UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name गोस्वामी तुलसीदास
Number of Questions 10
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
तुलसीदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
या
तुलसीदास जी की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
तुलसीदास का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए एवं साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म संवत् 1589 वि० (सन् 1532) भाद्रपद, शुक्ल एकादशी को राजापुर (जिला बाँदा) के सरयूपारीण ब्राह्मण-कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। जन्म के थोड़े दिनों बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया और अभुक्त मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण पिता ने भी इनको त्याग कर दिया। पिता द्वारा त्याग दिये जाने पर वे अनाथ के समान घूमने लगे। इन्होंने कवितावली में स्वयं लिखा है-“बारे तै ललात बिललात द्वार-द्वारे दीन, चाहते हो चारि फल चारि ही चनक को।” इसी दशा में इनकी भेंट रामानन्दीय सम्प्रदाय के साधु नरहरिदास से हुई, जिन्होंने इन्हें साथ लेकर विभिन्न तीर्थों का भ्रमण किया। तुलसीदास जी ने अपने इन्हीं गुरु का स्मरण इस पंक्ति में किया है-‘बन्दी गुरुपद कंज कृपासिन्धु नर-रूप हरि।’ तीर्थाटन से लौटकर काशी में इन्होंने तत्कालीन विख्यात विद्वान् शेषसनातन जी से 15 वर्ष तक वेद, शास्त्र, दर्शन, पुराण आदि का गम्भीर अध्ययन किया। फिर अपने जन्म-स्थान के दीनबन्धु पाठक की पुत्री रत्नावली से विवाह किया। तुलसी अपनी सुन्दर पत्नी पर पूरी तरह आसक्त थे। पत्नी के ही एक व्यंग्य से आहत होकर ये घर-बार छोड़कर काशी में आये और संन्यासी हो गये।

लगभग 20 वर्षों तक इन्होंने समस्त भारत का व्यापक भ्रमण किया, जिससे इन्हें समाज को निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ये कभी चित्रकूट, कभी अयोध्या और कभी काशी में निवास करते रहे। जीवन का अधिकांश समय इन्होंने काशी में बिताया और यहीं संवत् 1680(सन् 1623 ई०) में असी घाट पर परमधाम को सिधारे। इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रचलित है-

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ॥

कृतियाँ – गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित 37 ग्रन्थ माने जाते हैं, किन्तु प्रामाणिक ग्रन्थ 12 ही मान्य हैं, जिनमें पाँच प्रमुख है – श्रीरामचरितमानस, विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली। अन्य ग्रन्थ हैं—बरवै रामायण, रामलला नहछु, कृष्ण गीतावली, वैराग्य संदीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामाज्ञा प्रश्नावली।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ
युगीन परिस्थिति एवं गोस्वामी जी का योगदान – तुलसीदास जिस काल में उत्पन्न हुए, उस समय हिन्दू-जाति धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक अधोगति को पहुँच चुकी थी। हिन्दुओं का धर्म और आत्म-सम्मान यवनों के अत्याचारों से कुचला जा रहा था। सब ओर निराशा का वातावरण व्याप्त था। ऐसे समय में अवतरित होकर गोस्वामी जी ने जनता के सामने भगवान् राम का लोकरक्षक रूप प्रस्तुत किया, जिन्होंने यवन शासकों से कहीं अधिक शक्तिशाली रावण को केवल वानर-भालुओं के सहारे ही कुलसहित नष्ट कर दिया था।

रामराज्य के रूप में एक आदर्श राज्य की कल्पना – तुलसीदास ने एक आदर्श राज्य की कल्पना रामराज्य के रूप में लोगों के सामने रखी। इस आदर्श राज्य का आधार है-आदर्श परिवार। मनुष्य को चरित्र-निर्माण की शिक्षा परिवार में ही सबसे पहले मिलती है। उन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस के द्वारा व्यक्ति के स्तर से लेकर, समाज और राज्य तक के समस्त अंगों का आदर्श रूप प्रस्तुत किया और इस प्रकार निराश जनसमाज को प्रेरणा देकर रामराज्य के चरम आदर्श तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।

लोकभाषा को ग्रहण – तुलसीदास ने पण्डितों की भाषा संस्कृत के स्थान पर जनता की भाषा में अपना ग्रन्थ रची, जिससे राजा से रंक तक सबको अपना जीवन सुधारने का सम्बल (सहारा) प्राप्त हुआ। ‘मानस’ में समस्त वेद, पुराण, शास्त्र एवं काव्यग्रन्थों का निचोड़ सरल-से-सरल रीति से प्रस्तुत किया गया है। धर्म की दृष्टि से यदि यह महान् धर्मग्रन्थ है तो साहित्य की दृष्टि से यह एक अतीव रोचक एवं मनोरंजक कथा भी है। ऐसे अद्भुत ग्रन्थ संसार के साहित्य में विरल ही हैं।

भक्ति-भावना – गोस्वामी तुलसीदास की भक्ति दास्यभाव की थी, जिसमें स्वामी को पूर्ण समर्पित एवं अनन्य भाव से भजा जाता है। तुलसी के राम शक्ति, शील और सौन्दर्य तीनों के चरम उत्कर्ष हैं। तुलसी ने चातक को प्रेम का आदर्श माना है

एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास ॥

समन्वय-भावना – तुलसी द्वारा राम के चरित्र-चित्रण में मानव-जीवन के सभी पक्षों एवं सूक्ष्म-से- सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने भक्ति, ज्ञान और कर्म तीनों में सामंजस्य स्थापित किया। शिव और राम को एक-दूसरे का उपास्य-उपासक बताकर इन्होंने उस काल में बढ़ते हुए शैव-वैष्णव-विद्वेष को समाप्त किया।

तुलसी का वैशिष्ट्य – यद्यपि नम्रतावश तुलसी ने अपने को कवि नहीं माना, पर काव्यशास्त्र के सभी लक्षणों से युक्त इनकी रचनाएँ हिन्दी का गौरव हैं। प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य दोनों की रचना में इन्हें अद्वितीय सफलता मिली है। ‘मानस’ में कथा-संघटन, चरित्र-चित्रण, मार्मिक स्थलों की पहचान, संवादों की सरसता आदि सभी कुछ अद्भुत हैं।

रस-योजना – तुलसी के काव्य में नव-रसों की बड़ी हृदयग्राही योजना मिलती है। श्रृंगार का जैसा मर्यादित वर्णन इन्होंने किया है, वैसा आज तक किसी दूसरे कवि से न बन पड़ा। जनक-वाटिका में राम-सीता का प्रथम मिलन द्रष्टव्य है

अस कहि फिरि चितये तेहि ओरा। सिय-मुख-ससि भये नयन चकोरा ।।
भये बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दृगंचल ॥

स्वामी-सेवक भाव की भक्ति में विनय और दीनता का स्वाभाविक योग रहता है। विनय और दीनता का भाव तुलसी में चरम सीमा तक पहुँच गया है। अत्यन्त दीन भाव से वे राम को विनय से पूर्ण पत्रिका लिखते हैं। वीर रस का उल्लेख भरत के चित्रकूट जाते समय निषादराज के वचन में मिलता है। रौद्र रस का वर्णन कैकेयी-दशरथ-प्रसंग में एवं भरत के चित्रकूट पहुँचने के समाचार पर लक्ष्मण के कोप के रूप में मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘कवितावली’ के सुन्दरकाण्ड और युद्धकाण्ड में इसकी प्रभावशाली व्यंजना हुई है।

प्रकृति-वर्णन – अपने काव्य में तुलसी ने प्रकृति के अनेक मनोहारी दृश्य चित्रित किये हैं। इनके काव्य में प्रकृति उद्दीपन, आलम्बन, उपदेशात्मक, आलंकारिक एवं मानवीय रूपों में उपस्थित हुई है। प्रकृति का एक रमणीय चित्र देखिए

बोलत जल कुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥

कल्याण-भावना एवं स्वान्तःसुखाय रचना – तुलसीदास ने अपने सुख के लिए काव्य-रचना की है। उन्हें क्योंकि श्रीराम प्रिय थे, इसलिए उन्होंने अपने मन के सुख के लिए राम और उनके चरणों का गुणगान अपने काव्य में किया।

संगीतज्ञता – राग-रागिनियों में गाये जाने योग्य अगणित सरस पदों की रचना करके तुलसी ने अपने उच्चकोटि के संगीतज्ञ होने का प्रमाण भी दे दिया।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – गोस्वामी जी ने अपने समय की प्रचलित दोनों काव्य भाषाओं-अवधी और ब्रज में समान अधिकार से रचना की है। यदि ‘श्रीरामचरितमानस’, ‘रामलला नहछु’, ‘बरवै रामायण’, ‘जानकी मंगल’ और ‘पार्वती मंगल’ में अवधी की अद्भुत मिठास है तो विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ में मॅझी हुई ब्रजभाषा का सौन्दर्य देखते ही बनता है। भाषा शुद्धं, संस्कृतनिष्ठ तथा प्रसंगानुसारिणी है।

संवाद-योजना – गोस्वामी जी ने अपने काव्य को नाटकीयता प्रदान करने के लिए जिन साधनों का उपयोग किया है, उनमें संवाद-योजना सबसे प्रमुख है। अयोध्याकाण्ड संवादों की दृष्टि से विशेष समृद्ध है, जिसमें कैकेयी-मन्थरा-संवाद, कैकेयी-दशरथ-संवाद, राम-कौशल्या-संवाद, राम-सीता-संवाद, राम-लक्ष्मणसंवाद, केवट-राम-संवाद तथा चित्रकूट के मार्ग में ग्रामवधूटियों का संवाद। इन सभी संवादों में विभिन्न परिस्थितियों में पड़े भिन्न-भिन्न पात्रों के मनोभावों के सूक्ष्म उतार-चढ़ाव का बड़ी विदग्धता से चित्रण किया गया है। कैकेयी-मन्थरा-संवाद तो अपनी मनोवैज्ञानिकता के लिए विशेष विख्यात है।

शैली – गोस्वामी जी के समय तक जिन पाँच प्रकार की शैलियों में काव्य-रचना होती थी, वे थीं-
(1) भाटों की कवित्त-सवैया शैली,
(2) रहीम की बरवै शैली,
(3) जायसी की दोहा-चौपाई शैली,
(4) सूर की गेय-पद (गीतिकाव्य) शैली,
(5) वीरगाथाकाल की छप्पय शैली। गोस्वामी जी ने अद्भुत अधिकार से सभी शैलियों में सफल काव्य-रचना की।

रसानुरूप शैली के प्रयोग की दृष्टि से तुलसी अनुपम हैं। रति, करुणा आदि कोमल भावों की व्यंजना में उन्होंने प्रायः समासरहित, मधुर, कोमलकान्त पदावली का व्यवहार किया है, जब कि वीर, रौद्र, वीभत्स आदि रसों के प्रसंग में समासयुक्त एवं कठोर पदावली का प्रयोग किया है। शब्दों की ध्वनिमात्र से तुलसी कठोर-से-कठोर एवं मृदुल-से-मृदुल भावों एवं दृश्यों का साक्षात्कार कराने में बड़े कुशल हैं।

छन्द-प्रयोग – तुलसीदास छन्दशास्त्र के पारंगत विद्वान् थे। उन्होंने विविध छन्दों में काव्य-रचना की है। ‘अयोध्याकाण्ड में गोस्वामी जी ने दोहा, सोरठा, चौपाई और हरिगीतिका छन्दों का प्रयोग किया है। चौपाई छन्द कथा-प्रवाह को बढ़ाते चलने के लिए बहुत उपयोगी होता है। दोहा या सोरठा इस प्रवाह को सुखद विश्राम प्रदान करते हैं। हरिगीतिका छन्द वैविध्य प्रदान करे वातावरण की सृष्टि में सहायक सिद्ध होता है।

अलंकार-विधान – अलंकारों का विधान वस्तुत: रूप, गुण, क्रिया का प्रभाव तीव्र करने के लिए होना चाहिए न कि चमत्कार-प्रदर्शन के लिए। गोस्वामी जी का अलंकार-विधान बड़ा ही सहज और हृदयग्राही बन पड़ा है, जो रूप, गुण व क्रिया का प्रभाव तीव्र करता है। निम्नांकित उद्धरण में अनुप्रास की छटा द्रष्टव्य है

कलिकाल बेहाल किये मनुजा। नहिं मानत कोई अनुजा तनुजा॥

अलंकारों में गोस्वामी जी के सर्वाधिक प्रिय अलंकार हैं-उपमा, उत्प्रेक्षा और रूपक। संस्कृत में कालिदास की उपमाएँ विख्यात हैं। तुलसी अपनी कुछ श्रेष्ठ उपमाओं में कालिदास से भी बाजी मार ले गये हैं

अबला कच भूषण भूरि छुधा। धनहीन दुःखी ममता बहुधा।।

इसके अतिरिक्त इन्होंने सन्देह, प्रतीप, उल्लेख, व्यतिरेक, परिणाम, अन्वय, श्लेष, असंगति, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों के प्रयोग भी किये हैं।

साहित्य में स्थान – इस प्रकार रस, भाषा, छन्द, अलंकार, नाटकीयता, संवाद-कौशल आदि सभी दृष्टियों से तुलसी का काव्य अद्वितीय है। कविता-कामिनी उनको पाकर धन्य हो गयी। हरिऔध जी की निम्नलिखित उक्ति उनके विषय में बिल्कुल सत्य है

“कविता करके तुलसी न लसे। कविता लसी पा तुलसी की कला॥”

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

भरत-महिमा

प्रश्न 1:
भायप भगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख दूषन हरनू ।।
जो किछु कहब थोर सखि सोई । राम बंधु अस काहे न होई ।।
हम सब सानुज भरतहिं देखें । भइन्हें धन्य जुबती जन लेखें ।।
सुनि गुनि देखि दसा पर्छिताहीं । कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ।।
कोउ कह दूषनु रानिहि नहिन । बिधि सबु कीन्ह हमहिं जो दाहिन ।।
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी ।. लघु तिय कुल करतूति मलीनी ।।
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा । कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ।।
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा । जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ।।
तेहि बासर बसि प्रातहीं, चले सुमिरि रघुनाथ ।
राम दूरस की लालसा, भरत सरिस सब साथ ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भरत किसे मनाने के लिए पैदल ही फलाहार करते हुए जा रहे हैं?
(iv) किसके आचरण का वर्णन करने और सुनने से दुःख दूर हो जाते हैं।
(v) भरत को देखकर कैसा आश्चर्य और आनन्द गाँव-गाँव में हो रहा है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्य भक्तप्रवर गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भरत-महिमा’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – भरत-महिमा।
कवि का नाम – तुलसीदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रातःकाल ही रघुनाथ जी का स्मरण करके भरत जी चले। साथ के सभी लोगों को भी भरत जी के समान ही श्रीराम जी के दर्शन की लालसा लगी हुई है। इसीलिए सभी लोग शीघ्रातिशीघ्र श्रीराम के समीप पहुँचना चाहते हैं।
(iii) भरत राम को मनाकर अयोध्या वापस लौटा लाने के लिए पैदल ही फलाहार करते हुए चित्रकूट जा रहे
(iv) भरत के प्रेम, भक्ति भ्रात-स्नेह का सुन्दर वर्णन करने और सुनने से दु:ख दूर हो जाते हैं।
(v) भरत को देखकर ऐसा आश्चर्य गाँव-गाँव में हो रही है मानो मरुभूमि में कल्पतरु उग आया हो।

प्रश्न 2:
तिमिरु तरुन तरनिहिं मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़े छोनी ।।
मसक फूक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमद् भरतहिं पाई ।।

लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ।।
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता । मिलई रचइ परपंचु बिधाता ।।
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ।।
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजियारी ।।
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ।।

सुनि रघुबर बानी बिबुध, देखि भरत पर हेतु।
सकल संराहत राम सो, प्रभु को कृपानिकेतु ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) श्रीराम लक्ष्मण से उनकी और पिता की सौगन्ध खाकर क्या कहते हैं?
(iv) सूर्यवंशरूपी तालाब में हंसरूप में किसने जन्म लिया है?
(v) श्रीराम की वाणी सुनकर तथा भरत जी पर उनका प्रेम देखकर देवतागण उनकी कैसी सराहना करने लगे?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – श्रीराम लक्ष्मण को समझाते हुए कहते हैं कि अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्न के) सूर्य को निगल जाए, आकाश चाहे बादलों में समाकर मिल जाए, गौ के खुर जितने जल में चाहे अगस्त्य जी डूब जाएँ, पृथ्वी चाहे अपमी स्वाभाविक सहनशीलता को छोड़ दे और मच्छर की फेंक से सुमेरु पर्वत उड़ जाए, परन्तु हे भाई! भरत को रोजमर्द कभी नहीं हो सकता।
(iii) गुरु वशिष्ठ के आगमन का समाचार सुनकर श्रीराम उनके दर्शन के लिए वेग के साथ चल पड़े।
(iv) राम का सखा जानकर वशिष्ठ जी ने निषादराज को जबरदस्ती गले से लगा लिया।
(v) श्रीराम की सराहना करते हुए देवतागण कहने लगे कि श्रीरघुनाथ जी का हृदय भक्ति और सुन्दर मंगलों का मूल है।

कवितावली

लंका-दहन

प्रश्न 1:
बालधी बिसाल बिकराल ज्वाल-जाल मानौं,
लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है ।

कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
बीररस बीर तरवारि सी उघारी है ।।
तुलसी सुरेस चाप, कैधौं दामिनी कलाप,
कैंधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है ।
देखे जातुधान जातुधानीः अकुलानी कहैं,
“कानन उजायौ अब नगर प्रजारी है ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसे देखकर लगता है मानो लंका को निगलने के लिए काल ने अपनी जील्ला फैलाई है।
(iv) हनुमान जी के विकराल रूप को देखकर निशाचर और निशाचरियाँ व्याकुल होकर क्या कहती
(v) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस रस में मुखरित हुई हैं।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद कवि शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘कवितावली’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘लंका-दहन’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – लंका-दहन।
कवि का नाम – तुलसीदास।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी की विशाल पूँछ से अग्नि की भयंकर लपटें उठ रही थीं। अग्नि की उन लपटों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो लंका
को निगलने के लिए स्वयं काल अर्थात् मृत्यु के देवता ने अपनी जिह्वा फैला दी हो। ऐसा प्रतीत होता था जैसे आकाश-मार्ग में अनेकानेक पुच्छल तारे भरे हुए हों।
(iii) हनुमान जी की विशाल पूँछ से निकलती हुई भयंकर लपटों को देखकर लगता है मानो लंका को निगलने के लिए काल ने अपनी जिह्वा फैलाई है।
(iv) हनुमान जी के विकराल रूप को देखकर निशाचर और निशाचरियाँ व्याकुल होकर कहती हैं कि इस वानर ने अशोक वाटिका को उजाड़ा था, अब नगर जला रहा है; अब भगवान ही हमारा रक्षक है।
(v) प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘भयानक रस’ में मुखरित हुई हैं।

प्रश्न 2:
लपट कराल ज्वाल-जाल-माल दहूँ दिसि,
अकुलाने पहिचाने कौन काहि रे ?
पानी को ललात, बिललात, जरे’ गात जाते,
परे पाइमाल जात, “भ्रात! तू निबाहि रे” ।।
प्रिया तू पराहि, नाथ नाथ तू पराहि बाप
बाप! तू पराहि, पूत पूत, तू पराहि रे” ।
तुलसी बिलोकि लोग ब्याकुल बिहाल कहैं,
“लेहि दससीस अब बीस चख चाहि रे’ ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किस कारण कोई किसी को नहीं पहचान रहा है?
(iv) चारों ओर भयंकर आग और धुएँ से परेशान लोग रावण से क्या कहते हैं?
(v) ‘पानी को ललात, बिललात, जरे गात जाता’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – लंकानिवासी राजा रावण को कोसते हुए कह रहे हैं कि हे दस मुखों वाले रावण! अब तुम अपने सभी मुखों से लंकानगरी के विनाश का यह स्वाद स्वयं चखकर देखो। इस विनाश को अपनी बीस आँखों से भलीभाँति देखो और अपने मस्तिष्क से विचार करो कि तुम्हारे द्वारा बलपूर्वक किसी दूसरे की स्त्री का हरण करके कितना अनुचित कार्य किया गया है। अब तो तुम्हारी आँखें अवश्य ही खुलं जानी चाहिए, क्योंकि तुमने उसके पक्ष के एक सामान्य से वानर के द्वारा की गयी विनाश-लीला का दृश्य अपनी बीस आँखों से स्वयं देख लिया है।
(iii) दसों दिशाओं में विशाल अग्नि-समूह की भयंकर लपटें तथा धुएँ के कारण कोई किसी को नहीं पहचान रही है।
(iv) चारों ओर आग और धुएँ से परेशान लोग रावण से कहते हैं कि हे रावण! अब अपनी करतूत का फल बीसों आँखों से देख ले।
(v) अनुप्रास अलंकार।

गीतावली

प्रश्न 1:
मेरो सब पुरुषारथ थाको ।
बिपति-बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ?
सुनु सुग्रीव साँचेहूँ मोपर फेर्यो बदन बिधाता ।।
ऐसे समय समर-संकट हौं तज्यो लखन सो भ्राता ।।
गिरि कानन जैहैं साखामृग, हौं पुनि अनुज सँघाती ।
हैहैं कहा बिभीषन की गति, रही सोच भरि छाती ।।
तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु कपि सकल बिकल हिय हारे ।
जामवंत हनुमंत बोलि तब औसर जानि प्रचारे ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किस कारण विलाप करते हुए श्रीराम अपना पुरुषार्थ थका हुआ बताते हैं?
(iv) हनुमान जी को सुषेण वैद्य को लाने की सलाह किसने दी?
(v) ‘बिपति-बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको?” पंक्ति में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर:
(i) यह पद तुलसीदास जी द्वारा विरचित ‘गीतावली’ नामक रचना से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीतावली’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – गीतावली।
कवि का नाम –  तुलसीदास।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – श्रीराम कहते हैं कि मेरे हृदय में यही सोच भरा हुआ है कि विभीषण | की क्या गति होगी? जिस विभीषण को शरण देकर मैंने उसे लंका का राजा बनाने का निश्चय किया था, मेरी वह प्रतिज्ञा कैसे पूरी होगी?
(iii) लक्ष्मण श्रीराम की दायीं भुजा के समान थे किन्तु उनके शक्ति लगने के कारण श्रीराम विलाप करते हुए अपना पुरुषार्थ थका हुआ बताते हैं।
(iv) हनुमान जी को सुषेण वैद्य को लाने की सलाह जामवंत ने दी।
(v) अनुप्रास अलंकार।

दोहावली

प्रश्न 1:
हरो चरहिं तापहिं बरत, फरे पसारहिं हाथ ।
तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पशु-पक्षी कैसे वृक्षों को चरते हैं?
(iv) संसार के लोग कैसा व्यवहार करते हैं?
(v) तुलसीदास ने किसे परमार्थ का साथी बताया है।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘दोहावली’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है। इसके रचयिता भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – दोहावली।
कवि का नाम – तुलसीदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार में सभी मित्र और सम्बन्धी स्वार्थ के कारण ही सम्बन्ध रखते हैं। जिस दिन हम उनके स्वार्थ की पूर्ति में असमर्थ हो जाते हैं, उसी दिन सभी व्यक्ति हमें त्यागने में देर नहीं लगाते। इसी प्रसंग में तुलसीदास ने कहा है कि श्रीराम की भक्ति ही परमार्थ का सबसे बड़ा साधन है और श्रीराम ही बिना किसी स्वार्थ के हमारा हित-साधन करते हैं।
(iii) पशु-पक्षी हरे वृक्षों को चरते हैं।
(iv) संसार के लोग स्वार्थपूर्ण व्यवहार करते हैं।
(v) तुलसीदास जी ने श्रीरघुनाथ जी को एकमात्र परमार्थ का साथी बताया है।

प्रश्न 2:
बरषत हरषत लोग सब, करषत लखै न कोइ ।
तुलसी प्रजा-सुभाग ते, भूप भानु सो होइ ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राजा को किसके समान होना चाहिए?
(iv) सूर्य के द्वारा किसका कर्षण किया जाता है?
(v) ‘भूप भानु सो होइ’ पद्यांश में कौन-सा अलंकार होगा?

उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – प्रायः राजा अपने सुख और वैभव के लिए जनता से कर प्राप्त करते हैं। प्रजा अपने परिश्रम की गाढ़ी कमाई राजा के चरणों में अर्पित कर देती है, किन्तु वही प्रजा सौभाग्यशाली होती है, जिसे सूर्य जैसा राजा मिल जाए। जिस प्रकार सूर्य सौ-गुना जल बरसाने के लिए ही धरती से जल ग्रहण : करता है, उसी प्रकार से प्रजा को और अधिक सुखी करने के लिए ही श्रेष्ठ राजा उससे कर वसूल करता है।
(iii) राजा को सूर्य के समान अर्थात् प्रजापालक होना चाहिए।
(iv) सूर्य द्वारा पृथ्वी से जल का कर्षण किया जाता है।
(v) उपमा अलंकार।

विनय-पत्रिका

प्रश्न 1:
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगी।
श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपा ते संत सुभाव गहौंगो ।
जथालाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो ।
परहित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निबहौंगो ।
परुष बचन अतिदुसह स्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो ।
बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो ।।
परिहरि देहजनित चिंता, दु:ख सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरि भक्ति लहौंगो ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) तुलसीदास जी कैसा स्वभाव ग्रहण करना चाहते हैं?
(iv) तुलसीदास जी कैसे वचन सुनने के बाद भी क्रोध की आग में नहीं जलना चाहते?
(v) ‘संतोष’ शब्द का संधि-विच्छेद कीजिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद भक्त कवि तुलसीदास द्वारा विरचित ‘विनय-पत्रिका’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘विनय-पत्रिका’ शीर्षक से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम –  विनय-पत्रिका।
कवि का नाम – तुलसीदास
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि क्या कभी वह दिन आएगा, जब मैं सन्तों की तरह जीवन जीने लगूंगा? क्या तुलसीदास इस मार्ग पर चलकर कभी अटल भगवद्भक्ति प्राप्त कर सकेंगे; अर्थात् क्या कभी हरि-भक्ति प्राप्ति का मेरा मनोरथ पूरा होगा?
(iii) तुलसीदास जी रघुनाथ जी की कृपा से संत स्वभाव ग्रहण करना चाहते हैं।
(iv) तुलसीदास जी कठोर वचन सुनने के बाद भी क्रोध की आग में नहीं जलना चाहते।
(v) संतोष’ शब्द का संधि-विच्छेद है–सम् + तोष।

प्रश्न 2:
अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।
राम कृपा भवनिसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं ।।

पायो नाम चारु चिंतामनि, उर-कर तें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं ।
परबस जानि हँस्यौ इन इंद्रिन, निज बस है न हँसैहौं ।
मन मधुकर पन करि तुलसी रघुपति पद-कमल बसैहौं ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) तुलसीदास जी अब अपने जीवन को किसमें नष्ट नहीं करना चाहते?
(iv) तुलसीदास रामनामरूपी चिन्तामणि को कहाँ बसाना चाहते हैं?
(v) तुलसीदास का कब तक इन्द्रियों ने उपहास किया?
उत्तर:
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि मैंने अब तक अपनी आयु को व्यर्थ के कार्यों में ही नष्ट किया है, परन्तु अब मैं अपनी आयु को इस प्रकार नष्ट नहीं होने दूंगा। उनके कहने का भाव यह है। कि अब उनके अज्ञानान्धकार की राज्ञि समाप्त हो चुकी है और उन्हें सद्ज्ञान प्राप्त हो चुका है; अत: अब वे मोह-माया में लिप्त होने के स्थान पर ईश्वर की भक्ति में ही अपना समय व्यतीत करेंगे और ईश्वर से साक्षात्कार करेंगे। श्रीराम जी की कृपा से संसार रूपी रात्रि बीत चुकी है; अर्थात् मेरी सांसारिक प्रवृत्तियाँ दूर हो गयी हैं; अतः अब जागने पर अर्थात् विरक्ति उत्पन्न होने पर मैं फिर कभी बिछौना न बिछाऊँगा; अर्थात् सांसारिक मोह-माया में न फैंसँगा।
(iii) तुलसीदास जी अब अपना जीवन विषयवासनाओं में नष्ट नहीं करना चाहते।
(iv) तुलसीदास जी रामनामरूपी चिन्तामणि को अपने हृदय में बसाना चाहते हैं।
(v) तुलसीदास जी का मन जब तक विषयवासनाओं का गुलाम रहा तब तक इन्द्रियों ने उनका उपहास किया।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name सूरदास
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न 1.
सूरदास का जीवन-परिचय लिखिए।
या
सूरदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
सूरदास का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – महाकवि सूरदास हिन्दी-साहित्याकाश के सूर्य माने गये हैं। वे ब्रजभाषा के कवियों में बेजोड़ माने जाते हैं। अष्टछाप के कवियों के तो वे सिरमौर थे ही, कृष्णभक्त कवियों में भी उनकी समता का कोई दूसरा कवि दिखाई नहीं पड़ता। इनके जन्मकाल के विषय में मतभेद हैं। भारतीय विद्वानों की यह परम्परा रही है कि वे अपने नाम से नहीं, अपितु अपने काम से अमर होना चाहते हैं। यही कारण रहा है जिसके चलते भारतीय साहित्यकारों के जन्म से जुड़े हुए प्रसंग सदैव विवादास्पद रहे हैं। सूरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी, संवत् 1535( सन् 1478 ई०) को मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता (रेणुका क्षेत्र) ग्राम में हुआ। कुछ विद्वान् इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम में हुआ मानते हैं। ये सारस्वत ब्राह्मण रामदास के पुत्र थे। इनकी माता के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। ये जन्मान्ध थे या बाद में नेत्रहीन हुए, इस सम्बन्ध में भी विवाद हैं। इन्होंने प्रकृति के नाना व्यापारों, मानव-स्वभाव एवं चेष्टाओं आदि का जैसा सूक्ष्म व हृदयग्राही वर्णन किया है, उससे यह जान पड़ता है कि ये बाद में नेत्रहीन हुए।

आरम्भ से ही इनमें भगवद्भक्ति स्फुरित हुई। मथुरा के निकट गऊघाट पर ये भगवान् के विनय के पद गाते हुए निवास करते थे। यहीं इनकी महाप्रभु केल्लभाचार्य से भेंट हुई, जिन्होंने इनके सरस पद सुनकर इन्हें अपना शिष्य बनाया और गोवर्धन पर स्थित श्रीनाथजी के मन्दिर का मुख्य कीर्तनिया नियुक्त किया। यहीं इन्होंने श्रीमद्भागवत् में वर्णित कृष्णचरित्र का ललित पदों में गायन किया। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की भक्ति-सम्प्रदाय ‘पुष्टिमार्ग कहलाता है। एकमात्र भगवान् की कृपा पर ही निर्भरता को सिद्धान्तरूप में गृहीत करने के कारण यह पुष्टि सम्प्रदाय’ कहलाता है। गुरु के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। अन्त समय में इन्होंने अपने दीक्षागुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का स्मरण निम्नलिखित शब्दों में किया

भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो।
श्रीबल्लभ-नखचन्द्र-प्रभा बिनु सब जग माँझ अँधेरो॥

श्री वल्लभाचार्य जी की मृत्यु के उपरान्त उनके पुत्र गोस्वामी बिट्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि एवं गायकों को लेकर अष्टछाप की स्थापना की। सूरदास का इनमें सबसे प्रमुख स्थान था। गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में इनकी मृत्यु संवत् 1640(सन् 1583 ई०) में हुई। कहते हैं कि मृत्यु के समय इन्होंने यह पद गाकर प्राण त्यागे-‘खंजन नैन रूप रस माते।’

कृतियाँ – सूरदास की कीर्ति का मुख्य आधार उनका ‘सूरसागर’ ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त ‘सूरसारावली’ और ‘साहित्य लहरी‘ भी उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं, यद्यपि कतिपय विद्वानों ने इनकी प्रामाणिकता में सन्देह प्रकट किया है। ‘सूरसागर’ में श्रीमद्भागवत’ के दशम स्कन्ध की कृष्णलीलाओं का विविध भाव-भंगिमाओं में गायन किया गया है।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

भगवान् के लोकरंजक रूप का चित्रण – सूरदास ने भगवान् के लोकरंजक (संसार को आनन्दित करने वाले) रूप को लेकर उनकी लीलाओं का गायन किया है। तुलसी के समान उनका उद्देश्य संसार को उपदेश देना नहीं, अपितु उसे कृष्ण की मनोहारिणी लीलाओं के रस में डुबोना था। वल्लभाचार्य जी के शिष्य बनने से पहले। सूर विनय के पद गाया करते थे, जिनमें दास्य भाव की प्रधानता थी। इनमें अपनी दीनता और भगवान् की महत्ता : का वर्णन रहता था ।
(क) मो सम कौन कुटिल खल कामी।
(ख) हरि मैं सब पतितन को राऊ।
किन्तु पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने के उपरान्त सूर ने विनय के पद गाने के स्थान पर कृष्ण की बाल्यावस्था और किशोरावस्था की लीलाओं को बड़ा हृदयहारी गायन किया।

वात्सल्य वर्णन
सूरदास का काव्य-क्षेत्र मुख्य रूप से वात्सल्य और श्रृंगार, इन दो रसों तक ही सिमटकर रह गया। पर इस सीमित क्षेत्र में भी सूरदास की प्रतिभा ने जो कमाल किया, वह बेजोड़ है। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झाँक आये कि काव्यशास्त्र के पंडितों को वात्सल्य को एक स्वतन्त्र रस की मान्यता देनी ही पड़ी।

(1) वात्सल्य का संयोग पक्ष – वात्सल्य रस का जैसा सरस और विशद वर्णन सूर ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पुत्र को पालने में झुलाना और उसे लोरियाँ गाकर सुलाना मातृजीवन की सहज अभिलाषा होती है। इसके अतिरिक्त बालक की बाह्य चेष्टाओं और क्रियाओं, उनकी मनोवैज्ञानिक चपलताओं का सुन्दर अंकन तथा माता-पिता को उन पर बलिहारी होना आदि के चित्रण द्वारा उन्होंने वात्सल्य के संयोग पक्ष को परिपुष्ट किया है। इसका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

कबहुँ पलक हरि मूंद लेते हैं, कबहुँ अधर फरकावै॥

(2) वात्सल्य का वियोग पक्ष – वात्सल्य के वियोग-पक्ष के अन्तर्गत कृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनके प्रति नन्द-यशोदा के हृदयस्पर्शी उद्गार सूरदास ने बड़ी मार्मिकता से वर्णित किये हैं

तुम तो टेब जानतिहि है हो, तऊ मोहिं कहि आवै ।
प्रात उठत मेरे लाल-लद्वैतहिं, माखन रोटी भावै॥

वात्सल्य में सूर की इस असाधारण और अद्वितीय सफलता के रहस्य का उद्घाटन करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि, “सूर वस्तुत: वय:-प्राप्त शिशु थे। कदाचित् इसी कारण अपनी बन्द आँखों से सूर जो देख और दिखा सके, उसका शतांश भी खुली आँखों वाले न देख सके।”

श्रृंगार वर्णन

वात्सल्य के समान ही श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों पर सूर को समान अधिकार है। इस सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं, “श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का इतना प्रचुर विस्तार और किसी कवि में नहीं मिलता।’ इन दोनों पक्षों का संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

(1) संयोग पक्ष – वृन्दावन में कृष्ण और गोपियों का सम्पूर्ण जीवन क्रीड़ामय है, जो संयोग श्रृंगार के ही अन्तर्गत आता है। इसमें कृष्ण और राधा के अंग-प्रत्यंग की शोभा को अनेकानेक पदों में अत्यन्त चमत्कारपूर्ण वर्णन करने के बाद सूर वृन्दावन की करील-कुंजों, सुन्दर लताओं, हरे-भरे कछारों के बीच खिली हुई चाँदनी और कोकिल-कूजन के उद्दीपक परिवेश में कृष्ण, राधा और गोपिकाओं की विभिन्न क्रीड़ाएँ चित्रित करते हैं। कृष्ण और राधा का परिचय पारस्परिक आकर्षण से आरम्भ होकर संलाप से घनिष्ठ होता है

बूझत स्याम, कौन तू, गौरी ?
कहाँ रहति, काकी तू बेटी, देखी नाहिं कबहुँ ब्रज-खोरी।”
“काहे को हम ब्रज तन आवति? खेलति रहति अपनी पौरी ।
सुनति रहति श्रवनन नँद-ढोंटा, करत रहत माखन दधि चोरी ॥”
“तुम्हरो कहा चोरि हम लैहें? खेलन चल संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि बातन भुरई राधिका भोरी ॥”

(2) वियोग पक्ष – सूर ने जिस कौशल और पूर्णता से संयोग का चित्राधार खड़ा किया है, उससे कहीं अधिक मार्मिकता से वियोग के चित्र भी उकेरे हैं; क्योंकि प्रेम की साधना वस्तुत: विरह की साधना है। सूर ने स्वयं कहा है। कि विरह प्रेम को पुष्ट करता है ”ऊधौ, विरही प्रेम करै”। इस रस के कुछ छींटे द्रष्टव्य हैं.
(i) पिया बिनु नागिनी काली रात।
(ii) उर में माखनचोर गड़े।

इनमें गोपिकाओं के अनन्य (एकनिष्ठ) प्रेम, राधिका की विरह-वेदना के मार्मिक चित्र दिखाई पड़ते हैं। प्रेम की प्रगाढ़ता से ऐसा विरह उत्पन्न होता है, जिसका अनुभव भी कोई संवेदनशील रसमग्न हृदय ही कर सकता है। उपर्युक्त के अतिरिक्त प्रकृति-चित्रण तथा प्रेम की अलौकिकता का चित्रण सूरदास के काव्य की अन्यतम भावपक्षीय विशेषताएँ हैं।

प्रकृति-चित्रण – सूरदास के काव्य में प्रकृति का प्रयोग कहीं पृष्ठभूमि रूप में, कहीं उद्दीपन रूप में और कहीं अलंकारों के रूप में किया गया है। गोपियों के विरह-वर्णन में प्रकृति का प्रयोग सर्वाधिक मात्रा में किया गया है; यथा

कोउ माई बरजो री या चंदहि ।
अति ही क्रोध करत है हम पर, कुमुदिनि कुल अनन्दहि ॥

प्रेम की अलौकिकता – राधा-कृष्ण व गोपी-कृष्ण प्रेम में सूर ने प्रेम की अलौकिकता प्रदर्शित की है। उद्धव गोपियों को निराकार ब्रह्म का सन्देश देते हैं; परन्तु वे किसी भी प्रकार उद्धव के दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होतीं। गोपियाँ अपने तर्को से उद्धव को परास्त कर देती हैं और श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम का परिचय देती हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – सूर का सम्पूर्ण काव्य ब्रजभाषा में है। उनकी भाषा में सरसता, कोमलता और प्रवाहमयता सर्वत्र विद्यमान है। सूर की ब्रजभाषा ब्रज की ठेठ चलती बोली न होकर कुछ साहित्यिकता लिये हुए है, जिसमें दूसरे प्रदेशों के कुछ प्रचलित शब्दों के साथ-साथ अपभ्रंश के शब्द भी मिश्रित हैं। चलती ब्रजभाषा के ‘जाको’, ‘वाको’, ‘तासों जैसे रूपों के समान ही ‘जेहि’, ‘तेहि जैसे पुराने रूपों का प्रयोग भी मिलता है। ‘गोड़’, ‘आपन’, ‘हमार’ आदि पूरबी प्रयोग भी बराबर पाये जाते हैं। कुछ पंजाबी प्रयोग भी मौजूद हैं; जैसे-‘महँगी’ के अर्थ में ‘प्यारी’ शब्द। यद्यपि बहुत कम किन्तु कहीं-कहीं गरीब नवाज जैसे उर्दू शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।

शैली – सूर की शैली गीति-शैली है। ये संगीत के परम मर्मज्ञ थे, इसलिए इनके पद विभिन्न राग-रागिनियों में बँधे हैं। सूर स्वयं महान् गायक थे और गाते-गाते ही पदों की रचना करते चलते थे। फलतः उनके गेय-पदों में असाधारण संगीतात्मकता है, जो उनकी भाषा के माधुर्य के साथ मिलकर हृदय को मोह लेती है।

अलंकार-विधान – सूरदास का अलंकार-विधान अत्यधिक पुष्ट है। उन्होंने श्लेष, यमक, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, अर्थान्तरन्यास, अन्योक्ति आदि नाना अलंकारों का प्रयोग अतीव कुशलता से किया है। उनके काव्य में अलंकार बड़ी सहजता से स्वत: ही आते चले गये हैं, उनके लिए किसी प्रकार का प्रयास नहीं दिखाई पड़ता। लम्बे-लम्बे सांगरूपकों तक का निर्वाह सूर ने जिस कुशलता से किया है, वह विस्मयकारी है

“सूरदास खल कारी कामरी चढे न दूजौ रंग।”

छन्दविधान – सूर ने अपने काव्य में चौपाई, दोहा, रोला, छप्पय, सवैया, घनाक्षरी आदि विविध प्रकार के परम्परागत छन्दों का प्रयोग किया है।
साहित्य में स्थान – सूरदास के कृतित्व और महत्त्व की अनेक प्रशस्तियों से हिन्दी-साहित्य भरा पड़ा है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास ।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास ॥

यदि इसे अतिशयोक्ति भी मानें तो कम-से-कम इतना तो नि:संकोच कहा ही जा सकता है कि तुलसी के समान । व्यापक काव्यक्षेत्र न चुनने पर भी सूर ने अपने सीमित क्षेत्र–वात्सल्य और श्रृंगार का कोई कोना ऐसा न छोड़ा, जो उनके संचरण से अछूता रह गया हो। वे निर्विवाद रूप से वात्सल्य और श्रृंगार रस के सम्राट् हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न – निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

विनय

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै ।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै ।।
कमल-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै ।।
परम गंग कौ छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै ।।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै ।।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सूरदास किसकी भक्ति में परम सुख का अनुभव करते हैं?
(iv) जहाज का पक्षी किसे कहा गया है?
(v) सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति को त्यागकर अन्य देवताओं की भक्ति करने को क्या बताया है?
उत्तर:
(i) यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘विनय’ शीर्षक पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – विनय।
कवि का नाम – सूरदास।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – जहाज पर बैठा हुआ पक्षी बीच समुद्र में दूसरे अच्छे स्थान की खोज में जहाज पर से उड़कर दूर-दूर तक भटकता रहता है, किन्तु उसे सर्वत्र जल-ही-जल दिखाई देता है। उसे कहीं पंजे टिकाने का भी स्थान नहीं मिलता और अन्तत: वह जहाज पर ही लौटकर आ जाता है; क्योंकि वही उसका एकमात्र आश्रय होता है। इसी प्रकार कवि विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना द्वारा मोक्ष को प्राप्त करने में असफल होने पर पुनः श्रीकृष्ण की शरण में ही आ गया है। कवि का कथन है कि संसाररूपी सागर में प्रभु का नाम ही जहाज स्वरूप है।
(iii) सूरदास भगवान कृष्ण की भक्ति में परम सुख का अनुभव करते हैं।
(iv) सूरदास को मन के जहाज का पंक्षी कहा गया है।
(v) सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति को त्यागकर अन्य देवताओं की भक्ति करने को मूर्खता बताया है।

वात्सल्य

हरि जू की बाल-छवि कहौं बरनि ।
सकल सुख की सींव, कोटि-मनोज-शोभा-हरनि ।।
भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि ।
रहे बिवरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि ।।
मंजु मेचक मृदुल तनु, अनुहरत भूषन भरनि ।
मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फयौ अद्भुत फरनि ।।
चलत पद-प्रतिबिंब मनि आँगन घुटुरुवनि करनि ।
जलज-संपुट-सुभग-छबि भरि लेति उर जनु धरनि ।।
पुन्य फल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नँद-घरनि ।
सूरे प्रभु की उर बसी किलकनि ललित लरखरनि ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सूरदास ने किनकी शोभा को करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को हरने वाली बताया है?
(iv) नन्द-पत्नी यशोदा पुत्र कृष्ण को देखकर कैसा अनुभव करती हैं?
(v) ‘मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फयौ अद्भुत फरनि।’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘वात्सल्य’ शीर्षक से उधृत है।
अर्थात् निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – वात्सल्य।
कवि का नाम – सूरदास।।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – सूरदास जी कहते हैं कि मैं कृष्ण की बाल-शोभा का वर्णन करता हूँ। वह शोभा करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को भी हरने वाली (अर्थात् उससे भी बढ़कर) है और समस्त सुखों की सीमा है (अर्थात् सुखों की जो ऊँची-से-ऊँची.कल्पना की जा सकती है, वह उस सौन्दर्य को देखकर प्राप्त होती है)। नन्द-पत्नी यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को देखकर अनुभव करती हैं कि उनके अनन्त पुण्यों के फलस्वरूप ही ऐसा बालक उन्हें मिला है। सूरदास जी कहते हैं कि मेरे हृदय में तो प्रभु की मोहक किलकारियाँ और उनका लड़खड़ाकर चलना बस गया है।
(iii) सूरदास ने श्रीकृष्ण की मनोहारी बाल शोभा को करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को हरने वाली बताया है।
(iv) नन्द-पत्नी यशोदा पुत्र कृष्ण को देखकर अनुभव करती हैं कि उनके अनन्त पुण्यों के फलस्वरूप ही । ऐसा बालक उन्हें मिला है।
(v) उत्प्रेक्षा और अनुप्रास अलंकार।

भ्रमर-गीत

प्रश्न 1:
हमारें हरि हारिल की लकरी ।।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी ।।
जागत-सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्हु-कान्ह जकरी ।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी ।।
सु तौ व्याधि हमकौं ले आए, देखी सुनी ने करी ।
यह तौ सूर तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) गोपियों ने श्रीकृष्ण को किसके समान प्रिय बताया है?
(iv) गोपियाँ दिन-रात जागते-सोते किसकी रट लगाती रहती हैं?
(v) उद्धव की योग-चर्चा गोपिकाओं को किसकी तरह अरुचिकर लगती है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास के ‘सूरसागर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भ्रमर-गीत’ शीर्षक काव्यांश से लिया गया है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – भ्रमर-गीत।
कवि को नाम – सूरदास।
[संकेत-इसे शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार हारिल पक्षी को वह लकड़ी अत्यधिक प्रिय होती है, जिसे वह दृढ़ता से पकड़े रहता है, उसी प्रकार गोपियों को भी श्रीकृष्ण हारिल की लकड़ी के समान प्रिय हैं। गोपियों रूपी हारिल पक्षियों ने श्रीकृष्णरूपी लकड़ी को अपने तन-मन में बसा रखा है। वे एक क्षण के लिए श्रीकृष्ण को अपने मन से दूर करना नहीं चाहतीं।
(iii) गोपियों ने श्रीकृष्ण को हारिल पक्षी की लकड़ी के समान प्रिय बताया है।
(iv) गोपियाँ दिन-रात जागते-सोते कृष्ण-कृष्ण की रट लगाती रहती हैं।
(v) उद्धव की योग-चर्चा गोपिकाओं को कड़वी ककड़ी की तरह अरुचिकर लगती है।

प्रश्न 2:
कहत कत परदेसी की बात ।
मंदिर अरध अवधि बदि हमसौं, हरि अहार चलि जात ।।
ससि रिपु बरष, सूर रिपु जुग बर, हर-रिपु कीन्हौं घात ।
मघ पंचक लै गयौ साँवरौ, तातै अति अकुलाते ।।
नखत, बेद, ग्रह, जोरि, अर्ध करि, सोइ बनत अब खात ।
सूरदास बस भई बिरह के, कर मी पछितात।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(i) श्रीकृष्ण गोपिकाओं से कितने दिन में लौट आने का वादा करके मथरा गए थे?
(iv) श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों को एक-एक दिन और एक-एकरांत किसके समान प्रतीत होते हैं?
(v) गोपियाँ किस कारण और अधिक व्याकुलता का अनुभव करती हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – श्रीकृष्ण ने हम से वादा किया था कि वे एक पखवाड़े के अन्दर (अर्द्ध मन्दिर) अर्थात् आधे महीने में (15 दिन के अन्दर) ही लौटकर आएँगे। परन्तु हरि अर्थात् सिंह, सिंह अहार = सिंह का भोजन = मांस = एक महीना बीत गया है परन्तु वे नहीं लौटे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वचन देकर उसे निभाया नहीं है, क्योंकि ये परदेसी विश्वास के योग्य नहीं होते। उनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। इसलिए परदेसियों की बात ही हमसे मत करो।।
(iii) श्रीकृष्ण गोपिकाओं से एक पखवाड़ा अर्थात् पन्द्रह दिन में लौट आने का वादा करके गए थे।
(iv) श्रीकृष्ण के वियोग में गोपिकाओं को एक-एक दिन बरसों के समान और एक-एक रात युगों के समान प्रतीत हो रहे हैं।
(v) गोपियाँ अपने चित्त को श्रीकृष्ण के साथ चले जाने के कारण और अधिक व्याकुलता का अनुभव कर रही हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name भारतीय साहित्य की विशेषताएँ (श्यामसुन्दर दास)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
श्यामसुन्दर दास के जीवन-परिचय एवं प्रमुख कृतियों का उल्लेख करते हुए उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ भी लिखिए।
या
श्यामसुन्दर दास का साहित्यिक परिचय दीजिए।
या
श्यामसुन्दर दास की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
द्विवेदी युग के महान् साहित्यकार एवं हिन्दी को गौरव के शिखर पर प्रतिष्ठित करने वाले बाबू श्यामसुन्दर दास हिन्दी-साहित्य की उन महान् प्रतिभाओं में से हैं, जिन्होंने भावी पीढ़ी को मौलिक साहित्य-लेखन की प्रेरणा प्रदान की। ये ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ के संस्थापक, ‘हिन्दी शब्दसागर के विद्वान् सम्पादक, समर्थ समालोचक, प्रसिद्ध निबन्धकार एवं कुशल अध्यापक थे।
श्यामसुन्दर दास जी का जन्म काशी में एक खत्री परिवार में सन् 1875 ई० में हुआ था। इनके पिताजी का नाम देवीदास खन्ना था। ये बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण करके सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज में अंग्रेजी के अध्यापक और बाद में कालीचरण हाईस्कूल, लखनऊ में प्रधानाध्यापक हो गये। अन्त में ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने और अवकाश ग्रहण करने तक इसी पद पर बने रहे। इनकी साहित्य-सेवाओं से प्रभावित होकर अंग्रेज सरकार ने इन्हें ‘रायबहादुर’ की उपाधि से, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने ‘साहित्य-वाचस्पति की उपाधि से तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने डी० लिट्०’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया। निरन्तर अथक परिश्रम के कारण इनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और सन् 1945 ई० में इनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ: श्यामसुन्दर दास जी हिन्दी साहित्याकाश के ऐसे नक्षत्र हैं जिन्होंने अपने प्रकाश से हिन्दी साहित्य को प्रकाशित कर दिया। आपने ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ के माध्यम से अनेक दुर्लभ और प्राचीन ग्रन्थों की खोज की। महावीरप्रसाद द्विवेदी जी का निम्नांकित कथन इस सत्य की पुष्टि करता हैं

मातृभाषा के प्रचारक विमल बी० ए० पास।
सौम्य-शील-निधान बाबू श्यामसुन्दर दास ॥

श्यामसुन्दर दास जी ने अपने जीवन के पचास वर्षों में अनवरत रूप से हिन्दी की सेवा करते हुए, उसे कोश, इतिहास, काव्यशास्त्र एवं सम्पादित-ग्रन्थों से समृद्ध किया। हिन्दी के समस्त अभावों को दूर करने का व्रत लेने वाले इस महान् साहित्यकार ने अपने कुछ मित्रों के सहयोग से सन् 1893 ई० में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की। इन्होंने विश्वविद्यालय की उच्च कक्षाओं के लिए हिन्दी का पाठ्यक्रम भी निर्धारित किया। इसके साथ-ही-साथ इन्होंने श्रेष्ठ साहित्य का सृजन भी किया। श्यामसुन्दर दास जी ने हिन्दी को सर्वजन सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने के लिए अप्रतिम योगदान दिया। इन्होंने निम्नलिखित रूपों में हिन्दी-साहित्य की स्तुत्य सेवी की

(क) सम्पादक के रूप में।
(ख) साहित्य-इतिहास लेखक के रूप में।
(ग) निबन्धकार के रूप में।
(घ) आलोचक के रूप में।
(ङ) भाषा-वैज्ञानिक के रूप में।
(च) शब्दकोश-निर्माता के रूप में।

कृतियाँ:
श्यामसुन्दर दास जी आजीवन साहित्य-सेवा में संलग्न रहे। इन्होंने अनेक रचना-सुमन समर्पित कर । हिन्दी-साहित्य के भण्डार को भरा। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं

(1) निबन्ध-संग्रह:  ‘हिन्दी का आदिकवि’, ‘नीतिशिक्षा’, ‘गद्य कुसुमावली’ आदि पुस्तकों में इनके विविध विषयों पर आधारित निबन्ध संकलित हैं। कुछ निबन्ध ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका में भी प्रकाशित हुए। ‘साहित्यिक
लेख’ इनके साहित्यिक निबन्धों का संग्रह है।
(2) आलोचना:  ‘साहित्यालोचन’, ‘रूपक-रहस्य’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचनाओं की श्रेष्ठ रचनाएँ हैं।
(3) भाषा-विज्ञान: ‘हिन्दी भाषा का विकास’, ‘भाषा-विज्ञान’, ‘हिन्दी भाषा और साहित्य तथा ‘भाषा-रहस्य भाषा-विज्ञान सम्बन्धी इनकी श्रेष्ठ कृतियाँ हैं।
(4) इतिहास: ‘हिन्दी-साहित्य का इतिहास’ एवं ‘कवियों की खोज।
(5) आत्मकथा:  ‘मेरी आत्म-कहानी।
(6) सम्पादित ग्रन्थ:  हिन्दी निबन्धमाला’, ‘रामचरितमानस’, ‘कबीर ग्रन्थावली’, ‘भारतेन्दु नाटकावली’, ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ’, ‘हिन्दी शब्दसागर’, ‘हिन्दी वैज्ञानिक कोश’, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘मनोरंजन पुस्तकमाला’, ‘छत्र प्रकाश’, ‘शकुन्तला नाटक’, ‘इन्द्रावती’, ‘नासिकेतोपाख्यान’, ‘वनिता-विनोद’ आदि।
(7) पाठ्य-पुस्तकें:  ‘भाषा सार-हिन्दी संग्रह’, ‘हिन्दी पत्र-लेखन’, ‘हिन्दी ग्रामर’, ‘हिन्दी कुसुमावली’ आदि। इस प्रकार श्यामसुन्दर दास जी ने साहित्य के परिष्कार हेतु अथक परिश्रम किया और लगभग 100 ग्रन्थों की रचना करके हिन्दी की अपूर्व सेवा की।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ
हिन्दी भाषा को सर्वजन-सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने वाले बाबू श्यामसुन्दर दास ने गम्भीर विषयों पर साहित्य-रचना की है; अत: उनकी भाषा में विषयों के अनुरूप गम्भीरता का होना स्वाभाविक है। इन्होंने संस्कृत की तत्समप्रधान शब्दावली से युक्त परिष्कृत, परिमार्जित, सुगठित एवं प्रवाहमयी भाषा को अपनाया। ये भाषा को सरल और शुद्ध बनाने के पक्षपाती थे। इसलिए इनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है और उर्दू, फारसी के शब्दों का प्रायः अभाव। इन्होने यदि कहीं विदेशी शब्दों का प्रयोग भी किया है तो उसे हिन्दी की। प्रकृति के अनुरूप तद्भव बनाकर। इनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियों के प्रयोग नहीं के बराबर हैं। संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी भाषा में प्रसाद गुण का माधुर्य है। इन्होंने भाषा का व्याकरणसम्मत प्रयोग किया है। इनका वाक्य-विन्यास सरल, संयत और सुगठित है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ
अत्यन्त गम्भीर विषयों को बोधगम्य शैली में प्रस्तुत करने वाले बाबू श्यामसुन्दर दास ने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप विषयों के प्रतिपादन हेतु गम्भीर शैली को अपनाया। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा और शैली के परिमार्जन का कार्य किया तो श्यामसुन्दर दास ने उसे संयत और सुनिश्चित रूप प्रदान किया। इनकी शैली के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं

(1) विवेचनात्मक शैली: श्यामसुन्दर दास जी ने इस शैली का प्रयोग साहित्यिक निबन्धों में किया है। इसमें गम्भीरता तथा तत्सम शब्दावली की प्रचुरता है।
(2) आलोचनात्मक शैली: श्यामसुन्दर दास जी ने इस शैली का प्रयोग अपनी आलोचनात्मक रचनाओं में किया है। तार्किकता एवं गम्भीरता इस शैली की विशेषता है।
(3) गवेषणात्मक शैली: इस शैली में बाबूजी ने खोजपूर्ण, नवीन और गम्भीर निबन्धों की रचना की है। इसमें भाषा संस्कृतप्रधान और वाक्य लम्बे हैं।
(4) भावात्मक शैली: इस शैली में भाव-प्रवणता के साथ-साथ आलंकारिकता एवं कवित्वमयता का गुण भी है।।
(5) व्याख्यात्मक शैली: बाबू श्यामसुन्दर दास ने कठिन विषय को समझाने के लिए व्याख्यात्मक शैली अपनायी है।

साहित्य में स्थान: आधुनिक युग के भाषा और साहित्य के प्रमुख लेखकों में बाबू श्यामसुन्दर दास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने अनुपलब्ध प्राचीन ग्रन्थों का सम्पादन करके तथा हिन्दी-भाषा को विश्वविद्यालय स्तर तक पठनीय बनाकर आधुनिक हिन्दी-साहित्य की अपूर्व सेवा की है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न:
दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए(1)

प्रश्न 1:
साहित्यिक समन्वय से हमारा तात्पर्य साहित्य में प्रदर्शित सुख-दु:ख, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद आदि विरोधी तथा विपरीत भावों के समीकरण तथा एक अलौकिक आनन्द में उनके विलीन होने से है। साहित्य के किसी अंग को लेकर देखिए, सर्वत्र यही समन्वय दिखायी देगा। भारतीय नाटकों में ही सुख और दु:ख के प्रबल घात-प्रतिघात दिखाये गये हैं, पर सबका अवसान आनन्द में ही किया गया है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) साहित्यिक समन्वय से क्या तात्पर्य है?
(iv) प्रस्तुत गद्यांश में भारतीय साहित्य की किस भावना पर गम्भीर विचार हुआ है?
(v) कहाँ पर सुख-दुःख के प्रबल प्रतिघात दिखाए गए हैं?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत गद्यांश हमारी, पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं हिन्दी के प्रसिद्ध निबन्धकार श्यामसुन्दर दास द्वारा लिखित
‘भारतीय साहित्य की विशेषताएँ’ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है। अथवा निम्नवत् लिखिए
पाठ का नाम – भारतीय साहित्य की विशेषताएँ।
लेखक का नाम – श्यामसुन्दर दास।।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: हमारे नाटकों में, कहानियों में और साहित्य की किसी भी विधा में सर्वत्र यही समन्वय पाया जाता है। हमारे नाटकों में सुख और दु:ख के प्रबल घात-प्रतिघात दिखाये जाते हैं, पर सबका अन्त आनन्द में ही किया जाता है; क्योंकि हमारा ध्येय जीवन का आदर्श रूप उपस्थित कर उसे उन्नत बनाना रहा है।
(iii) साहित्यिक समन्वय से हमारा तात्पर्य साहित्य में प्रदर्शित सुख-दु:ख, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद आदि विरोधी तथा विपरीत भावों के समीकरण तथा एक अलौकिक आनन्द में उनके विलीन होने से है।
(iv) प्रस्तुत गद्यांश में भारतीय साहित्य में समन्वय की भावना पर गम्भीरता से विचार हुआ है।
(v) भारतीय नाटकों में सुख-दु:ख के प्रबल प्रतिघात दिखाए गए हैं।

प्रश्न 2:
भारतीय दर्शनों के अनुसार परमात्मा तथा जीवात्मा में कुछ भी अन्तर नहीं, दोनों एक ही हैं, दोनों सत्य हैं, चेतन हैं तथा आनन्दस्वरूप हैं। बंधन मायाजन्य है। माया अज्ञान उत्पन्न करने वाली वस्तु है। जीवात्मा मायाजन्य अज्ञान को दूर कर अपना स्वरूप पहचानता है और आनन्दमय परमात्मा में लीन होता है। आनन्द में विलीन हो जाना ही मानव-जीवन का परम उद्देश्य है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा और परमात्मा के बारे में क्या बताया गया है?
(iv) मानव-जीवन का परम उद्देश्य क्या है?
(v) अज्ञान उत्पन्न करने वाली वस्तु क्या है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश को व्याख्या: जब माया से उत्पन्न अनान दूर हो जाता है तो जीवात्मा अपने स्वरूप को पहचानकर आनन्दमय परमात्मा में लीन हो जाता है। इससे उसके दुःखों का अन्त हो जाता है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जीवात्मा द्वारा अपने स्वरूप को पहचानकर आनन्दमय परमात्मा में लीन हो जाना ही मानव-जीवन का मुख्य उद्देश्य है।
(iii) भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा तथा जीवात्मा में कोई अन्तर नहीं, दोनों एक ही हैं, दोनों सत्य हैं, चेतन हैं तथा आनन्दस्वरूप हैं।
(iv) आनन्द में विलीन हो जाना ही मानव-जीवन का परम उद्देश्य है।
(v) माया अज्ञान उत्पन्न करने वाली वस्तु है।

प्रश्न 3:
भारत की शस्यश्यामला भूमि में जो निसर्ग-सिद्ध सुषमा है, उस पर भारतीय कवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है। यों तो प्रकृति की साधारण वस्तुएँ भी मनुष्यमात्र के लिए आकर्षक होती हैं, परन्तु उसकी सुन्दरतम विभूतियों में मानव-वृत्तियाँ विशेष प्रकार से रमती हैं। अरब के कवि मरुस्थल में बहते हुए किसी साधारण से झरने अथवा ताड़ के लंबे-लंबे पेड़ों में ही सौन्दर्य का अनुभव कर लेते हैं तथा ऊँटों की चाल में ही सुन्दरता की कल्पना कर लेते हैं; परन्तु जिन्होंने भारत की हिमाच्छादित शैलमाला पर संध्या की सुनहली किरणों की सुषमा देखी है; अथवा जिन्हें घनी अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती हुई निर्झरिणी तथा उसकी समीपवर्तिनी लताओं की वसन्तश्री देखने का अवसर मिला है, साथ ही जो यहाँ के विशालकाय हाथियों की मतवाली चाल देख चुके हैं, उन्हें अरब की उपर्युक्त वस्तुओं में सौन्दर्य तो क्या; उलटे नीरसता, शुष्कता और भद्दापन ही मिलेगा।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किस पर भारतीय कृवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है?
(iv) अरब का भौगोलिक सौन्दर्य क्या है?
(v) अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती निर्झरणी कहाँ की भौगोलिक सुन्दरता का बखान करती है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: अरब एवं भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य और दोनों देशों के कवियों की सौन्दर्यानुभूति में पर्याप्त अन्तर है। अरब देश में सौन्दर्य के नाम पर केवल रेगिस्तान, रेगिस्तान में प्रवाहित होते हुए कुछ साधारण से झरने अथवा ताड़ के कुछ लम्बे-लम्बे वृक्ष एवं ऊँटों की चाल ही देखने को मिलती है। यही कारण है कि अरब के कवियों की कल्पना मात्र इतने-से सौन्दर्य तक ही सीमित रह जाती है। इसके विपरीत भारत में प्रकृति के विविध मनोहारी रूपों में अपूर्व सौन्दर्य के दर्शन होते हैं; उदाहरणार्थ-हिमालय की बर्फ से आच्छादित पर्वतश्रेणियाँ, सन्ध्या के समय उन पर्वतश्रेणियों पर पड़ने वाली सूर्य की सुनहली किरणों से उत्पन्न अद्भुत शोभा, सघन आम के बागों की छाया में कल-कल का निनाद करते हुए बहने वाली छोटी-छोटी नदियाँ, इन्हीं के निकट लताओं के पल्लवित एवं पुष्पित होने से उत्पन्न वसन्त की अनुपम छटा तथा भारत के वनों में विचरण करने वाले विशालकाय हाथियों की मतवाली चाल आदि। भारत में इस प्रकार के अनेक रमणीय प्राकृतिक दृश्य देखने को मिलते हैं, जिनके समक्ष अरब के सीमित प्राकृतिक सौन्दर्य में केवल नीरसता, शुष्कता और भद्देपन की ही अनुभूति होती है।
(iii) भारत की शस्यश्यामला भूमि में जो निसर्ग-सिद्धि सुषमा है, उस पर भारतीय कवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है।
(iv) अरब का भौगोलिक सौन्दर्य है-मरुस्थल में बहता कोई साधारण-सा झरना अथवा ताड़ के लम्बे-लम्बे पेड़।
(v) अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती निर्झरणी भारत की भौगोलिक सुन्दरता का बखान करती है।

प्रश्न 4:
प्रकृति के विविध रूपों में विविध भावनाओं के उद्रेक की क्षमता होती है; परन्तु रहस्यवादी कवियों को अधिकतर उसके मधुर स्वरूप से प्रयोजन होता है, क्योंकि भावावेश के लिए प्रकृति के मनोहर रूपों की जितनी उपयोगिता है, उतनी दूसरे रूपों की नहीं होती। यद्यपि इस देश की उत्तरकालीन विचारधारा के कारण हिन्दी में बहुत थोड़े रहस्यवादी कवि हुए हैं, परन्तु कुछ प्रेम-प्रधान कवियों ने भारतीय मनोहर दृश्यों की सहायता से अपनी रहस्यमयी उक्तियों को अत्यधिक सरस तथा हृदयग्राही बना दिया है। यह भी हमारे साहित्य की एक देशगत विशेषता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रेम-प्रधान कवियों ने किनकी सहायता से अपनी रहस्यमयी उक्तियों को अत्यधिक सरस तथा हृदयग्राही बना दिया है?
(iv) प्रकृति के किस स्वरूप से रहस्यवादी कवियों का प्रयोजन होता है?
(v) देश की किस विचारधारा के कारण हिन्दी में बहुत थोड़े रहस्यवादी कवि हुए हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: श्यामसुन्दर दास जी का कहना है कि व्यक्ति के सम्मुख प्रकृति अपने विभिन्न रूपों में उपस्थित होती है। जिस प्रकार प्रकृति के विभिन्न रूप हैं, उसी प्रकार व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में भी विभिन्न भावनाएँ विद्यमान होती हैं। इनमें से कुछ दमित होती हैं तो कुछ मुक्त। यही कारण है। कि प्रकृति के विभिन्न रूप व्यक्ति के मन में विविध भावनाओं की वृद्धि करते हैं।
(iii) प्रेम-प्रधान कवियों ने भारतीय मनोहर दृश्यों की सहायता से अपनी रहस्यमयी उक्तियों को अत्यधिक सरस तथा हृदयग्राही बना दिया है।
(iv) प्रकृति के मधुर स्वरूप से रहस्यवादी कवियों का प्रयोजन होता है।
(v) देश की उत्तरकालीन विचारधारा के कारण हिन्दी में बहुत थोड़े रहस्यवादी कवि हुए हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 1 भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?

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Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Number of Questions 5
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लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न 1.
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्यिक परिचय दीजिए।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जीवन-परिचय और रचनाएँ लिखते हुए उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ भी बताइए।
उत्तर:
जीवन-परिचय-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र खड़ी बोली हिन्दी गद्य के जनक माने जाते हैं। इन्होंने हिन्दी गद्य-साहित्य को नवचेतना और नयी दिशा प्रदान की। इनका जन्म काशी के एक सम्पन्न और प्रसिद्ध वैश्य परिवार में सन् 1850 ई० में हुआ था। इनके पिता गोपालचन्द्र, काशी के सुप्रसिद्ध सेठ थे जो ‘गिरिधरदास’ उपनाम से ब्रज भाषा में कविता किया करते थे। भारतेन्दु जी में काव्य-प्रतिभा बचपन से ही विद्यमान थी। इन्होंने पाँच वर्ष की आयु में निम्नलिखित दोहा रचकर अपने पिता को सुनाया और उनसे सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया

लै ब्योढा ठाढे भये, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सैन को, हनन लगे भगवान ॥

पाँच वर्ष की आयु में माता के वात्सल्य तथा दस वर्ष की आयु में पिता के प्यार से वंचित होने वाले भारतेन्दु की आरम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, बँगला आदि भाषाओं का अध्ययन किया। तेरह वर्ष की अल्पायु में मन्नो देवी नामक युवती के साथ इनका विवाह हो गया। भारतेन्दु जी यात्रा के बड़े शौकीन थे। इन्हें जब भी समय मिलता, ये यात्रा के लिए निकल जाते थे। ये बड़े उदार और दानी पुरुष थे। अपनी उदारता और दानशीलता के कारण इनकी आर्थिक दशा शोचनीय हो गयी और ये ऋणग्रस्त हो गये।  परिणामस्वरूप श्रेष्ठि-परिवार में उत्पन्न हुआ यह महान् साहित्यकार ऋणग्रस्त होने के कारण, क्षयरोग से पीड़ित हो 35 वर्ष की अल्पायु में ही सन् 1885 ई० में दिवंगत हो गया।साहित्यिक सेवाएँ: प्राचीनता के पोषक और नवीनता के उन्नायक, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी खड़ी बोली के ऐसे साहित्यकार हुए हैं, जिन्होंने साहित्य के विभिन्न अंगों पर साहित्य-रचना करके हिन्दी-साहित्य को समृद्ध बनाया। इन्होंने कवि, नाटककार, इतिहासकार, निबन्धकार, कहानीकार और सम्पादक के रूप में हिन्दी-साहित्य की महान् सेवा की है। नाटकों के क्षेत्र में इनकी देन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

भारतेन्दु जी से पूर्व खड़ी बोली गद्य के क्षेत्र में अलग-अलग दो शैलियाँ प्रचलित थीं। एक शैली में अरबी-फारसी के शब्दों की अधिकता थी तो दूसरी में संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता। भारतेन्दु जी ने इन शैलियों के मध्य मार्ग का अनुसरण करके हिन्दी गद्य को ऐसा व्यवस्थित स्वरूप दिया, जिसमें व्यावहारिक उर्दू  और फारसी के शब्दों के साथ-साथ प्रचलित संस्कृत और अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग था।।
भारतेन्दु जी ने हिन्दी भाषा के प्रचार के लिए आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन को गति देने के लिए इन्होंने नयी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं सम्पादन किया, साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना की और हिन्दी लेखकों को साहित्य-सृजन के लिए प्रेरित किया। इन्होंने साहित्य-सेवी संस्थाओं तथा साहित्यकारों को धन दिया और देश में अनेक शिक्षा संस्थाओं, पुस्तकालयों एवं नाट्यशालाओं की स्थापना की।

भारतेन्दु जी की साहित्य-रचना का काल भारत की परतन्त्रता का युग था।उस समय देश की सामाजिक और राजनीतिक दशा अत्यन्त दयनीय वे शोचनीय थी। इसलिए इन्होंने अपने साहित्य में समाज और देश की दयनीय स्थिति का चित्रण करके, देश की प्रगति के लिए लोगों का आह्वान किया। इनके नाटकों में समाज-सुधार, देशप्रेम, राष्ट्रीय चेतना और देशोद्धार के स्वर मुखरित हुए हैं।

भारतेन्दु जी ने साहित्य के विभिन्न अंगों अर्थात् विविध विधाओं की पूर्ति की। इन्होंने हिन्दी गद्य के क्षेत्र में नवयुग का सूत्रपात किया और नाटक, निबन्ध, कहानी, इतिहास आदि विषयों पर साहित्य-रचना की। अपने निबन्धों में इन्होंने तत्कालीन सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक परिस्थितियों का चित्रण किया। इतिहास, पुराण, धर्म, भाषा आदि के अतिरिक्त इन्होंने संगीत आदि पर निबन्ध-रचना की तथा सामाजिक रूढ़ियों पर व्यंग्य भी किये। काव्य के क्षेत्र में भारतेन्दु जी ने कविता को राष्ट्रीयता की ओर मोड़ा। इनके काव्य की मुख्य भाषा ब्रज भाषा और गद्य की प्रमुख भाषा खड़ी बोली थी।

भारतेन्दु जी ने एक यशस्वी सम्पादक के रूप में कवि वचन सुधा’ (1868 ई०) और ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन (1873 ई०) पत्रिकाओं का सम्पादन किया, जिससे हिन्दी गद्य के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। आठ अंकों के उपरान्त ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ का नाम बदलकर ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका हो गया। इस प्रकार भारतेन्दु जी ने व्यावहारिक हिन्दी भाषा को अपनाकर, विविध विषयों पर स्वयं निबन्ध लिखकर और अन्य लेखकों को लिखने के लिए प्रेरित करके हिन्दी साहित्य की महान् सेवा की और एक नये युग का सूत्रपात किया।

कृतियाँ:
भारतेन्दु जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने नाटक, काव्य, निबन्ध, उपन्यास, कहानी आदि साहित्य की तत्कालीन प्रचलित सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण रचनाएँ कीं, किन्तु नाटकों के क्षेत्र में इनकी देन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इनकी कृतियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

नाटक:
भारतेन्दु जी ने मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के नाटकों की रचना की है, जिनकी कुल संख्या 17 है:
(1) मौलिक नाटक: सत्य हरिश्चन्द्र, श्री चन्द्रावली, नीलदेवी, भारत दुर्दशा, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, सती प्रताप, अँधेर नगरी, विषस्य विषमौषधम् तथा प्रेम-जोगिनी।
(2) अनूदित नाटक:  मुद्राराक्षस, रत्नावली नाटिका, कर्पूरमंजरी, विद्यासुन्दर, पाखण्ड विडम्बन, धनंजय विजय, भारत जननी तथा दुर्लभ बन्धु।।

निबन्ध-संग्रह:
सुलोचना, मदालसा, लीलावती, दिल्ली दरबार दर्पण एवं परिहास-वंचक।

इतिहास:
अग्रवालों की उत्पत्ति, महाराष्ट्र देश का इतिहास तथा कश्मीर कुसुम।

कविता-संग्रह:
भक्त सर्वस्व, प्रेम सरोवर, प्रेम तरंग, सतसई सिंगार, प्रेम प्रलाप, प्रेम फुलवारी, भारत-वीणा आदि।

यात्रा वृत्तान्त:
सरयू पार की यात्री, लखनऊ की यात्री आदि।

जीवनी:
सूरदास, जयदेव, महात्मा मुहम्मद आदि।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ

भाषा के समन्वित रूप का प्रयोग:
भाषा समूची युग-चेतना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। यही कारण है कि भारतेन्दु जी ने काव्य में परम्परागत ब्रज भाषा का प्रयोग किया, परन्तु गद्य के लिए इन्होंने खड़ी बोली को ही अपनाया। भारतेन्दु जी से पूर्व हिन्दी गद्य का कोई निश्चित स्वरूप नहीं था तथा गद्य के लिए दो प्रकार की भाषा का प्रयोग हो रहा था। एक ओर उर्दू-फारसी मिश्रित खड़ी बोली का प्रयोग तो दूसरी ओर संस्कृत की तत्सम शब्दावली से युक्त खड़ी बोली। भारतेन्दु जी ने दोनों प्रकार की भाषा को समन्वित प्रयोग कर भाषा को सरल और व्यावहारिक रूप प्रदान किया। इन्होंने अरबी, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों के साथ-साथ, संस्कृत के तत्सम शब्दों, साधारण प्रयोग में आने वाले तद्भव और देशी शब्दों का प्रयोग करके खड़ी बोली हिन्दी का स्वरूप प्रतिष्ठित किया। इनकी इस भाषा को समकालीन लेखकों ने सहर्ष स्वीकार भी किया।

लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग:
भाषा को सजीव रूप प्रदान करने और उसमें प्रवाह एवं ओज उत्पन्न करने के लिए इन्होंने सुन्दर लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग किया। यद्यपि भारतेन्दु जी की भाषा में व्याकरण की दृष्टि से कतिपय दोष दिखाई देते हैं; क्योंकि इनके युग में खड़ी बोली का व्याकरण-सम्मत निश्चित स्वरूप नहीं था; तथापि इनकी भाषा सरल, सुबोध, सुमधुर, व्यावहारिक, भावानुगामिनी एवं सशक्त है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ:
भाव और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा और अभिव्यक्ति का ढंग शैली कहलाती है। भारतेन्दु जी की रचनाओं में हमें विषयानुरूप शैली के अनेक रूप दिखाई देते हैं। ये अपनी शैली के स्वयं निर्माता थे। इनकी शैली पर इनके मस्त और उदार व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इनकी शैली के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं

(1) वर्णनात्मक शैली:
किसी वस्तु का वर्णन करते समय अथवा परिचय देते समय भारतेन्दु जी ने वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया है। इस शैली में वर्णन की प्रधानता होती है। इसमें भारतेन्दु जी ने सरल और सुबोध भाषा का प्रयोग किया है। इस शैली में वाक्य छोटे और व्यवस्थित हैं।

(2) भावात्मक शैली:
भाषा के वेग और तीव्रता को प्रकट करने के लिए भारतेन्दु जी ने भावात्मक शैली को अपनाया है। इसमें वाक्य छोटे और गठे हुए हैं। इस शैली में प्रवाह, ओज तथा कोमल शब्दावली के प्रयोग से विशेष माधुर्य आ गया है।

(3) विवेचनात्मक शैली:
साहित्य, इतिहास, राजनीति आदि विषयों पर लिखते समय भारतेन्दु जी उनका गम्भीर विवेचन भी करते चलते हैं। इस शैली में इनकी भाषा तत्सम शब्दों से युक्त, गम्भीर और प्रौढ़ है।

(4) हास्य-व्यंग्यात्मक शैली:
भारतेन्दु जी ने सामाजिक कुरीतियों, पाखण्डों तथा अंग्रेजी शासकों पर अत्यन्त तीखे व्यंग्य किये हैं। इस शैली में सजीवता और चुटीलापन है।।

(5) गवेषणात्मक शैली:
भारतेन्दु जी ने इस शैली का प्रयोग ऐतिहासिक और साहित्यिक निबन्धों में किया है। इसमें इन्होंने नये-नये तथ्यों की खोज की है। साहित्यिक निबन्धों में शैली का प्रयोग करते समय संस्कृत के तत्सम शब्दों का तथा कुछ बड़े-बड़े वाक्यों का प्रयोग किया गया है।

(6) विवरणात्मक शैली:
जहाँ पर गति के साथ किसी विषय के वर्णन की आवश्यकता महसूस हुई है, वहाँ पर भारतेन्दु जी ने इस शैली का प्रयोग किया है। सरयूपार की यात्रा’, ‘लखनऊ की यात्रा’ आदि यात्रा-वृत्तान्त इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

(7) विचारात्मक शैली:
भारतेन्दु जी ने गम्भीर विषयों के विवेचन में इस शैली का सुन्दर प्रयोग किया है। ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’, ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?’ इत्यादि निबन्ध इनकी इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उपर्युक्त शैलियों के अतिरिक्त भारतेन्दु जी ने स्तोत्र शैली, प्रदर्शन शैली, शोध शैली, कथा शैली और भाषण शैली को भी बड़ी कुशलता के साथ अपनाया है।

साहित्य में स्थान:
नि:स्न्देह हिन्दी-साहित्याकाश के प्रभामण्डित इन्दु भारतेन्दु जी हिन्दी गद्य-साहित्य के जन्मदाता थे। आज भी साहित्य का यह इन्दु अपनी रचना-सम्पदा के माध्यम से हिन्दी-साहित्य गगन से अमृत-वृष्टि कर रहा है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित गद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1:
इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाय वही बहुत है। हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं। यद्यपि फर्स्ट क्लास सेकेण्ड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिन्दुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए “का चुप साधि रहा बलवाना’ फिर देखिए हनुमान जी को अपना बल कैसा याद आता है। सो बल कौन याद दिलावै।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्याकीजिए।
(iii) लेखक ने देश के लोगों को किसकी संज्ञा दी है? कारण सहित उत्तर दीजिए।
(iv) “का चुप साधि रही बलवाना” इस लोकोक्ति के माध्यम से लेखक किस बात को स्पष्ट करना चाहता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ के ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?’
शीर्षक निबन्ध से अवतरित है। इसके लेखक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
पाठ का नाम – भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?
लेखक का नाम – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।
[संकेत–इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: भारतेन्दु जी कहते हैं कि यह देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि भारतवासियों में विविध प्रकार से गुणी तथा सभी प्रकार की योग्यता रखने वाले लोग हैं, परन्तु वे सही नेतृत्व के अभाव में अभी तक अपनी उन्नति नहीं कर सके हैं। हमारे देश के लोगों को  लगाड़ी की संज्ञा दी जा सकती है। जैसे रेलगाड़ी में ऊँचे किराये तथा सामान्य किराये के डिब्बे लगे रहते हैं, परन्तु इंजन के अभाव में वे सभी अपनी जगह स्थिर रहते हैं, आगे नहीं बढ़ पाते; उसी प्रकार भारत के लोगों में भी उच्च और मध्यम श्रेणी के विद्वान्, वीर एवं शक्ति-सम्पन्न सभी प्रकार की प्रतिभाओं से सम्पन्न लोग हैं, परन्तु नेतृत्वहीनता के कारण वे अपनी उन्नति के लिए स्वयं कोई भी कार्य नहीं कर पाते। यदि भारतीयों को सही मार्गदर्शक की सत्प्रेरणा प्राप्त हो जो उन्हें उनके बल, पौरुष और ज्ञान का स्मरण दिला सके, तो वे कठिन-से-कठिन और बड़े-से-बड़े कार्य को भी आसानी से कर सकते हैं। मात्र एक नेता के अभाव में उसकी सारी शक्ति, ज्ञान और योग्यता व्यर्थ हो जाती है।

(iii) लेखक ने देश के लोगों को रेलगाड़ी की संज्ञा दी है क्योंकि जिस प्रकार से रेलगाड़ी में ऊँचे किराए तथा सामान्य किराए के डिब्बे लगे रहते हैं किन्तु सभी इंजन के अभाव में अपनी जगह स्थिर रहते हैं उसी प्रकार देश के लोगों की स्थिति है। वे भी नेतृत्वहीनता के कारण उन्नति नहीं कर सकते।

(iv) “का चुप साधि रहा बलवाना” लोकोक्ति के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि देश के लोग हनुमान जी की तरह हैं। जामवंत ने जिस प्रकार हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया और वे समुद्र लाँघ गए, उसी प्रकार भारत के लोगों को प्रेरणादायी, सफल नेतृत्व की आवश्यकता है।

(v) उपर्युक्त गद्यांश का आशय यह है हमारे देश के लोग प्रतिभावान एवं सभी प्रकार की योग्यता रखने वाले हैं, किन्तु उन्हें वे अपनी प्रतिभा से अनभिज्ञ हैं। यदि उनको कोई सही मार्गदर्शक मिल जाए तो वे क्या नहीं कर सकते! अर्थात् वे सब कुछ कर सकते हैं। प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक देशवासियों को स्वावलम्बी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

प्रश्न 2:
यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन अँगरेज फरासीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं। सबके जी में यही है कि पाला हमी पहले छू लें। उस समय हिन्दू
काठियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं। इनको औरों को जाने दीजिए जापानी टट्टुओं । को हाँफते हुए दौड़ते देख करके भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकेगा। इस लूट में इस बरसात में भी जिसके सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर को कोप ही कहना चाहिए।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने कहाँ के निवासियों को जापानी टट्टुओं की संज्ञा दी है?
(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने भारतवासियों को क्या सुझाव दिया है?
(v) “उस समय हिन्दू काठियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं।” इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने कौन-सी बात कही है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: भारतेन्दु जी कहते हैं कि भारतवासियों को यह समझना चाहिए। कि ऐसे क्षणों में यदि वे एक बार पिछड़ जाएँगे तो फिर आगे नहीं बढ़ सकते। लेखक को मत है कि आधुनिक वैज्ञानिक युग में उन्नति के साधन इतनी सरलता से उपलब्ध हैं, जैसे वे अनायास प्राप्त वर्षा का जल हों। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो लूट का माल बिखरा पड़ा हो और हमने आँखों पर पट्टी बाँध रखी हो अथवा वर्षा हो रही हो और हमने सिर पर छाता लगा रखा हो। तात्पर्य यह है कि भारतवर्ष के लोग आलस्य अथवा अज्ञानवश उन्नति के सुलभ साधनों का न तो उपयोग ही कर पा रहे हैं और न ही उन्हें उपलब्ध करा पा रहे हैं।

(iii) लेखक ने जापान के निवासियों को जापानी टट्टुओं की संज्ञा दी है क्योंकि वे अधिक शक्तिशाली नहीं होते, फिर भी अपनी उन्नति के लिए वे प्रयत्नशील हैं।
(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से भारतेन्दु जी ने भारतवासियों को सुझाव दिया है कि जब छोटे-छोटे देश भी अपने विकास में संलग्न हैं तब भारतवर्ष को भी अपनी उन्नति का पूरा प्रयास करना चाहिए।

(v) “उस समय हिन्दू काठियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं।” पंक्ति के माध्यम से भारतेन्दु जी भारतीयों की अकर्मण्यता और उदासीन-प्रवृत्ति से क्षुब्ध होकर कहते हैं कि संसार के सभी छोटे-बड़े देश उन्नति की दौड़ में निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं और हम भारतवासी अपने स्थान पर खड़े-खड़े पैरों से मिट्टी खोद रहे हैं। अमेरिकन, अंग्रेज, फ्रांसीसी आदि तुर्की घोड़ों की तरह तीव्र गति से प्रगति की दौड़ में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, किन्तु भारत के लोग निरन्तर पिछड़ते जा रहे हैं। इनका मानसिक और सामाजिक स्तर जो वर्षों पहले था, वही अब भी है। ये आज भी कुरीतियों और अन्धविश्वासों में जकड़े हुए हैं, इसीलिए स्वावलम्बी नहीं हैं।

प्रश्न 3:
सब उन्नतियों का मूल धर्म है। इससे सब के पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो! अंगरेजों की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली हैं इससे उनकी दिन-दिन कैसी उन्नति है। उनको जाने दो, अपने ही यहाँ देखो। तुम्हारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाज-गठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने सभी उन्नतियों का मूल किसे बताया है?
(iv) अंग्रेजों की उन्नति का क्या कारण है?
(v) भारतवासियों को सबसे पहले किसकी उन्नति करनी उचित है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी कहते हैं कि हमारे यहाँ धर्म की आड़ में विविध प्रकार की नीति, समाज-गठन आदि भरे हुए हैं। ये उन्नति का मार्ग प्रशस्त नहीं करते। इसलिए धर्म की उन्नति से सभी प्रकार की उन्नति सम्भव है।
(iii) लेखक ने धर्म को सभी उन्नतियों का मूल बताया है।
(iv) अंग्रेजों की धर्मनीति और राजनीति परस्पर मिली होना उनकी उन्नति का कारण है।
(v) भारतवासियों को सबसे पहले धर्म की उन्नति करनी उचित है।

प्रश्न 4:
एक बेफिकरे मॅगनी का कपड़ा पहनकर किसी महफिल में गये। कपड़े को पहिचान कर एक ने कहा अजी अंगी तो फलाने का है दूसरा बोला अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि घर की तो मूॐ ही मूढ़े हैं। हाय, अफसोस, तुम ऐसे हो गये कि अपने निज की क़ाम की वस्तु भी नहीं । बना सकते। भाइयो अब तो नींद से चौंको। अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो वैसे ही खेल खेलो वैसी ही बातचीत करो। परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सारी चीजें माँगी होने पर महाशय ने हँसकर अमुक व्यक्ति को क्या जवाब दिया?
(iv) लेखक ने किस बात पर अफसोस व्यक्त किया है?
(v) लेखक ने भारतीयों में किस भावना को विकसित करने पर बल दिया है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: देशवासियों का आह्वान करते हुए लेखक कहते हैं कि लोगों को चाहिए कि अब वे अज्ञानता की नींद से जाग जाएँ और अपने देश की उन्नति के लिए सर्वविध संलग्न हो जाएँ। इन्हें उन्हीं पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए जो इनके लिए कल्याणकारी हों, वैसे ही खेल खेलने चाहिए तथा वैसी ही बातें करनी चाहिए जो इनके नैतिक उत्थान में सहायक हों। साथ ही इनके लिए इस भ्रम से मुक्त होना भी अनिवार्य है कि विदेशी वस्तुएँ व भाषा हमारी वस्तुओं व भाषा से श्रेष्ठ । अपने देश को स्वावलम्बी राष्ट्र के रूप में विकसित करने के लिए स्वदेशी वस्तुओं और अपनी ही भाषा का प्रयोग करना होगा तथा विदेशी भाषा और वस्तुओं पर अपनी निर्भरता को समाप्त करना होगा।
(iii) सारी चीजें माँगी होने पर महाशय ने हँसकर अमुक व्यक्ति को यह जवाब दिया कि अजी घर की तो मूर्छ। ही मूछे हैं।
(iv) लेखक ने इस बात पर अफसोस व्यक्त किया है कि भारतवासी इतने अकर्मण्य हो गए हैं कि वे निज काम की वस्तुएँ भी नहीं बना सकते।
(v) लेखक ने भारतीयों में स्वदेशी की भावना को विकसित करने पर बल दिया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids (ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids (ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 12
Chapter Name Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids
Number of Questions Solved 99
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids (ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित यौगिकों की संरचना लिखिए –
(i) a-मेथॉक्सीप्रोपिऑनेल्डिहाइड
(ii) 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल
(iii) 2-हाइड्रॉक्सीसाइक्लोपेन्टेन कार्बोल्डिहाइड
(iv) 4-ऑक्सोपेन्टेनल
(v) डाइ-द्वितीयक-ब्यूटिल कीटोन
(vi) 4-क्लोरोऐसीटोफीनोन।
उत्तर
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के उत्पादों की संरचना लिखिए –
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उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों को उनके क्वथनांकों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
CH3CHO, CH3CH2OH, CH3OCH3, CH3CH2CH2
उत्तर
यौगिकों के मोलर द्रव्यमान तुलनात्मक हैं- CH3CHO (44), CH3CH2OH (46), CH3OCH3 (46), CH3CH2CH3 (44)। CH3CH2OH अत्यधिक अन्तराण्विक हाइड्रोजन आबन्ध प्रदर्शित करता है, अतएव यह संयुक्त अणुओं के रूप में पाया जाता है। अतः इसका क्वथनांक उच्चतम होता है (351 K)। CH3CHO के द्विध्रुव आघूर्ण (2.72 D) का मान CH3OCH3 (1.18D) से उच्च होता है, अतएव CH3CHO में द्विध्रुव-द्विधुव अन्योन्यक्रियाएँ CH3OCH3 से प्रबल होती हैं। अत: CH3CHO का क्वथनांक CH3OCH3 से उच्च होता है। CH3CH2CH3 केवल दुर्बल वाण्डर वाल बलों को प्रदर्शित करता है। CH3OCH3 में कुछ प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाएँ होती हैं। अत: CH3OCH3 का क्वथनांक CH3CH2CH3 से अधिक होता है, अतएव यौगिकों के क्वथनांकों का बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
CH3CH2CH3 < CH3OCH3 < CH3CHO < CH3CH2OH

प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों को नाभिकरागी योगज अभिक्रियाओं में उनकी बढ़ती हुई अभिक्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए –

  1. एथेनल, प्रोपेनल, प्रोपेनोन, ब्यूटेनोन
  2. बेन्जेल्डिहाइड, p-टॉलूऐल्डिहाइड, p-नाइट्रोबेन्जेल्डिहाइड, ऐसीटोफीनोन।

[संकेत– त्रिविम प्रभाव व इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव को ध्यान में रखें।]
उत्तर
1. कार्बोनिल यौगिकों की नाभिकरागी योगज अभिक्रियाओं के प्रति क्रियाशीलता का बढ़ता क्रम है –
ब्यूटेनोन < प्रोपेनोन < प्रोपनल < एथेनल

2. क्रियाशीलता का बढ़ता क्रम है –
ऐसीटोफीनोन < p-टॉलूऐल्डिहाइड < बेन्जेल्डिहाइड < p-नाइट्रोबेन्जेल्डिहाइड
ऐसीटोफीनोन कीटोन है, जबकि अन्य सदस्य ऐल्डिहाइड हैं। अत: यह सबसे कम क्रियाशील होता है। p-टॉलूऐल्डिहाइड में CH3 समूह कार्बोनिल समूह के सापेक्ष p:स्थान पर है जो कार्बोनिल समूह के कार्बन पर अतिसंयुग्मन (hyperconjugation) प्रभाव के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाता है और इसे बेन्जेल्डिहाइड से कम क्रियाशील बनाता है।
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दूसरी ओर p-नाइट्रोबेन्जेल्डिहाइड में -NO2 समूह शक्तिशाली इलेक्ट्रॉन निष्कासक समूह है। यह अनुनाद के कारण इलेक्ट्रॉन निष्कासित करता है। अत: कार्बोनिल समूह के कार्बन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व घटाता है। यह नाभिकस्नेही के आक्रमण की सुविधा प्रदान करता है तथा इसे बेन्जेल्डिहाइड की तुलना में अधिक क्रियाशील बनाता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के उत्पादों को पहचानिए –
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उत्तर
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प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० नाम दीजिए –
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उत्तर
(i) 3-फेनिलप्रोपेनोइक अम्ल
(ii) 3-मेथिलब्यूट-2-इनोइक अम्ल
(iii) 2-मेथिलसाइक्लोपेन्टेनकार्बोक्सिलिक अम्ल ।
(iv) 2, 4, 6-ट्राइनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल

प्रश्न 7.
निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जोइक अम्ल में कैसे परिवर्तित किया जा सकता है?
(i) एथिल बेन्जीन
(ii) ऐसीटोफीनोन
(iii) ब्रोमोबेन्जीन
(iv) फेनिलएथीन (स्टाइरीन)।
उत्तर
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प्रश्न 8.
नीचे प्रदर्शित अम्लों के प्रत्येक युग्म में कौन-सा अम्ल अधिक प्रबल है?
(i) CH3CO2H अथवा CH2FCO2H
(ii) CH2FCO2H अथवा CH2CICO2H
(iii) CH2FCH2CH2CO2H अथवा CH3CHFCH2CO2H
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उत्तर
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अत: O–H आबन्ध में कम इलेक्ट्रॉन-घनत्व तथा FCH2COO आयन के उच्च स्थायित्व के कारण FCH2COOH, CH3COOH की अपेक्षा एक प्रबल अम्ल है।
(ii) FCH2COO आयन, Cl की तुलना में F के अधिक प्रबल -I प्रभाव के कारण ClCH2COO आयन से अधिक स्थायी होता है। अत: ClCH2COOH की तुलना में FCH2COOH अधिक प्रबल अम्ल है।
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प्रेरक प्रभाव दूरी के साथ घटता जाता है, इसलिए F का -I प्रभाव, 4-फ्लुओरोब्यूटेनोइक अम्ल की तुलना में 3-फ्लुओरोब्यूटेनोइक अम्ल में अधिक प्रबल होता है। इसलिए FCH2CH2CH2COOH की तुलना में CH3CHFCH2COOH प्रबल अम्ल है।
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इसलिए, CH3– C6H4COO (p) आयन से F3C-C6H4-COO (p) आयन के अधिक स्थायी होने के कारण F3C-C6H4-COOH (p) प्रबल अम्लीय है।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पदों (शब्दों) से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।

  1. सायनोहाइड्रिन
  2. ऐसीटल
  3. सेमीकार्बजोन
  4. ऐल्डोले
  5. हेमीऐसीटल
  6. ऑक्सिम
  7. कीटैल
  8. इमीन
  9. 2, 4-DNP व्युत्पन्न
  10. शिफ-क्षारक।

उत्तर
1. ऐल्डिहाइड तथा कीटोन हाइड्रोजन सायनाइड से अभिकृत होकर संगत सायनोहाइड्रिन (cyanohydrins) देते हैं। शुद्ध HCN के साथ यह अभिक्रिया बहुत धीमी होती है, अत: यह क्षार द्वारा उत्प्रेरित की जाती है तथा जनित सायनाइड (CN) आयन प्रबल नाभिकस्नेही कार्बोनिल यौगिकों पर संयोजित होकर संगत सायनोहाइड्रिन देते हैं।
सायनोहाइड्रिन उपयोगी संश्लेषित मध्यवर्ती होते हैं।
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2. जैम-डाइऐल्कॉक्सी यौगिक जिनमें दो ऐल्कॉक्सी समूह टर्मिनल (अन्तस्थ) कार्बन परमाणु पर उपस्थित होते हैं, ऐसीटल (acetal) कहलाते हैं। ये ऐल्डिहाइड की मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल की दो तुल्यांक मात्रा के साथ शुष्क हाइड्रोजन क्लोराइड की उपस्थिति में अभिक्रिया होने पर बनते हैं।
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ऐसीटल जलीय खनिज अम्लों के साथ जल-अपघटित होकर संगत ऐल्डिहाइड देते हैं, इसलिए कार्बनिक संश्लेषण में इनका प्रयोग ऐल्डिहाइड समूह की रक्षा के लिए किया जाता है।

3. सेमीकाबेंजोन, ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों के व्युत्पन्न होते हैं तथा उन पर सेमीकाबेंजाइड की दुर्बल अम्लीय माध्यम में अभिक्रिया द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं।
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इन्हें ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों की पहचान एवं गुणधर्मों के अध्ययन के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

4. जिन ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों में कम-से-कम एक α-हाइड्रोजन विद्यमान होता है, वे तनु क्षार की (उत्प्रेरक के रूप में) उपस्थिति में अभिक्रिया द्वारा क्रमशः β-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (ऐल्डोल) अथवा β-हाइड्रॉक्सी कीटोन (कीटोल) प्रदान करते हैं। इस अभिक्रिया को ऐल्डोल अभिक्रिया (aldol reaction) कहते हैं।
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उत्पाद में विद्यमान दो प्रकार्यात्मक समूहों, ऐल्डिहाइड व ऐल्कोहॉल के नामों से ऐल्डोल का नाम व्युत्पन्न होता है। ऐल्डोल व कीटोल आसानी से जल निष्कासित करके α, β-असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक देते हैं, जो ऐल्डोल संघनन उत्पाद हैं और यह अभिक्रिया ऐल्डोल संघनन (aldol condensation) कहलाती है।

5. जैम- ऐल्कॉक्सीऐल्कोहॉल हेमीऐसीटल कहलाते हैं। ये मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल के एक अणु का ऐल्डिहाइड के साथ शुष्क HCl गैस की उपस्थिति में योग होने पर उत्पन्न होते हैं।
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6. जब ऐल्डिहाइड तथा कीटोन दुर्बल अम्लीय माध्यम में हाइड्रॉक्सिलऐमीन के साथ अभिक्रिया करते हैं, तब ऑक्सिम (oximes) उत्पन्न होते हैं।
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7. जैम-ऐल्कॉक्सीऐल्केन कीटैल (ketals) कहलाते हैं। कीटैल में दो ऐल्कॉक्सी समूह श्रृंखला के भीतर समान कार्बन पर उपस्थित होते हैं। जब कीटोन को शुष्क HCl गैस अथवा p-टॉलूईनसल्फोनिक अम्ल (PTS) की उपस्थिति में एथिलीन ग्लाइकॉल के साथ गर्म किया जाता है तो कीटैल प्राप्त होते हैं।
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ये जलीय खनिज अम्लों के साथ जल-अपघटित होकर संगत कीटोन देते हैं। इसलिए कीटैल कार्बनिक संश्लेषण में कीटो समूह के रक्षण हेतु प्रयुक्त किए जाते हैं।

8. UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 22 समूह युक्त यौगिक इमीन (imines) कहलाते हैं। ये ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों की अमोनिया व्युत्पन्नों के साथ अभिक्रिया से बनाए जाते हैं।
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Z = ऐल्किल/ऐरिल समूह, -NH2,-OH, C6H5NH, -NHCONHआदि।

9. जब ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन दुर्बल अम्लीय माध्यम में 2,4-डाइनाइट्रोफेनिलहाइड्राजीन के साथ अभिक्रिया करते हैं तो 2,4-डाइनाइट्रोफेनिलहाइड्रोजोन (2,4-DNP व्युत्पन्न) उत्पन्न होते हैं।
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2,4- DNP व्युत्पन्न ऐल्डिहाइडों तथा कीटोनों की पहचान एवं गुणधर्मों के अध्ययन में प्रयोग किए जाते हैं।

10. ऐल्डिहाइड तथा कीटोन प्राथमिक ऐलिफैटिक अथवा ऐरोमैटिक ऐमीनों से अभिक्रिया करके ऐजोमेथाइन अथवा शिफ़ क्षारक (Shiff’s Base) बनाते हैं।
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नामपद्धति में नाम लिखिए –

  1. CH3CH(CH3)CH2CH2CHO
  2. CH3CH2COCH(C2H5)CH2CH2Cl
  3. CH3CH = CHCHO
  4. CH3COCH2COCH3
  5. CH3CH(CH3)CH2C(CH3)2COCH3
  6. (CH3)3CCH2COOH
  7. OHCC6H4CHO-p

उत्तर

  1. 4-मेथिलपेन्टेनल
  2. 6-क्लोरो-4-एथिलहेक्सेन-3-ओन
  3. ब्यूट-2-इनल
  4. पेन्टेन-2,4-डाइओन
  5. 3,3,5-ट्राइमेथिलहेक्सेन-2-ओन
  6. 3,3-डाइमेथिलब्यूटेनोइक अम्ल
  7. बेन्जीन-1,4-डाइकार्बोल्डिहाइड

प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों की संरचना बनाइए –
(i) 3-मेथिलब्यूटेनल
(ii) p-नाइट्रोप्रोपिओफीनोन
(iii) p-मेथिलबेन्जेल्डिहाइड
(iv) 4-मेथिलपेन्ट-3-ईन-2-ओन
(v) 4-क्लोरोपेन्टेन-2-ओन
(vi) 3-ब्रोमो-4-फेनिल पेन्टेनोइक अम्ल
(vii) p, p’-डाइहाइड्रॉक्सीबेन्जोफीनोन
(viii) हेक्स-2-ईन-4-आइनोइक अम्ल।
उत्तर
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नाम लिखिए और जहाँ सम्भव हो सके साधारण नाम भी दीजिए।
(i) CH3CO(CH2)4CH3
(ii) CH3CH2CHBrCH2CH(CH3)CHO
(iii) CH3(CH2)5CHO
(iv) Ph-CH = CH-CH-CHO
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(vi) PhCOPh
उत्तर
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित व्युत्पन्नों की संरचना बनाइए –
(i) बेन्जेल्डिहाइड का 2,4-डाइनाइट्रोफेनिलहाइड्रेजोन
(ii) साइक्लोप्रोपेनोन ऑक्सिम
(iii) ऐसीटेल्डिहाइडडाइमेथिलऐसीटल
(iv) साइक्लोब्यूटेनोन का सेमीकाबेंजोन
(v) हेक्सेन-3-ओन का एथिलीन कीटैल
(vi) फॉर्मेल्डिहाइड का मेथिल हेमीऐसीटल।
उत्तर
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प्रश्न 6.
साइक्लोहेक्सेनकार्बोल्डिहाइड की निम्नलिखित अभिकर्मकों के साथ अभिक्रिया से बनने वाले उत्पादों को पहचानिए –
(i) PhMgBr एवं तत्पश्चात् H3O+
(ii) टॉलेन अभिकर्मक
(iii) सेमीकाबेंजाइड एवं दुर्बल अम्ल
(iv) एथेनॉल का आधिक्य तथा अम्ल
(v) जिंक अमलगम एवं तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल।
उत्तर
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प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा, किनमें कैनिजारो अभिक्रिया होगी और किनमें उपर्युक्त में से कोई क्रिया नहीं होगी? ऐल्डोल संघनन तथा कैनिजारो अभिक्रिया में सम्भावित उत्पादों की संरचना लिखिए –
(i) मेथेनल
(ii) 2-मेथिलपेन्टेनल
(iii) बेन्जेल्डिहाइड
(iv) बेन्जोफीनोन
(v) साइक्लोहेक्सेनोन
(vi) 1-फेनिलप्रोपेनोन
(vii) फेनिलऐसीटेल्डिहाइड
(viii) ब्यूटेन-1-ऑल
(ix) 2,2-डाइमेथिलब्यूटेनल।
उत्तर
(a) 2-मेथिल पेन्टेनल, साइक्लोहेक्सेनोन, 1-फेनिलप्रोपेनोन तथा फेनिलऐसीटैल्डिहाइड में 1 या अधिक -हाइड्रोजन उपस्थित हैं। अतः इनमें ऐल्डोल संघनन होगा। अभिक्रिया तथा सम्भावित उत्पादों की संरचनाएँ निम्नवत् हैं –
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(b) मेथेनल, बेन्जेल्डिहाइड तथा 2,2-डाइमेथिलब्यूटेनल में α-हाइड्रोजन नहीं होती है; अत: ये कैनिजारो (Cannizzaro reaction) अभिक्रिया देते हैं। अभिक्रियाएँ तथा सम्भावित उत्पाद निम्नवत् हैं –
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(c) (iv) बेन्जोफीनोन एक कीटोन है। इसमें α-हाइड्रोजन नहीं होती है, जबकि (viii) ब्यूटेन-1-ऑल एक ऐल्कोहॉल है। ये न ऐल्डोल संघनन और न कैनिजारो अभिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 8.
एथेनल को निम्नलिखित यौगिकों में कैसे परिवर्तित करेंगे?
(i) ब्यूटेन-1,3-डाइऑल
(ii) ब्यूट-2-ईनल
(iii) ब्यूट-2-ईनोइक अम्ल।
उत्तर
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प्रश्न 9.
प्रोपेनल एवं ब्यूटेनल के ऐल्डोल संघनन से बनने वाले चार सम्भावित उत्पादों के नाम एवं संरचना सूत्र लिखिए। प्रत्येक में बताइए कि कौन-सा ऐल्डिहाइड नाभिकरागी और कौन-सा इलेक्ट्रॉनरागी होगा?
उत्तर
1. प्रोपेनल नाभिकरागी तथा इलेक्ट्रॉनरागी की तरह –
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2. प्रोपेनल इलेक्ट्रॉनरागी तथा ब्यूटेनल नाभिकरागी की तरह –
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3. ब्यूटेनल एक इलेक्ट्रॉनरागी तथा प्रोपेनल नाभिकरागी की तरह –
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4. ब्यूटेनल नाभिकरागी तथा इलेक्ट्रॉनरागी दोनों के रूप में –
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प्रश्न10.
एक कार्बनिक यौगिक जिसका अणुसूत्र C9H10O है 2,4-DNP व्युत्पन्न बनाता है, टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है तथा कैनिजारो अभिक्रिया देता है। प्रबल ऑक्सीकरण पर वह 1,2-बेन्जीनडाइकार्बोक्सिलिक अम्ल बनाता है। यौगिक को पहचानिए।
उत्तर
1. अणुसूत्र C9H10O का दिया गया यौगिक 2,4-DNP यौगिक बनाता है तथा टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है; अत: यह ऐल्डिहाइड होगा।
2. यह कैनिजारो अभिक्रिया देता है। अत: -CHO समूह सीधा बेन्जीन वलय से जुड़ा होगा।
3. प्रबल ऑक्सीकरण पर यह 1,2-बेन्जीन डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल देता है, अत: यह ऑर्थोप्रतिस्थापी बेन्जेल्डिहाइड होगा। अणुसूत्र C9H10O का ऐसा ऐल्डिहाइड o-एथिल बेन्जेल्डिहाइड होगा।
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प्रश्न11.
एक कार्बनिक यौगिक ‘क’ (आण्विक सूत्र, C8H16O2) को तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ जल-अपघटित करने के उपरान्त एक कार्बोक्सिलिक अम्ल ‘ख’ एवं एक ऐल्कोहॉल ग’ प्राप्त हुए। ‘ग’ को क्रोमिक अम्ल के साथ ऑक्सीकृत करने पर ‘ख’ उत्पन्न होता है। ‘ग’ निर्जलीकरण पर ब्यूट-1-ईन देता है। अभिक्रियाओं में प्रयुक्त होने वाली सभी रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर
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प्रश्न 12.
निम्नलिखित यौगिकों को उनसे सम्बन्धित (कोष्ठकों में दिए गए) गुणधर्मों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
(i) ऐसीटेल्डिहाइड, ऐसीटोन, डाइ-तृतीयक-ब्यूटिलकीटोन, मेथिल तृतीयक ब्यूटिलकीटोन (HCN के प्रति अभिक्रियाशीलता)।
(ii) CH3CH2CH(Br)COOH, CH3CH(Br)CH2COOH, (CH3)2CHCOOH, CH3CH2CH2COOH (अम्लता के क्रम में)
(iii) बेन्जोइक अम्ल, 4-नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल, 3,4-डाइनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल, 4-मेथॉक्सी बेन्जोइक अम्ल (अम्लता की सामर्थ्य के क्रम में)।
उत्तर
(i) डाइ-तृतीयक ब्यूटिल कीटोन < तृतीयक ब्यूटिल मेथिल कीटोन < ऐसीटोन < ऐसीटैल्डिहाइड
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(iii) 4.मेथॉक्सी बेन्जोइक अम्ल < बेन्जोइक अम्ल < 4-नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल <3,4-डाइनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित यौगिक युग्मों में विभेद करने के लिए सरल रासायनिक परीक्षणों को दीजिए –

  1. प्रोपेनल एवं प्रोपेनोन
  2. ऐसीटोफीनोन एवं बेन्जोफीनोन
  3. फीनॉल एवं बेन्जोइक अम्ल
  4. बेन्जोइक अम्ल एवं एथिल बेन्जोएट
  5. पेन्टेन-2-ऑन एवं पेन्टेन-3-ऑन
  6. बेन्जेल्डिहाइड एवं ऐसीटोफीनोन
  7. एथेनल एवं प्रोपेनल।

उत्तर
1. प्रोपेनल एवं प्रोपेनोन – इन यौगिकों में विभेद करने के लिए आयोडोफॉर्म परीक्षण का प्रयोग किया जाता है। यह परीक्षण प्रोपेनोन द्वारा दिया जाता है, परन्तु प्रोपेनल द्वारा नहीं। प्रोपेनोन गर्म NaOH/I2 से अभिक्रिया करके CHI3 का पीला अवक्षेप देता है, जबकि प्रोपेनल नहीं देता।
2NaOH + I2 → NaI + NaOI + H2O
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2. ऐसीटोफीनोन एवं बेन्जोफीनोन – ऐसीटोफीनोन आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है, परन्तु बेन्जोफीनोन नहीं देता।
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3. फीनॉल एवं बेन्जोइक अम्ल – बेन्जोइक अम्ल NaHCO3 से अभिक्रिया करके बुदबुदाहट के साथ CO2 गैस देता है, जबकि फीनॉल नहीं देता।
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फीनॉल Br2 जल को रंगहीन करके सफेद अवक्षेप देता है, परन्तु बेन्जोइक अम्ल नहीं देता।
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4. बेन्जोइक अम्ल एवं एथिल बेन्जोएट – बेन्जोइक अम्ल सोडियम बाइकार्बोनेट के साथ अभिक्रिया पर तीव्र बुदबुदाहट के साथ CO2 गैस मुक्त करता है, जबकि एथिल बेन्जोएट ऐसा नहीं करता।
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5. पेन्टेन-2-ऑन एवं पेन्टेन-3-ऑन – पेन्टेन-2-ऑन आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है अर्थात् NaOH व  I2 के साथ आयोडोफॉर्म बनाता है, जबकि पेन्टेन-3-ऑन यह परीक्षण नहीं देता।
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6. बेन्जेल्डिहाइड एवं ऐसीटोफीनोन – ऐसीटोफीनोन आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है, परन्तु बेन्जेल्डिहाइड यह परीक्षण नहीं देता।
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7. एथेनल एवं प्रोपेनल – एथेनल आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है, परन्तु प्रोपेनल नहीं।
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प्रश्न 14.
बेन्जीन से निम्नलिखित यौगिकों का विरचन आप किस प्रकार करेंगे? आप कोई भी अकार्बनिक अभिकर्मक एवं कोई भी कार्बनिक अभिकर्मक, जिसमें एक से अधिक कार्बन न हों, का उपयोग कर सकते हैं।
(i) मेथिल बेन्जोएट
(ii) m-नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल
(iii) p-नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल
(iv) फेनिलऐसीटिक अम्ल
(v) p-नाइट्रोबेन्जेल्डिहाइड।
उत्तर
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प्रश्न15.
आप निम्नलिखित रूपान्तरणों को अधिकतम दो चरणों में किस प्रकार से सम्पन्न करेंगे?

  1. प्रोपेनोन से प्रोपीन
  2. बेन्जोइक अम्ल से बेन्जेल्डिहाइड
  3. एथेनॉल से 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल
  4. बेन्जीन से m-नाइट्रोऐसीटोफीनोन
  5. बेन्जेल्डिहाइड से बेन्जोफीनोन
  6. ब्रोमोबेन्जीन से 1-फेनिलएथेनॉल
  7. बेन्जेल्डिहाइड से 3-फेनिलप्रोपेन-1-ऑल
  8. बेन्जेल्डिहाइड से α-हाइड्रॉक्सीफेनिलऐसीटिक अम्ल
  9. बेन्जोइक अम्ल से m-नाइट्रोबेन्जिल ऐल्कोहॉल।

उत्तर
1. प्रोपेनोन से प्रोपीन
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2. बेन्जोइक अम्ल से बेन्जेल्डिहाइड
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3. एथेनॉल से 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल
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4. बेन्जीन से m-नाइट्रोऐसीटोफीनोन
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5. बेन्जेल्डिहाइड से बेन्जोफीनोन
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6. ब्रोमोबेन्जीन से 1-फेनिलएथेनॉल
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7. बेन्जेल्डिहाइड से 3-फेनिलप्रोपेन-1-ऑल
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8. बेन्जेल्डिहाइड से α-हाइड्रॉक्सीफेनिलऐसीटिक अम्ल
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9. बेन्जोइक अम्ल से m-नाइट्रोबेन्जिल ऐल्कोहॉल
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प्रश्न16.
निम्नलिखित पदों (शब्दों) का वर्णन कीजिए –

  1. ऐसीटिलिनन अथवा फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलीकरण
  2. कैनिजारो अभिक्रिया
  3. क्रॉस ऐल्डोल संघनन
  4. विकार्बोक्सिलन।

उत्तर
1. ऐसीटिलिनन (Acetylation) – ऐल्कोहॉलों, फीनॉलों अथवा ऐमीनों के एक सक्रिय हाइड्रोजन का एक ऐसिल (-RCO) समूह के साथ प्रतिस्थापन, जिसके फलस्वरूप संगत एस्टर या ऐमाइड बनते हैं, ऐसीटिलिनन कहलाता है। यह प्रतिस्थापन किसी क्षारक; जैसे- पिरिडीन अथवा डाइमेथिलऐनिलीन की उपस्थिति में अम्ल क्लोराइड अथवा अम्ल ऐनहाइड्राइड का प्रयोग करके कराया जाता है।
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2. कैनिजारो अभिक्रिया (Cannizzaro’s Reaction) – ऐल्डिहाइड, जिनमें α-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होते, सान्द्र क्षार की उपस्थिति में स्वऑक्सीकरण व अपचयन (असमानुपातन) की अभिक्रिया प्रदर्शित करते हैं। इस अभिक्रिया में ऐल्डिहाइड का एक अणु ऐल्कोहॉल में अपचयित होता है, जबकि दूसरा अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है।
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इन अभिक्रियाओं में ऐल्डिहाइड असमानुपातन दर्शाता है। इसका तात्पर्य है कि ऐल्डिहाइड का एक अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है तथा अन्य ऐल्कोहॉल में अपचयित हो जाता है। कीटोन ये अभिक्रिया नहीं देते हैं।
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3. क्रॉस ऐल्डोल संघनन (Cross Aldol Condensation) – जब दो भिन्न-भिन्न ऐल्डिहाइड और/या कीटोन के मध्य ऐल्डोल संघनन होता है तो उसे क्रॉस ऐल्डोल संघनन कहते हैं। यदि प्रत्येक में g-हाइड्रोजन हो तो ये चारे उत्पादों का मिश्रण देते हैं। इसे निम्नलिखित एथेनल व प्रोपेनल के मिश्रण की ऐल्डोल संघनन अभिक्रिया द्वारा समझाया गया है –
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क्रॉस ऐल्डोल संघनन में कीटोन भी एक घटक के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं।
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4. विकार्बोक्सिलन (Decarboxylation) – कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम लवणों को सोडलाइम (NaOH तथा CaO, 3 : 1 के अनुपात में) के साथ गर्म करने पर कार्बन डाइऑक्साइड निकल जाती है एवं हाइड्रोकार्बन प्राप्त होते हैं। यह अभिक्रिया विकार्बोक्सिलने (decarboxylation) कहलाती है।
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कार्बोक्सिलिक अम्लों के क्षार धातु लवणों के जलीय विलयन का विद्युत अपघटन द्वारा विकार्बोक्सिलन हो जाता है तथा ऐसे हाइड्रोकार्बन निर्मित होते हैं जिसमें कार्बन परमाणुओं की संख्या, अम्ल के ऐल्किल समूह में उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या से दुगुनी होती है। इस अभिक्रिया को कोल्बे विद्युत-अपघटन (Kolbe electrolysis) कहते हैं।

प्रश्न17.
निम्नलिखित प्रत्येक संश्लेषण में छूटे हुए प्रारम्भिक पदार्थ, अभिकर्मक अथवा उत्पादों को लिखकर पूर्ण कीजिए –
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उत्तर
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(iii) H2NNHCONH2 का अधिक नाभिकरागी NH2NH भाग अभिक्रिया करके सेमीकाबेंजोन बनाता है।
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(iv)
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(v) केवल ऐल्डिहाइड ही टॉलेन अभिकर्मक द्वारा ऑक्सीकृत होते हैं।
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(vi) सायनोहाइड्रिन निर्माण ऐल्डिहाइड समूह पर होता है।
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(viii) केवल कीटो समूह NaBH4 द्वारा अपचयित होता है।
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प्रश्न18.
निम्नलिखित के सम्भावित कारण दीजिए –
(i) साइक्लोहेक्सेनोन अच्छी लब्धि में सायनोहाइड्रिन बनाता है, परन्तु 2,2,6- ट्राइमेथिल साइक्लोहेक्सेनोन ऐसा नहीं करता।
(ii) सेमीकाबेंजाइड में दो -NH2 समूह होते हैं, परन्तु केवल एक -NH2 समूह ही सेमीकाबेंजोन विरचन में प्रयुक्त होता है।
(iii) कार्बोक्सिलिक अम्ल एवं ऐल्कोहॉल से अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में एस्टर के विरचन के समय जल अथवा एस्टर जैसे ही निर्मित होता है, उसको निकाल दिया जाना चाहिए।
उत्तर
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α-स्थानों पर तीन मेथिल समूहों की उपस्थिति के कारण CN आयनों का नाभिकस्नेही आक्रमण नहीं होता है। साइक्लोहेक्सेन में यह स्टेरिक अवरोध अनुपस्थित होता है। अत: CN आयनों का नाभिकस्नेही आक्रमण शीघ्रता से होता है। अत: साइक्लोहेक्सेनोन सायनोहाइडूिन अच्छी मात्रा में प्राप्त होता है।
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सेमीकाबेंजाइड में दो -NH2 समूह होते हैं, लेकिन इनमें से एक (ऊपर प्रदर्शित) अनुनाद में भाग लेता है जिसके परिणामस्वरूप इस NH2 समूह पर इलेक्ट्रॉन घनत्व घट जाता है। अतः यह नाभिकस्नेही नहीं है, लेकिन दूसरे NH2 समूह पर एकाकी युग्म इलेक्ट्रॉन अनुनाद में भाग नहीं लेता है। अत: ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के C == O समूह पर आक्रमण के लिए उपलब्ध होता है।

(iii) कार्बोक्सिलिक अम्ल तथा ऐल्कोहॉल से अम्ल की उपस्थिति में एस्टरों के निर्माण की प्रक्रिया उत्क्रमणीय अभिक्रिया होती है।
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साम्यावस्था को अग्र दिशा (forward direction) में विस्थापित करने के लिए जल या एस्टर को निर्मित होते ही निष्कासित कर लिया जाना चाहिए।

प्रश्न19.
एक कार्बनिक यौगिक में 69.77% कार्बन, 11.63% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। यौगिक का आण्विक द्रव्यमान 86 है। यह टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित नहीं करता, परन्तु सोडियम हाइड्रोजनसल्फाइट के साथ योगज यौगिक देता है तथा आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है। प्रबल ऑक्सीकरण पर एथेनोइक तथा प्रोपेनोइक अम्ल देता है। यौगिक की सम्भावित संरचना लिखिए। (2010)
हल
(क) यौगिक का अणुसूत्र ज्ञात करना –
कार्बन का प्रतिशत = 69.77%
हाइड्रोजन का प्रतिशत = 11.63%
∴ ऑक्सीजन का प्रतिशत = 100 – (69.77 + 11.63)
= 18.6%
C : H : O = [latex]\frac { 69.77 }{ 12 } :\frac { 11.6.3 }{ 1 } :\frac { 18.6 }{ 16 }[/latex]
=5.81 : 11.63 : 1.16
∴ सरल अनुपात = 5 : 10 : 1
दिए गए यौगिक का मूलानुपाती सूत्र = C5H10O
मूलानुपाती सूत्र द्रव्यमान = 5 × 12 + 10 × 1 + 1 × 16 = 86
आण्विक द्रव्यमान = 86 (दिया है)
अणुसूत्र = C5H10O × [latex]\frac { 86 }{ 86 } [/latex] = C5H10O
इस प्रकार दिए गए यौगिक का अणुसूत्र = C5H10O

(ख) यौगिक की संरचना ज्ञात करना

  1. चूंकि दिया गया यौगिक सोडियम हाइड्रोजन सल्फाइट के साथ योगज यौगिक बनाता है, इसलिए यह एक ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन होना चाहिए।
  2. चूंकि यौगिक टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित नहीं करता, इसलिए यह ऐल्डिहाइड नहीं हो सकता। अतः यह कीटोन होना चाहिए।
  3. चूँकि यौगिक आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है, इसलिए दिया गया यौगिक मेथिल कीटोन है।
  4. चूँकि दिया गया यौगिक प्रबल ऑक्सीकरण पर एथेनोइक अम्ले तथा प्रोपेनोइक अम्ल का मिश्रण देता है, इसलिए मेथिल कीटोन पेन्टेन-2-ओन है। इसकी संरचना इस प्रकार है –
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 86

(ग) सम्मिलित अभिक्रियाओं का विवरण
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 87

प्रश्न 20.
यद्यपि फीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाएँ कार्बोक्सिलेट आयन की तुलना में अधिक हैं, परन्तु कार्बोक्सिलिक अम्ल फीनॉल की अपेक्षा प्रबल अम्ल है, क्यों?
उत्तर
काबॉक्सिलेट आयन में ऋणावेश दो ऑक्सीजन परमाणुओं पर विस्थानित होता है, जबकि फीनॉक्साइड आयन में ऋणावेश एक ऑक्सीजन परमाणु पर ही विस्थानित होता है, इसलिए फोनॉक्साइड आयन की तुलना में कार्बोक्सिलेट आयन अधिक स्थायी होता है, फलस्वरूप कार्बोक्सिलिक अम्ल फीनॉल की अपेक्षा प्रबल अम्ल होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्न में से कौन जलीय KOH को गर्म करने पर ऐसीटेल्डिहाइड बनाता है ?
(i) CH3CH2Cl
(ii) CH3Cl,CH2Cl
(iii) CH3CHCl2
(iv) CH3COCl
उत्तर
(iii) CH3CHCl2

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन 50% सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन के साथ क्रिया करके संगत ऐल्कोहॉल तथा अम्ल देता है?
(i) ब्यूटेनॉल
(ii) बेन्जेल्डिहाइड
(iii) फीनॉल
(iv) बेन्जोइक अम्ल
उत्तर
(ii) बेन्जेल्डिहाइड

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन के साथ संगत ऐल्कोहॉल तथा अम्ल देगा?
(i) C6H5CHO
(ii) CH3CH2CH2CHO
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 88
(iv) C6H5CH2CHO
उत्तर
(i) C6H5CHO

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा यौगिक कैनिजारो अभिक्रिया नहीं देता है? (2017)
(i) HCHO
(ii) CH3CH2CHO
(iii) CCl3CHO
(iv) (CH3)3C .CHO
उत्तर
(ii) CH3CH2CHO

प्रश्न 5.
ऐसीटिल ब्रोमाइड CH3Mgl के आधिक्य तथा NH4Cl के संतृप्त विलयन से क्रिया करके देता है –
(i) 2-मेथिल प्रोपेन-2-ऑल ।
(ii) ऐसीटैमाइड
(iii) ऐसीटोन
(iv) ऐसीटिल आयोडाइड
उत्तर
(i) 2-मेथिल प्रोपेन-2-ऑल

प्रश्न 6.
C6H5COCl का IUPAC नाम है –
(i) क्लोरोबेन्जिले कीटोन
(ii) बेन्जीन क्लोरोकीटोन
(iii) बेन्जीन कार्बोनिल क्लोराइड
(iv) क्लोरोफेनिल कीटोन
उत्तर
(i) क्लोरोबेन्जिल कीटोन

प्रश्न 7.
एक प्रबल क्षार किससे -हाइड्रोजन कम कर सकता है?
(i) कीटोन
(ii) ऐल्केन
(iii) ऐल्कीन
(iv) ऐमीन
उत्तर
(i) कीटोन

प्रश्न 8.
वह अभिकर्मक जिसके साथ ऐसीटेल्डिहाइड तथा ऐसीटोन दोनों आसानी से अभिक्रिया करते हैं, है – (2017)
(i) फेहलिंग अभिकर्मक
(ii) ग्रिगनार्ड अभिकर्मक
(iii) शिफ अभिकर्मक
(iv) टॉलेन अभिकर्मक
उत्तर
(ii) ग्रिगनार्ड अभिकर्मक

प्रश्न 9.
ऐल्डोल संघनन में निर्मित उत्पाद है –
(i) α, β-असंतृप्त ईथर
(ii) α, β-हाइड्रॉक्सी अम्ल
(iii)α, β-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड तथा कीटोन
(iv) एक α-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड या कीटोन
उत्तर
(iii) α β-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड तथा कीटोन

प्रश्न 10.
एक द्रव को एथेनॉल में मिश्रित करके एक बूंद सान्द्र H So, मिलाया गया। फलों जैसी गंध वाला एक यौगिक निर्मित हुआ। द्रव था (2017)
(i) HCHO
(ii) CH3COCH3
(iii) CH3COOH
(iv) CH3OH
उत्तर
(iii) CH3COOH

प्रश्न11.
प्रोपियोनिक अम्ल Brg/P के साथ डाइब्रोमो उत्पाद देता है। इसकी संरचना होगी –
(i) HCBr2 – CH2COOH
(ii) CH2Br-CH2-COBr
(iii) CH3-CBr2-COOH
(iv) CH2Br-CHBr-COOH
उत्तर
(iii) CH3-CBr2-COOH

प्रश्न 12.
ऐसीटिक अम्ल की हाइड्रोजोइक अम्ल के साथ सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में 0°C पर क्रिया कराने पर बनता है – (2017)
(i) मेथेन
(ii) मेथिल ऐमीन
(iii) मेथिल सायनाइड
(iv) ऐथिल ऐमीन
उत्तर
(ii) मेथिल ऐमीन

प्रश्न 13.
ऐसीटिक अम्ल की क्रिया डाइएजोमेथेन से कराने पर बनने वाला यौगिक है – (2017)
(i) मेथिल ऐसीटेट
(ii) ऐथिल ऐसीटेट
(iii) मेथेन
(iv) मेथिल ऐमीन
उत्तर
(i) मेथिल ऐसीटेट

प्रश्न 14.
निम्न में कौन फेहलिंग विलयन का अपचयन नहीं कर सकता है? (2017)
(i) फॉर्मिक अम्ल
(ii) ऐसीटिक अम्ल
(iii) फॉर्मेल्डिहाइड
(iv) ऐसीटेल्डिहाइड
उत्तर
(ii) ऐसीटिक अम्ल

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐलिफैटिक ऐल्डिहाइड स्थान समावयवता प्रदर्शित नहीं करते, क्यों?
उत्तर
ऐलिफैटिक ऐल्डिहाइडों में -CHO समूह हमेशा सिरे पर होता है, अतः ये स्थान समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं।

प्रश्न 2.
ऐसिड क्लोराइडों को संगत ऐल्डिहाइडों में परिवर्तन के लिए अभिक्रिया का नाम तथा प्रयुक्त अभिकर्मक लिखिए।
उत्तर
रोजेनमुण्ड अभिक्रिया। अभिकर्मक Pd/BaSO4 द्वारा समर्थित तथा सल्फर या क्विनोलीन द्वारा आंशिक विषाक्त में हाइड्रोजन
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 89

प्रश्न 3.
ऐल्डिहाइडों के क्वथनांक जनक ऐल्केनों तथा संगत ऐल्कोहॉलों के मध्यवर्ती होते हैं। समझाइए।
उत्तर
ऐल्डिहाइडों का अणुभार जनक ऐल्केनों से अधिक होता है तथा ऐल्डिहाइडों में अधिक ध्रुवता के कारण ये जनक ऐल्केनों से अधिक क्वथनांक वाले होते हैं। दूसरी तरफ, ऐल्डिहाइड ऐल्कोहॉलों के समान संयुग्मित द्रव नहीं होते हैं, अत: इनके क्वथनांक संगत ऐल्कोहॉलों से निम्न होते हैं।

प्रश्न 4.
यूरोट्रोपीन पर टिप्पणी लिखिए। (2010)
उत्तर
फॉर्मेल्डिहाइड अमोनिया से अभिक्रिया करके हेक्सा मेथिलीन टेट्राऐमीन बनाती है जिसे हेक्सामीन या यूरोट्रोपीन कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 90

प्रश्न 5.
एक ऐल्डिहाइड का नाम लिखिए जो फेहलिंग विलयन परीक्षण नहीं देता है।
उत्तर
बेन्जेल्डिहाइड।

प्रश्न 6.
क्या होता है जब फॉर्मेल्डिहाइड की अभिक्रिया सान्द्र NaOH विलयन से कराते हैं ?
उत्तर
मेथिल ऐल्कोहॉल तथा सोडियम फॉर्मेट बनता है। यह कैनिजारो अभिक्रिया है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित को HCN के प्रति बढ़ती क्रियाशीलता के क्रम में लिखिए –
CH3CHO, CH3COCH3, HCHO, C2H5COCH3
उत्तर
C2H5COCH3 < CH3COCH3 < CH3CHO < HCHO

प्रश्न 8.
किस प्रकार के ऐल्डिहाइड कैनिजारो अभिक्रिया देते हैं?
उत्तर
ऐल्डिहाइड जिनमें 2-हाइड्रोजन नहीं होती, जैसे-फॉर्मेल्डिहाइड तथा बेन्जेल्डिहाइड कैनिजारो अभिक्रिया देते हैं।

प्रश्न 9.
फेहलिंग विलयन क्या होता है?
उत्तर
समान आयतन में CuSO4 विलयन (फेहलिंग A) तथा रोशले लवण के क्षारीय विलयन (फेहलिंग B) का मिश्रण फेहलिंग विलयन कहलाता है।

प्रश्न 10.
ऐल्डिहाइड समूह की पहचान के लिए फेहलिंग विलयन परीक्षण दीजिए।
उत्तर
RCHO + 2Cu2+ + 5OH → RCO0 + Cu2O + 3H2O

प्रश्न 11.
एथेनल को HI तथा लाल P के साथ उच्च दाब पर गर्म करने पर होने वाली क्रिया का समीकरण लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 91

प्रश्न 12.
उस उत्पाद की संरचना तथा नाम लिखिए जब ओजोन एथिलीन के साथ क्रिया करती है तथा अन्तिम उत्पाद को जल अपघटित करते हैं।
उत्तर
फॉर्मेल्डिहाइड (मेथेनल), HCHO.

प्रश्न 13.
आप ऐसीटेल्डिहाइड से 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल किस प्रकार प्राप्त करेंगे?
उत्तर
ऐल्डोल संघनन द्वारा।

प्रश्न 14.
क्या होता है जब ऐसीटेल्डिहाइड को H2SO4 की उपस्थिति में K2Cr2O7 से अभिकृत कराते हैं?
उत्तर
ऐसीटेल्डिहाइड ऐसीटिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है।

प्रश्न 15.
फॉर्मेल्डिहाइड ऐल्डोल संघनन में भाग क्यों नहीं लेता है?
उत्तर
ऐल्डोल संघनन में किसी विशेष कार्बोनिल यौगिक के एक अणु से जनित कार्बोधनायन का नाभिकस्नेही आक्रमण दूसरे अणु पर होता है। इसके लिए कार्बोनिल यौगिक में कम-से-कम एक α-हाइड्रोजन उपस्थित होना चाहिए। चूंकि फॉर्मेल्डिहाइड में α-हाइड्रोजन उपस्थित नहीं होता। अतः यह ऐल्डोल संघनन में भाग नहीं लेता, लेकिन यह α-हाइड्रोजन परमाणु युक्त अन्य कार्बोनिल यौगिक के साथ क्रॉस ऐल्डोल संघनन में भाग ले सकता है। उदाहरणार्थ- फॉर्मेल्डिहाइड तथा ऐसीटेल्डिहाइड।

प्रश्न 16.
फॉर्मेलिन क्या है? इसके उपयोग लिखिए। (2011)
उत्तर
फॉर्मेलिन, फॉर्मेल्डिहाइड का जलीय विलयन होता है जिसमें फॉर्मेल्डिहाइड की अधिकतम सान्द्रता 40% तक होती है। यह विलयन मृत जीवों के परिरक्षण में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 17.
एथेनल से ऐसीटोन कैसे प्राप्त करते हैं?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 92

प्रश्न18.
क्या होता है जब कैल्सियम ऐसीटेट को शुष्क आसवित करते हैं ?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 93

प्रश्न 19.
कौन-सा यौगिक बनता है जब बेन्जीन को निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में CH3COCl के साथ अभिकृत कराते हैं?
उत्तर
ऐसीटोफीनोन।

प्रश्न 20.
कीटोन ऐल्डिहाइडों की तुलना में कम सक्रिय होते हैं, क्यों?
उत्तर
कीटोनों में दो ऐल्किल समूहों के धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव (+I प्रभाव) के कारण कार्बन परमाणु कम धनात्मक हो जाता है तथा इन्हें ऐल्डिहाइडों से कम सक्रिय बनाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 94

प्रश्न 21.
कीटोनों के क्वथनांक समावयवी ऐल्डिहाइडों से उच्च होते हैं। कारण बताइए।
उत्तर
कीटोनों में दो इलेक्ट्रॉन विमोचक ऐल्किल समूह उपस्थित होते हैं जबकि ऐल्डिहाइडों में एक समूह उपस्थित होता है जिसके परिणामस्वरूप कीटोनों में ऐल्किल समूह ऐल्डिहाइडों से अधिक ध्रुवीय होता है। अत: कीटोनों के क्वथनांक समावयवी ऐल्डिहाइडों से उच्च होते हैं।

प्रश्न 22.
ऐल्डिहाइड तथा कीटोनों के हाइड्रोजोनों का निर्माण प्रबल अम्लीय माध्यम में नहीं किया जा सकता, क्यों?
उत्तर
हाइड्राजोनों को निर्माण कार्बोनिल यौगिकों की हाइड्राजीन से क्रिया द्वारा होता है जो कि नाभिकस्नेही की तरह कार्य करता है। प्रबल अम्लीय माध्यम में हाइड्राजीन प्रोटॉनीकृत हो जाती है। अत: यह नाभिकस्नेही के समान कार्य करने के योग्य नहीं रहती जिसके परिणामस्वरूप ऐल्डिहाइड तथा कीटोनों को प्रबल अम्लीय माध्यमों में नहीं बनाया जा सकता।

प्रश्न 23.
किस प्रकार के ऐल्डिहाइड एवं कीटोन ऐल्डोल संघनन प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर
वे ऐल्डिहाइड तथा कीटोन जिनमें α-हाइड्रोजन होती है।

प्रश्न 24.
किस प्रकार के कीटोन आयोडोफॉर्म अभिक्रिया देते हैं ?
उत्तर
कीटोन जिनमें CH3CO- समूह होता है।

प्रश्न 25.
डाइ t-ब्यूटिल कीटोन NaHSO3 एडक्ट नहीं देता जबकि ऐसीटोन देता है, क्यों?
उत्तर
बड़े t-ब्यूटिल समूह के कारण उत्पन्न स्टेरिक अवरोध के कारण बाइसल्फेट आयन कार्बोनिल समूह के योग को प्रेरित नहीं करते हैं।

प्रश्न 26.
आप ऐसीटोन को एथेनोइक ऐसिड में कैसे बदलोगे?
उत्तर
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प्रश्न 27.
क्लीमेन्स अपचयन को उदाहरण देते हुए समझाइए। (2014)
उत्तर
ऐल्डिहाइड या कीटोन का Zn/C2H5OH/HCl के द्वारा अपचयन कराने पर ऐल्केन बनता है। इसे क्लीमेन्स अपचयन कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 96

प्रश्न 28.
कार्बोनिल यौगिक ऐल्कोहॉलों से अधिक ध्रुवीय होते हैं जबकि C तथा O परमाणु के मध्य विद्युत्-ऋणात्मकता का अन्तर H तथा O परमाणुओं से कम होता है। समझाइए।
उत्तर
कार्बोनिल समूह UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 97 में π इलेक्ट्रॉन युग्म ढीला बँधा रहता है और आसानी से ऑक्सीजन परमाणु की ओर स्थानान्तरित हो जाता है। ऐसा ऐल्कोहॉल समूह (O-H) में नहीं होता। अतः कार्बोनिल यौगिक अधिक ध्रुवीय होते हैं और इनके द्विध्रुव आघूर्णमान (2.3 से 2.80) ऐल्कोहॉलों (1.6-1.8 D) से उच्च होते हैं।

प्रश्न 29.
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 98
उत्तर
हेक्स-2-ईन-4-आइनोइक अम्ल।

प्रश्न 30.
आप बेन्जीन को बेन्जोइक अम्ल में कैसे परिवर्तित करेंगे? (2018)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 99

प्रश्न 31.
बेन्जोइक अम्ल ऐसीटिक अम्ल से प्रबल अम्ल क्यों होता है?
उत्तर
बेन्जोइक अम्ल का K, मान (6.3 × 10-5) ऐसीटिक अम्ल के K मान (1.75 × 10-5) से अधिक होता है क्योंकि-I प्रभाव युक्त C6H5 समूह बेन्जोइक अम्ल से H+ का विमोचन सुलभ बनाता है जबकि + I प्रभाव युक्त CH3 समूह इसे रोके रखता है।

प्रश्न 32.
आप ऐसीटिक अम्ल का मेथिलेमीन में परिवर्तन कैसे करेंगे?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 100

प्रश्न 33.
बेन्जेल्डिहाइड तथा बेन्जोइक अम्ल के मध्य विभेद के लिए रासायनिक परीक्षण दीजिए।
उत्तर
बेन्जोइक अम्ल सोडियम बाइकार्बोनेट के साथ गर्म करने पर तेजी से झाग देता है जबकि बेन्जेल्डिहाइड क्रिया नहीं करता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 101

प्रश्न 34.
आप ऐसीटिक अम्ल को ऐसीटेल्डिहाइड में किस प्रकार परिवर्तित करेंगे?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 102

प्रश्न 35.
निम्नलिखित अभिक्रिया को पूर्ण कीजिए – (2013)
CH2 = CH2 + O3 [latex]\underrightarrow { { CCl }_{ 4 } } [/latex] A [latex]\underrightarrow { { Zn+H }_{ 2 }O } [/latex] B
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 103

प्रश्न 36.
उदाहरण द्वारा हैल-वोल्हार्ड-जेलिन्सकी अभिक्रिया समझाइए। (2017)
उत्तर
लाल फॉस्फोरस या आयोडीन उत्प्रेरक की अल्प मात्रा की उपस्थिति में उच्च ताप पर मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल की क्लोरीन से अभिक्रिया कराने पर 2-हैलोजने अम्ल बनते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 104

प्रश्न 37.
ऐसीटिक अम्ल को लाल P तथा Cl2 की उपस्थिति में हैलोजनीकृत किया जा सकता है। लेकिन फॉर्मिक अम्ल को नहीं, क्यों?
उत्तर
फॉर्मिक अम्ल में α-हाइड्रोजन नहीं पाया जाता है। अत: यह हैलोजनीकृत (halogenated) नहीं होता है जबकि ऐसीटिक अम्ल में α-कार्बन परमाणु होता है तथा हैलोजनीकरण -कार्बन परमाणु पर होता है।

प्रश्न 38.
किसका क्वथनांक उच्च होगा-ब्यूटेनोइक अम्ल या एथिल ऐसीटेट ? समझाइए।
उत्तर
दोनों यौगिक समावयवी हैं तथा इनके अणुभार समान हैं। ब्यूटेनोइक अम्ल में OH समूह होता है। अतः यह हाइड्रोजन आबन्ध बनाने में सक्षम होता है। एथिल ऐसीटेट में हाइड्रोजन आबन्ध नहीं पाया जाता है। ब्यूटेनोइक अम्ल का क्वथनांक उच्च होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 105

प्रश्न 39.
टॉलेन अभिकर्मक क्या होता है?
उत्तर
टॉलेन अभिकर्मक सिल्वर नाइट्रेट का अमोनीकृत विलयन होता है।

प्रश्न 40.
फॉर्मिक अम्ल टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है, समझाइए।
उत्तर
फॉर्मिक अम्ल में मुक्त ऐल्डिहाइड समूह होता है जो शीघ्रता से ऑक्सीकृत होता है, अत: यह टॉलेन अभिकर्मक (अमोनीकृत सिल्वर नाइट्रेट विलयन) को रजत दर्पण (silver mirror) में अपचयित करता है।

प्रश्न 41.
फॉर्मिक अम्ल गर्म करने पर ऐनहाइड्राइड क्यों नहीं बनाता है?
उत्तर
गर्म करने पर फॉर्मिक अम्ल H2O का एक अणु खोकर CO में निर्जलीकृत (dehydrated) हो जाता है, अत: यह गर्म करने पर ऐनहाइड्राइड नहीं बनाता है।
HCOOH [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] H2O + CO ↑

प्रश्न 42.
श्मिट अभिक्रिया द्वारा प्राथमिक ऐमीन कैसे बनायी जाती है? रासायनिक समीकरण भी दीजिए। (2014, 18)
उत्तर
कार्बोक्सिलिक अम्ल को हाइड्राजोइक अम्ल (N3H) के साथ सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में गर्म करने पर प्राथमिक ऐमीन बनती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 106

प्रश्न43.
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उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 108

प्रश्न 44.
रीमर-टीमेन अभिक्रिया को समीकरण सहित लिखिए। (2014, 15, 16)
उत्तर
फीनॉल के क्षारीय विलयन को CCl4 के साथ 60 – 70°C पर reflux करने के पश्चात् मिश्रण को HCl द्वारा अम्लीय करने पर o-हाइड्रॉक्सी बेन्जोइक ऐसिड प्राप्त होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 109

प्रश्न 45.
आप बेन्जोइक अम्ल को बेन्जामाइड में कैसे परिवर्तित करेंगे?
उत्तर
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक एस्टर का अणुभार 102 है। इसका जलीय अपघटन करने पर एक क्षारकीय अम्ल तथा एक ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है। यदि अम्ल का 0.185 ग्राम 0.1 NNaOH के 25 mL को पूर्णतया उदासीन करता है, तो बने हुए अम्ल, ऐल्कोहॉल तथा एस्टर के संरचना सूत्र लिखिए। (2015)
हल
माना एस्टर RCOOR’ है
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 111
जहाँ, R = R’ या R≠ R’
0.185 ग्राम अम्ल = 25 mL 0.1 N NaOH ≡ 25 mL N NaOH
∵ 1 N NaOH के 2.5 mL उदासीन करता है = 0.185 ग्राम अम्ल को
∵ 1 N NaOH के 1000 mL उदासीन करती है = [latex]\frac { 0.185\times 1000 }{ 2.5 } [/latex] = 74
अतः अम्ल का तुल्यांकी भार = 74
अम्ल का अणुभार = 74
RCOOH का अणुभार = 74
R + 12 + 32 + 1 = 74
R का अणुभार = 74 – 45 = 29
अत: R, C2H5 एथिल समूह है। अम्ल का अणुसूत्र C2H3COOH है। एस्टर का अणुभार = 102
RCOOR’ का अणुभार = 102
29 + 12 + 32 + R’ = 102
R’ = 29
अत: R = R’ है, तो एस्टर C2H5COOC2H5 है और ऐल्कोहॉल का अणुसूत्र C2H5OH है।
अम्ल = C2H5COOH, ऐल्कोहॉल = C2H5OH
एस्टर = C2H5COOC2H5

प्रश्न 2.
विशिष्ट गन्ध वाला कार्बनिक यौगिक A, सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ क्रिया करके दो यौगिक B तथा C बनाता है। यौगिक B का अणुसूत्र C7H8O है। इसका ऑक्सीकरण करने पर पुनः यौगिक A बनता है। यौगिक C को सोडालाइम के साथ गर्म करने पर बेंजीन प्राप्त होती है। A, B तथा C कार्बनिक यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए। सम्बन्धित अभिक्रियाओं के समीकरण भी लिखिए। (2014)
उत्तर
यौगिक A की C6H5CHO होने की सम्भावना लगती है। प्रश्नानुसार यौगिक A की NaOH से क्रिया कराने पर यौगिक B तथा C बनता है। यौगिक B का अणुसूत्र C7H8O है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 112
यौगिक B C6H5CH2OH के ऑक्सीकरण से पुनः यौगिक A C6H5CHO प्राप्त होता है।
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यौगिक C, C6H5COONa को सोडा लाइम के साथ गर्म करने पर बेंजीन बनती है।
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अत: यौगिक
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 115
B= C6H5CH2OH (बेन्जिल ऐल्कोहॉल), C= सोडियम बेन्जोएट

प्रश्न 3.
एक कार्बनिक यौगिक A जिसका अणुसूत्र C5H10 है ब्रोमीन जल को रंगहीन करता है। यौगिक A अपचयन करने पर 2 मेथिल ब्यूटेन और ओजोनीकरण करने पर ऐथेनल तथा प्रोपेनोन देता है। यौगिक A की पहचान कीजिए। सम्बन्धित अभिक्रियाओं के समीकरण दीजिए। (2014)
उत्तर
यौगिक के अणुसूत्र C5H10 से इसके UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 116 होने की सम्भावना लगती है। चूंकि ओजोनीकरण के उपरान्त एथेनल तथा प्रोपेनोन बनता है तथा यह ब्रोमीन जल को रंगहीन करता है। इससे यौगिक की असंतृप्त होने की पुष्टि होती है।
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यौगिक के अपचयन से 2-मेथिल ब्यूटेन बनता है।
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यौगिक A के ओजोनीकरण से एथेनल तथा प्रोपेनोन बनता है।
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अतः यौगिक A 3-मेथिल-1-ब्यूटीन है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों को अम्लीयता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए तथा अपने उत्तर को समझाइए –
(a) ब्यूटेनोइक अम्ल
(b) 2-क्लोरोब्यूटेनोइक अम्ल
(c) 3-क्लोरोब्यूटेनोइक अम्ल
उत्तर
अम्लीयता का क्रम निम्नवत् है –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 12 Aldehydes Ketones and Carboxylic Acids image 120
2-क्लोरो प्रतिस्थापी प्रेरणिक प्रभाव द्वारा ब्यूटेनोइक अम्ल की अम्लीयता बढ़ाता है। 3-क्लोरो प्रतिस्थापी अम्लीयता कम मात्रा में बढ़ाता है, क्योंकि C-Cl आबन्ध कार्बोक्सिल समूह से दूर हो जाता है। दूरी बढ़ने से प्रेरणिक प्रभाव घटता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रयोगशाला में फॉर्मेल्डिहाइड बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसकी (i) सान्द्र NaOH घोल तथा (ii) अमोनिया के साथ होने वाली क्रियाओं को समीकरण सहित समझाइए। (2010, 11, 16, 17)
उत्तर
प्रयोगशाला में फॉर्मेल्डिहाइड बनाना – मेथिल ऐल्कोहॉल के उत्प्रेरित ऑक्सीकरण द्वारा प्रयोगशाला में फॉर्मेल्डिहाइड (HCHO) बनाया जाता है।
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विधि
– एक फ्लास्क में मेथिल ऐल्कोहॉल लेकर वायु भेजने के लिए तथा वाष्प निकलने के लिए दो नलियाँ लगाई जाती हैं। वायु निकलने वाली नली को प्लेटिनमयुक्त ऐस्बेस्टॉस से भरी एक नली से जोड़ दिया जाता है, जिसमें से एक अन्य नली जल भरे चूषण पम्पयुक्त फ्लास्क में लगा दी जाती है। मेथिल ऐल्कोहॉल तथा प्लेटिनमयुक्त ऐस्बेस्टॉस को गर्म करने के लिए दो अलग-अलग बर्नर लगा दिए जाते हैं।
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प्लेटिनमयुक्त ऐस्बेस्टॉस से भरी नली को लाल तप्त होने तक गर्म करके चूषण पम्प द्वारा फ्लास्क की वायु निकाल देते हैं। मेथिल ऐल्कोहॉलयुक्त फ्लास्क में वायु प्रवाहित करते हुए 250°C से 300°C ताप के बीच गर्म करने पर मेथिल ऐल्कोहॉल की वाष्प Pt के सम्पर्क में आती है, जिससे इसके ऑक्सीकरण से फॉर्मेल्डिहाइड गैस बनती है, जो ग्राही के जल में विलेय होता है। फॉर्मेल्डिहाइड गैसयुक्त जलीय विलयन को फॉर्मेलिन कहते हैं। इसमें 40% फॉर्मेल्डिहाइड तथा शेष जल होता है।

(i) सान्द्र NaOH घोल से अभिक्रिया – फॉर्मेल्डिहाइड की सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के सान्द्र विलयन से क्रिया कराने पर मेथिल ऐल्कोहॉल और सोडियम फॉर्मेट बनता है।
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यह अभिक्रिया कैनिजारो अभिक्रिया कहलाती है।

(ii) अमोनिया से अभिक्रिया – फॉर्मेल्डिहाइड सान्द्र अमोनिया के साथ अभिक्रिया करके हेक्सामेथिलीन टेट्राऐमीन बनाती है जिसे हेक्सामीन या यूरोट्रोपिन कहते हैं।
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प्रश्न 2.
प्रयोगशाला में शुद्ध ऐसीटेल्डिहाइड बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। रासायनिक समीकरण भी दीजिए। इसके कुछ प्रमुख रासायनिक गुण भी दीजिए। (2009, 11, 13, 15, 18)
उत्तर
एथिल ऐल्कोहॉल का K2Cr2O7 तथा तनु H2SO4 द्वारा ऑक्सीकरण कराकर प्रयोगशाला में ऐसीटेल्डिहाइड बनाया जाता है।
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विधि – प्रयुक्त होने वाला उपकरण चित्रानुसार सजाया जाता है। गोल पेंदी के फ्लास्क में K2Cr2O7 चूर्ण (50 ग्राम) तथा जल (200 मिली) लेकर उसमें बिन्दु कीप द्वारा ऐल्कोहॉल (24 मिली) तथा तनु H2SO4 (60 मिली) का मिश्रण बूंद-बूंद करके गिराया जाता है और फ्लास्क को बालू ऊष्मक पर धीरे-धीरे गर्म किया जाता है। फ्लास्क में अभिक्रिया के फलस्वरूप बनी ऐसीटेल्डिहाईड वाष्प को हिम मिश्रण में रखे गए अमोनिया से संतृप्त ईथरयुक्त फ्लास्क में प्रवाहित किया जाता है, जिससे ऐसीटेल्डिहाइड अमोनिया के बने क्रिस्टलों को धोकर, सुखाकर तनु H2SO4 से आसवित करने पर 21°C पर शुद्ध ऐसीटेल्डिहाइड प्राप्त होता है जो ठण्डा होने पर द्रवित हो जाता है।
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रासायनिक परीक्षण – (1) यह I2 व NaOH के साथ पीले रंग का क्रिस्टलीय पदार्थ आयोडोफॉर्म बनाता है।
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2. अपचायक गुण – यह फेहलिंग विलयन को अपचयित कर Cu20 को लाल रंग देता है।
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3. NH2OHसे अभिक्रिया
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4. NaHSO3 से अभिक्रिया
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प्रश्न 3.
ऐसीटेल्डिहाइड बनाने की ऑक्सीकरण एवं उत्प्रेरकीय तथा विहाइड्रोजनीकरण विधियों के रासायनिक समीकरण लिखिए। ऐसीटोन की संघनन अभिक्रिया का समीकरण भी लिखिए। (2014)
या
ऐल्डिहाइडों को बनाने की किन्हीं दो विधियों के रासायनिक समीकरण लिखिए। ऐसीटेल्डिहाइड तनु NaOH तथा टॉलेन अभिकर्मक के साथ किस प्रकार क्रिया करता है? सम्बंधित रासायनिक समीकरण लिखिए। (2015, 18)
उत्तर
(i) ऐसीटेल्डिहाइड बनाने की ऑक्सीकरण एवं उत्प्रेरकीय विधि
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(ii) ऐसीटेल्डिहाइड बनाने की विहाइड्रोजनीकरण विधि
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NaOH से क्रिया
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टॉलेन अभिकर्मक से क्रिया
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प्रश्न 4.
शुद्ध ऐसीटोन बनाने की प्रयोगशाला विधि का नामांकित चित्र सहित वर्णन कीजिए। इसके प्रमुख रासायनिक गुण भी दीजिए। (2009, 10, 12, 13, 16, 18)
या
ऐसीटोन की क्षारीय आयोडीन के साथ अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2018)
उत्तर
प्रयोगशाला में निर्जल कैल्सियम ऐसीटेट के शुष्क आसवन से ऐसीटोन बनाया जाता है।
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विधि – धातु या काँच के रिटॉर्ट में निर्जल कैल्सियम ऐसीटेट लेकर उपकरण को दिये गये चित्र के । अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। रिटॉर्ट को गर्म करने पर ऐसीटोन की वाष्प बनती है जिसे संघनित्र में प्रवाहित करने पर द्रव ऐसीटोन ग्राही में एकत्र हो जाता है। यह ऐसीटोन अशुद्ध होता है। इसे संतृप्त NaHSO3 विलयन के साथ मिलाकर हिलाने के बाद 4-5 घण्टे के लिए रख दिया जाता है, जिससे ऐसीटोन सोडियम बाइसल्फाइट के क्रिस्टल बनते हैं। इन क्रिस्टलों को पृथक् करके इनमें Na2CO3 मिलाकर मिश्रण का आसवन करने पर शुद्ध ऐसीटोन प्राप्त होता है जिसमें जल का कुछ अंश होता है। शुद्ध एवं शुष्क ऐसीटोन प्राप्त करने के लिए ऐसीटोन को निर्जल CaCl2 से सुखाकर पुनः आसवित करने पर 56°C पर शुद्ध ऐसीटोन प्राप्त होता है जिसको संघनित्र द्वारा ग्राही में एकत्र कर लिया जाता है।
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अमोनिया के साथ क्रिया – डाइऐसीटोन ऐमीन बनता है।
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क्लोरोफॉर्म से क्रिया – क्लोरीटोन बनता है। (2009)
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H2SO4 से क्रिया – ऐसीटोन का सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ आसवन करने पर मेसिटलीन बनती है।
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आयोडीन से क्रिया – ऐसीटोन को आयोडीन और NaOH के जलीय विलयन के साथ गर्म करने पर आयोडोफॉर्म का पीला अवक्षेप बनता है।
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प्रश्न 5.
फॉर्मिक अम्ल बनाने की प्रयोगशाला विधि का नामांकित चित्र सहित वर्णन कीजिए तथा अभिक्रियाओं के समीकरण भी दीजिए। इसके दो अपचायक गुणों को लिखिए। (2011, 13)
या
फॉर्मिक अम्ल बनाने की प्रयोगशाला विधि का वर्णन नामांकित चित्र सहित कीजिए तथा अभिक्रियाओं के समीकरण दीजिए। फॉर्मिक अम्ल की फेहलिंग विलयन तथा टॉलेन अभिकर्मक के साथ क्या क्रिया होती है? (2011, 13)
या
फॉर्मिक अम्ल की लेड कार्बोनिल के साथ अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2018)
उत्तर
प्रयोगशाला में फॉर्मिक अम्ल, ऑक्सैलिक अम्ल तथा निर्जल ग्लिसरॉल के मिश्रण को 100-110°C ताप पर गर्म करके बनाया जाता है। अभिक्रिया निम्नलिखित पदों में होती है –
1. ऑक्सैलिक अम्ल ग्लिसरॉल के साथ अभिक्रिया करके ग्लिसरॉल मोनोऑक्सैलेट (एस्टर) बनाता है।
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2. ग्लिसरॉल मोनो ऑक्सैलेट 100-110°C ताप पर अपघटित होकर ग्लिसरॉल मोनो फॉर्मेट बनाता है।
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3. ग्लिसरॉल मोनो फॉर्मेट में ऑक्सेलिक अम्ल के क्रिस्टलों की कुछ मात्रा मिलाते हैं। इन क्रिस्टलों का जल, ग्लिसरॉल मोनो फॉर्मेट का जल अपघटन कर फॉर्मिक अम्ल तथा ग्लिसरॉल बनाता है।
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अभिक्रिया में बना फॉर्मिक अम्ल आसुत हो जाता है तथा शेष बचे ग्लिसरॉल में फिर ऑक्सैलिक अम्ल मिलाकर फॉर्मिक अम्ल की अधिक मात्रा प्राप्त कर लेते हैं। प्रयुक्त उपकरण का नामांकित चित्र निम्न है –
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निर्जल फॉर्मिक अम्ल बनाना – निर्जल फॉर्मिक अम्ल बनाने के लिए जल मिश्रित अम्ल को उबालकर लेड कार्बोनेट द्वारा उदासीन कर लेते हैं। गर्म विलयन को छानकर, द्रव को ठण्डा करने पर लेड फॉर्मेट के क्रिस्टल पृथक् हो जाते हैं।
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लेड फॉर्मेट लेड फॉर्मेट के क्रिस्टलों को छानकर तथा सुखाकर एक काँच की झुकी नली में लेते हैं। इसके ऊपर शुष्क H2S गैस प्रवाहित करते हैं जिसके फलस्वरूप फॉर्मिक अम्ल बनता है।
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ठोस लेड सल्फाइड नली में नीचे रह जाता है तथा द्रव फॉर्मिक अम्ल को बहाकर दूसरे पात्र में एकत्र कर लेते हैं। इससे निर्जल अम्ल बन जाता है।

अपचायक गुण – (i) फॉर्मिक अम्ल टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है।
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(ii) फॉर्मिक अम्ल फेहलिंग विलयन को अपचयित कर देता है।
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प्रश्न 6.
ऐसीटिक अम्ल के औद्योगिक निर्माण की क्विक विनेगर प्रक्रम की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसकी PCls के साथ अभिक्रिया लिखिए। इसका एक परीक्षण भी लिखिए। (2016)
या
शीघ्र सिरका विधि द्वारा ऐसीटिक अम्ल बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसके साथ एथिल ऐल्कोहॉल की अभिक्रिया का समीकरण लिखिए।
उत्तर
ऐसीटिक अम्ल का निर्माण निम्नलिखित विधियों से किया जाता है –

  1. ऐसीटिलीन से
  2. लकड़ी के भंजक आसवन से प्राप्त पाइरोलिग्नियस अम्ले से
  3. किण्वने द्वारा
  4. सोडियम मेथॉक्साइड द्वारा।

क्विक विनेगर विधि या किण्वन विधि
किण्वन विधि द्वारा ऐसीटिक अम्ल बनाना – इस विधि को शीघ्र सिरका (Quick vinegar) विधि कहते हैं। इस विधि में एथिल ऐल्कोहॉल का माइकोडर्मा ऐसीटी नामक जीवाणुओं द्वारा किण्वन कराके ऐसीटिक अम्ल का तनु विलयन (सिरका) प्राप्त किया जाता है। ये जीवाणु वायु में उपस्थित रहते हैं। ये अपनी वृद्धि के लिए एथिल ऐल्कोहॉल के विलयन में पहुँच जाते हैं और किण्वन द्वारा ऐल्कोहॉल को सिरके में ऑक्सीकृत कर देते हैं।
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ऐसीटिक अम्ले
किण्वन क्रिया एक लकड़ी के पीपे में होती है। इस पीपे में ऊपर और नीचे की ओर छिद्रयुक्त लकड़ी के तख्ते लगे होते हैं। इन दोनों तख्तों के बीच में लकड़ी का बरादा भरा रहता है जो माईकोडर्मा ऐसीटीयुक्त सिरके से गीला कर दिया जाता है। पीपे के चारों ओर दीवारों में भी छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। पीपे के निचले भाग में बने हुए सिरके को निकालने के लिए एक टोंटी लगी रहती है।

उपकरण को पूर्णतया व्यवस्थित करके पीपे के ऊपरी भाग में 10% एथिल ऐल्कोहॉल का विलयन धीरे-धीरे टपकाया जाता है। यह लकड़ी के बुरादे में उपस्थित माइकोडर्मा ऐसीटी की उपस्थिति में वायु की ऑक्सीजन से ऑक्सीकृत होकर ऐसीटिक अम्ल (सिरका) में परिवर्तित होता रहता है। इस प्रक्रम में पीपे का ताप 30-35°C रखा जाता। है। निचले भाग से प्राप्त द्रव को कई बार पीपे में ऊपर से टपकाया जाता है जिससे 6-8% ऐसीटिक अम्लयुक्त सिरका प्राप्त होता है। इस विधि से सिरका बनने में लगभग एक सप्ताह लगता है।
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ग्लेशियल ऐसीटिक अम्ल बनाना – सिरके को NaOH या Na2CO3 से उदासीन करके निर्जल सोडियम ऐसीटेट प्राप्त कर लिया जाता है। इसका सान्द्र H2SO4 के साथ आसवन करने पर 99% अम्ल प्राप्त होता है। इसको ठण्डा करके ग्लेशियल अम्ल प्राप्त कर लेते हैं।

PCl5 से क्रिया – ऐसीटिल क्लोराईड बनता है।
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C2H5OH से क्रिया – एथिल ऐसीटेट (एस्टर) बनता है।
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ऐसीटिक अम्ल का परीक्षण – ऐसीटिक अम्ल को NaOH विलयन द्वारा उदासीन करके FeCl3 का विलयन मिलाने पर लाल रंग का विलयन प्राप्त होता है।
CH3COOH + NaOH → CH3COONa + H2O
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प्रश्न 7.
ऑक्सैलिक अम्ल के निर्माण की प्रमुख विधियाँ लिखिए। इसके कुछ प्रमुख रासायनिक गुण भी लिखिए। (2016)
उत्तर
निर्माण विधि
1. सुक्रोस के ऑक्सीकरण द्वारा – प्रयोगशाला में ऑक्सैलिक अम्ल सुक्रोस (चीनी) का वैनेडियम पेन्टॉक्साइड उत्प्रेरक की उपस्थिति में सान्द्र नाइट्रिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकरण करके बनाते हैं।
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2. सोडियम फॉर्मेट से – सोडियम फॉर्मेट को 360°C पर गर्म करने पर सोडियम ऑक्सैलेट बनता है।
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सोडियम ऑक्सैलेट को जल में विलीन करके उसमें कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड का विलयन डालते हैं। जिससे कैल्सियम ऑक्सैलेट के अवक्षेप बनते हैं। अविलेय कैल्सियम ऑक्सैलेट को छानकर पृथक् करते हैं और उसकी तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की आवश्यक मात्रा से क्रिया कराते हैं जिससे कैल्सियम सल्फेट का सफेद अवक्षेप और ऑक्सैलिक अम्ल बनते हैं। अविलेय कैल्सियम सल्फेट को छानकर अलग कर देते हैं और फिल्टरित को वाष्पित करके सान्द्र करते हैं। विलयन को ठण्डा करने पर हाइड्रेटेड ऑक्सैलिक अम्ल (C2O4H2 . 2H2O) के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।

रासायनिक गुण
1. एस्टरीकरण अभिक्रिया – एथिल ऐल्कोहॉल के साथ अभिक्रिया करके यह दो प्रकार के एस्टर बनाता है जिनको अम्लीय तथा सामान्य एस्टर कहते हैं।
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2. अमोनिया से अभिक्रिया – अमोनिया के साथ अभिक्रिया करने पर यह मोनो तथा डाइअमोनियम ऑक्सैलेट बनाता है जो गर्म करने पर मोनोऑक्सैमाइड (ऑक्सैमिक अम्ल) तथा ऑक्सैमाइड देते हैं।
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ऑक्सैमाइड को P2O5 के साथ गर्म करने पर सायनोजन बनता है।
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3. फॉस्फोरस पेन्टाक्लोराइड से अभिक्रिया – फॉस्फोग्स पेन्टाक्लोराइड के साथ अभिक्रिया करके ऑक्सैलिक अम्ल ऑक्सैलिल क्लोराइड देता है।
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4. कैल्सियम क्लोराइड के साथ अभिक्रिया – ऑक्सैलिक अम्ल के NH4OH द्वारा उदासीन विलयन में कैल्सियम क्लोराइड विलयन डालने पर कैल्सियम ऑक्सैलेट का सफेद अवक्षेप बनता है।
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प्रश्न 8.
बेन्जोइक अम्ल बनाने की प्रयोगशाला विधि का वर्णन कीजिए। सम्बन्धित रासायनिक समीकरण, रासायनिक गुण तथा उपयोग भी बताइए।
उत्तर
प्रयोगशाला विधि – बेन्जिल क्लोराइड का क्षारीय माध्यम में पोटैशियम परमैंगनेट द्वारा पोटैशियम बेन्जोएट में ऑक्सीकरण करके मिश्रण को HCl द्वारा अम्लीय करने पर बेन्जोइक अम्ल प्राप्त होता है।
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विधि – एक गोल पेंदी के फ्लास्क में निर्जल सोडियम कार्बोनेट (4g), जल (200 मिली), पोटैशियम परमैंगनेट (9 g) और बेन्जिल क्लोराइड (5 g) लेते हैं और फ्लास्क में एक पश्चवाही संघनित्र लगाकर मिश्रण को अभिक्रिया पूर्ण होने तक (लगभग 1-2 घण्टे) उबालते हैं। बेन्जिल क्लोराइड बेन्जोइक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है और पोटैशियम परमैंगनेट मैंगनीज डाइऑक्साइड में अपचयित होता है। मिश्रण को ठण्डा करके उसे सान्द्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (लगभग 40 मिली) द्वारा अम्लीय करते हैं। फिर उसमें सोडियम सल्फाइड का जलीय विलयन (20%) मैंगनीज डाइऑक्साइड के पूरा घुलने तक डालते हैं। ठण्डे मिश्रण को छानकर बेन्जोइक अम्ल के सफेद क्रिस्टलों को पृथक् कर लेते हैं। फिर गर्म जल से उनका पुनः क्रिस्टलन कराकर शुद्ध बेन्जोइक अम्ल (m.p. 122°C) प्राप्त कर लेते हैं।

रासायनिक गुण
1. फॉस्फोरस पेन्टाक्लोराइड से अभिक्रिया – बेन्जोइक अम्ल की फॉस्फोरस पेन्टाक्लोराइड के साथ अभिक्रिया कराने पर बेन्जॉयल क्लोराइड बनता है।
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2. विकार्बोक्सिलकरण – बेन्जोइक अम्ल या सोडियम बेन्जोएट को सोडालाइम के साथ गर्म करने पर बेन्जीन बनती है।
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इस अभिक्रिया में अम्ल के अणु से कार्बन डाइ ऑक्साइड का एक अणु निष्कासित होता है। यह अभिक्रिया अम्ल का विकार्बोक्सिलकरण कहलाती है।
उपयोग

  1. सोडियम बेन्जोएट का उपयोग अचार, मुरब्बे, टमाटर की चटनी, फलों के रस एवं अन्य खाद्य पदार्थों के परिरक्षण (preservation) में परिरक्षक (preservative) के रूप में होता है।
  2. ऐनिलीन-ब्लू रंजक बनाने में
  3. बेन्जोइक अम्ल और उसके लवणों का उपयोग औषधि में मूत्रीय पूतिरोधी के रूप में होता है।

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