Class 9 Sanskrit Chapter 3 UP Board Solutions सुभाषितानि Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 3
Chapter Name सुभाषितानि (पद्य-पीयूषम्)
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 3 Subhashitani Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 3 हिंदी अनुवाद सुभाषितानि के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय-‘सुभाषित’ का अर्थ होता है—सुन्दर वचन, सुन्दर बातें, सुन्दर उक्तियाँ। सुभाषितों से जीवन का निर्माण होता है और जीवन महान् बनता है। जीवन को सफल बनाने के लिए सुभाषित गुरु-मन्त्र के समान हैं। संस्कृत-साहित्य में सुभाषितों का अपरिमित भण्डार संचित है। इसमें ज्ञान के जीवनोपयोगी कथन होते हैं, जो जीवन में उचित आचरण का निर्देश देते हैं। । प्रस्तुत पाठ में 15 सुभाषित श्लोकों का संकलन विविध ग्रन्थों से किया गया है। प्रत्येक श्लोक स्वयं में पूर्ण है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

 (1)
अन्यायोपार्जितं वित्तं दशवर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति ॥

शब्दार्थ
अन्यायोपार्जितं = अन्याय से कमाया गया।
वित्तं = धन।
तिष्ठति = ठहरता है।
समूलम् = मूल (धन) सहित, पूर्ण रूप से।
विनश्यति ६ नष्ट हो जाता है।

सन्दर्भ
प्रस्तुत नीति-श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ में संकलित ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत–प्रस्तुत पाठ के सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।] प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक में अन्याय से कमाये गये धन को शीघ्र नाशवान् बताया गया है। अन्वय-अन्यायोपार्जितं वित्तं दशवर्षाणि तिष्ठति, एकादशे च वर्षे प्राप्त तद् समूलं विनश्यति।

व्याख्या
अन्याय द्वारा कमाया गया धन मनुष्य के पास दस वर्ष तक ही ठहरता है। ग्यारहवाँ वर्ष प्राप्त होने पर वह मूलधन-सहित नष्ट हो जाता है; अर्थात् वह धन एक निश्चित समय तक; जीवन के एक छोटे अंश तक; ही स्थिर रहता है, उसके बाद नष्ट हो जाता है। अतः मनुष्य को अन्यायपूर्वक धन अर्जित करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।

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(2)
अतिव्ययोऽनपेक्षा च तथाऽर्जनमधर्मतः ।
मोक्षणं दूरसंस्थानं कोष-व्यसनमुच्यते ॥

शब्दार्थ-

अतिव्ययः = अधिक खर्च।
अनपेक्षा = देखभाल न करना, असावधानी।
अधर्मतः अर्जनम् = अधर्म द्वारा अर्जित करना।
मोक्षणम् = मनमाना त्याग करना या दान देना।
दूरसंस्थानम् = अपने से दूर छिपाकर रखना।
कोष-व्यसनम् = धन के विनाश के दोष (कारण)।
उच्यते = कहे गये।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में धन के विनाश के कारण बताये गये हैं।

अन्वय
अतिव्यय; अनपेक्षा तथा अधर्मतः अर्जनम् , मोक्षणं दूरसंस्थानं च कोष-व्यसनम् उच्यते।

व्याख्या
अत्यधिक खर्च, धन की देखभाल न करना तथा अधर्म या अन्याय द्वारा कमाना, मनमाना त्याग, अपने से दूर (छिपाकर) रखना-ये धन के विनाश के कारण हैं। तात्पर्य यह है कि धन का अत्यधिक व्यय करना, उसकी उचित देखभाल न करना, उसका अधर्म-अन्यायपूर्वक अर्जन करना, पर्याप्त दान करना और उसे अपने से दूर अर्थात् छिपाकर रखना—इन सभी से धन नष्ट हो जाता है।

(3)
नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान् न शठाः न च मायिनः।।
न च लोकापवाभीताः न च शश्वत् प्रतीक्षिणः ॥

शब्दार्थ
अलसाः = आलसी रोग।
प्राप्नुवन्त्यर्थान् (प्राप्नुवन्ति + अर्थान्) = धनों को प्राप्त |
करते हैं। मायिनः = छल-कपट वाले।
लोकापवादभीताः = लोक-निन्दा से डरे हुए। शश्वत्
प्रतीक्षिणः = निरन्तर धन की प्रतीक्षा करने वाले।। .

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में धन को प्राप्त न कर पाने वाले लोगों के विषय में बताया गया है।

अन्वयन
अलसाः, ने शठाः, न च मायिनः, न च लोकापवाभीताः, न शश्वत् प्रतीक्षिणः अर्थान् प्राप्नुवन्ति।

व्याख्या
ऐसे लोग धने नहीं कमा सकते हैं, जो आलसी हैं, दुष्ट हैं, अत्यन्त चालाक अर्थात् छल-कपट करने वाले हैं, जो सांसारिक बदनामी से भी डरे हुए हैं अथवा लगातार उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करने वाले हैं। तात्पर्य यह है कि धन-अर्जन के इच्छुक व्यक्तियों को इन दुर्गुणों से मुक्त रहना चाहिए।

(4)
वरं दारिद्रयमन्यायप्रभवाद् विभवादिह।
कृशताऽभिमता देहे पीनता न तु शोफतः ॥

शब्दार्थ
वरं = श्रेष्ठ।
दारिद्रयं = गरीबी।
अन्यायप्रभवात् = अन्याय के द्वारा उत्पन्न किये गये।
विभवात् = धन की अपेक्षा।
इह = इस लोक में।
कृशता = कमजोरी।
अभिमता = अभीष्ट है।
पीनता = मोटापा।
शोफतः = सूजन के कारण।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में अन्याय से धनार्जन की अपेक्षा गरीबी को श्रेष्ठ बताया गया है।

अन्वय
इह अन्यायप्रभवात् विभवात् दारिद्रयं वरम् (अस्ति)। देहे कृशता अभिमता, न तु शोफतः पीनता।

व्याख्या
इस संसार में निर्धन होकर रहना श्रेष्ठ है, परन्तु अन्यायपूर्वक धन अर्जित करना उचित नहीं है। जैसे शरीर में कमजोरी (दुबलापन) उचित है, परन्तु सूजन के कारण मोटापा अच्छा नहीं है। तात्पर्य यह है कि अन्यायपूर्वक धन का अर्जन उसी प्रकार उचित नहीं है जिस प्रकार शरीर का स्थूल होना।

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(5)
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वञ्चनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥

शब्दार्थ
अर्थनाशम् = धन के विनाश को।
मनस्तापम् = मन की पीड़ा को।
गृहे = घर में।
दुश्चरितानि = बुरे आचरण को।
वञ्चनम् = ठगे जाने को।
मतिमान् = बुद्धिमान्।
न प्रकाशयेत् = प्रकट न करे।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में दूसरों के सम्मुख प्रकट न करने योग्य बातों का वर्णन किया गया है।

अन्वय
मतिमान् अर्थनाशं, मनस्तापं, गृहे दुश्चरितानि च, वञ्चनं च, अपमानं च न प्रकाशयेत्।

व्याख्या
बुद्धिमान पुरुष वही है, जो धन के नष्ट हो जाने को, मन की वेदना को, घर में बुरे आचरण को, ठगे जाने को और अपमान को दूसरों पर प्रकट नहीं करता। तात्पर्य यह है कि दूसरों से कहने पर सर्वत्र उपहास के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होता है।

(6)
अतिथिर्बालकः पत्नी जननी जनकस्तथा।
पञ्चैते गृहिणः पोष्या इतरे न स्वशक्तितः॥

शब्दार्थ
अतिथिः = मेहमान।
जननी = माता।
जनकः, = पिता।
गृहिणः = गृहस्थ के।
पोष्या = पोषण करने के योग्य।
इतरे = दूसरे।
स्वशक्तितः = अपनी शक्ति के अनुसार।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि प्रत्येक गृहस्थ पुरुष को पाँच लोगों का अवश्य पोषण करना चाहिए।

अन्वय
गृहिणः अतिथिः, बालकः पत्नी, जननी तथा जनकः एते पञ्च पोष्याः (सन्ति), इतरे च स्व-शक्तत: (पोष्याः सन्ति)।

व्याख्या
गृहस्थ पुरुषों को अतिथि, बालक, पत्नी, माता तथा पिता–इन पाँचों का पालन-पोषण तो अवश्य ही करना चाहिए और दूसरों का अपनी शक्ति के अनुसार पालन-पोषण करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त पाँच का पालन-पोषण करने में किसी भी गृहस्थ को प्रमाद नहीं करना चाहिए।

(7)
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति सर्वदा ॥

शब्दार्थ
नात्यन्तम् (न + अत्यन्तम्) = अत्यधिक नहीं।
सरलैर्भाव्यं = सीधा-सच्चा होना।
गत्वा = जाकर।
पश्य = देखो।
वनस्थलीम् = वन में।
छिद्यन्ते = काटते हैं।
कुब्जाः = कुबड़े-टेढ़े-मेढ़े वृक्ष, कुटिल।
तिष्ठन्ति = स्थिर रहते हैं।
सर्वदा = हमेशा। |

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक सज्जन नहीं होना चाहिए।

अन्वय
अत्यन्तं सरलैः न भाव्यं, वनस्थलीं गत्वा पश्य। तत्र सरलाः (भवन्ति जनाः) छिद्यन्ते कुब्जाः सर्वदा तिष्ठन्ति।

व्याख्या
व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक सीधा नहीं होना चाहिए; वन में जाकर देखो। लोग वन में सीधे वृक्षों को ही काटते हैं; टेढ़े-मेढ़े वृक्ष यों ही खड़े रहते हैं। तात्पर्य यह है कि सीधे और सज्जन व्यक्तियों को ही लोग हानि पहुँचाते हैं, दुर्जन व्यक्तियों को नहीं। यही कारण है कि वन में सीधे (UPBoardSolutions.com) वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढ़े-मेढ़े वृक्ष नहीं। अतः अधिक सज्जनता व्यक्ति के स्वयं के लिए घातक बन जाती है। तुलसीदास जी ने भी कहा है-‘कतहुँ सिधायहु ते बड़ दोषू।’

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(8)
मौनं कालविलम्बश्च प्रयाणं भूमि-दर्शनम्।
भृकुट्यन्यमुखी वार्ता नकारः षड्विधः स्मृतः ॥

शब्दार्थ
कालविलम्बः= समय में देरी करना।
प्रयाणम् = चले जाना।
भूमिदर्शनम् = भूमि की ओर देखने लग जाना।
भृकुटी = भौंह तिरछी करना।
अन्यमुखी वार्ता = दूसरे की ओर मुंह करके बातें करने लग जाना।
नकारः = मना करना, मनाही।
षड्विधः = छः प्रकार का।
स्मृतः = कहा गया है।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में किसी विषय में अरुचि प्रदर्शित करने के लक्षणों का उल्लेख किया गया है।

अन्वय
मौनं, कालविलम्बः, प्रयाणं, भूमिदर्शनं, भृकुटी, अन्यमुखी वार्ता चेति षड्विधः नकारः स्मृतः।।

व्याख्या
चुप रहना, समय में देरी करना, अन्य स्थान पर चले जाना, भूमि की ओर देखने लगना, भौंहें टेढ़ी कर लेना, दूसरे की ओर मुँह करके बात करने लगनी-ये छ: प्रकार के मना करने के संकेत स्मृतियों में कहे गये हैं। तात्पर्य यह है कि कोई व्यक्तिं बात करते समय इन छ: लक्षणों में से कोई भी एक लक्षण प्रकट करता है तो व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि उसकी आपकी बातों में कोई रुचि नहीं है अथवा वह आपकी बातों से सहमत नहीं है।

(9)
प्रत्यक्षे गुरवः स्तुत्याः परोक्षे मित्र-बान्धवाः।
कर्मोन्ते दास-भृत्याश्च पुत्री नैव च नैव च ।।

शब्दार्थ
प्रत्यक्षे = सामने, सम्मुख।
गुरवः = गुरु की।
स्तुत्योः = प्रशंसा के योग्य।
परोक्षे = पीछे, बाद में, अनुपस्थिति में।
कर्मान्ते = काम की समाप्ति पर।
भृत्याः = नौकरों की।
नैव = नहीं।।

प्रसंग
कार्य करने पर किसकी किस समय प्रशंसा करनी चाहिए, इसका प्रस्तुत श्लोक में वर्णन किया गया है।

अन्वय
गुरुवः प्रत्यक्षे (स्तुत्याः भवन्ति), मित्र-बान्धवाः परोक्षे (स्तुत्याः भवन्ति), दास-भृत्याः च कर्मान्ते (स्तुत्याः भवन्ति) पुत्राः नैव च नैव च स्तुत्याः (भवन्ति)। |

व्याख्या
गुरुजन सामने प्रशंसा के योग्य होते हैं, मित्र और बन्धुजनों की उनकी अनुपस्थिति में प्रशंसा करनी चाहिए। सेवकों और नौकरों की कर्म की समाप्ति पर प्रशंसा करनी चाहिए। पुत्रों की प्रशंसा कभी नहीं करनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि पुत्र की प्रशंसा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सम्भव है कि प्रशंसा से हुए अभिमान के कारण उसकी उन्नति का मार्ग अवरुद्ध हो जाए।

(10)
क्षणे तुष्टा क्षणे रुष्टास्तुष्ट रुष्टाः क्षणे क्षणे।
अव्यवस्थितचित्तानां प्रसादोऽपि भयङ्करः ॥

शब्दार्थ
क्षणे = पलभर में।
तुष्टाः = सन्तुष्ट होने, प्रसन्न होने वाले।
रुष्टाः = रूठने वाले, अप्रसन्न होने वाले।
क्षणे-क्षणे = पल-पल में।
अव्यवस्थितचित्तानां = चंचल मन वालों का अर्थात् जिनको मन एकाग्र नहीं।
प्रसादः = कृपा, अनुगृह।
अपि = भी। भयङ्करः = भयानक।।

प्रसंग
इस श्लोक में बताया गया है कि किस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार के लोगों से सावधान रहना चाहिए।

अन्वय
(ये जनाः) क्षणे तुष्टाः क्षणे रुष्टाः क्षण-क्षणे तुष्टा:-रुष्टाः (ईदृशाः) अव्यवस्थित चित्तानां (जनानां) प्रसादः अपि भयङ्करः (भवति)। |

व्याख्या
जो लोग पलभर में सन्तुष्ट हो जाते हैं, अर्थात् प्रसन्न हो जाते हैं, पलभर में नाराज हो जाते हैं और पल-पल में नाराज और अप्रसन्न होते रहते हैं, ऐसे अस्थिर चित्त वाले लोगों की अनुकम्पा भी भयंकर होती है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए।

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(11)
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥

शब्दार्थ
षड् = छः।
पुरुषेण = मनुष्य द्वारा।
हातव्याः = त्याग करना चाहिए।
भूतिम् इच्छता = कल्याण चाहने वाले मनुष्य को।
तन्द्रा = ऊँघना, निद्रालुता।
दीर्घसूत्रता = किसी काम को धीरे-धीरे करना; अर्थात् मन्द गति से कार्य करना।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में मनुष्य के दोषों को बताकर उन्हें त्यागने का परामर्श दिया गया है।

अन्वेय
इह भूतिम् इच्छता पुरुषेण निद्रा, तन्द्रा, भयं, क्रोधः, आलस्यं, दीर्घसूत्रता–(एते) षड् दोषाः हातव्याः।।

व्याख्या
इस संसार में कल्याण चाहने वाले मनुष्य को नींद, ऊँघना (बँभाई लेना), भय, क्रोध, आलस्य और धीरे-धीरे काम करना-इन छ: दोषों का त्याग कर देना चाहिए। तात्पर्य यह है कि जिस व्यक्ति में भी ये दोष होंगे, वह कभी उन्नति नहीं कर सकता।

(12)
विद्या विनयाऽवाप्तिः सा चेदविनयाऽऽवहा।
किं कुर्मः कं प्रति बूमः गरदायां स्वमातरि ॥

शब्दार्थ
विद्यया = विद्या से।
विनयाऽवाप्तिः = विनय की प्राप्ति।
चेत् = यदि।
अविनयाऽऽवहा = उद्दण्डता लाने वाली।
कुर्मः = करें।
बूमः = कहें।
गरदायाम् = विष देने वाली हो जाने पर।
स्वमातरि = अपनी माता।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में विद्या के उद्देश्य को विनय से सम्पन्न होना बताया गया है।

अन्वय
विद्यया विनयाऽवाप्तिः (भवति) सा विद्या अविनयाऽऽवहा चेत् (स्यात्) किं कुर्मः? | स्वमातरि गरदायां के प्रति ब्रूमः? |

व्याख्या
विद्या से विनय की प्राप्ति होती है। यदि वह उद्दण्डता प्रदान करने वाली हो जाए तो हम क्या करें? अपनी ही माता के विष देने वाली हो जाने पर हम किससे कहें? तात्पर्य यह है कि यदि विद्यार्जन से हमें विनयी होने का गुण नहीं प्राप्त होता, तो ऐसा विद्यार्जन हमारे लिए व्यर्थ है।

(13)
सर्वे यत्र विनेतारः सर्वे पण्डितमानिनः।।
सर्वे महत्त्वमिच्छन्ति तद् वृन्दम वसीदति ॥

शब्दार्थ
सर्वे = सभी।
यत्र = जहाँ।
विनेतारः = नेता, मार्गदर्शक।
पण्डित = विद्वान्।
मानिनः= मानने वाले।
महत्त्वमिच्छन्ति (महत्त्वम् + इच्छन्ति) = प्रशंसा चाहते हैं।
वृन्दम् = समूह।
अवसीदति = निराश होता है।

प्रसंग
किस समूह की दलगत स्थिति निराशापूर्ण होती है; प्रस्तुत श्लोक में इस बात को समझाया गया है।

अन्वय
तद् वृन्दम् अवसीदति, यत्र सर्वे विनेतारः सर्वे पण्डितमानिनः, सर्वे महत्त्वम् इच्छन्ति।

व्याख्या
वह दल अथवा समूह निराश होता है, जहाँ सभी नेता हों, सब अपने आपको विद्वान् मानते हों और सबै दल में महत्त्व पाने की इच्छा करते हों। तात्पर्य यह है कि जिस सभा में सभी लोग महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने की इच्छा रखते हों, वह सभा कभी सफल नहीं होती; अर्थात् नेतृत्व एक के हाथ में ही होना चाहिए।

(14)
सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दमर्दो घटो घोषमुपैति नूनम् ।।
विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वं जल्पन्ति मूढास्तु गुणैर्विहीनाः ॥

शब्दार्थ
सम्पूर्णकुम्भः = पूण रूप से भरा हुआ घड़ा।
शब्दम् = आवाज।
अर्द्धः = आधा।
घषम् उपैति = शब्द करता है।
नूनम् = निश्चय ही।
कुलीनः = अच्छे कुल में उत्पन्न।
गर्वम् = अहंकार।
जल्पन्ति = बक्रवास करते हैं।
मूढाः = मूर्ख।
गुणैर्विहीनाः = गुणों से रहित।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में मूर्ख और गुणी लोगों की पहचान बतायी गयी है।

अन्वय
सम्पूर्णकुम्भ: शब्दं न करोति। अर्धः घट: नूनं घोषम् उपैति। कुलीनः विद्वान् गर्वं न करोति। गुणैर्विहीनाः मूढाः तु जल्पन्ति।

व्याख्या
(जल से) भरा हुआ घड़ा (चलते समय) शब्द नहीं करता है। (जल से) आधा भरा हुआ घड़ा निश्चय ही (चलते समय छलकने के) शब्द को प्राप्त होता है। उच्च कुल में उत्पन्न विद्वान् घमण्ड नहीं करता है, लेकिन गुणों से रहित मूर्ख लोग (व्यर्थ में) बकवास करते हैं। तात्पर्य यह है कि विद्वान् व्यक्ति व्यर्थ कभी बकवास नहीं करते हैं और मूर्ख बकवास में ही अपना समय व्यतीत करते हैं।

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(15)
दरिद्रता धीरतया विराजते कुरूपता शीलतया विराजते ।
कुभोजनं चोष्णतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते ॥

शब्दार्थ
दरिद्रता = निर्धनता, गरीबी।
धीरतया = धैर्य के कारण।
विराजते = सुशोभित होता है।
कुरूपता = बदसूरती।
शीलतया = सदाचार और अच्छे स्वभाव के कारण।
कुभोजनम् = स्वादरहित । भोजन।
उष्णतया = गर्म रहने के कारण।
कुवस्त्रता= बुरे वस्त्र, मलिन वस्त्र।
शुभ्रतया= साफ होने से। |

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में उन बातों पर प्रकाश डाला गया है, जिनके द्वारा व्यक्ति की शोभा बढ़ती है।

अन्वय
दरिद्रता धीरतया विराजते। कुरूपता शीलतया विराजते। कुभोजनं च उष्णतया विराजते। कुवस्त्रता च शुभ्रतया विराजते।।

व्याख्या
दरिद्रता धैर्य रखने से सुशोभित होती है। बदसूरती अच्छे स्वभाव या आचरण से सुशोभित होती है। स्वादरहित भोजन गर्म करने से शोभा पाता है और बुरे वस्त्र पहनना सफेद से या साफ रहने से शोभा पाता है। तात्पर्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति में उपर्युक्त दुर्गुण हों तो वह उनके उपायों को अपनाकर अपने आपको गुणवान् बना सकता है।

सूक्तिपरक वाक्य की व्याख्या

(1) वरं दारिद्रयमन्यायप्रभवाद् विभवादिह ।।

सन्दर्य
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘सुभाषितानि । शीर्षक पाठ से अवतरित है।

[संकेत-इस शीर्षक के अन्तर्गत आयी हुई समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। |

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि व्यक्ति को अन्याय से धन-संचय नहीं करना चाहिए।

अर्थ-
अन्याय से अर्जितं धन-सम्पदा से तो निर्धन होना श्रेष्ठ है।।

व्याख्या
श्रम से कमाया गया धन ही व्यक्ति के काम आता है और उसी से व्यक्ति के मन को सन्तोष और शान्ति मिलती है। अन्याय से अर्जित धन सदैव व्यक्ति को परेशान रखता है; क्योंकि व्यक्ति को सदैव ही यह भय बना रहता है कि कहीं उसके द्वारा अनैतिक साधनों से संग्रह करके जो धन छिपाया गया है, उसका भण्डाफोड़ न हो जाये। भला ऐसे धन का क्या लाभ, जो व्यक्ति से उसके दिन का.चैन और रातों की नींद छीन ले। मन की शान्ति संसार का सबसे बड़ा धन है। यदि निर्धनता में भी मन की शान्ति बनी रहती है तो यह निर्धनता अन्यायपूर्वक धनोपार्जन करके धनवान् होने से अधिक श्रेष्ठ है।

(2) कृशताऽभिमता देहे पीनता न तु शोफतः ।

प्रसंग
व्यक्ति के स्वस्थ होने के महत्त्व को प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है।

अर्थ
सूजन के मोटापे से शरीर की दुर्बलता ही अच्छी है। |

व्याख्या
किसी रोगवश सूजन के कारण शरीर में आयी स्थूलता किसी काम की नहीं होती; क्योंकि यह स्थूलता व्यक्ति को केवल कष्ट ही दे सकती है। वह व्यक्ति के लिए प्राणघातक हो सकती है अथवा व्यक्ति को अपंग भी बना सकती है। ऐसी स्थूलता से भला क्या लाभ, जो व्यक्ति के प्राण ले ले अथवा उसे अपंग बनाकर नारकीय जीवन जीने को विवश कर दे। उसे स्थूलता के कष्ट से तो शरीर की दुर्बलता ही अच्छी है। कम-से-कम यह दुर्बलता व्यक्ति को कोई कष्ट तो नहीं देती। तात्पर्य यह है कि दुर्बल होते हुए भी स्वस्थ शरीर वाला मनुष्य अधिक उत्तम होता है।

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(3) अव्यवस्थितचित्तानां प्रसादोऽपि भयङ्करः।

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में अस्थिर मन वाले लोगों से दूर रहने का परामर्श दिया गया है।

अर्थ
अस्थिर मन वालों की कृपा भी भयंकर होती है।

व्याख्या
जो लोग पलभर में रूठ जाते हैं और पलभर में मान जाते हैं, जो छोटी-छोटी बातों पर रूठते-मानते रहते हैं, ऐसे अस्थिर मन वाले लोगों की कृपा भी भयंकर होती है; क्योंकि ऐसे लोगों का कुछ पता नहीं होता कि वे कब क्या कर बैठेगे ? ऐसे लोग भावुकता में बहकर कभी-कभी व्यक्ति का ऐसा अनिष्ट कर डालते हैं कि उसका उस अनिष्ट से उबर पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो। जाता है। उदाहरणस्वरूप ऐसे किसी व्यक्ति के साथ मिलकर आप व्यापार आरम्भ करते हैं और अपनी कुल जमापूंजी उसमें लगा देते हैं। व्यापार अभी ठीक से आरम्भ भी नहीं हुआ होता कि वह किसी बात से नाराज होकर अपनी पूँजी के साथ व्यापार से अलग हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति के कारण आप अपना सब कुछ लुटा बैठेगे। इसलिए ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए।

(4) सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दमर्दो घटो घोषमुपैति नूनम् ।

प्रसंग
प्रस्तुत संक्ति में अज्ञानी व्यक्ति के विषय में बताया गया है।

अर्थ
पूरा भरा हुआ घड़ा शब्द नहीं करता है। आधा घड़ा निश्चय ही शब्द करता है।

व्याख्या
प्रायः देखा जाता है कि जो घड़ा पूरा भरा होता है, दूसरी जगह ले जाते समय वह शब्द नहीं करता। इसके विपरीत जो घड़ा आधा भरा होता है, वह दूसरी जगह ले जाते समय अवश्य शब्द करता है; क्योंकि खाली जगह होने के कारण वह छलकता है और छलकने का शब्द अवश्य होता है। उसी प्रकार जो विद्वान् और कुलीन होता है, वह अहंकार नहीं करता, वह बढ़-चढ़कर डींग नहीं मारता। इसके विपरीत जो अल्पज्ञ और गुणों से हीन होते हैं, वे बहुत डींगे मारते हैं। विद्वान् और कुलीन पूरे भरे घड़े के समान गम्भीर होते हैं; जब कि ओछे व्यक्ति आधे भरे हुए घड़े के समान छलके बिना नहीं रह सकते।

विशेष—इसी सन्दर्भ में निम्नलिखित उक्तियाँ भी कही गयी हैं
(1) क्षुद्र नदी भरि चली उतराई।
(2) अल्प विद्या भयंकरी
(3) प्यादे ते फरजी भयो टेढो-टेढो जाय।
(4) अधजल गगरी छलकत जाय।
(5) थोथा चना बाजे घना।

श्लोक का संस्कृत अर्थ

(1) नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्••••••••••••••••••••••• शश्वत् प्रतीक्षिणः ॥ (श्लोक 3 )
संस्कृतार्थः–
अस्मिन् संसारे धनं त एव जनाः लभन्ते ये श्रमशीला भवन्ति परन्तु अकर्मण्याः, धूर्ताः, मायाविनः, लोकापवाद-भीताः एवं समुचितावसरं सदैव प्रतीक्षमणाः जनाः अर्थान् कदापि न लभन्ते।

(2) अतिथिर्बालकः ••••••••••••••••••च स्वशक्तितः ॥ (श्लोक 6)
संस्कृताः –
अस्मिन् लोके गृहस्थैर्जनेर्विना प्रमादम् अतिथयः बालकाः पत्नी, माता तथा पिता सर्व प्रकारैः सेवनीया भवन्ति। एते पञ्च यथाशक्ति पोष्याः। अन्ये चापि जीवाः, प्राणिना वा यथाशक्ति परिपाल्याः सन्ति।

(3) पंड् दोषाः पुरुषेणेह ••••••••••••••••••••••• आलस्य दीर्घसूत्रता ॥ (श्लोक 11)
संस्कृतार्थः-
अस्मिन् संसारे यः मनुष्यः कल्याणम् इच्छति सः निद्रां, तन्द्रा, भयं, क्रोधम्, आलस्यं तथा मन्दगत्या कार्यकरणम् इति षड् दोषान् त्यजेत्।

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(4) सम्पूर्णकुम्भो न•••••••••••••••••••••••• मूढास्तु गुणैर्विहीनाः॥ (श्लोक 14)
संस्कृतार्थः-
प्रतिदिनं व्यवहारे दृश्यते यत् यः घट: जलेन पूर्णः भवति, तस्य कदापि शब्द: न भवति। य: घट: जलेन अर्धपूर्णः अस्ति, सः अवश्यमेव शब्दं करोति। एवमेव यः जनः उच्चकुलोत्पन्नः विद्वान् च भवति, सः स्वस्य कुलस्य विद्वत्तायाश्च कदापि अहङ्कारं न करोति। एतद् विपरीतं ये जनाः गुणैः विहीनाः अल्पशिक्षिताः च सन्ति, ते मूढा एवं बहुभाषन्ते।

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Class 10 Sanskrit Chapter 4 UP Board Solutions भारतीय जनतन्त्रम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 4 Bharatiya Jantantram Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 4 हिंदी अनुवाद भारतीय जनतन्त्रम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

आज विश्व में मुख्य रूप से तीन शासन-प्रणालियाँ–राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र एवं जनतन्त्र प्रचलित हैं। इसमें जनतन्त्र शासन-प्रणाली सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। हमारे देश में जनतान्त्रिक शासन-प्रणाली ही प्रचलित है। इस प्रणाली के अन्तर्गत देश का शासन जनता (UPBoardSolutions.com) द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहता है। जनतन्त्र को ही ‘प्रजातन्त्र’ अथवा ‘गणतन्त्र’ के नाम से जाना जाता है। भारत में शासन की यह प्रणाली 26 जनवरी, सन् 1950 ई० से लागू हुई थी। प्रस्तुत पाठ में राजतन्त्र और कुलीनतन्त्र के दोषों का निदर्शन करके उनकी निन्दा तथा जनतन्त्र की प्रशंसा की। गयी है। यह पाठ जनतन्त्र से होने वाले लाभों को भी इंगित करता है।

पाठ-सारांश     [2006,07,08, 10, 11, 13, 14]

शासन-प्रणाली के भेद राजनीतिशास्त्र के विद्वानों ने शासन-प्रणाली के तीन भेद बताये हैं—

  • राजतन्त्र में राजा का शासन होता है।
  • कुलीनतन्त्र में कुलीन (विशिष्ट) लोगों का शासन होता है।
  • जनतन्त्र में जनता का शासन होता है। भारतवर्ष में जनतन्त्र प्रणाली प्रचलित है।

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प्रत्येक प्रकार के शासन को संक्षिप्त वर्णन निम्नवत् है—
(1) राजतन्त्र राजतन्त्र में व्यक्ति विशेष का शासन होता है और वह सर्वोच्च शासक राजा कहलाता है। वह जीवनपर्यन्त शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका वरिष्ठ पुत्र या पुत्र के न रहने पर पुत्री सिंहासन पर बैठकर शासन करते हैं। राजतन्त्र के पक्षधर विद्वान् राजा को ईश्वरं का प्रतिनिधि मानकर उसके उचित या अनुचित आदेश का पालन करना अनिवार्य मानते हैं। प्राचीन काल में प्रजा को सन्तान के समान मानने वाले अनेक राजा हुए। वे दयालु, न्यायी और प्रजा के कल्याण के लिए राजकोष का व्यय करने वाले होते थे, परन्तु इसके विपरीत ऐसे भी राजा हुए, जो क्रूर, कृपण, प्रजा-पीड़क और अपने स्वार्थ के लिए राजकोष का व्यय करते थे; अत: लोगों के मन में राजतन्त्र के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी।

(2) कुलीनतन्त्र
कुलीन अथवा विशिष्ट लोगों का शासन भी प्रजा के लिए हितकर नहीं होता। समाज में धनी और बलवान ही विशिष्टजनों की श्रेणी में आते हैं। इनके शासन में इन्हीं वर्गों का हित सम्भव है। निर्धन और निर्बल लोग इनके शासन में अत्यन्त पीड़ित रहते हैं। इस शासन-प्रणाली में सामान्यजनों के कल्याण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।।

(3) जनतन्त्र
जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहते हैं। इसमें प्रभुत्वशक्ति जनता में निहित होती है। इस प्रणाली में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि शासन करते हैं। जनता अपने मतों से अपना प्रतिनिधि स्वयं चुनती है। ये जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। जो प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध (UPBoardSolutions.com) आचरण करते हैं, वे जनता द्वारा पुनः निर्वाचित नहीं किये जाते। अतः इस शासन में जनहित के विपरीत कार्यों की सम्भावना नहीं रहती है। अधिकांश देशों में यही जनतन्त्र प्रणाली प्रचलित है।

अनेक प्रजातान्त्रिक देशों में अब भी राजा होते हैं, परन्तु वे जन-प्रतिनिधियों की सलाह से ही कार्य करते हैं। वहाँ भी प्रजातन्त्र जैसा ही शासन चलता है। राजा उन्हीं अधिकारों को उपभोग करता है, जो प्रतिनिधि उसे देते हैं।

जनतन्त्र का आविर्भाव जनतन्त्र प्रणाली का आविर्भाव सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ था, वहीं से वह अन्य देशों में भी फैली। प्राचीन भारत में गणतन्त्र शासन-प्रणाली के होने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में गण शब्द तथा जैन और बौद्ध ग्रन्थों में गणराज्यों की चर्चा मिलती है। नीति-विशारद चाणक्य ने भी अपने ‘अर्थशास्त्र में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल में भारत में अनेक गणराज्य थे।

जनतन्त्र की विशेषता राजतन्त्र में लोग राजदण्ड के भय से ही कार्य करते थे, परन्तु जनतन्त्र में लोग कर्तव्य-भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। कर्तव्य करने के लिए सदा तत्पर रहने वाले परिश्रमी देशवासी नागरिक ही देश की उन्नति करने में समर्थ होते हैं। हमारा देश भारतवर्ष 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को स्वतन्त्र हुआ था। विदेशी शासन में फैले हुए गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि दोषों को दूर करता हुआ भारत सतत उन्नति के मार्ग पर अग्रसर है। भारत की उन्नति को देखकर विश्व के अन्य राष्ट्र दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं।

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भारत के बालक-बालिकाएँ ही देश के स्वामी और सेवक हैं। वे जैसा आचरण (UPBoardSolutions.com) करेंगे, देश का स्वरूप वैसा ही होगा; अत: उन्हें अनुशासित और सावधान रहकर, राष्ट्रहित के लिए स्वार्थ का त्याग करते हुए, राष्ट्र की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहकर देश की उन्नति करनी चाहिए।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
जनतन्त्राभिधाना शासनप्रणाली अस्माकं देशे प्रवर्तमानाऽस्ति। राजनयशास्त्रज्ञैः विद्वद्भिः राजतन्त्रं कुलीनतन्त्रं प्रजातन्त्रमिति शासनप्रणाल्यास्त्रयो भेदाः प्रतिपादिताः। राजतन्त्रम्-राज्ञः शासनम् कुलीनतन्त्रम्-कुलीनानां विशिष्टजनानां शासनं, जनतन्त्रम्-जनानां शासनमिति तैराधुनिकैः व्याख्यातम्।

शब्दार्थ जनतन्त्राभिधाना = जनतन्त्र नाम वाली। अस्माकं = हमारे प्रवर्तमाना = प्रचलित, लागू राजनयशास्त्रज्ञैः = राजनीतिशास्त्र के विद्वानों के द्वारा प्रतिपादिताः = प्रतिपादित किये गये हैं। तैराधुनिकैः (तैः + आधुनिकैः) = उन आधुनिकों ने। व्याख्यातम् = व्याख्या की है।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘भारतीय-जनतन्त्रम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शासन-प्रणालियों के तीन भेद बताये गये हैं।

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अनुवाद हमारे देश में जनतन्त्र’ नाम की शासन-प्रणाली प्रचलित है। राजनीतिशास्त्र को जानने वाले विद्वानों ने राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र, प्रजातन्त्र—ये शासन-प्रणाली के तीन भेद बताये हैं। राजतन्त्र’ का अर्थ राजा का,शासन, ‘कुलीनतन्त्र’ का अर्थ कुलीन अर्थात् विशिष्ट लोगों का शासन, ‘जनतन्त्र’ (UPBoardSolutions.com) का अर्थ जनता को शासन है; इस प्रकार सभी आधुनिक विद्वानों के द्वारा व्याख्या की गयी है।

(2)
राजतन्त्रम्-राजतन्त्रं व्यक्तिविशेषस्य शासनं भवति। स एव सर्वोच्चशासकः राजा भवति। यावज्जीवनं सः राजसिंहासने तिष्ठति शासनञ्च कुरुते। तस्य मृत्योः परं तस्य ज्येष्ठः पुत्रः, पुत्राभावे तस्य ज्येष्ठा पुत्री तत्पदमलङकुरुते। राजतन्त्रपक्षग्रहाः विपश्चितः राजानमीश्वरप्रतिनिधिभूतमेवाङ्गीकुर्वन्ति। तस्योचितोऽनुचितो वा आदेशः नोल्लङ्घनीयः इति तेषां मतम्।

शब्दार्थ सर्वोच्चशासकः = सबसे ऊपर शासन करने वाला। यावज्जीवनम् = समस्त जीवन, जीवनभर पुत्राभावे = पुत्र के अभाव में। तत्पदमलङकुरुते = उसके पद को सुशोभित करता है। राजतन्त्रपक्षग्रहाः = राजतन्त्र के पक्षधर। विपश्चितः = विद्वान्। राजानमीश्वरप्रतिनिधिभूतमेवाङ्गीकुर्वन्ति = राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि समझकर स्वीकार करते हैं। नोल्लङ्घनीयः = उल्लंघन करने योग्य नहीं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में राजतन्त्र के विषय में बताया गया है।

अनुवाद राजतन्त्र–राजतन्त्र व्यक्ति विशेष का शासन होता है। वही सर्वोच्च शासक राजा होता है। वह जीवनपर्यन्त राज-सिंहासन पर बैठती है और शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका सबसे बड़ा पुत्रे, पुत्र न होने पर उसकी सबसे बड़ी पुत्री उसके पद को सुशोभित करते हैं। राजतन्त्र का पक्ष लेने वाले विद्वान् राजा को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में ही स्वीकार करते हैं। “उसका उचित या अनुचित आदेश उल्लंघन करने योग्य नहीं है, अर्थात् सर्वथा मान्य है, ऐसा उनका मत है।

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(3)
पुरा बहवो राजानः प्रजां सन्ततिमिव मन्यमानाः शासनमकुर्वन यशोभागिनश्चाभूवन्। ते दयार्दहृदयाः न्यायरताः प्रजाकल्याणतत्पराः राज्यकोषस्य प्रजाहिताय प्रयोक्तारोऽभवन् परं बहवश्चेतरे क्रूाः, कृपणाः प्रजोत्पीडकाः राज्यकोषस्य स्वगर्हितमनोरथस्य पूर्तये व्ययशीलाः (UPBoardSolutions.com) स्वमनोवृत्तानुसारिणश्चासन्। एतादृशानां निरङकुशानां नृपतीनां शासने जनानां कीदृशी दशा स्यादिति सहज कल्पयितुं शक्यते। अतः शनैः शनैः कालेऽतीते राजतन्त्रं प्रति जनमानसेऽरुचिरुत्पन्ना।

शब्दार्थ सन्ततिमिव = सन्तान के समान। अभूवन् = होते थे। प्रयोक्तारः = प्रयोग करने वाले। अभवन् = हुए। बहवश्चेतरे (बहवः + च + इतरे) = और बहुत-से अन्य। प्रजोत्पीडकाः = प्रजा को पीड़ित करने वाले स्वगर्हितमनोरथस्य = अपने निन्दनीय मनोरथ की। स्वमनोवृत्तानुसारिणः = अपनी मनोवृत्ति के अनुसार चलने वाले। निरङ्कुशानां = अनियन्त्रितों का। स्यादिति = हो सकती है, यहा कालेऽतीते = समय बीतने पर। अरुचिः उत्पन्ना = अरुचि उत्पन्न हो गयी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि जनता की राजतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली में कैसे अरुचि हुई।

अनुवाद प्राचीनकाल में बहुत-से राजा प्रजा को सन्तान के समान मानते हुए शासन करते थे और उनका यश फैला हुआ था। वे अत्यन्त दयालु, न्यायशील, प्रजा के कल्याण में तत्पर, राजकोष (खजाने) का प्रजा के हित के लिए प्रयोग करते थे, परन्तु बहुत-से दूसरे क्रूर, कंजूस, प्रजा को सताने वाले, राजकोष को अपने निन्दित मनोरथ की पूर्ति के लिए व्यय करने वाले और अपने मन के अनुसार आचरण करने वाले थे। इस प्रकार के निरंकुश राजाओं के शासन में लोगों की क्या दशा होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। अतः धीरे-धीरे समय बीतने पर राजतन्त्र के प्रति लोगों के मन में अरुचि पैदा हो गयी।

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(4)
कुलीनतन्त्रम्-कुलीनानां विशिष्टजनानां शासनमपि जनानां कृते श्रेयस्करं न सम्भाव्यते। समाजे विशिष्टजनाः बहुधा धनिनो बलिनो वा भवन्ति। धनिनां शासनं धनिनां कृते। बलवतां शासनं बलवतामेव कृते कल्याणकृत् सम्पत्स्यते। एवंविधे शासने निर्धनाः दुर्बलाश्च भृशमुत्पीडिता (UPBoardSolutions.com) भवेयुर्नात्र संशयलेशः। तन्त्रेऽस्मिन् सामान्यजनानां कल्याणस्य कल्पनाऽपि खपुष्पमिव भवेत्। अतएवेदं तन्त्रं कदापि जनहृदि हृद्यं पदं नाऽलभत्।

शब्दार्थ कुलीनतन्त्रम् = विशिष्ट लोगों का शासन। विशिष्टजनानां = विशिष्ट मनुष्यों का। श्रेयस्करम् = लाभकारी, कल्याणकारी। न सम्भाव्यते = नहीं सम्भव होता है। बलिनः = बलशाली। कल्याणकृत् = कल्याण करने वाला। सम्पत्स्यते = होगा। भृशम् = अत्यधिक संशयलेशः = जरा भी संशय। खपुष्पमिव = आकाश-कुसुम के समान अर्थात् असम्भव हृद्यम् = हृदय को आनन्दित करने वाला। नाऽलभत् = नहीं प्राप्त किया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कुलीनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली का वर्णन किया गया है।

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अनुवद्ध कलीनतन्त्र-कुलीनों विशिष्टजनों का शासन भी लोगों के लिए कल्याणकारी सम्भव नहीं हो सकता है। समाज में विशेष लोग प्रायः धनी या बलवान् होते हैं। धनिकों का शासन धनियों के लिए, बलवानों का शासन बलवान् लोगों के लिए कल्याणकारी होगा। इस प्रकार के शासन में निर्धन और कमजोर अत्यधिक सताये जाते रहेंगे, इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं है। इस शासन में सामान्य लोगों के कल्याण की कर पना भी आकाश के फूल के समान अर्थात् असम्भव हो जाएगी। अतएव इस शासन ने कभी भी लोगों के हृदय में अच्छा स्थान प्राप्त नहीं किया।

(5)
जनतन्त्रम्-जनानां तन्त्रं जनानां शासनं जनतन्त्रं प्रजातन्त्रं वोच्यते। अस्मिन् तन्त्रे राज्ञः स्थानं जनाः गृह्णन्ति। राजतन्त्रे राजनि स्थिता प्रभुत्वशक्तिः जनतन्त्रे जनेषु सन्निहिता जायते। अतोऽस्यां पद्धतौ न कश्चिज्जनः शासकोऽपितु जनैः निर्वाचिताः प्रतिनिधयः शासनकार्यं कुर्वते। जनाः स्वप्रतिनिधीन् भारते पञ्चवर्षेभ्यश्चिन्वन्ति। निर्वाचनप्रसङ्ग न कश्चिच्छ्रेष्ठः, न वा कश्चिद्धीनः, न च बलवान्, न वा दुर्बलः विगण्यते। जातिधर्मवर्णलिङ्गनिर्विशेषाः सर्वे जनाः अष्टादशवर्षवयस्काः नराः नार्यश्च निर्वाचने

मताधिकृताः सन्ति। सर्वेषां मतमूल्यं तुल्यमेव भवति। एवंविधाः जननिर्वाचिताः प्रतिनिधयः जनताम्प्रत्येवोत्तरदायिनो भवन्ति। अतः ये प्रतिनिधयः जनविरोधिकार्यं कुर्वन्ति जनमतविरुद्धाचरणं वाऽऽचरन्ति ते पुनर्निर्वाचने साफल्यं न लभन्ते। एतदेव जनभयं तेषां पथच्युतिं रुणद्धि। निर्वाचनात्प्रागपि क्रियमाणजनहितविरुद्धकार्याणां विरोधाय जनाः संविधानप्रदत्तैरधिकारैः शासनं विरुन्धन्ति। शासनकार्ये रताः प्रतिनिधयस्तदा तथाविधस्य विचारस्य नीतेर्वा परित्यागाय परिवर्तनाय वा विवशाः सजायन्ते। अतएवास्यां शासनसरण्यां जनहितविपरीतनीतेः कार्यस्य च सम्भावनाऽल्पीयसी वर्तते इति सर्वेषां मतम्। स्ववैशिष्ट्यैः जनतन्त्रमिदानीं जगति सर्वेषामितरतन्त्राणां मूर्धानमधिशेते।।

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शब्दार्थ उच्यते = कहा जाता है। गृह्णन्ति = ग्रहण करते हैं। प्रभुत्वशक्तिः = सर्वोच्च राजत्व शक्ति, सत्ताधिकार सन्निहिता = स्थित, छिपी हुई, रखी हुई। पञ्चवर्षेभ्यः = पाँच वर्षों के लिए। चिन्वन्ति = चुनते हैं। निर्वाचनप्रसङ्गे = चुनाव के समय। कश्चिच्छेष्ठः = कोई श्रेष्ठ कश्चित् हीनः = कोई हीना विगण्यते = गिना जाता है। जातिधर्मवर्णलिङ्गनिर्विशेषाः = जाति, धर्म, वर्ण, लिंग आदि से रहित। अष्टादशवर्षवयस्कोः = अठारह वर्ष की आयु वाले। मताधिकृताः = मत के (UPBoardSolutions.com) अधिकारी जनताम्प्रत्येवोत्तरदायिनः (जनताम् + प्रति + एव + उत्तरदायिनः) = जनता के प्रति ही उत्तरदायी। साफल्य = सफलता को। पथच्युतिम् = पथभ्रष्ट होने को। रुणद्धि = रोकता है। प्रागपि = पहले-भी। विरुन्धन्ति = रोकते हैं, विरोध करते हैं। सञ्जायन्ते = हो जाते हैं। अल्पीयसी = बहुत कम| स्ववैशिष्ट्यैः = अपनी विशेषताओं से। इतरतन्त्रणां = दूसरे तन्त्रों का। मूर्धानमधिशेते = शीश पर सोता है, अर्थात् श्रेष्ठ है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली की अच्छाइयों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद जनतन्त्र–जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहा जाता है। इस शासन में राजा के स्थान को जनता ले लेती है। राजतन्त्र में राजा में स्थित प्रभुत्वशक्ति, जनतन्त्र में लोगों में स्थित हो जाती है। अत: इस प्रणाली में कोई व्यक्ति शासक नहीं होता है, अपितु जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि शासन का कार्य करते हैं। भारत में लोग पाँच वर्ष के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। निर्वाचन के सम्बन्ध में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता है, न कोई बलवान् अथवा न कोई दुर्बल समझा जाता है। जाति, धर्म, वर्ण, लिंग के अन्तर के बिना सभी अठारह वर्ष के स्त्री या पुरुष चुनाव में मत के अधिकारी होते हैं। सबके मत का मूल्य समान ही होता है। इस प्रकार से जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। अतः जो प्रतिनिधि जन-विरोधी कार्य करते हैं अथवा जनमत के विरुद्ध आचरण करते हैं, वे पुनः चुनाव में सफलता प्राप्त नहीं करते हैं। लोगों का यही भय उनको पथभ्रष्ट होने से रोकता है। चुनाव से पूर्व भी किये गये जनहित के विरुद्ध कार्यों के विरोध के लिए लोग संविधान के द्वारा दिये गये अधिकारों से शासन का विरोध करते हैं। सब लोगों का ऐसा मत है कि शासन के कार्य में लगे हुए प्रतिनिधि तब उस प्रकार के विचार अथवा नीति को त्यागने के लिए या बदलने के लिए विवश हो जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) इसलिए इस शासन-प्रणाली में जनहित के विपरीत नीति और कार्य की सम्भावना बहुत कम रह जाती है, यह सभी का मत है। अपनी विशेषताओं से जनतन्त्र इस समय संसार में सब दूसरे शासनों में श्रेष्ठ है।

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(6)
अनेकेषु प्रजातन्त्रीयेषु देशेष्वधुनाऽपि राजानः सन्ति, किन्तु ते तत्रालङ्कारमात्रभूताः जनप्रतिनिधिभिः नियमिताधिकाराः वर्तन्ते। सत्स्वपि राजसु तत्रापि च प्रजातन्त्ररीत्या एव शासन सञ्चरते। तत्रापि शासनस्य सर्वेऽधिकाराः जननिर्वाचितप्रतिनिधिसदसि सन्निहितास्तिष्ठन्ति। ते. एवाधिकारा राज्ञोपभुज्यन्ते ये प्रतिनिधिभिः तस्मै प्रदत्ताः। [2006]

शब्दार्थ अधुनापि = आज भी। अलङ्कारमात्रभूताः = मात्र अलंकार स्वरूप। नियमिताधिकाराः = निर्धारित अधिकारों वाले। सञ्चरते = चलता है। सदसि = सदन में या सभा में। सन्निहिताः = निहित। राज्ञोपभुज्यन्ते = राजा के द्वारा भोगे जाते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि अनेक प्रजातान्त्रिक देशों में राजा जनता का ही प्रतिनिधि होता है।

अनुवाद आज भी अनेक प्रजातन्त्र प्रणाली वाले देशों में राजा हैं, किन्तु वे वहाँ की शोभास्वरूप हैं, उनके अधिकार जन-प्रतिनिधियों द्वारा नियमित या निर्धारित हैं। राजाओं के रहने पर भी वहाँ भी प्रजातन्त्र की रीति से ही शासन चलता है। वहाँ भी शासन के सभी अधिकार जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि सभा में निहित हैं। राजा उन्हीं अधिकारों का उपभोग करता है, जो प्रतिनिधियों ने उसे दिये हैं।

(7)
जनतन्त्रशासनप्रणाल्याः आविर्भावादिविषये सुनिश्चिततरमिदं यदस्याः जन्म इङ्ग्लैण्डदेशेऽभवत्। तस्मादेव देशादेषाऽन्येदेशेषु प्रसृता तत्र तत्र देशेषु च प्रचलिता वर्तते।।

प्राचीनभारते गणतन्त्राभिधाना शासनपद्धतिः राजतन्त्रभिन्ना प्रचलिताऽभूदितीतिहासग्रन्थेषु तथाविधोल्लेखो दरीदृश्यते। विश्वस्य सर्वातिशायिप्राचीनग्रन्थे ऋग्वेदे ‘गण’ शब्दस्य बहुबारं प्रयोगो विहितः। जैनग्रन्थेषु बौद्धग्रन्थेषु गणाधीनराज्यानां चर्चा समुपलभ्यते। इतरेतरराज्यनामभिः विभक्तां (UPBoardSolutions.com) भारतभुवमेकसूत्रे आबद्धं बद्धपरिकरो, राजनयविचक्षणो विलक्षण आचार्यः कौटिल्यः स्वरचिते अर्थशास्त्राभिधाने ग्रन्थे गणराज्यानामुल्लेखं कृतवान्। गुप्तकालिकेतिहासे हिमगिरिविन्ध्ययोर्मध्येऽनेकेषां गणराज्यानामुपवर्णनं कृतमितिहासज्ञैः। यत्र तत्र प्रयुक्तो गणशब्दः बहुसङ्ख्यकान् जनानेव बोधयति। अनेन प्राचीनभारते राजतन्त्रेतरा शासनप्रणाली गणतन्त्ररूपा प्रचलिता आसीदिति सिद्ध्यति।

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(2013)
प्राचीनभारते गणतन्त्रा …………………………………. कृतमिति इतिहासज्ञैः। [2008, 14]

शब्दार्थ आविर्भावादिविषये = उत्पत्ति आदि के विषय में। प्रसृता = फैली। गणतन्त्राभिधाना= गणतन्त्र नाम की। राजतन्त्रभिन्ना = राजतन्त्र से भिन्न। तथाविधोल्लेखः = उस प्रकार की विधा का उल्लेख। दरीदृश्यते = प्रायः देखा जाता है। विहितः = किया गया है। समुपलभ्यते = प्राप्त होती है, मिलती है। इतरेतर = भिन्न-भिन्न। बद्धपरिकरः = दृढ़ता से तैयार। राजनय-विचक्षणः = राजनीति में कुशल। हिमगिरिविन्ध्ययोर्मध्येऽनेकेषाम् = हिमालय और विन्ध्याचल के बीच में अनेक का। बोधयति = बताता है। राजतन्त्रेतरा = राजतन्त्र से भिन्न| आसीदिति (आसीद् + इति) = थी, ऐसा। सिद्ध्यति = सिद्ध होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली के आविर्भाव और प्राचीन भारत में इसके प्रचलन के विषय में बताया गया है।

अनुवाद जनतन्त्र शासन-प्रणाली की उत्पत्ति के मत के विषय में यह निश्चित मत है कि इसका जन्म इंग्लैण्ड देश में हुआ था। उसी देश से ही अन्य देशों में फैली हुई यह उन-उन देशों में प्रचलित है। इतिहास के ग्रन्थों में प्रायः इस प्रकार का उल्लेख दिखाई पड़ता है कि प्राचीन भारत में राजतन्त्र से भिन्न ‘गणतन्त्र’ नाम की शासन-प्रणाली प्रचलित थी। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में ‘गण’ शब्द का बहुत बार प्रयोग किया गया है। जैन और बौद्ध ग्रन्थों में ‘गण’ के अधीन राज्यों की चर्चा प्राप्त होती है। दूसरे-दूसरे अलग-अलग राज्य के नामों से विभक्त भारत-भूमि को एक सूत्र में बाँधने के लिए दृढ़ता से तैयार राजनीति में कुशल आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने स्वरचित ‘अर्थशास्त्र’ नाम के ग्रन्थ में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल के इतिहास में इतिहास के जानकारों ने हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में अनेक गणराज्यों का वर्णन किया है। जहाँ-तहाँ प्रयोग किया गया ‘गण’ शब्द बहुत अधिक मनुष्यों को ही ज्ञान कराता है। इससे प्राचीन भारत में राजतन्त्र से भिन्न शासन-प्रणाली ‘गणतन्त्र’ के रूप में प्रचलित थी, ऐसा सिद्ध होता है।

(8)
राजतन्त्रे दण्डभयाद् कार्यं निष्पादयन्ति जनाः। जनतन्त्रे स्वत एव कर्तव्यभावनया स्वकार्दै निष्पादनीयं भवेत्। कर्तव्यबोधः एव जनतन्त्रस्य मूलाधारः। यस्मिन् कस्मिन् वा कार्ये नियुक्ताः कर्तव्यसम्पादनसमुत्सुकाः सततं राष्ट्रविकासनिरताः विहितसाध्यं साधयन्तोऽन्ताः श्रमशीला देशवासिनो मगरिका (UPBoardSolutions.com) एव स्वराष्ट्रमुन्नेतुं क्षमन्ते इति जनतन्त्रपद्धत्याः महद्वैशिष्ट्यम्। [2008, 10, 12, 15]

राजतन्त्रे दण्डभयाद् …………………………………. उन्नेतुं क्षमन्ते।

शब्दार्थ दण्डभयाद्
= दण्ड के भय से। निष्पादयन्ति = सम्पन्न करते हैं। स्वत एव = स्वयं ही। कर्त्तव्यबोधः = कर्तव्य का ज्ञान। मूलाधारः = मूल आधार। कर्त्तव्यसम्पादनसमुत्सुकाः = कर्तव्य पूरा करने के लिए अधिक उत्सुक। निरताः = लगे हुए। विहितसाध्यम् = इच्छित कार्य को। साधयन्तः = सिद्ध करते हुए। अश्रान्ताः = थकावटरहित, उत्साहसम्पन्न| उन्नेतुम् = उन्नति करने के लिए। क्षमन्ते = सफल होते हैं। महवैशिष्ट्यम् = महान् विशेषता।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्र प्रणाली की विशेषता बतायी गयी है।

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अनुवाद राजतन्त्र में लोग दण्ड के भय से कार्य सम्पन्न करते हैं। जनतन्त्र में स्वयं ही कर्त्तव्य की भावना से अपना काम करने योग्य होता है। कर्तव्य का ज्ञान ही जनतन्त्र का मूल आधार है। जनतन्त्र प्रणाली की यह महान् विशेषता है कि जिस किसी भी कार्य में लगाये गये, देशवासी नागरिक ही अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए उत्साहित, लगातार राष्ट्र के विकास में लगे हुए, इच्छित कार्य को पूरा करते हुए, उत्साहयुक्त, परिश्रमी और राष्ट्र की उन्नति करने में समर्थ होते हैं।

(9)
अस्माकं देशो भारतवर्षमपि सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे खीष्टाब्दे अगस्तमासस्य पञ्चदशदिनाङ्के वैदेशिकक्रूरकरान्मुक्तं सत् जनतन्त्रप्रणालीमूरीचकार। विदेशीयशासनजनितान् दारिद्रयाशिक्षाऽऽमयादिदोषान् अपाकुर्वन् सततं विकासोन्मुखोऽस्माकं देशस्त्वरितगत्याऽग्रेसरन्नस्ति। साश्चर्यमेतस्योन्नतिं विश्वराष्ट्राणि पश्यन्ति। देशवासिनां देशप्रेम्णः परिणामोऽयं विद्यते।।

अस्माकं देशो …………………………………. अग्रेसरन्नस्ति

शब्दार्थ सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतशतमे = उन्नीस सौ सैंतालीस में। ख्रीष्टाब्दे = ईस्वी में। वैदेशिकक्रूरकरान्मुक्तम् (वैदेशिक + क्रूरकरात् + मुक्तम्) = विदेशियों के कठोर हाथों से छूटा हुआ। ऊरीचकार = स्वीकार किया। आमयादिदोषान् = बीमारी आदि दोषों को। अपाकुर्वन् = दूर करते हुए। त्वरितगत्या = तीव्र गति से। अग्रेसरन्नस्ति = आगे बढ़ रहा है।

प्रसंग प्रस्तु गद्यांश में वर्तमान जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली द्वारा भारत की उन्नति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद हमारे देश भारतवर्ष ने भी सन् 1947 ईस्वी में अगस्त मास की 15 तारीख को विदेशियों के क्रूर हाथों से मुक्त होते हुए जनतन्त्र प्रणाली को स्वीकार किया। विदेशी शासन के कारण उत्पन्न हुई गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि दोषों को दूर करता हुआ निरन्तर विकास के लिए उन्मुख हमारा (UPBoardSolutions.com) देश तीव्रगति से आगे बढ़ रहा है। संसार के राष्ट्र इसकी उन्नति को आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं। यह देशवासियों के देशप्रेम का परिणाम है।

(10)
यूयमेव बालकबालिकाश्चास्य राष्ट्रस्य स्वामिनः सेवकाश्च स्थ। यूयं यथा समाचरिष्यथ तथैव राष्ट्ररूपं भविष्यति। यदि यूयं स्वकर्तव्यानि सदा सावधाना अनुशासिताः सम्पादयन्तः राष्ट्रहिताय स्वहितं परिहरन्तः राष्ट्ररक्षायै राष्ट्रविकासाय तत्पराः स्थास्यथ तदैवास्माकं राष्ट्र भारतवर्षं जगद्गुरुगौरवपदं पुनरुपलप्स्यते।। [2005]

शब्दार्थ समाचरिष्यथ = आचरण करोगे। स्वकर्तव्यानि = अपने कर्तव्य सम्पादयन्तः = सम्पन्न करते हुए। परिहरन्तः = त्यागते हुए। तत्पराः स्थास्यथ = तत्पर रहोगे। जगद्गुरुगौरवपदम् = संसार के गुरु होने का • गौरवशाली पद। उपलप्स्यते = प्राप्त करेगा।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में देशवासी बालक-बालिकाओं को राष्ट्र की उन्नति करने के लिए सम्बोधित किया गया है।

अनुवाद बालक-बालिकाओ! तुम सभी राष्ट्र के स्वामी और सेवक हो। तुम सब जैसा आचरण करोगे, वैसा ही राष्ट्र का स्वरूप होगा। यदि तुम लोग सदा सावधान और अनुशासित रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, राष्ट्रहित के लिए अपने हितों का त्याग करते हुए राष्ट्र की रक्षा हेतु राष्ट्र के विकास के लिए तैयार रहोगे, तभी हमारा राष्ट्र भारतवर्ष संसार के गुरु होने के गौरवपूर्ण पद को पुनः प्राप्त कर सकेगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनतन्त्र की विशेषता लिखिए। [2006]
या
जनतन्त्र का महत्त्व समझाइए। [2012]
या
जनतन्त्रको परिभाषित कीजिए। [2006,09]
उत्तर :
जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहते हैं। इसमें प्रभुत्व-शक्ति जनता के हाथ में निहित होती है। इसमें जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि शासन करते हैं, जो जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। जो प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध आचरण करते हैं, वे जनता के द्वारा पुनः (UPBoardSolutions.com) निर्वाचित नहीं किये जाते। इस शासन में जनहित के विपरीत कार्यों के किये जाने की सम्भावना नहीं रहती।

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प्रश्न 2.
शासन-प्रणाली के कितने भेद होते हैं? स्पष्ट कीजिए। [2006]
या
राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र और जनतन्त्र का अन्तर बताइए। [2007]
उत्तर :
राजनीतिवेत्ताओं ने शासन-प्रणाली के निम्नलिखित तीन भेद बताये हैं

  • राजतन्त्र – इसमें राजा का शासन होता है।
  • कुलीनतन्त्र – इसमें कुलीन अर्थात् विशिष्ट लोगों का शासन होता है।
  • जनतन्त्र – इसमें जनता का शासन होता है।

प्रश्न 3.
जनतन्त्र का आविर्भाव सर्वप्रथम कहाँ हुआ था? भारत में राजतन्त्र से भिन्न कौन-सी शासन-प्रणाली प्रचलित थी?
उत्तर :
जनतन्त्र प्रणाली का आविर्भाव सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ था। वहीं से यह प्रणाली विश्व के अन्य देशों में फैली। प्राचीन भारत में राजतन्त्र से कुछ भिन्न ‘गणतन्त्र’ शासन-प्रणाली प्रचलित थी। ऋग्वेद में गणतन्त्र शब्द का प्रयोग बहुत बार हुआ है। जैन और बौद्ध ग्रन्थों में भी ‘गण’ के अधीन राज्यों के उल्लेख मिलते हैं। आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने भी ‘अर्थशास्त्र में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकालीन इतिहास में हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य अनेक (UPBoardSolutions.com) गणराज्यों का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 4.
राजतन्त्र क्या है? [2006, 08,09]
या
राजतन्त्र किसे कहते हैं? [2010]
या
राजतन्त्र का स्वरूप बताइए। राजतन्त्र में कौन सर्वोच्च शासक होता है? [2006]
या
राजतन्त्र के प्रमुख दोष बताइए। [2011, 12, 13]
या
व्यक्ति-विशेष के शासन को क्या कहते हैं? [2010, 11]
या
जनता में राजतन्त्र के प्रति अरुचि क्यों उत्पन्न हुई। राजतन्त्र में राजा कैसे बनता है? [2006]
उत्तर :
राजतन्त्र में व्यक्ति विशेष का शासन होता है, वह सर्वोच्च शासक राजा कहलाता है। वह जीवनपर्यन्त शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र या पुत्री (पुत्र न होने की स्थिति में) उसके पद से जनता पर शासन करते हैं। राजतन्त्र के पक्षधर विद्वान् राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर उसके उचित या अनुचित आदेश का पालन करना अनिवार्य मानते हैं। प्राचीन काल में प्रजा को सन्तान के समान मानने वाले दयालु, न्यायी और प्रजा के कल्याण के लिए राजकोष का व्यय करने वाले अनेक राजा हुए। इसके विपरीत ऐसे भी राजा हुए, जो क्रूर, कृपण, प्रजापीड़क, अपने स्वार्थ के लिए राजकोष का व्यय करने वाले और मनोनुकूल आचरण करने वाले थे। साथ ही राजतन्त्र में लोग दण्डों के भय से कार्य सम्पन्न करते थे, कर्तव्य की भावना से नहीं। ऐसे ही दोषों के कारण लोगों के मन में राजतन्त्र के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी।

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प्रश्न 5.
हमारे देश में कौन-सी शासन-प्रणाली प्रवर्तमान है? [2011, 13]
या
भारतवर्ष ने किस सन्, महीने व दिनांक को जनतन्त्र प्रणाली को स्वीकार किया था? [2009]
उत्तर :
हमारे देश भारतवर्ष में 15 अगस्त, 1947 के बाद से जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली प्रवर्तमान है।

प्रश्न 6.
राजतन्त्र और जनतन्त्र का प्रमुख अन्तर स्पष्ट कीजिए [2006,07,13]
उत्तर :
राजतन्त्र में राजा का शासन होता है, जब कि जनतन्त्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का। (UPBoardSolutions.com) राजतन्त्र में लोग दण्ड के भय से कार्य सम्पन्न करते हैं, जब कि जनतन्त्र में कर्तव्य की भावना से कार्य सम्पन्न किया जाता है।

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प्रश्न 7.
राजनीतिज्ञों ने शासन-प्रणाली के कौन-कौन से तन्त्र स्वीकार किये हैं? किसी एक तन्त्रको संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत कीजिए।
या
राजनीतिज्ञों/विद्वानों द्वारा शासन-तन्त्रों के कौन-कौन से भेद स्वीकृत हैं? [2008, 09, 10]
उत्तर :
[ संकेत प्रश्न सं० 2 और प्रश्न सं० 1 के उत्तर को लिखें।]

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Class 9 Sanskrit Chapter 3 UP Board Solutions न गङ्गदतः पुनरेति कूपम् Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 3
Chapter Name न गङ्गदतः पुनरेति कूपम् (कथा – नाटक कौमुदी)
Number of Questions Solved 24
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 3 Na Gangadatta Punareti Kuppam Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 3 हिंदी अनुवाद न गङ्गदतः पुनरेति कूपम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ-सारांश

परिचय-संस्कृत साहित्य में कथा-लेखन की परम्परा अत्यधिक प्राचीन है। तत्कालीन समय में इन कथाओं की रचना का उद्देश्य धर्म, अर्थ एवं काम की प्राप्ति हुआ करता था। इनके अतिरिक्त संस्कृत वाङ्मय में नीति और उपदेशात्मक कथाओं की भी एक दीर्घ श्रृंखला प्राप्त होती है जिनमें ‘पञ्चतन्त्रम्, ‘हितोपदेशः’, ‘बृहत्कथामञ्जरी’, ‘कथासरित्सागर’, ‘वेतालपञ्चविंशतिका’, ‘भोजप्रबन्ध’, ‘भट्टकद्वात्रिंशतिका’ आदि उल्लेखनीय हैं। इस सभी कथा-श्रृंखलाओं में ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक कथा-संग्रह सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके रचयिता (UPBoardSolutions.com) विष्णुशर्मा नाम के एक ब्राह्मण थे। इन्होंने महिलारोप्य नगर के राजा अमरशक्ति के अयोग्य एवं विवेकशून्य पुत्रों को शिक्षित करने के लिए इस ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ. में शिष्टाचार, सदाचार, राजनीति एवं लोक-नीति से सम्बद्ध विषयों का कथाओं के माध्यम से अच्छा प्रतिपादन किया गया है। इसकी कथाओं के माध्यम से प्राप्त ज्ञान के द्वारा राजा अमरशक्ति के पुत्र अत्यधिक ज्ञानी और विवेकशील हो गये।

इस ग्रन्थ में पशु-पक्षियों, मानवों आदि के माध्यम से प्रत्येक कथा को विस्तार दिया गया है। इस ग्रन्थ के पाँच तन्त्र (भाग) हैं-‘मित्रभेदः’, ‘मित्र-सम्प्राप्तिः’, ‘काकोलूकीयम्’, ‘लब्धप्रणाशम् तथा ‘अपरीक्षितकारकम्’। इस ग्रन्थ का रचनाकाल 300 ईस्वी के आसपास माना जाता है। प्रस्तुत कथा इसी ग्रन्थ के चतुर्थ तन्त्र ‘लब्धप्रणाशम्’ से ली गयी है।

भागीदारों से बदला लेने का उपाय- किसी कुएँ में गंगदत्त नाम को मेढकों का राजा रहता था। वह अपने भागीदारों से अत्यधिक परेशान होकर एक दिन रहट की बाल्टी में चढ़कर कुएँ से बाहर निकल आया। उसने अपने भागीदारों से बदला लेने का विचार करके बिल में प्रवेश करते हुए एक काले सर्प को देखा और उसकी सहायता से अपने भागीदारों के विनाश करने का निश्चय किया। उसने बिल के द्वार पर जाकर सर्प को बुलाया और उससे मैत्री करने का प्रस्ताव किया। पहले तो सर्प (प्रियदर्शन) इसके लिए तैयार न हुआ, किन्तु बाद में (UPBoardSolutions.com) गंगदत्त की करुण कहानी सुनकर और उसके द्वारा भोज्य को सुलभतापूर्वक प्राप्त होता देककर उसके मैत्री प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। गंगदत्त ने उसे पक्के कुएँ में रहट के मार्ग से ले जाकर जल के पास स्थित कोटर (वह खोखला अंश, जिसमें पक्षी, साँप आदि रहते हैं।) में बैठकर सुख से भागीदारों का विनाश करने के लिए कहा और अपने परिवार वालों के भक्षण का निषेध कर दिया।

मेढकों का समूल विनाश- गंगदत्त ने सर्प को अपने भागीदार दिखा दिये। सर्प धीरे-धीरे उसके ‘समस्त भागीदारों को, कुछ को उसकी उपस्थिति में और कुछ को उसकी अनुपस्थिति में; चट कर गया। मेढकों के समाप्त हो जाने पर सर्प ने गंगदत्त से कहा कि मैंने तुम्हारे शत्रुओं को खा लिया है, अब मुझे दूसरा भोजन लाकर दो। इसके बाद गंगदत्त ने उसे अपने परिवार का एक मेढक प्रतिदिन देना प्रारम्भ कर दिया। सर्प उसे खाकर उसके पीछे दूसरों को भी खा लेता था। इसी प्रकार एक दिन उसने दूसरे मेढकों को खाकर गंगदत्त के पुत्र यमुनादत्त को भी खा लिया। कुछ दिनों बाद केवल गंगदत्त शेष रह गया।

गंगदत्त को कुएँ से बाहर जाना- एक दिन सर्प प्रियदर्शन ने गंगदत्त से कहा कि मैं भूखा हूँ, मुझे कुछ भोजन दो। गंगदत्त ने कहा कि तुम चिन्ता मत करो, मैं दूसरे कुएँ से मेंढक लाकर तुम्हें दूंगा और वह रहट की बाल्टी में चढ़कर कुएँ से बाहर आ गया। बहुत दिनों तक गंगदत्त के न आने पर प्रियदर्शन ने (UPBoardSolutions.com) अन्य कोटर में रहने वाली गोध्रा से कहा कि तुम गंगदत्त को खोजकर मेरा सन्देश उससे कहो कि यदि दूसरे मेढक नहीं आते हैं तो तुम अकेले ही आ जाओ, मैं (प्रियदर्शन) तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।

गंगदत्त का न लौटना- गोधा ने सर्प के कहने से गंगदत्त को खोजकर कहा कि तुम्हारा मित्र (प्रियदर्शन) तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, तुम वहाँ शीघ्र चलो। तब गंगादत्त ने गोधा से कहा कि “भूखा  कौन-सा पाप नहीं करता; अतः हे भद्रे! प्रियदर्शन से कहो कि गंगदत्त पुनः कुएँ में वापस नहीं जाएगा।’ ऐसा कहकर उसने गोधा को वापस भेज दिया।

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चरित्र-चित्रण

गंगदत्त 
परिचय- मेढकों का राजा गंगदत्त कुएँ में रहता है। वह अपने वंश के मेढकों से बहुत परेशान है। और उनसे बदला लेने की बात सोचकर कुएँ से बाहर आता है। वह मेढक जाति के जन्मजात शत्रु काले सर्प से मित्रता करके अपने वंश का समूल विनाश कर देता है। उसके चरित्र में निम्नांकित । विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं

(1) अविवेकी व्यक्ति का प्रतीक- गंगदत्त एक ऐसे अविवेकी व्यक्ति का प्रतीक है, जो अपने वंश के सगे-सम्बन्धियों का विनाश करने के लिए अपने जन्मजात शत्रु से सहायता लेता है और उनके साथ अपने परिवार के भी समूह विनाश को देखकर पश्चात्ताप की अग्नि में जलता रहता है। (UPBoardSolutions.com) उसे तभी सद्बुद्धि आती है, जब उसका परिवार भी समूल नष्ट हो जाता है। बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।’ जैसी कहावतें वास्तव में गंगदत्त जैसे अविवेकी व्यक्ति पर ही चरितार्थ होती हैं।

(2) मूर्ख- गंगदत्त इतना मूर्ख मेढक है कि वह अपने जन्मजात शत्रु को अपने परिवार वालों के पास शरण देता है। अन्ततः उसे अपनी मूर्खता का दुष्परिणाम भुगतना ही पड़ता है।

(3) भीरु– गंगदत्त भीरु प्रकृति का है। वह कायरों की भाँति अपने प्राण बचाकर अन्य मेढकों को लाने के बहाने कुएँ से बाहर चला जाता है। गोधा द्वारा बुलाये जाने पर भी वह नहीं आता। उसे डर है। कि सर्प भूखा होने के कारण उसे भी खा जाएगा। उसकी यही दुर्बलता उसमें प्रारम्भ में भी देखने को मिलती है। यदि ऐसा न होता तो वह अपने भागीदारों का सामना करता और उनसे डरकर न भागता। उसकी भीरुता ही उसे पश्चात्तापमय जीवन व्यतीत करने को बाध्य करती है। |

(4) घोर स्वार्थी–गंगदत्त घोर स्वार्थी है। स्वार्थ-साधन के लिए वह औचित्य-अनौचित्य का भी ध्यान नहीं रखता। उसकी स्वार्थपरता का अन्त वंश के संमूलोच्छेद से होता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि गंगदत्तं प्रतिशोधी स्वभाव का अविवेकी, भीरु और वज्रमूर्ख मेढक है, जो अपने वंशोच्छेद के बाद पश्चात्ताप की अग्नि में जलने के लिए बच जाता है।

प्रियदर्शन 

परिचय- प्रियदर्शन एक काला साँप है। गंगदत्त उससे मित्रता र्करके अपने सगे-सम्बन्धियों के विनाश के लिए उसे कुएँ में ले जाता है। वहाँ प्रियदर्शन गंगदत्त के सम्बन्धियों के साथ-साथ उसके परिवार का भी भक्षण कर जाता है। उसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) नीतिज्ञ— प्रियदर्शन नीति को जानने वाला है। गंगदत्त के पुकारने पर वह तुरन्त बिल से बाहर नहीं आता। उसे शंका है कि वह किसी मन्त्र, वाद्य, औषध से आकृष्ट करके उसे बन्धन में डालना चाहता है। वह गंगदत्त के मित्र बनने के प्रस्ताव पर भी सहसा विश्वास नहीं करता है। अन्ततः वह गंगदत्त (UPBoardSolutions.com) को कुलांगार जानकर उससे मित्रता करता है। वह सोचता है कि मैं कुएँ में आराम से रहूँगा और मेंढकों को खा जाऊँगा। अब अपने भोजन की चिन्ता मुझे नहीं करनी होगी।

(2) कपटी- मित्र-प्रियदर्शन गंगदत्त से मित्रता कर कपट करता है। वह वंशद्रोही गंगदत्त से इसलिए मित्रता करता है कि उसे आराम से भोजन मिलेगा। वह गंगदत्त के वंश-के साथ उसके पुत्र और पत्नी को भी खा जाता है और अन्त में गंगदत्त को भी अपनी मीठी बातों में फंसाकर खा जाना चाहता

(3) कृतघ्न- प्रियदर्शन कृतघ्न है। गंगदत्त की मूर्खता से उसे मेढकों के भक्षण का अवसर मिल जाता है, लेकिन उसकी लालसा बढ़ती ही जाती है। वह गंगदत्त के परिवार के मेढकों को खाकर अपनी कृतघ्नता का परिचय देता है। उसे मित्र के साथ विश्वासघात के दोष से मुक्त नहीं किया जा सकता।

(4) मूर्ख- प्रियदर्शन नीतिज्ञ होते हुए भी मूर्ख है। वह गंगदत्त की इस बात पर विश्वास कर लेता है कि वह उसे और मेढक लाकर देगा। अपनी मूर्खता के कारण ही उसे कुएँ में अकेले रहने के लिए विवश होना पड़ता है।

(5) दूरदर्शी- प्रियदर्शन एक दूरदर्शी सर्प है। वह प्रत्येक कार्य को करने से पहले उसके दूरगामी . परिणाम को सोचता है। जब वह इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि गंगदत्त के साथ कुएँ में जाने से उसे कोई हानि नहीं है, तब ही वह उसके साथ कुएँ में जाता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है (UPBoardSolutions.com) कि सर्प प्रियदर्शन के चरित्र में उपर्युल्लिखित समस्त विशेषताएँ पूर्णरूपेण विद्यमान हैं। इन विशेषताओं के सन्दर्भ में उसे बुरे-से-बुरे पात्र का प्रतीक माना जा सकती है।

लघु-उत्तरीय संस्कृत प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए

प्रश्‍न 1
गङ्गदत्तः कुत्रे प्रतिवसति स्म?
उत्तर
गङ्गदत्तः एकस्मिन् कुपे प्रतिवसति स्म।

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प्रश्‍न 2
गङ्गदत्तः किं कर्तुं प्रियदर्शनमाहूतवान्?
उत्तर
गङ्गदत्तः स्व दायादानां विनाशं कर्तुं प्रियदर्शनम् आहूतवान्।

प्रश्‍न 3
मण्डूकोभावे सर्पेण गङ्गदत्तः किमभिहितः?
उत्तर
मण्डूकाभावे सर्प: गङ्गदत्तम् अवदत्–भद्र! प्रयच्छ मे किञ्चिद् भोजनम्।

प्रश्‍न 5
गङ्गदत्तः स्वपल्या कथं निन्दितः?.,
उत्तर
गङ्गदत्त: स्वपल्या स्वपक्षक्षयकारणात् निन्दितः।

प्रश्‍न 5
गोधा प्रियदर्शनस्य कं सन्देशं गङ्गदत्तमकथयत्?
उत्तर
गोधा प्रियदर्शनस्य आगम्यतामेकाकिनापि भवता द्रुततरं, यदन्ये मण्डूकाः नागच्छन्ति। इति सन्देशं गङ्गदत्तमकथयत्।

प्रश्‍न 6
का निष्करुणा भवन्ति?
उत्तर
क्षीणाः नराः निष्करुणा भवन्ति।

वस्तुनिष्ठ  प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए

1. ‘न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम्’ नामक पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
(क) बृहत्कथामञ्जरी से
(ख) पञ्चतन्त्रम् से 
(ग) हितोपदेश से
(घ) कथासरित्सागर से

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2. ‘पञ्चतन्त्रम्’ के रचयिता कौन हैं?
(क) महाकवि भास
(ख) पण्डित विष्णु शर्मा
(ग) गुणाढ्य ।
(घ) शर्ववर्मा

3. पंण्डित विष्णु शर्मा ने पञ्चतन्त्रम् की रचना किसलिए की थी?
(क) अपने पुत्रों को शिक्षा देने के लिए।
(ख) सातवाहन के पुत्रों को शिक्षा देने के लिए
(ग) अमरशक्ति के पुत्रों को शिक्षा देने के लिए।
(घ) अमरशक्ति को शिक्षा देने के लिए

4. गंगदत्त कौन है?
(क) एक मगरमच्छ
(ख) एक सर्प
(ग) एक कछुआ
(घ) एक मेंढक

5. गंगदत्त कहाँ रहता था? 
(क) सरोवर में
(ख) कूप में,
(ग) बिल में
(घ) कोटर में

6. प्रियदर्शन किसका नाम है? 
(क) गंगदत्त के पुत्र का
(ख) यमुनादत्त के पिता का
(ग) एक मगरमच्छ का
(घ) एक सर्प का 

7. गंगदत्त प्रियदर्शन को कुएँ में क्यों लाया था? …………।
(क) वह प्रियदर्शन को अपना घर दिखाना चाहता था ,
(ख) प्रियदर्शन गंगदत्त का सम्बन्धी था ।
(ग) गंगदत्त प्रियदर्शन को दिखाकर अपने बन्धुओं को डराना चाहता था ।
(घ) गंगदत्त प्रियदर्शन के द्वारा अपने भागीदारों का विनाश कराना चाहता था।

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8. गंगदत्त की पत्नी ने गंगदत्त की निन्दा क्यों की?
(क) गंगदत्त द्वारा लाये गये सर्प ने उसके पुत्र यमुनादत्त को खा लिया था
(ख) गंगदत्त अपने बन्धुओं के साथ मित्रता से नहीं रह रहा था।
(ग) गंगदत्त की पत्नी को प्रियदर्शन से भय लगता था ।
(घ) प्रियदर्शन सर्प ने गंगदत्त की पत्नी को खाना चाहा था।

9. ‘स्वभाववैरी त्वमस्माकम्’ में किसको किसका वैरी कहा गया है?
(क) मेढक को गोधा का
(ख) गोधा को मेढक का
(ग) मेढक को साँप का
(घ) साँप को मेढक का

10. प्रियदर्शन सर्प ने गंगदत्त मेढक को कुएँ से बाहर क्यों जाने दिया?
(क) प्रियदर्शन कुएँ में अकेला रहना चाहता था,
(ख) प्रियदर्शन ने गंगदत्त के द्वारा अपने घर सन्देश भेजा था।
(ग) गंगदत्त ने बाहर से मेढकों को लाने का आश्वासन दिया था
(घ) गंगदत्त के शरीर से बहुत दुर्गन्ध आती थी।

11. गंगदत्त लौटकर कुएँ में क्यों नहीं गया?
(क) उसको कुएँ से अच्छा निवासस्थान मिल गया था।
(ख) उसको कुएँ में शीत सताती थी।
(ग) उसको प्रियदर्शन द्वारा खाये जाने का भय था
(घ) वह कुएँ में उतरने में असमर्थ था

12. ‘बुभुक्षितः किं न करोति पापं’ इस पंक्ति में बुभुक्षित किसको कहा गया है?
(क) गंगदत्त को
(ख) यमुनादत्त को
(ग) प्रियदर्शन को
(घ) गोधा को

13. ‘न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम्’, पाठ में कपटी मित्र कौन है?
(क) गोधा
(ख) यमुनादत्त
(ग) गंगदत्त
(घ) प्रियदर्शन

14. ‘भो गङ्गदत्त, बुभुक्षितोऽहम्। निःशेषिताः सर्वे मण्डूकाः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) गोधा ।
(ख) यमुनादत्तः
(ग) प्रियदर्शनः
(घ) मण्डूक

15. ‘अथ मण्डूकाभावे सर्पणाभिहितम्-भद्र, निःशेषितास्ते •••••••••••।’ में वाक्यपूर्ति होगी–
(क) परिजनाः
(ख) रिपवः
(ग) सुहृदाः
(घ) मित्राणि

16. ‘भो! अश्रद्धेयमेतत् यत्तृणानाम् अग्निना सह सङ्गमः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) गोधा
(ख) यमुनादत्त
(ग) प्रियदर्शनः
(घ) मण्डूकः

17. ‘तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्यतरं कोटरम् अस्ति।’ वाक्यस्य वक्ता कोऽस्ति?
(क) गोधा
(ख) यमुनादत्तः
(ग) गङ्गदत्तः
(घ) प्रियदर्शन:

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18. ‘अथान्यदिने सर्पेणगङ्गदत्तसुतो •••••••••• भक्षितः।’ वाक्य में रिक्त-स्थान में जाएगी
(क) प्रियदर्शनो
(ख) सरयूदत्तो
(ग) भगीरथो,
(घ) यमुनादत्तो

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Class 9 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions रामस्य पितृभक्तिः Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 2 रामस्य पितृभक्तिः (पद्य-पीयूषम्) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 2 रामस्य पितृभक्तिः (पद्य-पीयूषम्).

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Textbook NCERT
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Subject Sanskrit
Chapter Chapter 2
Chapter Name रामस्य पितृभक्तिः (पद्य-पीयूषम्)
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UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 2 Ramasya Pitribhakti Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद रामस्य पितृभक्तिः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय-‘रामस्य पितृभक्तिः
‘ शीर्षक पाठ महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ के अयोध्याकाण्ड के अठारहवें और उन्नीसवें सर्ग से संकलित किया गया है। इन सर्गों में उस समय की कथा का वर्णन है जब कैकेयी स्वयं को दिये गये वरदानों की पूर्ति के लिए दशरथ से दुराग्रह करती है। तब सुमन्त्र को भेजकर राम को वहाँ (UPBoardSolutions.com) बुलवाया जाता है। जब राम दशरथ और कैकेयी के पास पहुँचकर कैकेयी से अपने पिता की दुरवस्था के विषय में पूछते हैं, तब कैकेयी उनके प्रश्न का जो उत्तर देती है, उसी समय की घटना का वर्णन प्रस्तुत पाठ में किया गया है।

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पाठ-सारांश

राम का कैकेयी से पिता के दुःख का कारण पूछना-राम ने कैकेयी के साथ आसन पर बैठे हुए दु:खी पिता को देखा। उन्होंने पहले पिता के चरणों में अभिवादन किया और तत्पश्चात् कैकेयी के चरण स्पर्श किये। पिता दशरथ ‘राम’ शब्द कहकर आँसुओं के कारण न उन्हें देख सके और न बोल सके। पिता को आशीर्वाद न देते देखकर, राम सोचने लगे कि आज पिताजी मुझे देखकर प्रसन्न क्यों नहीं हो रहे हैं। शोकयुक्त राम ने कैकेयी से पूछा कि “आज पिताजी मुझ पर क्यों कुपित हैं? मैं पिता को सन्तुष्ट न करके और उनके वचन का पालन न करता हुआ एक क्षण भी नहीं जीना चाहता हूँ।”

कैकेयी का राम से पिता का वचन पूर्ण करने को कहना-कैकेयी ने राम के वचन सुनकर : स्वार्थ से भरकर कहा कि तुम इन्हें अत्यन्त प्रिय हो। यही कारण है कि तुम्हें अप्रिय बात कहने के लिए इनकी वाणी नहीं निकल रही है। इन्होंने मुझे जो वचन दिया है, वह तुम्हें अवश्य पूरा करना है। तुम्हारे पिता ने मुझे वर देकर मेरा सम्मान किया था, लेकिन अब उस वर को पूरा करते समय ये साधारणजन की तरह दु:खी हो रहे हैं। महाराज तुमसे जो शुभ या अशुभ कहेंगे, वह सब मैं तुमसे कहती हूँ।

राम द्वारा कैकेयी को विश्वास दिलाना-कैकेयी के वचन सुनकर दु:खी राम ने उससे कहा कि, “मैं राजा के कहने से आग में कूद सकता हूँ, भयंकर विष खा सकता हूँ और समुद्र में भी कूद सकता हूँ; अतः हे देवी! आप राजा को अभिलषित मुझे बताइए, मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा।’ कैकेयी का वरदानों के विषय में बताना–कैकेयी ने सरल और सत्यवादी राम से अत्यन्त कठोर शब्दों में कहा कि “प्राचीन समय में हुए (UPBoardSolutions.com) देवासुर संग्राम में तुम्हारे पिता की रक्षा करने पर उन्होंने मुझे दो वर प्रदान किये थे। उन दो वरों में से मैंने प्रथम वर भरत के राज्याभिषेक को तथा द्वितीय वर तुम्हारे वन में जाने का माँगा है। यदि तुम पिता का वचन और अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करना चाहते हो तो चौदह वर्ष तक वन में रहने के लिए जाओ, जिससे भरत पिता के इस राज्य का शासन कर सके।”

राम द्वारा वन जाने की स्वीकारोक्ति-कैकेयी के वचन को सुनकर राम दु:खी हुए और बोले कि “मैं पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए जटा और वल्कल वस्त्र धारण करके वन में चला जाऊँगा। भरत को राज्य की तो बात ही क्या, उसे मैं सीता, प्रिय प्राणों और धन को भी प्रसन्नतापूर्वक दे सकता हूँ। संसार में पिता की सेवा और उसकी आज्ञापालन से बढ़कर श्रेष्ठ धर्म कोई नहीं है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

(1)
स ददर्शासने रामो निषण्णं पितरं शुभे।
कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता ॥

शब्दार्थ
निषण्णं = बैठे हुए।
परिशुष्यता = सूखते हुए। |

सन्दर्भ
प्रस्तुत श्लोक महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘वाल्मीकि रामायण’ से संकलित और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘रामस्य पितृभक्तिः ‘ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग
कैकेयी के द्वारा राजा दशरथ से दो वरदान माँग लेने पर दशरथ द्वारा श्रीराम को सुमन्त्र से बुलवाया जाता है। राम महल में पहुँचकर जो कुछ देखते हैं, उसी का वर्णन यहाँ किया गया है।।

[संकेत-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही

सन्दर्भ
प्रसंग प्रयुक्त होगा।]

अन्वय
सः रामः परिशुष्यता मुखेन दीनं पितरं कैकेय्या सहितं शुभे आसने निषण्णं ददर्श।

व्याख्या
उन राम ने सूखे हुए मुख वाले, दीन पिता को कैकेयी के साथ आसन पर बैठे देखा; अर्थात् राम ने अपने पिता दशरथ को अत्यन्त दीन-हीन अवस्था में देखा। मानसिक कष्ट से उनका मुख सूख रहा था और वे कैकेयी के साथ सुन्दर आसन पर विराजमान थे।

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(2)
स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत् ।।
ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः ॥

शब्दार्थ
अभिवाद्य = अभिवादन करके।
विनीतवत् = विनम्र भाव से।
ततः = उसके बाद।
ववन्दे = प्रणाम किया।
सुसमाहितः = अत्यन्त।।

अन्वय
सुसमाहितः (भूत्वा) सः पूर्वं विनीतवत् पितुः चरणौ अभिवाद्य ततः कैकेय्याः चरणौ ववन्दै।

व्याख्या
अत्यधिक एकनिष्ठ होकर उन श्रीराम ने पहले अत्यन्त विनीत भाव के साथ पिता (दशरथ) के चरणों में प्रणाम करके, उसके बाद कैकेयी के चरणों में प्रणाम किया।

(3)
रामेत्युक्त्वा तु वचनं वाष्पपर्याकुलेक्षणः ।।
शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम् ॥

शब्दार्थ
वाष्पपर्याकुलेक्षणः = आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले।
ईक्षितुम् = देखने के लिए।
अभिभाषितुम् = बोलने के लिए।

अन्वय
वाष्पपर्याकुलेक्षण: दीनः नृपतिः ‘राम’ इति वचनम् उक्त्वा न ईक्षितुं न (च) अभिभाषितुं शशाक।।

व्याख्या
आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले, अत्यन्त दु:खी राजा राम’ इस वचन को कहकर न तो देख सके और न बोल सके; अर्थात् अत्यधिक दु:खी राजा दशरथ के नेत्र आँसुओ से भरे हुए थे। वे
केवल ‘राम’ इस शब्द को ही कह सके। नेत्रों के अश्रुपूरित होने के कारण न तो वे कुछ देख ही सके और अत्यधिक दु:ख के कारण न कुछ कह ही सके।

(4)
चिन्तयामास चतुरो रामः पितृहिते रतः।
किंस्विदचैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति ॥

शब्दार्थ
चिन्तयामास = सोचने लगे।
चतुरः = होशियार, मेधावी, तीक्ष्णबुद्धि।
पितृहिते रतः पिता के हित में लगे हुए।
किंस्विद्= किस कारण से।
प्रत्यभिनन्दति = प्रसन्न होकर आशीष दे रहे हैं।

अन्वय
पितृहिते रतः चतुरः रामः चिन्तयामास। किंस्विद् नृपतिः अद्य एवं मां न प्रत्यभिनन्दति।

व्याख्या
पिता के हित में लगे हुए तीक्ष्ण-बुद्धि राम ने सोचा कि किस कारण से राजा आज ही मुझसे प्रसन्न होकर आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं। तात्पर्य यह है कि जब भी राम अपने पिता (UPBoardSolutions.com) (राजा दशरथ) को प्रणाम करते थे, तो वे सदैव उन्हें आशीर्वाद दिया करते थे। केवल आज ही ऐसा नहीं हुआ। यह देखकर मेधावी राम, जो हमेशा पिता की हित-चिन्ता में लगे रहते थे; सोचने के लिए विवश हो गये कि ऐसा क्यों हुआ? |

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(5)
अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति ।  
तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते ॥

शब्दार्थ
अन्यदा = किसी दूसरे समय।
दृष्ट्य = देखकर।
कुपितः अपि = क्रोधित होने पर भी।
प्रसीदति = प्रसन्न होते हैं।
सम्प्रेक्ष्य = देखकर
आयासः = चित्त-क्लेश, दु:ख।
प्रवर्तते = प्रारम्भ हो रहा है। ।

अन्वय
अन्यदा कुपितः अपि पिता मां दृष्ट्वा प्रसीदति। अद्य मां सम्प्रेक्ष्य तस्य आयासः किं प्रवर्त्तते।

व्याख्या
अन्य दिनों कुपित हुए होने पर भी पिताजी मुझे देखकर प्रसन्न हो जाते थे। आज मुझे देखकर उनको दुःख क्यों हो रहा है? तात्पर्य यह है कि आज के अतिरिक्त दूसरे दिनों में जब पिता दशरथ क्रोधित भी होते थे, तब भी वह राम को देखकर प्रसन्न हो जाते थे, लेकिन आज राम को देखने के बाद दशरथ और भी दु:खी हो गये। ऐसा क्यों हुआ, यह राम समझ नहीं सके।

(6)
स दीन इव शोकात विषण्णवदनद्युतिः।
कैकेयीमभिवाद्यैवं रामो वचनमब्रवीत् ॥

शब्दार्थ
शोकार्त्तः = शोक से व्याकुल।
विषण्णवदनद्युतिः = विषाद के कारण मलिन मुख-कान्ति वाले।
अभिवाद्यैव (अभिवाद्य + एव) = प्रणाम करते ही।
अब्रवीत् = बोला, कहा।

अन्वय
दीनः इव शोकार्त्तः विषण्णवदनद्युतिः सः रामः कैकेयीम् अभिवाद्य एवं वचनम्। अब्रवीत्।।

व्याख्या
दीन-दु:खी के समान दुःख से पीड़ित, दु:ख के कारण मलिन मुख-कान्ति वाले उस राम ने कैकेयी को प्रणाम करते ही यह वचन कहा। तात्पर्य यह है कि पिता को दीन-हीन अवस्था में मानसिक कष्ट से पीड़ित देखते ही राम की मुख-मुद्रा और मानसिक स्थिति भी वैसी ही (पिता जैसी) हो गयी थी।

(7)
कच्चिन्मयानापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता।
कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय ॥

शब्दार्थ
कच्चित् = क्या कहीं।
मया = मेरे द्वारा।
अपराद्धम् = अपराध को, दोष को।
आचक्ष्व = बताओ।
प्रसादय = प्रसन्न करो।

अन्वय
कच्चित् मया अज्ञानात् न अपरार्द्धम्, येन मे पिता कुपितः, तत् मम आचक्ष्व। एनं त्वम् एव प्रसादये।

व्याख्या
क्या कहीं मैंने अज्ञान के कारण कोई अपराध तो नहीं कर दिया, जिससे मेरे पिता मुझ पर क्रुद्ध हो गये, उस कारण को मुझे बताइए (और) आप ही इनको (UPBoardSolutions.com) प्रसन्न करें। अर्थात् मेरी जानकारी में तो मुझसे कोई अपराध हुआ नहीं। सम्भव है कि अनजाने में मुझसे कोई अपराध निश्चित हो गया है, जिस कारण पिताजी मेरे ऊपर क्रुद्ध हो गये हैं। अतः आप मुझे मेरा अपराध बताइए और पिताजी को (मेरे ऊपर) प्रसन्न भी कराइए।

(8)
अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वचः।
मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे॥

शब्दार्थ
अतोषयन् = सन्तुष्ट न करता हुआ।
अकुर्वन् (न कुर्वन्) = न करता हुआ।
मुहूर्त्तम् । = एक मुहूर्त अर्थात् दो घटी (48 मिनट)।
इच्छेयम् = चाहो जाना चाहिए। 

अन्वय
नृपे कुपिते महाराजम् अतोषयन् पितुः वचः वा अकुर्वन् मुहूर्तम् अपित जीवितुं न इच्छेयम्।।

व्याख्या
राजा के क्रुद्ध होने पर महाराज को सन्तुष्ट न करता हुआ अथवा पिता के वचन का पालन न करता हुआ मैं एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहता हूँ; अर्थात् राम स्वयं को धिक्कारते हुए कहते हैं कि यदि मैं महाराज दशरथ को अपने कार्यों से सन्तुष्ट न कर सका, अथवा अपने पिता के वचनों का पालन न कर सका तो मेरे लिए एक क्षण भी जीवित रहना उचित न होगा। तात्पर्य है कि किसी भी स्थिति में मैं इनके वचनों का पालन अवश्य करूंगा।।

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(9)
यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः।।
कथं तस्मिन्न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते ।।

शब्दार्थ
यतोमूलम् = जिस मूल कारण से।
प्रादुर्भावम् = उत्पत्ति को। इह = यह लोक।
आत्मनः = अपनी।
वर्तेत = व्यवहार करे।
प्रत्यक्षे = साक्षात् उपस्थित, सामने।
दैवते = ईश्वर तुल्य।

अन्वय
नरः इह आत्मन: प्रादुर्भावं यतोमूलं पश्येत् , तस्मिन् प्रत्यक्षे दैवते सति कथं ने वर्तेत।

व्याख्या
मनुष्य इस संसार में अपनी उत्पत्ति को जिसके कारण देखता है, उस देवता स्वरूप पिता के विद्यमान रहने पर क्यों न उसके अनुकूल आचरण करे; अर्थात् इस संसार में मनुष्य कन जन्म पिता के कारण ही होता है। अतः पिता के रहने पर व्यक्ति को हमेशा उसके अनुकूल ही आचरण करना चाहिए; क्योंकि जन्म देने के कारण पिता देवतास्वरूप ही होता है।

(10)
एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना।
उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वचः ॥

शब्दार्थ
महात्मना = महान् पुरुष।
उक्ता = कहा।
सुनिर्लज्जा = अत्यधिक लज्जारहित।
धृष्टम् = ढिठाई से भरा, ढिठाई के साथ।
आत्महितं वचः = अपने स्वार्थ का वचन।
उवाच = कहा।

अन्वय
महात्मना राघवेण एवम् उक्ता तु सुनिर्लज्जा कैकेयी धृष्टम् आत्महितम् इदं वचः उवाच।

व्याख्या
महात्मना राम ने जब इस प्रकार कहा तो अत्यधिक निर्लज्ज कैकेयी ने धृष्टता में ही अपनी भलाई समझते हुए इस प्रकार वचन कहे। तात्पर्य यह है विशाल हृदय वाले राम के सम्मुख भी कैकेयी अपने तुच्छ स्वार्थ को त्याग न सकी और अत्यधिक निर्लज्जता और धृष्टता से स्वार्थ से युक्त अपनी बातें कहने लगी।

(11)
प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते।
तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम ॥

शब्दार्थ
त्वाम् = तुमको।
अप्रियं = अप्रिय, कटु।
वस्तुम् = कहने के लिए।
प्रवर्त्तते = प्रवृत्त हो रहे।
कार्यं = करना चाहिए।
आश्रुतम् = दिया गया वचन, की गयी प्रतिज्ञा को।।

अन्वय
प्रियं त्वाम् अप्रियं वक्तुम् अस्य वाणी न प्रवर्तते। अनेन यत् मम आश्रुतम् , तत् त्वया अवश्यं कार्यम्। |

व्याख्या
अत्यन्त प्रिय, तुमसे कटु बात कहने के लिए इनकी वाणी निकल ही नहीं रही है। इन्होंने मुझसे जो प्रतिज्ञा की है उसका पालन तुम्हें अवश्य करना है। तात्पर्य यह है कि हे राम! तुम अपने पिता महाराजा दशरथ को अत्यन्त प्रिय हो। इसलिए तुमसे ये कुछ भी अप्रिय वचन कहना नहीं चाहते। अतः अब ये तुम्हारा कर्तव्य है कि इन्होंने मुझे जो वचन दिया है, उसे तुम अवश्य पूरा करो।

(12)
एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च।।
स पश्चात् तप्यते राजा यथान्यः प्राकृतस्तथा ॥

शब्दार्थ
एष = इन्होंने।
मह्यं = मुझे।
पुरा = पहले, प्राचीनकाल में।
अभिपूज्य = सम्मान करके।
तप्यते = सन्तप्त हो रहे हैं।
प्राकृतः = साधारण-जन।।

अन्वय
एषः (राजा) पुरा माम् अभिपूज्य मह्यं वरं च दत्त्वा पश्चात् स राजा तथा तप्यते यथा अन्यः प्राकृतः (जनः तप्यते)।

व्याख्या
ये राजा (दशरथ) प्राचीन समय में मेरा सम्मान करके और मुझे वर देकर बाद में उसी प्रकार दु:खी हो रहे हैं, जैसे दूसरा कोई साधारण-जन दुःखी होता है। तप-सेवा आदि से प्रसन्न हुए देवता, गुरु आदि सामर्थ्यसम्पन्न जनों द्वारा जो इच्छित पदार्थ सेवा करने वाले को दिया जाता है,उसे (UPBoardSolutions.com) वर कहते हैं। कैकेयी का भी यही कहना है कि जब इन्होंने मुझ पर प्रसन्न होकर वर दिये थे तब आज वचन का पालन करते समय एक सामान्यजन की तरह क्यों दुःखी हो रहे हैं, अर्थात् इन्हें उसी प्रसन्नता से वचन का पालन भी करना चाहिए।

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(13)
यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाऽशुभम्। ।
करिष्यसि ततः सर्वामाख्यास्यामि पुनस्त्वहम् ॥

शब्दार्थ
वक्ष्यते = कहेंगे।
वो = अथवा।
आख्यास्यामि = बता देंगी

अन्वय
यदि राजा शुभं वा अशुभं वा वक्ष्यते, तद् यदि त्वं करिष्यसि, ततः अहं तु पुनः सर्वम् । आख्यास्यामि।

व्याख्या
राजा (दशरथ) प्रिय या अप्रिय जो कुछ भी तुमसे कहेंगे, तुम यदि उसे करोगे, तब फिर मैं सब कुछ तुम्हें बता दूंगी। तात्पर्य यह है कि स्वार्थ की बात कहने से पूर्व कैकेयी राम को भी भली-भाँति वचनबद्ध कर देना चाहती है।

(14)
एतत्तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम् ।
उवाच व्यथित रामस्तां देवीं नृपसन्निधौ ॥

शब्दार्थ
श्रुत्वा = सुनकर।
समुदाहृतम् = भली प्रकार से कहे गये।
व्यथितः = दु:खी।
नृपसन्निधौ = राजा के पास।

अन्वय
कैकेय्या समुदाहृतम् एतत् वचनं श्रुत्वा तु रामः व्यथितः (सन्) नृपसन्निधौ तां देवीम् । उवाच।

व्याख्या
कैकेयी द्वारा कहे गये इस वचन को सुनकर तो राम ने दुःखी होते हुए राजा के पास | . उस देवी (माता कैकेयी) से कहा।

(15)
अहो धिङ्नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः।
अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके ॥

शब्दार्थ
धिङ = धिक्कार है।
अर्हसे = उचित है, योग्य है।
माम् = मुझे।
ईदृशं = इस प्रकार के।
हि = निश्चय ही।
पतेयम् = गिर सकता हूँ।
पावके = अग्नि में।

अन्वय
अहो! धिङ मां। देवि! (त्वं) ईदृशं वचः वक्तुं न अर्हसे। राज्ञः वचनात् हि अहं पावके अपि पतेयम्। •

व्याख्या
अहो, मुझे धिक्कार है! हे देवी! (तुम्हें) मुझको इस प्रकार के वचन कहना उचित : नहीं है। मैं निश्चय ही राजा (पिता) की आज्ञा से अग्नि में भी गिर सकता हूँ। जब राम को अनुभव

हुआ कि कैकेयी उनके वचन-पालन के प्रति पूर्णरूपेण आश्वस्तं नहीं है, तब उन्होंने उसे विश्वास दिलाने के लिए कहा कि पिता की आज्ञा यदि उनके लिए प्राणघातक भी होगी तब भी वे उसे पूर्ण करने के लिए वचनबद्ध हैं।

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(16)
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे।
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च ॥

शब्दार्थ
भक्षयेयम् = खा सकता हूँ।
अर्णवे = समुद्र में
नियुक्तः = कहा गया।
गुरुणा = गुरु द्वारा।
पित्रा = पिता द्वारा।
नृपेण = राजा द्वारा।
हितेन = हितैषी द्वारा।

अन्वय
नृपेण गुरुणा हितेन च पित्री नियुक्तः (अहं) तीक्ष्णं विषं भक्षयेयम् , अर्णवे च अपि पतेयम्।।

व्याख्या
यदि राजा, गुरु, पिता और हितैषी मुझे आदेश दें तो मैं तेज विष खा सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ। तात्पर्य यह है कि राजा, गुरु और पिता तो श्रेष्ठ होते ही हैं, उनकी आज्ञा का पालन तो आवश्यक है ही, लेकिन राम तो उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए भी तत्पर हैं जो उनका हित चाहते हैं।

(17)
तद् बूहि वचनं देवि! राज्ञो यदभिकाङ्क्षितम्।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते ॥

शब्दार्थ
ब्रूहि = कहो।
अभिकाङ्क्षितम् = अभिलषित को।
प्रतिजाने = प्रतिज्ञा करता हूँ।
द्विः न अभिभाषते = दो तरह की बात नहीं कहता है।

अन्वय
देवि! राज्ञः यद् अभिकाङ्क्षितम् , तद् वचनं (मां) ब्रूहि। (अहं) प्रतिजाने, तत् । (अहं) करिष्ये। रामः द्विः न अभिभाषते।।

व्याख्या
हे देवी! राजा की जो अभिलाषा है, वह आप मुझे बतलाइए, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उसका पालन अवश्य करूंगा। राम दो प्रकार की बात नहीं कहता है। तात्पर्य यह है कि राम कभी असत्य-भाषण नहीं करता है। |

(18)
तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम्।।
उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम् ॥

शब्दार्थ
आर्जवसमायुक्तम् = सरलता से युक्त।
अनार्या = नीचे विचारों वाली।
भृशदारुणम् = अत्यन्त कठोर।

अन्वय
अनार्या कैकेयी आर्जवसमायुक्तं सत्यवादिनं तं रामं भृशदारुणं वचनम् उवाच।।

व्याख्या
नीचे अर्थात् निकृष्ट विचारों वाली कैकेयी ने सरल स्वभाव वाले और सत्यवक्ता राम से अत्यन्त कठोर वाणी से कहा। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के जैसे विचार होते हैं, उसी के अनुरूप उसकी वाणी भी परिवर्तित हो जाती है।

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(19)
पुरा दैवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव ! 
रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे ॥

शब्दार्थ
पुरा = प्राचीन काल में।
दत्तौ = दिये गये।
सशल्येन = बाण से विद्ध हुए।

अन्वय
हे राघव! पुरा दैवासुरे युद्धे शल्येन (मया) रक्षितेन ते पित्रा महारणे मम वरौ दत्तौ।।

व्याख्या
हे राघव! प्राचीनकाल में देवताओं और असुरों के बीच होने वाले युद्ध में बाण से। विद्ध हुए और मेरे द्वारा रक्षित तुम्हारे पिता ने उसी महान् युद्ध-भूमि में ही मुझे दो वर प्रदान किये थे।

(20)
तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम्।
गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव! ॥

शब्दार्थ
तत्र = वहाँ।
याचितः = माँगा।
अभिषेचनम् = अभिषेक, राज्याभिषेक।
दण्डकारण्ये = दण्डक वन में।
तव = तुम्हारा।
अध एवं = आज ही।

अन्वय
हे राघव! तत्र (एकेन) में भरतस्य अभिषेचनम्। (द्वितीयेन) अद्यैव तव दण्डकारण्ये गमनं च राजा याचितः।

व्याख्या
हे राघव! उन वरों में से मैंने राजा से एक वर से भरत का राज्याभिषेक और दूसरे वर से आज ही तुम्हारा दण्डक वन में जाना माँगा था।

(21)
यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि।
आत्मानं च नरश्रेष्ठ! मम वाक्यमिदं शृणु ॥

शब्दार्थ
सत्यप्रतिज्ञम् = सच्ची प्रतिज्ञा वाला।
कर्तुमिच्छसि = करना चाहते हो।
आत्मानं =’ स्वयं को।
नरश्रेष्ठ! = मनुष्यों में श्रेष्ठ।
शृणु = सुनो।..

अन्वय
हे नरश्रेष्ठ! यदि त्वं पितरम् आत्मानं च सत्यप्रतिज्ञं कर्तुम् इच्छसि, (तदा) मम इदं वाक्यं शृणु।।

व्याख्या
मानवों में श्रेष्ठ (हे राम)! यदि तुम पिताजी को और अपने को सच्ची प्रतिज्ञा वाला सिद्ध करना चाहते हो तो मेरे इस वचन को सुनो। कैकेयी का आशय यह है कि यदि राम स्वयं अपने वचनों की तथा अपने पिता के वचनों की रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें कैकेयी की बात मान लेनी चाहिए।

(22)
त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च।
भरतः कोशलपतेः प्रशास्तु वसुंधमिमाम् ॥

शब्दार्थ
त्वया = तुम्हारे द्वारा।
अरण्यम् = वने में।
प्रवेष्टव्यं = प्रवेश करना चाहिए।
नव पञ्च च वर्षाणि = नव और पाँच अर्थात् चौदह वर्ष तक।
प्रशास्तु = शासन करे। वसुधाम् = पृथ्वी का।

अन्वय
त्वया नव पञ्च च वर्षाणि अरण्यं प्रवेष्टव्यम्। भरतः कोशलपतेः इमां वसुधां प्रशास्तु।

व्याख्या
तुम्हें चौदह वर्षों के लिए वन में प्रवेश करना चाहिए और भरत को कोशल नरेश की इस भूमि का शासन करना चाहिए।

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(23)
तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम् ।
श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत् ॥

शब्दार्थ
अमित्रघ्नः = शत्रुओं का वध करने वाले।
मरणोपमम् = मृत्यु के समान कष्टदायक।
श्रुत्वा = सुनकर।
विव्यथे = पीड़ित हुए।

अन्वय
तद् अप्रियं मरणोपमं वचनं श्रुत्वा अमित्रघ्नः रामः न विव्यथे। कैकेयींच इदम् अब्रवीत्। .

व्याख्या
उस अप्रिय और मृत्यु के समान कष्टदायक वचने को सुनकर शत्रुओं का वध करने । वाले राम पीड़ित नहीं हुए और कैकेयी से यह वचन बोले।

(24)
एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः। |
जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥

शब्दार्थ
एवम् अस्तु = ऐसा ही हो।
वस्तुम् = रहने के लिए।
इतः = यहाँ से।
जटाचीरधरः = जटाएँ और वल्कल वस्त्र धारण करके
अनुपालयन् = पालन करता हुआ।

अन्वय
एवम् अस्तु। अहं तु ज़टाचीरधरः राज्ञः प्रतिज्ञाम् अनुपालयन् वनं स्तुम् इत: गमिष्यामि। व्याख्या-(राम ने कैकेयी से कहा अच्छा ठीक है) ऐसा ही हो। मैं जटाएँ और वल्कल धारण करके राजा (पिता) की आज्ञा का पालन करता हुआ वन में रहने के लिए यहाँ से चला जाऊँगा।

(25)
अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च। |
हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरताय प्रचोदितः ॥

शब्दार्थ
इष्टान् = प्रिय।
हृष्टः = प्रसन्न होकर।
दद्याम् = दे सकता हूँ।
प्रचोदितः = प्रेरित किया गया।

अन्वय
(त्वया) प्रचोदितः अहं हि सीता, राज्यम्, इष्टान् प्राणान् धनानि च हृष्टः भ्रात्रे भरताय स्वयं दद्याम्।

व्याख्या
(राम ने कैकेयी से कहा) आपके द्वारा प्रेरित किया गया मैं निश्चय ही, सीता को, राज्य को, प्रिय प्राणों को और धनों को भी प्रसन्न होकर स्वयं भाई भरत को दे सकता हूँ। तात्पर्य यह है । कि राम अपने भाई भरत के लिए सर्वस्व त्याग हेतु सदैव तत्पर हैं।

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(26)
न ह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम्।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥

शब्दार्थ
अतो महत्तरम् = इससे बढ़कर।
धर्माचरणम् = धर्म का आचरण करना।
किञ्चित् = कोई।
पितरि शुश्रूषा = पिता की सेवा करना।
वचनक्रिया = वचनों का पालन करना।

अन्वय
पितरि शुश्रूषा तस्य वचनक्रिया वा यथा धर्माचरणम्; अत: महत्तरं किञ्चित् (धर्माचरणम्) न हि अस्ति।

व्याख्या
निश्चय ही, पिता की सेवा अथवा उनके वचनों का पालन करने जैसे उत्तम धर्म के आचरण से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। तात्पर्य यह है कि पिता की सेवा और उनकी आज्ञा के पालन से बढ़कर सर्वोत्तम धर्म और कोई नहीं है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1)
यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः।।
कथं तस्मिन्न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते ॥

सन्दर्भ
प्रस्तुत सूक्ति श्लोक महर्षि वाल्मीकिकृत ‘रामायण’ से संकलित हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘रामस्य पितृभक्तिः शीर्षक पाठ से उधृत है।

[संकेत-इस शीर्षक के अन्तर्गत आयी हुई समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्तिपरक श्लोक में राम पिता के महत्त्व को बताते हुए उसकी इच्छानुसार आचरण करने की बात कहते हैं। |

अर्थ
मनुष्य इस संसार में अपनी उत्पत्ति को जिसके कारण देखता है, उस पिता रूप देवता के विद्यमान रहने पर क्यों न उसके अनुकूल आचरण करे।।

व्याख्या
प्रत्येक व्यक्ति के जन्म लेने का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण पिता है। बिना पिता के उसकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है। जिस पिता के कारण व्यक्ति अस्तित्व में आया, वह पिता निश्चित रूप से किसी भी देवता से बढ़कर है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने प्राण रहते पिता की इच्छा के अनुरूप आचरण करे। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में भी सर्वत्र पिता को देवता के समान पूज्य बताया गया है। महाभारत में भी यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में युधिष्ठिर ने पिता को आकाश से ऊँचा बताते हुए कहा है-खात्पितोच्चतरस्तथा।।

(2)
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे। |
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च ॥

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्तिपरक श्लोक में राम के मुख से यह सन्देश दिया गया है.कि यदि व्यक्ति  को पिता तथा राजा की भलाई के लिए अपना सर्वस्व भी त्यागना पड़े तो उसे कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

अर्थ
गुरु, पिता, राजा और हितैषी के लिए मैं तेज विष खा सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ।

व्याख्या
श्रीराम के कहने का तात्पर्य यह है कि यदि पिता, गुरु, राजा और हितैषी के लिए विष खाकर प्राण देना आवश्यक हो अथवा समुद्र में डूबकर मरने से उनका हित-साधन होता हो तो व्यक्ति को अपने प्राणों की चिन्ता त्यागकर विषपान कर लेना चाहिए तथा समुद्र में डूब जाना चाहिए। वे (UPBoardSolutions.com) यही बात अपनी माता कैकेयी से कह रहे हैं कि यदि पिता और राजा के हित के लिए मुझे भयंकर विषपान करना पड़े अथवा समुद्र में छलाँग लगानी पड़े तो मैं उससे विचलित नहीं होगा। आप निस्संकोच मुझे बताएँ कि पिता दशरथ का दु:ख कैसे दूर हो सकता है।

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(3)
रामो द्विर्नाभिभाषते ।। 

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में राम अपनी माता कैकेयी को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि मैं अपने कहे वचनों से पीछे नहीं हटूगा।

अर्थ
राम दो प्रकार की बातें नहीं कहता है।

व्याख्या
संसार में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जो कोई बात कह तो देते हैं, परन्तु उसे पूरा नहीं करते हैं। वे अवसर आने पर अपनी बात से हट जाने का मौका हूँढ़ा करते हैं। ऐसे व्यक्ति अधम कहलाते हैं। लेकिन महापुरुष जो बात कह देते हैं, वे उसे अवश्य पूरा करते हैं। राम माता कैकेयी से कहते हैं कि राम दो प्रकार की बातें नहीं कहता है। इसका तात्पर्य यह है कि राम जो कहता है, उसे पूरा करता है, उससे पीछे नहीं हटता है अर्थात् राम कभी असत्य-भाषण नहीं करता।

(4)
न ह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम् ।।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥

प्रसंग
पितृभक्ति को संसार को सर्वश्रेष्ठ धर्म बताते हुए राम कैकेयी से यह सूक्तिपरक श्लोक कहते हैं।

अर्थ
निश्चय ही पिता की सेवा, उनके वचनों का पालन करने से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं

व्याख्या
यह तो सभी जानते हैं कि पिता के कारण ही इस संसार में सभी व्यक्ति अस्तित्व में आये हैं तथा इस संसार में आने के पश्चात् ही ईश्वर और धर्म-कर्म को जान सके हैं। यदि पिता उन्हें उत्पन्न न करता तो वे इन धर्म-कर्मों को नहीं जान सकते थे; अर्थात् पिता के कारण ही हम उनके विषयों में जान सके हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पिता ही सबसे बड़ा देवता और धर्म होता है और उसकी सेवा-शुश्रूषा करके उसको प्रसन्न करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धर्म और पुण्य है।

श्लोक का संस्कृत अर्थ

(1) स दीन इव •••••••••••••••••••••• वचनमब्रवीत् ॥(श्लोक 6)
संस्कृतार्थः–
रामचन्द्रः, कैकेयीम् उपगम्य स्वपितरं दशरथम् एवं मातरं कैकेयीं प्रणम्य पितरम् अवलोक्य दुःखितः अभवत्। मातरं प्रणम्य शोकेन आर्त्तः खिन्न आनन: दीन: इव मातरः कैकेयीं विनम्रो भूत्वा इदम् उवाच।।

(2) यदि सत्यप्रतिज्ञम् ••••••••• इदं शृणु ॥(श्लोक 21)
संस्कृतार्थ:-
कैकेयी रामम् उवाच-हे नरश्रेष्ठ राम! यदि त्वं स्वजनकं सत्यपालकरूपेण जगति विख्यातं कर्तुम् इच्छसि, तु मम कथनं सावधानतया शृणु।।

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(3) न ह्यतो धर्माचरणं ••••••••••••••••••••••••••••••••••• वचनक्रिया ॥ (श्लोक 26 )
संस्कृतार्थ:-
श्रीरामः स्वमातुः कैकेय्याः वचनं श्रुत्वा अकथयत्-संसारेऽस्मिन् स्वपितुः। सेवाकरणं, तस्य च आज्ञायाः पालनं परमः धर्मः अस्ति। अतः महत्तरः मानवस्य कृते कोऽपि धर्में: नास्ति। अतः अहं पितुः आज्ञायाः पालनम् अवश्यं करिष्यामि। एष एव मुम कृते परम: धर्मः अस्ति।।

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Class 9 Sanskrit Chapter 14 UP Board Solutions षड्रिपुविजय Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 14
Chapter Name समास-प्रकरण (व्याकरण)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 14 Shadripu Vijay Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 14 हिंदी अनुवाद षड्रिपुविजय के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय– प्रस्तुत पाठ ‘प्रबोधचन्द्रोदयम्’ नामक नाटक से उद्धृत है। यह एक रूपकात्मक नाटक है और श्रीकृष्ण मिश्र के द्वारा प्रणीत है। कृष्ण मिश्र चन्देल राजा कीर्तिवर्मा के शासनकाल में हुए थे। इनका समय 1050 ईसवी के लगभग माना जाता है। नाटक की प्रस्तावना में यह उल्लिखित है कि राजा कीर्तिवर्मा की उपस्थिति में इसका मंचन किया गया था। इस नाटक में अत्यन्त सरल किन्तु प्रभावपूर्ण ढंग से यह बताया गया (UPBoardSolutions.com) है कि विवेक, श्रद्धा, मति, उपनिषद् आदि के सहयोग से पुरुष अविद्याजन्य अन्धकार को पार करके विष्णु-भक्ति की कृपा से अपने वास्तविक विष्णु पद को प्राप्त होता है। इस नाटक में वेदान्त के ब्रह्मवाद के साथ वैष्णव-भक्ति का सुन्दर समन्वय परिलक्षित होता है।

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पाठ सारांश 

प्रस्तुत नाटक में विवेक, श्रद्धा, मति, उपनिषद्, क्षमा, सन्तोष, वैराग्य, विष्णुभक्ति, महामोह आदि अमूर्त पात्रों के द्वारा दार्शनिक विषयों का अत्यन्त प्रभावोत्पादक एवं सरल शैली में सरसे वर्णन किया गया है। प्रस्तुत पाठ का सारांश इस प्रकार है

सर्वप्रथम मैत्री रंगमंच पर प्रवेश करती है और विष्णुभक्ति के द्वारा महाभैरवी के बन्धन से मुक्त हुई श्रद्धा को देखना चाहती है। उसी समय श्रद्धा प्रवेश करती है। मैत्री उसे गले लगाती है। श्रद्धा विष्णुभक्ति के आदेश से काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं पर विजय पाने का प्रयास करने के लिए राजा विवेक के पास जाती है। मैत्री भी विष्णुभक्ति की आज्ञा से विवेक की सफलता के लिए महात्माओं के हृदय में जाकर निवास करती है। इसके बाद प्रतीहारी के साथ राजा विवेक मंच पर आते हैं। वह विष्णुभक्ति की आज्ञा से काम आदि छ: रिपुओं को (UPBoardSolutions.com) जीतने का प्रयास करते हैं। वह सर्वप्रथम वस्तु-विचार को बुलाकर उसे काम को जीतने का आदेश देते हैं। इसके बाद क्षमा को बुलाकर उसे क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए कहते हैं। क्षमा कहती है कि मैं तो महामोह को भी जीत सकती हूँ और क्रोध तो उसका अनुचरमात्र है। क्रोध को जीत लेने पर हिंसा, कठोरता, मान, ईष्र्या आदि पर स्वतः विजय प्राप्त हो जाएगी।

इसके बाद राजा विवेक लोभ को जीतने के लिए सन्तोष को वाराणसी भेजते हैं। इसके बाद वह शुभ मुहूर्त में सेनापति को सेना के प्रस्थान के लिए आदेश देते हैं और स्वयं रथ पर सवार होकर वाराणसी के लिए प्रस्थान करते हैं। काम, क्रोध, लोभ आदि राजा विवेक के दर्शनमात्र से दूर भाग जाते हैं। राजा विवेक भगवान् शिव को प्रणाम करके वहीं अपनी सेना का पड़ाव डाल देते हैं।

विष्णुभक्ति हिंसाप्रधान युद्ध को देखने में स्वयं को असमर्थ पाकर वाराणसी से शक्तिग्राम चली जाती है और श्रद्धा को युद्ध का सारा वृत्तान्त अवगत कराने के लिए कह जाती है। श्रद्धा विष्णुभक्ति के पास जाती है। विष्णुभक्ति उस समय शान्ति से कुछ मन्त्रणा कर रही होती है। श्रद्धा उसे युद्ध का वृत्तान्त विस्तार से बताती है कि वस्तु-विचार ने काम को मार डाला। क्षमा ने क्रोध, कठोरता, हिंसा

आदि को धराशायी कर दिया। सन्तोष ने लोभ, तृष्णा, दीनता, असत्य, निन्दा, चोरी, असत्परिग्रह आदि को बन्दी बना लिया। अनुसूया ने मात्सर्य को जीत लिया। परोत्कर्ष की सम्भावना ने मद को दबा दिया। दूसरों के गुणों की अधिकता ने मान को नष्ट कर दिया और महामोह भी योग के विघ्नों के साथ डरकर कहीं छिप गया है।

चरित्र चित्रण

राजा
प्रस्तुत रूपक में बताया गया है कि व्यक्ति किस प्रकार से अत्यन्त सरल एवं प्रभावपूर्ण ढंग से विवेक, श्रद्धा, मति, उपनिषद् आदि के सहयोग से अविद्याजन्य अन्धकार को पार करके विष्णुभक्ति की कृपा से अपने वास्तविक स्वरूप विष्णुपद को प्राप्त होता है। ब्रह्मवाद के साथ वैष्णवभक्ति का सुन्दर समन्वय परिलक्षित होता है। राजा की चारित्रिक विशेषताएँ अग्र प्रकार हैं

(1) सुयोग्य राजा- राजा को अत्यन्त योग्य दर्शाया गया है। वह अच्छे-बुरे सभी कार्यों का मता है। उसे इस बात का पता है कि किस बुराई को किस तरह दूर किया जा सकता है।

(2) ज्ञानी- राजा अत्यन्त ज्ञानी है। वह महामोह को धिक्कारता है कि तुम्हारा मूल ही अज्ञान है। , तत्त्व ज्ञान से ही अविद्यादि विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है। वह काम के विजय हेतु वस्तु-विचार को, क्रोध के विजय हेतु क्षमा को, लोभ के विजय हेतु सन्तोष आदि को आदेश देता है।

(3) रणनीतिज्ञ- राजा एक कुशल रणनीतिज्ञ है। युद्ध-भूमि की भाँति ही वह समस्त विकारों को जीतने में समर्थ योद्धाओं-वस्तु-विचार, क्षमा, सन्तोष आदि–को लगाकर ही अन्त में सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए भेजता है। | (4) स्नेही-राजा को अत्यन्त स्नेही रूप में चित्रित किया गया है। वह सभी (UPBoardSolutions.com) लोगोंवस्तु-विचार, क्षमा, सन्तोष आदि–से परामर्श करने के बाद ही युद्ध की पूर्ण तैयारी करता है। शत्रुओं पर विजय पाने के लिए वह सर्वप्रथम अपने पक्ष के महान् योद्धाओं को यथोचित स्थानों पर लगाता है।

(5) विद्वान्- राजा अत्यन्त विद्वान् है। उसे मांगलिक समयों का सही पता है। ज्योतिषी द्वारा प्रस्थान का समय बताने पर वह आदरपूर्वक उसे स्वीकार कर लेता है तथा मांगलिक कार्य सम्पन्न करके ही वह रथ पर चढ़ने का अभिनय करता है। |

(6) आस्तिक- राजा अत्यन्त आस्तिक स्वभाव का है। वह षड्-विकारों को जीतने अर्थात् अभीष्ट की सिद्धि के लिए भगवान् को भी प्रणाम करता है और भगवन्मय नगरी वाराणसी में निवास करने का विचार व्यक्त करके वहीं सेना को पड़ाव डालता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राजा जो एक योग्य, ज्ञानी एवं संकल्पवान् व्यक्ति है, जटिल दार्शनिक विषयों का सरलता से प्रतिपादन करता है।

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 लघु उत्तरीय संस्कृत प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित  प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर लिखिए

प्रश्‍न 1

कामः केन हतः?
उत्तर
वस्तुविचारेण कामः हतः।

प्रश्‍न 2
लोभस्य जेता कः?
उत्तर
सन्तोष: लोभस्य जेता आसीत्।

प्रश्‍न 3
राजा क्रोधस्य विजयाय किम् आदिशति?
उत्तर
राजा क्रोधस्य विजयाय क्षमाम् आदिशति।

प्ररन 4
देव्या विष्णुभक्त्या राजानं किं सन्दिष्टम्?
उत्तर
कामक्रोधादीनां निर्जयाय उद्योगं कर्तुं विष्णुभक्त्या राजानं सन्दिष्टम्।

प्रश्‍न 5
महामोहेन सह विवेकस्य सङ्ग्रामे जाते कस्य विजयः जातः।
उत्तर
महामोहेन सह विवेकस्य सङ्ग्रामे जाते विवेकस्य विजयः जातः।

प्रश्‍न 6
मैत्री देव्याः प्रिय सखी का आसीत्?
उत्तर
मैत्री देव्याः प्रिय सखी श्रद्धा आसीत्।।

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प्रश्‍न 7
राजा रथमारुह्य क्व गतवान्?
उत्तर
राजा रथमारुह्य वाराणसी गतवान्।

प्रश्‍न 8
निलीनः कः तिष्ठति?
उत्तर
महामोह: योगविघ्नैः सह क्वापि निलीनः तिष्ठति।

प्रश्‍न 9
कामादिभिः सङ्ग्रामे कस्य विजयः जातः?
उत्तर
कामादिभिः सङ्ग्रामे राजा विवेकस्य विजयः जातः।

प्रश्‍न 10
विष्णुभक्तिः कस्य माता आसीत्? ।
उत्तर
विष्णुभक्तिः राजा विवेकस्य माता आसीत्।

वस्तुनिष्ठ प्रश्‍नोत्तर

अग्रलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए|

1. षड्पुिविजयः’ नामक पाठ किस ग्रन्थ से उधृत है?
(क) उत्तर रामचरितम्’ से।
(ख) ‘प्रबोधचन्द्रोदयम्’ से
(ग) “वेणीसंहारम्’ से ।
(घ) “विक्रमोर्वशीयम्’ से

2. ‘प्रबोधचन्द्रोदयम्’ के रचनाकार कौन हैं? 
(क) महाकवि भास
(ख) भट्टनारायण
(ग) विष्णु शर्मा
(घ) कृष्ण मिश्र

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3. ‘पड्रिपुविजयः’ नामक नाट्यांश के पात्र किस प्रकार के हैं?
(क) वास्तविक
(ख) पुरातन
(ग) आधुनिक
(घ) काल्पनिक

4. ‘अये, मे प्रियसखी मैत्री।’ में ‘मे’ पद से किसे संकेतित किया गया है?
(क) ‘महाभैरवी’ को
(ख) ‘श्रद्धा’ को
(ग) ‘विष्णुभक्ति’ को
(घ) ‘मैत्री’ को

5. राजा लोभ को जीतने हेतु सन्तोष को कहाँ जाने के लिए कहता है?
(क) प्रयाग
(ख) देवप्रयाग
(ग) कर्णप्रयाग
(घ) वाराणसी

6. राजा जिस रथ पर बैठकर वाराणसी के लिए चला, वह रथ कैसा था?
(क) सुखप्रद
(ख) सांग्रामिक
(ग) शोभन ।
(घ) स्वर्ण-निर्मित

7. ‘सुरसरित्’ शब्द से नदी का बोध होता है?
(क) वेत्रवती :
(ख) सरस्वती
(ग) गंगा
(घ) यमुना

8. ‘वत्से देव्या विष्णुभक्तेः प्रसादान्मुनिजनचेतः पदं प्राप्नुहि।’ कथन किसका है?
(क) ‘श्रद्धा’ का
(ख) प्रतीहारी’ का
(ग) “क्षमा’ का
(घ) “शान्ति’ का ।

9. निवृत्ति किससे होती है?
(क) ‘भक्ति-भाव से
(ख) “यज्ञ करने से
(ग) “तत्त्व-ज्ञान’ से
(घ) “तीर्थयात्रा’ से

10. ‘मया दृष्टा क्रुद्धशार्दूलमुखद्विभ्रष्टा •••••••••••• क्षेमेण सञ्जीविता प्रियसखी।’ में रिक्त-पद की पूर्ति होगी
(क) ‘मृगीव’ से
(ख) ‘गजेव’ से
(ग) “शृगालीव’ से
(घ) “कोकिलेव’ से

11. ‘लोभं जेतुं वाराणसी प्रति प्रतिष्ठीयताम्।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) राजा
(ख) सन्तोषः ।
(ग) सूर्तः
(घ) सेनापतिः

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12. ‘अत्र “”””””समुत्सृज्य पुण्यभाजो विशन्ति यम्।’ श्लोक की चरण-पूर्ति होगी
(क) “अहङ्कारम्’ से
(ख) मोहम्’ से
(ग) “देहम्’ से
(घ) “धनम्’ से

13. ‘यत्रासौ संसारसागरोत्तारतरणिकर्णधारो भगवान् हरिः स्वयं प्रतिवसति।’ वाक्यस्य वक्ता 
कः अस्ति?
(क) श्रद्धा

(ख) शान्तिः
(ग) विष्णुभक्तिः
(घ) सन्तोषः ।

14. क्षमा-‘देवस्याज्ञया महामोहमपि •••••••••••• पर्याप्तास्मि।’ वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी- .
(क) ‘पलायितुम्’ से
(ख) “नष्टुम्’ से
(ग) “जेतुम्’ से
(घ) “हन्तुम्’ से

15. ‘तत्र कामः तावत्प्रथमो वीरो वस्तुविचारेणैव जीयते।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) सन्तोषः
(ख) प्रतीहारिः
(ग) सूतः
(घ) राजा

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16. ‘ततो वस्तुविचारेण कामो ………………।’ वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी
(क) निषूदित:’ से
(ख) ‘निगृहीताः’ से
(ग) “हत:’ से ।
(घ) ‘खण्डितः’ से |

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