UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name राजमुकुट (व्यथित हृदय)
Number of Questions
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय)

प्रश्न 1:
श्री व्यथित हृदय द्वारा लिखित ‘राजमुकुट नाटक का सारांश अथवा कथा-सार संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के द्वितीय अंक का कथा-सार लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के तृतीय अंक का कथा-सार संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के प्रथम अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के किसी एक अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के अन्तिम (चतुर्थ) अंक की कथा संक्षिप्त रूप में लिखिए।
या
“राजमुकुट नाटक की कथा एवं अन्तर्कथाओं पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के आधार पर महाराणा प्रताप और अकबर की भेंट का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘राजमुकुट’ नाटक, नाटककार श्री व्यथित हृदय का एक ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक में * महाराणा प्रताप की वीरता, बलिदान और त्याग की कथा अंकित है। कथा का प्रारम्भ महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से तथा कथा का अन्त महाराणा प्रताप की मृत्यु पर होता है। महाराणा प्रताप इस नाटक के नायक हैं।
प्रथम अंक – प्रस्तुत नाटक के प्रथम अंक की कथा मेवाड़ के राणा जगमल के महल से आरम्भ होती है। राणा जगमल एक विलासी और क्रूर शासक है। वह अपनी मर्यादा का निर्वाह करना भूल गया था तथा सुरा-सुन्दरी में डूबा रहता था। ऐसे ही समय में राष्ट्रनायक कृष्णजी चन्दावत, राजसभा में पहुँचते हैं तथा राणा जगमल को उसके नीचे कर्मों के लिए भला-बुरा कहते हैं। वे जगमल से मेवाड़ का मुकुट’ उचित पात्र को सौंपने के लिए आग्रह करते हैं। जगमल उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं तथा चन्दावत से योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहते हैं। चन्दावत; राणा जगमल से राजमुकुट लेकर प्रताप के शीश पर रख देते हैं। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ जाती है। प्रताप विदेशी शासक से लोहा लेने का प्रण करते हैं तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। यह संकल्प नाटक की कथा को आगे बढ़ाने में सहायक है।

द्वितीय अंक – प्रताप मेवाड़ के राजा बनते ही अपनी प्रजा के खोये हुए सम्मान की रक्षा करते हैं। वे प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए अनेक आयोजन भी करते हैं। ऐसे ही एक आयोजन के अवसर पर जंगली सूअर के आखेट को लेकर प्रताप तथा उनके भाई शक्तिसिंह में विवाद हो जाता है। विवाद बढ़ जाने पर दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। भावी अनिष्ट की आशंका या राजकुल को संकट से बचाने के लिए राजपुरोहित अपनी कटार से अपना ही प्राणान्त कर लेते हैं। प्रताप शक्तिसिंह को देश से निर्वासित कर देते हैं। शक्तिसिंह अपने को अपमानित अनुभव करते हैं तथा अकबर के साथ मिल जाते हैं।

तृतीय अंक – मानसिंह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट अकबर की विवाहिता पत्नी थीं। इसलिए राणा ने उससे स्वयं भेंट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से चला गया तथा दिल्ली के सम्राट अकबर से जा मिला। चतुर अकबर अवसर का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप पर आक्रमण कर देता है। हल्दीघाटी के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप को बचाने के लिए कृष्णजी चन्दावत, प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर स्वयं पहन लेते हैं और युद्धभूमि में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। प्रताप बच जाते हैं, परन्तु दो मुगल सैनिक प्रताप का पीछा करते हैं। ऐसे समय पर शक्तिसिंह का भ्रातृ-प्रेम जाग्रत होता है और वे पीछा करके दोनों मुगलों को मार देते हैं। शक्तिसिंह और प्रताप आपस में गले मिलते हैं। इसी समय राणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक अपने प्राण त्याग देता है।

चतुर्थ अंक – हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाता है, परन्तु राणा हार नहीं मानते। अकबर प्रताप की देशभक्ति, त्याग और वीरता का लोहा मानते हैं तथा वे महाराणा प्रताप के प्रशंसक बन जाते हैं। एक दिन प्रताप के पास एक संन्यासी आती है। प्रताप संन्यासी का उचित सत्कार न कर पाने के कारण अत्यधिक व्यथित हैं। इसी समय राणा की पुत्री चम्पा घास की बनी रोटी लेकर आती है, जिसे एक वन-बिलाव छीनकर भाग जाता है। चम्पा गिर जाती है और पत्थर से टकराकर उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ समय पश्चात् अकबर संन्यासी वेश में वहाँ आता है और कहता है कि “आप उस अकबर से तो सन्धि कर सकते हैं जो भारतमाता को अपनी माँ समझता है, जो आपकी भाँति उसकी जय बोलता है।” इसी समय अकबर राणा को ‘भारतमाता का सपूत’ बताता है और प्रताप के दर्शन करके अपने को धन्य मानता है। संघर्षरत प्रताप रोगग्रस्त हो जाते हैं। वे शक्तिसिंह तथा अपने सभी साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेते हैं। भारतमाता की जय’ घोष के साथ ही महाराणां का देहान्त हो जाता है। ‘राजमुकुट’ की यह कथा भारत के स्वर्णिम इतिहास और एक रणबाँकुरे वीर की अमर कहानी है।

प्रश्न 2:
नाट्य-कला (नाट्य तत्त्वीं) की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
कथोपकथन (संवाद-योजना) की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की संवाद-कला पर प्रकाश डालिए। कथावस्तु की दृष्टि से ‘राजमुकुट नाटक की समीक्षा लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की भाषा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक में देश-काल और वातावरण का सफल निर्वाह हुआ है।” इस कथन के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के वातावरण एवं उद्देश्य पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक की अभिनेयता पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
रंगमंच की दृष्टि से नाटक की आलोचना कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा

नाट्य-कला के विभिन्न तत्त्वों के आधार पर श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) कथानक – इस नाटक का कथानक महाराणा प्रताप के शौर्यपूर्ण जीवन से सम्बन्धित है। कथानक का प्रारम्भ महाराणा के राजमुकुट धारण करने से होता है। कथानक के विकास में शक्तिसिंह और राणा का विवाद, अकबर की सेना का प्रताप पर आक्रमण, हल्दीघाटी का युद्ध, प्रताप का वन-वन भटकना, उनकी मृत्यु आदि अनेक घटनाएँ सहायक हुई हैं। कथानक सुगठित, सशक्त, सुन्दर तथा क्रमबद्ध है। इस प्रकार कथानक की दृष्टि से ‘राजमुकुट एक सफल नाटक है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – नाटक की पात्र-योजना श्रेष्ठ है। नाटक के नायक प्रताप हैं। प्रताप के अतिरिक्त शक्तिसिंह, कृष्णजी चन्दावत, जगमल, मानसिंह, अकबर आदि अन्य प्रमुख पात्र हैं। नारी-पात्रों की भी सुन्दर योजना है। प्रजावती का बलिदान सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रमिला, गुणवती तथा चम्पा अन्य प्रमुख नारी-पात्र हैं। सभी पात्रों का चरित्रांकन श्रेष्ठ है तथा कहानी के विकास में सहायक है। पात्रों की मुख्य विशेषता उनका उदात्त चरित्र है।

(3) संवाद-योजना – नाटक के संवाद सुन्दर, सरल, संक्षिप्त, सरस तथा पात्रों के अनुकूल हैं। ये संवाद मनोभावों को प्रकट करने में भी सक्षम और प्रभावशाली हैं। संवादों में कहीं माधुर्य है तो कहीं ओज। उदाहरणार्थ–“मैं अकबर से सन्धि कर लें ?उस अकबर से सन्धि कर लें, जिसने भारतमाता को दासता की जंजीरों में जकड़ रखा है।” नाटक में स्वगत कथनों की भरमार होने से पाठकों में अरुचि पैदा होने की अधिक सम्भावना है। कहीं-कहीं रंगमंच पर प्रस्तुत घटनाओं को संवादों द्वारा पुनः व्यक्त करके समय का दुरुपयोग भी किया गया है।

(4) देश-काल एवं वातावरण – नाटक में अकबर के समय के वातावरण को चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से नाटककार सफल हैं। ऐतिहासिक वातावरण सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। युद्ध के दृश्य सजीव हैं। नाटक में तत्कालीन राजस्थान का परिवेश मुखरित हो उठा है।

(5) भाषा-शैली – इस नाटक की भाषा साहित्यिक खड़ी बोली है। संस्कृत के शब्दों का बाहुल्य है। माधुर्य के साथ ओज गुण की भी प्रधानता है। अलंकारों, मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दर रूप में किया गया है। भाषा-शैली की दृष्टि से राजमुकुट एक सफल रचना है। उदाहरणार्थ-”वह देश में छाई हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा, आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है। उसका पौरुष गेय है।”

(6) उद्देश्य – नाटक की रचना में नाटककार का उद्देश्य देशप्रेम तथा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए त्याग एवं बलिदान का सन्देश देना है। प्रताप अपनी मृत्यु के समय कहते हैं-”बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”

(7) अभिनेयता – अभिनेयता की दृष्टि से नाटक रंगमंच के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। दृश्यों की संख्या बहुत अधिक है। युद्ध इत्यादि के दृश्यों का मंचन करना तथा हाथी-घोड़ों का मंच पर प्रस्तुतीकरण भी कठिन है। भाषा की दृष्टि से भी नाटक अभिनेयता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। हाँ, पठनीयता की दृष्टि से ‘राजमुकुट एक सफल रचना है।

प्रश्न 3:
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के जिस पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया है, उसके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर प्रमुख पात्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक महाराणा प्रताप हैं। नाटक में उनके चरित्र का मूल्यांकन . करने वाली; राज्याभिषेक से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ हैं। राणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) आदर्श भारतीय नायक – भारतीय नाट्यशास्त्र में आदर्श नायक के जिन गुणों के विषय में बताया गया है, महाराणा प्रताप के चरित्र में वे सभी गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र ‘धीरोदात्त नायक’ का आदर्श चरित्र है। वे उच्च कुल में उत्पन्न हुए वीर, साहसी तथा संयमी व्यक्ति हैं।

(2) प्रजा की आशाओं के आधार – मेवाड़ की प्रजा महाराणा प्रताप को इस आशा के साथ मुकुट पहनाती है। कि वे उसकी तथा देश की रक्षा करेंगे। प्रजा की आशा के अनुरूप प्रताप उसके सच्चे हितैषी सिद्ध होते हैं। प्रजा प्रताप के मुकुट धारण करने से पूर्व ही यह आशा रखती है कि “वह देश में छायी हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा; आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है; उसका पौरुष गेय है। वह महीमाता का पुण्य है। भारतमाता की साधना का फल है; अमरफल है।”

(3) मातृभूमि के अनन्य भक्त – प्रताप मातृभूमि के अनन्य भक्त हैं। वे देश की दासता और प्रजा की दुर्दशा से व्यथित हैं-“सारा देश विदेशियों के अत्याचारों से विकम्पित हो चुका है। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक असन्तोष राग अलाप रहा है। …………. चित्तौड़ का युद्ध भारत का युद्ध होगा।”

(4) दृढ़प्रतिज्ञ तथा कर्तव्यनिष्ठ – महाराणा दृढ़ निश्चयी तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान् हैं। राजमुकुट धारण करने के अवसर पर प्रताप के शब्द हैं – “मेरा जयनाद ! मुझे महाराणा बनाकर मेरा जयनाद न बोलो साथियो! जय बोलो भारत की, मेवाड़ की। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राणों में साँस रहते हुए प्रजा-प्रभु की दी हुई इस भेंट को मलिन न करूंगा। जब तक सारे भारत को दासता से मुक्त न कर लूंगा, सुख की नींद न सोऊँगा।”

(5) स्वतन्त्रता हेतु दृढ़ संकल्प – प्रताप जीवनपर्यन्त स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। वे अकबर से हल्दीघाटी में युद्ध करते हैं। सब कुछ खोकर, भी वे अकबर के सामने झुकते नहीं। बच्चे भूखों मर जाते हैं, फिर भी यह लौह-पुरुष अडिग रहता है। मृत्यु के समय भी राणा को एक ही लगन है, एक ही इच्छा है, एक ही अभिलाषा है, वह है देश की स्वतन्त्रता-“बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……………….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”

(6) निरभिमानी एवं सत्तालिप्सा से दूर – राणा देशभक्त हैं, स्वतन्त्रता के दीवाने हैं, परन्तु वे राजा बनना नहीं चाहते। राणा प्रताप महान् देशभक्त एवं मेवाड़ के महाराणा हैं, किन्तु उन्हें अभिमान बिल्कुल नहीं है। महान् होकर भी वे स्वयं को महान् नहीं समझते। वे कहते हैं—“मेवाड़ का राणा मैं ! नहीं, नहीं कृष्णजी ! आप भूल रहे हैं। मेवाड़ के महाराणा का पद महान् है, बहुत महान् है।”

(7) भारतीय संस्कृति, धर्म तथा मान-मर्यादा के रक्षक – महाराणा भारतीय संस्कृति के पोषक हैं। वे धर्म की रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य समझते हैं। संन्यासी के रूप में अकबर जब उनके पास पहुँचता है तो वे उसका आदर करते हैं, परन्तु खाने के लिए कुछ भी दे पाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें कष्ट होता है। वे कहते हैं-”आज कई दिनों से बच्चे घास की रोटियों पर निर्वाह कर रहे थे तो क्या संन्यासी अतिथि को घास की रोटिन खिलाऊँ।
धर्म के प्रति भी राणा के मन में निष्ठा है। पुरोहित का बलिदान देखकर राणा कहते हैं “देशभक्त पुरोहित तुम धन्य हो ! तुमने अपने अनुरूप ही अपना बलिदान दिया है। ज्ञान और चेतना से दूर हम अधम को तुमने प्रकाश दिखाया है …………..।”

(8) पराक्रमी योद्धा – राणा वीर हैं। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके शौर्य का साक्षी है। प्रताप अपने सैनिकों से कहते हैं-“चलो युद्ध का राग गाते हुए हम सब हल्दीघाटी की युद्धभूमि में चलें और रक्तदान से चण्डी माता को प्रसन्न करके उनसे विजय का शुभ आशीर्वाद लें।”
इस प्रकार राणा का चरित्र अनेक अमूल्य गुणों की खान है। वे आदर्श देशभक्त हैं और त्यागी, साहसी, उदार, वीर, दृढ़निश्चयी तथा उदात्त पुरुष हैं। वे प्रजा को आत्मीय मित्र मानते हैं। मुगल सम्राट अकबर भी उनकी प्रशंसा करते हैं – “महाराणा प्रताप भारत के अनमोल रत्न हैं।”

प्रश्न 4:
‘राजमुकुट नाटक के आधार पर शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट के आधार पर शक्तिसिंह की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट के आधार पर समीक्षा कीजिए कि “शक्तिसिंह देशभक्त और त्याग की प्रतिमा है। उसके पश्चात्ताप और त्याग ने उसके चरित्र को गरिमामय बना दिया है।”
उत्तर:

शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण

शक्तिसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक मेवाड़ के महाराणा प्रताप का छोटा भाई है। महाराणा के इस सुयोग्य अनुज के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) परम देशभक्त – शक्तिसिंह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमा है। उसके हृदय में अपने भाई के समान देश की दासता, जनता की व्यथा और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध आक्रोश है। वह मेवाड़ के घर-घर में जीवन और जागृति का मन्त्र फेंकना चाहता है। वह अपने देश के मंगल के लिए सब-कुछ करने को तत्पर है – ”माता-मही! तू मेरी भुजाओं में शक्ति दे कि मैं जगमल के सिंहासन को उलट सकें।’ …………….मेवाड़ में सुख-शान्ति स्थापित कर सकें।”

(2) राज्य-वैभव के प्रति अनासक्त – शक्तिसिंह का चरित्र त्याग भाव से परिपूर्ण है। उसे राज्य-वैभव में कोई आसक्ति नहीं है। अहेरिया उत्सव पर वन-शूकर के वध पर महाराणा से तकरार हो जाने पर दोनों में तलवारें खिंच जाती हैं, जिसमें मध्यस्थता करते हुए पुरोहित की हत्या हो जाती है। इस अपराध में उसे राज्य से निर्वासित कर दिया जाता है, जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।

(3) निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता – शक्तिसिंह में निर्भीकता और स्पष्ट बात कहने का साहस द्रष्टव्य है। वह अकबर की सेना में सम्मिलित तो हो जाता है, किन्तु अकबर द्वारा मेवाड़ का सर्वनाश करने का संकल्प लेने पर वह उसकी सहायता करने को तैयार नहीं होता।

(4) भावुक और प्रकृति-प्रेमी – शक्तिसिंह युवक है। प्राकृतिक सौन्दर्य उसे भाव-विमुग्ध कर देता है। वह उपवन में बैठकर गीत गुनगुनाता है। चन्दावत के पूछने पर वह कहता है “वन मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे होते हैं।”

(5) भ्रातृ-प्रेमी – शक्तिसिंह के हृदय में अपने भाई महाराणा के प्रति अनन्य प्रेम है। राणा प्रताप और शक्तिसिंह का युद्धभूमि में आमना-सामना होता है। युद्ध में ही राणा के घोड़े चेतक की मृत्यु हो जाती है। राणा उसके शव के निकट चिन्तित भाव से बैठे हुए थे, तभी दो मुगल सैनिकों को महाराणा पर प्रहार करते हुए देखकर शक्तिसिंह एक ही वार में दोनों को मौत के घाट उतार देता है और महाराणा से क्षमा-याचना करता है-”वह आया है.मेवाड़ के महाराणा से क्षमा-याचना करने, उनकी स्नेहमयी गोद में बैठकर पश्चात्ताप करने और उनकी वीरता की पवित्र गंगा में अपने कलुषित-कल्मषों को धोने।”

(6) साम्प्रदायिक सद्भावना तथा राष्ट्रीय एकता का पोषक – शक्तिसिंह यह सोचता है कि अकबर और प्रताप मिलकर ऐसे भारत की रचना कर सकते हैं, जिसमें धर्म और सम्प्रदाय का वैमनस्य नहीं होगा। ऐसा भारत ही अखण्ड राष्ट्र हो सकता है। वह हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों को मिल-जुलकर रहने का सन्देश देता है-“तुम उन्हें विदेशी और विधर्मी समझ रहे हो, क्या वे फिर काबुल, कंधार और ईरान लौट जाएँगे ? …………. वे अब इसी देश में रहेंगे और उसी प्रकार उसी कण्ठ से भारतमाता की जय बोलेंगे।”

(7) अन्तर्द्वन्द्व से घिरा – शक्तिसिंह उज्ज्वल चरित्र का व्यक्ति है। वह प्रतिशोध की भावना और देशभक्ति के द्वन्द्व से घिर जाता है, किन्तु अन्त में देशभक्ति की भावना की विजय होती है। तब वह सोचता है-”प्रतिहिंसा की भावना से उत्तेजित होकर दानव बन जाना ठीक नहीं।” इन सहज दुर्बलताओं ने उसके चरित्र को यथार्थ । का स्पर्श देकर निखार दिया है।

प्रश्न 5:
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर अकबर को चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

अकबर का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक में मुगल सम्राट अकबर एक प्रमुख पात्र है। वह महाराणा प्रताप का प्रतिद्वन्द्वी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं

(1) व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति – अकबर व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति है। अपने इसी गुण के कारण वह शक्तिसिंह के हृदय में जगी प्रतिशोध की भावना को तीव्र कर देता है-”छलिया संसार को छल और प्रपंचों से परास्त करने का पाठ पढ़ो। ……….. संसार में भावुकता से काम नहीं चल सकता शक्ति !”

(2) महत्त्वाकांक्षी – सम्राट् अकबर बहुत महत्त्वाकांक्षी है। क्ह मन-ही-मन मेवाड़-विजय का संकल्प करता है-“मैं अपने जीवन के उस अभाव को पूरा काँगा, मेवाड़ के गौरवमय भाल को झुकाकर अपने साम्राज्य की प्रभुता बढ़ाऊँगा।”

(3) मानव-स्वभाव का पारखी – अकबर बहुत बुद्धिमान है। वह शक्तिसिंह, मानसिंह और राणा प्रताप के चरित्र का सही मूल्यांकन करता है – “एक प्रताप है, जो मातृभूमि के लिए प्राण हथेली पर लिये फिरता है। और एक तुम हो, जो मातृभूमि के सर्वनाश के लिए खाइयाँ खोदते फिरते हो।”

(4) सदगुणों का प्रशंसक – अकबर व्यक्ति के सद्गुणों की प्रशंसा करने से नहीं चूकता, चाहे वे सद्गुण उसके शत्रु में ही क्यों न हों। यह विशेषता उसे महानता प्रदान करती है। वह हृदय से राणा की वीरता और स्वाभिमान की प्रशंसा करता है- “……… धन्य है मेवाड़ ! और धन्य हैं मेवाड़ की गोद में पलने वाले महाराणा प्रताप ! प्रताप मनुष्य रूप में देवता हैं, मानवता की अखण्ड ज्योति हैं।”

(5) साम्प्रदायिक सदभावना का प्रतीक – अकबर हिन्दू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है। उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही’ मत इसी साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है। वह मानवीय गुणों का आदर करता है। वह महाराणा की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए कहता है—“हमारा और आपका मिलन ! यह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं महाराणा ! दो धर्म-प्रवाहों का मिलन है, जिससे इस देश की संस्कृति सुदृढ़ तथा पुष्ट होगी।”

(6) कूटनीतिज्ञ – अकबर कुशल कूटनीतिज्ञ है। वह प्रत्येक निर्णय कूटनीति से लेता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-”प्रताप का भाई शक्तिसिंह स्वयं जादू के जाल में फंसकर माया की तरंगों में डुबकियाँ लगा रहा है। उसी को मेवाड़ के विध्वंस का साधन बनाऊँगा।”

प्रश्न 6:
राजमुकुट’ नाटक के नारी-पात्रों पर विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक में देशप्रेम एवं त्याग की प्रतिमूर्ति प्रमिला पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
प्रमिला के माध्यम से मेवाड़ की नारी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ के नारी-पात्र

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट में नारी-पात्रों का समावेश नगण्य है। इसमें प्रमिला, प्रजावती, गुणवती और चम्पा प्रमुख नारी पात्र हैं।

प्रमिला नाटक की एक साधारण स्त्री-पात्र है। वह जगमल के चापलूस सरदार हाथीसिंह की पत्नी है। वह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने पति को देश के कल्याण के लिए बलिदान हो जाने का सन्देश देती है। नाटक के तृतीय दृश्य में इसका राष्ट्रप्रेम अभिव्यक्त होता है। वह अपने पति से कहती है – “देश पर जब विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हों, तब देश के नर-नारियों को अधिक परित्याग करना ही चाहिए। यदि देश का कल्याण करने में माँग का सिन्दूर मिट गया, तो चिन्ता की क्या बात।” जब उसका पति कहता है-”खाँडे का नाम सुनकर ही मेरे प्राणों में भूचाल आने लगता है”-तो प्रमिला उस पर व्यंग्य करती हुई कहती है तो लहँगा पहनकर हाथों में चूड़ियाँ डाल लो। घूघट निकालकर घर के कोने में जाकर बैठे रहो।”

प्रजावती निरपराध, पवित्र, जनहित में लगी रहने वाली, स्वाभिमानिनी, देशप्रेमी व प्रजावत्सल नारी है। नाटककार ‘ने उसे मंच पर उपस्थित नहीं किया है, वरन् अन्य पात्रों के माध्यम से ही उसके चरित्र की विशेषताओं को उजागर किया है। जगमल का एक सैनिक उसके चरित्र पर प्रकाश डालता हुआ कहता है-“वह विक्षिप्ता है महाराज! दिन भर झाड़ियों और कन्दराओं में छिपी रहती है। जब रात होती है तब बाहर निकलकर अपने जीवनगान से सम्पूर्ण उदयपुर को प्रतिध्वनित कर देती है। वह रात भर अपने गान को मेदिनी पर, पाषाणों पर, दीवारों पर लिखती फिरती है। उसका जीवन-गान उदयपुर में धर्म-गीत बन रहा है।” राणा जगमल अपने क्रूर चाटुकारों के कहने से उसका वध करवा देता है। प्रजावती के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए प्रजा का नायक चन्दावत कहता है-”वह कृषकों और श्रमिकों के जीवन का प्रकाश थी; उनके प्राणों की आशा थी; उनकी धमनियों का रक्त थी।”
गुणवती मेवाड़ के राणा प्रताप की पत्नी हैं, जो उनके साथ वनवास के कष्टों को सहर्ष सहन करती हैं तथा अपने पति को हर संकट में साथ देती हैं।
चम्पा महाराणा की पुत्री है। वह नाटक के अन्त में मंच पर उपस्थित होती है। उसे अपने पिता के साथ वन में भटकते और कष्ट सहन करते हुए दिखाया गया है। इस प्रकार इस नाटक में नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है, किन्तु भावनात्मक स्तर पर वे पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 7:
मानसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
मानसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक का एक प्रमुख पात्र तथा अकबर का सेनापति है। वह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा ने उससे स्वयं भेंट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से लौट गया। वह दिल्ली के सम्राट् अकबर से जाकर मिला और उसके निर्देश और अपने नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ पहुँचा। मुगल और राजपूत दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ।
इस प्रकार मानसिंह एक असंयत मनोवृत्ति का व्यक्ति था, जिसमें सहनशीलता का अभाव था। उसने बदले की भावना से प्रेरित होकर, मुगल सम्राट अकबर की सहायता से राणा पर आक्रमण करके विधर्मी और विश्वासघाती होने को परिचय दिया।

प्रश्न 8:
“राष्ट्रनायक ‘चन्दावत’ राजमुकुट नाटक का एक प्रभावशाली चरित्र है।” इस कथन के आलोक में ‘चन्दावत’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
नाटककार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक में ‘चन्दावत’ नामक पात्र का भी वर्णन किया है जो राष्ट्रनायक है और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भलीभाँति निभाता है, उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कर्तव्य के प्रति जागरूक – इस नाटक में चन्दावत को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह मर्यादाओं के पालन में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। जब राणा जगमल अपने राज-कर्त्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब जाते हैं, तब इस कारण से राष्ट्रनायक चन्दावत बड़े दुःखी होते हैं। इसलिए वे जगमल को फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हो; अतः राजमुकुट किसी उचित उत्तराधिकारी को सौंप दो।

(2) महान् त्यागी एवं बलिदानी – चन्दावत महात्यागी एवं बलिदानी व्यक्ति हैं। वे युद्ध के मैदान में देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए उनको राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश पर अपने प्राण बलिदान कर देते हैं।

(3) सच्चा देशभक्त – चन्दावत एक सच्चा देशभक्त है। देशभक्ति की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार जानता है। युद्ध में राणा के प्राण बचाने के लिए उसका मुकुट स्वयं धारण करना देशभक्ति का एक अप्रतिम उदाहरण उसने प्रस्तुत किया है।

(4) दूरदर्शी – चन्दावत दूर की सोचने वाला व्यक्ति है। जब जगमल सुरासुन्दरी का दास होकर रह जाता है। तथा जनता उसका विरोध करती है, तो वह जगमल से उचित उत्तराधिकारी को राजमुकुट सौंपने को कह देते हैं। और स्वयं राणा को राजमुकुट पहनाते हैं जिससे जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि चन्दावत एक त्यागी, बलिदानी, दूरदर्शी और एक सच्चा देशभक्त था।

प्रश्न 9:
‘राजमुकुट’ नाटक के शीर्षक का औचित्य (सार्थकता) बताइए।
उत्तर:

शीर्षक का औचित्य

नाटक्रकार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक का नामकरण ‘राजमुकुट’ उचित ही किया है; क्योंकि सम्पूर्ण नाटक की कथा के मूल में राजमुकुट की मान-प्रतिष्ठा ही निहित है। नाटक का आरम्भ ही राजमुकुट की मर्यादाओं की प्रतिष्ठापना से होता है। राणा जगमल अपने राज-कर्त्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब गये हैं, जिससे राष्ट्र-नायक कृष्णजी चन्दावत बड़े व्यथित हैं। इसीलिए वे जगमल को फटकार लगाते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हो; अतः किसी उचित उत्तराधिकारी को राजमुकुट सौंप दो। राजमुकुट के योग्य उत्तराधिकारी को ढूंढने का दायित्व चन्दावत पर ही आता है और वे राजमुकुट को महाराणा प्रताप के सिर पर रख देते हैं। राणा प्रताप देश की स्वतन्त्रता को राजमुकुट की मान-प्रतिष्ठा से जोड़ देते हैं और भरी सभा के सम्मुख स्वतन्त्रता-प्राप्ति का संकल्प लेते हैं। वे अपने इस संकल्प से मरते दम तक नहीं डिगते। आगे चलकर कृष्णजी चन्दावत देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए, उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश के लिए मर-मिटते हैं।
इस प्रकार हम नाटक के शीर्षक राजमुकुट’ को कथानुसार एकदम सटीक और राष्ट्र-भावनाओं के अनुरूप पाते हैं।

प्रश्न 10:
” ‘राजमुकुट’ नाटक में इतिहास एवं कल्पना का उचित समावेश है।” स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘राजमुकुट’ नाटक के कथानक का आधार विशुद्ध ऐतिहासिक है, किन्तु यत्र-तत्र’ काल्पनिक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है।” इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
‘राजमुकुट की ऐतिहासिकता की समीक्षा कीजिए। या ऐतिहासिक दृष्टि से राजमुकुट’ नाटक का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ के कथानक की ऐतिहासिकता।

श्री व्यथित हृदय द्वारा रचित नाटक ‘राजमुकुट’ का कथानक विशुद्ध ऐतिहासिक है, किन्तु इसमें यत्र-तत्र काल्पनिक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है। नाटक में काल्पनिक तत्त्वों का समावेश ऐतिहासिक तत्त्वों के आधार पर; आधुनिक समाज में व्याप्त समस्याओं का बोध कराने के लिए किया गया है। कथानक में देशप्रेम, राष्ट्रीय एकता, भावात्मक समन्वय तथा अन्तर्राष्ट्रीय चेतना जैसे मानवीय मूल्यों का सुन्दर समायोजन केरके नाटककार ने, नाटक के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होने के पश्चात् भी इसे प्रत्येक देश-काल के लिए : उपयोगी बना दिया है। कथानक में प्राचीन भारतीय मूल्यों एवं संस्कृति की श्रेष्ठता को भी प्रदर्शित किया गया है; अत: प्रस्तुत नाटक का कथानक विशुद्ध ऐतिहासिक होने पर भी उद्देश्यपरकता और सशक्तता की कसौटी पर खरा उतरता है।

प्रश्न 11:
‘राजमुकुट’ नाटक के मर्मस्पर्शी स्थलों पर प्रकाश डालिए।
या
“मानव-हित से ही देश-हित सम्भव है।” “राजमुकुट’ नाटक के आधार पर इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक यद्यपि वीर रस से परिपूर्ण नाट्यकृति है, तथापि इसमें मर्मस्पर्शी स्थलों का अभाव नहीं है। नाटक का तृतीय अंक इस दृष्टि से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। कृष्णजी चन्दावत का राणा प्रताप को बचाने के लिए उनका मुकुट धारण करके आत्मबलिदान करना, राणा का पीछा करते मुगल सैनिकों पर भ्रातृ-प्रेम से व्याकुल होकर शक्तिसिंह का टूट पड़ना, राणा और शक्तिसिंह का आपसी वैमनस्य भूलकर एक-दूसरे के गले लगना तथा चेतक की मृत्यु इस नाटक के सर्वाधिक मर्मस्पर्शी स्थल हैं। इनके अतिरिक्त जंगल में भटकते राणा प्रताप का संन्यासी अतिथि को सत्कार न करने पर व्यथित होना, चम्पा का घास की रोटी लिये आना और वन-बिलाव को रोटी छीनकर भाग जाना, तत्पश्चात् पत्थर से टकराकर चम्पा की मृत्यु होना, रोगग्रस्त राणा प्रताप का शक्तिसिंह तथा अपने साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेना एवं राणा प्रताप का स्वर्ग सिधार जाना अन्य महत्त्वपूर्ण मर्मस्पर्शी स्थल हैं, जो कि पाठक और दर्शक के मन में करुणा के साथ-साथ वीर रस का संचार करके देशप्रेम की भावना जगाने में सक्षम हैं।

प्रश्न 12:
‘राजमुकुट’ नाटक के माध्यम से नाटककार क्या सन्देश देना चाहता है?
या
”राजमुकुट’ नाटक का उददेश्य स्पष्ट कीजिए।
या
राजमुकुट में निहित राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ में व्यक्त देशप्रेम और स्वाधीनता की भावना पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक देश-कल्याण की भावना को जगाने वाली रचना है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक में अन्तर्निहित उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक देश-प्रेम और त्याग की भावना का सन्देश देता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
‘राजमुकुट’ नाटक में नाटककार श्री व्यथित हृदय का उद्देश्य निम्नलिखित सन्देश देना रहा है

(1) जनता की आवाज सर्वोपरि – इस नाटक के माध्यम से लेखक यह सन्देश देता है कि जनता के दमन और शोषण द्वारा कोई भी राजा अपनी प्रजा का प्रिय नहीं हो सकता। यदि वह ऐसा करता है तो एक समय ऐसा आएगा, जब क्रान्ति का बिगुल बज उठेगा। ‘राजमुकुट’ नाटक में चन्दावत एक ऐसा ही पात्र है, जो स्पष्ट कहता है कि “राजा प्रजा का केवल प्रतिनिधि मात्र होता है।” यही आज के भारत की स्वर है।

(2) साम्प्रदायिक सद्भाव – लेखक ने हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य की भावना का आयोजन कर साम्प्रदायिकता पर कुठाराघात किया है। प्रताप और अकबर का मिलन; समन्वय की भावना को प्रदर्शित करता है।

(3) स्वाधीनता, देश-प्रेम और एकता का सन्देश – नाटक ‘राजमुकुट के द्वारा लेखक ने राष्ट्रीय एकता का सन्देश दिया है। प्रताप अन्तिम समय तक अपने राष्ट्र की एकता के लिए संघर्ष करते रहे। वे मरते समय भी अपने वीर साथियों को संघर्ष के लिए प्रोत्साहित करते हैं। नाटक में स्थान-स्थान पर प्रेरणादायक सन्देश हैं; यथा–“मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि ………… जब तक सारे भारत को दासता के बन्धनों से मुक्त न करा लूंगा, सुख की नींद नहीं सोऊँगा।”
लेखक की कामना है कि देश के नवयुवक स्वार्थ की संकुचित भावना से ऊपर उठे, राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो जाएँ तथा अपनी मातृभूमि के लिए त्याग तथा बलिदान कर सकें। भारतीय संस्कृति की रक्षा, भावात्मक एकता और मानवीय गुणों की स्थापना की ओर भी लेखक ने विशेष ध्यान दिया है। प्रस्तुत नाटक के माध्यम से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में नाटककार पूर्ण रूप से सफल रहा है।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

 

 

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय–हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 ई० में बलिया जिले के दूबे का छपरा नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता श्री अनमोल द्विवेदी ज्योतिष और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे; अत: इन्हें ज्योतिष और संस्कृत की शिक्षा उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। काशी जाकर इन्होंने संस्कृत-साहित्य और ज्योतिष का उच्च स्तरीय ज्ञान प्राप्त किया। इनकी प्रतिभा का विशेष विकास विश्वविख्यात संस्था शान्ति निकेतन में हुआ। वहाँ ये 11 वर्ष तक हिन्दी भवन के निदेशक के रूप में कार्य करते रहे। वहीं इनके विस्तृत अध्ययन और लेखन का कार्य प्रारम्भ हुआ। सन् 1949 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट्० की उपाधि से तथा सन् 1957 ई० में भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्य किया तथा उत्तर प्रदेश सरकार की हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात् ये हिन्दी-साहित्य सम्मेलन प्रयाग के सभापति भी रहे। 19 मई, 1979 ई० को यह वयोवृद्ध साहित्यकार रुग्णता के कारण स्वर्ग सिधार गया।

साहित्यिक योगदान-हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्य के प्रख्यात निबन्धकार, इतिहास-लेखक, अन्वेषक, आलोचक, सम्पादक तथा उपन्यासकार के अतिरिक्त कुशल वक्ता और सफल अध्यापक भी थे। वे मौलिक चिन्तक, भारतीय संस्कृति और इतिहास के मर्मज्ञ, बँगला तथा संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे। इनकी रचनाओं में नवीनता और प्राचीनता का अपूर्व समन्वय था। इनके साहित्य पर संस्कृत भाषा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का स्पष्ट प्रभाव है। इन्होंने ‘विश्वभारती’ और ‘अभिनव भारतीय ग्रन्थमाला का सम्पादन किया। इन्होंने अपभ्रंश और लुप्तप्राय जैन-साहित्य को प्रकाश में लाकर अपनी गहन शोध-दृष्टि का परिचय दिया। निबन्धकार के रूप में विचारात्मक निबन्ध लिखकर भारतीय संस्कृति और साहित्य की रक्षा की। इन्होंने नित्यप्रति के जीवन की गतिविधियों और अनुभूतियों का मार्मिकता के साथ चित्रण किया है। ये हिन्दी ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। द्विवेदी जी की साहित्य-सेवा को डी० लिट्, पद्मभूषण और मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया है।

आलोचक के रूप में द्विवेदी जी ने हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर नवीन दृष्टि से विचार किया। इन्होंने हिन्दी-साहित्य का आदिकाल में नवीन सामग्री के आधार पर शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सूर-साहित्य पर इन्होंने भावपूर्ण आलोचना प्रस्तुत की है। इनके समीक्षात्मक निबन्ध विभिन्न संग्रहों में संग्रहीत हैं।

उपन्यासकार के रूप में द्विवेदी जी ने चार उपन्यासों की रचना की। इनके उपन्यास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। इनमें इतिहास और कल्पना के समन्वय द्वारा नयी शैली और उनकी मौलिक प्रतिभा का परिचय मिलता है।

रचनाएँ-आचार्य द्विवेदी का साहित्य बहुत विस्तृत है। इन्होंने अनेक विधाओं में उत्तम साहित्य की रचना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
(क) निबन्ध-संग्रह-‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘विचार-प्रवाह’, ‘विचार और वितर्क’, ‘आलोक पर्व’, ‘कल्पलता’। इन संग्रहों में द्विवेदी जी के विचारात्मक, भावात्मक और ललित निबन्ध हैं।
(ख) आलोचना-साहित्य–‘सूरदास’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘कबीर’, ‘साहित्य- सहचर’, साहित्य का मर्म’। इनमें द्विवेदी जी की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचनाएँ हैं।।
(ग) इतिहास-‘हिन्दी-साहित्य की भूमिका’, ‘हिन्दी-साहित्य का आदिकाल’, ‘हिन्दी-साहित्य’। इनमें इतिहास का शोधपूर्ण विवेचन है।
(घ) उपन्यास-‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचन्द्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’।
(ङ) सम्पादन-‘नाथ सिद्धों की बानियाँ’, ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’, ‘सन्देश रासक’। इन ग्रन्थों में लेखक की शोध-कला और सम्पादन-कला के दर्शन होते हैं।
(च) अनूदित रचनाएँ–‘प्रबन्ध चिन्तामणि’, ‘पुरातन प्रबन्ध-संग्रह’, ‘प्रबन्धकोश’, ‘विश्वपरिचय’, ‘लाल कनेर’, ‘मेरा बचपन’ आदि।

साहित्य में स्थान–आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी गद्य के प्रतिभाशाली रचनाकार थे। इन्होंने साहित्य के इतिहास-लेखन को नवीन दिशा प्रदान की। वे प्रकाण्ड विद्वान्, उच्चकोटि के विचारक और समर्थ आलोचक थे। गम्भीर आलोचना, विचारप्रधान निबन्धों और उत्कृष्ट उपन्यासों की रचना कर द्विवेदी जी ने निश्चय ही हिन्दी-साहित्य में गौरवपूर्ण स्थान पा लिया है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं। ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था; परन्तु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य का भार लेकर प्रवेश करता है, वह पहले कहाँ था। उस प्रवेश में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है। फिर एकाएक मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-ही-साथ यह मनोहर पुष्प साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार दिया गया। नाम तो लोग बाद में भी लेते थे, पर उसी प्रकार जिस प्रकार बुद्ध, विक्रमादित्य का। अशोक को जो सम्मान कालिदास से मिला, वह अपूर्व था।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक का पुष्प कालिदास के महाकाव्य में किस भाँति शोभा पाता है?
(iv) अशोक के पुष्प को कब साहित्य के सिंहासन से उतार फेंका गया?
(v) लेखक ने किसे विचित्र नाटकीय व्यापार बताया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम– अशोक के फूल।
लेखक का नाम–-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी अशोक के फूल के बारे में बताते हुए कह रहे हैं कि भारतीय साहित्यिक वाङमय और भारतीय जीवन में अशोक के फूल का प्रवेश और फिर विलुप्त हो जाना विचित्र नाटकीय स्थिति के सदृश है। कालिदास ने अपने काव्य में इस पुष्प को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। कालिदास के काव्य में यह पुष्प जिस सुन्दरता और सुकुमारता के साथ वर्णित होता है, वैसा उनके पूर्ववर्ती किसी कवि के काव्य में नहीं होता।
(iii) अशोक का पुष्प कालिदास के महाकाव्य में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा पाता है।
(iv) अशोक का पुष्प मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-साथ ही साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार फेंका गया।
(v) लेखक ने भारतीय साहित्य और भारतीय जीवन में अशोक के पुष्प के प्रवेश और निर्गम को विचित्र नाटकीय व्यापार बताया है।

प्रश्न 2.
कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधा। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक को विस्मृत करने का आधार किसे माना गया है?
(iv) लेखक ने दुनिया का किस तरह का व्यवहार बताया है?
(v) स्वार्थ का अखाड़ा किसे कहा गया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-द्विवेदी जी कहते हैं कि यह संसार बड़ा स्वार्थी है। यह उन्हीं बातों को याद रखता है, जिनसे उसका कोई स्वार्थ सिद्ध होता है, अन्यथा व्यर्थ की स्मृतियों से यह अपने आपको बोझिल नहीं बनाना चाहता। यह उन्हीं वस्तुओं को याद रखता है, जो उसके दैनिक जीवन की स्वार्थ-पूर्ति में सहायता पहुँचाती हैं। बदलते समय की दृष्टि में अनुपयोगी होने से यदि कोई वस्तु उपेक्षित हो जाती है तो यह उसे भूलकर आगे बढ़ जाता है।
(iii) अशोक को विस्मृत करने का आधार स्वार्थवृत्ति को माना गया है।
(iv) लेखक ने दुनिया के व्यवहार को इस तरह का बताया है कि यह केवल उतना ही याद रखती है जितने से इसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है।
(v) सारे संसार को स्वार्थ का अखाड़ा कहा गया है।

प्रश्न 3.
मुझे मानव-जाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवन-धारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नयी शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मनुष्य की जीवन-शक्ति को निर्मम क्यों बताया गया है?
(iv) लेखक ने किसे बाद की बात बताया है?
(v) ग्रहण और त्याग का रूप क्या है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी कह रहे हैं कि मानव-जाति के विकास के हजारों वर्षों के इतिहास के मनन और चिन्तन के परिणामस्वरूप उन्होंने जो अनुभव किया है वह यह है कि मनुष्य में जो जिजीविषा है वह अत्यधिक निर्मम और मोह-माया के बन्धनों से रहित है। सभ्यता और संस्कृति के जो कतिपय व्यर्थ बन्धन या मोह थे, उन सबको रौंदती हुई वह सदैव आगे बढ़ती चली गयी।
(iii) मनुष्य की जीवन-शक्ति को निर्मम इसलिए बताया गया है क्योंकि वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। देश और जाति की अवशुद्ध संस्कृति को बाद की बात बताया है। वर्तमान समाज का रूप न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।

प्रश्न 4.
अशोक का फूल तो उसी मस्ती में हँस रहा है। पुराने चित्त से इसको देखने वाला उदास होता है। वह अपने को पंडित समझता है। पंडिताई भी एक बोझ है—जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबाती है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक को देखकर कौन उदास होता है?
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक विद्वत्ता के बारे में जनसामान्य को क्या सन्देश देना चाहता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पाण्डित्य अर्थात् विद्वत्ता भी एक भार है। यह जितनी भारी होती है, उतनी ही तेजी से मनुष्य को डुबाती है। विद्वत्ता अहंकार को उत्पन्न करती है और अहंकार मनुष्य के विनाश का कारण होता है। जो जितना बड़ा विद्वान् होता है, वह उतना ही बड़ा अहंकारी भी होता है। रावण का उदाहरण हमारे समक्ष है। उस जैसा विद्वान् धरती पर शायद ही पैदा हुआ हो। लेकिन उसके अहंकार ने उसका सर्वनाश कर दिया।
(iii) अशोक को पुराने चित्त से देखने वाला उदास होता है।
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक सन्देश देना चाहता है कि विद्वत्ता को सहज और जीवन का अंग होना चाहिए जिससे वह व्यक्ति को उत्थान की ओर प्रेरित करेगी।
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय यह है कि व्यक्ति को अपने उत्थान से उत्साहित और पतन से निरुत्साहित नहीं होना चाहिए। प्रत्येक स्थिति में समभाव से रहना चाहिए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ई० में सहारनपुर जिले के देवबन्द कस्बे में, एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता पं० रमादत्त मिश्र पौरोहित्य करते थे, परन्तु उनके विचारों में महानता और व्यक्तित्व में दृढ़ता थी। इनका जीवन अत्यन्त सरल और सात्त्विक था। इनकी माताजी का स्वभाव बड़ा उग्र था। इनकी शिक्षा नगण्य ही हुई। अपनी शिक्षा के विषय में इन्होंने लिखा है कि हिन्दी शिक्षा (सच माने) पहली पुस्तक के दूसरे पाठ ख-ट-म-ल खटमल, ट-म-ट-म टमटम। फिर साधारण संस्कृत। बस हरि ओम्। यानि बाप पढ़े न हम।” जब ये खुर्जा के एक संस्कृत विद्यालय में पढ़ते थे, तब प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता आसफ अली के ओजस्वी भाषण को सुनकर परीक्षा छोड़ दी और स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेने लगे। इसके बाद इन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा में लगा दिया। मिश्र जी सन् 1930 ई० से 1932 ई० तक और सन् 1942 ई० में जेल में रहे और राष्ट्र के उच्च नेताओं के सम्पर्क में आये। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् इन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता में लगा दिया। ये एक सजग पत्रकार थे तथा सहारनपुर से ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक मासिक पत्र निकालने के साथ-साथ साहित्य-सृजन में भी संलग्न रहते थे। इनके लेख राष्ट्रीय जीवन के मार्मिक संस्मरणों की सजीव झाँकियाँ हैं, जिसमें भारतीय स्वाधीनता के इतिहास के महत्त्वपूर्ण पृष्ठ भी हैं। 9 मई, 1995 ई० को इस महान् साहित्यकार की मृत्यु हो गयी।

साहित्यिक योगदान-प्रभाकर जी हिन्दी के लघुकथा, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज एवं ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। ये भारत की स्वतन्त्रता की लालसा लेकर साहित्य-क्षेत्र में अवतीर्ण हुए। इन्होंने अनेक नयी विधाओं पर फुटकर रचनाएँ कीं और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व सफलता प्राप्त की। इन्होंने पत्रकारिता को स्वार्थ-सिद्धि का साधन न बनाकर महान् मानवीय मूल्यों की स्थापना की। इनकी पत्रकारिता में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण देखने को मिलता है। ये एक आदर्श पत्रकार के रूप में हिन्दी जगत् में प्रतिष्ठित हुए। इनके पत्रों में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर इनके निर्भीक और आशावादी विचारों का परिचय मिलता है।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय इन्होंने जीवन के मार्मिक संस्मरण लिखे। इनके संस्मरणों में इनके व्यक्तित्व के साथ-साथ भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की झाँकी भी मिलती है। इस प्रकार आदर्श पत्रकार, संस्मरण लेखक और रिपोर्ताज लेखक के रूप में प्रभाकर जी की साहित्य-साधना चिरस्मरणीय है।

रचनाएँ-प्रभाकर जी ने हिन्दी की विविध विधाओं में साहित्य-रचना की। इनके अभी तक नौ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं-
रेखाचित्र-‘महके आँगन चहके द्वार’, ‘जिन्दगी मुसकाई’, ‘माटी हो गयी सोना’, ‘भूले-बिसरे चेहरे’।
लघुकथा—‘आकाश के तारे’, ‘धरती के फूल’।
संस्मरण-‘दीप जले शंख बजे।
ललित निबन्ध-‘क्षण बोले कण मुस्काये’, ‘बाजे पायलिया के चुंघरू।
सम्पादन–आपने ‘नया जीवन’ तथा ‘विकास’, दो पत्रों का सम्पादन भी किया। इन पत्रों में प्रभाकर जी के सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक समस्याओं पर आशावादी और निर्भीक विचारों का परिचय मिलता है।
साहित्य में स्थान-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ शिल्प और वस्तु दोनों ही दृष्टियों से समर्थ गद्यकार हैं। इनकी लघुकथाएँ भावपूर्ण हैं और संस्मरणों में राष्ट्रीय जीवन की मार्मिक झाँकी है। ये मानव-मूल्यों के सजग प्रहरी के रूप में एक आदर्शवादी पत्रकार थे। देश तथा हिन्दी भाषा की असाधारण सेवा के कारण हिन्दी गद्य-साहित्य में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।

प्रश्न 1.
मैंने बहुतों को रूप से पाते देखा था, बहुतों को धने से और गुणों से भी बहुतों को पाते देखा था पर मानवता के आँगन में समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप आज अपनी ही आँखों देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाये और किसी का उत्सर्ग सदा किसी को पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने समर्पण और प्राप्ति का कौन-सा अदभुतं सौम्य स्वरूप देखा?
(iv) प्रायः गुणी व्यक्ति का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने किसकी झाँकी प्रस्तुत की है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं प्रसिद्ध रिपोर्ताज और संस्मरण लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित राबर्ट नर्सिंग होम में पाठ निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- राबर्ट नर्सिंग होम में।
लेखक का नाम-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि मैंने संसार में ऐसे बहुत-से व्यक्तियों को देखा है, जो अपनी विशिष्ट विशेषताओं से लोगों को अपना बना लेते हैं एवं अपार यश अर्जित करते हैं। कुछ लोग अपने रूप-सौन्दर्य द्वारा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तो कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनके पास अपार धन होता है और वे उसके बल पर लोगों पर अपना प्रभाव जमाते हैं या दूसरों को आत्मीय बना लेते हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिनमें कोई विशिष्ट गुण होता है और वे अपने गुणों द्वारा बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं; परन्तु आज लेखक ने एक ऐसी अद्भुत नारी को देखा, जिसने मानवता के लिए सर्वस्व समर्पित करके दूसरों की श्रद्धा और आदर को प्राप्त किया है।
(iii) लेखक ने समर्पण और प्राप्ति का यह अद्भुत सौम्य स्वरूप देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाए और किसी का उत्सर्ग सदा किसी को पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।
(iv) प्राय: गुणी व्यक्ति का लोगों पर यह प्रभाव पड़ता है कि वे अपने गुणों के द्वारा दूसरों को अपना बना लेते
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने विश्वप्रसिद्ध मानव-सेविका मदर टेरेसा की सेवा-भावना एवं आत्म-त्याग की मनोरम झाँकी प्रस्तुत की है।

प्रश्न 2.
यह अनुभव कितना चमत्कारी है कि यहाँ जो जितनी अधिक बूढ़ी है वह उतनी ही अधिक उत्फुल्ल, मुसकानमयी है। यह किस दीपक की जोत है? जागरूक जीवन की! लक्ष्यदर्शी जीवन की! सेवा-निरत जीवन की! अपने विश्वासों के साथ एकाग्र जीवन की। भाषा के भेद रहे हैं, रहेंगे भी, पर यह जोत विश्व की सर्वोत्तम जोत है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा में क्या अन्तर देखने को मिलता है?
(iv) कौन-सी ज्योति विश्व की सर्वोत्तम ज्योति है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किसके मुसकानमय जीवन का चित्रांकन किया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं प्रसिद्ध रिपोर्ताज और संस्मरण लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखित राबर्ट नर्सिंग होम में पाठ से अद्भुत है।
अथवा
पाठ का नाम- राबर्ट नर्सिंग होम में।
लेखक का नाम-श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–मदर मार्गरेट इन्दौर के नर्सिंग होम की सर्वाधिक वृद्धा नर्स हैं। लेखक ने वहाँ रहकर देखा कि उस नर्सिंग होम में जो जितनी वृद्धा नर्स है, वह उतनी ही अधिक सेवा-परायण, कर्तव्यपरायण, क्रियाशील, प्रसन्न और मुसकानमयी है।
(iii) भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा में भिन्न-भिन्न अन्तर देखने को मिलते हैं।
(iv) सबके हृदय में एक अद्भुत ज्योति प्रज्वलित है, वह है सेवा और प्यार की ज्योति। यही ज्योति विश्व की सर्वोत्तम ज्योति है।
(v) लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में रोबर्ट नर्सिंग होम में समर्पित भाव से सेवारत और सर्वाधिक वृद्धा नर्स मार्गरेट के मुसकानमय जीवन का चित्रांकन किया है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 2 राबर्ट नर्सिंग होम में (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)

प्रश्न 1.
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की विशिष्ट (प्रमुख) घटनाओं का वर्णन कीजिए। [2012, 13]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वतन्त्रता-संग्राम का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2017]
या
“‘मुक्तियज्ञ’ सन् 1921 से लेकर सन् 1947 तक के स्वतन्त्रता संग्राम की कहानी है। इस उक्ति पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के कथानक का सार प्रस्तुत कीजिए। [2016]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वाधीनता संग्राम की घटनाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2016]
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है। इस अंश में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की गाथा है। ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु संक्षेप में निम्नवत् है|
गाँधी जी साबरमती आश्रम से अंग्रेजों के नमक-कानून को तोड़ने के लिए चौबीस दिनों की यात्रा पूर्ण करके डाण्डी गाँव पहुँचे और सागरतट पर नमक बनाकर ‘नमक कानून तोड़ा

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

गाँधी जी का उद्देश्य नमक बनाना नहीं था, वरन् इसके माध्यम से वे अंग्रेजों के इस कानून का विरोध करना और जनता में चेतना उत्पन्न करना चाहते थे। यद्यपि उनके इस विरोध के आधार सत्य और अहिंसा थे, किन्तु अंग्रेजों का दमन-चक्र पहले की भाँति ही चलने लगा। गाँधी जी तथा अन्य नेताओं को अंग्रेजों ने कारागार में डाल दिया। जैसे-जैसे दमने-चक्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे ही मुक्तियज्ञ भी तीव्र होता गया। गाँधी जी ने भारतीयों को स्वदेशी वस्तु के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रोत्साहित किया। सम्पूर्ण देश में यह आन्दोलन फैल गया। समस्त देशवासी स्वतन्त्रता आन्दोलन में एकजुट होकर गाँधी जी के पीछे हो गये। इस प्रकार गाँधी जी ने भारतीयों में एक अपूर्व उत्साह एवं जागृति उत्पन्न कर दी।

गाँधी जी ने अछूतों को समाज में सम्मानपूर्ण स्थान दिलवाने के लिए आमरण अनशन आरम्भ किया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष का निर्णय किया। सन् 1927 ई० में साइमन कमीशन भारत आया। भारतीयों द्वारा इस कमीशन का पूर्ण बहिष्कार किया गया। मैक्डॉनल्ड एवार्ड के द्वारा केन्द्र एवं प्रान्त की सीमाओं से सम्पूर्ण भारतवर्ष को विभिन्न साम्प्रदायिक टुकड़ों में विभक्त कर दिया गया। इससे असन्तोष और भी ज्यादा बढ़ गया। काँग्रेस ने विभिन्न प्रान्तों में कुछ नेताओं के समर्थन से मन्त्रिमण्डल बनानी स्वीकार किया। शीघ्र ही विश्वयुद्ध छिड़ गया। काँग्रेस के सहयोग की शर्ते ब्रिटिश सरकार को मान्य नहीं थीं। फलत: गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर दिया। जापान के विश्वयुद्ध में सम्मिलित हो जाने से भारत में भी खतरे की सम्भावनाएँ उत्पन्न होने लगीं। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने भारत की समस्याओं पर विचार करने के लिए ‘क्रिप्स मिशन’ भेजा, जिसका भारतीय जनता ने विरोध किया। सन् 1942 ई० में गाँधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगा दिया। उसी रात्रि में गाँधी जी व अन्य नेतागण बन्दी बना लिये गये और अंग्रेजों ने बालकों, वृद्धों और स्त्रियों तक पर भीषण अत्याचार आरम्भ कर दिये। इन अत्याचारों के कारण भारतीयों में और अधिक आक्रोश उत्पन्न हो उठा। चारों ओर हड़ताल और तालाबन्दी हो गयी। अंग्रेजी शासन इस आन्दोलन से हिल गया। कारागार में ही गाँधी जी की पत्नी कस्तूरबा का देहान्त हो गया। पूरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल आक्रोश एवं हिंसा भड़क उठी थी।

आजाद हिन्द सेना के संगठनकर्ता सुभाषचन्द्र बोस ने भी भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने की योजना बनायी। सन् 1945 ई० में सारे बन्दी बनाये गये नेता छोड़ दिये गये। इससे जनता में उत्साह की लहर पुनः उमड़ने लगी। इसी समय सुभाषचन्द्र बोस का वायुयान दुर्घटना में निधन हो गया।

सन् 1942 ई० में ही भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की गयी थी। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की माँग की। अन्ततः 15 अगस्त, 1947 ई० को अंग्रेजों ने भारत को मुक्त कर दिया। अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन करवा दिया। एक ओर तो देश में स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, दूसरी ओर नोआखाली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच संघर्ष हो गया। गाँधी जी ने इससे दु:खी होकर आमरण उपवास रखने का निश्चय किया।

30 जनवरी, 1948 ई० को नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस दुःखान्त घटना के पश्चात् कवि द्वारा भारत की एकता की कामना के साथ इस काव्य का अन्त हो जाता है।

इस प्रकार इस खण्डकाव्य का आधार-फलक बहुत विराट् है और उस पर कवि पन्त द्वारा बहुत सुन्दर और प्रभावशाली चित्र खींचे गये हैं। इसमें उस युग का इतिहास अंकित है, जब भारत में एक हलचल मची हुई थी और सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की आग सुलग रही थी। इसमें व्यक्त राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है। निष्कर्ष रूप में मुक्तियज्ञ गाँधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

प्रश्न 2.
‘मुक्तियज्ञ’ के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके किसी एक प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014, 15]
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है।” स-तर्क प्रमाणित कीजिए। [2009]
या
राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गाँधी ही ‘मुक्तियज्ञ’ के पुरोधा हैं, खण्डकाव्य की कथावस्तु के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए और उनका चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 14]
या
‘मुक्तियज्ञ’ में कथित उन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार पर गाँधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया।
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ काव्य के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं—

(1) प्रभावशाली व्यक्तित्व-गाँधी जी का आन्तरिक व्यक्तित्व बहुत अधिक प्रभावशाली है। उनकी वाणी में अद्भुत चुम्बकीय प्रभाव था। उनकी डाण्डी यात्रा के सम्बन्ध में कवि ने लिखा है

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन ।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

(2) सत्य, प्रेम और अहिंसा के प्रबल समर्थक-‘मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी के जीवन के सिद्धान्तों में सत्य, प्रेम और अहिंसा प्रमुख हैं। अपने इन तीन आध्यात्मिक अस्त्रों के बल पर ही गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी। इन सिद्धान्तों को वे अपने जीवन में भी अक्षरशः उतारते थे। उन्होंने कठिनसे-कठिन परिस्थिति में भी सत्य, अहिंसा और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ा।
(3) दृढ़-प्रतिज्ञ-‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी ने जो भी कार्य आरम्भ किया, उसे पूरा करके ही छोड़ा। वे अपने निश्चय पर अटल रहते हैं और अंग्रेजी सत्ता दमन चक्र से तनिक भी विचलित नहीं होते। उन्होंने नमक कानून तोड़ने की प्रतिज्ञा की तो उसे पूरा भी कर दिखाया

प्राण त्याग दूंगा पथ पर ही, उठा सका मैं यदि न नमक-कर।
लौट न आश्रम में आऊँगा, जो स्वराज ला सका नहीं घर ॥

(4) जातिवाद के विरोधी-गाँधी जी का मत था कि भारत जाति-पाँति के भेदभाव में पड़कर ही शक्तिहीन हो रहा है। उनकी दृष्टि में न कोई छोटा था, न अस्पृश्य और न ही तुच्छ। इसी कारण वे जातिवाद के कट्टर विरोधी थे-

भारत आत्मा एक अखण्डित, रहते हिन्दुओं में ही हरिजन।
जाति वर्ण अघ पोंछ, चाहते, वे संयुक्त रहें भू जनगण ।।

(5) जन-नेता–‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी सम्पूर्ण भारत में जन-जन के प्रिय नेता हैं। उनके एक संकेत मात्र पर ही लाखों नर-नारी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं; यथा

मुट्ठी-भर हड्डियाँ बुलातीं, छात्र – निकल पड़ते सब बाहर।
लोग छोड़ घर-द्वार, मान, पद, हँस-हँस बन्दी-गृह देते भर ॥

भारत की जनता ने उनके नेतृत्व में ही स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को भगाकर ही दम लिया।

(6) मानवता के अग्रदूत-‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता के कल्याण में ही लगा देते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि मानव-मन में उत्पन्न घृणा, घृणा से नहीं अपितु प्रेम से मरती है। वे आपस में प्रेम उत्पन्न कर घृणा एवं हिंसा को दूर करना चाहते थे। वे हिंसा का प्रयोग करके स्वतन्त्रता भी नहीं चाहते थे; क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा पर टिकी हुई संस्कृति मानवीयता से रहित होगी-

घृणा, घृणा से नहीं मरेगी, बल प्रयोग पशु साधन निर्दय।
हिंसा पर निर्मित भू-संस्कृति, मानवीय होगी न, मुझे भय ॥

(7) लोक-पुरुष-मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी एक लोक-पुरुष के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। इस सम्बन्ध में कवि कहता है-

संस्कृति के नवीन त्याग की, मूर्ति, अहिंसा ज्योति, सत्यव्रत ।
लोक-पुरुष स्थितप्रज्ञ, स्नेह धन, युगनायक, निष्काम कर्मरत ।

(8) साम्प्रदायिक एकता के पक्षधर–स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में भीषण संघर्ष हुआ। इससे गाँधी जी का हृदय बहुत दु:खी हुआ। साम्प्रदायिक दंगा रोकने के लिए गाँधी जी ने आमरण अनशन कर दिया। गाँधी जी सोच रहे हैं

मर्म रुधिर पीकर ही बर्बर, भू की प्यास बुझेगी निश्चय।

(9) समद्रष्टा-गाँधी जी सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में न कोई बड़ा था और न ही कोई छोटा। छुआछूत को वे समाज का कलंक मानते थे। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था—

छुआछूत का भूत भगाने, किया व्रती ने दृढ़ आन्दोलन,
हिले द्विजों के रुद्र हृदय पर, खुले मन्दिरों के जड़ प्रांगण।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधी जी महान् लोकनायक; सत्य, अहिंसा और प्रेम के समर्थक; दृढ़-प्रतिज्ञ, निर्भीक और साहसी पुरुष के रूप में सामने आते हैं। कवि ने गाँधी जी में सभी लोककल्याणकारी गुणों का समावेश करते हुए उनके चरित्र को एक नया स्वरूप प्रदान किया है।

प्रश्न 3.
‘मुक्तियज्ञ’ में निरूपित आजाद हिन्द सेना की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में अपने घर में ही नजरबन्द सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेजों को चकमा । देकर जनवरी सन् 1941 में नजरबन्दी से निकल भागे तथा अफगानिस्तान, जर्मनी होते हुए जापान पहुँच गये। दिसम्बर 1941 में जापान ने विश्वयुद्ध में प्रवेश किया। उस समय मलाया में अमेरिकी, ऑस्ट्रेलियन और अंग्रेजी सैन्य विभागों के साथ लगभग 60,000 भारतीय सैनिक और उच्च पदाधिकारी भी नियुक्त थे। पराधीन देश के सैनिक होने के कारण उनके तथा अन्य देश के सैनिकों में वेतन और अन्य सुविधाओं की दृष्टि से बहुत भेदभाव रखा गया था। जापानियों ने बड़ी आसानी से मलाया पर अधिकार कर लिया। इन्हीं दिनों बंगाल के क्रान्तिकारी नेता श्री रासबिहारी बोस ने जापानी सैन्य अधिकारियों से मिलकर युद्ध में बन्दी भारतीय सिपाहियों की एक देशभक्त सेना बनायी। सितम्बर सन् 1942 में भारतीय सेनानायकों के नेतृत्व में ‘आजाद हिन्द सेना’ बनी। मलाया, बर्मा, हाँगकाँग, जावा आदि देशों के अनेक प्रवासी भारतीय भी उसमें सम्मिलित हुए। सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में ‘आजाद हिन्द सेना’ एक महत्त्वपूर्ण और बलशाली सैन्यसंगठन बन गया। 26 जून, सन् 1945 को भारत के प्रति रेडियो सन्देश भेजते हुए आजाद हिन्द रेडियो से उन्होंने घोषित किया था कि आजाद हिन्द सेना कोई पराधीन और शक्तिहीन सेना नहीं थी। इसके नायक धुरी राष्ट्रों की सहायता से भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने की योजना बना रहे थे।

मई, 1945 में विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और जून में कांग्रेस के बन्दी नेता छोड़ दिये गये। सारे देश में उत्साह की लहर छा गयी। इन्हीं दिनों लाल किले में बन्दी आजाद हिन्द सेना के नायकों पर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे के दौरान जब इन वीरों की शौर्य-गाथाएँ जनता के सामने आयीं, तब समस्त भारतीय जनता का प्यार उन पर उमड़ पड़ा। इसी समय हवाई दुर्घटना में हुई सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के समाचार से सम्पूर्ण भारत पर अवसाद (निराशा) के बादल छा गये। उनके कठिन प्रवास की दु:खद कहानियों को सुन-सुनकर जनता का यह अवसाद क्रोध में बदल गया। इस प्रकार युद्ध समाप्त होते-होते सम्पूर्ण भारत में फिर क्रान्ति की उत्तेजना व्याप्त हो गयी।

प्रश्न 4.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने जिन प्रमुख राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है, उनका संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने निम्नलिखित राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है—

  1. साइमन कमीशन का बहिष्कार,
  2. पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग,
  3. नमक आन्दोलन (डाण्डी यात्रा),
  4. शासन को आतंकित करने का आन्दोलन,
  5. देशभक्तों को फाँसी,
  6. मैक्डोनाल्ड पुरस्कार,
  7. काँग्रेस मन्त्रिमण्डलों की स्थापना,
  8. द्वितीय विश्व युद्ध,
  9. सविनय अवज्ञा आन्दोलन,
  10. सन् 1942 ई० की क्रान्ति (भारत छोड़ो आन्दोलन),
  11. आजाद हिन्द फौज की स्थापना,
  12. स्वतन्त्रता की प्राप्ति,
  13. देश का विभाजन तथा
  14. बापू का बलिदान।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name राजमुकुट (व्यथित हृदय)
Number of Questions 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय)

प्रश्न 1.
श्री व्यथित हृदय द्वारा लिखित ‘राजमुकुट’ नाटक का सारांश लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक का कथा-सार अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए। [2015, 16, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के द्वितीय अंक का कथा-सार लिखिए। [2010, 15]
या
‘राजमुकुट नाटक के तृतीय अंक का कथा-सार संक्षेप में लिखिए। [2009, 12, 13, 14, 16, 17, 18]
या
‘राजमुकुट नाटक के प्रथम अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 16]
या
“राजमुकुट’ नाटक के अन्तिम अंक की कथा संक्षिप्त रूप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के चतुर्थ अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2017, 18]
उत्तर
‘राजमुकुट’ नाटक, नाटककार श्री व्यथित हृदय का एक ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक में महाराणा प्रताप की वीरता, बलिदान और त्याग की कथा अंकित है। कथा का प्रारम्भ महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से तथा कथा का अन्त महाराणा प्रताप की मृत्यु पर होता है। महाराणा प्रताप इस नाटक के नायक हैं।

प्रथम अंक—प्रस्तुत नाटक के प्रथम अंक की कथा मेवाड़ के राणा जगमल के महल से आरम्भ होती है। राणा जगमल एक विलासी और क्रूर शासक है। वह अपनी मर्यादा का निर्वाह करना भूल गया था तथा सुरासुन्दरी में डूबा रहता था। ऐसे ही समय में राष्ट्रनायक कृष्णजी चन्दावत, राजसभा में पहुँचते हैं तथा राणा जगमल को उसके नीचे कर्मों के लिए भला-बुरा कहते हैं। वे जगमल से ‘मेवाड़ का मुकुट’ उचित पात्र को सौंपने के लिए आग्रह करते हैं। जगमल उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं तथा चन्दावत से योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहते हैं। चन्दावत; राणा जगमल से राजमुकुट लेकर प्रताप के शीश पर रख देते हैं। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ जाती है। प्रताप विदेशी शासक से लोहा लेने का प्रण करते हैं तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। यह संकल्प नाटक की कथा को आगे बढ़ाने में सहायक है।।

द्वितीय अंक-प्रताप मेवाड़ के राजा बनते ही अपनी प्रजा के खोये हुए सम्मान की रक्षा करते हैं। वे प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए अनेक आयोजन भी करते हैं। ऐसे ही एक आयोजन के अवसर पर जंगली सूअर के आखेट को लेकर प्रताप तथा उनके भाई शक्तिसिंह में विवाद हो जाता है। विवाद बढ़ जाने पर दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। भावी अनिष्ट की आशंका या राजकुल को संकट से बचाने के लिए राजपुरोहित अपनी कटार से अपना ही प्राणान्त कर लेते हैं। प्रताप शक्तिसिंह को देश से निर्वासित कर देते हैं। शक्तिसिंह अपने को अपमानित अनुभव करते हैं तथा अकबर के साथ मिल जाते हैं।

तृतीय अंक-मानसिंह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थीं। इसलिए राणा ने उससे स्वयं भेट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से चला गया तथा दिल्ली के सम्राट् अकबर से जा मिला। चतुर अकबर अवसर का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप पर आक्रमण कर देता है। हल्दीघाटी के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप को बचाने के लिए कृष्णजी चन्दावत, प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर स्वयं पहन लेते हैं और युद्धभूमि में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। प्रताप बच जाते हैं, परन्तु दो मुगल सैनिक प्रताप का पीछा करते हैं। ऐसे समय पर शक्तिसिंह का भ्रातृ-प्रेम जाग्रत होता है और वे पीछा करके दोनों मुगलों को मार देते हैं। शक्तिसिंह और प्रताप आपस में गले मिलते हैं। इसी समय राणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक अपने प्राण त्याग देता है।

चतुर्थ अंक-हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाता है, परन्तु राणा हार नहीं मानते। अकबर प्रताप की देशभक्ति, त्याग और वीरता का लोहा मानते हैं तथा वे महाराणा प्रताप के प्रशंसक बन जाते हैं। एक दिन प्रताप के पास एक संन्यासी आता है। प्रताप संन्यासी का उचित सत्कार न कर पाने के कारण अत्यधिक व्यथित हैं। इसी समय राणा की पुत्री चम्पा घास की बनी रोटी लेकर आती है, जिसे एक वन-बिलाव छीनकर भाग जाता है। चम्पा गिर जाती है और पत्थर से टकराकर उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ समय पश्चात् अकबर संन्यासी वेश में वहाँ आता है और कहता है कि, “आप उस अकबर से तो सन्धि कर सकते हैं जो भारतमाता को अपनी माँ समझता है, जो आपकी भाँति उसकी जय बोलता है।” इसी समय अकबर राणा को भारतमाता का सपूत’ बताता है और प्रताप के दर्शन करके अपने को धन्य मानता है। संघर्षरत प्रताप रोगग्रस्त हो जाते हैं। वे शक्तिसिंह तथा अपने सभी साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेते हैं। ‘भारतमाता की जय’ घोष के साथ ही महाराणा का देहान्त हो जाता है।
‘राजमुकुट’ की यह कथा भारत के स्वर्णिम इतिहास और एक रणबाँकुरे वीर की अमर कहानी है।

प्रश्न 2.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर उसके प्रमुख पात्र (नायक) महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
‘राजमुकुट’ नाटक में जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो, उसके व्यक्तित्व का परिचय दीजिए। [2009, 14]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 11, 13, 14, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर प्रतापसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016, 18]
या
‘राजमुकुट’ नाटक के नायक की चरित्रगत विशेषताएँ प्रस्तुत कीजिए। [2018]
उत्तर
महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक महाराणा प्रताप हैं। नाटक में उनके चरित्र का मूल्यांकन करने वाली; राज्याभिषेक से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ हैं। राणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है-

(1) आदर्श भारतीय नायक-भारतीय नाट्यशास्त्र में आदर्श नायक के जिन गुणों के विषय में बताया गया है, महाराणा प्रताप के चरित्र में वे सभी गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र ‘धीरोदात्त नायक’ का आदर्श चरित्र है। वे उच्च कुल में उत्पन्न हुए वीर, साहसी तथा संयमी व्यक्ति हैं।
(2) प्रजा की आशाओं के आधार-मेवाड़ की प्रजा महाराणा प्रताप को इस आशा के साथ मुकुट पहनाती है कि वे उसकी तथा देश की रक्षा करेंगे। प्रजा की आशा के अनुरूप प्रताप उसके सच्चे हितैषी सिद्ध होते हैं। प्रजा प्रताप के मुकुट धारण करने से पूर्व ही यह आशा रखती है कि वह देश में छायी हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा; आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है; उसका पौरुष गेय है। वह महीमाता का पुण्य है। भारतमाता की साधना का फल है; अमरफल
(3) मातृभूमि के अनन्य भक्त-प्रताप मातृभूमि के अनन्य भक्त हैं। वे देश की दासता और प्रजा की दुर्दशा से व्यथित हैं—“सारा देश विदेशियों के अत्याचारों से विकम्पित हो चुका है। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक असन्तोष राग अलाप रहा है।”………” चित्तौड़ का युद्ध भारत का युद्ध होगा।”
(4) दृढ़प्रतिज्ञ तथा कर्त्तव्यनिष्ठ-महाराणा दृढ़ निश्चयी तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान हैं। राजमुकुट धारण करने के अवसर पर प्रताप के शब्द हैं-“मेरा जयनाद ! मुझे महाराणा बनाकर मेरा जयनाद न बोलो साथियो! जय बोलो भारत की, मेवाड़ की। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राणों में साँस रहते हुए प्रजा-प्रभु की दी हुई इस भेंट को मलिन न करूंगा। जब तक सारे भारत को दासता से मुक्त न कर लँगा, सुख की नींद न सोऊँगा।”
(5) स्वतन्त्रता हेतु दृढ़ संकल्प–प्रताप जीवनपर्यन्त स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। वे अकबर से हल्दीघाटी में युद्ध करते हैं। सब कुछ खोकर, भी वे अकबर के सामने झुकते नहीं। बच्चे भूखों मर जाते हैं, फिर भी यह लौह-पुरुष अडिग रहता है। मृत्यु के समय भी राणा को एक ही लगन है, एक ही इच्छा है, एक ही अभिलाषा है, वह है देश की स्वतन्त्रता-“बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”
(6) निरभिमानी एवं सत्ता-लिप्सा से दूर—राणा देशभक्त हैं, स्वतन्त्रता के दीवाने हैं, परन्तु वे राजा बनना नहीं चाहते। राणा प्रताप महान् देशभक्त एवं मेवाड़ के महाराणा हैं, किन्तु उन्हें अभिमान बिल्कुल नहीं है। महान् होकर भी वे स्वयं को महान् नहीं समझते। वे कहते हैं–‘‘मेवाड़ का राणी मैं ! नहीं, नहीं कृष्णजी! आप भूल रहे हैं। मेवाड़ के महाराणा का पद महान् है, बहुत महान् है।”
(7) भारतीय संस्कृति, धर्म तथा मान-मर्यादा के रक्षक-महाराणा भारतीय संस्कृति के पोषक हैं। वे धर्म की रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य समझते हैं। संन्यासी के रूप में अकबर जब उनके पास पहुँचता है तो वे उसका आदर करते हैं, परन्तु खाने के लिए कुछ भी दे पाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें कष्ट होता है। वे कहते हैं-…”आज कई दिनों से बच्चे घास की रोटियों पर निर्वाह कर रहे थे तो क्या संन्यासी अतिथि को भी धास की ही रोटियाँ खिलाऊँ।”
धर्म के प्रति भी राणा के मन में निष्ठा है। पुरोहित का बलिदान देखकर राणा कहते हैं-“देशभक्त पुरोहित तुम धन्य हो! तुमने अपने अनुरूप ही अपनी बलिदान दिया है। ज्ञान और चेतना से दूर हम अधम को तुमने प्रकाश दिखाया है ………….।”
(8) पराक्रमी योद्धा-राणा वीर हैं। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके शौर्य का साक्षी है। प्रताप अपने सैनिकों से कहते हैं—“चलो युद्ध का राग गाते हुए हम सब हल्दीघाटी की युद्धभूमि में चलें और रक्तदान से चण्डी माता को प्रसन्न करके उनसे विजय का शुभ आशीर्वाद लें।”

इस प्रकार राणा का चरित्र अनेक अमूल्य गुणों की खान है। वे आदर्श देशभक्त हैं और त्यागी, साहसी, उदार, वीर, दृढ़निश्चयी तथा उदात्त पुरुष हैं। वे प्रजा को आत्मीय मित्र मानते हैं। मुगल सम्राट् । अकबर भी उनकी प्रशंसा करते हैं-”महाराणा प्रताप भारत के अनमोल रत्न हैं।”

प्रश्न 3.
शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009]
या
‘राजमुकुट के आधार पर शक्तिसिंह की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 15, 16, 17]
उत्तर

शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण

शक्तिसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक मेवाड़ के महाराणा प्रताप का छोटा भाई है। महाराणा के इस सुयोग्य अनुज के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) परम देशभक्त–शक्तिसिंह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमा है। उसके हृदय में अपने भाई के समान देश की दासता, जनता की व्यथा और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध आक्रोश है। वह मेवाड़ के घर-घर में जीवन और जागृति का मन्त्र फेंकना चाहता है। वह अपने देश के मंगल के लिए सब-कुछ करने को तत्पर है-”माता-मही! तू मेरी भुजाओं में शक्ति दे कि मैं जगमल के सिंहासन को उलट सकें। ……………… मेवाड़ में सुख-शान्ति स्थापित कर सकें।”
(2) राज्य-वैभव के प्रति अनासक्त-शक्तिसिंह का चरित्र त्याग भाव से परिपूर्ण है। उसे राज्य-वैभव में कोई आसक्ति नहीं है। अहेरिया उत्सव पर वन-शूकर के वध पर महाराणा से तकरार हो जाने पर दोनों में तलवारें खिंच जाती हैं, जिसमें मध्यस्थता करते हुए पुरोहित की हत्या हो जाती है। इस अपराध में उसे राज्य से निर्वासित कर दिया जाता है, जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
(3) निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता–शक्तिसिंह में निर्भीकता और स्पष्ट बात कहने का साहस द्रष्टव्य है। वह अकबर की सेना में सम्मिलित हो जाता है, किन्तु अकबर द्वारा मेवाड़ का सर्वनाश करने का संकल्प लेने पर वह उसकी सहायता करने को तैयार नहीं होता।
(4) भावुक और प्रकृति-प्रेमी–शक्तिसिंह युवक है। प्राकृतिक सौन्दर्य उसे भाव-विमुग्ध कर देता है। वह उपवन में बैठकर गीत गुनगुनाता है। चन्दावत के पूछने पर वह कहता है-“वन मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे होते हैं।”
(5) भ्रातृ-प्रेमी–शक्तिसिंह के हृदय में अपने भाई महाराणा के प्रति अनन्य प्रेम है। राणा प्रताप और शक्तिसिंह का युद्धभूमि में सामना होता है। युद्ध में ही राणा के घोड़े चेतक की मृत्यु हो जाती है। राणा उसके शव के निकट चिन्तित भाव से बैठे हुए थे, तभी दो मुगल सैनिकों को महाराणा पर प्रहार करते हुए देखकर शक्तिसिंह एक ही बार में दोनों को मौत के घाट उतार देता है और महाराणा से क्षमायाचना करता है वह आया है मेवाड़ के महाराणा से क्षमायाचना करने, उनकी स्नेहमयी गोद में बैठकर पश्चात्ताप करने और उनकी वीरता की पवित्र गंगा में अपने कलुषित-कल्मषों को धोने।”
(6) साम्प्रदायिक सद्भावना तथा राष्ट्रीय एकता का पोषक–शक्तिसिंह यह सोचता है कि अकबर और प्रताप मिलकर ऐसे भारत की रचना कर सकते हैं, जिसमें धर्म और सम्प्रदाय का वैमनस्य नहीं होगा। ऐसा भारत ही अखण्ड राष्ट्र हो सकता है। वह हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों को मिल-जुलकर रहने का सन्देश देता है-“तुम उन्हें विदेशी और विधर्मी समझ रहे हो, क्या वे फिर काबुल, कंधार और ईरान लौट जाएँगे ? ……………. वे अब इसी देश में रहेंगे और उसी प्रकार उसी कण्ठ से भारतमाता की जय बोलेंगे।”
(7) अन्तर्द्वन्द्व से घिरा–शक्तिसिंह उज्ज्वल चरित्र का व्यक्ति है। वह प्रतिशोध की भावना और देशभक्ति के द्वन्द्व से घिर जाता है, किन्तु अन्त में देशभक्ति की भावना की विजय होती है। तब वह सोचता है-‘प्रतिहिंसा की भावना से उत्तेजित होकर दानव बन जाना ठीक नहीं।” इन सहज दुर्बलताओं ने तो उसके चरित्र को यथार्थ का स्पर्श देकर निखार दिया है।

प्रश्न 4.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर मुगल सम्राट अकबर का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014, 15, 16, 18]
उत्तर

अकबर का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक में मुगल सम्राट् अकबर एक प्रमुख पात्र है। वह महाराणा प्रताप का प्रतिद्वन्द्वी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं—

(1) व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति-अकबर व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति है। अपने इसी गुण के कारण वह शक्तिसिंह के हृदय में जगी प्रतिशोध की भावना को तीव्र कर देता है– ‘छलिया संसार को छल और प्रपंचों से परास्त करने का पाठ पढ़ो।……… संसार में भावुकता से काम नहीं चल सकता शक्ति!”
(2) महत्त्वाकांक्षी–सम्राट् अकबर बहुत महत्त्वाकांक्षी है। वह मन-ही-मन मेवाड़-विजय का संकल्प करता है-”मैं अपने जीवन के उस अभाव को पूरा करूंगा, मेवाड़ के गौरवमय भाल को झुकाकर अपने साम्राज्य की प्रभुता बढ़ाऊँगा।”
(3) मानव-स्वभाव का पारखी-अकबर बहुत बुद्धिमान है। वह शक्तिसिंह, मानसिंह और राणा प्रताप के चरित्र का सही मूल्यांकन करता है-”एक प्रताप है, जो मातृभूमि के लिए प्राण हथेली पर लिये फिरता है और एक तुम हो, जो मातृभूमि के सर्वनाश के लिए खाइयाँ खोदते फिरते हो।”
(4) सदगुणों का प्रशंसक-अकबर व्यक्ति के सद्गुणों की प्रशंसा करने से नहीं चूकता, चाहे वे सद्गुण उसके शत्रु में ही क्यों न हों। यह विशेषता उसे महानता प्रदान करती है। वे हृदय से राणा की वीरता और स्वाभिमान की प्रशंसा करता है-*”………….धन्य है मेवाड़! और धन्य हैं मेवाड़ की गोद में पलने वाले महाराणा प्रताप ! प्रताप मनुष्य रूप में देवता हैं, मानवता की अखण्ड ज्योति हैं।”
(5) साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक-अकबर हिन्दू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है। उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही’ मत इसी साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है। वह मानवीय गुणों का आदर करता है। वह महाराणा की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए कहता है- “हमारा और आपका मिलन ! यह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं महाराणा ! दो धर्म-प्रवाहों का मिलन है, जिससे इस देश की संस्कृति सुदृढ़ तथा पुष्ट होगी।”
(6) कूटनीतिज्ञ-अकबर कुशल कूटनीतिज्ञ है। वह प्रत्येक निर्णय कूटनीति से लेता है। उसकी चतुर कूटनीति का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-”प्रताप का भाई शक्तिसिंह स्वयं जादू के जाल में फंसकर माया की तरंगों में डुबकियाँ लगी रहा है। उसी को मेवाड़ के विध्वंस का साधन बनाऊँगा।”

प्रश्न 5.
राजमुकुट के आधार पर प्रमिला का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर सिद्ध कीजिए कि इसमें नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है किन्तु ये अपना-अपना प्रभाव छोड़ने में पूर्णरूपेण सक्षम हैं।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के प्रमुख स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2015)
उत्तर
‘राजमुकुट के नारी-पात्र । श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ में नारी-पात्रों का समावेश नगण्य है। इसमें प्रमिला, प्रजावती, गुणवती और चम्पा प्रमुख नारी पात्र हैं।
प्रमिला नाटक की एक साधारण स्त्री-पात्र है। वह जगमल के चापलूस सरदार हाथीसिंह की पत्नी है। वह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने पति को देश के कल्याण के लिए बलिदान हो जाने का संन्देश देती है। नाटक के तृतीय दृश्य में इसका राष्ट्रप्रेम अभिव्यक्त होता है। वह अपने पति से कहती है-“देश पर जब विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हों, तब देश के नर-नारियों को अधिक परित्याग करना ही चाहिए। यदि देश का कल्याण करने में माँग का सिन्दूर मिट गया, तो चिन्ता की क्या बात।” जब उसका पति कहता है-“खाँडे का नाम सुनकर ही मेरे प्राणों में भूचाल आने लगता है”-तो प्रमिला उस पर व्यंग्य करती हुई कहती है-“तो लहँगा पहनकर हाथों में चूड़ियाँ डाल लो। पूँघट निकालकर घर के कोने में जाकर बैठे रहो।”

प्रजावती निरपराध, पवित्र, जनहित में लगी रहने वाली, स्वाभिमानिनी तथा देशप्रेमी व प्रजावत्सल नारी है। नाटककार ने उसे मंच पर उपस्थित नहीं किया है, वरन् अन्य पात्रों के माध्यम से ही उसके चरित्र की

विशेषताओं को उजागर किया गया है। जगमल का एक सैनिक उसके चरित्र पर प्रकाश डालता हुआ कहता है-“वह विक्षिप्ता है महाराज! दिन भर झाड़ियों और कन्दराओं में छिपी रहती है। जब रात होती है तब बाहर निकलकर अपने जीवनगान से सम्पूर्ण उदयपुर को प्रतिध्वनित कर देती है। वह रात भर अपने गान को मादिनी पर, पाषाणों पर, दीवारों पर लिखती फिरती है। उसका जीवन-गान उदयपुर में धर्म-गीत बन रहा है।” राणा जगमल अपने क्रूर चाटुकारों के कहने से उसका वध करवा देता है। प्रजावती के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए प्रजा का नायक चन्दावत कहता है-“वह कृषकों और श्रमिकों के जीवन को प्रकाश थी; उनके प्राणों की आशा थी; उनकी धमनियों का रक्त थी।”

गुणवती मेवाड़ के राणा प्रताप की पत्नी हैं, जो उनके साथ वनवास के कष्टों को सहर्ष सहन करती हैं। तथा अपने पति का हर संकट में साथ देती हैं।
चम्पा महाराणा की पुत्री है। वह नाटक के अन्त में मंच पर उपस्थित होती है। उसे अपने पिता के साथ वन में भटकते और कष्ट सहन करते हुए दिखाया गया है।
इस प्रकार इस नाटक में नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है, किन्तु भावनात्मक स्तर पर वे पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 6.
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर मानसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012]
उत्तर
मानसिंह; श्री व्यथित हृदय द्वारा रचित ‘राजमुकुट’ नाटक का एक प्रमुख पात्र तथा अकबर का सेनापति है। वह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा ने उससे स्वयं भेट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वह वहाँ से लौट गया। वह दिल्ली के सम्राट् अकबर से जाकर मिला और उसके निर्देश और अपने नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ पहुँचा। मुगल और राजपूत दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ।

इस प्रकार मानसिंह एक असंयत मनोवृत्ति का व्यक्ति था, जिसमें सहनशीलता का अभाव था। उसने बदले की भावना से प्रेरित होकर, मुगल सम्राट अकबर की सहायता से राणा पर आक्रमण करके विधर्मी और विश्वासघाती होने का परिचय दिया।

प्रश्न 7.
“राष्ट्रनायक चन्दावत’ राजमुकुट नाटक का एक प्रभावशाली चरित्र है।” इस कथन के आलोक में ‘चन्दावत’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
नाटककार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक में ‘चन्दावत’ नामक पात्र का भी वर्णन किया है जो राष्ट्रनायक है और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भलीभाँति निभाता है, उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कर्त्तव्य के प्रति जागरूक-इस नाटक में ‘चन्दावत’ को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया। गया है। वह मर्यादाओं के पालन में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। जब राणा जगमल अपने राज-कर्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब जाते हैं, इस कारण राष्ट्रनायक चन्दवत बड़े दु:खी हैं। इसलिए वे जगमले को फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हों; अतः राजमुकुट किसी उचित उत्तराधिकारी को सौंप दो।
(2) महान् त्यागी एवं बलिदानी-‘चन्दावत’ महात्यागी एवं बलिदानी व्यक्ति है। युद्ध के मैदान में देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए, उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश पर अपने प्राण बलिदान कर देते हैं।
(3) सच्चा देशभक्त–चन्दावत एक सच्चा देशभक्त है। देशभक्ति की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार जानता है। युद्ध में राणा के प्राण बचाने के लिए उसका मुकुट स्वयं धारण करना देशभक्ति का एक अप्रतिम उदाहरण उसने प्रस्तुत किया है।
(4) दूरदर्शी-चन्दावत दूर की सोचने वाला व्यक्ति है। जब जगमल सुरासुन्दरी का दास होकर रह जाता है। जनता उसका विरोध करती है, तो वह जगमल से उचित उत्तराधिकारी को मुकुट सौंपने को कह देते हैं और स्वयं राणा को राजमुकुट पहनाते हैं जिससे जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि चन्दावत एक त्यागी, बलिदानी, दूरदर्शी और एक सच्चा देशभक्त था।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.