UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 6 Home or Family: As an Informal Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 6
Chapter Name Home or Family: As an Informal Agency of Education
(गृह या परिवार: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 33
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 6 Home or Family: As an Informal Agency of Education (गृह या परिवार: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रशा

प्रश्न 1.
परिवार से आप क्या समझते हैं ? एक संस्था के रूप में परिवार के शैक्षिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
“गृह बालक की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
बालक/बालिका की शिक्षा में गृह का क्या महत्त्व है ?
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में घर के महत्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में परिवार की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

गृह या परिवार का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Home or Family)

गृह या परिवार समाज का लघु रूप और सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार है। व्यक्ति का समाजीकरण परिवार के माध्यम से ही होता है। मनुष्य शिशु के रूप में परिवार में जन्म लेता है, पालित-पोषित एवं विकसित होता है। शैक्षिक प्रक्रिया के अन्तर्गत सीखने की दृष्टि से शिशु अवस्था को आदर्श काल माना गया है। इस अवस्था के विकास में गृह या परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है। नि:सन्देह परिवार, शिक्षा का प्रभावशाली अभिकरण या साधन होने के कारण बालक की शिक्षा में प्राथमिक एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री पी० वी० यंग एवं मैक का विचार है, “परिवार सबसे पुराना और मौलिक मानव-समूह है। पारिवारिक ढाँचे का विशिष्ट स्वरूप एक समाज से दूसरे समाज में भिन्न हो सकता है और होता है, पर सब जगह परिवार के मुख्य कार्य हैं-बच्चे का पालन करना और उसे समाज की संस्कृति से परिचित कराना–सारांश में उसका समाजीकरण करना।”

सामाजिक संगठनों में सर्वाधिक प्राचीन तथा प्रमुख संगठन ‘परिवार’ है। यह समाज की एक महत्त्वपूर्ण इकाई है और सबसे अधिक मौलिक सामाजिक समूह भी है। एकांकी परिवार में सामान्यत: पति-पत्नी और उनके बच्चे होते हैं, जब कि संयुक्त परिवार में पति या पत्नी के माता-पिता, उनके अन्य भाई-बहन या दो-तीन पीढ़ियों के सदस्य एक साथ मिलकर रहते हैं।

‘परिवार’ शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Family’ शब्द ‘Famulus’ से बना है, जिसका अर्थ है’Servant’ नौकर। यही कारण है कि कुछ प्राचीन समाजों में नौकरों को भी परिवार का ही सदस्य माना जाता था।

गृह या परिवार की निम्नलिखित परिभाषाएँ इसके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं|

  1. क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम सम्बन्धों की वह व्यवस्था समझते हैं, जो माता-पिता और उनकी सन्तानों के बीच पायी जाती है।”
  2. मैकाइवर तथा पेज के मतानुसार, “परिवार उस समूह का नाम है जिसमें स्त्री-पुरुष का यौन सम्बन्ध पर्याप्त निश्चित हो और इनका साथ इतनी देर तक रहे जिससे सन्तान उत्पन्न हो जाए और उसका पालन-पोषण भी किया जाए।
  3. बील्स तथा हाइजर के कथनानुसार, “संक्षेप में, परिवार को सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके सदस्य रक्त सम्बन्धों द्वारा बँधे रहते हैं।”

संस्था के रूप में परिवार का शैक्षिक महत्त्व
(Educational Importance of Family as Institution)

परिवार सदैव ही बालक पर अपना स्थायी प्रभाव छोड़ता है। बालक का जन्म, विकास और समाजीकरण परिवार से ही शुरू होता है। उसकी आधारभूत आवश्यकताएँ भी घर या परिवार से ही पूरी होती हैं। परिवार के वातावरण का प्रभाव बालक के विकास के सभी स्तरों पर पड़ता है। लॉरी का कथन है, “शैक्षिक इतिहास । के सभी स्तरों पर परिवार बालक की शिक्षा का प्रमुख साधन है।” अधिकांशत: बालक वैसा ही बनता है, जैसा उसका परिवार उसे बनाना चाहता है। अपने परिवार के सदस्यों का अनुकरण करके ही बच्चे अच्छे या बुरे गुण सीखते हैं। एक ओर जहाँ शिवाजी मराठा, गोपालकृष्ण गोखले, महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक आदि महापुरुषों का सदाचरण अपने परिवार की आदर्श पृष्ठभूमि पर आधारित था, वहीं दूसरी ओर एच० सी० एण्डरसन यह भी प्रमाण देते हैं, “हमारे अपराधियों में से 80 प्रतिशत अपराधी असहानुभूतिपूर्ण परिवारों से आते हैं।’

बालक की शिक्षा के सन्दर्भ में समाज की मौलिक संस्था परिवार का महत्त्व निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है–

1. शिक्षा की प्राचीनतम संस्था- प्राचीन समय में बालक के संस्था के रूप में परिवार का लालन-पालने, विकास तथा शिक्षा-दीक्षा के लिए परिवार ही शैक्षिक महत्त्व उत्तरदायी था। प्रागैतिहासिक काल से लेकर ईसा की, दसवीं सदी पूर्व शिक्षा की प्राचीनतम संस्था तक भारत में बालकों को व्यवस्थित रूप से शिक्षा देने के लिए परि विद्यालय नहीं थे, तब परिवार और विद्यालय अलग-अलग नहीं थे, अच्छी आदतों की शिक्षा और शिक्षा का कार्य परिवार द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था। वस्तुतः उस समय परिवार ही विद्यालय था और माता-पिता गुरुजन। वैदिक व्यक्तित्व एवं संस्कृति का तथा उपनिषद् काल में परिवार का नेता अपने पुत्रों को वेद, साहित्य, विकास धर्म, व्यवसाय, कृषि, व्यापार आदि का ज्ञान देता था। इस प्रकार शिक्षा , व्यावसायिक शिक्षा का केन्द्र की प्राचीनतम संस्था के रूप में परिवार का बड़ा महत्त्व था।

2. परिवार का आश्रय एवं अनुकरण- मानव-शिशु जन्म से असहाय होता है। अपनी विभिन्न क्रियाओं; जैसे–खाना-पीना, चलना-फिरना, बोलना तथा जीवन के बहुत-से कार्यों के लिए बालक माता-पिता पर निर्भर करता है। वह इन सभी क्रियाओं को परिवारजनों के अनुकरण द्वारा ही सीखता है। इस भाँति, आश्रय एवं अनुकरण की दृष्टि से बालक के जीवन में परिवार का सर्वोपरि स्थान है।

3. अच्छी आदतों की शिक्षा- बालक को अच्छी आदतों की शिक्षा अपने घर-परिवार से ही मिलती है। परिवार के बीच में रहकर ही वह सत्य, न्याय, प्रेम, दया, करुणा तथा श्रम का महत्त्व सीखता है। इस बारे में। रेमॉण्ट का यह कथन उल्लेखनीय है, “घर ही वह स्थान है, जहाँ वे महान् गुण उत्पन्न होते हैं, जिनकी सामान्य विशेषता ‘सहानुभूति’ है। घर में ही घनिष्ठ प्रेम की भावनाओं का विकास होता है। यहीं बालक उदारता एवं अनुदारता, नि:स्वार्थ एवं स्वार्थ, न्याय एवं अन्याय, सत्य एवं असत्य, परिश्रम एवं आलस्य में अन्तर सीखता है। यहीं उसमें इनमें से कुछ की आदत सबसे पहले पड़ती है।” अच्छी आदत सिखाने की दृष्टि से परिवार का बहुत महत्त्व है।

4. बालक का समाजीकरण- सामाजिक दृष्टि से परिवार में ही बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। परिवार बालक को समाज की आवश्यकताओं के अनुसार ढालता है। समाज में रहने-सहने, व्यवहार करने, सम्बोधन, जीवन-यापन एवं प्रतिक्रियाएँ करने के तरीके परिवार से ही सीखे जाते हैं। परिवार बालक के समाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।

5. व्यक्तित्व एवं संस्कृति का विकास- परिवार बालक के व्यक्तित्व एवं संस्कृति का निर्माता एवं ” पोषक है। व्यक्तित्व के प्रारम्भिक तथा मौलिक गुणों का निर्माण परिवार से होता है और मानव के व्यक्तित्व का परिचय परिवार की संस्कृति से प्राप्त होता है। सदरलैण्ड और वुडवर्थ ने लिखा है, “वास्तव में परिवार व्यक्तित्व के सामान्य प्रकार पर छाप लगा देता है। परिवार के अच्छे और बुरे संस्कारों का भी पर्याप्त प्रभाव बालक पर पड़ता है। जैसा कि बर्गेस और लॉक का कथन है, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली एक मौलिक समिति है और पारिवारिक परम्परा बालक को उसके प्रति प्रारम्भिक व्यवहार, प्रतिमान एवं आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

6. व्यावसायिक शिक्षा का केन्द्र- सामान्यत: परिवार ही समस्त आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र होता है। अत: अपने आरम्भिक जीवन में बालक आर्थिक दृष्टि से परिवार पर ही निर्भर करता है। आजकल उत्पादन 

का कार्य परिवार से बाहर चला गया है, किन्तु पहले यह परिवार के अन्तर्गत ही था और इसी कारण बालक के लिए व्यावसायिक शिक्षा का केन्द्र होता था। आज भी परिवार के आश्रय, प्रयासों तथा सहयोग द्वारा ही बालक आत्मनिर्भर और स्वावलम्बी बनने की शिक्षा प्राप्त करता है।

परिवार : बालकों की प्रथम पाठशाला
(Family: Child’s First School)

विश्व के सभी शिक्षाशास्त्रियों ने बालक की शिक्षा के सन्दर्भ में परिवार के महत्त्व को एकमत से स्वीकार किया है। आदि काल से आज तक बालक की शिक्षा को श्रीगणेश घर-परिवार के आँगन से होता आया है।

और परिवार की शिक्षा ने ही सदैव उसके संस्कारों पर अमिट छाप छोड़ी है। बाल-मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य के व्यक्तित्व, चरित्र, आचरण, व्यवहार, आदर्श एवं जीवन-मूल्यों का बीजारोपण उसकी शैशवावस्था में परिवार के माध्यम से होता है। मैजिनी कहते हैं, “बालक नागरिकता का सुन्दरतम् पाठ माता के चुम्बन और पिता के दुलार से सीखता है।” महात्मा गांधी की दृष्टि में, “बालक को प्रथम पाँच वर्षों में जो शिक्षा प्राप्त होती है वह फिर कभी नहीं मिलती।” मॉण्टेसरी विद्यालय को ‘बालघर’ (Children’s Home) मानते हुए शिशु शिक्षा में परिवार के वातावरण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक स्वीकार करते हैं। पेस्टालॉजी का स्पष्ट विचार है, “घर ही शिक्षा का सर्वोत्तम साधन और बालक का प्रथम विद्यालय है।”

इस भाँति, निष्कर्ष रूप में परिवार का वातावरण ही बालक का भविष्य निर्धारित करता है और कुल मिलाकर यह चित्र उभरता है कि परिवार बालकों की प्रथम पाठशाला है। इसी के समर्थन में बोगाईस के शब्द यहाँ उद्धृत करने योग्य हैं, “परिवार-समूह मानव की प्रथम पाठशाला है। प्रत्येक व्यक्ति की अनौपचारिक शिक्षा सामान्य रूप से परिवार में ही प्रारम्भ होती है। बालक की शिक्षा-प्राप्ति का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समय परिवार में ही व्यतीत होता है।”

प्रश्न 2.
परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
या
घर अथवा परिवार के शैक्षिक कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध विद्वान् ऑगबर्न तथा निमकॉफ ने परिवार के सात कार्य निर्धारित किए हैं-धार्मिक, 
आर्थिक, शैक्षिक, पारिवारिक स्थिति, प्रेम सम्बन्धी, रक्षा सम्बन्धी तथा मनोरंजन सम्बन्धी। उन्होंने इन कार्यों में शैक्षिक कार्यों को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना है। पारिवारिक शिक्षा के कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किए जा सकते हैं–

परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्य
(Main Educational Functions of Family)

1.शारीरिक विकास- शरीर का स्वास्थ्य और उसका समुचित विकास मनुष्य के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। कहते हैं स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। अतः बालक के शारीरिक स्वास्थ्य एवं विकास हेतु पौष्टिक, सन्तुलित भोजन तथा नियमित दिनचर्या को प्रबन्ध किया जाना चाहिए। परिवार बालक के शारीरिक विकास हेतु पौष्टिक भोजन, वस्त्र, मनोरंजन, व्यायाम, खेलकूद, उचित वातावरण, चिकित्सा और विश्राम आदि की व्यवस्था करता है। इसीलिए परिवार का पहला शैक्षिक उद्देश्य एवं कार्य बालक का शारीरिक विकास है।

2. मानसिक विकास- परिवार का वातावरण बालक की मानसिक शक्तियों, रुचियों और प्रवृत्तियों के निर्माण एवं विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि बालक की जिज्ञासा और कल्पना-शक्ति उसके मानसिक विकास की आधारशिला होती है। अत: परिवार का शैक्षिक दायित्व है कि वह यथोचित उत्तर के माध्यम से बालक की जिज्ञासा और उत्सुकता को शान्त करे, उनका दमन न करे। बौद्धिक विकास की दृष्टि से परिवार को भी चाहिए कि वह बालक को सर्वोत्तम एवं वांछित साहित्य सुलभ कराए। वस्तुतः बालक की निरीक्षण, परीक्षण, चिन्तन, कल्पना, विचार आदि मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण परिवार से ही शुरू हो जाता है।

3. भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास- गृह शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य बालक का भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास है। बालक में घर की सफाई तथा सौन्दर्यकरण द्वारा कलात्मक विषयों के प्रति रुचि जाग्रत की जानी चाहिए। साहित्य, संगीत और कला आदि में विशेष रुचि रखने वाले परिवार के बालकों में भावात्मकःप्रवृत्तियाँ आवश्यक रूप से मिलती हैं। इसके अलावा प्रत्येक समाज की संस्कृति के पालन, संरक्षण तथा हस्तान्तरण का पहला और सार्थक कार्य परिवार के माध्यम से ही सम्भव है। परिवार में रहते हुए बालक सहज और अनजाने ही संस्कृति को ग्रहण कर लेता है। अत: बालक के भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास हेतु घर का वातावरण सदाचरण से युक्त होना चाहिए।

4.चारित्रिक एवं नैतिक विकास- बालक के चारित्रिक एवं नैतिक विकास की आधारशिला घर-परिवार में ही रखी जाती है। बालक में शुरू से ही अनुकरण करने की आदत होती है। अत: परिवार के सदस्यों का कर्तव्य है कि वे बालक में उत्तम चरित्र और नैतिक मूल्यों के निर्माण हेतु सत्य, न्याय, प्रेम, दया, उदारता, सहानुभूति, सहिष्णुता, शिष्टाचार तथा श्रद्धा की भावना जगाएँ। सच तो यह है कि बालक के नैतिक-चरित्र की रूपरेखा विद्यालय जाने से पूर्व छोटी अवस्था में घर पर ही बन जाती है। अतः गृह-शिक्षा के माध्यम से बालक के चारित्रिक एवं नैतिक विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

5. धार्मिक शिक्षा- धार्मिक शिक्षा के अभाव में बालक का पूर्ण नैतिक-चरित्र विकसित नहीं हो सकता। एक धर्म-निरपेक्ष लोकतन्त्र परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्य होने के कारण हमारे देश में धार्मिक शिक्षा देने के लिए परिवार का शारीरिक विकास उत्तरदायित्व विशेष रूप से बढ़ गया है। घर में धर्म-ग्रन्थों को पढ़ने, मानसिक विकास धार्मिक कथाएँ सुनने, पूजा-अर्चना तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में भावात्मक एवं सांस्कृतिक सम्मिलित होने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं, जिसके फलस्वरूप विकास बालक का धर्म में विश्वास एवं आस्था दृढ़ होती है। पारिवारिक चारित्रिक एवं नैतिक विकास वातावरण से प्राप्त धार्मिक शिक्षा बालक को जीवन-पर्यन्त प्रभावित * धार्मिक शिक्षा । करती है। अतः परिवार को एक शैक्षिक उद्देश्य एवं कार्य धार्मिक आदत, रुचि एवं पसन्द का शिक्षा भी है। 

6. आदत, रुचि एवं पसन्द का विकास- बालक में सामाजिक भावना का विकास अच्छी-बुरी आदतों, रुचियों एवं पसन्दों का विकास परिवार में ही व्यावसायिक विकास होता है। घर के सदस्यों की आदतों को देखकर बालक अनजाने ही व्यक्तित्व का विकास उन्हें ग्रहण कर लेता है। घर की सुन्दर व आकर्षक वस्तुओं में उसकी रुचि अधिक होती है। इसी भाँति बालक की अलग-अलग चीजों के प्रति पसन्दगी या नापसन्दगी भी पारिवारिक वातावरण पर निर्भर करती है। अत: यह आवश्यक है कि अच्छी आदतों, रुचियों एवं पसन्दों के विकास हेतु अभिभावकगण अपने बच्चों के सम्मुख श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत करें।

7. सामाजिक भावना का विकास- परिवार एक छोटा-सा समाज है जो बालक को सामाजिक आदर्श एवं परम्पराओं के नमूने और आदर्श आचरण एवं व्यवहार के तरीके सिखाता है। परिवार के वातावरण में ही बालक को पहली बार सहयोग, सद्भावना, न्याय तथा अन्याय की अनुभूति होती है। स्पष्टतः परिवार ही बालक के सामाजिक जीवन का पहला शैक्षिक केन्द्र है, जहाँ उसमें अभीष्ट सामाजिक भावनाओं का विकास होता है।

8. व्यावसायिक विकास- गृह-शिक्षा का एक उद्देश्य एवं कार्य यह भी है कि वह बालक की व्यावसायिक रुचियों एवं अभिरुचियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर उसे उचित व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करे। वस्तुतः बालक की व्यावसायिक रुचियों व आकांक्षाओं की जितनी व्यापक जानकारी उसके परिवार के सदस्यों को हो सकती है, उतनी समाज की अन्य व्यावसायिक एवं प्रशिक्षण संस्थाओं को नहीं हो सकती। प्राचीनकाल में आयु बढ़ने के साथ-साथ बालके पैतृक व्यवसाय में हाथ बँटाकर प्रशिक्षण प्राप्त करता था और इस भाँति कुशलता प्राप्त कर लेता था।

9. व्यक्तित्व का विकास- बालक के व्यक्तित्व के शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, धार्मिक, नैतिक तथा सामाजिक आदि विभिन्न पक्षों का विकास परिवार के बीच रहकर ही होता है। बचपन में पड़ने वाले अच्छे संस्कारों का प्रभाव स्थायी होता है और यह बालक के व्यक्तित्व को सन्तुलित एवं सुन्दर बनाता है। वस्तुतः गृह शिक्षा बालक के व्यक्तित्व के भावी विकास का स्वरूप एवं दिशा निर्धारित करती है।

इस भाँति घर या परिवार ही वह प्रथम स्थान है, जहाँ बालक जीवन की अनेकानेक शिक्षाएँ ग्रहण करता है। गृह-शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य एवं कार्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है। रेमॉण्ट ने उचित  ही लिखा है, “सामान्य रूप से घर ही वह स्थान है जहाँ बालक अपनी माँ से चलना, बोलना, मैं और तुम में .. अन्तर करना और अपने चारों ओर की वस्तुओं के सरलतम गुणों को सीखता है।”

प्रश्न 3.
गृह-शिक्षा के मुख्य सिद्धान्तों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

गृह-शिक्षा के सिद्धान्त
(Principles of Home Education)

परिवार को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के लिए निम्नलिखित सामान्य सिद्धान्तों पर विचार किया जा सकता है

1. शारीरिक विकास का सिद्धान्त- बालक के शारीरिक विकास का सीखने की क्रियाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अभिभावकों को शरीर विज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए ताकि बालक के शारीरिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जा सके। शरीर वैज्ञानिक मानते हैं कि बाल-जीवन के पहले 6 वर्षों में बच्चे के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उसके सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, गृह-शिक्षा के सिद्धान्त स्वच्छ व हवादार आवास, चलने-फिरने, बोलने तथा व्यवहार के शारीरिक विकास का सिद्धान्त तौर-तरीकों पर भी ध्यान देना चाहिए। घर में बालक को शिक्षा देते समय शारीरिक विकास का सिद्धान्त अभिभावकों के लिए परमे। उपयोगी सिद्ध होता है।

2. बाल-मनोविज्ञान का सिद्धान्त- रूसो का कथन है, खेल द्वारा शिक्षा का सिद्धान्त बालक ऐसी पुस्तक है जिसे शिक्षक को आदि से अन्त तक पढ़ना पड़ता है। क्योंकि गृह-शिक्षा के सन्दर्भ में घर-परिवार के सदस्य ही शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। अत: परिवार में माता-पिता और परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों को बालमनोविज्ञान का ज्ञान अवश्य ही होना चाहिए। बाल-मनोविज्ञान के सिद्धान्त बालक की रुचियों, अभिरुचियों, आदतों, योग्यताओं, क्षमताओं, स्वभाव, भावनाओं तथा निर्माण आवश्यकताओं को समझने में अभिभावकों की भरपूर मदद करते हैं। इसके साथ ही, बाल-मनोविज्ञान का सिद्धान्त व्यावहारिक ज्ञान के सहज एवं स्वाभाविक विकास में योगदान देता है। वस्तुतः बालक की बुद्धि, मानसिक शक्तियों, प्रवृत्तियों तथा व्यक्तित्व की विशेषताओं के आधार पर ही उसकी शिक्षा की उचित व्यवस्था की जा सकती है।

3. बाल-केन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त-आधुनिक शिक्षा प्रणाली बाल-केन्द्रित शिक्षा के विचार पर आधारित है। इसका अभिप्राय यह है कि शिक्षा में अन्य तत्त्वों की अपेक्षा बालक को प्रमुखता दी जानी चाहिए। प्रायः अनुभव किया जाता है कि शिक्षा के सन्दर्भ में माता-पिता बालक की रुचि तथा अभिरुचि की अवहेलना कर अपनी ही इच्छा व आकांक्षा को थोपने का प्रयास करते हैं। इससे धन, शक्ति और समय का दुरुपयोग होता है। बाल-केन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त बालक की रुचि, योग्यता और सामर्थ्य के अनुसार ही उसकी शिक्षा के प्रबन्ध पर बल देता है। अतः अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चे को बाल-केन्द्रित शिक्षा के सिद्धान्त पर आधारित शिक्षा ही दिलाएँ।

4. क्रियाशीलता का सिद्धान्त- बच्चों में जन्म से और स्वभावतः क्रियाशीलता की प्रवृत्ति पायी जाती ” है। वे कभी भी शान्त होकर नहीं बैठते, हमेशा ही कुछ-न-कुछ करते रहते हैं। वस्तुत: बालक किसी काम को स्वयं करके शीघ्र और प्रभावशाली ढंग से सीख लेते हैं। अत: माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की क्रियाशील प्रवृत्तियों का महत्त्व समझे और उनकी रचनात्मक क्रियाओं को अधिकाधिक प्रोत्साहित करें। क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप बालक की अन्त:शक्तियों का प्रकाशन होता है। स्पष्टत: क्रियाशीलता का सिद्धान्त ‘स्वयं करके सीखने के विचार पर आधारित एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।

5. खेल द्वारा शिक्षा का सिद्धान्त- “खेल” बालक द्वारा आनन्दपूर्वक की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं का नाम है। यह बालक की एक सामान्य प्रवृत्ति है जो उसकी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच सन्तुलन बनाती हुई उसके शारीरिक व मानसिक विकास में सहायता देती है। कर्मेन्द्रियों पर आधारित बालक की समस्त क्रियाशीलता का स्वतन्त्र अभिप्रकाशन खेल के माध्यम से होता है। निश्चय ही वह खेल के द्वारा। काफी कुछ सीखता है और अपनी रचनात्मक शक्तियों का विकास करता है। अभिभावकों को चाहिए कि वे घर-परिवार के अधिकांश कार्य बच्चों से खेल द्वारा कराएँ और इस भाँति उन्हें खेल-खेल में शिक्षित करने का प्रयास करें।

6. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त-बालक के सन्तुलित व्यक्तित्व-निर्माण तथा स्वाभाविक व सर्वांगीण विकास की दृष्टि से उसे अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। इसके लिए परिवार में स्वतन्त्र वातावरण अपेक्षित है। बालक पर अनावश्यक एवं अनुचित बन्धन थोपने या अत्यधिक नियन्त्रण लगाने के फलस्वरूप उसमें हीनता की ग्रन्थियाँ बन जाती हैं और उसका व्यक्तित्व कुण्ठित हो जाता है। वह धीरे-धीरे उद्दण्ड और विद्रोही प्रकृति का बनकर अपने भावी जीवन को खराब कर लेता है। अत: गृह-शिक्षा के अन्तर्गत माता-पिता को बालकों की स्वतन्त्रता का समुचित ध्यान रखना चाहिए।

7. आत्मानुशासन का सिद्धान्त अनुशासन के सभी प्रकारों में आत्मानुशासन श्रेष्ठ है। आत्मानुशासन के अन्तर्गत बालक अपनी प्रवृत्तियों, इच्छाओं, क्रियाओं तथा निज के व्यवहार पर स्वयं ही नियन्त्रण रखने का प्रयास करते हैं। स्वशासन व स्वव्यवस्था का प्रशिक्षण मिलने पर वे आवश्यकतानुसार अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में सफलता प्राप्त करते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार परिवार में माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को छोटी-छोटी गलतियों पर डाँटने या सजा देने के बदले उन्हें प्यार से समझाएँ। परिवार के क्रियाकलापों में बालकों का सहयोग लेने की दृष्टि से उन्हें जिम्मेदारी के कुछ कार्य भी सौंपे जाने चाहिए।

8. सहानुभूति का सिद्धान्त- घर में अभिभावकों को सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार बच्चों को अपने माता-पिता के अधिक निकट लाता है। अतः बालक के प्रति घर के सदस्यों का व्यवहार हमेशा ही सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए। माता-पिता से भयभीत और अलग रहने वाले बच्चे अपने कष्टों और कठिनाइयों को उनके सामने रखने से सकुचाते हैं और परिणामस्वरूप मानसिक उलझनों व ग्रन्थियों के शिकार हो जाते हैं। सहानुभूति का सिद्धान्त बात-बात पर बच्चों को अपमानित या लांछित करने का विरोधी और उन्हें अधिकाधिक लाड़-प्यार एवं स्नेह देने का प्रबल समर्थक है।

9. निष्पक्ष व्यवहार का सिद्धान्त- माता-पिता को घर के सभी बच्चों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। पक्षपातपूर्ण व्यवहार का बालक के व्यक्तित्व एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा और प्रतिकूल असर पड़ता है। आवश्यक रूप से घर के प्रत्येक बच्चे के अच्छे कार्यों की प्रशंसा की जाए और सभी बच्चों को समान महत्त्व प्रदान किया जाए। घर के किसी बच्चे के साथ असमान व्यवहार करने में वह स्वयं को हीन एवं उपेक्षित समझने लगता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का सही विकास रुक जाता है। स्पष्टत: अभिभावकों का परम कर्तव्य है कि वे बच्चों के साथ पक्षपातरहित व्यवहार करें।

10. उत्तम चरित्र एवं आदतों का निर्माण- मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि बालक सदैव अनुकरण से सीखते हैं। परिवार के सदस्यों को देखकर वे अच्छी और बुरी आदतों का अनुकरण करते हैं। बालक के चरित्र व आदतों में ही उसके भविष्य की सफलता का रहस्य छिपा है। अत: माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि बालक में उत्तम चरित्र और श्रेष्ठ आदतों का निर्माण हो। इसके लिए बालकों के समक्ष परिवार में नैतिकता, सदाचार, स्वच्छता तथा सामाजिक जीवन के आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ।

प्रश्न 4.
गृह-शिक्षा के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

गृह-शिक्षा की विधियाँ
(Methods of Home Education)

घर-परिवार को शिशु की प्रथम पाठशाला माना जाता है। घर पर रहकर ही शिशु हर प्रकार का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त करता है। स्पष्ट है कि बच्चे की शिक्षा में घर-परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। अब प्रश्न उठता है कि गृह-शिक्षा को सुचारु एवं उत्तम बनाने के लिए किन विधियों को अपनाया जाता है। गृह-शिक्षा के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. खेल-विधि-गृह- शिक्षा में खेलों का विशिष्ट स्थान है। खेलों में बालक की जन्मजात एवं सहज रुचि होती है। खेल द्वारा आत्म-प्रकाशन का उचित अवसर मिलता है और इसके माध्यम से बच्चे अपनी सृजनात्मक प्रवृत्तियों तथा क्षमताओं का अधिकतम अभिप्रकाशन कर सकते हैं। यही नहीं, खेल बालक के. समाजीकरण का प्रभावशाली साधन भी हैं। खेल में बालक पास-पड़ोस के बच्चों के सम्पर्क में आता है और उनसे अच्छी-अच्छी बातें सीखता है। खेलों द्वारा दी गई शिक्षा सरल एवं स्वाभाविक होती है।

अतः शुरू से ही घर के बच्चों को खेल-विधि द्वारा शिक्षा देने का अधिकाधिक प्रयास करना चाहिए। माता-पिता का दायित्व है। कि वे अपने परिवार में भाँति-भाँति के खेलों का आयोजन कर बच्चों को खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। एक ओर जहाँ खेलों द्वारा बालक को मौलिकता, सहयोग, सद्भाव, भाई-चारा, परोपकार तथा आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी जा सकती है, वहीं दूसरी ओर परिवार में खेल के माध्यम से कहानियाँ, इतिहास, वर्णमाला तथा गिनती का ज्ञान भी आसानी से कराया जा सकता है। आजकल शिशुओं को मॉण्टेसरी व किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धतियों द्वारा मनोवैज्ञानिक आधार पर खेल-विधि द्वारा ही उत्तम शिक्षा दी जाती है।

2. कहानी-विधि-छोटे बच्चे कहानी सुनना पसन्द करते हैं। कहानी के माध्यम से उनकी कल्पना, विचार एवं तर्क-शक्ति का विकास होता है। पुराने जमाने से ही बड़े-बड़े लोग घर के बच्चों को धार्मिक, पौराणिक तथा शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाते आए हैं जो बालक के ज्ञान, गह-शिक्षा की विधियाँ सामाजिक व नैतिक गुणों के विकास में मदद देती हैं। कहानियाँ छोटी, रोचक और आयु के अनुसार होनी चाहिए।

3. अभ्यास-विधि-सीखने में अभ्यास का विशेष महत्त्व है।” अभ्यास-विधि बालक को कोई क्रिया सिखाने के लिए उसे बार-बार करने का अवसर देना चाहिए। इस भाँति निरन्तर अभ्यास द्वारा बालक के मानसिक विचार दृढ़ एवं स्थायी हो जाते हैं। अभ्यास-विधि केइन्द्रिय-प्रशिक्षण-विधि अन्तर्गत एक ही क्रिया को दोहराने में बालक को आनन्द आता है और वह उस कार्य को अच्छी प्रकार से सीख लेता है। गणित एवं संगीत की शिक्षा में अभ्यास-विधि अतीव उपयोगी सिद्ध हुई है। इसके अलावा मन्द बुद्धि बालकों के लिए इसे सर्वोत्तम विधि माना गया है।

4. साहचर्य-विधि-साहचर्य-विधि के अन्तर्गत बालक की “ शिक्षा-सम्बन्धी क्रियाओं को उसके ‘आनन्दमयपूर्व अनुभवों से सम्बन्धित किया जाता है। किसी कार्य को सीखने के लिए उसके प्रति बालक की रुचि जाग्रत होना आवश्यक है और आनन्ददायक कार्य या अनुभव में बालक की रुचि होना स्वाभाविक है। अत: साहचर्य विधि द्वारा बालक कार्य में रुचि प्रदर्शित कर उसे आसानी से सीख लेते हैं। बालक में सहयोग, भाईचारा, अनुशासन तथा सामाजिक गुणों का विकास करने हेतु यह विधि अत्यन्त उपयोगी है। वस्तुत: घर-परिवार में बालक साहचर्य द्वारा बहुत-से अच्छे कार्य सीख लेता है।

5. उत्तरदायित्व-विधि-जैसे- जैसे बच्चा बड़ा और समझदार होता जाता है, कहे गए कार्य को पूरा करने में आनन्द अनुभव करने लगता है। जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व की भावना बालक में उत्साह, आत्मविश्वास तथा कार्यकुशलता का विचार जाग्रत करती है। माता-पिता को चाहिए कि वे उपयुक्त अवसर जानकर बालक को छोटे-मोटे कार्य की जिम्मेदारी अवश्य सौंपे। जिम्मेदारी के काम को बालक अविलम्ब और प्रभावशाली ढंग से सफलतापूर्वक करने का प्रयास करता है। कार्य की सफलता उसे अभिप्रेरित करती है। गृह-शिक्षा के दौरान बच्चे को पहले छोटे और शनैः-शनै: बड़े कार्यों का उत्तरदायित्व सौंपना अत्यन्त हितकर ,

6. इन्द्रिय-प्रशिक्षण-विधि- बालक की ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का उसकी शिक्षा में विशेष योगदान रहता है। बालक को बाह्य जगत् की जानकारी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ही मिलती है। ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान का प्रवेश द्वार कहलाती हैं और इनकी कार्यकुशलता से वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षाशास्त्री बालक को शुरू से ही दृष्टि, स्पर्श, श्रवण, स्वाद तथा घ्राण सम्बन्धी ज्ञानेन्द्रियों का विशिष्ट प्रशिक्षण देने का परामर्श देते हैं। बालक की कर्मेन्द्रियों का विकास भी बालपन की आरम्भिक स्थिति से होना चाहिए। भाँति-भाँति की शैक्षिक प्रविधियों को प्रयोग कर बालक को शारीरिक अंगों को मस्तिष्क से सन्तुलन सिखाया जाए। इसके अलावा परिवार में विविध रंग तथा ध्वनि वाले खिलौने और शैक्षिक उपकरण होने आवश्यक हैं, जिनकी सहायता से बालक की ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के बीच मधुर सामंजस्य स्थापित किया जा सके।

7. निर्देश-विधि- बालक को कुछ जीवनोपयोगी बातों; जैसे-सदैव सत्य बोलना, बड़ों की आज्ञा मानना, सभी का आदर करना, चोरी न करना आदि का सीधे-सीधे निर्देश देना पड़ता है। माता-पिता यदि अच्छी बातों व आदर्श कार्यों को करने का बच्चों को निर्देश देंगे तो बच्चे अवश्य ही अनुकूल व्यवहार करेंगे। अत: गृह-शिक्षा में निर्देश विधि भी अत्यन्त उपयोगी है।

8.करके सीखने की विधि- जब बच्चे अपनी रुचि के अनुकूल कार्य को स्वयं करते हैं तो वे न केवल अधिक अच्छा महसूस करते हैं, बल्कि उत्साहित भी होते हैं। स्वयं या परिवार से सम्बन्धित सामान्य समस्याओं को अपने निजी प्रयास से हल करने से बालकों में आत्मविश्वास तथा अभिप्रेरणा का विकास होता है। उनमें प्रतिदिन अच्छे कार्य करने की आदत पड़ती है और वे अधिकांश कार्य सीख जाते हैं। अत: परिवार में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की जानी चाहिए, जिससे बालक स्वयं कार्य करके सीखने के लिए प्रेरित हो सके।

9. भाषा द्वारा शिक्षा- भाषा गृह-शिक्षा की एक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी विधि है। भाषा द्वारा भावनाओं को अभिव्यक्ति मिलती है। बच्चे विभिन्न ध्वनियों द्वारा अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं। यही नहीं, वे ध्वनि सुनकर उत्तेजित भी होते हैं और लगातार शब्दों की ध्वनि सुनकर पुन: उसके अनुकरण का प्रयत्न करते हैं। वास्तव में बच्चों को भाषा का ज्ञान अनुकरण द्वारा ही होता है। माता-पिता बच्चे के सम्मुख बहुत-से शब्द उच्चारित करते हैं, जिनका अनुकरण करके वह शुद्ध बोलना सीखता है। कुछ समय तक अभ्यास करके बालक का भाषा के बोलने व लिखने पर अधिकार हो जाता है। स्पष्टतः भाषा द्वारा शिक्षा परिवार के सदस्य ही प्रदान करते हैं।

10. संगीत द्वारा शिक्षा- बच्चे विशेषतः संगीत की ओर आकर्षित होते हैं और इसके परिणामस्वरूप उनके भाषा-ज्ञान में पर्याप्त वृद्धि होती है। प्रयोगों द्वारा ज्ञात हुआ है कि भाव-गीतों के साथ-साथ अभिनय से बालक का शारीरिक, मानसिक व सांवेगिक विकास होता है। किसी विषय-वस्तु को गीत रूप में याद करने में वह जल्दी ही याद हो जाती है। यही कारण है कि प्राइमरी स्तर पर शिशुओं को वर्णमाला, गिनती या पहाड़ों का ज्ञान गीतों के माध्यम से कराया जाता है। फ्रॉबेल ने अपनी किण्डरगार्टन प्रणाली में गीतों को उल्लेखनीय स्थान प्रदान किया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालक की शिक्षा में घर-परिवार के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

बालक की शिक्षा में घर-परिवार का योगदान
(Contribution of Family in Child’s Education)

बालक की शिक्षा की प्रक्रिया घर-परिवार से ही प्रारम्भ होती है। शिक्षा अपने आप में एक अत्यधिक व्यापक एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया है। शिक्षा की प्रक्रिया के प्रत्येक पक्ष में घर-परिवार का सर्वाधिक योगदान है। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि बालक को भाषा का ज्ञान परिवार द्वारा ही प्रदान किया जाता है। भाषा का ज्ञान औपचारिक शिक्षा अर्जित करने के लिए अनिवार्य शर्त है। शिक्षा के लिए शिष्टाचार एवं अच्छी आदतों की भी आवश्यकता होती है। परिवार इस कार्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार ही बालक की आदतों, रुचियों एवं कुछ अभिवृत्तियों के विकास में आधारभूत योगदान प्रदान करता है। शिक्षा के लिए बालक का शारीरिक, मानसिक, भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास भी आवश्यक होता है।

विकास के इन विभिन्न पक्षों में घर-परिवार का उल्लेखनीय योगदान होता है। शिक्षा का एक पक्ष व्यावसायिक शिक्षा भी है। बालक की व्यावसायिक शिक्षा में भी घर-परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया जाता है। पारम्परिक रूप से प्रत्येक परिवार का कोई-न-कोई पारिवारिक व्यवसाय होता था। इस दशा में परिवार के बालक स्वाभाविक रूप से ही अपने पारिवारिक व्यवसाय के प्रति उन्मुख हो जाते थे तथा उन्हें परिवार में अपने व्यवसाय का प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता था। आज भी परिवार का वातावरण बालक के व्यवसाय-वरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन सबके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि बालक की सम्पूर्ण औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था में भी परिवार का विशेष योगदान होता है।

प्रश्न 2.
घर को शिक्षा का पभावशाली अभिकरण कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर:
निःसन्देह घर-परिवार बालक की शिक्षा का एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। शिक्षा के इस अभिकरण को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है। सर्वप्रथम घर-परिवार को चाहिए कि वह बालक के शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सांस्कृतिक चारित्रिक एवं नैतिक विकास पर समुचित ध्यान दें। इसके लिए हरै सँम्भव उपाय किया जाना चाहिए। परिवार द्वारा बच्चों को समुचित धार्मिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। परिवार को बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास का ध्यान रखना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ घर-परिवार को विद्यालय के साथ पूर्ण सहयोग रखना चाहिए। वास्तव में परिवार द्वारा शिक्षा की प्रक्रिया को प्रारम्भ किया जाता है तथा विद्यालय द्वारा उसे विस्तृत रूप दिया जाता है। इस स्थिति में परिवार का सहयोग अति उपयोगी सिद्ध होता है। यदि परिवार द्वारा इन सब बातों को ध्यान में रखा जाता है तो निश्चित रूप से घर-परिवार बालक की शिक्षा का एक अधिक प्रभावशाली अभिकरण बन सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए कि परिवार ही बालक की शिक्षा की प्राचीनतम संस्था है।
उत्तर:
परिवार बालक की शिक्षा की प्राचीनतम संस्था है। आदिम काल में जब सभ्यता का कुछ भी विकास नहीं हुआ था तब भी बालक को प्रशिक्षित करने का कार्य परिवार द्वारा ही किया जाता था। बच्चों को शिकार करने, कन्द-मूल खोजने, शत्रु से मुकाबला करने के दाँव-पेंच परिवार द्वारा ही सिखाए जाते थे। वर्तमान विद्यालयों के विकास से पूर्व भी हर प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था परिवार द्वारा ही की जाती थी। स्पष्ट है कि परिवार ही बालक की शिक्षा की प्राचीनतम संस्था है।

प्रश्न 2.
बच्चों को शिक्षित करने के दृष्टिकोण से उनके प्रति माता-पिता का व्यवहार कैसा होना 
चाहिए?
उत्तर:
माता-पिता का एक मुख्य दायित्व है:-बच्चों को उचित ढंग से शिक्षित करना तथा शिक्षा की 
ओर उन्मुख करना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए माता-पिता को बच्चों के प्रति सदैव सन्तुलित एवं निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों की रुचि, योग्यता एवं क्षमता आदि को जानने का प्रयास करना चाहिए तथा उन्हीं के अनुसार बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही बच्चों की क्षमताओं एवं रुचियों को उचित दिशा में विकसित करने के भी प्रयास करने चाहिए। परिवार का कोई बच्चा यदि दुर्भाग्यवश किसी क्षेत्र में पिछड़ा हुआ हो तो उस बालक के प्रति विशेष ध्यान देना चाहिए। उसकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए तथा उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को सदैव आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करते रहे। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है। कि बच्चों को समुचित स्वतन्त्रता प्रदान करके अनुशासन में रहना सिखाया जाए।

प्रश्न 3.
स्पष्ट कीजिए कि बच्चों में मानवीय मूल्यों के विकास में परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है।
उत्तर:
बच्चों में मानवीय मूल्यों की स्थापना में परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है। बच्चा अपने पिता से न्याय, माता से नि:स्वार्थ प्रेम तथा भाई-बहनों से भ्रातृत्व-भाव की शिक्षा लेता है। जब बच्चा बड़ा होकर समझदार बनता है तो वह अपने परिवारजनों को परस्पर सहयोग देते हुए देखता है। वह इन सभी से सहयोग की शिक्षा ग्रहण करता है। बच्चा अपने घर में ही क्षमा, सच्चाई, सहानुभूति, उदारता तथा परिश्रम के महत्त्व को समझता है। इसके अतिरिक्त बच्चे अपने परिवार से ही परोपकार के मूल्य को सीखते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि बच्चों के मानवीय मूल्यों का सर्वाधिक विकास परिवार के द्वारा ही होता है।

प्रश्न 4.
गृह-शिक्षा की मुख्य विधियाँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
घर बच्चों की शिक्षा की महत्त्वपूर्ण संस्था है। घर एवं परिवार द्वारा बच्चों की शिक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। इस स्थिति में गृह-शिक्षा के अन्तर्गत विभिन्न विधियों को अपनाया जाता है। गृह-शिक्षा के लिए अपनाई जाने वाली मुख्य विधियाँ अग्रलिखित हैं

  • खेल-विधि।
  • कहानी-विधि।
  • अभ्यास-विधि।
  • साहचर्य-विधि।
  • उत्तरदायित्व-विधि।
  • इन्द्रिय-प्रशिक्षण-विधि।
  • निर्देश-विधि।
  • करके सीखने की विधि।
  • भाषा द्वारा शिक्षा।
  • संगीत द्वारा शिक्षा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया सर्वप्रथम किस संस्था द्वारा प्रारम्भ होती है ?
उत्तर:
बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया सर्वप्रथम परिवार नामक संस्था द्वारा प्रारम्भ होती है।

प्रश्न 2.
बालक की प्रथम पाठशाला कौन-सी है? ।
उत्तर:
बालक की प्रथम पाठशाला घर-परिवार है।

प्रश्न 3.
“परिवार समूह ही प्रथम मानवीय विद्यालय है, परिवार में प्रत्येक व्यक्ति की अनौपचारिक शिक्षा सामान्यतया आरम्भ होती है। बालक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समय परिवार में ही बीतता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
बोगास का।

प्रश्न 4.
“माताएँ आदर्श अध्यापिकाएँ हैं और घर द्वारा दी जाने वाली अनौपचारिक शिक्षा सबसे अधिक प्रभावशाली और स्वाभाविक है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन फ्रॉबेल का है।

प्रश्न 5.
आपके मतानुसार बच्चों के शिक्षण की प्राचीनतम संस्था कौन-सी है ?
उत्तर:
बच्चों के शिक्षण की प्राचीनतम संस्था परिवार है।

प्रश्न 6.
बच्चों के सामान्य विकास तथा व्यावहारिक शिक्षा में सर्वाधिक योगदान किसका होता है?
उत्तर:
बच्चों के सामान्य विकास तथा व्यावहारिक शिक्षा में सर्वाधिक योगदान परिवार का ही होता है।

प्रश्न 7.
“बालक नागरिकता का सुन्दरतम पाठ माता के चुम्बन और पिता के दुलार से सीखता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन मैजिनी का है। प्रश्न 8 आपके विचार से गृह-शिक्षा किस प्रकार की होनी चाहिए? उत्तर हमारे विचार से गृह-शिक्षा बाल-केन्द्रित होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
बच्चों को उत्तरदायित्व वहन करने की शिक्षा किस प्रकार से दी जा सकती है?
उत्तर:
बच्चों को छोटे-छोटे घरेलू कार्य सौंपकर उत्तरदायित्व वहन करने की शिक्षा प्रदान की जा सकती है।

प्रश्न 10.
गृह-शिक्षा के अन्तर्गत बच्चे विभिन्न कार्यों को सर्वाधिक किस विधि द्वारा सीखते हैं ?
उत्तर:
गृह-शिक्षा के अन्तर्गत बच्चे विभिन्न कार्यों को करना सर्वाधिक अनुकरण विधि द्वारा सीखते हैं।

प्रश्न 11.
बच्चों के नैतिक विकास के लिए गृह-शिक्षा के अन्तर्गत किस विधि को अपनाना चाहिए?
उत्तर:
कहानी विधि को अपनाकर बच्चों का समुचित नैतिक विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
परिवार बच्चे को शिक्षा देता है—
(i) औपचारिक,
(i) अनौपचारिक।
उत्तर:
परिवार बच्चे को अनौपचारिक शिक्षा देता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. गृह बच्चों की प्रथम पाठशाला है।
  2. गृह शिक्षा का एक औपचारिक अभिकरण है।
  3. परिवार बच्चों की शिक्षा का एक निष्क्रिय अभिकरण है।
  4. बालक का समाजीकरण परिवार में नहीं होता है।
  5. बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव माता का पड़ता है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-
प्रश्न 1.
बालक की शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है
(क) मित्र-मण्डली
(ख) परिवार
(ग) पास-पड़ोस
(घ) धार्मिक स्थल

प्रश्न 2.
गृह यो परिवार शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) सक्रिय अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 3.
बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक तथा सांस्कृतिक विकास में सर्वाधिक योगदान किया जाता है
(क) प्राथमिक विद्यालय द्वारा
(ख) मित्रों एवं साथियों द्वारा
(ग) परिवार द्वारा।
(घ) राज्य द्वारा

प्रश्न 4.
गृह अथवा परिवार का शैक्षिक दायित्व या कार्य नहीं है
(क) दैनिक जीवन से सम्बन्धित शिक्षा प्रदान करना
(ख) शारीरिक, मानसिक एवं धार्मिक विकास में योगदान देना।
(ग) शैक्षिक योग्यता एवं अर्जित ज्ञान का प्रमाण-पत्र प्रदान करना
(घ) उपर्युक्त सभी कार्य

प्रश्न 5.
बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करते समय अभिभावकों को ध्यान रखना चाहिए
(क) बच्चों को न तो कठोर अनुशासन में रखना चाहिए और न ही पूर्ण स्वतन्त्रता देनी चाहिए
(ख) शिक्षा सदैव बच्चों की रुचि, योग्यता तथा क्षमता के अनुसार हो
(ग) परिवार को बच्चों के प्रति कोई पक्षपात या पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए
(घ) उपर्युक्त सभी बातें.

प्रश्न 6.
परिवार द्वारा बच्चों को दी जाती है
(क) आज्ञापालन एवं कर्तव्यपालन की शिक्षा
(ख) सहयोग एवं अन्य सद्गुणों की शिक्षा
(ग) शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों की शिक्षा
(घ) उपर्युक्त सभी प्रकार की शिक्षा

प्रश्न 7.
गृह-शिक्षा के लिए अपनाई जाती है
(क) अनुकरण विधि
(ख) निर्देश विधि
(ग) उत्तरदायित्व विधि
(घ) उपर्युक्त सभी विधियाँ

प्रश्न 8.
गृह-शिक्षा की उस विधि को क्या कहते हैं जिसके अन्तर्गत बालक परिवार के अन्य सदस्यों को देखकर किसी कार्य को करना सीख लेते हैं?
(क) अभ्यास विधि
(ख) निर्देश विधि।
(ग) उत्तरदायित्व विधि
(घ) अनुकरण विधि

प्रश्न 9.
“घर ही शिक्षा का सर्वोत्तम साधन और बालक का प्रथम विद्यालय है।”यह कथन किसका है?
(क) पेस्टालॉजी
(ख) बोगास
(ग) फ्रॉबेल
(घ) महात्मा गांधी

प्रश्न 10.
समाज की कौन-सी प्रथम शिक्षा संस्था है?
(क) पुस्तकालय
(ख) गृह
(ग) विद्यालय
(घ) संग्रहालय

उत्तर:

  1. (ख) परिवार,
  2. (ख) अनौपचारिक अभिकरण,
  3. (ग) परिवार द्वारा,
  4. (ग) शैक्षिक योग्यता एवं अर्जित ज्ञान का प्रमाण-पत्र प्रदान करना,
  5. (घ) उपर्युक्त सभी बातें,
  6. (घ) उपर्युक्त सभी प्रकार की शिक्षा,
  7. (घ) उपर्युक्त सभी विधियाँ,
  8. (घ) अनुकरण विधि,
  9. (क) पेस्टालॉजी,
  10. (ख) गृह।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 5 Agencies of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 5
Chapter Name Agencies of Education (शिक्षा के अभिकरण)
Number of Questions Solved 36
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 5 Agencies of Education (शिक्षा के अभिकरण)

विस्तृत उत्तरीय प्रज

प्रश्न 1.
शिक्षा के अभिकरण (साधन) से क्या आशय है ? शिक्षा के अभिकरणों का एक व्यवस्थित
या
वर्गीकरण प्रस्तुत करते हुए औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
शिक्षा के औपचारिक साधन कौन-कौन से हैं?
या
शिक्षा के ‘औपचारिक’ एवं ‘अनौपचारिक’ अभिकरण का क्या तात्पर्य है?
या
शिक्षा के अनौपचारिक साधन कौन-कौन से हैं?
या
‘शिक्षा के अभिकरणों (साधनों) का वर्गीकरण’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:

शिक्षा के अभिकरण (या साधन) का अर्थ
(Meaning of the Agencies of Education)

प्राचीनकाल से ही समाज ने शिक्षा को क्रियान्वित करने के लिए अर्थात् यथार्थ में लागू करने के लिए विभिन्न संस्थाओं को अपनाकर उनका विकास किया है, इन्हीं संस्थाओं या माध्यमों को शिक्षा के अभिकरण (या साधन) कहा जाता है। अभिकरण या साधन अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘Agency’ का हिन्दी रूपान्तर है जो स्वयं Agent’ से बना है। ‘Agent’ का अर्थ ‘प्रतिनिधि’ या कार्यकर्ता’ या ‘साधन’ है। वस्तुतः ‘Agent’ से हमारा अभिप्राय उस व्यक्ति या संस्था से होता है जो कोई कार्य करता है या प्रभाव डालता है।

शिक्षा के अभिकरण या साधन के अन्तर्गत वे सभी तत्त्व, कारक, स्थान अथवा संस्थाएँ आ जाती हैं जो किसी-न-किसी प्रकार से शिक्षा प्रदान करती हैं या बालक को सीखने में सहायता देती हैं। सर गॉडफ्रे थामसन के अनुसार, “व्यापक अर्थ में सम्पूर्ण वातावरण व्यक्ति की शिक्षा का साधन है, पर इस वातावरण में कुछ तत्त्व अधिक महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे–घर, विद्यालय, चर्च, प्रेस, व्यवसाय, सार्वजनिक जीवन, मनोरंजन और प्रिय कार्य।” शिक्षा के अभिकरणों की विविधता या अनेकता को स्पष्ट करते हुए रेमॉण्ट ने लिखा है, “अध्यापक ही केवल शिक्षक नहीं होता, केवल स्कूल या कॉलेज ही शिक्षण संस्थाएँ नहीं हैं, वरन् ऐसी कई अन्य संस्थाएँ हैं, जिनका प्रभाव शैक्षिक होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिक्षा की प्रक्रिया में सहयोग देने वाले समस्त कारक शिक्षा के अभिकरण ही हैं।

शिक्षा के साधनों का वर्गीकरण
(Classification of the Agencies of Education)

शिक्षा के समस्त अभिकरणों या साधनों को सामान्य रूप से चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है

  • शिक्षा के औपचारिक साधन,
  • शिक्षा के अनौपचारिक साधन,
  • शिक्षा के सक्रिय साधन तथा
  • शिक्षा के निष्क्रिय साधन।।

शिक्षा के औपचारिक साधन
(Formal Agencies of Education)

शिक्षा के औपचारिक साधनों को सविधिक साधन भी कहते हैं। ये वे साधन हैं जो समाज द्वारा निर्मित तथा विशेष रूप से शिक्षा हेतु निर्धारित एवं निर्दिष्ट किए जाते हैं। औपचारिक साधनों द्वारा शिक्षा का कार्य एक निश्चित योजना के अनुसार होता है। इनका प्रयोग बालक के आचरण को रूपान्तरित करने के लिए किया जाता है। इनके निश्चित नियम होते हैं और इनकी देखभाल भी प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा की जाती है। शिक्षा सम्बन्धी सभी कार्यक्रम; जैसे-उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, नियम तथा व्यवस्था आदि की योजना पहले से ही तैयार कर ली जाती है।
ब्राउन ने अपनी पुस्तक ‘शिक्षा-समाजशास्त्र में शिक्षा के निम्नलिखित औपचारिक साधन बताए हैं–

  • स्कूल या विद्यालय,
  • पुस्तकालय तथा वाचनालय,
  • संग्रहालय,
  • धार्मिक संस्थाएँ,
  • कला-वीथिकाएँ तथा
  • व्यायामशाला।।

शिक्षा के अनौपचारिक साधन
(Informal Agencies of Education)

शिक्षा के अनौपचारिक साधनों को अविधिक साधन भी कहा जाता है। ये वे साधन हैं जिनकी न तो कोई पूर्व-निर्धारित योजना होती है और न ही कोई सुनिश्चित नियम। इनमें विधिपूर्वक प्रवेश लेना आवश्यक नहीं होता और इनका कोई निश्चित पाठ्यक्रम भी नहीं होता। अनौपचारिक साधन बालक के आचरण का रूपान्तरण करते हैं, लेकिन यहाँ रूपान्तरण की प्रक्रिया अज्ञात, अप्रत्यक्ष व अनौपचारिक होती है। इस प्रकार ये साधन बालक को अप्रत्यक्ष तथा अज्ञात रूप से प्रभावित करते हैं। अनौपचारिक अभिकरण निजी क्रियाओं द्वारा स्वाभाविक रूप से शिक्षा प्रदान करने का कार्य करते हैं। शिक्षा के अनौपचारिक साधन निम्न प्रकार हैं

  1. घर एवं परिवार,
  2. खेल समुदाय,
  3. समाज तथा राज्य,
  4. व्यावसायिक साधन–
    • प्रेस,
    • आकाशवाणी (रेडियो),
    • दूरदर्शन (टी० बी०),
    • चलचित्र तथा
    • पत्र-पत्रिकाएँ।
  5. अव्यावसायिक साधन-
    • खेल-संघ,
    • सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ,
    • राजनीतिक संस्थाएँ,
    • प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र,
    • बालचर तथा गर्ल्स गाइड और
    • यात्राएँ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा के औपचारिक साधनों या

अभिकरणों के गुण-दोष
(Merits and Demerits of Formal Means of Education)

शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के मुख्य गुण-दोष निम्नलिखित हैंगुण-

  1. औपचारिक अभिकरणों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा लक्ष्यों के अनुसार होती है।
  2. औपचारिक अभिकरणों के अन्तर्गत शिक्षण-प्रक्रिया को पूर्व निश्चित योजनाओं के अनुसार सम्पन्न किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा सुनिश्चित तथा अत्यन्त प्रभावशाली होती है।
  3. शिक्षा के औपचारिक साधनों द्वारा कम समय में उत्तम शिक्षा प्रदान की जाती है। शिक्षा के ये साधन प्रत्यक्ष रूप से बालक के व्यक्तिगत स्वभाव को प्रभावित करते हैं।
  4. शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों के गुणों को स्पष्ट करते हुए जॉन डीवी ने कहा है, “औपचारिक शिक्षा के बिना जटिल समाज के साधनों और उपलब्धियों को हस्तान्तरित करना सम्भव नहीं है। यह एक ऐसे अनुभव की प्राप्ति का द्वार खोलता है, जिसको बालक दूसरों के साथ रहकर अनौपचारिक शिक्षा द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता।”
  5. वर्तमान समय में औपचारिक अभिकरणों द्वारा प्रदान की गई शिक्षा को ही प्रामाणिक शिक्षा माना जाता है तथा इन अभिकरणों द्वारा प्रदान किए गए प्रमाण-पत्र को ही योग्यता का एकमात्र प्रमाण माना जाता है।

दोष-शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  1. शिक्षा के औपचारिक साधन बालकों को केवल सीमित ज्ञान ही प्रदान करते हैं।
  2. शिक्षा के इन अभिकरणों में अनेक बन्धनों एवं कठोर नियमों के कारण कृत्रिमता का वातावरण होता है तथा इस वातावरण में बालक का स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता।
  3. शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों में केवल पुस्तकीय ज्ञान पर बल दिया जाता है। इन अभिकरणों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा सैद्धान्तिक अधिक तथा व्यावहारिक कम होती है। जॉन डीवी के अनुसार, “इस बात का सदैव डर रहता है कि औपचारिक शिक्षा जीवन के अनुभव से कोई सम्बन्ध न रखकर केवल विद्यालयों की विषय-सामग्री न बन जाए।”

प्रश्न 2.
शिक्षा के अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोष
(Merits and Demerits of Informal Means of Education)

गुण- 1. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों का सम्बन्ध शिक्षा के व्यापक रूप से है।

  1. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण जीवन के निकट तथा जीवन से जुड़े होते हैं। इस स्थिति में ये अभिकरण बालक के चरित्र के स्वाभाविक विकास में योगदान प्रदान करते हैं।
  2. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण अनेक हैं तथा इनसे व्यक्तियों को व्यापक तथा उचित शिक्षा प्राप्त होती है। इस शिक्षा से व्यक्ति को जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायता प्राप्त होती है।
  3. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों के माध्यम से सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त की जा सकती है तथा इस प्रकार से पूरा विश्व ही शिक्षा-प्राप्ति का क्षेत्र है। शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों के महत्त्व को जॉन

डीवी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “बालक दूसरों के साथ रहकर अनौपचारिक ढंग से शिक्षा प्राप्त करता है। और साथ रहने की प्रक्रिया ही शिक्षा प्रदान करने का कार्य करती है। यह प्रक्रिया अनुभव को विस्तृत बनाती है। और कल्पना को प्रेरित करती है। यह कथन और विचारों में शुद्धता व सजीवता लाती है। यह शैक्षिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

दोष-शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों या साधनों के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  1. अनौपचारिक अभिकरणों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की कोई पूर्व-योजना नहीं होती; अतः कभी-कभी ज्ञान प्राप्ति के अवसर कष्टदायक हो सकते हैं।
  2. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों द्वारा सीखने की प्रक्रिया में अधिक समय लगता है।
  3. इन अभिकरणों द्वारा प्रदान की आने वाली शिक्षा अव्यवस्थित होती है। इस स्थिति में बालक कुछ ऐसा ज्ञान भी अर्जित कर सकता है जो उसके लिए तथा समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
  4. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों से अर्जित की गई शिक्षा का कोई योग्यता प्रमाण-पत्र प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 3.
शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों में अन्तर
(Difference between the Formal and Informal means of Education)

शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के बीच पर्याप्त अन्तर हैं, जिन्हें निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है–

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा के सक्रिय साधनों या अभिकरणों से क्या आशय है ?
उत्तर:
शिक्षा के सक्रिय साधनं या अभिकरण (Active Agencies of Education) शिक्षा के वे अभिकरण हैं, जिनके अन्तर्गत शिक्षा पाने वाले तथा शिक्षा देने वाले दोनों ही के व्यक्तित्व एक-दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत दोनों ही एक-दूसरे पर क्रिया और प्रतिक्रिया करते हैं तथा इस भाँति दोनों के आचरण में रूपान्तरण होता है। इस वर्ग के मुख्य अभिकरण हैं-विद्यालय, परिवार, समाज, राज्य, धर्म तथा समाजकल्याण केन्द्र आदि।

प्रश्न 2.
शिक्षा के निष्क्रिय साधनों या अभिकरणों से क्या आशय है ?
उत्तर:
शिक्षा के निष्क्रिय साधन या अभिकरण (Passive Agencies of Education) शिक्षा के वे अभिकरण हैं, जिनके अन्तर्गत शिक्षा की प्रक्रिया से सम्बद्ध दो पक्षों में से केवल एक पक्ष ही प्रभावित होता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत दूसरा पक्ष सामान्य रूप से निष्क्रिय ही रहता है। शिक्षा के निष्क्रिय अभिकरण इस अर्थ में निष्क्रिय हैं। वे दूसरों को तो प्रभावित करते हैं, किन्तु स्वयं दूसरों से प्रभावित नहीं होते। यह भी कहा जा सकता है कि इस व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षा ग्रहण करने वाला तो कुछ-न-कुछ अवश्य सीखता एवं ज्ञान अर्जित करता है, परन्तु शिक्षा प्रदान करने वाला पक्ष न तो कुछ सीखता है और न ही ज्ञान अर्जित करता है। इस वर्ग के मुख्य अभिकरण हैं—रेडियो, चलचित्र, दूरदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाएँ आदि।

प्रश्न 3.
आपके विचार के अनुसार शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों ” 
में से कौन-से साधन अधिक महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के मुख्य रूप से दो प्रकार के अभिकरण माने गए हैं जिन्हें क्रमश: शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरण कहा जाता है। शिक्षा के ये दोनों ही अभिकरण अपने-अपने क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण हैं। औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता समाज की जटिलता के साथ बढ़ती जाती है। आधुनिक युग में ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी कुशलता में आशातीत वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप औपचारिक शिक्षा का काफी विस्तार हुआ है, किन्तु इस विस्तार के साथ ही प्रत्यक्ष सम्पर्क और विद्यालयी अनुभवों में अवांछनीय अन्तर होने का डर भी है। ऐसा इस कारण है, क्योंकि शिक्षा के दोनों साधनों के बीच उचित सन्तुलन नहीं रखी जा सका। किसी एक साधन को अनावश्यक रूप से महत्त्व दे दिया गया, जब कि दूसरे की उपेक्षा कर  
दी गई। वास्तव में, औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों ही साधनों को बराबर मूल्य एवं महत्त्व प्रदान किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
जन-संचार माध्यम शिक्षा के कौन-से अभिकरण हैं?
या
जन-संचार माध्यमों की क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
जन-संचार के माध्यम शिक्षा के अनौपचारिक अंभिकरण (Informal Agencies of Education) हैं। जन-संचार के मुख्य माध्यम हैं–प्रेस, आकाशवाणी, दूरदर्शन, चलचित्र, पत्र-पत्रिकाएँ आदि। आजकल इण्टरनेट भी इस क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान कर रहा है। शिक्षा के इन अभिकरणों से शिक्षा प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से न तो प्रवेश लेना पड़ता है और न ही निर्धारित नियमों का पालन करना पड़ता है। ये आजीवन शिक्षा प्रदान करने वाले अभिकरण हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि जन-संचार के माध्यम शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण हैं।

वर्तमान परिस्थितियों में जन-संचार के माध्यमों को व्यापक शिक्षा के दृष्टिकोण से अत्यधिक उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योकि इनके माध्यम से कोई भी व्यक्ति कभी भी ज्ञान अर्जित कर सकता है। ये शिक्षा के सुलभ एवं सुविधापूर्ण अभिकरण हैं। इनमें अधिक समय तथा धन भी खर्च नहीं करना पड़ता।

प्रश्न 5.
पुस्तकालय के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में पुस्तकालय के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
पुस्तकालय की उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
पुस्तकालय शिक्षा का एक औपचारिक अभिकरण है। पुस्तकालय में अनेक प्रकार की पुस्तकों का संकलन होता है। पुस्तकें ज्ञान का भण्डार होती हैं तथा असंख्य सूचनाओं का अधिकाधिक स्रोत भी। ज्ञात-प्राप्ति का इच्छुक कोई भी बालक या व्यक्ति पुस्तकालयों से अत्यधिक लाभ प्राप्त कर सकता है। निर्धन तथा ज्ञान-प्राप्ति के इच्छुक बालकों के लिए तो पुस्तकालय वरदानस्वरूप हैं। पुस्तकालय के वातावरण में गहन अध्ययन करना सरल एवं सुविधाजनक होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शिक्षा के अभिकरण’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के अभिकरण या साधनों के अन्तर्गत वे सभी तत्त्व, कारण, स्थान अथवा संस्थाएँ सम्मिलित मानी जाती हैं जो किसी-न-किसी प्रकार की शिक्षा प्रदान करती हैं या सीखने में सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 2.
व्यवस्था एवं नियमों की निश्चितता के आधार पर शिक्षा के अभिकरण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था एवं नियमों की निश्चितता के आधार पर शिक्षा के मुख्य अभिकरण हैं-

  • शिक्षा के औपचारिक अभिकरण तथा
  • शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण।।

प्रश्न 3.
शिक्षा प्रदान करने वाले तथा शिक्षा ग्रहण करने वाले पक्षों के आपसी सम्बन्धों के आधार पर शिक्षा के अभिकरणों के मुख्य रूप से कौन-कौन से प्रकार निर्धारित किए गए हैं ?
उत्तर:

  • शिक्षा के सक्रिय अभिकरण तथा
  • शिक्षा के निष्क्रिय अभिकरण।

प्रश्न 4.
शिक्षा के दो अभिकरण बताइट।
उत्तर:
शिक्षा के दो मुख्य अभिकरण हैं-घर तथा विद्यालय। घर शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है तथा विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 5.
घर-परिवार, खेल-समूह तथा मित्रमण्डली आदि को शिक्षा के किस प्रकार के अभिकरण 
माना जाता है ?
या
परिवार (गृह) शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है?
उतर:
घर-परिवार, खेल-समूह तथा मित्रमण्डली आदि को शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण माना जाता है।

प्रश्न 6 शिक्षा के किन अभिकरणों से व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित शिक्षा प्राप्त होती है?
उत्तर:
व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित शिक्षा मुख्य रूप से शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 7.
विद्यालय, पाठशाला तथा विश्वविद्यालय आदि शिक्षण-संस्थाओं को शिक्षा के किस प्रकार 
के अभिकरण माना जाता है ?
उत्तर:
विद्यालय, पाठशाला तथा विश्वविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा के औपचारिक अभिकरण माना जाता है।

प्रश्न 8.
मकतब एवं मदरसे तथा गुरुकुल शिक्षा के किस प्रकार के अभिकरण हैं ?
उत्तर:
मकतब एवं मदरसे तथा गुरुकुल शिक्षा के औपचारिक अभिकरण हैं।

प्रश्न 9.
शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र शिक्षा के किस प्रकार के अभिकरणों द्वारा प्रदान किया जाता
उत्तर:
शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 10.
शिक्षा के उन अभिकरणों को क्या कहा जाता है जिनमें शिक्षा ग्रहण करने वाले तथा शिक्षा प्रदान करने वाले दोनों पक्ष एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के इस प्रकार के अभिकरणों को शिक्षा के सक्रिय अभिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 11.
शिक्षा के उन अभिकरणों को क्या कहा जाता है जिनमें शिक्षा प्रदान करने वाला पक्ष प्रभावित नहीं होता ?
उत्तर:
इस प्रकार के अभिकरणों को शिक्षा के निष्क्रिय अभिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 12.
‘राज्य शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है?
उत्तर:
राज्य शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण का उदाहरण है।

प्रश्न 13.
‘समुदाय’ शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है ?
उत्तर:
‘समुदाय’ शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण का उदाहरण है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विद्यालय ही शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।
  2. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों का न तो कोई महत्त्व है और न ही कोई आवश्यकता।
  3. व्यावहारिक जीवन में कुशलता अर्जित करने में शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण सहायक होते हैं।
  4. संग्रहालय शिक्षा के औपचारिक अभिकरण हैं।
  5. राज्य शिक्षा का अभिकरण नहीं है।
  6. रेडियो शिक्षा का निष्क्रिय साधन है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य,
  6. सत्य।.

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
शिक्षा की किसी भी प्रकार की प्रक्रिया के परिचालन में सहायक कारकों को माना जाता है
(क) शिक्षा के अंग।
(ख) शिक्षा के अभिकरण या साधन
(ग) शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारक
(घ) विद्यालय

प्रश्न 2.
पूर्व-निर्धारित योजना, उद्देश्य एवं व्यवस्था के अनुसार शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षा के अभिकरणों को कहते हैं
(क) महत्त्वपूर्ण अभिकरण
(ख) औपचारिक अभिकरण
(ग) अनौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 3.
शिक्षा का औपचारिक उपकरण ( अभिकरण ) है ?
(क) घर
(ख) राज्य
(ग) विद्यालय
(घ) समाज

प्रश्न 4.
बालक को शिक्षा प्रदान करने वाला प्रथम या प्रारम्भिक अभिकरण है ?
(क) क्रीड़ा विद्यालय
(ख) नर्सरी स्कूल
(ग) भाई-बहन तथा मित्र
(घ) परिवार

5. “अध्यापक ही केवल शिक्षक नहीं होता, केवल स्कूल या कॉलेज ही शिक्षण संस्थाएँ नहीं हैं, वरन् ऐसी कई अन्य संस्थाएँ हैं जिनका प्रभाव शैक्षिक होता है।” यह कथन किसको है?
(क) स्वामी विवेकानन्द का
(ख) रेमॉण्ट का
(ग) फ्रॉबेल का
(घ) बी० डी० भाटिया का

प्रश्न 6.
पुस्तकालय शिक्षा का अभिकरण है
(क) औपचारिक
(ख) अनौपचारिक
(ग) औपचारिकेत्तर
(घ) सक्रिय

प्रश्न 7.
‘दूरदर्शन’ शिक्षा का किस प्रकार की अभिकरण है?
(क) सक्रिय अभिकरण
(ख) निष्क्रिय अभिकरण
(ग) औपचारिक अभिकरण
(घ) अनावश्यक अभिकरण

प्रश्न 8.
शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों की विशेषता है
(क) निश्चित नियमावली होती है।
(ख) निर्धारित पाठ्यक्रम एवं परीक्षा का प्रावधान है।
(ग) योग्यता का प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ

प्रश्न 9.
शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों की विशेषता नहीं है
(क) कोई निश्चित एवं पूर्व-र्निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं होता।
(ख) योग्यता का प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
(ग) कोई निश्चित स्थान नहीं होता।
(घ) किसी-न-किसी रूप में आजीवन सक्रिय रहते हैं।

प्रश्न 10.
गृह या परिवार शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं ?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) निरौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 11.
विद्यालय शिक्षा का अभिकरण है।
(क) अनौपचारिक
(ख) औपचारिक
(ग) निरौपचारिक
(घ) विशेष

प्रश्न 12.
शिक्षा का प्रमुख सक्रिय साधन है
(क) राज्य
(ख) धर्म
(ग) विद्यालय
(घ) सिनेमा

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन-सा शिक्षा का निष्क्रिय अभिकरण है?
(क) गिरजाघर
(ख) क्लब
(ग) विद्यालय
(घ) टेलीविजन

उत्तर:

1. (ख) शिक्षा के अभिकरण या साधन,
2. (ख) औपचारिक अभिकरण,
3. (ग) विद्यालय,
4. (घ) परिवार,
5. (ख) रेमॉण्ट का,
6. (क) औपचारिक,
7, (ख) निष्क्रिय अभिकरण,
8, (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ,
9. (ख) योग्यता को प्रमाण-पत्र दिया जाता है,
10. (ख) अनौपचारिक अभिकरण,
11.(ख) औपचारिक,
12. (ग) विद्यालय,
13. (घ) टेलीविजन।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 18 Stages of Child Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 18
Chapter Name Stages of Child Development (बाल-विकास की अवस्थाएँ)
Number of Questions Solved 55
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 18 Stages of Child Development (बाल-विकास की अवस्थाएँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था से क्या आशय है ? शैशवावस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था का अर्थ
(Meaning of Infancy)

शिशु होने की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है। जो बालक अपने आप जीवन की सभी क्रियाओं को नहीं कर पाता, उसे शिशु कहा जाता है। ऐसा बालक अपने अस्तित्व एवं विकास के लिए दूसरों पर आश्रित होता है। शाब्दिक अर्थ में शिशु एक अबोध प्राणी है, जो अपने लिए कुछ कर नहीं सकता अर्थात् दूसरों पर आश्रित रहने वाला प्राणी है। शैशवावस्था को पराश्रितता तथा असहायावस्था भी कहते हैं। क्रो और क्रो के अनुसार, “शैशवावस्था वह अवस्था है जिसमें इन्द्रिय प्रणालियाँ कार्य करने लगती हैं और शिशु रेंगना, चलना और बोलना सीखता है। सामान्य रूप से जन्म से 2-3 वर्ष की आयु तक के काल को शैशवावस्था माना जाता है। कुछ विद्वानों ने जन्म से 6 वर्ष की आयु तक के काल को शैशवावस्था माना है।

शैशवावस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Characteristics of Infancy)

शैशवावस्था में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं-

1. पराश्रयिता- जन्म से लेकर;6 वर्ष की आयु तक शिशु अपने माता-पिता एवं अन्य लोगों पर आश्रित होता है, क्योंकि डेढ़-दो वर्ष तक तो शिशु की शारीरिक स्थिति ऐसी होती है कि वह अपने आप कुछ नहीं कर सकता। बाद में भी माँ उसे साफ करती, नहलाती, धुलाती, कपड़े पहनाती तथा भोजन कराती है। अपनी रक्षा, ज्ञानार्जन एवं प्रशिक्षण के लिए शिशु अपने से बड़ों पर आश्रित होता है। आयु के बढ़ने के साथ-साथ यह पराश्रितता कम हो जाती है।

2. अपरिपक्वता- जन्म के समय शिशु सर्वथा अशक्त एवं असहाय होता है। रोने, चिल्लाने व हाथ-पैर हिलाने के अतिरिक्त वह कुछ दिन तक और कुछ नहीं कर सकता। मानसिक क्रिया करने में भी वह अशक्त रहता है। भाषा बोलने में वह असमर्थ पाया जाता है। संवेगात्मक रूप से भी वह अपरिपक्व होता है। धीरे-धीरे शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक क्षमताओं की परिपक्वता आती है।

3. अभिवृद्धि और विकास की निरन्तरता- जन्म के समय अत्यन्त अपरिपक्वता होते हुए भी शिशु में निरन्तर अभिवृद्धि और विकास होता है। उसके शरीर का आकार, ‘भार, मांसपेशियों का गठन, हड्डियों की वृद्धि एवं परिपक्वता तथा सिर से लेकर पैर तक सभी अंगों का बढ़ना और पुष्ट होना निरन्तर चलता रहता है। सम्पर्क से वह भाषा सीखता है, बीत करना जानता है और उसकी अन्य मानसिक क्रियाएँ विकसित होती रहती हैं। अपने माता-पिता, भाई-बहन, पास-पड़ोस के लोगों से प्रेम, सहानुभूति, क्रोध, घृणा आदि के संवेगों को भी वह प्रकट करता है।

4. सीखने की तीव्रता- इस अवस्था में सीखने की क्रिया तेजी से होती है। अनुभव बढ़ने के साथ भाषा का ज्ञान बढ़ता है। प्रथम. छह वर्षों में भाषा की वृद्धि तेजी से होती है और शब्द भण्डार बहुत बड़ा हो जाता है। लगभग 15 हजार शब्द वह सीख लेता है, जो आगामी 12 वर्ष की दुगुनी मात्रा होती है। चलना, फिरना, दौड़ना, लोगों के साथ व्यवहार करना, अपने विचार-भाव व्यक्त करना भी तेजी से पाया जाता है और ये सब इसी अवस्था में सीखे जाते हैं।

5. अन्य मानसिक क्रियाओं की तीव्रता- शिशु में संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, स्मरण और विस्मरण भी तीव्र गति से होता है। अवधान में चंचलता पायी जाती है और किसी एक बिन्दु पर वह बहुत थोड़ी देर तक ही ध्यान दे पाता है। तर्क का अभाव अवश्य होता है, परन्तु फिर भी मानसिक क्रियाओं में तीव्रता पायी जाती है।

6. कल्पना का बाहुल्य- शिशु काल्पनिक और वास्तविक जगत में भेद नहीं कर पाता है। इसलिए उसमें कल्पना की अधिकता पायी जाती है। खेल में, बातचीत में तथा प्रेम व्यवहार में वह कल्पना का ही प्रयोग करता है। रॉस (Ross) के अनुसार, “जीवन की विषम परिस्थितियों की चोट से अपने को बचाने की वह कोशिश करता है। इसी कारण वह कल्पनाशील होता है। झूठ भी वह कल्पना की अधिकता के कारण ही बोलता है। अज्ञानता ही इसका कारण है, जो बाद में दूर हो जाता है और वह झूठ का प्रयोग नहीं करता है।

7. एकान्तप्रियता-शिशु आरम्भ में अकेले रहना पसन्द करता है। कोई साथी न रहने पर भी वह अकेले खेलता है। वह गुड्डे-गुड़ियों को ही अपने साथी होने की कल्पना कर लेता है। धीरे-धीरे उसमें समवयस्कों के साथ खेलने की इच्छा बढ़ती है। आरम्भ से इस प्रकार वह अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाला कहा जाता है।

8. अनुकरण की प्रवृत्ति- शिशु अपने चारों ओर जो कुछ क्रिया अन्य लोगों को करते देखता है, उसे ही दोहराता है और ऐसी स्थिति में उसमें अनुकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है। खेल, बोलचाल, खाने-पीने व घरेलू काम-काज करने में शिशु की अनुकरणशीलता पायी जाती है। इसका कारण मानसिक क्षमता में कम वृद्धि होना है।

9. मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार- इस अवस्था में शिशु का व्यवहार मूल-प्रवृत्तियों को प्रभावित करता है। उसकी आवश्यकता ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। भूख लगने पर वह रोता है। मचलना, हठ करना व मनमाना कार्य करना उसके मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार हैं। उसे समाज के रीति-रिवाज, परम्परा, नियम की चिन्ता नहीं रहती है।

10. अपनी क्रियाओं की पुनरावृत्ति- प्रो० भाटिया के अनुसार-“शिशुओं में अपनी गतियों एवं ध्वनियों को दोहराने की प्रवृत्ति पायी जाती है। वास्तव में शिशु के पास कोई अन्य क्रिया करने को नहीं होती है। इसलिए वह अपनी ही क्रियाओं को दोहराता है। चारपाई पर पड़े अशक्त शिशु के लिए अपने हाथ-पैर मारने की आदत स्वाभाविक है। पड़े-पड़े वह बलबलाती रहता है।”

11. स्नेह की आकांक्षा- शिशु सभी से स्नेह पाने की आकांक्षा रखता है। वह सभी से लिपट जाता है और सभी से स्नेह पाने की कोशिश करता है। स्नेह के अभाव में वह मानसिक आघात का अनुभव करता है, उसके मन में कुण्ठाएँ उत्पन्न हो जाती हैं तथा भाव-ग्रन्थियाँ बन जाती हैं। इनका उसके व्यक्तित्व के विकास पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।

12. आत्म के प्रति विशेष प्रेम- शिशु अपने आत्म के लिए विशेष प्रेम रखता है। इस कारण वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हठ करता है। वह अपनी चीजों के लिए बहुत अधिक प्रेम रखता है और दूसरों को छूने नहीं देता। वह माता-पिता, भाई-बहने तथा अन्य सभी सम्बन्धियों को केवल अपने से सम्बन्ध रखने की इच्छा रखता है। अन्य हिस्सेदारों से वह ईर्ष्या भी रखता है। बाद में वह इस प्रेम को दूसरों के साथ बाँट लेता है।

13. संवेगशीलता की तीव्रता- शिशु में क्रोध, घृणा, आश्चर्य, प्रेम, ईष्र्या आदि संवेगों का प्रकाशन तीव्रता से होता है, लेकिन ये संवेग क्षणिक, अपरिष्कृत तथा अपरिपक्व होते हैं। इनकी अभिव्यक्ति स्वतन्त्र रूप से होती है। इसलिए शिशु स्थान, समय एवं व्यक्ति की परवाह इन्हें अभिव्यक्त करते समय नहीं करती। धीरे-धीरे वह इन पर नियन्त्रण करना सीख लेता है।

14.पर्यावरण से अनुकूलन की असमर्थता- अपनी अशक्तता के कारण शिशु अपने वातावरण के साथ अनुकूलन नहीं कर पाता है। इसी बाध्यता के कारण यदि दुर्भाग्यवश उसे समुचित संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो वह रोग ग्रस्त हो सकता है तथा परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु भी हो सकती है। सामाजिक रूप से भी वह अनुभवहीन होने के कारण समायोजन करने में समर्थ नहीं होता। इसीलिए अधिकांशत: शिशु अशिष्ट व्यवहार कर देता है।

15. इन्द्रिय संवेदनाओं की तीव्रता- शिशु अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का प्रयोग करने की तीव्र इच्छा रखता है। छोटा शिशु खिलौने को अपने मुँह में डाल लेता है और सभी चीजों को पकड़ने की कोशिश करता है। इस प्रकार वह इन्द्रिय संवेदनाओं को तीव्रता से प्रकट करती है।

16. काम-प्रवृत्ति की सुप्तता- फ्रॉयड तथा अनेक मनोविश्लेषणवादियों ने अपनी खोजों के आधार पर सिद्ध किया है कि शिशु में काम-प्रवृत्ति सुप्त होती है और इसीलिए उसका प्रकटीकरण दूसरे तरीके से होता है; जैसे-अँगूठा चूसना, मल-मूत्र त्याग करना, दुग्धपान करते समय माँ के स्तन पकड़ना आदि। इससे उसकी काम-प्रवृत्ति सन्तुष्ट होती है, परन्तु यह कथन पूर्णतया सत्य प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार मनोविश्लेषणवादियों के अनुसार पुत्र का माता के प्रति प्रेम तथा पुत्री का पिता के प्रति प्रेम भी शिशु में पाया जाता है।

17. नैतिक भावना का अभाव- मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिशु में नैतिकता की भावना नहीं होती अर्थात् वह उचित-अनुचित में अन्तर नहीं कर पाता। वह अपनी इच्छा को स्वतन्त्र रूप से प्रकट करता है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है।

प्रश्न 2
शैशवावस्था में दी जाने वाली शिक्षा का सामान्य परिचय दीजिए।
या
शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए? समझाइए।
उत्तर:

शैशवावस्था की शिक्षा
(Infancy of Education)

शैशवावस्था विकास की प्रारम्भिक अवस्था है, इसलिए इस काल को शिक्षा का आधार भी कहें तो अनुचित नहीं होगा। फ्रॉयड के अनुसार, “मनुष्य चार-पाँच वर्षों में ही जो कुछ बनना होता है, बन जाता है। इसी प्रकार एडलर ने कहा है, “शैशवावस्था सम्पूर्ण जीवन का क्रम निर्धारित कर देती हैं।” इस अवस्था की शिक्षा में हमें निम्नांकित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए|

1. शारीरिक विकास का प्रयास- माता-पिता एवं शिक्षक सभी को शिशु को स्वस्थ बनाने का विशेष प्रयत्न करना चाहिए। शिशु को सन्तुलित भोजन, उपयुक्त आवास एवं । स्वस्थ क्रियाओं के लिए अवसर देना चाहिए।

2. शिशु की क्षमताओं का ज्ञान- शिशु की शारीरिक, मानसिक ५ शारीरिक विकास का प्रयास एवं भावात्मक क्षमताओं को समझकर उसी के अनुकूल शिक्षा की क्रियाओं का आयोजन करना चाहिए। इस अवस्था में मॉण्टेसरी और किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणालियों को अपनाना चाहिए।

3. जिज्ञासा की सन्तुष्टि- माता-पिता और शिक्षक का कर्तव्य है। कि खिलौने आदि देते समय शिशु उनसे जो प्रश्न पूछे, उनका उत्तर देकर शिशु की जिज्ञासा को सन्तुष्ट करें तथा उसके मानसिक विकास में सहायता दे।

4. शारीरिक दोषों का निराकरण- शिशु के शारीरिक दोषों को दूर करने के प्रयत्न करने चाहिए, क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का विकास होता है।

5. उचित वातावरण- शिशु के समुचित विकास के लिए यह आवश्यक है कि शिशु के लिए उचित वातावरण बनाया जाए। खेल की चीजें, ज्ञानात्मक अनुभव की वस्तुएँ, स्वतन्त्र क्रिया के लिए स्थान एव अवसर देने से शिशु को उत्तम विकास होता है।

6. भावात्मक दमन से सुरक्षा- बालक की मूल-प्रवृत्तियों एवं संवेगों का दमन नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें उचित रूप में अभिव्यक्त करने के अवसर देने चाहिए।

7. भाषा का विकास- परस्पर अच्छी भाषा का प्रयोग करने से शिशु में भाषा का अच्छे ढंग से विकास होता है।

8. समाजीकरण व अच्छी आदतों का निर्माण- शिशु के साथ प्रेम, सहानुभूति व सहयोग के द्वारा व्यवहार करके उसमें भी समायोजन करने की आदत डाली जा सकती है।

9. दण्ड व भय से मुक्ति- शिशुओं के साथ दण्ड का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उन्हें किसी प्रकार का भय भी नहीं दिखाना चाहिए, अन्यथा उनमें भाव-ग्रन्थियाँ बन जाएँगी और उनका विकास अवरुद्ध हो जाएगा।

10. आदर्शों द्वारा चरित्र-निर्माण- बड़े लोगों को चाहिए कि वे शिशु के समक्ष अच्छे आदर्श उपस्थित करें। इससे शिशुओं के चरित्र का निर्माण होता है।

11. अवस्थानुकूल शिक्षा- शिशु की शारीरिक, मानसिक, भावात्मक एवं सामाजिक विशेषताओं के अनुकूल ही शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-विधि का प्रयोग करना चाहिए।

12. स्वतन्त्रता, सहानुभूति एवं सहकारिता का व्यवहार- शिशु को स्वतन्त्रता देकर उसके साथ सहानुभूति एवं सहकारिता का व्यवहार करने से उसका उत्तम विकास होता है।

13. क्रिया द्वारा शिक्षा-शिशु एक क्रिया- प्रधान प्राणी होता है। अत: उसे क्रिया द्वारा ही शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे शिशुओं को आत्म-प्रदर्शन का भी अवसर मिलता है और कर्मेन्द्रियों का भी प्रशिक्षण होता है।

14. ज्ञानेन्द्रियों का प्रशिक्षण- मॉण्टेसरी एवं किण्डरगार्टन पद्धतियों में शिशुओं को ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है। इनके शिक्षा उपकरणों तथा उपहारों का प्रयोग करके शिशु अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को प्रशिक्षित करता है।

प्रश्न 3
बाल्यावस्था से क्या आशय है ? बाल्यावस्था की मुख्य विशेषताओं का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बाल्यावस्था से आप क्या समझते हैं ? इस अवस्था में भाषा के विकास का निरूपण कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था का अर्थ
(Meaning of Childhood)

शैशवावस्था की विशेषताएँ समाप्त होते ही बाल्यावस्था का आगमन हो जाता है। बालक वह व्यक्ति होता है, जो शिशु से बड़ा होता है। हरलॉक के अनुसार, “बाल्यकाल 6 वर्ष की आयु से 11-12 वर्ष की आयु तक होता है। इस अवस्था में बालक नियमित रूप से विद्यालय जाने लगता है और सामूहिक जीवन व्यतीत करता है। इसलिए कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसे ‘विद्यालय अवस्था’ और कुछ ने ‘क्षीण बौद्धिक बाधा’ की अवस्था कहा है, जिससे आगामी वयस्क जीवन के लिए सफल प्रयास किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस अवस्था को चुस्ती की आयु’, ‘गन्दी आयु’ तथा ‘समूह आयु’ आदि नामों से भी जाना जाता है।

बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Characteristics of Childhood)

बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

1. स्थायित्व- बाल्यावस्था में प्रवेश करते ही बालक के शारीरिक और मानसिक विकास में स्थायित्व आ जाता है। यह स्थायित्व उसे शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दृढ़ बनाता है। अत: बालक मानसिक दृष्टि से प्रौढ़-सा प्रतीत होने लगता है। परन्तु यह परिपक्वता वास्तविक न होकर ‘मिथ्या परिपक्वता होती है।

2. यथार्थ जगत् से सम्बन्ध- स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “बालक अपने को अति व्यापक संसार में पाता है तथा उसके विषय में शीघ्र जानकारी प्राप्त करना चाहता है।” शैशवावस्था का काल्पनिक जगत् इस अवस्था में प्रायः समाप्त हो जाता है और बालक जीवन की यथार्थताओं में प्रवेश करता है। अब वह केवल उन वस्तुओं की ही कल्पना करता है, जो उसके यथार्थ जीवन से सम्बन्धित होती हैं।

3. मानसिक योग्यताओं का विकास- इस अवस्था में बालक की मानसिक शक्ति का तीव्रता से विकास होता है। उसकी प्रत्यक्षीकरण और संवेदना शक्ति पर्याप्त विकसित हो जाती है तथा वह किसी बात पर पर्याप्त काल तक अपना ध्यान केन्द्रित करने लगता है।

4. जिज्ञासा की तीव्रता- बाल्यावस्था में जिज्ञासा प्रवृत्ति और अधिक प्रबल हो जाती है। बालक अपने वातावरण के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने का प्रयास करता है। माता-पिता तथा शिक्षक से वह प्रश्न किया करता है-यह कैसे हुआ ? ऐसा क्यों है ? इसका अर्थ क्या है ? आदि। जिज्ञासा की तीव्रता उसके मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। माता-पिता तथा अध्यापकों का दायित्व है कि वे बालक की जिज्ञासा को शान्त करने का प्रयास करें।

5. स्मरण- शक्ति का विकास-शैशवावस्था में बालक अपने सामने के पदार्थ के विषय में ही सोचता है, परन्तु बाल्यावस्था में बालक उन वस्तुओं के विषय में भी सोच लेता है, जो कि सामने नहीं है। प्रायः 6 से 12 वर्ष के मध्य के बालक पूर्व अनुभवों को याद करने के योग्य हो जाते हैं, और भाषा भी अनुभव द्वारा ज्ञानार्जन करने के लिए सहायता देती है।

6. रचनात्मक कार्यों में रुचि- इस अवस्था में बालकों में सामाजिकता की भावना का तीव्रता से विकास होता है। शैशवावस्था में बालक प्रायः अकेले ही खेलना पसन्द करता है, परन्तु बाल्यकाल में वह अपने साथियों के साथ खेलने में विशेष आनन्द का अनुभव करता है। उसका अधिकांश समय अपने सहयोगियों के साथ व्यतीत होता है।

7. संग्रह प्रवृत्ति का विकास- बाल्यावस्था में संग्रह प्रवृत्ति विशेष रूप से क्रियाशील रहती है। बालक चाक, टिकट, गोलियाँ तथा चित्रों आदि का संग्रह करने में विशेष रुचि लेते हैं। बालिकाएँ गुड़िया, सूई, वस्तुओं के टुकड़े तथा खिलौने आदि के संग्रह में आनन्द का अनुभव करती हैं।

8. अनुकरण प्रवृत्ति का विकास- इस अवस्था के बालकों में अनुकरण प्रवृत्ति का बाहुल्य होता है। बालक अपने बड़ों की नकल करने का प्रयास करते हैं तथा उनके जैसा आचरण करने में रुचि का अनुभव करते हैं। बालिकाएँ अपनी माँ के समान खाना पकाने, झाड़ लगाने तथा साड़ी पहनने का अनुकरण करती हैं।

9. निरुद्देश्य भ्रमण की प्रवृत्ति- बर्ट (Burt) महोदय ने अनेक परीक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि 9वर्ष की आयु के बालक आवारा घूमने, कक्षा से भागने तथा आलस्य में पड़े रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं।

10. रुचियों में परिवर्तन- इस अवस्था में बालकों की रुचियों में निरन्तर परिवर्तन होते हैं। रुचियों में परिवर्तन वातावरण के आधार पर होता रहता है।

11. सामूहिक खेलों में रुचि- इस अवस्था में बालक सामूहिक खेलों में विशेष रुचि लेते हैं। बालक गिरोह बनाकर किसी पार्क या मैदान में सामूहिक रूप से खेलना पसन्द करते हैं। वे विभिन्न प्रकार के खेलों द्वारा अनुकरण का पाठ भी सीखते हैं।

12. नैतिक गुणों का विकास- तिक भावना का विकास बाल्यकाल में ही होता है। बालक उचित और अनुचित के बीच अन्तर करने लग जाता है। अब वह किसी कार्य को करने से पूर्व विचार करने लगता है। स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “आठ वर्ष के बालकों में भले-बुरे के ज्ञान का न्यायपूर्ण व्यवहार, न्यायप्रियता तथा सामाजिक मूल्यों का विकास होने लगता है।”

13. भाषा का विकास- इस अवस्था में भाषा का विकास सबसे अधिक तीव्रता के साथ होता है। बालक अब शुद्ध उच्चारण करने लगता है। शब्दों के स्थान पर अब वह वाक्यों का भी प्रयोग सफलता के साथ करता है, परन्तु भाषा में पूर्ण शुद्धता नहीं आती।

14. स्वलिंगीय प्रेम- इस अवस्था में बालक का प्रेम माता-पिता से हटकर अपने मित्रों के प्रति अधिक होता है। बालक प्रायः बालकों के साथ तथा बालिकाएँ बालिकाओं के साथ खेलना पसन्द करती हैं।

15. बहिर्मुखी व्यक्तित्व का विकास- शैशवावस्था में बालक एकान्तप्रिय होता है और वह केवल अपने में ही रुचि लेता है। इस प्रकार शैशवकाल में उसका व्यक्तित्व अन्तर्मुखी होता है, परन्तु बाल्यकाल में बालक में बाह्य जगत के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाती है और वह अन्य व्यक्तियों में रुचि लेने लग जाता है।

प्रश्न 4
बाल्यावस्था में दी जाने वाली शिक्षा के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था की शिक्षा :
(Childhood of Education)

बाल्यावस्था की किसी भी रूप में उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि यह वह अवस्था है जब कि आधारभूत दृष्टिकोणों, मूल्यों और आदर्शों का पर्याप्त सीमा तक निर्माण हो जाता है। अत: बाल्यावस्था में बालक की शिक्षा का स्वरूप निर्धारित करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष रूप से ध्यान देना आवश्यक है

1. अवस्थानुकूल शिक्षा- प्रत्येक बालक की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा अन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।

2. भाषा के ज्ञान पर बल- इस अवस्था में बालक की भाषा में विशेष रुचि होती है। अत: उसे भाषा का समुचित ज्ञान कराने की उत्तम व्यवस्था की जानी चाहिए।

3. क्रियाशील शिक्षा- बाल्यावस्था में बालक में क्रियाशीलता की प्रधानता होती है। अतः उसकी शिक्षा का आयोजन क्रियाशीलता के सिद्धान्त को ध्यान में रखकर किया जाए। किण्डरगार्टन तथा मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणालियाँ इस उद्देश्य को प्राप्त कराने में सहायक हैं। अतः अध्यापक को उनके सिद्धान्तों का अध्ययन करना चाहिए और यथासम्भव उनको प्रयोग करना चाहिए।

4. रचनात्मक प्रवृत्तियों का विकास- इस अवस्था के स बालकों में रचनात्मक कार्यों के प्रति विशेष रुचि होती है। अतः बालक की शिक्षा में हस्त-कार्यों का भी आयोजन किया जाए। बालक से गृहं उपयोगी तथा सजावट की वस्तुएँ बनवायी जा सकती हैं।

5. पाठ्यक्रम के निर्माण में सावधानी- पाठ्यक्रम के निर्माण में विशेष सावधानी रखनी चाहिए। उन विषयों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए, जो इस अवस्था के बालकों की आवश्यकताओं को पूरा करते हों। भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, चित्रकला, पुस्तक कला, काष्ठ कला तथा सुलेख, निबन्ध आदि को विशेष स्थान दिया जाए। किसी विदेशी भाषा का भी प्रारम्भ इस स्तर पर किया जा सकता है।

6. रोचक पाठ्य-सामग्री- बाल्यावस्था में बालक की रुचियों में विभिन्नता और परिवर्तनशीलता होती है। अत: पाठ्य-सामग्री का चुनाव रोचकता और विभिन्नता के सिद्धान्त के आधार पर किया जाना चाहिए। पाठ्य-पुस्तकों, साहसी गाथाओं, नाटक, वार्तालाप, हास्य प्रसंग व विभिन्न देशों के निवासियों के विवरण आदि को स्थान दिया जाना चाहिए।

7. जिज्ञासा की सन्तुष्टि- दस वर्ष की अवस्था के बालक के मस्तिष्क का पर्याप्त विकास हो जाता है। अतः उसकी जिज्ञासा प्रवृत्ति काफी तीव्र हो जाती है। वह प्रत्येक बात को समझने का प्रयास करता है और अनेक प्रश्न करता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि वह बालकों की जिज्ञासु प्रवृत्ति को सन्तोषजनक ढंग से सन्तुष्ट करे, बालक द्वारा किये गये प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दे तथा समय-समय पर उन्हें अजायबघर और चिड़ियाघर ले जाकर उनके सामान्य ज्ञान का विकास करे।

8. संवेगों की अभिव्यक्ति के अवसर- बाल्यावस्था में संवेगों का विकास तीव्रता से होता है। कोल और बुस के अनुसार, “बाल्यावस्था संवेगात्मक विकास का अनोखा काल है। अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि बालकों के संवेगों का दमन न करके यथासम्भव उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करे।

9. सामूहिक प्रवृत्ति की तृप्ति- इस अवस्था में बालक समूह में रहना अधिक पसन्द करते हैं। इस प्रवृत्ति की तृप्ति के लिए विद्यालय में सामूहिक कार्यों तथा सामूहिक खेलों का आयोजन किया जाए। विद्यालय के समारोहों का आयोजन भी बालकों के द्वारा ही कराया जाए।

10. प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार-इस अवस्था में बालक का हृदय कोमल होता है। अत: वह कठोर अनुशासन को पसन्द नहीं करता। अध्यापक का कर्तव्य है कि इस अवस्था के बालकों के साथ वह यथासम्भव उदारता, प्रेम एवं सहानुभूति का व्यवहार करे। शारीरिक दण्ड और बल-प्रयोग का बालक पर इतना अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि प्रेम और सहानुभूति की।

11. उत्तम आचरण की शिक्षा- बाल्यावस्था में बालकों को उत्तम आचरण की विशेष रूप से शिक्षा प्रदान की जाए। नमस्कार व अभिवादन की शिक्षा के साथ-साथ बालकों से उनके साथियों के जन्मदिवस पर बधाई-पत्र, उपहार आदि भिजवाएँ।

12. सामाजिक गुणों का विकास- विद्यालय में उन क्रियाओं और गतिविधियों का आयोजन किया जाए, जिससे बालकों में सामाजिकता का विकास हो सके। किलपैट्रिक के अनुसार, “बाल्यावस्था प्रतिद्वन्द्वात्मक समाजीकरण का काल है। ऐसी दशा में विद्यालय में समय-समय पर उन क्रियाओं का आयोजन किया जाए, जिनसे छात्रों में आत्म-नियन्त्रण, सहानुभूति, प्रतियोगिता, सहयोग आदि गुणों का विकास हो सके।

13. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं की व्यवस्था- बालकों की विभिन्न रुचियों की सन्तुष्टि के लिए और विभिन्न शक्तियों के प्रदर्शन के लिए विद्यालय में विभिन्न पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन करना परम ।
आवश्यक है। संगीत प्रतियोगिता, अन्त्याक्षरी, कविता पाठ, वाद-विवाद प्रतियोगिता आदि का आयोजन विद्यालय में समय-समय पर किया जाना चाहिए।

14. पर्यटन तथा स्काउटिंग की व्यवस्था- इस अवस्था में बालकों में बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर घूमने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करने के लिए पर्यटन की समय-समय पर योजनाएँ बनायी जाएँ। बालकों को ऐतिहासिक स्थलों, कल-कारखानों तथा बन्दरगाहों का भ्रमण कराया जाए। विद्यालयों में स्काउटिंग की व्यवस्था भी अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 5
किशोरावस्था से आप क्या समझते हैं ? किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख
कीजिए।
या
किशोरावस्था की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। इनकी शिक्षण व्यवस्था में किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
या
“किशोरावस्था में मानसिक विकास उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए और इस काल में होने वाले मानसिक विकास का उल्लेख कीजिए।
या
“किशोरावस्था तूफान और तनाव की अवस्था है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
किशोरावस्था को तनाव, तूफान और संघर्ष का काल क्यों कहा जाता है?
या
किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
या
किशोरावस्था क्या है? किशोरावस्था की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था का आशय
(Meaning of Adolescence)

किशोरावस्था जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण काल है। यह अवस्था 12 से 18 वर्ष तक मानी जाती है। इस अवस्था में किशोर न तो बालक होता है और न वह प्रौढ़ होता है। जरसील्ड ने किशोरावस्था की परिभाषा देते हुए लिखा है-“किशोरावस्था वह अवस्था है, जिसमें मनुष्य बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर अग्रसर होता है। ब्लयेर, जोन्स तथा सिम्पसन के अनुसार, “किशोरावस्था प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में वह काल है, जो बाल्यावस्था के अन्त से प्रारम्भ होता है तथा प्रौढ़ावस्था के आरम्भ में समाप्त हो जाता है।” बालक भावी जीवन में क्या बनेगा, इसका निर्णय बहुत कुछ किशोरावस्था में ही हो जाता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं, “किशोरावस्था में मानसिक विकास उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।”

किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Characteristics of Adolescence)

किशोरावस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। अतः यह काल परिवर्तन का काल कहलाता है। बिग्स एवं हण्ट (Bigges and Hunt) के अनुसार, “किशोरावस्था की विशेषताओं को सर्वोत्तम रूप में अभिव्यक्त करने वाला एक शब्द है-परिवर्तन। यह परिवर्तन शारीरिक; मानसिक और मनोवैज्ञानिक होता है।” किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तनों का विवरण निम्नलिखित है-

1. शारीरिक परिवर्तन- इस अवस्था में किशोरों में पर्याप्त परिपक्वता आ जाती है। यह परिपक्वता लड़कों में 16 वर्ष तथा लड़कियों में 14 वर्ष तक आ जाती है। बालक तथा बालिकाओं की ऊँचाई में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। किशोरावस्था के प्रारम्भ में लड़कियों का विकास तीव्रता से होता है, परन्तु 16 वर्ष की आयु तक बालकों का कद लड़कियों की अपेक्षा अधिक हो जाता है। भार में भी पर्याप्त वृद्धि होती है। लड़कों की आवाज में भारीपन आने लगता है। उनकी दाढ़ी, मूछों, बगल तथा गुप्तांगों पर बाल चमकने लगते हैं। किशोरियों के स्तन उभरने लगते हैं तथा रजोदर्शन का आरम्भ भी इस अवस्था में हो जाता है। ये शारीरिक परिवर्तन किशोर तथा किशोरियों के मन में हलचल उत्पन्न कर देते हैं।

2. मानसिक परिवर्तन- इस अवस्था में शारीरिक परिवर्तन के साथ-साथ मानसिक परिवर्तन भी तीव्रता से होते हैं। बालक की वृद्धि, कल्पना, विचार तथा तर्क शक्तियाँ पर्याप्त विकसित हो जाती हैं। ये परिवर्तन इतनी तीव्रता से होते हैं कि बालक को ऐसा ज्ञान होने लगता है कि मानो वह उन परिस्थितियों में लाकर खड़ा कर दिया गया हो, जिनके लिए वह पहले से तैयार नहीं था।

3. आत्म-सम्मान का विकास- किशोर का मानसिक विकास पर्याप्त हो जाने से वह बालकों के मध्य अधिक रहना पसन्द नहीं करता। यदि माता-पिता अब भी उसके साथ बालक जैसा व्यवहार करते हैं तो उसे ठेस लगती है। इस अवस्था तक उसमें आत्म-सम्मान का विकास हो जाता है और वह अपने को बालक न मानकर वयस्क मानने लगता है।

4. स्थायित्व का अभाव- किशोर में स्थायित्व और समायोजन का अभाव रहता है। उसका मन शिशु के समान ही स्थिर नहीं होता। वह कभी कुछ विचार करता है, कभी कुछ। वह वातावरण में समायोजन नहीं कर पाता।

5. कल्पना की प्रधानता- इस अवस्था में किशोर में कल्पना की प्रधानता होती है। उसकी कल्पना-शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है और उसका अधिकांश समय दिवा-स्वप्न देखने में ही व्यतीत होता है। किशोर तथा किशोरियाँ उपन्यास तथा कहानियों में विशेष रुचि लेते हैं। साहित्य रचना के बीज इस अवस्था में अंकुरित होते हैं। कल्पना की प्रधानता के कारण किशोरों की प्रवृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है।

6. रुचियों में परिवर्तन तथा स्थिरता- प्रारम्भ में किशोर और किशोरियों की रुचियों में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं, परन्तु बाद में स्थिरता आ जाती है। किशोर और किशोरियों की रुचियों में समानता भी होती है और असमानता भी। उपन्यास कहानियाँ, पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने, सिनेमा देखने फैशन आदि में किशोर और किशोरियाँ समान रुचि रखते हैं, परन्तु लड़कों को यदि शारीरिक व्यायाम, खेलकूद तथा दौड़-भाग में विशेष रुचि होती है तो लड़कियों में सीने, काढ़ने, बुनने तथा नृत्य और संगीत में विशेष रुचि होती है।

7. व्यवहार में भिन्नता- इस अवस्था में संवेगों की प्रबलता होती है। किशोर भावुकता, अस्थिरता, उत्साह तथा उदासीनता में ग्रसित होता है। वह कभी एकदम उत्साहित हो जाते हैं तो कभी निरुत्साहित। उसके संवेगात्मक व्यवहार में कुछ विरोध होता है।

8. घनिष्ठ मित्रता पर बल- वेलेण्टाइन के अनुसार, “घनिष्ठ और व्यक्तिगत मित्रता उत्तर किशोरावस्था की विशेषता है।” किशोर यद्यपि किसी समूह का सदस्य होता है, परन्तु इस पर भी वह .. किसी-न-किसी को अपना घनिष्ठ मित्र बनाता है। घनिष्ठ मित्र से अपने मन की बात कहकर वह विशेष आत्म-सन्तोष का अनुभव करता है।

9. वीर पूजा- किशोर काल में वीर पूजा की भावना प्रबल होती है। शैशवावस्था में बालक का अनुराग अपनी माता की ओर अधिक रहता है, परन्तु किशोरकाल में माता-पिता का स्थान कोई महान नेता, वैज्ञानिक या आदर्श अध्यापक ले लेता है। प्रत्येक किशोर किसी उपन्यास, नाटक या सिनेमा के नायक को अपना इष्ट मान लेता है और उसके प्रति श्रद्धा रखता है।

10.धार्मिक चेतना का विकास- वीर पूजा के समान इस अवस्था के किशोर धर्म के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने लगते हैं। मानसिक अस्थिरता किशोरों में धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करती है। ईश्वर के प्रति निष्ठा की भावना इस काल में ही उत्पन्न होती है।

11. तार्किक भावना का विकास- किशोर किसी भी बात को आँख बन्द करके स्वीकार नहीं करते। उनमें तर्कात्मक-शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है और वे किसी भी बात को स्वीकार करने से पूर्व काफी तर्क-वितर्क करते हैं।

12. भावी व्यवसाय की चिन्ता- किशोर प्राय: भावी व्यवसाय की समस्या से चिंतित हो जाते हैं। ये विद्यार्थी जीवन में ही अपनी व्यावसायिक समस्या का निराकरण करने का प्रयास करते हैं, परन्तु उन्हें जब इस विषय में कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता तो वे चिंतित हो जाते हैं। स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “जब विद्यार्थी हाईस्कूल में होता है तो वह किसी व्यवसाय का चुनाव करने, उसके लिए तैयारी करने, उसमें प्रवेश करने तथा उसमें प्रगति करने के लिए अधिक-से-अधिक चिन्तनशील होता जाता है।”

13. अपराध प्रवृत्ति का विकास- इस अवस्था में दिवास्वप्न देखने के कारण बालकों में अपराध प्रवृत्ति का विकास होता है। बर्ट (Bert) के अनुसार, “प्राय: सभी बाल-अपराधी किशोर दिवास्वप्न-दृष्टा होते हैं।” दूसरे संवेगों की अस्थिरता और बलता, निराशा और प्रेम में असफलता भी बालकों को अपराधी बना देती है। वेलेण्टाइन के अनुसार, “किशोरकाल, अपराध प्रवृत्ति में विकास का नाजुक काल है।” अधिकांश अपराधी किशोरकाल में ही अपराधों में प्रवीण हो चुके होते हैं।

14. समाज सेवा की भावना- किशोरों में सामाजिक सेवा की भावना को तीव्रता से विकास होता है। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए वे समाज सेवा में विशेष रुचि लेते हैं। रॉस (Ross) के अनुसार, किशोर, समाज-सेवा के आदर्शों को निर्मित तथा पोषित करता है। उसका उदार हृदय मानव-जाति के प्रेम से ओत-प्रोत हो जाता है तथा आदर्श समाज के निर्माण में सहायता करने की इच्छा से व्यग्र हो जाता है।”

15. मानसिक स्वतन्त्रता और विद्रोह की भावना- किशोर स्वभाव से परम्पराओं और रूढ़ियों के विरोधी तथा स्वतन्त्रता-प्रेमी होते हैं। वे प्राचीन परम्पराओं, अन्धविश्वासों तथा रूढ़ियों के बन्धन में न रहकर स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना पसन्द करते हैं।

16. समूह या दल को महत्त्व- किशोर की अपने समूह या दल के प्रति विशेष श्रद्धा होती है। वह अपने समूह या दल को विद्यालय तथा परिवार से भी अधिक महत्त्व देता है तथा उससे ही सबसे अधिक प्रभावित होता है। ब्रिग्स तथा हण्ट के अनुसार, “जिन समूहों से किशोर सम्बन्धित होते हैं, उनसे उनके प्राय: सभी कार्य प्रभावित होते हैं। समूह उनकी भाषा, नैतिक मूल्यों, वस्त्र धारण करने की आदतों तथा भोजन करने की प्रणालियों को प्रभावित करते हैं।”

17. काम भावना का विकास- बाल्यावस्था में समलिंगीय प्रेम की भावना प्रबल होती है। बालक बालकों के प्रति तथा बालिकाएँ-बालिकाओं के प्रति आकर्षित होती हैं। किशोरावस्था में इसके विपरीत विषमलिंगीय प्रेम की भावना प्रबल होती है। प्रत्येक लड़का किसी लड़की के सम्पर्क में आना चाहता है और इसी प्रकार लड़कियाँ भी किसी-न-किसी लड़के का सम्पर्क चाहती हैं। प्रेम भावना के साथ-साथ किशोरकाल में काम-भावना का भी विशेष वेग होता है। प्राय: लड़के-लड़कियों में परस्पर काम-सम्बन्धों की स्थापना हो जाती है।
(नोट-किशोरावस्था में शिक्षा के स्वरूप के लिए प्रश्न संख्या 6 देखें)।

प्रश्न 6
किशोरावस्था में शिक्षा की किस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए? विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिएँ।
या
किशोरावस्था में शिक्षा के स्वरूप का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था की शिक्षा
(Adolescence of Education)

शैक्षिक दृष्टि से किशोरावस्था का अपना विशेष महत्त्व है। यह वह अवस्था हैं, जबकि बालक संवेगात्मक अस्थिरता तथा यौवन आवेग से ग्रसित होने के साथ-साथ एक नवीन उत्साह और आदर्श से प्रेरित होते हैं। यदि किशोरों को उचित मार्गदर्शन मिल जाता है तो भावी जीवन में वे बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके विपरीत उचित मार्गदर्शन के अभाव में वे निराशा, अपराध तथा असफलताओं के शिकार हो जाते हैं। किशोरावस्था में बालकों की शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत निम्नांकित बातों पर ध्यान देना अति आवश्यक है

1. शारीरिक विकास सम्बन्धी शिक्षा- किशोरावस्था में शरीर में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। उनमें शक्ति का अतिरिक्त प्रवाह होता है। अत: इस अतिरिक्त शक्ति के उचित प्रयोग तथा उनके शारीरिक विकास के लिए व्यायाम तथा विभिन्न शारीरिक परिश्रम वाले खेलों का आयोजन किया जाए। बालकों के लिए दौड़-धूप वाले खेल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। लड़कियों के नृत्य तथा हल्के शारीरिक व्यायाम अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

2. समुचित पाठ्यक्रम का निर्माण- किशोर के उचित मानसिक विकास के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय उनकी रुचियों, अभिरुचियों, आवश्यकताओं तथा योग्यताओं का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए। इस उद्देश्य से पाठ्यक्रम में गणित, कला, विज्ञान, साहित्य, भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र तथा हस्तशिल्प को अवश्य शामिल किया जाए।

3. कल्पना-शक्ति का समुचित उपयोग- किशोर और किशोरियाँ अत्यधिक कल्पनाशील होते हैं। उनकी कल्पना-शक्ति का समुचित उपयोग करने के लिए विद्यालय में आवश्यक व्यवस्था की सामाजिक सम्बन्धों की जाए। विद्यालय के पुस्तकालय में किशोरावस्था के अनुकूल साहित्य होना चाहिए। महान् पुरुषों के जीवन-चरित्र, साहित्यिक यात्रा वृतान्त, विभिन्न देशों के भौगोलिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विवरण, आदि सम्बन्धी पुस्तकें पुस्तकालय में अवश्य मँगवाई जाएँ।

4. संवेगों का उचित शोधन- किशोरावस्था में संवेगों का प्राबल्य होता है। अत: इनका उचित शोधन और मार्गान्तीकरण करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विद्यालय में विभिन्न पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन किया जाना चाहिए। समय-समय पर साहित्य, कला, संगीत तथा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए। इन क्रियाओं के माध्यम से निकृष्ट संवेगों का शोधन और मार्गान्तीकरण किया जा सकता है।

5. किशोर को महत्त्व देना- प्रत्येक किशोर समाज में अपना महत्त्व चाहता है। अतः इसके महत्त्व को मान्यता देना आवश्यक है। किशोरों को उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपने चाहिए तथा उन कार्यों के सम्पादन के बाद उनकी प्रशंसा भी की जानी चाहिए। विद्यालय अनुशासन स्थापना में भी छात्रों से हर प्रकार का सहयोग प्राप्त करना उपयोगी सिद्ध होगा।

6. बालक तथा बालिकाओं के पाठ्यक्रम में अन्तर- शारीरिक, मानसिक और रुचियों के सम्बन्ध में बालक तथा बालिकाओं की आवश्यकताओं में भिन्नता होती है। अत: इनके पाठ्यक्रम में अन्तर होना चाहिए। बी० एन० झा के अनुसार, “लिंग-भेद के कारण तथा इस विचार से कि बालकों और बालिकाओं को भावी जीवन में समाज में भिन्न-भिन्न कार्य करने हैं, दोनों के पाठ्यक्रम में विभिन्नता होनी चाहिए।’
यौन-शिक्षा

7. उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग- किशोरों को परम्परागत विधियों के आधार पर शिक्षा प्रदान करना। पूर्णतया अनुचित है।. यथासम्भव उन शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाए जिससे किशोरों को स्वयं परीक्षण-निरीक्षण, विचार और तर्क करने के अवसर प्राप्त हो सकें। सभी विषयों का शिक्षण पूर्णतया व्यावहारिक और दैनिक जीवन से सम्बन्धित होना चाहिए। साथ ही शिक्षण ऐसा हो जो बालकों की रुचियों को जाग्रत करे तथा उन्हें क्रियाशीलता के अवसर प्रदान करे।

8. व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर शिक्षा- किशोरावस्था में बालक तथा बालिकाओं के दृष्टिकोणों, भावनाओं और रुचियों में भिन्नता आ जाती है। अत: शिक्षा की योजना इस प्रकार की हो कि बालकों की विभिन्न रुचियों और भावनाओं की सन्तुष्टि हो सके। इस उद्देश्य से विद्यालय में विभिन्न पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए।

9. सामाजिक सम्बन्धों की शिक्षा- किशोर के लिए विद्यालय और परिवार से भी अधिक महत्त्व उस ‘समूह’ का होता है, जिसका वह सदस्य होता है। ऐसी दशा में विद्यालय में ही कुछ समूहों का संगठन किया जाए, जिससे कि छात्र उनके सदस्य बनकर उत्तम आचरण की शिक्षा ग्रहण कर सकें। ये समूह अध्यापकों के निरीक्षण में संगठित किये जाएँ। इसके अतिरिक्त विद्यालय में सामूहिक खेल तथा सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए। इनमें भाग लेकर बालक सामाजिकता की शिक्षा स्वाभाविक ढंग से प्राप्त कर सकते हैं।

10. स्काउटिंग तथा गर्लगाइड- किशोरों की अतिरिक्त शक्तियों तथा संवेगों को उचित दिशा में लगाने के लिए स्काउटिंग तथा गर्लगाइड जैसी संस्थाओं का संगठन करना अति आवश्यक है। स्काउटिंग किशोरों की पाशविक तथा निरुद्देशीय भ्रमण करने की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण का साधन है। स्काउटिंग उन्हें समाज-सेवा करने का अवसर प्रदान करती है तथा उनकी साहसिक प्रवृत्तियों को सन्तुष्ट करती है। गर्लगाइड की योजना किशोरियों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।

11. व्यावसायिक मार्गदर्शन- किशोरावस्था में बालक व्यवसाय सम्बन्धी चिन्ता करने लगता है। अतः शिक्षक का कर्तव्य है कि वह इस दिशा में बालकों का समुचित मार्गदर्शन करे। किशोर यह निश्चय नहीं कर पाता है कि उसके लिए कौन-सा व्यवसाये उचित है। अत: शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बालकों की रुचियों, झुकावों तथा योग्यताओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करे तथा उसके आधार पर उनका व्यावसायिक निर्देशन करे। विद्यालयों में भी कुछ व्यवसायों के प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। बहुउद्देशीय विद्यालयों की स्थापना इस उद्देश्य की पूर्ति करती है।

12. धार्मिक और नैतिक शिक्षा- किशोरावस्था में बालकों में जो मानसिक द्वन्द्व होता है, उसको समाप्त करने के लिए धार्मिक और नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करना आवश्यक है। नैतिक तथा धार्मिक शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो जिससे बालक उचित और अनुचित के मध्य अन्तर करना सीख सकें। महापुरुषों की जीवनगाथाओं का अध्ययन इस उद्देश्य को प्राप्त करने में विशेष सहायक सिद्ध हो सकता है।

13. यौन-शिक्षा- किशोरावस्था में काम-भावना का विकास होता है। यदि किशोरों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिलता तो वे भटक जाते हैं और अनेक उलझनें उत्पन्न हो जाती हैं। अत: किसी-न-किसी रूप में यौन शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। यौन शिक्षा बिना झिझक के उसी प्रकार प्रदान की जाए जिस प्रकार अन्य विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती है। किशोरों को यौन शिक्षा प्रदान करते समय स्वास्थ्य विज्ञान और शरीर विज्ञान का भी पूरा-पूरा ज्ञान कराया जाए। बालिकाओं को यौन शिक्षा गृह विज्ञान के साथ दी जाए तो उत्तम है।

काम-प्रवृत्ति को यथासम्भव उचित ढंग से शोधून या मार्गान्तीकरण किया जाना अति आवश्यक है। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि किशोरावस्था जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण और नाजुक अवस्था है। बालक भावी जीवन में जो कुछ बनेगा, वह किशोरावस्था में ही ज्ञात हो जाता है। जो बालक किशोरावस्था में अपराध, अधार्मिकता तथा आवारागर्दी में पड़ गया तो वह भावी जीवन में समाज व देश के लिए एक सिरदर्द बन सकता है। इसके विपरीत यदि उसका झुकाव साहित्य, कला तथा विज्ञान की ओर हो गया तो वह महान् साहित्यकार, कलाकार या वैज्ञानिक कुछ भी बन सकता है। अतः अभिभावकों तथा शिक्षकों का कर्तव्य है। कि वे किशोरों की मूल आवश्यकताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा समस्याओं को भली प्रकार समझें तथा उनका समुचित मार्गदर्शन करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
हरंलॉक द्वारा किये गये बाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

हरलॉक द्वारा किया गया वर्गीकरण
(Classification by Hurlock)

विकास के सिद्धान्त के अनुसार बाल-विकास क्रमशः होता है। इस विकास की प्रक्रिया में भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की विशेषताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए तथा विकास की प्रक्रिया का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए विकास की विभिन्न अवस्थाएँ निर्धारित की गयी हैं। यह वर्गीकरण भिन्न-भिन्न रूप में किया गया है। हरलॉक द्वारा किया गया वर्गीकरण निम्नलिखित है

  1. गर्भावस्था- गर्भधारण होने से लेकर शिशु के जन्म तक।
  2. नवजात अवस्था- शिशु के जन्म से 14 दिन तक।
  3. शैशवावस्था- 14 दिन की आयु से दो वर्ष की आयु तक।
  4. बाल्यावस्था- 2 वर्ष की आयु से 11 वर्ष की आयु तक।
  5. किशोरावस्था- 11 वर्ष की आयु से 21 वर्ष की आयु तक।

हरलॉक ने विकास की उपर्युक्त मुख्य अवस्थाएँ मानी हैं। इसके उपरान्त उसने किशोरावस्था का पुनः वर्गीकरण किया है। हरलॉक ने किशोरावस्था को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है

(क) पूर्व किशोरावस्था- 11 वर्ष की आयु से 13 वर्ष की आयु तक का काल।
(ख) मध्य किशोरावस्था- 13 वर्ष की आयु से 17 वर्ष की आयु तक का काल।
(ग) उत्तर किशोरावस्था- 17 वर्ष की आयु से 21 वर्ष तक की आयु तक का काल।

प्रश्न 2
किशोरावस्था के विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
किशोरावस्था में बच्चों के, सामाजिक विकास का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था के विकास के सिद्धान्त
(Theories of Development of Adolescence)

जब बालक बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करता है तो उसके अन्दर क्रान्तिकारी, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन शरीर और मन दोनों को प्रभावित करते हैं। इन परिवर्तनों के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो सिद्धान्त प्रचलित हैं

1. आकस्मिक विकास का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के प्रतिपादक स्टेनले हाल (Stenley Hall) हैं। इनके अनुसार किशोरावस्था में प्रवेश करते ही बालक में जो परिवर्तन होते हैं, उनका सम्बन्ध न तो शैशवावस्था से होता है और न बाल्यावस्था से। इस प्रकार किशोरावस्था एक प्रकार से नया जन्म है। इस अवस्था में बालकों में जो परिवर्तन होते हैं, वे सब आकस्मिक होते हैं।

2. क्रमिक विकास का सिद्धान्त- क्रमिक विकास का सिद्धान्त आकस्मिक विकास के सिद्धान्त के ठीक विपरीत है। थॉर्नडाइक का मत है कि किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक परिवर्तन अचानक न होकर क्रमिक होते हैं। किंग (King) के अनुसार, “जिस प्रकार एक ऋतु में ही दूसरी ऋतु के आगमन के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, उसी प्रकार बाल्यावस्था और किशोरावस्था परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्पष्ट कीजिए कि किशोरावस्था में व्यवहार एवं स्वभाव में अस्थिरता पायी जाती है ?
उत्तर:
किशोरावस्था के प्रारम्भिक चरण में ही बालक के व्यवहार एवं स्वभाव में पर्याप्त अस्थिरता एवं चंचलता आ जाती है। इस काल में बालक कल्पनाओं में अधिक रहता है। इस काल में बालक कभी उदास, कभी प्रसन्न, कभी आत्म-विश्वासी तथा इसी प्रकार परस्पर विरोधी मानसिक स्थितियों से गुजरता रहता है। इस काल में यौन-आकर्षण भी प्रारम्भ हो जाता है। यह भी किशोरों के लिए अस्थिरता का एक कारण होता है। इस काल में असुरक्षा की भावना भी काफी प्रबल हो उठती है।

प्रश्न 2
स्पष्ट कीजिए कि किशोरावस्था में कल्पनाओं तथा भावनाओं की अधिकता होती है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में बालक एवं बालिकाएँ अधिकतर कल्पनाओं में खोये रहते हैं। उनकी कल्पनाएँ। जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित होती हैं, जिनका ठोस आधार कुछ भी नहीं होता। इसीलिए अनेक किशोर-किशोरियाँ प्रायः अन्तर्मुखी हो जाते हैं। कल्पनाओं के अतिरिक्त इस काल में कोमल भावनाओं को भी बोलबाला रहता है। भावनाओं के वशीभूत होकर किशोर कभी-कभी ऐसे भी कार्य कर बैठते हैं जिन्हें असाधारण कार्य कहा जाता है।

प्रश्न 3
आडीपस (मातृ भावना) और इलेक्ट्रा (पितृ भावना) काम्प्लेक्स क्या हैं?
उत्तर:
बाल्यावस्था में प्राय: कुछ मनोग्रन्थियाँ विकसित हो जाती हैं। इन मनोग्रन्थियों में दो मुख्य मंनोग्रन्थियाँ हैं-आडीपस (मातृ भावना) तथा इलेक्ट्रा (पितृ भावना)। इन मनोग्रन्थियों का विस्तृत विवरण फ्रॉयड ने प्रस्तुत किया है। फ्रॉयड के अनुसार, आडीपस मनोग्रन्थि से ग्रस्त बालक (लड़की) अपनी माँ के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट होता है तथा वह उस पर अधिकार बनाना चाहता है। इस स्थिति में बालक अपने पिता को अपना प्रतिद्वन्द्वी मानने लगता है तथा माँ पर पिता के अधिकार को सहन नहीं कर पाता। इलेक्ट्रा या पितृ भावना की ग्रन्थि लड़कियों में विकसित होती है। इस ग्रन्थि से ग्रस्त बालिका अर्थात् बेटी अपने पिता के प्रति आकृष्ट होती है तथा पिता पर अपना अधिकार दर्शाना चाहती है। वह पिता पर माँ के अधिकार को सहन नहीं कर पाती।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सामान्य वर्गीकरण के अनुसार विकास की मुख्य अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
सामान्य वर्गीकरण के अनुसार विकास की मुख्य अवस्थाएँ हैं-

  1. गर्भावस्था
  2. शैशवावस्था
  3. बाल्यावस्था तथा
  4. किशोरावस्था

प्रश्न 2
हरलॉक ने किशोरावस्था को किन उपवर्गों में बाँटा है ?
उत्तर:
हरलॉक ने किशोरावस्था को तीन उपवर्गों में बाँटा है-

  1. पूर्व किशोरावस्था
  2. मध्य किशोरावस्था तथा
  3. उत्तर किशोरावस्था

प्रश्न 3
“व्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है, उसका आधा तीन वर्ष की आयु तक हो जाता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन गुडएनफ का है।

प्रश्न 4
विकास की किस अवस्था में सीखने की दर सर्वाधिक होती है ?
उत्तर:
विकास की शैशवावस्था में सीखने की दर सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 5
विकास की किस अवस्था में व्यक्ति का व्यवहार मुख्य रूप से मूलप्रवृत्यात्मक होता है?
उत्तर:
विकास की शैशवावस्था में व्यक्ति का व्यवहार मुख्य रूप से मूलप्रवृत्यात्मक होता है।

प्रश्न 6
शैशवावस्था में मुख्य रूप से किस विधि द्वारा सीखा जाता है ?
उत्तर:
शैशवावस्था में मुख्य रूप से अनुकरण विधि द्वारा सीखा जाता है।

प्रश्न 7
शैशवावस्था में नैतिक विकास की क्या स्थिति होती है ?
उत्तर:
शैशवावस्था में नैतिक विकास का प्रायः नितान्त अभाव होता है।

प्रश्न 8
विकास की बाल्यावस्था को अन्य किन-किन नामों से भी जाना जाता है ?
उत्तर:
विकास की बाल्यावस्था को क्रमशः ‘चुस्ती की आयु’, ‘गन्दी आयु’, ‘समूह आयु तथा ‘प्राथमिक विद्यालय की आयु’ आदि नामों से भी जाना जाता है।

प्रश्न 9
किन वर्षों के बीच की अवधि को प्रारम्भिक बाल्यकाल कहा जाता है?
उत्तर:
2 से 5 वर्षों के बीच की अवधि को प्रारम्भिक बाल्यकाल कहा जाता है।

प्रश्न 10
5 से 12 वर्ष तक विकास की अवस्था को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
मध्य बाल्यावस्था।

प्रश्न 11
विकास की किस अवस्था में व्यक्ति का नैतिक विकास प्रारम्भ हो जाता है ?
उत्तर:
सामान्य रूप से बाल्यावस्था में व्यक्ति का नैतिक विकास प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 12
व्यक्ति की जिज्ञासा वृत्ति विकास की किस अवस्था में प्रबल होती है ?
उत्तर:
व्यक्ति की जिज्ञासा वृत्ति बाल्यावस्था में प्रबन्न होती है।

प्रश्न 13
किशोरावस्था से क्या आशय है ?
उत्तर:
“किशोरावस्था बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के मध्य का परिवर्तन काल है।”

प्रश्न 14
कौन-सी अवस्था संघर्ष, तनाव, तूफान तथा विरोध की अवस्था कहलाती है?
उत्तर:
किशोरावस्था संघर्ष, तनाव, तूफान तथा विरोध की अवस्था कहलाती है।

प्रश्न 15
किशोरावस्था की व्याख्या करने वाले मुख्य सिद्धान्त कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
किशोरावस्था की व्याख्या करने वाले मुख्य सिद्धान्त हैं–

  1. त्वरित विकास का सिद्धान्त अथवा आकस्मिक विकास का सिद्धान्त तथा
  2. क्रमशः विकास का सिद्धान्त।

प्रश्न 16
किशोरावस्था के त्वरित विकास के सिद्धान्त को स्पष्ट करने वाले किसी कथन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“किशोर में जो शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होते हैं, वे एकदम छलाँग मारकर आते हैं।’

प्रश्न 17
किशोरावस्था के क्रमशः विकास के सिद्धान्त को स्पष्ट करने वाले किसी कथन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“जिस तरह एक ऋतु का आगमन दूसरी ऋतु के उपरान्त होता है, परन्तु पहली ही ऋतु में दूसरी ऋतु के आने के लक्षण प्रतीत होने लगते हैं, उसी प्रकार बाल्यावस्था और किशोरावस्था परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं।”

प्रश्न 18
शैशवावस्था को जीवन का महत्त्वपूर्ण काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
शैशवावस्था में सम्पूर्ण विकास का प्रारम्भ होता है। शैशवावस्था को सम्पूर्ण विकास का आधार माना जाता है। इस अवस्था में यदि सुचारु विकास हो जाता है तो भावी विकास-प्रक्रिया भी सुचारु रूप में ही चलती है। इसीलिए शैशवावस्था को जीवन का महत्त्वपूर्ण काल कहा जाता है।

प्रश्न 19
शिशु में किस भावना का प्रभुत्व होता है?
उत्तर:
शिशु में स्नेह की भावना का प्रभुत्व होता है।

प्रश्न 20
बालक के विकास की किस अवस्था में पूनरावृत्ति की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है ?
उत्तर:
बालक के विकास की पूर्व-बाल्यावस्था में पुनरावृत्ति की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है।

प्रश्न 21
बालक की किस अवस्था को संकट की अवस्था कहते है?
उत्तर:
बालक की किशोरावस्था को संकट की अवस्था कहते हैं।

प्रश्न 22
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. शैशवावस्था में बालक के विकास पर उसके स्वास्थ्य का गम्भीर प्रभाव पड़ता है।
  2. बाल्यावस्था को चुस्ती का काल’ भी कहते हैं।
  3. बाल्यावस्था में कठोर अनुशासन द्वारा शिक्षा दी जानी चाहिए।
  4. बाल्यावस्था संघर्ष और तनाव का काल है।
  5. किशोरावस्था महान तनाव, तूफान तथा विरोध का काल है।
  6. किशोरावस्था में कोई प्रबल समस्या नहीं होती।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
शैशवावस्था में कौन-सा विकास तीव्र गति से होता है ?
(क) शारीरिक विकास
(ख) मानसिक विकास
(ग) सामाजिक विकास
(घ) भाषागत विकास

प्रश्न 2.
शैशवावस्था में सुचारु विकास के लिए किस बात का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य है ?
(क) आज्ञापालन
(ख) अध्ययन
(ग) नैतिकता
(घ) पोषण

प्रश्न 3.
शैशवावस्था की मुख्य विशेषता है
(क) नैतिक बोध की प्रधानता
(ख) जटिल संवेगों का प्रदर्शन
(ग) काम-प्रवृत्ति का प्रकाशन
(घ) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रधानता

प्रश्न 4.
विकास की किस अवस्था में यौन-प्रवृत्ति सुप्तावस्था में होती है ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 5.
बाल्यावस्था की उल्लेखनीय विशेषता है-
(क) मानसिक विकास की अधिकता
(ख) अनुभव में वृद्धि
(ग) जिज्ञासा में वृद्धि
(घ) खेल की अवहेलना

प्रश्न 6.
विकास की किस अवधि को प्रारम्भिक विद्यालय की आयु’ कहा जाता है ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 7.
विकास की किस अवस्था में शारीरिक परिवर्तनों से सम्बन्धित समस्याएँ प्रबल होती हैं ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) युवावस्था

प्रश्न 8.
वीर पूजा की अवस्था कहलाती है
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 9.
किशोरावस्था जीवन का
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण काल है
(ख) महत्त्वपूर्ण काल है
(ग) अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल है
(घ) कम महत्त्वपूर्ण काल है

प्रश्न 10.
किशोरावस्था जीवन की सबसे
(क) महत्त्वपूर्ण काल है
(ख) कठिन काल है
(ग) अनोखा काल है
(घ) आदर्श काल है

प्रश्न 11.
अधिक तनाव का काल है-
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) युवावस्था

प्रश्न 12.
किशोरावस्था के विकास के सिद्धान्त हैं
(क) तीन
(ख) दो
(ग) चार
(घ) पाँच

प्रश्न 13.
यौन-शिक्षा को सामान्य शिक्षा में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना चाहिए
(क) बाल्यावस्था में
(ख) किशोरावस्था में
(ग) युवावस्था में।
(घ) प्रत्येक अवस्था में

प्रश्न 14.
किशोरावस्था सम्बन्धी समस्याएँ हैं
(क) समायोजन की समस्याएँ
(ख) शारीरिक परिवर्तन सम्बन्धी समस्याएँ
(ग) यौन समस्याएँ
(घ) ये सभी समस्याएँ

प्रश्न 15.
किशोरों हेतु सर्वाधिक आवश्यक है
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) यौन शिक्षा
(ग) कैरियर सम्बन्धी व्यावसायिक निर्देशन
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 16.
जन्म के समय बालकों का औसत भार होता है-
(क) 2.5 किग्रा
(ख) 2.9 किग्रा
(ग) 3.2 किग्रा
(घ) 4.7 किग्रा

प्रश्न 17.
शैशवावस्था की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विशेषता है|
(क) सामाजिक व्यवहार
(ख) धार्मिक व्यवहार
(ग) मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार
(घ) अनुकरणात्मक प्रवृत्ति का अभाव

प्रश्न 18.
शैशवावस्था की प्रमुख विशेषता नहीं है-
(क) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति
(ख) मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार
(ग) कल्पनाशीलता
(घ) परिपक्वता

प्रश्न 19.
चुस्त-दुरुस्त अवस्था’ किस अवस्था को कहा जाता है ?
(क) पूर्व शैशवावस्था
(ख) शैशवावस्था
(ग) बाल्यावस्था
(घ) किशोरावस्था

प्रश्न 20.
जीवन का अनोखा काल’ कहा जाता है
(क) किशोरावस्था को
(ख) शैशवावस्था को
(ग) बाल्यावस्था को
(घ) युवावस्था को

प्रश्न 21.
स्वतन्त्रता व विद्रोह की भावना प्रबल होती है
(क) शैशवावस्था में
(ख) बाल्यावस्था में
(ग) किशोरावस्था में
(घ) इन सभी में

उत्तर:

  1. (क) शारीरिक विकास
  2. (घ) पोषण
  3. (घ) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रधानता
  4. (ख) बाल्यावस्था
  5. (ग) जिज्ञासा में वृद्धि
  6. (ख) बाल्यावस्था
  7. (ग) किशोरावस्था
  8. (ग) किशोरावस्था
  9. (ग) अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल है
  10. (ग) अनोखी काल है
  11. (ग) किशोरावस्था
  12. (ख) दो
  13. (ख) किशोरावस्था में
  14. (घ) ये सभी समस्याएँ
  15. (ख) यौन शिक्षा
  16. (ख) 2.9 किग्रा
  17. (ग) मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार
  18. (घ) परिपक्वता
  19. (ग) बाल्यावस्था
  20. (क) किशोरावस्था को
  21. (ग) किशोरावस्था में

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 13 Project Method

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 13 Project Method (योजना अथवा प्रोजेक्ट पद्धति) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 13 Project Method (योजना अथवा प्रोजेक्ट पद्धति).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 13
Chapter Name Project Method
(योजना अथवा प्रोजेक्ट पद्धति)
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 13 Project Method (योजना अथवा प्रोजेक्ट पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की योजना पद्धति (Project Method) से आप क्या समझते हैं? इस पद्धति के मुख्य सिद्धान्तों का भी उल्लेख कीजिए।
या
प्रोजेक्ट विधि के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं?
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा पद्धतियों में प्रोजेक्ट या योजना पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस पद्धति के प्रवर्तक जॉन डीवी के शिष्य अमरीकन शिक्षाशास्त्री किलपैट्रिक थे। ये कोलम्बिया विश्वविद्यालय के अध्यापकों के कॉलेज में शिक्षाशास्त्र के प्रोफेसर थे। डीवी (Dewey) के प्रयोजनवाद के सिद्धान्तों के आधार पर ही इन्होंने योजना शिक्षा-पद्धति का निर्माण किया। प्रारम्भ में इस पद्धति का प्रयोग कृषि के कार्यों में किया जाता था, परन्तु कालान्तर में इस पद्धति का प्रयोग अन्य क्षेत्रों में भी होने लगा। इस पद्धति में पाठ्य-विषय का अध्ययन कराने के स्थान पर उसे प्रत्यक्ष रूप से समझाया जाता है।

योजना पद्धति का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Project Method)

योजना पद्धति के जनक किलपैट्रिक का कथन है कि कार्य दो प्रकार से किया जाता है—योजना बनाकर और बिना योजना के। योजना वाले कार्यों में भी कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जो जीवन की समस्या से सम्बन्धित होते हैं और कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जिनका जीवन की समस्याओं से कोई सम्बन्ध नहीं होता। योजना शिक्षा पद्धति के अनुसार बालक जो कार्य करते हैं, वे पूर्व निर्धारित होते हैं और जीवन की समस्याओं से सम्बन्धित होते हैं; जैसे—विद्यालय में सूत कातती हुई लड़कियों से यदि कह दिया जाए कि उस सूत से उनके लिए साड़ियाँ बनवाई जाएँगी तो वे और मन लगाकर तीव्र गति से कार्य करेंगी। इस प्रकार कार्यों को उद्देश्यपूर्ण, सार्थक, रोचक और स्वाभाविक बनाया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि योजना सोद्देश्य, स्वाभाविक, सार्थक एवं रुचिपूर्ण कार्य का आयोजन है। योजना शब्द की प्रमुख परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है—

  1. किलपैट्रिक के अनुसार, “योजना वह सहृदय उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो पूर्ण संलग्नता से सामाजिक वातावरण में किया जाए।”
  2. रायबर्न के अनुसार, “योजना वह उद्देश्यपूर्ण कार्य है जिसे सहयोग तथा सद्भावना से बालक स्वेच्छापूर्वक पूरा करने का प्रयास करते हैं।”
  3. थॉमस और लैंग के अनुसार, “योजना इच्छानुसार ऐसा कार्य है, जिसमें रचनात्मक प्रयास आपका विचार हो और जिसका कुछ साकार परिणाम हो।”
  4. बेलार्ड के अनुसार, “योजना वास्तविक जीवन का एक भाग है जो कि विद्यालय में प्रयोग किया जाता
  5. स्टीवेन्सन के अनुसार, “योजना एक समस्यामूलक कार्य है जो अपनी स्वाभाविक परिस्थितियों के ।अन्तर्गत पूर्णता को प्राप्त करता है।”
  6. किलपैट्रिक की संशोधित परिभाषा, “योजना सोद्देश्य अनुभव की कोई इकाई, सोद्देश्य क्रिया का कोई उदाहरण है जहाँ पर प्रभावशाली प्रयोजन एक आन्तरिक प्रवृत्ति के रूप में कार्य के उद्देश्य को निर्धारित करता है, क्रिया का पथ-प्रदर्शन करता है और उसे प्रेरणा देता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि “योजना एक जीवन अनुभव है जो एक प्रबल इच्छा से प्रेरित होता है और इस इच्छा का प्रयोग ही योजना पद्धति का आधार है।”

योजना पद्धति के सिद्धान्त
(Principles of Project Method)

योजना पद्धति एक नई शिक्षा-पद्धति है, जिसका निर्माण अमेरिका में शिक्षा के क्षेत्र में प्रचलित प्राचीन परम्पराओं की प्रतिक्रियास्वरूप हुआ है। यह पद्धति ‘करके सीखने’ (Learming by doing) के साथ-साथ रहकर सीखने’ (Learming by living) परे भी बल देती है। इस पद्धति के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|

1. उद्देश्य या प्रयोजन का सिद्धान्त- इस पद्धति के अनुसार बालकों के सम्मुख कोई भी कार्य समस्या के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है और उसे पूरा करने में कोई उद्देश्य निहित रहता है। उद्देश्य के अभाव में योजना निरर्थक हो जाती है, क्योंकि कोई भी कार्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जब बालक के सामने कोई उद्देश्य स्पष्ट होता है तो वह उत्तेजित होकर मन लगाकर काम करता है उद्देश्य या प्रयोजन का सिद्धान्त है। इसका परिणाम यह होता है कि बालक कम समय में अधिक ज्ञान क्रियाशीलता का सिद्धान्त प्राप्त कर लेते हैं।

2. क्रियाशीलता का सिद्धान्त- बालक स्वभावतः क्रियाशील होते हैं, इसलिए यह पद्धति बालक की क्रियाशीलता का सदुपयोग । करने में विश्वास करती है। इस पद्धति में बालकों को क्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है, क्योंकि जो भी ज्ञान स्वयं कार्य करके प्राप्त किया जाता है, वह अधिक स्थायी होता है, इसलिए जहाँ तक सम्भव हो सके बालक को व्यावहारिक क्रिया के आधार पर शिक्षा देनी चाहिए, जिससे बालक उत्साहपूर्वक सीख सके।

3. अनुभव का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालक अनुभवों को अर्जित करके शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस पद्धति के द्वारा बालक को ऐसे अनुभव प्रदान किए जाते हैं, जो उसके जीवन में काम आ सकें। यह अनुभव वे कार्य के द्वारा प्राप्त करते हैं। इससे बालक कार्य का अनुभव, सहयोग का अनुभव, सामाजिक सम्बन्धों का अनुभव और अन्य विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है।

4.स्वतन्त्रता का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालक को कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। बालकों को कार्य चुनने की पूरी स्वतन्त्रता होनी चाहिए। उन्हें इतना उत्साहित करना चाहिए कि वे कार्य का प्रस्ताव स्वयं रखें। विद्यालय का समस्त कार्यक्रम उनके प्रस्ताव के अनुकूल होना चाहिए। शिक्षकों को उन्हें किसी भी कार्य को करने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए।

5. वास्तविकता का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालकों से शैक्षिक कार्य वास्तविक और स्वाभाविक परिस्थितियों में कराए जाते हैं। बालकों के सामने काल्पनिक समस्याएँ न रखकर वास्तविक समस्याएँ प्रस्तुत की जानी चाहिए। वास्तविक परिस्थितियों में काम करने से जीवन और कार्य में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।

6. उपयोगिता का सिद्धान्त- इस पद्धति में बालकों से वही कार्य कराए जाते हैं, जिनमें उनका स्वार्थ हो और जो उनके भावी जीवन में सहायक बन सकें। उपयोगी कार्यों में बालक की रुचि होती है और वह उत्साहपूर्वक कार्य को पूरा करता है। बालक ऐसी समस्याओं का समाधान करने में कोई रुचि नहीं रखता, जो उसकी तात्कालिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित नहीं होते।

7. सामाजिकता का सिद्धान्त- यह पद्धति इस तथ्य पर विशेष बल देती है कि बालकों में शिक्षा द्वारा सामाजिक भावना का विकास करना चाहिए। इसलिए इस पद्धति में सामूहिक कार्यों, सामाजिक उत्तरदायित्वों तथा सामाजिक सम्बन्धों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।

8. सानुबन्यता का सिद्धान्त- यह पद्धति ज्ञान की एकता में विश्वास करती है। इसलिए इस पद्धति के अन्तर्गत इस सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है कि विभिन्न विषयों को एक-दूसरे से सम्बन्धित करते हुए पढ़ाना चाहिए। प्रायः एक ही योजना के द्वारा विभिन्न विषयों की शिक्षा बालकों को दे दी जाती है।

प्रश्न 2.
शिक्षा की योजना पद्धति के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

योजना पद्धति के गुण
(Merits of Project Method)

1. व्यावहारिकता- इस पद्धति के अनुसार बालक पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त नहीं करते, बल्कि वे स्वयं विभिन्न प्रकार की योजनाओं व समस्याओं को जीवन में कार्यान्वित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार जो ज्ञान बालकों को प्राप्त होता है, वह व्यावहारिक होता है और उसकी योजना पद्धति के गुण जीवन में उपयोगिता होती है।

2. रुचिपूर्ण पद्धति- इस पद्धति के अनुसार शिक्षा ग्रहण करने में बालक प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, क्योंकि शिक्षा देते समय मनोवैज्ञानिक पद्धति उनकी रुचि का पूरा ध्यान रखा जाता है। इसमें बालक प्रोजेक्ट के प्रति आकर्षित, जिज्ञासु एवं उत्सुक बने रहते हैं।

3. मनोवैज्ञानिक पद्धति- यह पद्धति मनोवैज्ञानिक है, क्योंकि विकास के समान अवसर इसमें बालकों की रुचि, प्रवृत्ति, इच्छा और क्षमता का पूर्ण ध्यान रखा जाता है। इसमें रटने तथा स्मरण करने की क्रिया की अपेक्षा सोचने स्वतन्त्रता की रक्षा तथा कार्य करने की प्रवृत्ति पर बल दिया गया है।

4. श्रम का महत्त्व- बालकों की समस्याओं का समाधान करने * पाठ्य-विषयों का समन्वय के लिए शारीरिक तथा मानसिक कार्य करने पड़ते हैं। शारीरिक कार्य गृह, पाठशाला एवं समाज के करने के कारण उनके हृदय में श्रम के प्रति आदर का भाव उत्पन्न हो बीच सम्बन्ध जाता है और वे हाथ से काम करने में कोई हीनता नहीं समझते। इस सामाजिक भावना का विकास प्रकार यह पद्धति श्रम को विशेष महत्त्व प्रदान करती है।

5. मानसिक विकास- यह पद्धति निष्क्रिय रहकर ज्ञान प्राप्त करने का विरोध करती है। इस पद्धति में बालकों को स्वतन्त्र रूप से सोचने-विचारने तथा कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं। इसमें बालक दूसरों से वाद-विवाद करके और परामर्श करके स्वयं निर्णय करता है। इस प्रकार इस पद्धति के द्वारा बालक की विभिन्न मानसिक शक्तियों का विकास बहुत अच्छी तरह से होता है।

6. विकास के समान अवसर- इस पद्धति में सभी बालकों को समान रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है, चाहे उनकी बुद्धि तीव्र, मन्द अथवा साधारण हो। परिणामस्वरूप बालकों का समान रूप से विकास होता है।

7. आत्म-विकास का अवसर- यह पद्धति बालकों को अपने अनुभव से सीखने का अवसर देती है। कोई भी ज्ञान बालक के ऊपर थोपा नहीं जाता है, बल्कि वे कार्य करके अपने अनुभव से सीखते हैं।

8. स्वतन्त्रता की रक्षा- इस पद्धति में बालकों को अधिक-से-अधिक स्वतन्त्र रखकर शिक्षा दी जाती है। उन्हें अपनी रुचि के अनुसार काम करने, प्रोजेक्ट चुनने तथा प्रोजेक्ट का कार्यक्रम बनाने का पूरा अधिकार होता है और उन्हें कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता होती है। इस प्रकार उनके विकास में कोई बाधा नहीं आती है।

9. पाठ्य- विषयों की स्वाभाविकता-इस पद्धति में बालक को पाठ्य-विषयों का ज्ञान स्वाभाविक परिस्थितियों में कराया जाता है, जिससे जीवन और कार्य में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इससे ज्ञान की स्वाभाविकता बनी रहती है। जीवन से सम्बन्धित हो जाने पर बालक रुचिपूर्वक कार्य को पूरा करता है और बालक में विधिपूर्वक कार्य करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है।

10. पाठ्य-विषयों का समन्वयं- इस पद्धति में बालकों को सभी पाठ्य-विषय अलग-अलग करके नहीं पढ़ाए जाते। पाठ्यक्रम के समस्त विषय समन्वित रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं। किसी विशेष समस्या को हल करने में बालक अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इससे बालकों को ज्ञान की एकता का अनुभव होता है और ज्ञान संगठित होकर उनके द्वारा आत्मसात किया जाता है।

11. गृह, पाठशाला एवं समाज के बीच सम्बन्ध- इस पद्धति की शिक्षाविधि ऐसी है कि गृह, पाठशाला एवं समाज तीनों में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। तीनों सम्बद्ध रूप से बालक की शिक्षा में भाग लेते हैं। विद्यालय में जो शिक्षा बालक ग्रहण करते हैं, उसे गृह एवं समाज में कार्यान्वित करते हैं। इसके साथ-साथ गृह और समाज में प्राप्त अनुभवों के आधार पर बालक विद्यालय में प्रोजेक्ट का निर्माण करते हैं।

12. चरित्र का विकास- इस पद्धति के द्वारा बालकों का चारित्रिक विकास होता है। यह सत्यम् शिवम सुन्दरम्’ की भावना का अनुभव करते हुए विश्व का कल्याण करने में समर्थ होते हैं।

13. सामाजिक भावना का विकास- इस पद्धति में बालकों को दूसरों के सहयोग से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है। इससे उनमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है। इसके साथ ही उनमें नागरिकता की भावना का भी विकास होता है। वह अपने उत्तरदायित्व को समझते हैं और एक-दूसरे के सहयोग से कार्य करते हैं।

प्रश्न 3.
योजना पद्धति के मुख्य दोषों अथवा कमियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

योजना पद्धति के दोष
(Defects of Project Method)

भले ही शिक्षा की योजना पद्धति के विभिन्न गुणों का उल्लेख किया जाता है, परन्तु अन्य शिक्षा-पद्धतियों के ही समान इस पद्धति में भी कुछ दोष हैं। इस पद्धति में मुख्य दोषों अथवा कमियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. खर्चीली पद्धति- इस पद्धति को कार्यान्वित करने के लिए अनेक पुस्तकों तथा यन्त्रों की आवश्यकता होती है, जिनके प्रबन्ध में काफी धन व्यय करना पड़ता है। इसलिए सामान्य विद्यालयों में इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

2. उचित परीक्षा प्रणाली का अभाव- इस पद्धति में एक योजना पद्धति के दोष निश्चित पाठ्यक्रम का अभाव रहता है, इसलिए परीक्षा के निर्धारण में काफी कठिनाई होती है। वर्तमान परीक्षा प्रणाली में योजना पद्धति को खर्चीली पद्धति कोई स्थान प्राप्त नहीं है। इस पद्धति में कार्य का सही-सही मूल्यांकन भी नहीं हो पाता है।

3. पाठ्य-पुस्तकों का अभाव- इस पद्धति से सम्बन्धित हिन्दी विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन का अभाव भाषा में लिखी हुई पाठ्य-पुस्तकों का भी अभाव है। इससे विषयों की । प्रोजेक्ट के चुनाव में कठिनाई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं हो पाती, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षण विधि कार्य सुचारु रूप से नहीं चल पाता है।

4. विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन का अभाव-इस पद्धति में कठिनाई विषयों का क्रमबद्ध अध्ययन नहीं किया जाता, इसलिए बालकों को किसी भी विषय का क्रमिक ज्ञान नहीं हो पाता। इससे सभी विषयों का ज्ञान अपूर्ण रहता है। गोड के टॉमसन ने इस पद्धति की आलोचना * व्यक्तिगत रुचियों की उपेक्षा करते हुए कहा है, “प्रासंगिक शिक्षा पद्धति बड़ी महत्त्वपूर्ण है, किन्तु प्रौढ़ों की समस्याएँ पर्याप्त नहीं होती।”

5. प्रोजेक्ट के चुनाव में कठिनाई- कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत योग्य शिक्षकों का अभाव है कि इस प्रकार के प्रोजेक्ट का चुनाव करना, जिनका सामाजिक * शिक्षक के प्रभाव का अभाव जीवन में कुछ मूल्य तथा महत्त्व हो और जो कक्षा के विद्यार्थियों की रुचि, बुद्धि तथा क्षमता के अनुकूल हो, अत्यन्त कठिन है। इसके अतिरिक्त विद्यालय के बहुसंख्यक विद्यार्थियों के लिए प्रोजेक्ट का चुनाव करना भी कठिन कार्य है। इस कार्य के लिए समय, सहनशीलता तथा समझदारी की आवश्यकता है। साधारणतया शिक्षक के पास इन बातों के लिए समय का अभाव रहता है, जिसके परिणामस्वरूप बालक ऐसे प्रोजेक्ट चुन लेता है जिनका कोई शैक्षिक मूल्य नहीं होता।

6. अव्यवस्थित शिक्षण विधि- इस पद्धति में शिक्षण विधि अव्यवस्थित तंथा क्रमहीन होती है, जिसके कारण बालकों को पाठ्यक्रम का पूरा ज्ञान नहीं हो पाता। इससे बालक उचित और मनोवैज्ञानिक क्रम से ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता है; जैसे—गुणा की आवश्यकता पहले पड़ने पर बिना जोड़-घटाने का ज्ञान प्राप्त किए बालक गुणा सीखने का प्रयत्न करेगा। यहीं पर यह पद्धति अमोवैज्ञानिक हो जाती है।

7.वातावरण से अनुकूलन में कठिनाई- जब विद्यार्थी इस शिक्षा विधि से पढ़ाए जाने वाले विद्यालय से किसी अन्य साधारण विद्यालय में प्रवेश लेता है, तो उसे अपने वातावरण से अनुकूलन करने में अत्यन्त कठिनाई होती है।

8. हस्त कार्यों का बाहुल्य- कुछ शिक्षाशास्त्रियों का कहना है कि इस पद्धति में हस्त कार्यों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया जाता है, जोकि अनुचित है। इसके परिणामस्वरूप बालक दिन भर विभिन्न वस्तुओं के मॉडल बनाता रहता है और उसे किसी विषय का ज्ञान नहीं होता। इस प्रकार इस पद्धति से बालकों का मानसिक विकास नहीं हो पाता।

9. समय का अपव्यय- यह शिक्षा विधि काफी लम्बी है और इसमें समय का अपव्यय करने के बाद भी बालक को उतना ज्ञान नहीं हो पाता, जितना अपेक्षित होता है।

10. व्यक्तिगत रुचियों की उपेक्षा- सामाजिक प्रोजेक्ट का चुनाव करते समय बालकों की व्यक्तिगत रुचियों और प्रवृत्तियों का ध्यान नहीं रखा जाता। यह मान लिया जाता है कि सभी बालकों के अन्दर वांछित रुचियाँ और प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं, लेकिन सभी बालकों के लिए एक ही प्रोजेक्ट की व्यवस्था करना अनुचित

11. प्रौढों की समस्याएँ- इस पद्धति में बालकों के सम्मुख अधिकतर प्रौढ़ जीवन की समस्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इससे बालकों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होती है। रेमॉण्ट (Raymont) के अनुसार, बालकों की पाठशाला में प्रौढ़ जीवन की समस्याओं को हल करने से पाठशाला की बुराइयाँ नहीं हो सकतीं। बालकों के सम्मुख क्रिया से परे कोई समस्या उपस्थित कर देना अमनोवैज्ञानिक है।”

12. समस्त विषयों के ज्ञान का अभाव- इस पद्धति के द्वारा एक ही प्रोजेक्ट से बालक सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता है। इससे उनमें आपस में सम्बन्ध नहीं जुड़ पाता है।

13. योग्य शिक्षकों का अभाव- हमारे देश में ऐसे शिक्षकों की कमी है, जोकि इस पद्धति के द्वारा बालकों को शिक्षा दे सकें। इनके प्रशिक्षण के साधन भी इतने सीमित हैं कि कुशल शिक्षक सरलता से उपलब्ध नहीं हो पाते हैं।

14. शिक्षक के प्रभाव का अभाव- इस पद्धति में शिक्षक को कोई प्रमुख स्थान नहीं है। शिक्षक को केवल पथ-प्रदर्शक के रूप में स्वीकार किया गया है, इसलिए शिक्षक के व्यक्तित्व और ज्ञान का प्रभाव बालकों पर नहीं पड़ पाता है। लेकिन यह आलोचना असंगत लगती है, क्योकि इस पद्धति में तो शिक्षक का उत्तरदायित्व और भी अधिक बढ़ जाता है। प्रोजेक्ट का सफलतापूर्वक सम्पन्न होना शिक्षक की योग्यता तथा कार्य-कुशलता पर निर्भर है।

लघु उत्तरीय प्रण

प्रश्न 1.
योजना पद्धति की कार्य-प्रणाली को स्पष्ट करने के लिए उसके विभिन्न सोपानों का उल्लेख कीजिए। योजना शिक्षण पद्धति के कौन-से सोपान हैं ?
उत्तर:

योजना शिक्षण पद्धति के सोपान
(Factors of Project Educational Method)

योजना शिक्षण पद्धति के मुख्य सोपान निम्नलिखित हैं

1. समस्या मूलक परिस्थिति उत्पन्न करना-जहाँ तक सम्भव हो सके बालकों को ही योजना या प्रोजेक्ट चुनने के अवसर देने चाहिए। शिक्षक इस कार्य में बालकों की सहायता कर सकता है। शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों के सम्मुख कोई समस्यामूलक परिस्थिति उत्पन्न कर दे, जिसमें कोई समस्या निहित हो और जो बालकों की रुचि और बौद्धिक विकास के अनुरूप हो। रुचि उत्पन्न होने पर बालकों का ध्यान उस . परिस्थिति में निहित समस्या की ओर आकर्षित हो जाएगा। उस समस्या का समाधान करने के लिए बालक स्वयं ही योजनाएँ बनाएँगे।

2. योजना का चुनाव- शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कोई भी योजना बालकों पर बलपूर्वक न लादे, क्योंकि ऐसा करने से योजना महत्त्वहीन हो जाती है। शिक्षक को चाहिए कि वह योजना का चुनाव करने के लिए बालकों को प्रोत्साहित करे। बालक योजनाओं को प्रस्तावित करेंगे, लेकिन प्रत्येक बालक के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसी योजना के प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए, जोकि बालकों के वास्तविक जीवन से सम्बन्धित हो। शिक्षक को योजना चुनने के सम्बन्ध में बालकों का पथ-प्रदर्शन करना चाहिए और उसी योजना को स्वीकार करना चाहिए जिसका शैक्षिक मूल्य सबसे अधिक

3. कार्यक्रम का निर्माण योजना का चुनाव होने के बाद उसका कार्यक्रम बनाया जाता है, जिसकी सहायता से बालक उस समस्या अथवा योजना को हल करते हैं। कार्यक्रम-निर्माण के सम्बन्ध में भी सब बालकों को इस प्रकार के अवसर मिलने चाहिए कि वे अपने सुझाव रख सकें। किसी भी कार्यक्रम को पूर्ण वाद-विवाद के बाद ही स्वीकार करना चाहिए। कार्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिए जोकि स्वाभाविक परिस्थितियों में पूर्ण किया जा सके। कार्यक्रम को कई भागों में विभाजित कर देना चाहिए और प्रत्येक बालक को योग्यतानुसार कुछ-न-कुछ कार्य अवश्य देना चाहिए। इस प्रकार सभी बालक मिलकर किसी योजना को पूरा करते हैं।

4. कार्यक्रम का क्रियान्वयन- कार्यक्रम के निर्धारण के पश्चात् प्रत्येक बालक उत्साहपूर्वक अपने-अपने कार्य को ग्रहण करता है और उसे पूरा करने में जुट जाता है। प्रत्येक बालक अपना कार्य स्वयं करता है। इस प्रकार बालक क्रिया द्वारा सीखते हैं। शिक्षकों को योजना का कोई भी कार्य स्वयं नहीं करना चाहिए, बल्कि योजना को पूरा करने में बालकों की सहायता करनी चाहिए। शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों को अपनी गति से कार्य करने दें। इससे समय तो अधिक लगता है, लेकिन इस प्रकार प्राप्त किया गया ज्ञान अधिक स्थायी रहता है। शिक्षक का कार्य बालकों के कार्य का निरीक्षण करना, प्रोत्साहन देना और आवश्यकता पड़ने पर आदेश देना है। आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक योजना में परिवर्तन भी कर सकता है। और उस परिवर्तन की ओर बालकों का ध्यान आकर्षित कर सकता है।

5. कार्य का निर्माण करना-योजना या प्रोजेक्ट पूर्ण होने के पश्चात् शिक्षक तथा बालकों द्वारा यह देखा जाता है कि योजना ने कहाँ तक सफलता प्राप्त की है। जिस उद्देश्य को लेकर योजना प्रारम्भ की गई थी, वह पूर्ण हुआ या नहीं। प्रत्येक बालक पूर्णतया स्वतन्त्र होकर अपने विचार प्रकट करता है। इन विचारों पर सामूहिक रूप से विचार करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। इस प्रकार से बालकों को अपनी गलतियों का ज्ञान हो जाता है और वे अपनी आलोचना स्वयं करते हैं। ‘

6. कार्य का लेखा- प्रत्येक बालक के पास एक विवरण-पुस्तिका रहती है, जिसमें बालक के कार्यों को लेखबद्ध कर दिया जाता है। बालक प्रारम्भ से अन्त तक जो कुछ भी करते हैं, वह अपनी विवरण-पुस्तिका में लिख देते हैं। शिक्षक को चाहिए कि वह जो कार्य बालकों को दे, उसे लिखा दे, ताकि वह लेखानुसार अपने कार्य में व्यस्त रहें। इस लेखे के द्वारा शिक्षक यह निरीक्षण करता है कि छात्रों ने कितना कार्य समाप्त कर दिया है और कितना शेष है। वे अपने उत्तरदायित्व को पूरी तरह निभा रहे हैं या नहीं, छात्रों ने कितनी प्रगति की है आदि।

प्रश्न 2.
प्रोजेक्ट प्रणाली की क्या उपयोगिता है ?
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा- पद्धतियों में प्रोजेक्ट या योजना प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रणाली का मुख्यतम गुण है-व्यावहारिकता। इस प्रणाली से प्राप्त होने वाला ज्ञान व्यावहारिक होता है तथा वह जीवन के लिए उपयोगी होता है। यह एक रोचक शिक्षा-प्रणाली है, जो मनोवैज्ञानिक मान्यताओं पर आधारित है। यह बच्चों के मानसिक विकास में सहायक है। इस शिक्षा-पद्धति में सभी बालकों को समान रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है, चाहे उनकी बुद्धि तीव्र, मन्द अथवा साधारण हो। यह शिक्षा-प्रणाली बालकों को आत्म-विकास के अवसर प्रदान करती है। इस प्रणाली में विभिन्न विषयों को समन्वित रूप से पढ़ाया जाता है। इस शिक्षा-प्रणाली में गृह, पाठशाला तथा समाज में एक प्रकार का सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। प्रोजेक्ट प्रणाली बालकों के चरित्र के विकास में भी सहायक है। इसके अतिरिक्त प्रोजेक्ट प्रणाली की एक अन्य उपयोगिता है–सामाजिक भावना के विकास में सहायक होना। इस पद्धति में बालकों को दूसरे के सहयोग से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है। इससे उनमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है।

प्रश्न 3.
योजना पद्धति का कोई एक उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

योजना पद्धति एक उदाहरण
(An Example of Project Method)

प्रोजेक्ट या योजना दो प्रकार के होते हैं- सरल और बहुपक्षीय। जिसमें एक ही काम होता है, उसे सरल प्रोजेक्ट कहते हैं; जैसे-रोटी पकाना, बाजार से कुछ सामान लाना आदि। बहुपक्षीय प्रोजेक्ट उसे कहते हैं, जिनके द्वारा बालकों को एक साथ कई विषयों का ज्ञान मिल जाता है; जैसे—सीमेण्ट की दीवार बनाना, विद्यालयों में पानी का प्रबन्ध करना, नाटक करना आदि। सी० डब्ल्यू० स्टोन (C. W. Stone) ने पार्सल भेजने के एक बहुपक्षीय प्रोजेक्ट का उल्लेख किया है, जिसके माध्यम से पाठ्यक्रम के कई विषयों की शिक्षा दी जाती है। इस प्रोजेक्ट के अनुसार चौथी कक्षा के विद्यार्थी अपने दूरवर्ती मित्रों तथा सम्बन्धियों को पार्सल भेजने का निश्चय करते हैं और उससे सम्बन्धित योजना तैयार करते हैं। इस पार्सल को डाक द्वारा भेजने के कार्य में बालक पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों का ज्ञान निम्नलिखित तरीकों से प्राप्त करते हैं|

1. वार्तालाप- सर्वप्रथम बालक पार्सल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के सम्बन्ध में वार्तालाप प्रारम्भ करते हैं। इससे उन्हें डाक सम्बन्धी अनेक स्थानों एवं नियमों का ज्ञान हो जाता है। इसके साथ-ही-साथ उनकी बोलने, सोचने तथा तर्क करने की शक्ति का विकास होता है।

2. इतिहास- इतिहास के घण्टे में बालक भिन्न-भिन्न काल में डाक भेजने के साधनों से परिचय प्राप्त करता है। इससे उन्हें टिकटों के बारे में, विभिन्न देशों व प्रान्तों के निवासियों के बारे में पता चल जाता है।

3.हस्त-कार्य- हस्त-कार्य के घण्टे में बालक स्वयं पार्सल बनाकर उस पर कागज लपेटते हैं। इससे उन्हें कागज के मोड़ने, काटने तथा प्रयोग करने की विधियों का ज्ञान हो जाता है। इसके साथ-ही-साथ उन्हें कागज बनाने का तरीका भी पता चल जाता है। वे जान जाते हैं कि पार्सल को लपेटने के लिए किस प्रकार के कागज को प्रयोग करना चाहिए

4. भाषा-भाषा के घण्टे में बालक पार्सलों पर अपने मित्रों का पता लिखते हैं। इसके पश्चात् वे अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को पत्र लिखते हैं। इस प्रकार वे लिखने तथा पत्र-व्यवहार करने की योग्यता का विकास करते हैं। इसके बाद वे यह जानने का प्रयास करते हैं कि पत्र किस प्रकार पोस्ट किए जाते हैं। पत्र भेजने तथा पार्सल भेजने के क्या-क्या नियम हैं और निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचने में कितना समय लगता है। आदि।

5. भूगोल- भूगोल के घण्टे में बालक मानचित्र की सहायता से उन स्थानों की स्थिति के विषय में ज्ञान प्राप्त करते हैं, जहाँ वे पार्सल भेजना चाहते हैं। इससे उन्हें पता चल जाता है कि वह स्थान कितनी दूर है, वहाँ पहुँचने के कौन-से साधन हैं, कौन-कौन सी रेलवे लाइनें जाती हैं और वे किस-किस प्रदेश में से निकलकर निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचती हैं ? उन्हें यह भी ज्ञात हो जाता है कि जिन स्थानों पर रेलवे लाइन का अभाव है, वहाँ पार्सल किस प्रकार से भेजा जाएगा।

6. भ्रमण-इसके बाद बालक शिक्षक के साथ डाकखाने जाते हैं और डाकखाने के विभिन्न कार्यों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। उन्हें यह मालूम हो जाता है कि उन्हें अपने पार्सलों को तोलना है, वजन के हिसाब से टिकट लगाना है और पोस्ट ऑफिस से रजिस्ट्री करानी है।

7. अंकगणित- इसके लिए बालक अपने-अपने पार्सलों को तोलते हैं और उन पर वजन के हिसाब से टिकट लगाते हैं। इससे उन्हें जोड़ना, घटाना, गुणा आदि आ जाता है। इससे उन्हें पता चल जाता है कि पार्सल भेजने में कुल कितना धन व्यय हुआ है। इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि प्रोजेक्ट के माध्यम से बालक भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार योजना फ्द्धति बालकों को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा प्रदान करती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1 शिक्षा के क्षेत्र में योजना पद्धति की आवश्यकता क्यों अनुभव की गई?
उत्तर:
किलपैट्रिक ने स्वयं योजना पद्धति की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, आधुनिक समय में शिक्षालय और समाज तीव्र एवं विस्तृत रूप में एक-दूसरे से पृथक् हो गए हैं। विचार एवं कार्य-दो क्षेत्रों में स्थान, समय और भेद में असम्बन्धित हो गए हैं। शिक्षालय में जो कुछ भी अध्ययन किया जाता है एवं संसार में जो कुछ हो रहा है, इन दोनों में बहुत ही कम सम्बन्ध पाया जाता है। शिक्षालय के विषयों में बालकों को प्रौढ़ों के साथ सामाजिक क्रियाओं में भाग लेने की कोई अवसर प्राप्त नहीं होता है, इसलिए हम चाहते हैं कि शिक्षा वास्तविक जीवन की गहराई में प्रवेश करे। केवल सामाजिक जीवन में ही नहीं, वरन् उस समस्त जीवन में जिसकी आकांक्षा करते हैं।’

प्रश्न 2.
किलपैट्रिक के अनुसार प्रोजेक्ट के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किलपैट्रिक ने चार प्रकार के प्रोजेक्टों का उल्लेख किया है

  1. रचनात्मक प्रोजेक्ट- ऐसे प्रोजेक्ट को रचनात्मक प्रोजेक्ट कहते हैं, जिनमें विचार अथवा योजना को बाह्य रूप से स्पष्ट किया जाए; जैसे–नाव बनाना, पत्र लिखना आदि।
  2. समस्यात्मक प्रोजेक्ट- उन प्रोजेक्टों को समस्यात्मक प्रोजेक्ट कहते हैं, जिनमें किसी बौद्धिक कठिनाई या समस्या का समाधान करना हो; जैसे–ताप पाकर द्रव क्यों फैलते हैं ?
  3. रसास्वादन प्रोजेक्ट- ऐसे प्रोजेक्ट, जिनका उद्देश्य सौन्दर्यानुभूति हो, को रसास्वादन प्रोजेक्ट कहते हैं; जैसे-कहानी सुनना, गाना सुनना आदि।
  4. कौशल प्रोजेक्ट- इन प्रोजेक्टों का उद्देश्य किसी कार्य में दक्षता अथवा उसका विशेष ज्ञान प्राप्त करना होता है; जैसे—किसी चक्र को चलाना अथवा उसके चलाने का ज्ञान प्राप्त करना आदि।

प्रश्न 3.
मकमेरी के अनुसार प्रोजेक्ट के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
चार्ल्स ए० मकमेरी ने प्रोजेक्ट के निम्नलिखित विशेष प्रकार बताए हैं|

  1. साहित्य सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इसमें साहित्यिक रचनाओं के आधार पर प्रोजेक्ट का निर्माण किया जाता है; जैसे-नाटक, कहानी, कविता आदि।
  2. विज्ञान सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इस प्रकार के प्रोजेक्ट में बालकों के सामने विभिन्न प्रकार की अन्वेषण सम्बन्धी योजनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं; जैसे-बेतार का तार, वायुयान, टेलीविजन आदि।
  3. ऐतिहासिक तथा जीवनी सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इसके द्वारा ऐतिहासिक कथाओं तथा महापुरुषों की रचनाओं को प्रोजेक्ट के रूप में प्रस्तुत किया जाता है; जैसेसिकन्दर का आक्रमण, चन्द्रगुप्त का शासन-प्रबन्ध, अशोक का धर्म प्रचार आदि।
  4. हस्तकौशल सम्बन्धी प्रोजेक्ट-इसमें पुस्तक कला, कृषि, बागवानी, बढ़ईगिरी, दुकानदारी, मुर्गीपालन आदि कुटीर उद्योगों को कार्यान्वित किया जाता है। सिलाई-वस्त्रों की धुलाई, पाक विद्या आदि की भी योजना बनाई जाती है।
  5. औद्योगिक एवं व्यापारिक प्रोजेक्ट-भौगोलिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए ये प्रोजेक्ट बहुत लाभदायक सिद्ध होते हैं। इसमें रेल, पुल-निर्माण, सड़क, नहर आदि की योजना प्रस्तुत की जाती है। प्रकृति सम्बन्धी योजना; जैसे—समुद्र की लहरें, घाटियाँ तथा पहाड़ियाँ आदि भी इसी में आती हैं।

प्रश्न 4.
शिक्षा की प्रोजेक्ट प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं ? सटीक उत्तर लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा की प्रोजेक्ट प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं- व्यावहारिकता पर विशेष बल दिया जाना, रोचक पद्धति होना, मनोवैज्ञानिक पद्धति होना, श्रम को समुचित महत्त्व देना, मानसिक विकास पर बल देना, विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना, आत्म-विकास के अवसर प्रदान करना, पाठ्य-विषयों की स्वाभाविकता तथा आपसी समन्वय, गृह, पाठशाला एवं समाज के बीच सम्बन्ध होना तथा चरित्र एवं सामाजिक भावना के विकास पर बल देना।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की योजना अथवा प्रोजेक्ट प्रणाली के प्रवर्तक कौन थे ?
या
प्रोजेक्ट शिक्षण-विधि किसकी देन है ?
उत्तर:
शिक्षा की योजना अथवा प्रोजेक्ट प्रणाली के प्रवर्तक जॉन डीवी के शिष्य अमरीका के शिक्षाशास्त्री किलपैट्रिक थे।

प्रश्न 2.
किलपैट्रिक द्वारा प्रतिपादित शिक्षा की योजना प्रणाली किस सिद्धान्त पर आधारित है?
उत्तर:
किलपैट्रिक, द्वारा प्रतिपादित शिक्षा की योजना प्रणाली जॉन डीवी द्वारा प्रतिपादित प्रयोजनवाद नामक सिद्धान्त पर आधारित है।

प्रश्न 3.
शिक्षा की योजना प्रणाली को प्रारम्भ करने का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:
शिक्षा की योजना प्रणाली को प्रारम्भ करने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को यथार्थ जीवन से जोड़ना था।

प्रश्न 4.
“योजना वास्तविक जीवन का एक भाग है जो विद्यालय में प्रयोग किया जाता है। यह 
कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन बेलार्ड का है।

प्रश्न 5.
“योजना वह सहृदय उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो पूर्ण संलग्नता से सामाजिक वातावरण में किया जाए।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन किलपैट्रिक का है।

प्रश्न 6.
शिक्षा की योजना पद्धति में सीखने की प्रक्रिया के आधार क्या हैं?
या
प्रोजेक्ट पद्धति का सम्बन्ध किस प्रकार के जीवन से है ?
उक्ट
शिक्षा की योजना पद्धति में सीखने की प्रक्रिया करके सीखने’ (Learning by doing) तथा जीने से सीखने (Learning by living) पर आधारित है।

प्रश्न 7.
शिक्षा की योजना प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उक्ट

  • उद्देश्य या प्रयोजन का सिद्धान्त,
  • क्रियाशीलता का सिद्धान्त,
  • स्वतन्त्रता का सिद्धान्त तथा
  • उपयोगिता का सिद्धान्त।

प्रश्न 8.
शिक्षा की योजना पद्धति के चार मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • व्यावहारिकता,
  • रोचक एवं मनोवैज्ञानिक पद्धति,
  • पाठ्य-विषयों की स्वाभाविकता तथा
  • गृह, पाठशाला तथा समाज से सम्बन्धित।

प्रश्न 9.
शिक्षा की योजना पद्धति के चार मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उक्त्र

  • खर्चीली पद्धति,
  • प्रोजेक्ट के चुनाव की कठिनाई,
  • उचित परीक्षा प्रणाली का अभाव तथा
  • विषयों के क्रमबद्ध अध्ययन का अभाव।

प्रश्न 10.
शिक्षा की योजना पद्धति के महत्त्व को दर्शाने वाला कोई कथन लिखिए।
उत्तर:
“योजना पद्धति शिक्षा का प्रजातान्त्रिक मार्ग है। यह बच्चों को सहयोग के लिए प्रोत्साहित करती है तथा सामान्य उद्देश्य के लिए विचार करने की प्रेरणा देती है।” -प्रो० भाटिया

प्रश्न 11.
शिक्षा की योजना पद्धति के अन्तर्गत मुख्य रूप से कितने प्रकार के प्रोजेक्ट होते हैं ?
उत्तर:
शिक्षा की योजना पद्धति के अन्तर्गत मुख्य रूप से दो प्रकार के प्रोजेक्ट होते हैं-
(i) व्यक्तिगत प्रोजेक्ट तथा
(i) सामाजिक प्रोजेक्ट।।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत प्रोजेक्ट से क्या आशय है ? उत्तर व्यक्तिगत प्रोजेक्ट उन्हें कहते हैं, जिनमें विद्यार्थी स्वतन्त्र रहकर कार्य करता है। कभी-कभी विद्यार्थी को अलग-अलग योजनाएँ दी जाती हैं जिन्हें वे पूर्ण करते हैं।

प्रश्न 13.
सामाजिक प्रोजेक्ट से क्या आशय है ?
उत्तर:
सामाजिक प्रोजेक्ट उस प्रोजेक्ट को कहते हैं जिनमें सब विद्यार्थी एक ही प्रोजेक्ट पर कार्य करते हैं और एक-दूसरे के सहयोग से उसे पूरा करते हैं।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. प्रोजेक्ट प्रणाली को मिस हैलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ किया था।
  2. प्रोजेक्ट से आशय है निश्चित उद्देश्यपूर्ण कार्य।
  3. किलपैट्रिक कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अध्यापकों के कॉलेज में शिक्षाशास्त्र के प्रोफेसर थे।
  4. योजना प्रणाली के अन्तर्गत बालकों को क्रिया के माध्यम से शिक्षा दी जाती है।
  5. योजना प्रणाली में बच्चों में सामाजिक भावना की पूर्ण अवहेलना की गई है।
  6. योजना प्रणाली के अन्तर्गत बच्चों के व्यक्तित्व पर शिक्षक का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. सत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य,
  6. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
प्रोजेक्ट प्रणाली के जन्मदाता हैं
(क) फ्रॉबेल
(ख) जॉन डीवी
(ग) किलपैट्रिक
(घ) पेस्टालॉजी

प्रश्न 2.
प्रोजेक्ट एक समस्याप्रधान कार्यवाही है जिसके अन्तर्गत स्वाभाविक परिस्थितियों में पूर्णता को प्राप्त किया जाता है।” यह कथन किसका है?
(क) किलपैट्रिक का
(ख) जॉन डीवी का
(ग) कमेनियस का।
(घ) स्टीवेन्सन का।

प्रश्न 3.
प्रोजेक्ट प्रणाली का आधार है
(क) आदर्शवाद
(ख) प्रयोजनवाद
(ग) उदारवाद
(घ) प्रयोगवाद

प्रश्न 4.
प्रोजेक्ट प्रणाली का प्रमुख सिद्धान्त है
(क) अनुभव का सिद्धान्त
(ख) प्रयोजन का सिद्धान्त
(ग) उपयोगिता का सिद्धान्त
(घ) प्रयोगशाला का सिद्धान्त

प्रश्न 5.
प्रोजेक्ट प्रणाली की शिक्षण विधि का अन्तिम चरण है
(क) प्रोजेक्ट का चुनाव
(ख) योजना का निर्माण
(ग) मूल्यांकन
(घ) कार्य का लेखा।

प्रश्न 6.
प्रोजेक्ट प्रणाली का प्रमुख दोष है
(क) प्राजक्ट चयन में कठिनाई
(ख) समय का अधिक व्यय
(ग) व्यावहारिकता
(घ) शारीरिक विकास के लिए उपयुक्त

उत्तर:

1. (ग) किलपैट्रिक,
2. (घ) स्टीवेनन का,
3. (ख) प्रयोजनवाद,
4, (ख) प्रयोजन का सिद्धान्त,
5. (घ) कार्य का लेखा,
6. (क) प्रोजेक्ट चयन में कठिनाई। .

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 4 Aims of Education in Present Democratic India

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 4
Chapter Name Aims of Education in Present Democratic India
(वर्तमान लोकतन्त्रीय भारत में शिक्षा के उद्देश्य)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 4 Aims of Education in Present Democratic India (वर्तमान लोकतन्त्रीय भारत में शिक्षा के उद्देश्य)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.

शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण के दृष्टिकोण से अपने देश की वर्तमान परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
शिक्षा अपने आप में एक व्यापक प्रक्रिया है। इसके अनेक उद्देश्य महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। इसके उद्देश्य सापेक्ष होते हैं। इसके उद्देश्यों के निर्धारण के लिए सम्बन्धित देशकाल की समस्त परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। वास्तव में भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में शिक्षा के भिन्न-भिन्न उद्देश्यों को प्राथमिकता प्रदान की जाती है।

आधुनिक भारत संक्रमण काल से होकर गुजर रहा है। एक तरफ जहाँ भारतीय समाज की पुरानी मान्यताएँ, सिद्धान्त तथा आदर्श मूल्यहीन होकर पतन की ओर बढ़ रहे हैं, वहाँ दूसरी तरफ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकसित होते नवीन दृष्टिकोण अभी पूर्णतः स्वीकृत नहीं हो पाए हैं। अत: स्थिति उलझन एवं निराशा भरी और विचित्र है। देश के धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक आदि सभी क्षेत्रों में भीषण समस्याओं ने जन्म ले लिया है। शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करने के लिए देश की निम्नलिखित परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है

1. धार्मिक दिशाहीनता- पारम्परिक रूप से भारत प्रारम्भ से ही एक धर्म-प्रधान देश रहा है, किन्तु वर्तमान में धर्म अपना वास्तविक | धार्मिक दिशाहीनता स्वरूप खो चुका है। आजकल धर्म के नाम पर मजहबी झगड़े और चारित्रिक एवं नैतिक पतन साम्प्रदायिक उन्माद ही दिखाई पड़ते हैं। स्वार्थी एवं दिशाहीन धार्मिक, सामाजिक विकृतियाँ एवं नेतृत्व ने समूचे भारत को साम्प्रदायिक विद्वेष की आग में झोंक दिया विखण्डन

2. चारित्रिक एवं नैतिक पतन- देश में चारों ओर छल, फरेब, बेरोजगारी तथा निर्धनता जालसाजी, घूसखोरी तथा भ्रष्टाचार फैला हुआ है। व्यक्ति का आर्थिक विषमताओं के कुप्रभाव चारित्रिक एवं नैतिक पतन समूचे समाज के पतन का कारण बनता जा राजनीतिक नेतृत्वहीनता रहा है। देश के नागरिकों के चरित्र एवं नैतिकता में निरन्तर पतन से 9 सांस्कृतिक विघटन राष्ट्रीय चरित्र का भारी अवमूल्यन हुआ है।

3. सामाजिक विकृतियाँ एवं विखण्डन- अशिक्षा एवं अज्ञानता पड़ोसी देशों से खतरा के कारण आज भी भारतीय समाज में नाना प्रकार की सामाजिक कुप्रथाएँ, रूढ़ियाँ तथा विकृतियाँ व्याप्त हैं। अन्धविश्वास, नारी उत्पीड़न, दहेज-प्रथा, मद्यपान, जूआखोरी जैसे दोषों ने समाज को रोगी बना दिया है। जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद एवं प्रान्तवाद की संकीर्ण विचारधाराओं ने राष्ट्र की एकता और अखण्डता को गम्भीर चुनौती दी है। यदि ये सामाजिक दोष एवं विखण्डनकारी प्रवृत्तियाँ इसी प्रकार बढ़ती रहीं तो एक दिन देश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।

4. भौतिकवादी मनोवृत्ति- पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के बढ़ते हुए प्रभाव ने भारतीयों के आध्यात्मिक मूल्यों तथा आदर्शों पर गहरी चोट की है। लगता है कि जैसे धर्म का आदि-स्रोत सूखकर शनैः-शनै: भौतिकवाद के रेगिस्तान में बदल रहा है। अधिक-से-अधिक भौतिक सुख और समृद्धि पाने की लालसा में लोग प्राचीन भारतीय संस्कृति को भुला बैठे हैं। भौतिकता की अन्धी दौड़ में जीवन का चरम लक्ष्य उपेक्षित हो रहा है।

5. बेरोजगारी तथा निर्धनता- विभिन्न कारणों से हमारे देश में दिन-प्रतिदिन बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है। शिक्षित तथा अशिक्षित दोनों ही प्रकार के बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। बेरोजगारी से समाज में असन्तोष तथा आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इसके साथ-ही-साथ समाज के एक बड़े वर्ग में निर्धनता की स्थिति उत्पन्न हो रही है। निर्धनता अपने आप में एक अभिशाप है।।

6. आर्थिक विषमताओं के कुप्रभाव- देश की अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व संकट की स्थिति में है। देश के कन्धे विदेशी ऋणों के भार से दबे जा रहे हैं। निर्धनता के दुष्चक्र में फंसे देशवासियों का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। देश के लगभग 60% से अधिक लोग ‘निर्धनता की रेखा से नीचे जीवन बिताने पर मजबूर हैं। शिक्षित एवं अशिक्षित दोनों ही तरह की निरन्तर बढ़ती हुई बेरोजगारी ने युवाओं में विद्रोह को जन्म दिया है, जिसके परिणामस्वरूप आतंकवाद, लूटमार, हत्या तथा डकैती की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

7. राजनीतिक नेतृत्वहीनता-वर्तमान समय में राजनीति भ्रष्टाचार एवं स्वार्थ की नीति का पर्याय बन चुकी है। जनकल्याण की भावना से प्रेरित राजनैतिक नेतृत्व शून्यप्रायः है। पदलोलुप नेता वोट बटोरने की खातिर संकीर्ण विचारधारा पर आधारित मनोभावों को भड़काकर जनता को आपस में लड़ा रहे हैं। राज्य और केन्द्र की अस्थिर सरकारों ने देश के सामने आन्तरिक तथा बाहरी, दोनों ही प्रकार की असुरक्षा का संकट उत्पन्न कर दिया है।

8. सांस्कृतिक विघटन- भारत की विश्वप्रसिद्ध सांस्कृतिक धरोहर आज क्रमशः विघटन की ओर है। आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी जगत् के अनमेल संस्कार भारतीयों के दिल-दिमाग पर हावी हो गए हैं, जिससे उनका नैतिक-चरित्र तथा आचरण गिरा है। इस सांस्कृतिक विघटन के कारण मनुष्य-मात्र मानवीय गुणों से हीन होता जा रहा है।

9. शिक्षा की शोचनीय दशा- वर्तमान शिक्षा-प्रणाली की विकृतियों ने उसके सभी अंगों; जैसे—शिक्षक, शिक्षार्थी, पाठ्यक्रम, शिंक्षण-नीति तथा मूल्यांकन-पद्धति को दोषों से भर दिया है। यही कारण है कि आज शैक्षिक प्रक्रिया का उत्पादन. (अर्थात् शिक्षार्थी) वांछित गुणों से युक्त नहीं है और शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन की माँग उठ रही है।

10. पड़ोसी देशों से खतरा- हमारे देश को अपने पड़ोसी देशों से भी समय-समय पर खतरा बना रहता है। इस कारण हमें अपने सैन्य बल को निरन्तर बढ़ाना पड़ रहा है।

प्रश्न 2.
वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में व्यक्ति के दृष्टिकोण से शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या निर्धारित किए जा सकते हैं ? ‘
या
हमारे देश की वर्तमान व्यवस्था के सन्दर्भ में शिक्षा के उद्देश्य क्या होने चाहिए ?
या
वर्तमान भारत में माध्यमिक शिक्षा के क्या उद्देश्य होने चाहिए ? सविस्तार व्याख्या कीजिए।
या
भारत की वर्तमान सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर आप शिक्षा के किन उद्देश्यों का निर्धारण करेंगे ?
या
आधुनिक लोकतन्त्रीय भारत में शिक्षा के क्या उद्देश्य होने चाहिए ?
या
भारत में उभरते हुए लोकतन्त्र में शिक्षा के क्या उद्देश्य होने चाहिए?
या
भारत की वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा के क्या उद्देश्य होने चाहिए। इनकी विस्तृत विवेचना कीजिए।
या
भारत के वर्तमान सन्दर्भ में शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। कौन-से उद्देश्य व्यक्तिगत विकास में सहायक हैं ?
उत्तर:
वर्तमान लोकतान्त्रिक भारत की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अन्तर्गत भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों का अध्ययन दो आधारों पर किया जा सकता है
(अ) व्यक्ति की दृष्टि से शिक्षा के उद्देश्य तथा
(ब) समाज की दृष्टि से शिक्षा के उद्देश्य।

व्यक्ति की दृष्टि से शिक्षा के उद्देश्य
(Aims of Education According to Man)

व्यक्ति से सम्बन्ध रखने वाले शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हो सकते हैं—

1.शारीरिक विकास- लोकतन्त्र में नागरिकों के शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ मस्तिष्क का सूचक है। स्वस्थ व्यक्ति ही परिश्रम के साथ उत्तम कार्य करने की क्षमता रखता है, वही व्यवसाय में सफल हो सकता है जो मानव-मात्र और राष्ट्र की सेवा कर सकता है। यही कारण है कि लोकतन्त्र में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य । व्यक्ति की दृष्टि से शिक्षा। बालकों के शरीर का विकास करना होना चाहिए। विश्वविद्यालय के उद्देश्य शिक्षा आयोग, माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने । इस उद्देश्य पर बल दिया है। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “मेरा विचार है कि जब तक हमारा शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं होगा, तब।  तक हम वास्तव में अधिक मानसिक प्रगति नहीं कर सकते।”चारोत्रक विकास

2. मानसिक विकास- लोकतन्त्र के आदर्श नागरिकों में वकास शारीरिक बल से भी अधिक मानसिक शक्तियों का विकास आवश्यक का विकास समझा जाता है। दुर्भाग्यवश हमारा देश सदियों तक कई विदेशी ताकतों . का गुलाम रहा, जिसके परिणामस्वरूप भारतीयों में स्वतन्त्र चिन्तने, व्यावसायिक कुशलता की उन्नति तर्क एवं आत्मनिर्णय आदि की मानसिक शक्तियाँ क्षीण पड़ गयीं। वर्तमान में इन शक्तियों को विकसित करने की सर्वाधिक आवश्यकता है। अत: हमारी शिक्षा का पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जिसके माध्यम से बालकों के मस्तिष्क व्यापक बनें और उनमें विभिन्न मानसिक शक्तियाँ विकसित हो सकें। प्रसिद्ध विचारक हरबर्ट स्पेन्सर के अनुसार, “मस्तिष्क ही व्यक्ति को अच्छा या बुरा, दुःखी या सुखी, धनी और निर्धन बनाता है।”

3.आध्यात्मिक विकास- महर्षि अरविन्द ने लिखा है, “हम में से हर एक कुछ दैवीय है, कुछ अपना स्वयं का है जो हमें पूर्णता और शक्ति प्राप्त करने का अवसर देता है। हमारा कार्य है इसकी खोज करना, इसे विकसित करना और इसका प्रयोग करना। शिक्षा का उद्देश्य विकसित होने वाली आत्मा को सर्वोत्तम प्रकार से विकास करने में मदद देना तथा श्रेष्ठ कार्य के लिए पूर्ण बनाना, होना चाहिए।” यह सच है कि पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध और लौकिकता के उन्माद में हम भारतीय अध्यात्म के महान् आदर्श को भूल चुके हैं। शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण कार्य आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति, इसके विकास तथा प्रयोग की क्षमता देना है। अतः बालक में आध्यात्मिक गुणों का विकास करना शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।

4. चारित्रिक विकास-कि सी लोकतन्त्र की उन्नति उसके नागरिकों के आदर्श चरित्र पर निर्भर करती है। आजकल भारतीय जनों के आचार-विचार तथा कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति उदासीनता का भाव, प्रपंच, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार तथा देशद्रोह जैसी प्रवृत्तियाँ समा गई हैं। इसका परिणाम यह है कि वैयक्तिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर चरित्र का पतन हुआ है। अत: भारतीय शिक्षा प्रणाली में बालकों के चारित्रिक विकास पर सर्वाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण होना चाहिए। जैसा कि डॉ० जाकिर हुसैन का विचार है, “हमारे शिक्षा-कार्य का पुनर्संगठन और व्यक्तियों का नैतिक पुनरुत्थान एक-दूसरे में अविच्छिन्न रूप से गुंथे हुए हैं।”

5. व्यक्तित्व का विकास-भारत जैसी लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति के अन्तर्गत शिक्षा का एक अपरिहार्य उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का विकास करना है। बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करने के लिए उसकी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, चारित्रिक, रचनात्मक तथा कलात्मक आदि सभी शक्तियों का समुचित प्रयोग किया जाना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि शिक्षा बालक की मनोवैज्ञानिक, भावात्मक, सामाजिक तथा व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे और उसमें अच्छी रुचियों का निर्माण करे। यह तभी सम्भव है जब शिक्षा के पाठ्यक्रम को इस प्रकार सुगठित किया जाए जिससे कि शिक्षार्थियों में साहित्य, कला, ” हस्तकौशल, नृत्य तथा संगीत आदि के प्रति अनुराग उत्पन्न हो सके।

6. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास- आधुनिक युग में विज्ञान एवं तकनीक का विकास किसी भी अर्थव्यवस्था की उन्नति का मूलतन्त्र है। विश्व का हर कोई फ्रगतिशील देश विज्ञान का सहारा लेकर ही आगे बढ़ रहा है। अतः शिक्षा का उद्देश्य शिक्षार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अभिवृत्तियों का विकास करना होना चाहिए। नि:सन्देह तर्क पर आधारित विज्ञान की शिक्षा ही भारतीयों को अन्धविश्वासों, आधारहीन मान्यताओं, कूप-मण्डूकता तथा रुग्ण विचारों से मुक्ति दिला सकती है। स्वामी विवेकानन्द का कथन है-“हमारे लिए पश्चिमी विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है। हमें तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता है, जिससे हमारे देश के उद्योगों का विकास होगा।’

7. व्यावसायिक कुशलता की उन्नति- बालकों की व्यावसायिक कुशलता में उन्नति लाना लोकतान्त्रिक देश की शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। शिक्षार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा के सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक दोनों ही पक्षों का पर्याप्त ज्ञान सुलभ कराया जाए। शिक्षा के दौरान ही वे इस तथ्य को अच्छी प्रकार समझ लें कि उनके देश की उन्नति सिर्फ कार्य द्वारा सम्भव है तथा शिक्षा की समाप्ति के बाद जब वे किसी व्यवसाय में लगें तो उसे कुशलता के साथ पूर्ण करने का प्रयत्न करें। अतः शिक्षा को छात्रों की व्यावसायिक कुशलता की उन्नति पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। भारत की वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में शिक्षा के व्यावसायिक कुशलता सम्बन्धी उद्देश्य का विशेष महत्त्व है।

8. जीवन-यापन की कला का विकास- भारतीय शिक्षा का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वह बालकों को समाज में जीवन-यापन की कला में दीक्षित करे। सर्वमान्य रूप से मनुष्य अकेला रहकर जीवन का सुख नहीं पा सकता। अपने सर्वांगीण विकास तथा समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति दूसरे लोगों के साथ रहने तथा उन्हें सहयोग देने का महत्त्व समझे। बालक को जीवन-यापन का प्रशिक्षण देने सम्बन्धी शिक्षा के उद्देश्य के बारे में डॉ० राधाकृष्णन ने लिखा है, “हमें युवकों को यथासम्भव सर्वोत्तम प्रकार के सर्व कार्यकुशल, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। उन्हें शिष्टाचार और सम्मान के अलिखित नियमों को अपनी इच्छा से मानना एवं सीखना चाहिए।”

9. अवकाश का सदुपयोग- लोकतन्त्रीय शिक्षा-प्रणाली को एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि वह हमें समय का सदुपयोग करना सिखाए। सम्भवतः हम भारतीय लोग समय का जितना दुरुपयोग करते हैं, उतना दुनिया के किसी भी देश के लोग नहीं करते। अवकाश काल में अनर्गल बातें करना, उद्देश्यहीन इधर-उधर घूमना, दूसरों के अहित की कामना करना या फिर क्षुद्र राजनीति का शिकार होना–ऐसी बातों से मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता। अवकाश के समय में भी व्यक्ति को किसी-न-किसी सत्कर्म में रत रहना चाहिए। नैपोलियन के इन शब्दों ने फ्रांस के छात्रों को प्रेरणा से भर दिया था, “अपने अवसरों से लाभ उठाओ, प्रत्येक घण्टा जो तुम अब तक नष्ट कर चुके हो वह तुम्हारे भावी दुर्भाग्य को मौका देता है। अतः अवकाश का उचित उपयोग सिखाना शिक्षा का परम कर्तव्य है।

10. सांस्कृतिक विकास- भारत देश की संस्कृति ने सदैव ही विश्व में इस धरती का मस्तक ऊँचा किया है। संस्कृति की सामंजस्य एवं समन्वयवादी विशेषता के कारण अगणित झंझावातों से निकलकर आज भी भारतीय समाज अखण्ड एवं अक्षुण्ण बना है, किन्तु दुर्भाग्यवश पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण भारतवासी अपनी बहुमूल्य संस्कृति को हीन समझने लगे हैं। परिणामतः भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्थिति डगमगा गई है। स्पष्टतः वर्तमान भारत में सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से शिक्षा में सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य को उच्च एवं सम्मानयुक्त स्थान देना होगा। प्रश्न 3 वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में समाज के दृष्टिकोण से शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या निर्धारित किए जा सकते हैं ?

समाज के दृष्टिकोण से शिक्षा के उद्देश्य
(Aims of Education According to Society)

वर्तमान भारत का धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वातावरण विभिन्न प्रकार की कुप्रवृत्तियों, शोषण एवं उत्पीड़न के कारण विषाक्त है। यदि हमें एक सुन्दर समाज की स्थापना करनी है, तो आवश्यक रूप से शिक्षा के ढाँचे में आमूल परिवर्तन करना होगा। इसके लिए शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निश्चित । किए जा सकते हैं।

1. लोकतान्त्रिक नागरिकता का विकास- विश्व का प्रत्येक लोकतन्त्र अपने नागरिकों की श्रेष्ठता पर निर्भर करता है। अतः लोकतन्त्र में हर एक व्यक्ति को उत्तम नागरिकता के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उत्तम नागरिकता के लिए आवश्यक मानसिक, सामाजिक और नैतिक गुण व्यक्ति में तभी विकसित होते हैं, जब–

  • वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं समाज के दृष्टिकोण से शिक्षा के का समाधान स्वतन्त्रतापूर्वक खोज सके,
  • अपने कार्य की विधि को स्वयं निश्चित कर सके और
  • उसमें स्पष्ट रूप से विचार व्यक्त करने की क्षमता हो। अत: अच्छे नागरिक को मानसिक

दृष्टि से स्वस्थ, योग्यता से युक्त, तर्कशील, विवेकपूर्ण तथा स्पष्ट  वक्ता होना चाहिए। इन समस्त विशेषताओं वाला नागरिक ही  अन्त शोषण एवं कुरीतियों का साहसपूर्वक विरोध करता हुआ का विकास सामाजिक दोषों को दूर करने में सफल हो सकता है। लोकतन्त्र जन-शिक्षा की व्यवस्था को सफल बनाने के लिए नागरिकों में लेखन और भाषण की स्पष्टता का होना भी अनिवार्य है, क्योंकि स्वतन्त्र विचार-विनिमय एवं वाद-विवाद ही लोकतन्त्र के वास्तविक भावात्मक एकता आधार हैं। उत्तम नागरिकता के लिए अपरिहार्य तथा उपर्युक्त सभी नि:स्वार्थ कार्य की भावना का विकास गुण व्यक्ति में स्वयं ही नहीं आ जाते, अपितु इन्हें शिक्षा द्वारा अन्तर-सांस्कृतिक भावना का विकास उत्पन्न किया जाता है। अत: लोकतन्त्रीय नागरिकता का विकास  शिक्षा का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

2.समाजवादी समाज की स्थापना- स्वतन्त्र भारत एक सुन्दर “समाजवादी समाज की स्थापना का स्वप्ने मन में सँजोए हुए है। इस अनोखी समाज-व्यवस्था में–

  • प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक वे आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाएगी,
  • सभी को स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के समान अवसर प्रदान किए जाएँगे तथा
  • जीवन के किसी भी क्षेत्र में असमानता की भावना न होगी।

स्पष्टत: यह भारतीय समाज का नवीन दिशा में रूप परिवर्तन होगा और यह परिवर्तन सिर्फ शिक्षा के माध्यम से ही लाना सम्भव है। इसीलिए शिक्षा का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वह बालकों में नई सामाजिक व्यवस्था के प्रति प्रेम एवं सद्भाव पैदा करे तथा भारतीय समाज के प्रत्येक सदस्य को समाजवादी समाज के सिद्धान्तों की ओर ले जाए। नेहरू जी का विचार था, “मैं समाजवादी राज्य में विश्वास करता हूँ और चाहता हूँ कि शिक्षा का इस उद्देश्य की तरफ विकास किया जाए।

3. सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त- आधुनिक भारतीय समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक कुप्रथाएँ व्याप्त हैं, जिनमें जाति-प्रथा, परदा-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-पुनर्विवाह निषेध तथा अस्पृश्यता आदि प्रमुख हैं। सुन्दर समाज की स्थापना तथा सामाजिक प्रगति के विचार से उचित शिक्षा द्वारा सभी कुप्रथाओं का अन्त करना होगा। इस सम्बन्ध में नेहरू जी का यह कथन उल्लेखनीय है, “मैं चाहता हूँ कि धर्म या जाति, भाषा या प्रान्त के नाम में जो संकीर्ण संघर्ष आजकल चल रहे हैं, वे समाप्त हो जाएँ और वर्गविहीन तथा जातिविहीन समाज का निर्माण हो जिसमें हर एक व्यक्ति को अपने गुण और योग्यता के अनुसार उन्नति करने का पूरा अवसर मिले। निष्कर्षत: भारतीय शिक्षा का उद्देश्य प्रचलित सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त करना होना चाहिए।’

4. सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज के अन्य व्यक्तियों पर निर्भर रहना पड़ता है। वस्तुत: व्यक्ति की शारीरिक, बौद्धिक तथा आत्मिक आवश्यकताओं को समाज के दूसरे सदस्य ही पूरा करते हैं। इस प्रकार से समाज के प्रत्येक व्यक्ति के कन्धे पर अनेक सामाजिक उत्तरदायित्व आ जाते हैं। इस दृष्टि से यह आवश्यक हो जाता है कि व्यक्ति सभी के साथ मिलकर समाज के जीवन को भौतिक एवं नैतिक रूप से उत्तम बनाने का दायित्व ले। लोगों में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास करने का कार्य शिक्षा ही करती है। डॉ० जाकिर हुसैन लिखते हैं, “सामुदायिक उत्तरदायित्व की शिक्षा देने के लिए स्वयं शिक्षा संस्थाओं को सामुदायिक जीवन की इकाइयों के रूप में संगठित किया जाना चाहिए।’

5. जन-शिक्षा की व्यवस्था—भारतीय समाज की निर्धनता, पिछड़ेपन, बदहाली, संकीर्ण मनोवृत्ति तथा अवनति का मूल कारण राष्ट्रव्यापी निरक्षरता है। लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति में शिक्षित नागरिक ही देश की उन्नति कर सकते हैं, लेकिन देश के बहुसंख्यक लोग अशिक्षित हैं। अत: देश में जन-शिक्षा की प्रभावपूर्ण एवं श्रेष्ठ व्यवस्था की जानी चाहिए। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “मेरे विचार से जनता की अवहेलना महान् राष्ट्रीय पाप है। कोई भी राजनीति उस समय तक सफल नहीं होगी, जब तक कि भारत की जनता एक बार पुनः अच्छी तरह शिक्षित न हो जाएगी।

6. नेतृत्व के गुणों का विकास- माध्यमिक शिक्षा आयोग की दृष्टि में-“लोकतान्त्रिक भारत में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य व्यक्तियों में नेतृत्व के गुणों का विकास करना है।” लोकतन्त्र का कार्य सबसे बुद्धिमान् निर्वाचित नागरिकों के नेतृत्व में सबकी प्रगति करना है। यदि बालकों को उचित शिक्षा द्वारा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों; जैसे-धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक–में आवश्यक प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा तो वे भारत के भावी समाज को नेतृत्व न दे सकेंगे। निश्चय ही, शिक्षा का एक विशिष्ट उद्देश्य शिक्षार्थियों में नेतृत्व के गुणों का विकास करना है।

7.भावात्मक एकता- भावात्मक एकता से अभिप्राय देश के विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों को भावात्मक रूप से एक रखने से है।  जीवन के कुछ ऐसे मूल्य होते हैं जिन्हें ‘राष्ट्र के रूप में सामान्य समझा जाता है। भावात्मक एकता ऐसे ही मूल्यों की भावात्मक चेतना और उन सब मूल्यों के प्रति भावनाओं के विकास का नाम है। वर्तमान भारत में जो सांस्कृतिक संघर्ष चल रहे हैं उन्हें कम करने में भावात्मक एकता सशक्त भूमिका निभा सकती है। भावात्मक एकता प्राप्त करने के लिए भारत के लोगों को समान रूप में सोचने-समझने, कार्य करने, समान जीवन के ढंग स्वीकार करने, विभिन्न धर्मों में समान आधार खोजने, समान सार्वजनिक परम्पराओं को अपनाने तथा समान भाषा को स्वीकार करने के लिए प्रशिक्षित करना होगा। इस दिशा में शिक्षा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकती है। सर्वमान्य रूप से लोकतान्त्रिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य देश के बालकों को भावात्मक एकता की प्राप्ति के लिए प्रचेष्ट करना है।

8. निःस्वार्थ कार्य की भावना का विकास- भौतिकवादी पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव ने नि:स्वार्थ त्याग के प्रतीक महर्षि दधीचि के देश भारत को स्वार्थपरता की भावनाओं से भर दिया है। हर कोई स्वार्थसिद्धि की आशा लेकर ही कार्य करता है। जिनसे स्वार्थ पूरा होने की आशा नहीं होती, उनसे बात तक नहीं की जाती और मतलब निकल जाने पर फिर कोई सम्बन्ध भी रखना नहीं चाहता। स्वार्थपरता की प्रबल भावना लोगों के मस्तिष्क में दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है, लेकिन ऐसी भावना मानवीय मूल्यों के एकदम विरुद्ध है। अतः शिक्षा के माध्यम से देशवासियों में नि:स्वार्थ भाव से कार्य करने की भावना का विकास करने की आवश्यकता है। जैसा कि डॉ० राधाकृष्णन ने लिखा है, “भारतमाता आपसे आशा करती है कि आपका जीवन शुद्ध, श्रेष्ठ और नि:स्वार्थ कार्य के लिए अर्पित हो।”

9. अन्तर-सांस्कृतिक भावना का विकास- हमारे देश में अनादिकाल में विभिन्न सांस्कृतिक धाराएँ प्रवाहित होती रही हैं। दूसरे शब्दों में, भारतीय संस्कृति अनेक संस्कृतियों का सुन्दर समाहार है। हमारी संस्कृति की इसी विशेषता ने उसे विश्व की अन्य संस्कृतियों से पृथक् एवं विशिष्ट बना दिया है। प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है कि वह विश्व के अन्य देशों की संस्कृतियों को समझे और उन्हें उचित सम्मान दे। इस कार्य में शिक्षा को सबसे अधिक योगदान करना होगा। उदाहरण के लिए–(i) शैक्षिक पाठ्यक्रम के अन्तर्गत बालकों को देश के विभिन्न भागों तथा विश्व की विविध संस्कृतियों का ज्ञान दिया जाए, (ii) विश्व इतिहास के अध्ययन पर जोर दिया जाए, (iii) देश के विश्वविद्यालय समय-समय पर सांस्कृतिक संगोष्ठियों का आयोजन करें, (iv) सभी राज्यों के शिक्षक परस्पर ज्ञान का विनिमय करें तथा (v) विश्व के सांस्कृतिक-मण्डलों, नृत्यकारों, लेखकों, संगीतज्ञों तथा कलाकारों के बीच ज्ञान एवं कलाओं के आदान-प्रदान की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।।

10. विश्व-बन्धुत्व की भावना- आधुनिक युग विश्व-बन्धुत्व की ओर बढ़ रहा है। ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी की उन्नति ने समूचे भूमण्डल को एक इकाई का रूप दे दिया है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में,  संसार से अलग रहकरे भारत समय के साथ कदम नहीं मिला सकेगा; अत: अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान एवं सद्भावना का विकास प्रगति का वास्तविक मानदण्ड बन गया है। पण्डित नेहरू के शब्दों में, “प्राचीन संसार बदल गया है और प्राचीन बाधाएँ समाप्त होती जा रही हैं। जीवन अधिक अन्तर्राष्ट्रीय होता जा रहा है। हमें आने वाली अन्तर्राष्ट्रीयता में अपनी भूमिका अदा करनी है। इस कार्य के लिए, संसार से सम्पर्क आवश्यक है। अतएव यह कार्य शिक्षा द्वारा प्रभावशाली ढंग से किया जाना चाहिए।’

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्तमान भारतीय सन्दर्भ में शैक्षिक आवश्यकताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शैक्षिक आवश्यकताएँ
(Educational Needs)

माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भारत में समाजवादी समाज की स्थापना के लिए देश की शैक्षिक आवश्यकताओं को इस प्रकार बताया है

1. बहुआयामी समस्याओं का समाधान- आज भारत धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक आदि गम्भीर बहुआयामी समस्याओं के साथ जूझ रहा है। शिक्षाशास्त्रियों के अनुसार इनमें से अधिकांश समस्याओं का समाधान उपयुक्त शिक्षा द्वारा ही सम्भव है।

2. नैतिक-चरित्र एवं सदगुणों का विकास- चरित्रवान्, नैतिक तथा मानवीय गुणों से युक्त नागरिक बनना किसी लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की पहली आवश्यकता है। श्रेष्ठ नागरिक ही स्वस्थ वे प्रगतिशील विचार रखते हैं। वे अपने अधिकार व उत्तरदायित्वों के प्रति भी सजग होते हैं। अत: उत्कृष्ट शिक्षा के माध्यम से नागरिकों में उत्तम चरित्र, आदतों, अभिरुचियों तथा नैतिक गुणों का विकास किया जाना चाहिए।

3. आर्थिक समृद्धि- भारत प्राकृतिक साधनों से सम्पन्न, किन्तु एक निर्धन अर्थव्यवस्था वाला देश है, जिसकी अधिकांश जनता दरिद्र है। वर्तमान समय में देश के आर्थिक, तकनीकी व औद्योगिक विकास द्वारा सर्वप्रथम, निर्धनता तथा बेरोजगारी की समस्या का समाधान आवश्यक है। शिक्षा द्वारा देशवासियों की उत्पादन-शक्ति में वृद्धि कर राष्ट्रीय आय बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि लोगों के रहन-सहन का स्तर ऊँचा हो सके। स्पष्टतः आर्थिक समृद्धि का विचार उचित शिक्षा के साथ जुड़ा है।

4. सांस्कृतिक पुनरुत्थान- भारत की अधिकांश जनता रोजी-रोटी की समस्या में इस तरह उलझी हुई है कि उसके पास सांस्कृतिक कार्यों की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं है। देश में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए वर्तमान शिक्षा पद्धति में वांछित एवं आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए। प्रश्न 2 “हमारे देश में शिक्षा को बहु-उद्देशीय होना चाहिए।” इस विषय में आपके क्या विचार हैं? ट

भारतीय शिक्षा को बहुउद्देशीय होना चाहिए
(Indian Educations should be Multi-Aimed)

किसी भी देश की शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण उस देश की विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियाँ अत्यधिक जटिल तथा कुछ विशेष प्रकार की हैं। इन परिस्थितियों में यदि शिक्षा के किसी एक या दो उद्देश्यों को ही प्राथमिकता दी जाए तो शिक्षा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकती। इस स्थिति में हम कह सकते हैं कि हमारे देश में शिक्षा को बहु-उद्देशीय होना चाहिए। इसी तथ्य को डॉ० सुबोध अदावल ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “भारतीय व्यक्ति तथा समाज के सर्वांगीण विकास के निमित्त शिक्षा में विभिन्न उद्देश्यों का महत्त्व समान रूप से है। हमारी शिक्षा एक सीमित उद्देश्य को लेकर व्यक्ति तथा राष्ट्र की सब समस्याओं को नहीं सुलझा सकती। हमारा जीवन जितना विविध दिशाओं में उन्मुख और व्यापक है, शिक्षा का उद्देश्य भी उतना ही विषद् और आकर्षक होना चाहिए। हमें व्यक्ति तथा समाज की उन्नति के लिए अपना प्रयत्न विविध दिशाओं में आयोजित करना पड़ेगा और शिक्षा के बहु-उद्देश्य ही इस कार्य में सफल हो सकते हैं।”

प्रश्न 3.
विभिन्न शिक्षा आयोगों के सुझावानुसार वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्यों का उल्लेख : कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा आयोगों के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य
(Aims of Education According to Éducation Commissions)

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत की केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों ने शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्गठन एवं निर्माण हेतु समय-समय पर शिक्षा आयोगों का गठन किया। इन आयोगों द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों तथा साधनों पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया, जिसका प्रस्तुतीकरण निम्न प्रकार किया जा सकता– 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्तमान परिस्थितियों में भारत में व्यक्ति के दृष्टिकोण से शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियाँ अत्यधिक जटिल तथा विशिष्ट हैं। इन परिस्थितियों में व्यक्ति के दृष्टिकोण से शिक्षा का मुख्यतम उद्देश्य है-व्यक्ति का बहुपक्षीय विकास। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक तथा सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के दृष्टिकोण को वैज्ञानिक बनाना भी शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। व्यक्ति की व्यावसायिक कुशलता की उन्नति, जीवन-यापन की कला का विकास, अवकाश को ” सदुपयोग तथा सांस्कृतिक विकास भी व्यक्ति की शिक्षा के कुछ मुख्य उद्देश्य हैं।

प्रश्न 2.
वर्तमान युग में शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करना क्यों 
माना गया है ?
या
वैज्ञानिक शिक्षा का क्या अर्थ है? वर्तमान में उसकी उपयोगिता को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
वैज्ञानिक शिक्षा का आशय है वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दी जाने वाली शिक्षा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दी जाने वाली शिक्षा तथ्यों पर आधारित होती है तथा उसमें वैज्ञानिक पद्धति को अपनाया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति सार्वभौमिक होती है तथा उसके द्वारा प्राप्त सिद्वान्तों का सत्यापन किया जा सकता है। 
वर्तमान युग विज्ञान तथा औद्योगिक क्रान्ति का युग है। आज हमारे जीवन का प्रत्येक पक्ष विज्ञान पर निर्भर हो गया है। अतः इस दशा में वही राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा जो वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति करेगा। परन्तु भारत जैसे अनेक विकासशील देश आज भी परम्पराओं, रूढ़ियों एवं अन्धविश्वासों से घिरे हुए हैं। ये समस्त कारक देश की प्रगति में बाधक हैं। इस स्थिति में हमारी शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जिससे जनसाधारण का दृष्टिकोण वैज्ञानिक बने तथा अन्धविश्वासों को उन्मूलन हो। इस प्रकार हम कह सकते हैं। कि वर्तमान युग में शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करना होना चाहिए।

प्रश्न 3 वर्तमान में व्यावसायिक शिक्षा की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर:
भारत प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न, किन्तु एक विकासशील अर्थव्यवस्था वाला देश है, जिसकी अधिकांश जनता निर्धन है। वर्तमान समय में देश के आर्थिक, तकनीकी व औद्योगिक विकास द्वारा सर्वप्रथम और अपरिहार्य रूप से निर्धनता तथा बेरोजगारी की समस्या का समाधान आवश्यक है। शिक्षा द्वारा देशवासियों की उत्पादन-शक्ति में वृद्धि कर राष्ट्रीय आय बढ़ानी चाहिए ताकि लोगों के रहन-सहन का स्तर ऊँचा हो सके। स्पष्टतः आर्थिक समृद्धि का विचार व्यावसायिक शिक्षा के बिना अधूरा है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी भी देशकाल में शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण मुख्य रूप से किस कारक के आधार पर होता है ?
उत्तर:
किसी भी देशकाल में शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण उस देशकाल की समस्त परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

प्रश्न 2.
पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से भारतीय समाज में कौन-सी मनोवृत्ति प्रबल हुई हैं ?
उत्तर:
पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से भारतीय समाज में भौतिकवादी मनोवृत्ति प्रबल हुई है।

प्रश्न 3.
वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था तथा रोजगारों की स्थिति क्या है ?
उत्तर:
वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था दुल-मुल है तथा बेरोजगारी की समस्या प्रबल है।

प्रश्न 4.
विज्ञान-शिक्षा की आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर:
‘अन्धविश्वासों के उन्मूलन, औद्योगिक उन्नति एवं प्रगति तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए विज्ञान-शिक्षा आवश्यक है।

प्रश्न 5.
“मेरा विचार है कि जब तक हमारा शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं होगा, तब तक हम 
वास्तव में अधिक मानसिक प्रगति नहीं कर सकते।” यह कथन किसका है ?
उत्तर प्रस्तुत कथन पं० जवाहरलाल नेहरू का है।

प्रश्न 6.
शिक्षा में विज्ञान के समावेश के महत्त्व सम्बन्धी स्वामी विवेकानन्द का कथन लिखिए।
उत्तर:
स्वामी विवेकानन्द के कथनानुसार, “हमारे लिए पश्चिमी विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है। हमें तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता है, जिससे हमारे देश के उद्योगों का विकास होगा।”

प्रश्न 7.
समाज के दृष्टिकोण से शिक्षा के चार मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
समाज के दृष्टिकोण से शिक्षा के चार प्रमुख उद्देश्य हैं–
(i) लोकतन्त्रीय नागरिकता का विकास,
(ii) सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त,
(iii) सामाजिक उत्तरदायित्वों की भावना का विकास तथा
(iv) जन-शिक्षा की व्यवस्था करना।

प्रश्न 8.
स्वतन्त्र भारत में शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण के लिए गठित किए गए मुख्य शिक्षा आयोगों 
का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्र भारत में गठित किए गए मुख्य शिक्षा आयोग हैं
(i) विश्वविद्यालय आयोग–1948,
(ii) माध्यमिक शिक्षा आयोग-1952-53 तथा
(iii) राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (कोठारी कमीशन)-1964-66.

प्रश्न 9.
किस शिक्षा आयोग ने व्यक्तियों में नेतृत्व के गुणों के विकास की शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण 
उद्देश्य निर्धारित करने का सुझाव दिया है?
उत्तर:
माध्यमिक शिक्षा आयोग ने नेतृत्व के गुणों के विकास की शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य … निर्धारित करने का सुझाव दिया है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा के किसी एक उद्देश्य को प्राथमिकता देना उचित नहीं है।
  2. भारत में शिक्षा का एक उद्देश्य निरक्षरता समाप्त करना भी है।
  3. भारत में शिक्षा का उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना कदापि नहीं है।
  4. भारत में शिक्षा का एक उद्देश्य व्यावसायिक कुशलता में वृद्धि करना भी है।
  5. शिक्षा के माध्यम से विश्व-बन्धुत्व की भावना को विकसित करना व्यर्थ एवं अनावश्यक है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न1.
“भारत में शिक्षा द्वारा लोकतन्त्रीय चेतना, वैज्ञानिक खोज और दार्शनिक सहिष्णुता का निर्माण किया जाना चाहिए।” यह कथन किसका है ?
(क) महात्मा गांधी का
(ख) हुमायूँ कबीर का
(ग) पं० जवाहरलाल नेहरू का
(घ) जाकिर हुसैन का

प्रश्न 2.
ब्रिटिश काल में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य था
(क) आध्यात्मिक उन्नति।
(ख) जीविकोपार्जन
(ग) चरित्र-निर्माण..
(घ) व्यक्तित्व का बहुपक्षीय विकास

प्रश्न 3.
विभिन्न सामाजिक समस्याओं के निराकरण के लिए शिक्षित करना चाहिए
(क) ग्रामीण समुदाय को
(ख) समाज के पिछड़े वर्ग को।
(ग) स्त्रियों को।
(घ) जनसाधारण को

प्रश्न 4.
हमारे देश में शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण होना चाहिए
(क) अमेरिकी शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर
(ख) प्राचीन भारतीय आदर्शों को ध्यान में रखकर
(ग) औद्योगिक उन्नति को ध्यान में रखकर।
(घ) भारतीय समाज की विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखकर

प्रश्न 5.
भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल सम्भव है
(क) चरित्र-निर्माण द्वारा
(ख) ज्ञानार्जन द्वारा
(ग) मानसिक विकास द्वारा
(घ) व्यावसायिक शिक्षा द्वारा

प्रश्न 6.
लोकतन्त्रीय भारत में व्यक्ति के दृष्टिकोण से शिक्षा का उद्देश्य है
(क) शारीरिक स्वास्थ्य का विकास
(ख) वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकास
(ग) व्यावसायिक कुशलता अर्जित करना
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
वर्तमान लोकतन्त्रीय भारत में समाज के दृष्टिकोण से शिक्षा के उद्देश्य हैं
(क) सहयोग की भावना को विकसित करना
(ख) समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करना।
(ग) सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता में वृद्धि करना
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 8.
किसी देश की शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण नहीं होना चाहिए
(क) देश की संस्कृति के अनुसार
(ख) देश की वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार
(ग) विदेश की संस्कृति के अनुसार
(घ) देश की आवश्यकता के अनुसार
उत्तर:

1. (ख) हुमायूँ कबीर का,
2. (ख) जीविकोपार्जन,
3. (घ) जनसाधारण को,
4. (घ) भारतीय समाज की विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखकर,
5. (घ) व्यावसायिक शिक्षा द्वारा,
6. (घ) उपर्युक्त सभी,
7.(घ) उपर्युक्त सभी,
8. (ग) विदेश की संस्कृति के अनुसार।

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