन को दे डालूंगा-

धरती की तो है क्या बिसात ?
आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ ।
उसको भी न्यौछावर कर दें,
कुरुपति के चरणों पर धर हूँ॥

इतना कहकर और श्रीकृष्ण को प्रणाम कर कर्ण चला जाता है।
इस सर्ग की कथा से जहाँ हमें श्रीकृष्ण के महान् कूटनीतिज्ञ और अलौकिक शक्तिसम्पन्न होने की विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है वहीं कर्ण के अन्दर हमें सच्चे मित्र और मित्र के प्रति कृतज्ञ होने के गुण दिखाई पड़ते हैं।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

इस सर्ग में कर्ण की उदारता एवं दानवीरता का वर्णन किया गया है। कर्ण प्रतिदिन एक प्रहर तक याचकों को दान देता था। श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि जब तक कर्ण के पास सूर्य द्वारा प्रदत्त कवच और कुण्डल हैं, तब तक कर्ण को कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास उसकी दानशीलता की परीक्षा लेने आये और कर्ण से उसके कवच और कुण्डल दान में माँग लिये। यद्यपि कर्ण ने छद्मवेशी इन्द्र को पहचान लिया, तथापि उसने इन्द्र को कवच और कुण्डल भी दान दे दिये। कर्ण की इस अद्भुत दानशीलता को देख देवराज इन्द्र का मुख ग्लानि से मलिन प्रड़ गया–

अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला।
देवराज का मुखमण्डल पड़ गया ग्लानि से काला ॥

इन्द्र ने कर्ण की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कर्ण को महादानी, पवित्र एवं सुधी कहा तथा स्वयं को प्रवंचक, कुटिल व पापी बताया और कर्ण को एक बार प्रयोग में आने वाला अमोघ एकघ्नी अस्त्र प्रदान किया।

पंचम सर्ग : माता की विनती

इस सर्ग का आरम्भ कुन्ती की चिन्ता से होता है। कुन्ती इस कारण चिन्तित है कि रण में मेरे पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। कुन्ती व्याकुल हो कर्ण से मिलने जाती है। उस समय कर्ण सन्ध्या कर रहा था, आहट पाकर कर्ण का ध्यान टूट जाता है। उसने कुन्ती को प्रणामकर उसका परिचय पूछा। कुन्ती ने बताया कि तू सूत-पुत्र नहीं मेरा पुत्र है। तेरा जन्म मेरी कोख से तब हुआ था, जब मैं अविवाहिता थी। मैंने लोक-लज्जा के भय से तुझे मंजूषा (पेटी) में रखकर नदी में बहा दिया था, परन्तु अब मैं यह सहन नहीं कर सकती कि मेरे ही पुत्र एक-दूसरे से युद्ध करें; अतः मैं तुझसे प्रार्थना करने आयी हूँ कि तुम अपने छोटे भ्राताओं के साथ मिलकर राज्य का भोग करो।

कर्ण ने कहा कि मुझे अपने जन्म के विषय में सब कुछ ज्ञात है, परन्तु मैं अपने मित्र दुर्योधन का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। असहाय कुन्ती ने कहा कि तू सबको दान देता है, क्या अपनी माँ को भीख नहीं दे सकता ? कर्ण ने कहा कि माँ! मैं तुम्हें एक नहीं चार पुत्र दान में देता हूँ। मैं अर्जुन को छोड़कर तुम्हारे किसी पुत्र को नहीं मारूंगा। यदि अर्जुन के हाथों मैं मारा गया तो तुम पाँच पुत्रों की माँ रहोगी ही, परन्तु यदि मैंने युद्ध में अर्जुन को मार दिया तो विजय दुर्योधन की होगी और मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तब भी तुम पाँच पुत्रों की ही माँ रहोगी। कुन्ती निराश मन लौट आती है-

हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर, दो बिन्दु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर ।
बेटे का मस्तक सँघ बड़े ही दुःख से, कुन्ती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से ।।

षष्ठ सर्ग : शक्ति-परीक्षण

युद्ध में आहत भीष्म शर-शय्या पर पड़े हुए हैं। कर्ण उनसे युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म पितामह उसे नर-संहार रोकने के लिए समझाते हैं, परन्तु कर्ण नहीं मानता और भीषण युद्ध आरम्भ हो जाता है। कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारता है, किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ कर्ण के सामने ही नहीं आने देते; क्योंकि उन्हें भय है कि कर्ण एकघ्नी का प्रयोग करके अर्जुन को मार देगा। अर्जुन को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने भीम-पुत्र घटोत्कचे को युद्धभूमि में उतार दिया। घटोत्कच ने घमासान युद्ध किया, जिससे कौरव-सेना अहि-त्राहि कर उठी। अन्ततः दुर्योधन ने कर्ण से कहा-

हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का अचिर किसी विधि त्राण करो,
जब नहीं अन्य गति, आँख मूंद एकघ्नी का सन्धान करो ।
अरि का मस्तक है दूर, अभी अपनों के सीस बचाओ तो,
जो मरण-पाश है पड़ा प्रथम, उसमें से हमें छुड़ाओ तो ॥

कर्ण ने भारी नरसंहार करते हुए घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग कर दिया, जिससे घटोत्कच मारा गया। घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से अर्जुन अभय हो गया। आज युद्ध में विजयी होने पर भी कर्ण एकत्री का प्रयोग हो जाने से स्वयं को मन-ही-मन पराजित-सा मान रहा था।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा

‘रश्मिरथी’ का यह अन्तिम सर्ग है। कौरव सेनापति कर्ण ने पाण्डवों की सेना पर भीषण आक्रमण किया। कर्ण की गर्जना से पाण्डव सेना में भगदड़ मच जाती है। युधिष्ठिर युद्धभूमि से भागने लगते हैं तो कर्ण उन्हें पकड़ लेता है, किन्तु कुन्ती को दिये वचन का स्मरण कर युधिष्ठिर को छोड़ देता है। इसी प्रकार भीम, नकुल और सहदेव को भी पकड़-पकड़कर छोड़ देता है। कर्ण का सारथी शल्य उसके रथ को अर्जुन के रथ के निकट ले आता है। कर्ण के भीषण बाण-प्रहार से अर्जुन मूर्च्छित हो जाता है। चेतना लौटने पर श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः कर्ण से युद्ध करने के लिए उत्तेजित करते हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। तभी कर्ण के रथ का पहिया रक्त के कीचड़ में फँस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है। इसी समय श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण-प्रहार करने के लिए कहते हैं

खड़ा है देखता क्या मौन भोले !
शरासन तान, बस अवसर यही है, घड़ी फिर और मिलने की नहीं है।
विशिख कोई गले के पार कर दे, अभी ही शत्रु का संहार कर दे।

कर्ण धर्म की दुहाई देता है तो श्रीकृष्ण उसे कौरवों के पूर्व कुकर्मों का स्मरण दिलाते हैं। इसी वार्तालाप में अवसर देखकर अर्जुन कर्ण पर प्रहार कर देता है और कर्ण की मृत्यु हो जाती है।
अन्त में युधिष्ठिर आदि सभी कर्ण की मृत्यु पर प्रसन्न हैं, किन्तु श्रीकृष्ण दु:खी हैं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि विजय तो अवश्य मिली, पर मिली मर्यादा खोकर। वास्तव में चरित्र की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहा। आप लोग कर्ण को भीष्म और द्रोणाचार्य की भाँति ही सम्मान दीजिए। यहाँ पर इस खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

[विशेष-मुझे इस सर्ग की कथा सर्वाधिक रुचिकर प्रतीत हुई। इस सर्ग में वर्णित कर्ण के शौर्य व साहस की तुलना इतिहास में विरले है। व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किस प्रकार पतित हो जाता है, भले ही वह ‘धर्मराज’ कहलाता हो अथवा ‘भगवान्’। यह यहाँ इतनी कलात्मकता से दर्शाया गया है कि मन नि:स्पन्द हो जाता है। अन्त में कर्ण की मृत्यु को ‘जीवन’ और ‘विजय’ से कहीं ऊँचा सिद्ध करते हुए कृष्ण कहते हैं-

दया कर शत्रु को भी त्राण देकर, खुशी से मित्रता कर प्राण देकर,
गया है कर्ण भू को दीन करके, मनुज-कुल को बहुत बलहीन करके।
x                                          x                                                  x
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए,
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है।

वस्तुत: कर्ण जैसा व्यक्ति और व्यक्तित्व स्रष्टा ने अभी तक कोई अन्य बनाया ही नहीं। वह अपनी तुलना आप है।)

प्रश्न 2.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर नायक (प्रमुख पात्र) कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण की वीरता एवं त्याग का वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव तथा शौर्य का चित्रण है। सिद्ध कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016, 17]
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के माध्यम से कवि ‘दिनकर’ ने महारथी कर्ण के किन गुणों पर प्रकाश डाला है ? अपने शब्दों में लिखिए। [2010]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में वर्णित कर्ण की संवेदना पर प्रकाश डालिए। [2012]
या
“‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में कर्ण के समक्ष अन्य सभी पात्र निस्तेज हो गये हैं।” इस उक्ति के प्रकाश में कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब इसे तोल सकता है धन ?” कथन के आधार पर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2010]
या
‘रश्मिरथी’ के कर्ण के व्यक्तित्व का निरूपण कीजिए। [2010]
उत्तर
‘रश्मिरथी’ कर्ण के चरित्र पर आधारित खण्डकाव्य है। कर्ण का चरित्र शील की प्रतिमूर्ति, शौर्य व पौरुष का अगाध सिन्धु, शक्ति का स्रोत, सत्य-साधना-दान-त्याग का तपोवन तथा आर्य-संस्कृति का आलोकमय तेज है। कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायक—कर्ण ‘रश्मिरथी’ का नायक है। काव्य की सम्पूर्ण कथा कर्ण के ही चारों ओर घूमती है। काव्य का नामकरण भी कर्ण को ही नायक सिद्ध करता है। ‘रश्मिरथी’ का अर्थ है-वह मनुष्य, जिसका रथ रश्मि अर्थात् पुण्य का हो। इस काव्य में कर्ण का चरित्र ही पुण्यतम है। कर्ण के आगे अन्य किसी पात्र का चरित्र नहीं ठहर पाता। कर्ण के सम्बन्ध में कवि के ये शब्द द्रष्टव्य हैं

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी ।
जाति गोत्र का नहीं, शील का पौरुष का अभिमानी ॥

(2) साहसी और वीर योद्धा-इस खण्डकाव्य के आरम्भ में ही कर्ण हमें एक वीर योद्धा के रूप में दिखाई देता है। शस्त्र-विद्या-प्रदर्शन के समय वह प्रदर्शन-स्थल पर उपस्थित होकर अर्जुन को ललकारता है। तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। जब इस पर कृपाचार्य कर्ण से उसकी जाति-गोत्र आदि पूछते हैं तो कर्ण उन्हें सटीक उत्तर देता है–

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुज बल से।
रवि-समान दीपित ललाट से, और कवच कुण्डल से ॥

(3) सच्चा मित्र-दुर्योधन ने जाति-अपमान से कर्ण की रक्षा उसे राजा बनाकर की, तभी से कर्ण दुर्योधन का अभिन्न मित्र बन गया। कृष्ण और कुन्ती के समझाने पर भी कर्ण दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। वह स्पष्ट शब्दों में कह देता है-

धरती की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें, कुरुपति के चरणों पर धर हूँ ॥

और अन्त समय तक कर्ण अपनी मित्रता के प्रति पूर्ण समर्पित रहता है।

(4) सच्चा गुरुभक्त-कर्ण गुरु के प्रति परम विनयी एवं श्रद्धालु है। कीट कर्ण की जाँघ काटकर भीतर घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, पर कर्ण पैर नहीं हिलाता; क्योंकि हिलने से उसकी जाँघ पर सिर रखकर सोये गुरु की नींद खुल जाएगी। आँखें खुलने पर गुरु को वह अपनी जाति-गोत्र बता देता है। तो वे क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, परन्तु कर्ण अपनी विनय नहीं छोड़ता और जाते समय गुरु की चरण-धूलि लेता है-

परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें, अपने हृदय की भक्ति देकर,
निराशा से विकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-शृंग से छूटा हुआ-सा ।।

(5) परम दानवीर-कर्ण के चरित्र की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह धन-सम्पत्ति की लिप्सा से मुक्त है। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या-वन्दन करने के बाद वह याचकों को दान देता है। ब्राह्मण-वेश में आये इन्द्र को वह अपने जीवन-रक्षक कवच और कुण्डल तक दान में दे देता है। अपनी माता कुन्ती को युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को न मारने का अभयदान देता है। कर्ण की दानशीलता के सम्बन्ध में कवि कहता है-

रवि-पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था।
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।

(6) महान् सेनानी–कौरवों की ओर से कर्ण महाभारत के युद्ध में सेनापति है। वह शर-शय्या पर लेटे भीष्म पितामह से युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म उसके विषय में कहते हैं-

अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे। तुम मिले कौरवों को वैसे ॥

युद्ध में कर्ण ने अपने रण-कौशल से पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। उसकी वीरता की प्रशंसा करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-

दाहक प्रचण्ड इसका बल है। यह मनुज नहीं कालानल है॥

(7) जाति-प्रथा का विरोधी-कर्ण को जाति और गोत्र के कारण ही भरी सभा में अपमानित होना पड़ा था। इसी कारण उसके मन में जाति और गोत्र के प्रति गहरा विषाद था। इस सम्बन्ध में कर्ण की तिलमिलाहट बड़ी मार्मिक है-

ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले।
शरमाते हैं नहीं जगत् में, जाति पूछने वाले ॥

(8) कृतज्ञ-कर्ण के चरित्र में कृतज्ञता का बड़ा गुण विद्यमान है। जब उसे यह पता लग जाता है कि उसकी माता राजरानी कुन्ती है तो भी वह निम्न जाति राधा के उपकार को नहीं भुलाता; जिसने उसका पालन-पोषण किया था। दुर्योधन ने उसे अंगदेश का राज्य देकर राजपुत्रों के साथ युद्ध का अधिकारी बनाया था, उसके उपकार को भी वह जीवनभर नहीं भुला पाता।

(9) मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त–आरम्भ से अन्त तक कर्ण को मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से जूझना पड़ता है। जीवन के प्रत्येक पग पर उसके सामने एक ही प्रश्न खड़ा होता है कि वह अब क्या करे ? शस्त्र-कौशल के समय उसका नाम, जाति तथा गोत्र पूछने पर, द्रोण द्वारा अपना शिष्य न बनाये जाने पर, परशुराम की सेवा करते समय अपनी सहनशक्ति के प्रदर्शन पर, गुरु परशुराम द्वारा शाप देने पर वह दुविधाग्रस्त हो जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा उसको उसके जन्म का रहस्य समझाने पर और पाण्डवों के पक्ष में कौरवों का साथ छोड़ देने के लिए कहने पर, माता कुन्ती द्वारा जन्म का रहस्य समझाने तथा कौरवों का साथ छोड़ अपने भाइयों से मिल जाने के लिए कहने आदि अनेक अवसरों पर कर्ण भयंकर अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त हो जाता है; किन्तु वह प्रत्येक अवसर पर विवेक और धैर्य से अपने अन्तर्द्वन्द्व पर विजय प्राप्त कर; अन्तत: सही निर्णय लेकर अपना मार्ग प्रशस्त करता है।

(10) अन्य विशेषताएँ–कर्ण महाभारत के युद्ध में मारा जाता है, किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण उसकी चारित्रिक विशेषताओं का गुणगान करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं-

हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का, दलित हारक, समुद्धारक त्रिया का।
बड़ां बेजोड़ दानी था, सदय था, युधिष्ठिर! कर्ण का अद्भुत हृदय था ।
x                                                   x                                          x
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए ।
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है ॥

इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव एवं शौर्य को चित्रण करना रहा है, जिसके लिए उसने कर्ण को राज्य और विजय की गलत महत्त्वाकांक्षाओं से पीड़ित न दिखाकर षड्यन्त्रों, परीक्षाओं और प्रलोभनों की स्थितियों में उसे अडिग चित्रित किया है। यही स्थिति उसको खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती है।

प्रश्न 3.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘रश्मिरथी के आधार पर कृष्ण के विराट् व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘कृष्ण’ की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2015)
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कृष्ण के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर
रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं—

(1) युद्ध-विरोधी-पाण्डवों के वनवास से लौटने के बाद श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए स्वयं हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध टालने का भरसक प्रयास कर करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। इसके बाद वे कर्ण को भी समझाते हैं, परन्तु कर्ण भी अपने प्रण से नहीं हटता। अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं-

यश मुकुट मान सिंहासन ले, बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तज रण रोक सखे, भू का हर भावी शोक सखे ।

(2) निर्भीक एवं स्पष्टवादी-श्रीकृष्ण केवल अनुनय-विनय ही करना नहीं जानते, वरन् वे निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता भी हैं। जब दुर्योधने समझाने से नहीं मानता तो वे उसे चेतावनी देते हुए कहते हैं-

तो ले मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ ।
याचना नहीं अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।

(3) शीलवान व व्यावहारिक-श्रीकृष्ण के सभी कार्य उनके शील के परिचायक हैं। वास्तव में वे एक सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं। वे शील को ही जीवन का सार मानते हैं-

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है, विभा का सार शील पुनीत में है।

साथ ही वह सांसारिक सिद्धि और सफलता के सभी सूत्रों से भी अवगत हैं।

(4) गुणों के प्रशंसक-श्रीकृष्ण अपने विरोधी के गुणों का भी आदर करते हैं। कर्ण उनके विरुद्ध लड़ता है, परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण का गुणगान करते नहीं थकते-

…………………वीर शत बार धन्य, तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

(5) महान् कूटनीतिज्ञ-श्रीकृष्ण महान् कूटनीतिज्ञ हैं। पाण्डवों की विजय श्रीकृष्ण की कूटनीति के कारण ही हुई। वे पाण्डवों की ओर के कूटनीतिज्ञ की कार्य कर दुर्योधन की बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का प्रमाण कर्ण से कहा गया उनका यह कथन है-

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ, बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम, तेरा अभिषेक करेंगे हम ॥

(6) अलौकिक शक्तिसम्पन्न–कवि ने श्रीकृष्ण के चरित्र में जहाँ मानव-स्वभाव के अनुरूप अनेक साधारण विशेषताओं का समावेश किया है, वहीं उन्हें अलौकिक शक्ति-सम्पन्न रूप देकर लीलापुरुष भी सिद्ध किया हैं। जब दुर्योधन उन्हें कैद करना चाहता है, तब वे अपने विराट स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं-

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।
डगमग डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ाकर साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे।”

इस प्रकार इस खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ, किन्तु महान् लोकोपकारक के रूप में चित्रित करके कवि ने उनके पौराणिक चरित्र को युगानुरूप बनाकर प्रस्तुत किया है। कवि के इस प्रस्तुतीकरण की विशेषता यह है कि इससे कहीं भी उनके पौराणिक स्वरूप को क्षति नहीं पहुंची है। कृष्ण का यह व्यक्तित्व कवि की कविता में युगानुसार प्रकट हुआ है।

प्रश्न 4.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 16, 17, 18]
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के किसी नारी पात्र के चरित्र का चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के मातृत्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में प्रस्तुत कुन्ती के मन की घुटन का विवेचन कीजिए।
उत्तर
कुन्ती पाण्डवों की माता है। अविवाहिता कुन्ती के गर्भ से सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छ: पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) वात्सल्यमयी माता–कुन्ती को जब यह ज्ञात होता है कि कर्ण को उसके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है तो वह कर्ण को मनाने उसके पास पहुँच जाती है। उस समय कर्ण सूर्य की उपासना कर रहा था। अपने पुत्र कर्ण के तेजोमय रूप को देख कुन्ती फूली नहीं समाती। सन्ध्या से आँखें खोलने पर कर्ण स्वयं को राधा का पुत्र बताता है तो कुन्ती यह सुनकर व्याकुल हो जाती है-

रे कर्ण! बेध मत मुझे निदारुण शर से।
राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है ॥

कर्ण के पास से निराश लौटती हुई कुन्ती कर्ण को अपने अंक में भर लेती है, जो उसके वात्सल्य का प्रमाण है।

(2) अन्तर्द्वन्द्व ग्रस्त-जेब कुन्ती के ही पुत्र परस्पर शत्रु बने खड़े हैं, तब कुन्ती के हृदय में अन्तर्द्वन्द्र । भीषण आँधी उठ रही थी। वह इस समय बड़ी ही उलझन में पड़ी हुई हैं। पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की हानि हो, पर वह हानि तो कुन्ती की ही होगी। वह अपने पुत्रों का सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख समझती है-

दो में किसका उर फटे, फटॅगी मैं ही।
जिसकी भी गर्दन कटे, कहूँगी मैं ही ॥

(3) समाज-भीरु-कुन्ती लोक-लाज से बहुत अधिक भयभीत एक भारतीय नारी की प्रतीक है। कौमार्यावस्था में सूर्य से उत्पन्न नवजात शिशु (कर्ण) को वह लोक-निन्दा के भय से गंगा की लहरों में बहा देती है। इस बात को वह कर्ण के समक्ष भी स्वीकार करती है–

मंजूषा में धर वज्र कर मन को,
धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को ।

कर्ण को युवा और वीरत्व की प्रतिमूर्ति बने देखकर भी अपनी पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सम्मुख आ जाती है, तो वह कर्ण से अपनी दयनीय स्थिति को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त करती है-

बेटा धरती पर बड़ी दीन है नारी,
अबला होती, सचमुच योषिता कुमारी ।
है कठिन बन्द करना समाज के मुख को,
सिर उठा न पा सकती पतिता निज सुख को ।

(4) निश्छल-कुन्ती का हृदय छलरहित है। वह कर्ण के पास मन में कोई छल रखकर नहीं, वरन् निष्कपट भाव से गयी थी। यद्यपि कर्ण उसकी बातें स्वीकार नहीं करता, किन्तु कुन्ती उसके प्रति अपना ममत्व कम नहीं करती।

(5) बुद्धिमती और वाक्पटु–कुन्ती एक बुद्धिमती नारी है। वह अवसर को पहचानने तथा दूरगामी परिणाम का अनुमान करने में समर्थ है। कर्ण-अर्जुन युद्ध का निश्चय जानकर वह समुचित कदम उठाती है–

सोचा कि आज भी चूक अगर जाऊँगी, भीषण अनर्थ फिर रोक नहीं पाऊँगी।
फिर भी तू जीता रहे, न अपयश जाने, अब आ क्षणभर मैं तुझे अंक में भर लें ॥

इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में कई उच्चकोटि के गुणों के साथ-साथ मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करके, इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)

प्रश्न 1.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 15, 16, 17, 18]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में वर्णित अत्यधिक मार्मिक प्रसंग का निरूपण कीजिए।
या
“‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा महाभारत के द्रौपदी चीर-हरण की संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है”, सिद्ध कीजिए। (2013)
या
“‘सत्य की जीत के आधार पर चीर-हरण प्रसंग का वर्णन कीजिए। [2015]
या
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन एवं विकर्ण के शस्त्र एवं शास्त्र सम्बन्धी विचारों की सम्यक् विवेचना कीजिए। (2010]
या
‘सत्य की जीत’ नामक खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का सारांश लिखिए। [2015] ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी चीर-हरण’ घटना अपने शब्दों में लिखिए। [2018]
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण से सम्बद्ध है। यह कथानक महाभारत के सभापर्व में द्यूतक्रीड़ा की घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघुकाव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। इसकी कथा संक्षेप में अग्रवत् है-

दुर्योधन पाण्डवों को छूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है। पाण्डव उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं और अन्त में अपना सर्वस्व हारने के पश्चात् द्रौपदी को भी हार जाते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दुर्योधन दु:शासन को आदेश देता है कि वह बलपूर्वक द्रौपदी को भरी सभा में लाये। दु:शासन राजमहल से द्रौपदी के केश खींचते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी को यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सिंहनी के समान गरजती हुई दु:शासन को ललकारती है। द्रौपदी की गर्जना से पूरा राजमहल हिल जाता है। और समस्त सभासद स्तब्ध रह जाते हैं–

ध्वंस विध्वंस प्रलय का दृश्य, भयंकर भीषण हा-हाकार।
मचाने आयी हूँ रे आज, खोल दे राजमहल का द्वार ।

इसके पश्चात् द्रौपदी और दु:शासन में नारी पर पुरुष द्वारा किये गये अत्याचार, नारी और पुरुष की सामाजिक समानता और उनके अधिकार, उनकी शक्ति, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शस्त्र और शास्त्र, न्याय-अन्याय आदि विषयों पर वाद-विवाद होता है। अहंकारी दुःशासन भी क्रोध में आ जाता है। ‘भरी सभा में युधिष्ठिर अपना सर्वस्व हार चुके हैं तो मुझे दाँव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार रह गया है’ ? द्रौपदी के इस तर्क से सभी सभासद प्रभावित होते हैं। वह युधिष्ठिर की सरलता और दुर्योधन आदि कौरवों की कुटिलता का भी रहस्य प्रकट करती है। वह कहती है कि सरल हृदय युधिष्ठिर कौरवों की कुटिल चालों में आकर छले गये हैं; अत: सभा में उपस्थित धर्मज्ञ यह निर्णय दें कि क्या वे अधर्म और कपट की विजय को स्वीकार करते हैं अथवा सत्य और धर्म की हार को अस्वीकार करते हैं ?

दुःशासन कहता है कि शास्त्र-बल से बड़ा शस्त्र-बल होता है। कर्ण, शकुनि और दुर्योधन, दुःशासन के इस कथन का पूर्ण समर्थन करते हैं। नीतिवान् विकर्ण दु:शासन की शस्त्र-बल की नीति का विरोध करता। है। वह कहता है कि यदि शास्त्र-बल से शस्त्र-बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण हो जाएगा तो मानवता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा; क्योंकि शस्त्र बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह इस बात पर बल देता है कि द्रौपदी द्वारा प्रस्तुत तर्क पर धर्मपूर्वक और न्यायसंगत निर्णय होना चाहिए। वह कहता है कि द्रौपदी किसी प्रकार भी कौरवों द्वारा जीती हुई नहीं है।

किन्तु कौरव ‘विकर्ण’ की बात को स्वीकार नहीं करते। हारे हुए युधिष्ठिर अपने उत्तरीय वस्त्र उतार देते हैं। दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है। वह कहती है कि मैं किसी प्रकार भी विजित नहीं हूँ और उसके प्राण रहते उसे कोई भी निर्वस्त्र नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दु:शासन द्रौपदी का चीर खींचने के लिए पुन: हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसके दुर्गा-जैसे तेजोद्दीप्त भयंकर रौद्र-रूप को देख दु:शासन घबरा जाता है और उसके वस्त्र खींचने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

द्रौपदी कौरवों को पुन: चीर-हरण करने के लिए ललकारती है। सभी सभासद द्रौपदी के सत्य, तेज और सतीत्व के आगे निस्तेज हो जाते हैं। वे सभी कौरवों की निन्दा तथा द्रौपदी के सत्य और न्यायपूर्ण पक्ष का समर्थन करते हैं। मदान्ध दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण आदि को द्रौपदी पुनः ललकारती हुई कहती है-

और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे कितना लग जाय ॥

वहाँ उपस्थित सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं; क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को आज रोका नहीं गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।

अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और पाण्डवों को मुक्त करने तथा उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को आदेश देते हैं। इसके साथ ही वे द्रौपदी का पक्ष लेते हुए उसका समर्थन करते हैं तथा सत्य, न्याय, धर्म की प्रतिष्ठा तथा संसार का कल्याण करना ही मानव-जीवन का उद्देश्य बताते हैं। वे पाण्डवों की कल्याण-कामना करते हुए कहते हैं-

तुम्हारे साथ तुम्हारा सत्य, शक्ति श्रद्धा, सेवा औ’ कर्म ।
यही जीवन के शाश्वत मूल्य, इन्हीं पर टिका मनुज का धर्म ॥
इन्हीं का लेकर दृढ़ अवलम्ब, चल रहे हो तुम पथ पर अभय ।
तुम्हारा गौरवपूर्ण भविष्य, प्राप्त होगी पग-पग पर विजय ॥

धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किये गये दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं तथा कहते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर-गीत ।।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी बनाया है और युग के अनुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दुहराया है।

प्रश्न 2.
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख पात्रों का संक्षेप में परिचय दीजिए।
या
“‘सत्य की जीत के पात्र पूर्णतः जीवन्त हैं।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख पात्र हैं-द्रौपदी, दु:शासन और धृतराष्ट्र। इनके अतिरिक्त दुर्योधन, विकर्ण, कर्ण और युधिष्ठिर भी उल्लेखनीय पात्र हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(1) द्रौपदी-यह प्रस्तुत खण्डकाव्य की नायिका है। यह द्रुपद राजपुत्री और पाण्डव-कुल की वधू है, जो युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की पत्नी है। यह सशक्त, ओजस्वी, आत्म-सम्मान से युक्त वीरांगना नारी है। इसके चरित्र पर आधुनिक नारी-जागरण का प्रभाव है। इसका व्यक्तित्व अत्यन्त तेजस्वी एवं प्रखर है। इसी के माध्यम से कवि ने अधर्म, अन्याय, असत्य और अत्याचार पर सत्य एवं न्याय की विजय प्रदर्शित की है।
(2) दुःशासन-दु:शासन इस खण्डकाव्य का प्रमुख पुरुष पात्र है। यह अभिमानी, विवेकहीन, अनैतिक, अहंकारी, भौतिक मद में चूर, अशिष्ट, दुराचारी तथा नारी के प्रति अनुदार व्यक्ति है। इसके चरित्र को भौतिकता के मद में चूर साम्राज्यवादी शासकों के चरित्र जैसा दर्शाया गया है।
(3) धृतराष्ट्र-धृतराष्ट्र कौरव नरेश हैं। प्रस्तुत काव्य के अन्तिम भाग में इनका उल्लेख हुआ है। इन्होंने पक्षपात-रहित होकर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य बताकर अपने नीर-क्षीर विवेक को दर्शाया है। कौरवों तथा पाण्डवों के समक्ष वे अपनी उदार और विवेकपूर्ण नीति की घोषणा करते हैं-

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।

धृतराष्ट्र के चरित्र के माध्यम से कवि ने आज के शासनाध्यक्षों को इसी नीति के अनुसरण का सन्देश दिया है। इसमें आपाधापी के इस युग के लिए बड़े कल्याण का भाव छिपा है।
(4) दुर्योधन-दु:शासन के समान ही दुर्योधन को भी असत्य, अन्याय और अनैतिकता का समर्थक कहा गया है। वह ईर्ष्यालु है। उसे छल-कपट में विश्वास है। उसने कपट-चाल से पाण्डवों को जीता और उनके राज्य को हड़प लिया। इस प्रकार उसके चरित्र में वर्तमान साम्राज्यवादी शासकों की लोलुपता की झलक दिखाई गयी है।
(5) विकर्ण और विदर-विकर्ण और विदुर अन्धी शस्त्र-शक्ति के विरोधी हैं। केवल शस्त्रे-बल पर स्थापित शान्ति को वे अनुचित मानते हैं। दोनों पात्र न्यायप्रिय हैं तथा कौरव-कुल के होते हुए भी वे द्रौपदी के सत्य-पक्ष के समर्थक, स्पष्टवादी और निर्भीक हैं।
(6) युधिष्ठिर-युधिष्ठिर के दृढ़ एवं निश्छल चरित्र में कवि ने आदर्श राष्ट्रनायक की झलक प्रस्तुत की है। वे आरम्भ से अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन चरित्र में ही गम्भीरता, शालीनता, सत्यनिष्ठा, न्यायप्रियता, विवेकशीलता और धर्मपरायणता जैसी अमूल्य विशेषताएँ प्रकट की हैं।
(7) कर्ण–कर्ण दुर्योधन का मित्र तथा अंगदेश का राजा है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि कवि ने सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक संस्पर्शों के सहारे पात्रों को पूर्णत: जीवन्त और युगानुकूल चित्रित किया है।

प्रश्न 3.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2015, 16, 18]
या
‘सत्य की जीत के किसी मुख्य नारी-पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए। [2012, 13]
या
‘सत्य की जीत’ में कवि ने द्रौपदी के चरित्र में जो नवीनताएँ प्रस्तुत की हैं, उनका उद्घाटन करते हुए उसके चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
सिद्ध कीजिए कि “द्रौपदी सत्य की अपराजेय आत्मिक शक्ति से ओतप्रोत नारी है।” [2010]
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायिका-द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका है। सम्पूर्ण कथा उसके चारों ओर घूमती है। वह राजा द्रुपद की पुत्री, धृष्टद्युम्न की बहन तथा युधिष्ठिर सहित पाँचों पाण्डवों की पत्नी है। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में अत्यधिक विकट समय होते हुए भी वह बड़े आत्मविश्वास से दु:शासन को अपना परिचय देती हुई कहती है-

जानता नहीं कि मैं हूँ कौन ? द्रौपदी धृष्टद्युम्न की बहन।
पाण्डुकुल वधू भीष्म धृतराष्ट्र, विदुर को कबरे यह सहन ॥

(2) स्वाभिमानिनी सबला-द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपना अपमान नारी-जाति का अपमान समझती है और वह इसे सहन नहीं करती। ‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी महाभारत की द्रौपदी की भाँति असहाय, अबला और संकोची नारी नहीं है। यह द्रौपदी तो अन्यायी, अधर्मी पुरुषों से जमकर संघर्ष व विरोध करने वाली है। इस प्रकार उसका निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है-

समझकर एकाकी, निशंक, दिया मेरे केशों को खींच।
रक्त का पैंट पिये मैं मौन, आ गयी भरी सभा के बीच ॥
इसलिए नहीं कि थी असहाय, एक अबला रमणी का रूप।
किन्तु था नहीं राज-दरबार, देखने मेरा भैरव-रूप ।

(3) विवेकशीला--द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँख बन्द कर चलने वाली नारी नहीं, वरन् विवेक से कार्य करने वाली नारी है। आज की नारी की भाँति वह अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए सजग है। द्रौपदी की स्पष्ट मान्यता है कि नारी में अपार शक्ति और आत्मबल विद्यमान है। पुरुष स्वयं को संसार में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न समझता है, किन्तु द्रौपदी इस अहंकारपूर्ण मान्यता का खण्डन करती हुई कहती हे–

नहीं कलिका कोमल सुकुमार, नहीं रे छुई-मुई-सा गात !
पुरुष की है यह कोरी भूल, उसी के अहंकार की बात ॥

वह केवल दु:शासन ही नहीं वरन् अपने पति को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर स्पष्टीकरण माँगती है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जुए में स्वयं को हारने वाले युधिष्ठिर को मुझे दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं है—-

पूछती हूँ मैं केवल एक प्रश्न, उसका उत्तर मिल जाय।
कसँगी फिर जो हो आदेश, बड़ों का वचन मानकर न्याय ॥
प्रथम महाराज युधिष्ठिर मुझे, या कि थे गये स्वयं को हार।।
स्वयं को यदि तो उनको मुझे, हारने का था क्या अधिकार ?

द्रौपदी के ये वचन सुनकर सम्पूर्ण सभा स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है और द्रौपदी के तर्को पर न्यायपूर्वक विचार करने के लिए विवश हो जाती है। द्रौपदी के ये कथन उसकी वाक्पटुता एवं योग्यता के परिचायक हैं।
(4) साध्वी-द्रौपदी में शक्ति, ओज, तेज, स्वाभिमान और बुद्धि के साथ-साथ सत्य, शील और धर्म का पालन करने की शक्ति भी है। द्रौपदी के चरित्र की श्रेष्ठता से प्रभावित धृतराष्ट्र उसकी प्रशंसा करते हुए। कहते हैं-

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार॥

(5) ओजस्विनी-‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी ओजस्विनी है। वह अपना अपमान होने पर सिंहनी की भाँति दहाड़ती है-

सिंहनी ने कर निडर दहाड़, कर दिया मौन सभा को भंग ।।

दु:शासन द्वारा केश खींचने के बाद वह रौद्र-रूप धारण कर लेती है। कवि कहता है–

खुली वेणी के लम्बे केश, पीठ पर लहराये बन काल।
उगलते ज्यों विष कालिया नाग, खोलकर मृत्यु-कणों का जाल ।

(6) सत्य, न्याय और धर्म की एकनिष्ठ साधिका-द्रौपदी सत्य और न्याय की अजेय शक्ति और असत्य तथा अधर्म की मिथ्या शक्ति का विवेचन बहुत संयत शब्दों में करती हुई कहती है-

सत्य का पक्ष, धर्म का पक्ष, न्याय का पक्ष लिये मैं साथ।
अरे, वह कौन विश्व में शक्ति, उठा सकती जो मुझ पर हाथ।।

(7) नारी-जाति की पक्षधर-‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी आदर्श भारतीय नारी है। भारतीय संस्कृति के आधार वेद हैं और वेदों के अनुसार आदर्श नारी में अपार शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आत्म-सम्मान, सत्य, धर्म, व्यवहार-कुशलता, वाक्प टुता, सदाचार आदि गुण विद्यमान होते हैं। द्रौपदी में भी ये सभी गुण विद्यमान हैं। अपने सम्मान को ठेस लगने पर वह सभा में गरज उठती है-

मौन हो जा मैं सह सकतीन, कभी भी नारी का अपमान ।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ॥

द्रौपदी को पता है कि नारी में अपार शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि और शील विद्यमान हैं। नारी ही मानवजाति के सृजन की अक्षय स्रोत है। वह नारी-जाति को पुरुष के आगे हीन सिद्ध नहीं होने देती है। नारी की गरिमा का वर्णन करती हुई वह कहती है-

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

(8) वीरांगना—वह पुरुष को विवश होकर क्षमा कर देने वाली असहाय अबला नहीं वरन् चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध है–

अरे ओ दुःशासन निर्लज्ज, देख तू नारी का भी क्रोध ।।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं उसका बोध ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानिनी, आत्मगौरवसम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 4.
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2009, 10, 11, 16, 17, 18]
या
“दुःशासन में पौरुष का अहम् और भौतिक शक्ति का दम्भ है।” ‘सत्य की जीत’ के आधार पर इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘सत्य की जीत के एक प्रमुख पुरुष-पात्र (दुःशासन) के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। [2009, 11, 14, 18]
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दु:शासन एक प्रमुख पात्र है जो दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) अहंकारी एवं बुद्धिहीन-दु:शासन को अपने बल पर बहुत अधिक घमण्ड है। विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है तथा पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। सत्य, प्रेम और अहिंसा की अपेक्षा वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है-

शस्त्रे जो कहे वही है सत्य, शस्त्र जो करे वही है कर्म।
शस्त्र जो लिखे वही है शास्त्र, शस्त्र-बल पर आधारित धर्म ।।

इसीलिए परिवारजन और सभासदों के बीच द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में वह तनिक भी लज्जा नहीं मानता है।
(2) नारी का अपमान करने वाला-द्रौपदी के साथ हुए तर्क-वितर्क में दु:शासन का नारी के प्रति पुरातन और रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। दुःशासन नारी को पुरुष की दासी और भोग्या तथा पुरुष से दुर्बल मानता है। नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाते हुए वह कहता है-

कहाँ नारी ने ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम।
जानती है वह केवल पुरुष, भुजदण्डों में करना विश्राम॥

(3) शस्त्र-बल विश्वासी–दुःशासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्म-शास्त्र और धर्मज्ञों में कोई विश्वास नहीं है। इन्हें तो वह शस्त्र के आगे हारने वाले मानता है-

धर्म क्या है और क्या है सत्य, मुझे क्षणभर चिन्ता इसकी न ।
शास्त्र की चर्चा होती वहाँ, जहाँ नर होता शस्त्र-विहीन ।।

(4) दुराचारी-दु:शासन हमारे समक्ष एक दुराचारी व्यक्ति के रूप में आता है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता। वह शास्त्रज्ञों, धर्मज्ञों व नीतिज्ञों पर कटाक्ष करता है और उन्हें दुर्बल बताता है-

लिया दुर्बल मानव ने ढूँढ़, आत्मरक्षा का सरल उपाय ।
किन्तु जब होता सम्मुख शस्त्र, शास्त्र हो जाता निरुपाय ॥

(5) धर्म और सत्य का विरोधी-धर्म और सत्य का शत्रु दुःशासन आध्यात्मिक शक्ति का विरोधी एवं भौतिक शक्ति का पुजारी है। वह सत्य, धर्म, न्याय, अहिंसा जैसे उदार आदर्शों की उपेक्षा करता है।
(6) सत्य व सतीत्व से पराजित–दुःशासन की चीर-हरण में असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती है। कि सत्य की ही जीत होती है। वह शक्ति से मदान्ध होकर तथा सत्य, धर्म एवं न्याय की दुहाई देने को दुर्बलता का चिह्न बताता हुआ जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के शरीर से प्रकट होने वाले सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता है।

दुःशासन के चरित्र की दुर्बलताओं या विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ० ओंकार प्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं कि, “लोकतन्त्रीय चेतना के जागरण के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दु:शासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाये हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में दु:शासन उन्हीं का प्रतीक है।”

प्रश्न 5.
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2011, 12, 13]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र महान गुणों से परिपूर्ण है। स्पष्ट कीजिए। [2013]
या
‘सत्य की जीत’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2015, 16]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2013, 14]
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र धृतराष्ट्र और द्रौपदी के कथनों के माध्यम से उजागर हुआ है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) सत्य और धर्म के अवतार-युधिष्ठिर की सत्य और धर्म में अडिग निष्ठा है। उनके इसी गुण पर मुग्ध धृतराष्ट्र कहते हैं

युधिष्ठिर ! धर्मपरायण श्रेष्ठ, करो अब निर्भय होकर राज्य।

(2) सरल-हृदय व्यक्ति –युधिष्ठिर बहुत सरल-हृदय के व्यक्ति हैं। वे दूसरों को भी सरल-हृदय समझते हैं। इसी सरलता के कारण वे शकुनि और दुर्योधन के कपट जाल में फँस जाते हैं और उसका दुष्परिणाम भोगते हैं। द्रौपदी ठीक ही कहती है-

युधिष्ठिर!धर्मराज थे, सरल हृदय, समझे न कपट की चाल।

(3) सिन्धु-से धीर-गम्भीर-द्रौपदी का अपमान किये जाने पर भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी दुर्बलता नहीं, वरन् उनकी धीरता, गम्भीरता और सहिष्णुता है-

खिंची है मर्यादा की रेखा, वंश के हैं वे उच्च कुलीन।।

(4) अदूरदर्शी-युधिष्ठिर यद्यपि गुणवान हैं, किन्तु द्रौपदी को दाँव पर लगाने जैसा अविवेकी कार्य कर बैठते हैं, जिससे जान पड़ता है कि वह सैद्धान्तिक अधिक किन्तु व्यवहारकुशल कम हैं। वह इस कृत्य का दूरगामी परिणाम दृष्टि से ओझल कर बैठते हैं-

युधिष्ठिर धर्मराज का हृदय, सरल-निर्मल-निश्छल-निर्दोष।
भरा अन्तर-सागर में अमित, भाव-रत्नों का सुन्दर कोष ॥

(5) विश्व-कल्याण के साधक-युधिष्ठिर का लक्ष्य विश्व-मंगल है, यह बात धृतराष्ट्र भी स्वीकार करते हैं-

तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि, तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के ऐसे पात्र हैं, जो आरम्भ से लेकर अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन से ही उनके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ स्पष्ट की हैं।

प्रश्न 6.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुर्योधन का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2011, 12, 14, 17]
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन का चरित्र एक तुच्छ शासक का चरित्र है। वह असत्य, अन्याय तथा अनैतिकता का आचरण करता है। वह छल विद्या में निपुण अपने मामा शकुनि की सहायता से पाण्डवों को छूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है और उनका सारा राज्य जीत लेता है। दुर्योधन चाहता है कि पाण्डव द्रौपदी सहित उसके दास-दासी बनकर रहे। वह द्रौपदी को सभा के बीच में वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहता है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
(1) शस्त्रबल का पुजारी-दुर्योधन सत्य, धर्म और न्याय में विश्वास नहीं रखता। वह शारीरिक तथा तलवार के बल में आस्था रखता है आध्यात्मिक एवं आत्मिक बल की उपेक्षा करता है। दु:शासन के मुख से शस्त्रबल की प्रशंसा और शास्त्रबल की निन्दा सुनकर वह प्रसन्नता से खिल उठता है।।
(2) अनैतिकता का अनुयायी-दुर्योधन न्याय और नीति को छोड़कर अनीति का अनुसरण करता है। भले-बुरे का विवेक वह बिलकुल नहीं करता। अपने अनुयायियों को भी अनीति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना ही उसकी नीति है। जब दु:शासन द्रौपदी का चीरहरण करने में असमर्थ हो जाता है तो दु:शासन की इस असमर्थता को वह सहन नहीं कर पाता है और अभिमान में गरज कर कहता है-

कर रहा क्या, यह व्यर्थ प्रलाप, भय वशं था दुःशासन वीर।
कहा दुर्योधन ने उठ गरज, खींच क्या नहीं खिचेगी चीर॥

(3) मातृद्वेषी-दुर्योधन बाह्य रूप में पाण्डवों को अपना भाई बताता है किन्तु आन्तरिक रूप से उनकी जड़े काटता है। वह पाण्डवों का सर्वस्व हरण करके उन्हें अपमानित और दर-दर का भिखारी बनाना चाहता है। द्रौपदी के शब्दों में-

किन्तु भीतर-भीतर चुपचाप, छिपाये तुमने अनगिन पाश।
फँसाने को पाण्डव निष्कपट, चाहते थे तुम उनका नाश।।

(4) असहिष्णुता-दुर्योधन स्वभाव से बड़ा ईष्र्यालु है। पाण्डवों का बढ़ता हुआ यश तथा सुखशान्तिपूर्ण जीवन उसकी ईर्ष्या का कारण बन जाता है। वह रात-दिन पाण्डवों के विनाश की ही योजना बनाता रहता है। उसके ईष्र्यालु स्वभाव का चित्रण देखिए-

ईष्र्या तुम को हुई अवश्य, देख जग में उनका सम्मान।
विश्व को दिखलाना चाहते, रहे तुम अपनी शक्ति महान् ॥

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि दुर्योधन का चरित्र एक साम्राज्यवादी शासक का चरित्र है।

प्रश्न 7.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर विकर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में विकर्ण को एक विवेकशील व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। कौरवों की विशाल सभा के मध्य जब दुःशासन शस्त्रबल की महत्ता और शास्त्रबल को निर्बलों का शस्त्र कहकर शास्त्रों के प्रति अपनी अश्रद्धा तथा अनास्था प्रकट करता है तो विकर्ण इस अनीति को सहन नहीं कर पाता है। बड़े-बड़े शूरवीरों और धर्मज्ञों की उपस्थिति में द्रौपदी पर किये गये अत्याचार को देखकर विकर्ण क्षुब्ध हो उठता है और कहता है-

बढ़े क्या अरे, यहीं तक आज, सभ्यता के संस्कृति के चरण?
कर रहा रे, मानव ललकार, शास्त्र को छोड़ शस्त्र का वरण ॥

आदि युग की पाशविकता से मुक्त होकर तथा अपने मस्तिष्क और हृदय की शक्ति का आश्रय लेकर मानव आज श्रेष्ठ मानव कहलाता है। किन्तु यदि आज वह पुनः शस्त्रबल को सर्वाधिक महत्ता प्रदान करेगा तो आज तक विकास के पथ पर अग्रसर होने के उसके सभी प्रयत्नों और संघर्षों को व्यर्थ कहा जा सकता है। विकर्ण इस सम्बन्ध में स्पष्ट घोषणा करता है-

शस्त्र सर्वस्व, शास्त्र सब व्यर्थ, धारणा यह विनाश की मूल।
शास्त्र सर्वस्व शस्त्र सब व्यर्थ, अभी कहना यह भी है भूल।

विकर्ण अन्धी शस्त्र-शक्ति का विरोधी है। उसका यह विश्वास है कि संसार की बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान भी प्रेम, शान्ति और सहयोग की भावना से किया जा सकता है। वह कहता है-

शस्त्र बल पर आधारित शान्ति, क्षणिक होती स्थायित्व विहीन ।

शस्त्रों के कारण ही मनुष्य में छिपी दानवता जाग्रत होती है और वह संसार की प्रगति एवं सभ्यता के विनाश का कारण बनती है। विकर्ण कहता है-

मौन है आज सभी क्यों? देख रहा हूँ मैं कैसा यह दृश्य।
सत्य को छिपा रहे हम जान, करेगा हमें क्षमा न भविष्य ॥

सत्य, धर्म एवं न्याय के प्रति भविष्य में मानव की आस्था एवं विश्वास उठ न जाए, उसके लिए वह सभी धर्मज्ञ सभासदों से आग्रह करते हुए कहता है-

अगर हमसे हो गया अधर्म, अगर हमसे हो गयी अनीति।
धर्म में न्याय-सत्य में रह जायेगी किसकी यहाँ प्रतीति।

इस स्पष्टोक्ति से स्पष्ट होता है कि विकर्ण के चरित्र में स्पष्टवादिता, निर्भीकता, न्यायप्रियता, धर्मभीरुता आदि सभी मानवोचित श्रेष्ठ गुणों का समावेश है।

प्रश्न 8.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर धृतराष्ट्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2011]
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के जिस पुरुष पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया हो, उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2011]
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने धृतराष्ट्र के चरित्र को काव्य के अन्तिम सर्ग में उपस्थित किया है। वे कौरवों के राज-दरबार में भीष्म, द्रोण, विदुर, विकर्ण जैसे धर्मज्ञों एवं शास्त्रज्ञों के साथ विराजमान हैं। तथा मौन होकर द्रौपदी तथा दु:शासन के तर्को एवं उनके पक्ष-विपक्ष में बोलने वाले सभासदों के विचारों को गम्भीरतापूर्वक सुनते हैं। वे पंच के गौरवपूर्ण पद पर विराजमान होकर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहकर अपने नीर-क्षीर विवेक का परिचय देते हैं। वह लोकमत का आदर करते हुए सभासदों को शान्त करते हुए कहते हैं-

हुई है दुर्योधन से भूल, किया है उसने यह दुष्कर्म ।
पाण्डवों पर छल से आघात, कहा जा सकता न्याय न धर्म ॥

वे धरती पर सुलभ सभी पदार्थों का उपयोग युद्ध के लिए नहीं, अपितु शान्ति-स्थापना के लिए करना चाहते हैं। प्रेम, करुणा, सहानुभूति, क्षमा एवं दया आदि सद्गुणों को ही वे विकास एवं कल्याण का मूल मानते हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि विश्व के सन्तुलित विकास के लिए हृदय और बुद्धि का समन्वित विकास आवश्यक है। वह दुर्योधन को आदेश देते हैं कि पाण्डवों को मुक्त कर दो एवं उन्हें उनका राज्य लौटा दो। वे अपनी नीति की घोषणा करते हुए कहते हैं–

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।
बाँट कर आपस में मिल सभी, धरा का करें बराबर भोग ।।

वे द्रौपदी के पक्ष का समर्थन करते हैं तथा उसे सती, साध्वी और धर्मनिष्ठ बताते हैं। द्रौपदी की प्रशंसा करते हुए धृतराष्ट्र कहते हैं-

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय-सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार ॥

सत्य, धर्म एवं न्याय के मार्ग का अनुसरण करने वाला जीवन में सदा विजयी होता है, इसी बात की। घोषणा वे निम्नलिखित शब्दों में करते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्, दिगन्त में गूंजेंगे स्वर गीत ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धृतराष्ट्र नीति पर चलने वाले, अनीति के विरोधी, नारी का सम्मान करने वाले हैं। उनमें एक श्रेष्ठ राजा के समस्त गुण विद्यमान हैं।

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