UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 हम और हमारा आदर्श

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name हम और हमारा आदर्श (डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 हम और हमारा आदर्श (डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम की साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख कीजिए।
या
डॉ० ए०पी०जे० का साहित्यिक परिचय दीजिए एवं प्रमुख कृतियों का उल्लेख कीजिए।
या
डॉ० ए०पी०जे० का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय–डॉ० ए०पी० जे० अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् में एक मुसलमान परिवार में हुआ। उनके पिता जैनुलअबिदीन एक नाविक थे और उनकी माता अशिअम्मा एक गृहणी थीं, उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें छोटी उम्र से ही काम करना पड़ा। अपने पिता की आर्थिक मदद के लिए बालक कलाम स्कूल के बाद समाचार-पत्र वितरण का कार्य करते थे। अपने स्कूल के दिनों में कलाम पढ़ाई-लिखाई में सामान्य थे, पर नयी चीज सीखने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। उनके अन्दर सीखने की भूख थी और वो पढ़ाई पर घंटों ध्यान देते थे। उन्होंने अपनी स्कूल की पढ़ाई रामनाथपुरम स्वार्ज मैट्रिकुलेशन स्कूल से पूरी की और उसके बाद तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ से उन्होंने सन् 1954 में भौतिक विज्ञान में स्नातक किया। वर्ष 1960 में कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कलाम ने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक के तौर पर भर्ती हुए। कलाम ने अपने कैरियर की शुरुआत भारतीय सेना के लिए एक छोटे हेलीकॉप्टर का डिजाइन बनाकर किया।

वर्ष 1969 में उनका स्थानान्तरण भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) में हुआ। यहाँ वो भारत के सैटेलाइट लांच ह्वीकल परियोजना के निदेशक के तौर पर नियुक्त किये गये थे। इसरो में शामिल होना कलाम के कैरियर का सबसे अहम मोड़ था और जब उन्होंने सैटेलाइट लांच ह्रीकल परियोजना पर कार्य आरम्भ किया तब उन्हें लगा जैसे वो वही कार्य कर रहे हैं जिसमें उनका मन लगता है।

1963-64 के दौरान उन्होंने अमेरिका के अन्तरिक्ष संगठन नासा की भी यात्रा की। परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना, जिनके देख-रेख में भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया, ने कलाम को वर्ष 1974 में पोखरण में परमाणु परीक्षण देखने के लिए भी बुलाया था। भारत सरकार ने महत्त्वाकांक्षी ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ का प्रारम्भ डॉ० कलाम के देख-रेख में किया। वह इस परियोजना के मुख्य कार्यकारी थे। इस परियोजना ने देश को अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें दी हैं। जुलाई, 1992 से लेकर दिसम्बर, 1999 तक डॉ० कलाम प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के सचिव थे। भारत ने पहला दूसरा परमाणु परीक्षण इसी दौरान किया था। इसमें एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आर० चिदम्बरम के साथ डॉ० कलाम इस परियोजना के समन्वयक थे। इस दौरान मिले मीडिया कवरेज ने उन्हें देश का सबसे बड़ा परमाणु वैज्ञानिक बना दिया।

एक रक्षा वैज्ञानिक के तौर पर उनकी उपलब्धियों और प्रसिद्धि के मद्देनजर एन०डी०ए० की गठबंधन सरकार ने उन्हें वर्ष 2002 में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया तथा 25 जुलाई, 2002 को उन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। डॉ० कलाम देश के ऐसे तीसरे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही भारतरत्न से नवाजा जा चुका था।

कलाम हमेशा से देश के युवाओं और उनके भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में बातें करते थे। इसी सम्बन्ध में उन्होंने देश के युवाओं के लिए “ह्वाइट कैन आई गिव’ पहल की शुरुआत भी की जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार का सफाया है। देश के युवाओं में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें 2 बार (2003 और 2004) ‘एम०टी०वी० यूथ आइकॉन ऑप द इयर अवार्ड’ के लिए मनोनीत भी किया गया था। शिक्षण के अलावा डॉ० कलाम ने कई पुस्तकें भी लिखीं जिनमें प्रमुख हैं–‘इंडिया 2020 : अ विजन फॉर द न्यू मिलेनियम, ‘विंग्स ऑफ फायर : ऐन ऑटोबायोग्राफी’, ‘इग्नाइटेड माइंड्स : अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया’, ‘मिशन इंडिया’, ‘इंडोमिटेबल स्पिरिट’ आदि।

देश और समाज के लिए किये गये उनके कार्यों के लिए डॉ० कलाम को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। लगभग 40 विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद की डॉक्टरेट की उपाधि दी और भारत सरकार ने उन्हें पदम्भूषण, पदविभूषण और भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत किया। 26 जुलाई, 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलाँग, में अध्यापन कार्य के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद करोड़ों लोगों के प्रिय और चहेते डॉ० अब्दुल कलाम परलोक सिधार गये।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोए

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
मैं खासतौर से युवा छात्रों से ही क्यों मिलता हूँ? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं अपने छात्र जीवन के दिनों के बारे में सोचने लगा। रामेश्वरम् के द्वीप से बाहर निकलकर यह कितनी लम्बी यात्रा रही। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो विश्वास नहीं होता। आखिर वह क्या था जिसके कारण यह सम्भव हो सका? महत्त्वाकांक्षा? कई बातें मेरे दिमाग में आती हैं। मेरा ख्याल है कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि मैंने अपने योगदान के मुताबिक ही अपना मूल्य आँका। बुनियादी बात जो आपको समझनी चाहिए वह यह है कि आप जीवन की अच्छी चीजों को पाने का हक रखते हैं, उनका जो ईश्वर की दी हुई हैं। जब तक हमारे विद्यार्थियों और युवाओं को यह भरोसा नहीं होगा कि वे विकसित भारत के नागरिक बनने के योग्य हैं तब तक वे जिम्मेदार और ज्ञानवान् नागरिक भी कैसे बन सकेंगे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम खासतौर से किससे मिलते थे?
(iv) डॉ० अब्दुल कलाम की कामयाबी के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात क्या रही?
(v) व्यक्ति किन चीजों को पाने का हक रखता है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित’डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम’ के तेजस्वी मन से “हम और हमारा आदर्श” का सम्पादित अंश है।
अथवा
पाठ का नाम– हम और हमारा आदर्श।
लेखक का नाम-डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–अनेकानेक उपलब्धियों एवं प्रसिद्धियों के धनी डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम ने प्रस्तुत अंश के माध्यम से भारतीय युवाओं को यह बताना चाहा है कि जब तक उन्हें यह विश्वास नहीं होगा कि वे देश के नागरिक बनने की सम्पूर्ण योग्यता स्वयं में रखते हैं तब तक वे एक | जिम्मेदार और ज्ञानवान नागरिक नहीं बन सकते अर्थात् जब तक व्यक्ति को अपनी कीमत का आकलन नहीं होगा तब तक वह महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकता।
(iii) डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम खासतौर से देश के युवा छात्रों से मिलते थे।
(iv) डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम की कामयाबी के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने अपने योगदान के मुताबिक ही अपने मूल्य का आकलन किया।
(v) व्यक्ति उन सभी अच्छी चीजों को पाने का हक रखता है जो ईश्वर की दी हुई हैं।

प्रश्न 2.
मैं यह नहीं मानता की समृद्धि और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी हैं या भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना कोई गलत सोच है। उदाहरण के तौर पर, मैं खुद न्यूनतम वस्तुओं का भाग करते हुए जीवन बिता रहा हूं लेकिन मैं सर्वत्र समृद्धि की कद्र करता हूँ, क्योंकि समृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो अंतत: हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक हैं। आप अपने आस-पास देखेंगे तो पाएँगे कि खुद प्रकृति भी कोई काम आधे-अधूरे मन से नहीं करती। किसी बगीचे में जाइए। मौसम में आपको फूलों की बहार देखने को मिलेगी। अथवा ऊपर की तरफ ही देखें, यह ब्रह्माण्ड आपके अनंत तक फैला दिखाई देगा, आपके यकीन से भी परे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक किनको एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानता?
(iv) डॉ० कलाम संवृद्धि की कद्र क्यों करते हैं?
(v) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने छात्रों को क्या संदेश दिया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित ‘डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम’ के तेजस्वी मन से “हम और हमारा आदर्श” का सम्पादित अंश है।।
अथवा
पाठ का नाम- हम और हमारा आदर्श।
लेखक का नाम-डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से अब्दुल कलाम जी समृद्धि की कद्र करते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को कामयाब होने के लिए वह सभी हरसम्भव प्रयास करने चाहिए जो वह कर सकता है। किसी भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए अर्थात् काम करते हुए उससे ऊबकर उसे बीच में नहीं छोड़ देना चाहिए। इसके लिए प्रकृति का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि यदि आप अपने आस-पास देखें तो आपको ऐसे प्रकृति के बहुत-से उदाहरण मिल जाएँगे जो कि पूर्ण होते दिखेंगे यानी प्रकृति अपने किसी भी काम को अधूरे मन से नहीं करती। आप किसी फूलों के बाग में ही पहुँच जाइए; वहाँ मौसम में आपको फूलों की बहार देखने को मिलेगी, क्योंकि मौसम ने अपने काम को अधूरा नहीं छोड़ा। या फिर आप अपने ऊपर की ओर ही देखें तो आपको यह ब्रह्माण्ड इस तरह विस्तृत दिखाई देगा जिसका कोई अन्त नहीं है, जहाँ तक आप सोच भी नहीं सकते अर्थात् यह नभ भी हमें विस्तृत होने का यानी पूर्णता का सन्देश देता है।
(iii) लेखक संवृद्धि और अध्यात्म को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानता।
(iv) डॉ० कलाम सम्वृद्धि की कद्र इसलिए करते हैं, क्योकि संवृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो अन्तत: हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है।
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने छात्रों को प्रगति करने के लिए किसी भी कार्य को पूर्ण करके ही चैन लेने का सन्देश दिया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements (d-एवं f-ब्लॉक के तत्त्व) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chapter 8 The d and f Block Elements (d-एवं f-ब्लॉक के तत्त्व).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 8
Chapter Name The d and f Block Elements
Number of Questions Solved 78
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements (d-एवं f-ब्लॉक के तत्त्व)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सिल्वर परमाणु की मूल अवस्था में पूर्ण भरित d कक्षक (4d10) हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक संक्रमण तत्व है?
उत्तर
सिल्वर (Z = 47), +2 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित कर सकता है तथा इस अवस्था में इसके 4d कक्षक अपूर्ण भरे हुए होते हैं, अत: यह एक संक्रमण तत्व है।

प्रश्न 2.
श्रेणी Sc (Z = 21) से Zn (Z = 30) में, जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम अर्थात 128 kJ mol-1 होता है, क्यों?
उत्तर
जिंक के 3d कक्षकों के इलेक्ट्रॉन आबन्धन में प्रयुक्त नहीं होते हैं, जबकि 3d श्रेणी की शेष सभी धातुओं के d कक्षक के इलेक्ट्रॉन आबन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। इसलिए श्रेणी में जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम होता है।

प्रश्न 3.
संक्रमण तत्वों की 3d श्रेणी का कौन-सा तत्व बड़ी संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है एवं क्यों?
उत्तर
मैंगनीज (Z = 25) के परमाणु में सर्वाधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। अत: यह +2 से +7 तक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है जो सबसे बड़ी संख्या है।

प्रश्न 4.
कॉपर के लिए E(M2+| M), का मान धनात्मक (+0.34 V) है। इसके सम्भावित कारण क्या हैं?
[संकेत-इसके उच्च ΔaH और ΔHyd H पर ध्यान दें।]
उत्तर
किसी धातु के लिए E(M2+| M), निम्नलिखित पदों में होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन के योग से सम्बद्ध होता है –

  • M(s) + ΔaH → M(g) (ΔaH = परमाण्विक एन्थैल्पी = धनात्मक)
  • M(g) + ΔiH → M2+ (g) (ΔiH = आयनन एन्थैल्पी = धनात्मक)
  • M2+ (g) + (aq) → M2+ (aq) + ΔhydH (ΔhydH = जलयोजन एन्थैल्पी = ऋणात्मक)

कॉपर की परमाण्विक एन्थैल्पी, उच्च तथा जलयोजन एन्थैल्पी कम होती हैं। इसलिए E(Cu2+| Cu) को मान धनात्मक होता है। अत: Cu(s) के Cu2+ (aq) में रूपान्तरण की उच्च ऊर्जा इसकी जलयोजन एन्थैल्पी द्वारा सन्तुलित नहीं होती है।

प्रश्न 5.
संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी (प्रथम और द्वितीय) में अनियमित परिवर्तन को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर
आयनन एन्थैल्पी में अनियमित परिवर्तन विभिन्न 3d विन्यासों के स्थायित्व की क्षमता में भिन्नता के कारण है (उदाहरण d0, d5, d10 असामान्य रूप से स्थायी होते हैं)।

प्रश्न 6.
कोई धातु अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था केवल ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में ही क्यों प्रदर्शित करती है?
उत्तर
छोटे आकार एवं उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन अथवा फ्लुओरीन तत्व, धातु को उसकी उच्च ऑक्सीकरण अवस्था तेक ऑक्सीकृत कर सकते हैं।

प्रश्न 7.
Cr2+ और Fe2+ में से कौन प्रबल अपचायक है और क्यों?
उत्तर
Fe2+ की तुलना में Cr2+ एक प्रबल अपचायक पदार्थ है।
कारण– Cr2+ से Cr3+ बनने में d4 → d3 परिवर्तन होता है, किन्तु Fe2+ से Fe3+ में d6 → d5 में परिवर्तन होता है। जल जैसे माध्यम में d5 की तुलना में d3 अधिक स्थायी है।

प्रश्न 8.
M2+ (aq) आयन (Z = 27) के लिए ‘प्रचक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
उत्तर
M परमाणु (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d7 4s2 है।
∴ M2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d7
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 1
अतः इसमें तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
∴ ‘प्रचक्रेण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण (µ) = [latex]\sqrt { n(n+2) } [/latex] B.M. = [latex]\sqrt { 3(3+2) } [/latex] B.M.
= [latex]\sqrt { 15 } [/latex] B.M. = 3.87 B.M.

प्रश्न 9.
स्पष्ट कीजिए कि Cu’ आयन जलीय विलयन में स्थायी नहीं है, क्यों? समझाइए।
उत्तर
Cu+ (aq) से Cu2+ (aq) अधिक स्थायी होता है। इसका कारण यह है कि कॉपर की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है, परन्तु Cu2+ (aq) के लिए ΔhydH, Cu+ (aq) की तुलना में अधिक ऋणात्मक होती है, इसलिए यह कॉपर की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के लिए अधिक क्षतिपूर्ति करती है। अत: अनेक कॉपर (I) यौगिक जलीय विलयन में अस्थायी होते हैं तथा निम्नलिखित प्रकार असमानुपातित होते हैं –
2Cu+ (aq) → Cu2+ (aq) + Cu (S)

प्रश्न 10.
लैन्थेनाइड आकुंचन की तुलना में एक तत्व से दूसरे तत्व के बीच ऐक्टिनाइड आकुंचन अधिक होता है, क्यों?
उत्तर
5d इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश से प्रभावी रूप से परिरक्षित रहते हैं। दूसरे शब्दों में, 5d इलेक्ट्रॉनों की श्रेणी में एक तत्व से दूसरे तत्व की ओर जाने पर दुर्बल परिरक्षण प्रभाव परिलक्षित होता है। अतः ऐक्टिनाइड आकुंचन (संकुचन) अधिक होता है।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए –

  1. Cr3+
  2. Pm3+
  3. Cu+
  4. Ce4+
  5. Co2+
  6. Lu2+
  7. Mn2+
  8. Th4+

उत्तर

  1. Cr3+ : [Ar] 3d3
  2. Pm3+ : [Xe] 4f4
  3. Cu+ : [Ar] 3d10
  4. Ce4+ : [Xe] 4f0
  5. Co2+ : [Ar] 3d7
  6. Lu2+ : [Xe] 4f14 5d1
  7. Mn2+ : [Ar] 3d5
  8. Th4+ : [Rn] 5f0

प्रश्न 2.
+3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के सन्दर्भ में Mn2+ के यौगिक Fe2+ के यौगिकों की तुलना में अधिक स्थायी क्यों हैं?
उत्तर
Mn2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 है, जबकि Fe2+ का [Ar] 3d6 है। चूंकि Mn2+ में अर्द्ध-पूर्ण कक्ष (3d5) होती है, जो कि Fe2+ की 3d6 कक्ष से अधिक स्थायी है, इसलिए Mn2+ यौगिक सरलता से Mn3+ में ऑक्सीकृत नहीं होते हैं क्योंकि इनकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी बहुत अधिक होती है। इसके विपरीत, Fe2+ यौगिक कम द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के कारण Fe3+ में सरलता से ऑक्सीकृत हो जाता है। यही कारण है कि Mn2+ यौगिक अपनी +3 अवस्था के लिए ऑक्सीकरण के प्रति Fe2+ से अधिक स्थायी होते हैं।

प्रश्न 3.
संक्षेप में स्पष्ट कीजिए कि प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था कैसे अधिक स्थायी होती जाती है?
उत्तर
प्रथम संक्रमण श्रेणी में बायें से दाये जाने पर IE1 + IE2 का योग बढ़ता जाता है। इसके परिणामस्वरूप M2+ आयन बनाने की प्रवृत्ति घटती जाती है। यही कारण है कि श्रेणी के प्रथम अर्द्ध भाग में +2 अवस्था अधिकाधिक स्थायी होती है।

प्रश्न 4.
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस सीमा तक ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निर्धारित करते हैं? उत्तर को उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जिस ऑक्सीकरण अवस्था में आयनों में पूर्ण भरी या अर्द्ध भरी d कक्ष होती है, वे आयन अधिक स्थायी होते हैं। जैसे Mn की +2 अवस्था इसकी अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं की अपेक्षा अधिक स्थायी होती है। जैसे Mn की +2 अवस्था इसकी अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं की अपेक्षा अधिक स्थायी होती है। क्योंकि Mn2+ में अर्द्ध भरी 3d5 कक्ष होती है। इसी प्रकार Zn की +2 अवस्था इसकी सबसे अधिक स्थायी अवस्था होती है क्योंकि इसमें पूर्ण भरी 3d10 कक्ष होती है।

प्रश्न 5.
संक्रमण तत्वों की मूल अवस्था में नीचे दिए गए d इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों में कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होगी?
3d3, 3d5, 3d8 तथा 3d4
उत्तर

  • 3d3 (वैनेडियम) : (+2), +3, +4, +5
  • 3d5 (क्रोमियम) : +3, +4, +6
  • 3d5 (मैंग्नीज) : +2, +4, +6, +7
  • 3d8 (कोबाल्ट) : +2, +3
  • 3d4 : इस विन्यास वाला कोई भी तत्त्व तलस्थ अवस्था में नहीं पाया जाता है।

प्रश्न 6.
प्रथम संक्रमण श्रेणी के ऑक्सो-धातुऋणायनों का नाम लिखिए, जिसमें धातु संक्रमण श्रेणी की वर्ग संख्या के बराबर ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती है।
उत्तर
Cr2O2-7 तथा CrO2-4 में क्रोमियम +6 अवस्था प्रदर्शित करता है, जो कि इसके समूह की संख्या (6) के बराबर है।
MnO4 में Mn + 7 अवस्था प्रदर्शित करता है, जो कि इसकी समूह की संख्या (7) के बराबर है। VO3 में V+ 5 अवस्था प्रदर्शित करता है, जो कि इसकी समूह की संख्या (5) के बराबर है।

प्रश्न 7.
लैन्थेनाइड आकुंचन क्या है? लैन्थेनाइड आकुंचन के परिणाम क्या हैं? (2015, 16, 17, 18)
उत्तर
लैन्थेनाइड आकुंचन (Lanthanoid Contraction) – लैन्थेनाइड श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्याएँ एक तत्व से दूसरे तत्व तक घटती हैं, परन्तु यह कमी अत्यन्त कम होती है। उदाहरणार्थ– Ce से Lu तक जाने पर परमाण्विक त्रिज्या 183 pm से 173 pm तक घट जाती है तथा यह कमी केवल 10 pm है। इसी प्रकार Ce3+ से Lu3+ आयन तक जाने पर आयनिक त्रिज्या 103 pm से घटकर 85 pm रह जाती है तथा यह कमी केवल 18 pm है। अत: परमाणु क्रमांक में 14 की वृद्धि के लिए, परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्याओं में होने वाली कमी अत्यन्त कम है। यह कमी अन्य वर्गों तथा आवर्तो के तत्वों की तुलना में अत्यल्प है।

सारणी-लैन्थेनम तथा लैन्थेनाइडों के परमाण्विक तथा
आयनिक त्रिज्याओं में परिवर्तन (pm)
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 2
लैन्थेनाइड तत्वों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर उनके परमाणु तथा आयनिक आकारों में होने वाली स्थिर कमी ‘लैन्थेनाइड आकुंचन’ कहलाती है।
त्रिसंयोजी लैन्थेनॉइडों (Ln3+) की आयनिक त्रिज्याओं में कमी चित्र-1 में दर्शायी गई है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 3
लैन्थेनाइड आकुंचन का कारण (Cause of Lanthanide Contraction) – लेन्थेनाइड श्रेणी में एक तत्व से दूसरे तत्व तक जाने पर नाभिकीय आवेश एक इकाई बढ़ता है तथा एक इलेक्ट्रॉन जुड़ता है। ये नए इलेक्ट्रॉन समानान्तर 4f- उपकोशों में जुड़ते हैं। यद्यपि एक 4f- इलेक्ट्रॉन का दूसरे 4f- इलेक्ट्रॉन पर परिरक्षण प्रभाव (नाभिकीय आवेश से), f- कक्षकों के अत्यन्त विस्तृत आकार के कारण, कम होता है। यद्यपि नाभिकीय आवेश प्रत्येक पद पर एक इकाई बढ़ जाता है, इसलिए परमाणु क्रमांक तथा नाभिकीय आवेश बढ़ने पर प्रत्येक 4f- इलेक्ट्रॉन द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ जाता है, परिणामस्वरूप सम्पूर्ण 4f- इलेक्ट्रॉन कोश प्रत्येक तत्व के जुड़ने पर आकुंचित हो जाता है, यद्यपि यह कमी अत्यन्त अल्प होती है। इसके परिणामस्वरूप परमाणु क्रमांक बढ़ने पर लैन्थेनाइडों के आकार में नियमित हस पाया जाता है। क्रमिक अपचयनों का योग कुल लैन्थेनाइड आकुंचन देता है।

लैन्थेनाइड आकुंचन के परिणाम (Consequences of Lanthanide Contraction) – लैन्थेनाइड आकुंचन के महत्त्वपूर्ण परिणाम निम्नलिखित हैं –
(1) द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणियों की समानता (Resemblance of second and third transition series) – आवर्त सारणी में लैन्थेनाइडों से पहले तथा बाद में आने वाले तत्वों के
आपेक्षिक गुणों पर इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अग्रलिखित सारणी से स्पष्ट होता है कि Sc से Y तथा Y से La तक आकार में नियमित वृद्धि होती है।
सारणी- d-ब्लॉक के तत्वों की परमाणु त्रिज्याएँ (pm में)
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 4
लैन्थेनाइड आकुंचन
इसी प्रकार हम अन्य वर्गों में आकार में सामान्य वृद्धि की अपेक्षा कर सकते हैं, यद्यपि लैन्थेनाइडों के पश्चात् द्वितीय से तृतीय संक्रमण श्रेणियों में त्रिज्याओं की वृद्धि लगभग नगण्य होती है।
Ti → Zr → Hf
V → Nb → Ta आदि
तत्वों के युग्मों; जैसे- Zr – Hf, Nb – Ta, Mo – W आदि के आकार समान (लगभग) होते हैं तथा इन तत्वों के गुण भी समान होते हैं। अत: लैन्थेनाइड आकुंचन के परिणामस्वरूप द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणियों के तत्व, प्रथम तथा द्वितीय संक्रमण श्रेणियों के तत्वों की तुलना में परस्पर अत्यधिक समानता रखते हैं।

(2) लैन्थेनाइडों में समानता (Similarity among lanthanides) – लैन्थेनाइडों की त्रिज्याओं में अत्यन्त अल्प-परिवर्तन के कारण, इनके रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं। अतः तत्वों को शुद्ध अवस्था में पृथक्कृत करना अत्यन्त कठिन होता है। पुनरावृत्त प्रभाजी क्रिस्टलन अथवा आयन-विनिमय तकनीकों पर आधारित आधुनिक विधियों द्वारा इनके त्रिसंयोजी आयनों के आकारों में अत्यल्प-अन्तर के आधार पर इन्हें पृथक्कृत किया जाता है। इन विधियों द्वारा तत्वों के गुणों जैसे विलेयता, संकुल आयन निर्माण, जलयोजन आदि में बहुत कम अन्तर के आधार पर इन्हें पृथक्कृत किया जाता है।

(3) क्षारकता अन्तर (Basicity differences) – लैन्थेनाइड आकुंचन के कारण लैन्थेनाइड आयनों का आकार, परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ नियमित रूप से घटता है। आकार में कमी के फलस्वरूप लैन्थेनाइड आयन तथा OH आयनों के मध्य इनके सहसंयोजक गुण La3+ से Lu3+ तक बढ़ते हैं, इसलिए परमाणु क्रमांक बढ़ने पर हाइड्रॉक्साइडों की क्षारकीय सामर्थ्य घटती है। अत: La(OH)3 अधिकतम क्षारकीय है, जबकि Lu(OH)3 सबसे कम क्षारकीय है।

प्रश्न 8.
संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं? d- ब्लॉक के तत्वों में कौन-से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते?
उत्तर
संक्रमण धातुओं के सामान्य अभिलक्षण (General Characteristics of Transition Elements) – संक्रमण धातुओं (d-ब्लॉक के तत्वों) के सामान्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं –

  1. लगभग सभी संक्रमण तत्व अभिधात्विक गुण जैसे उच्च तनन सामर्थ्य (tensile strength), तन्यता (ductility), वर्धनीयता (malleability), उच्च तापीय तथा विद्युत चालकता तथा धात्विक चमक दर्शाते हैं।
  2. मर्करी को छोड़कर, जो कमरे के ताप पर द्रव है, अन्य संक्रमण तत्वों की अभिधात्विक संरचनाएँ होती हैं।
  3. इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं तथा असंक्रमण तत्वों की तुलना में इनकी वाष्पन ऊष्मा उच्च होती है।
  4. s- ब्लॉक तत्वों की तुलना में संक्रमण तत्वों के घनत्व उच्च होते हैं।
  5. d- ब्लॉक के तत्वों की प्रथम आयनन ऊर्जाएँ 5-ब्लॉक के तत्वों से अधिक, परन्तु p-ब्लॉक के तत्वों से कम होती हैं।
  6. इनकी प्रवृत्ति विद्युत धनात्मक होती है।
  7. इनमें से अधिकांश तत्व रंगीन यौगिक बनाते हैं।
  8. इनमें संकुल बनाने की प्रवृत्ति अत्यधिक होती है।
  9. ये अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।
  10. इनके यौगिक सामान्यतया अनुचुम्बकीय प्रवृत्ति के होते हैं।
  11. ये अन्य धातुओं के साथ मिश्रधातु (alloy) बनाते हैं।
  12. ये कुछ तत्वों; जैसे हाइड्रोजन, बोरॉन, कार्बन, नाइट्रोजन आदि के साथ अन्तराकाशी यौगिक बनाते हैं।
  13. अधिकांश संक्रमण धातुएँ जैसे Mn, Ni, Co, Cr, V, Pt आदि तथा इनके यौगिक उत्प्रेरकों के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं।

d- ब्लॉक के तत्व संक्रमण धातुएँ कहलाते हैं क्योंकि ये तत्व अधिक विद्युत-धनात्मक 5-ब्लॉक के तत्वों तथा कम विद्युत-धनात्मक s- ब्लॉक के तत्वों से मध्यवर्ती गुण प्रदर्शित करते हैं तथा आवर्त सारणी में इनका स्थान s- तथा p- ब्लॉक के तत्वों के मध्य में है।
Zn, Cd तथा Hg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सामान्य सूत्र (n – 1)d10 ns2 से प्रदर्शित किया जाता है। इन तत्वों में कक्षक तलस्थ (सामान्य) अवस्था में तथा साधारण ऑक्सीकरण अवस्थाओं में भी पूर्णपूरित होते हैं अर्थात् इनकी परमाण्विक अवस्था अथवा किसी भी एक आयनिक अवस्था में उपकोश अपूर्ण नहीं होते हैं, इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 9.
संक्रमण धातुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस प्रकार असंक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से भिन्न हैं?
उत्तर
संक्रमण तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n – 1)d1 – 10 ns1 – 2 प्रकार के होते हैं तथा इस प्रकार इनमें अपूर्ण d-ऑर्बिटल होती है जबकि असंक्रमण तत्त्वों में d-ऑर्बिटल नहीं पायी जाती है। इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns1 – 2 या ns2 np1 – 6 प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 10.
लैन्थेनाइडों द्वारा कौन-कौन सी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित की जाती हैं? (2014)
उत्तर
लैन्थेनाइडों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation States of Lanthanides) – आवर्त सारणी के वर्ग 3 के सदस्यों से प्रत्याशित होता है कि लेन्थेनाइडों की एकसमान +3 ऑक्सीकरण अवस्था उनकी एक विशेषता है। त्रिधनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था 6s2 इलेक्ट्रॉन और एकाकी 5d-इलेक्ट्रॉन अथवा यदि कोई 5d- इलेक्ट्रॉन उपस्थित न हो तो f- इलेक्ट्रॉनों में से एक के उपयोग के अनुसार होती है। प्रथम तीन आयनन एन्थैल्पियों का योग अपेक्षाकृत निम्न होता है जिससे ये तत्व उच्च धनविद्युती होते हैं और तत्परता से +3 आयन बना लेते हैं। यद्यपि जलीय विलयन में तथा ठोस अवस्था में सीरियम (Ce4+) चर्तुधनात्मक तथा सैमेरियम, यूरोपियम और इटर्बियम (Sm2+, Eu2+ और Yb2+) द्विधनात्मक आयन दे सकते हैं। अन्य तत्व ठोस अवस्था में +4 अवस्था दे सकते हैं। MX3 का अपचयन न केवल MX2 अपितु विशेष स्थिति में जटिल अपचयित स्पीशीज भी दे सकता है।

लैन्थेनाइडों के लिए +3 ऑक्सीकरण अवस्था की धारणा पर्याप्त दृढ़ हो गई है तथा अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं को प्रायः असंगत’ कहा जाता है। विभिन्न लैन्थेनाइडों की ऐसी असंगत ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अग्र प्रकार प्रदर्शित की गई हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 5
यदि हम यह मान लें कि रिक्त, अर्द्धपूर्ण या पूर्ण f- उपकोश के साथ विशेष स्थायित्व सम्बन्धित होता है। तो एक निश्चित सीमा तक +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाओं की उपस्थिति का इलेक्ट्रॉनिक संरचनाओं के साथ सामंजस्य किया जा सकता है। इस प्रकार La, Gd और Lu केवल त्रिधनात्मक आयन निर्मित करते हैं क्योंकि तीन इलेक्ट्रॉनों के निष्कासन से La3+ आयन में उत्कृष्ट गैस का विन्यास बन जाता है। Gd3+ तथा Lu3+ आयनों में क्रमशः स्थायी विन्यास 4f7 तथा 4f14 से इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन नहीं होता क्योंकि M3+ आयनों की अपेक्षा M2+ अथवा M+ आयनों की जालक अथवा जलयोजन ऊर्जाएँ लघु M3+ आयनों के लवणों की योगात्मक जालक या जलयोजन ऊर्जाओं की अपेक्षा कम होगी।

सबसे अधिक स्थायी द्वि या चतुर्धनात्मक आयन उन तत्वों द्वारा निर्मित होते हैं जो ऐसा करके f9, f7 तथा f14 विन्यास प्राप्त कर सकते हों। इस प्रकार सीरियम +4 ऑक्सीकरण अवस्था में आकर f0 विन्यास प्राप्त कर लेता है। यूरोपियम तथा इटर्बियम +2 ऑक्सीकरण अवस्था में क्रमशः f7 तथा f14 विन्यास प्राप्त कर लेते हैं। ये तथ्य इस धारणा का समर्थन करते प्रतीत होते हैं कि लैन्थेनाइडों के लिए +3 के अतिरिक्त दूसरी ऑक्सीकरण अवस्थाओं का अस्तित्व निर्धारित करने में f0, f7 तथा f14 विन्यासों का विशेष स्थायित्व महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह तर्क कम निर्णयात्मक हो जाता है जब हम देखते हैं कि सैमेरियम और थूलियम f6 तथा f13 विन्यास रखते हुए M2+ आयन बनाते हैं, M+ आयन नहीं।

साथ ही प्रेजियोडिमियम एवं नियोडिमियम f1 तथा f2 विन्यासों के साथ M4+ आयन बनाते हैं, परन्तु कोई पंच या षट-संयोजक प्रकार के आयन नहीं बनाते। इसमें सन्देह नहीं है कि Sm (II) और विशेषकर Tm (II), Pr (IV) तथा Nd (IV) अवस्थाएँ बहुत अस्थायी हैं, परन्तु यह विचार भी संदिग्ध है कि f0, f7 या f14 विन्यास के केवल समीप पहुँच जाना भी स्थायित्व के लिए सहायक होता है चाहे ऐसा कोई विन्यास वस्तुतः प्राप्त नहीं भी हो। Nd2+ (f4) का अस्तित्व यह विश्वास करने के लिए विशेष निर्णयात्मक प्रमाण है कि यद्यपि f0, f7, f14 विन्यास का स्थायित्व ऑक्सीकरण अवस्थाओं का स्थायित्व निर्धारण करने में एक घटक हो सकता है, यद्यपि अन्य ऊष्मागतिकीय तथा गतिकीय घटक विशेष भी हैं जिनका समान या अधिक महत्त्व है।

प्रश्न 11.
कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए –

  1. संक्रमण धातुएँ तथा उनके अधिकांश यौगिक अनुचुम्बकीय हैं। (2014, 18)
  2. संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं।
  3. संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाती हैं।
  4. संक्रमण धातुएँ तथा इनके अनेक यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।

उत्तर
1. पदार्थों में अनुचुम्बकत्व की उत्पत्ति, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होती है। प्रतिचुम्बकीय पदार्थ वे होते हैं जिनमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं। संक्रमण धातु आयनों में प्रतिचुम्बकत्व तथा अनुचुम्बकत्व दोनों होते हैं अर्थात् इनमें दो विपरीत प्रभाव पाए जाते हैं, इसलिए परिकलित चुम्बकीय आघूर्ण इनका परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण माना जाता है। d0 (Sc3+, Ti4+) या d10 (Cu+, Zn2+) विन्यासों को छोड़कर, संक्रमण धातुओं के सभी सरल आयनों में इनके (n – 1) d उपकोशों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं; अत: ये अधिकांशत: अनुचुम्बकीय होते हैं। ऐसे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण, प्रचक्रण कोणीय संवेग तथा कक्षीय कोणीय संवेग से सम्बन्धित होता है। प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं के यौगिकों में कक्षीय कोणीय संवेग को योगदान प्रभावी रूप से शमित (quench) हो जाता है, इसलिए इसका कोई महत्त्व नहीं रह जाता।

अत: इनके लिए चुम्बकीय आघूर्ण का निर्धारण उसमें उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के आधार पर किया जाता है तथा इसकी गणना निम्नलिखित ‘प्रचक्रण मात्र’ सूत्र द्वारा की जाती है-
μ = [latex s=2]\sqrt { n(n+2) } [/latex]
यहाँ n अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है तथा ॥ चुम्बकीय आघूर्ण है जिसका मात्रक बोर मैग्नेटॉन (BM) है। अतः एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण 1.73 BM होता है।

2. संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं क्योंकि इनके परमाणुओं में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। इस कारण इनमें प्रबल अन्तरापरमाण्विक अन्योन्य-क्रियाएँ होती हैं। तथा इसलिए परमाणुओं के मध्य प्रबल आबन्ध उपस्थित होते हैं।

3. अधिकांश संक्रमण धातु आयन विलयन तथा ठोस अवस्थाओं में रंगीन होते हैं। ऐसा दृश्य प्रकाश के आंशिक अवशोषण के कारण होता है। अवशोषित प्रकाश इलेक्ट्रॉन को समान d-उपकोश के एक कक्षक से दूसरे कक्षक में उत्तेजित कर देता है। चूंकि इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण धातु आयनों के d-कक्षकों में होते हैं, इसलिए ये d-d संक्रमण कहलाते हैं। संक्रमण धातु आयनों में दृश्य प्रकाश को अवशोषित करके होने वाले d-d संक्रमणों के कारण ही ये रंगीन दिखाई देते हैं।

4. संक्रमण धातुएँ तथा इनके यौगिक उत्प्रेरकीय सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। संक्रमण धातुओं का यह गुण उनकी परिवर्तनशील संयोजकता एवं संकुल यौगिक के बनाने के गुण के कारण है। वैनेडियम (V) ऑक्साइड (संस्पर्श प्रक्रम में), सूक्ष्म विभाजित आयरन (हेबर प्रक्रम में) और निकिल (उत्प्रेरकीय हाइड्रोजनीकरण में) संक्रमण धातुओं के द्वारा उत्प्रेरण के कुछ उदाहरण हैं। उत्प्रेरक के ठोस पृष्ठ पर अभिकारक के अणुओं तथा उत्प्रेरक की सतह के परमाणुओं के बीच आबन्धों की रचना होती है। आबन्ध बनाने के लिए प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुएँ 3d एवं 4s इलेक्ट्रॉनों का उपयोग करती हैं, परिणामस्वरूप उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारक की सान्द्रता में वृद्धि हो जाती है तथा अभिकारक के अणुओं में उपस्थित आबन्ध दुर्बल हो जाते हैं। इन कारण सक्रियण ऊर्जा का मान घटे जाता है। ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तन हो सकने के कारण संक्रमण धातुएँ उत्प्रेरक के रूप में अधिक प्रभावी होती हैं।

उदाहरणार्थ– आयरन (III), आयोडाइड आयन तथा परसल्फेट आयन के बीच सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया को उत्प्रेरित करता है।

  • 2I + S2O2-8 → I2 ↑ + 2SO2-4

इस उत्प्रेरकीय अभिक्रिया का स्पष्टीकरण इस प्रकार है –

  • 2Fe3+ + 2I → 2Fe2+ +I2
  • 2Fe2+ + S2O2-8 → 2Fe3+ + 2SO2-4

प्रश्न 12.
अन्तराकाशी यौगिक क्या हैं? इस प्रकार के यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए भली प्रकार से ज्ञात क्यों हैं?
उत्तर
वे यौगिक जिनके क्रिस्टल जालक में अन्तराकाशी स्थलों को छोटे आकार वाले परमाणु अध्यासित कर लेते हैं, अन्तराकाशी यौगिक कहलाते हैं। अन्तराकाशी यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए भली प्रकार से ज्ञात होते हैं क्योंकि संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालकों में उपस्थित रिक्तियों (voids) में छोटे आकार वाले परमाणु; जैसे- H, N या C सरलता से सम्पाशित हो जाते हैं।

प्रश्न 13.
संक्रमण धातुओं की ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता असंक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता से किस प्रकार भिन्न है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
संक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्था +1 से एक के क्रमिक परिवर्तन से उच्च अवस्थाओं में परिवर्तित होती है। जैसे, मैंगनीज में यह +2, +3, +4, +5, +6, +7 पायी जाती है। असंक्रमण धातुओं में परिवर्तन चयनात्मक होता है तथा सामान्य रूप से 2 के अन्तर से परिवर्तित होता है, जैसे क्लोरीन में परिवर्तन क्रम -1, +1,+3, +5, +7 है।

प्रश्न 14.
आयरन क्रोमाइट अयस्क से पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। पोटैशियम डाइक्रोमेट विलयन पर pH बढ़ाने से क्या प्रभाव पड़ेगा? (2016, 18)
उत्तर
पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि (Method of Preparation of Potassium Dichromate) – आयरन क्रोमाइट अयस्क (FeCr2O4) को जब वायु की उपस्थिति में सोडियम यो पोटैशियम कार्बोनेट के साथ संगलित किया जाता है तो क्रोमेट प्राप्त होता है।
4FeCr2O4 + 8Na2CO3 + 7O2 → 8Na2CrO4 +2Fe2O3 + 8CO2

सोडियम क्रोमेट के पीले विलयन को छानकर उसे सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा अम्लीय बना लिया जाता है। जिसमें से नारंगी सोडियम डाइक्रोमेट, Na2Cr2O7 . 2H2O को क्रिस्टलित कर लिया जाता है।
2Na2CrO4 + 2H+ → Na2Cr2O7 + 2Na+ + H2O

सोडियम डाइक्रोमेट की विलेयता, पोटैशियम डाइक्रोमेट से अधिक होती है, इसलिए सोडियम डाइक्रोमेट के विलयन में पोटैशियम क्लोराइड डालकर पोटैशियम डाइक्रोमेट प्राप्त कर लिया जाता है।
Na2Cr2O7 + 2KCl → K2Cr2O7 + 2NaCl

पोटैशियम डाइक्रोमेट के नारंगी रंग के क्रिस्टल, क्रिस्टलीकृत हो जाते हैं। जलीय विलयन में क्रोमेट तथा डाइक्रोमेट का अन्तरारूपान्तरण होता है जो विलयन के pH पर निर्भर करता है। क्रोमेट तथा डाइक्रोमेट में क्रोमियम की ऑक्सीकरण संख्या समान है।
2CrO2-4 + 2H+ → Cr2O2-7 + H2O
Cr2O2-7 + 2OH → 2CrO2-4 + H2O
अत: pH बढ़ाने पर, अर्थात् विलयन को क्षारीय करने पर, डाइक्रोमेट आयन (नारंगी रंग) क्रोमेट आयनों में परिवर्तित हो जाते हैं तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है।

प्रश्न 15.
पोटैशियम डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्रिया का उल्लेख कीजिए तथा निम्नलिखित के साथ आयनिक समीकरण लिखिए-

  1. आयोडाइड आयन
  2. आयरन (II) विलयन
  3. H2S.

उत्तर
पोटैशियम डाइक्रोमेट प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। इसका उपयोग आयतनमितीय विश्लेषण में प्राथमिक मानक के रूप में किया जाता है। अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट आयन की ऑक्सीकरण क्रिया निम्नलिखित प्रकार से प्रदर्शित की जा सकती है –
Cr2O2-7 + 14H+ + 6e → 2Cr3+ + 7H2O (E = 1: 33 V)
आयनिक अभिक्रियाएँ (Ionic Reactions)

  1. आयोडाइड आयन के साथ (With iodide ion) –
    • Cr2O2-7 + 14H+ + 6I → 2Cr3+ + 7H2O + 3I2 ↑
  2. आयरन (II) विलयन के साथ (With Iron (II) solution)
    • Cr2O2-7 + 14H+ + 6Fe2+ → 2Cr3+ + 7H2O + 6Fe3+
  3. H2S के साथ (With H2S)
    • Cr2O2-7 + 8H+ + 3H2S → 2Cr3+ + 7H2O + 3S ↓

प्रश्न 16.
पोटैशियम परमैंगनेट को बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट किस प्रकार (2016)

  1. आयरन (II) आयन,
  2. SO2 तथा
  3. ऑक्सैलिक अम्ल से अभिक्रिया करता है? अभिक्रियाओं के लिए आयनिक समीकरण लिखिए। (2018)

उत्तर
पोटैशियम परमैंगनेट, KMnO4 (Potassium Permanganate, KMnO4) बनाने की विधि (Method of Preparation) – पोटैशियम परमैंगनेट को निम्नलिखित विधियों से। बनाया जा सकता है –
1. पोटैशियम परमैंगनेट को प्राप्त करने के लिए MnO2 को क्षारीय धातु हाइड्रॉक्साइड तथा KNO3 जैसे ऑक्सीकारक के साथ संगलित किया जाता है। इससे गाढ़े हरे रंग का उत्पाद K2MnO4 प्राप्त होता है जो उदासीन या अम्लीय माध्यम में असमानुपातित होकर पोटैशियम परमैंगनेट देता है।
2MnO2 + 4KOH + O2 → 2K2MnO4 + 2H2O
3MnO2-4 + 4H+ → 2MnO4 + MnO2 + 2H2O

2. औद्योगिक स्तर पर इसका उत्पादन MnO2 के क्षारीय ऑक्सीकरणी संगलन के पश्चात् मैंगनेट (VI) के विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 6

3. प्रयोगशाला में मैंगनीज (II) आयन के लवण परऑक्सीडाइसल्फेट द्वारा ऑक्सीकृत होकर परमैंगनेट बनाते हैं।
2Mn2+ + 5S2O2-8 + 8H2O → 2MnO4 + 10SO2-4 + 16H+

रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions)
अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट की रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. आयरन (II) आयन के साथ (With Iron (II) ion)
    • MnO4 + 8H+ + 5Fe2+ → Mn2+ + 4H2O + 5Fe3+
  2. SO2 के साथ (With SO2)
    • 2MnO4 + 2H2O + 5SO2 → 2Mn2+ + 4H+ + 5SO2-4
  3. ऑक्सैलिक अम्ल के साथ (With oxalic acid)
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 7

प्रश्न 17.
M2+ | M तथा M3+ | M2+ निकाय के सन्दर्भ में कुछ धातुओं के E के मान नीचे दिए गए हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 8
उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए –

  1. अम्लीय माध्यम में Cr3+ या Mn3+ की तुलना में Fe3+ का स्थायित्व।
  2. समान प्रक्रिया के लिए क्रोमियम अथवा मैंगनीज धातुओं की तुलना में आयरन के ऑक्सीकरण में सुगमता।

उत्तर

  1. Cr3+ / Cr2+ के लिए E का मान ऋणात्मक है। इसलिए Cr3+ स्थायी है तथा Cr2+ में अपचयित नहीं हो सकता है।
    Mn3+ / Mn2+ के लिए E का मान अधिक धनात्मक है, इसलिए Mn3+ बहुत स्थायी नहीं है तथा सरलता से Mn2+ में अपचयित हो सकता है। Fe3+ / Fe2+ के लिए E का मान कम धनात्मक लेकिन छोटा है। इसलिए Fe3+, Mn3+ से अधिक स्थायी है। लेकिन यह Cr2+ से कम स्थायी है।
  2. Fe, Cr तथा Mn के लिए ऑक्सीकरण विभव क्रमशः +0.4 V, + 0.9 V तथा +1.2 V है। इसलिए इनके ऑक्सीकरण की सुलभता का क्रम Mn > Cr > Fe होगा।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में कौन-से आयन जलीय विलयन में रंगीन होंगे?
Ti3+, V3+, Cu+, Sc3+, Mn2+, Fe3+ तथा Co2+ प्रत्येक के लिए कारण बताइए।
उत्तर
वे आयन रंगीन होते हैं जिनमें एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। Ti3+, V3+, Mn2+, Fe3+ तथा Co2+ रंगीन होते हैं। Cu+ तथा Sc3+ रंगहीन होते हैं।

प्रश्न 19.
प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं की +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व की तुलना कीजिए।
उत्तर
प्रथमें संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पियों का योग बढ़ता है। अत: मानक अपचायक विभव (E) कम तथा ऋणात्मक होता है। इसलिए M2+ आयन बनाने की प्रवृत्ति घटती है। अत: +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रथम अर्द्ध-भाग में अधिक स्थायी होती है। +2 ऑक्सीकरण अवस्था का अधिक स्थायित्व, Mn2+ में अर्द्धपूरित d-उपकोशों (d5) के कारण, Zn2+ में पूर्णपूरित d-उपकोशों (d10) के कारण तथा निकिल में उच्च ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी के कारण होता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित के सन्दर्भ में लैन्थेनाइड एवं ऐक्टिनाइड के रसायन की तुलना कीजिए –

  1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
  2. परमाण्वीय एवं आयनिक आकार
  3. ऑक्सीकरण अवस्था
  4. रासायनिक अभिक्रियाशीलता।

उत्तर
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) – लैन्थेनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]54 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि ऐक्टिनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]86 5f1-14 6d1-2 7s2 होता है। अतः लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से तथा ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से सम्बद्ध होते हैं।

2. परमाण्वीय एवं आयनिक आकार (Atomic and ionic sizes) – लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड दोनों +3 ऑक्सीकरण अवस्था में अपने परमाणुओं अथवा आयनों के आकारों में कमी प्रदर्शित करते हैं। लैन्थेनाइडों में यह कमी लैन्थेनाइड आकुंचन कहलाती है, जबकि ऐक्टिनाइडों में यह ऐक्टिनाइड आकुंचन कहलाती है। यद्यपि ऐक्टिनाइडों में एक तत्व से दूसरे तत्व तक 5f-इलेक्ट्रॉनों द्वारा अत्यन्त कम परिरक्षण प्रभाव के कारण आकुंचन उत्तरोत्तर बढ़ता है।

3. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation states) – लैन्थेनाइड सीमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2, + 3, +4) प्रदर्शित करते हैं जिनमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक सामान्य है। इसका कारण 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच अधिक ऊर्जा-अन्तर होना है। दूसरी ओर ऐक्टिंनाइड अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं क्योंकि 5f,6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।

4. रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical reactivity) – लैन्थेनाइड (Lanthanides) सामान्य रूप से श्रेणी के आरम्भ वाले सदस्य अपने रासायनिक व्यवहार में कैल्सियम की तरह बहुत क्रियाशील होते हैं, परन्तु बढ़ते परमाणु क्रमांक के साथ ये ऐलुमिनियम की तरह व्यवहार करते हैं।

अर्द्ध- अभिक्रिया Ln3+ (aq) + 3e → Ln(s) के लिए E का मान -2.2 V से -2.4 V के परास में है। Eu के लिए E का मान -2.0 V है। निस्सन्देह मान में थोड़ा-सा परिवर्तन है। हाइड्रोजन गैस के वातावरण में मन्द गति से गर्म करने पर ये धातुएँ हाइड्रोजन से संयोग कर लेती हैं। इन धातुओं को कार्बन के साथ गर्म करने पर कार्बाइड- Ln3C, Ln2C3 तथा LnC2 बनते हैं। ये तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं तथा हैलोजेन के वातावरण में जलने पर हैलाइड बनाती हैं। ये ऑक्साइड M2O3 तथा हाइड्रॉक्साइड M(OH)3 बनाती हैं। हाइड्रॉक्साइड निश्चित यौगिक हैं न कि केवल हाइड्रेटेड (जलयोजित) ऑक्साइड। ये क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की भाँति क्षारकीय होते हैं। इनकी सामान्य अभिक्रियाएँ चित्र-3 में प्रदर्शित की गई हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 9

ऐक्टिनाइड (Actinides) – ऐक्टिनाइड अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ हैं, विशेषकर जब वे सूक्ष्मविभाजित हों। इन पर उबलते हुए जल की क्रिया से ऑक्साइड तथा हाइड्राइड का मिश्रण प्राप्त होता है और अधिकांश अधातुओं से संयोजन सामान्य ताप पर होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सभी धातुओं को प्रभावित करता है, परन्तु अधिकतर धातुएँ नाइट्रिक अम्ल द्वारा अल्प प्रभावित होती हैं, इसका कारण यह है कि इन धातुओं पर ऑक्साइड की संरक्षी सतह बन जाती है। क्षारों का इन धातुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 21.
आप निम्नलिखित को किस प्रकार से स्पष्ट करेंगे –

  1. d4 स्पीशीज में से Cr2+ प्रबल अपचायक है, जबकि मैंगनीज (III) प्रबल ऑक्सीकारक है।
  2. जलीय विलयन में कोबाल्ट (II) स्थायी है, परन्तु संकुलनकारी अभिकर्मकों की उपस्थिति में यह सरलतापूर्वक ऑक्सीकृत हो जाता है।
  3. आयनों का d1 विन्यास अत्यन्त अस्थायी है।

उत्तर

  1. Cr2+ प्रबल ऑक्सीकारक होता है क्योंकि इसमें 3d4 से 3d3 का परिवर्तन निहित है। 3d3 विन्यास (t32g) अधिक स्थायी है। Mn3+ के ऑक्सीकारक गुणों में 3d4 से 3d5 का परिवर्तन होता है। तथा 3d5 अधिक स्थायी विन्यास है। यही कारण है कि Mn3+ प्रबल ऑक्सीकारक है।
  2. जटिलीकरण (complexing) अभिकर्मकों की उपस्थिति में क्रिस्टल फील्ड स्थिरीकरण ऊर्जा (CFSE) कोबाल्ट की तृतीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है। इस प्रकार Co (II) सरलता से Co (III) में ऑक्सीकृत हो जाता है।
  3. वे आयन जिनमें d1 विन्यास होता है, वे d-उपकक्ष में उपस्थित इलेक्ट्रॉन को त्यागने की प्रवृत्ति रखते हैं तथा अधिक स्थायी d0 विन्यास प्राप्त कर लेते हैं। यह सरलता से सम्पन्न हो सकता है। क्योंकि जलयोजन या जालक ऊर्जा का मान d-उपकक्ष से इलेक्ट्रॉन के पृथक्कीकरण में निहित आयनन एन्थैल्पी से अधिक होता है।

प्रश्न 22.
असमानुपातन से आप क्या समझते हैं? जलीय विलयन में असमानुपातन अभिक्रियाओं के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर
किसी रासायनिक अभिक्रिया के फलस्वरूप किसी पदार्थ का एक समय में ऑक्सीकरण व अपचयन समानुपातीकरण कहलाता है। इस प्रकार, पदार्थ की ऑक्सीकरण अवस्था बढ़ती भी है तथा घटती भी है। जैसे,
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प्रश्न 23.
प्रथम संक्रमण श्रेणी में कौन-सी धातु बहुधा तथा क्यों +1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती हैं?
उत्तर
Cu(3d10 4s1) प्रायः +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है तथा Cu+ आयन (3d10) बनाता है, जिसकी अधिक स्थायी विन्यास होता है।

प्रश्न 24.
निम्नलिखित गैसीय आयनों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की गणना कीजिए –
Mn3+, Cr3+, v3+ तथा Ti3+
इनमें से कौन-सा जलीय विलयन में अतिस्थायी है?
उत्तर
Mn3+; 3d4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 4
Cr3+; 3d3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 3
V3+; 3d3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2
Ti3+; 3d1 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 1
इनमें से Cr3+ जलीय विलयन में अतिस्थायी हैं, क्योंकि इनमें अर्द्धपूरित t2g स्तर होता है।

प्रश्न 25.
उदाहरण देते हुए संक्रमण धातुओं के रसायन के निम्नलिखित अभिलक्षणों का कारण बताइए –

  1. संक्रमण धातु का निम्नतम ऑक्साइड क्षारकीय है, जबकि उच्चतम ऑक्साइड उभयधर्मी या अम्लीय है।
  2. संक्रमण धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था ऑक्साइडों तथा फ्लुओराइडों में। प्रदर्शित होती है।
  3. धातु के ऑक्सोऋणायनों में उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित होती है।

उत्तर

  1. निम्नतम ऑक्साइड में संक्रमण धातु की ऑक्सीकरण अवस्था सबसे कम होती है। इसलिए ऑक्साइड क्षारीय होता है तथा उच्च ऑक्सीकरण अवस्था प्राप्त करने के लिए अम्ल से क्रिया कर ऑक्सीकृत होने की प्रवृत्ति रखता है। जबकि उच्चतम ऑक्साइड उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में बनते हैं। परिणामस्वरूप, ये ऑक्साइड अम्लीय या उभयधर्मी होते हैं।
  2. संक्रमण धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था ऑक्साइडों तथा फ्लुओराइडों में प्रदर्शित होती है। क्योंकि ऑक्सीजन तथा फ्लुओरीन उच्च विद्युत ऋणात्मक तत्त्व हैं तथा आकर में छोटे होते हैं। ये प्रबल ऑक्सीकारक होते हैं। उदाहरणार्थ– ऑस्मियम, OsF6 में +6 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है तथा वेनेडियम, V2O5 में +5 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
  3. धातु ऑक्सोऋणायनों में उच्च ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित होती है जैसे- Cr2O2-7 में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 है, जबकि MnO4 में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 है। धातु का ऑक्सीजन से संयोग का कारण यह है कि ऑक्सीजन उच्च विद्युत ऋणात्मक तथा ऑक्सीकरक तत्त्व है।

प्रश्न 26.
निम्नलिखित को बनाने के लिए विभिन्न पदों का उल्लेख कीजिए –

  1. क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7 (2018)
  2. पाइरोलुसाइट से KMnO4

उत्तर

  1. क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7 (K2Cr2O7 from chromite ore) – अभ्यास प्रश्न 14 का उत्तर देखें।
  2. पाइरोलुसाइट से KMnO4(KMnO4 from pyrolusite) – अभ्यास प्रश्न 16 का (ii) देखें।

प्रश्न 27.
मिश्रातुएँ क्या हैं? लैन्थेनाइड धातुओं से युक्त एक प्रमुख मिश्रातु का उल्लेख कीजिए। इसके उपयोग भी बताइए।
उत्तर
दो या दो से अधिक धातुओं या धातुओं व अधातुओं का समांग मिश्रण मिश्रातु कहलाती है। मिश धातु एक महत्त्वपूर्ण मिश्रातु है, जिसमें 30-35% सीरियम तथा कुछ मात्रा में अन्य हल्की लैन्थेनाइड धातु Zr होती है। यह धातुकर्म में अपचायक के रूप में प्रयोग होती है। 30% मिश्रातु तथा 1% Zr धातु युक्त मैग्नीशियम मिश्रातु का प्रयोग जेट इंजन में किया जाता है।

प्रश्न 28.
आन्तरिक संक्रमण तत्व क्या हैं? बताइए कि निम्नलिखित में कौन-से परमाणु क्रमांक आन्तरिक संक्रमण तत्वों के हैं –
29, 59, 74, 95, 102, 104
उत्तर
वे तत्त्व जिनमें विभेदी इलेक्ट्रॉन (n – 2) f-उपकक्षक में प्रवेश करता है, अन्त: संक्रमण तत्त्व कहलाते हैं। दिये गये तत्त्वों में 59,95 तथा 102 परमाणु क्रमांक वाले तत्त्व अन्त: संक्रमण तत्त्व हैं।

प्रश्न 29.
ऐक्टिनाइड तत्वों का रसायन उतना नियमित नहीं है जितना कि लैन्थेनाइड तत्वों का रसायन। इन तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आधार पर इस कथन का आधार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
लैन्थेनाइडों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ +2, +3 तथा +4 हैं। इनमें से +3 अवस्था सर्वाधिक सामान्य है। ऑक्सीकरण अवस्थाओं की सीमित संख्या का कारण 4f, 5d तथा 6s उपकक्षाओं के बीच अधिक ऊर्जा अन्तर होना है। इसके विपरीत, ऐक्टिनाइड अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ जैसे +2, +3, +4, +5, +6 तथा +7 प्रदर्शित करते हैं, यद्यपि इनकी सामान्य अवस्था +3 होती है। इसका कारण यह है कि 5f, 6d तथा 7s उपकक्षाओं के बीच ऊर्जा का अन्तर कम होता है।

प्रश्न 30.
ऐक्टिनाइड श्रेणी का अन्तिम तत्व कौन-सा है? इस तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। इस तत्व की सम्भावित ऑक्सीकरण अवस्थाओं पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
ऐक्टिनाइड श्रेणी का अन्तिम तत्त्व लॉरेन्शियम (Lr) है तथा इसका परमाणु क्रमांक 103 होता है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]5f14 6d1 7s2 है तथा सम्भावित ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।

प्रश्न 31.
हुण्ड-नियम के आधार पर Ce3+ आयन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को व्युत्पन्न कीजिए तथा ‘प्रचक्रण मात्र सूत्र के आधार पर इसके चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
उत्तर
Ce तथा Ce3+ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है –
Ce (Z = 58) : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s2 4p6
4d10 4f1 5s2 5p6 5d1 6s2 या : [Xe] 4f1 5d1 6s2
Ce3+ (z = 55) : [Xe]4f1
इस प्रकार Ce+ में केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, अर्थात् n = 1
∴ μs = [latex]\sqrt { n(n+2) } [/latex] BM
= [latex]\sqrt { 1\times (1+2) } =\sqrt { 3 } [/latex]
= 1.732 BM

प्रश्न 32.
लैन्थेनाइड श्रेणी के उन सभी तत्वों का उल्लेख कीजिए जो +4 तथा जो +2 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाते हैं। इस प्रकार के व्यवहार तथा उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए। उत्तर
+4 ऑक्सीकरण अवस्था : Ce, Pr, Nd, Tb तथा Dy
+2 ऑक्सीकरण अवस्था : Ce, Nd, Sm, Tm तथा Yb
ये तत्त्व +2 ऑक्सीकरण अवस्था उस समय प्रदर्शित करते हैं जब इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 5d0 6s2 होता है। इसके विपरीत, +4 अवस्था उस समय प्रदर्शित की जाती है जब इनका शेष विन्यास 4f0 के समीप (जैसे 4f1, 4f2, 4f3) या 4f7 की समीप (जैसे 4f8, 4f9) होता है।

प्रश्न 33.
निम्नलिखित के सन्दर्भ में ऐक्टिनाइड श्रेणी के तत्वों तथा लैन्थेनाइड श्रेणी के तत्वों के रसायन की तुलना कीजिए –
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
(ii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ।
(iii) रासायनिक अभिक्रियाशीलता।
उत्तर
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) – लैन्थेनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]54 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि ऐक्टिनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]86 5f1-14 6d1-2 7s2 होता है। अतः लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से तथा ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से सम्बद्ध होते हैं।

2. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation states) – लैन्थेनाइड सीमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2, + 3, +4) प्रदर्शित करते हैं जिनमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक सामान्य है। इसका कारण 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच अधिक ऊर्जा-अन्तर होना है। दूसरी ओर ऐक्टिंनाइड अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं क्योंकि 5f,6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।

3. रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical reactivity) – लैन्थेनाइड (Lanthanides) सामान्य रूप से श्रेणी के आरम्भ वाले सदस्य अपने रासायनिक व्यवहार में कैल्सियम की तरह बहुत क्रियाशील होते हैं, परन्तु बढ़ते परमाणु क्रमांक के साथ ये ऐलुमिनियम की तरह व्यवहार करते हैं।

अर्द्ध- अभिक्रिया Ln3+ (aq) + 3e → Ln(s) के लिए E का मान -2.2 V से -2.4 V के परास में है। Eu के लिए E का मान -2.0 V है। निस्सन्देह मान में थोड़ा-सा परिवर्तन है। हाइड्रोजन गैस के वातावरण में मन्द गति से गर्म करने पर ये धातुएँ हाइड्रोजन से संयोग कर लेती हैं। इन धातुओं को कार्बन के साथ गर्म करने पर कार्बाइड- Ln3C, Ln2C3 तथा LnC2 बनते हैं। ये तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं तथा हैलोजेन के वातावरण में जलने पर हैलाइड बनाती हैं। ये ऑक्साइड M2O3 तथा हाइड्रॉक्साइड M(OH)3 बनाती हैं। हाइड्रॉक्साइड निश्चित यौगिक हैं न कि केवल हाइड्रेटेड (जलयोजित) ऑक्साइड। ये क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की भाँति क्षारकीय होते हैं। इनकी सामान्य अभिक्रियाएँ चित्र-3 में प्रदर्शित की गई हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 11
ऐक्टिनाइड (Actinides) – ऐक्टिनाइड अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ हैं, विशेषकर जब वे सूक्ष्मविभाजित हों। इन पर उबलते हुए जल की क्रिया से ऑक्साइड तथा हाइड्राइड का मिश्रण प्राप्त होता है और अधिकांश अधातुओं से संयोजन सामान्य ताप पर होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सभी धातुओं को प्रभावित करता है, परन्तु अधिकतर धातुएँ नाइट्रिक अम्ल द्वारा अल्प प्रभावित होती हैं, इसका कारण यह है कि इन धातुओं पर ऑक्साइड की संरक्षी सतह बन जाती है। क्षारों का इन धातुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 34.
61, 91, 101 तथा 109 परमाणु क्रमांक वाले तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर
Z = 61 (प्रोमिथियम, Pr) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास,
[Xe]54 4f5 5d0 6s2
Z = 91 (प्रोटेक्टिनियम, Pa) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास,
[Rn]86 5f2 6d1 7s2
Z = 101 (मेण्डेलीवियम, Md) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
[Rn]86 5f13 6d0 7s2
Z = 109 (मेटनेरियम, Mt) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
[Rn]86 5f14 6d7 7s2

प्रश्न 35.
प्रथम श्रेणी के संक्रमण तत्वों के अभिलक्षणों की द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के वर्गों के संगत तत्वों से क्षैतिज वर्गों में तुलना कीजिए। निम्नलिखित बिन्दुओं पर विशेष महत्त्व दीजिए –

  1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
  2. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
  3. आयनन एन्थैल्पी तथा
  4. परमाण्वीय आकार।

उत्तर
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) – एक ही वर्ग के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सामान्यतया समान होते हैं। यद्यपि प्रथम संक्रमण श्रेणी दो अपवाद प्रदर्शित करती है –
Cr = 3d5 4s1 तथा Cu = 3d10 4s1, परन्तु द्वितीय श्रेणी इससे अधिक अपवाद प्रदर्शित करती है –
Mo (42) = 4d5 5s1, Tc (43) = 4d6 5s1, Ru (44) = 4d7 5s1, Rh (45) = 4d8 5s1, Pd (46) = 4d210 5s0, Ag (47) = 4d10 5s1। इसी प्रकार, तृतीय श्रेणी में W (74) = 5d4 6s1, Pt (78) = 5d9 6s1 तथा Au (79) = 5d10 6s1 अपवाद हैं। इसलिए क्षैतिज वर्ग में अनेक स्थितियों में, तीनों श्रेणियों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान नहीं हैं।

2. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation states) – समान क्षैतिज वर्ग में तत्व सामान्यतया समान ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक श्रेणी के मध्य में तत्वों द्वारा प्रदर्शित ऑक्सीकरण अवस्थाओं की संख्या अधिकतम होती है, जबकि अन्त में न्यूनतम होती है।

3. आयनन एन्थैल्पी (Ionization enthalpy) – प्रत्येक श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर प्रथम आयनन एन्थैल्पी सामान्यतया धीरे-धीरे बढ़ती है, यद्यपि प्रत्येक श्रेणी में कुछ अपवाद भी प्रेक्षित होते हैं। समान क्षैतिज वर्ग में 3d श्रेणी के तत्वों की तुलना में 4d श्रेणी के कुछ तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी उच्च तथा कुछ तत्वों की कम होती है, यद्यपि 5d श्रेणी की प्रथम आयनन एन्थैल्पी 3d तथा 4d श्रेणियों की तुलना में उच्च होती है। इसका कारण 5d श्रेणी में 4f इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक का दुर्बल परिरक्षण प्रभाव है।

4. परमाण्वीय आकार (Atomic sizes) – सामान्यतया किसी श्रेणी में समान आवेश के आयन अथवा परमाणु, परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ त्रिज्याओं में क्रमिक कमी प्रदर्शित करते हैं, यद्यपि यह कमी अत्यन्त कम होती है। परन्तु 4d श्रेणी के परमाणुओं के आकार, 3d श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों की तुलना में अधिक होते हैं, जबकि 5d श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों के आकार के लगभग समान होते हैं। इसका कारण लैन्थेनाइड आकुंचन है।

प्रश्न 36.
निम्नलिखित आयनों में प्रत्येक के लिए 3d इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए –
Ti2+, V2+, Cr3+, Mn2+, Fe2+, Fe3+, Co2+, Ni2+, Cu2+
आप इन जलयोजित आयनों (अष्टफलकीय) में पाँच 3d कक्षकों को किस प्रकार अधिग्रहीत करेंगे? दर्शाइए।
उत्तर
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प्रश्न 37.
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्व भारी संक्रमण तत्वों के अनेक गुणों से भिन्नता प्रदर्शित करते हैं। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
दिया गया कथन सत्य है। इस कथन के पक्ष में कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं –

  1. भारी संक्रमण तत्वों (4d तथा 5d श्रेणियाँ) की परमाणु त्रिज्याएँ प्रथम संक्रमण श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों की तुलना में अधिक होती हैं, यद्यपि 4d तथा 5d श्रेणियों की परमाणु त्रिज्याएँ लगभग समान होती हैं।
  2. 5d श्रेणी की आयनन एन्थैल्पियाँ 3d तथा 4d श्रेणियों के सम्बन्धित तत्वों से उच्च होती हैं।
  3. 4d तथा 5d श्रेणियों की कणन एन्थैल्पियाँ प्रथम श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों की तुलना में उच्च होती हैं।
  4. भारी संक्रमण तत्वों के गलनांक तथा क्वथनांक प्रथम संक्रमण श्रेणी की तुलना में अधिक होते हैं। इसका कारण इनमें प्रबल अन्तराधात्विक बन्धों की उपस्थिति है।

प्रश्न 38.
निम्नलिखित संकुल स्पीशीज के चुम्बकीय आघूर्णो के मान से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे?
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उत्तर
यदि किसी जटिल यौगिक में ‘n’ अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, तो इसका चक्रण के कारण चुम्बकीय आघूर्ण निम्न प्रकार प्राप्त किया जा सकता है –
μs = [latex]\sqrt { n(n+2) } [/latex] BM
∴ जब n = 1, μs = [latex]\sqrt { 1(1+2) } [/latex] = 1.73 BM
n = 2, μs = [latex]\sqrt { 2(2+2) } [/latex] = 2.83 BM
n = 3, μs = [latex]\sqrt { 3(3+2) } [/latex] = 3.87 BM
n = 4, μs = [latex]\sqrt { 4(4+2) } [/latex] = 4.9 BM
n = 5, μs = [latex]\sqrt { 5(5+2) } [/latex] = 5.92 BM

(i) K4[Mn(CN)6] का चुम्बकीय आघूर्ण 2.2 BM है। इससे स्पष्ट है कि इसमें केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। इस जटिल यौगिक में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। अतएव यह Mn2+ के रूप में है। Mn2+ का अभिविन्यास 3d होता है। एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति स्पष्ट करती है कि CN लीगैण्ड ने निम्नानुसार इलेक्ट्रॉनों को हुण्ड के नियम के विपरीत युग्मित कर दिया है –
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इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि CN एक प्रबल लीगैण्ड है तथा जटिल यौगिक के बनने में d2 sp3 संकरण होता है। अत: जटिल यौगिक एक आन्तरिक ऑर्बिटल अष्टफलकीय जटिल यौगिक है।

(ii) [Fe(H2O)6]2+ का चुम्बकीय आघूर्ण 5.3 है। इससे स्पष्ट है कि इसमें 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। इसमें Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। इस प्रकार यह Fe2+ आयन के रूप में है, जिसको अभिविन्यास 3d6 है। यौगिक में 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति सिद्ध करती है कि H2O लीगैण्ड दुर्बल है तथा इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करने में असमर्थ है।
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इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकलता है कि H2O एक दुर्बल लीगण्ड है तथा इसमें sp3 d2 संकरण होता है। यह एक बाह्य ऑर्बिटल अष्टफलकीय जटिल यौगिक है।

(iii) K2[MnCl4] का चुम्बकीय आघूर्ण 5.9 है, जिससे स्पष्ट है कि इसमें 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। अत: यह Mn2+ अवस्था में है तथा इसका विन्यास 3d5 है। 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति से स्पष्ट है कि Cl दुर्बल लीगैण्ड है तथा इलेक्ट्रॉन का युग्मन करने में असमर्थ है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 18
इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि Cl एक दुर्बल लीगैण्ड है तथा जटिल यौगिक में sp3 संकरण है। अतएव यह एक समचतुष्फलकीय जटिल यौगिक है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
संक्रमण श्रेणी धातुओं का विशिष्ट गुण है –
(i) ये परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती हैं।
(ii) ये सभी धातु उत्प्रेरक का कार्य करती हैं।
(iii) ये रंगीन यौगिक बनाती हैं।
(iv) उपर्युक्त सभी
उत्तर
(iv) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 2.
संक्रमण तत्त्व संकुल यौगिक बनाते हैं क्योंकि –
(i) रिक्त कक्षकों की उपलब्धता होती है।
(ii) धातु आयनों का आकार छोटा होता है।
(iii) परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
(iv) उपर्युक्त सभी
उत्तर
(iv) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3.
संक्रमण तत्वों में 4d श्रेणी का तत्त्व है – (2015)
(i) 37A
(ii) 47B
(iii) 57C
(iv) 30D
उत्तर
(ii) 47B

प्रश्न 4.
कौन-सा तत्त्व d-ब्लॉक तत्त्व तो है किन्तु संक्रमण धातु नहीं है?
(i) Zn
(ii) Cu
(iii) Cr
(iv) Mn
उत्तर
(i) Zn

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में अनुचुम्बकीय यौगिक है – (2017)
(i) CuCl
(ii) AgNO3
(iii) FeSO4
(iv) ZnCl2
उत्तर
(iii) FeSO4

प्रश्न 6.
निम्नलिखित आयनों में अनुचुम्बकीय आयन कौन-सा नहीं है? (2013)
(Ni= 28, Zn= 30, Cu= 29, Mn= 25)
(i) Ni++
(ii) Zn++
(iii) Cu+
(iv) Mn++
उत्तर
(ii) Zn++

प्रश्न 7.
निम्न में अनुचुम्बकीय आयन है। (2013, 16)
(i) Zn2+
(ii) Ni2+
(iii) Cu+
(iv) Ag+
उत्तर
(ii) Ni2+

प्रश्न 8.
निम्न में से रंगहीन आयन है। (2013)
(i) Cu+
(ii) Cu2+
(iii) Ni2+
(iv) Fe3+
उत्तर
(i) Cu+

प्रश्न 9.
एक संक्रमण धातु की अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था प्राप्त करने में कौन-से इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं? (2018)
(i) ns इलेक्ट्रॉन
(ii) (n + 1) d इलेक्ट्रॉन
(iii) (n – 1)d इलेक्ट्रॉन
(iv) ns + (n – 1) d इलेक्ट्रॉन
उत्तर
(iv) ns + (n – 1) d इलेक्ट्रॉन

प्रश्न 10.
संक्रमण धातु जो परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था नहीं प्रदर्शित करता है, है (2014)
(i) Ti
(ii) V
(iii) Fe
(iv) Zn
उत्तर
(iv) Zn

प्रश्न 11.
दुर्लभ मृदा तत्त्व हैं –
(i) क्षारीय मृदा तत्त्व
(ii) क्षारीय तत्त्व
(iii) संक्रमण श्रेणी के तत्त्व
(iv) लैन्थेनाइड
उत्तर
(iv) लैन्थेनाइड

प्रश्न 12.
निम्न तत्त्वों में लैन्थेनाइड तत्त्व है – (2015)
(i) Ra
(ii) Ce
(iii) Ac
(iv) Zr
उत्तर
(ii) Ce

प्रश्न 13.
लैन्थेनाइडों का सामान्य बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है –
(i) 4f1-14 5d0 6s2
(ii) 4f0,2-14 5d0 6s2
(iii) 4f20-14 5d0-2 6s2
(iv) 4f0-14 5d1 6s2
उत्तर
(ii) 4f0,2-14 5d0 6s2

प्रश्न 14.
लैन्थेनाइड निम्न ऋणायन के साथ संकुल बनाते हैं।
(i) F
(ii) Br
(iii) Cl
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i) F

प्रश्न 15.
लैन्थेनाइडों के परमाणु क्रमांक के बढ़ने के साथ परमाणवीय त्रिज्या में कमी होती है, किन्तु अपवाद है।
(i) Gd व Lu
(ii) Eu व Yb
(iii) Na व Ho
(iv) Dy व Ho
उत्तर
(ii) Eu व Yb

प्रश्न 16.
लैन्थेनाइड संकुचन के कारण पश्च लैन्थेनाइडों में
(i) आयनन ऊर्जा अधिक हो जाती है।
(ii) घनत्व उच्च हो जाता है।
(iii) आयनिक त्रिज्या कम हो जाती है।
(iv) ये सभी
उत्तर
(iv) ये सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संक्रमण तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याएँ किसी श्रेणी में किस प्रकार परिवर्तित होती हैं? (2014)
उत्तर
सामान्यत: एक विशिष्ट श्रेणी से सम्बन्धित संक्रमण तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याएँ परमाणु क्रमांक के बढ़ने के साथ घटती जाती हैं। प्रत्येक श्रेणी के अन्त में परमाणु त्रिज्याओं में थोड़ी वृद्धि देखने को मिलती है। समूह में नीचे की ओर जाने पर संक्रमण तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याओं में वृद्धि होती है। द्वितीय और तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याएँ लगभग समान रहती हैं।

प्रश्न 2.
संक्रमण तत्त्व धात्विक लक्षण क्यों प्रदर्शित करते हैं? (2014)
उत्तर
संक्रमण तत्त्व धात्विक लक्षण प्रदर्शित करते हैं क्योंकि उनकी आयनन ऊर्जाएँ निम्न होती हैं तथा । उनके बाह्यतम कोश में अनेक रिक्त कक्षक भी उपस्थित होते हैं। ये कारक उनमें धात्विक आबन्धों के निर्माण में सहायता करते हैं।

प्रश्न 3.
विलयन में Cu’ आयन रंगहीन जबकि Cu2+ आयन रंगीन होते हैं। क्यों? (2017)
उत्तर
Cu+ – 1s2, 252, 2p6, 3s2, 3p6, 3d10, 4s0, चूंकि सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं इसलिए Cu+ आयन रंगहीन है। Cu2+ आयन में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है इसलिए यह नीले रंग का है।
Cu2+ – 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d9
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प्रश्न 4.
Mn3+ आयन की अपेक्षा Mn2+ आयन अधिक स्थायी होते हैं। क्यों? (2017)
उत्तर
हम जानते हैं कि आधे और पूरे भरे हुए ऑर्बिटल अधिक स्थायी होते हैं। Mn2+ में 3d पर पाँच इलेक्ट्रॉन हैं जोकि आधा भरा हुआ है। इसलिए Mn3+ आयन की अपेक्षा Mn2+ आयन अधिक स्थायी होते हैं।
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प्रश्न 5.
आयतनात्मक विश्लेषण में पोटैशियम परमैंगनेट विलयन को अम्लीकृत करने के लिए तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के स्थान पर HNO3 का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता है? (2015)
उत्तर
आयतनात्मक विश्लेषण में KMnO4 विलयन को अम्लीकृत करने के लिए dil. H2SO4 का प्रयोग किया जाता है न कि HNO3 का क्योकि HNO3 स्वयं ऑक्सीकारक है और आंशिक रूप से अपचायक को ऑक्सीकृत कर देता है।
2KMnO4 + 3H2SO4 → K2SO4 + 2MnSO4 + 3H2O + 5[O]
Reducing agent + [O] → Oxidised product

प्रश्न 6.
आन्तरिक (अन्तः) संक्रमण तत्त्व क्या हैं? (2014)
उत्तर
जिन तत्त्वों में विभेदी इलेक्ट्रॉन (n- 2) f- कक्षकों में प्रवेश करता है वे तत्त्व आन्तरिक (अन्तः) संक्रमण तत्त्व कहलाते हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी में एक अलग ब्लॉक, f-ब्लॉक का निर्माण करते हैं; अत: इन्हें f- ब्लॉक के तत्त्व भी कहते हैं।

प्रश्न 7.
लैन्थेनाइड व ऐक्टिनाइड श्रेणियों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। या अन्तः संक्रमण तत्त्वों के सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। (2014)
उत्तर
लैन्थेनाइड्स के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हैं। अधिकांश तत्त्वों में विभेदी इलेक्ट्रॉन 4f- उपकोश में प्रवेश करता है; अतः इन तत्त्वों का सैद्धान्तिक इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe] 4fn 5d1 6s2 प्रकार का होता है।
चूँकि 4f- उपकोश की ऊर्जा 5d-उपकोश की ऊर्जा के काफी निकट है; अत: यह विभेद करना कठिन होता है कि इलेक्ट्रॉन 4f उपकोश में प्रवेश कर रहा है अथवा 5d-उपकोश में। यही कारण है कि इनके प्रागुक्त इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, इनके अवलोकित विन्यासों से भिन्न होते हैं। अवलोकित विन्यास मुख्यत: [Xe] 4fn+1 6s2 प्रकार के होते हैं।
ऐक्टिनाइड्स के इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों को [Rn] 5f1-14 6d0-1 7s2 (अपवाद थोरियम को छोड़कर) के रूप में प्रकट किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संक्रमण तत्त्व क्या हैं? इनकी विशेषताओं को लिखिए। (2014, 16, 17)
या
संक्रमण तत्त्वों के अनुचुम्बकीय लक्षण को स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर
वे तत्त्व जिनमें अन्तिम इलेक्ट्रॉन बाह्य कोश से पहले वाले कोश के पाँच d-कक्षकों में से किसी भी एक कक्ष में प्रवेश करता है, d-ब्लॉक के तत्त्व कहलाते हैं। इनमें विभेदी इलेक्ट्रॉन (n-1) d-कक्षकों में प्रवेश पाता है। चूँकि इन तत्त्वों के गुण s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉक के तत्त्वों के गुणों के मध्यवर्ती होते हैं अत: इन्हें संक्रमण तत्त्व भी कहते हैं।

विशेषताएँ– संक्रमण तत्त्वों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – संक्रमण तत्त्वों में बाह्यकोश से पिछले कोश के d ऑर्बिटलों में इलेक्ट्रॉन भरते हैं। इसके बाह्यतम दो कोशों का विन्यास इस प्रकार होता है –
(n – 1)s2 (n – 1)p6 (n-1)d1 to 10 ns1 or 2 या ns0

2. परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ – d-ब्लॉक (संक्रमण) तत्त्वों में ns ऑर्बिटल और (n – 1)d ऑर्बिटल दोनों के इलेक्ट्रॉन रासायनिक बन्ध बनाने में भाग लेते हैं। इसलिए संक्रमण तत्त्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
संक्रमण तत्त्वों में (n – 1)d और ns ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा में थोड़ा अन्तर होने के कारण ये इलेक्ट्रॉन रासायनिक बन्ध बनाने में भाग ले सकते हैं। इसलिए संक्रमण तत्त्व परिवर्ती ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित करते हैं।

3. उत्प्रेरक गुण – संक्रमण धातु और उनके यौगिकों में उत्प्रेरकीय गुण होते हैं। यह गुण उनकी परिवर्ती संयोजकता एवं उनके पृष्ठ पर उपस्थित मुक्त संयोजकताओं के कारण होता है।

4. रंगीन आयन व रंगीन यौगिक बनाने की प्रवृत्ति – संक्रमण तत्त्वों में d ऑर्बिटल आंशिक रूप से भरे होने के कारण ये रंगीन आयन व रंगीन यौगिक बनाते हैं।

5. आयनन विभव में परिवर्तन – संक्रमण धातुओं के प्रथम आयनन विभव दीर्घ आवर्गों में स्थित s-ब्लॉक और p ब्लॉक तत्त्वों के आयनन विभवों के बीच के हैं। प्रथम संक्रमण श्रेणी में तत्त्वों के प्रथम आयनन विभवों के मान 6 से 10 eV के मध्य है। किसी संक्रमण धातु परमाणु के उत्तरोत्तर (successive) आयनन विभव कम से बढ़ते हैं। संक्रमण धातु क्षार धातुओं (उपवर्ग IA) और क्षारीय मृदा-धातुओं (उपवर्ग IIA) से कम धन विद्युत होने के कारण आयनिक और सहसंयोजक दोनों प्रकार के यौगिक बनाते हैं।

6. चुम्बकीय लक्षण – अनेक संक्रमण तत्त्व उनके यौगिक अनुचुम्बकीय हैं। इसका कारण उनमें (n – 1) d कक्षकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है। किसी संक्रमण श्रेणी में बायें से दायें जाने पर जैसे-जैसे अयुग्मि इलेक्ट्रॉनों की संख्या एक से पाँच तक बढ़ती है, संक्रमण धातु आयन में अनुचुम्बकीय लक्षण बढ़ता है। अधिकतम अनुचुम्बकीय लक्षण श्रेणी के बीच में पाया जाता है और आगे जाने पर अनुचुम्बकीय लक्षण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होने से घटता है। वे संक्रमण धातु अथवा आयन जिनमें इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, प्रतिचुम्बकीय होते हैं।

प्रश्न 2.
संक्रमण तत्त्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था का प्रदर्शन क्यों करते हैं? (2015)
उत्तर
संक्रमण तत्त्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n – 1)d1 – 10 ns1 – 2 है। (n – 1) d-कक्षकों तथा ns- कक्षकों की ऊर्जाओं में अधिक अन्तर नहीं होता है अत: संक्रमण तत्त्वों में, (n – 1)d तथा ns दोनों कक्षकों के आबन्ध निर्माण के लिए उपलब्ध रहती हैं। +1 तथा +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं में ns-इलेक्ट्रॉनों का योगदान होता है, जबकि उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाओं जैसे +3, +4,+ 5,+6 आदि, में आबन्ध निर्माण में ns-कक्षकों के साथ (n – 1)d-इलेक्ट्रॉनों का भी योगदान होता है। उत्तेजित अवस्था में (n – 1) d. इलेक्ट्रॉन आबन्ध निर्माण में भाग लेने के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं तथा परमाणु विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करने के योग्य हो जाता है। उदाहरण के लिए, Sc का बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d1 4s2 है। जब यह केवल 4s-इलेक्ट्रॉनों का उपयोग करता है तो +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है, परन्तु जब यह दोनों 4s- इलेक्ट्रॉनों के साथ एक 3d-इलेक्ट्रॉन का भी उपयोग करता है तो +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 3.
संक्रमण तत्त्वों में जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति अधिक क्यों होती है? (2017)
उत्तर
संक्रमण तत्त्वों में जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति निम्नलिखित कारणों से अधिक होती है –

  1. धातु आयनों का छोटा आकार
  2. धातु आयनों का उच्च नाभिकीय आवेश
  3. लीगैण्ड द्वारा प्रदान किये गये इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्मों को ग्रहण करने के लिए उपयुक्त ऊर्जा के रिक्त d-कक्षकों की प्राप्यता।

प्रश्न 4.
ऐक्टिनाइड्स व लैन्थेनाइड्स में मुख्य समानताएँ बताइए। (2015)
उत्तर
चूंकि लैन्थेनाइड्स तथा ऐक्टिनाइड्स दोनों में ही इलेक्ट्रॉन (n- 2) f-उपकोश में प्रवेश पाता है। तथा दोनों के ही बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लगभग समान हैं, अतः ये गुणों में समानताएँ प्रदर्शित करते हैं। इनकी मुख्य समानताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. दोनों में ही (n – 2) f- कक्षक में इलेक्ट्रॉन प्रवेश करता है।
  2. दोनों की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
  3. परमाणु क्रमांक बढ़ने पर दोनों ही परमाणविक तथा आयनिक आकारों में कमी प्रदर्शित करते हैं (लैन्थेनाइड संकुचन तथा ऐक्टिनाइड संकुचन)।
  4. दोनों ही अधिक क्रियाशील तथा प्रबल विद्युत धनात्मक हैं।
  5. दोनों ही चुम्बकीय गुण प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 5.
लैन्थेनाइड्स व ऐक्टिनाइड्स में अन्तर/ असमानताएँ बताइए। (2014)
उत्तर
लैन्थेनाइड्स व ऐक्टिनाइड्स में निम्नलिखित अन्तर/असमानताएँ हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements image 21

प्रश्न 6.
ऐक्टिनाइड्स क्या हैं? इन्हें ऐक्टिनाइड्स क्यों कहा जाता है? इनके प्रमुख उपयोग लिखिए। (2016)
उत्तर
आन्तरिक संक्रमण तत्त्व अथवा f-ब्लॉक तत्त्वों की दो श्रेणियाँ होती हैं –

  1. लैन्थेनाइड श्रेणी तथा
  2. ऐक्टिनाइड श्रेणी।

ऐक्टिनाइड श्रेणी में थोरियम से लेकर लॉरेन्शियम तक के चौदह तत्त्वों को ऐक्टिनाइड्स कहा जाता है। ये तत्त्व आवर्त सारणी में ऐक्टिनियम का अनुसरण करते हैं तथा भौतिक व रासायनिक गुणों में उससे समानता भी प्रकट करते हैं। इसलिए इन्हें ऐक्टिनाइड्स कहा जाता है।
ऐक्टिनाइडों के उपयोग

  1. यूरेनियम तथा प्लूटोनियम का मुख्य उपयोग नाभिकीय रिएक्टर से परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ईंधन के रूप में किया जाता है। प्लूटोनियम का उपयोग परमाणु हथियार बनाने में भी किया जाता है।
  2. थोरियम ऑक्साइड का उपयोग चमकने वाले गैस मेन्टल के निर्माण में होता है।
  3. यूरेनियम के लवणों का उपयोग हरे रंग के काँच के निर्माण में होता है।
  4. थोरियम लवण का उपयोग आजकल कैंसर के उपचार में होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संक्रमण तत्त्वों को वर्गीकृत कीजिए तथा आवर्त सारणी में इनका स्थान निर्धारित कीजिए।
उत्तर
संक्रमण तत्त्वों का वर्गीकरण – संक्रमण तत्त्वों का वर्गीकरण (n – 1)d- कक्षकों के आधार पर किया गया है। इस आधार पर संक्रमण तत्त्वों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है जिन्हें संक्रमण श्रेणियाँ (transition series) कहते हैं। प्रत्येक श्रेणी (n – 1)d- कक्षक में इलेक्ट्रॉन-प्रवेश के क्रम के अनुसार है। ये संक्रमण श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. प्रथम संक्रमण श्रेणी अथवा 3d- श्रेणी – इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 3d- कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में Sc (Z = 21) से Zn (Z = 30) तक 10 तत्त्व हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के चतुर्थ आवर्त में स्थित हैं।
  2. द्वितीय संक्रमण श्रेणी अथवा 4d- श्रेणी – इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 4d- कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में 10 तत्त्व Y(Z = 39) से Cd (Z = 48) हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के पाँचवे आवर्त में स्थित हैं।
  3. तृतीय संक्रमण श्रेणी अथवा 5d- श्रेणी – इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 5d-कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में 10 तत्त्व La (Z = 57) तथा Hf (Z = 72) से Hg (Z = 80) हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के छठे आवर्त में स्थित हैं।
  4. चतुर्थ संक्रमण श्रेणी अथवा 6d- श्रेणी – इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 6d-कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में 10 तत्त्व Ac (Z = 89) तथा Rf (Z = 104) से कॉपरनिसियम (Z = 112) हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के सातवें आवर्त में स्थित हैं।

आवर्त सारणी में स्थिति – आवर्त सारणी में संक्रमण तत्त्व (d.ब्लॉक तत्त्व) समूह 2 तथा समूह 13 के मध्य स्थित हैं। d-ब्लॉक तत्त्व s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉकों के मध्य स्थित हैं। d-ब्लॉक तत्वों को संक्रमण’ की संज्ञा इसी कारण ही प्रदान की गई है। s-ब्लॉक के तत्त्व अत्यधिक विद्युत धनात्मक होते हैं तथा आयनिक यौगिकों के निर्माण की प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं। इसके विपरीत p-ब्लॉक के तत्त्व विद्युत ऋणात्मक होते हैं। और इनमें सहसंयोजी यौगिकों को बनाने की प्रवृत्ति होती है। d-ब्लॉक तत्त्व इन दोनों के मध्य एक संक्रमण व्यवहार प्रदर्शित करते हैं अर्थात् उनका व्यवहार अत्यधिक विद्युत धनात्मक s-ब्लॉक तत्त्वों तथा अत्यन्त दुर्बल रूप से विद्युत धनात्मक p-ब्लॉक तत्त्वों के मध्य का होता है। इस कारण ही d-ब्लॉक तत्त्वों को संक्रमण तत्त्व (transition elements) कहा जाता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 3 लाटी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name लाटी (शिवानी)
Number of Questions 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 3 लाटी (शिवानी)

प्रश्न 1
‘लाटी’ कहानी का सारांश (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2012, 13, 15, 16, 18]
उत्तर
प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं कथा-लेखिका शिवानी द्वारा कृत ‘लाटी’ कहानी एक घटना प्रधान कहानी है। इस कहानी में कप्तान जोशी का वर्णन है, जो अपनी बीमार पत्नी ‘बानो’ से अत्यधिक प्रेम करते हैं। टी०बी० की मरीज होने के कारण जब उनकी पत्नी जिन्दगी से निराश हो जाती है तो वह नदी में कूदकर आत्महत्या करने का प्रयास करती है तथा बाद में लाटी बनकर कप्तान से मिलती है परन्तु बोल नहीं पाती। इस कहानी का सारांश निम्नलिखित है–

कप्तान जोशी गोठिया टी०बी० सैनेटोरियम के तीन नम्बर के बंगले में दो गुना किराया देकर अपनी रोगिणी पत्नी ‘बानो’ के साथ रहता था। ‘बानो’ से अत्यधिक प्रेम के कारण वह उसको देख सहज भाव से मुस्करा देता तथा उसे प्रसन्न करने की पूरी कोशिश करता। बँगले के बरामदे में पत्नी के पलँग के पास वह दिन भर कुर्सी डाले बैठा रहता। कभी अपने हाथों से टेम्प्रेचर चार्ट भरता और कभी समय देख-देखकर दवाइयाँ देता। पास के बंगले के मरीज बड़ी तृष्णा और चाव से इनकी कबूतर-सी जोड़ी देखते। ऐसी घातक बीमारी पर भी बड़े यत्न और स्नेह से कप्तान अपनी पत्नी की सेवा करता था। विवाह के दो वर्ष बाद ही ‘बानो’ को भयंकर तपेदिक हो गयी। कप्तान दिन-रात सेवा करता तथा उसे बेहद प्यार करता। माता-पिता के पत्र आते कि यह भयंकर बीमारी है, तुम बचकर रहो। माँ ने रो-रोकर पत्र लिखा कि मेरे दस-बीस बेटे नहीं हैं, तुम अकेले हो। कप्तान पर इन बातों का कोई असर नहीं होता। उसने ‘बानो’ की सेवा-सुश्रूषा में कोई कमी नहीं रखी।

‘बानो’ से विवाह के ठीक तीसरे दिन कप्तान को बसरा जाना पड़ा। बानो को छोड़कर जाना उसके लिए असहनीय था। उसने बानो से पहली मुलाकात में ही उसका नाम पूछा। जब उसने अपना नाम बानो बताया तो कप्तान ने मजाक में कहा कि यह तो मुसलमानी नाम है। जब बानो की आँखें छलक उठीं तो कप्तान बोला मैं तो तुम्हें छेड़ रहा था-कितना प्यारा नाम है? अभी बानो केवल सोलह वर्ष की थी। कप्तान दो वर्ष बाद वापस आता है। इस बीच बानो ने सात सात ननदों के ताने सुने, भतीजों के कपड़े धोये, ससुर के होज बिने, पहाड़-सी नुकीली छतों पर पाँच-पाँच सेर उड़द पीस कर बड़ियाँ डालीं। उससे कहा गया कि तेरे पति को जापानियों ने कैद कर लिया है, अब वह कभी नहीं लौटेगा। सास और चचिया सास के व्यंग्य बाण उसे व्याकुल कर देते। वह घुलती गयी और एक दिन क्षय रोग से पीड़ित होकर उसने चारपाई पकड़ ली। दो साल बाद कप्तान आया और आकर बानो को देखने चल दिया तो घर वालों के चेहरे लटक गये। एक प्राइवेट वार्ड के बरामदे में लेटी बानो को देखकर कप्तान के होश उड़ गये। दो वर्ष में बानो घिसकर और भी बच्ची बन गयी थी। कप्तान को देखकर उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।।

बानो की नाजुक हालत देखकर अन्तत: डॉक्टर ने कप्तान को नोटिस दे दिया कि कमरा खाली करके मरीज को घर ले जाइए। कप्तान ने बानो से कहा घर नहीं, दूसरी जगह चलेंगे। सुबह उठा तो कप्तान ने देखा कि बानो पलँग पर नहीं थी। दूसरे दिन नदी के घाट पर बानो की साड़ी मिली तो वह समझ गया कि उसने आत्महत्या करने का प्रयास किया है।

कप्तान का एक साल में ही विवाह हो जाता है। दो बेटे और एक बेटी उसकी दूसरी पत्नी प्रभा ने उसे दिये। कप्तान अब मेजर हो गया। पन्द्रह-सोलह साल बाद कप्तान प्रभा के साथ नैनीताल घूमने आया। प्रभा की जिद पर वह सड़क की ही चाय की दुकान पर उसके साथ चाय पीने बैठ गया। वहीं पर वैष्णवी साध्वियों के झुण्ड के साथ उसे बानो मिलती है, जो कि अब जीभ कट जाने के कारण बोल नहीं पाती और उसकी याददाश्त भी जाती रही है। प्रभा उसकी सुन्दरता पर मुग्ध थी। वैष्णवियों के ही बातचीत से कप्तान को यह निश्चित हो जाता है कि लाटी ही बानो है। उसका प्रेम अभी भी बानो के प्रति समाप्त नहीं हुआ था। लेकिन अब वह जीवन की दौड़ में बहुत आगे बढ़ चुका था। वह सोच ही रहा था कि प्रभा ने चलने के लिए कह दिया, वह उठ खड़ा हुआ। उसे अनुभव हुआ कि कुछ ही पलों में वह बूढ़ा और खोखला हो चुका है। यहीं पर कथा का समापन हो जाती है।

प्रश्न 2
कथानक की दृष्टि से शिवानी की ‘लाटी’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
उद्देश्य की दृष्टि से ‘लाटी’ कहानी की समीक्षा कीजिए। या। ‘लाटी’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘लाटी’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। [2012, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
शिवानी हिन्दी की एक प्रसिद्ध महिला कथाकार रही हैं। इनकी कहानियों में नारी के विभिन्न रूपों का सुन्दर चित्रण हुआ है। सामाजिक रूढ़ियों और आडम्बरों पर ये शालीन व्यंग्य करती हैं। प्रस्तुत कहानी ‘लाटी’ में एक महिला की कथा है। कहानी-कला के कतिपय प्रमुख तत्त्वों के आधार पर इस कहानी की समीक्षा निम्नवत् है-

(1) शीर्षक-कहानी का शीर्षक संक्षिप्त, सरल, कौतूहलवर्द्धक तथा आकर्षक है। कहानी का मूल भाव शीर्षक के साथ जुड़ा है। शीर्षक पढ़ते ही जिज्ञासा होती है, कौन लाटी ? कहाँ की लाटी ? ‘लाटी’ के अतिरिक्त अन्य कोई भी शीर्षक पाठकों की जिज्ञासा में इतनी वृद्धि नहीं कर सकता था, जितना ‘लाटी’ ने किया। अत: प्रस्तुत कहानी का यह शीर्षक पूर्णतया उपयुक्त है।

(2) कथानक-बानो से विवाह के तीसरे ही दिन कप्तान को बसरा जाना पड़ा। अपनी खिलौने-सी बहू से उसे अतिशय प्यार है। दो वर्ष बाद जब वह वापस लौटता है तो उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी एक टी० बी० सैनेटोरियम में भर्ती है। इन दो वर्षों में सास-ननदों के ताने सुने; घर के समस्त काम किये और अन्ततः बीमार होकर सैनेटोरियम की चारपाई पकड़ ली। कप्तान आता है, उसे हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराता है और उसकी समस्त सेवा-सुश्रूषा स्वयं करता है। डॉक्टरों ने उसके बचने की उम्मीद छोड़ दी तो जीवन से तंग आकर बानो नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेती है। कप्तान की दूसरी शादी हो जाती है और उसके तीन बच्चे भी बड़े हो जाते हैं। सोलह-सत्रह वर्षों के बाद जब वह नैनीताल घूमने आता है तो एक चाय की दुकान पर बानो लाटी के रूप में जीवित मिलती है, जिसकी याददाश्त जा चुकी है और वह बोल नहीं सकती।

प्रस्तुत कहानी का अन्त नाटकीय है, कहानी में उत्सुकता, आकर्षण तथा सुगठन है। बानो को लाटी के रूप में जीवित दिखाकर लेखिका ने कथा में एक अकल्पनीय मोड़ प्रस्तुत किया है। कथा-लेखिका ने मुख्य घटना के घटने तक पाठकों की जिज्ञासा को बनाये तथा उन्हें कहानी से बाँधे रखा है। घटना का क्रम, उदय, विकास और उपसंहार अत्यधिक सुनियोजित ढंग से हुआ है। कहानी में प्रवाह और गतिशीलता अन्त तक बनी हुई है। अत: कहा जा सकता है कि कथानक के तत्त्वों की दृष्टि से लाटी एक उत्कृष्ट कहानी है।

(3) उद्देश्य–शिवानी की कहानियाँ चित्रण अथवा घटनाप्रधान होती हैं। इन कहानियों का उद्देश्य मुख्यत: मनोरंजन प्रदान करना ही होता है। इसके साथ ही लेखिका अपने पाठक को आज के समाज की वास्तविकता से भी अवगत कराना चाहती हैं। इस प्रकार कहानी-कला के प्रमुख तत्त्वों की दृष्टि से शिवानी जी की ‘लाटी’ कहानी सफल कहानी है। इसमें प्रारम्भ से अन्त तक पाठक के हृदय को बाँध लेने का गुण विद्यमान है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 2 मलिक मुहम्मद जायसी

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name मलिक मुहम्मद जायसी
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 2 मलिक मुहम्मद जायसी

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय लिखिए।
या
मलिक मुहम्मद जायसी की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन-परिचय देते हुए उसकी रचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
मलिक मुहम्मद जायसी प्रेम की पीर’ के गायक के रूप में विख्यात हैं और हिन्दी के गौरव ग्रन्थ ‘पद्मावत’ नामक प्रबन्ध काव्य के रचयिता हैं। ये हिन्दी-काव्य की निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के सर्वाधिक प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।

जीवन-परिचय – जायसी के अपने कथन के अनुसार उनका जन्म 900 हिजरी (1492 ई० ) में हुआ था – ‘भा औतार मौर नौ सदी।’ जायसी को जन्म-स्थान रायबरेली जिले का जायस नामक स्थान था, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है – जायसनगर मोर अस्थानू। इसी कारण ये ‘जायसी’ कहलाए। इनके पिता का नाम शेख ममरेज था। इनके माता-पिता की मृत्यु इनके बचपन में ही हो गयी थी। फलत: ये फकीरों और साधुओं के साथ रहने लगे। जायसी का व्यक्तित्व आकर्षक न था। इनके बायें कान की श्रवण-शक्ति एवं बायीं आँख सम्भवतः चेचक से जाती रही थी, जिसका उल्लेख इन्होंने स्वयं ‘पद्मावत’ में किया है-मुहम्मद बाईं दिसि तजा, एक सरवन एक आँखि। जायसी के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि वे एक बार शेरशाह के दरबार में गये। शेरशाह उनके कुरूप चेहरे पर हँस पड़ा। इस पर कवि ने बड़े शान्त भाव से पूछा-‘मोहिका हँसेसि कि कोहरहि?’ अर्थात् तुम मुझ पर हँसे थे या उस कुम्हार (सृष्टिकर्ता ईश्वर) पर? इस पर शेरशाह ने लज्जित होकर इनसे क्षमा माँगी थी। कवि जायसी का कण्ठस्वर बड़ा ही मीठा था और काव्य था ‘प्रेम की पीर’ से लबालब भरा हुआ। मुख की कुरूपता को देखकर जो हँसे थे, वे ही इस प्रेमकाव्य को सुनकर आँसू भर लाये-जेइमुख देखा तेइ हँसा, सुना तो आये आँसु। कवि का आध्यात्मिक अनुभव बहुत बढ़ा-चढ़ा था। सूफी मुसलमान फकीरों के अतिरिक्त कई सम्प्रदायों (जैसे—गोरखपन्थी, रसायनी, वेदान्ती आदि) के हिन्दू साधुओं के सत्संग से इन्हें हठयोग, वेदान्त, रसायन आदि से सम्बद्ध बहुत-सा ज्ञान प्राप्त हो गया था, जो इनकी रचना में सन्निविष्ट है। इन्हें इस्लाम और पैगम्बर पर पूरी आस्था थी। ये निजामुद्दीन औलिया की शिष्य-परम्परा में थे। ये बड़े भावुक भगवद्भक्त थे और अपने समय के बड़े ही सिद्ध और पहुँचे हुए फकीर माने जाते थे। सच्चे भक्त का प्रधान गुण प्रेम इनमें भरपूर था। अमेठी के राजा रामसिंह इन पर बड़ी श्रद्धा रखते थे।

जीवन के अन्तिम दिनों में ये अमेठी से कुछ दूर एक घने जंगल में रहा करते थे। यहीं पर एक शिकारी की गोली से इनकी मृत्यु हो गयी। इनका निधन 949 हिजरी अर्थात् सन् 1542 ई० में हुआ बताया जाता है।
रचनाएँ जायसी की तीन रचनाएँ प्रामाणिक रूप से इन्हीं की मानी जाती हैं। ये हैं – पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम।

पद्मावत: जायसी की कीर्ति का मुख्य आधार ‘पद्मावत’ नामक प्रबन्ध काव्य है, जो हिन्दी में अपने ढंग का अनोखा है। यह एक प्रेमाख्यानक काव्य है, जिसका पूर्वार्द्ध कल्पित और उत्तरार्द्ध ऐतिहासिक है। पूर्वार्द्ध में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमगाथा है। सूफी सिद्धान्तानुसार कवि ने रत्नसेन को साधक और पद्मावती को ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया है। रत्नसेने अनेक बाधाओं को पार करता और कष्टों को सहता हुआ अन्त में पद्मावती को प्राप्त करता है। उत्तरार्द्ध में पद्मिनी और अलाउद्दीन वाली ऐतिहासिक गाथा है। इस भाग में पद्मावती ब्रह्म रूप में नहीं, प्रत्युत एक सामान्य नारी के रूप में प्रस्तुत की गयी है।

आखिरी कलाम – यह रचना दोहे-चौपाइयों में और बहुत छोटी है। इनमें मरणोपरान्तं जीव की दशा और कयामत (प्रलय) के अन्तिम न्याय आदि का वर्णन है।

अखरावट – इसमें वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर इस्लामी सिद्धान्त-सम्बन्धी कुछ बातें कही गयी हैं। इसमें ईश्वर, जीव, सृष्टि आदि से सम्बन्धित दार्शनिक वर्णन है।

चित्ररेखा – यह ‘प्रेमकाव्य है, जिसमें कन्नौज के राजा कल्याणसिंह के पुत्र राजकुमार प्रीतम सिंह तथा चन्द्रपुर-नरेश चन्द्रभानु की राजकुमारी चित्ररेखा की प्रेमकथा वर्णित है।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

रस-योजना -‘पद्मावत’ प्रबन्ध काव्य होते हुए भी एक श्रृंगारप्रधान प्रेमकाव्य है; अतः श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का वर्णन इसमें मिलता है। यद्यपि अन्य रसों की भी योजना की गयी है, परन्तु गौण रूप में ही। ये गौण रस हैं–करुण, वात्सल्य, वीर, शान्त और अद्भुत।

संयोग-पक्ष – जायसी के प्रमुख काव्य ‘पद्मावत’ में संयोग-पक्ष को उतना विशद् और विस्तृत चिंत्रण नहीं है, जितना वियोग-पक्ष का; क्योंकि संयोग-पक्ष से कवि के आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती थी। रहस्यवादी कवि होने के नाते इन्होंने रनसेन और पद्मावती को जीव और ब्रह्म का प्रतीक माना है। सूफी सिद्धान्त की दृष्टि से रत्नसेन और पद्मावती के संयोग-वर्णन को इन्होंने अधिक महत्त्व दिया है। संयोग के अन्तर्गत नवोढ़ा स्त्री की भावनाओं का अत्यधिक सुन्दर चित्र निम्नांकित पंक्तियों में मिलता है

हौं बौरी औ दुलहिन, पीउ तरुन सह तेज।
ना जानौं कस होइहिं, चढ़त कंते के सेज ॥

विरह-वर्णन – जायसी का विरह-वर्णन अद्वितीय है। नागमती और पद्मावती दोनों के विरह-चित्र हमें ‘पद्मावत’ में मिलते हैं। यद्यपि इस वर्णन, में अत्युक्तियों का सहारा भी लिया गया है, पर उसमें जो वेदना की तीव्रता है, वह हिन्दी-साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। उसका एक-एक पद विरह का अगाध सागर है। पति के प्रवासी होने पर नागमती बहुत दु:खी है। वह सोचती है कि वे स्त्रियाँ धन्य हैं, जिनके पति उनके पास हैं

जिन्ह घर कंता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्ब।
कन्त पियारा बाहिरे, हम सुख भूला सर्ब ।।

करुणरस – श्रृंगार के उपरान्त करुण रस का जायसी ने विशेष वर्णन किया है। करुणा का प्रथम दृश्य वहाँ आता है, जहाँ रत्नसेन योगी बनकर घर से निकलने लगता है और उसकी माता–पत्नी विलाप करती हुई उसे समझाती

रोवत मायन बहुरत बारा। रतन चला घर भा अँधियारा॥
रोवहिं रानी तजहिं पराना। नोचहिं बार करहिं खरिहाना ॥

रहस्यवाद – कविवर जायसी ने अपने ‘पद्मावत’ नामक महाकाव्य में लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम का चित्रण किया है। ‘पद्मावत’ में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ लौकिक पक्ष से अलौकिक की ओर संकेत किया गया है। नागमती का हृदयद्रावक सन्देश निम्नलिखित पंक्तियों में द्रष्टव्य है ।

पिउ सौ कहेउ सँदेसड़ा, हे भौंरा ! हे काग।
सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग॥

प्रकृति-चित्रण – मानव-प्रकृति के चित्रण के अतिरिक्त जायसी ने बाह्य दृश्यों का भी बहुत ही उत्कृष्ट चित्रण किया है। यद्यपि इनके काव्य में प्रकृति का आलम्बन-रूप में चित्रण नहीं मिलता, तथापि उद्दीपन और मानवीकरण अलंकारों के रूप में प्रकृति के अनेक रम्य चित्र उपलब्ध होते हैं।
भावपक्ष के उपर्युक्त विवेचन से सिद्ध होता है कि जायसी वास्तव में रससिद्ध कवि हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ।

भावपक्ष के साथ ही जायसी का कलापक्ष भी पुष्ट, परिमार्जित और प्रांजल है, जिसका विवेचन निम्नवत् है

छन्दोविधान:
जायसी ने अपने काव्य के लिए दोहा-चौपाई की पद्धति चुनी है। इस पद्धति में कवि ने चौपाई की सात पंक्तियों के बाद एक दोहे का क्रम रखा है, जब कि तुलसी ने आठ पंक्तियों के बाद। इस छन्द-विधान के लिए जायसी तुलसी के पथ-प्रदर्शक भी माने जा सकते हैं।

भाषा:
जायसी की भाषा ठेठ अवधी है। इसमें बोलचाल की अवधी का माधुर्य पाया जाता है। इसमें शहद की। सहज मिठास है, मिश्री को परिमार्जित स्वाद नहीं। लोकोक्तियों के प्रयोग से इसमें प्राण-प्रतिष्ठा भी हुई है। कहीं-कहीं शब्दों को तोड़-मरोड़ दिया गया है और कहीं एक ही भाव या वाक्य के कई स्थानों पर प्रयुक्त होने के कारण पुनरुक्ति दोष भी आ गया है। भाषा की स्वाभाविकता, सरसता और मनोगत भावों की प्रकाशन-पद्धति ने जायसी को अवधी साहित्य के क्षेत्र में मान्य बना दिया है।

शैली:
काव्य-रूप की दृष्टि से जायसी ने प्रबन्ध शैली को अपनाया है। उस समय फारसी में मसनवी शैली और हिन्दी में चरितकाव्यों की एक विशेष शैली प्रचलित थी। जायसी ने दोनों का समन्वय कर एक नवीन शैली को जन्म दिया। ‘पद्मावत’ में शैली का यही मिश्रित-नवीन रूप मिलता है। ‘पद्मावत’ के आरम्भ में मसनवी शैली और भाषा, छन्द आदि में चरित-काव्य की शैली मिलती है। इन्होंने चौपाई और दोहा छन्दों में भाषा-शैली को सुन्दर निर्वाह किया है। समग्र रूप में जायसी की भाषा-शैली सरल, सशक्त एवं प्रवाहपूर्ण है।

अलंकार – अलंकारों का प्रयोग जायसी ने काव्य-प्रभाव एवं सौन्दर्य के उत्कर्ष के लिए ही किया है, चमत्कार-प्रदर्शन के लिए नहीं। इनके काव्य में सादृश्यमूलक अलंकारों की प्रचुरता है। आषाढ़ के महीने के घन-गर्जन को विरहरूपी राजा के युद्ध-घोष के रूप में प्रस्तुत करते हुए बिजली में तलवार का और वर्षा की बूंदों में बाणों की कल्पना कर कितना सुन्दर रूपक बाँधा गया है

खड़गे बीजु चमकै चहुँ ओरा। बूंद बान बरसहिं घन घोरा॥

यहाँ रूपक के साथ-साथ अनुप्रास का भी सुन्दर एवं कलात्मक प्रयोग हुआ है।
साहित्य में स्थानडॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने जायसी की सराहना करते हुए लिखा है कि, “जायसी अत्यन्त संवेदनशील कवि थे। संस्कृत के महाकवि बाण की भाँति वे शब्दों के चित्र लिखने के धनी हैं। वे अमर कवि हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

नागमती-वियोग-वर्णन

प्रश्न 1:
नागमती चितउर पथ हेरा । पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा ।।
नागर काहु नारि बस परा।   तेइ मोर पिउ मोसौं हरा ।।
सुआ काल होइ लेइगा पीऊ । पिउ नहिं जात, जात बरु जीऊ ।।
भयउ नरायन बावन करा। राज करत रोजा बलि छरा ।।
करन पास लीन्हेछ कै छंदू । बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू ॥
मानत भोग गोपिचंद भोगी । लेइ अपसवा जलंधर जोगी ।।
लै कान्हहिं भी अकरूर अलोपी । कठिन बिछोह जियहिं किमि गोपी ।।

सारस जोरी कौन हरि, मारि बियाधा लीन्ह ।
झुरि-झुरि पज़र हौं भई, बिरह काल मोहि दीन्ह ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) नागमती चित्तौड़ में किसकी राह देख रही है?
(iv) विष्णु ने वामन रूप धारण करके किसे छला था?
(v) किर कारण नागमती सूखकर हड्डियों का ढाँचामात्र रह गयी है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में ‘नागमती-वियोग-वर्णन’ शीर्षक के अन्तर्गत संकलित एवं मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित ‘पद्मावत’ महाकाव्य से उद्धृत है।। अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – नागमती-वियोग-वर्णन।
कवि का नाम – मलिक मुहम्मद जायसी।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – नागमती चित्तौड़ में अपने पति राजा रत्नसेन की बाट जोह रही थी और
कहती थी कि सारस की जोड़ी में से एक (नर) को मारकर किस व्याध (बहेलिये) ने मादा को उससे अलग कर दिया है और यह विरहरूपी काल मुझे दे दिया है, जिसके कारण मैं सूखकर हड्डियों का ढाँचामात्र रह गयी हूँ।
(iii) नागमती चित्तौड़ में अपने राजा रत्नसेन की राह देख रही है।
(iv) विष्णु ने वामन रूप धारण करके राजा बलि को छला था।
(v) नागमती अपने प्रीतम से अलग होकर विरह काल के कारण सूखकर हड्डियों का ढाँचामात्र रह गयी है।

प्रश्न 2:
पाट महादेइ ! हिये न हारू । समुझि जीउ चित चेतु सँभारू ।।
भौंर कँवल सँग होइ मेरावा । सँवरि नेह मालति पहँ आवा ।।
पपिहै स्वाती सौं जस प्रीती । टेकु पियास बाँधु मन थीती ।।
धरतिहिं जैस गगन सौं नेहा । पलटि आव बरषा ऋतु मेहा ।।
पुनि बसंत ऋतु आव नवेली । सो रसे सो मधुकर सो बेली ।।
जिनि असे जीव करसि तू बारी । यह तरिबर पुनि उठिहिं सँवारी ।।
दिन दस बिनु जल सूखि बिधंसा । पुनि सोई सरबर सोई हंसा ।।

मिलहिं जो बिछुरे साजन, अंकम भेटि गहंत ।
तपनि मृगसिरा जे सहैं, ते अद्रा पलुहंत ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पति-वियोग से पीड़ित नागमती को उनकी सखियाँ क्या धीरज बँधाती हैं?
(iv) आकाश पृथ्वी से किस रूप में वापस आ मिलता है?
(v) पपीहा अपनी प्यास कैसे बुझाता है
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – रानी नागमती पति-वियोग से पीड़ित है। उसकी सखियाँ उसे धीरज बँधाती हुई कहती हैं कि पटरानी जी! आप अपने हृदय में इतनी निराश न हों। धैर्य धारण कर स्वयं को सँभालिए। जब बिछुड़े हुए पति तुम्हें पुनः मिलेंगे तो वे (द्विगुणित अनुराग से) तुम्हें प्रगाढ़ आलिंगन में बाँध लेंगे; क्योकि जो मृगशिरा नक्षत्र में (ज्येष्ठ मास) की तपन सहते हैं, वे आर्द्रा नक्षत्र (आषाढ़) की वर्षा से पुनः पल्लवित (हरे-भरे) हो उठते हैं।
(iii) पति-वियोग से पीड़ित नागमती को उनकी सखियाँ यह धीरज बँधाती हैं कि महारानी आप निराश मत होइए। महाराज आपके पूर्व स्नेह को स्मरण करके पुन: वापस आ जाएँगे।
(iv) आकाश पृथ्वी से मेधों की वर्षा की बूंदों के रूप में वापस आ मिलता है।
(v) पपीहा स्वाति नक्षत्र का जल पीकर अपनी प्यास बुझाता है।

प्रश्न 3:
चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा । साजा बिरह दुद दल बाजा ।।
धूम, साम, धौरे घन धाए । सेत धजा बग पाँति देखाए ।।
खड़ग ‘बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुंद बान बरसहिं घनघोरा ।।
ओनई घटा आइ चहुँ फेरी । कंत ! उबारु मदन हौं घेरी ।।
दादुर मोर कोकिला पीऊ। गिरै बीजु घट रहै न जीऊ ।।
पुष्य नखत सिर ऊपर आवा । हौं बिनु नाह मंदिर को छावा ?
अद्रा लाग लागि भुईं लेई । मोहिं बिनु पिउ को आदर देई ?

जिन्ह घर कंता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्ब ।
कंत पियारा बाहिरै, हम सुख भूला सबै ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आषाढ़ के महीने में नागमती को बिजली की चमक तथा मेघों की गड़गड़ाहट कैसी प्रतीत होती
(iv) आषाढ़ माह में चारों ओर किनकी आवाजें सुनायी पड़ती हैं?
(v) आषाढ़ माह में कौन-सी स्त्रियाँ गर्व का अनुभव करती हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – राजा रत्नसेन पद्मावती को पाने के लिए योगी बनकर सिंहलगढ़ की ओर चले गये हैं। लम्बे समय तक न लौटने पर रानी नागमती शंकित होती है तथा विरह की अग्नि में जलने लगती है। आर्द्रा नक्षत्र के उदय होने पर घनघोर वर्षा होती है। ऐसे वातावरण में उसकी विरह-वेदना और बढ़ जाती है। वह अनुभव करती है कि जिन स्त्रियों के पति घर पर होते हैं। वे ही सुखी होती हैं। उन्हीं को पत्नी होने का गौरव प्राप्त होता है। विरहिणियों को तो दु:खी जीवन ही बिताना पड़ता है। मेरा पति बाहर है तो मैं तो सभी सुख भूल गयी हूँ।
(iii) आषाढ़ के महीने में नागमती को बिजली की चमक तलवार जैसी दिखाई पड़ती है तथा मेघों की गड़गड़ाहट युद्ध के जुगाड़ों के समान प्रतीत होती है।
(iv) आषाढ़ माह में चारों ओर मेंढ़क, मोर तथा कोयलों की आवाजें सुनायी पड़ती हैं।
(v) आषाढ़ माह में जिन स्त्रियों के पति घर पर हैं, वे गर्व का अनुभव करती हैं।

प्रश्न 4:
भा बैसाख तपनि अति लागी । चोआ चीर चॅदन भा आगी ।।
सुरुज जरत हिवंचल तांका । बिरह बजागि सौंह रथ हाँका ।।
जरत बजागिनि करु पिउ छाहाँ ।आइ बुझाउ अँगारन्ह माहाँ ।।
तोहि दरसन होइ सीतल नारी । आइ आगि ते करु फलवारी ।।
लागिउँ जरै जरै जस भारू | फिर फिर पूँजेसि, तजेउँ न बारू ।।
सरवर हिया घटती निति जाई । टूक टूक , होइ के बिहराई ।।
बिहरत हिया करहु पिउ ! टेका।’ दीठि दवॅगरा मेरवहु एका ।।

कॅवल जो बिगसा मानसर, बिनु जल गयउ सुखाइ।
कबहुँ बेलि फिरि पलुहै, जौ पिउ सींचै आइ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) वैशाख माह में कौन भाड़ में पड़े दाने के समान भुन रहा है?
(iv) विरह के ताप में कौन उत्तरोत्तर सूखता जा रहा है?
(v) किसके सींचने पर बेल फिर से हरी हो सकती है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – वैशाख मास की प्रचण्ड गर्मी में अपनी दशा का वर्णन करती हुई विरहिणी नागमती कहती है कि मानसरोवर में जो कमल खिला था, वह जल के अभाव में सूख गया। आपके सम्पर्क में आकर मुझे जो प्रेम मिला था, अब वही विरह के कारण नष्ट होता जा रहा है। वह बेल फिर हरी-भरी हो सकती है, यदि प्रिय स्वयं आकर उसे सींचें।
(iii) वैशाख माह में नागमती विरह वेदना के कारण भाड़ में पड़े चने के समान भुन रही है?
(iv) विरह के ताप में नागमती का हृदयरूपी सरोवर उत्तरोत्तर सूखता जा रहा है।
(v) पिय के स्वयं आकर सींचने पर बेल फिर से हरी हो सकती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 8 Index Numbers

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 8
Chapter Name Index Numbers (सूचकांक)
Number of Questions Solved 51
Category UP BoardSolutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 8 Index Numbers (सूचकांक)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मदों के सापेक्षिक महत्त्व को बताने वाले सूचकांक को
(क) भारित सूचकांक कहते हैं।
(ख) सरल समूहित सूचकांक कहते हैं।
(ग) सरल मूल्यानुपातों का औसत कहते हैं।
उत्तर
(क) भारित सूचकांक कहते हैं।

प्रश्न 2.
अधिकांश भारित सूचकांकों में भार का सम्बन्ध
(क) आधार वर्ष से होता है।
(ख) वर्तमान वर्ष से होता है।
(ग) आधार एवं वर्तमान वर्ष दोनों से होता है।
उत्तर
(ख) वर्तमान वर्ष से होता है।

प्रश्न 3.
ऐसी कंस्तु जिसका सूचकांक में कम भार है, उसकी कीमत में परिवर्तन से सूचकांक में कैसा परिवर्तन होगा
(क) कस
(ख)
अधिक
(ग)
अनिश्चित
उत्तर
(क)
कम 

प्रश्न 4.
कोई उपभोक्ता सूचकांक किस परिवर्तन को मापता है?
(क)
खुदरा कीमत ।
(ख) थोक कीमत
(ग)
उत्पादकों की कीमत
उत्तर
(क)
खुदरा कीमत

प्रश्न 5.
औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक में किस मद के लिए उच्चतम भार होता है?
(क) खाद्य पदार्थ
(ख)
आवास
(ग)
कपड़े
उत्तर
(क)
खाद्य पदार्थ

प्रश्न 6.
सामान्यतः मुद्रा-स्फीति में परिकलन में किसका प्रयोग होता है?
(क)
थोक कीमत सूचकांक
(ख) उपभोक्ता कीमत सूचकांक
(ग) उत्पादक कीमत सूचकांक
उत्तर
(क) थोक कीमत सूचकांक

प्रश्न 7.
हमें सूचकांक की आवश्यकता क्यों होती है?
उतर
सूचकांक सम्बन्धित चरों के समूह के परिमाण में परिवर्तनों को मापने का एक सांख्यिकीय साधन है। ये अर्थव्यवस्था के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। निम्नलिखित कारणों से हमें सूचकांक की आवश्यकता होती है

  1. मजदूरी तय करने, लगान, कर, आय नीति का निर्धारण, कीमत-निर्धारण एवं आर्थिक नीति बनाने | के लिए सूचकांक का प्रयोग किया जाता है।
  2. उपभोक्ता कीमत सूचकांक (CPI) फुटकर (retail)-कीमतों में औसत परिवर्तन मापने के लिए आवश्यक होता है।
  3. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IPI) अनेक उद्योगों के औद्योगिक उत्पादन के स्तर में परिवर्तन को मापने में सहायक होता है।
  4. थोक कीमत सूचकांक (WPI) सामान्य कीमत स्तर में परिवर्तन का संकेत देता है।
  5. कृषि क्षेत्र की प्रगति का जायजा लेने के लिए कृषि उत्पादन सूचकांक (API) आवश्यक होता है।

प्रश्न 8.
आधार अवधि (आधार वर्ष) के वांछित गुण क्या होते हैं?
उत्तर
आधार अवधि (आधार वर्ष) के वांछित गुण निम्नलिखित होने चाहिए|

  1. आधार वर्ष एक सामान्य वर्ष होना चाहिए, इस वर्ष असाधारण प्राकृतिक अथवा राजनीतिक घटनाएँ घटित न हुई हों।
  2. आधार वर्ष में कीमत स्तर में असाधारण परिवर्तन न हुए हों।
  3. यह वर्ष न तो अत्यधिक पुराना हो और न ही अत्यधिक नया।।
  4. इस वर्ष में पर्याप्त एवं विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध होने चाहिए।


प्रश्न 9.
भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोक्ता कीमत सूचकांकों की अनिवार्यता क्यों होती
उत्तर
भिन्न उपभोक्ताओं के उपभोग में व्यापक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। इसलिए भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोर्ग कीमत सूचकांक बनाए जाते हैं। भारत में तीन उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाए जाते

  1. औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (आधार वर्ष 1982)
  2. शहरी गैर-शारीरिक (मजदूर) कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (आधार वर्ष | 1984-85)
  3. कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (आधार वर्ष 1986-87)।

प्रश्न 10.
औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक क्या मापता है?
उत्तर
भारत के औद्योगिक श्रमिकों के लिए अलग से उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाया जाता है। इसे 1982 को आधार वर्ष मानकर बनाया जाता है। इसका नियमित रूप से हर महीने परिकलन किया जाता है। यह सूचकांक औद्योगिक श्रमिकों के जीवन-निर्वाह पर फुटकर कीमतों में आए परिवर्तनों के प्रभावों को मापता है। इनका प्रकाशन श्रमिक केन्द्र शिमला द्वारा किया जाता है। इसका निर्माण करते समय औद्योगिक श्रमिकों के लिए मुख्य वस्तु समूहों को उपयुक्त भार दिया जाता है।

प्रश्न 11.
कीमत सूचकांक तथा मात्रा सूचकांक में क्या अन्तर है?
उत्तर
कीमत सूचकांक एक अभारित सूचकांक है। यह वस्तु की वर्तमान वर्ष की कीमत एक आधार वर्ष की कीमत का सरल अनुपात होता है। सूत्र रूप में,
[latex] { p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma p }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 0 } } \times 100 [/latex]
यहाँ, P01= कीमत सूचकांक
P1 = वर्तमान वर्ष की कीमत
P0 = आधार वर्ष की कीमत
मात्रा सूचकांक कीमत के स्थान पर उत्पादन की मात्रा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस प्रकार के सूचकांक की रचना करते समय सर्वप्रथम मात्रा अनुपात ज्ञात किए जाते हैं। सूत्रानुसार,
[latex] \cfrac { q1 }{ q0 } \times 100 [/latex]
यहाँ, Q.R. = मात्रानुपात
q = वर्तमान वर्ष में उत्पादन की मात्रा
qo = आधार वर्ष में उत्पादन की मात्रा
इसके बाद प्रचलित वर्ष के सभी मात्रानुपातों का समान्तर माध्य निकाल लिया जाता है। यही मात्रा सूचकांक है।।

प्रश्न 12.
क्या किसी भी तरह की कीमत परिवर्तन एक कीमत सूचकांक में प्रतिबिम्बित होता है?
उत्तर
कीमत सूचकांक फुटकर कीमतों में परिवर्तनों के औसत को मापता है। यह किसी विशिष्ट कीमत परिवर्तन को प्रदर्शित नहीं करता है, जबकि प्रत्येक प्रकार की कीमत में परिवर्तन कीमत सूचकांक के मान को प्रभावित करता है।

प्रश्न 13.
क्या शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व कर सकता है?
उत्तर
नहीं, शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।

प्रश्न 14.
नीचे एक औद्योगिक केन्द्र के श्रमिकों द्वारा 1980 एवं 2005 के दौरान निम्न मदों पर प्रति
व्यक्ति मासिक व्यय को दर्शाया गया है। इन मदों का भार क्रमशः 75, 10, 5, 6 तथा 4 है। 1980 को आधार मानकर 2005 के लिए जीवन-निर्वाह लागत का एक भारित सूचकांक तैयार कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 1
हल
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 2
[latex] CPI=\cfrac { \Sigma wR }{ \Sigma W } =\cfrac { 18459.47 }{ 100 } =184.59 [/latex]

प्रश्न 15.
निम्नलिखित सारणी को ध्यानपूर्वक पढिए एवं अपनी टिप्पणी कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 3
उत्तर
उपर्युक्त तालिका से निम्नलिखित बातें प्रतिबिम्बित होती हैं

  1. विभिन्न उद्योगों, खनन एवं उत्खनन, विनिर्माण एवं विद्युत की संवृद्धि दरें भिन्न-भिन्न हैं। इनमें विनिर्माण क्षेत्र की संवृद्धि दर सबसे अधिक है, जबकि खनन एवं उत्खनन क्षेत्र की संवृद्धि दर सबसे कम है।
  2. विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को भिन्न-भिन्न भार दिए गए हैं। इनमें सबसे अधिक भार विनिर्माण क्षेत्र को तथा सबसे कम भार विद्युत क्षेत्र को दिया गया है।
  3. सामान्य संवृद्धि दर खनन एवं उत्खनन तथा विद्युत क्षेत्र से अधिक है किन्तु विनिर्माण क्षेत्र से कम

प्रश्न 16.
अपने परिवार में उपभोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची बनाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर
हमारे परिवार में उपभोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची
1. ईंधन एवं प्रकाश,
2. वस्त्र,
3. खाद्य-पदार्थ,
4. शिक्षा,
5. मकान का किरायी,
6. परिवहन,
7. मनोरंजन,
8. जूते-चप्पल,
9. फर्नीचर,
10. विविध

प्रश्न 17.
यदि एक व्यक्ति का वेतन आधार वर्ष में 4000 प्रतिवर्ष था और उसका वर्तमान वर्ष में वेतन १6000 है। उसके जीवन-स्तर को पहले जैसा ही बनाए रखने के लिए उसके वेतन में कितनी वृद्धि होनी चाहिए, यदि उपभोक्ता कीमत सूचकांक 400 हो।
उतर
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वेतन में प्रतिशत बढ़ोतरी  [latex]\cfrac { 10000\times 100 }{ 6000 } =166.67 [/latex]%
जीवन-स्तर का समान स्तर कायम रखने हेतु वेतन में 166.67% वृद्धि होनी चाहिए।

प्रश्न 18.
जून 2005 में उपभोक्ता कीमत सूचकांक 125 था। खाद्य सूचकांक 120 तथा अन्य मदीं का सूचकांक 135 था। खाद्य-पदार्थों को दिया जाने वाला भार कुल भार का कितना प्रतिशत है? ।
उत्तर
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प्रश्न 19.
किसी शहर में एक मध्यवर्गीय पारिवारिक बजट में जाँच-पड़ताल से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है|
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1995 की तुलना में 2004 में निर्वाह सूचकांक का मान क्या होगा?
हल
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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 8
प्रश्न 20.
दो सप्ताह तक अपने परिवार के (प्रति इकाई) दैनिक व्यय, खरीदी गई मात्रा तथा दैनिक खरीददारी को अभिलेखित कीजिए। कीमत में आए परिवर्तन आपके परिवार को किस तरह से प्रभावित करते हैं?
उत्तर
स्वयं करें।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित आँकड़े दिए गए हैं।
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रस्रोत- आर्थिक सर्वेक्षण, भारत सरकार, 2004-2005.
(क) विभिन्न सूचकांकों को प्रयुक्त करते हुए मुद्रास्फीति की दर का परिकलन कीजिए।
(ख) सूचकांकों के सापेक्षिक मानों पर टिप्पणी कीजिए।
(ग) क्या ये तुलना योग्य हैं?
उत्तर
(क)(i)
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(iv)
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(ख) औद्योगिक श्रमिकों के लिए आधार वर्ष 1982 के साथ उपभोक्ता कीमत सूचकांक सबसे अधिक है। थोक मूल्य सूचकांक पूरी अवधि में सबसे कम है। (1993-96 से 2003-04 तक)
(ग) तालिका में दिए गए सूचकांक निम्नलिखित कारणों से तुलनात्मक नहीं हैं

  1. आधार वर्ष अलग-अलग हैं।
  2.  विभिन्न सूचकांकों की मदें भिन्न हो सकती हैं।
  3. अलग-अलग सूचकांकों के लिए विभिन्न मदों को भिन्न भार प्रदान किए जा सकते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“कीमत क्य सूचकांक आधार-वर्ष की तुलना में किसी अन्य समय में कीमतों की औसत ऊँचाई को प्रकट करने वाली संख्या है।” यह परिभाषा दी है
(
क) प्रो० चैण्डलर ने
(ख) प्रो० बाउले ने
(ग) किनले ने ।
(घ) हार्पर ने
उत्तर—
(क)
प्रो० चैण्डलर ने

प्रश्न 2. सूचकांक की विशेषता नहीं है
(क) सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है।
(ख) सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त नहीं किया जाता है।
(ग) यह एक विशेष प्रकार का माध्य ही है।
(घ) सूचकांक आर्थिक पहलू के उच्चावचनों को संख्यात्मक रूप में ही माप सकता है।
उत्तर
(ख) सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त नहीं किया जाता है।

प्रश्न 3.
“सूचकांक की श्रेणी एक ऐसी श्रेणी होती है, जो अपने झुकाव तथा उच्चावचनों द्वारा जिस परिमाण से संबंधित है, में होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करती है।”
(क) डॉ० बावले ने
(ख) चैण्डलर ने
(ग) होरेस सेक्राइस्ट ने
(घ) किनले ने
उत्तर
(ग) होरेस सेक्राइस्ट ने

प्रश्न 4.
श्रृंखला मूल्यानुपात
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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 17
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 18

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूचकांक क्या है?
उत्तर
सूचकांक सम्बन्धित चरों के समूह के परिमाण में परिवर्तनों को मापने की एक सांख्यिकी विधि है।

प्रश्न 2.
सूचकांकों को किस रूप में व्यक्त किया जाता है?
उत्तर
सूचकांकों को प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 3.
आधार-वर्ष क्या है?
उत्तर
दो वर्षों में से जिस वर्ष को आधार मानकर तुलना की जाती है, उसे आधार-वर्ष कहते हैं।

प्रश्न 4.
कीमत सूचकांक का क्या उपयोग है?
उत्तर
कीमत सूचकांक कुछ वस्तुओं की कीमतों की माप करता है जिससे उनकी तुलना सम्भव हो जाती

प्रश्न 5.
परिमाणात्मक सूचकांक क्या मापते हैं? उत्तर–परिमाणात्मक सूचकांक उत्पादन की भौतिक मात्रा, निर्माण तथा रोजगार में परिवर्तन को मापते हैं। प्रश्न 6. उत्पार्दन सूचकांक किसका सूचक है?
उत्तर
उत्पादन सूचकांक अर्थव्यवस्था में उत्पादन के स्तर का सूचक होता है।

प्रश्न 7.
एक सरल समूहित कीमत सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 2 } } \times 100 [/latex]

प्रश्न 8.
एक भारित समूहित कीमत सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 2 }{ q }_{ 2 } } \times 100 [/latex]

प्रश्न 9.
मूल्यानुपातों के भारित सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma W(\cfrac { { P }_{ 1 } }{ { P }_{ 2 } } )\times 100 }{ \Sigma w } [/latex]

प्रश्न 10.
उपभोक्ता कीमत सूचकांक क्या मापता है?
उत्तर
यह फुटकर कीमतों में औसत परिवर्तन को मापता है।

प्रश्न 11.
उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाने की क्या उपयोगिता है?
उत्तर
उपभोक्ता कीमत सूचकांक (CPI) मजदूरी समझौता, आय-नीति, कीमत-नीति, किराया नियन्त्रण, कराधान तथा सामान्य आर्थिक नीतियों के निर्माण में सहायक होते हैं।

प्रश्न 12.
थोक कीमत सूचकांक का प्रयोग सामान्यतः किसलिए किया जाता है?
उत्तर
थोक कीमत सूचकांक (WPI) का प्रयोग सामान्य रूप से मुद्रा स्फीति को मापने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 13.
मुद्रा की क्रय शक्ति एवं वास्तविक मजदूरी के परिकलन के लिए किस सूचकांक का प्रया किया जाता है?
उत्तर
उपभोक्ता कीमत सूचकांक।

प्रश्न 14.
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की क्या उपयोगिता है?
उत्तर
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक हमें औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन में परिवर्तन के बारे में परिमाणात्मक अंक प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
कृषि उत्पादन सूचकांक का क्या उपयोग है।
उत्तर
कृषि उत्पादन सूचकांक हमें कृषि क्षेत्र के निष्पादन के बारे में बताते हैं।

प्रश्न 16.
सेंसेक्स क्या है?
उत्तर
सेंसेक्स वह सूचक है जो कि भारतीय स्टॉक बाजार में होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है। इसका आधार-वर्ष 1978-79 है।

प्रश्न 17.
सूचकांकों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर

  1. सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है।
  2. सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 18.
सूचकांकों के दो लाभ बताइए।
उत्तर

  1. सामान्य मूल्य-स्तर में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए सूचकांकों का प्रयोग किया जाता
  2. सूचकांक वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन का सूचक होता है।

प्रश्न 19.
सूचकांकों की दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर

  1. सूचकांके निरपेक्ष परिवर्तनों की मापों की अपेक्षा सापेक्ष परिवर्तनों की ही माप करता है।
  2. विभिन्न सूचकांक अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करते हैं।

प्रश्न 20.
फिशर का आदर्श सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
Fisher’s Ideal index
[latex]No.\sqrt { \cfrac { { \Sigma p }_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 0 } } \times \cfrac { { \Sigma { p }_{ 1 } }{ q }_{ 1 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 1 } } } \times 100 [/latex]

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूचकांकों की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
सूचकांकों की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  1. सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है।
  2.  सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त किया जाता है।
  3. इनका प्रयोग ऐसे तथ्यों के परिवर्तनों को मापने के लिए किया जाता है, जिन्हें प्रत्यक्ष माप से नहीं मापा जा सकता।
  4. यह एक विशेष प्रकार का माध्य ही है।
  5. सूचकांक आर्थिक पहलू के उच्चावचों को संख्यात्मक रूप में ही माप सकता है।

प्रश्न 2.
सूचकांकों के प्रमुख लाभ (उपयोगिता) बताइए।
उत्तर
सूचकांकों के कुछ महत्त्वपूर्ण लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. सूचकांकों द्वारा समय-समय पर कीमत स्तर में होने वाले परिवर्तन या मुद्रा के मूल्य की क्रय शक्ति में होने वाले परिवर्तन को मापा जा सकता है।
  2. सूचकांकों की सहायता से समाज में जीवन-स्तर के परिवर्तन का ज्ञान होता है। ये वास्तविक आय में परिवर्तन के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
  3. इनकी सहायता से वेतन-भत्तों में परिवर्तन करके वास्तविक आय को स्थिर रखने का प्रयास किया जाता है।
  4. व्यापारी व उत्पादक़ कीमत स्तर के परिवर्तन के अनुसार ही अपने उत्पादन तथा व्यापार की योजनाएँ तैयार करते हैं।
  5. आर्थिक स्थिति को ज्ञान प्राप्त करके ही आर्थिक नीतियों का निर्धारण किया जाता है। “
  6. सूचकांकों के आधार पर ही सरकार मौद्रिक व राजकोषीय नीति का प्रारूप तैयार करती है।

प्रश्न 3.
‘फिशर का सूचकांक एक आदर्श सूचकांक है।’ इस कथन के समर्थन में अपने तर्क दीजिए।
उत्तर
‘फिशर का सूचकांक एक आदर्श सूचकांक है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते 
हैं

  1. यह परिवर्तनशील भारों पर आधारित है।
  2. इसमें आधार-वर्ष व चालू वर्ष दोनों की मात्राओं तथा मूल्यों को शामिल किया जाता है।
  3. यह गुणोत्तर माध्य पर आधारित है।
  4. यह ‘समय व्युत्क्रम परीक्षण’ तथा ‘तत्त्व व्युत्क्रम परीक्षण’ दोनों को पूरा करता है।

प्रश्न 4.
सूचकांक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर
उद्देश्य के आधार पर सूचकांकों को दो भागों में बाँटा जा सकता है
1. थोक मूल्य सूचकांक तथा
2. जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक।
1. थोक मूल्य सूचकांक-
ये सूचकांक थोक मूल्यों के परिवर्तनों को प्रकट करने के लिए बनाए 
जाते हैं। इसमें किसी भी सामान्य वर्ष को आधार मानकर किसी भी अन्य चालू अवधि या अवधियों के मूल्यों में परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। कुछ प्रतिनिधि वस्तुओं को चुनकर उनके थोक मूल्य लिए जाते हैं, आधार-वर्ष के मूल्यों को 100 मानकर चालू वर्ष या वर्षों के मूल्यानुपात (Price Relatives) निकाले जाते हैं तथा उनका माध्य ज्ञात किया जाता है। औसत मूल्यानुपात में परिवर्तन सामान्य मूल्य-स्तर में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं।

2. जीवन-
निर्वाह व्यय सूचकांक-जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक किसी स्थान विशेष पर वर्ग विशेष के व्यक्तियों के निर्वाह व्यय में होने वाले परिवर्तनों की दिशा व मात्रा को प्रकट करते हैं। अत: इस सूचकांक को बनाने में उस विशिष्ट वर्ग द्वारा प्रयोग की जाने वाली प्रतिनिधि वस्तुओं को लेते हैं तथा उने सही फुटकर मूल्य ज्ञात करते हैं। विभिन्न वस्तुओं को उनके जीवन-निर्वाह में महत्त्व के अनुसार उचित भारांकन भी किया जाता है।

प्रश्न 5.
सूचकांक की रचना करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर
सूचकांक की रचना करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए

  1. सूचकांक का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
  2. सूचकांक के लिए मदों का चयन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए ताकि ये उनका प्रतिनिधित्व कर सकें।
  3. आधार-वर्ष एक सामान्य वर्ष होना चाहिए और इसे नियमित रूप से अद्यतन किया जाना चाहिए।
  4. उद्देश्य के अनुरूप सूत्र को चयन किया जाना चाहिए।
  5. आँकड़ों के संग्रह में उचित सावधानी बरती जानी चाहिए।

प्रश्न 6.
संवेदी सूचकांक (Sensex) क्या है?
उत्तर
संवेदी सूचकांक (Sensex) वह सूचक है जो कि भारतीय स्टॉक बाजार में होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है। यह मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज संवेदी सूचकांक का संक्षिप्त रूप है। इसका आधार वर्ष 1978-79 है। संवेदी सूचकांक का मान इस अवधि के सन्दर्भ में होता है। इसके अन्तर्गत 30 स्टॉक हैं जो अर्थव्यवस्था .
के 13 क्षेत्रकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। संवेदी सूचकांक का ऊपर चढ़ना यह बताता है कि अर्थव्यवस्था की दशा अच्छी है, बाजार ठीक चल रहा है और निवेशकों के लाभ बढ़ रहे हैं। इसके विपरीत, सूचकांक का नीचे आना शेयर धारकों की हानि का सबब बनता है।

प्रश्न 7.
फिशर का आदर्श सूचकांक ‘समय उत्क्राम्यता परीक्षण पर कैसे खरा उतरता है?
उत्तर
समय उत्क्राम्यता परीक्षण के अनुसार यदि आधार-वर्ष के आधार पर प्रचलित वर्ष का सूचकांक (Poi) निकाला जाए और फिर प्रचलित वर्ष के आधार पर प्रचलित वर्ष का सूचकांक (Po) ज्ञात किया जाए तो ये दोनों एक-दूसरे के व्युत्क्रम होंगे अर्थात् इन दोनों का गुणनफल 1 होगा। सूत्रानुसार,
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प्रश्न 8.
फिशर का आदर्श सूचकांक ‘तत्त्व उत्क्राम्यता परीक्षण पर कैसे खरा उतरता है?
उत्तर
तत्त्व क्राम्यता परीक्षण-इस परीक्षण के अनुसार, यदि ‘मूल्य’ के स्थान पर ‘मात्रा’ और ‘मात्रा के स्थान पर ‘मूल्य’ रखकर सूचकांक (q01) तैयार किया जाए तो उसका और मूल्य सूचकांक poi का गुणनफल चालू वर्ष के कुल मूल्य (Σp1q1) और आधार-वर्ष के कुल मूल्य (Σp0q0) के अनुपात के बराबर होना चाहिए।
सूत्रानुसार,
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूचकांक क्या है? इनकी उपयोगिता तथा सीमाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर
सूचकांक : अर्थ एवं परिभाषाएँ
समाज में वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन होने के कारण मुद्रा का मूल्य भी परिवर्तित होता रहता है, जिससे समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित होता है, फलस्वरूप कीमत-स्तर, उपभोग, जनसंख्या, बचत, निवेश, राष्ट्रीय आय, आयात-निर्यात, मजदूरी, ब्याज, किराया व लगान आदि चरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। अत: मुद्रा-मूल्य में हुए परिवर्तनों का माप करना व्यावहारिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी है। इन परिवर्तनों को निरपेक्ष रूप से मापने का कोई साधन नहीं है; अतः इनको सापेक्ष माप लिया जाता है। सूचकांक विशिष्ट प्रकार के सापेक्ष माप होते हैं, जिनके आधार पर समंकों की उचित एवं स्पष्ट तुलना की जा सकती है।

सूचकांकों की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. चैण्डलर के अनुसार-“कीमत का सूचकांक आधार-वर्ष की तुलना में किसी अन्य समय में कीमतों की औसत ऊँचाई को प्रकट करने वाली संख्या है।”
  2. डॉ० बाउले के शब्दों में- “सूचकांक की श्रेणी एक ऐसी श्रेणी होती है, जो अपने झुकाव तथा उच्चावचनों द्वारा जिस परिमाण से संबंधित है, में होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करती है।”
  3. किनले के शब्दों में- “सूचकांक वह अंक है, जो किसी पूर्व निश्चित तिथि को चुनी वस्तुओं या | वस्तु-समूह के मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे प्रामाणिक मानते हुए किसी बाद की तिथि को | उन्हीं वस्तुओं के मूल्य से तुलना करते हैं।”
  4. क्रॉक्सटन व काउडेन के अनुसार- “सूचकांक, संबंधित चर-मूल्यों के आकार में होने वाले |. अंतरों की माप करने के साधन हैं।”
  5. होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में- “सूचकांक अंकों की एक ऐसी श्रेणी है, जिसके द्वारा किसी भी तथ्य के परिमाण में होने वाले परिवर्तनों का समय या स्थान पर मापन किया जा सकता है।”

सूचकांकों की विशेषताएँ
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर सूचकांकों की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

  1. सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है। ”
  2. सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त किया जाता है।
  3. इनका प्रयोग ऐसे तथ्यों के परिवर्तनों को मापने के लिए किया जाता है, जिन्हें प्रत्यक्ष माप से नहीं मापा जा सकता।
  4. यह एक विशेष प्रकार का माध्य ही है।
  5. सूचकांक आर्थिक पहलू के उच्चावचनों को संख्यात्मक रूप में ही माप सकता है।

सूचकांक की उपयोगिता 

सूचकांकों की सार्वभौमिक उपयोगिता है। ये व्यापारी, अर्थशास्त्री व राजनीतिज्ञों का पथ-प्रदर्शन करते हैं। और उन्हें भावी प्रवृत्तियों का अनुमान लगाने में सहायता करते हैं। कीमत, जीवन-निर्वाह, औद्योगिक उत्पादन, खाद्यान्न उत्पादन, निर्यात, आयात, लाभ, मुद्रा-पूर्ति, जनसंख्या, राष्ट्रीय आय, बजट घाटा अथवा आधिक्य आदि से संबंधित सूचकांक विभिन्न घटनाओं का सापेक्षिक माप प्रस्तुत करते हैं, इसीलिए सूचकांक ‘आर्थिक वायुमापक यंत्र’ (Economic Barometers) कहलाते हैं। व्यावहारिक रूप में सूचकांकों से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं

  1. मुद्रा के मूल्य की माप- सामान्य मूल्य-स्तर में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए सूचकांकों का प्रयोग किया जाता है। सामान्य मूल्य-स्तर में होने वाले परिवर्तन से मुद्रा की क्रय-शक्ति में होने वाले परिवर्तनों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  2. आर्थिक स्थिति की तुलना—रहन-सहन संबंधी सूचकांकों की तुलना करके समाज के किसी | वर्ग के रहन-सहने में होने वाले परिवर्तनों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  3. मजदूरी निर्धारण में उपयोगिता– सूचकांक वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन का सूचक होता है। अतः मजदूरी व वेतन के निर्धारण में इनसे बहुत अधिक सहायता मिलती है। ”
  4. ऋणों के न्यायपूर्ण भुगतान का आधार- सूचकांकों की सहायता से मूल्य-स्तर में परिवर्तन का अनुमान लगाया जा सकता है और इसी आधार पर ऋणों की मात्रा में परिवर्तन करके उनका न्यायपूर्ण भुगतान किया जा सकता है। इससे किसी भी पक्ष को असंगत लाभ या हानि नहीं होती।
  5. अंतर्राष्ट्रीय तुलना करने में सहायक- सूचकांकों की सहायता से विभिन्न प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय तुलनाएँ करना संभव है। विभिन्न देशों की मुद्राओं की क्रय-शक्ति में क्या परिवर्तन जहुए हैं, इसकी जानकारी व तुलना सूचकांकों की सहायता से की जा सकती है।
  6. देश के आर्थिक विकास का अनुमान- उत्पादन सुचकांक देश में उत्पादन संबंधी जानकारी देते हैं, जिनके आधार पर सरकार अपनी औद्योगिक नीति का निर्माण करती हैं सूचकांकों की सहायता से ही विदेशी व्यापार की स्थिति व देश में पूँजी व विनियोग की मात्रा को ज्ञान होता है।
  7. भावी प्रवृत्तियों का अनुमान- सूचकॉक न केवल वर्तमान परिवर्तनों को बताते हैं बल्कि इनकी सहायता से भविष्य के संबंध में भी महत्त्वपूर्ण अनुमान लगाए जा सकते हैं।
  8. जटिल तथ्यों को सरल बनाना– सूचकांकों की सहायता से ऐसे जटिल तथ्यों में होने वाले परिवर्तनों की माप भी की जा सकती है, जिनकी माप किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।
  9. नियंत्रण एवं नीतियाँ- सूचकांकों के आधार पर ही सरकार आर्थिक नियोजन व नियंत्रण संबंधी नीतियाँ बनाती है। 

सूचकांकों की सीमाएँ

सबसे अधिक उपयोगी सांख्यिकीय विधि होते हुए भी सूचकांक परिवर्तनों की एक अपूर्ण माप है। इसकी प्रमुख सीमाएँ निम्मलिखित हैं

  1. सापेक्ष परिवर्तनों की अनुमानित माप- सूचकांक निरपेक्ष परिवर्तनों की मापों की अपेक्षा सापेक्ष परिवर्तनों की ही माप करता है और वह भी मात्र अनुमान के रूप में। वास्तव में, सूचकांक केवल सामान्य प्रवृत्तियों की ओर ही संकेत करते हैं।
  2. शुद्धता की कमी- सूचकांक बनाते समय समूह की प्रत्येक इकाई को शामिल नहीं किया जाता है। वरन् इसके लिए कुछ प्रतिनिधि इकाइयों का ही चयन किया जाता है। इससे प्रतिदर्श अपर्याप्त और अप्रतिनिधि परिणामों की सत्यता कम हो जाती है।
  3. उद्देश्य में अंतर- विभिन्न सूचकांक अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करते हैं। एक सूचकांक, जो एक उद्देश्य के लिए उपयुक्त हो सकता है, अन्य उद्देश्यों के लिए अनुपयुक्त हो सकता है।कोई भी सूचकांक सार्व-उद्देशीय नहीं होता।
  4. अंतर्राष्ट्रीय तुलना कठिन- सूचकांकों की सहायता से दो देशों के संबंध में किसी प्रकार की तुलना करना काफी कठिन होता है क्योंकि सूचकांकों की निर्माण-विधि, उनका आधार-वर्ष तथाप्रतिनिधि वस्तुओं की सूची विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न होती है।
  5. विभिन्न समय में तुलना करना कठिन– लोगों के द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं में | परिवर्तन होता रहता है। अतः सूचकांकों की सहायता से विभिन्न समयों में तुलना करना संभव नहींहोता है।
  6. भार निर्धारण अवैज्ञानिक- भारित सूचकांकों में भार निर्धारण मनमाना तथा अवैज्ञानिक होता है। भिन्न-भिन्न वर्षों में एक ही वस्तु के भार बदल जाते हैं, जिसके कारण परिणामों में अंतर आ जाता है।

प्रश्न 2.
सूचकांक रचना संबंधी समस्याओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर
सूचकांक रचना संबंधी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं
1. सूचकांक का उद्देश्य,
2. पदों या वस्तुओं का चुनाव,
3. मूल्य उद्धरण,
4. आधार-वर्ष का चुनाव और सूचकांकों का परिगणन,
5. माध्य का चुनाव,
6. भारांकन विधि।।
1. सूचकांक का उद्देश्य
सूचकांक रचना से पूर्व उसके उद्देश्य को निश्चित कर लेना चाहिए क्योंकि वस्तुओं के चुनाव, उनके मूल्य उद्धरण तथा भारांकन आदि का निर्धारण सूचकांक के उद्देश्य पर ही निर्भर करता है। उदाहरण के लिए एक सूक्ष्मग्राही मूल्य सूचकांक में केवल उन वस्तुओं का समावेश किया जाना चाहिए, जिनके मूल्यों में तेजी से परिवर्तन होते रहते हैं। इसके विपरीत, सामान्य उद्देश्य वाले मूल्य सूचकांक में अधिकाधिक वस्तुओं का समावेश किया जाना चाहिए ताकि वह समाज में सभी वर्गों का सही-सही प्रतिनिधित्व कर सके।

2. पदों या वस्तुओं का चुनाव
चूंकि किसी भी एक सूचकांक में समस्त पदों या वस्तुओं का चुना जाना संभव नहीं है; अत: कुछ प्रतिनिधि वस्तुओं का चुनाव कर लिया जाना चाहिए। इस संबंध में उठने वाले स्वाभाविक प्रश्न इस प्रकार हैं
(अ) कौन-सी वस्तुएँ चुनी जाएँ- चुनी जाने वाली वस्तुओं में निम्नलिखित गुण होने चाहिए|

  1.  वस्तुएँ ऐसी होनी चाहिए, जो अपने वर्ग का सच्चे अर्थों में प्रतिनिधित्व कर सकें।
  2. वस्तुएँ ऐसी होनी चाहिए, जो सरलता से पहचानी जा सकें तथा जिनका स्पष्ट रूप से वर्णन किया | जा सके।
  3. चुनी हुई वस्तुएँ प्रमापित व एकरूप होनी चाहिए।
  4. वस्तुएँ लोकप्रिय होनी चाहिए।

(ब) वस्तुओं की संख्या कितनी हो-सामान्यत:
सूचकांक में जितनी अधिक वस्तुएँ सम्मिलित की जाएँगी, वह उतना ही अधिक शुद्ध व विश्वसनीय माना जाएगा, परंतु बहुत अधिक वस्तुओं को सूचकांक में सम्मिलित करना भी संभव नहीं है। वास्तव में, संख्या का निर्धारण सूचकांक के उद्देश्य, उपलब्ध समय, धन तथा वांछित शुद्धता पर अधिक निर्भर करता है। सामान्य परम्परा यह है कि सूचकांक में 25 से 50 वस्तुओं तक का चयन किया जाता है।

(स) वस्तुएँ किस किस्म की हों
सूचकांकों में ऐसी किस्म की वस्तुएँ शामिल की जानी चाहिए, जो सबसे अधिक प्रचलित हों; प्रमापित हों तथा गुणों में स्थिर हों।

(द) वस्तुओं का किस प्रकार वर्गीकरण किया जाए-
चुनी हुई वस्तुओं को सजातीयता के आधार पर कुछ निश्चित वर्गों और उपवर्गों में विभाजित कर देना चाहिए, जिससे सम्पूर्ण मूल्य सूचकांक के साथ-साथ वर्ग सूचकांक भी ज्ञात हो जाए।

3. मूल्य उद्धरण
मूल्य उद्धरण लेते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए
(अ) थोक या फुटकर मूल्य सामान्यतः
मूल्य सूचकांकों की रचना में वस्तुओं के थोक मूल्य ही लिए जाते हैं क्योंकि वे फुटकर मूल्यों की अपेक्षा कम परिवर्तनशील होते हैं, स्थान-स्थान के आधार पर उनमें कम अंतर होते हैं और उन्हें ज्ञात करना भी सरल होता है।

(ब) द्रव्य-मूल्य अथवा वस्तु-मूल्य-
सूचकांकों के लिए मूल्य उद्धरण द्रव्य के रूप में ही व्यक्त किए। जाने चाहिए, वस्तुओं के परिमाण के रूप में नहीं। यदि मूल्य उद्धरण वस्तु-मूल्य के रूप में हों तो उन्हें पहले द्रव्य-मूल्यों के रूप में बदल लेना चाहिए।

(स) मूल्य उद्धरणों की संख्या व आवृत्ति– सूचकांक निर्माण से पूर्व यह भी तय कर लेना चाहिए,कि मूल्य कितनी बार और किस अंतराल में लिए जाने हैं। मूल्य उद्धरणों की आवृत्ति सूचकांक के उद्देश्य, अवधि, उपलब्ध साधन व शुद्धता के स्तर पर निर्भर होती है।

(द) मूल्य उद्धरण प्राप्ति के स्थान व साधन- मूल्य उन मण्डियों से प्राप्त किए जाने चाहिए, जहाँ पर वस्तुओं का बड़ी मात्रा में क्रय-विक्रय होता हो लेकिन जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक बनाने के लिए उसी स्थान के मूल्यों को प्राप्त करना चाहिए। मूल्य उद्धरण के स्रोत निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा उपयुक्त होने चाहिए।

4. आधार-वर्ष का चुनाव और सूचकांकों का परिगणन
आधार-वर्ष से हमारा आशय उस वर्ष विशेष से होता है, जिसको आधार मानकर हम आर्थिक क्रियाकलापों की तुलना करते हैं। अतः आधार-वर्ष का चुनाव अत्यंत सतर्कतापूर्वक करना चाहिए। यथासंभव आधार-वर्ष

  1. सामान्य होना चाहिए,
  2. वास्तविक होना चाहिए,
  3. उस काल की समस्त सूचनाएँ उपलब्ध होनी चाहिए तथा
  4. वह वर्ष अधिक पुराना नहीं होना चाहिए। आधार वर्ष निश्चित करने की निम्नलिखित दो रीतियाँ हैं

(अ) स्थिर आधार रीति,
(ब) श्रृंखला आधार रीति।
(अ) स्थिर आधार रीति–इस रीति के अनुसार सर्वप्रथम एक सामान्य वर्ष चुन लिया जाता है और फिर अन्य वर्षों के मूल्य-स्तर की तुलना उस स्थिर वर्ष के आधार पर की जाती है। स्थिर आधार-वर्षे दो प्रकार का हो सकता है

  1. एकवर्षीय आधार-एकवर्षीय आधार में जो वर्ष आधार-वर्ष के रूप में चुना जाता है, अन्ये वर्षों के मूल्यों की तुलना उस स्थिर वर्ष के आधार पर की जाती है।
  2. बहुवर्षीय मध्य आधार-कभी-कभी कोई अंक वर्ष ऐसा नहीं होता, जो सामान्य हो और जिसे स्थिर आधार माना जा सके। ऐसी दशा में अनेक ऐसे वर्ष छाँट लिए जाते हैं, जिनमें कम उतार-चढ़ाव हुए हों और फिर उन वर्षों के मूल्य-स्तर का समान्तर माध्य निकालकर उन माध्य मूल्यों को आधार माना जाता है।

आधार- वर्ष को निश्चित कर लेने के उपरांत चालू वर्ष के सूचकांक तैयार करने के लिए मूल्यानुपात निकाले जाते हैं। इसके लिए आधार-वर्ष के मूल्य को 100 मानकर, चालू वर्ष के मूल्यों का निकाला गया प्रतिशत मूल्यानुपात’ कहलाता है।
सूत्रानुसार,
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 5. माध्य का चुनाव
सूचकांक विभिन्न वस्तुओं के मूल्यानुपातों का माध्य है। अतः यह निर्धारित करना आवश्यक है कि सूचकांक रचना में किस माध्ये का प्रयोग किया जाए। व्यवहार में माध्यिका समान्तर माध्य अथवा गुणोत्तर माध्य में से किसी एक का प्रयोग करना उपयुक्त रहता है।

6. भारांकन विधि
व्यवहार में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का भिन्न-भिन्न सापेक्षिक महत्त्व होता है। उदाहरण के लिए उपभोग के क्षेत्र में लोहे की तुलना में नमक का महत्त्व अधिक है। इसी प्रकार उत्पादन के क्षेत्र में टी०वी० की तुलना में कपड़े का महत्त्व अधिक है। अत: विभिन्न वस्तुओं अथवा पदों के तुलनात्मक महत्त्व को प्रकट करने के लिए किसी सुनिश्चित आधार पर भारों का प्रयोग किया जाता है। ऐसे सूचकांक ‘भारित सूचकांक कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
साधारण सूचकांक रचना की

  1. सरल समूहीकरण विधि व
  2. सरल मूल्य अनुपात माध्य विधि को उदाहरणों की सहायता से समझाइए।

उत्तर
साधारण सूचकांक बनाने की दो मुख्य विधियाँ हैं|
1. सरल समूहीकरण विधि (Simple Aggregative Method),
2. सरल मूल्य अनुपात विधि (Simple Average of Price Relative Method)। 1. सरल समूहीकरण विधि-इस विधि में प्रचलित वर्ष के विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों के जोड़ को आधार वर्ष के जोड़ से भाग देकर 100 से गुणा कर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma { p }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 0 } } \times 100 [/latex]

यहाँ, P01 = वर्तमान वर्ष का मूल्य सूचकांक |
∑P1 = वर्तमान वर्ष की विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों का योग
P0= आधारे-वर्ष की उन्हीं वस्तुओं के मूल्यों का योग
उदाहरण
1. निम्नांकित आँकड़ों से सरल समूहीकरण विधि द्वारा 2011 को आधार-वर्ष मानकर वर्ष 2015 के मूल्य सूचकांक तैयार कीजिए।
वस्तुएँ :
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यह विधि अत्यंत सरल है किंतु इस विधि का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब सभी वस्तुओं के मूल्य एक ही इकाई के रूप में व्यक्त किए गए हों। अन्यथा निकाले गए निष्कर्ष भ्रामक होंगे।

2. सरल मूल्य अनुपात माध्य विधि— इस विधि के अनुसार सबसे पहले प्रत्येक वस्तु का मूल्य अनुपात निकाला जाता है। किसी वस्तु का मूल्य अनुपात चालू वर्ष तथा आधार-वर्ष की कीमत का प्रतिशत अनुपात है। इसमें सभी वस्तुओं को शामिल नहीं किया जाता अपितु केवल उन्हीं वस्तुओं का न्यादर्श लिया जाता है जो समग्र (Variance) की विशिष्टता को दर्शाते हैं।
स्थिर आधार के मूल्य को 100 मानकर निकाला गया प्रचलित वर्ष का प्रतिशत ही मूल्यानुपात कहलाता है। अतः
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { p }_{ 1 } }{ { p }_{ 0 } } \times 100 [/latex]
यहाँ, P01= मूल्य अनुपात
P1 = वर्तमान वर्ष की कीमत
P0= आधार-वर्ष की कीमत
निम्नलिखित सूत्र की सहायता से वर्तमान वर्ष का कीमत सूचकांक ज्ञात किया जा सकता है-
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma (\cfrac { { p }_{ 1 } }{ { p }_{ 2 } } \times 100) }{ N } [/latex]
यहाँ, R x 100 = मूल्य अनुपात
N = वस्तुओं की संख्या
P1 = चालू वर्ष के मूल्य
P0= आधार-वर्ष के मूल्य
उदाहरण
1.निम्नांकित आँकड़ों की सहायता से सरल मूल्यानुपात माध्य विधि द्वारा 2011 को आधार-वर्ष मानते हुए 2015 के लिए मूल्य सूचकांक ज्ञात कीजिए
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प्रश्न 4.
भारित सूचकांक से क्या आशय है? भारित सूचकांक के निर्माण की विधियों को उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर

भारित सूचकांक का अर्थ

भारित सूचकांक वे सूचकांक हैं जिनमें श्रृंखला के विभिन्न मदों को उनके सापेक्षिक महत्त्व के आधार पर विभिन्न भार दिए जाते हैं। इसलिए भारित सूचकांक विभिन्न वस्तुओं की कीमतों का भारित औसत है। उदाहरण-मानी एक उपभोक्ता खाद्यान्नों पर कपड़े की तुलना में तीन गुणा अधिक व्यय करता है तो कपड़े को 1 व खाद्यान्नों को 3 भार दिया जाएगा।

भारित सूचकांक के निर्माण की विधियाँ

भारित सूचकांक के निर्माण की दो विधियाँ हैं
1. भारित औसत मूल्य अनुपात माध्य विधि
2. भारित समूही विधि ।

1. भारित औसत मूल्य अनुपात माध्य विधि— इस विधि द्वारा भारित सूचकांक को ज्ञात करने के लिए, विभिन्न वस्तुओं के मूल्य अनुपातों को उनके भार से गुणा करके गुणनफल के योग को भार के योग से भाग दे दिया जाता है। वस्तुओं को भार उनकी मात्रा के आधार पर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma RW }{ \Sigma W } [/latex]

यहाँ,
P01 = आधार-वर्ष के मूल्यों के आधार पर वर्तमान वर्ष के मूल्यों का सूचकांक
w = भार
R = मूल्य अनुपात

उदाहरण 1. निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से मूल्य अनुपात विधि से 2011 को आधार-वर्ष मानकर 2016 का भारित सूचकांक ज्ञात करेंवस्तुएँ
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2. भारित समूही विधि— इस विधि में विभिन्न वस्तुओं को उनकी खरीदी हुई मात्राओं के आधार पर भार प्रदान किया जाता है। विभिन्न विद्वानों ने सूचकांकों का निर्माण करने के लिए भार देने की अलग-अलग विधियों का वर्णन किया है। कुछ प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं|
(i) लास्पीयर की विधि (Laspeyre’s Method)-लास्पीयर के आधार-वर्ष की मात्रा (q0) के आधार पर भार प्रदान किए हैं। सूत्रानुसार,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ { \Sigma p }_{ 0}{ q }_{ 0 } } \times 100 [/latex]

(ii) पाश्चे की विधि (Paasche’s Method)- पाश्चे ने चालू वर्ष की मात्रा (q1) के आधार पर भार प्रदान किए हैं। सूत्रानुसार,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 0}{ q }_{ 1 } } \times 100 [/latex]

(iii) फिशर की विधि (Fisher’s Method)- फिशर ने आधार-वर्ष तथा चालू वर्ष दोनों की मात्राओं (q0 व q1) के आधार पर भार प्रदान किए हैं। सूत्रानुसार,
p01 [latex]\sqrt { \cfrac { { \Sigma p }_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 0 } } \times \cfrac { { \Sigma { p }_{ 1 } }{ q }_{ 1 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 1 } } } \times 100 [/latex]

उदाहरण-2011 को आधार-वर्ष मानते हुए निम्नांकित आँकड़ों के कीमत सूचकांक वर्ष 2016 ज्ञात कीजिए-
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प्रश्न 5.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अथवा निर्वाह व्यय सूचकांक से क्या आशय है? इसके निर्माण की विधि उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अथवा निर्वाह व्यय सूचकांक का अर्थ उपभोक्ता मूल्य सूचकांक वह सूचकांक है जो विशिष्ट वर्ग के उपभोक्ताओं द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में आधार-वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में होने वाले परिवर्तन को मापता है। इनका निर्माण विभिन्न स्थानों में रहने वाले उपभोकॅता वर्गों पर फुटकर मूल्यों में होने वाले औसत परिवर्तनों के प्रभावों को मापने के लिए किया जाता है। चूंकि ये किसी वर्ग विशेष के लोगों की निर्वाह लागत में होने वाले परिवर्तन की दिशा तथा मात्रा को प्रकट करते हैं, इसलिए इन्हें निर्वाह व्यय सूचकांक कहा जाता है। भारत में मुख्यत: निम्नलिखित समूहों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाए जाते हैं

  • औद्योगिक श्रमिक,
  • शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारी तथा
  • कृषि श्रमिक

जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांकों की रचना

जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांकों की रचना में निम्नलिखित प्रमुख कार्य करने पड़ते हैं

1. सजातीय वर्ग का चुनाव- सर्वप्रथम यह निश्चित किया जाता है कि सूचकांक किस विशेष वर्ग के लिए बनाए जाते हैं। वर्ग सजातीय होना चाहिए। सजातीय वर्ग का चुनाव मुख्यत: निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है-

  • आय की समानता,
  • पेशे की समानता,
  • स्थान की समानता।

2. वस्तुओं का चुनाव- विभिन्न वर्गों के लोग विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग करते हैं। अत:
जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक बनाने के लिए वस्तुएँ वही होनी चाहिए, जिनका उपभोग उस वर्ग के लोग करते हैं, जिनके लिए जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक बनाना है। वस्तुओं को मुख्यत: निम्नलिखित वर्गों में बाँट लेते हैं

  • खाद्य-पदार्थ,
  • वस्त्र,
  • ईंधन तथा प्रकाश,
  • मकान किराया,
  • अन्य।

3. मूल्य उद्धरण– प्रायः चुनी हुई वस्तुओं के फुटकर मूल्य प्राप्त करने पड़ते हैं। ये मूल्य उस स्थान के बाजार मूल्य होने चाहिए, जहाँ से वह वर्ग उन वस्तुओं को खरीदता है। चूंकि स्थान-स्थान पर फुटकर मूल्यों में बहुत अंतर होता है; अत; उन्हें उस स्थान की उच्चकोटि की पत्रिकाओं, सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी प्रकाशनों, व्यापार परिषदों अथवा प्रतिष्ठित व्यापारियों की सहायता से प्राप्त करना चाहिए।

4. भारांकन- विभिन्न वस्तुओं को उनके महत्त्व के अनुसार भारांकित करना चाहिए। वास्तव में,सभी वस्तुएँ बराबर महत्त्व की नहीं होतीं। भार निम्नलिखित दो प्रकारों में से किसी एक प्रकार से दिया जा सकता है-
(अ) समूही आय विधि- भार देने की इस रीति की प्रमुख प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं|

  1. प्रत्येक वस्तु से चालू वर्ष के मूल्य में आधार-वर्ष की मात्रा का गुणा करते हैं।
    (p1 q0
    )
  2. प्रत्येक वस्तु के आधार-वर्ष के मूल्य में आधार-वर्ष की मात्रा का गुणा करते हैं।
    (p0 q0)
  3. दोनों वर्षों के गुणनफलों को अलग-अलग जोड़ लेते हैं।
  4. चालू वर्ष के गुणनफलों के योग में आधार-वर्ष के गुणनफलों के योग का भाग दे देते हैं।
  5. प्राप्त भजनफल में 100 का गुणा कर देते हैं।
    सूत्रानुसार,

[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ { \Sigma p }_{ 0}{ q }_{ 0 } } \times 100 [/latex]

उदाहरण
1. प्रदत्त आँकड़ों की सहायता से 2011 को आधार-वर्ष मानकर 2016 के लिए जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक (Cost of Living Indexed Number) तैयार कीजिए ।
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हल
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(ब) पारिवारिक बजट या भारित मूल्यानुपात विधि-इस विधि के अनुसार भार देने की प्रक्रिया निम्नलिखित है
(i) प्रत्येक वस्तु के आधार- वर्ष के मूल्य और आधार-वर्ष में उपभोग की गई मात्रा का गुणा करते हैं।
[latex](\cfrac { { p }_{ 1 } }{ { p }_{ 0 } } \times 100) [/latex]
(ii) प्रत्येक वस्तु के आधार-वर्ष के मूल्य और आधार-वर्ष में उपभोग की गई मात्रा का गुणा करते हैं।
(p0 q0)
(iii) प्रत्येक मूल्यानुपात को उसके भार से गुणा करते हैं। (RW)।
(iv) इन गुणनफलों का योग कर लेते हैं (ΣRW)।
(v) भारों का योग निकाल लेते हैं (Σw)।
(vi) गुणनफलों के योग में भारों के योग का भाग दे देते हैं।
[latex](\cfrac { \Sigma RW }{ \Sigma W } )[/latex]
प्राप्त भजनफल सूचकांक होता है। सूत्र रूप में,
Index No.[latex]\cfrac { \Sigma RW }{ \Sigma W } [/latex]

उदाहरण
2.
निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से 2011 को आधार-वर्ष मानकर 2015 और 2016 के लिए जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक तैयार कीजिए
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प्रश्न 6.
औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक क्या है? इसकी निर्माण विधि समझाइए।
उत्तर-

औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक का अर्थ

औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक एक देश में किसी आधार-वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में होने वाली वृद्धि या कमी का माप करता है। इनकी सहायता से हम औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों को मापते हैं, मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों को नहीं।

औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की रचना

औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की रचना निम्नलिखित चरणों में की जाती है
1. उद्योगों को समान्यतया तीन वर्गों में बाँट लिया जाता है
(i) खनन,
(ii) विनिर्माण तथा
(iii) विद्युत।
2. उत्पादन संबंधी आँकड़े मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक आधार पर एकत्र कर लिए जाते हैं।
3. विभिन्न वर्गों को उपयुक्त भार दिया जाता है। भारत में वर्तमान में इस प्रकार भार दिए गए हैं
(i) खनन = 10.47;
(ii) विनिर्माण = 79.36 तथा
(iii) विद्युत = 10.17
4. निम्नांकित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
[latex]IP=\left[ \cfrac { \Sigma (\cfrac { { q }_{ 1 } }{ { q }_{ 2 } } )W }{ \Sigma w } \right] [/latex]
यहाँ, IP = औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक |
q1 = चालू वर्ष में उत्पादन का स्तर ।
q0= आधार-वर्ष में उत्पादन का स्तर
W = भार।
उदाहरण-निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक ज्ञात कीजिए
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हल
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