UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 4 सूक्ति – सुधा (पद्य – पीयूषम्)

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परिचय

प्रस्तुत पाठ के अन्तर्गत कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है। ‘सूक्ति’ का अर्थ ‘सुन्दर कथन है। सूक्तियाँ प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में प्रत्येक मनुष्य के लिए समान रूप से उपयोगी होती हैं। जिस प्रकार सुन्दर वचन बोलने से बोलने वाले और सुनने वाले दोनों का (UPBoardSolutions.com) ही हित होता है, उसी प्रकार काव्यों में लिखित सूक्तियाँ आनन्ददायिनी होने के साथ-साथ जीवन में नैतिकता और सामाजिकता भी लाती हैं। ये मनुष्यं को अमृत-तत्त्व की प्राप्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती हैं।

पाठ-सारांश

प्रस्तुत पाठ में नौ सूक्तियाँ संकलित हैं। उनका संक्षिप्त सार इस प्रकार है

  1. संसार की समस्त भाषाओं में देववाणी कही जाने वाली भाषा संस्कृत सर्वश्रेष्ठ है। इसका काव्य सुन्दर है। और इसके सुन्दर एवं मधुर वचन (सूक्तियाँ) तो अद्वितीय हैं।
  2. मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न मानते हैं, जब कि इस पृथ्वी पर रत्न तो अन्न, जल एवं मधुरं वचन हैं।
  3. बुद्धिमान् लोग अपना समय ज्ञानार्जन में लगाते हैं, जब कि मूर्ख लोग अपने समय को सोने अथवा निन्दित कार्यों में व्यर्थ गॅवाते हैं।
  4. जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ संस्कृत के मधुर श्लोक सर्वत्र आनन्द का प्रसार करते हैं। इसके विपरीत जहाँ दुर्जन निवास करते हैं, वहाँ ‘श्लोक’ के ‘ल’ का लोप होकर केवल ‘शोक’ ही शेष रह जाता है, अर्थात् वहाँ पर आनन्द का अभाव हो जाता है।
  5. व्यक्ति को सदैव समयानुसार ही बात करनी चाहिए। समय के विपरीत बात करने पर तो बृहस्पति भी उपहास के पात्र बने थे।
  6. श्रद्धा के साथ कही गयी तथा पूछी गयी बात सर्वत्र आदरणीय होती है और बिना श्रद्धा के वह वन में रोने के समान व्यर्थ होती है।
  7. विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है; क्योंकि यह राजा द्वारा छीनी नहीं जा सकती, भाइयों द्वारा विभाजित नहीं की जा सकती। इसीलिए देवताओं और विद्वानों द्वारा इसकी उपासना की जाती है।
  8. याचकों के दु:खों को दूर न करने वाली लक्ष्मी, विष्णु की भक्ति में मन को न लगाने (UPBoardSolutions.com) वाली विद्या, विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त न करने वाला पुत्र, ये तीनों न होने के बराबर ही हैं।
  9. व्यक्ति की शोभा स्नान, सुगन्ध-लेपन एवं आभूषणों से नहीं होती है, वरन् उसकी शोभा तो एकमात्र सुन्दर मधुर वाणी से ही होती है।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्माद्धि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम् ॥ [2009, 10, 12, 13]

शब्दार्थ भाषासु = भाषाओं में मुख्या = प्रमुख। मधुरा = मधुर गुणों से युक्त। दिव्या = अलौकिक गीर्वाणभारती = देवताओं की वाणी, संस्कृत। तस्मात् = उससे। हि = निश्चयपूर्वका अपि = भी। सुभाषितम् = सुन्दर या उपदेशपरक वचन। सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ में संकलित ‘सूक्ति-सुधा’ शीर्षक पाठ से अवतरित है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संस्कृत भाषा और सुभाषित की विशेषता बतायी गयी है।

अन्वय भाषासु गीर्वाणभारती मुख्या, मधुरा दिव्या (च अस्ति)। तस्मात् हि काव्यं मधुरम् (अस्ति), तस्मात् अपि सुभाषितम् (मधुरम् अस्ति)।।

व्याख्या विश्व की समस्त भाषाओं में देवताओं की वाणी अर्थात् संस्कृत प्रमुख, मधुर गुण से युक्त (UPBoardSolutions.com) और अलौकिक है। इसलिए उसका काव्य भी मधुर है। उससे भी मधुर उसके सुन्दर उपदेशपरक वचन अर्थात् सुभाषित हैं। तात्पर्य यह है कि संस्कृतभाषा सर्वविध गुणों से युक्त है।

(2)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढः पाषाण-खण्डेषु रत्न-संज्ञा विधीयते ॥ [2006,07,08,09, 10,12]

शब्दार्थ पृथिव्यां = भूतल पर, पृथ्वी पर त्रीणि रत्नानि = तीन रत्न। सुभाषितम् =अच्छी वाणी। मूढः = मूर्ख लोगों के द्वारा पाषाणखण्डेषु = पत्थर के टुकड़ों में। रत्नसंज्ञा = रत्न का नाम विधीयते = किया जाता है।

प्रसग प्रस्तुत श्लोक में जल, अन्न और सुन्दर वचन को ही वास्तविक रत्न बताया गया है।

अन्वय पृथिव्यां जलम्, अन्नं, सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति)। मूढ: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।

व्याख्या पृथ्वी पर जल, अन्न और सुन्दर (उपदेशपरक) वचन–ये तीन रत्न अर्थात् श्रेष्ठ पदार्थ हैं। मूर्ख लोगों ने पत्थर के टुकड़ों को रत्न का नाम दे दिया है। तात्पर्य यह है कि जल, अन्न और मधुर वचनों का प्रभाव समस्त संसार के कल्याण के लिए होता है, जब कि रल जिनके पास होते हैं, केवल उन्हीं का कल्याण करते हैं। अत: जल, अन्न और मधुर वचन ही वास्तविक रत्न हैं।

(3) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। व्यँसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥ [2007,08, 10]

शब्दार्थ काव्यशास्त्रविनोदेन = काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन से। कालः = समय। गच्छति = बीतता है। धीमताम् = बुद्धिमानों का। व्यसनेन = निन्दनीय कर्मों के करने से। निद्रया = निद्रा द्वारा कलहेन = झगड़ा करने से। वा = अथवा।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में मूर्खा और बुद्धिमानों के समय बिताने के साधन में अन्तर बताया गया है।

अन्वय धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति, मूर्खाणां (कालः) च व्यसनेन, निद्रया कलहेन वा (गच्छति)।

व्याख्या बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन (आनन्द प्राप्त करने) और पठन-पाठन में व्यतीत होता है। मूर्खा का समय निन्दित कार्यों के करने में, सोने में अथवा झगड़ने में व्यतीत होता है।

(4)
श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः।
लकारो लुप्यते यत्र तत्र तिष्ठन्त्यसाधवः ॥ [2006,08,09, 10]

शब्दार्थ श्लोकस्तु = यश तो। लोकताम् याति = कीर्ति की प्राप्ति करता है। यत्र = जहाँ। (UPBoardSolutions.com) तिष्ठन्ति = रहते हैं। साधवः = सज्जन पुरुष लकारो लुप्यते = श्लोक का ‘ल’ वर्ण लुप्त हो जाता है अर्थात् श्लोक ‘शोक’ बन जाता है। तत्र = वहाँ। असाधवः = दुर्जन पुरुष।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों और दुर्जनों की संगति का प्रभाव दर्शाया गया है।

अन्वय यत्र साधवः तिष्ठन्ति, श्लोकः तु श्लोकताम् याति। यत्र असाधवः तिष्ठन्ति, तत्र लकारो लुप्यते (अर्थात् श्लोकः शोकतां याति)।

व्याख्या जहाँ सज्जन रहते हैं, वहाँ श्लोक (संस्कृत का छन्द) कीर्ति की प्राप्ति करता है। जहाँ दुर्जन रहते हैं, वहाँ श्लोक का ‘लु’ लुप्त हो जाता है अर्थात् श्लोक ‘शोक’ की प्राप्ति कराता है। तात्पर्य यह है कि अच्छी बातों, उपदेशों या सूक्तियों का प्रभाव सज्जनों पर ही पड़ता है; दुष्टों पर तो उसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह भी कहा जा सकता है कि सज्जनों की उपस्थिति वातावरण को आनन्दयुक्त कर देती है और दुर्जनों की उपस्थिति दुःखपूर्ण बना देती है।

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(5)
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन्।
प्राप्नुयाद् बुद्ध्यवज्ञानमपमानञ्च-शाश्वतम् ॥ [2011]

शब्दार्थ अप्राप्तकालम् = समय के प्रतिकूल वचन = बात। बृहस्पतिः = देवताओं के गुरु बृहस्पति अर्थात् अत्यधिक ज्ञानवान् व्यक्ति। अपि = भी। बुवन् = बोलता हुआ। प्राप्नुयात् = प्राप्त करता है। बुद्ध्यवज्ञानम् = बुद्धि की उपेक्षा; बुद्धि की अवमानना। शाश्वतम् = निरन्तर।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में समय के प्रतिकूल बात न कहने की शिक्षा दी गयी है।

अन्वय अप्राप्तकालं वचनं ब्रुवन् बृहस्पतिः अपि बुद्ध्यवज्ञानं शाश्वतम् अपमानं च प्राप्नुयात्।

व्याख्या समय के विपरीत बात को कहते हुए देवताओं के गुरु बृहस्पति भी बुद्धि की अवज्ञा और सदा रहने वाले अपमान को प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को समय के अनुकूल बात ही करनी चाहिए।

(6)
वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः
प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्याप्यरण्यरुदितोपमम् ॥

शब्दार्थ वाच्यम् = कहने योग्य। श्रद्धासमेतस्य = श्रद्धा से युक्त का। पृच्छतः = (UPBoardSolutions.com) पूछने वाले का। प्रोक्तं = कहा हुआ। श्रद्धाविहीनस्य = श्रद्धारहित के लिए। अरण्य-रुदितोपमम् = अरण्यरोदन के समान निरर्थक है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रद्धा के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अन्वये श्रद्धासमेतस्य विशेषतः पृच्छतः च वाच्यम्। श्रद्धाविहीनस्य प्रोक्तम् अपि अरण्यरुदितोपमम् (अस्ति )।

व्याख्या श्रद्धा से युक्त अर्थात् श्रद्धालु व्यक्ति की और विशेष रूप से पूछने वाले की बात कहने योग्य होती है। श्रद्धा से रहित अर्थात् अश्रद्धालु व्यक्ति का कहा हुआ भी अरण्यरोदन अर्थात् जंगल में रोने के समान निरर्थक है। तात्पर्य यह है कि ऐसे ही व्यक्ति या शिष्य को ज्ञान देना चाहिए, जो श्रद्धालु होने के साथ-साथ जिज्ञासु भी हो।

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(7)
वसुमतीपतिना नु सरस्वती, बलवता रिपुणा न च नीयते
समविभागहरैर्न विभज्यते, विबुधबोधबुधैरपि सेव्यते ॥ [2006, 10]

शब्दार्थ वसुमतीपतिना = राजा के द्वारा| सरस्वती = विद्या| बलवता रिपुणी = बलवान् शत्रु के द्वारा न नीयते = नहीं ले जायी जाती है। समविभागहरैः = समान हिस्सा लेने वाले भाई-बहनों के द्वारा। न विभज्यते = नहीं विभक्त की जाती है। विबुधबोधबुधैः = ऊँचे से ऊँचे विद्वानों के द्वारा। सेव्यते = सेवित होती है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्या को अमूल्य धन बताया गया है।

अन्वय सरस्वती वसुमतीपतिना बलवता रिपुणा च न नीयते। समविभागहरैः न विभज्यते, विबुधबोधबुधैः अपि सेव्यते।।

व्याख्या विद्या राजा के द्वारा और बलवान् शत्रु के द्वारा (हरण करके) नहीं ले जायी जाती है। यह समान हिस्सा लेने वाले भाइयों के द्वारा भी बाँटी नहीं जाती है तथा देवताओं के ज्ञान के समान ज्ञान वाले विद्वानों के द्वारा भी सेवित होती है। तात्पर्य यह है कि विद्या को न तो राजा ले सकता है और न ही बलवान् शत्रु। इसे भाई-बन्धु भी नहीं बाँटते अपितु यह तो ज्ञानी-विद्वानों द्वारा भी सेवित है।

(8)
लक्ष्मीनं या याचकदुः खहारिणी, विद्या नयाऽप्यच्युतभक्तिकारिणी।
पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः, सा नैव सा नैव स नैव नैव ॥ [2012]

शब्दार्थ या = जो लक्ष्मी। याचकदुःखहारिणी = याचकों के दुःख को दूर करने वाली। अच्युतभक्तिकारिणी = विष्णु की भक्ति उत्पन्न करने वाली। पण्डितमण्डलाग्रणीः = पण्डितों के समूह में आगे रहने वाला, श्रेष्ठ। सानैव = वह नहीं है।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वास्तविक लक्ष्मी, विद्या तथा पुत्र के विषय में बताया गया है।

अन्वय या लक्ष्मीः याचकदु:खहारिणी न (अस्ति) सा (लक्ष्मीः) नैव (अस्ति)। या विद्या अपि अच्युतभक्तिकारिणी न (अस्ति) सा (विद्या) नैव (अस्ति)। यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणी: न (अस्ति) सः (पुत्र) एव न (अस्ति), नैव (अस्ति)।

व्याख्या जो लक्ष्मी याचकों अर्थात् माँगने वालों के दु:खों को दूर करने वाली नहीं है, वह लक्ष्मी ही नहीं है, जो विद्या भी भगवान् विष्णु में भक्ति उत्पन्न करने वाली नहीं है, वह विद्या ही नहीं है, जो पुत्र पण्डितों के समूह में आगे रहने वाला (श्रेष्ठ) नहीं है; वह पुत्र ही नहीं है। (UPBoardSolutions.com) तात्पर्य यह है कि वास्तविक धन वही है, जो परोपकार में प्रयुक्त होता है; विद्या वही है, जिससे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है और पुत्र वही है जो विद्वान् होता है।

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(9)
केयूराः न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः।
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्द्धजाः ॥ [2012]
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009]

शब्दार्थ केयूराः = बाजूबन्द (भुजाओं में पहना जाने वाला सोने का आभूषण)। हाराः = हार। विभूषयन्ति = सजाते हैं। चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्रमा के समान उज्ज्वला विलेपनम् = शरीर में किया जाने वाला चन्दन आदि का लेप। कुसुमं = फूल। अलङ्कृताः = सजे हुए। मूर्द्धजाः = बाल। वाण्येका (वाणि + एका) = एकमात्र वाणी। समलङ्करोति = सजाती है। संस्कृती = संस्कार की गयी, भली-भाँति अध्ययन आदि के द्वारा शुद्ध की गयी। धार्यते = धारण की जाती है। क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं। खलु = निश्चित ही। भूषणानि = समस्त आभूषण। सततं = सदा| वाग्भूषणम् = वाणीरूपी आभूषण। भूषणं = आभूषण।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संस्कारयुक्त वाणी का महत्त्व बताया गया है।

अन्वय केयूराः पुरुषं न विभूषयन्ति, चन्द्रोज्ज्वला: हाराः न (विभूषयन्ति)। न स्नानं, न विलेपनं, न कुसुमं, न अलङ्कृताः मूर्द्धजाः पुरुषं (विभूषयन्ति)। एकावाणी, या संस्कृता धार्यते, पुरुषं समलङ्करोति। भूषणानि खलु क्षीयन्ते। वाग्भूषणं (वास्तविकं) सततं भूषणम् (अस्ति)।

व्याख्या पुरुष को सुवर्ण के बने बाजूबन्द सुशोभित नहीं करते हैं। चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार शोभित नहीं करते हैं। स्नान, चन्दनादि का लेप, फूल, सुसज्जित बाल पुरुष को शोभित नहीं करते हैं। एकमात्र वाणी, जो अध्ययनादि द्वारा संस्कार करके धारण की गयी है, पुरुष को सुशोभित करती है। अन्य आभूषण तो निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। वाणीरूपी आभूषण ही सदा आभूषण है। तात्पर्य यह है कि वाणी-रूपी आभूषण ही सच्चा आभूषण है, जो कभी नष्ट नहीं होता।

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सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती। [2011]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के . ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग इस सूक्ति में संस्कृत भाषा के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ सभी भाषाओं में संस्कृत सबसे प्रमुख, मधुर और अलौकिक है।

व्याख्या विश्व की समस्त भाषाओं में संस्कृत भाषा को ‘गीर्वाणवाणी’ अर्थात् देवताओं की भाषा बताया गया है। यह भाषा शब्द-रचना की दृष्टि से दिव्य, भाषाओं की दृष्टि से मधुर तथा विश्व की भाषाओं में प्रमुख है। इस भाषा में उत्तम काव्य, सरस नाटक और चम्पू पाये जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) इस भाषा में धर्म, दर्शन, इतिहास, चिकित्सा आदि सभी विषयों पर प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इतनी सम्पूर्ण भाषा विश्व में कोई और नहीं है।

(2) भाषासु काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्। [2005]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुभाषित के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ (संस्कृत) भाषा में काव्य मधुर है तथा उससे भी अधिक सुभाषित।

व्याख्या भाषाओं में संस्कृत भाषा सबसे दिव्य, मुख्य और मधुर है। इससे भी अधिक मधुर इस भाषा के काव्य हैं और काव्यों से भी अधिक मधुर हैं इस भाषा के सुभाषित। सुभाषित से आशय ऐसी उक्ति या कथन से होता है जो बहुत ही अच्छी हो। इसे सूक्ति भी कहते हैं। सूक्तियाँ प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में प्रत्येक मनुष्य के लिए समान रूप से उपयोगी होती हैं। जिस प्रकार सुन्दर वचन बोलने से वक्ता और श्रोता दोनों का ही हित होता है, उसी प्रकार काव्यों में निहित सूक्तियाँ आनन्ददायिनी होने के साथ-साथ जीवन में नैतिकता का समावेश कराती हैं तथा अमृत-तत्त्व की प्राप्ति में प्रेरणा प्रदान करती हैं। यही कारण है कि (संस्कृत) भाषा में सूक्ति को सर्वोपरि मान्यता प्रदान की गयी है।

(3)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम्। [2006,07, 08, 11, 12, 14]
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञाविधीयते ॥ [2007,08, 11, 15]

प्रसंग इन सूक्तियों में जल, अन्न और अच्छे वचनों को ही सर्वोत्कृष्ट रत्न की संज्ञा प्रदान की गयी है।

अर्थ पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित ये तीन रत्न हैं। मूर्ख व्यक्ति ही पत्थरों को रत्न मानते हैं।

व्याख्या मानव ही नहीं पशु-पक्षी भी अन्न-जल और सुन्दरवाणी के महत्त्व को भली प्रकार पहचानते हैं। अन्न से भूख शान्त होती है, जल से प्यास बुझती है और सुन्दर वचनों से मन को सन्तोष मिलता है। बिना अन्न और जल के तो जीवधारियों का जीवित रहना कठिन ही नहीं वरन् असम्भव ही है। इसीलिए इन्हें सच्चे रत्न कहा गया है। सांसारिक मनुष्य अपनी अल्पज्ञता के कारण सभी प्रकार से धन-संग्रह की प्रवृत्ति में लगा रहता है। वह हीरे, रत्न, जवाहरात, मणियों का संचय करके धनी एवं वैभवशाली बनना चाहता है। वह इन्हें ही अमूल्य एवं महत्त्वपूर्ण मानता है, परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। ये तो पत्थर के टुकड़े मात्र हैं। वास्तव में जल, अन्न और सुवाणी (अच्छे वचन) ही सच्चे रत्न हैं।

(4) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। [2006,07,08, 09, 10, 11, 14, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है।

अर्थ बुद्धिमानों का समय काव्य-शास्त्र के पठन-पाठन में ही बीत जाता है।

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व्याख्या विद्वान् और सज्जन अपने समय को शास्त्रों और काव्यों का अध्ययन करने में लगाते हैं। वे यदि अपना मनोरंजन भी करते हैं तो इसी प्रकार के अच्छे कार्यों से करते हैं और सदैव लोकोपकार की बात सोचते हैं, क्योंकि वे समय के महत्त्व को जानते हैं। वे समझते हैं कि “आयुषः क्षण एकोऽपि न लभ्यः स्वर्णकोटिकैः । सचेन्निरर्थकं नीतः का नु हानिस्ततोऽधिकाः ।।”; अर्थात् आयुष्य का एक भी क्षण सोने की करोड़ों मुद्राओं के द्वारा नहीं खरीदा जा (UPBoardSolutions.com) सकता। यदि इसे व्यर्थ बिता दिया गया तो इससे बड़ी हानि और क्या हो सकती है? इसीलिए वे अपना समय काव्य-शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत करते हैं क्योंकि आत्म-उद्धार के लिए भी ज्ञान परम आवश्यक है।

(5) व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रयाकलहेन वा। [2010]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में मूर्ख लोगों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है।

अर्थ मूख का समय बुरी आदतों, निद्रा व झगड़ने में व्यतीत होता है।

व्याख्या मूर्ख लोग अपना समय सदैव ही व्यर्थ के कार्यों में बिताते हैं। समय बिताने के लिए वे जुआ, शराब आदि के व्यसन करते हैं और स्वयं को नरक में धकेलते हैं। कुछ लोग अपना समय सोकर बिता देते हैं। और कुछ लड़ाई-झगड़े में अपना समय लगाकर दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हैं। इनके किसी भी कार्य से किसी को कोई लाभ अथवा सुख नहीं मिलता है; क्योंकि परोपकार करना इनको आता ही नहीं है। इन्हें तो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने में ही सुख की प्राप्ति होती है।

(6), श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः। [2012]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों की उपस्थिति का महत्त्व समझाया गया है।

अर्थ जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ श्लोक तो यश को प्राप्त करता है।

व्याख्या सज्जन अच्छी और सुन्दर बातों को बढ़ावा देकर उनके संवर्द्धन में अपना योगदान देते हैं। इसीलिए सज्जनों के मध्य विकसित श्लोक; अर्थात् संस्कृत कविता का छन्द; कवि की कीर्ति या यश को चतुर्दिक फैलाता है। आशय यह है कि कविता सज्जनों के मध्य ही आनन्ददायक होती है तथा कवि को यश व कीर्ति प्रदान करती है। दुर्जनों के मध्य तो यह विवाद उत्पन्न कराती है तथा शोक (दुःख) का कारण बनती है।

(2) वसुमतीपतिना नु सरस्वती।। [2011]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्या के विषय में वर्णन किया गया है।

अर्थ राजा के द्वारा भी विद्या (नहीं छीनी जा सकती है)।

व्याख्या विद्या न तो राजा के द्वारा अथवा न ही किसी बलवान् शत्रु के द्वारा बलपूर्वक छीनी जी सकती है। यह विद्यारूपी धन किसी के द्वारा बाँटा भी नहीं जा सकता, अपितु यह तो जितनी भी बाँटी जाए, उसमें उतनी ही वृद्धि होती है। यह धन तो बाँटे जाने पर बढ़ता ही रहता है। प्रस्तुत सूक्ति विद्या की महत्ता को परिभाषित करती है।

(8) लक्ष्मीनं या याचकदुःखहारिणी। [2012]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में लक्ष्मी की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ जो याचक (माँगने वालों) के दु:खों को दूर करने वाली नहीं है, (वह) लक्ष्मी (नहीं है)।

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व्याख्या किसी भी व्यक्ति के पास लक्ष्मी अर्थात् धन है तो उस लक्ष्मी की सार्थकता इसी में है कि वह उसके द्वारा याचकों अर्थात् माँगने वालों के दु:खों को दूर करे। आशय यह है कि धनसम्पन्न होने पर भी कोई व्यक्ति यदि किसी की सहायता करके उसके कष्टों को दूर नहीं करता है तो उसका धनसम्पन्न होना व्यर्थ ही है। व्यक्ति का धनी होना तभी सार्थक है जब वह याचक बनकर अपने पास आये लोगों को निराश न करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता करे। (UPBoardSolutions.com) कविवर रहीम ने सामर्थ्यवान् लेकिन याचक की मदद न करने वाले लोगों को मृतक के समान बताया है रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाय। उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाय ॥

(9) विद्या न याऽप्यच्युतभक्तिकारिणी।। [2008, 1]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्या की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति में प्रवृत्त करने वाली नहीं है, (वह विद्या नहीं है)।

व्याख्या वही विद्या सार्थक है, जो व्यक्ति को भगवान विष्णु अर्थात् ईश्वर की भक्ति में प्रवृत्त करती है। जो विद्या व्यक्ति को ईश्वर की भक्ति से विरत करती है, वह किसी भी प्रकार से विद्या कहलाने की अधिकारिणी ही नहीं है। विद्या वही है, जो व्यक्ति को जीवन और मरण के बन्धन से मुक्त करके मोक्ष-पद प्रदान करे। मोक्ष-पद को भक्ति के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति को भक्ति में विद्या ही अनुरक्त कर सकती है। इसीलिए विद्या को प्रदान करने (UPBoardSolutions.com) वाले गुरु को कबीरदास जी ने ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

(10) पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः। [2006,09]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सच्चे पुत्र की विशेषता बतायी गयी है।

अर्थ जो पुत्र विद्वानों की मण्डली में अग्रणी नहीं, वह पुत्र ही नहीं है।

व्याख्या सूक्तिकार का तात्पर्य यह है प्रत्येक व्यक्ति पुत्र की कामना इसीलिए करता है कि वह उसके कुल के नाम को चलाएगा; अर्थात् अपने सद्कर्मों से अपने कुल के यश में वृद्धि करेगा और यह कार्य महान् पुत्र ही कर सकता है। मूर्ख पुत्र के होने का कोई लाभ नहीं होता; क्योंकि उससे कुल के यश में वृद्धि नहीं होती। ऐसा पुत्र होने से तो नि:सन्तान रह जाना ही श्रेयस्कर है। वस्तुतः पुत्र कहलाने का अधिकारी वही है, जो विद्वानों की सभा में अपनी विद्वत्ता का लोहा मनवाकर अपने माता-पिता तथा कुल के सम्मान को बढ़ाता है।

(11) वाण्येको समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते [2006, 11]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वाणी को ही वास्तविक आभूषण कहा गया है।

अर्थ मात्र वाणी ही, जो शुद्ध रूप से धारण की जाती है, मनुष्य को सुशोभित करती है।

व्याख्या संसार का प्रत्येक प्राणी सांसारिक प्रवृत्तियों में उलझा रहता है और उन्हीं प्रवृत्तियों में वह (भौतिक) सुख का अनुभव करता है। इसीलिए वह अपने आपको सजाकर रखना चाहता है और दूसरों के समक्ष स्वयं को आकर्षक सिद्ध करना चाहता है, अर्थात् आत्मा की अपेक्षा वह शरीर को अधिक महत्त्व देता है। वह विभिन्न आभूषणों को धारण करता है, परन्तु ऐसे आभूषण तो समय बीतने के साथ-साथ नष्ट हो जाते हैं। सच्चा आभूषण तो मधुर वाणी है, जो कभी भी नष्ट नहीं होती। मधुर वाणी मनुष्य का एक ऐसा गुण है। जिसके कारण उसकी शोभा तो बढ़ती ही है, साथ ही वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा को भी अर्जित करता है तथा इससे (UPBoardSolutions.com) उसको आत्मिक आनन्द की भी अनुभूति होती है।

(12)
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं, वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009, 12, 13]
वाग्भूषणं भूषणम्।। [2007,08,09, 10, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुसंस्कारित वाणी को ही मनुष्य का एकमात्र आभूषण बताया गया है।

अर्थ सभी आभूषण धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं, सच्चा आभूषण वाणी ही है।

व्याख्या मनुष्य अपने सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के आभूषणों और सुगन्धित द्रव्यों का उपयोग करता है। ये आभूषण और सुगन्धित द्रव्य तो नष्ट हो जाने वाले हैं; अत: बहुत समय तक मनुष्य के सौन्दर्य को बढ़ाने में असमर्थ होते हैं। मनुष्य की संस्कारित मधुर वाणी सदा उसे आभूषित करने वाली है; क्योंकि वह सदा मनुष्य के साथ रहती है, वह कभी नष्ट नहीं होती। उसका प्रभाव तो मनुष्य के मरने के बाद भी बना रहता है। मनुष्य अपनी प्रभावशालिनी वाणी से ही दुष्टों और अपराधियों को भी बुराई से अच्छाई के मार्ग पर ले जाता है; अत: वाणी ही सच्चा आभूषण है।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) भाषासु मुख्या …………………………………………………….. तस्मादपि सुभाषितम् ॥ (श्लोक 1) [2009, 10, 14, 15]

संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके संस्कृतभाषायाः महत्त्वं प्रतिपादयन् कविः कथयति-संस्कृतभाषा सर्वासु भाषासु श्रेष्ठतमा अस्ति। इयं भाषा अलौकिका मधुरगुणयुक्ता च अस्ति। तस्मात् हि तस्य काव्यं मधुरम् अस्ति। तस्मात् अपि रम्यं मधुरं च तस्य सुभाषितम् अस्ति। अस्मात् कारणात् इयं गीर्वाणभारती कथ्यते। |

(2) पृथिव्यां त्रीणि …………………………………………………….. रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ (श्लोक 2) [2006, 09, 14]

संस्कृतार्थः कविः कथयति-भूतले जलम् अन्नं सुभाषितं च इति त्रीणि रत्नानि सन्ति। मूर्खः पाषाणखण्डेषु रत्नस्य संज्ञा विधीयते। वस्तुत: जलम् अन्नं सुभाषितञ्च अखिलं विश्वं कल्याणार्थं भवन्ति।

(3) काव्यशास्त्रविनोदेन …………………………………………………….. निद्रया कलहेन वा ॥ (श्लोक 3) [2008, 10, 12, 13, 14, 15]

संस्कृतार्थः
कवि मूर्खाणां बुद्धिमतां च समययापनस्य अन्तरं वर्णयति यत् बुद्धिमन्तः जनाः स्वसमयं काव्यशास्त्राणां पठनेन यापयन्ति, एतद् विपरीतं मूर्खाः जनाः स्वसमयं दुराचारेण, शयनेन, विवादेन वा यापयन्ति।

(4) श्लोकस्तु श्लोंकता …………………………………………………….. “यत्र तिष्ठन्त्यसाधवः॥ (श्लोक 4) [2006, 08, 15]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-यत्र सज्जनाः निवसन्ति, तत्र श्लोकः तु कीर्ति याति। यत्र दुर्जना: निवसन्ति, तत्र श्लोकस्य लकारः लुप्यते। एवं श्लोकः शोकं भवति। सदुपदेशैः सज्जना प्रभाविताः दुष्टाः न इति भावः।

(5) अप्राप्तकालं वचनं …………………………………………………….. अपमानञ्च शाश्वतम् ॥ (श्लोक 5) [2009]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति यत् बृहस्पतिः अपि असामयिकं वचनं ब्रुवन् बुद्धेः अधोगति शाश्वतम् अपमानञ्च प्राप्नोति। अतएव असामयिकं वचनं कदापि न ब्रूयात्।।

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(6) वाच्यं श्रद्धासमेतस्य …………………………………………………….. रुदितोपमम् ॥ (श्लोक 6) [2011]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-श्रद्धायुक्तस्य पुरुषस्य पृच्छतः सन् विशेषरूपेण वक्तव्यम्। श्रद्धाहीनस्य पुरुषस्य पृच्छतः वचनम् अरण्ये रुदितम् इव भवति।

(7) वसुमतिपतिना नु …………………………………………………….. बुधैरपि सेव्यते ॥ (श्लोक 7) [2010]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके सरस्वत्याः विशेषता वर्णिता अस्ति। सरस्वती राज्ञा तथा बलवता रिपुणा न नेतुं शक्यते न च भ्रातृबन्धुभिः विभक्तुं शक्यते अपितु विद्वद्भिः सेव्यते।

(8) लक्ष्मीनं या …………………………………………………….. स नैव नैव॥ (श्लोक 8) [2007]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-या लक्ष्मी याचक दुःखहारिणी न भवति, सा (UPBoardSolutions.com) लक्ष्मीति कथितुं न शक्यते। या विद्या विष्णुभक्तिकारिणी न भवति सापि विद्या कथितुं न शक्यते। यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणीः न भवति सः पुत्रः कथितुं न शक्यते।।

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(9)
केयूराः न विभूषयन्ति …………………………………………………….. वाग्भूषण भूषणं ॥ (श्लोक 9) [2002]
केयूराः न विभूषयन्ति …………………………………………………….. नालङ्कृता मूर्द्धजाः॥ [2005]

संस्कृतार्थः
अस्मिनु श्लोके वाणीम् एव सर्वश्रेष्ठं भूषणं कथितम् अस्ति। कर्णाभूषणानि चन्द्रोपमः रमणीयः हारः स्नान-विलेपनादि पुष्पाणि विभूषिता मूर्द्धजा: पुरुषं न भूषयन्ति परन्तु संस्कृता वाणी एव (या अमृतोपमा मधुरावाणी) सा एव वास्तविकम् आभूषणम्। अन्यानि आभूषणानि कालक्रमेण क्षीयन्ते परन्तु वाग्भूषणं कदापि न क्षीयते।

(10) वाण्येका समलङ्करोति …………………………………………………….. वाग्भूषण भूषणम् ॥ (श्लोक 9) [2007]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोकाद्धे कविः कथयति–अस्मिन् संसारे एकावाणी, या अध्ययनेन विनयेन च संस्कृता धार्यते, सर्वोत्तमं भूषणं अस्ति। सा पुरुषं विभूषयन्ति। अन्यानि भूषणानि खलु नष्टाः भवन्ति। वाग्भूषणं वास्तविक भूषणम् अस्ति, यः कदापि न विनश्यति।।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi अलंकार

UP Board Solutions for Class 10 Hindi अलंकार

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अलंकार

परिभाषा–अलंकार का अर्थ है-‘आभूषण’; जैसे आभूषण सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक होते हैं, उसी प्रकार काव्य में अलंकारों का प्रयोग करने से काव्य की शोभा बढ़ जाती है; अत: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को अलंकार कहते हैं। अलंकारों (UPBoardSolutions.com) के प्रयोग से शब्द और अर्थ में चमत्कार उत्पन्न होता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूप, गुण, क्रिया का अधिक तीव्रता से अनुभव कराने में सहायक होने वाली उक्ति अलंकार है।

वर्गीकरण–अलंकारों के मुख्य दो वर्ग हैं–

(अ) शब्दालंकार तथा
(ब) अर्थालंकार।

(अ) शब्दालंकार–जहाँ केवल शब्दों के प्रयोग के कारण काव्य में चमत्कार पाया जाता है, उसे शब्दालंकार कहते हैं। यदि उन शब्दों के स्थान पर उनके पर्यायवाची शब्द रख दिये जाएँ तो वह चमत्कार समाप्त हो जाएगा और वहाँ अलंकार नहीं रह जाएगा।

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(ब) अर्थालंकार-जहाँ अर्थ के कारण काव्य में चमत्कार पाया जाता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। इसमें शब्दों के पर्यायवाची रखने पर भी अलंकार बना रहता है।

शब्दालंकार में अनुप्रास, यमक और श्लेष मुख्य हैं, जबकि अर्थालंकारों में उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा मुख्य हैं।

[विशेष-पाठ्यक्रम में केवल उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा अर्थालंकार ही सम्मिलित हैं। पद्यांशों का काव्य-सौन्दर्य लिखने में अनुप्रास, यमक, श्लेष शब्दालंकारों का ज्ञान भी आवश्यक होता है; अत: यहाँ संक्षेप में उनका परिचय भी दिया जा रहा है।

(1) अनुप्रास अलंकार

परिभाषा–जहाँ किसी व्यंजन वर्ण की बार-बार आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण-‘चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में।”
स्पष्टीकरण–यहाँ ‘च’ वर्ण और ‘ल’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई (UPBoardSolutions.com) है; अत: यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

(2) यमक अलंकार

परिभाषा–जहाँ एक ही शब्द बार-बार आता है, किन्तु उसका अर्थ भिन्न-भिन्न होता है; वहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण—

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।
या खाये बौराय जग, वा पाये बौराय ।।

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है, किन्तु उसके भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। प्रथम ‘कनक’ का अर्थ ‘धतूरा’ तथा दूसरे ‘कनक’ का अर्थ ‘सोना’ है; अतः यहाँ यमक अलंकार है।

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(3) श्लेष अलंकार,

परिभाषा–जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त होकर अनेक अर्थ प्रकट करे, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। उदाहरण-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून ।
पानी गये न ऊबरे, मोती मानुष चुन ।।

स्पष्टीकरण–यहाँ ‘पानी’ शब्द के तीन अर्थ हैं—

  1. मोती के सम्बन्ध में चमक,
  2. मनुष्य के सम्बन्ध में सम्मान,
  3. जून के सम्बन्ध में जल; अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

(4) उपमा अलंकार- [2009, 10, 11, 12, 14, 15, 16, 17, 18]

परिभाषा–जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति की किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति से समान गुण-धर्म के आधार पर तुलना की जाए या समानता बतायी जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है; जैसे–‘राधा के चरण गुलाब के समान कोमल हैं।’ यहाँ राधा के चरण की (UPBoardSolutions.com) तुलना या समानता गुलाब से दिखाई गयी है। इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है।
उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं|

(1) उपमेय-जिस वस्तु की समानता बतायी जाती है; वह उपमेय (प्रस्तुत) होता है। ऊपर दिये गये उदाहरण में ‘राधा के चरण’ उपमेय हैं।
(2) उपमान-जिस वस्तु से समानता की जाती है; वह वस्तु उपमान (अप्रस्तुत) कहलाती है। ऊपर दिये गये उदाहरण में ‘गुलाब’ उपमान है।
(3) वाचक-समानता अथवा पहचान को व्यक्त करने वाला शब्द वाचक’ कहलाता है। ऊपर दिये गये उदाहरण में समान’ शब्द वाचक है।
(4) साधारण धर्म-जो गुण उपमान और उपमेय में समान रूप से रहता है; वह साधारण धर्म कहलाता है। ऊपर दिये गये उदाहरण में कोमल’ शब्द साधारण धर्म है; क्योंकि यह राधा के चरण और गुलाब दोनों में है।
उदाहरण—

  1. ‘हरिपद कोमल कमल-से।’ स्पष्टीकरण-उपमेय-हरिपद। उपमान–कमल। वाचक शब्द-। साधारण धर्म-कोमल।
  2. ‘पीपर पात सरिस मन डोला।’ [2009]

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स्पष्टीकरण-उपमेय-मन। उपमान–पीपर पात। वाचक शब्द-सरिस। साधारण धर्म-डोला।
अन्य उदाहरण-

  1. यहीं कहीं पर बिखर गयी वह, भग्न विजयमाला-सी।
  2. आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी।
  3. तम के तागे-सी जो हिल-डुल, (UPBoardSolutions.com) चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल।
  4. करि कर सरिस सुभग भुजदण्डा।
  5. अनुलेपन-सा मधुर स्पर्श था।
  6. सजल नीरद-सी कल कान्ति थी।
  7. छिन्न पुत्र मकरन्द लुटी-सी ज्यों मुझई हुई कली।
  8. अराति सैन्य सिन्धु में सुबाडवाग्नि-से जलो।

(5) रूपक अलंकार [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

परिभाषा-जहाँ उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप किया (UPBoardSolutions.com) जाता है अर्थात् उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) में अभिन्नता प्रकट की जाये, वहाँ रूपक अलंकार होता है; उदाहरण—

(1) मुख-चन्द्र तुम्हारा देख सखे ! मन-सागर मेरा लहराता। | स्पष्टीकरण–यहाँ मुख (उपमेय) में चन्द्र (उपमान) का तथा मन (उपमेय) में सागर (उपमान) का भेद न करके एकरूपता बतायी गयी है; अत: यहाँ रूपक अलंकार है।
(2) ‘चरण-कमल बन्द हरि राई।। [2010, 11]
स्पष्टीकरण–यहाँ चरण में कमल का भेद न रखकर एकरूपता बतायी गयी है।
अन्य उदाहरण

  • हरि-जननी, मैं बालक तेरा।
  • मुनि पद-कमल बंदि दोउ भ्राता।
  • अँसुवन जल सीचि-सीचि प्रेम बेलि बोई।
  • माया-दीपक नर-पतंग भ्रमि भ्रमि इवें पड़ेत। [2009, 10]
  • बढ़त-बढ़त सम्पति-सलिलु, मन-सरोज बढ़ि जाय।
  • रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरेउ चटकाय।
  • उदित उदयगिरि-मंचे पर, रघुबर-बाल पतंग।
  • बिकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन शृंग।।
  • अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।

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(6) उत्प्रेक्षा अलंकार [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

परिभाषा—जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना की जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। मनु-मानो, जनु-जानो, मनहुँ-जनहुँ आदि उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द हैं; उदाहरण,

(1) सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलोने गात ।।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात ॥ [2010, 11, 15, 18]

स्पष्टीकरण–यहाँ पीला वस्त्र धारण किये हुए कृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय, प्रस्तुत) में प्रात:कालीन धूप से शोभित नीलमणि शैल (उपमान, अप्रस्तुत) की सम्भावना की गयी है; अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(2) मोर-मुकुट की चन्द्रिकनु, यौं राजत नंद-नन्द।
मनु ससि सेखर की अकस, किये सेखर सत-चन्द ॥ [2009, 11, 14]

स्पष्टीकरण-यहाँ मोर पंख से बने मुकुट की चन्द्रिकाओं (उपमेय) में शत-चन्द्र (उपमान) की सम्भावना व्यक्त की गयी है।
अन्य उदाहरण—
(1) लोल-कपोल झलक कुण्डल की, यह उपमा कछु लागत ।
मानहुँ मकर सुधारस क्रीड़त, आपु-आपु अनुरागत ।।
(2) पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से ।।
मानो झूम रहे हों तरु भी, मन्द पवन के (UPBoardSolutions.com) झोंको से ।।
(3) धाये धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी । (2013)
(4) उभय बीच सिय सोहति कैसी। ब्रह्म-जीव बिच माया जैसी ।।
बहुरि कहउँ छबि जस मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई ।।
(5) लता भवन ते प्रकट भए, तेहि अवसर दोउ भाई ।। [2009]
निकसे जनु जुग विमल विधु, जलज पटल बिलगाइ ।।
(6) चमचमात चंचल नयन, बिच घूघट पट झीन ।।
मानहुँ सुरसरिता बिमल, जग उछरत जुग मीन ।।। [2012]
(7) चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी।
(8) अर्ध चन्द्र सम सिखर-सैनि कहुँ यों छबि छाई ।।
मानहुँ चन्दन-घौरि धौरि-गृह खौरि लगाई ।।

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अभ्यास

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखिए तथा उसका लक्षण (परिभाषा) बताइए
(1) हँसत दसने इक सोभा उपजति उपमा जदपि लजाइ ।
मनो नीलमनि-पुट मुकता-गन, बंदन भरि बगराइ ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास

(2) अरुन सरोरुह-कर-चरन, दृग-खंजन, मुख-चन्द ।
उत्तर
रूपक तथा अनुप्रास

(3) मुख मयंक सम मंजु मनोहर । ।
उत्तर
उपमा, रूपक तथा अनुप्रास

(4) अनुराग तड़ाग में भानु उदै। बिगसी मनो मंजुल कंज कली ।।
उत्तर
रूपक

(5) बिपति कसौटी जे कसे, तेही साँचे मीत ।।
उत्तर
रूपक

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(6) भज मन चरण-कॅवल अबिनासी ।।
उत्तर
रूपक

(7) जौ चाहते चटक न घटे, मैलौ होई न मित्त ।।
उत्तर
रूपक

(8) मनो रासि महातम तारक मैं ।
उत्तर
उत्प्रेक्षा

(9) बन्द नहीं अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप ।
उत्तर
रूपक

(10) बीती विभावरी जाग री ।।
अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घट ऊषा नागरी ।
उत्तर 
रूपक (UPBoardSolutions.com)

(11) अति कटु बचन कहत कैकेयी। मानहुँ लोन जरे पर देई ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास

(12) दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास

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(13) बन्दउँ कोमल कमल से, जगजननी के पाँव ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास

(14) कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय गुनि ।।
मानहुँ मदन दुन्दुभी दीन्हीं। मनसा विश्वविजय कहुँ कीन्हीं ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास।
[ संकेत–अलंकारों के लक्षण  (परिभाषा) के लिए पहले दिये गये विवरण को पढ़िए।]

प्रश्न 2
उपमा अथवा रूपक अलंकार की परिभाषा लिखिए और उसका उदाहरण दीजिए। [2011, 12, 14, 15]
या
उत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा लिखिए तथा एक उदाहरण दीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16]
या
उत्प्रेक्षा अलंकार का लक्षण और उदाहरण लिखिए। उपमा अलंकार की परिभाषा तथा उदाहरण लिखिए। [2011, 12, 14]
या
उपमा अलंकार के लक्षण और उदाहरण लिखिए। उपमा के चारों अंगों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
उपमा अलंकार के अंगों का उल्लेख करते हुए उसकी परिभाषा लिखिए। एक उदाहरण भी दीजिए|
उत्तर
[ संकेत–उपमा, रूपक तथा (UPBoardSolutions.com) उत्प्रेक्षा अलंकार के विवरण में देखिए।]

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प्रश्न 3
रूपक अलंकार को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
या
रूपक अलंकार की परिभाषा सोदाहरण लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16]
उत्तर
[ संकेत–रूपक अलंकार के विवरण में देखिए।]

प्रश्न 4
पठित अलंकारों में से किसी एक अलंकार की उदाहरण सहित परिभाषा लिखिए।
उत्तर
[ संकेत–अलंकारों के विवरण से अध्ययन करें।]

प्रश्न 5
उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार में अन्तर बताइए। [2012]
उत्तर
उपमा अलंकार में उपमेय और उपमान में समानता निश्चयपूर्वक प्रकट की जाती है; जैसे-मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है। यहाँ मुख (उपमेय) और चन्द्रमा (उपमान) में सुन्दरता (समान धर्म) के आधार पर समानता स्थापित की गयी (UPBoardSolutions.com) है परन्तु उत्प्रेक्षा अलंकार में उपमेय और उपमान में मात्र सम्भावना प्रकट की जाती है, वह निश्चित रूप से स्थापित नहीं की जाती; जैसे-मुख मानो चन्द्रमा है।

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UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 9 आजादः चन्द्रशेखरः (गद्य – भारती)

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 9 आजादः चन्द्रशेखरः (गद्य – भारती) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 9 आजादः चन्द्रशेखरः (गद्य – भारती).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 9
Chapter Name आजादः चन्द्रशेखरः (गद्य – भारती)
Number of Questions Solved 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 9 आजादः चन्द्रशेखरः  (गद्य – भारती)

पाठ-सारांश

परिचय और जन्म–राष्ट्र के लिए अपना जीवन बलि-वेदी पर चढ़ाने वाले देशभक्तों में अग्रगण्य चन्द्रशेखर आजाद का नाम भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। इन्हें भुला देना अत्यधिक कृतघ्नता होगी। चन्द्रशेखर तो जीवन-पर्यन्त आजाद ही रहे, निरन्तर प्रयासरस पुलिसकर्मी कभी उनके हाथों में हथकड़ी न डाल सके। | चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के ‘भाँवरा’ नामक (UPBoardSolutions.com) ग्राम में 23 जुलाई, सन् 1906 ईसवीं में हुआ था। इनकी माता का नाम जगरानी और पिता का नाम सीताराम था। इनके पिता उन्नाव जनपद के बदरका ग्राम से जाकर अलीराजपुर राज्य में 8 रुपये मासिक की नौकरी करते थे और वहीं रहने लगे थे।

घर से निष्कासन और अध्ययन-एक दिन चन्द्रशेखर ने राजा के उद्यान का एक फल तोड़ लिया था। क्रोधित हुए पिता ने ग्यारह वर्ष के उस बालक को घर से निकाल दिया; क्योंकि पिता के कहने पर भी चन्द्रशेखर ने माली से क्षमा न माँगी। घर से निकलकर दो वर्ष तक नगर-नगर घूमकर उन्होंने कठिन परिश्रम करके किसी प्रकार अपनी जीविका चलायी। दैवयोग से वाराणसी आये और वहाँ एक संस्कृत पाठशाला में संस्कृत का अध्ययन करने लगे।

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युवती की रक्षा-एक दिन किसी दुष्ट युवक को एक भद्र युवती को परेशान करते हुए चन्द्रशेखर ने देख लिया। चन्द्रशेखर उसे पृथ्वी पर गिराकर और उसकी छाती पर चढ़कर उसे तब तक पीटते रहे, जब तक कि उस बेशर्म युवक ने उस युवती से क्षमा नहीं माँगी। इस घटना से प्रभावित होकर आचार्य नरेन्द्रदेव ने उनके अध्ययन की व्यवस्था काशी विद्यापीठ में करा दी।

असहयोग आन्दोलन में भाग–विद्यापीठ के अनेक छात्रों को असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित होते देखकर आजाद भी तिरंगा झण्डा लेकर भारतमाता की जय’ और ‘गाँधी जी की जय बोलते हुए आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। सैनिकों द्वारा उन्हें न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित करने पर उन्होंने अपना नाम आजाद, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ और घर जेल’ बताया। इस पर क्रुद्ध होकर न्यायाधीश ने उनको 15 कोडे मारे (UPBoardSolutions.com) जाने की सजा दी। कोडों से पीटे जाने पर भी ‘भारतमाता की जय करते हुए उन्होंने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। जेल से छूटने पर नागरिकों ने उनका स्नेहसिक्त अभिनन्दन किया। जब गाँधी जी ने हिंसा के कारण अपना आन्दोलन वापस ले लिया, तब आजाद बहुत दु:खी हुए। “

क्रान्तिकारी दल के सदस्य–दैवयोग से आजाद प्रणवेश चटर्जी, मन्मथनाथ गुप्त आदि . क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आये। उनकी सत्यनिष्ठा को देखकर मन्मथनाथ गुप्त ने उन्हें क्रान्तिकारी दल का सदस्य बना लिया। थोड़े ही समय में वे क्रान्तिकारियों की केन्द्रीय परिषद् के सदस्य हो गये। उन्होंने गोली चलाने और निशाना लगाने में कौशल प्राप्त कर लिया। उन्होंने सन् 1925 ई० में काकोरी काण्ड में सक्रिय भाग लिया। इस अवसर पर आजाद को छोड़कर उनके अन्य सहयोगी पकड़े गये और हथकड़ी लगाकर शूली पर चढ़ा दिये गये। उस समय चन्द्रशेखर को बहुत दु:ख हुआ किन्तु वे क्रान्ति : से विरत नहीं हुए और उन्होंने क्रान्तिकारी दल का नेतृत्व सँभाला।।

आजाद ने अनेक अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों को मारा। लाला लाजपत राय के हत्यारे ‘साण्डर्स को भी आजाद ने मौत के घाट उतार दिया।

विधानसभा-भवन में बम-विस्फोट–सन् 1929 ई० में 8 अप्रैल को आजाद की सलाह से सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने विधानसभा भवन में बम विस्फोट कर दिया। चन्द्रशेख़र विधानसभा भवन के बाहर ही उपस्थित थे। उसमें भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने आत्मसमर्पण कर (UPBoardSolutions.com) दिया और उन्हें शूली पर चढ़ा दिया गया। आजाद के अनेक साथी भगवतीचरण, सालिगराम आदि भी मारे गये। आजाद बहुत दु:खी हुए। यशपाल और वीरभद्र के विश्वासघात से आजाद को गहरा दु:ख पहुंचा था।

अमर बलिदान–सन् 1931 ई० में फरवरी की 27 तारीख को आजाद प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में यशपाल और सुखदेव के साथ बैठे हुए बातचीत कर रहे थे। उसी समय वीरभद्र दिखाई पड़ा और यशपाल उठकर चल दिया। आजाद सुखदेव के साथ बातचीत कर ही रहे थे कि सैनिकों ने वहाँ आकर आजाद को घेर लिया।

आजाद ने अपने सहयोगी सुखदेव को किसी तरह पार्क से बाहर निकाला और पिस्तौल भरकर । खड़े हो गये। विपक्षियों ने आजाद पर गोलियाँ बरसायीं। आजाद ने भी निरन्तर गोलियाँ बरसाकर

अनेक को मूर्च्छित और घायल कर दिया। अन्त में जब उनकी पिस्तौल में एक गोली रह गयी, तब उन्होंने स्वयं को ही मार लिया। इस प्रकार चन्द्रशेखर अमर शहीद हो गये।

ऐसे क्रान्तिकारी देशभक्त सदा उत्पन्न नहीं होते। उनका जन्म कभी-कभी ही होता है। ऐसे अमर युवक युगान्तर उपस्थित करने के लिए जन्म लेते हैं। भारतभूमि धन्य है, जहाँ ऐसे शूरवीर उत्पन्न होते हैं, जो अपने जन्म से भारतभूमि को पवित्र करते हैं और खून से सींचते हैं।

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गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) राष्ट्रहितेऽनुरक्तानामात्मबलिं कर्तुं सहर्षमुद्यतानाम् अग्रगण्यः चन्द्रशेखरः भारतस्य स्वातन्त्र्येतिहासेऽसौ सततमुल्लेखनीयः स्मरणीयश्च। स्वतन्त्रतायाः मधुरं फलं भुञ्जानाः वयमधुना प्रकामं मोदामहे। तद् वृक्षारोपकास्तु त एवात्मबलिदायकास्तादृशाः वीराः एवासन्। प्रातः स्मरणीयास्ते वीराः कदापि भारतीयैरस्माभिः नैव विस्मर्तुं शक्यन्ते। तेषां विस्मृतिस्तु महती कृतघ्नता स्यात्। तेष्वेव वीरेषु मूर्धन्यः परमस्वतन्त्रश्चन्द्रशेखरः आजीवनं स्वतन्त्र एवासीत्। सततं प्रयतमानैरपि आरक्षकैः तत्करे लौहशृङ्खला न पिनद्धा। मातृभूमिपरिचारकः राणाप्रताप इव असावपि आत्मबलिदायको वीरः रक्तस्नातोऽपि स्वतन्त्र एव परिभ्रमन् प्राणानत्यजत्। (UPBoardSolutions.com) जीवितः स तैः कथमपिन गृहीतः। देशभक्तानामादर्शभूतस्य चन्द्रशेखरस्य जन्म षडधिकैकोनविंशतिशततमे . (1906) ख्रीष्टाब्दे जुलाईमासस्य त्रयोविंशतितयां तारिकायां मध्यप्रदेशस्य भाँवरा ग्रामेऽभवत्। तस्य जनकः श्री सीतारामः स्वीययो धर्मपत्न्या जगरानी नामधेयया सह उन्नावजनपदस्य बदरकाग्रामात् गत्वा तत्रैव व्यवसत्। सः तत्र ‘अलीराजपुरराज्ये’ वृत्त्यर्थं कार्यमकार्षीत्। अष्टमुद्रात्मकं मासिकं वेतनञ्चालभत्।

शब्दार्थ
आत्मबलिं कर्तुम् = अपना बलिदान करने के लिए।
उद्यतानाम् = उद्यत रहने वालों में।
सततमुल्लेखनीयः स्मरणीयश्च = सदैव उल्लेख करने और स्मरण रखने योग्य।
भुञ्जानाः = भोगते हुए।
प्रकामम् मोदामहे = अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।
तवृक्षारोपकास्तु = उस वृक्ष को लगाने वाले तो।
नैव = नहीं ही। विस्मर्तुं शक्यन्ते = भुलाये जा सकते हैं।
कृतघ्नता = उपकार न मानना।
मूर्धन्यः = सर्वश्रेष्ठ।
पिनद्धा = पहनायी।
असावपि (असौ + अपि) = यह भी।
परिभ्रमन् = घूमते हुए।
स्वीययाय धर्मपत्न्या = अपनी धर्मपत्नी के साथ।
वृत्त्यर्थम् = जीविका के लिए।
अकार्षीत् = करता था।

सन्दर्भ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संकलित ‘आजादः चन्द्रशेखरः’ शीर्षक पाठ से अवतरित है।

संकेत
इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रहित के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले चन्द्रशेखर आजाद के जन्म तथा पारिवारिक स्थिति के विषय में बताया गया है।

अनुवाद
राष्ट्रहित में लगे हुए स्वयं को बलिदान करने के लिए सहर्ष तैयार लोगों में सबसे पहले गिने जाने वाले चन्द्रशेखर भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास में मिरन्तर उल्लेख करने योग्य और स्मरणीय हैं। स्वतन्त्रता के जिस मधुर फल को खाते हुए हम आज अत्यन्त प्रसन्न हो रहे हैं, उस वृक्ष को लगाने वाले वे ही अपना बलिदान करने वाले उस प्रकार के वीर ही थे। प्रातः समय स्मरण करने योग्य ये वीर हम भारतीयों के द्वारा कभी भी भुलाये नहीं जा सकते। उनको भूल जाना तो बड़ी कृतघ्नता होगी। उन्हीं वीरों में सर्वश्रेष्ठ अत्यधिक स्वतन्त्र चन्द्रशेखर (UPBoardSolutions.com) जीवनभर स्वतन्त्र ही रहे। निरन्तर प्रयत्न करते हुए भी सिपाहियों ने उनके हाथों में लोहे की जंजीर (हथकड़ी) नहीं पहनायी। मातृभूमि की सेवा करने वाले राणाप्रताप की तरह अपनी बलि देने वाले इसी वीर ने रक्त में स्नान करते हुए भी स्वतन्त्र घूमते हुए ही प्राणों को त्याग दिया।

उनके द्वारा वह जीवित कभी नहीं पकड़े गये। देशभक्तों में आदर्शस्वरूप चन्द्रशेखर का जन्म सन् 1906 ईसवी में जुलाई महीने की 23 तारीख को मध्य प्रदेश के ‘‘भाँवरा’ नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री सीताराम अपनी जगरानी नाम की धर्मपत्नी के साथ उन्नाव जिले के बदरका ग्राम से जाकर वहीं रहते थे। वे वहाँ अल्लीराजपुर के राज्य में जीविका के लिए कार्य करते थे और आठ रुपये मासिक वेतन पाते थे।

(2) एकदा चन्द्रशेखरः तस्यैवोद्यानस्य फलमेकं पितरमपृष्ट्वैव अत्रोटयत्। क्रोधाविष्टस्तज्जनकः सीतारामः प्रियं सुतमेकादशवर्षदेशीयं चन्द्रशेखरं गृहान्निस्सारयामास। क्रोधाविष्टः जनकः अवोचत् , गत्वा मालाकारं क्षमा याचस्व, परं स एवं कर्तुं नोद्यतः। गृहान्निर्गत्य वर्षद्वयमितस्ततः सः प्रतिनगरं भ्रामं-भ्रामं घोरं श्रमं कृत्वा जीविकां निरवहत्। दैववशात् सः बालकः वाराणसीमुपगम्य कस्याञ्चित् संस्कृतपाठशालायां संस्कृताध्ययनमकरोत्।।

शब्दार्थ-
एकदा = एक बार
तस्यैवोद्यानस्य = उसी बगीचे का।
पितरम् अपृष्ट्वैव = पिता से पूछे बिना ही।
निस्सारयामास = निकाल दिया।
क्रोधाविष्टः = क्रोध में भरे हुए।
मालाकारं = माली से।
नोद्यतः (न + उद्यतः) = तैयार नहीं हुआ।
इतस्ततः = इधर-उधर।
निरवहत् = निर्वाह किया।
दैववशात् = भाग्य से।
उपगम्य = जाकर।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में पिता द्वारा चन्द्रशेखर को घर से निकालने और उनके वाराणसी जाकर अध्ययन करने का वर्णन है। |

अनुवाद
एक बार चन्द्रशेखर ने उसी (अल्लीराजपुर) के उद्यान का एक फल पिता से बिना पूछे ही तॉड़ लिया। क्रोध से युक्त उनके पिता सीताराम ने प्रिय पुत्र ग्यारह वर्षीय चन्द्रशेखर को घर से निकाल दिया। क्रुद्ध पिताजी बोले–‘जाकर माली से क्षमा माँगो’, परन्तु वह ऐसा करने को तैयार नहीं हुआ। घर से निकलकर दो वर्ष तक उसने इधर-उधर प्रत्येक नगर में घूम-घूमकर कठोर परिश्रम करके जीविका चलायी। दैवयोग से वह बालक वाराणसी पहुँचा और किसी संस्कृत की पाठशाला में संस्कृत का अध्ययन करने लगा।

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(3) एकदा कोऽपि दुष्टो युवा कामप्येकां भद्रयुवतीं पीडयन् चन्द्रशेखरेण बलात् गृहीतः। तं धराशायिनं कृत्वा तस्योरसि उपविष्टश्च, चन्द्रशेखरः तं तावन्नमुमोच यावत् स चञ्चलो दुष्टः धृष्टः निर्लज्जो युवा तां युवतिं भगिनिकेति नाकथयत् क्षमायाचनाञ्च नाकरोत्। अनया घटनया चन्द्रशेखरस्य महती ख्यातिः जाता। आचार्यनरेन्द्रदेवस्तेन प्रभावितः काशीविद्यापीठे तस्याध्ययनव्यवस्थां कृतवान्। यदा (UPBoardSolutions.com) विद्यापीठस्यानेके छात्राः असहयोगान्दोलने सम्मिलिताः जाताः तदाजादोऽपि तत्र सम्मिलितः त्रिवर्णध्वजमादाय ‘जयतु महात्मा गाँधी’, ‘जयतु भारतमाता’ इति घोषयन् न्यायाधीशस्य सम्मुखमानीतः।

तदा स स्वकीयं नाम ‘आजाद’ इति पितुर्नाम ‘स्वाधीन’ इति गृहञ्च कारागारमवोचत् , तदा क्रुद्धो न्यायाधीशः तस्मै पञ्चदशकशाघातदण्डमददात्। तदपि सः ‘जयजय’ कारं कृत्वा मनसि ब्रिटिशसाम्राज्यमुन्मूलयितुं सङ्कल्पमकरोत्। कशाघातेन पीड्यमानोऽपि सः निश्चल एवासीत्। ततः बहिरागत्य सः जनैरभिनन्दितः। द्वाविंशत्यधिकैकोनविंशतिशततमे (1922) वर्षे यदा महात्मना गान्धिमहोदयेनान्दोलनम् निवारितं तदाजादो दुःखितो जातः यतोऽहिसंकान्दोलने तस्य निष्ठा नासीत्।।

शब्दार्थ-
भद्रयुवतीम् = शिष्ट युवती को।
बलात् = बलपूर्वक।
धराशायिनं कृत्वा = पृथ्वी ।
पर गिराकर।
उरसि = छाती पर।
भगिनिकेति = बहन ऐसा।
ख्यातिः जाता = प्रसिद्धि हुई।
त्रिवर्णाध्वजम् आदाय = तिरंगे झण्डे को लेकर।
आनीतः = लाये गये।
घोषयन्= घोषणा करते हुए।
अवोचत् = कहा।
कशाघातदण्डम् = कोड़े मारने का दण्ड।
उन्मूलयितुम् = जड़ से उखाड़ के लिए।
कशाघातेन = कोड़ों की चोट से।
निवारितम् = रोक दिया।
निष्ठा = श्रद्धा, विश्वास।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रशेखर के द्वारा दुष्ट के हाथों से एक युवती को बचाने एवं महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित होने का वर्णन है।

अनुवाद
एक दिन किसी एक शिष्ट युवती को सताते हुए किसी दुष्ट युवक को चन्द्रशेखर ने बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे भूमि पर गिराकर उसकी छाती पर बैठ गया। चन्द्रशेखर ने उसे तब तक नहीं छोड़ा, जब तक उस चंचल, दुष्ट, धृष्ट, बेशर्म युवक ने उस युवती को ‘बहन’ नहीं कहा और क्षमा नहीं माँगी। इस घटना से चन्द्रशेखर की बड़ी प्रसिद्धि हो गयी। आचार्य नरेन्द्रदेव ने उससे प्रभावित होकर काशी विद्यापीठ में उसके अध्ययन की व्यवस्था करा दी। जब काशी विद्यापीठ के अनेक छात्र असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हुए, तब आजाद भी उसमें सम्मिलित हुए और तिरंगा झण्डा लेकर ‘महात्मा गाँधी की जय’, ‘भारतमाता की जय’ बोलते हुए न्यायाधीश (जज) (UPBoardSolutions.com) के सामने लाये गये। तब उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ और घर ‘कारागार’ बताया। तब क्रुद्ध जज ने उनको 15 कोड़े मारने का दण्ड दिया। तब भी उन्होंने जय्-जयकार करके मन में ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ने का संकल्प किया। कोड़ों से पीटे जाते हुए भी वे निश्चल ही रहे। इसके बाद बाहर आने पर उनका लोगों ने अभिनन्दन किया। सन् 1922 ई० में जब महात्मा गाँधी ने आन्दोलन रोक दिया, तब आजाद दुःखी हुए; क्योंकि अहिंसक आन्दोलन में उनको विश्वास नहीं था।

(4) दैवात् आजादस्य परिचयः क्रान्तिकारिणा प्रणवेशचटर्जीमहोदयेन सह सञ्जातः। अनेन प्रसिद्धक्रान्तिकारिणी मन्मथनाथगुप्तेन साकं तस्य परिचयः कारितः। आजादस्य सत्यनिष्ठामवलोक्य मन्मथनाथगुप्तः क्रान्तिकारिदलस्य सदस्यं तमकरोत्। तदानीं क्रान्तिकारिदलस्य नेता अमरबलिदायी रामप्रसादबिस्मिलः आसीत्। अल्पीयसैव समयेन आजादः केन्द्रियक्रान्तिकारिदलस्य सदस्यो जातः। गुलिकाचालने लक्ष्यभेदने च तेन महत् कौशलमवाप्तम्। अतः सः तस्मिन् दले अतीव समादृतः आसीत्। (UPBoardSolutions.com) पञ्चविंशत्यधिकैकोनविंशतिशततमे (1925) वर्षे अगस्तमासस्य नवम्यां तारिकायां जायमाने काकोरीकाण्डे आजादेन सक्रियभागो गृहीतः। तस्मिन्नवसरे आजादं विहाय अन्ये बहवः सहयोगिनः निगडिताः शूलमारोपिताश्च। तदानीं परमदुःखितोऽपि आजादः क्रान्तेर्विरतो न जातः, प्रत्युत क्रान्तिकारिसेनायाः नायको जातः।।

तेनानेकानि कार्याणि कृतानि अनेकेऽधिकारिणः आरक्षिणश्च हताः। लालालाजपतरायस्य हन्ता प्रधानरक्षी ‘साण्डर्स’ नामधेयोऽपि आजादेन निहतः।।

शब्दार्थ-
सञ्जातः = हुआ।
साकम् = साथ।
कारितः = कराया।
अल्पीयसैव (अल्पीयसा + एव) = थोड़ी ही।
अल्पीयसैव समयेन = थोड़े से ही समय में।
गुलिकाचालने = गोली चलाने में।
लक्ष्यभेदने = निशाना लगाने में।
अवाप्तम् = प्राप्त कर लिया।
जायमाने = होने वाले।
निगडिताः = गिरफ्तार कर लिये गये, बेड़ी पहना दिये गये।
शूलमारोपिताः = शूली पर चढ़ा दिये गये।
विरतः = उदासीन।
आरक्षिणः = सिपाही।
हन्ता = मारने वाला।
निहतः = मारा।।

प्रसंग”
प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रशेखर की क्रान्तिकारी कार्यवाहियों तथा क्रान्तिकारी दल के नेतृत्व को सँभालने का वर्णन है।

अनुवाद
भाग्य से आजाद का परिचय क्रान्तिकारी प्रणवेश चटर्जी महोदय के साथ हुआ। इस प्रसिद्ध क्रान्तिकारी ने मन्मथनाथ गुप्त के साथ उसका परिचय कराया। आजाद की सत्यनिष्ठा को देखकर मन्मथनाथ गुप्त ने उसे क्रान्तिकारी दल को सदस्य बना लिया। उस समय क्रान्तिकारी दल के नेता अमर बलि देने वाले ‘रामप्रसाद बिस्मिल’ थे। थोड़े ही समय में आजाद केन्द्रीय क्रान्तिकारी दल के सदस्य हो गये। गोली चलाने और निशाना लगाने में उन्होंने महान् कौशल प्राप्त कर लिया; अतः वह उस दल में अत्यन्त आदरणीय (UPBoardSolutions.com) हो गये थे। सन् 1925 ई० में अगस्त महीने की नौ तारीख को होने वाले काकोरी काण्ड में आजाद ने सक्रिय भाग लिया। उस अवसर पर आजाद को छोड़कर दूसरे बहुत-से सहयोगी पकड़े गये (अर्थात् हथकड़ियाँ पहना दीं) और शूली पर चढ़ा दिये गये। इस समय अत्यन्त दु:खी होते हुए भी आजाद क्रान्ति से उदासीन नहीं हुए, अपितु क्रान्तिकारियों की सेना के नायक हो गये।

उन्होंने अनेक कार्य किये, अनेक अधिकारियों और सैनिकों को मारा। लाला लाजपत राय के … हत्यारे सेना के प्रधान ‘साण्डर्स’ को भी आजाद ने मार दिया।

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(5) एकोनत्रिंशदधिकैकोनविंशतिशततमे (1929) वर्षे अप्रैलमासस्य अष्टम्यां तारिकायाम् आजादस्य परामर्शेनैव सरदारभगतसिंहः बटुकेश्वरदत्तश्च विधानसभाभवने बमविस्फोटमकुरुताम्। तस्मिन् समये चन्द्रशेखरोऽपि विधानसभाभवनाद् बहिः मोटरयानमादायोपस्थितः आसीत्। परं भगतसिंहः बटुकेश्वरदत्तश्च विधानसभाभवने एव आत्मसमर्पणं कृतवन्तौ। पश्चात् तौ द्वावपि शूलमारोपितौ। (UPBoardSolutions.com) एवम् आजादस्य अनेके सहयोगिनः भगवतीचरणसालिकरामप्रभृतयो मृताः। अतः आजादश्चन्द्रशेखरो नितरां खिन्नो जातः, केन्द्रियक्रान्तिकारिदलस्य सदस्ययोः यशपालवीरभद्रयोः सन्दिग्धाचरणेन तु आजादो विक्षुब्धोऽभवत्। यदी दलस्य सदस्याः एव विश्वासघातिनो जाताः तदा तस्य दुःखानुभूतिः स्वाभाविकी एव आसीत्। तदपि सः स्वमार्गात् विचलितो न जातः। कर्णपुरस्य वीरभद्रत्रिपाठिनः विश्वासघात एवं आजादस्य कृतेऽनिष्टकारको जातः।

शब्दार्थ
परामर्शेनैव = परामर्श से ही।
अकुरुताम् = किया।
मोटरयानमादायोपस्थितः = मोटर वाहन लेकर उपस्थित।
कृतवन्तौ = कर दिया। द्वावपि (द्वौ + अपि) = दोनों ही।
मृताः = मारे गये।
सन्दिग्धाचरणेन = सन्देह भरे आचरण से।
विक्षुब्धः = व्याकुल, असन्तुष्ट।
विश्वासघातिनः = विश्वासघात करने वाले।
कर्णपुरस्य = कानपुर के।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में क्रान्तिकारी गतिविधियों में चन्द्रशेखर के अनेक सहयोगियों के मारे जाने एवं दल के कुछ लोगों द्वारा विश्वासघात किये जाने का वर्णन है।

अनुवाद
सन् 1929 ई० में अप्रैल महीने की आठ तारीख को आजाद के परामर्श से ही सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त ने विधानसभा भवन में बम विस्फोट किया। उस समय चन्द्रशेखर भी विधानसभा भवन के बाहर मोटरगाड़ी लेकर उपस्थित थे, परन्तु भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने विधानस भवन में ही आत्मसमर्पण कर दिया। बाद में उन दोनों को शूली पर चढ़ा दिया गया। इसे प्रकार आजाद के अनेक साथी (UPBoardSolutions.com) भगवतीचरण, सालिगराम आदि मारे गये। इसलिए चन्द्रशेखर आजाद अत्यन्त दु:खी हुए। केन्द्रीय क्रान्तिकारी दल के दो सदस्यों यशपाल और वीरभद्र के सन्देहपूर्ण आचरण से आजाद नाराज हुए। जब दल के सदस्य ही विश्वासघाती हो गये, तब उनको दु:ख का अनुभव होना स्वाभाविक ही था। तब भी वह अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। कानपुर के वीरभद्र त्रिपाठी को विश्वासघात ही आजाद के लिए अनिष्टकारी हुआ।

(6) एकत्रिंशदधिकैकोनविंशतिशततमे (1931) वर्षे फरवरीमासस्य सप्तविंशतितमायां तारिकायां प्रातः नववादने प्रयागस्य अल्फ्रेड नाम्नि उद्याने एकस्य वृक्षस्याधश्छायायाम् आजादः यशपालेन सुखदेवेन च समं वार्तालापं कुर्वन् उपविष्टः आसीत्। तस्मिन्नेव समये गच्छन् वीरभद्रत्रिपाठी दृष्टः, यशपालोऽपि उत्थाय चलितः, आजादः सुखदेवराजेन सह वार्तालाप कुर्वन्नेवासीत्। तदा आरक्षिणः आगत्य परितोऽवरुद्धवन्तस्तम्। ।

शब्दार्थ-
नववादने = नौ बजे।
वृक्षस्याधश्छायायाम् = वृक्ष के नीचे छाया में।
समम् = साथ।
उपविष्टः आसीत् = बैठे हुए थे।
उत्थाय = उठकर।
परितः = चारों ओर।
अवरुद्धवन्तः = घेर लिया।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रशेखर के सिपाहियों द्वारा घेरे जाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
सन् 1931 ईसवी में फरवरी महीने की 27 तारीख को प्रातः नौ बजे प्रयाग के अल्फ्रेड नामक बगीचे में एक वृक्ष के नीचे छाया में आजाद यशपाल और सुखदेव के साथ बातचीत करते हुए बैठे थे। उसी समय जाता हुआ वीरभद्र त्रिपाठी दिखाई पड़ा। यशपाल भी उठकर चल दिया। आजाद सुखदेव के साथ बातचीत कर ही रहे थे, तब ही सैनिकों ने आकर चारों ओर से उसे घेर लिया।

(7) स्वकीयं सहयोगिनं कथञ्चित्ततः उद्यानात् निःसार्य. आजादः पेस्तौलअस्त्रं संसाधितवान्। तगा विपक्षतः गुलिकावृष्टिः जाता। विपक्षतः आरक्षिणां गुलिकावृष्टिं दर्श-दर्शम् आजादस्य मनः आकुलं नाभूत्। आजादोऽपि स्वकीयेनास्त्रेणानेकान् विमुग्धान् आहतांश्चाकरोत्। यदास्त्रे एका गुलिकावशिष्टा आसीत् तदा तया स्वमेवाहन्। एवमाजादश्चन्द्रशेखरो यशः शरीरेणामरतामभजत्। |

शब्दार्थ-
स्वकीयम् = अपने।
कथञ्चिद् = किसी प्रकार।
निःसार्य = निकालकरे।
संसाधित- वान् = तैयार किया।
विपक्षतः = शत्रु की ओर से।
गुलिकावृष्टिः = गोलियों की वर्षा।
आरक्षिणां = पुलिस वालों की।
आकुलं नाभूत् = व्याकुल नहीं हुआ।
विमुग्धान् = मूर्च्छित।
स्वमेवाहन (स्वम् + एव + अहन्) = अपने को ही मार दिया।
अभजत् = प्राप्त हुआ। |

प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश में आजाद का अपनी ही गोली से शहीद हो जाने का वर्णन है।

अनुवाद
अपने साथी (सुखदेव) को किसी तरह पार्क से निकालकर आजाद ने पिस्तौल सँभाली। तब विपक्ष की ओर से गोलियों की वर्षा हुई। विपक्ष की ओर से सैनिकों की गोलियों की वर्षा को देख-देखकर आजाद का मन व्याकुल नहीं हुआ। आजाद ने भी अपने अस्त्र से अनेक को मूर्च्छित और घायल कर दिया। जब पिस्तौल में एक गोली बची थी, तब उसने उसने स्वयं को मार लिया। इस प्रकार आजाद चन्द्रशेखर यशरूपी शरीर से अमर हो गये।।

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(8) एवं विधाः अमरबलिदानिनो देशाभिमानिनो देशसंरक्षकाः क्रान्तिकारिणो नवयुवानः प्रतिदिनं नोत्पद्यन्ते। तेषा जन्म युगे कदाचिदेव जायते। यतश्च एतादृशाः अमरयुवानः युगान्तरमुपस्थापयितुमेवोत्पद्यन्ते। एतेषामावश्यकतापि क्वाचित्की कदाचित्की एव भवति। एवंविधाः आजादस्य चन्द्रशेखरस्य द्रष्टारः साक्षात्कर्तारः अद्यापि जीवन्ति ये आत्मानं पावनं मन्यन्ते। भारतभूरपि धन्यैव यत्र एतादृशा आत्मबलिदायिनो शूराः स्वीयेन जन्मना भूमिं पावनां कृतवन्तः, शोणितेन सिञ्चितवन्तश्च।।

स्वातन्त्र्यमाप्तुकामोऽयं क्रान्तिकारी दृढव्रतः।
जातोऽमरो बलेर्दानादाजादश्चन्द्रशेखरः॥

शब्दार्थ
नोत्पद्यन्ते = उत्पन्न नहीं होते।
कदाचिदेव = कभी ही।
उपस्थापयितुं = उपस्थित करने के लिए।
क्वाचित्की = कहीं।
कादाचित्की = आकस्मिक।
द्रष्टारः = देखने वाले।
अद्यापि = आज भी।
पावनं मन्यते = पवित्र मानते हैं।
शोणितेन = रक्त से।
बलेर्दानाद् = बलिदान करने से।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रशेखर आजाद के बलिदान का स्मरण किया गया है।

अनुवाद
इस प्रकार के अमर बलिदानी, देश पर अभिमान करने वाले, देश की रक्षा करने वाले क्रान्तिकारी नवयुवक प्रतिदिन उत्पन्न नहीं होते हैं; अर्थात् जन्म नहीं लेते हैं। उनका ज़न्म युग में कभी ही होता है; क्योंकि इस प्रकार के अमर युवक युग-परिवर्तन उपस्थित करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं। इनकी आवश्यकता भी कहीं-कहीं, कभी-कभी ही होती है। चन्द्रशेखर आजाद के देखने वाले और साक्षात्कार करने वाले इस प्रकार के लोग आज भी जीवित हैं, जो अपने आप को पवित्र मानते हैं। भारतभूमि भी धन्य है, जहाँ इस प्रकार के आत्मबलि को देने वाले शूरवीर अपने जन्म से भूमि को पवित्र करते हैं और खून से सींचते हैं।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति का इच्छुक वह चन्द्रशेखर नाम का युवक अत्यन्त क्रान्तिकारी और दृढ़-प्रतिज्ञ था। वह आत्म-बलिदान देकर अमर हो गया।

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1
चन्द्रशेखर आजाद का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीषक के अन्तर्गत दी गयी सामग्री को संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें।] ।

प्ररन 2
चन्द्रशेखर के घर से निकलने की घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर
जब चन्द्रशेखर केवल ग्यारह वर्ष के थे, तब उन्होंने अल्लीराजपुर राज्य के बगीचे से एक फल बिना अपने पिताजी से पूछे तोड़ लिया। इस पर उनके पिता जी बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने चन्द्रशेखर से उद्यान के माली से माफी माँगने के लिए कहा। लेकिन चन्द्रशेखर ने माली से क्षमा न माँगी। इस पर उनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया।

प्ररन 3
चन्द्रशेखर आजाद किस प्रकार क्रान्तिकारियों में सम्मिलित होकर क्रान्तिकारी सेना के नायक बने?
उत्तर
असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के बाद आजाद का परिचय भाग्य से प्रणवेश चटर्जी नामक क्रान्तिकारी के साथ हो गया। प्रणवेश चटर्जी ने इनका परिचय मन्मथनाथ गुप्त से करवाया। इनकी सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर मन्मथनाथ गुप्त ने इन्हें क्रान्तिकारी दल का सदस्य बना लिया। गोली चलाने और निशाना लगाने में इन्होंने शीघ्र ही कुशलता प्राप्त कर ली। ‘काकोरी काण्ड में इन्होंने सक्रिय भाग लिया। इस काण्ड के पश्चात् जब प्रमुख सदस्य पकड़ लिये गये, तब ये क्रान्तिकारी सेना के नायक बना दिये गये।

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प्ररन 4
अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आजाद के बलिदान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
सत्ताइस फरवरी उन्नीस सौ इकतीस को प्रातः नौ बजे आजाद, अल्फ्रेड पार्क में एक वृक्ष की छाया में बैठे हुए यशपाल और सुखदेव से बात कर रहे थे। इसी समय उनका विश्वासघाती साथी वीरभद्र त्रिपाठी दिखाई दिया, जिसे देखकर यशपाल उठकर चला गया। इसी समय पुलिस ने आकर पार्क (UPBoardSolutions.com) को चारों ओर से घेर लिया। आजाद ने किसी प्रकार सुखदेव को पार्क के बाहर निकाल और पिस्तौल सँभाल लिया। पुलिस की ओर से गोलियों की बौछार होने लगी। आजाद ने भी अपनी गोलियों से बहुतों को घायल किया। जब उनके पास केवल एक ही गोली शेष रह गयी तो उन्होंने उससे स्वयं को मार लिया और शहीद हो गये।

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UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry

UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry (युक्लिड के ज्यामिति का परिचय)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry (युक्लिड के ज्यामिति का परिचय).

प्रश्नावली 5.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथनों में से कौन-से कथन सत्य हैं और कौन-से कथन असत्य हैं? अपने उत्तरों के लिए। कारण दीजिए।
(i) एक बिन्दु से होकर केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है।
(ii) दो भिन्न बिन्दुओं से होकर जाने वाली असंख्य रेखाएँ हैं।
(iii) एक सांत रेखा दोनों ओर अनिश्चित रूप से बढ़ाई जा सकती है।
(iv) यदि दो वृत्त बराबर हैं तो उनकी त्रिज्याएँ बराबर होती हैं।
(v) दी गई आकृति में, यदि AB = PQ और PQ = XY है तो AB = XY होगा :
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-1
हल :
(i) क्योंकि प्रतिच्छेदी रेखाएँ, संगामी रेखाएँ इत्यादि ज्यामिति तथ्य दिए कथन को खण्डित करते हैं।
साथ-ही-साथ एक बिन्दु से होकर अपरिमित रूप से अनेक रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
अत: कथन असत्य है।
(ii) क्योंकि दो भिन्न बिन्दुओं से होकर केवल एक रेखा खींची जा सकती है।
अतः कथन असत्य है।
(iii) एक सांत रेखा दोनों ओर अनिश्चित रूप से बढ़ाई जा सकती है।
अत: कथन सत्य है।
(iv) क्योंकि दो वृत्तों की त्रिज्याएँ समान होने पर ही वृत्त समान होते हैं।
अत: कथन सत्य है।
(v) यदि AB= PQ और PQ= XY ।
तो AB = XY (यूक्लिड के प्रथम अभिगृहीत से)
अत: कथन सत्य है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों में से प्रत्येक की परिभाषा दीजिए। क्या इनके लिए कुछ ऐसे पद हैं जिन्हें परिभाषित करने की आवश्यकता है? वे क्या हैं और आप इन्हें कैसे परिभाषित कर पाएँगे? ।
(i) समान्तर रेखाएँ
(ii) लम्ब रेखाएँ
(iii) रेखाखण्डे
(iv) वृत्त की त्रिज्या
(v) वर्ग।
हल :
(i) समान्तर रेखाएँ : दो सरल रेखाएँ जिनमें कोई भी उभयनिष्ठ बिन्दु नहीं होता है एक-दूसरे के समान्तर कहलाती हैं।
‘बिन्दु’ तथा ‘सरल रेखा कुछ ऐसे पद हैं जिन्हें परिभाषित करने की आवश्यकता है। ‘बिन्दु’ तथा ‘सरल रेखा’ को यूक्लिड के शब्दों में परिभाषित कर सकते हैं :
एक बिन्दु वह है जिसका कोई भाग नहीं होता है।
एक रेखा चौड़ाई रहित लम्बाई होती है तथा एक सीधी रेखा ऐसी रेखा है जो स्वयं पर बिन्दुओं के साथ सपाट रूप से स्थित होती है।

(ii) लम्बरेखाएँ : यदि दो समान्तर रेखाओं में से कोई एक 90° के कोण पर घूमती है तब दोनों रेखाएँ एक-दूसरे के
लम्बवत् होती हैं। ‘90° के कोण का घुमाव’ ऐसा पद है जिसे परिभाषित करने की आवश्यकता है।
घुमाव को अन्तर्ज्ञानात्मक रूप मान लिया जाता है, अतः इसका प्रयोग नहीं कर सकते हैं।

(iii) रेखाखण्ड : दो अन्त बिन्दुओं (end points) के साथ किसी रेखा को रेखाखण्ड कहते है|
‘बिन्दु’ तथा ‘रेखा’ कुछ ऐसे पद हैं जिन्हें परिभाषित करने की आवश्यकता है। परन्तु इन्हें भाग (i) में परिभाषित कर चुके हैं।

(iv) वृत्त की त्रिज्या : किसी वृत्त के केन्द्र से वृत्त की परिधि के किसी बिन्दु तक खींचे रेखाखण्ड को वृत्त की त्रिज्या कहते हैं।
केन्द्र ऐसा पद है जिसे परिभाषित करने की आवश्यकता है।
केन्द्र’ को वृत्त के अन्दर एक बिन्दु के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसकी वृत्त पर स्थित सभी बिन्दुओं से दूरी समान होती है।

(v) वर्ग : वर्ग वह क्षेत्र या प्रदेश है जो समान लम्बाई के चार रेखाखण्डों से घिरा होता है तथा प्रत्येक दो किनारों के बीच 90° का कोण होता है।
क्षेत्र या प्रदेश, किनारे तथा कोण को अन्तर्ज्ञानात्मक रूप मान लिया जाता है।

प्रश्न 3.
नीचे दी हुई दो अभिधारणाओं पर विचार कीजिए :
(i) दो भिन्न बिन्दु A और B दिए रहने पर, एक तीसरा बिन्दु C ऐसा विद्यमान है जो A और B के बीच स्थित होता है।
(ii) यहाँ कम-से-कम ऐसे तीन बिन्दु विद्यमान हैं कि वे एक रेखा पर स्थित नहीं हैं।
क्या इन अभिधारणाओं में कोई अपरिभाषित शब्द हैं? क्या ये अभिधारणाएँ अविरोधी हैं? क्या ये यूक्लिड की अभिधारणाओं से प्राप्त होती हैं? स्पष्ट कीजिए।
हल :
दोनों अभिधारणाओं में निम्न दो शब्द अपरिभाषित हैं : बिन्दु और रेखा।
दोनों अभिधारणाएँ परस्पर अविरोधी नहीं हैं।
ये अभिधारणाएँ यूक्लिड की अभिधारणाओं का अनुसरण नहीं करतीं परन्तु ये निम्न अभिगृहीत के अनुरूप हैं।
दिए गए दो भिन्न बिन्दुओं से होकर एक अद्वितीय रेखा खींची जा सकती है।
(i) माना AB एक सरल रेखा है।
अपरिमित रूप से ऐसे अनेक बिन्दु हैं जो इस रेखा पर स्थित हैं। दो अन्त बिन्दुओं A तथा B को छोड़कर इनमें से किसी का भी चयन करते हैं। यह बिन्दु A तथा B के मध्य स्थित होता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-2
(ii) कम-से-कम ऐसे तीन बिन्दुओं का होना आवश्यक है जिनमें से एक बिन्दु को अन्य दोनों बिन्दुओं को जोड़ने वाली सरल रेखा पर नहीं होना चाहिए।

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प्रश्न 4.
यदि दो बिन्दुओं A और B के बीच एक बिन्दु C ऐसा स्थित है कि AC = BC है, तो सिद्ध कीजिए कि AC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB है। एक आकृति खींचकर इसे स्पष्ट कीजिए।
हल :
बिन्दु C दो बिन्दुओं A और B के बीच स्थित है,
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-3
AC + BC = AB
परन्तु दिया है। AC = BC
AC + AC = AB
2AC = AB
[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] . 2AC = AB (बराबरों के आधे भी परस्पर बराबर होते हैं)
AC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
Proved.

प्रश्न 5.
प्रश्न 4 में, C रेखाखण्ड AB को मध्य-बिन्दु कहलाता है। सिद्ध कीजिए कि रेखाखण्ड का एक और केवल एक ही मध्य-बिन्दु होता है।
हल :
माना यदि सम्भव है तो C और C” रेखाखण्ड AB के दो मध्य-बिन्दु हैं।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-4
C, रेखाखण्ड AB का मध्य-बिन्दु है।
AC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
पुनः C”, रेखाखण्ड AB का मध्य-बिन्दु है।
AC” = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
यूक्लिड के अभिगृहीत से,
AC = AC”
AC – AC” = AC” – AC”
CC” = 0
C और C” समान बिन्दु हैं।
अतः रेखाखण्ड का एक और केवल एक ही मध्य-बिन्दु होता है।
Proved.

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प्रश्न 6.
दी गई आकृति में, यदि AC = BD है, तो सिद्ध कीजिए कि AB = CD है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-5
हल :
बिन्दु B, बिन्दुओं A तथा C के मध्य स्थित है।
AB + BC = AC
पुनः बिन्दु C, बिन्दुओं B तथा D के मध्य स्थित है। .
BC + CD = BD परन्तु दिया है।
AC = BD
AB + BC = BC + CD
बराबरों से बराबर (BC) घटाने पर,
AB + BC – BC = BC + CD – BC
AB = CD
Proved.

प्रश्न 7.
यूक्लिड की अभिगृहीतों की सूची में दिया हुआ अभिगृहीत 5 एक सर्वव्यापी सत्य क्यों माना जाता है?
हल :
यूक्लिड का 5वाँ अभिगृहीत निम्नलिखित है :
पूर्ण अपने भाग से बड़ा होता है?
यह सर्वव्यापी सत्य है क्योंकि पूर्ण का कोई भी भाग क्यों न हो, वह अस्तित्व में पूर्ण से ही आया होगा तब इसके लिए प्रमाण देने की आवश्यकता ही नहीं है।

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प्रश्नावली 5.2

प्रश्न 1.
आप यूक्लिड की पाँचवीं अभिधारणा को किस प्रकार लिखेंगे ताकि वह सरलता से समझी जा सके।
हल :
यदि दो रेखाओं l और m को तीसरी रेखा n काटती है और रेखा n के एक ही ओर बने दोनों अन्तः कोणों का योग दो समकोण से कम हो तो l और m रेखाएँ बढ़ाने पर उसी ओर मिलेंगी जिस ओर के कोणों का योग 2 समकोण से कम होगा।
अथवा
दो भिन्न प्रतिच्छेदी रेखाएँ एक ही रेखा के समान्तर नहीं हो सकतीं।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-6

प्रश्न 2.
क्या यूक्लिड की पाँचवीं अभिधारणा से समान्तर रेखाओं के अस्तित्व का औचित्य निर्धारित होता है? स्पष्ट कीजिए।
हल :
यदि दो रेखाओं l और m को तीसरी रेखा n काटती है और n के एक ही ओर बने अन्त: कोणों ∠1 और ∠2 का योग 2 समकोण हो तो रेखाएँ l और m, बढ़ाने पर रेखा n को इस ओर प्रतिच्छेद नहीं करेंगी। इसी प्रकार यदि ∠3 + ∠4 = 2 समकोण तो रेखाएँ l और m, बढ़ाने पर रेखा n के इस ओर भी प्रतिच्छेद नहीं करेंगी। अत: रेखाएँ l और m कभी प्रतिच्छेद नहीं करती। हैं। इस प्रकार रेखाएँ l और m समान्तर होंगी।
अत: यह कथन सत्य है।
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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 कर्ण (खण्डकाव्य)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 कर्ण (खण्डकाव्य)

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प्रश्न 1
‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कितने सर्ग हैं ? उनके नाम बताइए।
उत्तर
कर्ण खण्डकाव्य में सात सर्ग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—

  1. रंगशाला में कर्ण,
  2. द्यूतसभा में द्रौपदी,
  3. कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान,
  4. श्रीकृष्ण और कर्ण,
  5. माँ-बेटा,
  6.  कर्ण-वध,
  7. जलांजलि।।

प्रश्न 2
‘कर्ण खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 15, 16, 17]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। [2012, 13, 15]
या
‘कर्ण खण्डकाव्य के कथानक पर प्रकाश डालिए। [2012, 13, 14]
उत्तर
श्री केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ नामक खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभक्त है। इसकी कथावस्तु महाभारत के प्रसिद्ध वीर कर्ण के जीवन से सम्बद्ध है।

प्रथम सर्ग (रंगशाला में कर्ण) में कर्ण के जन्म से लेकर द्रौपदी के स्वयंवर तक की कथा का संक्षेप में वर्णन है। कुन्ती को; जब वह अविवाहित थी; सूर्य की आराधना के फलस्वरूप एक तेजस्वी पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। उसने लोक-लाज और कुल (UPBoardSolutions.com) की मर्यादा के भय से उस शिशु को नदी की धारा में बहा दिया। नि:सन्तान सारथी अधिरथ उस बालक को घर ले आया। उसके द्वारा पाले जाने के कारण वह ‘सूत-पुत्र कहलाया।

एक दिन वह बालक राजभवन की रंगशाला में पहुँच गया। सूत-पुत्र होने के कारण वहाँ उसकी वीरता का उपहास किया गया और उसे सूत-पुत्र कहकर अपमानित किया। पाण्डवों से ईष्र्या रखने वाले दुर्योधन ने स्वार्थवश उसे प्रेम और सम्मान प्रदान किया। इससे कर्ण के आहत मन को कुछ धीरज एवं बल मिला।।

द्रौपदी के स्वयंवर में जब कर्ण मत्स्य-वेध करने उठा, तब द्रौपदी ने भी हीन जाति का कहकर उसे अपमानित किया। इस प्रकार दूसरी बार एक नारी द्वारा अपमानित होकर भी वह मौन ही रहा, किन्तु क्रोध की चिंगारी उसके नेत्रों से फूटने लगी।

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द्वितीय सर्ग (द्युतसभा में द्रौपदी) में अर्जुन द्वारा मत्स्य-वेध से लेकर द्रौपदी के चीर-हरण तक का कथानक वर्णित है। द्रौपदी के स्वयंवर में ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन ने मत्स्य-वेध करके द्रौपदी का वरण कर लिया। द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की वधू बनकर आ गयी। विदुर के समझाने-बुझाने पर युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का आधा राज्य मिल गया।

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। यज्ञ में आमन्त्रित दुर्योधन को जल-स्थल का भ्रम हो गया। इस पर द्रौपदी ने व्यंग्य किया, जिस पर दुर्योधन क्षोभ से भर गया।

वापस आकर उसने प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर शकुनि की सलाह से चूत-क्रीड़ा की योजना बनायी और पाण्डवों को आमन्त्रित किया। इस द्यूत-क्रीड़ा में युधिष्ठिर सारा राजपाट, भाइयों और अन्त में द्रौपदी को भी हार बैठे। कर्ण और दुर्योधन ने बदले का उपयुक्त अवसर जानकर द्रौपदी को निर्वस्त्र करने को कहा। कर्ण को अपना प्रतिशोध लेना था। वह बोला–पाँच पतियों वाली कुलवधू कैसी? कर्ण ने दु:शासन को इस प्रकार उत्तेजित तो किया परन्तु बाद में वह अपने इस दुष्कृत्य के लिए आजीवन पछताता रहा।

तृतीय सर्ग (कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान) में दुर्योधन द्वारा वैष्णव-यज्ञ करने से लेकर, कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान करने तक का कथानक है। दुर्योधन ने चक्रवर्ती सम्राट् का पद ग्रहण करने के लिए वैष्णव-यज्ञ किया। कर्ण ने प्रतिज्ञा की कि मैं जब तक अर्जुन को नहीं मार (UPBoardSolutions.com) दूंगा, तब तक कोई भी याचक मुझसे जो कुछ भी माँगेगा, मैं वही दान दे दूंगा, मांस-मदिरा का सेवन नहीं करूंगा और अपने चरण भी नहीं धुलवाऊँगा। अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे; अतः इन्द्र ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास गये और कवच-कुण्डल का दान माँगा।

कर्ण ने इन्द्र की याचना पर जन्म से प्राप्त अपने दिव्य कवच-कुण्डल सहर्ष शरीर से काटकर दे दिये। ये ही कर्ण की जीवन-रक्षा के सुदृढ़ आधार थे। । |

चतुर्थ सर्ग (श्रीकृष्ण और कर्ण) में श्रीकृष्ण द्वारा कौरव-पाण्डवों को समझौता कराने, समझौता न होने पर कर्ण को कौरव पक्ष से युद्ध न करने के लिए समझाने के असफल प्रयास का वर्णन है। श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से कौरवों की राजसभा में दूत के रूप में न्याय माँगने गये, किन्तु दुर्योधन ने बार-बार यही कहा कि युद्ध के अतिरिक्त अब और कोई रास्ता नहीं है। श्रीकृष्ण निराश होकर कर्ण को समझाते हैं कि तुम पाण्डवों के भाई हो; अतः अपने भाइयों के पक्ष का समर्थन करो। |

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कर्ण की आँखों में वेदना के आँसू उमड़ आये। वह बोला कि मुझे आज तक घृणा, अनादर और अपमान ही मिला है। आज अधिरथ मेरे पिता और राधा मेरी माँ हैं। इन्हें छोड़कर मैं कुन्ती को अपनी माँ के रूप में ग्रहण नहीं कर सकता। मैं मित्र दुर्योधन के प्रति कृतघ्न नहीं बन सकता। लेकिन आप यह बात कभी युधिष्ठिर से मत कहिएगा कि मैं उनका बड़ा भाई हूँ, अन्यथा वे यह राज-पाट छोड़ देंगे। बहुत दिनों से मुझे एक आत्मग्लानि रही है कि द्रौपदी भरी सभा में अपमानित हुई थी और मैंने ही वह दुष्कर्म कराया था। अतः इस शरीर को त्यागकर अपने इस दुष्कर्म का प्रायश्चित्त करूंगा।

पञ्चम सर्ग (माँ-बेटा) में कुन्ती द्वारा कर्ण के पास जाने का वर्णन है। पाण्डवों के लिए चिन्तित कुन्ती बहुत सोच-विचारकर कर्ण के आश्रम पहुँचती है। कुन्ती के कुछ कहने से पहले ही कर्ण ने अपने जीवनभर की पीड़ा को साकार करते हुए अपने हृदय की ज्वाला माँ के सम्मुख स्पष्ट कर दी।

वह बोला कि माँ होकर तुमने मेरे साथ छल किया। में अपने मित्र दुर्योधन का कृतज्ञ हूँ, मैं उसे धोखा नहीं दे सकता। यह विडम्बना ही होगी कि एक माता अपने पुत्र के द्वार से खाली हाथ लौट जाए। मैंने केवल अर्जुन को ही मारने की प्रतिज्ञा की है। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि मैं अर्जुन के अतिरिक्त किसी पाण्डव को नहीं मारूंगा।

षष्ठ सर्ग (कर्ण-वध) में महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से लेकर कर्ण की मृत्यु तक की कथा का वर्णन है। महाभारत का युद्ध आरम्भ हुआ। भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति बनाये गये। वे इस शर्त पर सेनापति बने कि वे कर्ण का सहयोग नहीं लेंगे। युद्ध के दसवें दिन घायल होकर शर-शय्या पर पड़ने के बाद कर्ण के भीष्म पितामह के पास पहुँचने पर उन्होंने उसको भर आँख निहारने की (UPBoardSolutions.com) इच्छा प्रकट की तथा उसे दानवीर, धर्मवीर और महावीर बतलाया।

भीष्म पितामह ने कहा कि तुम भी अर्जुन आदि की तरह कुन्ती के ही पुत्र हो। हमारी इच्छा यही है कि तुम पाण्डवों से मिल जाओ। कर्ण ने अपने को प्रतिज्ञाबद्ध बताते हुए ऐसा करने से मना कर दिया। उसने पितामह से कहा कि भले ही उस ओर कृष्ण हों, किन्तु अर्जुन को मारने हेतु मैं हर प्रयास करूंगा। यह सुनकर पितामह ने उसे अपने शस्त्रास्त्र उठाकर दुर्योधन का स्वप्न पूर्ण करने के लिए कहा।

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भीष्म के बाद द्रोणाचार्य को सेनापति नियुक्त किया गया। पन्द्रहवें दिन वे भी वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के सोलहवें दिन कर्ण कौरव दल के सेनापति बने। उनकी भयंकर बाण-वर्षा से पाण्डव विचलित होने लगे, तभी भीम का पुत्र घटोत्कच भयंकर मायापूर्ण आकाश युद्ध करता हुआ कौरव सेना पर टूट पड़ा। कर्ण ने अमोघ-शक्ति का प्रहार कर घटोत्कच को मार डाला। इस अमोघ-शक्ति का प्रयोग वह केवल अर्जुन पर करना चाहता था। (UPBoardSolutions.com) अचानक कर्ण के रथ का पहिया पृथ्वी में धंस गया। कर्ण रथ से उतरकर स्वयं पहिया निकालने लगा। तभी श्रीकृष्ण का आदेश पाते ही अर्जुन ने नि:शस्त्र कर्ण का बाण-प्रहार से वध कर दिया।

सप्तम सर्ग (जलांजलि) में युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर द्वारा कर्ण को जलांजलि देने की कथा का वर्णन है। कर्ण के वीरगति प्राप्त करते ही कौरव सेना का मानो प्रदीप बुझ गया। वे शक्तिहीन हो गये। सेना अस्त-व्यस्त हो गयी। कर्ण के बाद शल्य और दुर्योधन भी मारे गये। युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को जलदान किया। तभी कुन्ती की ममता उमड़ पड़ी और उसने युधिष्ठिर से कर्ण को भाई के रूप में जलदान करने का आग्रह किया।

युधिष्ठिर के द्वारा पूछने पर कुन्ती ने कर्ण के जन्म का रहस्य प्रकट कर दिया। यह जानकर कि कर्ण उनके बड़े भाई थे, युधिष्ठिर का मन भर आया और वे बोले कि “माँ! वे हमारे अग्रज थे। कर्ण जैसे महामहिम, दानवीर, दृढ़प्रतिज्ञ, दृढ़-चरित्र, समर-धीर, अद्वितीय तेजयुक्त भाई को पाकर कौन धन्य नहीं होता। उन्होंने कठोर शब्दों में कहा कि “तुम्हारे द्वारा इस रहस्य को छिपाने के कारण ही वे जीवनभर अपमान (UPBoardSolutions.com) का घूट पीते रहे।” युधिष्ठिर के हृदय की इस करुण व्यंजना के साथ ही खण्डकाव्य समाप्त हो जाता

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प्रश्न 3
‘कर्ण’ काव्य के प्रथम सर्ग (रंगशाला में कर्ण) की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए।
उत्तर
श्री केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ नामक खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभक्त है। कथावस्तु के आधार पर ही सर्गों का नामकरण किया गया है। इसकी कथावस्तु महाभारत के प्रसिद्ध वीर कर्ण के जीवन से सम्बद्ध है। प्रथम सर्ग का नाम ‘रंगशाला में कर्ण’ है। इस सर्ग में कर्ण के जन्म से लेकर द्रौपदी के स्वयंवर तक की कथा का संक्षेप में वर्णन है। कुन्ती को; जब वह अविवाहित थी; सूर्य की आराधना के फलस्वरूप एक तेजस्वी पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। (UPBoardSolutions.com) उसने लोक-लाज और कुल की मर्यादा के भय से उस शिशु को नदी की धारा में बहा दिया। नि:सन्तान सारथी अधिरथ उस बालक को अपना पुत्र मानकर घर ले आया। उसे भला क्या ज्ञात था कि जो बालक उसे मिला है, उसमें साक्षात् सूर्य का तेज है। यही बालक महाभारत का अजेय वीर, कर्मवीर और दानवीर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध होगा। उसके द्वारा पाले जाने के कारण वह ‘सूत-पुत्र’ तथा पत्नी राधा के पुत्र-रूप में ‘राधेय’ कहलाया।

एक दिन वह बालक राजभवन की रंगशाला में पहुँच गया। सूत-पुत्र होने के कारण वहाँ उसकी वीरता का उपहास किया गया। यद्यपि वह सुन्दर और सुकुमार बालक था, किन्तु अर्जुन ने उसे सूत-पुत्र कहकर अपमानित किया। कौरव-पाण्डव राजकुमारों के गुरु कृपाचार्य भी उससे घृणा करते थे।

दुर्योधन कर्ण के वीर-वेश और ओज से अत्यन्त प्रभावित था। पाण्डवों से ईष्र्या रखने वाले दुर्योधन ने सोचा कि इसे अपनी ओर मिला लेने से भविष्य में पाण्डव-पक्ष को दबाये रखना सम्भव हो जाएगा; अतः स्वार्थवश उसने उसे प्रेम और सम्मान प्रदान किया। (UPBoardSolutions.com) इससे कर्ण के आहत मन को कुछ धीरज एवं बल मिला।

द्रौपदी के स्वयंवर में बड़े-बड़े वीर धनुर्धर आये हुए थे और स्वयंवर की प्रतिज्ञा के अनुसार लक्ष्यवेध करना था। जब कर्ण मत्स्य-वेध करने उठा, तब द्रौपदी ने भी उसको हीन जाति का कहकर अपमानित किया-

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सूत-पुत्र के साथ ने मेरा गठबन्धन हो सकता।
क्षत्राणी का प्रेम न अपने गौरव को खो सकता॥

इस प्रकार दूसरी बार एक नारी द्वारा अपमानित होकर भी वह मौन ही रहा, किन्तु क्रोध की चिंगारी उसके नेत्रों से फूटने लगी।’सूर्य की ओर बंकिम दृष्टि करके, उसने मन-ही-मन अपने अपमान को बदला ” लेने को प्रण कर लिया।

प्रश्न 4
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग (चूतसभा में द्रौपदी) का सारांश लिखिए। [2010, 13, 14]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपनी भाषा में लिखिए।
उत्तर
द्वितीय सर्ग में अर्जुन द्वारा मत्स्य-वेध से लेकर द्रौपदी के चीर-हरण तक का कथानक वर्णित है। द्रौपदी के स्वयंवर में ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन ने मत्स्य-वेध करके द्रौपदी का वरण कर लिया। बाद में जब भेद खुला तो अन्य राजागण ईष्र्या से प्रेरित हो गये, किन्तु द्रौपदी अर्जुन को पाकर धन्य थी। द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की वधू बनकर आ गयी। विदुर के समझाने-बुझाने पर युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का आधा राज्य मिल गया।

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। यज्ञ में आमन्त्रित दुर्योधन उनके यश-वैभव और राज्य की सुव्यवस्था देखकर ईर्ष्या व द्वेष से जलने लगा। दुर्योधन ने जैसे ही सभाभवन में प्रवेश किया तो उसे जहाँ जल भरा था, वहाँ स्थल का और जहाँ स्थल था, वहाँ जल का भ्रम हो गया। इस पर द्रौपदी ने व्यंग्य किया, जिस पर दुर्योधन क्षोभ से भर गया।

वापस आकर उसने प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर शकुनि की सलाह से द्यूत-क्रीड़ा की योजना बनायी और पाण्डवों को आमन्त्रित किया। इस द्यूत-क्रीड़ा में युधिष्ठिर; सारा राजपाट, भाइयों और अन्त में द्रौपदी को भी हार बैठे। दुर्योधन की आज्ञा से दु:शासन द्रौपदी को भरी सभा में बाल पकड़कर घसीटता हुआ लाया। द्रौपदी ने बहुत अनुनय-विनय की, परन्तु इस दुष्कृत्य को देखकर भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, पाण्डव तथा सभी सभासद मौन रह गये। कर्ण और दुर्योधन की प्रसन्नता का ठिकाना न था। कर्ण ने बदले का उपयुक्त अवसर जानकर दु:शासन को उत्तेजित किया और द्रौपदी को निर्वस्त्र करने को कहा। विकर्ण से (UPBoardSolutions.com) यह अन्याय सहन नहीं हुआ, उसने अन्याय का विरोध किया, परन्तु कर्ण को अपना प्रतिशोध लेना था। वह बोला—विकर्ण, यह कुलवधू नहीं, दासी है। पाँच पतियों वाली कुलवधू कैसी? उसने दु:शासन को आज्ञा दी–

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दुःशासन मत ठहर, वस्त्र हर ले कृष्णा के सारे।
वह पुकार ले रो-रोकर, चाहे वह जिसे पुकारे॥

कर्ण ने दुःशासन को इस प्रकार उत्तेजित तो किया परन्तु बाद में अपने इस दुष्कृत्य के लिए वह आजीवन पछताता रहा।

प्रश्न 5
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग (कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान) की कथा का सारांश लिखिए। [2009, 10, 12, 14, 15, 17, 18]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान के प्रसंग को लिखिए। [2013, 15]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की दानशीलता का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 17]
उत्तर
तृतीय सर्ग में दुर्योधन द्वारा वैष्णव-यज्ञ करने से लेकर, कर्ण द्वारा अर्जुन-वध की प्रतिज्ञा तथा कवच-कुण्डल दान करने तक का कथानक है। दुर्योधन ने चक्रवर्ती सम्राट् का पद ग्रहण करने के लिए वैष्णव-यज्ञ किया। कर्ण ने प्रतिज्ञा की कि मैं जब तक अर्जुन को नहीं मार दूंगा, तब तक कोई भी याचक मुझसे जो कुछ भी माँगेगा, मैं उसे वह दान में दे दूंगा, मांस-मदिरा का सेवन नहीं करूंगा, अपने चरण भी नहीं धुलवाऊँगा और न ही शान्ति से बैतूंगा। युधिष्ठिर को इस प्रतिज्ञा से चिन्ता हुई, जबकि दुर्योधन की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। कर्ण के पास जन्मजात कवच-कुण्डल थे, जिनके रहते उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था। अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे; अत: इन्द्र को अपने पुत्र के प्राणों की चिन्ता हुई। वह ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास गये और कवच-कुण्डल का दान (UPBoardSolutions.com) माँगा। सूर्य ने यद्यपि अपने पुत्र कर्ण को स्वप्न में इन्द्र की इस चाल के प्रति सावधान कर दिया था, तथापि दानवीर कर्ण ने उनसे साफ-साफ कह दिया –

ब्राह्मण माँगे दान, कर्ण ले निज हाथों को मोड़।

कोई भी याचक बनकर यदि मुझसे मेरे प्राण भी माँगे तो वह भी मेरे लिए अदेय नहीं। कर्ण ने इन्द्र की याचना पर जन्म से प्राप्त अपने दिव्य कवच-कुण्डल सहर्ष शरीर से काटकर दे दिये। ये ही कर्ण की जीवन-रक्षा के सुदृढ़ आधार थे।

प्रश्न 6
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के ‘श्रीकृष्ण और कर्ण’ नामक चतुर्थ सर्ग की कथा (कथावस्तु या कथानक) का सारांश लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 18]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथा लिखिए। [2018]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण और कर्ण के बीच हुए वार्तालाप का उद्धरण देते हुए चतुर्थ सर्ग की कथा का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [2011, 12, 17]
उत्तर
चतुर्थ सर्ग में श्रीकृष्ण द्वारा कौरव-पाण्डवों का समझौता कराने, समझौता न होने पर कर्ण को कौरव पक्ष से युद्ध न करने के लिए समझाने के असफल प्रयास का वर्णन है। श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से कौरवों की राजसभा में दूत के रूप में न्याय माँगने गये, किन्तु दुर्योधन ने बार-बार यही कहा कि युद्ध के अतिरिक्त अब और कोई रास्ता नहीं है। श्रीकृष्ण निराश होकर कर्ण को कुछ दूर तक रथ में अपने साथ लाते हैं और उसे (UPBoardSolutions.com) समझाते हैं कि तुम पाण्डवों के भाई हो; अत: अपने भाइयों के पक्ष का समर्थन करो। तुम धर्मप्रिय, बुद्धिमान् और धनुर्धर हो। तुम पापी और दुराचारी का साथ मत दो। तुम मेरे साथ पाण्डवों के पक्ष में चलो और सम्राट् का पद प्राप्त करो। |

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कर्ण की आँखों में वेदना के आँसू उमड़ आये। वह बोला कि मुझे आज तक घृणा, अनादर और अपमान ही मिला है। मैं कुन्ती का पुत्र हूँ।’ यह कहने के तो कुन्ती के पास कई अवसर आये

यों न उपेक्षित होता मैं, यों भाग्य न मेरा सोता।
स्नेहमयी जननी ने यदि रंचक भी चाहा होता॥
घृणा, अनादर, तिरस्क्रिया, यह मेरी करुण कहानी।
देखो, सुनो कृष्ण !क्या कहता इन आँखों का पानी।।।

कर्ण आगे कहता है कि आज अधिरथ मेरे पिता और राधा मेरी माँ हैं। इन्हें छोड़कर कैसे मैं कुन्ती को अपनी माँ के रूप में ग्रहण कर लूं? कैसे मैं मित्र दुर्योधन के प्रति कृतघ्न बनूं, जिसने मुझ पर अपूर्व उपकार किया है? तुम अर्जुन को महावीर, अदम्य और अजेय कहते हो, लेकिन अर्जुन की वीरता तुम्हारे ही बल से है, अन्यथा वह कुछ भी नहीं। मैं जानता हूँ, जिधर तुम हो, विजय उधर ही होगी। अर्जुन से जाकर कह देना कि अब तो मेरे पास कवच और कुण्डल भी नहीं हैं, किन्तु मेरा पुरुषार्थ और आत्मबल ही मुझे यह बलिदान देने के लिए प्रेरित कर रहा है। आप यह बात कभी युधिष्ठिर से मत कहिएगा कि मैं उनका बड़ा भाई हूँ, (UPBoardSolutions.com) अन्यथा वे यह राज-पाट छोड़ देंगे और दुर्योधन का कृतज्ञ होने के कारण मैं सब कुछ उसके चरणों पर धर, दूंगा।

बहुत दिनों से मुझे एक आत्मग्लानि रही है कि द्रौपदी भरी सभा में अपमानित हुई थी और मैंने ही वह दुष्कर्म कराया था। अतः इस शरीर को त्यागकर अपने इस दुष्कर्म का प्रायश्चित्त करूगा।

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प्रश्न 7
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के माँ-बेटा’ नामक पञ्चम सर्ग की कथा का सारांश अथवा कथानक लिखिए। [2010, 12, 15, 18]
या
‘कर्ण खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण तथा कुन्ती के वार्तालाप का वर्णन कीजिए। [2013]
उत्तर
पञ्चम सर्ग में कुन्ती द्वारा कर्ण के पास जाने का वर्णन है। महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने में पाँच दिन शेष हैं। पाण्डवों के लिए चिन्तित कुन्ती बहुत सोच-विचारकर कर्ण के आश्रम पहुँचती है। कुन्ती के कुछ कहने से पहले ही कर्ण ने उसे अपने जीवनभर की पीड़ा को साकार करते हुए ‘सूत-पुत्र राधेय कहकर प्रणाम किया। कुन्ती की आँखों में आँसू आ गये। उसने कहा कि तुम कुन्ती-पुत्र और पाण्डवों के बड़े भाई हो। आज अपने भाइयों में मिलकर दुर्योधन का कपटजाल तोड़ दो। कर्ण ने अपने हृदय की ज्वाला माँ के सम्मुख स्पष्ट कर दी

क्यों तुमने उस दिन न कही, सबके सम्मुख ललकार।
कर्ण नहीं है सूत-पुत्र, वह भी है राजकुमार॥

स्वयं कुन्ती के सम्मुख राजभवन में अपमान, स्वयंवर-सभा में अपमान तथा सर्वत्र सूत-पुत्र कहलाने की उसकी पीड़ा उभर आयी। वह बोला कि मेरे अपमानित और लांछित होते समय तुम्हारा पुत्र-प्रेम कहाँ गया था ? मैं अपने मित्र दुर्योधन का कृतज्ञ हूँ, मैं उसे धोखा नहीं दे सकता। कर्ण की वाणी सुनकर कुन्ती की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। वह मौन खेड़ी थी। कर्ण ने कहा कि यद्यपि भाग्य मेरे साथ बहुत खिलवाड़ कर रहा है फिर भी यह विडम्बना ही होगी कि एक माता अपने पुत्र के द्वार से खाली हाथ लौट जाए। उसने कहा कि मैंने केवल अर्जुन को ही मारने की प्रतिज्ञा की है। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि मैं (UPBoardSolutions.com) अर्जुन के अतिरिक्त किसी पाण्डव को नहीं मारूंगा। मेरे हाथों यदि अर्जुन मारा गया तो तुम अपनी इच्छानुसार उसको रिक्त स्थान मुझसे भर सकती हो और यदि मैं स्वयं मारा गया तो भी तुम पाँच पाण्डवों की माता तो रहोगी ही। इच्छित वरदान पाकर कुन्ती लौट गयी, परन्तु वह कर्ण के मन में विचारों का तूफान उठा गयी।

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प्रश्न 8
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के ‘कर्ण-वध’ नामक षष्ठ सर्ग की कथा को संक्षेप में लिखिए। [2011, 14, 15]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य की सबसे प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए। [2010, 12]
या
“कर्ण अपने प्रण व धुन का पक्का
था
” खण्डकाव्य के आधार पर इसकी पृष्टि कीजिए। [2014]
उत्तर
इस सर्ग में महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से लेकर कर्ण के मृत्यु तक की कथा का वर्णन है। पाँच दिन बाद महाभारत का युद्ध आरम्भ हुआ। भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति बनाये गये। वे इस शर्त पर सेनापति बने कि वे कर्ण का सहयोग नहीं लेंगे; क्योंकि वह कपटी, अत्याचारी, अधिरथी तथा अभिमानी है। कर्ण ने उनका प्रण सुनकर प्रतिज्ञा की कि वह भीष्म पितामह के जीवित रहते शस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे अन्यथा सूर्य-पुत्र नहीं कहलाएँगे। भीष्म प्रतिदिन अकेले दस सहस्र वीरों को मारते थे, किन्तु दसवें दिन बाणों से घायल होकर वे शरशय्या पर गिर पड़े। कर्ण के भीष्म पितामह के पास पहुँचने पर (UPBoardSolutions.com) उन्होंने कर्ण को भर आँख निहारने की इच्छा प्रकट की, उसे जल के भंवर में नाव खेने वाला कहा तथा उसे दानवीर, धर्मवीर और महावीर बतलाया

घूण्र्य काल-जल में बस तू ही नौका खेने वाला।
दानवीर तू, धर्मवीर तू, तू सम्बल आरत का।
जो न कभी बुझ सकता, वह दीप महाभारत का।

भीष्म पितामह ने कहा कि मैंने तेरा सूत-पुत्र कह कर तिरस्कार किया, केवल इसलिए कि तुम किसी भी तरह इस युद्ध से विरत हो जाओ और दुर्योधन अपने इस युद्धरूपी काण्ड में सफल न हो सके। उन्होंने पुनः कहा कि तुम यह सन्देह छोड़ दो कि तुम सूत-पुत्र हो। तुम भी अर्जुन आदि की तरह कुन्ती के ही पुत्र हो। हमारी इच्छा यही है कि तुम पाण्डवों से मिल जाओ। कर्ण ने अपने को प्रतिज्ञाबद्ध बताते हुए ऐसा करने से मना कर दिया। उसने पितामह से कहा कि विधि के लिखे हुए को कौन बदल सकता है? मुझसे भी मेरा। मन यही कहता है कि मैं अपनी मृत्यु की कहानी स्वयं लिख रहा हूँ। किन्तु यह भी सत्य है पितामह कि मैं अपना साहस नहीं छोडूंगा। भले ही उस ओर कृष्ण हों, किन्तु अर्जुन को मारने हेतु मैं हर प्रयास करूंगा। यह सुनकर पितामह ने कर्ण की जय-जयकार की और उसके मार्ग के समस्त अमंगलों को दूर होने की कामना की। उसे अपने शस्त्रास्त्र उठाकर दुर्योधन का स्वप्न पूर्ण करने के लिए कहा।

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भीष्म के बाद द्रोणाचार्य को सेनापति नियुक्त किया गया। पन्द्रहवें दिन वे भी वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के सोलहवें दिन कर्ण कौरव दल के सेनापति बने। उनकी भयंकर बाण-वर्षा से पाण्डव विचलित होने लगे, तभी भीम का पुत्र घटोत्कच भयंकर मायापूर्ण आकाश युद्ध करता हुआ कौरव सेना फ्र टूट पड़ा। घटोत्कच के भीषण प्रहार से कौरव सेना में त्राहि-त्राहि मच गयी। उन्होंने रक्षा के लिए कर्ण को पुकारा। कर्ण ने अमोघ-शक्ति का प्रहार कर घटोत्कच को मार डाला। इस अमोघ-शक्ति का प्रयोग वह केवल अर्जुन पर करना चाहता था, किन्तु परिस्थितिवश उसे उसका प्रयोग घटोत्कच पर करना पड़ गया। वह सोचने लगा, यह सब कुछ कृष्ण को माया है, अब अर्जुन की विजय निश्चित है। थोड़ा-सा दिन शेष था। अचानक कर्ण के रथ का पहिया पृथ्वी में धंस गया। सारथी प्रयास करने पर भी रथ का पहिया न निकाल सका, तब कर्ण रथ से उतरकर स्वयं पहिया निकालने लगा। तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रहार करने के लिए आदेश दिया; क्योंकि युद्ध में धर्म-अधर्म का विचार किये बिना (UPBoardSolutions.com) शत्रु को परास्त करना चाहिए। आदेश पाते ही अर्जुन ने नि:शस्त्र कर्ण का बाण-प्रहार से वध कर दिया। कर्ण की मृत्यु पर श्रीकृष्ण भी अश्रुपूर्ण नेत्रों से रथ से उतर ‘कर्ण! हाय वसुसेन वीर’ कहकर दौड़ पड़े।

प्रश्न 9
‘कर्ण खण्डकाव्य के जलांजलि’ नामक सप्तम सर्ग की कथा का सार लिखिए। [2009, 14]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के सम्बन्ध में युधिष्ठिर और कुन्ती के मध्य हुए वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए। [2010]
या
ऐसा कीर्तिवान भाई पा होता कौन न धन्य ।
किन्तु आज इस पृथ्वी पर, हतभाग्य न मुझ-सा अन्य ।।
उक्त पंक्तियों में व्यक्त वेदना का भाव पठित खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए। [2009, 10]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर सप्तम सर्ग का मार्मिक चित्रांकन कीजिए। [2011]
उत्तर
सप्तम सर्ग में युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर द्वारा कर्ण को जलांजलि देने की कथा का वर्णन है। कर्ण के वीरगति प्राप्त करते ही कौरव सेना का मानो प्रदीप बुझ गया। वे शक्तिहीन हो गये। सेना , अस्त-व्यस्त हो गयी। कर्ण के बाद शल्य सेनापति बने परन्तु वे भी युधिष्ठिर द्वारा मारे गये। अन्त में गदा युद्ध में भीम द्वारा दुर्योधन भी मारा गया। युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों का जलदान किया, तभी कुन्ती की ममता उमड़ पड़ी और उसने युधिष्ठिर से कर्ण को सबसे बड़े भाई के रूप में जलदान करने का आग्रह किया। युधिष्ठिर उसके इस आग्रह पर चकित रह गये।

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युधिष्ठिर के द्वारा पूछने पर कुन्ती ने कर्ण के जन्म और उसको नदी में बहाये जाने का रहस्य प्रकट कर दिया। यह भी बताया कि वह कर्ण से मिलकर यह रहस्य उस पर स्पष्ट कर चुकी है। यह जानकर कि कर्ण उनके बड़े भाई थे, युधिष्ठिर को मन भर आया और वे बोले कि “माँ! वे हमारे अग्रज थे। कर्ण जैसे महामहिम, दानवीर, दृढ़प्रतिज्ञ, दृढ़-चरित्र, समर-धीर, अद्वितीय तेजयुक्त भाई को पाकर कौन धन्य नहीं होता। किन्तु (UPBoardSolutions.com) आज हमारे जैसा हतभाग्य और कौन है? उन्होंने कठोर शब्दों में कुन्ती को इस बात के लिए दोषी । ठहराया और कहा कि तुम्हारे द्वारा इस रहस्य को छिपाने के कारण ही वे जीवन भर अपमान का घूट पीते रहे। उन्होंने बड़े आदर से कर्ण का स्मरण करते हुए जलदान किया और अपने मन की पीड़ा इस प्रकार व्यक्त की–

मानव को मानव न मिला, धरती को धृति धीर।
भूलेगा इतिहास भला, कैसे यह गहरी पी॥

युधिष्ठिर के हृदय की इस करुण व्यंजना के साथ ही खण्डकाव्य समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 10
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र उदघाटित कीजिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और बताइए कि उन्हें जीवनभर अपने किस कृत्य के प्रति ग्लानि रही ? [2014]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की वीरता पर सोदाहरण प्रकाश डालिए। [2015]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की तीन या चार चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की दानशीलता पर प्रकाश डालते हुए उसके अन्य गुणों पर प्रकाश डालिए।
या
कर्ण सच्चे दानवीर, युद्धवीर तथा प्राणवीर थे।” इस कथन की पुष्टि कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कीजिए। [2011]
उत्तर
श्री केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ नामक खण्डकाव्य का नायक महाभारत का अजेय योद्धा कर्ण है। इस काव्य में कर्ण के जन्म से लेकर मृत्यु तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन है। कर्ण की वीरता और उसके जीवन के करुण पक्ष का वर्णन करना ही कवि का लक्ष्य है। उसके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(1) जन्म से परित्यक्त–अविवाहित कुन्ती ने सूर्य की उपासना के फलस्वरूप सूर्य के तेजस्वी अंश को पुत्र-रूप में प्राप्त किया था। कुन्ती द्वारा त्याग दिये जाने के कारण वह माता के स्नेह से तो वंचित न रहा किन्तु सूत-पुत्र कहलाये जाने के कारण (UPBoardSolutions.com) आजीवन लांछित होता रहा। यह जानकर कि वह कुन्ती–पुत्र है, जिसको उसने लोक-समाज के लिए हृदय पर पत्थर रखकर त्याग दिया था, उसकी व्यथा और भी बढ़ गयी।

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(2) पग-पग पर अपमानित–वीर कर्ण समाज में सूत-पुत्र के रूप में जाना गया। राजभवन में राजकुमार अर्जुन ने उसे राधेय, सूत-पुत्र कहकर अपमानित किया तथा स्वयंवर-सभा में द्रौपदी ने मत्स्यवेध करने से रोककर उसको अपमानित किया। माता कुन्ती उसका इस प्रकार अपमान होते देखकर भी उसे अपना न सकी। ऐसे अपमानों से उसका हृदय प्रतिशोध की अग्नि से जल उठा। वह श्रीकृष्ण से अपने हृदय की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहता है–

घृणा, अनादर, तिरस्क्रिया, यह मेरी करुण कहानी।
देखो, सुनो कृष्ण क्या कहता, इन आँखों का पानी॥

(3) अद्वितीय तेजवान्–कर्ण सूर्य-पुत्र है; अतः स्वभावत: तेजस्वी है। उसका कमलमुख राजकुमारों की शोभा को हरण करने वाला है। युधिष्ठिर जलांजलि सर्ग में कहते हैं

अद्वितीय था तेज, और अनुपम था उनका ओज।।
हाय कहाँ मैं पाऊँ उनका पावन चरण-सरोज।

कुन्ती उसके तेजस्वी व्यक्तित्व को देखकर विस्मित और गद्गद हो गयी थी। वह अपने पुत्र की शोभा देखती ही रह जाती है। कवि ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है

एक सूर्य था उगा गगन में ज्योतिर्मय छविमान।
और दूसरा खड़ा सामने पहले का उपमान।।

(4) स्नेह और ममता का भूखा–कर्ण जीवनभर अपनी माता, भाई और गुरुजनों (UPBoardSolutions.com) का स्नेह न पा सका। उनसे उसे केवल लांछन और तिरस्कार हीं मिला। उसका हृदय सदा माँ की ममता पाने को तरसता रहा। वह कुन्ती से कहता है

यों न उपेक्षित होता मैं, यों भाग्य न मेरा सोता।
स्नेहमयी जननी ने यदि रंचक भी चाहा होता॥

(5) अद्वितीय दानी-कर्ण अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। उसने प्रण किया था कि जब तक वह अर्जुन का वध नहीं कर लेगा, तब तक जो भी याचक उससे जो कुछ माँगेगा, वह उसे देगा। उसके पिता सूर्य ने समझाया कि कपटी इन्द्र को अपने कवच-कुण्डल देकर अपनी शक्ति क्षीण न करो, परन्तु उसने सहर्ष इन्द्र को अपने कवच-कुण्डल पकड़ा दिये। वह कहता है कि धरती भले ही काँप उठे, आकाश फटने लगे; किन्तु कर्ण अपनी दानशीलता से कभी पीछे नहीं हट सकता

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चाहे पलट जाय पलभर में महाकाल की धारा।
वीर कर्ण का किन्तु न झूठा हो सकता प्रण प्यारा॥

कवच-कुण्डल देकर उसने स्वयं अपनी मृत्यु बुला ली, परन्तु अपनी दानशीलता नहीं छोड़ी।।

(6) दृढ़प्रतिज्ञ-कर्ण ने जो भी प्रण किया, उसे पूरा किया। अर्जुन का वध होने तक उसने दान का व्रत लिया था, जिसे उसने अपने कवच-कुण्डल देकर भी पूर्ण किया। कुन्ती को चारों भाइयों की रक्षा का वचन दिया था, उसे भी उसने युद्ध के समय में निभाया

किन्तु न अपना प्रण भूले थे, वीर कर्ण पलभर भी।
भीम नकुल का धर्मराज का, किया नवध पाकर भी॥

(7) आत्मविश्वासी-कर्ण को अपने शौर्य और पराक्रम पर अविचल आत्मविश्वास है। वह कृष्ण से, कुन्ती से और भीष्म से बातें करते हुए आत्मविश्वासपूर्वक अर्जुन का वध करने को कहता है। उसने कृष्ण । को स्पष्ट कह दिया था कि भले ही अब उसके पास कवच-कुण्डल नहीं हैं, किन्तु आत्मबल और आत्मविश्वास अब भी है।

(8) अजेय योद्धा-कर्ण महान् पराक्रमी और अजेय योद्धा था। उसके रण-कौशल से सभी परिचित थे। अर्जुन के वध की उसकी प्रतिज्ञा सुनकर दुर्योधन को प्रसन्नता और पाण्डवों को भय उत्पन्न हुआ था। इन्द्र भी कर्ण के पराक्रम के कारण उसके द्वारा अर्जुन के वध की प्रतिज्ञा से चिन्तित थे। कृष्ण भी कर्ण की युद्ध-कुशलता से परिचित थे; अत: अर्जुन को नि:शस्त्र कर्ण पर धर्म-विरुद्ध प्रहार करने का आदेश देते हैं। कर्ण के पराक्रम तथा शौर्य की प्रशंसा शर-शय्या पर भीष्म पितामह भी करते हैं।

(9) प्रतिशोध की भावना से दग्ध-स्वाभिमानी और वीर कर्ण को कदम-कदम पर अपमान और तिरस्कार सहना पड़ा। उसने प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर द्रौपदी को निर्वस्त्र करने के लिए दुःशासन को उकसाया। राजभवन में हुए अपमान के कारण ही उसने अर्जुन का वध करने का निश्चय किया। पाण्डवों का भाई होने पर भी प्रतिशोध की भावना ने ही उसकी स्नेह-भावना को नहीं जगने दिया।

(10) विवेकी और कृतज्ञ-कृष्ण ने कर्ण को पाण्डवों का पक्ष लेने के लिए बहुत (UPBoardSolutions.com) समझाया, किन्तु उसने उपकारी मित्र दुर्योधन से छल करना उचित नहीं समझा। वह दुर्योधन के उपकार को न भूलकर आजीवन उसके साथ रहता है। वह कृष्ण से कहता है-

मैं कृतज्ञ हूँ दुर्योधन का, उपकारों से हारा।
राजपाट उसके चरणों पर, चुप धर दूंगा सारा॥

(11) पश्चात्ताप से युक्त–कर्ण को द्रौपदी का भरी सभा में कराया गया अपमान सदैव कष्ट देता रहा। वह कृष्ण से कहता है-

धिक् कृतज्ञता को जिसने, ऐसा दुष्कर्म कराया।
प्रायश्चित्त करूंगा केशव, छोड़ नीच यह काया॥

(12) करुणामय जीवन-कर्ण का सम्पूर्ण जीवन करुणा से पूर्ण था। जन्म होते ही उसे माता ने त्याग दिया। राजभवन में सूत-पुत्र होने के कारण उसे अपमानित होना पड़ा। द्रौपदी के द्वारा किये गये अपमान का घूटे पीना पड़ा। जीवनभर माता, भाई और गुरुजनों के स्नेह से वंचित रहना पड़ा। सगे भाइयों के विरुद्ध हथियार उठाने पड़े। अजेय-योद्धा होते हुए भी वह अन्यायपूर्वक मारा गया। इस प्रकार पूरे काव्य में वीर कर्ण के जीवन का करुण पक्ष ही उभारा गया है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि कर्ण महाभारत के वीरों का सिरमौर है, फिर भी उसे नियतिवश : अपमान, तिरस्कार और छल-प्रपंच का शिकार होना पड़ा। इस प्रकार कर्ण के जीवन का करुण पक्ष अत्यधिक मार्मिक है।

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प्रश्न 11
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर भीष्म पितामह का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10]
उतर
भीष्म पाण्डव और कौरवों के पूज्य एवं परमादरणीय पितामह थे। कौरव और पाण्डव दोनों ही उन्हें श्रद्धा से पितामह कहते थे। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) वीर शिरोमणि-भीष्म पितामह बड़े वीर और पराक्रमी योद्धा थे। महाभारत के युद्ध में उन्होंने प्रतिदिन दस हजार सैनिकों को मारने की शपथ ली थी। कौरव तथा पाण्डव दोनों ही उनकी वीरता के सम्मुख नतमस्तक थे।

(2) परम नीतिज्ञ-भीष्म पितामह कर्त्तव्यपरायण होने के साथ-साथ बड़े नीतिज्ञ भी थे। वे पूर्ण मन से कौरवों का साथ नहीं दे पा रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि कौरव अनीति के मार्ग पर चल रहे हैं। वे नहीं चाहते थे कि युद्ध में जीत कौरवों की हो। कर्ण को वे नीच, अर्धरथी और अभिमानी इसीलिए कहते हैं जिससे कर्ण का तेज कम हो जाये, क्योंकि वे उसकी युद्ध-कुशलता और दुर्योधन के प्रति पूर्ण निष्ठा को भली-भाँति जानते थे। उनकी इस नीति का प्रभाव भी हुआ; क्योंकि कर्ण ने यह प्रतिज्ञा की कि पितामह के जीते जी वह युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएगा।

(3) न्याय एवं धर्म के समर्थक-भीष्म पितामह परिस्थितियोंवश ही कौरवों की (UPBoardSolutions.com) ओर से युद्ध करते हैं। वे नहीं चाहते कि युद्ध में दुर्योधन की विजय हो। वे पाण्डवों से अति प्रसन्न हैं; क्योंकि पाण्डव सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं। वे अनीति तथा अन्याय से घृणा करते हैं।

(4) शौर्य तथा पराक्रम के प्रेमी-शर-शय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह कर्ण के शौर्य और वीरता । की बड़ी प्रशंसा करते हैं तथा कर्ण के प्रति कहे गये अपमानजनक शब्दों पर पश्चात्ताप करते हैं। वे वीर और पराक्रमी योद्धा का बड़ा ही सम्मान करते हैं। कर्ण की प्रशंसा वे इन शब्दों में करते हैं-

तेरे लिए फूल आदर के, खिलते मेरे मन में।
देखा तुझ सा महावीर, मैंने न कभी जीवन में।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भीष्म पितामह का चरित्र एक वीर, पराक्रमी और न्यायवादी धर्म-प्रिय योद्धा को चरित्र है।

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प्रश्न 12
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2015]
उत्तर
श्रीकृष्ण ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के एक उदात्त-चरित्र महापुरुष हैं। वे एक अवतारी पुरुष और भगवान् के रूप में माने जाते हैं। अपने अलौकिक चरित्र से उन्होंने भारतीय जन-मानस को चमत्कृत किया है। तथा अपने महान् एवं अनुकरणीय चरित्र से लोगों को अत्यन्त प्रभावित भी किया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कूटनीतिज्ञ—कर्ण खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं में श्रीकृष्ण का विशेष हाथ है। वे पाण्डवों के परम हितैषी हैं। कृष्ण हर पल उनका ध्यान रखते हैं तथा समय-समय पर उन्हें सचेत भी करते हैं। शत्रु को नीचा दिखाना, साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति द्वारा किसी भी प्रकार से उसे वश में करना वे भली प्रकार जानते हैं। कर्ण की शक्ति को जानकर ही वे जहाँ उसे साम नीति द्वारा पाण्डवों के पक्ष में करने का प्रयास करते हैं, वहीं दुर्योधन के (UPBoardSolutions.com) अवगुणों को बताने में भेद-नीति अपनाते हैं। वे कर्ण से कहते हैं-

दुर्योधन का साथ न दो, वह रणोन्मत्त पागल है।
द्वेष, दम्भ से भरा हुआ, अति कुटिल और चंचल है॥

दाम नीति का प्रयोग करते हुए वे कर्ण को प्रलोभन देते हैं

चलो तुम्हें सम्राट बनाऊँ, अखिल विश्व का क्षण में।

कर्ण जब उनकी सभी बातों को ठुकरा देता है तो कृष्ण उसे अहंकारी भी बतलाते हैं। निश्चित ही वे सभी प्रकार की नीतियों में निष्णात हैं।

(2) परिस्थितियों के मर्मज्ञ-श्रीकृष्ण तो भगवान हैं। वे त्रिकालदर्शी हैं, भविष्यद्रष्टा हैं तथा परिस्थितियों को भली प्रकार समझने में सक्षम हैं। वे भली-भाँति जानते हैं कि धर्मयुद्ध में कर्ण को कोई मार नहीं सकता। तभी तो वे समय आने पर अर्जुन को कर्ण का वध करने का संकेत देते हैं। वे कहते हैं-

बाण चला दो, चूक गये तो लुटी सुकीर्ति सँजोयी।

(3) पाण्डवों के रक्षक-श्रीकृष्ण पाण्डवों के परम हितैषी हैं। वे हर परिस्थिति में पाण्डवों की रक्षा करते हैं, क्योंकि पाण्डव सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं, जिसकी स्थापना करने के लिए ही पृथ्वी पर उनका अवतार हुआ है। युद्ध में वे अर्जुन की रक्षा के लिए ही घटोत्कच को बुलवाते हैं और कर्ण के हाथ से उसका वध करवाकर अर्जुन का जीवन सुरक्षित करते हैं। |

(4) पराक्रम-प्रेमी–कृष्ण पराक्रमी एवं शूरवीर पुरुषों की निष्पक्ष होकर प्रशंसा करते हैं। वे कर्ण को एक अपराजेय योद्धा समझते हैं तथा उसके शौर्य की प्रशंसा करते हुए कहते हैं-

धर्मप्रिय, धृति-धर्म धुरी को तुम धारण करते हो।
वीर, धनुर्धर धर्मभाव तुम भू-भर में भरते हो।

(5) मायावी-कृष्ण की माया से महाभारत के सभी योद्धा परिचित हैं। वे महाभारत युद्ध में केवल अर्जुन के रथ के सारथी ही बने हैं और उन्होंने अस्त्र-शस्त्र न उठाने कीप्रतिज्ञा भी की है, किन्तु फिर भी सभी वीर योद्धा उनसे भयभीत रहते हैं। जिन बातों को बड़े-बड़े वीर प्रयत्न करके भी नहीं जान पाते, उन बातों को कृष्ण सहज रूप में ही जान लेते हैं। कर्ण भी कहता है कि कृष्ण की माया अर्जुन को तो छाया की तरह घेरे रहती है–

घेरे रहती है अर्जुन को छाया सदा तुम्हारी।।

इस प्रकार से कृष्ण का चरित्र अलौकिक, दिव्य तथा अन्यान्य सद्गुणों से युक्त है।

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प्रश्न 13
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख नारी पात्र ‘कुन्ती’ का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 13, 15]
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2009]
उत्तर
कविवर केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की कुन्ती प्रमुख स्त्री-पात्र है। वह महाराज पाण्डु की पत्नी तथा पाण्डवों की माता है। खण्डकाव्य से उसके चरित्र की अधोलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं

(1) अभिशप्त माता-खण्डकाव्य के प्रारम्भ में ही कुन्ती एक कुंवारी माँ की शापित स्थिति में सम्मुख आती है, जो सामाजिक निन्दा और भय से व्याकुल है। अपने नवजात पुत्र के प्रति उसके हृदय में ममता को अजस्र स्रोत फूट रहा है, किन्तु वह लोक-लाज के भय से विवश होकर अपने पुत्र को गंगा नदी की धारा में बहा देती है।

(2) एक दुःखिया माँ–खण्डकाव्य में कुन्ती को एक दु:खी माँ के रूप में दर्शाया गया है। उसके पुत्र पाण्डवों को उनका राज्यांश नहीं मिल रहा है तथा विवश होकर उनको कौरवों से युद्ध करना पड़ा रहा। है। कुन्ती इससे भयभीत तथा दु:खी है। वह कर्ण के पास जाती है और (UPBoardSolutions.com) उस पर उसकी माँ होने का पूरा राज खोल देती है। कर्ण उसे ताना मारता है, दुर्योधन का साथ न छोड़ने को कहता है तथा अर्जुन का वध करने की अपनी प्रतिज्ञा को भी दोहराता है। अन्ततः उदास तथा दु:खी होकर कुन्ती वापस लौट आती है।

(3) चिन्तित माँ-कौरव और पाण्डवों में युद्ध होने वाला है। कर्ण अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका है। कुन्ती इस चिन्ता में अति व्याकुल है कि युद्ध-भूमि में उसके पुत्र ही एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ेंगे और मृत्यु को प्राप्त होंगे।

(4) ममतामयी माँ-‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कुन्ती के मातृत्व की बहुपक्षीय झाँकी देखने को मिलती है। वह एक कुँवारी माँ है, जो अपनी ममता का गला स्वयं ही घोटती है। महाभारत के युद्ध में जब वह देखती है कि भाई-भाई ही एक-दूसरे को मारने हेतु तत्पर हैं, तब वह अपने पुत्र पाण्डवों की रक्षा के लिए कर्ण के पास जाती है और उससे तिरस्कृत भी होती है। फिर भी कर्ण के प्रति उसको वात्सल्य भाव रोके नहीं रुकता। वह कर्ण से कहती है

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माँ कहकर झंकृत कर दो मेरे प्राणों का तार ।।

जलदान के अवसर पर वह युधिष्ठिर से कर्ण का जलदान करने के लिए आग्रह करती है। | निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कुन्ती परिस्थितियों की मारी एक सच्ची माँ है, जो अपनी ममता को गहरा दफनाकर भी दफना नहीं पाती। उसको मातृरूप कई रूपों में हमारे सामने (UPBoardSolutions.com) आता है, जो भारतीय नारी की सामाजिक और पारिवारिक विवशताओं को मार्मिक अभिन्यक्ति प्रदान करता है।

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