UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name छन्द
Number of Questions Solved 56
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द

छन्द का अर्थ एवं परिभाषा
‘छन्द’ शब्द की उत्पत्ति ‘छिदि’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- ढकना अथवा आच्छादित करना। छन्द उस पद-रचना को कहते हैं, जिसमें अक्षर, अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा, मात्रा की गणना के साथ-साथ यति (विराम) एवं गति से सम्बद्ध नियमों का पालन किया गया हो।

छन्द के अंग अथवा तत्त्व
छन्दबद्ध काव्य को समझने अथवा रचने के लिए छन्द के निम्नलिखित अंगों का ज्ञान होना आवश्यक है।

1. चरण
चरण या पाद छन्द की उस इकाई का नाम है, जिसमें अनेक छोटी-बड़ी ध्वनियों को सन्तुलित रूप से प्रदर्शित किया जाता है। साधारणतः छन्द के चार चरण होते हैं—पहले तथा तीसरे चरण को ‘विषम’ तथा दूसरे और चौथे चरण को ‘सम’ चरण कहते हैं।

2. मात्रा और वर्ण
किसी ध्वनि के उच्चारण में जो समय लगता है, उसकी सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते हैं। छन्दशास्त्र में दो से अधिक मात्राएँ किसी वर्ण की नहीं होती। मात्राएँ स्वरों की होती है, व्यंजनों की नहीं। यही कारण है कि मात्राएँ गिनते समय व्यंजनों पर ध्यान नहीं दिया जाता। वर्ण का अर्थ अक्षर से हैं, इसके दो भेद होते हैं।

(क) ह्रस्व वर्ण (लघु)
जिन वर्गों के उधारण में कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व वर्ण कहते हैं। छन्दशास्त्र में इन्हें लघु कहा जाता है। इनकी ‘एक’ मात्रा मानी गई है तथा इनका चिह्न ” है। ‘ अ, इ, उ तथा ऋ लघु वर्ण हैं।
लघु के नियम

  • ह्रस्व स्वर से युक्त व्यंजन लघु वर्ण कहलाता है।
  • यदि लघु स्वर में स्वर के ऊपर चन्द्रबिन्दु UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi छन्द img 1 है तो उसे लघु ही माना जाएगा। उदाहरण-सँग, हँसना आदि।
  • छन्दों में कहीं-कहीं हलन्त (,) आ जाने पर लघु हीं माना जाता है।
  • हस्व स्वर के साथ संयुक्त स्वर हो तो भी लघु ही माना जाता है। कभी-कभी उच्चारण की सुविधा के लिए भी गुरु को लघु ही मान लिया जाता है।
  • संयुक्त वर्ण से पूर्व हस्व पर जोर न पड़े तो वह भी लघु मान लिया जाता है।

(ख) दीर्घ वर्ण (गुरु)
जिन वर्गों के उच्चारण में हस्व वर्ण से दोगुना समय लगता है, उन्हें दीर्घ वर्ण कहते हैं। इन्हें गुरु भी कहा जाता है। इनकी दो मात्राएँ होती हैं तथा इनको चिह्न ‘ऽ’ है।
आ, ई, ऊ, ओ, औं आदि दीर्घ वर्ण हैं।

गुरु के नियम

  • दीर्घ स्वर और उससे युक्त व्यंजन गुरु माने जाते हैं।
  • यदि हस्त स्वर के बाद विसर्ग (:) आ जाए, तो वह गुरु माना जाता है; जैसे प्रातः आदि।।
  • अनुस्वार (∸) वाले सभी स्वर एवं सभी व्यंजन भी गुरु माने जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर अन्तिम हस्व स्वर को गुरु मान लिया जाता है।
  • संयुक्त अक्षर या उसके ऊपर अनुस्वार हो तो भी ह्रस्व स्वर गुरु माना जाता है।

3. यति
छन्द पदते समय उच्चारण की सुविधा के लिए तथा लय को ठीक रखने के लिए कहीं-कहीं विराम लेना पड़ता है। इसी विराम या ठहराव को यति कहते हैं।

4. गति
छन्द पढ़ने की लय को गति कहते हैं। हिन्दी में छन्दों में गति प्रायः अभ्यास और नाद के नियमों पर ही निर्भर हैं।

5. तुक
छन्द के चरणों के अन्त में समान वर्गों की आवृत्ति को तुक कहते हैं।

6. संख्या, क्रम तथा गण
छन्द में मात्राओं और वर्गों की गिनती को संख्या कहते हैं तथा छन्द में लघु वर्ण और गुरु वर्ण की व्यवस्था को क्रम कहते हैं। तीन वर्षों के समूह को ‘गण’ कहते हैं। गणों का प्रयोग वर्णिक (वृत्त) में लघु-गुरु के क्रम को बनाए रखने के लिए होता है। इनकी संख्या आठ निश्चित की गई हैं। इनके लक्षण और स्वरूप की तालिका निम्न है ।

गण लक्षण रूप उदाहरण
1. मगण सर्व गुरु ऽऽऽ  नानाजी
2. यगण आदि लघु, बाद में दो गुरु |ऽऽ सवेरा
3. रंगण आदि-अन्त में गुरु, मध्य में लघु प्रथम दो लघु ऽ|ऽ  केतकी
4. सगण प्रथम दो लघु,  अन्त में गुरु ||ऽ रचना
5. तगण प्रथम दो गुरु, अन्त में लघु ऽऽ| आकार
6. जगण आदि-अन्त में लघु, मध्य में गुरु |ऽ| नरेश
7. भगण प्रथम गुरु, बाद में दो लघु ऽ|| गायक
8. भगण सर्व लघु ||| कमल

छन्द के भेद
सामान्यतः वर्ण और मात्रा के आधार पर छन्दों के निम्न चार भेद हैं।

1. मात्रिक छन्द
यह छन्द मात्रा की गणना पर आधारित होता है, इसीलिए इसे मात्रिक छन्द कहा जाता है। जिन छन्दों में मात्राओं की समानता के नियम का पालन किया जाता हैं, किन्तु वणों की समानता पर ध्यान नहीं दिया जाता, उन्हें मात्रिक छन्द कहा जाता है। दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई, हरिगीतिका, छप्पय आदि प्रमुख मात्रिक

2. वर्णिक छन्द
जिन छन्दों में केवल वर्गों की संख्या और नियमों का पालन किया जाता है, वे वर्णिक छन्द कहलाते हैं। पनामारी, रूपघनाक्षरी, देवघनाक्षरी, मुक्तक, दण्डक आदि वर्णिक छन्द हैं।

3. उभय छन्द
जिन छन्दों में मात्रा और वर्ण दोनों की समानता एक-साथ पाई जाती है, उन्हें उभय छन्द कहते हैं।

4. मुक्तक छन्द
इन छन्दों को स्वछन्द छन्द भी कहा जाता है, इनमें मात्रा और वर्गों की संख्या निश्थित नहीं होती। भावों के अनुकूल यति-विधान, चरणों की अनियमितता, असमान गति आदि भुक्तक छन्दों की विशेषताएँ हैं। ये अपनी स्वेच्छाचारिता का भरपूर परिचय देते हैं।

प्रमुख मात्रिक छन्द
मात्रिक छन्दों में केवल मात्राओं पर ध्यान दिया जाता है। मात्रिक छन्द तीन प्रकार के होते हैं-

  1.  सम्
  2. असम
  3. विषम्।

प्रमुख मात्रिक छन्दों का वर्णन नीचे किया जा रहा है।

1. चौपाई (2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12)
परिभाषा चार चरण वाले इस सम मात्रिक छन्द के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अन्त में जगण (|ऽ|) अथवा तगण (ऽऽ|) नहीं होता है। प्रथम तथा द्वितीय चरणों में ‘तुक’ समान होती है।
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स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में चार चरण हैं। प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ तथा अन्त में दो गुरु वर्ण हैं। प्रत्येक चरण के अन्त में यति है। अतः यह चौपाई छन्द का उदाहरण है।

2. दोहो (2018, 17, 16, 14, 13, 12, 10)
परिभाषा दोहा अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इस छन्द के प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11.11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अन्त में गुरु-लघु आते हैं।
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स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में चार चरण हैं। पहले (कागा काको धन हरै) और तीसरे (मीठे बचन सुनाय कर) चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे (कोयल काको देय) एवं चौथे (जग अपनो कर लेय) चरणों में 11-11 मात्राएँ हैं। सम चरणों के अन्त के वर्ण गुरु और लघु हैं। अतः यह दोहा छन्द को उदाहरण हैं।

3. सोरठा (2018, 17, 16, 14, 13, 12)
परिभाषा दो का उल्टा रूप सोरठा कहलाता है। यह एक अर्बसम छन्द है अर्थात् इसके पहले तीसरे तथा दूसरे-चौथे चरणों में मात्राओं की संख्या समान रहती है। इसके विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 11-11 और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। तुक विषम चरणों में ही होता है तथा सम चरणों के अन्त में जगण (|ऽ|) का निषेध होता है।
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स्पष्टीकरण
इस उदाहरण के पहले चरण (मूक होई वाचाल) और तीसरे चरण (जासु कृपा सु । दयाल) में 11-11 मात्राएँ हैं तथा दूसरे (पंगु चदै गिरिवर गहन) और चौथे चरण (द्रव सकल कलिमल दहन) में 13-13 मात्राएँ हैं। विषम चरण में तुक है तथा सम् चरण के अन्त में जगण (|ऽ|) नहीं है। अतः यह सोरठा छन्द का उदाहरण है।

4. रोला (2018, 15, 14, 13, 12, 10, 04)
परिभाषा यह एक सम मात्रिक छन्द है अर्थात् इसके प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या समान रहती हैं। चार चरणों वाले इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। तथा ग्यारह (11) और तेरह (13) मात्राओं पर यति होती है।
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स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में चार चरण हैं और प्रत्येक चरण में चौबीस (24) मात्राएँ हैं। ग्यारह (11) और तेरह (13) मात्राओं पर यति है। अतः यह रोला छन्द का उदाहरण है।

5. कुण्डलिया (2018, 17, 14, 13)
परिभाषा यह विषम मात्रिक एवं संयुक्त छन्द हैं। इस छन्द का निर्माण दोहा और रोला के संयोग से होता है। इसमें 6 चरण होते हैं। आरम्भ में दोहा और पश्चात् में दो छन्द रोला के होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।
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स्पष्टीकरण
छ; चरणों वाले इस उदाहरण के प्रत्येक चरण में चौबीस (24) माएँ हैं। इसका प्रथम चरण (कोई संगी”) दोहे में प्रथम एवं द्वितीय चरण को मिलाकर रचा गया है और इसके द्वितीय चरण (पथी लेहु ”) की रचना दोहे में तृतीय व चतुर्थ चरण के सम्मिश्रण से हुई है। इसके अन्य चरणों की रचना रोला के चरणों को मिला कर की गई है। इसमें यतियों की व्यवस्था दोहे एवं रोले के अनुसार ही है। अतः यह कुण्डलिया छन्द का उदाहरण है।

6. हरिगीतिका (2018, 17, 14, 13, 12)
परिभाषा इस सम मात्रिक छन्द के प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं तथा 16 और 12 मात्रा पर यति होती है। अन्त में लघु-गुरु का प्रयोग ही अधिक प्रचलित है।
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स्पष्टीकरण
यहाँ प्रत्येक चरण 28 मात्राओं वाला है, जिसमें 16 मात्रा पर यति है। अतः यह उदाहरण हरिगीतिका छन्द का है।

7. बरवै (2018, 17, 16, 15, 14, 11, 10)
परिभाषा इस असम मात्रिक छन्द में कुल 38 मात्राओं वाले चार चरण होते हैं। इसके प्रथम और तृतीय चरणों में 12 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में 7 मात्राएँ होती हैं।

सम अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ चरण में जगण (|ऽ|) अथवा तगण (ऽऽ|) के प्रयोग से कविता सरल हो जाती है। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती हैं।
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स्पष्टीकरण
यहाँ प्रथम एवं तृतीय चरण 12.12 तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण 7-7 मात्राओं के हैं। तथा सम चरणों के अन्त में जगण (|ऽ|) है। अतः यह बरवै छन्द का उदाहरण है।

प्रमुख वर्णिक छन्द (वर्णवृत्त)
वर्णिक छन्दों की रचना का आधार वर्गों की गणना होती है।
इसके तीन मुख्य भेद होते हैं-

  1. सम
  2. असम
  3.  विषम

प्रमुख वर्णिक छन्दों का उल्लेख नीचे किया जा रहा है।

1. इन्द्रवज्रो (2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12)
परिभाषा यह राम वर्णवृत्त अर्थात् सम वर्णिक छन्द है। चार चरण वाले इस छन्द के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 2 तगण, 1 जगण तथा 2 गुरु होते हैं। 11वें वर्ण पर यति होती है।
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स्पष्टीकरण
इस उदाहरण में 11-11 वर्गों वाले 4 चरण हैं तथा प्रत्येक चरण के 11वें वर्ण पर यति है। इसके प्रत्येक चरण में दो जगण, एक तगण एवं अन्त में दो गुरु हैं। अतः यह इन्द्रवज्रा छन्द का उदाहरण है।

2. उपेन्द्रवज्रा (2018, 17, 16, 14, 13, 10)
परिभाषा इस सम वर्णिक छन्द के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 2 जगण, 1 तगण तथा 2 गुरु होते हैं। 11वें वर्ण पर यति होती हैं।
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स्पष्टीकरण
इस पद्य के प्रत्येक चरण में जगण, तगण, जगण और दो गुरु के क्रम से 11 वर्ण है; अतः यह ‘उपेन्द्रवज्रा’ छन्द है।

3. मालिनी (2016, 13)
परिभाषा यह सम वर्णवृत्त है। इसमें 15 वर्षों वाले प्रत्येक चरण में दो नगण, एक मगण तथा दो यगण क्रम से रहते हैं। यति 8 एवं 7 वर्गों पर होती है।
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4. वसन्ततिलका (2018, 16, 13, 12)
परिभाषा यह सम पर्णिक छन्द अर्थात् सम वर्णवृत्त है। इसके 14 वर्णों वाले प्रत्येक चरण में एक तगण (ऽऽ|), एक भगण (ऽ||), दो जगण (|ऽ|) सहित अन्त में दो गुरु ‘ होते हैं।
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स्पष्टीकरण
यहाँ 14 वर्णों वाले प्रत्येक चरण में क्रम से 1 तगण,1 भगण, 2 जगण सहित 2 गुरु का विधान किया गया है। अतः यह वसन्ततिलका छन्द का उदाहरण है।

5. सवैया (2017, 16, 14, 13, 12)
परिभाषा इस सम वर्णवृत्त के प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण (अक्षर) होते हैं। सवैया छन्द के कई भेद हैं; जैसे—मत्तगयन्द, सुन्दरी, सुमुखी, मनहर इत्यादि।
(क) मत्तगयन्द (सवैया) यह सम वर्णवृत्त है। इसके 23 वर्गों वाले प्रत्येक चरण में 7 भगण तथा 2 गुरु क्रम से रहते हैं।
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स्पष्टीकरण
यहाँ प्रत्येक चरण में 23 वर्ण हैं तथा चरण का प्रारम्भ 7 भगण एवं अन्त 2 गुरु से हुआ है। अत: यह मत्तगयन्द छन्द का उदाहरण हैं।
(ख) सुन्दरी (सवैया) यह सम वर्णवृत्त है। इसका प्रत्येक चरण 25 वर्ण (अक्षर) वाला होता है। प्रत्येक चरण में 8 सगण तथा एक गुरु वर्ण क्रम से रहते हैं।
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स्पष्टीकरण
इस उदाहरण का प्रत्येक चरण 25 वणों वाला है। यहाँ सभी चरणों के प्रारम्भ में 8 सगण तथा अन्त में 1 गुरु के होने से यह सुन्दरी संवैया का उदाहरण है।

(ग) मनहर या मनहरण (सवैया) इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इस प्रकार मनहर छन्द में सवैया के वर्षों की अधिकतम निर्धारित संख्या 26 से अधिक होने के कारण इसे दण्डक छन्द या दण्डक वृत्त कहा जाता है। मनहर को कवित्त भी कहते हैं। इसमें 16-16 अथवा 8-8-8-7 वर्षों पर यति होती हैं तथा अन्त में एक गुरु वर्ण रहता है।
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स्पष्टीकरण यहाँ प्रत्येक चरण में 31 वर्ण हैं तथा सभी चरणों में 8-8-8-7 वर्षों पर यति है। अतः यह मनहर छन्द का उदाहरण हैं।

(घ) सुमुखि (सवैया) इसमें सात जगण तथा लघु-गुरु से छन्द की सृष्टि होती है। यति 11वें और 12वें वर्गों पर होती है। मदिरा संवैया के प्रारम्भ में एक लघु वर्ण जोड़ देने से सुमुखी सवैया की रचना होती है। संवैये का यह रूप जगण (|ऽ|) अर्थात् लघु गुरु लघु की आवृत्ति के आधार पर चलता है।
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स्पष्टीकरण
उपर्युक्त उदाहरण में सात जगण के पश्चात् लघु-गुरु का विधान है। अतः सात जगण + लघु + गुरु होने से यहाँ सुमुखि छन्द है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जिस छन्द में चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं, वह कहलाता है। (2010)
अथवा
यह सम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण और तगण के प्रयोग का निषेध है। इस छन्द का नाम है (2010)
(क) दोहा
(ख) सोरठा
(ग) रोला
(घ) चौपाई
उत्तर:
(घ) चौपाई

प्रश्न 2.
चौपाई छन्द में कितने चरण होते हैं? सही विकल्प चुनकर लिखिए।
(क) दो
(ख) चार
(ग) छः
(घ) आठ
उत्तर:
ख) चार

प्रश्न 3.
“प्रिय पति वह मेरा, प्राण प्यारा कहाँ है।
दुःख-जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है।
अब तक जिसको मैं देख कर जी सकी हैं।
वह हृदय हमारा, नेत्र तारा कहाँ है।”
उपर्युक्त पद्य में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) सवैया
(ख) सोरठा
(ग) मालिनी
(घ) रोला
उत्तर:
(ग) मालिनी

प्रश्न 4.
हरिगीतिका छन्द में प्रत्येक चरण में मात्राएँ होती हैं (2011)
(क) 24
(ख) 28
(ग) 26
(घ) 22
उत्तर:
(ख) 28

प्रश्न 5.
“नव उज्ज्वल जले-धार, हीर हीरक सी सोहति।
बिच-बिच छहरति बूंद, मध्य मुक्तामनि मोहति।।”
इसमें प्रयुक्त छन्द का नाम है। (2011)
(क) दोहा
(ख) चौपाई
(ग) सोरठा
(घ) बरवै
उत्तर:
(ग) सोरठा

प्रश्न 6.
यह सम मात्रिक छन्द है। यह चार चरण में लिखा जाता है। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। 11वीं और 13वीं मात्राओं पर यति रहती है। वहाँ छन्द होता है। (2010)
(क) रोला
(ख) कुण्डलिया
(ग) इन्द्रवज्रा
(घ) बरवै
उत्तर:
(क) रोला

प्रश्न 7.
“सुनत सुमंगल बैन, मन प्रमोद सनपुलक भर।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह जल।।”
इसमें छन्द है।
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) बरवै
(घ) सोरठा
उत्तर:
(घ) सोरठा

प्रश्न 8.
“नील सरोरुह स्याम, सरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीरसागर संयन।।”
इसमें छन्द है।
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) सवैया
(घ) बरवै
उत्तर:
(ख) सोरठा

प्रश्न 9.
“मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाईं परै श्याम हरित-दुति होय।।”
इस पद में छन्द है।
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) बरवै
उत्तर:
(ग) दोहा

प्रश्न 10.
“मैं लखि नारी ज्ञानु, करि राख्यौ निरधारु यह।
वहई रोग-निदानु, वहै बैदु, औषधी वहै।।
उपर्युक्त पद्य में कौन-सा छन्द है?
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) उपेन्द्रवज्रा
(घ) सोरठा
उत्तर:
(घ) सोरठा

प्रश्न 11.
बरवै छन्द में कुल मात्राएँ होती हैं। (2010)
(क) 48
(ख) 44
(ग) 38
(घ) 32
उत्तर:
(ग) 38

प्रश्न 12.
“अवधि शिला का उर पर, था गुरु भार।
तिल-तिल काट रही थी, दृग जल-धार।।”
इसमें प्रयुक्त छन्द है। (2010)
(क) सोरठा
(ख) दोहा
(ग) रोला
(घ) बरवै
उत्तर:
(घ) बरवै

प्रश्न 13.
सोरठा छन्द की प्रत्येक पंक्ति में कुल मात्राएँ होती हैं।
(क) 16
(ख) 24
(ग) 32
(घ) 64
उत्तर:
(ख) 24

प्रश्न 14.
“सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ।।”
इस पद्य में छन्द है। (2010)
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) सवैया
उत्तर:
(ग) दोहा

प्रश्न 15.
सिय मुख शरद कमल जिमि, किमि कहिजाय।
निसि मलीन वह, निसि दिन, यह बिगसाय।।
पद में प्रयुक्त छन्द का नाम हैं।
(क) दोहा
(ख) सोरठा
(ग) बरवै
(घ) चौपाई
उत्तर:
(ग) बरवै

प्रश्न 16.
ऋषिहिं देखि हरषै हियो, राम देखि कुम्हलाई।
धनुष देखि इरपै महा, चिन्ता चित्त डोलाइ।।।
इसमें प्रयुक्त छन्द है।
(क) सोरठा
(ख) चौपाई
(ग) बरवै
(घ) दोहा
उत्तर:
(घ) दोहा

प्रश्न 17.
यगण का सही सूत्र है।
(क) ||ऽ
(ख) |||
(ग) ऽऽ|
(घ) |ऽऽ
उत्तर:
(घ) |ऽऽ

प्रश्न 18.
“कागद पर लिखत न बनत, कहत सन्देसु लेजात।
कहिहै सब तेरो हियौ, मेरे हिय की बात।।”
इसमें प्रयुक्त छन्द का नाम है।
(क) मालिनी
(ख) सवैया
(ग) बरवै
(घ) दोहा
उत्तर:
(घ) दोहा

प्रश्न 19.
“जो न होत जग जनम भरत को।
सकल धरम धुर धरनि धरत को।।”
उपरोक्त पंक्तियाँ किस छन्द में हैं? (2010)
(क) बरवै
(ख) सवैया
(ग) कुण्डलिया
(घ) चौपाई
उत्तर:
(घ) चौपाई

प्रश्न 20.
रोला छन्द में कितनी मात्राएँ होती हैं? (2010)
अथवा
‘रोला’ छन्द के एक (प्रत्येक चरण में कुल कितनी मात्राएँ होती हैं? (2011, 10)
(क) 28
(ख) 24
(ग) 16
(घ) 19
उत्तर:
(ख) 24

प्रश्न 21.
कुण्डलिया के प्रत्येक चरण में मात्राएँ होती हैं।
(क) 22
(ख) 24
(ग) 26
(घ) 20
उत्तर:
(ख) 24

प्रश्न 22.
जिस छन्द में चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में तगण, भगण, दो जगण और दो गुरु होते हैं, वहाँ छ्न्द होता है
(क) इन्द्रवज्रा
(ख) मालिनी
(ग) वसन्ततिलका
(घ) मत्तगयन्द सवैया
उत्तर:
(ग) वसन्ततिलको

प्रश्न 23.
चम्पक हरवा अँग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कॅमिलाय।।
उपरोक्त पद्य में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) दोहा
(ख) बरवै
(ग) सोरठा
(घ) रोला
उत्तर:
(ख) बरवै

प्रश्न 24.
जिस छन्द में प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं, वह कहलाता है?
(क) दोहा
(ख) सोरठा
(ग) रोला
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ख) सोरठा

प्रश्न 25.
“बिनु पग चले सुने बिनु काना। कर बिनु कर्म करे विधि नाना।।
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। गहे घ्राण बिनु बास असेखा।।”
उपरोक्त पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) बरवै
(ख) चौपाई
(ग) हरिगीतिका
(घ) वसन्ततिलका
उत्तर:
(ख) चौपाई

प्रश्न 26.
“सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहँसे करुणा ऐन, चिरौ जानकी लखन तन।।”
उपरोक्त पद्य में कौन-सा छन्द है?
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) सोरठा
(घ) बरवै
उत्तर:
(ग) सोरठा

प्रश्न 27.
“कातिक सरद चन्द उजियारी जग सीतल हाँ विरहै जारी।”
उक्त पंक्ति में प्रयुक्त छन्द का नाम है। (2010)
(क) दोहा
(ख) रोला
(ग) चौपाई
(घ) सोरठा
उत्तर:
(ग) चौपाई

प्रश्न 28.
“मैं जो नया ग्रन्थ विलौकता हैं, भाता मुझे सो नव मित्र-सा है।
देखें उसे मैं नित नेम से ही, मानो मिला मित्र मुझे पुराना।।”
उपरोक्त पद्य में कौन-सा न्द है? (2010)
(क) उपेन्द्रवज्रा
ख) संवैया
(ग) वसन्ततिलका
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(घ) इन्द्रवज्रा

प्रश्न 29.
“भू में रमी शरद की कमनीयता थी।
नीला अनन्त नभ निर्मल हो गया था।
थी छा गई कंकुभ में, अमिता सिताभा।
उत्फुल-सी प्रकृति थी, प्रतिभात होती।।”
उपर्युक्त पद्यांश में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) मालिनी
(ख) इन्द्रवज्रा
(ग) वसन्ततिलका
(घ) उपेन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ग) वसन्ततिलका।

प्रश्न 30.
“सुख शान्ति रहे सब ओर सदा, अविवेक तथा अघ पास न आवै।
गुणशील तथा बल बुद्धि बढ़े, हठ बैर विरोध घटै मिटि जावै।
कहे मंगल दारिद दूर भगे, जग में अति मोद सदा सरसावै।।
कवि पण्डित शूरन वीरन से, विलसे यह देश सदा सुख पावै।।”
उपरोक्त पद्य में कौन-सा छन्द है? (2011, 10)
(क) सुन्दरी
(ख) मत्तगयन्द
(ग) कवित्त मनहर
(घ) कुण्डलिया
उत्तर:
(क) सुन्दरी

प्रश्न 31.
आदि में एक दोहा जोड़कर और बाद में एक रोला जोड़कर कौन-सा छन्द बनता है?
अथवा
रोला छन्द के प्रारम्भ में एक दोहा जोड़ने पर जो छन्द बन जाता है, उसका नाम लिखिए (2008)
(क) हरिगीतिका
(ख) कुण्डलिया
(ग) बरवै।
(घ) वसन्ततिलका
उत्तर:
(ख) कुण्डलिया

प्रश्न 32.
“सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखी सासु आन अनुसारी।” उपरोक्त पद में कौन-सा छन्द है? (2011)
(क) रोला
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) चौपाई
उत्तर:
(घ) चौपाई

प्रश्न 33.
चौपाई छन्द में कुल मात्राएँ होती हैं। (2007)
(क) 15
(ख) 16
(ग) 64
(घ) 32
उत्तर:
(ग) 64

प्रश्न 34.
दोहा छन्द में कुल मात्राएँ होती हैं। (2007)
(क) 24
(ख) 48
(ग) 38
(घ) 32
उत्तर:
(ख) 48

प्रश्न 35.
इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में कुल वर्ण होते हैं। (2007)
(क) 10
(ख) 12
(ग) 11
(घ) 14
उत्तर:
(ग) 11

प्रश्न 36.
वसन्ततिलका छन्द के एक चरण में कुल कितने वर्ण होते हैं? (2011)
(क) 16
(ख) 18
(ग) 28
(घ) 14
उत्तर:
(घ) 14

प्रश्न 37.
जहाँ पहले और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 7-7 मात्राएँ होती हैं और चरण के अन्त में लघु होता है, वहाँ छन्द होता है।
(क) कुण्डलिया
(ख) बरवै
(ग) इन्द्रवज्रा,
(घ) सवैया
(घ) 32
उत्तर:
(ख) बरवै

प्रश्न 38.
जिस छन्द में प्रत्येक चरण में क्रमशः जगण, तगण, जगण और दो गुरु वर्ण के क्रम से होते हैं, वह कहलाता है।
अथवा
इस छन्द में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में ग्यारह वर्ण होते हैं। वर्गों में जगण, तगण, जगण और गुरु-गुरु का क्रम होता है। चरण के अन्त में यति होती है। इस छन्द का नाम है। (2008)
(क) इन्द्रवज्रा
(ख) उपेन्द्रवज्रा
(ग) सवैया
(घ) वसन्ततिलका
उत्तर:
(ख) उपेन्द्रवज्रा

प्रश्न 39.
“राधा नागरि सोइ, मेरी भवबाधा हौं।
श्याम हरित दुति होड़, जा तन की झाई परै।।”
इस पद में छन्द है (2008)
(क) चौपाई
(ख) सोरठा
(ग) दोहा
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ख) सोरठा

प्रश्न 40.
माटी कहे कुम्हार से तु क्यों रौंदे मोय।।
एक दिन ऐसा होयगा, मैं दूंगी तोय।।
इसमें छन्द है।
(क) सरोठा
(ख) चौपाई
(ग) दोहा
(घ) इन्द्रवज्रा
उत्तर:
(ग) दोहा

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए ।
कुन्द इन्दु सम देह, उमा रमण करुणा अयन।
जाहि दीन पर नेह, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन।।। (2016)
उत्तर:
यहाँ अर्द्ध सम छन्द सोरठा है। सोरठा के विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में 11.11 और सम चरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। तुक विषम चरणों में होता है, जबकि विषम चरणों के अंत में जगण (|ऽ|) का निषेध रहता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
“मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झांई परे, श्याम हरित दुति होय।।” (2014)
उत्तर:
यहाँ अर्द्ध सम मात्रिक दोहा छन्द है।। दोहा छन्द के प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसके सम चरणों के अन्त में गुरु-लघु आते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सप्रमाण स्पष्ट कीजिए
“देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहि सुखारे।।” (2012)
उत्तर:
यहाँ सम मात्रिक चौपाई छन्द हैं, क्योंकि इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ और अन्त में दो गुरु वर्ण हैं। साथ ही चरण के अन्त में जगण (15) एवं तगण (55) नहीं हैं।’

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सप्रमाण स्पष्ट कीजिए।
सुनत सुमंगल बैन, मन प्रमोद तन पुलक भर।।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह जल।। (2016, 15, 14, 12, 09)
उत्तर:
यह अर्द्ध सम मात्रिक छन्द हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 11 (ग्यारह) दूसरे और चौथे चरण में 13 (तेरह) मात्राएँ हैं। इसमें चार चरण हैं। सोरठा छन्द है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
खग वृंद सोता है अतः कल, कल नहीं होता वहाँ।
बस मन्द मारुत का गमन ही, मौन है खोता जहाँ।।
इस भौति धीरे से परस्पर, कह सजगता की कथा।।
यों दीखते हैं वृक्ष ये हों, विश्व के प्रहरी यथा।।।
उत्तर:
यह सम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसमें प्रत्येक चरण में 16 और 12 पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण के अन्त में रगण (IऽI) आता हैं। इस आधार पर इन पंक्तियों में हरिगीतिका छन्द है।।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सप्रमाण स्पष्ट कीजिए।
कृतघन कतहुँ न मानहीं, कोटि करौ जो कोय।
सरबस आगे राखिए, तऊ न अपनो होय।।।
तऊ न अपनो होय, भले की भली न मौने।।
काम काठि चुप रहे, फेरि तिहि नहिं पहचानै।।
कह ‘गिरिधर कविराय’ रहत नित ही निर्भय मन।
मित्र शुत्र ना एक, दाम के लालच कृतघन।।
उत्तर:
यह एक विषम मात्रिक छन्द हैं। इसमें छः चरण होते हैं। एक दोहे और एक रोले के योग से बनता है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रथम चरण के प्रथम शब्द की अन्तिम चरण के अन्तिम शब्द के रूप में तथा द्वितीय चरण के अन्तिम अर्द्ध-चरण की तृतीय चरण के प्रारम्भिक अर्द्धचरण के रूप में आवृत्ति होती है। अत: यह कुण्डलिया छन्द हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है। उसका लक्षण लिखिए।
अवधि शिला का इर पर, था गुरु भार।
तिल तिल काट रही थी, दृग जल धार।।
उत्तर:
यह अर्थ सम मात्रिक बरवै छन्द है। इसके पहले और तीसरे चरणों में 12-12 मात्राएँ होती हैं, दूसरे और चौथे चरणों में 7-7 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अन्त में जगण (|ऽ|) आवश्यक होता है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
थे दीखते परमवृद्ध नितान्त रोगी,
या थी नवागत वधू गृह में दिखाती।
कोई न और इनको तज़ के कहीं था,
सूने सभी सदन गोकुल के हुए थे।।। (2016, 13, 12)
उत्तर:
यह समवृर्णवृत्त वसन्ततिलका नामक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं और प्रत्येक चरण में एक तगण (ऽऽ|), एक भगण (ऽ||), दो जगण (|ऽ|) और अन्त में दो गुरु होते हैं। इसमें 8, 6 वर्षों पर यति होती है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
भागीरथी रूप अनूपकारी, चन्द्राननी लोचन कंजधारी।
वाणी बखानी सुख तत्व सोध्यौ, रामानुजै आनि प्रबोध बोध्यौ। (2016, 15, 14, 13, 12)
उत्तर:
यह समवर्णवृत्त इन्द्रवज्रा छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में दो तगण (ऽऽ|), एक जगण (|ऽ|) और दो गुरु होते हैं। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में कुल 11 वर्ण होते हैं।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण भी लिखिए।
बंदऊँ गुरु पद पदुम पागा, सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।
अमिय मूरिमय चूरन चारु, समन सकल भव रुज परिमारु।।
उत्तर:
यह सम मात्रिक छन्द चौपाई है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण (|ऽ|) और तगण (ऽऽ|) के प्रयोग का निषेध होता है अर्थात् चरण के अन्त में गुरु (ऽ) लघु (|) नहीं होने चाहिए। दो गुरु (ऽऽ), दो लघु (||), लघु-गुरु (|ऽ) हो सकते हैं।

प्रश्न 11.
यति का प्रयोग कहाँ किया जाता है?
उत्तर:
कभी कभी छन्द का पाठ करते समय, कहीं-कहीं क्षण भर को रुकना पड़ता है, उसे यति कहते हैं।

प्रश्न 12.
गण किसे कहते हैं? गण कितने हैं?
उत्तर:
लघु-गुरु क्रम से तीन वर्षों के समुदाय को गण कहते हैं। गणों की संख्या आठ है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण भी लिखिए। (2014, 13, 12, 11, 10)
नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन।।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीर सागर सयन।।
उत्तर:
यह अर्द्ध सम मात्रिक छन्द सोरठा है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। पहले और तीसरे चरण के अन्त में गुरु-लघु आते हैं और कहीं-कहीं तुक भी मिलती है। यह दोहा छन्द का उल्टा होता है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
लसत मंजु मुनि मण्डली, मध्य सीय रघुचन्दु।
ग्यान सभा जनु तनु धरें, भगति सच्चिदानन्दु।।
उत्तर:
यह अर्द्ध सम मात्रिक छन्द दोहा है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ, दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरणों के शुरू में जगण (|ऽ|) नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अन्त में गुरु (ऽ) और लघु (|) नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा ऊन्द है? उसका लक्षण भी लिखिए।
प्रिय पति वह मेरा प्राण-प्यारा कहाँ है?
दुःख-जलनिधि-डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आज लौ जी सकी हैं।
वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है?
उत्तर:
यह समवर्णवृत्त मालिनी छन्द है। इसमें 15 वर्ण होते हैं और इसके . प्रत्येक चरण में नगण (|||), मगण (ऽऽऽ), यगण (|ऽऽ) होते हैं और 8-7 वर्गों पर यति होती है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? उसका लक्षण लिखिए।
चले बली पावन पादुका लै,
प्रदक्षिणा राम सियाहु को है।
गए ते नन्दीपुर बास कीन्हों,
सबन्धु श्रीरामहिं चित्त दीन्हों।।
उत्तर:
यह समवर्ण-वृत्त छन्द उपेन्द्रवज्रा है। इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं और वे जगण (|ऽ|), तगण (ऽऽ|), जगण और दो गुरु के क्रम से होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 8 हम और हमारा आदर्श

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name हम और हमारा आदर्श
Number of Questions Solved 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 8 हम और हमारा आदर्श

हम और हमारा आदर्श – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2017, 16, 14, 13, 12, 11)

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता है। | इस प्रश्न में किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ
भारत रत्न अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम अर्थात् ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को धनुषकोडी गाँव, रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ था। इनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन था, जो मछुवारों को किराए पर नाव दिया करते थे।

कलाम जी की आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम में ही पंचायत प्राथमिक विद्यालय में हुई, इसके पश्चात् इन्होंने मद्रास इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अन्तरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। स्नातक होने के पश्चात् इन्होंने हायराफ्ट परियोजना पर काम करने के लिए भारतीय रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। वर्ष 1962 में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन में आने के पश्चात् इन्होंने कई परियोजनाओं में निदेशक की भूमिका निभाई। इन्होंने एस. एल. बी. 3 के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, इसी कारण इन्हें मिसाइल मैन भी कहा गया। इसरो के निदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात्, ये वर्ष 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे, जिसके पश्चात् इन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य किया। अपने अन्तिम क्षणों में भी ये शिलांग में प्रबन्धन संस्थान में पढ़ा रहे थे। वहीं पढ़ाते हुए 27 जुलाई, 2015 में इनका निधन हो गया। इन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों से मानद (मान-प्रतिष्ठा देने वाला) उपाधियों प्राप्त होने के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा वर्ष 1981 व 1990 में क्रमशः पद्म भूषण व पद्म विभूषण से तथा 1997 से भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्यिक सेवाएँ
कलाम जी ने अपनी रचनाओं के द्वारा विद्यार्थियों में युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। इन्होंने अपने विचारों को विभिन्न पुस्तकों में समाहित किया है।

कृतियाँ
इण्डिया 2020, ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम, माई जर्नी, इग्नाइटेड माइण्डस, विंग्स ऑफ फायर, भारत की आवाज, टर्निग प्लॉइण्टेज, हम होंगे कामयाब इत्यादि।

भाषा-शैली
कलाम जी ने मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में लेखन कार्य किया है, जिसका अनुदित रूप पाठ्यक्रम में संकलित किया गया है। उनकी शैली लाक्षणिक प्रयोग से युक्त है।

योगदान
डॉ. कलाम एक बहुआयामों व्यक्तित्व के धनी थे। विज्ञान प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्क को प्रज्जवलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ-साथ वे पर्यावरण की चिन्ता भी बहुत करते हैं। डॉ. कलाम ने भारत के विकास स्तर को 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की। वे भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे।

हम और हमारा आदर्श – पाठ का सार

परीक्षा में पाठ का सार” से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता हैं। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।

नागरिकों में समृद्ध राष्ट्र की इच्छा होना
‘हम और हमारा आदर्श’ अध्याय में कलाम जी ने राष्ट्र की प्रगति के लिए स्वयं लोगों द्वारा सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन जीने की इच्छा रखने और पूर्ण करने हेतु हदय से प्रयास करने के लिए कहा है। साथ ही वे भौतिकता व यात्मिकता को परस्पर एक दूसरे का पूरक भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

प्रगति के लिए स्वयं के महत्त्व को पहचाना।
लेखक कलाम जी स्वयं की युवा छात्रों से मिलने की प्रवृत्ति पर विचार करते हुए, स्वयं के रामेश्वरम द्वीप से निकलकर जीवन में प्राप्त की गई अपनी उपलब्धियों पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। इन उपलब्धियों के मूल में वे अपनी महत्त्वाकांक्षा की प्रवृत्ति पर विचार-विमर्श करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उनके द्वारा समाज के प्रति दिए गए योगदान के अनुसार अपना मूल्यांकन करना ही महत्त्वपूर्ण था।

वे कहते हैं कि मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त सभी वस्तुओं का उपभोग करने का अधिकार है और जब तक मनुष्य के भीतर स्वयं समृद्ध भारत में जीने की इच्छा एवं विश्वास नहीं होगा, वह अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। विकसित अर्थात् जी-8 देशों के नागरिकों का समृद्ध राष्ट्र में जीने का विश्वास ही उनके विकास का रहस्य हैं।

जीवन में भौतिक वस्तुओं का महत्त्व
कलाम जी भौतिकता और आध्यात्मिकता को न तो एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं। और न ही भौतिकतावादी मानसिकता को गलत। वे स्वयं अपना उदाहरण देते हुए न्यूनतम वस्तुओं का उपभोग करने की अपनी प्रवृत्ति के विषय में बताते हैं और कहते हैं कि समृद्धि मनुष्य में सुरक्षा व विश्वास के भाव को संचारित करती है, जो उनमें स्वतन्त्र होने के भाव को पैदा करती है। कलाम जी ब्रह्माण्ड का व बगीचे में खिले फूलों का उदाहरण देते हुए प्रकृति द्वारा प्रत्येक कार्य को पूर्णता से करने के गुण को उद्धारित करते हैं। वे महर्षि अरविन्द द्वारा प्रत्येक वस्तु को ऊर्जा का अंश मानने का उदाहरण देते हुए कहते है कि आत्मा व पदार्थ सभी का अस्तित्व शीनों परस्पर जुड़े हुए हैं। अतः भौतिकता कोई बुरी चीज नहीं है।

स्वेच्छा पूर्ण कार्य ही आनन्द का साधन
कलाम जी कहते हैं कि भौतिकता को सदैव निम्न स्तरीय माना गया है और न्यूनतम में जीवन व्यतीत करने को श्रेयस्कर कहा जाता है। वे कहते हैं कि स्वयं गाँधी जी ने ऐसा जीवन व्यतीत किया, क्योंकि यह उनकी इच्छा थी। मनुष्य को सदैव अपने भीतर से उपजी इलाओं के अनुरूप जीवन शैली को अपनाना चाहिए, अनावश्यक रूप से त्याग की प्रतिमूर्ति बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि युवा छात्रों से मिलने का मूल उद्देश्य उन्हें इसी गुण से परिचित कराते हुए उन्हें सुख-सुविधाओं से पूर्ण जीवन के सपने देखने और उन्हें पूर्ण करने के लिए शुद्ध भाव से प्रयास करने के लिए प्रेरित करना है। ऐसा करने के उपरान्त ही वे अपने चारों ओर खुशियों का प्रसार कर पाएँगे।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

प्रश्न 1.
मैं खासतौर से युवा छात्रों से ही क्यों मिलता हूँ? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं अपने छात्र जीवन के दिनों के बारे में सोचने लगा। रामेश्वरम के द्वीप से बाहर निकलकर यह कितनी लम्बी यात्रा रही। पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो विश्वास नहीं होता। आखिर वह क्या था, जिसके कारण यह सम्भव हो सका? महत्त्वाकांक्षा? कई बातें मेरे दिमाग में आती हैं। मेरा ख्याल है कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि मैंने अपने योगदान के मुताबिक ही अपना मूल्य आँका। बुनियादी बात जो आपको समझनी चाहिए, वह यह है कि आप जीवन की अच्छी चीजों को पाने का हक रखते हैं, उनका जो ईश्वर की दी हुई हैं। जब तक हमारे विद्यार्थियों और युवाओं को यह भरोसा नहीं होगा कि वे विकसित भारत के नागरिक बनने के योग्य हैं, तब तक वे जिम्मेदार और ज्ञानवान नागरिक भी कैसे बन सकेंगे। विकसित देशों की समृद्धि के पीछे कोई रहस्य नहीं छिपा है। ऐतिहासिक तथ्य बस इतना है कि इन राष्ट्रों, जिन्हें जी-8 के नाम से पुकारा जाता है, के लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस विश्वास को पुख्ता किया कि मजबूत और समृद्ध देश में उन्हें अच्छा जीवन बिताना है। तब सच्चाई उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप ढल गई।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक अपने छात्र जीवन के विषय में क्यों सोचने लगता है?
उत्तर:
लेखक को युवा छात्रों से मिलना, उनसे बातें करना अत्यधिक रुचिकर लगता था। वह स्वयं की युवा छात्रों से मिलने की प्रवृत्ति पर प्रश्न अंकित करता है कि उसे यह क्यों अच्छा लगता है? और इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढते हुए वह अपने छात्र जीवन के विषय में सोचने लगता है।

(ii) लेखक के अनुसार मनुष्य जीवन में बड़ा बनने का मूल कारण क्या है?
उत्तर:
कलाम जी के अनुसार, मनुष्य का जीवन में बड़ा बनने का मूल कारण उसकी महत्त्वाकांक्षा है। मनुष्य महत्त्वाकांक्षा के बल पर ही अपने जीवन में आगे बढ़ पाता है।

(iii) किसी राष्ट्र के युवा कब तक राष्ट्र की उन्नति में अपनी भूमिका नहीं निभा सकते?
उत्तर:
किसी राष्ट्र के नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं व विद्यार्थियों में जब तक यह विश्वास नहीं होगा कि वे स्वयं विकसित राष्ट्र के नागरिक बनने के योग्य हैं, तब तक वे राष्ट्र के विकास एवं उन्नति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सकते, क्योंकि राष्ट्र के विकास के लिए उन्हें स्वयं जिम्मेदारियों को उठाते हुए अपना योगदान देना होगा।

(iv) लेखक के अनुसार विकसित देशों की समृद्धि के पीछे क्या तथ्य है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार विकसित देशों की समृद्धि के पीछे कोई रहस्य नहीं छिपा, अपितु इसके पीछे छिपा ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इन देशों के नागरिक समृद्ध राष्ट्र में जीने का विश्वास रखते हैं।

(v) ‘महत्त्वाकांक्षा एवं विद्यार्थी शब्दों का सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम भी लिखिए।
उत्तर:
महत्त्व + आकांक्षा = महत्त्वाकांक्षा (दीर्घ सन्धि)
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (दीर्घ सन्धि)

प्रश्न 2.
मैं यह नहीं मानता कि समृद्धि और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी हैं। या भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना कोई गलत सोच है। उदाहरण के तौर पर, मैं खुद न्यूनतम वस्तुओं को भोग करते हुए जीवन बिता रहा हूँ, लेकिन में सर्वत्र समृद्धि की कद्र करता हूँ, क्योकि यह अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो अन्ततः हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है। आप आस-पास देखेंगे, तो पाएँगे कि खुद प्रकृति भी कोई काम आधे-अधूरे मन से नहीं करती। किसी बगीचे में जाइए। मौसम में आपको फूलों की बहार देखने को मिलेगी अथवा ऊपर की तरफ ही देखें, यह ब्रह्माण्ड आपके अनन्त तक फैला दिखाई देगा, आपके यकीन से भी परे।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया हैं तथा इसके लेखक कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश ‘हम और हमारा आदर्श’ से लिया गया है। इसके लेखक ‘ए. पी. जे. अब्दुल कलाम’ हैं।।

(ii) लेखक अध्यात्म एवं भौतिकता को एक-दूसरे के समान मानने के विषय में क्या तर्क देता है।
उत्तर:
लेखक अध्यात्म एवं भौतिकता को एक-दूसरे के समान मानने के विषय में तर्क देते हैं कि समृद्धि अर्थात् धन, वैभव व सम्पन्नता को आध्यात्म के समान महत्त्व देते हुए उन्हें एक-दूसरे का विरोधी मानने से इनकार करते हैं। तथा साथ ही वे भौतिकतावादी मानसिकता रखने वालों को गलत मानने के पक्षधर नहीं हैं।

(iii) भौतिक समृद्धि के महत्व के विषय में लेखक का मत स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लेखक मनुष्य के जीवन में धन-वैभव, सम्पन्नता आदि को महत्वपूर्ण मानते हुए स्पष्ट करते हैं कि भौतिक सुख-सुविधाएँ मनुष्य में सुरक्षा एवं विश्वास का भायं उत्पन्न करती हैं, जो उनकी स्वतन्त्रता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं तथा मनुष्य में आत्मबल का संचार करती हैं।

(iv) लेखक के अनुसार मनुष्य को जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक वस्तुओं को किस प्रकार स्वीकार करना चाहिए?
उत्तर:
लेखक के अनुसार जिस प्रकार प्रकृति अपने सभी कार्य पूरे समभाव से करती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन में वस्तुओं को भौतिक एवं आध्यामिक दो वर्गों में विभाजित नहीं करना चाहिए, अपितु उन्हें सहज माव से एक स्वरूप स्वीकारते हुए जीवन को जीना चाहिए।

(v) ‘समृद्धि’ शब्द के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
समृद्धि सम्पन्नता, धन।

प्रश्न 3.
न्यूनतम में गुजारा करने और जीवन बिताने में भी निश्चित रूप से कोई हर्ज नहीं है। महात्मा गाँधी ने ऐसा ही जीवन जिया था, लेकिन जैसा कि उनके साथ था, आपके मामले में भी यह आपकी पसन्द पर निर्भर करता है। आपकी ऐसी जीवन-शैली इसलिए है, क्योंकि इससे वे तमाम जरूरतें पूरी होती हैं, जो आपके भीतर की गहराइयों से उपजी होती हैं, लेकिन त्याग की प्रतिमूर्ति बनना और जोर-जबरदस्ती से चुनने-सहने का गुणगान करना अलग बातें हैं।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार किस प्रकार का जीवन व्यतीत करने में परेशानी नहीं है?
उत्तर:
लेखक स्पष्ट करते हैं कि भौतिकता को सदैव निम्न स्तरीय माना गया और न्यूनतम में जीवन व्यतीत करने को श्रेयस्कर कहा जाता है अर्थात् यदि हमें कम में भी जीवन व्यतीत करने को कहा जाए, तो इसमें कोई परेशानी नहीं है।

(ii) लेखक महात्मा गाँधी के जीवन का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट करना चाहता है ?
उत्तर:
लेखक महात्मा गाँधी के जीवन का उदाहरण देकर यह स्पष्ट करना चाहता है। कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्हें दूसरों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने हेतु इच्छा के विपरीत त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं बनना चाहिए।

(iii) मनुष्य को सदैव किस प्रकार की जीवन-शैली को अपनाना चाहिए?
उत्तर:
मनुष्य को सदैव अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए, क्योंकि इससे हमारी वे सारी जरूरतें पूरी होती हैं, जो स्वयं हमारे अन्तर्मन की गहराइयों से निःसृत होती हैं अर्थात् मनुष्य को सदैव अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीवन-शैली को अपनाना चाहिए। अनावश्यक रूप से त्याग करने का प्रयास ठीक नहीं होता।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक भौतिकता या भौतिकता रहित जीवन दोनों में से किसी एक को महत्व न देकर यह सन्देश देना चाहते हैं कि हमें अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए।

(v) ‘हज’ एवं ‘तमाम’ शब्दों का पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
हर्ज-हानि, नुकसान; तमाम-सारा, सम्पूर्ण

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UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 14 त्रिभुज

UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 14 त्रिभुज

तुम भी करो:

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए त्रिभुजों की भुजाओं और कोणों की नापों को अपनी कॉपी में लिखो।
नोट : विद्यार्थी स्वयं नापकर देखें।

अभ्यास

प्रश्न 1.
दिए गए चित्र में 2 ब स अ का मान ज्ञात करो।
हल:
∠ ब स अ = 180° – ( ∠स अ ब + ∠ स ब अ) (त्रिभुज के तीनों कोणों का योग 180° होता है।)
= 180° – (40° + 60°) = 180° – 100° = 80°

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करो (पूर्ति करके)-
हल:
(क) त्रिभुज के तीनों कोणों का योगफल 180° या दो समकोण के बराबर होता है।
(ख) त्रिभुज में तीन शीर्ष होते हैं।
(ग) त्रिभुज में तीन कोण तथा तीन भुजाएँ होती हैं।
(घ) त्रिभुज की किन्हीं दो भुजाओं का योग तीसरी भुजा से अधिक होता है।
(ङ) त्रिभुज की दो भुजाओं का अन्तर तीसरी भुजा से कम होता है।

UP Board Solutions for Class 5 Maths Gintara

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 3 पेशी तन्त्र

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 3 पेशी तन्त्र (Muscular System)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 3 पेशी तन्त्र

UP Board Class 11 Home Science Chapter 3 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मांसपेशियों तथा पेशी तन्त्र (Muscles and muscular system) से क्या आशय है? मानव शरीर में पायी जाने वाली पेशियों के प्रकारों का सामान्य परिचय दीजिए। अथवा ऐच्छिक, अनैच्छिक तथा हृद-पेशियों का चित्र सहित सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा शरीर में पेशियों के प्रकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मांसपेशियाँ तथा पेशी तन्त्र (Muscles and Muscular System):
कंकाल तन्त्र शरीर को आकार देता है तो मांसपेशियाँ उस आकार को पूर्ण स्वरूप प्रदान करती हैं एवं सुडौल तथा सुन्दर बनाती हैं। ये कंकाल तन्त्र पर फैली रहती हैं तथा बाहर की ओर त्वचा से ढकी रहती हैं अर्थात् हमारे शरीर में सामान्य रूप से त्वचा तथा अस्थियों के मध्य में विद्यमान भाग को मांसपेशियों के रूप में जाना जाता है। पेशियाँ ही कंकाल के साथ मिलकर सभी प्रकार की गतियों के लिए उत्तरदायी हैं। इसी प्रकार विभिन्न आन्तरांगों को बनाने, उनके अन्दर फैलने-सिकुड़ने आदि की शक्ति उत्पन्न करने के लिए भी मांसपेशियों की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में, शरीर के लगभग सभी कार्यों में मांसपेशियों की संकुचन-क्षमता सहायक होती है क्योंकि मांसपेशियाँ लचीली होती हैं तथा इनमें संकुचन की विशिष्ट शक्ति होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 26
शरीर में लगभग सभी स्थानों पर इनकी उपस्थिति के कारण इनका भार सम्पूर्ण शरीर के भार का आधे से कुछ अधिक ही होता है। इस प्रकार, सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई ये पेशियाँ एक पेशी तन्त्र (muscular system) की तरह कार्य करती हैं तथा शरीर में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। मानव शरीर में कुल मिलाकर लगभग 600 पेशियाँ पायी जाती हैं।

मांसपेशियों के प्रकार (Types of Muscles):
रचना तथा कार्य की दृष्टि से मानव शरीर में तीन प्रकार की मांसपेशियाँ पायी जाती हैं। मांसपेशियों के तीनों प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

1. ऐच्छिक मांसपेशियाँ (Voluntary muscles):
इनमें पेशी कोशिकाएँ सूत्र के आकार की होती हैं, जो पेशी सूत्र कहलाती हैं। बहुत-से सूत्र बन्धक तन्तुओं द्वारा बँधे रहते हैं। इनमें आड़ी धारियाँ-सी बनी रहती हैं, जिनके कारण इनको रेखित पेशी (striped muscles) भी कहते हैं। ऐच्छिक पेशियाँ निरन्तर कार्य करके थक जाती हैं, तब इन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है। ऐच्छिक पेशियों की गति एवं कार्य हमारी इच्छा पर निर्भर करता है तथा इनकी गति पर हम नियन्त्रण कर सकते हैं। इस प्रकार की पेशियाँ मुख्य रूप से हाथ-पैर, गर्दन, आँख तथा अन्य ऐसे ही अंगों में होती हैं, जो हमारी इच्छा के अधीन कार्य करते हैं। चलना, दौड़ना, आँखें खोलना या बन्द करना, हाथ बढ़ाकर भोजन का कौर पकड़ना और उसे मुँह में चबाकर निगल जाना इत्यादि कार्य ऐच्छिक पेशियों के ही द्वारा किए जाते हैं। हड्डियों से जुड़े होने के कारण इन्हें कंकाल पेशी (skeleton muscles) भी कहते हैं। इनका नियन्त्रण एवं परिचालन मस्तिष्क तथा सुषुम्ना द्वारा होता है।

2. अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscles):
इन पेशियों में लम्बी-लम्बी पेशीय कोशिकाएँ होती हैं, जो ऐच्छिक पेशियों के पेशी सूत्रों से भिन्न होती हैं। इनमें ऐच्छिक पेशियों की तरह आड़ी धारियाँ नहीं होती हैं, इसीलिए इन्हें अरेखित पेशियाँ (unstriped muscles) कहते हैं। हमारे शरीर में अनैच्छिक पेशियाँ मुख्य रूप से आमाशय, आँतों, ग्रास-नलिका, पित्ताशय, फेफड़ों, धमनियों एवं शिराओं तथा आँखों की पुतलियों में पायी जाती हैं। इन पेशियों की गति पर हमारा नियन्त्रण नहीं होता, वरन् इन पेशियों में गति स्वत: ही होती है। आहार नाल में भोजन का खिसकना, रुधिर नलिकाओं में रुधिर का प्रवाहित होना, मूत्राशय से मूत्र बाहर निकलना, आँखों की पुतलियों का प्रकाश की तीव्रता के अनुसार फैलना या सिकुड़ना इत्यादि कार्य इन्हीं पेशियों की सहायता से स्वयं ही चलते रहते हैं। अनैच्छिक पेशियाँ कभी थकती नहीं; अतः इन्हें विश्राम की आवश्यकता नहीं होती है।

3. हृद-पेशियाँ (Cardiac muscles):
ये केवल हृदय की दीवारों में पायी जाती हैं। इनकी संरचना विशिष्ट प्रकार की होती है तथा इनमें ऐच्छिक पेशियों के समान आड़ी धारियाँ होती हैं। इस प्रकार संरचना में ऐच्छिक पेशियों से मिलती-जुलती होने पर भी, कार्य की दृष्टि से ये अनैच्छिक होती हैं। ये जीवनपर्यन्त कार्य करती रहती हैं और कभी थकती नहीं, इसीलिए इन्हें किसी विश्राम की आवश्यकता नहीं होती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 3 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में पायी जाने वाली सामान्य मांसपेशियों की रचना अथवा बनावट को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मांसपेशियों की रचना अथवा बनावट
बाहरी रूप से विभिन्न पेशियों का आकार या स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है, परन्तु शरीर की सभी पेशियों की आन्तरिक रचना या बनावट समान ही होती है। शरीर की समस्त पेशियाँ पेशी ऊतकों से निर्मित होती हैं। पेशी ऊतकों का निर्माण मूल रूप से पेशी कोशिकाओं से होता है। ये कोशिकाएँ बाल के समान पतली होती हैं। मांसपेशियों की रचना या बनावट को स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि इनके मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है-

  • मूल स्थान या मूल बन्ध-किसी भी पेशी का जो भाग सम्बन्धित हड्डी से जुड़ा रहता है, उस भाग को मूल स्थान या मूल बन्ध (origin) कहते हैं। पेशी का यह भाग स्थिर रहता है; अर्थात् यह भाग किसी भी स्थिति में घूमता नहीं है।
  • तुन्द-प्रत्येक पेशी का मध्य भाग अपेक्षाकृत रूप से कुछ मोटा होता है। पेशी के इस मोटे भाग को तुन्द (belly) कहते हैं।
  • निवेश-पेशियों का तीसरा भाग श्वेत तन्तुओं से निर्मित होता है तथा इसका आकार डोरी के समान होता है। पेशी के इस भाग को निवेश (tendon or insertion) कहते हैं। वास्तव में पेशी का यही भाग पेशी तथा अस्थि को परस्पर जोड़ता है।

प्रश्न 2.
मांसपेशियों के कार्यों एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
अथवा मांसपेशियों की मानव शरीर में उपयोगिता लिखिए।
अथवा शरीर में मांसपेशियों का होना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
मांसपेशियों का कार्य तथा महत्त्व मांसपेशियों द्वारा किए जाने वाले कार्य ही उनके महत्त्व को दर्शाते हैं। मांसपेशियों के कार्य तथा महत्त्व को निम्नवत् समझा जा सकता है-

  • शरीर के विभिन्न आन्तरिक अंग केवल मांसपेशियों से ही निर्मित हैं तथा इन अंगों की क्रियाएँ मांसपेशियों द्वारा ही संचालित होती हैं। जैसे कि आहार नाल, फेफड़े, हृदय तथा मस्तिष्क पेशियों से ही निर्मित हैं।
  • अनैच्छिक पेशियों के द्वारा शरीर के आवश्यक और महत्त्वपूर्ण कार्य संचालित होते हैं; जैसे—हृदय का धड़कना, साँस लेना आदि।
  • मांसपेशियों को आराम मिलने पर थके मनुष्य को भी आराम मिलता है।
  • मांसपेशियों के संकुचन और फैलने के. गुण के कारण आँख वस्तुओं को देखती है। दूर तथा पास की वस्तुओं को देखने आदि में पेशियाँ ही दृष्टि संयोजन करती हैं।
  • बालों के आधार पर पायी जाने वाली सूक्ष्म पेशियाँ संकुचित होकर रोंगटे खड़े करती हैं। यह हमारी शरीर की सुरक्षा प्रतिक्रिया का एक हिस्सा है।
  • ऐच्छिक मांसपेशियों के द्वारा प्रत्येक मनुष्य या अन्य कोई जन्तु अपनी इच्छानुसार कोई भी कार्य कर सकता है; जैसे-खेलना, दौड़ना, खाना आदि।
  • मांसपेशियों से शरीर को एक आकार मिलता है। मांसपेशियों के कारण ही शरीर सधा हुआ तथा सन्तुलित रहता है। पेशियाँ ही शरीर को सुन्दर एवं सुडौल बनाती हैं।
  • मांसपेशियों से हमारी हड्डियों की सुरक्षा होती है। मांसपेशियाँ अस्थियों को बाहरी आघात से बचाती हैं।

प्रश्न 3.
पेशियों का हमारे शरीर के अंगों की गति से क्या सम्बन्ध है? समझाइए।
उत्तर:
आंगिक गति और पेशियाँ .
शरीर में प्रत्येक प्रकार की गति पेशियों द्वारा ही होती है। पेशियाँ चाहे ऐच्छिक हों या अनैच्छिक, ये अपने-अपने प्रकार के अनुरूप गतियाँ करने में संलग्न रहती हैं। उदाहरण के लिए शरीर के अन्दर अनेक अनैच्छिक पेशियाँ; जैसे आहार नाल, अनेक अन्य नलिकाएँ तथा वाहिनियाँ आदि; जिनमें कोई पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचता है, सिकुड़कर तथा शिथिल होकर गति उत्पन्न करती हैं। हृदय की गति पूर्णत: उसकी भित्ति में उपस्थित हृद पेशियों के द्वारा सम्भव है, जो जीवनपर्यन्त नहीं थकतीं और निश्चित समय के अनुसार सिकुड़ती तथा शिथिल होती रहती हैं। इसी प्रकार चलने-फिरने, विभिन्न कार्य करने, साँस लेने आदि में अस्थियों के साथ जुड़ी हुई पेशियाँ गति करने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।

अस्थियों की प्रत्येक गतिशील सन्धि के साथ दो पेशियाँ बँधी रहती हैं। प्रत्येक पेशी का एक सिरा अर्थात मल उस अस्थि के साथ जुड़ा होता है, जो कम गतिशील होती है। इसका दूसरा सिरा अस्थि जो अधिक गतिशील होती है के साथ, जुड़ा रहता है। ये पेशियाँ अपनी कण्डराओं के सहारे अस्थियों से बँधी रहती हैं। प्रायः इन सिरों पर एक से अधिक कण्डराएँ (tandons) होती हैं।

जब एक पेशी सिकुड़ती है तो यह गतिशील भाग को अपनी तरफ खींचती है जिससे उसका मध्य भाग फूल जाता है और पीछे का भाग शिथिल हो जाता है। इसके विपरीत, जब दूसरी पेशी सिकुड़ती है तो यह दूसरी दिशा में शिथिल हो जाती है। उदाहरण के लिए कोहनी के जोड़ में होने वाली यह सम्पूर्ण क्रिया हाथ को ऊपर-नीचे करने आदि के लिए गति उत्पन्न करती है (चित्र 3. 2)।

प्रश्न 4.
ऐच्छिक तथा अनैच्छिक पेशियों में भिन्नता सविस्तार समझाइए।
उत्तर:
ऐच्छिक तथा अनैच्छिक पेशियों में भिन्नता
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 27

प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-पेशीय थकान (Muscular Fatigue)।
उत्तर:
पेशीय थकान
हमारे शरीर की ऐच्छिक पेशियाँ हमारी इच्छा एवं आवश्यकता के अनुसार अनेक कार्य करती हैं। शरीर की इन पेशियों की यह विशेषता है कि यदि इन्हें निरन्तर या अधिक कार्य करना पड़ जाए तो ये थक जाती हैं। पेशियों की थकान की स्थिति में इनकी आकुंचन क्षमता क्षीण हो जाती है। इसी स्थिति को पेशीय थकान कहते हैं। ऐच्छिक पेशियों में रक्त का संचार कम होता है।

अत: निरन्तर कार्य करने पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है तथा किण्वन के फलस्वरूप लैक्टिक अम्ल या दुग्धाम्ल बनता है। इसी लैक्टिक अम्ल के एकत्रित हो जाने से आकुंचन क्षमता प्रभावित होती है। कुछ समय विश्राम कर लेने के पश्चात् लैक्टिक अम्ल का पूर्ण ऑक्सीकरण हो जाता है और पेशीय थकान प्रायः समाप्त हो जाती है। इसीलिए थकान-निवारण का सर्वोत्तम उपाय विश्राम करना माना जाता है।

प्रश्न 6.
टिप्पणी लिखिए-‘शरीर की मांसपेशियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना।
उत्तर:
शरीर की मांसपेशियों की देखभाल
समस्त जीवित प्राणियों के शरीर में मांसपेशियों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। शारीरिक गतिविधियों, स्वास्थ्य तथा बाहरी सौन्दर्य में शरीर की मांसपेशियों द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। इसीलिए हमें मांसपेशियों के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मांसपेशियों की स्वस्थता के लिए पेशियों की सक्रियता, विश्राम तथा पर्याप्त आहार की आवश्यकता होती है। वास्तव में शरीर की सभी मांसपेशियों का सामान्य रूप से सक्रिय रहना आवश्यक है। यदि इन्हें निष्क्रिय रखा जाता है तो इनकी शक्ति तथा कार्यक्षमता घटने लगती है; अतः शरीर के सभी अंगों से सम्बन्धित कार्य करते रहना चाहिए। जो लोग शारीरिक श्रम के कार्य नहीं करते, उनके लिए नियमित रूप से व्यायाम करना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि मांसपेशियाँ निरन्तर कार्य करने पर थक जाती हैं।

यह थकावट मांसपेशियों में कुछ व्यर्थ पदार्थों के एकत्र हो जाने के कारण आती है। इस थकावट को समाप्त करने के लिए इन व्यर्थ पदार्थों का शरीर से विसर्जन आवश्यक होता है। शरीर की प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार विश्राम की अवस्था में शरीर से व्यर्थ पदार्थों का विसर्जन सुचारु रूप से होता है; अत: मांसपेशियों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए विश्राम को भी आवश्यक माना जाता है। स्पष्ट है कि मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए शरीर की सक्रियता तथा विश्राम में सन्तुलन आवश्यक होता है। इन उपायों के अतिरिक्त मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है कि पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार ग्रहण किया जाए। पेशियों के विकास, उन्हें पुष्ट बनाने तथा उनमें होने वाली टूट-फूट की मरम्मत के लिए प्रोटीन.सर्वाधिक उपयोगी होती है; अत: हमारे आहार में प्रोटीन की आवश्यक मात्रा अवश्य होनी चाहिए। प्रोटीन के अतिरिक्त हमारे आहार में खनिज लवणों की भी समुचित मात्रा होनी चाहिए। मांसपेशियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त मात्रा में जल भी ग्रहण करना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 3 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कंकाल तन्त्र एवं पेशी तन्त्र का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
कंकाल तन्त्र शरीर को आकार देता है तथा पेशी तन्त्र उसे सुडौलता एवं सुन्दरता प्रदान करता है। कंकाल तन्त्र तथा पेशी तन्त्र परस्पर सहयोग से शरीर को गति प्रदान करते हैं।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर में कुल कितनी पेशियाँ पायी जाती हैं? उत्तर–हमारे शरीर में कुल मिलाकर लगभग 600 पेशियाँ पायी जाती हैं। प्रश्न 3-हमारे शरीर में कितने प्रकार की पेशियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में तीन प्रकार की पेशियाँ पायी जाती हैं-

  • ऐच्छिक पेशियाँ,
  • अनैच्छिक पेशियाँ तथा
  • हृद-पेशियाँ।

प्रश्न 4.
पेशी ऊतक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं

  • रेखित या ऐच्छिक पेशी ऊतक,
  • अरेखित या अनैच्छिक पेशी ऊतक तथा
  • हृद-पेशी ऊतक।

प्रश्न 5.
ऐच्छिक पेशियों को अन्य किन-किन नामों से जाना जाता है? और क्यों?
उत्तर:
ऐच्छिक पेशियों में कुछ आड़ी धारियाँ होती हैं, इस कारण से इन्हें रेखित पेशी कहा जाता है। ये हड्डियों से जुड़ी रहती हैं, इस कारण से इन्हें कंकाल पेशी भी कहा जाता है।

प्रश्न 6.
अनैच्छिक पेशियाँ किस प्रकार से कार्य करती हैं?
उत्तर:
अनैच्छिक पेशियाँ अपने आप कार्य करती हैं। इनकी क्रिया व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं करती है।

प्रश्न 7.
अनैच्छिक पेशियाँ शरीर के किन अंगों में पायी जाती हैं?
उत्तर:
अनैच्छिक पेशियाँ मुख्य रूप से आमाशय, आँतों, ग्रास-नलिका, पित्ताशय, फेफड़ों, धमनियों एवं शिराओं तथा आँखों की पुतलियों में पायी जाती हैं। .

प्रश्न 8.
अनैच्छिक पेशियों को अन्य किन-किन नामों से भी जाना जाता है?
उत्तर:
अनैच्छिक पेशियों को ‘अरेखित पेशियाँ’ तथा ‘चिकनी पेशियाँ’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 9.
हृद-पेशियाँ कब तक कार्य करती हैं?
उत्तर:
हृद-पेशियाँ निरन्तर आजीवन कार्य करती रहती हैं।

प्रश्न 10.
मांसपेशियों की रचना में कौन-कौन से भाग होते हैं?
उत्तर:
मांसपेशियों की रचना तीन भागों से होती है-

  • मूल स्थान या मूल बन्ध,
  • तुन्द तथा
  • निवेश।

प्रश्न 11.
किसी अंग की गति के लिए मांसपेशियाँ किसके सहयोग से कार्य करती हैं?
उत्तर:
किसी अंग की गति के लिए मांसपेशियाँ सम्बन्धित अंग की हड्डी के सहयोग से कार्य करती हैं।

प्रश्न 12.
ऐच्छिक पेशियों तथा अनैच्छिक पेशियों की कार्य-प्रणाली में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
ऐच्छिक पेशियाँ व्यक्ति की इच्छा के अनुसार कार्य करती हैं, जबकि अनैच्छिक पेशियाँ व्यक्ति की इच्छा से मुक्त होकर निरन्तर रूप से कार्य करती रहती हैं।

प्रश्न 13.
मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर:
मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए पेशियों की सक्रियता, समुचित विश्राम तथा सन्तुलित आहार आवश्यक है।

प्रश्न 14.
मांसपेशियों की टूट-फूट की मरम्मत के लिए आहार में किस तत्त्व का अतिरिक्त समावेश होना चाहिए?
उत्तर:
मांसपेशियों की टूट-फूट की मरम्मत के लिए व्यक्ति के आहार में प्रोटीन की अतिरिक्त मात्रा का समावेश होना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 3 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए-

प्रश्न 1.
कंकाल तन्त्र को सुडौलता एवं सौन्दर्य प्रदान करने वाला तन्त्र है
(क) तन्त्रिका तन्त्र
(ख) पेशी तन्त्र
(ग) परिसंचरण तन्त्र
(घ) पाचन तन्त्र।
उत्तर:
(ख) पेशी तन्त्र।

प्रश्न 2.
एक वयस्क व्यक्ति के शरीर में कुल पेशियाँ होती हैं
(क) असंख्य
(ख) 206
(ग) लगभग 600
(घ) 450.
उत्तर:
(ग) लगभग 600.

प्रश्न 3.
मांसपेशियाँ शरीर भार का कितने प्रतिशत भाग बनाती हैं-
(क) 30%
(ख) 40% (लगभग)
(ग) लगभग 50%
(घ) अनिश्चित।
उत्तर:
(ग) लगभग 50%.

प्रश्न 4.
शरीर की उन मांसपेशियों को क्या कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छा के अनुसार कार्य करती हैं
(क) अनैच्छिक पेशियाँ
(ख) ऐच्छिक पेशियाँ
(ग) हृद पेशियाँ
(घ) ये सभी।
उत्तर:
(ख) ऐच्छिक पेशियाँ।

प्रश्न 5.
ऐच्छिक पेशियों की विशेषता है
(क) ये व्यक्ति की इच्छा के अनुसार कार्य करती हैं
(ख) निरन्तर कार्य करने पर ये थक जाती हैं तथा इन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है
(ग) ये किसी-न-किसी हड्डी से सम्बद्ध होती हैं
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 6.
हृद पेशियों की विशेषता नहीं है
(क) ये हृदय में पायी जाती हैं
(ख) इनमें आड़ी धारियाँ पायी जाती हैं
(ग) कुछ समय तक निरन्तर कार्य करने पर ये थक जाती हैं
(घ) ये व्यक्ति की इच्छा से मुक्त होकर कार्य करती हैं।
उत्तर:
(ग) कुछ समय तक निरन्तर कार्य करने पर ये थक जाती हैं।

प्रश्न 7.
हृदय बना है
(क) ऐच्छिक पेशियों द्वारा
(ख) अनैच्छिक पेशियों द्वारा
(ग) हृद पेशी द्वारा
(घ) कार्टिलेज द्वारा।
उत्तर:
(ग) हृद पेशी द्वारा।

प्रश्न 8.
मांसपेशियों के स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है
(क) पर्याप्त सक्रियता
(ख) समुचित विश्राम
(ग) सन्तुलित आहार ।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 9.
मांसपेशियों के निर्माण एवं वृद्धि के लिए निम्नलिखित में से क्या आवश्यक है
(क) विटामिन और खनिज
(ख) हॉर्मोन तथा कार्बोहाइड्रेट
(ग) वसा तथा कार्बोहाइड्रेट्स
(घ) खनिज तथा प्रोटीन्स।
उत्तर:
(घ) खनिज तथा प्रोटीन्स।

प्रश्न 10.
व्यायाम करने से मांसपेशियाँ
(क) दुर्बल होती हैं
(ख) स्वस्थ एवं सक्रिय बनती हैं
(ग) क्षमता घटती है तथा संकुचित होती हैं
(घ) कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उत्तर:
(ख) स्वस्थ एवं सक्रिय बनती हैं।

प्रश्न 11.
मांसपेशीय ऊतक जो बिना थके हुए जीवनपर्यन्त क्रियाशील होता है, वह है
(क) कंकाल मांसपेशी
(ख) हृदय मांसपेशी
(ग) ऐच्छिक मांसपेशी
(घ) चिकनी मांसपेशी।
उत्तर:
(ख) हृदय मांसपेशी।

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UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 13 ज्यामिति

UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 13 ज्यामिति

अभ्यास

प्रश्न 1.
एक आयताकार खेत की लम्बाई 110 मी तथा चौड़ाई 60 मी है। इसके चारों ओर तार लगाने में कितना लंबा तार लगेगा?
हल:
आयताकार खेत की लम्बाई = 110 मी
चौड़ाई = 60 मी
आयताकार खेत की परिमाप = 2(110 + 60) = 2 × 170 = 340 मी
अतः खेत के चारों ओर 340 मी लंबा तार लगेगा।

प्रश्न 2.
एक तिकोने पार्क की भुजाएँ क्रमश: 210मी, 190 मी और 150 मी हैं। इसके चारों ओर दीवार बनाना है। दीवार कितनी लम्बी होगी?
हल:
तिकोने पार्क की भुजाएँ = 210 मी, 190 मी व 150 मी
अतः दीवार की कुल लम्बाई- तिकोने पार्क का परिमाप = 210 + 190 + 150 = 550 मी.

प्रश्न 3.
एक वर्गाकार खेत की प्रत्येक भुजा 80 मीटर है। इसके चारों ओर एक पतली मेंड़ बनी है। मेंड़ की लम्बाई बताओ।
हल:
वर्गाकार खेत की प्रत्येक भुजा
मेंड की लम्बाई = खेत का परिमाप = 4 × भुजा = 4 × 80 = 320 मी

प्रश्न 4.
दिए गए चित्र में कितने कोण हैं? कोणों के नाम लिखो-(चित्र अनुसार)
हल:
चित्र (i) में तीन कोण हैं।
(1) ∠अ ब स
(2) ∠ब स अ
(3) ब अ स

चित्र (ii) में आठ कोण हैं।
(1) ∠अ द स
(2) ∠अ स द
(3) ∠द अ स
(4) ∠अ द ब
(5) ∠अ स ब
(6) ∠स ब द
(7) ∠ब स द
(8) ∠ब द स

प्रश्न 5.
निम्नलिखित कोणों के परिमाण देखकर बताओ कौन-सा कोण किस प्रकार का है?
(क) 118°
(ख) 36°
(ग) 90°
(घ) 45°
(ड.) 160°
(च) 120°
हल:
(क) 118°– अधिक कोण
(ख) 36° – न्यून कोण
(ग) 90° – समकोण
(घ) 45°– न्यून कोण
(ड.) 160°– अधिक कोण
(च) 120°-अधिक कोण

प्रश्न 6.
निम्नलिखित आकृतियों को देखकर बताओ कि कौन-सा कोण किस प्रकार का है?
हल:
(चित्र अनुसार)
(1) ∠ स अ ब = समकोण,
(2) ∠ग क ख = न्यूनकोण
(3) ∠ स अ ब = अधिक कोण

प्रश्न 7.
चाँदे के सहायता से निम्नलिखित नाप के कोण खींचो।
UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 13 ज्यामिति 1

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