UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 8
Chapter Name ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निम्न में से कौन-सी OOP पर आधारित भाषा है?
(a) FORTRAN
(b) C++
(c) PASCAL
(d) BASIC
उत्तर:
(b) C++

प्रश्न 2
OOPa किस प्रक्रिया पर कार्य करती है?
(a) Top – to – bottom
(b) Bottom – to – top
(c) Left – to – right
(d) Right – to – left
उत्तर:
(b) Bottom – to – top

प्रश्न 3
किसके द्वारा हम दूसरी क्लास के डाटा को एक्सेस कर सकते हैं?
(a) ऑब्जेक्ट
(b) पॉलीमॉरफिज्म
(c) क्लास
(d) डाटा एब्सट्रैक्शन
उत्तर:
(d) ऑब्जेक्ट

प्रश्न 4
क्लास किसका संयोजन रूप है?
(a) केवल डाटा
(b) केवल फंक्शन
(c) डाटा एवं फंक्शन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) डाटा एवं फंक्शन

प्रश्न 5
एक क्लास के गुणों को दूसरी क्लास में प्रयोग करना क्या कहलाता है?
(a) डाटा एब्सट्रैक्शन
(b) डाटा हाइडिंग
(c) इनहेरिटेन्स
(d) एनकैप्सूलेशन
उत्तर:
(c) इनहेरिटेन्स

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
OOP को समझाइए।
उत्तर:
यह ऑब्जेक्ट पर आधारित है, जिसकी सहायता से हम किसी क्लास के डाटा को क्लास के बाहर भी एक्सेस कर सकते हैं।

प्रश्न 2
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा के कोई दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
C++ तथा JAVA

प्रश्न 3
ऑब्जेक्ट की एक वाक्य में व्याख्या कीजिए। [2017, 16]
उत्तर:
किसी भी क्लास के डाटा तथा फंक्शन्स को एक्सेस करने के लिए ऑब्जेक्ट का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 4
क्लास की व्याख्या केवल एक वाक्य में कीजिए। [2018]
उत्तर:
क्लास, डाटा तथा फंक्शन्स का संयोजन रूप है। क्लास एक यूजर डिफाइन डेटा टाइप है।

प्रश्न 5
इनहेरिटेन्स क्या है?
उत्तर:
वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा एक क्लास के ऑब्जेक्ट, दूसरी क्लास के ऑब्जेक्ट को प्राप्त कर सकते हैं, इनहेरिटेन्स कहलाता है।

प्रश्न 6
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा के कोई दो उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा के निम्न दो उपयोग हैं।

  • एक्सपर्ट सिस्टम में
  • रियल टाइम सिस्टम में

लघु उत्तरीय प्रश्न I (2 अंक)

प्रश्न 1
उदाहरण सहित ऑब्जेक्ट का अर्थ समझाइए। [2009,07]
उत्तर:
कोई ऑब्जेक्ट, ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का मुख्य आधार होता है। किसी भी क्लास में डाटा व फंक्शन को घोषित करने के लिए ऑब्जेक्ट को ध्यान में रखा जाता है। वास्तव में, ऑब्जेक्ट क्लास के वैरिएबल होते हैं। ऑब्जेक्ट के बिना क्लास में किसी भी डाटा का कोई मान नहीं होता। ऑब्जेक्ट मेमोरी में स्थान घेरते हैं, जिनका मेमोरी में एक निश्चित एड्रेस होता है। उदाहरण-टी.वी., कम्प्यूटर आदि सभी ऑब्जेक्ट्स हैं।

प्रश्न 2
क्लास से क्या तात्पर्य है? [2014]
उत्तर:
डाटा तथा उससे सम्बन्धित फंक्शनों के समूह को क्लास कहते हैं। क्लास एक यूजर-डिफाइण्ड डाटा टाइप है। एक बार क्लास बनाने के पश्चात् हम उस क्लास के अनेक ऑब्जेक्ट्स बना सकते हैं। समान गुणों के आधार पर ऑब्जेक्ट को समान वर्ग में रखा जा सकता है तथा यह वर्ग ऑब्जेक्ट क्लास कहलाता है। एक क्लास अपने अन्तर्गत विभिन्न क्लासेस को रख सकती है।

प्रश्न 3
एब्सट्रैक्शन तथा एनकैप्सूलेशन में अन्तर बताइए।
उत्तर:
एब्सट्रेक्शन तथा एनकैप्सूलेशन में अन्तर इस प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-1

प्रश्न 4
कोड के पुनः प्रयोग से आप क्या समझते हैं? OOPs में इसे किस प्रकार किया जा सकता है? समझाइए। [2010]
उत्तर:
कोड को पुनः प्रयोग करने से समय की बचत होती है OOPs में यह सुविधा इनहेरिटेन्स उपलब्ध कराता है, जिसके प्रयोग से कोड को बार-बार लिखने की आवश्यकता नहीं होती। कोड को एक बार लिखने के बाद उसे आवश्यकतानुसार पूरे प्रोग्राम में कहीं भी प्रयोग कर सकते हैं। इसमें जिस क्लास के गुणों को इनहेरिट किया जाता है, उसे बेस या पेरे! क्लास कहा जाता है और जिसमें इनहेरिट किया जाता है, उसे डिराइव या चाइल्ड क्लास कहा जाता है।

प्रश्न 5
ऑपरेटर ओवरलोडिंग को उदाहरण सहित संक्षेप में लिखिए। [2017]
उत्तर:
ऑपरेटर ओवरलोडिंग ऑपरेटर को पॉलीमॉरफिज्म का गुण प्रदान करना अर्थात् एक ही ऑपरेटर का विभिन्न प्रकार से प्रयोग करना ही ‘ऑपरेटर ओवरलोडिंग’ कहलाता है। जब किसी ऑपरेटर को ओवरलोड किया जाता है, तब उसका वास्तविक अर्थ एवं कार्य नष्ट नहीं होता है, वे ओवरलोडिंग के कारण छिप जाते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-2

प्रश्न 6
स्ट्रक्चर्ड प्रोग्रामिंग व ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में तुलना [2013, 09, 07]
उत्तर:
स्ट्रक्चर्ड प्रोग्रामिंग और ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में अन्तर निम्न हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-3

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)

प्रश्न 1
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [2016, 12]
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग तकनीक को संक्षिप्त में OOP भी कहा जाता है। इस तकनीक का मुख्य तत्त्व ऑब्जेक्ट होता है। C++, JAVA आदि भाषाओं के द्वारा इस तकनीक पर आधारित प्रोग्राम तैयार किए जाते हैं। ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में विभिन्न प्रोग्रामिंग भाषाओं के सभी उत्तम गुणों का समावेश किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें अनेक नए गुणों का समावेश भी किया जाता है। पुरानी सभी भाषाओं में फंक्शन की क्रियाविधि पर विशेष महत्त्व दिया जाता था। 00P में ऑब्जेक्ट्स को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस प्रोग्रामिंग में डाटा को सीधे प्रयोग नहीं किया जाता है और न ही बाह्य फंक्शनों द्वारा बदला जा सकता है। 00P में समस्या के हल के लिए ऑब्जेक्ट का निर्माण करते हैं तथा इन्हीं ऑब्जेक्ट के अनुरूप डाटा व फंक्शन बनाए जाते हैं।

प्रश्न 2
क्लास और ऑब्जेक्ट में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2014, 10]
उत्तर:
क्लास और ऑब्जेक्ट में अन्तर इस प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-4

प्रश्न 3
इनहेरिटेन्स क्या है? इसके विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए। [2016, 12]
उत्तर:
इनहेरिटेन्स, ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा का प्रमुख गुण है, एक क्लास के गुणों को दूसरी क्लास में प्रयोग करना इनहेरिटेन्स कहलाता है। जिस क्लास से गुण इनहेरिट होते हैं, वह बेस क्लास या पेरेण्ट क्लास कहलाती है तथा जिस क्लास में ये गुण इनहेरिट होते हैं वो सब क्लास या चाइल्ड क्लास कहलाती है। इससे एक कोड को पुनः लिखने की आवश्यकता नहीं होती।

उदाहरण
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-5
इसके विभिन्न रूप निम्न हैं।

  1. सिंगल लेवल इनहेरिटेन्स
  2. मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स
  3. मल्टीपल इनहेरिटेन्स
  4. हाइब्रिड इनहेरिटेन्स
  5. हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स

प्रश्न 4
OOP के लाभ बताइए। [2015, 08]
अथवा
OOP की विशेषताओं की व्याख्या संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग (OOP) के लाभ निम्नलिखित हैं

  1. OOP द्वारा बड़े प्रोग्रामों को बनाना आसान होता है।
  2. इनहेरिटेन्स के द्वारा कोड को दोबारा लिखने की आवश्यकता नहीं होती अर्थात् हम ऑब्जेक्ट के द्वारा एक क्लास को दूसरी क्लास में डिराइव कर सकते हैं।
  3. OOP में प्रोग्राम बनाने से समय की बचत होती है।
  4. OOP में बने प्रोग्रामों को सरलता से अपग्रेड किया जा सकता है।
  5. यह सॉफ्टवेयर डेवलपमेण्ट की प्रोडेक्टिविटी को बढ़ाता है।
  6. किसी प्रोजेक्ट के कार्य का ऑब्जेक्ट के रूप में विभाजन करता है।
  7. प्रोग्राम को फंक्शन के स्थान पर ऑब्जेक्ट के द्वारा, विभाजित किया जाता है।
  8. प्रोग्राम में bottom-up approach का प्रयोग किया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
OOP (Object Oriented Programming) को समझाइए तथा इसके विभिन्न तत्त्व भी लिखिए।
अथवा
क्लासेस तथा ऑब्जेक्ट्स का वर्णन कीजिए। [2009]
अथवा
निम्नलिखित को उदाहरण देकर समझाइए [2018, 12, 06]
(i) ऑब्जेक्ट
(ii) क्लास
(iii) इनहेरिटेन्स
(iv) ऑपरेटर ओवरलोडिंग
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में विभिन्न प्रोग्रामिंग भाषाओं के सभी उत्तम गुणों का समावेश किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें अनेक नए गुण भी हैं। पुरानी सभी भाषाओं में फंक्शन की क्रियाविधि पर विशेष महत्त्व दिया जाता था, लेकिन OOP में ऑब्जेक्ट को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस प्रोग्रामिंग में डाटा को सीधे प्रयोग नहीं किया जाता। OOP में समस्या के हल के लिए ऑब्जेक्ट का निर्माण करते हैं तथा इन्हीं ऑब्जेक्ट्स के अनुरूप डाटा व फंक्शन बनाए जाते हैं।

निम्न चित्र में डाटा, फंक्शन तथा ऑब्जेक्ट का सम्बन्ध दिखाया गया है।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-6

ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग के तत्त्व
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग के तत्त्व निम्न हैं।

(i) ऑब्जेक्ट्स ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का मुख्य आधार ऑब्जेक्ट होता है। किसी भी क्लास में डाटा व फंक्शन को घोषित करने के लिए ऑब्जेक्ट को ध्यान में रखा जाता है। ऑब्जेक्ट के बिना क्लास में किसी भी डाटा का कोई मान नहीं होता। ऑब्जेक्ट मैमोरी में स्थान घेरते हैं, जिनको मैमोरी में एक निश्चित एड्स होता है। किसी भी क्लास के एक से ज्यादा ऑब्जेक्ट्स बनाए जा सकते हैं, जो यूजर की आवश्यकता पर निर्भर करते हैं। यह हमारे सामान्य जीवन का एक हिस्सा होते हैं। हमारे चारों ओर प्रत्येक जगह अनेक प्रकार के ऑब्जेक्ट्स हैं-टी.वी., कम्प्युटर आदि सभी ऑब्जेक्ट्स हैं। हमेशा डाटा तथा फंक्शन को हमेशा क्लास के अन्तर्गत घोषित करते हैं, लेकिन वास्तविक डाटा, ऑब्जेक्ट पर ही निर्भर करता है। ऑब्जेक्ट की सहायता से क्लास के सदस्यों का प्रयोग करने के लिए डॉट (.) ऑपरेटर का प्रयोग किया जाता है।

(ii) क्लास क्लास, डाटा तथा फंक्शन का संयोजन रूप है। डाटा तथा उस पर प्रयोग होने वाले फंक्शन्स को एक इकाई में घोषित किया जाता है, यह इकाई ही क्लास कहलाती है। वास्तव में, ऑब्जेक्ट क्लास के वैरिएबल होते हैं। एक बार क्लास बनाने के बाद उस क्लास के अनेक ऑब्जेक्ट्स बनाए जा सकते हैं। किसी भी ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में कम-से-कम एक क्लास का घोषित किया जाना आवश्यक होता है, जिसके द्वारा प्रोग्रामिंग भाषा C में तैयार किए गए प्रोग्राम को C++ में भी चलाया जा सकता है।
उदाहरण:
Car क्लास के दो ऑब्जेक्ट्स Ford तथा Toyota का चित्रण इस प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-7

(iii) इनहेरिटेन्स वह प्रक्रिया जिसके द्वारा एक क्लास के ऑब्जेक्ट, दूसरी क्लास के ऑब्जेक्ट के गुण प्राप्त कर सकते हैं, इनहेरिटेन्स कहलाते हैं। इस प्रक्रिया में हम एक क्लास से दूसरी क्लास को डिराइव (Derive) कर सकते हैं। डिराइव हुई क्लास में प्रथम क्लास के सभी गुण होते हैं तथा इसके अतिरिक्त उसमें स्वयं के भी कुछ गुण हो सकते हैं। इस प्रकार प्रथम क्लास जिससे दूसरी क्लास डिराइव हुई है, उसे वह पेरेण्ट क्लास यो सुपर क्लास कहते हैं बेस क्लास तथा दूसरी क्लास जो डिराइव्ड हुई है, सब क्लास, चाइल्ड क्लास या डिराइब्ड क्लास कहलाती है।
उदाहरण
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-8

डिराइल्ड क्लास Dog अपने बेस क्लास Animal की प्रोपर्टी इनहेरिट करेगा।

(iv) पॉलीमॉरफिज्म Polymorphism, poly तथा morphous दो शब्दों से मिलकर बना है। Poly का अर्थ है ‘अनेक’ तथा morphous का अर्थ है। ‘रूप’। अतः पॉलीमॉरफिज्म का अर्थ है एक ही तत्त्व के अनेक रूप’।
पॉलीमॉरफिज्म दो प्रकार के होते हैं।

ऑपरेटर ओवरलोडिंग ऑपरेटर को पॉलीमॉरफिज्म का गुण प्रदान करना अर्थात् एक ही ऑपरेटर का विभिन्न प्रकार से प्रयोग करना ही ‘ऑपरेटर ओवरलोडिंग’ कहलाता है। जब किसी ऑपरेटर को ओवरलोड़ किया जाता है, तब उसका वास्तविक अर्थ एवं कार्य नष्ट नहीं होता है, वे
ओवरलोडिंग के कारण छिप जाते हैं।

उदाहरण + ऑपरेटर का प्रयोग दो इण्टीजर को जोड़ने के लिए किया जा सकता है; जैसे- int a=5, b=2; ints = a + b; cout << s;

आउटपुट 7 इस प्रकार, + ऑपरेटर का प्रयोग दो स्ट्रिग्स को कॉनकोटेनेट (Concatenate) करने के लिए भी किया जा सकता है; जैसे
str = “Hello”;
str 1 = “World”;
str 2 = str + strl;
आउटपुट Helloworld

फंक्शन ओवरलोडिंग फंक्शन ओवरलोडिंग का अर्थ है कि किसी एक फंक्शन नाम से विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न कार्य कराना, जिससे एक फंक्शन के कोड को पुन: नहीं लिखना पड़ता और समय की बचत होती है। इसका प्रयोग करके हम फंक्शन को समान नाम से किन्तु अलग-अलग argument list से डिक्लेयर तथा परिभाषित कर सकते हैं।

(v) डाटा एब्सट्रैक्शन इसका प्रयोग क्लास में डाटा को छिपाने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया को डाटा हाइडिंग (Data hiding) भी कहते हैं। डाटा हाइडिंग का अर्थ है कि हम class में घोषित प्राइवेट डाटा को सीधे प्रोग्राम में प्रयोग नहीं कर सकते।

(vii) एनकैप्सूलेशन एनकैप्सूलेशन, 00P का मुख्य गुण है। यह डाटा तथा फंक्शन को एक यूनिट में एकत्रित कर नया ऑब्जेक्ट बनाने की सुविधा प्रदान करता है। एनकैप्सूलेशन का मुख्य उद्देश्य क्लास को इस प्रकार स्वतन्त्र रूप देना है, जिससे उन्हें अन्य प्रोग्रामों को संशोधित किए बिना पुन: उपयोग में लाया जा सकें।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 19
Chapter Name  शिशु मृत्यु की समस्या
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
शिशु मृत्यु का आशय है। (2014)
(a) जन्म लेते ही मृत्यु हो जाना
(b) स्कूल जाने से पूर्व मृत्यु हो जाना।
(c) जन्म से शैशवावस्था तक की अवधि में होने वाली मृत्यु
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) जन्म से शैशवावस्था तक की अवधि में होने वाली मृत्यु

प्रश्न 2.
शिशु मृत्यु-दर की गणना की जाती है।
(a) जन्म लेने वाले प्रति 100 शिशुओं के आधार पर
(b) जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं के आधार पर
(c) विभिन्न रोगों के संक्रमण के आधार पर
(d) जन्म एवं मृत्यु संख्या के अन्तर के आधार पर
उत्तर:
(b) जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं के आधार पर

प्रश्न 3.
शिशु मृत्यु-दर सबसे अधिक है।
(a) भारत में
(b) जापान में
(c) इंग्लैण्ड में
(b) अमेरिका में
उत्तर:
(a) भारत में

प्रश्न 4.
बाल मृत्यु को कारण है। (2006,17)
(a) स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी एवं सुविधाओं का अभाव
(b) यौन शिक्षा का अभाव
(c) बाल विवाह
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 5.
बाल मृत्यु को कम किया जा सकता है। (2010)
(a) शिक्षा एवं ज्ञान के प्रसार के द्वारा
(b) उपयुक्त प्रसव एवं स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना करके
(c) संक्रामक रोगों की रोकथाम करके
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 6.
उचित समय पर टीकाकरण (2009)
(a) बालक में रोग क्षमता को कम करता है।
(b) बाल मृत्यु की दर कम होती है।
(c) बच्चे की जान को खतरा रहता है।
(b) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) बाल मृत्यु की दर कम होती है।

प्रश्न 7.
परिवार नियोजन द्वारा किस समस्या का समाधान हो सकता है? (2017)
(a) जनसंख्या नियन्त्रण
(b) देश के विकास की वृद्धि
(c) माँ तथा शिशु की मृत्यु में कमी
(b) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 8.
गर्भावस्था में महिला को मिलना चाहिए। (2007, 16)
(a) केवल फल
(b) केवल दूध
(C) सन्तुलित आहार
(b) जो भी उपलब्ध हो
उत्तर:
(c) सन्तुलित आहार

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
शिशु मृत्यु से क्या आशय है?
उत्तर:
जन्म लेते ही अथवा जन्म लेने से एक वर्ष की आयु तक होने वाली मृत्यु को ‘शिशु मृत्यु’ कहते हैं।

प्रश्न 2.
बाल मृत्यु के प्रमुख कारण क्या हैं? (2006, 13)
उत्तर:
शिक्षा का अभाव, निर्धनता, गर्भावस्था में असावधानी, अव्यवस्थित प्रसूतिका गृह, बाल विवाह, चिकित्सा सुविधाओं की कमी आदि शिशु मृत्यु के प्रमुख कारण हैं।

प्रश्न 3.
शिशु मृत्यु-दर को रोकने के दो उपाय बताएँ। (2005, 10, 11)
उत्तर:
शिक्षा का प्रसार एवं लोगों में जागरूकता फैलाकर तथा प्रसव एवं स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना करके बाल मृत्यु-दर को रोका जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
शिशु मृत्यु-दर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी देश में एक वर्ष में जन्म लेने वाले प्रति हजार बच्चों में से जितने बच्चे जन्म लेने के समय या अपने जन्म के एक वर्ष के अन्दर मर जाते हैं, उसे शिशु मृत्यु दर’ कहते हैं। उदाहरण माना कि किसी देश में एक वर्ष के अन्दर एक लाख बच्चों ने जन्म लिया और 500 बच्चे जन्म लेने के तुरन्त बाद या 1 वर्ष की आयु पूर्ण होने से पूर्व ही मर गए, तो उस देश की शिशु मृत्यु-दर की गणना इस प्रकार करेंगे
[latex]\frac { 500 } { 100000 } \times 1000 = 5[/latex]
अर्थात् शिशु मृत्यु दर = 5/हजार है

प्रश्न 2.
बाल मृत्यु-दर पर निर्धनता को प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल मृत्यु-दर पर निर्धनता का प्रभाव तीन स्तरों पर देख सकते हैं।
प्रसव से पूर्व (गर्भावस्था के दौरान) गर्भावस्था में निर्धनता के कारण गर्भवती महिलाएँ सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार नहीं ले पाती हैं, जिससे शिशु की मृत्यु होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रसव के दौरान धन की कमी के कारण अनेक महिलाएँ प्रसव कराने के लिए। चिकित्सक के पास न जाकर घर पर ही दाइयों की सहायता से बच्चे को जन्म दे देती हैं, अत: प्रसव की समुचित व्यवस्था उपलब्ध न होने के कारण शिशु की मृत्यु की सम्भावना अधिक होती है।

प्रसव के बाद धन की कमी के कारण नवजात शिशु को सन्तुलित व पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है। अतः वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। निर्धनता के कारण इन बच्चों का समुचित उपचार भी नहीं हो पाता है, जो शिशु मृत्यु का एक प्रमुख कारण है।

प्रश्न 3.
शिशु के जीवन में माता-पिता के स्वास्थ्य का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
एक स्वस्थ शिशु को, एक स्वस्थ माता ही जन्म दे सकती है। आनुवंशिकी के कारण माता-पिता में व्याप्त रोगों का शिशु में भी हस्तान्तरण हो जाता है। गर्भावस्था में शिशु माता के रक्त से ही पोषक तत्त्वों को प्राप्त करता है। यदि माता पहले से ही कमजोर एवं अस्वस्थ है, तो वह कदापि एक स्वस्थ बच्चे को जन्म नहीं दे सकती है। जन्म के बाद भी माँ को संक्रमित दूध पीकर शिशु अस्वस्थ हो जाता है। अत: यह स्पष्ट है कि रोग-प्रतिरोधक क्षमता के अभाव के कारण रोगी माता-पिता की सन्तान भी रोगग्रस्त होगी। इस तरह से शिशु के माता-पिता के स्वास्थ्य का शिशु के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
बाल मृत्यु की समस्या का वर्णन करें एवं इसके मुख्य कारणों को स्पष्ट (2004, 06)
उत्तर:
किसी देश में एक वर्ष के भीतर जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं में मृत शिशुओं की गणना ‘शिशु मृत्यु-दर’ कहलाती है। शिशु मृत्यु-दर की गणना में 0 से 1 वर्ष की आयु तक के बच्चों को सम्मिलित किया जाता है। बाल मृत्यु दर की गणना पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौत के मामलों के आधार पर की जाती है। अर्थात् बाल मृत्यु-दर नवजात शिशुओं के साथ-साथ पाँच वर्ष तक की आयु के बच्चों की मौत को इंगित करती है। आज का बोलके कल को नागरिक होता है और यदि नागरिक न रहे, तो राष्ट्र कैसा, इसलिए बाल मृत्यु को किसी भी देश की प्रगति का शुभ संकेत नहीं माना जाता है। आज भारत में बाल मृत्यु दर बहुत अधिक है।

भारत में बाल मृत्यु की ऊँची दर के कारण
भारत में उच्च बाल मृत्यु दर के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  • शिक्षा का अभाव
  • निर्धनता
  • गर्भावस्था में असावधानी
  • बाल-विवाह
  • अनुचित प्रसूति-गृह
  • रोगी माता-पिता
  • परिवार नियोजन का पालन न करना
  • मातृ-शिशु कल्याणकारी संस्थाओं की कमी
  • चिकित्सा एवं नि:संक्रमण सम्बन्धी सुविधा की कमी

1. शिक्षा का अभाव बाल मृत्यु-दर के अधिक होने के कारणों में अशिक्षा एक महत्त्वपूर्ण कारक है। शिक्षा के अभाव में महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों की जानकारी नहीं होती है। शिक्षा के अभाव में महिलाओं को शिशु सुरक्षा, प्रसव पूर्व एवं प्रसव के बाद की जाने वाली परिचर्या की जानकारी नहीं हो पाती है, जो बाल मृत्यु-दर को बढ़ावा देती है। शिक्षा के अभाव में महिलाएँ सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं का भी लाभ नहीं उठा पा रही हैं।

2. निर्धनता बाल मत्य-दर पर निर्धनता का प्रभाव तीनों स्तर पर देखा जा सकता है, जन्म के पूर्व, जन्म के दौरान एवं जन्म के बाद।

निर्धनता के कारण गर्भावस्था के दौरान,महिलाएँ स्वयं को सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार नहीं दे पाती हैं, जिससे माता और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वहीं चिकित्सा सम्बन्धी विभिन्न सुविधाएँ होते हुए भी निर्धन जनता उसका लाभ नहीं उठा पाती है। ऐसी स्थिति में गरीब लोग घर पर ही दाइयों से प्रसव करा लेते हैं। इस मजबूरी के कारण अनेक बार जन्म के समय ही शिशु की मृत्यु हो जाती है। जन्म के बाद भी शिशु को निर्धनता के कारण पौष्टिक और सन्तुलित आहार नहीं मिल पाता है। इस स्थिति में इन नवजात शिशुओं को स्वास्थ्य खराब हो जाता है, लेकिन धन के अभाव के कारण बच्चों का समुचित उपचार नहीं हो पाता है।

3. गर्भावस्था में असावधानी गर्भावस्था के दौरान यदि माता अपने स्वास्थ्य, पोषण एवं अन्य आवश्यक देखभाल का ध्यान रखती है, तो जन्म लेने वाला बच्चा भी स्वस्थ होता है। इसके विपरीत यदि माता अपने स्वास्थ्य एवं पोषण का ध्यान नहीं रखती है, तो नवजात शिशु भी दुर्बल तथा अस्वस्थ हो जाता है। प्रायः इन दशाओं में जन्म लेने वाले बच्चे रोगों से संक्रमित हो जाते हैं, जो शिशु-मृत्यु का कारण बनते हैं।

4. बाल-विवाह आज भी अशिक्षा और अज्ञानता के कारण भारत में बहुत सारी लड़कियों की शादी 14-15 वर्ष की आयु में कर दी जाती है। इस आयु में लड़कियों का शारीरिक विकास पूर्णरूप से नहीं होता है तथा रज-वीर्य अपरिपक्व अवस्था में होता है। ऐसी स्थिति में इन लड़कियों से जन्म लेने वाला बच्चा दुर्बल एवं अपरिपक्व होता है, जो शिशु मृत्यु का कारण होता है।.

5. अनुचित प्रसूति-गृह प्रसूति-गृह ही वह स्थान होता है, जहाँ गर्भ से बाहर आने के बाद बच्चा पहली बार साँस लेता है। अतः किसी भी जन्म लेने वाले बच्चे के लिए प्रसूति-गृह का विशेष महत्त्व है। भारत में आज भी अधिकांश क्षेत्रों में व्यवस्थित एवं उचित प्रसूति-गृह का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राय: घर पर ही प्रसव कराए जाते हैं।

6. रोगी माता-पिता आज भारत में असंख्य माता-पिता रोगग्रस्त हैं। ऐसे में जब इन माता-पिता से बच्चे का जन्म होता है, तो बच्चे में भी रोग का , संक्रमण हो जाता है, इसलिए संक्रमित सन्तान का प्रायः जीवित रह पाना कठिन हो पाता है। इस स्थिति में कुछ शिशुओं की मृत्यु प्रसव के दौरान हो जाती है तथा कुछ की अल्पायु में मृत्यु हो जाती है।

7. परिवार नियोजन का पालन न करना परिवार नियोजन का पालन न करने | से अनेक परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक हो जाती है। ऐसे परिवार में जन्म लेने वाले बच्चों का समुचित ध्यान रख पाना कठिन होता है तथा बच्चों की मृत्यु की सम्भावना अधिक रहती है।

8. मातृ-शिशु कल्याणकारी संस्थाओं की कमी हमारे देश में जनसंख्या के अनुपात में मातृ-शिशु कल्याणकारी संस्थाओं की काफी कमी है। इस कारण से गर्भवती महिलाओं एवं नवजात शिशुओं को अनेक आवश्यक ‘सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। इन सुविधाओं के अभाव में अनेक माताओं एवं नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती है।

9. चिकित्सा एवं निःसंक्रमण सम्बन्धी सुविधा की कमी आज भी हमारे देश में जनसंख्या के अनुपात में चिकित्सा सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। अप्रशिक्षित नीम-हकीमों के पास अशिक्षित जनता जाने के लिए मजबूर हो जाती है। अनेक लोग तन्त्र-मन्त्र एवं झाड़-फूक के द्वारा उपचार में विश्वास करते हैं। इस तरह अव्यवस्थित चिकित्सा एवं योग्य प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी से हजारों बच्चे रोगग्रस्त होने पर स्वस्थ नहीं हो पाते और उनकी मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 2.
बाल मृत्यु-दर कम करने के मुख्य उपायों पर चर्चा करें। (2005)
अथवा
शिशु मृत्यु-दर कम करने हेतु अपने सुझाव दीजिए। (2016)
उत्तर:
बाल मृत्यु दर का अधिक होना देश की प्रगति में बाधक होता है। आज हमारे देश में जनसंख्या काफी अधिक है, जिसे नियन्त्रित करना अतिआवश्यक है। इस समस्या के समाधान के लिए जन्म दर को कम किया जाना चाहिए न कि मृत्यु-दर को बढ़ाया जाए।

बाल मृत्यु-दर कम करने के उपाय

देश के विकास के लिए बाल मृत्यु-दर को नियन्त्रित करने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं

  • शिक्षा का प्रसार
  • यौन शिक्षा
  • जीवन-स्तर में उन्नयन
  • स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्रसूति-गृह की स्थापना
  • बाल कल्याण योजनाएँ
  • बाल चिकित्सालय
  • बाल-विवाह पर रोक
  • परिवार नियोजन
  • माता एवं शिशु का पोषण

1. शिक्षा का प्रसार देश के नागरिकों में रूढ़िवादिता और अज्ञानता को कम करने के लिए शिक्षा का प्रसार जरूरी है। शिक्षा का प्रसार होने से नागरिकों में नए-नए विचार आएँगे और जाग्रति उत्पन्न होगी। अतः बाल मृत्यु को रोकने के लिए स्त्रियों का शिक्षित होना अतिआवश्यक है।

2. यौन शिक्षा भारत में यौन शिक्षा का अभाव है। प्रत्येक बच्चे को यौनसम्बन्धी प्रत्येक बात की लाभ-हानि की शिक्षा दी जानी चाहिए, ताकि वे पति-पत्नी के रूप में विवकेपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। ऐसे माँ-बाप अपने बच्चों के पालन-पोषण के प्रति जागरूक होते हैं, इससे बाल मृत्यु दर में गिरावट आती है। भारत सरकार ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए स्कूल के पाठ्यक्रमों में यौन शिक्षा को भी जोड़ दिया है।

3. जीवन-स्तर में उन्नयन जीवन-स्तर के सुधार में निर्धनता बड़ी बाधक है। सभी के पास रोजगार होगा, तो निर्धनता दूर होगी। फलस्वरूप गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार के साथ-साथ उपयुक्त वातावरण भी प्राप्त होगा, इससे बाल मृत्यु दर में कमी आएगी।

4. स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्रसूति-गृह की स्थापना देश के शहरों में जहाँ अस्पतालों की अधिकता है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में स्तरीय स्वास्थ्य केन्द्रों का काफी अभाव है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार नए स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्रसूति-गृह की व्यवस्था कर रही है, साथ ही योग्य डॉक्टर, नर्से आदि की नियुक्ति भी कर रही है। इन सभी सुविधाओं के साथ-साथ सरकार गरीबों को नि:शुल्क दवाइयाँ तथा उचित समय पर नि:शुल्क टीकाकरण की भी सुविधाएँ प्रदान कर रही है।

5. बाल कल्याण योजनाएँ शिशु देश का भविष्य होते हैं, इसलिए सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की बाल-कल्याण योजनाएँ चलाई जा रही हैं, लेकिन हमारे देश की ग्रामीण जनता इन सरकारी कार्यक्रमों से अनभिज्ञ रहती है। अत: कुछ नि:स्वार्थ नागरिकों को आगे आकर इन योजनाओं के बारे में लोगों को बताना चाहिए, ताकि इसका अधिक-से-अधिक लाभ लेकर शिशु मृत्यु-दर को कम किया जा सके।

6. बाल चिकित्सालय देश के प्रत्येक क्षेत्र में एक बाल चिकित्सालय की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें जन्म के बाद बच्चों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का समाधान अतिशीघ्र किया जा सके, जिससे बाल मृत्यु-दर में कमी आ सके।

7. बाल विवाह पर रोक बाल विवाह में 14.15 वर्ष की उम्र में बच्चों का विवाह कर दिया जाता है, ऐसी स्थिति में स्वस्थ बच्चा पैदा होने की सम्भावना न के बराबर होती है। अत: सरकार ने शादी की उम्र लड़कों के लिए 21 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 18 वर्ष निश्चित कर दी है, इससे शिशु मृत्यु-दर में काफी कमी आई है।

8. परिवार नियोजन परिवार नियोजन ने शिशु मृत्यु-दर में कमी लाने में काफी सहायता की है। ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ एवं ‘बच्चे दो या तीन ही अच्छे का नारा भी लोगों की मानसिकता बदलने में कारगर सिद्ध हुआ। अतः परिवार नियोजन के बारे में लोगों को और जागरूक होने की तथा समाज में व्याप्त कुप्रथाओं को समाप्त करने की आवश्यकता है।

9. माता एवं शिशु का पोषण बाल मृत्यु-दर को कम करने के लिए गर्भावस्था एवं प्रसव के बाद भी शिशु एवं माता को पौष्टिक एवं सन्तुलित भोजन मिलना आवश्यक है। इसके लिए सरकार विभिन्न योजनाएँ चलाती है; जैसे-‘जननी सुरक्षा योजना’ इत्यादि।

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UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 7 HTML एडवांस्डक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 7
Chapter Name HTML एडवांस्ड
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 7 HTML एडवांस्ड

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
लिस्ट के आइटम को किस टैग के अन्तर्गत लिखा जाता है?
(a) <L>
(b) <u>
(C) <LI>
(d) <UL>
उत्तर:
(c) <LI>

प्रश्न 2
start एट्रिब्यूट है।
(a) ऑर्डर्ड लिस्ट का
(b) अनऑर्डर्ड लिस्ट का
(c) डेफिनेशन लिस्ट का
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) ऑर्डर्ड लिस्ट का

प्रश्न 3
डेफिनेशन का टाइटल देने के लिए निम्न में से कौन-सा टैग प्रयोग किया जाता है?
(a) <DD>
(b) <DT>
(c) <DL>
(d) <DC>
उत्तर:
(b) <DT>

प्रश्न 4
इमेज की चौड़ाई सेट करने के लिए एट्रिब्यूट है।
(a) height
(b) width
(c) border
(d) src
उत्तर:
(b) width

प्रश्न 5
इण्टर्नल लिंकिंग में सेक्शन के नाम को किस एट्रिब्यूट के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है?
(a) alt
(b) href
(c) name
(d) link
उत्तर:
(c) name

प्रश्न 6
टेबल में हैडिंग देने के लिए प्रयुक्त टैग निम्न में से कौन-सा है?
(a) <TR>
(b) <TH>
(c) <TD>
(d) <TABLE>
उत्तर:
(b) <TH>

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
ऑर्डर्ड लिस्ट में आइटम कैसे दर्शाए जाते हैं?
उत्तर:
ऑर्डर्ड लिस्ट में आइटम क्रमानुसार दर्शाए जाते हैं। यद्यपि वे लेटर्स, नम्बर्स अथवा रोमन नम्बर्स हो सकते हैं।

प्रश्न 2
किसी लिस्ट को 5वें नम्बर से प्रारम्भ करने के लिए कोड लिखिए।
उत्तर:
<OL type = “1” start = “5”>

प्रश्न 3
डेफिनेशन लिस्ट का प्रारूप लिखिए। 
उत्तर:
<DL>
<DT> Title name</DT>
<DD> Definition</DD>
</DL>

प्रश्न 4
<IMG> टैग के किन्हीं दो एट्रिब्यूट्स के नाम लिखिए।
उत्तर:
(i) align
(ii) sre

प्रश्न 5
लिंकिंग कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
लिंकिंग दो प्रकार की होती हैं।

  • इण्टर्नल लिंकिंग
  • एक्सटर्नल लिंकिंग
प्रश्न 6
HTML में, लिंकिंग कैसे होती है?
उत्तर:
HTML में, लिंकिंग <A> टैग के साथ href एट्रिब्यूट के साथ होती। है;
जैसे
<A href="URL"> click </A>

प्रश्न 7
<TD> व <TH> टैग्स में भेद कीजिए। [2012]
उत्तर:
<TD> टैग प्रत्येक पंक्ति को डाटा सेल्स में विभाजित करता है, जबकि TH> टैग टेबल की हैडर रॉ को परिभाषित करता है।

प्रश्न 8
किसी टेबल का ब्राउजर में दायाँ एलाइनमेण्ट करने के लिए कोड लिखिए।
उत्तर:
<TABLE align=”right”>

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
लिंकिंग क्या होती है? एक्सटर्नल लिंकिंग को समझाइए।
अथवा
हाइपरटेक्स्ट लिंक को समझाइए। इसे किसी डॉक्यूमेण्ट में कैसे सम्मिलित किया जाता है? उदाहरण सहित समझाइए। [2017]
उत्तर:
लिंक से तात्पर्य हाइपरलिंक से है। यह दो भागों से मिलकर बना होता है। इसका पहला भाग वेब पेज पर दिखाई देता है, जिसे एंकर कहा जाता है। तथा दूसरा भाग ब्राउजर पर लिंक के रूप में प्रदर्शित होता है, जिसे URL कहा जाता है।
जब लिंक किसी अन्य वेबसाइट को लिंक करता है, तो उसे एक्सटर्नल लिकिंग कहा जाता है। इसके लिए <A> टैग के साथ href एट्रिब्यूट का प्रयोग किया जाता है।

प्रारूप <A href = “URL”></A>
उदाहरण <A href = “www.abc.com”>Click Here </A>

प्रश्न 2
<TABLE> टैग के निम्न एट्रिब्यूट्स को परिभाषित कीजिए।
(i) cellpadding
(ii) bordercolor
उत्तर:
(i) cellpadding एट्रिब्यूट का प्रयोग सेल के किनारे व टेक्स्ट के बीच स्पेस निर्दिष्ट करने के लिए किया जाता है।
प्रारूप <TABLE cellpadding=”pixel”>

(ii) bordercolor एट्रिब्यूट का प्रयोग टेबल में बॉर्डर कलर देने के लिए किया जाता है।
प्रारूप <TABLE bordercolor=”color_name/hex_num/rgb_num”>

लघु उत्तरीय प्रश्न (3 अंक)

प्रश्न 1
अनऑर्डर्ड लिस्ट का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अनऑर्डर्ड लिस्ट आइटम के क्रम को बुलेट के रूप में प्रदर्शित करती है। इस लिस्ट को बनाने के लिए <UL> टैग का प्रयोग किया जाता है। अनऑर्डर्ड लिस्ट का एट्रिब्यूट इस प्रकार है।

type यह अनऑर्डर्ड लिस्ट में बुलेट के टाइप को निर्धारित करता है। किसी बुलेट का टाइप disc, circle अथवा square में से एक हो सकता है।
जैसे <UI, type=”disc”>

उदाहरण:
<HTML> 
<HEAD>
<TITLE>Unordered list </TITLE>
</HEAD>
<BODY> 
<UL type="square">
<LI>Name</LI> 
<LI>Class</LI>
<LI>Sub</LI>
</UL> 
</BODY> 
</HTML>

आउटपुट
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प्रश्न 2
ऑर्डर्ड लिस्ट को उदाहरण सहित संक्षिप्त में समझाइए। 
उत्तर:
ऑर्डर्ड लिस्ट आइटम को क्रमानुसार किसी नम्बर्स, लेटर्स अथवा रोमन आदि के रूप में दर्शाता है। इस लिस्ट को बनाने के लिए <OL> टैग का प्रयोग किया जाता है। इस लिस्ट के एट्रिब्यूट्स इस प्रकार हैं। 
(i) start यह ऑर्डर्ड लिस्ट कहाँ से प्रारम्भ हो यह दर्शाता है, जैसे किसी लिस्ट का प्रारम्भ 3 से हो इसके लिए start एट्रिब्यूट में वैल्यू दी जाती है। 
(ii) type यह ऑर्डर्ड लिस्ट की टाइप वैल्यू को दर्शाता है। यह वैल्यू A, a, I,i, 1 आदि स्टाइल में से हो सकती है। 
उदाहरण:
<HTML> 
<HEAD>
<TITLE>Ordered list </TITLE>
</HEAD> 
<BODY> 
<OL type="A" start="13">
<LI>Name</LI> 
<LI>Class</LI>
<LI>Sub</LI>
<0L>
</BODY>
</HTML>

आउटपुट
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प्रश्न 3
डेफिनेशन लिस्ट को समझाइए।
उत्तर:
डेफिनेशन लिस्ट आइटम की लिस्ट और उसके विवरण की लिस्ट होती है, जिसमें लिस्ट का आइटम बाईं तरफ होता है। इस आइटम के विवरण के लिए अगली पंक्ति (Next line) में दाईं ओर एक फॉर्मेट होता है। इसवे लिए <DL> टैग का प्रयोग किया जाता है।डेफिनेशन का टाइटल देने के लिए <DT> टैग तथा डेफिनेशन के डिस्क्रिप्शन के लिए <DD> टैग का प्रयो’ किया जाता है।

उदाहरण:
<HTML> 
<HEAD>
<TITLE>Definition list </TITLE>
</HEAD> 
<BODY>
<DL> 
<DT><B>Food</B></DT>
<DD>Italian</DD> 
<DT><B>Drink</B></DT>
<DD>Juice</DD> 
</BODY> 
</HTML>

आउटपुट
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
निम्नलिखित को किसी वेब पेज में कैसे सम्मिलित किया जाता है? समझाइए। [2008, 06]
(i) इमेजेस 
(ii) बुलेट्स एवं नम्बर्स। 
अथवा 
एक वेब पेज में आप चित्रों, बुलेट्स तथा अंकों का समावेश कैसे करेंगे? उदाहरण सहित समझाइए। [2018]
उत्तर:
(i) बुलेट्स किसी वेब पेज में बुलेट्स लगाने के लिए अनऑर्डर्ड लिस्ट का प्रयोग किया जाता है। यह तीन प्रकार की बुलेट टाइप प्रदान
 करती है, जोकि disc, circle तथा square के रूप में हो सकती है। 
उदाहरण:
<HTML>
<HEAD>
<TITLE>Bullets</TITLE>
</HEAD> 
<BODY> <UL type="circle">
<LI>Game</LI>
<LI>Books</LI>
<LI>Cars</LI> 
</UL> 
</BODY> 
</HTML>

आउटपुट
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 7 HTML एडवांस्डक img-4

(ii) नम्बर्स किसी वेब पेज में नम्बर्स को दर्शाने के लिए ऑर्डर्ड लिस्ट का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए ऑर्डर्ड लिस्ट दो एट्रिब्यूट्स 
start तथा type प्रदान करती है। start एट्रिब्यूट किसी लिस्ट का प्रारम्भ नम्बर दर्शाता है तथा type एट्रिब्यूट लिस्ट के टाइप को 
दर्शाता है।
उदाहरण:
<HTML>
<HEAD>
<TITLE>Numbers</TITLE> 
</HEAD> 
<BODY> <OL type="1" start="4">
<LI>Game</LI> 
<LI>Books</LI>
<LI>Cars</LI> 
</0L>
</BODY> 
</HTML>

आउटपुट
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 7 HTML एडवांस्डक img-5

प्रश्न 2
एक वेब पेज में ग्राफिक्स (चित्र) का समावेश कैसे किया जाता है? [2007]
उत्तर:
किसी वेबसाइट को आकर्षक बनाने के लिए वेब पेज पर टेक्स्ट के अतिरिक्त इमेज आदि का भी महत्त्व है। इसके लिए HTML में <IMG> टैग उपलब्ध है। यह gif, jpg, jpeg आदि फॉर्मेट की इमेज को सपोर्ट करता है। <IMG> टैग एक एम्प्टी एलिमेण्ट हैं। अत: इसका क्लोजिंग टैग नहीं होता। इस टैग के निम्नलिखित एट्रिब्यूट्स हैं।

(i) src यह इमेज की लोकेशन अर्थात् URL को दर्शाता है।
जैसे <IMG src=”abc.jpg”>

(ii) alt इसे इमेज के अल्टरनेटिव टेक्स्ट के रूप में प्रयोग किया जाता है। alt एट्रिब्यूट की वैल्यू 1024 कैरेक्टर्स की एक स्टिंग तक हो सकती है।
जैसे <IMG alt=”New image”>

(iii) align इमेज को वेब पेज पर सेट करने के लिए एलाइनमेण्ट की आवश्यकता होती है, align एट्रिब्यूट द्वारा इमेज को Top, Bottom, Left, Right, Middle में सेट किया जा सकता है।
जैसे <IMG align = “left/right/top/bottom/middle”>

(iv) hspace तथा vspace इन एट्रिब्यूट्स द्वारा इमेज के चारों ओर स्पेस दिया जाता है। hspace द्वारा क्षैतिज तथा vspace द्वारा ऊध्र्वाधर स्थान दिया जाता है।
जैसे <IMG border = “2”>

(v) border यह एट्रिब्यूट इमेज का बॉर्डर सेट करने के लिए प्रयोग होता है।
जैसे <IMG border = “2”>

(vi) height तथा width किसी इमेज की हाइट तथा विड्थ को सेट करने के लिए इस फीचर का प्रयोग होता है।
जैसे <IMG height="10" width="5"> 

उदाहरण:
<HTML>
<HEAD>
<TITLE> IMAGE PAGE</TITLE></HEAD> 
<BODY> 
<IMG src="flower.jpg" alt="flower wallpaper" align="top" vspace="12" border="10" width="130" > 
</BODY> 
</HTML>

आउटपुट
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UP Board Class 7 Sports and Fitness Model Paper खेलकूद : खेल और स्वास्थ्य

UP Board Class 7 Sports and Fitness Model Paper are part of UP Board Class 7 Model Papers. Here we have given UP Board Class 7 Sports and Fitness Model Paper.

Board UP Board
Class Class 7
Subject Sports and Fitness
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 7 Sports and Fitness Model Paper खेलकूद : खेल और स्वास्थ्य

सत्र परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय-खेल और स्वास्थ्य

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.
शरीर फुर्तीला तथा नीरोगी कैसे बनता है?
उत्तर:
व्यायाम करने से।

प्रश्न-2.
व्यायाम कहाँ करना चाहिए?
उत्तर:
खुले स्थान में।

प्रश्न-3.
किस आसन से कद की वृद्धि होती है?
उत्तर:
पश्चिमोत्तनासन से।

प्रश्न-4.
राष्ट्रगान किसका प्रतीक है?
उत्तर:
राष्ट्रगान राष्ट्र की एकता का प्रतीक हैं।

प्रश्न-5.
हमारे राष्ट्रध्वज में उपस्थित चक्र में कितनी तीलियाँ होती हैं?
उत्तर:
24 तीलियाँ।

प्रश्न-6.
राष्ट्रगान की रचना किसने की थी?
उत्तर:
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने।

प्रश्न-7.
राष्ट्रध्वज कब फहराया जाता है?
उत्तर:
15 अगस्त एवं 26 जनवरी को।

प्रश्न-8.
मार्किंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
मार्चिग से हमें अनुशासन में रहने की शिक्षा मिलती है।

प्रश्न-9.
देश में राष्ट्रीय शोक के समय राष्ट्रध्वज का क्या किया जाता है?
उत्तर:
राष्ट्रध्वज को नियमानुसार झुकाया जाता है।

प्रश्न-10.
राष्ट्रगान कितने सेकंड में पूरा होना चाहिए?
उत्तर:
52 सेकंड में।

प्रश्न-11.
राष्ट्रध्वज किसका प्रतीक होता है?
उत्तर:
राष्ट्रध्वज देश की पहचान का प्रतीक होता है।

प्रश्न-12.
अंगों के सुधार हेतु क्या करना चाहिए?
उत्तर:
अंगों के सुधार हेतु नियमित योग, प्राणायाम, व्यायाम या पी०टी० करनी चाहिए।

प्रश्न-13.
जीतने या हारने पर अपने ऊपर नियन्त्रण रखने से कौन-सा गुण विकसित होता है?
उत्तर:
अनुशासन का।

प्रश्न-14.
सबसे लम्बी दौड़ कितने मीटर की होती है?
उत्तर:
600 मीटर की।

प्रश्न-15.
कौन-सा आसन सभी आसनों का राजा है?
उत्तर:
शीर्षासन।

प्रश्न-16.
ओलम्पिक खेलों को प्रारम्भ कहाँ हुआ?
उत्तर:
यूनान में।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-17.
शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:

  1. शारीरिक अंगों के सुधार हेतु
  2. अपनी रक्षा हेतु
  3. शरीर को फुर्तीला बनाने हेतु
  4. मनोरंजन हेतु

प्रश्न-18.
माचिंग क्या है?
उत्तर:
मार्चिग वह क्रिया है, जिसे एक निश्चित क्रम से किया जाता है। इसमें आदेशों को सुनते हुए ध्यान से क्रियाकलाप किए जाते हैं।

प्रश्न-19.
प्राथमिक चिकित्सा क्या है?
उत्तर:
जब कोई घटना घटती है, तब डॉक्टर के आने से पहले घायल व्यक्ति का जो उपचार किया जाता है, उसे प्राथमिक चिकित्सा कहते हैं।

प्रश्न-20.
राष्ट्रगान की रचना किसने की थी? यह कब स्वीकार किया गया?
उत्तर:
राष्ट्रगान की रचना गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ 24 जनवरी सन 1950 को स्वीकार किया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-21.
राष्ट्रगान गाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रगान गाते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. राष्ट्रगान के समय सावधान की मुद्रा में खड़ा होना चाहिए।
  2. राष्ट्रगान गाते समय न हिले-डुलें और न बात करें।
  3. राष्ट्रगान को सही-सही गाएँ।
  4. राष्ट्रगान का सम्मान करें।
  5. राष्ट्रगान 52 सेकंड में पूरा होना चाहिए।

प्रश्न-22.
शारीरिक शिक्षा से क्या लाभ है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा से निम्नलिखित लाभ हैं

  1. यह शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ व मजबूत बनाती है।
  2. इसके द्वारा स्फूर्ति, आनन्द व ऊर्जा प्राप्त होती है।
  3. हार-जीत के द्वारा अपने पर नियन्त्रण व अनुशासन का गुण उत्पन्न होता है।
  4. नैतिक मूल्यों जैसे सहयोग, दृढ़ता, संयम आदि का विकास होता है।
  5. शारीरिक शिक्षा से समय के सदुपयोग की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न-23.
मार्चिग क्या है? मार्चिग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
मार्चिग वह क्रिया है, जिसमें आदेशों को सुनते हुए ध्यान से मार्च किया जाता है, जैसे सेना व पुलिस के जवानों का कदम-ताल करते हुए चलना व विद्यालयों में बच्चों की ड्रिल। माचिंग करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है-सावधान की मुद्रा में खड़ा होना, गर्दन सीधी व आँखें सामने की ओर खुली रखना। विश्राम की अवस्था में दोनों हाथ पीछे करना, हाथों और पैरों को ढीला छोड़ना। बात करना, पीछे मुड़ना व रूमाल प्रयोग करना मना है।

प्रश्न-24.
शारीरिक शिक्षा क्यों आवश्यक हैं?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाने के साथ-साथ बालक के मानसिक, सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों के विकास के लिए आवश्यक है। यह शिक्षा शारीरिक अंगों के विकास के साथ, खेल व तैराकी सिखाने, अपनी रक्षा करने, शरीर को स्वस्थ रखने, फुर्तीला बनाने तथा मनोरंजन हेतु आवश्यक है।

प्रश्न-25.
‘किसी कार्य को करने के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है।’ इस कथन की पुष्टि कीजिए। उत्तर शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए जो सीख, ज्ञान और क्रियाएँ कराई जाती हैं, वही शारीरिक शिक्षा कहलाती है। पढ़ना और ज्ञान प्राप्त करना मानसिक कार्य के अन्तर्गत आते हैं। शरीर को मजबूत बनाने के लिए जो व्यायाम किए जाते हैं, वे सब शारीरिक कार्य के अन्तर्गत आते हैं। किसी भी कार्य को करने के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकसित होना आवश्यक है। पढ़ने लिखने आदि सभी कार्यों में हमारा मस्तिष्क और शरीर दोनों एक साथ कार्य करते हैं। जैसे क्रिकेट में गेंद को पकड़ने (कैच) के लिए मस्तिष्क और शरीर दोनों का प्रयोग करते हैं।

अर्धवार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय-खेल और स्वास्थ्य

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.
किस आसन को करने से स्मरण शक्ति का विकास होता है?
उत्तर:
शीर्षासन को।

प्रश्न-2.
शारीरिक तथा मानसिक विकास कैसे होता है?
उत्तर:
शरीरिक क्रियाओं द्वारा।

प्रश्न-3.
पोस्ट लाइन किस खेल से सम्बन्धित है?
उत्तर:
खो-खों से।

प्रश्न-4.
योग के कितने अंग होते हैं?
उत्तर:
आठ

प्रश्न-5.
गले सम्बन्धी रोगों में कौन-सा आसन उपयोगी है?
उत्तर:
सिंहासन

प्रश्न-6.
प्राण किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्वास को

प्रश्न-7.
मनुष्य एक बार में कितनी बार श्वास लेता है?
उत्तर:
सोलह से अट्ठारह बार

प्रश्न-8.
फेफड़े कैसे मजबूत होते हैं?
उत्तर:
प्राणायाम करने से।

प्रश्न-9.
राष्ट्र ध्वज का केसरिया रंग किसका प्रतीक है?
उत्तर:
त्याग तथा बलिदान का।

प्रश्न-10.
ऊँची कूद में प्रत्येक खिलाड़ी द्वारा कितने प्रयास किए जाते हैं?
उत्तर:
तीन

प्रश्न-11.
सिगरेट में कौन-सा विषैला रासायनिक तत्व पाया जाता है?
उत्तर:
निकोटिन

प्रश्न-12.
ओलम्पिक खेल कितने वर्षों के अन्तराल में आयोजित होता है?
उत्तर:
चार वर्षों के

प्रश्न-13.
डिस्कस किस आकार का होता है?
उत्तर:
वृत्ताकार

प्रश्न-14.
मल्ल युद्ध को वर्तमान में किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
कुश्ती

प्रश्न-15.
ओलम्पिक के ध्वज में कितने गोले हैं?
उत्तर:
पाँच

प्रश्न-16.
‘रूस्तम-ए-जहाँ’ किसे कहा जाता है?
उत्तर:
गामा पहलवान को

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-17.
व्यायाम से आप क्या समझते हैं ।
उत्तर:
मनुष्य की ऐसी क्रियाएँ, जिनसे शरीर की मांसपेशियाँ अच्छी तरह विकसित और मजबूत हो जाती हैं तथा शरीर निरोग हो जाता है, व्यायाम कहलाता है। खेलकूद व विभिन्न आसन इसके अन्तर्गत आते हैं।

प्रश्न-18.
योग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
योग शब्द युज’ से बना है। युज का अर्थ होता है जोड़ना या मिलाना। योग के द्वारा कार्य करते समय शरीर व मन में ताल-मेल बैठता है। योग एक प्रकार का आसन करने का अभ्यास है। योगाभ्यास करने से शरीर और मस्तिक दोनों स्वस्थ रहते हैं।

प्रश्न-19.
भस्त्रिका प्राणायाम कैसे किया जाता हैं? इसके चरण बताएँ।
उत्तर:
भस्त्रिका प्राणायाम 3 से 5 मिनट तक किया जाता है। इसे करने के लिए सर्वप्रथम वज्रासन में बैठ जाएँ, दोनों नासिकाओं से साँस अन्दर खींचे तथा बिना अन्दर रोके पूरी ताकत से बाहर निकालें।

प्रश्न-20.
अन्तरराष्ट्रीय खेल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय स्तर पर योग्य खिलाड़ी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में भाग लेकर खेलते हैं, उन्हें अन्तरराष्ट्रीय खेल कहते हैं। अन्तरराष्ट्रीय खेलों में ओलम्पिक, एशियाड एवं सैफ खेल प्रमुख हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-21.
व्यायाम करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ बरतनी चाहिए?

प्रश्न-22.
किन्हीं दो व्यायाम के विभिन्न चरणों को लिखिए?

प्रश्न-23.
प्राणायाम किसे कहते हैं? प्राणायाम के कोई पाँच लाभ बताएँ।

प्रश्न-24.
खेल भावना से आप क्या समझते हैं?

प्रश्न-25.
नशीले पदार्थों का सेवन करने से शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?

वार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय-खेल और स्वास्थ्य

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.
क्रिकेट की गेंद को पकड़ने के लिए किसका प्रयोग होता है?
उत्तर:
शरीर तथा मस्तिष्क का।

प्रश्न-2.
रक्त संचार कैसे बढ़ता है?
उत्तर:
अंगों की गति से।

प्रश्न-3.
कौन-सा आसान थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है?
उत्तर:
सवांगासन

प्रश्न-4.
किस आसन से मोटापा दूर होता है?
उत्तर:
पद्ममयूरासन

प्रश्न-5.
किस प्राणायाम से हृदय रोग दूर हो जाते हैं?
उत्तर:
भ्रामरी प्राणायाम

प्रश्न-6.
भारतीय संविधान ने राष्ट्रध्वज का प्रारूप कब अपनाया था?
उत्तर:
22 जुलाई 1947 की।

प्रश्न-7.
कुश्ती के गब्वे की ऊँचाई कितने मीटर होती है?
उत्तर:
मीटर

प्रश्न-8.
डिस्कस किस चीज का बना होता है?
उत्तर:
फाइबर या लकड़ी का

प्रश्न-9.
वालीबॉल में एक टीम के कितने खिलाड़ी होते हैं?
उत्तर:
बारह

प्रश्न-10.
राष्ट्रकुल खेल कितने वर्ष में अन्तराल पर आयोजित होते हैं?
उत्तर:
चार वर्ष के

प्रश्न-11.
टेक ऑफ किस खेल से सम्बन्धित है?
उत्तर:
लम्बी कूद

प्रश्न-12.
अर्जुन पुरस्कार किसे दिया जाता है?
उत्तर:
अच्छे खिलाड़ियों को।

प्रश्न-13.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किस वर्ष से प्रारम्भ किया गया?
उत्तर:
वर्ष 1985 से

प्रश्न-14.
राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार कौन-सा है?
उत्तर:
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार

प्रश्न-15.
खो-खो में एक पाली कितने मिनट की होती हैं?
उत्तर:
7 मिनट की।

प्रश्न-16.
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा महिला खिलाड़ियों को दिए जाने वाले पुरस्कार का नाम लिखिए।
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-17.
योग के कितने अंग होते हैं?
उत्तर:
योग के आठ अंग होते हैं

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि।

प्रश्न-18.
चक्रासन से होने वाले लाभ बताइए।
उत्तर:
चक्रासन से निम्नलिखित लाभ होते हैं

  1. यह रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाकर वृद्धावस्था नहीं आने देता तथा दाँतों को सक्रिय बनाता है।
  2. शरीर में स्फूर्ति एवं शक्ति बढ़ाता है।
  3. यह श्वास रोग, सिरदर्द, नेत्र विकार, सर्वाइकल तथा स्पोंडोलाइसिस में विशेष हितकारी हैं।
  4. यह हाथों तथा पैरों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।

प्रश्न-19.
सिंहासन या व्याघ्रासन की स्थिति समझाइए।
उत्तर:
सिंहासन या व्याघ्रासन करते समय यदि सम्भव हो तो सूर्य की ओर मुख करके वज्रासन में बैठकर घुटनों को थोड़ा खोलकर रखें। हाथों की अंगुलियाँ पीछे की ओर करके पैरों के बीच सीधा रखें। श्वास अन्दर भरकर जिह्वा को बाहर निकाले। सामने देखते हुए श्वास को बाहर निकालते हुए सिंहवत् गर्जना कीजिए। यह क्रिया 3-4 बार करनी चाहिए।

प्रश्न-20.
खेल उपकरण समिति क्या कार्य करती हैं?
उत्तर:
खेल उपकरण समिति सहायक समिति होती है। यह खेल के मैदान को सही तरीके से व्यवस्थित कराती है। मैदान को साफ-सुथरा तथा खेलने योग्य बनाती है। यह खिलाड़ियों के लिए सभी उपकरणों की व्यवस्था भी करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-21.
किन्हीं दो व्यायाम के विभिन्न चरणों को लिखिए।

प्रश्न-22.
सर्वाग आसन करने का तरीका बताइए।

प्रश्न-23.
प्राणायाम करने के सामान्य नियम क्या हैं? किन्हीं पाँच नियमों को बताइए।

प्रश्न-24.
खेल प्रबन्धन से तुम क्या समझते हो?

प्रश्न-25.
अन्तर विद्यालयीय प्रतियोगिता से होने वाले लाभ बताइए।

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते are the part of UP Board Solutions for Class 10 Commerce. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खातेते.

Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 2
Chapter Name समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)
                                                                                                                                                                               

प्रश्न 1.
तलपट के नीचे जो सूचनाएँ दी होती हैं, उन्हें किस नाम से जानते हैं?
(a) जर्नल
(b) समायोजनाएँ
(c) खाताबही
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) समायोजनाएँ

प्रश्न 2.
आहरण पर ब्याज व्यापार के लिए होता है।
(a) लाभ
(b) हानि
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) लाभ

प्रश्न 3.
अदत्त मजदूरी को ………….. में दर्शाया जाता है। (2014)
(a) व्यापार खाते के डेबिट पक्ष
(b) लाभ-हानि खाते के डेबिट पक्ष
(c) आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष
(d) आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष
उत्तर:
(c) आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष

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नोट पूर्ण सूचना के अभाव में अदत्त मजदूरी को तलपट के अन्दर मान लिया गया है।

प्रश्न 4.
यदि अन्तिम रहतिया तलपट के अन्दर दिया गया हो, तो उसका लेखा किस खाते में किया जाएगा?
(a) लाभ-हानि खाता।
(b) व्यापार खाता
(c) रोकड़ खाता
(d) आर्थिक चिट्ठा
उत्तर:
(d) आर्थिक चिट्ठा

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
समायोजनाओं की दोहरी प्रविष्टि आवश्यक है/अनावश्यक है।
उत्तर:
आवश्यक है

प्रश्न 2.
अदत्त व्यय वह व्यय है, जिसकी रकम अभी तक नहीं दी गई है/दी जा चुकी है।
उत्तर:
अभी तक नहीं दी (UPBoardSolutions.com) गई है

प्रश्न 3.
समायोजना में दिए गए ‘अदत्त व्यय’ को कहाँ प्रदर्शित किया जाएगा? (2016)
उत्तर:
व्यापार एवं लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में सम्बन्धित व्यय में जोड़कर व आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दिखाया जाएगा

प्रश्न 4.
तलपट में दिया गया अन्तिम रहतिया कहाँ लिखा जाता है?
उत्तर:
केवल आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में

प्रश्न 5.
अनुपार्जित आय वह आय है, जो अर्जित हो चुकी है/अभी अर्जित नहीं हुई है।
उत्तर:
अभी अर्जित नहीं हुई है।

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प्रश्न 6.
पेशगी प्राप्त किराया क्या कहलाता है?
उत्तर:
अनुपार्जित आये

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
“डेबिट हमेशा क्रेडिट के बराबर होता है।” व्याख्या कीजिए। (2017)
उत्तर:
किसी भी प्रविष्टि की शुद्धता के लिए आवश्यक है कि उसके दोनों पक्षों ऋणी और धनी (Debit and Credit) का योग बराबर हो। एक व्यवहार से दो या अधिक खाते प्रभावित होते हैं। अत: यदि एक खाते में कोई परिवर्तन (कमी या वृद्धि) होगा, तो (UPBoardSolutions.com) उसका प्रभाव दूसरे खाते पर भी पड़ेगा एवं यदि ऋणी (डेबिट) पक्ष में वृद्धि या कमी हुई, तो धनी (क्रेडिट) पक्ष में भी क्रमशः वृद्धि या कमी होगी। इसलिए डेबिट हमेशा क्रेडिट के बराबर होता है।

प्रश्न 2.
डूबत ऋण से क्या तात्पर्य है? (2007)
उत्तर:
देनदारों द्वारा जिस धनराशि का भुगतान करना अस्वीकार कर दिया जाता है अथवा परिस्थितिवश जिस धनराशि का भुगतान नहीं मिलता है, तो उस अप्राप्त धनराशि को डूबत ऋण (Bad Debts) कहते हैं। यह व्यापार के लिए हानि मानी जाती हैं।

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प्रश्न 3.
उपार्जित आय तथा अनुपार्जित आय में अन्तर बताइए। (2007)
उत्तर:
उपार्जित तथा अनुपार्जित आय में अन्तर 
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अक)

प्रश्न 1.
समायोजना के उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
समायोजना का अर्थ वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय कुछ लेन-देन ऐसे होते हैं, जिनका लेखा या तो अभी तक बिल्कुल किया ही नहीं गया है अथवा अधूरा किया गया है। इन लेन-देनों का लेखांकन, अवधि समाप्त होने पर अन्तिम खाते तैयार करते समय ही किया जाता है। ऐसे लेन-देनों को समायोजनाएँ कहते हैं और तत्सम्बन्धी जर्नल लेखे समायोजन लेखे कहलाते हैं। संक्षेप में, व्यापार के अपूर्ण या न लिखे गए लेखों को बहियों में (UPBoardSolutions.com) नियमानुसार उचित प्रकार से लिखने की कला को समायोजन कहते हैं। अत: तलपट के नीचे जो सूचनाएँ दी जाती हैं, उसे ‘समायोजना’ कहते हैं। समायोजनाओं की दोहरी प्रविष्टि करना आवश्यक होता है।

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समायोजन के लेखे करने के उद्देश्य अथवा महत्त्व समायोजन के लेखे करने की आवश्यकता को निम्न उद्देश्यों व महत्त्व द्वारा समझाया जा सकता है

  1. सही एवं पूर्ण लेखे करना कुछ अतिरिक्त लेखे होते हैं जो व्यापार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं; जैसे-अशोध्य ऋण संचिति हेतु प्रावधान, पूँजी व आहरण पर ब्याज, आदि। समायोजन लेखों के माध्यम से ही इन समस्त तथ्यों का समावेश किया जा सकता है।
  2. व्यापार की आर्थिक स्थिति ज्ञात करना व्यापार की आर्थिक स्थिति का सत्य एवं उचित चित्र प्रस्तुत करने के लिए समायोजन लेखों की आवश्यकता होती है।
  3. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित व्ययों का लेखा किसी वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित समस्त अदत्त एवं पूर्वदत्त व्ययों का ठीक प्रकार से समायोजन करके ही व्यापार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो सकता है।
  4. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित आय का लेखा समायोजन लेखों का प्रमुख उद्देश्य व्यवसाय (UPBoardSolutions.com) के किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त आय का ज्ञान प्राप्त करना है। इसी के माध्यम से आर्थिक स्थिति ज्ञात की जाती है।
  5. खातों की त्रुटियों (गलतियों) को सुधारना समायोजन लेखों के माध्यम से खातों में हुई विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारकर वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान सरलता से किया जा सकता है।
  6. शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि का पूर्ण ज्ञान समायोजन के लेखों का प्रमुख उद्देश्य वित्तीय वर्ष के सत्य एवं उचित परिणाम प्रदर्शित करना होता है। समायोजन लेखों के द्वारा ही व्यापार का शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि ज्ञात की जाती है।

प्रश्न 2.
निम्न पर टिप्पणी लिखिए।

  1. उपार्जित आय
  2. लेनदारों पर छूट के लिए संचय
  3. अन्तिम रहतिया
  4. अदत्त व्यय

उत्तर:
1. अप्राप्य या अशोध्य ऋण (Bad Debts) देनदारों द्वारा जिस धनराशि का भुगतान करना अस्वीकार कर दिया जाता है अथवा परिस्थितिवश जिस धनराशि का भुगतान नहीं मिलता है, तो इस अप्राप्त धनराशि को ‘अप्राप्य’ या ‘अशोध्य ऋण’ या ‘डूबत ऋण’ कहते हैं।
इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् किया जाता हैं-
अशोध्य ऋण खाता                                        ऋणी
देनदार का
(धनराशि अशोध्य ऋण खाते में लिखी गई)
अन्तिम खातों में लेखा अशोध्य ऋण की राशि को लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में लिखते हैं एवं आर्थिक चिट्ठे में देनदारों में से इस राशि को घटाकर दिखाते हैं।

2. आहरण पर ब्याज (Interest on Drawings) जब कोई व्यापारी अपनी निजी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए फर्म से माल या नकदी निकालता है, तो उसे आहरण’ कहा जाता है। व्यापारी द्वारा आहरण पर दिया गया ब्याज आहरण पर ब्याज’ कहलाता है।
इसका जर्नल में लेखा निम्नवत् किया जाता है
आहरण खाता                                               ऋणी
आहरण पर ब्याज खाते का
(आहरण पर ब्याज वसूला गया)
अन्तिम खातों में लेखा आहरण पर ब्याज की राशि लाभ-हानि खाते के धनी पक्ष में लिखी जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष की ओर आहरण की राशि में जोड़कर तथा पूँजी में से घटाकर दिखाई जाती है।

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3. अदत्त व्यय (Outstanding Expenses) ऐसे व्यय, जिनका चालू वित्तीय वर्ष में भुगतान नहीं किया गया है अर्थात् जिनका भुगतान बकाया है, ‘अदत्त व्यय’ कहलाते हैं। ऐसे व्यय आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दिखाए जाते हैं।
अदत्त व्यय का जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है|
(सम्बन्धित)व्यय खाता                                  ऋणी
अदत्त व्यय खाते का
(बकाया व्यय की राशि से लेखा किया गया)
अन्तिम खातों में लेखा अदत्त व्यय की धनराशि व्यापार अथवा लाभ-हानि (UPBoardSolutions.com) खाते के ऋणी पक्ष में सम्बन्धित व्यय में जोड़कर दिखाते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष में लिखते हैं।

4. पूर्वदत्त व्यय (Prepaid Expenses) ऐसे व्यय, जिनका भुगतान चालू वित्तीय वर्ष में सेवा लेने से पूर्व कर दिया गया हो, ‘पूर्वदत्त व्यय’ कहलाते हैं।
पूर्वदत्त व्यय का जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
पूर्वदत्त व्यय खाता                                       ऋणी
(सम्बन्धित) व्यय खाते का
(अग्रिम व्यय का लेखा किया गया)
अन्तिम खातों में लेखा पूर्वदत्त व्यय को व्यापार अथवा लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में सम्बन्धित व्यय में से घटाकर दिखाते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष की ओर दिखाते हैं।

5. अन्तिम रहतिया (Closing Stock) वह माल जो वित्तीय वर्ष के अन्त में बिकने से शेष रह जाता है, ‘अन्तिम रहतिया’ कहलाता है। तलपट में दिए गए अन्तिम रहतिये को केवले आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में दर्शाया जाता है, जबकि तलपट से बाहर समायोजना के रूप में दिए गए अन्तिम रहतिये को व्यापार खाते’ के धनी (Credit) पक्ष में तथा आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष दोनों में दर्शाया जाता है।
इसका जर्नल में लेखा निम्नवत् किया जाता है
अन्तिम रहतियां खाता                                 ऋणी
व्यापार खाते का
(अन्तिम रहतिया पुस्तकों में लाए)
अन्तिम खातों में लेखा अन्तिम रहतिया को व्यापार खाते के धनी (UPBoardSolutions.com) पक्ष में तथा आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में लिखते हैं।

6. देनदारों पर छट के लिए संचय (Reserve for Discount on Debtors)
व्यापारी द्वारा शीघ्र भुगतान प्राप्त करने के उद्देश्य से देनदारों को एक निश्चित प्रतिशत से छूट दी जाती है। इसके लिए व्यापारी द्वारा संचय का निर्माण किया जाता है, जिसे देनदारों पर छूट के लिए संचय’ कहा जाता है। इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् होता है
लाभ-हानि खाता                                        ऋणी
देनदारों पर छूट के लिए संचय खाते का
(देनदारों पर छूट के लिए संचय किया)
अन्तिम खातों में लेखा इसे लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में लिखते हैं। तथा आर्थिक चिढ़े में देनदारों में से इस राशि को घटाकर दिखाते हैं।

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7. लेनदारों पर छूट के लिए संचय (Reserve for Discount on Creditors) जिस प्रकार देनदारों से शीघ्र भुगतान प्राप्त होने पर हमें उन्हें छूट देते हैं, उसी प्रकार लेनदार भी शीघ्र भुगतान प्राप्त करने के लिए हमें छूट देते हैं। अतः अनुमान लगाकर उसके लिए संचय कर दिया जाता है, जो व्यापार के लिए लाभ होता है, इसे लेनदारों पर छूट के लिए संचय’ कहा जाता है।
इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् होता है
लेनदारों पर छूट के लिए संचय खाता          ऋणी
लाभ-हानि खाते का
(लेनदारों पर छूट के लिए संचय बनाया)
अन्तिम खातों में लेखा छूट की राशि को लाभ-हानि खाते में धनी पक्ष में लिखते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष की ओर लेनदारों में से घटाकर दिखाते हैं।

8. सम्पत्तियों पर ह्रास (Depreciation on Assets) स्थायी सम्पत्तियों का निरन्तर प्रयोग करने के कारण उनके मूल्य में जो कमी होती है, उस कमी को ही ‘सम्पत्तियों पर हास’ कहा जाता है
इसका जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
ह्रास खाता                                                ऋणी
सम्पत्ति खाते का
(सम्पत्ति पर ह्रास लगाया)
अन्तिम खातों में लेखा ह्रास की राशि लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में लिखी जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में सम्बन्धित सम्पत्ति में से घटाकर दिखाई जाती है।

9. अशोध्य तथा संदिग्ध ऋणों के लिए संचय (Reserve for Bad and Doubtful Debts) सम्भावित अशोध्य ऋणों की पूर्ति के लिए कुछ धनराशि प्रतिवर्ष संचय कर ली जाती है, जिसे ‘अशोध्य तथा संदिग्ध ऋणों के लिए संचय’ कहते हैं।
इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् किया जाता है
लाभ-हानि खाता                                      ऋणी
अशोध्य एवं संदिग्ध ऋण संचय खाते का
(संदिग्ध ऋणार्थ संचय निर्मित किया)
अन्तिम खातों में लेखा इसे लाभ-हानि खाते में ऋणी पक्ष की ओर (UPBoardSolutions.com) लिखते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में देनदारों में से घटाकर दिखाते हैं।

10. पूँजी पर ब्याज (Interest on Capital) पूँजी पर ब्याज दो कारणों से लगाया जाता है

  1. यदि व्यापारी व्यापार में स्वयं की पूँजी न लगाकर अन्य कहीं से ऋण के रूप में पूँजी प्राप्त करता है, तो उसे उस धन-राशि पर ब्याज देना | पड़ता है।
  2. यदि व्यापारी स्वयं व्यापार में रुपया न लगाकर, किसी दूसरी जगह पर उसे विनियोजित करता है, तो उसे विनियोजित राशि पर ब्याज प्राप्त होता है।
    इसका जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है

पूँजी पर ब्याज खाता                                ऋणी
पूँजी खाते का
(पूँजी पर ब्याज प्रदान करने हेतु लेखा किया)
अन्तिम खातों में लेखा पूँजी पर ब्याज की राशि लाभ-हानि खाते के ऋप्पी पक्ष में लिखी जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष में पूँजी में जोड़कर दिखाई जाती है।

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11. उपार्जित आय (Accrued Income) ऐसी आय, जो अर्जित तो कर ली जाती है, परन्तु वित्तीय वर्ष के अन्त तक प्राप्त नहीं होती है, ‘उपार्जित आय कहलाती है। उपार्जित आय को जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
उपार्जित आय खाता                                ऋणी
(सम्बन्धित) आय खाते का
(उपार्जित आय का लेखा किया गया)
अन्तिम खातों में लेखा उपार्जित आय की राशि को लाभ-हानि खाते के धनी पक्ष में सम्बन्धित आय में जोड़कर दिखाते हैं या धनी पक्ष की ओर ‘ पृथक् से लिख देते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में इसे सम्पत्ति पक्ष की ओर लिखते हैं।

12. अनुपार्जित आय (Unaccrued Income) ऐसी आय, जो वित्तीय वर्ष में प्राप्त तो हो गई है, परन्तु कमाई नहीं गई है, ‘अनुपार्जित आंय’ कहलाती है; जैसे–पेशगी प्राप्त किराया।
अनुपार्जित आय का जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
(सम्बन्धित) आय खाता                           ऋणी
अनुपार्जित आय खाते का
(आय पेशगी में प्राप्त हुई)
अन्तिम खातों में लेखा अनुपार्जित आय की राशि लाभ-हानि खाते के धनी पक्ष में सम्बन्धित आय में से घटाकर दिखाई जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में इसे दायित्व पक्ष की ओर लिखते हैं।

समायोजन का अर्थ
समायोजना का अर्थ वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय कुछ लेन-देन ऐसे होते हैं, जिनका लेखा या तो अभी तक बिल्कुल किया ही नहीं गया है अथवा अधूरा किया गया है। इन लेन-देनों का लेखांकन, अवधि समाप्त होने पर अन्तिम खाते तैयार करते समय ही किया जाता है। ऐसे लेन-देनों को समायोजनाएँ कहते हैं और तत्सम्बन्धी जर्नल लेखे समायोजन लेखे कहलाते हैं। संक्षेप में, व्यापार के अपूर्ण या न लिखे गए लेखों को बहियों (UPBoardSolutions.com) में नियमानुसार उचित प्रकार से लिखने की कला को समायोजन कहते हैं। अत: तलपट के नीचे जो सूचनाएँ दी जाती हैं, उसे ‘समायोजना’ कहते हैं। समायोजनाओं की दोहरी प्रविष्टि करना आवश्यक होता है।

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समायोजन के लेखे करने के उद्देश्य अथवा महत्त्व समायोजन के लेखे करने की आवश्यकता को निम्न उद्देश्यों व महत्त्व द्वारा समझाया जा सकता है

  1. सही एवं पूर्ण लेखे करना कुछ अतिरिक्त लेखे होते हैं जो व्यापार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं; जैसे-अशोध्य ऋण संचिति हेतु प्रावधान, पूँजी व आहरण पर ब्याज, आदि। समायोजन लेखों के माध्यम से ही इन समस्त तथ्यों का समावेश किया जा सकता है।
  2. व्यापार की आर्थिक स्थिति ज्ञात करना व्यापार की आर्थिक स्थिति का सत्य एवं उचित चित्र प्रस्तुत करने के लिए समायोजन लेखों की आवश्यकता होती है।
  3. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित व्ययों का लेखा किसी वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित समस्त अदत्त एवं पूर्वदत्त व्ययों का ठीक प्रकार से समायोजन करके ही व्यापार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो सकता है।
  4. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित आय का लेखा समायोजन लेखों का प्रमुख उद्देश्य व्यवसाय के किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त आय का ज्ञान प्राप्त करना है। इसी के माध्यम से आर्थिक स्थिति ज्ञात की जाती है।
  5. खातों की त्रुटियों (गलतियों) को सुधारना समायोजन लेखों के माध्यम (UPBoardSolutions.com) से खातों में हुई विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारकर वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान सरलता से किया जा सकता है।
  6. शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि का पूर्ण ज्ञान समायोजन के लेखों का प्रमुख उद्देश्य वित्तीय वर्ष के सत्य एवं उचित परिणाम प्रदर्शित करना होता है। समायोजन लेखों के द्वारा ही व्यापार का शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि ज्ञात की जाती है। विभिन्न समायोजनाएँ व उनकी जर्नल प्रविष्टियाँ इसके लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 देखें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अक)

प्रश्न 1.
समायोजनाएँ क्या हैं? इनके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए। समायोजनाओं के किन्हीं आठ प्रकारों का वर्णन कीजिए। (2008)
अथवा
समायोजनाओं से आप क्या समझते हैं? समायोजनाएँ क्यों आवश्यक होती हैं? किन्हीं चार समायोजनाओं के विवरण सहित उपयुक्त रीति से जर्नल लेखे कीजिए। (2013)
अथवा
अन्तिम खाते बनाते समय समायोजन लेखे क्यों किए जाते हैं? किन्हीं तीन समायोजन लेखों की विवेचना कीजिए और उचित रूप से तत्सम्बन्धी लेखे भी दीजिए। (2007)
अथवा
समायोजन लेखे क्यों किए जाते हैं? किन्हीं चार प्रकार की समायोजनाओं से सम्बन्धित जर्नल लेखे दीजिए। (Imp 2010, 09)
उत्तर:
समायोजना का अर्थ वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय कुछ लेन-देन ऐसे होते हैं, जिनका लेखा या तो अभी तक बिल्कुल किया ही नहीं गया है अथवा अधूरा किया गया है। इन लेन-देनों का लेखांकन, अवधि समाप्त होने पर अन्तिम खाते तैयार करते (UPBoardSolutions.com) समय ही किया जाता है। ऐसे लेन-देनों को समायोजनाएँ कहते हैं और तत्सम्बन्धी जर्नल लेखे समायोजन लेखे कहलाते हैं। संक्षेप में, व्यापार के अपूर्ण या न लिखे गए लेखों को बहियों में नियमानुसार उचित प्रकार से लिखने की कला को समायोजन कहते हैं। अत: तलपट के नीचे जो सूचनाएँ दी जाती हैं, उसे ‘समायोजना’ कहते हैं। समायोजनाओं की दोहरी प्रविष्टि करना आवश्यक होता है।

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समायोजन के लेखे करने के उद्देश्य अथवा महत्त्व समायोजन के लेखे करने की आवश्यकता को निम्न उद्देश्यों व महत्त्व द्वारा समझाया जा सकता है

  1. सही एवं पूर्ण लेखे करना कुछ अतिरिक्त लेखे होते हैं जो व्यापार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं; जैसे-अशोध्य ऋण संचिति हेतु प्रावधान, पूँजी व आहरण पर ब्याज, आदि। समायोजन लेखों के माध्यम से ही इन समस्त तथ्यों का समावेश किया जा सकता है।
  2. व्यापार की आर्थिक स्थिति ज्ञात करना व्यापार की आर्थिक स्थिति का सत्य एवं उचित चित्र प्रस्तुत करने के लिए समायोजन लेखों की आवश्यकता होती है।
  3. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित व्ययों का लेखा किसी वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित समस्त अदत्त एवं पूर्वदत्त व्ययों का ठीक प्रकार से समायोजन करके ही व्यापार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो सकता है।
  4. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित आय का लेखा समायोजन लेखों का प्रमुख उद्देश्य व्यवसाय के किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त आय का ज्ञान प्राप्त करना है। इसी के माध्यम से आर्थिक स्थिति ज्ञात की जाती है।
  5. खातों की त्रुटियों (गलतियों) को सुधारना समायोजन लेखों के माध्यम से खातों में हुई विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारकर वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान सरलता से किया जा सकता है।
  6. शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि का पूर्ण ज्ञान समायोजन के लेखों का प्रमुख उद्देश्य वित्तीय (UPBoardSolutions.com) वर्ष के सत्य एवं उचित परिणाम प्रदर्शित करना होता है। समायोजन लेखों के द्वारा ही व्यापार का शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि ज्ञात की जाती है। विभिन्न समायोजनाएँ व उनकी जर्नल प्रविष्टियाँ इसके लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 देखें।

प्रश्न 2.
अन्तिम खाते में किए जाने वाले किन्हीं चार समायोजनाओं के बारे में लिखिए। उनके लिए जर्नल लेखे भी दीजिए। (2014)
अथवा
समायोजनाओं से आप क्या समझते हैं? इसके किन्हीं छः प्रकारों के बारे में लिखिए। तत्सम्बन्धी जर्नल लेखे भी दीजिए। (2012)
अथवा
विभिन्न प्रकार की समायोजनाओं का वर्णन कीजिए तथा उनके जर्नल लेखे भी दीजिए। (2011)
अथवा
समायोजनाओं से आप क्या समझते हैं? अन्तिम खाते तैयार करते समय किए जाने वाले किन्हीं आठ समायोजनाओं की विवेचना कीजिए तथा उनसे सम्बन्धित जर्नल प्रविष्टियाँ भी दीजिए। (2006)
उत्तर:
समायोजन का अर्थ 
समायोजना का अर्थ वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय कुछ लेन-देन ऐसे होते हैं, जिनका लेखा या तो अभी तक बिल्कुल किया ही नहीं गया है अथवा अधूरा किया गया है। इन लेन-देनों का लेखांकन, अवधि समाप्त होने पर अन्तिम खाते तैयार करते समय ही किया जाता है। ऐसे लेन-देनों को समायोजनाएँ कहते हैं और तत्सम्बन्धी जर्नल लेखे समायोजन लेखे कहलाते हैं। संक्षेप में, व्यापार के अपूर्ण या न लिखे गए लेखों को बहियों में नियमानुसार उचित प्रकार से लिखने की कला को समायोजन कहते हैं। अत: तलपट के नीचे जो सूचनाएँ दी जाती हैं, उसे ‘समायोजना’ कहते हैं। समायोजनाओं की दोहरी प्रविष्टि करना आवश्यक होता है।

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समायोजन के लेखे करने के उद्देश्य अथवा महत्त्व समायोजन के लेखे करने की आवश्यकता को निम्न उद्देश्यों व महत्त्व द्वारा समझाया जा सकता है

  1. सही एवं पूर्ण लेखे करना कुछ अतिरिक्त लेखे होते हैं जो व्यापार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं; जैसे-अशोध्य ऋण संचिति हेतु प्रावधान, पूँजी व आहरण पर ब्याज, आदि। समायोजन लेखों के माध्यम से ही इन समस्त तथ्यों का समावेश किया जा सकता है।
  2. व्यापार की आर्थिक स्थिति ज्ञात करना व्यापार की आर्थिक स्थिति का सत्य एवं उचित चित्र प्रस्तुत करने के लिए समायोजन लेखों की आवश्यकता होती है।
  3. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित व्ययों का लेखा किसी वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित समस्त अदत्त एवं पूर्वदत्त व्ययों का ठीक प्रकार से समायोजन करके ही व्यापार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो सकता है।
  4. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित आय का लेखा समायोजन लेखों (UPBoardSolutions.com) का प्रमुख उद्देश्य व्यवसाय के किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त आय का ज्ञान प्राप्त करना है। इसी के माध्यम से आर्थिक स्थिति ज्ञात की जाती है।
  5. खातों की त्रुटियों (गलतियों) को सुधारना समायोजन लेखों के माध्यम से खातों में हुई विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारकर वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान सरलता से किया जा सकता है।
  6. शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि का पूर्ण ज्ञान समायोजन के लेखों का प्रमुख उद्देश्य वित्तीय वर्ष के सत्य एवं उचित परिणाम प्रदर्शित करना होता है। समायोजन लेखों के द्वारा ही व्यापार का शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि ज्ञात की जाती है।

1. अप्राप्य या अशोध्य ऋण (Bad Debts) देनदारों द्वारा जिस धनराशि का भुगतान करना अस्वीकार कर दिया जाता है अथवा परिस्थितिवश जिस धनराशि का भुगतान नहीं मिलता है, तो इस अप्राप्त धनराशि को ‘अप्राप्य’ या ‘अशोध्य ऋण’ या ‘डूबत ऋण’ कहते हैं।
इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् किया जाता हैं-
अशोध्य ऋण खाता                                        ऋणी
देनदार का
(धनराशि अशोध्य ऋण खाते में लिखी गई)
अन्तिम खातों में लेखा अशोध्य ऋण की राशि को लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में लिखते हैं एवं आर्थिक चिट्ठे में देनदारों में से इस राशि को घटाकर दिखाते हैं।

2. आहरण पर ब्याज (Interest on Drawings) जब कोई व्यापारी अपनी निजी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए फर्म से माल या नकदी निकालता है, तो उसे आहरण’ कहा जाता है। व्यापारी द्वारा आहरण पर दिया गया ब्याज आहरण पर ब्याज’ कहलाता है।
इसका जर्नल में लेखा निम्नवत् किया जाता है
आहरण खाता                                               ऋणी
आहरण पर ब्याज खाते का
(आहरण पर ब्याज वसूला गया)
अन्तिम खातों में लेखा आहरण पर ब्याज की राशि लाभ-हानि खाते के धनी पक्ष में लिखी जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष की ओर आहरण की राशि में जोड़कर तथा पूँजी में से घटाकर दिखाई जाती है।

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3. अदत्त व्यय (Outstanding Expenses) ऐसे व्यय, जिनका चालू वित्तीय (UPBoardSolutions.com) वर्ष में भुगतान नहीं किया गया है अर्थात् जिनका भुगतान बकाया है, ‘अदत्त व्यय’ कहलाते हैं। ऐसे व्यय आर्थिक चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दिखाए जाते हैं।
अदत्त व्यय का जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है|
(सम्बन्धित)व्यय खाता                                  ऋणी
अदत्त व्यय खाते का
(बकाया व्यय की राशि से लेखा किया गया)
अन्तिम खातों में लेखा अदत्त व्यय की धनराशि व्यापार अथवा लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में सम्बन्धित व्यय में जोड़कर दिखाते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष में लिखते हैं।

4. पूर्वदत्त व्यय (Prepaid Expenses) ऐसे व्यय, जिनका भुगतान चालू वित्तीय वर्ष में सेवा लेने से पूर्व कर दिया गया हो, ‘पूर्वदत्त व्यय’ कहलाते हैं।
पूर्वदत्त व्यय का जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
पूर्वदत्त व्यय खाता                                       ऋणी
(सम्बन्धित) व्यय खाते का
(अग्रिम व्यय का लेखा किया गया)
अन्तिम खातों में लेखा पूर्वदत्त व्यय को व्यापार अथवा लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में सम्बन्धित व्यय में से घटाकर दिखाते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष की ओर दिखाते हैं।

5. अन्तिम रहतिया (Closing Stock) वह माल जो वित्तीय वर्ष के अन्त में बिकने से शेष रह जाता है, ‘अन्तिम रहतिया’ कहलाता है। तलपट में दिए गए अन्तिम रहतिये को केवले आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में दर्शाया जाता है, जबकि तलपट से बाहर समायोजना के रूप में दिए गए अन्तिम रहतिये को व्यापार खाते’ के धनी (Credit) पक्ष में तथा आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष दोनों में दर्शाया जाता है।
इसका जर्नल में लेखा निम्नवत् किया जाता है
अन्तिम रहतियां खाता                                 ऋणी
व्यापार खाते का
(अन्तिम रहतिया पुस्तकों में लाए)
अन्तिम खातों में लेखा अन्तिम रहतिया को व्यापार खाते के धनी पक्ष में तथा आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में लिखते हैं।

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6. देनदारों पर छट के लिए संचय (Reserve for Discount on Debtors)
व्यापारी द्वारा शीघ्र भुगतान प्राप्त करने के उद्देश्य से देनदारों को एक निश्चित प्रतिशत से छूट दी जाती है। इसके लिए व्यापारी द्वारा संचय का निर्माण किया जाता है, जिसे देनदारों पर छूट के लिए संचय’ कहा जाता है। इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् होता है
लाभ-हानि खाता                                        ऋणी
देनदारों पर छूट के लिए संचय खाते का
(देनदारों पर छूट के लिए संचय किया)
अन्तिम खातों में लेखा इसे लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में लिखते हैं। तथा आर्थिक चिढ़े में देनदारों में से इस राशि को घटाकर दिखाते हैं।

7. लेनदारों पर छूट के लिए संचय (Reserve for Discount on Creditors) जिस प्रकार देनदारों से शीघ्र भुगतान प्राप्त होने पर हमें उन्हें छूट देते हैं, उसी प्रकार लेनदार भी शीघ्र भुगतान प्राप्त करने के लिए हमें छूट देते हैं। अतः अनुमान लगाकर उसके लिए (UPBoardSolutions.com) संचय कर दिया जाता है, जो व्यापार के लिए लाभ होता है, इसे लेनदारों पर छूट के लिए संचय’ कहा जाता है।
इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् होता है
लेनदारों पर छूट के लिए संचय खाता          ऋणी
लाभ-हानि खाते का
(लेनदारों पर छूट के लिए संचय बनाया)
अन्तिम खातों में लेखा छूट की राशि को लाभ-हानि खाते में धनी पक्ष में लिखते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष की ओर लेनदारों में से घटाकर दिखाते हैं।

8. सम्पत्तियों पर ह्रास (Depreciation on Assets) स्थायी सम्पत्तियों का निरन्तर प्रयोग करने के कारण उनके मूल्य में जो कमी होती है, उस कमी को ही ‘सम्पत्तियों पर हास’ कहा जाता है।
इसका जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
ह्रास खाता                                                ऋणी
सम्पत्ति खाते का
(सम्पत्ति पर ह्रास लगाया)
अन्तिम खातों में लेखा ह्रास की राशि लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में लिखी जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में सम्बन्धित सम्पत्ति में से घटाकर दिखाई जाती है।

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9. अशोध्य तथा संदिग्ध ऋणों के लिए संचय (Reserve for Bad and Doubtful Debts) सम्भावित अशोध्य ऋणों की पूर्ति के लिए कुछ धनराशि प्रतिवर्ष संचय कर ली जाती है, जिसे ‘अशोध्य तथा संदिग्ध ऋणों के लिए संचय’ कहते हैं।
इसका लेखा जर्नल में निम्नवत् किया जाता है
लाभ-हानि खाता                                      ऋणी
अशोध्य एवं संदिग्ध ऋण संचय खाते का
(संदिग्ध ऋणार्थ संचय निर्मित किया)
अन्तिम खातों में लेखा इसे लाभ-हानि खाते में ऋणी पक्ष की ओर लिखते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में देनदारों में से घटाकर दिखाते हैं।

10. पूँजी पर ब्याज (Interest on Capital) पूँजी पर ब्याज दो कारणों से लगाया जाता है

  1. यदि व्यापारी व्यापार में स्वयं की पूँजी न लगाकर अन्य कहीं से ऋण के रूप में पूँजी प्राप्त करता है, तो उसे उस धन-राशि पर ब्याज देना | पड़ता है।
  2. यदि व्यापारी स्वयं व्यापार में रुपया न लगाकर, किसी दूसरी जगह पर उसे विनियोजित करता है, तो उसे विनियोजित राशि पर ब्याज प्राप्त होता है।
    इसका जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है

पूँजी पर ब्याज खाता                                ऋणी
पूँजी खाते का
(पूँजी पर ब्याज प्रदान करने हेतु लेखा किया)
अन्तिम खातों में लेखा पूँजी पर ब्याज की राशि लाभ-हानि खाते के ऋप्पी पक्ष में लिखी जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में दायित्व पक्ष में पूँजी में जोड़कर दिखाई जाती है।

11. उपार्जित आय (Accrued Income) ऐसी आय, जो अर्जित तो कर ली जाती है, परन्तु वित्तीय वर्ष के अन्त तक प्राप्त नहीं होती है, ‘उपार्जित आय कहलाती है। उपार्जित आय को जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
उपार्जित आय खाता                                ऋणी
(सम्बन्धित) आय खाते का
(उपार्जित आय का लेखा किया गया)
अन्तिम खातों में लेखा उपार्जित आय की राशि को लाभ-हानि खाते के धनी (UPBoardSolutions.com) पक्ष में सम्बन्धित आय में जोड़कर दिखाते हैं या धनी पक्ष की ओर ‘ पृथक् से लिख देते हैं तथा आर्थिक चिट्ठे में इसे सम्पत्ति पक्ष की ओर लिखते हैं।

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12. अनुपार्जित आय (Unaccrued Income) ऐसी आय, जो वित्तीय वर्ष में प्राप्त तो हो गई है, परन्तु कमाई नहीं गई है, ‘अनुपार्जित आंय’ कहलाती है; जैसे–पेशगी प्राप्त किराया।
अनुपार्जित आय का जर्नल लेखा निम्नवत् किया जाता है
(सम्बन्धित) आय खाता                           ऋणी
अनुपार्जित आय खाते का
(आय पेशगी में प्राप्त हुई)
अन्तिम खातों में लेखा अनुपार्जित आय की राशि लाभ-हानि खाते के धनी पक्ष में सम्बन्धित आय में से घटाकर दिखाई जाती है तथा आर्थिक चिट्ठे में इसे दायित्व पक्ष की ओर लिखते हैं।

प्रश्न 3.
समायोजन लेखों से क्या आशय है? निम्न समायोजनाओं के जर्नल लेखे कल्पित धनराशि दिखाते हुए कीजिए। (2016)

  1. अन्तिम रहतिया
  2. पूँजी पर ब्याज
  3. आहरण पर ब्याज
  4. देनदारों पर छूट के लिए प्रावधान
  5. अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान
  6. फर्नीचर पर हास

उत्तर:
समायोजन लेखों से आशय 
समायोजना का अर्थ वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय कुछ लेन-देन ऐसे होते हैं, जिनका लेखा या तो अभी तक बिल्कुल किया ही नहीं गया है अथवा अधूरा किया गया है। इन लेन-देनों का लेखांकन, अवधि समाप्त होने पर अन्तिम खाते तैयार करते समय ही किया जाता है। ऐसे लेन-देनों को समायोजनाएँ कहते हैं और तत्सम्बन्धी जर्नल लेखे समायोजन लेखे कहलाते हैं। संक्षेप में, व्यापार के अपूर्ण या न लिखे गए लेखों को बहियों (UPBoardSolutions.com) में नियमानुसार उचित प्रकार से लिखने की कला को समायोजन कहते हैं। अत: तलपट के नीचे जो सूचनाएँ दी जाती हैं, उसे ‘समायोजना’ कहते हैं। समायोजनाओं की दोहरी प्रविष्टि करना आवश्यक होता है।

समायोजन के लेखे करने के उद्देश्य अथवा महत्त्व समायोजन के लेखे करने की आवश्यकता को निम्न उद्देश्यों व महत्त्व द्वारा समझाया जा सकता है

  1. सही एवं पूर्ण लेखे करना कुछ अतिरिक्त लेखे होते हैं जो व्यापार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं; जैसे-अशोध्य ऋण संचिति हेतु प्रावधान, पूँजी व आहरण पर ब्याज, आदि। समायोजन लेखों के माध्यम से ही इन समस्त तथ्यों का समावेश किया जा सकता है।
  2. व्यापार की आर्थिक स्थिति ज्ञात करना व्यापार की आर्थिक स्थिति का सत्य एवं उचित चित्र प्रस्तुत करने के लिए समायोजन लेखों की आवश्यकता होती है।
  3. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित व्ययों का लेखा किसी वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित समस्त अदत्त एवं पूर्वदत्त व्ययों का ठीक प्रकार से समायोजन करके ही व्यापार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो सकता है।
  4. वित्तीय वर्ष से सम्बन्धित आय का लेखा समायोजन लेखों का प्रमुख उद्देश्य व्यवसाय के किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त आय का ज्ञान प्राप्त करना है। इसी के माध्यम से आर्थिक स्थिति ज्ञात की जाती है।
  5. खातों की त्रुटियों (गलतियों) को सुधारना समायोजन लेखों के माध्यम से खातों में हुई विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारकर वास्तविक आर्थिक स्थिति का ज्ञान सरलता से किया जा सकता है।
  6. शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि का पूर्ण ज्ञान समायोजन के लेखों का प्रमुख उद्देश्य वित्तीय वर्ष के सत्य एवं उचित परिणाम प्रदर्शित करना होता है। समायोजन लेखों के द्वारा ही व्यापार का शुद्ध लाभ अथवा शुद्ध हानि ज्ञात की जाती है। विभिन्न समायोजनाएँ व (UPBoardSolutions.com) उनकी जर्नल प्रविष्टियाँ इसके लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 देखें।

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जर्नल लेखे
(कल्पित धनराशि)

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

क्रियात्मक प्रश्न (8 अंट)

प्रश्न 1.
अदत्त वेतन, पूर्वदत्त किराये, पूँजी पर 5% ब्याज तथा फर्नीचर पर 10% हा की समायोजनाएँ करते हुए काल्पनिक आँकड़ों से व्यापारिक एवं लाभ-हा खाता तथा आर्थिक चिट्ठा बनाइए। (2016)
हल
ऋणी                                         व्यापार खाता                              धनी
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

आर्थिक चिट्ठा
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 2

प्रश्न 2.
निम्नलिखित समायोजनाओं के लिए उचित रूप से जर्नल में लेखा कीजिए।

  1. कर्मचारियों का ₹ 6,000 वेतन अदत्त है।
  2. पूर्वदत्त बीमा प्रीमियम ₹ 1,500 है।
  3. पूँजी ₹ 1,00,000 पर 6% से ब्याज लगाना है।
  4. ₹ 1,50,000 के भवन पर 10% से हास लगाना है।
  5. कमीशन का ₹ 400 अदत्त है।

हल
जर्नल लेखा
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

प्रश्न 3.
एक व्यवसायी ने व्यक्तिगत खर्च के लिए वर्ष के दौरान ₹ 2,400 का आहरण किया। आहरण पर 3% की दर से ब्याज लगाते हुए जर्नल की प्रविष्टियाँ कीजिए। व्यापारिक पूँजी ₹ 18,000 थी। 31 मार्च, 2006 को लाभ-हानि खाता एवं आर्थिक चिट्ठा भी बनाइए। (2007)
हल           
जर्नल लेखा

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 3

UP Board Solutions

लाभ-हानि खाता

ऋणी        (31 मार्च, 2006 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)     धनी
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 4
आर्थिक चिट्ठा
(31 मार्च, 2006 को)
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 5

प्रश्न 4.
अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए संचय से आप क्या समझते हैं? 31 दिसम्बर, 2006 को किताब महल की पुस्तकों में कुल देनदार ₹ 40,000 के थे। उन पर 5% की दर से अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए संचय करना है। उपरोक्त समायोजन के सम्बन्ध में जर्नल। लेखे कीजिए और उन्हें 31 दिसम्बर, 2006 को लाभ-हानि खाते एवं आर्थिक चिट्ठे में प्रदर्शित कीजिए। (2006)
हल
अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए संचय से आशय
इसके लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 का उत्तर देखें।

 जर्नल लेखा
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

लाभ-हानि खाता
ऋणी   (31 दिसम्बर, 2006 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)      धनी
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 6

आर्थिक चिट्ठा
(31 दिसम्बर, 2006 को)
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 7

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित सूचनाओं से अवनीश कुमार, चेन्नई का 31 दिसम्बर, 2007 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए लाभ-हानि खाता तैयार कीजिए। मशीनरी ₹ 80,000, छूट दिया ₹ 350, बैंक व्यय ₹ 75, देनदार ₹ 45,000, वेतन १ 6,800, अशोध्य ऋणार्थ संचय है 525, बीमा प्रीमियम ₹ 2,000, विज्ञापन ₹ 10,000, छूट प्राप्त है ₹ 800, सकल लाभ ₹ 1,09,100, पूँजी  ₹ 50,000, लेनदार ₹ 35,000|
समायोजनाएँ

  1. मशीनरी पर 6% की दर से हास
  2. पूँजी पर 5% वार्षिक ब्याज
  3. अशोध्य ऋणार्थ संचय ₹ 1,000 (2008)

हल                   लाभ-हानि खातो
ऋणी (31 दिसम्बर, 2007 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए) (UPBoardSolutions.com) धनी
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 8

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित सूचनाओं से अकरमुल्लाह, असम को 31 दिसम्बर, 2008 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए लाभ-हानि खाता तैयार कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते
समायोजनाएँ

  1. अदत्त वेतन ₹ 500, पूर्वदत्त बीमा र 2001
  2. देनदारों पर 5% की दर से अशोध्य ऋण हेतु संचय।
  3. मशीनरी पर 15%, भवन पर 10% तथा फर्नीचर पर 6% की दर से हास। (2009)

हल                            लाभ -हानि खाता
ऋणी    (31 दिसम्बर, 2008 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)    धनी
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प्रश्न 7.
निम्नलिखित सूचनाओं से मैसर्स केशव एण्ड सन्स का 31 दिसम्बर, 2010 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए लाभ-हानि खाता तैयार कीजिए। हाथ में रोकड़ के ₹ 1,000, बैंक में रोकड़ ₹ 5,000, मशीनरी ₹ 21,000, देनदार ₹ 45,000, छूट (क्रेडिट) ₹ 1,750, मरम्मत ₹ 1,200, अशोध्य ऋण ₹ 650, विज्ञापन व्यय ₹ 4,500, बीमा प्रीमियम  ₹ 4,200, पूँजी ₹ 45,000, सकल लाभ ₹ 81,000।
समायोजनाएँ

  1. पूर्वदत्त बीमा प्रीमियम 600
  2. अशोध्य ऋण १ 500 तथा देनदारों पर 5% की दर से संदिग्ध ऋणार्थ संचय
  3. 6% प्रतिवर्ष की दर से पूँजी पर ब्याज।
  4. 10% की दर से मशीनरी पर हास। (2011)

हल
लाभ-हानि खाता
ऋणी      (31 दिसम्बर, 2010 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)      धनी

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

प्रश्न 8.
निम्नलिखित सूचनाओं से मैसर्स किंग्सले ब्रदर्स का 31 दिसम्बर, 2010 को आर्थिक चिट्ठा बनाइए। रोकड़ ₹ 16,000, बैंक ₹ 24,000, देनदार ₹ 61,000, मशीनरी ₹ 74,000, भवन.₹ 1,50,000, प्राप्य विपत्र ₹ 15,000, देय विपत्र ₹ 14,000, लेनदार ₹ 21,000, पूँजी ₹ 2,75,000, आहरण ₹ 16,000, अशोध्य ऋण संचय ₹ 4,500, अन्तिम रहतिया ₹ 17,350, शुद्ध लाभ ₹ 31,460, फर्नीचर ₹ 6,000|
अन्य सूचनाएँ निम्नांकित समायोजनाओं के पश्चात् शुद्ध लाभ की गणना की गई थी।

  1. अदत्त वेतन ₹ 5,0001
  2. पूर्वदत्त बीमा प्रीमियम ₹ 600।
  3. अशोध्य ऋण ₹ 4,000 तथा अशोध्य ऋणार्थ संचय देनदारों पर 5% की दर से।
  4. पूँजी और आहरण पर 6% की दर से ब्याज।
  5. मशीनरी पर 15% की दर से हास। (2011)

हल
आर्थिक चिट्ठा
(31 दिसम्बर, 2010 को)
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 9
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

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प्रश्न 9.
31 मार्च, 2016 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए ‘सागर ट्रेडर्स’ के अन्तिम खाते निम्नांकित सूचनाओं के आधार पर बनाइए।

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 8 सन्देशवाहक प्रणालियाँ 10

समायोजनाएँ

  1. अन्तिम रहतिया ₹ 32,000
  2. पूर्वदत्त कर ₹ 6001
  3. हास की व्यवस्था कीजिए- प्लाण्ट पर 10% एवं फर्नीचर पर 15%
  4. अशोध्य ऋण प्रावधान को ₹ 400 से बढ़ाइए। (2017)

हल
‘सागर ट्रेडर्स’ की पुस्तकों में व्यापार एवं लाभ-हानि खाता
ऋणी       (31 मार्च, 2016 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)           धनी
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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 2 समायोजनाओं सहित अन्तिम खाते

आर्थिक चिट्ठा
(31 मार्च, 2016 को)
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प्रश्न 10.
मैसर्स माताराम, दाताराम, कानपुर वाले के निम्नलिखित तलपट से 31 दिसम्बर, 2013 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए व्यापार खाता, लाभ-हानि खाता एवं उसी तिथि का आर्थिक चिट्ठा तैयार कीजिए।
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समायोजनाएँ

  1. 31 दिसम्बर, 2013 को रहतिये का मूल्यांकन ? ₹ 45,000 किया गया।
  2. मशीनरी, भूमि व भवन का 10% की दर से होस काटा गया।
  3. देनदारों पर 5% की दर से अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए संचय कीजिए।
  4. अदत्त वेतन ₹ 2,500 था। (2014)

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व्यापार एवं लाभ-हानि खाता
ऋणी    (31 दिसम्बर, 2013 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)     धनी
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आर्थिक चिट्ठा
(31 दिसम्बर, 2013 को)
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प्रश्न 11.
निम्नलिखित तलपट से 31 मार्च, 2014 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए व्यापार खाता, लाभ-हानि खाता तथा उसी तिथि का आर्थिक चिट्ठा तैयार कीजिए।

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समायोजनाएँ

  1. अन्तिम रहतिया ₹ 1,500।
  2. मशीन पर 5% प्रतिवर्ष की दर से हास काटिए।
  3. देनदारों पर 5% की दर से अप्राप्य एवं संदिग्ध (UPBoardSolutions.com) ऋणों के लिए संचय कीजिए।
  4. 2% की दर से देनदारों पर कटौती के लिए संचय कीजिए।
  5. ₹ 200 वेतन अदत्त है। (2015)

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व्यापार एवं लाभ-हानि खाता

ऋणी       (31 मार्च, 2014 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)      धनी
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आर्थिक चिट्ठा
(31 मार्च, 2014 को)
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नोट डूबत ऋण के लिए संचय = 8000×5% = 8,000×5= ₹ 400
देनदारों पर कटौती के लिए 2% संचय = 8,000- 400 = ₹ 7,600
=7,600×2%=7,600×2 = ₹ 152

प्रश्न 12.
मैसर्स मंगतराम, संगतराम, जबलपुर वाले के निम्नलिखित तलपट से 31 दिसम्बर, 2013 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए व्यापार खाता, लाभ-हानि खाता एवं उसी तिथि का आर्थिक चिट्ठा तैयार कीजिए।
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समायोजनाएँ

  1. 31 दिसम्बर, 2013 को अन्तिम रहतिये को मूल्य ₹ 16,000 था।
  2. मशीनरी पर 10% की देरे से ह्रास लगाना है।
  3. देनदारों पर 5% की दर से अशोध्य ऋणार्थ संचय बनाइए।
  4. अदत्त वेतन ₹ 2,000 है। (2013)

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व्यापार एवं लाभ-हानि खाता
ऋणी (31 दिसम्बर, 2013 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए) धनी
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आर्थिक चिट्ठा
(31 दिसम्बर, 2013 को)
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प्रश्न 13.
31 मार्च, 2017 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए ‘सागर ट्रेडर्स’ अन्तिम खाते निम्नांकित सूचनाओं के आधार पर बनाइए।

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समायोजनाएँ

  1. अन्तिम रहतिया ₹ 32,000
  2. पूँजी पर 6% और आहरण पर 5% ब्याज लगाना है।
  3. पूर्वदत्त कर ₹ 300 और उपार्जित कमीशन 720 है।
  4. अशोध्य ऋण संचय देनदारों पर 25% किया जाना है। (2018)

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लाभ-हानि खाता
ऋणी   (31 मार्च, 2017 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)      धनी
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आर्थिक चिट्ठा
(31 मार्च, 2017 को)
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प्रश्न 14.
31 मार्च, 2015 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए ‘सिंह ट्रेडर्स’ के अन्तिम खाते निम्नांकित सूचनाओं के आधार पर बनाइए।
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समायोजनाएँ

  1. अन्तिम रहतिया ₹21,4991
  2. ₹4,200 के उधार क्रय को नहीं लिखा गया है।
  3. ₹300 अशोध्य ऋण के अपलिखित कीजिए तथा ₹1,000 अशोध्य एवं संदिग्ध ऋण हेतु प्रावधान कीजिए।
  4. ₹2,000 फर्नीचर के क्रय को भूलवश क्रय बही में लिख दिया गया है।

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व्यापार एवं लाभ-हानि खाता

ऋणी     (31 मार्च, 2015 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए)    धनी
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आर्थिक चिट्ठा
(31 मार्च, 2015 को)

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