UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 20 Mental Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 20
Chapter Name Mental Development (मानसिक विकास)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 20 Mental Development (मानसिक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक विकास से आप क्या समझते हैं? मानसिक विकास की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
मानसिक विकास से आप क्या समझते हैं? मानसिक विकास का शिक्षा में क्या महत्त्व है? अच्छी तरह समझाइए।
उत्तर:

मानसिक विकास का अर्थ
(Meaning of Mental Development)

विकास के एक पक्ष को मानसिक विकास’ कहा जाता है। मानसिक विकास के अन्तर्गत बालक की विभिन्न मानसिक क्षमताओं का क्रमशः विकास होता है। मानसिक विकास के परिणामस्वरूप बालक के व्यवहार में भी उल्लेखनीय परिवर्तन होता है। मानसिक विकास एक सतत प्रक्रिया है। विकास की सभी अवस्थाओं में यह अनवरत् रूप से चलती है। पहले वर्ष से ही उत्तरोत्तर मानसिक विकास में निरन्तर प्रगति होती रहती है। चिन्तन, भाषा तथा कल्पना मानसिक विकास को प्रभावित करती हैं। आन्तरिक अवस्था में चिन्तन, विचार ग्रहण, स्थान, समय, भार तथा दूरी
आदि के प्रत्यय द्वारा मानसिक विकास होता है। मानसिक विकास एवं शिक्षा का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक ओर सुचारु शिक्षा के लिए समुचित मानसिक विकास अनिवार्य शर्त है तो दूसरी ओर यह भी सत्य है। कि शिक्षा के माध्यम से बालक का मानसिक विकास सुचारु बनता है।

मानसिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Features of Mental Development)

बालक के मानसिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. शिशु की आयु-वृद्धि के साथ ही मानसिक विकास होने लगता है। नवजात शिशु तीन-चार माह तक संवेगात्मक अवस्था में रहता है। वह केवल भूख, प्यास, ताप, शीत, शोरगुल आदि का ही अनुभव करती है। 4 माह के बाद शिशु के अन्दर प्रत्यक्षीकरण की क्रिया आरम्भ हो जाती है। उसे वातावरण का ज्ञान होने लगता है और वह वस्तुओं को देखकर पहचानने लगता है। इसी समय उसके शब्द भण्डार में भी वृद्धि होने लगती है।

2. दो वर्ष बाद बालक अपनी स्मृति की सहायता से विश्व की प्रत्येक वस्तु को पहचानने लगता है। बाद में उसमें अमूर्त चिन्तन होने लगता है और उसमें प्रत्ययों का भी निर्माण होने लगता है। वह अपने माता-पिता, परिवार के भाई-बहनों व अन्य प्रियजनों को पहचानने लगता है और उन्हें सम्बोधित भी करने लगता है। इसी अवस्था में उसे भाषा का ज्ञान होता है।

3. मानसिक विकास के साथ बालकों की कल्पना-शक्ति विकसित होती है। वह अपनी इच्छाओं को ध्वनि, प्रतीक, शब्दों और धीरे-धीरे वाक्यों में अभिव्यक्त करने लगता है।

4. बुद्धि का विकास मानसिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण चरण है। टरमन के अनुसार 15 वर्ष, जीन्स (Jeans) के अनुसार 16 वर्ष और फ्रीमेन के अनुसार 20 वर्ष में बुद्धि परिपक्व होती है। लेकिन माइल्स ने बुद्धि की पूर्ण परिपक्वता 28 वर्ष की आयु में मानी है।

5. मानसिक विकास सभी अवस्थाओं में एकसमान नहीं होता है। किशोरावस्था में तीव्रता से मापक विकास होता है।
6. मानसिक विकास के अन्तर्गत मन के चेतन और अचेतन दोनों पक्षों का विकास होता है।
7. बालिकाओं का विकास बालकों से एक वर्ष पूर्व होता है।
8. शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हैं।
9. शारीरिक विकास के समान मानसिक विकास में भी वैयक्तिक भिन्नता होती है।
10. सिर पर आघात लगने से मानसिक विकास में अवरोध आ जाता है और मानसिक रोग तक उत्पन्न हो। जाते हैं।

11. मानसिक विकास के फलस्वरूप ही व्यक्ति अतीत के अनुभवों से लाभ उठाने में समर्थ होता है।
मानसिक विकास का शिक्षा में महत्त्व-मानसिक विकास तथा शिक्षा का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। समुचित मानसिक विकास होने पर ही शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल सकती है। वास्तव में बालक के मानसिक विकास के स्तर के अनुकूल ही शिक्षा का स्तर होना चाहिए। जैसे-जैसे मानसिक विकास हो वैसे-वैसे शिक्षा के स्तर में वृद्धि की जानी चाहिए। बालक के मानसिक विकास के अनुकूल पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाना चाहिए तथा उसी के अनुकूल शिक्षण विधियों को अपनाया जाना चाहिए। शिक्षा के लिए पाठ्य-पुस्तकों तथा पाठ्य-सहगामी गतिविधियों का निर्धारण भी बालकों के मानसिक विकास के स्तर के अनुसार ही होना चाहिए। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा की व्यवस्था मानसिक विकास के स्तर के अनुसार ही होनी चाहिए। वैसे यह भी सत्य है कि उचित शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से मानसिक-विकास में भी योगदान प्राप्त होता है।

प्रश्न 2
मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Mental Development)

बालक के मानसिक विकास के क्रम का ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक शिक्षक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। मानसिक विकास के ज्ञान के साथ-साथ शिक्षक को उन तत्त्वों या कारकों पर भी विचार करना चाहिए, जो बालक के मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं। इन कारकों का विवेचन निम्नवत् है-

1. वंशानुक्रम- विभिन्न मनोवैज्ञानिक प्रयोगों तथा अनुसन्धानों से यह सिद्ध हो चुका है कि बालक वंशानुक्रम के आधार पर पर्याप्त मानसिक गुण तथा योग्यताएँ अर्जित करते हैं। थॉर्नडाइक (Thorndyke) के अनुसार, मानसिक योग्यता का आंगे की पीढ़ियों में संक्रमण होता है। मन्द बुद्धि वाले माता-पिता की जो सन्तान होती है, उसका मानसिक विकास भी मन्द गति से होता है।

2. पारिवारिक वातावरण- परिवार का सुखद, शान्त तथा उत्साहवर्द्धक वातावरण, बालक के मानसिक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। जिस परिवार में कलह, निराशा तथा लापरवाही का वातावरण रहता है, वहाँ बालक के मानसिक विकास की बहुत कम सम्भावनाएँ रहती हैं। बालक की विकास आनन्द और स्वतन्त्रता के वातावरण में ही सुचारु रूप से होता है।

3. परिवार की आर्थिक दशा- परिवार की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति का भी बालक के मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योग रहता है। जो बालक आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न परिवारों के होते हैं, उनके मानसिक विकास के मूल कारण हैं-उत्तम शैक्षिक अवसर, पौष्टिक भोजन, आर्थिक चिन्ता से मुक्ति तथा भविष्य की सुरक्षा। टरमन (Terman) के अनुसार, “प्रतिभाशाली बालक प्रायः सम्पन्न परिवारों से ही सम्बन्धित होते हैं।”

4. उत्तम स्वास्थ्य- अरस्तू ने ठीक लिखा है कि “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” शारीरिक दृष्टि से पुष्ट बालक दुर्बल बालक की अपेक्षा अधिक मानसिक श्रम करके अपना बौद्धिक विकास कर सकता है। रोग ग्रस्त बालक प्रायः मानसिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं। ऐसी दशा में बालकों के शारीरिक स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

5. शिक्षित माता- पिता-स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “माता-पिता की शिक्षा बालकों की मानसिक योग्यता से निश्चित रूप से सम्बन्धित है।” शिक्षित माता-पिता का आचरण बालक की मौलिक आवश्यकताओं, रुचियों और बौद्धिक क्षमताओं को भली प्रकार समझते हैं और उनके अनुकूल ही बालक के साथ व्यवहार करते हैं। इस प्रकार का व्यवहार बालक के मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योग देता है।

6. विद्यालय का वातावरण- यदि विद्यालय का वातावरण प्रेम, सहयोग तथा सद्भावनाओं पर आधारित है तो विद्यार्थियों का मानसिक विकास सुगमता से होता है। जिस विद्यालय में विद्यार्थियों की रुचियों और आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है तथा विभिन्न क्रियाओं के आयोजन द्वारा विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किये जाते हैं, वहाँ के विद्यार्थियों का मानसिक विकास सामान्य विद्यालय की अपेक्षा अधिक होता है।

7. शिक्षक का व्यवहार- शिक्षक का व्यवहार बालक के मानसिक विकास का प्रमुख कारक होता है। यदि शिक्षक बाल-मनोविज्ञान का ज्ञाता है और वह छात्रों के साथ प्रेम, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार तथा उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग करता है तो बालक का मानसिक विकास अनिवार्य रूप से होगा। शिक्षक की उपेक्षा, ताड़ना तथा बात-बात पर दण्डित करने की धमकी देना मानसिक विकास में अवरोध उपस्थित करते है।

8. समाज का स्तर- बालक के मानसिक विकास पर सामाजिक स्तर को भी प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक बालक किसी-न-किसी समाज का सदस्य होता है। यदि बालक के सम्बन्धित समाज का स्तर ऊँचा तथा शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला होता है तो बालक के मानसिक विकास की गति तीव्र रहती है। अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा जापान आदि देशों का सामाजिक जीवन सम्पन्न तथा प्रभावशाली होता है। वहाँ प्रत्येक नगर या मोहल्ले में पुस्तकालयों, वाचनालयों, बालभवनों तथा अजायबघरों की व्यवस्था होती है। परिणामस्वरूप अन्य देशों की अपेक्षा इन देशों के बालकों का मानसिक विकास तीव्र गति से होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में मानसिक विकास
(Mental Development in Infancy)

शैशवावस्था में होने वाले मानसिक विकास को सामान्य विवरण निम्नलिखित है-

1. नवजात शिशु का प्रथम सप्ताह- नवजात शिशु का मस्तिष्क कोरी प्लेट के समान होता है। इस पर भी वह कुछ क्रियाएँ करता है; जैसे-भूख लगने पर वह रोता है, अधिक शीत लगने पर वह प्रतिक्रिया करता है; जैसे कि छींकना, हिचकी लेना तथा तेज आवाज सुनकर चौंकना उसकी प्रमुख क्रियाएँ होती हैं। वास्तव में शैशवावस्था में मानसिक विकास का प्रमुख साधन ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं।

2. दूसरा सप्ताह- जब शिशु 8 या 9 दिन का होता है तो वह प्रकाश की ओर एकटक देखने लगता है। शरमन के अनुसार, “नवजात शिशु प्रकाश के प्रति विशेष संवेदनशील होता है। गन्ध के प्रति उसे संवेदना होने लगती है। यदि माँ के स्तन में पेट्रोल लगा दिया जाए तो वह दूध पीने से इन्कार कर देगा।

3. प्रथम तथा द्वितीय मास- जब बालक एक मास का होता है तो वह वस्तु को पकड़ने की चेष्टा करता है। दो मास का होने पर वह आवाज सुनकर सिर घुमाने लगता है तथा विभिन्न वस्तुओं को ध्यान से देखने लगता है। अब वह अपनी माता के स्पर्श को भी पहचानने लगता है और माँ को देखकर मुस्करा जाता है।

4. चतुर्थ मास- इस मास में शिशु वस्तुओं को दृढ़ता से पकड़ता है। इच्छित वस्तु के न मिलने पर वह क्रोध करता है व रोता है। अब वह खोये हुए खिलौने को खोजने का भी प्रयास करता है।

5. छठा मास- शिशु स्नेहपूर्ण व्यवहार और क्रोध के अन्तर को समझने लगता है। वह सुमी हुई ध्वनि का अनुसरण करने लगता है।

6. सातवाँ मास- अब वह अनेक खिलौनों के मध्य से अपनी रुचि का खिलौना छाँटने लग जाता है और उसे अन्य बालकों के साथ खेलने में आनन्द आने लगता है।

7. दसवाँ मास- दसवें मास में शिशु की अनुकरण शक्ति प्रबल होने लगती है। वह टूटा-फूटा उच्चारण करने लग जाता है। वह अपना खिलौना छीने जाने का विरोध भी करने लगता है।

8. प्रथम वर्ष- एक वर्ष का शिशु बाबा, दादा, पापा, मम्मी आदि शब्दों का उच्चारण करने लगता है। अब वह अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं का अनुसरण तेजी से करने लगता है।

9. द्वितीय वर्ष- दो वर्ष का शिशु दो शब्दों का वाक्य बोलने लगता है। दूसरे वर्ष के अन्त तक उसके पास सौ से दो सौ :शब्दों का भण्डार हो जाता है।

10. तीसरा और चौथा वर्ष- तीन या चार वर्ष के बालक का सम्बन्धीकरण ज्ञान पर्याप्त विकसित हो जाता है। एक बार बताने के पश्चात् वह गरम को ‘गरम’ कहने लगता है। वह चार-पाँच तक की गिनती गिन लेता है और छोटी तथा बड़ी रेखाओं के मध्य भी अन्तर करना सीख जाता है। प्रयास करने पर वह अक्षरे भी लिख लेता है।

11. पाँचवाँ वर्ष- पाँच वर्ष का बालक भविष्यकाल का ज्ञान करने लगता है। वह रंगों के अन्तर को समझने लग जाता है तथा हल्के और भारी को भी भेद कर लेता है। अब वह अपना नाम स्पष्ट बोलने लग जाता है तथा नाम भी लिख लेता है। वह दस-दस शब्दों के वाक्यों की पुनरावृत्ति भी कर लेता है।

प्रश्न 2
बाल्यावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में मानसिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में मानसिक विकास
(Mental Development in Childhood)

बाल्यावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण निम्नलिखित है

1. छठा वर्ष-इस आयु में बालक की स्मरण- शक्ति का विकास तीव्रता से होता है। अब बालक उन वस्तुओं के विषय में भी सोचने लगता है, जो कि उसके सामने नहीं होतीं। बालक पूरी गिनती भी सुना देता है। तथा 13-14 पदार्थों को गिन भी लेता है। अब वह शरीर के विभिन्न अंगों के नाम भी बता देता है तथा सामान्य प्रश्नों के उत्तर भी दे देता है।

2. सातवाँ वर्ष- इस आयु में बालक दो वस्तुओं में अन्तर करने लग जाता है। वह छोटी-छोटी घटनाओं तथा सुनी हुई कहानियों को सुना देता है। उसे सात या आठ तक के पहाड़े भी याद हो जाते हैं। वह कठिन वाक्यों का भी प्रयोग कर लेता है।

3. आठवाँ वर्ष- इस अवस्था में बालक लम्बे वाक्यों का प्रयोग करना सीख जाता है। छोटी-छोटी कहानियाँ तथा कविताएँ उसे सरलता से याद हो जाती हैं। वह 16 या 17 शब्दों के वाक्यों को दोहरा लेता है। अब जीवन में आने वाली समस्याओं को खोजने की क्षमता उसमें आ जाती है।

4. नवाँ वर्ष- इस आयु का बालक दिन, समय, तारीख तथा सिक्कों के विषय में ज्ञान प्राप्त कर लेता है। अब वह 6-7 शब्दों को उल्टे क्रम में दोहराने में सफल हो जाता है। शब्दों का प्रयोग वाक्यों में वह सरलता से कर लेता है। वह पाठ्य-पुस्तक के पाठ की सरलता से पढ़ लेता है और पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दे सकता है।

5. दसवाँ वर्ष- दसवें वर्ष के बालक में जिज्ञासा की प्रवृत्ति प्रबल होने लगती है। वह अपने आस-पास के वातावरण को समझने के लिए प्रश्न करने लगती है; जैसे—पानी क्यों बरसता है? बादल क्या है? रात क्यों होती है?

6. ग्यारहवाँ वर्ष- इस आयु का बालक बीस शब्दों के वाक्यों को दोहरा सकता है तथा कठिन शब्दों की व्याख्या भी कर सकता है। इस आयु में उसमें तुलना करने की प्रवृत्ति का भी विकास हो जाता है। वह वाक्यों में गलती निकाल सकता है तथा चित्र को देखकर उसका सम्पूर्ण विवरण दे सकता है।

7. बारहवाँ वर्ष- इस आयु के बालक में तर्क-शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है। अब वह समस्याओं का समाधान भी करने लगता है। इस आयु का बालक अपनी ओर से व्याख्या कर सकता है तथा किसी बात का कारण भी बता सकता है।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
“किशोरावस्था में मानसिक विकास उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए और इस काल में होने वाले मानसिक विकास का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में मानसिक विकास
(Mental Development in Adolescence)

किशोरावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण अग्रलिखित है

1. बुद्धि का विकास- किशोरावस्था में बालक का मन प्रायः अस्थिर रहता है, परन्तु उसका बौद्धिक विकास तीव्रता से होता है। हरमन (Harman) के अनुसार, “15 से 16 वर्ष तक की आयु में बुद्धि का विकास चरम सीमा पर पहुँच जाता है।”

2. केन्द्रीकरण की शक्ति का विकास- किशोरावस्था में किसी वस्तु या विषय के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता का पर्याप्त विकास हो जाता है। इस आयु में किशोर अमूर्त चिन्तन करता है और किसी वस्तु पर काफी समय तक अपना ध्यान केन्द्रित कर सकता है।

3. मानसिक स्वतन्त्रता का विकास- बाल्यावस्था तक बालक परम्परागत रूढ़ियों को बिना किसी विरोध के स्वीकार करता है, परन्तु किशोरावस्था में तर्क-शक्ति के विकास के कारण उसमें मानसिक स्वतन्त्रता का उदय हो जाता है। अब वह रूढ़ियों, परम्पराओं तथा अन्धविश्वासों को आँखें बन्द करके स्वीकार नहीं करता है।

4. स्मरण- शक्ति का विकास-किशोरावस्था में बालक कल्पना-जगत् में विचरण करता है और दिवा-स्वप्न देखने लगता है। ये दोनों प्रवृत्तियाँ किशोरावस्था में विशेष रूप से विकसित हो जाती हैं। कल्पना-शक्ति के अत्यधिक विकसित हो जाने के कारण बालक तथा बालिकाएँ काव्य और कहानी सृजन में रुचि लेने लगते हैं। कल्पना-शक्ति का विकास बालकों की अपेक्षा बालिकाओं में अधिक होता है। इस प्रकार साहित्य साधन के बीज किशोरावस्था में ही अंकुरित होते हैं।

5. तर्क-शक्ति का विकास-तर्क- शक्ति का विकास किशोरावस्था में पर्याप्त मात्रा में हो जाता है। किशोर बिना तर्क के किसी भी बात को स्वीकार नहीं करता।

6. विभिन्न रुचियों का विकास- किशोरावस्था में बालक की रुचियों का विकास तीव्रता से होता है। कुछ रुचियाँ समान होती है। जैसे-भावी व्यवसाय और जीवन के सम्बन्ध में रुचि, फिल्मी गीत सुनने तथा फिल्में देखने, प्रेम साहित्य पढ़ने, स्वतन्त्र अध्ययन तथा चोरी-छिपे काम-यौन सम्बन्धी साहित्य का अवलोकन करना। लड़कों को जासूसी तथा मारधाड़ की फिल्में देखने में तथा लड़कियों को सामाजिक तथा प्रेम सम्बन्धी फिल्में देखने में विशेष आनन्द आता है। अपनी रुचि के आधार पर किशोर वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, कवि तथा लेखक आदि बनने का प्रयास करते हैं। कुछ किशोर राजनीति में भी सक्रिय भाग लेने लग जाते हैं। लड़के शारीरिक व्यायाम तथा खेलकूद में और लड़कियाँ साहित्य, संगीत तथा नृत्य आदि में विशेष रुचि लेती हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1
बालक के मानसिक विकास में शिक्षक के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
या
बालक के मानसिक विकास के लिए शिक्षक को क्या करना चाहिए?-स्पष्ट कीजिए।
या
बालक के मानसिक विकास में अध्यापक की क्या भूमिका है?
उत्तर:
शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बालकों के मानसिक विकास में अपना सहयोग देने के लिए। मानसिक विकास के क्रम और उसे प्रभावित करने वाले कारकों को समझे तथा उनके अनुकूल ही अपने छात्रों के साथ व्यवहार करे। विद्यालय का उचित वातावरण, समुचित पाठ्यक्रम, प्रभावशाली शिक्षण विधियाँ तथा समाज का उच्च स्तर बालक के मानसिक विकास में परम सहायक होते हैं। अत: इनके समुचित सृजन में शिक्षक को अपना पूर्ण सहयोग देना चाहिए। इस प्रकार सम्पूर्ण शैक्षिक वातावरण बालक के मानसिक विकास के अनुकूल होना चाहिए। इतना ही नहीं शिक्षक का यह भी कर्तव्य है कि वह बालकों के अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करके उन्हें बताये कि कौन-कौन सी बातें बालक के मानसिक विकास में सहायक होती हैं और कौन-सी बाधक। वास्तव में परिवार और विद्यालय दोनों का उचित वातावरण बालक के स्वस्थ मानसिक विकास में सहायक होता है। अत: ऐसी दशा में परिवार और विद्यालय दोनों को ही इस क्षेत्र में परस्पर सहयोग देना चाहिए।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक विकास का अर्थ संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
मानसिक क्षमताओं में होने वाले क्रमिक विकास को मानसिक विकास कहते हैं।

प्रश्न 2
मानसिक विकास से सम्बन्धित मुख्य क्षमताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानसिक विकास से सम्बन्धित मुख्य क्षमताएँ हैं-प्रत्यक्षीकरण, ध्यान एवं रुचि, स्मृति, विचार, कल्पना, विश्वास, तर्क तथा निर्णय की क्षमताएँ।

प्रश्न 3
मानसिक विकास के लिए अनिवार्य प्रमुख शर्त क्या है?
उत्तर:
मानसिक विकास के लिए अनिवार्य प्रमुख शर्त है-पर्यावरण के साथ अन्त:क्रिया।

प्रश्न 4
बालक के सामान्य मानसिक विकास के लिए उसकी जिज्ञासा-वृत्ति के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए?
उत्तर:
बालक के सामान्य मानसिक विकास के लिए उसकी जिज्ञासा-वृत्ति को शान्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5
बालक के मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. वंशानुक्रम,
  2. परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति
  3. विद्यालय का वातावरण तथा
  4. शिक्षक का व्यवहार

प्रश्न 6
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन अरस्तू का है।

प्रश्न 7
“माता-पिता की शिक्षा बालकों की मानसिक योग्यता से निश्चित रूप से सम्बन्धित है।”
यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन स्ट्रांग का है।

प्रश्न 8
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. बालक के मानसिक विकास के परिणामस्वरूप मानसिक, शक्तियों का जन्म होता है तथा वे क्रमशः पुष्ट होती हैं।
  2. मानसिक विकास के लिए पर्यावरण के साथ सम्पर्क स्थापित होना अनिवार्य है।
  3. मानसिक विकास का शिक्षा की प्रक्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं है।
  4. मानसिक विकास की प्रक्रिया पर व्यक्तिगत भिन्नताओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  5. सुचारु मानसिक विकास के लिए बालक की जिज्ञासा-वृत्ति को नियन्त्रित रखना चाहिए।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
मानसिक विकास से आशय है-
(क) पढ़ना-लिखना सीख लेना
(ख) मानसिक क्षमताओं का पुष्ट होना
(ग) बालक द्वारा व्यक्तियों की पहचान करना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 2.
मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं-
(क) आनुवंशिकता
(ख) परिवार का वातावरण
(ग) विद्यालय का वातावरण
(घ) ये सभी

प्रश्न 3.
मानसिक विकास तथा शिक्षा की प्रक्रिया का सम्बन्ध है-
(क) कोई सम्बन्ध नहीं है।
(ख) दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
(ग) शिक्षा का मानसिक विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(घ) मानसिक विकास का शिक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता

प्रश्न 4.
व्यक्ति का मानसिक विकास प्रायः पूर्ण हो जाता है-
(क) बाल्यावस्था के अन्त तक
(ख) किशोरावस्था के अन्त तक
(ग) वृद्धावस्था में आकर
(घ) कभी नहीं

प्रश्न 5.
15 से 20 वर्ष की अवस्था में मानसिक विकास की सीमा-
(क) उच्चतम होती है
(ख) न्यूनतम होती है
(ग) औसत होती है
(घ) असीमित होती है

प्रश्न 6.
सामान्य से अधिक तथा निरन्तर बनी रहने वाली थकान का मानसिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(क) उत्साहपूर्वक प्रभाव पड़ता है
(ख) कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(ग) प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है
(घ) सभी कथन भ्रामक हैं

प्रश्न 7.
“संवेदना ज्ञान की प्रथम सीढ़ी है।”
(क) मानसिक विकास है
(ख) भाषागत विशेषता है
(ग) शारीरिक विशेषता है
(घ) सर्वांगीण विकास है

प्रश्न 8.
“ज्ञान की प्रथम सीढ़ी” कौन-सी है?
(क) संवेदना
(ख) भाषागत विकास
(ग) शारीरिक विकास
(घ) ये सभी

उत्तर:

  1. (ख) मानसिक क्षमताओं का पुष्ट होना
  2. (घ) ये सभी,
  3. (ख) दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं
  4. (ख) किशोरावस्था के अन्त तक
  5. (क) उच्चतम होती है
  6. (ग) प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है
  7. (क) मानसिक विकास है
  8. (क) संवेदना

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 8 Community: As an Agency of Education

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 8 Community: As an Agency of Education (समुदाय: शिक्षा के अभिकरण के रूप में) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 8 Community: As an Agency of Education (समुदाय: शिक्षा के अभिकरण के रूप में).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 8
Chapter Name Community: As an Agency of Education
(समुदाय: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 8 Community: As an Agency of Education (समुदाय: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 समुदाय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। समुदाय की मुख्य विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।
उतर:

समुदाय का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Community)

अंग्रेजी का शब्द ‘Community’ (समुदाय) दो लैटिन शब्दों-‘Com’ एवं ‘Munis’ का मिश्रित रूप है। Com का अर्थ ‘एक साथ’ और Munis का अर्थ ‘सेवा करना है। इन शब्दों के आधार पर समुदाय का शाब्दिक अर्थ ‘साथ-साथ मिलकर सेवा करने से है। समुदाय का तात्पर्य व्यक्तियों के ऐसे समूह से है जो निश्चित भूभाग पर सामान्य उद्देश्यों के लिए एकसाथ मिलकर जीवन व्यतीत करते हैं। वे साधारण जीवन व्यतीत करते हुए एक-दूसरे की सहायता करते हैं और अपने अधिकारों का उपयोग भी करते हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैकाइवर तथा पेज की दृष्टि में समुदाय सामान्य जीवन का क्षेत्र है। समुदाय के आधारभूत तत्त्वों तथा प्रकृति के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने समुदाय को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित करने का प्रयास किया है

  1. ऑगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “एक सीमित क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन को समुदाय कहा जाता है।”
  2. बोगाईस की दृष्टि में, “संमुदाय एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसमें कुछ अंशों में ‘हम की भावना पाई जाती है तथा जो एक निश्चित्रं क्षेत्र में रहता है।”
  3. डेविस के अनुसार, “समुदाय सबसे छोटा ऐसा क्षेत्रीय समूह है जिसमें सामाजिक जीवन के सभी पहलू आ जाते हैं।”
  4. मैकाइवर तथा पेज के मतानुसार, “जब किसी छोटे या बड़े समूह के सदस्य साथ-साथ इस प्रकारे रहते हैं कि वे किसी विशेष हित में ही भागीदार न होकर सामान्य जीवन की मूलभूत दशाओं या स्थितियों में भाग लेते हैं तो ऐसे समूह को समुदाय कहा जाता है।

इस प्रकार, “समुदाय सामान्य सामाजिक जीवन में सहभागी लोगों का एक ऐसा समूह है जो किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में साथ-साथ रहता है और जिसमें ‘हम की भावना’ या ‘सामुदायिक भावना पाई जाती है।”

समुदाय की विशेषताएँ
(Characteristics of Community)

समुदाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. जन-समूह- व्यक्तियों का समूह (जन-समूह) समुदाय के निर्माण हेतु प्रथम मुख्य आधार है। ..
  2. निश्चित भौगोलिक क्षेत्र- निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाला समूह ही समुदाय है। गाँव, नगर या राष्ट्र इसलिए समुदाय हैं क्योंकि इनमें से हर एक का निश्चित भौगोलिक क्षेत्र है।
  3. सामुदायिक भावना- समुदाय में रहने वाले लोगों के बीच सामुदायिक भावना पाई जाती है, जिसके तीन तत्त्व हैं-हम की भावना, दायित्व निर्वाह की भावना तथा निर्भरता की भावना।
  4. व्यापक उद्देश्य- समुदाय के उद्देश्य व्यक्ति विशेष, समूह विशेष या वर्ग विशेष के हितों की पूर्ति नहीं करते। ये तो व्यापक रूप से समस्त व्यक्तियों एवं समूहों के सभी प्रकार के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु कार्य करते हैं।
  5. सामुदायिक सदस्यता- एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहने के कारण समुदाय की सदस्यता स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।
  6. स्वतः विकसित- समुदाय का निर्माण जान-बूझकर या नियोजित प्रयासों से नहीं किया जाता। ये तो समय के साथ स्वत: विकसित होते हैं।
  7. विशिष्ट नाम- प्रत्येक समुदाय को अपना एक विशिष्ट नाम समुदाय की विशेषताएँ होता है।जन-समूह
  8. सामान्य नियम व्यवस्था- समुदाय में सामान्य नियमों के निश्चित भौगोलिक क्षेत्र माध्यम से लोगों के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है व उन पर १ सामुदायिक भावना नियन्त्रण रखा जाता है।व्यापक उद्देश्य
  9. स्थायित्व- किसी अस्थायी समूह; जैसे-भीड़, श्रोता सामुदायिक सदस्यता समूह या खानाबदोश झुण्ड को समुदाय नहीं कहेंगे। समुदाय एक स्वतः
  10. विकसित निश्चित भू- भाग से स्थायी रूप से जुड़ी रहता है। विशिष्ट नाम
  11. सामान्य जीवन- समुदाय के सभी सदस्य प्रायः एक जैसा सामान्य नियम व्यवस्था सामान्य जीवन जीते हैं। उनके कुछ सामान्य रीति-रिवाज, परम्पराएँ, स्थायित्व त्योहार, विश्वास, उत्सव तथा संस्कार होते हैं जो उन्हें एकता के सूत्र के सामान्य जीवन में बाँध देते हैं।

प्रश्न 2.
शिक्षा के एक अभिकरण के रूप में समुदाय के शैक्षिक कार्यों की विवेचना कीजिए।
या
“समाज शिक्षा का एक शक्तिशाली अभिकरण है।” इस सन्दर्भ में समाज के शैक्षिक कार्यों को लिखिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में समुदाय की भूमिका का वर्णन कीजिए।
या
“समुदाय शिक्षा का सक्रिय एवं अनौपचारिक अभिकरण है।” विवेचना कीजिए।
या
समाज के शैक्षिक कार्य क्या हैं?
या
समुदाय के शैक्षिक कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उतर:

शिक्षा के अभिकरण के रूप में समुदाय के कार्य
(Functions of Community as Agency of Education)

शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों में समुदायका महत्त्वपूर्ण स्थान है। समुदाय को अपने सदस्यों विशेष रूप से बच्चों एवं युवा वर्ग के प्रति विशेष दायित्व होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए समुदाय अपने क्षेत्र में विभिन्न शैक्षिक कार्यों को दायित्वपूर्ण ढंग से सम्पन्न करता है। शिक्षा के एक सक्रिय एवं अनौपचारिक अभिकरण के रूप में समुदाय के शैक्षिक कार्यों का विवरण निम्नलिखित है

1. शारीरिक विकास की व्यवस्था-समुदाय के शैक्षिक कर्तव्य में प्रथम है बालक के शारीरिक विकास की व्यवस्था। समुदाय का कर्तव्य है कि वह विद्यालय में शान्त एवं स्वस्थ वातावरण के माध्यम से विद्यार्थियों का समुचित शारीरिक विकास करे। इसके लिए विद्यालय प्रांगण अथवा किसी सार्वजनिक स्थान पर खेलकूद तथा व्यायामशालाओं का पर्याप्त प्रबन्ध किया जाना चाहिए। प्रत्येक ग्राम और नगर में स्थान-स्थान पर सामुदायिक उद्यान, पार्क, क्रीड़ा-स्थल, मनोरंजन के साधन तथा स्वास्थ्य व चिकित्सा केन्द्र स्थापित किए जाने चाहिए। यही नहीं, समुदाय द्वारा निर्धन वर्ग के बच्चों हेतु मुफ्त आहार की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

2. सम्पूर्ण मानसिक विकास- शारीरिक विकास के साथ ही बालक को मानसिक विकास भी अपरिहार्य है। बालक को अपनी क्षमताओं, योग्यताओं तथा विचारों को मुक्त रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए और यह शैक्षिक दायित्व भी समुदाय का है। समुदाय का कर्तव्य है कि वह श्रेष्ठ शिक्षण संस्थाओं, पुस्तकालयों, वाचनालयों, पत्र-पत्रिकाओं, नाट्यशालाओं, रेडियो, टी०वी० तथा चलचित्रों जैसे अभिकरणों के माध्यम से बच्चों के बौद्धिक विकास में मदद दे। समुदाय द्वारा बालक को सम्पूर्ण मानसिक विकास के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।

3. नैतिकता का विकास- किसी समुदाय के सदस्यों का नैतिक-चरित्र उसे समाज में उत्कृष्ट तथा गौरवशाली बनाता है। अत: समुदाय का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है कि वह बालकों के नैतिक-चरित्र को उन्नत करे। प्रेम, परोपकार, उदारता, विनम्रता, कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता, बन्धुत्व की भावना एवं पारस्परिक सहयोग-इन सभी मानवीय गुणों से बालक के जीवन में नैतिकता की आधारभूमि निर्मित होती है। समुदाय को ऐसे शैक्षिक साधन सुलभ कराने चाहिए जो बालक का अधिकतम नैतिक विकास कर सकें। बालक में उत्तम गुणों के विकास हेतु जहाँ एक ओर समुदाय के वातावरण को स्वच्छ एवं सुन्दर बनाया जाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर बालकों को दूषित एवं अनैतिक वातावरण से दूर रखना सर्वथा उपयुक्त है।

4. धार्मिक सहिष्णुता का विकास- भारतीय सैमॉज के प्रत्येक नागरिक के जीवन में धर्म तथा मानव-सेवा की भावना सर्वोपरि पाई जाती है। समुदाय का कर्तव्य है कि वह बालक में ऐसी भावनाओं का समावेश तथा विकास करे, क्योंकि समाज में विभिन्न मत-मतान्तरों एवं मजहबों के अनुयायी रहते हैं। अतः समुदाय को अपने औपचारिक व अनौपचारिक अभिकरणों के माध्यम से लोगों को धर्म का वास्तविक अर्थ एवं स्वरूप समझाना चाहिए। इससे लोगों में धार्मिक सहिष्णुता तथा समन्वयवादी भावनाओं का विकास होगा। इसके अतिरिक्त समुदाय द्वारा आयोजित किए जाने वाले धार्मिक-पर्व, उत्सव, गोष्ठियाँ, व्याख्यान मालाओं तथा धार्मिक शिक्षा के अभिकरण के रूप में आयोजनों से समाज के नागरिकों में सत्य, अहिंसा, दया, त्याग, समुदाय के कार्य सहयोग, विश्व-शान्ति तथा भाईचारे की मानवीय भावनाओं का ॐ शारीरिक विकास की व्यवस्था विकास भी होगा। सम्पूर्ण मानसिक विकास

5. भावात्मक तथा कलात्मक विकास- मानव-जीवन के दो , नैतिकता का विकास पक्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं- (i) भावपक्ष एवं (ii) कलापक्ष। सुन्दर-विशुद्ध भावनाएँ तथा विविध रूपमयी कलाएँ मनुष्य को जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता देती हैं। इन दोनों पक्षों के समुचित विकास की दृष्टि से समुदाय को ललित कलाओं, संगीत २ जीविकोपार्जन की समस्या का विद्यालयों, सौन्दर्य स्थलों एवं बाल-उद्यानों आदि की स्थापना करनी समाधान चाहिए। इसके अतिरिक्त समय-समय पर संगीत समारोह, साहित्य के शिक्षा-प्रणाली एवं संस्थाओं पर सम्मेलन, नाटक, प्रदर्शनी एवं उत्सव भी आयोजित किए जाएँ। बालक नियन्त्रण का भावात्मक तथा कलात्मक विकास नि:सन्देह समुदाय का शैक्षिक ” शिक्षा के अनौपचारिक साधनों कर्तव्य है, जिसे पूरा करने हेतु समुदाय को अधिकतम प्रयास करना। की व्यवस्था चाहिए।

6. जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान- समुदाय का एक शैक्षिक कर्तव्य यह भी है कि वह बालक के व्यावसायिक विकास में योगदान कर जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान करे। इसके लिए एक तो व्यावसायिक एवं औद्योगिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जाए; दूसरे कृषि, हस्तकौशल तथा विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित प्रशिक्षण संस्थाएँ स्थापित की जाएँ। समुदाय द्वारा जीविकोपार्जन के उचित अवसर उपलब्ध कराने से बच्चों में आत्मनिर्भरता तथा स्वावलम्बन की भावना जाग्रत होगी।

7. शिक्षा-प्रणाली एवं संस्थाओं पर नियन्त्रणसभी लोकतान्त्रिक देश अपनी शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत शैक्षिक उद्देश्य एवं शिक्षण की विधियों में लोकतान्त्रिक आदर्शों का समावेश चाहते हैं, किन्तु यह कार्य समुदाय के बिना सम्भव नहीं है। यह सामुदायिक नेतृत्व का दायित्व है कि वह समुदाय की आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रकार के विद्यालयों; जैसे—बाल-विद्यालय, विकलांग एवं पिछड़े बालकों के लिए विद्यालय, सामान्य बुद्धि के बालकों हेतु विद्यालय, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र तथा व्यावसायिक व तकनीकी संस्थान की स्थापना करे तथा शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों तथा प्रशासनिक संगठन की रूपरेखा सुनिश्चित करे।

यह दायित्व भी समुदाय का ही है कि वह विद्यालय की शिक्षा-दीक्षा एवं प्रबन्ध-तन्त्र के संचालन हेतु ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करे जो पर्याप्त रूप से कुशल और अनुभवी हों। इस सन्दर्भ में हावर्थ के अनुसार, ‘विद्यालय समाज के चरित्र का सुधार करने का साधन है। यह सुधार सामाजिक उन्नति की दिशा में है या नहीं, यह विद्यालय के संचालकों के विचारों तथा आदर्शों पर निर्भर रहता है।”

8. शिक्षा के अनौपचारिक साधनों की व्यवस्था शिक्षा के व्यापक दृष्टिकोण के अन्तर्गत शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक सभी साधन सम्मिलित हैं। सिर्फ औपचारिक साधनों की व्यवस्था करके ही समुदाय का शैक्षिक दायित्व पूरा नहीं हो जाता, उसे बालकों के लिए शिक्षा के अनौपचारिक साधनों का प्रबन्ध भी करना चाहिए। इस दृष्टि से समुदाय द्वारा पुस्तकालयों, चित्रशालाओं, संग्रहालयों, संगीतशालाओं, अभिनय केन्द्रों तथा स्वास्थ्य संगठनों की स्थापना होनी आवश्यक है। उल्लेखनीय रूप से इन अनौपचारिक साधनों में भाँति-भाँति के शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि शिक्षा के साधन के रूप में समुदाय के अनेक शैक्षिक कर्तव्य हैं। जो बालक की शिक्षा में समुदाय के महत्त्व तथा शैक्षिक प्रभाव का प्रतिपादन करते हैं। वास्तव में समुदाय के सहयोग से ही बालक एक आदर्श नागरिक बनकर व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से समाज की प्रगति में सहायता दे सकता है।

प्रश्न 3.
विद्यालय और समुदाय में सहयोग स्थापित करने की विधियों का उल्लेख कीजिए।
या
उन मुख्य उपायों का संक्षेप में वर्णन कीजिए जो विद्यालय तथा समुदाय के बीच सामंजस्य स्थापित करते हैं।
उतर:

विद्यालय और समुदाय में सहयोग
(Co-operation in School and Community)

एडम्स का यह कथन है, “विद्यालय एक ऐसी संस्था है जहाँ बालक में समाज, देश और युग की आवश्यकतानुसार गुणों का विकास करके उसे एक सुयोग्य नागरिक बनाया जाता है। विद्यालय, समुदाय के घनिष्ठ एवं अटूट सम्बन्ध की पुष्टि करता है। समुदाय शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विद्यालयों की स्थापना करते हैं और विद्यालय शिक्षा के माध्यम से समुदाय की प्रगति में सहयोग करते हैं। इस भाँति विद्यालय और समुदाय दोनों के शैक्षिक उद्देश्य प्रायः एकसमान हैं और इनकी उन्नति भी आपसी सहयोग पर ही निर्भर करती है। अत: दोनों संस्थाओं को मिल-जुलकर सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए। विद्यालय और समुदाय में परस्पर सहयोग एवं सामंजस्य स्थापित करने की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित

1. विद्यालयों में कार्यक्रमों का आयोजन- विद्यालय और समुदाय के बीच आपसी सहयोग एवं सामंजस्य बढ़ाने की दृष्टि से विद्यालय के प्रांगण में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। समय-समय पर विद्यालयों में वाद-विवाद, निबन्ध एवं भाषण प्रतियोगिताओं, विज्ञान एवं चित्रकला प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों तथा सम्मेलनों का आयोजन किया जाए और उनमें समुदाय के सदस्यों को भी आमन्त्रित किया जाए। सामुदायिक समस्याओं के सम्बन्ध में आपसी विचार-विमर्श तथा समाधान की खोज निश्चय ही शिक्षकों, शिक्षार्थियों तथा समुदाय के सदस्यों को निकट लाने में मदद देगी।

2. समुदाय के शैक्षिक साधनों का उपयोग- समुदाय के कुछ शैक्षिक साधन होते हैं; जैसे-शिक्षा-प्रसार विभाग, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, साक्षरता केन्द्र, महिला शिक्षा केन्द्र, सांस्कृतिक कार्य केन्द्र आदि। समाज की शिक्षा संस्थाओं को चाहिए कि वे उपलब्ध सामुदायिक शैक्षिक साधनों का उपयोग करके अधिकाधिक लाभ अर्जित करें। स्पष्टत: विद्यालय और समुदाय के पारस्परिक हित एक-दूसरे को अधिक निकट लाने में सहयोग करेंगे।

3. अनुकूल पाठ्यक्रम का निर्माण- विद्यालय का पाठ्यक्रम व्यक्ति और समुदाय दोनों के लिए उपयोगी होना चाहिए। इसके साथ ही शैक्षिक पाठ्यक्रम समुदाय विशेष की प्रकृति, समस्याओं तथा आवश्यकताओं के अनुकूल भी होना चाहिए। इस भाँति जीवन्त तथा उपयोगी पाठ्यक्रम, विद्यालय और समुदाय के मध्य एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बनकर दोनों संस्थाओं में सामंजस्य स्थापित करता है।

4. विद्यालय-प्रबन्ध में समुदाय का योगदान- विद्यालय और समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध तभी स्थापित हो सकता है जब दोनों एक-दूसरे के विकास हेतु अपना दायित्व समझकर वांछित योगदान करें। इस दृष्टि से विद्यालय के प्रबन्ध-तन्त्र में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। विद्यालय के प्रबन्ध में समुदाय के सदस्यों के प्रतिनिधित्व तथा योगदान से जहाँ एक ओर विद्यालय अधिकाधिक उन्नति करेगा, वहीं दूसरी ओर विद्यालय तथा समुदाय के मध्य आपसी समझ-बूझ तथा सहयोग की भावना भी बढ़ेगी।

5. समाज-सेवा के कार्य विद्यालयों को उचित एवं यथेष्ठ अवसरों पर समुदाय के अन्तर्गत समाज-सेवा के कार्य करने चाहिए। समाज-सेवा समिति, बालचर संघ, श्रमदान तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी सहायता कार्यों में सक्रिय भाग लेकर शिक्षक एवं छात्र समज-सेवा की भावना से प्रेरित होते हैं तथा समुदाय को लाभ पहुँचाते हैं। यही कारण है कि हर एक शिक्षा संस्थान में स्काउटिंग-गाइडिंग, राष्ट्रीय सेवा योजना, समाज-सेवा, प्राथमिक चिकित्सा, श्रमदान सप्ताह तथा सफाई सप्ताह आदि का आयोजन किया जाना चाहिए। इन सामाजिक कार्यों के परिणामस्वरूप विद्यालय एवं समुदाय के बीच सहयोग की भावना का विकास होगा।

6. शिक्षक-अभिभावक संघ-शिक्षक- अभिभावक संघ भी विद्यालय और समुदाय में सहयोग स्थापित करने की उत्तम विधि है। यह संघ विद्यालय के शिक्षकों तथा विल य भयो। शिक्षार्थियों के अभिभावक-गणों का एक सोद्देश्य संगठन है, जिसके अन्तर्गत शिक्षक और अभिभावक मिलकर समदाय की प्रगति एवं विद्यालय में कार्यक्रमों का विद्यालय की उन्नति के विषय में विचार-विनिमय करते हैं। यह आयोजन विद्यालय तथा समुदाय के बीच घनिष्ठता बढ़ाने का एक द्विमार्गीय उपयोग उपाय है। अत: प्रत्येक विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक संघ की स्थापना आवश्यक रूप से की जाए और समय-समय पर उसकी सभाएँ भी आयोजित की जाएँ।

7. पूर्व-छात्र परिषद् विद्यालयों में पूर्व- छात्र परिषद् की , समाज-सेवा के कार्य स्थापना द्वारा विद्यालय तथा समुदाय के पारस्परिक सम्बन्धों को उत्तम शिक्षक-अभिभावक संघ बनाया जा सकता है। विद्यालय से जाने के बाद छात्र समाज के पूर्व-छात्र परिषद् विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं। वे अपने अनुभवी सुझावों द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान करना विद्यालय की मदद कर सकते हैं। अतः पूर्व-छात्र परिषद् की स्थापना के सरस्वती यात्राएँ करके शिक्षा-संस्थाओं में समुदाय के बीच से पुरातन छात्रों को विद्यालय को सामुदायिक जीवन आमन्त्रित करना चाहिए। इस प्रकार की गतिविधियाँ, निश्चय हीका केन्द्र बनाना विद्यालय और समुदाय को अत्यधिक निकट ला देंगी।

8. आर्थिक सहायता प्रदान करना- समुदाय के सक्षम सदस्य विद्यालयों की आर्थिक दशा सुधारने हेतु उन्हें वांछित आर्थिक सहायता प्रदान कर सकते हैं। इसके निमित्त समुदाय के प्रबुद्ध नागरिकों तथा विद्यालय के अधिकारियों को पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा अनिवार्यताओं के क्रम में आर्थिक योजना का प्रारूप तैयार करना चाहिए। आर्थिक सहायता पाकर जहाँ एक ओर विद्यालयों की उन्नति होगी, वहीं दूसरी ओर समुदाय के सदस्य भी अपने शैक्षिक दायित्वों के प्रति अधिकाधिक प्रेरित होंगे।

9. सरस्वती यात्राएँ- सरस्वती यात्राएँ विद्यालय और समुदाय में सहयोग स्थापित करने हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन यात्राओं के अन्तर्गत समय-समय पर विद्यालय के बच्चों को ऐतिहासिक तथा भौगोलिक स्थलों पर ले जाना चाहिए। उन्हें विभिन्न औद्योगिक संस्थानों, वन्य प्राणि-विहारों, संग्रहालयों तथा दर्शनीय स्थानों का भ्रमण कराना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे निरीक्षण एवं अनुभव द्वारा अपना अधिकाधिक ज्ञान बढ़ा सकते हैं। वस्तुतः उनका यह ज्ञान समुदाय एवं विद्यालय के बीच सहयोग बनाने की एक कड़ी के रूप में उपयोगी सिद्ध होता है।

10. विद्यालय को सामुदायिक जीवन का केन्द्र बनाना- विद्यालयी शिक्षा सामुदायिक जीवन से जुड़कर ही अर्थपूर्ण हो सकती है। अतः विद्यालय के प्रांगण में समुदाय के हितों से सम्बद्ध विभिन्न गतिविधियों के केन्द्र स्थापित किए जाने चाहिए। विद्यालयों में प्रौढ़ शिक्षा एवं स्त्री-शिक्षा के केन्द्र, संध्या या रात्रि समय पुस्तकालय व वाचनालय तथा स्वस्थ मनोरंजन सम्बन्धी कार्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए। विद्यालय में उपलब्ध शैक्षिक साधनों का प्रयोग करके समुदाय के लोगों की भावनाएँ विद्यालय के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण तथा उदार होती हैं, जिसके परिणामतः वे विद्यालय को अधिकाधिक सहयोग देने हेतु प्रेरित होते हैं।

निष्कर्षतः सर्वांगीण उन्नति एवं विकास की दृष्टि से पारस्परिक सहयोग बढ़ाने के लिए विद्यालय और समुदाय को एक-दूसरे की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समुदाय के महत्त्व का उल्लेख कीजिए। या शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में समुदाय के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

समुदाय का महत्त्व
(Importance of Community)

  1. समुदाय, गृह अथवा विद्यालय की तरह ही, बालक के व्यवहार में परिवर्तन इस भाँति लाता है ताकि वह एक सदस्य के रूप में समूह के कार्यों में सक्रिय भाग ले सके।
  2. समुदाय बालक की शिक्षा को शुरू से ही प्रभावित करता है। यह शिक्षा के उपयोगी साधनों की व्यवस्था करता है जिससे समुदाय के सभी सदस्यों का सर्वांगीण विकास होता है।
  3. बालक की संस्कृति, बोलचाल, रहन-सहन, स्वभाव, विचारों तथा आदतों पर समुदाय की अप्रत्यक्ष, किन्तु प्रभावपूर्ण छाप होती है। बच्चे को शिक्षित एवं सुसंस्कृत बनाने में समुदाय की विशिष्ट भूमिका रहती है।
  4. समुदाय बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया में अधिकतम योगदान देता है। समुदाय विशेष के बीच रहकर अर्जित किए गए अनुभव तथा सामाजिक प्रतिमान बालक को सामाजिक व्यक्ति बनाने में सहयोग प्रदान करते हैं।
  5. समुदाय का वातावरण बालक की अनुकरण करने की जन्मजात प्रवृत्तियों पर विशेष प्रभाव डालता है। बालक गृह-परिवार, आस-पड़ोस, विद्यालय तथा अनेक समूहों के साथ रहकर सम्बन्ध बनाता है और उनसे प्रभावित होकर शिक्षा ग्रहण करता है।
  6. 6. समुदाय को शिक्षा का महत्त्वपूर्ण अभिकरण स्वीकार करते हुए विलियम ए० ईगर ने इस प्रकार लिखा है, “क्योंकि मानव स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसने वर्षों के अनुभव से सीख लिया है। कि व्यक्तित्व और सामूहिक क्रियाओं का विकास समुदाय द्वारा ही सर्वोत्तम रूप में किया जा सकता है।”

प्रश्न 2.
बालक की शिक्षा में समुदाय के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

बालक की शिक्षा में समुदाय का योगदान
(Contribution of Community in Child’s Education)

परिवार और विद्यालय के समान समुदाय भी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। समुदाय बालक के व्यवहार को इस भाँति रूपान्तरित करता है ताकि वह उस समूह के कार्यों में सक्रिय भाग ले सके, जिसका कि वह सदस्य है। बालक समुदाय से औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्राप्त करता है। व्यापक अर्थ में शिक्षा आजन्म चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बालक अनौपचारिक तथा स्वाभाविक रूप से प्रत्येक क्षण अपने सामुदायिक जीवन से कुछ-न-कुछ सीखता रहता है। जॉन डीवी का मत है, “विद्यालय को समाज का वास्तविक प्रतिनिधि होना चाहिए।’ विद्यालय शिक्षा की एक औपचारिक संस्था है, जिसकी स्थापना समाज या समुदाय करता है। अत: विद्यालय पर समुदाय का प्रभाव पड़ता ही है। इसी तरह से समुदाय भी विद्यालय शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करने में योगदान देता है।

बालक के व्यक्तित्व के विकास पर समुदाय का गहरा असर पड़ता है। बालक की संस्कृति, आचरण, रहन-सहन, बोलचाल, स्वभाव, विचारों तथा आदतों के निर्माण में भी समुदाय का परोक्ष, प्रभावशाली एवं महत्त्वपूर्ण योगदान है। बालक की अनुकरण करने की जन्मजात प्रवृत्तियों पर समुदाय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। प्रायः बालक वैसा ही बनता है जैसा कि समुदाय का नेतृत्व उसे बनने की प्रेरणा देता है। सामुदायिक संगति का गहरा और व्यापक असर होता है। प्राय: देखने में आता है कि कलाकार के साथ रहने वाला बालक उसकी कला से प्रभावित हो जाता है और विशिष्ट कला में रुचि रखने लगता है। इसके अतिरिक्त, धार्मिक, सामाजिक, नागरिक एवं शैक्षिक संस्थाएँ; जैसे-विद्यालय, समाज सेवी तथा राजनीतिक दल, समाचार-पत्र, पुलिस, यात्राएँ, घर, पास-पड़ोस तथा क्रीड़ा-स्थल आदि सामुदायिक इकाइयाँ भी बालक की शिक्षा और उसके सर्वांगीण विकास में भूमिका निभाती हैं। स्पष्टतः बालक की शिक्षा में समुदाय का अभीष्ट योगदान रहता है।

प्रश्न 3.
समाज तथा समुदाय में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उतर:

समाज तथा समुदाय में अन्तर

मनुष्यों द्वारा सामूहिक जीवन व्यतीत करने के लिए विभिन्न संगठन गठित किए गए हैं, जिनमें से दो मुख्य हैं–‘समाज’ तथा समुदाय’। समाज तथा समुदाय में विभिन्न समानताएँ होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर–

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय तथा समुदाय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उतर:
विद्यालय तथा समुदाय का आपसी सम्बन्ध निम्नलिखित विवरण द्वारा स्पष्ट हो जाएगा–

  1. विद्यालय का समुदाय से गहरा सम्बन्ध है और दोनों ही अपने विकास के लिए एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
  2. विद्यालय औपचारिक शिक्षा के माध्यम से तथा समुदाय अनौपचारिक शिक्षा द्वारा बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। अतः व्यक्तित्व के समुचित विकास हेतु विद्यालय एवं समुदाय में आपसी सहयोग अनिवार्य है।
  3. प्रत्येक समुदाय अपनी प्रगति हेतु विद्यालय की स्थापना करता है। विद्यालय, समुदाय के प्रतिनिधि तथा राष्ट्र के भावी नागरिक के रूप में बालक को शिक्षा प्रदान करता है।
  4. विद्यालय में विभिन्न समुदायों से प्रायः सभी संस्कृतियों के बालक शिक्षा पाने हेतु आते हैं और साथ-साथ रहकर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
  5. विद्यालय और समुदाय के वातावरण भी एक-दूसरे के साथ अन्त:क्रिया करते हैं। विद्यालय का वातावरण कृत्रिम, किन्तु समुदाय का वातावरण स्वाभाविक होता है। समुदाय की सभी अच्छाइयाँ और बुराइयाँ विद्यालय के संगठन एवं क्रियाकलापों पर गहरा असर रखती हैं।
  6. बालक के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास द्वारा विद्यालय समुदाय के विकास में सहयोग करते हैं। हावर्थ लिखते हैं, “विद्यालय समाज के चरित्र में सुधार करने का साधन है। यह सुधार सामाजिक उन्नति की दिशा में है या नहीं, यह विद्यालय के संचालकों के चरित्र एवं आदर्शों पर निर्भर करता है।”
  7. जॉन डीवी ने सच ही कहा है, “विद्यालय समाज का सच्चा प्रतिनिधि है।”

प्रश्न 2.
गृह अथवा परिवार तथा समुदाय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गृह अथवा परिवार तथा समुदाय के आपसी सम्बन्ध का विवरण निम्नलिखित है-

  1. व्यक्ति, गृह (परिवार) का एक सदस्य है-परिवारों से समुदाय बनते हैं और समुदाय समाज का महत्त्वपूर्ण अंग है। इस प्रकार व्यक्ति, समुदाय एवं समाज का घनिष्ठ सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है।
  2. गृह और समुदाय एक-दूसरे से इतने अधिक सम्बद्ध हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं रहता।
  3. घर में जन्म लेने वाला प्रत्येक बच्चा एक निश्चित समुदाय से जुड़ा होता है। उसके प्रारम्भिक जीवन का अधिकांश समय जिस समुदाय के बीच व्यतीत होता है, उस समुदाय की संस्कृति के अनुसार ही उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।
  4. समुदाय अपने शैक्षिक कर्तव्यों के अन्तर्गत परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का व्यापक प्रबन्ध करता है।
  5. दूसरी ओर, जहाँ परिवार का सभ्य-सुसंस्कृत वातावरण, चरित्र, आचरण एवं नैतिक आदर्श समुदाय की दिशा निर्धारित करता है, वहीं परिवार के सदस्यों के दोष भी समुदाय के वातावरण पर प्रभाव डालते हैं।
  6. रॉस के अनुसार, ‘‘ऐसे व्यक्ति का कोई भी मूल्य नहीं है जो सामाजिक जीवन से पृथक् हो।”

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘समुदाय’ की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए। उत्तर “समुदाय एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसमें कुछ अंशों में हम की भावना पाई जाती है तथा जो एक निश्चित क्षेत्र में रहता है।” 
-बोगस

प्रश्न 2.
‘समुदाय की तीन मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • ‘सामुदायिक भावना’ अथवा ‘हम की भावना’ का पाया जाना,
  • निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तथा
  • स्वत: विकास।

प्रश्न 3.
क्या समुदाय भी शिक्षा का अभिकरण है? यदि हाँ, तो यह शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है? ‘समुदाय शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है ?
उत्तर:
समुदाय स्पष्ट रूप से शिक्षा का अभिकरण है। यह शिक्षा का अनौपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 4.
समुदाय द्वारा अपने युवकों की जीविकोपार्जन की समस्या के समाधान में क्या योगदान दिया जाता है?
उत्तर:
समुदाय द्वारा युवकों के औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करके उनकी जीविकोपार्जन सम्बन्धी समस्या के समाधान में योगदान दिया जाता है।

प्रश्न 5.
बच्चों की औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था में समुदाय द्वारा क्या योगदान दिया जाता है?
उत्तर:
समुदाय विद्यालय एवं अन्य शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करके बच्चों की औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था करता है।

प्रश्न 6.
“विद्यालय समाज का सच्चा प्रतिनिधि है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन जॉन डीवी का है।

प्रश्न 7.
कथन सत्य हैं या असत्य

  1. एक सीमित क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन को समुदाय कहते हैं।
  2. समुदाय द्वारा बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं दिया जाता है।
  3. समुदाय स्पष्ट रूप से शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण औपचारिक अभिकरण है।
  4. विद्यालय तथा समुदाय में घनिष्ठ आपसी सम्बन्ध होता है।
  5. समुदाय द्वारा बच्चों के बहुपक्षीय विकास में विशेष योगदान दिया जाता है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोण से समुदाय को माना जाता है|
(क) अनावश्यक अभिकरण
(ख) औपचारिक अभिकरण
(ग) अनौपचारिक अभिकरण
(घ) कामचलाऊ अभिकरण

प्रश्न 2.
बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था के दृष्टिकोण से विद्यालय तथा समुदाय का आपसी सम्बन्धहोता है
(क) परस्पर विरोध का
(ख) परस्पर सहयोग का
(ग) समुदाय विद्यालय पर हावी रहता है।
(घ) विद्यालय समुदाय के प्रभाव से मुक्त है।

प्रश्न 3.
‘समुदाय’ का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान है
(क) शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों की व्यवस्था करना
(ख) शिक्षा पर आवश्यक नियन्त्रण रखना
(ग) विद्यालय पर आवश्यक नियन्त्रण रखना
(घ) उपर्युक्त सभी योगदान

उत्तर:

1. (ग) अनौपचारिक अभिकरण,
2. (ख) परस्पर सहयोग का,
3. (घ) उपर्युक्त सभी योगदान।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 19 Physical Development

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 19 Physical Development (शारीरिक विकास) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 19 Physical Development (शारीरिक विकास).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 19
Chapter Name Physical Development (शारीरिक विकास)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 19 Physical Development (शारीरिक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शारीरिक विकास का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शारीरिक विकास का अर्थ
(Meaning of Physical Development)

डॉ० सीताराम जायसवाल का यह कथन उल्लेखनीय है, “बालक के विकास का विस्तृत अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान में किया जाता है। इसके अन्तर्गत विकास के सभी पक्षों का अध्ययन किया जाता है। बालक का शैक्षिक विकास और व्यावहारिक ज्ञान, उसकी शारीरिक गति तथा विकास से प्रभावित होते हैं।” शरीर के विभिन्न अंगों की वृद्धि, उनकी परिपक्वता तथा क्रियाशीलता शारीरिक विकास के अन्तर्गत आती। है। बालक के शरीर के विभिन्न अंगों के आकार व भार में वृद्धि और उनकी क्रियाशीलता में होने वाले परिवर्तनों तथा उनकी परिपक्वता की प्रक्रिया ही शारीरिक विकास है। मानवीय विकास की सम्पूर्ण प्रक्रिया में शारीरिक विकास का सर्वाधिक महत्त्व है। वास्तव में यदि बालक को शारीरिक विकास सामान्य एवं सुचारु हो, तो विकास के अन्य पक्ष भी सामान्य ही रहते हैं। शारीरिक विकास के असामान्य हो जाने की स्थिति में विकास के अन्य पक्षों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

शारीरिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Features of Physical Development)

शारीरिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. क्रमिक व धीमा विकास- गर्भाधान के पश्चात् ही शिशु का शारीरिक विकास प्रारम्भ हो जाता है। इस अवस्था में विकास की गति बहुत मन्द होती है, लेकिन विकास एक निश्चित क्रम में ही होता है।

2. शारीरिक विकास का चक्र- शरीर का विकास एकसमान गति से नहीं होता है। शरीरशास्त्रियों के अनुसार जन्म से प्रथम दो वर्षों तक शारीरिक विकास अत्यधिक तीव्र गति से होता है। इसके बाद 11 वर्ष की आयु तक विकास की गति धीमी रहती है। 11 से 15 वर्ष की आयु के मध्य पुनः विकास तीव्र गति से होता है। 16 से 18 वर्ष की आयु में विकास की गति पुन: धीमी पड़ जाती है। जब विकास की गति धीमी होती है, उस समय हट्ठियों व मांसपेशियों आदि का पुष्टिकरण होता है। इसी कारण विकास के साथ-साथ अंग मजबूत और पुष्ट होते चलते हैं।

3. शारीरिक विकास की दिशा- मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बालक के विभिन्न अंगों का विकास एक निश्चित क्रमानुसार होता है। इस क्रमिक विकास को सिर-पुच्छीय दिशा कहा जाता है। गर्भ से पहले शिशु का सिर विकसित होता है और फिर धड़ तथा अन्त में हाथ-पैरों का विकास होता है। जन्म के पश्चात् बालक के अंगों की गति और क्रियाओं को विकास भी इसी क्रम से होता है।

4. शारीरिक विकास में अनियमितता- शरीर के सभी अंग एक साथ नहीं बढ़ते हैं और न ही विकसित होते हैं। सभी अंगों का विकास भिन्न-भिन्न समय से होता है; जैसे—सिर का विकास सर्वप्रथम होता है और वह पहले ही परिपक्व भी हो जाता है। इसके अलावा जिन अंगों की एक ही समय में वृद्धि होती है, उनमें भी पृथक्-पृथक् दर से वृद्धि होती है। यही कारण है कि बालक और प्रौढ़ की आँखों के आकार में कोई विशेष अन्तर नहीं होता है, जबकि हाथ-पैर आदि अंगों में काफी अन्तर होता है।

5. लिंग-भेद का प्रभाव- शारीरिक विकास की गति और स्वरूप पर लिंग-भेद का काफी प्रभाव पड़ता है। इसलिए लड़के और लड़कियों का शारीरिक विकास भिन्न-भिन्न रूप में होता है। किशोरावस्था में लड़कों की तुलना में लड़कियों का शारीरिक विकास अधिक तीव्रता से होता है।

6. शारीरिक विकास का बालक के व्यवहार पर प्रभाव- शारीरिक विकास का बालक के व्यवहार पर भी प्रभाव पड़ता है। यदि बालक हृष्ट-पुष्ट होता है तो बड़े होने पर उसमें नेतृत्व करने तथा दूसरों पर अपना प्रभुत्व जमाने की प्रवृत्ति आ जाती है। उसमें अभिमान की भावना आ जाती है और वह सबसे अकड़ कर बोलने लगता है। इसके विपरीत दुर्बल शरीर का बालक डरपोक बन जाता है और उसमें अन्य बालकों से दबकर रहने की प्रवृत्ति आ जाती है।

प्रश्न 2
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
या
बालकों के शारीरिक विकास पर किन-किन कारकों का प्रभाव पड़ता है? किन्हीं दो कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक हैं? इन कारकों का ज्ञान एक बाल-मनोवैज्ञानिक के लिए किस प्रकार लाभदायक है।
या
बाल्यावस्था में शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Physical Development)

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है|

1. वंशानुक्रम- स्वस्थ माता-पिता की सन्तान भी स्वस्थ होती है। जो माता-पिता विभिन्न रोगों से ग्रस्त होते हैं और शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होते हैं, उनके बच्चे भी शारीरिक दृष्टि से दुर्बल ही होते हैं। अत: उनका शारीरिक विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

2. वातावरण- बालक के शारीरिक विकास में वातावरण का विशेष योगदान रहता है। खुली हवां, पर्याप्त धूप और शान्त तथा स्वच्छ वातावरण शारीरिक विकास के लिए पूर्णतया अनुकूल होता है। इसके विपरीत जो बालक प्रकाशहीन, सीलन भरे तथा तंग मकानों में रहते हैं, उनका शारीरिक विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता और वे प्रायः विभिन्न रोगों से ग्रस्त रहते हैं। क्रो एवं क्रो के अनुसार, बालक के प्राकृतिक विकास में वातावरण के तत्त्व सहायक या बाधक होते हैं।”

3. पौष्टिक भोजन- पौष्टिक भोजन का भी शारीरिक विकास पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पौष्टिक भोजन से बालक के विभिन्न अंगों का उचित विकास होता है। प्रत्येक बालक का वजन, ऊचाई तथा शारीरिक शक्ति बहुत कुछ पौष्टिक भोजन पर निर्भर करते हैं। जिन बालकों को पौष्टिक भोजन मिलता है, उनका विकास भी समुचित होता रहता है। पौष्टिक भोजन के अभाव में बालक के विभिन्न अंगों का समुचित विकास नहीं होता और अनेक रोग आक्रमण कर देते हैं।

4. नियमित दिनचर्या- यमित दिनचर्या शारीरिक विकास का प्रमुख तत्त्व है। जो बालक समय से सोते-उठते हैं, समय से भोजन करते एवं खेलते हैं, उनका शारीरिक विकास अन्य बालकों की अपेक्षा उत्तम ढंग से होता है। नियमित दिनचर्या स्वास्थ्य की आधारशिला है।

5. व्यायाम और खेलकूद- व्यायाम और खेलकूद शारीरिक विकास के लिए परम आवश्यक हैं। व्यायाम और खेलकूद से शरीर के रक्त का परिभ्रमण उचित ढंग से होता है तथा मांसपेशियों में दृढ़ता आती है।

6. निद्रा और विश्राम- शरीर के समुचित विकास के लिए निद्रा और विश्राम का सर्वाधिक महत्त्व है। शैशवकाल में शिशु का अधिकांश समय सोने में ही व्यतीत होता है। बालक और किशोरों को भी निद्रा के लिए
पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। आवश्यकता से अधिक देर तक पढ़ना, बालकों और किशोरों के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है। विभिन्न शोध कार्यों से ज्ञात हुआ है कि यह उनके शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है।

7. सुरक्षा की भावना- यदि बालक में सुरक्षा की भावना नहीं है तो उसका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं होगा। सुरक्षा की भावना के अभाव में बालक भय और चिन्ता से ग्रस्त हो जाता है। इस प्रकार उसमें आत्मविश्वास की भावना लुप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप उसका विकास स्वाभाविक ढंग से नहीं हो पाता।

8. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार- बालक की मन:स्थिति का उसके स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जिन बालकों को ताड़ना और उपेक्षापूर्ण व्यवहार मिलता है, उनका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता। अनाथ बालक इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। शिक्षक को यह बात ध्यान में रखकर बालकों के साथ यथासम्भव प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए।

9. दोषपूर्ण सामाजिक परम्पराएँ- अल्प आयु में बालकों और बालिकाओं का विवाह हो जाना शारीरिक विकास के लिए घातक है। जिन बालक-बालिकाओं का विवाह 13 या 15 वर्ष की आयु में हो जाता है, उनका स्वास्थ्य तीव्रता से नष्ट होने लगता है।

10. अन्य कारक- शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कुछ अन्य कारक इस प्रकार हैं।

  1. कोई दुर्घटना या आकस्मिक बीमारी।
  2. दूषित और अस्वस्थ जलवायु।
  3. बालकों में हस्तमैथुन जैसे कुटेवों का विकसित होना।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि बालक के शारीरिक विकास को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। इन कारकों में से किसी एक या अधिक कारकों की अवहेलना हो जाने अथवा उनमें असामान्यता ओ जाने की स्थिति में बालक के शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। शारीरिक विकास का घनिष्ठ सम्बन्ध बालक के विकास के अन्य सभी पक्षों से भी होता है; अत: शारीरिक विकास के अवरुद्ध हो जाने अथवा असामान्य हो जाने की दशा में बालक के सम्पूर्ण विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले सभी कारकों का ज्ञान बाल-मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक एवं लाभकारी है। बाल-मनोवैज्ञानिक इन कारकों को सामान्य रखकर बालक के सम्पूर्ण विकास को सुचारु बना सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में शारीरिक विकास
(Physical Development in Infancy)

विकास की प्रथम अवस्था को शैशवावस्था कहते हैं। शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का विवरण निम्नवर्णित है-

1. शिशु का भार- गर्भ से बाहर आने के पश्चात् शिशु का भार 6.5 पौण्ड से 8 पौण्ड तक का होता है। बालक 9 से 9.5 पौण्ड तक के भी उत्पन्न हुए हैं। बालिकाओं का भार बालकों से कम होता है। प्रथम 5 वर्ष में बालक का विकास जिस तीव्रता से होता है, उस अनुपात में फिर नहीं होता। प्रथम 6 माह में बालक को भार दुगुना और वर्ष भर में तीन-गुना हो जाता है। पाँचवें वर्ष के अन्त में शिशु का भार 38 एवं 43 पौण्ड के बीच में हो जाता है।

2. शिशु की लम्बाई- जन्म के समय शिशु की लम्बाई 20 इंच के लगभग होती है। लड़कों की लम्बाई लड़कियों से अधिक होती है, परन्तु बाद में लड़कियों की लम्बाई लड़कों से अधिक हो जाती है। प्रथम दो वर्ष में शिशु की लम्बाई 10 इंच और दूसरे वर्ष में 4 या 5 इंच बढ़ती है। तीसरे से पाँचवें वर्ष तक बालक की लम्बाई बढ़ने की गति पूर्व की अपेक्षा कम रहती है।

3. सिर और मस्तिष्क- नवजात शिशु के सिर की लम्बाई उसके शरीर की सम्पूर्ण लम्बाई की 1/4 होती है। प्रथम दो वर्षों में सिर अत्यन्त तीव्रता से विकसित होता है और बाद में विकास की गति मन्द हो जाती है। जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का भार 350 ग्राम होता है। मस्तिष्क का भार दो वर्ष में दुगुना और पाँच वर्ष में लगभग 1000 ग्राम हो जाता है।

4. मांसपेशियाँ- जन्म के समय शिशु की मांसपेशियों का भार सम्पूर्ण शरीर के कुल भार का 23.4 प्रतिशत होता है। इस भार का विकास धीरे-धीरे होता है। भुजाएँ दो वर्ष में प्राय: दो-गुनी तथा अंगों का विकास डेढ़-गुना हो जाता है।

5. अस्थियाँ- नवजात शिशु की अस्थियाँ कोमल तथा लचीली होती हैं। पर्याप्त काल तक खोपड़ी की विभिन्न अस्थियाँ ठीक प्रकार से नहीं जुड़ पातीं। एक वर्ष के अन्त में ऊपर की अस्थियों को छोड़कर शेष अस्थियाँ जुड़ जाती हैं। दूसरे वर्ष ऊपर की अस्थियाँ भी जुड़ जाती हैं। एक नवजात शिशु की अस्थियों की संख्या कुल मिलाकर 212 के लगभग होती है। कैल्सियम, फॉस्फेट की सहायता से अस्थियों में दिन-प्रतिदिन कड़ापन आता जाता है। यह प्रक्रिया अस्थीकरण कहलाती है। बालकों की अपेक्षा बालिकाओं का अस्थीकरण तीव्रता से होता है।

6. दाँत- लगभग 6 से 8 माह के पश्चात् शिशु के दूध के दाँत चमकते हैं। कमजोर शिशु के दाँत देर से निकलते हैं। प्रारम्भ में नीचे के अगले दाँत निकलते हैं। जो वर्ष में 8 के लगभग हो जाते हैं। चार वर्ष की आयु में बालक के समस्त दाँत निकल आते हैं।

7. अन्य अंगों का विकास- प्रथम माह में नवजात शिशु के हृदय की धड़कन एक मिनट में 140 बार होती है। जैसे-जैसे हृदय बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे हृदय की धड़कन में स्थिरता आती जाती है। 6 वर्ष तक शिशु के शरीर के ऊपरी भाग का पर्याप्त विकास हो जाता है। शिशुओं के यौनांगों का विकास धीमी गति से होता है। तीन वर्ष के पश्चात् शिशु के शरीर और मस्तिष्क में सन्तुलन प्रारम्भ हो जाता है। मस्तिष्क का शरीर के अंगों पर नियन्त्रण स्थापित हो जाता है। हाथों और पैरों में दृढ़ता आ जाती है। पाँच वर्ष के अन्त तक बालक पर्याप्त आत्म-निर्भर हो जाता है और वह कुशलता तथा स्वतन्त्रता से कार्य करना प्रारम्भ कर देता है।

प्रश्न 2.
बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास
(Physical Development in Childhood)

शैशवावस्था के उपरान्त प्रारम्भ होने वाली अवस्था को बाल्यावस्था कहते हैं। बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण निम्नलिखित है|

1. भार- इस अवस्था में बालक का भार पर्याप्त तीव्रता से बढ़ता है। 12 वर्ष के अन्त तक बालक का भार 80 और 95 पौण्ड के मध्य होता है। 10 वर्ष तक बालकों का भार अधिक बढ़ता है। तत्पश्चात् बालिकाओं के भार में वृद्धि होती है, क्योंकि उनकी किशोरावस्था जल्दी आती है।

2. लम्बाई- बाल्यावस्था में लम्बाई अधिक तीव्रता से नहीं बढ़ती। 6 से 12 वर्ष के बालक की लम्बाई 3 या 4 इंच तक ही बढ़ती है।

3. अस्थियाँ- इस अवस्था में अस्थियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। बाल्यावस्था में अस्थीकरण तीव्रता से होता है तथा बालक की अस्थियों में पर्याप्त दृढ़ता आ जाती है। बालिकाओं का अस्थीकरण दो वर्ष पूर्व हो जाता है।

4. सिर और मस्तिष्क- इस अवस्था में सिर के आकार में पर्याप्त अन्तर आ जाता है। 5 वर्ष के बालक का सिर 90 प्रतिशत प्रौढ़ के आकार का हो जाता है तथा 10 वर्ष की आयु में 95 प्रतिशत होता है। इस अवस्था में मस्तिष्क का भी पर्याप्त विकास हो जाता है।

5. मांसपेशियाँ- बाल्यावस्था में मांसपेशियों का विकास धीरे-धीरे होता है। 8 वर्ष के बालक की मांसपेशियों का भार शरीर के कुल भार का 27 प्रतिशत हो जाता है। बाल्यावस्था में बालिकाओं की मांसपेशियों में बालक की अपेक्षा अधिक वृद्धि होती है।

6. अन्य अंगों का विकास- इस अवस्था में हृदय की धड़कन निरन्तर कम होती जाती है। 6 वर्ष के बालक के हृदय की धड़कन एक मिनट में 100 बार होती है, जब कि 12 वर्ष में यह घटकर 85 रह जाती है। बालकों के कन्धे पर्याप्त चौड़े हो जाते हैं तथा कूल्हे पतले हो जाते हैं और पैरों में सीधापन व लम्बापन आ जाता है। इसके विपरीत बालिकाओं के कन्धे पतले और कूल्हे चौड़े हो जाते हैं। पैर अन्दर की तरफ झुके होते हैं।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बालक अथवा बालिकाओं में किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में शारीरिक विकास
(Physical Development in Adolescence)

किशोरावस्था में अनेक क्रान्तिकारी शारीरिक परिवर्तन होते हैं। इनमें मुख्य परिवर्तन निम्नलिखित होते हैं-

1. भार- किशोर बालक का भार बालिकाओं की अपेक्षा अधिक तीव्रता से बढ़ता है। 18 वर्ष तक बालकों का भार बालिकाओं से लगभग 25 पौण्ड अधिक हो जाता है।

2. लम्बाई- इस अवस्था में बालकों तथा बालिकाओं की लम्बाई तीव्रता से बढ़ती है, परन्तु यौवन में प्रवेश करते-करते लड़कों की ऊँचाई लड़कियों से 3 से 4 इंच अधिक होती है। बालिकाओं की ऊँचाई 16 वर्ष की अवस्था में अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है।

3. अस्थियाँ- बाल्यावस्था में अस्थियों में जो लचीलापन होता है, वह समाप्त हो जाता है और उनमें दृढ़ता आ जाती है। दूसरे शब्दों में, अस्थीकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। बालिकाओं को अस्थीकरण बालकों से दो वर्ष पूर्व हो जाता है।

4. सिर और मस्तिष्क- इस अवस्था में भी सिर और मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। 16 वर्ष की आयु तक सिर का विकास. पूर्ण हो जाता है। मस्तिष्क का भार 1200 से 1400 ग्राम के मध्य में होता है। मस्तिष्क में पर्याप्त परिपक्वती आ जाती है।

5. मांसपेशियाँ- किशोरावस्था में मांसपेशियों का विकास तीव्र गति से होता है। 16 वर्ष की आयु में मांसपेशियों का भार कुल शरीर के भार का लगभग 44 प्रतिशत हो जाता है।

6. दाँत- किशोरावस्था में बालकों और बालिकाओं के लगभग समस्त स्थायी दाँत निकल आते हैं।

7. अन्य अंगों का विकास- हृदय की धड़कन में पूर्व की अपेक्षा पर्याप्त मन्दी आ जाती है। प्रौढ़ अवस्था में प्रवेश करते समय किशोर की धड़कन एक मिनट में 72 बार होती है। बालकों की मुखाकृति में पर्याप्त परिवर्तन हो जाता है। बालकों की आवाज भारी होने लगती है, परन्तु बालिकाओं की आवाज में कोमलता रहती है। लड़कों के कन्धे पर्याप्त चौड़े हो जाते हैं। बालिकाओं के कूल्हों की चौड़ाई बढ़ जाती है। बालकों के दाढ़ी-मूंछ निकल आती है। गुप्तांगों में पर्याप्त वृद्धि होती है। किशोरों में स्वप्नदोष और बालिकाओं में मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है। उनके स्तनों का पर्याप्त विकास हो जाता है तथा बगल और गुप्तांग पर बाल उगने आरम्भ हो जाते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा के स्वरूप का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बालक के सुचारु शारीरिक विकास के लिए बालक की शिक्षा के उचित स्वरूप को अपनाना चाहिए। बालक की शिक्षा में खेल एवं व्यायाम का समुचित समावेश होना चाहिए। सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा की व्यवस्था व्यक्तिगत शारीरिक गुणों को ध्यान में रखकर ही की जानी चाहिए। शारीरिक रूप से दुर्बल अथवा विकलांग बालकों की शिक्षा की व्यवस्था अलग से की जानी चाहिए। सुचारु शारीरिक विकास के लिए बच्चों के उचित पोषण का भी ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों एवं अभिभावकों को परस्पर सहयोग से काम करना चाहिए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों के स्वास्थ्य एवं आदतों का भी ध्यान रखें। समय-समय पर विद्यालय में छात्रों के स्वास्थ्य का परीक्षण होना चाहिए।

प्रश्न 2
शारीरिक विकास पर आहार एवं पोषण का क्या प्रभाव पइता है?
उत्तर:
बालक के शारीरिक विकास पर आहार एवं पोषण का विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि बालक को पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध होता रहता है तो उसका शारीरिक विकास सुचारु रूप में होता है। वास्तव में सन्तुलित आहार उपलब्ध होने की दशा में बालक विभिन्न अभावजनित रोगों का शिकार नहीं होता तथा उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। यही नहीं सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करने से बालक की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में भी उल्लेखनीय विकास होता है तथा परिणामस्वरूप बालक स्वस्थ रहता है। अच्छे स्वास्थ्य वाले बालक का शारीरिक विकास सामान्य होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सन्तुलित आहार उपलब्ध न होने की दशा में बालक का शारीरिक विकास प्रायः अवरुद्ध हो जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालक के शारीरिक विकास से क्या आशय है?
उत्तर:
बालक के शरीर के समस्त अंगों की वृद्धि तथा उनकी परिपक्वता एवं क्रियाशीलता में क्रमशः होने वाले परिवर्तन को शारीरिक विकास के रूप में जाना जाता है।

प्रश्न 2
बालक के विकास के विभिन्न पक्षों में से शारीरिक विकास को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
उत्तर:
बालक के विकास के विभिन्न पक्ष किसी-न-किसी रूप में शारीरिक विकास पर ही निर्भर करते हैं। अत: शारीरिक विकास को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 3
जीवन के किस काल में शारीरिक विकास की दर सर्वाधिक होती है?
उत्तर:
जन्म के उपरान्त शैशवकाल में शारीरिक विकास की दर सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 4
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं-

  1. वंशानुक्रम
  2. वातावरण
  3. पौष्टिक भोजन
  4. नियमित दिनचर्या
  5. निद्रा और विश्राम तथा
  6. सुरक्षा की भावना

प्रश्न 5
सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा में किन गतिविधियों का समावेश होना आवश्यक है?
उत्तर:
सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा में खेल एवं व्यायाम जैसी गतिविधियों का समावेश होना आवश्यक है।

प्रश्न 6
दुर्बल स्वास्थ्य एवं विकलांगता का शारीरिक विकास पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
दुर्बल स्वास्थ्य एवं विकलांगता का शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रश्न? निम्नलिखित कथन सत्य हैं अथवा असत्य

  1. शरीर के अंगों में आने वाली परिपक्वता शारीरिक विकास को दर्शाती है।
  2. शारीरिक विकास का विकास के अन्य पक्षों से कोई सम्बन्ध नहीं है।
  3. बालक के शारीरिक विकास में आनुवंशिकता का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।
  4. परिवार का सामाजिक-आर्थिक स्तर भी बालक के शारीरिक विकास को प्रभावित करता है।
  5. सुचारु शारीरिक विकास की दशा में बालक की शैक्षिक गतिविधियाँ सामान्य होती हैं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
बालक के शरीर के अंगों की वृद्धि एवं परिपक्वता तथा क्रियाशीलता में होने वाले परिवर्तनों को सम्मिलित रूप में कहते हैं
(क) सामान्य विकास
(ख) शारीरिक विकास
(ग) गामक विकास
(घ) सम्पूर्ण विकास

प्रश्न 2.
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाला एक मुख्य कारक है
(क) पोषण एवं स्वास्थ्य
(ख) फैशन
(ग) मनोरंजन
(घ) व्यवसाय

प्रश्न 3.
विकास के अन्य पक्षों की तुलना में शारीरिक विकास को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है
(क) इससे व्यक्तित्व में निखार आता है
(ख) इससे व्यक्ति बलवान बनता है
(ग) इसका अच्छा प्रभाव विकास के अन्य पक्षों पर पड़ता है
(घ) इसका कोई अतिरिक्त महत्त्व नहीं है

प्रश्न 4.
बालक के शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कारक हैं
(क) सन्तुलित आहार एवं पोषण
(ख) खेल एवं व्यायाम
(ग) रोग एवं दुर्बल स्वास्थ्य
(घ) नियमित दिनचर्या

प्रश्न 5.
सामान्य शारीरिक विकास के लिए बालक की शिक्षा में समावेश होना चाहिए
(क) नियमित मनोरंजन का
(ख) खेल एवं व्यायाम का
(ग) प्रतिस्पर्धा का
(घ) संघर्ष का

उत्तर:

  1. (ख) शारीरिक विकास
  2. (क) पोषण एवं स्वास्थ्य
  3. (ग) इसका अच्छा प्रभाव विकास के अन्य पक्षों पर पड़ता है
  4. (ग) रोग एवं दुर्बल स्वास्थ्य
  5. (ख) खेल एवं व्यायाम का

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method (डाल्टन पद्धति) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method (डाल्टन पद्धति).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 14
Chapter Name Dalton Method (डाल्टन पद्धति)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method (डाल्टन पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की डाल्टन पद्धति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या
डाल्टन शिक्षण पद्धति के क्या सिद्धान्त हैं ?
उतर:

हाल्टन पद्धति का अर्थ
(Meaning of Dalton Method)

शिक्षा की आधुनिक पद्धतियों में डाल्टन पद्धति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा की इस नयी पद्धति को अमेरिका की मिस हैलन पार्कहर्ट ने जन्म दिया है। इस पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिका के डाल्टन नगर में हुआ था, इसलिए इस पद्धति को डाल्टन पद्धति के नाम से जाना जाता है। इस पद्धति का पहला विद्यालय सन् 1920 में स्थापित हुआ। मिस पार्कहर्स्ट को डॉ० मॉण्टेसरी के साथ कुछ समय तक कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ था, जिसके कारण विचारों में कुछ समानता होने के कारण मॉण्टेसरी और डाल्टन पद्धति में भी कुछ समानता पाई जाती है। मॉण्टेसरी पद्धति के समान ही डाल्टन पद्धति भी बच्चों में पाई जाने वाली व्यक्तिगत विभिन्नता पर विशेष बल देती है। 11 और 12 वर्ष की आयु के बालकों के लिए डाल्टन पद्धति बड़ी उपयोगी और सफल मानी जाती है।

इस पद्धति को ‘प्रयोगशाला पद्धति” भी कहा जाता है। इस पद्धति के द्वारा शिक्षा देने वाले विद्यालयों में प्रत्येक विषय की प्रयोगशालाएँ होती हैं। इनमें अनेक विषयों के अध्यापक रहते हैं और बालकों के ऊपर समय का कोई बन्धन नहीं होता। बालकों की रुचि और इच्छाओं को ध्यान में रखकर बालकों को एक सप्ताह या एक महीने का कार्य करने को दिया जाता है। जब बालक अपना काम पूरा कर लेता है तो उसे आगे काम मिल जाता है। इस प्रकार इस पद्धति में कला-शिक्षण और व्यक्तिगत शिक्षण का प्रबन्ध होता है। और बालक की स्वतन्त्रता का भी ध्यान रखा जाता है।

इस प्रकार “डाल्टन का तात्पर्य उस पद्धति से है जिसमें बालकों को उनकी रुचियों और इच्छाओं के अनुकूल कार्यों को, सुविधायुक्त प्रयोगशालाओं में दिए गए समय में पूरा करते हुए, अपने व्यक्तित्व का उत्तरदायित्वपूर्ण समुचित विकास करने का अवसर प्राप्त होता है।” डाल्टन पद्धति की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. मिस हैलन पार्कहर्ट के अनुसार, “डाल्टन पद्धति एक यान्त्रिक व्यवस्था है जिसमें कि वैयक्तिक कार्य के सिद्धान्त को व्यवहार में लाया जाता है। यह शिक्षालयों का सरल एवं आर्थिक पुनसँगठन है, जहाँ शिक्षक एवं शिक्षार्थी को अधिक उपयोगी एवं समय से कार्य करने के लिए अवसर प्राप्त होते हैं।”
  2. ग्रेव्ज (Graves) के अनुसार, “डाल्टन पद्धति में एक ऐसी ‘निर्दिष्ट कार्य व्यवस्था निहित है जिसमें कि बालक एक दिए गए समय में कार्य को पूरा करने को स्वीकार करता है और जिसमें उस कार्य को पूरा । करने के साधन एवं भागों के चयन करने का कार्य उसी पर छोड़ दिया जाता है।”

डाल्टन पद्धति के उद्देश्य
(Aims of Dalton Method)

मिस हैलन पार्कहर्ट ने डाल्टन पद्धति के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “इस योजना का उद्देश्य बालकों को साधारण कक्षा में मिलने वाली जीवन की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों में रखकर एक नए प्रकार के शैक्षिक समाज को जन्म देना तथा विद्यालय के सामाजिक जीवन का पुनर्सगठन करना

डाल्टन पद्धति के सिद्धान्त
(Principles of Dalton Method)

डाल्टन पद्धति के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं–

1. बाल-केन्द्रित शिक्षा-मनोवैज्ञानिक विचारधारा के प्रवेश से पूर्व शिक्षा में बालक का कोई स्थान नहीं था और शिक्षा देते समय बालक की व्यक्तिगत विभिन्नता पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। मिस हैलेन ने इस परिपाटी को बदल दिया। उन्होंने अपनी शिक्षा पद्धति में बालक डाल्टन पद्धति के सिद्धान्त को प्रधान बनाया। शिक्षक को उसकी शिक्षा में सहायता देने वाला एक सहायक समझा गया जो बालक का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके बालक को उसकी योग्यता के अनुसार उसे सीखने के लिए आवश्यक सामग्री जुटाता है। मिस पार्कहर्स्ट के शब्दों में, “फलस्वरूप उसका पूर्ण स्वतन्त्रता विकास प्राकृतिक संगति से होता है और प्रयास से प्राप्त की जाने वाली शिक्षक पथ-प्रदर्शक के रूप में योग्यता वास्तविक एवं सुदृढ़ होती है।”

2. स्वशिक्षा का सिद्धान्त-कक्षा शिक्षण में बालक को यह स्वतन्त्रता नहीं होती कि वह जितनी देर चाहे एक विषय का अध्ययन में व्यक्तिगत करे, लेकिन डाल्टन पद्धति में स्वशिक्षा के सिद्धान्त की पूर्ति होती है। विशेष परीक्षा की व्यवस्था इसके अनुसार बालक जितनी देर तक चाहे एक विषय का अध्ययन कर सकता है। वह अपनी शिक्षा के लिए किसी पर पूर्णरूप से आश्रित नहीं होता। स्वाध्याय के लिए बालक को सुविधाएँ दे दी जाती हैं। प्रयोगशालाओं में सब प्रकार की सामग्री तथा पुस्तकें उपस्थित रहती हैं। वह स्वयं अध्ययन करती है। इस प्रकार प्राप्त किया हुआ ज्ञान स्थायी होता है। इससे बालक में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के गुण का विकास होता है।

3. पूर्ण स्वतन्त्रता-इस पद्धति में बालकों को अपनी रुचि, योग्यता तथा गति के अनुसार कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। वह समय के बन्धन से मुक्त रहता है। इस पद्धति में इस बात की सुविधा है कि यदि किसी तीव्र बुद्धि वाले बालक ने अपना कार्य शीघ्र ही समाप्त कर लिया है तो उसे दूसरा कार्य प्रदान कर दिया जाता है। इसके विपरीत मन्दबुद्धि के बालकों को अधिक समय दिया जाता है। जब बालक काम में लगा रहता है तो अनुशासन की समस्या नहीं रहती।

4. शिक्षक पथ-प्रदर्शक के रूप में इसके अन्तर्गत यद्यपि प्रयोगशालाओं में विभिन्न विषयों के शिक्षक रहते हैं, लेकिन वे बालकों के कार्य तथा अध्ययन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करते। उनका कार्य बालक का पथ-प्रदर्शन करना होता है। शिक्षक बालक को उसके कार्य से सम्बन्धित निर्देश दे देता है। वह बालकों को यह बता देता है कि उसे किन-किन पुस्तकों की सहायता लेनी चाहिए तथा किस प्रकार से काम करना चाहिए। शिक्षक बालक की कठिनाइयों को दूर करता है। बालकों के कार्य करते समय शिक्षक बालकों का निरीक्षण करता है और पास आने पर पथ-प्रदर्शन करता है।

5. सामूहिक शिक्षा- यद्यपि इस शिक्षा पद्धति में व्यक्तिगत शिक्षा पर बल दिया गया है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इसमें बालकों के सामाजिक पक्ष की अवहेलना की जाती है। दिन में कम-से-कम दो बार सभी बालक एक जगह एकत्र होकर पारस्परिक वाद-विवाद, परामर्श, वार्ता आदि करके विचारों और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त स्वतन्त्र रूप से कार्य करते समय भी आवश्यकता पड़ने पर वे दूसरों की सम्मति ले सकते हैं। इस प्रकार बालकों को सहयोग से काम करने का अवसर मिल जाता है और उनमें सहकारिता तथा सामाजिकता की भावना का विकास होता है।

6. मनोवैज्ञानिकता- इस पद्धति में बालक सर्वप्रथम अपने सारे कार्य पर दृष्टिपात करता है। फिर वह उसको करने के लिए प्रत्येक दृष्टिकोण से प्रयत्नशील होता है। वह अपनी गलती स्वयं पकड़ता है और उसे सुधारने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार से उसका दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक हो जाता है।

7. व्यक्तिगत विभिन्नता पर ध्यान-इस पद्धति में बालक की व्यक्तिगत योग्यता की अवहेलना नहीं की जाती, बल्कि उनकी व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखकर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया जाता है। बालक अपनी योग्यता के अनुसार अपने कार्य का चुनाव करता है और अपनी गति से कार्य को करता है। मन्दबुद्धि के बालक को सामूहिक खिंचाव में विवश होकर नहीं बहना पड़ता। इसी प्रकार से कुशाग्र बुद्धि वाले बालक आगे बढ़ जाते हैं। उन्हें कमजोर बालकों के साथ घिसटने की आवश्यकता नहीं रहती। .

8. विशेष परीक्षा की व्यवस्था- आजकल की दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली से यह पद्धति मुक्त है। इस पद्धति में साधारण परीक्षा प्रविधि को नहीं अपनाया गया है। इसमें बालक के कार्य का प्रतिदिन मूल्यांकन किया जाता है। यदि कोई बालक निश्चित समय में अपना कार्य पूरा नहीं कर सकता तो वह दूसरा कार्य नहीं ले सकता। शिक्षक प्रतिदिन के कार्य का निरीक्षण करता है और उसी की प्रकृति के आधार पर बालक को अगली कक्षा में भेजता है। पुस्तकीय ज्ञान के अतिरिक्त बालक के व्यावहारिक ज्ञान को भी महत्त्व दिया जाता है।

प्रश्न 2.
शिक्षा की डाल्टन पद्धति की शिक्षण-विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उतर:

डाल्टन पद्धति की शिक्षण विधि
(Teaching Technique of Dalton Method)

डाल्टन पद्धति की शिक्षण विधि को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है

1. पाठ का ठेका- जिस प्रकार एक ठेकेदार किसी काम को निश्चित अवधि में पूरा करता है, उसी प्रकार इस पद्धति में बालक भी निर्दिष्ट कार्य को करने का ठेका लेता है। वर्ष के प्रारम्भ में ही शिक्षक सम्पूर्ण सत्र के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर लेता है, जिससे विद्यार्थी इस डाल्टन पद्धति की शिक्षण विधि | बात से परिचित हो जाता है कि वर्ष भर में उसे कितना काम करना है। उनका सम्पूर्ण सत्र के लिए निर्धारित पाठों को बारह भागों में विभाजित कर , निर्दिष्ट पत्र दिया जाता है और उस काम को निश्चित अवधि में पूरा करने का कार्य इकाई उत्तरदायित्व बालक का होता है। इस प्रकार बालक किसी भी काम को . प्रयोगशालाएँ ठेके के रूप में स्वीकार करता है। बालक इस ठेके को पूरा करने में स्वतन्त्र होता है। वह अपनी सुविधा के अनुसार समय के अन्दर काम को पूरा करता है।

2. निर्दिष्ट पाठ- कार्य की सुविधा के लिए शिक्षक मासिक कार्य को साप्ताहिक कार्य में बाँट देता है। शिक्षक यह निश्चित कर देता है कि किस सप्ताह में बालक को मासिक कार्य का कितना काम करना है। इस प्रकार का विभाजन बालक की योग्यता को ध्यान में रखकर किया जाता है। शिक्षक यह विभाजन बड़ी योग्यता से करता है, जिससे कार्य न तो बिल्कुल आसान होता है। और न ही काफी कठिन। इस प्रकार शिक्षक बालक के महीनेभर के कार्य को चार भागों में विभाजित कर देता है और बालक पर निर्दिष्ट कार्य को एक सप्ताह में पूरा करने का उत्तरदायित्व रहता है। इस प्रकार एक सप्ताह के कार्य को निर्दिष्ट पाठ कहा जाता है और निर्दिष्ट पाठों के सम्मिलित रूप को वह ठेका कहता है।

3. कार्य इकाई- कार्य की दृष्टि से प्रत्येक पाठ के पाँच भाग किए जाते हैं और प्रत्येक भाग को इकाई कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक निर्दिष्ट पाठ में पाँच और महीने के ठेके में बीस इकाइयाँ होती हैं। इस प्रकार एक दिन के कार्य को इकाई कहते हैं, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक बालक प्रतिदिन प्रत्येक विषय की इकाई को पूरा कर ले। उसे अपनी गति के अनुसार कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता होती है। यदि कोई बालक अपने सभी विषयों के कार्य को एक महीने से पहले कर लेता है तो उसे अगले माह का ठेका दे दिया जाता है। शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक बालक अपने ठेके के अनुसार अपने एक महीने के कार्य को उसी महीने में यथासम्भव पूरा कर दे।

4. प्रयोगशालाएँ- डाल्टन पद्धति में कक्षाओं सम्बन्धी प्रयोगशाला में उस विषय से सम्बन्धित पुस्तकें व चित्र इत्यादि होते हैं। इसके अलावा प्रत्येक प्रयोगशाला में प्रत्येक कक्षा के बालकों के लिए स्थान निश्चित होते हैं। इससे कक्षा-प्रबन्ध में सुविधा रहती है। इस प्रकार बालक निर्दिष्ट कार्य की इकाई के अनुसार विभिन्न प्रयोगशालाओं में जाकर अध्ययन कार्य करता है। जिस बालक को जिस विषय से सम्बन्धित कठिनाई दूर करनी होती है, वह उसी प्रयोगशाला में चला जाता है।

5. सम्मेलन तथा विमर्श सभा- सम्मेलन तथा विमर्श सभा डाल्टन पद्धति के अंग हैं। ठेके के अनुसार कार्य में जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं उन्हें दूर करने के लिए कक्षा की विमर्श सभाएँ होती हैं, जो प्रात:काल होती हैं। उसमें शिक्षक बालकों को आवश्यक सूचनाएँ देता है। दूसरी सभा शाम को होती है, जिसमें विद्यार्थी – अपने अनुभवों का वर्णन सुनाता है। इस प्रकार प्रात:काल शिक्षक निर्देश देता है और विद्यार्थी अपने अनुभव सुनाता है। सम्मेलन और विमर्श सभा विद्यार्थियों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होते हैं।

6. प्रगतिसूचक रेखाचित्र- विद्यार्थी अपना कार्य ठीक प्रकार से कर रहे हैं या नहीं, यह जानने के लिए प्रगतिसूचक रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है। ये रेखाचित्रयाग्राफ तीन प्रकार के होते हैं

  • प्रत्येक बालक अपने पास एक रेखाचित्र रखता है, जिसमें वह प्रत्येक विषय में जितना कार्य करता है, उसे अंकित कर देता है। इससे बालक को यह पता चलता है कि उसने कितनी इकाइयाँ पूरी कर ली हैं।
  • दूसरा रेखाचित्र शिक्षक के पास रहता है, जिसमें विषय विशेषज्ञ बालक की अपने विषय में की गई प्रगति को अंकित करता है। इससे शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को पता रहता है कि उनके कार्य की क्या स्थिति
  • तीसरा रेखाचित्र सम्पूर्ण कक्षा का होता है। इसमें कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी सम्पूर्ण विषयों में कितना कार्य करते हैं, उसे अंकित कर दिया जाता है। इस आधार पर यह ज्ञात किया जा सकता है कि किस विद्यार्थी का कार्य कैसा है।

यह ग्राफ मार्गदर्शन के कार्य में शिक्षक की बड़ी सहायता करता है। इसके द्वारा विद्यार्थियों के कार्य की तुलना की जा सकती है। जिस विषय में बालक कमजोर होता है, उस विषय का शिक्षक बालक पर विशेष ध्यान देता है और उसे आगे बढ़ाने की चेष्टा करता है।

7. सामाजिक क्रियाएँ- मूल रूप से डाल्टन पद्धति में सामाजिक क्रियाओं को यथोचित स्थान दिया गया, लेकिन बाद में इनको कुछ कारणों से हटा देना पड़ा। फिर भी कुछ समर्थकों ने तीसरे प्रहर कुछ खेल, जिमनास्टिक व सामाजिक योजनाओं को स्थान दिया है।

प्रश्न 3.
शिक्षा की डाल्टन पद्धति के गुणों अथवा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
डाल्टन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

डाल्टन:पद्धति के गुण या विशेषताएँ
(Merits or Features of Dalton Method)

डाल्टन पद्धति में कुछ विशिष्ट गुण पाए जाते हैं, जिनका विवेचन निम्नलिखित है

1. योग्यतानुसार प्रगति का अवसर- इस पद्धति का प्रमुख गुण यह है कि इसमें प्रत्येक बालक को अपनी योग्यता, रुचि, शक्ति तथा गति के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने की स्वतन्त्रता होती है। किसी भी विद्यार्थी को दूसरे विद्यार्थियों की तीव्र गति होने के कारण न तो शीघ्रता से आगे बढ़ना पड़ता है और न ही मन्दबुद्धि सहपाठियों के कारण ठहरना पड़ता है।

2. कार्य की निरन्तरता- इस पद्धति के अनुसार ज्ञानार्जन का कार्य निरन्तर होता रहता है। उसका क्रम भंग नहीं होता। यदि विद्यार्थी किसी कारण से विद्यालय में उपस्थित नहीं रह पाता, तो वह अपनी कमी को व अपने पिछड़े कार्य को स्वयं प्रयत्न करके पूरा करता है। इसमें किसी विद्यार्थी का कार्य अन्य विद्यार्थियों पर निर्भर नहीं होता।

3. समय का सदुपयोग- चूंकि प्रत्येक बालक अपना कार्य समय से करता है, इसलिए इस पद्धति में समय का दुरुपयोग नहीं होता। इस पद्धति में विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

4. सभी विषयों का यथोचित अध्ययन- इस पद्धति में विद्यार्थियों को विषयों का चयन करने की पूर्ण । स्वतन्त्रता होती है। वह किसी विषय को जितना चाहे पढ़ सकता है। इससे बालक किसी भी विषय को गहन अध्ययन कर सकता है।

5. अपने स्रोतों से ज्ञान संचय करने का अवसर- इस पद्धति में बालकों को स्वयं शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी अपने पाठ स्वयं तैयार करते हैं और अन्य कार्य भी स्वतन्त्रतापूर्वक अकेले रहकर करते हैं। इसके लिए वे प्रयोगशालाओं में विभिन्न पुस्तकें और साधनों का अध्ययन करते हैं। इससे बालकों में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, स्वावलम्बन आदि गुणों का विकास होता है। इसके द्वारा बालक श्रम का महत्त्व समझने लगते हैं।

6. उत्तरदायित्व की शिक्षा- इस पद्धति में बालक पर ही अपने पाठ को पूरा करने का उत्तरदायित्व रहता है। वे अपने ठेके को पूरा करने के लिए विभिन्न विषयों एवं उपभागों को पढ़ते हैं और अपनी योग्यतानुसार आगे बढ़ते हैं। इसमें बालक को यह ज्ञात रहता है कि उसे क्या कार्य करना है। अपने उत्तरदायित्व को निभाने की उसे चिन्ता रहती है। इससे उसे उत्तरदायित्व के मूल्य का ज्ञान रहता है।

7. शिक्षक एवं विद्यार्थी का परस्पर सम्बन्ध- इस पद्धति में। शिक्षक और विद्यार्थियों को पारस्परिक सम्बन्ध बड़ा मधुर रहता है। में शिक्षक विद्यार्थियों के मित्र एवं पथ-प्रदर्शक के रूप में योग्यतानुसार प्रगति का अवसर उन्हें आवश्यक सहायता देते हैं। विद्यार्थी भी बिना किसी डर या। संकोच के शिक्षकों की आवश्यक सहायता लेते रहते हैं।

8. गृह-कार्य का अनिवार्य न होना इस पद्धति में गृह- कार्य को अनिवार्य नहीं बताया गया है। विद्यार्थी द्वारा सम्पूर्ण कार्य विद्यालय अध्ययन की प्रयोगशालाओं में पूरा करने का प्रयास किया जाता है। घर पर अपने स्रोतों से ज्ञान संचय करने अध्ययन करना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। 

9. स्वतन्त्र वातावरण- इस पद्धति में बालकों को पूर्णरूप से स्वतन्त्र वातावरण में पढ़ने का अवसर प्राप्त होता है। उन पर शिक्षक एवं विद्यार्थी का परस्पर टाइम-टेबिल व कक्षा का कोई बन्धन नहीं होता। बालक जिस कक्षा में सम्बन्ध चाहे प्रवेश कर सकता है। शिक्षक विद्यार्थियों पर विश्वास करके उन्हें गृह-कार्य का अनिवार्य न होना । बिना डराए-धमकाए पढ़ाने का प्रयास करते हैं।

10. अन्वेषण की प्रेरणा- इस पद्धति में बालक स्वयं अध्ययन करते हैं और स्वयं ही अपनी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं। इससे बालकों की अन्वेषण शक्ति का विकास होता है। वह शिक्षण में समन्वय अध्ययन के दौरान नई-नई बातों की खोज करने लगती है।

11. कक्षा शिक्षण एवं वैयक्तिकं शिक्षण में समन्वय- इस अवसर पद्धति में कक्षा शिक्षण और वैयक्तिक शिक्षण में समन्वय किया जा सकता है। बालक वैयक्तिक रूप से कार्य करके अपने ठेके को पूरा कक्षा शिक्षण और परीक्षा प्रणाली करते हैं, परन्तु ठेके पर विचार-विमर्श तथा उसके पूर्ण होने पर के दोषों से मुक्त उसका मूल्यांकन सामूहिक रूप से करते हैं। अतः उनका व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार का विकास होता है।

12. पारस्परिक सहायता देने का अवसरे- इस पद्धति में सम्मेलनों तथा विचार-विमर्श सभाओं को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है। इससे बालक एक-साथ बैठकर एक-दूसरे की समस्याओं का समाधान करते हैं और एक-दूसरे को उचित सुझाव देते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में बालकों को पारस्परिक सहायता देने का अवसर प्राप्त हो जाता है।

13. ग्राफ रिकॉर्डों का महत्त्व- इस पद्धति में ग्राफ रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था है, जिससे विद्यार्थी की प्रगति को मापा जाता है। इन रिकॉर्डों में बालकों के कार्यों एवं समय के सदुपयोग आदि का लेखा-जोखा रहता है। इन रिकॉर्डों के द्वारा विद्यार्थियों को प्रेरणा भी मिलती है।

14. कक्षा शिक्षण और परीक्षा प्रणाली के दोषों से मुक्त- यह पद्धति कक्षा शिक्षण के दोषों से मुक्त है, क्योंकि इसमें बालक की वैयक्तिक भिन्नता पर काफी ध्यान दिया जाता है। इस पद्धति में बालक के सिर पर परीक्षा का भूत भी सवार नहीं होता, क्योंकि इसमें परीक्षा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। वर्षभर का ठेका पूरा करने के बाद बालक को नई कक्षा में प्रवेश दिया जाता है।

15. अनुशासन की समस्या का समाधान कार्य करने के लिए पूर्णरूप से स्वतन्त्र होने और रुचिपूर्ण कार्य करने के कारण बालकों के मन की भावनाओं का दमन नहीं होता और वे अनुशासनहीनता उत्पन्न करने के लिए तनिक भी प्रेरित नहीं होते। इस पद्धति में बालक पर विश्वास किया जाता है और विश्वास की भावना अनुशासन स्थापना में बहुत सहायक होती है।

प्रश्न 4.
डाल्टन पद्धति के मुख्य दोषों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उतर:

डाल्टन पद्धति के दोष।
(Demerits of Dalton Method)

इस पद्धति के प्रमुख दोष निम्न प्रकार हैं

1.वैयक्तिक शिक्षण पर विशेष बल- इस पद्धति में वैयक्तिक शिक्षण पर आवश्यकता से अधिक बल दिया जाता है, जिसके कारण बालकों में सामूहिक भावना का विकास नहीं हो पाता है।

2. शिक्षकों की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध- इस पद्धति के द्वारा। डाल्टन पद्धति के दोष शिक्षा देने से बालकों को तो स्वतन्त्रता मिल जाती है, लेकिन शिक्षकों की स्वतन्त्रता सीमित रह जाती है।

3. शिक्षकों के प्रभाव में कमी- इस पद्धति में बालक वैयक्तिक। रूप से अध्ययन करते हैं जिससे शिक्षकों को कम काम करना पड़ता है। और उनका प्रभाव घट जाता है। इसके अतिरिक्त बालकों पर शिक्षकों के व्यक्तित्व तथा चरित्र की छाप नहीं पड़ती, फलस्वरूप उनके व्यक्तित्व तथा चरित्र का कोई मूल्य नहीं रह जाता है।

4. योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव- इस पद्धति के अनुकूल शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों की कमी है। इसी कमी के कारण बालकों के शिक्षण का कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं किया जा सकता।

5. विशेषीकरण पर बल- इस पद्धति में विशेषीकरण पर बल संगीत तथा विज्ञान की शिक्षा देना दिया जाता है। यह असंगत प्रतीत होता है। विशेषीकरण से बालक को असम्भव सर्वतोन्मुखी विकास नहीं हो पाता है। छोटी आयु में सर्वांगीण विकास अनैतिक कार्य होने की आशंका न होने के कारण बालक का व्यक्तित्व एकांगी रह जाता है। पुस्तकीय निर्भरता का भय

6. सामूहिक शिक्षा का अभाव इस पद्धति में वैयक्तिक शिक्षा, पाठान्तर क्रियाओं का अभाव पर इतना अधिक बल दिया जाता है कि सामूहिक शिक्षा का सर्वथा व्ययशील पद्धति अभाव हो जाता है। इस पद्धति में अभिनय, संगीत, खेल आदि के दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली माध्यम से शिक्षा नहीं दी जाती, जब कि ये सामूहिक शिक्षा के स्वरूप

7, मौखिक कार्य का अभाव- इस पद्धति में बालकों को लिखने का काम अधिक करना पड़ता है, इसलिए उन्हें मौखिक कार्य के अभ्यास के लिए अवसर नहीं मिल पाता। इसके परिणामस्वरूप बालक की भाषा को विकास भी सन्तुलित रूप में नहीं हो पाता है।

8. उत्तम पुस्तकों का अभाव डाल्टन पद्धति को कार्यान्वित करने के लिए उपयुक्त पुस्तकों का होना अति आवश्यक है, परन्तु अभी हमारे देश में भी विभिन्न विषयों पर इस पद्धति के ढंग की पुस्तकों का अभाव पाया जाता है। इसी कारण यह पद्धति भारत में कार्यान्वित नहीं की जा सकी है।

9. विषयों में सानुबन्ध का अभाव- इस पद्धति में जो शिक्षक कार्य करते हैं, वे अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं। उनके द्वारा जो विषय पढ़ाए जाते हैं उनमें सानुबन्ध नहीं होने पाता। चूंकि प्रत्येक विषय का अध्ययन अलग-अलग होता है। इस कारण विभिन्न विषयों का समन्वय करना कठिन है। | 10. संगीत तथा विज्ञान की शिक्षा देना असम्भव-कुछ विषयों में शिक्षक को अधिक बताने की आवश्यकता होती है। ऐसे विषयों में विद्यार्थी बिना शिक्षक की सहायता के आगे नहीं बढ़ सकते। इसी कारण इस पद्धति से सब विषयों की शिक्षा नहीं दी जा सकती, विशेष रूप से संगीत और विज्ञान की शिक्षा देना तो सम्भव ही नहीं है।

10. अनैतिक कार्य होने की आशंका- इस पद्धति में शिक्षा सम्बन्धी कुछ अनैतिक कार्य होने की सम्भावना भी रहती है। इस पद्धति में यह भी आशंका रहती है कि बालक अपना कार्य किसी दूसरे विद्यार्थी की सहायता से न करा ले या उसके कार्य की नकल कर ले। चारित्रिक तथा मानसिक विकास की दृष्टि से यह कार्य अनुचित है।

12. पुस्तकीय निर्भरता का भय- इस पद्धति के द्वारा शिक्षा देने से बालक किताबी कीड़े बन जाते हैं। इसका कारण यह है कि इसमें व्यावहारिक शिक्षा का अभाव रहता है और पुस्तकीय शिक्षा की प्रधानता है।

13. पाठान्तर क्रियाओं का अभाव- इस पद्धति में पिकनिक, निरीक्षण, भ्रमण आदि को महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं दिया गया है। इससे बालकों के संर्वतोन्मुखी विकास में बाधा पड़ती है।

14. व्ययशील पद्धति- इस पद्धति के अनुसार शिक्षा देने में प्रत्येक विषय के लिए एक प्रयोगशाला, विषय-विशेषज्ञ, उपयुक्त पुस्तकों तथा शिक्षण यन्त्रों की आवश्यकता होती है। इनकी व्यवस्था के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है, परन्तु भारत जैसे निर्धन देश में वर्तमान स्थितियों को देखते हुए इतनी व्ययशील पद्धति कार्यान्वित नहीं की जा सकती है।

15. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली- इस पद्धति में वार्षिक कार्य के आधार पर बालक को अगली कक्षा में चढ़ाया जाता है। इससे बालक की सही योग्यता का मापन नहीं होता। कार्य तो वह अन्य किसी से भी करा सकता है। फिर कार्य कर लेने से यह नहीं समझा जा सकता है कि बालक ने उसे सीख लिया है और उसे धारण कर लिया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समुचित तर्क के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा की डाल्टन प्रणाली शिक्षा की अन्य प्रचलित शिक्षा-प्रणालियों से भिन्न है।
उत्तर:

डाल्टन प्रणाली की विशिष्टता
(Characteristics of Dalton Method)

मिस हैलन पार्कहर्ट द्वारा प्रतिपादित डाल्टन शिक्षा-प्रणाली शिक्षा की अन्य प्रचलित प्रणालियों से पर्याप्त भिन्न है। यह शिक्षा प्रणाली सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से एक प्रयोगात्मक प्रणाली है। डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत शिक्षण कार्य सदैव सम्बन्धित विषय की सुव्यवस्थित प्रयोगशाला में ही सम्पन्न होता है। इस शिक्षा-प्रणाली की आधारभूत मान्यता के अनुसार बच्चों द्वारा स्वयं कार्य करके ज्ञान अर्जित किया जाता है। किसी भी विषय का ज्ञान शिक्षक द्वारा कक्षा-शिक्षण विधि द्वारा प्रदान नहीं किया जाता। शिक्षक ही सामान्य रूप से बच्चों के लिए मात्र पथ-प्रदर्शक ही होता है।

बच्चों को कुछ कार्य सौंपे जाते हैं तथा सौंपे गए कार्य को पूरा करने का दायित्व बच्चों का ही होता है। जैसे-जैसे बच्चे अपना कार्य पूरा कर लेते हैं, वैसे-वैसे ही उन्हें आगे का कार्य सौंप दिया जाता है। बच्चा अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार दिए गए कार्य को निर्धारित समय से पूर्व भी पूरा कर सकता है। डाल्टन प्रणाली के अन्तर्गत किसी व्यवस्थित परीक्षा-पद्धति का प्रावधान नहीं है। बच्चों को उनके द्वारा पूरे किए गए कार्य को ध्यान में रखते हुए ही अगली कक्षा में भेज दिया जाता है। इस शिक्षा प्रणाली में अनुशासन की समस्या भी प्रायः नहीं होती तथा शिक्षक एवं शिष्य के सम्बन्ध भी मधुर होते हैं। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं। कि डाल्टन प्रणाली अन्य शिक्षा-प्रणालियों से भिन्न एवं विशिष्ट है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली के मुख्य उद्देश्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली का प्रतिपादन कुछ विशेष उद्देश्यों को ध्यान में रख कर किया गया है। वास्तव में इस शिक्षा-प्रणाली का प्रतिपादन पूर्व प्रचलित शिक्षा के दोषों को समाप्त करने के लिए किया गया था। इस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य शिक्षा को अधिक व्यावहारिक तथा जीवन से सम्बद्ध बनाना था। इस शिक्षा-प्रणाली का उद्देश्य एक नए शैक्षिक समाज का निर्माण करना था। डाल्टन प्रणाली के उद्देश्य को पार्कहर्ट ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “इस योजना का उद्देश्य बालकों को साधारण कक्षा में मिलने वाली

जीवन की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों में रखकर एक नए प्रकार के शैक्षिक समाज को जन्म : देना तथा विद्यालय के सामाजिक जीवन का पुनसँगठन करना था।’

प्रश्न 2.
तर्कसहित स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा की डाल्टन प्रणाली एक बाल-केन्द्रित शिक्षा-प्रणाली है?
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली में शिक्षण की सम्पूर्ण व्यवस्था बालक पर केन्द्रित है। इस प्रणाली में बालक के बहुपक्षीय विकास को प्राथमिकता दी गई है। बालक को अधिक महत्त्व दिया गया है तथा शिक्षक की भूमिका गौण है। इस शिक्षा प्रणाली में बालक को जो कार्य सौंपे जाते हैं वे उसकी योग्यता, क्षमता, स्वभाव एवं कार्य के अनुकूल होते हैं। यही नहीं सौंपे गए कार्यों को करने में भी बालक पूर्ण रूप से स्वतन्त्र होता है। वह अपनी इच्छा से कार्य को निर्धारित समय से पूर्व भी पूरा कर सकता है। डाल्टन शिक्षा-प्रणाली की इन समस्त मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए, हम कह सकते हैं कि यह शिक्षा प्रणाली बाल-केन्द्रित शिक्षा-प्रणाली है।

प्रश्न 3.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली में शिक्षक का क्या स्थान है ?
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली अपने आप में एक विशिष्ट शिक्षा-प्रणाली है। इस शिक्षा-प्रणाली में बालक या छात्र का स्थान मुख्य है तथा उसी के बहुपक्षीय विकास को शिक्षा का मुख्य उद्देश्य स्वीकार किया गया है। इस सैद्धान्तिक मान्यता को ध्यान में रखते हुए नि:सन्देह रूप से कहा जा सकता है कि इस प्रणाली में शिक्षक का स्थान गौण ही है। डाल्टन प्रणाली में शिक्षक केवल पथ-प्रदर्शक की ही भूमिका निभाता है। इस शिक्षा प्रणाली में कक्षा-शिक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। अतः शिक्षक के व्यक्तित्व को बच्चों पर प्रभाव भी पड़ने की कोई गुंजाइश नहीं होती। डाल्टन प्रणाली में शिक्षक द्वारा किसी रूप में नियन्त्रक की भूमिका नहीं निभाई जाती, वह तो बालकों का मित्र एवं सहायक ही होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली के प्रतिपादक का नाम क्या है ?
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली के प्रतिपादक का नाम है–मिस हैलन पार्कहर्ट।

प्रश्न 2.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली को अन्य किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली को प्रयोगशाला प्रणाली’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 3.
मिस हैलन पार्कहर्स्ट द्वारा प्रतिपादित शिक्षा-प्रणाली को ‘डाल्टन शिक्षा-प्रणाली’ का नाम क्यों दिया गया है ?
उत्तर:
मिस हैलन पार्कहर्ट ने अपनी शैक्षिक अवधारणा के आधार पर प्रथम विद्यालय अमेरिका के डाल्टन नगर में स्थापित किया था। इसी कारण से इस शिक्षा प्रणाली को डाल्टन शिक्षा प्रणाली’ नाम दिया गया है।

प्रश्न 4.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत अध्ययन के किस स्वरूप को अपनाया गया है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत अध्ययन के प्रयोगात्मक स्वरूप को अपनाया गया है।

प्रश्न 5.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत किस आयु-वर्ग के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिया जाता
उत्तर:
ल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत सामान्य रूप से 11-12 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिया जाता है।

प्रश्न 6.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि क्या कहलाती है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि ‘कार्य की ठेका पद्धति कहलाती है।

प्रश्न 7.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली में शिक्षक की भूमिका क्या है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली में शिक्षक द्वारा बालकों के मित्र, सहायक तथा पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई जाती है।

प्रश्न 8.
“डाल्टन पद्धति एक यान्त्रिक व्यवस्था है, जिसमें कि कार्य के सिद्धान्त को व्यवहार में लाया जाता है। यह शिक्षालयों को सरल एवं आर्थिक पुनसँगठन है, जहाँ शिक्षक एवं शिक्षार्थी को अधिक उपयोगी ढंग से कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन मिस हैलन पार्कहर्स्ट का है।

प्रश्न 9.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के मुख्य सिद्धान्त हैं-

  • बाल-केन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त,
  • स्व-शिक्षा का सिद्धान्त,
  • पूर्ण स्वतन्त्रता का सिद्धान्त तथा
  • व्यक्तिगत शिक्षा का सिद्धान्त।

प्रश्न 10.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत ‘निर्दिष्ट पाठ’ से क्या आशय है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत बालक द्वारा एक सप्ताह में किए जाने वाले कार्य को निर्दिष्ट पाठ कहते हैं।

प्रश्न 11.
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत कार्य इकाई’ से क्या आशय है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत बालक द्वारा एक दिन में समाप्त किए जाने वाले कार्य को ‘कार्य इकाई’ कहते हैं।

प्रश्न 12.
कार्य का ठेका और निर्दिष्ट कार्य किस शिक्षा-प्रणाली के सिद्धान्त हैं ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के।

प्रश्न 13.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली किलपैट्रिक/हैलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ की।
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली हैलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ की।

प्रश्न 14 निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. डाल्टन प्रणाली का प्रादुर्भाव मॉण्टेसरी प्रणाली के विरोधस्वरूप हुआ है।
  2. डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में प्रयोगात्मक कार्यों की पूर्ण अवहेलना की जाती है।
  3. डाल्टने शिक्षा-प्रणाली छोटे शिशुओं की शिक्षा के लिए एक उपयोगी प्रणाली है।
  4. डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक द्वारा सहायक एवं पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई जाती है।
  5. डाल्टन प्रणाली व्यक्तिवादी विचारधारा पर आधारित है।
  6. डाल्टन शिक्षा प्रणाली में त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक तथा वार्षिक परीक्षाओं की व्यवस्था की जाती है।
  7. भारत में डाल्टन प्रणाली के प्रयोग में अनेक कठिनाइयाँ हैं।

उत्तर

  1. असत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य,
  6. असत्य,
  7. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
डाल्टन शिक्षण पद्धति के प्रवर्तक का नाम क्या है?
(क) मैडम हैलन पार्कहर्स्ट
(ख) फ्रॉबेल
(ग) जॉन डीवी
(घ) मार्टिन

प्रश्न 2.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में अधिक बल दिया जाता है
(क) सैद्धान्तिक अध्ययन पर
(ख) प्रयोगात्मक अध्ययन पर ध्ययन पर
(घ) कक्षा-अध्ययन पर

प्रश्न 3.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में प्रावधान नहीं है
(क) प्रयोगात्मक कार्यों को
(ख) नियमित परीक्षाओं का
(ग) कार्य करने की स्वतन्त्रता का
(घ) उपर्युक्त सभी का।

प्रश्न 4.
मूल रूप से डाल्टन शिक्षा-प्रणाली है–
(क) शिक्षक-केन्द्रित प्रणाली
(ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली
(ग) उत्पादन-केन्द्रित प्रणाली
(घ) प्रदर्शन-केन्द्रित प्रणाली

प्रश्न 5.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में बालक को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाता है–
(क) आयु के अनुसार
(ख) समय के अनुसार।
(ग) योग्यता के अनुसार
(घ) शिक्षक की सिफारिश के अनुसार

प्रश्न 6.
“डाल्टन पद्धति में एक ऐसी ठेका व्यवस्था निहित है, जिसमें बालक को एक दिए हुए समय में कार्य पूरा करने के साधन एवं मार्गों के चयन का कार्य उसी पर छोड़ दिया जाता है।” यह कथन किसका है?
(क) हैलन पार्कहर्स्ट
(ख) ग्रेव्ज
(ग) फ्रॉबेल
(घ) जॉन डीवी

प्रश्न 7.
किस शिक्षा विधि में बालक प्रयोगशालाओं में कार्य करते हैं?
(क) मॉण्टेसरी
(ख) बेसिक शिक्षा
(ग) डाल्टन प्लान
(घ) किण्डरगार्टन विधि

उत्तर:

1. (क) मैडम हैलन पार्कहर्स्ट,
2. (ख) प्रयोगात्मक अध्ययन पर,
3. (ख) नियमित परीक्षाओं का,
4. (ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली,
5. (ग) योग्यता के अनुसार,
6. (ख) ग्रेव्ज,
7. (ग) डाल्टन प्लान।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 24 Individual Differences: Meaning, Kinds, Causes and Measurement

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 24
Chapter Name Individual Differences: Meaning, Kinds, Causes and Measurement (व्यक्तिगत भिन्नताएँ- अर्थ, प्रकार, कारण एवं मापन)
Number of Questions Solved 31
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 24 Individual Differences: Meaning, Kinds, Causes and Measurement (व्यक्तिगत भिन्नताएँ- अर्थ, प्रकार, कारण एवं मापन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भिन्नता से आप क्या समझते हैं ? व्यक्तिगत भिन्नता के मुख्य कारणों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
व्यक्तिगत भिन्नता का क्या अर्थ है ? इसके मुख्य कारण क्या हैं ? समझाकर लिखिए।
या
व्यक्तिगत भेद किसे कहते हैं? इसके कारणों को स्पष्ट कीजिए।
या
“भिन्नताएँ प्रत्येक व्यक्ति में पायी जाती हैं।” यदि आप इस कथन से सहमत हैं, तो वैयक्तिक विभिन्नता के कारणों का वर्णन कीजिए।
या
व्यक्तिगत विभिन्नताओं के क्या कारण हैं ? विस्तार से समझाइए।
या
व्यक्तिगत भिन्नता के कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
व्यक्तिगत विभिन्नता को परिभाषित कीजिए।
या
दो व्यक्तियों में जिन कारणों से व्यक्तिगत भिन्नताएँ पायी जाती हैं, उन्हीं के आधार पर व्यक्तिगत भेद निश्चित किये जाते हैं।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नता का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Individual Difference)

व्यक्तिगत भिन्नता का नियम यद्यपि प्राचीनकाल से ही माना जाता रहा है, परन्तु जब से बुद्धि-मापन के परीक्षण प्रारम्भ हुए, तब से इसका महत्त्व काफी बढ़ गया है। व्यक्तिगत भिन्नता को अर्थ है–किन्हीं दो व्यक्तियों का परस्पर एक-सा न होना। भिन्नताएँ प्रत्येक व्यक्ति में पायी जाती हैं। यह भिन्नता जुड़वाँ बालकों तक में पायी जाती है। दूसरे शब्दों में, “व्यक्तिगत भिन्नताओं का अर्थ एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से रूप-रंग, शारीरिक गठन, बुद्धि, विशिष्ट योग्यताओं, रुचियों, उपलब्धियों, स्वभाव, व्यक्तित्व के गुणों आदि में भिन्नता से है। कोई भी दो व्यक्ति शारीरिक गठन, बुद्धि, रुचियों, व्यक्तित्व के गुणों आदि में समान नहीं पाये जाते हैं।”

व्यक्तिगत भिन्नता की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नांकित हैं-

  1. जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “औसत समूह से मानसिक, शारीरिक विशेषताओं के सन्दर्भ में समूह के सदस्य के रूप में भिन्नता या अन्तर को वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं।”
  2. स्किनर के अनुसार, “मापन किया जाने वाला व्यक्तित्व का प्रत्येक पक्ष वैयक्तिक भिन्नता का अंश हैं।”
  3. टॉयलर के अनुसार, “शरीर के आकार और रूप, शारीरिक कार्य, गति की क्षमताओं, बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान, रुचियों, अभिवृत्तियों और व्यक्तित्व के लक्षणों में मापी जाने वाली भिन्नताओं को वैयक्तिक भिन्नताओं के अन्तर्गत रखा जा सकता है।”

व्यक्तिगत विभिन्नताओं के कारण
(Causes of Individual Differences)

व्यक्तिगत विभिन्नताओं के अनेक कारण हैं जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. वंशानुक्रम- कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तिगत भिन्नताओं का मूल कारण वंशानुक्रम है। प्रायः देखा गया है कि बुद्धिमान माता-पिता की सन्तान बुद्धिमान होती है और मन्द-बुद्धि माता-पिता की सन्तान मन्द-बुद्धि। अपराधी व्यक्ति की सन्तान में भी अपराध की प्रवृत्ति पायी जाती है। इसी प्रकार कुछ अन्य गुण-अवगुणों का भी हस्तान्तरण आनुवंशिक रूप से होता रहता है।

2. वातावरण- व्यक्तिगत भिन्नता का अन्य महत्त्वपूर्ण कारण वातावरण है। भौतिक वातावरण द्वारा व्यक्ति की लम्बाई, रंग, रूप तथा आचार-विचार प्रभावित होते हैं, जबकि सामाजिक वातावरण व्यक्ति की सामाजिक मान्यताओं का निर्धारण करता है। वातावरण की भिन्नता के कारण ही ठण्डे देश के निवासी गोरे, लम्बे तथा शक्तिवान होते हैं, उनमें श्रम करने की प्रवृत्ति होती है। इसके विपरीत गरम देशों के व्यक्ति काले, ठिगने तथा आलसी होते हैं।

3. लिंग-भेद- लिंग-भेद के कारण ही बालक और बालिकाओं की शारीरिक बनावट, सोचने-विचारने तथा बौद्धिक क्षमताओं में अन्तर पाया जाता है। बालकों में शारीरिक कार्य करने की अधिक क्षमता होती है तो बालिकाओं में सहनशीलता का गुण अधिक मात्रा में पाया जाता है। बालिकाओं की स्मरण शक्ति बालकों की अपेक्षा तीव्र होती है। यदि बालक गणित और विज्ञान में अधिक कुशाग्र होते हैं तो बालिकाएँ साहित्य और कला में विशेष निपुण होती हैं। बालिकाओं का हस्तलेख बालकों से अधिक सुन्दर और आकर्षक होता है।

4. जाति, प्रजाति और देश- जाति, प्रजाति और देश का भी व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर विशेष प्रभाव पड़ता है। वैश्य व्यापार में निपुण होते हैं, तो ब्राह्मण अध्ययन और अध्यापन में। क्षत्रिय अपनी युद्धप्रियता के लिए प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार प्रादेशिक भिन्नता भी प्रभाव डालती है। भारत में प्रादेशिक भिन्नता का प्रभाव विशेष रूप से देखा जा सकता है।

5. आयु और बुद्धि का प्रभाव- आयु और बुद्धि का प्रभाव भी व्यक्तिगत भिन्नता पर पड़ता है। आयु के आधार पर ही बालक को शारीरिक, मानसिक और भावात्मक विकास होता है। इस प्रकार आयु के कारण भी बालकों में भिन्नता पायी जाती है। बुद्धि जन्मजात गुण है। अत: कोई बालक प्रतिभाशाली होता है, तो कोई मूढ़।

6. शिक्षा और आर्थिक दशा- शिक्षा व्यक्ति में पर्याप्त परिवर्तन कर देती है। जो व्यक्ति साक्षर होते हैं, वे निरक्षर व्यक्तियों से काफी भिन्नताएँ रखते हैं। शिक्षित व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास निरक्षर व्यक्ति की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है। शिक्षा के समान ही आर्थिक दशा का प्रभाव भी व्यक्तिगत भिन्नता पर पड़ता है। अक्सर निर्धन बालक अभावग्रस्त और लालची होते हैं। उनमें हीनता की भावना भी पायी जाती है, परन्तु धन की अधिकता भी बालकों को भ्रष्ट कर देती है।

प्रश्न 2
बालकों में पायी जाने वाली व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखते हुए अध्यापक को शिक्षण-कार्य में किन-किन व्यवस्थाओं को लागू करना चाहिए ?
या
व्यक्तिगत भिन्नताओं के कारण शिक्षक को मुख्य रूप से किन-किन बातों को ध्यान में । रखना चाहिए ?
या
शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत भिन्नता की भूमिका एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
या
“व्यक्तिगत भेदों के ज्ञान ने शिक्षा की व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया है।” आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं ?
या
“व्यक्तिगत भिन्नताओं के ज्ञान ने शिक्षा को अत्यधिक प्रभावित किया है।” कैसे?
या
“व्यक्तिगत भिन्नता का ज्ञान शिक्षक के लिए अत्यन्त उपयोगी है।” स्पष्ट कीजिए।
या
पाठ्यक्रम, छात्रों के वर्गीकरण और शिक्षण-विधियों में व्यक्तिगत भिन्नताओं को कैसे समायोजित किया जा सकता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नताएँ तथा शिक्षा
(Individual Differences and Education)

आधुनिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत भिन्नताओं को विशेष महत्त्व दिया जाता है। बालक की व्यक्तिगत रुचियों, क्षमताओं, इच्छाओं तथा मानसिक योग्यताओं को ध्यान में रखकर ही शिक्षा का आयोजन करना आवश्यक है। इस दशा में अध्यापक को अग्रलिखित बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए

1. उचित वर्गीकरण- प्रायः विद्यालय में परम्परागत विधि के अनुसार बालकों का कंक्षाओं में विभाजन किया जाता है। परन्तु यह विभाजन सर्वथा गलत है, क्योंकि विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों की आयु में ही अन्तर नहीं होता, वरन् शारीरिक व मानसिक दृष्टि से भी उनमें अन्तर होता है। अतः ऐसी दशा में बालकों की विशेषताओं के अनुसार उनको । विभाजन समरूप समूहों में किया जाना चाहिए। वर्गीकरण में मानसि योग्यताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रत्येक कक्षा में प्रतिभाशाली, सामान्य तथा निम्न मानसिक क्षमताओं वाले बालकों को तीन समूहों में विभाजित किया जाना चाहिए।

2. कक्षा का सीमित आकार- वर्तमान समय में शिक्षा की हीन दशा का प्रमुख कारण कक्षा में छात्रों को आवश्यकता से अधिक संख्या में होना है। जब कक्षा में छात्रों की संख्या 50 से 60 तक होती है तो अध्यापक के लिए उनसे व्यक्तिगत सम्पर्क रखना कठिन हो जाता है। अध्यापक न तो व्यक्तिगत रूप से उन बालकों की समस्याओं को समझ पाता है और न ही छात्र अध्यापक से अपनी शंकाओं का समाधान कर पाते हैं। अत: कक्षाओं में छात्रों की संख्या 20 से 30 के बीच में होनी चाहिए।

3. विस्तृत पाठ्यक्रम- बालकों की आकाँक्षाओं, रुचियों और क्षमताओं में पर्याप्त अन्तर होता है। अत: सबके लिए एक-सा पाठ्यक्रम निर्धारित करना उनकी व्यक्तिगत विभिन्नताओं की उपेक्षा करना है। अतः पाठ्यक्रम विस्तृत और लचीला बनाया जाए, जिससे छात्र अपनी-अपनी रुचि के अनुकूल विषयों का चुनाव कर सकें।

4. व्यक्तिगत शिक्षण की व्यवस्था- बालकों में मानसिक भिन्नताएँ पायी जाती हैं। अत: उन्हें सामूहिक शिक्षण द्वारा ज्ञान प्रदान करना निरर्थक है। उनकी मानसिक क्षमताओं को ध्यान में रखकर व्यक्तिगत शिक्षण की व्यवस्था करना अत्यन्त आवश्यक है। डाल्टन योजना तथा बिने योजनाओं का निर्माण इसी उद्देश्य से किया गया है।

5. गृह-कार्य- बालकों को गृहकार्य उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को ध्यान में रखकर ही प्रदान किया जाए। जो बालक प्रतिभाशाली हैं, उन्हें गृह-कार्य अधिक प्रदान किया जाए तथा मन्दबुद्धि और निर्बल शरीर वाले बालकों को कम गृह-कार्य प्रदान किया जाए।

6. शिक्षण-विधि- शिक्षण विधियों का निर्माण भी व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए। कुशाग्र बुद्धि का बालक एक मूर्ख की अपेक्षा शीघ्र सीख जाता है। अत: दोनों को शिक्षा प्रदान करने की विधियों में अन्तर होना चाहिए। मन्दबुद्धि वाले बालकों के साथ विशेष सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है।

7. रुचियों पर ध्यान- विद्यालय में अध्ययन करने वाले बालकों की विभिन्न रुचियाँ होती हैं। अतः उनकी रुचियों के विषय में अध्यापक को अवश्य जानकारी रखनी चाहिए तथा उनके समुचित विकास की चेष्टा भी करनी चाहिए। टी० पी० नन (T: P Nunn) के अनुसार, “हमें बालकों को एक ही रुचि में ढाली गयी मशीनों का स्वरूप नहीं देना है, क्योंकि प्रत्येक की अलग-अलग सत्ता है और व्यक्तिगत सत्ता के अनुसार ही उनकी रुचियाँ हैं, अत: उनका विनाश न करके उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए।’

8. शारीरिक अयोग्यता का ध्यान- बालकों की शारीरिक समर्थताओं तथा अयोग्यताओं का पूरा-पूरा ध्यान रखना आवश्यक है। कक्षा में कुछ बालक ऐसे होते हैं, जिन्हें कम सुनाई देता है तथा कुछ की दृष्टि कमजोर होती है। ऐसे बालकों को कक्षा में आगे बैठाना चाहिए। इसी प्रकार कुछ बालक शारीरिक दृष्टि से अत्यन्त निर्बल होते हैं। ऐसे बालकों के पढ़ने के बीच में पर्याप्त विश्राम दिया जाए तथा उन्हें गृह-कार्य भी कम दिया जाए तथा समय-समय पर ऐसे बालकों की डॉक्टरी जाँच कराई जाए।

9. आर्थिक और सामाजिक स्तर का ध्यान- बालकों के परिवारों के आर्थिक और सामाजिक स्तरों का उनके रहन-सहन, आचार-विचार तथा दृष्टिकोणों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव ही उनमें व्यक्तिगत भिन्नताएँ उत्पन्न करते हैं। अत: अध्यापकों को बालकों के आर्थिक और सामाजिक स्तर का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए तथा उसी आधार पर उनकी शिक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए।

10. लिंग-भेद का ध्यान- बालक और बालिकाओं की रुचियों, आवश्यकताओं और क्षमताओं में पर्याप्त अन्तर होता है। अत: दोनों के पाठ्यक्रमों में अन्तर अवश्य होना चाहिए। शिक्षा प्रदान करते समय भी लिंग-भेद का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत भिन्नता की उल्लेखनीय भूमिका एवं महत्त्व है। यही कारण है कि हम कहते हैं कि व्यक्तिगत भेदों के ज्ञान ने शिक्षा की व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया है।

प्रश्न 3
विभिन्न आधारों पर किये गये व्यक्तिगत भिन्नताओं के वर्गीकरण का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
वैयक्तिक विभिन्नता के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
या
शेल्डन के अनुसार व्यक्तित्व के प्रकार का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नताओं का वर्गीकरण
(Classification of Individual Differences)

व्यक्तिगत भिन्नता के सम्बन्ध में टरमन ने लिखा है, “उच्च योग्यता वालों या प्रतिभाशाली बालकों में कुछ सीमा तक अपनी अनेक योग्यताओं के मामले में अपने ही भीतर या अन्य व्यक्तियों के साथ भिन्नताएँ होती हैं।” व्यक्तियों में निम्नांकित प्रकार की भिन्नताएँ पायी जाती हैं’

1. शारीरिक भिन्नता- शरीर की बनावट, रूप, रंग, आकृति, यौन में अन्तर को शारीरिक भिन्नता कहते हैं। शरीर के स्वास्थ्य एवं अंगों की क्रियाशीलता में भेद होने से शारीरिक भिन्नता पायी जाती है। भिन्न-भिन्न विद्वानों ने व्यक्ति में विभिन्न भिन्नताएँ पायी हैं और उसके अनुसार उन्हें निम्न वर्गों में बाँटा है

(i) क्रेश्मर का वर्गीकरण

  1. ऐथलेटिक- मजबूत हड्डी, स्वस्थ मांसपेशियों, चौड़े सीने, लम्बे हाथ-पैर और लम्बे चेहरे वाले, क्रियाशील, चिन्तारहित, उचित रूप से समायोजित करने वाले।
  2. ऐसथेनिक- लम्बे, पतले हाथ-पैर वाले, तिकोने चेहरे, चपटे सीने और छोटी ठोढ़ी वाले, अपनी निन्दा न सुनने वाले, दूसरों की निन्दा करने वाले।
  3. पिकनिक- बड़े सिर और धड़ वाले, छोटे पैर, गोल सीने व कन्धे, छोटे हाथ-पैर वाले।
  4. डिसप्लास्टिक- असाधारण शरीर वाले, रोगग्रस्त, ग्रन्थि रोग वाले, उपर्युक्त तीनों प्रकार के लोगों का मिश्रण।

(ii) केनन का वर्गीकरण

  1. थायरॉइड ग्रन्थि-प्रधान-पर्याप्त शक्ति वाले, स्वस्थ, ओजस्वी व्यक्ति।
  2. थायरॉइड ग्रन्थि से न्यून स्राव वाले-कमजोर, अस्वस्थ, आलसी, क्रियाहीन व्यक्ति।
  3. एड्रीनल ग्रन्थि-प्रधान-बहादुर, लड़ाकू, क्रोधी, साहसी, कर्मठ व्यक्ति।
  4. पिट्यूटरी ग्रन्थि-प्रधान-क्रियाशील, हँसी-मजाक में निपुण, प्रसन्नचित्त व्यक्ति।
  5. गोनाड ग्रन्थि-प्रधान-अधिक क्रियाशील, कामुक, नाटे, स्वस्थ व्यक्ति।

(iii) शेल्डन का वर्गीकरण

  1. कोमल, गोल तथा मोटे शरीर वाले व्यक्ति।
  2. हृष्टपुष्ट, शक्तिशाली, भारी और मजबूत व्यक्ति।
  3. लम्बे आकार वाले, शक्तिहीन, दुर्बल मांसपेशियों वाले, शीघ्र उत्तेजित होने वाले व्यक्ति।

(iv) वार्नर का वर्गीकरण

  1. सामान्यतया स्वस्थ, सुडौल, गठीले शरीर वाले व्यक्ति।
  2. अविकसित अंग वाले, छोटे हाथ, पैर, गर्दन वाले व्यक्ति।
  3. असन्तुलित शरीर वाले, निर्बल, अपरिपुष्ट व्यक्ति।
  4. स्नायुविक गड़बड़ी वाले, शीघ्र घबराने वाले व्यक्ति।
  5. अंगहीन, हाथ, पैर, आँख, कान ठीक न होने वाले व्यक्ति
  6. आलसी, सुस्त, इच्छाविहीन, निर्जीव से व्यक्ति।
  7. पिछड़े हुए, आयु के अनुकूल कार्य करने में असमर्थ व्यक्ति।
  8. प्रतिभाशाली, अपनी आयु से अधिक कार्य करने वाले व्यक्ति।
  9. मिर्गी रोगग्रस्त व्यक्ति।
  10. स्नायु रोगग्रस्त व्यक्ति।

2. बौद्धिक भिन्नता- टरमन (Turman) ने बुद्धिलब्धि निकालकर निम्नलिखित भिन्नताएँ बतायी।

           प्रकारे                                        बुद्धिलब्धि

  1. अति प्रतिभाशाली               200 या इससे अधिक
  2. प्रतिभाशाली                       140 से 200 तक
  3. अति उत्कृष्ट                       120 से 140 तक
  4. उत्कृष्ट                               110 से 120 तक
  5. साधारण                            90 से 110 तक
  6. मन्दबुद्धि                           80 से 90 तक
  7. निर्बल बुद्धि                       70 से 80 तक
  8. हीन बुद्धि                          70 से कम
  9. मूर्ख                                  50 से 70 तक
  10. मूढ़                                   20 से 50 तक
  11. जड़                                  20 से कम

3. मानसिक योग्यताओं की भिन्नता- व्यक्ति संवेदनशीलता, प्रत्यक्षीकरण, निरीक्षण, स्मरण, कल्पना, चिन्तन, तर्क, अधिगम आदि मानसिक योग्यताओं में भिन्न पाये जाते हैं। कुछ बड़े संवेदनशील होते हैं, कुछ तीव्र स्मरण करने वाले होते हैं, कुछ बड़े तार्किक होते हैं, कुछ की कल्पना-शक्ति बहुत तीव्र होती है, कुछ देर से सीखते हैं आदि। कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस सम्बन्ध में किये गए वर्गीकरण इस प्रकार हैं—

(i) थॉर्नडाइक का वर्गीकरण- यह वर्गीकरण विचारशक्ति पर आधारित है

  1. सूक्ष्म विचारक; जैसे-गणितज्ञ, तर्कशास्त्री, वैज्ञानिक।
  2. प्रत्यय विचारक; जैसे-कवि, साहित्यकार, नाटककार।
  3. स्थूल विचारक; जैसे-वस्तुओं के साथ विचार करने वाले।
  4. ज्ञानेन्द्रिय-प्रधान विचारक; जैसे-आँख से देखकर समझने वाले।

(ii) थॉर्नडाइक का कल्पना- शक्ति पर आधारित वर्गीकरण

  1. दर्शनालु अर्थात् आँख की इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  2. श्रवणालु अर्थात् कान की इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  3. गमनालु अर्थात् क्रिया, इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  4. स्पर्शालु, अर्थात् त्वक इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  5. घृणालु अर्थात् नासिको इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  6. मिश्रित अर्थात् कई इन्द्रियों को एक-साथ मिलाकर कार्य करने वाले व्यक्ति।

(iii) स्टीफेन्सन का वर्गीकरण- इनका वर्गीकरण बाह्य उत्तेजकों द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों पर आधारित है

  1. प्रसारक- अर्थात् स्थायी प्रभाव वाले व्यक्ति।
  2. अप्रसारक-अर्थात् क्षणिक प्रभाव वाले व्यक्ति।

4. स्वभावगत भिन्नता- व्यक्तियों में स्वभावगत भिन्नता भी पायी जाती है। इसका ज्ञान मनोवैज्ञानिकों द्वारा दिये गये वर्गीकरण से होता है। इनका विवरण इस प्रकार है

(i) मॉर्गन और गिलीलैण्ड का वर्गीकरण- यह वर्गीकरण मनोभावों पर आधारित है-

  1. प्रफुल्ल, जो हमेशा हँसने वाले, आशावादी, गम्भीरतारहित काम करने वाले, संकट में प्रसन्न रहने वाले, जीवन को खेल समझने वाले होते हैं।
  2. उदास, जो सदैव दु:खी रहते हैं और निराशावादी अभिवृत्ति रखते हैं।
  3. चिड़चिड़े जो छोटी-छोटी बातों में खीझ उठते हैं, जल्दी क्रुद्ध हो जाते हैं और मजाक को सहन नहीं करते हैं।
  4. अस्थिर, जो शीघ्र क्रुद्ध, शीघ्र प्रसन्न, शीघ्र दुःखी, अनियन्त्रित भावना वाले होते हैं।

(ii) गैलन का वर्गीकरण- यह शारीरिक क्रियाओं पर आधारित है

  1. अति रुधिरयुक्त, जो अत्यन्त संवेदनशील, परिवर्तनशील, शीघ्र उत्तेजित होने वाले, उत्साही एवं कार्य करने वाले होते हैं।
  2. पीतपित्त-प्रधान, जो क्रोधी, वीर, साहसी, हठी, दृढ़-प्रतिज्ञ तथा कठोर स्वभाव वाले होते हैं।
  3. श्याम पित्त-प्रधान, जो दुःखी, चिन्तित, हतोत्साही, निराशावादी तथा कार्य में अरुचि रखने वाले होते हैं।
  4. कफ-प्रधान, जो आलसी, सुस्त, कम संवेदनशील, काम से भागने वाले तथा परिश्रमहीन होते हैं।

(iii) शेल्डन का वर्गीकरण- यह स्वाभाविक गुणों पर आधारित है-

  1. आलसी, जो आराम-पसन्द, निद्रा-प्रेमी, पराश्रित, परामुखी तथा काम न करने वाले होते हैं।
  2. कर्मठ, जो सक्रिय, परिश्रमी, साहसी, अधिकार-प्रेमी, कार्यरत तथा शक्तिशाली होते हैं।
  3. संयमी, जो अपने पर नियन्त्रण रखने वाले, संकोची, कार्याभ्यस्त तथा एकान्त प्रेमी होते हैं।

5. सामाजिकता सम्बन्धी भिन्नता- व्यक्तियों में सामाजिकता अधिक या कम होती है। कुछ अपने आप में, कुछ दूसरों में और कुछ अपने तथा दूसरों में बराबर-बराबर रुचि रखते हैं। प्रोफेसर गुंग ने व्यक्तियों को तीन वर्गों में विभक्त किया है-

  1. अन्तर्मुखी- जो आत्म-केन्द्रित, समाज के कार्यों में रुचि न लेने वाले, एकान्त प्रेमी, भविष्य की चिन्ता अधिक करने वाले, अधिक सोच-विचार करने वाले, देर से निर्णय लेने वाले, अव्यावहारिक तथा चिन्ता से घिरे होते हैं।
  2. बहिर्मुखी- जो सामाजिक कार्यों में भाग लेने वाले, दूसरों की भलाई में लगे रहने वाले, अकेले ऊबने वाले, व्यवहार-कुशल, सक्रिय, शीघ्र निर्णय लेने वाले, दृढ़ निश्चयी, मिलनसार, नेता, प्रशासक तथा वक्ता होते हैं।
  3. उभयमुखी- इनमें उपर्युक्त दोनों प्रकार के गुणों से सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। अधिकांश व्यक्ति इसी वर्ग में आते हैं।

6. सीखने की क्षमता में भिन्नता- एबिंगहास ने अनेक परीक्षणों के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि विभिन्न आयु के बालकों एवं वयस्कों में भी सीखने की क्षमता भिन्न पायी जाती है। कोई बालक जल्दी सीखता है तो कोई देर से। कक्षा में एक बात को कुछ बालक जल्दी समझने लगते हैं और दूसरों को बहुत समय लगता है।

7. रुचि की भिन्नता- प्रत्येक व्यक्ति की रुचि दूसरे की रुचि से भिन्न होती है। कुछ बालक पढ़ने में रुचि रखते हैं तो कुछ वैज्ञानिक कार्य करने और कुछ शिल्प-कार्यों में।

8. अभिरुचि की भिन्नता- कुछ व्यक्ति संगीत में अभिरुचि रखते हैं, तो दूसरे हस्तकौशल या तकनीकी कार्यों में। वकील, डॉक्टर, मास्टर, इंजीनियर, कारीगर, क्लर्क व प्रशासक में अभिरुचि की भिन्नता पायी जाती है।

9. चारित्रिक भिन्नता- आचरण, व्यवहार, अभिवृत्ति, आदत, स्थायी भाव ये सब मिलकर चरित्र को निर्माण करते हैं। चोर, लुटेरे, अपराधी, हत्यारे, उदार, दृढ़ प्रतिज्ञ, कृत संकल्पी, शीलवान, लज्जाशील चारित्रिक भिन्नता के व्यक्ति होते हैं।

10. ज्ञानात्मक भिन्नता- व्यक्ति प्रायः व्यावहारिक एवं सैद्धान्तिक ज्ञान वाले होते हैं। व्यावहारिक ज्ञान के कारण संसार के क्रिया-कलापों में, विषम परिस्थितियों में और पारस्परिक सम्पर्क में व्यक्ति आगे बढ़ता है। सैद्धान्तिक ज्ञान-भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, कृषि आदि का ज्ञान होता है। ज्ञान की भिन्नता आयु, बुद्धि, सामाजिक व आर्थिक स्थिति, सीखने के अवसर व प्रेरणा आदि पर कम या अधिक हो सकती है। व्यावहारिक ज्ञान वास्तविक परिस्थितियों में कार्य करने से मिलता है।

11. व्यक्तित्व की भिन्नता- व्यक्ति के विभिन्न गुणों के समूह का मनोवैज्ञानिक नाम व्यक्तित्व होता है। सभी व्यक्तियों में सभी गुण नहीं होते हैं। व्यक्तित्व की भिन्नता के निम्नलिखित वर्ग हैं

(i) स्पेल्जर का वर्गीकरण- इन्होंने छह प्रकार के व्यक्तियों का उल्लेख किया है-

  1. ऐन्द्रिय सुख चाहने वाला, जो अपनी इन्द्रियों को सतुष्ट करने में संलग्न रहे; जैसे-लोभी, लालची, कामी, घूसखोर, कालाबाजारी, तस्कर, व्यापारी, बेईमान आदि।
  2. धन से प्रेम रखने वाला, जो व्यापार एवं वाणिज्य में दिन-रात लगा रहता है और धन कमाने के पीछे तन-मन सब कुछ खराब कर देता है।
  3. चिन्तन-मनन करने वाला, जो दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक, अध्ययन में, शोध कार्य में अपना सारा समय लगता है।
  4. राजनीति में संलग्न रहने वाला, जो शासन के कार्यों में, दलबन्दी करने में, दाँव-पेंच व घात-प्रतिघात में लगा हुआ पाया जाता है।
  5. समाज के कार्यों में लगा रहने वाला, जो जाति-पाँति से दूर सभी समाजों के समस्त कार्यों में सजग रूप में लगा रहता है।
  6. धर्मनिष्ठ, जो ईश्वर के भजन, पूजा-पाठ, स्थान-ध्यान, रोजा-नमाज व चर्च की सेवा में लगा पाया जाता है।

(ii) सामान्य वर्गीकरण- इनके तीन वर्ग हैं-

  1. भाव-प्रधान व्यक्ति, जो जल्दी ही संवेदनशील हो उठते हैं। कोमल हृदय वाले होते हैं; जैसे-कवि, सेवक, भक्त, दयालु।
  2. विचार-प्रधान व्यक्ति, जो जीवन की समस्याओं के सम्बन्ध में काफी सोच-विचार और चिन्तन किया करते हैं; जैसे–दार्शनिक, लेखक, वैज्ञानिक आदि।
  3. हिंसा-प्रधान व्यक्ति, जो अपने जीवन में क्रिया ही करना पसन्द करते हैं; जैसे-सैनिक, खिलाड़ी श्रमिक, कारीगर आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भिन्नताओं की प्रकृति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नताओं की प्रकृति- व्यक्तिगत भिन्नताओं की प्रकृति निम्न प्रकार की होती

  1. व्यक्तिगत भिन्नताएँ सर्वव्यापी होती हैं। विश्व के सभी देशों के लोगों में ये भिन्नताएँ पायी जाती हैं।
  2. व्यक्तिगत भिन्नता व्यक्ति के प्रत्येक गुण में पायी जाती है। भिन्नता की मात्रा में अन्तर-हो सकता है।
  3. व्यक्तिगत भिन्नता व्यक्ति के प्रत्येक गुण की सभी किस्मों में पायी जाती है; जैसे—काले रंग की कई किस्में होती हैं और प्रत्येक किस्म में कुछ-न-कुछ भेद दिखायी देता है।
  4. व्यक्तिगत भिन्नता जन्म के बाद बढ़ती जाती है। जन्म के समय प्रायः सभी प्राणी एक-समान दिखायी देते हैं, परन्तु बाद में उनमें भिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
  5. व्यक्तिगत भिन्नता का मूल स्रोत वंशानुक्रम है। विशेषकर व्यक्तियों में पर्यावरण की भिन्नता के बाद में व्यक्तिगत भिन्नता में वृद्धि होती है।
  6. व्यक्तिगत भिन्नता व्यक्तियों के लक्षणों व संगठन में भी पायी जाती है। इसी कारण व्यक्तित्व में भिन्नता देखने को मिलती है।
  7. व्यक्तिगत भिन्नता का अनुपात सदैव बदलता रहता है। इसीलिए दो व्यक्तियों के बीच पायी जाने. वाली भिन्नता सदैवं एक-समान नहीं रहती है।
  8. व्यक्तिगत भिन्नता से व्यक्ति के व्यवहार में भी परिवर्तन होता रहता है और तदनुरूप उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

प्रश्न 2
व्यक्तिगत भिन्नताओं के मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नता के आधार
(Bases of Individual Difference)

व्यक्तिगत भिन्नता के निम्नलिखित आधार हैं-

  1. शारीरिक रचना- शरीर की रचना के आधार पर हम व्यक्तिगत भिन्नता निश्चित करते हैं। शरीर रचना की दृष्टि से लम्बे, नाटे, मोटे, पतले आदि व्यक्ति होते हैं। रंग-रूप में भी भिन्नता पायी जाती है।
  2. मानसिक योग्यताएँ- बुद्धि, स्मृति तथा उपलब्धि परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि व्यक्तियों में काफी अन्तर पाया जाता है। कोई निम्न बुद्धि का, कोई तीव्र बुद्धि का, अधिकतर सामान्य बुद्धि के होते हैं। कुछ शिल्पी, कुछ दार्शनिक तो कुछ वैज्ञानिक होते हैं।
  3. रुचि-पढ़ने- लिखने, खाने-पीने, वस्त्र-आभूषण पहनने, खेलने-कूदने आदि में लोग भिन्न रुचि रखते हैं। इस आधार पर भी व्यक्तिगत भिन्नता का निर्धारण किया जाता है।
  4. सीखना- सीखने के आधार पर भी व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है। कोई जल्दी सीखता है, तो कोई देर से सीखता है। यही नहीं कोई व्यक्ति त्रुटिरहित ढंग से सीखता है जबकि कोई व्यक्ति सीखने में अधिक त्रुटियाँ करता है।
  5. व्यक्तित्व- व्यक्तित्व के लक्षणों के आधार पर कोई रूढ़िवादी विचार का, कोई ईमानदार, कोई प्रचारक, कोई परिश्रमी, कोई आलसी, कोई सामाजिक और कोई अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाला कहा जाता है।
  6. क्षमता व उपलब्धि- इसके आधार पर कोई वैज्ञानिक, कोई कवि, कोई चित्रकार, कोई संगीतज्ञ, कोई अधिक या कोई कम उपलब्धि वाला होता है।
  7. स्वभाव के आधार पर- कुछ क्रोधी, कुछ प्रसन्नचित्त, कुछ चिड़चिड़े या लड़ाकू होते हैं।
  8. विशिष्टता- ऐसा देखने में आता है कि कोई बालक सभी विषयों में अच्छा होते हुए भी भाषा में कमजोर हो सकता है। इसके विपरीत कोई अन्य बालक गणित में तेज होते हुए भी कला में कमजोर हो सकता है। यह भिन्नता विशिष्टता पर आधारित है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भेद के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
या
व्यक्तिगत भेद कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
व्यक्ति के समस्त पक्षों में पायी जाने वाली भिन्नताओं के आधार पर ही व्यक्तिगत भेदों के प्रकारों का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार व्यक्तिगत भिन्नता या भेद के मुख्य प्रकार हैं-शारीरिक भिन्नता, बौद्धिक भिन्नता, मानसिक भिन्नता, स्वभावगत भिन्नता, सामाजिकता-सम्बन्धी भिन्नता, सीखने की क्षमता सम्बन्धी भिन्नता, रुचि की भिन्नता, अभिरुचि की भिन्नता, चारित्रिक भिन्नता, ज्ञानात्मक भिन्नता तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी भिन्नता।

प्रश्न 2
व्यक्तिगत भिन्नता के मापन के लिए अपनायी जाने वाली परीक्षण विधि का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
विभिन्न परीक्षण व्यक्ति के विभिन्न गुणों को मापते हैं; जैसे-शारीरिक परीक्षण शरीर सम्बन्धी गुणों को मापते हैं। बुद्धि परीक्षण बुद्धि को मापते हैं। क्षमता परीक्षण विशिष्ट योग्यताओं को मापते हैं। उपलब्धि परीक्षण विभिन्न विषयों के ज्ञान को मापते हैं। संवेग परीक्षण व्यक्ति के संवेगों का मापन करते हैं। निदानात्मक परीक्षण व्यक्ति की विषय सम्बन्धी कमजोरियों को परखते हैं। अभिवृत्ति परीक्षण विशेष प्रवृत्तियों की जाँच करते हैं। रुचि परीक्षण विभिन्न कामों में व्यक्ति की रुचि को बताते हैं। व्यक्तित्व परीक्षण व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावात्मक गुणों तथा लक्षणों का मापन करते हैं।

प्रश्न 3
व्यक्तिगत भिन्नताओं के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली विधि व्यक्ति-इतिहास विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नताओं के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि व्यक्ति-इतिहास विधि’ भी है। यह विधि मुख्य रूप से समस्यात्मक बालकों के व्यक्तित्व सम्बन्धी अध्ययनों के लिए अपनायी जाती है। इस अध्ययन विधि के अन्तर्गत व्यक्ति-विशेष से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं; यथा-उसका शारीरिक स्वास्थ्य, संवेगात्मक स्थिरता, सामाजिक जीवन आदि। व्यक्ति के भूतकालीन जीवन के अध्ययन द्वारा उसकी वर्तमान मानसिक व व्यावहारिक संरचना को समझने का प्रयास किया जाता है। इन सूचनाओं को इकट्ठा करने में व्यक्ति-विशेष के माता-पिता, अभिभावक, सगे-सम्बन्धी, मित्र-पड़ोसी तथा चिकित्सकों से सहायता ली जाती है। इन सभी सूचनाओं, बुद्धि परीक्षण तथा रुचि परीक्षण के आधार पर व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति के वर्तमान व्यवहार की असामान्यताओं के कारणों की खोज उसके भूतकाल के जीवन से करने में व्यक्ति-इतिहास विधि उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 4
व्यक्तिगत भिन्नताओं के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली भेंट या साक्षात्कार विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नताओं को ज्ञात करने के लिए भेट या साक्षात्कार विधि को भी अपनाया जाता है। व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की यह विधि सरकारी नौकरियों में चुनाव के लिए सर्वाधिक प्रयोग की जाती है। भेंट या साक्षात्कार के दौरान परीक्षक परीक्षार्थी से प्रश्न पूछता है और उसके उत्तरों के आधार पर उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है। बालक के व्यक्तित्व का अध्ययन करने के लिए उसके अभिभावक, माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों आदि से भी भेंट या साक्षात्कार किया जा सकता है। इस विधि का सबसे बड़ा दोष आत्मनिष्ठता का है। थोड़े से समय में किसी व्यक्ति विशेष के हर पक्ष से सम्बन्धित प्रश्न नहीं पूछे जा सकते और अध्ययन किये गये विभिन्न व्यक्तित्वों की पारस्परिक तुलना भी नहीं की जा सकती है। इस विधि को अधिकतम उपयोगी बनाने के लिए एक निर्धारित मान का प्रयोग किया जाना चाहिए तथा प्रश्न व उनके उत्तर पूर्व-निर्धारित हों ताकि साक्षात्कार के दौरान समय एवं शक्ति की बचत हो।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भिन्नता से क्या आशय है ?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता का आशय एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से रूप-रंग, शारीरिक गठन, बुद्धि, विशिष्ट योग्यताओं, रुचियों, उपलब्धियों, स्वभाव तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों में पायी जाने वाली भिन्नता से है।

प्रश्न 2
व्यक्तित्व भिन्नता के चार मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तित्व भिन्नता के चार मुख्य आधार हैं-

  1. शारीरिक रचना
  2. मानसिक योग्यताएँ
  3. रुचियाँ तथा
  4. क्षमता एवं उपलब्धि

प्रश्न 3
व्यक्तिगत भिन्नताओं के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता के मुख्य कारण हैं-

  1. वंशानुक्रम या आनुवंशिकता
  2. वातावरण
  3. लिंग-भेद तथा
  4. आयु तथा बुद्धि का प्रभाव

प्रश्न 4
व्यक्तिगत भिन्नता का शिक्षा से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
बालक की शिक्षा की व्यवस्था उसके व्यक्तिगत गुणों के अनुसार ही होनी चाहिए।

प्रश्न 5
व्यक्तिगत भिन्नता को जानने की प्रमुख विधि कौन-सी है ?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता को जानने की प्रमुख विधि है-परीक्षण विधि।

प्रश्न 6
व्यक्तिगत भिन्नता की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार शिक्षक का मुख्य दायित्व क्या है?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार शिक्षक का दायित्व है कि वह कक्षा के प्रत्येक छात्र के प्रति व्यक्तिगत रूप से ध्यान दे।

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. प्रकृति ने समस्त मनुष्यों को एकसमान बनाया है।
  2. यह सत्य है कि इस जगत् में कोई दो व्यक्ति पूर्ण रूप से समान नहीं हैं।
  3. व्यक्तिगत भिन्नता पर न तो आनुवंशिकता का कोई प्रभाव पड़ता है और न ही वातावरण का।
  4. व्यक्तिगत भिन्नता की अवधारणा ने शिक्षा की व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किये हैं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
वैयक्तिक विभिन्नताओं का जनक किसे माना गया है ?
(क) टेलर को
(ख) गाल्टन को
(ग) थॉर्नडाइक को
(घ) टरमन को

प्रश्न 2.
‘मनोमिति’ किस विज्ञान की शाखा है ?
(क) मनोविज्ञान
(ख) शिक्षा मनोविज्ञान
(ग) पर्यावरण विज्ञान
(घ) बाल मनोविज्ञान

प्रश्न 3.
वैयक्तिक विभिन्नता का प्रमुख आधार है
(क) आर्थिक स्थिति
(ख) सामाजिक स्थिति
(ग) वंशानुक्रम
(घ) बौद्धिक श्रेष्ठता

प्रश्न 4.
वैयक्तिक विभिन्नता का कारण है:
(क) वंशानुक्रम
(ख) पृथ्वी
(ग) आसमान
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
“बालकों की विभिन्नताएँ, प्रेरणा, बुद्धि, परिपक्वता, वातावरण सम्बन्धी उद्दीपकों की विभिन्नता का परिणाम होती हैं।” यह किसका मत है ?
(क) गैरीसन को
(ख) जर्सील्ड का
(ग) गिलफोर्ड का
(घ) थॉर्नडाइक को

प्रश्न 6.
सर्वप्रथम व्यक्तित्व के चार अर्थ किसने बताए?
(क) आगस्टाइन ने
(ख) सिसरो ने
(ग) अरस्तू ने
(घ) प्लेटो ने

प्रश्न 7.
“व्यक्तित्व उन मनोशारीरिक अवस्थाओं का गत्यात्मक संगठन है, जो किसी व्यक्ति का उसके पर्यावरण के साथ अनूठा समायोजन स्थापित करते हैं।” यह परिभाषा किसने दी है ?
(क) मन ने
(ख) ड्रेवर ने
(ग) आलपोर्ट ने
(घ) मार्टन प्रिन्स ने

प्रश्न 8.
व्यक्तित्व का सर्वप्रथम वर्गीकरण किसने किया ?
(क) हिप्पोक्रेटीज ने
(ख) कैमरर ने
(ग) थॉर्नडाइक ने
(घ) कार्ल यंग ने

प्रश्न 9.
मानव प्रकृति के आधार पर किस विद्वान् ने व्यक्तित्व के तीन प्रकार बताए हैं ?
(क) कैटेल ने
(ख) टरमन ने
(ग) कार्ल यंग ने
(घ) जुड ने

प्रश्न 10.
वैयक्तिक भिन्नता की अवधारणा ने किस शिक्षण-विधि को जन्म दिया है?
(क) कक्षा शिक्षण-विधि को
(ख) डाल्टने विधि को
(ग) सामूहिक शिक्षा-विधि को
(घ) व्यक्तिगत शिक्षा-विधि को

प्रश्न 11.
व्यक्तिगत भेद के कारण हैं
(क) वंशानुक्रम और वातावरण
(ख) वातावरण और आदत
(ग) वंशानुक्रम और रुचि
(घ) आदत और रुचि

प्रश्न 12.
जन्मजात भिन्नता के लिए मुख्य रूप से कौन-से कारक जिम्मेदार होते हैं?
(क) समाज का प्रभाव
(ख) वंशानुक्रम
(ग) जाति एवं धर्म
(घ) पर्यावरण

प्रश्न 13.
निम्नलिखित कारण व्यक्तिगत भेद के हैं सिवाय-
(क) वंशानुक्रम
(ख) वातावरण
(ग) शिक्षा-व्यवस्था
(घ) आयु एवं बुद्धि

प्रश्न 14.
व्यक्तिगत विभिन्नता का मुख्य आधार है-
(क) वर्गवाद
(ख) धर्मवाद
(ग) वंशानुक्रम
(घ) आतंकवाद

प्रश्न 15.
व्यक्तिगत भिन्नता के प्रकार हैं
(क) शारीरिक भिन्नता
(ख) मानसिक भिन्नता
(ग) व्यक्तित्व भिन्नता
(घ) ये सभी

प्रश्न 16.
स्कूली बच्चों में व्यक्तिगत भिन्नताएँ किस रूप में पायी जाती हैं ?
(क) शारीरिक
(ख) मानसिक
(ग) रुचि सम्बन्धी
(घ) ये सभी

उत्तर:

  1. (ख) गाल्टन को
  2. (क) मनोविज्ञान
  3. (ग) वंशानुक्रम
  4. (क) वंशानुक्रम
  5. (क) गैरीसन का
  6. (ख) सिसरो ने
  7. (ग) आलपोर्ट ने
  8. (क) हिप्पोक्रेटीज ने
  9. (ग) कार्ल यंग ने
  10. (ख) डाल्टन विधि को
  11. (क) वंशानुक्रम और वातावरण
  12. (ख) वंशानुक्रम
  13. (ग) शिक्षा-व्यवस्था
  14. (ग) वंशानुक्रम
  15. (घ) ये सभी
  16. (घ) ये सभी

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