UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 5 महादेवी वर्मा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name महादेवी वर्मा
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 5 महादेवी वर्मा

कवयित्री का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
महादेवी वर्मा के जीवन-परिचय एवं कृतियों (साहित्यिक योगदान) पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
था
महादेवी वर्मा का साहित्यिक परिचय दीजिए एवं उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय–महादेवी वर्मा का जन्म फखाबाद के एक शिक्षित कायस्थ परिवार में सन् 1907 ई०( संवत् 1963 वि०) में होलिका दहन के दिन हुआ था। इनके पिता श्री गोविन्दप्रसाद वर्मा, भागलपुर के एक कॉलेज में प्रधानाचार्य थे। इनकी माता हेमरानी परम विदुषी धार्मिक महिला थीं एवं नाना ब्रजभाषा के एक अच्छे कवि थे। महादेवी जी पर इन सभी का प्रभाव पड़ा और अन्ततः वे एक प्रसिद्ध कवयित्री, प्रकृति एवं परमात्मा की निष्ठावान् उपासिका और सफल प्रधानाचार्या के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में और उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई। संस्कृत से एम० ए० उत्तीर्ण करने के बाद ये प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्या हो गयीं। इनका विवाह 9 वर्ष की अल्पायु में ही हो गया था। इनके पति श्री रूपनारायण सिंह एक डॉक्टर थे, परन्तु इनका दाम्पत्य जीवन सफल नहीं था। विवाहोपरान्त ही इन्होंने एफ०ए०, बी०ए० और एम०ए० परीक्षाएँ सम्मानसहित उत्तीर्ण कीं। महादेवी जी ने घर पर ही चित्रकला तथा संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की।

इन्होंने नारी-स्वातन्त्र्य के लिए संघर्ष किया, परन्तु अपने अधिकारों की रक्षा के लिए नारियों का शिक्षित होना भी आवश्यक बताया। कुछ वर्षों तक ये उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् की मनोनीत सदस्या भी रहीं। भारत के राष्ट्रपति से इन्होंने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से इन्हें ‘सेकसरिया पुरस्कार’ तथा ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ मिला। मई 1983 ई० में ‘भारत-भारती’ तथा नवम्बर 1983 ई० में यामा पर ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से इन्हें सम्मानित किया गया। 11 सितम्बर, 1987 ई० (संवत् 2044 वि०) को इस महान् लेखिका का स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ–श्रीमती महादेवी वर्मा का मुख्य रचना क्षेत्र काव्य है। इनकी गणना छायावादी कवियों की वृहत् चतुष्टयी (प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी) में होती है। इनके काव्य में वेदना की प्रधानता है। काव्य के अतिरिक्त इनकी बहुत-सी श्रेष्ठ गद्य-रचनाएँ भी हैं। इन्होंने प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ की स्थापना करके साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी किया। ‘चाँद’ पत्रिका का सम्पादन करके इन्होंने नारी को अपनी स्वतन्त्रता और अधिकारों के प्रति सजग किया है।

महादेवी वर्मा जी के जीवन पर महात्मा गाँधी का तथा कला-साहित्य साधना पर कवीन्द्र रवीन्द्र का प्रभाव पड़ा। इनका हृदय अत्यन्त करुणापूर्ण, संवेदनायुक्त एवं भावुक था। इसलिए इनके साहित्य में भी वेदना की गहरी टीस है।

रचनाएँ-महादेवी जी का प्रमुख कृतित्व इस प्रकार है-

  1. नीहार-यह इनका प्रथम प्रकाशित काव्य-संग्रह है।
  2. रश्मि-इसमें आत्मा-परमात्मा विषयक आध्यात्मिक गीत हैं।
  3. नीरजा-इस संग्रह के गीतों में इनकी जीवन-दृष्टि का विकसित रूप दृष्टिगोचर होता है।
  4. सान्ध्यगीत-इसमें इनके श्रृंगारपरक गीतों को संकलित किया गया है।
  5. दीपशिखा-इसमें इनके रहस्य-भावना-प्रधान गीतों का संग्रह है।
  6. यामा-यह महादेवी जी के भाव-प्रधान गीतों का संग्रह है।

इसके अतिरिक्त ‘सन्धिनी’, ‘आधुनिक कवि’ तथा ‘सप्तपर्णा’ इनके अन्य काव्य-संग्रह हैं। ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ इनकी महत्त्वपूर्ण गद्य रचनाएँ हैं।
साहित्य में स्थान–निष्कर्ष रूप में महादेवी जी वर्तमान हिन्दी-कविता की सर्वश्रेष्ठ गीतकार हैं। इनके भावपक्ष और कलापक्ष दोनों ही अतीव पुष्ट हैं। अपने साहित्यिक व्यक्तित्व एवं अद्वितीय कृतित्व के आधार पर, हिन्दी साहित्याकाश में महादेवी जी का गरिमामय पद ध्रुव तारे की भाँति अटल है।

‘पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

गीत 1

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना !
जाग तुझको दूर जाना !
अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले ! पर तुझे है नाश-पथ पर, चिह्न अपने छोड़ आना !
जाग तुझको दूर जाना !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवयित्री ने पथिक को क्या प्रेरणा दी है?
(iv) मार्ग में आने वाली अनेकानेक कठिनाइयों के बावजूद भी पथिक को विनाश और विध्वंश के बीच क्या छोड़ जाना है?
(v) ‘हिमगिरि’ शब्द के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित सान्ध्यगीत नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 1′ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम– गीत 1
कवयित्री का नाम-महादेवी वर्मा।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे पथिक! तुम्हारी सदा सचेत रहने वाली आँखों में यह खुमारी कैसी है और तुम्हारी वेशभूषा इतनी अस्त-व्यस्त क्यों हो रही है? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम अपने घर पर ही विश्राम कर रहे हो। सम्भवतः तुम यह भूल गये हो कि तुम्हें लम्बी यात्रा पर जाना है। इसीलिए तुम जाग जाओ, क्योंकि तुम्हारा प्राप्य या लक्ष्य बहुत दूर है। इसीलिए तुम्हें आलस्य में पड़े न रहकर तुरन्त निकल जाना चाहिए। आशय यह है कि साधक को साधना-मार्ग में अनेक कठिनाइयों-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। जो साधक इनसे घबराकर या हताश होकर बैठ जाता है, वह अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाता। इसलिए साधक को आगे बढ़ते रहने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवयित्री ने पथिक को निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने की प्रेरणा दी है।
(iv) मार्ग में आने वाली अनेकानेक कठिनाइयों के बावजूद भी पथिक को विनाश और विध्वंस के बीच नव-निर्माण के चित्र छोड़ जाना है।
(v) ‘हिमगिरि’ शब्द के दो पर्यायवाची हैं–हिमालय, गिरिराज।

प्रश्न 2.
कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी !
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना !
जाग तुझको दूर जाना !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इस पद्यांश से कवयित्री का आशय स्पष्ट कीजिए।
(iv) किसकी राख अमर दीपक की भाग बनकर अमर हो जाती है?
(v) ‘क्षणिक’ शब्द से मूल शब्द और प्रत्यय अलग करके लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित सान्ध्यगीत नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 1′ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत 1
कवयित्री का नाम-महादेवी वर्मा।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवयित्री का कहना है कि यदि किसी के हृदय में अज्ञात प्रियतम के प्रति सच्चा प्रेम है तथा उसके हृदय में अपने प्रियतम से मिलने की एकनिष्ठ छटपटाहट विद्यमान है तो इस स्थिति में उसको मिलने वाली हार भी जीत ही मानी जाएगी। भाव यह है कि प्रेम की सफलता इसी में है कि हम एकनिष्ठ भाव से अपने प्रेम को प्रदर्शित करते रहें, चाहे हमारा अपने प्रियतम से मिलन हो या न हो। आशय यह है कि जीवात्मा अविनाशी परमात्मा पर अपने को मिटाकर भी अक्षय पुण्य एवं गौरव की अधिकारिणी बनती है।
(iii) इस पद्यांश से कवयित्री का आशय है कि साधना के कष्टों से घबराकर साधक को हार नहीं माननी चाहिए। साधना-पथ पर मिली असफलता भी गौरव का ही कारण बनती है।।
(iv) पतंगा दीपक पर जलकर राख बन जाता है। उसकी राख अमर दीपक का भाग बनकर अमर हो जाती
(v) क्षणिक = क्षण + इक।

गीत 2

प्रश्न 1.
पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन !
और होंगे नयन सूखे, तिल बुझे औ’ पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवयित्री को साधना-पथ पर आगे बढ़ने से कौन नहीं रोक सकता?
(iv) कवयित्री के साधनारूपी दीपक पर किनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता?
(v) ‘प्राण’ तथा ‘अश्रु’ शब्दों के वचन बताइए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा लिखित ‘दीपशिखा’ नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 2’ नामक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत 2
कवयित्री का नाम–महादेवी वर्मा।
(ii) महादेवी जी कह रही हैं कि लक्ष्य-पथ पर यदि कोई साथ न भी चले, अकेला ही चलना पड़े, तब भी वे निरन्तर आगे बढ़ती रहेंगी और अपरिचित मार्ग के समस्त संकटों को सहर्ष झेलकर अज्ञात प्रियतम के पास पहुँच जाएँगी। ऐसा उनका दृढ़विश्वास है।
(iii) कवयित्री को मार्ग में आने वाली बाधाएँ साधना-पथ पर आगे बढ़ने से नहीं रोक सकतीं।
(iv) कवयित्री के साधनारूपी दीपक पर घनघोर वर्षा और कौंधती बिजलियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
(v) ‘प्राण’ तथा ‘अश्रु’ सदा बहुवचन में रहने वाले शब्द हैं।

गीत 3

प्रश्न 1.
मैं नीर भरी दुख की बदली !
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसो,
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली ।।
मेरा पग पग संगीत-भरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,
छाया में मलय-बयार पली !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने स्वयं को क्या बताया है?
(iv) कवयित्री के निरन्तर रुदन का क्या कारण है?
(v) कवयित्री आकाश से अपने हृदय की समानता करते हुए क्या कहती है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘सान्ध्य-गीत’ नामक काव्य-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 3’ शीर्षक कविता से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत 3
कवयित्री का नाम–महादेवी वर्मा।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवयित्री महादेवी वर्मा का कहना है कि मैं नीर-भरी दु:ख की बदली हूँ; अर्थात् मेरा जीवन दु:ख की बदलियों से घिरा हुआ है। जिस प्रकार बदली आकाश में रहती है; किन्तु दूर-दूर तक फैले हुए आकाश का कोई भी कोना उसका स्थायी निवास नहीं होता, वह तो इधर-उधर भ्रमण करती रहती है। उसी प्रकार इस विस्तृत संसार में भी ‘मेरा’ कहने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। मेरा तो इतना ही परिचय और इतना ही इतिहास है कि मैं कल आई थी और आज जा रही हूँ। कवयित्री का आशय यह है कि मानव-जीवन क्षणिक है; अर्थात् जो आज है, वह कल नहीं होगा। समग्र मानव-जीवन का मात्र इतना ही परिचय है और इतना ही इतिहास है।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने स्वयं को दुःख की बदली बताया है।
(iv) प्रीतम से मिलने की व्याकुलता कवयित्री के निरन्तर रुदन का कारण है।
(v) कवयित्री आकाश से अपने हृदय की समानता करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार आकाश बहुरंगी मेघरूपी दुपट्टे से सुशोभित है उसी प्रकार मेरा हृदय भी बहुरंगी नाना अभिलाषाओं से राँगा हुआ है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 4 सुमित्रानन्दन पन्त

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 4 सुमित्रानन्दन पन्त are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 4 सुमित्रानन्दन पन्त.

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name सुमित्रानन्दन पन्त
Number of Questions 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 4 सुमित्रानन्दन पन्त

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
सुमित्रानन्दन पन्त का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।[2013, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-पारचय–प्रकृति के सुकुमार कवि पं० सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म 20 मई, 1900 ई० ( संवत् 1957 वि० ) को प्रकृति की सुरम्य क्रीड़ास्थली कूर्माचल प्रदेश के अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम गंगादत्त पन्त तथा माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था। ये अपने माता-पिता की सबसे छोटी सन्तान थे। पन्त जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में हुई। इसके पश्चात् ये अल्मोड़ा गवर्नमेण्ट हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात् काशी के जयनारायण हाईस्कूल से इन्होंने स्कूल लीविंग की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1916 ई० में आपने प्रयाग के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज से एफ० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद ये स्वतन्त्र रूप से अध्ययन करने लगे। इन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी तथा बँगला का गम्भीर अध्ययन किया। उपनिषद्, दर्शन तथा आध्यात्मिक साहित्य की ओर भी इनकी रुचि रही। संगीत से इन्हें पर्याप्त प्रेम था। सन् 1950 ई० में ये ऑल इण्डिया रेडियो के परामर्शदाता पद पर नियुक्त हुए और सन् 1957 ई० तक इससे सम्बद्ध रहे। इन्हें ‘कला और बूढ़ा चाँद’ नामक काव्य-ग्रन्थ पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘लोकायतन’ पर ‘सोवियत भूमि पुरस्कार’ और ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने पन्त जी को ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। पन्त जी 28 दिसम्बर, 1977 ई० ( संवत् 2034 वि०) को परलोकवासी हो गये।

साहित्यिक सेवाएँ–पन्त जी गम्भीर विचारक, उत्कृष्ट कवि और मानवता के प्रति आस्थावान एक ऐसे सहज कुशल शिल्पी थे, जिन्होंने नवीन सृष्टि के अभ्युदय के नवम्वप्नों को मजना की। इन्होंने सौन्दर्य को व्यापक अर्थ में ग्रहण किया है, इसीलिए इन्हें सौन्दर्य का कवि भी कहा जाता है।। रचनाएँ-पन्त जी ने अनेक काव्यग्रन्थ लिखे हैं। कविताओं के अतिरिक्त इन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और नाटक भी लिखे हैं, किन्तु कवि रूप में ये अधिक प्रसिद्ध है। पन्त जी के कवि रूप के विकास के तीन सोपान हैं—(1) छायावाद और मानवतावाद, (2) प्रगतिवाद या माक्संवाद तथा (3) नवचेतनावाद।।

  1. पन्त जी के विकास के प्रथम सोपान (जिसमें छायावादी प्रवृत्ति प्रमुख थी) की सूचक रचनाएँ हैं वीणा, ग्रन्थि, पल्लव और गुंजन। ‘वीणा’ में प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति कवि का अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। ‘ग्रन्थि’ से वह प्रेम की भूमिका में प्रवेश करता है और नारी-सौन्दर्य उसे आकृष्ट करने लगता है। ‘पल्लव’ छायावादी पन्त का चरमविन्दु है। अब तक कवि अपने ही सुख-दु:ख में केन्द्रित था, किन्तु ‘गुंजन’ से वह अपने में ही केन्द्रित न रहकर विस्तृत मानव-जीवन (मानवतावाद) की ओर उन्मुख होता है।
  2. द्वितीय सोपान के अन्तर्गत तीन रचनाएँ आती हैं-युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या। इस काल में कवि पहले ‘गाँधीवाद’ और बाद में ‘मार्क्सवाद’ से प्रभावित होकर फिर प्रगतिवादी बन जाता है।
  3. मार्क्सवाद की भौतिक स्थूलता पन्त जी के मूल संस्कारी कोमल स्वभाव के विपरीत थी। इस कारण वह तृतीय सोपान में वे पुनः अन्तर्जगत् की ओर मुड़े। इस काल की प्रमुख रचनाएँ हैंस्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, अतिमा, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, किरण, पतझर-एक भाव क्रान्ति और गीतहंसः इस काल में कवि पहले विवेकानन्द और रामतीर्थ से तथा बाद में अरविन्द-दर्शन से प्रभावित होता है।

सन् 1955 ई० के बाद की पन्त जी की कुछ रचनाओं (कौए, मेंढक आदि) पर प्रयोगवादी कविता का प्रभाव है, पर कवि का यह रूप भी सहज न होने से वह इसे भी छोड़कर अपने प्राकृत (वास्तविक) रूप पर लौट आया।

साहित्य में स्थान-पन्त जी निर्विवाद रूप से एक सजग प्रतिभाशाली कलाकार थे। इनकी काव्य-साधना सतत विकासोन्मुखी रही है। ये अपने काव्य के बाह्य और आन्तरिक दोनों पक्षों को सँवारने में सदैव सचेष्ट रहे हैं। प्रकृति के सर्वाधिक सशक्त चितेरे के रूप में आधुनिक हिन्दी-काव्य में ये सर्वोपरि हैं। पन्त जी निश्चित ही हिन्दी-कविता के श्रृंगार हैं, जिन्हें पाकर माँ भारती कृतार्थ हुई है।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

नौका-विहार

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
जब पहँची चपला बीच धार,
छिप गया चाँदनी का कगार !
दो बाहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर
आलिंगन करने को अधीर !
अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भू-रेखा-सी अराल,
अपलक नभ नील-नयन विशाल;
माँ के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप,
उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक?
छाया की कोकी को विलोक !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कब चाँद-सा चमकता हुआ रेत का कगार कवि की आँखों से ओझल हो गया?
(iv) धारा के बीच से देखने पर गंगा के दोनों तट किसके समान लगते हैं?
(v) धारा के बीच स्थित द्वीप कैसा दिखाई पड़ता है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘नौका-विहार’ शीर्षक कविता से उद्धत है। और हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक नाम- नौका-विहार।।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-जब नौका गंगा की बीच धारा में पहुँची तो हमने देखा कि चाँदनी में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार हमारी दृष्टि से ओझल हो गया। गंगा के दूर-दूर स्थित दोनों तट फैली हुई दो बाँहों के समान लग रहे थे, जो गंगा-धारा के दुबले-पतले कोमल नारी शरीर का आलिंगन करने के लिए अधीर थे; अर्थात् अपने में कस लेना चाहते थे।
(iii) जब नाव बीच धारा में पहुंची तब कवि ने देखा कि चाँदनी रात में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार आँखों से ओझल हो गया।
(iv) धारा के बीच में देखने पर गंगा के दोनों तट फैली हुई दो भुजाओं के समान लग रहे हैं, जो गंगा के दुबले-पतले शरीर का आलिंगन करने के लिए अधीर हैं।
(v) धारा के बीच स्थित द्वीप ऐसा दिखाई पड़ता है जैसे माँ की छाती से चिपककर कोई नन्हा बालक सोया हुआ हो।

प्रश्न 2.
ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार
उर में आलोकित शत विचार ।
इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम !
शाश्वत नभ का नीला विकास, शाश्वत शशि का यह रजत हास,
शाश्वत लघु लहरों का विलास !
हे जग-जीवन के कर्णधार ! चिर जन्म-मरण के आर-पार,
शाश्वत जीवन-नौका-विहार?
मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण,
करता मुझको मरत्व दान !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इस संसार की गति कवि को किसके समान लगती है?
(iv) गंगा के दोनों किनारे कवि को किसके समान लगते हैं?
(v) कवि क्या भूल गया था?
उत्तर
(i) यह पद्यांश कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘नौका-विहार’ शीर्षक कविता से उद्धत है। और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम- नौका-विहार।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-जिस प्रकार गंगा की धारा अनादि काल से प्रवाहित होती चली आ रही है, उसी प्रकार यह जगत् (संसार) भी अनादि काल से चला आ रहा है। जिस प्रकार गंगा के जल का उद्गम, प्रवाह एवं सागर में मिलना शाश्वत (निश्चित) है उसी प्रकार जीवन का उत्पन्न होना, गतिशील होना और अन्त में विराट तत्त्व में विलीन हो जाना भी सनातन ही है।
(iii) इस संसार की गति कवि को धारा के समान ही लगती है।
(iv) गंगा के दोनों किनारे जन्म और मृत्यु के समान सनातन लगते हैं।
(v) कवि जीवन का वास्तविकस्वरूप भूल गया था।

परिवर्तन

प्रश्न 1.
आज बचपन का कोमल गात
जरा को पीला पात !
चार दिन सुखदै चाँदनी रात
और फिर अन्धकार, अज्ञात !
शिशिर-सा झर नयनों का नीर
झुलस देता गालों के फूल ।
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर
अधर जाते अधरों को भूल !
मृदुल होठों का हिमजले हास
उड़ा जाता नि:श्वास समीर,
सरल भौंहों का शरदाकाश
घेर लेते घन, घिर गम्भीर !
शून्य साँसों का विधुर वियोग
छुड़ाता अधर मधुर संयोग,
मिलन के पल केवल दो चार,
विरह के कल्प अपार !
अरे, वे अपलक चार नयन,
आठ आँसू रोते निरुपाय,
उठे रोओं के आलिंगन
कसक उठते काँटों-से हाय !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) बचपन का कोमल और सुन्दर शरीर वृद्धावस्था आने पर कैसा हो जाता है।
(iv) वृद्धावस्था की गहरी साँसें किसे उड़ा देती हैं?
(v) कवि ने सुःख और दुःख की क्या समयावधि बतायी है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता से उद्धत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम— परिवर्तन।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-मनुष्य को इस संसार में प्रियजनों से मिलने का सुख बहुधा कुछ ही पल मिल पाता है। अभी वह उन क्षणों को पूर्ण आनन्द भी नहीं ले पाता कि वियोग का क्षण आ पहुँचता है, जो अनन्त काल तक खिंचता चला जाता है। वस्तुत: समय की गति संयोग में अत्यधिक अल्पकालिक और वियोग में अत्यन्त दीर्घकालिक हो जाती है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता। मिलन-विरह समकालिक है। मिलन के क्षण आनन्द की अनुभूति कराते हैं इसलिए वे शीघ्र बीत गये प्रतीत होते हैं, जबकि विरह के क्षण दु:खपूर्ण होते हैं। कष्ट से व्यतीत होने के कारण वे स्थायी रूप से रुक गये प्रतीत होते हैं।
(iii) बचपन का कोमल शरीर वृद्धावस्था आने पर पीले, सूखे, खुरदरे पत्ते के समान हो जाता है।
(iv) वृद्धावस्था की गहरी साँसें बचपन की होंठों पर ओस की बूंद के समान निर्मल और मोहक हँसी को उड़ा देती हैं।
(v) कवि ने सु:ख के क्षणों को दो-चार दिन यानी बहुत कम तथा दु:ख के समय को कल्पों के समान लम्बा (लगभग सम्पूर्ण जीवन) बताया है।

प्रश्न 2.
अहे निष्ठुर परिवर्तन !
तुम्हारा ही तांडव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन !
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन !
अहे वासुकि सहस्रफन !
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर !
शत-शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर ।
मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर,
वक्र कुण्डल
दिङमंडल !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने निष्ठुर किसे कहा है?
(iv) नित्यप्रति होने वाले परिवर्तन किसके समान दृष्टिगोचर नहीं होते?
(v) कवि ने मृत्यु को क्या बताया है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता से उद्धत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम – परिवर्तन।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि ने परिवर्तन को हजार फनों वाले नागराज वासुकि का रूप दिया है। और बताया है कि परिवर्तन रूपी सर्प के रहने का बिल (विवर) सम्पूर्ण विश्व है, क्योंकि परिवर्तन सर्वत्र ही व्याप्त है। सम्पूर्ण दिशाओं का मण्डल ही इसकी गोलाकार कुण्डली है। सभी दिशाओं और सम्पूर्ण संसार में ऐसा कोई भी स्थान नहीं बचा है जहाँ परिवर्तन का प्रभाव न होता हो।
(iii) कवि ने परिवर्तन को निष्ठुर कहा है।
(iv) नित्यप्रति होने वाले परिवर्तन वासुकि सर्प के पैरों के समान दृष्टिगोचर नहीं होते।
(v) कवि ने मृत्यु को वासुकि नाग का विषैला दाँत बताया है।

बापू के प्रति

प्रश्न 1.
तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष ! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण ! हे चिर नवीन !
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर ।
भावी की संस्कृति समासीन ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कौन हइडियों का ढाँचा मात्र प्रतीत होते हैं?
(iv) गाँधी जी को कवि ने चिर पुराण तथा चिर नवीन क्यों कहा है?
(v) गाँधी जी के आदर्शों पर भविष्य में किसे खड़ा होना पड़ेगा?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘बापू के प्रति’ शीर्षक कविता से उद्धत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम- बापू के प्रति।।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–हे बापू! जैसी जीवन्मुक्त योगियों की दशा होती है, वैसी ही दशा आपकी भी है। तुममें मानव-जीवन की पूर्णता (चरम आदर्श) निहित है, जिसमें (अर्थात् पूर्णता में) विश्व की समस्त असारता लीन हो जाएगी। आशय यह है कि संसार तुम्हारे मार्ग पर चलकर अपना खोखलापन दूर करके मानव-जीवन की चरम सार्थकता को प्राप्त करेगा। तुम जिन सिद्धान्तों के आधार पर खड़े हो, वे अमर हैं, शाश्वत हैं। इसलिए भविष्य की मानव-संस्कृति को तुम्हारे ही आदर्शों पर खड़े
होना पड़ेगा; अर्थात् आपके द्वारा दिये गये विचार और ज्ञान ही मानव-जाति के लिए आधार होंगे।
(iii) गाँधी जी देखने में हड्डियों का ढाँचा मात्र प्रतीत होते हैं।
(iv) गाँधी जी को शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा अर्थात् आत्मस्वरूप होने के कारण कवि ने चिर पुराण तथा चिर नवीन कहा है।
(v) गाँधी जी के आदर्शों पर भविष्य की मानव-संस्कृति को खड़ा होना पड़ेगा।

प्रश्न 2.
सुख भोग खोजने आते सब,
आये तुम करने सत्य-खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज !
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया
तुमने मानवता का सरोज ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अधिकांश मनुष्य संसार में आकर किसकी खोज में लग जाते हैं?
(iv) गाँधी जी का भौतिकवादी मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
(v) ‘तुम आत्मा के, मन के मनोज!’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘बापू के प्रति’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम- बापू के प्रति।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-वह पशुता की कीचड़ से उत्पन्न कमलवत् था। तुमने उसे मानवीयतारूपी निर्मल जल वाले सरोवर से उत्पन्न कमल बना दिया; अर्थात् तुमने भौतिकवादी मनुष्य को अध्यात्मवादी बना दिया।
(iii) अधिकांश मनुष्य संसार में सुख की खोज में लग जाते हैं।
(iv) गाँधी जी ने भौतिकवादी मनुष्य को अध्यात्मवादी बना दिया अर्थात् लोगों को मानवीय गुणों के आधार पर जीना सिखा दिया।
(v) रूपक अलंकार।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 जयशंकर प्रसाद

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name जयशंकर प्रसाद
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 जयशंकर प्रसाद

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2010, 11, 16, 17]
या
जयशंकर प्रसाद को साहित्यिक परिचय लिखते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 16, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में माघ शुक्ल दशमी संवत् 1945 वि० (सन् 1889 ई०) में हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। ये तम्बाकू के एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने से इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। घर पर ही इन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी का गहन अध्ययन किया। ये बड़े मिलनसार, हँसमुख तथा सरल स्वभाव के थे। इनका बचपन बहुत सुख से बीता, किन्तु उदार प्रकृति तथा दानशीलता के कारण ये ऋणी हो गये। अपनी पैतृक सम्पत्ति का कुछ भाग बेचकर इन्होंने ऋण से छुटकारा पाया। अपने जीवन में इन्होंने कभी अपने व्यवसाय की ओर ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप इनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती गयी और चिन्ताओं ने इन्हें घेर लिया।

बाल्यावस्था से ही इन्हें काव्य के प्रति अनुराग था, जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। ये बड़े स्वाभिमानी थे, अपनी कहानी अथवा कविता के लिए पुरस्कारस्वरूप एक पैसा भी नहीं लेते थे। यद्यपि इनका जीवन बड़ा नपा-तुला और संयमशील था, किन्तु दु:खों के निरन्तर आघातों से ये न बच सके और संवत् 1994 वि० ( सन् 1937 ई०) में अल्पावस्था में ही क्षय रोग से ग्रस्त होकर स्वर्ग सिधार गये। साहित्यिक सेवाएँ-श्री जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक, उन्नायक तथा प्रतिनिधि कवि होने के साथ-साथ युग प्रवर्तक नाटककार, कथाकार तथा उपन्यासकार भी थे। विशुद्ध मानवतावादी दृष्टिकोण वाले प्रसाद जी ने अपने काव्य में आध्यात्मिक आनन्दवाद की प्रतिष्ठा की है। प्रेम और सौन्दर्य इनके काव्य के प्रमुख विषय रहे हैं, किन्तु मानवीय संवेदना उनकी कविता का प्राण है।

रचनाएँ–प्रसाद जी अनेक विषयों एवं भाषाओं के प्रकाण्ड पण्डित और प्रतिभासम्पन्न कवि थे। इन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध आदि सभी साहित्यिक विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी और अपने कृतित्व से इन्हें अलंकृत किया। इनका काव्य हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि है। इनके प्रमुख काव्यग्रन्थों का विवरण निम्नवत् है-
कामायनी—यह प्रसाद जी की कालजयी रचना है। इसमें मानव को श्रद्धा और मनु के माध्यम से हृदय और बुद्धि के समन्वय का सन्देश दिया गया है। इस रचना पर कवि को मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिल चुका है।
आँसू-यह प्रसाद जी का वियोग का काव्य है। इसमें वियोगजनित पीड़ा और दु:ख मुखर हो उठा है।
लहर—यह प्रसाद जी का भावात्मक काव्य-संग्रह है।
झरना—इसमें प्रसाद जी की छायावादी कविताएँ संकलित हैं, जिसमें सौन्दर्य और प्रेम की अनुभूति साकार हो उठी है।
कहानी—आकाशदीप, इन्द्रजाल, प्रतिध्वनि, आँधी।
उपन्यास-कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)।
निबन्ध-काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध।
चम्पू-प्रेम राज्य। इनके अन्य काव्य-ग्रन्थ चित्राधार, कानन-कुसुम, करुणालय, महाराणा को महत्त्व, प्रेम-पथिक आदि हैं।
साहित्य में स्थान–प्रसाद जी असाधारण प्रतिभाशाली कवि थे। उनके काव्य में एक ऐसा नैसर्गिक आकर्षण एवं चमत्कार है कि सहृदय पाठक उसमें रसमग्न होकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है। निस्सन्देह वे आधुनिक हिन्दी-काव्य-गगन के अप्रतिम तेजोमय मार्तण्ड हैं।

‘पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोवर

गीत

प्रश्न-दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
बीती विभावरी जाग री ।
अम्बर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट ऊषा-नागरी ।
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय को अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी—
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी ।
अधरों में राग अमन्द पिये,
अलकों में मलयज बन्द किये–
तू अब तक सोयी है आली !
आँखों में भरे विहाग री।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में किस समय का सुन्दर वर्णन किया गया है?
(iv) कौन आकाशरूपी पनघट पर तारारूपी घड़े को डुबो रहा है? ।
(v) ‘खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गीत महाकवि श्री जयशंकर प्रसाद के ‘लहर’ नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत’ शीर्षक रचना से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-इस गीत में मानवीकरण द्वारा प्रात:काल की शोभा का सुन्दर चित्रण किया गया है। एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! रात बीत चुकी है। अब तू उठ। आकाशरूपी पनघट पर ऊषारूपी चतुर नारी तारारूपी घड़ा डुबो रही है; अर्थात् तारे एक-एक करके छिपते चले जा रहे हैं।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में प्रात:काल की शोभा का सुन्दर वर्णन किया गया है।
(iv) उषारूपी चतुर नारी आकाशरूपी पनघट पर तारारूपी घड़े को डुबो रही है।
(v) अलंकार-अनुप्रास, रूपक।

श्रद्धा-मनु

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
“कौन तुम ? संसृति-जलनिधि तीर
तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप
प्रभा की धारा से अभिषेक ?
मधुर विश्रान्त और एकान्त–
जगत का सुलझा हुआ रहस्य
एक करुणामय सुन्दर मौन
और चंचल मन का आलस्य !”
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) उक्त पंक्तियों में कौन किसका परिचय पूछ रहा है?
(iv) कौन अपनी कान्ति से वीराने को शोभायमान कर रहा है?
(v) ‘प्रभा की धारा से अभिषेक?’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मेनु।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा मनु से उनका परिचय पूछ रही है कि संसाररूपी सागर के तट पर तरंगों (लहरों) द्वारा फेंकी गयी किसी मणि के सदृश तुम कौन हो, जो चुपचाप बैठे अपनी शोभा की किरणों से इस निर्जन प्रदेश को स्नान करा रहे हो; अर्थात् जिस प्रकार लहरें समुद्र के तल से किसी मणि को उठाकर तट पर पटक देती हैं, उसी प्रकार सांसारिक आघातों से ठुकराये हुए हे भव्य पुरुष! तुम कौन हो?
(iii) उक्त पंक्तियों में श्रद्धा मनु का परिचय पूछ रही हैं।
(iv) मनु भव्य पुरुष की भाँति अपनी कांति से वीराने को शोभायमान कर रहे हैं।
(v) रूपक अलंकार।।

प्रश्न 2.
समर्पण लो सेवा का सार
सजल संसृति का यह पतवार;
आज से यह जीवन उत्सर्ग
इसी पद तल में विगत विकार।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) श्रद्धा किसकी जीवनसंगिनी बनकर सेवा करना चाहती हैं?
(iv) किसका समर्पण मनु की जीवन-नौका के लिए पतवार के समान सिद्ध होगा?
(v) ‘सजल संसृति का यह पतवार।’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मनु।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-श्रद्धा मानवता को सफल और समृद्ध बनाने के लिए मनु के समक्ष आत्मसमर्पण करती है और कहानी है कि यह मेरा आत्मसमर्पण संसार-सागर में निरुद्देश्य भटकने वाली तुम्हारी जीवन-नौका के लिए पतवार के समान सिद्ध होगा अर्थात् तुम्हारे जीवन को निश्चित दिशा देगा। आज से तुम्हारे चरणों में बिना किसी स्वार्थभावना के मैं अपने जीवन को न्योछावर करती हूँ।
(iii) श्रद्धा मनु की जीवनसंगिनी बनकर उनकी सेवा करना चाहती हैं।
(iv) श्रद्धा का समर्पण मनु की जीवन-नौका के लिए पतवार के समान सिद्ध होगा।
(v) अनुप्रास अलंकार।।

प्रश्न 3.
डरो मत अरे अमृत सन्तान
अग्रसर है। मंगलमय वृद्धि
पूर्ण आकर्षण जीवन-केन्द्र
खिंची आवेगी सकल समृद्धि!
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मनु ने संसार और जीवन को क्या मान लिया था?
(iv) श्रद्धा मनु को किसकी संतान बताकर उत्साहित करती हैं?
(v) कब सकल समृद्धि पास खिंची चली आएगी?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मनु।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रसाद जी के ‘कामायनी’ महाकाव्य की नायिका श्रद्धा निवृत्ति पथ पर अग्रसर मनु को प्रवृत्ति पथ पर लाने का प्रयास करती है। मनु ने संसार को निराशा से भरा और जीवन को उपायहीन मान लिया था। श्रद्धा उनमें जीवन के प्रति उत्साह भरती हुई कहती है कि तुम कभी न मरने वाले देवताओं की सन्तान हो; अत: भयभीत क्यों होते हो? तुम्हारे सामने मंगलों की भरपूर समृद्धि है। तुम उसे पाने का साहस तो करके देखो।
(iii) मनु ने संसार को निराशा से भरा और जीवन को उपायहीन मान लिया था।
(iv) श्रद्धा मनु को कभी न मरने वाले देवताओं की संतान बताकर उत्साहित करती हैं।
(v) जब भय समाप्त हो जाएगा और मन के अन्दर जीने का उत्साह पैदा हो जाएगा तब सेब सकल समृद्धि पास खिंची चली आएगी।

प्रश्न 4.
शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करे समस्त ।
विजयिनी मानवता हो जाय।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इन पंक्तियों में श्रद्धा ने मनु को कौन-सी बात बताई है?
(iv) समस्त सृष्टि की रचना किनसे हुई है?
(v) श्रद्धा मनु को किस प्रकार मानवता का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करती हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मनु।।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-श्रद्धा मनु से कहती है कि जीवन के प्रति हताशा और निराशा को त्यागकर आपको लोक-मंगल के कार्यों में लगना चाहिए। इसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और मुख्य कार्य संसार की विभिन्न शक्तियों में पारस्परिक समन्वय स्थापित करना है। विश्व की विद्युत्-कणों के समान जो भी करोड़ों-करोड़ शक्तियाँ हैं, वे सब बिखरी पड़ी हैं, जिस कारण जीवन में उनका कोई भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। उन सब शक्तियों को एकत्रित कीजिए और उनमें आया समन्वय स्थापित कीजिए, जिससे उन शक्तियों का अधिक-से-अधिक उपयोग हो सके। इसी में मानवता का कल्याण निहित है। यदि आप यह समन्वय स्थापित करने में सफल हो गए तो सर्वत्र मानवता का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा।
(iii) इन पंक्तियों में श्रद्धा ने मनु को मानवता की विजय का उपाय बताया है।
(iv) समस्त सृष्टि की रचना शक्तिशाली विद्युत्-कणों से हुई है।
(v) श्रद्धा ने मनु को बिखरी पड़ी समस्त शक्तियों को एकत्रित करके उनके उपयोग द्वारा मानवता का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित किया है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 आनन्द की खोज, पागल पथिक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name आनन्द की खोज, पागल पथिक (राय कृष्णदास)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 आनन्द की खोज, पागल पथिक (राय कृष्णदास)

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
राय कृष्णदास जी का साहित्यिक परिचय दीजिए।
या
राय कृष्णदास की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
राय कृष्णदास का जीवन-परिचय लिखते हुए उनकी कृतियाँ भी लिखिए तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
हिन्दी में गद्य को काव्य जैसी मधुरता प्रदान करने वाले और अपनी अनुभूतियों और भावनाओं को कवित्व का रूप प्रदान करने वाले राय कृष्णदास, गद्यगीतों के प्रवर्तक माने जाते हैं। इन्होंने जीव और परमात्मा के बीच की क्रीड़ाओं का मनमोहक ढंग से, प्रिय और प्रिया की आँख-मिचौनी के रूप में सजीव चित्र अंकित किया है।

जीवन-परिचय:
राय कृष्णदास का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित अग्रवाल परिवार में सन् 1892 ई० में हुआ था। यह परिवार कला, संस्कृति और साहित्य-प्रेम के लिए प्रसिद्ध था। इनके पिता राये प्रहाददास; भारतेन्दु जी के सम्बन्धी तथा आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के परम मित्र थे। ये काव्यकला के मर्मज्ञ और साहित्यप्रेमी व्यक्ति थे। इस प्रकार राय कृष्णदास को कला और साहित्य-प्रेम पितृदाय रूप में प्राप्त हुआ था। फलतः ये अपने पिता के संस्कारों और साहित्यकार सहयोगियों के सम्पर्क में आकर आठ वर्ष की आयु में ही कविता करने लगे थे।
राय कृष्णदास की स्कूली शिक्षा अधिक समय तक न चल सकी, परन्तु उत्कट ज्ञान-पिपासा के कारण इन्होंने घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषाओं का स्वतन्त्र रूप से अध्ययन किया। तदनन्तर विविध प्रकार से हिन्दी-साहित्य की सेवा करते हुए सन् 1980 ई० में इनकी मृत्यु हो गयी। इसी वर्ष (सन् 1980 ई०) की 26 जनवरी को भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से अलंकृत भी किया था।

साहित्यिक सेवाएँ:
राय कृष्णदासं हिन्दी-साहित्य के भावुक कवि, कहानीकार, निबन्धकार एवं प्रसिद्ध गद्यगीतकार होने के साथ-साथ प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षक और पुरातत्त्व के मर्मज्ञ विद्वान् भी थे।

हिन्दी-साहित्य में अपने गद्यगीतों के लिए प्रसिद्ध राय कृष्णदास ने हिन्दी-गद्य को नये आयाम प्रदान कर अपनी मौलिकता का परिचय दिया। काशी के साहित्यिक वातावरण में, महान् साहित्यकारों की वरद् छाया में इनका पालन-पोषण हुआ था। साहित्य और कला की अमर संजीवनी से इनका जीवन आप्लावित था। इनकी कविताएँ, कहानियाँ और क्बिन्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होते थे। जयशंकर प्रसाद और कवीन्द्र रवीन्द्र से प्रभावित होने के कारण इनकी रचनाओं में सर्वत्र आध्यात्मिकता, भावुकता और हृदय की कोमल अनुभूतियाँ विद्यमान हैं। इनकी कहानियों में सात्त्विक भावों और मानवीय गुणों की अभिव्यक्ति की गयी है। संवाद शैली में लिखे गये इनके निबन्धों में भावात्मकता विद्यमान है।

साहित्य-सेवा के साथ-साथ इन्होंने भारतीय कला के उत्थान और विकास के लिए भारत कला भवन’ नामक विशाल संग्रहालय का निर्माण कराया। इन्होंने भारतीय कलाओं पर प्रामाणिक इतिहास और अन्य ग्रन्थों की रचना करके अपने कला-प्रेम को प्रदर्शित किया है। राय कृष्णदास ने भारतीय भूगोल और पौराणिक वंशावली पर शोधपूर्ण निबन्धों की रचना की। ‘गद्य गीत’ विधा के प्रवर्तक राय कृष्णदास जी के गद्य-गीतों में पद्य की तरह तुक तो नहीं है, परन्तु लय और पूर्ण संगीतात्मकता विद्यमान है। इनका शब्द-चयन, वाक्य-विन्यास एवं अलंकारों का प्रयोग भव्य है। इनके गद्यगीत सरल, सरस और आकार में लघु हैं। इस प्रकार राय कृष्णदास भावुक कवि, मर्मज्ञ कलाकार, गद्यगीत प्रवर्तक, कहानीकार, पुरातत्त्व और इतिहास के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान् साहित्यकार थे।

रचनाएँ:
राय कृष्णदास ने कविता, कहानी, निबन्ध, गद्यगीत, कला, इतिहास आदि सभी क्षेत्रों में अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया। इनकी रचनाओं का विवरण निम्नलिखित है

(1) कविता – संग्रह-ब्रज भाषा में ‘ब्रजराज’ तथा खड़ी बोली में ‘भावुक हैं। ‘भावुक’ काव्य-संग्रह पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव है।
(2) गद्यगीत – इनके गद्यगीतों के संग्रह ‘छायापथ’ और ‘साधना’ के नाम से प्रकाशित हुए हैं। ‘साधना’ के निबन्धों में जीव और परमात्मा के बीच की क्रीड़ाओं का, प्रिय और प्रिया की आँख – मिचौनी के रूप में मनमोहक और सजीव चित्रण किया गया है।
(3) निबन्ध-संग्रह – ‘संलाप’ और ‘प्रवाल’ संवाद शैली के इनके निबन्धों का संग्रह है।
(4) कहानी-संग्रह – ‘अनाख्या’, सुधांशु’ और ‘आँखों की थाह’।।
(5) अनुवाद – खलील जिब्रान के ‘दि मैडमैन’ को ‘पगला’ नाम से हिन्दी रूपान्तर।
(6) कला-इतिहास – ‘भारत की चित्रकला’ और ‘भारतीय मूर्तिकला’। ये भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला के इतिहास से सम्बन्धित प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने प्राचीन भारतीय भूगोल एवं पौराणिक वंशावली पर भी शोध-निबन्ध लिखे हैं।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ:
राय कृष्णदास जी की भाषा शुद्ध, परिमार्जित एवं तत्सम शब्दावली से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली है। बीच-बीच में तद्भव और देशज शब्दों के प्रयोग से इनकी भाषा सरल और व्यावहारिक हो गयी है। इन्होंने यत्र-तत्र उर्दू-फारसी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया है। मुहावरों के प्रयोग से इनकी भाषा में सजीवता और प्रवाह उत्पन्न होता है। इनका वाक्य-विन्यास सुगठित, शब्द-चयन सटीक और अलंकारों का प्रयोग भव्य है। कवित्वपूर्ण होते हुए भी इनकी भाषा सहज और सरल है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ:
राय कृष्णदास भावुक रचनाकार हैं; अतः इनकी शैली में काव्यमयता, भावुकता, सांकेतिकता एवं अनुभूति की प्रबलता विद्यमान है। इनके गीत इस बात का प्रमाण कि आधुनिक गद्यप्रधान युग में गद्य ने पद्य को भी आत्मसात् कर लिया है। भले ही इनके गद्यगीतों को विधिवत् गाया न जा सके, परन्तु गुनगुनाया तो अवश्य जा सकता है। इनकी रचनाओं में निम्नलिखित शैलियों की प्रधानता है

(1) भावात्मक शैली:
राय कृष्णदास हिन्दी में कवित्वपूर्ण भावात्मक गद्य के सम्राट माने जाते हैं। उनके गद्य में एक सहज मधुरता, भावुकता और कवित्वपूर्ण सौन्दर्य सर्वत्र विद्यमान है।

(2) चित्रात्मक शैली:
प्रकृति चित्रण के सन्दर्भ में राय कृष्णदास जी प्रकृति का ऐसा मार्मिक धरातल प्रस्तुत करते हैं कि एक सौन्दर्यमय दृश्य आँखों के आगे साकार हो उठता है। इस शैली की भाषा में भावुकता पाठक के मन में आह्लाद उत्पन्न करती है।

(3) संवाद शैली:
‘संलाप’ तथा ‘प्रवाल’ में सभी निबन्ध संवाद शैली में लिखे गये हैं। ये संवाद बड़े मार्मिक, भावपूर्ण एवं प्रभावशाली हैं।

(4) आलंकारिक शैली:
राय कृष्णदास की प्राय: सभी रचनाओं में आलंकारिक शैली के दर्शन होते हैं। इस शैली की भाषा चमत्कारपूर्ण और प्रवाहपूर्ण होती है।

(5) गवेषणात्मक शैली:
लेखक ने प्राचीन काल के इतिहास की खोज सम्बन्धी रचनाओं में गवेषणात्मक शैली का प्रयोग किया है। यह शैली गम्भीर एवं गहन होते हुए भी क्लिष्टता से रहित है तथा तार्किकता से युक्त होते हुए। भी इसमें सरसता विद्यमान है।

(6) विवरणात्मक शैली:
लेखक ने अपनी कहानियों में कथा-प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए विवरणात्मक शैली को अपनाया है। इसमें घटना और तथ्यों का विवरण सजीव तथा भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण होती है। इसमें वाक्य। छोटे-छोटे हैं तथा आलंकारिकता और भावुकता का पुट सर्वत्र देखने को मिलता है।

साहित्य में स्थान:
हिन्दी में गद्यगीत’ विधा के प्रवर्तक राय कृष्णदास जी की रचनाओं में भावुकता, कवित्व, आलंकारिकता एवं चित्रात्मकता के ऐसे गुण विद्यमान हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। इनकी काव्यात्मक भावपूर्ण शैली में दार्शनिक अनुभूति के समन्वय ने चार चाँद लगा दिये हैं। राय कृष्णदास निश्चय ही हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ गद्यगीत लेखक रहे हैं।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1:
अन्त को मुझसे न रहा गया। मैं चिल्ला उठा-आनन्द, आनन्द; कहाँ है आनन्द! हाय! तेरी खोज में मैंने । व्यर्थ जीवन गॅवाया। बाह्य प्रकृति ने मेरे शब्दों को दुहराया, किन्तु मेरी आन्तरिक प्रकृति स्तब्ध थी। अतएव मुझे अतीव आश्चर्य हुआ। पर इसी समय ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण सजीव होकर मुझसे पूछ उठा-क्या कभी अपने-आप में भी देखा था? मैं अवाक् था।

(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अंन्त में लेखक क्यों चिल्ला उठा?
(iv) किसने लेखक के शब्दों को दुहराया?
(v) लेखक कब अवाक् था?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा राय कृष्णदास द्वारा लिखित ‘आनन्द की खोज, पागल पथिक’ शीर्षक गद्यगीत से अवतरित है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
पाठ का नाम – आनन्द की खोज, पागल पथिक।
लेखक का नाम – राय कृष्णदास।
[संकेत – इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – जब लेखक बाह्य जगत् में आनन्द की खोज में भटकते-भटकते थक गया और उसे कहीं भी आनन्द नहीं मिला, तब उसकी आत्मा से अज्ञान का आवरण हट गया। अब
उसने समझा कि उसने इतना मूल्यवान समय व्यर्थ के प्रयत्न में खो दिया है।

(iii) आनन्द की खोज में बाह्य जगत् में भटकने पर लेखक को आनन्द की प्राप्ति नहीं होती। इन सभी क्रियाओं से अन्ततः निराश होकर उससे रहा न गया और वह चिल्ला उठा।
(iv) बाह्य प्रकृति ने लेखक के शब्दों को दुहराया।
(v) जब ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण सजीव होकर उससे पूछ उठा-क्या कभी अपने-आप में भी देखा था? तब लेखक अवाक् था।

प्रश्न 2:
भला इस विश्वमण्डल के बाहर तुम जा कैसे सकते हो? तुम जहाँ से चलोगे फिर वहीं पहुँच जाओगे। यह तो घटाकार न है। फिर, तुम उस स्थान की कल्पना तो इसी आदर्श पर करते हो और जब तुम्हें इस भूल ही में सुख नहीं मिलता तब अनुकरण में उसे कैसे पाओगे? मित्र, यहाँ तो सुख के साथ दु:ख लगा है और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में भी एक सुख है। जब उसे ही नहीं पा सकते तब वहाँ का निरन्तर सुख तो तुम्हें एक अपरिवर्तनशील बोझ, नहीं यातना हो जायेगी। अरे, बिना नव्यता के सुख कहाँ? तुम्हारी यह कल्पना और संकल्प नितान्त मिथ्या और निस्सार है, और इसे छोड़ने ही में तुम्हें इतना सुख मिलेगा कि तुम छक जाओगे।’

(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) संसार का आकार कैसा है?
(iv) लेखक ने भूल किसे बताया है?
(v) इस संसार में कौन किसके साथ लगा है और उसके किस उद्योग में सुख है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुम सोचो कि बिना नवीनता के भी कहीं सुख मिलता है? अर्थात् सुख के लिए नवीनता आवश्यक है; अत: तुम्हारी कल्पना बिल्कुल झूठी और व्यर्थ है, इसलिए तुम पूर्ण सुख को प्राप्त करने की कल्पना त्याग दो। ऐसा करने से तुम्हें इसी संसार में इतना सुख मिलेगा कि तुम पूरी तरह सन्तुष्ट हो जाओगे, लेकिन वह सुख तुम्हें अपने अन्दर मिलेगा, बाहर नहीं। उसे अपने भीतर ही खोजना पड़ेगा। तुम यही करो।
(iii) संसार का आकार घट जैसा है।
(iv) लेखक ने बाह्य जगत की कल्पना को भूल बताया है।
(v) इस संसार में सुख के साथ दु:ख लगा है और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में सुख है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 5 ध्रुवयात्रा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name ध्रुवयात्रा
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 5 ध्रुवयात्रा

प्रश्न 1:
‘धुवयात्रा’ कहानी का सारांश (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘ध्रुवयात्रा’ हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकार जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी है। जैनेन्द्र जी मुंशी प्रेमचन्द की परम्परा के अग्रणी कहानीकार हैं। मनोवैज्ञानिक कहानियाँ लिखकर इन्होंने हिन्दी कहानी-कला के क्षेत्र में एक नवीन अध्याय को जोड़ा है। प्रस्तुत कहानी में इन्होंने मानवीय संवेदना को मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण में समन्वित करके एक नवीन धारा को जन्म दिया और कहानी ‘ध्रुवयात्रा’ की रचना की। इस कहानी का सारांश निम्नवत् है

राजा रिपुदमन बहादुर उत्तरी ध्रुव को जीतकर अर्थात् उत्तरी ध्रुव की यात्रा करके यूरोप के नगरों से बधाइयाँ लेते हुए भारत आ रहे हैं इस खबर को सभी समाचार-पत्रों ने मुखपृष्ठ पर मोटे अक्षरों में प्रकाशित किया। उर्मिला, जो राजा रिपुदमन की प्रेमिका है और जिसने उनसे विवाह किये बिना उनके बच्चे को जन्म दिया है, ने भी इस समाचार को पढ़ा। उसने यह भी पढ़ा कि वे अब बम्बई पहुँच चुके हैं, जहाँ उनके स्वागत की तैयारियाँ जोर-शोर से की जा रही हैं। ………. उन्हें अपने सम्बन्ध में इस प्रकार के प्रदर्शनों में तनिक भी उल्लास नहीं है। ……….. इसलिए वे बम्बई में न ठहरकर प्रातः होने के पूर्व ही दिल्ली पहुँच गये। ……… उनके चाहने वाले उन्हें अवकाश नहीं दे रहे हैं, ऐसा लगता है कि वे आराम के लिए कुछ दिन के लिए अन्यत्र जाएँगे।

राजा रिपुदमन को अपने से ही शिकायत है। उन्हें नींद नहीं आती है। वे अपने किये पर पश्चाताप कर रहे हैं। जब उर्मिला ने उनसे शादी के लिए कहा था तो उन्होंने परिवारीजनों के डर से मना कर दिया था। उनकी वही भूल आज उम्हें पीड़ा प्रदान कर रही है। वह उसके विषय में बहुत चिन्तित हैं।
दिल्ली में आकर वे आचार्य मारुति से मिलते हैं, जिनके बारे में उन्होंने यूरोप में भी बहुत सुन रखा था। आचार्य मारुति तरह-तरह की चिकित्सकीय जाँच के परिणामों को ठीक बताते हुए उन्हें विवाह करने की सलाह देते हैं। लेकिन रिपुदमन स्वयं को विवाह के अयोग्य बताते हुए इसे बन्धन में बँधना कहते हैं। आचार्य मारुति उन्हें प्रेम-बन्धन में बँधने की सलाह देते हैं और कहते हैं कि प्रेम का इनकार स्वयं से इनकार है।’

अगले दिन राजा रिपुदमन उर्मिला से मिलते हैं और अपने बच्चे का नामकरण करते हैं। वे उर्मिला से समाज के विपरीत अपने द्वारा किये गये व्यवहार के लिए क्षमा माँगते हैं और अपने व उर्मिला के सम्बन्धों को एक परिणति देना चाहते हैं। लेकिन उर्मिला मना करती है और उनसे सतत आगे बढ़ते रहने के लिए कहती है। वह पुत्र की ओर दिखाती हुई कहती है कि तुम मेरे ऋण से उऋण हो और मेरी ओर से आगामी गति के लिए मुक्त हो।

रिपुदमन उर्मिला को आचार्य मारुति के विषय में बताता है। वह उसे ढोंगी, महत्त्व को शत्रु और साधारणता का अनुचर बताती है। वह कहती है कि तुम्हारे लिए स्त्रियों की कमी नहीं है, लेकिन मैं तुम्हारी प्रेमिका हूँ और तुम्हें सिद्धि तक पहुँचाना चाहती हैं, जो कि मृत्यु के भी पार है।।

रिपुदमन आचार्य मारुति से मिलता है तथा उसे बताता है कि वह उर्मिला के साथ विवाह करके साथ में रहने के लिए तैयार था, लेकिन उसने मुझे ध्रुवयात्रा के लिए प्रेरित किया और कुछ मेरी स्वयं की भी इच्छा थी। अब वह मुझे सिद्धि तक जाने के लिए प्रेरित कर रही है। आचार्य मारुति स्वीकार करते हैं कि उर्मिला उनकी ही पुत्री है। वे उसे विवाह के लिए समझाएँगे।

जब उर्मिला आचार्य के बुलवाने पर उनके पास जाती है तो वे उससे विवाह के लिए कहते हैं। वह कहती है कि शास्त्र से स्त्री को नहीं जाना जा सकता उसे तो सिर्फ प्रेम से जाना जा सकता है। वे उसे रिपुदमन से विवाह के लिए समझाते हैं, लेकिन वह नहीं मानती। वह स्पष्ट कहती है कि मुक्ति का पथ अकेले का है। अन्त में आचार्य उर्मिला के ऊपर इस रहस्य को प्रकट कर देते हैं कि वे ही उसके पिता हैं। इस अभागिन को भूल जाइएगा यह कहती हुई वह उनके पास से चली जाती है।

रिपुदमन के पूछने पर उर्मिला बताती है कि वह आचार्य से मिल चुकी है। रिपुदमन उसके कहने पर दक्षिणी ध्रुव के शटलैण्ड द्वीप के लिए जहाज तय करते हैं। अब उर्मिला उनको रोकना चाहती है, लेकिन वे नहीं रुकते। वे चले जाते हैं।
रिपुदमन की ध्रुव पर जाने की खबर पूरी दनिया को ज्ञात हो जाती है। उर्मिला को भी अखबारों के माध्यम से सारी खबर ज्ञात होती रहती है और वह इन्हीं कल्पनाओं में डूबी रहती है।
तीसरे दिन के अखबार में उर्मिला राजा रिपुदमन की आत्महत्या की खबर को एक-एक अंश पूरे ध्यान से पढ़ती है। अखबार वालों ने एक पत्र भी छापा थी, जिसमें रिपुदमन ने स्वीकार किया था कि उनकी यह यात्रा नितान्त व्यक्तिगत थीं, जिसे सार्वजनिक किया गया। मैं किसी से मिले आदेश और उसे दिये गये अपने वचन को पूरा नहीं कर पा रहा हूँ, इसलिए होशो हवाश में अपना काम-तमाम कर रहा हूँ। भगवान मेरे प्रिय के अर्थ मेरी आत्मा की रक्षा करे।” यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्वों की दृष्टि से ‘धुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
‘धुवयात्रा’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए।
या
श्रेष्ठ कहानी की विशेषताएँ बताते हुए ‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
कथा-संगठन की दृष्टि से ‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
कहानी के प्रमुख तत्वों के आधार परे ‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की विशेषताएँ बताइए।
या
धुवयात्रा’ कहानी के आधार पर जैनेन्द्र कुमार की कहानी-कला का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
जैनेन्द्र कुमार महान् कथाकार हैं। ये व्यक्तिवादी दृष्टि से पात्रों का मनोविश्लेषण करने में कुशल हैं। प्रेमचन्द की परम्परा के अग्रगामी लेखक होते हुए भी इन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य को नवीन शिल्प प्रदान किया। ‘ध्रुवयात्रा’ जैनेन्द्र कुमार की सामाजिक, मनोविश्लेषणात्मक, यथार्थवादी रचना है। कहानी-कला के तत्त्वों के .
आधार पर इस कहानी की समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – कहानी का शीर्षक आकर्षक और जिज्ञासापूर्ण है। सार्थकता तथा सरलता इस शीर्षक की विशेषता है। कहानी का शीर्षक अपने में कहानी के सम्पूर्ण भाव को समेटे हुए है तथा प्रारम्भ से अन्त तक कहानी इसी ध्रुवयात्रा पर ही टिकी है। कहानी का प्रारम्भ नायक के ध्रुवयात्रा से आगमन पर होता है और कहानी का समापन भी ध्रुवयात्रा के प्रारम्भ के पूर्व ही नायक के समापन के साथ होता है। अत: कहानी का शीर्षक स्वयं में पूर्ण और समीचीन है।

(2) कथानक – श्रेष्ठ कथाकार के रूप में स्थापित जैनेन्द्र कुमार जी ने अपनी कहानियों को कहानी-कला की दृष्टि से आधुनिक रूप प्रदान किया है। ये अपनी कहानियों में मानवीय गुणों; यथा–प्रेम, सत्य तथा करुणा; को आदर्श रूप में स्थापित करते हैं।

इस कहानी की कथावस्तु का आरम्भ राजा रिपुदमन की ध्रुवयात्रा से वापस लौटने से प्रारम्भ होता है। कथानक का विकास रिपुदमन और आचार्य मारुति के वार्तालाप, तत्पश्चात् रिपुदमन और उसकी अविवाहिता प्रेमिका उर्मिला के वार्तालाप और उर्मिला तथा आचार्य मारुति के मध्य हुए वार्तालाप से होता है। कहानी के मध्य में ही यह स्पष्ट होता है कि उर्मिला ही मारुति की पुत्री है। कहानी का अन्त और चरमोत्कर्ष राजा रिपुदमन द्वारा आत्मघात किये जाने से होता है।

प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने एक सुसंस्कारित युवती के उत्कृष्ट प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाया है तथा प्रेम को नारी से बिलकुल अलग और सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। कहानी का प्रत्येक पात्र कर्तव्य के प्रति निष्ठा एवं नैतिकता के प्रति पूर्णरूपेण सतर्क दिखाई पड़ता है और जिसकी पूर्ण परिणति के लिए वह अपना जीवन अर्पण करने से भी नहीं डरता। कहानी मनोवैज्ञानिकता के साथ-साथ दार्शनिकता से भी ओत-प्रोत है और संवेदना प्रधान होने के कारण पाठक के अन्तस्तल पर अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ध्रुवयात्रा एक अत्युत्कृष्ट कहानी है।।

(3) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – जैनेन्द्र कुमार जी की प्रस्तुत कहानी में मात्र तीन पात्र हैं-राजा रिपुदमन, रिपुदमन की प्रेमिका उर्मिला और उर्मिला के पिता आचार्य मारुति। तीनों ही एक-दूसरे से पूर्णतया सम्बद्ध और तीनों ही मुख्य एवं समस्तरीय हैं। जैनेन्द्र जी की कहानियों के पात्र हाड़-मांस से निर्मित सामान्य मनुष्य होते हैं, जिनमें बुराइयों के साथ-साथ अंच्छाइयाँ भी विद्यमान होती हैं। इनके पात्र अन्तर्मुखी होते हैं, जो सामान्य एवं विशिष्ट दोनों ही परिस्थितियों में अपना विशिष्ट परिचय प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत कहानी के पात्र भी ऐसे ही हैं, जिनमें से एक जीवन की परिस्थितियों से असन्तुष्ट हो विद्रोही बन जाता है, दूसरा क्षणिक विद्रोही हो आत्म-त्यागी हो जाता है और तीसरी अन्ततोगत्वा समझौतावादी हो जाता है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी के पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिकता से युक्त है।

(4) कथोपकथन या संवादे-योजना – कहानी के संवाद छोटे, सरल, पात्रानुकूल तथा कथा के विकास में सहायक हैं। जैनेन्द्र जी अपने पात्रों के मनोभावों को सरलता से व्यक्त करने में सफल हुए हैं। लगभग पूरी कहानी ही संवादों पर आधारित है, अतः संवाद-योजना की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ कहानी है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

दूर जमुना किनारे पहुँचकर राजा ने कहा, “अब कहो, मुझे क्या कहती हो?”
कहती हैं कि तुम क्यों अपना काम बीच में छोड़कर आये?”
“मेरा काम क्या है?”
“मेरी और मेरे बच्चे की चिन्ता जरूर तुम्हारा काम नहीं है। मैंने कितनी बार तुमसे कहा, तुम उससे ज्यादा के लिए हो?”
“उर्मिला, अब भी मुझसे नाराज हो?”
“नहीं, तुम पर गर्वित हूँ।”
“मैंने तुम्हारा घर छुड़ाया। सब में रुसवा किया। इज्जत ली। तुमको अकेला छोड़ दिया। उर्मिला, मुझे जो कहा जाय, थोड़ा। पर अब बताओ, मुझे क्या करने को कहती हो? मैं तुम्हारा हूँ। रियासत का हूँ, न धुव का हूँ। मैं बस, तुम्हारा हूँ। अब कहो।”

(5) देश-काल तथा वातावरण – प्रस्तुत कहानी सन् 1960 के आस-पास की है। तत्कालीन सामाजिक वातावरण के अनुरूप ही जैनेन्द्र जी ने कहानी के पात्रों तथा उनके व्यवहार को प्रदर्शित किया है। कहानी का वातावरण सजीव है। प्रस्तुत कहानी में जीवन्त वातावरण की पृष्ठभूमि पर मानवीय प्रेम और संवेदना के मर्मस्पर्शी चित्र उकेरे गये हैं, जिसमें कहानीकार को पूर्ण सफलता मिली है। एक उदाहरण देखिए
समय सब पर बह जाता है और अखबार कल को पीछे छोड़ आज पर चलते हैं।राजा रिपु नयेपन से जल्दी छूट गये। ऐसे समय सिनेमा के एक बॉक्स में उर्मिला से उन्होंने भेंट की। उर्मिला बच्चे को साथ लायी थी। राजा सिनेमा के द्वार पर उसे मिले और बच्चे को गोद में लेना चाहा। उर्मिला ने जैसे यह नहीं देखा और अपने कन्धे से उसे लगाये वह उनके साथ जीने पर चढ़ती चली गयी। बॉक्स में आकर सफलतापूर्वक उन्होंने बिजली का पंखा खोल दिया। पूछा, ‘कुछ मँगाऊँ?’ ‘नहीं।’

(6) भाषा-शैली – अपनी कहानियों में जैनेन्द्र जी सरल, स्वाभाविक और व्यावहारिक भाषा का प्रयोग करते हैं, जिसमें संस्कृत के तत्सम, उर्दू, अंग्रेजी तथा देशज शब्दों का भी प्रचुरता से प्रयोग करते हैं। इसी कारण इनकी भाषा सहज, बोधगम्य एवं भावपूर्ण हो जाती है। इनके शब्द-चयन भावों के अनुकूल होते हैं तथा शब्दों की रचना पात्रों की भूमिका को साकार कर देती है। प्रस्तुत कहानी की भाषा की भी ये ही विशेषताएँ हैं। इस कहानी में इन्होंने मुख्य रूप से कथा शैली को अपनाया है, जिसमें वार्ता शैली का प्राचुर्य तथा दृष्टान्त शैली का अल्पांश दृष्टिगोचर होता है। इनकी भाषा-शैली का एक उदाहरण अग्रवत् है

प्रेम से तो नाराज़ नहीं हो?विवाह का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। प्रेम के निमित्त से उसकी सृष्टि है। विवाह की बात तो दुकानदारी की है। सच्चाई की बात प्रेम है। इस बारे में तुम अपने से बात करके देखो। वह बात डायरी में दर्ज कीजिएगा। अब परसों मिलेंगे। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि भाषा-शैली की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।।

(7) उद्देश्य – प्रस्तुत कहानी में कहानीकार जैनेन्द्र जी ने बताया है कि प्रेम एक पवित्र बन्धन है और विवाह एक सामाजिक बन्धन। प्रेम में पवित्रता होती है और विवाह में स्वार्थता। प्रेम की भावना व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करती है। उर्मिला कहती है, “हाँ, स्त्री रो रही है, प्रेमिकी प्रसन्न है। स्त्री की मत सुनना, मैं भी पुरुष की नहीं सुनँगी। दोनों जने प्रेम की सुनेंगे। प्रेम जो अपने सिवा किसी दया को, किसी कुछ को नहीं जानता।” निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि प्रेम को ही सर्वोच्च दर्शाना इस कहानी का मुख्य उद्देश्य है, जिसमें कहानीकार
को पूर्ण सफलता मिली है।

प्रश्न 3:
‘धुवयात्रा’ कहानी के आधार पर उर्मिला का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की प्रमुख स्त्री पात्र के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ध्रुवयात्रा’ कहानी के आधार पर उर्मिला के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती है।

(1) सुसंस्कारित युवती – प्रस्तुत कहानी की नायिका उर्मिला’ एक सुसंस्कारित युवती है। उसे बचपन में अपनी माता द्वारा अच्छे संस्कार प्राप्त हुए हैं। इसीलिए वह राजा रिपुदमन को अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होने के लिए प्रेरित करती रहती है।

(2) सच्ची प्रेमिका – अपनी युवावस्था में उर्मिला रिपुदमन के प्रेमपाश में बद्ध हो जाती है। उस समय रिपुदमन किन्हीं सामाजिक कारणों से विवाह करने से मना कर देता है। बाद में जब उसे पता चलता है कि वह माँ बनने वाली है तो वह उससे विवाह के लिए कहता है, तब वह इनकार कर देती है और कहती है कि मुझे तुमसे प्रेम है। प्रेम और विवाह में अन्तर होता है। प्रेम पवित्रतायुक्त होता है और विवाह स्वार्थयुक्त।” अत: वह उसकी सच्ची प्रेमिका ही बने रहना चाहती है, स्त्री नहीं।

(3) स्वतन्त्र विचारों वाली – उर्मिला स्वतन्त्र और स्पष्ट विचारों वाली युवती है। रिपुदमन के पूछने पर कि क्या वह विवाह करना नहीं चाहती। वह विवाह के लिए स्पष्ट मना कर देती है। वह रिपुदमन से कहती है कि, “तुम्हारा शरीर स्वस्थ है और रक्त उष्ण है, तो स्त्रियों की कहीं कमी नहीं है। मै तुम्हारे लिए स्त्री नहीं हूँ, प्रेमिका हूँ।इसलिए किसी स्त्री के प्रति मैं तुममें निषेध नहीं चाह सकती।” निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है। कि वह वर्तमान युग में प्रचलित ‘स्त्री-पुरुष के साथ-साथ रहने की उत्कृष्ट विचारधारा की पोषक है।

(4) दार्शनिक विचारों से युक्त – उर्मिला शिक्षित, स्वतन्त्र और स्पष्ट विचारों वाली युवती तो है ही, कहानी के पढ़ने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि उसके विचारों में दार्शनिकता की विद्यमानता भी है। उसके विचार कभी भी छिछले स्तर पर प्रकट नहीं होते, उनमें दार्शनिकता का गम्भीर स्वर गुंजित होता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है
‘उर्मिला, सिद्धि मृत्यु से पहले कहाँ है ?’
‘वह मृत्यु के भी पार है, राजा! इससे मुझ तक लौटने की आशा लेकर तुम नहीं आओगे। सौभाग्य का क्षण मेरे लिए शाश्वत है। उसका पुनरावर्तन कैसा?’
‘उर्मिला, तो मुझे जाना ही होगा? तुम्हारा प्रेम दया नहीं जानेगा?’
‘यह क्या कहते हो, राजा! मैं तुम्हें पाने के लिए भेजती हूँ, और तुम मुझे पाने के लिए जाते हो। यही तो मिलने की राह है। तुम भूलते क्यों हो?’

(5) ज्ञानवान् – उर्मिला अच्छे संस्कारों में पालित-पोषित हुई ज्ञानवान् स्त्री है। उसके बोलने मात्र से ही उसका यह गुण स्पष्ट हो जाता है। वह प्रेमिका और स्त्री के कर्तव्य को अलग-अलग मानती है। वह कहती है कि
“शास्त्र से स्त्री को नहीं जाना जा सकता। स्त्री को मात्र प्रेम से जाना जा सकता है।”

(6) पित् स्नेही – उर्मिला के मन में अपने पिता के प्रति अपार स्नेह है। वह नहीं जानती कि उसका पिता कौन है? कहानी के उत्तरार्द्ध में आचार्य मारुति यह स्पष्ट करते हैं कि वे ही उसके पिता हैं, तब वह स्तब्ध होकर उनको देखती रह जाती है और यह कहती हुई चली जाती है कि मुझ हतभागिन को भूल जाइएगा।

(7) मातृभाव से युक्त – उर्मिला ने यद्यपि बिना वैवाहिक जीवन में प्रवेश किये ही पुत्र प्राप्त किया है, तथापि उसमें मातृभाव की कमी कदापि नहीं है। वह रिपुदमन से कहती है, ”मेरे लिए क्या यही गौरव कम है कि मैं तुम्हारे पुत्र की माँ हूँ।”दुनिया को भी जताने की जरूरत नहीं है कि मेरा बालक तुम्हारा है। मेरा जानना मेरे गर्व को काफी है।”

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उर्मिला ही इस कहानी की सर्व प्रमुख पात्र और नायिका के रूप में नायक है। कहानीकार को अपनी कल्पना में किसी स्त्री को जिन-जिन गुणों का होना अभीष्ट प्रतीत हुआ वे सभी गुण उसने प्रस्तुत कहानी की नायिका में समाविष्ट कर उसके चरित्र को अतीव गरिमा प्रदान की है।

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