UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 11
Chapter Name Dual Nature of Radiation and Matter (विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति)
Number of Questions Solved 82
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter (विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1:
30 kV इलेक्ट्रॉनों के द्वारा उत्पन्न X-किरणों की
(a) उच्चतम आवृत्ति, तथा |
(b) निम्नतम तरंगदैर्ध्य प्राप्त कीजिए।
हल:
दिया है, V= 30 kV = 30 x 103v
ऊर्जा E = eV = 1.6 x 10-19 x 30 x 103 J= 4.8 x 10-15 J
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प्रश्न 2:
सीज़ियम धातु का कार्य-फलन 2,14eV है। जब 6 x 1014 Hz आवृत्ति का प्रकाश धातु-पृष्ठ पर आपतित होता है, इलेक्ट्रॉनों का प्रकाशिक उत्सर्जन होता है।
(a) उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा
(b) निरोधी विभव, और
(c) उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम चाल कितनी है?
हल:
दिया है, सीजियम धातु का कार्य-फलन
W = 2.14 eV
= 214 x 1.6 x 10-19 जूल
आपतित प्रकाश की आवृत्ति
v = 6 x 1014 Hz
प्लांक का नियतांक
h = 6.62 x 10-34 जूल सेकण्ड
∴ आपतित फोटॉन की ऊर्जा
hν= 6.62 x 10-34 x 6 x 1014 जूल

(a) यदि उत्सर्जित प्रकाश इलेक्ट्रॉन की उच्चतम गतिज ऊर्जा Emax हो तो
आइन्सटीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण hν = w + Emax से
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(b) यदि विरोधी विभव V0 हो तो
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(c) यदि उत्सर्जित प्रकाश इलेक्ट्रॉन की अधिकतम चाल νmax हो तो
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प्रश्न 3:
एक विशिष्ट प्रयोग में प्रकाश-विद्युत प्रभाव की अन्तक वोल्टता 1.5 v है। उत्सर्जित प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा कितनी है?
हल:
संस्तब्ध वोल्टेज, V0= 1.5 V
प्रकाश इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा,
E = eV0 = 1.5 ev = 1.5 x 16 x 10-19J = 2.4 x 10-19J

प्रश्न 4:
632.8 nm तरंगदैर्घ्य का एकवर्णी प्रकाश एक हीलियम-नियॉन लेसर के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। उत्सर्जित शक्ति 9.42mW है।
(a) प्रकाश के किरण-पुंज में प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा तथा संवेग प्राप्त कीजिए।
(b) इस किरण-पुंज के द्वारा विकिरित किसी लक्ष्य पर औसतन कितने फोटॉन प्रति सेकण्ड पहुँचेंगे? (यह मान लीजिए कि किरण-पुंज की अनुप्रस्थ काट एकसमान है जो लक्ष्य के
क्षेत्रफल से कम है), तथा ।
(c) एक हाइड्रोजन परमाणु को फोटॉन के बराबर संवेग प्राप्त करने के लिए कितनी तेज चाल से चलना होगा?
हल:
दिया है, λ = 632.8 nm = 6328 x 10-9m
शक्ति P = 9.42 mW = 9.42 x 10-3 W
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प्रश्न 5:
पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचने वाला सूर्यप्रकाश का ऊर्जा-अभिवाह (फ्लक्स) 1.388 x 103 W/m2 है। लगभग कितने फोटॉन प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकण्ड पृथ्वी पर आपतित होते हैं? यह मान लें कि सूर्य-प्रकाश में फोटॉन का औसत तरंगदैर्घ्य 550nm है।
हल:
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प्रश्न 6:
प्रकाश-विद्युत प्रभाव के एक प्रयोग में, प्रकाश आवृत्ति के विरुद्ध अन्तक वोल्टता की ढलान 4.12 x 10-15 Vs प्राप्त होती है। प्लांक स्थिरांक का मान परिकलित कीजिए।
हल:
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण है,
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प्रश्न 7:
एक 100 w सोडियम बल्ब (लैम्प) सभी दिशाओं में एकसमान ऊर्जा विकिरित करता है। लैम्प को एक ऐसे बड़े गोले के केन्द्र पर रखा गया है जो इस पर आपतित सोडियम के सम्पूर्ण प्रकाश को अवशोषित करता है। सोडियम प्रकाश का तरंगदैर्घ्य 589 nm है।
(a) सोडियम प्रकाश से जुड़े प्रति फोटॉन की ऊर्जा कितनी है?
(b) गोले को किस दर से फोटॉन प्रदान किए जा रहे हैं?
हल:
दिया है, P = 100 W, λ = 589 nm = 589 x 10-9 m
(a) प्रति फोटॉन ऊर्जा,
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(b) प्रति सेकण्ड गोले को दिए गए फोटॉनों की संख्या
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प्रश्न 8:
किसी धातु की देहली आवृत्ति 3.3 x 1014 Hz है। यदि 8.2 x 1014 Hz आवृत्ति का प्रकाश धातु पर आपतित हो तो प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के लिए अन्तक वोल्टता ज्ञात कीजिए।
हल:
आइन्सटीन का प्रकाश-वैद्युत समीकरण है।
hν = hν0 + Ek
यदि अन्तक वोल्टता V% हो, तो Ek = eV0
∴ hv = hv0 +eV0
⇒ eV0 = h(ν – ν0)
= 6.63 x 10-34 (8.2 x 1014 – 3.3 x 1014)
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प्रश्न 9:
किसी धातु के लिए कार्य-फलन 4.2eV है। क्या यह धातु 330 nm तरंगदैर्घ्य के आपतित विकिरण के लिए प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन देगा?
हल:
आपतित विकिरण के फोटॉन की ऊर्जा,
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∴ प्रकाश धातु का कार्य-फलन, 20 = 4.2 eV (दिया है) चूँकि आपतित फोटॉन की ऊर्जा कार्य-फलन से कम है, अत: प्रकाश-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन सम्भव नहीं

प्रश्न 10:
7.21 x 1014 Hz आवृत्ति का प्रकाश एक धातु-पृष्ठ पर आपतित है। इस पृष्ठ से 6.0 x 10 m/s की उच्चतम गति से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो रहे हैं। इलेक्ट्रॉनों के प्रकाश उत्सर्जन के लिए देहली आवृत्ति क्या है?
हल:
दिया है, आवृत्ति v = 7.21 x 1014 Hz,
νmax = 6.0 x 105 ms-1
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण से
Ek = hν – hν0
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प्रश्न 11:
488 pm तरंगदैर्ध्य का प्रकाश एक ऑर्गन लेसर से उत्पन्न किया जाता है, जिसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव के उपयोग में लाया जाता है। जब इस स्पेक्ट्रमी-रेखा के प्रकाश को उत्सर्जक पर आपतित किया जाता है, तब प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों का निरोधी (अन्तक) विभव 0.38 V है। उत्सर्जक के पदार्थ का कार्य-फलन ज्ञात करें।
हल:
दिया है, λ = 488 nm = 488 x 10-9m, V0 = 0.38 V
आपतित फोटॉन की ऊर्जा,
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प्रश्न 12:
56V विभवान्तर के द्वारा त्वरित इलेक्ट्रॉनों का
(a) संवेग, और
(b) डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य परिकलित कीजिए।
हल:
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान = 9.1 x 10-31 kg
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प्रश्न 13:
एक इलेक्ट्रॉन जिसकी गतिज ऊर्जा 120 eV है, उसका (a) संवेग, (b) चाल, और (c) डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य क्या है?
हल:
गतिज ऊर्जा, Ec = 120 eV = 120 x 1.6 x 10-19 J
= 1.92 x 10-17 J
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प्रश्न 14:
सोडियम के स्पेक्ट्रमी उत्सर्जन रेखा के प्रकाश का तरंगदैर्घ्य 589 nm है। वह गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए जिस पर
(a) एक इलेक्ट्रॉन, और
(b) एक न्यूट्रॉन का डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य समान होगा।
हल:
दिया है, λ = 589 nm = 5.89 x 10-7m [∵1 nm = 10-9 m]
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प्रश्न 15:
(a) एक 0.040 kg द्रव्यमान का बुलेट जो 1.0 km/s की चाल से चल रहा है, (b) एक 0.060 kg द्रव्यमान की गेंद जो 1.0m/s की चाल से चल रही है, और (c) एक धूल-कण जिसका द्रव्यमान 1.0 x 10-9kg और जो 2.2m/s की चाल से अनुगमित हो रहा है, का डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य कितना होगा?
हल:
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प्रश्न 16:
एक इलेक्ट्रॉन और एक फोटॉन प्रत्येक का तरंगदैर्घ्य 1.00 pm है।
(a) इनका संवेग,
(b) फोटॉन की ऊर्जा, और
(c) इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
हल:
दिया है, ∴ λ= 1.00 nm = 1.00 x 10-9m
(a) इलेक्ट्रॉन तथौ फोटॉन के संवेग होते हैं।
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(b) फोटॉन की ऊर्जा,
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(c) इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा,
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प्रश्न 17:
(a) न्यूट्रॉन की किस गतिज ऊर्जा के लिए डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य 1.40 x 10-10 m होगा?
(b) एक न्यूट्रॉन, जो पदार्थ के साथ तापीय साम्य में है और जिसकी 300 K पर औसत गतिज ऊर्जा [latex]\frac { 3 }{ 2 }[/latex]kT है, का भी डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए।
हल:
(a) डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य,
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(b) डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य,
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प्रश्न 18:
यह दर्शाइए कि विद्युतचुम्बकीय विकिरण का तरंगदैर्घ्य इसके क्वांटम (फोटॉन) के तरंगदैर्घ्य के बराबर है।
हल:
वैद्युत-चुम्बकीय विकिरण की तरंगदैर्घ्य,
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समीकरण (1) व (3) की तुलना करने पर, λ = λ’
अर्थात् वैद्युत-चुम्बकीय विकिरण की तरंगदैर्घ्य, डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य के बराबर है।

प्रश्न 19:
वायु में 300 K ताप पर एक नाइट्रोजन अणु का डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य कितना होगा? यह मानें कि अणु इस ताप पर अणुओं के चाल वर्ग माध्य से गतिमान है। (नाइट्रोजन का परमाणु द्रव्यमान= 14.0076 u)
हल:
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 20:
(a) एक निर्वात नली के तापित कैथोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की उस चाल का आकलन कीजिए, जिससे वे उत्सर्जक की तुलना में 500v के विभवान्तर पर रखे गए एनोड से टकराते हैं। इलेक्ट्रॉनों के लघु प्रारम्भिक चालों की उपेक्षा कर दें। इलेक्ट्रॉन का आपेक्षिक आवेश अर्थात् [latex]\frac { e }{ m }[/latex] = 1.76 x 1011 C kg है।।
(b) संग्राहक विभव 10 MV के लिए इलेक्ट्रॉनों की चाल ज्ञात करने के लिए उसी सूत्र का प्रयोग करें, जो (a) में काम में लाया गया है। क्या आप इस सूत्र को गलत पाते हैं? इस सूत्र को किस प्रकार सुधारा जा सकता है?
हल:
(a) त्वरक विभव V= 500 V
इलेक्ट्रॉन का आपेक्षिक आवेश [latex]\frac { e }{ m }[/latex] = 1.76 x 1011 c kg-1
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माना एनोड से टकराते समय इलेक्ट्रॉनों का वेग ν है, तब
इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा में वृद्धि
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(b) पुनः इलेक्ट्रॉन की चाल
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∵ इलेक्ट्रॉन की यह चाल निर्वात् में प्रकाश की चाल c= 3 x 10 m s-1 से अधिक है तथा हम जानते हैं कि कोई द्रव्य कण निर्वात् में प्रकाश के वेग के बराबर अथवा अधिक चाल से नहीं चल सकता। इससे स्पष्ट है कि इस दशा में उक्त सूत्र (K. E. = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]mν2) सही नहीं हो सकता।
इस दशा में इलेक्ट्रॉन की सही चाल ज्ञात करने के लिए सापेक्षता के विशिष्ट सिद्धान्त का उपयोग करना होगा।
इस सिद्धान्त के अनुसार यदि कोई द्रव्य कण प्रकाश के वेग के तुलनीय वेग से गति करता है तो उसका गतिज द्रव्यमान निम्नलिख़ित होगा
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प्रश्न 21:
(a) एक समोर्जी इलेक्ट्रॉन किरण-पुंज जिसमें इलेक्ट्रॉन की चाल 5.20 x 106 ms-1 है, पर एक चुम्बकीय-क्षेत्र 1.30 x 10-4 किरण-पुंज की चाल के लम्बवत् लगाया जाता है। किरण-पुंज द्वारा आरेखित वृत्त की त्रिज्या कितनी होगी, यदि इलेक्ट्रॉन के [latex]\frac { e }{ m }[/latex]का मान 1.76 x 1011C kg-1 है।
(b) क्या जिस सूत्र को (a) में उपयोग में लाया गया है वह यहाँ भी एक 20 Mev इलेक्ट्रॉन किरण-पुंज की त्रिज्या परिकलित करने के लिए युक्तिपरक है? यदि नहीं तो किस प्रकार इसमें संशोधन किया जा सकता है? [नोट: प्रश्न 20 (b) तथा 21 (b) आपको आपेक्षिकीय यांत्रिकी तक (UPBoardSolutions.com) ले जाते हैं जो पुस्तक के विषय के बाहर है। यहाँ पर इन्हें इस बिन्दु पर बल देने के लिए सम्मिलित किया गया है कि जिन सूत्रों को आप (a) में उपयोग में लाते हैं वे बहुत उच्च चालों अथवा ऊर्जाओं पर युक्तिपरक नहीं होते। यह जानने के लिए कि ‘बहुत उच्च चाल अथवा ऊर्जा का क्या अर्थ है? अन्त में दिए गए उत्तरों को देखें।
हल:
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इलेक्ट्रॉन की चाल = 2.65 x 109 m/s
∵ इलेक्ट्रॉन की चाल निर्वात् में प्रकाश की चाल से अधिक है। अतः पथ की त्रिज्या का परिकलन करने के लिए सामान्य सूत्र का प्रयोग नहीं किया जा सकता अपितु आपेक्षिकीय यांत्रिकी का प्रयोग करना होगा।
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उक्त सूत्र से पथ की त्रिज्या की गणना की जा सकती है।

प्रश्न 22:
एक इलेक्ट्रॉन गन जिसका संग्राहक 100V विभव पर है, एक कम दाब (~10-2 mm Hg) पर हाइड्रोजन से भरे गोलाकार बल्ब में इलेक्ट्रॉन छोड़ती है। एक चुम्बकीय-क्षेत्र जिसका मान 2.83 x 10-4 Tहै, इलेक्ट्रॉन के मार्ग को 12.0 cm त्रिज्या के वृत्तीय कक्षा में वक्रित कर देता है। (इस मार्ग को देखा जा सकता है क्योंकि मार्ग में गैस आयन किरण-पुंज को इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करके और इलेक्ट्रॉन प्रग्रहण के द्वारा प्रकाश उत्सर्जन करके फोकस करते हैं; इस विधि को परिष्कृत किरण-पुंज नली विधि कहते हैं। आँकड़ों से [latex]\frac { e }{ m }[/latex] का मान निर्धारित कीजिए।
हल:
दिया है, इलेक्ट्रॉनों के लिए त्वरक विभव V = 100 V
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प्रश्न 23:
(a) एक x-किरण नली विकिरण का एक संतत स्पेक्ट्रम जिसका लघु तरंगदैर्घ्य सिरा 0.45 [latex]\mathring { A }[/latex] पर है, उत्पन्न करता है। विकिरण में किसी फोटॉन की उच्चतम ऊर्जा कितनी है? (b) अपने (a) के उत्तर से अनुमान लगाइए कि किस कोटि की त्वरक वोल्टता (इलेक्ट्रॉन के लिए) की इस नली में आवश्यकता है?
हल:
(a) X – किरण विकिरण में λ = 0.45 [latex]\mathring { A }[/latex] = 45 x 10-12 m
∴ विकिरण में फोटॉन की उच्चतम ऊर्जा
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(b) माना लक्ष्य से टकराने वाले इलेक्ट्रॉनों को उक्त ऊर्जा प्रदान करने के लिए त्वरक विभव V की आवश्यकता होती है।
तब इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E = eV
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प्रश्न 24:
एक त्वरित्र (accelerator) प्रयोग में पॉजिट्रॉनों (e+) के साथ इलेक्ट्रॉनों के उच्च-ऊर्जा संघट्टन पर, एक विशिष्ट घटना की व्याख्या कुल ऊर्जा 10.2 BeV के इलेक्ट्रॉन-पॉजिट्रॉन युग्म के बराबर ऊर्जा की दो γ-किरणों में विलोपन के रूप में की जाती है। प्रत्येक γ-किरण से सम्बन्धित तरंगदैघ्र्यों के मान क्या होंगे? (1 BeV= 109 eV)
हल:
घटना में विलुप्त इलेक्ट्रॉन-पॉजिट्रॉन की कुल ऊर्जा = 10.2 x 109 eV
यह ऊर्जा दोनों γ-फोटॉनों में बराबर-बराबर बँट जाएगी।
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प्रश्न 25:
आगे आने वाली दो संख्याओं का आकलन रोचक हो सकता है। पहली संख्या यह बताएगी कि रेडियो अभियान्त्रिक फोटॉन की अधिक चिन्ता क्यों नहीं करते। दूसरी संख्या आपको यह बताएगी कि हमारे नेत्र ‘फोटॉनों की गिनती क्यों नहीं कर सकते, भले | ही प्रकाश साफ-साफ संसूचन योग्य हो।
(a) एक मध्य तरंग (medium wave) 10 kW सामर्थ्य के प्रेषी, जो 500 m तरंगदैर्ध्य की रेडियो तरंग उत्सर्जित करता है, के द्वारा प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या।
(b) निम्नतम तीव्रता का श्वेत प्रकाश जिसे हम देख सकते हैं (10-10 w m4) के संगत फोटॉनों की संख्या जो प्रति सेकण्ड हमारे नेत्रों की पुतली में प्रवेश करती है। पुतली का क्षेत्रफल लगभग 0.4 cm और श्वेत प्रकाश की औसत आवृत्ति को लगभग 6 x 1024 Hz मानिए।
हल:
(a) प्रेषी की शक्ति P = 10 kW = 104 W
उत्सर्जित फोटॉनों की तरंगदैर्घ्य λ = 500 m
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हम देख सकते हैं कि 10 kW सामर्थ्य के प्रेषी द्वारा प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या इतनी अधिक है। अत: फोटॉनों की अलग-अलग ऊर्जा की उपेक्षा करके रेडियो तरंगों की कुल ऊर्जा को सतत माना जा सकता है।

(b)
श्वेत प्रकाश की औसत आवृत्ति v = 6 x 104 Hz
∴ श्वेत प्रकाश की फोटॉन की ऊर्जा E = hav = 6.62 x 10-34 x 6 x 1014
= 3.97 x 10-19 J
आँख द्वारा संसूचित न्यूनतम तीव्रता = 10-10 Wm-2
इस स्थिति में आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की न्यूनतम शक्ति
P = 10-10 Wm-2 x (0.4 x 10-4 m2)
= 4 x 10415 W
∴ आँख में प्रति सेकण्ड प्रवेश करने वाले फोटॉनों की संख्या
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यद्यपि यह संख्या रेडियो प्रेषी द्वारा प्रति सेकण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या से अत्यन्त कम है। परन्तु आँख के सूक्ष्म क्षेत्रफल की दृष्टि से इतनी अधिक (UPBoardSolutions.com) है कि हम आँख पर गिरने वाले फोटॉनों के अलग-अलग प्रभाव को संसूचित नहीं कर पाते अपितु प्रकाश के सतत प्रभाव का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 26:
एक 100 W पारद (Mercury) स्रोत से उत्पन्न 2271 [latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य का पराबैंगनी प्रकाश एक मॉलिब्डेनम धातु से निर्मित प्रकाश सेल को विकिरित करता है। यदि निरोधी विभव – 1.3 V हो तो धातु के कार्य-फलन का आकलन कीजिए। एक He-Ne लेसर द्वारा . उत्पन्न 6328 [latex]\mathring { A }[/latex] के उच्च तीव्रता (~105 w m-2) के लाल प्रकाश के साथ प्रकाश सेल
किस प्रकार अनुक्रिया करेगा?
हल:
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प्रश्न 27:
एक नियॉन लैम्प से उत्पन्न 640.2nm (1 nm = 10-9 m) तरंगदैर्ध्य का एकवर्णी विकिरण टंगस्टन पर सीजियम से निर्मित प्रकाश-संवेदी पदार्थ को विकिरित करता है। निरोधी वोल्टता 0.54 V मापी जाती है। स्रोत को एक लौह-स्रोत से बदल दिया जाता है। इसकी 427.2 nm वर्ण-रेखा उसी प्रकाश सेल को विकिरित करती है। नयी निरोधी वोल्टता ज्ञात कीजिए।
हल:
दिया है, λ1 = 640.2nm = 640.2 x 10-9 m
निरोधी वोल्टता V1 = 0.54 V
λ2 = 427.2nm = 427.2 x 10-9m के लिए निरोधी विभव V2 = ?
आइन्स्टीन के प्रकाश-विद्युत समीकरण से,
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प्रश्न 28:
एक पारद लैम्प, प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन की आवृत्ति निर्भरता के अध्ययन के लिए एक सुविधाजनक स्रोत है, क्योंकि यह दृश्य-स्पेक्ट्रम के पराबैंगनी (UV) से लाल छोर तक कई वर्ण-रेखाएँ उत्सर्जित करता है। रूबीडियम प्रकाश सेल के हमारे प्रयोग में, पारद (Mercury) स्रोत की निम्न वर्ण-रेखाओं का प्रयोग किया गया
λ1 = 3650[latex]\mathring { A }[/latex] ,
λ2 = 4047[latex]\mathring { A }[/latex] ,
λ3 = 4358[latex]\mathring { A }[/latex] ,
λ4 = 5461A, 25 = 6907[latex]\mathring { A }[/latex]
निरोधी वोल्टताएँ, क्रमशः निम्न मापी गईं हैं
V01 = 1.28 v,
V02 = 0.95 v,
V03 = 0.74V,
V04 = 0.16 V,
V05 = 0V
(a) प्लांक स्थिरांक h का मान ज्ञात कीजिए।
(b) धातु के लिए देहली आवृत्ति तथा कार्य-फलन का आकलन कीजिए।
[नोट-उपर्युक्त आँकड़ों से h का मान ज्ञात करने के लिए आपको e = 1.6 x 10-19 C की आवश्यकता होगी। इस प्रकार के प्रयोग Na,Li, K आदि के लिए मिलिकन ने किए थे। मिलिकन ने अपने तेल-बूंद प्रयोग से प्राप्त के मान का उपयोग कर आइन्स्टीन के प्रकाश विद्युत समीकरण को सत्यापित किया तथा इन्हीं प्रेक्षणों से h के मान के लिए पृथक् अनुमान लगाया।]
हल:
किसी दी गई तरंगदैर्घ्य 2 के लिए संगत आवृत्ति
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प्रश्न 29:
कुछ धातुओं के कार्य-फलन निम्न प्रकार दिए गए हैं
Na: 2.75 ev; K: 2.30 ev; Mo:417ev; Ni : 5.15 ev इनमें धातुओं में से कौन प्रकाश सेल से 1m दूर रखे गए He-cd लेसर से उत्पन्न 3300[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य के विकिरण के लिए प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नहीं देगा? लेसर को सेल के निकट 50 cm दूरी पर रखने पर क्या होगा?
हल:
He-Cd लेसर से उत्पन्न तरंगदैर्घ्य λ = 3300[latex]\mathring { A }[/latex] = 3.3 x 10-7m
इस विकिरण के एक फोटॉन की ऊर्जा
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∵ Mo तथा Ni के लिए कार्य-फलंन, उक्त विकिरण के एक फोटॉन की ऊर्जा से अधिक है; अतः उक्त दोनों धातु प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नहीं देंगे। यदि लेसर (UPBoardSolutions.com) को 1m के स्थान पर 50 cm दूरी पर रख दें तो भी उक्त परिणाम में कोई अन्तर नहीं आएगा, क्योंकि लेसर को समीप रखने पर धातु पर गिरने वाले प्रकाश की तीव्रता तो बढ़ जाएगी,परन्तु एक फोटॉन से सम्बद्ध ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

प्रश्न 30:
10-5 W m-2 तीव्रता का प्रकाश सोडियम प्रकाश सेल के 2 cm2 क्षेत्रफल के पृष्ठ पर पड़ता है। यह मान लें कि ऊपर की सोडियम की पाँच परतें आपतित ऊर्जा को अवशोषित करती हैं तो विकिरण के तरंग-चित्रण में प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के लिए आवश्यक समय का आकलन कीजिए। धातु के लिए कार्य-फलन लगभग 2eV दिया गया है। आपके उत्तर का क्या निहितार्थ है?
हल:
दिया है, प्रकाश की तीव्रता I = 10-5 W/m2
सेल का क्षेत्रफल A= 2 x 10-4m, कार्य-फलन Φ0 = 2eV
∴ सोडियम परमाणु की लगभग त्रिज्या r = 10-10 m
∴ सोडियम परमाणु का लगभग क्षेत्रफल πr² = 3.14 x 10-20 = 10-20 m2
∴ एक परत में उपस्थित सोडियम परमाणुओं की संख्या
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter 30
∴ 5 परतों में परमाणुओं की संख्या n= 5 x 2x 1016 = 1017
∵ सोडियम के एक परमाणु में एक चालन इलेक्ट्रॉन होता है; अतः इन n परमाणुओं में n चालन इलेक्ट्रॉन होंगे। सेल पर प्रति सेकण्ड आपतित प्रकाशिक ऊर्जा = I x A
= 10-5 x 2 x 10-4 = 2x 109W
∵ कुल ऊर्जा.सोडियम की पाँच (UPBoardSolutions.com) परतों द्वारा अवशोषित होती है; अतः तरंग सिद्धान्त के अनुसार यह ऊर्जा पाँच परतों के n. इलेक्ट्रॉनों में समान रूप से बँट जाती है।
∴ एक इलेक्ट्रॉन को प्रति सेकण्ड प्राप्त होने वाली ऊर्जा
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अर्थात् 1 इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित कराने के लिए आवश्यक ऊर्जा = 3.2 x 10-19 J
∴ किसी इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित होने में लगा समय है = पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त करने में लगा समय
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उत्तर का निहितार्थ: इस उत्तर से स्पष्ट है कि प्रकाश के तरंग सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश विद्युत-उत्सर्जन की घटना में एक इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित होने में लगने वाला (UPBoardSolutions.com) समय बहुत अधिक है जो कि इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन में लगे प्रेक्षित समय (लगभग 10-9s) से मेल नहीं खाता। इससे स्पष्ट है कि प्रकाश का तरंग सिद्धान्त प्रकाश विद्युत उत्सर्जन की व्याख्या नहीं कर सकता।

प्रश्न 31:
X-किरणों के प्रयोग अथवा उपयुक्त वोल्टता से त्वरित इलेक्ट्रॉनों से क्रिस्टल-विवर्तन प्रयोग किए जा सकते हैं। कौन-सी जाँच अधिक ऊर्जा सम्बद्ध है? (परिमाणिक तुलना के लिए, जाँच के लिए तरंगदैर्घ्य को 1[latex]\mathring { A }[/latex] लीजिए, जो कि जालक (लेटिस) में अन्तर-परमाणु अन्तरण की कोटि को है) (me = 9.11 x 10-31 kg)।
हल:
दिया है, X-किरण फोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्घ्य λ = 1[latex]\mathring { A }[/latex] = 10-10 m
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प्रश्न 32:
(a) एक न्यूट्रॉन, जिसकी गतिज ऊर्जा 150 eV है, का डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य प्राप्त कीजिए। जैसा कि आपने प्रश्न 31 में देखा है, इतनी ऊर्जा का इलेक्ट्रॉन किरण-पुंज क्रिस्टल विवर्तन प्रयोग के लिए उपयुक्त है। क्या समान ऊर्जा का एक न्यूट्रॉन किरण-पुंज इस प्रयोग
के लिए समान रूप से उपयुक्त होगा? स्पष्ट कीजिए। [mn = 1.675 x 10-27 kg]
(b) कमरे के सामान्य ताप (27°C) पर ऊष्मीय न्यूट्रॉन से जुड़े डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। इस प्रकार स्पष्ट कीजिए कि क्यों एक तीव्रगामी न्यूट्रॉन को न्यूट्रॉन-विवर्तन प्रयोग में उपयोग में लाने से पहले वातावरण के साथ तापीकृत किया जाता है।
हल:
(a) दिया है, न्यूट्रॉन की ऊर्जा E = 150 eV = 150 x 1.6 x 10-19 J.
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(b) दिया है, कमरे का तापमान T = 27 + 273 = 300K
न्यूट्रॉन का द्रव्यमान mn = 1.675 x 10-27 kg
बोल्टजमैन नियतांक k = 1.38 x 10-23 J/mole K
कमरे के ताप पर न्यूट्रॉन की गतिज ऊर्जा
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स्पष्ट है कि 27°C के न्यूट्रॉन की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य, क्रिस्टलों में अन्तरापरमाण्विक दूरी के साथ तुलनीय है। अतः यह न्यूट्रॉन क्रिस्टल विवर्तन प्रयोग के लिए उपयुक्त है। इससे स्पष्ट है कि न्यूट्रॉनों को क्रिस्टल विवर्तन प्रयोगों में उपयोग में लाने के लिए उन्हें वातावरण के साथ तापीकृत करना चाहिए।

प्रश्न 33:
एक इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में 50 kV वोल्टता के द्वारा त्वरित इलेक्ट्रॉनों का उपयोग किया जाता है। इन इलेक्ट्रॉनों से जुड़े डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। यदि अन्य (UPBoardSolutions.com) बातों (जैसे कि संख्यात्मक द्वारक आदि) को लगभग समान लिया जाए, इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता की तुलना पीले प्रकाश का प्रयोग करने वाले प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से किस प्रकार होती है?
हल:
दिया है, इलेक्ट्रॉनों का त्वरक विभवान्तर V= 50kV= 50 x 103 v
∴ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E = eV जूल
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter 33
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प्रश्न 34:
किसी जाँच की तरंगदैर्घ्य उसके द्वारा कुछ विस्तार में जाँच की जा सकने वाली संरचना के आकार की लगभग आमाप है। प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों की क्वार्क (quark) संरचना 10-15 m या इससे भी कम लम्बाई के लघु पैमाने की है। इस संरचना को सर्वप्रथम 1970 दशक के प्रारम्भ में, एक रेखीय त्वरित्र (Linear accelerator) से उत्पन्न उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों के किरणे-पुंजों के उपयोग द्वारा, स्टैनफोर्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका में जाँचा गया था। इन इलेक्ट्रॉन किरण-पुंजों की ऊर्जा की कोटि का अनुमान लगाइए। (इलेक्ट्रॉन
की विराम द्रव्यमान ऊर्जा 0.511 MeV है।)
हल:
क्वार्क संरचना का आमाप, λ = 10-15m
इलेक्ट्रॉन का विराम द्रव्यमान m0 = 9.1 x 10-31 kg
∴ इलेक्ट्रॉन की विराम द्रव्यमान ऊर्जा ।
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प्रश्न 35:
कमरे के ताप (27°C) और 1 atm दाब पर He परमाणु से जुड़े प्रारूपी डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए और इन परिस्थितियों में इसकी तुलना दो परमाणुओं के बीच औसत दूरी से कीजिए।
हल:
कमरे का ताप T = 27 + 273 = 300 K
He का परमाणु द्रव्यमान = 4g
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प्रश्न 36:
किसी धातु में (27°C) पर एक इलेक्ट्रॉन का प्रारूपी डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य परिकलित कीजिए और इसकी तुलना धातु में दो इलेक्ट्रॉनों के बीच औसत पृथक्य से कीजिए जो लगभग 2 x 10-10 m दिया गया है। (नोट-प्रश्न 35 और 36 प्रदर्शित करते हैं कि जहाँ सामान्य परिस्थितियों में गैसीय अणुओं से जुड़े तरंग पैकेट अ-अतिव्यापी हैं; किसी धातु में इलेक्ट्रॉन तरंग पैकेट प्रबल रूप से एक-दूसरे से अतिव्यापी हैं। यह सुझाता है कि जहाँ किसी सामान्य गैस में अणुओं की अलग पहचान हो सकती है, किसी धातु में । इलेक्ट्रॉन की एक-दूसरे से अलग पहचान नहीं हो सकती। इस अप्रभेद्यता के कई मूल निहितार्थताएँ हैं। जिन्हें आप भौतिकी के अधिक उच्च पाठ्यक्रमों में जानेंगे]
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter 36
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 37:
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(a) ऐसा विचार किया गया है कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के भीतर क्वार्क पर आंशिक आवेश होते
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter 37
यह मिलिकन तेल-बूंद प्रयोग में क्यों नहीं प्रकट होते?
(b) संयोग की क्या विशिष्टता है? हम e तथाm के विषय में अलग-अलग विचार क्यों नहीं करते?
(c) गैसें सामान्य दाब पर कुचालक होती हैं, परन्तु बहुत कम दाब पर चालन प्रारम्भ कर देती हैं। क्यों?
(d) प्रत्येक धातु का एक निश्चित कार्य-फलन होता है। यदि आपतित विकिरण एकवर्णी हो तो सभी प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन समान ऊर्जा के साथ बाहर क्यों नहीं आते हैं? प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों का एक ऊर्जा वितरण क्यों होता है?
(e) एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा तथा इसका संवेग इससे जुड़े पदार्थ-तरंग की आवृत्ति तथा इसके तरंगदैर्घ्य के साथ निम्न प्रकार सम्बन्धित होते हैं
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter 37b
परन्तु λ का मान जहाँ भौतिक महत्त्व का है, के मान (और इसलिए कला चाल 22 को मान) का कोई भौतिक महत्त्व नहीं है। क्यों?
उत्तर:
(a) भिन्नात्मक आवेश वाले क्वार्क न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन के भीतर इस प्रकार सीमित रहते हैं कि प्रोटॉन में उपस्थित क्वार्को के आवेशों का योग +e तथा न्यूट्रॉन में उपस्थित क्वार्को के आवेशों का योग । शून्य बना रहता है तथा ये क्वार्क पारस्परिक आकर्षण बलों द्वारा बँधे रहते हैं। जब इन्हें (UPBoardSolutions.com) अलग करने का प्रयास किया जाता है तो बल और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और इसी कारण वे एक साथ बने रहते हैं। इसीलिए प्रकृति में भिन्नात्मक आवेश मुक्त अवस्था में नहीं पाए जाते अपितु वे सदैव इलेक्ट्रॉनिक आवेश के पूर्ण गुणज के रूप में ही पाए जाते हैं।

(b) इलेक्ट्रॉन की गति समीकरणों eV= [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] mν, eE = ma तथा eνB = mν2/r द्वारा निर्धारित होती है। इनमें से प्रत्येक में e तथा m दोनों एक साथ आए हैं। इससे स्पष्ट है कि इलेक्ट्रॉन की गति के लिए e अथवा m पर अकेले-अकेले विचार करने के स्थान पर [latex]\frac { e }{ m }[/latex] पर विचार किया जाता है।

(c) सामान्य दाब पर गैसों में विसर्जन के कारण उत्पन्न आयन कुछ ही दूरी तय करने तक गैस के
अन्य अणुओं से टकराकर उदासीन हो जाते हैं (UPBoardSolutions.com) और इस कारण सामान्य दाब पर गैसों में विद्युत चालन नहीं हो पाता। इसके विपरीत अत्यन्त निम्न दाब पर गैस में अणुओं की संख्या बहुत कम रह जाती है। इस कारण उत्पन्न आयन अन्य अणुओं से टकराने से पूर्व ही विपरीत इलेक्ट्रॉड तक पहुँच जाते हैं।

(d) कार्य फलन से, धातु में उच्चतम ऊर्जा स्तर अथवा चालन बैण्ड में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा का ज्ञान होता है। परन्तु प्रकाश विद्युत उत्सर्जन में । इलेक्ट्रॉन अलग-अलग ऊर्जा स्तरों से निकल कर आते हैं। अतः उत्सर्जन के बाद उनके पास , भिन्न-भिन्न ऊर्जाएँ होती हैं।

(e) किसी द्रव्य कण की ऊर्जा का निरपेक्ष मान (न कि संवेग) एक निरपेक्ष स्थिरांक के अधीन स्वेच्छ होता है। यही कारण है कि द्रव्य तरंगों से सम्बद्ध तरंगदैर्घ्य λ का ही भौतिक महत्त्व होता है न कि आवृत्ति ν का। इसी कारण कला वेग νλका भी कोई भौतिक महत्त्व नहीं होता।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1:
किसी धातु का कार्य फलन  [latex]\frac { hc }{ { \lambda }_{ 0 } }[/latex] है। इसके पृष्ठ पर λ तरंगदैर्घ्य का प्रकाश आपतित होता है। धातु में से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के लिए शर्त है (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter p1
उत्तर:
(iii) λ = λ0

प्रश्न 2:
किसी धात्विक पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन तभी सम्भव है, जब आपतित प्रकाश की आवृत्ति (2016)
(i) देहली आवृत्तिं की आधी हो।
(ii) देहली आवृत्ति की एक तिहाई हो
(iii) देहली आवृत्ति से कुछ कम हो
(iv) देहली आवृत्ति से अधिक हो।
उत्तर:
(iv) देहली आवृत्ति से अधिक हो।

प्रश्न 3:
प्रकाश वैद्युत प्रयोग में निरोधी विभव Vs तथा आपतित प्रकाश की आवृत्ति के बीच ग्राफ खींचने पर एक सरल रेखा प्राप्त होती है जो अक्ष से 8 कोण बनाती है। यदि पृष्ठ का कार्य फलन Φ हो, तो tanθ का मान होगा
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter p3
उत्तर:
(i)
[latex]\frac { h }{ e }[/latex]

प्रश्न 4:
समान गतिज ऊर्जा वाले विभिन्न कणों की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य (λ), कण के द्रव्यमान पर (m) निर्भर करती है (2014)
(i) λ α m
(ii) λ α m1/2
(iii) λ α m-1
(iv) λ α m-1/2
उत्तर:
(iv)
 λ α m-1/2

प्रश्न 5:
किसी गतिमान कण से सम्बद्ध डी-ब्रॉग्ली तरंग की तरंगदैर्घ्य निर्भर नहीं करती है (2011, 16)
(i) द्रव्यमान पर
(ii) आवेश पर
(iii) वेग पर
(iv) संवेग पर
उत्तर:
(ii) आवेश पर

प्रश्न 6:
यदि किसी कण का संवेग दुगुना कर दिया जाए, तो इसकी डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य होगी (2017)
(i) अपरिवर्तित
(i) चारगुनी
(iii) दुगुनी
(iv) आधी
उत्तर:
(iv) आधी

प्रश्न 7:
फोटॉन.का विराम द्रव्यमान होता है
(i) E/c2
(ii) h/cλ
(iii) h/λ
(iv) शून्य
उत्तर:
(iv) शून्य

प्रश्न 8:
फोटॉन के गतिक द्रव्यमान का सूत्र है (2009)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter p8
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter p8a

प्रश्न 9:
फोटॉन के गतिज द्रव्यमान का सूत्र है (2015, 17)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter p9
जहाँ, h प्लांक नियतांक, ν फोटॉन की आवृत्ति तथा c उसकी चाल है
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter p9a

प्रश्न 10:
एक फोटॉन की तरंगदैर्घ्य 1[latex]\mathring { A }[/latex] है। इसका संवेग होगा : (2011)
(i) 0.1 h
(ii) 10h
(iii) 1010h
(iv) 1011h
उत्तर:
(iii) 1010h

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
प्रकाश-वैद्युत कार्य-फलन से क्या तात्पर्य है? (2009, 10, 11)
या
कार्य-फलन की परिभाषा लिखिए। (2013, 18)
या
कार्य-फलन से आप क्या समझते हैं? (2014)
उत्तर:
“वह न्यूनतम प्रकाश ऊर्जा जो किसी धातु पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करने के लिए आवश्यक होती है, उस धातु का प्रकाश वैद्युत कार्य-फलम (work function) कहलाता है। सामान्यत: इसको W से व्यक्त करते हैं।
W = hν0 अथवा w = hc/λ0

प्रश्न 2:
सीजियम का कार्यफलन 2eV है। इस कथन की व्याख्या कीजिए। (2010)
उत्तर:
सीजियम धातु के पृष्ठ से प्रकाश इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करने के लिए इस पर आपतित प्रकाश फोटॉन की न्यूनतम ऊर्जा 2 eV होनी चाहिए।

प्रश्न 3:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव में देहली आवृत्ति से क्या तात्पर्य है? इसकी क्या महत्ता है? (2011)
या
देहली आवृत्ति से आप क्या समझते हैं? (2013, 14, 17)
या
प्रकाश वैद्युत उत्सर्जन में देहली आवृत्ति से आप क्या समझते हैं? (2017)
उत्तर:
देहली आवृत्ति आपतित प्रकाश की वह न्यूनतम आवृत्ति है जो किसी धातु से प्रकाश-इलेक्ट्रॉन का। उत्सर्जन कर सके। इसे ν0 से प्रदर्शित करते हैं। इससे कम आवृत्ति के प्रकाश से धातु से कोई प्रकाश-इलेक्ट्रॉन नहीं निकलता है। यही इसकी महत्ता है।।

प्रश्न 4:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव में देहली तरंगदैर्ध्य से आप क्या समझते हैं? (2009, 17, 18)
उत्तर:
देहली तरंगदैर्ध्य-किसी धातु पर आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य का वह अधिकतम मान जिससे तरंगदैर्ध्य का प्रकाश धातु-पृष्ठ से प्रकाश इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित कर सके, देहली तरंगदैर्ध्य कहलाता है। इसको λ0 से प्रदर्शित करते हैं। यह देहली आवृत्ति के संगत तरंगदैर्घ्य होती है, अर्थात् λ0= c/ν0, जहाँ c = प्रकाश की चाल (निर्वात् में)।

प्रश्न 5:
सीजियम धातु के पृष्ठ का कार्यफलन 1.8eV हो तो देहली तरंगदैर्ध्य क्या होगी? (2011,14)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 6:
एक धातु का कार्य-फलन 2.5eV है, 2eV ऊर्जा के दो फोटॉन धातु पृष्ठ पर आपतित होते हैं। कारण सहित स्पष्ट कीजिए कि फोटो इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हींगे या नहीं। (2014)
हल:
धातु का कार्य-फलन W = 2.5 eV है तथा इस पर आपतित दोनों फोटॉनों में प्रत्येक की ऊर्जा hν = 2 eV; चूँकि hν <W, अत: फोटो-इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा क्योंकि फोटो-इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन फोटॉन की ऊर्जा पर निर्भर करता है, धातु पर आपतित सभी फोटॉनों की कुल ऊर्जा पर नहीं।

प्रश्न 7:
किसी पृष्ठ का कार्य-फलन 2.5 इलेक्ट्रॉन वोल्ट है। उसके लिए देहली आवृत्ति ज्ञात कीजिए। (2013)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 8:
किसी धातु जिसका कार्य-फलन 3.2eV है, पर 4.0 eV ऊर्जा वाला एक फोटॉन आपतित होता है। उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा कितनी होगी? (2013, 14)
हल:
उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा
Ek = hν – W = 4eV- 3.2eV
= 0.8 eV= 0.8 x 1.6 x 10-19 जूल
= 1.28 x 10-19 जूल

प्रश्न 9:
किसी धातु के लिए कार्य फलन 3.3 इलेक्ट्रॉन वोल्ट है। धातु के लिए देहली आवृत्ति की  गणना कीजिए। (2017)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 10:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के प्रयोग में आपतित प्रकाश की आवृत्ति दोगुनी करने पर उत्सर्जित प्रकाश-इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा कितनी बढ़ जायेगी ? (2012)
उत्तर:
∵ E = hν
∴ गतिज ऊर्जा दोगुनी हो जायेगी।

प्रश्न 11:
प्रकाश वैद्युत प्रभाव में आपतित प्रकाश की आवृत्ति और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा के बीच ग्राफ खींचिए। (2017)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 12:
फोटॉन की ऊर्जा तथा संवेग में सम्बन्ध लिखिए। (2009, 11)
उत्तर:
संवेग p =[latex]\frac { E }{ c }[/latex] (जहाँ E = ऊर्जा, c = प्रकाश का वेग)।

प्रश्न 13:
4000[latex]\mathring { A }[/latex]  तरंगदैर्घ्य वाले एकवर्णीय प्रकाश के फोटॉन की ऊर्जा ज्ञात कीजिए। (2012)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter A13

प्रश्न 14:
एक फोटॉन की ऊर्जा 30eV है। इसका संवेग ज्ञात कीजिए। (2012)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 15:
डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र लिखिए। (2017)
हल:
λ = [latex]\frac { h }{ m\upsilon }[/latex] जहाँ, λ तरंगदैर्घ्य, h प्लांक नियतांक, m कण का द्रव्यमान तथा ν कण का वेग है।

प्रश्न 16:
एक इलेक्ट्रॉन 0.5 x 103 मी/से की चाल से गतिमान है। इससे सम्बद्ध डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। (2017)
हल:
दिया है, ν = 0.5 x 103 मी/से, λ = ?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 17:
एक गतिमान कण का डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य 2.0[latex]\mathring { A }[/latex]  है। कण का संवेग क्या है? (2014, 17)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter A17

प्रश्न 18:
किसी आवेशित कण का द्रव्यमान m तथा इस पर q आवेश है। यदि कण V विभवान्तर सेत्वरित किया जाए, तो इससे सम्बन्धित डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य का सूत्र लिखिए। (2015)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

प्रश्न 19:
m द्रव्यमान के कण के साथ जुड़ी डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य λ  का सम्बन्ध इसके गतिज ऊर्जा K के पदों में लिखिए। (2016)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter A19
जहाँ λ = तरंगदैर्घ्य, m = कण का द्रव्यमान तथा K = गतिज ऊर्जा

प्रश्न 20:
प्रोटॉन तथा α-कण की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य समान हों तो उनकी चालों में अनुपात क्या होगा? (mα = 4mp) (2016)
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 11 Dual Nature of Radiation and Matter

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियम लिखिए। या प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन के नियम लिखिए। (2012, 15, 17)
उत्तर:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियम: वैज्ञानिक लेनार्ड तथा मिलीकन ने प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के सम्बन्ध में किये गये प्रयोगों से प्राप्त प्रेक्षणों के आधार पर कुछ नियम दिये जो प्रकाश-वैद्युत प्रभाव (ऊष्मा उत्सर्जन) के नियम कहलाते हैं।
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियम निम्नलिखित हैं

  1. किसी धातु की सतह से प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन की दर धातु की सतह पर गिरने वाले प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।
  2. उत्सर्जित प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती।
  3. प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम (UPBoardSolutions.com) गतिज ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति के बढ़ने पर बढ़ती है।
  4.  यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति एक न्यूनतम मान से कम है तो धातु से कोई भी प्रक़ाश-इलेक्ट्रॉन नहीं निकलता। यह न्यूनतम आवृत्ति (देहली आवृत्ति) भिन्न-भिन्न धातुओं के लिए भिन्न-भिन्न होती है।
  5. प्रकाश के धातु की सतह पर गिरते ही इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं, अर्थात् प्रकाश के सतह पर गिरने तथा इलेक्ट्रॉन के सतह से बाहर निकलने के बीच कोई समय-पश्चता (time-lag) नहीं . होती, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी क्यों न हो।

प्रश्न 2:
प्रकाश:वैद्युत धारा पर क्या प्रभाव पड़ता है, यदि (i) आपतित प्रकाश की तीव्रता बढ़ा दी जाए? (ii) आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य घटा दी जाए? (2013)
उत्तर:
(i)
यदि आपतित प्रकाश की तीव्रता बढ़ा दी जाए तब धातु पर प्रति सेकण्ड अधिक फोटॉन गिरेंगे जिससे कि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ेगी अर्थात् प्रकाश वैद्युत धारा बढ़ेगी।
(ii) आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य घटाने पर भी प्रकाश वैद्युत धारा को मान बढ़ जायेगा।

प्रश्न 3:
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण लिखिए तथा इसकी व्याख्या कीजिए। (2009, 12, 15)
या
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण लिखिए तथा इसकी सहायता से प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियमों को समझाइए। (2017)
या
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन सम्बन्धी समीकरण के आधार पर प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियमों की व्याख्या कीजिए। (2013)
या
आइन्सटीन का प्रकाश-वैद्युत प्रभाव का समीकरण लिखिए तथा प्रयुक्त संकेतों का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर:
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण
[latex]\frac { RT }{ F }[/latex] mν2max = h(ν – ν0) ……..(1)
जहाँ m = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, νmax = उत्सर्जित फोटो इलेक्ट्रॉनों का अधिकतम वेग, h= प्लांक नियतांक, ν = धातु पर आपतित फोटॉन की आवृत्ति, ν0 = देहली आवृत्ति।
व्याख्या:
आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण के आधार पर प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियमों की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है

(i) जब किसी धातु-पृष्ठ पर आपतित निश्चित आवृत्ति के प्रकाश की तीव्रता बढ़ायी जाती है तो सतह पर प्रति सेकण्ड आपतित फोटॉनों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ जाती है परन्तु प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा hν नियत रहेगी। आपतित फोटॉन की संख्या बढ़ने से उत्सर्जित (UPBoardSolutions.com) प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाएगी, परन्तु समी० (1) से स्पष्ट है कि आवृत्ति के निश्चित होने तथा धातु विशेष के लिए ν0 निश्चित होने से पृष्ठ से उत्सर्जित सभी प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा Ek एकसमान । होगी। अत: प्रकाश इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन की दर तो आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है। परन्तु इनकी अधिकतम गतिज ऊर्जा नहीं। ये ही क्रमश: प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के पहले तथा दूसरे नियम के कथन हैं।

(ii) समीकरण (1) से यह भी स्पष्ट है कि आपतित प्रकाश की आवृत्ति ν बढ़ाने पर उत्सर्जित प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा Ek उसी अनुपात में बढ़ जाएगी। यही प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के तीसरे नियम का कथन है।

(iii) समीकरण (1) में यदि ν < νतो Ek का मान ऋणात्मक होगा, जो असम्भवं है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति ν0 से कम है तो प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन सम्भव नहीं है, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो। यही प्रकाश-वैद्युत प्रभाव का चौथा नियम है।

(iv) जब प्रकाश किसी धातु-पृष्ठ पर गिरता है तो जैसे ही कोई एक प्रकाश फोटॉन धातु पर आपतित होता है, धातु का कोई एक इलेक्ट्रॉन तुरन्त उसे ज्यों-का-त्यों (UPBoardSolutions.com) अवशोषित कर लेता है तथा धातु-पृष्ठ से उत्सर्जित हो जाता हैं। इस प्रकार धातु-पृष्ठ पर प्रकाश के आपतित होने तथा इससे प्रकाश-इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जित होने में कोई पश्चता नहीं होती। यही प्रकाश-वैद्युत प्रभाव का पाँचवाँ नियम है।

प्रश्न 4:
विकिरण सम्बन्धी प्लांक की परिकल्पना समझाइए। इसके द्वारा फोटॉन के गतिमान द्रव्यमान का व्यंजक प्राप्त कीजिए। फोटॉन संवेग क्या होगा? या फोटॉन किसे कहते हैं ? इसके गतिज द्रव्यमान एवं संवेग का सूत्र लिखिए। (2012)
या
फोटॉन के गतिज द्रव्यमान का सूत्र लिखिए। (2012)
या
फोटॉन के विराम द्रव्यमान तथा गतिक द्रव्यमान से आप क्या समझते हैं? फोटॉन का संवेग P = [latex]\frac { h }{ \lambda }[/latex] निगमित कीजिए जहाँ h प्लांक नियतांक तथा 2 फोटॉन की तरंगदैर्घ्य है। (2014)
उत्तर:
कृष्णिका विकिरण के स्पेक्ट्रमी वितरण की व्याख्या करने के लिए सन् 1900 में जर्मनी के वैज्ञानिक मैक्स प्लांक ने एक क्रान्तिकारी विचार रखा जिसे ‘प्लांक की क्वाण्टम परिकल्पना’ कहते हैं। इसके अनुसार, किसी पदार्थ द्वारा ऊर्जा का उत्सर्जन अथवा अवशोषण सतत रूप से न होकर ऊर्जा के छोटे-छोटे बण्डलों अथवा पैकेटों के रूप में होता है, जिन्हें ‘फोटॉन’ अथवा ‘क्वाण्टम’ कहते हैं। प्रत्येक (UPBoardSolutions.com) तरंगदैर्घ्य 2 अथवा आवृत्ति (=c/λ) का अपना एक अलग फोटॉन होता है जिसकी ऊर्जा की मात्रा hν होती है; जहाँ । एक नियतांक है, जिसे ‘प्लांक नियतांक’ कहते हैं। प्लांक ने बताया कि कोई भी वस्तु ऊष्मा का उत्सर्जन अथवा अवशोषण इन फोटॉनों के पूर्ण गुणज के रूप में कर सकती है, अर्थात् कोई वस्तु hν, 2hν, 3haν,… आदि के रूप में ऊर्जा का अवशोषण अथवा उत्सर्जन करेगी।
प्लांक नियतांक का मात्रक जूल-सेकण्ड है।
प्लांक ने इस परिकल्पना के आधार पर ऊर्जा वितरण का सूत्र दिया जो कि ल्यूमर तथा प्रिंग्जहाइम के प्रायोगिक (Eλ – λ) वक्रों के पूर्णत: अनुकूल था। आइन्सटीन ने भी इस परिकल्पना की सहायता से प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की सफल व्याख्या की।

फोटॉन का विराम द्रव्यमान तथा गतिक (गतिज) द्रव्यमान:

फोटॉन का विराम द्रव्यमान शून्य होता है, परन्तु इसका गतिक द्रव्यमान शून्य नहीं होता। फोटॉन प्रकाश की चाल से गति करते हैं तथा गतिज अवस्था में फोटॉन की (UPBoardSolutions.com) ऊर्जा के कारण उसमें जो द्रव्यमान होता है, वह फोटॉन का गतिक द्रव्यमान । कहलाता है। आइन्सटीन के द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण के अनुसार
फोटॉन की ऊर्जा E = mc2 …….(1)
जहाँ m = फोटॉन का गतिज द्रव्यमान
तथा c = फोटॉन (प्रकाश) का वेग
प्लांक के अनुसार फोटॉन की ऊर्जा E = hν …..(2)
समी० (1) व समी० (2) से, mc2 = hν
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प्रश्न 5:
द्रव्य तरंगें क्या हैं? द्रव्य तरंगों की तरंगदैर्ध्य का सूत्र लिखिए। (2017, 18)
या
लूईडी-ब्रॉग्ली के द्रव्य तरंग की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। द्रव्य तरंगों के तरंगदैर्घ्य का सूत्र स्थापित कीजिए। (2009, 11, 16, 17)
या
डी-ब्रॉग्ली तरंगें क्या हैं? डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य के लिये व्यंजक लिखिए। (2010, 17)
या
m द्रव्यमान का एक कण वेग से गतिमान है। कण के साथ सम्बन्ध डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य का सूत्र लिखिए। (2012, 15)
या
द्रव्य तरंगें क्या हैं? डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य के लिए सूत्र लिखिए। इन तरंगों का प्रायोगिक सत्यापन करने वाले प्रयोग का नाम लिखिए। (2015)
या
डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का व्यंजक लिखिए। (2016)
उत्तर:
द्रव्य तरंगें (Matter Waves)-सन् 1922 में डी-ब्रॉग्ली (de-Broglie) ने विचार रखा कि पदार्थ और विकिरण की पारस्परिक क्रिया समझने के लिए कणों को पृथक् रूप में न मानकर तरंग पद्धति से समन्वित माना जाये। उन्होंने बताया कि जब कोई द्रव्य-कण चलता है तो वह भी तरंग की भाँति व्यवहार करता है। इस सिद्धान्त का सत्यापन डेवीसन (Davission) और जर्मर (Germer) ने अपने प्रयोगों (UPBoardSolutions.com) द्वारा किया। उन्होंने स्थापित किया कि इलेक्ट्रॉन के किरण पूँज का विवर्तन देखा जा सकता है, जो एक तरंग का गुण है। अत: द्वैती प्रकृति न केवल प्रकाश में होती है बल्कि यह द्रव्य-कणों में भी होती है।
अतः “गतिमान द्रव्य-कणों (इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि) से तरंग सम्बद्ध होती है। इन तरंगों को द्रव्ये तरंगें अथवा डी-बॉग्ली तरंगें (de-Broglie’s Waves) कहते हैं। द्रव्य तरंगों की तरंगदैर्घ्य डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य कहलाती है।”
द्रव्य तरंगों की तरंगदैर्ध्य
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प्रश्न 6:
प्रकाश-वैद्युत प्रवाह पर एक प्रयोग में निम्न प्रेक्षण प्राप्त होते हैं
(i) आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य = 1.98 x 10-7 मीटर
(ii) संस्तब्ध विभव = 2.5 वोल्ट
फोटो इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा तथा धातु का कार्य फलन ज्ञात कीजिए। (2012)
हल:
फोटो इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा
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प्रश्न 7:
सोडियम का कार्य-फलन 2.0 eV है। ज्ञात कीजिए कि क्या 7000[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य का प्रकाश उसके | पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित कर सकेगा? h = 6.6 x 10-34 जूल-से, c = 3 x 108 मी/से। (2009,11)
हल:
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परन्तु यहाँ सोडियम का कार्य फलन W = 2.0 eV
चूंकि E < w
इसलिए 7000[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य का प्रकाश सोडियम के पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं कर सकेगा।

प्रश्न 8:
एक पदार्थ से फोटो इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन की देहली तरंगदैर्घ्य 6000[latex]\mathring { A }[/latex] है। इसकी सतह पर 4000[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य का प्रकाश डाला जाता है। उत्सर्जित फोटो इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा तथा निरोधी-विभव ज्ञात कीजिए। (2012, 18)
हल:
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प्रश्न 9:
किसी धातु का कार्य-फलन 6.8 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट है। इस पर 100[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य का विकिरण आपतित हो रहा है। उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा की गणना कीजिए। (2014)
हल:
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प्रश्न 10:
5400[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य का विकिरण एक धातु पर गिरता है जिसका कार्य-फलन1.9 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट है। उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा तथा उसका निरोधी विभव ज्ञात कीजिए। (2014)
हल:
उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की अधिकतम ऊर्जा
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प्रश्न 11:
एक प्रकाश सुग्राही धातु पृष्ठ का कार्य-फलन hν0 है। जब 2hν0 ऊर्जा के फोटॉन धातु पृष्ठ पर डाले जाते हैं तब 4×106 मीटर/सेकण्ड के अधिकतम वेग से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। यदि आपतित फोटॉन की ऊर्जा 5hν0 हो, तब उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन का अधिकतम वेग क्या होगा? (2015)
हल:
आइन्स्टीन का प्रकाश वैद्युत समीकरण
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प्रश्न 12:
300 वाट तथा 6000[latex]\mathring { A }[/latex] तरंगदैर्घ्य के एकवर्षीय प्रकाश स्रोत से प्रति सेकण्ड कितने फोटॉन का उत्सर्जन होता है?
[प्लांक नियतांक (h) = 6.6 x 10-34 Js तथा प्रकाश की चाल (c) = 3×108 ms-1] (2017)
हल:
प्रकाश स्रोत से उत्सर्जित प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा,
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300 वाट के प्रकाश स्रोत से प्रति सेकण्ड उत्सर्जित ऊर्जा 300 जूल/सेकण्ड है।
अत: प्रकाश स्रोत से प्रति सेकण्ड निकलने वाले फोटॉन की संख्या
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प्रश्न 13:
1.6 x 10-27 किलोग्राम द्रव्यमान के न्यूट्रॉन की गतिज ऊर्जा 0.04 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट है।  न्यूट्रॉन की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। (2015)
हल:
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प्रश्न 14:
समान चाल से गतिशील इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटॉन से सम्बद्ध डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य का अनुपात ज्ञात कीजिए। प्रोटॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान का 1840 गुना है। (2016)
उत्तर:
हम जानते हैं कि ν  चाल से गतिमान m द्रव्यमान के कण से बद्ध डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य,  λ =  [latex]\frac { m }{ \upsilon }[/latex]
जहाँ h प्लांक नियतांक है, इस प्रकार
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन सम्बन्धी आइन्स्टीन की समीकरण  [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] mν2max = h(ν – ν0) की स्थापना कीजिए। (2010, 14, 16, 17)
या
क्वाण्टम मॉडल के आधार पर प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की व्याख्या कीजिए तथा आइन्स्टीन के प्रकाश-वैद्युत समीकरण को व्युत्पादित कीजिए। (2011, 15)
या
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव से आप क्या समझते हैं? आइन्स्टीन के प्रकाश-वैद्युत समीकरण को व्युत्पन्न कीजिए। (2012)
या
आइन्सटीन द्वारा प्रकाश वैद्युत उत्सर्जन की घटना की व्याख्या कीजिए तथा प्रकाश-वैद्युत समीकरण व्युत्पादित कीजिए। (2013)
या
प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन सम्बन्धी आइन्स्टीन की समीकरण को व्युत्पन्न कीजिए। (2013, 17)
या
प्रकाश वैद्युत उत्सर्जन में उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम ऊर्जा का समीकरण व्युत्पन्न कीजिए। (2015, 17)
उत्तर:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect)-जब किसी धातु पर उच्च आवृत्ति का प्रकाश (जैसे—पराबैंगनी विकिरण) डाला जाता है तो उसकी सतह से इलेक्ट्रॉन निकलने लगते हैं।
” धातुओं पर प्रकाश के आपतित होने से उनकी सतह से इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन (emission) की घटना को प्रकाश-वैद्युत प्रभाव (photoelectric effect) कहते हैं।”
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की घटना में उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को प्रकाश-इलेक्ट्रॉन अथवा फोटो- इलेक्ट्रॉन (photoelectron) तथा इन इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के कारण उत्पन्न वैद्युत धारा को प्रकाश-वैद्युत धारा (photoelectric current) कहते हैं।

आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण (Einstien’s Photoelectric Equation):
वैज्ञानिक आइन्सटीन ने प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की व्याख्या प्रकाश के क्वाण्टम मॉडल के आधार पर इस प्रकार दी। जब कोई फोटॉन धातु की प्लेट पर गिरता है तो वह अपनी ‘संमस्त ऊर्जा’ धातु के भीतर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों में से किसी एक ही इलेक्ट्रॉन को स्थानान्तरित (transfer) कर देता है तथा ऊर्जा का कुछ भाग इलेक्ट्रॉन को धातु के अन्दर से बाहर निकालने में व्यय हो जाता है जो धातु का कार्य-फलन कहलाता है। तथा शेष ऊर्जा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन को उसकी गतिज ऊर्जा के रूप में प्राप्त हो जाती है जिससे इलेक्ट्रॉन धातु पृष्ठ से उत्सर्जित हो जाता है। यही प्रकाश-वैद्युत प्रभाव है। चूंकि सभी इलेक्ट्रॉन धातु की सतह से ही उत्सर्जित नहीं होते; अतः धातु से विभिन्न ऊर्जाओं के इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं; क्योंकि जो इलेक्ट्रॉन धातु के भीतर से निकलकर (UPBoardSolutions.com) सतह पर पहुँचते हैं वे सतह तक आने में धन आयनों व परमाणुओं से टकराते हैं; जिससे वे कुछ ऊर्जा खो देते हैं। अतः जो इलेक्ट्रॉन धातु की सतह से उत्सर्जित होते हैं, उनकी गतिज ऊर्जा अपेक्षाकृत अधिक होती है; क्योंकि उनकी ऊर्जा टकराने में नष्ट नहीं होती है। इस प्रकार धातु की ऊपरी सतह से उत्सर्जित प्रकाश इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है। माना किसी धातु की सतह से उत्सर्जित किसी प्रकाश इलेक्ट्रॉन की (UPBoardSolutions.com) अधिकतम गतिज ऊर्जा E, तथा इसको धातु के अन्दर से बाहर सतह पर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा w है। यहाँ w धातु का कार्य-फलन होगा। अतः आइन्सटीन द्वारा दी गयी प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन की उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार इन दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का योग ही धातु के अन्दर सतह के निकट इलेक्ट्रॉन द्वारा अवशोषित फोटॉन की ऊर्जा hay के बराबर होगा।
∴ Ek + W= hν
अथवा  Ek =  hν – W   …….(1)
समीकरण (1) से स्पष्ट है कि यदि प्रकाश फोटॉन की ऊर्जा hν कार्य-फलन W के बराबर है तो धातु की सतह से कोई भी इलेक्ट्रॉन नहीं निकलेगा। यदि दी हुई धातु के लिए देहली आवृत्ति ν0 है तो इस आवृत्ति का फोटॉन, इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह तक लाने में ही समर्थ होगा, क्योंकि ऐसे फोटॉन (UPBoardSolutions.com) की ऊर्जा hν0 इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह तक लाने में ही व्यय हो जाएगी। अत: सतह पर इसका वेग शून्य होगा, अर्थात् इस फोटॉन की ऊर्जा hν0 धातु के कार्य-फलन के बराबर होगी। अतः W = hν0
w का मान समी० (1) में रखने पर
Ek = hν – hν0
अथवा E = h(ν- ν0) …….(2)
यदि धातु की सतह पर निकलने वाले इलेक्ट्रॉन का अधिकतम वेग νmax है, तो इसकी अधिकतम गतिज ऊर्जा Ek = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] mν2max = h(ν – ν0) होगी। Ek का यह मान उपर्युक्त समी० (2) में रखने पर
[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] mν2max = h(ν – ν0)
इस समीकरण को ‘आइन्सटीन की प्रकाश-वैद्युत समीकरण’ (Einstien’s photoelectric equation) कहते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics (रासायनिक बलगतिकी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics (रासायनिक बलगतिकी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 4
Chapter Name Chemical Kinetics
Number of Questions Solved 79
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics (रासायनिक बलगतिकी)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
R → P, अभिक्रिया के लिए अभिकारक की सान्द्रता 0.03 M से 25 मिनट में परिवर्तित होकर 0.02 M हो जाती है। औसत वेग की गणना सेकण्ड तथा मिनट दोनों इकाइयों में कीजिए।
हल
R → P अभिक्रिया के लिए,
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प्रश्न 2.
2A → उत्पाद, अभिक्रिया में A की सान्द्रता 10 मिनट में 0.5 mol L-1 से घटकर 0.4 mol L-1 रह जाती है। इस समयान्तराल के लिए अभिक्रिया वेग की गणना कीजिए।
हल
2A → उत्पाद, अभिक्रिया के लिए औसत वेग
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प्रश्न 3.
एक अभिक्रिया A + B → उत्पाद, के लिए वेग नियम r = k [A]1/2 [B]2 से दिया गया है। अभिक्रिया की कोटि क्या है?
हल
अभिक्रिया की कोटि = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] + 2 = 2.5

प्रश्न 4.
अणु X का Y में रूपान्तरण द्वितीय कोटि की बलगतिकी के अनुरूप होता है। यदि X की सान्द्रता तीन गुनी कर दी जाए तो Y के निर्माण होने के वेग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
हल
अभिक्रिया X → Y के लिए।
अभिक्रिया का वेग (r) = k[X]2
यदि सान्द्रता तीन गुनी कर दी जाये तब
अभिक्रिया का वेग (r) = [3X]2
[latex s=2]\frac { { r }^{ ‘ } }{ r } =\frac { { k[3X] }^{ 2 } }{ { k[X] }^{ 2 } }=9 [/latex]
अत: Y के निर्माण का वेग 9 गुना बढ़ जायेगा।

प्रश्न 5.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया का वेग स्थिरांक 1.15 x 10-3 s-1 है। इस अभिक्रिया में अभिकारक की 5g मात्रा को घटकर 3g होने में कितना समय लगेगा?
हल
प्रथम कोटि अभिक्रिया के लिए,
[latex s=2]t=\frac { 2.303 }{ k } log\frac { a }{ (a-x) }[/latex]
a = 5 g; (a – x) = 3g; k= 1.15 x 10-3 s-1
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प्रश्न 6.
SO2Cl2 को अपनी प्रारम्भिक मात्रा से आधी मात्रा में वियोजित होने में 60 मिनट का समय लगता है। यदि अभिक्रिया प्रथम कोटि की हो तो वेग स्थिरांक की गणना कीजिए।
हल
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए,
[latex s=2]k=\frac { 0.693 }{ { t }_{ 1/2 } } =\frac { 0.693 }{ 60min } [/latex] = 1.155 × 10-2 min-1
= [latex s=2]\frac { 0.693 }{ 60\times 60s } [/latex] = 1.925 × 10-4 s-1

प्रश्न 7.
ताप का वेग स्थिरांक पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर
सामान्यतः अभिक्रिया का वेग स्थिरांक 10°C ताप बढ़ाने पर लगभग दोगुना हो जाता है। वेग स्थिरांक की ताप पर सटीक निर्भरता आरेनियस समीकरण k = Ae-Ea/RT द्वारा दी जाती है जहाँ A आवृत्ति गुणांक तथा E, अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा है।

प्रश्न 8.
परमताप, 298 K में 10 K की वृद्धि होने पर रासायनिक अभिक्रिया का वेग दुगुना हो जाता है। इस अभिक्रिया के लिए Ea की गणना कीजिए।
या
एक रासायनिक अभिक्रिया का ताप 290 K से बढ़ाकर 300 K करने पर अभिक्रिया की दर दोगुनी हो जाती है? अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा का मान ज्ञात कीजिए।
(दिया है-R = 8314 JK-1 मोल-1 ; log 102 = 0.3010) (2018)
हल
आरेनियस समीकरण के अनुसार,
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प्रश्न 9.
581 K ताप पर अभिक्रिया 2 HI (g) → H2 (g) + I(g) के लिए सक्रियण ऊर्जा को मान 209.5 kJ mol-1 है। अणुओं के उस अंश की गणना कीजिए जिसकी ऊर्जा सक्रियण ऊर्जा के बराबर अथवा इससे अधिक है।
हल
अणुओं का वह अंश जिसकी ऊर्जा सक्रियण ऊर्जा के बराबर या अधिक है।
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के वेग व्यंजकों से इनकी अभिक्रिया कोटि तथा वेग स्थिरांकों की इकाइयाँ ज्ञात कीजिए –

  1. 3NO (g) → N2O (g) वेग = k [NO]2
  2. H2O(aq) + 3I (aq) + 2H+ → 2H2O(l) + I3 वेग = k [H2O2] [I]
  3. CH3CHO (g) → CH4 (g)+ CO (g) वेग = k [CH3CHO]3/2
  4. C2H5Cl (g) → C2H4 (g) + HCl (g) वेग = k [C2H5Cl]

उत्तर

  1. द्वितीय कोटि,L mol-1 time-1
  2. farite alfa, L mol-1 time-1
  3. 3/2 कोटि, L1/2 mol-1/2 time-1
  4. प्रथम कोटि, time-1

प्रश्न 2.
अभिक्रिया 2A + B → A2B के लिए वेग = k[Al [B]2 यहाँ ६का मान 2.0 x 10-6 mol-2 L2 s-1 है। प्रारम्भिक वेग की गणना कीजिए; जब [A]= 0.1 mol L-1 एवं [B] = 0.2 mol L-1 हो तथा अभिक्रिया वेग की गणना कीजिए; जब [A] घटकर 0.06 mol L-1 रह जाए।
हल
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प्रश्न 3.
प्लैटिनम सतह पर NH3 का अपघटन शून्य कोटि की अभिक्रिया है। N2 एवं H2 के उत्पादन की दर क्या होगी जब ६ का मान 25 x 10-4 mol L-1 s-1 हो?
हल
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प्रश्न 4.
डाइमेथिल ईथर के अपघटन से CH4, H2 तथा CO बनते हैं। इस अभिक्रिया का वेग निम्नलिखित समीकरण द्वारा दिया जाता है –
वेग = k [CH3OCH3]3/2
अभिक्रिया के वेग का अनुगमन बन्द पात्र में बढ़ते दाब द्वारा किया जाता है, अतः वेग समीकरण को डाइमेथिल ईथर के आंशिक दाब के पद में भी दिया जा सकता है। अतः
वेग = k(PCH3OCH3)3/2
यदि दाब को bar में तथा समय को मिनट में मापा जाए तो अभिक्रिया के वेग एवं वेग स्थिरांक की इकाइयाँ क्या होंगी?
उत्तर
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प्रश्न 5.
रासायनिक अभिक्रिया के वेग पर प्रभाव डालने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
किसी रासायनिक अभिक्रिया के क्षेत्र को ताप किस प्रकार प्रभावित करता है? (2018)
हल
निम्नलिखित कारक अभिक्रिया के वेग को प्रभावित करते हैं –

  1. सान्द्रण (Concentration) – गतिज आण्विक सिद्धान्त के अनुसार आण्विक अभिक्रियाएँ अणुओं के परस्पर टकराने से होती हैं। अभिकारक का सान्द्रण बढ़ने से अणुओं की संख्या में वृद्धि होती है जिसके फलस्वरूप इकाई समय में अणुओं के आपस में टकराने की सम्भावना बढ़ने से अभिक्रिया का वेग भी बढ़ जाता है।
  2. ताप (Temperature) – ताप की वृद्धि से सक्रिय अणुओं तथा प्रभावकारी टक्करों की संख्या में, वृद्धि हो जाती है जिससे अभिक्रिया का वेग बढ़ जाता है।
  3. दाब (Pressure) – दाब बढ़ने से गैसीय अणु निकट आ जाते हैं जिसके फलस्वरूप उनके परस्पर टकराने की सम्भावना बढ़ जाती है अर्थात् वेग बढ़ जाता है।
  4. अभिकारकों के पृष्ठ क्षेत्रफल का प्रभाव (Effect of surface area of reactants) – अभिकारक पदार्थों की भौतिक अवस्था का प्रभाव विषमांग अभिक्रिया पर पड़ता है जैसे- लकड़ी के लट्टे की तुलना में लकड़ी का बुरादा तीव्रता से जलता है। अम्लों के साथ धातुओं की तुलना में धातु चूर्ण अधिक तीव्र वेग से क्रिया करते हैं अर्थात् पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ने पर अभिक्रिया का वेग बढ़ता है।
  5. उत्प्रेरक का प्रभाव (Effect of catalyst) – उत्प्रेरक वे पदार्थ हैं, जो रासायनिक अभिक्रिया की गति को प्रभावित करते हैं। इसकी उपस्थिति में अभिक्रिया का वेग अधिक या कम हो जाता है जो उत्प्रेरक की प्रकृति पर निर्भर करता है।
  6. अभिकारकों की प्रकृति पर (On the nature of reactants) – यदि अभिकारक आयनिक है तो उस अभिक्रिया का वेग अनायनिक अभिक्रियाओं के वेग से अधिक होता है।

प्रश्न 6.
किसी अभिक्रियक के लिए एक अभिक्रिया द्वितीय कोटि की है। अभिक्रिया का वेग कैसे प्रभावित होगा, यदि अभिक्रियक की सान्द्रता –

  1. दुगुनी कर दी जाए,
  2. आधी कर दी जाए?

उत्तर
प्रश्नानुसार, वेग (r0) = k [A]2 यदि A की सान्द्रता को दो गुना किया जाये
तब r1 = k [2A]2 = 4r0
यदि आधा कर दिया जाये, तब r2 = [A/2]2, r2 = 1/4r0

प्रश्न 7.
वेग स्थिरांक पर ताप का क्या प्रभाव पड़ता है? ताप के इस प्रभाव को मात्रात्मक रूप में कैसे प्रदर्शित कर सकते हैं?
उत्तर
अभिक्रिया का वेग स्थिरांक सदैव ताप बढ़ाने पर बढ़ता है। ताप में 10°C की वृद्धि पर इसका मान लगभग दोगुना हो जाता है। इसे मात्रात्मक रूप में निम्न प्रकार प्रदर्शित करते हैं –
k = Ae-Ea/RT
जहाँ = ताप T पर वेग स्थिरांक है, A= आवृत्ति गुणांक तथा E,= सक्रियण ऊर्जा

प्रश्न 8.
जल में एस्टर के छद्म प्रथम कोटि के जल-अपघटन से निम्नलिखित आँकड़े प्राप्त हुए –
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(i) 30 से 60 सेकण्ड के समय-अन्तराल में औसत वेग की गणना कीजिए।
(ii) एस्टर के जल-अपघटन के लिए छद्म प्रथम कोटि की अभिक्रिया के वेग स्थिरांक की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 9.
एक अभिक्रिया A के प्रति प्रथम तथा B के प्रति द्वितीय कोटि की है।

  1. अवकल वेग समीकरण लिखिए।
  2. B की सान्द्रता तीन गुनी करने से वेग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
  3. A तथा B दोनों की सान्द्रता दुगुनी करने से वेग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर

  1. वेग = k [A]1 [B]2
  2. r0 = k [A]1 [B]2, r1 = k[A]1 [3B]2, r1 = 9 x r0
  3. r0 = k [A]1 [B]2, r2 = k[2A] [2B]2, r2 = 8 x r0

प्रश्न 10.
A और B के मध्य अभिक्रिया में A और B की विभिन्न प्रारम्भिक सान्द्रताओं के लिए प्रारम्भिक वेग (r0) नीचे दिए गए हैं –
A और B के प्रति अभिक्रिया की कोटि क्या है?
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हल
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प्रश्न 11.
2A + B → C+ D अभिक्रिया की बलगतिकी अध्ययन करने पर निम्नलिखित परिणाम प्राप्त हुए। अभिक्रिया के लिए वेग नियम तथा वेग स्थिरांक ज्ञात कीजिए।
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हल
प्रयोग I तथा IV में [B] समान है लेकिन [A] चार गुना हो गया है तथा अभिक्रिया का वेग भी चार गुना हो गया है।
∴ A के सापेक्ष वेग ∝ [A] …..(i)
प्रयोग II तथा III में [A] समान है लेकिन [B] दोगुना हो गया है तथा अभिक्रिया का वेग । भी चार गुना हो गया है।
B के सापेक्ष वेग ∝ [B]2 …..(ii)
समीकरण (i) तथा (ii) को संयुक्त करने पर हमें अभिक्रिया 2A + B → C + D का वेग नियम प्राप्त हो जाता है।
वेग = k [A] [B]2
अभिक्रिया की समग्र कोटि = 1 + 2 = 3
वेग स्थिरांक की गणना :
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अतः वेग स्थिरांक = 6.0 mol-2 L2 min-1

प्रश्न 12.
A तथा B के मध्य अभिक्रिया A के प्रति प्रथम तथा B के प्रति शून्य कोटि की है। निम्नांकित तालिका में रिक्त स्थान भरिए –
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हल
अभिक्रिया के लिए वेग व्यंजक, वेग = k [A]1 [B]0 = k [A]
प्रयोग I: 2.0 x 10-2 mol L-1 min-1 = k (0.1 M)
या  k= 0.2 min-1
प्रयोग II : 4.0 x 10-2 mol L-1 min-1 = 0.2 min-1 [A]
या k= 0.2 mol L-1
प्रयोग III: वेग = (0.2 min-1) (0.4 mol L-1)
= 0.08 mol L-1 min-1
प्रयोग IV: 2.0 x 10-2 mol L-1 min-1
= 0.2 min-1 [A]
या [A] = 0.1 mol L-1

प्रश्न 13.
नीचे दी गई प्रथम कोटि की अभिक्रियाओं के वेग स्थिरांक से अर्द्ध-आयु की गणना कीजिए –

  1. 200 s-1
  2. 2 min-1
  3. 4 year-1

हल

  1. [latex s=2]{ t }_{ 1/2 }=\frac { 0.693 }{ k } =\frac { 0.693 }{ 200 } [/latex] = 3.465 x 10-3 s
  2. [latex s=2]{ t }_{ 1/2 }=\frac { 0.693 }{ k } =\frac { 0.693 }{ 2 } [/latex] = 3.465 x 10-1 min
  3. [latex s=2]{ t }_{ 1/2 }=\frac { 0.693 }{ k } =\frac { 0.693 }{ 4 } [/latex] = 1.733 x 10-1 yr

प्रश्न 14.
14C के रेडियोऐक्टिव क्षय की अर्द्ध-आयु 5730 वर्ष है। एक पुरातत्व कलाकृति की लकड़ी में, जीवित वृक्ष की लकड़ी की तुलना में 80% 14C की मात्रा है। नमूने की आयु का परिकलन कीजिए।
हल
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प्रश्न 15.
गैस प्रावस्था में 318 K पर N,05 के अपघटन की अभिक्रिया
[2N2O → 4NO2 + O2] के आँकडे नीचे दिए गए हैं –
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(i) [N2O5] एवं t के मध्य आलेख खींचिए।
(ii) अभिक्रिया के लिए अर्द्ध-आयु की गणना कीजिए।
(iii) log [N2O5] एवं t के मध्य ग्राफ खींचिए।
(iv) अभिक्रिया के लिए वेग नियम क्या है?
(v) वेग स्थिरांक की गणना कीजिए।
(vi) k की सहायता से अर्द्ध-आयु की गणना कीजिए तथा इसकी तुलना (ii) से कीजिए।
हल
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(iv) log [N2O5] तथा समय के मध्य ग्राफ एक सीधी रेखा है अत: यह प्रथम कोटि की अभिक्रिया है। अतः वेग नियम होगा –
वेग = k [N2O5]
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प्रश्न 16.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए वेग स्थिरांक 60 s-1 है। अभिक्रियक को अपनी प्रारम्भिक सान्द्रता से वाँ भाग रह जाने में कितना समय लगेगा?
हल
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प्रश्न 17.
नाभिकीय विस्फोट का 28.1 वर्ष अर्द्ध-आयु वाला एक उत्पाद 90Sr होता है। यदि कैल्सियम के स्थान पर 1µg, 90Sr नवजात शिशु की अस्थियों में अवशोषित हो जाए और उपापचयन से ह्रास न हो तो इसकी 10 वर्ष एवं 60 वर्ष पश्चात कितनी मात्रा रह जाएगी?
हल
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प्रश्न 18.
दर्शाइए कि प्रथम कोटि की अभिक्रिया में 99% अभिक्रिया पूर्ण होने में लगा समय 90% अभिक्रिया पूर्ण होने में लगने वाले समय से दुगुना होता है।
हल
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प्रश्न 19.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया में 30% वियोजन होने में 40 मिनट लगते हैं। t1/2 की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 20.
543 K ताप पर एजोआइसोप्रोपेन के हेक्सेन तथा नाइट्रोजन में विघटन के निम्नांकित आँकड़े प्राप्त हुए। वेग स्थिरांक की गणना कीजिए।
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हल
ऐजोआइसोप्रोपेन निम्न समीकरण के अनुसार विघटित होता है –
(CH3)2CHN = NCH(CH3)(g) → N(g) + C6H14 (g)
यह क्रिया प्रथम कोटि की है।
प्रारम्भिक दाब P0 = 35.0 mm Hg
t समय बाद ऐजोआइसोप्रोपेन के दाब में कमी = P
N2 के दाब में वृद्धि = PN2
हेक्सेन के दाब में वृद्धि =PC6 H14
मिश्रण का कुल दाब Pt = PA + PN2 + PC6 H14
Pt = (P0 – P) + P + P = P0 + P
P = Pt – P0
PA = P0 – (Pt – P0) = 2P0 – Pt
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प्रश्न 21.
स्थिर आयतन पर, SO2Cl2 के प्रथम कोटि के ताप अपघटन पर निम्नांकित आँकड़े प्राप्त हुए –
SO2Cl(g) → SO2 (g) + Cl2 (g)
अभिक्रिया वेग की गणना कीजिए जब कुल दाब 0.65 atm हो।
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हल
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प्रश्न 22.
विभिन्न तापों पर N2O5 के अपघटन के लिए वेग स्थिरांक नीचे दिए गए हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 31
In k एवं 1/T के मध्य ग्राफ खींचिए तथा A एवं E, की गणना कीजिए। 30°C तथा 50°C पर वेग स्थिरांक को प्रागुक्त कीजिए।
हल
log k तथा 1/T के मध्य ग्राफ खींचने के लिए, हम दिए गए आँकड़ों को अग्रलिखित प्रकार से लिख सकते हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 32
उपर्युक्त मानों पर आधारित ग्राफ निम्नांकित चित्र में प्रदर्शित है –
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इस समीकरण की तुलना y = mx + c से करते हैं जो अन्त:खण्डे रूप में रेखा की समीकरण है।
log A= Y- अक्ष पर अर्थात् k अक्ष पर अन्त:खण्ड का मान
= (-1 + 7.2) = 6.2 [y2 – y1 = – 1 – (-7.2)]

आवृत्ति गुणक A = Antilog 6.2
= 1585000
= 1.585 x 106 collisions s-1
वेग स्थिरांक के मान ग्राफ से निम्नलिखित प्रकार प्राप्त किए जा सकते हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 35

प्रश्न 23.
546 K ताप पर एक हाइड्रोकार्बन के अपघटन में वेग स्थिरांक 2.418 x 10-5 s-1 है। यदि सक्रियण ऊर्जा 179.9 kJ mol-1  हो तो पूर्व-घातांकी गुणन का मान क्या होगा?
हल
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प्रश्न 24.
किसी अभिक्रिया A→ उत्पाद के लिए = 2.0 x 10-2 s-1 है। यदि A की प्रारम्भिक सान्द्रता 1.0 mol L-1 हो तो 100 s पश्चात इसकी सान्द्रता क्या रह जाएगी?
हल
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प्रश्न 25.
अम्लीय माध्यम में सुक्रोस का ग्लूकोस एवं फ्रक्टोस में विघटन प्रथम कोटि की अभिक्रिया है। इस अभिक्रिया की अर्द्ध-आयु 3.0 घण्टे है। 8 घण्टे बाद नमूने में सुक्रोस का कितना अंश बचेगा?
हल
k = [latex s=2]\frac { 0.693 }{ k } [/latex] = 0.231 hr-1
माना सुक्रोस की प्रारम्भिक सान्द्रता 1 M है।
माना सुक्रोस का 8 घण्टे पश्चात् सान्द्रण (1 – x) M है।
[latex s=2]k=\frac { 1 }{ { t }_{ 2 }-{ t }_{ 1 } } ln\frac { 1 }{ 1-x } [/latex]
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प्रश्न 26.
हाइड्रोकार्बन का विघटन निम्नांकित समीकरण के अनुसार होता है। Ea की गणना कीजिए।
k= (4.5 x 1011 s-1) e-28000 K/T
हल
आरेनियस समीकरण के अनुसार, k = Ae-Ea/RT
∴ [latex s=2]-\frac { { E }_{ a } }{ RT } =-\frac { 28000K }{ T } [/latex]
E = 28000 K x R=28000 K x 8.314 JK-1 mol-1
= 232.79 kJ mol-1

प्रश्न 27.
H2O2 के प्रथम कोटि के विघटन को निम्नांकित समीकरण द्वारा लिख सकते हैं –
log k = 14.34 – 1.25 x 104 K/T
इस अभिक्रिया के लिए E, की गणना कीजिए। कितने ताप पर इस अभिक्रिया की अर्द्ध -आयु 256 मिनट होगी?
हल
(i) log k = log A – [latex s=2]\frac { { E }_{ a } }{ 2.303RT } [/latex]
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प्रश्न 28.
10°C ताप पर A के उत्पाद में विघटन के लिए का मान 4.5 x 103 s-1 तथा सक्रियण ऊर्जा 60 kJ mol-1 है। किस ताप पर B का मान 1.5 x 104 s-1 होगा?
हल
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प्रश्न 29.
298 K ताफ्पर प्रथम कोटि की अभिक्रिया के 10% पूर्ण होने का समय 308 K ताप पर 25% अभिक्रिया पूर्ण होने में लगे समय के बराबर है। यदि A का मान 4 x 1010 s-1 हो तो 318 K ताप पर है तथा Ea की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 30.
ताप में 293 K से 313 K तक वृद्धि करने पर किसी अभिक्रिया का वेग चार गुना हो जाता | है। इस अभिक्रिया के लिए सक्रियण ऊर्जा की गणना यह मानते हुए कीजिए कि इसका मान ताप के साथ परिवर्तित नहीं होता।
हल
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
[latex s=2]\frac { dx }{ dt } [/latex] ∝ [a]° की अभिक्रिया की कोटि है – (2017)
(i) शून्य
(ii) प्रथम
(iii) द्वितीय
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i) शून्य।

प्रश्न 2.
शून्य कोटि अभिक्रिया के दर-नियतांक का मात्रक है – (2015)
(i) लीटर-सेकण्ड-1
(ii) लीटर-मोल-1  सेकण्ड-1
(iii) मोल-लीटर-1 सेकण्ड-1
(iv) मोल-सेकण्ड-1
उत्तर
(iii) मोल-लीटर-1  सेकण्ड-1

प्रश्न 3.
शून्य कोटि की अभिक्रिया के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा सूत्र सही है? (2017)
(i) t1/2 ∝ a
(ii) t1/2 ∝ [latex s=2]\frac { 1 }{ a } [/latex]
(iii) t1/2 ∝ [latex s=2]\frac { 1 }{ { a }^{ 2 } } [/latex]
(iv) t1/2 ∝ a0
उत्तर
(iv) t1/2 ∝ a0

प्रश्न 4.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के वेग नियतांक का मात्रक है – (2017)
(i) मोल ली०-1 सेकण्ड-1
(ii) ली० मो-1 सेकण्ड-1
(iii) सेकण्ड-1
(iv) मोल लीटर-1
उत्तर
(iii) सेकण्ड-1

प्रश्न 5.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए वेग स्थिरांक (A) का समीकरण है – (2011, 12)
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प्रश्न 6.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए वेग स्थिरांक तथा अर्द्ध आयुकाल में सम्बन्ध है – (2017)
(i) [latex s=2]k=\frac { 0.6932 }{ { t }_{ 1/2 } }[/latex]
(ii) [latex s=2]k=\frac { { t }_{ 1/2 } }{ 0.6932 } [/latex]
(iii) [latex s=2]{ t }_{ 1/2 }=0.6932k[/latex]
(iv) [latex s=2]{ t }_{ 1/2 }=\frac { k }{ 0.6932 }[/latex]
उत्तर
(i) [latex s=2]k=\frac { 0.6932 }{ { t }_{ 1/2 } }[/latex]

प्रश्न 7.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया में अर्द्ध भाग के पूर्ण होने में लगा समय (t1/2) – (2013, 15)
(i) उसकी प्रारम्भिक सान्द्रता पर निर्भर करता है।
(ii) उसकी प्रारम्भिक सान्द्रता के व्युत्क्रमानुपाती है।
(iii) उसकी प्रारम्भिक सान्द्रता पर निर्भर नहीं करता है।
(iv) उसकी प्रारम्भिक सान्द्रता के वर्गमूल पर निर्भर करता है।
उत्तर
(iii) उसकी प्रारम्भिक सान्द्रता पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 8.
प्रथम कोटि की एक अभिक्रिया 72 मिनट में 75% पूर्ण होती है। कब आधी (50%) अभिक्रिया पूर्ण हुई? (2016)
(i) 36 मिनट में
(ii) 48 मिनट में
(iii) 52 मिनट में
(iv) 144 मिनट में
उत्तर
(i) 36 मिनट में।

प्रश्न 9.
यदि किसी प्रथम कोटि की अभिक्रिया का 90%, 90 मिनट में पूर्ण हुआ हो, तो इसके 50% पूर्ण होने में लगने वाला समय होगा (log 2= 0.30) (2016)
(i) 30मिनट
(ii) 36 मिनट
(iii) 50 मिनट
(iv) 27 मिनट
उत्तर
(iv) 27 मिनट

प्रश्न 10.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के 90% पूर्ण होने में लगने वाला समय लगभग होता है – (2018)
(i) अर्द्धआयु का 2.2 गुना
(ii) अर्द्धआयु का 4.4 गुना
(iii) अर्द्धआयु का 3.3 गुना
(iv) अर्द्धआयु का 1.1 गुना
उत्तर
(iii) अर्द्धआयु का 3.3 गुना

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन-सी अभिक्रिया आभासी एकाणुक है? (2009, 11, 16)
(i) CH3COOC2H5 + NaOH → CH3COONa + C2H5OH
(ii) CH3COOCH3 + H2O → CH2COOH+ CH3OH
(iii) 2 FeCl3 + SnCl2 → 2FeCl2 + SnCl4
(iv) H2 + Cl2 → 2HCl
उत्तर
(ii) CH3COOCH3 + H2O → CH3COOH+ CH3OH

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.

  1. अभिक्रिया का वेग क्या है? (2018)
  2. अभिक्रिया की तात्क्षणिक दर को परिभाषित कीजिए। (2017)

उत्तर
1. वह देर, जिस पर समय के साथ-साथ अभिकारक पदार्थों का सान्द्रण परिवर्तित होता है, अभिक्रिया का वेग कहलाता है।”
यदि सूक्ष्म अन्तराल dt में अभिकारक के dr मोल उत्पाद में परिवर्तित होते हों तो
अभिक्रिया का वेग = [latex s=2]\frac { dx }{ dt } [/latex]
यदि अन्तराल dt में अभिकारक के de मोल शेष रहते हों तो
अभिक्रिया का वेग = [latex s=2]-\frac { d[c] }{ dt } [/latex]

2. किसी निश्चित क्षण पर किसी एक अभिकारक अथवा उत्पाद के सान्द्रता परिवर्तन की दर (अथवा इकाई समय में सान्द्रता परिवर्तन) उस क्षण पर अभिक्रिया की दर अर्थात् अभिक्रिया की तात्क्षणिक दर कहलाती है।
वास्तव में, तात्क्षणिक दर लघुतम सम्भव समय अन्तराल (जब Δt शून्य की ओर अग्रसर हो) के दौरान औसत दर होती है। यदि किसी लघुतम समय अन्तराल dt में होने वाला लघुतम सान्द्रता परिवर्तन dx है तो
rinst = [latex s=2]\frac { dx }{ dt } [/latex]

प्रश्न 2.
वेग नियम को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
वह गणितीय व्यंजक जो अभिकारकों की मोलर सान्द्रता पर अभिक्रिया के वेग की प्रायोगिक निर्भरता को व्यक्त करता है, वेग नियम कहलाता है। यदि एक सामान्य अभिक्रिया
aA+ bB → उत्पाद
का वेग A की सान्द्रता की घात p तथा B की सान्द्रता की घात q पर निर्भर करता है, तो
वेग = k [A]p [B]q
जहाँ k वेग स्थिरांक अथवा दर स्थिरांक है।
उपर्युक्त समीकरण को ही वेग नियम कहते हैं।

प्रश्न 3.
वेग नियम और द्रव्य अनुपाती क्रिया के नियम में क्या अन्तर है?
उत्तर
वेग नियम के अनुसार, अभिक्रिया का वेग उन सान्द्रता पदों पर निर्भर करता है,जिन पर अभिक्रिया , का वेग वास्तव में निर्भर करता है (प्रयोगों द्वारा ज्ञात) जबकि द्रव्य अनुपाती क्रिया का नियम सन्तुलित रासायनिक समीकरण की स्टॉइकियोमीट्री पर आधारित है।
उदाहरणार्थ-किसी सामान्य अभिक्रिया aA+ bB → उत्पाद के लिए,
वेग नियम के अनुसार, वेग = k[A]p [B]q
जबकि द्रव्य अनुपाती क्रिया नियम के अनुसार, वेग = k[A]a [B]b

प्रश्न 4.
अभिक्रिया का वेग स्थिरांक क्या है? (2009, 12, 17)
उत्तर
यदि किसी रासायनिक अभिक्रिया में किसी क्षण अभिकारक का आण्विक सान्द्रण C हो, तो उस समय अभिक्रिया का वेग [latex s=2](\frac { dx }{ dt } )[/latex], सान्द्रण C के समानुपाती होता है,

अर्थात् [latex s=2]\frac { dx }{ dt } [/latex] ∝ C या [latex s=2]\frac { dx }{ dt } [/latex] = kC
जहाँ, k एक स्थिरांक है, जिसे वेग स्थिरांक कहते हैं।
अब यदि C= 1 तो [latex s=2]\frac { dx }{ dt } [/latex] = k
अतः स्थिर ताप पर अभिकारक पदार्थ के इकाई सान्द्रण पर होने वाले अभिक्रिया के वेग को उसे अभिक्रिया का वेग स्थिरांक कहते हैं।

प्रश्न 5.
वेग स्थिरांक तथा साम्य स्थिरांक में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2010, 12)
उत्तर
वेग स्थिरांक अभिकारक पदार्थों की इकाई सान्द्रता पर होने वाली अभिक्रिया की गति को कहते हैं। जबकि साम्य स्थिरांक उत्क्रमणीय अभिक्रिया में अग्र अभिक्रिया के वेग स्थिरांक तथा विपरीत क्रिया के साम्य स्थिरांक का अनुपात होता है।

प्रश्न 6.
तापीय गुणांक क्या है? अभिक्रिया के वेग से इसका सम्बन्ध बताइए। (2017)
उत्तर
तापीय गुणांक 10°C अन्तर के दो भिन्न तापों पर वेग स्थिरांकों के अनुपात के बराबर होता है।
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यह प्राप्त मान 2 और 3 के मध्य में होता है।

प्रश्न 7.
निम्न अभिक्रिया की कोटि और वेग स्थिरांक की इकाई लिखिए – (2016)
H2 + Cl2 → 2HCl
उत्तर
अभिक्रिया की कोटि शून्य तथा वेग स्थिरांक की इकाई मोल लीटर-1 सेकण्ड-1

प्रश्न 8.
कारण सहित बताइए कि निम्न में अभिक्रिया की कोटि क्या होगी? (2016)
2FeCl3 + SnCl2 → SnCl4 + 2FeCl2
उत्तर
अभिक्रिया तृतीय कोटि की है, क्योंकि तृतीय कोटि की अभिक्रिया में अभिकारक पदार्थ के तीन अणुओं का सान्द्रण समय के साथ-साथ परिवर्तित होता है अर्थात् इनका वेग अभिकारक के तीन अणुओं के सान्द्रण के रूप में व्यक्त होता है।

प्रश्न 9.
शून्य कोटि की अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं? उदाहरण द्वारा समझाइए। इसके वेग स्थिरांक को व्यंजक लिखिए। (2012, 16)
या
कारण सहित बताइए कि निम्न रासायनिक अभिक्रिया किस कोटि की है?
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उत्तर
शून्य कोटि की अभिक्रिया – वह अभिक्रिया जिसकी प्रगति में अभिकारक के किसी भी अणु का सान्द्रण परिवर्तित नहीं होता है अर्थात् जिसका वेग अभिकारक के सान्द्रण पर निर्भर नहीं करता है, शून्य कोटि की अभिक्रिया कहलाती है।
A → B+ C
यदि इसका वेग ∝[A]0 हो, तो यह शून्य कोटि की अभिक्रिया होगी।
उदाहरणार्थ- सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में H2 व Cl2 का संयोग
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शून्य कोटि के वेग स्थिरांक का व्यंजक – शून्य कोटि की अभिक्रिया के वेग स्थिरांक का व्यंजक x = kt है।
जहाँ x अभिकारक A की वह मात्रा है जो t समय में अभिक्रिया करती है और है अभिक्रिया का वेग स्थिरांक है।

प्रश्न 10.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं? उदाहरण द्वारा समझाइए। (2016)
या
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लक्षण लिखिए। (2011)
उत्तर
प्रथम कोटि की अभिक्रिया – वह अभिक्रिया जिसका वेग केवल एक अभिकारक की सान्द्रता के अनुक्रमानुपाती होता है, प्रथम कोटि की अभिक्रिया कहलाती है। उदाहरणार्थ-निम्नलिखित अभिक्रिया में केवल शक्कर के अणुओं की सान्द्रता परिवर्तित होती है; अत: यह प्रथम कोटि की अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 49
प्रथम कोटि की अभिक्रिया का समीकरण निम्नलिखित है –
[latex s=2]k=\frac { 2.303 }{ t } { log }_{ 10 }\frac { a }{ a-x } [/latex]
जहाँ a अभिकारक की प्रारम्भिक सान्द्रता तथा (a – x ) समय t पर सान्द्रता है।
लक्षण

  1. प्रथम कोटि की अभिक्रिया के वेग स्थिरांक ६ का मान अभिकारक की सान्द्रता की इकाई पर निर्भर नहीं करता। यह केवल समय की इकाई पर निर्भर करता है।
  2. इस अभिक्रिया के लिए log(a- x) और है के मध्य ग्राफ खींचने पर एक सरल रेखा प्राप्त होती है। जिसका ढाल [latex s=2]\frac { k }{ 2.303 } [/latex] है।
  3. प्रथम कोटि की अभिक्रिया का अर्द्ध-आयुकाल अभिकारकों के प्रारम्भिक सान्द्रण पर निर्भर नहीं करता
  4. अभिक्रिया के पूर्ण होने में अनन्त समय लगता है।
  5. अभिकारक की सान्द्रता n गुना बढ़ने पर अभिक्रिया का वेग भी n गुना बढ़ जाता है।

प्रश्न 11.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के वेग स्थिरांक की इकाई ज्ञात कीजिए। (2014)
उत्तर
प्रथम कोटि की अभिक्रिया का वेग समीकरण- r = k [A]1
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प्रश्न 12.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया का 50% (आधा भाग) 10 मिनट में समाप्त होता है। इस ” अभिक्रिया का 99% भाग कितने समय में पूरा होगा? (2012)
हल
प्रथम कोटि की वेग-अभिक्रिया का समीकरण
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पुनः अभिक्रिया के 99% भाग पूरा होने में लगे समय के लिए अभिक्रिया के समीकरण से
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 52
अतः अभीष्ट समय 66.45 मिनट है।

प्रश्न 13.
एक यौगिक के 1 मोल से प्रारम्भ करने पर यह ज्ञात हुआ कि 1 घण्टे में अभिक्रिया तीन-चौथाई पूर्ण हो जाती है। वेग स्थिरांक की गणना कीजिए यदि अभिक्रिया प्रथम कोटि का अनुसरण करती है। (2016)
हल
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए,
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 53

प्रश्न 14.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया 10 मिनट में 20% पूरी हो जाती है। अभिक्रिया के 75% पूरा होने में कितना समय लगेगा? (2016)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 54

प्रश्न 15.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए अर्द्ध-आयु 69.3 सेकण्ड है। इस अभिक्रिया के लिए वेग स्थिरांक की गणना कीजिए। (2015)
हल
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए,
k= [latex s=2]\frac { 0.6932 }{ { t }_{ 1/2 } } =\frac { 0.6932 }{ 69.3 } [/latex] = 10-2 सेकण्ड-1

प्रश्न 16.
प्रथम कोटि की एक अभिक्रिया में 50 सेकण्ड में पदार्थ की सान्द्रता प्रारम्भिक सान्द्रता की आधी रह जाती है। इसके वेग स्थिरांक की गणना कीजिए। (20017, 18)
हल
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए,
[latex s=2]k=\frac { 0.6932 }{ { t }_{ 1/2 } } =\frac { 0.6932 }{ 50 } =\frac { 6.932 }{ 5 } [/latex] x 10-2
= 1.38 x 10-2 सेकण्ड-1

प्रश्न 17.
किसी प्रथम कोटि की अभिक्रिया का वेग स्थिरांक 7 x 10-4 प्रति सेकण्ड है। अपनी प्रारम्भिक सान्द्रता के 1/4 तक कम होने के लिए अभिकारक द्वारा लिए गए समय की गणना कीजिए। [log10 2= 0.3010] (2016)
हल
प्रथम कोटि की अभिक्रिया का वेग स्थिरांक
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 55

प्रश्न 18.
आरेनियस का समीकरण दीजिए। (2017)
उत्तर
k = Ae-Ea/RT ; जहाँ Ea सक्रियण ऊर्जा, R गैसीय स्थिरांक, T परमताप, k वेग स्थिरांक, A आवृत्ति गुणांक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अभिक्रिया की कोटि और आणविकता को समझाइए। (2009, 10, 12, 16, 17)
या
अभिक्रिया की कोटि को समझाते हुए निम्न अभिक्रिया की कोटि कारण सहित बताइए
C12H22O11 + H2O [latex s=2]\underrightarrow { { H }^{ + } } [/latex] C6H12O6 + C6H12O6 (2011, 17)
या
कारण सहित अभिक्रिया,
CH3COOC2H5 + NaOH [latex]\rightleftharpoons [/latex] CH3COONa + C2H5OH की कोटि बताइए। (2013)
उत्तर
आणविकता – किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाले अभिकारक अणुओं की न्यूनतम संख्या को अभिक्रिया की आणविकता कहते हैं।
उदाहरणार्थ– (i) अमोनियम नाइट्राइट को गर्म करने पर होने वाली अभिक्रिया में अमोनियम नाइट्राइट का एक अणु भाग लेता है; अत: इसकी आणविकता एक है।
NH4NO2 → 2H2O + N2
(ii) NaOH द्वारा एथिल ऐसीटेट के जल – अपघटन की अभिक्रिया की आणविकता 2 है, क्योंकि इसमें दोनों अभिकारकों का एक-एक अणु भाग लेता है।
CH3COOC2H5 + NaOH → CH3COONa + C2H5OH

कोटि – किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाले पदार्थों के अणुओं की वह संख्या जिनका सान्द्रण अभिक्रिया की प्रगति में परिवर्तित होता है, अभिक्रिया की कोटि कहलाती है।
उदाहरणार्थ– CH3COOC2H5 + NaOH → CH3COONa + C2H5OH
उपर्युक्त अभिक्रिया में दोनों अभिकारकों के एक-एक अणु की सान्द्रता प्रभावित हो रही है; अत: यह द्वितीय कोटि की अभिक्रिया है परन्तु अभिक्रिया
C12H22O11 + H2O → C6H12O6 + C6H12O6 में केवल C12H22O11 की सान्द्रता में परिवर्तन होने पर अभिक्रिया का वेग परिवर्तित होता है। जल (H2O) की सान्द्रता में परिवर्तन का वेग पर कोई प्रभाव नहीं होता है। अतः अभिक्रिया की कोटि एक है।

प्रश्न 2.
आणविकता तथा कोटि में अन्तर स्पष्ट कीजिए। N,05 के अपघटन की कोटि निर्धारित कीजिए।
(2010, 12, 17, 18)
उत्तर
अभिक्रिया की आणविकता और कोटि में अन्तर

  1. अभिक्रिया की आणविकता सदैव एक पूर्ण संख्या होती है, जबकि अभिक्रिया की कोटि भिन्नात्मक भी हो सकती है।
  2. अभिक्रिया की आणविकता कभी-भी शून्य नहीं हो सकती, जबकि अभिक्रिया की कोटि शून्य भी हो सकती है।
  3. किसी अभिक्रिया की आणविकता और कोटि समान या भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।
  4. अभिक्रिया के वेग निर्धारक पद में भाग लेने वाले अणुओं की संख्या उस पद की आणविकता कहलाती है। अभिक्रिया की कोटि उन अणुओं की संख्या है, जिनकी सान्द्रताएँ अभिक्रिया के वेग को निर्धारित करती हैं।
  5. अभिक्रियाको आणविकता की व्याख्या उसकी क्रिया-विधि द्वारा करते हैं, जबकि अभिक्रिया की कोटि प्रयोग द्वारा निकाली जाती है।
    N2O5 के तापीय अपघटन की अभिक्रिया 2N2O5 → 4NO2 + O2 के लिए प्रयोगों द्वारा निर्धारित नियम निम्न है, दर = k [N2O5]
    दर नियम में N2O5 की सान्द्रता की घात = 1 है, अत: N2O5 का अपघटन प्रथम कोटि की अभिक्रिया है।

प्रश्न 3.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के वेग स्थिरांक का सूत्र लिखिए। किसी अभिक्रिया में अभिकारक के सान्द्रण में 20 मिनट में 20% तथा 40 मिनट में 40% की कमी होती है। अभिक्रिया की कोटि की गणना कीजिए। (2015)
या
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए वेग स्थिरांक का व्यंजक लिखिए। (2017)
उत्तर
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए वेग स्थिरांक का सूत्र
[latex s=2]k=\frac { 2.303 }{ t } log\frac { a }{ a-x } [/latex]
जहाँ, k = वेग स्थिरांक, t = लगा समय, a = प्रारम्भिक मात्रा, a – x = बची हुई मात्रा कोटि की अभिक्रिया के लिए k = [latex s=2]\frac { x }{ t } [/latex]

  1. यदि t = 20% t = 20 मिनट, x = 20
    k1 = [latex s=2]\frac { 20 }{ 20 } [/latex] = 1 मोल/लीटर/मिनट
  2. यदि t = 40% t = 40 मिनट, x = 40
    k2 = [latex s=2]\frac { 40 }{ 40 } [/latex] = 1 मोल/लीटर/मिनट

k1 तथा k2 बराबर हैं। अतः अभिक्रिया शून्य कोटि की होगी।

प्रश्न 4.
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के वेग स्थिरांक के लिए व्यंजक लिखिए तथा सन्निहित पदों को समझाइए। दर्शाइए कि प्रथम कोटि की अभिक्रिया का अर्द्ध-आयुकाल अभिकारकों के प्रारम्भिक सान्द्रण पर निर्भर नहीं करता है। (2010, 12, 14, 17)
उत्तर
प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए [latex s=2]k=\frac { 2.303 }{ t } { log }_{ 10 }\frac { a }{ a-x } [/latex]
जहाँ t = समय, a = अभिकारक का प्रारम्भिक सान्द्रण तथा (a – x), t समय बाद सान्द्रण है।
अभिक्रिया में आधा सान्द्रण समाप्त होने के लिए,
परिवर्तित सान्द्रण (x) = 0.5 a, t = t1/2 (अर्द्ध-आयुकाल)
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 56
उपर्युक्त समीकरण में सान्द्रण का कोई पद नहीं है; अतः प्रथम कोटि की अभिक्रिया का अर्द्ध-आयुकाल अभिकारक के प्रारम्भिक सान्द्रण पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि प्रथम कोटि की अभिक्रिया को 3/4 पूर्ण करने में लगा समय, अर्द्ध-क्रिया को पूर्ण करने में लगे समय का दोगुना होता है। (2015)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 57

प्रश्न 6.
प्रथम कोटि की एक अभिक्रिया में यदि कोई पदार्थ अपनी प्रारम्भिक मात्रा का 100 मिनट में आधा रह जाता है तो बताइए कि कितने समय में यह अपनी प्रारम्भिक मात्रा का एक-चौथाई रह जायेगा? (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 58
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 59

प्रश्न 7.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया का अर्द्ध-आयुकाल 60 मिनट है। कितने समय में अभिक्रिया 90% पूर्ण हो जायेगी? (2015)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 60

प्रश्न 8.
एक प्रथम कोटि की अभिक्रिया का आधा भाग (50%) 10 मिनट में पूर्ण होता है। इस अभिक्रिया का 80% भाग कितने समय में पूर्ण होगा? (2017)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 4 Chemical Kinetics image 61

प्रश्न 9.
आभासी एकाणुक अभिक्रिया को उदाहरण द्वारा समझाइए। (2009, 11, 13, 15, 18)
उत्तर
वह अभिक्रिया जिसकी कोटि एक हो, परन्तु आणविकता एक न हो, आभासी एकाणुक क्रिया कहलाती है।
उदाहरणार्थ

  1. C12H22O11 + H2O [latex]\underrightarrow { { H }^{ + } } [/latex] C6H12O6 + C6H12O6
  2. CH3COOCH3 + H2O [latex]\underrightarrow { { H }^{ + } } [/latex] CH3COOH + CH3OH

इन दोनों अभिक्रियाओं की कोटि एक है; क्योंकि H2O के सान्द्रण में कोई परिवर्तन नहीं होता, जबकि इनकी आणविकता दी है। अत: ये आभासी एकाणुक अभिक्रियाएँ हैं।

प्रश्न 10.
सक्रियण ऊर्जा क्या होती है? किसी अभिक्रिया का वेग सक्रियण ऊर्जा के मान को कैसे प्रभावित करता है? (2017)
उत्तर
ऊर्जा अवरोध को पार करके उत्पाद बनाने के लिए देहली ऊर्जा से कम ऊर्जा युक्त अभिकारक अणुओं को जितनी ऊर्जा की और आवश्यकता होती है उसे अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा कहते हैं।

अत: सक्रियण ऊर्जा = देहली ऊर्जा – अभिकारक अणुओं की औसत ऊर्जा
या Ea = EThreshold – EReactants

प्रत्येक अभिक्रिया के लिए सक्रियण ऊर्जा का मान निश्चित होता है। किसी अभिक्रिया के लिए जब सक्रियण ऊर्जा का मान कम होता है तो अधिक संख्या में अणु ऊर्जा अवरोध को पार करके उत्पाद बना सकते हैं। इस प्रकार की अभिक्रियाओं के वेग अधिक होते हैं। सक्रियण ऊर्जा के उच्च मान युक्त अभिक्रियाओं के वेग कम होते हैं। अत: तीव्र अभिक्रियाओं के लिए सक्रियण ऊर्जा कम होती है। मन्द अभिक्रियाओं के लिए सक्रियण ऊर्जा अधिक होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अभिक्रिया के वेग पर उत्प्रेरक की उपस्थिति का क्या प्रभाव पड़ता है? (2013)
उत्तर
उत्प्रेरक का प्रभाव (Effect of Catalyst) – उत्प्रेरक वह पदार्थ है जो स्वयं स्थायी रूप से परिवर्तित हुए बिना अभिक्रिया के वेग को परिवर्तित कर देता है। उदाहरणार्थ– MnO2 निम्नांकित अभिक्रिया को उत्प्रेरित कर वेग में महत्त्वपूर्ण वृद्धि करता है –
2KClO3 → 2KCl + 3O2
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उत्प्रेरक की क्रिया को मध्यवर्ती संकुल सिद्धान्त से समझा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उत्प्रेरक रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेकर अभिकारकों के साथ अस्थायी बन्ध बनाती है जो कि मध्यवर्ती संकुल में परिणत होता है। इसका अस्तित्व क्षणिक होता है तथा यह वियोजित होकर उत्पाद एवं उत्प्रेरक देता है। यह विश्वास किया जाता है कि उत्प्रेरक एक वैकल्पिक पथ अथवा क्रियाविधि से अभिकारकों वें उत्पादों के मध्य सक्रियण ऊर्जा कम करके एवं इस प्रकार ऊर्जा अवरोध में कमी करके अभिक्रिया सम्पन्न करता है जैसा कि चित्र-7 में दर्शाया गया है। आरेनिअस समीकरण से यह स्पष्ट है कि सक्रियण ऊर्जा का मान जितना कम होगा अभिक्रिया को वेग उतना अधिक होगा।

उत्प्रेरक की लघु मात्रा अभिकारकों की दीर्घ मात्रा को उत्प्रेरित कर सकती है। उत्प्रेरक, अभिक्रिया की गिब्ज ऊर्जा, ΔG, में बदलाव नहीं करता। यह स्वत:प्रवर्तित (spontaneous) अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करता है, परन्तु स्वत:अप्रवर्तित अभिक्रिया को उत्प्रेरित नहीं करता। यह भी पाया गया है कि उत्प्रेरक किसी अभिक्रिया के साम्य स्थिरांक में परिवर्तन नहीं करता, किन्तु यह साम्य को शीघ्र स्थापित करने में सहायता करता है। यह अग्र एवं प्रतीप दोनों अभिक्रियाओं को समान रूप से उत्प्रेरित करता है जिससे साम्यावस्था अपरिवर्तित रहती है, परन्तु शीघ्र स्थापित हो जाती हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 2
Chapter Name Solutions
Number of Questions Solved 99
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions (विलयन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यदि 22 g बेन्जीन में 122 g कार्बन टेट्राक्लोराइड घुली हो तो बेन्जीन एवं कार्बन टेट्राक्लोराइड के द्रव्यमान प्रतिशत की गणना कीजिए।
हल
विलयन को द्रव्यमान = बेंजीन का द्रव्यमान + कार्बन टेट्राक्लोराइड का द्रव्यमान
= 22 g +122 g = 144 g
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प्रश्न 2.
एक विलयन में बेंजीन का 30 द्रव्यमान % कार्बन टेट्राक्लोराइड में घुला हो तो बेन्जीन के मोल अंश की गणना कीजिए।
हल
कार्बन टेट्राक्लोराइड में 30 द्रव्यमान % बेन्जीन का तात्पर्य है,
बेन्जीन का विलयन में द्रव्यमान = 30 g
CCl4 का विलयन में द्रव्यमान = 70 g
बेन्जीन (C6H6) का मोलर द्रव्यमान = 6 x 12 + 6 x 1 = 78 g mol-1
कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) का मोलर द्रव्यमान = 12 + 4 x 35.5 = 154 g mol-1
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रत्येक विलयन की मोलरता की गणना कीजिए –

  1. 30g, Co(NO3)2 .6H2O 4.3 लीटर विलयन में घुला हुआ हो
  2. 30 mL 0.5 M-H2SO4 को 500 mL तनु करने पर।

हल
1. Co(NO3)2.6H2O का आण्विक द्रव्यमान
= 58.7 + 2(14 + 48) + 6 x 18 g mol-1 = 310.7 g mol-1
Co(NO3)2.6H2O के मोलों की संख्या = [latex]\frac { 30g }{ { 310.7gmol }^{ -1 } } [/latex] = 0.0966
विलयन का आयतन = 4.3 L
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[latex s=2]\frac { 0.0966mol }{ 4.3L }[/latex] = 0.022 M

2. 1000 mL 0.5M H2SO4 में H2SO4 = 0.5 mol
∴ 30 mL 0.5 M H2SO4 में H2SO4 = [latex]\frac { 0.5 }{ 1000 } [/latex] x 30 mol = 0.015 mol
विलयन का आयतन = 500 mL = 0.5 L
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UP Board Solutions

प्रश्न 4.
यूरिया (NH2CONH2) के 0.25 मोलर, 2.5 kg जलीय विलयन को बनने के लिए आवश्यक यूरिया के द्रव्यमान की गणना कीजिए।
हल
यूरिया के 0.25 मोलर जलीय विलयन से तात्पर्य है –
यूरिया के मोल = 0.25
जल का द्रव्यमान = 1 Kg = 1000 g
यूरिया (NH2CONH2) का मोलर द्रव्यमान
= 14 + 2 + 12 + 16 + 14 + 2 = 60 g mol-1
अतः यूरिया के 0.25 mol = 0.25 mol x 60 g mol-1 = 15 g
विलयन को कुल द्रव्यमान = 1000 + 15 = 1015 g= 1.015 kg
अब, 1.015 kg विलयन में यूरिया = 15 g
अत: 2.5 kg विलयन में आवश्यक यूरिया = [latex]\frac { 15g }{ 1.015kg }[/latex] x 2.5 kg = 37 g

प्रश्न 5.
20% (w/w) जलीय KI का घनत्व 1.202 g mL-1 हो तो KI विलयन की

  1. मोललता
  2. मोलरता
  3. मोल-अंश की गणना कीजिए।

हल
20% (द्रव्यमान/द्रव्यमान) जलीय KI विलयन का अभिप्राय है कि KI का द्रव्यमान = 20 g
विलयन में जल को द्रव्यमान = 100 g
जल का द्रव्यमान = 100 – 20 = 80 g= 0.080 kg
1. विलयन की मोललता की गणना
KI का मोलर द्रव्यमान = 39 +127 = 166 g mol-1
KI के मोलों की संख्या = [latex]\frac { 20g }{ { 166gmol }^{ -1 } }[/latex] = 0.120
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2. विलयन की मोलरता की गणना
विलयन का घनत्व = 1.202 g mL-1
100 g विलयन का आयतन = [latex]\frac { 100g }{ { 1.202gmL }^{ -1 } }[/latex] = 83.2 mL = 0.0832 L
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 6
= [latex]\frac { 0.120mol }{ 0.0832L } [/latex] = 1.44 M

3.
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 7

प्रश्न 6.
सड़े हुए अण्डे जैसी गन्ध वाली विषैली गैस H2S गुणात्मक विश्लेषण में उपयोग की जाती है। यदि H2S गैस की जल में STP पर विलेयता 0.195 m हो तो हेनरी स्थिरांक की गणना
कीजिए।
हल
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प्रश्न 7.
298 K पर CO2 गैस की जल में विलेयता के लिए हेनरी स्थिरांक का मान 1.67 x 108 Pa है। 500 mL सोडा जल 2.5 atm दाब पर बन्द किया गया। 298 K ताप पर घुली हुई CO2 की मात्रा की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 8.
350 K पर शुद्ध द्रवों A एवं B के वाष्पदाब क्रमशः 450 एवं 750 mm Hg हैं। यदि कुल वाष्प दाब 600 mm Hg हो तो द्रव मिश्रण का संघटन ज्ञात कीजिए। साथ ही वाष्प प्रावस्था का संघटन भी ज्ञात कीजिए।
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 10

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प्रश्न 9.
298 K पर शुद्ध जल का वाष्प दाब 23.8 mm Hg है। 850 g जल में 50 g यूरिया (NH2CONH2) घोला जाता है। इस विलयन के लिए जल के वाष्प दाब एवं इसके आपेक्षिक अवनमन का परिकलन कीजिए।
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 11

प्रश्न 10.
750 mm Hg दाब पर जल का क्वथनांक 99.63°c है। 500 g जल में कितना सुक्रोस मिलाया जाए कि इसका 100°C पर क्वथन हो जाए?
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 12

प्रश्न 11.
ऐस्कॉर्बिक अम्ल (विटामिन C, C6H8O6) के उस द्रव्यमान का परिकलन कीजिए जिसे 75 g ऐसीटिक अम्ल में घोलने पर उसके हिमांक में 1.5°C की कमी हो जाए।
Kf = 3.9K kg mol-1
हल
हिमांक में अवनमन (∆Tf) = 1.5°
विलायक (CH3COOH) का द्रव्यमान, w1 = 75 g
विलायक (CH3COOH) का मोलर द्रव्यमान,
M1 = 60 g mol-1
विलेय (C6H8O6) का मोलर द्रव्यमान,
M2 = 176 g mol-1
Kf = 3.9 Kkg mol-1
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 13

प्रश्न 12.
1,85,000 मोलर द्रव्यमान वाले एक बहुलक के 1.0 g को 37°C पर 450 mL जल में घोलने से उत्पन्न विलयन के परासरण दाब का पास्कल में परिकलन कीजिए।
हल
परासरण दाब π = CRT = [latex s=2]\frac { { w }_{ 2 }\times R\times T }{ { M }_{ 2 }\times V } [/latex]
बहुलक को द्रव्यमान w2 = 1.0 g
बहुलक का मोलर द्रव्यमान (M2) = 185000 g mol-1
विलयन का आयतन (V) = 450 mL = 0.45 L
ताप (T)= 37 +273 = 310 K
विलयन स्थिरांक (R) = 8.314 × 103 Pa LK-1 mol-1
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 14
= 30.96 Pa

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
विलयन को परिभाषित कीजिए। कितने प्रकार के विभिन्न विलयन सम्भव हैं? प्रत्येक प्रकार के विलयन के सम्बन्ध में एक उदाहरण देकर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर
विलयन (Solution) – विलयन दो या दो से अधिक अवयवों का समांगी मिश्रण (homogeneous mixture) होता है जिसका संघटन निश्चित परिसीमाओं के अन्तर्गत ही परिवर्तित हो सकता है।

यहाँ समांगी मिश्रण से तात्पर्य यह है कि मिश्रण में सभी स्थानों पर इसका संघटन व गुण समान होते हैं। विलयन को बनाने वाले पदार्थ विलयन के अवयव कहलाते हैं। किसी विलयन में उपस्थित अवयवों की कुल संख्या के आधार पर इन्हें द्विअंगी विलयन (दो अवयव), त्रिअंगी विलयन (तीन अवयव), चतुरंगी विलयन (चार अवयव) आदि कहा जाता है।

द्विअंगी विलयन के अवयवों को सामान्यत: विलेय तथा विलायक कहा जाता है। सामान्यतः जो अवयव अधिक मात्रा में उपस्थित होता है, वह विलायक कहलाता है, जबकि कम मात्रा में उपस्थित अन्य अवयव विलेय कहलाता है। विलायक विलयन की भौतिक अवस्था निर्धारित करता है जिसमें विलयन विद्यमान होता है। दूसरे शब्दों में विलेय वह पदार्थ है जो घुलता है तथा विलायक वह पदार्थ है जिसमें यह विलेय (UPBoardSolutions.com) घुलता है। उदाहरणार्थ– यदि चीनी के कुछ क्रिस्टलों को जल से भरे बीकर में डाला जाता है तो ये जल में घुलकर विलयन बना लेते हैं। इस स्थिति में चीनी विलेय तथा जल विलायक है। विलयन में कणों का आण्विक आकार लगभग 1000 pm होता है तथा इसके विभिन्न अवयवों को किसी भी भौतिक विधि जैसे फिल्टरीकरण, निथारन, अभिकेन्द्रीकरण आदि के द्वारा पृथक्कृत नहीं किया जा सकता है।

विलयन के प्रकार (Types of solution) – विलेय तथा विलायक की भौतिक अवस्था के आधार पर विलयनों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 15
उपर्युक्त नौ प्रकार के विलयनों में से तीन विलयन- द्रव में ठोस, द्रव में गैस तथा द्रव में द्रव अतिसामान्य विलयन हैं। इन तीनों प्रकार के विलयनों में द्रव विलायक के रूप में होता है। वे विलयन जिनमें जल विलायक के रूप में होता है, जलीय विलयन (aqueous solution) कहलाते हैं, (UPBoardSolutions.com) जबकि जिन विलयनों में जल विलायक के रूप में नहीं होता अजलीय विलयन (non-aqueous solution) कहलाते हैं। सामान्य अजलीय विलायकों के उदाहरण हैं- ईथर, बेन्जीन, कार्बन टेट्राक्लोराइड आदि।
विलयन के प्रकारों की व्याख्या निम्नलिखित है –

(1) गैसीय विलयन (Gaseous solutions) – सभी गैसें तथा वाष्प समांगी मिश्रण बनाती हैं तथा इसीलिए इन्हें विलयन कहा जाता है। ये विलयन स्वत: तथा तीव्रता से बनते हैं। वायु गैसीय विलयन का एक सामान्य उदाहरण है।

(2) द्रव विलयन (Liquid solutions) – ये विलयन ठोसों अथवा गैसों को द्रवों में मिश्रित करने पर अथवा दो द्रवों को मिश्रित करने पर बनते हैं। कुछ ठोस पदार्थ भी मिश्रित करने पर द्रव विलयन बनाते हैं। उदाहरणार्थ- साधारण ताप पर सोडियम तथा पोटैशियम धातुओं की सममोलर मात्राएँ मिश्रित करने पर द्रव विलयन प्राप्त होता है। जल में पर्याप्त मात्रा में विलेय ऑक्सीजन तालाबों, नदियों तथा समुद्र में जलीय जीवों की प्राण-रक्षा करती है।
इन विलयनों में द्रव में द्रव विलयन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। गैसों के समान द्रव मिश्रित किए जाने पर समांगी मिश्रण नहीं बनाते हैं। इनकी विलेयताओं के आधार पर इन मिश्रणों को तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है –

  1. जब दोनों अवयव पूर्णतया मिश्रणीय हों (When both components are completely miscible) – इस स्थिति में दोनों द्रव समान प्रवृत्ति के होते हैं अर्थात् या तो ये दोनों ध्रुवी (जैसे-एथिल ऐल्कोहॉल तथा जल) होते हैं या अध्रुवी (जैसे—बेन्जीन तथा हेक्सेन) होते हैं।
  2. जब दोनों अवयव लगभग मिश्रणीय हों (When both components are almost miscible) – यहाँ एक द्रव ध्रुवी तथा दूसरा अध्रुवी प्रकृति का होता है; जैसे-बेन्जीन तथा जल, तेल तथा जल आदि।
  3. जब दोनों अवयव आंशिक मिश्रणीय हों (When both components are partially miscible) – यदि द्रव A में अन्तरअणुक आकर्षण A-A, द्रव B में अन्तरअणुक आकर्षण B-B से भिन्न हो, परन्तु A-B आकर्षण माध्यमिक कोटि का हो, तब दोनों द्रव परस्पर सीमित मिश्रणीय होते हैं। उदाहरणार्थ-ईथर तथा जल आंशिक रूप से मिश्रित होते हैं।

(3) ठोस विलयन (Solid solutions) – ठोसों के मिश्रणों की स्थिति में ये विलयन अत्यन्त सामान्य होते हैं। उदाहरणार्थ- गोल्ड तथा कॉपर ठोस विलयन बनाते हैं; क्योंकि गोल्ड परमाणु कॉपर क्रिस्टल में कॉपर परमाणुओं को प्रतिस्थापित कर देते हैं तथा इसी प्रकार कॉपर परमाणु (UPBoardSolutions.com) गोल्ड क्रिस्टलों में गोल्ड परमाणुओं को प्रतिस्थापित कर सकते हैं। दो अथवा दो से अधिक धातुओं की मिश्रधातुएँ ठोस विलयन होती हैं।
ठोस विलयनों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. प्रतिस्थापनीय ठोस विलयन (Substitutional solid solutions) – इन विलयनों में एक पदार्थ के परमाणु, अणु अथवा आयन क्रिस्टल जालक में अन्य पदार्थ के कणों का स्थान ले लेते हैं। पीतल, कॉपर तथा जिंक प्रतिस्थापनीय ठोस विलयनों के सामान्य उदाहरण हैं।
  2. अन्तराकाशी ठोस विलयन (Interstitial solid solutions) – इन विलयनों में एक प्रकार के परमाणु अन्य पदार्थ के परमाणुओं के जालक में विद्यमान रिक्तिकाओं अथवा अन्तराकाशों के स्थान को ग्रहण कर लेते हैं। अन्तराकाशी ठोस विलयन का एक सामान्य उदाहरण टंगस्टन-कार्बाइड (WC) है।

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प्रश्न 2.
एक ऐसे ठोस विलयन का उदाहरण दीजिए जिसमें विलेय कोई गैस हो।
उत्तर
चूँकि एक पदार्थ के कण दूसरे पदार्थ के कणों की तुलना में बहुत छोटे हैं, अतः छोटे कण बड़े कणों के अन्तराकाशी स्थलों में व्यवस्थित हो जायेंगे। अतः ठोस विलयन अन्तराकाशी ठोस विलयन (interstitial solid solution) प्रकार का होगा।

प्रश्न 3.
निम्न पदों को परिभाषित कीजिए –

  1. मोल-अंश (2018)
  2. मोललता
  3. मोलरता
  4. द्रव्यमान प्रतिशत।

या
किसी जलीय विलयन की सान्द्रता व्यक्त करने की किन्हीं चार विधियों का उल्लेख कीजिए। प्रत्येक का एक उदाहरण भी दीजिए। (2018)
उत्तर
1. मोल-अंश (Mole-Fraction) – विलयन में उपस्थित किसी एक घटक या अवयव के मोलों की संख्या तथा विलेय एवं विलायक के कुल मोलों की संख्या के अनुपात को उस अवयव का मोल-अंश कहते हैं। इसे x से व्यक्त करते हैं।
माना एक विलयन में विलेय के nA मोल तथा विलायक के nB मोल उपस्थित हैं, तब
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 16
अतः यदि किसी द्विअंगी विलयन के एक अवयव के मोल-अंश ज्ञात हों तो दूसरे अवयव के मोल-अंश ज्ञात किए जा सकते हैं। उदाहरणार्थ-द्विअंगी विलयन के लिए मोल-अंश xA, xB से निम्नलिखित प्रकार सम्बन्धित है –
xA = 1 – xB
या  xB = 1 – xA
मोल- अंश विलयन के ताप पर निर्भर नहीं करते हैं।

2. मोललता (Molality) – किसी विलयन के 1 kg विलायक में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या विलयन की मोललता कहलाती है। इसे m से व्यक्त किया जाता है। गणितीय रूप में,
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 17
अत: मोललता की इकाई मोल प्रति किग्रा (mol kg-1) होती है।
यदि विलेय के nB मोल विलायक के W ग्राम में घुले हों, तब
मोललता = [latex]\frac { { n }_{ B } }{ W }[/latex] x 1000

3. मोलरता (Molarity) – एक लीटर (1 क्यूबिक डेसीमीटर) विलयन में घुले हुए विलेय के मोलों की संख्या को उस विलयन की मोलरता (M) कहते हैं।
अत: वह विलयन जिसमें विलेय के एक ग्राम- मोल विलयन के एक लीटर में उपस्थित हों, 1 M विलयन कहलाता है। उदाहरणार्थ– 1M-Na2CO3 (मोलर द्रव्यमान = 106) विलयन के प्रति लीटर में 106 g विलेय उपस्थित होता है।
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अतः मोलरता की इकाई मोल प्रति लीटर (mol L-1) या मोल प्रति घन डेसीमीटर (mol dm-3) होती हैं। प्रतीक M को mol L-1 अथवा mol dm-3 के लिए प्रयोग किया जाता है तथा यह मोलरता व्यक्त करता है।
यदि विलेय के nB मोल विलयन के V mL आयतन में उपस्थित हों, तब
मोलरता (M) = [latex]\frac { { n }_{ B } }{ V }[/latex] x 1000
विलेय के मोल निम्नलिखित प्रकार ज्ञात किए जा सकते हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 19
मोलरता सान्द्रता व्यक्त करने की एक साधारण माप है जिसे प्रयोगशाला में सामान्यतया प्रयोग किया जाता है। यद्यपि इसमें एक कमी है, यह ताप के साथ परिवर्तित हो जाती है क्योंकि ताप के साथ द्रव का प्रसार अथवा संकुचन हो जाता है।

(iv) द्रव्यमान प्रतिशत (Mass Percentage) – किसी विलयन में किसी अवयव का द्रव्यमान प्रतिशत विलयन के प्रति 100 g में उस अवयव का द्रव्यमान होता है। उदाहरणार्थ– यदि विलयन में अवयव A का द्रव्यमान WA तथा अवयव B को द्रव्यमान WB हो तो
A का द्रव्यमान प्रतिशत = [latex]\frac { { W }_{ A } }{ { W }_{ A }+{ W }_{ B } } [/latex] × 100
इसे w/w से व्यक्त किया जाता है। उदाहरणार्थ- 10% (w/w) सोडियम क्लोराइड विलयन का अर्थ है। कि 10 g सोडियम क्लोराइड 90 g जल में उपस्थित है तथा विलयन का कुल द्रव्यमान 100 g है अथवा 10 g सोडियम क्लोराइड 100 g विलयन में उपस्थित है।

प्रश्न 4.
प्रयोगशाला कार्य के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला सान्द्र नाइट्रिक अम्ल द्रव्यमान की दृष्टि से नाइट्रिक अम्ल का 68% जलीय विलयन है। यदि इस विलयन का घनत्व 1.504 g mL-1 हो तो अम्ल के इस नमूने की मोलरता क्या होगी?
हल
द्रव्यमानानुसार 68% HNO3 का तात्पर्य है कि 100 g विलयन में 68 g HNO3 उपस्थित होगा।
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प्रश्न 5.
ग्लूकोस का एक जलीय विलयन 10% (w/w) है। विलयन की मोललता तथा विलयन में प्रत्येक घटक का मोल-अंश क्या है? यदि विलयन का घनत्व 1.2 g mL-1 हो तो विलयन की मोलरता क्या होगी?
हल
10%(w/w) ग्लूकोस विलयन का तात्पर्य है कि 100 g ग्लूकोस विलयन में 10 g ग्लूकोस उपस्थित होगा।
जल का द्रव्यमान = 100 – 10 = 90 g= 0.090 kg
10 g ग्लूकोस = [latex]\frac { 10 }{ 180 } [/latex] mol = 0.0555 mol,
90 g H2O = [latex]\frac { 90 }{ 18 } [/latex] = 5 mol
मोललता (m)= [latex]\frac { 0.0555 }{ 0.090 } [/latex] = 0.617 m
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प्रश्न 6.
यदि 1 g मिश्रण में Na2CO3 एवं NaHCO3 के मोलों की संख्या समान हो तो इस मिश्रण से पूर्णतः क्रिया करने के लिए 0.1 M HCl के कितने mL की आवश्यकता होगी?
हल
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प्रश्न 7.
द्रव्यमान की दृष्टि से 25% विलयन के 300 g एवं 40% के 400 g को आपस में मिलाने पर प्राप्त मिश्रण का द्रव्यमान प्रतिशत सान्द्रण निकालिए।
हल
25% विलयन का तात्पर्य है कि 25 g विलेय 100 g विलयन में उपस्थित है तथा 40% विलयन का तात्पर्य है कि 40 g विलेय 100 g विलयन में उपस्थित है।
300 g विलयन में विलेय = [latex s=2]\frac { 25\times 300 }{ 100 } [/latex] = 75 g
400 g विलयन में विलेय = [latex s=2]\frac { 40\times 400 }{ 100 } [/latex] = 160 g
∴ विलेय का कुल द्रव्यमान = 75 + 160 = 235 g
∴ मिश्रण में विलेय का द्रव्यमान प्रतिशत = [latex s=2]\frac { 235\times 100 }{ 700 } [/latex] = 33.57 %

प्रश्न 8.
222.6 g, एथिलीन ग्लाइकॉल, C2H4(OH)2 तथा 200 g जल को मिलाकर प्रतिहिम मिश्रण बनाया गया। विलयन की मोललता की गणना कीजिए। यदि विलयन का घनत्व 1.072 g mL-1 हो तो विलयन की मोलरता निकालिए।
हल
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प्रश्न 9.
एक पेय जल का नमूना क्लोरोफॉर्म (CHCl3) से कैंसरजन्य समझे जाने की सीमा तक बहुत अधिक संदूषित है। इसमें संदूषण की सीमा 15 ppm (द्रव्यमान में) है –
(i) इसे द्रव्यमान प्रतिशत में व्यक्त कीजिए।
(ii) जल के नमूने में क्लोरोफॉर्म की मोललता ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 10.
ऐल्कोहॉल एवं जल के एक विलयन में आण्विक अन्योन्यक्रिया की क्या भूमिका है?
उत्तर
ऐल्कोहॉल एवं जल के विलयन में ऐल्कोहॉल तथा जल के अणु अन्तराआण्विक H- बन्ध बनाते हैं। लेकिन यह H2O-H2O तथा ऐल्कोहॉल-ऐल्कोहॉल H-बन्ध से दुर्बल होते हैं। इससे अणुओं की वाष्प अवस्था में जाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। अत: यह विलयन राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 11.
ताप बढ़ाने पर गैसों की द्रवों में विलेयता में हमेशा कमी आने की प्रवृत्ति क्यों होती है?
उत्तर
गैस + विलायक [latex]\leftrightarrows [/latex] विलयन + ऊष्मा
गैस का द्रव में घुलना एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है। ताप बढ़ाने पर साम्य बायीं ओर विस्थापित होता है और विलयन से गैस मुक्त होती है।

प्रश्न 12.
हेनरी का नियम तथा इसके कुछ महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग लिखिए।
उत्तर
हेनरी का नियम (Henry’s Law) – सर्वप्रथम गैस की विलायक में विलेयता तथा दाब के मध्य मात्रात्मक सम्बन्ध हेनरी ने दिया। इसे हेनरी का नियम कहते हैं। इसके अनुसार, ‘‘स्थिर ताप पर विलायक के प्रति एकांक आयतन में घुला गैस का द्रव्यमान विलयन के साथ साम्यावस्था में गैस के दाब के समानुपाती होता है।’

डाल्टन, जो हेनरी के समकालीन थे, ने भी स्वतन्त्र रूप से निष्कर्ष निकाला कि किसी द्रवीय विलयन में गैस की विलेयता गैस के आंशिक दाब पर निर्भर करती है। (UPBoardSolutions.com) यदि हम विलयन में गैस के मोल-अंश को उसकी विलेयता का माप मानें तो यह कहा जा सकता है कि किसी विलयन में गैस का मोल-अंश उस विलयन के ऊपर उपस्थित गैस के आंशिक दाब के समानुपाती होता है।
अत: विकल्पतः हेनरी नियम को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –
“किसी गैस का वाष्प-अवस्था में आंशिक दाब (p), उस विलयन में गैस के मोल-अंश (x) के समानुपाती होता है।”
p α x
p= KH . x
यहाँ KH हेनरी स्थिरांक है। जब एक से अधिक गैसों के मिश्रण को विलायक के सम्पर्क में लाया जाता है, तब प्रत्येक गैसीय अवयव अपने आंशिक दाब के समानुपात में घुलता है। इसीलिए हेनरी नियम अन्य गैसों की उपस्थिति से स्वतन्त्र होकर प्रत्येक गैस पर लागू किया जाता है।

हेनरी नियम के अनुप्रयोग (Applications of Henry’s Law) – हेनरी नियम के उद्योगों में अनेक अनुप्रयोग हैं एवं यह कुछ जैविक घटनाओं को समझने में सहायक होता है। इसके कुछ महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं –

(1) सोडा-जल एवं शीतल पेयों में CO2 की विलेयता बढ़ाने के लिए बोतल को अधिक दाब पर बन्द किया जाता है।

(2) गहरे समुद्र में श्वास लेते हुए गोताखोरों को अधिक दाब पर गैसों को अधिक घुलनशीलता का सामना करना पड़ सकता है। अधिक बाहरी दाब के कारण श्वास के साथ ली गई वायुमण्डलीय गैसों की विलेयता रुधिर में अधिक हो जाती है। जब गोताखोर सतह की ओर आते हैं, बाहरी दाब धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसके कारण घुली हुई गैसें बाहर निकलती हैं, इससे रुधिर में नाइट्रोजन के (UPBoardSolutions.com) बुलबुले बन जाते हैं। यह केशिकाओं में अवरोध उत्पन्न कर देता है और एक चिकित्सीय अवस्था उत्पन्न कर देता है। जिसे बेंड्स (Bends) कहते हैं, यह अत्यधिक पीड़ादायक एवं जानलेवा होता है। बेंड्स से तथा नाइट्रोजन की रुधिर में अधिक मात्रा के जहरीले प्रभाव से बचने के लिए, गोताखोरों द्वारा श्वास लेने के लिए उपयोग किए जाने वाले टैंकों में हीलियम मिलाकर तनु की गई वायु को भरा जाता है (इस वायु को संघटन इस प्रकार होता है-11.7% हीलियम, 56.2% नाइट्रोजन तथा 32.1% ऑक्सीजन)।

(3) अधिक ऊँचाई वाली जगहों पर ऑक्सीजन का आंशिक दाब सतही स्थानों से कम होता है, अत: इन जगहों पर रहने वाले लोगों एवं आरोहकों के रुधिर और ऊतकों में ऑक्सीजन की सान्द्रता निम्न हो जाती है। इसके कारण आरोहक कमजोर हो जाते हैं और स्पष्टतया सोच नहीं पाते। इन लक्षणों को एनॉक्सिया कहते हैं।

प्रश्न 13.
6.56 x 10-3 g एथेन युक्त एक संतृप्त विलयन में एथेन का आंशिक दाब 1 bar है। यदि विलयन में 5.00 x 10-2 g एथेन हो तो गैस का आंशिक दाब क्या होगा?
हल
m = KH x p
प्रथम मामले में, 6.56 x 10-2 g = KH x 1 bar
KH = 6.56 x 10-2 g bar-1
द्वितीय मामले में, 5.00 x 10-2 g = (6.56 x 10-2 g bar-1) x p
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प्रश्न 14.
राउल्ट के नियम से धनात्मक एवं ऋणात्मक विचलन का क्या अर्थ है तथा Δमिश्रण H का चिह्न इन विचलनों से कैसे सम्बन्धित है?
उत्तर
जब कोई विलयन सभी सान्द्रताओं पर राउल्ट के नियम का पालन नहीं करता तो वह अनादर्श विलयन (non-ideal solution) कहलाता है। इस प्रकार के विलयनों का वाष्प दाब राउल्ट के नियम द्वारा निर्धारित किए गए वाष्प दाब से या तो अधिक होता है या कम। यदि यह अधिक होता है तो यह विलयन राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन (positive deviation) प्रदर्शित करता है और यदि यह कम होता है तो यह ऋणात्मक विचलन (negative deviation) प्रदर्शित करता है।

(i) राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन प्रदर्शित करने वाले अनादर्श विलयन (Non-ideal solutions showing positive deviation from Raoult’s law) – दो अवयवों A तथा B वाले एक द्विअंगी विलयन पर विचार करते हैं। यदि विलयन में A-B अन्योन्यक्रियाएँ A-A तथा B-B अन्योन्यक्रियाओं की तुलना में दुर्बल होती हैं अर्थात् विलेय-विलायक अणुओं के मध्य अन्तराआण्विक आकर्षण बल विलेय-विलेय और विलायक-विलायक अणुओं की तुलना में दुर्बल होते हैं, तब इस प्रकार के विलयनों में से A अथवा B के (UPBoardSolutions.com) अणु शुद्ध अवयव की तुलना में सरलता से पलायन कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप विलयन के प्रत्येक अवयव का वाष्प दाब राउल्ट नियम के आधार पर अपेक्षित वाष्प दाब से अधिक होता है। इस प्रकार कुल वाष्प दाब भी अधिक होता है। विलयन का यह व्यवहार राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन के रूप में जाना जाता है।
गणितीय रूप से इसे इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –
PA > PºA xA तथा PB > PºBxB

इसी प्रकार कुल वाष्प दाब, p = pA + pB सदैव (pºAxA + pºBxB) से अधिक होता है।
इस प्रकार के विलयनों में, Δमिश्रण H शून्य नहीं होता, अपितु धनात्मक होता है क्योकि A-A अथवा B-B आकर्षण बलों के विरुद्ध ऊष्मा की आवश्यकता होती है। अत: घुलनशीलता ऊष्माशोषी प्रक्रिया होती है।

(ii) राउल्ट नियम से ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करने वाले अनादर्श विलयन (Non-ideal solutions showing negative deviation from Raoult’s law) – इस प्रकार के विलयनों में A-A व B-B के बीच अन्तराआण्विक आकर्षण बल A-B की तुलना में दुर्बल होता है, अत: इस प्रकार के विलयनों में A तथा B अणुओं की पलायन प्रवृत्ति शुद्ध अवयव की तुलना में कम होती है, परिणामस्वरूप विलयन के प्रत्येक अवयव का वाष्प दाब राउल्ट नियम के आधार पर अपेक्षित वाष्प दाब से कम होता है। इसी प्रकार कुल वाष्प दाब भी कम होता है। गणितीय रूप में,
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इस प्रकार के विलयनों में Δमिश्रण H शून्य नहीं होता, अपितु ऋणात्मक होता है क्योंकि आकर्षण बलों में वृद्धि से ऊर्जा उत्सर्जित होती है। अत: घुलनशीलता ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 15.
विलायक के सामान्य क्वथनांक पर एक अवाष्पशील विलेय के 2% जलीय विलयन का 1.004 bar वाष्प दाब है। विलेय का मोलर द्रव्यमान क्या है?
हल
क्वथनांक पर शुद्ध जल का वाष्प दाब (p°) = 1 atm = 1.013 bar
विलयन का वाष्प दाब (ps) = 1.004 bar

विलेय का द्रव्यमान (w2) = 2 g
विलयन का द्रव्यमान = 100 g
विलयन का द्रव्यमान = 98 g
तनु विलयनों के लिए राउल्ट के नियमानुसार,
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प्रश्न 16.
हेप्टेन एवं ऑक्टेन एक आदर्श विलयन बनाते हैं। 373 K पर दोनों द्रव घटकों के वाष्प दाब क्रमशः 105.2 k Pa तथा 46.8 k Pa हैं। 26.0 g हेप्टेन एवं 35.0 g ऑक्टेन के मिश्रण का वाष्प दाब क्या होगा?
हल
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प्रश्न 17.
300 K पर जल का वाष्प दाब 12.3 k Pa है। इसमें बने अवाष्पशील विलेय के एक मोलल विलयन का वाष्प दाब ज्ञात कीजिए।
हल
एक मोलल विलयन का तात्पर्य है कि 1 kg विलायक (जल) में विलेय का 1 mol उपस्थित है।
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प्रश्न 18.
114 g ऑक्टेन में किसी अवाष्पशील विलेय (मोलर द्रव्यमान 40 gmol-1) की कितनी मात्रा घोली जाए कि ऑक्टेन का वाष्प दाब घट कर मूल वाष्प दाब का 80% रह जाए?
हल
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प्रश्न 19.
एक विलयन जिसे एक अवाष्पशील ठोस के 30 g को 90 g जल में विलीन करके बनाया गया है। उसका 298 K पर वाष्प दाब 2.8 k Pa है। विलयन में 18 g जल और मिलाया जाता है जिससे नया वाष्प दाब 298 K पर 2.9 k Pa हो जाता है। निम्नलिखित की गणना कीजिए-
(i) विलेय का मोलर द्रव्यमान
(ii) 298 K पर जल का वाष्प दाब।
हल
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प्रश्न 20.
शक्कर के 5% (द्रव्यमान) जलीय विलयन का हिमांक 271 K है। यदि शुद्ध जल को हिमांक 273.15 K है तो ग्लूकोस के 5% जलीय विलयन के हिमांक की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 21.
दो तत्व A एवं B मिलकर AB2 एवं AB4 सूत्र वाले दो यौगिक बनाते हैं। 20 g बेन्जीन में घोलने पर 1g AB2 हिमांक को 2.3 K अवनमित करता है, जबकि 1.0 g AB4 से 1.3 K का अवनमन होता है। बेन्जीन के लिए मोलर अवनमन स्थिरांक 5.1 K kg mol-1 है। A एवं B के परमाण्वीय द्रव्यमान की गणना कीजिए।
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 36

प्रश्न 22.
300 K पर 36 g प्रति लीटर सान्द्रता वाले ग्लूकोस के विलयन का परासरण दाब 4.98 bar है। यदि इसी ताप पर विलयन का परासरण दाब 1.52 bar हो तो उसकी सान्द्रता क्या होगी?
हल
प्रश्नानुसार, परासरण दाब = 4.98 bar, w = 36 g, V = 1 L (I मामले में)
परासरण दाब = 1.52 bar (II मामले में)
I के लिए, πV = [latex]\frac { w }{ M }[/latex] RT
4.98 × 1 = [latex]\frac { 36 }{ 180 }[/latex] × R × T
II के लिए, 1.52 = c x R x T(c = [latex s=2]\frac { w }{ M\times V } [/latex])
समीकरण (i) तथा (ii) को हल करने पर, c= 0.061 mol L-1

प्रश्न 23.
निम्नलिखित युग्मों में उपस्थित सबसे महत्त्वपूर्ण अन्तरआण्विक आकर्षण बलों का सुझाव दीजिए –

  1. n-हेक्सेन व n-ऑक्टेन
  2. I2 तथा CCl4
  3. NaClO4 तथा H2O
  4. मेथेनॉल तथा ऐसीटोन
  5. ऐसीटोनाइट्राइल (CH3CN) तथा ऐसीटोन (C3H6O)।

उत्तर

  1. लण्डन परिक्षेपण बल,
  2. लण्डन परिक्षेपण बल,
  3. आयन-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाएँ,
  4. द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्य क्रियाएँ
  5. द्विध्रुव–द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाएँ।

प्रश्न 24.
विलेय-विलायक आकर्षण के आधार पर निम्नलिखित को n-ऑक्टेन में विलेयता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
KCl, CH3OH, CH3CN, साइक्लोहेक्सेन।
उत्तर
KCl < CH3OH < CH3CN < साइक्लोहेक्सेन
KCl आयनिक यौगिक,है। अत: यह अध्रुवीय विलायक में नहीं घुलता, अत: यह 2-ऑक्टेन में सबसे कम विलेय है। साइक्लोहेक्सेन अध्रुवीय होने के (UPBoardSolutions.com) कारण n-ऑक्टेन में आसानी से विलेय होती है। CH3CN, CH3OH की तुलना में कम ध्रुवीय है, अत: इसकी विलेयता CH3OH से अधिक होती है।

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प्रश्न 25.
पहचानिए कि निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-से जल में अत्यधिक विलेय, आंशिक रूप से विलेय तथा अविलेय हैं –

  1. फीनॉल
  2. टॉलूईन
  3. फॉर्मिक अम्ल
  4. एथिलीन ग्लाइकॉल
  5. क्लोरोफॉर्म
  6. पेन्टेनॉल।

उत्तर

  1. आंशिक विलेय,
  2. अविलेय,
  3. अत्यधिक विलेय,
  4. अत्यधिक विलेय,
  5. अविलेय,
  6. आंशिक विलेय।

प्रश्न 26.
यदि किसी झील के जल का घनत्व 1.25 g mL-1 है तथा उसमें 92 g Na+ आयन प्रति किलो जल में उपस्थित हैं तो झील में Na+ आयन की मोललता ज्ञात कीजिए।
हल
विलेय का भार = 92 g, विलायक का भार = 1000 g
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प्रश्न 27.
अगर CuS का विलेयता गुणनफल 6 x 10-16 है तो जलीय विलयन में उसकी अधिकतम मोलरता ज्ञात कीजिए।
हल
जलीय विलयन में CuS की अधिकतम मोलरता = mol L-1 में CuS की विलेयता यदि mol L-1 में Cus की विलेयता s है तो
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प्रश्न 28.
जब 6.5 g ऐस्पिरीन (C9H8O4) को 450 g ऐसीटोनाइट्राइल (CH3CN) में घोला जाए तो ऐस्पिरीन का ऐसीटोनाइट्राइल में भार प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 29.
नैलॉन (C19H21NO3) जो कि मॉर्फीन जैसी होती है, का उपयोग स्वापक उपभोक्ताओं द्वारा स्वापक छोड़ने से उत्पन्न लक्षणों को दूर करने में किया जाता है। सामान्यतया नैलॉन की 1.5 mg खुराक दी जाती है। उपर्युक्त खुराक के लिए 1.5 x 10-3 m जलीय विलयन का कितना द्रव्यमान आवश्यक होगा?
हल
विलेय का भार = 1.5 mg= 0.0015 g,
विलेय का अणुभार = 311,
विलायक को भार = w
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विलायक का भार = 3.2154 g,
विलयन का भार = 3.2154 + 0.0015 = 3.2159 g

प्रश्न 30.
बेन्जोइक अम्ल का मेथेनॉल में 0.15 m विलयन बनाने के लिए आवश्यक मात्रा की गणना कीजिए।
हल
V = 250 ml, m = 0.15 m, विलेय का अणुभार = 122, विलेय की मात्रा = ?
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प्रश्न 31.
ऐसीटिक अम्ल, ट्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल एवं ट्राइफ्लुओरो ऐसीटिक अम्ल की समान मात्रा से जल के हिमांक में अवनमन इनके उपर्युक्त दिए गए क्रम में बढ़ता है। संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
हिमांक में अवनमन निम्न क्रम में होता है –
ऐसीटिक अम्ल < ट्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल < ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल

फ्लोरीन अधिक ऋणविद्युती होने के कारण उच्चतम इलेक्ट्रॉन निष्कासन प्रेरणिक प्रभाव रखती है। अतः ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल प्रबल अम्ल है जबकि ऐसीटिक अम्ल दुर्बलतम अम्ल है।। अतः ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल अत्यधिक आयनित होकर अधिक आयन उत्पन्न (UPBoardSolutions.com) करता है जबकि ऐसीटिक अम्ल सबसे कम आयन उत्पन्न करता है। अधिक आर्यन उत्पन्न करने के कारण ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल हिमांक में अधिक अवनमन करता है एवं ऐसीटिक अम्ल सबसे कम।

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प्रश्न 32.
CH3 – CH2 – CHCl – COOH के 10 g को 250 g जल में मिलाने से होने वाले हिमांक का अवनमन परिकलित कीजिए। (Ka = 1.4 × 10-3, Kf = 186 K kg mol-1)
हल
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प्रश्न 33.
CH2FCOOH के 19.5 g को 500 g H2O में घोलने पर जल के हिमांक में 10°C का अवनमन देखा गया। फ्लुओरोऐसीटिक अम्ल का वान्ट हॉफ गुणक तथा वियोजन स्थिरांक परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 34.
293 K पर जल का वाष्प दाब 17.535 mm Hg है। यदि 25 g ग्लूकोस को 450 g जल में घोलें तो 293 K पर जल का वाष्प दाब परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 35.
298 K पर मेथेन की बेन्जीन में मोललता का हेनरी स्थिरांक 4.27 x 105 mm Hg है। 298 K तथा 760 mm Hg दाब पर मेथेन की बेन्जीन में विलेयता परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 36.
100 g द्रव A (मोलर द्रव्यमान 140 g mol-1) को 1000 g द्रव B (मोलर द्रव्यमान 180 g mol-1) में घोला गया। शुद्ध द्रव B का वाष्प दाब 500 Torr पाया गया। शुद्ध द्रव A का वाष्प दाब तथा विलयन में उसका वाष्प दाब परिकलित कीजिए यदि विलयन का कुल वाष्प दाब 475 Torr हो।
हल
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प्रश्न 37.
328 K पर शुद्ध ऐसीटोन एवं क्लोरोफॉर्म के वाष्प दाब क्रमशः 741.8 mm Hg तथा 632.8 mm Hg हैं। यह मानते हुए कि संघटन के सम्पूर्ण परास में ये आदर्श विलयन बनाते हैं, Pकल , Pक्लोरोफॉर्म तथा Pएसीटोन  को xएसीटोन  के फलन के रूप में आलेखित कीजिए। मिश्रण के विभिन्न संघटनों के प्रेक्षित प्रायोगिक आँकड़े अग्रलिखित हैं –
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उपर्युक्त आँकड़ों को भी उसी ग्राफ में आलेखित कीजिए और इंगित कीजिए कि क्या इसमें आदर्श विलयन से धनात्मक अथवा ऋणात्मक विचलन है?
हल
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उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर ग्राफ की प्रकृति निम्नलिखित है –

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चूंकि Pकल का ग्राफ नीचे की ओर झुका है, अत: विलयन राउल्ट के नियम से ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित कर रहा है।

प्रश्न 38.
संघटनों के सम्पूर्ण परास में बेन्जीन तथा टॉलूईन आदर्श विलयन बनाते हैं। 300 K पर शुद्ध बेन्जीन तथा टॉलूईन का वाष्प दाब क्रमशः 50.71 mm Hg तथा 32.06 mm Hg है। यदि 80 g बेन्जीन को 100 g टॉलूईन में मिलाया जाए तो वाष्प अवस्था में उपस्थित बेन्जीन के मोल-अंश परिकलित कीजिए।
हल
द्रव अवस्था में nB = [latex]\frac { 80 }{ 78 } [/latex] = 1.026, nT = [latex]\frac { 100 }{ 92 } [/latex] = 1.087
XB = 0.486, XT = 0.514
PB = 50.71 x 0.486 = 24.65
pT = 32.06 x 0.514 = 16.48
बेंजीन का वाष्प अवस्था में मोल प्रभाज = [latex]\frac { 24.65 }{ 24.65+16.48 } [/latex] = 0.60

प्रश्न 39.
वायु अनेक गैसों का मिश्रण है। 298 K पर आयतन में मुख्य घटक ऑक्सीजन और नाइट्रोजन लगभग 20% एवं 79% के अनुपात में हैं। 10 वायुमण्डल दाब पर जल वायु के साथ साम्य में है। 298 K पर यदि ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन के हेनरी स्थिरांक क्रमशः 3.30 x 107 mm तथा 6.51 x 107 mm हैं तो जल में इन गैसों का संघटन ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 40.
यदि जल का परासरण दाब 27°C पर 0.75 वायुमण्डल हो तो 2.5 लीटर जल में घुले CaCl2 (i = 2.47) की मात्रा परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 41.
2 लीटर जल में 25°C पर K2 SO4 के 25 mg को घोलने पर बनने वाले विलयन का परासरण दाब, यह मानते हुए ज्ञात कीजिए कि K2 SO4 पूर्णतः वियोजित हो गया है।
हल
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
1 मोलल जलीय विलयन में विलेय का मोल प्रभाज है – (2017)
(1) 1
(ii) 1.8
(iii) 18
(iv) 0.018
उत्तर
(iv) 0.018

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प्रश्न 2.
शुद्ध जल की मोलरता होती है – (2014, 16, 17)
(i) 55.56
(ii) 5.556
(iii) 0.18
(iv) 0.018
उत्तर
(i) 55.56

प्रश्न 3.
0.2 M H ,SO, विलयन की सान्द्रता ग्राम प्रति लीटर में होगी – (2017)
(i) 21.4
(ii) 39.2
(iii) 9.8
(iv) 19.6
उत्तर
(iv) 19.6

प्रश्न 4.
किसका वाष्प दाब न्यूनतम होगा? (2017)
(i) 0.1 M BaCl2 विलयन
(ii) 0.1 M फिनॉल विलयन
(iii) 0.1 M सुक्रोज विलयन
(iv) 0.1 M सोडियम क्लोराइड विलयन
उत्तर
(i) 0.1 M BaCl2 विलयन

प्रश्न 5.
दो द्रवों Pएवं ९ के वाष्पदाब क्रमशः 80 मिमी एवं 60 मिमी हैं। P के 3 मोल तथा Q के 2 मोल मिलाने पर प्राप्त विलयन का कुल वाष्पदाब होगा – (2014)
(i) 140 मिमी
(ii) 20 मिमी
(iii) 68 मिमी
(iv) 72 मिमी
उत्तर
(iv) 72 मिमी

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा अणुसंख्य गुणधर्म है? (2015)
(i) श्यानता।
(ii) परासरण दाब
(iii) प्रकाशिक घूर्णन
(iv) पृष्ठ तनाव
उत्तर
(ii) परासरण दाब

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से विलयन का कौन-सा भौतिक गुण अणुओं की संख्या पर निर्भर नहीं करता? (2018)
(i) वाह्य सह अवनमन
(ii) हिमांक अवनमन
(iii) पृष्ठ तनाव
(iv) परासरण दाब
उत्तर
(iii) पृष्ठ तनाव

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प्रश्न 8.
निम्न में किसके जलीय विलयन का क्वथनांक सर्वाधिक होगा? (2017)
(i) 1% ग्लूकोस
(ii) 1% NaCl
(iii) 1% CaCl2
(iv) 1% सुक्रोस
उत्तर
(iii) 1% CaCl2

प्रश्न 9.
निम्न के 0.1 M जलीय मोलल विलयन में न्यूनतम हिमांक किसका है? (2009)
(i) पोटैशियम सल्फेट
(ii) सोडियम क्लोराइड
(iii) यूरिया
(iv) ग्लूकोस
उत्तर
(i) पोटैशियम सल्फेट

प्रश्न 10.
12.0 ग्राम यूरिया को 1 लीटर जल में घोला गया तथा 68.4 ग्राम सुक्रोज को 1 लीटर जल में घोला गया। यूरिया विलयन के वाष्पदाब का आपेक्षिक अवनमन होगा – (2012)
(i) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा अधिक
(ii) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा कम
(iii) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा दोगुना
(iv) सुक्रोज विलयन के बराबर
उत्तर
(i) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा अधिक।

प्रश्न 11.
किस सूत्र द्वारा मोलल उन्नयन स्थिरांक (KA) की गणना की जा सकती है? (2017)
(i) [latex s=2]\frac { { m\times T }_{ b }\times W }{ 1000\times w } [/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { { 1000\times \triangle T }_{ b }\times w }{ W } [/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { 1000w }{ { m\times \triangle T }_{ b }\times W } [/latex]
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i)
[latex s=2]\frac { { m\times T }_{ b }\times W }{ 1000\times w } [/latex]

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से किसका परासरण दाब सबसे कम होता है ? (2010, 16)
(i) पोटैशियम क्लोराइड विलयन
(ii) स्वर्ण विलयन
(iii) मैग्नीशियम क्लोराइड विलयन
(iv) ऐलुमिनियम फॉस्फेट विलयन
उत्तर
(ii) स्वर्ण विलयन

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प्रश्न 13.
किसी विलयन का परासरण दाब किस सम्बन्ध द्वारा प्रदर्शित किया जाता है? (2013)
(i) p = [latex s=2]\frac { RT }{ C } [/latex]
(ii) p = [latex s=2]\frac { CT }{ R } [/latex]
(ii) p = [latex s=2]\frac { RC }{ T } [/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { p }{ C } [/latex] = RT
उत्तर
(iv) [latex s=2]\frac { p }{ C } [/latex] = RT

प्रश्न 14.
निम्नलिखित विलयनों में सर्वाधिक परासरण दाब किसका है? (2014)
(i) 1 M KCl
(ii) 1 M (NH4)3PO4
(iii) 1 M BaCl2
(iv) 1 M C6H12O6
उत्तर
(ii) 1 M (NH4)3PO4

प्रश्न 15.
समान ताप पर किन विलयनों के युग्म समपरासरी हैं? (2012)
(i) 0.1 M NaCl तथा 0.1 M Na2SO4
(ii) 0.1 M यूरिया तथा 0.1 M NaCl
(iii) 0.1 M यूरिया तथा 0.2 M MgCl2
(iv) 0.1 M Ca(NO3)2 तथा 0.1 M Na2SO4
उत्तर
(iv) 0.1 M Ca(NO3)2 तथा 0.1 M Na2SO4

प्रश्न 16.
गन्ने की शक्कर (अणुभार 342) का 5% विलयन, पदार्थ x के 1% विलयन से समपरासरी है। पदार्थx का अणुभार है – (2013)
(i) 68.4
(ii) 171.2
(iii) 136.2
(iv) 34.2
उत्तर
(i) 68.4

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी विलयन में विलेय तथा विलायक क्या होते हैं?
उत्तर
विलयन का वह अवयव जो द्रव्यमानानुसार अधिक मात्रा में उपस्थित होता है, विलायक कहलाता है जबकि दूसरा अवयव जो कम मात्रा में उपस्थित होता है, विलेय कहलाता है।

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प्रश्न 2.
0.25 N ऑक्सैलिक अम्ल विलयन की मोलरता ज्ञात कीजिए।
[C = 12, O = 16, H = 1] (2009)
हल
ऑक्सैलिक अम्ल (COOH)2 का तुल्यांकी भार = 63
तथा अणुभार = 126
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प्रश्न 3.
किसी पदार्थ का 1 मोल 500 मिली जल में घोला गया। विलयन की मोलरता की गणना कीजिए। (2017)
हल
मोलरता = [latex s=2]\frac { 1\times 1000 }{ 500 } [/latex] = 2 M

प्रश्न 4.
100 ग्राम विलायक में विलेय का [latex]\frac { 1 }{ 10 } [/latex] मोल घुला है। विलयन की मोललता ज्ञात कीजिए। (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 56

प्रश्न 5.
H2SO4 का एक नमूना 94% (w/v) है और इसका घनत्व 1.84 ग्राम/मिली है। इस विलयन की मोललता ज्ञात कीजिए। [H = 1, 0 = 16, S = 32] (2017)
हल
100 मिली में H2SO4 का भार = 94 ग्राम
100 मिली नमूने का भार = आयतन x घनत्व = 100 x 1.84 = 184 ग्राम
नमूने में विलायक की मात्रा = 184 – 94 = 90 ग्राम = 0.09 किग्रा
तथा H2SO4 का अणु भार = 2 x 1 + 32 + 4 x 16 = 98
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प्रश्न 6.
14.625 ग्राम सोडियम क्लोराइड को 250 ग्राम जल में विलेय किया गया। प्राप्त विलयन की मोललता की गणना कीजिए। [Na = 23, cl = 35.5] (2013)
हल
सोडियम क्लोराइड के ग्राम-अणुओं की संख्या
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 58

प्रश्न 7.
एक विलयन में 40 ग्राम NaOH को 500 mL जल में घोला गया है। इसकी मोलरता एवं नॉर्मलता की गणना कीजिए। (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 59
NaOH विलयन की नॉर्मलता एवं मोलरता समान होगी क्योंकि इसका तुल्यांकी भार एवं अणुभार समान हैं।

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प्रश्न 8.
राउल्ट का वाष्प दाब अवनमन नियम लिखिए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए। (2009, 11, 16)
उत्तर
राउल्ट के नियम के अनुसार, “किसी विलयन के वाष्प-दाब का आपेक्षिक अवनमन विलेय पदार्थ के मोल प्रभाज के बराबर होता है।”
[latex s=2]\frac { { p-p }_{ s } }{ p } =\frac { { n }_{ 1 } }{ { n }_{ 1 }+{ n }_{ 2 } }[/latex]
जहाँ, P तथा Ps क्रमशः विलायक तथा विलयन के वाष्प दाब हैं और n1 तथा n2 क्रमशः विलेय तथा विलायक के ग्राम-अणुओं की संख्या है।सीमाएँ

  1. राउल्ट का नियम तनु विलयनों पर लागू होता है। सान्द्र विलयन राउल्ट के नियम से विचलन प्रदर्शित करते हैं।
  2. यह नियम केवल अवाष्पशील पदार्थों के (UPBoardSolutions.com) विलयनों पर लागू होता है।
  3. वैद्युत-अपघट्यों के विलयनों पर राउल्ट का नियम लागू नहीं होता है।
  4. जो पदार्थ विलयनों में संगुणित हो जाते हैं, उन पदार्थों के विलयन भी राउल्ट के नियम का पालन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
साधारणतया किसी विलायक में विलेय को घोलने पर उसका क्वथनांक बढ़ जाता है। क्यों ? उचित कारण दीजिए। (2011)
उत्तर
किसी विलायक में कोई अवाष्पशील पदार्थ घोलने पर विलयन का वाष्पदाब कम हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विलयन का क्वथनांक बढ़ जाता है।

प्रश्न 10.
एक अवाष्पशील विलेय को किसी विलायक में मिलाने से उसका वाष्प दाब कम क्यों हो जाता है ? (2012)
उत्तर
किसी द्रव में उपस्थित अणु प्रत्येक दिशा में गतिशील रहते हैं। सतह के अणुओं की गतिज ऊर्जा अन्य अणुओं की अपेक्षा अधिक होती है; अतः ये अणु द्रव की सतह से वाष्प के रूप में पृथक् हो जाते हैं। अणुओं की यह प्रवृत्ति निर्गामी प्रवृत्ति कहलाती है। वाष्प के ये अणु सतह पर दाब डालते हैं, जिसको वाष्प दाब कहते हैं। किसी द्रव या विलायक में अवाष्पशील पदार्थ मिलाने पर द्रव के अणुओं की यह निर्गामी (UPBoardSolutions.com) प्रवृत्ति घट जाती है; क्योंकि विलेय पदार्थ द्रव के अणुओं पर एक प्रकार का अवरोध उत्पन्न करता है; अत: द्रव का वाष्प दाब घट जाता है; इसलिए विलयन का वाष्प दाब विलायक के वाष्प दाब से सदा कम रहता है।

प्रश्न 11.
दो द्रवों A तथा B के वाष्प दाब क्रमशः 80 mm तथा 60 mm हैं। A के 3 मोल तथा B के 2 मोल मिलाने पर प्राप्त विलयन का कुल वाष्प दाब क्या होगा? (2017)
हल
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प्रश्न 12.
ग्राम-अणुक उन्नयन स्थिरांक तथा ग्राम अणुक अवनमन स्थिरांक को परिभाषित कीजिए। (2016)
उत्तर
ग्राम-अणुक उन्नयन स्थिरांक – किसी विलायक के 100 ग्रामों में किसी अवाष्पशील विलेय या वैद्युत-अन अपघट्य के एक ग्राम-अणु घोलने पर उसके क्वथनांक में जो उन्नयन होता है, वह उस विलायक का ग्राम-अणुक उन्नयन स्थिरांक कहलाता है। इसको K या K100 से व्यक्त करते हैं।
ग्राम-अणुक अवनमन स्थिरांक – किसी अवाष्पशील वैद्युत-अपघटय के 1 ग्राम-अणु (मोल) को 100 ग्राम विलायक में घोलने पर विलायक के हिमांक में जो अवनमन होता है, उसे विलायक का ग्राम-अणु अवनमन स्थिरांक कहते हैं।

प्रश्न 13.
12 ग्राम ग्लूकोज को 100 ग्राम जल में घोलने पर विलयन का क्वथनांक 100.34°Cपाया गया। ग्लूकोज के मोलल उन्नयन स्थिरांक की गणना कीजिए।
[C = 12, O = 16, H = 1] (2015, 16)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 61

प्रश्न 14.
6 ग्राम यूरिया को 200 ग्राम जल में घोलने पर प्राप्त विलयन का क्वथनांक 0.28°C है। इसी विलयन का हिमांक क्या होगा? जल का मोलल उन्नयन स्थिरांक एवं मोलल अवनमन स्थिरांक के मान क्रमशः 0.52°C मोलल-1 तथा 1.86 °C मोलल-1 हैं।
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 62

प्रश्न 15.
वाण्ट-हॉफ गुणांक क्या है? 0.1 मोलल Ca(NO3)2 के विलयन के क्वथनांक की गणना कीजिए। जल के लिए kb = 0.52 K kg mol-1 (2015)
हल
वाण्ट-हॉफ गुणांक- वाण्ट-हॉफ गुणांक किसी पदार्थ के अणुसंख्य गुणधर्मों के प्रेक्षित तथा परिकलित या आपेक्षित मानों का अनुपात होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 63

प्रश्न 16.
परासरण क्या है ? परासरण दाब के लिए व्यंजक लिखिए। (2012, 14)
उत्तर
विलायक के अणुओं का अर्द्धपरासरण झिल्ली में होकर शुद्ध विलायक से विलयन की ओर या तनु विलयन से सीन्द्र विलयन की ओर स्वत: प्रवाह परासरण कहलाता है। परासरण दाब के लिए व्यंजक PV = nRT
जहाँ P = विलयन का परासरण दाब (वायुमण्डल में)
V = विलयन का आयतन (लीटर में)
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T = परमताप और R = विलयन स्थिरांक = 0.082 लीटर-वायु /डिग्री/मोल

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प्रश्न 17.
परासरण तथा विसरण क्रिया में विभेद कीजिए। (2010)
उत्तर
परासरण क्रिया तथा विसरण क्रिया में अन्तर
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प्रश्न 18.
समपरासरी विलयन किसे कहते हैं? (2009)
उत्तर
ऐसे विलयन, जिनके परासरण दाब समान ताप पर समान हों, समपरासरी विलयन कहलाते हैं। दो समपरासरी विलयनों को अर्द्ध-पारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक् करने पर परासरण नहीं होता है।

प्रश्न 19.
0.1 M ग्लूकोस तथा 0.1 M सोडियम क्लोराइड विलयन में किसका परासरण दाब अधिक होगा और क्यों? कारण सहित लिखिए। (2016)
उत्तर
इनमें 0.1 M सोडियम क्लोराइड का जलीय विलयन अधिक परासरण दाब प्रदर्शित करेगा; क्योंकि यह आयनन पर Na+ तथा Cl दो आयन देता है, जबकि ग्लूकोस का आयनन नहीं होता है। परासरण दाब अणुसंख्य गुणधर्म का उदाहरण है। अणुसंख्य गुणधर्म आयनों की संख्या पर निर्भर करते हैं। अणुसंख्य गुणधर्म ० अणुओं की संख्या (इन गुणों में आयन अणुओं के समान व्यवहार करते हैं)।

प्रश्न 20.
27°C पर डेसी मोलर यूरिया विलयन का परासरण दाब ज्ञात कीजिए।
R = 0.082 ली०वायु०/डिग्री-मोल  (2017)
हल
दिया गया है, T = 27 + 273 = 300 K, [latex]\frac { n }{ v }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 10 }[/latex], P= ?, R= 0.0821
PV = n RT
P = [latex]\frac { n }{ v }[/latex] RT
P = [latex]\frac { 1 }{ 10 }[/latex] × 0.0821 × 300 = 0.0821×30 = 0.821 × 3
= 2.463 वायुमण्डल

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
72 ग्राम जल और 92 ग्राम एथिल ऐल्कोहॉल के मिश्रण में दोनों का मोल-प्रभाज ज्ञात कीजिए। (2011)
हल
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प्रश्न 2.
36 ग्राम जल और 46 ग्राम एथिल ऐल्कोहॉल मिश्रण में दोनों का मोल प्रभाज ज्ञात कीजिए। (2015)
हल
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प्रश्न 3.
यूरिया का एक विलयन भारानुसार 6°० है। विलयन में यूरिया तथा जल का मोल प्रभाज ज्ञात कीजिए। (यूरिया का अणुभार = 60) (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 68

प्रश्न 4.
एक सल्फ्यूरिक अम्ल विलयन की मोललता की गणना कीजिए जिसमें जल का मोल प्रभाज 0.85 है। (2015)
हल
जल का मोल प्रभाज = 0.85
H2SO4 का मोल प्रभाजे = 1 – 0.85 = 0.15
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 69
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प्रश्न 5.
बेन्जीन के एक विलयन में I2 घुली है। विलयन में I2 का मोल प्रभाज 0.25 है। विलयन की मोललता ज्ञात कीजिए। (2017)
हल
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प्रश्न 6.
शुद्ध बेन्जीन का किसी ताप पर वाष्पदाब 640 mm Hg है। एक अवाष्पशील विद्युत अपघटय ठोस जिसका भार 2.75 ग्राम है, 39 ग्राम बेन्जीन में डाला गया। विलयन का वाष्पदाब 600 mm Hg है। ठोस पदार्थ का अणुभार ज्ञात कीजिए। (2017)
हल
P0 = 640 mm Hg, Ps = 600 mm Hg, w = 2.75 ग्राम, w = 39 gram, m = ?
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प्रश्न 7.
जब एक अवाष्पशील पदार्थ का 1.5 ग्राम 60 ग्राम जल में घोला जाता है तो उसका हिमांक 0.136°C कम हो जाता है। पदार्थ के अणुभार की गणना कीजिए। (जल का मोलल अवनमन स्थिरांक = 1.86°C) (2017)
हल
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प्रश्न 8.
चीनी का जल में बना एक 5% (भारानुसार) विलयन का हिमांक 271 K है। ग्लूकोस के जल में बने 5% विलयन के हिमांक की गणना कीजिए, यदि शुद्ध जल का हिमांक 273.15 K है। (2015)
हल
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प्रश्न 9.
27°C पर 2% यूरिया विलयन का परासरण दाब ज्ञात कीजिए।(विलयन स्थिरांक= 0.082 ली-वायु/डिग्री/मोल) (2016)
हल
प्रश्नानुसार, R= 0.082, T = 27 + 273 = 300 K
यूरिया का अणुभार = 60
∴ 2 ग्राम यूरिया विलयन का आयतन = 100 मिली
∴ 60 ग्राम (1 मोल) यूरिया विलयन का आयतन = [latex]\frac { 100 }{ 2 }[/latex] x 60 = 3000 मिली
= 3 लीटर
सूत्रानुसार, परासरण दाब (P) = [latex]\frac { RT }{ V }[/latex] = [latex]\frac { 0.0822\times 300 }{ 3 } [/latex] = 8.2 वायुमण्डल

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक ठोस की किसी द्रव में विलेयता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
एक ठोस की किसी द्रव में विलेयता मुख्य रूप से निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
1. विलेय तथा विलायक की प्रकृति – सामान्यतः एक ठोस रासायनिक रूप से समान द्रव में घुलता है। इसे इस प्रकार कह सकते हैं कि समान-समान को घोलता है (like dissolves like)। इससे स्पष्ट है कि NaCl जैसे आयनिक (ध्रुवीय) यौगिक जल जैसे ध्रुवीय विलायकों में घुल जाते हैं (UPBoardSolutions.com) जबकि बेंजीन, ईथर आदि अध्रुवीय विलायकों में बहुत कम विलेय या लगभग अविलेय होते हैं। इसी प्रकार नैफ्थलीन, एन्थ्रासीन आदि अध्रुवीय (सहसंयोजक) यौगिक बेंजीन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, ईथर आदि अध्रुवीय (सहसंयोजक) विलायकों में आसानी से घुल जाते हैं जबकि ये जल जैसे ध्रुवीय विलायकों में बहुत कम घुलते हैं।

यही कारण है कि साधारण नमक (सोडियम क्लोराइड) चीनी की तुलना में जल में अधिक विलेय होता है। उनकी जल में विलेयताएँ क्रमश: 5.3 मोल प्रति लीटर तथा 3.8 मोल प्रति लीटर हैं।

2. ताप– किसी विलायक में एक ठोस की विलेयता पर ताप का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि घुलन प्रक्रिया ऊष्माक्षेपी (exothermic) है अथवा ऊष्माशोषी (endothermic)। इसे आसानी से लाशातेलिए सिद्धान्त (Le-Chatelier’s principle) के आधार पर निम्न प्रकार से समझा जा सकता है –

(i) जब कोई पदार्थ ऊष्मा अवशोषण के साथ घुलता है तो ताप में वृद्धि करने पर उसकी विलेयता में सतत् वृद्धि होती है। माना कि एक पदार्थ AB जल में निम्न साम्य स्थापित करता है –
AB(s) + aq [latex]\leftrightarrows [/latex] AB (aq) + ऊष्मा
ला-शातेलिए सिद्धान्त के अनुसार, ताप में वृद्धि करने पर साम्य दाईं ओर विस्थापित हो जाता है। और इस प्रकार ताप में वृद्धि करने पर पदार्थ की विलेयता में वृद्धि हो जाती है।
NaNO3 KNO3 NaCl, KCl आदि ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।

(ii) जब कोई पदार्थ ऊष्मा उत्सर्जन के साथ घुलित होता है तो ताप में वृद्धि होने पर उसकी विलेयता निरन्तर घटती है। माना कि एक पदार्थ AB जल में निम्न साम्य स्थापित करता है –
AB(s) + aq [latex]\leftrightarrows [/latex] AB (aq) – ऊष्मा
ला-शातेलिए सिद्धान्त के अनुसार, ताप में वृद्धि करने पर साम्य को उस दिशा में विस्थापित होना चाहिए जिस दिशा में यह उत्पन्न ऊष्मा के प्रभाव को समाप्त कर सके। स्पष्ट है कि ताप में वृद्धि करने पर साम्य बायीं ओर विस्थापित होगा और पदार्थ की विलेयता कम हो जाएगी। सीरियम सल्फेट, लीथियम कार्बोनेट, सोडियम काबॉनेट मोनोहाइड्रेट ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।

उपरोक्त पदार्थों (जिनकी विलेयता ताप वृद्धि के साथ निरन्तर घटती या बढ़ती है) के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार के पदार्थ भी ज्ञात हैं। इनकी विलेयता ताप वृद्धि के साथ निरन्तर घटती या बढ़ती नहीं है। ये पदार्थ एक निश्चित ताप पर अपने एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। यह तापे संक्रमण ताप (transition temperature) कहलाता है। रूपों में यह परिवर्तन एक बहुरूपी रूप से दूसरे बहुरूपी रूप में (अमोनियम नाइट्रेट का से 8 रूप में) अथवा एक जलयोजित रूप से दूसरे जलयोजित रूप में (CaCl2.6H2O → CaCl. 4H2O) अथवा जलयोजित रूप से अनार्द्र रूप में (Na2SO4 . 10H2O → Na2SO4) हो सकता है। रूपों में इस प्रकार के परिवर्तन के कारण ही सोडियम सल्फेट की विलेयता पहले 32.4°C तक बढ़ती है और उसके पश्चात् घटने लगती है।

Na2SO4. 10H2O [latex]\overset { { >32.4 }^{ 0 }C }{ \underset { { <32.4 }^{ 0 }C }{ \leftrightarrows } } [/latex] Na2SO4

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution (विकास) are part of UP Board Solutions for Class 12 Biology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution (विकास).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Evolution
Number of Questions Solved 52
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution (विकास)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
डार्विन के चयन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में जीवाणुओं में देखे गए प्रतिजैविक प्रतिरोध का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर
रोगजनक जीवाणुओं के विरुद्ध प्रतिजैविक अत्यन्त प्रभावी होते हैं किन्तु किसी नये प्रतिजैविक के विकास के 2 – 3 वर्ष पश्चात् नये प्रतिजैविक प्रतिरोधी, समष्टि में प्रकट हो जाते हैं। कभी-कभी एक जीवाणुवीय समष्टि में एक अथवा कुछ ऐसे जीवाणु उत्परिवर्तन युक्त होते हैं जो उन्हें प्रतिजैविक के लिए प्रतिरोधी बनाते हैं। इस प्रकार के प्रतिरोधी जीवाणु तेजी से गुणन व उत्तरजीविता करने लगते हैं। शीघ्र ही प्रतिरोधिता प्रदान करने वाले जीन दूर-दूर तक फैल जाते हैं व सम्पूर्ण जीवाणु समष्टि प्रतिरोधी बन जाते हैं। कुछ अस्पतालों में प्रतिजैविक प्रतिरोधी पनपते रहते हैं क्योंकि वहाँ प्रतिजैविकों का अत्यधिक प्रयोग होता है।

प्रश्न 2.
समाचार-पत्रों और लोकप्रिय वैज्ञानिक लेखों से विकास सम्बन्धी नए जीवाश्मों और मतभेदों की जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर
जीवाश्म (fossils) चट्टानों से प्राप्त आदिकालीन जीवधारियों के अवशेष या चिह्न होते हैं। जीवाश्मों के अध्ययन को जीवाश्म विज्ञान (Palaeontolgy) कहते हैं अर्थात् जीवाश्म विज्ञान में लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व के जीवधारियों के अवशेषों का अध्ययन करते हैं। जीवाश्म वैज्ञानिकों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किस काल में किस प्रकार के जीवधारी पृथ्वी पर उपस्थित थे। चट्टानों और पृथ्वी की पर्ती में दबे जीवाश्मों को खोदकर निकाला जाता है। इन चिह्नों या अवशेषों से जीवधारी की संरचना की परिकल्पना की जाती है।

चट्टानों की आयु ज्ञात करके जीवाश्मों की अनुमानित आयु भी ज्ञात कर ली जाती है। अतः वैज्ञानिक जीवाश्मों को जैव विकास के सशक्त प्रमाण मानते हैं। जीवाश्मों के सबसे परिचित उदाहरणे आर्किओप्टेरिक्स तथा डायनोसोर हैं। डायनोसोर विशालकाये सरीसृप थे। मीसोजोइक युग में इनका पृथ्वी पर साम्राज्य स्थापित था। इस युग को सरीसृपों का स्वर्ण युग (golden age of reptiles) कहा जाता है।

भिन्न आयु की चट्टानों से भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवधारियों के जीवाश्म पाए गए हैं, जो कि सम्भवत: उस चट्टान के निर्माण के दौरान उनमें दब गए। वे विलुप्त जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर जीवन को स्वरूप बदलता रहा है। इथोपिया तथा तंजानिया से कुछ मानव जैसी अस्थियों के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। मानव पूर्वजों के जीवाश्मों से मानव विकास का इतिहास ज्ञात हुआ है।

प्रश्न 3.
प्रजाति की स्पष्ट परिभाषा देने का प्रयास कीजिए।
उत्तर
प्रजाति आकारिकी रूप से प्रथम व प्रजनन रूप से विलगित व्यष्टियों की एक या ज्यादा प्राकृतिक समष्टि होती है जो एक-दूसरे से अत्यधिक मिलती-जुलती है तथा आपस में एक-दूसरे के बीच स्वतंत्र रूप से प्रजनन करते हैं।

प्रश्न 4.
मानव विकास के विभिन्न घटकों का पता कीजिए (संकेत-मस्तिष्क साइज और कार्य, कंकाले संरचना, भोजन में पसंदगी आदि)।
उत्तर
लगभग 16 मिलियन वर्ष पूर्व ड्रायोपिथिकस (Dryopithecus) तथा रामापिथिकस (Ramapithecus) प्राइमेट्स विद्यमान थे। इनके शरीर पर भरपूर बाल थे तथा ये गोरिल्ला एवं चिम्पैंजी जैसे चलते थे। इनमें ड्रायोपिथिकस वनमानुष (ape) जैसे और रामापिथिकस मनुष्यों जैसे थे। इथोपिया तथा तंजानिया में अनेक मानवी विशेषताओं को प्रदर्शित करते जीवाश्म प्राप्त हुए। इससे यह स्पष्ट होता है कि 3-4 मिलियन वर्ष पूर्व मानव जैसे वानर गण (प्राइमेट्स) पूर्वी अफ्रीका में विचरण करते थे। ये लगभग 4 फुट लम्बे थे और सीधे खड़े होकर चलते थे। लगभग 2 मिलियन वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलोपिथेसिन (Australopithecines) अर्थात् आदि मानव सम्भवतः पूर्वी अफ्रीका के घास स्थलों में विचरण करता था। होमो हैबिलिस (Homo habilis) को प्रथम मानव जैसे प्राणी के रूप में जाना जाता है। होमो इरेक्टस (Homo erectus) के जीवाश्म लगभग 1.5 मिलियन वर्ष पूर्व के हैं। इसके अन्तर्गत जावा मानव, पेकिंग मानव, एटलांटिक मानवे आते हैं। प्लीस्टोसीन युग के अन्तिम काल में होमो सेपियन्स (वास्तविक मानव) ने होमो इरेक्टस का स्थान ले लिया। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से निएण्डरथल मानव, क्रोमैगनॉन मानव एवं वर्तमान मानवे आते हैं।

मानव विकास के विभिन्न घटक
विकास के अन्तर्गत उपार्जित निम्नलिखित विशिष्ट घटकों (लक्षणों) के कारण मानव का विकास हुआ –

1. द्विपाद चलन (Bipedal locomotion) – मानव पिछली टाँगों की सहायता से चलता है। अग्रपाद (भुजाएँ) अन्य कार्यों के उपयोग में आती हैं। पश्चपाद लम्बे और मजबूत होते हैं।
2. सीधी मुद्रा (Erect posture) – इसके लिए निम्नलिखित परिवर्तन हुए हैं –

  1. टाँगें लम्बी होती हैं। धड़ छोटा और वक्ष चौड़ा होता है।
  2. कशेरुक दण्ड में लम्बर कशेरुकाओं की संख्या 4-5 होती है। त्रिक कशेरुकाएँ समेकित होती हैं।
  3. कशेरुक दण्ड में कटि आधान (lumbar curve) होता है।
  4. श्रोणि मेखला चिलमचीनुमा (basin shaped) होती है।
  5. खोपड़ी कशेरुक दण्ड पर सीधी-सधी होती है महारन्ध्र नीचे की ओर होता है।

3. चेहरा (Face) – मानव का चेहरा उभर कर सीधा रहता है। इसे ऑर्थोग्नेथस (orthognathous) कहते हैं। मानव में भौंह के उभार हल्के होते हैं।
4. दाँत (Teeth) – सर्वाहारी होने के कारण अविशिष्टीकृत होते हैं। इनकी संख्या 32 होती है। मानव पहले शाकाहारी था, बाद में सर्वाहारी हो गया।
5. वस्तुओं को पकड़ने की क्षमता (Grasping ability) – मानव के हाथ वस्तुओं को पकड़ने के लिए रूपान्तरित हो गए हैं। अँगूठा सम्मुख (opposable) हो जाने के कारण वस्तुओं को पकड़ने व उठाने की क्षमता का विकास हुआ।
6. मस्तिष्क व कपाल क्षमता (Brain & Cranial Capacity) – प्रमस्तिष्क तथा अनुमस्तिष्क (cerebrum & cerebellum) सुविकसित होता है। कपाल क्षमता लगभग 1450 cc होती है। शरीर के भार वे मस्तिष्क के भार का अनुपात सबसे अधिक होता है। मस्तिष्क के विकास होने के कारण मानव का बौद्धिक विकास (intelligence) चरम सीमा पर पहुँच गया है। इसमें अक्षरबद्ध वाणी, भावनाओं की अभिव्यक्ति, चिन्तन, नियोजन एवं तर्क संगतता की अपूर्ण क्षमता होती है।
7. द्विनेत्री दृष्टि (Binocular vision) – द्विपादगमन के फलस्वरूप इसमें द्विनेत्री (binocular) तथा त्रिविमदर्शी (stereoscopic) दृष्टि पायी जाती है।
8. जनन क्षमता (Breeding capacity) में कमी, शरीर पर बालों की कमी, घ्राण शक्ति (Olfactory sense) में कमी, श्रवण शक्ति (hearing) में कमी आदि अन्य विकासीय लक्षण हैं।

प्रश्न 5.
इंटरनेट (अंतरजाल तन्त्र) या लोकप्रिय विज्ञान लेखों से पता कीजिए कि क्या मानवेत्तर किसी प्राणी में आत्म संचेतना थी?
उत्तर
प्रकृति उपयुक्तता को चुनती है। तथाकथित उपयुक्तता प्राणी की विशिष्टताओं पर आधारित होती है जो वंशानुगत होती है। अत: चयनित होने तथा विकास हेतु निश्चित ही एक आनुवंशिक आधार होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि वे जीवधारी (प्राणी) प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहने से बेहतर अनुकूलित होते हैं। अनुकूलन क्षमता वंशानुगत होती है। अनुकूलन के लिए प्राणियों की आत्म संचेतना महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। अनुकूलनशीलता एवं प्राकृतिक चयन को अन्तिम परिणाम उपयुक्तता है। जीववैज्ञानिकों के अनुसार अनेक प्राणियों में मानवेत्तर आत्म संचेतना (self-consciousness) पायी जाती है।

प्रश्न 6.
इंटरनेट (अन्तरजाल-तन्त्र) संसाधनों का उपयोग करते हुए आज के 10 जानवरों और उनके विलुप्त जोड़ीदारों की सूची बनाएँ (दोनों के नाम दें)।
उत्तर
आधुनिक एवं विलुप्त जोड़ीदार प्राणी
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-1

प्रश्न 7.
विविध जन्तुओं और पौधों के चित्र बनाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-2
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-3

प्रश्न 8.
अनुकूलनी विकिरण के एक उदाहरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अनुकूलनी विकिरण (Adaptive Radiation) – एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिन्दु से प्रारम्भ होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूलनी विकिरण (adaptive radiation) कहते हैं। जैसे-ऑस्ट्रेलियाई मार्क्सपियल (शिशुधानी प्राणी) विकिरण।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-4
अधिकांश मार्क्सपियल एकसमान पूर्वज से विकसित हुए। सभी मार्क्सपियल ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में विकसित हुए हैं। जब एक से अधिक अनुकूली विकिरण एक अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र में (विभिन्न आवासों में) प्रकट होते हैं तो इसे अभिसारी विकास (convergent evolution) कहते हैं।

प्रश्न 9.
क्या हम मानव विकास को अनुकूलनी विकिरण कह सकते हैं?
उत्तर
नहीं, मानव विकास को अनुकूलनी विकिरण नहीं कह सकते क्योंकि होमो सेपियन्स की जनक जातियाँ प्रगामी विकास द्वारा एच हेबिलस-एच इरेक्टस (वंशज) से विकसित हुईं।

प्रश्न 10.
विभिन्न संसाधनों जैसे-विद्यालय का पुस्तकालय या इंटरनेट (अन्तर जाल तन्त्र) तथा अध्यापक से चर्चा के बाद किसी जानवर जैसे कि घोड़े के विकासीय चरणों को खोजें।
उत्तर
घोड़े का उद्भव लगभग 60 करोड़ वर्ष पहले, पूर्वी उत्तरी अमेरिका में इओसीन (eocene) युग में हुआ था। इसके विकास की विभिन्न अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं –
1. इओहिप्पस (Eohippus) – इसका उद्भव इओसीन युग में हुआ था। इस युग का घोड़ा, लोमड़ी जैसा व 30 सेमी ऊँचा था। इसका सिर व गर्दन अत्यन्त छोटे थे। यह पत्तियाँ, घास आदि खाता था। इसका अग्रपाद चार क्रियात्मक अंगुली युक्त था किन्तु पश्चपाद में सिर्फ तीन अंगुलियाँ थीं।

2. मीसोहिप्पस (Mesohippus) – यह ओलिगोसीन युग का घोड़ा था। इसका आकार भेड़ जैसा था व इसके अग्र तथा पश्चपाद तीन-तीन अंगुली युक्त थे। मध्य वाली अंगुली अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ी थी जो संभवत: शरीर का बोझ वहन करती थी।

3. मेरीचिप्पस (Merrichippus) – यह मायोसिन युग का घोड़ा था। यह वर्तमान के टट्टू जितना ऊँचा था व दोनों टाँगें तीन-तीन अंगुलियाँ युक्त थीं। इनकी सिर्फ मध्य वाली अंगुली ही पृथ्वी | तक पहुँच पाती थी व यह तेज दौड़ सकता था। 4. प्लायोहिप्पस (Pliohippus)-यह प्लायोसिन युग का घोड़ा था। यह एक अंगुली वाला घोड़ा था।

5. इक्वस (Equus) – यह प्लास्टोसिन युग का घोड़ा है। इसकी ऊँचाई 1.50 मीटर थी।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
लुई पाश्चर के हंस ग्रीवा फ्लास्क (स्वान नेक फ्लास्क) प्रयोग से सिद्ध होता है – (2017)
(क) जीवात जीवोत्पत्ति
(ख) अजीवात जीवोत्पत्ति
(ग) आकस्मिक उत्पत्ति
(घ) विशिष्ट सृजन
उत्तर
(क) जीवात जीवोत्पत्ति

प्रश्न 2.
‘पुनरावृत्ति सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाले वैज्ञानिक का नाम है – (2014, 17, 18)
(क) डार्विन
(ख) माल्थस
(ग) वीजमान
(घ) हीकल
उत्तर
(घ) हीकल

प्रश्न 3.
पुनरावर्तन के सिद्धान्त के अनुसार – (2016)
(क) प्रत्येक जन्तु का प्रारम्भ एक अण्डे से होता है।
(ख) सन्तान जनकों के समान होती है
(ग) जीवन वृत्त में जाति वृत्त प्रतिबिम्बित होता है।
(घ) शरीर के क्षत भागों का पुनरुद्भवन होता है।
उत्तर
(ग) जीवन वृत्त में जाति वृत्त प्रतिबिम्बित होता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से किसका सिद्धान्त जीवन की उत्पत्ति से सम्बन्धित नहीं है? (2016)
(क) स्टेनले मिलर
(ख) ए०आई० ओपेरिन
(ग) जे०बी०एस० हैल्डेन
(घ) माल्थस
उत्तर
(घ) माल्थस

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन सरीसृपों एवं पक्षियों को जोड़ने वाली कड़ी माना जाता है? (2014, 15)
(क) डिप्नोई
(ख) आर्किओप्टेरिक्स
(ग) स्फीनोडॉन
(घ) कीवी
उत्तर
(ख) आर्किओप्टेरिक्स

प्रश्न 6.
चिड़ियों के पंख तथा घोड़े की अगली टाँगें दर्शाती हैं – (2017)
(क) समरूपता
(ख) समजातता
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) कोई नहीं
उत्तर
(ख) समजातता

प्रश्न 7.
आकस्मिक आनुवंशिक परिवर्तन को कहते हैं – (2017)
(क) उत्परिवर्तन
(ख) समसूत्री विभाजन
(ग) अर्धसूत्री विभाजन
(घ) पुनर्सम्मिश्रण
उत्तर
(क) उत्परिवर्तन

प्रश्न 8.
विकास का उत्परिवर्तनवाद निम्नलिखित में से किसने प्रतिपादित किया था? (2016)
(क) चार्ल्स डार्विन
(ख) ए०आर० वैलेस
(ग) ह्यूगो डी ब्रीज
(घ) हक्सले
उत्तर
(ग) ह्यूगो डी ब्रीज

प्रश्न 9.
जैव विकास में उत्परिवर्तन का महत्त्व है – (2017)
(क) जननात्मक विलगन
(ख) आनुवंशिकी पुनर्संयोजन
(ग) आनुवंशिक विभिन्नताएँ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) आनुवंशिक विभिन्नताएँ।

प्रश्न 10.
डार्विन फिंचेज उदाहरण हैं – (2017)
(क) अनुकूली विकिरण का
(ख) जेनेटिक ड्रिफ्ट का
(ग) अनुकूली अभिसरण का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) अनुकूली विकिरण का

प्रश्न 11.
निम्नलिखित किस सिद्धान्त को डार्विन ने प्रतिपादित नहीं किया था? (2018)
(क) पैंजेनेसिस
(ख) प्राकृतिक चयन
(ग) जनन प्रबल की निरन्तरता
(घ) लैंगिक चयन
उत्तर
(ग) जनन प्रबल की निरन्तरता

प्रश्न 12.
आधुनिक गानव का निकट सम्बन्धी है – (2017)
(क) गोरिल्ला
(ख) गिबन
(ग) ओरंग-उटान
(घ) चिम्पैंजी
उत्तर
(घ) चिम्पैंजी

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन वास्तविक मानव है? (2015)
(क) निएण्डरथल मानव
(ख) होमो इरेक्टस
(ग) होमो हेबिलिस
(घ) शिवापिथिकस
उत्तर
(क) निएण्डरथल मानव

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयोजक कड़ी से आप क्या समझते हैं। उस जीवाश्म जन्तु का नाम बताइए जो प्रमाणित | करता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ है। (2013)
या
आर्किओप्टेरिक्स किन वर्गों की संयोजी कड़ी है? (2013, 16)
उत्तर
जन्तु जगत में कुछ जीव ऐसे हैं जिनके लक्षण दो समीप वर्गों के लक्षणों से मिलते हैं। इनमें से एक वर्ग के जन्तु कम विकसित तथा दूसरे वर्ग के जन्तु अधिक विकसित होते हैं। ऐसे जन्तुओं को संयोजी कड़ियाँ (Connecting links) कहा जाता है।
उदाहरण – आर्किओप्टेरिक्स जो पक्षी तथा सरीसृप वर्ग के बीच की कड़ी है।

प्रश्न 2.
पेरीपैटस किन दो संघों के बीच की कड़ी है? (2012)
उत्तर
पेरीपैटस (Peripatus) को संघ आर्थोपोडा तथा एनेलिडा के बीच की कड़ी माना जाता है, क्योंकि इसमें इन दोनों ही संघों के लक्षण पाये जाते हैं।

प्रश्न 3.
एनेलिडा एवं आर्थोपोडा संघ तथा सरीसृप एवं पक्षी वर्ग को जोड़ने वाली कड़ियों के नाम लिखिए। (2015)
उत्तर
एनेलिडा एवं आर्थोपोडा संघ को जोड़ने वाली कड़ी-पेरीपैटस
सरीसृप एवं पक्षी वर्ग को जोड़ने वाली कड़ी-आर्किओप्टेरिक्स।

प्रश्न 4.
अवशेषी अंग से आप क्या समझते हैं? मनुष्य में पाये जाने वाले एक अवशेषी अंग का नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
वे अंग जो हमारे पूर्वजों में क्रियाशील थे किन्तु उनका उपयोग न होने के कारण वे धीरे-धीरे । लुप्त हो गये और केवल अवशेष के रूप में पाये जाते हैं, अवशेषी अंग कहलाते हैं; जैसे- कृमिरूप परिशेषिका, पूँछ कशेरुका आदि।

प्रश्न 5.
पैन्जेनेसिस का सिद्धान्त तथा पुनरावृत्ति का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया? (2018)
उत्तर
पैन्जेनिसस का सिद्धान्त डार्विन ने तथा पुनरावृत्ति का सिद्धान्त हीकल ने प्रतिपादित किया।

प्रश्न 6.
पूर्वजता या प्रत्यावर्तन को उदाहरण सहित समझाइए। (2017, 18)
उत्तर
किसी जीव या जीवों के समूह में किसी ऐसे लक्षण का आकस्मिक आना जो सामान्य रूप से उस जाति में नहीं पाया जाता परन्तु पहले किसी पूर्वज में पाया जाता था पूर्वजता या प्रत्यावर्तन कहलाता है। जैसे कभी-कभी बच्चे में जन्म के समय एक छोटी पूँछ का पाया जाना।

प्रश्न 7.
“योग्यतम की अतिजीविता’ की परिकल्पना किसने प्रस्तुत की थी? (2017)
उत्तर
हरबर्ट स्पेन्सर ने योग्यतम की अतिजीविता का सिद्धान्त सामाजिक विकास के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया तथा डार्विन ने इसे जैव विकास के प्राकृतिक चयन के सम्बन्ध में समझाया।

प्रश्न 8.
डार्विन के जैव विकास के सिद्धांत में सबसे बड़ी कमी किस चीज की जानकारी न होनी थी? (2014)
उत्तर
डार्विन के जैव विकास के सिद्धांत में सबसे बड़ी कमी आनुवंशिकता की जानकारी न होनी थी।

प्रश्न 9.
जीवन संघर्ष से आप क्या समझते हैं? यह सिद्धान्त किस वैज्ञानिक ने प्रस्तावित किया? (2015)
उत्तर
प्रत्येक जीव को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे जीवों से संघर्ष करना पड़ता है। इसे ही जीवन संघर्ष कहते हैं। प्रत्येक जीव के लिए यह भ्रूणावस्था से प्रारम्भ होकर जीवनपर्यन्त चलता रहता है। यह सिद्धान्त डार्विन ने प्रस्तावित किया था।

प्रश्न 10.
रोमर के मतानुसार आधुनिक मानव की विभिन्न प्रजातियों के नाम लिखिए।
उत्तर
ए0एस0 रोमर (A.S. Romer) ने मानव प्रजातियों को निम्न चार प्रमुख समूहों में बाँटा है –

  1. कोकोसॉयड (Caucasoid) – इनके बाल धुंघराले, नाक पतली तथा त्वचा सफेद होती है। ये यूरोप, दक्षिणी-पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में विकसित हुए।
  2. नीग्रॉयड (Negroid) – इनके बाल ऊनी व कुण्डलित, चौड़ी नाक तथा काली त्वचा थी। ये अफ्रीका, पेसिफिक द्वीप, कांगो, अण्डमान, मलाया, न्यूगिनी एवं फिलीपिन्स द्वीपों पर पाए जाते हैं।
  3. मोन्गोलॉयड (Mongoloid) – इनके बाल सीधे, नाक बीच की तथा त्वचा पीली, भूरी होती है। इसमें चीनी, जापानी, मंगोल, एस्किमो तथा रेड इंडियन मिलते हैं।
  4. ऑस्ट्रेलॉयड (Australoid) – इनके बाल धुंघराले, नाक बीच की तथा त्वचा भूरी होती है। ऑस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के बुशमैन, भारत के भील तथा श्रीलंका के वेढ़ा आदि इस प्रकार के मानव हैं।

प्रश्न 11.
वर्तमान मानव का वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
होमो सेपियन्स सेपियन्स (Homo sapiens sapiens)।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ओपैरिन की परिकल्पना पर टिप्पणी लिखिए। (2014)
या
जीवन की उत्पत्ति का रासायनिक मत बताइए। (2015)
उत्तर
आदि पृथ्वी पर रासायनिक उविकास के फलस्वरूप “जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विस्तृत और सर्वमान्य परिकल्पना रूसी जीव-रसायनशास्त्री ए०आई० ओपैरिन (A.I. Oparin) ने सन् 1924 में भौतिकवाद या पदार्थवाद (Materialistic Theory) के नाम से प्रस्तुत की। ओपैरिन की यह परिकल्पना 1936 में उनकी पुस्तक “The Origin of Life” में छपी। ऐसी ही परिकल्पना अंग्रेज, वैज्ञानिक हैल्डेन (Haldane) ने, जो 1961 में भारतीय नागरिक बन गए थे, सन् 1929 में प्रस्तुत की। इस परिकल्पना के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति और फिर इस पर जीवन की उत्पत्ति की पूरी प्रक्रिया को हम संक्षेप में आठ चरणों (steps) में बाँट सकते हैं –

  1. पहला चरण – परमाणु प्रावस्था
  2. दूसरा चरण – अणुओं एवं सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति
  3. तीसरा चरण – कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति एवं उविकास
  4. चौथा चरण – कोलॉइड्स, कोएसरवेट्स, वैयक्तिकता तथा रासायनिक स्वाधीनता
  5. पाँचवाँ चरण – स्व: उत्प्रेरक तन्त्रों, जीन्स, वायरसों तथा प्रारम्भिक जीवों की उत्पत्ति
  6. छठाँ चरण – प्रारम्भिक पूर्व केन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति
  7. सातवाँ चरण – स्व: पोषण की उत्पत्ति
  8. आठवाँ चरण – सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं अर्थात् प्रोटिस्टा की उत्पत्ति

प्रश्न 2.
मिलर के प्रयोग का वर्णन कीजिए तथा नामांकित चित्र बनाइए। (2013, 16)
या
मिलर के चिनगारी विमुक्ति उपकरण का नामांकित चित्र बनाइए। (2017)
उत्तर
स्टेनले मिलर का प्रयोग (Stanley Miller’s Experiment) – शिकागो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हेरोल्ड यूरे (Harold Urey) तथा स्टेनले मिलर (Stanley Miller) ने सन् 1953 में जीवन की उत्पत्ति के सन्दर्भ में प्रयोग किये। उन्होंने आदि पृथ्वी पर पाये जाने वाले आदि वातावरण की परिस्थिति को प्रयोगशाला में उत्पन्न किया तथा जीवन की उत्पत्ति की प्रयोगशाला में जाँच की। मिलर ने एक बड़े फ्लास्क में मेथेन, अमोनिया तथा हाइड्रोजन गैस 2 : 1 : 2 के अनुपात में ली।

गैसीय मिश्रण को टंगस्टन के इलेक्ट्रोड द्वारा गर्म किया गया। दूसरे फ्लास्क में जल को उबालकर जल वाष्प (water vapor-H,0) बनायी जिसे एक मुड़ी हुई काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क में प्रवाहित किया। इसके उपरान्त दोनों के मिलने से बने मिश्रण को कण्डेन्सर द्वारा ठण्डा किया गया। ठण्डा मिश्रण एक U नली में एकत्रित किया गया जो गन्दे लाल रंग का द्रव था। इस प्रकार पूरे सप्ताह तक यह प्रयोग किया गया। प्रयोग द्वारा प्राप्त तरल द्रव का रासायनिक परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इसमें ग्लाइसीन (glycine); ऐलेनिन (alanine) नामक अमीनो अम्ल तथा अन्य जटिल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हो गया था (चित्र)।
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इसी प्रकार अनेक वैज्ञानिकों; जैसे- सिडनी फॉक्स (Sydney Fox), केल्विन (Calvin) तथा मैल्विन (Melvin) आदि ने प्रयोगों द्वारा अनेक अमीनो अम्ल तथा जटिल यौगिकों का संश्लेषण किया। इन्हें अनुरूपण प्रयोग (simulation experiments) कहा जाता है।

प्रश्न 3.
उत्परिवर्तन क्या है ? जैव विकास में इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए। (2010)
या
‘उत्परिवर्तन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2011)
या
उत्परिवर्तन की परिभाषा तथा कारण लिखिए। (2012)
या
उत्परिवर्तनवाद की व्याख्या कीजिए। (2011)
या
उत्परिवर्तन की परिभाषा दीजिए। उत्परिवर्तनवाद किस वैज्ञानिक ने दिया? (2013, 14)
उत्तर
उत्परिवर्तन
ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries, 1848 – 1935), हॉलैण्ड के एक प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री ने सांध्य प्रिमरोज (evening primrose) अर्थात् ऑइनोथेरा लैमार्किआना (Oenothera lamarckigna) नामक पौधे की दो स्पष्ट किस्में देखीं, जिनमें तने की लम्बाई, पत्तियों की आकृति, पुष्पों की आकृति एवं रंग में स्पष्ट भिन्नताएँ थीं। इन्होंने यह भी देखा कि अन्य पीढ़ियों में कुछ अन्य प्रकार की वंशागत विभिन्नताएँ भी उत्पन्न हुईं। डी ब्रीज ने इस पौधे की शुद्ध नस्ल की इस प्रकार की सात जातियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने इन्हें प्राथमिक जातियाँ (primary species) कहा। जातीय लक्षणों में होने वाले इन आकस्मिक (sudden) वंशागत परिवर्तनों को डी ब्रीज ने उत्परिवर्तन (mutation) कहा और सन् 1901 में उन्होंने इस सम्बन्ध में एक उत्परिवर्तन सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

उन्होंने बताया कि नयी जीव जातियों का विकास लक्षणों में छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा न होकर एक ही बार में स्पष्ट एवं वंशागत आकस्मिक परिवर्तनों अर्थात् उत्परिवर्तनों के द्वारा होता है। उन्होंने यह भी बताया कि जाति का प्रथम सदस्य, जिसमें उत्परिवर्तन होता है, उत्परिवर्तक (mutant) है और यह शुद्ध नस्ल (pure breed) का होता है। उत्परिवर्तन की यह प्राकृतिक प्रवृत्ति (inherent tendency) लगभग सभी जीव-जातियों में पायी जाती है। उत्परिवर्तन अनिश्चित (indeterminate) होते हैं तथा लाभदायक अथवा हानिकारक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। ये किसी एक अंग विशेष अथवा एक से अधिक अंगों में साथ-साथ हो सकते हैं।

एक जाति के विभिन्न सदस्यों में अलग-अलग प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं। इस प्रकार एक जनक अथवा पूर्वज जाति से अनेक मिलती-जुलती नयी जातियों की उत्पत्ति सम्भव है। ये उत्परिवर्तन जननद्रव्य (germplasm) में होते हैं तथा इनसे उत्पन्न भिन्नताएँ वंशागत होती हैं।

मॉर्गन (T.H. Morgan, 1909) ने डी ब्रीज के विचारों से असहमति व्यक्त करते हुए ड्रोसोफिला (Drosophila) नामक फल मक्खी (fruit fly) पर आधारित अपने अध्ययन के आधार पर उत्परिवर्तनों को आकस्मिक रूप से होने वाले परिवर्तन बताया जो जीन या गुणसूत्रों में होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केवल जननिक उत्परिवर्तन ही वंशागत होते हैं। ये प्रभावी एवं अप्रभावी दोनों प्रकार के हो सकते हैं। प्रभावी उत्परिवर्तन शीघ्र ही अभिव्यक्त हो जाते हैं, जबकि अप्रभावी उत्परिवर्तन कई पीढ़ियों बाद भी प्रकट हो सकते हैं। घातक उत्परिवर्तन प्राय: अप्रभावी होते हैं। उत्परिवर्तन की दर विकिरण (radiation), रासायनिक उत्परिवर्तकों (chemical mutagens) तथा वातावरणीय दशाओं आदि कारकों पर निर्भर करती है। उत्परिवर्तन शरीर के लगभग सभी लक्षणों को प्रभावित कर सकते हैं।

उत्परिवर्तन एवं जैव विकास
उत्परिवर्तन जैव विकास-क्रिया को सीधे ही प्रभावित करते हैं। इसे निम्नलिखित तथ्यों द्वारा भली प्रकार समझा जा सकता है –

  1. उत्परिवर्तन बहुत ही अल्प समय में हो जाते हैं अत: जैव विकास की क्रिया में अत्यधिक महत्त्व रखते हैं।
  2. संयोजी कड़ियों की उपस्थिति को उत्परिवर्तन सिद्धान्त द्वारा सहज ही समझा जा सकता है।
  3. डॉबजैन्स्की (Dobzhansky) के अनुसार जीव को वातावरण के प्रति अनुकूल बनाने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक चयन (natural selection) द्वारा शीघ्र जीनिक संरचना में संकलित हो जाते हैं। इस प्रकार उत्परिवर्तनों का जैव विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है।

प्रश्न 4.
क्या सभी प्रकार के उत्परिवर्तन जीवों के लिए हानिकारक होते हैं? अगर नहीं तो क्यों?
उत्तर
सभी प्रकार के उत्परिवर्तन जीवों के लिए हानिकारक नहीं होते हैं क्योंकि कुछ उत्परिवर्तन तो संरचनात्मक होते हैं जिनके प्रभाव जीव के शरीर पर स्पष्ट दिखाई देते हैं; जैसे- हमारे बालों, त्वचा, नेत्रों आदि का काला या भूरा होना। इसके अतिरिक्त कुछ जीन उत्परिवर्तन के बाद जीव को (विशेषकर जीवाणुओं को) पूरकपोषी (auxotrophic) बना देते हैं। कुछ जीनी उत्परिवर्तन ही प्राण घातक (lethal) या प्रतिबन्धित प्राण घातक (conditional lethal) होते हैं।

प्रश्न 5.
जननिक/वंशागत एवं उपार्जित विभिन्नताओं/लक्षणों में अन्तर बताइए। (2009)
या
वंशागत तथा उपार्जित लक्षणों में अन्तर बताइए तथा प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए। (2014, 16)
या
वंशागत तथा उपार्जित लक्षणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
जननिक/वंशागत तथा उपार्जित विभिन्नताओं/लक्षणों में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-6

प्रश्न 6.
अनुकूली विकिरण क्या है? इसके किन्हीं तीन कारणों का उल्लेख कीजिए। (2017)
उत्तर
अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) – एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिन्दु से प्रारम्भ होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूली विकिरण कहते हैं। उदाहरण-गैलापैगोस द्वीप समूह पर डार्विन की फिंचे पक्षियों का अनुकूली विकिरण तथा ऑस्ट्रेलिया में शिशुधानी जन्तुओं में अनुकूली विकिरण।। अनुकूली विकिरण के लिए उत्तरदायी तीन प्रमुख कारण निम्न हैं –

  1. प्रकृति में एक जीव-जाति की उत्पत्ति एक बार तथा एक क्षेत्र में होती है।
  2. किसी जाति की आबादी बढ़ने पर इसके सदस्य उत्पत्ति क्षेत्र के चारों ओर फैल जाते हैं।
  3. एक ही जाति के जीवों में अलग-अलग वातावरण के अनुरूप परिवर्तन होने से नई प्रजातियाँ बनती हैं।

प्रश्न 7.
डार्विन के प्राकृतिक वरणवाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012, 15)
उत्तर
जैव विकास को समझाने के लिए डार्विन ने प्राकृतिक वरणवाद या प्राकृतिक चयनवाद प्रस्तुत किया। इसके अनुसार प्रत्येक जीव में सन्तान उत्पत्ति की प्रचुर क्षमता पाई जाती है। इनमें से अधिकांश जीव वृद्धि करके अपनी जनसंख्या बढ़ाते हैं। इस बढ़ी हुई जनसंख्या के कारण समान जाति या भिन्न-भिन्न जाति के जीवों के बीच अस्तित्व के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। ये संघर्ष प्रायः समान आवश्यकताओं के लिए होता है। संघर्ष में वे जीव ही जीतते हैं जिनमें सामान्य जीवों से हटकर कुछ अलग विभिन्नताएँ (variations) पाई जाती हैं। ये विभिन्नताएँ आनुवंशिक होती हैं और प्रकृति द्वारा जीवों में उत्पन्न की जाती हैं। इस प्रकार विभिन्नताओं से युक्त जीव ही आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहते हैं। ये जीव वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को सहने में समर्थ होते हैं।

प्रश्न 8.
लैमार्क के मूल आधार क्या थे? (2013)
उत्तर
लैमार्क के मूल आधार निम्नलिखित हैं –

  1. जीव के आन्तरिक बल में जीवों के आकार को बढ़ाने की प्रवृत्ति होती है जिसका अर्थ यह है कि जीवों के पूरे शरीर तथा उनके विभिन्न अंगों में बढ़ने की प्रवृत्ति होती है।
  2. जीवों की लगातार नयी जरूरतों के अनुसार नये अंगों तथा शरीर के दूसरे भागों का विकास होता है।
  3. किसी अंग का विकास तथा उसके कार्य करने की क्षमता उसके उपयोग तथा अनुपयोग पर निर्भर करती है। लगातार उपयोग से अंग धीरे-धीरे मजबूत हो जाते हैं तथा पूर्णतः विकसित हो जाते हैं। जबकि उनके अनुपयोग से इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है। इससे इन अंगों का धीरे-धीरे अपह्रास (degeneration) हो जाता है और अन्त में ये लुप्त हो जाते हैं।
  4. इस प्रकार जीवनकाल में आये परिवर्तनों को जीव उपार्जित (acquire) कर लेता है और उसे आनुवंशिकी (heredity) द्वारा अपनी संतानों में पहुँचा देता है।

प्रश्न 9.
अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिद्धान्त क्या है? इस सिद्धान्त को किस वैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया था? (2011)
उत्तर
अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिद्धान्त
फ्रांस के प्रसिद्ध जीवशास्त्री जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क (Jean Baptiste de Lamarck, 1744 – 1829) ने जैव विकास क्रिया को समझाने के लिए सर्वप्रथम उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिद्धान्त प्रस्तुत किया, जो उनकी पुस्तक फिलोसफी जुलोजिक (Philosophic Zoologique) में सन् 1809 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग के प्रभाव का सिद्धान्त भी दिया। उनके विचार लैमार्कवाद के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके अनुसार, वातावरण के प्रभाव से अंगों में आकार वृद्धि की प्रवृत्ति होने के कारण तथा शरीर के कुछ अंगों का प्रयोग अधिक व कुछ का कम होने के कारण अधिक उपयोग में आने वाले अंग अधिक विकस्ति हो जाते हैं, जबकि कम उपयोग में आने वाले अंग कम विकसित हो पाते हैं।

कुछ अंगों को लगातार अनुपयोग होने के कारण उनका ह्रास (degeneration) भी होता है और ये अवशेषी अंगों (vestigial organs) के रूप में शेष रह जाते हैं या फिर लुप्त हो जाते हैं। जीवों के जीवनकाल में या तो वातावरण के सीधे प्रभाव से या फिर अंगों के अधिक अथवा कम उपयोग के कारण जो शारीरिक परिवर्तन होते हैं, वे उपार्जित लक्षण (acquired characters) कहलाते हैं। ये लक्षण वंशागत होते हैं तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आने वाली सन्तानों में पहुँचते रहते हैं। इस प्रकार हजारों वर्ष पश्चात् । सन्तानें अपने पूर्वजों से पर्याप्त भिन्न होकर नयी-नयी जातियों का रूप ले लेती हैं।

प्रश्न 10.
लैमार्कवाद के अनुसार आधुनिक सर्प पैर रहित तथा बत्तख के पैर जालयुक्त होते हैं। समझाइए। (2017)
उत्तर
लैमार्क के अनुसार सर्प झाड़ियों तथा बिलों में रहता है तथा जमीन पर रेंगकर चलता है जिसके कारण उसके पैर इस्तेमाल नहीं होते थे तथा बिल में घुसने में भी बाधा उत्पन्न करते थे इसलिए इनके पैर धीरे-धीरे लुप्त होते चले गये जबकि अन्य सरीसृपों मे पैर उपस्थित होते हैं।

लैमार्क का मानना था कि बत्तख प्रारम्भ में स्थलीय थे जो खाने की खोज में पानी में जाया करते थे। पानी में चलने के लिए उन्हें अपने पंजे फैलाने पड़ते थे। इसके परिणामस्वरूप उनके पंजों के आधार पर त्वचा लगातार खिंचती गयी और पेशीय चलन से पंजों में रुधिर का बहाव बढ़ गया। अतः त्वचा ने अंगुलियों के बीच में पाद जाल का रूप ले लिया।

प्रश्न 11.
भौमिक समय सारणी क्या है? कौन-सा महाकल्प सरीसृप युग कहलाता है और क्यों? (2017)
उत्तर
पृथ्वी का आवरण बनने से लेकर पृथ्वी के इतिहास के सम्पूर्ण समय का मापक्रम भौमिक समय सारणी (geological time scale) कहलाता है।
मीसोजोइक महाकल्प को सरीसृप का युग कहा जाता है क्योंकि इस महाकल्प में पूरी पृथ्वी पर विशालकाय सरीसृपों जैसे डायनोसोर का आधिपत्य था।

प्रश्न 12.
मानव एवं कपि में समानताएँ और असमानताएँ बताइए। (2014)
या
मानव और कपि में चार अन्तर बताइए। (2009,12,17)
उत्तर
कपि और मानव में समानताएँ
कपि तथा मानव का विकास समान पूर्वजों से हुआ है। दोनों के लक्षणों में अनेक समानताएँ मिलती हैं: जैसे-वक्ष भाग का चौड़ा होना, अँगुलियों में नाखूनों का होना, मस्तिष्क एवं कपालगुहा का चौड़ा होना, सिर बड़ा, गर्दन व पाद अपेक्षाकृत लम्बे, पूँछ को अभाव, प्रत्येक भौंह के नीचे हड्डी का उभार,पोषण शाकाहारी, कभी-कभी मांसाहारी, पति-पत्नी के रूप में गृहस्थ जीवन की भावना का विकास आदि।
कपि और मानव में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-7

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव विकास सिद्धान्त के समर्थन में उपस्थित विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख कीजिए। (2009, 12)
या
जैव विकास के पक्ष में दिये जाने वाले किन्हीं तीन प्रमाणों की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए (2011)
या
समजातता की परिभाषा दीजिए। यह किस प्रकार समवृत्तिता से भिन्न है? इनका जैव विकास में क्या महत्त्व है?
या
जैव विकास के पक्ष में दिये जाने वाले विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख कीजिए। तुलनात्मक शरीर रचना से सम्बन्धित प्रमाणों की व्याख्या कीजिए। (2014, 16)
या
जैव विकास की मौलिक परिकल्पना क्या है? इसे प्रमाणित करने के लिए किन्हीं चार प्रमाणों के नाम लिखिए। (2014, 16)
या
समजात एवं समरूप अंगों की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। (2015)
या
“व्यक्तिवृत्त में जातिवृत्त पुनरावृत्ति” की व्याख्या कीजिए। (2017)
या
आर्कियोप्टेरिक्सका विकास किस कल्प एवं युग में हुआ था? इसके सरीसृप वर्ग तथा पक्षी वर्ग का एक-एक लक्षण लिखिए। (2017)
या
समजात अंग और समरूप अंग का एक-एक उदाहरण देते हुए अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2017)
या
समजात एवं समरूप अंगों में दो अन्तर लिखिए तथा प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए। (2017)
या
जैव विकास के पक्ष में तुलनात्मक आकारिकी एवं तुलनात्मक भौणिकी का वर्णन साक्ष्य या प्रमाण के साथ कीजिए। (2015, 17)
उत्तर
जैव विकास की मौलिक परिकल्पना
“परिवर्तन के साथ अवतरण (Descent with change or modification)” जैव विकास की मौलिक परिकल्पना है। “विकास या उद्विकास (evolution)” शब्द का साहित्यिक अर्थ है-“सिमटी वस्तु का खुलकर या फैलकर समय-समय पर हुए परिवर्तनों को प्रदर्शित करना (e, out + volvere, to roll = unrolling or unfolding to reveal modifications)”, a mai fos साइकिल, मोटर, रेल, जहाज आदि के प्रथम नमूने घटिया और कम लाभदायक थे। यदि हम इन पब के आविष्कारों के बाद के इनके विकास-इतिहासों को पढ़े तो हमें पता लग जाएगा कि लोगो ने समय-समय पर इनमें क्या-क्या क्रमिक सुधार किए जिससे वर्तमान नमूनों का विकास हुआ। ठीक इसी प्रकार, जैव विकास का भी संक्षेप में मतलब यही है कि प्रत्येक जीव-जाति के लक्षणों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी, प्राकृतिक आवश्यकताओं के अनुसार, कुछ परिवर्तन होते रहते हैं जो हजारों-लाखों वर्षों में इस जाति से नई, अधिक सुसंगठित एवं जटिल जातियों के विकास का कारण बनते हैं।

अत: जैव-विकास परिकल्पना के अनुसार, प्रत्येक वर्तमान जीव-जाति का विकास किसी-न-किसी, अपेक्षाकृत निम्न कोटि की, भूतकालीन (पूर्वज) जाति से हुआ है। इस प्रकार, प्रारम्भिक, निम्न कोटि के सरल जीवों से, क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवं जटिल जीवों की उत्पत्ति को ही जैव विकास कहते हैं। अत: जीवन की उत्पत्ति के ओपैरिनवाद (Oparin theory) के अनुसार बने, प्रारम्भिक, कोशिकारूपी सरल आदिजीवों से, एक ओर जटिल एककोशिकीय जीवों का विकास हुआ तथा दूसरी ओर इनमें से कुछ ने समूहों में एकत्र होकर प्रारम्भिक बहुकोशिकीय जीवों की उत्पत्ति की। फिर प्रारम्भिक बहुकोशिकीय जीवों की कोशिकाओं के बीच धीरे-धीरे कार्यों का बँटवारा, अर्थात् श्रम विभाजन (division of labour) हो जाने से, इनमें कोशिकीय विभेदीकरण (cell differentiation) हुआ। इस प्रकार, शनैः शनैः शरीर के अधिकाधिक सुचारू संघटन के कारण नई-नई उच्चतर श्रेणियों की जीव-जातियों का विकास होता गया।

जैव विकास के प्रमाण
वर्तमान युग में जीवों की उत्पत्ति प्राचीन काल के सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों के फलस्वरूप हुई। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए कुछ ठोस प्रमाण इस प्रकार हैं –

  1. संयोजी कड़ियों से प्रमाण (evidences from connecting link)।
  2. तुलनात्मक आकारिकी से प्रमाण (evidences from comparative morphology)
    • समजात अंगों से प्रमाण (evidences from homologous organs)।
    • समवृत्ति अंगों से प्रमाण (evidences from analogous organs)।
  3. अवशेषी अंगों से प्रमाण (evidences from vestigial organs)।
  4. वर्गीकरण से प्रमाण (evidences from classification)।
  5. भ्रूण विज्ञान से प्रमाण (evidences from embryology)।
  6. शरीर क्रिया-विज्ञान से प्रमाण (evidences from physiology)।
  7. प्राणियों के भौगोलिक वितरण तथा पृथक्करण से प्रमाण (evidences from geographical distribution and isolation of animals)
  8. आनुवंशिकी से प्रमाण (evidences from genetics)।
  9. पूर्वजता (atavism or reversion)।
  10. जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण (evidences from palaeontology)।

संयोजक कड़ियाँ तथा उनसे जैव विकास के प्रमाण
कुछ जीव जातियों में दो समीप के वर्गों के लक्षण पाये जाते हैं। इनमें कम विकसित जातियों के साथ ही उच्च श्रेणी की अधिक विकसित जातियों के लक्षण मिश्रित रूप से पाये जाते हैं। ये संयोजक कड़ियाँ या संयोजक जातियाँ (connecting links or connecting species) कहलाती हैं तथा ये जैव विकास के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। संयोजक जातियों के कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण इस प्रकार हैं –
(i) विषाणु (Virus) – इसे सजीव तथा निर्जीव के बीच की कड़ी माना जाता है।

(ii) युग्लीना (Euglena) – प्रोटोजोआ संघ का यह एक एककोशिकीय क्लोरोफिलयुक्त सदस्य है। सामान्य जन्तुसम भोजन प्राप्त करने तथा गति (movement) के कारण यह जन्तुओं से तथा क्लोरोफिल (chlorophyll) की उपस्थिति के कारण पादपों से समानता रखता है। इस प्रकार यह जन्तुओं एवं पादपों के मध्य संयोजक कड़ी के रूप में पहचाना जाता है।

(iii) प्रोटेरोस्पंजिया (Proterospongia) – प्रोटोजोआ संघ का यह एक निवही (colonial) जन्तु है। यह स्पंज (sponge) के समान कीप कोशिकाओं अथवा कोएनोसाइट्स (collared cells or choanocytes) का बना होता है। इस प्रकार यह प्रोटोजोआ एवं स्पंज के बीच की संयोजक कड़ी है।

(iv) निओपिलाइना (Neopling) – संघ मॉलस्का (mollusca) के इस जन्तु में कवच व मैण्टल (shell and mantle) पाये जाते हैं तथा इसके अधरतल पर चपटा व मांसल पाद (foot) भी होता है। प्रशान्त महासागर से प्राप्त इस जन्तु में खण्डयुक्त शरीर (segmented body), क्लोम (gills) तथा ट्रोकोफोर (trochophore) जैसी भ्रूण प्रावस्था आदि संघ ऐनेलिडा (annelida) के समान लक्षण भी पाये जाते हैं। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि संघ मॉलस्का का विकास संघ ऐनेलिडा के सदस्यों से हुआ है।

(v) पेरीपेंटस (Peripatus) – संघ आर्थोपोडा (arthropoda) का यह एक सुंडी के समान (caterpillar like) जन्तु है, जिसमें समखण्डीय जोड़ीदार पाद, सिर पर एण्टिनी तथा संयुक्त नेत्र होते हैं। दूसरी ओर इसमें संघ ऐनेलिडा के समान काइटिनरहित क्यूटिकल तथा उत्सर्गिकाएँ (nephridia) पायी जाती हैं। इस प्रकार यह ऐनेलिडा से आर्थोपोडा के विकास को प्रमाणित करता है।

(vi) आर्किओप्टेरिक्स (Archaeopteryx) – इसका उद्भव मीसोजोइक महाकल्प के जुरैसिक . कल्प में हुआ था। इस पक्षी के जीवाश्म (fossils) लगभग 15 करोड़ वर्ष प्राचीन जुरैसिक (Jurassic) चट्टानों से प्राप्त हुए हैं। इसमें सरीसृपों (reptilia) के समान लम्बी पूँछ, चोंच में दाँत तथा अग्रपाद पंजे (claws) युक्त थे। पक्षियों के समान उड़ने के लिए इस जन्तु में विकसित पंख भी थे। इस प्रकार यह सरीसृपों एवं पक्षियों के बीच की संयोजक कड़ी है।

(vii) प्रोटोथेरिया समूह के जन्तु (Animals of Prototheria Group) – ऑस्ट्रेलिया में पाये जाने वाले कुछ वर्ग स्तनधारी (mammalia) के जन्तु हैं। इनकी तीन श्रेणियाँ एकिडना (echidna); जैसे- टैकीग्लॉसस (Tachyglossus), जैग्लॉसस (Jaglossus) तथा ऑॉर्नथोरिन्कस (Ornithorthynchus) हैं। इनमें एक ओर तो स्तनधारियों के समान शरीर पर बाल व दुग्ध ग्रन्थियाँ होती हैं तथा दूसरी ओर सरीसृपों के समान इनमें कर्ण पल्लवों का अनुपस्थित होना, क्लोएका (Cloaca) का पाया जाना, मादाओं का अण्डे देना आदि लक्षण पाये जाते हैं। इस प्रकार इन्हें सरीसृपों एवं स्तनधारियों के बीच की संयोजक कड़ी माना गया है।

जैव विकास के तुलनात्मक आकारिकी से प्रमाण
जन्तुओं की तुलनात्मक आकारिकी (comparative morphology) के अध्ययन से ज्ञात होता है कि एक ही उत्पत्ति के अंग भिन्न-भिन्न जन्तुओं में आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के हो जाते हैं, जबकि अनेक जन्तुओं में एक कार्य को करने के लिए विकसित विभिन्न प्रकार की उत्पत्ति के अंगों में समरूपता होती है। इनको क्रमशः समजातता (homology) तथा समरूपता (analogy) कहते हैं।

समजातता एवं समजात अंग
सर रिचर्ड ओवन (Sir Richard Ovan-1843) ने समजातता की परिभाषा दी थी। जब अंगों की मूल रचना (basic structure) तथा उद्भव (origin) समान होते हैं, परन्तु इनके कार्यों में समानता होना आवश्यक नहीं होता तो यह समजातता (homology) कहलाती है अर्थात् समान उद्भव एवं मूल रचना वाले अंग जो भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए अनुकूलित होते हैं, समजात अंग (homologous organs) कहे जाते हैं; जैसे-पक्षियों के पंख, सील (seal) के फ्लिपर (flipper), चमगादड़ का पैटेजियम (patagium), ह्वेल व पेंग्विन के चप्पू (paddle), घोड़े के अग्रपाद, मनुष्य के हाथ इत्यादि। विभिन्न प्राणियों में उपलब्ध समजातता यह स्पष्ट करती है कि इनका विकास समान पूर्वजों से ही हुआ है। अतः समजातता अपसारी जैव विकास (divergent organic evolution) का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
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समरूपता एवं समरूप अंग
ऐसे अंग जो समान कार्य के लिए अनुकूलित (adapted) हो जाने के फलस्वरूप एक जैसे दिखायी देते हैं, लेकिन मूल रचना एवं उत्पत्ति में भिन्न होते हैं, समरूप अंग (analogous organs) कहलाते हैं। इस स्थिति को समरूपता या समवृत्तिता (analogy) कहते हैं। कीट-पतंगों के पंख, पक्षियों एवं चमगादड़ के पंखों के समान दिखायी पड़ते हैं तथा उड़ने का कार्य करते हैं, परन्तु अकशेरुकीय होने के कारण कीटों के पंखों में कंकाल नहीं पाया जाता, जबकि चमगादड़ व पक्षी कशेरुकीय होते हैं और इनमें अस्थियों-उपास्थियों का कंकाल पाया जाता है। इस प्रकार मौलिक रचना में दोनों प्रकार के पंख एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

समरूपता से अभिसारी जैव विकास (convergent organic evolution) के प्रमाण प्राप्त होते हैं।
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जैव विकास के तुलनात्मक भौणिकी से प्रमाण
यदि हम विभिन्न जन्तुओं की भ्रूणीय अवस्थाओं का अध्ययन करें तो हमें यह पता चलता है कि विभिन्न जन्तुओं के भ्रूण में उनकी प्रौढ़ अवस्थाओं से ज्यादा समानताएँ होती हैं। इस तथ्य से प्रभावित होकर वैज्ञानिक अर्नस्ट हीकल (Ernst Haeckel: 1834-1919) ने एक नियम बनाया जिसे उन्होंने पुनरावृत्ति सिद्धांत (recapitulation theory) या बायोजेनेटिक नियम (biogenetic law) कहा जिसके अनुसार, प्रत्येक जीव का व्यक्तिवृत्त उसके जातिवृत्त की पुनरावृत्ति करता है (ontogeny repeats phylogeny)। व्यक्तिवृत्त (ontogeny) एक जीव का जीवन काल है जो अण्डाणु से शुरू होता है तथा जातिवृत्त (phylogeny) जीवों के परिपक्व या वयस्क पूर्वजों को वह क्रम है जो उस जीव समूह के जैव विकास के दौरान बने होंगे। इससे तात्पर्य यह है कि प्रत्येक जीव अपनी भौणिक अवस्था में अपने पूर्वजों के इतिहास को प्रदर्शित करता है अर्थात् पुनरावृत्ति सिद्धांत के अनुसार उच्च कोटि या जाति के जन्तुओं की भौणिक अवस्था उनके पूर्वजों की वयस्क अवस्था से मिलती है।
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सभी बहुकोशिकीय जीवों में लैंगिक जनन के समय अण्डाणु तथा शुक्राणु के संयोजन से युग्मनज (zygote) बनता है जिसमें विदलन (Cleavage) के फलस्वरूप, मोरूला, ब्लास्टुला, गेस्ट्रला अवस्थाएँ पायी जाती हैं जिससे आगे चलकर भ्रूण का विकास होता है। यदि हम विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूण को पास-पास रखकर अध्ययन करें तो उसमें बहुत-सी समानताएँ दिखाई देती हैं; जैसे- क्लोम तथा क्लोम दरारें, नोटोकॉर्ड, दो वेश्मी हृदय तथा पूँछ। इस अध्ययन से यह प्रमाणित हो । जाता है कि सभी कशेरुकियों का विकास मछलियों के समान किसी निम्न श्रेणी के जन्तु से हुआ है। इसलिये वान बियर (Von Baer, 1792 – 1876) ने इससे पहले भ्रूणीय परिवर्धन के चार मूल सिद्धान्त दिये जो निम्नलिखित हैं –

  1. सामान्य लक्षण (general characters) विशिष्ट लक्षणों (special characters) से पहले बनते हैं।
  2. ज्यादा सामान्य लक्षणों से कम सामान्य लक्षण तथा फिर विशिष्ट लक्षण विकसित होते हैं।
  3. परिवर्धन के समय भ्रूण धीरे-धीरे दूसरे जीवों के भ्रूण से अलग होता जाता है।
  4. किसी जन्तु की प्रारम्भिक भ्रूण अवस्था दूसरे कम विकसित जन्तु के भ्रूण से ज्यादा मिलती है। न कि उसके वयस्क से।

प्रश्न 2.
जैव विकास के पक्ष में जीवाश्म विज्ञान के प्रमाण पर टिप्पणी लिखिए। (2016, 18)
उत्तर
जैव विकास के जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण
(Gr. Palaeos = ancient, onta – existing things and logous = science) जीवाश्म (fossil) का अध्ययन जीवाश्म विज्ञान (Palaeontology) कहलाता है। जीवाश्म का अर्थ उन जीवों के बचे हुए अंश से है जो अब से पहले लाखों-करोड़ों वर्षों पूर्व जीवित रहे होंगे। जीवाश्म लैटिन शब्द फॉसिलिस (fossilis) से बना है जिसका मतलब है खोदना (dug up)। यह जीव विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है जो जीव विज्ञान (Biology) और भूविज्ञान (Geology) को जोड़ती है।

जीवाश्म का बनना
1. अश्मीभूत जीवाश्म (Petrified Fossils) – जीवाश्म मुख्यत: अवसादी शैल (sedimentary rocks) में पाये जाते हैं जो समुद्र या झीलों के तल पर रेत के जमा हो जाने से बनते हैं। मरे हुए जीवों का पूरा शरीर रेत से ढक जाता है तथा धीरे-धीरे यह ठोस पत्थर में परिवर्तित हो जाता है। इसी प्रकार मृत जीवों के विभिन्न भागों का एक स्पष्ट अक्स (चित्र) पत्थर पर बन जाता है इस क्रिया को अश्मीभवन (petrifaction) कहते हैं तथा इस प्रकार बने जीवाश्मों को अश्मीभूत जीवाश्म (perified fossils) कहते हैं।

2. साँचा जीवाश्म (Mould Fossils) – उन जीवाश्मों में जिनमें शरीर का कोई भाग शेष नहीं | रहता केवल शरीर का साँचा मात्र रह जाता है, इसे साँचा जीवाश्म (mould fossils) कहते हैं।

3. अपरिवर्तित जीवाश्म (Unaltered Fossils) – जब जीवधारी का पूरा शरीर बर्फ में भली प्रकार से सुरक्षित रहकर सम्पूर्ण जीवाश्म बनाता है तब इन्हें अपरिवर्तित जीवाश्म (unaltered fossils) कहते हैं।

4. ठप्पा जीवाश्म (Print Fossils) – कभी-कभी मरने के बाद सड़ने से पहले जीव चट्टानों पर अपना ठप्पा बना जाते हैं, ऐसे जीवाश्म को ठप्पा जीवाश्म (print fossils) कहते हैं।

जीवाश्म का महत्त्व
जीवाश्म के अध्ययन से जीवों की उपस्थिति का पता चलता है। जीवाश्म यह भी दर्शाते हैं कि विभिन्न पौधों एवं जन्तुओं में जैविक विकास किस तरह हुआ। निम्न तथ्यों से इसका पता चलता है –

  1. विभिन्न भूवैज्ञानिक स्तरों से प्राप्त जीवाश्म विभिन्न वंशों के होते हैं।
  2. सबसे नीचे पाये जाने वाले भूवैज्ञानिक स्तरों में सबसे सरल जीव होते थे, उससे ऊपर पाये जाने वाले स्तरों में क्रमशः जटिल जीवों के जीवाश्म पाये जाते हैं। इससे पता चलता है कि जन्तुओं का विकास निम्न प्रकार से हुआ –
    एककोशिकीय प्रोटोजोआ → बहुकोशिकीय जन्तु → अकशेरुक जन्तु → कशेरुक जन्तु।
  3. विभिन्न स्तरों से प्राप्त जीवाश्मों से पता चलता है कि विभिन्न वर्गों के जीवों के बीच की संयोजी कड़ी भी थी जो जैव विकास की जटिल गुत्थी को सुलझाने में सहायक है।
  4. जीवाश्मों के अध्ययन से किसी एक जन्तु की वंशावली (pedigree) का क्रम पता चलता है।
  5. जीवाश्मों के आधार पर भूवैज्ञानिकों ने भूवैज्ञानिक समय सारणी बनायी जिसके आधार पर यह कह सकते हैं कि पौधों में पुष्पधारी पौधे (angiosperms) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे आधुनिक एवं विकसित हैं।

प्रश्न 3.
जैव विकास से आप क्या समझते हैं? डार्विन के जैव विकास के सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। (2015)
या
‘योग्यतम की अतिजीविता का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया था? इस सिद्धान्त को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर
जैव विकास
प्रारम्भिक निम्न कोटि के सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवं जटिल जीवों की उत्पत्ति को जैव विकास कहते हैं।

डार्विनवाद
यह डार्विन की ही विचारधारा थी कि प्रकृति जन्तु और पौधों का इस प्रकार चयन करती है कि वह जीव जो उस वातावरण में रहने के लिये सबसे अधिक अनुकूलित होते हैं संरक्षित हो जाते हैं और वह जीव जो कम अनुकूलित होते हैं नष्ट हो जाते हैं। प्राकृतिक चयनवाद को समझाने के लिये डार्विन ने अपने विचारों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया –

1. संख्या में तेजी से बढ़ जाने की प्रवृत्ति
प्रत्येक जीव की यह प्रवृत्ति होती है कि वह अपनी संख्या में अधिक से अधिक वृद्धि करे लेकिन उससे उत्पन्न सभी संतानें जीवित नहीं रह पातीं क्योंकि उनकी उत्पत्ति की संख्या ज्यामितीय अनुपात में होती है जबकि रहने और खाने की जगह स्थिर होती है। इसलिये यदि सबसे धीमी गति से प्रजनन करने वाले जीव पर भी प्राकृतिक अंकुश न लगे तो वह पूरी पृथ्वी के भोजन व स्थान को समाप्त कर देगा। इसके लिये उन्होंने सबसे मन्द गति से प्रजनन करने वाले हाथी का उदाहरण लिया, जो लगभग 100 वर्षों तक जीवित रहता है। एक जोड़ा हाथी 30 वर्ष की उम्र में प्रजनन करना शुरू करता है तथा 90 वर्ष तक करता रहता है। इस बीच यह औसतन 6 बच्चों की उत्पत्ति करता है।

उन्होंने हिसाब लगाया कि यदि हाथी की सभी संतानें जीवित रहें तो एक जोड़ा हाथी 740-750 सालों में लगभग 19 मिलियन हाथी पृथ्वी पर पैदा कर देगा। इसी प्रकार यदि एक जोड़ी मक्खी अप्रैल में प्रजनन करना शुरू करती है और उसका प्रत्येक अण्डा जीवित रहे तथा उससे निकली मक्खी पुन: प्रजनन करती रहे तो अगस्त के अन्त तक 191×1018 मक्खियाँ पैदा हो जायेंगी। इसी प्रकार मादा टोड एक बार में 12,000 अण्डे देती है। और यदि वे सब जीवित रहें तो यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पृथ्वी पर कितने टोड हो जायेंगे। इसी प्रकार एक कवक 65 करोड़ बीजाणु (spores) तथा एक समुद्री सीप 60 लाख अण्डे प्रतिवर्ष देती है।

2. सीमान्त कारक
हमारी पृथ्वी हाथियों से क्यों नहीं रोधी हुई है, हमारे खेत टोड से क्यों नहीं ढके हुए हैं, हमारे तालाब आयस्टर से क्यों नहीं भरे हुए हैं? क्योंकि प्रत्येक जाति को रोकने के लिये कुछ बाधक कारक होते हैं। जिससे उसकी संख्या सीमित हो जाती है। कुछ महत्त्वपूर्ण सीमान्त कारक इस प्रकार से हैं –

  1. सीमित भोज्य सामग्री (Limited Food) – जनसंख्या भोज्य सामग्री की कमी के कारण सीमित हो जाती है। डार्विन इस बात में माल्थस (Malthus) के सिद्धान्त से सहमत थे जिनके अनुसार जनसंख्या ज्यामितीय अनुपात में बढ़ती है और भोज्य सामग्री बहुत धीमी गति से।
  2. परभक्षी जन्तु (Predatory Animals) – परभक्षी जन्तु जनसंख्या पर अंकुश लगाते हैं; जैसे- अफ्रीका के जंगलों से यदि शेर को खत्म कर दिया जाये तो जेब्रा की जनसंख्या उस समय तक इतनी बढ़ जायेगी जब तक कि सीमित भोज्य सामग्री व रोग उनके लिये बाधक न बन जाये।
  3. रोग (Disease) – रोग तीसरा सीमान्त कारक है। जब भी जनसंख्या की अति हो जाती है तो कोई न कोई महामारी इस पर रोक लगा देती है।
  4. स्थान (Space) – स्थान की कमी के कारण भी जनसंख्या की अनियमित वृद्धि रुक जाती है। क्योंकि इसकी वजह से भुखमरी, महामारी हो जाती है तथा प्रजनन भी सीमित हो जाता है।
  5. प्राकृतिक विपदाएँ (Natural Calamities) – जन्तु के अचेत वातावरण में कोई भी बदलाव बाधक बन जाता है; जैसे- सूखा, बाढ़, तूफान, अत्यधिक गर्मी व ठण्ड आदि।

3. जीवन के लिये संघर्ष
यह देखा गया है कि प्रत्येक प्रजाति की प्रत्येक पीढ़ी में अधिक से अधिक व्यष्टि (individuals) उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है जो उपरोक्त दिये गये सीमान्त कारकों से सीमित हो जाती है- जैसे खाना, साथी, स्थान आदि के लिये होड़ (competition), परभक्षी जन्तु, रोग तथा प्राकृतिक विपदाएँ। इस प्रक्रिया को डार्विन ने जीवन के लिये संघर्ष (struggle for existence) कहा। यही संघर्ष निर्णय करता है कि कौन-सी व्यष्टि सफल होगी और कौन-सी नहीं।

जीवन के लिये संघर्ष तीन तरह से हो सकते हैं –
(i) सजातीय संघर्ष (Intraspecific Struggle) – अपने ही तरह की अर्थात् एक ही जाति के सदस्यों में आपस में होने वाले संघर्षों को सजातीय संघर्ष (intraspecific struggle) कहते हैं। जंगल में एक ही पेड़ के नीचे उगे उसी जाति के छोटे-छोटे पौधे इसका अच्छा उदाहरण हैं, उन पौधों में से कुछ मिट्टी तथा नमी की कमी से मर जाते हैं तथा बचे हुए पौधों में से कुछ लम्बे होकर अविकसित छोटे पौधों की हवा व रोशनी रोक देते हैं जिसके कारण छोटे पौधे खत्म हो जाते हैं। इस प्रकार उस क्षेत्र में पेड़ों की संख्या लगातार गिरती रहती है तथा कुछ ही पौधे परिपक्व हो पाते हैं।

(ii) अन्तरजातीय संघर्ष (Interspecific Struggle) – प्रकृति में सबसे अधिक संघर्ष अन्तरजातीय होता है अर्थात् एक साथ रहने वाली विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष। एक जाति दूसरे जाति का भोजन बन जाती है। मनुष्य इस प्रकार के संघर्ष में सबसे अग्रणी है। जो जीव इस संघर्ष में खत्म हो जाते हैं वे अपने इस नुकसान को या तो पूरा करते हैं या खत्म हो जाते हैं।

(iii) वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle) – सभी जातियाँ प्रतिकूल वातावरण; जैसे- अत्यधिक सर्दी व गर्मी, बाढ़, सूखा, तूफान आदि से अपने आपको बचाने के लिये लगातार संघर्ष करती रहती हैं।

4. विभिन्नताएँ
यह बात सर्वविदित है कि दो जीव कभी भी एक से नहीं हो सकते। एक ही माता-पिता की दो संतानें भी कभी एक-सी नहीं होतीं, इसी को विभिन्नताएँ (variations) कहते हैं। विभिन्नताएँ जैव विकास की एक मूल आवश्यकता तथा प्रगामी कारक हैं क्योंकि बिना विभिन्नताओं के जैव विकास नामुमकिन है। विभिन्नताएँ दो प्रकार की होती हैं-एक तो वह जो पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत हो जाती हैं तथा दूसरी वह जो केवल उस जीव के जीवन काल में ही होती हैं लेकिन वंशागत नहीं होतीं।

5. योग्यतम की उत्तरजीविता
हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer) ने योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धान्त सामाजिक विकास के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। डार्विन इससे अत्यधिक प्रभावित हुए तथा उन्होंने इसे जैव विकास के प्राकृतिक चयन के सम्बन्ध में समझाया। डार्विन के अनुसार जीवन के संघर्ष में वही जीव सफल होते हैं जो वातावरण के अनुरूप अनुकूलित हो जाते हैं। यह अधिक सफल जीवन व्यतीत करते हैं, इनकी जनन क्षमता भी अधिक होती है तथा यह स्वस्थ संतानों को उत्पन्न करते हैं, जिससे उत्तम लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत हो जाते हैं और इस प्रकार उत्पन्न संताने वातावरण के प्रति अधिक अनुकूल होती हैं। इसके साथ ही वातावरण के प्रतिकूल प्राणी नष्ट हो जाते हैं इसी को डार्विन ने प्राकृतिक वरण या चयन (natural selection) कहा।

डार्विन ने प्राकृतिक वरण द्वारा योग्यतम की उत्तरजीविता को लैमार्क के जिराफ द्वारा समझाया। जिराफ की गर्दन तथा पैरों की लम्बाई में अत्यधिक विभिन्नताएँ होती हैं। घास के मैदानों की कमी के कारण इन्हें ऊँचे पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा जिसके फलस्वरूप वह जिराफ जिनमें लम्बी गर्दन व टाँगें थीं, वह छोटी गर्दन व टाँगों वाले जिराफ से ज्यादा अनुकूलित पाये गये। लंबी गर्दन वाले जिराफ को उत्तरजीविता का अधिक अवसर मिला तथा वह संख्या में बढ़ने लगे तथा छोटी गर्दन वाले जिराफ लुप्त हो गये।

6. नयी जाति की उत्पत्ति
वातावरण निरन्तर परिवर्तित होता रहता है जिससे जीवों में उनके अनुकूल रहने के लिए विभिन्नताएँ आ जाती हैं। यह विभिन्नताएँ पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों में इकट्ठा होती रहती हैं। धीरे-धीरे वह अपने पूर्वजों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि वैज्ञानिक उन्हें नई जाति (species) का स्थान दे देते हैं। इसी के आधार पर डार्विन ने जाति के उद्भव का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

प्रश्न 4.
नवडार्विनवाद से आप क्या समझते हैं? इसकी आधुनिक स्थिति की विवेचना कीजिए। (2011,15)
या
जन्तुओं में मुख्य विकासीय प्रवृत्तियों का निरूपण कीजिए। (2011)
या
जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। (2014, 15)
या
नवडार्विनवाद पर एक टिप्पणी लिखिए। (2014, 16)
उत्तर
नवडार्विनवाद/जैव विकास का आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धांत
वर्ष 1930 तथा 1945 के मध्य आधुनिक खोजों के आधार पर डार्विनवाद में कुछ परिवर्तन सम्मिलित किये गये तथा प्राकृतिक चयनवाद को पुनः मान्यता प्राप्त कराने वालों में वीजमान (Weismann), हैल्डेन (Haldane), जूलियन हक्सले (Julian Huxley), गोल्डस्मिट (Goldschmidt) तथा डॉबजैन्स्की (Dobzhansky) आदि हैं।

डॉडसन (Dodson) के अनुसार, जैव विकास का आधुनिक संश्लेषित मत (moderm synthetic theory of evolution) ही वास्तव में नवडार्विनवाद है। नवडार्विनवाद के अनुसार नयी जातियों की उत्पत्ति निम्नांकित पदों के आधार पर होती है –

  1. विभिन्नताएँ (Variations) – ये जीन विनिमय (crossing over) के कारण, माता-पिता के गुणसूत्रों के लैंगिक जनन में सम्मिलित होने के कारण उत्पन्न होती हैं। केवल ऐसी विभिन्नताएँ जो लाभदायक हों तथा जिनकी वंशागति हो, जैव विकास में सहायक रहती हैं।
  2. उत्परिवर्तन (Mutations) – जीन्स के स्तर पर होने वाले आकस्मिक परिवर्तन जो प्रायः आनुवंशिक होते हैं, उत्परिवर्तन कहलाते हैं।
  3. प्राकृतिक चयन (Natural selection) – बदलती हुई परिस्थितियों में जिन जीवों में लाभदायक विभिन्नताएँ एवं उत्परिवर्तन हो जाते हैं, वे जीव जीवन संघर्ष में अधिक सफल रहते हैं। ये सदैव वातावरण के अनुकूल बने रहते हैं।
  4. लैंगिक पृथक्करण (Sexual Isolation) – क्रियात्मक एवं भौगोलिक कारकों; जैसे- मरुस्थल, पर्वत, समुद्र, नदियों आदि के प्रभाव में प्रायः जीवों के अन्तराजनन में बाधा पहुँचती है।

इस प्रकार जीनी विभिन्नताओं द्वारा जीवों में परिवर्तन (variations) आते हैं। प्राकृतिक वरण (natural selection) तथा जनन पृथक्करण जीवों को अनुकूलित दिशा में ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त तीन सहायक प्रक्रियाएँ-प्रवास (migration), संकरण (hybridization) तथा अवसर (chance) जैव विकास को आगे बढ़ाने, उसका मार्ग तथा दिशा बदलने में सहायक होती हैं। वर्ष 1905 में मेंडलवाद की पुनखज होने तथा जैव विकास में डॉबजैन्स्की (Dobzhansky, 1937) द्वारा आनुवंशिकी को जातियों की उत्पत्ति में महत्व देने पर जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त की नींव पड़ी। ऐसा डार्विनवाद व मंडलवाद के नियमों को जीव-जातियों की समष्टियों (आबादियों) पर एक साथ लागू करने पर सम्भव हुआ। इसे पहले नवडार्विनवाद (neodarwinism) कहा गया।

इस प्रकार “जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त’ की नींव डॉबजैन्स्की (Dobahansky, 1937) की पुस्तक, “आनुवंशिकी तथा जातियों की उत्पत्ति’ (Genetics and the Origin of Species) से पड़ी। यह नाम जूलियन हक्सले (Julian Huxley, 1942) ने दिया। इस सिद्धान्त के विकास में मुलर (Muller, 1949), फिशर (Fisher, 1958), हैल्डेन (Haldane, 1932), राइट (Wright, 1968), मेयर (Mayer, 1963, 1970), स्टेबिन्स (Stebbins, 1966-1976) आदि वैज्ञानिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस सिद्धान्त में जैव विकास की क्रिया-विधि को जीव-जातियों की समष्टियों की आनुवंशिकी के सन्दर्भ में समझाया गया है। इसके अनुसार, किसी जीव जाति की विभिन्न क्षेत्रों की समष्टियों में उपस्थित आनुवंशिक अर्थात् जीनी विभिन्नताओं पर प्राकृतिक चयन तथा जननिक पृथक्करण (reproductive isolations) कम करके समष्टियों को नयी-नयी अनुकूलन योग्य दिशाओं की ओर मोड़ते रहते हैं जिससे नयी जातियों का विकास सम्भव होता है।

लघु उविकास तथा वृहत् उदविकास
जैव विकास को लघु उविकास तथा वृहत् उविकास में बाँटा गया है। लघु उविकास में जीव जातियों की प्रत्येक समष्टि में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते रहने वाले आनुवंशिक (genetic) परिवर्तनों का आंकलन होता है, जबकि वृहत् उविकास में विस्तृत स्तर पर जीवों में नयी-नयी संरचनाओं के विकास, विकासीय प्रवृत्तियों (evolutionary trends), अनुकूलन योग्य प्रसारणों (adaptive radiations), विभिन्न जीव जातियों के मध्य विकासीय सम्बन्धों (phylogenetic relationships) तथा जीव जातियों की विलुप्ति का अध्ययन किया जाता है।

समष्टि या जनसंख्या के प्रत्येक सदस्य में विभिन्न आनुवंशिक लक्षणों के विभिन्न जीनरूप होते हैं। इसके सभी आनुवंशिक लक्षणों के जीनरूपों को सामूहिक रूप में इसका जीन समूह या जीन प्ररूप (genome) कहते हैं। विभिन्न सदस्यों के बीच दृश्यरूप लक्षणों की विभिन्नताओं से स्पष्ट होता है कि इतनी ही विभिन्नताएँ इनके जीन प्ररूपों में भी होनी आवश्यक हैं। इस प्रकार एक समष्टि के सभी सदस्यों में उपस्थित सम्पूर्ण युग्मविकल्पी जीन्स (allelic genes) को मिलाकर समष्टि की जीनराशि (gene pool) कहते हैं। यद्यपि समष्टि के प्रत्येक लक्षण के दो ही युग्मविकल्पी जीन्स होते हैं, परन्तु सामान्यतः उत्परिवर्तनों (mutations) के होते रहने के कारण पूरी समष्टि में प्रत्येक जीन के कई युग्मविकल्पी (allelomorphic) स्वरूप भी हो सकते हैं। इसे जीन की बहुरूपता कहते हैं। इस जीनी बहुरूपता (polymorphism) में प्रत्येक स्वरूप की बारम्बारता अर्थात् आवृत्ति को युग्मविकल्पी
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आवृत्ति (allelic frequency) कहते हैं जो महत्त्वपूर्ण है। ऐसी जीन्स की विभिन्नताएँ तथा आवृत्तियों में इस प्रकार की विभिन्नताएँ भिन्न-भिन्न स्थानों की समष्टियों के मध्य लघु उविकासीय अपसारिता (micro evolutionary divergence) को प्रदर्शित करती हैं।

हार्डी एवं वीनबर्ग (Hardy and weinberg, 1908) ने स्पष्ट किया कि जिन समष्टियो में आनुवंशिक परिवर्तन नहीं होते, उनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी युग्मविकल्पी जीन्स और जीनरूपों की आवृत्तियों (frequencies) में एक सन्तुलन बना रहता है, क्योंकि प्रबल जीन अप्रबल जीन को समष्टि की जीनराशि से हटा नहीं सकते। इसे हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन (Hardy-Weinberg equilibrium) कहते हैं।

यह वास्तव में मंडल के प्रथम पृथक्करण अर्थात् युग्मकों की शुद्धता के नियम (law of segregation or purity of gametes) का ही तार्किक निष्कर्ष (logical consequence) है। इसे हार्डी-वीनबर्ग ने गणितीय समीकरणों द्वारा समझाया जिन्हें सम्मिलित रूप से हार्डी-वीनबर्ग का नियम (Hardy-Weinberg rule) कहते हैं। इस नियम में पूर्वानुमान किया जाता है कि समष्टि बड़ी है। इसमें युग्मकों का संयुग्मन (union of gametes) अनियमित तथा संयोगिक (random ) होता है अर्थात् विकास को प्रेरित करने वाली कोई प्रक्रिया समष्टि (आबादी) को प्रभावित नहीं करती है।

विकास के कारण
ऐसी प्रक्रियाएँ जिनके द्वारा किसी समष्टि में हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन (Hardy-Weinberg equilibrium) समाप्त होता है, विकास का कारण होती हैं तथा समष्टि में विकास की दिशा भी निर्धारित करती हैं। इन्हें विकासीय अभिकर्मक कहते हैं। विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त को प्रमुखत: निम्नलिखित विकासीय अभिकर्मकों के आधार पर स्पष्ट किया गया है –
1. उत्परिवर्तन एवं विभिन्नताएँ (Mutations and variations) – जीन्स के रासायनिक संयोजन में परिवर्तनों के कारण होने वाले ये उत्परिवर्तन प्रायः अप्रभावी होते हैं अन्यथा हानिकारक। सामान्यतः इनके घटित होने की दर भी बहुत कम होती है। इस प्रकार लाखों युग्मनजों (zygotes) में से किसी में ही उत्परिवर्तित जीन होता है। कुछ भी हो विकास के लिए आनुवंशिक परिवर्तन स्थापित करने में उत्परिवर्तनों तथा अन्य विभिन्नताओं का काफी महत्त्व होता है, क्योंकि विकासीय प्रक्रिया बहुत लम्बा समय लेती है।

2. देशान्तरण एवं जननिक पृथक्करण (Migration and Genetic Isolation) – अनेक जीव – जातियों में इनकी विभिन्न समष्टियों के बीच इनके सदस्यों का आवागमन होता रहता है। इसे देशान्तरण कहते हैं। इसी प्रकार जब कोई दो समष्टियाँ किसी भौगोलिक अवरोध के कारण अलग-अलग हो गयी हैं और पास-पास आने पर आपस में जनन कर सकती हैं, किन्तु यदि इनमें प्रजनन नहीं हो सकता तो इनको भिन्न-भिन्न जाति मान लिया जाता है। किसी समष्टि में अन्य समष्टियों से आये हुए सदस्य अर्थात् आप्रवासी (immigrants) किसी समष्टि को छोड़कर अन्य समष्टियों में चले जाने वाले सदस्य अर्थात् उत्प्रवासी (emigrants) समागम करके समष्टियों की जीनराशि में नवीन जीन्स ला सकते हैं, हटा सकते हैं अथवा युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियों को बदल सकते हैं।

3. जीनी अपवहन (Genetic Drift) – विभिन्न सदस्यों की प्रजनन दर की विभिन्नता के कारण, जीव जातियों की छोटी-छोटी समष्टियों पर हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन लागू नहीं होता है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सभी युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियों को समान रूप से प्रसारण होते रहना प्रायः असम्भव होता है। यह जीनी अपवहन है जिसमें कभी-कभी हानिकारक युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्ति इतनी बढ़ जाती है कि समष्टि के कई सदस्य समाप्त ही हो जाते हैं। इस प्रकार समष्टि और छोटी हो जाती है और इसमें आनुवंशिक विभिन्नताएँ भी बहुत कम रह जाती हैं। कभी-कभी महामारियों (epidemics), परभक्षण (predation) आदि के कारण भी छोटी समष्टियों में जीनी अपवहन हो सकता है।

4. असंयोगिक समागम (Non-Random Mating) – पेड़-पौधों की अनेक जातियों में स्वपरागण (self-pollination) द्वारा प्रजनन होना, मानवों की कुछ जनसंख्याओं में सजातीय विवाह आदि प्रकार के जनन के कारण समयुग्मजी (homozygous) जीनरूपों की संख्या बढ़ती जाती है तथा हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन भी नहीं रहता है।

5. जीवन संघर्ष तथा प्राकृतिक चयन (Struggle for Existance and Natural Selection) – किसी भी समष्टि में प्रत्येक जीव जीवित रहने के लिए भोजन, सुरक्षित स्थान, प्रजनन के लिए साथी की खोज आदि के लिए संघर्षरत रहता है। इसी में से अधिकतम अनुकूलित भिन्नता वाले जीव के चयन को डार्विन (Darwin) ने प्राकृतिक चयन अथवा योग्यतम की उत्तरजीविता (survival of fittest) बताया। इस प्रकार, प्राकृतिक चयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके कारण जीवों की समष्टियों में जीनरूपों तथा युग्मविकल्पी जीन्स, दोनों की ही आवृत्तियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते रहते हैं। इस प्रक्रिया में जिस सदस्य के कुल आनुवंशिक लक्षण अथवा जीन प्ररूप (genome) इसे तात्कालिक वातावरणीय दशाओं में, अनुकूलन (adaptation) की अधिक क्षमता प्रदान करते हैं, वह अन्य सदस्यों की तुलना में सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करता है। इससे स्पष्ट है कि प्राकृतिक चयन के कारण, समष्टियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अधिक लाभदायक लक्षणों के जीनरूपों एवं युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियाँ । अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं तथा कम लाभदायक लक्षणों के जीनरूपों और युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियाँ कम होती जाती हैं।

उपर्युक्त सभी प्रक्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से जीव जातियों की प्राकृतिक समष्टियों की जीनराशि में धीरे-धीरे जो परिवर्तन होते हैं, अति महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हीं से प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया समष्टि की अनुकूलन योग्य (adaptive) विकासीय दिशा (evolutionary direction) का मार्ग प्रशस्त करती है।

प्रश्न 5.
लैमार्कवाद व डार्विनवाद की तुलना रेखाचित्रों सहित कीजिए। (2017)
उत्तर
लैमार्कवाद वे डार्विनवाद की तुलना
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प्रश्न 6.
किस कल्प में तथा किन निकटतम पूवर्षों से आधुनिक मानव का विकास हुआ? (2016)
उत्तर
लगभग 40 मिलियन वर्ष पूर्व ड्रायोपिथिकस तथा 14 मिलियन वर्ष पूर्व रामापिथिकस नामक नरवानर विद्यमान थे। इन लोगों के शरीर बालों से भरपूर थे तथा ये गोरिल्ला एवं चिम्पैंजी जैसे चलते थे। रामापिथिकस मनुष्यों जैसे थे जबकि ड्रायोपिथिकस वनमानुष (ऐप) जैसे थे। इथोपिया तथा तंजानिया में कुछ जीवाश्म (फोसिल) अस्थियाँ मानवों जैसी प्राप्त हुई हैं। ये जीवाश्म मानवीय विशिष्टताएँ दर्शाते हैं जो इस विश्वास को आगे बढ़ाती हैं कि 3 – 4 मिलियन वर्ष पूर्व मानव जैसे नर वानर गण (प्राइमेट्स) पूर्वी-अफ्रीका में विचरण करते रहे थे।

लगभग 5 मिलियन वर्ष पूर्व ओस्ट्रालोपिथेसिन (आदिमानव) सम्भवतः पूर्वी अफ्रीका के घास स्थलों में रहता था। होमो इरैक्टस संभवतः मांस खाता था। निएण्डरथल मानव, 100,000 से 40,000 वर्ष पूर्व लगभग पूर्वी एवं मध्य एशियाई देशों में रहते थे। वे अपने शरीर की रक्षा के लिए खालों का इस्तेमाल करते थे और अपने मृतकों को जमीन में गाड़ते थे। होमो सेपियंस अफ्रीका में विकसित हुआ और धीरे-धीरे महाद्वीपों से पार पहुँचा तथा विभिन्न महाद्वीपों में फैला, इसके बाद वह भिन्न जातियों में विकसित हुआ। 75,000 से 10,000 वर्ष के दौरान हिमयुग में यह आधुनिक युगीन मानव पैदा हुआ। मानव द्वारा प्रागैतिहासिक गुफा-चित्रों की रचना लगभग 18,000 वर्ष पूर्व हुई। कृषि कार्य लगभग 10,000 वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ और मानव बस्तियाँ बनना शुरू हुईं। बाकी जो कुछ हुआ वह मानव इतिहास या वृद्धि का भाग और सभ्यता की प्रगति का हिस्सा है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption (पाचन एवं अवशोषण)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्न में से सही उत्तर छाँटें
(क)
आमाशय रेस में होता है

(a) पेप्सिन, लाइपेज और रेनिन
(b) ट्रिप्सिन, लाइपेज और रेनिन
(c) ट्रिप्सिन, पेप्सिन और लाइपेज
(d) ट्रिप्सिन, पेप्सिन और रेनिन

(ख)
सक्कस एंटेरिकस नाम दिया गया है

(a) क्षुद्रांत्र (ileum) और बड़ी आँत के संधि स्थल के लिए
(b) आंत्रिक रस के लिए
(c) आहारनाल में सूजन के लिए
(d) परिशेषिका (appendix) के लिए
उत्तर :
(क) (a)
(ख) (b)

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
स्तम्भ I का स्तम्भ II से मिलान कीजिए

स्तम्भ I – स्तम्भ II
(a) बिलिरुबिन व बिलिवर्डिन –     (i) पैरोटिड
(b) मंड (स्टार्च) का जल अपघटन  – (ii) पित्त
(e) वसा का पाचन  – (iii) लाइपेज
(d) लार ग्रन्थि –  (iv) एमाइलेज
उत्तर :
(a) (ii)
(b) (iv)
(C) (iii)
(d) (i)

प्रश्न 3.
संक्षेप में उत्तर दें

(क)
अंकुर (villi) छोटी आँत में होते हैं, आमाशय में क्यों नहीं?
उत्तर :
क्योंकि अंकुरों में रक्त केशिकाएँ होती हैं तथा एक बड़ी लसीका वाहिनी (UPBoardSolutions.com) लेक्टिअल होती है। अवशोषण की क्रिया आँत में ही होती है।

(ख)
पेप्सिनोजन अपने सक्रिय रूप में कैसे परिवर्तित होता है?
उत्तर :
पेप्सिनोजन एक प्रोएन्जाइम है जो HCl के साथ क्रिया करके सक्रिय पेप्सिन में परिवर्तित होता है।

(ग)
आहारनाल की दीवार के मूल स्तर क्या हैं?
उत्तर :
आहारनाल की भित्ति में निम्न स्तर होते हैं
(a) सीरोसा
(b) मस्कुलेरिस
(C) सबम्यूकोसा
(d) म्यूकोसा

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(घ)
वसा के पाचन में पित्त कैसे मदद करता है?

उत्तर :
पित्त वसा को इमल्सीकरण कर देता है। यह लाइपेज को सक्रिय करता है जो वसा का पाचन पित्त की सहायता से करता है वसा डाइ तथा मोनोग्लिसेराइड में टूटता है।

प्रश्न 4.
प्रोटीन के पाचन में अग्न्याशयी रस की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. प्रोटीन के पाचन में अग्न्याशयी रस की भूमिका अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice) :
यह क्षारीय होता है। इसमें लगभग 98% पानी, शेष लवण तथा अनेक प्रकार के एन्जाइम्स पाए जाते हैं। इसका pH मान 75-83 होता है। इसे पूर्ण पाचक रूप कहते हैं; क्योंकि इसमें कार्बोहाइड्रेट, वसा तथा प्रोटीन को पचाने वाले एन्जाइम्स पाए जाते हैं। प्रोटीन पाचक एन्जाइम्स निम्नलिखित होते हैं

2. ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन (Trypsin and Chymotrypsin) :
ये निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन तथा काइमोट्रिप्सिनोजन के रूप में स्रावित होते हैं। ये आन्त्रीय रस एवं एण्टेरोकाइनेज एन्जाइम के कारण सक्रिय अवस्था में बदल जाते हैं। ये प्रोटीन का पाचन करके मध्यक्रम की प्रोटीन्स तथा ऐमीनो अम्ल बनाते हैं। एण्टेरोकाइनेज ट्रिप्सिनोजन
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प्रश्न 5.
आमाशय में प्रोटीन के पाचन की क्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
आमाशय में प्रोटीन का पाचन आमाशय की जठर ग्रन्थियों से जठर रस स्रावित होता है। यह अम्लीय (pH 0.9-3.5) होता है। इसमें 99% जल, 0:5% HCl तथा शेष एन्जाइम्स होते हैं। इसमें प्रोपेप्सिन, प्रोरेनिन तथा गैस्ट्रिक लाइपेज एन्जाइम होते हैं। प्रोपेप्सिन तथा प्रोरेनिन (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम HCl की उपस्थिति में सक्रिय पेप्सिन (pepsin) तथा रेनिन (rennin) में बदल जाते हैं। ये प्रोटीन तथा केसीन (दूध प्रोटीन) का पाचन करते हैं।

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प्रश्न 6.
मनुष्य का दंत सूत्र बताइए।

उत्तर :
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प्रश्न 7.
पित्त रस में कोई पाचक एन्जाइम नहीं होते, फिर भी यह पाचन के लिए महत्त्वपूर्ण है; क्यों?
उत्तर :
पित्त (Bile) :
पित्त का स्रावण यकृत से होता है। इसमें कोई एन्जाइम नहीं होता। इसमें अकार्बनिक तथा कार्बनिक लवण, पित्त वर्णक, कोलेस्टेरॉल, लेसीथिन आदि होते हैं।

  1. यह आमाशय से आई अम्लीय लुगदी (chyme) को पतली क्षारीय काइल (chyle) में बदलता है जिससे अग्न्याशयी एन्जाइम भोजन का पाचन कर सकें।
  2. यह वसा का इमल्सीकरण (emulsification) करता है। इमल्सीकृत वसा का लाइपेज एन्जाइम द्वारा सुगमता से पाचन हो जाता है।
  3. कार्बनिक लवण वसा के पाचन में सहायता करते हैं।
  4. हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके भोजन को सड़ने से बचाता है।

प्रश्न 8.
पाचन में काइमोट्रिप्सिन की भूमिका वर्णित करें। जिस ग्रन्थि से यह स्रावित होता है, इसी श्रेणी के दो अन्य एंजाइम कौन-से हैं?
उत्तर :
काइमोट्रिप्सिन (Chymotrypsin) :
अग्न्याशय से स्रावित प्रोटीन पाचक एन्जाइम है। यह निष्क्रिय अवस्था काइमोट्रिप्सिनोजन (chymotrypsinogen) के रूप में स्रावित होता है। यह आन्त्रीय रस में उपस्थित एण्टेरोकाइनेज (enterokinase) एन्जाइम की उपस्थिति में सक्रिय काइमोट्रिप्सिन में बदलता है। यह प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड तथा पेप्टोन (polypeptides and peptones) में बदलता है।

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अग्न्याशय से स्रावित अन्य प्रोटीन पाचक एन्जाइम निम्नलिखित हैं

  1. ट्रिप्सिनोजन (Trypsinogen)
  2. कार्बोक्सिपेप्टिडेज (Carboxypeptidase)

प्रश्न 9.
पॉलीसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड का पाचन कैसे होता है?
उत्तर :

पॉली तथा डाइसैकेराइड्स का पाचन

कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन मुखगुहा से ही प्रारम्भ हो जाता है। भोजन में लार मिलती है। लार का pH मान 6.8 (UPBoardSolutions.com) होता है। यह भोजन को चिकना तथा निगलने योग्य बनाती है। लार में टायलिन (ptyalin) एन्जाइम होता है। यह स्टार्च (पॉलीसैकेराइड) को डाइसैकेराइड (माल्टीस) में बदलता है।
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आमाशय में कार्बोहाइड्रेट का पाचन नहीं होता। अग्न्याशय रस में ऐमाइलेज (amylase) एन्जाइम होता है। यह स्टार्च या पॉलीसैकेराइड्स को डाइसैकेराइड्स में बदलता है।
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क्षुदान्त्र (छोटी आँत) में आंत्रीय रस में पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम्स के निम्नलिखित प्रकार इसके पाचन में सहायक होते हैंUP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 7
(माल्टोस, लैक्टोस तथा सुक्रोस डाइसैकेराइड्स हैं।)

प्रश्न 10.
यदि आमाशय में HCl का स्राव नहीं होगा तो क्या होगा?
उत्तर :
यदि आमाशय में HCl का स्राव नहीं होगा तो पेप्सिनोजन सक्रिय पेप्सिन में परिवर्तित नहीं होगा तथा पेप्सिन को कार्य करने के लिए अम्लीय माध्यम नहीं मिलेगा। HCl भोज्य पदार्थों के रेशेदार पदार्थों को गलाता है वे जीवाणु आदि को भी मारता है।

प्रश्न 11.
आपके द्वारा खाए गए मक्खन का पाचन और उसका शरीर में अवशोषण कैसे होता है? विस्तार से वर्णन करें।
उतर :
मक्खन वसा है और इसका पाचन ड्यूडिनमे में पित्तरस की सहायता से होता है। वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल अघुलनशील होते हैं अतः रक्त में अवशोषित नहीं किए जा सकते हैं। ये आंत्रीय म्यूकोसा में छोटी गुलिकाओं के रूप में जाते हैं। उसके पश्चात् उस पर प्रोटीन कवच चढ़ जाता है और इन गुलिकाओं को काइलोमाइक्रस (chylomicrous) कहते हैं। इनका संवहन रसांकुर में उपस्थित लिम्फ वाहिका (lacteal) में होता है। लिम्फ वाहिकाओं से ये रक्त द्वारा अवशोषित हो जाता है।

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प्रश्न 12.
आहारनाल के विभिन्न भागों में प्रोटीन के पाचन के मुख्य चरणों का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर :
सर्वप्रथम प्रोटीन का पाचन आमाशय में दो प्रोटियोलिटिक विकरों के द्वारा होता है

(i) पेप्सिन :
आमाशय द्वारा स्रावित

(ii) ट्रिप्सिन :
अग्न्याशय द्वारा स्रावित।

(i) आमाशय में प्रोटीन का पाचन :
पेप्सिन अम्लीय माध्यम (pH 1.8) में सक्रिय होता है। रेनिन केवल छोटे बच्चों के आमाशय में दूध से प्रोटीन को पचाने के लिए मिलता है।

(ii) दांत्र में प्रोटीन का पाचन :
अग्न्याशय रस में ट्रिप्सिनोजन मिलता है जो एन्टेरोकाइनेज के द्वारा सक्रिय ट्रिप्सिन में परिवर्तित होता है। ट्रिप्सिन क्षारीय माध्यम में सक्रिय होता है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 8

प्रश्न 13.
गर्तदंती (thecodont) तथा द्विबारदंती (diphyodont) शब्दों की व्याख्या करें।

उत्तर :
जबड़े के गड्ढे में धंसे दाँत को गर्तदंती (thecodont) कहते हैं। द्विबारदंती का अर्थ है दाँत का दो बार आनाप्रथम दाँत अस्थाई होते हैं इन्हें क्षीर दंत भी कहते हैं। जो 14 वर्ष की अवस्था तक टूट जाते हैं। इनके स्थान पर दूसरी बार स्थाई दाँत आते हैं।

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प्रश्न 14.
विभिन्न प्रकार के दाँतों के नाम और एक वयस्क मनुष्य में दाँतों की संख्या बताइए।
उत्तर :
वयस्क मनुष्य में 32 दाँत होते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं

  1. कुंतक (Incisor)—इनकी संख्या 2 होती है।
  2. रदनक (Canine)-इनकी संख्या 1 होती है।
  3.  अग्र चवर्णक (Premolar)–इनकी संख्या 2 होती है।
  4. चवर्णक (Molar)-इनकी संख्या 3 होती है। इस प्रकार एक जबड़े में 16 दाँत होते हैं और इस प्रकार मुख में 32 दाँत होते हैं

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प्रश्न 15.
यकृत के क्या कार्य हैं?
उत्तर :

यकृत के कार्य

यकृत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यकृत से पित्त रस स्रावित होता है। इसमें अकार्बनिक तथा कार्बनिक लवण; जैसे—सोडियम क्लोराइड, सोडियम बाइकार्बोनेट, सोडियम ग्लाइकोकोलेट, सोडियम टॉरोकोलेट आदि पाये जाते हैं। ये कोलेस्टेरॉल (cholesterol) को घुलनशील बनाए रखते हैं।
  2. पित्तरस में हीमोग्लोबिन (haemoglobin) के विखण्डन से बने पित्त वर्णक (bile pigments) पाए जाते हैं; जैसे—बिलिरुबिन (bilirubin) तथा बिलिवर्डन (biliverdin)। यकृत कोशिकाएँ रुधिर से जब बिलिरुबिन को ग्रहण नहीं कर पातीं तो यह शरीर में एकत्र होने लगता (UPBoardSolutions.com) है इससे पीलिया (jaundice) रोग हो जाता है।
  3. पित्त रस आन्त्रीय क्रमाकुंचन गतियों को बढ़ाता है ताकि पाचक रस काइम में भली प्रकार मिल जाए।
  4. पित्त रस काइम के अम्लीय प्रभाव को समाप्त करके काइल (chyle) को क्षारीय बनाता है। जिससे अग्न्याशयी तथा आन्त्रीय रसों की भोजन पर प्रतिक्रिया हो सके।
  5. पित्त लवण काइम के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके काइम को सड़ने से बचाते हैं।
  6. पित्त रस के कार्बनिक लवण वसाओं के धरातल तनाव (surface tension) को कम करके : इन्हें सूक्ष्म बिन्दुकों में तोड़ देते हैं। ये जल के साथ मिलकर इमल्सन या पायस बना लेते हैं। इस क्रिया को इमल्सीकरण (emulsification) कहते हैं।
  7. पित्त लवणों के कारण वसा पाचक एन्जाइम सक्रिय होते हैं।
  8. वसा में घुलनशील विटामिनों (A, D, E एवं K) के अवशोषण के लिए पित्त लवण आवश्यक | होते हैं।
  9. पित्त के द्वारा विषाक्त पदार्थ, अनावश्यक कोलेस्टेरॉल आदि का परित्याग किया जाता है।
  10. यकृत में विषैले पदार्थों का विषहरण (detoxification) होता है।
  11. यकृत में मृत लाल रुधिराणुओं का विघटन होता है।
  12. यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है।
  13. यकृत कोशिकाएँ हिपैरिन (heparin) का स्रावण करती हैं। यह रक्त वाहिनियों में रक्त का थक्का बनने से रोकता है।
  14. यकृत में प्लाज्मा प्रोटीन्स; जैसे-ऐल्बुमिन, ग्लोबुलिन, प्रोथॉम्बिन, फाइब्रिनोजन आदि का संश्लेषण होता है। फाइब्रिनोजन (fibrinogen) रक्त का थक्का बनने में सहायक होता है।
  15. यकृत आवश्यकता से अधिक ग्लूकोस को ग्लाइकोजन में बदल करें संचित करता है।
  16. आवश्यकता पड़ने पर यकृत प्रोटीन्स व वसा से ग्लूकोस का निर्माण करता है।
  17. यकृत कोशिकाएँ विटामिन A, D, लौह, ताँबा आदि का संचय करती हैं। 18. यकृत की कुफ्फर कोशिकाएँ जीवाणु तथा हानिकारक पदार्थों का भक्षण करके शरीर की सुरक्षा करती हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आमाशय की दीवार का पेशीय संकुचन कहलाता है।
(क) पाचन
(ख) संवहन
(ग) क्रमाकुंचन
(घ) मंथन
उत्तर :
(ग) क्रमाकुंचन

प्रश्न 2.
वयस्क मनुष्य का दन्त सूत्र होता है।
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उत्तर :
(क)
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प्रश्न 3.
मनुष्य में प्रोटीन का पाचन कहाँ से प्रारम्भ होता है?
(क) मुखगुहा
(ख) आमाशय
(ग) ग्रासनली
(घ) आँत
उत्तर :
(ख) आमाशय

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प्रश्न 4.
मानव में विटामिन-C की कमी से कौन-सा रोग उत्पन्न हो जाता है ?
(क) सूखा रोग
(ख) स्कर्वी
(ग) बेरी-बेरी
(घ) रतौंधी
उत्तर :
(ख) स्कर्वी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
ऐसे पोषक पदार्थ जो शारीरिक ऊतकों द्वारा संश्लेषित होकर जैविक ऑक्सीकरण कै फलस्वरूप ऊर्जा प्रदान करते हैं और जीवद्रव्य संश्लेषण का कार्य करते हैं, भोजन कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
मनुष्य के लिए आवश्यक पोषक पदार्थों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनुष्य के लिए आवश्यक पोषक पदार्थ इस प्रकार हैं

  1. कार्बोहाइड्रेट्स
  2. वसा
  3. प्रोटीन तथा
  4. खनिज लवण

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प्रश्न 3.
दो आवश्यक वसा अम्लों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. α – लिनोलेनिक अम्ल (ओमेगा-3 वसीय अम्ल) तथा
  2.  लिनोलिक अम्ल (ओमेगा-6 वसीय अम्ल)

प्रश्न 4.
शाकाहारी भोजन में प्रोटीन देने वाले दो पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर :
शाकाहारी भोजन में दूध एवं दालें प्रोटीन देने (UPBoardSolutions.com) वाले दो प्रमुख पदार्थ हैं।

प्रश्न 5.
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा किस रूप में उपस्थित होती है ?
उत्तर :
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा लैक्टोस के रूप में उपस्थित होती है।

प्रश्न 6.
जन्तु शरीर में जल की क्या उपयोगिता है?
उत्तर :
जल शरीर में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए माध्यम प्रदान करता है।

प्रश्न 7.
होलोफाइटिक एवं होलोजोइक पोषण में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वह पोषण जिसके अन्तर्गत जीव वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया, नाइट्रेट्स, जल, लवण आदि अकार्बनिक पदार्थ लेकर कार्बनिक पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, वसा आदि) को स्वयं संश्लेषण करते हैं, होलोफाइटिक पोषण कहलाता है। उदाहरणार्थ-नीले-हरे शैवाल, हरे प्रोटिस्टा ( यूग्लीना) इत्यादि। वह पोषण जिसके अन्तर्गत जीव बिना पचे हुए ठोस या तरल भोजन का अन्तर्ग्रहण करते हैं, होलोजोइक पोषण कहलाता है। उदाहरणार्थ-कीटाहारी जन्तु तथा रुधिराहारी जन्तु।

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प्रश्न 8.
शाकाहारी जीवों में कौन-सा दन्त अनुपस्थित होता है?
उत्तर :
रदनक (चीरने-फाड़ने वाले) दन्त।

प्रश्न 9.
टायलिन (Ptyalin) क्या है? यह किस माध्यम में सक्रिय होता है?
उत्तर :
टायलिन (Ptyalin) एक एन्जाइम है जो मुँह में पाई जाने वाली लार (saliva) में होता है। तथा मुखगुहा के क्षारीय माध्यम में सक्रिय होता है। यह मण्ड (starch) को पचाता है।
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प्रश्न 10.
एमाइलेज तथा लाइपेज में अन्तर बताइए।
उत्तर :
एमाइलेज कार्बोहाइड्रेट्स को तथा लाइपेज वसा का पाचन करता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य में प्रोटीन तथा वसा को पचाने वाले एन्जाइमों के नाम लिखिए
उत्तर :

  1. प्रोटीन पाचक विकर – पेप्सिन, रेनिन, ट्रिप्सिन, इरेप्सिन।
  2. वसा पाचक विकर  – लाइपेज।

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प्रश्न 12.
पेप्सिन क्या है? यह किस माध्यम में सक्रिय होता है? इसका कार्य बताइए।
उत्तर :
पेप्सिन प्रोटीन पाचक विकर है। यह प्रोटीन को प्रोटिओजेज तथा पेप्टोन्स में बदलता है। यह अम्लीय माध्यम में सक्रिय होता है।

प्रश्न 13.
प्रोटीन क्या हैं? इसका पाचन कैसे होता है?
उत्तर :
प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं। प्रोटीन का पाचन पेप्सिन, रेनिन, ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन तथा इरेप्सिन द्वारा होता है। प्रोटीन्स पाचन के पश्चात अमीनो अम्ल बनाती हैं।

प्रश्न 14.
आहारनाल के किस भाग में रसांकुर पाये जाते हैं? इनका क्या कार्य है?
उत्तर :
रसांकुर क्षुद्रान्त्र भाग में पाये जाते हैं। ये पचे हुए भोजन का अवशोषण करते हैं।

प्रश्न 15.
यदि किसी मनुष्य की जठर ग्रन्थियाँ निष्क्रिय हो जाये तो उसकी पाचन क्रिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर :
जठर ग्रन्थियों से जठर रस स्रावित होता है। इसमें पेप्सिन, लाइपेज तथा रेनिन (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम होते हैं। ये क्रमशः प्रोटीन, वसा तथा दूध की केसीन प्रोटीन का पाचन करते हैं। जठर ग्रन्थियों के निष्क्रिय होने से इनका पाचन प्रभावित हो जायेगा।

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प्रश्न 16.
किस विटामिन की कमी से मनुष्य में चर्मदाह (pellagra) रोग एवं रिकेट्स (rickets) रोग होता है? इन रोगों के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर :

(i) चर्मदाह (Pellagra) रोग विटामिन B5 (PP) :
निकोटिनिक अम्ल (C6H5NO2 ) की कमी से होता है। जीभ तथा त्वचा में पपड़ियाँ फड़ना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

(ii) रिकेट्स (Rickets) रोग विटामिन ‘D’ :
कैल्सीफेरॉल (C28 H44O) की कमी से होता है। हड्डियों एवं दाँतों का कमजोर हो जाना व टेढ़ा-मेढ़ा हो जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

प्रश्न 17.
विटामिन ‘ए’ तथा विटामिन ‘के’ की कमी से कौन-सा रोग होता है? या मनुष्य में विटामिन ए’ की अल्पता से होने वाली चार व्याधियों का उल्लेख कीजिए। इसके दो प्रमुख स्रोत लिखिए।
उत्तर :
विटामिन ‘ए’ की कमी से रतौंधी, जीरोफ्थैल्मिया; वृक्क संक्रमण, मन्दित वृद्धि, डर्मेटोसिस तथा विटामिन ‘के’ की कमी से रक्त का थक्का नहीं बनता है। अण्डा, घी, मछली, यकृत, गाजर तथा हरी सब्जियाँ विटामिन ‘ए’ के प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 18.
विटामिन ‘सी’ व विटामिन डी की कमी से कौन-सा रोग होता है। इनके स्रोत भी बताइए।
उत्तर :
विटामिन ‘सी’ की कमी से स्कर्वी तथा विटामिन डी की कमी से सूखा रोग हो जाता है। विटामिन ‘डी’ का स्रोत मक्खन, दूध, मछली, सूर्य का प्रकाश है। विटामिन ‘सी’ का प्रमुख स्रोत ताजे खट्टे फल होते हैं।

प्रश्न 19.
किस तत्त्व की कमी से कमजोर बच्चों के पैर टेढ़े हो जाते हैं ?
उत्तर :
विटामिन डी की कमी से कमजोर बच्चों के पैर टेढ़े हो जाते हैं।

प्रश्न 20.
किस विटामिन को धूप विटामिन कहते हैं?
उत्तर :
विटामिन ‘डी’ को।

प्रश्न 21.
कब्ज एवं अपच में अन्तर कीजिए।
उत्तर :
कब्ज में मलाशय में मल रुक जाता है। आँत द्वारा सारे जल का अवशोषण होने से मल अत्यन्त कठोर हो जाता है। आँत की गतिशीलता भी अनियमित हो जाती है, जबकि अपच में भोजन का पूर्ण पाचन नहीं हो पाता है। पेट भरा-सा लगता है। यह विकर स्रावण में कमी, (UPBoardSolutions.com) व्याग्रता, खाद्य विषाक्तता, अधिकता में भोजन करना तथा अत्यन्त मसालेयुक्त व खट्टा भोजन करने आदि से होता है।

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प्रश्न 22.
प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण से आप क्या समझते हैं? मलबन्ध या कब्ज का कारण बताइए। या मनुष्य में प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के कारण होने वाले दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर :
यदि हम अपने भोजन में प्रोटीनयुक्त भोजन नहीं लेते हैं तो हमारे शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाती है। इस स्थिति को ही प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण कहते हैं। क्वाशिओरकर, मैरेस्मसे आदि रोग इसी कारण से होते हैं। रेशेयुक्त भोजन का प्रयोग न करना मलबन्ध या कब्ज को प्रमुख कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जन्तुओं के लिए पोषक तत्त्व क्यों आवश्यक हैं? दो पोषक तत्वों के नाम लिखिए।
उत्तर :
मनुष्य के शरीर में निरन्तर विभिन्न प्रकार की जैविक क्रियाएँ; जैसे—श्वसन, उत्सर्जन, गमन आदि होती रहती हैं। उन क्रियाओं के सम्पादन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा पोषक पदार्थों से प्राप्त होती है। जीव इन पोषक पदार्थों को बाह्य वातावरण से ग्रहण करता है। शरीर में इन पोषक पदार्थों का पाचन होता है। अवशोषित पदार्थों का श्वसन में ऑक्सीकरण तथा अवशोषण होता है, जिससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। दो पोषक तत्व

  1. कार्बोहाइड्रेट्स
  2. प्रोटीन

प्रश्न 2.
संतुलित आहार का वर्णन कीजिए तथा भोजन की ऊष्मीय गुणवत्ता का महत्त्व बताइए। या संतुलित आहार क्या है ?
उत्तर :

1. संतुलित आहार 
अपनी पोषण क्रिया (nutrition) में हम अपने भोजन से उन पोषक पदार्थों (nutrients) को पचाकर प्राप्त करते रहते हैं जो शरीर की कोशिकाओं के उपापचय (metabolism) में मिरन्तर खपते रहते हैं। अत: हमारे शरीर की वृद्धि, स्वास्थ्य, क्रियाशीलता, उद्यमशीलता, आयु आदि लक्षण हमारे आहार की गुणवत्ता (quality) तथा मात्रा (quantity) पर निर्भर करते हैं। स्पष्ट है कि हमारे आहार में विभिन्न प्रकार के सभी पोषक पदार्थ ऐसे अनुपात में होने चाहिए कि जिससे हमारे शंरीर की सारी विभिन्न आवश्यकताओं की निरन्तर पूर्ति होती रहे। ऐसे ही आहार को सन्तुलित आहार (balanced diet) कहते हैं।

2. भोजन की ऊष्मीय गुणवत्ता 
भोजन की उपापचयी उपयोगिता को ऊष्मीय ऊर्जा की इकाइयों (units) में व्यक्त किया जाता है जिन्हें ऊष्मांक (calories) कहते हैं। एक छोटा ऊष्मांक तापीय ऊर्जा (heat energy) की वह मात्रा होती है जो एक ग्राम जल के ताप को 1°C बढ़ा देती है। 1000 छोटे ऊष्मांकों (UPBoardSolutions.com) का एक बड़ा ऊष्मांक अर्थात् किलो ऊष्मांक होता है। इसमें इतनी तापीय ऊर्जा होती है जो एक किलोग्राम जल के ताप को 1°C बढ़ा देती है। शरीर को जीवित दशा में बनाए रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा हमें तीन श्रेणियों के दीर्घपोषक पदार्थों-कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन्स तथा वसाओं के ऑक्सीकर विखण्डन अर्थात् उपापचयी जारण (अपचय) से प्राप्त होती है। एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट या प्रोटीन के उपापचयी जारण से 4 किलोकैलोरी तथा एक ग्राम वसा के जारण से 9.3 किलोकैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है।

प्रश्न 3.
विष्ठा भोजिता से क्या तात्पर्य है? किसी विष्ठा भोजी स्तनिक का वैज्ञानिक नाम बताइए।
उत्तर :
कुछ जीव अपने द्वारा त्यागे गये मल को पुन: सेवन करते हैं। पोषण की इस विधि को विष्ठा भोजिता कहते हैं।

उदाहरण
(i) खरगोश :
ऑरिक्टोलेगस क्यूनिकुलस।

प्रश्न 4.
दन्तावकाश क्या है? एक वयस्क मानव के दाँत का फॉर्मूला लिखिए। या दन्त विन्यास को परिभाषित कीजिए। मनुष्य में किसप्रकार का दन्त विन्यास पाया जाता है? वयस्क मनुष्य का दन्त सूत्र लिखिए। बुद्धि दन्त किसे कहते हैं?
उत्तर :
1. दन्तावकाश :
अनेक शाकाहारी प्राणियों में रदनक (canines) नहीं पाये जाते हैं। इनके रिक्त स्थान को दन्तावकाश कहते हैं।

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2. दन्त विन्यास :
मुख गुहिका में दाँतों के व्यवस्थित होने के क्रम को दन्त विन्यास कहते हैं। मानव का दन्त विन्यास गोल परवलयाकार के रूप में होता है। तृतीय चर्वणकों को बुद्धि दन्त कहते हैं।
वयस्क मानव का दन्त सूत्र :
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 12
(i = कृन्तक, c = रदनक, pm = प्रचर्वणक, m = चर्वणक)

प्रश्न 5.
पित्तरस शरीर के किस अंग में बनता है? पाचन में इसकी क्या भूमिका है?
उत्तर :
पित्तरस (Bile juice) :
इसका निर्माण यकृत में होता है। यह पित्ताशय में एकत्र होता रहता है और आवश्यकतानुसार सामान्य पित्तवाहिनी द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है। यह भोजन के माध्यम को। क्षारीय बनाता है। भोजन की लुगदी (chyme) को पतला (chyle) करता है तथा वसा की। इमल्सीकरण करता है जिससे वसा (UPBoardSolutions.com) का पाचन सुगमता से हो जाता है।

प्रश्न 6.
पानी में घुलनशील विटामिन्स के नाम एवं कार्य लिखिए। या जल में घुलनशील विटामिन्स के नाम लिखिए तथा इनकी प्राप्ति के मुख्य स्रोत एवं इनकी कमी से होने वाले विभिन्न रोग/व्याधियों का वर्णन कीजिए। यो संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-विटामिन्स की कमी से होने वाले रोग।
उत्तर :
जल में घुलनशील विटामिन्स के प्रकार, मुख्य स्रोत,
कार्य एवं उनके अभाव में होने वाले रोग
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प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ की कमी से रतौंधी किस प्रकार उत्पन्न होती है?
उत्तर :
विटामिन ‘ए’ का प्रमुख कार्य हमारी आँखों में उपस्थित दृष्टि-रंगाओं का संश्लेषण करना होता है जिसके कारण हम कम रोशनी या रात में देख सकते हैं। इसके विपरीत विटामिन ‘ए’ की कमी म दृष्ट-२ गाओं का संश्लेषण नहीं हो पाता तथा हमें कम रोशनी या रात में स्पष्ट दिखाई देना बन्द हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) इसी रोग को रतौंधी कहा जाता है।

प्रश्न 8.
किन विटामिनों की कमी से निम्न रोग होते हैं? इनके स्रोत बताइए।
(क) स्कर्वी रोग
(ख) रतौंधी
(ग) पेलाग्रा
(घ) घेघा
(ङ) सूखा रोग
उत्तर :
(क)
स्कर्वी रोग :
यह रोग विटामिन ‘C’ की कमी से होता है। टमाटर, नींबू, सन्तरा, मुसम्मी, ताजे खट्टे फल इसके मुख्य स्रोत हैं।

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(ख)
रतौंधी :
यह रोग विटामिन ‘A’ (retinol) की कमी से होता है। इसके मुख्य स्रोत दूध, मक्खन, अण्डा, यकृत, मछली का तेल, गाजर आदि हैं।

(ग)
पेलाग्रा :
यह रोग विटामिन ‘B,’ की कमी से होता है। इसके मुख्य स्रोत मांस, यकृत, अण्डा, मछली, दूध, मेवा, मटर आदि फलियाँ होती हैं।

(घ)
घेघा :
यह रोग आयोडीन की कमी से होता है। आयोडीन युक्त नमक आयोडीन का प्रमुख स्रोत है।

(ङ)
सूखा रोग :
यह विटामिन डी की कमी के कारण होता है। त्वचा धूप में इसका संश्लेषण स्वयं कर लेती है। मछली का तेल, मक्खन, घी, आदि इसके अन्य स्रोत हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पोषण क्या है? पाचन और पोषण में क्या अन्तर है? मनुष्य के पाचन तन्त्र का एक नामांकित चित्र बनाइए। या पाचन क्या है? मनुष्य की आहारनाल का सचित्र वर्णन कीजिए। या पाचन क्या है? पाचन व पोषण में विभेद कीजिए।
उत्तर :

पोषण

सभी जीवों को जीवित रहने तथा शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को करने के लिए। ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा भोजन से प्राप्त होती है। विभिन्न प्रकार के जीव भोजन लेने के लिए विभिन्न विधियाँ अपनाते हैं। भोजन ग्रहण करने से लेकर, पाचन, अवशोषण, कोशिकाओं तक पहुँचाने, कोशिका में उसके ऊर्जा उत्पादन में प्रयोग करने अथवा जीवद्रव्य में स्वांगीकृत करने तथा भविष्य के लिए उसे शरीर में संगृहीत करने तक की सभी क्रियाओं का सम्मिलित नाम पोषण है। इस प्रकार पोषण जटिल क्रियाओं का नाम है तथा यह अनेक पदों या चरणों में पूरी होती है।

पाचन

भोर्जीन के जटिल एवं अविलेय पदार्थों को शरीर में उनके कार्यों को सम्पादित करने के लिए अवशोषित नहीं किया जा सकता है। पहले इनको सरल एवं विलेय पदार्थों में बदलने की आवश्यकता होती है। तथा यह कार्य अनेक भौतिक एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा किया जाता है। ये सभी क्रियाएँ सम्मिलित रूप से पाचन (digestion) कहलाती हैं अर्थात् भोजन को अवशोषण योग्य अवस्था में परिवर्तित करने की क्रिया पाचन कहलाती है, जो एक जटिल (UPBoardSolutions.com) जैविक क्रियाओं का सम्मिलित नाम है और जिसमें कई भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाएँ भाग लेती हैं। भौतिक क्रियाओं में भोज्य पदार्थ ग्रहण करना, इन्हें चबाकर निगलने योग्य बनाना तथा आहारनाल में इन्हें गति प्रदान करना आदि प्रमुख यान्त्रिक क्रियाएँ होती हैं, जबकि पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, वसाओं एवं प्रोटीन्स आदि) के जटिल अणुओं को जल अपघटन (hydrolysis) द्वारा उनके सरल एवं विलेय मोनोमर्स (monomers) में विखण्डित करना अति महत्त्वपूर्ण रासायनिक प्रक्रियाएँ हैं। पाचन की विभिन्न रासायनिक क्रियाएँ मुख्यतः एन्जाइम्स (enzymes) द्वारा नियन्त्रित होती हैं। मनुष्य में पाचन क्रिया एक नली में सम्पन्न होती है जिसे आहारनाल (alimentary canal) कहते हैं। आहारनाल से सम्बद्ध विभिन्न पाचक ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं जो विभिन्न प्रकार के एन्जाइमों का स्रावण करती हैं।

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पाचन एवं पोषण में अन्तर

सभी जीवों को विभिन्न कार्यों को करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा शरीर के अन्दर कोशिकाओं में भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। दूसरी ओर जीवद्रव्य की वृद्धि करने तथा उसे बनाये रखने के लिए अलग-अलग प्रकार से भोजन करके कोशिकाओं तक पहुँचाना, उसे स्वांगीकृत करना या आवश्यकता के लिए संगृहीत करना आदि का सम्मिलित नाम पोषण (nutrition) है। पोषण अत्यधिक जटिल प्रक्रिया है। पाचन पोषण के लिए भोजन पर की गई एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसमें अघुलनशील (जल में) भोज्य पदार्थों को घुलनशील अवस्था में बदलकर उन्हें अवशोषण (absorption) के योग्य बनाया जाता है, जिससे वे रुधिर में मिलकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुँच जाएँ।

मनुष्य का पाचन तन्त्र (आहारनाल)

मनुष्य तथा स्तनियों में कशेरुकी जन्तुओं की अपेक्षा पाचन तन्त्र (digestive system) विशेषकर, इसकी आहारनाल (alimentary canal) अधिक लम्बी तथा जटिल प्रणाली होती है।

मनुष्य की आहारनाल
भोजन को पचाने, तत्त्वों को अवशोषित करने आदि के लिए एक लम्बी, लगभग 8-9 मीटर लम्बी, नली जैसी संरचना होती है जो मुखद्वार (mouth) से मलद्वार (anus) तक फैली रहती है। इस नली को पाचन प्रणाली या आहारनाल (digestive tract or alimentary canal) कहते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों पर आहारनाल का व्यास भिन्न-भिन्न होता है। इसको निम्नलिखित पाँच भागों में बाँटा जाता है

1. मुख व मुखगुहा (Mouth and buccal cavity) :
दो चल होठों (ओष्ठों = lips) से घिरा हुआ मुखद्वार (mouth), मुखगुहा (buccal cavity) में खुलता है। मुखगुहा दोनों जबड़ों तक, गालों से घिरी चौड़ी गुहा है जिसमें ऊपरी जबड़ा खोपड़ी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ तथा अचल होता है। निचला जबड़ा पाश्र्व-पश्च भाग में ऊपरी जबड़े के साथ सन्धित तथा चल होता है। मुखगुहा की छत, तालू (palate) कहलाती है। तालू का अगला तथा अधिकांश भाग कठोर होता है तथा कठोर तालू (hard palate) कहलाता है। इसके पीछे कंकालरहित कोमल तालू (soft palate) होता है, जो अन्त में एक कोमल लटकन के रूप में होता है। इसे काग (uvula or velum palati) कहते हैं।

काग के इधर-उधर छोटी-छोटी गाँठों के रूप में गलांकुर tonsiles) होते हैं। निचले तथा ऊपरी जबड़े में कुल मिलाकर 32 दाँत (teeth) होते हैं। दाँतों की संख्या उम्र के साथ बदलती रहती है। मुखगुहा के फर्श पर एक अति मुलायम लचीली तथा लसलसी जीभ या जिह्वा (tongue) होती है जिसका केवल अगला थोड़ा-सा भाग ही स्वतन्त्र होता है जो नीचे फर्श के साथ एक भंज (fold), जिह्वा फ्रेनुलम (frenulum linguae) के द्वारा जुड़ा दिखायी देता है। जीभ का पिछला भाग फर्श के साथ पूर्णतः जुड़ा होता है। जीभ की ऊपरी सतह अत्यन्त खुरदरी होती है जो इस पर उपस्थित (UPBoardSolutions.com) अनेक जिह्वा अंकुरों (lingual papillae) तथा कुछ सूक्ष्म गाँठों के कारण है। ये संरचनाएँ हमें विभिन्न पदार्थों के स्वाद का ज्ञान कराती हैं।

2. ग्रसनी (Pharynx) :
नीचे जीभ तथा ऊपर काग के पीछे कीप के आकार का लगभग 12-15 सेमी लम्बा भाग ग्रसनी (pharynx) कहलाता है। इसके तीन भाग किये जा सकते हैं

(क) नासाग्रसनी (nasapharynx), जो श्वसन मार्ग के पीछे स्थित होता है।
(ख) स्वरयन्त्री ग्रसनी (laryngeal pharynx) यहाँ वायु मार्ग तथा आहार मार्ग एक-दूसरे को काटते (cross) हैं तथा
(ग) मुख ग्रसनी (oropharynx) ठीक सामने वाला भाग प्रतिपृष्ठ (अधर) भाग है, जो अन्त में ग्रास नली (oesophagus) में निगल

द्वार (gullet) के द्वारा खुलता है। निगल द्वार सामान्यतः बन्द रहता है। निगल द्वार के नीचे श्वास नली (trachea) का द्वार, कण्ठद्वार (glottis) होता है। इस पर एक लचीला उपास्थि का बना घाँटी ढापन (epiglottis) होता है।

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3. ग्रास नली (Oesophagus) :
यह लगभग 25 सेमी लम्बी सँकरी नली है जो गर्दन के पिछले भाग से प्रारम्भ होती है। वायु नलिका के साथ-साथ तथा इसके तल पृष्ठ पर स्थित होती है तथा पूरे वक्ष भाग से होती तन्तु पट (diaphragm) को छेदकर उदर गुहा में पहुँचती है।

4. आमाशय (Stomach) :
आमाशय उदर गुहा में अनुप्रस्थ अवस्था में स्थित एक मशक के समान रचना है। आहारनाल का यह सबसे चौड़ा भाग है जिसकी लम्बाई लगभग 24 सेमी तथा चौड़ाई 10 सेमी होती है। आमाशय के स्पष्ट रूप से दो भाग किये जा सकते हैं-एक, प्रारम्भ का अधिक चौड़ा भाग जिसमें ग्रास नली खुलती है-हृदयी भाग (cardiac part) कहलाता है। इस द्वार को कार्डिया (cardia) कहते हैं तथा यह विशेष कार्डिया संकोचक (cardiac sphincter) पेशी द्वारा घिरा होता है। दूसरा भाग क्रमशः सँकरा होता जाता है और एक निकास द्वार के द्वारा आँत के प्रथम भाग में खुलता है। इस भाग को पक्वाशयी भाग (pyloric part or pylorus) तथा निकास द्वार को (UPBoardSolutions.com) पक्वाशयी छिद्र (pyloric aperture) कहते हैं। आमाशय के हृदयी भाग के पास का गोल-सा भाग विशेष तथा विकसित जठर ग्रन्थियों (gastric glands) से युक्त होता है, इसे फण्डिक भाग (fundic part) तथा इसकी जठर ‘ग्रन्थियों को फण्डिक ग्रन्थियाँ (fundic glands) कहते हैं। यद्यपि जठर ग्रन्थियाँ हृदयी तथा पक्वाशयी भाग के श्लेष्मिका में भी होती हैं, जो प्रायः श्लेष्मक (mucous) अथवा पक्वाशयी भाग में मैस्ट्रिन (gastrin) नामक हॉर्मोन बनाती हैं।

सम्पूर्ण आहारनाल की अपेक्षा आमाशय की भित्ति में सबसे अधिक पेशियाँ (muscles) होती हैं; अतः यह सबसे अधिक मोटी होती हैं। फण्डिक जठर ग्रन्थियाँ (fundic gastric glands) विशेष पाचक जठर रस (gastric juice) बनाती हैं। आमाशय की भित्ति में भी अनेक उभरी हुई सलवटें होती हैं, इन्हें यूगी (rugae) कहते हैं।

5. आँत (Intestine) :
आहारनाल का शेष भाग आँत (intestine) कहलाता है तथा यह अत्यधिक कुण्डलित होकर लगभग पूरी उदर गुहा को घेरे रहता है। इसकी लम्बाई लगभग 7.5 मीटर होती है। इसके दो प्रमुख भाग किये जा सकते हैं-छोटी आँत तथा बड़ी आँत।

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(i)
छोटी आँत (Small intestine)
यह लगभग 6 मीटर लम्बी अत्यधिक कुण्डलित नली है। जिसको तीन भागों में बाँटा जा सकता है
(a) ग्रहणी
(B) मध्यन्त्रि तथा
(C) शेषान्त्र

(a) ग्रहणी या पक्वाशय (Duodenum) :
यह लगभग 25 सेमी लम्बी, छोटी आंत की सबसे छोटी तथा चौड़ी नलिका है। आमाशय इसी में पक्वाशयी छि (pyloric aperture) द्वारा खुलता है और आमाशय के साथ लगभम ‘C’ का आकार बनाता है। इसी मध्य भाग में मीसेण्ट्री द्वारा अग्न्याशय (pancreas) लटका होता है।

(b) मध्यान्त्र (Jejunum) :
यह लगभग 2.5 मीटर लम्बी, चरि’ सेमी चौड़ी नलिका है जो अत्यधिक कुण्डलित होती है।

(c) शेषान्त्र (Ileum) :
यह लगभग 2.75 मीटर लम्बी व 3.5 सेमी चौड़ी कुण्डलित आँत है। छोटी आँत की आन्तरिक दीवार अपेक्षाकृत पतली होती हैं, किन्तु इसमें मांसपेशियाँ आदि सभी स्तर होते हैं। ग्रहणी को छोड़कर शेष छोटी आंत में भीतरी सतह पर असंख्य छोटे-छोटे अँगुली के आकार के उभार आँत की गुहा में लटके रहते हैं। इनको रसांकुर (villi) कहते हैं। प्रति वर्ग मिलीमीटर क्षेत्र में अनुमानतः इनकी संख्या 20-40 होती है। इनकी उपस्थिति के कारण आँत की भीतरी भित्ति तौलिये की तरह रोयेदार होती है।

(ii)
बड़ी आँत (Large intestine) 

छोटी आँत के बाद शेष आहारनाल बड़ी आँत का निर्माण करती है। यह लम्बाई में (लगभग 1.5 मीटर) छोटी आँत से छोटी, किन्तु अधिक चौड़ी (लगभग 7.0 सेमी) होती है। इसमें तीन भाग स्पष्ट दिखायी देते हैं

(a) उण्डुक
(b) कोलन तथा
(c) मलाशय। छोटी आँत, बड़ी आँत के किसी एक भाग में खुलने के बजाय उण्डुक तथा कोलन के संगम स्थान पर खुलती है। इस द्वार पर श्लेष्म कला के भंजों के रूप में शेषान्त्र उण्डुकीय (ileo-caecal valve) होता है।

(a) उण्डुक (Caecum) :
यह लगभग 6 सेमी लम्बी, 7.5 सेमी चौड़ी थैली की तरह की संरचना है जिससे लगभग 9 सेमी लम्बी, सँकरी, कड़ी तथा बन्द नलिका निकलती है। इसको कृमिरूप परिशेषिका (vermiform appendix) कहते हैं। वास्तव में, यह संरचना शरीर में अनावश्यक तथा अवशेषी (vestigial) भाग है। यदि इसमें मल या श्लेष्म एकत्रित हो जाये तो यहाँ जीवाणुओं के संक्रमण होने का खतरा रहता है। संक्रमण होने पर कृमिरूप परिशेषिका की दीवार गलने लगती है जिससे प्रदाह (inflammation) के कारण रोगी को पीडा, मितली, ज्वर तथा भूख न लगने की शिकायत रहती है। इस रोग को अपेण्डीसाइटिस (appendicitis) कहते हैं। इसके उपचार के लिये ऑपरेशन द्वारा कृमिरूप परिशेषिका को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

(b) कोलन (Colon) :
यह लगभग 1.25 सेमी लम्बी, 6 सेमी चौड़ी नलिका है जो की तरह पूरी छोटी आँत को घेरे रहती है। इसका अन्तिम भाग मध्य से कुछ बायीं ओर झुककर मलाशय (rectum) में खुलता है। इस प्रकार कोलन में चार भाग दिखायी देते हैं—लगभग 15 सेमी आरोही खण्ड (ascending part), लगभग 50 सेमी अनुप्रस्थ खण्ड (transverse part), लगभग 25 सेमी लम्बा अवरोही खण्ड (descending part) तथा 40 सेमी लम्बा. शेष सिग्मॉइड या श्रोणि खण्ड (sigmoid or pelvic part)

(c) मलाशय (Rectum) :
लगभग 20 सेमी लम्बा तथा 4 सेमी चौड़ा नलिका की तरह का यह भाग अपने अन्तिम 3-4 सेमी भाग में काफी सँकरी नली बनाता है। इसे गुदनाल (anal canal) कहते हैं। इसकी भित्ति में मजबूत संकुचनशील पेशियाँ होती हैं तथा यह एक छिद्र द्वारा बाहर खुलती है। इस छिद्र को भी संकोचक (UPBoardSolutions.com) पेशियाँ (sphincter muscles) बन्द किये रखती हैं। गुदनाल की श्लेष्म झिल्ली में कई खड़े भंज (vertical folds) होते हैं जिन्हें गुद स्तम्भ (anal columns) कहते हैं।

प्रश्न 2.
मनुष्य की आहारनाल में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटको तथा वसा की पाचन क्रिया का वर्णन कीजिए। या मनुष्य की आहारनाल में प्रोटीन एवं वस-पाचन की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर :

कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, वसाओं का पाचन

भोजन में उपस्थित पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन तथा वसाएँ) के पाचन की विस्तृत प्रक्रिया मुखगुहा से प्रारम्भ होकर क्षुद्रान्त्र में पूरी होती है। इनके पाचन का सारांश निम्नलिखित है

1. कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन (Digestion of Carbohydrates) :
हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स पॉलिसैकेराइड्स (मण्ड तथा ग्लाइकोजन), डाइसैकेराइड्स (सुक्रोज तथा लैक्टोज) और मोनोसैकेराइड्स (ग्लूकोज एवं फ्रक्टोस) के रूप में होते हैं। मुखगुहा में लार का ऐमाइलेज (salivary amylase) एन्जाइम कुछ मण्ड को माल्टोज नामक डाइसैकेराइड में विखण्डित करता है। इसका यह कार्य ग्रासनली में होता रहता है और भोजन के आमाशय में पहुँचने पर जठर रस की अम्लीयता के कारण बन्द हो जाता है। ग्रहणी में अग्न्याशयी ऐमाइलेज भोजन की शेष पॉलिसैकेराइड्स को डाइसैकेराइड्स में विखण्डित कर देता है। अन्त में आन्त्रीय रस के ब्रुश-बोर्डर कार्बोहाइड्रेट-पाचक एन्जाइम-माल्टेज, सुक्रेज तथा लैक्टज-काइम के डाइसैकेराइड्स, क्रमशः माल्टोज, सुक्रोज तथा लैक्टोज, को मोनोसैकेराइड्स, अर्थात् सरलतम शर्कराओं में विखण्डित कर देते हैं।

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2. प्रोटीन्स का पाचन (Digestion of Proteins) :
भोजन की प्रोटीन्स जटिल दीर्घअणुओं (macromolecules) के रूप में होती हैं। इनका पाचन आमाशय में प्रारम्भ होता है। जठर रस का HCl जटिल प्रोटीन अणुओं के कुण्डलों तथा वलनों को खोल देता है, फिर जठर रस को पेप्सिन (pepsin) एन्जाइम खुली हुई पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं में से 10 से 20% श्रृंखलाओं के बीच-बीच के पेप्टाइड बन्धों को तोड़कर इन्हें छोटी पेप्टाइड श्रृंखलाओं (व्युत्पन्न प्रोटीन्स) में  विखण्डित कर देता है। ग्रहणी में अग्न्याशयी रस के ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम शेष पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं को इसी प्रकार छोटी श्रृंखलाओं में विखण्डित करते हैं। इसी रस का कार्बोक्सीपेप्टिडेज एन्जाइम कुछ पेप्टाइड श्रृंखलाओं के छोर बन्धों को तोड़कर इनसे ऐमीनो अम्ल इकाइयों को पृथक् करता है। अन्त में आन्त्रीय रस के ऐमीनोपेप्टिडेज तथा कार्बोक्सीपेप्टिडेज एन्जाइम सभी पेप्टाइड श्रृंखलाओं के छोर बन्धों को क्रमशः तोड़-तोड़कर इन्हें ऐमीनो अम्लों में विखण्डित कर देते हैं।

3. वसाओं का पाचन (Digestion of Fats) :
हमारी भोजन सामग्री में अधिकांश वसाएँ सरल वसाओं, अर्थात् ट्राइग्लिसराइड्स (triglycerides) के रूप में होते हैं। लार तथा जठर रस के लाइपेज एन्जाइम कुछ वसाओं को वसीय अम्लों तथा मोनोग्लिसराइड्स में विखण्डित करते हैं। ग्रहणी में पित्त लवण समस्त वसाओं को छोटे-छोटे बिन्दुकों में तोड़ते हैं जिनका कि काइम में पायस (emulsion) बन जाता है। फिर अग्न्याशयी रस के लाइपेज, कोलेस्टेरॉल, एस्टरेज तथा फॉस्फोलाइपेज (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम और आन्त्रीय रस के लाइपेज एन्जाइम सारे वसाओं को वसीय अम्लों, मोनोग्लिसराइड्स, कोलेस्टेरॉल एवं फॉस्फोरिक अम्ल में विखण्डित कर देते हैं।

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