Class 10 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions वर्षवैभवम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 2 Versh Vaibhavam Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद वर्षवैभवम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ के किष्किन्धाकाण्ड से संगृहीत है। रामायण में राम-कथा के प्रसंग में स्थान-स्थान पर बड़े ही सरस, स्वाभाविक प्रकृति-वर्णन उपलब्ध होते हैं। सीता-हरण के बाद उनको खोजते हुए राम और (UPBoardSolutions.com) लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचते हैं। वहाँ उनकी भेंट सुग्रीव से होती है, जो अपने अग्रज बालि के भय से उस पर्वत पर रहता है। राम उसे अपना मित्र मानते हुए उसके अग्रज बालि को मारकर उसको किष्किन्धा का राजा बना देते हैं। तदनन्तर वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है। राम-लक्ष्मण भी माल्यवान् पर्वत पर वर्षा ऋतु का समय व्यतीत करने लगते हैं। यहीं राम ने लक्ष्मण से वर्षा के आगमन के दृश्यों का मनोहारी वर्णन किया है। किष्किन्धाकाण्ड का यह वर्षा-वर्णन अपने आप में अनुपम है।

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पाठ-सारांश

राम ने बालि को मारकर, सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य देकर माल्यवान् पर्वत के ऊपर रहते हुए वर्षा के आगमन को देखकर लक्ष्मण से कहा-हे लक्ष्मण! वर्षा का समय आ गया है। अब आकाश पर्वत के समान आकार वाले बादलों से ढक गया है। नीले मेघों के मध्य चमकती हुई बिजली रावण के पाश में छटपटाती हुई तपस्विनी सीता के समान मालूम पड़ रही है। धूल शान्त हो गयी है, वायु बर्फीली है, गर्मी की तेज धूप और चलती हुई गर्म हवाएँ नष्ट हो गयी हैं। राजाओं ने अपनी विजय-यात्राएँ स्थगित कर दी हैं और प्रवासी लोग। वापस घर लौट रहे हैं। बादलों से ढक जाने के कारण आकाश कहीं स्पष्ट और कहीं अस्पष्ट-सा दिखाई पड़ रहा है। जामुन के फल जो रस से भरे हुए हैं, खाये जा रहे हैं। अनेक अधपके आम हवा के तीव्र झोंकों से हिलकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं। जामुन के वृक्षों की शाखाएँ फलों से लदी हुई भौंरों के द्वारा रस-पान की जाती हुई प्रतीत हो रही हैं। प्यासे पक्षी मोतियों के समान स्वच्छ जल की बूंदों को अपनी चोंच फैलाकर प्रसन्न होकर पी रहे हैं। प्रसन्न भौरे वर्षा की धारा से नष्ट हुई केसर वाले कमलों को (UPBoardSolutions.com) छोड़कर केसरयुक्त कदम्ब के

फूलों के रस का पान कर रहे हैं। वर्षा की बड़ी-बड़ी धाराएँ गिर रही हैं और तेज वायु चल रही है। नदियाँ मार्गों में फैलकर आकार में विस्तृत हो तेज गति से बह रही हैं। वर्षा की धारा से धुलकर पर्वतों की चोटियाँ बड़े-बड़े आकार वाले निर्झरों से लटकती हुई मोतियों की झालरों के समान अत्यधिक सुशोभित हो रही हैं।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
स तदा बालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषिच्य च।।
वसन् माल्यवतः पृष्ठे समो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ [2007, 11]

शब्दार्थ तदा = तब। हत्वा = मारकर अभिषिच्य = राजपद पर अभिषेक करके वसन् = रहते हुए।

माल्यवतः = माल्यवान् पर्वत। यह दक्षिण भारत में एक पर्वत है। पृष्ठे = पीठ पर, ऊपरी भाग पर। अब्रवीत् = बोले, कहा।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘वर्षावैभवम् शीर्षक पाठ से उधृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अन्वय सः रामः तदा बालिनं हत्वा सुग्रीवम् (राज्ये) अभिषिच्य च माल्यवतः पृष्ठे वसन् लक्ष्मणम् अब्रवीत्।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में राम अपने मनोभावों को लक्ष्मण से व्यक्त कर रहे हैं।

व्याख्या राम ने उस समय अर्थात् सीता-हरण के पश्चात्; बालि को मारकर (UPBoardSolutions.com) और सुग्रीव को राज्य का अभिषेक करके अर्थात् राजतिलक करके माल्यवान् पर्वत के ऊपरी भाग पर निवास करते हुए लक्ष्मण से कहा।

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(2)
अयं स कालः सम्प्राप्तः समयोऽद्य जलागमः
सम्पश्य त्वं नभो मेघैः संवृत्तं गिरिसन्निभैः [2007, 10, 11, 14, 15]

शब्दार्थ सम्प्राप्तः = आ गया है। जलागमः = वर्षा ऋतु का आगमन सम्पश्य = अच्छी तरह देखो। नभः = आकाश को। मेधैः = बादलों से। संवृत्तम् = घिरे हुए। गिरिसन्निभैः = पर्वतों के समान।

अन्वय अद्य अयं सः कालः सम्प्राप्तः (य:) समय: जलागमः। त्वं गिरिसन्निभैः मेघैः संवृत्तं नभः सम्पश्य।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में राम लक्ष्मण से वर्षा ऋतु के आगमन की बात कह रहे हैं।

व्याख्या आज यह वह समय आ पहुँचा है, जो समय वर्षा ऋतु के आगमन का होता है। तुम पर्वतों के समान; अर्थात् विशालकाय आकार वाले बादलों से घिरे हुए आकाश को भली-भाँति देखो।

(3)
नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे।
स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी ॥ [2007,08, 10, 13]

शब्दार्थ नीलमेघाश्रिता = काले बादलों का आश्रय लेने वाली। विद्युत् = बिजली। (UPBoardSolutions.com) स्फुरन्ती = चमकती हुई। प्रतिभाति मे = मुझे प्रतीत होती है। स्फुरन्ती = छटपटाती हुई। रावणस्याङ्के= रावण की गोद में। वैदेही = सीता। तपस्विनी असहाय, बेचारी।

अन्वय नीलमेघाश्रिता स्फुरन्ती विद्युत् मे रावणस्य अङ्के स्फुरन्ती तपस्विनी वैदेही इव प्रतिभाति।

प्रसंग प्रस्तुते श्लोक में बादलों के मध्य चमकती बिजली की तुलना सीता से की गयी है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि काले बादलों का आश्रय लेकर चमचमाती हुई बिजली मुझे ऐसी प्रतीत हो रही है, जैसे रावण की गोद में छटपटाती हुई असहाय सीता हो।

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(4)
रजः प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायुः, निदाघदोषप्रसराः प्रशान्ताः।
स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां, प्रवासिनो यान्ति नराः स्वदेशान् ॥ [2006, 09, 11, 15]

शब्दार्थ रजः = धूल। प्रशान्तम् = पूर्णतया शान्त हो गयी है। सहिमः = बर्फ के कणों से युक्त, अत्यन्त शीतल। निदाघदोषप्रसराः = गर्मी के तेज धूप, लू आदि दोषों का विस्तार स्थिता = रुक गयी है। वसुधाधिपानाम् (वसुधा + अधिपानाम्) = राजाओं की। प्रवासिनः = जीविका आदि के लिए विदेश में गये हुए। यान्ति = जा रहे हैं। स्वदेशान् = अपने देशों को।

अन्वय अद्य रज: प्रशान्तं, वायुः सहिमः (अस्ति), निदाघदोषप्रसरा: प्रशान्ताः (अभवन्), वसुधाधिपानां यात्रा हि स्थिता, प्रवासिनः नराः स्वदेशान् यान्ति।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वर्षाकालीन वातावरण का वर्णन किया गया है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि आज धूल पूर्णतया शान्त हो गयी है। वायु बर्फ के कणों से युक्त अर्थात् अत्यन्त शीतल है। गर्मी के तेज धूप, लू आदि दोषों का विस्तार पूर्णतया शान्त हो गया है। राजाओं की (विजय) यात्राएँ रुक गयी हैं। प्रवासी अर्थात् जीविका (UPBoardSolutions.com) के लिए दूसरे स्थानों में जाकर बसने वाले लोग अपने स्थानों को अर्थात् घरों को (लौटकर) जा रहे हैं।

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(5)
क्वचित् प्रकाशं क्वचिदप्रकाश, नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति
क्वचित् क्वचित् पर्वतसन्निरुद्धं, रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य॥ [2008]

शब्दार्थ क्वचित् = कहीं पर प्रकाशम् = स्पष्ट, स्वच्छ। अप्रकाशम् = अप्रकट, मलिन, अस्पष्ट नभः = आकाश। प्रकीर्णाम्बुधरं = बिखरे हुए बादलों को धारण करने वाला। विभाति = शोभित हो रहा है। पर्वत-सन्निरुद्धम् = पर्वतों से आच्छादित। रूपं = स्वरूप। यथा = जैसे। शान्तमहार्णवस्य = शान्त लहरों वाले महासागर के समान।

अन्वय प्रकीर्णाम्बुधरं नभः क्वचित् प्रकाशं क्वचित् (च) अप्रकाशं विभाति। क्वचित् क्वचित् । पर्वतसन्निरुद्धं शान्तमहार्णवस्य रूपं यथा विभाति।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वर्षाकालीन आकाश की शोभा का चित्रण हुआ है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि बिखरे हुए बादलों वाला आकाश कहीं स्पष्ट दिखाई पड़ (UPBoardSolutions.com) रहा है। और कहीं अस्पष्ट सुशोभित हो रहा है। कहीं-कहीं यह पर्वतों से आच्छादित शान्त लहरों वाले महासागर के स्वरूप जैसा सुशोभित हो रहा है।

(6)
रसाकुलं षट्पदसन्निकाशं प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम्।
अनेकवर्णं पवनावधूतं भूमौ पतत्याम्नफलं विपक्वम्॥ [2006, 09, 11, 13]

शब्दार्थ रसाकुलम् = रस से पूर्णतया भरा हुआ। षट्पदसन्निकाशम् = भौंरे के समान आकार और रंग वाले; अर्थात् काले-काले)। प्रभुज्यते = खाया जा रहा है। जम्बुफलम् = जामुन का फल। प्रकामम् = अधिक मात्रा में। अनेकवर्णं = अनेक रंगों वाले। पवनावधूतम् = हवा के द्वारा हिलाये गये। भूमौ = पृथ्वी पर। पतति = गिरता है। आम्रफलं = आम का फल। विपक्वम् = विशेष रूप से पका हुआ।

अन्वय रसाकुलं षट्पद सन्निकाशं जम्बुफलं प्रकामं प्रभुज्यते। अनेकवर्णं पवनावधूतं विपक्वम् आम्रफलं भूमौ पतति।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वर्षाकाल में जामुन के फल की मनोहारी छटा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि रस से पूर्णतया भरे हुए भौंरों के समान काले रंग के जामुन के फल अत्यधिक मात्रा में खाये जा रहे हैं। अनेक रंगों वाले, वायु के झोंकों के द्वारा हिलाये गये, विशेष रूप से पके हुए आम के फल जमीन पर गिर रहे हैं।

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(7)
अङ्गारचूर्णोत्करसन्निकाशैः फलैः सुपर्याप्तरसैः समृद्धाः ।
 जम्बुद्वमाणां प्रविभान्ति शाखाः निपीयमाना इव षट्पदीर्घः ॥

शब्दार्थअङ्गारचूर्णोत्करसन्निकाशैः = कोयले के चूरे के समूह के समान; अर्थात् (UPBoardSolutions.com) काली कान्ति वाले। सुपर्याप्तरसैः = खूब अधिक रस वाले। समृद्धाः = सम्पन्न, युक्त। जम्बुद्माणां = जामुन के वृक्षों की। प्रविभान्ति = लग रही हैं। शाखाः = शाखाएँ। निपीयमाना इव = मानो पी जाती हुई। षट्पदीधैः = भौंरों के समूहों से।

अन्वय अङ्गारचूर्णोत्करसन्निकाशैः सुपर्याप्तरसैः फलैः समृद्धयः जम्बुद्रुमाणां शाखाः षट्पदौघैः निपीयमाना इव प्रविभान्ति।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में फलों से लदे जामुन के वृक्ष की सुन्दरता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि कोयलों के चूर्ण के ढेर के समान दीखने वाले; अर्थात् अत्यधिक काली कान्ति वाले, पर्याप्त रस से भरे हुए, फलों से लदी हुई जामुन के वृक्षों की शाखाएँ ऐसी लग रही हैं। मानो भौंरों के समूह जामुनों का रसपान कर रहे हों।

(8)
मुक्तासकाशं सलिलं पतलै, सुनिर्मलं पत्रपुटेषु लग्नम्।
आवर्त्य चञ्चु मुदिता विहङ्गाः, सुरेन्द्रदत्तं तृषिताः पिबन्ति ॥

शब्दार्थ मुक्तासकाशम् = मोती के समान कान्ति वाला। सलिलं = जल। पतत् = गिरते हुए। सुनिर्मलं = अत्यन्त स्वच्छ। पत्रपुटेषु लग्नम् = पत्तों के मध्य भागों में लगे हुए। आवज्यं = फैलाकर। चञ्चु = चोंच को। मुदिताः = प्रसन्न होते हुए। विहगाः = पक्षी। सुरेन्द्रदत्तम् = इन्द्र के द्वारा दिये गये। तृषिताः = प्यासे। पिबन्ति = पी रहे हैं।

अन्वय मुक्तासकाशं, सुनिर्मलं पतत् वै पत्रपुटेषु लग्नं सुरेन्द्रदत्तं सलिलं तृषिताः (UPBoardSolutions.com) विहङ्गाः चञ्चुम् आवर्थ्य मुदिता (सन्तः) पिबन्ति।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में पत्तों पर स्थित जल-बिन्दुओं को पक्षियों द्वारा पीने का वर्णन है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि मोती के समान कान्ति वाले, अत्यधिक स्वच्छ, गिरते हुए और पत्तों के मध्य भाग में लगे हुए, इन्द्र देवता द्वारा दिये गये उस जल को प्यासे पक्षी अपनी चोंच फैलाकर प्रसन्न होते हुए पी रहे हैं।

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(9)
नवाम्बुधाराहतकेसराणि द्रुतं परित्यज्य सरोरुहाणि।।
कदम्बपुष्पाणि सकेसराणि नवानि हृष्टा भ्रमराः पिबन्ति ॥

शब्दार्थ नवाम्बुधाराहतकेसराणि = नये वर्षा के जल की धारा से नष्ट हुए केसर वाले। द्रुतम् = शीघ्र। परित्यज्य= त्यागकर सरोरुहाणि = कमल के फूलों को कदम्बपुष्पाणि= कदम्ब के फूलों का। सकेसराणि = केसरों से युक्त। नवानि = नवीन। हृष्टा भ्रमराः = आनन्दित भौंरे। पिबन्ति = पी रहे हैं।

अन्वय हृष्टाः भ्रमरा: नवाम्बुधाराहतकेसराणि सरोरुहाणि द्रुतं परित्यज्य सकेसराणि नवानि कदम्बपुष्पाणि पिबन्ति।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भौंरों द्वारा कमल-पुष्पों के स्थान पर कदम्ब-पुष्पों के रसपान का वर्णन हुआ है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि आनन्दित भौरे; नये वर्षा के जल की धारा से जिन (UPBoardSolutions.com) कमल पुष्पों का केसर नष्ट हो गया है, उन पुष्पों को छोड़कर केसरयुक्त नये कदम्ब के पुष्प का रसपान कर रहे हैं।

(10)
वर्षप्रवेगा विपुलाः पतन्ति प्रवान्ति वाताः समुदीर्णवेगाः।
प्रनष्टकूला प्रवहन्ति शीघ्रं नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गाः ॥ [2005,07]

शब्दार्थ वर्षप्रवेगा = अत्यन्त तेज वर्षा की धाराएँ। विपुलाः = अत्यधिक पतन्ति =गिर रही हैं। प्रवान्ति = चल रही हैं। वाताः = हवाएँ। समुदीर्णवेगाः = बढ़े हुए वेग वाली। प्रनष्टकुलाः = टूटे हुए किनारों वाली। प्रवहन्ति = बह रही हैं। शीघ्रं = तेजी से। जलम् = जल को। विप्रतिपन्नमार्गाः = मार्गों में इधर-उधर फैली हुई।

अन्वय विपुलाः वर्षप्रवेगाः पतन्ति। समुदीर्णवेगा: वाता: प्रवान्ति। प्रनष्टकूला: नद्यः जलं विप्रतिपन्नमार्गाः शीघ्रं प्रवहन्ति।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वर्षा की अधिकता और उससे प्रभावित वायु और नदियों का वर्णन किया गया है।

व्याख्या श्री राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि बहुत अधिक तेज वर्षा की धाराएँ गिर रही हैं। तेज गति वाली हवाएँ चल रही हैं। नदियों में वर्षा का अधिक जल भर जाने के कारण टूटे हुए किनारों वाली नदियों का जल मार्गों में चारों ओर फैलकर तेजी से बह रहा है।

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(11)
“हान्ति कुटानि महीधराणां धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति।
महाप्रमाणैर्विपुलैः प्रपातैः मुक्ताकलापैरिव लम्बमानैः॥ [2005,09]

शब्दार्थ महान्ति = बड़े-बड़े। कुटानि = शिखर महीधराणां = पर्वतों के। धाराविधौतानि = वर्षा के जल की धारा से धुली हुई। अधिकं विभान्ति = अधिक शोभित हो रहे हैं। महाप्रमाणैः = महान् आकार वाले। विपुलैः = विशाल प्रपातैः = झरनों के द्वारा। मुक्ताकलापैः = मोतियों की लड़ियों से लम्बमानैः = लटकते हुए।

अन्वय धाराविधौतानि महीधराणां महान्ति कुटानि महाप्रमाणैः विपुलैः प्रपातैः लम्बमानैः मुक्ताकलापैः इव अधिकं विभान्ति।

प्रसंग प्रस्तुते श्लोक में वर्षाकाल के पर्वतों की शोभा वर्णित है।

व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि वर्षा की जलधारा से पर्वत धुल गये हैं। (UPBoardSolutions.com) पर्वतों के शिखरों से महान् आकार वाले झरने गिर रहे हैं। वे झरने मोती की लड़ियों के समान अत्यधिक शोभा को धारण कर रहे हैं।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) अयं स कालः सम्प्राप्तः समयोऽद्य जलागमः।
सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘वर्षावैभवम्’ नामक पाठ से ली गयी है।

[ संकेत इस पाठ की शेष समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में राम अपने भाई लक्ष्मण से वर्षा ऋतु के आगमन के विषय में बता रहे हैं।

अर्थ आज वह समय आ पहुँचा है, जो वर्षा के आगमन का है।

व्याख्या माल्यवान् पर्वत पर निवास करते हुए भगवान् श्रीराम ने बालि-वध के उपरान्त एक दिन पर्वत पर उठते हुए विशालकाय बादलों को देखा। उन्हीं बादलों को अपने छोटे भाई लक्ष्मण को दिखाते हुए राम कहते हैं कि पर्वत पर उमड़ते हुए इन बादलों से यह जान पड़ता है कि अब वर्षा ऋतु का आगमन हो गया है। यह इसलिए भी प्रतीत हो रहा है क्योंकि वातावरण में उड़ने वाली धूल शान्त हो गयी है, तेज और गर्म हवाओं (लू) का चलना बन्द हो गया है और बादलों के मध्य बिजली रह-रहकर चमक रही है।

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(2) स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी।। [2006,09, 14]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में राम वर्षा ऋतु में बादलों के बीच चमकती हुई बिजली की तुलना सीता से कर रहे हैं।

अर्थ जैसे रावण के अंक (पाश) में छटपटाती हुई सीता।

व्याख्या वर्षा ऋतु में आकाश में बादल छाये हुए हैं और बादलों के बीच बिजली रह-रहकर चमक रही है। श्रीराम उसको देखकर विचलित हो उठते हैं; क्योंकि वह बिजली उनको रावण की पाश (बन्धन) में तड़पती हुई सीता के समान दिखाई पड़ रही है। सीता (UPBoardSolutions.com) पतिव्रता नारी हैं, इसलिए वे परपुरुष का स्पर्श तक नहीं कर सकतीं। राम को भी उनकी पतिभक्ति-परायणता पर पूर्ण विश्वास है। इसीलिए वे कल्पना कर रहे हैं कि जिस प्रकार बादलों में चमकती बिजली मानो क्रोध, बेचैनी और आवेश में बादल के पाश से निकलकर भागना चाहती है, उसी प्रकार असहाय सीता भी रावण के पाश से छूटने का भरपूर प्रयास कर रही होंगी।

(3) रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य। [2015)

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वर्षाकालीन आकाश की तुलना शान्त समुद्र से की गयी है।

अर्थ
लहरों से रहित अर्थात् शान्त महासागर के समान स्वरूप।

व्याख्या
श्रीराम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि जो बादल वर्षा के पूर्व समग्र आकाश को आच्छादित किये हुए थे, वे वर्षा के हो जाने पर बिखर गये हैं। बिखरे हुए बादल आकाश में प्रकट और अप्रकट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं। इस कारण आकाश पर्वतों से युक्त शान्त महासागर के समान दिखाई पड़ रहा है। आशय यह है कि जहाँ पर आकाश में बादलों की विद्यमानता है वहाँ ये बादल ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे किसी शान्त अर्थात् लहरों से रहित समुद्र में कोई पर्वत उठ आया हो।

(4) भूमौ पतत्याग्रफलं विपक्वं

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में भूमि पर गिरे हुए आम के फलों का वर्णन किया गया है।

अर्थ विशेष रूप से पंके हुए आम के फल पृथ्वी पर गिर रहे हैं।

व्याख्या श्रीराम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि वर्षा के होने के कारण आम के फल; जो पहले वृक्षों पर ही लगे हुए थे; विशेष रूप से पक जाने के कारण अर्थात् पूर्णरूपेण सुस्वादु हो जाने पर भूमि पर गिर जा रहे हैं। यह सब कुछ वर्षा के आगमन के कारण ही हो रहा है।

(5) निपीयमाना इव षट्पदीधैः। [2010]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में फलों से लदे जामुन के वृक्षों का वर्णन किया गया है।

अर्थ जैसे भौंरों के समूह रसपान कर रहे हों।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्ति में श्रीराम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि वर्षा ऋतु में जामुन के वृक्षों की शाखाएँ जामुन के फलों से लदी हुई हैं; अर्थात् जामुन के फलों से वृक्ष भरे हुए हैं और इन फलों में रस भरे हुए हैं। रस से भरे ये काले रंग के जामुन के फल ऐसे लग रहे हैं, जैसे काले रंग (UPBoardSolutions.com) के भौंरों के समूह जामुन के वृक्ष से लगकर उसके रस का पान कर रहे हैं। इस सूक्ति में जामुन के फलों की उपमा भौरों से की गयी है।।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) स तदा बालिनं …………………………………………………….. लक्ष्मणं अब्रवीत् ॥ (श्लोक 1) [2012]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति यत् सः दशरथपुत्रः रामः बालिनं हत्वा तस्य भ्रातरं सुग्रीवं च राज्यशासने अभिषिच्य माल्यवत: पृष्ठे निवसन् स्व-भ्रातरं लक्ष्मणम् अब्रवीत्।

(2) अयं स कालः …………………………………………………….. संवृतं गिरिसन्तिभैः ॥ (श्लोक 2) [2006, 12, 13, 15]

संस्कृतार्थः
रामः लक्ष्मणं कथयति यत् अद्य अयं स समय: उपस्थितः, यदा वर्षर्तुः आगच्छति, यतः त्वं सम्पश्य नभः पर्वतसदृशैः मेघैः आच्छादितः।

(3) रजः प्रशान्तं …………………………………………………….. यान्ति नराः स्वदेशान्॥ (श्लोक 4)

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः वर्षायाः प्रभावः वर्णयति यत् अद्य रजः शान्तं वायुः शीतलः ग्रीष्मदोषाः समाप्ताः अभवन्। नृपाणां यात्रा स्थगिता। परदेशगता: नराः स्वदेशान् प्रत्यागच्छन्ति।

(4) क्वचित् प्रकाशं …………………………………………………….. यथा शान्तमहार्णवस्य ॥ (श्लोक 5) [2006]

संस्कृतार्थः रामः लक्ष्मणं दर्शयन् वदति, हे लक्ष्मण! गगने क्वचित् प्रकाशः क्वचित् अन्धकारः (UPBoardSolutions.com) च भवति। गगने मेघाः आच्छादिताः भवन्ति। क्वचित् शान्तसमुद्रस्य इव मेघाः सन्निरुद्धा: विभान्ति।

(5) रसाकुलं षट्पदसन्निकाशं …………………………………………………….. आम्रफलं विपक्वम्॥ (श्लोक 6)

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके प्रावृट्कालसुषमा वर्णयन् कविः कथयति यत् वर्षर्ती भ्रमरसमानानि कृष्णवर्णानि सरसानि सुस्वादूनि जम्बुफलानि यथेच्छम् आस्वादयन्ति। वायुवेगेन आलोडितानि पक्वानि सुमधुराणि विविधवर्णानि आम्रफलानि धरायां पतन्ति।

(6) मुक्तासकाशं सलिलं ……………………………………………………..तृषिताः पिबन्ति ॥ (श्लोक 8)

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संस्कृतार्थः सुरेन्द्रेण दत्तम्, आकाशात् पतितं, मुक्तानिर्मलं, पत्राणां पुटेषु संलग्नं, जलं तृषिताः खगाः प्रसन्नं भूत्वा चञ्चु प्रसार्य पिबन्ति।

(7) नवाम्बुधारा …………………………………………………….. भ्रमराः पिबन्ति ॥ (श्लोक 9) [2007]

संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके रामः लक्ष्मणं कथयति यत् वर्षाकाले वर्षाजलं कमलानां केसराणि अपनयति। अतः प्रसन्नाः भ्रमराः तानि पुष्पाणि परित्यज्य सकेसराणि नवानि कदम्बस्य पुष्पाणि पिबन्ति।

(8) वर्षप्रवेगा विपुलाः …………………………………………………….. जलं विप्रतिपन्नमार्गाः ॥ (श्लोक 10) [2007]

संस्कृतार्थः श्रीरामः लक्ष्मणं प्रति वर्षत: वर्णयन् कथयति यत् अत्यधिका: वर्षाधारा: आकाशात् पतन्ति समुदीर्णवेगा: पवना: प्रवहन्ति। नद्यः स्वानि कुलानि नष्टं कृत्वा मार्गेषु जलम् इतस्ततः प्रसारयित्वा शीघ्र प्रवहन्ति।

(9) महान्ति कुटानि …………………………………………………….. कलापैरिव लम्बमानैः ॥ (श्लोक 11)

संस्कृतार्थः
रामः लक्ष्मणं कथयति यत् वर्षाकाले वर्षायाः जलेन विधा एतानि पर्वताः अधिकं शोभन्ते। पर्वतानां शिखरैः यदा विपुला: प्रपाता: पतन्ति तदा ते लम्बमानैः मुक्ताकलापैः इव अधिकं शोभन्ते।

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Class 10 Sanskrit Chapter 3 UP Board Solutions नैतिकमूल्यानि Question Answer

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These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 3 नैतिकमूल्यानि (गद्य – भारती)

परिचय

‘नयन’, ‘नीति’ और ‘न्याय’ तीनों समानार्थक शब्द हैं। इनमें अन्तर केवल इतना ही है कि ‘नयन नपुंसकलिंग है, ‘नीति’ स्त्रीलिंग और ‘न्याय’ पुंल्लिग। ये तीनों शब्द संस्कृत की ‘नी’ धातु से निष्पन्न हैं, जिसका अर्थ है–आगे बढ़ना या ले जाना। ‘नीति’ न्याय का ही दूसरा रूप है। यह समाज और व्यक्ति दोनों को ही उन्नति की ओर ले जाती है। यह धर्म से भिन्न है, लेकिन धर्म से कम कल्याण करने वाली नहीं है। इसका सम्बन्ध इसी लोक के जीवन से है। बहुत-से (UPBoardSolutions.com) ऐसे कार्य जो न तो धर्म के अन्तर्गत आते हैं और न ही न्याय की सीमा में, इनकी गणना नीति के अन्तर्गत की जाती है और इन्हें ही नैतिक मूल्य कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में नैतिक मूल्यों को विस्तार से समझाया गया है तथा उनका धर्म से सम्बन्ध भी बताया गया है। प्रत्येक व्यक्ति को नैतिक मूल्यों को जानकर व समझकर उनका पालन करना चाहिए।

पाठ-सारांश [2006, 08, 10, 11, 12, 13, 14]

नीति का स्वरूप एवं नीति-ग्रन्थ जिस मार्ग से कार्य करने से मनुष्य का जीवन सुन्दर और सफल होता है, उसे नीति कहते हैं। नीतिपूर्वक व्यवहार से केवल मनुष्य या समाज का ही कल्याण नहीं होता अपितु इसके अनुरूप आचरण करने से प्रजा, शासक और सम्पूर्ण संसार का कल्याण होता है। प्राचीन काल से ही नीतिकारों ने नीति-वाक्यों की रचना की; अतः साधारण लोग भी व्यवहार के लिए नीति वाक्यों और श्लोकों को कण्ठस्थ करते हैं। चाणक्यनीति’, ‘विदुरनीति’, ‘विदुलोपाख्यान’, ‘पञ्चतन्त्र’, शुक्रनीति’, ‘नीतिसार’, नैतिकमूल्यानि ‘नीतिद्विषष्टिका’, ‘भल्लाटशतक’, ‘नीतिशतक’, ‘बल्लालशतक’, ‘दृष्टान्तशतक’ आदि संस्कृत के प्रमुख नीतिग्रन्थ हैं।

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नीति : काव्य का मुख्य प्रयोजन किसी भी राष्ट्र के साहित्य में उसके प्रारम्भिक काल से ही यह विश्वास प्रचलित था कि नीति-परितोष’ काव्य को एक मुख्य प्रयोजन है। इसीलिए प्लेटो, अरस्तू, पेटर, होरेस इत्यादि पाश्चात्य विद्वानों ने भी काव्य के अनेकानेक प्रयोजनों में नैतिक विकास एवं सन्तोष को काव्य का एक मुख्य साधन माना है।

नैतिकता की आवश्यकता नैतिक मूल्यों से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। नैतिकता से ही व्यक्ति, समाज, देश और विश्व का कल्याण होता है। नैतिक आचरण से मानव में त्याग, तप, विनय, सत्य, न्यायप्रियता आदि गुणों का विकास होता है। इसके साथ ही (UPBoardSolutions.com) व्यक्ति और समाज ईष्र्या, द्वेष, छल, कलह आदि दोषों से मुक्त होते हैं।

दूसरों का हित नैतिक आचरण का मुख्य उद्देश्य परहित-साधन है। नैतिक आचरण से युक्त मनुष्य अपनी हानि करके भी दूसरों का कल्याण करता है। समाज में प्रचलित रूढ़ियाँ सबके हित के लिए नहीं होती हैं। इसलिए प्रबुद्ध विद्वान् उसका विरोध करते हैं और नवीन आदर्श स्थापित करते हैं, परन्तु उनके ऐसा करने पर भी नैतिक मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। शाश्वत धर्म सदैव अपरिवर्तनीय होता है और नीति की अपेक्षा अधिक व्यापक भी होता है। नीति से केवल लौकिक कल्याण होता है, जब कि धर्म लौकिक और पारलौकिक दोनों तरह का कल्याण करता है।

धर्म की परिभाषा धर्माचार्यों ने ”यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस् सिद्धिः स धर्मः” कहकर धर्म की व्याख्या की है। जिस कर्म से मानव का इस लोक में कल्याण होता है और परलोक में उसे उच्च स्थान प्राप्त होता है, वह धर्म है। मनुस्मृति में धर्म के दस अंग बताये गये हैं–धृति (धैर्य), क्षमा, दान, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य और अक्रोध।

धर्म और नीति तीर्थयात्रा, पवित्र नदियों में स्नान, यज्ञ करना और कराना, गुरु-माता-पिता की सेवा, सन्ध्या-वन्दना और सोलह संस्कार मुख्य रूप से धर्म के वाचक हैं। इन कर्मों में नीति का मिश्रण नहीं है; अतः धर्म व्यापक है। धैर्य, दया, सहनशीलता, सत्य, परोपकार आदि के आचरण में धर्म और नीति दोनों का मिश्रण है। दोनों का समान रूप से आचरण करने से संसार का परम कल्याण होता है। नीतिकारों के मतानुसार-जीव-हिंसा और परधनापहरण से निवृत्ति, सत्यभाषण, चुगलखोरी से मुक्ति, सत्पात्रों और दोनों को दान, लोभ का त्याग, दया, सहनशीलता, परोपकार, श्रद्धा, गुरुजनों में अनुराग, विनयशीलता आदि नैतिकता (UPBoardSolutions.com) के गुण हैं। गर्वहीनता, अतिथि-सत्कार, न्याय से अर्जित जीविका, ईर्ष्या का अभाव, सत्संग, प्रेम, दुर्जन-संगतिं का त्याग, धैर्य, क्षमा, वाक्-पटुता, समय का सदुपयोग इत्यादि नैतिकता के आचरणों से व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण होता है।

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अत: व्यक्ति को नैतिक आचरण करके अपना, समाज का, देश का और विश्व का कल्याण करना चाहिए।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) नयनं नीतिः, नीतेरिमानि मूल्यानि नैतिकमूल्यानि। यथा सरण्या कार्यकरणेन मनुष्यस्य जीवन सुचारु सफलञ्च) भवति सा नीतिः कथ्यते। इयं नीतिः केवलस्य जनस्य समाजस्य कृते एव न भवति, अपितु जनानां, नृपाणां समेषां चे व्यवहाराय भवति। नीत्या चलनेन, व्यवहरणेन, प्रजानां शासकानां समस्तस्य लोकस्यापि कल्याणं भवति। [2006]

शब्दार्थ नयनं = ले जाना। नीतेरिमानि = नीति के ये। सरण्या = मार्ग से। सुचारु = सुन्दर। कथ्यते = कही जाती है। कृते = हेतु, लिए। समेषाम् = सबके। कल्याणं = कल्याण, भला।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘नैतिकमूल्यानि’ शीर्षक पाठ से उधृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीति के स्वरूप एवं प्रयोजन के विषय में बताया गया है।

अनुवाद ले जाना’ नीति कहलाता है। नीति के ये मूल्य (ही) नैतिक मूल्य कहलाते हैं। जिस मार्ग से कार्य करने से मनुष्य का जीवन सुन्दर और अच्छी प्रकार से सफल होता है, वह नीति कहलाता है। यह नीति केवल मनुष्य और समाज के लिए ही नहीं है, अपितु मनुष्यों और (UPBoardSolutions.com) राजाओं सभी के व्यवहार के लिए होती है। नीति के द्वारा चलने से, व्यवहार करने से, प्रजा का, शासकों का, सारे संसार को भी कल्याण होता है।

(2) पुरातनकालादेव भारते कवयः नीतिकाराः मनोरमया सरसया गिरा नीतिंवाक्यानि, कथाभिः श्लोकैश्च व्यरचयन्। इत्थं नीतिशास्त्राणि व्यवहारविदे, कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे बभूवुः। फलन्त्विदं सम्पन्नं साधारणाः अपि जनाः व्यवहाराय नीतिवाक्यानि नीतिश्लोकांश्च गलबिलाधः कुर्वन्ति स्म। यथा च चाणक्यनीतिः, विदुरनीतिः, विदुलोपाख्यानम्, पञ्चतन्त्रम्, शुक्रनीतिः, घटकर्परकृतः नीतिसारः, सुन्दरपाण्डेयेन कृता ‘नीतिद्विषष्टिका’, भल्लाटशतकम्, भर्तृहरिकृतं नीतिशतकम्, ‘बल्लालशतकम्’, ‘दृष्टान्तशतकम्’ इत्यादि बहूनि नीतिपुस्तकानि संस्कृते उपलभ्यन्ते। [2012, 15]

शब्दार्थ पुरातनकालादेव = प्राचीन काल से ही। गिरा = वाणी के द्वारा, भाषा के द्वारा। कथाभिः = कथाओं के द्वारा। व्यरचन् = रचना की है। इत्थम् = इस प्रकार व्यवहारविदे = व्यवहार को जानने के लिए। कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे (कान्ता + सम्मिततया + उपदेशयुजे) = स्त्री से सम्मित होने से उपदेश के लिए। गलबिलाधः (गल + बिल + अधः) = गले के छेद के नीचे अर्थात् कण्ठस्था उपलभ्यन्ते = प्राप्त होती हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीति के स्वरूप और प्रयोजन को बताते हुए प्रमुख नीति-ग्रन्थों के नाम दिये गये हैं।

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अनुवाद प्राचीन काल से ही भारत में कवियों और नीतिकारों ने सुन्दर और सरस वाणी द्वारा कथाओं, श्लोकों से नीति-वाक्यों की रचना की। इस प्रकार नीतिशास्त्र व्यवहार को जानने के लिए, स्त्री से सम्मित होने से उपदेश से युक्त होने के लिए हुए। परिणाम यह हुआ कि सम्पन्न, साधारण लोगों ने भी व्यवहार के लिए नीति-वाक्यों और नीति-श्लोकों को कण्ठस्थ कर लिया था। जैसे कि चाणक्यनीति, विदुरनीति, विदुलोपाख्यान, पञ्चतन्त्र, शुक्रनीति, घटकर्पर द्वारा रचित नीतिसार, सुन्दरपाण्डेय द्वारा रचित नीतिद्विषष्टिका, भल्लाटशतक, भर्तृहरि द्वारा रचित नीतिशतक, बल्लालशतक, दृष्टान्तशतक इत्यादि बहुत-सी नीति पुस्तकें संस्कृत में = प्राप्त होती हैं।

(3) विचार्यमाणे साहित्ये आदिकालादेव सर्वेष्वपि राष्ट्रेषु अयं विश्वासः प्रचलितः आसीत्, यत् काव्यास्योन्येषु (UPBoardSolutions.com) प्रयोजनेषु सत्स्वपि एकं मुख्यं प्रयोजनं नैतिकः परितोषः। प्लेटो, अरस्तू, पेटर, होरेसादि सर्वैः विचारकैः काव्यस्य मुख्यं प्रयोजनं नैतिकविकासः एव स्वीकृतः।

शब्दार्थ विचार्यमाणे साहित्ये = विचार करने पर साहित्य में। आदिकालादेव = आदिकाल से ही। सत्स्वपि (सत्सु + अपि) = होते हुए भी। प्रयोजनम् = प्रयोजन, कारण, हेतु। परितोषः = सन्तोष। स्वीकृतः = स्वीकार किंया गया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नीति का प्रयोजन तथा कुछ पाश्चात्य नीतिकारों का उल्लेख किया गया है।

अनुवाद साहित्य में विचार किये जाने पर आदिकाल से ही सभी राष्ट्रों में यह विश्वास प्रचलित था कि काव्य के अन्य प्रयोजनों के होने पर भी एक मुख्य प्रयोजन नैतिक सन्तोष था। प्लेटो, अरस्तू, पेटर, होरेस आदि। सभी विचारकों ने काव्य का मुख्य प्रयोजन नैतिक विकास ही स्वीकार किया है।

(4) नैतिकमूल्यैः व्यक्तेः सामाजिक प्रतिष्ठाभिवर्धते। मानवकल्याणाय नैतिकता आवश्यकी। नैतिकतैव व्यक्तेः, समाजस्य, राष्ट्रस्य, विश्वस्य कल्याणं कुरुते। नैतिकताचरणेनैव मनुष्येषु त्यागः, तपः, विनयः, सत्यं, न्यायप्रियता एवमन्येऽपि मानवीयाः गुणाः उत्पद्यन्ते। नैतिकतया मनुष्योऽन्यप्राणिभ्यः भिन्नः जायते। लदाचरणेन व्यक्तेः समाजस्य च जीवनम् अनुशासितं निष्कण्टकं च भवति। व्यक्तेः समाजस्य, वर्गस्य, देशस्य च समुन्नयनावसरो लभ्यते। समाजः ईष्र्या-द्वेषच्छल-कलहादिदोषेभ्यः मुक्तो भवति। अस्माकं सामाजिकाः, अन्ताराष्ट्रियाः सम्बन्धाः नैतिकताचरणेन दृढाः भवन्ति। अतः नैतिकताशब्दः सच्चरित्रतावाचकः, सुखमयमानवजीवनस्याधारः अस्ति।

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नैतिकमूल्यैः व्यक्तेः ……………………………………….. उत्पद्यन्ते ।
नैतिकमूल्यैः व्यक्तेः …………………………………… मुक्तो भवति [2010,12]

शब्दार्थ अभिवर्धते = बढ़ती है। व्यक्तेः = व्यक्ति का। नैतिकताचरणेनैव = नैतिकता के आचरण से ही। उत्पद्यन्ते = उत्पन्न होते हैं। अन्यप्राणिभ्यः = दूसरे प्राणियों से। समुन्नयनावसरः = ठीक उन्नति का अवसर। मुक्तो भवति = छूट जाता है। सच्चरित्रतावाचकः = सदाचार का वाचक अर्थात् बताने वाला। जीवनस्याधारः = जीवन का आधार

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नैतिक मूल्यों के आचरण का महत्त्व बताया गया है।

अनुवाद नैतिक मूल्यों से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। मानव-कल्याण के लिए नैतिकता आवश्यक है। नैतिकता ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण करती है। नैतिकता के आचरण से ही मनुष्यों में त्याग, तप, विनय, सत्य, न्यायप्रियता एवं इसी प्रकार के दूसरे भी मानवीय (UPBoardSolutions.com) गुण उत्पन्न होते हैं। नैतिकता से मनुष्य दूसरे प्राणियों से भिन्न हो जाता है। उसके आचरण से व्यक्ति और समाज का जीवन अनुशासित और निष्कण्टक होता है। व्यक्ति, समाज, वर्ग और देश की उन्नति का अवसर प्राप्त होता है। समाज ईष्र्या, द्वेष, छल, कलह आदि दोषों से मुक्त होता है। हमारे सामाजिक और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध नैतिकता के आचरण से मजबूत होते हैं। अतः ‘नैतिकता’ शब्द सच्चरित्रता का वाचक, सुखमय मानव-जीवन का आधार है।

(5) इदन्तु सम्यक् वक्तुं शक्यते यत् नैतिकताचरणस्य, नैतिकतायाश्च मुख्यमुद्देश्यं स्वस्य अन्यस्य च कल्याणकरणं भवति। कदाचित् एवमपि दृश्यते यत् परेषां कल्याणं कुर्वन् मनुष्यः स्वीयां हानिमपि कुरुते। एवंविधं नैतिकाचरणं विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च मन्यते। परेषां हितं नैतिकतायाः प्राणभूतं तत्त्वम्। [2008]

शब्दार्थ इदन्तु = यह तो। सम्यक् = भली प्रकार कल्याणकरणम् = कल्याण करना। कदाचित् = कभी। एवमपि = ऐसा भी। कुर्वन् = करते हुए। स्वीयाम् = अपनी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नैतिक मूल्यों के आचरण का महत्त्व बताया गया है।

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अनुवाद यह तो भली प्रकार कहा जा सकता है कि नैतिकता के आचरण का और नैतिकता का मुख्य उद्देश्य अपना और दूसरों का कल्याण करना होता है। कभी ऐसा भी देखा जाता है कि दूसरों का कल्याण करता हुआ मनुष्य अपनी हानि भी करता है। इस प्रकार का नैतिक आचरण विशेष और महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दूसरों का हित नैतिकता का प्राणभूत तत्त्व है।

(6) कदाचित् एवमपि दृश्यते यत्समाजे प्रचलिता रूढिः सर्वेषां कृते हितकरी न भवति। अतः प्रबुद्धाः विद्वांसः तस्याः रूढः विरोधमपि कुर्वन्ति। परं तैः आचरणस्य व्यवहारे नवीनः आदर्शः स्थाप्यते। यः कालान्तरे समाजस्य कृते हितकरः भवति। एवं सदाचरणेऽपि परिवर्तनं दृश्यते। परं वस्तुतः यानि नैतिकमूल्यानि सन्ति। तेषु परिवर्तनं न भवति। यथा सनातनो धर्मः न परिवर्तते तथा नैतिकमूल्यान्यपि स्थिराणि एव। एवं धर्मे नीतौ च दृढीयान् सम्बन्धो दृश्यते। परं द्वयो भेदोऽपि वर्तते। (UPBoardSolutions.com) धर्मशब्दः व्यापकः अस्ति। नीतिस्तु व्याप्या धर्मे एव विलीयते। यानि अवश्यकरणीयानि कर्त्तव्यानि यैः पुण्यानि नोपलभ्यन्ते तेषामपि गणना धर्मे कृता मेहर्षिभिः धर्माचार्यैः। नीतिः लौकिकं कल्याणं कुरुते। धर्मस्तु लौकिकं पारलौकिकञ्च कल्याणं कुरुते। उभयोः कुत्रापि साङ्कर्त्यमपि प्राप्यते। धर्मः अलौकिक शक्ति प्रकटयति। सः मुक्तेः मार्गमपि प्रशस्तं करोति। परलोकमपि प्रदर्शयति कल्पयति च। नीतिः लौकिकं हितं साधयति। परं नीतिधर्मयोः साहचर्यं सर्वैरेव स्वीक्रियते।

कदाचित् एवमपि …………………………………. स्थिराणि एवं। [2013]
धर्मशब्दः व्यापकः …………………………………… संर्वैरेव स्वीक्रियते। [2009]

शब्दार्थ रूढिः = पहले से प्रचलित परम्परा प्रबुद्धाः = जगे हुए, जागरूका स्थाप्यते = स्थापित किया जाता है। दृश्यते = दिखाई देता है। कालान्तरे = समय बीतने पर। परिवर्तते = बदलता है। नीतौ = नीति में। दृढीयान् = अधिक छ। व्यापकः = विस्तृत, फैला हुआ। व्याप्या = व्याप्त होने वाली, सीमित स्थान में रहने वाली। विलीयते = विलीन हो जाती है, मिल जाती है। नोपलभ्यन्ते = नहीं प्राप्त होते हैं। पारलौकिकम् = परलोक से सम्बन्धित। कुत्रापि = कहीं भी। साङ्कर्यमपि = मिश्रण भी। प्रशस्तम् = सुन्दर। कल्पयति = कल्पना करता है। साधयति = साधता है, पूरा करता है। स्वीक्रियते = स्वीकार किया जाता है।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में नैतिक आचरण, नीति और धर्म के अन्तर तथा साहचर्य पर प्रकाश डाला गया है।

अनुवाद कभी ऐसा भी देखा जाता है कि समाज में प्रचलित रूढ़ि (प्राचीन परम्परा) सबके लिए हितकारी नहीं होती है; अतः जागरूक विद्वान् उस रूढ़ि का विरोध भी करते हैं, परन्तु उनके आचरण के व्यवहार में नवीन आदर्श स्थापित किया जाता है, जो कालान्तर में समाज के लिए हितकारी होता है। इस प्रकार सदाचरण करने में भी परिवर्तन दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में जो नैतिक मूल्य हैं, उनमें परिवर्तन नहीं होता है। जैसे सनातन (सदा बना रहने वाला, शाश्वत) धर्म नहीं बदलता है, उसी प्रकार नैतिक मूल्य भी स्थिर ही हैं। इस प्रकार धर्म और नीति में दृढ़ सम्बन्ध दिखाई देता है, परन्तु दोनों में अन्तर भी है। धर्म शब्द व्यापक है, नीति तो व्याप्त है, जो धर्म में ही विलीन हो जाती है। जो अवश्य करने योग्य कर्तव्य हैं, जिनसे पुण्य की प्राप्ति नहीं होती है, उनकी गणना महर्षियों और धर्माचार्यों ने धर्म में की है। नीति लौकिक कल्याण करती है, धर्म लौकिक और पारलौकिक कल्याण करता है। दोनों में कहीं मिश्रण भी प्राप्त होता है। धर्म तो अलौकिक शक्ति को प्रकट करता है। वह मुक्ति के मार्ग को भी प्रशस्त करता है। (UPBoardSolutions.com) परलोक को दिखाता है। और कल्पना करता है। नीति सांसारिक हित करती है, परन्तु नीति और धर्म का साथ सभी स्वीकार करते हैं।

(7) दार्शनिकैः, धर्माचार्यैः पौराणिकैश्च धर्मः परिभाषितः यथा-“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः” यतः यस्मात् कर्मणः, इहलोके कल्याणं जायते, परत्र परलोके च शोभनं स्थानं जनैः लभ्यते नरकापातो न भवेत् येन, स धर्मः। एवं महाभारते-ध्रियते धर्मः, धारणाद्धर्मः यतः धारयते प्रजाः। धर्मशास्त्रकारेण मनुना –

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीविद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

इति मनुस्मृतौ दशस्वरूपको धर्मः उपवर्णितः। इत्थं धर्माचरणे नैतिकताचरणे च साङ्कर्यमुपलभ्यते। शब्दार्थ दार्शनिकैः = दर्शन (शास्त्र) के ज्ञाता। पौराणिकैः = पुराण को जानने वाले परिभाषितः = परिभाषित किया गया। अभ्युदय = उन्नति, समृद्धि। निःश्रेयस् सिद्धिः = कल्याण की प्राप्ति होती है। परत्र = दूसरे स्थान पर, परलोक में। लभ्यते = प्राप्त किया जाता है। नरकापातः = नरक में गिरना। धियते = धारण किया जाता है। धृतिः = धैर्य। दमः = दमन करना। अस्तेयम् = चोरी करना। शौचः = पवित्रता। धीः = बुद्धि। उपवर्णितः = उल्लिखित, वर्णित। साङ्कर्यम् = मिश्रण।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में धर्म की परिभाषा दी गयी है तथा धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख भी किया गया है।

अनुवाद दार्शनिकों, धर्माचार्यों और पौराणिकों ने धर्म की परिभाषा दी है; जैसे-“जिससे उन्नति और कल्याण की प्राप्ति होती है, वह धर्म है। जिस कर्म से इस संसार में कल्याण होता है, परलोक और इस लोक में जिससे लोगों को सुन्दर स्थान प्राप्त होता है, नरक में पतन नहीं होता है, वह धर्म है। इसी प्रकार : महाभारत में कहा गया है कि “धारण किया जाता है, वह धर्म है। जिसे प्रजा को धारण कराया जाता है, वह धर्म है।” धर्मशास्त्रों के रचयिता मनु ने कहा है-“धैर्य, क्षमा, संयम, अचौर्य, शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध-ये दस धर्म के लक्षण हैं।”

मनुस्मृति में ऐसे दस स्वरूप वाले धर्म का वर्णन है। इस प्रकार धर्माचरण और नैतिकता के आचरण में मिश्रण प्राप्त होता है।

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(8) तीर्थाटनं, पावनासु नदीषु स्नानं, यजनं, याजनं, गुरुसेवा, मातृपितृसेवा, सन्ध्यावन्दनं, षोडशसंस्काराः एते मुख्यरूपेण धर्मपदवाच्याः। एषु कर्मसु नीतेः मिश्रणं नास्ति। अतः धर्मो व्यापकः। धृति-दया-सहिष्णुता-सत्य-परोपकाराद्याचरणेषु द्वयोः साङ्कर्यमस्ति। परमेतत् निश्चितं यत् द्वयोराचरणेन लोकस्य परमं कल्याणं जायते एव। नीतिकाराणां मते इमे नैतिकतायाः गुणाः यथा–जीवहिंसायाः विरक्तिः, परधनापहरणान्निवृत्तिः, सत्यभाषणं, पैशुन्यात् निवृत्तिः, सत्पात्रेभ्यः दीनेभ्यश्च दानं, (UPBoardSolutions.com) अतिलोभात् वितृष्णा, दया, सहिष्णुता, परोपकारः, गुरुजनेष्वनुरागः, श्रद्धा, विनयशीलता च। अनुत्सेकः, आतिथ्यं, न्याय्यावृत्तिः, परगुणेभ्यः ईष्र्याऽभावः, सत्सङ्गानुरक्तिः, दुष्टसङ्गान्निवृत्तिः, विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, समयस्य सदुपयोगः इत्यादयः नैतिकताचाराः एषामाचरणेनैव व्यक्तेः समाजस्य, राष्ट्रस्य विश्वस्य च सर्वथा कल्याणं सम्पद्यते।

तीर्थाटनं, पावनासु ……………………………………… विनयशीलता च। [2009]
तीर्थाटनं, पावना …………………………………. जायते एव।

शब्दार्थ पावनासु = पवित्रों में। यजनम् = यज्ञ करना। याजनं = यज्ञ कराना| नास्ति = नहीं है। परमेतत् = किन्तु यहा विरक्तिः = त्याग, छोड़ना। परधनापहरणात् = दूसरों का धन छीनने से। निवृत्तिः = छुटकारा। पैशुन्यात् = चुगली करने से। वितृष्णा = विरक्ति, अनिच्छा। अनुत्सेकः = गर्वहीनता। न्याय्यावृत्तिः = न्याय से अर्जित जीविका। विपदि = विपत्ति में। अभ्युदये = उन्नति में। सदसि = सभा में। वाक्पटुता = बोलने की कुशलता। सम्पद्यते = सम्पन्न होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में धर्म और नैतिकता के गुणों को बताया गया है और उन्हें अपनाने की प्रेरणा दी गयी है।

अनुवाद तीर्थयात्रा, पवित्र नदियों में स्नान, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, गुरु-सेवा, माता-पिता की सेवा, सन्ध्या-वन्दना आदि सोलह संस्कार-ये मुख्य रूप से धर्म शब्द के वाचक हैं। इन कामों में नीति का मिश्रण नहीं है; अत: धर्म व्यापक है। धैर्य, दया, सहनशीलता, सत्य, परोपकार आदि के आचरणों में दोनों (धर्म और नीति) का मिश्रण है। परन्तु यह निश्चित है कि दोनों के आचरण से संसार का अत्यधिक कल्याण होता ही है। नीतिकारों के मत में ये नैतिकता के गुण हैं; जैसे—जीवों की हिंसा से वैराग्य, दूसरों के धन के चुराने से छुटकारा, सत्य बोलना, चुगलखोरी से छुटकारा, सत्पात्रों और दोनों को दान देना, अधिक लोभ से विरक्ति, दयो, सहनशीलता, परोपकार, गुरुजनों पर अनुराग, श्रद्धा और विनयशीलता, गर्वहीनता, अतिथि-सत्कार, न्याय से अर्जित आजीविका, दूसरों के गुणों में ईष्र्या का अभाव, सत्संग में अनुरक्ति, दुर्जनों की संगति (UPBoardSolutions.com) से छुटकारा, विपत्ति में धैर्य धारण करना, उन्नति में क्षमाभाव, सभा में बोलने की चतुराई, समय का सदुपयोग इत्यादि नैतिकता के कार्य हैं। इनके आचरण से ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और संसार का सब तरह का कल्याण होता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनु द्वारा निर्धारित धर्म के दस लक्षण कौन-कौन-से हैं? [2006, 11]
या
मनु ने धर्म के क्या लक्षण बताये हैं? [2012, 13]
उत्तर :
धर्मशास्त्रों के रचयिता मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं –

  1. धैर्य
  2. क्षमा
  3. संयम
  4. अचौर्य
  5. शौच (पवित्रता)
  6. इन्द्रिय-निग्रह
  7. बुद्धि
  8. विद्या
  9. सत्य तथा
  10. अक्रोध।

प्रश्न 2.
नीति से सम्बन्धित संस्कृत साहित्य में उपलब्ध किन्हीं पाँच पुस्तकों व उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर :
नीति से सम्बन्धित पाँच पुस्तकों व उनके लेखकों के नाम हैं –

  1. चाणक्य द्वारा रचित ‘चाणक्य-नीतिः
  2. विदुरकृत ‘विदुर-नीतिः
  3. भर्तृहरिकृत ‘नीतिशतकम्’
  4. घटकर्परकृत ‘नीतिसार:’ तथा
  5. सुन्दर पाण्डेय कृत ‘नीतिद्विषष्टिका।

प्रश्न 3.
मनुष्य के लिए नैतिक मूल्यों की क्या आवश्यकता है? [2007,09]
या
नैतिक मूल्यों का महत्त्व लिखिए।
उत्तर :
नैतिक मूल्यों से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। नैतिकता से ही व्यक्ति, समाज, देश और विश्व का कल्याण होता है। नैतिक आचरण से मानव में त्याग, तप, विनय, सत्य, न्यायप्रियता आदि गुणों का विकास होता है तथा समाज ईष्र्या, द्वेष, छल, कलह आदि दोषों से मुक्त होता है।

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प्रश्न 4.
धर्म और नीति का पारस्परिक सम्बन्ध बताइए। [2006]
या
धर्म को परिभाषित कीजिए।
या
नीति और धर्म का अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2011]
उत्तर :
उन्नति और कल्याण की प्राप्ति जिससे होती है, वह धर्म है। धर्म और नीति परस्पर एक भी हैं और अलग-अलग भी। धर्म लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार का कल्याण करता है, किन्तु नीति मात्र लौकिक कल्याण ही करती है। दोनों में परस्पर भेद होते हुए भी विद्वान् धर्म (UPBoardSolutions.com) और नीति के साहचर्य को स्वीकार करते हैं। धर्म व्यापक शब्द है और नीति व्याप्य। इस प्रकार सभी नैतिक गुण धर्म में निहित होते हैं। और नैतिकतापूर्ण आचरण ही व्यक्ति को समाज में विशिष्ट स्थान दिलाता है।

प्रश्न 5.
प्रमुख नीति-ग्रन्थों के नाम लिखिए। [2006,07,08]
या
नीतिशास्त्र के प्रमुख तीन ग्रन्थों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर :
नीति से सम्बन्धित कुछ प्रमुख ग्रन्थ हैं –

  1. चाणक्य-नीति
  2. विदुर-नीति
  3. विदुला-उपाख्यान
  4. पञ्चतन्त्र
  5. शुक्रनीति
  6. घटकर्पर नीतिसार
  7. सुन्दरपाण्डेय-नीतिद्विषष्टिका
  8. भल्लाट-शतकम्
  9. भर्तृहरि-नीतिशतकम्
  10. बल्लाल-शतकम्
  11. दृष्टान्तशतकम् इत्यादि।

प्रश्न 6.
नैतिकता का प्राणभूत तत्त्व क्या है? [2010, 11, 13, 14]
उत्तर :
दूसरों का हित करना की नैतिकता का प्राणभूत तत्त्व है।

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प्रश्न 7.
नैतिकता का मुख्य उद्देश्य क्या है? [2012]
उत्तर :
नैतिकता का मुख्य उद्देश्य है-अपना और दूसरों का कल्याण करना। कभी-कभी दूसरों का कल्याण करता हुआ मनुष्य अपनी हानि भी कर बैठता है। इस प्रकार का आचरण विशेष और महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 8.
‘नैतिकमूल्यानि’ पाठ के आधार पर मानव-जीवन में नीति के महत्त्व को बताइए।
उत्तर :
जिस मार्ग से कार्य करने से मनुष्य का जीवन सुन्दर और सफल होता है, वह नीति कहलाता है। (UPBoardSolutions.com) नीति केवल मनुष्य और समाज के लिए ही नहीं अपितु मनुष्यों और राजाओं सभी के व्यवहार के लिए होती है। नीति के अनुसार चलने से प्रजा का, शासकों और समस्त संसार का कल्याण होता है।

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Class 10 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions उद्भिज्ज परिषद् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 2 Udbhij Parishad Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद उद्भिज्ज परिषद् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

वृक्ष मनुष्य के सबसे बड़े हितैषी हैं और मनुष्य ने सबसे अधिक अत्याचार भी वृक्षों पर ही किया है। प्रस्तुत पाठ में यह कल्पना की गयी है कि यदि मनुष्यों द्वारा किये जा रहे अत्याचार के विरोध में वृक्ष सभा करें तो उनके सभापति का भाषण कैसा होगा? वह मनुष्यों की भाषा में वृक्षों को किस रूप में सम्बोधित करेगा? प्रस्तुत पाठ में अश्वत्थ (पीपल) को वृक्षों और लताओं की सभा का सभापति बनाया गया है, जिसने मनुष्यों की हिंसा-वृत्ति और लालची स्वभाव के (UPBoardSolutions.com) कारण मनुष्य को पशुओं से ही नहीं तिनकों से भी निकृष्ट सिद्ध किया है और अपनी बात की पुष्टि में तर्क और प्रमाण भी दिये हैं।

पाठ-सारांश [2007, 10, 11, 14]

उद्भिज्जों की सभा में अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष वृक्षों और लताओं को सम्बोधित करते हुए मानवों की निकृष्टता बता रहा है –

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मानव की हिंसा-वृत्ति जीवों की सृष्टि में मनुष्य के समान धोखेबाज, स्वार्थी, मायावी, कपटी और हिंसक प्राणी कोई नहीं है; क्योंकि जंगली पशु तो मात्र पेट भरने के लिए हिंसाकर्म करते हैं। पेट भर जाने पर वे वन-वन घूमकर दुर्बल पशुओं को नहीं मारते, जब कि मानव की हिंसावृत्ति की सीमा का अन्त नहीं है। वह अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अपनी स्त्री, पुत्र, मित्र, स्वामी और बन्धु को भी खेल-खेल में मार डालता है। वह मन बहलाने के लिए जंगल में जाकर निरीह पशुओं को मारता है। उसकी पशु-हिंसा को देखकर तो जड़ वृक्षों का भी हृदय फट जाता है। दूसरे पशुओं की भक्ष्य वस्तुएँ नियमित हैं। मांसभक्षी पशु मांस ही खाते हैं, तृणभक्षी तृण (UPBoardSolutions.com) खाकर ही जीवन-निर्वाह करते हैं, परन्तु मनुष्यों में इस प्रकार के भक्ष्याभक्ष्य पदार्थों के सम्बन्ध में कोई निश्चित नियम नहीं हैं।

मानव का असन्तोष अपनी अवस्था में सन्तोष न प्राप्त करके मनुष्य-जाति स्वार्थ साधन में निरत है। वह धर्म, सत्य, सरलता आदि मनुष्योचित व्यवहार को त्यागकर झूठ, पापाचार और परपीड़न में लगी हुई है। उनकी विषय-लालसा बढ़ती ही रहती है, जिससे उन्हें शान्ति एवं सुख नहीं मिल पाता है। अपनी अवस्था में सन्तुष्ट रहने वाले पशुओं से मानव भला कैसे श्रेष्ठ हो सकता है; क्योंकि वह घोर-से-घोर पापकर्म करने में भी नहीं हिचकिचाता।

पशु से निकृष्ट और तृणों से भी निस्सार मानव मनुष्य केवल पशुओं से निकृष्ट ही नहीं है, वरन् वह तृणों से भी निस्सार है। तृण आँधी-तूफान के साथ निरन्तर संघर्ष करते हुए वीर पुरुषों की तरह शक्ति क्षीण होने पर ही भूमि पर गिरते हैं। वे कायर पुरुषों की तरह अपना स्थान छोड़कर नहीं भागते। लेकिन मनुष्य मन में भावी विपत्ति की आशंका करके कष्टपूर्वक जीते हैं और प्रतिकार का उपाय सोचते रहते हैं। निश्चित ही मनुष्ये पशुओं से भी निकृष्ट और (UPBoardSolutions.com) तृणों से भी निस्सार है। विधाता ने उसे बनाकर अपनी बुद्धि की कैसी श्रेष्ठता दिखायी है? तात्पर्य यह है कि मनुष्य को बनाकर विधाता ने कोई बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं किया है।

इस प्रकार अश्वत्थ (सभापति) ने हेतु और प्रमाणों द्वारा विशद् व्याख्यान देकर वृक्षों की सभा को विसर्जित कर दिया।

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गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) अथ सर्वविधविटपिनां मध्ये स्थितः सुमहान् अश्वत्थदेवः वदति-भो भो वनस्पतिकुलप्रदीपा महापादपाः, कुसुमाकोमलदन्तरुचः लताकुलललनाश्च। सावहिताः शृण्वन्तु भवन्तः। अद्य मानववार्तव अस्माकं समालोच्यविषयः। सर्वासु सृष्टिधारासु निकृष्टतमा मानवा सृष्टिः, जीवसृष्टिप्रवाहेषु मानवा इव परप्रतारका, स्वार्थसाधनापरा, मायाविनः, कपटव्यवहारकुशला, हिंसानिरता जीवा न विद्यन्ते। भवन्तो नित्यमेवारण्यचारिणः सिंहव्याघ्रप्रमुखान् हिंस्रत्वभावनया प्रसिद्धान् श्वापदान् अवलोकयन्ति प्रत्यक्षम्। ततो भवन्त एव सानुनयं पृच्छ्यन्ते, कथयन्तु भवन्तो यथातथ्येन किमेते हिंसादिक्रियासु मनुष्येभ्यो भृशं गरिष्ठाः? श्वापदानां हिंसाकर्म जठरानलनिर्वाणमात्रप्रयोजनकम्। प्रशान्ते तु जठारानले, सकृद् उपजातायां स्वोदरपूर्ती, न हि ते करतलगतानपि हरिणशशकादीन् उपघ्नन्ति। न वा तथाविध दुर्बलजीवघातार्थम् (UPBoardSolutions.com) अटवीतोऽटवीं परिभ्रमन्ति। [2007]

अथ सर्वविध ………………………… भृशं गरिष्ठाः [2008]
सर्वासु सृष्टिधारासु …………………….. भृशं गरिष्ठाः [2007]

शब्दार्थ अथ = इसके बाद विटपिनाम् = वृक्षों के अश्वत्थदेवः = पीपल देवता। कुसुमकोमलदन्तरुचः = फूलों के समान कोमल दाँतों की कान्ति वाली। लताकुलललनाश्च = और बेलों के वंश की नारियों। सावहिताः = सावधानी से। मानववातैव = मनुष्य की बात ही। समालोच्यविषयः = आलोचना करने योग्य विषय। निकृष्टतमाः = निकृष्टतम, सर्वाधिक निम्न। परप्रतारकाः = दूसरों को ठगने वाले। मायाविनः = कपट (माया) से भरे हुए। हिंसानिरताः = हत्या करने में लगे हुए। नित्यमेवारण्यचारिणः (नित्यम् + एव + अरण्यचारिणः) = नित्य ही वन में घूमने वालों को। श्वापदान् = हिंसक पशुओं को। अवलोकयन्ति = देखते हैं। सानुनयम् = विनयपूर्वका पृच्छ्य न्ते = पूछे जा रहे हैं। यथातथ्येन = वास्तविक रूप में। भृशम् = अत्यधिक गरिष्ठाः = कठोर। जठरानलनिर्वाणमात्रप्रयोजनकम् = पेट की क्षुधा शान्त करने (UPBoardSolutions.com) मात्र के प्रयोजन वाला। सकृत् = एक बार। करतलगतानपि = हाथ में आये हुओं को भी। उपघ्नन्ति = मारते हैं। अटवीतः अटवीम् = जंगल से जंगल में। परिभ्रमन्ति = घूमते हैं।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘उदिभज्ज-परिषद्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में पीपल के वृक्ष द्वारा मनुष्यों की निकृष्टता का वर्णन किया जा रहा है।

अनुवाद इसके बाद सभी प्रकार के वृक्षों के मध्य में स्थित अत्यन्त विशाल पीपल देवता कहता है कि हे वनस्पतियों के कुल के दीपकस्वरूप बड़े वृक्षो! फूलों के समान कोमल दाँतों की कान्ति वाली लतारूपी कुलांगनाओ! आप सावधान होकर सुनें। आज मानवों की बात ही हमारी आलोचना का विषय है। सृष्टि की सम्पूर्ण धाराओं में मानवों की सृष्टि सर्वाधिक निकृष्ट है। जीवों के सृष्टि प्रवाह में मानवों के समान दूसरों को धोखा देने वाले, स्वार्थ की पूर्ति में लगे हुए, मायाचारी, कपट-व्यवहार में चतुर और हिंसा में लीन जीव नहीं हैं। आप सदैव ही जंगल में घूमने वाले सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक भावना से प्रसिद्ध हिंसक जीवों को प्रत्यक्ष देखते हैं। इसलिए आपसे ही विनयपूर्वक पूछते हैं कि वास्तविक रूप में आप ही बताएँ, क्या हिंसा आदि कार्यों में ये मनुष्यों से अधिक कठोर हैं? हिंसक जीवों का हिंसा-कर्म पेट की भूख मिटानेमात्र के प्रयोजन वाला है। पेट की क्षुधाग्नि के (UPBoardSolutions.com) शान्त हो जाने पर, एक बार अपने पेट के भर जाने पर, वे हाथ में आये हुए हिरन व खरगोश आदि को भी नहीं मारते हैं और न ही उस प्रकार के कमजोर जीवों को मारने के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमते रहते हैं।

(2) मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः निरवसाना च। यतोयत आत्मनोऽपकर्षः समाशङ्कयते तत्र-तत्रैव मानवानां हिंसावृत्तिः प्रवर्तते। स्वार्थसिद्धये मानवाः दारान् मित्रं, प्रभु, भृत्यं, स्वजनं, स्वपक्षं, चावलीलायें उपघ्नन्ति। पशुहत्या तु तेषामाक्रीडनं, केवलं चित्तविनोदाय महारण्यम् उपगम्य ते यथेच्छ निर्दयं च पशुघातं कुर्वन्ति। तेषां पशुप्रहारव्यापारम् आलोक्य जडानामपि अस्माकं विदीर्यते हृदयम्, अन्यच्च पशूनां भक्ष्यवस्तूनि प्रकृत्या नियमितान्येव न हि पशवो भोजनव्यापारे प्रकृतिनियममुल्लङ्घयन्ति। तेषु ये मांसभुजः ते मांसमपहाय नान्यत् आकाङ्क्षन्ति। ये पुनः फलमूलाशिनस्ते तैरेव जीवन्ति। मानवानां न दृश्यते तादृशः कश्चिन्निर्दिष्टो नियमः। [2007, 14, 15)

पशुहत्या तु ………………………………… नियममुल्लङ्घयन्ति। [2007]
मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु ………………………………….. प्रकृत्या नियमितान्येव। [2010]
स्वार्थसिद्धये मानवः …………………………………… निर्दिष्टो नियमः।

शब्दार्थ निरवधिः = सीमारहित निरवसाना = समाप्तिरहित। यतोयतः = जहाँ-जहाँ से। अपकर्षः = पतन। शङ्कयते = शंका करता है। तत्र-तत्रैव = वहाँ-वहाँ ही। प्रवर्तते = बढ़ती है। दारान् = पत्नियों को। प्रभुम् = स्वामी को भृत्यम् = सेवक को। लीलायै = मनोरंजन के लिए। उपघ्नन्ति = मार देते हैं। आक्रीडनम् = खेल। चित्तविनोदाय =मन के बहलाव के लिए। उपगम्य = पहुँचकर। पशु-धातम् = पशु-हत्या। आलोक्य = देखकर विदीर्यते = फटता है। अन्यच्च (अन्यत् + च) = और दूसरी ओर। मांसभुजः = मांस खाने वाले। अपहाय = छोड़कर। नान्यत् = अन्य नहीं। फलमूलाशिनस्ते (फल + मूल + अशिनः + ते) = फल और जड़ खाने वाले थे। तैरेव (तैः + एव) = उनसे ही।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मनुष्यों की हिंसावृत्ति की असीमता और अनियमितता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद मनुष्यों की हिंसावृत्ति तो सीमारहित और समाप्त न होने वाली है। मनुष्य जिस-जिससे अपने पतन की आशंका करता है, वहीं-वहीं मनुष्यों की हिंसावृत्ति प्रारम्भ हो जाती है। स्वार्थ पूरा करने के लिए मनुष्य स्त्री, मित्र, स्वामी, सेवक, अपने सम्बन्धी और अपने पक्ष वाले को अत्यधिक सरलता से मार देता है। पशुओं की हिंसा तो उनका खेल है। केवल मनोरंजन के लिए बड़े जंगल में जाकर वे इच्छानुसार निर्दयता से पशुओं को मारते हैं। उनके पशुओं को मारने के कार्य को देखकर हम जड़ पदार्थों का भी हृदय फट जाता है। दूसरे, पशुओं की खाद्य वस्तुएँ स्वभाव (प्रकृति) से नियमित ही हैं। निश्चय ही पशु भोजन के कार्य में प्रकृति के नियम का उल्लंघन नहीं करते हैं। (UPBoardSolutions.com) उनमें जो मांसभोजी हैं, वे मांस को छोड़कर दूसरी वस्तु नहीं चाहते हैं। और जो फल-मूल खाने वाले हैं, वे उन्हीं से जीवित रहते हैं। मनुष्यों का उस प्रकार का कोई निश्चित नियम नहीं दिखाई पड़ता है।

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(3) स्वावस्थायां सन्तोषमलभमाना मनुजन्मानः प्रतिक्षणं स्वार्थसाधनाय सर्वात्मना प्रवर्तन्ते, न धर्ममनुधावन्ति, न सत्यमनुबध्नन्ति तृणवदुपेक्षन्ते स्नेहम्, अहितमिव परित्यजन्ति आर्जवम्, किञ्चिदपिलज्जन्ते अनृतव्यवहारात्, न स्वल्पमपि बिभ्यति पापाचरेभ्यं, न हि क्षणमपि विरमन्ति परपीडनात्। यथा यथैव स्वार्थसिद्धर्घटते परिवर्धते विषयपिपासा। निर्धनः शतं कामयते, शती दशशतान्यभिलषति, सहस्राधिपो लक्षमाकाङ्क्षति, इत्थं क्रमश एव मनुष्याणामाशा वर्धते। विचार्यतां तावत्, ये खलु स्वप्नेऽपि तृप्तिसुखं नाधिगच्छन्ति, सर्वदैव नवनवाशाचित्तवृत्तयो भवन्ति, सम्भाव्यते तेषु कदाचिदपि स्वल्पमात्रं शान्तिसुखम्? येषु क्षणमपि शान्तिसुखं नाविर्भवति ते खलु दुःखदुःखेनैव समयमतिवाहयन्ति इत्यपि किं वक्तव्यम्? कथं वा निजनिजावस्थायामेव तृप्तिमनुभवद्भ्यः पशुभ्यस्तेषां श्रेष्ठत्वम्? यद्धि विगर्हितं कर्म सम्पादयितुं पशवोऽपि लज्जन्ते तत्तु मानवानामीषत्करम् । नास्तीह किमपि अतिघोररूपं महापापकर्म यत्कामोपहतचित्तवृत्तिभिः मनुष्यैः नानुष्ठीयते। निपुणतरम् अवलोकयन्नपि अहं न तेषां पशुभ्यः कमपि उत्कर्षम् परमतिनिकृष्टत्वमेव अवलोकयामि।

स्वावस्थायां सन्तोषम् …………………………………. परपीडनात्। [2008]
स्वावस्थायां सन्तोषम् …………………………………. मनुष्याणाम् आशा वर्धते। [2011, 14]

शब्दार्थ अलभमाना = न प्राप्त करते हुए। मनुजन्मानः = मनुष्य योनि में जन्मे। सर्वात्मना = पूरी तौर से। प्रवर्तन्ते = लगे रहते हैं। अनुबध्नन्ति = अनुसरण करते हैं। तृणवदुपेक्षन्ते = तिनके के समान उपेक्षा करते हैं। आर्जवम् = सरलता को। अपलज्जन्ते = लज्जित होते हैं। अनृत = झूठे, असत्य। बिभ्यति = डरते हैं। विरमन्ति = रुकते हैं। घटते = पूरी होती है। परिवर्धते = बढ़ती है। कामयते = चाहता है। लक्षम् = लांख को। आकाङ्क्षति = चाहता है। विचार्यताम् = विचार कीजिए। नाधिगच्छन्ति (न + अधिगच्छन्ति) = नहीं प्राप्त करते हैं। कदाचिदपि (कदाचिद् + अपि) = कभी भी। आविर्भवति = उत्पन्न होता है। अतिवाहयन्ति = व्यतीत करते हैं। (UPBoardSolutions.com) विगर्हितम् = निन्दित। सम्पादयितुम् = पूरा करने के लिए। ईषत्करम् = तुच्छ कार्य। कामोपहतचित्तवृत्तिभिः = अभिलाषा से दूषित मनोवृत्ति वालों के द्वारा अनुष्ठीयते = किया जाता है। अवलोकयन् = देखते हुए। उत्कर्षम् = श्रेष्ठता को। परमतिनिकृष्टत्वमेव = अपितु अधिक नीचता को ही। अवलोकयामि = देखता हूँ।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में पीपल द्वारा मनुष्यों के जघन्य कृत्यों को बताया जा रहा है।

अनुवाद अपनी अवस्था में सन्तोष को न प्राप्त करने वाले मनुष्य प्रति क्षण स्वार्थसिद्धि के लिए पूरी तरह से लगे रहते हैं, धर्म के पीछे नहीं दौड़ते हैं, सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, स्नेह की तृण के समान उपेक्षा करते हैं, सरलता को अहित के समान त्याग देते हैं, झूठे व्यवहार से कुछ भी लज्जित नहीं होते हैं, पापाचारों से थोड़ा भी नहीं डरते हैं, दूसरों को पीड़ित करने से क्षणभर भी नहीं रुकते हैं। जैसे-जैसे स्वार्थसिद्धि पूर्ण होती जाती है, विषयों की प्यास बढ़ती जाती है। धनहीन सौ रुपये की इच्छा करता है, सौ रुपये वाला हजार रुपये चाहता है, हजार रुपये का स्वामी लाख रुपये चाहता है, इस प्रकार क्रमशः (UPBoardSolutions.com) मनुष्य की इच्छा बढ़ती जाती है। विचार तो कीजिए, जो निश्चित रूप से स्वप्न में भी तृप्ति के सुख को प्राप्त नहीं करते हैं, सदा ही नयी-नयी इच्छा से जिनका मन भरा रहता है, क्या उनमें कभी भी थोड़ी भी शान्ति के सुख की सम्भावना होती है? जिनमें क्षणभर भी शान्ति के सुख का उदय नहीं होता है, वे निश्चय ही महान् दु:खों में अपना समय बिताते हैं। इस विषय में भी क्या कहना चाहिए? अपनी-अपनी अवस्था में ही तृप्ति का अनुभव करने वाले पशुओं से उनकी श्रेष्ठता कैसे हो सकती है? जिस निन्दित कार्य को करने के लिए पशु भी लज्जित होते हैं, वह मनुष्यों के लिए तुच्छ काम है। इस संसार में अत्यन्त भयानक ऐसा कोई बड़ा पापकर्म नहीं है, जो लालसा से दूषित चित्तवृत्ति वाले मनुष्यों के द्वारा न किया जाता हो। अच्छी तरह देखता हुआ भी मैं पशुओं से उनके किसी उत्कर्ष को नहीं, अपितु अत्यन्त नीचता को ही देखता हूँ।

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(4) न केवलमेते पशुभ्यो निकृष्टास्तृणेभ्योऽपि निस्सारा इव। तृणानि खलु वात्यया सह स्वशक्तितः अभियुध्य वीरपुरुषा इव शक्तिक्षये क्षितितले पतन्ति, न तु कदाचित्, कापुरुषा इव स्वस्थानम् अपहाय प्रपलायन्ते। मनुष्याः पुनः स्वचेतसाग्रत एव भविष्यत्काले सङ्घटिष्यमाणं कमपि विपत्पातम् आकलय्य (UPBoardSolutions.com) दुःखेन समयमतिवाहयन्ति, परिकल्पयन्ति च पर्याकुला बहुविधान् प्रतीकारोपायान्, येन मनुष्यजीवने शान्तिसुखं मनोरथपथादपि क्रान्तमेव। अथ ये तृणेभ्योऽप्यसाराः पशुभ्योऽपि निकृष्टतराश्च, तथा च तृणादिसृष्टेरनन्तरं तथाविधं जीवनिर्माणं विश्वविधातुः कीदृशं बुद्धिप्रकर्षं प्रकटयति।

इत्येवं हेतुप्रमाणपुरस्सरं सुचिरं बहुविधं विशदं च व्याख्याय सभापतिरश्वत्थदेव उद्भिज्जपरिषदं विसर्जयामास।।

न केवलमेते। ……………………….. प्रपलायन्ते।
तृणानि खलु ……………………… पथादपि क्रान्तमेव। [2007]

शब्दार्थ निकृष्टतरास्तृणेभ्योऽपि =अधिक नीच हैं, तिनकों से भी। निस्साराः = सारहीन| वात्यया सह = आँधी के साथ। स्वशक्तितः = अपनी शक्ति से। अभियुध्य = युद्ध करके। शक्तिक्षये = शक्ति के नष्ट हो जाने पर। कापुरुषाः = कायर। अपहाय = छोड़कर। प्रपलायन्ते = भागते हैं। सङ्कटिष्यमाणम् = भविष्य में घटित होने वाले। विपत्पातम् = विपत्ति के आगमन को। आकलय्य = विचार करके। अतिवाहयन्ति = व्यतीत करते हैं। प्रतीकारोपायान् = रोकने के उपायों को। मनोरथपथादपि = इच्छा के मार्ग अर्थात् मन से भी। क्रान्तम् = हट गया। विश्वविधातुः = संसार की रचना करने वाले ब्रह्माजी के बुद्धिप्रकर्षम् = बुद्धि की श्रेष्ठता। प्रकटयति = प्रकट करता है। इत्येवम् = इस प्रकार हेतुप्रमाणपुरस्सरं = कारण के प्रमाणों को सामने रखकर। सुचिरं =अधिक समय तक विशदम् = विस्तृत, विस्तारपूर्वक व्याख्याय = व्याख्यायित करके विसर्जयामास = समाप्त कर दी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मानव को पशुओं से ही नहीं, अपितु तृणों से भी निकृष्ट बताकर मनुष्य की निस्सारता का दिग्दर्शन कराया गया है।

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अनुवाद ये केवल पशुओं से ही निकृष्ट नहीं हैं, तृणों से भी सारहीन हैं। तिनके निश्चय ही आँधी के साथ अपनी शक्ति से युद्ध करके वीर पुरुषों की तरह शक्ति के नष्ट हो जाने पर ही पृथ्वी पर गिरते हैं, कभी भी कायर पुरुषों की तरह अपने स्थान को छोड़कर नहीं भागते हैं। मनुष्य अपने चित्त में पहले ही भविष्यकाल में घटित होने वाली किसी विपत्ति के आने (पड़ने) का विचार करके कष्ट से समय बिताते हैं और व्याकुल होकर अनेक प्रकार के उपायों को सोचते हैं, जिससे मनुष्य जीवन में शान्ति और सुख मनोरथ के रास्ते से भी हट जाता है। इस प्रकार जो तृणों से भी सारहीन हैं और पशुओं से भी नीच हैं तथा तृणादि की सृष्टि के बाद उस प्रकार के जीव का निर्माण करना, संसार के निर्माता की किस प्रकार की बुद्धि की श्रेष्ठता को प्रकट करता है? इस प्रकार हेतु और प्रमाण देकर बहुत देर तक अनेक प्रकार से विशद् व्याख्या करके सभापति पीपल ने वृक्षों की सभा को विसर्जित (समाप्त) कर दिया।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्यों की हिंसा-वृत्ति कैसी होती है?
उत्तर :
मनुष्यों की हिंसावृत्ति की सीमा का कोई अन्त नहीं है। मनुष्य स्वार्थसिद्धि के लिए स्त्री, पुत्र, स्वामी और बन्धु को भी अनायास मार डालता है और केवल मन बहलाने के लिए जंगल में जाकर पशुओं को मारता है। इनकी पशु-हिंसा को देखकर तो जड़ वृक्षों का हृदय भी फट जाता है।

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प्रश्न 2.
मनुष्य को किनसे निकृष्ट और किनसे निस्सार बताया गया है?
उत्तर :
मनुष्य केवल पशुओं से ही निकृष्ट नहीं है, वरन् वह तृणों से भी निस्सार है। तृण आँधी के साथ निरन्तर लड़ते हुए वीर पुरुषों की तरह शक्ति क्षीण होने पर ही भूमि पर गिरते हैं। वे कायर पुरुषों की तरह अपना स्थान छोड़कर नहीं भागते। लेकिन मनुष्य पहले ही मन में भावी विपत्ति की आशंका (UPBoardSolutions.com) करके कष्टपूर्वक जीते हैं और उसके प्रतिकार का उपाय सोचते रहते हैं।

प्रश्न 3.
‘उद्भिज्ज-परिषद्’ पाठ के आधार पर वृक्षों के महत्त्व पर आलेख लिखिए। [2012]
उत्तर :
[संकेत प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर ‘जीवनं निहितं वने” नामक पाठ के आधार पर लिखा जा सकता है, प्रस्तुते पाठ के आधार पर नहीं। इस प्रश्न का उत्तर ‘जीवनं निहितं वने’ नामक पाठ से ही पढ़े।]

प्रश्न 4.
मनुष्य पशुओं से निकृष्ट क्यों है?
उत्तर :
मनुष्य पशुओं से निकृष्ट इसलिए है, क्योंकि पशु तो मात्र अपना पेट भरने के लिए हिंसा-कर्म करते हैं। लेकिन मनुष्य तो पेट भर जाने पर मात्र मनोरंजन के लिए वन-वन घूमकर दुर्बल पशुओं को मारता रहता है।

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प्रश्न 5.
वृक्षों की सभा का सभापतित्व किसने किया? उसने मनुष्यों में क्या-क्या दोष गिनाये हैं?
या
वृक्षों की सभा में सभापति कौन था? [2010, 11, 12, 14]
उत्तर :
वृक्षों की सभा को सभापतित्व अश्वत्थ (पीपल) के एक विशाल वृक्ष ने किया। उसने कहा कि मनुष्य अपनी अवस्था से सन्तुष्ट न रहकर सदैव स्वार्थ-साधन में लगा रहता है। वह सत्य, धर्म, सरलता आदि व्यवहारों को छोड़कर झूठ, पापाचार, परपीड़न आदि में लगा रहता है। उसकी विषय-लालसा (UPBoardSolutions.com) निरन्तर बढ़ती ही रहती है, जिससे उसे शान्ति व सुख की प्राप्ति नहीं होती। वह घोर-से-घोर पापकर्म करने में भी नहीं हिचकिचाता। ये ही दोष वृक्षों की सभा में सभा के सभापति द्वारा गिनाये गये।

प्रश्न 6.
हिंसक जीवों की हिंसा और मनुष्य की हिंसा में क्याअन्तर है? भोजन के विषय में पशु-पक्षियों के नियम बताइए। [2007]
या
मनुष्यों एवं पशुओं के हिंसा-कर्म का क्या प्रयोजन है? [2012, 15]
उत्तर :
हिंसक जीवों की हिंसा केवल पेट की भूख शान्त करने के लिए ही होती है। भूख शान्त हो जाने पर वे हिंसा नहीं करते। लेकिन मनुष्य अपनी भूख शान्त करने के लिए तो हिंसा करता ही है अपितु उसके बाद वह मनोरंजन के लिए भी हिंसा करता है। हिंसा तो उसके लिए खेल के समान है। भोजन के विषय में पशु-पक्षियों के निश्चित नियम हैं। मांसाहारी पशु मांस को छोड़कर दूसरी वस्तु नहीं खाते और फल-मूल खाने वाले उसी को खाते हैं, वे मांस नहीं खाते।

प्रश्न 7.
वृक्षों की सभा का विषय क्या है? [2011,14]
उत्तर :
वृक्षों की सभा का विषय मनुष्यों की हिंसा-वृत्ति और उनका लालची स्वभाव है। इस कारण वृक्षों ने मनुष्यों को पशुओं से ही नहीं वरन् तिनकों से भी निकृष्ट सिद्ध किया है।

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प्रश्न 8.
उद्भिज्ज-परिषद् में निकृष्टतम जीव किसको माना गया है? [2010]
उत्तर :
‘उद्भिज्ज-परिषद्” पाठ में निकृष्टतम जीव मनुष्य को माना गया है।

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Class 10 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions कारुणिको जीमूतवाहनः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 2 Karuniko Jimutvahan Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद कारुणिको जीमूतवाहनः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ महाकवि हर्ष द्वारा विरचित ‘नागानन्द’ नामक नाटक से संगृहीत है। इसमें जीमूतवाहन नामक विद्याधर-राजकुमार के द्वारा आत्मोत्सर्ग करके शंखचूड़ नामक सर्प को गरुड़ से बचाने का वर्णन है। नाटक में पाँच अंक हैं। इस नाटक पर बौद्ध धर्म का (UPBoardSolutions.com) प्रभाव परिलक्षित होता हैं। बौद्ध धर्म में अहिंसा का बहुत अधिक महत्त्व है। यह नाटक भी अहिंसा, आत्म-बलिदान और परोपकार का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस नाटक की भाषा अत्यधिक सरल और सुबोध है तथा भाव-सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इस नाटक में शान्त और करुण रस की प्रधानता है।

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पाठ-सारांश

जीमूतवाहन की खोज – जीमूतवाहनं समुद्र-तट को देखने के कुतूहल से समुद्र-तट पर गया हुआ था। वह बहुत देर तक लौटकर नहीं आता है; अतः महाराज विश्वावसु द्वारपाल को उसके घर यह पता करने के लिए भेजते हैं कि जीमूतवाहन वहाँ पहुँचा या नहीं। द्वारपाल वहाँ जाकर देखता है कि जीमूतवाहन के पिता जीमूतकेतु की सेवा उनकी पत्नी और पुत्रवधू द्वारा की जा रही है। वह जाकर कहता है कि महाराज विश्वावसु ने जीमूतवाहन का समाचार न मिल पाने के कारण उसे जानने के लिए आपके पास भेजा है। यह सुनकर जीमूतकेतु, उसकी पत्नी और पुत्रवधू अत्यन्त चिन्तित होते हैं कि जीमूतवाहन कहाँ गया? कहीं उसका कोई अमंगल तो नहीं हो गया? इसी समय अमंगलसूचक उनका बायाँ नेत्र भी फड़कता है।

चूड़ामणि की प्राप्ति – उसी समय गीले मांस और बालों से युक्त एक चूड़ामणि उनके पैरों पर आकर गिरती है।इस मणि को वे जीमूतवाहन का ही समझकर दुःखी हो जाते हैं। लेकिन द्वारपाल उन्हें सान्त्वना देते हुए कहता है कि ऐसे चूड़ामणि तो गरुड़ के द्वारा खाये गये सर्यों के गिरते हैं। (UPBoardSolutions.com)  इसके बाद जीमूतकेतु अपने पुत्र जीमूतवाहन का पता लगाने के लिए प्रतिहार को उसके ससुर के घर भेज देते हैं।

शंखचूड़ का आगमन – द्वारपाल के चले जाने के बाद रक्तवस्त्र पहने शंखचूड़ नामक सर्प वहाँ आता है। उसे देखकर और चूड़ामणि को उसी का समझकर सब निश्चिन्त हो जाते हैं। तब शंखचूड़ उनसे कहता है कि यह चूड़ामणि मेरा नहीं है। मुझे वासुकि ने पूर्व निश्चित शर्त के अनुसार गरुड़ के भोजन के लिए उसके पास भेजा था। किन्तु किसी दयालु विद्याधर ने गरुड़ को अपने प्राण देकर मेरी रक्षा की है। दूसरों का उपकार करने वाला वह जीमूतवाहन ही है, ऐसा सोचकर जीमूतवाहन के माता-पिता एवं पत्नी तीनों मूर्च्छित हो जाते हैं।

उन्हें ऐसी अवस्था में देखकर शंखचूड़ रोता हुआ सोचता है कि ये दोनों निश्चित ही उसे महाभाग के माता-पिता हैं। मैंने अप्रिय वचन कहकर इनके हृदय को दुःखी किया है। अब मेरा यह कर्तव्य हो जाता है कि मैं अपने प्राण दे ६ या इन दोनों को धैर्य दिलाऊँ? अन्ततः वह उन्हें धैर्य दिलाने का निश्चय करता है।

गरुड़ के पास जाना – इसके बाद शंखचूड़ उन्हें सान्त्वना देता हुआ कहता है कि उसे नाग न जानकर सम्भव है कि गरुड़ उसे न खाये। अत: हम खून की धारा का अनुसरण करते हुए गरुड़ के पास चलते हैं। शंखचूड़ के पीछे-पीछे जीमूतवाहन के माता-पिता भी गरुड़ के पास जाते हैं।

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अपने सम्मुख पड़े हुए जीमूतवाहन के पास गरुड़ बैठा हुआ है और सोच रहा है कि जन्म के बाद से मैंने अभी तक केवल नागों को ही खाया है, परन्तु यह महान् प्राणी कौन है, जो मेरे द्वारा खाया जाता हुआ भी प्रसन्न दिखाई दे रहा है। तब गरुड़ उसको खाना छोड़कर उससे पूछता है कि वह कौन है? जीमूतवाहन कहता है कि पहले तुम मेरे मांस और रक्त से अपनी भूख मिटा लो, परन्तु गरुड़ उसका मांस खाने का विचार छोड़ देता है।

इसके बाद गरुड़ के पास जाकर शंखचूड़ उससे कहता है कि यह नाग नहीं है; अत: तुम इसे छोड़कर मुझे ही खाओ, क्योंकि पूर्व शर्त के अनुसार वासुकि ने तुम्हारे खाने के लिए मुझे ही भेजा है।

जीमूतकेतु का आगमन – उसी समय जीमूतवाहन के पिता उसकी माता और पत्नी समेत वध-स्थल पर पहुँच जाते हैं। जीमूतवाहन उन्हें देखकर शंखचूड़ से चादर द्वारा अपने शरीर को ढकने के लिए कहता है, क्योंकि उसे आशंका है कि उसके माता-पिता उसे इस अवस्था में देखकर निश्चित ही अपने प्राण त्याग देंगे।

जीमूतवाहन की मृत्यु – इसके बाद जीमूतकेतु पत्नी व पुत्रवधू के साथ वहाँ आते हैं। गरुड़ जीमूतकेतु को आया हुआ देखकर अत्यधिक दु:खी और लज्जित होता है। पहले तो जीमूतवाहन को देखकर उसके माता-पिता प्रसन्न होते हैं परन्तु जब (UPBoardSolutions.com) जीमूतवाहन के उठने पर उसकी चादर गिर जाती है और जीमूतवाहन स्वयं मूच्छित हो जाता है तब उसकी उस अवस्था को देखकर उसके माता-पिता व पत्नी भी मूच्छित हो जाते हैं। जीमूतवाहन की माता लोकपालों से अमृत की वर्षा करने के लिए प्रार्थना करती है। गरुड़ इन्द्र की प्रार्थना करके अमृत को लाने तथा जीमूतवाहन और पहले खाये गये नागों को जीवित करने के लिए चला जाता है।

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जीमूतवाहन का जीवित होना इसके बाद पार्वती आकर जीमूतवाहन पर जल छिड़ककर उसे जीवित करती हैं। सभी पार्वती के चरणों में गिरते हैं। उसी समय गरुड़ के द्वारा जीमूतवाहन और सभी नागों को जीवित करने के लिए अमृत की वर्षा की जाती है। सभी नाग जीवित हो जाते हैं।

इस नाटक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिए हमें अपने प्राणों की बाजी लगा देने में भी संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि परोपकार सबका कल्याण करने वाला होता है। हमें किसी भी कार्य को करने से पूर्व भली-भाँति विचार लेना चाहिए तथा किये हुए अशुभ कार्य का प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिए।

चरित्र-चित्रण

जीमूतवाहन [2006,07,08, 10, 11, 12, 13, 15]

परिचय जीमूतवाहन विद्याधर जाति का और गन्धर्वराज जीमूतकेतु का पुत्र है। उसकी पत्नी का नाम मलयवती है। वह परोपकारी, दयालु, मातृ-पितृभक्त और असाधारण व्यक्तित्व का प्राणी है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1.त्यागमय जीवन – जीमूतवाहन का जीवन त्यागमय है। गरुड़ के साथ वासुकि की यह शर्त थी कि वह गरुड़के भोजन के लिए प्रतिदिन एक सर्प को भेज दिया करेगा। क्रमशः शंखचूड़ नामक सर्प की बारी आती है। शंखचूड़ की माता की करुण-क्रन्दन सुनकर जीमूतवाहन शंखचूड़ के प्राणों की रक्षा करने हेतु वध के लिए निश्चित लाल वस्त्रों को पहनकर गरुड़ के पास वधस्थल पर चली जाती है और गरुड़ के द्वारा रक्त पिये जाते हुए भी तनिक विचलित नहीं होता, यह उसके महान् त्याग का परिचायक है।

2. निर्भीक – जीमूतवाहन निर्भीक व्यक्ति है। गरुड़ के भक्षणार्थ जाने के लिए वह तनिक भी विचलित नहीं होता। गरुड़ के द्वारा पेट फाड़ डालने पर भी उसकी मुखकान्ति मलिन नहीं होती। वह गरुड़ को अपने रक्तऔर मांस से तृप्त हो जाने के लिए कहता है। इससे उसकी निर्भीकता सिद्ध होती है।

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3. मातृ-पितृभक्त – जीमूतवाहन अपने माता-पिता का भक्त है। वह उन्हें दु:खी नहीं देखना चाहता। इसीलिए उनको वध-स्थल पर आया हुआ देखकर शंखचूड़ से अपने शरीर पर चादर डालने के लिए कहता है, क्योंकि वह नहीं चाहता है कि वे उसकी विपन्न दशा देखें। घायल होने पर भी (UPBoardSolutions.com) वह उनका अभिवादन करने के लिए उठता है। उसकी यह गुण उसके मातृ-पितृभक्त होने का परिचायक है।

4. दयालु – जीमूतवाहन स्वभाव से दयालु है। वह किसी के कष्ट को नहीं देख पाता। शंखचूड़ की माँ को विलाप सुनकर वह गरुड़ का भोजन बनने के लिए स्वयं वधस्थल पर पहुँच जाता है और उसे आसन्न मृत्यु से बचा लेता है।

5. प्रभावशाली – जीमूतवाहन एक प्रभावशाली युवक है। शंखचूड़ उसके अनुपम त्याग से तो प्रभावित होता ही है; गरुड़ के ऊपर भी उसका ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वह सदा के लिए हिंसा करना छोड़ अहिंसक बन जाता है तथा सभी नागों को जीवित करने के लिए अमृत की वर्षा करता है।

6. विनयशील – जीमूतवाहन विनम्र और विनयशील है। वह सभी के साथ विनम्रता का व्यवहार करता है। तथा अपने व्यवहार से किसी को भी कष्ट देना नहीं चाहता। उसके इसी गुण के कारण उसके पिता तथा श्वसुर दोनों ही उससे अपार स्नेह करते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जीमूतवाहन त्यागी, परोपकारी, मातृ-पितृभक्त, दयालु और प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी है।

गरुड़ [2010, 1]

परिचय गरुड़ पक्षीराज तथा विष्णु का वाहन है, ऐसी पौराणिक मान्यता है। गरुड़ का सर्वप्रिय खाद्य सर्प है। प्रस्तुत नाट्यांश में भी उसका इसी रूप में वर्णन आया है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. दयालु – यद्यपि गरुड़ मांसाहारी जीव है, तथापि उसमें दया का अभाव नहीं है। अपने भक्ष्य के रूप में आये जीमूतवाहन को देखकर उसके हृदय में दया-भाव जाग्रत होता है और वह उसे खाना छोड़कर उसका परिचय पूछता है। जीमूतवाहन की मृत्यु से उसके माता-पिता-पत्नी (UPBoardSolutions.com) को मूर्च्छित होते देखकर वह दु:खी हो जाता है। इन्द्र से अमृत वर्षा कराकर समस्त सर्यों को जीवित कराने के पुनीत कार्य से भी उसकी दयालुता को भान होता है।

2. बलशाली – गरुड़ बलशाली पक्षी है। भगवान् विष्णु का वाहन होने के कारण उसके बलशाली होने का संकेत भी मिलता है। दूसरे सर्प जाति का विनाश करने और सर्पराज वासुकि द्वारा उससे समझौता कर स्वयं उसका भोज्य पदार्थ उसे उपलब्ध कराने के प्रसंग से भी उसके बलशाली होने की पुष्टि होती है।

3. प्रायश्चित्त करने वाला – सर्यों के राजा वासुकि के प्रार्थना करने पर वह सर्यों के अन्धाधुन्ध विनाश को रोक देता है और अपने भोजन हेतु प्रतिदिन एक सर्प देने के लिए वासुकि से कहता है। जीमूतवाहन के प्रसंग मे भी उसे अपने किये पर पश्चात्ताप होता है और वह उसके प्रायश्चित्त के लिए इन्द्र से अमृत वर्षा कराकर सभी सर्यों को पुनर्जीवित तो करता ही है, साथ ही प्रायश्चित्तस्वरूप सदैव के लिए अहिंसक भी बन जाता है।

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4. गुणग्राही और विवेकशील – गरुड़ गुणग्राही पक्षी है। जीमूतवाहन के त्याग, परोपकार एवं आत्म-बलिदान के गुणों को देखकर उसका हृदय द्रवित हो उठता है। उसके गुणों से प्रभावित होकर वह उसे खाना त्यागकर उसका परिचय पूछता है और अन्ततः अपने कर्म के अनौचित्य पर पश्चात्ताप करता हुआ सभी सर्यों को जीवित करा देता है। यह तथ्य उसके गुणग्राही और विवेकशील होने को इंगित करता है। निष्कर्ष रूमें कहा जा सकता है कि गरुड़ समझौतावादी, सिद्धान्तवादी, विवेकशील, गुणग्राही, क्षमाशील, दयालु और पराक्रमी पक्षी है।

शंखचूड़ [2009,10, 12, 15]

परिचय शंखचूड़ एक गुणग्राही सर्प है, जिसको सर्पराज वासुकि के समझौतानुसार गरुड़ का भोजन बनने के लिए उसके पास भेजा गया है। उसके माता-पिता का उस पर विशेष स्नेह है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. दयावान् – शंखचूड़ एक दयावान् सर्प है। वह दूसरे के दुःखों को सहन नहीं कर (UPBoardSolutions.com) पाता है। जीमूतवाहन के माता-पिता एवं उसकी पत्नी की दीनदशा को देखकर उसका हृदय दया से भर जाता है। वह अपने को धिक्कारने लगता है कि यह मैंने क्या कर दिया।

2. बुद्धिमान्  जीमूतवाहन के माता-पिता जब उसके द्वारा सुनाये गये वृत्तान्त को सुनकर मूर्च्छित हो जाते हैं तो वह यह जान लेता है कि ये दोनों उस उपकारी के ही माता-पिता हैं। उसकी चेतना लौट आने पर वह उनसे कहता है कि गरुड़ ने जीमूतवाहन को सर्प न होने के कारण शायद न खाया हो और वह जीवित हो। हमें रक्त के चिह्नों का अनुसरण करते हुए उसकी खोज करनी चाहिए। अन्तत: वह उसे खोजने में सफल भी हो जाता है। ये दोनों ही घटनाएँ उसके बुद्धिमान् होने का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।

3. सत्यवादी – शंखचूड़ सत्यवादी सर्प है। वह जीमूतवाहन के माता-पिता से सम्पूर्ण वृत्तान्त सही-सही बता देता है। इसके उपरान्त वह गरुड़ के पास पहुँचकर अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए उससे सच-सच बता देता है कि तुम्हारा भक्ष्य जीमूतवाहन नहीं, मैं हूँ। तुम मुझे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करो।

4. आशावादी – शंखचूड़ एक आशावादी नाग है। उसे आशा है कि नाग न होने के कारण गरुड़ ने जीमूतवाहन को छोड़ दिया होगा। इसी आशा से वह जीमूतवाहन के शरीर से टपकते हुए रक्त के सहारे गरुड़ तक पहुँच जाता है।

5. निर्भीक – शंखचूड़ एक निर्भीक सर्प है। उसे मृत्यु का भय नहीं है। इसीलिए वह जीमूतवाहन को (UPBoardSolutions.com) बचाने के लिए गरुड़ के पास जाता है और उससे कहता है कि उसका (गरुड़ का) भोजन बनने की आज उसकी (शंखचूड़ की) बारी है। अतः वह जीमूतवाहन को छोड़कर उसे खा ले।

निष्कर्ष रूप में हमें कह सकते हैं कि शंखचूड़ एक दयावान्, निर्भीक, आशावादी, सत्यवादी और बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण चरित्र वाला एक नाग है, जो अन्तत: जीमूतवाहन के प्राण बचाने में सफल होता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीमूतवाहनस्य वार्तामन्चेष्टुं महाराजविश्वावसुना प्रतीहारः कुत्र प्रेषितः ?
उत्तर :
जीमूतवाहनस्य वार्ताम् अन्वेष्टुं महाराजविश्वावसुनी प्रतीहारः जीमूतकेतोः समीपं प्रेषितः।

प्रश्न 2.
जीमूतवाहनः कस्य पुत्रः आसीत् ? [2008, 09, 11]
उत्तर :
जीमूतवाहन: जीमूतकेतोः पुत्रः आसीत्।

प्रश्न 3.
शङ्खचूडः कः आसीत् ? [2006,09, 11, 12, 13, 14, 15]
उत्तर :
शङ्खचूड: एकः नागः आसीत्।

प्रश्न 4.
जीमूतवाहनः फणिनः प्राणान् परिरक्षितं किमकरोत् ?
उत्तर :
जीमूतवाहनः फणिनः प्राणान् रक्षितुं गरुडाय स्वदेहं समर्पयत्।

प्रश्न 5.
गरुडेनकः व्यापादितः ? [2006,07,09, 10]
उत्तर :
गरुडेन जीमूतवाहन: व्यापादितः।

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प्रश्न 6.
जीमूतवाहनः कथं प्रत्युज्जीवितः कृतः ? [2008]
उत्तर :
जीमूतवाहनः गौर्या कमण्डलु-उदकेन अभिषिच्य (UPBoardSolutions.com) प्रत्युज्जीवितः अभवत्।

प्रश्न 7.
अनभ्रा वृष्टिः कथम् अभवत् ? [2009, 15]
उत्तर : 
जीमूतवाहनम् अस्थिशेषान् उरगपतीन् च प्रत्युज्जीवयितुम् अनभ्रा वृष्टिः अभवत्।

प्रश्न 8.
जीमूतवाहनस्य पिता कः आसीत् ? [2006,07,08,09]
या
जीमूतवाहनः पितुः किं नाम? [2011]
उत्तर :
जीमूतवाहनस्य पिता जीमूतकेतुः आसीत्।

प्रश्न 9.
जीमूतवाहनः केन व्यापादितः ?
उत्तर :
जीमूतवाहनः गरुडेन व्यापादितः।

प्रश्न 10.
नागानन्दनाटकस्य प्रणेतुः किं नाम आसीत् ? [2011]
उत्तर :
नागानन्दनीटेकस्य प्रणेतुः नाम महाकवि हर्षः आसीत्।

प्रश्न 11.
जीमूतवाहनः कः आसीत् ? [2013]
उत्तर :
जीमूतवाहनः गन्धर्वराज जीमूतकेतोः पुत्रः विद्याधर-वंशतिलकः च आसीत्।

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प्रश्न 12.
नागानन्दस्य नाटकस्य रचयिता कः आसीत् ? [2014]
उत्तर :
नागानन्दस्य नाटकस्य रचयिता महाकविः (UPBoardSolutions.com) हर्षः आसीत्।

बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए –
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

1. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ शीर्षक पाठ किस कृति से संकलित है?

(क) “पुरुष-परीक्षा से
(ख)‘नागानन्दम्’ से
(ग) “बुद्धचरितम्’ से
(घ) “जातकमाला’ से

2. जीमूतवाहन के अनुपम त्याग को दर्शाने वाला नाटक ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ किस धर्म से सम्बद्ध है?

(क) बौद्ध धर्म
(ख) सिक्ख धर्म
(ग) जैन धर्म
(घ) पारसी धर्म

3. परोपकारी विद्याधर राजकुमार का क्या नाम है?

(क) विश्वावसु
(ख) शंखचूड़
(ग) जीमूतवाहन
(घ) जीमूतकेतु

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4. जीमूतवाहन और जीमूतकेतु का परस्पर क्या सम्बन्ध है ?

(क) पुत्र-पिता
(ख) पिता-पुत्र
(ग) भाई-भाई
(घ) स्वामी-सेवक

5. मलयवती जीमूतवाहन की कौन थी ?

(क) माता
(ख) पत्नी
(ग) पुत्री
(घ) दासी

6. जीमूतवाहन किसकी रक्षा करता है ?

(क) शंखचूड़ की
(ख) वासुकि की
(ग) गरुड़ की
(घ) विश्वावसु की

7. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’पाठ में सर्पराज किसे कहा गया है?

(क) वासुकि को
(ख) गरुड़ को
(ग) शंखचूड़ को
(घ) विश्वावसु को

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8. गरुड़ ने जीमूतवाहन का मांस क्यों खाया?

(क) उसकी जीमूतवाहन से शत्रुता थी
(ख) उसको जीमूतवाहन का मांस प्रिय था
(ग) उसने जीमूतवाहन को नाग समझा था
(घ) इनमें से कोई नहीं

9. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ शीर्षक पाठ में ‘नायिका’ कौन है?

(क) शंखचूड़ की माता
(ख) जीमूतवाहन की सास
(ग) जीमूतवाहन की माता
(घ) जीमूतवाहन की पत्नी

10. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ पाठ में ‘देवी’ के रूप में किसको प्रस्तुत किया गया है ?

(क) शंखचूड़ की माँ को
(ख) जीमूतवाहन की माँ को
(ग) पार्वती को।
(घ) जीमूतवाहन की पत्नी को

11. “वत्स! अवितथैषा तव भारती भवतु। वयमपि त्वरितमेवानुगच्छामः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) शंखचूडः
(ख) जीमूतवाहनः
(ग) गरुडः
(घ) जीमूतकेतुः

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12. जीमूतवाहन को किसने जीवित किया?

(क) अमृत वर्षा ने
(ख) गौरी ने
(ग) गरुड़ ने
(घ) इन्द्र ने

13. अमृत लेने के लिए इन्द्र के पास कौन जाता है ?

(क) शंखचूड़
(ख) गरुड़
(ग) वासुकि
(घ) जीमूतकेतु

14. “सुनन्द! यावदनया वेलया ………………… सदनमेव गतो मे पुत्रको भविष्यति।” वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति होगी –

(क) ‘वधू’ से
(ख) मातु से
(ग) श्वशुर’ से
(घ) “पितु से

15. “शङ्खचूडः नाम नागः खल्वहं वैनतेयस्याहारार्थमवसरप्राप्तो वासुकिना प्रेषितः। वाक्यस्य वक्ता कोऽस्ति?

(क) गरुडः
(ख) जीमूतकेतुः
(ग) मलयकेतुः
(घ) शंखचूडः

16. “अहं तव” ……………………… “प्रेषितोऽस्मि वासुकिना।” में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी

(क) ‘रक्षार्थम्’ से
(ख) ‘हन्तुम्’ से
(ग) ‘आहारार्थम्’ से
(घ) “नष्टार्थम्’ से

17. ‘‘शङ्खचूडः समुपविश्यानेनोत्तरीयेण आच्छादितशरीरं कृत्वा धारयमाम्।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) जीमूतवाहनः
(ख) जीमूतकेतुः
(ग) मलयकेतुः
(घ) मलयवती

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18. जीमूतवाहनस्य पिता …………………. आसीत्। [2008, 09, 10]

(क) शङ्खचूडः
(ख) मलयकेतुः
(ग) जीमूतकेतुः
(घ) सत्यकेतुः

19. नागानन्दस्य नाटकस्य रचयिता …………………… अस्ति। [2007]

(क) कालिदासः
(ख) हर्षवर्धनः
(ग) भवभूतिः
(घ) विशाखदत्तः

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20. विद्याधरेण केनानि ………………… आविष्ट चेतसा। [2009]

(क) क्रोध
(ख) भय
(ग) पीड़ा
(घ) करुणा

21. विद्याधरः ……………………… रक्षां करोति। [2009,11]

(क) गरुडस्य
(ख) शङ्खचूडस्य
(ग) वासुकेः
(घ) जीमूतकेतोः

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Class 10 Sanskrit Chapter 9 UP Board Solutions गीतामृतम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 9 Geetamritam Kalidas Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 9 हिंदी अनुवाद गीतामृतम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

समस्त उपनिषदों की सारभूत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भारतीय दर्शन की अमूल्य निधि है। यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित अनुपम ग्रन्थ; ‘महाभारत’ जिसे पंचम वेद भी माना जाता है; के अन्तर्गत सात-सौ श्लोकों का संकलन है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया; निष्काम कर्म करने का; उपदेश ही इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का एक भी वाक्य सदुपदेश से रहित नहीं है। यह भारत के समस्त आध्यात्मिक (UPBoardSolutions.com) ग्रन्थों की चरम परिणति है। प्रस्तुत श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता से ही संगृहीत हैं।

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पाठ-सारांश

श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल की प्राप्ति में नहीं: अतः तुम निरन्तर कर्म करते रहो। हे अर्जुन! सफलता और असफलता को एक समान मानकर कर्म करो; ऐसा करने की बुद्धि रखने वाला व्यक्ति ही योगी कहलाता है। कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है; क्योंकि बिना कर्म किये तो जीवन ही सम्भव नहीं है। इसलिए अपने निर्धारित कर्मों को करो। हे भरतवंशी अर्जुन! लोक-कल्याण को चाहने वाले विद्वान् तो राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे मूर्ख हैं। प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से सन्तुष्ट, ईर्ष्या से रहित, सफलता-असफलता को एक समान मानकर कार्य करने वाला और सुख-दु:ख में तटस्थ व्यक्ति सांसारिक बन्धनों में नहीं बँधता है। श्रद्धावान्, प्रयत्नशील और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला मनुष्य ही ज्ञान को प्राप्त कर परम शान्ति को प्राप्त करता है। इसके विपरीत ज्ञानहीन, श्रद्धाहीन और संशय से युक्त मन वाला व्यक्ति न तो इहलोक में और न ही परलोक में सुख-शान्ति प्राप्त करता है।

पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो व्यक्ति मुझे बड़ा मानकर, कुसंगति एवं विद्वेषरहित होकर कर्म करता है, वह मुझे प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रसन्नता, द्वेष, शोक, शुभ-अशुभ में तटस्थ रहकर त्याग एवं भक्ति का जीवन बिताता है, जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी एवं सुख-दु:ख को एकसमान मानता है (UPBoardSolutions.com) और आसक्ति से रहित है; जो निन्दा-प्रशंसा में समान भाव रखता है, प्राप्त वस्तु से सन्तुष्ट रहता है, गृह-त्यागी, स्थिर बुद्धि और भक्ति में लीन रहता है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ [2008]

शब्दार्थ कर्मणि एव = कर्म करने में ही। अधिकारः = अधिकार है। ते = तुम्हारा। मा = नहीं है। फलेषु =(कर्म, के) फलों पर। कदाचन = कभी। कर्मफलहेतुः = कर्मफल के निमित्त। मा भूः = मत बनो। सङ्गः = आसक्ति। अस्तु = हो। अकर्मणि = कर्म न करने में।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘गीतामृतम्’ पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

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प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि तुम्हारी अधिकार केवल कर्म करने में ही है।

अन्वय ते अधिकारः कर्मणि एव (अस्ति), फलेषु कदाचन मा (अस्ति)। कर्मफलहेतुः मा भूः। अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार मात्र कर्म करने में ही है, उसके फल की प्राप्ति में कभी नहीं है। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो तथा कर्म न करने में अर्थात् कर्महीन होकर बैठे रहने में तुम्हारी आसक्ति न हो। तात्पर्य यह (UPBoardSolutions.com) है कि कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, इसलिए तुम्हारा कर्महीन हो जाना एक अनुचित प्रवृत्ति है। अतः तुम्हें कर्महीनता की ओर उन्मुख नहीं होना चाहिए।

(2)
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ [2006]

शब्दार्थ योगस्थः = योग में स्थित रहते हुए। कुरु कर्माणि = कर्मों को करो। सङ्गम् = फल के प्रति आसक्ति को। त्यक्त्वा = त्यागकर। धनञ्जय = अर्जुन का एक नाम। सिद्ध्यसिद्ध्योः = सफलता और असफलता को। समः भूत्वा = समान रहकर। समत्वं = सदा समान स्थिति में रहना ही। योगः = योग। उच्यते = कहा जाता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में अर्जुन को योग-भाव से कर्म करने का उपदेश दिया गया है।

अन्वय धनञ्जय! सङ्गं त्यक्त्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समः भूत्वा योगस्थः कर्माणि कुरु। समत्वं योग उच्यते।

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व्याख्या श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! फल के प्रति आसक्ति को छोड़कर सफलता और असफलता को समान समझकर योग में स्थित होकर कर्म करो। सफलता और असफलता को समान समझकर कार्य करना ही योग कहलाता है।

(3)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ [2008, 14]

शब्दार्थ नियतम् = निर्धारित कुरु = करो। त्वं = तुम। ज्यायः = श्रेष्ठ है। हि = क्योंकि (UPBoardSolutions.com) अकर्मणः = कर्म न करने से। शरीरयात्रापि = शरीर-निर्वाह भी। प्रसिद्ध्येत् = पूर्ण नहीं हो सकता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में कर्म को जीवन के लिए आवश्यक बताया गया है।

अन्वय त्वं नियतं कर्म कुरु हि अकर्मणः कर्म ज्याय: (अस्ति)। अकर्मण: ते शरीरयात्रा अपि न प्रसिद्ध्येत्।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम निर्धारित कर्म करो अर्थात् अपने कर्तव्यों का पालन करो; क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना अधिक श्रेष्ठ है। कर्म न करने वाले, तुम्हारा जीवन-निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकता है। तात्पर्य यह है कि कर्म के बिना तो जीवन (जीवित रहना) ही असम्भव है।

(4)
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥

शब्दार्थ सक्ताः = आसक्त रहने वाले कर्मणि = क़र्म में। अविद्वांसः = अज्ञानी लोग। यथा = जैसे। कुर्वन्ति = करते हैं। भारत = भरत-वंश में उत्पन्न होने वाले अर्जुन कुर्यात् = करना चाहिए। विद्वान् = विवेकी। तथा = उसी प्रकार। असक्तः = अनासक्त रहकर चिकीर्षुः = करने की इच्छा रखने वाला। लोकसङ्ग्रहम् = लोक-कल्याण।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि विद्वान् को कर्म का त्याग न करके उसकी (UPBoardSolutions.com) आसक्ति का त्याग करना चाहिए। अन्वय भारत! कर्मणि सक्ताः अविद्वांसः यथा कुर्वन्ति, लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुः विद्वान् असक्तः (सन्) तथा कुर्यात्।।

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व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे भरतवंशी अर्जुन! कर्म करने में आसक्त अर्थात् राग-द्वेष से लिप्त हुए अज्ञानीजन जैसा कार्य करते हैं, लोक-कल्याण करने की इच्छा रखने वाला विद्वान् अनासक्त रहकर अर्थात् राग-द्वेष में लिप्त न होकर वैसा कार्य करता है। तात्पर्य यह है कि कर्म को विवेकी और अविवेकी दोनों ही करते हैं किन्तु अविवेकी कर्म में आसक्ति के कारण कर्म करता है और विवेकी लोकशिक्षा की दृष्टि से।।

(5)
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

शब्दार्थ यदृच्छालाभसन्तुष्टः = स्वभावतः प्राप्त होने वाली वस्तुओं से सन्तुष्ट रहने वाला। द्वन्द्वातीतः = सुख और दुःख के द्वन्द्वों से रहित। विमत्सरः = ईष्र्या (मत्सर) से रहित। समः = समान रहने वाला। सिद्धौ असिद्धौ च= सफलता (सिद्धि) और असफलता (असिद्धि) में। कृत्वा अपि = कर्म करके भी। ननिबध्यते =(कर्मबन्धन में) नहीं बँधता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि कर्मफल भोगने के लिए कौन बाध्य नहीं होता।

अन्वय यदृच्छालाभसन्तुष्टः, द्वन्द्वातीतः, विमत्सरः, सिद्धौ असिद्धौ च समः (पुमान्) (कर्म) कृत्वा अपि न निबध्यते।

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व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य उसी लाभ से सन्तुष्ट होता है, जो उसे मिलता रहता है, जो सुख में प्रसन्न और दुःख में दु:खी नहीं होता है, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में एक-सा रहने वाला पुरुष कर्म करके भी कर्मबन्धन में नहीं बँधता है।

(6)
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ [2009, 11, 12, 13]

शब्दार्थ श्रद्धावान् = श्रद्धावाला, श्रद्धालु। लभते ज्ञानं = ज्ञान को प्राप्त करता है। तत्परः = उसमें लगा हुआ, तल्लीन। संयतेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखने वाला, जितेन्द्रिय। ज्ञानं = ज्ञान को। लब्ध्वा = प्राप्त करके। परां शान्ति = अत्यधिक शान्ति (UPBoardSolutions.com) को। अचिरेण = शीघ्र ही। अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को शीघ्र शान्ति प्राप्त करने का उपाय बता रहे हैं।

अन्वय श्रद्धावान्, तत्परः, संयतेन्द्रियः ज्ञानं लभते। ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य श्रद्धालु हो, सदैव ज्ञान प्राप्त करने का इच्छुक हो, अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाला अर्थात् जितेन्द्रिय हो, वही पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परम शान्ति अर्थात् लोकोत्तर शान्ति को प्राप्त कर लेता है।

(7)
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
नायं लोकोऽस्ति नपरोन सुखं संशयात्मनः॥ [2010, 11, 12]

शब्दार्थ अज्ञः = ज्ञानहीना च = और अश्रद्दधानः = श्रद्धा न रखने वाला; अश्रद्धालु। संशयात्मा = संशय से युक्त मन वाला। विनश्यति = नष्ट हो जाता है। न अयं लोकः अस्ति =न यह संसार है। न परः =न परलोक है। न सुखं = न सुख है। संशयात्मनः = संशययुक्त मन वाले का।

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प्रसंग प्रस्तुत लोक में संशय में पड़े हुए मनुष्य की दुर्गति के विषय में बताया गया है।

अन्वय अज्ञः च अश्रद्दधानः संशयात्मा च विनश्यति। संशयात्मन: अयं लोकः न अस्ति, परः (लोकः) न अस्ति, सुखं न (अस्ति)।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञानहीन, श्रद्धा न रखने वाला और संशय से युक्त मनवाला पुरुष नष्ट हो जाता है। संशय में पड़े हुए मनुष्य का न यह लोक है, न परलोक है और न ही सुख है।

(8)
मत्कर्म कृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव! ॥

शब्दार्थ मत्कर्म कृत् = मेरे लिये कर्म करने वाला। मत्परमः = मुझे ही सबसे बड़ा मानने वाला। मद्भक्तः = मेरा भक्त। सङ्गवर्जितः = आसक्तिरहित, दुर्जनों के साथ से रहित। निर्वैरः = शत्रुता से रहित; अर्थात् वैर न करने वाला। सर्वभूतेषु = सभी जीवों में। यः = जो। सः = वह। माम् = मुझको। एति = प्राप्त करता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को मोक्ष-प्राप्ति का उपाय बताया गया है।

अन्वये पाण्डव! यः मत्कर्म कृत्, मत्परमः, मद्भक्त: सङ्गवर्जितः, सर्वभूतेषु (च) निर्वैरः (अस्ति), सः माम् एति।।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे ही सबसे बड़ा मानने वाला, मेरा भक्त (किसी भी व्यक्ति या वस्तु की) आसक्ति से रहित और सब जीवों पर शत्रुता-भाव से रहित है, वह पुरुष मुझे प्राप्त कर लेता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर (UPBoardSolutions.com) लेता है। यह श्लोक श्रीकृष्ण के परमब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है।

(9)
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ [2009, 12, 13, 14]

शब्दार्थ यः न हृष्यति = जो न प्रसन्न होता है। द्वेष्टि = द्वेष करता है। शोचति = शोक करता है। काङ्क्षति = इच्छा करता है। शुभाशुभपरित्यागी = शुभ और अशुभ का परित्याग करने वाला। भक्तिमान् = भक्त) मे प्रियः = मेरा प्रिय है।

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प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि भगवान् को कौन प्रिय ?

अन्वय यः न हृष्यति, ने द्वेष्टि, न शोचति, न काङ्क्षति, शुभाशुभ परित्यागी, यः भक्तिमान् (चे अस्ति) स मे प्रियः (अस्ति)।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो पुरुष न प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न इच्छा करता है, शुभ और अशुभ पदार्थों का त्याग करने वाला और जो भक्तियुक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

(10)
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ [2014]

शब्दार्थ समः = समान। शत्रौ = शत्रु में। मित्रे = मित्र से। मानापमानयोः = मान और अपमान में।। शीतोष्णसुखदुःखेषु = सर्दी, गर्मी, सुख और दुःख में भी। सङ्गविवर्जितः = आसक्ति से रहित।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि भगवान् को कौन प्रिय है?

अन्वय (यः जनः) शत्रौ मित्रे च समः (अस्ति), तथा मानापमानयोः (समः अस्ति), शीतोष्ण सुखदुःखेषु समः (अस्ति), सङ्गविवर्जितः (च अस्ति), (स में प्रियः अस्ति)।

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व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! जो मनुष्य शत्रु और मित्र में एक समान, सम्मान तथा अपमान में एक समान, सर्दी-गर्मी में एक समान और सुख-दुःख में एक समान आचरण करने वाला और आसक्ति से रहित होता है, वह मुझे प्रिय है। तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य शत्रु से घृणा और मित्र से प्रेम नहीं करता, सम्मान से जिसे प्रसन्नता नहीं होती, अपमान से मानसिक कष्ट नहीं होता, गर्मी-सर्दी और सुख-दु:ख में जो समान है तथा इन्द्रियादि विषयों की (UPBoardSolutions.com) आसक्ति से रहित है, वह मुझे प्रिय है।

(11)
तुल्यनिन्दास्तुतिमनी सन्तुष्टो येन केनचित्
अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ [2008, 10, 12]

शब्दार्थ तुल्यनिन्दास्तुतिः = जो निन्दा और प्रशंसा में समान है। मौनी = मौन रहने वाला अर्थात् मननशील। सन्तुष्टः = सुप्रसन्ना येन केनचित् = जिस-किसी वस्तु से, अर्थात् जो कुछ मिले उसी से। अनिकेतः = गृहरहित। स्थिरमतिः = स्थिर बुद्धि वाला। भक्तिमान् = भक्ति से युक्त। मे = मुझे। प्रियः = प्रिय है। नरः = मनुष्य।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि भगवान् को कौन प्रिय है?

अन्वय (य: नर:) तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी, येन केनचित् (वस्तुना) सन्तुष्टः, अनिकेतः, स्थिरमतिः, भक्तिमान् (च अस्ति), (सः) नरः मे प्रियः (अस्ति)।

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व्याख्या जो मनुष्य निन्दा और स्तुति में समान रहता है, मौन रहता है, जो कुछ मिल जाये उसी में सन्तुष्ट रहता है, गृहविहीन, स्थिर बुद्धि वाला और भक्ति से युक्त मुझे प्रिय है। तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य अपनी निन्दा सुनकर दुःखी नहीं होता, प्रशंसा सुनकर आनन्दित नहीं होता, वाणी पर जिसका संयम है, जो कुछ भी उसे प्राप्त हो जाता है, उसी में वह सन्तुष्ट हो जाता है, अपने घर का त्याग कर देता है, स्थिर बुद्धि वाला और भक्तियुक्त है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। [2007, 13, 14]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘गीतामृतम्’ नामक पाठ से अवतरित है।

[संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रेरित किया गया है।

अर्थ तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल की प्राप्ति में नहीं।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि तुम्हारे अधिकार में केवल कर्म करना है, उसके फल के विषय में सोचना नहीं। कर्म के फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। इसलिए तुम्हें अकर्मण्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि बिना कर्म किये तो व्यक्ति वित भी नहीं रह सकता। इसलिए जो (कर्म-फल) तुम्हारे वश में नहीं है, उस पर विचार करना छोड़ दो और कर्म करने में लग जाओ।

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(2) ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। [2009]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं कि कर्महीनता में तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अर्थ तुम्हारी अकर्म में आसक्ति न हो।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति को कभी भी आलस्य के वशीभूत होकर, कर्महीन होकर नहीं रहना चाहिए, क्योंकि कर्महीनता की स्थिति में व्यक्ति को जीवित रहना ही सम्भव नहीं। व्यक्ति को कभी इस बात से निराश होकर भी कर्महीन नहीं होना चाहिए कि वह जो कर्म करता है, उसको फल उसे नहीं मिलता। व्यक्ति का अधिकार तो केवल कर्म करने का ही है, अत: उसे अपने कर्तव्य का निर्वाह निरन्तर करते रहना चाहिए। व्यक्ति को उसके (UPBoardSolutions.com) कर्मों का फल कब और कितना मिलना है, यह सोचने का विषय तो केवल परमेश्वर का ही है।

(3) योगस्थः कुरु कर्माणि। [2008, 10, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कर्म के तरीके पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ योग में स्थित होकर कर्म करो।

व्याख्या, सफलता तथा असफलता में समान भाव रखना ही योग कहलाता है। कार्य करते समय मनुष्य को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह सफल होगा अथवा असफल। सफलता मिलने पर प्रसन्न न होना और असफलता में दुःखी न होना ही समान भाव अर्थात् योग है। अत: व्यक्ति को सदैव योग अर्थात् समान भाव में स्थित होकर ही कोई भी कर्म करना चाहिए।

(4)
समत्वं योग उच्यते।। [2006, 07, 08,09, 10, 12, 14, 15]
सिध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में समत्व-योग को स्पष्ट किया गया है।

अर्थ सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाले समत्व को योग कहा जाता है।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को कर्म करते समय यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि मुझे इस कार्य में सफलता मिलेगी या असफलता। सफलता मिलने पर प्रसन्न न होना और असफलता मिलने पर दु:खी न होना अर्थात् सफलता और असफलता में समान भाव रखनी ही योग कहलाता है। तात्पर्य यह है। कि मनुष्य को आसक्तिरहित होकर अर्थात् सुख और दुःख में समभाव रखते हुए कर्म करना चाहिए।

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(5) ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति। [2009, 10, 11, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में भगवान् कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि ज्ञान से चिरशान्ति प्राप्त होती है।

अर्थ व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त करता है।

व्याख्या इस संसार में अज्ञान ही दु:खों का कारण है और जब तक व्यक्ति दु:खों का अनुभव करता रहेगा, उसे शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। व्यक्ति को जैसे ही ज्ञान प्राप्त होता और वह यह जान लेता है कि संसार के सभी सुखोपभोग मिथ्या हैं, उनसे वास्तविक सुख-शान्ति (UPBoardSolutions.com) की प्राप्ति नहीं हो सकती, तब वह परम शान्ति की प्राप्ति के लिए ईश्वर-भक्ति में अपना समय लगाता है। संसार के सुखोपभोगों से उसे विरक्ति होने लगती है। जब व्यक्ति संसार से पूर्णरूपेण विरक्त होकर अपना सर्वस्व ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब वह परम शान्ति का अनुभव करता है। इसीलिए उचित ही कहा गया है कि ज्ञान ही परम-शान्ति को प्रदान करने वाला है।

(6) श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः। [2006, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कहा गया है कि श्रद्धालु व्यक्ति ही ज्ञानी होता है।

अर्थ, श्रद्धावान्, संलग्न और इन्द्रियों को वश में रखने वाला ही ज्ञान को प्राप्त करता है।

व्याख्या ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है और ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना अवश्य होनी चाहिए। श्रद्धा का भाव उसी व्यक्ति में होता है, जो विनयशील होता है। जिस व्यक्ति के हृदय में श्रद्धा का भाव नहीं होता है, वह विनयशील नहीं हो सकता; क्योंकि उसके हृदय में अहंकार का वास होता है और अहंकारी व्यक्ति कभी भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अत: कृष्ण का यह कथन कि श्रद्धा से ही ज्ञान प्राप्त होता है पूर्ण रूप से व्यावहारिक और स्वाभाविक है। विनयशील म य ज्ञान को प्राप्त करके परम शान्ति को प्राप्त करता है।

(7)
संशयात्मा विनश्यति।
न सुखं संशयात्मनः।। [2011, 13, 14]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में संशययुक्त व्यक्ति की दुर्गति के विषय में बताया गया है।

अर्थ संशययुक्त मन वाला विनष्ट हो जाता है। संशययुक्त व्यक्ति को कोई सुख प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या ये दोनों ही सूक्तियाँ श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नलिखित श्लोक की अंश हैं

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अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

अर्थात् अज्ञानी, श्रद्धा से रहित और संशय से युक्त मने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए न तो यह संसार है, न परलोक है और न तो सुख ही है। श्रीकृष्ण ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के इस श्लोक में नष्ट होने वाले व्यक्ति के तीन लक्षण बताये हैं—प्रथम लक्षण है-‘ज्ञान का न होना’, दूसरा लक्षण है-“श्रद्धा का न होना और तीसरा लक्षण है-‘संशय से युक्त मन वाला होना। व्यक्ति का अज्ञानी होना उसके लिए। कितना घातक है, यह तो वर्तमान (UPBoardSolutions.com) परिवेश में जीवन व्यतीत करने वाला सामान्य व्यक्ति भी जानता है। श्रद्धा का भाव सदैव अपने से बड़ों के प्रति होता है। जिस व्यक्ति में अपने से बड़ों के प्रति श्रद्धा नहीं होती, निश्चित ही उसके मन में अहंकार का भाव विद्यमान होता है और अहंकारी व्यक्ति का विनाश होना तो अवश्यम्भावी ही है। गीता में ही अन्यत्र कहा गया है कि श्रद्धावान् व्यक्ति को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। संशययुक्त मन वाला अर्थात् द्विविधा में पड़ा हुआ व्यक्ति सदैव करणीय और अकरणीय के द्वन्द्व से ग्रस्त होने के कारण कुछ भी नहीं कर पाता। कहा भी गया है-“दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम।” निश्चित ही ज्ञानहीन के लिए इस लोक में कोई स्थान नहीं, श्रद्धाहीन व्यक्ति के लिए उसे लोक (परलोक) में कोई स्थान नहीं और संशयग्रस्त व्यक्ति को तो कभी सुख प्राप्त हो ही नहीं सकता। श्रीकृष्ण के कहने का आशय यह है कि इहलोक और परलोक में सुख-प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को इनका-अज्ञान, अश्रद्धा, संशय-त्याग कर देना चाहिए।

(8) निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डवः। [2006]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में प्राणिमात्र से प्रेम को उचित बताया गया है।

अर्थ जो सभी प्राणियों के प्रति वैररहित होता है, वही मुझे प्राप्त करता है।

व्याख्या श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे पाण्डुपुत्र! जो व्यक्ति सभी प्राणियों से प्रेम करता है, किसी से वैरभाव नहीं रखता है, वह व्यक्ति मुझे सबसे अधिक प्रिय है। सभी प्राणियों को ईश्वर ने बनाया है, फिर उसके द्वारा बनायी वस्तु के प्रति बैर अथवा ईष्र्या-द्वेष रखना उचित नहीं है। जो प्राणी ईश्वर द्वारा बनायी गयी वस्तुओं से प्रेम नहीं कर सकता, ईश्वर को वह प्राणी कैसे प्रिय हो सकता है। यदि हम चाहते हैं कि हम पर ईश्वर की कृपा-दृष्टि बनी रहे तो हमें ईष्र्या-द्वेष आदि भावनाओं को अपने हृदय से निकालकर प्राणिमात्र से प्रेम करना चाहिए।

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(9) शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।

प्रसंग प्रस्तुत पंक्ति में भक्ति और समभाव के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ शुभ और अशुभ का परित्याग करने वाला भक्तिमान् व्यक्ति मुझे प्रिय है।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति–जो शुभ और अशुभ अर्थात् पवित्र और अपवित्र का विचार किये बिना समस्त भोग्य वस्तुओं का समान भाव से परित्याग करता है; अर्थात् उसे शुभ वस्तुओं के प्रति जरा-भी लगाव और अशुभ के प्रति जरा-भी दुराव नहीं होता; जो मेरी भक्ति; अर्थात् परमात्मा की भक्ति; में मन लगाता है, वही मुझे; अर्थात् परमात्मा को; प्रिय होता है।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) कर्मण्येवाधिकारस्ते ……………………………………………….. सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ (श्लोक 1) (2008, 15]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनं कर्म कर्तुम् उपदिशति यत् भोः अर्जुन! कर्मकरणे एवं तव अधिकारः अस्ति, कर्मणः फले तव अधिकारः न अस्ति। अतः त्वं कर्मणः फलस्य कारणं मी भव। कर्मणां फलस्येच्छां त्यक्त्वा कर्म कर्त्तव्यम्। कर्म न करणे तव आसक्तिः अपि न स्यात्। अत: त्वं कर्म एव कुरु, तस्य फलस्य इच्छां मा करु।

(2) योगस्थः कुरु ……………………………………………….. योग उच्यते ॥ (श्लोक 2) 2011, 12]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् हे अर्जुन! सफलता-असफलतयोः समं भूत्वा, रागं त्यक्त्वा, योगस्थः भूत्वा च कर्माणि कुरु। यः पुरुषः सिद्ध्यसिद्ध्यो: समं मत्वा कार्यं कुरुते तस्य समत्वं योगः उच्यते।

(3) श्रद्धावान् लभते ……………………………………………….. अचिरेणाधिगच्छति ॥ (श्लोक 6) [2007,09, 12]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः व्यक्ति श्रद्धावान् भवति, ज्ञानम् (UPBoardSolutions.com) आप्तुं सदैव तत्परः भवति, इन्द्रियाणि संयमते, सः व्यक्तिः सद्ज्ञानं प्राप्य शीघ्रम् एव परां शान्ति प्राप्य सुखी भवति।।

(4) यो न हृष्यति ……………………………………………….. स मे प्रियः ॥ (श्लोक 9) [2007,08, 11, 14]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः पुरुषः सुखे न प्रसन्नं भवति, कस्मै न ईष्र्ण्यति, दु:खे न शोकं करोति, कस्मै न स्पृह्यति, शुभम् अशुभम् च परित्यजति, यः मां भजति, सः पुरुषः मे प्रियः अस्ति।

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(5) समः शत्रौ च ……………………………………………….. समः सङ्गविवर्जितः ॥ (श्लोक 10) [2009]
संस्कृतार्थः श्रीकृष्णः अर्जुनं कथयति–यः नर: रिपो सुहृदि च समानं व्यवहरति, आदरे अनादरे च तुल्यरूपः भवति, शीतम् उष्णं सुखं दुःखं च समानं मन्यते, एवेषु किमपि भेदं न करोति, आसक्तिहीनः च भवति, सः नरः मम (भगवत:) प्रियः भवति।

(6) तुल्यनिन्दास्तुतिः ……………………………………………….. प्रियो नरः ॥ (श्लोक 11)
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् श्रीकृष्ण: अर्जुनम् उपदिशति यत् यः पुरुषः निन्दायां स्तुतौ च समः भवति, मौनी तथा सर्वासु अवस्थासु सन्तुष्टः, गृहे ममत्वरहितः, स्थिरमतिः अस्ति, स एव भक्तिमान् पुरुष: मे प्रियः भवति।

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