UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State (राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Civics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State (राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter Chapter 1
Chapter Name Principles of Origin of State (राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त)
Number of Questions Solved 17
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State (राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर
राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता सिद्धान्त
राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में इस सिद्धान्त का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसे सामाजिक अनुबन्ध का सिद्धान्त’ भी कहते हैं। आधुनिक काल में इस सिद्धान्त के प्रणेता हॉब्स, लॉक एवं रूसो हैं। जिन्होंने इस सिद्धान्त के अन्तर्गत यह कल्पना की है कि मानव-समाज के विकास के इतिहास में एक ऐसी अवस्था थी जब राज्य नहीं थे, वरन् कुछ प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही लोग अपना जीवन व्यतीत करते थे। इसलिए इस सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने इस अवस्था को प्राकृतिक अवस्था’ का नाम दिया है।

हॉब्स के अनुसार, “प्राकृतिक अवस्था में लोग जंगली, असभ्य, झगड़ालू तथा स्वार्थी थे। इसलिए वे सभी आपस में हर समय झगड़ते रहते थे। इस कारण प्राकृतिक अवस्था असहनीय थी।”…..” इस काल में मानव-जीवन एकाकी, बर्बर, सम्पत्तिहीन, दु:खपूर्ण तथा अल्पकालिक था।” लॉक के अनुसार, “यह अवस्था असुविधाजनक थी।” रूसो के अनुसार, “प्रारम्भ में प्राकृतिक अवस्था आदर्श थी, परन्तु यह आदर्श अवस्था कुछ कारणों से दूषित हो गई। अतः यह अवस्था असहनीय हो गई। इस प्रकार, असहनीय अवस्था से छुटकारा पाने के लिए लोगों ने आपस में समझौता किया, जिसके फलस्वरूप राज्य का उदय हुआ। राज्य के निर्माण से प्राकृतिक नियमों के स्थान पर मानव-निर्मित कानून लागू हुए और प्राकृतिक अधिकारों के स्थान पर राज्य ने सबको समान नागरिक या राजनीतिक अधिकार प्रदान किए।

गैटिल के अनुसार, “राजभक्तों द्वारा प्रतिपादित दैवी सिद्धान्त के विरोध में 17वीं तथा 18वीं शताब्दी के क्रान्तिकारी विचारकों ने लोकप्रिय राजसत्ता, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता एवं क्रान्ति के अधिकारों का प्रचार करने के लिए सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की शरण ली।”

इस सिद्धान्त की इन तीन विद्वानों हॉब्स, लॉक और रूसो ने बड़ी विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याख्या की है, परन्तु अपने-अपने ढंग से। इसीलिए कहीं-कहीं तीनों में पर्याप्त मतभेद भी हैं। किन्तु तीनों ने निष्कर्ष एक ही निकाला है। तीनों का ही मत है कि प्राकृतिक अवस्था के कुछ दोषों तथा असुविधा के कारण ही राज्य का निर्माण हुआ। संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य दैवी संस्था न होकर एक मानवीय संस्था है।

आलोचना- इस सिद्धान्त की अनेक विद्वानों ने कटु आलोचना की है। इस सिद्धान्त की आलोचना के निम्नलिखित आधार हैं।

  1. यह सिद्धान्त कल्पना पर आधारित है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है।
  2. यह सिद्धान्त तर्कसंगत भी नहीं है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में लोग जंगली एवं असभ्य थे। परन्तु जंगली एवं असभ्य लोगों के मन में अचानक राज्य-निर्माण की बात कैसे आई और उन्होंने कैसे कानून और अधिकार आदि का निर्माण किया? इन परस्पर विरोधी प्रश्नों का समुचित उत्तर इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों के द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सका है।
  3. कुछ विद्वानों ने इस सिद्धान्त को ‘भयानक’ कहकर कड़ी आलोचना की है। उनका मत है। कि यह सिद्धान्त लोगों को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनके मतानुसार यह सिद्धान्त न तो इतिहास से प्रमाणित किया जा सकता है और न उच्च राजनीतिक दर्शन के विषय में प्रकाश डालता है।
  4. राज्य एक कृत्रिम संस्था न होकर प्राकृतिक संस्था है और दीर्घकालीन विकास का परिणाम है।
  5. यह समझौता वर्तमान समय में मान्य नहीं है; क्योंकि कोई भी समझौता केवल उन्हीं लोगों पर लागू होता है जिनके मध्य वह किया जाता है।
  6. यह सिद्धान्त मानव-स्वभाव के सन्दर्भ में अशुद्ध दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

महत्त्व- इस सिद्धान्त का महत्त्व निम्नलिखित दृष्टियों से है-

  1. यह सिद्धान्त व्यक्ति को विशेष महत्त्व देता है।
  2. यह सिद्धान्त निरंकुश एवं स्वेच्छाधारी शासन का विरोध करता है।
  3. इस सिद्धान्त ने लोकतन्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
  4. यह सिद्धान्त लोकतन्त्र और स्वतन्त्रता का पोषक है।

प्रश्न 2.
राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक अथवा विकासवादी सिद्धान्त का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर
राज्य की उत्पत्ति का ऐतिहासिक अथवा विकासवादी सिद्धान्त
राज्य की उत्पत्ति के सभी सिद्धान्तों में यह सिद्धान्त, राज्य की उत्पत्ति की वास्तविक तथा सही व्याख्या करता है। इस सिद्धान्त के प्रवर्तकों का मत है कि राज्य की उत्पत्ति किसी निश्चित समय में नहीं हुई, वरन् मानव-इतिहास के विकास के साथ-साथ इसका भी विकास होता गया और राज्य का वर्तमान रूप सामने आया। वास्तव में, इतिहास में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है कि पहले समाज में राज्य नहीं था तथा बाद में मनुष्यों ने राज्य का निर्माण किया। जब मनुष्य आखेट अवस्था में था, उस समय भी वह समाज में ही रहता था, परन्तु वह समाज की अविकसित अवस्था थी। फिर मनुष्य चरागाह युग में आया और फिर कृषि युग में। तत्पश्चात् औद्योगिक युग की सभ्यता में मनुष्य ने प्रवेश किया। मनुष्य के विकास के साथ-साथ उसके समाज एवं राज्य का स्वरूप भी बदलता गया। अतः राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यही सिद्धान्त अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। लीकॉक के शब्दों में, “राज्य एक आविष्कार नहीं है, अपितु वह एक विकासपूर्ण वस्तु है। मनुष्य की विकासपूर्ण प्रवृत्ति के कारण ही राज्य की उत्पत्ति हुई।”

विकासवादी सिद्धान्त के प्रवर्तकों का मत है कि राज्य की उत्पत्ति धीरे-धीरे क्रमिक विकास के परिणामस्वरूप हुई है। प्रो० बर्गेस का भी मानना है, “राज्य अत्यन्त अपूर्ण प्रारम्भिक अवस्थाओं में से धीरे-धीरे कुछ उन्नत अवस्थाओं में होकर मानवता के पूर्ण सार्वभौमिक संगठन की दशा में मानव-समाज का क्रमिक विकास है। ऐसा ही विचार गार्नर ने व्यक्त किया है, “राज्य न तो ईश्वर की कृति है और न किस उच्चतर शक्ति का परिणाम, न किसी समझौते की सृष्टि है और न ही परिवार का विस्तार-मात्र, वरन् यह ऐतिहासिक विकास का परिणाम है।”
राज्य के क्रमिक विकास में जिन तत्त्वों ने योगदान दिया है, उनका वर्णन निम्नलिखित है-

1. रक्त-सम्बन्ध – राज्य के विकास में सहायक प्रथम तत्त्व रक्त-सम्बन्ध है। मनुष्य का प्रारम्भिक संगठन, परिवार, रक्त के सम्बन्ध के आधार पर ही बना। धीरे-धीरे बहुत-से परिवारों ने मिलकर कबीलों और कबीलों ने कालान्तर में राज्य का रूप धारण कर लिया। मैकाइवर के अनुसार, “रक्त-सम्बन्ध से समाज की स्थापना हुई और समाज से राज्य की।”

2. मनुष्य की स्वाभाविक सामाजिक प्रवृत्ति – मानव स्वभाव से एक सामाजिक और राजनीतिक प्राणी है और समूह में रहने की प्रवृत्ति ने ही राज्य को जन्म दिया है। जॉन मार्ने के अनुसार, “राज्य के विकास का वास्तविक आधार मनुष्य के जीवन में विद्यमान अन्तर्जात प्रवृत्ति रही है।”

3. धर्म – धर्म ने भी मानव-अस्तित्व के प्रारम्भिक काल में लोगों को सामाजिक व राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य किया। इस प्रकार राज्य के विकास में धर्म ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। गैरेट के अनुसार, “राजनीतिक विकास के प्रारम्भिक एवं बड़े कठिन काल में धर्म में बर्बरतापूर्ण अराजकता का दमन कर सका और मानव को आदर भाव तथा आज्ञापालन
की शिक्षा प्रदान कर सका तथा जंगलों की अराजकता को नष्ट कर सका।”

4. आर्थिक आवश्यकताएँ – राज्य की उत्पत्ति के विकास में मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। मनुष्य ने अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सम्पत्ति संग्रह करना प्रारम्भ कर दिया। सम्पत्ति के कारण ही संघर्ष हुए और इन संघर्षों को समाप्त करने के लिए कुछ नियमों का निर्माण किया गया। इन नियमों का पालन कराने के लिए यह एक सार्वभौमिक संस्था स्थापित हुई, जो राज्य कहलायी। मार्क्स के अनुसार, “राज्य आर्थिक परिस्थितियों की ही अभिव्यक्ति है।

5. राजनीतिक चेतना – राज्य के विकास में राजनीतिक चेतना का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।
राजनीतिक चेतना से तात्पर्य यह है कि राज्य के लोगों में राजनीतिक संस्थाओं के माध्यम से किसी उद्देश्य की प्राप्ति की भावना होनी चाहिए। अत: राज्य की उत्पत्ति एक निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हुई। गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राज्य के निर्माण के सभी तत्त्वों की तह में, जिनमें रक्त-सम्बन्ध तथा धर्म भी शामिल है, राजनीतिक चेतना सबसे प्रमुख तत्त्व है।”

6. शक्ति – शक्ति तथा युद्ध ने भी राज्य के विकास में योग दिया है। प्राचीन समय में शक्तिशाली लोगों ने दुर्बलों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और वे स्वयं शासक बन बैठे। अनेक कबीलों के शासकों ने सत्ता प्राप्त करके राज्य की स्थापना की। जैक्स के अनुसार, “जन समाज को राजनीतिक समाज में परिवर्तन शान्तिपूर्ण उपायों से नहीं वरन् युद्ध द्वारा हुआ।”

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त की विवेचना संक्षेप में कीजिए।
उत्तर
राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य का निर्माण ईश्वर ने किया है। राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है और उसी की इच्छानुसार शासन करता है। उसे समस्त शक्तियाँ तथा अधिकार ईश्वर से ही प्राप्त होते हैं। वह प्रजा के प्रति नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति भी उत्तरदायी होता है। राजा की आज्ञा का उल्लंघन ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन है।

प्राचीन काल में भारत, मिस्र, यूनान तथा चीन आदि देशों में इस सिद्धान्त की विशेष मान्यता थी और राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। प्राचीन तथा मध्यकाल में राज्य पर धर्म का प्रभाव था। अतः धार्मिक दृष्टि से इस सिद्धान्त को मान्यता मिली। ईसाई धर्म के अनुसार, “राज्य की उत्पत्ति ईश्वर की इच्छा के अनुसार हुई है।’ यहूदियों के अनुसार, “ईश्वर ने स्वयं राज्य की स्थापना की है।” सेण्ट पॉल के शब्दों में, “राजा को ईश्वर ने बनाया है। अतः ईश्वर ने ही राज्य का निर्माण किया है।”

संक्षेप में इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य ईश्वरीकृत है, धरती पर ईश्वर का अवतार है, राज्य के पास दैवीय अधिकार हैं, राजा की आज्ञा का पालन करना जनता को कर्तव्य है और उसकी आलोचना करना महापाप है। ऑक्सबर्ग के अनुसार इस सिद्धान्त का मुख्य आधार है–संसार में समस्त सत्ता, सरकार तथा व्यवस्था ईश्वर ने उत्पन्न की है और स्थापित भी की है।

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प्रश्न 2.
राज्य की उत्पत्ति के मातृक तथा पैतृक सिद्धान्त का परीक्षण कीजिए।
उत्तर
राज्य की उत्पत्ति का मातृक तथा पैतृक सिद्धान्त
भूमि की उत्पत्ति के इन सिद्धान्तों के अनुसार राज्य परिवार का विकसित रूप है। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार आदिकाल में परिवार पितृ-प्रधान नहीं, वरन् मातृ-प्रधान थे। इनके अनुसार वंशानुक्रम पुरुष के नाम से न चलकर स्त्री के नाम से चलता था। माता की मृत्यु के बाद सम्पत्ति भी उसकी सबसे बड़ी लड़की को ही मिलती थी। जे०जे० वेशोफैन के अनुसार, “प्रारम्भिक समाज में न केवल वंश परम्परा माता से होती थी और सम्पत्ति का अधिकार स्त्री को ही प्राप्त होता था, वरन् समाज की स्त्रियों की स्थिति भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी।” मातृक सिद्धान्त के अनुसार प्रारम्भिक समाज में कबीले गोत्र में, गोत्र परिवार में, परिवार व्यक्तियों में और व्यक्ति समाज में बँट गए जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई।

पैतृक सिद्धान्त के प्रमुख व्याख्याकार सर हेनरीमैन हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रारम्भ में मनुष्य परिवार में रहक़र जीवन व्यतीत करता था। परिवार के समस्त सदस्यों पर पिता का पूर्ण नियन्त्रण रहता था। इस प्रकार के परिवार पैतृक कहलाते थे। कालान्तर में ऐसे परिवार विकसित होकर गोत्र, कबीले और जन में परिवर्तित हो गए। कबीलों से मिलकर राज्य का निर्माण हुआ।

  1. इन सिद्धान्तों के पीछे ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव है।
  2. इन सिद्धान्तों में राज्य की उत्पत्ति की अपेक्षा परिवार की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
क्या राज्य एक दीर्घ विकास का परिणाम है?
उत्तर
यह सही है कि राज्य एक दीर्घ विकास का परिणाम है। धीरे-धीरे उसका विकास हुआ है। अनेक तत्त्वों ने इसके विकास में सहयोग दिया है; जैसे–रक्त सम्बन्ध, धर्म, वर्ग-संघर्ष तथा युद्ध, राजनीतिक चेतना, आर्थिक आवश्यकताएँ आदि। मनुष्य का आदिम सामाजिक संगठन सरल ढंग का था। वातावरण के प्रभाव से बदली हुई परिस्थितियों के कारण वह जटिल हो गया। इसी से आगे चलकर राजनीतिक संगठन का उदय हुआ। इसी ने विकसित होकर आधुनिक राज्य का रूप धारण कर लिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
राज्य की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धान्तों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. सामाजिक समझौता सिद्धान्त
  2. ऐतिहासिक तथा विकासवादी सिद्धान्त,
  3. दैवी सिद्धान्त तथा
  4. मातृ-सत्तात्मक तथा पितृसत्तात्मक सिद्धान्त।

प्रश्न 2.
समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए किसकी आवश्यकता होती है?
उत्तर
समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ नियमों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त के अनुसार राज्य का निर्माण किसने किया है?
उत्तर
राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त के अनुसार राज्य का निर्माण ईश्वर ने किया है।

प्रश्न 4.
सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का सार किन तीन तत्त्वों में निहित है?
उत्तर

  1. प्राकृतिक अवस्था,
  2. समझौता तथा
  3. नागरिकों का समाज।

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प्रश्न 5.
राज्य के विकास के तीन तत्त्वों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. रक्त सम्बन्ध,
  2. धर्म तथा
  3. राजनीतिक चेतना।

प्रश्न 6.
‘सामाजिक समझौता (सोशल कॉण्ट्रेक्ट) नामक पुस्तक का लेखक कौन था? (2016)
उत्तर
रूसो।

प्रश्न 7.
प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य की जनसंख्या कितनी होनी चाहिए? (2016)
उत्तर
दस हजार (10000)।

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बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

1. प्राकृतिक अवस्था में मानव-जीवन था
(क) एकाकी
(ग) सम्पत्तिहीन
(ख) बर्बर
(घ) ये सभी

2. राज्य की उत्पत्ति का सबसे मान्य सिद्धान्त कौन-सा है?
(क) विकासवादी सिद्धान्त
(ख) सामाजिक समझौता सिद्धान्त
(ग) मातृक तथा पैतृक सिद्धान्त
(घ) दैवी सिद्धान्त

3. किसके मतानुसार ईश्वर ने स्वयं राज्य की स्थापना की है?
(क) यहूदियों के
(ख) हिन्दुओं के
(ग) मुस्लिमों के
(घ) सिक्खों के

4. पैतृक सिद्धान्त के प्रमुख व्याख्याकार कौन हैं?
(क) जे० जे० वेशोफैन
(ख) सर हेनरीमैन
(ग) स्मिथ
(घ) रूसो

5. सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रणेता हैं-
(क) हॉब्स
(ख) लॉक
(ग) रूसो
(घ) ये सभी

उत्तर-

1. (घ) ये सभी,
2. (क) विकासवादी सिद्धान्त,
3. (क) यहूदियों के,
4. (ख) सर हेनरीमैन,
5. (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 12 Female Persecution

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 12 Female Persecution (महिला उत्पीड़न) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 12 Female Persecution(महिला उत्पीड़न).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 12
Chapter Name Female Persecution
(महिला उत्पीड़न)
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 12 Female Persecution(महिला उत्पीड़न)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
महिला उत्पीड़न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

महिला उत्पीड़न

भारत पर ब्रिटिश शासन का लगभग 200 वर्ष तक प्रभुत्व रहा है। इससे पूर्व मुगलों का एक लम्बा शासनकाल भारत में रहा है। इन सैकड़ों वर्षों में भारतीय संस्कृति, मूल्य, आदर्श और मान्यताएँ एक के बाद एक लचर होती गईं।

सच्चिदानंद सिन्हा हिंसा की मूल प्रवृत्तियों को खंगालते हुए कहते हैं, “हिंसा मानव की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसका निर्गुण में जितना निषेध होता है, सगुण में उसका उतना ही जबरदस्त आकर्षण भी है।” अहिंसा परम धर्म है, यह लगभग सभी प्राचीन भारतीय धर्मों-बौद्ध, जैन या सनातनियों द्वारा उद्घोषित होता है। ईसाई धर्म में तो एक गाल पर कोई चाँटी मारे तो दूसरा गाल भी मारने वाले के सामने कर देना ईसा मसीह के उपदेश का मूल-मंत्र है, लेकिन व्यवहार में धर्म का यह रूप कहीं नहीं दिखाई देता है।

मनुष्य में हिंसा की पाशविक प्रवृत्तियाँ सदैव रही हैं। उसने सभ्यता के विकास और शिक्षा की ओढ़नी ओढ़ रखी है। आज भी हम मुक्केबाजी में खून से लथपथ बॉक्सर को देखकर आनंदित होते हैं, बुल-फाइटिंग देखकर अपना मनोरंजन करते हैं और डब्ल्यू डब्ल्यू०एफ० में भारी-भरकम पहलवानों की धरपटक कुश्ती या फाइटिंग का मजा लेते हैं एवं मुर्गे को हलाल कर उसके तड़पने का मजा लेते हैं। इस प्रकार ऐसे कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं। डाकू आज भी सामूहिक कत्ल करने में संकोच नहीं करता, आतंकवादी और नक्सलवादी कत्लेआम करते रहते हैं। क्या ये 21वीं सदी के सभ्य-शिक्षित, वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील समाज के चिह्न हैं? ये सभी हिंसी की प्रवृत्तियों के उदाहरण हैं।

इस भौतिक और भोगवादी संस्कृति में रिश्तों के नाम गुम हो रहे हैं। उसका रिश्ता केवल स्वयं से है। वह सब कुछ मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र है, उसे न समाज का भय है और न संबंधियों का, तभी तो रिश्तों, यहाँ तक कि खून के रिश्तों में भी बलात्कार जैसी निकृष्ट घटनाएँ घटने लगी हैं। यह कैसा उत्पीड़न है, जहाँ स्त्री जीवनपर्यंत घुट-घुटकर मरती है। यह कैसा समाज है, जो स्त्री को जिंदा ही मार देता है।

यह नव-जन्मा युवा वर्ग, स्थापित मर्यादाओं और मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हुआ है जिसकी सोच में पाश्चात्य देशों की खुली-सेक्स संस्कृति का स्वप्न है, जो चलते-फिरते व्यंग्यों से युवतियों को अपमान करता रहता है। जंगल की आग की तरह भय लड़कियों में समाता जा रहा है कि वे कैसे स्कूल, कॉलेज, बाजार या नौकरी पर जाएँ; क्योकि जगह-जगह छेड़ने वाले खड़े हैं। ये नवयुवतियाँ कितनी अपमानित हों और किस सीमा तक, इसके अलावा प्रतिरोध करने पर ये अराजक तत्त्व लड़की पर सार्वजनिक स्थानों पर ही तेजाब तक फेंककर उसे बदसूरत बना देते हैं। यह सामाजिक-सामूहिक उत्पीड़न इस अनैतिक व अपराधी समाज में उत्पन्न हुआ है।

भारतीय समाज में सदियों से स्त्री की स्थिति कितनी दयनीय और सोचनीय रही है? वर्षों-वर्षों तक उसका स्वरूप स्त्री के रूप में दासी की तरह रहा है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में स्त्रियों का तरह-तरह से शोषण और उत्पीड़न हो रहा है। विज्ञापनों और चलचित्रों में जिस रूप में स्त्री या युवती को प्रस्तुत किया जा रहा है, इसका प्रभाव खुले रूप में समाज में दिखाई पड़ता है। प्रेम और कामवासना की भावना जन्मजात होती है, किन्तु जिस रूप में यह पनप रहा है, वह परिवार, समाज और देश के तथा संस्कृति के लिए घातक हैं।

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि दुनिया के हर क्षेत्र ने स्त्रियों के पैरों में बेड़ियाँ डाली हैं। हर जगह। उसे पुरुष के अधीन रहना है। इस दृष्टि से स्त्री का घर में भी भरपूर उत्पीड़न हो रहा है और वह घर के बाहर भी सुरक्षित नहीं है। आर्थिक-सामाजिक मूल्यों में जो गिरावट आई है, उसने पूरे समाज, देश व राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है। लोकतंत्र में स्त्री का अपमान, उत्पीड़न, अत्याचार आदि भयमुक्त समाज की देन हैं। हम लोकतंत्र के दोराहे पर खड़े अभी रास्ता ढूंढ़ रहे हैं कि देश को किस रास्ते पर ले जाएँ।

 

1947 से लेकर आज तक हम भटकाव की स्थिति में हैं। यही कारण है। कि लोकतंत्र अराजकता में बदलता जा रहा है और स्त्री का सार्वजनिक स्थानों पर अपमान हो रहा है। दुःख इस बात का है कि स्त्री हिंसा की प्रवृत्तियों में कमी आने के बजाय उसमें वृद्धि हो रही है। हम किसी-न-कि- 7 में स्त्री को अपमानित कर रहे हैं, उत्पीड़न और अत्याचार कर रहे हैं। दूसरे को किसी भी रूप में कष्ट पहुँचाना हिंसा है चाहे वह शब्दों से हो या व्यवहार से अथवा किसी के प्रति मन में बुरी भावना आना भी हिंसा है। इस दृष्टि से यदि देखा जाए तो समाज के चारों ओर का परिदृश्य कहीं-न-कहीं हमें हिंसात्मक दिखाई पड़ता है, भले ही उसका स्वरूप कुछ भी हो।

प्रश्न 2
सती प्रथा से क्या आशय है? भारत में इसका उन्मूलन किस प्रकार सम्भव हो सका?
उत्तर:
सती-प्रथा पी०वी० काणे लिखते हैं-“आजकल भारत में सती होना अपराध है, किन्तु लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व (सन् 1829 से पूर्व) इस देश में विधवाओं का सती हो जाना एक धर्म था। विधवाओं का सती अर्थात् पति की चिता पर जलकर भस्म हो जाना केवल ब्राह्मण धर्म में नहीं पाया गया है, प्रत्युत यह प्रथा मानव समाज की प्राचीनतम धार्मिक धारणाओं एवं अंधविश्वासपूर्ण कृत्यों में समाविष्ट रही है। सती होने की प्रथा प्राचीन यूनानियों, जर्मनों, स्लावों एवं अन्य जातियों में पाई गई है, किन्तु इसका प्रचलन बहुधा राजघरानों एवं भद्र लोगों में ही रहा है। पति की मृत्यु पर विधवा के जल जाने को सहमरण या सहगमन या अन्वारोहण कहा जाता है, किन्तु अनुसरण तब होता है। जब पति और कहीं मर जाता है तथा जला दिया जाता है और उसकी भस्म के साथ या पादुका के साथ या बिना किसी चिह्न के उसकी विधवा जलकर मर जाती है।

भारत में अनेक धर्मग्रंथों में सती-प्रथा का उल्लेख मिलता है। बहुत-से अभिलेखों में सती होने के उदाहरण प्राप्त होते हैं, इनमें सबसे प्राचीन गुप्त संवत् 191 (510 ई०) का है। कभी-कभी भारतीय धर्म पर तरस आता है कि उसने स्त्री के साथ इतना अन्याय और अत्याचार कैसे किया ? यदि स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं तो नियम और सिद्धान्त दोनों के लिए समान होने चाहिए। इस दृष्टि से पत्नी की मृत्यु के पश्चात् उसकी चिता पर पति क्यों नहीं जलकर भस्म होता है? स्त्री के साथ ही इतना अमानवीय और पाशविक व्यवहार क्यों? राजा राममोहन राय की अनुपस्थिति में उनकी भाभी सती हो गई थी, इस घटना ने उन्हें झकझोरकर रख दिया। सती-प्रथा के विरुद्ध उन्होंने आन्दोलन छेड़ा तथा इसके विरुद्ध कानून बनवाकर ही उन्होंने साँस ली। सती-प्रथा भारतीय समाज, हिन्दू धर्म पर कलंक थी, हालाँकि अभी भी भूले-भटके इस प्रकार की घटनाएँ प्रकाशित होती हैं।

प्रश्न 3
घरेलू हिंसा से क्या तात्पर्य है? महिलाएँ किस प्रकार घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं?
या
महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के विभिन्न स्वरूपों की विवेचना कीजिए। [2017]
या
“महिलाओं के विरूद्ध अत्याचार एक ज्वलंत सामाजिक समस्या है।” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय समाज में महिलाओं को घरेलू हिंसा एवं उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है। यह उत्पीड़न भी अत्यधिक व्यापक है। इसमें भी साधारण उत्पीड़न से लेकर हत्या तक के उदाहरण प्रायः मिलते रहते हैं। इस वर्ग के उत्पीड़न एवं हिंसा का विवरण निम्नवर्णित है

1. दहेज के कारण होने वाली हत्याएँ-भारतीय समाज में दहेज प्रथा भी एक प्रमुख समस्या मानी जाती है। यह भारतीय समाज में पाया जाने वाला एक ऐसा अभिशाप है जो आज भी अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रयासों के बावजूद अपनी अस्तित्व बनाए हुए है। दहेज के कारण लड़की के माता-पिता को कई बार अनैतिक साधनों को अपनाकर उसके दहेज का प्रबन्ध करना पड़ता है। ज्यादा दहेज न ला पाने के कारण अनेक नवविवाहित वधुओं को सास-ससुर तथा ननद आदि के ताने सुनने पड़ते हैं।

कई बार तो उन्हें दहेज की बलि पर जिन्दा चढ़ा दिया जाता है। दहेज प्रथा के कारण बेमेल विवाहों को भी प्रोत्साहन मिलता है तथा वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन अत्यन्त संघर्षमय हो जाता है। दहेज न लाने वाली वधुओं को विविध प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक कष्ट सहन करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप वे अनेक बीमारियों का शिकार हो जाती है। दुःख की बात तो यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ तथा उनके पढ़े-लिखे माता-पिता भी इस बुराई का विरोध नहीं करते अपितु ज्यादा दहेज देना अपनी शान एवं प्रतिष्ठा समझते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में दहेज के कारण होने वाली स्त्रियों की हत्याओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राम आहूजा के अनुसार दहेज हत्याओं की शिकार अधिकतर मध्यम वर्ग की महिलाएँ होती हैं। ये अधिकतर उच्च जातियों में होती हैं तथा पति पक्ष के लोगों द्वारा ही की जाती हैं। दहेज हत्याओं की शिकार स्त्रियों की आयु 21 से 24 वर्ष के बीच होती है। तथा परिवार की रचना की इन हत्याओं में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। दहेज हत्या से पहले स्त्रियों को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी जाती हैं तथा उनका उत्पीड़न किया जाता है।

2. विधवाओं पर होने वाले अत्याचार-भारतीय समाज में विधवाओं की सामाजिक स्थिति अत्यन्त निम्न रही है। हिन्दू समाज में तो स्त्री का पति ही सब कुछ माना जाता है तथा उसे भगवान व देवता तक का पद प्रदान किया जाता है। पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा स्त्री की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो जाती है तथा परिवार और समाज के सदस्य उसे हीन दृष्टि से देखते हैं। उन्हें पुनर्विवाह करने की अनुमति भी प्रदान नहीं की जाती है जिसके कारण उन्हें पति के परिवार में ही अपमानजनक, उपेक्षित, नीरस एवं आर्थिक कठिनाइयों से भरा हुआ जीवन व्यतीत करना पड़ता है। विधवाओं का किसी भी शुभ अवसर पर जाना अपशगुन माना जाता रहा है। इसलिए उन्हें सामाजिक जीवन से अलग-थलग कर दिया जाता रहा है।

आज भी उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। यद्यपि कानूनी रूप से विधवाओं के पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की गई है, तथापि आज भी इसका प्रचलन अधिक नहीं हो पाया है। राम आहूजा के अनुसार विधवाओं पर अत्याचार करने वाले व्यक्ति पति पक्ष के होते हैं जो उन्हें उनके पतियों की सम्पत्ति से वंचित रखना चाहते हैं। विधवाओं को अपने पतियों के व्यापार आदि के बारे में काफी कम जानकारी होती है। यही अज्ञानता उनके शोषण का प्रमुख कारण बन जाती है। इनका कहना है कि युवा विधवाओं को अधिक अपमान एवं शोषण सहन करना पड़ता है। यद्यपि विधवाओं पर होने वाले अत्याचारों के लिए सम्पत्ति की प्रमुख भूमिका होती है, तथापि विधवाओं की निष्क्रियता एवं बुजदिली भी इसमें सहायक कारक हैं।

3. तलाकशुदा स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार-विवाह-विच्छेद अथवा तलाक भारतीय स्त्रियों की एक प्रमुख समस्या है। परम्परागत रूप से पुरुषों को अपनी पत्नियों को तलाक देने का अधिकार प्राप्त था। मनुस्मृति में कहा गया है कि यदि कोई स्त्री शराब पीती है, हमेशा पीड़ित रहती है, अपने पति की आज्ञा का पालन नहीं करती है तथा धन का सर्वनाश करती है तो मनुष्य को उसके जीवित रहते हुए भी दूसरा विवाह कर लेना चाहिए। पुरुषों की ऐसी स्थिति होने पर स्त्री को उन्हें छोड़ने का अधिकार प्राप्त नहीं था। तलाकशुदा स्त्री को आज भी , समाज में एक कलंक माना जाता है तथा हर कोई व्यक्ति उसी को दोष देता है चाहे यह सब उसके शराबी, जुआरी व चरित्रहीन पति के कारण ही क्यों न हुआ हो।

उसे सब बुरी नजर से देखते हैं तथा आजीविका का कोई साधन न होने के कारण वह यौन शोषण का शिकार बन जाती है। तलाक के बाद उसके सामने तथा अपने बच्चों का पेट भरने की समस्या उठ खड़ी होती है। समाज के कुछ दलाल ऐसी स्त्रियों को बहका-फुसलाकर वेश्यावृत्ति जैसे अनैतिक कार्य करने पर विवश कर देते हैं। वे बेचारी न चाहती हुई भी अनेक समस्याओं का शिकार हो जाती हैं।

4. पत्नी की मार-पिटाई-घरेलू हिंसा का एक अन्य रूप पत्नी के साथ होने वाली मार-पिटाई है। अनेक स्त्रियाँ पति द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के अत्याचारों को चुपचाप सहन करती रहती हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रकार की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है यद्यपि इसके बारे में किसी भी प्रकार के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। राम आहूजा के अनुसार मार-पिटाई की शिकार स्त्रियों की आयु अधिकतर 25 वर्ष से कम होती है। अधिकतर ऐसी घटनाएँ निम्न आय वाले परिवारों में अधिक होती हैं। इसके कारणों का उल्लेख करते हुए आहूजा ने बताया है कि इनमें यौनिक असामंजस्य, भावात्मक अशान्ति, पति का अत्यधिक घमण्डी होना, पति का शराबी होना तथा पत्नी की निष्क्रियता व बुजदिली प्रमुख हैं।

प्रश्न 4
महिला उत्पीड़न के कारण व उत्तर:दायी तत्वों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

महिला उत्पीड़न के कारण एवं उत्तर:दायी तत्त्व

स्त्री-हिंसा, उत्पीड़न, अत्याचार, शोषण आदि इस बात पर निर्भर करता है कि समाज की व्यवस्था और संरचना कैसी है? स्त्री की आर्थिक-सामाजिक स्थिति कैसी है? परिवार में उसका मान कैसा है? स्त्री स्वावलंबी और शिक्षित है कि नहीं। शासन-व्यवस्था में कानून की भूमिका कैसी है? उपर्युक्त वे पहलू या कोण हैं जिनके आधार पर हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि स्त्री-हिंसा में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका किसकी है? पुरुषों के अतिरिक्त महिला उत्पीड़न में कुछ महिलाएँ भी अपने निहित स्वार्थों के कारण स्त्री-हिंसा में सहभागी बन जाती हैं।

लेकिन मुख्य रूप से पुरुष वर्ग ही स्त्री के साथ अत्याचार करता है, शोषण करता है तथा धोखा देकर उत्पीड़न करता है। इसके साथ-ही-साथ कुछ चीजें ऐसी हैं जो स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए विवश करती हैं। ये वे लोग हैं जो समाज से उपेक्षित हैं, इन्हें मान-सम्मान कहीं नहीं मिला, ये निराशावादी और कुंठाग्रस्त होते हैं तथा इनमें हीनता की भावना इतनी अधिक होती है कि ये बात-बात पर अपना आक्रोश प्रकट करते हैं। इस प्रकार निराशा और हताशा की स्थिति में ये स्त्रियों के साथ किसी सीमा तक जा सकते हैं, इस श्रेणी में वे लोग भी आते हैं जो वैयक्तिक विघटन के शिकार हो गए हैं अथवा जिनकी स्थिति एवं भूमिका के साथ परिवार में द्वंद्व है, ऐसे लोग अच्छे और बुरे का अन्तर भी भूल जाते हैं।

इस प्रकार के व्यक्ति स्त्री के साथ परिवार और परिवार के बाहर कुछ भी कर सकते हैं; क्योकि ये मानसिक रूप से बीमार हैं। विकृत व्यक्तित्व का व्यक्ति, शक्की, ईष्र्यालु, झगड़ालू तथा बात-बात पर लड़ने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति अपनी पत्नी, बेटी या परिवार की स्त्री के साथ अत्याचार करते हैं तथा मार-पीट और गाली-गलौज की भी सीमाएँ लाँघ जाते हैं। इस तरह पुरुष चाहे स्वस्थ मस्तिष्क का हो या विकृत मानसिकता और सोच का अथवा हीन-भावना से ग्रस्त हो, इन सबका कहर स्त्री पर ही टूटता है। मूलतः पुरुषप्रधान समाज ही यौन-हिंसा के लिए भी उत्तर दायी है।

प्रश्न 5
समाज में स्त्री हिंसा के पोषक तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
स्त्री-हिंसा के पोषक तत्त्व व्यक्ति परिस्थितियों का दास है, पर स्त्री और पुरुष की परिस्थितियों में अन्तर है। क्षमता, शक्ति, योग्यता और संषर्घ करने की क्षमता में भी अन्तर है, संवेदनशीलता में भी काफी अन्तर है। ऐसा नहीं है कि महिलाएँ अपराधी नहीं हैं, वे भी डकैती से लेकर तस्करी तक के क्षेत्र में नामजद हैं। और उन पर भी मुकदमे दर्ज हैं। जेल में हजारों की संख्या में महिलाएँ भी हैं। हत्या जैसे जघन्य अपराध में भी महिलाएँ पीछे नहीं हैं, लेकिन इन सबके पीछे किसी-न-किसी व्यक्ति या अपराधी समूह या रैकेट का हाथ होता है। वर्तमान समय में न जाने कितने यौनकर्मियों के रैकेट हैं, जोकि पुरुषों के निर्देशन में महिलाएँ चला रही हैं।
महिला उत्पीड़न एवं स्त्री-हिंसा के पोषक तत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. अराजक तत्त्व इनका कोई धर्म, जाति व संप्रदाय नहीं होता। जब भी लोकतंत्र कमजोर होता है, अराजक तत्त्वों का दबदबा समाज में बढ़ जाता है। इस प्रकार के लोग दिनदहाड़े लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बलात्कार, अपहरण आदि की दुर्घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
  2. माफिया नगरों और महानगरों में तरह-तरह के माफियाओं के संगठन हैं। ये धन, बल, गुंडई, राजनीति आदि में शक्तिशाली हैं। इनकी पहुँच दूर-दूर तक है। ये नियोजित ढंग से लड़कियों और महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं।
  3. नशे की दुनिया और नशेबाज इनके चरित्र का अनुमान लगाना कठिन है। विशेषतौर से निम्न और निम्न मध्यम-वर्ग के नशेबाज चौराहों पर लड़कियों के स्कूल के पास खड़े होकर छेड़खानी करना, व्यंग्य मारना, भद्दे-भद्दे मजाक करना, जबरदस्ती प्यार दर्शाना आदि करते हैं। इस प्रकार के लोग अपनी निजी जिन्दगी में भी अपनी पत्नी और बच्चों को मारते-पीटते हैं और कभी-कभी ये इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि पत्नी-बच्चों की हत्या तक कर देते हैं।
  4. विद्वेष की भावना लड़की जब प्रेमजाल में नहीं हँसती तो बदला लेने की भावना से उस पर तेजाब फेंका जाता है। अपहरण करके सामूहिक बलात्कार यहाँ तक कि उसकी हत्या तक कर दी जाती है।
  5. परिस्थितिवश परिवार में कभी-कभी अचानक ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जो अचानक विस्फोटक बन जाती हैं; जैसे-छोटी-छोटी बातों को लेकर बहस करना, बच्चों को डाँटना, घरेलू कार्यों को लेकर अथवा किसी और कारण से ऐसी गर्म और उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति तैयार हो जाती है कि गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। इसी प्रकार की परिस्थितियों में घर-परिवार में भी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है जिसमें घर की अन्य महिला सदस्य भी सम्मिलित होती हैं। अतः इस प्रकार की घटनाएँ घरेलू हिंसा की श्रेणी में आती हैं।
  6. देह-व्यापार के रैकेट ये वे रैकेट हैं जो अपने व्यापार में चतुर, सक्षम और अनुभवी होते हैं। ये लड़की को अपनी चालों में फंसाकर उसके घर और परिवार से बाहर निकाल लाते हैं। इसके अलावा ये रैकेट लड़की का अपहरण करके भी उन्हें जबरदस्ती देह-व्यापार के धंधे में डालते हैं तथा ऐसा करने के लिए लड़की को विवश करते हैं, इसके लिए उसे तरह-तरह की यातनाएँ दी जाती हैं और यह तब तक चलता है जब तक वह देह-व्यापार का हिस्सा नहीं बन जाती।

समाज में यौन-उत्पीड़न, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार आदि को नियंत्रित करने हेतु उच्चस्तरीय कार्यवाही आवश्यक है जिसके तहत इस प्रकार की गतिविधियों और अभद्र व्यवहार को रोका जा सके।

प्रश्न 6
पंचवर्षीय योजनाओं में महिला कल्याण योजनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

नारी और पंचवर्षीय योजनाएँ।

प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56)-यह कल्याणकारी लक्ष्यों को लेकर बनाई गई थी। महिला कल्याण के मुद्दे इसमें समाहित थे। केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड (सी०एस०डब्ल्यू० बोर्ड) ने स्वैच्छिक संस्थाओं से मिलकर या इनके सहयोग से स्त्री कल्याण का बहुत कार्य किया।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61)-द्वितीय योजना की मुख्य बात यह है कि इनमें महिलामंडलों को प्रोत्साहित किया गया कि वे जमीनी स्तर पर कार्य करें जिससे कि कल्याणकारी लक्ष्यों की प्रगति हो सके, साथ ही बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसरों को उत्पन्न करना। आय और सम्पत्ति में असमानता घटाना था।

तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-62 से 1965-66)-इस योजना में महिला शिक्षा पर अत्यधिक जोर दिया गया और प्राथमिकता भी दी गई। माँ और बच्चों के स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया गया। गर्भवती स्त्रियों को सुविधाएँ प्रदान करने के लिए कार्यक्रम बनाए गए। समानता के बेहतर अवसरों का विकास करना और आय तथा सम्पत्ति के अन्तर को घटाना, साथ ही धन के समान वितरण की बेहतर व्यवस्था करना।

चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-74)-इस योजना के तहत् समानता और सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों को प्रेरित करना था जिससे जीवन स्तर अच्छा हो सके।

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79)-इस योजना में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया कि ‘कल्याण’ शब्द के स्थान पर विकास शब्द को रखा गया। इस दृष्टि से सामाजिक कल्याण का दायरा काफी बढ़ गया। परिवार की विभिन्न समस्याओं पर विचार किया जाने लगा। वहीं स्त्री की भूमिका पर भी ध्यान दिया गया कि वह देश के विकास में किस प्रकार उपयोगी होगी। यह कल्याण और विकास की अवधारणा के मध्य एक नवीन समन्वयात्मक उपागम था।

छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85)-इस योजना में महिला कल्याण व विकास को एक पहचान ही नहीं मिली, बल्कि उसको प्राथमिकता प्रदान की गई। महिला विकास हेतु एक पृथक् सेक्टर का प्रस्ताव रखा गया जिससे कि महिलाओं का विकास समुचित ढंग से हो सके। इसकी मुख्य बात स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार था। यह महसूस किया गया कि चीजें अति आवश्यक हैं, बुनियादी हैं।

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90)-महिला विकास का कार्यक्रम वैसा ही चलता रहेगा, परन्तु महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में इस तरह का बदलाव लाया जाए जिससे कि वे राष्ट्र की मुख्य विकास की धारा में शामिल हो सकें। इस दृष्टि से महिलाओं के लिए लाभप्रद कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाने लगा जिससे महिलाओं को आर्थिक लाभ प्राप्त हो सके और उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति बेहतर हो सके।

आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97)-इस योजना में यह सुनिश्चित किया गया कि विकास लाभ स्त्रियों को प्राप्त हो रहा है अथवा नहीं। ऐसा तो नहीं है कि उनकी उपेक्षा की जा रही हो। कुछ विशेष कार्यक्रम भी चलाए गए जिससे स्त्रियों को अतिरिक्त लाभ प्राप्त हो सके। इन कार्यक्रमों पर निगाह रखी गई जिससे इनमें कोई गड़बड़ी न हो सके। विकास कार्यक्रम का लक्ष्य स्त्रियों को इस योग्य बनाया जाना था कि वे पुरुषों के समान विकास कार्य में भाग ले सकें। निश्चय ही सरकार का यह कदम सामाजिक-आर्थिक विकास से महिला सशक्तीकरण की ओर ले जाता है।

नौवी पंचवर्षीय योजना (1997-2002)-यह देश की आजादी के पचासवें वर्ष में शुरू हुई। योजना का लक्ष्य था–सभी स्तरों के लोगों को विकास कार्य से जोड़ा जाए। महिलाओं को. सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और विकास के लिए अधिकार सम्पन्न बनाया जाए।

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007)-इस योजना के केन्द्र में लक्ष्य था कि विकास इस तरह हो कि नीचे के पिछड़े, दलित, निर्धन लोगों को लाभ प्राप्त हो सके। यह लाभ सभी स्त्री-पुरुष को समान रूप से प्राप्त हो तथा नौकरी के अवसर सभी को समान रूप से प्राप्त हों एवं इसमें संतुलित विकास का लक्ष्य रखा गया।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012)-इस योजना का लक्ष्य समावेशी विकास, था . जिसमें देश की प्रत्येक महिला को स्वयं विकसित करने में सक्षम बनाना प्रमुख है तथा यह आभास कराना कि वे देश की आर्थिक समृद्धि एवं विकास का प्रमुख घटक हैं।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017)-इस योजना में महिला सशक्तीकरण को मुख्य लक्ष्य के रूप में रखा गया है। इसके लिए, ‘स्वाधार’ नामक एक 24 × 7 महिला हेल्पलाइन, ‘उज्ज्वला’ नामक तस्करी रोधी योजना को कार्यान्वित किया जा रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
पुनर्जागरण काल में महिलाओं की क्या स्थिति थी?
उत्तर:

पुनर्जागरण काल में महिलाओं की स्थिति

भारतीय समाज के आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक ढाँचे में स्त्री की स्थिति दोयम पायदान पर रही है। उसे उसका अधिकार नहीं मिला। वह ऐसी स्थिति और परिस्थिति से घिरी रही है, जहाँ से बाहर निकलना कठिन रहा है। धार्मिक अंधविश्वासों और रूढ़ियों ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल रखी हैं। वे अभी भी कहीं-न-कहीं उन्हें कमजोर बनाए हुए हैं।

एक नई चेतना और सुधार का युग नवजागरण के साथ आरम्भ हुआ। 19वीं सदी के पूर्व नवजागरण का संदेश धर्म के विभिन्न संप्रदायों द्वारा दिया गया। जाति-पाति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों का विरोध धार्मिक संतों, सूफियों आदि के द्वारा किया गया। 19वीं शताब्दी के बाद मूलतः वे धार्मिक तत्व नष्ट तो नहीं हुए, किन्तु उनका स्वरूप परिवर्तित हो गया। कहीं पर यह यूरोपीय संस्कृति से प्रेरित होता प्रतीत होता है और कहीं पर विशुद्ध भारतीय धर्म की ओर अग्रसर होने के लिए आन्दोलन छेड़ता है।

18वीं शताब्दी के भारत का यदि अवलोकन किया जाए, तो यह युग संक्रमण काल का था। राजनीतिक दृष्टि से मुगल सिंहासन डाँवाडोल था। मुगल शासन नीति के तहत धार्मिक कट्टरता ने भारत में अनेक समस्याओं को जन्म दिया। यह वह युग था जिसमें स्त्री से जुड़ी अनेक समस्याओं ने अपनी मजबूत जगह बना ली; जैसे-बाल-विवाह, सती-प्रथा, विधवा-पुनर्विवाह निषेध आदि। नवजागरण के समाज सुधारकों ने स्त्री समस्याओं और उत्पीड़न के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा। पुनर्जागरण आन्दोलन के पिता कहे जाने वाले राजा राममोहन राय ने सती-प्रथा के विरुद्ध आवाज बुलंद की और अंततः अंग्रेजों को सन् 1829 में सती-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित करके कानून बनाना पड़ा।

इसी तरह उन्होंने बहुपत्नी प्रथा का विरोध किया। भारत में धर्म और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों के साथ अत्याचार होते रहे हैं, शोषण और उत्पीड़न होता रहा है। इसके साथ एक लम्बा इतिहास जुड़ा है, इसलिए स्त्री हिंसा की जड़े बहुत गहरी हैं। उसकी पृष्ठभूमि में धर्म और संस्कृति है तो कहीं पितृसत्तात्मक व्यवस्था का दबदबा।

प्रश्न 2
अंग्रेजी शासनकाल में महिलाओं से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिनियम कौन-कौन से थे?
उत्तर:
अंग्रेजी शासनकाल के महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिनियम –

  1. सती-प्रथा निषेध अधिनियम (1829)
  2. बाल-विवाह निरोधक अधिनियम (1929)
  3. हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856)
  4. हिन्दू स्त्रियों का संम्पत्ति पर अधिकार अधिनियम (1937)
  5. विशेष विवाह अधिनियम (1872, 1923, 1954)
  6. पृथक् रहने पर भरण-पोषण हेतु हिन्दू-विवाहित स्त्रियों का अधिकार अधिनियम (1946)
  7. हिन्दू विवाह निर्योग्यता निवारण अधिनियम (1946)

प्रश्न 3
स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में महिला उत्थान के लिए कौन-कौन से अधिनियम व कानून पारित किए गए?
उत्तर:

स्वतन्त्रता के पश्चात बने अधिनियम

स्वतंत्रता के पश्चात् सरकार का यह पुनीत कर्तव्य और दायित्व था कि वह हिन्दू कानूनों को संशोधित कर उनकी कमियों का निराकरण करे। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर सन् 1948 में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया गया, किन्तु इसका विरोध होने के कारण इसे आगामी चुनाव तक स्थगित क़र दिया गया। सन् 1950 में पुनः इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया गया, फिर भी यह पास न हो सका। इसके पश्चात् सन् 1952 में चुनाव हुआ और जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा लोकसभा का गठन हुआ। नई लोकसभा में इसे छोटे-छोटे खंडों में प्रस्तुत किया गया और वे कानून के रूप में पारित कर दिए गए। स्वतंत्रता के पश्चात् बने अधिनियम निम्नलिखित हैं

  1. हिन्दू विवाह अधिनियम (1955)
  2. हिन्दू उत्तर:ाधिकार अधिनियम (1955)
  3. हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (1956)
  4. स्त्रियों और कन्याओं का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम (1956)
  5. दहेज निरोधक अधिनियम (1961)
  6. चिकित्सा गर्भ समापन अधिनियम (1971)
  7. कन्या-भ्रूण हत्या अधिनियम (1994, 1996, 2003)
  8. घरेलू हिंसा अधिनियम (संरक्षण) 2005

प्रश्न 4
मूल अधिकारों में महिला अधिकारों के सन्दर्भ में क्या उल्लेखित है।
उत्तर:
संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों की व्याख्या की गई है। प्रजातांत्रिक देश में मूल अधिकार मानव स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के आधार स्तम्भ हैं। अतः प्रजातांत्रिक समाज के संविधान में व्यक्तियों के मूल अधिकारों को शामिल किया जाना अत्यन्त जरूरी है। एक स्वतंत्र प्रजातांत्रिक देश में मूल अधिकार सामाजिक, धार्मिक और नागरिक जीवन के पूर्ण उपभोग के एकमात्र साधन हैं, इसलिए लोकतंत्र के आदर्शों को प्राप्त करने तथा मानव के पूर्ण विकास के लिए मूल अधिकारों का होना अत्यन्त आवश्यक है। संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों और भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों की व्याख्या की गई है। इनमें स्पष्ट रूप से महिलाओं के अधिकार संबंधी बातें कही गई हैं।

प्रश्न 5
कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध कब से लगाया गया था?
उत्तर:
पितृसत्तात्मक परिवार में पुत्र का महत्त्व कन्या से कहीं अधिक है, इसीलिए अनादिकाल से परिवार पुत्र-प्राप्ति की कामना करता है। वह वंश का नाम चलाता है। सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों को पूर्ण करता है। यदि परिवार में पहली-दूसरी लड़की का जन्म हो जाए और इसके पश्चात् पत्नी गर्भधारण करती है तो लिंग का पता लगाने हेतु भ्रूण का लिंग परीक्षण कराया जाता है और गर्भ में लड़की है तो गर्भपात करा दिया जाता है। इससे देश में स्त्री और पुरुष के अनुपात में असंतुलन पैदा हो रहा है, इसलिए इसे रोकने हेतु प्रसव पूर्व जाँच अधिनियम, 1994 में बनाया गया तथा यह 1 जनवरी, 1996 से पूरे देश में लागू कर दिया गया।

लिंग चयन एवं भ्रूण की लिंग जाँच पर निषेध के अतिरिक्त ऐसी सेवा देने वालों के विज्ञापनों तथा प्रसव पूर्व तकनीक का प्रयोग कर भ्रूण के लिंग की जानकारी देने पर भी निषेध है। किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करने पर 5 वर्ष की कैद और र 1,00,000 का जुर्माना किया जा सकता है। ऐसे केन्द्रों का पंजीयन/लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
स्त्रियों के विरुद्ध हिंसक व्यवहार के स्वरूप बताइए।
उत्तर:
स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के निम्नलिखित स्वरूप हो सकते हैं-

  1. सती-प्रथा,
  2. बलात्कार, अपहरण और हत्या,
  3. कन्या-भ्रूण हत्या,
  4. घरेलू हिंसा,
  5. दहेज प्रथा,
  6. देह-व्यापार,
  7. अन्य छेड़खानी, ताना मारना, मारना-पीटना, धोखे से विवाह आदि।

प्रश्न 2
महिला समाख्या योजना पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
महिला समाख्या योजना सन् 1989 में आरम्भ की गई। इस योजना के तहत् ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ जो आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग की हैं, उन्हें शिक्षित करने/समानता प्राप्त करने हेतु इस योजना का अपना महत्त्व है; क्योकिं महिला को शिक्षित कर उन्हें शक्तिशाली बनाना है। महिला संघ ग्रामीण स्तर पर, महिलाओं को प्रश्न करने, अपने विचार रखने और अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है। इस तरह महिलाओं के व्यक्तित्व निर्माण का भी कार्य करती है और महिला सशक्तीकरण का भी।।

प्रश्न 3
शिक्षा गारंटी योजना से महिला वर्ग किस प्रकार लाभान्वित हुआ है?
उत्तर:
किसी भी समाज, देश व राष्ट्र की प्रगति के लिए बुनियादी चीजों में से एक शिक्षा भी है। अशिक्षित समाज में न तो पुरुष उन्नति कर सकती है और न ही स्त्री, इसलिए सरकार ने सर्वप्रथम शिक्षा पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इस शिक्षा योजना के तहत् उन बच्चों को स्कूल लाने का प्रयास किया जाता है, जो स्कूल नहीं जाते हैं। इस योजना की विशेषता है कि दुर्गम स्थानों पर जहाँ एक किलोमीटर में कोई औपचारिक स्कूल नहीं है और स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की आयु 6-14 वर्ष के बीच है और उस क्षेत्र में 15 से 25 बच्चे तक हैं तो एक ईजीपीएस (शिक्षा गारंटी योजना) के तहत् स्कूल खोल दिया जाएगा।

प्रश्न 4
किस पंचवर्षीय योजना में महिला कल्याण शब्द के स्थान पर महिला विकास शब्द का प्रयोग किया गया था?
उत्तर:
पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79)-महिला कल्याण शब्द के स्थान पर महिला विकास शब्द का प्रयोग किया गया इससे सामाजिक कल्याण का दायरा काफी बढ़ गया। परिवार की विभिन्न समस्याओं पर विचार किया जाने लगा वहीं स्त्री की भूमिका पर भी ध्यान दिया गया कि वह देश के विकास में किस प्रकार उपयोगी होगी। यह कल्याण और विकास की अवधारणा के मध्य एक नवीन समन्वयात्मक उपागम था।

निश्वित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“हिंसा मानव की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसका निर्गुण में जितना निषेध होता है सगुण में उसका उतना ही जबरदस्त आकर्षण भी है।” यह कथन किसके द्वारा प्रतिपादित है।
उत्तर:
उपर्युक्त कथन सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा हिंसा की मूल प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा गया है।

प्रश्न 2
सती प्रथा उन्मूलन का श्रेय किसको जाता है?
उत्तर:
सती प्रथा उन्मूलन का श्रेय राजा राममोहन राय को जाता है।

प्रश्न 3
भारत में बाल विवाह के उन्मूलन हेतु अंग्रेजी शासनकाल में बने अधिनियम का क्या नाम था और यह कब से प्रभाव में आया था?
उत्तर:
अंग्रेजी शासनकाल में बाल विवाह रूपी ज्वलंत समस्या के निराकरण के लिए “बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 में प्रभाव में आया था।

प्रश्न 4
स्वाधार’ नामक महिला हेल्पलाइन किस पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ की गई थी?
उत्तर:
स्वाधार’ नामक महिला हेल्पलाइन बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ की गई थी।

प्रश्न 5
महिला समाख्या योजना कब प्रारम्भ हुई थी?
उत्तर:
महिला समाख्या योजना सम् 1989 में प्रारम्भ हुई थी।

बहुविकल्पीय प्रा (1 अंक)

प्रश्न 1.
भारत के किस प्राचीन धर्म द्वारा “अहिंसा परम धर्म” का उदघोष किया जाता है?
(क) सनातन धर्म
(ख) जैन धर्म
(ग) बौद्ध धर्म
(घ) इन सभी धर्मों द्वारा
उत्तर:
(घ) इन सभी धर्मों द्वारा

प्रश्न 2.
इनमें से स्त्री-हिंसा के पोषक तत्त्व कौन-से हैं?
(क) अराजक तत्व
(ख) माफिया
(ग) विद्वेष की भावना
(घ) ये सभी
उत्तर:
(घ) ये सभी

प्रश्न 3.
केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड ने किस पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत स्वैच्छिक संस्थाओं के साथ मिलकर महिला कल्याण के क्षेत्र में कार्य किए थे?
(क) प्रथम पंचवर्षीय योजना
(ख) द्वितीय पंचवर्षीय योजना
(ग) तीसरी पंचवर्षीय योजना
(घ) चौथी पंचवर्षीय योजना
उत्तर:
(क) प्रथम पंचवर्षीय योजना

प्रश्न 4.
पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में महिला कल्याण’ के स्थान पर किस शब्द का प्रयोग किया गया?
(क) अभिवृद्धि
(ख) विकास
(ग) आयोजना
(घ) सामाजिक कल्याण
उत्तर:
(ख) विकास

प्रश्न 5.
कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी प्रतिबंध के लिए बनाया गया “प्रसव पूर्व जाँच अधिनियम-1994″
कब से लागू किया गया था?
(क) 1 जनवरी, 1994
(ख) 1 जनवरी, 1995
(ग) 1 जनवरी, 1996
(घ) 1 जनवरी, 1997
उत्तर:
(ग) 1 जनवरी, 1996

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Psychological Experiments
(मनोवैज्ञानिक प्रयोग)
Number of Questions Solved 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments (मनोवैज्ञानिक प्रयोग)

नोट- नवीनतम पाठ्यक्रम के अन्तर्गत कक्षा-12 के पाठ्यक्रम में दो प्रयोग-लेखन का प्रावधान है। ये प्रयोग हैं—
(1) सीखने में दर्पण लेखन का प्रयोग तथा
(2) द्विपाश्विक अन्तरण।

प्रयोग-1 :  सीखने में दर्पण लेखन का प्रयोग

प्रश्न 1
सीखने में दर्पण-लेखन के प्रयोग का वर्णन कीजिए। (2008, 10, 15)
या
आपने जो प्रयोग सीखने में ‘दर्पण-लेखन विधि के सम्बन्ध में किया हो, उसका विवरण दीजिए तथा प्राप्त निष्कर्षों की विवेचना कीजिए। (2012, 15, 17, 18)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 1

प्रयोग की समस्या या उद्देश्य- प्रयोगकर्ता ने निम्नलिखित उद्देश्यों को सामने रखकर यह प्रयोग किया

(1) प्रयास और भूल द्वारा सीखने में थॉर्नडाइक द्वारा दिये गये नियमों के प्रभाव की जाँच करना।
(2) ‘दर्पण-लेखन यन्त्र’ की सहायता से हाथ और आँख के समन्वय का अध्ययन करना। सामग्री तथा यन्त्र-प्रयोगकर्ता ने इस प्रयोग में निम्नलिखित सामग्री का प्रयोग किया

  1. दर्पण-लेखन यन्त्र
  2. स्टॉप वाच
  3. सितारों की बारह आकृतियाँ
  4. पिन
  5. पेन्सिल
  6. पर्दा।।

प्रयोग विधि- प्रयोग आरम्भ करने से पहले प्रयोगकर्ता ने प्रयोज्य को आराम से बैठाकर दर्पण लेखन यन्त्र के बोर्ड पर तारे की आकृति वाला कागज इस प्रकार लगाया कि तारे की आकृति दर्पण में स्पष्ट रूप से दिखाई दे। दर्पण और पर्दे को इस प्रकार लगाया कि प्रयोज्य को तारे की आकृति वाला कागज सीधा न दिखाई पड़े वरन् दर्पण में परोक्ष रूप से प्रतिबिम्बित होकर दिखाई दे।

निर्देश- प्रयोग की तैयारी कर लेने के बाद प्रयोज्य को निम्नलिखित निर्देश दिये-

  1. मेरे सावधान’ कहते ही आप प्रयोग के लिए तैयार हो जाएँगे और प्रारम्भ’ कहते ही कार्य प्रारम्भ कर देंगे।
  2. आपको प्रथम दो तथा अन्तिम दो प्रयास उल्टे हाथ द्वारा तथा बीच में आठ प्रयास सीधे हाय द्वारा करने होंगे।
  3. आपको प्रारम्भ बिन्दु से घड़ी की दिशा में पेन्सिल चलाते हुए तारे का पूरा चक्कर करके फिर प्रारम्भिक स्थान पर पहुँचना होगा।
  4. आपको यह ध्यान रखना होगा कि जितनी बार पेन्सिल की नोक तारे की दोहरी रेखाओं में से किसी को छुएगी या काटेगी उतनी ही गलतियाँ मानी जाएंगी।
  5. रेखा खींचते समय पेन्सिल को बीच में उठाना नहीं है।

सावधानियाँ- प्रयोगकर्ता ने प्रयोग करने में निम्नलिखित सावधानियाँ रखीं

  1. वातावरण शान्त रखा गया।
  2. दर्पण-लेखन यन्त्र को व्यवस्थित करने में यह विशेष ध्यान रखा गया कि बोर्ड के नीचे की तारे की आकृति प्रयोज्य को सीधे न दिखाई दे।
  3. प्रत्येक प्रयास के पश्चात् विश्राम का ध्यान रखा गया।

वास्तविक प्रयोग- प्रयोज्य को निर्देश देने के बाद प्रयोगकर्ता ने प्रयोग प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम प्रयोगकर्ता ने ‘सावधान’ कहा, जिससे प्रयोज्य तैयार होकर बैठ गया। पाँच सेकण्ड के बाद ‘प्रारम्भ’ कहा गया और प्रयोज्य ने दर्पण घड़ी की दिशा में तारे की दोहरी रेखाओं के बीच में रेखा खींचना आरम्भ कर दिया। ‘प्रारम्भ’ कहते ही प्रयोगकर्ता ने घड़ी चालू कर दी। जब प्रयोज्य रेखा खींचता हुआ अपने प्रारम्भिक स्थान पर फिर आ गया तो प्रयोगकर्ता ने घड़ी रोक दी। प्रत्येक प्रयास में गलतियों और समय को नोट कर लिया तथा प्रत्येक प्रयास के पश्चात् प्रयोज्य को दो मिनट का विश्राम दिया गया।

परिणाम- प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणामों को निम्नलिखित तालिका में नोट कर लिया, जो इस प्रकार हैं
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 2
अन्तर्दर्शन रिपोर्ट- प्रयोज्य द्वारा दी गयी अन्तर्दर्शन रिपोर्ट इस प्रकार थी-“प्रारम्भ में पेन्सिल चलाने में गति की दिशा का अन्दाज नहीं लगा पा रहा था। बार-बार पेन्सिल इधर-उधर की रेखाओं को छूने लगती थी। कुछ देर में ठीक दिशा का अन्दाजा हुआ। पहले प्रयास में कुछ कठिनाई हुई, लेकिन बाद के प्रयासों में कुछ आसानी हुई और त्रुटियाँ कम होने पर काफी प्रसन्नता हुई। बायें हाथ से प्रयास आरम्भ करने में कुछ कठिनाई हुई, किन्तु सीधे हाथ से उतनी कठिनाई महसूस नहीं हुई। जैसे-जैसे कार्य का अभ्यास होता गया, कार्य शीघ्रतापूर्वक होने लगा तथा त्रुटियाँ भी कम होने लगीं, . जिससे अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव हुआ।”

निष्कर्ष-

  1. प्रत्येक हाथ से प्रयास आरम्भ करने में त्रुटियाँ अधिक हुईं, किन्तु बाद में त्रुटियाँ कम होती गयीं व समय भी कम होता गया। इससे यह ज्ञात होता है कि अभ्यास द्वारा कार्य में शुद्धता आती है।
  2. प्रयोज्य के अनुभवों द्वारा यह सिद्ध होता है कि दायें हाथ का अनुभव बायें हाथ के प्रयास में सहायक होता है।
  3. क्रमश: गलतियाँ कम होने से जो प्रसन्नता प्रयोज्य को हुई उससे प्रयोज्य में उत्साह की वृद्धि होती है। इससे भी सीखने की योग्यता बढ़ती है।

प्रयोग-2द्विपाश्विक अन्तरण

प्रश्न 2
द्विपाश्विक अन्तरण सम्बन्धी प्रयोग का विवरण लिखिए। (2010, 12, 14, 16, 17, 18)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 3

प्रयोग-समस्या– प्रयोग की मुख्य समस्या यह ज्ञात करना है कि अधिगम में एक हाथ से दूसरे हाथ में द्विपाश्विक अन्तरण किस प्रकार होता है।

प्रयोग की आवश्यक सामग्री प्रयोग के लिए आवश्यक सामग्री है- दर्पण-चित्रण उपकरण, पेन्सिल, कुछ ड्राइंग पिन, स्टॉप वाच, तारा बना कागज तथा ग्राफ पेपर।

प्रयोग की व्यवस्था प्रयोग की समुचित व्यवस्था के अन्तर्गत सर्वप्रथम विषय- पात्र को निर्धारित स्थान पर आराम से कुर्सी पर बिठाया जाता है। इस स्थिति में दर्पण-चित्रण उपकरण विषय-पात्र के सम्मुख होता है। दर्पण-चित्रण उपकरण में तारा चित्रित कागज को फिट कर दिया जाता है, परन्तु उसे एक पर्दे द्वारा ढककर रखा जाता है। इस व्यवस्था को पूरा कर लेने पर विषय-पात्र के हाथ को तारे के प्रारम्भिक बिन्दु पर रख दिया जाता है तथा उसे आगे की क्रिया प्रारम्भ करने के लिए यह निर्देश दिया जाता है-“मैं पहले तैयार’ कहूँगा तथा उसके दो सेकण्ड के उपरान्त ‘प्रारम्भ कहूँगा। इसके साथ ही तुम चित्रण का कार्य प्रारम्भ कर दोगे। चित्रण के लिए निर्दिष्ट बिन्दु से प्रारम्भ करोगे तथा अपनी पेन्सिल को निर्दिष्ट दिशा में ही चलाओगे। इसके लिए तुम्हें दर्पण में तारे की आकृति को देखना होगा। समय का विशेष ध्यान रखना होगा तथा इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि पेन्सिल तारे की बाहरी सीमा को न छूने पाये। प्रयोग में मुख्य

रूप से यह देखा जाएगा कि तुम अपने लक्ष्य तक पेन्सिल घुमाते हुए कितनी शीघ्रता से आते हो तथा तुम इस प्रक्रिया में कितनी त्रुटियाँ करते हो। एक बार पेन्सिल को कागज पर रख देने के बाद चक्कर पूरा किये बिना उठाना नहीं है।’

प्रयोग- विधि प्रयोग की व्यवस्था के अन्तर्गत प्रयोगकर्ता द्वारा विषय-पात्र को उपर्युक्त निर्देश देने के उपरान्त ‘तैयार रहने का संकेत दिया जाता है तथा इस संकेत के अल्प अन्तराल के उपरान्त ‘प्रारम्भ करो’ का महत्त्वपूर्ण निर्देश दे दिया जाता है। इस निर्देश के साथ-ही-साथ प्रयोगकर्ता द्वारा स्टॉप वाच को भी बटन दबाकर चालू कर दिया जाता है। जब विषय-पात्र की पेन्सिल निर्धारित लक्ष्य पर अर्थात् तारे के अन्तिम बिन्दु पर पहुँच जाती है तो प्रयोगकर्ता द्वारा स्टॉप वाच को रोक दिया जाता है। अब प्रयोगकर्ता द्वारा इस कार्य में लगे समय को तथा विषय-पात्र द्वारा की गयी त्रुटियों को भी नोट

कर लिया जाता है। प्रयोग में इस क्रिया को कुल 16 बार दोहराया जाता है। प्रयोग की प्रक्रिया में प्रारम्भ के तीन प्रयासों में विषय-पात्र को अपना बायाँ हाथ इस्तेमाल करना होता है तथा इसके उपरान्त किये जाने वाले 10 प्रयासों में विषय-पात्र को अपना दायाँ हाथ इस्तेमाल करना होता है। अन्तिम तीन प्रयासों में पुन: विषय-पात्र को अपना बायाँ हाथ ही इस्तेमाल करना होता है। विषय-पात्र को प्रत्येक प्रयास के उपरान्त एक मिनट का विश्राम दिया जाता है।

कुल 16 प्रयासों का विवरण निम्नलिखित तालिका में व्यवस्थित ढंग से साथ-ही-साथ लिख लिया जाता है-
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 4

उपर्युक्त वर्णित तालिका में प्रयोग से प्राप्त आँकड़ों को यथास्थान लिखने के उपरान्त इन आँकड़ों के आधार पर प्रयासों में लगने वाले समय तथा होने वाली त्रुटियों के दो अलग-अलग ग्राफ तैयार कर लिये जाते हैं। आँकड़ों का अलग से निम्नलिखित रूप में सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है

E = पहले तीन (बायें हाथ से) प्रयासों में लगने वाले समय का औसत।
F = पहले तीन प्रयासों में होने वाली त्रुटियों का औसत मान।
G= चौथे से तेरहवें (दायें हाथ से) प्रयास तक 10 प्रयासों के समय का औसत।
H = उपर्युक्त दस प्रयासों (दायें हाथ से) में होने वाली त्रुटियों का औसत।
I = अन्तिम तीन प्रयासों (बायें हाथ से) में लगने वाले समय का औसत।
J= अन्तिम तीन प्रयासों (बायें हाथ से) में होने वाली त्रुटियों का औसत।

अवलोकन एवं निष्कर्ष– उपर्युक्त आँकड़ों का अवलोकन करने से स्पष्ट हो जाता है कि अन्तिम तीन प्रयासों में प्रथम तीन प्रयासों की तुलना में समय कम लगा। इन प्रयासों में त्रुटियाँ भी कम हुईं। इससे सिद्ध होता है कि अधिगम में द्विपाश्विक अन्तरण के सिद्धान्त सत्य हैं।

सावधानियाँ–

  1. परीक्षण-स्थल का वातावरण हर प्रकार से शान्त एवं सुविधाजनक होना चाहिए।
  2. प्रत्येक प्रयास के समय का मापन शुद्ध होना चाहिए।
  3. प्रत्येक प्रयास के उपरान्त विषय-पात्र को एक मिनट विश्राम अवश्य दें।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 13 Cyber Crime

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 13 Cyber Crime (साइबर अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 13 Cyber Crime (साइबर अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 13
Chapter Name Cyber Crime
(साइबर अपराध)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 13 Cyber Crime (साइबर अपराध)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
साइबर अपराध से आप क्या समझते हैं? इन अपराधों की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
या
साइबर अपराध की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

साइबर अपराध

‘साइबर स्पेस’ शब्द की रचना विज्ञान तथा साहित्य के लेखक विलियम गिब्सन ने अपने उपन्यास न्यूरोमेन्सर (Neuromancer) में की थी। यह शब्द वस्तुतः एक ऐसे समुदाय को इंगित करता है, जो एक-दूसरे से परम्परागत रूप से परिभाषित समुदाय की अपेक्षा विस्तृत नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसमें उससे सम्बन्धित अवधारणाओं; जैसे-साइबर समुदाय, साइबर सम्प्रेषण इत्यादि के अनुभव का ज्ञान होता है। यहाँ पर साइबर अपराध को उस आपराधिक व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, जहाँ पर व्यक्तिगत कम्प्यूटर आवश्यक और अभिन्न घटक है। साइबर अपराध आपराधिक व्यवहार का एक स्वरूप है, जो कम्प्यूटर के आने से पूर्व अस्तित्व में नहीं था तथा अपनी आरम्भिक अवस्था में यह इतना नहीं फैला था कि भय उत्पन्न करे। वास्तव में आरम्भिक अवस्था में इस क्षेत्र में विचलन से ऐसे नवाचार आये जिसके दूरगामी परिणाम थे, वस्तुतः संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में इन्टरनेट का विकास कॉलेज विद्यार्थियों से जुड़ चुका था और वे एक-दूसरे से छिपे तौर पर विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर का प्रयोग करके बातचीत करते थे।

यद्यपि इस अवस्था में इन कम्प्यूटरों और इन नेटवर्को तक मुट्ठीभर शोध छात्रों, वैज्ञानिकों और सरकारी कर्मचारियों की ‘ ही सीमित पहुँच थी और यह व्यवहार बहस का विषय नहीं बना था, लेकिन जैसे-जैसे कम्प्यूटर नेटवर्क अधिक सामान्य एवं विस्तृत होता गया, विचलित व्यवहार एवं आपराधिक व्यवहार और ० महत्त्वपूर्ण होते गये। प्रायः आज अधिकतर विकसित राष्ट्रों में कम्प्यूटर बहुत-से घरों में भी पाया जाता है, यहाँ तक कि भारत में भी इनके मूल्यों में अप्रत्याशित गिरावट से ये सामान्य होते जा रहे हैं और उसी समान इन्टरनेट प्रयोगकर्ता की वृद्धि दर भी विश्व के अन्य राष्ट्रों की अपेक्षा भारत में तीव्र है। इस प्रकार लोगों की ज्यों-ज्यों कम्प्यूटर और इन्टरनेट तक पहुँच सामान्य होती जायेगी, साइबर अपराध भी उसी अनुपात में बढ़ता जायेगा।

साइबर अपराध को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि “साइबर अपराध, अपराध का एक नवीन प्रकार है जो आधुनिक सूचना समाज (नेटवर्क सोसाइटी) में कम्प्यूटर, इन्टरनेट और संचार क्रान्ति के अन्य प्रौद्योगिकी साधनों को प्रयोग करने वालों द्वारा अपने व्यापारिक व व्यावसायिक क्रियाकलापों के सन्दर्भ में आपराधिक विधानों का उल्लंघन है।” अन्य प्रकार इसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है कि “साइबर अपराध के अन्तर्गत जान-बूझकर किये गये छल-कपट, धोखेबाजी से सम्बन्धित वे सभी समाज-विरोधी कार्य समाविष्ट हैं जो वैधानिक रूप से निषिद्ध हैं तथा जिनके लिए दण्ड का प्राविधान है।”

साइबर अपराध की विशेषताएँ

उपर्युक्त परिभाषा के विश्लेषण से निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं ।

  1. साइबर अपराध, अपराध का एक अत्याधुनिक प्रकार है।
  2. यह अपराध आधुनिक सूचना समाज से जुड़ा हुआ है।
  3. यह अपराध कम्प्यूटर, इन्टरनेट और संचार क्रान्ति के अन्य तकनीकी साधनों के माध्यम से एवं उनको प्रयोग करने वाले लोगों द्वारा सम्पादित किया जाता है।
  4. इस अपराध का चलन व्यापारिक व व्यावसायिक परिक्षेत्रों में अधिक होता है। इसके माध्यम से गलत वित्तीय विवरण बनाना, जनता को प्रत्यक्ष या परोक्ष झूठे विज्ञापन देना, गलत प्रमाण-पत्र बनाना, झूठा बिल बनाना, करों की चोरी, बैंकों के साथ धोखाधड़ी इत्यादि ढंग के अपराध किये जाते हैं।
  5. यह अपराध न केवल वैधानिक उल्लंघन है बल्कि सामाजिक निष्ठा और विश्वास को भंग करने का भी उत्तर:दायी है।
  6. यह अपराध सामान्य अपराधों से बिल्कुल भिन्न है।

प्रश्न 2
साइबर अपराध क्या है? साइबर अपराध के प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
साइबर क्राइम (साइबर अपराध) को परिभाषित कीजिए। भारत में इसके विभिन्न स्वरूपों की व्याख्या कीजिए। [2017]
उत्तर:

साइबर अपराध का अर्थ

एक ओर सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति ने विश्व को जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, तो दूसरी ओर उस अपराध के क्षेत्र में नवीन प्रकार के अपराधों का जन्म हुआ है। साइबर क्राइम का सम्बन्ध सूचना प्रौद्योगिकी के महत्त्वपूर्ण उपकरण कम्प्यूटर द्वारा होने वाली सूचनाओं के आदानप्रदान एवं व्यापारिक लेन-देन से है। इण्टरनेट, संचार के प्रमुख माध्यम के रूप में उभरा है। इस मुक्त प्रणाली में सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए आवश्यक है कि डिजिटल जानकारी किसी अनचाहे व्यक्ति के हाथ में पड़ने से बचाने के लिए सुरक्षा प्रणाली स्थापित हो। जनता में इस माध्यम के इस्तेमाल से व्यापार, संचार, मनोरंजन, सॉफ्टवेयर विकास करने के प्रति विश्वास ही जरूरी नहीं है, अपितु प्रशासन का भी पूरा विश्वास आवश्यक है ताकि वह इसका प्रभावशाली ढंग से दुरुपयोग रोक सके।

साइबर अपराध मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों द्वारा सूचनाओं के आदान-प्रदान, विशेष रूप से ई-मेल एवं ई-व्यापार के दुरुपयोग से सम्बन्धित है। यह अपराध केवल भारत में ही नही है अपितु सभी देशों में चिंता का विषय है तथा सभी देश इस पर नियन्त्रण हेतु जूझ रहे हैं। व्रस्तुत: डिजिटल तकनीक ने संचार व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं तथा इसका व्यापारिक गतिविधियों में अत्यधिक प्रयोग किया जाने लगा है। आज व्यापारी एवं उपभोक्ता परम्परागत फाइलों के स्थान पर कम्प्यूटरों में सभी प्रकार की सूचनाएँ सुरक्षित रख रहे हैं। कागज एवं फाइल सरलता से खराब हो जाते हैं, जबकि कम्प्यूटर में रखी गयी सूचना वर्षों तक पूर्णतया सुरक्षित रहती है। साइबर अपराध का सम्बन्ध इस सूचना का किसी अनाधिकृत व्यक्ति द्वारा दुरुपयोग है।

साइबर अपराध के प्रमुख प्रकार

साइबर अपराध का एक प्रकार नहीं है, अपितु इसके अनेक प्रकार आज सम्पूर्ण विश्व के सामने एक चुनौती के रूप में उपस्थित हैं। इसके निम्नलिखित चार प्रमुख प्रकार हैं।
1. कम्प्यूटर आधारित प्रलेखों के साथ हेर-फेर इस प्रकार के साइबर अपराध में कोई व्यक्ति सचेत रूप से जानबूझकर कम्प्यूटर में प्रयुक्त गुप्त कोड, कम्प्यूटर प्रोग्राम, कम्प्यूटर सिस्टम अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क के साथ हेर-फेर या अदला-बदली करता है या इनको नुकसान पहुंचाने का प्रयास करता है।

2. कम्यूटर सिस्टम को अपने नियन्त्रण में लेना-
इस प्रकार के साइबर अपराध में कोई व्यक्ति किसी सरकारी वेबसाइट अथवा कम्प्यूटर सिस्टम को जान-बूझकर किसी माध्यम से अपने नियन्त्रण में ले लेता है तथा उसमें सुरक्षित सूचनाओं के साथ हेर-फेर करता है अथवा उन्हें समाप्त करने का प्रयास करता है, इसे हैकिंग (Hacking) कहा जाता है। हैकर्स दूसरे प्रोग्राम सिस्टम का अवैध रूप से शोषण करते हैं और पूरे कार्यक्रम को तहस-नहस कर देते हैं। अनेक देशों में ऐसे साइबर अपराधों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।

3. अश्लील सामग्री का प्रसारण
इस प्रकार के साइबर अपराध में व्यक्ति ऐसी अश्लील सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संचारित करता है जिसका देखने वालों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे ऐसी सामग्री को दर्शकों को दिखाकर, पढ़ाकर अथवा अश्लील बातों को सुनाकर कानून द्वारा इस सन्दर्भ में लगाए गए प्रतिबन्धों को तोड़ने का प्रयास करते हैं।

4. स्टाल्किग, डाटा डिडलिंग एवं फिकरिंग-स्टाल्किग वह तकनीक है जिसमें किसी अनिच्छुक व्यक्ति को लगातार वाहियत संदेश भेजे जाते हैं जिससे उसे संत्रास हो अथवा जिससे उसमें चिंता या उद्विग्नता उत्पन्न हो। डाटा डिडलिंग में उपलब्ध ‘डाटा’ को इस प्रकार मिटाया या सूक्ष्म रूप से परिवर्तित किया जाता है कि उसे पुनः वापस न लाया जा सके अथवा उसकी परिशुद्धता नष्ट हो जाए। फिकरिंग में टेलीफोन बिलों में कम्प्यूटर द्वारा हेरा-फेरी करके बिना मूल्य चुकाए कहीं भी फोन कॉल करके अवैध लाभ उठाया जाता है। उपर्युक्त साइबर अपराधों के अतिरिक्त अनेक प्रकार के कम्प्यूटर वायरसों को तैयार कर सॉफ्टवेयर को गम्भीर क्षति पहुँचाने के मामलों में भी काफी वृद्धि हुई है। वर्तमान में हजारों की संख्या में ऐसे वायरस अस्तित्व में हैं जिनके कारण इण्टरनेट साइट्स को अपूर्णीय क्षति हो रही है।

प्रश्न 3
किस प्रकार से साइबर अपराध को एक प्रमुख सामाजिक समस्या माना जाता है? इन्हें रोकने के उपाय लिखिए।
या
साइबर अपराध की रोकथाम के उपाय बताइए। (2017)
या
साइबर अपराध के निराकरण हेतु उपाय सुझाइए।
उत्तर:
साइबर अपराध, अपराध का एक अत्याधुनिक प्रकार है तथा यह वर्तमान अत्याधुनिक समाज में संगणक, इन्टरनेट और संचार की आधुनिक प्रौद्योगिकी के साधनों का प्रयोग करने वालों के द्वारा अपने व्यापारिक व व्यावसायिक क्रिया-कलापों के सन्दर्भ में आपराधिक प्रावधानों का उल्लंघन है।

अपराध का स्वरूप तथा विस्तार प्रायः किसी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं प्रौद्योगिकी परिवेश की प्रकृति को प्रतिबिम्बित करता है। जब कभी परिवेश में परिवर्तन आता है, अपराध की अन्तर्वस्तु एवं स्वरूप में भी परिवर्तन परिलक्षित होता है। विज्ञान एवं तकनीकी के विकास से समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में अनेक नवीन परिवर्तनों का जन्म होता है। समकालीन आधुनिक समाज मूल रूप से इस अद्यतन आपराधिक उपसंस्कृति के मध्य संक्रमण से गुजर रहा है, परिणामतः आतंक, हिंसा, भ्रष्टाचार एवं अपराधी व्यवहार सामान्य जनजीवन का अंग बनते जा रहे हैं। इस प्रकार स्पष्ट रूप से परिलक्षित है कि अपराध सामाजिक-सांस्कृतिक समूह का दर्पण है।

भारतीय परिवेश में यह प्रघटना वैश्वीकरण एवं सूचना-समाज के सन्दर्भ में अभिव्यक्त होती दृष्टिगत हो रही है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट एवं संचार के अत्याधुनिक साधनों के माध्यम से विश्व के देशों, समुदायों, संस्कृतियों एवं व्यक्तियों के बीच की दूरियों का कम-से-कमतर होते चले जाना वैश्वीकरण का सूचक है। इन्टरनेट एक ऐसा कम्प्यूटर नेटवर्क है, जो विश्वभर के नेटवर्को से मिलकर बना है। इसके माध्यम से तथ्यों और सूचनाओं का आदान-प्रदान और संचार की गति अत्यधिक तेज हो गयी है। इन्टरनेट का प्रयोग बहुत कम खर्चीला और सरल है। अनेक विषयों, व्यक्तियों और घटनाओं के बारे में इन्टरनेट के माध्यम से बहुत ही कम समय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा इन्टरनेट ने ई-मेल की सुविधा प्रदान करके परस्पर संचार की शैली को क्रान्तिकारी ढंग से बदल दिया है।

साइबरजनित अपराधों की रोकथाम तथा उपचार

सच्चाई यह है कि इस अपराध की भयावहता के पश्चात् भी इन पर विराम लगाना एक विकराल समस्या का रूप ले रहा है। हमारे देश भारत में इन अपराधों को रोकने के लिए कोई प्रभावी कानून नहीं बनाया जा सका है। वर्तमान परिस्थिति में साइबर अपराध पर नियन्त्रण हेतु विशेष प्रकार के उपाय आवश्यक हैं। इनमें से कुछ उपाय निम्नलिखित हैं

  1. सरकार द्वारा ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम पारित करने से यह आशा जगी थी कि इसके माध्यम से साइबर अपराधों को यिन्त्रित किया जा सकेगा, परन्तु इसके बावजूद भी यह अधिनियम प्रभावकारी नहीं हो सका। क्योंकि इसमें बहुत सारे प्रावधान व्यावहारिक नहीं है। तथा व्यावहारिक रूप से इस अपराध के लिए एक पृथक् कानून के द्वारा कठोर प्रावधान के माध्यम से दण्ड की व्यवस्था करना आवश्यक है।
  2. साइबर अपराध रोकने के लिए इससे सम्बन्धित प्रौद्योगिकी को ज्ञान रखने वालों की एक टीम बनाना आवश्यक है। ऐसा करके किसी भी साइबर से सम्बन्धित अपराध की सूचना मिलते ही जानकारी प्राप्त कर अपराधी को दण्डित किया जा सकता है।
  3. कम्प्यूटर द्वारा लेखा सम्बन्धी अपराधों; जैसे-गबन और जालसाजी को तभी कम किया जा सकता है, जब सम्बन्धित लेखा परीक्षकों को कम्प्यूटर सम्बन्धी प्रौद्योगिकी का उच्च स्तरीय ज्ञान हो। आज के परिवेश में बड़ी-बड़ी कम्पनियों, संस्थानों एवं बैंकों के सारे आँकड़े कम्प्यूटर पर ही रहते हैं, ऐसी परिस्थिति में इस ज्ञान के बिना इसको समुचित ढंग से परीक्षण नहीं किया जा सकता है।
  4. भारत में BSNL संचार से जुड़ी हुई एक प्रमुख संस्था है। इस संस्था को यह स्पष्ट निर्देश देना आवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में अश्लील कार्यक्रम प्रदर्शित न हो सके। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक प्रगति के माध्यम से एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना है। ऐसी परिस्थिति में संचार निगम का दायित्व और बढ़ जाता है।
  5. अमेरिका में साइबर अपराध को मानवाधिकार उल्लंघन से सम्बन्धित मानकर इस हेतु कठोर दण्ड का प्रावधान है। हमारे देश में भी इस आधार पर साइबर अपराधों को कम किया जा सकता है।
  6. अधिकांश कम्प्यूटर से जुड़े अपराध किसी-न-किसी प्रकार से पासवर्ड चुराकर सम्पन्न किये जाते हैं। अत: महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी रोकने के लिए यह आवश्यक है कि पासवर्ड जटिल प्रकार के हों तथा इसका ज्ञान केवल इनका उपयोग करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था को ही हो।

इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि साइबर अपराधों के विरुद्ध प्रारम्भिक स्तर पर ही समुचित कार्यवाही नहीं की जाती है तो मानवाधिकारों और मानवीय मूल्यों का पतन होने से कोई नहीं रोक सकता है। यह एक ऐसी परिस्थिति है कि जिससे आने वाली पीढ़ी खतरे में पड़ सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
साइबर अपराध की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

साइबर अपराध की अवधारणा

‘साइबर स्पेस शब्द की रचना सर्वप्रथम विलियम गिब्सन ने अपने उपन्यास ‘न्यूरोमेन्स में की थी। यह शब्द वस्तुतः एक ऐसे समुदाय को इंगित करता है जो एक-दूसरे से परम्परागत रूप से परिभाषित समुदाय की अपेक्षा विस्तृत नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसमें इससे सम्बन्धित अवधारणाओं; जैसे-साइबर समुदाय, साइबर सम्प्रेषण आदि के व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, जहाँ पर व्यक्तिगत कम्प्यूटर आवश्यक और अभिन्न घटक हैं। कम्प्यूटर के अस्तित्व में आने के बाद अस्तित्व में आने वाला यह अपराध अपनी आरम्भिक अवस्था में इतना नहीं फैला था कि भये उत्पन्न करे।

लेकिन समयानुसार कम्प्यूटर और इण्टरनेट तक लोगों की पहुँच जितनी सामान्य होती जा रही है, साइबर अपराध उतनी ही तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार साइबर अपराध, अपराध को एक अत्याधुनिक प्रकार है जो कम्प्यूटर इण्टरनेट और संचार क्रान्ति के अन्य तकनीकी साधनों के माध्यम से तथा उनकी प्रयोग करने वाले लोगों द्वारा सम्पादित किया जाता है। यह अपराध व्यापारिक व व्यावसायिक परिक्षेत्रों में अधिक होता है। इसके माध्यम से गलत वित्तीय विवरण बनाना, जनता, को प्रत्यक्ष या परोक्ष झूठे विज्ञापन देना, गलत प्रमाण-पत्र बनाना, झूठा बिल बनाना, करों की चोरी, बैंकों के साथ धोखाधड़ी इत्यादि अपराधों को अंजाम दिया जाता है।

प्रश्न 2
साइबर अपराध के प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साइबर अपराध के प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है।
1. कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के साथ किए जाने वाले अपराध कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के साथ किए जाने वाले अपराध निम्नलिखित है।

  • उनमें रखे जाने वाले आँकड़ों के साथ छेड़छाड़।
  • पासवर्ड की चोरी।
  • पासवर्ड या अनुचित प्रवेश को रोकने के लिए की गई व्यवस्थाओं का उल्लंघन।
  • कम्प्यूटरों को चलाने के लिए बनाए गए सॉफ्टवेयर की पायरेसी या उनका अनाधिकृत उपयोग।

2. कम्प्यूटर नेटवर्क के साथ किए जाने वाले अपराध कम्प्यूटर नेटवर्क के साथ किए जाने वाले अपराधों में से कुछ प्रमुख निम्न हैं।

  • कम्प्यूटर नेटवर्क पर उपलब्ध सूचनाओं में फेरबदल करना, आँकड़ों की चोरी करना।
  • व्यापार के लिए उपलब्ध जानकारियों की चोरी।
  • क्रेडिट कार्ड आदि के उपयोग के समय उपलब्ध जानकारी के आधार पर जालसाजी और हेराफेरी।
  • कम्प्यूटर नेटवर्क को नुकसान पहुंचाने के लिए वायरस का प्रयोग।
  • अश्लील सामग्री को नेटवर्क पर उपलब्ध कराना।
  • किसी भी देश की सामान्य प्रशासनिक अथवा वित्तीय व्यवस्था को हानि पहुँचाना या पहुँचाने का प्रयास करना।

प्रश्न 3
साइबर अपराध के उत्तर:दायी कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
भारत में साइबर क्राइम के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
भारत में साइबर क्राइम के प्रमुख कारण भारत में साइबर क्राइम किए जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. आर्थिक लाभ के लिए घर में बैठे-बैठे पकड़े जाने के भय के बिना आर्थिक अपराध सरलता से कर लिया जाता है। कभी ई-मेल के जरिए, कभी पासवर्ड हैक करके, कभी बैंक अकाउण्ट से जानकारी प्राप्त करके, कभी क्रेडिट कार्ड चोरी करके आदि तरीकों से आर्थिक लाभ साइबर क्रिमिनल द्वारा लिया जाता है।
  2. राजनीतिक लाभ के लिए अपने संगठन के प्रचार-प्रसार के लिए, सुर्खियाँ बटोरने के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पाने के लिए इण्टरनेट का लाभ लिया जाता है।
  3. संबक सिखाने के उद्देश्य से कभी-कभी स्कूल या कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र अपने किसी दोस्त या शिक्षक-शिक्षिका को सबक सिखाने के उद्देश्य से या फिर उनके प्रति आकर्षित होकर साइबर क्राइम कर डालते हैं। उन्हें इस बात का पता नहीं होता है कि वह जोकर रहे हैं, वह संगीन अपराध की श्रेणी में आता है।
  4. मनोवैज्ञानिक कारण से इण्टरनेट के जानकार कभी-कभी मनोरंजनवेश या अपनी जानकारी दूसरों पर प्रदर्शित करने के लिए या किसी को तंग करने या चिढ़ाने के लिए या फिर गोपनीय पत्रों को पढ़कर मनोरंजन करने के लिए साइबर क्राइम कर डालते हैं।
  5. व्यापारिक-व्यावसायिक कारण से कभी-कभी किसी संगठन में काम करने वाले कर्मचारी
    को लगता है कि उसे उपेक्षित किया जा रहा है, उसके कार्य का सही मूल्यांकन नहीं किया जा रहा है। ऐसे व्यक्ति किसी अधिकारी को या संगठन को नुकसान पहुँचाने के लिए साइबर
    क्राइम का सहारा लेते हैं।
  6. प्रतिभा का स्वार्थ पूर्ति हेतु उपयोग-साइबर के तकनीकी विशेषज्ञ अपने स्वार्थ हेतु अपनी तकनीकी जानकारी का दुरुपयोग करते हैं तथा लाभान्वित होते रहते हैं। दूसरों को कम्प्यूटर व इण्टरनेट से नुकसान पहुँचाने से उनका अहम सन्तुष्ट होता है तथा वे यह सोचकर बार-बार अपराध करते हैं कि वे तकनीकी की जानकारी की वजह से दूसरों को हरा पाते हैं।

प्रश्न 4
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-
(क) क्रैकिंग,
(ख) हैकिंग
उत्तर:
(क) क्रैकिंग क्रैकिंग और हैंकिंग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं तथा क्रैकर्स और हैकर्स में भेद अस्पष्ट है। एक व्यक्ति जो साइबर अपराध में किसी प्रकार में लिप्त है, वह दूसरे में भी लिप्त हो सकता है। क्रैकर्स व्यावसायिक सॉफ्टवेयर में उनके कोड बदलकर सेंध लगाते हैं, इस प्रकार कॉपीराइट क्रोचिंग क्रैकिंग का मुख्य स्वरूप है। कुछ व्यावसायिक प्रोग्रामों में विशेषकर पुराने प्रोग्रामों की अवैध प्रतिलिपि बनाये जाने के भय से उन्हें सुरक्षित बनाये रखने के लिए न तोड़े जा सकने वाले कोड का प्रयोग किया जाता है, लेकिन बहुत-से प्रयोगकर्ता (क्रैकर्स) इस कोड को तोड़ने योग्य होते हैं और स्वतन्त्रतापूर्वक इन प्रोग्रामों की प्रतिलिपि बना लेते हैं।

(ख) हैकिंग विस्तार की दृष्टि से हैकिंग एक महत्त्वपूर्ण साइबर अपराध का रूप है। सामयिक तकनीकी में हैकर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकती है जो कम्प्यूटर से पीड़ित है। एक हैकर कम्प्यूटर नेटवर्क में अवैध प्रवेश पा लेता है या वह प्रतिलिप्याधिकार (Copyright) के प्रतिबन्धों (कोड्स) को अपनी चालाकी से तोड़ देता है। फिर भी, हम स्पष्टता के लिए पुरानी पारिभाषिक शब्दावली को स्थापित करेंगे। हैकर्स कम्प्यूटर से पीड़ित कम्प्यूटर व्यवसायी है, जो गहन और स्वच्छन्द या रूढ़ियुक्त ज्ञान का प्रयोग बहुधा अवैध लाभ प्राप्त करने के लिए दूसरे व्यक्ति या संगठन के कम्प्यूटर सिस्टम में प्रवेश करता है।

प्रश्न 5
साइबर अपील अधिकरण (कैट) क्या है?
उत्तर:
भारत में पहले और एकमात्र साइबर न्यायालय की स्थापना केन्द्र सरकार द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 48(1) के अन्तर्गत दिए गए प्रावधानों के अनुसार की गई है। न्यायालय को आरम्भ में साइबर विनियम अपील अधिकरण (कैट) के रूप में जाना जाता था। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में वर्ष 2008 में संशोधन होने के बाद अधिकरण को साइबर अपील अधिकरण के रूप में जाना जाता है जो सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के एक संगठन का भाग है जिसके पीठासीन अधिकारी अध्यक्ष हैं। संशोधित अधिनियम में अधिकरण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा तथा कई अन्य सदस्यों को अधिसूचित/नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है। कैट का अध्यक्ष साइबर कानून कार्यान्वयन सम्मेलन का संचालन कर सकता है जिसमें भारत में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यों के मुख्य न्यायाधीश, न्यायिक अधिकारी और भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
साइबर अपराध की कोई एक परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
“साईबर अपराधं, अपराध का एक नवीन प्रकार है जो आधुनिक सूचना समाज (नेटवर्क सोसाइटी) में कम्प्यूटर, इन्टरनेट और संचार क्रान्ति के अन्य प्रौद्योगिकी साधनों को प्रयोग करने वालों द्वारा अपने व्यापारिक व व्यावसायिक क्रियाकलापों के सन्दर्भ में आपराधिक विधानों का उल्लंघन है।”

प्रश्न 2
फ्रीक्स के बारे में संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रीक्स उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो टेलीफोन व्यवस्था में अपर्याप्तता से लाभ उठाने के लिए पर्याप्त समय, प्रयास और धन तक लगा देते हैं। इसमें फोन का वास्तविक नम्बर डायल करने से पूर्व शून्य (0) लगाना तथा दूसरे की बातों को उलट देना इत्यादि चालें सम्मिलित हैं।

प्रश्न 3
साइबर रैवर्स से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
‘साइबर रैवर्स (Cyber Ravers) साइबर रैवर्स वे व्यक्ति हैं जो कला के उच्च वैयक्तिक कार्यों की रचना के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं। भारत के प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन द्वारा कला का प्रयोग करके कम्प्यूटर से बनायी गयी कलाकृतियाँ इसी श्रेणी में आती हैं। यद्यपि कम्प्यूटर की कुशल योग्यताओं द्वारा चित्र व आवाज का उपयोग कलात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाता है, तथापि इसका उपयोग ज्यादातर संदिग्ध उद्देश्यों के लिए बहुत आसानी से किया जाता है।

प्रश्न 4
साइबर जनित अपराधों की रोकथाम के कोई दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
साइबर जनित अपराधों की रोकथाम के दो उपाय अग्रलिखित हैं

  • पासवर्ड को जटिल प्रकार का रखना तथा इसका पता उपयोग करने वाले व्यक्ति या संस्थान तक ही सीमित रखना।
  • सॉफ्टवेयरों को पायरेसी से बचाना।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
इण्टरनेट का आविष्कार कब हुआ था?
उत्तर:
अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा इण्टरनेट का आविष्कार सन् 1969 में किया गया था।

प्रश्न 2
नेटिजंस क्या है?
उत्तर:
नेटिजंस का शाब्दिक तात्पर्य इण्टरनेट के प्रयोगकर्ताओं से है। यह शब्द दो शब्दों Internet और Citizen का संक्षिप्त रूप है।

प्रश्न 3
एकाउण्ट क्या है?
उत्तर:
प्रयोगकर्ताओं के साइबर नाम और उनके पासवर्ड के प्रत्येक समूह को ‘एकाउण्ट’ कहते हैं।

प्रश्न 4
साइबर अपराध किस समाज से अत्यधिक जुड़ा हुआ है?
उत्तर:
सूचना समाज से

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में अपराध की सबसे नवीनतम अवधारणा है।
(क) श्वेतवसन अपराध
(ख) बाल अपराध
(ग) तस्करी
(घ) साइबर अपराध
उत्तर:
(घ) साइबर अपराध

प्रश्न 2.
साइबर अपराध को स्वरूप है।
(क) साइबर पोर्न
(ख) हैकर्स
(ग) क्रैकर्स
(घ) ये सभी
उत्तर:
(घ) ये सभी

प्रश्न 3.
ई-मेल एकाउण्ट से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा गुप्त रूप से छेड़छाड़ करना किसके अन्तर्गत आता है?
(क) साइबर अपराध
(ख) बाल अपराध
(ग) ई-मेल अपराध
(घ) साइट अपराध
उत्तर:
(क) साइबर

प्रश्न 4.
साइबर अपराध के अन्तर्गत नहीं आता है
(क) हैकिंग
(ख) फिल्म शूटिंग
(ग) क्रैकिंग
(घ) पोर्नोग्राफी
उत्तर:
(ख) फिल्म शूटिंग

प्रश्न 5.
साइबर अपराध को प्रश्रय देने वाले कारक हैं
(क) स्वार्थ एवं नैतिक पतन
(ख) शिक्षा की कमी
(ग) बेरोजगारी
(घ) ये सभी अपराध,
उत्तर:
(घ) ये सभी

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name वाक्यों में त्रुटि-मार्जन
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

नवीनतम पाठ्यक्रम में वाक्यों में त्रुटि-मार्जन अर्थात् वाक्य-संशोधन को सम्मिलित किया गया है। इसमें लिंग, वचन, कारक, काल तथा वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियों के संशोधन कराये जाते हैं। इसके लिए कुल 2 अंक निर्धारित है।

वाक्ये भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई होती है। यदि वाक्य-रचना निर्दोष हो तो वक्ता/लेखक का आशय श्रोता/पाठक को समझने में कठिनाई नहीं होती। दोषपूर्ण वाक्य से आशय स्पष्ट नहीं हो पाता; अत: वाक्य-रचना का निर्दोष होना अत्यन्त आवश्यक है। वाक्य-रचना में दोष अनेक कारणों से हो सकते हैं। यदि वाक्य में लिंग, वचन, पुरुष, काल, वाच्य, विभक्ति, शब्दक्रम आदि में कोई भी दोषपूर्ण हुआ तो वाक्य सदोष हो जाता है। शुद्ध वाक्य-रचना के लिए व्याकरण-ज्ञान परमावश्यक है। वाक्य-रचना की अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं-

  1. अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  2. पदक्रम सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  3. वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  4. पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  5. पदों की अनुपयुक्तता सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  6. वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ।

(1) अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाक्यों में पदों की एकरूपता (लिंग, वचन, पुरुष आदि) के साथ क्रिया की भी अनुरूपता होनी चाहिए। हिन्दी में पदों की क्रिया के साथ इसी अनुरूपता अर्थात् अन्विति के कुछ विशेष नियम हैं-
(क) कर्ता-क्रिया की अन्विति
(1) विभक्तिरहित कर्ता वाले वाक्य की क्रिया सदा कर्ता के अनुसार होती है। यदि कर्ता के साथ ‘ने’ विभक्ति चिह्न जुड़ा हो तो सकर्मक क्रिया कर्म के लिंग, वचन के अनुसार होती है; जैसे-

  • लड़का पुस्तक पढ़ता है। (कर्ता के अनुसार
  • लड़की पत्र पढ़ती है। (कर्ता के अनुसार)
  • लड़के ने पुस्तक पढ़ी। (कर्म के अनुसार)
  • लड़की ने पत्र पढ़ा। (कर्म के अनुसार)

(2) कर्ता और कर्म दोनों विभक्ति-चिह्नसहित हों तो क्रिया पुंल्लिग एकवचन में होती है; जैसे

  • प्रधानाचार्य ने अध्यापिका को बुलाया।
  • नेताओं ने किसानों को समझाया।

(3) यदि समान लिंग के विभक्ति-चिह्नरहित अनेक कर्ता पद ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया उसी लिंग की तथा बहुवचन में होती है; जैसे

  • स्वाति, चित्रा और मधु आएँगी।
  • डेविड, नीरज और असलम खेल रहे हैं।

(4) ‘या’ से जुड़े विभक्तिरहित कर्ता पदों की क्रिया अन्तिम कर्ता के अनुसार होती है; जैसेभाई या बहन आएगी।
(5) विभिन्न लिंगों के अनेक कर्ता यदि ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया पुंल्लिग बहुवचन में होती है; जैसेगणतन्त्र दिवस की परेड को लाखों बालक, वृद्ध और नारी देख रहे थे।
(6) यदि कर्ता भिन्न-भिन्न पुरुषों के हों तो उनका क्रम होगा—पहले मध्यम पुरुष, फिर अन्य पुरुष और अन्त में उत्तम पुरुष। क्रिया अन्तिम कर्ता के लिंग के अनुसार बहुवचन में होगी; जैसे

  • तुम, गीता और मैं नाटक देखने चलेंगे।
  • तुम, विकास और मैं टेनिस खेलेंगे।

(7) कर्ता का लिंग अज्ञात हो तो क्रिया पुंल्लिग में होगी; जैसे–

  • देखो, कौन आया है ?
  • तुम्हारा पालन-पोषण कौन करता है ?

(8) आदर देने के लिए एकवचन कर्ता के लिए भी क्रिया बहुवचन में प्रयुक्त होती है; जैसे

  • मुख्यमन्त्री भाषण दे रहे हैं।
  • महात्मा गाँधी राष्ट्रपिता माने जाते हैं।

(9) सम्बन्ध कारक का लिंग उसके सम्बन्धी के लिंग के अनुसार होता है-यदि ये लोग भिन्न-भिन्न लिंग के हों तथा ‘और’ से जुड़े हों तो संज्ञा-सर्वनाम को लिंग प्रथम सम्बन्धी के अनुसार होगा; जैसे–

  • मेरा बेटा और बेटी दिल्ली गये हैं।
  • मेरे भाई-बहन पढ़ रहे हैं।
  • तुम्हारे भाई और बहन आजकल क्या कर रह

(ख) कर्म और क्रिया की अन्विति
(1) यदि कर्ता ‘को’ प्रत्यय से जुड़ा हो तथा कर्म के स्थान पर कोई क्रियार्थक संज्ञा प्रयुक्त हुई हो तो क्रिया सदैव एकवचन, पुंल्लिग तथा अन्य पुरुष में होगी; जैसे

  • उसे (उसको) पुस्तक पढ़ना नहीं आता।
  • तुम्हें (तुमको) बात करने नहीं आता।।

(2) यदि वाक्य में कर्ता ‘ने’ विभक्ति से युक्त हो तथा कर्म की ‘को’ विभक्ति प्रयुक्त नहीं हुई हो तो वाक्य की क्रिया कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार प्रयुक्त होगी; जैसे-

  • श्याम ने पुस्तक पढ़ी।
  • श्यामा ने क्षमा माँगी।

(3) यदि एक ही लिंग और वचन के अनेक अप्रत्यय कर्म एक साथ एक वचन में आयें तो क्रिया एक वचन में होगी; जैसे

  • राघव ने एक घोड़ा और एक ऊँट खरीदा।।
  • रमेश ने एक पुस्तक और एक कलम खरीदी।

(4) यदि एक ही लिंग और वचन के अनेक प्राणिवाचक अप्रत्यय कर्म एक साथ प्रयुक्त हों तो क्रिया उसी लिंग में तथा बहुवचन में प्रयुक्त होगी; जैसे

  • महेश ने गाय और बकरी मोल लीं।
  • लक्ष्मण ने दूध के लिए गाय और भैंस खरीदीं।

(5) यदि वाक्य में भिन्न-भिन्न लिंग के एकाधिक अप्रत्यय कर्म प्रयुक्त हों तथा वे ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया-अन्तिम कर्म के लिंग और वचन के अनुसार प्रयुक्त होगी; जैसे

  • रमेश ने चावल, दाल और रोटी खायी।
  • सुरेश ने रोटी, दाल और चावल खाया।

(ग) विशेषण और विशेष्य की अन्विति
(1) विशेषण का लिंग और वचन अपने विशेष्य के अनुसार होता है; जैसे

  • यहाँ उदार और परिश्रमी लोग रहते हैं।
  • गोरे मुखड़े पर काला तिल अच्छा लगता है।

(2) यदि एक से अधिक विशेषण हों, तब भी उपर्युक्त नियम का ही पालन होता है; जैसे– वह गिरती-उठती, ऊँची-ऊँची लहरों को निहारती रही।
(3) अनेक समासरहित विशेष्यों को विशेषण निकटवर्ती विशेष्य के अनुरूप होता है; जैसे

  • भोले-भाले बालक और बालिकाएँ।
  • भोली-भाली बालिकाएँ और बालक।

(घ) सर्वनाम और संज्ञा की अन्विति
(1) सर्वनाम उसी संज्ञा के लिंग-वचन का अनुसरण करता है, जिसके स्थान पर वह आया है; जैसे–

  • मैंने सुमन को देखा, वह आ रही थी।
  • मैन विजय को देखा, वह आ रहा था।

(2) आदर के लिए बहुवचन सर्वनाम का प्रयोग होता है; जैसे

  • दादाजी आये हैं। वे एक महीना रुकेंगे।
  • कथावाचक व्यास जी आ चुके हैं। अब वे नियमित पन्द्रह दिन तक प्रवचन करेंगे।

(3) वर्ग का प्रतिनिधि अपने लिए ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग करता है; जैसे–

  • शिक्षामन्त्री ने कहा कि हमें अपने देश से अशिक्षा दूर करनी है।
  • शिक्षक ने कहा कि हमें अपने देश का गौरव बढ़ाना है।

अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियों के उदाहरण

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(2) पदक्रम सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाक्य पदों और पदबन्धों से बनता है। वाक्य के साँचे में पदों का क्या क्रम हो, इसके कुछ निश्चित नियम हैं–
(1) प्रायः कर्त्तापद वाक्य में सबसे पहले आता है और क्रियापद सबसे अन्त में; जैसे|

  • भिखारी आ रहा है।
  • सूर्योदय हो गया।

(2) सम्बोधन और विस्मयसूचक पद वाक्य के प्रारम्भ में कर्ता से भी पहले आते हैं; जैसे

  • अरे ! भिखारी आ रहा है।
  • अहा ! सूर्योदय हो गया।

(3) कर्मपद कर्ता और क्रियापदों के बीच रहता है; जैसे-

  • राजेश पाठ पढ़ाता है।
  • बच्चे ने गीत सुनाया।

(4) सम्बन्धकारक अपने सम्बन्धी शब्द से पूर्व आता है; जैसे

  • भिखारी के बच्चे ने रहीम का पद सुनाया।
  • वह तुम्हारा नाम पूछ रहा था।

(5) प्रश्नवाचक पद प्रश्न के विषय से पूर्व आता है; जैसे

  • कौन खड़ा है ? (कर्ता पर प्रश्न)
  • तुम क्या खा रही हो ? (कर्म पर प्रश्न)
  • वह कैसे आया ? (रीति पर प्रश्न)

(6) कर्ता और कर्म को छोड़कर शेष सभी कारक कर्ता-कर्म के बीच आते हैं। एक से अधिक कारक रूप होने पर ये उल्टे क्रम में (पहले अधिकरण) रखे जाते हैं; जैसे

  • मजदूर खेत में रहट से सिंचाई कर रहे थे।
  • छात्र मैदान में अपने मित्रों के साथ हॉकी खेलने लगे।

(7) पूर्वकालिक क्रिया, मुख्य क्रिया से पहले आती है; जैसे-

  • कल पढ़कर आइए।
  • कल मुंह धोकर आना।

(8) “न” या “नहीं” का प्रयोग निषेध के अर्थ में हो तो क्रिया से पूर्व और आग्रह के अर्थ में हो तो क्रिया के बाद होता है; जैसे–

  • मैं नहीं जाऊँगा।
  • तुम आओ न।

(9) पदक्रमों में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वाक्य के विभिन्न पदों में ऐसी तर्कसंगत निकटता होनी चाहिए, जिससे कि वाक्य द्वारा अपेक्षित अर्थ स्पष्ट हो। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्य देखें-

  • फल बच्चे को काटकर खिलाओ।
  • गर्म गाय का दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।
    उपर्युक्त दोनों वाक्यों का अर्थ अटपटा और हास्यास्पद है। इन वाक्यों का उचित क्रम होगा
  • बच्चे को फल काटकर खिलाओ।
  • गाय का गर्म दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।

अन्य उदाहरण
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(3) वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियों से भाषा का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। इस प्रकार की अशुद्धियों से अर्थ का अनर्थ होने का भय प्रायः कम ही रहता है। इस प्रकार की अशुद्धियों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
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(4) पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ

पीछे दिये गये तीन भेदों के अतिरिक्त वाक्य में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी मिलती हैं, जिनके मूल में एक ही घटक को दो भिन्न रीतियों से एक साथ उद्धृत किया गया होता है; जेस–

  • मुझे केवल दस रुपये मात्र मिले। (अशुद्ध)
  • मुझे केवल दस रुपये मिले। (शुद्ध)
  • मुझे दस रुपये मात्र मिले। (शुद्ध)

यहाँ प्रथम वाक्य अशुद्ध है; क्योंकि केवल’ शब्द के अर्थ को दो विभिन्न रीतियों के माध्यम से एक साथ प्रयुक्त कर दिया गया है। ऐसी अशुद्धियों के मूल में पुनरावृत्ति या पुनरुक्ति की भावना रहती है। आगे कुछ उदाहरणों की सहायता से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा रहा है-
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(5) पदों की अनुपयुक्तता सम्बन्धी अशुद्धियाँ

कई बार लिखते समय हम वाक्यों में पदों के अनुपयुक्त रूपों का प्रयोग करके उन्हें अशुद्ध बना देते हैं। इस प्रकार की अशुद्धियों से बचने के लिए व्याकरण का ज्ञान होना अति आवश्यक है। पद-भेदों के अनुसार इस प्रकार की अशुद्धियों के भी अनेक भेद हैं, जिन्हें उदाहरणसहित यहाँ समझाया जा रहा है। दिये गये उदाहरणों में अनुपयुक्त पद को मोटे अक्षरों में अंकित किया गया है और उनके उपयुक्त (शुद्ध) रूप को वाक्य के सम्मुख कोष्ठक में दिया गया है।
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(6) वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वर्तनी का शाब्दिक अर्थ है-वर्तन यानि अनुवर्तन करना अर्थात् पीछे-पीछे चलना। लेखन-व्यवस्था में वर्तनी शब्द-स्तर पर शब्द की ध्वनियों का अनुवर्तन करती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शब्द-विशेष के लेखन में शब्द की एक-एक करके आने वाली ध्वनियों के लिए लिपि-चिह्नों के क्या रूप हों और उनका कैसा संयोजन हो यह वर्तनी (वर्ण-संयोजन) का कार्य है।

वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ प्रायः निम्नलिखित कारणों से होती हैं
(1) असावधानी अथवा शीघ्रता – वर्तनी सम्बन्धी अधिकांश अशुद्धियाँ असावधानी व शीघ्रता के कारण ही होती हैं। बहुत बार अच्छी तरह से ज्ञात शब्द के लिखने में भी अशुद्धि हो जाती है; जैसे—गौण का गौड़, धन का घन, पत्ता का पता आदि। ऐसी भूलों के निवारण के लिए यही सलाह दी जा सकती है कि लेखन-कार्य अत्यधिक सावधानी से करना चाहिए।
(2) उच्चारण—हिन्दी भाषा की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह जैसे बोली जाती है, वैसे ही लिखी जाती है और जैसे लिखी जाती है वैसे ही पढ़ी या बोली भी जाती है। उच्चारण अवयव में दोष, बोलने में असावधानी, शुद्ध उच्चारण का ज्ञान न होने आदि कारणों से उच्चारण में अन्तर आ जाता है और इस भूल का निराकरण न होने तक वर्तनी से सम्बन्धित अशुद्धियाँ होती ही रहती हैं।
(3) स्थानिक प्रभाव-भाषा को सौन्दर्य और सौष्ठव उसके गठन और उच्चारण की शुद्धता पर आधारित होता है। शुद्ध उच्चारण से ही भाषा का लिखित रूप (वर्तनी) शुद्ध होता है। अंग्रेजी बोलने वाला कितना ही अभ्यास कर ले, जब भी वह हिन्दी बोलेगा, उसके उच्चारण में अंग्रेजी का पुट जाने-अनजाने आ ही जाएगा। यही स्थिति हिन्दी में भी होती है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, दिल्ली व हरियाणा के निवासी ‘क, ख, ग’ को ‘कै, खै, गै, बोलते हैं, जबकि पूर्वी अंचल में इसका अभ्यास ‘क, ख, ग’ का ही विकसित होता है। स्वाभाविक है कि क्षेत्र-विशेष के उच्चारण का प्रभाव लिखने पर भी पड़ता है; परिणामस्वरूप वर्तनी में भी ऐसी ही भूलें दिखाई देती हैं। हिन्दी भाषा में वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की होती हैं-

  • स्वर (मात्रा) सम्बन्धी,
  • व्यंजन सम्बन्धी,
  • सन्धि सम्बन्धी,
  • समास सम्बन्धी,
  • विसर्ग सम्बन्धी तथा,
  • हलन्त सम्बन्धी।

वर्तनी से सम्बन्धित उपर्युक्त समस्त बिन्दुओं पर विवरण देना यहाँ नितान्त अप्रासंगिक है और परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी भी नहीं है। विद्यार्थियों से तो इतनी ही अपेक्षा है कि वे हिन्दी को अधिक-से-अधिक शुद्ध रूप में लिखें। इसके लिए उन्हें अधिकाधिक हिन्दी लिखने का अभ्यास करना चाहिए। हिन्दी की स्तरीय पुस्तकों का अध्ययन, इसमें सहायक सिद्ध होगा।

अशुद्धियों के बहु-प्रचलित कुछ उदाहरण

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