UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 6 Geomorphic Processes

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 6 Geomorphic Processes (भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (1) निम्नलिखित में से कौन-सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?
(क) निक्षेप
(ख) ज्वालामुखीयता
(ग) पटल-विरूपण ।
(घ) अपरदन
उत्तर-(घ) अपरदन।

प्रश्न (ii) जलयोजन प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) चीका (क्ले) मिट्टी
(घ) लवण
उत्तर-(घ) लवण।

प्रश्न (iii) मलवा अवधाव को किस श्रेणी में सम्मिलित किया जा सकता है?
(क) भू-स्ख लन
(ख) तीव्र प्रवाही बृहत् संचालन
(ग) मन्द प्रवाही बृहत् संचलन
(घ) अवतल/धसकन।
उत्तर-(क) भू-स्खलन।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे?
उत्तर-अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। जैव मात्रा एवं जैव विविधता वनस्पति की उपज है। विशेषतः अपक्षय वातावरण एवं खनिजों के अयने के स्थानान्तरण की दिशा में उपयोगी है। इससे नई सतहों का निर्माण होता है, जिससे रासायनिक प्रक्रिया द्वारा सतह में नमी और हवा के वेधन में सहायता मिलती है। इससे मिट्टी के अन्दर ह्युमिक कार्बनिक एवं अम्ल जैसे तत्त्वों के उत्पादन में वृद्धि से जैव विविधता को प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रकार अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता को योगदान प्रदान करता है।

प्रश्न (ii) बृहत संचलन जो वास्तविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य (Perceptible) हैं, वे क्या है? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर-बृहत् संचलन के अन्तर्गत वे सभी संचलन आते हैं, जिनमें शैलों का मलबा (Debris) गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढाल के अनुरूप बृहत् मात्रा में स्थानान्तरित होता है। बृहत् संचलन में कोई भी भू-आकृतिक कारक; जैसे–प्रवाहित जल, हिमानी, वायु आदि सीधे रूप में सम्मिलित नहीं होते हैं। बृहत् संचलन को तीन मुख्य प्रकारों में सूचीबद्ध किया जाता है

  1. मन्द संचलन,
  2. तीव्र संचलन तथा
  3. भूमि संचलन।

प्रश्न (iii) विभिन्न गतिशील एवं शक्तिशाली बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य सम्पन्न करते हैं?
उत्तर-विभिन्न गतिशील एवं शक्तिशाली बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारक निम्नलिखित हैं

  1. प्रवाहित जल,
  2. संचलित हिमखण्ड अथवा हिमानी,
  3. वायु,
  4. भूमिगत जल,
  5. लहरें आदि।

गतिशील एवं शक्तिशाली बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारकों का प्रधान कार्य अपरदन या काटव करता है। इनके द्वारा प्रभावित उभरा हुआ धरातलीय भू-भाग अवतलित होता रहता है तथा पूर्व अवतलित क्षेत्रों में भराव अथवा अधिवृद्धि होती है।

प्रश्न (iv) क्या मृदा-निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?
उत्तर-मृदा-निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है। अपक्षय जलवायु, चट्टान की संरचना तथा जैविक तत्त्वों पर निर्भर होता है। कालान्तर में ये सभी कारक मिलकर अपक्षयी प्रावार की मूल विशेषताओं को उत्पन्न करते हैं और मृदा-निर्माण के मूल आधार बनते हैं। इसलिए अपक्षय मृदा-निर्माण में आवश्यक अनिवार्यता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) “हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है।” विवेचना कीजिए।
उत्तर-हम जानते हैं कि भूपर्पटी गत्यात्मक है। यह क्षैतिज एवं लम्बवत् दिशाओं में संचालित होती रहती है। भूपर्पटी का निर्माण करने वाली पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों में उत्पन्न अन्तर पृथ्वी की बाह्य शक्ति से अनवरत रूप से प्रभावित होता रहता है। इसका तात्पर्य यह है कि धरातल स्थलमण्डल के अन्तर्गत उत्पन्न बाह्य शक्तियों तथा पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों द्वारा प्रभावित रहता है। आन्तरिक शक्तियाँ धरातल पर रचनात्मक रूप से अपना कार्य करती रहती हैं। महाद्वीप, पर्वत, पठार आदि स्थलाकृतियों का निर्माण इसी शक्ति का परिणाम है जबकि बाह्य शक्तियाँ धरातल के उभरे हुए भागों के समतलीकरण के कार्य में संलग्न रहती हैं। अतएव दोनों शक्तियों की यह भिन्नता तब तक बनी रहती है जब तक बहिर्जनिक एवं अन्तर्जनिक बलों के विरोधात्मक कार्य चलते रहते हैं। इस प्रकार पृथ्वी इन शक्तियों के खेल का रंगमंच है।

प्रश्न (ii) बर्जिनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर-बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ वास्तव में अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्यातप से ही प्राप्त करती हैं। तापक्रम और वर्षण दो महत्त्वपूर्ण जलवायु तत्त्व हैं जो विभिन्न प्रकार से सूर्य द्वारा ही नियन्त्रित होते हैं। ये जलवायु तत्त्व रासायनिक, भौतिक एवं जैविक कारकों को संचालित कर भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को गतिशील रखते हैं। इससे चट्टानों में रासायनिक एवं भौतिक अभिक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं जिसका परिणाम अपक्षय, बृहत् संचलन एवं अपरदन के रूप में प्रकट होता है।

वास्तव में, समस्त वायुमण्डलीय शक्तियों का स्रोत सूर्य ही है। इसी से ऊर्जा एवं अन्तर्जनित शक्तियाँ नियन्त्रित होती हैं। इसी से प्राप्त प्रति इकाई क्षेत्र पर अनुप्रयुक्त शक्ति को प्रतिबल कहते हैं। ठोस पदार्थ में प्रतिबल धक्का और खिंचाव से उत्पन्न होता है। यही प्रतिबल चट्टानों को तोड़ता है। गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल के अतिरिक्त आणविक प्रतिबल से भी धरातल के पदार्थ प्रभावित चट्टानों को तोड़ता है। गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल के अतिरिक्त आणविक प्रतिबल से भी धरातल के पदार्थ प्रभावित होते हैं। अतः शक्ति के इन सभी स्रोतों का मूल स्रोत वस्तुतः सूर्य ही है जो अप्रत्यक्ष रूप से अन्य स्रोतों को उत्पन्न करके जलवायु तत्त्वों के रूप में कार्य करता है। यही कारक रासायनिक एवं भौतिक ऊर्जा उत्पन्न करके भू-आकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा भूपर्पटी में परिवर्तन उत्पन्न करता है। हमारे धरातल पर विभिन्न प्रकार के जलवायु प्रदेश उपलब्ध हैं। इन प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ होती रहती हैं जिसके लिए धरातल पर तापीय प्रवणता, अक्षांशीय दशाएँ, वर्षण एवं अन्य मौसमी दशाएँ उत्तरदायी होती हैं परन्तु इन सभी को नियन्त्रित एवं प्रभावित करने वाला एकमात्र ऊर्जा स्रोत सूर्य ही होता है।

प्रश्न (iii) क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर-भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र नहीं हैं। अपक्षय के अन्तर्गत वायुमण्डलीय तत्त्वों के प्रति धरातल के पदार्थों की प्रतिक्रिया सम्मिलित होती है। वास्तव में अपक्षय के अन्दर अनेक प्रक्रियाएँ हैं जो पृथक् या सामूहिक रूप से धरातल के पदार्थों को विखण्डित करने के लिए प्रयत्नशील रहती हैं।

अपक्षय प्रक्रिया का एक वर्ग रासायनिक क्रियाओं; जैसे-जलयोजन, ऑक्सीकरण, कार्बोनेट विलयन, मृदा जल और अन्य अम्ल द्वारा विघटन के लिए कार्यरत रहता है। इसमें ऊष्मा के साथ जल और वायु की विद्यमानता सभी रासायनिक प्रक्रियाओं को तीव्र गति देने के लिए आवश्यक है।

अपक्षय प्रक्रिया का दूसरा वर्ग जिसे भौतिक अपक्षय कहा जाता है. अनुप्रयुक्त बलों पर आश्रित होता है जिसमें तापक्रम, दबाव आदि से चट्टानों में संकुचन एवं विस्तारण के कारण चट्टानों की सन्धियाँ कमजोर होकर विदीर्ण होने लगती हैं।

वास्तव में, भौतिक और रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ दोनों भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से प्रभावित होने के कारण स्वतन्त्र नहीं हैं। उदाहरण के लिए, तापमान जिसे भौतिक अपक्षय का महत्त्वपूर्ण कारक कहा जाता है जब तक सक्रिय नहीं होता तब तक वह चट्टानों की रासायनिक संरचना के साथ अभिक्रिया नहीं करेगा। इसी प्रकार जल किसी चट्टान से तब तक कोई अभिक्रिया नहीं करेगा जब तक उसे ताप या दाब के कारण ऊष्मा प्राप्त नहीं होगी। अत: भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय एक-दूसरे से अलग-अलग होते हुए भी स्वतन्त्र नहीं हैं बल्कि वायुमण्डलीय ऊष्मा के कारण नियन्त्रित हैं।

प्रश्न (iv) आप किस प्रकार मृदा-निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा कारकों के बीच अन्तर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा-निर्माण में दो महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?
उत्तर-किसी प्रदेश में मिट्टियों का निर्माण मृदा-निर्माण कारकों और मृदा-निर्माण प्रक्रिया का परिणाम होता है। मृदा-निर्माण कारकों के अन्तर्गत जलवायु, स्थलाकृति, उच्चावच (मूल पदार्थ) जैविक प्रक्रियाओं और काल अवधि को सम्मिलित किया जाता है, जबकि मृदा-निर्माण प्रक्रिया में मृदा-संवृद्धि, मृदा क्षति, पदार्थों का विस्थापन एवं पदार्थों का रूपान्तरण सम्मिलित है।

अत: मृदाजनित कारक जब निश्चित अवधि तक मृदा संवृद्धि मृदा क्षति तथा पदार्थों के विस्थापन और रूपान्तरण की प्रक्रियाओं में क्रियाशील होते हैं तभी मृदा का निर्माण होता है। अतः मृदा कारक एवं प्रक्रिया दोनों ही मृदा के निर्माण के अलग-अलग पक्ष होते हुए भी समन्वित रूप से कार्य करते हैं तभी किसी प्रदेश की मृदा का निर्माण कार्य सम्पन्न होता है।

जलवायु एवं जैविक कारकों की बूंदा-निर्माण में भूमिका

जलवायु मृदा-निर्माण का सक्रिय कारक है। इसके अन्तर्गत वर्षण, वाष्पीकरण, आर्द्रता और तापक्रम तथा मौसम की दैनिक भिन्नता की प्रमुख भूमिका होती है। वर्षा से मृदा को आर्द्रता मिलती है जिससे रासायनिक और जैविक क्रिया होती है। इन क्रियाओं को तापक्रम के माध्यम से गति प्राप्त होती है। वर्षा के कारण मृदा में अपक्षालन (Leaching) तथा केशिका क्रिया (Capillary Action) होती है जो तापमान की दरों से प्रभावित होती है। अतः जलवायु मृदा-निर्माण का सक्रिय कारक है तथा मृदा प्रक्रिया को संचालित करने में विशेष योगदान देती है (चित्र 6.1)।

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जैविक प्रक्रियाएँ या कारक मृदा में नमी धारण करने की क्षमता तथा नाइट्रोजन उत्पत्ति में सहायक होती हैं। मृत पौधे या जैविक अवशेषों से मृदा को ह्युमस प्राप्त होता है। मृदा में ह्यूमस की उपलब्धता एवं अल्पता भी तापमान द्वारा नियन्त्रित होती है। इसी कारण उष्ण प्रदेशों में ह्यूमस की उपलब्धता शीत प्रदेशों की अपेक्षा कम होती है।

अतएव मृदा-निर्माण में जलवायु एवं जैविक प्रक्रिया दो महत्त्वपूर्ण कारक हैं। इन दोनों कारकों के अभाव में अन्य मृदाजनित कारक निष्क्रिय ही रहते हैं। वास्तव में यही वे कारक हैं जो मृदा-निर्माण प्रक्रिया को संचालित करते हैं। इसलिए किसी प्रदेश में मृदा-निर्माण जलवायु और जैविक क्रियाओं पर निर्भर होता हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. समस्त वायुमण्डलीय शक्तियों का स्रोत है
(क) सूर्य
(ख) चन्द्रमा
(ग) तारा
(घ) पृथ्वी
उत्तर-(क) सूर्य।

प्रश्न 2. पेड़-पौधों के सड़े-गले पदार्थ तथा जीवाणुओं के अवशेष क्या कहलाते हैं?
(क) मृदा
(ख) ह्यूमस
(ग) अपरदन
(घ) सन्निघर्षण
उत्तर-(ख) ह्यूमस।

प्रश्न 3. बृहत् संचालन कितने प्रकार का होता है?
(के) एक
(ख) दो
(ग) तीन ।
(घ) चार
उत्तर-(ग) तीन।

प्रश्न 1. सूर्यातप किस प्रकार अपक्षय में सहायक है?
उत्तर-दिन के समय चट्टानें सूर्य के ताप से फैलती हैं तथा रात्रि में ताप का विकिरण होने से सिकुड़ती हैं। फैलने व सिकुड़ने की क्रिया बार-बार होने से अपक्षय में वृद्धि होती है।

प्रश्न 2. रासायनिक अपक्षय किसे कहते हैं? इसकी प्रबलता का क्षेत्र बताइए।
उत्तर-जब वियोजन की क्रिया द्वारा चट्टानें ढीली पड़कर विदीर्ण हो जाती हैं तो इस क्रिया को रासायनिक अपक्षय कहते हैं। रासायनिक अपक्षय आर्द्र जलवायु प्रदेशों में अधिक प्रबल होता है।

प्रश्न 3. जैविक अपक्षय का क्या अर्थ है?
उत्तर-जब अपक्षय क्रिया में मनुष्य, जीव-जन्तुओं तथा वनस्पति का योगदान होता है तो उसे जैविक अपक्षये कहते हैं।

प्रश्न 4. अपक्षय एवं अपरदन में क्या मौलिक अन्तर हैं?
उत्तर-अपक्षय स्थैतिक एवं अपरदन गतिशील प्रक्रियाएँ हैं। अपक्षय में चट्टानें अपने ही स्थान पर टूट-फूटकर चूरामात्र हो जाती हैं परन्तु अपरदन में इस चूर्ण का स्थानान्तरण होता रहता है।

प्रश्न 5. अपरदन के प्रमुख अभिकर्ताओं के नाम लिखिए।
उत्तर-बहता हुआ जल या नदी, पवन, हिमनद, भूमिगत जल एवं समुद्री लहरें प्रमुख अपरदन अभिकर्ता

प्रश्न 6. अनाच्छादन का क्या अर्थ है?
उत्तर-अनाच्छादन का अर्थ है-चट्टान का आवरण हटना। इस क्रिया में अपक्षय एवं अपरदन दोनों प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।

प्रश्न 7. बाह्य शक्ति के प्रमुख कारक बतलाइए।
उत्तर-धरातल पर बाह्य शक्ति में तापमान, वर्षा गुरुत्वाकर्षण, बहता जल, पवन तथा हिमनद प्रमुख कारक हैं।

प्रश्न 8. अपरदन में कौन-कौन-सी क्रियाएँ सम्मिलित हैं?
उत्तर-अपरदन में चट्टानों का अपघर्षण, सन्निघर्षण जलगति क्रिया, घोलीकरण, अपवहन तथा परिवहन आदि क्रियाएँ सम्मिलित हैं।

प्रश्न 9. अपक्षय कितने प्रकार का होता है?
उत्तर-अपक्षय मुख्यत: तीन प्रकार का होता है—(1) भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय, (2) रासायनिक अपक्षय एवं (3) जैविक अपक्षय।।

प्रश्न 10. मृदा क्या है?
उत्तर-मृदा धरातल का वह पदार्थ है जिसका निर्माण जलवायु कारकों द्वारा चट्टानों के क्षय से होता है। इसमें ह्यूमस, खनिज एवं लवण तत्त्वों की प्रधानता होती है।

प्रश्न 11. ह्यूमस से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-पेड़-पौधों के सड़े-गले पदार्थ तथा सूक्ष्म जीवाणुओं के अवशेष ह्यूमस कहलाते हैं। यह मृदा में मृत , जैविक पदार्थ है जिससे मृदा में उपजाऊ तत्त्वों का विकास होता है।

प्रश्न 12. अपक्षालन क्या है?
उत्तर-मृदा परिच्छेदिका में ऊपरी सतह से पदार्थों का नीचे की सतह की ओर परिगमन अपक्षालन कहलाता है।

प्रश्न 13. मृदा-निर्माण प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के नाम लिखिए।
उत्तर-मृदा-निर्माण प्रक्रिया अग्रलिखित चरणों में सम्पन्न होती है

  1. पदार्थों का स्थानान्तरण,
  2. लवणीकरण,
  3. पदार्थों का कार्बनिक परिवर्तन,
  4. पोडजोलाइजेशन,
  5. लैटेराइजेशन।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. मृदा-निर्माण प्रक्रिया में कालावधि, स्थलाकृति एवं मूल पदार्थ को निष्क्रिय कारक क्यों माना जाता है?
उत्तर-मृदा-निर्माण प्रक्रिया में कालावधि, स्थलाकृति एवं मूल पदार्थ तब तक सक्रिय नहीं होते हैं जब तक इन पर कोई रासायनिक या भौतिक अभिक्रिया न हो। इस क्रिया के लिए जलवायु तत्त्वों या अन्य वायुमण्डलीय शक्तियों का सहयोग आवश्यक है। इसी कारण स्थलाकृति, मूल पदार्थ एवं कालावधि को मृदा-निर्माण में निष्क्रिय कारक कहा गया है।

प्रश्न 2. अपक्षय का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-अपक्षय का महत्त्व निम्नलिखित है

  • अपक्षय की क्रिया द्वारा उपजाऊ मिट्टी का निर्माण होता है। विखण्डित एवं अपरदित शैलों के कण एकत्रित होकर उपजाऊ भूमि में बदल जाते हैं जो कृषि के लिए उपयुक्त है।
  • अपक्षय की क्रिया से गन्धक, चूना, जिप्सम आदि उपयोगी खनिज पदार्थ सुगमता से प्राप्त हो जाते
  • अपक्षय की क्रिया शैलों को चट्टानी चूर्ण में बदल देती है। इस बारीक शैल-चूर्ण को नदियाँ, हिमनद तथा पवन बहाकर एवं उड़ाकर अन्यत्र ले जाती हैं तथा उन्हें दूसरे स्थान पर जमा कर समतल मैदानों का निर्माण करती हैं जो कृषि-कार्य के लिए उपयोगी होते हैं।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में ऋतु-अपक्षय के कारण विशाल शिलाखण्ड टूटते-फूटते रहते हैं, जिनसे नदियों की घाटियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं और झीले बन जाती हैं।
  • अपक्षय की क्रिया द्वारा भूमि का अपक्षरण सरल हो जाता है।
  • शैलों को अपक्षय एवं निक्षेपण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मूल्यवान खनिजों; जैसे-लोहा, मैंगनीज, ऐलुमिनियम, ताँबा के अयस्कों के समृद्धीकरण एवं सकेन्द्रण में यह सहायक होता है।

प्रश्न 3. मृदा परिच्छेदिका (Profile) का अर्थ बताइए तथा मृदा परिच्छेदिका परतों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-प्रत्येक प्रकार की मिट्टी में विकसित संस्तर उसकी परिच्छेदिका कहलाता है। मृदा परिच्छेदिका में निम्नलिखित चार परतें स्पष्ट रूप से प्रकट होती हैं|

  1. ऊपरी मृदा या A संस्तर-यह मृदा की सबसे ऊपरी परत होती है जिसमें महीन कण, रासायनिक और जैविक पदार्थ, ह्यूमस आदि पाए जाते हैं।
  2. उपमृदा या B संस्तर-यह मृदा परिच्छेदिका की दूसरी परत है, इसमें अपक्षयित पदार्थ बालू, गाद तथा चिकनी मिट्टी आदि के पदार्थ होते हैं। यहाँ जल रिसाव के कारण आर्द्रता बनी रहती है।
  3. अपक्षयित चट्टान या c संस्तर-मृदा परिच्छेदिका के इस भाग में चट्टान के अपक्षयित पदार्थ पाए जाते हैं, जिनका अपक्षरण पूरी तरह से नहीं होता है।
  4. आधारी चट्टान या D संस्तर-यह परिच्छेदिका का आधार होता है जिसमें मूल चट्टानी पदार्थ अपक्षयित नहीं होता है।

प्रश्न 4. क्या शैलों के अपक्षय के बिना पर्याप्त अपरदन सम्भव हो सकता है?
उत्तर-अपरदन द्वारा उच्चावचे का निम्नीकरण होता है, अर्थात् भूदृश्य विघर्षित होता है। इसका तात्पर्य यह है कि अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, लेकिन अपक्षय अपरदन के लिए अनिवार्य दशा नहीं है।

प्रश्न 5. शैल एवं मृदा में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-शैल एवं मृदा में अन्तर
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प्रश्न 6. मृदा निर्माणकारी सक्रिय एवं निष्क्रिय कारकों में अन्तर बताइए।
उत्तर- मृदा निर्माणकारी सक्रिय एवं निष्क्रिय कारकों में अन्तर
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प्रश्न 7. शुष्क एवं आर्द्र जलवायु प्रदेशों की मिट्टियों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- शुष्क एवं आद्र जलवायु प्रदेशों की मिट्टियों में अन्तर
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प्रश्न 8. पृथ्वी के अन्तर्जात या आन्तरिक बल किस प्रकार स्थलरूपों के विकास में सहायक हैं। वर्णन कीजिए।
उत्तर-अन्तर्जात बल पृथ्वी के अन्तरतम में दो प्रकार की गतियों को जन्म देते हैं-(1) क्षैतिज गति एवं (2) लम्बवत् या ऊध्र्वाधर गति। इन दोनों गतियों के परणिामस्वरूप आन्तरिक भागों में उत्पंन्न होने वाले परिवर्तनों की प्रतिक्रिया धरातल के बाह्य भाग पर भी होती है। धरातल के बाह्य भागों में पर्वत, पठार, मैदान तथा भ्रंशन आदि स्थलाकृतियाँ बनती व बिगड़ती रहती हैं। पृथ्वी के आन्तरिक भागों में मुख्यतः आकस्मिक गतियाँ और पटल विरूपणी प्रक्रिया स्थलरूपों के विकास में सहायक हैं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

1. आकस्मिक गतियाँ-इस गति के परिणामस्वरूप पृथ्वी के आन्तरिक भागों में अचानक हलचल प्रारम्भ हो जाती है। ये गतियाँ मानव के लिए अत्यन्त विनाशकारी होती हैं क्योंकि इनसे ज्वालामुखी उद्गार और भूकम्प की उत्पत्ति होती है। ज्वालामुखी द्वारा आन्तरिक भाग में बैथोलिथ, फैकोलिथ, लैपोलिथ, डाइक आदि तथा बाह्य भाग में विभिन्न प्रकार के ज्वालामुखी शंकु और लावा पठारों को निर्माण होता है। भूकम्प द्वारा विभिन्न प्रकार की दरार और भ्रंशों का विकास होता है।

2. पटल विरूपण गतियाँ-पृथ्वी के आन्तरिक भाग में लम्बवत् या क्षैतिज दोनों प्रकार की गतियाँ सक्रिय रहती हैं। ये गतियाँ मंद गति से अपना कार्य सम्पन्न करती हैं। इनके द्वारा महाद्वीप एवं पर्वतों का निर्माण विभिन्न प्रकार की भूसंचलन प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

प्रश्न 9. भूसंचलन से आप क्या समझते हैं? भूसंचलन प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भूसंचलन
भूपटल पर पाए जाने वाले विविध स्थलरूपों के विकास में भूसंचलन का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भूसंचलन पृथ्वी की आन्तरिक एवं बाह्य शक्तियों की पारस्परिक क्रिया द्वारा सम्पन्न होता है। आन्तरिक शक्तियाँ भूगर्भ से तथा बाह्य शक्तियाँ वायुमण्डल से सम्बन्धित हैं। आन्तरिक शक्तियों द्वारा धरातल पर पर्वत, पठार, मैदान आदि अनेक स्थलरूपों का निर्माण होता है; अतः इन्हें संरचनात्मक बल कहा जाता है। इसके विपरीत बाह्य शक्तियों को विनाशात्मक बल कहा गया है, क्योंकि ये चट्टानों को विदीर्ण करके अपने स्थान से हटाकर अन्यत्र एकत्रित करती रहती हैं। अत: भूसंचलन प्रकृति के परिवर्तनशील स्वभाव का परिचायक है जो पृथ्वी पर उसकी आन्तरिक एवं बाह्य शक्तियों द्वारा विविध स्थलरूपों के निर्माण एवं विनाश के रूप में प्रकट होता है।

भूसंचलन प्रकृति की परिवर्तनशीलता का परिचायक है। यह प्रक्रिया पृथ्वी की आन्तरिक एवं बाह्य शक्तियों द्वारा सम्पन्न होती है। निम्नांकित वर्गीकरण द्वारा भूसंचलन प्रक्रिया को समझाया गया है
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प्रश्न 10. महाद्वीप एवं पर्वत निर्माणकारी गतियों का विवरण दीजिए।
उत्तर-1. महाद्वीप निर्माणकारी गतियाँ-महाद्वीपों के निर्माण, उत्थान और अवतलन की क्रियाएँ इन्हीं गतियों द्वारा सम्पन्न होती हैं। ये गतियाँ लम्बवत् स्थलाकृतियों को जन्म देती हैं। दिशा के आधार पर इन गतियों को दो भागों में विभक्त किया जाता है

(अ) उपरिमुखी संचलन-महाद्वीपों में ये गतियाँ दो प्रकार के उत्थान उत्पन्न करती हैं। प्रथम राति में महाद्वीप का कोई भाग ऊपर उठता है, परन्तु द्वितीय गति में केवल महाद्वीपों का तटीय भाग समुद्रतल से ऊपर उठता है, जिसे निर्गमन कहते हैं।

(ब) अधोमुखी संचलन-इस गति के अन्तर्गत महाद्वीपों में दो प्रकार का धंसाव होता है—प्रथम दशा में महाद्वीप का कोई खण्ड पहली सतह से नीचे चला जाता है। द्वितीय दशा में महाद्वीप का कोई खण्ड समुद्रतल से नीचे चला जाता है तथा जलमग्न हो जाता है। सागरतटीय भागों में यह स्थिति अधिक पाई जाती है।

2. पर्वत निर्माणकारी गतियाँ-ये गतियाँ क्षैतिज दिशा में स्थलरूपों का निर्माण करती हैं। पर्वत निर्माणकारी गतियाँ जब विपरीत दिशाओं में क्रिया करती हैं तो चट्टानों में भ्रंश उत्पन्न होता है। परन्तु जब ये गतियाँ आमने-सामने अर्थात् सम्मुख दिशा में कार्य करती हैं तो सम्पीडन उत्पन्न होती है जिसके फलस्वरूप चट्टानों में भिंचाव से वलन एवं संवलन की उत्पत्ति होती है।।

प्रश्न 11. बृहत संचलन का अर्थ बताइए तथा इसमें प्रक्रिया कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारक चट्टान या चट्टानी पदार्थ का ढाल के अनुरूप स्थानान्तरण संचलन या बृहत् संचलन कहलाता है। इस प्रकार के मलवा संचलन में संचलन की गति मन्द से. तीव्र हो सकती है, जिनके अन्तर्गत, विसर्पण बहाव, स्खलन एवं पतन (Fall) सम्मिलित होता है। दूसरे शब्दों में, बृहत् संचलन का तात्पर्य है कि वायु, जल, हिम ही अपने साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक मलवा नहीं ढोते, अपितु मलवा भी अपने साथ वायु, जल या हिम ले जाता है। बृहत् संचलन में गुरुत्वाकर्षण शक्ति सहायक होती है तथा कोई भी भू-आकृतिक कारक; जैसे–प्रवाहित जल, हिमानी, वायु, लहरें एवं धाराएँ बृहत् संचलन की प्रक्रिया में सीधे ही सम्मिलित नहीं होते हैं साथ ही इसमें अपरदन भी सम्मिलित नहीं होता है। यद्यपि पदार्थों का संचलन गुरुत्वाकर्षण के सहयोग से एक से दूसरे स्थान को होता रहता है। बृहत् संचलन में अपरदन के अतिरिक्त अपक्षय भी
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अनिवार्य नहीं होता है, परन्तु अपक्षय बृहत् संचलन को बढ़ावा अवश्य देता है। इसीलिए बृहत्.संचलन अपक्षयित ढालों पर अनपक्षयित पदार्थों की अपेक्षा बहुत अधिक सक्रिय होता है। अतः असम्बद्ध कमजोर चट्टानी पदार्थ छिछले संस्तर वाली शैलें, भ्रंश, तीव्रता से झुके संस्तर खड़े भृगु या तीव्र ढाल, पर्याप्त वर्षा, वनस्पति अभाव और गुरुत्वाकर्षण बल बृहत् संचलन में विशेष रूप से सहायक हैं। यह तथ्य चित्र सं० 6.2 से भी स्पष्ट है।

सक्रिय कारक-बृहत् संचलन की सक्रियता में निम्नलिखित कारक मुख्य रूप से सम्मिलित होते हैं

  1. प्राकृतिक एवं कृत्रिम साधनों द्वारा ऊपर के पदार्थों के टिकने के आधार का हटना।
  2. ढाल प्रवणता एवं ऊँचाई में वृद्धि।
  3. प्राकृतिक एवं कृत्रिम भराव या अत्यधिक वर्षा के कारण उत्पन्न अतिभार।
  4. मूल ढाल की सतह से भार या पदार्थ का हटना।
  5. भूकम्प, मशीनी कम्पन या विस्फोट।
  6. अत्यधिक प्राकृतिक रिसावे।
  7. झीलों, जलाशयों एवं नदियों से भारी मात्रा में जल का निष्कासन, परिणामस्वरूप ढालों एवं नदी तटों के नीचे से जल का मन्द गति से बहना।
  8. वनस्पति का अत्यधिक विनाश।

प्रश्न 12. बृहत संचलन कितने प्रकार का होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर-बृहत् संचलन निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है–
1. मन्द संचलन-इसमें मलबा संचलन इतना मन्द होता है कि इसका आभास करना कठिन होता है। | और दीर्घकाल के अवलोकन या निरीक्षण से ही इसका पता चलता है। इसमें सम्मिलित पदार्थ में शैल चूर्ण मृदा की मात्रा अधिक होती है।

2. तीव्र संचलन-ये संचलन आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में निम्न से लेकर तीव्र ढालों में अधिक होते। हैं। इस संचलन में चिकनी मिट्टी, कीचड़ प्रवाह एवं मलबा पदार्थों की प्रधानता होती है।

3. भू-स्खेलन-भू-स्खलने अपेक्षाकृत तीव्र एवं अवगम्य संचलन है। इसमें स्खलित होने वाले पदार्थ प्रायः शुष्क होते हैं। भू-स्खलन में पदार्थों के संचलन के प्रकार के आधार पर कई प्रकार के स्खलन पहचाने जा सकते हैं; जैसे कि चित्र 6.3 में दिखाए गए हैं। (ढाल के सन्दर्भ में भू-स्खलन के कई प्रकार हैं; जैसे—अवसर्पण, शैलसर्पण आदि)।

हमारे देश में भू-स्खलन की घटना हिमालय क्षेत्र में अधिक देखी जाती है। इसका मुख्य कारण हिमालय विवर्तनिकी सक्रियता एवं ढाल के कारण गुरुत्वाकर्षण शक्ति की प्रबलता है।
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ऋतु-अपक्षय से क्या तात्पर्य है? इसे नियन्त्रित करने वाले प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।
या ऋतु-अपक्षय से आप क्या समझते हैं? अपक्षय का वर्गीकरण कीजिए एवं इसके कार्य बताइए।
या ऋतु-अपक्षय पृथ्वी की चट्टानों को किन रूपों में प्रभावित करती है? ऋतु-अपक्षय के मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-ऋतु-अपक्षय
भूपटल पर दो प्रकार की शक्तियाँ कार्यरत हैं—आन्तरिक एवं बाह्य। यही शक्तियाँ भूपृष्ठ के भौतिक स्वरूप में लगातार परिवर्तन करती रहती हैं। पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों में ज्वालामुखी तथा भूकम्प मुख्य हैं तथा बाह्य शक्तियों में धरातल को अपरदित करने वाले कारक-जल, वायु, सूर्यातप, हिमानी, सागरीय तरंगें आदि हैं। आन्तरिक शक्तियाँ धरातल को असमतल करने में लगी रहती हैं, जबकि बाह्य शक्तियाँ इस ऊबड़-खाबड़ धरातल को समतल करने में अपना योगदान देती हैं। मोंकहाउस नामक विद्वान के शब्दों में, “अपक्षय में उन सभी साधनों के कार्य शामिल हैं जिनके द्वारा पृथ्वी तल के किसी भी भाग का अत्यधिक विनाशें, अपव्यय एवं हानि होती है। इस अपार विनाश से जो पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर निक्षेपित हो जाता है, उसके द्वारा अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है।

” इस प्रकार, ”मौसम के तत्त्वों द्वारा पृथ्वी पर विखण्डन की वह क्रिया, जिसमें चट्टानों का संगठन ढीला पड़ जाता है तथा वे टूटकर खण्ड-खण्ड हो जाती हैं, अपक्षय या ऋतु-अपक्षय कहलाती है।” हिण्डस ने भी कहा है कि “अपक्षय यान्त्रिक विघटन या रासायनिक अपघटन की वह क्रिया है जो चट्टानों के भौतिक स्वरूप को समाप्त करती रहती है।”

अपक्षय को नियन्त्रित करने वाले प्रमुख कारक

अपक्षय को नियन्त्रित करने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं
1. तापमान-जलवायु की विभिन्नता अपक्षय का एक प्रमुख कारक है। उष्ण एवं शुष्क जलवायु | प्रदेशों में वर्षा बहुत कम होती है। इसीलिए दिन में अत्यधिक तापक्रम के कारण चट्टानें फैल जाती हैं तथा रात्रि में ठण्ड पाने से सिकुड़ती हैं। बार-बार इस प्रक्रिया से चट्टानों में विघटन तथा वियोजन को बढ़ावा मिलता है। शीतोष्ण प्रदेशों में अधिक ठण्ड पड़ने के कारण जल चट्टानों की दरारों में ठोस (हिम) रूप में जम जाता है तथा दिन में यह हिम पिघलकर जल में परिवर्तित हो जाती है। इससे चट्टानों में तोड़-फोड़ की क्रिया होती है। इस प्रकार अति शीत-प्रधान प्रदेशों में रासायनिक
और जैविक अपक्षय अधिक होता है।

2. चट्टानों की संरचना एवं संगठन-भूपृष्ठ के किसी भाग का अपक्षय चट्टानों की संरचना एवं संगठन पर निर्भर करता है। कमजोर, कोमल तथा असंगठित चट्टानों में विघटन तथा अपघटन की | क्रियाएँ तीव्रता से होती हैं। घुलनशील खनिजों वाली चट्टानों में रासायनिक अपक्षय की क्रिया भी शीघ्र होती है, जबकि कठोर चट्टानों में यह क्रिया कम होती है। यदि चट्टानों की परतें लम्बवत् हों तो उन पर जल, वायु, तुषारापात एवं सूर्यातप का प्रभाव शीघ्र पड़ता है, जबकि क्षैतिज अवस्था की। चट्टानों में अपक्षय का प्रभाव कम हो जाता है।

3. ढाल का स्वरूप-तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में विघटन क्रिया सरलता से होती है, क्योंकि यहाँ चट्टानों का स्वरूप बड़ा ही दुर्बल होता है। इसीलिए ऊपरी भागों से चट्टानी खण्ड टूट-टूटकर नीचे घाटी में गिरने लगते हैं। इसके विपरीत कम ढाल वाले भागों में चट्टानें अधिक संगठित, कठोर एवं शक्तिशाली होती हैं। मलबे का स्थानान्तरण न हो पाने के कारण अपक्षय क्रिया भी बहुत कम होती है।

4. वनस्पति का प्रभाव-वनस्पति अपक्षय को दोनों रूपों में प्रभावित करती है। बनस्पतिविहीन प्रदेशों में अधिक ताप के कारण चट्टानें फैलती हैं तथा सिकुड़ने के बाद विघटित हो जाती हैं।

अपक्षय के प्रकार एवं उनके कारक

अपक्षय क्रिया के निम्नलिखित कारक हैं-
1. भौतिक या यान्त्रिक कारक-(i) बहता हुआ जल और वर्षा, (ii) सूर्यातप, (iii) पाला, (iv) वायु, (v) हिम एवं (vi) सागरीय लहरें।
2. रासायनिक कारक-(i) ऑक्सीकरण, (ii) कार्बनीकरण एवं (iii) घोलीकरण।
3. जैविक कारक-(i) वनस्पति, (ii) जीव-जन्तु एवं (iii) मानव।

अपक्षय का वर्गीकरण एवं कार्य

अपक्षय को निम्नलिखित रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है–
1. भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय-इस प्रक्रिया में भौतिक तत्त्वों द्वारा चट्टानों का अपक्षय होता है। इन तत्त्वों में ताप प्रमुख यान्त्रिक कारक है। अपक्षय की इस क्रिया में चट्टानों का फैलाव एवं संकुचन होता है जिससे वे टूट-फूटकर शिलाचूर्ण बन जाती हैं। यान्त्रिक अपक्षय के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं

(i) जल-बहता हुआ जल, वर्षा का जल एवं स्थिर जल चट्टानों को विघटित करता रहता है। पर्वतीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियाँ तीव्र ढाल से प्रवाहित होने के कारण पर्वतीय भागों को काट देती हैं। वर्षा का जल चट्टानों की दरारों में भरकर उनका विघटन कर देता है। शीत प्रदेशों में जल हिम के रूप में चट्टानी दरारों में भर जाता है। दिन के समय यही जल पिघल जाता है। जल चट्टानों के भौतिक एवं रासायनिक दोनों प्रकार के विघटन में सहायक होता है।

(ii) सूर्यातप-उष्ण एवं शुष्क मरुस्थलीय भागों में दिन के समय चट्टानें सूर्य की गर्मी पाकर फैलती हैं तथा रात्रि में ठण्ड पाकर सिकुड़ती हैं। इस क्रिया के बार-बार होने से चट्टानों में
दरारें पड़ जाती हैं। इन क्षेत्रों में चट्टानों का अपक्षय मोटे बालू-कणों के रूप में होता है।

(iii) हिम या पाला-चट्टानों की सन्धियों में वर्षा का जल प्रवेश कर जाता है। शीत एवं शीतोष्ण प्रदेशों में यही जल हिम के रूप में जम जाता है। इसके आयतन में वृद्धि होने के कारण चट्टानों में दरारें एवं चटकन पड़ जाती हैं तथा चट्टानों का विघटन होकर वे खण्ड-खण्ड हो जाती हैं।

(iv) वायु-वायु अपक्षय का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। वायु अपघर्षण, सन्निघर्षण तथा अपवाहन क्रियाओं द्वारा चट्टानों का अपक्षय करती है।

(v) समुद्री लहरें-तटवर्ती भागों में समुद्री लहरें बड़े-बड़े शिलाखण्डों को काट देती हैं तथा . तटों का रूप परिवर्तित करती रहती हैं। समुद्र तट पर लम्बवत् चट्टानों में अधिक विघटन होता है।

2. रासायनिक अपक्षय-भौतिक अपक्षय के साथ-साथ चट्टानों का रासायनिक अपक्षय भी होता है। वायुमण्डल के निचले स्तर की सभी गैसें; जैसे—कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, जलवाष्प, नाइट्रोजन आदि वर्षा जल से क्रिया कर रासायनिक अपक्षय में वृद्धि करती हैं। इससे चट्टानें ढीली पड़ जाती हैं और अपघटित होकर विखण्डित हो जाती हैं। रासायनिक अपक्षय निम्नलिखित विधियों के अनुसार होता है–

(i) ऑक्सीकरण-वर्षा अथवा नदियों का जल ऑक्सीजन को अपने साथ घोलकर चट्टानों से क्रिया करता है, जिसे ऑक्सीकरण कहते हैं। चट्टानों का लोहा ऑक्सीजन के प्रभाव से ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। यही कारण है कि वर्षा ऋतु में लोहे पर जंग लग जाती है। इस क्रिया में चट्टानों का आयतन बढ़ जाता है तथा वे ढीली होकर टूट जाती हैं।

(ii) कार्बनीकरण-कार्बन डाइऑक्साइड गैस जब जल से रासायनिक क्रिया करती है तो वह विभिन्न खनिजों के साथ रासायनिक क्रिया द्वारा कार्बोनेट बनाती है। ये कार्बोनेट चट्टानों के घुलनशील तत्त्वों से अलग होकर जल में मिल जाते हैं। इससे शैलों का संगठन कमजोर पड़ जाता है तथा वे वियोजित हो जाती हैं।

(iii) घोलीकरण-जल के चट्टानों में अवशोषित होने की क्रिया को घोलीकरण कहते हैं। इससे उनका आयतन बढ़ जाता है तथा चट्टानों के कणों एवं खनिजों में तनाव, दबाव एवं खिंचाव की क्रिया आरम्भ हो जाती है। इससे चट्टानों को अपक्षय प्रारम्भ हो जाता है।

3. जैविक अपक्षय–धरातल पर जैविक अपक्षय वनस्पति, जीव-जन्तु एवं मानव द्वारा निम्नलिखित प्रकार से सम्पन्न होता है

(i) वानस्पतिक अपक्षय-चट्टानों की दरारों में जब पेड़-पौधों की जड़ें प्रवेश करती हैं तो जड़े धीरे-धीरे मोटी होती जाती हैं। चट्टानों की दरारें अधिक चौड़ी होने पर टूट जाती हैं जो अपक्षय में सहायक होती हैं। वनस्पति के मिट्टी में सड़ने-गलने से रासायनिक क्रिया द्वारी जीवांश की उत्पत्ति होती है।

(ii) जीव-जन्तु अपक्षय-पृथ्वी तल पर जितने भी जीव-जन्तु हैं, वे सभी अपक्षय में सहायक हैं। इनके द्वारा भौतिक एवं रासायनिक दोनों ही अपक्षय होते हैं। लोमड़ी, गीदड़; बिज्जू, केंचुए, चूहे, दीमक तथा कुछ अन्य जीव-जन्तु अपनी सुरक्षा के लिए चट्टानों में अपनी गुफा तथा बिल बनाते हैं जिससे भूमि को काफी मलबा बाहर आ जाता है।

(iii) मानवकृत अपक्षय-मानव अपनी रचनात्मक क्रियाओं; जैसे—कुएँ, झीलें, नहरें तालाब, रेल, सड़कें, खान, कृषि (जुताई) आदि के लिए भूमि से मिट्टी खोदता है जिससे चट्टानें असंगठित हो जाती हैं तथा धीरे-धीरे वे टूटती रहती हैं।

ऋतु-अपक्षय का महत्त्व अथवा मानव जीवन पर प्रभाव

ऋतु-अपक्षय अपनी निम्नलिखित उपादेयता द्वारा अपनी महत्ता सिद्ध करता है–
1. उपजाऊ मिट्टी का निर्माण-ऋतु-अपक्षय शैलों के विखण्डन द्वारा कृषि के लिए उपयोगी तथा उपजाऊ मिट्टी का निर्माण करता है। उपजाऊ मिट्टी कृषि का आधार है और कृषिगत उपजें मानव-जीवन का आधार होती हैं। ऋतु-अपक्षय उपजाऊ मिट्टी का निर्माण करके मानव को पर्याप्त हित करता है।

2. खनिज पदार्थों की उपलब्धता-शैलों के टूटने से चूना, गन्धक, चाक तथा जिप्सम आदि उपयोगी खनिजों का निर्माण होता है। ये खनिज बड़े उपयोगी होते हैं।

3. समतल मैदानों का निर्माण-ऋतु-अपक्षय के कारक अपने द्वारा घर्षित अवसाद अन्यत्र ले | जाकर तथा बिछाकर समतल मैदानों का निर्माण कर कृषि, उद्योग, परिवहन तथा मानव बसाव के रूप में मानव का हित सम्पादन करते हैं।

4. धरातल के स्वरूप में परिवर्तन-नदियाँ, हिमनद्, पवन तथा सागरीय लहरें अपक्षये द्वारा धरातल का स्वरूप ही बदल डालते हैं। इसके द्वारा झरने, घाटी तथा बालू के टीलों का निर्माण होता है जो अनेक प्रकार से उपयोगी होते हैं।

5. झीलों का निर्माण-अपक्षय के कारक भूस्खलन द्वारा गर्त बनाते हैं जिनमें जलभराव से झील बन जाती है। झीलें अनेक प्रकार से मानव का हित करती हैं।

प्रश्न 2. रासायनिक एवं जैविक अपक्षय का वर्णन कीजिए।
उत्तर-रासायनिक अपक्षय
जब वियोजन की क्रिया द्वारा चट्टानें ढीली पड़कर विदीर्ण हो जाती हैं तो इस क्रिया को रासायनिक अपक्षय कहते हैं। रासायनिक अपक्षय आर्द्र जलवायु में अधिक प्रबल होता है क्योंकि इसके लिए जल का होना बहुत आवश्यक है। ऑक्सीजनं, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन आदि गैसें रासायनिक अपक्षय का महत्त्वपूर्ण साधन हैं जो रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा शैलों के संगठन एवं संरचना में परिवर्तन उत्पन्न करती हैं। इससे शैलें टूट जाती हैं। रासायनिक अपक्षय निम्नलिखित रूपों में सम्पन्न होता है।

(क) ऑक्सीकरण-शैलों में उपस्थित लोहांश जब ऑक्सीजन गैस के सम्पर्क में आता है तब रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप लोहे के कण ऑक्साइडों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस क्रिया के फलस्वरूप चट्टानों का आयतन बढ़ जाता है। आयतन बढ़ने से शैलों का संगठन ढीला पड़ जाता है। तथा उनका अपक्षय होने लगता है। इन प्रक्रिया से चट्टानें शीघ्रता से टूट जाती हैं।

(ख) कार्बनीकरण-कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल के साथ क्रिया कर हल्का अम्ल बनाती है। यह अम्ल शैलों में पाए जाने वाले चूने के अंश को घोल लेता है, जिससे कैल्सियम कार्बोनेट का निर्माण होता है। इस प्रकार शैलों का संगठन निर्बल पड़ जाता है और वे घुलकर टूट जाती हैं।

(ग) जलयोजन-जल में हाइड्रोजन गैस उपस्थित रहती है। जैसे ही यह गैस शैलों के सम्पर्क में आती है उनके आयतन में वृद्धि कर देती है, फलतः उन पर तनाव पैदा होता है, जिसके कारण उनमें उपस्थित खनिज लवण चूर्ण-चूर्ण हो जाते हैं तथा शैलों के स्तर उखड़ने लगते हैं। इस प्रकार जलयोजन से अपक्षय की क्रिया सक्रिय रहती है।

जैविक अपक्षय

अपक्षय की क्रिया में जैविक तत्त्वों का भी सहयोग रहता है। मनुष्य, जीव-जन्तुओं तथा वनस्पति द्वारा किया गया अपक्षय जैविक अपक्षय कहलाता है। यह निम्नलिखित प्रकार का होता है

(क) जीव-जन्तुओं द्वारा अपक्षय-अनेक जीव-जन्तु; जैसे-लोमड़ी, गीदड़, केंचुए, चूहे, सर्प, दीमक आदि शैलों में बिल बनाकर निवास करते हैं। उनके द्वारा खोदी गई मिट्टी को जल, वायु, | हिमानी बहाकर ले जाती है जिससे शैलों का अपक्षय हो जाता है। जीव-जन्तुओं द्वारा भौतिक तथा रासायनिक दोनों ही प्रकार का अपक्षय सम्पन्न होता है।

(ख) वनस्पति द्वारा अपक्षय-अपक्षय में पेड़-पौधे भी सहयोग देते हैं। इनके द्वारा भी भौतिक एवं रासायनिक दोनों प्रकार का अपक्षय किया जाता है। प्रायः पेड़-पौधों की जड़ें अपनी वृद्धि द्वारा चट्टानों को तोड़ने का कार्य करती हैं, जो इनका भौतिक कार्य है। वनस्पति के अंश सड़-गलकर रासायनिक अपक्षय उत्पन्न करते हैं।

(ग) मानव द्वारा अपक्षय-मनुष्य भी अपनी रचनात्मक, आर्थिक क्रियाओं द्वारा शैलों को विघटित करता रहता है। वह रेलवे लाइन बिछाने, नहरें एवं सुरंग खोदने तथा खनिज पदार्थों को भू-गर्भ से निकालने के लिए धरातल को खोदता है। इस प्रकार शैलों का संगठन ढीला पड़ जाता है, जिससे कालान्तर में शैलें अपरदित हो जाती हैं।

प्रश्न 3. पृथ्वी की बाह्य शक्तियों से क्या अभिप्राय है? इस शक्ति के अन्तर्गत अनाच्छादन का वर्णन कीजिए।
या बाह्य प्रक्रियाओं के ऊर्जा स्रोत को स्पष्ट कीजिए
उत्तर- बाह्य शक्ति
भूपटल परं पाए जाने वाले विविध स्थलरूपों के विकास में भूसंचलन का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भूसंचलन आन्तरिक एवं बाह्य शक्तियों की पारस्परिक क्रिया द्वारा सम्पन्न होता है। ‘बाह्य शक्तियों का सम्बन्ध वायुमण्डल से है। ये शक्तियाँ आन्तरिक शक्तियों द्वारा निर्मित स्थलरूपों में काट-छाँट करती हुई नई स्थलाकृतियों को जन्म देती हैं, जिससे कालान्तर में धरातल का निम्नीकरण होता है। इस कारण ‘बाह्य शक्तियों को ‘विनाशात्मक बल’ भी कहा जाता है। धरातल पर विनाश की यह प्रक्रिया तापमान, वर्षा, गुरुत्वाकर्षण, नदी, पवन, हिमनद आदि कारकों द्वारा निरन्तर चलती रहती है। इन कारकों से चट्टानें विदीर्ण होकर अपने स्थान से हट जाती हैं तथा किसी उपयुक्त स्थान पर उनका जमाव होता रहता है।

अनाच्छादन

अनाच्छादन का अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द ‘Denudation’ है, जिसकी व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के Denudare शब्द से हुई है। ‘डेन्यूड़े का अर्थ आवरण हटने से है। इस प्रकार अनाच्छादन का शाब्दिक अर्थ धरातल के आवरण के हटने या कटने से है।

मोंकहाउस के शब्दों में, “अनाच्छादन शब्द का प्रयोग विस्तृत रूप में उन सभी साधनों के कार्यों के लिए किया जाता है, जिनसे भूपटल के किसी भाग का विनाश, अपव्यय तथा हानि होती है, इस प्रकार पृथक् हुए पदार्थ का अन्यत्र निक्षेप होता है, जिससे परतदार चट्टानें बनती हैं।”

अनाच्छादन के अन्तर्गत मुख्यत: दो प्रकार की प्रक्रियाएँ निहित होती हैं—स्थैतिक प्रक्रियाएँ (अपक्षयु) तथा गतिशील प्रक्रियाएँ (अपरदन) (चित्र 6.4)। स्थैतिक प्रक्रिया में कोई भी चट्टान अपने ही स्थान पर टूट-फूटकर चूरा मात्र हो जाती है। इसमें ताप, वर्षा, तुषार, वनस्पति, जीव-जन्तु आदि कारकों का महत्त्वपूर्ण योग होता है। यह स्थैतिक प्रक्रिया अपक्षय कहलाती है। गतिशील प्रक्रिया के अन्तर्गत चट्टानों का विदीर्ण होना, विदीर्ण पदार्थों का परिवहन तथा निक्षेप सम्मिलित है। यह कार्य प्रवाही जल, पवन, हिमनद, भूमिगत जल आदि कारकों द्वारा सम्पन्न होता है। यह गतिशील प्रक्रिया अपरदन कहलाती है।
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प्रश्न 4. क्या मृदा-निर्माण कारक संयुक्त रूप से कार्यरत रहते हैं? विवेचना कीजिए।
या मृदा-निर्माण के कारक बताइए तथा इनके संयुक्त प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर- मृदा-निर्माण के कारक
मृदा धरातल पर प्राकृतिक तत्त्वों का समुच्चय है जिसमें जीवित पदार्थ तथा पौधों का पोषित करने की क्षमता होती है। इसके निर्माण में निम्नलिखित पाँच मूल कारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है(1) जलवायु, (2) मूल पदार्थ (शैल/चट्टान), (3) स्थलाकृति, (4) जैविक क्रियाएँ एवं (5) कालावधि (चित्र 6.5)।
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वास्तव में मृदा-निर्माण में प्रयुक्त कारक एकाकी रूप से सक्रिय नहीं होते हैं, बल्कि ये कारक संयुक्त रूप से कार्यरत रहते हैं एवं एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करते हैं (चित्र 6.5)। इनका संक्षिप्त विवरण अधोलिखित है

1. जलवायु-मृदा-निर्माण में जलवायु सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण सक्रिय कारक हैं। मृदा के निर्माण एवं विकास में जलवायु के निम्नलिखित कारक प्रमुख रूप से योगदान देते हैं-

  1. प्रवणता, वर्षा एवं वाष्पीकरण की बारम्बारता,
  2. आर्द्रता अवधि,
  3. तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

2. मूल पदार्थ अथवा चट्टान-मृदा-निर्माण में चट्टान अथवा मूल पदार्थ निष्क्रिय किन्तु महत्त्वपूर्ण नियन्त्रक कारक है। मृदा-निर्माण गठन, संरचना शैल निक्षेप के खनिज एवं रासायनिक संयोजन पर निर्भर होते हैं।

3. स्थलाकृति या उच्चावच-स्थलाकृति या उच्चावच भी मृदा-निर्माण का निष्क्रिय कारक है। इस कारक में मृदा-निर्माण और विकास पर ढाल का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। तीव्र ढालों पर मृदा | छिछली तथा सपाट, उच्च क्षेत्रों में गहरी या मोटी होती है। निम्न ढालों पर जहाँ अपरदन मन्द तथा जल का परिश्रवण अच्छा रहता है, वहाँ मृदा-निर्माण बहुत अनुकूल होता है।

4. जैविक क्रियाएँ-जैविक क्रियाएँ मृदा के विकास में महत्त्वपूर्ण होती हैं। वनस्पति आवरण एवं जीव के मूल पदार्थों में विद्यमान रहने पर ही मिट्टी में नमी धारण क्षमता तथा नाइट्रोजन एवं जैविक अम्ल मृदा को उर्वरकता प्रदान करते हैं। जलवायु इन सभी तत्त्वों को नियन्त्रित करती है। इसी से जैविक तत्त्व सक्रिय होकर मूल पदार्थों में विनियोजित होते हैं।

5. कालावधि-मृदा-निर्माण प्रक्रिया उपर्युक्त कारकों के संयोग से लम्बी अवधि में सम्पन्न होती है। कालावधि जितनी लम्बी होती है मृदा उतनी ही परिपक्वता ग्रहण करती है और मृदा की पाश्विका (Profile) का विकास होता है। कम समय में निक्षेपित मूल पदार्थ में मृदा-निर्माण में कार्यरत कारक अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते: अत: मृदा तरुण या युवा होती है। इसमें संस्तर का अभाव होता है। अत: मृदा-निर्माण एवं विकास हेतु पर्याप्त कालावधि एवं अनिवार्य व आवश्यक कारक है।

प्रश्न 5. अपरदन या कटाव से आप क्या समझते हैं? अपरदन की क्रियाएँ एवं उनके रूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-अपरदन अपक्षय के विभिन्न कारकों द्वारा पृथ्वीतल की बहुत-सी अवसाद टूट-फूटकर एकत्रित हो जाती है तो यही मलबा या अवसाद जल, हिमानी, वायु आदि द्वारा अपरदित होकर एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाया जाता है। इस मलबे के स्थानान्तरण से अपरदन में और भी वृद्धि होती है; जैसे–नदियाँ अथवा हिमानियाँ अपने साथ लाये हुए बड़े-बड़े शिलाखण्डों के मार्ग में धरातल से रगड़ खाकर चलती हैं। जिससे धरातल तथा शिलाखण्डों का चूर्ण होता रहता है। इस प्रकार भौतिक कारकों के द्वारा भूतल की चट्टानों का विखण्डन होता है। इस विखण्डित पदार्थ को कुछ सीमा तक इन कारकों द्वारा अन्यत्र ले जाया जाता है और उसे किसी स्थान पर जमा कर दिया जाता है।

अपरदन की क्रियाएँ

अपरदन को प्रतिक्रियाओं के आधार पर निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया गया है

  1. अपक्षय द्वारा एकत्रित मलबे को गतिशील शक्तियों द्वारा नियन्त्रित करना।
  2. गतिशील शक्तियों का एकत्रित मलबे को बहाकर अथवा उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना।
  3. इस असंगठित एकत्रित मलबे का गतिशील शक्तियाँ कुछ दूरी तक परिवहन करती हैं तो अपघर्षण द्वारा और भी अधिक अपरदन होता है।

पुरिवहन की क्रिया निम्नलिखित तीन क्रमों में सम्पन्न होती है

  • घोलकर-धरातल पर एकत्रित चट्टानों की अवसाद को अपरदन के साधन, जैसे जल अपने में घोलकर परिवहन करता है।
  • तैराकर-बाढ़ का जल अथवा नदियाँ धरातल के बारीक कणों को तैराते हुए ले जाती हैं जो परिवहन में सम्मिलित हैं।
  • उड़ाकर-वायु अपने तीव्र वेग के साथ धूल-कणों को मार्ग में धरातल पर घसीटते हुए उड़ा ले जाती है। इससे अपरदन तथा परिवहन दोनों ही स्वतन्त्र रूप में अपनी क्रिया करते हैं।

अपरदन के प्रकार

अपरदन के विभिन्न रूप अपरदन की भिन्न-भिन्न क्रियाओं में सम्पन्न होते हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है
1. अपघर्षण (Abrasion or Corrasion)-अपरदन क्रिया में अपघर्षण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। धरातल पर एकत्रित अवसाद को जब अपरदन के कारक-वायु, नदियाँ, हिमानी, समुद्री लहरें आदि-उड़ाकर या बहाकर ले जाते हैं तो मार्ग में बड़े-बड़े शिलाखण्ड धरातल को स्वयं खुरचते चलते हैं। इस प्रकार ये कंकड़-पत्थर धरातल पर अपरदन के यन्त्रों का कार्य करते हैं। इससे
अपरदन क्रिया को बल मिलता है।

2. सन्निघर्षण (Attrition)-सन्निघर्षण की क्रिया प्रमुख रूप से नदी, हिमानी, वायु तथा समुद्री लहरों द्वारा होती है। इस क्रिया में धरातल के असंगठित पदार्थ जो अपरदन के कारकों द्वारा बहाकर या उड़ाकर ले जाए जाते हैं, वे आपस में भी टकराकर चलते हैं जिससे उनका आकार और भी छोटा होता जाता है। बाद में ये चूर्ण अर्थात् रेत में परिणत होकर मिट्टी में मिल जाते हैं।

3. घोलीकरण (Solution)-यह जल द्वारा की जाने वाली रासायनिक क्रिया है। वर्षा के जल में कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस मिली होने के कारण जल घोलन के रूप में कार्य करता है। यह जल चट्टानों में मिले हुए खनिज पदार्थों को घोलकर अपने साथ मिला लेता है तथा अन्यत्र बहा ले जाता

4. जलगति क्रिया (Hydraulic Action)-यह एक यान्त्रिक क्रिया है। इसमें बहता हुआ जल अपने वेग तथा दबाव के कारण मार्ग में स्थित चट्टानी-कणों को अपने साथ बहाकर ले जाता है।

5. अपवाहन (Deflation)-अपवाहन में वायु मुख्य कारक होती है जो भौतिक अपक्षय से विखण्डित पदार्थों को उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। यह क्रिया शुष्क मरुस्थलीय भागों में अधिक होती है।

6. निक्षेपण (Deposition)-अपरदन के विभिन्न कारक परिवहन कार्य करने के बाद अपने साथ लाये गये मलबे को अपनी वाहन शक्ति के अनुसार जगह-जगह छोड़ते जाते हैं, जिसे निक्षेपण कहते हैं। निक्षेपण क्रिया से धरातल ऊँचा-नीचा हो जाता है। इस कार्य को बहता हुआ जल (नदी), भूमिगत जल, हिमानी, वायु तथा सागरीय लहरें सम्पन्न करती हैं। निक्षेपण की इस अवस्था में धरातल पर विभिन्न भू-आकृतियों का जन्म एवं विकास होता है।

प्रश्न 6. अपक्षय और अपरदन में क्या अन्तर है? अपरदन के मुख्य कारकों का विवरण दीजिए।
उत्तर-अपक्षय और अपरदन में अन्तर
अपक्षय और अपरदन में अन्तर स्पष्ट करने से पूर्व अपक्षय तथा अपरदन की क्रियाओं को समझना आवश्यक है। अपक्षय का अर्थ है–शैलों का अपने ही स्थान पर क्षीण होना या ढीला पड़ना। इस क्रिया को ऋतु-अपक्षय भी कहते हैं, क्योंकि इसमें मौसम के तत्त्व; जैसे-तापमान, आर्द्रता (वर्षा), पाला आदि चट्टानों को प्रभावित करके उनके कणों को ढीला कर देते हैं जिससे वे विखण्डित हो जाती हैं। चट्टानों के अपक्षय की यह क्रिया दो रूपों में होती है—(1) भौतिक अथवा यान्त्रिक रूप से तथा (2) रासायनिक रूप से। भौतिक अपक्षय द्वारा चट्टानें विघटित होती हैं। रासायनिक अपक्षय में शैलों में टूट-फूट नहीं होती वरन् उनके रासायनिक संगठन में परिवर्तन हो जाता है। उदाहरणत: जल के प्रभाव से शैलों के कण घुल जाते हैं जिससे वे ढीली पड़ जाती हैं। इसे शैलों का अपघटन कहते हैं। शैलों के अपक्षय की क्रिया तीन प्रकार की होती है—(1) भौतिक यो यान्त्रिक, (2) रासायनिक तथा (3) जैविक।। यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि भौतिक एवं रासायनिक कारकों के अतिरिक्त प्राणी (वनस्पति एवं जीव-जन्तु) भी शैलों को ढीला करने में सहयोग देते हैं। उदाहरणत: पेड़-पौधों की जड़े शैलों को ढीला करती हैं। अनेक प्रकार के बिलकारी जीव-जन्तु, कीड़े आदि भी शैलों को ढीला बनाने का कार्य करते हैं।

अपरदन का अर्थ है-चट्टानों को घिसना। इस कार्य में अपरदन के अनेक गतिशील साधन जो पदार्थ को बहाकर या उड़ाकर ले जाने की क्षमता रखते हैं, चट्टानों के अपरदन में सहयोग देते हैं। इन साधनों में बहता हुआ जल या नदी, हिमानी, पवन, सागरीय लहरें तथा भूमिगत जल अपरदन के प्रधान कारक हैं। ये सभी साधन गतिशील होने के कारण शैलों को तोड़ने-फोड़ने, अपरदित पदार्थ को बहाकर ले जाने तथा उसे अन्यत्र जमा करने में समर्थ होते हैं। अपरदन की इस क्रिया से भूपटल का बड़े पैमाने पर अनाच्छादन होता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपक्षय और अपरदन में निम्नलिखित मौलिक अन्तर होते हैं
1. अपक्षय एक स्थैतिक क्रिया है, जिसमें शैलों की अपने ही स्थान पर टूट-फूट होती है। इसके विपरीत, अपरदन एक गतिशील क्रिया है जिसमें टूटी शैलों को उनके स्थान से हटाकर अन्यत्र ले
जाकर निक्षेपित कर दिया जाता है।

2. अपक्षय में वायुमण्डल की शक्तियाँ; जैसे–तापमान, पाला, वर्षा आदि योग देते हैं। इसके विपरीत, अपरदन में धरातल के ऊपर सक्रिय (बाह्यजात) गतिशील साधन योग देते हैं।

3. अपक्षय एक पूर्ववर्ती क्रिया है जो बाद में अपरदन क्रिया को सरल बनाती है। किन्तु चट्टानों के अपक्षय के लिए अपरदन की कोई भूमिका नहीं होती। दूसरे शब्दों में, अपक्षय क्रिया अपरदन पर निर्भर नहीं है।

अपरदन के कारक

शैलों के अपरदन में गतिशील साधनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इन कारकों में बहता हुआ जल या नदी, हिमानी, पवन, सागरीय तरंगें तथा भूमिगत जल महत्त्वपूर्ण हैं। इन सभी कारकों में जल का कार्य सार्वत्रिक या सबसे व्यापक है। जल का कार्य आर्द्र क्षेत्रों में, पवन का कार्य शुष्क क्षेत्रों में, हिमानी का कार्य हिमाच्छादित क्षेत्रों में, भूमिगत जल का कार्य चूने की शैलों के क्षेत्रों में तथा लहरों का कार्य सागर तटों पर होता है। इन कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है–

1. नदी या प्रवाही जल-अपरदन के कारकों में नदी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। नदियाँ प्रायः पर्वतों से निकलकर समुद्र में गिरती हैं। ये अपने पर्वतीय, मैदानी तथा डेल्टाई खण्ड में अपरदन तथा निक्षेप कार्य करती हैं जिससे अनेक प्रकार की आकृतियाँ उत्पन्न होती हैं। नदियाँ अपनी घाटी का भी क्रमशः विकास करती हैं। पर्वतीय खण्ड में नदी की घाटी सँकरी तथा गहरी होती है जिसे गार्ज कहते हैं। इसकी आकृति अंग्रेजी के ‘V’ आकार की होती है। क्रमशः नदी अपनी घाटी को चौड़ा करती है। अन्त में डेल्टा बनाकर यह समुद्र में गिरती है।

2. हिमानी या हिमनद-हिमानियाँ या हिमनद हिमाच्छादित या उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। हिमनद हिम की नदी होती है जो पर्वतीय ढालों पर धीरे-धीरे सरकती है। इसकी गति तो मन्द होती है किन्तु इसमें अपरदन की अपार क्षमता होती है। यह अनेक प्रकार की अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक आकृतियाँ बनाती है। हिमरेखा के नीचे हिमानी का अन्त हो जाता है।

3. वायु या पवन-वायु का कार्य प्रायः मरुस्थलों में होता है जहाँ यह वनस्पति तथा अन्य किसी भौतिक बाधा के अभाव में निर्बाध रूप से बहती है। वायु का कार्य अधिक ऊँचाई पर न होकर धरातल के निकट होता है। यह चट्टानों को खरोंचकर या अपघर्षण करके अनेक प्रकार की आकृतियों का निर्माण करती है। धरातल की रेत को उड़ाकर उसे अन्यत्र जमा कर देती है जिससे
अनेक प्रकार की निक्षेपणात्मक आकृतियाँ बन जाती हैं।

4. सागरीय तरंगें-तरंगें या लहरें सागर तट पर सदैव प्रहार करती रहती हैं, जिससे सागर तट की चट्टानें क्रमशः ढीली पड़ती हैं तथा फिर टूट जाती हैं। यह शैल पदार्थ लहरों द्वारा सागर में बहा दिया जाता है। कुछ पदार्थ सागर तट पर या सागर से कुछ दूर जमा कर दिया जाता है। इस प्रकार लहरों के कार्य से अनेक प्रकार की अपरदनात्मक तथा निक्षेपात्मक आकृतियाँ बनती हैं।

5. भूमिगत जल-वर्षा का जल धरातले से रिसकर क्रमशः भूमि में चट्टानों के नीचे एकत्रित रहता है। यह जल हमें कुओं, ट्यूबवैल, पातालतोड़ कुओं तथा अन्य रूपों में उपलब्ध होता है। भूमिगत जल में नदी की भाँति प्रवाह नहीं होता है; अत: यह अपरदन का कार्य अधिकांशतः घुलन क्रिया द्वारा करता है। इस क्रिया से भूमि के नीचे अनेक प्रकार की आकृतियाँ बन जाती हैं। भूमिगत जल का कार्य चूना-पत्थर जैसी घुलनशील शैलों के क्षेत्र में अधिक व्यापक रूप से होता है। इस जल के साथ चूने के ढेर भी चट्टानों के फर्श तथा छतों पर एकत्रित हो जाते हैं जिनसे अनेक प्रकार की निक्षेपणात्मक आकृतियाँ बन जाती हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 16 Biodiversity and Conversation

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 16 Biodiversity and Conversation (जैव विविधता एवं संरक्षण)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) जैव-विविधता का संरक्षण निम्न में से किसके लिए महत्त्वपूर्ण है?
(क) जन्तु ।
(ख) पौधे
(ग) पौधे और प्राणी
(घ) सभी जीवधारी
उत्तर-(घ) सभी जीवधारी।।

प्रश्न (ii) निम्नलिखित में से असुरक्षित प्रजातियाँ कौन-सी हैं?
(क) जो दूसरों को असुरक्षा दें।
(ख) बाघ व शेर
(ग) जिनकी संख्या अत्यधिक हो ।
(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है।
उत्तर-(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है।

प्रश्न (iii) नेशनल पार्क (National Parks) और पशु विहार (Sanctuaries) निम्न में से किस उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं?
(क) मनोरंजन ।
(ख) पालतू जीवों के लिए
(ग) शिकार के लिए
(घ) संरक्षण के लिए
उत्तर-(घ) संरक्षण के लिए।

प्रश्न (iv) जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र है|
(क) उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र
(ख) शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र
(ग) ध्रुवीय क्षेत्र
(घ) महासागरीय क्षेत्र
उत्तर-(क) उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र।

प्रश्न (v) निम्न में से किस देश में पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) हुआ था?
(क) यू०के० (U.K.)
(ख) ब्राजील
(ग) मैक्सिको
(घ) चीन
उत्तर-(ख) ब्राजील।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) जैव-विविधता क्या है?
उत्तर-किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहते हैं।

प्रश्न (ii) जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?
उत्तर-जैव-विविधता के निम्नलिखित तीन स्तर हैं

  1. आनुवंशिक विविधता,
  2. प्रजातीय विविधता,
  3. पारितन्त्रीय विविधता।

प्रश्न (iii) हॉट स्पॉट (Hot Spot) से आप क्या समझते हैं?
उतर-वह क्षेत्र जहाँ जैव-विविधता अधिक पाई जाती है उन क्षेत्रों को ‘हॉटस्पॉट’ कहते हैं। विश्व में ऐसे क्षेत्रों का पता लगाया गया है जो जैव-विविधता की दृष्टि से सम्पन्न हैं, किन्तु जीवों के आवास लगातार नष्ट होने के कारण वहाँ की अनेक जातियाँ संकटग्रस्त या क्षेत्र विशेषी हो गई हैं। अतः ऐसे स्थल जहाँ किसी प्राणी अथवा वनस्पति जाति की बहुलता हो या निरन्तर घट रही विलुप्तप्राय जातियाँ हों, को जैव-विविधता के संवेदनशील क्षेत्र या तप्त स्थल (हॉट स्पॉट) कहते हैं।

प्रश्न (iv) मानव जाति के लिए जन्तुओं के महत्त्व का वर्णन संक्षेप में करें।
उत्तर-विभिन्न जीव-जन्तु मानव समाज के अभिन्न अंग हैं। कृषि, पशुपालन, आखेट एवं वनोपज एकत्रीकरण पर निर्भर मानव समुदाय के लिए जीव-जन्तुओं की विविधता जीवन का आधार है। विभिन्न घुमक्कड़ जातियाँ व आदिवासी समाज आज भी जैव-विविधता से प्रत्यक्षतः प्रभावित होते हैं। उनके सामाजिक संगठन व रीति-रिवाजों में विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं का विशिष्ट स्थान रहा है। जीव-जन्तुओं के माध्यम से जीवनोपयोगी शिक्षाओं को सरल रूप में व्यक्त किया गया है; जैसे—शेर जैसी । निडरता, बगुले जैसी एकाग्रता, कुत्ते जैसी वफादारी आदि आज भी मानव आचरण के प्रतिमान माने जाते हैं।

प्रश्न (v) विदेशज प्रजातियों (Exotic Species) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-वे प्रजातियाँ जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन इस तन्त्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें विदेशज प्रजातियाँ कहा जाता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (1) प्रकृति को बनाए रखने में जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-प्रकृति अजैव एवं जैव तत्त्वों का समूह है। इसकी कार्यशीलता इन दोनों तत्त्वों की पारस्परिक क्रिया द्वारा ही संचालिव्र होती है। जैव तत्त्वों के अन्तर्गत विद्यमान जैव-विविधता प्रकृति के सन्तुलित संचालन का ही परिणाम है। अत: प्रकृति को बनाए रखने के लिए जैव-विविधता एवं जैव-विविधता की सुरक्षा के लिए प्रकृति के साथ मानव के मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का अपना विशिष्ट महत्त्व है। दूसरे शब्दों में, प्रकृति एवं जैव-विविधता में घनिष्ट सम्बन्ध है तथा ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

आज जो जैव-विविधता हम देखते हैं वह 2.5 से 3.5 अरब वर्षों के विकास का परिणाम है। पारितन्त्र में मौजूद विभिन्न प्रजातियाँ कोई-न-कोई क्रिया करती रहती हैं। पारितन्त्र में कोई भी प्रजाति न तो बिना कारण के विकसित हो सकती है और न ही उसका अस्तित्व बना रह सकता है अर्थात् प्रत्येक जीव अपनी आवश्यकता पूरी करने के साथ-साथ दूसरे जीवों के विकास में भी सहायक होता है। जीव वे प्रजातियाँ ऊर्जा ग्रहण कर उसका संरक्षण करती हैं। जैव-विविधता कार्बनिक पदार्थ विघटित तथा उत्पन्न करती हैं और पारितन्त्र में जल व पोषक तत्त्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायक होती है। यह जलवायु को नियन्त्रित करने में सहायक है और पारितन्त्र को सन्तुलित रखती हैं। इस प्रकार जैव-विविधता प्रकृति कों बनाए रखने में सहायक है।

प्रश्न (ii) जैव-विविधता के ह्रास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।
उत्तर-पृथ्वी पर जीवों के उद्भव एवं विकास में करोड़ों वर्ष लगे हैं। विभिन्न पारिस्थितिक तन्त्र भाँति-भाँति के जीव-जन्तुओं एवं पादपों के प्राकृतिक आवास बने। कालान्तर में मानवजनित एवं प्राकृतिक कारणों से अनेक जीवों की जातियाँ धीरे-धीरे लुप्त होने लगीं। वर्तमान में पौधों एवं प्राणी जातियों के विलोपन की दर बढ़ गई। इससे पृथ्वी की जैव-विविधता को खतरा उत्पन्न हो गया। भू-पृष्ठ पर जैव-विविधता में ह्रास के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं

1. आवासों का निवास-वन एवं प्राकृतिक घास स्थल अनेक जीवों के प्राकृतिक आवास होते हैं, किन्तु जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि एवं मानव आवास के लिए भूमि आपूर्ति को पूरा करने के लिए जैव-विविधता क्षेत्र का विनाश किया गया है।

2. वन्य जीवों का अवैध शिकार-मानव ने उत्पत्ति काल से ही वन्य जीवों का शिकार प्रारम्भ कर दिया था, किन्तु तब यह सीमित मात्रा में था। वर्तमान में मनोरंजन के अतिरिक्त अवैध धन कमाने (तस्करी) के लिए जैव-विविधता का बड़ी बेहरमी से शोषण किया जा रहा है।

3. मानव-वन्यप्राणी द्वन्द्व-मानव जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण भोजन और आवास की माँग बढ़ी है। इसीलिए जीवों एवं पादप आवास स्थलों पर अतिक्रमण में वृद्धि हुई है। विभिन्न आर्थिक
लाभों के लिए भी मानव-वन्य प्राणी द्वन्द्व चरम पर है।

4. प्राकृतिक आपदाएँ-ऐसी अनेक प्राकृतिक आपदाएँ हैं जिनके कारण जैव-विविधता का ह्रास बड़ी मात्रा में होता है। अकाल, महामारी, दावानल, बाढ़, सूखा, तूफान; भू-स्खलन, भूकम्प आदि के कारण वनस्पति एवं प्राणियों का व्यापक विनाश हुआ है। उपर्युक्त के अतिरिक्त आणविक हथियारों का प्रयोग, औद्योगिक दुर्घटनाएँ समुद्रों में तेल रिसाव, हानिकारक अपशिष्ट उत्सर्जन आदि भी ऐसे कारक हैं जिनके कारण जैव-विविधता ह्रास में वृद्धि हुई है।

रोकने के उपाय-जैव-विविधता ह्रास या विनाश को रोकने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

  • जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण,
  • वनारोपण में वृद्धि
  • मृदा अपरदन को रोकना,
  • कीटनाशकों के प्रयोग पर नियन्त्रण,
  • विभिन्न प्रकार के प्रदूषण पर नियन्त्रण,
  • वन्य प्राणियों के शिकार पर कठोर प्रतिबन्ध,
  • संकटापन्न प्रजातियों का संरक्षण,
  • वन्य-जीव एवं वनस्पति के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर रोक।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. कॉर्बेट नेशनल पार्क कहाँ पर है?
(क) रामनगर (नैनीताल)
(ख) दुधवा (लखीमपुर)
(ग) बाँदीपुर (राजस्थान)
(घ) काजीरंगा (असम)
उत्तर-(क) रामनगर (नैनीताल)।

प्रश्न 2. ‘काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान कहाँ स्थित है?
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) असम में
(ग) ओडिशा में
(घ) गुजरात में
उत्तर-(ख) असम में।।

प्रश्न 3. वह राज्य जहाँ सर्वाधिक शेर पाये जाते हैं
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) गुजरात
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) आन्ध्र प्रदेश
उत्तर-(ख) गुजरात।

प्रश्न 4. भारत का राष्ट्रीय पक्षी है
(क) कबूतर
(ख) मोरे
(ग) गौरैया
(घ) हंस
उत्तर-(ख) मोर।।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नलिखित के उत्तर दीजिए
(अ) विश्व वानिकी दिवस कब मनाया जाता है?
(ब) भारत का पहला जीन अभयारण्य कहाँ पर स्थित है?
(स) भारतीय वन्य जैवमण्डल की स्थापना कहाँ हुई?
(द) वन्य-जीव सप्ताह कब मनाया जाता है?
(य) वन महोत्सव कब मनाया जाता है?
उत्तर-(अ) विश्व वानिकी दिवस (World Forestryday) प्रतिवर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है।
(ब) भारत में सबसे पहला जीन अभयारण्य (Gene sanctuary) बंगलौर (बंगलुरु) में स्थापित किया गया है।
(स) भारत में सन् 1952 में भारतीय वन जैवमण्डल (Indian Board for Wild Life-IBW) की स्थापना की गई। भारतीय संविधान में वन्य-जीवों के शिकार करने पर प्रतिबन्ध है।
(द) प्रतिवर्ष 1 से 8 अक्टूबर तक वन्य जीव सप्ताह मनाया जाता है।
(य) प्रतिवर्ष फरवरी तथा जुलाई में वन महोत्सव मनाया जाता है।

प्रश्न 2. संकटग्रस्त प्रजातियाँ किन्हें कहते हैं ।
उत्तर-संकटग्रस्त प्रजातियाँ वे प्रजातियाँ हैं जिनके विलुप्त होने का भय है, क्योंकि इनके आवास अत्यधिक कम हो गए हैं। निकट-भविष्य में इन प्रजातियों के विलुप्त होने की सम्भावना अधिक बढ़ती जा रही है। इससे इनकी संख्या भी बहुत कम हो गई है।

प्रश्न 3. दुर्लभ प्रजातियाँ क्या हैं?
उत्तर-वे प्रजातियाँ जो संख्या में कम तथा कुछ विशेष स्थानों पर अवशिष्ट हैं। इनके विलुप्त होने का भय अधिक है।

प्रश्न 4 आपत्तिग्रस्त एवं सुभेछ प्रजातियों का क्या अर्थ है?
उत्तर-पत्तिग्रस्त प्रजातियाँ-वे प्रजातियाँ जिनके आवास इतने नष्ट हो चुके हैं कि उनके शीघ्र ही संकटग्रस्त स्थिति में आ जाने की सम्भावना है या ये संकट-सीमा तक पहुंच चुकी हैं। सुभेद्य या असुरक्षित प्रजातियाँ-वे प्रजातियाँ जिनकी निकट-भविष्य में आपत्तिग्रस्त श्रेणी में आने की सम्भावना है।

प्रश्न 5. नए प्रकार के बीजों एवं रासायनिक खादों के क्या परिणाम है?
उत्तर-नए प्रकार के बीज एवं रासायनिक खादों के प्रयोग से हरित क्रान्ति आई है। उत्पादन में वृद्धि हुई है, किन्तु जैव-विविधता का ह्रास और विभिन्न प्रकार के प्रदूषण में भी वृद्धि हुई है।

प्रश्न 6. राष्ट्रीय पार्क तथा अभयारण्य में अन्तर बताइए।
उत्तर-राष्ट्रीय पार्क–यह वह क्षेत्र है जहाँ प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य जीव और अन्य प्राकृतिक सुन्दरता को सुरक्षित रखा जाता है। अभयारण्ये—यह वह सुरक्षित क्षेत्र है जहाँ लुप्तप्राय प्रजातियों को संरक्षित रखने के प्रयास किए जाते हैं।

प्रश्न 7. किसी जैव-विविधता सम्मेलन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-सन् 1992 में ब्राजील के रियो-डि-जेनेरियो (Rio-de-Janerio) में जैव-विविधता को विश्वस्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में जैव-विविधता संरक्षण हेतु भारत संहित विश्वें के 155. देश हस्ताक्षरी (कृत संकल्पी) हैं।

प्रश्न 8. भारत सरकार ने प्रजातियों को बचाने के लिए कौन-सा मुख्य कानूनी प्रयास किया है?
उत्तर-भारत सरकार ने प्रजातियों को बचाने, संरक्षित करने और विस्तार के लिए वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम, 1972 पारित किया है, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य स्थापित किए गए तथा देश में कुछ क्षेत्रों को जीवमण्डल आरक्षित घोषित किया गया है।

प्रश्न 9. जैव-विविधता की आर्थिक भूमिका क्या है?
उत्तर-जैव-विविधती की एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक भूमिका फसलों की विविधता के कारण है। इसके अतिरिक्त जैव-विविधता को संसाधनों के उन भण्डारों के रूप में भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है जिनकी उपयोगिता भोज्य पदार्थ, औषधियों और सौन्दर्य प्रसाधन आदि बनाने में है।
प्रश्न 10. अन्तर्राष्ट्रीय संस्था (IUCN) ने संरक्षण के उद्देश्य से संकटापन्न पौधों व जीवों को कितने वर्गों में विभक्त किया है?
उत्तर-अन्तर्राष्ट्रीय संस्था (IUCN) ने संरक्षण के उद्देश्य से संकटापन्न पौधों व जीवों को तीन निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया है
(i) संकटापन्न प्रजातियाँ,
(ii) सुभेद्य प्रजातियाँ,
(ii) दुर्लभ प्रजातियाँ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. प्रजातियों की विलुप्तता के मुख्य कारण लिखिए।
उत्तर-प्रजातियों की विलुप्तता के मुख्य कारण निम्नवत् है
1. बाढ़ (flood), सूखा (drought), भूकम्प (earthquakes) आदि प्राकृतिक विपदाएँ।
2. पादप रोगों का संक्रमण (epidemic) के रूप में।
3. परागण करने वाले साधनों या कारकों में कमी।
4. समाज में प्रजातियों की विलुप्तता के सम्बन्ध में ज्ञान न होना।
5. वनों का अत्यधिक कटाव।
6. मनुष्य द्वारा पौधों के प्राकृतिक आवासों में परिवर्तन।
7. औद्योगीकरण, बाँध (dams), सड़क आदि के निर्माण से वनों की कटाई।
8. पशुओं के अति चरण (over grazing) के कारण पौधों का नष्ट होना।
9. प्रदूषण तथा पारितन्त्र का असन्तुलन।
10. पौधों का व्यापार।

प्रश्न 2. जीन बैंक पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-वे संस्थान, जो महत्त्वपूर्ण व उपयोगी पौधों के जर्मप्लाज्म (germplasm) को सुरक्षित रखते हैं, जीन बैंक के नाम से जाने जाते हैं। जर्मप्लाज्म से तात्पर्य है कि जिसके द्वारा उस पौधे का परिवर्धन होता है। जीन बैंक में बीज, परागकण, बीजाण्डों, अण्ड कोशिकाओं (egg cells), ऊतक संवर्द्धन (tissue culture) के सहयोग से तने के शीर्ष भागों को कम ताप पर (-10° से -20°C) तथा कर्म ऑक्सीजन अवस्था में सुरक्षित रखते हैं, परन्तु कुछ पौधों के जर्मप्लाज्म (बीज) कम ताप व कम ऑक्सीजन अवस्था में मर जाते हैं। इस प्रकार के बीजों को रिकेल्सीटेण्ट बीज (Recalcitrant seeds) कहते हैं। आवश्यकता पर इन जर्मप्लाज्म से उन पौधों का परिवर्द्धन किया जा सकता है।

प्रश्न 3. विभिन्न संकटग्रस्त (जन्तु) जातियों के नाम लिखिए।
उत्तर-स्तनधारी-लंगूर, मेकाकू, चीता, शेर, सफेद भौंह वाला गिब्बन, बाघ, सुनहरी बिल्ली, मरुस्थली बिल्ली तथा भारतीय भेड़िया आदि। पक्षी सफेद पंख वाली बतख, भारतीय बस्टर्ड आदि। उभयचर तथा सरीसृप-घड़ियाल, मगर, वैरेनस, सेलामेण्डर आदि। भारत में लगभग 94 राष्ट्रीय उद्यान व 501 अभयारण्य हैं। राष्ट्रीय उद्यान में महत्त्वपूर्ण प्राणिजात व पादपंजात को उनके प्राकृतिक रूप में ऐतिहासिक इमारतों के साथ संरक्षित किया जाता है। इस क्षेत्र में शिकार व पशुचारण आदि की अनुमति नहीं दी जाती है। अभयारण्य-वन्य जन्तुओं व पक्षियों को सुरक्षित रहने व प्रजनन आदि की स्वतन्त्रता प्राकृतिक परिस्थितियों में प्रदान की जाती है।

प्रश्न 4. विश्व के विभिन्न वन्य जीव संगठनों के विषय में लिखिए।
उत्तर-1. आई०यू०सी०एन०आर० (International Union for Conservation of Natural Resources-I.U.C.N.R.)-इसकी स्थापना 1948 ई० में हुई थी तथा इसका कार्यालय स्विट्जरलैण्ड में है।

2. आई०बी०डब्ल्यू ०एल०–(Indian Boards of Wildlife-I.B.W.L.)-भारतवर्ष में इसकी स्थापना 1952 ई० में हुई थी।

3. डब्ल्यू डब्ल्यू०एफ० (World Wildlife Fund-W.W.F.)—इसकी स्थापना 1962 ई० में हुई थी तथा इसका कार्यालय स्विट्जरलैण्ड में है।

4. बी०एन०एच०एस० (The Bombay Natural History Society-B.N.H.S.)-यह गैर-सरकारी संस्थान है। इसकी स्थापना 1881 ई० में बम्बई (मुम्बई) में हुई।।

5. इल्यू०पी०एस०आई० (Wildlife Preservation Society of India-W.P.S.I.) इसकी स्थापना 1958 ई० में देहरादून में हुई। यह एक गैर-सरकारी संस्था है।

प्रश्न 5. संसार के कुछ मुख्य हॉट-स्पॉट के नाम लिखिए।
उत्तर-संसार के मुख्य हॉट-स्पॉट निम्नवत् हैं
1. अमेजन [Amazon (लैटिन अमेरिका)]
2. आर्कटिक टुण्डा Arctic Tundra (उत्तरी ध्रुव)]
3. अलास्का [Alaska (उत्तरी अमेरिका)]
4. मेडागास्कर द्वीप [Islands of Madagaskar (पूर्वी अफ्रीका के तट)]
5. आल्प्स [Alps (यूरोप)]
6. मालदीव द्वीप [Maldiv Island. (दक्षिण-पूर्वी एशिया)]
7. कैरीबियन द्वीप [Caribbean Islands (दक्षिण प्रशान्त)]
8. मॉरिशस [Mauritius (पूर्वी अफ्रीका के तट)]
9. विक्टोरिया झील [Lake of Victoria (कीनिया)]
10. अण्टार्कटिका [Antarctica (दक्षिणी ध्रुव)]

प्रश्न 6. जैव-विविधता के संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
उत्तर-ब्राजील के रियो-डि-जेनेरियो (Rio-de-Janerio) में 1992 ई० में पृथ्वी सम्मेलन (Earth summit) आयोजित किया गया जिसमें जैव-विविधता के संरक्षण के लिए प्रस्ताव पारित किया गया। यह प्रस्ताव 29 दिसम्बर, 1993 ई० से अमल में लाया गया। इस प्रस्ताव के मुख्य विषय निम्न प्रकार हैं|
(i) जैव-विविधता का संरक्षण,
(ii) जैव-विविधता (Sustainable) का उपयोग,
(iii) आनुवंशिक स्रोतों के उपयोग से उत्पन्न लाभ का सही बँटवारा।। वल्र्ड कन्जर्वेशन यूनियन (World Conservation Union) तथा वर्ल्ड वाइड फण्ड फॉर नेचर [World Wide Fund for Nature-WWF] सम्पूर्ण संसार में संरक्षण व जैवमण्डल रिजर्व (Biosphere reserve) के रखरखाव को प्रोन्नत करने वाले प्रोजेक्ट को सहायता दे रही है।

प्रश्न 7. वन्य जीव प्रबन्धन/संरक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-वन्य-जीवन के अन्तर्गत वे जीव (पादप, जन्तु तथा सूक्ष्म जीव) सम्मिलित हैं जो अपने प्राकृतिक आवासों में मिलते हैं। मानवजाति के लिए वन्य जन्तु भी वनों के समान ही महत्त्वपूर्ण हैं। औद्योगीकरण, सड़क निर्माण, विद्युत परियोजनाओं तथा अन्य आधुनिक गतिविधियों के कारण वनों का विनाश हुआ है। जिससे वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हुए हैं। इसी कारण अनेक वन्य जन्तुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं या विलुप्तीकरण की ओर अग्रसर हैं जिनमें बाघ, काला चीतल, हिरण, जंगली सूअर, शेर आदि प्रमुख हैं। एक अनुमान के अनुसार वन्य जन्तुओं की लगभग 81 संकटग्रस्त जातियाँ विलुप्तीकरण के कगार पर हैं। वन्य जन्तुओं के प्रबन्धन से तात्पर्य जन्तुओं की वृद्धि, विकास प्रजनन, उपयोग तथा संरक्षण से है। प्रबन्धन का मूल उद्देश्य यह भी है कि किसी भी जाति का अधिक शोषण न हो, रोग तथा अन्य प्राकृतिक . आपदाओं उसके विलुप्त होने का कारण न बने तथा मानवजाति अधिक-से-अधिक लाभान्वित हो सके।

प्रश्न 8. वन्य-जीव संरक्षण का महत्त्व बताइए।
उत्तर-भारत में वन्य जीवों का संरक्षण एक दीर्घकालिक परम्परा रही है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि ईसा से 6000 वर्ष पूर्व के आखेट-संग्राहक समाज में भी प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाता था। प्रारम्भिक काल से ही मानव समाज कुछ जीवों को विनाश से बचाने के प्रयास करते रहे हैं। हिन्दू महाकाव्यों, धर्मशास्त्रों, पुराणों, जातकों, पंचतन्त्र एवं जैन धर्मशास्त्रों सहित प्राचीन भारतीय साहित्य में छोटे-छोटे जीवों के प्रति हिंसा के लिए भी दण्ड का प्रावधान था। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में वन्य-जीवों को कितना सम्मान दिया जाता था। आज भी अनेक समुदाय वन्य-जीवों के संरक्षण के प्रति पूर्ण रूप से सजग एवं समर्पित हैं। विश्नोई समाज के लोग पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए उनके द्वारा निर्मित सिद्धान्तों का पालन करते हैं। महाराष्ट्र में भी मोरे समुदाय के लोग मोर एवं चूहों की सुरक्षा में विश्वास रखते हैं। कौटिल्य द्वारा लिखित ‘अर्थशास्त्र में कुछ पक्षियों की हत्या पर महाराजा अशोक द्वारा लगाये गये प्रतिबन्धों का भी उल्लेख मिलता है।

प्रश्न 9. संसार में जैव-विविधता के संरक्षण के विभिन्न प्रकारों की रूपरेखा बनाइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 16 Biodiversity and Conversation (जैव विविधता एवं संरक्षण) img 1

प्रश्न 10. निम्नलिखित की परिभाषा जैव-विविधता के सन्दर्भ में दीजिए(अ) विलुप्त, (ब) संकटग्रस्त, (स) असुरक्षित।
उत्तर-(अ) विलुप्त-वह प्रजाति जिसका अन्तिम जीव भी मर चुका हो, जिसका कोई भी जीव वर्तमान में नहीं मिलता हो, विलुप्त मानी जाती है।
(ब) संकटग्रस्त–एक प्रजाति संकटग्रस्त (endangered) तब मानी जाती है जब उसके जीव लगभग समाप्त हो रहे हों अथवा समाप्ति के कगार पर हों।
(स) असुरक्षित-वह प्रजातियाँ जो संकटग्रस्त तो नहीं हैं, परन्तु निकट भविष्य में संकटग्रस्त हो सकती हैं,,असुरक्षित कहलाती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. जैवमण्डल रिजर्व क्या हैं? इसके अन्तर्गत सम्मिलित क्षेत्र का सीमांकन कीजिए तथा जैवमण्डल रिजर्व के कार्य बताइए।
उत्तर-जैवमण्डल रिजर्व
जैवमण्डल रिजर्व वह संरक्षित क्षेत्र है जिसमें ‘आबादी’ तन्त्र की अल्पता होती है। ये प्राकृतिक जीवोम (Natural biomes) हैं जहाँ के जैविक समुदाय विशिष्ट होते हैं। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संघ (UNESCO) के मानव व जैवमंण्डल (man and bisophere) कार्यक्रम में 1975 ई० में जैवमण्डल रिजर्व के सिद्धान्त (concept) को रखा गया जिसके अन्तर्गत पारितन्त्र का संरक्षण आनुवांशिक स्रोतों (genetic resources) के संरक्षण से किया जाना सुझाया गया। मई, 2002 : ई० तक 408 जैवमण्डलों का 94 देशों में पता लगा है। भारत में कुल 14 जैवमण्डल रिजर्व मिलते हैं। भारत में जैवमण्डल रिजर्व के रूप में राष्ट्रीय उद्यानों को भी रखा गया है।

जैवमण्डल रिजर्व के अन्तर्गत कोर (core), बफर (buffer) तथा उदासीन क्षेत्र (Transition zones) आते हैं। प्राकृतिक अथवा कोर क्षेत्र वह है जहाँ का पारितन्त्र पूर्ण तथा कानूनी रूप से संरक्षित होता है। बफर क्षेत्र कोर क्षेत्र को घेरता है तथा इसमें विभिन्न प्रकार के स्रोत मिलते हैं जिन पर शैक्षिक व शोध गतिविधियाँ चलती रहती हैं। संक्रमण क्षेत्र जैवमण्डल रिजर्व का सबसे बाहरी क्षेत्र है। यहाँ पर स्थानीय लोगों द्वारा बहुत-सी क्रियाएँ; जैसे—रहन-सहन, खेती-बाड़ी, प्राकृतिक सम्पदा का आर्थिक उपयोग आदि होती रहती हैं।

जैवमण्डल रिजर्व के मुख्य कार्य

1. संरक्षण–आनुवंशिक स्रोतों, जातियों, पारितन्त्र आदि का संरक्षण करना।
2. विकास–सांस्कृतिक, सामाजिक तथा पारिस्थितिकीय स्रोतों का विकास।
3. वैज्ञानिक शोध तथा शैक्षणिक उपयोग–संरक्षण सम्बन्धी इन क्रियाओं से वैज्ञानिक शोध व सूचना का राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विनिमय होता है।

प्रश्न 2. जैव-विविधता के विभिन्न स्तरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-संसार में विभिन्न प्रकार के जीव मिलते हैं। इनके मध्य जटिल पारिस्थितिकीय सम्बन्ध, प्रजातियों के मध्य आनुवंशिक विविधता तथा अनेक प्रकार के पारितन्त्र आदि सम्मिलित हैं। जैव विविधता में तीन प्रमुख स्तर हैं
1. आनुवंशिकीय जैव विविधता (Genetic biodiversity),
2. जाति विविधता (Species diversity),
3. समुदाय व पारितन्त्र विविधता (Community and Ecosystem diversity)। ये सभी स्तर एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, परन्तु इन्हें अलग से जाना व पहचाना जा सकता है

1. आनुवंशिकीय विविधता–प्रत्येक जाति चाहे जीवाणु हो या बड़े पादप अथवा जन्तु आनुवंशिक सूचनाओं को संचित रखते हैं, जो जीन में संरक्षित होती हैं। उदाहरण के लिए माइकोप्लाज्मा में लगभग 450.700 जीन।।

2. जाति विविधता–जाति, विविधता की पृथक् व निश्चित इकाई है। प्रत्येक जाति इकोसिस्टम अथवा पारितन्त्र में महत्त्वपूर्ण है। अतः किसी भी जाति की विलुप्तता पूरे पारितन्त्र पर प्रभाव डालती है। जाति विविधता किसी निश्चित क्षेत्र के अन्दर जातियों में विभिन्नता है। जाति की संख्या प्रति इकाई क्षेत्रको जाति धन्यता कहते हैं। जितनी जाति धन्यता अधिक होती है उतनी ही जाति विविधता अधिक होती है। प्रत्येक जाति के जीवों की संख्या भिन्न हो सकती है। इससे समानता (equality) पर प्रभाव पड़ता है।

3.समुदाय व पारितन्त्र विविधिता–समुदाय के स्तर पर पारितन्त्र में विविधता तीन प्रकार की होती है
(अ) एल्फा विविधता–यह विविधता समुदाय के अन्दर होती है। इस प्रकार की विविधता एक ही आवास व समुदाय में मिलने वाले जीवों के मध्य मिलती है। समुदाय/आवास बदलते ही जाति भी बदल जाती है।
(ब) बीटा विविधता–समुदायों व प्रवासों के मध्य बदलते जाति के विभव को बीटा विविधता कहते हैं। समुदायों में विभिन्न जातियों के संघटन में भिन्नता मिलती है।
(स) गामा विविधता-भौगोलिक क्षेत्रों में मिलने वाली सभी प्रकार जैव विविधता को गामा विविधता कहते हैं।

प्रश्न 3. जैव-विविधता से क्या अभिप्राय है? भारत में जैव-विविधता की सुरक्षा तथा संरक्षण के लिए क्या उपाय किये जा रहे हैं?
उत्तर-जैव-विविधता
जैव-विविधता से अभिप्राय जीव-जन्तुओं तथा पादप जगत् में पायी जाने वाली विविधता से है। संसार के अन्य देशों की भाँति हमारे देश के जीव-जन्तुओं में भी विविधता पायी जाती है। हमारे देश में जीवों की 81,000 प्रजातियाँ, मछलियों की 2,500 किस्में तथा पक्षियों की 2,000 प्रजातियाँ विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त 45,000 प्रकार की पौध प्रजातियाँ भी पायी जाती हैं। इनके अतिरिक्त उभयचरी, सरीसृप, स्तनपायी तथा छोटे-छोटे कीटों एवं कृमियों को मिलाकर भारत में विश्व की लगभग 70% जैव विविधता, पायी जाती है।

जैव-विविधता की सुरक्षा तथा संरक्षण के उपाय

वन जीव-जन्तुओं के प्राकृतिक आवास होते हैं। तीव्र गति से होने वाले वन-विनाश का जीव-जन्तुओं के आवास पर दुष्प्रभाव पड़ा है। इसके अतिरिक्त अनेक जन्तुओं के अविवेकपूर्ण तथा गैर-कानूनी आखेट के कारण अनेक जीव-प्रजातियाँ दुर्लभ हो गयी हैं तथा कई प्रजातियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। अतएव उनकी सुरक्षा तथा संरक्षण आवश्यक हो गया है। इंसी उद्देश्य से भारत सरकार ने अनेक प्रभावी कदम उठाये हैं, जिनमें निम्नलिखित मुख्य हैं

1. देश में 14 जीव आरक्षित क्षेत्र (बायोस्फियर रिजर्व) सीमांकित किये गये हैं। अब तक देश में आठ जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किये जा चुके हैं। सन् 1986 ई० में देश का प्रथम जीव आरक्षित क्षेत्र नीलगिरि में स्थापित किया गया था। उत्तर प्रदेश के हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में नन्दा देवी, मेघालय में नोकरेक, पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन, ओडिशा में सिमलीपाल तथा अण्डमान- निकोबार द्वीप समूह में जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किये गये हैं। इस योजना में भारत के विविध प्रकार की जलवायु तथा विविध वनस्पति वाले क्षेत्रों को भी सम्मिलित किया गया है। अरुणाचल प्रदेश में पूर्वी हिमालय क्षेत्र, तमिलनाडु में मन्नार की खाड़ी, राजस्थान में थार का मरुस्थल, गुजरात में कच्छ का रन, असोम में काजीरंगा, नैनीताल में कॉर्बेट नेशनल पार्क तथा मानस उद्यान को जीव आरक्षित क्षेत्र बनाया गया है। इन जीव आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना का उद्देश्य पौधों, जीव-जन्तुओं तथा सूक्ष्म जीवों की विविधती तथा एकता को बनाये रखना तथा पर्यावरण-सम्बन्धी अनुसन्धानों को प्रोत्साहन देना है।

2. राष्ट्रीय वन्य-जीव कार्य योजना वन्य-जीव संरक्षण के लिए कार्य, नीति एवं कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। प्रथम वन्य-जीव कार्य-योजना, 1983 को संशोधित कर अब नयी वन्य-जीव कार्य योजना (2002-16) स्वीकृत की गयी है। इस समय संरक्षित क्षेत्र के अन्तर्गत 89 राष्ट्रीय उद्यान एवं 490 अभयारण्य सम्मिलित हैं, जो देश के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र के 1 लाख 56 हजार वर्ग किमी क्षेत्रफल पर विस्तृत हैं।

3. वन्य जीवन( सुरक्षा) अधिनियम, 1972 जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर (इसका अपना पृथक् अधिनियम है) शेष सभी राज्यों द्वारा लागू किया जा चुका है, जिसमें वन्य-जीव संरक्षण तथा विलुप्त होती जा रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए दिशानिर्देश दिये गये हैं। दुर्लभ एवं समाप्त होती जा रही प्रजातियों के व्यापार पर इस अधिनियम द्वारा रोक लगा दी गयी है। राज्य सरकारों ने भी ऐसे ही कानून बनाये हैं।

4. जैव-कल्याण विभाग, जो अब पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय का अंग है, ने जानवरों को अकारण दी जाने वाली यन्त्रणा पर रोक लगाने सम्बन्धी शासनादेश पारित किया है। पशुओं पर क्रूरता पर रोक सम्बन्धी 1960 के अधिनियम में दिसम्बर, 2002 ई० में नये नियम सम्मिलित किये गये हैं। अनेक वन-पर्वो के साथ ही देश में प्रति वर्ष 1-7 अक्टूबर तक वन्यजन्तु संरक्षण सप्ताह मनाया जाती है, जिसमें वन्य-जन्तुओं की रक्षा तथा उनके प्रति जनचेतना जगाने के लिए विशेष प्रयास किये जाते हैं। इन सभी प्रयासों के अति सुखद परिणाम भी सामने आये हैं। आज राष्ट्रहित में इस बात की आवश्यकता है कि वन्य-जन्तु संरक्षण का प्रयास एक जन-आन्दोलन का रूप धारण कर ले।

प्रश्न 4. जैव संवेदी क्षेत्र अथवा हॉट-स्पॉट किसे कहते हैं? विश्व मानचित्र पर संसार के मुख्य हॉट- स्पॉट प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-जैव संवेदी क्षेत्र वे क्षेत्र हैं जिनमें जैव विविधता स्पष्ट रूप से मिलती है। इस स्थान को मानव द्वारा अधिक हानि नहीं पहुँचानी चाहिए, ये स्थान धरोहर के रूप में रखने चाहिए जिससे दुर्लभ प्रजातियों को भी बचाकर रखा जा सके तथा प्राकृतिक पर्यावरण में उन्हें उगाया जा सके। नार्मन मेयर ने 1988 ई० में हॉट स्पॉट संकल्पना (Hot Spot Concept) विकसित की जिससे उन स्थानों का पता लगाया जहाँ स्वस्थाने (in situ) संरक्षण किया जा सके। हॉट स्पॉट धरती पर पादप व जन्तु के जीवन में दुर्लभ प्रजातियों के सबसे धनी भण्डार (richest reservoirs) कहते हैं। हॉट स्पॉट को पहचानने के लिए निम्नांकित तथ्यों को ध्यान में रखा जाता है

1. एण्डेमिक (endemic) प्रजातियों की संख्या अर्थात् ऐसी प्रजातियाँ जो और कहीं नहीं मिलती हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 16 Biodiversity and Conversation (जैव विविधता एवं संरक्षण) img 2

2. प्राकृतिक आवास के बिगड़ते सन्दर्भ में प्रजातियों को होने वाली हानि अथवा चेतावनी के आधार पर संसर में लगभग 25 स्थलीय हॉट स्पॉट जैव विविधता को संरक्षित करने के लिए पहचाने गए हैं। ये सभी हॉट स्पॉट पृथ्वी के लगभग 1.4% भू-भाग पर विस्तृत हैं। 15 हॉट स्पॉट में ट्रॉपिकल वनों (Tropical Forest), 5 मेडीटेरेनियन प्रकार के क्षेत्रों में (Mediterranean type zone) , तथा लगभग 9 हॉट स्पॉट द्वीपों (Islands) में विस्तृत हैं। 16 हॉट स्पॉट उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र में | मिलते हैं (चित्र 16.1)। लगभग 20% जनसंख्या इन हॉट स्पॉट क्षेत्रों में रहती है।

संसार के 25 हॉट स्पॉट क्षेत्रों में से 2 भारत में मिलते हैं जो समीपवर्ती पड़ोसी देशों तक फैले हुए हैं; जैसे–पश्चिमी घाटे व पूर्वी हिमालय क्षेत्र।

प्रश्न 5. संकटापन्न प्रजातियों से आप क्या समझते हैं? संकटापन्न प्रजातियों को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर-इसमें वे सभी प्रजातियाँ सम्मिलित हैं जिनके लुप्त हो जाने का खतरा है। जिस तेजी से वनों का विनाश विभिन्न मानवीय आवश्यकताओं के लिए हो रहा है तथा जलवायु में परिवर्तन हुए हैं, उससे विश्व की विभिन्न प्रजातियाँ संकटग्रस्त हो गई हैं। विलुप्त हो रही प्रजातियों को निम्नलिखित वर्गों में रखा जाता है

I. संकटग्रस्त जातियाँ
ये जीवों (पादप तथा जन्तु) की वे जातियाँ हैं जिनकी संख्या कम हो गई है या तेजी से कम हो रही है। तथा इनके आवास इतने कम हो गए हैं कि इनके लुप्त होने का भय है।

II. सुभेद्य जातियाँ
इसमें जीवों की वे जातियाँ सम्मिलित हैं जिनके पौधे पर्याप्त संख्या में अपने प्राकृतिक आवासों में पाए। जाते हैं, परन्तु यदि भविष्य में इनके वातावरण में प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, तो इनका निकटभविष्य मे विलुप्त होने का भय है।

III. दुर्लभ जातियाँ
ये उन पौधों की जातियाँ हैं, जिनकी संख्या संसार में बहुत कम है। इनके आवास विश्व में सीमित संख्या मे हैं। इनके विलुप्त होने का भय सदैव बना रहता है।

प्रश्न 6. भारत के प्रमुख वन्य जन्तुओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत के प्रमुख जन्तुओं को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है

  • उभयचर-मेंढक, टोड, पादविहीन उभयचर (limbless amphibians), सरटिका आदि।
  • सरीसृप-जंगली छिपकली, गिरगिट, घड़ियाल, मगर, सर्प, कछुआ आदि।
  • पक्षी–गिद्ध, बाज, मोर, मैना कोयल, गरुड़ सारस, बतख, उल्लू, नीलकंठ, हंस, बुलबुल, कठफोड़वा, बगुला आदि।
  • स्तनी–बब्बर शेर, भेड़िया, रीछ, लोमड़ी, बन्दर, हाथी लकड़बग्घा, हिरण, गिलहरी, याक, खरहा, लंगूर गिब्बन, गैंडा, भेड़, लोरिस, गधा आदि।
    भारत में मुख्य वन्य जन्तु निम्नलिखित हैं

(क) भारतीय मगरमच्छ—ये तीन प्रकार के होते हैं(i) घड़ियाल (यथा Goviglis gungeticus), (ii) खारे जल के मगरमच्छ (यथा Crocodylus parosus), (iii) स्वच्छ जल के मगरमच्छ (यथा Crocodylus palustrust)। इनके प्रजनन के मुख्य केन्द्र आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, केरल, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक तथा ओडिशा आदि राज्य हैं।
(ख) भारतीय मोर—यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी (national bird) है।
(ग) भारतीय बस्टर्ड—यह विश्व का सबसे तेज उड़ने वाला पक्षी है, यह अब दुर्लभ है। यह पक्षी गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक तथा राजस्थान के वनों में मिलता है।
(घ) भारतीय हाथी—यह हिमालय की तराई, केरल, कर्नाटक आदि राज्यों में मिलता है।
(ङ) भारतीय शेर—यह गुजरात के गिर वन (Gir forest) में मिलता है।
(च) भारतीय बाघ– भारतवर्ष में बाघ अभयारण्य (Tiger reserves) हैं–काबेंट, दुधवा, कान्हा, रणथम्भौर, सरिस्का, सुन्दर वन, भेलघाट, बद्रीपुर, बुक्स, पेरियार, नमदफ आदि।
(छ) होर्न बिल–यह एक बड़ा पक्षी है जिसका शिकार आदिवासियों द्वारा मांस के लिए किया जाता है।
(ज) भारतीय गेंडा—इसका शिकार सींगों (horms) के लिए किया जाता है। यह उत्तरी भारत के गंगा नदी के मैदानी भागों में मिलता है।

प्रश्न 7. वन्य जन्तुओं की विलुप्ति के मुख्य कारण बताइए।
उत्तर-वन्य जन्तुओं की विलुप्ति के निम्नलिखित कारण हैं

1. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि-विश्व में जनसंख्या अनियन्त्रित रूप से बढ़ रही है। इसके लिए मानव ने अव्यवस्थित रूप से वन्य जन्तुओं के प्राकृतिक आवासों को हानि पहुँचाई है। कृषि योग्य भूमि, आवास व्यवस्था, सड़क निर्माण, उद्योग के विकास के लिए वनों को काटा गया। इन सभी के कारण वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों में कमी आई है। यह वन्य जातियों की विलुप्ति का प्रमुख कारण है।

2. औद्योगीकरण-औद्योगीकरण के लिए बिना किसी योजना के वनों का शोषण बड़े स्तर पर हुआ | है जिस कारण वन्य जन्तुओं के आवास सीमित हुए हैं। इससे अनेक प्रजातियों के संकटग्रस्त होने को भय उत्पन्न हो गया है।

3. प्रदूषण-प्राकृतिक आवासों में प्रदूषण होने से जन्तुओं को विषमताओं का सामना करना पड़ता है। प्रदूषण के कारण कभी-कभी कुछ अति हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं जिससे जन्तुओं के स्वास्थ्य को हानि होती है तथा वे मर भी सकते हैं।

4. आखेट-प्राचीनकाल से ही भारववर्ष में अनेक मुगल सम्राटों, अंग्रेजी शासकों व राजा-महाराजाओं का आखेट करना प्रिय शौक रहा, फलस्वरूप वन्य जन्तुओं को मारा गया। मांस का भोजन के रूप में प्रयोग भी इनकी विलुप्ति का प्रमुख कारण है। स्वतन्त्रता के बाद आखेट पर सरकार ने कानूनी नियन्त्रण स्थापित किया है।

5. मानवीय क्रियाकलापमानव-की धन के लिए लालसा सर्वविदित है। वन्य जन्तुओं का शिकार कर उनकी खाल, दाँत, सींग, नख आदि का निर्यात करंके करोड़ों रुपये कमाने के लालच में वन्य जन्तुओं का विनाश किया जा रहा है।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception (प्रत्यक्षीकरण) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception (प्रत्यक्षीकरण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 6
Chapter Name 6 Perception
(प्रत्यक्षीकरण)
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception (प्रत्यक्षीकरण)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्षीकरण (Perception) से आप क्या समझते हैं? प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में निहित क्रियाओं का भी उल्लेख कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण को परिभाषित कीजिए।

उत्तर :

प्रत्यक्षीकरण का अर्थ
(Meaning of Perception)

प्रत्यक्षीकरण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। यह ज्ञानार्जन से सम्बन्धित मानसिक प्रक्रियाओं में विशेष महत्त्व रखती है। ‘संवेदना’ किसी उद्दीपक का प्रथम प्रत्युत्तर है और प्रत्यक्षीकरण’ प्राणी की संवेदना के पश्चात् का द्वितीय प्रत्युत्तर है जो संवेदना से ही सम्बन्धित होता है। वातावरण में उपस्थित किसी उद्दीपक से मिलने वाली उत्तेजना एक संवेदनात्मक प्रत्युत्तर के रूप में अस्तित्व रखती है जिसका प्रथम प्रत्युत्तर संवेदना और द्वितीय प्रत्युत्तर प्रत्यक्षीकरण की शक्ल में प्रस्तुत होता है।

प्रत्यक्षीकरण की परिभाषा
(Definition of Perception)

प्रत्यक्षीकरण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –

  1. कॉलिन्स तथा डुवर के कथनानुसार, “प्रत्यक्षीकरण किसी वस्तु का तात्कालिक ज्ञान है या संवेदना द्वारा सभी ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान है।”
  2. वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रत्यक्षीकरण विभिन्न इन्द्रियों की सहायता से पदार्थ अथवा उनके आधारों का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया है।”
  3. स्टेगनर के अनुसार, “बाहरी वस्तुओं और घटनाओं का इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रत्यक्षीकरण है।”
  4. मैक्डूगल के अनुसार, “उपस्थित वस्तुओं के बारे में सोचना ही प्रत्यक्षीकरण करना है। एक वस्तु तभी उपस्थित कही जाती है जब तक उससे आने वाली शक्ति (उत्तेजना) हमारी ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करती रहती है।”

प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया
(Process of Perception)

प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हुए हम कह सकते हैं कि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्रथम संवेदना, जो किसी वस्तु, प्राणी या घटना के विषय में प्राप्त होती है-मस्तिष्क में एक संस्कार को जन्म देती है। यह संस्कार प्रथम संवेदना का संस्कार होता है। जब वह वस्तु एक बार फिर से तत्सम्बन्धी ज्ञानेन्द्रिय पर प्रभाव डालती है तो मस्तिष्क पूर्व संस्कार के आधार पर दोनों अनुभूतियों की पारस्परिक समानताओं तथा विषमताओं की व्याख्या प्रस्तुत करता है और इस भाँति तुलना द्वारा वस्तु से प्राप्त अनुभूति की पहचान का प्रयत्न करता है। परिणामस्वरूप, प्रथम-संवेदना को उसका वास्तविक अर्थ मिल जाता है और यह अर्थपूर्ण संवेदना ही प्रत्यक्षीकरण है। उदाहरणार्थ–कोई बच्चा एक स्नेहपूर्ण कोमल आवाज पहली बार सुनता है। यह उसके लिए संवेदना है। किन्तु जब बच्चा वही आवाज दूसरी बार सुनता है तो उसकी तुलना अपनी माँ की पहली आवाज से करता है। फलस्वरूप वह दोनों आवाजों में गहरी समानता पाता है और उस आवाज का अपनी माँ की आवाज के रूप में प्रत्यक्षीकरण करता है।

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 1

प्रत्यक्षीकरण की क्रियाएँ
(Actions of Perception)

प्रत्यक्षीकरण वर्तमान वस्तु से प्राप्त संवेदना को अर्थ प्रदान करने का कार्य करता है। अर्थ प्रदान करने में निम्नलिखित मुख्य क्रियाएँ पायी जाती हैं –

(1) संग्राहक क्रियाएँ – संग्राहक क्रियाएँ प्रथम मुख्य क्रियाएँ हैं जो विभिन्न संग्राहकों या ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सम्पन्न होती हैं। प्रत्येक सम्बन्धित ज्ञानेन्द्रियाँ उत्तेजना को ग्रहण करके उसे स्नायु-संस्थान के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। मस्तिष्क में इस प्रथम ज्ञान अर्थात् संवेदना की अनुभूति होती है जिसके पश्चात् प्रत्यक्षीकरण होता है।

(2) प्रतीकात्मक क्रियाएँ – प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया की द्वितीय मुख्य क्रियाएँ प्रतीकात्मक क्रियाएँ हैं जिनके माध्यम से अन्य क्रियाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है। प्रतीक (Symbol)’को देखकर उससे सम्बन्धित अनुक्रिया का अनुभव होने लगता है। ‘मोहन’ यह शब्द किसी व्यक्ति का प्रतीक बनकर उनका प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार रसगुल्ले को देखकर उससे सम्बन्धित स्वाद का अनुभव होने लगता है, इमली को देखकर मुँह खट्टा हो जाता है।

(3) भावात्मक क्रियाएँ – तीसरी महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ भावात्मक क्रियाएँ हैं। हम जानते हैं कि विविध वस्तुओं के प्रत्यक्षीकरण द्वारा भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। भावनाएँ व्यक्ति से व्यक्ति तक परिवर्तित होती जाती हैं। उदाहरण के लिए-मन्दिर में रखे शिवलिंग को आस्तिक श्रद्धा एवं भक्तिभाव से प्रणाम करते हैं, नास्तिक उसके लिए एक पत्थर का भाव रखता है।

(4) एकीकरण क्रियाएँ – इस चौथी क्रिया के अन्तर्गत वर्तमान संवेदना का पूर्व संवेदनाओं के साथ एकीकरण कर देते हैं। प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में एकीकरण का सोपान अत्यन्तावश्यक है जो मस्तिष्क में सम्पन्न होता है।

(5) विभेदीकरण क्रियाएँ – कभी-कभी प्राप्त संवेदना को अन्य संवेदनाओं से पृथक् भी करना पड़ता है; जैसे-बच्चे अपने पिता के स्कूटर का हॉर्न सुनकर उसकी तुलना या विभेदीकरण अन्य आवाजों से करते हैं और इस प्रकार उसे दूसरी आवाजों से अलग कर लेते हैं।

प्रश्न 2.
प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारकों को उदाहरणों सहित वर्णन कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक तत्त्वों की भली-भाँति व्याख्या कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण के प्रमुख निर्धारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारक
या प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक तत्त्व
(Factors Affecting Perception)

प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारकों तथा उसके निर्धारक तत्त्वों की व्याख्या करने से पूर्व इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि प्रत्यक्षीकरण किस तरह का मनोवैज्ञानिक प्रक्रम है-जन्मजात या अर्जित ? वस्तुतः इस विवाद को लेकर कई विचार सम्मुख आते हैं। गेस्टाल्टवादियों के अनुसार, प्रत्यक्षीकरण का सम्बन्ध केन्द्रीय स्नायु-संस्थान की जन्मजात विशेषताओं से है। हेब्ब (Hebb) नामक मनोवैज्ञानिक के अनुसार, प्रत्यक्षात्मक संगठन (Perceptual Organization) केन्द्रीय स्नायु संस्थान की संरचना से प्रभावित होकर स्वत: निर्धारित होता है। साहचर्यवादी विचारकों की दृष्टि में प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम, अनुभवों पर आधारित है। प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक तत्त्वों के विषय में कई मत अवश्य हैं, किन्तु यह निर्विवाद है कि ये निर्धारक तत्त्व प्रत्यक्षीकरण को स्वतन्त्र रूप से प्रभावित नहीं करते बल्कि विशिष्ट दशा में कई कारकों की अन्त:क्रियाएँ प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती हैं। प्रत्यक्षीकरण के मुख्य निर्धारक तत्त्वों अथवा कारकों को निम्त्नलिखित रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है –

(1) प्रत्यक्षीकरण पर सन्दर्भ का प्रभाव – व्यक्ति प्रत्येक उद्दीपक का प्रत्यक्षीकरण किसी-न-किसी सन्दर्भ में करता है। इस प्रकार सन्दर्भ, प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करता है। यह प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है

(अ) अन्तःइन्द्रिय सन्दर्भ – जब उद्दीपक और उद्दीपक का सन्दर्भ दोनों एक ही ज्ञानेन्द्रिय क्षेत्र में होते हैं तो इस तरह का सन्दर्भ प्रत्यक्षीकरण उद्दीपक के लिए पृष्ठभूमि का कार्य करता है। इस दशा को अन्त:इन्द्रिय सन्दर्भ का प्रभाव कहा जाता है। यह दशा प्रत्यक्षीकरण में भ्रम भी पैदा कर सकती है।

(ब) अन्तःइन्द्रिय सन्दर्भ – इस अवस्था में प्रत्यक्षीकरण उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिय के एक क्षेत्र में तथा उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिय के दूसरे क्षेत्र में होता है। यह दशा अन्त:इन्द्रिय सन्दर्भ कहलाती है और प्रत्यक्षीकरण को अर्थपूर्ण ढंग से प्रभावित करती है।

(2) प्रत्यक्षीकरण पर अभिप्रेरणा का प्रभाव – अभिप्रेरणा से सम्बन्धित व्यवहार का कुछ-न-कुछ लक्ष्य या उद्देश्य होता है। व्यक्ति इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सक्रिय हो उठता है तथा हर सम्भव प्रयास करता है। निश्चय ही, अभिप्रेरणा व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं पर असर डालती है। और इस भाँति अभिप्रेरणा से प्रत्यक्षीकरण का निर्धारित होना भी स्वाभाविक है। अभिप्रेरणा का प्रत्यक्षीकरण पर प्रभाव निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट होता है

(अ) प्रात्यक्षिक सतर्कता – प्रात्यक्षिक सतर्कता की प्रघटना में प्राणी का उद्दीपक पहचान सीमान्त कम हो जाता है। प्रायः प्राणी को कुछ खास उद्दीपकों के प्रति अतिरिक्त रूप से तत्पर पाया जाता है। कभी-कभी यह तत्परता इतनी ज्यादा हो जाती है कि प्राणी उद्दीपक के प्रति उस स्थिति में भी अनुक्रिया प्रकट करने लगता है, जबकि उद्दीपक अस्पष्ट हो और उसमें प्रत्यक्षीकरण के आवश्यक गुण भी न हों।

(ब) प्रात्यक्षिक सुरक्षा – प्रात्यक्षिक सुरक्षा की प्रघटना के अन्तर्गत, जब प्रयोज्यों के सम्मुख कोई दु:खदायी उद्दीपक लाया जाता है तो सामान्य या उदासीन उद्दीपकों की अपेक्षा इन उद्दीपकों की पहचान सीमान्त बढ़ जाती है।

(स) उद्दीपक-गुण – मनोवैज्ञानिक प्रयोग के सम्बन्ध में यह परिकल्पना सत्य सिद्ध हुई कि उदासीन उद्दीपक के प्रत्यक्षित आकार की अपेक्षा प्रयोज्यों को मूल्यवान उद्दीपक का प्रत्यक्षित आकार बड़ा प्रतीत होगा। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि उद्दीपक-गुणों के प्रत्यक्षीकरण पर अभिप्ररेणा का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

(द) उद्दीपक-चयन – मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से पता चला है कि प्रत्यक्षीकरण के सम्बन्ध में उद्दीपक के चयन पर अभिप्रेरणा का प्रभाव पड़ता है। एक परीक्षण में मुखाकृति के अर्धाशों (Half Parts) को जोड़कर प्रस्तुत किया गया। इन अर्धाशों में से एक को पुरस्कृत किया गया था और दूसरे को दण्डित। प्रयोज्यों ने पुरस्कृत अर्धाश का प्रत्यक्षीकरण अधिक किया।

(3) प्रत्यक्षीकरण पर तत्परता या सेट का प्रभाव – वातावरण में बहुत से उद्दीपक उपस्थित रहते हैं। अनुभव में आता है कि अक्सर प्राणी विशेष उद्दीपकों के प्रति प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से अधिक तत्पर रहता है या कम तत्पर रहता है। यह तत्परता, जिसे सेट (Set) भी कहा जाता है, प्रयोज्य के उन उद्दीपकों के प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती है। प्रत्यक्षीकरण पर तत्परता या सेट का प्रभाव दो प्रकार से देखा जा सकता है

(अ) पहचान के आधार पर – प्रत्यक्ष निर्देशों के माध्यम से पहचान के आधार पर सेट के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि इस आधार पर बने सेट प्रत्यक्षीकरण पर प्रभाव डालते हैं। पोस्टमैन एवं बूनर के अनुसार, जब प्रयोज्यों में निर्देशों के आधार पर एक सेट निर्मित होता है, उस समय पहचान अधिक सुविधाजनक होती है, किन्तु जब इसी आधार पर एक से अधिक सेट बनते हैं तो पहचान मुश्किल व दुविधापूर्ण हो जाती है। |

(ब) आकृति-पृष्ठभूमि के आधार पर – लीपर नामक मनोवैज्ञानिक ने सेट से सम्बन्धित एक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया कि आकृति एवं पृष्ठभूमि से सम्बद्ध निर्देशों के आधार पर निर्मित सेट प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करते हैं। बूनर द्वारा किये गये अध्ययन के निष्कर्षों से भी पता चलता है कि आकृति के रंग के सम्बन्ध में बना सेट रंग प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करता है।

(4) प्रत्यक्षीकरण पर अधिगम का प्रभाव – अधिगम अर्थात् सीखना प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम को विशेष रूप से प्रभावित करता है। प्रत्यक्षपरक तादात्मीकरण (Perceptual Identification) अधिगम के कारण ही होता है और अधिगम क्रियाएँ प्रत्यक्षीकरण का शोधन एवं परिमार्जन करती है। यह भी ज्ञात होता है कि व्यक्ति के दीर्घकालीन अनुभव तथा अभ्यास प्रत्यक्षीकरण को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं।

(5) प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले अन्य कारक – प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम को प्रभावित करने वाले कुछ अन्य कारक निम्नलिखित हैं

(i) परिचय – व्यक्ति को उन उद्दीपकों या संगठनों का प्रत्यक्षीकरण आसानी से होता है जिनसे वह भली प्रकार परिचित होता है; जैसे–परिचित, रिश्तेदार का प्रत्यक्षीकरण भीड़ के अन्य लोगों के बीच सरलता से हो जाता है।

(ii) पूर्व – अनुभव-जिस व्यक्ति में पूर्व-अनुभवों की अधिकता होती है, वह कम अनुभव वाले व्यक्तियों की अपेक्षा वातावरण में मौजूद उद्दीपकों का शीघ्र और बेहतर प्रत्यक्षीकरण कर लेता है। उदाहरण के लिए—प्रौढ़ व्यक्ति बच्चे की अपेक्षा शीघ्र व अधिक प्रत्यक्षीकरण करता है।

(iii) रंग – आकृति एवं पृष्ठभूमि के रंगों में जितना अधिक विरोध या अन्तर होता है, आकृति एवं पृष्ठभूमि का प्रत्यक्षीकरण उतना ही अधिक स्पष्ट होता है। काली पृष्ठभूमि पर सफेद बिन्दी एकदम साफ चमकती है।

(iv) आकार – बड़े आकार की उत्तेजनाओं को प्रत्यक्षीकरण छोटे आकार की उत्तेजनाओं की अपेक्षा शीघ्र और अधिक होता है।

(v) चमक – यदि आकृति व पृष्ठभूमि की चमक में अधिक अन्तर होगा तो आकृति एवं पृष्ठभूमि का अधिक स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण होगा।

(vi) अवधि – प्रदर्शनकाल भी प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करता है। लम्बी अवधि के लिए उपस्थित उद्दीपक को हम सरलता से प्रत्यक्षीकरण कर लेते हैं।

(vii) मानसिक तत्परता – मानसिक तत्परता भी प्रत्यक्षीकरण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव रखती है। माना, माँ अपने बच्चे के आने की प्रतीक्षा कर रही है तो दरवाजे पर कोई भी आहट बच्चे के आने का संकेत देती है।

(viii) अभिवृत्ति – अभिवृत्ति भी उद्दीपकों के प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती है; जैसे-एक दल के लोग अभिवृत्ति (ऋणात्मक) के प्रभाव में विरोधी दल के लोगों का भ्रष्ट व अनैतिक लोगों के रूप में प्रत्यक्षीकरण करते है।

उपर्युक्त विवरण में सभी कारक परस्पर जटिल अन्त:क्रिया के कारण सक्रिय होते हैं तथा परिपक्व व्यक्तियों के प्रत्यक्षीकरण में अधिक स्पष्ट होते हैं।

प्रश्न 3.
प्रत्यक्षीकरण में गैस्टाल्ट सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण के सम्बन्ध में गैस्टाल्टवादियों के सिद्धान्त क्या हैं?
या
प्रत्यक्षीकरण का क्या अर्थ है? प्रात्यक्षिक संगठन के नियमों का वर्णन कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरणात्मक संगठन के नियमों को विस्तार से लिखिए। आकृतियों में समानता और समीपता के आधार पर प्रत्यक्षीकरण के संगठन की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

गैस्टाल्टवादी मनोविज्ञान
(Gestalt Psychology)

मनोविज्ञान मानव के स्वभाव व व्यवहार का विधिवत् अध्ययन करता है। 1912 में जब व्यवहारवादी विचारधारा (Behaviourists) के मनोवैज्ञानिक जे० बी० वाटसन अमेरिका में व्यवहारवाद का आन्दोलन चला रहे थे, उन्हीं दिनों जर्मनी में व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से मानव स्वभाव को समझने के लिए एक नवीन विचारधारा का जन्म हो रहा था, जिसे गैस्टाल्टवाद या गैस्टाल्टवादी मनोविज्ञान (Gestalt Psychology) का नाम दिया गया है। मैस्टाल्ट मनोविज्ञान का प्रारम्भ तीन मनोवैज्ञानिकों-मैक्स वरदाईमर (Max warthiemer), वोल्फगैंग कोहलर (Wolfgang Kohler) तथा कर्ट कोफ्का (Kurt Koffka) द्वारा किया गया।

गैस्टाल्ट का अर्थ-गैस्टाल्ट’ शब्द का अर्थ है किसी वस्तु का आकार, प्रकार या स्वरूप। पूर्ण को जर्मन भाषा में गैस्टाल्टन (Gestaltan) कहते हैं और अंग्रेजी भाषा में गैस्टाल्ट’ (Gestalt) कहते हैं। गैस्टाल्टवादियों के अनुसार, किसी भी उत्तेजना का प्रत्यक्षीकरण (Perception) उसके पूर्णरूप में होता है तथा वस्तु का वास्तविक रूप उसके पूर्ण में ही दृष्टिगोचर होता है। यही कारण है कि इस विचारधारा के अनुयायी वस्तु के पूर्णरूप को लेकर चलते हैं तथा उसे ही सही एवं वास्तविक प्रत्यक्षीकरण स्वीकार करते हैं। ये मनोवैज्ञानिक इस अवधारणा को स्वीकार नहीं करते कि प्रत्यक्षीकरण संवेदनाओं तथा पूर्व अनुभवों का योग होता है। यदि किसी सुन्दर बच्चे के चेहरे का उदाहरण लें तो वह अपने पूर्णरूप में सुन्दर दिखाई देता है। यदि बच्चे की आँख, नाक, होंठ, कान, गाल, मस्तक आदि को अलग-अलग करके देखें तो वह सुन्दरता विलुप्त हो जाती है। कारण यह है । कि सुन्दरता चेहरे के समस्त अंगों में निहित होने के बावजूद भी पूर्णरूप में देखने पर ही दिखाई पड़ती है, अंश या भागों में देखने पर नहीं। वस्तुत: चेहरा इन समस्त अंगों का योग ही नहीं है, वह तो इनका एक विशेष संगठन है और इस विशेष संगठन में ही बच्चे के चेहरे की सुन्दरता को रहस्य छिपा है।

प्रत्यक्षीकरण का गैस्टाल्ट सिद्धान्त (Gestalt Theory of Perception) – गैस्टील्ट सिद्धान्त के अनुसार, किसी वस्तु का प्रत्यक्षीकरण संश्लेषणात्मक विधि के द्वारा पहले होता है, बाद में उसका प्रत्यक्षीकरण विश्लेषणात्मक ढंग से होता है। कोई वस्तु हमें सर्वप्रथम अपने संश्लेषित या पूर्णरूप में दिखाई देती है। धीरे-धीरे, जैसे-ही-जैसे वस्तु के प्रत्यक्षीकरण के चिह्न घटते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे उसके अंग-प्रत्यंग (भागों) का प्रत्यक्षीकरण विश्लेषित या आंशिक रूप में होता है। किसी भव्य इमारत को देखने पर उसका प्रत्यक्षीकरण सम्पूर्ण रूप में किया जाता है, उसके विभिन्न हिस्सों में नहीं। पहली एक दृष्टि में उसके हिस्सों को अलग-अलग करके नहीं देखा जाता। किन्तु शनैः-शनै: जब उसको कई बार देखा जाता है तो हम उसके किसी भी हिस्से का प्रत्यक्षीकरण करने लगते हैं, यथार्थ या वास्तविक प्रत्यक्षीकरण वस्तु के विभिन्न हिस्सों या अंगों का योग न होकर उस संगठन द्वारा होता है जिसमें विषय-वस्तु संगठित रहती है। यदि उस विषय-वस्तु के विभिन्न अंगों का संगठन परिवर्तित हो जाए तो प्रत्यक्षीकरण में भी परिवर्तन आ जाएगा।

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संगठन के नियम
(Laws of Organisation)

अपने मत के समर्थन में गैस्टाल्टवादियों ने संगठन के कुछ नियम प्रतिपादित किये हैं। वे नियम इस प्रकार हैं –

1. समग्रता का नियम (Law of wholes) – समग्रता का नियम प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी एक महत्त्वपूर्ण नियम है जिसके अनुसार प्रत्यक्षीकरण में समग्र परिस्थिति का प्रत्यक्ष एक साथ होता है। ज्ञान के क्षेत्र में अनेक उत्तेजक तत्त्व स्वयं को विविध प्रकार के आकारों में संगठित कर लेते हैं। जर्मनी भाषा में ये आकार गैस्टाल्टन (Gestaltan) कहलाते हैं। हमारे मस्तिष्क पर इन संगठित आकारों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है और इन्हीं का हम प्रत्यक्षीकरण करते हैं। क्योंकि ज्ञान क्षेत्र में सर्वप्रथम हमें समग्र ही दिखाई पड़ता है, अत: बड़े शब्दों के बीच हुई अक्षरों की गलतियाँ अक्सर हम नहीं देख पाते और गलतियों के बावजूद भी शब्द को पूर्णरूप में ही पढ़ते हैं।

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उपर्युक्त चित्र में कुल 12 फूल हैं हम जिनका प्रत्यक्षीकरण चार-चार के समूह में करते हैं। कारण यह है कि चार-चार फूल मिलकर एक समग्र या इकाई बना रहे हैं।

2. आकृति और पृष्ठभूमि का नियम (Law of Figure and Background) – इस नियम के अनुसार किसी आकृति या दूसरी उत्तेजनाओं का प्रत्यक्षीकरण हम एक पृष्ठभूमि में करते हैं। चित्रकला में आकृति और पृष्ठभूमि नियम का विशेष ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के लिए कुछ चित्र ऐसे होते हैं जो सिर्फ पृष्ठभूमि के विरोधी रंग के कारण उभर आते हैं। फिल्म देखते समय हम लोग अलग-अलग दृश्यों के साथ संगीत की अलग-अलग पृष्ठभूमि पाते हैं। पृष्ठभूमि की वजह से आकृति (उत्तेजना) का प्रत्यक्षीकरण प्रभावित होता है।

निर्धारक नियम
(Determining Laws)

गैस्टाल्टवादियों ने संगठन के नियमों के अलावा आकृति और पृष्ठभूमि के निर्धारक नियम भी प्रतिपादित किये हैं। ये नियम निम्नलिखित हैं –

(1) समीपता का नियम (Law of Proximity) – देश-काल की किसी पृष्ठभूमि में उन दशाओं, वस्तुओं, पदार्थों तथा प्राणियों का प्रत्यक्षीकरण शीघ्रता से होता है जो अपनी समीपता के कारण एक इकाई या आकृति का रूप धारण कर लेती हैं। इसके विपरीत, अनियमित तथा दूर-दूर बिखरे तत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण आसानी से नहीं होता। बगीचे के उन पौधों का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र व सरलता से होता है जो एक-दूसरे के समीप तथा समूह में होते हैं। बगीचे के बाहर खड़े एकाकी पौधे के प्रत्यक्षीकरण में देर लगती है।

(2) निरन्तरता का नियम (Law of Continuity) – उने उत्तेजनाओं का शीघ्र प्रत्यक्षीकरण कर लिया जाता है जो अनवरत रूप से निरन्तर या लगातार आती हैं। इस प्रकार की उत्तेजनाएँ किसी ज्ञानेन्द्रिय को ज्यादा देर तक तथा पूर्णरूप से प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए स्कूटर के रुक-रुककर बजने वाले हॉर्न की अपेक्षा लगातार और निरन्तर बजने वाले हॉर्न का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र होता है।

(3) समानता का नियम (Law of Similarity) – समानता प्रत्यक्षीकरण का एक महत्त्वपूर्ण नियम है। समान आकृति वाली उत्तेजनाओं का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र कर लिया जाता है। वस्तुतः नाड़ी-तन्त्र में उन्हीं उत्तेजनाओं (वस्तुओं या व्यक्तियों) की आकृति बनती है जो वातावरण में समान रूप से पायी जाती हैं यानि जिनके विभिन्न अंगों में अधिक समानता दृष्टिगोचर होती है।

(4) सजातीयता का नियम (Law of Homogeneity) – गैस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, किसी पृष्ठभूमि में एक ही जाति के उत्तेजक या विभिन्न वस्तुएँ पहले दिखाई पड़ती हैं। एक ही दीप्ति के प्रकाश अथवा एक ही तीव्रता की ध्वनियों का प्रत्यक्षीकरण पृष्ठभूमि की अपेक्षा शीघ्रता से होता है। वसन्त ऋतु में फलते-फूलते टेसू के फूलों से लदे पेड़ों को देखकर प्रायः जंगल में आग का, भ्रम हो जाता है। ऐसा इसे कारण होता है क्योंकि एक ही जाति के ढेर सारे फूलों का प्रत्यक्षीकरण इनके एकसमान रंग की दीप्ति के कारण होता है।

(5) तत्परता का नियम (Law of Readiness) – वस्तु या उत्तेजना के संगठन पर मानसिक तत्परता का भी प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति जिस चीज का प्रत्यक्षीकरण करने के लिए तत्पर होता है उसे वह जल्दी देख अथवा सुन लेता है। उदाहरण के लिए परीक्षार्थी प्रश्न-पत्र में पहले उन प्रश्नों का प्रत्यक्षीकरण करता है जिनके आने की उम्मीद थी, दूसरे प्रश्नों का प्रत्यक्षीकरण वह बाद में करता है।

(6) आच्छादन का नियम (Law of Closure) – कई बार उत्तेजनाएँ रिक्त स्थान (Gaps) छोड़ देती हैं जिन्हें मानव मस्तिष्क द्वारा स्वयं पूरा कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया आच्छादन अंग के प्रभाव के कारण है। जब हम कोई ऐसी आकृति देखते हैं जिस का कोई अंग अपूर्ण है तो हम उस अपूर्णता की ओर ध्यान न देकर आकृति का प्रत्यक्षीकरण पूर्ण रूप में ही करते हैं।

(7) प्रेरणा का नियम (Law of Motivation) – किसी व्यक्ति में कार्यरत प्रेरक अपने से सम्बन्धित उत्तेजनाओं तथा तत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण पहले करने की दृष्टि से व्यक्ति को प्रेरित करता है। रिक्शा चलाने वाली सवारियों का प्रत्यक्षीकरण अन्य राहगीरों की अपेक्षा शीघ्र करेगा, जबकि पान वाला पान खाने वालों का।

(8) संगति या सम्बद्धता का नियम (Law of Symmetry) – गैस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, व्यक्ति किसी वस्तु अथवा उद्दीपक को उसके पूर्ण रूप में देखने की प्रवृत्ति रखता है। वह वस्तु की सम्बद्धता या संगति पर ध्यान देता है तथा छोटी-मोटी असम्बद्धताओं या विसंगतियों पर ध्यान नहीं देता। वस्तुतः संगति की वजह से समस्त उत्तेजना के अंग संगठित हो जाते हैं जिससे उनका सम्पूर्ण प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। कमरे की दीवारों को प्रत्यक्षीकरण इसी संगति या संम्बद्धता के कारण है।

(9) अनुभव का नियम (Law of Experience) – प्रत्यक्षीकरण पर पहले अनुभव का भी । प्रभाव पड़ता है। जिन वस्तुओं अथवा उत्तेजनाओं को व्यक्ति को पहले से अनुभव रहता है उनका प्रत्यक्षीकरण वह शीघ्र करता है। यह इस कारण से होता है क्योंकि प्रत्यक्षीकरण करने वाला व्यक्ति पृष्ठभूमि की अन्य वस्तुओं की अपेक्षा उस वस्तु-विशेष से अधिक परिचित होता है।

(10) मनोवृत्ति का नियम (Law of Attitude) – व्यक्ति की मनोवृत्ति भी उसकी उत्तेजना के प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती है, क्योंकि व्यक्ति अपनी आन्तरिक प्रवृत्ति के अनुसार ही वस्तु का प्रत्यक्षीकरण करता है। उपवन में सैर कर रहे विभिन्न लोग अपनी मनोवृत्ति के अनुकूल ही फूल-पौधों का प्रत्यक्षीकरण करेंगे। माली उन्हें उगाने की विधि, मिट्टी की दशा तथा उर्वरकों की दृष्टि से; कवि या लेखक सौन्दर्यानुभूति की प्रवृत्ति से तथा युवती फूल के सौन्दर्य से आकर्षित होकर उसका प्रत्यक्षीकरण करेगी।

प्रश्न 4.
भ्रम अथवा विपर्यय (nlusion) से क्या आशय है? भ्रम की प्रकृति को स्पष्ट कीजिए तथा इसके कारणों का भी उल्लेख कीजिए।
या
भ्रम क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
या
विपर्यय या भ्रम के कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण में हम किसी उत्तेजना या वस्तु-विशेष के यथार्थ का बोध करते हैं, किन्तु मिथ्या या त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण भ्रम कहलाता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से घर के किसी प्रकोष्ठ में रस्सी का प्रत्यक्षीकरण करता है। व्यक्ति को यह यथार्थ ज्ञान हो जाता है कि यह रस्सी है। वह घर में आते-जाते, सुबह-शाम रस्सी का प्रत्यक्ष बोध करता है। एक दिन रात के अन्धेरे में इसके विपरीत घटना घटी और वह रस्सी को साँप समझ बैठा और चीखकर दौड़ पड़ा। व्यक्ति प्रत्यक्षीकरण यहाँ भी कर रहा है, किन्तु यह यथार्थ या वास्तविक नहीं है। यह विपरीत अर्थात् विपर्यये (उल्टा) प्रत्यक्षीकरण है और इसी कारण भ्रम है।

विपर्यय अथवा भ्रम का अर्थ
(Meaning of Illusion)

विपर्यय अथवा भ्रम (Ilusion) त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण का दूसरा नाम है। प्रत्यक्षीकरण की क्रिया में संवेगात्मक अनुभव को उचित अर्थ प्रदान किया जाता है, किन्तु जब हम अपनी संवेदनाओं को त्रुटिपूर्ण या गलत अर्थ प्रदान कर देते हैं तो हमें विपर्यय (भ्रम) हो जाता है। इसे भाँति, प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी कोई भी त्रुटि विपर्यय के अन्तर्गत शामिल की जा सकती है। हालाँकि ऐसी त्रुटियाँ सामान्यतया होती रहती हैं, किन्तु ‘विपर्यय’ या ‘भ्रम’ शब्द का प्रयोग हम केवल उस दशा में ही करते हैं, जबकि निरीक्षण के दौरान कोई अनोखी तथा बड़ी त्रुटि हो गयी हो। भ्रम किसी स्वप्नावस्था का नाम नहीं है, क्योकि इसमें प्रत्यक्ष वस्तु सामने विद्यमान है। यह कल्पना भी नहीं है। यह तो मिथ्या या भ्रामक प्रत्यक्ष है। नींद से जागने पर अक्सर आदमी सवेरे को शाम या शाम को सवेरा समझ लेता है।

विपर्यय या भ्रम की प्रकृति स्थायी नहीं होती। यह एक क्षणिक और नितान्त अस्थायी प्रक्रिया है। जैसे ही व्यक्ति को उत्तेजक की सच्चाई का ज्ञान प्राप्त होता है, वैसे ही व्यक्ति को अपनी त्रुटि का आभास हो जाता है और उसका भ्रम दूर हो जाता है।

विपर्यय या भ्रम के प्रकार
(kinds of Illusion)

विपर्यय या श्रम साधारणतया दो प्रकार के होते हैं –

  1. व्यक्तिगत विपर्यय या भ्रम तथा
  2. सामान्य विपर्यय या भ्रम।

(1) व्यक्तिगत विपर्यय या भ्रम (Personal Illusion) – व्यक्तिगत विपर्यय या भ्रम वे हैं जो सभी व्यक्तियों में एकसमान नहीं होते। ये व्यक्ति से व्यक्ति में बदलते रहते हैं। हर एक व्यक्ति ऐसे भ्रम को अनुभव ही करे, यह अनिवार्य भी नहीं है अर्थात् इन्हें कोई अनुभव कर पाता है। अनुभव का स्वरूप भी भिन्न-भिन्न होता है। ये भ्रम क्षणिक प्रकृति के होते हैं तथा जल्दी ही दूर हो जाते हैं। उदाहरण के लिए—कुछ व्यक्ति अन्धेरे में रस्सी को साँप समझ सकते हैं, किन्तु जिस किसी ने साँथे । को देखा-सुना नहीं है, वह अन्धेरे में साँप को भी रस्सी ही समझ बैठेगा। यदि किसी ने कभी भूत के बारे में नहीं सुना है तो उसे कोई विचित्र आकृति भूत का भ्रम नहीं दे सकती।

(2) सामान्य विपर्यय’ या भ्रम (General Illusion) – सामान्य विपर्यय सार्वभौम (Universal) होते हैं। यही कारण है कि इन्हें सार्वभौमिक विपर्यय भी कहते हैं। ये दुनिया भर के सभी लोगों को समान रूप से होते हैं। इनका स्वरूप पर्याप्त रूप से स्थायी होता है। इसी कारण वास्तविकता जान लेने पर भी ये भ्रम ही रहते हैं। ऐसे भ्रमों से मुक्ति पाने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं। सामान्य विपर्यय को निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है –

(i) गतिभ्रम – गतिभ्रम सामान्य या सार्वभौमिक विपर्यय का एक अच्छा उदाहरण है जिसे ‘फाई-फिनोमिना’ (Phi-Phenomena) कहते हैं। इसका प्रमाण सिनेमाघर में मिलता है। सिनेमा की रोल में थोड़े-थोड़े फासले पर किसी अभिनेता के सैकड़ों-हजारों चित्र होते हैं। रील को प्रोजेक्टर से चलाने पर पर्दे पर व्यक्ति अभिनय करता दीख पड़ता है। अभिनेता वास्तव में पर्दे पर अभिनय नहीं कर रहा है, किन्तु गति भ्रम के कारण यह सजीव जान पड़ता है। शादी-ब्याह, नुमाइश या मेले के अवसर पर बिजली के बल्बों को जला-बुझाकर गतिभ्रम कराया जाता है। कभी चक्र घूमता जान पड़ता है तो कभी बल्बों की माला चलती हुई महसूस होती है।

(ii) अक्सर किसी बस या गाड़ी से यात्रा करते समय नेत्र बन्द कर लेने से अनुभव होता है कि बस या गाड़ी उल्टी दिशा में चल रही है।
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(iii) इसी प्रकार किसी वाहन से सफर के दौरान हर एक व्यक्ति अनुभव करता है कि दोनों ओर के मकान, पेड़-पौधे या विभिन्न वस्तुएँ। विपरीत दिशा में भागे जा रहे हैं। टेलीफोन के खम्भों पर खिंचे तार भी ऊपर-नीचे चलते अनुभव होते हैं।
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(iv) म्यूलर-लापर विपर्यय (Muller-Lyer Illusion) – म्यूलरलायर विपर्यय या भ्रम को संलग्न चित्र में दिखाया गया है। चित्र को देखकर हर एक व्यक्ति यही बतायेगा कि अ ब रेखा ब स रेखा से बड़ी है जबकि अ * ब रेखा, ब स के एकदम बराबर है। अ सिरे पर अ अ, ब सिरे पर ब ब” तथा स सिरे पर स स रेखाओं के कारण यह भ्रम उत्पन्न होता है।

(v) जुलनर का भ्रम (Zullner’s Illusion)प्रायः हम लोग किसी वस्तु पर देर तक ध्यान केन्द्रित करके अ > तथा उसका विश्लेषण करके ही उसका प्रत्यक्षीकरण कर सट पाते हैं। जब ऐसा करना सम्भव नहीं होता तथा विरोधी उत्तेजनाओं को हम वस्तु से पृथक् नहीं कर पाते तो हमें संलग्न चित्र में प्रदर्शित भ्रम के सदृश विपर्यय हो जात्रा है। अब, सद, यर तथा ल व-ये चार खड़ी समान्तर रेखाएँ हैं, किन्तु तिरछी काटने वाली छोटी रेखाओं के कारण समानान्तर महसूस नहीं होती।
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(vi) हैरिंग का विपर्यय (Herring’s Illusion) – संलग्न चित्र में हैरिंग द्वारा प्रस्तुत एक ज्यामितीय आकृति दिखाई गयी है जिसमें अब और स द दो समान्तर पड़ी रेखाओं को कुछ रेखाएँ इस प्रकार काट रही हैं कि ये समानान्तर नहीं जान पड़तीं।

विपर्यय के कारण
(Causes of Illusion)

निःसन्देह किसी वस्तु का मिथ्या प्रत्यक्षीकरण या झूठी भ्रान्ति ही विपर्यय अथवा भ्रम है और इसके अन्तर्गत ऐसी वस्तु का प्रत्यक्षीकरण किया जाता है जो वास्तविक वस्तु से सर्वथा भिन्न है। किन्तु, ऐसा होता क्यों है ? इस प्रश्न के उत्तर की खोज में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। इन सिद्धान्तों के आधार पर ही विपर्यय या भ्रम के मुख्य कारण अग्रलिखित रूप से प्रस्तुत हैं –

(1) पूर्वधारणा या पूर्वानुभव (Preconception) – आमतौर पर लोगों को अपने पुराने अनुभवों या पूर्वधारणाओं के कारण भ्रम पैदा हो जाता है। किसी विषय-वस्तु के सन्दर्भ में पूर्वधारणाओं के कारण प्रत्यक्षीकरण विकृत होकर विपर्यय को जन्म देता है। उदाहरणार्थ-किसी मकान में कभी एक स्त्री का कत्ल कर दिया गया था। यह बात फैल गयी कि रात के समय उस स्त्री का प्रेत मकान में आता है। इस बात को जानकर कोई व्यक्ति यदि उस मकान में रात व्यतीत करे त सम्भव है कि उसे रात में किसी आवाज से प्रेत का भ्रम हो जाये या कोई आकृति भूत जैसी दिखाई पड़े। यह भ्रम सोने वाले व्यक्ति की पूर्वधारणा के कारण होगा।

(2) आशा (Expectation) – प्रायः हम किसी वस्तु या घटना की आशा करते हैं। इस आशा के अनुकूल तथा इसके कारण विपर्यय या भ्रम हो जाते हैं। देखने में आता है कि परीक्षा में किसी प्रश्न के आने की आशा में छात्र उससे मिलते-जुलते किसी अन्य प्रश्न का उत्तर लिख देते हैं। यदि अकेले सफर कर रहे यात्री को आशा हो कि आज डाकू मिलेगा तो सामान्य आदमी को देखकर भी वह भयभीत हो उठेगा। यह भ्रान्त दशा आशा के कारण है।

(3) आदतें (Habits) – यदा-कदा व्यक्ति आदतों के कारण भ्रम का शिकार हो जाता है। यदि हम किसी वस्तु को विशेष रूप में देखने की आदत रखते हैं तो उसी तरह की दूसरी वस्तुएँ देखने पर हमें पहली वस्तुओं का ही बोध होगा। यदि किसी परिचित को एक विशेष पोशाक में देखने की आदत है तो किसी अन्य को उसी पोशाक में देखकर परिचित व्यक्ति का भ्रम होगा।

(4) ज्ञानेन्द्रिय दोष (Defects of Sense Organs) – कुछ विपर्यय या भ्रम ज्ञानेन्द्रिय दोष के कारण उत्पन्न होते हैं। ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को खाने की सभी वस्तुएँ कड़वी या नमकीन लगती हैं, पीलिया (Jaundice) का रोगी प्रत्येक वस्तु को पीला पाता है तथा सुनने का दोषी अद्भुत आवाजें सुना करता है।

(5) नेत्रगति (Eye Movement) – विपर्यय या भ्रम में नेत्रगति की विशेष भूमिका है। चित्रानुसार अ ब रेखा पर स द रेखा लम्बवत् खड़ी है। हालाँकि अ ब और स द आपस में समान लम्बाई की हैं लेकिन अ ब, से स द लम्बी महसूस होती है। यह भ्रम हमें अपनी ज्ञानेन्द्रियों की विशेषताओं के कारण होता है।

(6) नवीनता (Novelty) – नवीनता के कारण भी व्यक्ति को विपर्यय होता है। अक्सर किसी परिस्थिति या वस्तु में परिवर्तन के कारण कोई नवीनता उत्पन्न होने से उसके विषय में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। जब हम किसी शहर में एक लम्बे समय बाद आते हैं तो वहाँ किसी खास गली या मुहल्ले के नये मकानों को देखकर उस स्थान-विशेष के बारे में भ्रम हो जाता है।

(7) संवेग (Emotion) – संवेगावस्था में व्यक्ति को बहुधा भ्रम होते हैं। संवेग की दशा में व्यक्ति असामान्य हो जाता है और गलत प्रत्यक्षीकरण करने लगता है। चोर या डाकू की आशंका से उत्पन्न भय की संवेगावस्था में दरवाजे या छत पर होने वाली जरा-सी आहट भी चोर या डाकू की उपस्थिति का भ्रम करा देती है।।

(8) उत्तेजनाओं का विरोध (Contrast of Stimuli) – दो विपरीत गुणों वाली उत्तेजनाओं के सम्मुख आने पर व्यक्ति को उसकी वास्तविकता के विषय में भ्रम हो जाता है। लम्बा व्यक्ति यदि ठिगने व्यक्ति के साथ चले तो ठिगना और अधिक ठिगना दिखाई देगा, किन्तु यदि ठिगना, ठिगने व्यक्तियों के ही साथ चलेगा तो इतना ठिगना नहीं लगेगा। यदि एक साथ बनी चाय को तीन प्यालों में डालकर उन तीन व्यक्तियों को पिलायी जाये जिनमें से एक ने पहले मिठाई खाई हो, दूसरे ने नमकीन और तीसरे ने कुछ भी न खाया-पिया हो, तो मिठाई खाने वाला चाय को कम मीठी (या फीकी), नमकीन खाने वाला अपेक्षाकृत अधिक मीठी तथा बिना कुछ खाये-पिये चाय पीने वाला व्यक्ति उसे वास्तविक रूप से मीठा बतायेगा। ऐसा वस्तुओं के विरोधी गुणों के कारण है।

(9) सम्भ्रान्ति (Confusion) – सम्भ्रान्ति से अभिप्राय है–किसी आकृति के किसी भाग का अशुद्ध या मिथ्या प्रत्यक्षीकरण। किसी आकर्षक वस्तु को देखकर हम उसके सम्पूर्ण रूप में इतना खो जाते हैं कि उसके भागों की कमी पर ध्यान ही नहीं देते। अक्सर सुन्दर आकृति से सम्भ्रान्ति का विपर्यय या भ्रम पैदा हो जाता है।

(10) समग्रतो की प्रवृत्ति (Tendency towards whole) – प्रत्यक्षीकरण में समग्रता की प्रवृत्ति पायी जाती है। किसी चित्र या दृश्य के विभिन्न रूप समग्र के गुणों पर निर्भर होते हैं। इनका अर्थ भी समग्र के अर्थ पर आधारित होता है। बादलों को ध्यानपूर्वक देखने पर उसमें कई प्रकार की आकृतियाँ दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि बादल को समग्र रूप से देखा जाता है।

(11) परिदृश्य (Perspective) – किसी भी वास्तविक वस्तु में ये सभी माप पायी जाती हैं–लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई अथवा गहराई आदि, किन्तु वस्तु के चित्र में सामान्यतया सिर्फ लम्बाई और चौडाई ही दिखाई पड़ती है। परिदृश्य त्रिमिति (Three Dimensional) होता है। इसी कारण त्रिमित्याकार चित्रों को देखकर वे वास्तविक जैसी लगती हैं, किन्तु यह भ्रम है त्रिमित्याकार फिल्मों को एक विशेष प्रकार का चश्मा लगाकर देखा जाता है और उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे फिल्म की चीजें हमारे सिर पर आ रही हों। ऐसे भ्रम परिदृश्य के कारण हैं।

उपर्युक्त विभिन्न कारणों से भ्रम या विपर्यय होती है। भ्रम कभी किसी एक कारण या अनेक कारणों से भी हो सकता है। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि इस प्रकार के भ्रमों को निर्मूल या निराधार भ्रम से अलग समझा जाता है।

प्रश्न 5.
विभ्रम (Hallucination) से क्या आशय है? विभ्रम के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
एक निराधार प्रत्यक्षीकरण के रूप में विभ्रम का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा उसके कारणों को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

विभ्रम का अर्थ
(Meaning of Hallucination)

संवेग की अवस्था में प्रत्यक्षीकरण की दशाएँ असामान्य हो जाती हैं, किन्तु संवेग की अवस्था समाप्त हो जाने पर प्रत्यक्षीकरण पुनः सामान्य रूप से होने लगता है। प्रत्यक्षीकरण की असामान्य दशाओं में विभ्रम का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है।

विपर्यय अथवा भ्रम की तरह से विभ्रम भी एक त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण है। भ्रम और विभ्रम के बीच अन्तर यह है कि भ्रम बाह्य उत्तेजक का गलत प्रत्यक्षीकरण करने से उत्पन्न होता है जबकि विभ्रम बाह्म उत्तेजक की अनुपस्थिति (अभाव) के प्रत्यक्षीकरण करने से पैदा होता है। इस प्रकार से विभ्रम, वस्तुतः निर्मूल या निराधार प्रत्यक्षीकरण है। जब हम किसी ऐसी वस्तु को देखते हैं जो सचमुच में नहीं है, ऐसी गन्ध को सँघते हैं जो वातावरण में नहीं है और ऐसी ध्वनि को सुनते हैं जो पैदा नहीं हुई तो यही विभ्रम कहलायेगा। उदाहरण के तौर पर–रेगिस्तान में दूर-दूर तक कहीं पानी नहीं है, किन्तु प्यासे हिरन को कुछ दूर पानी का स्रोत होने का निर्मूल प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। प्यासा हिरने पानी की चाह में जैसे ही आगे बढ़ता जाता है, पानी का स्रोत वैसे ही पीछे हटता जाता है। रेगिस्तान में पानी का पूर्ण अभाव है तथापि प्राणी को पानी का प्रत्यक्षीकरण हो रहा है-यह विभ्रम हुआ।

साधारणतया ऐसा माना जाता है कि विभ्रम असामान्य व्यक्तियों में होते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, विभ्रम वे अनुभव हैं जिनमें प्रतिमाओं को प्रत्यक्ष समझ लिया गया है। उनकी दृष्टि में विभ्रम एक स्मृति प्रतिमा (Memory Image) है जिसे संवेदना को स्वरूप प्रदान किया गया है। यह हमारे पूर्व-अनुभव पर निर्मित होती है तथा वर्तमान में सत्य लगती है। रस्सी को साँप समझना यही विपर्यय अथवा भ्रम है तो कुछ भी न होने पर साँप देख लेना विभ्रम है। यद्यपि मनुष्य को श्रवण विभ्रम अधिक होते हैं लेकिन विभ्रम हमारी किसी भी ज्ञानेन्द्रिय आँख, नाक, कान, त्वचा, जिह्वा आदि को हो सकते हैं।

विभ्रम के कारण
(Causes of Hallucination)

विभ्रम की असामान्य स्थिति उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण अग्रलिखित हैं –

(1) मानसिक रोग – विभ्रम सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा एक मानसिक रोगी को अधिक मत्रा में होते हैं। इसमें मानसिक रोगों में से प्रमुख रोग हैं-हिस्टीरिया, शिजोफ्रेनिया और न्यूरिस्थीनिया आदि। इन रोगियों को विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं; यथा-वह आकाश में उड़ा चला जा रहा है, उसके कान में तरह-तरह की आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, उसकी नाक टेढ़ी हुई जा रही है या हाथ मुड़ रहा है आदि। इस भाँति मानसिक रोग भी विभ्रम के कारण हैं।

(2) तीव्र कल्पना शक्ति – तीव्र कल्पना शक्ति वाले लोग अधिकांशतः कल्पना-जगत् में खोये रहते हैं। ऐसे लोग गहन कल्पनाएँ करते-करते स्वयं को उसी काल्पनिक परिस्थिति में पहुँचा देते हैं। वे वास्तविक विषय-वस्तु की अनुपस्थिति में भी उसका निराधार, किन्तु वास्तविक प्रत्यक्षीकरण करने लगते हैं। यह बात अलग है कि यह प्रत्यक्षीकरण सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए वास्तविक होता है जो कल्पनाएँ कर रहे हैं।

(3) दिवास्वप्न – जब व्यक्ति चेतना (जाग्रत) अवस्था में बैठे-बैठे स्वप्न देखता है तो इसे दिवास्वप्न देखना कहते हैं। जागते हुए भी ऐसे व्यक्ति अपने मन की आँखों से कोई दूसरा ही नजारा देख रहे होते हैं। वे उसमें इतने लवलीन रहते हैं कि उन्हें वह नजारा एकदम सच जान पड़ता है। यह दिवास्वप्न के कारण विभ्रम की स्थिति है।

(4) अचेतन मन – अचेतन मन की इच्छाएँ विभ्रम का कारण बनती हैं। फ्रॉयड के अनुसार, व्यक्ति की अपूर्ण इच्छाएँ अन्ततोगत्वा अचेतन मन में चली जाती हैं। कोई तीव्र एवं शक्तिशाली इच्छा अचेतन रूप से व्यक्ति पर प्रभाव डाल सकती है और वहीं से उसके व्यवहार को संचालित कर सकती है। अचेतन मन में बसी यह प्रबल इच्छा विभ्रम उत्पन्न कर सकती है।

(5) मादक द्रव्य – मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले लोग भी विभ्रम का शिकार हो जाते हैं। मादक द्रव्य यथा शराब, अफीम, भाँग, गाँजा तथा चरस आदि के सेवन से चेतना शक्ति प्रभावित होती है। इस अवस्था में या तो चेतना शक्ति समाप्त हो जाती है या कमजोर पड़ जाती है और विभ्रम उत्पन्न करती है। एक शराबी को सरलता से विभ्रम हो जाते हैं।

(6) चिन्तनशील प्रवृत्ति – अधिक विचारशील एवं चिन्तनशील व्यक्ति भी विभ्रम के शिकार होते हैं। ऐसे व्यक्ति निरन्तर एक ही बात सोचते रहते हैं और उसी से सम्बन्धित प्रत्यक्ष करने लगते हैं। जो विभ्रम के कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संवेदन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में संवेदना (Sensation) का विशेष महत्त्व है। वास्तव में अभीष्ट संवेदना के आधार पर ही प्रत्यक्षीकरण होता है। संवेदना के अभाव में प्रत्यक्षीकरण हो ही नहीं सकता। अब प्रश्न उठता है कि संवेदना से क्या आशय है अर्थात् संवेदना किसे कहते हैं? वास्तव में, जब कोई व्यक्ति या जीव किसी बाहरी विषय-वस्तु से किसी उत्तेजना को प्राप्त करता है, तब वह जो अनुक्रिया करता है, उसे ही हम संवेदना कहते हैं। सभी संवेदनाएँ इन्द्रियों द्वारा ग्रहण की जाती हैं। सैद्धान्तिक रूप से संवेदना सदैव प्रत्यक्षीकरण से पहले उत्पन्न होती है, परन्तु व्यवहार में संवेदना को ग्रहण करना तथा प्रत्यक्षीकरण सामान्य रूप से साथ-साथ ही होते हैं। संवेदनाएँ आँख, नाक, कान, जिल्ला तथा त्वचा नामक पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं। प्रत्येक विषय की संवेदना विशिष्ट होती है। इस विशिष्टता के कारण ही प्रत्येक विषय का प्रत्यक्षीकरण अलग रूप में होता है। संवेदनाएँ अनेक प्रकार की होती हैं; जैसे-आंगिक संवेदनाएँ, विशेष संवेदनाएँ तथा गति संवेदनाएँ।

प्रश्न 2.
आंगिक संवेदनाओं के अर्थ एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्राणियों द्वारा ग्रहण की जाने वाली एक मुख्य प्रकार की संवेदनाएँ, आंगिक संवेदनाएँ हैं। इन संवेदनाओं का सम्बन्ध प्राणियों की कुछ आन्तरिक अंगों की विशिष्ट दशाओं से होता है। आंगिक संवेदनाएँ इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण नहीं की जातीं। आंगिक संवेदनाओं के मुख्य उदाहरण हैं – खुजली अथवा पीड़ा, बेचैनी, वेदना, पुलकित होना तथा भूख एवं प्यास। आंगिक संवेदनाओं के तीन वर्ग या प्रकार निर्धारित किये गये, जिनका सामान्य परिचय निम्नलिखित है –

(अ) निश्चित स्थानवाली आंगिक संवेदनाएँ-जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस प्रकार की आंगिक संवेदनाओं का शरीर में निश्चित स्थान होता है अर्थात् व्यक्ति या जीव यह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि संवेदना शरीर के किस अंग या भाग से सम्बन्धित है। उदाहरण के लिए—खुजली अथवा दर्द की संवेदना निश्चित स्थाने वाली आंगिक संवेदना होती है।

(ब) अनिश्चित स्थान वाली आंगिक संवेदनाएँ—इस वर्ग में उन आंगिक संवेदनाओं को सम्मिलित किया जाता है, जिनकी उत्तेजना का स्थान शरीर में स्पष्ट रूप से जाना नहीं जा सकता। इस प्रकार की मुख्य संवेदनाएँ हैं-बेचैनी, वेदना तथा आनन्दित अथवा पुलकित होने की संवेदनाएँ।

(स) अस्पष्ट स्थान वाली आंगिक संवेदनाएँ-तीसरे वर्ग या प्रकार की संवेदनाओं को अस्पष्ट स्थान वाली आंगिक संवेदनाएँ कहा जाता है। इस प्रकार की आंगिक संवेदनाओं के स्थान को शरीर में स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। भूख तथा प्यास की संवेदनाएँ इसी प्रकार की आंगिक संवेदनाएँ हैं।

प्रश्न 3.
विशेष संवेदनाओं के अर्थ एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्राणियों द्वारा अपनी इन्द्रियों के माध्यम से जिन संवेदनाओं को ग्रहण किया जाता है, उन संवेदनाओं को विशेष संवेदनाएँ कहा जाता है। विशेष संवेदनाओं का सम्बन्ध बाहरी विषय-वस्तुओं से होता है अर्थात् इन संवेदनाओं की उत्पत्ति बाहरी विषय-वस्तुओं से होती है। हम कह सकते हैं कि बाहरी विषय-वस्तुओं से उत्पन्न होने वाली उत्तेजनाओं के प्रति होने वाली अनुक्रिया को विशेष । संवेदनाएँ कह सकते हैं। हम जानते हैं कि बाहरी विषय असंख्य हैं; अत: उनसे सम्बन्धित विशेष संवेदनाएँ भी असंख्य हैं। विशेष संवेदनाएँ विभिन्न इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं; अतः पाँच इन्द्रियों से सम्बन्धित संवेदनाओं को ही पाँच प्रकार की विशेष संवेदनाओं के रूप में वर्णित किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

(अ) दृष्टि संवेदेनाएँ – आँखों अथवा नेत्रों के माध्यम से ग्रहण की जाने वाली संवेदनाओं को दृष्टि संवेदनाएँ कहा जाता है। इस प्रकार की संवेदनाओं के लिए जहाँ एक ओर बाहरी जगत की वस्तुएँ आवश्यक हैं, वहीं साथ-ही-साथ प्रकाश का होना भी एक अनिवार्य कारक है।

(ब) घ्राण संवेदनाएँ – नाक से ग्रहण की जाने वाली संवेदनाओं को घ्राण संवेदनाएँ कहते हैं। इस वर्ग की संवेदनाओं के विभिन्न प्रकार की गन्ध ही उत्तेजना की भूमिका निभाती है। सामान्य रूप से दो प्रकार की गन्ध मानी जाती है अर्थात् सुगन्ध तथा दुर्गन्ध।

(स) श्रवण संवेदनाएँ – उन विशेष संवेदनाओं को श्रवण संवेदनाएँ माना जाता है, जो कानों के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं। इस वर्ग की संवेदनाओं को हम ध्वनि तरंगों के माध्यम से ग्रहण करते हैं।

(द) स्पर्श संवेदनाएँ – त्वचा द्वारा ग्रहण की जाने वाली संवेदनाओं को स्पर्श संवेदनाएँ कहते हैं। स्पर्श संवेदनाओं का क्षेत्र काफी व्यापक है तथा हम विभिन प्रकार का ज्ञान इन्हीं संवेदनाओं के माध्यम से प्राप्त करते हैं। सामान्य रूप से स्पर्श संवेदनाओं के माध्यम से हम कोमलता एवं कठोरता, छोटे-बड़े एवं ऊँचे तथा गर्म एवं ठण्डे का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

(य) स्वाद संवेदनाएँ – जीभ द्वारा ग्रहण की जाने वाली विशेष संवेदनाओं को हम स्वाद संवेदनाएँ कहते हैं। इन संवेदनाओं के लिए विभिन्न वस्तुओं के अलग-अलग स्वाद ही उत्तेजना होते हैं। जीभ के भिन्न-भिन्न भागों से भिन्न-भिन्न स्वादों की जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 4.
गति संवेदनाओं के अर्थ एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उतर :
गति से सम्बन्धित संवेदनाओं को गति संवेदना के नाम से जाना जाता है। सामान्य रूप से शरीर के जोड़ों, कण्डराओं तथा मांसपेशियों के माध्यम से गति संवेदनाओं को ग्रहण किया जाता है। गति संवेदनाओं के मुख्य उदाहरण हैं-खिंचाव, तनाव तथा सिकुड़न। गति संवेदनाओं की अनुभूति जहाँ एक ओर शरीर की विभिन्न मांसपेशियों के तथा स्नायु तन्तुओं द्वारा होती है, वहीं दूसरी ओर पूरी त्वचा का भी गति संवेदनाओं से सम्बन्ध होता है। ये संवेदनाएँ अग्रलिखित तीन प्रकार की होती हैं –

(अ) स्थिति से सम्बन्धित गति संवेदनाएँ – प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव है कि यश-कदा बैठे-बैठे ही व्यक्ति की भुजाओं या जंघाओं की मांसपेशियों में एक विशेष प्रकार की कम्पन्न या गति होने लगती है। इस गति के लिए न तो अंगों को हिलाया जाता है और न ही फैलाया जाता है। इस प्रकार की संवेदनाओं को स्थिति से सम्बन्धित गति संवेदनाएँ कहते हैं।

(ब) स्वच्छन्द गति संवेदनाएँ – गति संवेदनाओं का एक प्रकार या रूप है–स्वच्छन्द गति संवेदनाएँ। इस प्रकार की गति संवेदनाएँ उस समय अनुभव की जाती हैं, जब शरीर के अंगों को मुक्त रूप से इधर-उधर हिलाया जाता है।

(स) प्रतिरुद्ध गति संवेदनाएँ – शरीर के विभिन्न मांसपेशियों के माध्यम से अनुभव की जाने वाली एक प्रकार की गति संवेदनाओं को प्रतिरुद्ध गति संवेदनाएँ कहा जाता है। जब हम किसी वस्तु पर दबाव डालते हैं, या भारी वस्तु को उठाते हैं, तब अनुभव की जाने वाली संवेदना को प्रतिरुद्ध गति संवेदना कहते हैं।

प्रश्न 5.
संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 7 UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 8

प्रश्न 6.
प्रत्यक्षीकरण पर संवेग का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेग एक भावनात्मक मनोवैज्ञानिक अवस्था है और प्रत्यक्षीकरण किसी उत्तेजक (वस्तु, घटना या व्यक्ति) का बाद का ज्ञान है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अनेकानेक संवेगों की अनवरत अनुभूति करती है; जैसे-क्रोध, भय, प्रेम, घृणा, शोक, हर्ष तथा आश्चर्य इत्यादि की अनुभूतियाँ। संवेग मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित एक जटिल अवस्था है जो मनुष्य के विभिन्न मनोवैज्ञानिक अवयवों को प्रभावित करती है। संवेग का प्रत्यक्षीकरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति किसी विशिष्ट संवेग की अवस्था में है तो वह अपने सम्मुख उपस्थित उत्तेजक अर्थात् वस्तु, घटना या व्यक्ति को यथार्थ एवं सही-सही प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक शोक संतप्त है तो ऐसी संवेगावस्था में वह शुभ विवाह की मधुर शहनाई का भी कर्कश एवं पीड़ादायक संगीत के रूप में प्रत्यक्षीकरण करेगा। भले ही क्रोधित व्यक्ति के सामने दुनिया के स्वादिष्टतम व्यंजन परोस दिये जाएँ उसे तो वे स्वादहीन ही अनुभव होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि समस्त शक्तिशाली संवेग यथार्थ प्रत्यक्षीकरण के प्रति विपरीत कारक समझे जायेंगे और जितनी ही प्रबल संवेगावस्था होगी उतना ही गलत प्रत्यक्षीकरण भी हो सकता है। वस्तुत: सही प्रत्यक्षीकरण के लिए संवेगमुक्त एवं तटस्थ मानसिक दशा एक पहली शर्त है। मोटे तौर पर, जिस रंग का चश्मा व्यक्ति लगायेगा सामने की वस्तु भी उसी के अनुसार दिखाई देगी। संवेगावस्था तो एक रंगीन चश्मा है और प्रत्यक्षीकरण दीख पड़ने वाली वस्तु। स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण के लिए व्यक्ति की भावनाएँ किसी संवेग से रँगी न हों, अन्यथा संवेग प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकेगा।

प्रश्न 7.
भ्रम (विपर्यय) तथा विभ्रम में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भ्रम (विपर्यय) तथा विभ्रम में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 9

प्रश्न 8.
रंग-प्रत्यक्षीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
रंगों के प्रत्यक्षीकरण से आशय है–सम्बन्धित विषय-वस्तु के रंग को देखना एवं पहचानना। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत रंगों के अन्तर का भी ज्ञान प्राप्त होता है। किसी भी वस्तु के रंग का निर्धारण उससे निगमित ‘प्रकाश-तरंगों द्वारा होता है अर्थात् रंग-प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में प्रकाश-तरंगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वास्तव में, रंग अपने आप में कोई स्वतन्त्र या अलग। विषय-वस्तु नहीं है, जिसका हम प्रत्यक्षीकरण करते हैं बल्कि रंग का निर्धारण विषय-वस्तु से निकलने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई से होता है। भिन्न-भिन्न वस्तुओं से निकलने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है तथा इसी लम्बाई से ही वस्तु के रंग के स्वरूप का निर्धारण होता है। समस्त प्रकार की तरंगें प्रकाश के किसी मूल स्रोत से सम्बन्धित होती हैं। हमारे विश्व में प्रकाश का मुख्यतम एवं सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। इसके अतिरिक्त चाँद एवं तारे भी प्रकाश के प्राकृतिक स्रोत हैं। कृत्रिम स्रोतों में दीपक की लौ तथा विद्युत बल्ब को भी प्रकाश का स्रोत माना जा सकता है। हम जानते हैं कि जब विद्युत-धारा बल्ब के तार में प्रवाहित होती है तो वह प्रकाश में परिवर्तित हो जाती है। प्रकाश ही वह एकमात्र कारक है, जिसके माध्यम से हम बाहरी वस्तुओं को देखते हैं। बाहरी वस्तुओं को दिखाने वाला प्रकाश हमारी आँखों तक मुख्य रूप से दो प्रकार से पहुँचता है। अपने प्रथम रूप में प्रकाश की किरणें या तरंगें सीधे ही हमारी आँखों तक पहुँचती हैं। दूसरे रूप में प्रकाश की किरणें पहले किसी वस्तु पर पड़ती हैं तथा इसके उपरान्त उस वस्तु से परावर्तित होकर हमारी आँखें पर पड़ती हैं। भौतिक विज्ञान के अध्ययनों द्वारा ज्ञात हो चुका है कि प्रकाश की तरंगों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। जहाँ तक हमारी आँखों की प्रकृति का प्रश्न है तो यह सत्य है कि हमारी आँखें 4000 से 7800 8 तक की तरंग दैर्घ्य (1 ऍग्स्ट्रम = 10-10 मीटर) वाली प्रकाश-तरंगों को ही ग्रहण कर सकती हैं। हमारी आँखें इससे अधिक लम्बाई वाली तरंगों को सामान्य रूप से ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखती। इसका कारण यह है कि एक सीमा से अधिक लम्बाई वाली प्रकाश-तरंगें प्रकाश के स्थान पर ताप की संवेदना देने लगती हैं। कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिन पर किसी स्रोत से प्रकाश पड़ने पर वे हमें दिखाई देती हैं तथा उनके प्रभाव से अन्य वस्तुओं को भी देखा जा सकता है। इन वस्तुओं को प्रकाशमान वस्तुएँ कहा जाता है। वास्तव में ये वस्तुएँ प्रकाश का परावर्तन करती हैं। इससे भिन्न कुछ वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं जिनमें न तो अपना प्रकाश होता है और न ही वे प्रकाश का परावर्तन ही कर पाती हैं। इन वस्तुओं को प्रकाशहीन वस्तुएँ कहा जाता है। इस प्रकार की वस्तुएँ हर प्रकार के बाहरी प्रकाश को अवशोषित कर लेती हैं। प्रकाश की तरंगों एवं विभिन्न वस्तुओं के गुणों का उल्लेख करने के उपरान्त हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु के रंग का निर्धारण एवं प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धित वस्तु से परावर्तित होने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई के आधार पर होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-संवेदना व प्रत्यक्षीकरण।
उत्तर :
संवेदना (Sensation) तथा प्रत्यक्षीकरण (Perception) में घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा इन दोनों का अध्ययन साथ-साथ ही किया जाता है। संवेदना में प्राणी वस्तु का सिर्फ प्रथम ज्ञान ही अनुभव करता है, वस्तु का वास्तविक अर्थ वह नहीं समझ पाता। कोई व्यक्ति हरे-पीले रंग की गोल वस्तु देखता है, यह छूने में चिकनी और दबाने में रसदार है, सँघने पर उसकी विशेष गन्ध तथा जीभ द्वारा चखने पर तीव्र खट्टे स्वाद की संवेदना होती है। दृष्टि, स्पर्श, घ्राण एवं स्वाद की विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों की अलग-अलग संवेदनाओं से उस वस्तु का सही अर्थ पता नहीं चलता। इसके लिए इन सभी संवेदनाओं को मिलाकर समन्वित तथा समष्टि रूप में देखा जायेगा तथा सभी संवेदनाओं के अर्थ की व्याख्या करनी होगी। इस व्याख्या में संवेदनाओं के साथ प्रत्यभिज्ञा (सदृश वस्तु देखकर किसी पहले देखी हुई वस्तु का स्मरण) का योगदान रहने से वस्तु का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता है। इसे प्रत्यक्षीकरण कहते हैं। यह प्रत्यक्षीकरण वर्तमान में घटने वाली घटना, किसी प्राणी अथवा किसी वस्तु का होता है।

प्रश्न 2.
प्रत्यक्षीकरण की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

  1. प्रत्यक्षीकरण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है।
  2. इसके द्वारा हमें सम्पूर्ण स्थिति का ज्ञान होता है। हम किसी वस्तु या घटना को उसके अलग-अलग अंगों के रूप में नहीं वरन् सम्पूर्ण रूप में देखते हैं।
  3. प्रत्यक्षीकरण में सबसे पहले वस्तु या उत्तेजक उपस्थित होता है।
  4. यह उसैजक ज्ञानेन्द्रियों या संग्राहकों को प्रभावित करता है जिसके फलस्वरूप ज्ञानवाही स्नायुओं का प्रवाह शुरू होता है।
  5. यह स्नायु प्रवाह मस्तिष्क केन्द्र तक पहुँचता है और उत्तेजक की संबेदना अनुभव की जाती है।
  6. अब इस संवेदना में पूर्ण संवेदना के आधार पर अर्थ जोड़कर व्याख्या की जाती है और इस भॉति प्रत्यक्षीकरण हो जाता है।
  7. प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से हम अपने चारों ओर की वस्तुओं में से उस वस्तु का चयन कर लेते हैं जिसका हमसे सम्बन्ध है स्वभावतः उसी की ओर हमारा ध्यान भी हो जाता है।
  8. प्रत्यक्षीकरण का आधार परिवर्तन है क्योंकि परिवर्तन की वजह से ही प्रत्यक्षीकरण होता है। हमारे चारों ओर उपस्थित विभिन्न वस्तुओं में से उस वस्तु का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र होगा जो परिवर्तित हो रही है।
  9. प्रत्यक्षीकरण में संगठन की विशेषता पायी जाती है, और अन्ततः
  10. प्रत्यक्षीकरण में संवेदनात्मक पूर्व ज्ञान का अधिक समावेश रहता है।

प्रश्न 3.
व्यक्तिगत तथा सामान्य भ्रमों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को भ्रम या विभ्रम कहते हैं। भ्रम दो प्रकार के होते हैं—व्यक्तिगत भ्रम तथा सामान्य भ्रम। इन दोनों प्रकार के भ्रमों में कुछ मौलिक अन्तर होते हैं। व्यक्तिगत भ्रमों का स्वरूप भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सन्दर्भ में भिन्न-भिन्न होता है। उदाहरण के लिए कम प्रकाश में किसी व्यक्ति द्वारा रस्सी को साँप समझ बैठना एक व्यक्तिगत भ्रम है। हो सकता है कि इसी परिस्थिति में कोई अन्य व्यक्ति भ्रमित न हों तथा रस्सी को रस्सी ही समझे। इससे भिन्न सामान्य भ्रम सार्वभौमिक होते हैं, अर्थात् इस प्रकार के भ्रमों की स्वरूप सभी व्यक्तियों के लिए एकसमान ही होता है। उदाहरण के लिए पानी में पड़ी छड़ टेढ़ी दिखाई देती है। यह एक सामान्य भ्रम है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए एकसमान होता है।

प्रश्न 4.
विभ्रम में संवेगों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सामान्यजनों में विभ्रम की उत्पत्ति संवेगों की प्रबलता के कारण होती है। कोई शक्तिशाली भय का संवेग हमारे अन्दर विभ्रम उत्पन्न कर सकता है; जैसे-श्मशान या कब्रिस्तान के मार्ग से गुजरते हुए हमें प्रेत या जिन्न को विभ्रम हो सकता है। संवेगावस्था में अयथार्थ तथा आत्मनिष्ठ प्रत्यक्षीकरण होता है और इस कारण विभ्रम उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त संवेग की दशा में आन्तरिक उद्दीपन होते हैं तथा अनायास ही शारीरिक परिवर्तन आते हैं जिनके कारण व्यक्तियों में विभ्रम की सम्भावना रहती है। संवेग की दशा में सामान्य कार्य-व्यापार अवरुद्ध हो जाते हैं तथा व्यक्ति का जीवन असन्तुलित हो जाता है जिसके फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले विभ्रम असामान्य व्यवहार द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। कभी-कभी यह असामान्यता पागलपन की दशा में बदल जाती है; अतः इसे दूर करने के लिए तत्काल उपाय वांछित हैं।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए। –

  1. किसी बाहरी विषय-वस्तु से प्राप्त होने वाली उत्तेजना के प्रति व्यक्ति द्वारा की जाने वाली अनुक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में …………………. कहते हैं।
  2. उद्दीपक द्वारा …………………. घटित होती है।
  3. संवेदना किसी उद्दीपक का प्रथम प्रत्युत्तर है और …………………. प्राणी की संवेदना के पश्चात् का द्वितीय प्रत्युत्तर है जो संवेदना से ही सम्बन्धित होता है।
  4. बाहरी विषय-वस्तुओं का इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही …………………. है।
  5. जब किसी संवेदना को अर्थ प्रदान कर दिया जाता है तब उसे …………………. कहते हैं।
  6. संवेदना को …………………. की कच्ची सामग्री माना जाता है।
  7. प्रत्यक्षीकरण एक …………………. मानसिक प्रक्रिया है, जब कि संवेदना एक सरल मानसिक प्रक्रिया है।
  8. प्रत्यक्षीकरण में समग्रता पर बल देने वाले मत को …………………. कहते हैं।
  9. वस्तुओं को समग्र रूप में देखने की प्रवृत्ति …………………. कहलाती है।
  10. जब समीप स्थित उद्दीपक नये रूप में संगठित हो जाए तो इसे प्रत्यक्षीकरणात्मक संगठन का …………………. नियम कहते हैं।
  11. संवेगावस्था में प्रत्यक्षीकरण पर …………………. प्रभाव पड़ता है।
  12. मानसिक तत्परता का प्रत्यक्षीकरण पर …………………. प्रभाव पड़ता है।
  13. त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को …………………. कहते हैं।
  14. बिना किसी उद्दीपक के ही प्रत्यक्षीकरण होना …………………. कहलाता है।
  15. भ्रम एक गलत प्रत्यक्षीकरण है तथा विभ्रम …………………. ।
  16. किसी भी वस्तु के रंग का निर्धारण उससे निगमित …………………. द्वारा होता है।
  17. मानसिक रोगी प्रायः …………………. के शिकार हो जाते हैं।

उत्तर :

  1. संवेदना
  2. संवेदना
  3. प्रत्यक्षीकरण
  4. प्रत्यक्षीकरण
  5. प्रत्यक्षीकरण
  6. प्रत्यक्षीकरण
  7. जटिल
  8. गेस्टाल्टवाद
  9. समग्रता
  10. समीपता का
  11. प्रतिकूल
  12. अनुकूल
  13. भ्रम या विपर्यय
  14. विभम
  15. निराधार प्रत्यक्षीकरण
  16. प्रकाश तरंगों
  17. विमा

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
संवेदना का अर्थ एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर :
किसी बाहरी विषय-वस्तु से प्राप्त होने वाली उत्तेजना के प्रति व्यक्ति द्वारा की जाने वाली अनुक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में संवेदना कहते हैं।

प्रश्न 2.
संवेदनाओं को ग्रहण करने वाले शरीर के अंगों को क्या कहते हैं ?
उत्तर :
संवेदनाओं को ग्रहण करने वाले शरीर के अंगों को ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं।

प्रश्न 3.
हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :
ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं – आँख, नाक, कान, जिल्ला तथा त्वचा।

प्रश्न 4.
संवेदनाओं के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
संवेदनाओं के मुख्य प्रकार हैं-आंगिक संवेदनाएँ, विशेष संवेदनाएँ तथा गति संवेदनाएँ।

प्रश्न 5.
प्रत्यक्षीकरण की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
स्टेगनर के अनुसार, “बाहरी वस्तुओं और घटनाओं की इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रत्यक्षीकरण है।”

प्रश्न 6.
कोई ऐसा कथन लिखिए जिससे संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण का सम्बन्ध स्पष्ट होता हो।
उत्तर :
रॉस के अनुसार, “संवेदना को सही अर्थ प्रदान करना ही प्रत्यक्षीकरण है।”

प्रश्न 7.
संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर :
संवेदना किसी विषय-वस्तु का प्रथम अर्थहीन ज्ञान या अनुभूति है, जबकि प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धित विषय-वस्तु का द्वितीयक अर्थपूर्ण ज्ञान है।

प्रश्न 8.
संवेगों का प्रत्यक्षीकरण पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेगावस्था में तटस्थ एवं सही प्रत्यक्षीकरण सम्भव नहीं होता है।

प्रश्न 9.
प्रत्यक्षीकरण के विषय में गैस्टाल्टवाद की क्या मान्यता है?
उत्तर :
गैस्टाल्टवाद के अनुसार, किसी विषय-वस्तु का प्रत्यक्षीकरण पहले संश्लेषणात्मक विधि द्वारा होता है तथा बाद में उसका प्रत्यक्षीकरण विश्लेषणात्मक ढंग से होता है।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्षीकरण के समग्रता के नियम से क्या आशय है?
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण के समग्रता के नियम के अनुसार प्रत्यक्षीकरण में किसी वस्तु के विभिन्न अंगों को अलग-अलग प्रत्यक्षीकरण नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण वस्तु का प्रत्यक्षीकरण एक साथ होता है।

प्रश्न 11.
भ्रम या विपर्यय से क्या आशय है?
उत्तर :
त्रुटिपूर्ण या गलत प्रत्यक्षीकरण को भ्रम या विपर्यय कहते हैं; जैसे-रस्सी को साँप समझ लेना अथवा साँप को रस्सी समझ लेना।

प्रश्न 12.
भ्रम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
भ्रम दो प्रकार के होते हैं –

  1. व्यक्तिगत भ्रम तथा
  2. सामान्य भ्रम।

प्रश्न 13.
विभ्रम (Hallucination) से क्या आशय है?
उत्तर :
यथार्थ विषय-वस्तु के नितान्त अभाव में होने वाले निराधार प्रत्यक्षीकरण को विभ्रम कहते हैं।

प्रश्न 14.
सामान्य रूप से किस वर्ग के व्यक्ति विभ्रम के अधिक शिकार होते हैं?
उत्तर :
सामान्य रूप से मानसिक रोगी विभ्रम के अधिक शिकार होते हैं।

प्रश्न 15.
भ्रम तथा विभ्रम में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर :
भ्रंम एक गलत या त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण होता है, जबकि विभ्रम एक निराधार प्रत्यक्षीकरण होता है।

प्रश्न 16.
रंगों का प्रत्यक्षीकरण किसके माध्यम से होता है?
उत्तर :
रंगों का प्रत्यक्षीकरण प्रकाश की तरंगों के माध्यम से होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
प्राणी में अनुक्रिया प्रारम्भ करने के लिए क्या आवश्यक है?
(क) उद्दीपक
(ख) संवेग
(ग) रुचि
(घ) वातावरण

प्रश्न 2.
किसी बाहरी विषय-वस्तु की प्रथम अनुभूति को कहते हैं –
(क) प्रत्यक्षीकरण
(ख) प्रतिमा
(ग) संवेदना
(घ) कल्पना

प्रश्न 3.
किसी बाहरी विषय-वस्तु का सही ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया को कहते हैं
(क) संवेदना
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) स्मरण
(घ) संज्ञान

प्रश्न 4.
“संवेदना का सही अर्थ निकालना ही प्रत्यक्षीकरण है।” यह कथन किसका है?
(क) मैक्डूगल
(ख) वुडवर्थ
(ग) रॉस
(घ) बोरिंग

प्रश्न 5.
प्रत्यक्षीकरण विभिन्न इन्द्रियों की सहायता से पदार्थ अथवा उनके आधारों का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया है।” यह परिभाषा किसके द्वारा प्रतिपादित है?
(क) वुडवर्थ
(ख) स्टेगनर
(ग) कालिन्स एवं ड्रेवर
(घ) विलियम जेम्स

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन प्रत्यक्षीकरणात्मक संगठन का नियम नहीं है?
(क) समीपता
(ख) समानता
(ग) अन्तर्मुखता
(घ) निरन्तरता

प्रश्न 7.
जर्मनी में व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से मानव स्वभाव को समझने के लिए जिस विचारधारा का जन्म हुआ, उसका नाम है –
(क) साहचर्यवाद
(ख) मनोविश्लेषणवाद
(ग) प्रयोजनवाद
(घ) गैस्टाल्टवाद

प्रश्न 8.
सेट प्रत्यक्षीकरण पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, जब वह –
(क) एक हो
(ख) दो हो।
(ग) दो से अधिक हो
(घ) अनगिनत हो

प्रश्न 9.
किसी ‘आकृति के प्रत्यक्षीकरण के लिए क्या आवश्यक है?
(क) अधिगम
(ख) पृष्ठभूमि
(ग) चिन्तन
(घ) कल्पना

प्रश्न 10.
जब हम कोई ऐसी आकृति देखते हैं जिसका कोई अंग अपूर्ण है, परन्तु हम उस अपूर्णता की ओर ध्यान नहीं देते तथा आकृति का प्रत्यक्षीकरण पूर्ण रूप में ही करते हैं। ऐसा प्रत्यक्षीकरण के किस नियम के अनुसार होता है?
(क) निरन्तरता का नियम
(ख) आच्छादन का नियम
(ग) समीपता का नियम
(घ) सम्बद्धता का नियम

प्रश्न 11.
किसी भी संवेदना के गलत अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया को कहते हैं –
(क) संवेग
(ख) चिन्तन
(ग) भ्रम
(घ) विभ्रम

प्रश्न 12.
मन्द प्रकाश में आँगन के कोने में साँप को देखकर रस्सी समझ लेना क्या है?
(क) विभ्रम
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) भ्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 13.
मन्द प्रकाश में गोल आकृति में रखी हुई रस्सी समझ लेना है –
(क) विभ्रम
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) भ्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 14.
किसी बाहरी विषय-वस्तु के अस्तित्व के नितान्त अभाव की स्थिति में होने वाले प्रत्यक्षीकरणको कहते हैं –
(क) विशेष प्रत्यक्षीकरण
(ख) शुद्ध प्रत्यक्षीकरण
(ग) भ्रम या त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण
(घ) विभ्रम

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में से किसमें उद्दीपक अनुपस्थित रहता है?
(क) संवेदना
(ख) विभ्रम
(ग) भ्रम
(घ) प्रत्यक्षीकरण

प्रश्न 16.
प्रबल संवेगावस्था में प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया
(क) सर्वोत्तम होती है।
(ख) दोषपूर्ण होती है।
(ग) यथार्थ होती है
(घ) सम्पन्न हो ही नहीं सकती

उत्तर :

  1. (क) उद्दीपक
  2. (ग) संवेदना
  3. (ख) प्रत्यक्षीकरण
  4. (ग) रॉस
  5. (क) वुडवर्थ
  6. (ग) अन्तर्मुखता,
  7. (घ) गैस्टाल्टवाद
  8. (ग) दो से अधिक हो
  9. (ख) पृष्ठभूमि
  10. (ख) औच्छिादन का नियम
  11. (ग) अम
  12. (ग) भ्रम
  13. (ग) प्रम
  14. (घ) विषम
  15. (ख) विश्रम
  16. (ख) दोषपूर्ण होती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 12
Chapter Name Statistics in Psychology
(मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना)
Number of Questions Solved 66
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सांख्यिकी को परिभाषित कीजिए।
या
सांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित करते हुए बताइए कि आप किस परिभाषा को उपयुक्त समझते हैं और क्यों?
या
“सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।’ इस कथन की व्याख्या करते हुए समझाइए कि आपकी दृष्टि में सांख्यिकी की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए?

उत्तर :

सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Statistics)

‘सांख्यिकी अंग्रेजी शब्द ‘स्टैटिस्टिक्स (Statistics) का हिन्दी रूपान्तर है। अंग्रेजी भाषा का स्टैटिस्टिक्स (Statistics) शब्द लैटिन भाषा के ‘स्टेटस (Status), इटैलियन भाषा के ‘स्टैटिस्टा (Statista) या जर्मन भाषा के स्टैटिस्टिक’ (Statistik) शब्द से उत्पन्न हुआ है। इन सभी शब्दों का अर्थ राज्य (State) होता है। इस प्रकार प्रारम्भ में सांख्यिकी का प्रयोग राज्य विज्ञान के रूप में किया जता था। वास्तविक रूप में सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग करने का श्रेय जर्मन विद्वान् गॉटफ्रायड एकेनॉल (Gottfried Achenwall) को जाता है। उन्होंने 1749 ई० में सांख्यिकी को मानव ज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में प्रयोग किया।

सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द का दो अर्थों में प्रयोग होता है—एक ‘एकवचन’ में तथा दूसरा ‘बहुवचन’ में। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी’ का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

अब हम ‘सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द की परिभाषा का उपर्युक्त दोनों ही अर्थों में अध्ययन करेंगे।

बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषाएँ

बहुवचन के रूप में ‘साख्यिकी’ शब्द का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं। जनसंख्या, शिक्षा, कृषि, स्त्री-शिक्षा, प्रौढ़-शिक्षा आदि से सम्बन्धित आँकड़े बहुवचन के रूप में होते हैं।

(1) गॉटफ्रायड एकेनवाल के अनुसार, “राज्य से सम्बन्धित ऐतिहासिक और विवरणात्मक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का संग्रह ‘समंक’ है।”

(2) डॉ० ए० एल० बाउले के अनुसार, “किसी अनुसन्धान से सम्बन्धित तथ्यों का अंकात्मक विवरण ‘समंक’ होते हैं, जिन्हें एक-दूसरे के सम्बन्ध में रखा जा सकता है।”

(3) होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार, “सांख्यिकी से हमारा तात्पर्य तथ्यों के उन समूहों से है जो अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्यात्मक रूप से व्यक्त किये जाते हैं, जिनकी गणना या अनुमान शुद्धता के एक उचित स्तर तक की जाती है तथा जिन्हें किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्रमबद्ध ढंग से संगृहीत किया जाता है तथा जिन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित करके रखा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं में होरेस सेक्राइस्ट की परिभाषा ही सर्वश्रेष्ठ है। इस परिभाषा में समंकों की सभी विशेषताओं पर पूर्ण प्रकाश डाला गया है।

एकवचन अर्थात् विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

एकवचन के रूप में ‘सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग एक विज्ञान की दृष्टि से किया जाता है। सांख्यिकी विज्ञान की परिभाषाओं को तीन भागों में विभक्त किया गया है –

(क) संकुचित परिभाषाएँ

प्रारम्भ में सांख्यिकी को एक राज्य-विषय के रूप में जाना जाता था; अतः प्राचीन परिभाषाएँ सांख्यिकी के केवल कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालती है जो कि निम्नलिखित हैं

(1) बॉडिंगटन (Boddington) के अनुसार, “सांख्यिकी अनुमानों और सम्भावनाओं का विज्ञान है।” बॉडिंगटन की परिभाषा में सांख्यिकी के क्षेत्र को संकुचित कर दिया गया है। इन्होंने इसे केवल विज्ञान माना है, न कि विज्ञान और कला दोनों।

(2) डॉ० बाउले ने सांख्यिकी की तीन परिभाषाएँ दी हैं –

(i) “सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।”
उपर्युक्त परिभाषा में सांख्यिकीय अनुसन्धान की अनेक विधियों में से केवल गणना विधि को महत्त्व दिया गया है, किन्तु केवल गणना ही सांख्यिकीय नहीं है। विशाल संख्याओं का तो मात्र अनुमान लगाया जाता है, उनकी गणना नहीं की जाती; अतः यह परिभाषा अधूरी है।

(ii) “सांख्यिकी को सही रूप में औसतों को विज्ञान कहा जा सकता है।”
प्रस्तुत परिभाषा में औसत पर बल दिया गया है। सांख्यिकीय विश्लेषण में न केवल औसत (मध्य) का प्रयोग होता है अपितु अपकिरण, विषमता, सह-सम्बन्धन आदि का भी प्रयोग किया जाता है; अतः यह परिभाषा भी अधूरी है।

(iii) “सांख्यिकी, सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर माप का विज्ञान है।”
डॉ० बाउले ने इस परिभाषा में सांख्यिकी को केवल सामाजिक संस्थाओं एवं उनके क्रिया-व्यवहार के मापन का विज्ञान कहा है। इस प्रकार गैर सामाजिक क्रियाएँ सांख्यिकी के क्षेत्र से बाहर कर सांख्यिकी का क्षेत्र अति संकुचित बना दिया गया है।

(3) पर्सन और हार्लोज के शब्दों में, “सांख्यिकी तथ्यों के समूह को प्रयोग में लाने का विज्ञान और कला है।”

प्रस्तुत परिभाषा में विश्लेषण की विधियों को स्पष्ट नहीं किया गया है।

(ख) विस्तृत परिभाषाएँ

(1) क्रॉक्स्टन और काउडेन के अनुसार, “सांख्यिकी को संख्यात्मक, समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

(2) प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

(3) लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है जिसे घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

उपर्युक्त परिभाषाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करें
  2. सांख्यिकी के उद्देश्य को स्पष्ट करें
  3. सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करें तथा
  4. सांख्यिकी, विज्ञान और कला दोनों है।

(ग) उपयुक्त परिभाषा

सांख्यिकी की उपयुक्त परिभाषा वही हो सकती है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हों –

  1. सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करे
  2. सांख्यिकी के उद्देश्य को स्ट करे
  3. सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करे तथा
  4. सांख्यिकी की विभिन्न रीतियों को स्पष्ट करे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी, विज्ञान एवं कला दोनों ही है जिसमें पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के अनुसार सर्वेक्षणों, अध्ययनों एवं प्रयोगों आदि के आधार पर प्राप्त आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण, विवरण, विश्लेषण, तुलना एवं विवेचन किया जाता है। आँकड़ों के विश्लेषण को उद्देश्यों, तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध को ज्ञात करना, तथ्यों की विशेषताओं को वर्णन करना, तथ्यों के सम्बन्ध में अनुमान लगाना, निष्कर्ष निकालना और भविष्य कथन करना है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी विज्ञान है अथवा कला। स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी विज्ञान एवं कला दोनों ही है।” स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी एक विज्ञान नहीं है, वह एक वैज्ञानिक विधि है।” आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी की प्रकृति
(Nature of Statistics)

सांख्यिकी की प्रकृति या स्वभाव जानने के लिए यह देखना होगा कि सांख्यिकी विज्ञान है या कला अथवा दोनों है। अत: सर्वप्रथम हमें विज्ञान और कला का अर्थ जानना जरूरी है।

विज्ञान का अर्थ (Meaning of Science) – विज्ञान, ज्ञान के क्रमबद्ध समूह को कहते हैं। साधारणत: निम्नलिखित शर्तों को पूर्ण करने वाले ज्ञान (विषय) को विज्ञान कह सकते हैं –

  1. जिस ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) किया जाता हो।
  2. वह ज्ञाप्त जिससे कारण और प्रभाव (Cause and Effect) के सम्बन्धों की जानकारी मिलती है।
  3. जिस ज्ञान के अध्ययन के लिए स्वयं के नियम होते हैं।
  4. जिसके नियम सार्वभौमिक (Universal) होते हैं।
  5. जिसके नियमों के द्वारा भविष्यवाणी या पूर्वानुमान (Forecasting) किये जा सके।
  6. जिसका अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध होता है।

कला का अर्थ (Meaning of Art)-यदि विज्ञान ज्ञान है तो कला क्रिया है। किसी कार्य को करना ही कला कहलाता है। कला विज्ञान का व्यावहारिक या प्रयोगात्मक पहलू (Practical Aspect) है। किसी विज्ञान के विभिन्न नियमों तथा सिद्धान्तों का प्रयोग और क्रियान्वयन ही कला कहलाता है।

‘विज्ञान’ और ‘कला’ का अर्थ समझने के बाद अब हमें यह देखना है कि सांख्यिकी विज्ञान है। या कला है अथवा दोनों।

सांख्यिकी एक विज्ञान के रूप में
(Statistics as a Science)

सांख्यिकी एक विज्ञान है, क्योंकि इसमें विज्ञान के ऊपर वर्णित सभी लक्षण या विशेषताएँ पायी जाती हैं। सांख्यिकी ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन करती है। अध्ययन के लिए इसके अपने स्वयं के सिद्धान्त और पद्धतियाँ हैं। इसके अपने नियम हैं; जैसे—सम्भावना का नियम, जड़ता का नियम, सांख्यिकीय नियमितता का नियम आदि। ये नियम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक हैं। इन नियमों के द्वारा अध्ययन करके पुर्वानुमान या भविष्यवाणी की जा सकती है। सांख्यिकी में ‘कारण’ और ‘प्रभाव (Cause and Effect) में सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता है। सांख्यिकी के नियमों द्वारा किसी ‘कारण’ के ‘परिणाम’ का विश्लेषण और पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सांख्यिकी एक विज्ञान है। इसमें विज्ञान होने के सभी लक्षण पाये जाते हैं।

सांख्यिकी एक कला के रूप में
(Statistics as an ‘Art’)

सांख्यिकी कला भी है। यह विभिन्न समस्याओं के समाधान की विधि बताती है। सांख्यिकीय समंकों को एकत्रित करना, उनका उपयोग करना आदि कला के स्वरूप को व्यक्त करते हैं। विभिन्न वर्गों पर मूल्यवृद्धि का जो प्रभाव पड़ता है, उसकी जानकारी मूल्य-निर्देशकों (Price Index) द्वारा की जाती है। यह सांख्यिकी का कला पक्ष ही है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं का विभिन्न सांख्यिकीय विधियों से अध्ययन करके आँकड़ों को बिन्दुरेखाओं (Graphs), चित्रों (Diagrams) एवं तालिकाओं द्वारा प्रदर्शित करना भी कला ही है। सांख्यिकी की विषय-वस्तु (Subject-matter) में व्यावहारिक सांख्यिकी का समावेश है।

विभिन्न सांख्यिकीय तथ्यों को तुलनीय बनाना तथा उनसे निष्कर्ष निकालना सांख्यिकी के कला पक्ष को स्पष्ट करते हैं।

सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि सांख्यिकी न केवल विज्ञान है, अपितु कला भी है। यह सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार का विज्ञान है। अन्त में टिप्पेट के शब्दों में कह सकते हैं, सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों है। यह विज्ञान इसलिए है क्योंकि इसकी रीतियाँ मौलिक रूप से क्रमबद्ध हैं तथा उनका सर्वत्र उपयोग होता है और कला इसलिए है कि इसकी रीतियों का सफल प्रयोग पर्याप्त सीमा तक सांख्यिकी की योग्यता, विशेष अनुभव तथा उसके प्रयोग-क्षेत्र; जैसे—अर्थशास्त्र के ज्ञान पर निर्भर करता है।”

अन्त में, सांख्यिकी एक विज्ञान और कला दोनों है जिसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मके तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् । अध्ययन किया जाता है।

सांख्यिकी एक वैज्ञानिक विधि है
(Statistics is a Scientific Method)

क्रॉक्सटन और काउडेन का यह विचार है कि सांख्यिकी स्वयं एक विज्ञान नहीं है, अपितु अनुसन्धान करने की एक वैज्ञानिक विधि है, ज्ञान-प्राप्ति का एक तरीका है। उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत हम सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए उल्लेख कर चुके हैं कि सांख्यिकी एक विज्ञान भी है और कला भी, परन्तु क्रॉक्सटन और काउडेन का मत भिन्न है। वे इसे विज्ञान नहीं मानते वरन् एक वैज्ञानिक विधि (तरीका) मानते हैं, क्योंकि सभी विषयों में अनुसन्धान के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग भरपूर तरीके से किया जाता है। अनुसन्धानकर्ता अपने-अपने निष्कर्षों को सांख्यिकीय विधियों से प्रदर्शित करते हैं; प्राप्त आँकड़ों का वर्गीकरण व निर्वचन करते हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों अर्थात् सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक एवं प्राकृतिक क्षेत्रों में सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि वॉलिस और रॉबर्स कहते हैं, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है, अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

इस तरह इन विद्वानों के अनुसार, सांख्यिकी अर्थशास्त्र, भौतिकशास्त्र या रसायनशास्त्र आदि की तरह स्वयं एक स्वतन्त्र विशुद्ध विज्ञान नहीं है, अपितु ज्ञान-प्राप्ति की वैज्ञानिक विधि है। परन्तु अधिकांश विशेषज्ञ सांख्यिकी को एक विज्ञान मानते हैं; क्योंकि विज्ञान की सभी विशेषताएँ और लक्षण इसमें पाये जाते हैं।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक समय में मानव-जीवन की सभी समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान में सांख्यिकी की उपयोगिता है और जीवन के प्रत्येक मोड़ पर यह पथ-प्रदर्शक की तरह कार्य करती है। यही कारण है कि विद्वान् सांख्यिकी को ‘मानव-कल्याण का अंकगणित’ कहते हैं। वर्तमान में मानवजीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें सांख्यिकी का उपयोग एवं महत्त्व न हो। सांख्यिकी के बढ़ते हुए महत्त्व एवं उपयोगिता के कारण टिप्पट (Tippet) ने कहा है, “सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को ‘प्रभावित करती है तथा जीवन को अनेक बिन्दुओं पर स्पर्श करती है।”

सामाजिक विज्ञानों की भाँति, मनोविज्ञान में भी सांख्यिकी का उपयोग दिन-प्रतिदिन विस्तार ले। रहा है। मनोविज्ञान की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान के लिए और मनोविज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्यों में सांख्यिकी का उपयोग अपरिहार्य हो गया है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता की निम्नलिखित प्रकार विवेचना कर सकते हैं

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता
(Utility of Statistics in Psychology)

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता निर्विवाद, सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है। प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक अध्ययनों, प्रयोग एवं शोध कार्यों में सांख्यिकी की भारी माँग है। सच तो यह है कि सांख्यिकीय विधियों के अभाव में ये कार्य हो ही नहीं सकते। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी की उपयोगिता के निम्नलिखित कारण हैं –

(1) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना – मनोवैज्ञानिक प्रयोग अक्सर एक विशाल समूह पर लागू किये जाते हैं जिनसे प्रदत्त या समंक आँकड़े प्राप्त होते हैं। इन आँकड़ों को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें सुव्यवस्थित किया जाए आँकड़ों को सुव्यवस्थित बनाने में सांख्यिकी विधियाँ उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए–आँकड़ों का आवृत्ति वितरण बनाकर उन्हें विभिन्न रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित करने में सांख्यिकी का बहुत महत्त्व है। केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन की विधियों द्वारा आँकड़ों का वर्णन करने में भी सांख्यिकी उपयोगी है। इस भॉति, सांख्यिकी अव्यवस्थित एवं अर्थहीन आँकड़ों को सरल तथा बोधगम्य बनाती है।

(2) ऑकड़ों की सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण – सांख्यिकी की मदद से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से सम्बद्ध आंकड़ों का सरल, सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण किया जाता है। वृत्तचित्र, स्तम्भ रेखाचित्र, आवृत्ति बहुभुज, स्तम्भाकृति, संचित प्रतिशत वक्र तथा संचित आवृत्ति वक्र आदि विधियों के द्वारा आँकड़ों की मुख्य विशेषताओं को स्पष्टता मिलती है। एक मनोवैज्ञानिक बालकों के एक बड़े समूह पर बुद्धि परीक्षण का प्रयोग करके मध्यमान तथा प्रामाणिक विचलन की गणना द्वारा सभी इकाइयों में सामूहिक रूप से मिलने वाले लक्षणों को खोज निकालता है। वह बालकों की औसत बुद्धि ज्ञात कर सकता है और यह पता भी लगा सकता है कि समूह सजातीय है अथवा विषमजातीय। पढ़ने वाले बालकों की योग्यताओं में विषमता अधिक होने पर कक्षा को कई हिस्सों में विभाजित कर बालकों की योग्यताओं के अनुसार पढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार आँकड़ों के वर्णन में सामान्य सम्भावना वक्र के प्रारम्भिक सिद्धान्तों का उपयोग भी किया जाता है।

(3) आँकड़ों को मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना – अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह से मनोविज्ञान में शोध कार्य के अन्तर्गत प्राप्त आँकड़े प्रायः गुणात्मक प्रकृति के होते हैं जिन्हें मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना होता है। यह कार्य सांख्यिकीय विधियों की सहायता से ही सम्भव है। बुद्धि, समायोजन, अन्तर्मुखता, बहिर्मुखता आदि से सम्बन्धित गुणात्मक आँकड़ों को मात्रात्मक रूप में परिवर्तित करने के लिए सांख्यिकी अत्यन्त उपयोगी है।

(4) घटना की यथार्थ व्याख्या – सांख्यिकीय विधियाँ किसी घटना की यथार्थ व्याख्या (Exact descriptions) करने में सक्षम हैं। इस व्याख्या को कोई भी प्रशिक्षित व्यक्ति बिना किसी सन्देह के ठीक-ठीक समझ सकता है। यदि कहा जाए कि कक्षा 12 के छात्र श्याम ने मनोविज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किये हैं तो इससे श्याम की मनोविज्ञान में योग्यता का सुनिश्चित ज्ञान नहीं होता; किन्तु यदि यह कहा जाए कि श्याम के मनोविज्ञान में प्राप्तांकों का प्रतिशत 95 है तो इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है। कि 95% छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक, श्याम के प्राप्तांकों से कम हैं। इस भाँति सांख्यिकी की सहायता से घटना की सही-सही व्याख्या की जा सकती है।

(5) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन – मनोविज्ञान से जुड़े अध्ययन एवं अनुसन्धान कार्यों में सांख्यिकीय विधियों की सहायता से दो या दो से अधिक चरों (variables) में सहसम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। यदि कोई मनोवैज्ञानिक किसी कक्षा के बालकों की आयु और उनकी स्मरण-शविन के मध्य सम्बन्ध ज्ञात करना चाहे तो वह सहसम्बन्ध गुणांक को प्रयोग करता है। सहसम्बन्ध की विधियाँ आंशिक तथा बहुगुणी सहसम्बन्ध की गणना भी कर सकती हैं।

(6) तुलनात्मक अध्ययन – बॉडिंगटन का कथन है, “सांख्यिकी का निचोड़ गणना करना ही नहीं है अपितु तुलना करना भी है।’ मनोवैज्ञानिक दो या दो से अधिक समूहों की तुलना के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि यह ज्ञात करना हो कि कक्षा 11 के छात्रों को मनोविज्ञान पढ़ाने के लिए शिक्षण की पुस्तक-पाठन तथा व्याख्यान विधि में से कौन-सी विधि अच्छी है तो इसके लिए प्रयोग किया जा सकता है। समान योग्यता वाले छात्रों के दो समूह बनाकर एक समूह को पुस्तक-पाठन विधि द्वारा तथा दूसरे समूह को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया जाएगा। फिर दोनों समूहों की प्रामाणिक परीक्षा लेकर उनके प्राप्तांकों पर सांख्यिकीय विधियाँ लागू कर तुलनात्मक अध्ययन द्वारा यह बताना सम्भव है कि मनोविज्ञान शिक्षण की प्रभावशाली विधि कौन-सी

(7) कार्यकारण सम्बन्ध – सांख्यिकीय विधियों की सहायता से कोई भी मनोवैज्ञानिक किसी घटना को उत्पन्न करने वाले कारणों को ज्ञात कर सकता है। इसके लिए स्वतन्त्र चर का परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना होगा। यदि यह ज्ञात करना हो कि अमुक छात्र किसी विषय में क्यों फेल हो जाता है तो तत्सम्बन्धी कारणों को प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- प्रयोग में सभी कारणों को स्थिर (Constant) करने के उपरान्त यह पाया जाए कि नियमित अध्ययन न करने वाले छात्र फेल हो जाते हैं तो सम्भवतया छात्र के उस विषय में फेल होने का कारण, नियमित अध्ययन का अभाव ही हो।

(8) मापन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में सांख्यिकी का उपयोग – सांख्यिकीय विधियों के अभाव में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण, उनकी व्याख्या तथा विश्वसनीयता व वैधता की जाँच नहीं की जा सकती। बुद्धि-परीक्षण, निष्पत्ति परीक्षण, अभिवृत्ति परीक्षण तथा प्रवणता परीक्षण आदि के निर्माण में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यधिक उपयोगी हैं। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक मापन में भी सांख्यिकी बहुत उपयोगी है।

(9) भविष्यकथन में सांख्यिकी का उपयोग – जब कोई मनोवैज्ञानिक मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किसी घटना के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना चाहता है या भविष्यकथन करना चाहता है तो वह सांख्यिकी की प्रतीपगमन तथा भविष्यकथन से सम्बन्धित विधियों का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए यदि कक्षा बारह के किसी छात्र की बुद्धि-लब्धि (I.Q.), हाईस्कूल में उसके प्राप्तांक तथा अध्ययन के घण्टों के आधार पर उसकी बोर्ड की परीक्षा में सफलता का पूर्वानुमान/भविष्यकथन करना हो तो प्रतीपगमन रेखाओं की मदद से ऐसा किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक सांख्यिकीय विधियों की सहायता से यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि उसका भविष्यकथन कितना त्रुटिपूर्ण है।

(10) शैक्षिक समस्याओं का निदान – सांख्यिकीय विधियाँ शैक्षिक समस्याओं के निराकरण में भी विशिष्ट भूमिका निभाती हैं। छात्रों के चयन (Selection), उनकी पदोन्नति (Promotion) तथा शैक्षिक उपलब्धियों (Educational Achievements) के विषय में भविष्यकथन करने में भी सांख्यिकीय विधियाँ उपयोगी हैं। छात्रों के लिए परीक्षण तैयार करने व उनके मूल्यांकन में सांख्यिकी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार छात्रों के मार्गदर्शन में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यन्त उपयोगी सिद्ध

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि मनोविज्ञान में सांख्यिकी की महती उपयोगिता है। मनोवैज्ञानिक समस्याओं से सम्बन्धित आकंड़ों के संकलन, वर्गीकरण व्याख्या तथा तुलना में ही नहीं बल्कि उनसे सम्बद्ध पूर्वानुमान व भविष्यकथन में भी सांख्यिकी का बहुत उपयोग है।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की सीमाओं की विवेचना कीजिए।
या
“सांख्यिकीय विधियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी की सीमाएँ
(Limitations of Statistics)

सांख्यिकी एक लाभप्रद विज्ञान है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्पर्श करता है। सामाजिक विज्ञान शिक्षा तथा मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कृषि, नियोजन, अर्थशास्त्र, राजस्व, राजनीतिशास्त्र आदि में भी इसका भरपूर प्रयोग होता है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सांख्यिकी की कोई सीमाएँ (कमियाँ) ही नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि सांख्यिकी जितना लाभदायक विज्ञान है, उतना ही यह ख़तरनाक भी है। इसका प्रयोग बहुत ही सोच-विचारकर, सावधानीपूर्वक तथा विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि सांख्यिकी का प्रयोग अकुशल व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो यह बहुत हानिप्रद सिद्ध हो सकता है। इसकी सीमाओं पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। सांख्यिकी की प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं –

(1) सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, न कि गुणात्मक तथ्यों का – सांख्यिकी की यह महत्त्वपूर्ण कमजोरी है। यह मानव-जीवन के केवल उसी पहलू का अध्ययन करती है जिसे संख्याओं द्वारा प्रस्तुत किया जा सके; जैसे-ऊँचाई, आयु, भार तथा आय आदि। जीवन के गुणात्मक पक्ष; जैसे—सुन्दरता, भावना, दुष्टता, बुद्धिमत्ता, कुटिलता आदि का अध्ययन सांख्यिकी द्वारा नहीं कर सकते हैं। गुणात्मक पहलू को संख्याओं में व्यक्त करके अप्रत्यक्ष रूप में अध्ययन कर सकते हैं। बुद्धिमत्ता का माप अनुमानित संख्याओं द्वारा व्यक्त कर सकते हैं, प्रत्यक्ष रूप में नहीं।

(2) सांख्यिकीय समंक सजातीय और एकरूप होने चाहिए – सांख्यिकी में विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता, सांख्यिकीय विधियों द्वारा समंकों की तुलना तभी सम्भव है जबकि वे सजातीय हों तथा उनमें एकरूपता पायी जाये।

(3) सांख्यिकी समूह का अध्ययन करती है, न कि व्यक्ति को प्रो० नीजवैगर के अनुसार, सांख्यिकी के निष्कर्ष समूह के सामूहिक व्यवहार का अनुमान करने में सहायक होते हैं, उस समूह की व्यक्तिगत इकाइयों फ़ा नहीं।” सांख्यिकी व्यक्तिगत इकाई की विशेषता पर ध्यान न देकर सामूहिक विशेषता या औसत पर ध्यान देती है। सांख्यिकी के परिणाम समूह से जुड़े होते हैं, न कि व्यक्ति से। किसी कक्षा के प्राप्तांकों का औसत यह नहीं बताता कि अमुक विद्यार्थी के प्राप्तांक उतने ही होंगे।

(4) बिना सन्दर्भ के सांख्यिकी के परिणाम असत्य और भ्रामक होते हैं – समस्या के बिना सन्दर्भ और पूर्ण जानकारी के सांख्यिकीय परिणाम भ्रामक और असत्य मालूम होते हैं। कुछ समंकों से प्राप्त निष्कर्ष किसी भी विषय पर तब तक लागू नहीं किये जा सकते जब तक कि परिस्थिति, सन्दर्भ व समस्या की पूर्ण जानकारी न हो।

(5) सांख्यिकी के प्रयोग के लिए सांख्यिकीय विधियों की जानकारी आवश्यक – सांख्यिकी विज्ञान की यह एक गम्भीर सीमा है कि इसके सही उपयोग करने के लिए सांख्यिकीय विधियों की पूर्ण व सही जानकारी अति आवश्यक है। जो व्यक्ति सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग की पूर्ण जानकारी नहीं रखते हैं, उनके द्वारा इनके प्रयोग से लाभ के स्थान पर नुकसान ही होता है। यूल और केण्डाल ने तो यहाँ तक कहा है, “अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में सांख्यिकीय विधियाँ खतरनाक औजार हैं।”

(6) सांख्यिकी के परिणाम दीर्घकाल में तथा औसत रूप में सही होते हैं – प्राकृतिक विज्ञानों; जैसे-रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि के नियम और परिणाम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक होते हैं। ये अल्पकाल तथा दीर्घकाल सभी कालों में लागू होते हैं, परन्तु सांख्यिकी के परिणाम केवले दीर्घकाल में ही सही निकलते हैं तथा वे एक औसत प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं। उनमें छोटे-छोटे उच्चावचन एवं कमियाँ विद्यमान रहती हैं। सांखियकी के नियम सम्भावना सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। जिसके अनुसार यदि किसी सिक्के को 20 बार उछालें तो सम्भावना यह है कि 10 बार चित (Head) तथा 10 बार पट (Tail) आएगा; किन्तु ‘यथार्थ में हो सकता है 14 बार चित व 6 बार पट आये।

(7) सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं – सांख्यिकी का प्रमुख कार्य समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित कर उन्हें वर्गीकृत करके सारणीयन तथा रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुत करना है। बाउले के मत में सांख्यिकी का काम परिणाम या निष्कर्ष निकालना नहीं है। यदि सांख्यिकी परिणाम निकालेगी। भी, तो वे निष्पक्ष नहीं होंगे। परन्तु कुछ दूसरे सांख्यिकीवेत्ता यह मानते हैं कि बिना परिणाम के सांख्यिकी अनुपयोगी होगी; अतः निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि समंकों के एकत्रीकरण में पूर्ण सावधानी रखकर तटस्थ रूप में उनका प्रयोग करना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के तटस्थ न रहने पर। परिणाम गलत और हानिकारक हो सकते हैं; अतः सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग साधन के रूप में बुद्धिमानीपूर्वक करना चाहिए।

(8) सांख्यिकीय विधि अनुसन्धान की एकमात्र विधि नहीं है – समस्याओं के अनुसन्धान की अनेक विधियाँ हैं, सांख्यिकीय विधि उन अनेक विधियों में से एक हैं। अत: सांख्यिकी से प्राप्त परिणामों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि अनुसन्धान की दूसरी विधियों से परिणामों की पुनः जाँच न कर ली जाए।

अंत में यह कह सकते हैं कि सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग में पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। उपर्युक्त सीमाओं को ध्यान में रखकर निष्कर्ष निकालने चाहिए, अन्यथा इसके परिणाम भ्रामक और हानिकारक हो सकते हैं। यही कारण है कि यूल और केण्डाल यह कहने पर मजबूर हुए हैं कि सांख्यिकीय गीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
सांख्यिकीय श्रेणियों (Statistical series) से आप क्या समझते हैं। इनके विभिन्न प्रकारों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकीय श्रेणियाँ
(Statistical Series)

संकलिन आँकड़ों को जब एक निश्चित क्रम में लिखा जाता है तो इस भाँति बनी हुई पदमाला या श्रृंखला को सांख्यिकीय श्रेणी (Statistical Series) कहा जाता है। सांख्यिकीय श्रेणी में हम आँकड़ों को एक क्रमबद्ध ढंग से प्रदर्शित करते हैं। कॉनर (Conner) ने सांख्यिकीय श्रेणी की परिभाषा इस प्रकार दी है, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाए कि एक का मापनीय अन्तरे दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

सांख्यिकीय श्रेणियों के प्रकार
(Types of Statistical Series)

सांख्यिकीय श्रेणियाँ कई प्रकार की होती हैं। मुख्यतः सांख्यिकीय श्रेणियों की रचना तीन प्रकार से की जा सकती है –

  1. व्यक्तिगत श्रेणी
  2. असतत या खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी
  3. सतत् या अखण्डित या अविच्छिन्न श्रेणी।

(1) व्यक्तिगत श्रेणी (Individual Series) – व्यक्तिगत श्रेणी वह है जिसमें समूह की प्रत्येक इकाई का मान अलग-अलग दिया जाता है। इस श्रेणी में प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है। व्यक्तिगत श्रेणी का निर्माण उस समय किया जाता है कि जब संकलित आँकड़ों से समूह अथवा वर्ग बनाने सम्भव न हों अथवा हर एक पद को महत्त्व देना हो। इन श्रेणियों की रचना आरोही (Ascending) तथा अवरोही (Descending) दोनों ही क्रमों में की जा सकती है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित तालिका में कक्षा XI के दस छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक आरोही तथा अवरोही क्रम में प्रस्तुत किये गये हैं –

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(2) असतत या खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी (Discrete or Discontinuous Series) – जिस श्रेणी में प्रत्येक मान अलग-अलग नहीं लिखा जाता, अपितु प्रत्येक मान के समक्ष उसकी आवृत्ति लिख दी जाती है, उसे असतत/खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी कहा जाता है। यह श्रेणी वास्तविक अन्तर को प्रकट करती है। उदाहरण के लिए—कक्षा XI के 20 छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक निम्नलिखित हैं –
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(3) सतत या अखण्डित या अविच्छिन्न श्रेणी (Continuous Series) – सतत श्रेणी में इकाइयों के मानों को वर्गान्तरों (Class-intervals) के रूप में व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रकार की श्रेणी में ऐसे मान आते हैं जिनका सूक्ष्म विभाजन सम्भव है; जैसे—समय को घण्टा-मिनट-सेकण्ड आदि में विभाजित किया जा सकता है। बुद्धि, भार, ऊँचाई व लम्बाई आदि को भी सरलता से मापा और उपविभाजित किया जा सकता है। मनोविज्ञान में जिन चल-राशियों का अध्ययन किया जाता है, वे अधिकतर इसी श्रेणी के अन्तर्गत आती हैं। कक्ष X के 100 छात्रों के मनोविज्ञान के प्राप्तांकों का विवरण निम्नलिखित है –
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श्रेणियों की रचना में निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है –

(i) व्यक्तिगत श्रेणी वस्तुतः असतत या खण्डित श्रेणी का एक विशिष्ट रूप है। यदि असतत श्रेणी में प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति 1 हो तो वह व्यक्तिगत श्रेणी का रूप धारण कर लेती है।
(ii) यदि सतत श्रेणी में प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य बिन्दु पर उनकी सम्पूर्ण आवृत्तियाँ केन्द्रित मान ली जाये तो यह श्रेणी असतत या खण्डित श्रेणी का रूप धारण कर लेती है।

प्रश्न 6.
ऑकड़ों के व्यवस्थापन से क्या आशय है? आँकड़ों के व्यवस्थापन के मुख्य प्रकारों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
आँकड़ों का व्यवस्थापन या आवृत्ति विवरण
(Organization of the Data or Frequency Distribution)

मनोविज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न समस्याओं को लेकर अध्ययन, प्रयोग एवं अनुसन्धान कार्य किये जाते हैं। ये प्रयोग या अनुसन्धान कार्य एक विशाल समूह पर किये जाते हैं। जिनके फलस्वरूप हमें आँकड़े प्राप्त होते हैं। ये आँकड़े हमारे लिए तब तक निरर्थक हैं जब तक कि उन्हें व्यवस्थित रूप प्रदान नहीं कर दिया जाता। इस भाँति, आँकड़ों को सार्थक एवं उपयोगी बनाने के लिए व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का विशेष महत्त्व है।

संगृहीत आँकड़ों से सुगमतापूर्वक निष्कर्ष निकालने हेतु इनका व्यवस्थापन (Organization) किया जाता है। जिसमें आँकड़ों का वर्गीकरण तथा सारणीयन सम्मिलित है। संगृहीत आँकड़ों को सर्गों तथा सारणियों के रूप में निरूपित करना ही आँकड़ों का व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण है। मुख्यत: व्यवस्थापन की तीन पद्धतियाँ हैं –

  1. वर्गीकरण (Classification)
  2. सारणीयन (Tabulation) तथा
  3. रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण (Graphical Representation)।

आँकड़ों का वर्गीकरण समानता या सजातीयता के आधार पर किया जाता है; जैसे–सामाजिक स्तर या धर्म के आधार पर वर्गीकरण। आँकड़ों का वर्गीकरण करने के बाद उनके आपसी सम्बन्ध तथा प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनका सारणीयन किया जाता है जिसे अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए रेखाचित्रों के माध्यम से आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है।

मूल आँकड़ों के व्यवस्थापन के प्रकार
(Types of Basic Datas Distribution)

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों या अनुसन्धान कार्यों में मूल आँकड़े अधिक संख्या में तथा विस्तृत (फैले हुए) होते हैं जिन्हें व्यवस्थापन की प्रक्रिया द्वारा सुस्पष्ट एवं सार्थक बनाया जाता है। आँकड़ों के व्यवस्थापन के प्रमुख तीन प्रकार हैं –

  1. साधारण व्यवस्था
  2. आवृत्ति व्यवस्था तथा
  3. आवृत्ति वितरण।

(1) साधारण व्यवस्था (Simple Array) – साधारण व्यवस्था आँकड़ों को व्यवस्थित करने की सबसे सरल विधि है जिसमें आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। आँकड़ों को इस प्रकार विन्यसित करने से उनकी प्रकृति स्पष्ट हो जाती है। आँकड़ों को साधारण व्यवस्था में उस समय व्यवस्थित किया जाना चाहिए जबकि आँकड़ों की संख्या कम हो। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी परिसीमा यह है कि इससे अन्य सांख्यिकी गणनाओं में सहायता नहीं मिलती है।

उदाहरण 1 – कक्षा XI के 10 छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक (पूर्णाक 50) निम्न प्रकार हैं –
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अब इन्हें साधारण व्यवस्था के अन्तर्गत आरोही व अवरोही क्रम में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाएगा –
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(2) आवृत्ति व्यवस्था (Frequency Array) – आँकड़ों की प्रकृति अधिक स्पष्ट करने के लिए उनका व्यवस्थापन आवृत्तियों के आधार पर किया जाता है। साधारण व्यवस्था से आवृत्ति व्यवस्था अधिक अच्छी समझी जाती है, किन्तु इसे तभी प्रयोग किया जाना चाहिए जबकि आँकड़ों की संख्या कम हो तथा उनकी आवृत्ति बार-बार हुई हो।

उदाहरण 2 – नीचे की तालिका में एक कक्षा के 100 विद्यार्थियों को बुद्धि-लब्धि के आधार पर विभाजित किया गया है –
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(3) आवृत्ति वितरण (Frequency Distribution) – आवृत्ति वितरण एक ऐसी व्यवस्था है। जिसमें पदों (चरों) के मूल्य तथा उनकी आवृत्तियाँ दी हुई होती हैं। आवृत्ति वितरण के दो प्रमुख तत्त्व हैं –
(i) पद (चर) तथा (ii) आवृत्तियाँ।

(i) पद (Variable) – पद या चर वह संख्यात्मक तथ्य है जो मात्रा या आकार में परिवर्तित होता रहता है; जैसे—आयु, लम्बाई, भार, आय या प्राप्तांक आदि। पद या चर दो प्रकार के हैं(अ) सतत चर तथा (ब) असतत या खण्डित चर। पद या चर को ‘x’ से प्रदर्शित करते हैं।

(ii) आवृत्तियाँ (Frequencies) – किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की प्रवृत्ति को आवृत्ति (Frequency) कहते हैं। इकाइयों (व्यक्तियों) की वह संख्या जो किसी वर्ग-विशेष में आती है, उस वर्ग की आवृत्ति या बारम्बारता कहलाती है। इस प्रकार आवृत्तियाँ वह संख्या है जो किसी वर्ग-विशेष के पदों (मूल्यों) को ग्रहण करती है। कोई प्राप्तांक/पद या संख्या यदि पाँच बार आती है तो उस प्राप्तांक की आवृत्ति ‘5’ होगी। आवृत्ति को ‘f’ से प्रकट करते हैं। प्रत्येक वर्ग के अन्तर्गत आने वाले पदों की संख्या उस वर्ग की आवृत्ति कहलाती है।

इन आवृत्तियों को सुविधानुसार भिन्न-भिन्न वर्गों में वितरित अथवा प्रदर्शित करने की विधि आवृत्ति वितरण कहलाती है।

सरल आवृत्ति वितरण
(Simple Frequency Distribution)

सरल आवृत्ति वितरण में सर्वाधिक तथा सबसे कम प्राप्तांकों तथा उनके मध्य जितने भी प्राप्तांक आ सकते हैं उन सभी को आकार के अनुसार लिखा जाता है। फिर हर एक प्राप्तांक के सामने वह अंक लिखा जाता है जितनी बार वह प्राप्तांक दोहराया गया है। यही उस पद की आवृत्ति है।
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ये सभी प्राप्तांक अव्यवस्थित, अपरिष्कृत तथा अवर्गीकृत हैं जिन्हें न तो मस्तिष्क में अंकित रखा जा सकता है और न ही इन्हें देखकर मनोविज्ञान की कक्षा के बारे में कोई सुनिश्चित धारणा ही बनायी जा सकती है। हम इन्हें पहले सरल आवृत्ति वितरण के रूप में प्रदर्शित करते हैं –
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सरल आवृत्ति वितरण से प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति ज्ञात हो जाती है। प्राप्तांकों का वितरण अर्थात् अधिकांश विद्यार्थियों ने कम अंक प्राप्त किये हैं या उच्च अंक तथा सामान्य अंक पाने वाले विद्यार्थी कितने हैं, इन सभी बातों का हमें आसानी से ज्ञात हो जाता हैं। किन्तु सरल आवृत्ति वितरण बहुत अधिक स्थान घेरता है; अतः हम आवृत्ति वितरण बनाने की वह प्रक्रिया अपनाएँगे जो कुछ क्रुमबद्ध सोपानों पर आधारित होती है। आवृत्ति वितरण तालिका की यह प्रक्रिया निम्नलिखित है –

आवृत्ति वितरण तालिका निर्माण की प्रक्रिया
(Procedure of Preparing a Frequency Distribution Table)

आवृत्ति वितरण तालिका निर्माण की प्रक्रिया के पाँच प्रमुख सोपान हैं जिनके आधार पर आवृत्ति वितरण तालिका आसानी से निर्मित हो सकती है। ये सोपान निम्न प्रकार वर्णित हैं—

(1) प्रसार क्षेत्र (Range) – आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के लिए सबसे पहले प्रसार क्षेत्र ज्ञात कर लेना चाहिए। आँकड़ों में उच्चतम अंक (Highest Score) तथा न्यूनतम अंक (Lowest Score) के अन्तर को प्रसार क्षेत्र कहते हैं।

प्रसार क्षेत्र = उच्चतम अंक – न्यूनतम अंक
Range = Highest Score – Lowest Score or Range =H.S. – L.S.
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(2) वर्गान्तर (Class-anterval : C.I.) – प्रसार क्षेत्र ज्ञात करने के उपरान्त वर्गान्तर की संख्या ज्ञात की जाती है जो साधारणत: 5 से लेकर 20 तक हो सकती है। कुछ विद्वानों की राय में यह 10 से कम तथा 20 से अधिक नहीं होनी चाहिए। परिणामों की शुद्धता का ध्यान रखते हुए वर्गान्तरों की संख्या 10 से 15 तक रखना उपयुक्त है।

वर्गान्तरों की संख्या ज्ञात करने के लिए आवश्यक है कि वर्गान्तर का आकार (Size of C.I.) पता लगाया जाये। वर्गान्तर का आकार सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित सूत्र प्रयुक्त होता है –
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गणना सम्बन्धी कार्य (जोड़ना व घटाना ओदि) में सुविधा की दृष्टि से वर्गान्तर का आकार ऐसा चुना जाये जो 5 से पूरी तरह विभाजित हो जाये। प्रश्न हल करते समय प्रसार क्षेत्र को सिर्फ 5 से भाग देकर वर्गान्तर का आकार ज्ञात कर लेना चाहिए। यदि प्रश्न में वर्गान्तर का आकार दिया हुआ हो तो फिर आकार ज्ञात करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

(3) वर्गान्तरों का निर्माण (Construction of Class-intervals) – वर्गान्तरों की संख्या तथा उनका आकार ज्ञात करने के बाद वर्गान्तरों का निर्माण किया जाता है। प्रथम वर्गान्तर बनाते समय निम्नतम अंक सर्वप्रथम लिखा जाता है, फिर निम्नतम अंक में वर्गान्तर के आकार को जोड़कर उसके सामने लिख देते हैं। उदाहरण (3) में निम्नतम अंक 30 है तथा वर्गान्तर का आकार 5 है। अत: पहले 30 लिखा जाएगा, फ़िर 30 में 5 जोड़कर (30 + 5) यानि 35 लिखा जायेगा। इस तरह से पहला वर्गान्तर 30-35 बना।

इसके आगे, पहले वर्गान्तर 30-35 की ऊपरी सीमा दूसरे वर्गान्तर की निम्न सीमा बन जायेगी तथा 35 में 5 जोड़कर (35+ 5) यानी 40, यह दूसरे वर्गान्तर की ऊपरी सीमा होगी। इस भाँति, दूसरा वर्गान्तर होगा 30-40। तीसरे वर्गान्तर की निम्न सीमा 40 होगी जिसमें वर्गान्तर का आकार 5 जोड़ने पर 40 + 5 = 45, इसकी ऊपरी सीमा बनेगी और तीसरा वर्गान्तर 40-50 होगा। वर्गान्तर बनाने का यह क्रम तब तक चलता जायेगा जब तक कि उच्चतम अंक वर्गान्तर में शामिल न हो जाये।

नोट – वर्गान्तरों का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

(i) अक्सर प्राप्तांकों के न्यूनतम अंक से ही वर्गान्तर बनाना शुरू करते हैं; जैसे—उपर्युक्त उदाहरण में न्यूनतम अंक 30 से वर्गान्तर बनाना प्रारम्भ किया गया है।

(ii) गणना को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से ‘वर्गान्तरों को न्यूनतम अंक से भी छोटा या कम अंक से शुरू किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-यदि न्यूनतम अंक 26 है और वर्गान्तर का आकार 5 है तो 26-31 वर्गान्तर बन जाता है और यह 25-30 वर्गान्तर भी बन सकता है। वैसे वर्गान्तर 25-30 गणना की दृष्टि से सरल व सुविधाजनक कहा जाएगा।

(iii) यदि निम्नतम प्राप्तांक 5 से कम है तथा आकार 5 या 5 से ज्यादा है तो प्रथम वर्गान्तर ‘शून्य’ से प्रारम्भ करना चाहिए। यदि प्रथम वर्गान्तर ‘शून्य से प्रारम्भ है और वर्गान्तर का आकार 5 है। तो प्रथम वर्गान्तर 0-4 होगा। यहाँ यह स्पष्ट करना उचित है कि 0-4 वर्गान्तर में 5 प्राप्तांक हैं। यानि 0, 1, 2, 3 व 4। इसलिए इस समूह में 0 से लेकर 4 तक अंक पाने वाले सभी व्यक्ति शामिल हो जाएँगे। इस क्रम में दूसरा वर्गान्तर 5 से शुरू होगा तथा 9 पर समाप्त हो जाएगा यानि यही वर्गान्तर 5-9 होगा इसमें भी 5 प्राप्तांक शामिल हैं – 5, 6, 7, 8 व 9।

(iv) वर्गान्तरों को आरोही क्रम (Ascending Order) तथा अवरोही क्रम (Descending Order) दोनों में से किसी भी क्रम में लिखा जा सकता है।

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आवृत्ति तालिका का निर्माण करते समय अव्यवस्थित आँकड़ों के पहले प्राप्तांक को पढ़कर अनुमान लगायें कि यह किस वर्गान्तर में आता है। जिस वर्गान्तर में यह अंक आता हो, उसके सामने एक अंकदण्ड लगा देना चाहिए। अब दूसरा प्राप्तांक पढ़कर सम्बन्धित वर्गान्तर में उसके सामने एक अंकदण्ड लगा दें। इसी तरह से एक के बाद एक सभी प्राप्तांकों को पढ़कर अंकदण्ड लगा दिये जाते हैं। जैसे—उदाहरण (3) में पहला प्राप्तांक 42 है जिसके लिए 40-45 वर्गान्तर के सामने एक अंकदण्ड लगा देंगे। अभिप्राय यह है कि यही क्रिया सभी प्राप्तांकों के लिए दोहराई जाएगी।

(5) अंकदण्डों का आवृत्तियों में बदलना (Changing Tallies in Frequencies)- वर्गान्तरों के सम्मुख आवृत्तियों के अंकदण्डों द्वारा प्रदर्शन के बाद अंकदण्डों को आवृत्तियों में बदलकर लिख दिया जाता है। इसके लिए अंकदण्डों को जोड़कर योग को आवृत्ति (Frequencies) वाले खाने में लिख देते हैं। उदाहरण (3) के 55-60 वर्गान्तर में UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 13 छह अंकदण्ड हैं; अत: इस वर्गान्तर के सामने आवृत्ति वाले खाने में 6 लिखा गया है। इसी प्रकार से सभी वर्गान्तरों के सामने के अंकदण्डों को आवृत्तियों में बदल दिया जाता है। यदि आवृत्ति वितरण तालिका में अंकदण्डों को लगाने में कोई त्रुटि नहीं है तो आवृत्तियों (f) का योगफल व्यक्तियों की कुल संख्या (N) के बराबर होता है।

अब हम उदाहरण (3) के अन्तर्गत सरल आवृत्ति वितरण के आधार पर आरोही तथा अवरोही क्रम में आवृत्ति वितरण तालिकाओं को निर्माण करेंगे।

आवृत्ति वितरण तालिका
(Frequency Distribution Table)
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उदाहरण 4 – कक्षा XI के 50 परीक्षार्थियों ने मनोविज्ञान में नीचे दिये गए अंक प्राप्त किये। इन प्राप्तांकों का आवृत्ति वितरण तैयार कीजिए –
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उदाहरण 5 – निम्नलिखित प्राप्तांकों से उचित वर्गान्तरलेकर आवृत्ति-वितरण तालिका बनाइए –
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उदाहरण 6 – कक्षा x के 50 छात्रों के भार (पौण्ड्स में) ज्ञात किये गये। इन भारों से उचित वर्गान्तर द्वारा आवृत्ति वितरण तालिका तैयार कीजिए –
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संचयी आवृत्तियाँ ज्ञात करना।
(To Find out the Cumulative Frequencies)

किसी आवृत्ति वितरण तालिका में संचयी आवृत्तियाँ (Cumulative Frequencies : C.E:) ज्ञात करने के लिए प्रत्येक वर्ग के सम्मुख उस वर्ग की आवृत्तियों तथा उस वर्ग के नीचे वाले कुल वर्गों की आवृत्तियों का योग लिख दिया जाता है।

उदाहरण 7 – एक स्कूल के 32 शिक्षकों की आयु (वर्षों में दर्शाने वाली संचयी आवृत्तियाँ निम्न प्रकार सारणीबद्ध हैं –
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उपर्युक्त उदाहरण में 20-25 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्ति 4 + 0 = 4 है; क्योंकि इस वर्गान्तर से नीचे आवृत्तियों की संख्या ‘शून्य’ (अर्थात् कुछ भी नहीं) है। इसी भाँति

25 – 30 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 8 = 12
30 – 35 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 7 + 12 = 19
35 – 40 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 19 = 23
40 – 45 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 23 = 27
45 – 50 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 2 + 27 = 29
50 – 55 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 2 + 29 = 31
55 – 60 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 1 + 31 = 32

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ
(Methods of Grouping Scores)

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की तीन विधियाँ हैं –

  1. समावेशी विधि (Inclusive Method)
  2. शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (Pure Classification Series)
  3. अपवर्जी विधि (Exclusive Method)

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(1) समावेशी विधि (Inclusive Method) – समावेशी विधि में वर्गान्तर का अन्तिम अंक वर्गान्तर में ही शामिल है। उदाहरणार्थ-40-44 का अर्थ है कि 40 से लेकर 44 तक के प्राप्तांक इसी वर्ग में सम्मिलित हैं। इसी प्रकार 45-49 का अर्थ है कि 45 से लेकर 49 तक के सभी प्राप्तांक इस वर्ग में सम्मिलित हैं। समावेशी विधि द्वारा आवृत्ति वितरण सरलता से एवं बिना किसी त्रुटि के बनाये जा सकते हैं; अत: यह विधि प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की सर्वश्रेष्ठ विधि है।

(2) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (Pure Classification Method) – यह विधि सांख्यिकीय दृष्टि से विशुद्ध हैं; क्योंकि इसमें वास्तविक सीमाएँ प्रदर्शित की गयी हैं। यहाँ प्रत्येक वर्ग की उच्चतम तथा निम्नतम सीमाएँ जानने के लिए प्राप्तांकों की वास्तविक सीमाओं की गणना करते हैं। निम्नतम सीमा जानने के लिए उसे प्राप्तांक में से 0.5 घटा देते हैं तथा उचचतम सीमा जानने के लिए 0.5 जोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए-पहले वर्गान्तर 40-44 की निम्नतम सीमा 40-0.5 = 39.5 हुई और उच्चतम सीमा 44+ 0.5 = 44.5 हुई। इसी तरह से सभी वर्गों का निर्माण करते हैं। इस विधि की परिसीमा यह है कि इसमें समय अधिक व्यय होता है।

(3) अपवर्जी विधि (Exclusive Method) – अपवर्जी विधि में वर्गान्तर 40-45 का अर्थ यह है कि इस वर्ग में 40 से लेकर 44 तक के अंक शामिल हैं किन्तु 45 शामिल नहीं हैं। 45 प्राप्तांक पहले वर्ग में न होकर दूसरे वर्ग में है। इसी प्रकार वर्गान्तर 45-50 का अर्थ है कि इसमें 45 से 49 तक शामिल हैं लेकिन 50 नहीं। 50 तीसरे वर्ग में है। अपवर्जी विधि का एक दोष यह है कि इसमें कभी-कभी भ्रमवश आवृत्ति चिह्न (अंकदण्ड) गलत वर्ग के सामने लग जाता है। क्योंकि 50 का अंक 45-50 में भी लिखा है और 50-55 में भी, जबकि इसे शामिल 50-55 वाले वर्ग में करना है; अतः यह ध्यान रखना चाहिए।

वर्गान्तर का मध्य-बिन्द ज्ञात करना
(Mid-point of a Class Interval)

किसी वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु (Mid-point) उस वर्गान्तर के निम्नतम और उच्चतम प्राप्तांकों को जोड़कर तथा योग का आधार करने पर प्राप्त हो सकता है। इसके लिए अग्रलिखित सूत्र प्रयोग करते हैं –
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प्रश्न 7.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से क्या आशय है। केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के मुख्य उद्देश्य का भी उल्लेख कीजिए।
या
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
समंकों की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) की माप का महत्त्वपूर्ण स्थान है। समंकों के वर्गीकरण तथा सारणीयन से समंक सरल, सुबोध, व्यवस्थित तथा तुलनीय तो बन जाते हैं किन्तु इससे उनकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ प्रकट नहीं होतीं; अत: एक ऐसी विधि की आवश्यकता है जिसके द्वारा एक ही संख्या से सभी संगृहीत आँकड़ों को प्रतिनिधित्व कराया जा सके। इसके लिए केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्यमों का अध्ययन आवश्यक है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : अर्थ
(Definitions of Measures of Central Tendency or Average)

संगृहीत आँकड़ों के मध्य ऐसी संख्या, जो सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती हो, तो न तो समूह की न्यूनतम मान वाली संख्या होगी और न ही अधिकतम मान वाली। अवश्य ही, वह संख्या समूह के मध्य या उसके आस-पास की संख्या होगी। अत; आँकड़ों में से किस एक आँकड़े के पास पाये जाने की उनकी प्रवृत्ति को केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) कहा जाता है तथा इस माध्य या औसत को केन्द्रीय माप या केन्द्रीय प्रवृत्ति की मान कहते हैं।

इस भाँति केन्द्रीय प्रवृत्ति से तात्पर्य उस मान से है जो प्राप्त आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् वह मान जो प्राप्त आँकड़ों में सबसे अधिक बार आया हो। साधारणत: केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों से हमारा अर्थ ‘सांख्यिकीय माध्य’ या ‘औसत (Average) से होता है; क्योंकि सांख्यिकी माध्यम के आस-पास सभी आँकड़े वितरित होते हैं।

वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकीय माध्य से औसत कहलाती है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की परिभाषाएँ
(Definitions of Measures of Central Tendency or Average)

सांख्यिकीय माध्य या केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) सिम्पसन और काक्का के अनुसार, “केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप एक ऐसा प्रतिरूपी मूल्य है। जिसकी ओर अन्य संख्याएँ केन्द्रित होती हैं।”

(2) क्लार्क और शकाडे के मत में, “माध्ये सम्पूर्ण समंक समूह का विवरण देने वाली एकमात्र संख्या प्राप्त करने का प्रयत्न है।”

(3) क्रॉक्सटन और काउडेन के मतानुसार, “माध्य समंकों के विस्तार के अन्तर्गत स्थित एक ऐसा पद है। जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी पदों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है। समंक माला के विस्तार के अन्तर्गत स्थित होने के कारण माध्य को कभी-कभी केन्द्रीय मूल्य का माप भी कहा जाता है।

समंक माला के कुछ पद (मूल्य) माध्य से छोटे तथा कुछ मूल्य बड़े होते हैं; अत: माध्य समंक श्रेणी की केन्द्रीय प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है। अन्त में कह सकते हैं कि माध्य समंक श्रेणी का मध्य मूल्य होता है जो श्रेणी की बनावट वे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को बतलाता है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के उद्देश्य
(Objectives of Averages)

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या औसत या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निम्नलिखित है।

(1) जटिल तथ्यों को सरल रूप में प्रस्तुत करना – जिससे वे आसानी से समझ में आ सकें।

(2) विस्तृत तथ्यों को संक्षिप्तता प्रदान करना – माध्य तथ्यों के विशाल समूह को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत कर देता है। इससे विशाल समूह की जानकारी प्राप्त हो जाती हैं। मोरेनो के अनुसार, माध्य का उद्देश्य व्यक्तिगत मूल्यों के समूह का सरल और संक्षिप्त रूप में प्रतिनिधित्व करना है। जिससे मस्तिष्क समूह की इकाइयों के सामान्य आकार को असानी से समझ सके।”

(3) समग्र की रचना तथा विशेषताओं की जानकारी प्रदान करना – माध्य के द्वारा सारे समूह की सामान्य बनावट (रचना) की जानकारी मिल जाती है। सम्पूर्ण समूह की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं तथा गुणों की जानकारी भी मिलती है।

(4) तुलना में सहायता – माध्यों के द्वारा दो या दो से अधिक समूहों, प्रदेशों के कुछ खास लक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। दो कक्षा के छात्रों के माध्य से उनके भार या ऊँचाई की जानकारी मिल जाती है।

(5) मार्गदर्शक के रूप में कार्य करना – सांख्यिकीय माध्यम मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। माध्य की जानकारी से समूह के विकास सम्बन्धी नीतियों के निर्धारण में सहायता मिलती है।

(6) सांख्यिकीय विश्लेषण का आधार – माध्यम विभिन्न वर्गों में गणितीय सम्बन्ध स्थापित करता है। माध्य से विभिन्न समूहों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है।

(7) माध्य बहुत बड़े समूह या वार्ड के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया करता है।

अन्त में कह सकते हैं कि माध्यों का विश्लेषण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ० बाउले के शब्दों में, “माध्य का उद्देश्य जटिल समूहों तथा विशाल क्रियाओं को कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों में या संख्याओं में प्रस्तुत करना है।”

प्रश्न 8.
मध्यमान अथवा समान्तर माध्य (Mean) से आप क्या समझते हैं? मध्यमान ज्ञात करने की विधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
मध्यमान की परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
मध्यमान अथवा समान्तर माध्य
(Mean or Arithmetic Mean)

अंकगणित में जिस मान को औसत (Average) कहा जाता है, उसे हम सांख्यिकी में मध्यमान अथवा समान्तर माध्य (Mean or Arithmetic Mean) कहते हैं। मध्यमान को ‘M’ अक्षर द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

परिभाषा – “मध्यमान वह मान है जो दिये हुए पदों के योगफल में पदों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।”

या किसी अंक-सामग्री के समस्त अंकों के योगफल को उन अंकों की संख्या से भाग देने से जो भागफल प्राप्त होता है, उसे मध्ययान कहते हैं।”

या “मध्यमान वह प्राप्तांक है जिसके दोनों ओर विचलन समान होता है।”

उदाहरण 1 – यदि कक्षा 8 के पाँच विद्यार्थियों के भार क्रमानुसार 54, 2, 56, 53 तथा 50 किलोग्राम हों तो इनके मध्यमान की गणना कीजिए।
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मध्यमान ज्ञात करना
(Calculation of Mean)

मध्यमान अव्यवस्थित (Ungrouped) तथा व्यवस्थित (Grouped) दोनों ही प्रकार के प्राप्तांकों की मदद से निकाला जा सकता है –

(I) अव्यवस्थित प्राप्तांकों से मध्यमान की गणना (The mean of the Ungreuped Scores) – (N) अव्यवस्थित प्राप्तांकों को मध्यमान निकालने के लिए अव्यवस्थित अंकों को जोड़ लेते हैं तथा प्राप्त योगफल को अंकों की संख्या से भाग दे देते हैं। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
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उदाहरण 3 – नीचे तालिका में प्राप्तांक तथा उनके सामने आवृत्तियाँ लिखी गयी हैं, मध्यमान की गणना कीजिए –
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  1. सबसे पहले प्रत्येक वर्गान्तर (Class-interval) का मध्य-बिन्दु ज्ञात किया जाता है।
  2. प्रत्येक मध्य-बिन्दु को तत्सम्बन्धी आवृति से गुणा कर लेते हैं।
  3. गुणनफलों के योगफल को आवृत्तियों की कुल संख्या से विभाजित कर देते हैं।

उदाहरण 4 – मीचे दी गयी सारणी का दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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उदाहरण 5 – निम्नांकित सारणी का दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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(2) संक्षिप्त विधि (Short Method) – मध्यमान की गणना की दीर्घ विधि में समय बहुत ज्यादा लगता है; अत: सामान्यतया, संक्षिप्त विधि से मध्यमान की गणना की जाती है। इसके क्रमागत पद निम्नलिखित हैं –

    1. सबसे पहले वर्गान्तरों के बीच से मध्यवर्ती वर्गान्तर ज्ञात किया जाता है। इस मध्यवर्ती वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु ही कल्पित मध्यमान (Assumed Mean) है। सर्वाधिक आवृत्तियों वाले, वर्गान्तर को मध्यवर्ती वर्गान्तर मानना उचित होता है।
    2. इस कल्पित मध्यमान को प्रत्येक मध्य-बिन्दु में से घटाकर विचलन (Deviation) (X- A) ज्ञात किया जाता है।
    3. अब विचलन को वर्ग–अन्तराल से भाग देते हैं। भागफल को संक्षिप्त विचलन Step Deviation) (d) कहते हैं।
    4. स्पष्टंत: कल्पित मध्यमान वाले वर्गान्तर के सामने वाले स्तम्भ में ‘0’ लिखा जाएगा। वितरण के जिस ओर मध्य-बिन्दुओं का मान बढ़ता है, उस तरफ विचलन क्रमशः धनात्मक +1,+2, +3, +4,… आदि होता है तथा जिस ओर मध्य-बिन्दुओं का मान घटता है, उस तरफ विचलन क्रमागत ऋणात्मक -1-2-3,-4… आदि होता है।
    5. अब (fd) ज्ञात किया जाता है जिसके लिए वर्गान्तर के सामने की आवृत्तियों को विचलन से गुणा कर देते हैं और (fd) वाले खाने में लिखते हैं।
    6. (∑fd) की गणना के लिए धनात्मक व ऋणात्मक संख्याओं का अलग-अलग योग ज्ञात करके दोनों का अन्तर ज्ञात कर लिया जाता है।
    7. वर्गान्तर का आकार तथा N का मान प्रश्न से देखकर लिख लिया जाता है और सूत्र में ज्ञात मानों को रखकर मध्यमान की गणना कर ली जाती है।
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उदाहरण 7 – नीचे दी गयी सारणी का संक्षिप्त विधि से मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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प्रश्न 9.
मध्यांक या माध्यिका (Median) से आप क्या समझते हैं? मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसकी गणना की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक अथवा माध्यिका
(Median)

मध्यांक (या माध्यिका) (Median) दिये हुए आँकड़ों को दो समूहों में विभक्त कर देता है जिसके एक समूह के प्रत्येक पद का मान मध्यांक से कम और दूसरे समूह का मान मध्यांक से अधिक होता है।

परिभाषा – (1) “यदि आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाये तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला आँकड़ा ‘मध्यांक’ कहलाता है।”

(2) गैरेट के अनुसार, “जब अव्यवस्थित अंक (Ungrouped Scores) या दूसरी माप, क्रम में व्यवस्थित हो तो मध्य का अंक मध्यांक कहलाता है।”

मध्यांक का संकेत चिह्न Md है।

उदाहरण 1 – किसी कक्षा के पाँच बच्चों की ऊँचाई क्रमानुसार 140, 143, 145, 147, 152 सेमी हैं। और इन्हें ऊँचाईं के आरोही क्रम में खड़ा किया गया है। इनका मध्यांक क्या होगा?

हल – ऊँचाइयाँ आरोही क्रम में-140, 143, 145, 147, 152 पाँच बच्चों की ऊँचाइयों का मध्यांक तीसरे बच्चे की ऊँचाई =145 सेमी होगा।

मध्यांक की विशेषताएँ
(Characterisitics of Median)

मध्यांक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मध्यांक श्रेणी का केन्द्रीय मूल्य होता है; अत: मध्यांक निर्धारण के लिए श्रेणी को किसी क्रम में व्यवस्थित करना आवश्यक है।
  2. यह श्रेणी का मध्य अंक (बिन्दु) है जिसके ऊपर व नीचे की ओर आधे-आधे प्राप्तांक स्थित होते हैं; अत: मध्यांक का मान इस बात पर निर्भर है कि उसके ऊपर-नीचे कितने प्राप्तांक स्थित हैं, न कि इस बात पर कि उससे प्राप्तांक कितनी दूरी पर स्थित हैं।
  3. मध्यांक की गणना क्रमीय स्तर (Ordinal level) के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
  4. वितरण के सिरों पर स्थित प्राप्तांक, मध्यांक के मान को कम प्रभावित करते हैं।
  5. मध्यांक की मानक त्रुटि (Standard Error); मध्यमान की मानक त्रुटि से अधिक किन्तु बहुलक की मानक त्रुटि से कम होती है।

मध्यांक को ज्ञात करना।

मध्यांक की गणना भी ‘आँकड़ों की प्रकृति के अनुसार की जाती है। अव्यवस्थित तथा व्यवस्थित आँकड़ों के मध्यांक को ज्ञात करने की प्रक्रिया का विवरण निम्नलिखित है –

(I) अव्यवस्थित ऑकों का मध्यांक (The Medium of Ungrouped Data) – अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक निकालने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान देते हैं –

(1) सर्वप्रथम अव्यवस्थित आँकड़ों को आरोही क्रम (Ascending Order) या अवरोही क्रम (Descending Order) में रखते हैं।
(2) N की संख्या ज्ञात करके उसमें 1 जोड़ देते हैं और योग को 2 से भाग देकर भागफल निकाल लेते हैं।
(3) भागफल की संख्या वाला पद/स्थान मध्यांक है जिसकी गिनती किसी भी छोर से की जा सकती है।
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11 का विस्तार 10.5 से लेकर 11.5 तक है तथा वर्ग-विस्तार (10.5-11.5) का मध्य-बिन्दु 11 है; अतः मध्यांक =11

(II) व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक (The Median of Grouped Data) – व्यवस्थित या वर्गीकृत आँकड़ों का मध्यांक ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित पदों का अनुसरण करना चाहिए –

  1. सर्वप्रथम आवृत्ति वितरण तालिका से दी गयी आवृत्तियों को संचयी आवृत्तियों में बदल लेना चाहिए ताकि यह पता लग सके कि मध्यांक किस वर्गान्तर में है।
  2. इस भाँति उस वर्ग को ज्ञात किया जाता है जिसमें आवृत्तियों के योग के आधार ()[latex]\frac { N }{ 2 } [/latex] स्थित हो। इसे मध्यांक वर्ग कहते हैं।
  3. मध्यांक वर्ग ज्ञात करने के बाद ‘F’, ‘fm’ तथा ” संकेतों के मूल्य ज्ञात करके प्राप्त मूल्यों को निम्नलिखित सूत्र में स्थापित कर मध्यांक की गणना कर लेनी चाहिए –

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हल – प्रश्न में मध्यांक वह बिन्दु होगा जिसके ऊपर ([latex]\frac { 24 }{ 2 } [/latex]) = 12 प्राप्तांक हों। अवलोकन से ज्ञात होता है कि मध्यांक मान 30-39 वाले वर्ग में स्थित है जिसके सम्मुख संचयी आवृत्ति 14 लिखी है।
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विशेष परिस्थितियाँ – आवृत्ति वितरण में मध्यांक की गणना करते समय कुछ विशेष परिस्थितियाँ भी उपस्थित हो सकती हैं जो इस प्रकार हैं –

(i) यदि आवृत्ति वितरण में f का मान °0 दिया गया हो यानी आवृत्ति वितरण के ठीक मध्य में एक अन्तराल (Gap) हो तो मध्यांक की गणना का सूत्र होगा –
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उदाहरण 6 – में 22-24 वर्गान्तर की आवृत्ति ‘0’ है यानी वितरण के ठीक मध्य में एक अन्तराल (Gap) है; अतः यहाँ सूत्र Md = [latex]\frac { L+U }{ 2 } [/latex] प्रयुक्त होगा।
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उदाहरण 7 – में तीन क्रमागत वर्गान्तरों (85-89), (80-84), (75-79) की आवृत्ति ‘0’ दिखायी दे रही है। वितरण में कुल वर्गान्तरों की संख्या 9 है। यहाँ मध्य का वर्गान्तर 80-84 है; अतः =795 और U = 84.5।
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प्रश्न 10.
‘बहुलाक या ‘भूयिष्क (Mol) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। बहुलाक की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसकी गणना की प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिए।
या
बहुलक किसे कहते हैं?
उत्तर :
बहुलांक (Mode) को हिन्दी में भूयिष्ठक’ भी कहते हैं। यह वह मूल्य या बिन्दु है जिसकी अधिकतम आवृत्ति होती है। सबसे अधिक घनत्व वाले बिन्दु को भी बहुलोक कहते हैं। इस प्रकार से वह मूल्य जिसके आसपास सर्वाधिक श्रेणियाँ केन्द्रित हों बहुलांक कहलाएगा।

उदाहरण 1 – मान लीजिए हमने किसी कक्षा के 15 छात्रों का भार ज्ञात किया जो किग्रा में निम्न प्रकार है –
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हल – इस सारणी में 15 छात्रों में से 6 छात्र ऐसे हैं जिनका भार 51 किग्रा है अर्थात् सर्वाधिक आवृत्ति 51 किग्रा है अर्थात् इन आँकड़ों का बहुलांक 51 किग्रा है।

निष्कर्षतः, सांख्यिकीय आँकड़ों में जिस पद की आवृत्ति अधिकतम हो वह पद बहुलांक कहलाता है।

बहुलांक की परिभाषा
(Definition of Mode)

‘बहुलांक’ को अंग्रेजी में ‘Mode’ कहा गया है। ‘Mode’ शब्द की व्युत्पत्ति फ्रेंच भाषा के ‘la mode’ से हुई है जिसका अर्थ फ्रेंच में फैशन या ‘रिवाज से लिया जाता है। जो वस्तु या मूल्य सर्वाधिक फैशन या चलन में होता है, बहुलांक कहलाती है। उदाहरण के लिए—जूते की दुकान पर उस माप के जूते सबसे ज्यादा संख्या में होंगे जो सबसे ज्यादा लोगों की माप है। इसी भाँति, कपड़े की दुकान पर उस माप के कपड़े अधिक संख्या में होंगे जो अधिकांश लोगों की माप है। यह माप ही बहुलांक है। बहुलांक को Mo से प्रदर्शित किया जाता है।

बहुलांक को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया जा सकता है –

  1. गिलफोर्ड के अनुसार, “किसी वितरण में वह बिन्दु, जिसकी आवृत्ति सर्वाधिक हो, बहुलांक कहलाता है।
  2. क्रॉक्सटन ऐवं काउडेन के अनुसार, “एक श्रेणी का बहुलांक वह मूल्य है जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं।”
  3. ए० एम० टुटले के मतानुसार, “बहुलांक वह मूल्य है जिसके तुरन्त आस-पास आवृत्ति घनत्व अधिकतम होता है।”

बहुलांक की विशेषताएँ
(Characteristics of Mode)

बहुलांक की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. बहुलांक केन्द्रीय प्रवृत्ति को स्थिर एवं विश्वसनीय मान नहीं है, किन्तु इसकी गणना अन्य केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों की अपेक्षा अधिक सरल है।
  2. अव्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक की स्थिति सुनिश्चित नहीं होती; अत: ऐसे समूहों में एक से ज्यादा भी बहुलांक हो सकते हैं।
  3. बहुलांक को वर्गीय स्तर (Nominal Level) के प्राप्तांकों की केन्द्रीय प्रवृत्ति का एकमात्र तथा सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। ऐसी दशाओं में यह केन्द्रीय प्रवृत्ति का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करता है।

अव्यवस्थित आँकड़ों का बहुलक ज्ञात करना
(The Mode of Ungrouped Data)

अव्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक वह प्राप्तांक होता है जो सबसे अधिक बार दोहराया गया हो, अर्थात् जिसकी आवृत्ति सबसे अधिक हो।

उदाहरण 2 – एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग में निम्नलिखित त्रुटियाँ प्राप्त हुई, इनका बहुलक ज्ञात कीजिए –
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हल – निरीक्षण से ज्ञात होता है कि 13 अंक 3 बार दोहराया गया है, जो सबसे अधिक है अर्थात् इसकी आवृत्ति 3 है। अतः अभीष्ट बहुलांक 3 होगा।

व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक
(The Mode of Grouped Data)

व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलक ज्ञात करने के प्रमुख दो सूत्र हैं –
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इस सूत्रे से बहुलांक की गणना के लिए पहले मध्यमान ज्ञात किया जाता है फिर मध्यांक। मध्यांक में 3 का गुणा करते हैं तथा मध्यमान में 2 का। पहली संख्या में से दूसरी घटाकर बहुलक ज्ञात कर लेते हैं। इस सूत्र की सहायता से बहुलक का सन्निकट मान प्राप्त होता है।
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यहाँ, Mo = बहुलांक (Mode)

L1 = उस वर्गान्तर की निम्नतम सीमा है जिसमें आवृत्तियों की संख्या सर्वाधिक है,
fa = यह उस वर्ग की आवृत्ति है जो बहुलांक मान वाले वर्ग के पास हो तथा जिसकी निम्नतम सीमा बहुलांक व मान वाले वर्ग की निम्नतम सीमा से अधिक हो (Post-modal Class),
fb = यह उस वर्ग की आवृत्ति है जो वर्ग बहुलांक मान वाले वर्ग के पास है तथा जिसकी निम्नतम सीमा बहुलांक मान वाले वर्ग की निम्नतम सीमा से कम हो (Pre-Modal Class), तथा
C.I.= वर्गान्तर

उदाहरण 3 – नीचे दी गयी व्यवस्थित अंक सामग्री से बहुलांक की गणना कीजिए –
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नोट – सूत्र (1) द्वारा ज्ञात Mo का मान 29.16 है, जबकि सूत्र (2) द्वारा ज्ञात Mo को मान 33.79 आता है। दोनों मान भिन्न हैं क्योंकि सूत्र (1) की सहायता से सन्निकट मान प्राप्त होता है।

उदाहरण 4 – नीचे दी गयी सारणी की बहुलक मान ज्ञात कीजिए –
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मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक पर अभ्यास के लिए कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर,

1. निम्नलिखित आँकड़ों का मध्यमान तथा मध्यांक ज्ञात कीजिए –
5, 6, 6, 4, 7, 9, 10, 15, 13, 22

2. निम्नलिखित प्राप्तांकों का मध्यांक तथा बहुलांक ज्ञात कीजिए –
72, 80, 84, 88, 92, 76, 78,72,74, 72, 80, 62

3. निम्नलिखित व्यवस्थित अंक सामग्री से मध्यमान तथा बहुलांक की गणना कीजिए (N=70) –
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4. नीचे दी गयी सारणी का मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलांक ज्ञात कीजिए (N = 72) –
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5. नीचे दिये गये आवृत्ति वितरण की मदद से केन्द्रवर्ती मान ज्ञात कीजिए (N=84) –
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6. निम्न व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान, मध्यांक व बहुलांक ज्ञात कीजिए –
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7. कक्षा 11 के छात्रों की मनोविज्ञान में परीक्षा के प्राप्तांकों का आवृत्ति वितरणनीचे है। इनके द्वारा मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक ज्ञात कीजिए (N=38) –
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समंकों (Data) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
समंकों की मुख्य विशेषताएँ सांख्यिकी का सम्बन्ध समंकों से होता है। समंकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) समंक तथ्यों के समूह होते हैं  इसका अभिप्राय यह है कि किसी एक तथ्य से सम्बन्धित संख्या समंक नहीं कही जा सकती है, क्योंकि एक संख्या से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए-यदि किसी विद्यार्थी के हिन्दी में प्राप्तांक 40 हैं तो ये प्राप्तांक समंक नहीं कहे जाएँगे, परन्तु यदि उस कक्षा के समस्त विद्यार्थियों के प्राप्तांक दिये हुए हैं तो इन प्राप्तांकों को समंक कहा जाएगा।

(2) समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं – सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही समंक कहलाते हैं, न कि गुणात्मक रूप में व्यक्त किये गये तथ्य उदाहरणार्थ–तथ्यों का गुणात्मक रूप; जैसे तीव्र बुद्धि, सामान्य, मन्द बुद्धि समंक नहीं कहलाएँगे; परन्तु यदि इन तथ्यों को हम संख्यात्मक रूप में व्यक्त कर दें तो वे संख्याएँ समंक कही जाएँगी; जैसे-बुद्धि को संख्यात्मक रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है –

(3) समंकों के संकलन में उचित शुद्धता होनी चाहिए – समंकों के संकलन में उनकी शुद्धता पर काफी ध्यान देना चाहिए। समंकों की शुद्धता की मात्रा अनुसन्धान के क्षेत्र, उद्देश्य, साधन, समय आदि पर निर्भर करती है।

(4) समंकों को एक-दूसरे से सम्बन्धित रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए – इसका तात्पर्य यह है कि समंक सजातीय तथा समरूप होने चाहिए, तभी उनकी आपस में तुलना की जा सकती है। जैसे-यदि हम किसी कक्षा के एक विद्यार्थी के गणित में प्राप्तांक लिख लें और दूसरे विद्यार्थी की आयु लिख लें तो इन संख्याओं को हम समंक नहीं कह सकते; क्योंकि इन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों विद्यार्थियों के गणित में प्राप्तांक या दोनों की आयु ही लिखें तो वे समंक कहलाये जा सकते हैं।

(5) समंकों के संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है – वे संख्यात्मक तथ्य ही समंक कहे जाएँगे जिनके संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है। बिना उद्देश्य के एकत्रित किये गये आँकड़े समंक नहीं बल्कि केवल संख्याएँ ही कहलाते हैं।

(6) समंक अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं – समंकों पर अनेक कारणों को सामूहिक रूप से प्रभाव पड़ता है। कोई एक घटना किसी एक कारण का परिणाम नहीं होती, अपितु अनेक कारणों से प्रभावित होती है। जैसे-यदि हाईस्कूल की परीक्षा में अधिक विद्यार्थियों की प्रथम श्रेणी है तो प्रथम श्रेणी के अनेक कारण हो सकते हैं। हो सकता है विद्यार्थी अधिक संख्या में प्रतिभावान हों, अधिक परिश्रम से पढ़ते हों, निरीक्षक उदार हों आदि।

(7) सर्मक व्यवस्थित रूप से संकलित होते हैं – समंक एकत्रित करने के लिए एक निश्चित योजना तैयार की जाती है तथा उन आँकड़ों का विश्लेषण करके समुचित तथा तर्कसंगत निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। संगणकों को आँकड़े एकत्रित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। समंक प्रश्नावली तथा अनुसूची के अनुसार एकत्र किये जाते हैं।

(8) समंकों को गणना या अनुमान द्वारा संकलित किया जाता है – संमकों को गणना अथवा अनुमान द्वारा एकत्रित किया जाता है। यदि अनुसन्धान का क्षेत्र सीमित है तो गणना द्वारा समंकों का संकलन,किया जा सकता है और यदि क्षेत्र विस्तृत है तो अनुमान द्वारा ही समंकों का संकलन सम्भव है।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान में सांख्यिकीय अध्ययन की कोई चारे उपयोगिताएँ बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व

आधुनिक युग में मनोविज्ञान के अध्ययनों में सांख्यिकी का अपना एक विशिष्ट स्थान है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। सच तो यह है कि मनोवैज्ञानिक सांख्यिकी का प्रयोग अपनी पसन्द या नापसन्द के आधार पर नहीं करता बल्कि आँकड़ों की प्रकृति के कारण सांख्यिकी का प्रयोग उसे अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। सांख्यिकीय विधियाँ उपकल्पना की जाँच, व्यक्तिगत विभिन्नताओं के मापन तथा जटिल मानव-व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सांख्यिकी के प्रयोग से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणाम निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा वैध बन जाते हैं और उनके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना सम्भव होता है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व इस प्रकार है

(1) मनोविज्ञान की समस्याओं के अध्ययन में एकत्र किये गये आँकड़े जटिल, अतुलनीय एवं अस्पष्ट होते हैं। सांख्यिकीय विधियों से अव्यवस्थित समंकों को व्यवस्थित रूप में वर्गीकृत करके सारणी, चित्रों व रेखाचित्रों के माध्यम से सरल व बोधगम्य रूप से प्रदर्शित किया जाता है।

(2) मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के सम्बन्ध में सांख्यिकी की मदद से वस्तुगत (Objective) तथा शुद्ध (Accurate) परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

(3) सांख्यिकीय अध्ययनों से कुछ निष्कर्ष प्राप्त होते हैं जो तथ्यों की वैधानिक व्याख्या कर सकते हैं। सामान्य निष्कर्षों के निर्धारण में भी सांख्यिकी का महत्त्व है; क्योंकि ये निष्कर्ष सांख्यिकीय सूत्रों व नियमों के आधार पर निकाले जाते हैं।

(4) मनोविज्ञान से सम्बन्धित तुलनात्मक अध्ययनों में शुद्ध विश्वसनीय परिणाम निकाले जा सकते हैं। साथ ही तुलना ज्यादा सरल हो जाती है। उदाहरणार्थ-बालकों की बुद्धि की तुलना बुद्धि-लब्धि (1.2.) द्वारा सम्भव है।

(5) सांख्यिकीय अध्ययनों के आधार पर व्यवहार से सम्बन्धित निष्कर्षों के आधार मनोवैज्ञानिक पूर्वकथन या भविष्यवाणी कर सकते हैं।

(6) मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्राय: अध्ययन प्रतिदर्श (Sample) पर आधारित होते हैं। प्रतिदर्श समष्टि (Universe) का प्रतिनिधि होता है। सांख्यिकी विधियाँ प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रतिदर्श का चयन करने में सहायक हैं।

(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण में सांख्यिकी का अत्यधिक महत्त्व है। मानसिक व शारीरिक योग्यताओं के मापन हेतु बहुत-से मनोवैज्ञानिक परीक्षण निर्मित होते हैं; उदाहरणार्थ-बुद्धि परीक्षण, व्यक्तित्व परीक्षण तथा रुचि परीक्षण आदि।

स्पष्टत: मेनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3.
आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आँकड़ों के व्यवस्थापन यो आवृत्ति वितरण का महत्त्व

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रतिपादित किया जा सकता है –

(1) संगृहीत किन्तु अव्यवस्थित आँकड़ों से तत्सम्बन्धी समस्या या अध्ययन विषय के परिणाम के सम्बन्ध में उचित निर्णय लेने में कठिनाई होती है। आँकड़ों को व्यवस्थित करने अर्थात् आवृत्ति वितरण बनाने पर ये ही आँकड़े संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य महसूस होते हैं और इनके द्वारा परिणामों के बारे में सरलतापूर्वक उचित निर्णय दिया जा सकता है।

(2) व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का संक्षिप्त प्रदर्शन सम्भव है। अर्थात् आवृत्ति वितरण आँकड़ों को अर्थपूर्ण बनाने का एक सरल उपाय है। वस्तुतः अव्यवस्थित आँकड़े अर्थहीन होते हैं जिनके गुण-दोषों को सामान्यतः व्यक्ति ग्रहण नहीं कर पाता है। आवृत्ति वितरण तालिका में प्रदर्शित होकर ये ही आँकड़े अर्थपूर्ण बन जाते हैं जिन्हें व्यक्ति सरलता से ग्रहण कर लेता है।

(3) सारणीयन में आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के उपरान्त तालिका (Table) का सिर्फ अवलोकन करके ही आँकड़ों का अर्थ ज्ञात किया जा सकता है।

(4) आवृत्ति वितरण तालिका के माध्यम से समान या सजातीय गुण (Homogeneous Characters) पूरी तरह स्पष्ट हो जाते हैं।

(5) आवृत्ति वितरण से आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन एकदम सरल हो जाता है।

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्त्व को हम एक उदाहरण के माध्यम से अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। मान लीजिए, हमें कक्षा XI के छात्रों की अंक-सूची (Marks-list) प्राप्त है। क्योंकि ये अंक अव्यवस्थित हैं; अतः इनसे परीक्षण के परिणाम के बारे में उचित निर्णय देना दुष्कर होगा। इन प्राप्तांकों को सुव्यवस्थित करैने पर अर्थात् इनका आवृत्ति वितरण तैयार करने पर यही अंक-सूची एक संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य स्वरूप में हमारे सामने आ जाएगी। अब हम इसके माध्यम से आसानी से बता पाएँगे कि कितने छात्रों ने प्रथम श्रेणी, कितनों ने द्वितीय और तृतीय श्रेणी प्राप्त की है तथा कितने छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुए हैं।

प्रश्न 4.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्व एवं उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य : महत्त्व और उपयोगिता

माध्य के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए प्रो० फिशर ने कहा है कि विशाल संख्यात्मक तथ्यों को समझाने के लिए माध्य बहुत उपयोगी अंक है। सांख्यिकीय में माध्य के अत्यधिक महत्त्व के कारण ही डॉ० बाउले ने तो सांख्यिकी को माध्यों का विज्ञान (Science of Averages) तक कह दिया है। सांख्यिकी विश्लेषण की दूसरी अनेक विधियाँ माध्य पर ही अवलम्बित हैं।

व्यक्तिगत इकाइयों का सांख्यिकी में कोई महत्त्व या उपयोगिता नहीं है किन्तु माध्यों के द्वारा सभी इकाइयों की सामूहिक विशेषताओं व लक्षणों को आसानी से प्रकट किया जा सकता है। इसी प्रकार एक व्यक्ति की आये या आयु का कोई महत्त्व नहीं है, किन्तु सम्पूर्ण समाज की औसत आय या आयु का अत्यधिक महत्त्व है। इस तरह माध्य का समाज में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। माध्य के महत्त्व पर प्रो० टिप्पेट ने इस प्रकार प्रकाश डाला है—“माध्य की अपनी सीमाएँ (कमियाँ)होती हैं, किन्तु यदि उनको स्वीकार किया जाए तो कोई भी एक सांख्यिकीय संख्या माध्य से अधिक उपयोगी नहीं होती है।”

गैरेट (H.E. Garrett) ने केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का महत्त्व इस प्रकार प्रतिपादित किया है –

  1. केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप समूह के प्राप्तांकों का प्रतिनिधित्व करती है।
  2. यह समूचे समूह के गुणों को संक्षेप में प्रदर्शित कर देती है।
  3. इसकी सहायता से दो या दो से अधिक समूह के कार्यों एवं गुणों का बोध व उनकी तुलना आसानी से की जा सकती है।
  4. इनके द्वारा ढेर सारे प्राप्तांकों के अर्थ को सिर्फ कुछ अंकों या शब्दों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
  5. प्रामाणिक विचलन (Standard Deviation) तथा सह-सम्बन्ध (Correlation) जैसे उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप आवश्यक होती है।
  6. उच्च सांख्यिकीय अध्ययनों में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप का प्रयोग प्राथमिक सांख्यिकीय विधियों के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 5.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकी माध्य की प्रमुख विशेषताओं एवं गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की
प्रमुख विशेषताएँ एवं गुण

‘केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का आदर्श माध्य में निम्नलिखित विशेषताएँ तथा गुण अनिवार्य रूप से होने चाहिए –

(1) सरल – एक अच्छी माध्य वही हो सकता है जो समझने तथा गणना करने में सरल हो। इससे उसका उपयोग व्यापक रूप में किया जा सकती है।

(2) स्पष्टता और निश्चितता – माध्य की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए। उसकी कितनी ही बार गणना की जाये, उसका मान हमेशा ही समान आना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के अनुमान की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। परिभाषा में भिन्न-भिन्न अर्थ न निकले।।

(3) प्रतिनिधित्व – माध्य ऐसा होना चाहिए कि समंक माला अर्थात् समूह के प्रमुख-प्रमुख लक्षण उसमें दिखाई दें। समग्र के प्रत्येक पद में उसके निकट रहने की प्रवृत्ति दिखलाई दे।

(4) बीजगणितीय क्रियाओं के योग्य – माध्य ऐसा हो कि उससे बीजगणितीय क्रियाएँ अर्थात् । जोड़, बाकी, गुणा एवं भाग आसानी से की जा सकें।

(5) माध्ये एक निरपेक्ष संख्या होनी चाहिए – माध्यम समंक माला की संख्याओं में हो,.न कि प्रतिशत या दूसरे सापेक्ष रूप में।

(6) न्यादर्श में परिवर्तन से माध्य बहुत कम प्रभावित हो। न्यादर्श के बदल जाने से माध्य में परिवर्तन न हो या क-से-कम हो। समग्र में से एक तरीके से अनेक न्यादर्श चुने जाये जिनके माध्य लगभग समान हों।

(7) समंक माला के सभी पदों पर आधारित होना चाहिए – माध्य किसी एक पद पर आधारित न हो, तभी माध्य समग्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

(8) माध्ये सीमान्त पदों से अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए, वह सभी पदों पर आधारित हो।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाओं या दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाएँ या दोष

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की प्रमुख सीमाएँ या दोष निम्नलिखित हैं –

  1. सांख्यिकीय माध्य से सिर्फ समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं को ही समझा जा सकता है, ये व्यक्तिगत विशेषताओं का वर्णन नहीं करते।
  2. यदि समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं में विषमता पायी जाये तो उस दशा में सांख्यिकी माध्य समूह की प्रतिनिधित्व नहीं करते, जिसका परिणाम यह होता है कि उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण के दौरन दूषित और भ्रामक निष्कर्ष निकलते हैं।
  3. अलग-अलग तरह के सांख्यिकी विश्लेषण में सांख्यिकीय माध्य के अलग-अलग मापक भिन्न परिणाम प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 7.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए तथा इनका तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के प्रकार

सांख्यिकी में माध्य कई प्रकार के होते हैं जिनमें से प्रमुख माध्ये निम्नलिखित हैं –

  1. मध्यमान (Mean)
  2. मध्यांक माने (Median) तथा
  3. बहुलांक मान (Mode)।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की विभिन्न मापों की तुलना

मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक – केन्द्रीय प्रवृत्ति की इन तीन मापों में समानता या विषमता, आवृत्ति वितरण की प्रकृति पर निर्भर है। इस विषय में निम्नलिखित दशाएँ अनुभव में आती हैं –

(1) सममित (Symmetrical) आवृत्ति वितरण की स्थिति में मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक तीनों को मान समान आता है।
(2) विषमता (Skewness) आवृत्ति वितरण होने पर इन तीनों अर्थात् मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक के मान भिन्न-भिन्न आते हैं। यहाँ दो स्थितियाँ सम्भव हैं –
(a) धनात्मक विषमता (Positively Skewed Distribution) में मध्यमान का मूल्य कम, मध्यांक को मध्यमान से अधिक तथा बहुलांक का मध्यांक से भी अधिक होता है।
(b) ऋणात्मक विषमता (Negatively Skewed Distribution) में मध्यमान का मान सबसे अधिक, मध्यांक का मान उससे कम तथा बहुलांक का मान सबसे कम होता है।
(3) मध्यमान सबसे अधिक शुद्ध, मध्यांक अपेक्षाकृत कम शुद्ध तथा बहुलांक सबसे कम शुद्ध मान स्वीकार किये गये हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
प्रो० सेलिगमैन ने सांख्यिकी की एक स्पष्ट परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है, सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आंकड़ों का संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की किन्हीं दो विशेषताओं के बारे में लिखिए।
उत्तर :

  1. सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है।
  2. सांख्यिकी में किसी अनुसंधान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी की मुख्य सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य है कि सांख्यिकी की अत्यधिक उपयोगिता एवं महत्त्व है, परन्तु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी के माध्यम से केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन किया जा सकता है, इसके माध्यम से गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सांख्यिकी के माध्यम से विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता है। यही नहीं, इसके माध्यम से केवल समूह का अध्ययन किया जा सकता है, व्यक्ति का नहीं। बिना सन्दर्भ से सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम असत्य तथा भ्रामक होते हैं। सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम केवल औसत रूप में ही सही हैं। वास्तव में, सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं। इन्हीं सीमाओं को ध्यान में रखते हुए यूल तथा केण्डाल ने कहा है, “सांख्यिकीय राीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती हैं।”

प्रश्न 4.
प्रदत्त (Data) से क्या आशय है?
उत्तर :
प्रदत्त (Datum) वह तथ्य या सूचना है जिसके आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं। किसी परीक्षा में प्राप्तांकों को प्रदत्त कहा जा सकता है। यह परीक्षा उनके व्यवहार के किसी भी पहलू से सम्बन्धित हो सकती है। उदाहरण के लिए-यदि कक्षा बारह के छात्रों की मनोविज्ञान विषय में परीक्षा ली जाये तो परीक्षा में छात्रों को जो प्राप्तांक प्राप्त होंगे उन्हें प्रदत्त कहा जाएगा। प्रयोगों, शोध कार्य या सर्वेक्षणों में जो आँकड़े सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं, उन्हें भी प्रदत्त कहा जाता है। अंग्रेजी में Data शब्द बहुवचन है जबकि Datum शब्द एकवचन।

प्रश्न 5.
प्राप्तांक (Score) के अर्थ एवं सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
“किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षा में प्राप्तांक का अभिप्राय उस इकाई से है जो दो सीमान्तों के बीच होती है। उदाहरणार्थ-किसी छात्र के बुद्धि-परीक्षण में 130 प्राप्तांक का अर्थ दो सीमान्तों 129.5-130.5 में लगाया जाता है। यहाँ 130 प्राप्तांक 129.5-130.5 का मध्य-बिन्दु है।

सांख्यिकी में किसी भी प्राप्तांक का विस्तार (Interval) दी गई संख्या से आधा इकाई कम से लेकर आधार इकाई अधिक तक माना जाता है। इस भाँति प्रत्येक प्राप्तांक का प्रसार क्षेत्र (Range) एक के बराबर होता है। किसी प्राप्तांक की दो सीमाएँ हैं—उसकी उच्चतम सीमा (Upper limit) तथा उसकी निम्नतम सीमा (Lower limit)। प्राप्तांक की उच्चतम सीमा ज्ञात करने के लिए उसमें 0.5 जोड़ देना चाहिए तथा निम्नतम सीमा ज्ञात करने के लिए उसमें से 0.5 घटा देना चाहिए। प्राप्तांक 130 से हमारा अभिप्राय- 129.5 से लेकर 130.5 तक है तथा प्राप्तांक 130 का मान इन दोनों सीमाओं के मध्य कोई भी हो सकता है। 130.5 इस प्राप्तांक की उच्चतम सीमा तथा 129.5, इसकी निम्नतम सीमा है। प्राप्तांक 150 की उच्चतम सीमा 150 + 0.5 अर्थात् 15.5 तथा निम्नतम सीमा 150-0.5 = 149.5 होगी।। इसी भाँति 151 प्राप्तांक की निम्नतम सीमा 150.05 तथा उच्चतम सीमा 151.5 होगी। इसे निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं –
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प्रश्न 6.
सांख्यिकी में प्रसार क्या है?-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी में प्राप्तांकों में परिवर्तनशीलता की मापों को ज्ञात किया जाता है। परिवर्तनशीलता की एक माप को प्रसार (Range) कहा जाता है। यह परिवर्तनशीलता की एक स्थल माप है। जब किसी अध्ययन के दौरान अध्ययनकर्ता के पास कम समय होता है तथा वह प्राप्तांकों के विवरण की परिवर्तनशीलता को जानना चाहता है तो उस स्थिति में विवरण के प्रसार को ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है। नियमानुसार प्रसार को निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है –
प्रसार (Range)= (उच्चतम प्राप्तांक-न्यूनतम प्राप्तांक) +1
उदाहरण-उच्चतम प्राप्तांक 80, न्यूनतम प्राप्तांक 5
प्रसार = (80 – 5) + 1 = 76

प्रश्न 7.
मध्यमान (Mean) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :
मध्यमान में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. मध्यमान दिये गये वितरण का केन्द्र या सन्तुलन बिन्दु होता है।
  2. मध्यमान की स्थिति वितरण के प्रत्येक प्राप्तांक से प्रभावित होती है। उदाहरणार्थ—प्राप्तांकों में से किसी प्राप्तांक को घटाने या बढ़ाने पर वितरण का मध्यमान भी घट या बढ़ जाएगा।
  3. वितरण के सभी प्राप्तांकों को एक निश्चित संख्या से गुणा करने पर मध्यमान का मान उस संख्या के गुणनफल के बराबर हो जाएगा।
  4. केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापों में मध्यमान एक निष्पक्ष (Unbiased) सांख्यिकी है जिसमें मानक त्रुटि (Standard Error) कम होती है।

प्रश्न 8.
मध्यसान के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यमान के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप मध्यमान है।
  2. यह सबसे अधिक विश्वसनीय सांख्यिकी है।
  3. इसकी गणना शीघ्र तथा सरलता से हो जाती है।
  4. मध्यमान वितरण के प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व करता है।
  5. केन्द्रीय प्रवृत्ति की अन्य मापों की अपेक्षा मध्यमान की मदद से तुलना करना अधिक सरल
  6. प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध गुणांक जैसी सांख्यिकी गणनाओं में मध्यमान की गणना जरूरी है।

प्रश्न 9.
मध्यमान के मुख्य दोषों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि इसका प्रयोग कब उचित होता है?
उत्तर :
मध्यमान के कुछ दोष ये हैं –

  1. मुक्त सिरों वाले या अपूर्ण प्राप्तांक वितरण के अन्तर्गत मध्यमान प्रयोग नहीं किया जा सकता।
  2. इसी प्रकार असामान्य अंक-वितरण के अन्तर्गत भी मध्यमान की जगह मध्यांक का प्रयोग उचित समझा जाता है।

मध्यमान का प्रयोग कब और कहाँ करना उचित है, इसके लिए कुछ निर्देश नीचे दिये जा रहे

  1. सबसे अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय केन्द्रीय प्रवृत्ति ज्ञात करने हेतु मध्यमान का प्रयोग किया जाता है।
  2. जब बहुलांक, प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध आदि की गणना करनी हो, तब भी मध्यमान की गणना आवश्यक होती है।
  3. सामान्य वितरण (अर्थात् जब दिये गये प्राप्तांकों के सभी अंक समान रूप से वितरित हों) के अन्तर्गत भी मध्यमान प्रयुक्त होती है।
  4. मध्यमान की गणना तुलनात्मक अध्ययन के समय भी आवश्यक होती है।

प्रश्न 10.
मध्यांक (Median) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. सरलता – मध्यांक को ज्ञात करना तथा इसे समझना दोनों ही बहुत आसान हैं।
  2. चरम मूल्यों से अप्रभावित – मध्यांक के मूल्य पर श्रेणी के सबसे बड़े या छोटे मूल्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  3. गुणात्मक विशेषताओं के अध्ययन में उपयोगी – गुणात्मक तथ्य; जैसे-बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, ईमानदारी, गरीबी आदि के निर्धारण में यह अति उपयोगी होता है।
  4. निश्चितता – मध्यांक का मूल्य बहुलांक की भाँति अस्पष्ट और अनिश्चित नहीं होता है।
  5. अधूरे समंक से मध्यांक निर्धारण सम्भव है। केवल मध्यांक वर्ग तथा कुछ दूसरी सूचनाएँ मिल जाने पर ही इसको ज्ञात कर सकते हैं। सम्पूर्ण पदमाला की जानकारी जरूरी नहीं।
  6. इसको बिन्दुरेख विधि से भी ज्ञात कर सकते हैं। निरीक्षण से भी मध्यांक का निर्धारण किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
मध्यांक (Median) के मुख्य दोषों या सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के मुख्य दोष या सीमाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. सीमान्त मूल्यों की उपेक्षा – सामान्यत: मध्यांक निर्धारण में श्रेणी के सीमान्त पदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस तरह मध्यांक में सभी पदों को समान महत्त्व नहीं देते हैं।
  2. आवश्यक क्रियाएँ – श्रेणी को आरोही या अवरोही आधार पर व्यवस्थित करने का कार्य अनिवार्य रूप से करमा पड़ता है।
  3. निर्धारण में कठिनाई – यदि मध्य पद दो मूल्यों के बीच आता है, तब मध्यांक मूल्य बिल्कुल ठीक नहीं होता है। केन्द्रीय मूल्यों के औसत को मध्यांक लिया जाता है। इसी तरह सतत श्रेणी में भी यह इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक वर्ग में आवृत्तियाँ समान हैं।
  4. कभी-कभी मध्यांक एक प्रतिनिधि माप नहीं होता है विशेषकर पदों की संख्या कम होने पर।
  5. मध्यांक बीजगणितीय विवेचन में अनुपयोगी रहता है। मध्यांक मूल्य को पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों के मूल्यों का योग मालूम नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 12.
मध्यांक के उचित प्रयोग सम्बन्धी कुछ निर्देश दीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के उचित प्रयोग हेतु निम्नलिखित निर्देश दिये जा सकते हैं –

  1. मध्यांक की गणना असामान्य वितरण की स्थिति में करनी चाहिए जबकि अंक सामग्री का वास्तविक मध्य-बिन्दु पता लगाना हो।
  2. श्रेणी के शुरू तथा अन्तर के अंक जब मध्यमान को प्रभावित करते हों तब भी मध्यांक की गणना की जाती है। उदाहरणार्थ – 2, 3, 4, 5, 6 का मध्यमान (M) तथा मध्यांक (Md) 4 है। यदि 6 के स्थान पर 11 हो तो मध्यांक 4 ही रहेगा लेकिन मध्यमान 5 हो जाएगा।
  3. इसकी गणना उस समय की जानी उचित है जबकि अपेक्षाकृत कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की आवश्यकता हो।
  4. बहुलांक (Mode) की गणना के समय भी मध्यांक ज्ञात किया जाता है।

प्रश्न 13.
बहुलांक (Mode) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बहुलांक के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. निर्धारण में सरलता—इसको निरीक्षण अर्थात् देखकर भी तय किया जा सकता है।
  2. बिन्दुरेखीय विधि से भी इसका निर्धारण कर सकते हैं।
  3. प्रतिनिधित्व-बहुलांक मूल्य श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ प्रतिनिधि माना जाता है।
  4. सीमान्त पदों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य में इसका बहुत उपयोग होता है। विशेषकर जूते निर्माताओं, सिले-सिलाये वस्त्र तैयार करने वालों आदि के लिए यह बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 14.
बहुलांक (Mode) के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बहुलांक के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

  1. समान आवृत्तियाँ होने पर इसका निर्धारण कठिन हो जाता है।
  2. सीमान्त मूल्यों की अवहेलना होती है।
  3. बीजगणितीय विश्लेषण सम्भव नहीं है।
  4. श्रेणी के सभी पदों पर आधारित नहीं होता है।
  5. श्रेणी में कभी-कभी बहुलांक भ्रमात्मक होता है।

प्रश्न 15.
बहुलांक (Mode) का प्रयोग किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए?
उत्तर :

बहुलांक का प्रयोग निम्नलिखित परिस्थितियों में करना वांछित है –

  1. सबसे कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की गणना के समय बहुलांक का प्रयोग उचित है।
  2. यदि निरीक्षण-मात्र से ही केन्द्रीय प्रवृत्ति की गणना करनी हो तो बहुलक उपयोगी है।
  3. वितरण के कुछ वर्ग या अंक छूटे होने पर भी बहुलांक का प्रयोग उचित है।
  4. व्यापार में अधिक प्रचलित वस्तु या लोकप्रिय फैशन से जुड़ी समस्या के अध्ययन में बहुलांक का सर्वाधिक प्रयोग होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. बहुवचन में सांख्यिकी शब्द का अर्थ ………………….. से है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं।
  2. ………………….. प्रदत्तों के संग्रह, उनके विश्लेषण तथा निष्कर्ष निकालने का विज्ञान है।
  3. सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही ………………….. कहलाते हैं।
  4. मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुलनात्मक अध्ययन करने में सांख्यिकी ………………….. होती है।
  5. सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, ………………….. का नहीं।
  6. सांख्यिकी द्वारा केवल ………………….. तथ्यों का ही अध्ययन किया जा सकता है।
  7. सांख्यिकी अपने आप में एक साधन है, ………………….. नहीं।
  8. संकलित आँकड़ों को जब एक निश्चित क्रम में लिखा जाता है तो इस भाँति बनी हुई पदमाला या श्रृंखला को ………………….. कहा जाता है।
  9. दिये गये प्रदत्तों के उच्चतम एवं न्यूनतम अंकों के अन्तर को ………………….. कहते हैं।
  10. आँकड़ों को समानता या सजातीयता के आधार पर वर्गों में व्यवस्थित करने को ………………….. कहते हैं।
  11. किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की प्रवृत्ति को ………………….. कहते हैं।
  12. केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप समूह के प्राप्तांकों का ………………….. करती है।
  13. अव्यवस्थित सांख्यिकीय आँकड़ों को व्यवस्थित करके मध्यमान की गणना हेतु ………………….. निर्धारित किया जाता है।
  14. किसी कक्षा के बच्चों के प्राप्तांकों को जोड़कर बच्चों की कुल संख्या से भाग देने पर जो मान प्राप्त होता है, उसे ………………….. कहते हैं।
  15. केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप ………………….. है।
  16. सांख्यिकी में दिये गये प्राप्तांकों को ठीक दो बराबर भागों में बांटने वाले बिन्दु को ………………….. कहते हैं।
  17. आरोही अथवा अवरोही क्रम में लिखे पदों के मध्य पद के रूप को ………………….. कहते हैं।
  18. किसी दी गयी पदमाला में सर्वाधिक बार आने वाले मूल्य को ………………….. कहते हैं।
  19. बहुलांक में श्रेणी के सीमान्त मूल्यों की ………………….. होती है।

उत्तर :

  1. सर्मकों या आंकड़ों
  2. सांख्यिकी
  3. समंक
  4. सहायक
  5. गुणात्मक तथ्यों
  6. सजातीय
  7. साध्य
  8. सांख्यिकी श्रेणी
  9. वर्ग विस्तार
  10. वर्गीकरण
  11. केन्द्रीय प्रवृत्ति
  12. प्रतिनिधित्व
  13. कल्पित मध्यमान
  14. मध्यमान
  15. मध्यमान
  16. मध्यांक
  17. मण्यांक
  18. पुलकि
  19. अपहेलना।

प्रश्न II
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए।

प्रश्न 1.
शाब्दिक रूप से सांख्यिकी (Statlalc) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी’ शब्द दो अर्थों में प्रयोग होता है। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी के सन्दर्भ में समंकों की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. समंक तथ्यों के समूह होते हैं तथा
  2. समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 3.
एक विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की उचित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है, जिससे उन्हें घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की प्रकृति क्या है?
उत्तर :
सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है। इसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 5.
सांख्यिकी के विषय में वॉलिस और “रॉबर्टस का दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर :
बॉलिस और रॉबर्ट्स के अनुसार, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

प्रश्न 6.
‘सांख्यिकीय श्रेणी की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाये कि एक मापनीय अन्तर दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

प्रश्न 7.
सांख्यिकीय श्रेणियों के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

(क) व्यक्तिगत श्रेणी
(ख) असतत या खण्डित या, विच्छिन्न श्रेणी तंथा
(ग) सतत या अखण्डित या अविच्छिन श्रेणी।

प्रश्न 8.
वर्गीकरण की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “वर्गीकरण तथ्यों को उनकी विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर समूह एवं वर्गों में क्रमबद्ध करने की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य विभिन्नताओं के बीच समान तथ्यों को खोजकर एक साथ रखना है।”

प्रश्न 9.
सारणीयन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “सारणीयन किसी विचाराधीन समस्या को स्पष्ट करने के उद्देश्य से किया जाने वाला सांख्यिकी तथ्यों का क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है।’

प्रश्न 10.
प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :

(क) समावेशी विधि
(ख) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला विधि तथा
(ग) अपवर्जी विधि।

प्रश्न 11.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप लिखिए।
उत्तर :

  1. मध्यमान, (Mean)
  2. मध्यांक (Median) तथा
  3. बहुलांक (Mode)

प्रश्न 12.
सांख्यिकीय माध्य या औसत से क्या आशय है?
उत्तर :
वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकी माध्य या औसत कहलाती है।

प्रश्न 13.
मध्यमान (Mean) से क्या आशय है?
उत्तर :
मध्यमान वह मान है जो दिये हुए पदों के योगफल में पदों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।

प्रश्न 14.
अव्यवस्थित प्राप्तांकों से मध्यमान ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
[latex]{ M= }\frac { \Sigma X }{ N } [/latex]
यहाँ M = मध्यमान, ∑ = प्राप्तांकों का योग, N = प्राप्तांकों की संख्या।

प्रश्न 15.
मध्यांक (Median) से क्या आशय है?
उत्तर :
यदि आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाये तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला आँकड़ा मध्यांक कहलाता है।

प्रश्न 16.
बहुलांक (Mode) से क्या आशय है?
उत्तर :
क्राक्सटन एवं काउडेन के अनुसार, “एक श्रेणी का बहुलांक वह मूल्य है। जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं।”

प्रश्न 17.
शुद्धता के दृष्टिकोण से मध्यमान, मध्यांक और बहुतांक या तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
परिणामों की शुद्धता के दृष्टिकोण से मध्यमान को सबसे अधिक शुद्ध, मध्यांक को अपेक्षाकृत कम शुद्ध तथा बहुलांक को सबसे कम शुद्ध माना जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी का प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध है –

(क) विज्ञान से
(ख) संख्यात्मक तथ्यों से
(ग) सुझावों एवं संकेतों से
(घ) गुणात्मक तथ्यों से,

प्रश्न 2.
“सांख्यिकी को संख्यात्मक समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” प्रस्तुत परिभाषा के प्रतिपादक हैं –

(क) डॉ० बाउले
(ख) पर्सन और हार्लोज
(ग) क्रॉक्सटन और काउडेन
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी को माना जाता है –

(क) शुद्ध विज्ञान
(ख) शुद्ध कला
(ग) विज्ञान तथा कला दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता है –

(क) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना
(ख) आँकड़ों को सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण
(ग) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
आँकड़ों के व्यवस्थापन की पद्धति है –

(क) वर्गीकरण
(ख) सारणीयन
(ग) रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
प्राप्तांक 76 की न्यूनतम सीमा है – [2014]

(क) 76
(ख) 76.5
(ग) 755
(घ) 75.

प्रश्न 7.
सांख्यिकी में प्राप्तांक 1 का विस्तार होता है – [2011]

(क) 0.0 से 1
(ख) 0.5 से 1
(ग) 0.5 से 1.5
(घ) 1 से 1.5 8.

प्रश्न 8.
आंकड़े 8, 23, 16, 15, 5, 26, 6, 38, 33, 11 एवं 15 का विस्तार है – (2015)

(क) 5
(ख) 6
(ग) 33
(घ) 38

प्रश्न 9.
केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप हैं – (2008)

(क) मध्यमान तथा सहसम्बन्ध
(ख) मध्यांक तथा
(ग) बहुलक
(घ) मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक।

प्रश्न 10.
अंक वितरण के सभी अंकों को जोड़कर उनकी संख्या से भाग देने पर जो भागफल प्राप्त होता है, उसे कहते हैं – (2010)

(क) प्रतिशतांक
(ख) मध्येमान
(ग) मध्यांक
(घ) प्रसार

प्रश्न 11.
मध्यमान का गुण है –

(क) सर्वाधिक शुद्ध माप
(ख) शीघ्र एवं सरल गणना
(ग) दिये गये प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
किसी सांख्यिकीय वितरण में ऊपर-नीचे दो बराबर भागों में बाँटने वाले बीच के अंक को कहते हैं –

(क) मध्यमान
(ख) मध्यांक
(ग) बहुलक
(घ) प्रतिशतांक

प्रश्न 13.
यदि दिये गये आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाए तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला ऑकड़ा कहलाता है – (2007)

(क) मध्यमान
(ख) मध्यांक
(ग) बहुलांक
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 14.
मध्यांक का दोष है –

(क) सीमान्त मूल्यों की अपेक्षा
(ख) निर्धारण में कठिनाई
(ग) कम पदों की दशा में सही प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता
(घ) उपर्युक्त सभी दोष

प्रश्न 15.
वितरण में जिस अंक की आवृत्ति सर्वाधिक होती है, उसे कहते हैं –

(क) मध्यांक
(ख) बहुलक
(ग) मध्यमान
(घ) चतुर्थांक

प्रश्न 16.
आँकड़े 8, 6, 8, 2, 11, 6, 8 एवं 5 में से है –

(क) मध्यमान
(ख) मानक विचलन
(ग) मध्यांक
(घ) बहुलांक

उत्तर :

  1. (ख) संख्यात्मक तथ्यों से
  2. (ग) क्रॉक्सटन और काउडन
  3. (ग) विज्ञान तथा कला दोनों
  4. (घ) उपर्युक्त सभी
  5. (घ) ये सभी
  6. (ग) 75.57
  7. (ख) 0.5 से 1 8.
  8. (ग) 33
  9. (घ) मध्यमान मध्यांक तथा बहुलेक
  10. (ख) मध्यमान
  11. (घ) उपर्युक्त सभी
  12. (ख) मध्याक
  13. (ख) मध्यांक
  14. (घ) उपर्युक्त सभी दोष
  15. (ख)बहुलक
  16. (घ) बहुलाका

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 11 Psychology in Industry

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 11
Chapter Name Psychology in Industry
(उद्योग में मनोविज्ञान)
Number of Questions Solved 54
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 11 Psychology in Industry (उद्योग में मनोविज्ञान)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) से आप क्या समझते हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भूमिका
(Introduction)

आधुनिक विश्व तेजी से औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में मनुष्यों के व्यवहार की जटिलताओं ने मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी ओर आकर्षित किया। उद्योग-धन्धों से। सम्बन्धित तथा इन क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों का व्यवहार समाज के अन्य क्षेत्रों के निवासियों के व्यवहार से कुछ भिन्न पाया जाता है तथा उनकी समस्याएँ भी कुछ अलग प्रकार की हो जाती हैं। उद्योग से जुड़े लोगों की समस्याओं का अध्ययन करने एवं उनका उचित समाधान ढूंढ़ने के प्रयास ने ‘औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) को जन्म दिया। कालान्तर में मनोविज्ञान ने उद्योग के क्षेत्र में एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है।

औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Industrial Psychology)

‘औद्योगिक मनोविज्ञान’ एक संयुक्त शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है : ‘उद्योग + मनोविज्ञान’ अर्थात् उद्योग जगत से सम्बन्धित मनोविज्ञान। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक मनोविज्ञान, व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें उद्योग सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान की सहायता ली जाती है। श्रमिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना, उनके आवास, स्वास्थ्य व उनके बच्चों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध करना आदि बातों को लेकर मनोविज्ञान ने उद्योग में कदम रखा। मनोविज्ञान में विभिन्न श्रमिक समस्याओं; यथा-कार्य विश्लेषण, कार्य और विश्राम का समय निर्धारण, थकान का प्रभाव, कुशल कार्य और गति तथा मालिक-मजदूर सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित अनुसन्धान कार्य भी हुए। स्पष्टत: उद्योग, उसके कर्मचारियों तथा मालिकों के मानवीय व्यवहार व सम्बन्धों को लेकर जो भी समस्याएँ और तनावपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, उनका निदान तथा समाधान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में असम्भव था। मनोवैज्ञानिकों के सत्प्रयासों से लघु और बड़े सभी उद्योगों में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। यह सम्पूर्ण विवेचन औद्योगिक मनोविज्ञान के अर्थ को अभिप्रकाशित एवं स्पष्ट करता है।

औद्योगिक मनोविज्ञान की परिभाषा
(Definition of Industrial Psychology)

विभिन्न विद्वानों ने औद्योगिक मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) हैरल के अनसार, “औद्योगिक मनोविज्ञान उद्योग और व्यवसाय में लगे लोगों का अध्ययन हैं,

(2) ब्लम के मतानुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।’

(3) स्मिथ के शब्दों में, “व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए औद्योगिक मनोविज्ञान को उन लोगों के व्यवहार का अध्ययन केहकर परिभाषित किया जा सकता है जो अपने मस्तिष्क तथा हाथ के कार्य को जीविका कमाने के लिए अनिवार्य वस्तुओं में बदल लेते हैं।”

उपर्युक्त विवरण के आधार पर औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ‘औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।” औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।

औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व
(Need and Importance of Psychology in the Field of Industry)

मानव-व्यवहार और स्वभाव से प्रभावित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता महसूस की गयी है और इसके महत्त्व में वृद्धि हुई है। औद्योगिक जगत की समस्याएँ न्यूनाधिक रूप से मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ हैं, जिसे मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व एवं प्रकार वर्णित है –

(1) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता – आधुनिक समय में नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप उद्योग-धन्धों का अत्यधिक विकास हुआ है। बड़ी-बड़ी मिलों, कारखानों तथा फैक्ट्रियों में, जहाँ सैकड़ों-हजारों कर्मचारी श्रम में जुटे हों, नाना प्रकार की समस्याओं का प्रादुर्भाव निश्चित है। इन समस्याओं में भौतिक दशाओं से सम्बन्धित समस्याओं के अतिरिक्त बहुत सारी मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ भी होती हैं। ये समस्याएँ मानवीय अध्ययन द्वारा ही हल की जा सकती है; अत: उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने के लिए मनोविज्ञान की आवश्यकवा अनुभव की जाती है।

(2) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – वर्तमान औद्योगिक युग ने घरेलू उद्योगों को गौण बना दिया है। बड़ी मात्रा में मशीनों तथा मजदूरों ने मिलकर राष्ट्रीय एवं व्यापक स्तर पर उत्पादन कार्य शुरू किया तथा दूर-दूर से भारी मात्रा में कच्चा सामान’ मँगाया जाने लगा। कर्मचारियों पर वरयता क्रम में अधिकारी नियुक्त हुए। उनके निरीक्षण में श्रमिकों की कार्यशक्ति और उत्पादन शक्ति बढ़ाकर उत्पादित वस्तुओं को दूर-दूर भेजने का प्रयास किया गया। श्रमिकों की कार्यशक्ति एवं उत्पादन शक्ति बढ़ाने की नयी-नयी युक्तियों की खोज होने के अतिरिक्त मिल-मालिकों तथा श्रमिकों के सम्बन्धों की ओर भी ध्यान दिया गया। इस प्रकार उद्योग का क्षेत्र जटिल से जटिलतम हुआ, समस्याएँ उलझती गईं, जिनके विश्लेषण एवं निराकरण हेतु मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा प्रविधियों का उपयोग किया गया। कालान्तर में उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व स्थायी रूप से अंकित हो गया। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व निम्नांकित कारणों से है –

(1) कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of the Personnel Selection)-उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान ने जो सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य किया, वह कर्मचारियों के चुनाव में सहायता पहुँचाना है। वर्तमान समय में उद्योग के क्षेत्र में विशेषीकरण (Specialization) का बोलबाला है। कार्य का विभाजन और कार्य की हर शाखा में विशेषीकरण आधुनिक उद्योगों का प्रमुख लक्षण है। प्रत्येक कार्य के लिए विशिष्ट निपुणता तथा योग्यता की आवश्यकता है। इस आवश्यकता ने हमारे सामने उपयुक्त कर्मचारियों के चयन की समस्या खड़ी कर दी है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से यह ज्ञात हो जाता है कि किस व्यक्ति में कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में है? उसी के अनुसार कर्मचारियों का चयन किया जाता है और तद्नुसार ही उन्हें कार्य भी प्रदान किया जाता है।

(2) कार्य की परिस्थितियों की समस्या (Problem of working Condition)–वर्तमान समय में उद्योग सम्बन्धी कार्य की परिस्थितियों के निर्धारण में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कर्मचारियों की कार्य करने की दशाओं का उत्पादन और कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान कार्य की परिस्थितियों को समझने में सहायता प्रदान करता है। उत्पादन की वृद्धि हेतु इस बात का अनुभव किया गया कि कार्य करने की विभिन्न परिस्थितियों; जैसे—प्रकाश, तापमान, वायु संचार, विश्राम आदि को अनुकूल बनाया जाए। मनोविज्ञान की सहायता से श्रमिकों के कार्य की परिस्थितियों में उचित सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।

(3) पदोन्नति की समस्या (Problem of the Promotion)-उद्योगों में कार्य की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कर्मचारियों व अधिकारियों के पद निर्धारित हैं। कुछ समय तक कार्यानुभव प्राप्त करने के उपरान्त व्यक्ति को उच्च पद पर भेजने की आवश्यकता महसूस की जाती है। किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की बुद्धि, मानसिक योग्यता, कार्य के प्रति रुचि, कार्य को सीखने की क्षमता आदि की जाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा विधियों की सहायता से की जाती है। जाँच के परिणामों व निष्कर्षों के आधार पर ही किसी कर्मचारी की उपयुक्तता निश्चित की जा सकती है। स्पष्टत: पदोन्नति की समस्या का उचित समाधान मनोविज्ञान पर ही आधारित है।

(4) मानवीय सम्बन्धों की समस्या (Problem of Human Relations)-औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों को महत्त्व प्रदान किया जाने लगा। इससे पूर्व पिछली शताब्दी में श्रमिकों के साथ पशुओं जैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उनसे प्रति दिवस बारह घण्टे से ऊपर कार्य कराया जाता था। इन दशाओं ने उद्योग में मनोविज्ञान का प्रवेश करा दिया जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों के कल्याण पर ध्यान दिया गया। श्रमिकों के आवास, चिकित्सा, प्रशिक्षण, स्त्रियों के लिए कल्याण-केन्द्र तथा उनके बच्चों के लिए समुचित शिक्षा की व्यवस्था को आवश्यक समझा गया। मनोविज्ञान ने लोगों को परस्पर मानवीय दृष्टि से देखने में सहायता दी, मजदूरी यूनियनों ने भी श्रमिक हितों के लिए अथक संघर्ष किया और शनैः-शनैः उद्योगपति श्रमिकों के प्रति उदारता दिखाने लगे। उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की समस्या के निराकरण एवं श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को करने में मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

(5) औद्योगिक संघर्ष की समस्या (Problem of Industrial Conflicts)-कभी-कभी स्वहितों की रक्षार्थ श्रमिकों और मिल-मालिकों के मध्य तनाव एवं संषर्घ की,दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। या तो श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं अथवा मालिकों पर अनुचित दबाव डालकर अधिक लाभ प्राप्त करने चाहते हैं-दोनों ही स्थितियों में औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप हड़ताल और तालाबन्दी की स्थितियाँ जन्म लेती हैं तथा समूचे औद्योगिक क्षेत्र में अशान्ति पैदा हो जाती है। मनोविज्ञान ही श्रमिक वर्ग एवं मिल मालिकों दोनों की मानसिक स्थिति को ठीक-ठीक समझ सकता है। मनुष्यों के दो वर्गों के बीच उत्पन्न इस तनाव की स्थिति को समझकर हल करने का प्रयास मनोविज्ञान की विधियों द्वारा सम्भव है। इस प्रकार औद्योगिक संघर्ष से बचने का उपाय भी मनोविज्ञान के ही पास है।

प्रश्न 2.
कर्मचारी चयन (Personnel Selection) से क्या आशय है? कर्मचारी-चयन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
कर्मचारी चयन के उद्देश्य से कार्य-विश्लेषण तथा कर्मचारी-विश्लेषण की प्रक्रियाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
कर्मचारियों के चयन की समस्या
(Problem of Personnel Selection)

आधुनिक काल के मिल, कारखानों या फैक्ट्रियों में कार्य-विशेषीकरण के आधार पर कार्य का विभाजन हुआ। इस श्रम-विभाजन के कारण उत्पादन कार्य को पूरी गति मिली; अत: हर विभाग के विशेष कार्य हेतु निपुणतम व्यक्ति की खोज हुई। विज्ञापन छापे गये, सैकड़ों अभ्यर्थियों ने नियोक्ताओं (मालिकों) के पास अपने प्रार्थना-पत्र भेजे। अब नियोक्ता अथवा मालिकों के सामने उनमें से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति के चुनाव की समस्या उत्पन्न हुई।

विभिन्न प्रकार के व्यवसायों अथवा कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की आवश्यकता होती है। अनुभव द्वारा पता चलता है कि एक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के व्यवसायों या कार्यों को एक समान कुशलता से नहीं कर सकता; इसी प्रकार से अनेक व्यक्ति एक व्यवसाय या कार्य के लिए एक समान कुशलता भी नहीं अपना सकते। यहाँ यह समस्या उठ खड़ी होती है कि किस भाँति व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसाय तथा व्यवसाय को उपयुक्त व्यक्ति उपलब्ध हो? व्यक्ति के लाभ और सुख की दृष्टि से आवश्यक है कि उसे अपनी सर्वोत्तम योग्यता के अनुकूल कार्य मिले। स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के चयन की समस्या के दो पहलू हैं-एक, व्यक्ति को उसकी सर्वोत्तम योग्यताओं के अनुसार उद्योग में कार्य मिलना, तथा दो, उद्योगों के विभिन्न कार्यों हेतु अभ्यर्थियों में से सर्वोत्तम व्यक्ति का चयन करना। कर्मचारी चयन के नकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों को छाँटकर अलग कर देते हैं तथा ‘स्वीकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों का चयन कर लेते हैं।

कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया
(Process of the Personnel Selection)

कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं – (1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण तथा (2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण। व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण के अन्तर्गत यह ज्ञात किया जाता है कि किसी व्यवसाय के लिए किस तरह के कार्य, किस तरह की कार्य की परिस्थितियों, किस स्तर की शिक्षा, बौद्धिक स्तर तथा मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता है। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत यह पता लगाया जाता है कि कर्मचारी में किस स्तर की बुद्धि है, उसकी कौन-कौन सी मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ हैं। अब हम इन दोनों पक्षों का अलग-अलग विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

(1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण (Job-Analysis)

व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण का अर्थ है कि किसी व्यवसाय से सम्बन्धित पूरी जानकारी प्राप्त करना। उद्योग-धन्धों तथा विभिन्न व्यवसायों के सन्दर्भ में व्यवसाय-विश्लेषण का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। वस्तुतः इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्य के विभिन्न तत्त्वों को फैलाकर उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। कर्मचारी के कर्तव्य तथा कार्य की दशा, के साथ-साथ कर्मचारी की व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन भी किया जाता है। व्यवसाय-विश्लेषण के माध्यम से कार्य के आधारभूत या मूल तत्त्वों का निर्धारण एवं स्पष्टीकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी में अपेक्षित गुण और विशेषताओं का ज्ञान भी हो जाता है।

ब्लम ने व्यवसाय-विश्लेषण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण किसी व्यवसाय के विभिन्न तत्त्वों का सूक्ष्म अध्ययन है। इसका सम्बन्ध न केवल कार्य से सम्बन्धित कर्तव्य और दशाओं से है, वरन् कार्य के लिए अपेक्षित वैयक्तिक योग्यताओं से भी है।”

इस भाँति, व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण का तात्पर्य किसी व्यवसाय या कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित समस्त बातों के सूक्ष्म एवं व्यापक अध्ययन से है जिससे कार्य से सम्बन्धित बातों का सही-सही ज्ञान हो सके।

व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित प्राप्त की जाने वाली सूचनाएँ – व्यवसाय-विश्लेषण करते समय किसी कार्य से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। वाइटलीज (Viteles) ने व्यवसाय-विश्लेषण के अन्तर्गत एकत्र की जाने वाली सूचनाओं की एक सूची जारी की है, जिसे प्रस्तुत किया जा रहा है –

  1. कार्य का नाम
  2. कर्मचारियों की संख्या
  3. कर्तव्यों का विवरण
  4. कार्य में प्रयुक्त होने वाले यन्त्र
  5. क्रियाओं का विश्लेषण
  6. कार्य की दशाएँ या परिस्थितियाँ
  7. वेतन एवं अन्य सुविधाएँ (जैसे- मुफ्त आवास एवं चिकित्सा सुविधाएँ)
  8. अन्य समान व्यवसायों से सम्बन्ध
  9. स्थानान्तरण तथा पदोन्नति के अवसर
  10. प्रशिक्षण-काल तथा उसकी प्रकृति
  11. व्यक्तिगत

योग्यताएँ –

  1. अवस्था, लिंग, राष्ट्रीयता तथा वैवाहिक स्तर
  2. शारीरिक योग्यताएँ
  3. मानसिक योग्यताएँ
  4. शैक्षिक योग्यताएँ
  5. पूर्व अनुभव
  6. सामान्य एवं विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ तथा
  7. स्वभाव एवं चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।

कार्य से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करने की विधियाँ-किसी भी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित विभिन्न सूचनाएँ एकत्र करने में अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

(1) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method) – इस विधि में किसी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित, व्यक्तित्व की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, कुछ प्रश्नों की एक तालिका बना ली जाती है। इस तालिका को सम्बन्धित कर्मचारियों व अधिकारियों में बाँट दिया जाता है। उनसे जो उत्तर प्राप्त होते हैं, उनसे कार्य सम्बन्धी सूचनाएँ एकत्र कर ली जाती हैं और कर्मचारियों का चयन कर लिया जाता है।

(2) निरीक्षण विधि (Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत सूचना एकत्र करने वाला व्यक्ति स्वयं कार्य-स्थल पर जाकर कर्मचारियों को काम करते हुए देखता है। वह उनके कार्यों को भली प्रकार निरीक्षण करता है तथा तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकालता है।

(3) परीक्षण विधि (Test Method) – इस विधि में किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक योग्यताओं को लेकर कुछ विश्वसनीय व प्रामाणिक परीक्षाएँ तैयार की जाती हैं। उस आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि उस कार्य की सफलता हेतु कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में होनी चाहिए।

(4) वैयक्तिक मनोरेखा विधि (Individual Psychographic Method) – इस विधि द्वारा किसी विशेष व्यवसाय या कार्य में सफल किसी कर्मचारी की मानसिक एवं अन्य विशेषताओं का पता लगाया जाता है। उन्हें ज्ञात करने के बाद एक ग्राफ पर प्रदर्शित किया जाता है तथा ग्राफों के प्रदर्शनों के आधार पर कर्मचारियों की मानसिक विशेषताओं से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।

(5) व्यवसाय मनोरेखांकित विधि (Job Psychographic Method) – इस विधि के द्वारा भी रेखाचित्रों के माध्यम से कार्य में लगे हुए लोगों की विशेषताओं को ग्राफ पर प्रदर्शित करके व्यवसाय का मनोरेखांकन किया जाता है। वाइटलीज द्वारा वर्णित इस विधि में तीन आवश्यक बातें इस प्रकार हैं – (अ) मानसिक गुणों का सुगम वर्गीकरण, (ब) प्रशिक्षित निरीक्षकों द्वारा प्रत्यक्ष पर्यावलोकन एवं (स) प्रामाणिक मूल्यांकन विधि। यहाँ कुछ विशेषज्ञों द्वारा व्यवसाय या कार्य का विश्लेषण करके एक ऐसी तालिका निर्मित की जाती है जिसमें कार्य के लिए आवश्यक समस्त गुणों का सुगम वर्गीकरण सम्भव हो सके। इन समस्त गुणों के आधार पर एक ग्राफ तैयार करके भविष्य में उससे सहायता ली जाती है।

(6) गति अध्ययन विधि (Motion Study Method) – इस विधि के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय में लगे कर्मचारी के काम की गति तथा काम में लगा हुआ समय ज्ञात किया जाता है। इस भाँति, भिन्न-भिन्न कर्मचारियों की गति नोट कर ली जाती है तथा उसकी आपस में तुलना कर ली जाती है जिसे भविष्य में गति अध्ययन (Time and Motion Study) है जिसके अन्तर्गत आजकल सम्पूर्ण कार्य का विस्तृत चित्रांकन मूवी कैमरे द्वारा कर लिया जाता है। इसके बाद, फिल्म को धीमी गति से चलाकर पूरी प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाता है।

उपर्युक्त वर्णित विधियों में से किसी भी एक विधि का आवश्यकता व परिस्थिति के अनुसार चयन करके कार्य के विषय में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।

(2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण
(Individual Analysis)

कर्मचारियों के चयन में जहाँ एक ओर कार्य की विशेषताओं की विस्तृत जानकारी आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर अभ्यर्थी (काम पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति) के विषय में भी पूरी जानकारी प्राप्त होनी चाहिए। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण, व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तिगत गुणों का होता है जिसके माध्यम से यह निश्चित किया जाता है कि अमुक व्यक्ति किस प्रकार के कार्य के योग्य या अयोग्य है। इसके द्वारा व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण के विषय में ज्ञान मिलता है तथा कर्मचारी की योग्यतानुसार वेतन निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत व्यक्ति के घिषय में निम्नलिखित जानकारियाँ हासिल करनी होती हैं –

  1. नाम
  2. आयु
  3. लिंग
  4. जाति
  5. धर्म
  6. राष्ट्रीयता
  7. शारीरिक स्वास्थ्य एवं विशेषताएँ; जैसे – भार ऊँचाई, दृष्टि, सीने की माप, दाँतों की अवस्था, हृदय एवं फेफड़ों की दशा, नाक-कान की दशा, कोई कमी (यदि हो तो) इत्यादि
  8. मानसिक सूचनाएँ; जैसे – बुद्धि का स्तर, मानसिक योग्यताएँ व उनका स्तर, रुचियाँ-अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व की विशेषताएँ
  9. शैक्षिक योग्यताएँ
  10. कार्य का अनुभव
  11. प्रशिक्षण का विवरण तथा
  12. चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।

कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण की विधियाँ – कर्मचारी विश्लेषण की प्रक्रिया में कर्मचारी से सम्बन्धित उपर्युक्त सूचनाएँ एकत्र करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ काम में लायी जाती हैं –

(1) आवेदन-पत्र (Application Form) – उद्योग के कार्यालय में कार्य पाने के इच्छुक अभ्यर्थियों को सादे छपे हुए आवेदन-पत्र प्रदान किये जाते हैं। इन आवेदन-पत्रों में कुछ शीर्षकों के अन्तर्गत सूचनाएँ माँगी जाती हैं। अभ्यर्थी द्वारा भरकर दिये गये आवेदन-पत्र के माध्यम से उस व्यक्ति के सम्बन्ध में शिक्षा, अनुभव, प्रशिक्षण तथा व्यक्तिगत इतिहास का पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी शक्तियों, महत्त्वाकांक्षाओं तथा पाठान्तर क्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से उपयोगी सूचनाएँ मँगाने के लिए उन्हें विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाना आवश्यक समझा जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से वे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध हो जाती हैं जिनका उत्तर अभ्यर्थी से मिल सकता है। आजकल कुछ विशिष्ट कम्पनियाँ विज्ञापनों में ही आवेदन-पत्र का नमूना भी छाप देती हैं और आशा करती हैं कि आवेदक उसी नमूने के अनुसार आवेदन करें।

(2) संस्तुति-पत्र (Letters of Recommendation) – प्रत्येक अभ्यर्थी के पास उसके शिक्षाकाल में मिले कुछ संस्तुति-पत्र और प्रमाण-पत्र होते हैं जो उसकी विशेषताओं पर पर्याप्त रूप से प्रकाश डालते हैं। बहुत-से व्यावसायिक संस्थान आवेदन-पत्रों के साथ कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के संस्तुति-पत्र भी मँगवाते हैं। इससे अभ्यर्थियों के बारे में आवश्यक व महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलने की सम्भावनाएँ रहती हैं। इससे उसकी कमियों व दोषों की जानकारी तो, नहीं, किन्तु विशिष्टताएँ अवश्य प्रकाश में आ जाती हैं। संस्तुति-पत्रों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इनमें व्यक्ति के विषय में अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण कर दिया जाता है। इससे इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है, किन्तु, व्यावसायिक संस्थान संस्तुति (सिफारिश) करने वाले व्यक्तियों से संम्पर्क स्थापित करके प्रश्नावलियों (Questionnaire) व निर्धारण-मान (Rating-scale) की सहायता से अभ्यर्थी के विषय में आवश्यक एवं वास्तविक सूचनाएँ प्राप्त कर लेते हैं।

(3) शैक्षिक आलेख (Academic Records) – शैक्षिक आलेख के माध्यम से अभ्यर्थी की शिक्षा सम्बन्धी योग्यता का पता चल जाता है। विभिन्न व्यावसायिक संस्थान अभ्यर्थियों से आवेदन-पत्रों के साथ उनका शैक्षिक आलेख प्रमाणित प्रतिलिपियों के रूप में मॅगा लेते हैं। इनके साथ ही उन संस्थानों के नाम भी पूछे जाते हैं जहाँ से अभ्यर्थी ने शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त शिक्षा संस्थाओं में अभ्यर्थी से सम्बन्धित सामूहिक अभिलेख (Cumulative Records) होते हैं जिनके अवलोकनों से अभ्यर्थी के विषय में काफी जानकारी प्राप्त हो जाती है।

(4) समूह निरीक्षण विधि (Group Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत किसी पद के लिए उपस्थित हुए अभ्यर्थियों के समूह में विभिन्न व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण के दौरान ध्यान दिया जाता है कि कोई व्यक्ति समूह में किस प्रकार का व्यवहार कर रहा है। इस विधि द्वारा अभ्यर्थियों के नेतृत्व, सामाजिकता, कर्तव्यपरायणता, हास्यप्रियता, ईमानदारी तथा तात्कालिक बुद्धि आदि गुणों का पता करने हेतु सामूहिक निरीक्षण किया जाता है।

(5) शारीरिक परीक्षण (Physical Tests) – अनेक व्यवसायों में कुछ विशेष प्रकार की शारीरिक विशेषताओं व योग्यताओं की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए शारीरिक परीक्षण अनिवार्य है। इसके लिए भार ज्ञात करने की मशीन, स्टेथोस्कोप, फीता तथा अन्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। पुलिस विभाग के कर्मचारियों के लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर व रेलवे गार्ड के लिए उत्तम नेत्र-शक्ति आवश्यक है। खदान उद्योग में काम करने वालों की भी शारीरिक जाँच विस्तार से की जाती है, क्योंकि उन्हें अस्वास्थ्यप्रद दर्शाओं में रहकर काम करना होता है।

(6) प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ (Try-out) – इसके अन्तर्गत, यदि अधिकारीगण आवश्यकता महसूस करे तो, अभ्यर्थियों को उस पद या उन मशीनों के साथ काम करने का अवसर दिया जाता है जिन पर उन्हें काम करना है। उनसे आवश्यक पूछताछ व कार्य कराकर भी देखा जा सकता है। इस प्रकार की प्रयोगात्मक वे अन्वेषणात्मक क्रियाओं से अभ्यर्थियों की योग्यता का वास्तविक बोध हो जाता है।

(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Tests) – कर्मचारी की योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं। अभ्यर्थियों का बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं को जानने के लिए तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

(8) साक्षात्कार (Interview) – कार्य-विश्लेषण की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त करने के उपरान्त साक्षात्कार द्वारा उनके व्यक्तित्व का पता लगाना चाहिए। अभ्यर्थी को सामने बैठाकर उससे बातचीत करना या प्रश्न पूछना साक्षात्कार कहलाता है। साक्षात्कार के माध्यम से अन्य सूचनाओं के साथ-साथ अभ्यर्थियों का आत्म-विश्वास, तत्परता, आचार-विचार, अनुशासनप्रियता, आत्म-नियन्त्रण, महत्त्वाकांक्षाएँ तथा वेशभूषा आदि का सम्यक् ज्ञान होता है। विद्वानों के मतानुसार साक्षात्कार विधि जितनी ही अधिक विश्वसनीय, वैध तथा वस्तुनिष्ठ होगी, कर्मचारियों का चयन उतना ही अधिक उपयुक्त व प्रामाणिक होगा।

निष्कर्षत: कर्मचारियों के चयन सम्बन्धी प्रक्रिया में व्यवसाय-विश्लेषण तथा कर्मचारी विश्लेषण के माध्यम से जो सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। जो अभ्यर्थी रिक्त पद के लिए वांछित योग्यताएँ देखते हैं उनका चयन कर लिया जाता है। कर्मचारियों का उपयुक्त चयन किसी भी उद्योग या व्यावसायिक संस्थान की सफलता हेतु एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है।

प्रश्न 3.
‘कार्य की दशाओं से क्या आशय है? कार्य की दशाओं के महत्व को स्पष्ट करते हुए औद्योगिक क्षेत्र की भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
उद्योग में कार्य की परिस्थितियों का कर्मचारी की कुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है? मनोवैज्ञानिक अध्ययनों की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कार्य की दशाओं या परिस्थितियों को अर्थ
(Meaning of Working Conditions)

प्रत्येक व्यवसाय या कार्य में एक विशेष प्रकार का वातावरण होता है जिसे कार्य का वातावरण या ‘औद्योगिक वातावरण कहकर पुकारते हैं। वस्तुत: किसी भी स्थान पर कार्य करते समय व्यक्ति या कर्मचारी के अतिरिक्त वहाँ जो कुछ भी स्थूले या सूक्ष्म रूप में होता है उसे ‘कार्य की दशाओं (working conditions) के अन्तर्गत सम्मिलित किया जा सकता है और यही दूसरे शब्दों में कार्य का वातावरण है। कार्य की दशाओं या वातावरण में भवन, स्वच्छता, प्रकाश, तापमान, वायु संचार, मशीनें, ध्वनियाँ तथा कर्मचारियों की मानसिक स्थितियाँ निहित हैं। कार्य की दशाओं को मूल रूप से निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है – (अ) भौतिक दशाएँ तथा (ब) मनोवैज्ञानिक दशाएँ।

कार्य की दशाओं का महत्त्व
(Importance of Working Conditions)

औद्योगिक श्रमिक उन परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं जिनमें वे कार्य करते हैं। कार्य की दशाएँ यदि कर्मचारियों या श्रमिकों के अनुकूल होती हैं तो इससे न केवल कर्मचारी अपितु अन्ततोगत्वा उद्योगपतियों का भी हित होता है। कार्य करने की अनुकूल परिस्थितियों में श्रमिक अपेक्षाकृत अधिक एकाग्र भाव से परिश्रम करते पाये जाते हैं। इसके विपरीत असन्तोषजनक परिस्थितियाँ उनकी मनोदशाओं, कार्यक्षमताओं एवं स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। श्रमिक को कार्य करते समय उत्साहपूर्ण एवं स्वस्थ वातावरण होना चाहिए। इससे वह अधिक कार्यकुशलता से कार्य करता है। गन्दा एवं क्षुब्ध कर देने वाला वातावरण उत्पादन में तो कमी करता है, इससे श्रमिकों की प्रवासी प्रवृत्ति, श्रम अनुपस्थिता तथा श्रम-परिवर्तन को भी बढ़ावा मिलता है। इन सबका अन्ततोगत्वा उद्योग के उत्पादने पर भी बुरा असर पड़ता है और इससे सेवायोजक लाभ भी घटता चला जाता है। उद्योगों में तालाबन्दी की सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं, जिससे श्रमिक बेरोजगार होने लगते हैं। यह सम्पूर्ण दुश्चक्र समाज को बहुत बुरी तरह से प्रभावित करता है।

अतः यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि श्रमिक की कार्य करने की प्रतिकूल दशाओं में सुधार लाया जाये। इससे न केवल श्रमिकों की मनोवृत्ति, स्वास्थ्य तथा कार्य क्षमताओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा अपितु उत्पादन में आशातीत वृद्धि सम्भव हो पायेगी और श्रमिक-नियोजन सम्बन्धों में सुन्दर समन्वय स्थापित हो सकेगा।

(1) भौतिक दशाएँ एवं उनका प्रभाव (Physical Conditions and their Effect)

उद्योग से सम्बन्धित भौतिक दशाओं के अन्तर्गत बाहरी स्थूल परिस्थितियाँ; जैसे—स्वच्छता, ऊष्मा एवं ताप, प्रकाश, वायु का प्रबन्ध, धूल से रक्षा, कार्य के घण्टे तथा विश्राम आदि की व्यवस्था सम्मिलित किये जाते हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित हैं” –

(1) स्वच्छता (Sanitation) – साधारणतः मनुष्य स्वच्छता पसन्द करते हैं। गन्दगी के बीच रहकर श्रमिक जन कार्य नहीं कर पाते हैं, न ही कार्य करने में उनका मन लग पाता है। अस्वच्छता विभिन्न रोगों की जननी है; अत: कारखाने की नित्य प्रति सफाई अनिवार्य है। कार्य करने की अनुकूल दशाओं में स्वच्छता सबसे मुख्य वस्तु है। वर्ष में कम-से-कम दो बार सफेदी अवश्य हो जानी चाहिए। मशीनों, छतों एवं दीवारों की धूल को प्रतिदिन हटाया जाना चाहिए। फर्श पक्का हो, पानी के निकलने । की उत्तम व्यवस्था हो तथा शौचालय आदि का उचित प्रबन्ध हो। कारखाने के अन्दर का कूड़ा-करकट कूड़ादान में इकट्ठा किया जाता रहे तथा कारखाने के बाहर चारों ओर सफाई रहना भी अति आवश्यक है। स्वच्छ वातावरण श्रमिकों को उत्साहपूर्वक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।

(2) ऊष्मा एवं ताप (Heat and Temperature) – तापमान का शरीर की शक्ति और क्रियाशीलता पर सीधा असर पड़ता है। श्रमिक अधिक ताप और अधिक ठण्डक में क्षमतापूर्वक कार्य नहीं कर सकते हैं। जिन कारखानों में वातावरण का तापमान सामान्य से कहीं अधिक होता है वहाँ श्रमिकों का स्वास्थ्य एवं मानसिक सन्तोष विकृत हो जाती है। तापमान अधिक रहने से जल्दी थकान आती है, कर्मचारियों का ध्यान विचलित हो जाता है तथा दुर्घटनाएँ बढ़ जाती हैं। स्टील, काँच तथा आयरन के उद्योगों में अत्यधिक ऊष्मा एवं ताप पाया जाता है। ऐसी दशाओं में कार्य करने वाले श्रमिकों को असहनीय पीड़ा होती है एवं इन परिस्थितियों में दुर्घटनाओं के घटित होने की सम्भावनाएँ भी तीव्र हो जाती हैं। खनन-उद्योगों में भी यही तथ्य सामने आते हैं। कुछ खानों का तापमान काफी अधिक पाया जाता है। मैसूर की 11,000 फुट गहरी खानों को तापक्रम 150°F तक मिलता है। ये खाने विश्व में दूसरा स्थान रखती हैं। इतने ऊँचे तापक्रम पर इतनी गहराई में काम करने वाले श्रमिकों को विशेष साहस का परिचय देना पड़ता है। ऐसी दशाओं में स्वास्थ्य की रक्षा, कार्यक्षमता को बनाये रखना एवं दुर्घटनाओं को नगण्य कर देना अत्यन्त कठिन है।

(3) प्रकाश (Lighting) – प्रकाश की दशा से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण बातें हैं; जैसे—स्थिति, वितरण, तीव्रता और रंग। स्थिति से तात्पर्य है—प्रकाश का स्रोत कहाँ स्थित है। प्रकाश-स्रोत की स्थिति ऐसी हो कि प्रकाश सीधे आँखों पर न पड़े, यन्त्रों या लिखने की मेज आदि पर पड़े। प्रकाश का वितरण काम करने के स्थान पर एक समान होना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रकाश न अधिक तीव्रता के साथ हो और न बहुत कम। गहन काम में तीव्र प्रकाश चाहिए। इसी प्रकार प्रकाश का रंग भी महत्त्वपूर्ण है। दिन के उजाले जैसा प्रकाश का रंग होना अच्छा है। यदि रंगीन प्रकाश की आवश्यकता हो तो हल्का रंग प्रयोग करना उपयुक्त है। यदि कारखाने में प्रकाश की समुचित व्यवस्था नहीं होगी तो दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी तथा उत्पादन स्तर गिर जाएगा।

प्रकाश श्रमिकों की कार्य करने की दशाओं में एक सर्वप्रमुख घटक है। इसकी उपस्थिति रोग के अनेकानेक कीटाणु का विनाश करती है एवं इससे प्राकृतिक रूप से विसंक्रमण (Disinfection) होता रहता है। रोशनदान एवं खिड़कियों की सहायता से प्राकृतिक प्रकाश की व्यवस्था की जा सकती है। प्राकृतिक प्रकाश के अभाव में कृत्रिम प्रकाश; जैसे – विद्युत, गैसीय लैम्प आदि का प्रबन्ध किया जा सकता है। प्रकाश की व्यवस्था करते। समय श्रमिकों की नेत्रदृष्टि को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है। अप्राकृतिक प्रकाश उनकी नेत्र-ज्योति को लम्बी समयावधि में बुरे रूप से प्रभावित कर सकता है।

(4) वायु का प्रबन्ध (Ventilation) – वायु संचार से कर्मचारियों की क्रियाशीलता बनी रहती है और वे स्वस्थ रहते हैं; अतः उद्योग अथवा कारखाने में स्वच्छ एवं ताजी हवा के आरपार जाने की व्यवस्था (Cross Ventilation) होनी चाहिए। इससे कारखाने की गर्म एवं गन्दी हवा का विसर्जन होता रहता है तथा बाहर की शुद्ध एवं ताजा हवा अन्दर आती रहती है। भारत के विभिन्न उद्योगों में अभी तक इस विषय पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। सूती वस्त्र उद्योग में जहाँ पर कि धूल और नम वायु की प्रधानता पायी जाती है तथा साथ-ही-साथ उन उद्योगों में जहाँ पर कि विषैली गैसें उत्पन्न होती रहती हैं, इस व्यवस्था का होना सबसे पहली आवश्यकता है। पोफनबर्जन (Pofenbergen) के अनुसार वायु में 14% ऑक्सीजन की मात्रा होने पर काम करने वालों पर बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है। इसके अतिरिक्त वायु में वांछित रूप से नमी की मात्रा भी होनी चाहिए।

(5) धूल (bust) – भारत जैसे देश की जलवायु कुछ ऐसी है कि गर्मी की ऋतु में यहाँ धूल बड़ी मात्रा में उत्पन्न हो जाती है। सामान्य परिस्थितियों में भी उद्योगों के अन्दर धूल तथा बुरादा दूर करने की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। धूल से भरे वातावरण में श्रमिकों को साँस लेने में कठिनाई होती है तथा उनकी आँखों पर भी धूल का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। भारत के अनेक उद्योगों में धूल विशाल मात्रा में उत्पन्न होती है। इसका तुरन्त समाधान किया जाना चाहिए तथा उचित उपायों द्वारा धूल को दूर करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(6) कार्य के घण्टे (working Hours) – प्रायः ऐसा समझा जाता है कि कर्मचारियों से अधिक-से-अधिक कार्य लेने पर उत्पादन में वृद्धि होगी, किन्तु अनुभव बताते हैं कि कार्य के घण्टे आवश्यकता से अधिक बढ़ा देने पर उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति के काम करने की क्षमता सीमित है, इससे अधिक कार्य उसे थका देता है और बीमार बना देता है; अतः उद्योगों में कार्य करने के अधिक घण्टे नहीं होने चाहिए। किसी भी श्रमिक से एक निश्चित अवधि के बाद कार्य नहीं लिया जाना चाहिए। इसके लिए पुरुष, महिला, किशोर एवं बालक वर्ग के लिए कार्य करने के घण्टे तय कर दिये जाएँ। इससे श्रमिकों की कार्यक्षमता तथा कार्य-कुशलता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है तथा औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होती है।

(7) पीने का पानी (Drinking water) – कारखाने में श्रमिकों के लिए पीने के पानी की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए। पीने का पानी स्वच्छ हो तथा ग्रीष्म ऋतु में शीतल जल का प्रबन्ध किया जाये।

(8) विश्रामालय (Rest Houses) – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि लगातार काम करने से कर्मचारी थकान अनुभव करते हैं और ऊब जाते हैं; अतः श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि करने के लिए उन्हें शारीरिक रूप से आराम प्रदान करने की व्यवस्था विशेष रूप से की जानी चाहिए। एक लम्बे मध्यान्तर के अतिरिक्त बीच-बीच में 5-10 मिनट का विश्राम भी मिलता रहना चाहिए। उनके लिए कारखाने के भीतर ही उचित स्थान पर आराम-घरों की समुचित व्यवस्था की जाये जहाँ कि वे अवकाश के समय आराम कर सकें। इस व्यवस्था का सीधा प्रभाव उत्पादन की वृद्धि में पाया जाता

(9) शौचालय एवं मूत्रालय (Laterines and Urinals) – श्रमिकों के लिए कारखाने के . भीतर ही शौचालय एवं मूत्रालय की आवश्यक रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। इन स्थानों की पर्याप्त सफाई बहुत अनिवार्य है तथा महिला कर्मचारियों के लिए इसका अलग से प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

(10) भीड़ (Over Crowding) – भारतीय उद्योगों में श्रमिकों के लिए खुले स्थान का प्रबन्ध नहीं मिलता है। एक श्रमिक के लिए न्यूनतम 50 वर्ग फुट स्थान स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त माना जाता है। इसके अभाव में उद्योग के भीतर भीड़ के कारण दुर्घटनाएँ घटित होने की आशंका रहती है।

(11) यन्त्रों से सुरक्षा (Safety Provision of Machines) – कारखाने के यन्त्रों से श्रमिकों की पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था अनिवार्य है अन्यथा अवांछनीय दुर्घटनाओं की सम्भावना अधिक होती है। मशीनों के बीच में काफी स्थान दिया जाना चाहिए तथा मशीनों के ऊपर आवश्यक मात्रा में आवरण रहने चाहिए। केवल उन्हीं भागों को खुला रखा जा सकता है जिन्हें ढकना कदापि सम्भव नहीं। प्रायः कारखानों में शाफ्ट, पैली, पट्टे तथा ऐसी अन्य बहुत-सी चीजें खुली अवस्था में रहती हैं जिनकी चपेट में कार्यशील श्रमिक आ सकते हैं। इसके लिए उचित प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

(12) संगीत (Music) – काम के समय में हल्का लयात्मक संगीत कार्य को रोचक बना देता है। इससे कार्य अधिक होता है तथा उत्पादन बढ़ता है। संगीत से कार्य में उत्साह बना रहता है। स्मिथ ने 1000 कर्मचारियों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि 98% कर्मचारियों ने 8 घण्टे तक काम के समय संगीत का आनन्द अनुभव किया और उनमें ऊब व थकान काफी कम हुई।

(2) मनोवैज्ञानिक दशाएँ एवं उनका प्रभाव
(Psychological Conditions and their Effect)

उद्योग के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक दशाएँ मुख्य रूप से मानव-मन और उसके व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। प्रमुख मनोवैज्ञानिक दशाएँ और उनके प्रभाव निम्नलिखित हैं

(1) सुरक्षा (Security) – सुरक्षा जीवन की एक महान् आवश्यकता है जिसका उद्योग और व्यवसाय में समान महत्त्व है। जिन उद्योगों और व्यवसायों में कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा होती है। उनमें लोग बहुत ही प्रसन्नता से कार्य करते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि करके निरन्तर प्रशंसा पाने को प्रयास करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कम-से-कम एक निश्चित समयावधि के बाद तो नौकरी पक्की हो जानी चाहिए। असुरक्षित नौकरी वाले व्यक्ति को कार्य-विशेष से कोई लगाव नहीं रहता। नौकरी की सुरक्षा के अतिरिक्त कर्मचारी को बुढ़ापे, बेकारी, बीमारी तथा दुर्घटनाओं आदि अवस्थाओं में भी सुरक्षा की गारण्टी मिलनी चाहिए। जीवन बीमा, ग्रेच्युइटी, प्रॉविडेण्ट फण्ड तथा पेन्शन इत्यादि सुविधाएँ भी व्यक्ति को अधिकाधिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। वस्तुतः सुरक्षा एक ऐसी मनोवैज्ञानिक दशा और आवश्यकता है जो कर्मचारियों को अधिक-से-अधिक कार्य हेतु प्रेरित करती है।

(2) अधिकारियों का व्यवहार (Behaviour of Authorities) – अधिकारियों का अच्छा व्यवहार भी एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक दशा है। अधिकारी अपने अच्छे व्यवहार से उद्योग के कर्मचारियों में स्फूर्ति, उत्साह तथा सौहार्द उत्पन्न कर सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार, कर्मचारी प्रेम, सहानुभूति एवं सहयोग के वातावरण में अधिक लगन से कार्य करते हैं। वस्तुतः अधिकारियों का कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है; अतः उनका कर्मचारियों के प्रति अच्छा व्यवहार अति आवश्यक समझा जाता है। इसके विपरीत बुरा व्यवहार तनाव, क्षोभ एवं विद्रोह को जन्म देता है। कर्मचारियों को अपने अधिकारियों से मधुर सम्बन्ध होना, उनके प्रति सम्मान भावना तथा उचित सामंजस्य के कारण तनाव की प्रत्येक स्थिति दूर होती है जिससे उत्पादन में वांछित उन्नति होती है। क्रोधी, चिड़चिड़े तथा अभिमानी अधिकारियों का व्यवहार कर्मचारियों तथा श्रमिकों को भड़का देता है, वे रुचि के साथ ध्यानपूर्वक काम करना बन्द कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(3) कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध (Mutual Relations among Employees) – कर्मचारियों में परस्पर प्रेम, मैत्री और भाईचारे का सम्बन्ध भी कार्य करने की एक महत्त्वपूर्ण दशा है। जिस उद्योग में कर्मचारियों में पारस्परिक सद्व्यवहार बना रहता है, वहाँ कर्मचारी सन्तुष्ट रहते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि होती रहती है। किन्हीं कारणों से कर्मचारियों में फूट, प्रतिस्पर्धा और तनाव की दशाएँ उत्पन्न होने से उत्पादन कार्य हतोत्साहित होता है। वस्तुतः सामूहिक कार्य मिल-जुलकर सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से किये जाने चाहिए।

(4) आवश्यकताओं की पूर्ति (Satisfaction of Needs) – उद्योग में कार्य करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की अनेक शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, चिकित्सा सम्बन्धी तथा सांवेगिक आवश्यकताएँ होती हैं। यदि कर्मचारी अपनी और परिवार की इन आधारभूत आवश्यकताओं के प्रति चिन्तित रहेगा तो वह तनाव महसूस करेगा; अतः वह अस्थिर चित्त से ठीक प्रकार कार्य नहीं कर पाएगा। सेवायोजकों या मालिकों को चाहिए कि वे कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व एवं सद्भावना प्रदर्शित करते हुए इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उन्हें सहायता दें। जिन उद्योगों के सेवायोजक या मालिक इन कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रयास करते हैं, वहाँ के कर्मचारी अधिक मेहनत से काम करते हैं, उत्पादन वृद्धि में सहयोग देते हैं तथा उद्योगों के हित में पूरी शक्ति लगा देते हैं।

(5) प्रलोभन (Incentives) – व्यवसायों में कर्मचारियों या श्रमिकों को प्रेरणा प्रदान करने की आवश्यकता होती है। जिस उद्योग में कर्मचारियों को सुविधाओं का प्रलोभन रहता है, वहाँ लोग लगन से कार्य करते हैं। इन प्रलोभनों में वेतन वृद्धि, बोनस, प्रशंसा, गुड एन्ट्री, पुरस्कार तथा पदोन्नति आदि प्रमुख हैं। इनसे प्रेरित होकर कर्मचारीगण निरन्तर श्रमपूर्वक कार्य करते हैं।

(6) पदोन्नति के अवसर (Opportunities of Promotion) – प्रत्येक व्यवसाय या उद्योग में कार्य की विभिन्न श्रेणियाँ होती हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ दिन तक किसी कार्य को कर लेता है तो उसे उस कार्य का अनुभव हो जाता है। सन्तोषजनक और अच्छे कार्य के लिए व्यक्ति को उच्च पद प्रदान कर दिया जाता है, यह क्रिया ही पदोन्नति कहलाती है। वस्तुत: पदोन्नति उद्योग की एक मनोवैज्ञानिक दशा है जो कर्मचारियों को अच्छा काम करने के लिए प्रेरित करती है तथा उद्योग को उनके अनुभव से लाभ उठाने में सहायता प्रदान करती है। न्यायोचित पदोन्नति से कर्मचारियों, मिल-मालिकों तथा उस औद्योगिक इकाई को कई लाभ मिलते हैं जिससे अन्ततः उत्पादन वृद्धि को बल मिलता है।

उद्योग को अपनी ही इकाई से अनुभवी कर्मचारी मिल जाते हैं जो प्रेरित होकर उद्योग के विकास हेतु और अधिक कार्य करते हैं। पदोन्नति से कर्मचारियों में लगातार उत्साह तथा कार्य करने की प्रेरणा बनी रहती है। इससे कर्मचारियों में अधिक सुरक्षा एवं आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न होती है। वे पदोन्नति का लक्ष्य लेकर अच्छे-से-अच्छा काम करने को तत्पर रहते हैं। रुचिपूर्वक मन लगाकर काम करने से अधिकारीगण सन्तुष्ट रहते हैं जिससे आपसी सम्बन्धों में मधुरता का संचार होता है और उद्योग में शान्तिपूर्ण वातावरण बना रहता है। औद्योगिक तनाव और संघर्ष जन्म नहीं लेते तथा उत्पादन कार्य सामान्य गति से चलता है। इस प्रकार पदोन्नति के अवसर एक ओर, कर्मचारियों की दक्षता बनाये रखने में सहायक सिद्ध होते हैं; तो दूसरी ओर उनकी उत्पादन क्षमताओं पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकती है कि उद्योग पर प्रभाव डालने वाली विभिन्न भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाएँ अनुकूल परिस्थितियों में ऐसे वातावरण का सृजन करती हैं जिसके माध्यम से औद्योगिक उत्पादक में आशातीत वृद्धि होती है। इसके विपरीत, प्रतिकूल परिस्थितियों में उत्पादन में कमी आती है।

प्रश्न 4.
कर्मचारियों की पदोन्नति से क्या आशय है? पदोन्नति करते समय ध्यान में रखने योग्य बातों का उल्लेख कीजिए।
या
उद्योगों में कर्मचारियों की पदोन्नति के क्या आधार होने चाहिए? उदाहरणों द्वारा अपना मत स्पष्ट कीजिए।
या
उद्योग में पदोन्नति के अवसर के बारे में लिखिए।
उत्तर :
विभिन्न औद्योगिक संस्थानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कार्य की विविध श्रेणियों के अन्तर्गत कर्मचारियों एवं अधिकारियों के पद सुनिश्चित होते हैं और किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता भी\ किन्हीं मानदण्डों के आधार पर निर्धारित की जाती है। आवश्यक रूप से ये मानदण्ड कर्मचारी की योग्यता, उसकी कार्य की क्षमता, निपुणता, रुचि, वरिष्ठता तथा अपने उच्च अधिकारियों के साथ उसके सम्बन्धों पर आधारित हो सकते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि कोई भी कर्मचारी अपने वर्तमान पद पर लम्बे समय तक सन्तुष्ट नहीं रह सकता। वह एक के बाद एक उच्च पद पर उन्नत होने की लालसा व महत्त्वाकांक्षा रखता है। पदोन्नति की कामना ही उसे अपने कर्म-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती है। कर्मचारियों की पदोन्नति से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित करने से पूर्व आवश्यक है कि यह समझा जाए कि ‘पदोन्नति’ से क्या अभिप्राय है।

पदोन्नति का अर्थ
(Meaning of Promotion)

किसी भी उद्योग अथवा व्यवसाय के प्रबन्ध-तन्त्र की कार्यकुशलता इस बात पर निर्भर करती है। कि वह अपने कर्मचारियों को ऊँचा उठाने के पर्याप्त एवं यथेष्ट अवसर ‘किस सीमा तक’ प्रदान करता है। विभिन्न पदों के लिए अधिक-से-अधिक सक्षम कर्मचारी प्राप्त करने की दृष्टि से किसी भी प्रबन्ध-तन्त्र को अपने कर्मचारियों को निरन्तर प्रेरित एवं उत्साहित करते रहना चाहिए। एक पद से उच्च पद पर अग्रसरित एवं उन्नत करने से बढ़कर किसी भी कर्मचारी को कोई दूसरी प्रेरणा क्या मिलेगी? इस भाँति स्पष्ट रूप से कर्मचारियों की पदोन्नति एक वांछित, अनिवार्य एवं अभीष्ट माँग है।

अर्थ – पदोन्नति से अभिप्राय उच्च पद की प्राप्ति से होता है जिसमें कर्मचारियों की प्रतिष्ठा, उत्तरदायित्वों, पद तथा आय में वृद्धि होती है। आवश्यक नहीं कि पदोन्नति के साथ आय में भी वृद्धि हो, बिना आय में वृद्धि हुए भी पदोन्नति सम्भव है। इसके साथ ही, वार्षिक वेतन वृद्धि को भी पदोन्नति नहीं कहा जा सकता। कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों में परिवर्तन होना पदोन्नति की प्रक्रिया का अनिवार्य लक्षण है।

विलियम जी० टोरपी के अनुसार, “पदोन्नति पदाधिकारी के एक पद से ऐसे दूसरे पद पर पहुँचने की ओर संकेत करती है जो उच्चतर श्रेणी या उच्चतर न्यूनतम वेतन वाला होता है। पदोन्नति का अभिप्राय है-कर्मचारी के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर देना।”

एल० डी० ह्वाइट के शब्दों में, “पदोन्नति का अर्थ है एक पद से किसी उच्चतर श्रेणी के अन्य पद पर नियुक्ति जिसमें कठिनतर प्रकृति एवं गहनतर उत्तरदायित्वों का कार्य करना पड़ता है। इसमें पद का नाम बदल जाता है और प्रायः वेतन में भी वृद्धि होती है।”

इस प्रकार पदोन्नति के अन्तर्गत किसी उद्योग अथवा व्यवसाय में कार्य करने वाला कर्मचारी किसी दूसरे ऐसे कार्य (पद) पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है जिससे उसे अधिक उत्तरदायित्व, आय, सुविधाएँ तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होते हैं।

पदोन्नति के समय ध्यान रखने योग्य बातें।
(Factors Determining Eligibility of Promotion)

पदोन्नति के लिए कर्मचारियों की पात्रता का क्षेत्र क्या हो या कर्मचारियों की पदोन्नति करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाये, यह एक प्रमुख समस्या समझी जाती है। पदोन्नति करते समय निम्नलिखित बातों (तत्त्वों) पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना आवश्यक है –

(1) ज्येष्ठता या वरिष्ठता – अधिकतर कर्मचारीगण पदोन्नति के लिए ज्येष्ठता या वरिष्ठता के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं। इसके अन्तर्गत उच्चतर पद पर किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति इसलिए की जानी चाहिए, क्योंकि उसका सेवा काल (Length of Service) दूसरे कर्मचारियों की तुलना में अधिक है। इसका अभिप्राय यह है कि सेवा में पहले भर्ती होने वाले व्यक्ति की पदोन्नति पहले तथा बाद में भर्ती होने वाले व्यक्ति की पदोन्नति बाद में की जानी चाहिए। ज्येष्ठ कर्मचारी का कार्य अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है और अधिक अनुभव पदोन्नति के लिए एक बड़ी योग्यता है; अतः कहा जाता है कि पदोन्नति के लिए “ज्येष्ठता ही योग्यता है। यह आधार पदोन्नति को निश्चितता प्रदान करता है और इससे पुराने कर्मचारियों की प्रतिष्ठा की रक्षा हो पाती है। ज्येष्ठता का तत्त्व स्वयंचालित पदोन्नति का नेतृत्व करता है। इस प्रकार इसे उचित, न्यायपूर्ण एवं निष्पक्ष आधार रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

कुछ विचारकों की दृष्टि से ज्येष्ठता या वरिष्ठता के आधार पर कर्मचारियों की पदोन्नति नहीं की जानी चाहिए। इससे कर्मचारियों में प्रतिस्पर्धा की भावना पर रोक लगती है और वे अधिक मेहनत, बुद्धिमत्ता एवं उत्साह से कार्य नहीं कर पाते। आलोचकों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को सौभाग्य से नियति ने पहले जन्म देकर ज्येष्ठता प्रदान कर दी है तो इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वह उस पद के लिए पूरी तरह सक्षम, कुशल एवं योग्य है। इसके साथ-ही-साथ ज्येष्ठता या वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति मिलने की नीति उन प्रतिभा सम्पन्न नौजवान कर्मचारियों का भी अहित करती है जिन्होंने स्वतन्त्र प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त आगे बढ़ने की उम्मीद से व्यवसाय/संस्थान में प्रवेश किया है।

वास्तव में, पदोन्नति का आशय है-उच्चतर कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों के लिए व्यक्ति की नियुक्ति और इसके लिए एकमात्र ज्येष्ठता को ही आधार नहीं बनाया जा सकता, किन्तु व्यवहार में ज्येष्ठता या वरिष्ठता या सेवा-काल की किसी भी भाँति उपेक्षा नहीं की जा सकती। ‘टॉमलिन आयोग (Tbmlin Commission) ने ठीक ही कहा है, “सेवा के सम्बन्ध में सामान्यतः ज्येष्ठता (वरिष्ठता) के तत्त्व के कम मूल्यांकन की सम्भावना नहीं है।”

(2) योग्यता – आधुनिक युग में पदोन्नति का आधार कर्मचारी की योग्यता’ को बनाने पर विशेष बल दिया जाता है। किन्तु योग्यता की जाँच किस तरह की जाये और इसके लिए क्या मानदण्ड होना चाहिए, यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा जटिल प्रश्न है। निश्चय ही पदोन्नति के लिए योग्यता की जाँच का मानदण्ड नितान्त रूप से वस्तुनिष्ठ अर्थात् व्यक्ति निरपेक्ष होना चाहिए।

(3) कार्य में दक्षता या निपुणता – कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए कार्य में दक्षता या निपुणता का आधार अत्यन्त सामान्य तथा लोकप्रिय सिद्धान्त है। किसी भी उद्योग या व्यापारिक संस्थान में नियोक्ता (मालिक) की यही इच्छा रहती है कि उसका कर्मचारी कार्य में दक्ष या निपुण हो और वह अच्छे-से-अच्छा कार्य करे। नौकरी के मामले में प्राय: देखा जाता है कि जो कर्मचारी अच्छा कार्य करते हैं, मालिक या अधिकारियों की दृष्टि में उनका एक विशेष स्थान बन जाता है। उनकी दक्षता, क्षमता तथा विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें ऊँचे पद पर प्रोन्नत कर दिया जाता है। उत्तम कार्य प्रदर्शित कर पदोन्नति पाने का यह सिद्धान्त दूसरे कर्मचारियों में अच्छा कार्य करने का प्रलोभन पैदा करता है। इससे अन्य लोगों के उत्साह एवं रुचि में वृद्धि होती है। दक्षता या निपुणता के आधार पर उच्च पद, अधिक आय, सुविधाएँ तथा प्रतिष्ठा पाने वाले कर्मचारियों का अनुकरण कर अन्य कर्मचारी भी उन्हीं की तरह कार्य में दक्ष एवं निपुण होने के लिए प्रयास करते हैं।

(4) सिफारिश या कृपा – आजकल पदोन्नति पाने के लिए उच्च अधिकारी की सिफारिश या कृपा सबसे बड़ा एवं प्रभावशाली अस्त्र समझा जाता है। इस अस्त्र के सामने कर्मचारी की ज्येष्ठता, योग्यता, निपुणता या विश्वसनीयता सभी गुण व्यर्थ हो जाते हैं। प्रायः अधिकारियों की दावतें करने वाले, उन्हें तरह-तरह के लाभ पहुँचाने वाले, किसी-न-किसी बहाने भेट अर्पित करने वाले चाटुकार कर्मचारी सबसे पहले पदोन्नति पाते हैं। चाटुकारिता के माध्यम से अपने अधिकारियों की कृपा द्वारा पदोन्नति हासिल करने वाले कर्मचारियों के सामने लम्बी अवधि तक सेवा करने वाले अनुभवी, कार्यकुशल, ईमानदार तथा सुयोग्य कर्मचारी वर्षों तक निम्न स्तर पर ही पड़े रहते हैं। स्पष्टतः सिफारिश या कृपा के आधार पर पदोन्नति पाने की यह बुरी रीति किसी भी प्रकार से अनुकरणीय नहीं है, यह सर्वथा त्याज्य है।

उपर्युक्त बिन्दुओं के अन्तर्गत हमने उन सभी बातों का विवेचन किया है जिन्हें कर्मचारियों की पदोन्नति के अवसर पर पूरी तरह से ध्यान में रखा जाना चाहिए। स्पष्टतः पदोन्नति के लिए व्यक्तिगत भेदभाव से दूर; व्यक्ति को निरपेक्ष एवं वस्तुनिष्ठ नीति अपनायी जानी चाहिए। पक्षपातपूर्ण, मनचाहे तरीके से तथा सिफारिशों के माध्यम से होने वाली पदोन्नतियाँ संस्थानों के वातावरण को दूषित कर सकती हैं।

प्रश्न 5.
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होता है? उद्योग में मानवीय सम्बन्ध बनाये रखने के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?
या
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध से क्या समझते हैं? उद्योग में मानवीय सम्बन्धों के महत्व को विस्तार से समझाइये।
या
श्रम-कल्याण कार्यों से आप क्या समझते हैं? औद्योगिक क्षेत्र में किये जाने वाले श्रम-कल्याण कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
श्रम-कल्याण से आप क्या समझते हैं? उद्योग के श्रम-कल्याण कार्यों का महत्त्व बताइए।
या
उभेग में कर्मचारी-कल्याण से सम्बन्धित योजनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति से पहले उद्योगपतियों के अपने कर्मचारियों या श्रमिकों के साथ भावनाहीन और अमानवीय सम्बन्ध थे। उद्योगपतियों का मात्र एक लक्ष्य था-अधिकतम आर्थिक लाभ अर्जित करना, जिसकी पूर्ति के लिए वे श्रमिकों से मशीनों के कलपुर्जा की तरह काम लेते थे। जिस प्रकार मशीन का कलपुर्जा टूट जाने या व्यर्थ हो जाने पर फेंक दिया जाता है वही स्थिति श्रमिकों की भी थी; अयोग्य होने पर उन्हें निकाल बाहर कर दिया जाता था। उनसे पशुवत् व्यवहार रखते हुए दस-बारह घण्टे तक लगातार काम लिया जाता था। उन्हें कठिनाई से पेट भरने के लिए थोड़ा-सा धन दिया जाता था। उनके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई उद्योगपतियों तथा सेवायोजकों की विलासिता में खर्च होती थी। बीमार श्रमिकों, गर्भवती स्त्रियों तथा बच्चों से भी गुलामों की तरह काम लिया जाता था। यह उत्पीड़न आर्थिक शोषण तथा अमानवीय कृत्यों की चरम परिणति थी।

ऐसी विषम परिस्थितियों में श्रमिक वर्ग के दु:खों, निराशाओं तथा असन्तोष की कोई सीमा न थी। शनैः-शनैः श्रमिकों में जागृति आयी, वे अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए तथा संघर्षों की महान् त्रासदियों के बाद अमानवीयता के काले बादलों से उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की रोशनी झलकी। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् श्रम-कल्याण जैसे नवीन मूल्यों को मान्यता प्राप्त हुई। इसी के परिणामस्वरूप आज स्वयं उद्योगपति और सेवायोजक श्रमिकों की भलाई के कार्यों में गहरी दिलचस्पी लेते हैं।

उद्योग में मानवीय सम्बन्ध
(Human Relation in Industry)

उद्योग में मानवीय सम्बन्धों का अर्थ – वर्तमान समय में औद्योगिक प्रगति के लिए मानवीय सम्बन्धों को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया जाने लगा है। मानवीय सम्बन्धों का आधार है-प्रेम, दया, सहानुभूति, सहयोग, सौहार्द तथा बन्धुत्व की भावनाएँ। इन्हें मानवीय भावनाओं का नाम दिया जाता है, क्योंकि इनके माध्यम से ही विश्व के मनुष्य एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तथा अटूट सम्बन्धों में बँध जाते हैं। जब औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत मनुष्यों को आपसी व्यवहार इस प्रकार की भावनाओं से युक्त होता है तो ऐसे सम्बन्धों को उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहकर परिभाषित किया जा सकता है।

इस भाँति श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम एवं श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है। ये मानवीय सम्बन्ध उत्तम कार्य, अधिक उत्पादन तथा औद्योगिक शान्ति के प्रणेता होते हैं। उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध अच्छे स्तर पर रखने से सरकार, उद्योगपति तथा कर्मचारी सभी का हित होता है। आजकल औद्योगिक प्रगति के लिए प्रत्येक सभ्य देश में मानवीय सम्बन्धों को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया जाने लगा है।

उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों के रूप
उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध दो रूपों में दृष्टिगोचर होते हैं –

(i) औद्योगिक प्रशासन एवं प्रबन्धन में मानवीय सम्बन्ध
(Human Relations in Industrial Administration and Management)

आधुनिक समय में औद्योगिक प्रशासन और प्रबन्धन में एक बुनियादी परिवर्तन आया है। आजकल औद्योगिक इकाइयों में मानवीय तत्त्व को प्रमुखता प्रदान कर एक मौलिक आवश्यकता की पूर्ति की गयी है। सेवायोजकों और उद्योगपतियों ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि श्रमिक और कर्मचारी लोग मनुष्य हैं, मशीनें नहीं हैं। उन्हें तेल या बिजली से नहीं चलाया जा सकता, उनकी प्यास और जरूरत प्रेरणाएँ, प्रशंसाएँ, सम्मान, प्रेम और सहानुभूति हैं। प्रोत्साहन और प्रलोभन के वशीभूत होकर श्रमिक अधिक-से-अधिक कार्य करने हेतु प्रवृत्त होता है। पशु या गुलाम जैसे व्यवहार और कठोरतम प्रशासन उसे विद्रोह की ओर बढ़ाता है।

‘सामूहिके उत्साहशीलता द्वारा मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन – औद्योगिक प्रगति एवं मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु कर्मचारियों तथा श्रमिकों में सामूहिक उत्साहशीलता (Group Morale का होना अत्यन्त आवश्यक है। सामूहिक उत्साहशीलता एक सामूहिक भावना को नाम है जो उन लोगों में उत्पन्न हो जाती है जो एक लक्ष्य से प्रेरित होकर एक साथ ही एक ही प्रकार का कार्य करते हैं। एक साथ काम करने से उनमें जो उत्साह पैदा होता है उसे सामूहिक उत्साहशीलता कहा जाता है। प्रत्येक उद्योग में सामूहिक उत्साहशीलता एक महान् आवश्यकता है। वस्तुतः यही मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन प्रदान करने की कुंजी भी है। इसके माध्यम से मानवीय सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

(1) सामान्य लक्ष्य के प्रति जागरूकता – उद्योगपति, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा श्रमिकों सभी का यही लक्ष्य होना चाहिए कि उद्योग में अधिक-से-अधिक प्रगति हो। इसके लिए आवश्यक है। कि सभी श्रमिक अपने उद्योग के प्रति सम्मान एवं सर्वहित की भावना उत्पन्न कर प्रयत्नशील बनें।

(2) लक्ष्य पूर्ति में प्रगति – सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्योग के समस्त कर्मचारी सतत प्रयास करें। इसके लिए अति आवश्यक है कि उद्योग का लाभांश उसके अंशों में विवेकपूर्ण दृष्टि से विभाजित हो। यह प्रलोभन ही सबको लक्ष्य की ओर ले जाएगा।

(3) लाभांश वितरण – मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देने हेतु कम्पनी के लाभ का सभी कर्मचारियों तथा श्रमिकों को उपयुक्त एवं न्यायपूर्वक अंश मिलना चाहिए। इससे उद्योग से सम्बन्धित उत्पादन के सभी अंग अधिकाधिक कार्य करेंगे और अधिक लाभ पाने की प्रेरणा से मिलजुलकर कठोर श्रम करेंगे।

(4) निश्चित सार्थक कार्य – कर्मचारियों और श्रमिकों में यह विचार उत्पन्न होने पर कि उनका कार्य उद्योग का अभिन्न अंग है, एक समान भावधारा का प्रवाह होगा। इसके फलस्वरूप वे सभी प्रेम, भाईचारे व सहयोग के साथ काम करेंगे।

(5) सामूहिक सहयोग एवं परामर्श – उद्योग से सम्बन्धित सभी समस्याओं के निराकरण हेतु सभी श्रमिकों व कर्मचारियों का सहयोग एवं परामर्श वांछित है। इसके लिए श्रमिकों के प्रतिनिधियों को वार्ताओं में आमन्त्रित किया जाये। ये वार्ताएँ उत्पादन वृद्धि और उद्योग व कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान तलाशने के लिए आयोजित की जाती हैं।

(6) पुरस्कार – अधिक कार्य करने तथा अच्छे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करने की दृष्टि से कर्मचारियों को समय-समय पर पुरस्कार दिये जाने चाहिए।

इस प्रकार, उपर्युक्त उपायों के माध्यम से मिल-मालिकों एवं श्रमिकों के बीच प्रेम, सहयोग एवं मैत्री की भावना उत्पन्न कर सहयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे मानवीय सम्बन्ध प्रोत्साहित होते हैं जो प्रत्येक उद्योग की एक अपरिहार्य मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है।

(ii) श्रम-कल्याण कार्य (Labour welfare Activities)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने मानवीय सम्बन्धों को स्थापित करने तथा उन्हें अधिक-से-अधिक दृढ़ बनाने के लिए ‘श्रम-कल्याण (Labour welfare) का विचार दिया है।

श्रम-कल्याण का अर्थ (Meaning of Labour welfare)-श्रम-कल्याण के अन्तर्गत व्यावसायिक संस्थानों तथा उद्योग समूह के कर्मचारियों को मानवीय आधार पर अधिक-से-अधिक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक सुविधाएँ प्रदान करने पर जोर दिया। जाता है। ‘श्रम-कल्याण’ का विचार अत्यन्त विस्तृत और अनेकार्थबोधक है जोकि देश-काल व परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होते है। किसी विशिष्ट स्थान के श्रमिकों या कर्मचारियों के लिए एक समय-विशेष पर जो कार्य कल्याणकारी समझा जा रहा है, आवश्यक नहीं है कि वह अन्य स्थान के श्रमिकों या कर्मचारियों के लिए भी समय-विशेष पर कल्याणकारी कहा जाये। हमारे देश में किसी उद्योग के श्रमिकों के लिए सन्तुलित आहार तथा वर्दी का प्रबन्ध करना श्रम-कल्याण कार्य के अन्तर्गत गिना जा सकता है लेकिन जापान, जर्मनी या अमेरिका के लिए इसे आवश्यक रूप से श्रम-कल्याण कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित नहीं कर सकते।

इस विषय में ‘श्रम पर रॉयल कमीशन की रिपोर्ट (Report of Royalcommission on Labour) में ठीक ही कहा गया है, “कल्याण शब्द, जैसा कि औद्योगिक श्रमिकों के लिए लागू होता है, आवश्यक रूप से लचीला, एक-दूसरे देश से भिन्न अर्थ वाला, विभिन्न सामाज्ञिक प्रथाओं, औद्योगीकरण के स्तर और श्रमिकों के शैक्षणिक विकास के अनुरूप होता है। सच तो यह है कि श्रम-कल्याण एक बहुत ही व्यापक शब्द है जो श्रमिकों तथा कर्मचारियों के लिए भाँति-भाँति की आवश्यक सुविधाओं को प्रदान करने से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में श्रम-कल्याण का अर्थ उद्योगपति या मालिकों द्वारा अपने श्रमिकों को वेतन के अतिरिक्त प्रदान की जाने वाली उन सुविधाओं से समझा जाता था जो उनकी उन्नति में सहायक सिद्ध होती थीं, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में श्रम-कल्याण का अर्थ अधिक व्यापक हो गया है। अपने व्यापक अर्थ में श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, शासन तथा श्रम संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।”

भ्रम-कल्याण की परिभाषा (Definition of Labour welfare)–श्रम-कल्याण के अर्थ को और स्पष्ट करने के लिए हम निम्नलिखित परिभाषाओं का उल्लेख करेंगे –

(1) एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज के अनुसार, “श्रम-कल्याण के अन्तर्गत किसी मिल के मालिकों के वे ऐच्छिक प्रयास सम्मिलित हैं जिनके द्वारा, वर्तमान औद्योगिक व्यवस्था में, कर्मचारियों के लिए कार्य के आवश्यक तथा यदा-कदा जीवन के लिए आवश्यक उन दशाओं की स्थापना की जाती है जो कानून, उद्योग की प्रथा एवं बाजार की दशा के ऊपर होती है।”

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, “श्रमिकों के कल्याण का अर्थ ऐसी सेवाओं, सुविधाओं तथा आरामों से है जोकि उद्योगों में या उनके निकट स्थापित किये जायें ताकि काम करने वाले लोग अपना काम स्वस्थ और अनुकूल वातावरण में कर सकें तथा उन्हें अच्छे स्वास्थ्य एवं उच्च सामूहिक उत्साहशीलता के वर्द्धन में सहायक सुविधाएँ प्राप्त हो सकें।

श्रम-कल्याण के कार्य (Labour-welfare Activities)-श्रम-कल्याण के कार्यों को सामान्य रूप से तीन प्रमुख वर्गों के अन्तर्गत रखा जाता है

(अ) श्रम-कल्याण के कार्यों का सामान्य वर्गीकरण – साधारणतया श्रम-कल्याण के कार्य तीन भागों में विभाजित किये जा सकते हैं –

(1) श्रम-कल्याण के वैधानिक कार्य – श्रम-कल्याण के वैधानिक कार्यों के श्रमिकों के हित में कानून द्वारा सुनिश्चित ऐसे कल्याण कार्य सम्मिलित हैं जिन्हें करने के लिए उद्योगपति कानून से बाध्य होते हैं। उदाहरण के लिए कार्य के घण्टे, सुरक्षा की व्यवस्था तथा कार्य करने की आवश्यक अनुकूल दशाओं को बनाये रखना आदि वैधानिक कार्यों में सम्मिलित हैं।

(2) श्रम-कल्याण के ऐच्छिक कार्य – ये श्रमिकों के हितार्थ किये जाने वाले वे सभी कार्य हैं। जिन्हें उद्योगपति अपनी इच्छा से सम्पादित करते हैं। इन कार्यों को करने के लिए मालिकों को बाध्य नहीं किया जा सकता है।

(3) पारस्परिक कार्य – पारस्परिक कार्यों में ऐसी सुविधाएँ सम्मिलित हैं जो श्रम संगठनों तथा उद्योगपतियों के मध्य समझौता होकर सुनिश्चित की जाती हैं तथा श्रमिकों को मिलती हैं।

(ब) डॉ० ब्राउटन के अनुसार श्रम-कल्याण कार्यों का वर्गीकरण-डॉ० ब्राउटन (Dr. Broughton) ने श्रम-कल्याण कार्यों को मुख्य रूप से दो वर्गों में रखा है –

  1. उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य तथा
  2. उद्योग के बाहर श्रम-कल्याण के कार्य।

इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(1) उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य-ये कार्य निम्नलिखित हैं –

(i) वैज्ञानिक भर्ती – औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की भर्ती पक्षपातविहीन तथा वैज्ञानिक ढंग से की जानी चाहिए। इस भर्ती का आधार पूर्व अनुभव, साक्षात्कार, क्षमताओं एवं अभिवृत्तियों का परीक्षण होना चाहिए। वैज्ञानिक भर्ती उस भर्ती को कहा जाता है जिसे सभी लोग न्याययुक्त एवं निष्पक्ष स्वीकार करते हों और उससे किसी को असन्तोष नहीं होता।

(ii) औद्योगिक प्रशिक्षण – नये-नये कार्यों को सिखाने के लिए उद्योग के कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

(iii) दुर्घटनाओं की रोकथाम – उद्योग में घटित होने वाली दुर्घटनाओं से श्रमिकों को बचाने के लिए अनिवार्य एवं व्यापक प्रबन्ध किये जाने चाहिए। खतरनाक यन्त्रों से हानि, अत्यधिक ताप तथा आग लगने से हानि की उचित रोकथाम हो। सावधानी के तौर पर आकस्मिक खतरों की पूर्व-सूचना के यन्त्र उपयोग में लाये जा सकते हैं।

(iv) स्वच्छता, प्रकाश तथा वायु का प्रबन्ध – कर्मचारियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए उद्योग के अन्दर कुछ सुविधाओं का दिया जाना आवश्यक है। उद्योग में सफाई, पुताई, रोशनदान, पीने का पानी, प्रकाश, स्नानगृह, मूत्रालय, शौचालय, गन्दी वायु बाहर निकालने के पंखे, ताजी हवा प्रदान करने के पंखे एवं वातानुकूलन इत्यादि की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(v) अन्य सुविधाएँ  उद्योग के भीतर रेडियो, टेलीविजन, मनोरंजन कक्ष, जलपानगृह तथा विश्राम गृह का भी प्रबन्ध किया जाए जहाँ बीच-बीच में जाकर श्रमिक और कर्मचारीगण आराम व राहत पा सकें।

(2) उद्योग के बाहर श्रम – कल्याण के कार्य – उद्योग के बाहर श्रम-कल्याण के प्रमुख कार्य इस प्रकार हो सकते हैं –

(i) सस्ते एवं पौष्टिक भोजन की व्यवस्था – श्रमिकों को सस्ता, अच्छा एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की दृष्टि से उद्योग की तरफ से भोजनालय शुरू किये जा सकते हैं। बहुत-से श्रमिक और कर्मचारी ऐसे होते हैं जो किन्हीं परिस्थितियोंवश अपने साथ परिवार नहीं रखते या वे परिवारविहीन होते हैं। उनका काफी समय एवं शक्ति भोजन की व्यवस्था में खर्च हो जाती है। भोजनालय की व्यवस्था से ऐसे श्रमिकों या कर्मचारियों को भोजन के कष्ट से मुक्ति मिल सकती है। इसके अतिरिक्त श्रमिक बस्तियों के निकट सरकारी सस्ते गल्ले, घी-तेल, मिट्टी का तेल तथा अन्य घरेलू आवश्यक सामान की बिक्री की व्यवस्था हो।

(ii) उत्तम आवास की व्यवस्था – कुछ महानगरों में आवास की विकट समस्या रहती है। उद्योग के श्रमिकों या कर्मचारियों को उनकी हैसियत के मुताबिक उचित आवास नहीं मिल पाता अथवा उन्हें उद्योग से काफी दूर जाकर आवास उपलब्ध होता है जिससे आने-जाने की समस्या उत्पन्न होती है। यदि उद्योगों के निकट श्रमिकों को आवास की सुविधा दी जाये तो वे राहत महसूस करेंगे जिसका उत्पादन पर अच्छा प्रभाव होगा। इसके लिए उद्योगपति, कारखाने में या उसके समीप सस्ते हवादार मकाने बनवा सकते हैं।

(iii) चिकित्सा की व्यवस्था – कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ सकता है, श्रमिक भी बीमार होते हैं। कुछ उद्योगों की प्रतिकूल दशाएँ श्रमिकों या कर्मचारियों को रोगी बना देती हैं। आजकल की महँगाई में श्रमिक अपना अच्छा इलाज नहीं करवा पाते, इसलिए उनका रोग बढ़ता रहता है। पौष्टिक आहार के अभाव में कमजोर और कृशकाय श्रमिकों को रोग जल्दी घेरते हैं। रोगों से उत्पादन क्षमता पर उल्टा असर होता है। मिल-मालिकों को उद्योग या उसके बाहर चिकित्सा की सस्ती, सुलभ एवं अच्छी व्यवस्था प्रदान करनी चाहिए।

(iv) शिक्षा की व्यवस्था – मालिकों द्वारा श्रमिकों या कर्मचारियों के बच्चों हेतु अच्छी प्राथमिक एवं विद्यालयी शिक्षा का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। उनकी पत्नियों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोले जाने चाहिए। इसके अलावा सामाजिक शिक्षा भी श्रम-कल्याण का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। शिक्षा की यह व्यवस्था नि:शुल्क होनी चाहिए।

(v) मनोरंजन की व्यवस्था – कठोर श्रम के बाद मनोरंजन विश्राम जैसा लाभ देता है। श्रमिकों के कल्याण की दृष्टि से उद्योगों के बाहर कर्मचारियों तथा श्रमिकों के मनोरंजन की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए उद्योगपति विभिन्न प्रकार के प्रबन्ध कर सकते हैं; जैसे-रेडियो, टेलीविजन, वीडियो पर फिल्में, चलते-फिरते सिनेमा की व्यवस्था, श्रमिक क्लब, पुस्तकालय तथा वाचनालय आदि की व्यवस्था। श्रमिक बस्तियों में समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नाटकों, स्वांग-तमाशों, धार्मिक लीलाओं, राग-रागनियों, आल्हा आदि के आयोजनों से भी श्रमिकों का मनोरंजन किया जा सकता है। श्रमिकों एवं कर्मचारियों के आवास क्षेत्र में पार्क, मैदान, खेल-क्लब, तैरने व नहाने के ताल तथा अखाड़े आदि का भी प्रबन्ध किया जा सकता है।

(स) आर्थिक लाभ सम्बन्धी भ्रम-कल्याण कार्य – श्रमिकों एवं कर्मचारियों के आर्थिक लाभ की दृष्टि से निम्नलिखित श्रम-कल्याण के कार्य किये जाने आवश्यक हैं –

(i) ओवरटाइम की सुविधा – कभी-कभी उद्योग में उत्पादन-कार्य जोर-शोर से चलता है। कार्य की अधिकता के कारण श्रमिकों को कार्य के नियत घण्टों के अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है। जो श्रमिक निर्धारित समय से अधिक कार्य करते हैं, उनके लिए ओवरटाइम की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(ii) नियमों की सुरक्षा – श्रमिकों के हितों को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें उद्योग में लागू नियमों की सुरक्षा की गारण्टी प्रदान की जाये। पदोन्नति, कार्य के घण्टे, कार्य की अनुकूल दशाएँ तथा अन्य सुविधाओं का नियमानुसार एवं न्यायोचित पालन किया जाना चाहिए। सर्वविदित रूप से, नियमानुसार प्रदान की जाने वाली सुविधाओं में अवहेलना तथा अन्याय से अशान्ति, तनाव एवं संघर्ष जन्म लेते हैं।

(iii) प्रॉविडेण्ट फण्ड, बीमा तथा पेन्शन की सुविधा – यदि उद्योग में कार्यरत श्रमिक और कर्मचारी अपने भविष्य के प्रति चिन्तामग्न रहेंगे तो मानसिक अशान्ति एवं तनाव के कारण वे ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पायेंगे। श्रमिकों और कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने की दृष्टि से प्रॉविडेण्ट फण्ड, जीवन बीमा, सामूहिक बीमा, क्षतिपूर्ति बीमा, महँगाई-भत्ते की किस्तें, बोनस तथा पेन्शन आदि की सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए।

(iv) यात्रा-भत्ता – देशाटन से स्थान-स्थान की आबोहवा, सांस्कृतिक विनिमय तथा स्वच्छन्दता पाकर व्यक्ति का मन सुखी होता है। यदि श्रमिक या कर्मचारी को वर्ष में एक बार अपने परिवारजनों के साथ भ्रमण की सुविधा प्रदान की जाये तो उससे उसका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा। मालिकों के प्रति उसकी श्रद्धा में वृद्धि होगी, उसका उत्साह व कार्यक्षमता बहुगुणित होकर वर्षपर्यन्त बने रहेंगे। इसके लिए समुचित यात्रा-भत्ता प्रदान किया जाना चाहिए।

निष्कर्षतः मनोविज्ञान के उद्योग में मानव-कल्याण के उन्नयन पर अत्यधिक बल दिया है। श्रम-कल्याण के कार्यों के बिना श्रमिकों की कार्य-क्षमता एवं उत्पादन वृद्धि की बात करना व्यर्थ है। मानवीय सम्बन्ध चिर-स्थायी हैं जिन्हें प्रोत्साहित करने के लिए श्रमिकों की भलाई में श्रम-कल्याण कार्यों का नियोजन अपरिहार्य है, किन्तु यह भी समझ लेना चाहिए कि श्रमिकों तथा कर्मचारियों के हिव में श्रम-कल्याण कार्य सुसंयोजित तथा उदारतापूर्वक प्रशासित हों। वस्तुतः बुद्धिमत्तापूर्वक आयोजित एवं उदारतापूर्वक प्रशासित कल्याण कार्य अन्ततः उद्योगपतियों तथा सेवायोजकों के लिए ही उपयोगी व लाभप्रद सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 6.
हड़ताल’ एवं ‘तालाबन्दी के अर्थ एवं कारणों का उल्लेख करते हुए इनकी रोकथाम के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
हड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने में मनोविज्ञान किस प्रकार सहायक है?
उत्तर :
भूमिका
(Introduction)

मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र समस्याओं तथा अशान्ति से परिपूर्ण है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों की समस्याओं के अनुरूप ही औद्योगिक क्षेत्र भी विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त है। इन समस्याओं में से कुछ उत्पादन सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं अथवा तकनीकी बातों को लेकर उत्पन्न होती हैं; और कुछ समस्याएँ मानव व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। अधिकांश उद्योगपति श्रमिकों और कर्मचारियों को-कम-से कम वेतन देकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। इसके विपरीत श्रमिकों और कर्मचारियों का यह प्रयास रहता है कि वे अपने कड़े परिश्रम के बदले जीने के लिए पर्याप्त वेतन तथा जीवन सम्बन्धी सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—काम करने के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना व बीमारी के लिए उचित चिकित्सा की व्यवस्था तथा भत्ता आदि उद्योगपतियों से प्राप्त करें जब औद्योगिक व व्यावसायिक संस्थानों में कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता और श्रमिक हितों की अनदेखी की जाती है तो उससे दोनों वर्गों-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के बीच तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के बीच का तनाव प्रायः ‘हड़ताल’ और ‘तालाबन्दी’ के रूप में प्रकट होता है।

हड़ताल
(Strike)

हड़ताल का अर्थ (Meaning of Strike)

हड़ताल औद्योगिक’ अशान्ति का एक प्रमुख एवं प्रचलित रूप है। उद्योगपति एवं श्रमिकों के सम्बन्धों का इतिहास बहुत पुराना है। प्रारम्भिक काल में श्रमिक उद्योगपतियों को ईश्वर या देवता का प्रतिरूप मानते हुए उनकी सभी आज्ञाओं का पालन करते थे और उद्योगपति इस भावना का लाभ उठाते हुए उनका जबरदस्त शोषण करते थे, किन्तु औद्योगिक क्रान्ति के आगमन ने पासा ही पलट दिया, श्रमिकों में जागरूकता आयी और वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गये। आवश्यकताओं, कठिनाईयों तथा समस्याओं में समानता के आधार पर श्रमिकों में एकता तथा सहयोग की भावना विकसित हो जाना स्वाभाविक है। श्रमिक एक हुए और उनके संगठन बने। इस प्रकार सामूहिक एकता ने श्रमिक संघों (Labour Unions) की विचारधारा को व्यवहार में बदल दिया। श्रमिक संघों ने उद्योगपतियों से अपने अधिकारों तथा सुविधाओं की माँगें प्रारम्भ कीं जिन्हें अधिकतम लाभ की लालसा से प्रेरित उद्योगपतियों द्वारा ठुकरा दिया गया। जब उद्योग में श्रमिकों पर काम का दबाव अधिक पड़ता है लेकिन उनकी न्यायोचित माँगों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो वे विरोधस्वरूप काम पर जाना बन्द कर देते हैं। वे सभी या अधिकांश लोग, जो काम पर नहीं जाते, उद्योगपति एवं उसकी नीतियों के विरुद्ध तथा अपनी माँगों व समस्याओं के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, जुलूस आदि निकालते हैं तथा भूख-हड़ताल पर बैठ जाते हैं। श्रमिकों की इन समस्त क्रियाओं को हड़ताल (Strike) कहा जाता है।

हड़ताल के कारण (Causes of Strike)

हड़ताल के मूल में उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के परस्पर विरोधी लक्ष्यों एवं हितों पर आधारित वर्ग-संघर्ष की एक लम्बी दास्तान निहित है। इस वर्ग-संघर्ष के अनेक कारण हो सकते हैं; यथा-अधिक वेतन व भत्तों की माँग, कम के घण्टे कम करने की माँग, बोनस तथा दूसरी सुविधाओं को लेकर मजदूर-मालिक में संघर्ष आदि। वास्तविकता यह है कि श्रमिक जानता है कि उद्योगपति के भोग-विलास के सभी साधन उसकी खून-पसीने की कमाई से आये हैं, जबकि वह जीवन-पर्यन्त झोंपड़पट्टी में पशुओं की तरहू जीवन जीता है। श्रमिक स्वयं को शोषित तथा उद्योगपति को शोषक समझता है। अपने शोषण को लेकर श्रमिकों के मन में असन्तोष की यह आग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तात्कालिक कारणों से हड़ताल के रूप में भड़क उठती है। हड़ताल के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) इतिहासजनित अविश्वास की प्रवृत्ति – औद्योगिक क्रान्ति से लेकर वर्तमान क्षणों तक करीब-करीब तीन शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। औद्योगिक संघर्षों के इस लम्बे इतिहास में उद्योगपति और श्रमिकों के बीच छत्तीस (36) का आँकड़ा रहा है यानि दोनों एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। विरोध के उग्र होते स्वरों ने दोनों वर्गों के बीच अविश्वास की खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि हर पल विश्व के किसी-न-किसी कोने में हड़ताल देखी जा सकती है।

(2) सामाजिक दूरी – उद्योगपति और श्रमिक समाज की सीमाओं के दो छोर हैं जिनके बीच कोई सामाजिक सम्बन्ध, सम्पर्क, प्रेम एवं सहानुभूति नहीं पायी जाती। इससे भी निकटता समाप्त होती है तथा अविश्वास बढ़ता है। दोनों वर्ग अपने हितों में जरा से भी आघात से तिलमिला उठते हैं। श्रमिक उद्योगपतियों के अन्याय से उत्तेजित होकर हड़ताल का निर्णय ले लेते हैं। सामाजिक दूरी के कारण उनमें आपसी सूझ-बूझ होने का अवसर और समझौते का रास्ता नहीं मिलता।।

(3) दुर्व्यवहार – कभी-कभी किसी उद्योग के अधिकारी श्रमिकों को मार बैठते हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार, कर बैठते हैं जिससे सामूहिक असन्तोष पैदा होता है और उस अधिकारी को दण्डित कराने के लिए हड़ताल होती है।

(4) कार्य की दशाएँ – कार्य की प्रतिकूल दशाएँ हड़ताल को जन्म देती हैं। कुछ उद्योगों में श्रमिकों से अमानवीय तरीके से काम लिया जाता है और उन्हें आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उदाहरणार्थ-श्रमिकों के काम के घण्टे अधिक होते हैं, उन्हें विश्राम नहीं करने दिया जाता, उन्हें अधिक ताप याघातक मशीनों का सामना करना पड़ता है तथा उनसे बचाव का कोई उचित प्रबन्ध भी नहीं किया जाता ईत्यादि। इससे न केवल श्रमिकों की कार्य-क्षमता पर बुरा असर पड़ता है बल्कि उनका स्वास्थ्य भी गिरता जाता है। इन कारणों से कभी-कभी किसी श्रमिक की मृत्यु भी हो सकती है। इन विभिन्न कारणों से श्रमिकों में रोष उत्पन्न हो जाता है और वे हड़ताल के माध्यम से अपनी माँगे मनवाते हैं।

(5) ओवरटाइम – काम के निर्धारित घण्टों के अतिरिक्त काम करने पर जब श्रमिकों को इस अतिरिक्त समय को पारिश्रमिक नहीं दिया जाता तो उन्हें हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है।

(6) वेतन-वृद्धि, भत्ता और बोनस – बढ़ती हुई महँगाई के विरुद्ध उद्योगों के श्रमिक अपने मालिकों से वेतन बढ़ाने की माँग करते हैं। महँगाई बढ़ने के साथ-साथ भत्तों का बढ़ना भी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उद्योगों में लाभ का पूरा अंश मालिकों के पेट में क्ला जाता है। अतः वेतन-वृद्धि, भत्ता तथा बोनस को लेकर जब श्रमिकों की माँगें पूरी नहीं होतीं तो वे हड़ताल करने पर उतारू हो जाते

(7) राजनीतिक कारण – कुछ स्वार्थी नेता लोग अपनी नेतागिरि चमकाने के इरादे से श्रमिकों को बहला-फुसलाकर हड़ताल करवाते हैं और उद्योगपति से साँठ-गाँठ कर पैसा खा जाते हैं। इससे श्रमिकों को भारी हानि होती है।

(8) मजदूर-संगठनों की बहुलता – आजकल दुनिया में इतने सच्चे-झूठे मजदूर-संगठन किसी-न-किसी लक्ष्य को लेकर पैदा हो गये हैं कि उनमें से अधिकांश अपने अस्तित्व या स्वार्थपूर्ति में श्रमिकों को मोहरा बनाकर हड़ताल कराने में सफल हो ही जाते हैं। श्रमिक इनके बहकावे में आकर हड़ताल कर देते हैं।

तालाबन्दी
(Lockout)

तालाबन्दी का अर्थ (Meaning of Lockout)

तालाबन्दी औद्योगिक अशान्ति का एक दूसरा किन्तु प्रमुख पक्ष है। इसके लिए विशेष रूप से उद्योगपतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। कभी-कभी जब उद्योगपति श्रमिकों की माँग पूरी नहीं कर पाते या पूरी करना नहीं चाहते तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे औद्योगिक इकाई बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। ऐसी अवस्था में श्रमिकों या कर्मचारियों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। इस भाँति ‘तालाबन्दी’ (Lockout) हड़ताल का एक विरोधी रूप है।

तालाबन्दी के कारण (Causes of Lockout)

तालाबन्दी के बहुत से कारण हो सकते हैं। इनमें से प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है –

(1) प्रथमतः उद्योगपति श्रमिकों की अतिशय, औचित्य की सीमा से बाहर तथा राजनीति से प्रेरित माँगों से परेशान होकर तालाबन्दी का आश्रय लेते हैं। उद्योगपति सोचते हैं कि लम्बे समय तक भूख और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं से तड़प-तड़पकर श्रमिक सबक सीख जाएँगे और ताला खोलने की खुशामद करेंगे। इस प्रकार, भारी नुकसान सहते हुए भी श्रमिकों पर अंकुश लगाने का उद्योगपतियों की दृष्टि में यह एक उपाय है।

(2) दुसरे, किन्हीं कारणों से कभी-कभी कोई औद्योगिक इकाई लगातार नुकसान उठाती है और इस भाँति घाटे में चलती है। उद्योगपति कुछ समय तक तो घाटा सहते रहते हैं लेकिन फिर वे मिल में ताला लगा देते हैं।

(3) तीसरे, यदा-कदा लम्बे समय तक पावर सप्लाई, ईंधन या कच्चे माल की आपूर्ति न होने के कारण भी उद्योगपति को नुकसान होता है। उत्पादन घटने या समाप्त होने से तैयार माल का उठान नहीं हो पाता; अत: चे विवश होकर तालाबन्दी कर देते हैं।

हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के उपाय
(Measures to Remove Strikes and Lockouts)

‘हड़ताल और तालाबन्दी’ दोनों ही औद्योगिक अशान्ति के परिचायक हैं। हड़ताल में श्रमिक काम बन्द कर देते हैं और तालाबन्दी में उद्योगपति कारखाने का ताला बन्द कर देते हैं। दोनों में ही औद्योगिक संघर्ष का वीभत्स रूप देखने को मिलता है जिससे उत्पादन कार्य ठप हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर पर हानि उठानी पड़ती है; अतः हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम व निवारण के तत्काल उपाय करने चाहिए। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

(1) श्रमिकों का सहयोग (Co-operation of Labourers) – उद्योगपतियों को श्रमिकों का विश्वास अर्जित कर उनसे प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्राप्त करना चाहिए। इससे औद्योगिक अशान्ति एवं संघर्ष स्वतः ही दूर हो जाएगा।

(2) उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस (Sufficient wages, Allowance and Bonus) – श्रमिकों को उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस आदि समय पर तथा नियमानुसार प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी आवश्यकताओं की भली प्रकार पूर्ति कर सकें। बढ़ती हुई महँगाई के साथ वेतन-दरों में वृद्धि न्यायोचित तथा मानवीय दृष्टि से वांछित है।

(3) तात्कालिक कारणों का निराकरण (Removing of Immediate Causes) – हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के लिए तात्कालिक असन्तोष के कारणों को जल्दी ही निराकरण कर लिया जाए। ऐसी परिस्थितियों की जाँच-पड़ताल किन्हीं सर्वमान्य एवं उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से करायी जाए और उनका शीघ्र समाधान प्रस्तुत कर उसे क्रियान्वित किया जाए।

(4) श्रम-कल्याण कार्यों का प्रबन्ध (Managing Labour-welfare Activities) – उद्योग की तरफ से श्रमिकों के लिए कुछ सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। इन सुविधाओं की प्राप्ति से उन्हें सुख और सन्तोष मिलता है जिससे वे अधिक समायोजन के साथ कार्य कर सकते हैं। इन सुविधाओं में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, आवास, भोजन आदि का प्रबन्ध मुख्य है।

(5) विशिष्ट समिति (Specific Association) – औद्योगिक प्रशासन के लिए एक विशेष समिति का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसमें श्रमिकों, कर्मचारियों तथा मालिकों के प्रतिनिधियों को स्थान दिया जाए। यह समिति किसी भी समस्या या अवरोध की परिस्थिति में सभी मामलों में विचार-विमर्श करते हुए पारस्परिक मतभेदों का निवारण करेगी। इससे सहयोगपूर्ण वातावरण की वृद्धि होगी और औद्योगिक तनाव व अशान्ति कम होगी।

निष्कर्षतः हड़ताल और तालाबन्दी इन दोनों में से किसी एक का भी विचार व्यक्तिगत एवं राष्ट्रहित में नहीं है। इनसे उत्पादन में कमी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी तथा अन्ततः भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। ये दोनों ही आन्दोलन, तनाव और संघर्ष के परिचायक हैं जिनके परिणामतः अशान्ति व अव्यवस्था का जन्म होता है। कुल मिलाकर उद्योग की मुख्य जिम्मेदारी उद्योगपति या सेवायोजक की होती है। यदि वे अपने लाभांश की एक छोटी-सी मात्रा का त्याग करना सीखें तथा श्रमिकों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें सहानुभूति का पात्र बनायें तो इससे न केवल उत्पादन-वृद्धि होगी अपितु उद्योग की सम्पूर्ण व्यवस्था अभीष्ट रूप से संचालित भी हो सकेगी।

प्रश्न 7.
विज्ञापन (Advertisement) से क्या आशय है? विज्ञापन के उद्देश्यों अथवा कार्यों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति के सूत्रपात ने विश्व के सभी देशों की औद्योगिक इकाइयों को आधुनिकतम तथा स्वचालित मशीनों से सजा दिया। इससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक वृद्धि हुई और वाणिज्य एवं आर्थिक क्षेत्रों की काया ही पलट हो गयी, लेकिन जनसंख्या-वृद्धि तथा मानव सम्पर्को की परिधि व्यापक होने के कारण एक नयी समस्या उभरी। यह समस्या औद्योगिक उत्पादनों की प्रमुखता की वजह से एक ही प्रकार के अनेकानेक उत्पादन बाजार में आने के कारण उत्पादकों के सम्मुख उत्पादित वस्तुओं की बिक्री की समस्या थी। वस्तुत: विज्ञान और तकनीकी की विकसित प्रविधियों की सहायता से एक ही वस्तु अनेक स्थानों पर बहुत-सी कम्पनियों द्वारा बनायी जाने लगी जिससे प्रतियोगिता बहुत बढ़ गयी। प्रगतिशील व्यापारियों एवं औद्योगिक संस्थानों ने बिक्री की समस्या के समाधान तथा अतिरिक्त उपभोक्ताओं को अपने उत्पादन के प्रति आकर्षित करने के विचार से ‘विज्ञापन (Advertisement) का सहारा लिया।

विज्ञापन का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Advertisement)

आधुनिक समय विज्ञापन का समय है। विज्ञापन का शाब्दिक अर्थ है-‘वि + ज्ञापन’ अर्थात् विशेष प्रकार से बताना तथा जानकारी प्रदान करना। ‘विज्ञापन’ एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं का ध्यान किसी उत्पादन (वस्तु) विशेष की ओर इस भाँति आकृष्ट किया जाता है कि वह व्यक्ति उस वस्तु को खरीदने हेतु प्रेरित हो तथा अन्तत: उसे क्रय कर ही ले। अतः विज्ञापन से तात्पर्य उस पद्धति से है जिसके माध्यम से कुछ विशिष्ट एवं निश्चित वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व एवं विशेषताओं की ओर लोगों का ध्यान खींचा जाता है। कुल मिलाकर विज्ञापन एक तरह का प्रचार है जो किसी वस्तु की आन्तरिक व बाह्य विशेषताओं तथा उपयोगिताओं को लोगों के मस्तिष्क पर इस प्रकार से चित्रित करता है कि वे उसे खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं। इस प्रकार विज्ञापित वह वस्तु पहले की अपेक्षा अधिक बिकने लगती है।

आरडब्ल्यू० हसबैण्ड ने विज्ञापन को इस प्रकार परिभाषित किया है, “विज्ञापन को प्रचार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व व गुणों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।”

“Advertisement may be defined as publicity which calls attention to the existence and merits of certain goods and services.”
-R. W. Husband

विज्ञापन के उद्देश्य अथवा कार्य अथवा विज्ञापन के मनोवैज्ञानिक आधार
(Aims or Functions of Advertisement)

विज्ञापन का अर्थ जानने एवं इसकी परिभाषा का अध्ययन करने के उपरान्त ज्ञात होता है कि विज्ञापन के माध्यम से कुछ उपलब्ध उत्पादनों की ओर ध्यान आकर्षित कराने का प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही जो विज्ञापन इस उद्देश्य अथवा कार्य में सफल रहते हैं उनकी उत्पादित वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि हो जाती है। विज्ञापन के प्रमुख उद्देश्य अथवा कार्य निम्नलिखित हैं –

(1) ध्यान आकृष्ट करना (To Attract Attention) – विज्ञापन का सर्वप्रथम उद्देश्य एवं कार्य लोगों का ध्यान वस्तु-विशेष की ओर आकृष्ट करना है। विज्ञापन के माध्यम से वस्तु के प्रति यह आकर्षण इतना अधिक उत्पन्न कर दिया जाता है कि लोगों की वस्तु में रुचि बढ़ जाती है तथा वे प्रेरित होकर उसे खरीद लेते हैं। इसके लिए आकर्षक शीर्षक, रंगबिरंगे चित्र, रेडियो पर रुचिकर मधुर ध्वनि तथा टी० वी० पर तस्वीर और आवाज का मनोहारी संगम प्रस्तुत किया जाता है।

(2) रुचि उत्पन्न करना (To Create Interest) – विज्ञापन का दूसरा उद्देश्य या कार्य वस्तु-विशेष में लोगों की रुचि उत्पन्न करना है। विज्ञापनदाता अपनी वस्तु में रुचि उत्पन्न करने के लिए तरह-तरह के साधन अपनाते हैं। विज्ञापन की अनोखी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। पुरुषों में रुचि पैदा करने की दृष्टि से सुन्दर युवतियों के चित्र प्रदर्शित किये जाते हैं। बच्चों को उस वस्तु को प्रयोग करते दिखाया जाता है।

(3) विश्वास पैदा करना (‘Tb Produce Belief) – विज्ञापन का उद्देश्य यह होता है कि उसके माध्यम से उपभोक्ताओं में वस्तु-विशेष के प्रति यह विश्वास पैदा हो जाए कि सिर्फ वही वस्तु उनके लिए उपयोगी हो सकती है, कोई अन्य वस्तु नहीं। विश्वास उत्पन्न करने की दृष्टि से विज्ञापन के चित्र के अतिरिक्त शीर्षक एवं लिखी गयी सामग्री को प्रभावशाली ढंग से संयोजित किया जाता है। उदाहरण के लिए कोई लोकप्रिय गायिका किसी गोली को चूसते हुए यह विश्वास दिलाती है इसके उसके गले की खराश एकदम ठीक ही गयी है।

(4) स्मृति पर प्रभाव (Tb Influence Memory) – विज्ञापन का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है। कि किसी वस्तु-विशेष के विषय में जो बातें उसमें व्यक्त की जाएँ वे लोगों के मस्तिष्क पर लम्बे समय तक अंकित रहें तथा उनका प्रभाव स्थायित्व ग्रहण कर सके। मानव स्मृति पर जितना तीव्र प्रभाव विज्ञापन डालेगा इतना ही वह सफल होगा।

(5) क्रय की प्रेरणा (Intention to Buy) – विज्ञापन का अन्तिम किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य यह है कि वह व्यक्ति में विज्ञापित वस्तु को खरीदने की इच्छा उत्पन्न कर दे। वस्तुतः वस्तु के क्रय की प्रेरणा एवं बिक्री के विचार से ही अन्य सभी उद्देश्य जुड़े हैं। इस उद्देश्य में सफल विज्ञापन अपने उपयुक्त सभी उद्देश्यों में सफल समझा जाता है।

प्रश्न 8.
वर्तमान युग में विज्ञापन के प्रमुख साधनों का उल्लेख करते हुए उनके सापेक्षिक महत्त्व का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक युग में विज्ञापनों की बढ़ती हुई उपयोगिता के कारण इन्हें मानव-जीवन का एक अपरिहार्य अंग मान लिया गया है। हर रोज सुबह को समाचार-पत्रों में विज्ञापन के साथ दिनारम्भ होता है, समाचार-पत्रों में रखे विज्ञापन के पैम्फलेट, रेडियो या एफ०एम० पर विज्ञापन, सड़क और चौराहों के बोर्ड, टेलीविजन पर विज्ञान आदि-आदि, मनुष्य का जीवन हर तरफ विज्ञापनों से भरा पड़ा है। छोटी-से छोटी वस्तु के क्रय-विक्रय से लेकर आवश्यकताओं से सम्बन्धित तथा वैवाहिक विज्ञापन अपने महत्त्व एवं उपयोगिता को सिद्ध करते हैं। विज्ञापन और तकनीक की प्रगति ने विज्ञापन के क्षेत्र को भी विभिन्न नवीनतम प्रविधियों, यन्त्रों, माध्यमों तथा साधनों से सुसज्जित किया है।

विज्ञापन के प्रमुख साधन अथवा माध्यम
(Advertising Media)

विज्ञापन के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं –

(1) समाचार-पत्र – समाचार-पत्र विज्ञापन का सर्वव्यापी एवं सर्वस्वीकृत साधन है। अधिकांश समाचार-पत्र प्रतिदिवस प्रात: प्रकाशित होते हैं। कुछ सन्ध्याकाल में या सप्ताहवार भी प्रकाशित किये जाते हैं। समाचार-पत्रों की आय का मुख्य साधन विज्ञापन है क्योंकि इन पत्रों के माध्यम से सन्देश को देश-विदेश में पहुँचाया जा सकता है। वस्तुतः दैनिक समाचार-पत्र जन-सम्पर्क के श्रेष्ठ साधन कहे जाते हैं। शिक्षित लोगों का एक बड़ा प्रतिशत तो निस्सन्देह, समाचार-पत्र पढ़ने को आदि है ही, लेकिन अनपढ़ लोग भी इसमें समुचित दिलचस्पी रखते हैं और शिक्षित लोगों से पूछताछ कर विज्ञापन आदि की जानकारी प्राप्त करते हैं। समाचार-पत्रों के कुछ पृष्ठ एवं विशिष्ट स्थान विज्ञापन के लिए ही निश्चित होते हैं। ये विज्ञापन प्रायः भावात्मक अपील के साथ सरल और सीधी भाषा-शैली में होते हैं। विज्ञापनों की निरन्तर पुनरावृत्ति से विज्ञापन की प्रभावकता में वृद्धि भी होती है। नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी, आदि-आदि अनेक समाचार-पत्र विभिन्न स्थानों से प्रकाशित एवं प्रसारित होते हैं। इस प्रकार समाचार-पत्र नाना प्रकार के विज्ञापन का प्रमुख साधन है।

(2) पत्रिकाएँ एवं अन्य प्रकाशन – अनेक मासिक, पाक्षिक तथा साप्ताहिक पत्रिकाएँ भी विज्ञापन की अच्छी माध्यम हैं। कुछ जनप्रिय एवं अच्छी पत्रिकाओं की साज-सज्जा, कागज, छपाई तथा पाठ्य-सामग्री इतनी आकर्षक होती है कि लोग इन्हें खरीदकर पढ़ते हैं और सँभालकर रख लेते हैं। इन पत्रिकाओं का एक विशेष आकर्षण उनमें छपे रंगीन एवं अनूठे विज्ञापन हैं। आजकल पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों के चित्र, सामग्री तथा प्रस्तुतीकरण का समंजन इतने उच्च स्तर का होने लगा है। कि बहुत से लोग तो इन्हें बहुत ही दिलचस्पी लेकर देखते-पढ़ते हैं। मुख्य पत्रिकाओं के अतिरिक्त अन्य प्रकाशन भी हमें प्राय: हर एक बुक स्टॉल पर रखे हुए मिलते हैं। इस भाँति पत्रिकाएँ तथा अन्य कुछ प्रकाशन विझपन के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

(3) पोस्टर एवं बोर्ड – नगरों एवं महानगरों के चौराहों पर, राष्ट्रीय राजमार्गों पर तथा अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर विशालकाय बोर्ड लगाकर उन पर विज्ञापन लिखे जाते हैं। ये बोर्ड अपनी स्थिति के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। बहुधा इन बोर्डो पर लिखे विज्ञापनों की सामग्री संक्षिप्त, रोचक व प्रभावशाली होती है तथा चित्रे बड़े, रंगीन और आकर्षक होने के कारण लोगों का ध्यान बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कुछ छोटे-छोटे बोर्ड बस, ट्रक या कारों पर भी लटके हुए देखे जा सकते हैं।

बोर्डों के अतिरिक्त नगरों की दीवारों पर पोस्टर भी चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। ये पोस्टर किसी कम्पनी या व्यापारिक संस्थान के हो सकते हैं तथा फिल्मों के भी-ज्यादातर फिल्म उद्योग से सम्बन्धित पोस्टर ही हमें दीवारों पर चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। पोस्टर चिपकाने से दीवारें खराब हो जाती हैं; अत: मकान मालिक इनके चिपकाने पर आपत्ति करते हैं। यही कारण है कि आमतौर पर रात को ही पोस्टर चिपकाये आते हैं। इस दृष्टि से यह आपत्तिजनक तथा समाज विरोधी कार्य है। ऐसा ही एक अन्य कार्य दीवारों पर रंग-रोगन से लिखवाकर विज्ञापन करना भी है। निजी दीवार पर लिखना या किराया देकर वे स्वीकृति लेकर लिखना एक अलग बात है, अन्यथा इसे भी अच्छा एवं उचित नहीं कहा जा सकता। कुछ भी सही लेकिन बोर्ड के माध्यम से, पोस्टर द्वारा या दीवार पर लिखकर विज्ञापन करना विज्ञापन के प्रमुख माध्यम हैं।

(4) पर्चे छपवाना – आमतौर पर कम्पनियाँ, व्यापारिक संस्थाएँ, प्रतिष्ठित दुकानदार एवं अन्य संस्थान कागज के पर्चे पर विज्ञापन छपवाकर उन्हें समाचार-पत्रों में रखवा देती हैं या बाजार आदि में बँटवाती हैं। विज्ञापन की दुनिया में इसे एक स्वस्थ परम्परा तथा सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि इससे किसी को किसी प्रकार की हानि नहीं होती। विज्ञापनकर्ता द्वारा छपवाकर बाँटे गये ऐसे पर्चे जिज्ञासु, इच्छुक तथा सम्बन्धित लोग ही पढ़ पाते हैं, अन्यथा प्रायः लोग इन्हें फाड़कर फेंक देते हैं।

(5) रेडियो पर विज्ञापन – आज की दुनिया में रेडियो/मोबाइल फोन का प्रयोग बहुतायत से होता है। हमारे देश में रेडियो पर विविध भारती, ऑल इण्डिया रेडियो तथा रेडियो सीलोन पर प्रसारित कार्यक्रमों ने काफी लोकप्रियता अर्जित की है। इन प्रसारणों में विज्ञापन प्रसारण सेवा प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण है। विज्ञापन के प्रसारण में संगीत लय की सुमधुर धुनें हृदय पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इनकी अनुगूंज श्रोता के मस्तिष्क में लम्बे समय तक बसी रहती है। यही कारण है कि रेडियो के विज्ञापन घर-घर सुने जाते हैं और विज्ञापन के सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकृत हैं।

(6) दृश्य-श्रव्य माध्यम – दृश्य-श्रव्य माध्यम में टेलीविजन, वीडियो, मोबाइल तथा सिनेमा प्रमुख एवं प्रभावशाली माध्यम हैं। यह माध्यम मुद्रित माध्यम से कई गुना अधिक प्रभावशाली कहा जा सकता है। टेलीविजन पर अनेक कम्पनियों, उद्योगों तथा व्यापारिक संस्थानों के विज्ञापन तथा प्रायोजित कार्यक्रम दिखाये जाते हैं। वीडियो फिल्में भी टेलीविजन के साथ जुड़ी हैं। वीडियो रील में तो विज्ञापनों की भरमार होती है। सिनेमा में सभी आयु वर्ग के लोग मनोरंजन हेतु जाते हैं पिक्चर शुरू होने से ही पहले तथा इण्टरवल के समय भारी मात्रा में विज्ञापन दिखाये जाते हैं। इस प्रकार दृश्य-श्रव्य माध्यम विज्ञापन का एक अत्यन्त प्रभावशाली व महत्त्वपूर्ण साधन है।

(7) अन्य माध्यम – कुछ समृद्ध औद्योगिक एवं व्यापारिक संस्थान पर वार्षिक कैलेण्डर, डायरी, चाबी के गुच्छे, पेन तथा पेन-होल्डर आदि पर अपना विज्ञापन छपवाते हैं। रेलवे टाइम-टेबिल तथा टेलीफोन निर्देशिका पर भी विज्ञापन दिए जाते हैं। बड़े-बड़े मेलों में विशालकाय उड़ने वाले गुब्बारों पर भी विज्ञापन देखे जाते हैं।

लघुउतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है
  2. यह औद्योगिक जगत् से सम्बन्धित मनुष्यों के व्यवहारों का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है
  3. मनोविज्ञान की यह अध्ययन शाखा उत्पादक व उत्पादक तत्त्वों के मध्य कड़ी का काम करती है
  4. औद्योगिक मनोविज्ञान जहाँ एक ओर निरीक्षक तथा उसके अधीनस्थ कर्मचारियों के सम्बन्धों के विषय में अध्ययन करता है वहीं दूसरी ओर श्रम एवं प्रबन्ध का भी समुचित ज्ञान कराता है
  5. इसके अन्तर्गत उद्योग में ‘उपयुक्त कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है
  6. यह मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों को उद्योगों में लागू करता है जिससे उद्योगों से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों का हित एवं कल्याण होता है तथा
  7. औद्योगिक मनोविज्ञान, औद्योगिक क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान तथा उपलब्धियों से सम्बन्ध रखता है।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्षेत्र में उपयुक्त कर्मचारियों के चयन का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
उत्पादन में वांछित वृद्धि के अतिरिक्त कर्मचारियों के मानसिक सुख के लिए उपयुक्त कार्य हेतु उपयुक्त व्यक्तियों का चयन आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इस चयन का महत्त्व निम्न प्रकार प्रतिपादित है –

(1) कर्मचारी का सुख एवं सन्तोष – जब कोई कर्मचारी अपनी रुचि, अभिरुचि, योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुकूल कार्य या व्यवसाय प्राप्त करता है तो उसे वह अत्यन्त दक्षता और कुशलतापूर्वक सम्पन्न करता है। यह दक्षता और कुशलता उसे पदोन्नति की ओर अग्रसर करती है। उच्च पद पर आसीन होकर कर्मचारी और अधिक सुख व सन्तोष प्राप्त करता है।

(2) उत्पादन-वृद्धि – योग्यताओं एवं रुचि के अनुसार कार्य पाने पर कर्मचारी खूब मन लगाकर उसमें जुट जाता है, जिससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक अभिवृद्धि होती है। अतः उपयुक्त कर्मचारी का चयन उत्पादन वृद्धि के विचार से सम्बद्ध है।

(3) समय एवं धन की बचत – उपयुक्त कर्मचारियों के चयन से समय एवं धन की बचत होती है। हम जानते हैं कि अनुपयुक्त कार्य या व्यवसाय को व्यक्ति कुछ दिन करके छोड़ देता है। वह नये सिरे से पुनः नया कार्य पकड़ता है जिसके लिए चयन एवं प्रशिक्षण की प्रक्रिया दोहरायी जाती है। इससे समय और धन की हानि होती है।

(4) दुर्घटनाओं का अभाव – मनवांछित तथा उपयुक्त कार्य पाकर कर्मचारी पूरे मन और ध्यान से कार्य करता है। ध्यान उचटने से मशीनों के साथ दुर्घटनाएँ घटती हैं, किन्तु ध्यानपूर्वक कार्य करने से दुर्घटनाओं के होने की बहुत कम सम्भावना रहती है। इससे उद्योग में टूट-फूट भी कम होती है।

(5) परिस्थितियों से उचित समायोजन – उपयुक्त व्यवसाय मिलने पर कर्मचारी का व्यवसाय से उचित एवं स्वस्थ समायोजन स्थापित हो जाती हैं। वह चुने गये कार्य एवं परिस्थितियों के साथ आसानी से तालमेल बना लेता है।

(6) स्थायित्व – मनोनुकूल व्यवसाय या कार्य मिलने पर कर्मचारी अपने कार्य को छोड़कर अन्य स्थान पर नहीं जाते, वरन् वे उसी उद्योग में स्थिर रहना चाहते हैं और उनकी गतिशीलता कम हो जाती है।

(7) औद्योगिक शान्ति – व्यवसाय से सन्तुष्ट, सुखी एवं समायोजित कर्मचारी मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। वह तनावों से मुक्त रहता है और प्रतिकूल परिस्थितियों से भी मधुर सामंजस्य बनाने में सफल रहता है। इन दशाओं में औद्योगिक शान्ति कायम रहती है, उत्पादन कार्य प्रगति पर रहता है और किसी प्रकार का कोई अवरोध उत्पन्न नहीं होता।

प्रश्न 3.
पदोन्नति के लिए योग्यता की जाँच की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्षेत्र में व्यक्ति की पदोन्नति के लिए आवश्यक योग्यता का होना अनिवार्य माना जाता है। व्यक्ति की इस आवश्यक योग्यता के मूल्यांकन या जाँच के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है –

(1) प्रतियोगी परीक्षाएँ – वर्तमान समय में पदोन्नति के लिए कर्मचारी की योग्यता आँकने की यह पहली वस्तुनिष्ठ विधि हो सकती है। कर्मचारी तीन प्रकार परीक्षाओं में अपनी योग्यता प्रदर्शित कर सकते हैं –

(i) खुली प्रतियोगिता परीक्षा – इसके अन्तर्गत सभी कर्मचारियों को परीक्षा में बैठकर पदोन्नति का समान अवसर प्रदान करते हुए उच्च पदों के लिए व्यापक क्षेत्र की व्यवस्था की जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि इसमें भाग लेने वाले परीक्षार्थी पहले से ही सेवा में हों।

(ii) सीमित प्रतियोगिता परीक्षा – इसके अन्तर्गत परीक्षा में बैठने का अवसर सिर्फ पहले से ही निम्न पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को प्रदान किया जाता है। इसे बन्द व्यवस्था भी कहते हैं।

(iii) उत्तीर्णता परीक्षा – न्यूनतम योग्यता सिद्ध करने वाले परीक्षार्थियों को केवल उत्तीर्ण भर होना होता है। उत्तीर्ण व्यक्तियों की एक सूची तैयार कर ली जाती है तथा पद रिक्त होने पर सूची के आधार पर उन्हें पदोन्नत कर दिया जाता है।

(2) सेवा अभिलेख – कर्मचारी की योग्यता मापन के लिए उसकी सेवा का एक अभिलेख (Record) तैयार किया जाता है, जिसमें उसके कार्य सम्पादन का पूरा विवरण होता है। इसे ‘कार्यकुशलता माप’ भी कहते हैं। अनेक व्यवसायों में सेवा अभिलेख के आधार पर पदोन्नति का प्रावधान होता है।

(3) नियुक्ति करने वाले अधिकारी या विशिष्ट पदोन्नति मण्डल का वैयक्तिक निर्णय – कर्मचारी जिस विभाग में कार्यरत हैं, उस विभाग के अध्यक्ष द्वारा कर्मचारियों की कार्यकुशलता का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि कर्मचारी विभागाध्यक्ष के अधीन लम्बी अवधि तक काम कर चुके होते हैं; अत: वह उनकी अच्छाइयों-बुराइयों को बेहतर पहचान सकता है। विभागाध्यक्ष के व्यक्तिगत निर्णय में पक्षपात का दोष आ सकता है। इस दोष के निवारण हेतु विभागीय पदोन्नति मण्डल’ स्थापित किये जाते हैं। ये मण्डल सभी कर्मचारियों के काम की समीक्षा करते हैं तथा सेवा-अभिलेखों के आधार पर उनकी पदोन्नति के विषय में अपनी संस्तुति प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए-हड़ताल का स्वरूप।
उत्तर :
हड़ताल का स्वरूप श्रमिकों की माँग के विषय तथा उद्योगपतियों की मनोवृत्ति द्वारा निर्धारित होता है। हड़ताल के विभिन्न स्वरूप हैं; यह शान्त प्रकृति की भी हो सकती है और उग्र प्रवृत्ति की भी। कभी-कभी हड़ताल में कर्मचारी चुपचाप एक ओर खड़े होकर इकट्ठा होते रहते हैं तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रबन्धकों एवं सेवायोजक का शान्तिपूर्वक विरोध करते हैं। ‘कलम-बन्दी’ (Pen-Strike) भी हड़ताल का एक रूप है जिसके अन्तर्गत कर्मचारी काम पर तो जाते हैं, उपस्थिति भी भरते हैं किन्तु काम बिल्कुल नहीं करते। प्रायः लोग अपनी माँगों और समस्याओं को लेकर चिल्लाते हैं, जोर-जोर से नारे लगाते हैं या अपनी माँगों को गीतों के रूप में उच्चारित करते हैं। कहीं-कहीं कर्मचारियों को भूख-हड़ताल के माध्यम से स्वयं को यन्त्रणा देते हुए देखा जाता है, इससे उनके पक्ष में जनसमर्थन जुटता है। कभी-कभी तो भूख-हड़ताल का सुखद परिणाम निकलता है क्योंकि उद्योगपति उनकी न्यूनाधिक माँगों को स्वीकार कर उन्हें जल्दी ही हड़ताल खत्म करने के लिए राजी कर लेते हैं।

किन्तु कभी-कभी भूख-हड़ताल लम्बी खिंच जाने से श्रमिक नेता की मृत्यु तक हो जाती है, ऐसा होने पर हड़ताल अधिक उग्र रूप धारण कर लेती है तथा हिंसात्मक हो जाती है। इन दशाओं में, आन्दोलनकारी श्रमिकों में अराजक तत्त्व मिल जाते हैं जो तोड़-फोड़, आगजनी तथा लूटमार कर उद्योग की करोड़ों की सम्पत्ति को हानि पहुँचाते हैं। धीरे-धीरे हड़ताल अनियन्त्रित होती जाती है और उसका नेतृत्व अकुशल वे अवसरवादी नेताओं के हाथ में पहुँच जाता है। इसके विपरीत, सुलझे हुए तथा कुशल नेता हड़ताल को तब तक शान्तिपूर्वक चलाते हैं जब तक कि श्रमिकों की माँगे नहीं मान ली जातीं। हड़ताल की प्रक्रिया को तीव्र एवं प्रभावी बनाने के लिए सरकार, राजनीतिक दलों तथा समाजसेवी संगठनों की ओर से उद्योगपतियों से श्रमिकों की माँगें स्वीकार कर हड़ताल समाप्त करवाने की अपील की जाती है।

प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-औद्योगिक संघर्ष।
उत्तर :
औद्योगिकसंघर्ष’ वर्तमान युग में औद्योगिक जगत् की प्रमुख समस्या है। उद्योग की दुनिया में दो वर्ग हैं-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग। यदा-कदा उत्पादन सम्बन्धी तकनीकी या मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किन्हीं समस्याओं को लेकर उद्योगपति (मिल मालिक)तथा श्रमिकों (मजदूरों) के बीच संघर्ष की स्थिति आ जाती है। उद्योगपतियों की मनोवृत्ति अपने मजदूरों तथा कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन प्रदान कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करने की होती है। इसके विपरीत मजदूरों तथा कर्मचारियों का प्रयास रहता है कि वे अपने कठोर श्रम के बदले जीवन निर्वाह हेतु पर्याप्त वेतन तथा सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—-कार्य के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना तथा बीमारी के लिए। उचित चिकित्सा की व्यवस्था और भत्ता आदि मिल मालिकों से प्राप्त करें। जब उद्योगों तथा व्यावसायिक संस्थानों में मजदूरों के हितों की अनदेखी होती है और कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता तो उद्योगपति एवं श्रमिक वर्ग आमने-सामने आ जाते हैं, जिसके परिणामतः तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। यह तनाव अक्सर हड़ताल व तालाबन्दी के रूप में प्रकट होता है तथा औद्योगिक क्षेत्र को भीषण समस्याओं व अशान्ति से भर देता है।

इस भाँति, औद्योगिक क्षेत्र से सम्बन्धित श्रमिक एवं उद्योगपति जब अपने-अपने हितों की पूर्ति हेतु संघर्ष के लिए तत्पर होते हैं तो यह स्थिति औद्योगिक संघर्ष कहलाती है। आजकल श्रमिकों में एकता व सहयोग की भावना जाग्रत होने के फलस्वरूप शक्तिशाली श्रमिक-संघ बन गये हैं। श्रमिक-संर्यों का नेतृत्व उद्योगपतियों से अपने अधिकारों व सुविधाओं की माँग करता है। जब उद्योग में मजदूरों की न्यायोचित माँगों की उपेक्षा हो और उन पर काम का दबाव अधिक हो तो समस्त या अधिकांश मजदूर विरोध प्रकट करते हुए काम पर जाना छोड़ देते हैं। वे मिल-मालिकों की नीतियों के विरोध में तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रदर्शन, नारेबाजी, जूलूस, भूख-हड़ताल व आमरण अनशन का सहारा लेते हैं। मजदूर वर्ग की ये सभी गतिविधियाँ ‘हड़ताल के अन्तर्गत आती हैं।

कभी-कभी मिल-मालिक मजदूरों की माँग पूरी नहीं कर पाते (अथवा पूरी करना नहीं चाहते) तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे मिल बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। यह तालाबन्दी है। तालाबन्दी की दशा में मजदूरों या कर्मचारीगणों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, जिसका वे विरोध करते हैं। हड़ताल और तालाबन्दी औद्योगिक संघर्ष के परिचायक हैं।

प्रश्न 6.
मानवीय सम्बन्धों पर औद्यौगीकरण के कारण पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए
या
भारतीय समाज पर औद्योगीकरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक गतिविधियों की गति एवं दर के बढ़ने की प्रक्रिया को औद्योगीकरण कहा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से औद्योगीकरण एक आर्थिक-व्यावसायिक प्रक्रिया है, परन्तु इसके विभिन्न प्रभाव मानवीय/सामाजिक सम्बन्धों पर भी पड़ते हैं। औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप मानवीय सम्बन्धों एवं समाज पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. मानवीय सम्बन्ध औपचारिक हो जाते हैं।
  2. आपसी सम्बन्ध वर्ग-भेद के आधार पर निर्धारित होते हैं।
  3. उच्च वर्ग के लिए निम्न आर्थिक वर्ग के लोगों से एक प्रकार की सामाजिक दूरी बनाये रखते
  4. समाज में वर्ग-संघर्षों में वृद्धि होती है तथा मानवीय सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते हैं।
  5. पारिवारिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध भी परिवर्तित होते हैं। संयुक्त परिवार विघटित होते हैं तथा वैवाहिक सम्बन्धों में स्थायित्व घटता है।
  6. औद्योगीकरण के प्रभाव से समाज में गतिशीलता में वृद्धि होती है।
  7. औद्योगीकरण ने सामाजिक स्तरीकरण के नये प्रतिमान निर्धारित किये हैं।
  8. सामाजिक नियन्त्रण के लिए औपचारिक अभिकरणों को प्राथमिकता दी जाने लगती है।
  9. धार्मिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में परिवर्तन होता है।
  10. भारतीय समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था के नियमों में शिथिलता आयी है।

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्षेत्र में विज्ञापन के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
विज्ञापन तथा उद्योग के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आज के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक युग में विज्ञापन का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। विश्व की विकसित एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ व्यापक स्तर पर विज्ञापन सम्बन्धी प्रविधियाँ तथा तकनीकों को अपनाती हैं। आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतियोगिता का बोलबाला है। बाजार में अनेकानेक फर्मे हैं और उनके ढेरों उत्पादन हैं। किसी एक वस्तु की खरीदारी के समय क्रेता बाजार में उस वस्तु के अनेक फर्मों द्वारा निर्मित स्वरूप देखता है। उदाहरण के लिए–साबुन खरीदते समय वह एक ही दुकान पर ढेर सारे साबुन; जैसे–लक्स, हमाम, रेक्सोना, लाइफबॉय, लिरिल, सिन्थॉल, मोती, मारवेल, गोदरेज, सरल तथा निरमा आदि-आदि देखता है।

क्रेता के सामने इनमें से एक साबुन को चुनने की समस्या है और साथ-ही-साथ उसे अपनी जेब का ख्याल भी रखना है। यहाँ विज्ञापन उसे बताता है कि कम दामों में वह कैसे अपनी रुचि का अच्छे-से-अच्छा साबुन खरीद सकता है। इसका दूसरा पक्ष भी है – मान लीजिए, किसी नयी फर्म ने एक नहाने का साबुन बनाया जो गुणवत्ता में इन सबसे आगे है और दाम भी कम हैं; लेकिन खरीदार को यह कैसे पता चले कि इस नाम से एक साबुन उपलब्ध है; फिर उसकी विशेषताओं को भी बताना होगा, अन्य साबुनों की तुलना में उसका वजन और दाम भी खोलना होगा, यह भी बताना होगा कि खरीदार कम-से-कम दाम में बढ़िया-से-बढ़िया चीज खरीदकर ले जा रहा है; यही नहीं, उसे इसका विश्वास कैसे दिलाया जाए और उसकी रुचि के अनुसार उसमें उस साबुन के क्रय की इच्छा कैसे पैदा की जाए? ये सभी बातें विज्ञापन के अन्तर्गत आती हैं और विज्ञापन के माध्यम से सुगम बनायी जाती हैं।

विज्ञापनों के माध्यम से उत्पादक, उत्पादित वस्तु तथा उपभोक्ताओं के मध्य एक अच्छा तालमेल स्थापित हो जाता है। उत्पादक घर बैठे ही उपभोक्ता से सम्पर्क साध लेता है और अपनी वस्तु उसके पास पहुँचा देता है। जो फर्म या व्यापारिक संस्था जितना अच्छे स्तर का विज्ञापन जुटा पाती है, उसकी बिक्री उतनी ही बढ़ जाती है। यही कारण है कि आज के समय में विज्ञापन एक कला, एक विज्ञान, एक उद्योग के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। सभी बड़े-बड़े उद्योग अपने वार्षिक बजट का एक अच्छा प्रतिशत विज्ञापन पर खर्च करते हैं।

बहुत-सी संस्थाएँ विज्ञापन पर करोड़ों तथा अरबों रुपया खर्च करती हैं और उनके माध्यम से उससे ज्यादा कमाती भी हैं। इसके लिए बड़े-बड़े साइनबोर्ड, इलेक्ट्रॉनिक्स के माध्यम से जगमगाते एवं गति करते बोर्ड, भाँति-भाँति के पोस्टर, पैम्फलेट, रेडियो, टी०वी०, सिनेमा तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन देकर प्रचार किया जाता है। आजकल हर एक वस्तु विज्ञापित हो सकती है, इसमें दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, साहित्य, कला, राजनीतिक नेता, अभिनेता, वर-वधू के विज्ञापन, संस्थाओं तथा प्रतिष्ठानों के विज्ञापन तथा विज्ञापन-फर्मों के भी विज्ञापन सम्मिलित किये जाते हैं। निस्सन्देह विज्ञापन मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर छा चुका है और उद्योगों व व्यापारिक संस्थानों के लिए तो यह एक वरदान सिद्ध हो चुका है। यही कारण है कि प्रगतिशील देशों में विज्ञापन के क्षेत्र में हर रोज एक-न-एक नयी खोज की जाती है जो प्रचार की दुनिया में बढ़ता हुआ एक नया कदम होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान का क्षेत्र उद्योग-धन्धों के अतिरिक्त व्यापार एवं व्यवसाय तक विस्तृत है, तथापि यह उनमें निहित मानवीय तत्त्वों का ही अध्ययन करता है। इसका विषय-क्षेत्र इस प्रकार है –

  1. कर्मचारियों का चयन, प्रशिक्षण एवं दक्षता सम्बन्धी नयी-नयी विधियों की खोज;
  2. उपयुक्त कार्यों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन तथा व्यवसाय परामर्श;
  3. कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर;
  4. कार्य की दशाएँ;
  5. उत्पादन व उत्पादन से सम्बन्धित मानवीय समस्याएँ;
  6. विज्ञापन एवं विक्रय;
  7. कर्मचारियों को मनोबल तथा प्रेरणा बनाये रखना;
  8. श्रम कल्याण;
  9. औद्योगिक असन्तोष, तनाव व संघर्ष के निराकरण के उपायों की खोज तथा
  10. हड़ताल व तालाबन्दी की समस्याएँ।

प्रश्न 2.
व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

  1. व्यवसाय-विलेषणे से व्यवसायों का वर्गीकरण आसानी से किया जा सकता है;
  2. इसके माध्यम से कर्मचारियों के कार्य-सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्धारण हो जाता है;
  3. कर्मचारियों के उत्तरदायित्व को निश्चित किया जा सकता है;
  4. पूर्ण व्यवसाय-विश्लेषण से कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है;
  5. व्यवसाय के लिए आवश्यक क्षमताएँ तथा योग्यताएँ सुनिश्चित होती हैं;
  6. नयी भर्ती द्वारा आये कर्मचारियों के प्रशिक्षण की अवधि और उसके स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है;
  7. इसके कर्मचारियों में आपसी सद्भावना उत्पन्न होने में मदद मिलती है;
  8. कर्मचारियों के कार्य के अनुसार उनके वेतन का निर्धारण हो सकता है;
  9. आवश्यक कच्चे माल के विषय में जानकारी मिलती है;
  10. कार्य में आने वाले तथा उपयोगी, यन्त्रों, उपकरणों, मशीनों व औजारों के बारे में विस्तृत सूचना मिलती है;
  11. कार्य में लगने वाले समय का अनुमान हो जाता है तथा
  12. कार्य के लाभकारी एवं हानिकारक, शारीरिक और मानसिक पहलुओं का सम्यक् बोध हो जाता है।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक निर्देशन और व्यावसायिक चयन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
किसी व्यक्ति को व्यवसाय के चुनाव के लिए आवश्यक जानकारी एवं सहायता प्रदान करना व्यावसायिक निर्देशन है। वास्तव में व्यावसायिक निर्देशने व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है जिसके द्वारा स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके। इससे भिन्न व्यावसायिक चयन का अर्थ है-किसी कार्य के लिए उपयुक्त कर्मचारी का चुनाव करना। इसके लिए कार्य की प्रकृति तथा सम्बन्धित व्यक्ति की योग्यता एवं क्षमता को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। व्यावसायिक निर्देशन का कार्य निर्देशन द्वारा प्रदान किया जाता है, जबकि व्यावसायिक चयन का कार्य सम्बन्धित कार्यालय या संस्थान के प्रबन्धकों या अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 4.
पदोन्नति के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पदोन्नति कर्मचारियों में अनवरत प्रेरणा का स्रोत है जो उन्हें हमेशा कार्यकुशल बनाये रखती है। यह कुशल सेवा के लिए पुरस्कार की गारण्टी देती है। पदोन्नति की आशा लेकर कर्मचारी अपने कार्य को रुचिपूर्वक करते हैं। नियोक्ता (मालिक) अपने कर्मचारियों की योग्यता और कार्य अनुभव का पूरा लाभ उठा पाते हैं, क्योंकि पदोन्नत होने वाले कर्मचारीगण पहले से ही सेवा में लगे हुए थे। अतः उन्हें उत्पादन की सभी प्रक्रियाओं तथा कार्य प्रणालियों का पूरा ज्ञान रहता है। इस प्रकार से नियोक्ता की दृष्टि से भी पदोन्नति का विचार महत्त्वपूर्ण है। पदोन्नति की कामना कर्मचारियों को अनुशासित एवं सन्तुष्ट बनाये रखती है जिससे औद्योगिक या व्यापारिक संगठन में सम्भावित विरोधाभास शान्त रहते हैं। पदोन्नति के सुनिश्चित एवं स्पष्ट नियम कर्मचारियों में आत्म-विश्वास तथा सुरक्षा का विचार उत्पन्न करते हैं। निष्कर्षत: पदोन्नति की नीति प्रत्येक व्यवसाय में नियोक्ता तथा कर्मचारी दोनों के लिए लाभप्रद एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 5.
हड़ताल एवं तालाबन्दी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही औद्योगिक क्षेत्र की मुख्य समस्याएँ हैं। हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही दशाओं में कार्य ठप हो जाता है। हड़ताल श्रमिकों एवं कर्मचारियों द्वारा उचित-अनुचित माँगों को मनवाने के लिए की जाती है। यह प्रायः आन्दोलन के रूप में होती है तथा इसके हिंसक रूप धारण करने की भी आशंका रहती है। इससे भिन्न तालाबन्दी मालिकों एवं प्रबन्धकों द्वारा घोषित की जाती है। इस दशा में श्रमिकों को कार्य से वंचित कर दिया जाता है तथा मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया जाता है। यह कार्य प्रायः मजबूरी में या अपनी सत्ता को दर्शाने के लिए किया जाता है। श्रमिक तालाबन्दी का विरोध करते हैं।

प्रश्न 6.
तालाबन्दी के क्या परिणाम होते हैं?
उत्तर :
तालाबन्दी में उद्योगपति उद्योग को बन्द रखता है जिससे श्रमिक व कर्मचारी काम पर नहीं जा पाते हैं। इससे श्रमिकों को वेतन नहीं मिल पाता और वे बेरोजगार हो जाते हैं। उनके पास अपना कोई संचित धन तो होता है नहीं, वे तो शाम तक श्रम करते हैं और प्राप्त पारिश्रमिक से दो जून की रोटी खाते हैं; अतः उनकी दशा खराब होती जाती है और वे भूखों मरने लगते हैं। इसके विरोध-स्वरूप वे प्रदर्शन, जुलूस तथा अनशन आदि का सहारा लेते हैं। कभी-कभी यह विरोध उग रूप धारण कर तोड़फोड़, आगजनी तथा हिंसात्मक घटनाओं में बदल जाता है। इसमें प्रशासन, पुलिस तथा राजनेताओं को भी हस्तक्षेप करमा पड़ता है। इसके अलावा तालाबन्दी के परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं की बाजार में कमी हो जाती है जिससे मुनाफाखोरी व जमाखोरी जैसी आर्थिक दुष्प्रवृत्तियों का जन्म होता है। इससे सम्बन्धित अन्य उद्योग, कारखाने या व्यावसायिक संस्थान भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। जिससे अन्ततः राष्ट्र की आर्थिक हानि होती है।

प्रश्न 7.
उद्योग में विज्ञापन के किन्हीं दो कार्यों के बारे में लिखिए।
उत्तर :

(i) उद्योग में विज्ञापन के माध्यम से सम्बन्धित उत्पादनों को बहुपक्षीय जानकारी जनसामान्य तक पहुँचायी जाती है। सम्बन्धित उत्पाद के गुणों, उपयोगों तथा लाभों एवं सुविधाओं आदि की समुचित जानकारी उपलब्ध करायी जाती है।

(ii) विज्ञापन द्वारा किया जाने वाला दूसरा मुख्य कार्य सम्बन्धित उपभोक्ता वर्ग को अपने उत्पादनों को खरीदने या अपनाने के लिए प्रेरित करना होता है। विज्ञापन का यह कार्य अधिक
विश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.

निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. औद्योगिक-व्यावसायिक परिस्थितियों में होने वाले मानवीय-व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को ……………………. कहते हैं।
  2. औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के ……………………. पक्ष से सम्बन्धित है।
  3. आधुनिक युग में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप औद्योगिक मनोविज्ञान की उपयोगिता ……………………. है।
  4. कर्मचारी चयन की प्रक्रिया में कार्य-विश्लेषण के साथ-साथ ……………………. भी आवश्यक होता है।
  5. उद्योग में अनुपयुक्त कार्य-दशाओं के कारण कर्मचारी की ……………………. घट जाती है।
  6. कार्य की दशाओं में भौतिक दशाओं के अतिरिक्त ……………………. को भी ध्यान में रखा जाता है।
  7. औद्योगिक स्थल की स्वच्छता, प्रकाश की व्यवस्था, वायु तथा कार्य के घण्टे कार्य की मुख्य ……………………. दशाएँ हैं।
  8. नौकरी की सुरक्षा, अधिकारियों का व्यवहार तथा पदोन्नति के अवसर कार्य की मुख्य ……………………. दशाएँ हैं।
  9. तापमान में वृद्धि के कारण कर्मचारी का ……………………. घट जाता है।
  10. कार्य की भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाओं के अनुकूल होने की स्थिति में उत्पादन की दर एवं गुणवत्ता ……………………. है।
  11. कार्य के दौरान अल्पकालिक विश्राम से व्यक्ति की कार्य-क्षमता ……………………. है।
  12. कार्यस्थल पर अधिक शोर या ध्वनि प्रदूषण का श्रमिकों के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  13. कार्य के घण्टे बढ़ा देने पर उत्पादन की दर ……………………. है।
  14. पदोन्नति कर्मचारियों के लिए ……………………. स्रोत है जो उन्हें निरन्तर कार्य-कुशल बनाये रखती है।
  15. औद्योगिक मालिकों द्वारा श्रमिकों एवं कर्मचारियों तथा उनके परिवारों को दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को ……………………. कहते है।
  16. औद्योगिक प्रगति के लिए उद्योगपति और कर्मचारियों के बीच अच्छे ……………………. का होना आवश्यक होता है।
  17. श्रमिकों के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन की व्यवस्था करना ……………………. कहलाता है।
  18. हड़ताल एवं ……………………. का उद्योग की उन्नति पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  19. श्रमिकों द्वारा विद्रोह स्वरूप कार्य करना बन्द कर देना ……………………. कहलाता है।
  20. उद्योगपतियों द्वारा उत्पादन कार्य रोक देना तथा श्रमिकों को कार्य से रोक देना ……………………. कहलाता है।
  21. तीव्र औद्योगिक तनाव के चलते उद्योगों में ……………………. और ……………………. की घटनाएँ होती हैं।
  22. उद्योग में उत्पाद का प्रचार ……………………. कहलाता है।
  23. किसी उत्पाद की उपस्थिति एवं विशेषताओं का प्रचार ……………………. कहलाता है।
  24. प्रलोभन विज्ञापन की प्रभावकता को ……………………. है।
  25. प्रेरणा और आवश्यकताएँ औद्योगिक विज्ञापन के ……………………. आधार हैं।
  26. बड़े आकार का उद्दीपक उपभोक्ता के ध्यान को ……………………. करता है।
  27. वर्तमान समय में औद्योगिक एवं व्यावसायिक सफलता के लिए विज्ञापन ……………………. है।
  28. किसी उद्योग की सफलता के लिए प्रबन्ध-तन्त्र, संसाधन एवं ……………………. में आपसी समन्वय होना आवश्यक है।

उत्तर :

  1. औद्योगिक मनोविज्ञान
  2. व्यावहारिक
  3. बढ़ गयी
  4. कर्मचारी-विश्लेषण
  5. कार्य-क्षमता
  6. मनोवैज्ञानिक दशाओं
  7. भौतिक दशाएँ
  8. मनोवैज्ञानिक
  9. कार्य के प्रति उत्साह
  10. बढ़ जाती
  11. बढ़ जाती
  12. प्रतिकूल
  13. घट जाती
  14. प्रेरणा का
  15. श्रम-कल्याण कार्य
  16. सम्बन्धों
  17. श्रम कल्याण कार्य
  18. तालाबन्दी, प्रतिकूल
  19. तालाबन्दी
  20. तालाबन्दी
  21. हड़ताल, तालाबन्दी,
  22. विज्ञापन
  23. विज्ञापन
  24. बढ़ाता
  25. मनोवैज्ञानिक
  26. आकर्षित
  27. अनिवार्य
  28. श्रमिक वर्ग

प्रश्न II

निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर :
औद्योगिक परिस्थितियों में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान कहलाता है।

प्रश्न 2.
औद्योगिक मनोविज्ञान की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
ब्लम के अनुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।”

प्रश्न 3.
औद्योगिक मनोविज्ञान की दो मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है।
(ii) यह औद्योगिक जगत से सम्बन्धित मनुष्य के व्यवहार का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है।

प्रश्न 4.
औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की भूमिका अथवा महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. कर्मचारियों के चुनाव में सहायक
  2. औद्योगिक झगड़ों तथा तनाव को समाप्त करने में सहायक
  3. कार्य की दशाओं के सुधार में सहायक तथा
  4. औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन।

प्रश्न 5.
कर्मचारी-विश्लेषण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
किसी श्रमिक अथर्वा कर्मचारी की व्यक्तिगत योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों को जानने की प्रक्रिया को कर्मचारी-विश्लेषण कहते हैं।

प्रश्न 6.
उपयुक्त कर्मचारी के चुनाव से होने वाले मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. कर्मचारी सुखी एवं सन्तुष्ट रहते हैं
  2. उत्पादन वृद्धि
  3. समय एवं धन की बचत
  4. दुर्घटनाओं की आशंका घटती है
  5. स्थायित्व रहता है तथा
  6. औद्योगिक शान्ति बनी रहती है।

प्रश्न 7.
कर्मचारी-विश्लेषण के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. आवेदन-पत्र
  2. संस्तुति-पत्र
  3. शैक्षिक आलेख
  4. समूह निरीक्षण विधि
  5. शारीरिक परीक्षण
  6. प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ
  7. मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा
  8. साक्षात्कार।

प्रश्न 8.
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-स्वच्छता, ऊष्मा या ताप, प्रकाश व्यवस्था, वायु का प्रबन्ध, पानी, शौचालय आदि की सुविधा, कार्य के घण्टे तथा यन्त्रों से सुरक्षा।

प्रश्न 9.
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-नौकरी की सुरक्षा, अधिकारियों का व्यवहार, कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध, आवश्यकताओं की पूर्ति, उचित प्रलोभन तथा पदोन्नति के अवसर।

प्रश्न 10.
‘पदोन्नति की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
विलियम जी० टोरपी के अनुसार, “पदोन्नति पदाधिकारी के एक पद से ऐसे दूसरे पद पर पहुँचने की ओर संकेत करती है जो उच्चतर श्रेणी या उच्चतर न्यूनतम वेतन वाला होता । है। पदोन्नति का अभिप्राय है-कर्मचारी के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर देना।”

प्रश्न 11.
पदोन्नति के मुख्य आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। .
उत्तर :

  1. उच्चतर पद पर स्थानान्तरण
  2. उत्तरदायित्व की अधिकता तथा
  3. वेतन में वृद्धि।

प्रश्न 12.
पदोन्नति के मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. ज्येष्ठता या वरिष्ठता
  2. योग्यता
  3. कार्य में ‘दक्षता या निपुणता तथा
  4. सिफारिश या कृपा।

प्रश्न 13.
उद्योग में मानवीय सम्बन्धों से क्या आशय है?
उत्तर :
श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम तथा श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है।

प्रश्न 14.
उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर :
उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित होने से कार्य उत्तम होते हैं, उत्पादन की दर में वृद्धि होती है तथा औद्योगिक शान्ति में वृद्धि होती है। इससे कर्मचारियों, उद्योगपतियों तथा राज्य सभी का हित होता है।

प्रश्न 15.
श्रम-कल्याण-कार्यों से क्या आशय है?
उत्तर :
श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए उद्योग के भीतर और बाहर उद्योगपतियों, शासन तथा श्रम-संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।

प्रश्न 16.
उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित मुख्य श्रम-कल्याण कार्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर :

  1. वैज्ञानिक भर्ती
  2. औद्योगिक प्रशिक्षण
  3. दुर्घटनाओं से रोकथाम
  4. स्वच्छता, प्रकाश और वायु का प्रबन्ध तथा
  5. अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

प्रश्न 17.
श्रमिकों के आर्थिक लाभ सम्बन्धी श्रम-कल्याण कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. ओवरटाइम की सुविधा
  2. नियमों की सुरक्षा
  3. प्रॉविडेण्ट फण्ड, बीमा और पेन्शन की सुविधा तथा
  4. यात्रा-भत्ता।

प्रश्न 18.
विज्ञापन की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
आर० डब्ल्यू० हसबैण्ड के अनुसार, “विज्ञापन को प्रचार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व व गुणों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

प्रश्न 19.
विज्ञापन के मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. ध्यान आकृष्ट करना
  2. रुचि उत्पन्न करना
  3. विश्वास पैदा करना
  4. स्मृति पर प्रभाव डालना तथा
  5. क्रय के लिए प्रेरणा।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
औद्योगिक परिस्थितियों में मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को कहते हैं –
(क) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(ख) सामान्य मनोविज्ञान
(ग) औद्योगिक मनोविज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 2.
व्यावहारिक मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में औद्योगिक मनोविज्ञान का महत्त्व है –
(क) इसके अध्ययन से औद्योगिक समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।
(ख) कर्मचारियों के उचित चुनाव में सहायता मिलती है।
(ग) औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देता है।
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व

प्रश्न 3.
औद्योगिक मनोविज्ञान सहायक होता है –
(क) उपर्युक्त यन्त्र एवं मशीनें खरीदने में
(ख) आर्थिक नियोजन में
(ग) अधिक लाभ कमाने में
(घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में

प्रश्न 4.
वर्तमान परिस्थितियों में कर्मचारी-विश्लेषण की सरल एवं उत्तम विधि है –
(क) आवदेन-पत्र विधि
(ख) शैक्षिक प्रमाण-पत्र विधि
(ग) शारीरिक परीक्षण विधि
(घ) सिफारिश का

प्रश्न 5.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर कर्मचारियों के चुनाव से लाभ हैं
(क) औद्योगिक प्रबन्धकों की शान बढ़ती है।
(ख) नियुक्त किये गये कर्मचारियों को अधिक वेतन देना पड़ता है
(ग) नियुक्त किये गये कर्मचारी अधिक लगन, रुचि एवं परिश्रम से कार्य करते हैं।
(घ) कर्मचारी निकम्मे होते हैं तथा उत्पादन घटता है।

प्रश्न 6.
अधिक आयु वाले कर्मचारियों के कार्य-स्थल पर कैसा प्रकाश होना चाहिए?
(क) चकाचौंध युक्त प्रकाश
(ख) मन्द प्रकाश
(ग) तीव्र प्रकाश
(घ) चाहे जैसा प्रकाश

प्रश्न 7.
कार्यस्थल पर संगीत व्यवस्था का उत्पादन एवं कार्यक्षमता पर कैसा प्रभाव पड़ता है?
(क) प्रतिकूल प्रभाव
(ख) अनुकूल प्रभाव
(ग) अनावश्यक प्रतीत होती है।
(घ) बाधक प्रतीत होती है।

प्रश्न 8.
श्रमिकों तथा उनके परिवारों की दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को कहा जाता है –
(क) श्रमिक संघ के कार्य
(ख) आवश्यक कार्य
(ग) श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्य
(घ) पारिवारिक सहायता

प्रश्न 9.
“पदोन्नति का अर्थ है एक पद से किसी उच्चतर श्रेणी के अन्य पद पर नियुक्ति, जिसमें कठिनतर प्रकृति एवं गहनतर उत्तरदायित्वों का कार्य करना पड़ता है। इस पद का नाम बदल जाता है और प्रायः वेतन में भी वृद्धि होती है।” यह कथन किसका है?
(क) ब्लम
(ख) टोरपी
(ग) एल० डी० ह्वाइट
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 10.
पदोन्नति के स्वीकृत आधार हैं –
(क) ज्येष्ठता या वरिष्ठता
(ख) योग्यता
(ग) कार्य में दक्षता या निपुणता
(घ) ये सभी

प्रश्न 11.
यदि श्रमिक औद्योगिक कार्यों में सहयोग देना बन्द कर दें तो उसे कहा जाता है –
(क) नाराजगी
(ख) हड़ताल
(ग) तालाबन्दी
(घ) अवकाश पर जाना।

प्रश्न 12.
उद्योगपतियों एवं प्रबन्धकों द्वारा अपनी मर्जी से उत्पादन कार्य बन्द कर देना कहलाता है –
(क) हड़ताल
(ख) बँटनी
(ग) तालाबन्दी
(घ) गम्भीर समस्या

उत्तर :

  1. (ग) औद्योगिक मनोविज्ञान
  2. (घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व
  3. (घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में
  4. (क) आवेदन-पत्र विधि
  5. (ग) नियुक्त किये गये कर्मचारी अधिक लगन, रुचि एवं परिश्रम से कार्य करते हैं
  6. (ग) तीव्र प्रकाश
  7. (ख) अनुकूल प्रभाव
  8. (ग) अम-कल्याण सम्बन्धी कार्य
  9. (ग) एल० डी० ह्वाइट
  10. (घ) ये सभी
  11. (ख) हड़ताल
  12. (ग) तालाबन्दी।

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