UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi राजनीति सम्बन्धी निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name राजनीति सम्बन्धी निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi राजनीति सम्बन्धी निबन्ध

राजनीति सम्बन्धी निबन्ध

 भारत में लोकतन्त्र की सफलता

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारतीय लोकतन्त्र और राजनीतिक दल
  • राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोकतन्त्र
  • स्वतन्त्र भारत में जन-प्रतिनिधियों की भूमिका
  • भारतीय लोकतन्त्र और नैतिकता।

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2.  दलों को संवैधानिक मान्यता,
  3.  भारत में प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रणाली,
  4.  दलों की अनिवार्यता,
  5. दल द्वारा सरकार की रचना
  6. विरोधी दल का महत्त्व,
  7. राजनीतिक दलों की उपयोगिता,
  8.  भारत में लोकतन्त्र की सफलता,
  9. उपसंहार।

प्रस्तावना – भारतीय संविधान की प्रस्तावना ने भारत को लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया है। लोकतन्त्र और प्रजातन्त्र समान अर्थ वाले शब्द हैं। आधुनिक युग में लोकतन्त्र को शासन की सर्वोत्तम प्रणाली माना गया है। अनेक विद्वानों ने लोकतन्त्र की व्याख्या की है। यूनान के दार्शनिक क्लीयॉन (Cleon) ने प्रजातन्त्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि, “वह व्यवस्था प्रजातान्त्रिक होगी, जो जनता की होगी, जनता के द्वारा और जनता के लिए होगी।” बाद में यही परिभाषा अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन द्वारा भी दोहरायी गयी। भारत का एक सामान्य शिक्षित व्यक्ति प्रजातन्त्र का अर्थ एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया से लगाता है जो वयस्क मताधिकार चुनाव, कम-से-कम दो राजनीतिक दल, स्वतन्त्र न्यायपालिका, प्रतिनिध्यात्मक एवं उत्तरदायी सरकार, स्वस्थ जनमत, स्वतन्त्र प्रेस तथा मौलिक अधिकारों की विशिष्टताओं से युक्त हो। विस्तृत अर्थों में प्रजातन्त्र एक आदर्श है, स्वयं में एक ध्येय है न कि साधन। एक प्रजातान्त्रिक देश में प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास का समुचित अवसर प्राप्त होता है, आर्थिक शोषण की अनुपस्थिति होती हैं, एकता तथा नैतिकता का वास होता है।

दलों को संवैधानिक मान्यता – भारत में प्राचीनकाल से ही लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति विद्यमान है तथा विश्व में सबसे बड़ा लोकतन्त्रात्मक राष्ट्र भारत है। यहाँ प्रत्येक पाँच वर्ष के बाद चुनाव होते हैं। चुनाव में जो दल विजयी होता है, वह सरकार बनाता है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त संविधान प्रत्येक व्यक्ति को संस्था या संगठन बनाने का अधिकार भी देता है। इस कारण देश में कई दल या पार्टियाँ हैं, जो अपने सिद्धान्तों एवं आदर्शों को लेकर चुनाव के अखाड़े में उतरती हैं।
भारतीय लोकतन्त्र का आधार इंग्लैण्ड का लोकतान्त्रिक स्वरूप रहा है। इंग्लैण्ड में केवल दो ही दल हैं। भारत का यह दुर्भाग्य है कि यहाँ अनेकानेक दल हैं, लेकिन कोई भी सशक्त दल नहीं है। लगभग चालीस वर्षों तक कांग्रेस सशक्त दल के रूप में सत्ता में थी, लेकिन आपसी फूट के कारण अब उसका भी अपना प्रभाव समाप्त होता जा रहा है।

भारत में प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रणाली – भारत में प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्र प्रचलन में है। इस पद्धति में जनता अपने प्रतिनिधि वोट द्वारा चुनती है। जे० एस० मिल के अनुसार, “प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्र वह है, जिसमें सम्पूर्ण जनता अथवा उसका बहुसंख्यक भाग शासन की शक्ति का प्रयोग उन प्रतिनिधियों द्वारा करते हैं, जिन्हें वह समय-समय पर चुनते हैं।”
प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है। ये दल संख्या में दो या दो से अधिक भी हो सकते हैं। निर्दलीय व्यवस्था के अन्तर्गत प्रजातन्त्र चल नहीं सकता। इसलिए प्रजातन्त्र में दलीय व्यवस्था अपरिहार्य है। राजनीतिक दल व्यक्तियों का एक संगठित समूह होता है जिसका राजनीतिक विषयों के सम्बन्ध में एक मत होना आवश्यक है। गिलक्रिस्ट के अनुसार, “राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का संगठित समूह है, जो एक-से राजनीतिक विचार रखता है और एक इकाई के रूप में कार्य करके सरकार पर नियन्त्रण रखता है।’

दलों की अनिवार्यता – राजनीतिक दलों के मुख्य कार्य राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैदेशिक समस्याओं के सम्बन्ध में अपने विचार निश्चित करके जनता के सामने रखना है। दल तदनुसार विचार व मान्यता रखने वाले प्रत्याशियों को चुनाव में खड़ा करते हैं। इस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दल अपने आदर्श और उद्देश्यों के प्रति जनता को आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार आधुनिक युग की प्रजातन्त्रीय पद्धति में राजनीतिक दलों का महत्त्व स्थापित हो जाता है। जो व्यक्ति चुनाव में चुन लिया जाता है, वह दल के नियन्त्रण में रहने के कारण मनमानी नहीं कर पाता। यदि दल का नेतृत्व योग्य और ईमानदार व्यक्ति के हाथों में होता है तो वह इस बात का ध्यान रखता है कि दुराचरण के कारण उसकी प्रतिष्ठा और जनप्रियता कम न हो। यह सत्य है कि निष्पक्ष, नि:स्वार्थ व योग्य व्यक्ति आजकल चुनाव लड़ना पसन्द नहीं करते। यह हमारे प्रजातन्त्र की बहुत बड़ी कमजोरी है। फिर भी इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीतिक दल प्रजातन्त्र के लिए अनिवार्य हैं।

दल द्वारा सरकार की रचना – चुनाव के पश्चात् जिस दल के प्रत्याशी अधिक संख्या में निर्वाचित होकर संसद या विधानमण्डलों में पहुँचते हैं, वही दल मन्त्रिमण्डल बनाता है और शासन की बागडोर सँभालता है। यदि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो दो या अधिक दल स्वीकृत न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर मिलकर मन्त्रिमण्डल बनाते हैं। शेष विरोधी पक्ष में रहकरे सरकार की नीति और कार्यक्रम की समीक्षा करते हैं। यदि मन्त्रिमण्डल के सभी मन्त्री एक राजनीतिक दल के नहीं हों तो सरकार के विभिन्न विभागों के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकेगा और कोई दीर्घकालीन कार्यक्रम नहीं चल सकेगा। इसके विपरीत यदि किसी सुसंगठित दल के पास शासन-सत्ता हो तो वह आगामी चुनाव तक निश्चिन्त होकर शासन चला सकता है। शासक दल के सदस्य संसद के बाहर भी सरकार की नीतियों का स्पष्टीकरण करके निरन्तर जन-समर्थन प्राप्त करते रहते हैं।

विरोधी दल का महत्त्व – शासक दल के दूसरी ओर विरोधी पक्ष रहता है। जहाँ विरोधी पक्ष में एक से अधिक दल होते हैं, वहाँ अधिक सदस्यों वाले दल का नेता या अन्य कोई व्यक्ति जिसके विषय में सभी दलों की सहमति हो जाए विरोधी पक्ष का नेता चुन लिया जाता है। वास्तव में संसदीय प्रजातन्त्र में विरोधी पक्ष का बड़ा महत्त्व होता है। विरोधी पक्ष सरकार की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखता है। कोई भी प्रस्ताव या विधेयक बिना वाद-विवाद के पारित नहीं हो सकता। स्थगन-प्रस्तावों, निन्दा-प्रस्तावों और अविश्वास-प्रस्तावों के भय से शासक दल मनमानी नहीं कर सकता और सदा सतर्क रहता है। यदि विरोधी पक्ष बिल्कुल ही न रहे या अति दुर्बल व अशक्त हो तो सरकार निरंकुश हो सकती है तथा सत्तारूढ़ दल जनमत की अवहेलना कर सकता है।

राजनीतिक दलों की उपयोगिता – राजनीतिक दल जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करने का कार्य करते हैं। वे सरकार द्वारा किये गये कार्यों का औचित्य व त्रुटियाँ जनता को बतलाते हैं। जनता एक प्रकार से विरोधी दलों के लिए अदालत का कार्य करती है। उसके सामने शासक दल और विरोधी दल अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं और फिर उससे आगामी चुनाव में निर्णय माँगते हैं। विभिन्न दलों के तर्क-वितर्क सुनकर जनता भी राजनीतिक परिपक्वता प्राप्त करती है। इस प्रकार जन-शिक्षा और जन-जागृति के लिए राजनीतिक दलों का बड़ा महत्त्व है।

भारत में लोकतन्त्र की सफलता – अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन कैनेडी के अनुसार, “लोकतन्त्र में एक मतदाता को अज्ञान सबकी सुरक्षा को संकट में डाल देता है।” हम जानते हैं कि भारत के लगभग आधे मतदाता अशिक्षित हैं और वोट’ के महत्त्व से अपरिचित हैं। ऐसी स्थिति भारत की लोकतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली पर निश्चित रूप से प्रश्न-चिह्न लगाती है।

आज भारतीय लोकतन्त्र उठा-पटक की स्थिति से गुजर रहा है। वह देश जिसने लोकतन्त्र के चिराग को प्रज्वलित कर तृतीय विश्व के देशों को आलोकित करने का प्रयास किया था, आज उसके चिराग की रोशनी स्वयं मद्धिम होती जा रही है। राष्ट्र की छवि दिनानुदिन धूमिल पड़ती जा रही है तथा राजनीतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। कह सकते हैं कि भारतीय लोकतन्त्र संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है।

लोकतन्त्र के चार आधार-स्तम्भ होते हैं-विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और समाचार-पत्र। वर्तमान में संसद और विधानसभाओं में हाथा-पायी, गाली-गलौज, एक-दूसरे पर अश्लील आरोप आदि होते हैं तथा जनता के प्रतिनिधि जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। सन् 1967 के चुनावों के बाद त्यागी, योग्य, ईमानदार एवं चरित्रवान् व्यक्तियों को कम ही चुना जा सका है। निर्वाचित सदस्य जन-कल्याण की भावना से दूर रहे हैं। तथा भारतीय राजनीति का अपराधीकरण हुआ है। फलतः लोकतान्त्रिक मूल्यों को आघात पहुंचा है।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता लोकतन्त्र में अनिवार्य है। आज भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति, उनके स्थानान्तरण, पदोन्नति आदि में जिस प्रकार की नीति का परिचय दिया जाता है उससे न्यायपालिका के चरित्र को आघात पहुँचा है। दूसरी ओर लाखों मुकदमे न्यायालयों में न्याय की आशा में लम्बित पड़े हुए हैं। ग्लैडस्टन के मतानुसार, ‘Justice delayed is justice denied” अर्थात् विलम्बित न्याय न्याय से वंचित करना है। ऐसी स्थिति में भारत में लोकतन्त्र की सफलता कैसे मानी जा सकती है?

भारत में लोकतन्त्र की जड़े खोदने का कार्य करती है – कार्यपालिका प्रशासन की सुस्ती, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, शीघ्र निर्णय न लेना, अधिकारियों का आमोद-प्रमोद में डूबे रहना, स्वच्छन्द प्रवृत्ति के लोगों का प्रशासन में घुस आना, देश में आतंकवाद और अराजकता को रोकने के लिए ठोस कदम न उठाना, गरीबी और बेरोजगारी पर नियन्त्रण न कर पाना प्रशासन की असफलता के द्योतक हैं। ऐसे प्रशासन से तो लोकतन्त्र की सफलता की क्या कल्पना की जा सकती है?

लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ है–समाचार-पत्र; अर्थात् लोकतन्त्र की रीढ़ है–विचारों की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति। आज इस पर भी अनेक नाजायज विधानों द्वारा इनके मनोबल को तोड़ा जाता है। ऐसे में भारत में लोकतन्त्र की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

उपसंहार – आवश्यकता है कि भारत में सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाया जाए तथा दिनानुदिन गिरते हुए राष्ट्रीय चरित्र को बचाया जाए। राष्ट्रीय भावना का दिनोदिन ह्रास होता जा रहा है, इसे उन्नत किया जाना चाहिए। मन्त्रिमण्डलीय अधिनायक तन्त्र, दल-बदले की संक्रामकता, केन्द्र-राज्य में बिगड़ते सम्बन्ध, सांसदों का गिरता हुआ नैतिक स्तर तथा प्रान्तीय पृथकतावाद को समाप्त करना होगा। समस्त नागरिकों को आर्थिक व सामाजिक न्याय उपलब्ध कराना होगा। लोकतन्त्र में शासन-सत्ता वस्तुत: सेवा का साधन समझी जानी चाहिए। लोकतन्त्र की सफलता के लिए नेताओं एवं शासकों में लोक-कल्याण की भावना का होना आवश्यक है। यद्यपि लोकतन्त्र में पक्ष-विपक्ष की भावना ‘‘मैं और मेरा, तू और तेरा’ की भाव-धारा को जन्म देती है तथापि पक्षों का होना भी एक अपरिहार्य आवश्यकता है। यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि मतभेद व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और वैमनस्य का रूप न ग्रहण कर लें।
यदि उपर्युक्त बातें पूरी होती रहें तो कोई भी झोंका भारतीय लोकतन्त्र को हिला नहीं सकता; क्योंकि कोई भी व्यवस्था यदि जन-आकांक्षाओं की पूर्ति करती है तो उस व्यवस्था के प्रति लोगों की आशाएँ खण्डित नहीं होती। प्रजातन्त्र में दलों का होना अति आवश्यक है। राजनीतिक दल चाहे शासक के रूप में हों या विरोधी पक्ष के रूप में, उनसे जनता का हित-साधन ही होता है, किन्तु बरसाती मेंढकों की तरह राजनीतिक दलों का बढ़ना देश के लिए अहितकर और विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। इससे फूट, द्वेष, हिंसा, कलह आदि बढ़ते हैं और देश में कोई रचनात्मक व अभ्युदय कार्यक्रम नहीं हो पाते। अतः हमारे देश में भी इंग्लैण्ड की तरह द्विदल प्रणाली विकसित हो सके तो वह दिन सौभाग्य व खुशहाली का दिन होगा।

विद्याथी और राजनीति

सम्बद्ध शीर्षक

  •  राजनीति में विद्यार्थियों की सहभागिता
  • छात्रसंघ चुनाव : दशा एवं दिशा
  •  राजनीति में युवकों की भूमिका

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2.  स्वतन्त्र भारत में विद्यार्थी का दायित्व,
  3.  विद्यार्थी से अपेक्षाएँ,
  4.  लोकतन्त्र में राजनीति का महत्त्व,
  5. ( सक्रिय राजनीति में भाग लेने से हानियाँ,
  6.  उपसंहार।

प्रस्तावना – ‘विद्यार्थी का अर्थ है ‘विद्या का अर्थी’; अर्थात् विद्या की चाह रखने वाला। इस प्रकार विद्यार्जन को ही मुख्य लक्ष्य बनाकर चलने वाला अध्येता विद्यार्थी कहलाता है। जिस प्रकार चर्मचक्षुओं के बिना मनुष्य अपने चारों ओर के स्थूल जगत् को नहीं देख पाता, उसी प्रकार विद्यारूपी ज्ञानमय नेत्रों के बिना वह अपने वास्तविक स्वरूप को भी नहीं पहचान सकता और अपने जीवन को सफल नहीं बना सकता। इसी कारण विद्याध्ययन का समय अत्यधिक पवित्र समय माना गया है; क्योंकि मानव अपने शारीरिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला इसी समय रखता है। विद्याध्ययन एक तपस्या है और तपस्या बिना समाधि के, बिना चित्त की एकाग्रता के सम्भव नहीं। इसलिए विद्यार्थी अन्तर्मुखी होकर ही विद्यार्जन कर सकता है। दूसरी ओर, राजनीति पूर्णत: बहिर्मुखी विषय है। तब विद्यार्थी और राजनीति का परस्पर क्या सम्बन्ध हो सकता है? इस पर विचार अपेक्षित है। यह इसलिए भी आवश्यक है कि आज राजनीति का राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना बोलबाला है कि कोई समझदार व्यक्ति चाहकर भी उससे सर्वथा असम्पृक्त नहीं रह सकता।

स्वतन्त्र भारत में विद्यार्थी का दायित्व – स्वतन्त्रता से पहले प्रत्येक व्यक्ति के मन में एक ही अभिलाषा थी कि किसी भी प्रकार देश को विदेशी शासन से मुक्त कराया जाए। इसके लिए प्रौढ़ नेताओं तक ने विद्यार्थियों से सहयोंग की माँग की और सन् 1942 ई० के आन्दोलन में न जाने कितने होनहार युवक-युवतियों ने विद्यालयों का बहिष्कार कर और क्रान्तिकारी बनकर देश के लिए असह्य यातनाएँ झेलीं और हँसते-हँसते अपना जीवन भारतमाता की बलिवेदी पर अर्पण कर दिया। वह एक असामान्य समय था, आपात् काल था, जिसमें उचित-अनुचित, करणीय-अकरणीय का विचार नहीं था। पर देश के स्वतन्त्र होने के बाद विद्यार्थियों पर राष्ट्र-निर्माण का गुरुतर दायित्व आ पड़ा है; क्योंकि युवक ही किसी देश के भावी भाग्य-विधाता होते हैं। वृद्धजन तो केवल दिशा-निर्देश दे सकते हैं, किन्तु उन निर्देशों को क्रियान्वित करने की क्षमता पौरुषसम्पन्न युवाओं में ही निहित होती है।

विद्यार्थी से अपेक्षाएँ – मनुष्य का प्रारम्भिक जीवन ज्ञानार्जन के लिए होता है, जब कि वह अपनी शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्तियों को अधिक-से-अधिक विकसित और परिपुष्ट करे अपने परिवार और समाज की सेवा के लिए स्वयं को तैयार करता है। इस समय विद्यार्थी विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है। आज का विद्यार्थी निश्चित ही कल का नागरिक और नेता होगा, परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह समय राजनीति तथा अन्य विषयों का ज्ञान प्राप्त करने का है, उन्हें प्रयोग में लाने का नहीं।

सुयोग्य विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने देश की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उनकी पूर्ति के लिए स्वयं को ढाले। इसके लिए सबसे पहले उसे अपने देश के भूगोल, इतिहास और संस्कृति से भली-भाँति परिचित होना आवश्यक है; क्योंकि बिना अपने देश की मिट्टी से जुड़े, उसकी उपलब्धियों और अभावों, क्षमताओं और दुर्बलताओं को गहराई से समझे कोई व्यक्ति देश का सच्चा हित-साधन नहीं कर सकता। आज हमारा देश अनेक बातों में विदेशी तकनीक पर निर्भर है। किसी स्वतन्त्र देश के लिए यह स्थिति कदापि वांछनीय नहीं कही जा सकती। विद्यार्थी वैज्ञानिक, औद्योगिक एवं हस्तशिल्प आदि का उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कर इस स्थिति को सुधार सकते हैं। इसी प्रकार समाज के सामने मुंह खोले खड़ी अनेक समस्याओं; जैसे – अन्धविश्वास, रूढ़िग्रस्तता, अशिक्षा, महँगाई, भ्रष्टाचार, दहेज-प्रथा आदि के उन्मूलन में भी वे अपना मूल्यवान योगदान कर सकते हैं।

लोकतन्त्र में राजनीति का महत्त्व – अन्यान्य विषयों के साथ विद्यार्थी को राजनीति का भी ज्ञान प्राप्त करना उचित है; क्योंकि वर्तमान युग में राजनीति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर छा गयी है। यद्यपि यह स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती, परन्तु वास्तविकता से मुंह मोड़ना भी समझदारी नहीं है। सबसे पहले तो विद्यार्थी को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिए। साथ ही उसे संसार में प्रचलित विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को गम्भीर तुलनात्मक अध्ययन करके उनके अपेक्षित गुणावगुण की परीक्षा करना तथा अपने देश की
दृष्टि में उनमें से कौन-से विचार कल्याणकारी सिद्ध हो सकते हैं; इस पर गम्भीर चिन्तन-मनन करना वांछनीय है। लोकतन्त्र में निर्वाचन-प्रणाली द्वारा शासन-तन्त्र का गठन होता है। लोकतन्त्र में शासक दल का चुनाव जनता करती है, इसलिए जनता का सुशिक्षित होना, अपने मत की शक्ति को पहचानना और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ, भय आदि को मन में स्थान न दे देश के भावी कर्णधारों का चुनाव करना लोकतन्त्र की सफलता का बीजमन्त्र है। विद्यार्थियों को इस दिशा में शिक्षित करना चाहिए। आज कोई देश अपने में सिमटकर संसार से अलग-थलग होकर नहीं रह सकता। वर्तमान युग में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की लपेट में छोटे-बड़े सभी देश आते हैं, इसलिए विद्यार्थी को भी चाहिए कि वह विश्व में घटने वाली घटनाओं पर बारीकी से नजर रख अपने देश पर पड़ने वाले उसके सम्भावित प्रभावों का भी आकलन करे। ऐसा विद्यार्थी ही आगे चलकर अपने देश की सच्ची पथ-प्रदर्शक बन सकती है। इससे सिद्ध होता है कि विद्यार्जन का काल ज्ञान-संचय का काल है, अर्जित ज्ञान को क्रियात्मक रूप देने का नहीं।

सक्रिय राजनीति में भाग लेने से हानियाँ – सक्रिय राजनीति में भाग लेने से विद्यार्थी को सबसे पहली हानि तो यही होती है कि उसका शैक्षणिक ज्ञान अधूरी रह जाता है। अधकचरे ज्ञान को लेकर कोई व्यक्ति जनता को योग्य दिशा नहीं दे सकता। छात्रावस्था भोलेपन, आदर्शवाद और भावुकता की होती है। उस समय व्यक्ति में जोश तो होता है, पर होश नहीं होता। अनेक विद्यार्थी ऐसे हैं, जो कि राजनीतिक क्षेत्र में तो उतरे किन्तु राजनीति में न पड़कर अपराधी प्रवृत्ति में पड़ गये। राजनीति वस्तुतः अधिकार, पद एवं सत्ता की अन्धी दौड़ है। निःसन्देह ये कलुषित प्रवृत्तियाँ हैं जिनका दुष्परिणाम कॉलेजों में होने वाली दादागिरी, हिंसा व अन्य छात्र-उत्पीड़ने के रूप में कई बार हमारे सम्मुख आ चुका है।
दूसरों के नेतृत्व का गुण अत्यन्त विरल होता है, किन्तु आधुनिक राजनीति में बलपूर्वक दूसरों को अपना अनुगामी बनाया जाता है। यह अस्वस्थ दूषित मनोवृत्ति सम्पूर्ण परिवेश को विषाक्त कर देती है। विद्यालय व महाविद्यालय का पवित्र परिवेश राजनीति की पदचाप से मलिन हो उठता है। इस प्रकार न केवल विद्यार्थी का जीवन नष्ट हो जाता है, अपितु राष्ट्र को भी अपूरणीय क्षति पहुँचती है; क्योंकि वह अपने एक अत्यधिक उपयोगी घटक की क्षमताओं का अपने विकास के लिए उपयोग होने की बजाय, अपने हित के विरुद्ध प्रयोग होते देखता है। कश्मीर का ज्वलन्त उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ युवक सक्रिय राजनीति की कुटिलता में फंसकर राष्ट्रहित के स्थान परे राष्ट्रध्वंस करने एवं राष्ट्र के घोर शत्रुओं का मनोरथ पूरा करने में लगे हैं।
अत: विद्यार्थी और राष्ट्र दोनों का हित इसी में है कि विद्यार्थी सच्चे अर्थों में विद्या का अर्थी ही बना रहकर अपने सर्वांगीण विकास द्वारा अपनी और राष्ट्र की सेवाओं के लिए स्वयं को तैयार करे।

उपसंहार – निष्कर्ष यह है कि विद्यार्थी का मुख्य कार्य विद्यार्जन द्वारा अपने भावी जीवन-व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय–को सफल बनाने की तैयारी करना है। वर्तमान युग में राजनीति के व्यापक प्रभाव को देखते हुए विद्यार्थी को उसका भी विभिन्न कोणों से गहरा सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त करना उचित है, पर क्रियात्मक राजनीति से दूर रहने में ही उसका और राष्ट्र को कल्याण है। उसे अपने कर्तव्य को समझना चाहिए और लक्ष्य पर दृष्टि जमानी चाहिए। राजनीति के कण्टकाकीर्ण पथ पर पैर रखना अभी उसके लिए उचित नहीं है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi हिन्दी-संस्कृत अनुवाद

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name हिन्दी-संस्कृत अनुवाद
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi हिन्दी-संस्कृत अनुवाद

हिन्दी-संस्कृत अनुवाद

नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार इस खण्ड से परीक्षा में किन्हीं चार हिन्दी वाक्यों को संस्कृत में अनुवाद करने के लिए कहा जाता है, जिसके लिए कुल 4 अंक निर्धारित हैं।

हिन्दी के वाक्य को संस्कृत में परिवर्तित करने के लिए दोनों भाषाओं के मूलभूत नियमों की जानकारी अत्यावश्यक है। हिन्दी वस्तुतः संस्कृत का ही परवर्ती विकास है, इसलिए दोनों भाषाओं की शब्द-रचना में विशेष अन्तर नहीं है। कुछ मुख्य अन्तर निम्नवत् हैं

(1) वचन एवं लिङ्ग – हिन्दी में दो वचन (एकवचन और बहुवचन) होते हैं। संस्कृत में द्विवचन भी होने के कारण वचन तीन हैं। इसी प्रकार हिन्दी में दो ही लिङ्ग (पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग) होते हैं, संस्कृत में नपुंसकलिङ्ग भी होने के कारण तीन लिङ्ग होते हैं।

(2) पुरुष – संस्कृत में तीन पुरुष होते हैं
(क) प्रथम पुरुष – जिसके सम्बन्ध में बात की जाती है; जैसे – सः (वह), तौ (वे दोनों), ते (वे सब)
(ख) मध्यम पुरुष – जिससे बात की जाती है; जैसे – त्वम् (तुम), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सब)।
(ग) उत्तम पुरुष – बात करने वाला स्वयं; जैसे – अहम् (मैं ), आवाम् (हम दोनों), वयम् (हम सब)।।

(3) विशेषण – संस्कृत में विशेषण सदा विशेष्य के लिङ्ग तथा वचन का अनुगमन करता है, जब कि हिन्दी में संस्कृत से आये विशेषणों के सन्दर्भ में ऐसा नहीं होती; जैसे
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सुन्दर बालक। सुन्दर बालिका। सुन्दर पुस्तक। परन्तु हिन्दी के अपने विशेषण विशेष्य के लिङ्गानुसार बदल जाते हैं; जैसे

काला घोड़ा।                         काली घोड़ी। |
काले घोड़े।                          काली घोड़ियाँ।

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिन्दी के अपने विशेषण पुंल्लिङ्ग विशेष्य के वचन (एकवचन, बहुवचन) को भी सूचित करते हैं, पर स्त्रीलिङ्ग विशेष्य के साथ सदा एकवचनान्त ही रहते हैं, उसके बहुवचन को सूचित नहीं करते; जैसे – काली घोड़ियाँ।

संस्कृत से तुलना करने पर तो स्थिति निम्नवत् प्राप्त होती है
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रूप ही सम्भव हैं, संस्कृत के समान ये समस्त विभक्तियों (कारकों) में भिन्न-भिन्न नहीं होते।।

(4) लकार – संस्कृत में प्रमुख लकार पाँच होते हैं, जो विभिन्न भावों को सूचित करते हैं

(क) लट् लकार (वर्तमान काल)।
(ख) लङ् लकार ( भूत काल)।
(ग) लृट् लकार (भविष्यत् काल)।
(घ) लोट् लकार (आज्ञासूचक)।
(ङ) विधिलिङ् लकार (विध्यर्थ, चाहिए, सम्भावना, शक्ति-प्रदर्शन के अर्थ में)।

(5) कारक और विभक्तियाँ – संस्कृत में मोटे तौर पर आठ कारक और सात विभक्तियाँ मानी जाती हैं, किन्तु वास्तव में कारक छ: ही होते हैं। षष्ठी और सम्बोधन को संस्कृत में कारक नहीं माना जाता। ये कारक
और विभक्तियाँ निम्नवत् हैं ।
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(6) कर्ता, क्रिया और धातु – क्रिया के करने वाले को कर्ता कहते हैं; जैसे-रामः पठति। इस वाक्य में ‘रामः’ कर्ता है। जिससे किसी काम को करना या होना जाना जाता है, उसे क्रिया कहते हैं; जैसे – रामः पठति। इस वाक्य में ‘पठति’ क्रिया है। क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं; जैसे-‘पठति क्रिया में ‘पद्’ धातु है।

अनुवाद के सामान्य नियम

हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद करते समय सर्वप्रथम कर्ता पर ध्यान देना चाहिए कि कर्ता किस वचन तथा किस पुरुष में है। हम जानते हैं कि संस्कृत में तीन पुरुष और तीन वचन होते हैं। इस प्रकार कुल नौ कर्ता हुए। मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष के कर्ता निश्चित होते हैं अर्थात् ये कभी नहीं बदलते। शेष समस्त कर्ता प्रथम पुरुष के अन्तर्गत आते हैं। निम्नलिखित तालिका को ध्यानपूर्वक पढ़िए
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कर्ता जिस वचन का होगा, क्रिया भी उसी वचन की होगी। हम जानते हैं कि संस्कृत में पाँच लकारों का प्रयोग किया जाता है, जो पाँचों कालों की क्रिया के लिए प्रयुक्त होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक लकार की क्रिया के पुरुष और वचन के अनुसार नौ रूप होते हैं, जिनका प्रयोग कर्ता की स्थिति के अनुसार किया जाता है।

लट् लकार (वर्तमान काल)
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लङ् लकार (भूत काल)
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लृट् लकार (भविष्यत् काल)
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लोट् लकार (आज्ञासूचक)
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विधिलिङ् लकार (‘चाहिए’ अर्थ में)
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi हिन्दी-संस्कृत अनुवाद 9

संस्कृत में अव्यय सदा अपरिवर्तित रहते हैं; उदाहरणार्थ-अकस्मात्, अतः, अतीव, अत्र, अद्य, अधुना (अब), एव (ही), अलम् (बस), इदानीम् (अब) आदि अव्यय हैं। वाक्य में ये सर्वदा इसी रूप में प्रयुक्त होंगे। संस्कृत में कुछ शब्दों के साथ विभक्ति विशेष का ही प्रयोग होता है, जो हिन्दी से भिन्न है। उदाहरणार्थ हिन्दी में कहते हैं-‘मैं उसके साथ जाऊँगा’ पर संस्कृत में ‘अहं तेन सह गमिष्यामि’ ही कहेंगे अर्थात् ‘सह अव्यय के साथ तृतीया विभक्ति का ही प्रयोग होगा, जो ‘तेन’ सर्वनाम में है। इसी प्रकार विना’ अव्यय के साथ भी तृतीया का प्रयोग होगा; जैसे—’रामेण विना सः न गमिष्यति’ (राम के बिना वह नहीं जायेगा)। इसी प्रकार ‘दा (देना) क्रिया के साथ ग्रहीता (दी हुई वस्तु को लेने वाले) के लिए चतुर्थी का ही प्रयोग होगा, हिन्दी के समान कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति) का नहीं; ‘वह बालक को पुस्तक देता है’ के लिए संस्कृत में ‘स: बालकाय पुस्तकं ददाति ही होगा। ये सभी नियम सतत अभ्यास से ही सीखे जा सकते हैं। विभक्तियों के ज्ञान के लिए ‘विभक्ति परिचय’ प्रकरण का विधिवत् अध्ययन करें।
उपर्युक्त सभी बातों को ध्यान रखकर अनुवाद करने से अनुवाद शुद्ध होगा।

विभक्तियों के अनुसार अनुवाद

प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक)
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi हिन्दी-संस्कृत अनुवाद 10

द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi हिन्दी-संस्कृत अनुवाद 11

तृतीया विभक्ति (करण कारक)
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चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक)
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पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक)
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षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक)
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सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक)
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अभ्यास

निम्नलिखित वाक्यों के संस्कृत में अनुवाद कीजिए

    1.  वन्दना पुस्तक पढ़ती है।
    2. राम फल खाता है।
    3.  वे दोनों खेलते हैं।
    4.  हम सब गाना गाते हैं।
    5.  तुम हँस रहे थे।
    6. उसने नाटक देखा।
    7.  वे सब पाठ याद करेंगे।
    8. तुम दोनों निबन्ध लिखोगे।
    9.  शीला खाना पकाये।
    10. रमेश स्कूल जाए।
    11.  उसे परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए।
    12.  हमें बड़ों का आदर करना चाहिए।
    13.  महिमा स्कूल जाती है।
    14. तुम्हें दूध पीना चाहिए।
    15.  वे बाण से मृग को मारेंगे।
    16.  हाथी ने सँड़ से पानी पीया।
    17.  विद्या विनय के लिए होती है।
    18.  गुरुजी को नमस्कार।
    19.  चूहा बिल से निकलता है।
    20.  कुसुम स्कूल से आयी।
    21.  गुलाब का फूल सफेद है।
    22.  तुम्हारा क्या नाम है?
  1. जल में मछली रहती है।
  2.  उपवन में पेड़ हैं।।

पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठों से सम्बद्ध अनुवाद

निम्नलिखित वाक्यों की संस्कृत में अनुवाद कीजिए
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 6 चरैवेति-चरैवेति

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name चरैवेति-चरैवेति
Category UP Board Solutions

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श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति …………………. न प्रमादितव्यम् ||1||

[ वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति (वेदम् + अनूच्य+आचार्याः+अन्तेवासिनम् + अनुशास्ति) =वेद का अध्ययन पूर्ण कराके वेदाचार्य दूर जाने वाले (अर्थात् प्रस्थान करने वाले विद्यार्थी) को अनुशासित करता है। चर -आचरण करो। स्वाध्यायान्मा (स्व + अध्यायात् + मा) प्रमदः = स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। धनमाहृत्य = धन लाकर। प्रजातन्तुः = सन्तान परम्परा का। व्यवच्छेत्सी = सन्तानोत्पत्ति करना। प्रमदितव्यम् = प्रमाद करना चाहिए। कुशलात् = कुशल कार्यों में। भृत्यै =नौकरों अथवा सहयोगियों से। स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम् = स्वाध्याय और भाषण में।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के चरैवेति-चरैवेति’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इस मन्त्र में वेद का अध्ययन पूर्ण कराने के उपरान्त वेदाचार्य अपने से दूर जाने वाले विद्यार्थियों को समापवर्तन संस्कार देता है।
[विशेष – इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा]

अनुवाद – वेद का अध्ययन पूर्ण कराके वेदाचार्य अपने से दूर जाने वाले अर्थात् प्रस्थान करने वाले विद्यार्थी को अनुशासित करता है। सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। आचार्य के लिए धन लाकर अर्थात् गुरु-दक्षिणा देकर (समापवर्तन संस्कार के उपरान्त विवाह करके) सन्तान पराम्परा का पालन करो। तुम्हें सत्य बोलने में प्रमाद नहीं करना चाहिए। तुम्हें धर्म के कार्य में प्रमाद नहीं करना चाहिए। कुशल कार्यों में प्रमाद नहीं करना चाहिए। नौकरों अथवा सहयोगियों में प्रमाद नहीं करना चाहिए और तुम्हें स्वाध्याय और भाषण में प्रमाद नहीं करना चाहिए।

(2) देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ……………….. तानि त्वयोपास्यानि || 2||

[ देवपितृकार्याभ्याम् = देव (धार्मिकादि) तथा पितृ (आद्धादि कर्म) कार्यों में अतिथि = अभ्यागत। यान्यनवद्यानि कर्माणि =जितने भी अनुचित कार्य न हों। सेवितव्यानि =पालन करना चाहिए। सुचरितानि श्रेष्ठ आचरण। त्वयोपास्यानि-तुम्हारे द्वारा विश्वास किए जाने चाहिए।]

अनुवाद – देव (धार्मिकादि) तथा पितृ (श्राद्धादि) कार्यों में प्रमाद नहीं करना चाहिए। माता को देवता स्वरूप मानो। पिता को देवता स्वरूप मानो। आचार्य को देवता स्वरूप मानो। अभ्यागत को देवता स्वरूप मानो। जितने भी उचित कार्य हैं, उनका पालन करो। अन्य का नहीं। जितने भी हमारे श्रेष्ठ आचरण हैं तुम्हारे द्वारा उन पर विश्वास किया जाना चाहिए।

(3) नो इतराणि ……………………. वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ||3||

[ चास्मफ़ेयांसो ब्राह्मणाः =और हमारे कल्याणकारी ब्राह्मण। देयम् = (दान) देना चाहिए। श्रिया = ऐश्वर्य से। हिया = लज्जा से। संविदा = वायदे के अनुसार। कर्मविचिकित्सा = कर्म के अनुष्ठान में।
वृत्तविचिकित्सा = आचरण के अनुष्ठान में।]

अनुवाद – अन्य पर विश्वास नहीं करना चाहिए। और जो हमारे कल्याण चाहने वाले ब्राह्मण हैं तुम्हारे द्वारा उन्हें भली प्रकार दान देना चाहिए। श्रद्धाभाव से (दान) देना चाहिए। अश्रद्धाभाव से (दान) नहीं देना चाहिए। ऐश्वर्य के द्वारा देना चाहिए। लज्जा के द्वारा देना चाहिए। वायदे के अनुसार देना चाहिए। यदि कर्म के अनुष्ठान में और आचरण के अनुष्ठान में देना पड़े तो भी आपके द्वारा दान दिया जाना चाहिए।

(4) ये तव ब्राहाणाः ………………….. एवमु चैतदुपास्यम् ||4||

[ सम्मर्शिनः = विचारशील। अलुक्षा = मृदु स्वभाव। धर्मकामाः – धार्मिक प्रकृति के। वर्तेरन् – आचरण करते हो। अथाभ्याख्यातेषु =यही अर विषयों में भी। एषः आदेशः =यही आदेश है। वेदोपनिषत् = यही वेद और उपनिषत्। एवमुपासितव्यम् – इसी की उपासना करनी चाहिए। ]

अनुवाद – वहाँ (संदिग्ध विषय में) जो ब्राह्मण सम्म (विचारशील) हो, अधिकृत हो अर्थात् सावधान चित्त हो तथा विषय में विशिष्ट विद्वान् हो, उसे ही मानना चाहिए अर्थात् उसके ही विचार को प्रमाण मानना चाहिए। जहाँ ब्राह्मण सौम्य स्वभाव वाले और धार्मिक स्वभाव वाले हों, वे जैसा निर्णय दें तब तुम्हें वैसा ही मानना चाहिए। अन्य विषयों में भी जो ब्राह्मण सम्म (विचारशील) हो, अधिकृत हो अर्थात् सावधान चित्त हो तथा विषय में विशिष्ट विद्वान् हो, उसे ही मानना चाहिए अर्थात् उसके ही विचार को प्रमाण मानना चाहिए। जहाँ ब्राह्मण सौम्य स्वभाव वाले और धार्मिक स्वभाव वाले हों, वे जैसा निर्णय दें तब तुम्हें वैसा ही मानना चाहिए। यही आदेश है। यही उपदेश है। यही वेदोपनिषत् का कहना है। यही अनुशासन है। इसे उपासित करना चाहिए। इसे हृदय में धारण करना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 गीतामृतम्

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Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
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श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) तं तथा ……………………… मधुसूदनः।।

[कृपयाविष्ठमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् (कृपया +आविष्टम् +अश्रुपूर्ण +आकुल + ईक्षणम्) = करुणा से युक्त (दयनीय), आँसुओं से परिपूर्ण व्याकुल नेत्रों वाले (अर्जुन)। विषीदन्तम् = दुःखी होते हुए (विषाद करते हुए)। मधुसूदनः = भगवान् कृष्ण।]

सन्दर्भ – यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘गीतामृतम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। इस पाठ में कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दुःखित होते हुए अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा प्रबोध दिये जाने का वर्णन
[ विशेष – इस पाठ के समस्त श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – भगवान् कृष्ण ने उस प्रकार से दयनीय, आँसुओं से परिपूर्ण व्याकुल नेत्रों वाले, (और) दुःखी होते हुए उस (अर्जुन) से यह वाक्य कहा।

(2) क्लै व्यं ……………… परन्तप।

[क्लैव्यम् = कायरता को। मा स्म गमः = मत प्राप्त हो। पार्थ – अर्जुन (पृथा या कुन्ती के पुत्र)। नैतत्त्वय्युपपद्यते (न+एतत् +त्वयि +उपपद्यते) = यह तेरे योग्य नहीं है। क्षुद्रम् -तुच्छ| हृदय- दौर्बल्यम् = हृदय की दुर्बलता को। त्यक्त्वा = छोड़कर। उत्तिष्ठ – उठ खड़ा हो। परन्तप = हे शत्रुओं को ताप (पीड़ा) पहुँचाने वाले (अर्जुन)।]

अनुवाद – हे पृथापुत्र (अर्जुन)! कायरता को मत प्राप्त हो (अर्थात् कायर मत बन)। यह (कायरता की) बात करना तेरे योग्य नहीं है। हे शत्रुसन्तापकारी! तू हृदय की (इस) तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर (युद्ध के लिए) उठ खड़ा हो।।

(3) अशोच्यानन्वशोचस्त्वं …………………………. पण्डिताः ।।

[ अशोच्यानन्वशोचस्त्वं (अशोच्यान् +अन्वशोचः +त्वं) =शोक न करने योग्य लोगों के लिए शोक करता है तू। प्रज्ञावादांश्च (प्रज्ञावादान +च) = और पण्डितों के से वचनों को। गतासूनगतासूश्च (गतासून + अगतासून +च) =मरे हुओं (गत -निकल गये; असून =प्राण जिनके) और जीवितों के लिए। नानुशोचन्ति (न + अनुशोचन्ति) = शोक नहीं करते।]

अनुवाद – (हे अर्जुन!) तुम शोक न करने योग्य (लोगों) के लिए शोक कर रहे हो और बुद्धिमानों जैसी बात (भी) कर रहे हो। (जब कि) मरे हुओं के लिए और जीवितों के लिए पण्डितजन (विद्वान् व्यक्ति) शोक नहीं
करते हैं।

(4) देहिनोऽस्मिन् ……………… न मुह्यति।।

[ देहिनोऽस्मिन् (देहिनः + अस्मिन्) = जीवात्मा की इस (में)। देहे = शरीर में। जरा = वृद्धावस्था। देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र (देहान्तरप्राप्तिः + धीरः +तत्र) – दूसरा शरीर प्राप्त होना। बुद्धिमान् (धीर!) इस विषय में (तत्र)| मुह्यति = मोहित होता है (भ्रम में पड़ता है)।]

अनुवाद – जैसे जीवात्मा को इस शरीर में कुमारावस्था, यौवन तथा बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही दूसरा शरीर भी प्राप्त होता है। इसमें बुद्धिमान् व्यक्ति मोहग्रस्त नहीं होता। आशय यह है कि जैसे व्यक्ति को कौमार्य, यौवन और बुढ़ापे से किसी प्रकार का शोक नहीं होता; क्योंकि वह यह जानता है कि ये तो शरीर के धर्म हैं, जो होंगे ही। इसी प्रकार उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि दूसरा शरीर धारण करना अर्थात् पुनर्जन्म होना भी शरीर का ही धर्म है। इससे जीवात्मा नहीं बदलता; अतः शोक का कोई कारण नहीं।

(5) य एनं …………………….. न हन्यते।।

[एनम = इस (आत्मा) को वेति = समझता है। यश्चैनम् (यः +च+एनम्) = और जो इसको। विज्ञानीतो – जानते हैं। अयं = यह। हन्ति = मारता है। हन्यते = मारा जाता है।]

अनुवाद – जो (व्यक्ति) इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते (अर्थात् अज्ञानी हैं ); क्योंकि यह आत्मा न (तो) मारता है (और) न (ही) मारा जाता है (यह अमर है)।

(6) वासांसि जीर्णानि ………………………. नवानि देही।।

[ वासांसि = वस्त्रों को। जीर्णानि = पुराने। नरोऽपराणि (नरः + अपराणि) = मनुष्य दूसरों को। जीर्णान्यन्यानि (जीर्णानि +अन्यानि) = पुरानों को (त्यागकर) दूसरों (नयों को)। संयाति प्राप्त होता है। देही = जीवात्मा।]

अनुवाद – जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण ( धारण) करता है वैसे (ही) जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता (ग्रहण करता) है (तब संसार कहता है कि किसी का जन्म हुआ है या मृत्यु हुई है)।

(7) नैनं छिन्दन्ति ……………………….. शोषयति मारुतः।।

[नैनं (न + एनम) = न तो इस (जीवात्मा) को। छिन्दन्ति = काटते हैं। चैनं (च +एनम्) = और इसको। लेदयन्त्यापः (लेदयन्ति +आपः) = जल गीला करते हैं। ]

अनुवाद – इस आत्मा को शस्त्रादि नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गीला कर सकते और (इसको) वायु नहीं सुखा सकती (अर्थात् किसी भी भौतिक पदार्थ से यह नष्ट नहीं किया जा सकता)।

(8) जातस्य हि ……………………….. शोचितुमर्हसि।।

[जातस्य – पैदा होने वाले की| हि – क्योंकि ध्रुवः – निश्चित। तस्मादपरिहार्येऽर्थे (तस्मात + अपरिहार्ये +अर्थे) = इस कारण अनिवार्य विषय में। शोचितुमर्हसि (शोचितुम् +अर्हसि) = शोक करने योग्य हो (तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। ]

अनुवाद – क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है, इसलिए तुम्हें ऐसे विषय में शोक नहीं करना चाहिए, जिसका कोई उपाय न हो (अर्थात् जन्म-मृत्यु के इस क्रम को कोई नहीं बदल सकता। तब फिर इसके विषय में शोक करने से क्या लाभ ?)।

(9) यदृच्छया …………………………….. युद्धमीदृशम्।।
[ यदृच्छया = अपने आप| चोपपन्नम् (च+उपपन्नम्) = और प्राप्त हुए। स्वर्गद्वारमपावृतम् (स्वर्गद्वारम् +अपावृतम्) = खुले हुए स्वर्गद्वार को। सुखिनः = भाग्यवान्। युद्धमीदृशम् (युद्धम् +ईदृशम्)= ऐसा युद्ध।]

अनुवाद – हे अर्जुन! अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार-रूप ऐसे युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय (ही) पाते हैं (अर्थात् तू भाग्यशाली है कि तुझे यह युद्ध लड़ने का अवसर प्राप्त हो रहा है; क्योंकि धर्मयुद्ध क्षत्रिय को सीधे स्वर्ग प्राप्त कराता है)।

(10) हतो वा ………………….. कृतनिश्चयः।।

[ हतः = मरकर वा = या (तो)। जित्वा = जीतकर। भोक्ष्यसे = (तू) भोगेगा। महीम् = पृथ्वी को। तस्मादुत्तिष्ठ (तस्मात् + उत्तिष्ठ) = इसलिए उठो। कौन्तेय = हे कुन्ती पुत्र (अर्जुन)!! कृतनिश्चयः = निश्चय करके।]

अनुवादे – या तो तू (युद्ध में) मरकर स्वर्ग को प्राप्त होगा या (युद्ध) जीतकर पृथ्वी का भोग करेगा। (इस प्रकार तेरे दोनों हाथों में लड्डू हैं।) इसलिए तू युद्ध (करने) का निश्चय करके उठ खड़ा हो।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 हिमालयः

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Chapter Chapter 4
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अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) भारतदेशस्य …………………… प्रान्तरे तिष्ठति।
भारतदेशस्य ……………………. प्रदेशाः च सन्तिः ।
भारतदेशस्य …………………….. नाम सुप्रसिद्धम्।
भारतदेशस्य ………………….. उन्नततमानि सन्ति।

[नाम्नाभिधीयते (नाम्ना +अभिधीयते) = नाम से पुकारा जाता है। हिमगिरिरित्यपि (हिमगिरिः + इति + अपि) – हिमगिरि भी। उन्नतानि = ऊँची। आच्छादितानि = ढकी हुई। प्रभृतीनि = इत्यादि। उन्नततमानि – सबसे ऊँचे। अधित्यका = पर्वत के ऊपर की समतल भूमि, पठार। त्रिविष्टप-तिब्बत प्रान्तरे = भूभाग में, प्रदेश में।]

सन्दर्भ – यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘हिमालयः’ शीर्षक पाठ से अवतरित है।
[ विशेष—इस पाठ के अन्य सभी अवतरणों में यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – भारत देश की अत्यन्त विस्तृत उत्तर दिशा में विद्यमान् पर्वत को लोग ‘पर्वतराज हिमालय’ के नाम से पुकारते हैं। इसकी बहुत ऊँची चोटियाँ संसार के सारे पर्वतों को जीतती हैं; इसी कारण लोग इसे पर्वतों की । राजा कहते हैं। इसकी ऊँची चोटियाँ सदा बर्फ से ढकी रहती हैं, इसलिए यह ‘हिमालय’ (हिम + आलय = बर्फ का घर) या ‘हिमगिरि’ (हिम + गिरि = बर्फ का पहाड़) के नाम से भी सुप्रसिद्ध है। इसके ‘एवरेस्ट’, ‘गौरीशंकर’ जैसे शिखर संसार में सबसे ऊँचे हैं। इसके ऊपरी समतल भाग में (पठार पर) तिब्बत, नेपाल, भूटान पूर्ण सत्तासम्पन्न देश हैं, (और) कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, असम, सिक्किम, मणिपुर जैसे भारतीय प्रदेश हैं। उत्तर भारत का पर्वतीय भाग (गढ़वाल, कुमाऊँ आदि) भी हिमालय के ही अन्तर्वर्ती भू-भाग में ( श्रेणियों के मध्य) स्थित है।

(2) अयं पर्वतराजः …………………….. कुर्वन्ति।

(उत्तरसीम्नि-उत्तरी सीमा पर। प्रहरीव (प्रहरी +इव) – पहरेदार के समान समुदगम्य = निकलकर। स्वकीयैः = अपने। तीर्थोदकैः (तीर्थ + उदकैः) – पवित्र जलों से। पुनन्ति = पवित्र करती है। शस्यश्यामलाम = धनधान्य से परिपूर्ण।]

अनुवाद – यह पर्वतराज (अर्थात् पर्वतों का राजा) भारतवर्ष की उत्तरी सीमा पर स्थित प्रहरी के सदृश शत्रुओं से निरन्तर उसकी रक्षा करता है। हिमालय से ही गङ्गा, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र नामक महानदियाँ (तथा) शतद्रु (सतलज), विपाशा (व्यास), यमुना, सरयू, गण्डकी (गण्डक), नारायणी, कौशिकी (कोसी) जैसी नदियाँ भारत की समस्त उत्तर भूमि को अपने पवित्र जल से न केवल पवित्र करती हैं, अपितु इसे धनधान्य से सम्पन्न (हरा-भरा) भी करती हैं।

(3) अस्योपत्यकासु ……………………. प्रवर्तयति।।

अस्योपत्यकासु (अस्य + उपत्यकासु) =इसकी तलहटी (निम्न भू-भाग) में। वनराजयः = वन समूह (राजि – पंक्ति)| वनस्पतयश्तरवश्च (वनस्पतयः +तरवः +च) = वनस्पतियाँ और वृक्ष। आमयेभ्यो = रोगों से (आमय = रोग)| तरवः (तरु का बहुवचन) = वृक्ष। आसन्यादिगृहोपकरण- निर्माणार्थम (आसन्दी +आदि +गृह +उपकरण + निर्माण +अर्थम्) = कुर्सी आदि घरेलू सामान बनाने के लिए। वर्ष (वर्षा + ऋतौ) = वर्षा ऋतु में। अवरुध्य = रोककर।]

अनुवाद – इसकी तलहटी में विशाल वनसमूह सुशोभित हैं, जहाँ अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ, वनस्पतियाँ और वृक्ष हैं। ये जड़ी-बूटियाँ लोगों की रोगों से रक्षा करती हैं और वृक्ष कुर्सी आदि घरेलू सामान बनाने में प्रयुक्त होते हैं। हिमालय वर्षा ऋतु में दक्षिणी समुद्र से उठने वाले बादलों को रोककर उन्हें बरसने के लिए प्रेरित करता है।

(4) अस्योपत्यकायां …………………. भ्रमणाय आकर्षन्ति ।
अस्योपत्यकायां ……………………… अभिधीयते।
अस्योपत्यकासु ……………………… प्रसिद्ध आसीत्।
अस्योपत्यकायां ……………………… मनो न हति।

[ स्वकीयाभिः = अपनी। सुषमाभिः — सुन्दरता से। संज्ञया = नाम से। अभिहितः भवति = पुकारा जाता है। ततश्च (ततः + च) पूर्वस्यां – और उससे पूर्व (दिशा) में। ग्रीष्मत (ग्रीष्म +ऋतौ) = ग्रीष्म ऋतु में। बलादिव (बलात् +इव) = बलपूर्वक-सा। एभ्योऽपि (एभ्यः +अपि) = इनके भी। भागेऽवस्थितः (भागे + अवस्थितः) – भाग में स्थित कामरूपतया – इच्छानुसार रूप धारण करने के कारण, सुन्दरता के कारण। कामरूप = असम का एक जिला, जहाँ कामाख्या देवी का मन्दिर है।

अनुवाद – इसकी तलहटी (घाटी) में स्थित कश्मीर प्रदेश अपनी शोभा के कारण संसार में ‘पृथ्वी के स्वर्ग के नाम से पुकारा जाता है और उससे पूर्व दिशा में स्थित ‘किन्नर देश’ प्राचीन साहित्य में ‘देवभूमि’ (देवताओं का निवास-स्थान) नाम से प्रसिद्ध था। आज भी ‘कुलू घाटी’ के नाम से प्रसिद्ध यह प्रदेश अपनी सुन्दरता से किसका मन नहीं हरता है। शिमला, देहरादून, मसूरी, नैनीताल जैसे नगर ग्रीष्म ऋतु में देश के धनी लोगों को घूमने के लिए बलपूर्वक अपनी ओर खींचते हैं (अर्थात् देश के धनवान् लोग इसके सौन्दर्य पर आकर्षित होकर ही यहाँ घूमने के लिए आते हैं)। इनसे और भी पूर्व में स्थित सर्वाधिक सुन्दर प्रदेश अपने इच्छानुसार रूप धारण करने के कारण कामरूप’ नाम से पुकारा जाता है।

विशेष – असम का ‘कामरूप जिला प्राचीनकाल से ही अपने जादू-टोने के लिए प्रसिद्ध रहा है। लोगों का विश्वास था कि वहाँ के तन्त्र-मन्त्र विशेषज्ञ किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप (भेड़, बकरी आदि) में बदल सकते थे। इसी कारण इसका नाम ‘कामरूप’ (काम = इच्छानुसार + रूप = रूप धारण कर सकने वाला) पड़ गया।

(5) अस्यैव कन्दरासु …………………. पर्वतराजः इति।
अस्यैव कन्दरासु ………………… तीर्थस्थानानि सन्ति।
अस्यैव कन्दरासु ………………………. स्वीकृतमस्ति ।

[ अस्यैव (अस्य+एव) इसकी ही। कन्दरासु-गुफाओं में। तपस्यन्तः -तप करते हुए सिद्धिमत्वम् – सिद्धि देने वाली शक्ति को। विलोक्यैव (विलोक्य +एव) = देखकर ही। उपल्लरे = गुफा में। गिरीणाम् = पर्वतों की। धिया = बुद्धि से (युक्त)| विप्रोऽजायत (विप्रः +अजायत) = ब्राह्मण हुए। प्रदातुः- देने वाले का। सुतराम् = अत्यधिक समादृतः = सम्मानित। ]

अनुवाद – इसकी गुफाओं में तप करते हुए अनेक ऋषियों और मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की। इसकी सिद्धि देने की क्षमता को देखकर ही ‘पर्वतों की गुफा में और नदियों के संगम पर ब्राह्मणों (ब्रह्मप्राप्ति के इच्छुक साधकों) ने बुद्धत्व (ज्ञान) प्राप्त किया ऐसा कहते हुए वैदिक ऋषियों ने इसके महत्त्व को स्वीकार किया। पुराणों में सब प्रकार की सिद्धियाँ देने वाले शिव का स्थान इसी पर्वत के कैलास शिखर पर माना गया है।
इसी के प्रदेशों में बदरीनाथ, केदारनाथ, पशुपतिनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश, वैष्णव देवी, ज्वाला देवी आदि तीर्थस्थल हैं। इसलिए यह पर्वतराज हिमालय रक्षक, पालक, समस्त ओषधियों का संरक्षक तथा सभी सिद्धियों का प्रदाता होने से भारतवासियों में ‘पर्वतराज’ (पर्वतों का राजा) के नाम से अति आदर को प्राप्त है।

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