UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का गठन एवं कार्य (अनुभाग – दो)

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विर] उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का गठन कैसे होता है ? इसके प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। [2013, 14]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के कार्यों एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए। [2012]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के किन्हीं दो कार्यों को बताइए। [2010]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के तीन प्रमुख कार्य लिखिए। [2015, 17]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद का गठन कैसे होता है? [2017]
उत्तर :
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति को उसके कार्यों के सम्पादन में सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होगी, जिसका अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होगा।

गठन– 
लोकसभा में जिस दल को बहुमत होता है उस दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है। प्रधानमन्त्री की सलाह से राष्ट्रपति अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनमें विभागों का वितरण करता है। मन्त्री तीन स्तर (UPBoardSolutions.com) के होते हैं-(1) कैबिनेट मन्त्री, (2) राज्य मन्त्री तथा (3) उपमन्त्री। जब लोकसभा में किसी भी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं होता तो राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग करके प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है।

मन्त्रियों की योग्यताएँ- 
प्रधानमन्त्री तथा अन्य मन्त्रियों के लिए संसद के किसी भी सदन का सदस्य होना आवश्यक है। यदि कोई मन्त्री सदस्य नहीं है तो उसे मन्त्री बनने के बाद 6 महीने के अन्दर किसी-न-किसी
सदन का सदस्य बन जाना चाहिए अन्यथा उसे मन्त्री-पद से त्याग-पत्र देना पड़ेगा।

मन्त्रियों द्वारा शपथ- प्रत्येक मन्त्री को अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति के समक्ष संविधान और अपने पद के प्रति पूर्ण ईमानदार तथा निष्ठावान रहने, अपने कर्तव्यों का पालन करने तथा मन्त्रिपरिषद् की सभी नीतियों एवं कार्यवाहियों को गुप्त रखने की शपथ लेनी पड़ती है। राष्ट्रपति तथा मन्त्रियों के सरकारी रजिस्टर में हस्ताक्षर के बाद केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का गठन हो जाता है।

मन्त्रिपरिषद के कार्य
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को शासन के संचालन के लिए जो अधिकार दिये गये हैं, उनका प्रयोग मन्त्रिपरिषद् ही करती है, वही राष्ट्रपति के नाम से देश का शासन चलाती है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मन्त्रिपरिषद् मुख्यतया निम्नलिखित कार्य करती है|

  • राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देना–संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् के गठन का उद्देश्य | राष्ट्रपति को उसके कार्यों के सम्पादन में सहायता एवं परामर्श देना है।
  • राष्ट्रीय नीति का निर्धारण-मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य शासन सम्बन्धी नीतियों का निर्धारण करना है। मन्त्रिपरिषद् ही देश तथा विदेश के लिए नीतियों का निर्धारण करती है।
  • अपने विभाग सम्बन्धी कार्य करना-केन्द्रीय प्रशासन अनेक विभागों में बँटा हुआ है और प्रत्येक मन्त्री अपने विभाग का प्रशासनिक कार्य करता है। संसद में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर अधिकांशतया सम्बन्धित विभाग के मन्त्री ही देते हैं।
  • वित्तीय कार्य–मन्त्रिपरिषद् प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने से पूर्व देश का बजट तैयार कराकर संसद में प्रस्तुत करती है तथा उसे पारित कराती है। देश की आर्थिक नीति भी मन्त्रिपरिषद् ही निर्धारित करती है।
  • विधायन कार्य-प्रत्येक मन्त्री अपने विभाग सम्बन्धी विधेयक तैयार कराकर संसद में पेश करता है । तथा कानून बन जाने पर उसे लागू करता है।
  • संसद में सरकार का प्रतिनिधित्व-संसद की बैठकों में मन्त्रिगण सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं, सदस्यों के प्रश्नों तथा आलोचनाओं का उत्तर देते हैं और सरकार की नीति का समर्थन करते हैं।
  • संविधान में संशोधन-संविधान में संशोधन सम्बन्धी प्रस्ताव मन्त्रिपरिषद् द्वारा प्रस्तुत एवं पारित | कराये जाते हैं।
  • व्यवस्थापिका की कार्यवाही-लोकसभा तथा राज्यसभा की बैठकों की तिथि निश्चित करना, । बैठक के घण्टे तथा विधेयकों के पेश करने का क्रम निश्चित करना, प्रत्येक विधेयक पर विचार करने
    का समय निश्चित करना आदि कार्यों को मन्त्रिपरिषद् ही करती है।
  • नियुक्ति सम्बन्धी कार्य-संविधान ने राष्ट्रपति को जिन महत्त्वपूर्ण (UPBoardSolutions.com) पदों पर नियुक्ति का अधिकार दिया है, उन सभे पदों पर नियुक्ति राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह से ही करता है।
  • सूचना देना–मन्त्रिपरिषद् अपनी नीतियों एवं कार्यों के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को नियमित रूप से सूचना देती रहती है। राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् से कोई भी प्रशासनिक जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  • जनमत तैयार करना–मन्त्रिपरिषद् के सदस्य सरकारी नीतियों के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास करते हैं जिससे जनता में सरकार की लोकप्रियता बढ़े।
  • युद्ध अथवा शान्ति सम्बन्धी घोषणाएँ–मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही युद्ध और शान्ति सम्बन्धी घोषणाएँ की जाती हैं और यह निर्णय किया जाता है कि दूसरे देशों से किस प्रकार के सैनिक और व्यापारिक । सम्बन्ध स्थापित किये जाएँ।
  • अन्य कार्य–मन्त्रिपरिषद् अपराधियों को क्षमा करने के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को सलाह देती है। मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार ही राष्ट्रपति भारतरत्न, पद्मभूषण, पद्मश्री आदि उपाधियाँ प्रदान करता है।
    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मन्टिअरिषद् के कार्य एवं शक्तियाँ बहुत अधिक व्यापक होती हैं। देश की समस्त राजनीतिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर उसका अधिकार होता है।

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प्रश्न 2.
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है ? उसके अधिकारों एवं कार्यों (कर्तव्यों) का वर्णन | कीजिए। [2010, 14]
           या
प्रधानमन्त्री के किन्हीं दो कार्यों एवं शक्तियों का उल्लेख कीजिए। [2012]
           या
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है? भारतीय शासन में प्रधानमन्त्री की स्थिति की व्याख्या कीजिए। [2014, 18]
उत्तर :

प्रधानमन्त्री की नियुक्ति

प्रधानमन्त्री केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का मुखिया होता है । संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार, “प्रधानमन्त्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। किन्तु व्यवहार में राष्ट्रपति उस राजनीतिक दल के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है, जिसका (UPBoardSolutions.com) लोकसभा में बहुमत होता है। यदि लोकसभा में एक दल का बहुमत न होने पर दो या अधिक दल परस्पर अपना गठबन्धन बनाकर नेता चुन लेते हैं तो राष्ट्रपति ऐसे गठबन्धन के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है। यदि लोकसभा में किसी भी दल या दलों के गठबन्धन को बहुमत प्राप्त नहीं होता तो राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी भी व्यक्ति को प्रधानमन्त्री नियुक्त कर सकता है। जुलाई, 1979 ई० में चौ० चरण सिंह की प्रधानमन्त्री के रूप में नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने विवेक के प्रयोग का एक ज्वलन्त उदाहरण है।

प्रधानमन्त्री के कार्य (शक्तियाँ) तथा महत्त्व

प्रधानमन्त्री के निम्नलिखित कार्यों से उसकी शक्तियों तथा महत्त्व का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है

1. मन्त्रिपरिषद्को निर्माता- 
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री को नियुक्त करता है तथा उसके बाद प्रधानमन्त्री की सलाह से अन्य मन्त्रियों तथा उनके विभागों का वितरण करता है। प्रधानमन्त्री किसी भी मन्त्री के विभाग में फेर-बदल कर सकता है।

2. मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष– 
प्रधानमन्त्री केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष तथा नेता होता है। वह मन्त्रिपरिषद् की बैठकों में अध्यक्षता करता है तथा उसकी कार्यवाही का संचालन भी करता है। मन्त्रिपरिषद् के सभी निर्णय उसकी इच्छा से प्रभावित होते हैं। (UPBoardSolutions.com) मन्त्रिपरिषद् यदि देश की नौका है तो प्रधानमन्त्री उसका नाविक। यदि किसी मन्त्री की राय प्रधानमन्त्री से नहीं मिलती है तो प्रधानमन्त्री ऐसे मन्त्री को त्याग-पत्र देने के लिए बाध्य कर सकता है अथवा उसे राष्ट्रपति द्वारा मन्त्रिपरिषद् से हटवा सकता है।

3. कार्यपालिका का प्रधान- 
राष्ट्रपति देश की कार्यपालिका का नाममात्र का प्रधान होता है। कार्यपालिका की वास्तविक शक्ति प्रधानमन्त्री में निहित होती है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से देश का मुख्य शासक प्रधानमन्त्री होता है।

4. शासन का प्रमुख प्रबन्धक- 
देश की शासन-व्यवस्था को विभिन्न विभागों तथा मन्त्रालयों में बाँटना, मन्त्रियों में विभागों का वितरण करना, मन्त्रालयों की नीतियाँ तय करना तथा उनमें समय-समय पर अपेक्षित परिवर्तन करना आदि कार्य प्रधानमन्त्री की इच्छा तथा निर्देश पर निर्भर होते हैं। इस प्रकार प्रधानमन्त्री ही देश के शासन का प्रमुख प्रबन्धक होता है।

5. लोकसभा का नेता- 
लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होने के कारण वह लोकसभा काअधिवेशन बुलाने, कार्यक्रम निश्चित करने तथा सत्र स्थगित करने का निर्णय लेती है। वह लोकसभा में अपने मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व करता है तथा शासन सम्बन्धी नीतियों (UPBoardSolutions.com) की घोषणा करता है। वह राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का भी परामर्श दे सकता है।

6. राष्ट्रपति एवं मन्त्रिपरिषद् तथा राष्ट्रपति एवं संसद के बीच की कड़ी– 
प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति और मन्त्रिपरिषद् के बीच की कड़ी का कार्य करता है। वह मन्त्रिमण्डल की नीतियों, निर्णयों आदि की। जानकारी राष्ट्रपति को देता है तथा राष्ट्रपति के निर्णयों से वह मन्त्रियों को अवगत कराता है। इसी प्रकार प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति तथा संसद के बीच की कड़ी के रूप में कार्य करता है। वह राष्ट्रपति को संसद की कार्यवाही से अवगत कराता है तथा राष्ट्रपति के सुझावों को संसद तक पहुँचाता है।

7. नियुक्तियाँ सम्बन्धी अधिकार- 
राष्ट्रपति के द्वारा मन्त्रियों, राज्यपालों, न्यायाधीशों, राजदूतों, विभिन्न आयोगों, लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य इत्यादि की जितनी भी नियुक्तियाँ की जाती
हैं, वे सभी प्रधानमन्त्री के परामर्श पर की जाती हैं।

8. अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व– 
अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारतीय प्रधानमन्त्री का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। चाहे विदेश विभाग प्रधानमन्त्री के हाथ में हो या नहीं, फिर भी अन्तिम रूप से | विदेश नीति का निर्णय प्रधानमन्त्री ही करता है। भारत की पुट-निरपेक्षता की विदेश नीति भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू जी की ही देन है।

9. शासन का प्रमुख प्रवक्ता– 
देश तथा विदेश में प्रधानमन्त्री ही शासन की नीति को प्रमुख तथा अधिकृत प्रवक्ता होता है। यदि कभी संसद में किन्हीं दो मन्त्रियों के आपसी विरोधी वक्तव्यों के कारण भ्रम और विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो प्रधानमन्त्री का वक्तव्य ही इस स्थिति को समाप्त कर सकता है।

10. देश का सर्वोच्च नेता तथा शासक- 
प्रधानमन्त्री देश का सर्वोच्च नेता तथा शासक होता है। देश का समस्त शासन उसी की इच्छानुसार संचालित होता है। यह व्यवस्थापिका से अपनी इच्छानुसार कानून
बनवा सकता है और संविधान में आवश्यक संशोधन भी करवा सकता है।

11. आम चुनाव प्रधानमन्त्री के नाम पर-
देश के आम चुनाव (सामान्य निर्वाचन) प्रधानमन्त्री के नाम पर ही कराये जाते हैं। आम चुनाव प्रधानमन्त्री का ही चुनाव होता है। इस प्रकार आम चुनाव | स्वाभाविक रूप से प्रधानमन्त्री की प्रतिष्ठा व शक्ति में बहुत वृद्धि कर देते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रधानमन्त्री (UPBoardSolutions.com) राष्ट्र का नेता होता है; क्योंकि देश के शासन की सम्पूर्ण बागडोर उसके हाथ में होती है। व्यावहारिक दृष्टि से देश का समस्त शासन उसी की इच्छानुसार संचालित होता है।

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प्रश्न 3.
भारतीय प्रधानमन्त्री के राष्ट्रपति और संसद से सम्बन्ध का वर्णन कीजिए।
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् तथा लोकसभा के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
संसदीय शासन-प्रणाली के अन्तर्गत मन्त्रिपरिषद् ही व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका की प्रधान होती है; क्योकि प्रधानमन्त्री मन्त्रिपरिषद् का प्रमुख होता है; अत: प्रधानमन्त्री का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। भारत में संसदीय प्रणाली होने के कारण, भारत के प्रधानमन्त्री का पद भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारत के राष्ट्रपति की स्थिति ग्रेट ब्रिटेन के राजा अथवा रानी के समान है। वह एक वैधानिक प्रधान- मात्र है।

डॉ० अम्बेडकर के अनुसार, “वह राष्ट्र का प्रमुख है, कार्यपालिका का प्रमुख नहीं।” राष्ट्रपति अपने में निहित सभी शक्तियों का प्रयोग, मन्त्रिपरिषद् के परामर्श के उपरान्त ही करता है। भारतीय व्यवस्था में संसद का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संसद ही सम्पूर्ण व्यवस्था के नियमन के लिए उत्तरदायी होती है। परन्तु भारत में संसद पूर्ण रूप से अप्रतिबन्धित नहीं है। इसका प्रमुख कारण प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिमण्डल का संसद पर दबाव बना रहना है।

प्रधानमन्त्री एवं राष्ट्रपति का सम्बन्ध– भारत में कार्यपालिका का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। सैद्धान्तिक दृष्टि से प्रधानमन्त्री की मन्त्रिपरिषद् का गठन उसको परामर्श देने के लिए किया जाता है; किन्तु वास्तविक स्थिति इसके विपरीत है। मन्त्रिपरिषद् के निर्णय एवं परामर्श राष्ट्रपति को मानने पड़ते हैं। यद्यपि राष्ट्रपति इनके सम्बन्ध में अपनी व्यक्तिगत असहमति प्रकट कर सकता है; किन्तु वह मन्त्रिपरिषद् के निर्णयों को मानने के लिए (UPBoardSolutions.com) अन्ततः बाध्य होता है। भारतीय संविधान में किये गये 42वें तथा 44वें संशोधन के पूर्व राष्ट्रपति अपनी मन्त्रिपरिषद् की राय मानने के लिए कानूनी दृष्टिकोण से बाध्य था। इन संशोधनों के उपरान्त व्यवस्था यह कर दी गयी है कि राष्ट्रपति को अपनी मन्त्रिपरिषद् की राय मानने के लिए विवश कर दिया गया है। वह केवल मन्त्रिमण्डल से पुनर्विचार के लिए आग्रह ही कर सकता है, किन्तु फिर भी वह मन्त्रिपरिषद् की नीतियों को प्रभावित कर सकता है, यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर है। मन्त्रिपरिषद् में लिये गये समस्त निर्णयों से राष्ट्रपति को अवगत कराया जाता है तथा राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल से किसी भी प्रकार की सूचना माँग सकता है। प्रधानमन्त्री की सलाह पर वह अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनको शपथ-ग्रहण कराता है। प्रधानमन्त्री के परामर्श पर वह किसी भी मन्त्री को पदच्युत कर सकता है।

प्रधानमन्त्री और संसद का सम्बन्ध– प्रधानमन्त्री और संसद के घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। प्रधानमन्त्री व उसकी मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा (संसद का प्रथम सदन) के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद प्रश्न, पूरक प्रश्न, निन्दा प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव आदि के द्वारा प्रधानमन्त्री एवं उसके मन्त्रिमण्डल पर नियन्त्रण रखती है। संविधान द्वारा भारत में संसदात्मक शासन-व्यवस्था अपनायी गयी है और संसदात्मक शासन में व्यवस्थापिका और (UPBoardSolutions.com) कार्यपालिका परस्पर सम्बन्धित होती हैं तथा कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। उत्तरदायित्व का अर्थ है कि प्रधानमन्त्री और उसकी मन्त्रिपरिषद् संसद (लोकसभा) के. अधीन है। वह उसकी इच्छानुसार ही कार्य करता है और उस समय तक ही अपने पद पर बना रह सकता है। जब तक कि उसे लोकसभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त हो।

व्यावहारिक दृष्टि से संसद प्रधानमन्त्री और उसकी मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण नहीं रखती, क्योंकि प्रधानमन्त्री बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और उसके पीछे संसद का बहुमत साधारणतया सदैव रहता है। संसद पर प्रधानमन्त्री के नियन्त्रण का एक महत्त्वपूर्ण साधन प्रधानमन्त्री के हाथ में लोकसभा को भंग करने की संस्तुति का अधिकार है। राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री के परामर्श पर लोकसभा को भंग कर पुनः चुनाव करा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व का क्या अर्थ है ? [2012]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् किस प्रकार संसद के प्रति उत्तरदायी है ? [2013]
           या
मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है? [2014]
           या
मन्त्रियों के सामूहिक उत्तरदायित्व’ का क्या अर्थ है ? मन्त्रिपरिषद् किसके प्रति उत्तरदायी है ? [2013]
उत्तर :
भारत में संसदात्मक शासन-प्रणाली की व्यवस्था की गयी है और संसदात्मक शासन-प्रणाली में मन्त्रिपरिषद् को सामूहिक उत्तरदायित्व रहता है। सामूहिक उत्तरदायित्व से मतलब है कि मन्त्रिपरिषद् के सदस्य सभी मन्त्री अपने कार्यों के लिए संसद के प्रति व्यक्तिगत रूप से (UPBoardSolutions.com) तो उत्तरदायी होते ही हैं, सामूहिक रूप से भी प्रशासनिक नीति और समस्त प्रशासनिक कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सम्पूर्ण मन्त्रिपरिषद् एक इकाई के रूप में कार्य करती है, जिससे सभी मन्त्री एक-दूसरे के निर्णय और कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं। अतः कहा जा सकता है कि मन्त्रिमण्डल की सफलता या असफलता का भार एक मन्त्री पर नहीं पड़ता, वरन् सभी मन्त्रियों पर पड़ता है अर्थात् वे एक साथ तैरते हैं। और एक साथ ही डूबते हैं।

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प्रश्न 2.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद पर संसद किस प्रकार नियन्त्रण रखती है ?
           या
संसद मन्त्रिपरिषद् पर कैसे नियन्त्रण रखती है ? इसके द्वारा अपनाये जाने वाले किन्हीं तीन तरीकों का उल्लेख कीजिए। [2015]
उत्तर : केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् संसद के प्रति उत्तरदायी है; अत: संसद उस पर अग्रलिखित प्रकार से नियन्त्रण रखती है।

1. संसद-सदस्य मन्त्रिपरिषद् के कार्यों एवं नीतियों की आलोचना करते हैं।
2. मन्त्रिपरिषद् द्वारा पेश किये गये वित्तीय विधेयकों पर संसद (UPBoardSolutions.com) की पूर्ण नियन्त्रण रहता है।
3. मन्त्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति भी उत्तरदायी होती है, क्योंकि संसद में अविश्वास पारित होने पर । मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है।
4. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, प्रश्नों तथा पूरक प्रश्नों द्वारा संसद मन्त्रिपरिषद् पर पूर्णत: नियन्त्रण रखती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के प्रथम प्रधानमंन्त्री का नाम बताइए। [2009, 11]
उत्तर :
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री-पं० जवाहरलाल नेहरू।

प्रश्न 2.
मन्त्रियों की कितनी श्रेणियाँ होती हैं ?
उत्तर :
मन्त्रियों की तीन श्रेणियाँ होती हैं।

प्रश्न 3.
कौन-से संविधान संशोधन द्वारा मन्त्रिपरिषद् में सदस्यों की संख्या सीमित कर दी गयी है?
उत्तर :
91वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा मन्त्रिपरिषद् में सदस्यों की संख्या सीमित कर दी गयी है।

प्रश्न 4.
संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य क्या है ?
उतर :
संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण कार्य देश तथा विदेश के लिए शासन सम्बन्धी नीतियों का निर्धारण करना है तथा राष्ट्रपति को परामर्श देना है।

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प्रश्न 5.
भारत में कुल कितने राज्य हैं ? हाल में ही नये बनाए गए राज्य की राजधानी का नाम लिखिए। (2015)
उत्तर :
भारत में कुल 29 राज्य हैं। हाल में ही नये बनाए गए राज्य की राजधानी हैदराबाद है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् में अधिक-से-अधिक कितने मंत्री हो सकते हैं ? उनकी नियुक्ति कौन करता है ? (2015)
उत्तर :
सरकार में जितने भी प्रकार के मन्त्री बनाये जाते हैं वे संयुक्त रूप से मन्त्रिपरिषद् का निर्माण करते हैं जिनका प्रधान प्रधानमंत्री होता है। मन्त्रिपरिषद् में तीन प्रकार के मन्त्री होते हैं-मन्त्रिमण्डल अथवा कैबिनेट स्तर के मन्त्री, राज्य (UPBoardSolutions.com) मन्त्री तथा उपमन्त्री।

मन्त्रिपरिषद् में मन्त्रियों की संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के अधिकतम 15% तक हो सकती है। इनकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री की सलाह पर राष्ट्रपति करता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है

(क) राष्ट्रपति
(ख) लोकसभा अध्यक्ष
(ग) उपराष्ट्रपति
(घ) जनता

2. मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है? (2014]

(क) लोकसभा के प्रति
(ख) प्रधानमन्त्री के प्रति
(ग) उपराष्ट्रपति के प्रति
(घ) इनमें से कोई नहीं

3. मन्त्रिपरिषद्का अध्यक्ष कौन होता है?

(क) राष्ट्रपति
(ख) उपराष्ट्रपति
(ग) प्रधानमन्त्री
(घ) लोकसभा अध्यक्ष

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4. यदि मन्त्रिपरिषद् की कोई सदस्य संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, तो वह . अधिकतम कितने दिनों तक मन्त्री रह सकता है?

(क) 2 माह
(ख) 6 माह
(ग) 10 माह
(घ) एक वर्ष

5. दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमन्त्री कौन थे ? (2014)

(क) लाल बहादुर शास्त्री
(ख) मोरारजी देसाई
(ग) चरण सिंह
(घ) गुलजारी लाल नन्दा

6. भारत का प्रधानमन्त्री किसके प्रति उत्तरदायी होता है? (2017)

(क) राष्ट्रपति के प्रति ।
(ख) राज्यसभा के प्रति
(ग) लोकसभा के प्रति
(घ) सर्वोच्च न्यायालय के प्रति

उत्तरमाला
1.
(क), 2. (क), 3. (ग), 4. (ख), 5. (ग)

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy (उर्जा के स्रोत)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy.

पाठगत हल प्रश्न

[NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खंड 14.1 (पृष्ठ संख्या 273)

प्रश्न 1.
ऊर्जा का उत्तम स्रोत किसे कहते हैं?
उत्तर
ऊर्जा का उत्तम स्रोत वह है, जो

  1. प्रति एकांक आयतन अथवा प्रति एकांक द्रव्यमान अधिक कार्य करे।
  2. जो आसानी से उपलब्ध हो।
  3. भंडारण तथा परिवहन में आसान हो।
  4. वह सस्ता हो।
  5. जलने पर प्रदूषण न फैलाए।

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प्रश्न 2.
उत्तम ईंधन किसे कहते हैं?
उत्तर
उत्तम ईंधन में निम्नलिखित गुण होने चाहिए-

  1. दहन के बाद प्रति एकांक द्रव्यमान से अधिक ऊष्मा मुक्त हो।
  2. यह आसानी से, सस्ती दर पर उपलब्ध हो।
  3. जलने पर अत्यधिक (UPBoardSolutions.com) धुआँ उत्पन्न न करे।
  4. इसका ज्वलन ताप उपयुक्त हो तथा ऊष्मीय मान उच्च हो।।

प्रश्न 3.
यदि आप अपने भोजन को गर्म करने के लिए किसी भी ऊर्जा-स्रोत का उपयोग कर सकते हैं, तो आप किसका उपयोग करेंगे और क्यों?
उत्तर
हम LPG गैस या विद्युतीय उपकरण का उपयोग करेंगे क्योंकि

  1. इससे अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।
  2. इसके दहन से धुआँ नहीं निकलता है।
  3. यह आसानी से उपलब्ध है तथा इसका उपयोग सुगमतापूर्वक किसी भी समय किया जा सकता है।
  4. यह सस्ता है तथा इसका भंडारण एवं परिवहन आसानी से किया जा सकता है।
  5. इससे वांछित ऊर्जा आवश्यकतानुसार प्राप्त कर सकते हैं।

खण्ड 14.2 (पृष्ठ संख्या 279)

प्रश्न 1.
जीवाश्मी ईंधन की क्या हानियाँ हैं?
उत्तर
जीवाश्मी ईंधन के उपयोग से निम्नलिखित हानियाँ हैं

  1. जीवाश्मी ईंधन बनने में करोड़ों वर्ष लगते हैं तथा इनके भंडार सीमित हैं।
  2. जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत हैं।
  3. जीवाश्मी ईंधन जलने से वायु प्रदूषण होता है, जिसके फलस्वरूप कार्बन, नाइट्रोजन और सल्फर के अम्लीय आक्साइड; जैसे–CO2, NO2, SO2 आदि गैसें मुक्त होती हैं, जो अम्लीय वर्षा कराती हैं तथा जल (UPBoardSolutions.com) एवं मृदा के संसाधनों को प्रभावित करती हैं।
  4. अतिरिक्त CO2 के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव होता है।
  5. वायु प्रदूषण के कारण श्वसन संबंधी रोग होते हैं।

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प्रश्न 2.
हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर क्यों ध्यान दे रहे हैं?
उत्तर
हम जानते हैं कि जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत हैं। अतः इन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। पृथ्वी के गर्भ में कोयले, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि ईंधन सीमित मात्रा में मौजूद हैं। यदि हम इनका उपयोग इसी प्रकार करते रहे तो ये शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे। अतः हमें ऊर्जा के संकट से निपटने हेतु वैकल्पिक स्रोतों की ओर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारी सुविधा के लिए पवन तथा जल ऊर्जा के पारंपरिक उपयोग में किस प्रकार के सुधार किए गए हैं?
उत्तर

  1. किसी एक पवन-चक्की द्वारा उत्पन्न विद्युत बहुत कम होती है जिसका व्यापारिक उपयोग नहीं हो सकता। अतः किसी विशाल क्षेत्र में बहुत-सी पवन चक्कियाँ लगाई जाती हैं तथा इन्हें युग्मित कर लिया जाता है, जिसके कारण प्राप्त कुल (नेट) ऊर्जा सभी पवन-चक्कियों द्वारा उत्पन्न विद्युत ऊर्जाओं के योग के तुल्य हो जाती है।
  2. जल विद्युत उत्पन्न करने हेतु नदियों के बहाव (UPBoardSolutions.com) को रोक कर बड़े जलाशयों (कृत्रिम झीलों) में जल एकत्र करने के लिए ऊँचे-ऊँचे बाँध बनाए जाते हैं। बाँध के ऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल, बाँध के आधार के पास स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिराया जाता है, फलस्वरूप टरबाइन के ब्लेड घूर्णन गति करते हैं और
    जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन होता है।

खंड 14.3 ( पृष्ठ संख्या 285)

प्रश्न 1.
सौर कुकर के लिए कौन-सा दर्पण-अवतल, उत्तल अथवा समतल-सर्वाधिक उपयुक्त होता है? क्यों?
उत्तर
सौर कुकर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दर्पण-अवतल दर्पण होता है, क्योंकि यह एक अभिसारी दर्पण (Converging mirror) | है, जो सूर्य की किरणों को एक बिंदु पर फोकसित करता है, जिसके कारण शीघ्र ही इसका ताप और बढ़ जाता है।

प्रश्न 2.
महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जाओं की क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर
महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊजाओं की निम्न सीमाएँ हैं

  1. ज्वारीय ऊर्जा का दोहन सागर से किसी संकीर्ण क्षेत्र पर बाँध का निर्माण करके किया जाता है, परंतु इस प्रकार के स्थान बहुत कम हैं, जहाँ बाँध बनाए जा सकते हैं।
  2. तरंग ऊर्जा का वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों।
  3. ऊर्जा संयंत्रों (plant) के निर्माण की लागत बहुत (UPBoardSolutions.com) अधिक है और इनके द्वारा ऊर्जा उत्पादन की दक्षता का मान बहुत कम है।
  4. समुद्र में या समुद्र के किनारे स्थित विद्युत ऊर्जा संयंत्र के रखरखाव उच्चस्तरीय होनी चाहिए अन्यथा इसके क्षरण की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।

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प्रश्न 3.
भूतापीय ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर
पृथ्वी के अंदर गहराइयों में ताप परिवर्तन के फलस्वरूप कुछ पिघली चट्टानें ऊपर धकेल दी जाती हैं, जो कुछ क्षेत्रों में एकत्र हो जाती हैं। इन क्षेत्रों को तप्त स्थल कहते हैं। जब भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपर्क में आता है, तो भाप उत्पन्न होती है। (UPBoardSolutions.com) इन तप्त स्थलों से प्राप्त ऊष्मा या ऊष्मीय ऊर्जा भूतापीय ऊर्जा कहलाती है। इसे पाइपों द्वारा भी बाहर निकाला जाता है तथा उच्चदाब पर निकली इस भाप से टरबाइनों को घुमाकर जनित्र द्वारा विद्युत उत्पन्न की जा सकती है।

प्रश्न 4.
नाभिकीय ऊर्जा का क्या महत्त्व है?
उत्तर
नाभिकीय ऊर्जा के निम्नलिखित महत्त्व होते हैं

  1. बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। उदाहरण के लिए, यूरेनियम के 1 परमाणु के विखंडन से जो ऊर्जा मुक्त होती है, वह कोयले के 1 कार्बन परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊर्जा की तुलना में 1 करोड़ गुनी अधिक होती है।
  2. इससे किसी प्रकार का धुआँ या हानिकारक गैसें नहीं निकलतीं, जिससे वायु प्रदूषण नहीं होता है।
  3. यह ऊर्जा का शक्तिशाली स्रोत है तथा इसके द्वारा ऊर्जा की आवश्यकता का बड़ा भाग प्राप्त किया जा | सकता है।
  4. नाभिकीय विद्युत संयंत्र किसी भी स्थान पर स्थापित किए जा सकते हैं।

खंड 14.4( पृष्ठ संख्या 285)

प्रश्न 1.
क्या कोई ऊर्जा स्रोत प्रदूषण मुक्त हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर
हाँ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, समुद्रों से प्राप्त ऊर्जा तथा जल ऊर्जा प्रदूषण मुक्त होते हैं परंतु पूर्णत: नहीं। उदाहरण के लिए सौर-सेल जैसी कुछ युक्तियों का वास्तविक प्रचालन प्रदूषण मुक्त होता है परंतु इस युक्ति के संयोजन में पर्यावरण (UPBoardSolutions.com) की क्षति होती है।

प्रश्न 2.
रॉकेट ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता रहा है? क्या आप इसे CNG की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन मानते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर
हाँ, हाइड्रोजन, CNG की तुलना में स्वच्छ ईंधन है क्योंकि (UPBoardSolutions.com) हाइड्रोजन के दहन से केवल जल उत्पन्न होता है जबकि CNG में उपस्थित मिथेन के दहन से CO2 जैसी ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं।

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खंड 14.5 ( पृष्ठ संख्या 286)

प्रश्न 1.
ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर
नवीकरणीय ऊर्जा के दो स्रोत निम्न हैं

  1. सौर ऊर्जा-सौर ऊर्जा एक अनवरत ऊर्जा स्रोत है जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तथा इसका भंडार कभी खत्म नहीं हो सकता।
  2. जल विद्युत ऊर्जा-सूर्य के ताप के कारण जल चक्र (UPBoardSolutions.com) सदैव चलता रहता है, जिससे विद्युत संयंत्रों के जलाशय में जल पुनः भर जाते हैं, अतः यह एक सदैव चलने वाली (अक्षय) ऊर्जा स्रोत है। साथ ही उपर्युक्त दोनों ऊर्जा स्रोतों से किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता है।

प्रश्न 2.
ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप समाप्य मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर
कोयला और पेट्रोलियम दो समाप्य (Exhaustible) ऊर्जा के स्रोतों के उदाहरण हैं। ये दोनों जीवाश्मी ईंधन हैं, जो करोड़ों वर्षों में बने हैं तथा केवल सीमित भंडार ही शेष हैं। जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत हैं, जिन्हें पुनः नहीं बनाया जा सकता है। यदि इसी तरह इनका उपयोग करते रहेंगे, तो इनके भंडार शीघ्र ही खत्म हो जाएँगे।

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पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्रश्न 1.
गर्म जल प्राप्त करने के लिए हम सौर जल तापक का उपयोग किस दिन नहीं कर सकते? |
(a) धूप वाले दिन ।
(b) बादलों वाले दिन
(c) गर्म दिन
(d) पवन (वायु) वाले दिन
उत्तर
(d) बादलों वाले दिन ।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत का उदाहरण नहीं है?
(a) लकड़ी
(b) गोबर गैस
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) कोयला
उत्तर
(c) नाभिकीय ऊर्जा

प्रश्न 3.
जितने ऊर्जा स्रोत हम उपयोग में लाते हैं, उनमें से अधिकांश सौर ऊर्जा को निरूपित करते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत अंतत: सौर ऊर्जा से व्युत्पन्न नहीं है?
(a) भूतापीय |
(b) पवन ऊर्जा
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) जैवमात्रा
उत्तर
(c) नाभिकीय ऊर्जा

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प्रश्न 4.
ऊर्जा स्रोत के रूम में जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy img-1

प्रश्न 5.
जैवमात्रा तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में जल वैद्युत की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy img-2

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में ऊर्जा निष्कर्षित करने की सीमाएँ लिखिए
(a) पवनें
(b) तरंगें
(c) ज्वार-भाटा
उत्तर
(a) पवन ऊर्जा की सीमाएँ

  1. इसके संयंत्र केवल उसी स्थान पर स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ ज्यादातर सालभर तीव्र हवा चलती है।
  2. पवन ऊर्जा फार्म के लिए विशाल भूखंड तथा (UPBoardSolutions.com) अत्यधिक प्रारंभिक लागत की आवश्यकता होती है।
  3. टरबाइनों की गति बनाए रखने के लिए पवनों की न्यूनतम चाल 15mk/h से अधिक होनी चाहिए।
  4. इसके रखरखाव उच्चस्तरीय होना चाहिए, क्योंकि पवन चक्कियाँ धूप, वर्षा आदि से प्रभावित हो सकती हैं।
  5. इसकी दक्षता कम होती है।

(b) तरंग ऊर्जा की सीमाएँ

  1. तरंग ऊर्जा का सिर्फ वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें बहुत प्रबल हों।
  2. प्रारंभिक लागत, रखरखाव का खर्च अधिक है तथा तकनीकी दृष्टि से कठिन भी है।
  3. इससे लगातार एक-समान विद्युत शक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती है।
  4. इसकी दक्षता निम्न होती है।

(c) ज्वार-भाटा-

  1. ज्वारीय ऊर्जा का दोहन हम सागर के किसी संकीर्ण क्षेत्र पर बाँध का निर्माण करके कर सकते हैं। ऐसे बाँध सिर्फ सीमित स्थानों पर ही बनाए जा सकते हैं।
  2. इसकी दक्षता बहुत निम्न है।
  3. इसके प्लांट की लागत अधिक है।
  4. ज्वार आने की आवृत्ति कम है। अतः इस ऊर्जा का प्रयोग सीमित है।

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प्रश्न 7.
ऊर्जा स्रोतों का वर्गीकरण निम्नलिखित वर्गों में किस आधार पर करेंगे
(a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय
(b) समाप्य तथा अक्षय क्या
(c) तथा
(d) के विकल्प समान हैं?
उत्तर
(a) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत वे होते हैं, जिसका प्रयोग बार-बार करने के बाद भी स्रोत में कमी नहीं आए। वे पुनः प्राप्त हो जाते हैं तथा इसका भंडार अक्षय रहता है; जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि।

(b) ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत वे हैं, जिनको एक बार प्रयुक्त कर लेने पर पुनः तुरंत नहीं बनाया जा सकता इसे बनाने में करोड़ों वर्ष लग जाते हैं अर्थात् यदि इसी प्रकार तथा इसी दर से प्रयोग किया जाए, तो यह संभावना है कि निकट भविष्य (UPBoardSolutions.com) में कभी भी इसके भंडार समाप्त हो सकते हैं। ऐसे स्रोत जे खत्म हो सकते हैं समाप्य स्रोत कहलाते हैं। जैसे-जीवाश्मी ईंधन (कोयला, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस)। अतः (a) और (b) के विकल्प समान हैं क्योंकि ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत अक्षय हैं, परंतु अनवीकरणीय स्रोत समाप्य स्रोत हैं।

प्रश्न 8.
ऊर्जा के आदर्श स्रोत में क्या गुण होते हैं?
उत्तर
एक आदर्श स्रोत के निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  1. उस ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करने में सरलता हो।
  2. उस ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा, प्राप्त करना सस्ता हो।
  3. स्रोत से प्राप्त ऊर्जा का भंडारण और परिवहन आसानी से किया जा सके।
  4. इसका उच्च ऊष्मीय मान तथा उपयुक्त ज्वलन ताप होनी चाहिए।
  5. उस ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करने की दक्षता उच्च होनी चाहिए।
  6. इससे पर्यावरण को क्षति नहीं होनी चाहिए।
  7. दहन के बाद प्रति एकांक द्रव्यमान से अधिक ऊष्मा मुक्त हो।

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प्रश्न 9.
सौर कुकर का उपयोग करने के क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? क्या ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकरों की सीमित उपयोगिता है?
उत्तर
सौर कुकर के लाभ-

  1. सौर कुकर के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता है।
  2.  इसमें ईंधन की लागत शून्य है।
  3. खाना बनाने के बाद राख या अपशिष्ट नहीं बनता है।
  4. भोजन का पोषक तत्व नष्ट नहीं होता है।
  5. यह सस्ता है एवं इसका इस्तेमाल भी सरल है।
  6.  सौर कुकर में एक समय में (UPBoardSolutions.com) चार खाद्य पदार्थ पकाए जा सकते हैं।
  7. इसके रखरखाव पर कोई लागत नहीं आती।

सौर कुकर की सीमाएँ-

  1. सौर कुकर द्वारा रात के समय भोजन नहीं पकाया जा सकता।
  2. खराब मौसम में सौर कुकर में भोजन नहीं पकाया जा सकता है।
  3. इसमें खाना बनाने की प्रक्रिया धीमी है।
  4. यह हर प्रकार के भोजन बनाने के लिए उपयुक्त नहीं है।
  5. सिर्फ़ तेज धूप में ही इसका उपयोग किया जा सकता है।
  6. अधिक उच्च ताप पर खाना बनाना; जैसे-तलना इत्यादि संभव नहीं है।

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प्रश्न 10.
ऊर्जा की बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम क्या हैं? ऊर्जा की खपत को कम करने के उपाय लिखिए।
उत्तर
ऊर्जा की बढ़ती माँग की पूर्ति ज्यादातर जीवाश्म ईंधनों कोयला और पेट्रोलियम द्वारा पूरी की जाती है। परंतु ये स्रोत अनवीकरणीय एवं समाप्य हैं।

इसके दहन से वायुमंडल में प्रदूषण होता है। SO2, NO2 आदि गैसें मुक्त होती हैं, जिससे अम्लीय वर्षा होती है, जिसके कारण जल तथा मृदा के संसाधन प्रभावित होते हैं। इमारतों, लोहे की वस्तुओं, पुल इत्यादि को संक्षरित कर देते हैं। CO2 गैस (UPBoardSolutions.com) ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ जाता है तथा हिम के पिघलने पर समुद्र तल बढ़ता है। समुद्रीय तट पर स्थित क्षेत्र तथा टापुओं के डूबने का खतरा बढ़ जाता है। वायुमंडल में कोयले तथा पेट्रोलियम के दहन से अवांछनीय कण जैसे-शीशा (lead) धूल कण इत्यादि बढ़ जाते हैं। इस तरह हमारे परिस्थितिक तंत्र के नष्ट हो जाने का भय होता है।
ऊर्जा की खपत कम करने के उपाय-

  1. नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों का उपयोग अधिक-से-अधिक करना; जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि।
  2. कोयले के स्थान पर ग्रामीण क्षेत्रों में बायो गैस का प्रयोग करना।
  3. विद्युत उपकरणों को अनावश्यक रूप से नहीं चलाना चाहिए।
  4. सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का अधिक-से-अधिक उपयोग करना।
  5. वाहनों में CNG का प्रयोग करना।
  6. रेड लाइटों पर इंजन बंद कर देना।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे (मंजरी)

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समस्त पद्याशों की व्याख्या

नीति के पद

बड़े न हूजै …………………………………….…………………….. जाय ॥1॥
संदर्भ-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक मंजरी’ के बिहारी के नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता बिहारी लाल जी हैं।
प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में कवि ने गुणों की महत्ता का वर्णन किया है। (UPBoardSolutions.com)
व्याख्या-कविवर बिहारी लाल जी कहते हैं कि कोई भी मनुष्य चाहे कितना ही बड़ा यश प्राप्त क्यों न कर ले परन्तु बिना गुणों के महान नहीं हो सकता, जैसे- धतूरे को भी कनक कहा जाता है। परन्तु उसका गहना नहीं बन सकता।

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अति अगाध………………………………………………………… बुझाइ॥2॥
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-नदी, कुआँ, तालाब और बावड़ी कितने ही गहरे हों या कितने ही उथले। जिसके द्वारा किसी की प्यास बुझ जाए (शान्त हो जाए), वही उसके लिए समुद्र के समान होता है।

ओछे बड़े ………………………………………………………………नैन ॥3॥
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-छोटे कभी बड़े नहीं हो सकते हैं। चाहे वे कितना भी ऐंठकर गगन छूने की कोशिश क्यों न कर लें। छोटी वस्तु बड़ी नहीं हो सकती चाहे उसे कितना भी आँखें फाड़कर क्यों न देखा जाय।

कनक कनक ……………………………………………………….बौराय ॥4॥
संदर्भ एवं प्रसंग-
पूर्ववत्।
व्याख्या-धतूरे की अपेक्षा सोने में सौ गुना अधिक मादकता होती है, क्योंकि धतूरे को खाने पर आदमी पागल हो जाता है, जबकि सोने (स्वर्ण) की प्राप्ति होने पर भी वह पागल हो जाता है अर्थात् । सोना मिलने पर वह घमण्डी हो जाता है।

दिन दस………………………………………………………….. सनमानु ॥5॥
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-मनुष्य को यह बात जान लेनी चाहिए कि उसका थोड़े दिन ही आदर (सम्मान) होता है। जिस प्रकार श्राद्ध पक्ष (क्वार मास के आरंभिक पन्द्रह दिन) में कौए को बुला-बुलाकर आदर होता है।

भक्ति के पद

 बन्धु भएँ ……………………………………….…….. कहाई ॥1॥
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-हे रघुराई, आपने गरीब के बन्धु (UPBoardSolutions.com) बनकर उसे संसार सागर से पार उतार दिया। आप प्रसन्न हो जाइए और मेरा उद्धार कीजिए जिससे आपके बड़े होने  की बड़ाई झूठी न हो।

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मोहन मूरति …………………………..……………. जग होई ॥2॥
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-श्याम की मोहने वाली मूर्ति की अद्भुत गति होती है। यह जिसके अच्छे हृदय में बस जाती है, उससे सारा संसार प्रतिबिम्बित हो जाता है। भजन कयौ …………………………………………………….गॅवार ॥3॥

संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-हे मूर्ख! तुम्हें जिसका भजन (गुणगान) करने के लिए कहा गया, उसे तो तुमने एक बार भी नहीं भजा, किंतु तुम्हें जिन दुर्गुणों से दूर रहने के लिए कहा गया, तुमने उन्हीं दुर्गुणों को अपनाया।

प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को-                             नोट-विद्यार्थी स्वयं करें।
विचार और कल्पना-

प्रश्न 1.
‘धतूरे’ की अपेक्षा ‘सोने’ को अधिक मादक क्यों कहा गया है?
उत्तर-
मनुष्य जितना पागल धतूरे को खाने से होता है उससे सौ गुना अधिक पागल सोने (स्वर्ण) को केवल पाने से हो जाता है। अतः सोने में अधिक मादकता होती है।

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प्रश्न 2.
नीति के दोहों में कोई न कोई मूल्य छिपा होती है, जैसे-पहले दोहे में व्यक्ति अपने गुणों से बड़ा होता है’ से सम्बन्धित मूल्य है। इसी प्रकार निम्नलिखित मूल्यों से सम्बन्धित दोहों को लिखिए
(क) दिखावा करने से बड़प्पन नहीं आता।
उत्तर-बड़े न हुजै गुनन बिन, बिरद-बड़ाई पाय।कहत धतूरे सो कनक, गहनों गढ्यौ न जाय।
(ख) स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। (UPBoardSolutions.com)
उत्तर- ओछे बड़े न ह्वै सकें, लगौं सतर ह्वै गैन। 
दीरघ होहिं न नैकहूँ, फारि निहारै नैन।
(ग)
जिस वस्तु से हमारा कार्य सिद्ध हो, वही महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर- अति अगाध, अति ओथरो, नदी, कूप, सर बाइ।सो ताकौ सागर जहाँ, जाकि प्यास बुझाइ।
(घ) गुण, सौंदर्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर- बड़े न हूजे गुनन बिन, विरद बंड़ाई पाय। 
कहत धतूरे सों कनक, गहनों गढ्यो न जाय।

कविता से-

प्रश्न 1.
‘नाम बड़ा होने से ही कोई बड़ा नहीं हो सकता’ इस कथन की पुष्टि के लिए कवि ने कौन-सा उदाहरण दिया है?।
उत्तर-धतूरे को कनक (सोना) कहने से वह बड़ा नहीं हो जाता क्योंकि उससे गहने नहीं बनाए जा सकते। (उसमें बड़ा होने का गुण नहीं है।) –

प्रश्न 2.
कवि ने नदी, कूप, सर, बावली को सागर के समान किस स्थिति में सागर माना है?
उत्तर-
कवि ने नदी, कूप, तालाब और बावली को सागर के समान इसलिए माना है क्योंकि इन्होंने जिसकी प्यास बुझाई उसके लिए तो यह सागर ही है।

प्रश्न 3.
‘छोटे बड़े नहीं हो सकते’ इसके लिए कौन सा उदाहरण दिया गया है?
उत्तर-
छोटे बड़े नहीं हो सकते’ उदाहरणार्थ हम लाख अपनी आँखें फाड़-फाड़ कर क्यों न देखें, छोटी वस्तु हमें बड़ी नहीं दिखाई दे सकती। .

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प्रश्न 4.
कृष्ण की मोहन मूरति क्यों अद्भुत है?
उत्तर-
कृष्ण की मोहन मूरति इसलिए अद्भुत है क्योंकि उन्होंने गरीब का बन्धु बनकर उन्हें भव सागर से पार उतार दिया।

प्रश्न 5.
पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए
(क) सो ताकौ सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाई।
भाव-
जिसकी जो प्यास बुझा दे उसके लिए तो वही सागर है।
(ख)
दूरि भजन जातें कयौ, सौ रौं भन्यौ गॅवार।
भावे-तुम्हें जिन दुर्गुणों से दूर रहने के लिए कहा गया; तुमने उन्हीं दुर्गुणों को अपनाया।
(ग) तूठे तूठे फिरत हौ, झूठे बिरद कहाई।।
भाव-दीन बन्धु आप मेरा उद्धार कीजिए जिससे आपके बड़े होने की बडाई झुठी न हो।

भाषा की बात-

प्रश्न 1.
कविता में प्रयुक्त निन्नलिखित शब्दों को देखिए और उनके खड़ी बोली के रूप पर ध्यान दीजिए। सो = वह, ताकौ = उसके लिए, हुवै सकें = हो सके। नीचे लिखे शब्दों के खड़ी बोली रूप लिखिए
उत्तर-
तऊ = उससे, ताते = उतना, जातें = जितना, कह्यौं = कहा।

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प्रश्न 2.
कविता में जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और उसका अर्थ भिन्न-भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है। नीचे लिखी पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है और क्यों?
उत्तर-
(क)
भजन कयौ, ताते भन्यौ, भन्यौ न एकौ बार।
दूरि भजन जातें कह्यौ, सौ तों भन्यौ गॅवार। यमक अलंकार है क्योंकि भजन और भज्यौ शब्द दो बार आकर भिन्न-भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं।
(ख)
‘इस धरा का इस धरा पर ही धरा रह जायेगा।
(ग) “काली घटा का घमण्ड घटा’

We hope the UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे (मंजरी) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 6 बिहारी के दोहे (मंजरी), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 प्रथम स्वतन्त्रता-संग्राम–कारण तथा परिणाम (अनुभाग – एक)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 ई० के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के कारणों पर प्रकाश डालिए। [2012]
          या
1857 ई० की क्रान्ति के सामाजिक, धार्मिक तथा सैनिक कारणों की विवेचना कीजिए।
          या
1857 ई० के स्वतन्त्रता संघर्ष के किन्हीं तीन कारणों का वर्णन करें और इसकी असफलता के कोई दो कारण भी लिखिए। [2012]
          या
1857 ई० की क्रान्ति के कारणों एवं परिणामों की व्याख्या कीजिए। [2013]
          या
अंग्रेजों की आर्थिक शोषण की नीति 1857 ई० के विद्रोह का एक प्रमुख कारण थी। स्पष्ट कीजिए।
          या
भारत के लोग ब्रिटिश शासन से क्यों असन्तुष्ट थे ? उनके असन्तोष के किन्हीं चार कारणों पर प्रकाश डालिए। [2015]
          या
1857 ई० के भारत में क्रान्ति का स्वरूप क्या था? उसके प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर :

1857 ई० की क्रान्ति (स्वाधीनता संग्राम) का स्वरूप

निःसन्देह 1857 ई० का संघर्ष भारतीय इतिहास की एक अभूतपूर्व युगान्तकारी घटना है। इस क्रान्ति के स्वरूप के विषय में मुख्य रूप से दो भिन्न मत हैं। अंग्रेजों ने, जो साम्राज्यवाद के स्वाभाविक पक्षपाती थे, इसे केवल सैनिकों के (UPBoardSolutions.com) संघर्ष की संज्ञा दी है, जबकि भारतीयों ने इसे निर्विवाद रूप से प्रथम स्वाधीनता संग्राम और प्रथम राष्ट्रीय आन्दोलन बताया है।

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1857 ई० की क्रान्ति के विषय में कतिपय इतिहासकारों एवं विद्वानों के मत इस प्रकार हैं
सर जॉन लारेन्स के अनुसार-“यह एक सैनिक क्रान्ति थी।”
सर जेम्स आउटरम के अनुसार-“यह एक मुस्लिम षड्यन्त्र था, क्योंकि भारतीय मुसलमानों ने दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह के नेतृत्व में अंग्रेजों को भारत से निकालकर पुन: देश पर अपनी सत्ता स्थापित करने का सशस्त्र प्रयत्न किया था।”
वीर सावरकर के अनुसार-“यह भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम था।”
अशोक मेहता के अनुसार-“यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय आन्दोलन था।”
पी०ई० राबर्ट्स के अनुसार-“यह केवल एक सैनिक संघर्ष था, जिसका तत्कालीन कारण कारतूस वाली घटना थी। इसका किसी पूर्वगामी षड्यन्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं था।”
एल०ई०आर० रीज के अनुसार-“यह धर्मान्धों का ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध था।”
निष्कर्षत: अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई० का स्वतन्त्रता संग्राम भारतीयों का प्रथम राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम ही था जो सैनिक क्रान्ति के माध्यम से प्रारम्भ हुआ था। इसका वास्तविक स्वरूप कुछ भी क्यों न हो, शीघ्र ही यह भारत में अंग्रेजी सत्ता के लिए एक चुनौती का प्रतीक बन गया।
1857 ई० की क्रान्ति को भारतीय इतिहास (UPBoardSolutions.com) में प्रमुख स्थान प्राप्त है। इसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाता है। 1857 ई० की क्रान्ति कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। जब से अंग्रेजों ने भारत पर अपना प्रभुत्व जमाया, भारतीय जनता में तभी से असन्तोष की लहर दौड़ रही थी। अनेक राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सैनिक कारणों ने भारतीयों में अत्यधिक असन्तोष भर दिया था और 1857 ई० की क्रान्ति उसी का परिणाम थी। 1857 ई० की क्रान्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(क) राजनीतिक कारण
1857 ई० की क्रान्ति के प्रमुख राजनीतिक कारण निम्नलिखित थे –

1. ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्वार्थपूर्ण नीति – भारत पर अपने शासन का प्रभुत्व जमाने वाली कम्पनी स्वार्थ पर आधारित थी। यह किसी भी रूप में भारतीयों के हितों का ध्यान नहीं करती थी। अधिकांश अंग्रेज गवर्नर जनरलों ने कम्पनी की स्वार्थ-लिप्सा को ही पूरा करने का प्रयत्न किया। कम्पनी का दोषपूर्ण शासन और अमानवीय व्यवहार इस क्रान्ति की नींव बना।

2. मुगल सम्राटों की दयनीय स्थिति – मुगल सम्राटों की स्थिति निरन्तर खराब होती जा रही थी। पहले | सिक्कों पर मुगल शासकों के नाम मुद्रित किये जाते थे और कम्पनी के उच्च पदाधिकारी तक उनको झुककर सलाम करते थे, किन्तु 1835 ई० के बाद से कम्पनी ने मुगलों को बहुत ही पंगु बना दिया। सिक्कों से उनका नाम हटा दिया गया और अंग्रेज पदाधिकारियों ने उनका सम्मान करना भी छोड़ दिया।

3. उच्च नौकरियों में भारतीयों की उपेक्षा – उच्च नौकरियों में भारतीयों को नियुक्त नहीं किया जाता था। लॉर्ड विलियम बैंटिंक के 1835 ई० में वापस जाने के बाद भारतीयों की पुन: उपेक्षा शुरू हो गयी थी। इस स्थिति में, भारतीयों में स्वाभाविक रूप से असन्तोष उत्पन्न हो गया।

4. दोषपूर्ण न्याय-प्रणाली – कम्पनी ने जो न्याय-प्रणाली स्थापित कर रखी थी, उससे भारतीयों को पूर्ण न्याय प्राप्त नहीं होता था। यह न्याय-प्रणाली बहुत जटिल थी। इस दूषित न्याय-प्रणाली ने भारतीयों के असन्तोष में और अधिक (UPBoardSolutions.com) वृद्धि कर दी।

5. प्रशासनिक अधिकारियों का दुर्व्यवहार – ब्रिटिश प्रशासनिक व राजस्व अधिकारी जनता पर मनमाने व अमानवीय अत्याचार किया करते थे। यह दुर्व्यवहार भी क्रान्ति का एक कारण बना था।

6. लॉर्ड डलहौजी की राज्य-अपहरण की नीति – लॉर्ड डलहौजी ने साम्राज्यवादी नीति का पालन करते हुए सभी प्रकार की नैतिकताओं और आदर्शों को त्यागकर, उचित-अनुचित का विवेक किये बिना साम्राज्य–विस्तार की नीति को ही सर्वोपरि महत्त्व दिया। मुगल बादशाह, अवध के नवाब ‘ (वाजिद अली शाह) और मराठों को उसने अत्यधिक क्षति पहुँचायी। राज्य-अपहरण की नीति में ‘गोद निषेध नियम’ बनाकर उसने अनेक राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। यह राज्य-अपहरण की नीति प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का मुख्य कारण थी।

7. पेंशन तथा उपाधियों की समाप्ति – लॉर्ड डलहौजी ने पेंशन तथा उपाधियों को भी बन्द करवा दिया। नाना साहब की पेंशन के साथ-साथ जो सम्मानसूचक उपाधि क्रमागत रूप से चली आ रही थी, समाप्त कर दी गयी। इस कारण नाना साहब स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रगण्य नेता बन गये।

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(ख) आर्थिक कारण
1857 ई० की क्रान्ति के लिए निम्नलिखित आर्थिक कारण भी उत्तरदायी थे –

1. भारतीय व्यापार को क्षति – ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप भारतीय व्यापार नष्ट हो गया। यहाँ के कच्चे माल को अंग्रेज सस्ते मूल्य पर खरीदकर इंग्लैण्ड ले जाते और उससे तैयार माल बनाकर बेचते थे। इस व्यापारिक क्षति ने भारतीय व्यापारियों और बेरोजगार हुए कारीगरों में विद्रोह की भावना जगा दी।

2. हस्तशिल्पियों की दुर्दशा – भारत का आर्थिक जनजीवन हस्तशिल्पियों पर निर्भर था। कम्पनी के व्यापार के बाद से इन हस्तशिल्पियों के दुर्दिन आ गये। इन हस्तशिल्पियों की दुर्दशा ने क्रान्ति की स्थिति में वृद्धि कर दी।

3. किसानों की दयनीय स्थिति – कम्पनी के राज्य में कृषकों की दशा दयनीय थी। भारतीय पदाधिकारी, जमींदार के ठेकेदार, कम्पनी के छोटे कर्मचारी, सभी ने कृषकों का शोषण किया। किसानों की यह विवशता एक दिन उग्र क्रान्ति का रूप बनकर ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार हो गयी।

4. भारतीय धन का ब्रिटेन चले जाना – कम्पनी के अधिकारी और कर्मचारी कुछ थोड़े समय के लिए भारत आया करते थे। अतः वे अपनी जेबें भरने के लिए लालायित रहते थे। कम्पनी भी अपनी कोष बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहती थी। इस दोहरी मार ने साधारण भारतीयों को अपार क्षति पहुँचाई। इसीलिए भारतीय, ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के लिए लालायित हो गये।

5. जमींदारी प्रथा के दोष – अंग्रेजों ने जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी बना दिया था, इससे जमींदारी प्रथा के अनेक दोष प्रकट हुए। चूँकि जमींदार किसानों से मनमाना लगान वसूल किया करते थे, इससे किसानों को अपार कष्ट (UPBoardSolutions.com) मिलता था। जब स्वयं कुछ जमींदार लगान न देने के कारण जमींदारी से हटा दिये गये, तो वे अंग्रेजों के शत्रु बन गये। इस तरह जमींदारी से हटाये गये जमींदार एवं शोषित कृषक संयुक्त होकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक हो गये।

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(ग) सामाजिक कारण
1857 ई० की क्रान्ति के प्रमुख सामाजिक कारण निम्नलिखित थे –

1. सामाजिक प्रथाओं पर प्रतिबन्ध – सुधारों के नाम पर जिन गवर्नरों ने सामाजिक प्रथाओं (विधवा-विवाह, सती–प्रथा, बाल-विवाह) पर रोक लगायी वे यथार्थ में तो उपयोगी थे, परन्तु इससे तात्कालिक रूप से सरकार के विरुद्ध असन्तोष पैदा हुआ था।

2. पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचलन – अंग्रेजों ने भारत में पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति का भी प्रचार किया। उन्होंने भारतीय साहित्य और प्रान्तीय भाषाओं की उपेक्षा की। लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया। भारतीय जनता ने इस भाषा का विरोध किया।

3. अंग्रेजी शिक्षा का विरोध – गवर्नर जनरल विलियम बैंटिंक और उसके कानूनी सदस्य लॉर्ड मैकाले के सहयोग से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाने लगी। यह शिक्षा कालान्तर में राष्ट्रीय उत्थान में सहायक सिद्ध हुई, परन्तु शुरू में इसके विरुद्ध असन्तोष पनपा

4. श्रेष्ठता की भावना – भारत में उच्च प्रशासनिक (UPBoardSolutions.com) पदों पर अंग्रेज ही आसीन थे और उनके अधीन अंग्रेजी शिक्षित भारतीय कार्य करते थे। अंग्रेज अधिकारी तो भारतीयों को निम्न श्रेणी का समझते ही थे, अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीय भी उनका पक्ष लेते हुए भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे। अत: लोगों में अंग्रेज अधिकारियों के दुर्व्यवहार के प्रति तीव्र रोष उत्पन्न होने लगा था।

(घ) धार्मिक कारण
1857 ई० की क्रान्ति के प्रमुख धार्मिक कारण निम्नलिखित थे –

1. ईसाई धर्म का प्रचार – भारत में ईसाई पादरियों ने मिशनरियों के माध्यम से भारतीयों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई बनाया था। इससे भारतीय जनता में अंग्रेजों के विरुद्ध रोष उत्पन्न हुआ और क्रान्ति के बीज अंकुरित हुए।

2. हिन्दू और इस्लाम धर्म की अवहेलना – अंग्रेजों ने भारत के दोनों मुख्य धर्मो-हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म की अवहेलना की। वे इन धर्मों का तनिक भी आदर नहीं करते थे। यह स्थिति जनता के प्रबल असन्तोष का कारण बनी थी।

3. गोद निषेध नियम – भारतीय परम्परानुसार जो दम्पति नि:सन्तान होते थे, वे किसी दूसरे बालक को गोद ले लेते थे। लॉर्ड डलहौजी ने गोद निषेध नियम बनाकर इस परम्परा पर कुठाराघात किया तथा अनेक राज्यों का अपहरण कर लिया।

4. ईसाइयों को विशेष सुविधाएँ – ईसाई धर्म ग्रहण करने वालों को सामाजिक और धार्मिक स्तर पर अनेक सुविधाएँ प्रदान की गयी थीं। नये बने ईसाई भी अनेक प्रकार की सुविधाओं का उपभोग कर रहे थे। सरकार की इस पक्षपातपूर्ण नीति ने भारतीयों में असन्तोष की वृद्धि कर दी।

5. चर्बी लगे कारतूसों का प्रयोग – भारतीय सैनिकों को दिये गये नये कारतूसों को राइफलों में भरने के लिए मुँह से छीलना पड़ता था। सैनिकों में यह अफवाह फैल गयी कि इन कारतूसों में गाय तथा सूअर की चर्बी मिली होती है। गाय हिन्दुओं (UPBoardSolutions.com) के लिए पवित्र थी, जबकि सूअर मुसलमानों के लिए अपवित्र। परिणामत: हिन्दू और मुसलमान सैनिक भड़क उठे और उन्होंने इन कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। इस क्रान्ति को ही 1857 ई० के स्वतन्त्रता संग्राम का तात्कालिक कारण माना जाता है।

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(ङ) सैनिक कारण
1857 ई० की क्रान्ति के प्रमुख सैनिक कारण अग्रलिखित थे –

1. सैनिकों में भेदभाव – अंग्रेजी सेना में सेवारत भारतीय सैनिकों और अंग्रेज सैनिकों के बीच भेदभाव रखा गया था। भारतीयों को वेतन, भत्ते, पदोन्नति भी कम दी जाती थी तथा इन्हें उच्च पदों पर भी नियुक्त नहीं किया जाता था।

2. ब्राह्मण एवं क्षत्रिय सैनिकों की समस्या – अंग्रेजी सेना में ब्राह्मण एवं क्षत्रिय सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। इन वर्गों के लोगों का समाज में बहुत सम्मानित स्थान था, परन्तु ब्रिटिश सेना में इनके साथ बहुत ही निम्न स्तर का व्यवहार किया जाता था। इस कारण भी सैनिकों के मन में असन्तोष की भावना व्याप्त थी।

3. अफगान युद्ध का प्रभाव – ब्रिटिश सैनिक 1838-42 ई० के प्रथम अफगान युद्ध में बुरी तरह से पराजित हो गये थे। इससे भारतीय सैनिकों में यह धारणा व्याप्त हुई कि यदि अफगानी सैनिक ब्रिटिश सैनिकों को हरा सकते हैं, तो हम भी अपने देश को इनसे मुक्त करा सकते हैं।

4. क्रीमिया का युद्ध – यूरोप में 1854-56 ई० में हुए क्रीमिया के युद्ध में अंग्रेजों की पर्याप्त सेना समाप्त हो गयी थी। अत: भारतीयों ने उचित अवसर पाकर क्रान्ति करने का निश्चय कर लिया था।

5. विदेश जाने की समस्या – सन् 1856 ई० में एक कानून यह बनाया गया कि आवश्यकता पड़ने पर भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों की ओर से युद्ध लड़ने के लिए विदेश में भी भेजा जा सकता है तथा भारतीय सैनिक वहाँ जाने से मना नहीं कर सकते।

6. रियासती सेना की समाप्ति – सन् 1856 ई० में अवध को अंग्रेजी राज्य में मिला दिया गया और वहाँ की रियासती सेना को भंग कर दिया गया। इससे साठ हजार सैनिक बेकार हो गये। इसी प्रकार ग्वालियर, मालवा आदि राज्यों की सेनाएँ भी समाप्त कर दी गयीं। (UPBoardSolutions.com) बेकार भारतीय सैनिक भड़क उठे। तथा क्रान्ति की योजनाएँ बनाने लगे।
[असफलता के कारण – इसके लिए निम्नलिखित प्रश्न संख्या 2 को उत्तर देखें।]
[परिणाम – इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखें।

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प्रश्न 2.
1857 ई० की क्रान्ति की असफलता के कारणों का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 12]
           या
1857 की क्रान्ति की असफलता के प्रमुख दो कारण लिखिए। (2013)
           या
1857 के स्वतन्त्रता संघर्ष की असफलता के क्या कारण थे ? किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए। [2013, 17]
उत्तर :

1857 ई० की क्रान्ति की असफलता के कारण

सन् 1857 ई० की क्रान्ति या संग्राम की असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

1. समय से पूर्व क्रान्ति का प्रारम्भ – क्रान्ति के प्रारम्भ करने की तिथि 31 मई निश्चित की गयी थी, परन्तु कुछ भारतीय सैनिकों ने आवेश में आकर 10 मई को ही क्रान्ति का बिगुल बजा दिया। इस प्रकार निर्धारित समय से पूर्व क्रान्ति प्रारम्भ हो जाने के कारण संगठित क्रान्ति का प्रयास असफल हो गया और क्रान्तिकारियों को बहुत हानि उठानी पड़ी।

2. क्रान्ति का सीमित क्षेत्र – इस क्रान्ति का क्षेत्र देशव्यापी न होकर सीमित था। यह क्रान्ति दिल्ली से लेकर कलकत्ता तक ही सीमित रही। पंजाब, राजस्थान, सिन्ध तथा पूर्वी बंगाल में अंग्रेजी सत्ता का अन्त करने के लिए तनिक भी प्रयत्न नहीं किया (UPBoardSolutions.com) गया, वरन् पंजाब, राजपूताना, ग्वालियर, इन्दौर आदि, के नरेशों ने अंग्रेजों की सहायता की। सर डब्ल्यू० रसल ने लिखा है, “यदि सारे देशवासी, सर्वतोभाव से अंग्रेजों के विरुद्ध हो गये होते, तो अपने साहस के रहते भी अंग्रेज पूर्णतया नष्ट कर दिये गये होते।”

3. संगठन का अभाव – क्रान्तिकारी नेताओं में संगठन का सर्वथा अभाव था। प्रत्येक की नीति अलग-अलग थी और प्रत्येक के समर्थक अपने ही नेता के नेतृत्व में काम करना चाहते थे। डॉ० ईश्वरी प्रसाद ने ठीक ही लिखा है, “यदि शिवाजी या बांबर जैसा नेता होता तो वह अपने चुम्बकीय व्यक्तित्व से क्रान्ति के विभिन्न वर्गों को एक कर लेता, परन्तु ऐसे नेता के अभाव में विभिन्न लोगों के व्यक्तिगत ईष्र्या-द्वेष सामूहिक कार्य के बीच आते रहे।

4. एक लक्ष्य का अभाव – क्रान्तिकारियों का कोई एक लक्ष्य न था। वे भिन्न-भिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लड़ रहे थे। नाना साहब पेंशन चाहते थे, लक्ष्मीबाई गोद लेने का अधिकार और बहादुरशाह जफर बादशाहत चाहते थे।

5. कुछ भारतीयों की अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति – क्रान्ति की विफलता का एक प्रमुख कारण यह था कि कुछ भारतीय नरेशों ने अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति प्रदर्शित की। उन्होंने क्रान्तिकारियों का साथ नहीं दिया और क्रान्ति का दमन करने में अंग्रेजी सेना की सहायता की।

6. सफल नेतृत्व का अभाव – क्रान्ति के नेताओं में कोई कुशल तथा अनुभवी नेता नहीं था। बहादुरशाह तथा कुँवरसिंह वृद्ध थे। सूबेदार बख्त खाँ तथा तांत्या टोपे वीर होते हुए भी साधारण कोटि के व्यक्ति थे। रानी लक्ष्मीबाई वीरांगना होते हुए भी स्त्री थीं। नाना साहब में रणनीतिज्ञता का अभाव था। इसका परिणाम यह हुआ कि इस क्रान्ति की विभिन्न शक्तियों का यथेष्ट समीकरण न हो सका। इसके विपरीत अंग्रेजों की ओर नील, हैवलॉक, आउटरम तथा यूरोज जैसे योग्य सेनापति एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे।

7. साधनों व अनुशासन का अभाव – क्रान्तिकारियों के पास साधनों का अभाव था। उनके पास धन तथा आधुनिक ढंग के अस्त्र-शस्त्रों की कमी थी। इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारियों में अनुशासन का अभाव था। वे एक (UPBoardSolutions.com) अनुशासनहीन-अनियन्त्रित क्रान्तिकारियों की भीड़ के समान थे। अनुशासन तथा सामग्री का अभाव भी इस क्रान्ति की असफलता का एक मुख्य कारण बना।

8. अंग्रेजों के पास पर्याप्त साधन – अंग्रेजों को इंग्लैण्ड से सैनिक और युद्ध-सामग्री की आपूर्ति बराबर मिलती रहती थी तथा यातायात के साधनों, रेल, तार आदि पर भी उनका अधिकार था। अतः वे सरलतापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्रता से आ-जा सकते थे तथा सन्देश भेज सकते थे। परन्तु क्रान्तिकारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में तथा सन्देश भेजने में पर्याप्त समय लगता था।

9. रचनात्मक कार्यक्रमों का अभाव – क्रान्तिकारियों ने सामान्य जनता के समक्ष भविष्य का कोई रचनात्मक कार्य नहीं रखा। इस कारण सामान्य जनता का भी इन्हें भरपूर समर्थन प्राप्त न हो सका।

10. वीभत्स और क्रूर अत्याचार – अंग्रेजों के वीभत्स और क्रूर अत्याचार भी क्रान्ति की असफलता के कारण बने। उनके अत्याचारों से भारतीय जनता इतनी अधिक भयभीत हो गयी कि उसका मनोबल गिर गया और वह क्रान्तिकारियों को समुचित सहयोग नहीं दे सकी।

11. नौसैनिक शक्ति का अभाव – 1857 ई० के विद्रोह को दबाने के लिए विश्व में फैले ब्रिटिश साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों से एक लाख से भी अधिक सैनिक भारत भेजे गये थे। क्रान्तिकारियों के पास कोई नौसैनिक शक्ति नहीं थी, फलत: (UPBoardSolutions.com) ये इंग्लैण्ड से आ रही युद्ध-सामग्री और सेना को रोक न सके।

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प्रश्न 3.
1857 ई० के भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दो प्रमुख नेताओं के जीवन एवं कार्यों का वर्णन कीजिए। [2014]
           या
महारानी लक्ष्मीबाई कौन थीं ? संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2010]
           या
सन् 1857 ई० के स्वतन्त्रता संघर्ष के चार क्रान्तिकारियों का उल्लेख कीजिए। उनमें से किन्हीं दो का अंग्रेजों के प्रति असन्तोष और उनके द्वारा किये गये संघर्ष का विवरण दीजिए।
           या
रानी लक्ष्मीबाई कौन थी ? उसने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष क्यों किया ?
           या
सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के किन्हीं दो क्रान्तिकारियों के अंग्रेजों के प्रति असन्तोष और उनके संघर्ष पर प्रकाश डालिए। [2012]
           या
देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई की क्या भूमिका थी? संक्षेप में लिखिए। [2016]
उत्तर :
सन् 1857 ई० के स्वतन्त्रता संग्राम में अनेक क्रान्तिकारियों (नेताओं) ने उल्लेखनीय योगदान दिया, जिनमें निम्नलिखित मुख्य हैं

1. नाना साहब – नाना साहब, पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। इनका वास्तविक नाम धुन्धुपन्त था। अंग्रेजों ने इन्हें पेशवा का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया तथा इनकी 80 हजार पौण्ड की पेंशन बन्द कर दी। इससे नाना साहब के मन में अंग्रेजों के प्रति असन्तोष फैल गया तथा वे उनके सबसे बड़े शत्रु बन गये। हिन्दू उन्हें बाजीराव का कानूनी उत्तराधिकारी समझते थे तथा उनके प्रति अंग्रेजों का यह व्यवहार अन्यायपूर्ण समझा गया। नाना साहब ने विद्रोहियों में स्वयं को एक नायक प्रमाणित किया। अजीमुल्ला खान ने उनकी सहायता की। अंग्रेजों से संघर्ष करने के लिए नाना साहब ने (UPBoardSolutions.com) मुगल सम्राट के प्रति निष्ठा की घोषणा कर दी और स्वतन्त्रता के संघर्ष को राष्ट्रीय जागृति के रूप में प्रस्तुत करने का कार्य किया। फलत: नाना साहब अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्तिकारियों का नेतृत्व करने वालों में आगे आ गये। संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने कानपुर पर अधिकार कर लिया तथा वहाँ अनेक अंग्रेज मौत के घाट उतार दिये। कुछ समय पश्चात् ही कानपुर के निकट बिठूर नामक स्थान पर वे अंग्रेजों से पराजित हो गये। क्रान्ति समाप्त होने
के बाद 1859 ई० में वे नेपाल चले गये।

2. महारानी लक्ष्मीबाई – महारानी लक्ष्मीबाई झाँसी के राजा गंगाधर राव की महारानी थीं। राजा गंगाधर राव की सन् 1853 ई० में मृत्यु हो गयी। अपने पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने दामोदर राव नामक एक अल्पवयस्क बालक को गोद ले लिया और पुत्र की संरक्षिका बनकर शासन-कार्य प्रारम्भ कर दिया। लॉर्ड डलहौजी ने गोद-निषेध नियम का लाभ उठाकर झाँसी के राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। इससे महारानी असन्तुष्ट हो गयीं तथा अंग्रेजों के प्रति उनके मन में असन्तोष व्याप्त हो गया। उन्होंने अंग्रेजों से बड़ी वीरता के साथ लोहा लिया तथा 1858 ई० में कालपी के निकट हुए संग्राम में वीरगति प्राप्त की।

3. मंगल पाण्डे – मंगल पाण्डे बैरकपुर की छावनी में कार्यरत एक वीर सैनिक था। इसने सबसे पहले 6 अप्रैल, 1857 ई० को चर्बीयुक्त कारतूसों का प्रयोग करने से स्पष्ट इनकार कर दिया था। जब कारतूसों के प्रयोग के लिए उससे जबरदस्ती की गयी तो वह भड़क उठा और उसने शीघ्र ही दो अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला। उस पर हत्या का आरोप लगा, परिणामस्वरूप उसे मृत्युदण्ड दिया गया। 8 अप्रैल, 1857 ई० को मंगल पाण्डे को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। मंगल पाण्डे का बलिदान 1857 ई० की महाक्रान्ति का तात्कालिक कारण बना।

4. कुँवर सिंह – कुंवर सिंह बिहार प्रान्त में आन्दोलन की रणभेरी बजाने वाले महान् स्वतन्त्रता सेनानी थे। कुंवर सिंह जगदीशपुर के जमींदार थे। राजा के नाम से विख्यात 80 वर्षीय कुंवर सिंह ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। इन्होंने आजमगढ़ और बनारस में सफलताएँ प्राप्त की। अपने युद्ध-कौशल और छापामार युद्ध-नीति द्वारा इन्होंने अनेक स्थानों पर अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिये। ब्रिटिश सेनानायक मारकर ने इन्हें पराजित करने का भरसक प्रयास किया, परन्तु कुंवर सिंह गंगा पार कर अपने प्रमुख गढ़ जगदीशपुर पहुँच गये और वहाँ अप्रैल, 1858 ई० में अपने को स्वतन्त्र राजा घोषित कर दिया। दुर्भाग्यवश कुछ ही दिनों बाद इनकी मृत्यु हो गयी।

5. तात्या टोपे – तात्या टोपे स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर चढ़ जाने वाले महान् सेनानी थे। ये नाना साहब के सेनापति थे। इन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई० के स्वतन्त्रता आन्दोलन को दीर्घकाल तक जारी रखा। अपनी सेना को लेकर इन्हें संकटकाल (UPBoardSolutions.com) में जंगलों में छिपे रहना पड़ता था। तात्या टोपे रानी लक्ष्मीबाई के साथ भी रहे। रानी द्वारा ग्वालियर के किले पर अधिकार करने में इनकी उल्लेखनीय भूमिका रही। रानी के वीरगति प्राप्त करने पर ये क्रान्ति की मशाल लेकर दक्षिण में पहुँचे। ये अन्तिम समय तक अंग्रेजों से लड़ते रहे। एक विश्वासघाती ने इन्हें सोते समय गिरफ्तार करवा दिया। अंग्रेजों ने 15 अप्रैल, 1859 ई० को इस महान् देशभक्त को तोप से उड़वा दिया।

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प्रश्न 4.
सन् 1857 ई० की क्रान्ति के क्या परिणाम हुए ? [2012]
उत्तर :

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम (सन् 1857 ई०) के परिणाम

सन् 1857 ई० का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम यद्यपि असफल रहा, तथापि इसके निम्नलिखित व्यापक प्रभाव पड़े –

  1. इस संग्राम ने इंग्लैण्ड की सरकार का ध्यान भारत में प्रशासन की ओर दिलाया, जिससे भारत को कम्पनी के शासन के स्थान पर सीधे ताज के अधीन कर दिया गया।
  2. महारानी विक्टोरिया ने देशी रियासतों का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय न करने की घोषणा की तथा गोद-निषेध प्रथा को समाप्त कर दिया गया।
  3. अंग्रेजी शिक्षा के और अधिक प्रचार और प्रसार का निर्णय लिया गया।
  4. अंग्रेजों ने भारत में साम्राज्यवादी प्रादेशिक विस्तार के स्थान पर आर्थिक शोषण की नीति के युग का आविर्भाव किया।
  5. अंग्रेजों के अत्याचारों से भारतीयों के मन में उनके प्रति द्वेष और बढ़ा जिससे राष्ट्रीयता की भावनाएँ प्रबल हुईं, जिसके फलस्वरूप भारतीय नेता देश को उनके चंगुल से छुड़ाकर ही चैन से बैठे।
  6. इस क्रान्ति ने अंग्रेजों को हिन्दू-मुस्लिम एकता की शक्ति का अनुभव करा दिया; अतः अब ब्रिटिश शासकों ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपनायी। इस नीति के कारण ही भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  7. प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने भारत के राष्ट्रीय जागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। राष्ट्रीय जागरण के फलस्वरूप भारतवासी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपना स्वाधीनता संघर्ष चलाने के लिए कटिबद्ध हो गये।
  8. इस क्रान्ति के फलस्वरूप भारत में ब्रिटिश संसद ने लोकतान्त्रिक (UPBoardSolutions.com) संस्थाओं के विकास को प्रोत्साहन दिया। कालान्तर में भारत एक सम्प्रभुतासम्पन्न लोकतान्त्रिक देश बन गया।
  9. इस क्रान्ति के परिणामस्वरूप जनता के प्रति अंग्रेजों की सहानुभूति कम हो गयी। उन्होंने जनता से अलग रहने की नीति अपना ली तथा प्रशासन में भी जातीय भेदभाव बढ़ गया।
  10. आर० सी० मजूमदार का कथन है कि “सन् 1857 ई० की क्रान्ति से भड़की आग ने भारत में ब्रिटिश शासन को उससे अधिक क्षति पहुँचायी, जितनी कि स्वयं क्रान्ति ने पहुँचायी थी।”
  11. अंग्रेजी सेना का पुनर्गठन किया गया और सेना में भारतीयों की संख्या को कम किया गया। तोपखाने में केवल यूरोपीय सैनिकों को तैनात किया जाने लगा। इसके अतिरिक्त भारतीय सैनिकों की जाति, धर्म व प्रान्त के आधार पर अलग-अलग टुकड़ियाँ बनायी गयीं, जिससे वे एक न हो सकें।

इस प्रकार प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के परिणाम बड़े व्यापक तथा दूरगामी सिद्ध हुए। इसके प्रभाव को स्पष्ट करते हुए ग्रिफिन ने कहा है कि “प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम भारतीय इतिहास की एक सौभाग्यशाली घटना थी, जिसने भारतीय गगनमण्डल को अनेक मेघों से मुक्त कर दिया था।”

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 ई० के संग्राम में महिला क्रान्तिकारियों के योगदानों की चर्चा संक्षेप में कीजिए।
           या
भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम (सन् 1857) में निम्नलिखित में से किन्हीं दो का परिचयदेते हुए उनके योगदान का वर्णन कीजिए
(क) रानी लक्ष्मीबाई, (ख) बेगम हजरत महल तथा, (ग) रानी अवन्ती बाई। (2010)
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति में महिला क्रान्तिकारियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं –

1. महारानी लक्ष्मीबाई – [संकेत–विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 के उत्तर को द्वितीय शीर्षक देखें।

2. बेगम हजरत महल – अवध में बेगम हजरत महल ने क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। ये साहसी, धैर्यवान और प्रबुद्ध महिला थीं। इन्होंने अपने राज्य के सम्मान को बचाने के लिए अंग्रेजों से टक्कर ली। कुछ समय के लिए ये लखनऊ क्षेत्र को स्वतन्त्र कराने में भी सफल हुईं। बाद में जनरल कैम्पबेल की सेनाओं ने 31 मार्च, 1858 ई० को लखनऊ पर अधिकार कर लिया था। बेगम हजरत महल अंग्रेजों के हाथ नहीं पड़ीं और वहाँ से बचकर निकल गयीं।

3. बेगम जीनत महल – सन् 1857 ई० की क्रान्ति राष्ट्रीयता की लड़ाई थी, इस तथ्य को बेगम जीनत महल जैसी साहसी महिला ने आन्दालेन में सक्रिय भाग लेकर सिद्ध कर दिया। बेगम जीनत महल प्रतिभाशाली और आकर्षक व्यक्तित्व वाली महिला थीं। इन्होंने भी सम्राट के (UPBoardSolutions.com) साथ आन्दोलन की लड़ाई को बड़े धैर्य और साहस के साथ लड़ा। राष्ट्र की स्वतन्त्रता से बेगम जीनत को विशेष स्नेह था, तभी अपनी सुख-सुविधा को छोड़कर इन्होंने स्वयं को राष्ट्र-सेवा में समर्पित कर दिया।

4. रानी अवन्ती बाई – मध्य प्रदेश की रियासत रामगढ़ की रानी अवन्ती बाई ने अंग्रेजी सेना से संघर्ष करने के लिए एक सशस्त्र सेना का निर्माण किया और क्रान्ति के दौरान युद्ध में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। बाद में अंग्रेजों की संगठित सेना के विरुद्ध लड़ते हुए रानी ने वीरतापूर्वक वीरगति प्राप्त की।

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प्रश्न 2.
महारानी के घोषणा-पत्र से ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर :
महारानी के घोषणा-पत्र से ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –

  1. सन् 1857 ई० की क्रान्ति के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन कम्पनी के स्थान पर ब्रिटिश की महारानी के हाथों में चला गया, जिससे कम्पनी अब भारत में अपनी मनमानी नहीं कर सकती थी।
  2. भारत की शासन-व्यवस्था अब ब्रिटिश ‘क्राउन’ द्वारा मनोनीत वायसराय को सौंप दी गयी। गवर्नर जनरल का पद समाप्त कर दिया गया।
  3. बोर्ड ऑफ डायरेक्टर एवं बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के समस्त अधिकार ‘भारत सचिव’ (Secretary of State for India) को सौंप दिये गये।
  4. इस अधिनियम के लागू होने के बाद 1784 ई० के (UPBoardSolutions.com) पिट्स इण्डिया ऐक्ट द्वारा स्थापित द्वैध शासन व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी गयी। देशी राजाओं का क्राउन से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित हो गया और डलहौजी की राज्य हड़प नीति निष्प्रभावी हो गयी।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कब लड़ा गया ?
उत्तर :
भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 ई० में लड़ा गया।

प्रश्न 2.
अपहरण की नीति किसने लागू की? इसकी मुख्य विशेषता क्या थी? [2011]
उत्तर :
अपहरण की नीति लॉर्ड डलहौजी ने लागू की। इसकी मुख्य विशेषता देशी राज्यों पर बलपूर्वक अधिकार प्राप्त करना था।

प्रश्न 3.
1857 ई० की क्रान्ति कब और कहाँ से प्रारम्भ हुई ? [2011]
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति का प्रारम्भ मेरठ से 10 मई, 1857 ई० को हुआ।

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प्रश्न 4.
1857 ई० के स्वाधीनता-संग्राम के चार प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए। [2011, 14]
उत्तर :
1857 ई० स्वाधीनता संग्राम के चार प्रमुख नेताओं के नाम निम्नलिखित हैं –

  1. रानी लक्ष्मीबाई
  2. कुंवर सिंह
  3. मंगल पाण्डे तथा
  4. नाना साहब।

प्रश्न 5.
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की दो वीरांगनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. रानी लक्ष्मीबाई तथा
  2. बेगम हजरत महल; प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की दो वीरांगनाएँ हैं।

प्रश्न 6.
10 मई, 1857 ई० का स्वाधीनता संग्राम किस नगर से प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर :
10 मई, 1857 ई० का स्वाधीनता संग्राम मेरठ से प्रारम्भ हुआ।

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प्रश्न 7.
रानी लक्ष्मीबाई किस राज्य की शासिका थीं ?
उतर :
रानी लक्ष्मीबाई झाँसी राज्य की शासिका थीं।

प्रश्न 8.
1857 ई० में नाना साहब ने विद्रोह का नेतृत्व कहाँ से किया था ?
उत्तर :
सन् 1857 ई० में नाना साहब (UPBoardSolutions.com) ने क्रान्ति का नेतृत्व कानपुर से किया था।

प्रश्न 9.
मंगल पाण्डे कौन थे ? उन्हें फाँसी की सजा कब दी गयी ?
उत्तर :
मंगल पाण्डे भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी थे, जिन्हें ब्रिटिश सेना के द्वारा क्रान्ति के लिए बैरकपुर में 8 अप्रैल, 1857 ई० को फाँसी दी गयी।

प्रश्न 10.
1857 ई० की क्रान्ति के किन्हीं दो प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति के दो प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. देशी राज्यों को हड़पने की नीति का अन्त हो गया।
  2. भारतीय राजाओं को गोद लेने का अधिकार प्रदान किया गया।

प्रश्न 11.
सन् 1857 ई० में बैरकपुर छावनी में दो ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करने वाले सैनिक का नाम लिखिए।
उत्तर :
बैरकपुर छावनी में दो ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करने वाले सैनिक का नाम मंगल पाण्डे था।

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प्रश्न 12.
बेगम हजरत महल कौन थीं ?
उत्तर :
बेगम हजरत महल अवध के अपदस्थ नवाब वाजिद अली शाह की बेगम तथा नवाब के अवयस्क बच्चे की संरक्षिका थीं। वे बड़ी वीर और साहसी महिला थीं। इन्होंने लखनऊ में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया और 1857 ई० के (UPBoardSolutions.com) स्वतन्त्रता संग्राम में वीरता से भाग लिया।

प्रश्न 13.
बरेली में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर :
बरेली में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व खान बहादुर खान ने किया।

प्रश्न 14.
कुशासन के आधार पर सर्वप्रथम किसे गद्दी से हटाया गया ?
उत्तर :
कुशासन के आधार पर सर्वप्रथम हैदराबाद के निजाम को गद्दी से हटाया गया।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आरम्भ कहाँ से हुआ ? [2009]

(क) कानपुर से
(ख) मेरठ से
(ग) दिल्ली से
(घ) लखनऊ से

2. मंगल पाण्डे किस ब्रिटिश छावनी में सैनिक थे?

(क) झाँसी
(ख) बैरकपुर
(ग) जगदीशपुर
(घ) रामपुर

3. मंगल पाण्डे को फाँसी कब दी गई ?

(क) 6 मई, 1859 ई० को
(ख) 8 अप्रैल, 1857 ई० को
(ग) 13 मई, 1859 ई० को
(घ) 17 जून, 1858 ई० को

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4. 1857 ई० के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के प्रमुख बलिदानी कुंवर सिंह किससे सम्बन्धित थे ?

(क) जगदीशपुर से
(ख) बैरकपुर से
(ग) अवध से
(घ) बिठूर से

5. बेगम हजरत महल सम्बन्धित थींया
          या
बेगम हजरत महल का सम्बन्ध किस स्थान से था ? [2013, 16, 17]
          या
बेगम हजरत महल ने स्वतन्त्रता संग्राम में कहाँ का नेतृत्व किया था ? (2015)

(क) अलीगढ़ से
(ख) कानपुर से
(ग) दिल्ली से
(घ) लखनऊ से

6. रानी अवन्ती बाई किस राज्य की रानी थी? [2011, 14, 17]
          या
रानी अवन्ती बाई, जिसने 1857 ई० में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था, शासक थी [2013]

(क) झाँसी की
(ख) रामगढ़ की
(ग) अवध की
(घ) जगदीशपुर की

7. भारत में अन्तिम मुगल सम्राट कौन था ? [2011, 15]

(क) बहादुरशाह
(ख) औरंगजेब
(ग) शाहआलम
(घ) सिराजुद्दौला

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8. प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम (1857) के दौरान भारत का गवर्नर जनरल कौन था? [2015]

(क) लॉर्ड कैनिंग
(ख) लॉर्ड डलहौजी
(ग) लॉर्ड नार्थब्रुक
(घ) लॉर्ड मेयो

9. भारत में गोद निषेध का सिद्धान्त किसने लागू किया था?

(क) लॉर्ड डलहौजी
(ख) लॉर्ड बैंटिंक
(ग) लॉर्ड कैनिंग
(घ) लॉर्ड मिन्टो

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 प्रथम स्वतन्त्रता-संग्राम–कारण तथा परिणाम 1

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 भारत के पड़ोसी देशों से सम्बन्ध तथा दक्षेस (अनुभाग – दो)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों का वर्णन कीजिए। [2012, 17]
या

भारत के निम्नलिखित पड़ोसी देशों के सम्बन्धों पर टिप्पणी लिखिए
1. अफगानिस्तान, 2. म्यांमार, 3. भूटान।
या
भारत के उत्तरी तथा उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर कौन-कौन से देश हैं? भारत से उनके सम्बन्धों का वर्णन कीजिए। [2015]
 या
भारत-पाकिस्तान के मध्य विवाद का मुख्य कारण क्या है? संक्षेप में लिखिए। [2018]
उत्तर :
भारत तथा पड़ोसी देश भारत की उत्तरी सीमा पर चीन, नेपाल और भूटान राष्ट्र स्थित हैं। पश्चिमोत्तर सीमा पर अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान स्थित हैं। उत्तर-पूर्वी सीमा पर म्यांमार और बांग्लादेश स्थित हैं। भारत के विशाल क्षेत्रफल के कारण इसकी सीमाएँ बहुत विस्तृत हैं तथा अनेक पड़ोसी सम्प्रभु राष्ट्रों से मिलती हैं। पंचशील के सिद्धान्तों में अटूट विश्वास होने के कारण भारत ने सदैव यही प्रयास किया है कि पड़ोसी (UPBoardSolutions.com) राज्यों के साथ उसके सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण बने रहें। भारत ने उनके साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का संचालन किया है तथा समय-समय पर उनके आर्थिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास में भी सहयोग दिया है। दक्षेस (SAARC) इन तथ्यों का जीता-जागता उदाहरण है।

भारत के उसके पड़ोसी देशों से सम्बन्धों को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है–

1. नेपाल– नेपाल के साथ भारत के बहुत प्राचीन सम्बन्ध हैं। नेपाल के नागरिकों को भारत में अनेक सुविधाएँ प्राप्त हैं। भारत ने नेपाल की अनेक परियोजनाओं को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता दी है। 13 अगस्त, 1971 ई० को भारत व नेपाल के बीच एक व्यापारिक सन्धि हुई। नेपाल अपने आन्तरिक संकट से जूझ रहा है, वहाँ राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। 27 नवम्बर, 2011 को तत्कालीन वित्तमंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने नेपाल की यात्रा की। यात्रा के दौरान उन्होंने डॉ० रामबरन यादव, राष्ट्रपति तथा बाबूराम भट्टराई, प्रधानमंत्री से मुलाकात की। अपने नेपाली प्रतिरूप श्री बरसामन पुन से उन्होंने द्विपक्षीय सलाह की जहाँ उन्होंने द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग की समीक्षा की तथा दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों का विस्तार करने के उपायों पर चर्चा की। नेपाल के प्रधानमंत्री की उपस्थिति में वित्तमंत्री ने संशोधित डबल टैक्सेशन एवायडेंस एग्रीमेंट (डीटीएए) पर हस्ताक्षर किए। भारत एवं नेपाल के सांसदों के मध्य परस्पर संपर्क बढ़ाने तथा बेहतर समझ एवं मित्रता का विकास करने के लिए 26-29 मार्च, 2011 को 6 युवा भारतीय सांसदों के दल ने नेपाल की यात्रा की। 7-13 अगस्त, 2011 के दौरान नेपाल के 15 महिला संविधान सभा सदस्यों/सांसदों ने भारत की यात्रा की। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार तथा विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत एवं पर्यटकों का हब रहा है। वर्तमान में भारत-नेपाल आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (UPBoardSolutions.com) के तहत छोटे तथा बड़े लगभग 400 प्रोजेक्ट चल रहे हैं। नेपाल के आर्थिक विकास में सहयोग करने तथा नेपाल के तराई क्षेत्र में विकास की सुविधा प्रदान करने की दृष्टि से, भारत नेपाल को भारत से जुड़े उसके सीमावर्ती क्षेत्रों में समेकित चेक पोस्टों का विकास, क्रास बार्डर रेल लिंक तथा तराई क्षेत्र में फीडर रोड तथा पाश्विक सड़कों के विकास के जरिए आधारभूत संरचना का विकास करने में सहायता प्रदान कर रहा है।

2. श्रीलंका-
श्रीलंका एवं भारत के सम्बन्ध प्राचीनकाल से ही मैत्रीपूर्ण एवं घनिष्ठ रहे हैं। सन् 1984 ई० में तमिल लोगों की समस्या को लेकर श्रीलंका सरकार का दृष्टिकोण भारत-श्रीलंका सम्बन्धों पर विपरीत प्रभाव डाल रहा था, परन्तु सन् 1988 ई० में कोलम्बो समझौते के बाद दोनों देशों के बीच सम्बन्ध अब सौहार्दपूर्ण हो गए हैं।

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3. म्यांमार (बर्मा)- म्यांमार एवं भारत के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण हैं। दोनों देशों में स्थल-सीमा के निर्धारण हेतु एक समझौता हो चुका है और दोनों देश गुट-निरपेक्ष नीति के समर्थक हैं। सभ्यतापरक जुड़ावों, भौगोलिक सामीप्य, संस्कृति, इतिहास तथा धर्म के सम्बन्धों से जुड़े भारत तथा म्यांमार के बीच काफी निकट सम्बन्ध रहे हैं। भारत तथा म्यांमार परस्पर 1600 किमी से अधिक की थल सीमा एवं बंगाल की खाड़ी की समुद्री सीमा साझा करते हैं। भारतीय मूल की एक बड़ी जनसंख्या (अनुमानतः 2.5 मिलियन) म्यांमार में निवास करती है। भारत तथा म्यांमार के सम्बन्धों में संतोषजनक वृद्धि एवं विविधता आई है तथा पिछले वर्ष इसमें बढ़ी हुई गति देखी गई। इस दौरान अक्टूबर, 2011 में म्यांमार के राष्ट्रपति की भारत यात्रा, विदेश मंत्री की जून, 2011 में म्यांमार यात्रा तथा म्यांमार के विदेश मंत्री की जनवरी, 2012 में यात्रा (UPBoardSolutions.com) शामिल है। वर्ष 2011-12 को म्यांमार के राजनीतिक ढाँचे के बदलाव के रूप में चिह्नित किया गया, क्योंकि इस दौरान संसदीय प्रजातन्त्र ढाँचे को ग्रहण किया गया। एक विस्तृत तथा व्यापक आधारित तरीके से प्रजातन्त्र में परिवर्तित होने के म्यांमार के प्रयासों को भारत ने निरन्तर सहयोग दिया है।

4. भूटान- 
भारत-भूटान सम्बन्ध प्रारम्भ से ही मैत्रीपूर्ण रहे हैं। भारत प्रतिवर्ष भूटान को आर्थिक सहायता प्रदान करता है। अगस्त, 2011 में नई दिल्ली में आयोजित भारत-भूटान द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में भारत ने भूटान के निवेदन पर सहमति जताते हुए डालू एवं घासूपारा लैन्ड कस्टम स्टेशनों का उपयोग भूटानी कार्यों के लिए तथा चार अतिरिक्त प्रवेश/निकास बिन्दु के नोटिफिकेशन पर सहमति । दी। 68 प्रमुख सामाजिक आर्थिक सेक्टर प्रोजेक्ट; यथा–कृषि, सूचना एवं संचार तकनीक (आईसीटी), मीडिया, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, संस्कृति तथा आधारभूत संरचना में भारत द्वारा सहायता प्रदान की जा रही है। लघु विकास प्रोजेक्ट (एसडीपी) के अंतर्गत देश के 20 जिलों एवं 205 ब्लाकों में 1900 प्रोजेक्टों के लिए भारत द्वारा भूटान को अनुदान दिया जा रहा है। पुनतसांगचू-1 हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (एचईपी) पूर्ण गति पर है तथा पुनतसांगचू-2 तथा मांगदेचू हाइड्रो इलेक्टूिड प्रोजेक्ट भी बेहतर तरीके से प्रगति पर है। इस प्रकार दोनों देश भूटान में वर्ष 2020 तक लगभग 10,000 मेगावाट बिजली के संयुक्त उत्पादन के लक्ष्य के करीब हैं, जिसका निर्यात भारत को किया जा सकेगा।

5, पाकिस्तान– पिछली शताब्दी में भारत तथा पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में काफी कटुता रही है, कई मुद्दों की गम्भीरता भी दोनों देशों को आपसी टकराव के कारण झेलनी पड़ी। लेकिन इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ होने पर इन देशों के नेताओं तथा सामान्य जनता ने भी सुधार लाने का प्रयत्न किया। प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में वाजपेयी व मुशर्रफ के बीच अनेक वार्ताएँ सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुईं। श्री मनमोहन सिंह की सरकार में पर-राष्ट्र मन्त्रालय के स्तर पर भी विदेश सेवा के उच्च अधिकारियों ने दोनों देशों के बीच सम्बन्धों को सामान्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। वीजा’ की शर्तों को अब कुछ आसान कर दिया गया है। दोनों देशों को उच्चायोगों के कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि करने की भी छूट दी गई है। पाकिस्तान की जेलों में कैद अनेक भारतीय मछुआरों को उच्च (UPBoardSolutions.com) हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप रिहा कर दिया गया है। भूटान के नगर थिम्पू में हुए सार्क सम्मेलन में भारत-पाकिस्तान के प्रधानमन्त्रियों के बीच अनेक मुद्दों पर वार्ता हुई। इन सब बिन्दुओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि भविष्य में दोनों देशों के मध्य विवादित पहलू समाप्त हो जाएँगे तथा सहयोग और मैत्री का नया आयाम विकसित होगा।

6. बांग्लादेश- 
बांग्लादेश के गठन में भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सन् 1972 ई० में ‘शान्ति व मैत्री सन्धि’ होने से दोनों देशों के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को प्रदान किए गए बांग्लादेश फ्रीडम एवार्ड को स्वीकार करने यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने 24-25 जुलाई, 2011 को ढाका की यात्रा की। सेंट्रल त्रिपुरा विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त मानद डी० लिट् पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 11-12 जनवरी, 2012 को त्रिपुरा की यात्रा की। दोनों देशों के बीच मित्रतापूर्ण एवं गतिपूर्ण द्विपक्षीय सहयोग के निष्कर्ष के रूप में दो ऐतिहासिक समझौते एवं आठ अन्य द्विपक्षीय दस्तावेजों पर भारतीय प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए गए। इसमें शामिल है सहयोग एवं विकास पर एक लैंडमार्क तथ अग्रदर्शी समझौता जो परस्पर शान्ति, समृद्धि तथा स्थायित्व हासिल करने के लिए एक टिकाऊ तथा दीर्घकालीन सहयोग के साझा विजन को रेखांकित करता है तथा 1974 समझौते के प्रोटोकॉल को भी रेखांकित करता है जो भारत-बांग्लादेश की थल सीमा के निर्धारण से सम्बन्धित है। प्रोटोकॉल 1974 के बल सीमा समझौते के तीन लंबित मुद्दों के हल होने को राह दिखलाता है, जो हैं- (i) अनिर्धारित थल सीमा सेगमेन्ट, (ii) एनक्लेव का आदान-प्रदान तथा (iii) प्रतिकूल कब्जे का निपटारा। भारत तथा बांग्लादेश में संयुक्त रूप में रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जन्म वर्षगाँठ मनाया जाना दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रदर्शित करता है। संयुक्त समारोह के उद्घाटन समारोह के लिए भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम० हामिद अंसारी ने 5-6 मई, 2011 को ढाका की यात्रा की। पूरे वर्ष के दौरान कलाकारों एवं सांस्कृतिक दलों का आदान-प्रदान जारी रहा।

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7. अफगानिस्तान- 
अफगानिस्तान एवं भारत के बीच व्यापारिक, सांस्कृतिक व तकनीकी सम्बन्ध स्थापित हुए हैं। हामिद करजाई अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हैं। वे उच्च अध्ययन के लिए भारत में कुछ वर्ष व्यतीत कर चुके हैं। भारत के अफगानिस्तान से काफी मधुर सम्बन्ध हैं। भारत नवनिर्माण के लिए अफगानिस्तान को प्राथमिकता के आधार पर आर्थिक सहायता उपलब्ध करा रहा है। पुलों आदि के निर्माण में भी भारत ने अफगानिस्तान को तकनीकी विशेषज्ञ तथा इंजीनियरों का दल उपलब्ध कराया है। अक्टूबर, 2011 में राष्ट्रपति करजई की यात्रा के दौरान भारत तथा अफगानिस्तान ने सामरिक भागीदारी पर एक (UPBoardSolutions.com) ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किये। समझौते में दोनों देशों के बीच एक मजबूत, जोशपूर्ण तथा बहुमुखी सम्बन्धों पर जोर दिया गया है।

8. चीन- 
भारत-चीन सम्बन्ध वर्तमान में सामान्य और मधुर हैं, किन्तु इन सम्बन्धों को बहुत अधिक मधुर और मित्रतापूर्ण इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि भारत-चीन सीमा विवाद बहुत पुराना है। और उसे सुलझाने की दिशा में चीन की ओर से कभी गम्भीर प्रयास नहीं किए गए। भारत के सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी चीन ने कुछ क्षेत्र अपना बताकर उस पर कब्जा कर लिया है। भारत द्वारा बार-बार विरोध व्यक्त किए जाने के बाद भी चीन की ओर से कोई निर्णयात्मक सहयोग नहीं मिल पा रहा है। वर्ष 2010 में भारत गणराज्य तथा चीन के बीच कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना के 60 वर्ष पूरे हुए। वर्ष 2011 को भारत-चीन आदान-प्रदान वर्ष के रूप में मनाया गया तथा इस दौरान विशेषकर राज्य/प्रांत स्तर पर दोनों राष्ट्रों के बीच बढ़े हुए आदान-प्रदान देखे गये। दोनों देशों के मध्य नियमित उच्च स्तरीय राजनीतिक संपर्क की गति देखी गयी।

बीआरआईसीएस सम्मेलन के दौरान अप्रैल 2011 में सान्या, चीन में भारतीय प्रधानमंत्री डॉ० मनमोहन सिंह ने चीन के राष्ट्रपति श्री हू जिन्ताओ से मुलाकात की। पूर्वी एशिया सम्मेलन के दौरान बाली, इंडोनेशिया में नवंबर, 2011 में उन्होंने चीनी प्रमुख श्री वेन जिआबाओ से मुलाकात की। सघन वार्ता ढाँचे के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय, क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर दोनों पक्षों ने परस्पर आदान-प्रदान किया। दोनों देशों के मध्य व्यापार तथा आर्थिक संबंध में व्यापार विस्तार हुआ तथा एक सामरिक आर्थिक संवाद (एसईडी) का प्रारम्भ कर इस सम्बन्ध को और गहरा किया गया। एसईडी की पहली बैठक चीन में सितम्बर, 2011 में हुई। दोनों पक्ष सभी लंबित मुद्दों जिसमें भारत-चीन सीमा प्रश्न भी शामिल है, को एक शान्तिपूर्ण बातचीत से हल करने की प्रतिबद्धता जताई। नई दिल्ली में जनवरी, 2012 में भारत-चीन सीमा (UPBoardSolutions.com) प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता का 15वाँ चक्र सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर भारत-चीन सीमा मामले पर सलाह एवं समन्वय हेतु एक कार्यकारी तन्त्र की स्थापना परे समझौता हुआ।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत ने सदैव अपने पड़ेसी देशों की सम्प्रभुता तथा अखण्डता का सम्मान किया है तथा किसी भी राज्य के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। अपनी सुदृढ़ तथा शक्तिशाली सैन्य शक्ति होने पर भी भारत ने कभी भी अपने पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण नहीं किया है, वरन् उनके साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना का प्रयास किया है। भारत ने अपने पड़ोसी राज्यों की विकास योजनाओं में आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया है।

प्रश्न 2.
सार्क क्या है ? इसके कितने सदस्य देश हैं ? इसका सचिवालय कहाँ है ? [2012]
या
दक्षेस के सदस्य देशों के नाम बताइए। इसके गठन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए। [2013]
या

दक्षेस (सार्क) की स्थापना कब और कहाँ हुई ? इसके किन्हीं दो उद्देश्यों को लिखिए। [2013, 18]
या

सार्क से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। [2015, 16]
या

सार्क के चार्टर में उल्लिखित किन्हीं तीन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। [2016]
या

दक्षेस का मुख्य न्यायालय कहाँ है? इसके सदस्य देशों के नाम लिखिए। इसके मुख्य उददेश्य क्या हैं? [2017]
या

दक्षेस की स्थापना व उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर :
सार्क (SAARC: South Asian Association for Regional Co-operation) विश्व का नवीनतम अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। हिन्दी में यह ‘दक्षेस’ (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) कहलाता है। इस संगठन की स्थापना 8 दिसम्बर, 1985 ई० को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में दो-दिवसीय अधिवेशन में हुई। यह दक्षिण एशिया के आठ देशों को एक क्षेत्रीय संगठन है। इस संगठन के देश-भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, (UPBoardSolutions.com) नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान हैं। सार्क ने इस क्षेत्र में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास में तेजी लाने और अखण्डता का सम्मान करते हुए परस्पर सहयोग से सामूहिक आत्मनिर्भरता में वृद्धि करने का लक्ष्य निर्धारित किया।

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सार्क के सभी सदस्य देशों की भू अथवा समुद्री सीमाएँ भारत से मिलती हैं। वैसे तो राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व में देशों के अनेक संगठन हैं; किन्तु दक्षिण एशिया के इन आठ देशों के क्षेत्रीय सहयोग पर आधारित इस संगठन का अपना ही महत्त्व है। पिछले कुछ वर्षों में इन देशों में परस्पर अविश्वास का जो माहौल बन गया है, . इस संगठन द्वारा उसे दूर करने में मदद मिलेगी। सार्क संगठन आठ देशों का एक परिवार है।
सार्क संगठन का मुख्य सचिवालय (प्रधान कार्यालय) नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में है।
सार्क के चार्टर के अनुच्छेद 2 में इसके निम्नलिखित सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है

  • सदस्य राष्ट्र एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • संगठम के ढाँचे के अन्तर्गत सहयोग, प्रभुसत्तासम्पन्न, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता, दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना तथा आपसी हित के सिद्धान्तों का आदर करना।
  • यह सहयोग द्विपक्षीय या बहुपक्षीय सहयोग की अन्य किसी स्थिति का स्थान नहीं लेगा, वरन् परस्पर पूरक होगा।

सार्क के चार्टर में 10 अनुच्छेद हैं, जिनमें सार्क के उद्देश्यों, सिद्धान्तों तथा वित्तीय व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। चार्टर के अनुच्छेद 1 में सार्क के निम्नलिखित उद्देश्य बताये गये हैं

  • दक्षिण एशियाई क्षेत्र में निवास करने वाली जनता के कल्याण तथा उनके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करना।
  • दक्षिण एशियाई राष्ट्रों की सामूहिक आत्मनिर्भरता में वृद्धि करना।
  • दक्षिण एशियाई क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित करना।
  • दक्षिण एशियाई राष्ट्रों में आपसी विश्वास, दूरदर्शिता तथा (UPBoardSolutions.com) एक-दूसरे की समस्याओं के प्रति सहानुभूति की भावना उत्पन्न करना।
  • सदस्य राष्ट्रों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में सक्रिय सहयोग और पारस्परिक सहायता में अभिवृद्धि करना।
  • अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग में वृद्धि करना।
  • सामान्य हित के मामलों पर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर आपसी सहयोग को अभिव्यक्त करना।

प्रश्न 3.
दक्षेस की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
दक्षिण एशियाई क्षेत्र में इस संगठन का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। इसे इस क्षेत्र के इतिहास में ‘नयी सुबह की शुरुआत कहा जा सकता है। भूटान नरेश ने तो इसे सामूहिक बुद्धिमत्ता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम बताया है, किन्तु व्यवहार में इस संगठन की सार्थकता कम होती जा रही है। सार्क ने पिछले दस वर्षों में एक ही ठोस काम किया है और वह है-खाद्य कोष बनाना। कृषि, शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण आदि 12 क्षेत्रों में सहयोग के लिए सार्क के देश सिद्धान्ततः सहमत हैं।

सार्क, सदस्य राष्ट्रों के आपसी सहयोग में वृद्धि करने की दिशा में पहला सशक्त प्रयास है। अत: सार्क की स्थापना का मूल उद्देश्य इन राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्धों को सामान्य बनाना है, जिसके लिए आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग अति आवश्यक है। सार्क ने नशीले पदार्थों की तस्करी पर रोक, आतंकवाद का विरोध, जनसंख्या पर नियन्त्रण, निरशस्त्रीकरण आदि विषयों पर प्रभावकारी कार्य सम्पादित किया है और सदस्य राष्ट्रों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक वृद्धि में भी सहायता दी है। गरीबी उन्मूलन, पर्यावरण, गुट-निरपेक्षता आदि प्रश्नों पर भी सार्क के सदस्य राष्ट्रों ने गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श किया है। सार्क देशों में भारत प्रमुख और सर्वाधिक शक्तिशाली देश है। इसलिए कुछ सार्क देश यह समझने लगे कि भारत इस क्षेत्र में अपनी चौधराहट स्थापित करना चाहता है, जब कि भारत का (UPBoardSolutions.com) उद्देश्य तो मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना है। इसके बावजूद भारत के बांग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका के साथ सम्बन्धों में दरार आ गयी। पाकिस्तान तो भारत के विरुद्ध विष उगलने लगा है। इसके अतिरिक्त सदस्य देशों की शासन-प्रणालियों और नीतियों में भिन्नता तथा द्विपक्षीय व विवादास्पद मामलों की छाया ने भी इस संगठन को निर्बल बनाये रखा है। इन कारणों और परस्पर अविश्वास के आधार पर यह संगठन केवल सैद्धान्तिक ढाँचा मात्र रह गया है, इसका कोई व्यावहारिक महत्त्व बने रहना सम्भव नहीं।

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लघ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत-मालदीव के पारस्परिक सम्बन्धों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
भारत और मालदीव ने आधिकारिक तौर पर और सौहार्दपूर्ण ढंग से 1976 में अपनी समुद्री सीमा का फैसला किया है। हालाँकि एक मामूली राजनयिक घटना 1982 में हुई जब मालदीव के राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल गयूम के भाई ने यह घोषणा की कि पड़ोसी मिनीकॉय द्वीप जो भारत के अधिकार क्षेत्र में था, मालदीव का एक हिस्सा है। मालदीव ने जल्दी और आधिकारिक तौर पर इस द्वीप पर अपने दावे से इन्कार किया। भारत और मालदीव ने 1981 में एक व्यापक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। दोनों ही देश क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के लिए दक्षिण एशियाई एसोसिएशन के संस्थापक हैं। इन दोनों (UPBoardSolutions.com) देशों ने दक्षिण एशियाई आर्थिक संघ और दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर भी किए हैं। भारत और | मालदीव के नेताओं ने क्षेत्रीय मुद्दों पर उच्चस्तरीय संपर्क और विचार-विमर्श को बनाए रखा है।

प्रश्न 2.
अब तक आयोजित दक्षेस शिखर सम्मेलनों की सूची प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 भारत के पड़ोसी देशों से सम्बन्ध तथा दक्षेस 1

प्रश्न 3.
भारत की पूर्वी सीमा पर स्थित दो पड़ोसी देशों के नाम लिखिए। भारत का उनसे सम्बन्ध समझाकर लिखिए। [2014]
             या
भारत की पूर्वी सीमा के निकट चार पड़ोसी देशों के नाम लिखिए। [2016]
उत्तर :
भारत की पूर्वी सीमा पर चीन, म्यांमार, भूटान तथा बांग्लादेश (UPBoardSolutions.com) स्थित हैं। [संकेत-भारत के इन देशों से सम्बन्ध के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।

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प्रश्न 4.
सार्क के सदस्य देश कितने हैं? उसका मुख्यालय कहाँ पर है? [2014]
उत्तर :
सार्क के सदस्य देश आठ हैं–भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान। इसका मुख्यालय काठमाण्डू (नेपाल) में है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत और पाकिस्तान के मध्य तनाव का मुख्य कारण क्या है ?
उत्तर :
भारत और पाकिस्तान के मध्य ‘कश्मीर-समस्या’ तनाव का प्रमुख कारण है।

प्रश्न 2.
बांग्लादेश की स्थापना में किस देश का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा ?
उत्तर :
बांग्लादेश की स्थापना में भारत (UPBoardSolutions.com) का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

प्रश्न 3.
भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकन्द समझौता कब हुआ ?
उत्तर :
भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकन्द समझौता सन् 1966 ई० में हुआ।

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प्रश्न 4.
भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता कब हुआ ?
उत्तर :
भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता सन् 1971 ई० में हुआ।

प्रश्न 5.
दक्षेस का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर :
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC : South Asian Association for Regional Co-operation)।

प्रश्न 6.
दक्षेस का पन्द्रहवाँ शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ ?
उत्तर :
दक्षेस का पन्द्रहवाँ शिखर सम्मेलन अप्रैल, 2008 ई० में कोलम्बो (श्रीलंका) में हुआ था।

प्रश्न 7.
दक्षेस (सार्क) संगठन के सदस्य देश कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
दक्षेस (सार्क) संगठन के सदस्य देश भारत, (UPBoardSolutions.com) पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव हैं। (वर्तमान में अफगानिस्तान भी इसका सदस्य है। इस प्रकार, इसके सदस्य देशों की संख्या आठ है।)

प्रश्न 8.
उन दो देशों के नाम लिखिए जिनकी सीमाएँ भारत की उत्तरी सीमा को स्पर्श करती हैं। [2012]
             या
भारत के किन्हीं दो पड़ोसी देशों के नाम लिखिए। [2015, 16]
उत्तर :

  • नेपाल तथा
  • चीन।

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प्रश्न 9.
सार्क का सचिवालय कहाँ और किस देश में स्थित है ? [2013]
उत्तर :
सार्क का सचिवालय काठमाण्डू (नेपाल) में स्थित है।

प्रश्न 10.
भारत और श्रीलंका के मध्य मुख्य विवाद किस बिन्दु पर है? [2014]
उत्तर :
भारत और श्रीलंका के मध्य मुख्य विवाद का कारण (UPBoardSolutions.com) मछुआरों द्वारा समुद्री सीमा का उल्लंघन करना है जिस पर दोनों ही देश आए दिन कार्यवाही करते हैं और मछुआरों को गिरफ्तार कर लेते हैं।

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. कश्मीर समस्या किन दो देशों के बीच में है?

(क) भारत-चीन में :
(ख) चीन-नेपाल में
(ग) भारत-पाकिस्तान में
(घ) भारत-मालदीव में

2. भारत और बांग्लादेश के बीच शान्ति और मैत्री सन्धि पर हस्ताक्षर हुए|

(क) 1972 ई० में
(ख) 1971 ई० में
(ग) 1950 ई० में
(घ) 1973 ई० में

3. भारत-भूटान मैत्री सन्धि कब हुई?

(क) 1977 ई० में
(ख) 1949 ई० में
(ग) 1950 ई० में
(घ) 1955 ई० में

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4. भारत-पाक के बीच शिमला समझौता हुआ

(क) 1972 ई० में
(ख) 1971 ई० में
(ग) 1973 ई० में
(घ) 1970 ई० में

5. ‘सार्क’ का प्रथम शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ था [2011, 12, 18]

(क) बंगलुरु में
(ख) काठमाण्डू में
(ग) इस्लामाबाद में
(घ) ढाका में

6. बांग्लादेश का जन्म हुआ

(क) 1971 ई० में।
(ख) 1972 ई० में
(ग) 1973 ई० में
(घ) 1970 ई० में

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7. दक्षेस की स्थापना हुई

(क) 1985 ई० में।
(ख) 1987 ई० में
(ग) 1988 ई० में।
(घ) 1986 ई० में

8. दक्षेस का 17वाँ शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ।[2012]

(क) भारत में
(ख) अर्दू में
(ग) नेपाल में
(घ) बांग्लादेश में

9. दक्षेस का 15वाँ शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ [2013]
              या
दक्षेस ( दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन, सार्क) का पन्द्रहवाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। [2013]

(क) कोलम्बो में
(ख) माले में
(ग) दिल्ली में
(घ) ढाका में

10. दक्षेस का मुख्यालय स्थित है [2012]

(क) काठमाण्डू में
(ख) ढाका में
(ग) नई दिल्ली में
(घ) कोलम्बो में

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11. भारत-पाकिस्तान के बीच दूसरा युद्ध हुआ था [2013]

(क) 1965 ई० में
(ख) 1970 ई० में
(ग) 1971 ई० में
(घ) 1972 ई० में

12. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) की स्थापना किस वर्ष हुई थी ? [2015, 16]

(क) 1984
(ख) 1985
(ग) 1986
(घ) 1987

13. भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता पर हस्ताक्षर हुए थे [2016]

(क) 1962 ई० में
(ख) 1965 ई० में
(ग) 1972 ई० में
(घ) 1999 ई० में

14. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) की स्थापन करने में निम्नलिखित में से .. किसने पहल की थी? [2017]

(क) जिया-उर-रहमान (बांग्लादेश),
(ख) मोहम्मद नशीद (मालद्वीप)
(ग) राजीव गाँधी (भारत)
(घ) महिन्द्रा राजपक्षे (श्रीलंका)

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15. निम्नलिखित में से कौन राज्य म्यांमार की सीमा रेखा पर स्थित नहीं है? [2018]

(क) नागालैण्ड
(ख) मिजोरम
(ग) मेघालय
(द) अरुणाचल प्रदेश

उत्तरमाला

1. (ग), 2. (क), 3. (ख), 4. (ख), 5. (घ), 6. (क), 7. (क), 8. (ख), 9. (क), 10. (क), 11. (ग), 12. (ख) 13. (ग), 14. (क), 15. (क)

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 are helpful to complete your homework.

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