Class 9 Sanskrit Chapter 12 UP Board Solutions प्राचीना भारतीयशिक्षाव्यवस्था Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 12
Chapter Name प्राचीना भारतीयशिक्षाव्यवस्था (गद्य – भारती)
Number of Questions Solved 4
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 12 Prachin Bhartiya Shiksha Pranali Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 12 हिंदी अनुवाद प्राचीना भारतीयशिक्षाव्यवस्था के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ-सारांश

शिक्षा के स्वरूप—मनुष्य के वचन, शरीर और मन का जिससे संस्कार होता है, जिससे वह अपने अन्दर के पशुत्व को नियन्त्रित करता है और जिससे स्वयं में दया, उदारता आदि गुणों को धारण करता है, उसे शिक्षा कहते हैं। शिशु माता-पिता के पास रहकर ही बहुत शिक्षा प्राप्त करता है। वह माता की गोद में बैठे हुए; परिवार के सदस्यों के आचरण का सूक्ष्म निरीक्षण करके; उसका अनुकरण करता। है। यह उसकी अनौपचारिक शिक्षा है। इसीलिए माता-पिता बालक के आरम्भिक गुरु होते हैं। इसके बाद उसकी औपचारिक शिक्षा (UPBoardSolutions.com) आरम्भ होती है, जिसे वह घर के बाहर गुरु के पास रहकर प्राप्त करता है। यहाँ वह गुरु के आदेशों का पालन करता हुआ कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान प्राप्त करता है। यही उसका व्यावहारिक ज्ञान भी है। जिस देश की जैसी संस्कृति होती है उसके अनुरूप ही वहाँ की । शिक्षा-व्यवस्था भी होती है।

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शिक्षा एवं संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव-भारत की संस्कृति संसार की समस्त संस्कृतियों से श्रेष्ठ एवं प्राचीन है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। विदेशियों के आक्रमणों ने इसे अत्यधिक प्रभावित किया है। यही कारण है कि आज भारतीय जीवन-शैली पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है। इसका कारण हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली है, जो शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का स्पर्श भी नहीं करती। इस कारण ही न तो बालक के व्यक्तित्व का विकास हो पाता है और न आत्मा का।।

प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था प्राचीनकाल में भारत में गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी। छात्र ब्रह्मचर्यपूर्वक, यज्ञोपवीत और मेखला धारण करके स्वयं गुरु के पास जाकर विद्या अध्ययन करते थे। गुरु गार्हस्थ्य जीवन समाप्त करके जंगलों में रहकर छात्रों को शिक्षा प्रदान करते थे। छात्र की योग्यता की (UPBoardSolutions.com) परीक्षा लेकर ही गुरु उसकी योग्यतानुसार उसे गुरुकुल में प्रवेश देते थे। गुरुकुल में रहकर छात्र गुरुकुल के नियमों का पालन करते हुए विद्याध्ययन करते थे। वहाँ उसे समिधा लाना, गायें चराना, खेती करना आदि गुरु के काम भी करने होते थे। गुरु अपने शिष्यों को पुत्र के समान प्रेम करते थे। वहीं छात्र, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, त्याग, ध्यान, धारणा और समाधि का भी अभ्यास कर शिक्षा समाप्त करके और गुरु को दक्षिणा देकर वे गृहस्थाश्रम धर्म का पालन करते थे। | गुरु और शिष्य का सम्बन्ध-गुरुकुल में गुरु के समीप रहकर शिष्य अपने चरित्र का विकास करते थे। ज्ञानार्जन के साथ ही वह दया, उदारता, स्वावलम्बन आदि सद्गुणों की शिक्षा भी प्राप्त करते थे। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध स्नेहपूर्ण हुआ करता था। शिष्य गुरु के चरणों में प्रणाम करते थे, भक्ति से उनकी सेवा करते थे, विषयों से सम्बन्धित प्रश्न नि:संकोच पूछा करते थे। गुरु तत्त्वदर्शी, ज्ञानी, अध्यापन में रुचि रखने वाले होते थे।

चार सोपान-प्राचीन भारत में युवक ज्ञान के लिए विद्या अध्ययन करते थे। ज्ञान के बोध के अनुसार ही वे आचरण करते थे और आचारवान् होकर ही वे विद्या का प्रचार करते थे। उस समय शिक्षा की चार कोटियाँ अथवा सोपान विद्यमान थे—
(1) अध्ययन,
(2) बोध,
(3) आचरण और
(4) प्रचार।।

विनय-सम्पन्नता
अध्ययन का फल विनय की सम्पन्नता है। पहले विद्या और विनय से सम्पन्न युवक ही समाज में आदर पाता था। विद्या प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी अविनयी होने पर

अध्ययन में त्रुटि समझी जाती थी। पिता भी, विद्या पुढ़कर लौटे हुए पुत्र की विद्वत्ता’ को विनय.के • आधार पर ही आँकता था। विद्या और विद्वत्ता की कसौटी विनय ही थी। अविनय से अध्ययन की

अपूर्णता ज्ञात होती थी। छान्दोग्य उपनिषद् के एक प्रसंग में बताया गया है कि गुरु के आश्रम से लौटे हुए अपने पुत्र के अहंकार को देखकर पिता ने उसकी विद्या-प्राप्ति में सन्देह किया था। कुछ प्रश्न पूछने पर उसे उसकी विद्या की अपूर्णता ही ज्ञात हुई थी।

स्त्री-शिक्षा-गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति में युवकों की तरह युवतियाँ भी शिक्षा पाती थीं। गार्गी, वागाम्भृणी आदि विदुषी युवतियाँ इसकी उदाहरण हैं।

बौद्धयुगीन शिक्षा-प्रणाली–बौद्धयुग में गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली का ह्रास हो गया था। इस काल में विश्वविद्यालयों में शिक्षा दी जाती थी। वलभी, तक्षशिला, नालन्दा आदि विश्वविद्यालय उस समय शिक्षा के प्रधान केन्द्र थे। इन विश्वविद्यालयों में देश-विदेश के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। इनमें (UPBoardSolutions.com) पढ़ाने वाले अध्यापक अपने ज्ञान के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध थे। विश्वविद्यालयों में अत्यधिक समृद्ध पुस्तकालय भी होते थे। पढ़ने के इच्छुक छात्रों को योग्यता के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता था। चीनी यात्री ह्वेनसाँग ने उन विश्वविद्यालयों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

उपसंहार–हमारे राष्ट्र के नेताओं का कर्तव्य है कि राष्ट्र की उन्नति के लिए वे पुरातन और नवीन शिक्षा-प्रणालियों का समन्वय करके शिक्षा योजना तैयार करें। तभी देश में राष्ट्रीय पुरुष होंगे और देश उन्नति करेगा।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) मनुष्यस्य वाक्कायमेनसां सम्यक् संस्कारो यया भवति, यया च स जन्पना पशु-निर्विशेष सन्नपि स्वपशुत्वं नियमयति स्वस्मिन् दयादाक्षिण्यादिमानवधर्मान् आधत्ते सा शिक्षेत्यभिधीयते। जन्मकालान्मृत्युं यावत् मनुष्यस्यानुदिनं विकासो भवति। सेयं विकासपरम्परा एकानवरता प्रक्रिया भवति। शिशुः पित्रोराचार्याणाञ्च सन्निधौ स्वत एवानल्पं शिक्षते। मातुरुत्सङ्गे स्थितः शुिशुः कुटुम्बिजनानां दैनन्दिनमाचरणं सूक्ष्मेक्षिकया निरीक्षते तज्जनितकुतूहलेन तदनुकुरुते। सेयं मनुष्यस्य आदिमानौपचारिकी शिक्षा भवति। क्रमशः शिशुत्वमतिक्रम्य (UPBoardSolutions.com) स पित्रोः विधिनिषेधपरानादेशान् पालयन् कर्तव्याकर्त्तव्यज्ञानमर्जयति तद् द्वारा तस्य व्यवहारज्ञानं भवति। एवं पितरौ बालस्याद्यौ गुरू स्तः। मनुष्यमात्रस्यैवं शिक्षा गृहप्राङ्गणादेव प्रारभते। औपचारिकी शिक्षा तदनन्तरं गृहाद बहिर्गुरुसन्निधौ भवति। एतादृश्याः शिक्षाव्यवस्थायाः स्वरूपं प्रतिदेशं भिद्यते। यादृशी संस्कृतिः यस्य देशस्य भवति तदनुरूपा शिक्षाव्यवस्थापि तस्य देशस्य भवति।।

शब्दार्थ
सम्यक् = भली प्रकार से।
संस्कारः = शुद्धि।
पशु-निर्विशेषः = पशु के समान।
स्वपशुत्वं = अपनी पशुता को।
नियमयति = नियन्त्रित करता है।
दाक्षिण्य = चतुरता।
आधत्ते = धारण करता है।
शिक्षेत्यभिधीयते = शिक्षा कहलाती है।
यावत् = जब तक।
अनुदिनम् = प्रतिदिन।
अनवरता = निरन्तरता।
सन्निधौ = पास में।
अनल्पम् = बहुत।
उत्सङ्गे = गोद में।
दैनन्दिनम् = दैनिक।
सूक्ष्मेक्षिकया = सूक्ष्म दृष्टि से।
तदनुकुरुते = उसका अनुकरण करता है।
अर्जयति = अर्जित करता है।
पितरौ = माता-पिता।
बालस्याद्यौ = बच्चे के प्रारम्भिक।
प्रतिदेशम् = प्रत्येक देश में।
भिद्यते = अन्तर होता है।
तदनुरूपा = उसी के अनुसार।

सन्दर्थ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संगृहीत ‘प्राचीन भारतीयशिक्षाव्यवस्था’ शीर्षक पाठ से उधृत है।
[संकेत-इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में शिक्षा का औपचारिक और अनौपचारिक स्वरूप बताया गया है।

अनुवाद
मनुष्य की वाणी, मन और शरीर की शुद्धि जिससे भली प्रकार से होती है, जिससे जन्म से पशुओं से अभिन्न होते हुए भी (मनुष्य) अपनी पशुता को नियन्त्रित करता है, स्वयं में दया, उदारता आदि मनुष्य के गुणों को धारण करता है, वह ‘शिक्षा’ कही जाती हैं। जन्म के समय से मृत्यु तक मनुष्य का (UPBoardSolutions.com) नित-प्रति विकास होता है। यह विकासक्रम एक लगातार प्रक्रिया होती है। बच्चा माता-पिता और गुरुओं के पास में स्वयं ही बहुत कुछ सीखता है। माता की गोद में बैठा हुआ बच्चा परिवार वालों के दिनभर के आचरण को सूक्ष्म दृष्टि से देखता है और उससे उत्पन्न उत्सुकता से उसी

प्रभृतयस्ते गुरवो वानप्रस्थाश्रमिणः संन्यासिनो वा सन्तः अरण्येऽवसन्। अध्ययनाध्याप तत्त्वचिन्तनं च तेषां दिनचर्यासीत्। वैराग्यप्रभावात् कामक्रोधादिषरिपूणां सुतरामप्रभावोऽ भवत् तेषां मनस्सु। शुद्धचित्तास्ते तपस्विनो विद्यार्थिनां योग्यतां सम्यक् परीक्ष्य तेषामर्हताञ्च निर्धार्य तदनु तान् स्वान्तेवासिनः अकुर्वन्। अद्यत्वे यथा निर्धारितं शिक्षाशुल्कं दत्वा ये केऽपि जनाः शालासु प्रवेशं लभन्ते विहिताविहितोपायैश्च परीक्षां समुत्तीर्य विद्वत्पदवीधारिणो भवनि, तथा प्राचीनव्यवस्थायां सम्भावना नासीत्। अर्हतां कुमाराणामेव तदा विद्याध्ययनेऽधिकारोऽभवत्। श्रुतिरपि आदिशति

नापुत्राय दातव्यं नाशिष्याय दातव्यम्।
सम्यक् परीक्ष्य दातव्यं मासं षण्मासवत्सरम्॥

शब्दार्थ
पुरा = प्राचीन काल में।
परिसमाप्य = समाप्त करके।
अरण्येषु = वनों में।
बटवः = ब्रह्मचारी छात्र।
अन्तेवासिनः = पास में रहने वाले (शिष्य)।
कृतोपनयनाः (कृत + उपनयना:) = उपनयन संस्कार किये गये।
समेखलाः = करधनी पहने हुए।
सपलाशदण्डः = ढाक का दण्ड धारण किये हुए।
समित्पाणयः भूत्वा = हाथ में समिधा लेकर।
अन्तिकम् = पास।
जग्मुः = जाते थे।
सुतराम् = पूरी तरह से।
अर्हताम् = योग्यता को।
निर्धार्य = निर्धारित करके।
तदनु = उसके बाद।
विहिताविहितोपायैः = उचित और अनुचित उपायों से।
समुत्तीर्य = उत्तीर्ण करके।
नासीत् = नहीं थी।
अर्हताम् = योग्य को।
श्रुतिरपि = वेद भी।
नापुत्राय = अयोग्य पुत्र के लिए नहीं।
नाशिष्याय = अयोग्य शिष्य के लिए नहीं।
पाण्मासवत्सरम् = छः महीने अथवा साल भर।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में प्राचीनकाल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों के प्रवेश की व्यवस्था का वर्णन किया गया है। |

अनुवाद
वर्ण और आश्रमों को प्रधानता देने वाले भारतवर्ष में प्राचीनकाल में गुरुकुल की शिक्षा का प्रचलन था। गृहस्थ जीवन को समाप्त करके जो लोग वानप्रस्थी होकर वन में रहते थे, शिक्षा-प्राप्त करने के इच्छुक ब्रह्मचारी छात्र प्रायः उन्हीं के पास रहते थे और वहीं उनकी शिक्षा होती थी। उपनयन-संस्कार किये हुए (जनेऊ धारण किये हुए) बालक ब्रह्मचर्यव्रत रखकर मेखला (तगड़ी) पहने हुए, पलाश का दण्ड लिये हुए, हाथ में समिधा लेकर वेदों के अध्ययन के लिए गुरु के समीप जाते थे। इसके लिए वेद का यह आदेश है-“विशेष ज्ञान के लिए ब्रह्मचारी हाथ में समिधा लेकर वेदपाठी, ब्रह्म में निष्ठा रखने वाले गुरु के पास ही जाये।” द्रोण, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि वे गुरु हैं, जो वानप्रस्थ आश्रम वाले या संन्यासी होकर जंगल में रहते थे। अध्ययन, अध्यापन और तत्त्वों का चिन्तन करना उनकी (UPBoardSolutions.com) दिनचर्या थी। वैराग्य के प्रभाव से उनके मनों में काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं का अत्यधिक अभाव हो जाता था। निर्मल मन वाले वे तपस्वी विद्यार्थियों की योग्यता की अच्छी तरह से जाँच करके और उनकी योग्यता निश्चित करके उसके बाद उन्हें अपना अन्तेवासी (शिष्य) बनाते थे। आजकल जैसा कि निर्धारित शिक्षा-शुल्क (फीस) देकर जो कोई भी लोग विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं और उचित-अनुचित तरीकों से परीक्षा उत्तीर्ण करके विद्वान् की उपाधि धारण करने वाले हो जाते हैं, वैसी प्राचीन व्यवस्था में सम्भावना नहीं थी। योग्य बालकों का ही उस समय विद्या-अध्ययन में अधिकार होता था। वेद भी आदेश देते हैं अयोग्य पुत्र को (शिक्षा) नहीं देनी चाहिए, न ही अयोग्य शिष्य को (शिक्षा) देनी चाहिए। अच्छी तरह छ: महीने-सालभर जाँच करके ही (शिक्षा) देनी चाहिए।

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(4) गुरुकुलं प्रविश्य ब्रह्मचारिणो गुरुकुलस्य नियमान् सम्यक् यथावत्परिपालयन्तः विद्याध्ययनमकुर्वन्। सममेव समिदाहरणगोचारणकृषिकर्मादिगुर्वाश्रमविहितव्यापारेष्वपि तेषां सहभागित्वं कुटुम्बिवदभवत्। गुरवोऽपि तेषु स्वसुतनिर्विशेषं स्निह्यन्ति स्म। अध्ययनकाले एव यमनयिमासनप्राणायामप्रत्याहारध्यानधारणासमाधीनामभ्यसोऽप्यभवत्। शिक्षासमाप्तौ गुरुदक्षिणां दत्त्वा (UPBoardSolutions.com) स्नातकोपाधिभूषितास्ते प्रत्यावर्तनविधिमनुसृत्य गृहस्थाश्रमे प्रवेशमकुर्वन्। येषां शिष्याणां यावज्जीवनं शिक्षाप्राप्ती अभिरुचिरभवत् ते नैष्ठिकपदवीभाजः सन्तः गुरुकुलेष्वेवावसन्।

शब्दार्थ
प्रविश्य = प्रवेश पाकर।
सममेव = साथ ही।
समिदाहरण (समित् + आहरण) = लकड़ी लाना।
विहितव्यापारेष्वपि = निश्चित कार्यों में भी।
सहभागित्वम्= सहयोग।
स्वसुतनिर्विशेष = अपने पुत्र के समान।
प्रत्याहार = त्याग।
प्रत्यावर्तनविधिम् = शिक्षा प्राप्तकर गुरुकुल से विदा होने की विधि को।
अनुसृत्य = अनुसरण करके।
प्रवेशम् अकुर्वन् = प्रवेश करता था।
यावज्जीवनम् = जीवनपर्यन्त।
अभिरुचिरभवत् = लगन होती थी।
नैष्ठिकपदवीभाजः = नैष्ठिक ब्रह्मचारी की पदवी धारण करने वाले। |

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गुरुकुल में प्रवेश प्राप्त करने के बाद शिक्षा-प्राप्ति की विधि का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
गुरुकुल में प्रवेश पाकर ब्रह्मचारी गुरुकुल के नियमों को पूर्णतया अच्छी तरह पालन करते हुए विद्या-अध्ययन करते थे। साथ ही लकड़ी लाने, गायें चराने, खेती का काम आदि गुरु के आश्रम के योग्य कार्यों में उनका सहयोग परिवार के सदस्यों की तरह होता था। गुरु भी उन पर पुत्र के समान स्नेह करते थे। अध्ययन के समय में ही यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि आदि का अभ्यास हो (UPBoardSolutions.com) जाता था। शिक्षा समाप्त करने पर गुरु को दक्षिणा देकर स्नातक की उपाधि से विभूषित होकर दीक्षान्त विधि को अनुसरण करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। जिन शिष्यों की जीवनपर्यन्त शिक्षा-प्राप्त करने में रुचि होती थी, वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी के पद को ग्रहण करते हुए गुरुकुल में ही रहते थे।

(5) गुरुकुलवासकाले शिष्याः गुरुसन्निधौ स्वचरित्रस्य सर्वाङ्गीणम् विकासमकुर्वन्। ज्ञानार्जनेन सहैव स्वावलम्बनादीनां सदगुणानामात्मन्याधानमपि कृतवन्तः। गुरुशिष्ययोः सम्बन्धः स्नेहसिक्त आसीत् श्रीमद्भगवद्गीतायामुक्तमस्ति

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

शब्दार्थ
गुरुसन्निधौ = गुरु के पास में।
आत्मन्याधानम् = आत्मा में धारण करना।
प्रणिपातेन = प्रणिपात (प्रणाम) द्वारा।
प्ररिप्रश्नेन = प्रश्न (पूछने) की परिपाटी से।
उपदेक्ष्यन्ति = उपदेश देंगे।
तत्त्वदर्शिनः = तत्त्वद्रष्टा।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गुरु और शिष्य के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद

गुरुकुल में रहते समय शिष्य गुरु के पास अपने चरित्र का सर्वांगीण विकास करते. . थे। ज्ञान-प्राप्ति के साथ स्वावलम्बन आदि गुणों को भी आत्मा में धारणा करते थे। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध स्नेह से सिंचित (पूर्ण) होता था। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है| ज्ञानी और तत्त्वदर्शी गुरु प्रणाम करने से, सरलतापूर्वक प्रश्न पूछने से और सेवा करने से ही तुझे ज्ञान का उपदेश देंगे। तुम उस ज्ञान को उनके पास जाकर समझो।

(6) अयं श्लोकः गुरुशिष्ययोरादर्शसम्बन्धं स्फुटं प्रकाशयति। स एव शिष्यो ज्ञानार्जने प्रभवति यः गुरोः चरणेषु प्रणिपातं करोति। प्रणिपातस्यात्र कोऽर्थः इति जिज्ञासायां सत्यां वाक्कायमनसां गुरवे समर्पणामिति मन्तव्यं भवति। तेन गुरुशिष्ययोर्मध्येऽभेदबुद्धिरुत्पद्यते। एष एव ज्ञानावाप्तेः ऋजुः मार्गः। समर्पणेन सहैव छात्रस्य बौद्धिकस्वातन्त्र्यस्य रक्षार्थं श्लोके परिप्रश्नानां व्यवस्थापि दृश्यते। गुरु प्रति (UPBoardSolutions.com) अतिशयितः आदरः शिष्यान् विषयसम्बन्धिपरिप्रश्नेभ्यो न वारयति। सेवाभावः शिष्याणां परमो धर्मः। एवं सच्छिष्यलक्षणमत्र निरूपितम्। एवमेव तादृशा एव पुरुषाः गुरुवः भवन्ति ये तत्त्वद्रष्टारो ज्ञानिनश्च सन्ति। सममेव अध्यापनरुचिः तेषां गुरुभावं सर्वथा द्रढयति। एष सम्बन्धः एव शिक्षा समुन्नयति। अद्यत्वे न तादृशः गुरुशिष्ययोः सम्बन्धो दृश्यते। फलतः सर्वत्र शिक्षाप्राप्तिविधौ वैफल्यमेव लक्ष्यते। शिक्षायाः परमां कोटिं प्राप्तां अपि युवानो विनयविरहिताः दिग्भ्रान्ताः अद्य भवन्ति।

शब्दार्थ

स्फुटं = स्पष्ट।
प्रकाशयति = प्रकाशित करता है।
प्रभवति = समर्थ होता है।
प्रणिपातं करोति = प्रणाम करता है।
जिज्ञासायां सत्यां = जानने की इच्छा होने पर।
वाक्कायमनसाम् = वाणी, शरीर और मन का।
मन्तव्यं = मानना चाहिए।
अभेदबुद्धिरुत्पद्यते = अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है।
ऋजुः = सरल, सीधा।
परिप्रश्नानाम् = बार-बार पूछने की।
अतिशयितः आदरः = अत्यधिक आदर।
वारयति = रोकता है।
सच्छिष्यलक्षणमत्र (सत् + शिष्य + लक्षणम् + अत्र) = अच्छे शिष्य को लक्षण यहाँ।
सममेव = साथ ही।
द्रढयति = दृढ़ करती है।
समुन्नयति = समुन्नत करती है।
वैफल्यम् एव = विफलता ही।
दिग्भ्रान्ताः = दिशाहीन, भटके हुए।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गुरुकुल की शिक्षा पर विधिवत् प्रकाश डाला गया है।

अनुवाद
यह श्लोक गुरु और शिष्य के आदर्श सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। वही शिष्य ज्ञानार्जन में समर्थ होता है, जो गुरु के चरणों में प्रणाम करता है। ‘प्रणिपात’ का यहाँ क्या अर्थ है? ऐसी जानने की इच्छा होने पर वाणी, शरीर और मन को गुरु को अर्पित करना, ऐसा समझना चाहिए। उससे गुरु 
और शिष्य के मध्य अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है। यही ज्ञाने-प्राप्ति का सरल मार्ग है। समर्पण के साथ ही छात्र की बौद्धिक स्वतन्त्रता क रक्षा के लिए श्लोक में सरलतापूर्वक प्रश्न पूछने की व्यवस्था भी दिखाई देती है। गुरु के प्रति अत्यधिक आदर शिष्यों को (UPBoardSolutions.com) विषय सम्बन्धी प्रश्न बार-बार पूछने से नहीं रोकता है। सेवा करना शिष्य का परम धर्म है। इस प्रकार उत्तम शिष्य का लक्षण यहाँ बताया गया है। इसी प्रकार वैसे ही पुरुष गुरु होते हैं, जो तत्त्वद्रष्टा और ज्ञानी होते हैं। साथ ही पढ़ाने में लगन उनके गुरु होने को सभी प्रकार से पुष्ट करती है। यह सम्बन्ध ही शिक्षा की उन्नति करता है। आजकल गुरु-शिष्य का वैसा सम्बन्ध नहीं दिखाई पड़ता है। फलस्वरूप सब जगह शिक्षा-प्राप्ति की विधि में विफलता ही दिखाई पड़ती है। शिक्षा की चरमसीमा को प्राप्त हुए युवक भी आज विनयहीन और दिग्भ्रमित होते हैं।

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(7) प्राचीनभारते युवानो बोधार्थम् अधीतिनोऽभवन्। बोधानुकूलं तेषामाचरणमभूत्। आचारवन्तः सन्तः ते विद्यां प्राचारयन्। एवम् अधीतिबोधाचरणप्रचारणानि तदा शिक्षाव्यवस्थायाः चतस्रः कोटयः आसन्।

शब्दार्थ
बोधार्थम् = ज्ञान के लिए।
अधीतिनः = पढ़ने वाले।
बोधानुकूलम् = ज्ञान के अनुरूप।
प्राचारयन् = प्रचार किया।
चतस्रः = चार।
कोटयः = श्रेणियाँ। |

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि विद्या की चार श्रेणियाँ होती हैं।

अनुवाद
प्राचीन भारत में युवक ज्ञान के लिए पढ़ते थे। ज्ञान के अनुसार ही उनका आचरण होता था। आचारवान् होकर वे विद्या का प्रचार करते थे। इस प्रकार उस समय पढ़ना, ज्ञान, आचरण और प्रचार शिक्षा-व्यवस्था के चार सोपान होते थे।

(8) ज्ञानिनो गुरवः श्रद्धालवश्छात्राः गुरुकुलस्य मणिकाञ्चनसंयोगं व्यञ्जन्ति स्म। एवं वैशिष्ट्ययुक्ते गुरुकुले पठिता विद्या कथं न सफला भवेत्? अधीतेः फलं विनतिरिति गुरुकुले समाजेऽपि च स्वीकृती आसीत्। विद्याविनयसम्पन्न एव समाजे श्रद्धास्पदं जायते स्म, नहि विद्यासम्पन्नः केवलम्। अधीते स्नातकेऽविनयस्य स्थितिरधीतावेव काचित्रुटिरिति ते अमन्यन्त। पिताऽपि गुरुकुलात् प्रतिनिवृत्तस्य स्नातकभूतस्य स्वसूनोः (UPBoardSolutions.com) विनयसम्पन्नतामेव परीक्षते स्म। विद्यायाः विद्वत्त्वस्य चोभयोः विनय एव तदानीं निकषमासीत्। अविनयेना- ध्ययनस्यैवापूर्णता द्योतिताऽभवत्। छान्दोग्योपनिषदि तादृश एकः प्रसङ्गोऽस्ति। यत्र गुरोराश्रमात्प्रतिनिवृत्तस्य स्वतनयस्य श्वेतकेतोः दर्पमवलोक्य पिता तस्य विद्यावाप्तौ सन्देग्धि।कतिपयैः प्रश्नैः पुत्रं परीक्ष्य स तस्य विद्याया एवापूर्णतामवगच्छति तत्पूर्व्यर्थं स्वयं प्रययते।।

शब्दार्थ
मणिकाञ्चनसंयोगम् = मणि और सुवर्ण का संयोग।
व्यञ्जन्ति स्म = प्रकट करते थे।
विनतिः = विनय, नम्रता।
स्थितिरधीतावेव (स्थितिः + अधीतौ + एव) = होना अध्ययन में ही।
अमन्यत = मानते थे।
स्वसूनोः = अपने पुत्र का।
परीक्षते = स्म परीक्षा करता था।
निकषम् = कसौटी।
द्योतिताऽभवत् = विदित होती थी।
सन्देग्धि = सन्देह करता है।
प्रयतते = प्रयत्न करता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में; शिक्षा का आधार छात्र को विनय सम्पन्न होना; बताया गया है।

अनुवाद
ज्ञानी गुरु और श्रद्धालु छात्र गुरुकुल के मणिकांचन योग को व्यक्त करते थे। इस प्रकार की विशेषता से युक्त गुरुकुल में पढ़ी गयी विद्या कैसे न सफल हो, अर्थात् अवश्य ही सफल होगी। अध्ययन का परिणाम विनय’ है, यह गुरुकुल में और समाज में भी स्वीकार किया गया था। विद्या और विनय से युक्त (युवक) ही समाज में श्रद्धा का पात्र होता था, केवल विद्या से सम्पन्न नहीं। पढ़े हुए स्नातक में अविनय होना, पढ़ने में कोई कमी रह गयी है, ऐसा वे मानते थे। पिता भी गुरुकुल से लौटे हुए स्नातक बने अपने पुत्र की विनयसम्पन्नता की परीक्षा (UPBoardSolutions.com) करता था। विद्या और विद्वत्ता दोनों की कसौटी उस समय विनय ही थी। अविनय से अध्ययन की अपूर्णता ही ज्ञात होती थी। छान्दोग्य उपनिषद् में ऐसा एक प्रसंग है जहाँ गुरु के आश्रम से लौटे हुए अपने पुत्र श्वेतकेतु के गर्व को देखकर पिता उसकी विद्या-प्राप्ति में सन्देह करता है। कुछ प्रश्नों से पुत्र की परीक्षा लेकर वह उसकी विद्या की अपूर्णता को जान जाता है। उसकी पूर्ति के लिए वह (पिता) स्वयं प्रयत्न करता है।

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(9) प्रसङ्गोऽयं गुरुकुलस्य माहात्म्यं स्वीकुर्वन्नपि पित्रोरभिभावकस्य पालकस्य वा शिक्षापूर्तये कर्तव्यमनुदिशति। ये च पितरोऽभिभावकोः वा शिक्षालयमेवालमिति मत्वा विरमन्ति सन्तुष्यन्ति च तेषां तनयाः बोधीप्तौ कृतार्थाः न भवेयुरिति छान्दोग्योपनिषदः प्रसङ्गस्याशयः। | गुरुकुलशिक्षा-व्यवस्थायां यथा युवानस्तथ युवतयोऽपि शिक्षामाप्नुवन्। गार्गीवागाम्भृणीप्रभृतयो नार्यः विद्वत्संसत्सु प्रतिष्ठामलभन्त।

बौद्धकालिके भारते गुरुकुलव्यवस्थायाः ह्रासः प्रारब्धः। तदा शिक्षण कार्यार्थं विश्वविद्यालयाः प्रादुरभवन्। वलभीतक्षशिलानालन्दादयः प्रमुखानि शिक्षाकेन्द्राण्यासन्। |

शब्दार्थ
पित्रोः = माता-पिता का।
अनुदिशति = बतलाता है।
विमन्ति = उदासीन हो जाते हैं।
सन्तुष्यन्ति = सन्तुष्ट करते हैं।
बोधावाप्तौ = (बोध + अवाप्तौ) ज्ञान की प्राप्ति में।
युवतयोऽपि = युवतियाँ भी।
विद्वत्संसत्सु = विद्वानों की सभाओं में।
बौद्धकालिके भारते = बुद्धकालीन भारत में।
ह्रासः = अवनति। प्रादुरभवन् = प्रादुर्भूत हुए।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्य अवतरणों में माता-पिता और अभिभावक को अपने कर्तव्य के प्रति सचेत किया गया है तथा गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था के ह्रास एवं विश्वविद्यालयीय शिक्षा-व्यवस्था के प्रादुर्भाव को बताया गया है।

अनुवाद
यह प्रसंग गुरुकुल की महत्ता को स्वीकार करता हुआ भी माता-पिता, अभिभावक  अथवा पालक के शिक्षा-पूर्ति के कर्तव्य को बतलाता है। जो माता-पिता अथवा अभिभावक (शिक्षा के लिए) विद्यालय (को) ही पर्याप्त है, ऐसा मानकर उदासीन हो जाते हैं और सन्तुष्ट हो जाते हैं, उनके पुत्र ज्ञान-प्राप्ति में सफल नहीं होते–यह छान्दोग्य उपनिषद् के प्रसंग का तात्पर्य है।

गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली में जैसे युवक (शिक्षा प्राप्त करते थे) वैसे ही युवतियाँ भी शिक्षा प्राप्त करती थीं। गार्गी, वागाम्भृणी आदि नारियों ने विद्वानों की सभाओं में सम्मान प्राप्त किया था।

बौद्धकाल में भारत में गुरुकुल प्रणाली का पतन प्रारम्भ हो गया था। उस समय शिक्षा-कार्य के लिए विश्वविद्यालयों का प्रादुर्भाव हुआ। वलभी, तक्षशिला, नालन्दा आदि प्रमुख शिक्षा- केन्द्र थे।

(10) तेषु विश्वविद्यालयेषु बहुसङ्ख्यकाः स्वदेशीयविदेशीयाः छात्राः शिक्षामलभन्त। तत्राध्यापनरताः शिक्षकाः स्व-स्वज्ञान-वैभवप्रभावात् सर्वत्र प्रख्याता आसन्। तेषु विश्वविद्यालयेषु सुसमृद्धाः पुस्तकालया आसन्। तत्र प्रपठिषवश्छात्राः पूर्वं द्वारपण्डितैः परीक्षिताः जायन्ते स्म। अर्हतानिर्धारणोपरि तेषां प्रवेशोऽभवत्। चीनदेशीयह्वेनसाङ्गाख्य-महोदयैः तेषां विश्वविद्यालयानां व्यवस्था भूरि-भूरि प्रशंसिता। हा हन्त! (UPBoardSolutions.com) क्रूरकालप्रहारेण तेषामस्तित्वमप्यद्य स्मृतिपर्यवसायि भवति। तेन सममेव भारतस्य भारतीयता समाप्तप्राया दृश्यते। राष्ट्रसमुन्नतये सततं प्रयतमानानां राष्ट्रनेतृणां प्रथमं कर्त्तव्यमस्ति यत्ते नूतनपुरातनशिक्षाव्यवस्थयोः सामानुपातिकं समन्वयं विधाय शिक्षा संयोजयेयुः। तदैव राष्ट्रे राष्ट्रपुरुषाः प्रादुर्भविष्यन्ति, राष्ट्रोन्नतिश्च भविष्यति।।

शब्दार्थ

बहुसङ्ख्य काः = अधिक संख्या में
प्रख्याताः = प्रसिद्ध।
प्रपठिषवः = पढ़ने के इच्छुक।
द्वारपण्डितैः = द्वारपण्डितों के द्वारा।
अर्हतानिर्धारणोपरि = योग्यता निश्चित करने के बाद।
भूरि-भूरि = बहुत अधिक।
स्मृतिपर्यवसायि = स्मृति की समाप्ति।
सततप्रयतमानानाम् = लगातार प्रयत्न करने वालों का।
यत्ते (यत् + ते) = कि वे।
समानुपातिकम् = समान अनुपात में।
समन्वयं = ताल-मेल।
विधाये = करके।
संयोजयेयुः = सुनियोजित करना चाहिए।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में प्राचीन विश्वविद्यालयीय प्रणाली की शिक्षा की प्रशंसा एवं उसकी समाप्ति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
उन विश्वविद्यालयों में अपने देश के और विदेश के बहुत संख्या में छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। उनमें अध्यापन में लगे हुए शिक्षक अपने ज्ञान के वैभव के प्रभाव से सब जगह प्रसिद्ध थे। उन विश्वविद्यालयों में बहुत समृद्ध पुस्तकालय थे। वहाँ पढ़ने के इच्छुक छात्र पहले द्वार पर स्थित विद्वानों के द्वारा परीक्षित किये जाते थे। योग्यता के आधार पर उनका प्रवेश होता था। चीन देश के ह्वेनसाँग महोदय ने उन विश्वविद्यालयों की (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था की बहुत-बहुत प्रशंसा की है। हाय खेद है! समय के कठोर प्रहार से आज उनका अस्तित्व भी स्मृति से परे हो गया है। उसके साथ ही भारत की भारतीयता भी प्रायः समाप्त दिखाई पड़ रही है। राष्ट्र की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्न करने वाले राष्ट्र के नेताओं का प्रथम कर्तव्य है कि वे नयी और पुरानी शिक्षा-व्यवस्था का समान अनुपात में मेल करके शिक्षा की योजना बनाएँ, तभी राष्ट्र में राष्ट्रभक्त पुरुष उत्पन्न होंगे और राष्ट्र की उन्नति होगी। .

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1
प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के सम्बन्ध में पठित अंश के आधार पर दस : वाक्य लिखिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षक ‘प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा-व्यवस्था की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।]

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प्ररन 2
‘प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था’ पाठ के आधार पर गुरु-शिष्य सम्बन्धों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षक ‘गुरु और शिष्य का सम्बन्ध’ की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।]

प्ररन 3
बौद्धयुगीन शिक्षा-पद्धति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये ‘बौद्धयुगीन शिक्षा प्रणाली शीर्षक की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।]

प्ररन 4
शिक्षा के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए इस पर पाश्चात्य प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षकों; “शिक्षा के स्वरूप और शिक्षा एवं संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव’; की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।

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Class 9 Sanskrit Chapter 4 UP Board Solutions राष्ट्रपिता महात्मा गन्धी Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 4
Chapter Name राष्ट्रपिता महात्मा गन्धी (गद्य – भारती)
Number of Questions Solved 36
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 4 Rashtrapita Mahatma Gandhi Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 हिंदी अनुवाद राष्ट्रपिता महात्मा गन्धी के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ-सारांश

भारतभूमि पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है। उनमें महात्मा गाँधी का नाम श्रद्धा के साथ लिया जाता है। सारा संसार उनके स्वदेश-प्रेम, सत्याग्रह और मानवमात्र के प्रति सहज स्नेह को देखकर आश्चर्य करता है। दुबला-पतला शरीर होने पर भी उन्होंने अपने सुदृढ़ आत्मबल से अंग्रेजों के शासन को हिला दिया था। यही कारण था कि विश्वकवि रवीन्द्र ने उन्हें महात्मा’ शब्द से सम्बोधित किया।

प्रारम्भिक जीवन-महात्मा गांधी का जन्म गुजरांत प्रान्त के पोरबन्दर नामक नगर में 2 अक्टूबर, सन् 1869 ई० को हुआ था। इनके पिता का नाम कर्मचन्द और माता का पुतलीदेवी था। गाँधी जी की माता पुतलीदेवी सत्यनिष्ठ व धर्मपरायणा महिला थीं। गाँधी जी के जीवन पर माता के, धार्मिक जीवन (UPBoardSolutions.com) का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। सन् 1888 ई० में उच्च-शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड जाते समय माता ने उन्हें मांस न खाने और मदिरा न पीने का उपदेश दिया। वहाँ अपनी माता जी के उपदेश का पालन करते हुए, इन्होंने कानून की शिक्षा ग्रहण की और अपने देश लौट आये।

दक्षिण अफ्रीका गमन-इंग्लैण्ड से लौटकर गाँधी जी ने बम्बई में वकालत करना प्रारम्भ कर दिया। तभी अफ्रीका निवासी कुछ धनी भारतीय उन्हें एक अभियोग में पैरवी के लिए अफ्रीका ले गये। वहाँ भारतीयों पर अंग्रेजों के अत्याचारों को देखकर इनका हृदय अत्यन्त दुःखी हुआ। वहाँ कचहरियों, दफ्तरों, रेलयानों, मार्गों और सड़कों पर काले-गोरे का भेद दिखाई देता था। वहाँ गाँधी जी जब रेल में प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे थे, तब गोरों ने उन्हें बाहर धकेल दिया था। इस घटना से दु:खी गाँधी जी ने लोगों को अंग्रेजी शासन से मुक्ति दिलाने (UPBoardSolutions.com) की प्रतिज्ञा की और सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। प्रवासी भारतीयों में अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाने के लिए एक नयी जागृति उत्पन्न हुई। अंग्रेजों ने गाँधी जी को बार-बार जेल में बन्द किया, परन्तु उनका आन्दोलन उग्रतर होता गया।

भारत वापसी-गाँधी जी सन् 1915 ई० में एक जननेता के रूप में भारत लौट आये। यहाँ उनकी गोपालकृष्ण गोखले से मुलाकात हुई। उनकी सलाह से इन्होंने भारत के विभिन्न भागों का भ्रमण करके लोगों की दीनता, दरिद्रता और अशिक्षा को प्रत्यक्ष देखा। उन्होंने अंग्रेजों के कृपापात्र ऐसे भारतीयों को भी देखा, जो श्रमिकों को अधिक-से-अधिक कष्ट दे सकते थे। इन्होंने परतन्त्रता को सब दुःखों का मूल कारण जानकर उसे नष्ट करने का निश्चय किया। | चम्पारन आन्दोलन-गाँधी जी ने बिहार के चम्पारन जिले में नील की खेती करने वाले किसानों के साथ अंग्रेज भूस्वामियों के अमानवीय अत्याचारों को सम्माप्त करने के लिए आन्दोलन किया। गाँधी जी का यह भारत में प्रथम आन्दोलन था। इस आन्दोलन की सफलता से लोगों ने इन्हें अपना नेता स्वीकार कर लिया और राष्ट्रपिता’ कहना आरम्भ कर दिया। ‘

असहयोग आन्दोलन-भारतीयों पर अंग्रेजों के बढ़ते हुए अत्याचारों को रोकने के लिए गाँधी जी ने सन् 1920 ई० में असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया। उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार विदेशियों की नौकरियों और उपाधियों का परित्याग आदि के द्वारा इस आन्दोलन का स्वरूप निर्धारित किया। भारतीयों ने इस आन्दोलन में निर्भीकता से भाग लिया। हजारों भारतीय बन्दी बना लिये गये और गाँधी जी को भी (UPBoardSolutions.com) छह वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया। गाँधी जी ने इस आन्दोलन में सत्य और अहिंसा नाम के दो अस्त्र भारतीयों को प्रदान किये। सत्याग्रहियों द्वारा ‘चौरी-चौरा’ नामक स्थान पर हुई हिंसा के कारण यह आन्दोलन स्थगित कर दिया गया।

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सविनय अवज्ञा आन्दोलन–गाँधी जी सन् 1926 ई० में जेल से रिहा हुए। सरकार द्वारा नमक पर कर लगाये जाने के विरोध में इन्होंने सन् 1930 ई० में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ किया। इस आन्दोलन के लिए गाँधी जी के साथ-साथ उस समय के चोटी के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने गुजरात के दाण्डी ग्राम से समुद्र तक पैदल यात्रा की और समुद्र के जल से नमक बनाकर नमक-कानून का उल्लंघन किया। इस आन्दोलन का इतना व्यापक प्रभाव हुआ कि गाँव-गाँव, नगर-नगर, गली-गली में नमक बनाया जाने लगा, जिसे सरकार न रोक सकी।‘अंग्रेजो!

भारत छोड़ो आन्दोलन–अंग्रेज शासकों ने सबल भारत को विखण्डित करने के लिए हिन्दू-मुस्लिम, अस्पृश्यता, वर्ण आदि की समस्याओं को उभारा। महात्मा जी ने अनशन द्वारा भारत की अखण्डता की रक्षा की। अनेक आन्दोलन चलाये जाने पर भी अंग्रेजों द्वारा भारत को स्वतन्त्रता देने में रुचि नहीं दिखाई गयी; अतः 8 अगस्त, सन् 1942 ई० में बम्बई में कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा जी ने अंग्रेजो! भारत छोड़ो’ नारे की घोषणा की। तुरन्त ही नेहरू, आजाद आदि प्रमुख भारतीय नेताओं को बन्दी बना लिया गया। इस समाचार को सुनकर जनता में क्षोभ फैल गया। उन्होंने बिना नेता के ही देशव्यापी आन्दोलन चलाया। सरकारी भवनों और कार्यालयों (UPBoardSolutions.com) पर तिरंगा झण्डा फहराना उनका मुख्य लक्ष्य था। अपनी छाती फैलाकर यहाँ गोली मारो’, ‘यहाँ गोली मारो’ चिल्लाते हुए वीर बालक घूमने लगे। अंग्रेजों की गोलियाँ भी उनकी गति को न रोक सकीं। एक के गोली लगने पर दूसरा उसका स्थान ले लेता था, परन्तु ध्वज को नीचे न गिरने देता था। इस अनुपम बलिदान से विदेशी शासन हिल गया। 15 अगस्त,सन् 1947 ई० को अंग्रेज भारत को भारतवासियों को सौंपकर स्वदेश चले गये और भारत स्वतन्त्र हो गया।

सामाजिक और आर्थिक स्वतन्त्रता-गाँधी जी सत्याग्रह द्वारा सामाजिक और आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त कराना चाहते थे। उन्होंने अहमदनगर में साबरमती नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया। बाद में यह आश्रम वर्धा के पास सेवाग्राम में लाया गया। यहाँ गाँधी जी ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग व ग्रामोद्योगों के प्रचार द्वारा जनता को दरिद्रता से मुक्ति दिलाने हेतु उन्हें चरखे से सूत बनाना सिखाया। उन्होंने इस सबके (UPBoardSolutions.com) लिए बुनियादी शिक्षा का स्वरूप प्रस्तुत किया। उनका विश्वास था कि शिक्षा से ही सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है।

रामराज्य की कल्पना-गाँधी जी अपने मन में कल्पित रामराज्य का साकार चित्र भारत-भूमि पर देखना चाहते थे; अतः उन्होंने भारत में कोई दुःखी, अज्ञानी, अवगुणी न रहे, श्रम की प्रतिष्ठा हो, दलितों और शोषितों के प्रति स्नेह हो आदि द्वारा रामराज्य की कल्पना की। उनके मार्ग का अनुसरण करके हम अपने देश का उत्थान कर सकते हैं।

33 वर्षों तक अंग्रेजों के साथ जूझने और देश को स्वतन्त्र कराने वाले गाँधी जी 30 जनवरी, सन् 1948 ई० को एक विक्षिप्त भारतीय की गोली से आहत होकर ‘राम-राम’ (UPBoardSolutions.com) कहते हुए परलोक सिधार गये। उनके द्वारा मानवों के कल्याण के लिए प्रज्वलित ज्योति सदा प्रकाश देती रहेगी, इसमें सन्देह नहीं है।

गघांशों का सासन्दर्भ अनुवाद

(1) बहवो महापुरुषाः स्वजन्मनाऽमुं भारतभुवं समलञ्चक्रुः। तेषु विशिष्टगुणाकरेषु श्रद्धास्पदेषु महापुरुषेषु महात्मनो गान्धिनो नाम को वी न जानाति? न केवल भारतवर्ष, समग्रं विश्वं तस्य स्वदेशानुरागं सत्यं प्रति तस्याग्रहं, मानवमात्रप्रति तस्य सहजस्नेहमवलोक्य, विस्मितमिव तिष्ठति। क्षीणकायोऽसौ महापुरुषः प्रस्तरादपि कठोरः रिक्तहस्तोऽपि स्वतपोबलेन आङ्ग्लैजातिशासनमकम्पयत्। यदासौ स्वसत्याहिंसास्त्राभ्यां स्वमातृभूमेः पारतत्र्यशृङ्खलामुच्छेत्तुं निश्चिकाय, तदाऽन्येऽनेके स्मयमाना अब्रुवन् , सत्यमहिंसाञ्चानुसृत्य क्वचित् गिरिकानने निर्जने वा प्रदेशे तपश्चरितुं कश्चित् क्षमते न तु क्रूरकुटिलनीतिकलाकलुषितैः वैदेशिकशासकैः सह योद्धं क्षमेत। परं गान्धिना तत्सर्वं कृतं यदन्येभ्यः शशशृङ्गमिवासीत्।

विश्वकविः रवीन्द्रस्तस्याप्रतिमं नूतनमिव क्रियाकौशलमात्मनः सबलत्वं च प्रत्यक्षीकृत्य . ‘महात्मा’ शब्देन तं सम्बोधितवान्।

शब्दार्थ-
अमुं = इस।
भारतभुवं = भारतभूमि को।
समलञ्चक्रुः = भली-भाँति सुशोभित किया।
विशिष्टगुणाकरेषु = विशिष्ट गुणों के भण्डारों में।
श्रद्धास्पदेषु = श्रद्धा के पात्रों में।
तस्याग्रहम् = उनके आग्रह को।
सहजस्नेहमवलोक्य = स्वाभाविक प्रेम को देखकर।
विस्मितम् =आश्चर्यचकित।
क्षीणकायः = पतले-दुबले शरीर वाला।
प्रस्तरात् = पत्थर से।
उच्छेत्तुम् = काटने के लिए।
निश्चिकाय = निश्चित किया।
स्मयमाना = आश्चर्य करते हुए।
अनुसृत्य = अनुसरण करके।
कानने = वन में।
क्षमते = समर्थ हो सकता है।
योदधुं = युद्ध करने के लिए।
क्षमेत = समर्थ।
शशशृंम् = खरगोश के सींग; अर्थात् असम्भव वस्तु।
प्रत्यक्षीकृत्य = साक्षात् देखकर।।

सन्दर्भ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संकलित राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

संकेत
इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में महात्मा गाँधी के दृढ़-निश्चयी एवं देश-प्रेमी स्वभाव के विषय में बताया गया है।

अनुवाद
बहुत-से महापुरुषों ने अपने जन्म से इस भारतभूमि को सुशोभित किया है। उन विशिष्ट गुणों के अँण्डार, श्रद्धा के योग्य महापुरुषों में महात्मा गाँधी का नाम कौन नहीं जानता है? केवल भारतवर्ष ही नहीं, सम्पूर्ण संसार अपने देश के प्रति उनके प्रेम, सत्य के प्रति उनके आग्रह, मनुष्यमात्र के प्रति उनके स्वाभाविक स्नेह को देखकर विस्मित-सा रह जाता है। दुर्बल शरीर वाले पत्थर से भी कठोर इस महापुरुष ने खाली हाथ होते हुए भी अपने तप की शक्ति से अंग्रेजों के शासन को हिला दिया। जब उन्होंने अपने सत्य और अहिंसा के अस्त्रों (UPBoardSolutions.com) से अपनी मातृभूमि की पराधीनता की जंजीर को तोड़ने का निश्चय किया, तब दूसरे अनेक आश्चर्य करते हुए बोले-“सत्य और अहिंसा का अनुसरण करके कहीं पर्वतों, वनों या निर्जन । प्रदेश में तप करने में कोई समर्थ हो सकता है, किन्तु क्रूर, कुटिल, नीति-कला में कलुषित विदेशी शासकों । के साथ युद्ध करने में समर्थ नहीं हो सकता है। परन्तु गाँधी जी ने वह सब किया, जो दूसरों के लिए खरगोश के सींग के समान अर्थात् असम्भव वस्तु था।

विश्वकवि रवीन्द्र ने उनके अनुपम और नवीन क्रिया-कौशल को और आत्मा की सबलता को प्रत्यक्ष देखकर ही उन्हें महात्मा’ शब्द से सम्बोधित किया। |

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(2) महात्मा गान्धी सौराष्ट्रमण्डले पोरबन्दरनाम्नि लघुनगरे ऊनसप्तत्युत्तराष्टादशशततमे ख्रीष्टाब्दे अक्टूबरमासस्य द्वितीये दिनाङ्के स्वजन्मना धरणीतलमलञ्चकार। तस्य पिता कर्मचन्दः माता च पुतलीदेवी आस्ताम। पुत्रानाम्ना सह पितुर्नामापि प्रयोक्तव्यमिति। तत्रत्यपरम्परानुसारं स मोहनदासकर्मचन्दगान्धीति नाम्ना प्रसिद्धो जातः।

शब्दार्थ
ऊनसप्तत्युत्तराष्टादशशततमे = 1869 में। धरणीतलमलञ्चकार (धरणीतलं + अलं + चकार) = धरणी (पृथ्वी) तल को सुशोभित किया। प्रयोक्तव्यम् = प्रयोग करना चाहिए। तत्रत्यपरम्परानुसारं = वहाँ की परम्परा के अनुसार।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी के जन्म-स्थान और माता-पिता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
महात्मा गाँधी ने सौराष्ट्र (गुजरात) प्रान्त में पोरबन्दर नाम के छोटे नगर में 1869 ई० में अक्टूबर मास की दो तारीख को अपने जन्म से पृथ्वीमण्डल को सुशोभित किया। उनके पिता कर्मचन्द और माता पुतलीदेवी थे। “पुत्र के नाम के साथ पिता का नाम भी प्रयोग करना चाहिए ऐसी वहाँ की परम्परा के अनुसार वे ‘मोहनदास कर्मचन्द गाँधी’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए। |

(3) गान्धिमहोदयस्य जननी ‘पुतली देवी’ सातिशयं सत्यरता, धर्मपरायणा, व्रतोपवासादिविधौ श्रद्दधाना श्रद्धेया चासीत्। गान्धिनः जीवनपद्धत्यां तस्य मातुष्प्रभावः सुस्पष्टं दरीदृश्यते। अष्टाशीत्युत्तराष्टादशशततमे वर्षे उच्चशिक्षार्थं से इङ्ग्लैण्डदेशं जगाम। प्रस्थानकाले जननी मांसादिभक्षणं न कर्तुं मदिरां न स्पष्टुम् तमनुशास्ति स्म। गान्धी मातुः शिक्षामनुसरन्नेव तत्र शिक्षा जग्राह। अधिवक्त्र्युपाधिनात्मानमलङ्कृत्य स्वदेशं प्रत्याजगाम।

शब्दार्थ-
सातिशयं = अत्यधिक।
श्रद्दधाना = श्रद्धा रखती हुई (श्रद्धा रखने वाली)।
दरीदृश्यते = दिखाई पड़ता है।
अष्टाशीत्युत्तराष्टादशशततमे = 1888 में।
स्पष्टुम् = स्पर्श करने के लिए।
अनुशास्ति स्म = उपदेश दिया।
जग्राह = ग्रहण की।
अधिवक्त्र्युपाधिनात्मानम- लङ्कृत्य (अधिवक्तृ + उपाधिनी + आत्मानम् + अलङ्कृत्य) = बैरिस्टर की उपाधि से अपने आपको सुशोभित करके।
प्रत्याजगाम = लौट आया।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी पर पड़े माता के प्रभाव और उनकी शिक्षा का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
गाँधी जी की माता ‘पुतलीदेवी’ अत्यन्त सत्यनिष्ठ, धार्मिक, व्रत-उपवास आदि में श्रद्धा रखने वाली और श्रद्धा के योग्य थीं। गाँधी जी की जीवन-पद्धति पर उनकी माता का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। 1888 ईसवी वर्ष में वे उच्च-शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड देश गये। जाते समय माता ने मांसादि न खाने और मदिरा को न छूने का उपदेश दिया था। गाँधी जी ने माता की शिक्षा का अनुसरण करते हुए ही वहाँ शिक्षा ग्रहण की। वकालत की उपाधि से अपने को अलंकृत करके अपने देश लौट आये।

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(4) इंग्लैण्डदेशाद् प्रतिनिवृत्य मुम्बईनगरे अधिवक्तृकर्म प्रारब्धं स यदा सयनोऽभवद् तदैव अफ्रिकादेशे निवसन्तः कतिपये धनिनो भारतीयाः अफ्रिकादेशस्थे न्यायालये स्वन्यायपक्षस्य प्रस्तुत्यर्थं गान्धिनम् अफ्रिकादेशमनयन्। तत्र अफ्रिकादेशे आङ्ग्लजातीयानी शासनमासीत्। तत्र निवसतः भारतीयान्प्रति आङ्ग्लशासकानां तदधिकारिणाञ्च घोरमत्याचारं वीक्ष्य तस्य हृदयं भृशमयत। वयं श्वेताः (UPBoardSolutions.com) यूयं कृष्णा इत्यपूर्वो भेदः तैः प्रचारितः। न्यायालयेषु, कार्यालयेषु, रेलयानेषु पथिषु वीथीषु चैष भेदः दृश्यते स्म। एकदा गान्धिमहोदयः रेलयानस्य प्रथमश्रेण्या गच्छनासीत्। रेलयानस्य प्रथमश्रेण्यां यात्रार्थं श्वेताङ्गा एवाधिकृता आसन्। अतः श्वेताधिकारिणः रेलयानात्तं बलाबहिश्चक्रुः।

शब्दार्थ—
प्रतिनिवृत्य = लौटकर।
सयत्नः = प्रयत्नशील।
प्रस्तुत्यर्थम् = प्रस्तुत करने के लिए।
अनयत् = ले गये। वीक्ष्य = देखकर।
भृशम् = अत्यधिक।
अद्यत = दु:खी हुए। वीथीषु = गलियों .. में।
गच्छन्नासीत् = जा रहे थे।
बलाबहिश्चक्रुः = बलपूर्वक बाहर कर दिया। .

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के प्रति गौरांगों के घोर अत्याचारों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
इंग्लैण्ड देश से लौटकर मुम्बई नगर में जब वे वकालतं का काम प्रारम्भ करने के लिए प्रयत्नशील थे, तभी अफ्रीका देश के रहने वाले कुछ धनी भारतीय अफ्रीका के न्यायालय में अपने न्याय-पक्ष को प्रस्तुत करने के लिए गाँधी जी को अफ्रीका देश ले गये। वहाँ अफ्रीका देश में अंग्रेज जाति का शासन था। वहाँ रहने वाले भारतीयों के प्रति अंग्रेज शासकों और उनके अधिकारियों के घोर अत्याचारों को देखकर उनका हृदय बहुत दुःखित हुआ। हम श्वेत हैं, तुम काले हो, यह अपूर्व भेद उन्होंने चला रखा था। कचहरियों, दफ्तरों, रेलगाड़ियों, (UPBoardSolutions.com) रास्तों, गलियों में यह भेद दिखाई पड़ता था। एक दिन गाँधी जी रेलगाड़ी की प्रथम श्रेणी में जा रहे थे। रेलगाड़ी की प्रथम श्रेणी में यात्रा करने के लिए गौरांग ही अधिकृत थे; अत: गोरे अधिकारियों ने उन्हें रेलगाड़ी से बलपूर्वक बाहर कर दिया।

(5) घटनैषा गान्धिनः जीवनसरणिमेव पर्यवर्त्तयत्। राज्यसभायामवमानितः कौटिल्यो नन्दवंशासनोच्छेदाय यथा सङ्कल्पं व्यधात् तथैव गान्धी अपि आङ्ग्लशासनाज्जनेभ्यो मुक्तिं प्रदापयितुं प्रतिजज्ञे। अन्यायं सोढ्वा जीवनं तदपेक्षया मरणमेव वरमित्युदघुष्यासौ स्वसत्याग्रहान्दोलनं तत्र प्रारभत। सत्याग्रहान्दोलनं सर्वथा नूतनमश्रुतपूर्वमासीत्। नूतनं जनानाकर्षयति हि। अफ्रिकादेशवासिषु (UPBoardSolutions.com) भारतीयेषु चाङ्ग्लशासनादुन्मुक्तये नवा जागर्तिः सागरे ऊर्मिमालेव समुत्थिता। आङ्ग्लशासकैर्गान्धिमहोदयः बहुबारं कारागारे निक्षिप्तः परमेतेन तस्य सङ्कल्पः दृढात् दृढतरो जीतः। अधिवक्तृरूपेणाफ्रिकादेशं गतः जननेतृ- रूपेणासौ पञ्चदशोत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे भारतं स्वमातृभूमिं प्रत्याजगामा ।

शब्दार्थ-
घटनैषा = यह घटना।
जीवनसरणिम् = जीवन के मार्ग को।
पर्यवर्त्तयत् = बदल दिया।
अवमानितः = अपमानित हुए।
व्यधात् = धारण किया।
प्रदापयितुम्= दिलाने के लिए।
प्रतिजज्ञे = प्रतिज्ञा की।
सोढ्वा = सहन करके।
उदघुष्य = घोषणा करके।
अभुतपूर्वम् = पहले कभी न सुना गया।
नवा = नयी।
जागर्तिः = जागरण।
ऊर्मिमालेव = लहरों के समूह की तरह।
कारागारे = जेल में।
निक्षिप्तः = डाला।
दृढात् दृढतरो = दृढ़ से दृढ़तर।
पञ्चदशोत्तरैकोनविंशतिशततमे = 1915 ई० में।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में अंग्रेजों द्वारा अपमानित किये जाने पर गाँधी जी द्वारा अफ्रीका में सत्याग्रह आन्दोलन करने एवं वहाँ रहने वाले भारतीयों में नयी चेतना जगाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
इस घटना ने गाँधी जी के जीवन-मार्ग को ही बदल दिया। उन्होंने अंग्रेजी शासन को समूल नष्ट करने का संकल्प उसी तरह ले लिया, जिस तरह चाणक्य ने राज्यसभा में अपमानित होकर

नन्दवंश के शासन को समाप्त करने का संकल्प लिया था। “अन्याय को सहकर जीने की अपेक्षा मरना । ही अच्छा है, यह घोषणा करके, उन्होंने वहाँ अपनी सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। सत्याग्रह आन्दोलन सब प्रकार से नया तथा पहले कभी न सुना गया था। नवीनता लोगों को आकृष्ट करती ही है। अफ्रीका देश में रहने वाले. भारतीयों में अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए नयी जागृति समुद्र में लहरों के समूह की (UPBoardSolutions.com) तरह उठ गयी। अंग्रेज शासकों ने गाँधी जी को बहुत बार जेल में डाला, परन्तु इससे उनको संकल्पे मजबूत से और मजबूत होता गया। वकील के रूप में अफ्रीका गये हुए वे जननेता के रूप में 1915 ई० में अपनी मातृ-भूमि भारत लौट आये।।

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(6) अत्रागत्य अखिलभारतीयकाङ्ग्रेसदलस्य विश्रुतस्य गोखले’ इति संज्ञया ख्यातस्य गोपालकृष्णगोखलेमहोदयस्य सान्निध्यं तेनावाप्तम्। तस्य परामर्शमनुसृत्य गान्धी भारतस्य विभिन्नभागानां यात्रां कृत्वां जनदशया प्रत्यक्षमवगतोऽभवत्। यात्राप्रसंङ्गे तेन प्रत्यक्षीकृतं यद् विशिष्टजनेषु एव राष्ट्रभावना व्यापृता तामेवाधिश्रित्य तिष्ठति।

शब्दार्थ-
अत्रागत्य (अत्र + आगत्य) = यहाँ आकर।
विश्रुतस्य = प्रसिद्ध संज्ञया = नाम से।
ख्यातस्य = विख्यात।
सान्निध्यम् = समीपता, सम्पर्क।
अवाप्तम् = प्राप्त किया।
अनुसृत्य = अनुसरण करके।
प्रत्यक्षमवगतोऽभवत् (प्रत्यक्षम् + अवगतः + अभवत्) = प्रत्यक्ष जानकार हुए।
व्यापता = फैली हुई थी।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत लौटे हुए गाँधी जी को भारत की प्रत्यक्ष दशा के ज्ञात होने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
यहाँ आकर उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस दल के बहुत प्रसिद्ध, ‘गोखले’ नाम से विख्यात गोपालकृष्ण गोखले के सान्निध्य को प्राप्त किया। उनकी सलाह का अनुसरण करके गाँधी जी भारत के विभिन्न भागों की यात्रा करके लोगों की दशा से प्रत्यक्ष रूप से अवगत हो गये। यात्रा के समय उन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि विशेष लोगों में ही राष्ट्रभावना फैली हुई है, (और वह) उसी का सहारा लेकर बैठी है; अर्थात् इस भावना को प्रसार नहीं हो रहा है।

(7) भारतीयेषु व्याप्तं दैन्यं, दारिद्रयमशिक्षा चासौ दृष्टवान्। श्रमिकाणामेव सततपरिश्रमेणार्जितवित्तबलेन, शैत्यतापप्रभावशून्यासु विशालासु सौधशालासु निवसन्तः किं नाम कष्टमित्यजानन्तस्तान् श्रमिकान् विविधैः क्लेशैः पीडयन्तः को वा कियत् कष्टं दातुं क्षमेतेति स्पर्धाशीलाः आङ्ग्लशासकानां प्रीतिमवाप्तुं तत्पराः आङ्ग्लानां कृपाश्रयभूताः वैभवशालिनो, भारतीयाः गान्धिनः दृष्टिपथमागताः। श्रमिकभूतानां (UPBoardSolutions.com) दैन्यपराभूतजीवनानां जीवनं धनिभिः पालितेभ्यः श्वभ्योऽपि हीनतरं गान्धिना दृष्टम्। तस्य हृदयं सहस्रधा विदीर्णम्। पारतन्त्र्यमेवैतस्य हेतुरिति हेतुरेवोच्छेद्यः स मनसि निश्चिकाय।।

शब्दार्थ-
अर्जितवित्तबलेन = कमाये हुए धन के बल से।
शैत्यतापप्रभावशून्यासु = ठण्ड और गर्मी के प्रभाव से रहित।
सौधशालासु = भवनों में कियत् = कितना।
स्पर्धाशीलाः = होड़ में लगे हुए।
प्रीतिमवाप्तुम् = प्रसन्नता को प्राप्त करने में लगे हुए।
पराभूत = पराजित, विवश।पालितेभ्यः = पालितों (आश्रितों) के लिए।
श्वभ्यः = कुत्तों से।
विदीर्णम् = टूट गया।
उच्छेद्यः = दूर करने योग्य।
निश्चिकाय = निश्चित किया।

प्रसंग
अफ्रीका से भारत लौटकर गाँधी जी ने भारतीयों की दीनता, दरिद्रता और अशिक्षा को प्रत्यक्ष देखा और उसके मूल कारण परतन्त्रता को निश्चित किया। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में किया गया है।

अनुवाद
(उन्होंने) भारतीयों में व्याप्त दीनता, दरिद्रता और अशिक्षा को देखा। मजदूरों के ही लगातार परिश्रम से कमाये हुए धन के बल से शीत और ताप के प्रभाव से रहित विशाल महलों में रहते हुए, ‘कष्ट क्या है?’ यह न जानते हुए, उन मजदूरों को अनेक कष्टों से पीड़ित करते हुए ‘कौन कितना कष्ट देने में समर्थ है?’ इस प्रकार की होड़ में लगे हुए, अंग्रेज शासकों की प्रसन्नता को प्राप्त करने में लगे हुए, अंग्रेजों के कृपापात्र, (UPBoardSolutions.com) ऐश्वर्यसम्पन्न भारतवासी गाँधी जी की दृष्टि में आये। गाँधी जी ने दीनता से व्याप्त जीवन वाले मजदूर लोगों के जीवन को धनी लोगों द्वारा पालित कुत्तों से भी बदतर देखा और उनका हृदय हजारों टुकड़ों में फट गया। उन्होंने गुलामी ही इसका कारण है; अत: कारण ही मिटाने योग्य है, ऐसा मन में निश्चय किया।

(8) बिहारप्रान्ते चम्पारणजनपदे नीलकृषकैः सह आङ्ग्लैः भूस्वामिभिः क्रियमाणममानवीयमत्याचारं समापयुितं सत्याग्रहं सः समारब्धवान्। तेन भूस्वामिनः क्रूरतरान् स्वात्याघारान् परित्यक्तुं विवशा अभवन्। गान्धिनः स्वदेशभूमावयं प्रथमः सत्याग्रहः प्रथमश्च तस्य विजयः आसीत्।।

शब्दार्थ-
नीलकृषकैः = नील की खेती करने वाले कृषक।
क्रियमाणम् = किये गये।
अमानवीय = क्रूर।
समापयितुम् = समाप्त करने के लिए।
समारब्धवान् = आरम्भ किया।
परित्यक्तुम् = छोड़ने के लिए।
स्वदेशभूमावयम् (स्वदेशभूमौ + अयम्) = अपने देश की भूमि पर यह।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी के प्रथम सत्याग्रह और प्रथम विजय का वर्णन है। |

अनुवाद
उन्होंने (गाँधी जी ने) बिहार प्रान्त में चम्पारन जिले में नील की खेती करने वाले किसानों के साथ अंग्रेज जमींदारों के द्वारा किये गये अमानवीय अत्याचार को समाप्त करने के लिए। सत्याग्रह आरम्भ किया। उससे जमींदार अपने क्रूरता भरे अत्याचारों को छोड़ने के लिए विवश हो गये। अपने देश की भूमि पर गाँधी जी का यह प्रथम सत्याग्रह और उनकी पहली विजय थी।

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(9) चम्पारणान्दोलने तस्य नेतृत्वक्षमता प्रमाणिता जाता। समग्रोऽपि देशः स्वनेतृरूपेण समङ्गीचकार। गान्धिमहोदयोऽपि भारतमेकसूत्रे निबध्नन् देशाय राष्ट्ररूपमददात्। जनाः स्वकृतज्ञता ज्ञापयन्तस्तं राष्ट्रपितेत्यब्रुवन्।।

शब्दार्थ-
समग्रः = सम्पूर्ण।
अङ्गीचकार = स्वीकार कर लिया।
निबध्नन् = बाँधता हुआ।
ज्ञापयन्तः = जनाते (व्यक्त करते) हुए।
अब्रुवन् = बोले।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी की नेतृत्व-क्षमता की प्रामाणिकता के बारे में बताया गया है।

अनुवाद
चम्पारन (बिहार) जिले के आन्दोलन में उनकी (गाँधी जी की) नेतृत्व की योग्यता प्रमाणित हो गयी। सम्पूर्ण देश ने उन्हें अपने नेता के रूप में स्वीकार कर लिया। गाँधी जी ने भी भारत को एक सूत्र में बाँधते हुए देश को राष्ट्र का रूप प्रदान किया। लोगों ने अपनी कृतज्ञता को प्रकट करते हुए उन्हें राष्ट्रपिता’ कहा।

(10) विंशत्युत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे प्रतिदिनमेधमानानाङ्ग्लशासकानामत्याचारान् प्रतिरोद्धमसौ असहयोगाख्यमान्दोलनं प्रवर्तयामास। वैदेशिकवस्तूनि परिहर्त्तव्यानि, वैदेशिकसेवाः परित्यक्तव्याः, वैदेशिकशिक्षालयेषु न पठितव्यम् , वैदेशिकोपाधयः परिहातव्याः, राष्ट्रियविद्यालयाः स्थापयितव्यास्तेषु पठितव्यमिति तत्स्वरूपं तेन व्याख्यातम्। भारतीयजनाः तस्मिन्नान्दोलने, भूयसोत्साहन सम्मिलिता (UPBoardSolutions.com) अभवन्। महात्मन् आत्मशक्त्या निःशस्त्रिणोऽपि भारतीयाः निर्भीका अभवन्। दण्डात् तेषां किं भयं ये दण्डमेव स्वेच्छया आलिङ्गितुं सन्नद्धाः।

शाब्दार्थ-
एधमानान् = बढ़ते हुए।
प्रतिरोद्धम् = रोकने के लिए।
प्रवर्तयामास = चलाया।
परिहर्त्तव्यानि = छोड़ देनी चाहिए।
स्थापयितव्याः = स्थापना करनी चाहिए।
भूयसा = अत्यधिक।
आलिङ्गितुम् = आलिंगन (चुम्बन) करने के लिए।
सन्नद्धाः = तैयार।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी द्वारा चलाये गये असहयोग आन्दोलन का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
सन् 1920 ई० में अंग्रेज शासकों के प्रतिदिन बढ़ते हुए अत्याचारों को रोकने के लिए उन्होंने ‘असहयोग’ नाम का आन्दोलन चलाया। विदेश की वस्तुएँ छोड़ देनी चाहिए, विदेशियों की नौकरियों को त्याग देना चाहिए, विदेशियों के स्कूलों में नहीं पढ़ना चाहिए, विदेशियों की उपाधियों को छोड़ देना चाहिए, राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना करनी चाहिए, उन्हीं में पढ़ना चाहिए, उन्होंने उसको ऐसा स्वरूप बतलाया। (UPBoardSolutions.com) भारतवासी उस आन्दोलन में अत्यन्त उत्साह से सम्मिलित हुए। महात्मा जी के आत्मबल से शस्त्ररहित होते हुए भी भारतवासी निडर हो गये। उनको दण्ड का क्या भय है, जो दण्ड को ही अपनी इच्छा से गले लगाने को तैयार हैं।

(11) उपाधिधारिभिरुपाधयः परित्यक्तताः शिक्षार्थिभिः शिक्षकैश्च शिक्षालयाः परित्यक्ताः, वैदेशिकवस्त्राणि वह्नौ दग्धानि। सहस्रशो भारतीयाः बन्दीकृताः। महात्माऽपि राजद्रोहारोपे षड्वर्षाणि यावत् कारागारे निक्षिप्तः। जनाः वैदेशिकदमनचक्रेणाक्रान्ताः भृशमुत्पीडिताः जाताः।।

शब्दार्थ-
वह्नौ = अग्नि में दग्धानि = जला दिये।
निक्षिप्तः = डाल दिया।
भृशम् उत्पीडिताः = अत्यधिक पीड़ित।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी द्वारा चलाये गये असहयोग आन्दोलन में भारतीयों के . सम्मिलित होने का एवं अंग्रेजी सरकार द्वारा किये गये दमन-चक्र का वर्णन है। ।

अनुवाद
उपाधिधारियों ने उपाधियाँ त्याग दीं। विद्यार्थियों और शिक्षकों ने विद्यालय छोड़ दिये। विदेशी वस्त्र अग्नि में जला दिये गये। हजारों भारतवासी बन्दी बना लिये गये। महात्मा जी को भी राजद्रोह के अपराध में छ: वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया। लोग विदेशियों के दमन-चक्र से आक्रान्त हुए अत्यधिक पीड़ित हो गये।

(12) आन्दोलनेऽस्मिन् महात्मना सत्याहिंसारूपे अस्त्रद्वयं भारतीयेभ्यः प्रदत्तम्। स्वराज्यापेक्षयाऽप्येते महत्त्वपूर्ण स्त इति तस्य दृढं मतमासीत्। अतएव चौरी-चौरा नामके (UPBoardSolutions.com) स्थाने सत्याग्रहिभिः प्रवर्तितां हिंसावृत्तिमाकण्र्य महात्मना सत्याग्रहः झटिति स्थगितः। इतरे भारतीया नेतारः महात्मन एतेन निश्चयेन विस्मिताः खिन्नाश्चाभूवन्। परं जना अनुशासनस्य महन्निदर्शनं प्रस्तुतवन्तः। महात्मनो माहात्म्यं तदानीं परां कोटिमवाप्नोत्।

शब्दार्थ-
प्रवर्तिताम् = चलायी जा रही।
आकर्य = सुनकर।
झटिति = तत्काल, तुरन्त।
महन्निदर्शनम् (महत् + निदर्शनम्) = बड़ा उदाहरण।
परां कोटिम् अवाप्नोत् = चरम सीमा को प्राप्त हुआ।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी के द्वारा आन्दोलन के स्थगित किये जाने का वर्णन है।’

अनुवाद
इस आन्दोलन में महात्मा जी ने सत्य और अहिंसा के रूप में दो अस्त्र भारतीयों को प्रदान किये। अपने राज्य की अपेक्षा से भी ये दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, ऐसा उनका पक्का विचार था। इसलिए ‘चौरी-चौरा’ नामक स्थान पर सत्याग्रहियों के द्वारा चलायी जा रही हिंसावृत्ति को सुनकर महात्मा जी ने सत्याग्रह आन्दोलन को तत्काल स्थगित कर दिया। दूसरे भारतीय नेता महात्मा जी के इस निश्चय से विस्मित और खिन्न हो गये। परन्तु लोगों ने अनुशासन का महान् उदाहरण प्रस्तुत किया। महात्मा जी का महत्त्व उस समय ‘चरम सीमा को प्राप्त हुआ।

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(13) वैदेशिकशासनेन जीवनाय परमोपयोगिनि वस्तुनि लवणे करं निर्धारितम्। एतन्निरोद्धं त्रिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे ‘सविनयावज्ञाख्यान्दोलनं तेन प्रारब्धम्। तदर्थं गुर्जरप्रान्तस्यै दाण्डीग्रामाद् समुद्रपर्यन्तं पदयात्रा तेन विहिता। दाण्डीग्रामादासमुद्रमेषा यात्रा ग्रामाद् ग्राम प्रेयन्ती (UPBoardSolutions.com) सहस्रशो जनान् नरान् नारीश्चात्मन्यामेलितवती समुद्रतटमुपगम्य सागरजलाल्लवणं निर्माय तैः जनैः महात्मना च तद्विधानस्य सविनयमवज्ञा कृता। ग्रामें ग्रामे नगरे नगरे वीथीषु वीथीषु लवणनिर्माणं संवृत्तम्। शासनं तन्निरोद्धं न शशाक। वायुवेगेनोन्मत्तान् सागरतरङ्गान् किं तटबन्धः रोद्धं क्षमेत? |

शब्दार्थ-
लवणे करें = नमक पर कर (टैक्स)।
एतत् निरोद्धम् = इसे रोकने के लिए।
विहिता = की।
आसमुद्रम् = समुद्र तक।
प्रेरयन्ती = प्रेरणा देती हुई।
ऑमेलितवती = मिल लिया।
निर्माय = बनाकर।
विधानस्य = कानून की।
अवज्ञा = अवहेलना।
वीथीषु = गलियों में।
संवृत्तम् = सम्पन्न हुआ।
न शशाक = समर्थ नहीं हुआ।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में विदेशी सरकार द्वारा नमक पर लगाये गये कर के विरोध में गाँधी जी द्वारा चलाये गये सविनय अवज्ञा आन्दोलन का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
विदेशी सरकार ने जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी वस्तु नमक पर कर (टैक्स) लगा दिया। इसे रोकने के लिए उन्होंने गाँधी जी ने) सन् 1930 ईसवी में ‘सविनय अवज्ञा’ नाम का आन्दोलन प्रारम्भ किया। इसके लिए उन्होंने गुजरात प्रान्त के दाण्डी ग्राम से समुद्र तक पैदल यात्रा की। दाण्डी ग्राम से (UPBoardSolutions.com) समुद्र तल की इस यात्रा ने गाँव-गाँव को प्रेरित करते हुए हजारों लोगों (स्त्री-पुरुषों) को अपने में मिला लिया। समुद्र के तट पर जाकर सागर के जल से नमक बनाकर उन लोगों और महात्मा जी के द्वारा उस कानून की विन

यपूर्वक अवहेलना की गयी। गाँव-गाँव, नगर-नगर, गली-गली में नमक बनाया गया। शासन के लिए उसे रोकना सम्भव न रहा। वायु के वेग से मतवाली सागर की तरंगों को क्या तट का बाँध रोक सकता है? (अर्थात् नहीं रोक सकता)।

(14) महात्मनः गान्धिनः सत्याहिंसाभ्यां भृशमुद्विग्नाः कुटिलराजनयकुशलाः वैदेशिक शासकाः हिन्दु-मुस्लिम-स्पृश्यास्पृश्यादिवर्णसमस्यामुद्घाट्य महात्मनः प्रभावादेकसूत्रे आबद्धं सबलं भारतं विखण्डयितुमुपचक्रिरे। महात्मा अनशनव्रतेन तेषां तेषां पक्षग्राहिणां च प्रयत्न निष्फलं चकार। महात्मा गान्धी स्वप्राणानपि अविगणय्य राष्ट्रस्यैकत्वमखण्डत्वरक्षत्।

शब्दार्थ-
उद्विग्नाः = परेशान हुए।
उद्घाट्य = उभारकर, फैलाकर।
चिखण्डयितुम् = खण्डित करने के लिए।
उपचक्रमे = प्रारम्भ किया।
अविगणय्य = न गिनकर, परवाह न करके।
ऐकत्वमखण्डत्वम् = एकता, अखण्डता।
अरक्षत् = बचाया।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी के द्वारा अंग्रेजों की कुटिल नीति के विफल किये जाने का वर्णन है।

अनुवाद
महात्मा गाँधी की सत्य और अहिंसा से बहुत परेशान हुए कुटिल राजनीति में चतुर विदेशी शासकों ने हिन्दू-मुसलमान, छुआछूत आदि की जातीय समस्या को उभार कर महात्मा जी के प्रभाव से एक सूत्र में बँधे हुए शक्तिशाली भारत के टुकड़े करने प्रारम्भ कर दिये। महात्मा जी ने अनशन व्रत (UPBoardSolutions.com) के द्वारा उन-उन पक्ष लेने वालों (शासकों और उनके अनुयायियों) के प्रयत्न को व्यर्थ कर दिया। महात्मा गाँधी ने अपने प्राणों की भी परवाह न करके राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा की।

(15) महात्मनो नेतृत्वे बहूनि आन्दोलनानि प्रवृत्तानि जातानि। वैदेशिकशासकैस्तथापि भारताय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं रुचिर्न प्रदर्शिता। बहुविधं व्याजमालम्ब्य कालात्ययमेव ते कुर्वन्त आसन्। अतः द्वाचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे अगस्तमासस्याष्टमे दिनाङ्के मुम्बईनगरे सम्पन्ने काङ्ग्रेसाधिवेशने महात्मना घोषितम्-आङ्ग्ला भारतं त्यजत। त्यज भारतमिति नाम्ना विश्रुतमिदमान्दोलनं भारतमुक्तेः सरणि सरलां चकार। सद्य एव तत्रोपस्थिताः नेहरू-आजादपटेल-प्रसाद-देसाई-प्रभृतयः प्रमुखनेतारो महात्मना सह निगृहीताः कारागारे च बन्दीकृताः। वृत्तमिदं विद्युद्गत्या भारतवर्षे जनेषु प्रावर्त्तत। समग्रो देशः झञ्झावातेन विक्षुब्धसागर इव सङ्क्षुब्धः सञ्जातः। नेतृभिः विनाऽपि सम्पूर्णदेशमभिव्याप्य जनान्दोलनं प्रारब्धम्। ग्रामे ग्रामे नगरे नगरे स्वविवेकेन स्वरीतया चान्दोलनमिदं जनाः समचालयन्। राजकीयभवनेषु कार्यालयेषु च स्वत्रिवर्णध्वजारोपणमेवासीन्मुख्य लक्ष्यम्। ध्वजारोपणयज्ञे बहवः युवकाः कुमाराश्च स्वप्राणान् अत्यजन्। तेषां शरीरं गुलिकाभिः हतं भूमावपतत् किन्तु ध्वजो नाऽपतत्।

पततस्तस्मात्कश्चिदन्योध्वजमगृह्णात्। तदानीन्तनमद्भुतं शौर्य्यमप्रतिमं साहसं देशप्रेम्णः लोकोत्तरं निदर्शनं प्रस्तुतं भारतीयैःस्ववक्षः प्रसार्य स्वहस्तेन च प्रदश्र्य (UPBoardSolutions.com) अत्र गुलिकां मारय’ ‘अत्र गुलिकां मारय’ इति नदन्तः कुमारवीराः आसन्। आग्नेयास्त्रेभ्यः सततं प्रक्षिप्ताः गुलिकास्तेषां गतिमवरोद्धं नाऽशक्नुवन्। गुलिकया कश्चिन्निहतश्चेपरः तत्स्थानमगृह्णात्। अहिंसयाऽनुप्राणितास्ते वीराः प्रतिरोधमकुर्वाणाः मृत्योर्वरणमकुर्वन्। इत्थमासीदस्माकं युववर्गस्य छात्राणां च मरणस्पर्धा।

शब्दार्थ-
प्रवृत्तानि जातानि = शुरू (जारी) हुए।
प्रदातुम् = प्रदान करने के लिए।
व्याजम् आलम्ब्य = बहानों का सहारा लेकर।
कालात्ययम् = समय बिताना।
सरणिम् = मार्ग को।
सद्य एव = तुरन्त ही।
निगृहीताः = पकड़ लिये गये।
प्रावर्त्तत = फैल गया।
झञ्झावातेन = आँधी-तूफान से।
सङ्क्षुब्धः = व्याकुल।
सञ्जातः = हो गया।
स्वरीत्या = अपनी रीति से।
अत्यजन् = त्याग दिये।
गुलिकाभिः = गोलियों से।
स्ववक्षः = अपनी छाती।
प्रसार्य = फैलाकर आग्नेयास्त्रेभ्यः = बन्दूकों द्वारा।
प्रक्षिप्ताः = फेंकी गयीं, दागी गयीं।
नदन्तः = चिल्लाते हुए।
प्रतिरोधम् = रुकावट।
वरणम् = चमन। मरणस्पर्धा = मरने की होड़।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में महात्मा गाँधीजी के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का रोमांचक वर्णन किया गया है।

अनुवाद
महात्मा जी के नेतृत्व में बहुत-से आन्दोलन शुरू हुए, तो भी विदेशी शासकों ने स्वतन्त्रता प्रदान करने में रुचि नहीं दिखायी। अनेक प्रकार के बहाने बनाकर वे समय ही व्यतीत करते रहे। इसलिए सन् 1942 ईसवी में अगस्त महीने की 8 तारीख को बम्बई (अब मुम्बई) नगर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा जी ने घोषणा की “अंग्रेजो! भारत छोड़ो।” “भारत छोड़ो’ इस नाम से प्रसिद्ध इस आन्दोलन ने भारत की स्वतन्त्रता का मार्ग सरल कर दिया। तत्काल ही वहाँ उपस्थित नेहरू, आजाद, पटेल, प्रसाद, देसाई (UPBoardSolutions.com) आदि प्रमुख नेताओं को महात्मा जी के साथ पकड़ लिया गया और जेल में बन्दी बना दिया गया। यह समाचार बिजली की गति से भारतवर्ष के लोगों में फैल गया। सारा देश तूफान से विक्षुब्ध सागर की तरह क्षुब्ध हो गया। नेताओं के बिना भी सम्पूर्ण देश में
जनान्दोलन शुरू हो गया। गाँव-गाँव में, नगर-नगर में अपने विवेक से और अपने ढंग से लोगों ने इस ‘ आन्दोलन को चलाया। सरकारी इमारतों और दफ्तरों पर अपना तिरंगा झण्डा फहराना ही इस | (आन्दोलन) का मुख्य लक्ष्य था। ध्वज को फहराने के यज्ञ में बहुत-से युवकों और बालकों ने अपने । प्राण न्योछावर कर दिये।

उनका शरीर गोलियों से घायल होकर भूमि पर गिरा किन्तु (उनके हाथों का) ध्वज नहीं गिरा। गिरते हुए उससे (व्यक्ति से) ध्वज कोई दूसरा ले लेता था। उस समय अद्भुत वीरता और अतुल साहस को दिखाकर भारतीयों ने देश-प्रेम का अलौकिक उदाहरण प्रस्तुत किया। अपनी छाती को फैलाकर और अपने हाथ से दिखाकर “यहाँ गोली मारो, यहाँ गोली मारो” इस प्रकार वीर बालक चिल्ला रहे थे। बन्दूकों से लगातार (UPBoardSolutions.com) फेंकी (चलायी) गयी गोलियाँ भी उनकी गति को नहीं रोक सकीं। यदि कोई गोली से मरता तो दूसरा उसका स्थान ले लेता था। अहिंसा से अनुप्राणित उन वीरों ने प्रतिरोध न करते हुए मृत्यु का वरण किया। इस प्रकार यह हमारे युवावर्ग और छात्रों के मरने की होड़ थी।

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(16) अनेनाप्रतिमेनात्मोत्सर्गकर्मणा वैदेशिकशासनं प्रकम्पते स्म। सप्तचत्वारिंश| दुत्तरैकोनविंशतिशततमे अगस्तमासस्य पञ्चदशदिनाङ्के भारतस्य शासनं भारतीयेभ्यः समर्थ्य वैदेशिकाः शासकाः स्वदेशं गताः। भारतं स्वतन्त्रमभवत्।।

शब्दार्थ-
आत्मोत्सर्गकर्मणा = आत्मबलिदान के कार्य से।
प्रकम्पते स्म = काँप गया।
समर्थ्य = सौंपकर।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
इस अतुलनीय आत्म-बलिदान के कार्य से विदेशियों का शासन काँप गया। सन् 1947 ईसवी में अगस्त महीने की 15 तारीख को विदेशी शासक भारत के शासन को भारतीयों को सौंपकर अपने देश को चले गये। भारत स्वतन्त्र हो गया।

(17) सः स्वसत्याग्रहेण राजनीतिकं सामाजिकमार्थिकञ्च स्वातन्त्र्यं प्राप्तुं प्रायतत। अफ्रिकादेशादागत्य स अहमदनगरस्यान्तिके साबरमतीनद्यतटे आश्रमं स्थापितवान्। तत्र त्रिविधं लक्ष्यमभिलक्ष्य नराः नार्यश्च शिक्षिताः जाताः, पश्चादसावाश्रमः वर्धासमीपं सेवाग्राममानीतः। (UPBoardSolutions.com) तत्र राजनीतिककार्यक्रमात्पृथक् रचनात्मक कार्यक्रमः तेन प्रारब्धः। स्वदेशिवस्तूनामुपयोगः ग्रामोद्योगस्य प्रचारः दारिद्रयान्मुक्तेरुपायश्च गान्धिना समुपदिष्टाः। तेन चर्खायन्त्रेण कार्पाससूत्रनिर्माणं प्रशिक्षितम्। वैदेशिकशासने भारतीयहस्तशिल्पं वस्तूनिर्माणकलाकौशलं विनष्टम्। तत्पुनरुज्जीव्यैव दारिद्रयान्मुक्तिः सम्भवेति तस्य दृढ़ो विचारः आसीत्। एतदर्थ स आधारभूत

कलाकौशलसम्पृक्तां शिक्षानीतिं प्रास्तौत्। अज्ञानादेवीस्पृश्यतादिदोषाः समाजे समुत्पन्नाः | शिक्षया एव तदूरीकर्तुं शक्यन्ते इति तेनोक्तम्।

शब्दार्थ-
प्रायतत = प्रयत्न किया।
अन्तिके = पास।
अभिलक्ष्य = सामने रखकर।
समुपदिष्टाः = उपदेश दिया।
कार्पाससूत्रनिर्माणम् = सूती धागा बनाना।
तत्पुनरुज्जीव्यैवे (तत् + पुनः + उज्जीव्य + एव) = उसे पुनः जीवित करके ही।
सम्पृक्तां = अच्छी प्रकार मिली हुई को।
प्रास्तौत् = प्रस्तुत किया।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी द्वारा चलाये गये रचनात्मक कार्यक्रमों का वर्णन है। |

अनुवाद
उन्होंने अपने सत्याग्रह से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्वतन्त्रता को प्राप्त करने का प्रयत्न किया। अफ्रीका से आकर उन्होंने अहमदनगर के समीप साबरमती नदी के किनारे एक आश्रम स्थापित किया था। वहाँ तीन प्रकार के लक्ष्य को लेकर नर-नारी शिक्षित हुए। बाद में यह (UPBoardSolutions.com) आश्रम वर्धा के पास सेवाग्राम, में लाया गया। वहाँ उन्होंने राजनीतिक कार्यक्रम से अलग रचनात्मक कार्यक्रम प्रारम्भ किया। गाँधी जी ने अपने देश की वस्तुओं का उपयोग, ग्रामोद्योग का प्रचार और गरीबी से छुटकारे के उपाय का उपदेश दिया।

उन्होंने चर्खा यन्त्र से सूती धागे का निर्माण करना सिखाया। विदेशियों के शासन में भारतीय हस्तकला, वस्तु-निर्माण का कला-कौशल नष्ट हो गया था। उसको पुनर्जीवित करके ही गरीबी से छुटकारा सम्भव हो सकता है, यह उनका दृढ़ विचार था। इसके लिए उन्होंने बुनियादी कला-कौशल से मिली शिक्षा-नीति को प्रस्तुत किया। “अज्ञान से ही छुआछूत आदि दोष समाज में उत्पन्न हुए हैं, शिक्षा से ही उन्हें दूर किया जा सकता है, ऐसा उन्होंने बताया।

(18) स्वमनसि भारतभुवः प्रकल्पिततस्या चित्रस्यानुरूपं भारतराष्ट्रं द्रष्टुं स कामयते स्म। अतस्तेन भारते रामराज्यस्य कल्पना कृता। तस्मिन् कश्चिद् दीनः, न कश्चिद् दुःखी, न कश्चिद्बुधः, न वा कश्चिद् गुणहीनः भविष्यति। श्रमं प्रति प्रतिष्ठा सर्वान्प्रति समदर्शित्वं दलितान् शोषितान्प्रति स्नेहः (UPBoardSolutions.com) साधनस्यापि पवित्रत्वं सर्वधर्मान्प्रति सहिष्णुतादिभावाः तस्य , जीवनदर्शनस्याङ्गभूता आसन्। |

शब्दार्थ
स्वमनसि = अपने मन में।
प्रकल्पितं = कल्पना किया गया।
कामयते स्म = चाहते थे।
अबुधः = अंज्ञानी।
समदर्शित्वम् = समान दृष्टित्व।
अङ्गभूताः = प्राणभूत या मुख्य आधार।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी की रामाराज्य की कल्पना का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
वे अपने मन में भारतभूमि के कल्पित चित्र के अनुसार ही भारत राष्ट्र को देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारत में रामराज्य की कल्पना की थी। उसमें न कोई दीन, न कोई दुःखी, न कोई अज्ञानी अथवा न कोई गुणहीन होगा। श्रम की प्रतिष्ठा, सबके प्रति समानदर्शिता, दलितों और शोषितों के प्रति स्नेह, साधनों की भी पवित्रता, सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता आदि का भाव उनके जीवन-दर्शन के अंगभूत (अंगस्वरूप) थे।

(19) महात्मना गान्धिना प्रदर्शितो मार्गे व्यापको वर्तते। तत्प्रदर्शितमार्गमनुसृत्यैव वयं स्वराष्ट्रस्याभ्युत्थानं विधातुं शक्नुमः।त्रयस्त्रिंशद्वर्षाणि यावद वैदेशिकैः शासकैः सह सङ्घर्षरत अष्टचत्वारिंशदूत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे जनवरीमासस्य त्रिंशे दिनाङ्के भारतीयेनैव केनचिन्मत्तेन दिल्लीनगरे हिंसितः (UPBoardSolutions.com) ‘हे राम’ इत्युच्चरन् मृत्युलोकमुत्सृज्य दिवङ्गतः। तत्प्रज्वालितं ज्योतिः विश्वस्मिन् विश्वे मानवजातेः परित्राणाय सततं प्रकाशं दास्यतीति नाऽत्र संशयलेशः।

शब्दार्थ-
अनुसृत्यैव (अनुसृत्य + एव) = अनुसरण करके ही।
अभ्युत्थानं = उन्नति।
विधातुं = करने के लिए।
शक्नुमः = सकते हैं।
त्रयस्त्रिंशद्वर्षाणि = तैंतीस वर्ष।
यावत् = तक।
उन्मत्तेन = पागल द्वारा।
हिंसितः = मारे गये।
उत्सृज्य = छोड़कर।
दिवंगत = स्वर्ग को चले गये।
प्रज्वालितं = जलाया हुआ।
विश्वस्मिन्= इस संसार में।
परित्राणाय = रक्षा के लिए।
संशयलेशः = थोड़ा-सा भी सन्देह।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी की हत्या किये जाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
महात्मा गाँधी के द्वारा दिखाया गया मार्ग व्यापक है। उनके द्वारा दिखाये गये मार्ग का अनुसरण करके ही हम अपने राष्ट्र की उन्नति करने में समर्थ हो सकते हैं। | तैंतीस वर्ष तक विदेशी शासकों के साथ संघर्ष करते हुए सन् 1948 ईसवी में जनवरी महीने की तीस तारीख को किसी एक (UPBoardSolutions.com) उन्मत्त (विक्षिप्त) भारतवासी के द्वारा ही दिल्ली नगर में मारे गये, ‘हे राम’ का उच्चारण करते हुए मनुष्यलोक को छोड़कर स्वर्ग सिधार गये। उनके द्वारा जलाई गयी ज्योति इस संसार में मानव-जाति की रक्षा के लिए निरन्तर प्रकाश देगी, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1
गाँधी जी के प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत ‘प्रारम्भिक जीवन’ शीर्षक देखें।

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प्ररन 2
महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका में किये गये कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों और अंग्रेजों की रंग-भेद की नीति को देखकर गाँधी जी को बहुत दु:ख हुआ। गाँधी जी ने वहाँ अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने हेतु सत्याग्रह
आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। इससे वहाँ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जन-जागृति उत्पन्न हुई। सन् 1919 ई० में वे भारत वापस लौट आये।

प्ररन 3
गाँधी जी के चम्पारन आन्दोलन के विषय में लिखिए। या महात्मा गाँधी को ‘राष्ट्रपिता’ किस कारण कहा गया?
उत्तर
संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत ‘चम्पारन आन्दोलन’ शीर्षक देखें।

प्ररन 4
महात्मा गाँधी द्वारा ‘असहयोग आन्दोलन’, ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ और ‘ ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ कब-कब किये गये? इनका संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर
संकेत-‘पाठे-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत इन आन्दोलनों से सम्बद्ध अनुच्छेद देखें।

We hope the UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 4 राष्ट्रपिता महात्मा गन्धी  (गद्य – भारती) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 4 राष्ट्रपिता महात्मा गन्धी (गद्य – भारती), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

Class 9 Sanskrit Chapter 11 UP Board Solutions बुद्धिर्यस्य बलं तस्य Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 11 बुद्धिर्यस्य बलं तस्य (कथा – नाटक कौमुदी) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 11 बुद्धिर्यस्य बलं तस्य (कथा – नाटक कौमुदी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 11
Chapter Name बुद्धिर्यस्य बलं तस्य (कथा – नाटक कौमुदी)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 11 Buddhiryasya Balam Tasya Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 11 हिंदी अनुवाद बुद्धिर्यस्य बलं तस्य के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय– संस्कृत-साहित्य में कथाओं के माध्यम से न केवल मानव अपितु पशु-पक्षियों की सहज प्रकृति पर भी पर्याप्त सामग्री प्राप्त होती है। ये कथाएँ प्रायः नीतिपरक, उपदेशात्मक और मनोरंजक होती हैं। इस प्रकार के कथा-ग्रन्थों में शुक-सप्तति’ का उल्लेखनीय स्थान है। इसमें 70 कथाओं का संग्रह किया गया है। ये कथाएँ एक तोते के मुख से हरिदत्तं सेठ के पुत्र मदनविनोद की पत्नी के लिए कही गयी हैं। इस ग्रन्थ के लेखक और इसके रचना-काल के विषय में विश्वस्त सामग्री का अभाव है। इसका परिष्कृत और विस्तृत संस्करण श्री चिन्तामणि (UPBoardSolutions.com) भट्ट की रचना प्रतीत होती है तथा संक्षिप्त संस्करण किसी श्वेताम्बर जैन लेखक की। हेमचन्द्र (1088-1172 ई०) ने शुक-सप्तति’ का उल्लेख किया है तथा ‘तूतिनामह’ नाम से यह ग्रन्थ चौदहवीं शताब्दी में फारसी में अनूदित हुआ था। अतः इस ग्रन्थ की रचना काल 1000-1200 ई० के मध्य जाना चाहिए। इस ग्रन्थ की सभी कथाएँ कौतूहलवर्द्धक तथा मनोरंजन हैं। भाषा सरल, सुबोध तथा प्रवाहमयी है। । प्रस्तुत कहानी ‘शुक-सप्तति’ नामक कथा-ग्रन्थ से संगृहीत है। इस कथा में व्याघ्रमारी बुद्धि के प्रभाव से वन में बाघ और शृगाल जैसे हिंसक जीवों से अपनी और अपने पुत्रों की रक्षा करती है।

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पाठ सारांश  

व्याघ्रमारी का परिचय– देउल नाम के किसी गाँव में राजसिंह नाम का एक राजपूत रहता था। उसकी पत्नी बहुत झगड़ालू थी, इसीलिए उसका नाम कलहप्रिया था। वह एक दिन अपने पति से झगड़कर अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर अपने पिता के घर की ओर चल दी। वह ग्राम, नगरों और वनों को पार करती हुई मलय पर्वत के पास उसकी तलहटी में स्थित एक महावन में पहुँची।

व्याघ्र का मिलना- उस वन में उस कलहप्रिया ने एक व्याघ्र को देखा। उसे तथा उसके पुत्रों को देखकर व्याघ्र उनकी ओर झपटा। उस स्त्री ने व्याघ्र को अपनी ओर आता देखकर अपने पुत्रों को चाँटा मारकर कहा कि तुम दोनों क्यों एक-एक व्याघ्र के लिए झगड़ते हो। लो, एक व्याघ्र आ गया है। अभी इसे ही आधा-आधा बाँटकर खा लो। बाद में कोई दूसरा देखेंगे।

भागते हुए व्याघ्र को सियार का मिलना- ऐसा समझकर कि ‘यह कोई व्याघ्रमारी है’, व्याघ्र डरकर भाग गया। उसे भय से भागता हुआ देखकर एक सियार ने हँसकर कहा-“अरे व्याघ्र! किससे डरकर भागे जा रहे हो।’ व्याघ्र ने उससे कहा कि जिस व्याघ्रमारी के बारे में मैंने शास्त्रज्ञों से सुन रखा था, (UPBoardSolutions.com) आज उसे स्वयं देख लिया। इसी डर से भागा जा रहा हूँ। तुम भी घने वन में जाकर छिप जाओ। सियार ने कहा कि आप उस धूर्त स्त्री के पास पुनः चलिए। वह आपकी ओर देखेगी भी नहीं। यदि उसने ऐसा किया तो आप मुझे जान से मार दीजिएगा।

व्याघ्र का सियारसहित व्याघमारी के पास पुनः आना- व्याघ्र ने गीदड़ से कहा कि यदि तुम मुझे उसके पास छोड़कर भाग आये तो। सियार ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो आप मुझे अपने गले में बाँध लीजिए। व्याघ्र सियार को अपने गले में बाँधकर पुनः ले गया। व्याघ्रमारी सियार को देखते ही समझ गयी कि यही व्याघ्र को लेकर वापस आया है। अत: वह सियार को ही फटकारती हुई बोली कि तूने मुझे पहले तीन बाघ देने को कहा था और अब एक ही लेकर आ रहा है। ऐसा कहकर व्याघ्रमारी तेजी से उसकी ओर दौड़ी। उसे अपनी ओर आता हुआ देखकर गले में सियार को बाँधा हुआ व्याघ्र वैसे ही फिर भाग खड़ा हुआ। ।

व्याघ्र और सियार का अलग होना– व्याघ्र के गले में बँधा हुआ सियार उसके बेतहाशा भागने के कारण भूमि पर रगड़ खा-खाकर लहू-लुहान हो गया। बहुत दूर जाकर वह अपने को छुड़ाने की इच्छा से वह जोर से हँसा। व्याघ्र ने जब उससे हँसने का कारण पूछा तब उसने कहा कि आपकी कृपा से (UPBoardSolutions.com) ही मैं भी सकुशल इतनी दूर आ गया। अब वह पापिनी यदि हमारे खून के निशानों का पीछा करती हुई आ गयी तो हम जीवित न बचेंगे। इसीलिए मैं हँस रहा था। उसकी बात को ठीक मानकर व्याघ्र सियार को छोड़कर अज्ञात स्थान की ओर भाग खड़ा हुआ। सियार ने भी जीवन के शेष दिन सुख से व्यतीत किये।

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चरित्र-चित्रण

व्याघ्रमारी

परिचय– व्याघ्रमारी देउल ग्राम के राजसिंह की झगड़ालू पत्नी है। झगड़ालू प्रवृत्ति की होने के कारण ही लेखक ने उसका नाम कलहप्रिया रखा है। उसकी चरित्रगत विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(1) क्रोधी स्वभाव- व्याघ्रमारी क्रोधी स्वभाव की स्त्री है। यही कारण है कि वह अत्यधिक झगड़ालू है। क्रोध में आकर वह गृह-त्याग जैसा त्रुटिपूर्ण कदम उठाने में भी नहीं हिचकिचाती है। क्रोधान्धता के वशीभूत होकर ही वह पिता के घर पहुँचने के स्थान पर वन में पहुँच जाती है।

(2) यथा नाम तथा गुण- कलहप्रिया पर ‘यथा नाम तथा गुण वाली कहावत अक्षरश: चरितार्थ होती है। वह किसी से भी कलह करने में संकोच नहीं करती है। घर पर वह अपने पति से कलह करती है तो जंगल में व्याघ्र और सियार में भी कलह करा देती है। उसका व्याघ्रमारी नाम भी सार्थक-सा प्रतीत होता है; क्योंकि वह व्याघ्र जैसे शक्तिशाली पशु को भी अपने बुद्धि-चातुर्य से भयभीत कर मैदान छोड़कर भाग जाने के लिए विवश कर देती है।

(3) निर्भीक- निर्भीकता उसके रोम-रोम में समायी प्रतीत होती है। पति से झगड़ा करके अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर वन-मार्ग से होते हुए अपने पिता के घर जाने का उसका निर्णय तथा जंगल में व्याघ्र एवं सियार जैसे हिंसक पशुओं को देखकर भी न घबराना, उसकी निर्भीकता का स्पष्ट प्रमाण (UPBoardSolutions.com) है। यदि वह तनिक भी डर जाती तो उसकी और उसके पुत्रों की जान अवश्य चली जाती; जब कि उसकी निर्भीकता के कारण व्याघ्र स्वयं ही अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ।

(4) बुद्धिमती- उसका असाधारण बुद्धिमती होना भी उसके चरित्र का मुख्य गुण है। अपने बुद्धि-चातुर्य से वह व्याघ्र जैसे हिंसक पशु को भयभीत करके उन्हें भाग जाने के लिए विवश करती है। और अपनी तथा अपने पुत्रों की प्राणरक्षा करती है।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि व्याघ्रमारी (कलहप्रिया) जहाँ एक लड़ाकू और कलह- कारिणी स्त्री है वहीं वह एक निर्भीक, क्रोधी, शीघ्र निर्णय लेने वाली और विपत्ति में भी धैर्य धारण करने वाली वीरांगना है।

शृगाल

परिचय- शृगाल जंगल का छोटा-सा हिंसक जीव है। वह भय से भागते व्याघ्र को मार्ग में मिलता है और व्याघ्र से उसके भय का कारण पूछता है। अपनी धूर्तता से वह स्वयं अपने प्राण भी संकट में डाल लेता है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) महाधूर्त- जंगल के जीवों में शृगाल को सबसे धूर्त जीव माना जाता है। प्रस्तुत पाठ का पात्र शृगाल भी इस अवधारणा पर खरा उतरता है। भय से भागते व्याघ्र को देखकर उसकी हँसी से उसकी धूर्तता का बोध होता है। उसकी धूर्तता तब चरम सीमा पर पहुँच जाती है, जब वह व्याघ्र को अपनी (UPBoardSolutions.com) बातों में फंसाकर पुनः कलहप्रिया के निकट ले जाता है। व्याघ्र के डर जाने और कलहप्रिया की निर्भीकता क़ा दण्ड उसे स्वयं भी घायल होकर भुगतना पड़ता है।

(2) निर्भीक एवं साहसी- धूर्त होने के साथ-साथ उसमें निर्भीकता एवं साहस जैसे गुण भी विद्यमान हैं। अपने से कई गुना शक्तिशाली व्याघ्र पर हँसना, व्याघ्र को पुनः कलहप्रिया के पास लेकर आना उसकी निर्भीकता एवं साहस की पुष्टि के लिए पर्याप्त हैं।

(3) बुद्धिमान्- बुद्धिमानी उसका विशिष्ट गुण है। अपनी बुद्धि के द्वारा ही वह व्याघ्र को पुनः कलहप्रिया के पास लाने में सफल हो जाता है और व्याघ्र के गले में बँधा हुआ भी व्याघ्र से अपने प्राणों की रक्षा कर लेता है, यह उसके बुद्धिमान् होने को दर्शाता है।

(4) धैर्यशाली–विपत्ति के समय में भी शृगाल धैर्य को नहीं त्यागता है। व्याघ्र के गले में बँधा हुआ लहूलुहान होने पर भी वह घबराता नहीं है। धैर्यपूर्वक वह अपनी मुक्ति का उपाय सोचता है और अन्ततः अपने प्राणों की रक्षा करने में सफल हो जाता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शृगाल में उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त वाक्पटु, शीघ्र निर्णय लेना इत्यादि गुण विद्यमान हैं।

व्याघ्र

परिचय–प्रस्तुत पाठे के पात्रों में कलहप्रिया के पश्चात् व्याघ्र ही दूसरा प्रमुख पात्र है। वह जंगल का हिंसक, किन्तु मूर्ख जीव है। उसके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं|

(1) मूर्ख- शक्तिशाली जीव होते हुए भी व्याघ्र मूर्ख है। उसकी मूर्खता का उद्घाटन उस समय होता है, जब वह व्याघ्रमारी द्वारा अपने बेटों को उसे खा लेने का आदेश देते सुनकर ही भाग खड़ा होता है। वह यह भी नहीं सोच पाता कि दो छोटे निहत्थे बालक और एक स्त्री कैसे उसे मारकर खा जाएँगे। ..

(2) भीरु– व्याघ्र बलशाली अवश्य है, किन्तु अत्यधिक भीरु. भी है। कलहप्रिया द्वारा उसको मारकर खा जाने के कथनमात्र से ही वह घबरा जाता है। अपने भीरु स्वभाव के कारण वह अपनी शक्ति को भी भूल जाता है। शृगाल से जंगल में कहीं छिपकर जान बचाने के उसके कथन से भी उसकी भीरुता का बोध होता है।

(3) शक्ति के मद में चूर– व्याघ्र को अपनी शक्ति पर गर्व है। कलहप्रिया को दो बच्चोंसहित देखकर वह फूला नहीं समाता। उन्हें खाने के लिए वह बड़ी वीरता के साथ अपनी पूँछ को भूमि पर पटकता है और तत्पश्चात् उनकी ओर झपटता है। धरती पर पूँछ को पटकना ही उसके शक्ति-मद को इंगित करता है।

(4) अविवेकी- अपने ऊपर उल्लिखित दुर्गुणों के साथ-साथ वह अविवेकी भी है। उसका कोई भी कार्य विवेक से पूर्ण नहीं लगता, चाहे कलहप्रिया को खाने के लिए झपटने का उसका निर्णय हो अथवा शृगाल को गले में बाँधकर पुनः कलहप्रिया के पास आने का निर्णय। मात्र अविवेकी होने के (UPBoardSolutions.com) कारण ही वह दोनों बार भय को प्राप्त होता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि व्याघ्र झूठी मान-प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने वाला अविवेकी, शक्ति के मद में चूर, भीरु और मूर्ख जीव है।।

लघु उत्तरीय संस्कृत प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्‍नो के उत्तर संस्कृत में लिखिए

प्रश्‍न 1
राजसिंहो नाम राजपुत्रः कुत्र अवसत्?
उत्तर
राजसिंहो नाम राजपुत्र: देउलाख्ये ग्रामे अवसत्।

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प्रश्‍न 2
व्याघ्रः कलहप्रियां दृष्ट्वा किम् अकरोत्?
उतर
व्याघ्रः कलहप्रियां दृष्ट्वा पुच्छेन भूमिमाहत्य धावितः।

प्रश्‍न 3
व्याघ्रो जम्बुकं किं कर्तुम् अकथयत्?
उत्तर
व्याघ्रः जम्बुकं किञ्चिद् गूढप्रदेशं गन्तुम् अकथयत्।

प्रश्‍न 4
व्याघमारी जम्बुकं प्रति किं चिन्तितवती?
उत्तर
व्याघ्रमारी चिन्तितवती यदयं व्याघ्रः मृगधूत्तेन आनीतः।

प्रश्‍न 5
व्याघमारी शृगालं किम् अकथयत्?
उत्तर
व्याघ्रमारी शृगालम् अकथयत् यत् त्वया पुरा मह्यं व्याघ्रत्रयं दत्तम्, अद्य त्वम् एकमेव कथम् आनीतवान्।।

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प्रश्‍न 6
जम्बुकेन स्वप्राणान्त्रातुं किं कृतम्?
उत्तर
जम्बुकेन स्वप्राणान् त्रातुं उच्चैः हसितम् उक्तञ्च यदि साऽस्मद्रक्तस्रावसंलग्ना पापिनी पृष्टत: समेति तदा कथं जीवितव्यम्।।

वस्तुनिष्ठ प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए।

1. ‘बुद्धिर्यस्य बलं तस्य’ पाठ किस ग्रन्थ से उधृत है?
(क) कथासरित्सागर’ से
(ख) “शुक-सप्तति’ से।
(ग) ‘पञ्चतन्त्रम्’ से
(घ) “हितोपदेशः’ से ।

2. शुकसप्तति में कुल कितनी कथाएँ संगृहीत हैं और यह किसके मुख से कही गयी हैं?
(क) सत्रह, कबूतर के मुख से ।
(ख) संतासी, मैना के मुख से
(ग) सत्ताइस, शृगाल के मुख से ।
(घ) सत्तर, शुक के मुख से ।

3. राजसिंह किस गाँव का निवासी था?
(क) रामपुर ग्राम का
(ख) शिवपुर ग्राम का
(ग) देउलाख्य ग्राम का ।
(घ) कुसुमपुर ग्राम का

4. कलहप्रिया किसके साथ अपने पिता के घर की ओर चली?
(क) अपने पति के साथ
(ख) अपने सेवक के साथ
(ग) अपने पिता के साथ
(घ) अपने दो पुत्रों के साथ

5. कलहप्रिया ने महाकानन में व्याघ्र को देखकर अपने पुत्रों को चपत लगाकर क्या कहा?
(क) तुम खाना खाने के लिए क्यों लड़ रहे हो।
(ख) तुम बिना बात के क्यों लड़ रहे हो ।
(ग) तुम मार खाने के लिए क्यों लड़ रहे हो।
(घ) तुम एक-एक व्याघ्र को खाने के लिए क्यों लड़ रहे हो

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6. व्याघ्र ने कलहप्रिया को क्या समझा?
(क) अश्वमारी
(ख) गजमारी
(ग) व्याघ्रमारी
(घ) शृगालमारी

7. बाघ को भागता हुआ देखकर शृगाल ने क्या किया?
(क) वह हँसने लगा।
(ख) वह रोने लगा
(ग) उसने बाघ को धैर्य बँधाया
(घ) उसने क्रोध किया

8. कथाकार ने व्याघ्र पर हँसते हुए जम्बुक( सियार) को क्या कहा है?
(क) बुद्धिमान्
(ख), धूर्त
(ग) मृगधूर्त
(घ) शृगाल

9. दुबारा कलहप्रिया के पास जाते हुए बाघ ने क्या किया?
(क) शृगाल को अपने आगे कर लिया
(ख) शृगाल को अपनी पूंछ से बाँध लिया
(ग) शृगाले को अपने गले में बाँध लिया।
(घ) शृगाल की गर्दन पकड़ ली

10. दौड़ते हुए बाघ के गले से छूटने के लिए सियार ने क्या किया?
(क) वह जोर से रोने लगा
(ख) उसने बाघ से निवेदन किया
(ग) वह हँसने लगा।
(घ) उसने मरने का ढोंग किया

11.’•••••••••••••राजसिंहस्य भार्या आसीत्?’ वाक्य में रिक्त-पद की पूर्ति होगी
(क) “कलहप्रिया’ से
(ख) “शान्तिप्रिया’ से
(ग) “भानुप्रिया’ से
(घ) “माधुर्य प्रिया’ से

12. ‘यदि त्वं मां मुक्त्या यासि तदा वेलाप्यवेला स्यात्।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) व्याघ्रः
(ख) शृगालः
(ग) व्याघ्रमारी
(घ) कश्चित् नास्ति

13. ‘तर्हि मां निज ……………… बद्ध्वा चल शीघ्रम्।’ वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी
(क) ‘हस्ते से
(ख) “पृष्ठे’ से
(ग) “गले’ से
(घ) “पादे’ से

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14. ‘तदा मम त्वदीया वेला स्मरणीया।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) जम्बुकः
(ख) व्याघ्रः
(ग) व्याघ्रमारी
(घ) कश्चित् नास्ति

15. ‘यतो हि व्याघमारीति या ………………भूयते।’ में वाक्य-पूर्ति होगी
(क) “शास्ये’ से
(ख) ‘लोके से
(ग) ‘पुराणे’ से
(घ) “जना’ से

16. ‘रे रे धूर्त ••••••••••••दत्तं मह्यं व्याघ्रत्रयं पुरा।’ में वाक्य-पूर्ति का पद है–
(क) त्वम्
ख) मया
(ग) त्वया ।
(घ) अहम् । 

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Class 9 Sanskrit Chapter 6 UP Board Solutions कपिलोपाख्यानम् Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 6 कपिलोपाख्यानम् (पद्य-पीयूषम्) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 6 कपिलोपाख्यानम् (पद्य-पीयूषम्).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 6
Chapter Name कपिलोपाख्यानम् (पद्य-पीयूषम्)
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 6 Kapilopakhyan Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 हिंदी अनुवाद कपिलोपाख्यानम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय–वेदों के अर्थ को सरल एवं सरस बनाने हेतु महर्षि व्यास ने अठारह पुराणों की रचना की। इन्हीं अठारह पुराणों में स्कन्दपुराण का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। भौगोलिक क्षेत्रों का विस्तृत और विशद विवरण प्रस्तुत करना इस पुराण के विविध खण्डों का वैशिष्ट्य है। इस बृहत्काय पुराण में वेदों की (UPBoardSolutions.com) सामग्री पर्याप्त रूप में मिलती है। यह रचयिता के अलौकिक वैदुष्य का परिचायक है। प्रस्तुत पाठ इसी । पुराण से संकलित है। इस पाठ में कपिला नाम की गाय के माध्यम से सत्यवचन का महत्त्व बताया गया है।

पाठ-सारांश

कपिला का अपने यूथ से बिछड़ना-कपिला नाम की एक धेनु अपने यूथ (समूह) के साथ चरने के लिए वन में गयी थी। हरी-हरी घास चरती हुई वह अपने समूह से बिछुड़कर एक भयंकर गुफा में पहुँच जाती है। जहाँ वह भयंकर दाढ़ों वाले एक बाघ को देखकर डर जाती है।

कपिला का विलाप करना-बाघ को देखकर कपिला गोकुल में बँधे अपने दुधमुंहे बछड़े को स्मरण कर रोने लगती है। विलाप करती हुई गाये को देखकर बाघ ने कहा- “हे धेनो! तुम क्यों व्यर्थ रोती हो? मेरे पास पहुँचने के बाद अब तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते। इसलिए अब तुम अपने जीवन की आशा छोड़ दो और अपने इष्ट देवता का स्मरण करो।”

कपिला का सिंह से वार्तालाप-कपिला ने बाध से कहा कि मैं अपने प्राणों के भय से नहीं रो रही हूँ। गौशाला में दुग्ध पीने वाला बछड़ा नित्य की भाँति मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा। मैं उसे दूध पिलाकर और स्वजनों से मिलकर पुन: लौट आऊँगी। बाघ ने कहा कि तुम्हारी बात का कैसे विश्वास कर लिया (UPBoardSolutions.com) जाए। यदि तुम वापस नहीं लौटी, तो। कपिला ने कहा कि आपका सन्देह उचित ही है। लेकिन मैं आपसे शपथपूर्वक कहती हूँ कि मैं आपके पास लौटकर अवश्य आऊँगी। बाघ ने उसकी शपथ पर विश्वास कर उसे उसके कुल में जाने की अनुमति दे दी।

कपिला का बाड़े में आकर बछड़े को दूध पिलाना-बाघ के द्वारा अनुमति पाकर कपिला पुत्र-प्रेम से विह्वल होकर तीव्र गति से बाड़े की ओर चल दी। उसके शब्द को सुनकर उसका बछड़ा

अपनी पूँछ उठाकर प्रसन्न होता हुआ माँ के सामने आया और बोला कि माँ आज कैसे देर हो गयी? कपिला ने उसे तृप्ति के साथ दूध पीने को कहा और उसके बाद उसे सारी बात कह सुनायी और बताया कि मैं तुम्हारे प्रेम के कारण ही यहाँ आयी हूँ। मुझे अपना जीवन मायावी बाघ को देना है। इसके बाद बछड़े और अन्य प्रिय जनों से विदा लेकर वह बाघ के पास लौटने को तैयार हुई।

बाघ का कपिला को जीवन-दान देना—अपने वचने का निर्वाह कर आती हुई कपिला को देखकर बाघ के नेत्र प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो उठे। उसने हर्ष से गद्गद् होकर नम्रतापूर्वक कहा कि

हे कल्याणि! तुम्हारा स्वागत है। तुमने सत्य वचन का निर्वाह किया है। सत्य बोलने वाले और उनका निर्वाह करने वाले का कहीं भी अशुभ नहीं हो सकता। अतः तुम जाओ, मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ। तुम लौटकर वहीं पहुँचो जहाँ तुम्हारा वत्स (पुत्र) और तुम्हारे प्रियजन हैं।”

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

(1)
तत्रैका गौः परिभ्रष्टा स्वयूथात्तृणतृष्णया।
कपिलेति च विख्याता स्वयूथस्याग्रगामिनी ॥

शब्दार्थ
परिभ्रष्टा = बिछुड़ गयी,
अलग हो गयी।
स्वयूथात् = अपने समूह से।
तृणतृष्णया = घास खाने के लालच में
विख्याता = प्रसिद्ध।
अग्रगामिनी = आगे चलने वाली।

सन्दर्थ-
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ में संगृहीत ‘कपिलोपाख्यानम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत-इस पाठ के शेष श्लोकों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रंस्तुत श्लोक में बताया गया है कि कपिला नाम की गाय अपने समूह के साथ पर्वत पर चरने गयी थी।

अन्वय
तत्र स्वयूथस्य अग्रगामिनी ‘कपिला’ इति विख्याता एका गौः तृणतृष्णया स्वयूथात् परिभ्रष्टा। | व्याख्या-वहाँ अर्थात् उस पर्वत पर, अपने झुण्ड के आगे चलने वाली ‘कपिला’ इस नाम से प्रसिद्ध एक गाय घास खाने के लालच में अपने समूह से बिछुड़ गयी।।

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(2)
अच्छिन्नाग्रतृणम् या तु सदा भक्षयते नृप।
अथ सा गह्वरं प्राप्ता गिरेः शून्यं भयङ्करम् ॥ 

शब्दार्थ
अच्छिन्नाग्रतृणम् = न काटी हुई नोक वाली घास को।
सदा भक्षयते = सदा खाती है।
अथ = पश्चात्।
गह्वरम् = गुफा में।
प्राप्ता = पहुँची।
गिरेः = पर्वत की।
शून्यं = निर्जन, सूनसान।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाय के अपने समूह से बिछड़कर एक गुफा में प्रवेश कर जाने का वर्णन है।

अन्वय
हे नृप! या सदा अच्छिन्नाग्रतृणम् भक्षयते, सा अथ गिरेः शून्यं भयङ्करं गह्वरं प्राप्ता।

व्याख्या
हे राजन्! जो गाय सदा न काटी हुई नोक वाली घास को खाती है, वह अब पर्वत की सुनसान भयंकर गुफा में पहुँच गयी। तात्पर्य यह है कि अनुकूल परिस्थितियों में रहने वाली गाय प्रतिकूल परिस्थितियों में फँस गयी।

(3)
तत्राससाद तां व्याघ्रो दंष्ट्ोत्कटमुखावहः ।
सा तं दृष्टवती पापं त्रासमाप मृगीव हि ॥

शब्दार्थ
तत्र = उस गुफा में।
आससाद = प्राप्त किया।
व्याघ्रः = बाघ ने।
दंष्टोत्कटमुखावहः = भयंकर दाढ़ के कारण भयंकर मुख को धारण करने वाला।
तं = उस।
दृष्टवती = देखा।
पापं = दुष्ट को।
त्रासम् = डर।
आप = प्राप्त किया।
मृगीव (मृगी + इव) = हिरनी के समान।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में एक बाघ को देखकर कपिला के डर जाने का वर्णन किया गया है।

अन्वय
तत्र दंष्टोत्कटमुखावह: व्याघ्रः ताम् आससाद। (सा) तं पापं दृष्टवती, मृगी इव त्रासम् आप।

व्याख्या
वहाँ (उस गुफा में) निकले हुए बड़े-बड़े दाँतों (दाढ़) के कारण भयंकर मुख को धारण करने वाला एक व्याघ्र उसके पास पहुँचा। उस गाय ने उस पापी व्याघ्र को देखा तो मृगी (हिरनी) के समान डर गयी।।

(4)
स्मरन्ती गोकुले बद्धं स्व-सुतं क्षीरपायिनम् ।। 
दुःखेन रुदतीं तां स दृष्ट्वोवाच मृगाधिपः ॥

शब्दार्थ
स्मरन्तीं = स्मरण करती हुई।
गोकुले बद्धम् = गौशाला में बँधे हुए।
क्षीरपायिनम् =दूध पीने वाले।
रुदतीम् = रोती हुई (से)।
दृष्ट्वोवाच (दृष्ट्वा + उवाच) = देखकर बोली।
मृगाधिपः = सिंह। |

प्रसंग
व्याघ्र से डरकर कपिला अपने बछड़े को याद करके रोने लगती है, इसी का वर्णन इस श्लोक में हुआ है।

अन्वय
गोकुले बद्धं क्षीरपायिनं स्वसुतं स्मरन्तीं दुःखेन रुदतीं तां दृष्ट्वा सः मृगाधि उवाच।

व्याख्या
गौशाला में बँधे हुए दूध पीने वाले अपने बच्चे को यादर्कर दुःख से रोती हुई उस गाय को देखकर वह पशुओं का राजा अर्थात् व्याघ्र बोला।।

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(5)
किं वृथा रुद्यते धेनो! माम् प्राप्य नहि जीवितम्।।
विद्यते कस्यचिन्मूखें स्मरेष्टदेवतां ततः ॥

शब्दार्थ
किम् = क्यों।
वृथा = व्यर्थ।
रुद्यते = रो रही हो।
मां प्राप्य = मेरे पास पहुँचकर।
जीवितम् = जीवन।
विद्यते = रहता है।
कस्यचित् = किसी का।
स्मर = याद करो।
इष्टदेवताम् = अभीष्ट देवता को।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्याघ्र गाय को अपने इष्ट देव को याद करने को कहता है।

अन्वय
धेनो! किं वृथा रुद्यते। मूखें! मां प्राप्य कस्यचित् जीवितं न हि विद्यते। ततः इष्टदेवतां स्मर।

व्याख्या
हे गाय! तुम व्यर्थ क्यों रो रही हो? हे मूर्ख मुझे पाकर किसी का जीवन नहीं रहता है। अब तुम अपने इष्ट देवता का स्मरण करो। तात्पर्य यह है कि व्याघ्र के पास आ जाने पर किसी का भी जीवित बचना सम्भव नहीं है। इसलिए अब तुम्हें अपना अन्तिम समय समीप जानकर अपने इष्ट-देवता का स्मरण कर लेना चाहिए।

(6)
स्व-जीवितभयाद् व्याघ्र न रोदिमि कथञ्चन।
पुत्रो मे बालको गोठ्यां क्षीरपायी प्रतीक्षते ॥

शब्दार्थ
स्व-जीवितभयाद् = अपने जीवन के भय से।
रोदिमि = रो रही हूँ।
कथञ्चन = किसी भी प्रकार।
गोठ्याम् = गायों के बाड़े में।
क्षीरपायी = दूध पीने वाला दुधमुहाँ।
प्रतीक्षते = प्रतीक्षा कर रहा होगा।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कपिला गाय बाघ को अपने रोने का कारण बता रही है।

अन्वय
व्याघ्र! स्व-जीवितभयात् कथञ्चन न रोदिमि। क्षीरपायी मे बालकः पुत्रः गोठ्या प्रतीक्षते।

व्याख्या
हे बाघ! मैं अपने जीवन के भय से किसी भी तरह नहीं रो रही हैं। दूध पीने वाला मेरा छोटा बछड़ा गौशाला में मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा। तात्पर्य यह है कि गाय को अपनी मृत्यु को भय नहीं है। उसे तो चिन्ता इस बात की है कि उसका पुत्र उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा।
विशेष—इसीलिए कहा गया है कि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

(7)
पाययित्वा सुतं बालं दृष्ट्वा पृष्ट्वा जनं स्वकम्।
पुनः प्रत्यागमिष्यामि यदि त्वं मन्यसे विभो! ॥

शब्दार्थ
पाययित्वा = पिलाकर।
सुतं = पुत्र को।
बालं = बालक को।
दृष्ट्वा = देखकर।
पृष्ट्वा = पूछकर।
जनं स्वकम् = अपने परिवार के लोगों को।
प्रत्यागमिष्यामि = लौट आऊँगी। मन्यसे मानते हो।
विभो = हे स्वामिन्।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कपिला बाघ से अपने बछड़े के पास जाने की अनुमति माँग रही है।

अन्वये
विभो! यदि त्वं मन्यसे (तर्हि अहं) बालं सुतं पाययित्वा स्वकं जनं दृष्ट्वा पृष्ट्वा च पुनः प्रत्यागमिष्यामि।।

व्याख्या
(कपिला बाघ से कहती है कि) हे स्वामिन्! यदि तुम अनुमति.दो तो मैं अपने शिशु बछड़े को दूध पिलाकर तथा अपने लोगों को देखकर और उनसे पूछकर पुनः वापस आ जाऊँगी। तात्पर्य यह है कि मेरे वापस लौट आने के बाद तुम मुझे खा लेना।।

(8)
गत्वा स्वसुतसान्निध्यं दृष्ट्वात्मीयं च गोकुलम्।।
पुनरागमनं यत्ते न च तच्छुद्दधाम्यहम्॥

शब्दार्थ
गत्वा = जाकर।
स्वसुतसान्निध्यम् = अपने बछड़े के पास।
आत्मीयं = अपनों को।
पुनरागमनम् (पुनः + आगमनम्) = पुनः लौट आना।
ते = तुम्हारे।
न श्रद्दधामि = विश्वास नहीं करता हूँ।

प्रसंग
कपिला की बाड़े में जाकर लौट आने की बात पर अविश्वास व्यक्त करता हुआ.बाघ .. यह श्लोक कहता है।

अन्वय
स्वसुतसान्निध्यं गत्वा, आत्मीयं गोकुलं च दृष्ट्वा यत् ते पुनः आगमनम् तत् अहं च न श्रद्दधामि। |

व्याख्या
व्याघ्र ने कहा-अपने बच्चे के पास जाकर और अपने आत्मीय लोगों (गायों के झुण्ड) को देखकर जो तुम्हारा पुनः आना है, उस पर मैं विश्वास नहीं करता हूँ। तात्पर्य यह है कि तुम बछड़े के प्रेम का और अपने आत्मीयों का परित्याग करके पुनः आओगी, मैं इसका विश्वास नहीं कर रहा हूँ।

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(9)
शपथैरागमिष्यामि सत्यमेतच्छृणुष्व मे ।
प्रत्ययो यदि ते भूयान्मां मुञ्च त्वं मृगाधिपः॥

शब्दार्थ
शपथैः = मैं शपथपूर्वक कहती हूँ।
आगमिष्यामि = आऊँगी।
सत्यम् एतत् = इस सत्य को।
शृणुष्व = सुनो।
प्रत्ययः = विश्वास।
मां मुञ्च = मुझे छोड़ दो।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कपिला व्याघ्र को वापस लौट आने का विश्वास दिलाने के लिए शपथ खाती है।

अन्वय
मृगाधिप! शपथैः आगमिष्यामि, इति एतत् मे सत्यं शृणुष्व। यदि ते प्रत्ययः भूयात् , (तर्हि) त्वं मां मुञ्च।।

व्याख्या
(गाय ने कहा-) हे व्याघ्र! मैं शपथपूर्वक कहती हूँ कि मैं आ जाऊँगी, मेरे इस सत्य को सुनो। यदि तुम्हें विश्वास हो तो तुम मुझे छोड़ दो।

(10)
स तस्याः शपथाञ्छुत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः।
प्रत्ययं च तदा गत्वा व्याघ्रो वाक्यमथाब्रवीत् ॥

शब्दार्थ
तस्याः = उसकी।
शपथाञ्छुत्वा (शपथान् + श्रुत्वा) = शपथों को सुनकर।
विस्मयोत्फुल्ललोचनः = आश्चर्य से विकसित नेत्र वाला।
प्रत्ययं गत्वा = विश्वास को प्राप्त करके।
तदा = तब।
वाक्यं = वचन।
अब्रवीत् = बोला।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्याघ्र के कपिला की शपथ पर विश्वास कर लेने के बारे में बताया गया है।

अन्वय
अथ स: व्याघ्रः तस्याः शपथान् श्रुत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचन: प्रत्ययं गत्वा तदा वाक्यम् 
अब्रवीत्।।

व्याख्या
उसकी (कपिला गाय की) कसमों को सुनकर आश्चर्यचकित नेत्रों वाले उस व्याघ्र ने उस समय उसकी बात पर विश्वास करके उस गाय से यह वचने कहा।।

(11)
गच्छ त्वं गोकुले भद्रे! पुनरागमनं कुरु।
न चैतदवगन्तव्यं यदयं वञ्चितो मया ॥

शब्दार्थ
गच्छ त्वं = तुम जाओ।
भद्रे = हे कल्याणी।
पुनः आगमनं कुरु = पुन: लौट आओ।
अवगन्तव्यम् = समझना चाहिए।
यत् = कि।
अयं = यह।
वञ्चितः मया = मैंने धोखा दिया है।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्याघ्र कपिला से धोखा न देने की बात कहता है।

अन्वय
भद्रे! त्वं गोकुले गच्छ। पुनः आगमनं कुरु। एतत् च न अवगन्तव्यं यत् अयं मया वञ्चितः।।

व्याख्या
(व्याघ्र बोला-) हे कल्याणी! तुम गौशाला जाओ। वहाँ से पुन: लौट आना और तुम्हें यह नहीं समझना चाहिए कि मैंने इसे धोखा दे दिया है। तात्पर्य है कि गाय की सत्यनिष्ठा का विश्वास करके बाघ ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया।

(12)
सानुज्ञाता मृगेन्द्रेण कपिला पुत्र-वत्सला।
अश्रुपूर्णमुखी दीना प्रस्थिता गोकुलं प्रति ॥

शब्दार्थ
अनुज्ञाता = अनुमति दी गयी।
मृगेन्द्रेण = पशुओं के राजा द्वारा।
पुत्र-वत्सला = पुत्र पर स्नेह करने वाली।
अश्रुपूर्णमुखी = आँसुओं से भीगे मुख वाली।
दीना = दुःखी।
प्रस्थिता = चल दी।
प्रति = की ओर।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्याघ्र से अनुमति प्राप्त कपिला के गोकुल की ओर आने का वर्णन किया गया है।

अन्वय
मृगेन्द्रेण अनुज्ञाता पुत्रवत्सला सा कपिला अश्रुपूर्णमुखी दीना (सती) गोकुलं प्रति . प्रस्थिता।

व्याख्या
व्याघ्र के द्वारा अनुमति दी गयी पुत्र से प्रेम करने वाली वह कपिला गाय आँसुओं से। पूर्ण मुख वाली और दीन होती हुई गोकुल (गौशाला) की ओर चल दी।

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(13)
तस्याः शब्दं ततः श्रुत्वा ज्ञात्वा वत्सः स्वमातरम्।
सम्मुखः प्रययौ तूर्णमूर्ध्वपुच्छः प्रहर्षितः॥

शब्दार्थ
तस्याः = उसके।
शब्दं = शब्द को।
ततः = इसके बाद।
श्रुत्वा = सुनकर।
ज्ञात्वा = जानकर।
वत्सः = बछड़ा।
स्वमातरं = अपनी माता को।
प्रययौ = गया।
तूर्णम् = शीघ्र।
ऊर्ध्वपुच्छः = ऊपर को पूँछ किये हुए।
प्रहर्षितः = अत्यधिक प्रसन्न होता हुआ।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कपिला के समीप उसके बछड़े के आने का वर्णन किया गया है।

अन्वय
ततः तस्याः शब्दं श्रुत्वा, स्वमातरं ज्ञात्वा वत्सः तूर्णम् ऊर्ध्वपुच्छ: प्रहर्षित: (सन्) सम्मुखः प्रययौ।

व्याख्या
इसके बाद (गाय के गौशाला में पहुँचने के बाद) उसके शब्द को सुनकर और उसे अपनी माता जानकर बछड़ा शीघ्र ऊपर को पूँछ किये प्रसन्न होता हुआ दौड़कर सामने आ गया।

(14)
पिब पुत्र स्तनं पश्चात् कारणं चापि मे शृणु।
आगताऽहं तवस्नेहात् कुरु तृप्तिं यथेप्सिताम् ॥

शब्दार्थ
दार्थ-पिब = पी लो।
पश्चात् = बाद में।
मे = मुझसे।
शृणु = सुनो।
आगता = आयी हुई।
तव = तुम्हारे।
स्नेहात् = स्नेह के कारण।
कुरु = करो।
तृप्तिम् = सन्तुष्टि को।
यथेप्सिताम् = इच्छानुसार।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कपिला अपने बछड़े को समझाती है कि मैं तुम्हारे प्रेम के कारण यहाँ आयी हूँ।

अन्वय
पुत्र! स्तनं पिब। पश्चात् में कारणं च अपि शृणु। अहम् तव स्नेहात् आगता (अस्मि), (त्वं) यथेप्सितां तृप्तिं कुरु। | व्याख्या -हे पुत्र! तुम मेरे स्तन के दूध को पी लो। इसके बाद मेरे आने के कारण को भी सुनो। मैं तुम्हारे स्नेह से आयी हूँ। तुम इच्छानुसार तृप्ति कर लो।

(15)
व्याघस्य कामरूपस्य दातव्यं जीवितं मया।
तेनाहं शपथैर्मुक्ता कारणात्तव पुत्रक॥

शब्दार्थ
कामरूपस्य = इच्छानुसार रूप धारण करने वाला।
दातव्यं = देना चाहिए।
जीवितम् = जीवन।
मया = मेरे द्वारा।
तेन = उसके द्वारा।
शपथैः = कसमें खाने के द्वारा।
मुक्ता = छोड़ी गयी हूँ।
कारणात् = कारण से।
तव = तुम्हारे।
पुत्रक = हे पुत्र!। प्रसंग-पूर्ववत्।।

अन्वय
पुत्रक! मया कामरूपस्य व्याघ्रस्य जीवितं दातव्यम्। तेन अहं तव कारणात् शपथैः मुक्ता (अस्मि)।

व्याख्या
हे पुत्र! मुझे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले (मायावी) व्याघ्र को अपना जीवन देना है। उसके द्वारा मैं तुम्हारे कारण शपथों के आधार पर छोड़ी गयी हूँ।

(16)
एवमुक्त्वा च कपिला गती यत्र मृगाधिपः।।
अथासौ कपिलां दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥

शब्दार्थ
एवं = इस प्रकार।
उक्त्वा = कहकर।
गता = गयी।
यत्र = जहाँ।
मृगाधिपः = व्याघ्र।
विस्मयोत्फुल्ललोचनः = विस्मय से विकसित नेत्रों वाला।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि कपिला को वापस आया देखकर व्याघ्र किस प्रकार आश्चर्यचकित होती है।

अन्वय
कपिला च (वत्सं) एवम् उक्त्वा यत्र मृगाधिपः (आसीत्) (तत्र) गता। अथ असौ कपिलां दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः अभवत्।

व्याख्या
और कपिला बछड़े को पूर्वोक्त प्रकार से कहकर जहाँ व्याघ्र था, वहाँ चली गयी। इसके बाद वह (व्याघ्र) कपिला को देखकर विस्मय से विकसित नेत्रों वाला हो गया। तात्पर्य है कि कपिला को देखकर व्याघ्र अत्यधिक आश्चर्यचकित हो गया।

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(17)
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं हर्ष-गद्गदया गिरा।
स्वागतं तव कल्याणि, कपिले सत्यादिनि ।।

शब्दार्थ
अब्रवीत् = बोला।
प्रश्रितम् = विनयपूर्वक।
हर्षगद्गदया = प्रसन्नता के कारण गद्गद।
गिरा = वाणी से।
सत्यवादिनि = हे सत्य बोलने वाली।

प्रसंग-
पूर्ववत्।।

अन्वये
(सः व्याघ्रः) हर्ष गद्गदया गिरा प्रश्रितं वाक्यम् अब्रवीत्। हे कल्याणि! सत्यवादिनि! कपिले! तव स्वागतम् (अस्तु)।।

व्याख्या
उस व्याघ्र ने हर्ष से गद्गद वाणी में उस गाय से विनयपूर्ण वचन कहे। हे कल्याणमयी! सत्य बोलने वाली कपिला! तुम्हारा स्वागत है। तात्पर्य यह है कि व्याघ्र कपिला की सत्यवादिता पर प्रसन्न होकर उसका स्वागत करता है।

(18)
नहि सत्यवतां किञ्चिदशुभं विद्यते क्वचित् ।
तस्माद् गच्छ मया मुक्ता यत्राऽसौ तनयस्तव ॥

शब्दार्थ
सत्यवताम् = सत्यवादियों का।
किञ्चिद् = कुछ भी।
अशुभं = बुरा।
विद्यते = होता है।
क्वचित् = कहीं भी।
गच्छ = जाओ।
मुक्ता = मुक्त की गयी।
यत्र = जहाँ।
असौ = वह। तनयः = पुत्र।

प्रसंग
कपिला की सत्यप्रियता से प्रसन्न होकर व्याघ्र उसे मुक्त कर देता है। इसी का वर्णन इस श्लोक में किया गया है।

अन्वय
सत्यवतां क्वचित् किञ्चित् अशुभं नहि विद्यते। तस्माद् भय मुक्ता (त्वं) यत्र असौ । तव तनयः (अस्ति), (तत्र) गच्छ। –

व्याख्या
(व्याघ्र कहता है कि) सत्य बोलने वालों का कहीं पर कोई अशुभ नहीं होता है। इस कारण से मेरे द्वारा मुक्त की गयी तुम, जहाँ तुम्हारा वह पुत्र है, वहीं जाओ। तात्पर्य यह है कि व्याघ्र कपिला को मुक्त कर देता है। विशेष—उचित ही कहा है-‘सत्यमेव जयते।’

सूक्तिपरक वाक्यांश की व्याख्या

(1)
नहि सत्यवतां किञ्चिदशुभं विद्यते क्वचित् ।

सन्दर्थ
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘कपिलोपाख्यानम्’ पाठ से अवतरित है।

प्रसंग

कपिला जब अपने कहे अनुसार व्याघ्र के पास लौट आती है, तब व्याघ्र उसकी सत्यप्रियता से अत्यधिक प्रसन्न होकर उसे मुक्त कर देता है और यह सूक्ति कहता है।

अर्थ
सत्य वचन बोलने वालों का कहीं भी कुछ भी अशुभ (अहित) नहीं होता है।

व्याख्या
जो व्यक्ति सत्य वचन का पालन करते हैं, उनका कहीं भी कोई भी अनिष्ट नहीं होता है। कपिला नाम की धेनु व्याघ्र के द्वारा घिर जाने पर अपने बछड़े को दूध पिलाकर उसका आहार बनने हेतु पुनः लौट आने का शपथपूर्वक आश्वासन देती है। व्याघ्र उसके विश्वास पर बछड़े को दूध पिलाने के लिए उसे मुक्त कर देता है। कपिला गौशाला में जाकर अपने बछड़े को दूध पिलाकर अपने कथनानुसार पुनः व्याघ्र के पास लौट आती है। व्याघ्र उसके सत्य-पालन से प्रभावित होकर उसे मुक्त कर देता है। इस प्रकार सत्य को पालन करने के कारण कपिला का कोई अनिष्ट नहीं हुआ। कहा भी गया है-‘सत्यमेव जयते।’

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) शपथैरागमिष्यामि ••••••••••••••••••••• मृगाधिपः ॥ (श्लोक 9)
संस्कृता-
पुत्रवत्सला कपिला गौः व्याघ्रम् उवाच–हे व्याघ्र! इदम् अहं प्रतिजाने यत् पुत्रं दुग्धं पाययित्वा अहम् अत्र पुनः आगमिष्यामि। मम वचनं कदापि न व्यभिचरिष्यति। यदि त्वं मयि विश्वसिसि तु मां मुञ्च।

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(2) नहि सत्यवतां :••••••••••••••••••••• तनयस्तव ॥ (श्लोक 18 )
संस्कृतार्थः–
यदा पुत्रवत्सला कपिला स्ववत्सं दुग्धं पाययित्वा स्ववचोऽनुसारं सिंहस्य समीपे पुनरायाति, तदा सिंह: तस्याः सत्यपालनेन प्रसन्नः भवति कथयति च-हे कपिले! अस्मिन् जगति सत्यस्य पालकानां कुत्रापि किञ्चिदपि अनिष्टं न भवति। त्वं सत्यवादिनी असि, तव अपि अहम् अनिष्टं न करिष्यामि। अहं त्वां मुक्तां करोमि, त्वं तत्रैव गच्छ, यत्र तव वत्सः अस्ति।

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Class 10 Sanskrit Chapter 7 UP Board Solutions विद्यार्थिचर्या Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 7 Vidyarthi Charya Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद विद्यार्थिचर्या के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

स्मृति-ग्रन्थों में जीवन की रीति-नीति, करणीय-अकरणीय कर्म, इनके औचित्य-अनौचित्य एवं विधि-दण्ड का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। प्रमुख स्मृति-ग्रन्थों की संख्या अठारह मानी जाती है। इनमें जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्मृति-ग्रन्थ है, उसका नाम है-‘मनुस्मृति’। इसके रचयिता (UPBoardSolutions.com) आदिपुरुष मनु को माना जाता है।

प्रस्तुत पाठ के श्लोक इसी मनुस्मृति से संगृहीत हैं। यह सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालने वाला श्रेष्ठ ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की उपयोगिता, प्रामाणिकता एवं तार्किकता को इस बात से समझा जा सकता है कि आजकल न्यायालयों में भी मनुस्मृति को प्रमाण मानकर व्यवहार-निर्वाह किया जाता है। इसी ग्रन्थ से विद्यार्थियों के लिए व्यवहार से सम्बन्धित नियम संकलित किये गये हैं।

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पाठ-सारांश

विद्यार्थी को सूर्योदय से पूर्व ब्राह्म-मुहूर्त में उठकर धर्म, अर्थ, शरीर के कष्टों एवं वेदों के तत्त्वों पर विचार करना चाहिए। भोजन करने के उपरान्त स्नान नहीं करना चाहिए। रुग्णावस्था में, रात्रि में, वस्त्रों को पहने हुए, निरन्तर तथा अपरिचित जलाशय में कभी भी स्नान नहीं करना चाहिए। विद्यार्थी को अपना जूठा भोजन किसी को नहीं देना चाहिए। भोजन को समय पर एवं उचित मात्रा में ग्रहण करना चाहिए। भोजनोपरान्त मुँह अवश्य साफ करना चाहिए।

प्रणाम करने की आदत वाले तथा बड़ों की सेवा-शुश्रुषा करने वाले विद्यार्थी की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। विद्यार्थी को गीले पाँव भोजन करना चाहिए, किन्तु गीले पाँव सोना नहीं चाहिए। गीले पाँव भोजन करने से आयु बढ़ती है। विद्यार्थी को सदैव प्रिय सत्य ही बोलना चाहिए। अप्रिय सत्य और प्रिय असत्य को कभी नहीं बोलना चाहिए, यही उत्तम धर्म है। उसे चंचल हाथ-पैर, चंचल नेत्र, कठोर स्वभाव, चंचल वाणी, दूसरों से द्रोह करने वाला नहीं होना चाहिए।

सभी शुभ लक्षणों से हीन होने पर भी सदाचारी, श्रद्धावान् और दूसरों की निन्दा न करने वाला व्यक्ति सौ (UPBoardSolutions.com) वर्ष तक जीवित रहता है। स्वतन्त्रता ही सुख है और परतन्त्रता दुःख है, रि.धार्थी को सुख-दु:ख को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। एकान्त चिन्तने ही कल्याणकारी होता है; अतः विद्यार्थी को अपना हितचिन्तन एकान्त में बैठकर करना चाहिए।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत्, धर्मार्थी चानुचिन्तयेत्
कायक्लेशांश्च तन्मूलान्, वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ [2006]

शब्दार्थ ब्राह्म मुहूर्ते = ब्राह्म-मुहूर्त में, सूर्योदय से पूर्व 48 मिनट तक के समय को ब्राह्म-मुहूर्त कहते हैं। बुध्येत = जागना चाहिए। धर्मार्थी = धर्म और अर्थ (धन) के बारे में। अनुचिन्तयेत् = विचार करना चाहिए। कायक्लेशान् = शरीर के कष्टों को। तन्मूलान् = उनके (शारीरिक कष्ट के कारणों को। वेदतत्त्वार्थम् = वेदों के वास्तविक अर्थ को।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड‘पद्य-पीयूषम्’ के विद्यार्थिचर्या शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्यार्थी के प्रात: उठने के उचित समय को बताया गया है।

अन्वय, (छात्रः) ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थी च अनुचिन्तयेत्, कायक्लेशान् तन्मूलान्, वेद-तत्त्वार्थम् एव च (चिन्तयेत्)।

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व्याख्या मनु का कथन है कि छात्र को ब्राह्म-मुहूर्त में अर्थात् सूर्योदय से 1 घण्टे पूर्व जागना चाहिए और धर्म तथा अर्थ के बारे में चिन्तन करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि लोक-कल्याण के लिए जितना आवश्यक धन है, परलोक कल्याण के लिए उतना ही आवश्यक धर्म भी है। साथ (UPBoardSolutions.com) ही उसे अपने शारीरिक कष्टों, उनके कारणों व निवारण के उपायों तथा वेदों के सारतत्त्व के विषय में भी विचार करना चाहिए।

(2)
न स्नानमाचरेद भुक्त्वा , नातुरो न महानिशि।
न वासोभिः सहाजस्त्रं, नाविज्ञाते जलाशये ॥ [2006, 09]

शब्दार्थ आचरेत् = करना चाहिए। भुक्त्वा = भोजन करके। आतुरः = रोगी। महानिशि = अधिक रात में। वासोभिः सह = कपड़ों के साथ। अजस्त्रम् = निरन्तर, बहुत समय तक अविज्ञाते = अपरिचिता जलाशये = तालाब में।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि विद्यार्थी को कब, कहाँ और कैसे स्नान नहीं करना चाहिए।

अन्वय (छात्रः) भुक्त्वा स्नानं न आचरेत्, न आतुरः, न महानिशि, न वासोभिः सह अजस्रं, न अविज्ञाते जलाशये (स्नानम् आचरेत्)।

व्याख्या मनु का कथन है कि विद्यार्थी को भोजन करके स्नान नहीं करना चाहिए; न रोगी (बीमार) होने पर, न मध्य रात्रि में, न कपड़ों के साथ बहुत समय तक और न अपरिचित जलाशय में स्नान करना चाहिए।

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(3)
नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत् ॥

शब्दार्थ उच्छिष्टम् = जूठा भोजन। कस्यचित् = किसी के लिए। दद्यात् = देना चाहिए। न अद्यात् = भोजन नहीं करना चाहिए। अन्तरा = बीच में, अर्थात् भोजन के दो समयों के मध्य में या बहुत-से लोगों के मध्य। अत्यशनम् = अधिक भोजन। कुर्यात् = करना चाहिए। उच्छिष्टः = जूठे मुँहा क्वचित् = कहीं पर। व्रजेत् = जाना चाहिए।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भोजन की उचित प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय (छात्रः) कस्यचित् उच्छिष्टं न दद्यात् अन्तरा च न एव अद्यात्। न च अति अशनं एव कुर्यात्। उच्छिष्ट: च क्वचित् न व्रजेत्।

व्याख्या मनु का कथन है कि विद्यार्थी को किसी को अपना जूठा भोजन नहीं देना चाहिए तथा (UPBoardSolutions.com) भोजन के दो समयों के बीच में (अर्थात् बार-बार) या बहुत-से लोगों के बीच में भोजन नहीं करना चाहिए। उचित मात्रा से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए। जूठे मुंह (बिना मुँह धोये) कहीं नहीं जाना चाहिए।

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(4)
अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः।।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशो बलम् ॥ [2006, 08,09, 10, 11, 15]

शब्दार्थ अभिवादनशीलस्य = प्रणाम करने के स्वभाव वाले की। नित्यं = प्रतिदिन। वृद्धोपसेविनः = बड़े-बूढों की सेवा करने वाले की। चत्वारि = चार चीजें। तस्य = उस (विद्यार्थी) के वर्धन्ते = बढ़ते रहते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में व्यावहारिक सदाचरण पर प्रकाश डालते हुए उसके महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।

अन्वय अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविन: तस्य आयुः विद्या यश: बलम् (एतानि) चत्वारि वर्धन्ते।

व्याख्या मनु का कथन है कि जो छात्र अपने से बड़ों को अभिवादन कर उनका आशीर्वाद लेता है, नित्य अपने बड़े-बूढ़ों की सेवा करता है, उस छात्र की आयु, विद्या, यश और बल ये चार बढ़ते रहते हैं।

(5)
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत, नार्दपादस्तु संविशेत्।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो, दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ [2008, 12]

शब्दार्थ आर्द्रपादः = गीले पाँव वाला, धोने के पश्चात् बिना पोंछे। (UPBoardSolutions.com) भुञ्जीत = भोजन करना चाहिए। संविशेत् = सोना चाहिए। भुञ्जानः = भोजन करता हुआ। अवाप्नुयात् = प्राप्त करता है।

प्रसग प्रस्तुत श्लोक में दीर्घायु होने का उपाय बताया गया है।

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अन्वय आर्द्रपादः तु भुजीत। आईपादः तु ने संविशेत्। आर्द्रपादः तु भुञ्जानः दीर्घम् आयुः अवाप्नुयात्।।

व्याख्या मनु का कथन है कि गीले पाँव (धोने के बाद बिना पोंछे) भोजन करना चाहिए। गीले पैर नहीं सोना चाहिए। गीले पाँव भोजन करता हुआ दीर्घ आयु को प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ भीगे हुए पैरों से भोजन करना आयुवर्द्धक होता है, वहीं भीगे पैरों शयन करना हानिकारक।

(6)
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न बूयोत्सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं बूयादेष धर्मः सनातनः ।। [2009)

शब्दार्थ बूयात् = बोलना चाहिए। सत्यम् अप्रियम् = बुरा लगने वाला सत्य। अनृतम् = झूठ। सनातनः = सदा रहने वाला, शाश्वत।

प्रसंग इस श्लोक में अप्रिय सत्य और प्रिय असत्य न बोलने का परामर्श दिया गया है।

अन्वय सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, अप्रियं सत्यं न ब्रूयात्, प्रियं च अनृतं न ब्रूयात् एष सनातन: धर्मः (अस्ति)।

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व्याख्या मनु का कहना है कि सत्य बोलना चाहिए। प्रिय बोलना चाहिए। अप्रिय अर्थात् बुरा लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिए तथा प्रिय अर्थात् अच्छा लगने वाला झूठ नहीं बोलना चाहिए। यही शाश्वत धर्म है।

(7)
न पाणिपादचपलो, न नेत्रचपलोऽनृजुः ।।
न स्याद्वाक्चपलश्चैव, न परद्रोहकर्मधीः ॥

शब्दार्थ पाणिपादचपलः = चंचल हाथ-पैर वाला। नेत्रचपलः = नेत्रों से चंचल। अनृजुः = कठोर स्वभाव वाला, कुटिल। वाक्चपलः = वाणी से चंचल। परद्रोहकर्मधीः = दूसरों के साथ द्रोह करने में बुद्धि रखने वाला।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्यार्थी को चंचल न होने का परामर्श दिया गया है।

अन्वय (छात्रः) पाणिपादचपल: न (स्यात्)। नेत्रचपलः न (स्यात्), अनृणुः न (स्यात्), वाक्चपल: न (स्यात्), च न एवं परद्रोहकर्मधीः न स्यात्।।

व्याख्या मनु का कथन है कि छात्र को हाथ-पैरों से चंचल नहीं होना चाहिए; अर्थात् उसे अपने हाथ-पैर व्यर्थ में नहीं हिलाने चाहिए। चंचल नेत्रों वाला नहीं होना चाहिए, कुटिल स्वभाव वाला नहीं होना चाहिए, चंचल वाणी वाला नहीं होना चाहिए और न ही दूसरों से द्रोहकर्म में बुद्धि रखने वाला होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि विद्यार्थी को कुछ भी करने, कहीं भी जाने, सब कुछ देखने और कुछ भी कहने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिए।

(8)
सर्वलक्षणहीनोऽपि, यः सदाचारवान्नरः
श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ [2008, 11, 14]

शब्दार्थ सर्वलक्षणहीनोऽपि = सभी शुभ लक्षणों से हीन होता हुआ भी। यः (UPBoardSolutions.com) सदाचारवान्नरः = जो सदाचारी व्यक्ति। श्रद्दधानः = श्रद्धा रखने वाला, श्रद्धालु। अनसूयः = निन्दा न करने वाला, ईष्र्यारहित। शतं वर्षाणि जीवति = सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सदाचारी व्यक्ति की उपलब्धि पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय सर्वलक्षणहीनः अपि यः नरः सदाचारवान्, श्रद्दधानः, नसूयः च (अस्ति), (स:) शतं वर्षाणि जीवति।

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व्याख्या मनु का कथन है कि सभी शुभ लक्षणों से हीन होता हुआ भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धा रखने वाला और दूसरों की निन्दा न करने वाला होता है, वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है। तात्पर्य यह है कि सदाचारी, श्रद्धालु और ईर्ष्यारहित व्यक्ति ही दीर्घायुष्य को प्राप्त करते हैं।

(9)
सर्वं परवशं दुःखं, सर्वमात्मवशं सुखम्।।
एतद्विद्यात् समासेन, लक्षणं सुख-दुःखयोः ॥ [2008, 10, 12, 14, 15]

शब्दार्थ परवशं = पराधीनता। आत्मवशम् = स्वाधीनता। विद्यात् = जानना चाहिए। समासेन = संक्षेप में। लक्षणं = पहचान। सुख-दुःखयोः = सुख और दुःख की।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सुख-दु:ख के लक्षणों पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय परवशं सर्वं दु:खम् (अस्ति)। आत्मवशं सर्वं सुखम् (अस्ति)। एतद् समासेन सुख-दु:खयोः लक्षणं विद्यात्।।

व्याख्या मनु का कथन है कि जो दूसरे के अधीन है, वह सब दुःख है। जो अपने अधीन है, वह सब सुख है। इसे संक्षेप में सुख-दु:ख का लक्षण समझना चाहिए। तात्पर्य यह है कि स्वाधीनता सबसे बड़ा सुख और पराधीनता सबसे बड़ा दुःख है।

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(10)
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं, विविक्ते हितमात्मनः।
एकाकी चिन्तयानो हि, परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ [2006,07, 15]

शब्दार्थ एकाकी = अकेला| चिन्तयेत् = विचार करना चाहिए। विविक्ते = एकान्त में। हितम् आत्मनः = अपनी भलाई। चिन्तयानो = विचार करने वाला। परं श्रेयः = परम कल्याण को। अधिगच्छति = प्राप्त करता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में एकान्त के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अन्वय विविक्ते एकाकी (सन्) नित्यम् आत्मनः हितं चिन्तयेत्। हि एकाकी चिन्तयान: (पुरुष:) परं श्रेयः अधिगच्छति।।

व्याख्या मनु का कथन है कि एकान्त में अकेला होते हुए सदा अपने हित के विषय (UPBoardSolutions.com) में विचार करना चाहिए; क्योंकि अकेले ही (अपने हित का) चिन्तन करने वाला पुरुष परम कल्याण की प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि आत्म-कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह एकान्त में यह सोचे कि मेरा हित किसमें है।

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सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत, धर्माचानुचिन्तयेत्।। [2010]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘विद्यार्थिचर्या’ नामक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्यार्थी के कर्तव्य का वर्णन किया गया है।

अर्थ ब्राह्म-मुहूर्त में जागना चाहिए तथा धर्म-अर्थ के बारे में चिन्तन करना चाहिए।

व्याख्या सूर्योदय के एक घण्टे पूर्व से लेकर सूर्योदय तक का समय ब्राह्म-मुहूर्त कहलाता है। अत: इस अन्तराल में विद्यार्थी को अवश्य ही निद्रा से जाग जाना चाहिए तथा धर्म और अर्थ के बारे में विचार करना चाहिए। अर्थ से आशय धन से होता है। विद्यार्थी का धन तो विद्या ही है। अतः विद्यार्थी को प्रात:काल विद्याध्ययन या स्वाध्याय करना चाहिए। सभी विद्वान् और शिक्षाशास्त्री मानते हैं कि ब्राह्म-मुहूर्त में किया गया अध्ययन मस्तिष्क में स्थायी रूप से बस जाता है अर्थात् याद हो जाता है। विद्यार्थी के लिए धर्म का तात्पर्य नित्य-नैमित्तिक कार्य तथा ईश्वर की यथासम्भव आराधना से है। अत: प्रत्येक विद्यार्थी को सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने धर्म-अर्थ का चिन्तन करना चाहिए।

(2) न स्नानमाचरेद् भुक्त्वा नातुरो न महानिशि। [2008, 10, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्यार्थियों के लिए स्नान सम्बन्धी कति ‘ नियमों का वर्णन किया गया है।

अर्थ भोजन करके, रुग्णावस्था में और आधी रात में स्नान नहीं करना चाहिए।

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व्याख्या स्वस्थ और नीरोग रहने के लिए व्यक्ति को भोजन करके स्नान नहीं करना चाहिए। इसका कारण यह है कि भोजन को पचाने के लिए जिस पाचन-अग्नि की आवश्यकता होती है, वह स्नान करने के उपरान्त मन्द पड़ जाती है, जिससे भोजन ठीक से नहीं पच पाता और व्यक्ति क्रमश: अस्वस्थ होता जाता है। रुग्णावस्था में स्नान करने पर व्यक्ति की बीमारी और अधिक भयंकर स्थिति में पहुँचकर उसके लिए प्राणघातक हो सकती है। इसी कारण अर्द्ध-रात्रि या मध्यरात्रि में किया गया स्नान भी व्यक्ति के लिए हानिकारक ही होता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि विद्यार्थी को सदैव भोजन से पूर्व स्नान करना चाहिए, रोगग्रस्त होने पर रोग की (UPBoardSolutions.com) अवस्था के अनुसार ही स्नान करना चाहिए और अर्द्ध-रात्रि में स्नान से बचना चाहिए।

(3) अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में व्यक्ति को अभिवादनशील एवं वृद्ध-सेवी होने का परामर्श दिया गया है।

अर्थ अभिवादनशील और प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।

व्याख्या जो लोग अपने से बड़ों का नम्रतापूर्वक अभिवादन करते हैं और वृद्धों की नियमित रूप से सेवा करते हैं, उन लोगों की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। इसका कारण यह है कि जो लोग ऐसा करते हैं, उनके साथ बड़ों के आशीर्वाद और शुभकामनाएँ सम्मिलित होती हैं और सच्चे मन से दिये गये आशीर्वाद अवश्य फलीभूत होते हैं; अतः व्यक्ति को अपने से बड़ों का अभिवादन और वृद्धों की सेवा तन-मन से करनी चाहिए।

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(4)
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्। [2006,07] |
आयुर्विद्या यशो बलम्। [2012, 14, 15]

प्रसंग यहाँ अभिवादनशीलता और बड़े-बूढ़ों की सेवा को सर्वांगीण उन्नति का साधन बताया गया है।

अर्थ उसकी (अभिवादनशील और प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करने वाले की) आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं।

व्याख्या बड़ों का आदर-सत्कार करने और नित्य-प्रति सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल ये चारों बढ़ते हैं; क्योंकि इन गुणों से युक्त व्यक्ति की सर्वत्र प्रशंसा होती है, जिससे वह मरकर भी जीवित रहता है। गुरुजनों की कृपा होने पर व्यक्ति विद्या में निपुण हो जाता है (UPBoardSolutions.com) और गुरुजनों; अर्थात् अपने से बड़ों का आदर करना विनम्रता का द्योतक है। विपत्ति में ऐसे व्यक्ति की सभी सहायता करते हैं। वस्तुतः हम महानता के समीप तभी होते हैं जब हम विनम्र होते हैं। विनम्रता बड़ों के प्रति कर्तव्य है, बराबर वालों के प्रति विनयसूचक है और छोटों के प्रति कुलीनता की द्योतक है।

(5)
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्। [2006]

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ।। [2007, 11, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में प्रिय सत्य बोलने पर बल दिया गया है।

अर्थ सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए परन्तु अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए।

व्याख्या मनुष्य को सदा सत्य बोलना चाहिए। सत्य बोलने के साथ-साथ उसे ऐसा वचन भी बोलना चाहिए, जो सुनने वालों को प्रिय लगे। यदि कोई बात सत्य है, लेकिन सुनने वाले को वह बुरी लगती है तो उसे भी नहीं बोलना चाहिए; जैसे किसी काने व्यक्ति को ‘काना’ कहकर पुकारा जाए तो यह बात सत्य तो है, लेकिन उसके लिए अप्रिय है। अतः सत्य होते हुए भी अप्रिय होने के कारण ऐसा नहीं कहना चाहिए।

(6), श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति [2007]

प्रसग प्रस्तुत सूक्ति में मनुष्य के दीर्घायु होने के कारणों पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ श्रद्धा रखने वाला, निन्दा न करने वाला व्यक्ति सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

व्याख्या मनु जी कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धेय लोगों और वस्तुओं के प्रति श्रद्धा रखता है और दूसरे लोगों की निन्दा नहीं करता है, वह संसार में कम-से-कम सौ वर्ष तक जीवित रहता है। यहाँ पर जीवित रहने से आशय उसका यश निरन्तर चलते रहने से है; क्योंकि व्यक्ति के जीवन (UPBoardSolutions.com) का उद्देश्य सद्कर्मों के द्वारा युगों-युगों तक चलते रहने वाले यश की प्राप्ति करना है। श्रद्धावान् और दूसरों की निन्दा न करने वाला व्यक्ति उस यश को प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इन गुणों से युक व्यक्ति का लोग मरने के पश्चात् भी युगों-युगों तक स्मरण करते हैं। इस प्रकार व्यक्ति मरणोपरान्त भी जीवित रहता है।

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(7)
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।। [2006,09, 11, 12, 14]
सर्वं परवशं दुःखं। [2013]
एतद् विद्यात् समासेन, लक्षणं सुखदुःखयोः ॥

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में स्वतन्त्रता के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ पराधीनता सबसे बड़ा दु:ख है तथा स्वाधीनता सबसे बड़ा सुख।

व्याख्या महर्षि मनु ने संक्षेप में सुख और दुःख का लक्षण बताते हुए कहा है कि पराधीनता से बढ़कर दुःख नहीं है और स्वाधीनता से बढ़कर सुख नहीं है। तोता सोने के पिंजरे में रहकर भी परवश होने से दुःखी रहता है और मुक्त हो जाने पर सुखी हो जाता है। पराधीनता में मनुष्य मन के अनुकूल कार्य नहीं कर पाता; जिससे वह दुःखी रहता है। स्वाधीनता में वह अपने मन के अनुकूल कार्य करके सुखी रहता है। निश्चित ही बन्धन में कोई सुख नहीं है। स्वाधीन रहने पर ही सुख की प्राप्ति हो सकती है। तुलसीदास जी ने भी कहा है-‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।’ इसी को संक्षेप में सुख और दुःख का लक्षण जानना चाहिए अर्थात् सुख को स्वाधीनता का तथा दुःख को पराधीनता का।

(8)
एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति। [2007,08,09, 10, 14]
पॅरं श्रेयोधिगच्छति।।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में एकान्त के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अर्थ निश्चय ही अकेला मनुष्य चिन्तन करने पर परम कल्याण को प्राप्त करता है।

व्याख्या मनुष्य को एकान्त में बैठकर अपना हित सोचना चाहिए। जो व्यक्ति एकान्त में बैठकर अपना हित सोचता है, वह परम कल्याण को प्राप्त करता है; क्योंकि एकान्त में बैठने से एकाग्रता होती है और एकाग्र होकर ही कोई व्यक्ति ध्यानपूर्वक सोच सकता है। एकान्त में बैठने से व्यक्ति के ऊपर बाहरी वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे उसे किसी प्रकार के दबाव का सामना नहीं करना पड़ता; फलतः उचित निर्णय लेना आसान हो जाता है। इसीलिए कहा गया है कि व्यक्ति को अपने सम्बन्ध में चिन्तन एकान्त में ही करना चाहिए।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) ब्राह्म मुहूर्ते …………………………………………… वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ [2014]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् छात्र: प्रात:काले ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत्, धर्मान् अर्थान् च अनुचिन्तयेत्। कायस्य क्लेशान् तन्मूलान्, तत् निवारणोपायान्, वेदस्य तत्त्वानाम् अर्थस्य च चिन्तयेत्।।

(2) न स्नानमाचरेद …………………………………………… नाविज्ञाते जलाशये॥ [2006, 10, 13]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् छात्र: भोजनं कृत्वा कदापि स्नानं ने आचरेत्। आतुरोऽपि, दीर्घ निशायाम् अपि, वस्त्राणि परिधायापि, अविज्ञाते सरोवरे स्नानं कदापि न आचरेत्।

(3) नोच्छिष्टं कस्यचिद् …………………………………………… क्वचिद् व्रजेत् ॥ [2007, 09]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् विद्यार्थी कस्यचित् उच्छिष्टं भोजनं न दद्यात्, नैव द्वौ भोजनस्य मध्ये भोजनं कुर्यात्, अत्यधिक भोजनं न कुर्यात्, नापि उच्छिष्टः मुखात् क्वचित् गच्छेत्।।

(4) अभिवादनशीलस्य …………………………………………… यशो बलम् ॥ [2010, 11, 12, 13, 14, 15]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः अभिवादनशीलतायाः वृद्ध-सेवायाः च लाभं वर्णयति यत् यस्य स्वभाव: स्वपूज्यानाम् अभिवादनम् अस्ति, यः सदा वृद्धानां सेवां करोति, तस्य जनस्य आयुः, विद्या, यशः शक्तिः च इति चत्वारि वस्तूनि वृद्धि लभन्ते।

(5) आर्दपादस्तु भुञ्जीत …………………………………………… दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ (2006, 11]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके चरण-प्रक्षालनस्य नियमानां र्णनम् : प्त–जलेन चरणौ प्रक्षाल्य आर्द्रपाद एव भोजनं (UPBoardSolutions.com) कुर्यात्, परम् आर्द्राभ्यां पादाभ्यां शयनं न कुर्यात्। यः जनः जलेन चरणौ प्रक्षाल्य आर्द्रपादः भोजनं करोति सः दीर्घम् आयुः प्राप्नोति।।

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(6) सत्यं ब्रूयात्प्रियं …………………………………………… धर्मः सनातनः ॥ [2006, 13]
संस्कृतार्थः महर्षिः मनुः सत्यभाषणस्य विषये नियमं कथयति यत् मनुष्यः सदा सत्यं वदेत्। सदा प्रियं वदेत्। तादृशं सत्यं न वदेत् यत् कस्यापि अप्रियं कटु च अस्ति। तादृशं प्रियम् अपि न वदेत् यत् सत्यं न अस्ति। इत्थं प्रकारेण सत्यं-प्रियं-भाषणं सर्वेषां समीचीनः धर्मः अस्ति।

(7) न पाणिपादचपलो …………………………………………… परद्रोहकर्मधीः ॥
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् विद्यार्थी हस्त–पादयोः चापल्यं न कुर्यात्, इत्यमेव अनृजुः सन् वाक्चापल्यमपि न कुर्यात्। परेषां द्रोहकर्मणि बुद्धिः अपि न कुर्यात्।

(8) सर्वलक्षणहीनोऽपि …………………………………………… वर्षाणि जीवति॥ [2008, 09, 10, 12, 13]
संस्कृतार्थः मनुः महाराजः कथयति यत् यः नरः सर्वलक्षणैः हीनः अस्ति, परञ्च सदाचारयुक्तः, श्रद्धायुक्तः, ईष्र्यारहितः च अस्ति, सः शतं संवत्सराणि जीवति।।

(9) सर्वं परवशं दुःखं, …………………………………………… सुखदुःखयोः ॥ [2006, 08, 10, 12, 14]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति-अस्मिन् संसारे यदपि (UPBoardSolutions.com) पराधीनम् अस्ति, तत्सर्वं दु:खस्वरूपम् अस्ति। यत् स्वाधीनम् अस्ति, तत्सर्वं सुखस्वरूपम् अस्ति। पराधीनतां दुःखस्य स्वाधीनतां च सुखस्य सङ्क्षेपेणलक्षणं जानीयात्।।

(10) एकाकी चिन्तयेन्नित्यं …………………………………………… श्रेयोऽधिगच्छति। [2006, 09, 14]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके एकान्तचिन्तनस्य महत्त्वं प्रदर्शितम् यत् प्रत्येक मानवा: एकान्तस्थले स्थित्वा प्रतिदिनं स्वहिताय चिन्तनं कुर्यात्। य: मानव: नित्यप्रति एकाकी भूत्वा स्वहितकारिणं विषयं प्रति चिन्तयति.य: सर्वथा स्वकल्याणं प्राप्नोति।

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