UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 4 Poverty

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 4
Chapter Name Poverty (निर्धनता)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 4 Poverty (निर्धनता)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निर्धनता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
शाहीन रफी खान और डेनियन किल्लेन के शब्दों में-“निर्धनता भूख है। निर्धनता बीमार होने पर चिकित्सक को न दिखा पाने की विवशता है। निर्धनता स्कूल में न जा जाने और निरक्षर रह जाने का नाम है। निर्धनता बेरोजगारी है। निर्धनता भविष्य के प्रति भय है; निर्धनता दिन में एक बार भोजन पाना है। निर्धनता अपने बच्चे को उस बीमारी से मरते देखने को कहते हैं जो अस्वच्छ पानी पीने से होती है। निर्धनता शक्ति, प्रतिनिधित्वहीनता और स्वतंत्रता की हीनता का नाम है।” संक्षेप में, निर्धनता से अभिप्राय है-“जीवन, स्वास्थ्य और कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता।”

प्रश्न 2.
काम के बदले अनाज कार्यक्रम का क्या अर्थ है?
उत्तर
‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम देश के 150 सर्वाधिक पिछड़े जिलों में इस उद्देश्य के साथ शुरू किया गया ताकि पूरक वेतन रोजगार के सृजन को बढ़ाया जा सके। इस कार्यक्रम के अंतर्गत मुख्यतः जल संरक्षण, सूखे से सुरक्षा और भूमि विकास संबंधी कार्य सम्पन्न कराए जाते हैं और मजदूरी के न्यूनतम 25% का भुगतान नकद राशि में तथा शेष भुगतान अनाज के रूप में किया जाता है। इस योजना के अंतर्गत देश में प्रत्येक परिवार के एक सक्षम व्यक्ति को 100 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी पर रोजगार देने का प्रावधान है। यह कार्यक्रम शत-प्रतिशत केन्द्र प्रायोजित है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार का एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्र में जब एक किसान अपनी भूमि पर अपने निजी संसाधनों का प्रयोग करके फसलों का उत्पादन करता है तो यह स्वरोजगार कहलाएगा। इस प्रकार शहरी क्षेत्र में जब कोई आदमी एक दुकान खोलकर उसे चलाता है तो वह भी स्वरोजगार श्रमिक कहलाएगा।

प्रश्न 4.
आय अर्जित करने वाली परिसम्पत्तियों के सृजन से निर्धनता की समस्या का समाधान किस प्रकार हो सकता है?
उत्तर
निर्धनों के विकास के लिए विकल्पों की खोज के क्रम में नीति निर्धारकों को लगा कि वर्धनशील परिसम्पत्तियों और कार्य सृजन के साधनों द्वारा निर्धनों के लिए आय और रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। इस नीति को तृतीय पंचवर्षीय योजना से आरम्भ किया गया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत छोटे उद्योग लगाने के लिए बैंक ऋणों के माध्यम से वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया जाता है। भूमिहीनों को भूमि आवंटित करके रोजगार के अधिक अवसरों का सृजन होता है। वित्तीय सहायता, भूमि एवं अन्य परिसम्पत्तियों के अर्जन से रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है तथा आमदनी बढ़ती है, जिससे निर्धनता की समस्या हल होती है।

प्रश्न 5.
भारत सरकार द्वारा निर्धनता पर त्रि-आयामी प्रहार की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर
भारत सरकार ने निर्धनता निवारण के लिए त्रि-आयामी नीति अपनाई, जिसका विवरण इस प्रकार है
1. संवृद्धि आधारित रणनीति- यह इस आशा पर आधारित है कि आर्थिक संवृद्धि (अर्थात् सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में तीव्र वृद्धि) के प्रभाव समाज के सभी वर्गों तक पहुँच जाएँगे। यह माना जा रहा था कि तीव्र दर से औद्योगिक विकास और चुने हुए क्षेत्रों में हरित क्रांति के माध्यम से कृषि का पूर्ण कार्याकल्प हो जाएगा। परंतु जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूस प्रति व्यक्ति आय में बहुत कमी आई जिस कारण धनी और निर्धन के बीच की दूरी और बढ़ गई।

2. वर्धनशील परिसम्पत्तियों और कार्य का सृजन- प्रथम आयाम की असफलता के बाद नीति-निर्धारकों को ऐसा लगा कि वर्धनशील परिसम्पत्तियों और कार्य सृजन के साधनों द्वारा निर्धनों के लिए आय और रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। इस दूसरी नीति को द्वितीय पंचवर्षी योजना से आरम्भ किया गया। स्वरोजगार एवं मजदूरी आधारित रोजगार कार्यक्रमों को निर्धनता भगाने का मुख्य माध्यम माना जाता है। स्वरोजगार कार्यक्रमों के उदाहरण हैं—ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम (REGP), प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY) तथा स्वर्णजयंती शहरी रोजगार योजना (SJSRY)। इन रोजगार कार्यक्रमों एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से निम्न आय वर्ग के लोगों को आय अर्जित करने के अवसर प्राप्त हुए हैं।

3. न्यूनतम आधारभूत सुविधाएँ– निर्धनता निवारण की दिशा में तीसरा आयाम न्यूनतम आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। इस नीति के अंतर्गत उपभोग, रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य एवं शिक्षा में आपूर्ति बढ़ाने पर बल दिया गया। निर्धनों के खाद्य उपभोग और पोषण-स्तर को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कार्यक्रम हैं—सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, एकीकृत बाल विकास योजना तथा मध्यावकाश भोजन योजना। बेसहारा बुजुर्गों एवं निर्धन महिलाओं के लिए भी सामाजिक सहायता अभियान चलाए जा रहे हैं।

प्रश्न 6.
सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं के सहायतार्थ कौन-से कार्यक्रम अपनाए हैं?
उत्तर
सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं की सहायतार्थ निम्नलिखित कार्यक्रम अपनाए हैं-सामाजिक सुरक्षा बीमा योजना (1989-80 ई०), राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (1994-95 ई०), राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना (1994-95 ई०), राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (1994-95 ई०), प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (1997-98 ई०), लक्ष्य आधारित खाद्यान्न वितरण कार्यक्रम (1997-98 ई०), महिला सर्वशक्ति योजना (1998-99 ई०), अन्नपूर्णा योजना (2001 ई०), महिला स्वयंसिद्ध योजना (2001-02 ई०), महिला स्वाधार योजना (2001-02 ई०), वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना (2003-04 ई०), जननी सुरक्षा योजना (2003-04 ई०), सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना (2003-04 ई०), आशा योजना (2005 ई०), एकल बालिका नि:शुल्क शिक्षा योजना (2005 ई०), राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण स्कीम-सबला (2010-11 ई०), इन्दिरागांधी मातृत्व सहयोग योजना (2010-11 ई०)।

प्रश्न 7.
क्या निर्धनता और बेरोजगारी में कोई संबंध होता है? समझाए।
उत्तर
निर्धनता का संबंध व्यक्ति के रोजगार एवं उसके स्वरूप से भी होता है; जैसे—बेरोजगारी, अल्परोजगार, कभी-कभी काम मिलना आदि। अधिकांश शहरी निर्धन या तो बेरोजगार हैं या अनियमित मजदूर हैं, जिन्हें कभी-कभी रोजगार मिलता है। ये अनियमित मजदूर समाज के बहुत ही दयनीय सदस्य हैं। क्योंकि इनके पास रोजगार सुरक्षा, परिसम्पत्तियाँ, वांछित कार्य-कौशल, पर्याप्त अवसर तथा निर्वाह के लिए अधिशेष नहीं होते हैं। इसीलिए भारत सरकार ने अकुशल श्रमिकों के लिए रोजगार कार्यक्रम आरम्भ किए। इसी क्रम में 1970 ई० के दशक में चलाया गया ‘काम के बदले अनाज’ एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम रही। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अकुशल निर्धन लोगों के लिए मजदूरी पर रोजगार के सृजन के लिए भी सरकार के पास अनेक कार्यक्रम हैं। इनमें से प्रमुख हैं-राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम तथा सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना।

प्रश्न 8.
सापेक्ष और निरपेक्ष निर्धनता में क्या अंतर है?
उत्तर
सापेक्ष निर्धनता– सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों या दूसरे देशों की तुलना में पायी जाने वाली निर्धनता से है। जिस देश या वर्ग के लोगों का जीवन निर्वाह स्तर निम्न होता है वे उच्च निर्वाह स्तर के लोगों या देशों की तुलना में गरीब या सापेक्ष रूप से निर्धन माने जाते हैं।

निरपेक्ष निर्धनता- निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता के माप से है। भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा की धारणा का प्रयोग किया जाता है। निर्धनता रेखा वह है जो उस प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट कर सकते हैं। भारत की कीमतों के आधार पर ३ 328 ग्रामीण क्षेत्र में तथा १ 454 शहरी क्षेत्र में प्रति मास उपभोग को निर्धनता रेखा माना गया है। जिन लोगों का प्रति माह उपभोग व्यय इससे कम है उन्हें निर्धन माना जाता है। कैलोरी की दृष्टि से निर्धनता रेखा की सीमा ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी है।

प्रश्न 9.
मान लीजिए कि आप एक निर्धन परिवार से हैं और छोटी सी दुकान खोलने के लिए सरकारी सहायता पाना चाहते हैं। आप किस योजना के अंतर्गत आवेदन देंगे और क्यों? ”
उत्तर
स्वरोजगार कार्यक्रम के अंतर्गत निर्धन परिवार का कोई भी शिक्षित सदस्य किसी भी प्रकार की छोटी दुकान चलाने के लिए सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकता है। पूर्व रोजगार कार्यक्रमों के तहत परिवारों और व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, पर नब्बे के दशक से इस नीति में बदलाव 
आया है। अब इन कार्यक्रमों का लाभ चाहने वालों को स्वयं सहायता समूहों का गठन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। प्रारम्भ में उन्हें अपनी ही बचतों को एकत्र कर परस्पर उधार देने को प्रोत्साहित किया जाता है। और बाद में सरकार ‘बैंकों के माध्यम से उन स्वयं सहायता समूहों को आंशिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। ये समूह ही निश्चित करते हैं कि किसे ऋण दिया जाए।

प्रश्न 10.
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अंतर स्पष्ट करें। क्या यह कहना सही होगा कि निर्धनता गाँवों से शहरों में आ गई है? अपने उत्तर के पक्ष में निर्धनता अनुपात प्रवृत्ति का प्रयोग करें।
उत्तर
दिए गए तालिका’और चित्र भारत में निर्धनता प्रवृत्तियों के ग्रामीण-शहरी परिदृश्य को प्रस्तुत करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में पायी जाने वाली निर्धनता शहरी निर्धनता की तुलना में अभी भी अधिक है।
तालिका : गरीबी की जनगणना का अनुपात-ग्रामीण, शहरी व कुल 
(प्रतिशत में)
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 4 Poverty 1

इन आँकड़ों से निम्नलिखित निष्कर्ष निकालते हैं

  1. ग्रामीण निर्धनता 1972-73 ई० में 54% से घटकर 1999- 2000 में 27.09% हो गई थी।
  2. शहरी निर्धनता भी 1972-73 ई० में 42% से गिरकर 23.62% हो गई थी।
  3. गाँवों में गरीबी का स्तर शहरों से ज्यादा है।
  4. 1993-94 ई० तथा 1999-2000 ई० में गरीबी के स्तर में सराहनीय,कमी आई।

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प्रश्न 11.
भारत के कुछ राज्यों में निर्धनता रेखा के नीचे की जनसंख्या का प्रयोग कर सापेक्ष निर्धनता की अवधारणा की व्याख्या करें।
उत्तर
योजना आयोग द्वारा जारी अखिल भारतीय स्तर के आँकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, कनार्टक व उत्तराखण्ड में निर्धनता अनुपात में 10 प्रतिशत बिन्दु से भी अधिक की कमी वर्ष 2005 से 2010 में दर्ज की गई है, जबकि पूर्वात्तर के राज्यों असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम व नागालैण्ड में निर्धनता अनुपात में वृद्धि हुई है, बिहार, छत्तीसगढ़ व उत्तर प्रदेश जैसे अपेक्षाकृत बड़े राज्यों में निर्धनता अनुपात में मामूली कमी दर्ज की गई है। योजना आयोग के इन आँकड़ों के अनुसार 2009-10 में देश में निर्धनों की सर्वाधिक संख्या वाले राज्य क्रमशः उत्तर प्रदेश, बिहार व महाराष्ट्र रहे हैं, जबकि निर्धनता अनुपात की दृष्टि से पहले तीन स्थान क्रमशः बिहार, छत्तीसगढ़ व मणिपुर के हैं। केन्द्रशासित क्षेत्रों में निर्धनता अनुपात न्यूनतम अण्डमान निकोबार में 0.4 प्रतिशत, पुदुचेरी में 1.2 प्रतिशत व लक्षद्वीप में 6.8 प्रतिशत पाया गया है। राज्यों में न्यूनतम निर्धनता अनुपात वाले राज्य क्रमशः गोवा (8.7 प्रतिशत), जम्मू कश्मीर (9.4 प्रतिशत) व हिमचल प्रदेश (9.5 प्रतिशत) रहे हैं।

प्रश्न 12.
मान लीजिए कि आप किसी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव से निर्धनता निवारण के कुछ | सुझाव दीजिए।
उत्तर
स्वतंत्रता के बाद से हमारी सभी नीतियों का ध्येय समान और सामाजिक न्याय सहित तीव्र और संतुलित आर्थिक विकास रहा है। हमारा निर्धनता निवारण कार्यक्रम प्रगति पर है लेकिन हमें निर्धनता निवारण में सराहनीय सफलता प्राप्त नहीं हुई है। ग्रामीण होने के नोते गाँव से निर्धनता निवारण हेतु मैं निम्नलिखित सुझाव देंगा

  1. सर्वप्रथम निर्धनों की पहचान की जाए।
  2. संवृद्धि कार्यक्रमों में निर्धनों की प्रभावपूर्ण सहभागिता को प्रोत्साहन दिया जाए।
  3. निर्धनता-ग्रस्त क्षेत्रों की पहचान कर वहाँ स्कूल, सड़कें, विद्युत, संचार, सूचना आदि आधारित संरचनाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  4. संवृद्धि कार्यक्रमों में निर्धनों की प्रभावपूर्ण सहभागिता होनी चाहिए जिससे रोजगार के अवसरों की | रचना होगी और आय के स्तर में सुधार होगा।
  5. स्वरोजगार कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए।
  6. अकुशल श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया जाए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
केन्द्र आयोजित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की पुनर्संरचना की गई
(क) 1 मई, 1999 को
(ख) 1 अप्रैल, 1999 को
(ग) 2 अक्टूबर, 1993 को
(घ) 2 नवम्बर, 1993 को
उत्तर
(ख) 1 अप्रैल, 1999 को

प्रश्न 2.
अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र वयोवृद्ध नागरिकों को प्रतिमाह कितना अनाज निःशुल्क उपलब्ध कराये जाने का प्रावधान है? (क) 5 किग्रा
(ख) 10 किग्रा
(ग) 15 किग्रा
(घ) 20 किग्रा
उत्तर
(ख) 10 किग्रा

प्रश्न 3.
7 सितम्र, 2005 को अधिसूचित मनरेगा कार्यक्रम का उद्देश्य
(क) प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारण्टीशुदा रोजगार उपलब्ध कराना। (ख) प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 90 दिन का| गारण्टीशुदा रोजगार उपलब्ध कराना।
(ग) प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 200 दिन का 
गारण्टीशुदा रोजगार उपलब्ध कराना।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क)प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारण्टीशुदा 
रोजगार उपलब्ध कराना।

प्रश्न 4.
बारहवीं पंचवर्षीय योजना में विकास का लक्ष्य रखा गया
(क) 6%
(ख) 7%
(ग) 8%
(घ) 9%
उत्तर
(घ) 9%

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्धनता से क्या आशय है?
उत्तर
निर्धनता वह सामाजिक स्थिति है जिसमें समाज का एक भाग अपने जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की संतुष्टि करने में असमर्थ रहता है।

प्रश्न 2.
निर्धनता की परिभाषा का मूल आधार क्या है?
उत्तर
निर्धनता की परिभाषा का मूल आधार न्यूनतम या अच्छे जीवन-स्तर की कल्पना है।

प्रश्न 3.
नगरीय क्षेत्र में निर्धनता की माप का आधार क्या है?
उत्तर
नगरीय क्षेत्र में वह व्यक्ति निर्धन माना जाता है जिसे प्रतिदिन 2,100 कैलोरी प्राप्त नहीं हो पाती।

प्रश्न 4.
ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता की माप का आधार क्या है?
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्र में वह व्यक्ति निर्धन माना जाता है जिसे प्रतिदिन 2,400 कैलोरी प्राप्त नहीं हो पाती।

प्रश्न 5.
भारत में निर्धनता का प्रतिशत क्या है?
उत्तर
भारत में निर्धनता का प्रतिशत 26.1 है। इस प्रकार भारत को हर चौथा व्यक्ति निर्धन है।

प्रश्न 6.
कुछ निर्धन वर्गों को बताइए।
उत्तर
गाँवों में भूमिहीन श्रमिक, नगरों में झुग्गियों में रहने वाले लोग, निर्माण स्थलों के दैनिक भोगी श्रमिक, भिक्षु तथा ढाबों में काम करने वाले बाल श्रमिक आदि।

प्रश्न 7.
भूमिहीनता से क्या आशय है?
उत्तर
किसी भूमि का स्वामी न होना भूमिहीनता कहलाती है।

प्रश्न 8.
बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
मजदूरी की प्रचलित दरों पर काम करने के इच्छुक व योग्य व्यक्तियों को काम को न मिल पाना बेरोजगारी कहलाता है।

प्रश्न 9. 
परिवार का आकार क्या होता है?
उत्तर
परिवार में सदस्यों की संख्या को परिवार का आकार कहते हैं।

प्रश्न 10.
निरक्षरता से क्या आशय है?
उत्तर
निरक्षरता से आशय व्यक्ति विशेष में लिखने-पढ़ने की योग्यता का न होना है।

प्रश्न 11.
खराब स्वास्थ्य/कुपोषण क्या होता है?
उत्तर
स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं/पोषण का अभाव खराब स्वास्थ्य/कुपोषण कहलाता है।

प्रश्न 12.
बाल श्रम क्या है?
उत्तर
14 वर्ष से कम आयु में धन कमाने के लिए काम करना बाल श्रम कहलाता है।

प्रश्न 13.
असहायता से क्या आशय है?
उत्तर
असहायता से आशय निम्न लोगों के साथ खेतों, कारखानों, सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों तथा अन्य स्थानों पर दुर्व्यवहार करने से है।

प्रश्न 14.
सामाजिक अपवर्जन क्या है?
उत्तर
निर्धनों को बेहतर माहौल और अधिक अच्छे वातावरण में रहने वाले सम्पन्न लोगों की सामाजिक समता से वंचित रहकर निकृष्ट वातावरण में दूसरे निर्धनों के साथ रहना सामाजिक अपवर्जन कहलाता है।

प्रश्न 15.
असुरक्षा की अवधारणा क्या है?
उत्तर
असुरक्षा निर्धनता के प्रति एक माप है। किसी भी प्राकृतिक आपदा (बाढ़ अथवा भूकम्प) के कारण अथवा नौकरी न मिलने के कारण, दूसरे लोगों की तुलना में अधिक प्रभावित होने की बड़ी सम्भावना का निरूपण ही असुरक्षा है।

प्रश्न 16.
निर्धनता के आकलन की सर्वमान्य विधि क्या है?
उत्तर
निर्धनता के आकलन की सर्वमान्य विधि ‘आय’ अथवा ‘उपभोग’ स्तर है।

प्रश्न 17.
अमेरिका में किस आदमी को निर्धन माना जाता है?
उत्तर
अमेरिका में उस आदमी को निर्धन माना जाता है जिसके पास कार नहीं है।

प्रश्न 18.
निर्धनता रेखा का आकलन किस संगठन द्वारा किया जाता है?
उत्तर
निर्धनता रेखा का आकलन, प्रतिदर्श सर्वेक्षण के माध्यम से राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (N.S.S.O.) द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 19.
उन सामाजिक समूहों को बताइए जो निर्धनता के प्रति सर्वथा असुरक्षित है?
उत्तर
निम्न सामाजिक समूह निर्धनता के प्रति सर्वथा असुरक्षित हैं-
1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवार,
2. ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार,
3. नगरीय अनियमित श्रमिक परिवार।

प्रश्न 20.
अनुसूचित जनजातियों में निर्धनता का प्रतिशत क्या है? ।
उत्तर
अनुसूचित जनजातियों में निर्धनता का प्रतिशत 51 है।

प्रश्न 21.
नगरीय क्षेत्रों में अनियमित मजदूरों का निर्धनता का प्रतिशत कितना है?
उत्तर
नगरीय क्षेत्रों में अनियमित मजदूरों का निर्धनता का प्रतिशत 50 है।

प्रश्न 22.
भूमिहीन कृषि श्रमिकों का निर्धनता का प्रतिशत क्या है?
उत्तर
भूमिहीन कृषि श्रमिकों का निर्धनता का प्रतिशत 50 है।

प्रश्न 23.
अनुसूचित जातियों में निर्धनता का प्रतिशत क्या है?
उत्तर
अनुसूचित जातियों में निर्धनता का प्रतिशत 63 है।

प्रश्न 24.
बिहार और छत्तीसगढ़ में निर्धनता का प्रतिशत क्या है? ”
उत्तर
बिहार में निर्धनता का प्रतिशत 53.5 तथा छत्तीसगढ़ में 48.7 है। यह स्थिति वर्ष 2009-10 की

प्रश्न 25.
किन राज्यों में निर्धनता में उल्लेखनीय गिरावट आई है?
उत्तर
केरल, जम्मू कश्मीर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा में निर्धनता मैं उल्लेखीय गिरावट आई है।

प्रश्न 26.
वर्तमान समय में भारत सरकार की निर्धनता विरोधी रणनीति किन दो कारकों पर निर्भर| करती है?
उत्तर
वर्तमान में भारत सरकार की निर्धनता विरोधी रणनीति निम्न कारकों पर निर्भर करती है
1. आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन तथा
2. लक्षित निर्धनता विरोधी कार्यक्रम।।

प्रश्न 27.
‘राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम कब और कितने जिलों में लागू किया गया?
उत्तर
यह कार्यक्रम 2004 ई० में देश के सबसे अधिक पिछड़े 150 जिलों में लागू किया गया।

प्रश्न 28.
प्रधानमंत्री रोजगार योजना, 2003 ई० का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में शिक्षित बेरोजगार युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर सृजित करना है।

प्रश्न-29.
स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना 1999 ई० का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
इस कार्यक्रम का उद्देश्य सहायता प्राप्त निर्धन परिवारों को स्व-सहायता समूहों में संगठित कर बैंक ऋण और सरकारी सहायता के संयोजन द्वारा निर्धनता रेखा से ऊपर लाना है।

प्रश्न 30. भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर
भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती सभी को स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, निर्धनों को उचित सम्मान दिलाना है।

प्रश्न 31.
निर्धनता उन्मूलन के कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर
कार्यक्रमों का उचित क्रियान्वयन किया जाए, उनके परस्पर व्यापी होने के दोष को समाप्त किया जाए तथा उनके उचित परिवीक्षण पर बल दिया जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में निर्धनता रेखा का आकलन कैसे किया जाता है? क्या आप समझते हैं कि निर्धनता आकलन को यह तरीका सही है? । उत्तर
भारत में निर्धनता रेखा का आकलन दो स्तरों पर किया जाता है-
1. आय स्तर,
2. उपभोम स्तर।

आय स्तर- आय स्तर के आधार पर वर्ष 2009-10 में किसी व्यक्ति के लिए निर्धनता रेखा का निर्धारण ग्रामीण क्षेत्रों में ३१ 672.8 प्रतिमाह और शहरी क्षेत्रों में १ 859.6 प्रतिमाह किया गया था।

उपभोग स्तर-
उपभोग स्तर के आधार पर भारत में स्वीकृत कैलोरी आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन और नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। विभिन्न देशों में निर्धनता आकलन के तरीके भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक देश एक काल्पनिक रेखा का प्रयोग करता है जिसे विकास एवं उसके स्वीकृत न्यूनतम सामाजिक मानदण्डों के वर्तमान स्तर के अनुरूप माना जाता है; उदाहरण के लिए अमेरिका में उस आदमी को निर्धन माना जाता है जिसके पस कार नहीं है। जबकि भरत में यह उपयोग स्तर पर आधारित हैं निर्धनता आकलन का यह तरीका सही है।

प्रश्न 2.
भारत में 1973 ई० से निर्धनता की प्रवृत्तियों की चर्चा कीजिए।
उत्तर
भारत में निर्धनता अनुपात 1973 ई० में लगभग 55 प्रतिशत था जो 1983 ई० में घटकर 36 प्रतिशत हो गया। वर्ष 2000 में निर्धनता रेखा के नीचे के निर्धनों का अनुपात 26 प्रतिशत पर आ गया। इसमें नगरों में निर्धनता अनुपात 23.62 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता अनुपात 27.09 प्रतिशत था। अनुमान है कि यह 2007 ई० में गिरकर 19.3 प्रतिशत रह जाएगा। निरपेक्ष संख्या के रूप में भारत में 1973-74 ई० में 32.13 करोड़ जनसंख्या निर्धन थी। यह 1999-2000 ई० में घटकर 26.02 करोड़ रह गई। वर्ष 2015-16 में यह संख्या 38.14 करोड़ हो गई।

प्रश्न 3.
उन सामाजिक और आर्थिक समूहों की पहचान कीजिए जो भारत में निर्धनता के समक्ष निरुपोय हैं?
उत्तर
निर्धनता अनुपात भारत के सभी सामाजिक समूहों और आर्थिक वर्गों में एक समान नहीं है। जो सामाजिक समूह निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं, वे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवार हैं। इसी प्रकार आर्थिक समूहों में सर्वाधिक असुरक्षित समूह, ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार और नगरीय अनियमित श्रमिक परिवार हैं। भारत में अनुसूचित जनजाति में 51 प्रतिशत, नगरीय क्षेत्र के अनियमित मजदूरों में 50 प्रतिशत, भूमिहीन कृषि श्रमिकों में 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जातियों में 43 प्रतिशत निर्धन हैं।

प्रश्न 4.
भारत में अंतर्राज्यीय निर्धनता में विभिन्नता के कारण बताइए।
उत्तर
भारत में प्रत्येक राज्य में निर्धनता अनुपात में भिन्नता पाई जाती है। कुछ राज्य अति निर्धन बने हुए हैं। तो कुछ राज्यों की निर्धनता अनुपात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। जहाँ ओडिशा, बिहार, असम व त्रिपुरा आदि में निर्धनता अधिक है, वहीं, गोवा, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में निर्धनता में काफी कमी आई है। इससे अंतर्राज्यीय असमानताएँ बढ़ी हैं। इसके मुख्य कारण हैं

1. पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में कृषि विकास दर काफी ऊँची रही है,
2. केरल ने मानव संसाधन के विकास पर काफी बल दिया है,
3. पश्चिम बंगाल ने भू-सुधार कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन में सफलता प्राप्त की है तथा
4. आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु में सार्वजनिक वितरण प्रणाली बेहद सफल रही है।

प्रश्न 5.
निर्धनता उन्मूलन की वर्तमान सरकारी रणनीति की चर्चा कीजिए।
उत्तर
निर्धनता उन्मूलन ही भारत की विकास रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रहा है। सरकार की वर्तमान रणनीति मुख्यतः दो घटों पर आधारित है
1. आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन तथा
2. लक्षित निर्धनता विरोधी कार्यक्रम।
1. आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन- 1950 से 1980 ई० तक देश में प्रति व्यक्ति आय बहुत धीमी 
गति से बढ़ी (3.5 प्रतिशत)। किंतु 1980-90 ई० के दशक में यह 6 प्रतिशत तक पहुँच गई। दसवीं योजना में विकास लक्ष्य 8 प्रतिशत था। बारहवीं योजना में विकास लक्ष्य 9% रखा गया है। आर्थिक संवृद्धि की उच्च दर ने निर्धनता को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2. लक्षित निर्धनता विरोधी कार्यक्रम- इनके मुख्य कार्यक्रम निम्न प्रकार हैं-राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 ई०; राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम, 2004 ई; प्रधानमंत्री रोजगार योजना, 1993 ई०; ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम 1995 ई; स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, 1999 ई०; प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना, 2000 ई०; अन्त्योदय अन्न योजना।। हाल के वर्षों में इन कार्यक्रमों के उचित पर्यवेक्षण पर बल दिया गया है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर संक्षेप में दीजिए
(क) मानव निर्धनता से आप क्या समझते हैं?
(ख) निर्धनों में भी सबसे निर्धन कौन हैं?
(ग) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 ई० की मुख्यविशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर
(क) मानव निर्धनता से अभिप्राय मनुष्य का जीवन, स्वास्थ्य और कुशलता के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की आपूर्ति न कर पाना है। परंतु आधुनिक समय में निर्धनता को निरक्षरता स्तर, कृपोषण के कारण रोग प्रतिरोध की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, रोजगार के अवसरों की कमी, सुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता तक न पहुँच पाने के संदर्भ में जाना जाता है।
(ख) निर्धनों में सबसे निर्धन अनुसूचित जनजातियाँ, नगरीय अनियमित मजदूर, ग्रामीण खेतिहर मजदूर 
तथा अनुसूचित जातियाँ आदि हैं।
(ग) महात्मा गांधी सृष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 ई० की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. यह अधिनियम देश के 200 जिलों में प्रत्येक परिवार को वर्ष में 100 दिन के सुनिश्चित रोजगार का प्रावधान करता है।
  2. धीरे-धीरे इस योजना का विस्तार 600 जिलों में किया जाएगा।
  3. प्रस्तावित रोजगारों का एक-तिहाई रोजगार महिलाओं के लिए आरक्षित है।
  4. यदि आवेदक को 15 दिन के अंदर रोजगार नहीं दिया जा सका, तो वह दैनिक रोजगार भत्ते का हकदार होगा।

प्रश्न 7.
निर्धनता के विभिन्न आयामों को बताइए।
उत्तर
निर्धनता के अनेक आयाम निम्नलिखित हैं
(अ) आर्थिक आयाम

  1. भुखमरी,
  2. आश्रय का न होना,
  3. नियमित रोजगार की कमी।।

(ब) सामाजिक आयाम

  1. निरक्षरता स्तर,
  2. कुपोषण के कारण रोग-प्रतिरोधी क्षमता में कमी
  3. स्वास्थ्य सेवाओं की कमी तथा
  4. सुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता तक पहुँच में कमी।

प्रश्न 8.
भारत में निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित समूहों की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
भारत में असुरक्षित समूहों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवार, ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार, नगरीय | अनियमित मजदूर परिवार निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं।
  2. इनमें निर्धनता के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों का प्रतिशत भारत के सभी समूहों के लिए औसत प्रतिशत (26) से अधिक है। यह अनुसूचित जनजातियों में 51, नगरीय अनियमित मजदूरों में 50, भूमिहीनों व कृषि श्रमिकों में 50 तथा अनुसूचित जातियों में 43 प्रतिशत है।
  3. ये समूह आर्थिक व सामाजिक सुविधाओं से वंचित हैं।
  4. अनुसूचित जनजाति परिवारों को छोड़कर अन्य सभी तीनों समूहों में नब्बे के दशक में कमी आई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्धनता को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य स्वरूप बताइए। निर्धनता का आकलन कैसे | किया जाता है?
उत्तर

निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा

निर्धनता का अर्थ उस स्थिति से है जिसमें समाज का एक भाग अपने जीवन की आधारभूत/न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में विफल रहता है। इन आधारभूत/न्यूनतम आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम मानवीय आवश्यकताएँ सम्मिलित होती हैं। इन न्यूनतम आवश्यकताओं के पूरा न होने पर मनुष्य को कष्ट होता है, इसके स्वास्थ्य का स्तर गिरता है, कार्यकुशलता का ह्रास होता है, उत्पादन की हानि होती है, आय कम होती है। इस प्रकार निर्धनता और उत्पादन के निम्न स्तर का दुश्चक्र बन जाता है।
परिभाषा– निर्धनता से अभिप्राय है-जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता।

निर्धनता के स्वरूप

निर्धनता को दो रूपों में समझाया जा सकता है
1. सापेक्ष निर्धनता– सापेक्ष निर्धनता से आशय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों या दूसरे देशों की तुलना में 
पायी जाने वाली निर्धनता से है। जिस देश या वर्ग के लोगों का जीवन निर्वाह स्तर निम्न होता है, वे सापेक्ष रूप से निर्धन होते हैं।
उदाहरण- मामा अमेरिका की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, 34,870 डॉलर और भारत की प्रति 
व्यक्ति वार्षिक आय 330 डॉलर है, तो भारत सापेक्षिक रूप से निर्धन है।

2. निरपेक्ष निर्धनत- निरपेक्ष निर्धनता से आशय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता की माप से है। भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा’ की अवधारणों का प्रयोग किया जाता है।

निर्धनता रेखा- निर्धनता रेखा वह है जो उस प्रति व्यक्ति औसत मासिक आय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट कर सकते हैं।

भारत में निर्धनता रेखा- भारत में 2009-10 ई० की कीमतों पर ग्रामीण क्षेत्र में है 672.8 तथा शहरी क्षेत्रों में १ 859.6 प्रति मास उपभोग को निर्धनता रेखा माना गया है। भारत में उन व्यक्तियों को निरपेक्ष रूप से निर्धन माना गया है जिसका मासिक उपभोग व्यय इस रेखा से नीचे है।

निर्धनता का आकलन

भारत में निर्धनता के आकलन का आधार है-
1. कैलोरी आवश्यकता तथा
2. आय आधार।

1. कैलोरी आवश्यकता- भारत में निर्धनता रेखा का आकलन करते समय कैलोरी आवश्यकता को ध्यान में रखा जाता है। खाद्य वस्तुएँ; जैसे-अनाज, दालें, सब्जियाँ, दूध, तेल, चीनी आदि; मिलकर आवश्यक कैलोरी की पूर्ति करती हैं। आयु, लिंग, काम करने की प्रकृति आदि के आधार पर कैलोरी आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। भारत में स्वीकृत कैलोरी की आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन एवं नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। चूँकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अधिक शारीरिक कार्य करते हैं, अतः ग्रामीण क्षेत्रों की कैलोरी आवश्यकता शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक मानी गई है।

2. आय आधार- खाद्यान्न, चीनी व तेल आदि के रूप में इन कैलोरी आवश्यकताओं को खरीदने के लिए प्रति व्यक्ति मौद्रिक व्यय को, कीमतों में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, समय-समय पर संशोधित किया जाता है। निर्धनता रेखा का आकलन समय-समय पर प्रतिदर्श सर्वेक्षण के माध्यम से किया जाता है। ये सर्वेक्षण एन०एस०एस०ओ० द्वारा समय-समय पर कराए जाते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में निर्धनता के क्या कारण हैं? निर्धनता दूर करने के उपाय भी बताइए। .
उत्तर
भारत में निर्धनता के कारण। भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की भाँति भारतीय अर्थव्यवस्था भी गरीबी के दुश्चक्र में फंसी है। भारत में निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(अ) आर्थिक कारण
1. अल्प विकास–
भारत में निर्धनता का सर्वप्रमुख कारण देश का अल्प विकास है। यद्यपि गत 56 वर्षों में हम योजनाबद्ध आर्थिक विकास के मार्ग पर अग्रसर हैं तथापि हमारे विकास की गति बहुत धीमी रही है। धीमे आर्थिक विकास के कारण राष्ट्रीय आय में वांछित वृद्धि नहीं हो सकती है।

2. आय तथा धन के वितरण में असमानता- भारत में आय व धन का वितरण असमान है। रिजर्व बैंक के एक अनुमान के अनुसार समस्त राष्ट्रीय आय का लगभग 30% भाग जनसंख्या के 10% धनी लोगों को प्राप्त होता है, जबकि जनसंख्या के 20% निर्धन वर्ग को राष्ट्रीय आय का केवल 8% भाग ही प्राप्त हो पाता है। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी क्षेत्र में आय वितरण की असमानता और भी अधिक है।

3. अपर्याप्त विकास दर- भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर निम्न है। योजनाकाल में औसत विकास दर लगभग 3.5% रही है जिसने गरीबी की जड़ों को और अधिक गहरी कर दिया है।

4. जनसंख्या की उच्च वृद्धि-दर- भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर अर्थव्यवस्था की विकास दर की तुलना में ऊँची रही है। इसका दुष्परिणाम यह है कि प्रति व्यक्ति आय व उपभोग कम हो जाता है, अभावे पनपने लगते हैं, जीवन-स्तर में ह्रास होता है और निर्धनता व्यापक रूप धारण कर लेती

5. बेरोजगारी– देश में निरन्तर बढ़ती हुई बेरोजगारी ने निर्धनता को और अधिक व्यापक बनाया है। बेरोजगारी के बढ़ते रहने से निर्धनता अधिक संचयी रूप धारण करती जा रही है। वर्तमान में 3 | करोड़ से भी अधिक लोग बेरोजगार हैं।

6. प्रादेशिक असंतुलन तथा असमानताएँ- असंतुलित प्रादेशिक विकास के साथ-साथा निर्धनता का वितरण भी असमान हो गया है; उदाहरण के लिए उड़ीसा (ओडिशा) में 66.4%, त्रिपुरा में 59.7%, बिहार व मध्य प्रदेश में 57.5% जनसंख्या निर्धनता रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रही है, जबकि पंजाब में केवल 15.1% तथा हरियाणा में 24.8% जनसंख्या निर्धनता के स्तर से नीचे

7. स्फीतिक दबाव- भारत में सामान्य कीमत स्तर बढ़ता रहा है। कीमतों के बढ़ने पर मुद्रा की क्रय-शक्ति कम हो जाती है और वास्तविक आय गिर जाती है। इसके फलस्वरूप समाज में निम्न तथा मध्यम आय वर्ग के लोगों की निर्धनता बढ़ जाती है।

8. पूँजी की कमी- भारत में प्रति व्यक्ति आय का स्तर निम्न है, जिससे बचत कर्म होती है और पूँजी-निर्माण दर भी कम रहती है। पूँजी की प्रति व्यक्ति निम्न उपलब्धता और पूँजी-निर्माण की निम्न दर ने देश में निर्धनता को जन्म दिया है।

9. औद्योगीकरण का निम्न स्तर- कृषि तथा विनिर्माणी क्षेत्र में परम्परागत उत्पादन तकनीकों ने प्रति व्यक्ति उत्पादकता के स्तर को नीचा बनाए रखा है, जिसके कारण गरीबी और अधिक गहने हुई है।

(ब) सामाजिक कारण

आर्थिक कारणों के अतिरिक्त सामाजिक कारण भी निर्धनता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं। भारत में विद्यमान सामाजिक ढाँचे में बँधे रहने के कारण लोग जान-बूझकर निर्धनता से चिपके हुए हैं। सामाजिक सम्मान एवं प्रतिष्ठा की झूठी महत्त्वाकांक्षा ने लोगों को अपव्ययी बना दिया है। जनसाधारण में व्याप्त निक्षरता, भाग्यवादिता, धार्मिक रूढ़िवादिता व अन्धविश्वास ने गरीबी को बढ़ाया है। जातिवाद एवं संयुक्त परिवार प्रणाली ने लोगों को अकर्मण्य बनाया है और उन्हें आधुनिक तकनीक का प्रयोग करने से रोका है और सामाजिक संस्थाओं ने श्रम को अगतिशील बनाकर उनकी प्रगति में बाधा डाली है।।

(स) राजनीतिक कारण
देश की लम्बी दासता ने अर्थव्यवस्था को गतिहीन बना दिया था। विदेशी शासकों ने देश में आधारभूत उद्योगों के विकास में कोई रुचि नहीं ली। उनकी ‘वि-औद्योगीकरण की नीति (Policy of Deindustrialization) ने देश के औद्योगिक आधार को कमजोर बना दिया। देश में सामन्तशाही प्रथा पनपी, जिसने कृषकों को भरपूर शोषण किया। उनकी नीति ने एक ओर जमींदारों को जन्म दिया और दूसरी ओर भूमिहीन किसानों को। फलत: उनके शोषण के साथ-साथ निर्धनता भी बढ़ती चली गई। निर्धनता दूर करने के उपाय भारत में निर्धनता दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

1. विकास की गति को तीव्र किया जाए। इससे रोजगार के अधिक अवसर सृजित होंगे और निर्धनता में कमी आएगी।
2. आय एवं धन के वितरण की असमानताओं को कम किया जाए।
3. जनसंख्या की वृद्धि को नियंत्रित करने हेतु प्रयास किए जाएँ। इस संबंध में परिवार कल्याण 
कार्यकम्रमों को सफल बनाने के लिए भरसक प्रयास किए जाएँ।
4. कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए यथासंभव प्रयास किए जाएँ। |
5. कीमत स्थिरता के उत्पादन एवं वितरण व्यवस्था में सुधार किए जाएँ।
6. बेरोजगारी (अर्द्ध-बेरोजगारी, अदृश्य बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी व शिक्षित बेरोजगारी) को दूर | करने के लिए छोस कदम उठाए जाएँ।
7. उत्पादन तकनीक में आवश्यक परिवर्तन किए जाएँ।
8. न्यूनतम आवश्यर्कता कार्यक्रम’ को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
9. देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए।
10. ‘स्वरोजगार के लिए सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।

प्रश्न 3.
निर्धनता उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा किए गए उपायों की चर्चा कीजिए।
उत्तर

निर्धनता उन्मूलन के लिए भारत सरकार द्वारा किए गए उपाय

भारत में निर्धनता उन्मूलन हेतु सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए गए हैं जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है

पंचवर्षीय योजनाओं में निर्धनता उन्मूलन विकास कार्यक्रम

सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। इसके बाद ग्रामीण विकास एवं किसानों के हितों के लिए ठोस प्रयास किए गएँ। अनेक राज्यों में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया, पंचायती राज व्यवस्था को नया जीवन दिया गया, सामुदायिक विकास कार्यक्रमों का तेजी से विस्तार किया गया तथा गाँवों में विद्युत, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा ग्रामीण औद्योगीकरण सहित अनेक परियोजनाएँ बनाई गईं। प्रथम तीन

पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान ग्रामीण विकास के लिए निम्नलिखित कार्यक्रमों को अपनाया गया

  1. सामुदायिक विकास कार्यक्रम, 1952 ई०,
  2. व्यावहारिक पोषाहार कार्यक्रम, 1958 ई०,
  3. पंचायती राज व्यवस्था, 1959 ई०,
  4. सघन कृषि जिला कार्यक्रम, 1960 ई०,
  5. पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम, 1962 ई०,
  6. जनजाति क्षेत्र का विकास कार्यक्रम, 1964 ई०,
  7. सघन कृषि क्षेत्र कायर्चक्रम, 1965 ई०,
  8. उन्नत बीज कार्यक्रम, 1965 ई० तथा
  9.  सघन क्षेत्र विकास कार्यक्रम, 1965 ई०॥

तीन वार्षिक योजनाओं तथा चौथी एवं पाँचवीं पंचवर्षीय योजनाओं में निम्नलिखित कार्यक्रमों को लागू किया गया

  1. लघु कृषक मास अभिकरण, 1969 ई०,
  2. सीमांत कृषक एवं कृषि श्रमिक अभिकरण, 1969 ई०,
  3. सूखाग्रत त्र कार्यक्रम, 1974-75 ई०,
  4. ग्रामीण निर्माण कार्यक्रम, 1973 ई०,
  5. ग्रामीण रोजगार हेतु क्रैश कार्यक्रम 1971 ई०,
  6. पायलट परियोजना, 1972 ई०,
  7. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, 1974 ई०,
  8. बीस सूत्रीय कार्यक्रम, 1975 ई०,
  9. काम के बदले अनाज कार्यक्रम 1977 ई०,
  10. अन्त्योदय योजना, 1977 ई०,
  11. मरुभूमि विकास कार्यक्रम, 1977 ई०,
  12. कमाण्ड एरिया विकास कार्यक्रम, 1978 तथा जिला उद्योग केंद्र, 1978 ई० तथा
  13. रोजगार गारण्टी कार्यक्रम, 1982 ई०।।

वर्ष 1978-79 से 2000 ई० तक की अवधि में ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को एक नई दिशा प्राप्त हुई। इस अवधि में ग्रामीण विकास हेतु प्रमुख रूप से निम्नलिखित कार्यकम्रम आयोजित किए गए-

  1. एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम,
  2. ट्राइसेम कार्यक्रम,
  3. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम,
  4. राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम,
  5. विशेष पशुधन विकास कार्यक्रम,
  6. ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम,
  7. जवाहर रोजगार योजना,
  8. आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग हेतु नई स्वरोजगार योजना,
  9. नेहरू रोजगार योजना,
  10. अकोलग्रस्त क्षेत्र कार्यक्रम,
  11. रोजगार गारण्टी कार्यक्रम तथा
  12. मजदूरी रोजगार कार्यक्रम आदि।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार उपलब्ध कराने के लिए चल रही विभिन्न योजनाओं; समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम कार्यक्रम, ग्रामीण महिला एवं बाल विकास, ट्राइसेम, गंगा विकास योजना, दस लाख कुआँ योजना, ग्रामीण दस्तकारों को उन्नत औजार पूर्ति योजना; को मिलाकर 1 अप्रैल, 1998 ई० से स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना आरम्भ की गई। ‘जवाहर रोजगार योजना’ को ‘ग्राम समृद्धि योजना में बदल दिया गया और इसका विकास क्षेत्र भी बढ़ाया गया। इन्दिरा आवास योजना की जगह समग्र आवास योजना प्रारम्भ की गई।

वर्ष 2000 के बाद की अवधि- ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जनवरी 2001 ई० में सूखा प्रभावित राज्यों के ग्रामीण इलाकों में काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम शुरू किया। नौकरी छूट जाने के कारण प्रभावित कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 10 अक्टूबर, 2001 ई० को ‘आश्रय बीमा योजना शुरू की गई। 2002 ई० में ‘बीमा ग्राम योजना चालू की गई। 27 जनवरी, 2003 ई० को ‘हरियाली परियोजना का शुभारम्भ किया गया। 14 नवम्बर, 2004 ई० को प्रधनमंत्री ने काम के बदले अनाज कार्यक्रम का शुभारम्भ आन्ध्र प्रदेश के रंगा रेड्डी जिले में गाँव अलूर में किया। बजट 2005-06 के प्रस्तावों में इस योजना को राष्ट्रीय ग्रामीण गारण्टी रोजगार योजना में रूपांतरित करने का प्रावधान किया। गया।

कुछ महत्त्वपूर्ण योजनाओं को संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

1. प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (Prime Minister Rural Road Programme PMRRP)
यह योजना 25 दिसम्बर, 2000 ई० को शुरू हुई। देश के सभी गाँवों को पक्के सड़क मार्गों से जोड़ने की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 500 से अधिक जनसंख्या वाले सभी गाँवों को अच्छी बारहमासी सड़कों से जोड़ दिया जाएगा। इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य 
चल रहा है।

2. ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल हेतु प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (Prime Minister Gramodaya Yojana-PMGY)-इस कार्यक्रम के तहत राज्यों को धन जारी करने के लिए पेयजलापूर्ति विभाग, भारत सरकार को शीर्षस्थ विभाग है। ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम का क्रियान्वयन मिशन द्वारा 1999 ई० में जारी हुआ और अब तक दिए गए निर्देशों के मुताबिक होगा। इस योजना का उद्देश्य उन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था करना है, जहाँ पेयजल उपलब्ध नहीं है या आंशिक रूप से उपलब्ध है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल से लौह तत्त्वों, आर्सेनिक तथा फ्लुओराइड जैसे हानिकारक तत्त्वों को दूर करना हैं।

3. ग्रामीण पेयजल आपूर्ति- ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुविधाएँ ‘राज्य स्कन्ध न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के तहत प्रदान की जाती हैं। केन्द्र सरकार के प्रशासन हेतु राष्ट्रीय एजेण्डे में अगले पाँच वर्षों में सभी के लिए सुरक्षित पेयजल के प्रावधान की घोषणा की गई है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु बनाई गई रणनीति में निम्नलिखित मुद्दे सम्मिलित हैं– बचे हुए ग्रामीण क्षेत्रों तथा ऐसे क्षेत्रों को सुरक्षित पेयजल व्यवस्था शीघ्र प्रदान करना, जहाँ केवल कुछ ही लोगों को पेयजल की सुविधा प्राप्त है, हानिकारक तत्त्वों से प्रभावित क्षेत्रों में जल की गुणवत्ता संबंधी समस्याओं से लड़ना तथा जल गुणवत्ता प्रबन्धन व निगरानी व्यवस्थाओं को संस्थागत करना, तंत्र एवं स्रोत दोनों की निरंतरता को बढ़ाना तथा पेयजल सुविधासम्पन्न ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की निरंतर आपूर्ति को सुनिश्चित करना।

4. केन्द्र प्रायोजित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (Central Rural Sanitation Programme-CRSP)- ग्रामीण स्वच्छता राज्य का विषय होने के कारण ग्रामीण स्वच्छता कार्यकम्रम राज्य क्षेत्र के न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के तहत राज्य सरकारों द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। इस कार्यक्रम की शुरुआत 1986 ई० में हुई। 1 अप्रैल, 1999 ई० को इस कार्यक्रम की पुनर्संरचना की गई। पुनर्गठित केन्द्र प्रायोजित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम को चरणबद्ध क्रम में निर्धनता निर्धारक तथ्य पर मुख्यत: आधारित प्रदेशवारे निधियों के आबंटन के सिद्धांत से हटाकर माँग प्रेरित’ पहले की ओर केन्द्रित किया जा रहा है। कार्यक्रम में उच्च अनुदान के स्थान पर निम्न अनुदान की ओर झुकाव रहेगा।

5. इन्दिरा आवास योजना (Indira Avas Yojana-IAY)- इन्दिरा आवास योजना वर्ष 1985-86 में RLEGP में एक उपभोक्ता कार्यक्रम के रूप में प्रारम्भ की गई थी, जिस द्देश्य अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के सबसे निर्धन लोगों तथा मुक्त ए गए बँधुआ श्रमिकों के लिए मकानों का निर्माण कराना है, जो उन्हें नि:शुल्क (Free of Cost) उपलब्ध कराए जाते हैं। वर्ष 1989-90 ई० में RLEGP के जवाहर रोजगार योजना में विलय के बाद इस योजना को भी जवाहर रोज़गार योजना (JRY) का अंग बना दिया गया था, किंतु 1996 ई० में इसे JRY से पृथक् कर एक स्वतंत्र योजना का रूप दे दिया गया। इस प्रकार 1 जनवरी, 1996 ई० से यह एक स्वतंत्र योजना के रूप में लागू है। इस योजना का लक्ष्य अत्यंत निर्धन अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के, मुक्त बँधुआ मजदूरों और गैर-अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों की श्रेणियों में आने वाले ग्रामीण गरीबों को आवासीय इकाइयों के निर्माण और मौजूदा अनुपयोगी कच्चे मकानों को सुधारने में मदद देना है। जिसके लिए उन्हें सहायता अनुदान दिया जाता है।

6. प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (Prime Minister Gramodaya Yojana- PMGY)-इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए आवासों की कमी को दूर करना तथा इन क्षेत्रों के पर्यावरण के स्वस्थ विकास में सहायता देना है। प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना की रूपरेखा, इन्दिरा आवास योजना पर आधारित है।
ग्रामीण आवासों के लिए ऋण एवं अनुदान की योजना (Credit Cum Subsidy Plan for Rural Housing)-यह योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० से शुरू की गई थी। इस योजना में प्रत्येक पात्र परिवार को ३ 10,000 का अनुदारन तथा प्रति परिवार र 40,000 तक का ऋण दिया जाता है। स्वच्छ शौचालय और धुआँरहित चूल्हे ग्रामीणों के आवास के अभिन्न अंग बनाए गए हैं। यह योजना ऐसे ग्रामीण परिवारों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, जिनकी वार्षिक आमदनी १ 32,000 तक है। योजना के लिए धनराशि का बँटवारा केन्द्र और राज्यों के बीच 75 : 25 के अनुपात में होता है।

7. समग्र आवास योजना (Samagra Avas Yojana-SAY)-यह योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० को शुरू हुई। इसका मुख्य उद्देश्य आवास, स्वच्छता, पेयजल की समग्रे व्यवस्था तथा ग्रामीण क्षेत्रों के सम्पूर्ण पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण सुधार लाना है।।

8. ग्रामीण आवास और पर्यावरण विकास का अभिनव कार्यक्रम (New Programme for Rural Housing and Environment Development-PRHED)—यह योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० से शुरू हुई। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में नवीन व प्रमाणित आवास प्रौद्योगिकियों, डिजाइनों और ग्रामीण सामग्रियों को बढ़ावा देना व उन्हे प्रचारित करना है।

9. ग्रामीण निर्माण केन्द्र (Rural Construction Centre-RCC)—इस कार्यक्रम की शुरुआत केरल में 1995 ई० में हुई। इसका उद्देश्य प्रशिक्षण तथा किफायती व पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री के उत्पादन के माध्यम से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना, सूचना-प्रसार तथा कुशलता बढ़ाना है। ग्रामीण निर्माण केन्द्रों को प्रयोगशाला से जमीन तक प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में सम्मिलित किया जा रहा है। ग्रामीण निर्माण केन्द्र राज्य सरकार, ग्रामीण विकास एजेन्सियों, निजी उद्यमियों, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं आदि के द्वारा स्थापित किया जा सकता है। ग्रामीण निर्माण केन्द्र की स्थापना हेतु एकमुश्त र 15 लाख की सहायता प्रदान की जा सकती है। राष्ट्रीय आवास और पर्यावरण के लिए राष्ट्रीय मिशन (National Mission for National Housing and Environment)-इस मिशन की स्थापना ग्रामीण आवास क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई।

10. स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना (Swarna Jayanti Gram Swa-Rojgar Yojana-sGSY)- स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना गाँवों में रहने वाले निर्धनों के लिए स्वरोजगार की एक अकेली योजना है, जो 1 अप्रैल, 1999 ई० को प्रारम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में भारी संख्या में कुटीर उद्योगों की स्थापना करना है। इस योजना में सहायता प्राप्त व्यक्ति स्वरोजगारी कहलाएँगे, लाभार्थी नहीं। इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक सहायता प्राप्त परिवार को धन उपलब्ध होने पर तीन वर्ष में निर्धनता-रेखा से ऊपर उठाना है। आगामी पाँच वर्षों में प्रत्येक विकास खण्ड में रहने वाले निर्धन ग्रामीणों में से 30% को इस योजना के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। विकास खण्ड स्तर पर प्रमुख गतिविधियों का चयन पंचायत समितियों द्वारा किया जाएगा। यह योजना एक ऋण एवं अनुदान कार्यक्रम है। ऋण प्रमुख तत्त्व होगा, जबकि अनुदान केवल समर्थनकारी तत्त्व। अनुदान परियोजना लागत के 30% की एक समान दर पर होगी, किंतु इसकी अधिकतम सीमा १ 7,500 होगी। अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए यह सीमा 50% या अधिकतम १ 10,000 होगी। सिंचाई परियोजनाओं के लिए अनुदान की कोई अधिकतम सीमा नहीं होगी। योजना में दी जाने वाली धनराशि को केन्द्र और राज्य सरकारें 75: 25 के अनुपात में वहन करेंगी।

11. जवाहर ग्राम समृद्धि योजना (Jawahar Gram Samriddhi Yojana-JGSY)- यह योजना पहले की जवाहर रोजगार योजना का पुनर्गठित, सुव्यवस्थित और व्यापक स्वरूप है। 1 अप्रैल; 1999 ई० को प्रारम्भ की गई इस योजना का उद्देश्य गाँव में रहने वाले निर्धनों का जीवन-स्तर सुधारना और उन्हें लाभप्रद रोजगार के अवसर प्रदान करना है। इस योजना को दिल्ली और चण्डीगढ़ को छोड़ समग्र देश में सभी ग्राम पंचायतों में लागू किया गया है। योजना में खर्च की जाने वाली राशि 75: 25 के अनुपात में केन्द्र व राज्य सरकारें वहन करेंगी।

12. जिला ग्रामीण विकास एजेन्सी प्रशासन (District Rural Development Agency-DRDA)- प्रशासनिक खर्च के संबंध में विभिन्न कार्यक्रमों में एकरूपता नहीं होने के कारण केन्द्र द्वारा प्रायोजित एक नई जिला ग्रामीण एजेन्सी (DRDA) प्रशासन योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० से शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों को सशक्त बनाना तथा इन्हें इनके क्रियान्वयन के लिए अधिक व्यावसायिक बनाना है।

13. सुनिश्चित रोजगार योजना (Sunishchit Rojgar Yojana-SRY)- वर्ष 1997-98 में इस योजना को देश की सभी पंचायतों में लागू कर दिया गया। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले ग्रामीण गरीबों को भीषण मन्दी के दिनों में श्रम कार्यों द्वारा अतिरिक्त मजदूरी रोजगार अवसरों को प्रदान करना है। यह योजना उन सभी निर्धनों के लिए है। जिनको मजदूरी रोजगार की आवश्यकता है। योजना के अंतर्गत संसाधनों का बंटवारा केन्द्र और राज्य सरकारें क्रमशः 25 : 25 के अनुपात में वहन करेंगी।

14. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme NSAP)—यह कार्यक्रम 15 अगस्त, 1995 ई० से लागू किया गया। इस कार्यक्रम के तीन निम्नलिखित प्रमुख घटक थे

  1. राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना,
  2. राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना,
  3. राष्ट्रीय प्रसव | लाभ योजना। उपर्युक्त सभी योजनाएँ वृद्धावस्था परिवार के कमाऊ सदस्य की मृत्यु तथा मातृत्व के दौरान सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।

1. राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के अंतर्गत निर्धनता रेखा से नीचे वर्ग के 65 वर्ष अथवाउससे अधिक आयु वाले आवेदक को १ 75 प्रति माह की राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन दिए जाने का प्रावधान है।

2.राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना के अंतर्गत परिवार के मुख्य आय अर्जक (महिला अथवापुरुष) की सामान्य मृत्यु होने पर (18 वर्ष से अधिक व 65 वर्ष से कम) निर्धन परिवार को १ 5,000 की एकमुश्त राशि उत्तरजीवी लाभ के रूप में दी जाती है। दुर्घटना से मृत्यु की स्थिति में है 10,000 की सहायता दी जाती है।

3. राष्ट्रीय प्रसव लाभ योजना के अंतर्गत निर्धन परिवारों की 19 वर्ष या उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए पहले दासे बच्चों के जनम पर प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर मातृत्व देखभाल हेतु १ 500 की वित्तीय सहायता दी जाती है। यह कार्यक्रम 100% केन्द्र पोषित कार्यक्रम है, जो पंचायत/नगरपालिका जैसी स्थानीय संस्थाओं द्वारा क्रियान्वित किया जाता है।

15. अन्नपूर्णा योजना Annapurna Yojana)- यह योजना निर्धन एवं बेसहारा वयोवृद्ध नागरिकोंको नि:शुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा मार्च 1991 ई० में प्रारम्भ की गई। 19 मार्च, 1999 ई० को प्रधानमंत्री द्वारा गाजियाबाद जिले के सिखेड़ा गाँव से इस योजना को प्रारम्भ किया गया था। अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र वयोवृद्ध नागरिकों को प्रतिमाह 10 किग्रा अनाज निःशुल्क उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है।

16. कुटीर ज्योति कार्यक्रम (Kutir Jyoti Programme-KJP)–हरिजन और आदिवासीपरिवारों सहित निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले ग्रामीण परिवारों के जीवन-स्तर में सुधार के लिए भारत सरकार ने 1988-89 ई० में ‘कुटीर ज्योति’ कार्यक्रम प्रारम्भ किया। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों को एक बत्ती का विद्युत कनेक्शन उपलब्ध कराने के लिए ३ 400 की सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

17. लोक कार्यक्रम एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद् (Council for Advancement of People’s Action and Rural Technology : CAPART)-इसका गठन 1 सितम्बर, 1986 को किया गया था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समृद्धि के लिए परियोजनाओं के क्रियान्वयन में स्वैच्छिक कार्य को प्रोत्साहन देना और उनमें मदद करना है। कपार्ट की नौ प्रादेशिक समितियाँ/प्रादेशिक केन्द्र हैं। प्रादेशिक समितियों को अपने-अपने प्रदेशों में स्वयंसेवी संस्थाओं की है 20 लाख तक के परिव्यय वाली परियोजनाओं को मंजूरी देने का अधिकार प्राप्त है।

18. एकीकृत बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (Integrated Waste Land Development | Programme–IWLDP)–यह कार्यक्रम वर्ष 1989-90 से चलाया जा रहा है। यह पूर्णतया केन्द्र प्रायोजित कार्यकम्रम है। इस कार्यक्रम से बंजर भूमि विकास कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न करने में भी मदद मिलती है।

19.निवेश संवर्द्धन योजना (Investment Promotion Plan–IPP)-गैर-वन बंजर भूमि के विकास के लिए संसाधनों को एकत्र करने में निगमित क्षेत्र तथा वित्तीय संस्थानों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1994-95 में निवेश संवर्द्धन योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत सामान्य वर्ग के लिए केन्द्रीय संवर्द्धन अंशदान/सब्सिडी १ 25 लाख या कृषि आधारित विकास परियोजना लागत को 25 प्रतिशत, जो भी कम हो, तक सीमित हैं; बशर्ते परियोजना में संवर्द्धक का अंशदान परियोजना लागत के 25 प्रतिशत से कम न हो। लघु कृषकों के लिए अनुदान की सीमा 30 प्रतिशत है तथा सीमांत कृषकों व अनुसूचित जाति/जनजाति के कृषकों के लिए कृषि-आधारित विकास गतिविधियों की परियोजना लागत का 50 प्रतिशत है।

20. प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम (Technological Development Expansion and Training Programme-TDETP)–वर्ष 1993-94 में बंजर भूमि के सुधार द्वारा खाद्य, ईंधन, लकड़ी, चारा आदि के निरंतर उत्पादन हेतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास के लिए एक केन्द्रीय उपक्रम योजना–प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण योजना की शुरुआत की गई थी। इस योजना को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों तथा शासकीय संस्थानों, जिनके पास पर्याप्त संस्थागत ढाँचा तथा संगठनात्मक समर्थन हो, के जरिए लागू किया जा रहा है। निजी कृषकों/निगमित निकायों की बंजर भूमि पर लागू परियोजनाओं के मामले में परियोजना लागत को 60:40 के अनुपात में भू-संसाधन विभाग तथा हितग्राहियों के मध्य बॉटना आवश्यक है।

21. सूखा सम्भावित क्षेत्र कार्यक्रम (Drought-prone Area Development Programme DADP)-सूखे की सम्भावना वाले चुनिन्दा क्षेत्रों में यह राष्ट्रीय कार्यक्रम 1973 ई० में प्रारम्भ किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य इन क्षेत्रों में भूमि, जल व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित विकास करके पर्यावरण संतुलन को बहाल करना है। कार्यक्रम हेतु वित्त की व्यवस्था केन्द्र व संबंधित राज्य द्वारा 50: 50 के अनुपात में की जाती है। वर्तमान में यह कार्यक्रम 13 राज्यों के 55 जिलों के 947 ब्लॉकों में चलाया जा रहा है तथा इसके अधीन कुल क्षेत्र 41 लाख हेक्टेयर है।

22. मरुस्थल विकास कार्यक्रम (Oasis Development Programme-ODP)-मरुभूमि को बढ़ने से रोकने, मरुभूमि में सूखे के प्रभाव को समाप्त करने, प्रभावित क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने व इन क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता तथा जल संसाधनों को बढ़ाने के उद्देश्य से मरुस्थले विकास कार्यक्रम चुने हुए क्षेत्रों में 1977-78 ई० में प्रारम्भ किया गया था। यह कार्यक्रम शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता के आधार पर क्रियान्वित किया जा रहा है।

23. महात्मामयी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (मनरेगा)- गरीबी को प्रभावी तरीके से दूर करने के लिए मजदूरी मिलने वाले रोजगार कार्यक्रमों को तैयार करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम बनाया। अपने वैधानिक ढाँचे और अधिकार आधारित दृष्टिकोण की वजह से मनरेगा का यह कार्यक्रम बेरोजगारों को रोजगार देने और पहले से चले आ रहे कार्यक्रमों का एक प्रतिमान बन गया है। 7 सितम्बर, 2005 को अधिसूचित मनरेगा कार्यक्रम का उद्देश्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारण्टीशुदा अकुशल मजदूरी/रोजगार उपलब्ध कराना है। 2 फरवरी, 2006 से लागू इस अधिनियम के अंतर्गत पहले चरण में 200 जिलों को शामिल किया गया और 2007-08 में इसे बढ़ाकर 130 अतिरिक्त जिले शामिल कर लिए गए। अन्य शेष जिलों को एक अप्रैल 2008 को अधिसूचना जारी करके अधिनियम में शामिल कर लिया गया।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल)

प्रश्न 1.
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) को संक्षेप में (अपने शब्दों में) लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के प्रथम एवं द्वितीय सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 17]
या
‘त्यागपथी’ काव्यग्रन्थ की प्रमुख घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए।[2011, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘त्यागपथी’ के तीसरे सर्ग का कथानक (कथा/कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के चौथे सर्ग के आधार पर राज्यश्री, हर्षवर्द्धन और दिवाकर मित्र के वार्तालाप का सारांश लिखिए। [2014]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु लिखिए। [2016, 18]
या
‘त्यागपथी’ के प्रथम तीन सर्यों के आधार पर सम्राट् हर्षवर्द्धन के जीवन की कहानी लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के पंचम (अन्तिम) सर्ग की कथा अपनी भाषा (अपने शब्दों) में लिखिए। [2013, 14, 15, 16, 17]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में पंचग सर्ग में वर्णित घटनाओं को अपने शब्दों में लिखिए।
या
आपको ‘त्यागपथी’ का कौन-सा सर्ग रुचिकर प्रतीत होता है और क्यों ? उस सर्ग का कथानक अपनी भाषा में लिखिए। [2009]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के पंचम संर्ग’ की कथावस्तु का उल्लेख कीजिए। [2015, 18]
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के द्वितीय संर्ग’ की कथा अपने शब्दों में लिखिए।[2014, 15]
या
‘त्यागपथी’ में वर्णित भारत की राजनीतिक उथल-पुथल का वर्णन कीजिए। [2012, 13]
[ संकेत : प्रथम, द्वितीय व तृतीय सर्ग का सारांश संक्षेप में लिखें। ]
उत्तर
श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल द्वारा रचित ‘त्यागपथी’ ऐतिहासिक खण्डकाव्य की कथा पाँच सर्गों में विभाजित है। इसमें छठी शताब्दी के प्रसिद्ध सम्राट् हर्षवर्धन के त्याग, तप और सात्विकता का वर्णन किया गया है। सम्राट् हर्ष की वीरता का वर्णन करते हुए कवि ने इस खण्डकाव्य में राजनीतिक एकता और विदेशी आक्रान्ताओं के भारत से भागने का भी वर्णन किया है। इस खण्डकाव्य का सर्गानुसार कथानक निम्नवत् है-

प्रथम सर्ग

थानेश्वर के राजकुमार हर्षवर्द्धन वन में आखेट हेतु गये थे। वहीं उन्हें अपने पिता प्रभाकरवर्द्धन के विषम ज्वर-प्रदाह का समाचार मिलता है। कुमार तुरन्त लौट आते हैं। वे पिता के रोग का बहुत उपचार करवाते हैं, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। हर्षवर्द्धन के बड़े भाई राज्यवर्द्धन उत्तरापथ पर हूणों से युद्ध करने में लगे थे। हर्षवर्द्धन ने दूत के साथ अपने अग्रज को पिता की अस्वस्थता का समाचार पहुँचाया। इधर हर्षवर्द्धन की माता अपने पति की दशा बिगड़ती देख आत्मदाह के लिए तैयार हो जाती हैं। हर्ष ने उन्हें बहुत समझाया, पर वे नहीं मानीं और हर्ष के पिता की मृत्यु से पूर्व ही वे आत्मदाह कर लेती हैं। कुछ समय पश्चात् राजा प्रभाकरवर्द्धन की भी मृत्यु हो जाती है। पिता का अन्तिम संस्कार कर हर्षवर्द्धन शोकाकुल मन से राजमहल में लौट आते हैं। उन्हें इस बात की बड़ी चिन्ता है कि पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर अनुजा (बहन) राज्यश्री तथा अग्रज (भाई) राज्यवर्द्धन की क्या दशा होगी ?

द्वितीय सर्ग

राज्यवर्द्धन हुणों को परास्त कर सेनासहित अपने नगर सकुशल लौट आते हैं। शोकविह्वल हर्षवर्द्धन की दशा देख वे बिलख-बिलखकर रोते हैं। माता-पिता की मृत्यु से शोकाकुल राज्यवर्द्धन वैराग्य लेने का निश्चय कर लेते हैं, किन्तु तभी उन्हें समाचार मिलता है कि मालवराज ने उनकी छोटी बहन राज्यश्री के पति गृहवर्मन को मार डाला है तथा राज्यश्री को कारागार में डाल दिया है। राज्यवर्द्धन वैराग्य को भूल मालवराज का विनाश करने चल देते हैं। राज्यवर्द्धन गौड़ नरेश को पराजित कर देते हैं, परन्तु गौड़ नरेश छलपूर्वक उनकी हत्या करवा देता है। हर्षवर्द्धन को जब यह समाचार मिलता है तो वे विशाल सेना लेकर मालवराज से युद्ध करने के लिए चल पड़ते हैं। मार्ग में हर्षवर्द्धन को समाचार मिलता है कि उनकी छोटी बहन राज्यश्री बन्धनमुक्त होकर; विन्ध्याचल की ओर वन में चली गयी है। यह समाचार पाकर हर्षवर्द्धन बहन को खोजने वन की ओर चल देते हैं। वन में दिवाकर मित्र के आश्रम में उन्हें एक भिक्षुक से यह समाचार मिलता है कि राज्यश्री आत्मदाह करने वाली है। वे शीघ्र ही पहुँचकर राज्यश्री को आत्मदाह करने से बचा लेते हैं। वे दिवाकर मित्र और राज्यश्री को अपने साथ ले कन्नौज लौट आते हैं।

तृतीय सर्ग

हर्षवर्द्धन अपनी बहन के छीने हुए राज्य को पुन: प्राप्त करने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ कन्नौज पर आक्रमण कर देते हैं। वहाँ अनीतिपूर्वक अधिकार जमाने वाला मालव-कुलपुत्र भाग जाता है। राज्यवर्द्धन का हत्यारा गौड़पति-शशांक भी अपने गौड़-प्रदेश को भाग जाता है। सभी लोग हर्षवर्द्धन से कन्नौज का राजा बनने की प्रार्थना करते हैं, परन्तु हर्ष अपनी बहन का राज्य लेने से मना कर देते हैं। वे अपनी बहन से सिंहासन पर बैठने को कहते हैं, परन्तु बहन भी राज-सिंहासन ग्रहण करने से मना कर देती है। फिर हर्षवर्द्धन ही कन्नौज के संरक्षक बनकर अपनी बहन के नाम से वहाँ का शासन चलाते हैं।

इसके बाद छः वर्षों तक हर्षवर्द्धन का दिग्विजय-अभियान चलता है। उन्होंने कश्मीर, पञ्चनद, सारस्वत, मिथिला, उत्कल, गौड़, नेपाल, वल्लभी, सोरठ आदि सभी राज्यों को जीतकर तथा यवन, हूण और अन्य विदेशी शत्रुओं का नाश करके देश को अखण्ड और शक्तिशाली बनाकर एक सुसंगठित राज्य बनाया। अपनी बहन के स्नेहवश वे अपनी राजधानी भी कन्नौज को ही बनाते हैं और अनेक वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी तथा धर्म, संस्कृति और कला की भी पर्याप्त उन्नति हो रही थी।

चतुर्थ सर्ग

राज्यश्री एक बड़े राज्य की शासिका होकर भी दु:खी है। वह सब कुछ छोड़कर गेरुए वस्त्र धारणकर भिक्षुणी बनना चाहती है। वह हर्षवर्द्धन से संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा माँगने जाती है तो हर्षवर्द्धन उसे समझाते हैं कि तुम तो मन से संन्यासिनी ही हो। यदि तुम गेरुए वस्त्र ही धारण करना चाहती हो तो अपने वचनानुसार मैं भी तुम्हारे साथ ही संन्यास ले लूंगा। तभी दिवाकर मित्र आकर उन्हें समझाते हैं कि वास्तव में आप दोनों भाई-बहन का मन संन्यासी है, किन्तु आज देश की रक्षा एवं सेवा संन्यास-ग्रहण करने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। दिवाकर मित्र के समझाने पर दोनों संन्यास का विचार त्याग कर देशसेवा में लग जाते हैं।

पंचम सर्ग

हर्षवर्द्धन एक आदर्श सम्राट् के रूप में शासन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा सब प्रकार से सुखी है, विद्वानों की पूजा की जाती है। सभी प्रजाजन आचरणवान्, धर्मपालक, स्वतन्त्र तथा सुरुचिसम्पन्न हैं। महाराज हर्षवर्द्धन सदैव जन-कल्याण एवं शास्त्र-चिन्तन में लगे रहते हैं। अपने भाई के ऐसे धर्मानुशासन को देखकर राज्यश्री भी प्रसन्न रहती है। सम्पूर्ण राज्य एकता के सूत्र में बँधा हुआ है। एक बार हर्षवर्द्धन तीर्थराज प्रयाग में सम्पूर्ण राजकोष को दान कर देने की घोषणा करते हैं

हुई थी घोषणा सम्राट की साम्राज्य भर से,
करेंगे त्याग सारा कोष ले संकल्प कर में ।

सब कुछ दान करके वे अपनी बहन से माँगकर वस्त्र पहनते हैं। इसके पश्चात् प्रत्येक पाँच वर्ष बाद वे इसी प्रकार अपना सर्वस्व दान करने लगे। इस दान को वे प्रजा-ऋण से मुक्ति का नाम देते हैं। अपने जीवन में वे छ: बार इस प्रकार के सर्वस्व-दान का आयोजन करते हैं। हर्षवर्द्धन संसारभर में भारतीय संस्कृति का प्रसार करते हैं। इस प्रकार कर्तव्यपरायण, त्यागी, परोपकारी, परमवीर, महाराज हर्षवर्द्धन का शासन सब प्रकार से सुखकर तथा कल्याणकारी सिद्ध होता है।

प्रश्न 2.
‘त्यागपथी’ के प्रमुख पात्रों का परिचय देते हुए बताइए कि आपको कौन-सा पात्र सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों ?
उत्तर
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में प्रभाकरवर्द्धन तथा उनकी पत्नी यशोमती, उनके दो पुत्र (राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन), एक पुत्री (राज्यश्री), कन्नौज, मालव, गौड़ प्रदेश के राजाओं के अतिरिक्त आचार्य दिवाकर, सेनापति भण्ड आदि अनेक पात्र हैं। खण्डकाव्य का नायक हर्षवर्द्धन है तथा काव्य की नायिका होने का गौरव उसकी बहन राज्यश्री को प्राप्त हुआ है। इन सभी पात्रों में मुझे हर्षवर्द्धन का चरित्र सबसे अधिक प्रभावित करता है; क्योंकि वह एक आदर्श भाई एवं पुत्र; देश-प्रेमी, अजेय-योद्धा, श्रेष्ठ शासक, महान् त्यागी, धर्मपरायण और महादानी है।।

प्रश्न 3.
‘त्यागपथी’ के नायक अथवा प्रमुख पात्र (हर्षवर्द्धन) का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘त्यागपथी’ काव्य के आधार पर हर्षवर्द्धन की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए। [2009, 11, 12, 14, 15, 16, 18]
या
” ‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन का चरित्र देशप्रेम का प्रखरतम (आदर्श) उदाहरण है।” उपयुक्त उदाहरण देते हुए इस कथन को प्रमाणित कीजिए। [2011]
या
” ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में सम्राट हर्षवर्द्धन का चरित्र ही केन्द्र है और उसी के चारों ओर कथानक का चक्र घूमता है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नाम को ध्यान में रखकर हर्षवर्द्धन का चरित्रांकन कीजिए। [2015]
या
हर्षवर्द्धन का चरित्र, आचरण का संवाहक है। सिद्ध कीजिए।
या
“‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्ष एक इतिहास पुरुष के रूप में चित्रित है।” इस उक्ति के आलोक में हर्ष का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन का चरित्र आज के युवकों पर कितना प्रभावकारी है? [2009]
या
“हर्ष एक सच्चा त्यागपथी था।” उक्ति के आधार पर हर्ष का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 11]
या
“शौर्य था साकार नृप में अवतरित था ज्ञान।” कथन के आधार पर ‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए। [2010, 11]
उत्तर
थानेश्वर के महाराज प्रभाकरवर्द्धन के छोटे पुत्र हर्षवर्द्धन के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) नायक–हर्षवर्द्धन ‘त्यागपथी’ के नायक हैं। इस खण्डकाव्य की सम्पूर्ण कथा का केन्द्र वही हैं। सम्पूर्ण घटनाचक्र उन्हीं के चारों ओर घूमता है। कथा आरम्भ से अन्त तक हर्षवर्द्धन से ही सम्बद्ध रहती है।।
(2) आदर्श पुत्र एवं भाई-इस खण्डकाव्य में हर्षवर्द्धन एक आदर्श पुत्र एवं आदर्श भ्राता के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। अपने पिता के रुग्ण होने का समाचार पाकर वे आखेट से तुरन्त लौट आते हैं और यथासामर्थ्य उनकी चिकित्सा करवाते हैं। पिता के स्वस्थ न होने तथा माता द्वारा आत्मदाह करने की बात सुनकर वे भाव-विह्वल हो जाते हैं। वे अपनी माता से कहते हैं-

मुझ मन्द पुण्य को छोड़ न माँ तुम भी जाओ।
छोड़ो विचार यह मुझे चरण से लिपटाओ ।

आदर्श पुत्र के समान ही वे आदर्श भाई का कर्तव्य भी पूरा करते हैं। वे अपनी बहन राज्यश्री को अग्निदाह करने एवं संन्यास लेने से रोकते हैं-

दोनों करों से घेरकर छोटी बहिन के भाल को।
भूल खड़े थे निकट जलती चिता की ज्वाल को ।

बड़े भाई राज्यवर्द्धन के प्रति भी उनका अपार प्रेम है-

बाहर चले जब राज्यवर्द्धन हर्ष पीछे चल पड़े।
ज्यों वन-गमन में राम के पीछे चले लक्ष्मण अड़े।

(3) देश-प्रेमी-हर्षवर्द्धन सच्चे देश-प्रेमी हैं। उन्होंने छोटे राज्यों को एक साथ मिलाकर विशाल राज्य की स्थापना की। देश की एकता एवं रक्षा हेतु वे बड़े-से-बड़ा युद्ध करने से भी नहीं हिचकते थे। उन्होंने एक बड़े राज्य की स्थापना ही नहीं की, वरन् धर्मपूर्वक शासन भी किया। देश सेवा ही उनके जीवन का व्रत है।

(4) अजेय योद्धा--हर्षवर्द्धन एक अजेय योद्धा हैं। विद्रोही उनके तेजबल के आगे ठहर नहीं पाता। कोई भी राजा उन्हें पराजित नहीं कर सका। भारत के इतिहास में महाराज हर्षवर्द्धन की दिग्विजय, उनका युद्ध-कौशल और उनकी अनुपम वीरती आज भी स्वर्णाक्षरों में लिखी है। उनकी वीरता एवं कुशल शासन का ही यह परिणाम था कि ”उठा पाया न सिर कोई प्रवंचक।”

(5) श्रेष्ठ शासक-महाराज हर्षवर्द्धन एक श्रेष्ठ शासक हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रजा के हितार्थ ही समर्पित है। उनका शासन धर्म-शासन है। उनके शासन में सभी जनों को समान न्याय एवं सुख उपलब्ध है-

शान्ति शुभता का व्रती था हर्ष का शासन ।
था लिया जिसने प्रजा-हित राजसिंहासन ॥
थी सकल साम्राज्य में सुख श्री उमड़ आयी।
थी चतुर्दिक न्याय समता की विभा छायी ॥

वे सदैव प्रजा के कल्याण में लगे रहते थे और स्वयं को प्रजा का सेवक समझते थे। उनका मत था-

नहीं अधिकार नृप को पास रखे धन प्रजा का,
करे केवल सुरक्षा देश-गौरव की ध्वजा का।।

(6) महान् त्यागी-हर्षवर्द्धन महान् त्यागी एवं आत्म-संयमी हैं। आत्म-संयम एवं सर्वस्व त्याग करने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ के नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई के अधिकार को ग्रहण करना नहीं चाहते। इसी प्रकार कन्नौज को राज्य भी वे अपनी बहन के नाम पर चलाते हैं। प्रयाग में छ: बार अपना सर्वस्व प्रजा के लिए दे देना उनके महान् त्याग का प्रमाण है। वे राजकोष को प्रजा की सम्पत्ति मानते हैं। इसीलिए वे उसे प्रजा को ही दान कर देते हैं। वे अपने पहनने के वस्त्र भी अपनी बहन राज्यश्री से माँगकर पहनते हैं-

दिये सम्राट् ने निज वस्त्र आभूषण वहाँ परे ।
बहिन से भीख में माँग वसन पहिना वहाँ पर ॥

(7) धर्मपरायण–हर्षवर्द्धन के जीवन में धर्मपरायणता कूट-कूटकर भरी हुई है। वे जन-सेवा में ही अपना जीवन लगा देते हैं-

रहे कल्याण मानवमात्र का ही धर्म मेरा,
रहे सर्वस्व-त्यागी पुण्य पर विश्वास मेरा।

उन्होंने शैव, शाक्त, वैष्णव और वेद-मत को एक साथ रखा। उन्होंने किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं बरता।

(8) कर्त्तव्यनिष्ठ एवं दृढनिश्चयी-सम्राट हर्ष ने आजीवन अपने कर्तव्य का पालन किया। प्रारम्भ में इच्छा न होते हुए भी इन्होंने अपने भाई के कहने पर राज्य सँभाला और प्रत्येक संकटापन्न स्थिति में भी अपने कर्तव्य को निभाया। बहन राज्यश्री को वनों में खोजकर वे अपनी कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं-

मैं स्वयं जाऊँगा बहिन को ढूँढ़ने वन प्रान्त में,
पाए बिना उसको न क्षण भर हो सकेंगा शान्त मैं।

भाई की छल से की गयी हत्या का समाचार सुनकर उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उससे उनके दृढ़निश्चय का पता चलता है-

लेकर चरण रज आर्य की करता प्रतिज्ञा आज मैं,
निर्मूल कर दूंगा धरा से अधर्म गौड़ समाज मैं ।।

(9) महादानी—त्यागपथी के हर्षवर्द्धन आत्मसंयमी तथा महादानी हैं। महान् त्यागी होने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई का अधिकार ग्रहण नहीं करना चाहते। कन्नौज विजय के बाद भी वे कन्नौज का सिंहासन राज्यश्री को देना चाहते हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि हर्ष का चरित्र एक महान् राजा, आदर्श भाई, आदर्श पुत्र और महान् त्यागी का चरित्र है, जिसके लिए प्रजा की सुख-सुविधा ही सर्वोपरि है और वह अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति भी निष्ठावान है।

प्रश्न 4.
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर राज्यश्री का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
या
‘त्यागपथी’ के प्रमुख नारी-पात्र राज्यश्री की चारित्रिक विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए/लिखिए। [2013, 15, 16, 17]
या
‘त्यागपथी’ में निरूपित राज्यश्री की चारित्रिक छवि पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
उत्तर
राज्यश्री सम्राट हर्षवर्द्धन की छोटी बहन है। हर्षवर्द्धन के चरित्र के बाद राज्यश्री का चरित्र ही ऐसा है, जो पाठकों के हृदय एवं मस्तिष्क पर छा जाता है। राज्यश्री के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-
(1) माता-पिता की लाडली-राज्यश्री अपने माता-पिता को प्राणों से भी प्यारी है। कवि कहता है|

माँ की ममता की मूर्ति राज्यश्री सुकुमारी।
थी सदा पिता को, माँ को प्राणोपम प्यारी ॥

(2) आदर्श नारी–राज्यश्री आदर्श पुत्री, आदर्श बहन और आदर्श पत्नी के रूप में हमारे समक्ष आती है। वह यौवनावस्था में विधवा हो जाती है तथा गौड़पति द्वारा बन्दिनी बना ली जाती है। भाई राज्यवर्द्धन की मृत्यु के बाद वह कारागार से भाग जाती है और वन में भटकती हुई एक दिन आत्मदाह के लिए उद्यत हो जाती है; किन्तु अपने भाई हर्षवर्द्धन द्वारा बचा लेने पर वह तन-मन-धन से प्रजा की सेवा में ही अपना जीवन अर्पित कर देती है। हर्ष द्वारा राज्य सौंपे जाने पर भी वह राज्य स्वीकार नहीं करती। यही है उसका आदर्श रूप, जो सबको आकर्षित करता है–

विपुल साम्राज्य की अग्रज सहित वह शासिका थी,
अभ्यन्तर से तथागत की अनन्य उपासिका थी।

(3) देश-भक्त एवं जन-सेविका–राज्यश्री के मन में देशप्रेम और लोक-कल्याण की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। हर्ष के समझाने पर वह अपने वैधव्य का दु:ख झेलती हुई भी देश-सेवा में लगी रहती है। देशप्रेम के कारण राज्यश्री संन्यासिनी बनने का विचार भी छोड़ देती है तथा शेष जीवन को देशसेवा में ही लगाने का व्रत लेती है-

करूंगी साथ उनके मैं हमेशा राष्ट्र-साधन
अहिंसा नीति का होगा सभी विधिपूर्ण पालन ॥
x                          x                                     x
प्रजा के हित समर्पित है व्रती जीवन तुम्हारा।
सभी का हित सभी को सुख, तुम्हें दिन-रात प्यारा ।।

(4) करुणामयी नारी–राज्यश्री ने माता-पिता की मृत्यु तथा पति और बड़े भाई की मृत्यु के अनेक दुःख झेले। इन दुःखों ने उसे करुणा की मूर्ति बना दिया। अपने अग्रज हर्षवर्द्धन से मिलते समय उसकी कारुणिक दशा अत्यन्त मार्मिक प्रतीत होती है–

सतत बिलखती थी बहिन माता-पिता की याद कर ।
ले नाम सखियों का, उमड़ती थी नदी-सी वारि भर ॥
था साखु अग्रज धैर्य देता माथ उसका ढाँपकर ।
रोती रही अविरल बहिन बेतस लता-सी काँपकर ।।

(5) त्यागमयी नारी–राज्यश्री का जीवन त्याग की भावना से आलोकित है। भाई हर्षवर्द्धन द्वारा कन्नौज का राज्य दिये जाने पर भी वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह कहती है–

स्वीकार न मुझको कान्यकुब्ज सिंहासन।
बैठो उस पर तुम करो शौर्य से शासन ।।

वह राज्य-कार्य के बन्धन में पड़ना नहीं चाहती; क्योंकि वह मन से संन्यासिनी है। हर्षवर्द्धन के समझाने पर भी वह नाममात्र की ही शासिका बनी रहती है। प्रयाग महोत्सव के समय हर्षवर्द्धन के साथ राज्यश्री भी अपना सर्वस्व प्रजा के हितार्थ त्याग देती है–

लुटाती थी बहन भी पास का सब तीर्थस्थल में,
पहिन दो वस्त्र केवल दीपती थी छवि विमल में ।।

(6) सुशिक्षिता एवं ज्ञान-सम्पन्न राज्यश्री सुशिक्षिता एवं शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न है। जब आचार्य दिवाकर मित्र संन्यास धर्म का तात्त्विक विवेचन करते हुए उसे मानव-कल्याण के कार्य में लगने का उपदेश देते हैं तब राज्यश्री इसे स्वीकार कर लेती है और आचार्य की आज्ञा का पूर्णरूपेण पालन करती है।
इस प्रकार राज्यश्री का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी का चरित्र है। उसके पातिव्रत-धर्म, देश-धर्म, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श निश्चय ही अनुकरणीय हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)

प्रश्न 1.
‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु (कथानक अथवा सारांश) पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर द्वितीय सर्ग की कथावस्तु का निरूपण कीजिए। [2011, 12, 13]
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर सन् 1942 ई० की जनक्रान्ति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ काव्य में वर्णित स्वतन्त्रता-प्राप्ति की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [2013]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए। [2011, 14, 15, 18]
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर गाँधी जी के अफ्रीका-प्रवास के जीवन पर प्रकाश डालिए। [2010, 12, 13]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए। [2016]
या
“‘आलोकवृत्त’ काव्य भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का संक्षिप्त इतिहास है।” विवेचन कीजिए। [2013]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग में कथित ‘भारत छोड़ो आन्दोलन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के ‘सप्तम सर्ग’ के कथानक पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के प्रथम एवं द्वितीय सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। [2016, 18]
या
‘आलोकवृत्त’ के दूसरे एवं तीसरे सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग’ की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग के आधार पर ‘असहयोग आन्दोलन’ की भूमिका पर सोदाहरण प्रकाश डालिए। [2011]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत प्रथम तथा द्वितीय सर्ग में वर्णित घटनाओं का उल्लेख कीजिए। [2012]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग में वर्णित नमक सत्याग्रह के सन्दर्भ में गाँधी जी की दांडी यात्रा का वर्णन कीजिए। [2009, 11, 12]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग में निरूपित सन् 1942 ई० की जनक्रान्ति का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। [2010, 14]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग का कथानक अपनी भाषा में लिखिए। [2016, 17, 18]
या
‘आलोकवृत्त’ के अष्टम सर्ग की कथावस्तु प्रस्तुत कीजिए। [2013, 14]
या
‘आलोकवृत्त’ के अन्तिम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015]
उत्तर
‘आलोकवृत्त’ के कथानक में आठ सर्ग हैं, जिनकी कथावस्तु संक्षेप में निम्नलिखित है-

प्रथम सर्ग : भारत का स्वर्णिम अतीत

प्रथम सर्ग में कवि ने भारत के अतीत के गौरव तथा तत्कालीन पराधीनता का वर्णन किया है। कवि ने बताया है कि भारत वेदों की भूमि रहा है। भारतवर्ष ने ही संसार को सर्वप्रथम ज्ञान की ज्योति दी थी, किन्तु दुर्भाग्यवश एक समय ऐसा आया कि भारतवासी यह भूल गये कि हम कितने गौरवमण्डित थे ? इसका परिणाम यह हुआ कि भारतवर्ष सैकड़ों वर्ष तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। सन् 1857 ई० की क्रान्ति के पश्चात् गुजरात के पोरबन्दर’ नामक स्थान पर एक दिव्य ज्योतिर्मय विभूति मोहनदास करमचन्द गाँधी के रूप में प्रकट हुई, जिसने हमें विदेशियों की दासता से मुक्त करवाया।

द्वितीय सर्ग : गाँधी जी का प्रारम्भिक जीवन

द्वितीय सर्ग में गाँधी जी के जीवन के क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला गया है। वे बचपन में कुसंगति में फँस गये थे, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने पिता के समक्ष अपनी त्रुटियों पर पश्चात्ताप किया और दुर्गुणों को सदैव के लिए छोड़ने की प्रतिज्ञा की और आजीवन उसका निर्वाह किया। इसके बाद कस्तूरबा के साथ गाँधी जी का विवाह हुआ। इसके कुछ समय बाद उनके पिताजी का देहान्त हो गया। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड गये। उनकी माँ ने विदेश में रहकर मांस-मदिरा का प्रयोग न करने के लिए समझाया–

मद्य-मांस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर।
माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल तिलक लगाकर ।।

इंग्लैण्ड में सात्त्विक जीवन व्यतीत करते हुए भी वे एक दिन एक कलुषित स्थान पर पहुँच गये, लेकिन उन्होंने अपने चरित्र को कलुषित होने से बचा लिया। वहाँ से वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत आने पर उन्हें उनकी माता के देहान्त का दु:खद समाचार मिला। यहीं पर द्वितीय सर्ग की कथा समाप्त हो जाती है।

तृतीय सर्ग : गाँधी जी का अफ्रीका-प्रवास

तृतीय सर्ग में गाँधी जी के अफ्रीका में निवास का वर्णन है। एक बार रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक गोरे अंग्रेज ने उन्हें काला होने के कारण अपमानित करके रेलगाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस कुटिल नीति से गाँधी जी के हृदय को बहुत दुःख पहुँचा। वे भारतीयों की दुर्दशा से चिन्तित हो उठे। यहाँ पर कवि ने गाँधी जी के मन में उत्पन्न अन्तर्द्वन्द्व का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा का सहारा लेकर असत्य और हिंसा का सामना करने का दृढ़ निश्चय किया। अपनी जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर उन्होंने मानवता के उद्धार का प्रण लिया-

पशु-बल के सम्मुख आत्मा की शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की आग बुझानी होगी।

सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया। दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष-समाप्ति के साथ ही तृतीय सर्ग समाप्त हो जाता है।

चतुर्थ सर्ग : गाँधी जी का भारत आगमन

चतुर्थ सर्ग में गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आते हैं। भारत आकर गाँधी जी ने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। उन्होंने साबरमती नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया। अनेक लोग गाँधी जी के अनुयायी हो गये, जिनमें डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, ‘राजगोपालाचारी’, सरोजिनी नायडू, ‘दीनबन्धु’, मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस आदि प्रमुख थे। अंग्रेज देश की जनता पर भारी अत्याचार कर रहे थे। गाँधी जी ने चम्पारन में नील की खेती को लेकर आन्दोलन आरम्भ किया; जिसमें वे सफल हुए। एक अंग्रेज द्वारा अपनी पत्नी के हाथों गाँधी जी को विष देने तक का प्रयास किया गया, परन्तु वह स्त्री गाँधी जी के दर्शन कर ऐसा न कर सकी। इसके विपरीत उन दोनों का हृदय-परिवर्तन हो गया। इसी सर्ग में खेड़ा-सत्याग्रह का वर्णन भी हुआ है। कवि ने इस सत्याग्रह में सरदार वल्लभभाई पटेल का चरित्र-चित्रण विशेष रूप से किया है।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

इस सर्ग में कवि ने यह चित्रित किया है कि गाँधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेजों की दमन-नीति भी बढ़ती गयी। गाँधी जी के नेतृत्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों का समूह नागपुर पहुँचता है। नागपुर के कांग्रेस-अधिवेशन में गाँधी जी के ओजस्वी भाषण ने भारतवर्ष के लोगों में नयी स्फूर्ति भर दी, किन्तु अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने हिन्दुओं-मुसलमानों में साम्प्रदायिक दंगे करवा दिये। गाँधी जी को बन्दी बना लिया गया। उन्होंने सत्याग्रह का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। कारागार से छूटने के बाद उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजनोत्थान, खादी-प्रचार आदि रचनात्मक कार्यों में अपना सम्पूर्ण समय लगाना आरम्भ कर दिया। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गाँधी जी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा-

आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के अनशन का संकल्प सुनाया।

फिर लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रस्ताव के साथ ही पाँचवाँ सर्ग समाप्त हो जाता है।

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

इस सर्ग में गाँधी जी द्वारा चलाये गये नमक-सत्याग्रह का वर्णन हुआ है। गाँधी जी ने समुद्रतट पर बसे ‘डाण्डी’ नामक स्थान की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया। अंग्रेज सरकार ने लन्दन में ‘गोलमेज सम्मेलन बुलाया, जिसमें गाँधी जी को आमन्त्रित किया गया। इसके परिणामस्वरूप सन् 1937 ई० में ‘प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना हुई। इसके साथ ही षष्ठ सर्ग समाप्त हो जाता है।

सप्तम सर्ग : सन् 1942 की जनक्रान्ति

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज सरकार भारतीयों को सहयोग तो चाहती थी, किन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद 1942 ई० में गाँधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा दिया। सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इसका वर्णन कवि ने बड़े ही सजीव रूप से किया है–

थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे।
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुथल में थी ज्वाला घर-घर ॥

कवि ने इस आन्दोलन का वर्णन अत्यधिक ओजस्वी भाषा में किया है। बम्बई अधिवेशन के बाद गाँधी जी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिये जाते हैं। पूरे देश में इसकी विद्रोही प्रतिक्रिया होती है। कवि के शब्दों में,

जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं ।

इस सर्ग में कवि ने गाँधी जी एवं कस्तूरबा के मध्य हुए एक वार्तालाप का भी भावपूर्ण चित्रण किया है। जिसमें गाँधी जी के मानवीय स्वभाव और कस्तूरबा की सेवा-भावना, मूक त्याग और बलिदान का सम्यक् निरूपण किया है।

अष्टम सर्ग : भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

अष्टम सर्ग का आरम्भ भारत की स्वतन्त्रता से किया गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् देशभर में हिन्दू-मुस्लिम-साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हैं। गाँधी जी को इससे बहुत दु:ख हुआ। वे ईश्वर से प्रार्थना करते है-

प्रभो ! इस देश को सत्पथ दिखाओ, लगी जो आग भारत में बुझाओ ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दें, लपट में रोष की निज शीश धर हूँ॥

इस कल्याण-कामना के साथ ही यह खण्डकाव्य समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2010, 11, 13, 14, 15, 16, 18]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2016,18]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) गाँधी जी का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक की (चारित्रिक) विशेषताएँ लिखिए। [2015, 16, 17]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी के जीवन व राष्ट्रीय आदर्शों पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
“‘आलोकवृत्त’ में गाँधी जी का कृतित्व ही नहीं उनका जीवन-दर्शन और चिन्तन भी अभिव्यक्त हुआ है।” इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए। [2012]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी के व्यक्तित्व की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार है।

(1) सामान्य मानवीय दुर्बलताएँ–गाँधी जी का आरम्भिक जीवन एक साधारण मनुष्य की भाँति मानवीय दुर्बलताओं वाला रहा है। उन्होंने एक बार अपने गुरु से छुपकर मांस-भक्षण किया था; उदाहरणार्थ–

करने लगे मांस-भक्षण, गुरुजन की आँख बचाकर।

किन्तु बाद में उन्होंने अपनी इन दुर्बलताओं पर अपनी आत्मिक शक्ति के बल पर पूर्ण विजय पा ली।
(2) देश-प्रेमी-‘आलोकवृत्त’ में गाँधी जी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता उनका देशप्रेम है। वे देशप्रेम के कारण अनेक बार कारागार जाते हैं, जहाँ उन्हें अंग्रेजों के अपमान-अत्याचार सहने पड़ते हैं। उन्होंने अपना सर्वस्व देश के लिए न्यौछावर कर दिया। भारत के लिए उनका कहना था–

तू चिर प्रशान्त, तू चिर अजेय
सुर-मुनि-वन्दित, स्थित, अप्रमेय
हे सगुण ब्रह्म, वेदादि-गेय
हे चिर अनादि, हे चिर अशेष
मेरे भारत, मेरे स्वदेश ।

(3) सत्य और अहिंसा के प्रबल समर्थक–गाँधी जी देश की स्वतन्त्रता केवल सत्य और अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त करना चाहते हैं। असत्य और हिंसा का मार्ग उन्हें अच्छा नहीं लगता। वे कहते हैं-

पशुबल के सम्मुख आत्मा की, शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की, आग बुझानी होगी।

अहिंसा व्रत का पूर्ण रूप से पालन उनके जैसी कोई बिरला व्यक्ति ही कर सकता है।
(4) दृढ़ आस्तिक-गाँधी जी पुरुषार्थी हैं तो भी वे ईश्वर की सत्ता में अटूट विश्वास रखते हैं। उनका मानना है कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। वे प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। यही कारण है कि वे मात्र पवित्र साधनों को प्रयोग ही उचित समझते हैं-

क्या होगा परिणाम सोच लें, पर क्यों सोचूं, वह तो।
मेरा क्षेत्र नहीं, स्रष्टा का, जो प्रभु करे वही हो ।

(5) स्वतन्त्रता-प्रेमी-गाँधी जी के जीवन का मूल उद्देश्य भारत को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारतमाता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। देशवासियों को परतन्त्रता की बेड़ियाँ काटने के लिए प्रेरित करते हुए वे कहते हैं-

जाग तुझे तेरी अतीत, स्मृतियाँ धिक्कार रही हैं।
जाग-जाग तुझे भावी, पीढ़ियाँ पुकार रही हैं ।

(6) मानवतावादी-गाँधी जी मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते। वे सबके लिए समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उन्होंने जीवन-भर ऊँच-नीच, जाति-पाँति और रंग-भेद का डटकर विरोध किया। अछूत कहे जाने वाले भारतीयों के उद्धार के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहे। इस भेदभाव से उन्हें बहुत दु:ख होता था-

जिसने मारा मुझे, कौन वह, हाथ नहीं क्या मेरा।
मानवता तो एक, भिन्न, बस उसका मेरा घेरा ।।

(7) भावात्मक, राष्ट्रीय और हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक–गाँधी जी ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी व समृद्ध देखना चाहते थे। इन्होंने भारत की समग्र जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए जीवन-पर्यन्त प्रयास किया और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा दी। उनका कहना था–

यदि मिलकर इस राष्ट्रयज्ञ में सब कर्त्तव्य निभायें अपना,
एक वर्ष में ही पूरा हो मेरा रामराज्य का सपना ।

(8) आत्मविश्वासी-गाँधी जी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे, उन्होंने जो कुछ भी किया पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी हुए। उनका मानना था-

शासित की स्वीकृति न मिले तो शासक क्या कर लेगा
यदि आधार मिटे भय का तो एकतन्त्र ठहरेगा।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एक श्रेष्ठ मानव में जितने भी मानवोचित गुण हो सकते हैं वे सभी महात्मा गाँधी में विद्यमान थे।

प्रश्न 3.
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना के उद्देश्य (शिक्षा-संदेश) पर प्रकाश डालिए। [2010, 15]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नामकरण की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
‘आलोकवृत्त’ में निसूचित जीवन के प्रमुख मूल्यों को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए। [2009]
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में जीवन के श्रेष्ठ मूल्य वर्णित हैं। संक्षेप में लिखिए।[2017]
उत्तर
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य नामकरण (शीर्षक) की सार्थकता-कवि गुलाब खण्डेलवाल ने ‘आलोकवृत्त’ में महात्मा गाँधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से प्रकाशित व्यक्तित्व को चित्रित किया है। इस खण्डकाव्य का विषय उद्देश्य एवं मूलभाव यही है। महात्मा गाँधी के जीवन को हम प्रकाश स्वरूप कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सद्गुणों एवं सविचारों से प्रकाशित किया है। उन्होंने विश्व में सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का प्रकाश फैलाया। अत: हम इस जीवन वृत्त को आलोकवृत्त कह सकते हैं। इस दृष्टिकोण से यह शीर्षक उपयुक्त है। यह महात्मा गाँधी के जीवन, उनके चरित्र, उनके गुणों, सिद्धान्तों एवं दर्शन को पूर्णरूपेण परिभाषित करता हुआ एक साहित्यिक एवं दार्शनिक शीर्षक है।

आलोकवृत्त का उद्देश्य-कवि गुलाब खण्डेलवाल ने महात्मा गाँधी के जीवन व कार्यों के द्वारा हमें देश-प्रेम, भावात्मक एकता, राष्ट्रीय एकता, लोककल्याण की भावना, मानव मूल्यों की स्थापना, साधनों की पवित्रता, सत्य, अहिंसा और प्रेम की भावना आदि का सन्देश दिया है। प्रस्तुत खण्डकाव्य मनुष्य के जीवन में आशा और आलोक विकीर्ण करता हुआ, उसे मानवता के उच्चतम शिखरों की ओर उन्मुख करता हुआ, उसे मानवता और संस्कृति की चेतना के परिष्कृत रूप में प्रस्तुत करता है। अपने इस उद्देश्य को उन्होंने काव्य के नायक महात्मा गाँधी के मुख से कहलवाया है

यदि मिलकर इस राष्ट्रयज्ञ में सब कर्तव्य निभायें अपना,
एक वर्ष में ही पूरा हो मेरा रामराज्य का सपना ।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 3 Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 3 Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 3 Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 3
Chapter Name Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 3 Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में आर्थिक सुधार क्यों आरम्भ किए गए?
उत्तर
वर्ष 1991 में भारत को विदेशी ऋणों के मामले में संकट का सामना करना पड़ा। सरकार अपने विदेशी ऋण के भुगतान करने की स्थिति में नहीं थी। पेट्रोल आदि आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए सामान्य रूप से रखा गया विदेशी मुद्रा भण्डार पन्द्रह दिनों के लिए आवश्यक आयात का भुगतान करने योग्य भी नहीं बचा था। इस संकट को आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने और भी गहन बना दिया था। इन सभी कारणों से आर्थिक सुधार आरम्भ किए गए।

प्रश्न 2.
विश्व व्यापार संगठन के कितने सदस्य देश हैं?
उत्तर
विश्व व्यापार संगठन के 160 सदस्य देश हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय रिजर्व बैंक का सबसे प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर
भारतीय रिजर्व बैंक का प्रमुख कार्य मौद्रिक नीति बनाना और उसे लागू करना है।

प्रश्न 4.
रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों पर किस प्रकार नियन्त्रण रखता है?
उत्तर
भारत में विसीय क्षेत्र का नियन्त्रण रिजर्व बैंक का दायित्व है। रिजर्व बैंक के विभिन्न नियम और कसौटियों के माध्यम से ही बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के कार्यों का नियमन होता है। भारतीय रिजर्व बैंक निम्नलिखित प्रकार से व्यावसायिक बैंकों पर नियन्त्रण रखता है

  1. कोई बैंक अपने पास कितनी मुद्रा जमा रख सकता है। |
  2. यह ब्याज की दरों को निर्धारित करता है।
  3. विभिन्न क्षेत्रों को उधार देने की प्रकृति इत्यादि को भी यक्लक करता है।

प्रश्न 5.
रुपयों के अवमूल्यन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
विदेशी विनिमय बाजार में विदेशी मुद्रा से तुलना में रुपये के मूल्य को घटाने को रुपये का अवमूल्यन कहा जाता है।

प्रश्न 6.
इनमें भेद करें
(क) युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय।
(ख) द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार।
(ग) प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधक।
उत्तर

(क) युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय

युक्तियुक्त विक्रय राज्य के स्वामित्व वाली इकाइयों में कमी करने को युक्तियुक्त विक्रय कहते हैं। अल्पांश विक्रय-इसके अन्तर्गत वर्तमान सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के एक हिस्से को निजी क्षेत्र को बेच दिया जाता है।

(ख) द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार

द्विपक्षीय व्यापार इसमें दो देशों को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में समान अवसर प्राप्त होते हैं।
बहुपक्षीय व्यापार- बहुपक्षीय व्यापार में सभी देशों को विश्व व्यापार में समान अवसर प्राप्त होते, हैं। इसमें विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य ऐसी नियम आधारित व्यवस्था की स्थापना है, जिसमें कोई देश मनमाने ढंग से व्यापार के मार्ग में बाधाएँ खड़ी न कर पाए। इसका उद्देश्य सेवाओं का सृजन और व्यापार को प्रोत्साहन देना भी है ताकि विश्व के संसाधनों का इष्टतम प्रयोग हो सके।

(ग) प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधक

प्रशुल्क अवरोधक- प्रशुल्क, आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर है जिसके कारण आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं और इससे विदेशी प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योगों की रक्षा होती है। आयात पर कठोर नियन्त्रण एवं ऊँचे प्रशुल्क द्वारा ये अवरोधक लगाए जाते हैं। इसमें सीमा कर तथा
आयात- निर्यात करों को शामिल किया जाता है। अप्रशुल्क अवरोधक-अप्रशुल्क अवरोधक (जैसे कोटा एवं लाइसेंस) में वस्तुओं की मात्रा निर्दिष्ट की जाती है। ये अवरोधक भी परिमाणात्मक अवरोधक कहलाते हैं।

प्रश्न 7.
प्रशुल्क क्यों लगाए जाते हैं?
उत्तर
देशी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए प्रशुल्क लगाए जाते हैं।

प्रश्न 8.
परिमाणात्मक प्रतिबन्धों को क्या अर्थ होता है?
उत्तर
देशी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से, हमारे नीति-निर्धारकों ने परिमाणात्मक उपाय लागू किए। इसके लिए आयात पर कठोर नियन्त्रणों एवं प्रशुल्कों का प्रयोग होता था। परिमाणात्मक उपाय प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क दोनों प्रकार से किए जाते हैं। कोटा, लाइसेंस, प्रशुल्क आदि परिमाणात्मक प्रतिबन्धों के अन्तर्गत आते हैं।

प्रश्न 9.
‘लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर देना चाहिए। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? क्यों?
उत्तर
निजीकरण से तात्पर्य है—किसी सार्वजनिक उपक्रम के स्वामित्व या प्रबन्धन का सरकार द्वारा त्याग। किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा जनसामान्य को इक्विटी की बिक्री के माध्यम से निजीकरण को विनिवेश कहा जाता है। निजीकरण का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की कार्यक्षमता को बढ़ाना है। परन्तु निजीकरण से हमेशा उद्योग क्षेत्र की कार्यक्षमता में बढ़ोतरी नहीं होती है, लेकिन इससे सार्वजनिक क्षेत्र का वित्तीय भार सरकार पर कुछ कम हो जाता है। हमारे विचार से लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक व सामाजिक कल्याण करने वाली सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 10.
क्या आपके विचार में बाह्य प्रापण भारत के लिए अच्छा है? विकसित देशों में इसका विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर
बाह्य प्रापण वैश्वीकरण की प्रक्रिया का एक विशिष्ट परिणाम है। इसमें कम्पनियाँ किसी बाहरी स्रोत (संस्था) से नियमित सेवाएँ प्राप्त करती हैं; जैसे-कानूनी सलाह, कम्प्यूटर सेवा, विज्ञापन, सुरक्षा आदि। संचार के माध्यमों में आई क्रान्ति, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार, ने अब इन सेवाओं को ही एक विशिष्ट आर्थिक गतिविधि का स्वरूप प्रदान कर दिया है।

आजकल बहुत सारी बाहरी कम्पनियाँ ध्वनि आधारित व्यावसायिक प्रक्रिया प्रतिपादन, अभिलेखांकन, लेखांकन, बैंक सेवाएँ, संगीत की रिकार्डिंग, फिल्म सम्पादन, शिक्षण कार्य आदि सेवाएँ भारत से प्राप्त कर रही हैं। अब तो अधिकांश बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ-साथ अनेक छोटी-बड़ी कम्पनियाँ भी भारत से ये सेवाएँ प्राप्त करने लगी हैं क्योंकि भारत में इस तरह के कार्य बहुत कम लागत में और उचित रूप से निष्पादित हो जाते हैं। इस कार्य से भारत विकसित देशों से काफी विदेशी मुद्रा पारिश्रमिक के रूप में अर्जित कर रहा है। विकसित देश बाह्य प्रापण का इसीलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि भारत ने बाह्य प्रापण के व्यापर में अच्छी प्रगति की है और विकसित देशों को इस बात का डर है कि कहीं उनका देश उक्त सेवाओं पर भारत पर निर्भर न हो जाए।

प्रश्न 11.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिसके कारण यह विश्व का बाह्य प्रापण केन्द्र बन रहा है। ये अनुकूल परिस्थितियाँ क्या हैं?
उत्तर
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिसके कारण यह विश्व का बाह्य प्रापण केन्द्र बन रहा है। ये विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं

  1. भारत में इस तरह के कार्य कम लागत में व उचित रूप से निष्पादित हो जाते हैं क्योंकि यहाँ | मजदूरी दर विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।
  2. भारत में जनसंख्या आधिक्य के कारण कुशल श्रमिक बहुत हैं जिसके कारण उक्त सेवाओं में कुशलता एवं शुद्धता का मानक भी भारत रख सकता है।

प्रश्न 12.
क्या भारत सरकार की नवरत्न नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में सहायक रही है? कैसे? ।
उत्तर
1996 ई० में नवउदारवादी वातावरण में सार्वजनिक उपक्रमों की कुशलता बढ़ाने, उनके प्रबन्धन में व्यवसायीकरण लाने और उनकी स्पर्धा क्षमता में प्रभावी सुधार लाने के लिए सरकार ने नौ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का चयन कर उन्हें नवरत्न घोषित कर दिया। ये कम्पनियाँ हैं—IOCL, BPCL, HPCL,ONGC, SAIL, IPCL, BHEL, NTPC और BSNL. नवरत्न’ नाम से अलंकरण के बाद इन कम्पनियों के निष्पादन में निश्चय ही सुधार आया है। स्वायत्तता मिलने से ये उपक्रम वित्तीय बाजार से स्वयं संसाधन जुटाने एवं विश्व बाजार में अपना विस्तार करने में सफल होते जा रहे हैं।

प्रश्न 13.
सेवा क्षेत्रंक के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण कौन-से रहे हैं?
उत्तर
सेवा क्षेत्रक के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण इस प्रकार हैं

  1. भारत में मजदूरी की दरें विकसित देशों की तुलना में काफी कम हैं।
  2. जनसंख्या आधिक्य के कारण भारत में कुशल श्रमिकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
  3. निम्न मजदूरी-दरें व कुशल श्रम शक्ति की उपलब्धता के कारण बाह्य प्रापण के जरिए भारत विश्व स्तर पर उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। यह भी सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास का कारण है।

प्रश्न 14.
सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्रक दुष्प्रभावित हुआ लगता है। क्यों?
उत्तर
सुधार कार्यों से कृषि को कोई लाभ नहीं हो पाया है और कृषि की संवृद्धि दर कम होती जा रही है। इस पर विचार के लिए हम निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार कर सकते हैं

  1. कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय; जैसे—सिंचाई, बिजली, सड़क-निर्माण और शोध-प्रसार आदि पर व्यय में काफी कमी आई है।
  2. उर्वरक सहायिकी में कमी ने उत्पादन लागतों को बढ़ा दिया है।
  3. विश्व व्यापार संघ की स्थापना के कारण कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की समाप्ति का विचार है जिस कारण देशी किसानों को बाहरी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
  4. आन्तरिक उपभोग की खाद्यान्न फसलों के स्थान पर निर्यात के लिए नकदी फसलों पर बल दिया जा रहा है। इससे देश में खाद्यान्नों की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।
  5. प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता एवं गुणवत्ता घट रही है।
  6. सरकार का ध्यान कृषि से उद्योग की ओर परिवर्तित हुआ है।

प्रश्न 15.
सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के क्या कारण रहे हैं?
उत्तर
आर्थिक सुधारों का औद्योगिक क्षेत्र के विकास पर ऋणात्मक प्रभाव पड़ा है। यह प्रभाव अग्रलिखित है

  1. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने पदार्थों की बिक्री के लिए भारतीय बाजारों का शोषण कर रही हैं और घरेलू उत्पादक अपनी कमजोर प्रतियोगी शक्ति के कारण पीछे की ओर खिसकते जा रहे हैं।
  2. औद्योगिक उत्पादनका निष्पादन सन्तोषजनक नहीं रहा। यह अस्सी के दशक के निष्पादन स्तर से भी नीचा था।

प्रश्न 16.
सामाजिक न्यायं और जन-कल्याण के परिप्रेक्ष्य में भारत के आर्थिक सुधारों पर चर्चा करें।
उत्तर
उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के माध्यम से वैश्वीकरण के भारत सहित अनेक देशों पर कुछ सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि वैश्वीकरण विश्व बाजारों में बेहतर पहुँच तथा तकनीकी उन्नयन द्वारा विकासशील देशों के बडे उद्योगों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण बनने का अवसर प्रदान कर रहा है। दूसरी ओर आलोचकों का विचार है कि वैश्वीकरण ने विकसित देशों को विकासशील देशों के आन्तरिक बाजार पर कब्जा करने का भरपूर अवसर प्रदान किया है। इसके कारण गरीब देशवासियों का कल्याण ही नहीं वरन् उनकी पहचान भी तिरे में पड़ गई है। विभिन्न देशों और जनसमुदायों के बीच की खाई और विस्तृत हो रही है। आर्थिक सुधारों ने केवल उच्च आय वर्ग की आमदनी और उपभोग स्तर का उन्नयन किया है तथा सारी संवृद्धि कुछ गिने-चुने क्षेत्रों; जैसे-दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, मनोरंजन आदि तक सीमित रही है। कृषि विनिर्माण जैसे आधारभूत क्षेत्रक, जो देश के करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं, इन सुधारों से लाभान्वित नहीं हो पाए हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
उदारीकरण का उपाय नहीं है-
(क) लाईसेन्स अथवा पंजीकरण की समाप्ति
(ख) विस्खार तथा उत्पादन की स्वतन्त्रता
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करना
(घ) लघु उद्योगों की निवेश सीमा में वृद्धि
उत्तर
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करना

प्रश्न 2.
GATT नामक एक बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए
(क) 30 नवम्बर, 1947 को
(ख) 30 अक्टूबर, 1947 को
(ग) 30 सितम्बर, 1950 को
(घ) 30 जनवरी, 1950 को
उत्तर
(ख) 30 अक्टूबर, 1947 को

प्रश्न 3.
विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य है
(क) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार की प्रसार करना
(ख) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का प्रसार करना
(ग) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4.
भारत में औद्योगिक नीति की प्रक्रिया कब से अपनायी जा रही है?
(क) सन् 1991 ई० से
(ख) सन् 1992 ई० से
(ग) सन् 1993 ई० से
(घ) सन् 1994 ई० से
उत्तर
(क) सन् 1991 ई० से ।

प्रश्न 5.
देश में विदेशी निवेश के संरक्षण के लिए भारत के बहुपक्षीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (MIGA) प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कब किए? (क) 14 अप्रैल, 1991 ई० को ।
(ख) 14 अप्रैल, 1992 ई० को
(ग) 13 अप्रैल, 1992 ई० को
(घ) 13 अप्रैल, 1991 ई० को ।
उत्तर
(ग) 13 अप्रैल, 1992 ई० को ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था की क्या विशेष बात थी?
उत्तर
भारत में अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था में बाजार अर्थव्यवस्था की विशेषताओं के साथ नियोजित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ भी पायी जाती थीं।

प्रश्न 2.
वर्ष 1991 में भारत को किन संकटों का सामना करना पड़ा?
उत्तर
वर्ष 1991 में भारत को निम्नलिखित संकटों का सामना करना पड़ा

  1. विदेशी मुद्रा कोष में कमी के कारण उत्पन्न आयातों का भुगतान करने का संकट,
  2. मूल्यों में तीव्र वृद्धि,
  3. आयातों में वृद्धि।

प्रश्न 3.
वित्तीय संकट का उद्गम स्रोत क्या था?
उत्तर
वित्तीय संकट का वास्तविक उद्गम स्रोत 1980 ई० के दशक में अर्थव्यवस्था में अकुशल प्रबन्धन था।।

प्रश्न 4.
सरकार को अपने राजस्व से अधिक व्यय क्यों करना पड़ा? ।
उत्तर
गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या विस्फोट के कारण सरकार को अपने राजस्व से अधिक व्यय करना पड़ा।

प्रश्न 5.
किन्हीं दो अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के नाम बताइए।
उत्तर
1. अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (विश्व बैंक) |
2. अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष।। 

प्रश्न 6.
भारत को ऋण देने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने क्या शर्ते रखीं?
उत्तर
भारत को ऋण देने के लिए सरकार ने निम्नलिखित शर्ते रखीं
1. सरकार उदारीकरण करेगी,
2. निजी क्षेत्र पर लगे प्रतिबन्धों को हल्लाएगी तथा
3. विदेशी व्यापार पर लगे प्रतिबन्ध कम करेगी।

प्रश्न 7.
नई आर्थिक नीति का क्या उद्देश्य था?
उत्तर
नई आर्थिक नीति का उद्देश्य था-अर्थव्यवस्था में अधिक स्पर्धापूर्ण व्यावसायिक वातावरण की रचना करना तथा फर्मों के व्यापार में प्रवेश करने तथा उनकी संवृद्धि के मार्ग के आने वाली बाधाओं को दूर करछा।

प्रश्न 8.
स्थायित्वकारी उपाय के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर
1. भुगतान सन्तुलन में आ गई कुछ त्रुटियों को दूर करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भण्डार (बनाना)।
2. मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करना।

प्रश्न 9.
संरचनात्मक सुधार उपाय अपनाने के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर
1. अर्थव्यवस्था की कुशलता को सुधारना,
2. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों की अनम्यताओं (कठोरता) को दूर कर भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा-क्षमता को संवर्धित करना।

प्रश्न 10.
उदारीकरण की नीति क्या थी?
उत्तर
उदारीकरण की नीति आर्थिक गतिविधियों पर लगे प्रतिबन्धों को दूर करे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को मुक्त करने की नीति थी।

प्रश्न 11.
औद्योगिक क्षेत्र के विनियमीकरण की मुख्य बातें क्या हैं?
उत्तर
1. केवल 6 उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेन्स व्यवस्था समाप्त कर दी गई।
2. सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या केवल 3 रखी गई।
3. लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित अनेक वस्तुओं को अनारक्षित श्रेणी में रख दिया गया।

प्रश्न 12.
वित्तीयक क्षेत्रक में कौन-कौन से सुधार किए गए हैं?
उत्तर
1. भारतीय और विदेशी निजी बैंकों को बैंकिंग क्षेत्र में पदार्पण की अनुमति दी गई।
2. विदेशी निवेश संस्थाओं तथा व्यापारी बैंक, म्युचुअल फण्ड और पेंशन कोष आदि को भारतीय वित्तीय बाजार में प्रवेश करने की अनुमति दी गई है।

प्रश्न 13.
कर-व्यवस्था में क्या सुधार किए गए?
उत्तर
1. व्यक्तिगत आय-कर पर लगाए गए करों की दरों में निरन्तर कमी की गई है।
2. निगम कर की दरों को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।
3. अप्रत्यक्ष करों की दरों में कमी की गई है तथा कर-संग्रह प्रक्रिया को सरल बनाया गया है।

प्रश्न 14.
विदेशी विनिमय के क्षेत्र में क्या सुधार किए गए हैं?
उत्तर
1. अन्य देशों की तुलना में रुपये का अवमूल्यन किया गया है।
2. विनिमय दरों का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा ही किया जा रहा है।

प्रश्न 15.
व्यापार नीति में सुधार के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर
1. आयात और निर्यात पर परिमाणात्मक प्रतिबन्धों की समाप्ति।
2. प्रशुल्क दरों में कटौती तथा
3. आयातों के लिए लाइसेन्स प्रक्रिया की समाप्ति।

प्रश्न 16.
सरकार के 1996 ई० में नौ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को नवरत्न घोषित करने के क्या उद्देश्य थे? ”
उत्तर
1. सार्वजनिक उपक्रमों की कुशलता में वृद्धि करना,
2. उनके प्रबन्धन में व्यवसायीकरण लाना तथा
3. उनकी स्पर्धा क्षमता में प्रभावी सुधार करना।।

प्रश्न 17.
निजीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध को निजी स्वामित्व, प्रबन्ध एवं संचालन में अन्तरित किया जाता है।

प्रश्न 18.
विनिवेश से क्या आशय है?
उत्तर
किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा जनसामान्य को इक्विटी की बिक्री के माध्यम से निजीकरण को विनिवेश कहा जाता है।

प्रश्न 19.
विनिवेश के क्या उददेश्य थे?
उत्तर
1. वित्तीय अनुशासन एवं आधुनिकीकरण,
2. निजी पूँजी और प्रबन्ध क्षमताओं का उपयोग,
3. सार्वजनिक उद्यमों के निष्पादन में सुधार।।

प्रश्न 20.
वैश्वीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
वैश्वीकरण उदारीकरण का एक विस्तृत रूप है। इसका मुख्य क्षेत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और शेष विश्व के मध्य नियन्त्रण व प्रतिबन्ध रहित सम्बन्धों का विकास है।

प्रश्न 21.
बाह्य प्रापण का क्या अर्थ है?
उत्तर
बाह्य प्रापण का अर्थ है-कम्पनियों द्वारा किसी बाह्य स्रोत से नियमित सेवाएँ प्राप्त करना।

प्रश्न 22.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब और क्यों की गई?
उत्तर
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना 1995 ई० में निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की गई
1. व्यापार बाधाओं को समाप्त करना,
2. सेवाओं के सृजन और व्यापार को प्रोत्साहन देना,
3. पर्यावरण संरक्षण। 

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक सुधारों से क्या आशय है? भारत में आर्थिक सुधारों को लागू करने के उद्देश्य 
बताइए।
उत्तर
आर्थिक सुधार का अर्थ– आर्थिक सुधारों से अभिप्राय उन सभी उपायों से है जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को अधिक कुशल एवं प्रतियोगी बनाना है।
आर्थिक सुधारों के उद्देश्य- भारत में आर्थिक सुधारों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित रहे हैं|

  1. अवसंरचना के विकास द्वारा अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना।।
  2. आर्थिक विकास एवं आर्थिक स्वामित्व के मध्य उचित समन्वय स्थापित करना।
  3. औद्योगिक उत्पादकता एवं कार्यकुशलता में वृद्धि करना।
  4. वित्तीय क्षेत्र में सुधार करना एवं साख व्यवस्था का आधुनिकीकरण करना।
  5. सार्वजनिक उपक्रमों के कार्य निष्पादन में सुधार लाना।
  6. विदेशी विनियोग, विदेशी तकनीकी एवं विदेशी पूँजी में अन्तर्रवाह को प्रोत्साहित करना।
  7. राजकोषीय अनुशासन को लागू करना।।

प्रश्न 2.
निजीकरऐप से क्या आशय है?
उत्तर
निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध को निजी स्वामित्व, प्रबन्ध एवं संचालन में अन्तरित किया जाता है। ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र की असफलताओं को दृष्टिगत रखते हुए किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में सन् 1984 ई० में ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी ने घोषणा की थी, “सार्वजनिक क्षेत्र ऐसे बहुत से क्षेत्रों में फैल गया है, जहाँ इसे नहीं फैलना चाहिए। था। हम अपने सार्वजनिक क्षेत्र का विकास केवल उन क्षेत्रों में करें, जिनमें निजी क्षेत्र अक्षम है, किन्तु अब हम निजी क्षेत्र के लिए बहुत से द्वार खोल देंगे, ताकि वह अपना विस्तार कर सके और अर्थव्यवस्था अधिक स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सके। निजी क्षेत्र को अधिक व्यापक क्षेत्र उपलब्ध कराने के लिए अनेक नीतिगत परिवर्तन किए गए, जिनका सम्बन्ध औद्योगिक लाइसेन्सिग नीति को अधिक उदार बनाने, निर्यात-आयात नीति के अन्तर्गत मात्रात्मक प्रतिंबन्धों को समाप्त करने, राजकोषीय एवं विदेशी पूँजी से सम्बन्धित नियन्त्रणों एवं प्रतिबन्धों को कम करने तथा प्रशासनिक सरलीकरण से था।

प्रश्न 3.
भारत में निजीकरण के विस्तार के लिए सरकार ने क्या किया है?
उत्तर
भारत में निजीकरण के विस्तार के लिए सरकार ने निम्नलिखित उपाय किए हैं

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों में कमी की गई है और निजी क्षेत्र के लिए औद्योगिक क्षेत्र खोले गए हैं।
  2. सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में अंश पूँजी का अपनिवेश किया जा रहा है ताकि विकास के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाए जा सकें तथा इन उपक्रमों के कार्य निष्पादन में सुधार किया जा सके।
  3. आधारभूत संरचना (परिवहन, संचार एवं बीमा) के क्षेत्र में अधिकाधिक निजी भागीदारी को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
  4. सेवा सुविधाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा रही है।
  5.  निजीकरण की नई व्यवस्था चालू की गई है जिसमें स्वामित्व तो सरकार के अधीन रहता है, लेकिन संचालक मण्डल में, शीर्ष स्तर पर निजी संचालकों की नियुक्ति की जा रही है।
  6.  सरकार ने अपनी नई औद्योगिक नीति में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई है।

प्रश्न 4.
उदारीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
उदारीकरण का अभिप्राय अर्थव्यवस्था पर प्रशासनिक नियन्त्रण को धीरे-धीरे शिथिल करते हुए अन्तत: उन्हें समाप्त कर देने से है। यह आर्थिक कार्यकरण में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध है। यह विरोध मूलतः दो मान्यताओं पर आधारित है—प्रथम, सरकारी हस्तक्षेप प्रतियोगिता को कुंठित करता है, कुशलता को घटाता है और उत्पादन लागतों को बढ़ाता है, जिससे अर्थव्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता करने में शिथिल पड़ जाती है। दूसरे, सरकारी नियन्त्रणों के कारण संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग नहीं हो पाता, जिससे मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से उत्पादन पिछड़ जाता है। भारत में यह प्रक्रिया औद्योगिक नीति सन् 1991 ई० से अपनाई जा रही है।

प्रश्न 5.
सार्वभौमीकरण (भूमण्डलीकरण) से क्या आशय है? इस दृष्टि से भारतीय निवेश नीति (1991 ई०) की मुख्य बातें बताइए।
उत्तर
सार्वभौमीकरण उदारीकरण का ही एक विस्तृत रूप है। इसका मुख्य क्षेत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था 
और शेष विश्व के मध्य नियन्त्रण व प्रतिबन्ध रहित सम्बन्धों का विकास है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में बनने वाली वस्तुओं को प्रोत्साहन देने हेतु विदेशी निवेशकों पर भारत में उद्योग खोलने अथवा भारतीय उद्योगों में पूँजी लगाने पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए थे, जो देश के आर्थिक विकास में बाधक बने हुए थे। इस सन्दर्भ में घोषित निवेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. देश में उच्च प्राथमिकता प्राप्त 34 उद्योगों में 51% इक्विटी तक के विदेशी निवेश के लिए स्वतः अनुमोदन की अनुमति के लिए विदेश नीति को अधिक उदार बनाया गया।
  2. प्रवासी भारतीयों (NRIs) को उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में पूँजी और आय की प्रत्यावर्तनीयता के साथ शत-प्रतिशत इक्विटी तक निवेश करने की अनुमति प्रदान की गई।
  3. भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति लिए बिना आवासीय सम्पत्ति अधिगृहीत करने का अधिकार प्राप्त हो गया है।
  4. FERA के उपबन्धों को उदार बना दिया गया है। अब इसके स्थान पर FEMA लागू है।
  5. विदेशी कम्पनियों को 14 मई, 1992 ई० से देशी बिक्री के सम्बन्ध में अपने ट्रेडमार्क का प्रयोग करने की अनुमति दे दी गई।
  6. देश में विदेशी निवेश के संरक्षण के लिए 13 अप्रैल, 1992 ई० को भारत ने ‘बहुपक्षीय निवेश गारण्टी एजेन्सी’ (MIGA) प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर भी किए हैं।
  7. गैर-प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में विदेशी निवेश को उदार बनाने के लिए विदेशी निवेश संवर्द्धन (FIPB) का गठन किया गया है, ताकि विदेशी कम्पनियों के निवेश सम्बन्धी मामलों का निपटारा शीघ्रता से किया जा सके।

प्रश्न 6.
भारत सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र सम्बन्धी नीति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
सार्वजनिक क्षेत्र सम्बन्धी नीति (Public Sector Policy)-सार्वजनिक क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने एक नया दृष्टिकोण अपनाया, जिसके मुख्य अंग अग्रलिखित हैं

  1. सार्वजनिक विनियोग के वर्तमान पोर्टफोलियो के यथार्थवाद की कसौटी के आधार पर समीक्षा की जाएगी ताकि इसे उन क्षेत्रों से दूर रखा जा सके जिनमें सामाजिक धारणाएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं और जहाँ निजी क्षेत्र अधिक कुशल है।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र को अपेक्षाकृत अधिक प्रबन्धकीय स्वायत्तता प्रदान की जाएगी।
  3. सार्वजनिक उद्यमों के लिए बजटीय सेमर्थन क्रमशः घटाया जाएगा।
  4. सार्वजनिक व निजी क्षेत्र प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा कुछ चुने हुए उद्यमों में हिस्सा (शेयर) पूँजी को अत्रिनियोग किया जाएगा।
  5. अति रुग्ण सार्वजनिक उद्यमों को भारी हानियाँ उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

इस नीति के अनुपालन के लिए अनेक उपाय अपनाए गए हैं|

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या को 17 से कम करके 8, फिर 6 और अब 3 कर दिया गया है।
  2. जीर्ण रूप से बीमार सार्वजनिक उद्यमों को, उनके पुनरुत्थान/पुनःस्थापना के लिए औद्योगिक एवं वित्तीय पुनःनिर्माण बोर्ड (BIFR) को सौंप दिया जाएगा।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में लाभदायकता एवं प्रत्याय दर बढ़ाने के प्रयास किए जाएँगे।
  4. सरकार की 20% तक हिस्सा पूँजी पारस्परिक निधियों द्वारा चुने गए निजी उद्यमों में विनियोजित की जाएगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक सुधार से क्या आशय है? भारत में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया अपनाने की क्या। आवश्यकता थी?
उत्तर

आर्थिक सुधार का अर्थ

आर्थिक सुधार से आशय आर्थिक संकट को दूर करने की दृष्टि से अपनाए जाने वाले उपायों से है। सरकार ने 1991 ई० में नवीन आर्थिक नीति की घोषणा की और इस नवीन आर्थिक नीति में व्यापक आर्थिक नीतियों को सम्मिलित किया। इन सुधारों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में अधिक स्पर्धापूर्ण व्यावसायिक वातावरण की रचना करना और फर्मों के व्यापार में प्रवेश करना तथा उनके विकास के मार्ग । में आने वाली बाधाओं को दूर करना था। इसके अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक दोनों ही प्रकार के उपायों की घोषणा की गई। अल्पकालिक उपायों का उद्देश्य भुगतान सन्तुलन में आ गई कुछ त्रुटियों को दूर करना और मुद्रा स्फीति को.नियन्त्रित करना था जबकि दीर्घकालिक उपायों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था की कुशलता को सुधारना तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों की असमानताओं को दूर कर अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा क्षमता को संवर्धित करना था।

आर्थिक सुधारों की आवश्यकता 

भारत में 1 अप्रैल, 1951 से मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए, आर्थिक नियोजन का मार्ग अपनाया गया था। अभी तक 11 पंचवर्षीय योजनाएँ तथा पाँच एकवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। योजनाएँ अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में सफल भी रही हैं और असफल भी। सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्व, निजी क्षेत्र पर नियन्त्रण, उद्योग एवं व्यापार पर प्रतिबन्ध, नौकरशाही एवं लालफीताशाही ने जून 1991 के अन्छ में देश में एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट पैदा कर दिया। विदेशी मुद्रा भण्डार में निरन्तर कमी, नए ऋणों में विलम्ब, अनिवासी खातों से धन की निकासी, निरन्तर आसमान छूती महँगाई ने अर्थव्यवस्था को डाँवाँडोल कर दिया। अतः अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकट से निकालने, आर्थिक विकास में गति लाने, वित्तीय असन्तुलन को दूर करने, मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने, भुगतान सन्तुलन को सन्तुलित करने तथा विदेशी विनिमय के भण्डार में वृद्धि करने के लिए नवीन आर्थिक नीति की घोषणा करना और आर्थिक सुधारों को अपनाना आवश्यक हो गया। संक्षेप में, भारत में आर्थिक सुधारों को अपनाने की आवश्यकता मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से अनुभव की गई

  1. अनुत्पादक व्ययों में निरन्तर वृद्धि होने के कारण सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा था। इसका अर्थ है कि सरकार के कुल व्यय कुल प्राप्तियों से बहुत अधिक थे जिनकी पूर्ति ऋणों द्वारा की जाती थी। इसके फलस्वरूप ऋण और ऋणों पर ब्याज में वृद्धि होती गई और सरकार के ऋण-जाल में फंसने की सम्भावना बढ़ गई। अत: इस राजकोषीय घाटे को कम करना आवश्येक था।
  2. व्यापार सन्तुलन के निरन्तर प्रतिकूल रहने के कारण भुगतान सन्तुलन की समस्या उत्पन्न हो गई। थी। निर्यातों में वृद्धि की तुलना में आयातों में अधिक तेजी से वृद्धि हुई। घाटे को पूरा करने के लिए विदेशी ऋण लिए गए।
  3. 1991 ई० में ईराक युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई। खाड़ी संकट के कारण भुगतान सन्तुलन का घाटा बहुत अधिक बढ़ गया।
  4. 1990-91 ई० में भारत के विदेशी विनिमय कोष इतने कम हो गए थे कि वे 15 दिन के आयात के लिए भी काफी नहीं थे। उस समय की चन्द्रशेखर सरकार को विदेशी ऋण सेवा का भुगतान करने के लिए सेना गिरवी रखना पड़ा था।
  5. मूल्य स्तर में तेजी से वृद्धि हो रही थी जिसके कारण देश की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई थी। कीमतों के बढ़ने का मुख्य कारण घाटे की वित्त व्यवस्था थी।
    6. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का कार्य निष्पादन असन्तोषजनक था। ये उद्यमी परिसम्पत्ति के बजाय 
    दायित्व बनते जा रहे थे।

प्रश्न 2.
उदारीकरण से क्या आशय है? आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत सरकार ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कौन-से उपाय अपनाए?
उत्तर
उदारीकरण का अर्थ उदारीकरण का अभिप्राय अर्थव्यवस्था पर प्रशासनिक नियन्त्रण को धीरे-धीरे शिथिल करते हुए अन्ततः उन्हें समाप्त कर देने से है। यह आर्थिक कार्यकरण में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध है। यह विरोध मूलतः दो मान्यताओं पर आधारित है–प्रथम, सरकारी हस्तक्षेप प्रतियोगिता को कुण्ठित करता है, कुशलता को घटाता है और उत्पादन लागतों को बढ़ाता है जिससे अर्थव्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता करने में शिथिल पड़ जाती है। दूसरे, सरकारी नियन्त्रणों के कारण संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग नहीं हो पाता, जिससे मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से उत्पादन पिछड़ जाता है। भारत में यह प्रक्रिया सन् 1991 से अपनाई जा रही है।
भारत में 1991 ई० से पूर्व अर्थव्यवस्था पर अनेक प्रकार के नियन्त्रण लगा रखे थे; जैसे–औद्योगिक लाइसेन्स व्यवस्था, आयात लाइसेन्स, विदेशी मुद्रा नियन्त्रण, बड़े घरानों द्वारा निवेश पर प्रतिबन्ध आदि। इन नियन्त्रणों के परिणामस्वरूप, नए उद्योगों की स्थापना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, भ्रष्टाचार, अनावश्यक विलम्ब तथा अकुशलता में वृद्धि हुई तथा आर्थिक प्रगति की दर कम हो गई। अत: सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई अर्थात् प्रत्यक्ष भौतिक नियन्त्रणों से अर्थव्यवस्था को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।

उदारीकरण के उपाय

ऑर्थिक सुधार कार्यक्रमों के अन्तर्गत सरकार ने उदारीकरण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं

1. लाइसेन्स अथवा पंजीकरण की समाप्ति- नई औद्योगिक नीति (1991) में सरकार ने नियन्त्रण के स्थान पर ‘उदारवादी नीति अपनाई। अब तक केवल 6 उद्योगों के लिए लाइसेन्स लेने की अनिवार्य व्यवस्था है, शेष उद्योगों के लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य नहीं है। ये उद्योग हैं

  1. शराब,
  2. सिगरेट,
  3. रक्षा उपकरण,
  4. औद्योगिक विस्फोटक,
  5. खतरनाक रसायन,
  6. औषधियाँ।

2. एकाधिकारी कानून से छूट- अब एम०आर०टी०पी० फर्म की अवधारणा को समाप्त कर दिया गया है। अब इन फर्मों को अपना विस्तार करने की स्वतन्त्रता मिल गई है। निर्धारित पूँजी निवेश सीमा भी समाप्त कर दी गई है।

3. विस्तार तथा उत्पादन की स्वतन्त्रता- उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत अब उद्योगों को अपना विस्तार तथा उत्पादन करने की स्वतन्त्रता है। अब उत्पादक बाजार की माँग के आधार पर यह निर्णय भी ले सकते हैं कि उन्हें कौन-सी वस्तुओं का उत्पादन करना है।

4. लघु उद्योगों की निवेश सीमा में वृद्धि- लघु उद्योगों की निवेश सीमा को बढ़ाकर 5 करोड़ कर दिया गया है ताकि वे अपना आधुनिकीकरण कर सकें।

5. पूँजीगत पदार्थों के आयात की स्वतन्त्रता- उदारीकरण की नीति के फलस्वरूप भारतीय उद्योग | अपना विस्तार तथा आधुनिकीकरण करने के लिए विदेशों से मशीनें तथा कच्चा माल खरीदने के लिए स्वतन्त्र हैं।

6. तकनीकी आयात की छूट- आधुनिकीकरण के लिए उच्च तकनीक का प्रयोग आवश्यक है। भारतीय उद्योगों को नई तकनीकी उपलब्ध कराने के लिए अब उच्चतम प्राथमिकता वाले उद्योगों को तकनीकी समझौते करने के लिए अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

7. ब्याज-दरों का स्वतन्त्र निर्धारण- भारतीय रिजर्व बैंक ने व्यापारिक बैंकों को यह स्वतन्त्रता दे। दी है कि वे बाजार शक्तियों के आधार पर स्वयं ही ब्याज-दर का निर्धारण करें।

प्रश्न 3.
निजीकरण से क्या आशय है? आर्थिक सुधारों में भारत सरकार ने निजीकरण के लिए क्या उपाय अपनाए हैं?
उत्तर

निजीकरण का अर्थ

निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध को निजी स्वामित्व प्रबन्ध एवं संचालन में अन्तरित किया जाता है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों में से अधिक-से-अधिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया जाता है तथा वर्तमान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को पूर्ण रूप से अथवा आंशिक रूप से निजी क्षेत्र को बेच दिया जाता है। विक्रीत अंश उसका स्वामित्व एवं प्रबन्ध निजी क्षेत्र में आ जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र के अकुशल निष्पादन ने निजीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया है। निर्णय लेने की स्वतन्त्रता का अभाव, निर्णय लेने में विलम्ब, आर्थिक प्रोत्साहनों की कमी, उत्पादन क्षमता का निम्न प्रयोग एवं प्रबन्धकीय दोषों के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की उत्पादकता का स्तर निरन्तर गिरता जा रहा था। इससे निजीकरण की प्रक्रिया को बल मिला और यह माना गया कि अकुशल सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने से अर्थव्यवस्था अधिक कुशल होगी, अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी तथा उत्पादन की गुणवत्ता एवं विविधता में वृद्धि होगी, और इससे सभी उपभोक्ता लाभान्वित होंगे।

निजीकरण के उपाय

आर्थिक सुधार कार्यक्रम के अन्तर्गत सरकार ने निजीकरण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं
1. सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करना- औद्योगिक नीति में प्रारम्भ से ही सार्वजनिक क्षेत्र को , प्रमुख स्थान दिया गया था। इसके पीछे यह धारणा थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार से पूँजी संचय में वृद्धि होगी, औद्योगिकीकरण को गति मिलेगी, विकास की दर बढ़ेगी तथा निर्धनता में कमी आएगी। किन्तु परिणाम इसके विपरीत निकले और सार्वजनिक क्षेत्र इन आशाओं में खरा नहीं उतर सका। फलत: सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घटाकर 3 कर दी 
गई।

2. विनिवेश – सरकार ने घाटे में चल रहे उपक्रमों को निजी क्षेत्र को पूर्णत: या अंशतः बेचना आरम्भ कर दिया है। अब इनका स्वामित्व तथा प्रबन्ध सरकार के स्थान पर निजी क्षेत्र का हो जाएगा।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण अथवा भूमण्डलीकरण से क्या आशय है? वैश्वीकरण की दिशा में सरकार ने क्या उपाय अपनाए हैं?
उत्तर

वैश्वीकरण का अर्थ

वैश्वीकरण का अर्थ है-देश की अर्थव्यवस्था को संसार के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था से मुक्त व्यापार पूँजी और श्रम की मुक्त गतिशीलता आदि के द्वारा सम्बन्धित करना। इसके अन्तर्गत देश की अर्थव्यवस्था विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ एकीकृत कर दी जाती है। किन्तु भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में इसका अर्थ इससे अधिक व्यापक है। भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में वैश्वीकरण के अन्तर्गत निम्नलिखित बातें सम्मिलित की जाती हैं–अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोलना, नियन्त्रणों को धीरे-धीरे समाप्त करना, आयात उदारीकरण कार्यक्रमों को व्यापक आधार पर लागू करना तथा निर्यात संवर्द्धन को प्रोत्साहित करना।

वैश्वीकरण के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए उपाय

आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत भारत सरकार ने वैश्वीकरण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं
1. विदेशी पूँजी निवेश की साम्य सीमा में वृद्धि–आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत भारत सरकार ने 
विदेशी पूँजी निवेश की सीमा 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 से 100 प्रतिशत तक कर दी। उच्च प्राथमिकता प्राप्त 47 उद्योगों व निर्यातक व्यापारिक घरानों के लिए यह 100 प्रतिशत थी। इस सम्बन्ध में विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम’ (FERA) के स्थान पर ‘विदेशी मुद्रा प्रबन्ध अधिनियम’ (FEMA) लागू किया गया है।

2. आंशिक परिवर्तनशीलता- भारतीय रुपये को आंशिक रूप से परिवर्तनशील बना दिया गया। यह परिवर्तनशीलता पूँजीगत सौदों पर लागू नहीं थी। इस प्रकार राजस्व खाते में रुपया पूर्णत: परिवर्तनशील कर दिया गया।

3. दीर्घकालीस व्यापार नीति- विदेश व्यापार नीति को दीर्घकाल अर्थात् 5 वर्ष के लिए लागू किया गया। इसमें व्यापार में लगे सभी नियन्त्रण व प्रतिबन्धों को हटा दिया गया, प्रशासनिक नियन्त्रणों को न्यूनतम कर दिया गया तथा खुली प्रतियोगिता को प्रोत्साहन दिया गया।

4. प्रशुल्कों में केमी- आर्थिक सुधारों के अनुरूप प्रशुल्कों (आयात-निर्यात शुल्क) को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।

प्रश्न 5.
आर्थिक सुधार कार्यक्रम के अन्तर्गत अपनाए गए राजकोषीय एवं वित्तीय सुधारों को बताइए।
उत्तर

राजकोषीय सुधार

राजकोषीय सुधार से आशय सरकार की आय में वृद्धि करना और सार्वजनिक व्यय को इस प्रकार कम करना है कि उत्पादन तथा आर्थिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसका उद्देश्य राजकोषीय असन्तुलन को दूर करके राजकोषीय अनुशासन को बनाए रखना है। इसका मुख्य कारण देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के बढ़ते राजकोषीय घाटे, ऋण एवं ऋणजाल में फँसी अर्थव्यवस्था, ब्याज में वृद्धि, विदेशी विनिमय में कमी आदि के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की निरन्तर बिगड़ती स्थिति। भारतीय अर्थव्यवस्था को इस स्थिति से उबारने के लिए अनेक उपाय अपनाए गए; जैसे-सार्वजनिक व्यय पर नियन्त्रण, करों में वृद्धि, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के शेयरों में वृद्धि तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उत्पादों की कीमतों में वृद्धि। राजा चेलैया समिति की रिपोर्ट के आधार पर राजकोषीय नीति में अनेक सुधार किए गए। मुख्य सुधार निम्नलिखित थे

  1. कर-प्रणाली को अधिक वैज्ञानिक एवं युक्तिसंगत बनाया गया। आयकर की अधिकतम दर को 50 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया।
  2. विदेशी कम्पनियों के लाभ को कम किया गया।
  3. आयात-निर्यात कर को घटाया गया।
  4. अनेक वस्तुओं पर उत्पादन कर को घटाया गया।
  5. आर्थिक सहायता को कम किया गया।
  6. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को राजकोषीय प्रेरणा प्रदान की गई और पोर्टफोलियो निवेश के.तिए विदेशियों को प्रोत्साहित किया गया।
  7. कर-प्रणाली की संरचना को सरल बनाया गया।
  8. सीमा शुल्क की दरों को युक्तिपरक बनाया गया।

वित्तीय सुधार

वित्तीय सुधारों से आशय देश की बैंकिंग तथा वित्तीय नीतियों में सुधार करने से है। नरसिंहम समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने वित्तीय क्षेत्र में निम्नलिखित सुधार किए

  1. वैधानिक तरलता अनुपात को 38.5 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दिया गया।
  2. आरक्षित नकदी अनुपात को धीरे-धीरे कम करके 4.5 प्रतिशत पर लाया गया। किन्तु गत कुछ समय से इसमें निरन्तर वृद्धि की जा रही है। वर्तमान में यह 6.5% प्रतिशत है।
  3. ब्याज-दरों का निर्धारण करने के लिए बैंकों को स्वतन्त्र छोड़ दिया गया।
  4. बैंकिंग प्रणाली की पुनर्संरचना की गई। बैंकिंग क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया।
  5. बैंकों को अधिकाधिक स्वतन्त्रता प्रदान की जा रही है।

प्रश्न 6.
नवीन आर्थिक नीति (आर्थिक सुधार) के प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर
आर्थिक सुधार के लिए अपनाए गए विभिन्न कार्यक्रमों के भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं ऋणात्मक दोनों ही प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है 
सकारात्मक (अनुकूल) प्रभाव।

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीनता से बाहर निकलकर एक सक्रिय अर्थव्यवस्था बन गई है। आर्थिक सुधारों के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ अधिक सक्रिय हुई हैं। इसके फलस्वरूप देश की संवृद्धि दर बढ़ी है। यह लगभग 8 प्रतिशत अनुमानित है।
  2. औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई है। यह वृद्धि लगभग 10 प्रतिशत है। भारत की सूचना प्रौद्योगिकी विश्व में अपना स्थान बनाए हुए है।
  3. निरन्तर बढ़ते राजकोषीय घाटे में कमी आई है। सरकारी राजस्व में वृद्धि हुई है।
  4. मुद्रा स्फीति पर रोक लगी है (यद्यपि गत दो वर्षों से इसमें पुनः वृद्धि आरम्भ हो गई है)।
  5. उपभोक्ता को विविध प्रकार की उत्तम गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उचित कीमत पर सरलता से प्राप्त हो | जाती हैं। इसके फलस्वरूप लोगों के जीवन स्तर एवं जनकल्याण में वृद्धि हुई है।
  6. विदेशी विनिमय कोषों में आशा से अधिक वृद्धि हुई है। इसमें भारतीय बाजारों में निवेश के प्रति विदेशियों का
    विश्वास बढ़ा है।
  7. देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। निवेश के साथ पूँजी व तकनीकी का |
    भी अन्तर्रवाह बढ़ा है।
  8. एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में भारत की पहचान होने लगी है।
  9. भारतीय बाजारों की संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। भारतीय बाजार अब अधिक प्रतियोगी| बनते जा रहे हैं। इस प्रकार आर्थिक सुधारों के फलस्वरूप न केवल विकास की प्रक्रिया में तेजी आई है, अपितु इसमें विविधता भी आई है और वैश्विक दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक सुदृढ़ हुई है।

नकारात्मक (प्रतिकूल प्रभाव

1. आर्थिक सुधारों का लाभ उद्योग क्षेत्र को अधिक मिला है, कृषि क्षेत्र उपेक्षित रहा है। उद्यमियों का ध्यान कृषि से उद्योगों की ओर विवर्तित हुआ है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कृषि क्षेत्र का धीमा विकास औद्योगिक क्षेत्र की विकास प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है।
2. विकास प्रक्रिया का स्वरूप नगरीय हो गया है। सभी विदेशी कम्पनियाँशहरी क्षेत्रों को ही अपना 
केन्द्रबिन्दु बनाए हुए हैं। इससे ग्रामीण-शहरी अन्तर बढ़ा है।
3. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारण हमारे देश पर ‘आर्थिक उपनिवेशवाद’ का खतरा मँडराने लगा है। ये कम्पनियाँ भारतीय बाजारों का शोषण कर रही हैं और कमजोर स्पर्धा क्षमता के कारण भारतीय उद्योगपति हताश हो रहे हैं।
4. उपभोक्तावाद के प्रसार के कारण लोग अपव्ययी बनते जा रहे हैं। प्रदर्शन प्रभाव के कारण 
परिवारों की शान्ति भंग हो रही है। 5. भारतीय समाज का सांस्कृतिक ह्रास हो रहा है। आर्थिक सम्पन्नता नैतिक मूल्यों पर हावी हो चुकी
संक्षेप में, आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही प्रकार के प्रभाव छोड़े हैं। कुछ भी अमिश्रित वरदान नहीं है। अत: इनका पालन बड़ी सावधानी से किया जाना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अन्तर्राष्ट्रीय बड़े खिलाड़ी हम पर हावी न हों और घरेलू अर्थव्यवस्था को कोई हानि न हो।

प्रश्न 7.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना क्यों की गई? इसके कार्य एवं कार्य-प्रणाली पर प्रकाश डालिए।
अथवा विश्व व्यापार संगठन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर

विश्व व्यापार संगठन

30 अक्टूबर, 1947 को GATT’ नामक एक बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। तब से लेकर दिसम्बर, 1994 तक गैट के अन्तर्गत वार्ताओं के आठ दौर सम्पन्न हुए हैं। गैट का आठवाँ दौर बहुचर्चित एवं विवादास्पद रहा क्योंकि इसमें वस्तुओं के व्यापार के साथ-साथ सेवाओं, बौद्धिक सम्पदाओं आदि के सम्मिलित किए जाने के लिए विकसित देशों की ओर से काफी दबाव पड़ा। अन्ततः 15 अप्रैल, 1995 को मराकश (मोरक्को) में समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके द्वारा नए विषयों को भी विश्व व्यापार के दायरे में शामिल कर लिया गया और विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना की

अनुशंसा की गई। विश्व व्यापार संगठन (WTO) से आशय- विश्व व्यापार संगठन उरुग्वे दौर की वार्ताओं के बाद हुए समझौते को कार्यरूप देने एवं उनके अनुपालन की देख-रेख करने के लिए गठित एक बहुपक्षीय व्यापारिक संगठन है। यह सदस्य देशों के बीच व्यापार सम्बन्धों के लिए एक संस्थागत ढाँचा प्रदान करेगा एवं इससे जुड़े बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते से सम्बन्धित बातचीत के लिए एक मंच की तरह कार्य करेगा। विश्व व्यापार संगठन ने 1 जनवरी, 1995 से कार्य करना आरम्भ कर दिया है। इसका मुख्यालय जेनेवा में है। वर्ष 2014 में WTO की सदस्य संख्या 160 थी।

विश्व व्यापार संगठन का प्रशासनिक ढाँचा– विश्व व्यापार संगठन के शीर्ष पर एक मंत्रिस्तरीय सम्मेलन है। इसकी बैठक हर दो वर्ष के अन्तराल पर एक बार बुलाई जाएगी। दो मंत्रिस्तरीय सम्मेलनों के बीच एक महापरिषद् का गठन किया गया है, जिसमें प्रत्येक सदस्य देश का एक-एक प्रतिनिधि शामिल होगा। इस महापरिषद् के अधीन तीन और परिषदें होंगी

  1. सेवाओं के लिए परिषद्,
  2. उत्पादों के लिए परिषद् तथा
  3. बौद्धिक सम्पदा के लिए परिषद्।

इन परिषदों के अधीन अनेक समितियाँ गठित की जाएँगी, जो क्षेत्र के अन्दर आने वाले विशेष मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगी; यथा-

  1. व्यापार एवं विकास के लिए समिति,
  2. भुगतान सन्तुलन के लिए समिति,
  3. बजट के लिए समिति आदि।।

विश्व व्यापार संगठन की कार्य-प्रणाली– विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत आने वाले सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँगे। जिन विषयों पर सर्वसम्मति नहीं हो पाएगी, उन पर मतदान होगा। प्रत्येक सदस्य देश को केवल एक मत देने का अधिकार होगा। किसी भी सदस्य देश को संगठन के प्रति उसके दायित्वों से राहत देने के लिए तीन-चौथाई बहुमत की आवश्यकता होगी, सदस्य राष्ट्रों के बीच व्यापारिक विवादों को हल करने के लिएँ एक विवाद निपटारा विधि (Dispute Settlement Mechanism) की व्यवस्था की गई है। शिकायत मिलने पर विवाद निपटाने के लिए निर्धारित विस्तृत कानूनी प्रक्रिया के अन्तर्गत ही विवाद का निपटारा किया जाएगा। दोषी पाए जाने वाले सदस्य देश के विरुद्ध तो बदले की कार्यवाही (Retaliatory measures) की जाएगी। संगठन में उल्लिखित प्रावध्रानों का उल्लंघन दण्डनीय होगा।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में इसके उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया है, जो निम्नलिखित हैं

  1. जीवन-स्तर में वृद्धि करना,
  2. पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण माँग में वृहत् स्तरीय, परन्तु ठोस वृद्धि करना,
  3. वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का प्रसार करना,
  4. सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का प्रसार करना,
  5. विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना,
  6. अविरत (Sustainable) विकास की अवधारणा को स्वीकार करना तथा
  7. पर्यावरण को संरक्षण एवं उसकी सुरक्षा करना।।

विश्व व्यापार संगठन के कार्य

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के कुछ कार्यों का उल्लेख निम्नवत् किया जा सकता है

  1. विश्व व्यापार समझौता एवं बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय (Plurilatera) समझौतों के कार्यान्वयन, प्रशासन एवं परिचालन हेतु सुविधाएँ प्रदान करना।
  2. व्यापार एवं प्रशुल्क से सम्बन्धित किसी भी भावी मसले पर सदस्यों के बीच विचार-विमर्श हेतु एक मंच के रूप में कार्य करना।
  3. विवादों के निपटारे (Settlement of Disputes) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।
  4. व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Review Mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं | प्रावधानों को लागू करना।
  5. वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामंजस्य भाव (Coherence) लाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक से सहयोग करना।।
  6. विश्व संसाधनों (World Resources) का अनुकूलतम प्रयोग करना।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 2 पंचलाइट

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name पंचलाइट
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 2 पंचलाइट (फणीश्वरनाथ ‘रेणु’)

प्रश्न 1
पंचलाइट कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
‘पंचलाइट’ रेणु जी की आंचलिक कहानी है। कहानी में बिहार के एक पिछड़े गाँव के परिवेश का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया गया है।
महतो टोली में अशिक्षित लोग हैं। उन्होंने रामनवमी के मेले से पेट्रोमेक्स खरीदा, जिसे वे ‘पंचलैट’ कहते हैं। ‘पंचलाइट’ को ये सीधे-सादे लोग सम्मान की चीज समझते हैं। पंचलाइट को देखने के लिए टोली के सभी बालक, औरतें और मर्द इकट्ठे हो जाते हैं। सरदार अपनी पत्नी को आदेश देता है कि शुभ कार्य को करने से पहले वह पूजा-पाठ का प्रबन्ध कर ले। सभी उत्साहित हैं, परन्तु समस्या उठती है कि ‘पंचलैट’ जलाएगा कौन ? सीधे-सादे लोग पेट्रोमैक्स को जलाना भी नहीं जानते।।

इस टोली में गोधन नाम का एक युवक है। वह गाँव की मुनरी नामक एक युवती से प्रेम करता है। मुनरी की माँ ने पंचों से गोधन की शिकायत की थी कि वह उसके घर के सामने से सिनेमा का गाना गाकर निकलता है। इस कारण पंचों ने उसे जाति से निकाल रखा है। मुनरी को पता है कि गोधन पंचलाइट जला सकता है। वह चतुराई से यह बात पंचों तक पहुँचा देती है। पंच गोधन को पुन: जाति में ले लेते हैं। वह ‘पंचलाइट’ को जला देता है। मुनरी की माँ गुलरी काकी प्रसन्न होकर गोधन को शाम के भोजन का निमन्त्रण देती है। पंच भी अति उत्साहित होकर गोधन को कह देते हैं-“तुम्हारा सात खून माफ। खूब गाओ सलीमा का गाना।” पंचलाइट की रोशनी में लोग भजन-कीर्तन करते हैं तथा उत्सव मनाते हैं।

कहानी का कथानक सजीव है। सीधे-सादे अनपढ़ लोगों की संवेदनाओं को वाणी देने में रेणु जी समर्थ रहे हैं। इस कहानी में आंचलिक जीवन की सजीव झाँकी प्रस्तुत की गयी है।

प्रम2
कथावस्तु के आधार पर ‘पंचलाइट’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘पंचलाइट’ का कथानक लिखिए तथा उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। ‘पंचलाइट’ कहानी के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘पंचलाइट’ कहानी के कथानक की विवेचना कीजिए। [2018]
या
कहानी-कला के आधार पर पंचलाइट कहानी के कथानक पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
फणीश्वरनाथ रेणु जी हिन्दी-जगत् के सुप्रसिद्ध आंचलिक कथाकार हैं। अनेक जनआन्दोलनों से वे निकट से जुड़े रहे, इस कारण ग्रामीण अंचलों से उनका निकट का परिचय है। उन्होंने अपने पात्रों की कल्पना किसी कॉफी हाउस में बैठकर नहीं की, अपितु वे स्वयं अपने पात्रों के बीच रहे हैं। बिहार के अंचलों के सजीव चित्र इनकी कथाओं के अलंकार हैं। ‘पंचलाइट’ भी बिहार के आंचलिक परिवेश की कहानी है। कहानी-कला की दृष्टि से इस कहानी की समीक्षा (विशेषताएँ) निम्नवत् है-

(1) शीर्षक-कहानी का शीर्षक ‘पंचलाइट’; एक सार्थक और कलात्मक शीर्षक है। यह शीर्षक संक्षिप्त और उत्सुकतापूर्ण है। शीर्षक को पढ़कर ही पाठक कहानी को पढ़ने के लिए उत्सुक हो जाता है। ‘पंचलाइट’ का अर्थ है ‘पेट्रोमैक्स’ अर्थात् ‘गैस की लालटेन’। शीर्षक कथा का केन्द्रबिन्दु है।

(2) कथानक-महतो टोली के सरपंच पेट्रोमैक्स खरीद लाये हैं, परन्तु इसे जलाने की विधि वहाँ कोई नहीं जानता। दूसरे टोले वाले इस बात का मजाक बनाते हैं। महतो टोले का एक व्यक्ति पंचलाइट जलाना जानता है और वह है-‘गोधन’, किन्तु वह जाति से बहिष्कृत है। वह ‘मुनरी’ नाम की लड़की का प्रेमी है। उसकी ओर प्रेम की दृष्टि रखने के कारण ही पंच उसे बिरादरी से बहिष्कृत कर देते हैं। मुनरी इस बात की चर्चा करती है कि गोधन पंचलाइट जलाना जानता है। इस समय जाति की प्रतिष्ठा का प्रश्न है, अत: गोधन को पंचायत में बुलाया जाता है। वह पंचलाइट को स्पिरिट के अभाव में गरी के तेल से ही जला देता है। अब न केवल गोधन पर लगे सारे प्रतिबन्ध हट जाते हैं वरन् उसे मनोनुकूल आचरण की भी छूट मिल जाती है। पंचलाइट की रोशनी में गाँव में उत्सव मनाया जाता है। प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आवश्यकता किसी भी बुराई को अनदेखा कर देती है। कथानक संक्षिप्त, रोचक, सरल, मनोवैज्ञानिक, आंचलिक और यथार्थवादी है। कौतूहल और गतिशीलता के अलावा इसमें मुनरी तथा गोधन का प्रेम-प्रसंग बड़े स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

(3) उद्देश्य–इस कहानी के द्वारा रेणु जी ने अप्रत्यक्ष रूप से ग्राम-सुधार की कोशिश की है। उन्होंने ग्रामीण अंचल का वास्तविक चित्र खींचा है। गोधन के द्वारा ‘पेट्रोमैक्स’ जलाने पर उसकी सभी गलतियाँ माफ कर दी जाती हैं तथा उसे मनोनुकूल आचरण की छूट भी मिल जाती है जिससे स्पष्ट है, कि आवश्यकता बड़े-से-बड़े रूढ़िगत संस्कार और परम्परा को व्यर्थ साबित कर देती है। इस प्रकार पंचलाइट जलाने की समस्या और उसके समाधान के माध्यम से कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु जी ने ग्रामीण मनोविज्ञान का सजीव चित्र उपस्थित कर दिया है। ग्रामवासी जाति के आधार पर किस प्रकार टोलियों में विभक्त हो जाते हैं और आपस में ईष्र्या-द्वेष युक्त भावों से भरे रहते हैं इसका बड़ा ही सजीव चित्रण इस कहानी में हुआ है। रेणु जी ने यह भी दर्शाया है कि भौतिक विकास के इस आधुनिक युग में भी भारतीय गाँव और कुछ जातियाँ कितने अधिक पिछड़े हुए हैं। कहानी के माध्यम से रेणु जी ने अप्रत्यक्ष रूप से ग्राम-सुधार की प्रेरणा भी दी है।

प्रश्न 3
पंचलाइट कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए। [2016]
उत्तर
‘पंचलाइट’ फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की एक आंचलिक कहानी है। यह कहानी ग्रामीण जीवन पर आधारित है। इसमें ग्रामवासियों की मन:स्थिति की वास्तविक झलक देखने को मिलती है। गोधन इस कहानी का एक मुख्य पात्र है, जिसे समाज के लोग बहिष्कृत कर देते हैं। गोधन के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं–

(1) योग्य युवक-‘गोधन’ ‘पंचलाइट’ कहानी का एक ऐसा पात्र है जो अशिक्षित होते हुए भी योग्य है। पेट्रोमैक्स जलाने के कार्य को उसकी बिरादरी का कोई भी व्यक्ति नहीं जानता, परन्तु वह उसे जला देता है।
(2) गुणवान-गोधन अशिक्षित होते हुए भी गुणवान् है। उसके इसी गुण के कारण टोले का सरदार उसकी सभी गलतियों को माफ कर देता है तथा उसे फिर से अपने टोले में सम्मिलित कर लेता है।
(3) विवेकी–गोधन अशिक्षित अवश्य है; किन्तु वह विवेकी है। पेट्रोमैक्स जलाने के लिए जब स्पिरिट उपलब्ध नहीं थी तो उसने ‘गरी’ के तेल से ही पेट्रोमैक्स को जला दिया था।
(4) वर्ग-भेद से दूर-गोधन और मुनरी परस्पर स्नेह रखते हैं। गोधन जाति-पाँति, ईष्र्या-द्वेष आदि के चक्कर में नहीं पड़ता। वह मानवीय गुणों का समर्थक है। उसके लिए सभी व्यक्ति एकसमान हैं।
(5) निडर-गोधन में निडरता का गुण भी है। वह गाने गाकर तथा आँख मटकाकर मुनरी के प्रति अपने प्रेम को प्रकट कर देता है।
अतः कहा जा सकता है कि गोधन ग्रामीण परिवेश में पलने-बढ़ने वाला उपर्युक्त गुणों से युक्त एक आदर्श लड़का है।

प्रश्न 4.
आंचलिक कहानी से आप क्या समझते हैं? पंचलाइट कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ प्रथम कथाकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में आंचलिकता को स्थान दिया है। ‘अंचल’ किसी निश्चित भू-भाग को कहते हैं। वहाँ के निवासियों का रहन-सहन, वेशभूषा, रीति-रिवाज तथा लोक-संस्कृति का दर्शन उस आंचलिक रचना में होता है। रेणु जी से पूर्व यह शब्द केवल उपन्यासों में प्रयुक्त होता था। आंचलिकता के समावेश से इनकी कहानियाँ सजीव और मार्मिक होने के साथ-साथ ग्रामीण अंचलों की सम्पूर्ण तस्वीर भी पाठक के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। ‘पंचलाइट’ कहानी बिहार के ग्रामीण वातावरण को पाठकों के समक्ष साकार करती है। डॉ० देवराज उपाध्याय के अनुसार-‘किसी प्रदेश विशेष का यथातथ्य और बिम्बात्मक वर्णन ही आंचलिकता है।”

‘रेणु’ की ‘पंचलाइट’ कहानी पूर्ण रूप से आंचलिक है। यह बिहार के ऐसे विशेष भाग से सम्बन्धित है, जो अभी अशिक्षित है, रूढ़िवादी और बौद्धिक चेतनाहीन है।

इस कहानी में बिहार के ग्रामीण भू-भाग की सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है तथा गाँव में अलग-अलग टोली बनाना, उनका आपस में वैमनस्य होना, एक-दूसरे की खिल्ली उड़ाना, झूठी शान-शौकत का दिखावा करना तथा रूढ़िवादिता आदि का सफल चित्रण करके वास्तविक स्थिति का परिचय दिया गया है।

कहानी में प्रयुक्त ग्रामीण शब्दावली ने पूर्ण रूप से इसे आंचलिक बना दिया है। रोजमर्रा बोले जाने वाले शब्द, अंग्रेजी शब्दों का बिगड़ा रूप और पंचलाइट जलने पर उसकी जय-जयकार करना ग्रामवासियों के भोलेपन और स्वच्छ हृदय को प्रदर्शित करता है।

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