UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants (पुष्पी पादपों का शारीर)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न प्रकार के मेरिस्टेम की स्थिति तथा कार्य बताइए।
उत्तर :
1. शीर्षस्थ विभज्योतक :
ये मुख्य रूप से जड़ व तने के शीर्षों पर तथा पत्तियों के अग्रों पर मिलते हैं जहाँ ये नई-नई कोशिकाएँ बनाते रहते हैं।

 2. अन्तर्वेशी विभज्योतक :
यह शीर्षस्थ विभज्योतक का अलग होकर छूटा हुआ भाग होता है। जो स्थाई ऊतकों में परिवर्तित न होकर उनके मध्य में छूट जाता है। घासों के पर्यों के आधारों में, पोदीने के तने की पर्व सन्धियों के नीचे यह ऊतक पाया जाता है। इनकी कोशिकाओं में (UPBoardSolutions.com) विभाजन के फलस्वरूप पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है।

3. पाश्र्व विभज्योतक :
पौधों में इस ऊतक की स्थिति पार्श्व में होती है इसीलिए इसे पार्श्व विभज्योतक कहते हैं। इनकी कोशिकाओं में विभाजन अरीय दिशा में होता है। इनके

उदाहरण :
पूलीय कैम्बियम व कॉर्क कैम्बियम हैं।

प्रश्न 2.
कॉर्क कैम्बियम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? वर्णन करो।
उत्तर :
हाँ। हम इस कथन से सहमत हैं कि कॉर्क कैम्बियम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। ये पार्श्व विभज्योतकों की कोशिकाओं के अरीय दिशा में विभाजन के फलस्वरूप बनता है।

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प्रश्न 3.
चित्रों की सहायता से काष्ठीय एन्जियोस्पर्म के तने में द्वितीयक वृद्धि के प्रक्रम का वर्णन कीजिए इसकी क्या सार्थकता है?
उत्तर :

द्वितीयक वृद्धि

शीर्षस्थ विभज्योतक की कोशिकाओं के विभाजन, विभेदन और परिवर्द्धन के फलस्वरूप प्राथमिक ऊतकों का निर्माण होता है। अत: शीर्षस्थ विभज्योतक के कारण पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है। इसे प्राथमिक वृद्धि कहते हैं। द्विबीजपत्री तथा जिम्नोस्पर्स आदि काष्ठीय पौधों में पार्श्व विभज्योतक के कारण तने तथा जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। इस प्रकार मोटाई में होने वाली वृद्धि को द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहते हैं। जाइलम और फ्लोएम के मध्य विभज्योतक को संवहन एधा (vascular cambium) तथा वल्कुट या परिरम्भ  में विभज्योतक को कॉर्क एधा (cork cambium) कहते हैं।

द्वितीयक वृद्धि-द्विबीजपत्री तना

द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा (vascular cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) की क्रियाशीलता के कारण होती है।

संवहन एधा की क्रियाशीलता 
द्विबीजपत्री तने में संवहन बण्डल वर्षी (open) होते हैं।  संवहन बण्डलों के जाईलम तथा फ्लोएम के मध्य अन्तःपूलीय एधा (intrafascicular cambium) होती है। मज्जा रश्मियों की मृदूतकीय कोशिकाएँ जो अन्त:पूलीय एधा के मध्य स्थित होती हैं, विभज्योतकी होकर आन्तरपूलीय (UPBoardSolutions.com) एधा (interfascicular cambium) बनाती हैं। पूलीय तथा आन्तरपूलीय एधा मिलकर संवहन एधा का घेरा बनाती हैं।
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संवहन एधा वलय (vascular cambium ring)
की कोशिकाएँ तने की परिधि के समानान्तर तल अर्थात् स्पर्शरेखीय तल (tangential plane) में ही विभाजित होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कोशिका के विभाजन से जो नई कोशिकाएँ बनती हैं उनमें से केवल एक जाइलम या फ्लोएम की कोशिका में रूपान्तरित हो जाती है, जबकि दूसरी कोशिका विभाजनशील (meristematic) बनी रहती है। परिधि की ओर बनने वाली कोशिकाएँ फ्लोएम के तत्त्वों में तथा केन्द्र की ओर बनने वाली कोशिकाएँ जाइलम के तत्त्वों में परिवद्धित हो जाती हैं। बाद में बनने वाला संवहन ऊतक क्रमशः द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) तथा द्वितीयक फ्लोएम (secondary phloem) कहलाता है। ये संरचना तथा कार्य में प्राथमिक जाइलम तथा फ्लोएम के समान होते हैं।

कॉर्क एधा की क्रियाशीलता
संवहन एधा की क्रियाशीलता से बने द्वितीयक ऊतक पुराने ऊतकों पर दबाव डालते हैं जिसके कारण भीतरी (केन्द्र की ओर उपस्थित) प्राथमिक जाइलम अन्दर की ओर दब जाता है। इसके साथ ही परिधि की ओर स्थित प्राथमिक फ्लोएम नष्ट हो जाता है। इससे पहले कि बाह्य त्वचा (epidermis) की कोशिकाएँ एक निश्चित सीमा तक खिंचने के बाद टूट-फूट जाएँ, अधस्त्वचा (hypodermis) के अन्दर की कुछ मृदूतकीय कोशिकाएँ विभज्योतक (meristem) होकर कॉर्क एधा (cork cambium) बनाती हैं। कॉर्क एधा कभी-कभी वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ (pericycle) आदि से बनती है। कॉर्क एधा तने की परिधि के समानान्तर विभाजित होकर बाहर की ओर सुबेरिनयुक्त (suberized) कॉर्क या फेलम (cork or phellem) का निर्माण करती है। यह तने के अन्दर के भीतरी ऊतकों की सुरक्षा करती है। कॉर्क एधा से केन्द्र की ओर बनने वाली मृदूतकीय (parenchymatous), स्थूलकोणीय अथवा दृढ़ोतकी कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट (phelloderm) का निर्माण करती हैं। कॉर्क एधा से बने (UPBoardSolutions.com) फेलम तथा फेलोडर्म को पेरीडर्म (periderm) कहते हैं। पेरीडर्म में स्थान-स्थान पर गैस विनिमय के लिए वातरन्ध्र (lenticels) बन जाते हैं। द्वितीयक जाइलम वसन्त काष्ठ तथा शरद् काष्ठ में भिन्नत होता है। इसके फलस्वरूप कुछ पौधों में स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं।
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में विभेद कीजिए

(अ) टैकीड तथा वाहिका
(ब) पैरेन्काइमा तथा कॉलेन्काइमा
(स) रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ
(द) खुला तथा बन्द संवहन बण्डल।
उत्तर :
(अ) टैकीड तथा वाहिका में अन्तर
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(ब)
पैरेन्काइमा (मृदूतक) तथा कॉलेन्काइमा (स्थूलकोण ऊतक) में अन्तर
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(स)
रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ में अन्तर

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(द)
खुले तथा बन्द संवहन बण्डल में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants image 7प्रश्न 5.
निम्नलिखित में शारीर के आधर पर अन्तर कीजिए
(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल
(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना।
उत्तर :
(अ)
एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल में अन्तर

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(ब)
एकबीजपत्री तने तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर ऊतक एकबीजपत्री तना

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प्रश्न 6.
आप एक शैशव तने की अनुप्रस्थं काट का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन कीजिए। आप कैसे पता करेंगे कि यह एकबीजपत्री तना है अथवा द्विबीजपत्री तना है? इसके कारण बताइए।
उत्तर :
शैशव तने की अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदर्शीय अवलोकन करके निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर एकबीजपत्री या द्विबीजपत्री तने की पहचान करते हैं

(क)
तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण

  1. बाह्य त्वचा पर उपचर्म (cuticle), रन्ध्र (stomata) तथा बहुकोशीय रोम पाए जाते हैं।
  2.  अधस्त्वचा (hypodermis) उपस्थित होती है।
  3. अन्तस्त्वचा प्रायः अनुपस्थित या अल्पविकसित होती है।
  4. परिरम्भ (pericycle) प्रायः बहुस्तरीय होता है।
  5. संवहन बण्डल संयुक्त (conjoint), बहि:फ्लोएमी (collateral) या उभयफ्लोएमी (bicollateral) होते हैं।
  6. प्रोटोजाइलम एण्डार्क (endarch) होता है।

(ख)
एकबीजपत्री तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण

  1. बाह्यत्वचा पर बहुकोशिकीय रोम अनुपस्थित होते हैं।
  2. अधस्त्वचा दृढ़ोतक (sclerenchymatous) होती है।
  3. भरण ऊतक (ground tissue) वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ तथा मज्जा में अविभेदित होता है।
  4. संवहन बण्डल भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं।
  5. संवहन बण्डल संयुक्त, बहि:फ्लोएमी तथा अवर्थी (UPBoardSolutions.com) (closed) होते हैं।
  6. संवहन बण्डल चारों ओर से दृढ़ोतक से बनी बण्डल अच्छद से घिरे होते हैं।
  7. जाइलम वाहिकाएँ (vessels) ‘V’ या ‘Y’ क्रम में व्यवस्थित रहती हैं।

(ग)
द्विबीजपत्री तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण

  1. बाह्य त्वचा पर बहुकोशिकीय रोम पाए जाते हैं।
  2. अधस्त्वचा (hypodermis) स्थूलकोण ऊतक से बनी होती है।
  3.  संवहन बण्डल एक या दो घेरों में व्यवस्थित होते हैं।
  4.  भरण ऊतक वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ, मज्जा तथा मज्जा रश्मियों में विभेदित होता है।
  5.  संवहन बण्डल संयुक्त, बहि:फ्लोएमी या उभयफ्लोएमी और वर्धा (open) होते हैं।
  6. जाइलम वाहिकाएँ रेखीय (linear) क्रम में व्यवस्थित होती हैं।

प्रश्न 7.
सूक्ष्मदर्शी, किसी पौधे के भाग की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित शारीर रचनाएँ दिखाती है
(अ) संवहन बण्डल संयुक्त, फैले हुए तथा उसके चारों ओर स्क्लेरेन्काइमी आच्छद हैं।
(ब) फ्लोएम पैरेन्काइमा नहीं है।
आप कैसे पहचानोगे कि यह किसका है?
उत्तर :
एकबीजपत्री तने की आन्तरिक आकारिकी या शारीर में संवहन बण्डल भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं। संवहन बण्डल संयुक्त तथा अवर्थी होते हैं। संवहन बण्डल के चारों ओर स्क्लेरेन्काइमी बण्डल आच्छद (bundle sheath) होती है। फ्लोएम में फ्लोएम मृदूतक का अभाव होता है। अत: सूक्ष्मदर्शी में प्रदर्शित पौधे का भाग एकबीजपत्री तना है।

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प्रश्न 8.
जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक क्यों कहते हैं?
उत्तर :
जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि ये एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं। सभी कोशिकाएँ मिलकर एक इकाई के रूप में विभाजित होकर कार्य करती हैं।

प्रश्न 9.
रन्ध्रीतन्त्र क्या है? रन्ध्र की रचना का वर्णन करो और इसका नामांकित चित्र भी बनाओ।
उत्तर :
रन्ध्र (Stomata) ऐसी रचनाएँ हैं, जो पत्तियों की बाह्यत्वचा पर पाये जाते हैं। रन्ध्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के विनिमय को नियमित करते हैं। प्रत्येक रन्ध्र (stoma= एकवचन) में सेम के आकार की दो कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। एकबीजपत्री पौधों में द्वार कोशिकाएँ डम्बलाकार होती हैं। द्वार कोशिका की बाहरी भित्ति पतली तथा आन्तरिक भित्ति मोटी होती है। द्वार कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट होता है और यह रन्ध्र के खुलने (UPBoardSolutions.com) तथा बंद होने के क्रम को नियमित करता है। कभी-कभी कुछ बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ भी रन्ध्र के साथ लगी रहती हैं, इन्हें उप कोशिकाएँ (accessory cells) कहते हैं। रन्ध्रीय छिद्र, द्वारकोशिका तथा सहायक कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री तन्त्र (stomatal system) का निर्माण करती हैं।
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प्रश्न 10.
पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र बताओ। प्रत्येक तंत्र के ऊतक बताओ।

उत्तर :
पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र निम्नवत् हैं

  1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र-मृदूतक।
  2. भरण ऊतक तंत्र-पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा।
  3. संवहन ऊतक तंत्र-जाइलम तथा फ्लोएम।

प्रश्न 11.
पादप शारीर का अध्ययन हमारे लिए कैसे उपयोगी है?
उत्तर :
फार्माकोचोसी (Pharmaconosy) विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत औषधीय महत्त्व के पदार्थों के स्रोत, विशेषताओं और उनके उपयोग का अध्ययन प्राकृतिक अवस्था में किया जाता है। यह अध्ययन मुख्य रूप से पौधों के शारीर (anatomy) पर निर्भर करता है। इमारती लकड़ी (timber) की दिन-प्रतिदिन कमी होती जा रही है, इसीलिए अच्छी इमारती लकड़ीके स्थान पर खराब इमारती लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है। शारीर अध्ययन द्वारा लकड़ी की किस्म (quality) का पता लगाया जा सकता है। शारीर अध्ययन द्वारा एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने और जड़ की पहचान की जा सकती है। जीवाश्म शारीर (fossil anatomy) अध्ययन द्वारा प्राचीनकालीन पौधों का ज्ञान होता है। इससे जैवविकास का ज्ञान होता है कि आधुनिक पौधों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई है। सूक्ष्मदर्शीय अध्ययन द्वारा चाय, कॉफी, तम्बाकू, केसर, हींग, वनस्पति रंगों, पादप औषधियों में मिलावट (adulteration) का अध्ययन किया जा सकता है। मिलावट के कारण इनकी आन्तरिक संरचना में भिन्नता आ जाती है।

प्रश्न 12.
परिचर्म क्या है? द्विबीजपत्री तने में परिचर्म कैसे बनता है?
उत्तर :
परिचर्म (Periderm) :
कॉर्क एधा की जीवित मृदूतक कोशिका से परिचर्म का निर्माण होता है। कॉर्क एधा या कागजन (cork cambium or phellogen) की कोशिकाएँ विभाजित होकर परिधि की ओर जो कोशिकाएँ बनाती हैं, वे सुबेरिनयुक्त (suberinized) कोशिकाएँ होती हैं। सुबेरिनयुक्त कोशिकाओं से बना यह स्तर कॉर्क या फेलम (cork or phellem) कहलाता है। कॉर्क एधा (cork cambium) से भीतर की ओर बनने वाली मृदूतकीय कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट या फेलोडर्म (phelloderm) (UPBoardSolutions.com) बनाती हैं। फेलम (कॉर्क), कॉर्क एधा तथा द्वितीयक वल्कुट मिलकर परिचर्म (periderm) बनाती हैं।

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प्रश्न 13.
पृष्ठाधर पत्ती की भीतरी रचना का वर्णन चिह्नित चित्रों की सहायता से कीजिए।
उत्तर :

पृष्ठाधर या द्विबीजपत्री पत्ती की संरचना

द्विबीजपत्री पौधों की पत्ती की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित संरचनाएँ दिखाई देती हैं

(क)
बाह्यत्वचा (Epidermis) :
बाह्यत्वचा सामान्यत: दोनों सतहों पर एककोशिकीय मोटे स्तर के रूप में होती है।

(i) ऊपरी बाह्यत्वचा :
यह एक कोशिका मोटा स्तर है। इसकी कोशिकाएँ ढोलकनुमा परस्पर एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं। इन कोशिकाओं की बाहरी भित्ति उपचर्म-युक्त होती है। कोशिकाओं में साधारणत: हरितलवक नहीं होते हैं। कुछ पौधों (प्रायः शुष्क स्थानों में उगने वाले पौधों में) में बहुस्तरीय बाह्यत्वचा (multiple epidermis) पाई जाती हैं।

(ii) निचली बाह्यत्वचा :
निचली बाह्यत्वचा एक कोशिका मोटे स्तर रूप में पाई जाती है। इस पर पतला उपचर्म होता है। रन्ध्र बहुतायत में पाए जाते हैं। रन्ध्रों की रक्षक कोशिकाओं में हरितलवक पाए जाते हैं। कुछ पत्तियों की ऊपरी बाह्यत्वचा पर भी रन्ध्र होते हैं, किन्तु इनकी संख्या सदैव कम होती है।

(ख)
पर्णमध्योतक (Mesophyll) :
दोनों बाह्यत्वचाओं के मध्य स्थित सम्पूर्ण ऊतक (संवहन बण्डलों को छोड़कर) पर्णमध्योतक कहलाता है। पृष्ठाधर पत्तियों में पर्णमध्योतक दो प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनता है

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(i) खम्भ ऊतक (Palisade tissue) :
ऊपरी बाह्यत्वचा के नीचे लम्बी, खम्भाकार कोशिकाएँ दो-तीन पर्यों में लगी होती हैं। इन कोशिकाओं के मध्य अन्तराकोशिकीय स्थान बहुत कम या नहीं होते हैं। ये रूपान्तरित मृदूतकीय कोशिकाएँ होती हैं। यह प्रकाश संश्लेषी (photosynthetic) ऊतक है।
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(ii) स्पंजी ऊतक (Spongy tissue) :
खम्भ मृदूतक से लेकर निचली बाह्यत्वचा तक स्पंजी मृदूतक ही होता है। ये कोशिकाएँ सामान्यतः गोल और ढीली व्यवस्था में अर्थात् काफी और स्पष्ट अन्तराकोशिकीय स्थान वाली होती हैं। इन कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट्स कम संख्या में होते हैं। मध्य शिरा में संवहन पूल के ऊपर तथा नीचे दृढ़ोतक या स्थूलकोण ऊतक पाया जाता है।

(ग)
संवहन पूल (Vascular bundles) :
पत्ती की अनुप्रस्थ काट में अनेक छोटी-छोटी शिराएँ संवहन पूलों के रूप में दिखाई पड़ती हैं। संवहन पूल जाइलम और फ्लोएम के मिलने से बनता है। आदिदारु (protoxylem) सदैव ऊपरी बाह्यत्वचा की ओर होती है, जबकि अनुदारु (metaxylem) निचली बाह्यत्वचा की ओर होता है। फ्लोएम निचली बाह्यत्वचा की ओर होता है। जाइलम और फ्लोएम के मध्य एधा (cambium) होती है। इस प्रकार संवहन पूल संयुक्त (conjoint), समपार्श्व (collateral) तथा वध (open) होते हैं। प्रत्येक संवहन पूल दृढ़ोतक रेशों से घिरा होता है तथा इसके बाहर मृदूतकीय कोशिकाओं का पूलीय आच्छद होता है। यह बण्डल आच्छद सामान्यत: छोटी-से-छोटी शिरा के चारों ओर भी होता है।

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प्रश्न 14.
त्वक् कोशिकाओं की रचना तथा स्थिति उन्हें किस प्रकार विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है?
उत्तर :

त्वक कोशिकाएँ

ये पादप शरीर के सभी भागों पर सबसे बाहरी रक्षात्मक आवरण बनाती हैं। यह प्रायः एक कोशिका मोटा स्तर होता है। कोशिकाएँ अनुप्रस्थ काट में ढोलकनुमा (barrel shaped) दिखाई देती हैं। बाहर से देखने पर ये अनियमित आकार की फर्श के टाइल्स की तरह अथवा बहुभुजीय दिखाई देती हैं। ये परस्पर एक-दूसरे से मिलकर अखण्ड सतह बनाती हैं। ये कोशिकाएँ मृदूतकीय कोशिकाओं का रूपान्तरण होती हैं। इन कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य की मात्रा बहुत (UPBoardSolutions.com) कम होती है तथा प्रत्येककोशिका में एक बड़ी रिक्तिका होती है। पौधे के वायवीय भागों की त्वक् कोशिकाएँ उपचर्म (cuticle) से ढकी होती हैं, परन्तु मूलीय त्वचा की कोशिकाओं पर उपचर्म की रक्षात्मक आवरण नहीं होता। तने, पत्ती आदि की त्वक् कोशिकाओं के मध्य रन्ध्र (stomata) पाए जाते हैं। रन्ध्र द्वार कोशिकाओं (guard cells) से घिरे होते हैं। द्वार कोशिकाएँ वृक्काकार होती हैं। द्वार कोशिकाओं के चारों ओर पाई जाने वाली कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएँ कहते हैं। रन्ध्रों का खुलना तथा बन्द होना रक्षक कोशिकाओं की आशूनता पर निर्भर करता है। रन्ध्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के आदान प्रदान का कार्य करते हैं। रन्ध्रों की स्थिति, संख्या, संरचना, उपचर्म की मोटाई आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है।

जड़ों की त्वक कोशिकाओं से एककोशिकीय मूलरोम बनते हैं। ये मृदा से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। तने और पत्तियों की त्वक्को शिकाओं से बहुकोशिकीय रोम बनते हैं। पत्ती एवं तने की रोमयुक्त सतह वाष्पोत्सर्जन की दर को नियन्त्रित करने में सहायक होती है। रन्ध्रों के रोमों से ढके रहने के कारण मरुभिद् पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। त्वक् कोशिकाएँ वातावरणीय दुष्प्रभावों से पौधों की सुरक्षा करती हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किस पादप के फ्लोएम में सह कोशिकाएँ नहीं होती हैं?
(क) साइकस
(ख) नीम
(ग) आम
(घ) सागौन
उत्तर :
(क) साइकस

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किसकी दारू में वाहिकाएँ नहीं होती हैं?
(क) साइकस
(ख) आम
(ग) नीम
(घ) सागौन
उत्तर :
(क) साइकस

प्रश्न 3.
उस पादप का नाम क्या है जिसमें सिस्टोलिथ पायी जाती है?
(क) फाइकस
(ख) मेज
(ग) आम
(घ) सागौन
उत्तर :
(क) फाइकस

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प्रश्न 4.
वाहिकाएँ तथा सखी कोशिकाएँ किसमें अनुपस्थित रहती हैं?
(क) इफेड्रा
(ख) साइकस
(ग) सूरजमुखी
(घ) आम
उत्तर :
(ख) साइकस।

प्रश्न 5.
मध्यादिदारूक आदिदारू पाया जाता है।
(क) सरसों की जड़ में
(ख) सरसों के तने में
(ग) टेरिस के राइजोम में
(घ) साइकस की कोरेलायड जड़ों में
उत्तर :
(ख) सरसों के तने में

प्रश्न 6.
कैस्पेरियन पट्टी पायी जाती हैं।
(क) बाह्य त्वचा में
(ख) अधत्वचा में
(ग) अन्तस्त्वचा में
(घ) फ्लोयम में
उत्तर :
(ग) अन्तस्त्वचा में।

प्रश्न 7.
रबर की पत्ती में पाये जाने वाले कैल्सियम कार्बोनेट के क्रिस्टल को कहते हैं।
(क) रैफाइड्स
(ख) सिस्टोलिथ
(ग) स्फीरैफाइड्स
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) रैफाइड्स

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प्रश्न 8.
संयुक्त, उभयफ्लोएमी और खुले संवहन बण्डले पाये जाते हैं।
(क) मक्का के तने में
(ख) सभी द्विबीजपत्री तनों में
(ग) कुकुरबिटा में
(घ) जड़ों में
उत्तर :
(ग) कुकुरबिटा में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पाश्र्व विभज्योतक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
एधा (cambium)।

प्रश्न 2.
“वल्कुट की सबसे भीतरी परत का नाम लिखिए।
उत्तर :
अन्तस्त्वचा (endodermis)।

प्रश्न 3.
उस जीवित ऊतक का नाम बताइए जो प्रमुखतः शाकीय पौधों में यान्त्रिक शक्ति प्रदान करता है।
उत्तर :
शाकीय पौधों में यान्त्रिक शक्ति प्रदान करने वाला प्रमुख जीवित ऊतक अधः स्तरीय भाग में (in hypodermal part) स्थूल कोण ऊतक (collenchyma) होता है।

प्रश्न 4.
जड़ों में पाये जाने वाले संवहन बण्डलों के लक्षण लिखिए।
उत्तर :
जड़ों में अरीय संवहन बण्डल पाये जाते हैं। इस प्रकार के संवहन बण्डलों में जाइलम और फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं पर होते हैं। इनमें जाइलम सदैव बाह्यआदिदारुक मिलता है अर्थात् आदिदारु परिधि की ओर तथा अनुदारु केन्द्र की ओर होता है। इन संवहन बण्डलों में प्राथमिक एधा नहीं पायी जाती। द्विबीजपत्री जड़ों में माइलम तथा फ्लोएम के मध्य बाद में, द्वितीयक एधा बन जाती है।

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प्रश्न 5.
उस पौधे का नाम लिखिए जिसमें उभय फ्लोएमी संवहन बण्डल (पूल) पाये जाते हैं।
उत्तर :
आवृतबीजी पौधों के कुल कुकुरबिटेसी के पौधों जैसे काशीफल (Cucurbita maxima) आदि में उभय फ्लोएमी (bicollateral) संवहन पूल पाये जाते हैं।

प्रश्न 6.
विरल दारुक तथा सघन दारुक काष्ठ में अन्तर बताइए।
उत्तर :
विरल दारुक (manoxylic) काष्ठ :
साइकस में द्वितीयक जाइलम वलयों के मध्य मृदुतक कोशिकाओं के समूह पाये जाते हैं क्योंकि इसमें द्वितीयक वृद्धि के लिए हर वर्ष नयी एधा वलय बनती है। सघन दारुक (pycnoxylic) काष्ठ-आवृतबीजी तथा अधिकांश अनावृतबीजी पौधों में एधा वलय जीवनपर्यन्त क्रियाशील (UPBoardSolutions.com) रहती है। इससे केन्द्र की ओर द्वितीयक जाइलम तथा परिधि की ओर द्वितीयक फ्लोएम बनता रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ट्यूनिका कॉर्पस थ्योरी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
सन् 1924 में शिमिट (Schmidt) ने अग्रस्थ वर्षी प्रदेशों (apical growing regions) के लिए ट्यूनिका कॉर्पस (tunica corpus) की विचारधारा प्रस्तुत की। इस विचारधारा के अनुसार, अग्रस्थ भाग में ऊतियों के दो क्षेत्र ट्यूनिका (tunica) तथा कॉर्पस (corpus) पाए जाते हैं। ट्यूनिका कोशिकाओं का एक या अधिक स्तरों का बाह्य क्षेत्र तथा कॉर्पस मध्य वाला क्षेत्र है जो कोशिकाओं का एक समूह है तथा ट्यूनिकों द्वारा घिरा रहता है। इस विचारधारा के अनुसार, बाह्यत्वचा, ट्यूनिका की बाहरी स्तर से विकसित होती है तथा शेष ऊतक पूर्ण कॉर्पस एवं ट्यूनिका के कुछ भागों से विकसित होते हैं। जब ट्यूनिका केवल एकस्तरीय होती है। तो यह हेन्सटीन द्वारा वर्णित त्वचाजन (dermatogen) की भाँति कार्य करती है, लेकिन जब यह बहुस्तरीय होती है तो यह वल्कुट के ऊतक (cortical tissue) के कुछ भाग के विकास में सहायक हो सकती है। ट्यूनिका की कोशिकाएँ केवल अपनतिक (anticlinal) विभाजन द्वारा विभाजित होती है। जबकि कॉर्पस भाग की कोशिकाएँ अपनतिक तथा परिनतिक (periclinal) विभाजनों से विभाजित होती हैं।

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प्रश्न 2.
बाह्य त्वचा ऊतक तन्त्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
बाह्यत्वचा पौधों के अधिकांश भागों की बाहरी त्वचा है। इसकी कोशिकाएँ लम्बी तथा एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं और एक अखण्ड सतह बनाती हैं। बाह्यत्वचा प्राय: एकल परत वाली होती है। बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ मृदूतकी प्रकार की होती हैं जिनमें बहुत कम मात्रा में साइटोप्लाज्म होता है। इसमें एक बड़ी (UPBoardSolutions.com) रसधानी होती है। बाह्यत्वचा की बाहरी सतह पर क्यूटिकल (cuticle) नामक रक्षात्मक परत का आवरण पाया जाता है। क्यूटिकल जल की हानि को रोकती है। जड़ों में क्यूटिकल अनुपस्थित होती है।

प्रश्न 3.
वार्षिक वलय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या कश्मीर में पाये जाने वाले वृक्षों में वार्षिक वलय प्रायः स्पष्ट होते हैं परन्तु उन पौधों में नहीं जो चेन्नई के समीप पाये जाते हैं। क्यों ?
उत्तर :

वार्षिक वलय

संवहन एधा की क्रियाशीलता मौसम में परिवर्तन के साथ अलग-अलग होने के कारण अधिक ठण्डे शरद ऋतु और बसन्त ऋतु में बनने वाले द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) में काफी (कभी-कभी अत्यधिक भी) अन्तर उत्पन्न कर देती है। बसन्त ऋतु (spring season) में तापमान उचित होने आदि के कारण बनने वाले द्वितीयक जाइलम अर्थात् बसन्त काष्ठ (spring wood) में
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वाहिकाएँ इत्यादि अधिक स्पष्ट तथा चौड़ी गुहा वाली होती हैं। शरद ऋतु में पौधे के सभी भागों के साथ पूलीय एधा (fascicular cambium) भी कम क्रियाशील हो जाती है। इस प्रकार, इस काष्ठ में वाहिकाएँ बहुत कम तथा बहुत छोटी गुहा वाली होती हैं, साथ ही इस काष्ठ में वाहिनिकाओं और काष्ठ रेशों (tracheids and wood fibres) की अधिकता होती है। इसका रंग भी गहरा होता है। इस प्रकार बने काष्ठ को शरद काष्ठ (autumn wood) कहते हैं दोनों प्रकार के काष्ठ अर्थात् बसन्त काष्ठ तथा शरद काष्ठ तने की अनुप्रस्थ काट (transverse section) संकेन्द्री वलयों (concentric rings) के रूप में दिखायी देते हैं।इस प्रकार एक शरद काष्ठ और एक बसन्त काष्ठ के वलय को मिलाकर वार्षिक वलय (annual ring) अथवा वृद्धि वलय (growth ring) कहते हैं। इस प्रकार एक वलय के बनने में एक वर्ष का समय लगता है अत: वार्षिक वलयों की संख्या देखकर किसी वृक्ष की आयु का पता लगाया जा सकता है।

यह भी स्पष्ट है कि केवल मुख्य स्तम्भ के आधारीय भाग में ही वार्षिक वलयों की संख्या गिनकर वृक्ष की आयु बतायी जा सकती है, क्योकि आधार से सिरे की ओर वलयों की संख्या कम होती जाती है। वर्षभर के मौसम में अधिक परिवर्तन नहीं होने से वार्षिक वलय नहीं बनते हैं अथवा स्पष्ट नहीं होते हैं; इसलिए ‘वार्षिक वलय’ में बसन्त वे शरद् ऋतुओं में अत्यधिक अन्तर होने से कश्मीर में बसन्त काष्ठ व शरद काष्ठ स्पष्ट रूप से घेरों या वलयों (rings) में बनते हैं। चेन्नई मेंदोनों ऋतुओं के तापमान में न तो इतना अन्तर होता है और न ही काष्ठ में बसन्त व शरद काष्ठ के वलय बन पाते हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(i) अन्तःकाष्ठ तथा रस काष्ठ
(ii) वातरन्ध्र
उत्तर :
(i) अन्त:काष्ठ तथा रस काष्ठ (Heart wood and Sap wood) :
तने के पुराने भाग अथवा केन्द्रीय भाग में टैनिन (tannin), रेजिन (resin), गोंद (gum) आदि पदार्थों के जमाव के कारण यह भाग कठोर हो जाता है। इस भाग को अन्त:काष्ठ (heart wood) अथवा ड्यूरामेन (duramen) कहते हैं। द्वितीयक वृद्धि के साथ-साथ प्रतिवर्ष अन्त:काष्ठ की मात्रा बढ़ती जाती है।अनुप्रस्थ कोट में यह भाग गहरे बादामी रंग को दिखलाई देता है। इसका मुख्य कार्य दृढ़ता प्रदान करना है। द्वितीयक काष्ठ की परिधि वाला भाग हल्के रंग का होता है। इस भाग। को रस काष्ठ (sap wood) अथवा एलबर्नम (alburnum) कहते हैं। यह काष्ठ का सक्रिय भाग है। यह जल तथा खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है।

(ii) वातरन्ध्र (Lenticel) :
ये पुराने वृक्ष के तनों पर पाये जाने वाले लेंस की तरह के छिद्र होते हैं जिनके द्वारा तना वातावरण से गैसों का आदान-प्रदान करता है। वातरन्ध्र (lenticel), रन्ध्र (stomata) के नीचे स्थित होते हैं। प्रत्येक वातरन्ध्र में अनियमित आकार की छोटी, पतली भित्ति वाली कोशिकाओं का समूह पाया जाता है जिन्हें पूरक या कम्पलीमेण्टरी (complementary) कोशिकाएँ कहते हैं। इस प्रकार ये कोशिकाएँ कॉर्क कैम्बियम द्वारा बाहर की ओर कॉर्क कोशिकाओं के स्थान पर बनती हैं। इन (UPBoardSolutions.com) कोशिकाओं की कोशिका-भित्ति में सुबेरिन नहीं होती। इन कोशिकाओं की संख्या बढ़ते रहने से बाह्यत्वचा फट जाती है और पूरक कोशिकाएँ ऊपर की ओर उठकर छोटे-छोटे उभार बना लेती हैं। इस प्रकार वातरन्ध्र (lenticel) बन जाते हैं। शीत ऋतु में कॉर्क कोशिकाओं के बनने के कारण वातरन्ध्र बन्द हो जाते हैं, परन्तु नववर्ष के आगमन पर ये पुनः खुल जाते है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभज्योतक क्या है ? स्थिति के आधार पर ये कितने प्रकार के होते हैं ? या शीर्षस्थ विभज्योतक तथा अन्तर्वेशी (अन्तर्विष्ट) विभज्योतक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

विभज्योतक ऊतक

विभज्योतक या मेरिस्टेमी ऊतक (meristems) वे हैं जिनकी कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता होती है अथवा इनमें विभाजन हो रहा होता है। इनका भिन्नन (differentiation) भी नहीं हुआ होता है। इनकी कोशिकाएँ सेलुलोस की पतली भित्ति वाली, कोशिकाद्रव्य से भरी हुई अर्थात् रिक्तिकाएँ बहुत कम और छोटी, किन्तु बड़े व स्पष्ट केन्द्रक वाली होती हैं। इनमें कोशिकाएँ अत्यन्त पास-पास लगी होती हैं जिनके मध्य अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) प्रायः नहीं होते। ये आकार में समव्यासी (isodiametric) होती हैं तथा उपापचयी (metabolic) रूप से अधिक सक्रिय होती हैं।

विभज्योतक पौधों के वृद्धि भागों में मिलते हैं। निम्न श्रेणी के बहुकोशिकीय पौधों में ये पूरे पौधे के शरीर में रहते हैं, किन्तु उच्च श्रेणी के पौधों में तो ये निश्चित और विशेष स्थितियों में ही पाये जाते हैं। इन कोशिकाओं के विभाजन, परिवर्द्धन, वृद्धि और भिन्नन के बाद ही स्थायी ऊतक (permanent tissues) बनते हैं।

स्थिति के आधार पर विभज्योतक
स्थिति के अनुसार विभज्योतक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

1. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem) :
यह ऊतक किसी अंग (मूल या तने) के शीर्ष में होता है और नई-नई कोशिकाएँ बनाते रहने के कारण, वहाँ पर वर्धन प्रदेश (growing zone) बनाता है। इसी के कारण उस भाग में पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। तने तथा जड़ कें शीर्षों के अनुदैर्ध्य काटों में इनको तथा इनसे बनने वाले स्थायी ऊतकों (permanent tissues) को देखा जा सकता है। शीर्षस्थ विभज्योतक प्रायः सदैव ही प्राथमिक (primary) प्रकार का विभज्योतक होता है। शीर्षस्थ विभज्योतक से तनों तथा जड़ों के शीर्षों में जिस प्रकार से क्रमशः नये तथा स्थायी ऊतकों का निर्माण होता है, इसको समय-समय पर कई प्रकार के सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जाता रहा है। इनमें सबसे पुराना तथा मान्यवाद हिस्टोजन वाद (histogen theory) है। इस वाद के अनुसार, किसी शीर्षस्थ विभज्योतक से बनने वाले स्तर तीन प्रकार के ऊतकजन क्षेत्रों (histogen zones) में बँटे होते हैं (चित्र देखिए)। ये क्षेत्र प्राविभज्योतक (promeristem) के रूप में अपना परिवर्द्धन प्रारम्भ करते हैं तथा अग्रलिखित प्रकार से स्थायी ऊतकों का निर्माण करते हैं जड़ के (UPBoardSolutions.com) शीर्ष पर चूँकि मूलगोप (root cap) होता है अतः इसको निर्मित करने वाला एक अलग विभज्योतक होता है, इसे कैलिप्ट्रोजन (calyptrogen) कहते हैं। यह मूलगोप की होते रहने वाली क्षति की पूर्ति करता है।
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2. पाश्र्व विभज्योतक (Lateral meristem) :
यह ऊतक तने या मूल के पाश्र्यों में अक्ष के समान्तर अर्थात् स्पर्श रेखीय तल (tangential plane) में स्थित होता है। इसकी कोशिकाएँ केवल इसी तल में विभाजित होती हैं। अत: इससे द्वितीयक ऊतकों (secondary tissues) का निर्माण होता है, जिससे जड़ या तने (प्ररोह) की मोटाई बढ़ती है। द्विबीजपत्री पौधों के तने में उपस्थित संवहन एधा (fascicular cambium)इस प्रकार का ऊतक होता है। अन्य उदाहरण में तने या जड़ में स्थायी ऊतकों से उत्पन्न होने वाला द्वितीयक विभज्योतक (secondary meristem) काग एधा (cork cambium) अथवा द्विबीजपत्री जड़ों में उत्पन्न होने वाली द्वितीयक संवहन एधा (secondary fascicular cambium) होती है। उपर्युक्त सभी उदाहरणों में तने अथवा जड़ की मोटाई में द्वितीयक वृद्धि (secondary growth in thickness) ही होती है।

3. अन्तर्वेशी विभज्योतक (Intercalary meristem) :
यह ऊतक शीर्षस्थ विभज्योतक का अलग होकर छूटा हुआ भाग होता है, जो स्थायी ऊतकों में परिवर्तित न होकर, उनके मध्य में रह जाता है। इस ऊतक के कारण भी पौधे के भागों की लम्बाई में वृद्धि होती है। घासों के पर्वो (internodes) के आधारों में तथा पोदीना (mint) के तने की पर्वसन्धियों (UPBoardSolutions.com) (nodes) के नीचे यह ऊतक पाया जाता है। यह पर्णाधार (leaf base) पर भी पाया जाता है; जैसे-चीड़ (Pinus) में। अन्तर्वेशी विभज्योतक प्राथमिक स्थायी ऊतकों को जन्म देते हैं तथा पौधों की लम्बाई बढ़ाते हैं। इस प्रकार की वृद्धि अल्पकालिक होती है।

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प्रश्न 2.
ऊतक से आप क्या समझते हैं? पौधों के स्थायी ऊतकों की संरचना और उनके कार्यों का सचित्र वर्णन कीजिए। या स्थूलकोण ऊतक तथा दृढ़ोतक में अन्तर बताइए।
उत्तर :
ऊतक कोशिकाओं का वह समूह जिसकी उत्पत्ति, संरचना तथा कार्य समान होते हैं, ऊतक कहलाता है। पादप ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

  1.  स्थायी ऊतक तथा
  2. विभज्योतकी ऊतक।

स्थायी ऊतक
इसकी कोशिकाओं में कोशा विभाजन की क्षमता नहीं होती है।

1. सरल ऊतक  :
ये जीवित या मृत पतली या मोटी भित्ति वाली एक जैसी कोशिकाओं का समूह होता है। सरल ऊतक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

(i) मृदूतक (Parenchyma) :
यह समव्यासी, गोलाकार, अण्डाकार या बहुभुजी, पतली भित्ति वाली जीवित कोशाओं से बना होता है। कोशिकाओं के मध्य प्रायः अन्तराकोशीय स्थान (inercellular space) पाया जाता है। यह ऊतक प्रायः पौधों के कोमल भागों में पाया जाता है।

कार्य :
(अ) जल एवं खाद्य पदार्थों (स्टार्च, प्रोटीन, वसा) को संचय करता है।
(ब) हरितलवक (chloroplast) की उपस्थिति के कारण प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करता है।
(स) वायु गुहिकाओं युक्त मृदूतक को वायुतक (aerenchyma) कहते हैं। यह जलीय पौधों के प्लवने (floating) में सहायक होता है।
(द) इसे स्पंजी मृदूतक भी कहते है। यह गैस विनिमय में सहायता करता है।
(य) कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाने के कारण द्वितीयक वृद्धि एवं घाव भरने में सहायता करता है।
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(ii) स्थू लकोण ऊतक Collenchyma) :
ये कोणीय कोशिकायें मृदूतक की अपेक्षा लम्बी होती हैं। इनमें अन्तराकोशीय अवकाश (intercellular space) का अभाव होता है। कोशिकाओं के कोनों पर । पेक्टिन तथा सेलुलोस एकत्र हो जाता है। जिससे ये कोशिकायें अनुप्रस्थ काट में गोलाकार या अण्डाकार दिखाई देती हैं। कभी-कभी कोशिकाओं में हरितलवक भी उत्पन्न हो जाता है।
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कार्य :
(अ)
पौधों के कोमल अंगों को तनन दृढ़ता (tensile strength) प्रदान करता है।
(ब) भोजन का संचय करता है।
(स) हरितलवक की उपस्थिति के कारण भोजन का निर्माण करता है।

(iii) दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) :
कोशिका भित्ति के लिग्निनकरण के कारण परिपक्व कोशिकाएँ मृत (dead) हो जाती हैं। दृढ़ ऊतक दो प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है।
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(a)
दृढ़ोतक रेशे (Sclerenchymatous fibres) :

ये लम्बी, सँकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली, मृत कोशिकाएँ होती हैं कोशिकायें लिग्निनकरण के कारण मृत (dead) हो जाती हैं। तन्तुओं की लम्बाई प्राय: 1 से 3 मिमी होती है। जूट (jute) के रेशे 20 मिमी तथा बोहमेरिया (Boehmeria) के रेशे 550 मिमी तक लम्बे होते हैं।

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(b)
दृढ़ कोशाएँ (Stone cells or sclereids) :

ये कोशिकाएँ लगभग समेव्यासी, गोलाकार, अण्डाकार या अनियमित होती हैं। कोशिका भित्ति लिग्निनयुक्त हो जाने से कोशिकाएँ मृत हो जाती हैं। दृढ़ कोशाएँ फलभित्ति, बीजकवच आदि में पायी जाती हैं।

कार्य :
(अ) दृढ़ ऊतके पौधे के विभिन्न अंगों को यान्त्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करता है।
(ब) यह बीज तथा फलों का रक्षात्मक आवरण बनाता है।

2. जटिल ऊतक (Complex tissue) :
दो या अधिक प्रकार की कोशिकाएँ परस्पर मिलकर एक ही कार्य सम्पन्न करती हैं। जटिल ऊतक दो प्रकार के होते हैं

(i) जाइलम तथा
(ii) फ्लोएम।

(i) जाइलम :
इसके अध्ययन के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 देखें।

(ii) फ्लोएम :
इस ऊतक का प्रमुख कार्य पौधे के प्रकाश संश्लेषी भागों (जैसे–पत्तियों) में निर्मित भोज्य-पदार्थों को पौधे के अन्य भागों में स्थानान्तरित करना होता है। इस ऊतक को बास्ट (bast) भी कहते हैं।

संरचना  :
जाइलम की तरह ही फ्लोएम के निर्माण में भी चार प्रकार की कोशिकाएँ भाग लेती हैं। ये कोशिकाएँ निम्नवत् हैं

  1. चालनी नलिकाएँ (sieve tubes)
  2. सहचर कोशिका (companion cell)
  3.  फ्लोएम पेरेनकाइमा (phloem parenchyma)
  4. फ्लोएम तन्तु (phloem fibres)।

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(a)
चालनी नलिकाएँ
एन्जियोस्पर्म में चालनी नलिका (sieve tube) :
मिलती है तथा टेरिडोफाइटा में चालनी कोशिका (sieve cell) मिलती है। ये पतली नली के समान होती हैं जिसमें कोशिकाएँ एक के ऊपर एक कतार में
लगी रहती हैं। इनकी अन्त:भित्ति (end wall) पर चालनी प्लेट (sieve plate) पाई जाती है। कोशिका भित्ति सेलुलोस की बनी होती है। इसमें अनेकों छिद्र मिलते हैं जिससे आस-पास की कोशिकाओं में सम्पर्क बना रहता है। कभी-कभी चालनी प्लेट अनुदैर्ध्य भित्ति (longitudinal wall) में भी पाई जाती है। वर्षी ऋतु (growing season) के अन्त में चालनी पट्टिका एक प्रकार के रंगहीन चमकदार कैलोस (callose) नामक कार्बोहाइड्रेट की तह से ढक जाती है, जिसे कैन्नस (callus) कहते हैं। बहुत पुरानी चालनी-पट्टिका में कैलस स्थाई रूप से जम जाता है जिससे भोजन का संवहन रूक जाता है। परिपक्व चालनी नलिका में केन्द्रक नहीं मिलता है। प्रत्येक चालनी नलिका के साथ छिद्रों द्वारा जुड़ी हुई एक लम्बी सहचर कोशिका (companion cell) पाई जाती है।

(b)
सहचर कोशिका 

जिम्नोस्पर्म व टेरिडोफाइटा में सहचर-कोशिका नहीं पाई जाती है। जिम्नोस्पर्म व टेरीडोफाइटा में चालनी कोशिका (sieve cell) मिलती है जिस पर चालनी प्लेट (sieve plate) स्पष्ट नहीं होती है। आमतौर पर चालनी क्षेत्र (sieve areas) पाश्र्व दीवार (lateral wall) पर पाए जाते हैं। एन्जियोस्पर्म में चालनी नलिका से पाश्र्व दिशा से लगी एक लम्बी-पतली कोशिका होती है जिसे सहचर कोशिका कहते हैं। यह पतली कोशिका भित्ति वाली कोशिका होती है जो भोजन के संवहन में (UPBoardSolutions.com) सहायता करती है। सामान्यत: एक चालनी नलिका से एक सहचर कोशिका लगी रहती है। सहचर कोशिका में एक बड़ा केन्द्रक व प्रचुर मात्रा में जीवद्रव्य मिलता है। इनमें स्टार्च कण (starch grain) नहीं मिलते हैं, परन्तु माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria), एन्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम (endoplasmic reticulum), राइबोसोम (ribosome) आदि कोशिकांग मिलते हैं।

(c)
फ्लोएम पेरेनकाइमा
आकृति में ये कोशिकाएँ लम्बी, चौड़ी, पतली व गोल हो सकती हैं। ये कोशिकाएँ चालनी नलिका के बीच-बीच में मिलती हैं व जीवित होती हैं। इनको मुख्य कार्य भोजन का संचय करना व संवहन में सहायता करना है। इन कोशिकाओं के अन्य गुण पेरेनकाइमा की कोशिकाओं की तरह होते हैं। एकबीजपत्री पौधों के तनों में फ्लोएम पेरेनकाइमा का प्रायः अभाव होता है।

(d)
फ्लोएम तन्तु
ये दृढ़ऊतक के बने होते हैं। इनकी कोशिकाभित्ति मोटी, कोशिका-गुहा सँकरी व इनमें गर्त मिलते हैं। इन तन्तुओं का बहुत आर्थिक महत्त्व है। इनसे रस्सी, सुतली, गद्दे, बैग आदि बनाए जाते हैं। तन्तुओं की लम्बाई निश्चित नहीं होती है। ये द्वितीयक फ्लोएम में अधिक मिलते हैं। प्राथमिक फ्लोएम में तन्तुओं की कोशिकाभित्ति अधिकतर सेलुलोस की बनी होती है।

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प्रश्न 3.
दारु के विभिन्न घटकों का विवरण दीजिए एवं उनके कार्यों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए। या जाइलम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या दारु (जाइलम) ऊतक के विभिन्न अवयवों के नामांकित चित्र बनाइए। या टिप्पणी लिखिए-जाइलम द्वारा खनिज लवणों का परिवहन।
उत्तर :

दारु या जाइलम

दारु या जाइलम (xylem) ऐसा संवहन ऊतक (vascular tissue) है जिसके द्वारा भूमि से अवशोषित जल तथा उसमें घुले हुए खनिज पदार्थों का संवहन होता है। इन कार्यों को करने के लिए जाइलम में निम्नलिखित चार प्रकार की विशेष संरचनाएँ या दारु अवयव (xylem elements) पाए। जाते हैं।

1. दारु वाहिनिकाएँ (Xylem tracheids) :
ये लम्बी व नलिकाकार कोशिकाएँ होती हैं जिनके भीतर जीवद्रव्य नहीं होता तथा ये मृत हो जाती हैं। इनकी भित्तियाँ, जो प्राथमिक रूप में सेलुलोस की बनी होती हैं, किन्तु बाद में लिग्निन (lignin) से स्थूलितं होने से, अधिक मोटी हो जाती हैं। लिग्निनयुक्त (lignified) होने के कारण ये कठोर तथा काष्ठीय हो जाती हैं। कोशिका भित्तियों को लिग्निन द्वारा स्थूलन (thickening) होने से भित्तियों पर कई प्रकार की संरचनाएँ बन जाती हैं। इन्हीं के आधार पर ये कई प्रकार की मानी जाती हैं; जैसे-वलयाकार (annular), सर्पिल (spiral) प्रकार के स्थूलन प्रोटोजाइलम (protoxylem) में होते हैं। सीढ़ीनुमा (scalariform) प्रकार का स्थूलन प्रोटोजाइलम तथा मेटाजाइलम (metaxylem) दोनों में होता है। जालिकारूपी (reticulate) प्रकार का स्थूलन मेटाजाइलम में मिलता है।

जब कोशिका भित्ति पर जालिकावत् स्थूलन और भी अधिक घना हो जाता है तो कुछ स्थानों पर ही लिग्निन न जमा होने के कारण छोटे-छोटे स्थान शेष रह जाते हैं।इन स्थानों पर केवल सेलुलोस की भित्ति ही होती है, इन स्थानों को गर्त (pits) कहते हैं। गर्त पड़ोसी कोशिका की भित्ति पर भी इसी स्थान पर बनता है, अतः इन्हें गर्त युग्म (pit pair) कहना अधिक उचित है। गर्त साधारण (simple) अर्थात् पूरी गहराई तक बराबर स्थूलन वाले अथवा परिवेशित  (bordered) हो सकते हैं। परिवेशित गर्त में स्थूलन बाहर से अन्दर की ओर क्रमशः कम होता जाता है। गर्तमय (pitted) स्थूलन मेटाजाइलम में पाया जाता है।

2. दारु वाहिकाएँ या टैकी (Xylem vessels or tracheae) :
ये बहुत लम्बी और चौड़ी नलिकाओं के समान संरचनाएँ होती हैं जो एक पंक्ति में, एक के सिरे से दूसरी (end to end) लगी रहती हैं। वाहिकाओं (vessels) में वाहिनिकाओं की अपेक्षा अनुप्रस्थ भित्तियों का पूर्ण या अपूर्ण रूप से अभाव होता है। यदि अनुप्रस्थ भित्तियाँ होती हैं तो अत्यधिक छिद्रिल होती हैं। (UPBoardSolutions.com) वाहिकाओं (vessels) में भी मृत, मोटी कोशिका भित्ति होती है तथा वाहिनिकाओं की तरह कोशिका भित्तियाँ समान मोटाई की होती हैं। वाहिकाओं की भित्ति पर लिग्नीभवन (lignification) भी वाहिनिकाओं के समान कई प्रकार का होता है।

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अनुप्रस्थ काट में जाइलम वाहिकाएँ वाहिनिकाओं के समान ही बहुभुजी दिखायी देती हैं। अनावृतबीजी पौधों (gymnosperms) में जाइलम केवल वाहिनिकाओं (tracheids) का बना रहता है, इनमें वाहिकाओं (vessels) का प्रायः अभाव होता है जबकि आवृतबीजी पौधों (angiosperms) में वाहिकाएँ ही प्रमुख जाइलम अवयव (xylem elements) हैं।

3. दारु मृदूतक (Xylem parenchyma) :
ये मृदूतकीय कोशिकाएँ (parenchymatous cells) जाइलम के अन्दर पायी जाती हैं। इनकी भित्तियाँ बाद में कुछ मोटी हो जाती हैं, किन्तु ये सजीव होती हैं। स्थूलित होने पर इन कोशिकाओं की भित्तियों में सरल गर्त (pits) होते हैं। इनका मुख्य कार्य जल व खाद्य पदार्थ संचित रखना है, किन्तु ये जल संवहन में भी दारु | वाहिकाओं आदि को सहयोग देती हैं।

4. दारु रेशे (Xylem fibres) :
ये रेशे दृढ़ोतकी (sclerenchymatous) होते हैं अर्थात् इनकी भित्तियाँ लिग्निनयुक्त (lignified) होती हैं और इन भित्तियों में विभिन्न प्रकार के गर्त पाये जाते हैं। इन रेशों का मुख्य कार्य मजबूती तथा सहारा देना होता है।

(i) आदिदारु (Protoxylem) :
वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ पहले संकरी बनती हैं तथा उनकी भित्तियों पर वलयाकार अथवा सर्पिल स्थूलन (annular or spiral thickening) होती है। इनको आदिदारु (protoxylem) कहते हैं।

(ii) अनुदारु (Metaxylem) :
बाद में वाहिकाएँ (vessels) तथा वाहिनिकाएँ (tracheids) चौड़ी तथा अधिक लम्बी हो जाती हैं। इनकी भित्तियों पर जालिकारूपी या सीढ़ीनुमा स्थूलन (thickenings) अथवा गर्त पाये जाते हैं, इसको अनुदारु (metaxylem) कहते हैं।

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(iii) जाइलम के कार्य (Functions of xylem) :

  1.  जाइलम द्वारा, मूलों द्वारा अवशोषित जल तथा लवणों के घोल को पौधों के वायव भागों तक (पत्तियों तक) पहुँचाया जाता है। इस कारण इस जटिल ऊतक को जल संवाहक ऊतक (water conducting tissue) कहते हैं।
  2.  इसमें उपस्थित कोशिकाओं की भित्तियाँ मोटी व दृढ़ होने के कारण यह ऊतक पौधे के भागों को यान्त्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
भरण ऊतक तन्त्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
बाह्यत्वचा तथा संवहन बण्डल के अतिरिक्त सभी ऊतक भरण ऊतक की श्रेणी में आते हैं। ये पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा कोशिकाओं से बने होते हैं। पत्तियों में भरण ऊतक पतली भित्ति वाले तथा क्लोरोप्लास्ट युक्त होते हैं और इसे पर्णमध्योतक (leaf mesophyll) कहते हैं। भरण ऊतक में निम्नलिखित भाग आते हैं

(i) वल्कुट (Cortex) :
यह बाह्यत्वचा के नीचे पाया जाने वाला भरण ऊतक (ground tissue) है जो प्रायः अन्तस्त्वचा (endodermis) तक फैला रहता है। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं

(a)
अधस्त्वचा (Hypodermis) :

द्विबीजपत्री पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे स्थूलकोण ऊतक (collenchyma tissue) तथा एकबीजपत्री पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे दृढ़ोतके (sclerenchyma tissue) की एक या कुछ परतें पूरी पट्टी के रूप में अथवा छोटे-छोटे टुकड़ों में पाई जाती हैं। इन्हें अधस्त्वचा (hypodermis) कहते हैं। यह ऊतक पतली कोशिकाभित्ति वाली मृदूतक कोशिकाओं से बना होता है तथा अधस्त्वचा के ठीक नीचे पाया जाता है। ये परतें रक्षा का कार्य करती हैं।

(b)
सामान्य वल्कुट (General Cortex) :

इनमें सुविकसित अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) पाए जाते हैं। प्रायः तरुण तने की वल्कुट की कोशिकाओं में हरितलवक पाए जाते हैं। इस प्रकार के मृदूतक को क्लोरेनकाइमा (chlorenchyma) कहते हैं। वल्कुट की कोशिकाओं में मण्ड, टेनिन तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थ भी पाए जाते हैं। जलीय पौधों में वल्कुट में एक विशेष प्रकार का मृदूतक पाया जाता है जिसे वायूतक (aerenchyma) कहते हैं। इसमें बीच-बीच में काफी बड़े वायु-स्थान (air-spaces) मिलते हैं। वल्कुट (cortex) पौधों को यान्त्रिक शक्ति प्रदान करता है; ‘भोज्य-पदार्थ का संग्रह करता है तथा पौधों के आन्तरिक ऊतकों की रक्षा करता है।

(c)
अन्तस्त्वचा (Endodermis) :

इसे मण्डआच्छद (starch sheath) भी कहते हैं। यह कोशिकाओं की एक अकेली परत के रूप में पायी जाती है। यह वल्कुट को रम्भ (stele) से पृथक् करती है। यह परत ढोल-सदृश (barrel-shaped) कोशिकाओं की बनी होती है और इनके बीच अन्तराकोशिकीय स्थान नहीं होते। यह (UPBoardSolutions.com) कोशिकाएँ जीवित होती हैं और इनमें मण्ड, टेनिन, म्यूसिलेज की अधिकता होती है। मण्डे की उपस्थिति के कारण ही इसे मण्ड आच्छद (starch sheath) भी कहते हैं। अन्तस्त्वचा की कुछ कोशिकाओं की अरीय (radial) और आन्तरिक (inner) भित्तियाँ, सुबेरिन (suberin), क्यूटिन (cutin) या कभी-कभी लिग्निन (lignin) पदार्थों के संग्रह के कारण स्थूलित (thickened) हो जाती हैं। इस स्थूलित पट्टी को केस्पेरियन पट्टी (casparian strip) कहते हैं। इन मोटी भित्ति वाली अन्तस्त्वचा कोशिकाओं के बीच अनेक जड़ों में कुछ पतली भित्ति वाली कोशिकाएँ आदिदारु (protoxylem) के अभिमुख (opposite) होती हैं। इन कोशिकाओं को मार्ग कोशिकाएँ (passage cells) अथवा संचरण कोशिकाएँ (transfusion cells) कहते हैं। इन्हीं कोशिकाओं द्वारा मूलरोमों द्वारा अवशोषित जल व खनिज पदार्थ जाइलम में जाते हैं।

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प्रश्न 5.
संवहन बण्डल क्या हैं ? चित्रों की सहायता से आवृतबीजी पौधों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के संवहन बण्डलों की संरचना का वर्णन कीजिए। या उपयुक्त चित्रों की सहायता से आवृतबीजियों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के संवहन बण्डलों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

संवहन पूल

जाइलम व फ्लोएम (Xylem and phloem) पौधों में पाये जाने वाले संवहन ऊतक हैं। ये पौधों में अलग-अलग प्रकार से विन्यसित होते हैं। प्रायः यह भी देखा गया है कि दोनों प्रकार के संवहन ऊतक सदैव ही एक-दूसरे के आस-पास रहते हैं। इस प्रकार जाइलम और फ्लोएम के पास-पास होने तथा इनसे बनने वाले विशेष तन्तुओं (strands) को संवहन पूल (vascular bundle) कहते हैं। द्विबीजपत्री पौधों (dicot plants) में जाइलम तथा फ्लोएम के अतिरिक्त एधा (cambiun) भी संवहन पूल बनाने में मदद करती है। समस्त पौधों में संवहन पूल अपनी संवहन ऊतकों की व्यवस्था के अनुसार प्रमुखत: निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

1. संयुक्त संवहन पूल
इस प्रकार के संवहन पूल में जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या (radius) पर होते हैं। इस प्रकार के संवहन पूल सामान्यत: आवृतबीजी (angiospermic) पौधों के स्तम्भों (stems) में पाये जाते हैं। ये संवहन पूल भी निम्नलिखित दो प्रकार के मिलते हैं

(i) कोलेटरल संवहन (Collateral vascular bundles) :
ये प्रायः अधिकतर तनों में मिलते हैं। इन संवहन पूलों में जाइलम केन्द्र की ओर तथा फ्लोएम परिरम्भ (pericycle) की ओर होता है। द्विबीजपत्री तनों में जाइलम और फ्लोएम के मध्य प्राथमिक एधा (primary cambium) होती है जिससे ये पूल वर्धा (open) कहलाते हैं। एकबीजपत्री तनों के संवहन पूलों में एधा नहीं होती और वे अवर्थी (closed) कहलाते हैं। इन संवहन पूलों में जाइलम सदैव ही अन्तःआदिदारुक (endarch) होता है अर्थात् आदिदारु केन्द्र की ओर तथा अनुदारु परिधि की ओर होता है।

(ii) बाइकोलेटरल संवहन पूल (Bicollateral vascular bundles) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में जाइलम के दोनों ओर अर्थात् केन्द्र की ओर भी और परिधि की ओर भी फ्लोएम होता है। इस प्रकार के संवहन पूलों में भी जाइलम अन्त:आदिदारुक ही होता है और ये मदेव बर्थी होते हैं। इनमें जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य दोनों ओर एधा होती है।

उदाहरण :
कद्दू के पौधों के तनों में संवहन पूल प्राय: बाइकोलेटरल ही होते हैं।
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2. अरीय संवहन पूल
इस प्रकार के पूलों में जाइलम और फ्लोरम अलग-अलग त्रिज्याओं पर होते हैं। इस प्रकार के संवहन पूल जड़ों में पाये जाते हैं। इनमें जाइलम सदैव बाह्यआदिदारुक (exarch) मिलता है अर्थात् आदिदारु परिधि की ओर तथा अनुदारु केन्द्र की ओर होता है। इन संवहन पूलों में प्राथमिक एधा (primary cambium) नहीं पायी जाती है। द्विबीजपत्री जड़ों में जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य, बाद में द्वितीयक एधा (secondary cambitum) बन जाती है। 3. संकेन्द्री संवहन पूल इन पूलों (UPBoardSolutions.com) में एक संवहन ऊतक (vascular tissue) केन्द्र में तथा दूसरा इसे चारों ओर से घेरता है। सभी सुकेन्द्री संवहन पूल अवर्थी closed) होते हैं अर्थात् इनमें एधा कभी नहीं होती है। जाइलम तथा फ्लोएम की स्थिति के अनुसार ये संवहन पूल प्रायः निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं।

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(i) दारु केन्द्री (Amphicribral) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में जाइलम केन्द्र में तथा फ्लोएम इसे चारों ओर से घेरता है। दारु केन्द्री संवहन पूल फर्क्स (ferns) के राइजोम में मिलते हैं।

(ii) फ्लोएम केन्द्री (Amphivasal) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में फ्लोएम मध्य में तथा दारु इसे चारों ओर से घेरता है। फ्लोएम केन्द्री संवहन पूल कुछ एकबीजपत्री पौधों; जैसे—यक्का (Yucca), डैसीना (Dracaena) आदि के तने में मिलते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules (जैव अणु)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वृहत अणु क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
जो तत्त्व अम्ल अविलेय अंश में पाये जाते हैं वे वृहत् अणु या वृहत् जैविक अणु कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ :
(i) न्यूक्लिक अम्ल।

प्रश्न 2.
ग्लाइकोसाइडिक, पेप्टाइड तथा फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

1. ग्लाइकोसाइडिक बन्ध (Glycosidic Bond) :
बहुलकीकरण में मोनोसैकेराइड अणु एक-दूसरे के पीछे जिस सहसंयोजी बन्ध द्वारा जुड़ते हैं उसे ग्लाइकोसाइडिक बन्ध कहते हैं। इस बन्ध में एक मोनोसैकेराइड अणु का ऐल्डिहाइड या कीटोन समूह दूसरे अणु के एक ऐल्कोहॉलिय अर्थात् हाइड्रॉक्सिल (UPBoardSolutions.com) समूह (-OH) से जुड़ता है जिसमें कि जल (H,O) का एक अणु पृथक् हो जाता है।

2. पेप्टाइड बन्ध (Peptide Bond) :
जिस बन्ध द्वारा अमीनो अम्लों के अणु एक-दूसरे से आगे-पीछे जुड़ते हैं, उसे पेप्टाइड या ऐमाइड बन्ध कहते हैं। यह बन्ध सहसंयोजी होता है और एक अमीनो अम्ल के कार्बोक्सिलिक समूह की अगले अमीनो अम्ल के अमीनो समूह से अभिक्रिया के फलस्वरूप बनता है। इसमें जल का एक अणु हट जाता है।

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3. फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (Phosphodiester Bonds) :
न्यूक्लीक अम्ल के न्यूक्लिओटाइड्स (nucleotides) फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों (phosphodiester bonds) द्वारा एक-दूसरे से संयोजित होकर पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला बनाते हैं। फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध समीपवर्ती दो न्यूक्लियोटाइड्स के फॉस्फेट अणुओं के मध्य बनता है। DNA की दोनों पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं के नाइट्रोजन क्षारक हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़े होते हैं।

प्रश्न 3.
प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
प्रोटीन की तृतीयक संरचना के अन्तर्गत प्रोटीन की एक लम्बी कड़ी अपने ऊपर ही ऊन के एक खोखले गोले के समान मुड़ी हुई होती है यह संरचना प्रोटीन के त्रिआयामी रूप को प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 4.
10 ऐसे रुचिकर सूक्ष्म जैव अणुओं का पता लगाइए जो कम अणुभार वाले होते हैं व इनकी संरचना बनाइए। ऐसे उद्योगों का पता लगाइए जो इन यौगिकों का निर्माण विलगन द्वारा करते हैं? इनको खरीदने वाले कौन हैं? मालूम कीजिए।
उत्तर :
सूक्ष्म जैव अणु जीवधारियों में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक यौगिकों को जैव अणु कहते हैं।

(i) कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates); जैसे :
ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस, डिऑक्सीराइबोस शर्करा, माल्टोस आदि।

(ii) वसा व तेल (Fat & Oils) :
पामिटिक अम्ल, ग्लिसरॉल, ट्राइग्लिसराइड, फॉस्फोलिपिड्स, कोलेस्टेरॉल आदि।

(iii) ऐमीनो अम्ल (Amino Acids) :
ग्लाइसीन, ऐलेनीन, सीरीन आदि।।

(iv) नाइट्रोजन क्षारक (Nitrogenous Base) :
ऐडेनीन (adenine), ग्वानीन : (guanine), थायमीन (thymine), यूरेसिल (uracil), सायटोसीन (cytosine) आदि।
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शर्करा उद्योग, तेल एवं घी उद्योग, औषधि उद्योग आदि इनका निर्माण करते हैं। मनुष्य इनका उपयोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करती है।

प्रश्न 5.
प्रोटीन में प्राथमिक संरचना होती है, यदि आपको जानने हेतु ऐसी विधि दी गई है जिसमें प्रोटीन के दोनों किनारों पर ऐमीनो अम्ल है तो क्या आप इस सूचना को प्रोटीन की शुद्धता अथवा समांगता (homogeneity) से जोड़ सकते हैं?
उत्तर :
प्रोटीन्स की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लम्बी व रेखाकार होती हैं। प्रोटीन कुण्डलन एवं वलन द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृति धारण करती हैं। इन्हें प्रोटीन्स के प्राकृत संरूपण (native conformations) कहते हैं। प्रोटीन के प्राकृत संरूपण चार स्तर के होते हैं—प्राथमिक, (UPBoardSolutions.com) द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुष्क स्तर। पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े ऐमीनो अम्लों के अनुक्रम प्रोटीन की संरचना का प्राथमिक स्तर प्रदर्शित करते हैं। प्रोटीन में ऐमीनो अम्लों का अनुक्रमे इसके जैविक प्रकार्य का निर्धारण करता है।
पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के एक सिरे पर प्रथम ऐमीनो अम्ल का खुला ऐमीनो समूह तथा दूसरे सिरे पर अन्तिम ऐमीनो अम्ल का खुला कार्बोक्सिल समूह (carboxyl group) होता है। अतः इन सिरों को क्रमशः N-छोर तथा C-छोर कहते हैं। इससे प्रोटीन की शुद्धता या समांगता प्रदर्शित होती है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 3

प्रश्न 6.
चिकित्सार्थ अभिकर्ता (therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए। प्रोटीन की अन्य उपयोगिताओं को बताइए। (जैसे-सौन्दर्य-प्रसाधन आदि)।
उत्तर :
साइटोक्रोम ‘C’, हीमोग्लोबिन तथा इम्यूनोग्लोबिन ‘G’ चिकित्सार्थ अभिकर्ता के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन हैं। प्रोटीन के निम्नलिखित कार्यों की वजह से इनकी उपयोगिता अधिक है।

  1. लगभग सभी एन्जाइम्स (enzymes) प्रोटीन के बने होते हैं।
  2. थ्रोम्बिन (thrombin) तथा फाइब्रोजिन (fibrogen) रुधिर प्रोटीन्स हैं जो चोट लगने पर रुधिर का थक्का बनने में सहायक होती हैं।
  3. एक्टिन तथा मायोसिन (actin & myosin) संकुचन प्रोटीन्स हैं जो सभी कंकालीय (UPBoardSolutions.com) पेशियों के संकुचन में भाग लेती हैं।
  4. रेशम में फाइब्रोइन (fibroin) प्रोटीन होती है।
  5. कुछ हार्मोन्स; जैसे—अग्र पिट्यूटरी ग्रन्थि का वृद्धि हार्मोन (somatotropic) तथा अग्न्याशय ग्रन्थि से स्रावित इन्सुलिन (insulin) हार्मोन शुद्ध प्रोटीन के बने होते हैं।
  6. एन्टीबॉडीज या इम्यूनोग्लोब्यूलिन जोकि शरीर की सुरक्षा करती है प्रोटीन से ही बनी होती है।

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प्रश्न 7.
ट्राइग्लिसराइड के संगठन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
एक ग्लिसरॉल (glycerol or glycerine) अणु से एक-एक करके तीन वसीय अम्ल अणुओं के तीन सहसंयोजी बन्धों (covalent bonds) द्वारा जुड़ने से वास्तविक वसा का एक अणु बनता है। इन बन्धों को एस्टर बन्ध (ester bonds) कहते हैं। ग्लिसरॉल एक ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल trihydric alcohol) होता है, क्योंकि इसकी कार्बन श्रृंखला के तीनों कार्बन परमाणुओं से एक-एक हाइड्रॉक्सिल समूह (hydroxyl group, -OH) जुड़ा होता है। एस्टर बन्ध प्रत्येक हाइड्रॉक्सिल समूह तथा एक वसीय अम्ल के कार्बोक्सिल समूह ( COOH) के बीच बनती है। इसीलिए वसा अणु को ट्राइग्लिसराइड या ट्राइऐसिलग्लिसरॉल (triglyceride or triacylglycerol) कहते हैं।
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प्रश्न 8.
क्या आप प्रोटीन की अवधारणा के आधार पर वर्णन कर सकते हैं कि दूध का दही अर्थवा योगर्ट में परिवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर :
दूध की विलेय प्रोटीन केसीनोजन (caseinogen) को अविलेय केसीन (casein) में बदलने का कार्य रेनिन (rennin) एन्जाइम तथा स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणु करते हैं। ये किण्वन द्वारा दूध को ही या योगर्ट में बदल देते हैं; क्योंकि केसीनोजन प्रोटीन अवक्षेपित हो जाती है।

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प्रश्न 9.
क्या आप व्यापारिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बॉल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते हैं?
उत्तर :
बॉल व स्टिक नमूना (Ball and Stick Model) के द्वारा जैव अणुओं के प्रारूपों को (UPBoardSolutions.com) प्रदर्शित किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन (itrate) कर, ऐमीनो अम्ल में वियोजी क्रियात्मक समूहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर :
ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन करने से कार्बोक्सिल समूह (-COOH) तथा ऐमीनो समूह (-NH2) पृथक् हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
ऐलेनीन ऐमीनो अम्ल की संरचना बताइए।
उत्तर :
ऐलेनीन में R समूह अत्यधिक जलरोधी हाइड्रोकार्बन समूह होते हैं जिन्हें पार्श्व श्रृंखलाएँ कहते हैं। इसमें पाश्र्व श्रृंखला मेथिल समूह की होती है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 5

प्रश्न 12.
गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?

उत्तर :

गोंद (Gum) :
यह एक द्वितीयक उपापचयज (secondary metabolite) है। यह एक कार्बोहाइड्रेट बहुलक (polymer) है। गोंद पौधों की काष्ठ वाहिकाओं (xylem vessels) से प्राप्त होने वाला उत्पाद है। यह कार्बनिक घोलक में अघुलनशील होता है। गोंद जल के साथ चिपचिपा घोल (sticky solution) बनाता है। फेविकोल (fevicol) एक कृत्रिम औद्योगिक उत्पाद है।

प्रश्न 13.
प्रोटीन, वसा व तेल, ऐमीनो अम्लों का विश्लेषणात्मक परीक्षण बताइए एवं किसी भी फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण कीजिए?
उत्तर :
प्रोटीन एवं ऐमीनो अम्ल का परीक्षण प्रोटीन के वृहत् अणु (macromolecules) ऐमीनो अम्लों की लम्बी श्रृंखलाएँ होते हैं। ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े रहते हैं। इनका आण्विक भार बहुत अधिक होता है। अण्डे की सफेदी, सोयाबीन, दालों (मटरे, राजमा आदि) में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। अण्डे की सफेदी या दालों (सेम, चना, मटरे, राजमा) आदि को जल के साथ पीसकर पतली लुगदी बना लेते हैं। इसे जल के साथ उबाल कर छान लेते हैं। निस्वंद द्रव में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) होती है।

प्रयोग 1 :
एक परखनली में 3 मिली प्रोटीन नियंद लेकर, इसमें 1 मिली सान्द्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) मिलाइए। सफेद अवक्षेप बनता है। परखनली को गर्म करने पर अवक्षेप घुल जाता है तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है। अब इसे ठण्डा करके इसमें 10% सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) (UPBoardSolutions.com) विलयन मिलाते हैं। परखनली में विलयन का रंग पीले से नारंगी हो जाता है।

प्रयोग 2 :
एक परखनली में प्रोटीन नियंद की 1 मिली मात्रा लेकर इसमें लगभग 1 मिली मिलन अभिकर्मक (Millon’s Reagent) मिलाने पर हल्के पीले रंग का अवक्षेप बनता है। इस अवक्षेप में 4-5 बूंदें सोडियम नाइट्रेट (NaNO3,) की मिलाकर विलयन को गर्म करने पर अवक्षेप का रंग लाल हो जाता है।

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वसा व तेल का परीक्षण

ये जल में अविलेय और ईथर, पेट्रोल, क्लोरोफॉर्म आदि में घुलनशील (विलेय) होती हैं। साधारण ताप पर जब वसाएँ ठोस होती हैं तो वसा (चर्बी-fat) और जब ये तरल होती हैं तो तेल (oil) कहलाती हैं। पादप वसाएँ असंतृप्त (नारियल का तेल तथा ताड़ का तेल संतृप्त) तथा जन्तु वसाएँ संतृप्त होती हैं।

प्रयोग 1 :
मूंगफली के कच्चे दाने लेकर उनको सफेद कागज पर रखकर पीस लीजिए। अब इस कागज के टुकड़े को प्रकाश के किसी स्रोत की ओर रखकर देखिए। यह अल्पपारदर्शी नजर आता है। इस पर एक बूंद पानी डालकर देखिए। कागज पर पानी का प्रभाव नहीं होता। यह प्रयोग जन्तु वसा (देशी घी) के साथ भी किया जा सकता है।

प्रयोग 2 :
एक परखनली में 0:5 मिली परीक्षण तेल या वसा तथा 0:5 मिली जल (दोनों बराबर मात्रा में) लेते हैं। अब इसमें 2-3 बूंदें सुडान-III विलयन की डालकर हिलाते हैं तथा पाँच मिनट तक ऐसे ही रख देते हैं। परखनली में जल तथा तेल की पृथक् पर्यों में, तेल की पर्त लाल नजर आती है। (नोट-फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण उपर्युक्त विधियों द्वारा किया जा सकता है।)

प्रश्न 14.
पता लगाइए कि जैवमण्डल में सभी पादपों द्वारा कितने सेलुलोस का निर्माण होता है? इसकी तुलना मनुष्यों द्वारा उत्पादित कागज से कीजिए। मानव द्वारा प्रतिवर्ष पादप पदार्थों की कितनी खपत की जाती है? इसमें वनस्पतियों की कितनी हानि होती है?
उत्तर :
सेलुसोस (cellulose) पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाला कार्बोहाइड्रेट है। यह जटिल बहुलक होता है। पादपों में सेलुलोस की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। पौधों के काष्ठीय भागों व कपास तथा रेशेदार पौधों में इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। काष्ठ में लगभग 50% तथा कपास के रेशे में इसकी मात्रा लगभग 90% होती है। मनुष्य द्वारा सेलुलोस का उपयोग ईंधन तथा इमारती लकड़ी के रूप में, तन्तुओं के रूप में वस्त्र निर्माण, कृत्रिम रेशे निर्माण, कागज निर्माण में प्रमुखता से किया जाता है। नाइट्रोसेलुलोस का उपयोग विस्फोटक पदार्थ के रूप (UPBoardSolutions.com) में किया जाता है। इसका उपयोग पारदर्शी प्लास्टिक सेलुलॉयड, (celluloid) बनाने के लिए किया जाता है जिससे खिलौने, कंघे आदि बनाए जाते हैं। मनुष्य‘सेलुलोस का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनस्पतियों को हानि पहुँचा रहा है। इसके फलस्वरूप प्राकृतिक वन क्षेत्रों में निरन्तर कमी होती जा रही है। पारितन्त्र के प्रभावित होने के कारण अनेक पादप प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।

प्रश्न 15.
एन्जाइम के महत्त्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
एन्जाइमों के महत्त्वपूर्ण गुण निम्नवत् हैं-

  1. विकर (enzymes), उत्प्रेरकों (catalyst) के रूप में कार्य करते हैं और जीवों (living organisms) में अभिक्रिया की दर (rate of reaction) को प्रभावित करते हैं।
  2. क्रियाधारों (reactants or substrate) को उत्पादों (products) में बदलने के लिए एन्जाइम की बहुत सूक्ष्म मात्रा अथवा सान्द्रता की आवश्यकता होती है।
  3. एन्जाइम उत्प्रेरक (enzyme catalyst) उच्च अणुभार के, जटिल, नाइट्रोजनी कार्बनिकः यौगिक, प्रोटीन होते हैं जो जीवित कोशिकाओं में उत्पन्न होते हैं। एन्जाइम का अणु उसके क्रियाधार के अणु की तुलना में बहुत बड़ा होता है। एन्जाइम का आणविक भार हजारों से लेकर लाखों तक होता है, जबकि क्रियाधारों का अणुभार प्रायः कुछ सैकड़ों में ही होता है।
  4. ये किसी रासायनिक क्रिया को प्रारम्भ नहीं करते, बल्कि क्रिया की गति को उत्प्रेरित (catalysed) करते हैं।
  5. अधिकांश एन्जाइम जल अथवा नमक के घोल में घुलनशील होते हैं। कोशिकाद्रव्य में ये कोलॉइडी (colloidal) विलयन बनाते हैं।
  6. एन्जाइम जीवों में होने वाली समस्त शरीर-क्रियात्मक अभिक्रियाओं (physiological reactions), जैसे-जल-अपघटन, ऑक्सीकरण, अपचयन, अपघटन आदि को उत्प्रेरित करते हैं।
  7. एन्जाइम प्रायः विशिष्ट (specific) होते हैं, अर्थात् एक एन्जाइम एक विशेष क्रिया का ही उत्प्रेरण करता है। उदाहरणार्थ-एन्जाइम इन्वटेंस (invertase) केवल सुक्रोस के जल-अपघटन को उत्प्रेरित करता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 6
    इन्वटेंस (invertase) एन्जाइम द्वारा माल्टोस का ग्लूकोस में जल-अपघटन उत्प्रेरित नहीं होता
  8. एन्जाइम ताप परिवर्तन से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। किसी एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता जिस ताप पर सर्वाधिक होती है उसे अनुकूलन ताप (optimum temperature) कहते हैं। अनुकूलन ताप पर अभिक्रिया की दर उच्चतम होती है। अधिक ताप पर एन्जाइम की विकृति (denatured) हो जाती है अर्थात् एन्जाइम की प्रोटीन संरचना और उसकी उत्प्रेरक सक्रियता नष्ट हो जाती है। एन्जाइमों का अनुकूलन ताप साधारणत: 25-40°C होता है। बहुत कम ताप पर एन्जाइम निष्क्रिय (inactive) हो जाते हैं।
  9. एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं की दर pH परिवर्तमं से बहुत प्रभावित होती है। प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष (UPBoardSolutions.com) pH माध्यम में ही पूर्ण सक्रिय होता है। प्रत्येक एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता जिस pH पर अधिकतम होती है उसे अनुकूलनःH (optimum pH) कहते हैं। एन्जाइमों की अनुकूलन pH साधारणत: 5-7 होती है।
  10. कुछ एन्जाइम अम्लीय माध्यम में तथा कुछ क्षारीय माध्यम में क्रिया करते हैं।
  11. कुछ एन्जाइम कोशिका के अन्दर सक्रिय होते हैं तथा कुछ एन्जाइम कोशिका के बाहर भी सक्रिय होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एन्जाइम की रासायनिक प्रकृति (स्वभाव) है।
(क) वसा
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) हाइड्रोकार्बन
(घ) प्रोटीन
उत्तर :
(घ) प्रोटीन

प्रश्न 2.
उस विकर (एन्जाइम) का नाम लिखिए जो बेकरी उद्योग में प्रयुक्त होता है।
(क) फॉस्फेटेज
(ख) एमाइलेज
(ग) जाइमेज
(घ) फॉस्फोरिलेज
उत्तर :
(ख) एमाइलेज

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फॉस्फो-प्रोटीन्स के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
फॉस्फो-प्रोटीन्स में फॉस्फोरस सम्मिलित होता है; जैसे-दुग्ध प्रोटीन-केसीन (castin), अण्डे की पीतक प्रोटीन-फॉस्फोवाइटिन (phosphovitin) आदि।

प्रश्न 2.
वसा अम्ल क्या है?
उत्तर :
वसा अम्ल (fatty acids) लम्बी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्ल (carboxylic acids) हैं।

प्रश्न 3.
दो आवश्यक वसा अम्लों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जन्तुओं में वसीय अम्ल प्रायः संतृप्त होते हैं तथा पादपों में असंतृप्त। मनुष्य सहित सभी स्तनियों में लाइनोलीक (linoleic) तथा लाइनोलीनिक (linolenic) वसीय अम्ल शरीर की कोशिकाओं में संश्लेषित नहीं होते अतः ये दोनों केवल पादपों से प्राप्त होते हैं तथा आवश्यक (essential) वसीय अम्ल कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा किस रूप में उपस्थित होती है?
उत्तर :
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा (milk sugar) एक डाइसैकेराइड (disaccharide)लैक्टोज (lactose) के रूप में पायी जाती है। यह हेटेरोडाइसैकेराइड (heterodisaccharide) होती है, क्योंकि इसका एक अणु ग्लूकोज एवं गैलेक्टोज के एक-एक अणु 3-1,4 से ग्लाइकोसिडिक बन्ध द्वारा जुड़ने से बनता है। यह पानी में कम घुलनशील तथा कम मीठी होती है।

प्रश्न 5.
प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयों को क्या कहते हैं? जन्तुओं में ये कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयों को अमीनो अम्ल (amino acids) कहते हैं। ये जन्तु शरीर में 20 होते हैं जिनमें से 10 अमीनो अम्ल आवश्यक कहे जाते हैं, क्योंकि इनका संश्लेषण शरीर नहीं कर सकता है। शेष अनावश्यक कहलाते हैं जिनका संश्लेषण जन्तु शरीर स्वयं कर लेता है।

प्रश्न 6.
उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ किसे कहते हैं? पौधों में संचित पदार्थ कार्बोहाइड्रेट का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
उपापचयी क्रिया के फलस्वरूप प्राप्त उत्पादों के निष्क्रिय रहने की अवस्था को उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ कहते हैं। पौधों में संचित पदार्थ मण्ड (कार्बोहाइड्रेट) होता है जो कि एक पॉलिसैकेराइड है। इसमें ग्लूकोज इकाइयों से बने दो प्रकार के होमोपॉलिसैकेराइड अणु होते (UPBoardSolutions.com) हैं-10 से 30% तक ऐमाइलोस के तथा 70 से 90% का ऐमाइलोपेक्टिन के अणु। ऐमाइलोपेक्टिन के अणु शाखान्वित और संकेन्द्रीय रूप से कुण्डलित होते हैं। ऐमाइलोस और ऐमाइलोपेक्टिन के अणु प्रायः समूहों में एकत्रित होकर विभिन्न आकृतियों एवं माप के मण्ड कण बना लेते हैं।

प्रश्न 7.
न्यूक्लियोसाइड्स तथा न्यूक्लियोटाइड्स में दो अन्तर बताइए।
उत्तर :

  1. एक न्यूक्लियोटाइड न्यूक्लिक अम्ल की एक पूर्ण इकाई है, जबकि न्यूक्लियोसाइड में एक फॉस्फेट मूलक (PO4) की कमी होती है।
  2. स्वभाव में न्यूक्लियोसाइड्स क्षारकीय होते हैं जबकि न्यूक्लियोटाइड्स अम्लीय होते हैं।

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प्रश्न 8.
ATP तथा ADP के पूरे नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. ATP = ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट (adenosine triphosphate)
  2. ADP = ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट (adenosine diphosphate)

प्रश्न 9.
जीवधारियों में खनिजों के दो कार्य लिखिए। या जीवन के लिए आवश्यक दो महत्त्वपूर्ण खनिज तत्त्वों के नाम लिखिए तथा इनके महत्त्व बताइए।
उत्तर :

  1. कई धात्विक खनिज अनेक एन्जाइम्स को क्रियाशील बनाते हैं अर्थात् सह-कारक (co-factor) का कार्य करते हैं; जैसे-लौह (Fe) एवं कॉपर (Cu)।
  2. कुछ खनिज; जैसे–सोडियम, पोटैशियम तथा क्लोराइड्स आयन्स के रूप में कोशिका कला की पारगम्यता (permeability) तथा विद्युत विभव को प्रभावित करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संदेश वाहक RNA पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
संदेशवाहक-RNA m-RNA, DNA के ऊपर निर्देशित सूचना का संदेशवाहक है। इसकी जीवन अवधि अल्प होती है। इसका संश्लेषण तीव्र गति से होता है। इसका अणुभार तथा लम्बाई सूचना संदेश के अनुसार कम या अधिक होती रहती है। m-RNA के विषय में सर्वप्रथम जानकारी ब्रेनर आदि (Brenner etal) ने 1961 ई० में दी। नीरेनबर्ग तथा मथाई (Nirenberg and Matthaei) ने 1961 ई० में प्रयोगशाला में कोशिका के बाहर प्रोटीन संश्लेषण में इसे दर्शाया। बेसीलस सबटिलिस (Bacillus subtilis) के m-RNA की अर्द्धआयु केवल 2.30 मिनट होती है। इसका अणुभार 50,000 से 2,00,000 डाल्टन तक हो सकता है। m-RNA सदैव (UPBoardSolutions.com) एकरज्जुकी (single stranded) होता है। इसमें मिलने वाले क्षारक यूरेसिल, साइटोसीन, ग्वानीन तथा एडीनीन हैं। यह केन्द्रक में DNA से बनता है तथा प्रत्येक जीन अपना अलग m-RNA अनुलेखित (transcribe) करती है। जब m-RNA केवल एक जीन (सिस्ट्रोन) से बना होता है तब इसको मोनोसिस्ट्रोनिक अथवा मोनोजीनिक m-RNA (monocistronic or monogenic m-RNA) कहते हैं। यूकैरियोट का m-RNA मोनोसिस्ट्रोनिक होता है।

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जब एक m-RNA दो या अधिक जीन से बनते हैं तब उसे पॉलिसिस्ट्रोनिक अथवा पॉलिजीनिक m-RNA (polycistronic or polygenic m-RNA) कहते हैं। प्रोकैरियोट का m-RNA पॉलिसिस्ट्रोनिक होता है। एक मोनोसिस्ट्रोनिक m-RNA की संरचना के निम्नलिखित भाग हैं

1. कैप (Cap) :
यूकैरियोट तथा कुछ विषाणुओं के m-RNA पर 5′ अन्त (5’end) पर 7-मिथाइल ग्वानोसीन समूह मिलता है। यह कैप (cap) कहलाता है। इस कैप के द्वारा ही m-RNA राइबोसोम से जुड़ता है। प्रोटीन संश्लेषण की गति इसकी उपस्थिति से तीव्र हो जाती है। क्योंकि यदि m-RNA पर कैप न हो तो वह राइबोसोम के साथ ठीक से नहीं जुड़ पाता है तथा प्रोटीन संश्लेषण की गति अति धीमी हो जाती है।

2. नॉन कोडिंग क्षेत्र  :
(Non-coding Region )-कैप के पश्चात् 10 से 100 न्यूक्लिओटाइड होते हैं जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग नहीं लेते हैं। इस क्षेत्र में ‘A’ तथा ‘U’ अधिक मात्रा में होते हैं।

3. इनीशिएसन कोडोन (Initiation Codon) :
सभी प्रोकैरियोट तथा यूकैरियोट में प्रोटीन संश्लेषण की शुरुआत इनीशिएशन कोडोन AUG से होती है।

4. कोडिंग क्षेत्र (Coding Region) :
यह AUG के पश्चात् उपस्थित क्षारक क्रमों का क्षेत्र है जो प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में भाग लेता है। इसमें उपस्थित सभी न्यूक्लिओटाइड एक जीन के निर्देश को प्रोटीन में अनुवादित करते हैं।

5. टर्मिनेटिंग कोडोन (Terminating Codon) :
ये क्षारक क्रम UAA, UAG या UGA से अंकित होते हैं। इन कोडोन के आते ही प्रोटीन बनने की श्रृंखला समाप्त हो जाती है।

6. पॉली ‘A’ क्रम (Poly ‘A’ Sequence) :
m-RNA के छोर (end) पर एक लम्बी लगभग 200 न्यूक्लिओटाइड की श्रृंखला होती है जो Adenylic acid (poly’A’ अर्थात् AAAAAA….A) क्रम में रहती है। यह m-RNA की पूँछ (tail) है। यह m-RNA के साइटोप्लाज्म तक पहुँचने से पूर्व केन्द्रक में जोड़ी जाती है।

प्रश्न 2.
ए०टी०पी० की संरचना तथा कार्य लिखिए। या पादप कोशिका में ऊर्जा की मुद्रा क्या है? किन्हीं तीन ऊर्जा वाहकों का नाम लिखिए।
उत्तर :

ए०टी०पी० या ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट

सभी जीवित कोशिकाओं में ए०टी०पी० अणु महत्त्वपूर्ण संरचना वाले पदार्थ हैं। ये अपने अन्तिम दो फॉस्फेट समूहों के अन्तर्गत अत्यधिक ऊर्जा को इस प्रकार संचित रखते हैं कि आवश्यकतानुसार (कम ऊर्जा वाले स्थान या समय में) टूटकर इसको मुक्त कर देते हैं और इस (UPBoardSolutions.com) ऊर्जा का उपयोग जीव अपने कार्यों के सम्पादन हेतु कर लेता है। इस प्रकार, ये ऊर्जा के सिक्के (energy coins) हैं, जो सभी प्रकार की उपापचयिक क्रियाओं में, फिर चाहे ये उपचयी (anabolic) हों अथवा अपचयी (catabolic), अपना स्थान रखते हैं ऊर्जा ग्रहण करते हैं अथवा ऊर्जा मुक्त करते हैं, अतः इन्हें उपापचयी (metabolic) जगत का सिक्का भी कहते हैं।

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किसी भी ऐसे स्थान पर, कोशिका में जहाँ ऊर्जा की कमी होती है, ATP का एक उच्च ऊर्जा बन्ध टूट जाता है और यह ADP (ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट) में बदल जाता है। इस प्रकार जो ऊर्जा प्राप्त होती है। वह सभी प्रकार की उपापचयी (metabolic) अभिक्रियाओं में प्रयुक्त होती है। विभिन्न प्रकार की ऑक्सीकारक क्रियाओं में (विशेषकर श्वसन में) ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा ABP से ATP बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है। ऊर्जा वाहक (Energy carriers)-पादप कोशिका में ए०टी०पी० (ATP) के अतिरिक्त कई अन्य पदार्थ भी ऊर्जा वाहक का कार्य करते हैं; जैसे

  1. ऐसीटिल को-एन्जाइम ‘ए’ (acetyl co-enzyme (‘A’)
  2. ग्वानोसीन ट्राइफॉस्फेट (guanosine triphosphate = GTP)
  3. निकोटिनेमाइड ऐडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड (nicotinamide adenine dinucleotide =NAD) इन ऊर्जा वाहकों का मुख्य मध्यस्थ यौगिक भी ए०टी०पी० ही होता है।

प्रश्न 3.
एन्जाइम के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
एन्जाइम्स के कार्य एन्जाइम्स वे रासायनिक पदार्थ हैं जो जीवों में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं की गति को प्रेरित करते हैं। ये सामान्यत: अभिक्रिया में भाग नहीं लेते हैं। ये मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार के रासायनिक परिवर्तनों को प्रेरित करते हैं।

1. जल अपघटन (Hydrolysis) :
जब पदार्थ के अणु जल के अणु ग्रहण करके अपेक्षाकृत छोटे अणुओं में विघटित हो जाते हैं, इस प्रकार की क्रियाओं को जल अपघटन कहते हैं; जैसे—प्रोटीन्स जल अपघटन द्वारा प्रोटिओजेज, पेप्टोन्स, पॉलिपेप्टाइड्स (proteoses, peptones, polypeptides) तथा अन्त में अमीनो अम्ल (amino acid) में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी प्रकार मण्ड, शर्करा आदि के मोनोसैकेराइड्स (monosaccharides) में परिवर्तन भी जल अपघटन क्रिया के ही उदाहरण हैं। जीवित कोशिकाओं में निर्जलीकरण (dehydration) की भी उतनी ही सम्भावनाएँ हैं जितनी कि जल अपघटन की होती हैं। इन्हें भी एन्जाइम्स ही प्रेरित करते हैं।

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2. कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation) :
इस प्रकार की क्रियाओं में COOH-समूह विलग होने से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का निर्माण होता है। पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid), डीकार्बोक्सीलेज (decarboxylase) एन्जाइम द्वारा ऐसीटैल्डिहाइड (acetaldehyde) तथा CO2 में विघटित हो जाता है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 8
यद्यपि इस क्रिया में को-फैक्टर तथा को–एन्जाइम भी कार्य करते हैं और यह क्रिया अत्यधिक जटिल होती है।

3. ऑक्सीकरण व अवकरण (Oxidation and reduction) :

उपापचय क्रिया के समय खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है। ग्लूकोज के एक ग्राम अणु से ,0 व CO, बनने में ऑक्सीकरण के फलस्वरूप 4.1 cal ऊर्जा उत्पन्न होती है। सदैव ही ऑक्सीकरण की क्रिया के अन्तर्गत एक पदार्थ का ऑक्सीजन क्षय अथवा (UPBoardSolutions.com) हाइड्रोजन ग्रहण द्वारा अवकरण होता है। ऑक्सीजन क्षय द्वारा अवकृत पदार्थ ऑक्सीजन दाता (Oxygen donor) कहलाता है। तथा ऑक्सीकृत पदार्थ ग्राहक (acceptor) कहलाता है। इसी प्रकार हाइड्रोजन ग्रहण द्वारा अवकृत पदार्थ हाइड्रोजन ग्राहक (hydrogen acceptor) तथा अवकारक पदार्थ हाइड्रोजन दाता (hydrogen donor) कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
विकर के प्रकार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
सन् 1961 में अन्तर्राष्ट्रीय जैव रसायनज्ञ संघ (IUB) ने विकर वर्गीकरण वे नामकरण की एक नवीन पद्धति का अनुसरण किया। इसके अनुसार विकर का नाम ‘‘स्वव्याख्या’ (self explanatory) द्वारा सम्पन्न होता है। इस पद्धति के अनुसार विकरों का वर्गीकरण छ: मुख्य वर्गों में किया गया है

1. ऑक्सीडोरिडक्टेजेज (Oxidoreductases) :
इस वर्ग में ऑक्सीकरण-अपचयन (oxidation-reduction) की अभिक्रियाएँ उत्प्रेरित करने वाले विकर आते हैं। ये इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण (electron transport) को उत्प्रेरित करते हैं।

उदाहरणार्थ
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(ii) 
Cytochrome-oxidase (साइटोक्रोम-ऑक्सीडेज) ऑक्सीजन का अपचयन करके cyt. a3 का ऑक्सीकरण करता है।

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2. ट्रान्सफरेजेज (Transferases) :
वे विकर जो एक क्रियाधार (substrate) से H के अतिरिक्त अन्य किसी भी समूह को दूसरे अणु में स्थानान्तरित कर देते हैं, ट्रान्सफरेज कहलाते हैं। स्थानान्तरित होने वाले समूह प्राय: अमीनो एसाइल, मिथाइल ग्लूकोसिल, फॉस्फेट, थायोल, कीटोन, फार्माइल आदि होते हैं; जैसे– डी-हेक्सोज-6-फॉस्फोट्रान्सफरेज (हेक्सोकाइनेज-hexokinase) ATP से एक फॉस्फेट अणु का स्थानान्तरण ग्लूकोस को कर देता है।
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3. हाइड्रोलेजेज (Hydrolases) :
वे विकर जो क्रियाधार (substrate) का जल अपघटन (hydrolysis) करते हैं, हाइड्रोलेज कहलाते हैं; जैसे–पाचक एन्जाइम, ग्लूटामीन हाइड्रोलेज (ग्लूटामिनेज- glutaminase) आदि।
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4. लायेजेज (Lyases or Desmolases) :
वे विकर जो जल अपघटन के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से क्रियाधार (substrate) में से समूहों को हटाते या जोड़ते हैं, लायेजेज कहलाते हैं; जैसे

  1. मैलेट-हाइड्रोलायेज (फ्यूमेरेज-fumerase)
  2.  डीकार्बोक्सीलेज (कार्बनिक एनहाइड्रेज-carbonic anhydrase)
  3. कीटोज-1-फॉस्फेट ऐल्डिहाइड लायेज (ऐल्डोलेज-aldolase) आदि।

5. आइसोमेरेजेज (Isomerases) :
ये विकर क्रियाधार (substrate) में समूहों की अन्त: अवस्था में परिवर्तन कर पुनर्व्यवस्था को उत्प्रेरित करते हैं अर्थात् किसी यौगिक के एक समावयवी (isomer) को दूसरे समावयवी में बदलते हैं। इन्हें आइसोमेरेज कहते हैं, जैसे

  1. ट्रायोज आइसोमेरेज (triose isomerase)
  2.  फॉस्फोहेक्सोसआइसोमेरेज (phosphohexoseisomerase)
  3.  फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेज (phosphoglyceromutase) आदि।

6. लाइगेजेज (Ligases) :
ये विकर सिन्थेटेज (synthetase) के नाम से भी जाने जाते हैं। ये ATP से ऊर्जा प्राप्त कर यौगिकों को जोड़ने की अभिक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं; जैसे

  1. को-एन्जाइम ए लाइगेज (ऐसीटाइल को-एन्जाइम-ए सिन्थेटेज)
  2. अमोनिया लाइगेज (ग्लूटामीन सिन्थेटेज) आदि।।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्बोहाइड्रेट्स के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का क्या महत्त्व है? या कार्बोहाइड्रेट्स की प्रमुख श्रेणियों के नाम लिखिए। इन श्रेणियों में प्रमुख अन्तर क्या होते हैं? इन्हें सैकेराइड्स क्यों कहते हैं?
उत्तर :

कार्बोहाइड्रेट्स तथा उनके प्रकार (संवर्ग) या श्रेणियाँ

ये कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के यौगिक हैं तथा इनका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है अर्थात् इनमें कार्बन, हाइड्रोजन तथा
ऑक्सीजन का अनुपात 1: 2 : 1 का होता है। कार्बोहाइड्रेट्स को सैकेराइड्स (saccharides) भी कहते हैं क्योंकि इनके छोटे अणु स्वाद में मीठे होते हैं। स्पष्टतः इनमें हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का अनुपात जेल के समान (H2O) होता है। कुछ कार्बोहाइड्रेट्स में सल्फर, नाइट्रोजन (UPBoardSolutions.com) तथा फॉस्फोरस तत्त्व भी होते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण सभी क्लोरोफिल युक्त जीवाणुओं, शैवालों, पौधों आदि के द्वारा किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट्स के प्रमुखत: तीन प्रकार (संवर्ग) होते हैं

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(i) मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides) :
ये सरलतम कार्बोहाइड्रेट्स हैं तथा सबसे छोटे होते हैं। इन्हें प्राय: सरल शर्कराएँ (simple sugars) कहते हैं तथा ये स्वाद में मीठे और जल में घुलनशील होते हैं। इनके बनने की इस क्रिया को बहुलीकरण (polymerization) कहते हैं। इनमें उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर इन्हें ट्राइओज (triose) जैसे ग्लिसरैल्डिहाइड (glyceraldehyde); टेट्रोज (tetrose) जैसे इरिथ्रोज (erythrose); पेण्टोज (pentose) जैसे राइबोज (ribose), डीऑक्सीराइबोज (deoxyribose) आदि; हेक्सोज (hexose) जैसे ग्लूकोज (glucose C6H1206), फ्रक्टोज (fructose) आदि, हेप्टोज (heptose) जैसे हेप्ट्यू लोज (heptulose) आदि वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

(ii) ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides) :
ऐसे कार्बोहाइड्रेट्स दो से दस तक मोनोसैकेराइड इकाइयों से मिलकर इनके बहुलक के रूप में होते हैं। इनके बनने की इस क्रिया को बहुलीकरण (polymerization) कहते हैं। बेहुलीकरण के लिए मोनोसैकेराइड्स ग्लाइकोसिडिक बन्ध (glycosidic bond) के द्वारा जुड़ते हैं। ये भी अधिकतर स्वाद में मीठे तथा जल में घुलनशील होते हैं। ये रेखीय श्रृंखला में होते हैं किन्तु जल में घुलने पर चक्रीय स्वरूप में आ जाते हैं। इसी अवस्था में इनका बहुलीकरण भी होता है। ग्लाइकोसिडिक बन्ध बनाने में एक मोनोसैकेराइड का ऐल्डिहाइड या कीटोन (aldehyde or ketone) समूह दूसरे मोनोसैकेराइड के हाइड्रोक्सिल (ऐल्कोहॉलीय) समूह से जुड़ता है तथा जल का एक अणु बनाता है। सामान्यत: ऑलिगोसैकेराइड्स डाइसैकेराइड्स (disaccharides) ही पाये जाते हैं। इनमें दो मोनोसैकेराइड्स होते हैं। अधिक मोनोसैकेराइड्स वाले ऑलिगोसैकेराइड्स अन्य कार्बनिक यौगिकों जैसे-प्रोटीन्स, लिपिंड्स के साथ मिलकर ग्लाइकोप्रोटीन्स, ग्लाइकोलिपिड्स आदि बनाते हैं। जन्तुओं में ये प्रायः कोशिका कला (plasma membrane) का बाह्य आवरण बनाते हैं। डाइसैकेराइड प्रमुखतः माल्टोज (maltose), सुक्रोज (sucrose) आदि होते हैं।

(iii) पॉलिसैकेराइड्स (Polysaccharides) :
इन्हें ग्लाइकन्स (glycans) भी कहते हैं। ये सामान्यत: संगृहीत खाद्य के रूप में जीवद्रव्य में पाये जाते हैं। इनके निर्माण में दस से अधिक (कभी-कभी काफी जैसे सैकड़ों, हजारों) मोनोसैकेराइड इकाइयाँ (शाखित या अशाखित रेखीय श्रृंखला में) आपस में सम्बन्धित होती हैं; जैसे–मण्ड (starch), सेल्यूलोज (cellulose), ग्लाइकोजन (glycogen) आदि। इनका अणुभार (molecular weight) लाखों में होता है।

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कार्बोहाइड्रेट्स का मानव शरीर में महत्त्व

मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का महत्त्व इस प्रकार है

  1. ये श्वसन आधार (respiratory substrate) होते हैं। इन्हीं से ऊर्जा (energy) उत्पन्न की जाती है, इसीलिए इन्हें ‘जीव का ईंधन’ कहते हैं अर्थात् ये शरीर के लिए ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है
  2. अन्य कार्बनिक अथवा अकार्बनिक अणुओं या मूलकों से मिलकर ये अनेक महत्त्वपूर्ण पदार्थ बनाते हैं; जैसे—पेण्टोज शर्कराएँ न्यूक्लिक अम्लों के अणुओं का अनिवार्य भाग होती हैं। ये ATP के संश्लेषण में भी सहायक होते हैं।
  3. इनका महत्त्व खाद्य संचय के लिए अत्यधिक है; जैसे शरीर में ये ग्लाइकोजन (glycogen) के रूप में संचित रहते हैं।
  4. ये रुधिर का थक्का जमने (clotting) से रोकने में सहायक होते हैं; जैसे—हीपैरिन (heparin)।
  5. शर्करा के कुछ अणु अस्थि सन्धियों पर स्नेहक (चिकनाई) का कार्य करते हैं।
  6. कोशिका कला की बाहरी सतह पर ग्लाइकोप्रोटीन्स तथा ग्लाइकोलिपिड्स के रूप में संयुक्त कार्बोहाइड्रेट्स की उपस्थिति कलाओं की पहचान बनाती है और ग्राही का कार्य करती है।
  7. लारे, म्यूकस, रुधिर समूह के एण्टीजेन्स में भी शर्करा के अणु उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 2.
एन्जाइम की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए। विभिन्न प्रकार के कारकों को एन्जाइम की क्रिया-विधि पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए। या विकर की संरचना का वर्णन कीजिए तथा इसकी उत्प्रेरित अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कारकों का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
उत्तर :

एन्जाइम्स

एन्जाइम्स (enzyme, Gr, en = in; zyme = yeast) विशेष प्रकार के कार्बनिक उत्प्रेरक (organic catalysts) हैं जो जीवों में रासायनिक प्रक्रियाओं के उत्प्रेरण के लिए उत्तरदायी होते हैं। जीवतन्त्र में एन्जाइम्स की उपस्थिति का ज्ञान बहुत पुराना है। यद्यपि एन्जाइम (enzyme) नाम तब पड़ा, जब कुहने (Kuhne, 1878) ने यीस्ट (yeast) में पाये जाने वाले खमीर को इस नाम से पुकारा। प्राय: सभी एन्जाइम्स प्रोटीन (protein) के बने होते हैं। इनकी संरचना जटिल तथा अणुभार भी बहुत अधिक होता है। जीव तन्त्र के बाहर अर्थात् प्रयोगशाला में इनका संश्लेषण अभी सम्भव नहीं है। वैज्ञानिकों ने कई एन्जाइम्स (enzymes) को कोशिकाओं से (UPBoardSolutions.com) निकालकर उनके रवे (crystals) प्राप्त किये हैं। अनेक एन्जाइम; जैसे—पेप्सिन (pepsin) में शुद्ध प्रोटीन के साथ अन्य पदार्थ जुड़े रहते हैं। अनेक एन्जाइम में प्रोटीन के साथ किसी धातु; जैसे-लोहा (Fe), जस्ता (Zn), ताँबा (Cu) आदि के अंश सम्बद्ध होते हैं, जैसे—साइटोक्रोम्स (cytochromes) में लोहा होता है आदि। एज़ाइम के प्रोटीन तथा नॉन-प्रोटीन भाग क्रमश: एपोएन्जाइम  (apoenzyme) तथा प्रोस्थेटिक ग्रुप (prosthetic group) कहलाते हैं तथा सम्पूर्ण एन्जाइम को होलोएन्जाइम (holoenzyme) कहते हैं। कुछ एन्जाइम्स की सक्रियता उनसे लगे हुए आयनों (ions) पर निर्भर करती है। ऐसे आयनों को डायलिसिस (dialysis) द्वारा विलग किया जा सकता है। इस प्रकार के आयन सक्रिय कारक होते हैं।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 13

एन्जाइम्स की क्रिया-विधि

वास्तव में, एन्जाइम जिस क्रिया के प्रति अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं, वे अपने-आप भी होती हैं। किन्तु अत्यधिक धीमी गति से। एन्जाइम कैसे कार्य करता है? इस बारे में समय-समय पर अनेक विचारधाराएँ प्रस्तुत की गई हैं, जैसे. हेनरी (Henry, 1903) ने बताया कि एन्जाइम अपने क्रियाधार या सब्सट्रेट (substrate) से मिलकर एक यौगिक बना लेते हैं। बाद में, इस सिद्धान्त को एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) परिकल्पना कहा गया। इसके अनुसार, एन्जाइम के बाह्य तल पर विशेष प्रकार की संरचनाएँ होती हैं जिनको टेम्प्लैट (template) कहते हैं। इन्हीं में आधारीय पदार्थों के अणु हँस जाते हैं। इन अणुओं की संरचना टेम्प्लैट के अनुसार होती है। इस प्रकार बनने वाले विशिष्ट घनिष्ठ साहचर्य की स्थापना के विषय में निम्नलिखित दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं

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1. ताला-कुँजी सिद्धान्त
इस विचारधारा को वैज्ञानिक एमिल फिशर (Emil Fisher, 1894) ने दिया। इसके अनुसार, एन्जाइम क्रियाधार (substrate) के साथ क्रिया कर एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) नामक अत्यधिक सक्रिय अस्थाई यौगिक बनाता है। इस कॉम्प्लेक्स से अन्त में एन्जाइम अलग हो जाता है तथा क्रियाधार से नया पदार्थ बनता है।
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2. प्रेरित आसंजन सिद्धान्त
कॉशलेण्ड (Koshland, 1960) द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त में ये माना गया है कि एन्जाइम का सक्रिय स्थल (active site) स्थिर संरचना का न होकर परिवर्तन योग्य होता है। एक विशेष प्रकार का क्रियाधार (substrate) एक विशेष एन्जाइम के सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित करने में सक्षम होता
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है अर्थात् प्रारम्भ में सब्सट्रेट की रचना तथा सक्रिय स्थल की रचना अनुपूरक (complementary) नहीं होती, किन्तु सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित कर यह क्रियाधार इसे अपने अनुपूरक बना लेता है और एन्जाइम के साथ संयुक्त हो जाता है। इसके बाद की क्रियाओं में सक्रिय स्थल क्रियाधार के बॉण्ड्स (bonds) को विच्छेदित कर उत्पादक पदार्थों को मुक्त कर देता है।

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एन्जाइम की सक्रियता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित कारक

एन्जाइम की क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं

1. ताप (Temperature) :
एन्जाइम को जिस स्थान पर कार्य करना है, वहाँ का ताप; सामान्यतः 35° से 45°C होना चाहिये। इससे अधिक या कम ताप पर एन्जाइम की क्रियाशीलता कम हो जाती है। 60°-65°C ताप तथा इससे अधिक ताप पहुँचने पर एन्जाइम प्रायः नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार, कम ताप (UPBoardSolutions.com) पर भी इनकी क्रियाशीलता घटती है और 0°C पर पहुँचने पर ये प्रायः निष्क्रिय होकर परिरक्षित (preserve) हो जाते हैं।

2. pH का मान (Value of pH) :
कुछ एन्जाइम्स अम्लीय माध्यम में तथा अन्य क्षारीय माध्यम में क्रियाशील होते हैं, इसके विपरीत ये कार्य नहीं करेंगे। वास्तव में, प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष pH माध्यम में ही उच्चतम क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। pH मान कम या अधिक होने पर एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। pH परिवर्तन से अभिक्रिया की दिशा भी बदल सकती है।
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pH परिवर्तन से एन्जाइम, क्रियाधार, सक्रियकारक व संदमकों की घुलनशीलता तथा आयनीकरण प्रभावित होते हैं। एन्जाइमों पर अम्लीय अथवा क्षारीय आयनों युक्त अनेक पाश्र्व श्रृंखलाएँ पायी जाती हैं। pH परिवर्तनों से इन पार्श्व श्रृंखलाओं में परिवर्तन होने से आयनीकरण प्रभावित होता है।

3. आर्द्रता (Humidity) :
10-25% आर्द्रता पर एन्जाइम सक्रियता समाप्त हो जाती है। अनुकूलतम बिन्दु तक आर्द्रता बढ़ाने पर एन्जाइम की सक्रियता बढ़ती है।

4. अन्तिम उत्पादों की सान्द्रता (Concentration of end products) :
अन्तिम उत्पादों के संचयन (accumulation) से एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। उत्पाद संचयन से अभिक्रिया का विपरीत दिशा में तीव्र होना, एन्जाइम की सतह पर संचयन
से एन्जाइम का निष्क्रिय होना अथवा उत्पादों द्वारा pH प्रभावित होना आदि पाया जाता है। कभी-कभी उत्पाद सक्रिय स्थल पर जुड़कर उसे अवरुद्ध कर देता है। इस घटना को पुनर्निवेशित
संदमन feedback inhibition)कहते हैं।

5. सक्रियकारक (Activators) :
अनेक अकार्बनिक आयन अथवा परमाणु सूक्ष्म मात्रा में रहकर एन्जाइमों की सक्रियता बढ़ा देते हैं; जैसे-K+, Mg++, Mn++, Cl आदि। सक्रियकारक क्रियाधार व एन्जाइम के जुड़ने में सहायक होते हैं।

6. प्रोटीनविष (Protein poisons) :
भारी धातु (Hg++, Ag++, Pb++ आदि)-COOH अथवा -SH से जुड़ जाते हैं। ऑक्सीकारक (oxidants) S-S बन्ध बनाकर एन्जाइम की संरचना में परिवर्तन कर देते हैं। साइनाइड्स (cyanides), कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide), फ्लोराइड्स (fluorides) आदि सक्रियकारक के साथ जुड़कर सम्मिश्र बनाते हैं। ये सब अप्रतियोगी संदमक (non-competitive inhibitors) कहलाते हैं।

7. क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ (Substrate analogues) :
क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ एन्जाइम के सक्रिय स्थल के लिये होड़ करते हैं। इनकी उपस्थिति से एन्जाइम सक्रियता में कमी होती है। इन पदार्थों को प्रतियोगी संदमक (competitive inhibitors) कहते हैं। इस संदमन को क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से दूर किया जा सकता है।

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8. विकिरण (Radiant rays) :
उच्च ऊर्जा किरणों (X-rays, gamma rays, ultraviolet rays) आदि से विभिन्न बन्ध टूटकर (-SH) नये बन्ध (S-S) बनते हैं जिससे एन्जाइम सक्रियता कम हो जाती है।

9. क्रियाधार की सान्द्रता (Substrate concentration) :
यदि एन्जाइम की मात्रा अधिक हो तो क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है।

10. एन्जाइम की सान्द्रता (Enzyme concentration) :
यदि क्रियाधार की सान्द्रता अधिक हो तो एन्जाइम की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है। एन्जाइम के द्वारा सम्पादित प्रतिक्रियाएँ प्रतिवर्ती (reversible) होती हैं। अतः संश्लेषणात्मक (synthetic) प्रतिक्रिया होगी या विखण्डनात्मक (decompositional), इसका निर्णय अन्य दशाओं पर निर्भर होगा, न कि एन्जाइम पर। सामान्यतः किसी भी ऐसी प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पादित (produced) पदार्थ को अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा हटाया जाते रहना चाहिये। (UPBoardSolutions.com) इसलिये एन्जाइम प्रक्रियाएँ सामूहिक एवं शृंखलाबद्ध serial) होती हैं, क्योंकि प्रत्येक क्रिया में बना हुआ उत्पाद (product) अगली प्रतिक्रिया के लिये आधारीय पदार्थ (substrate) का कार्य करता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 8 Weather Instruments. Maps and Charts

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 8 Weather Instruments. Maps and Charts (मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनें|
(i) प्रत्येक दिन के लिए भारत के मौसम मानचित्र का निर्माण कौन-सा विभाग करता है?
(क) विश्व मौसम संगठन
(ख) भारतीय मौसम विभाग
(ग) भारतीय सर्वेक्षण विभाग
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-(ख) भारतीय मौसम विभाग।

(ii) उच्च एवं निम्न तापमानों में कौन-से द्रवों का प्रयोग किया जाता है?
(क) पारी एवं जल
(ख) जल एवं अल्कोहल ।
(ग) पारा एवं अल्कोहल
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर-(ग) पारा एवं अल्कोहल।

(iii) समान दाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाओं को क्या कहा जाता है?
(क) समदाब रेखाएँ
(ख) समवर्षा रेखाएँ
(ग) समताप रेखाएँ
(घ) आइसोहेल रेखाएँ।
उत्तर-(क) समदाब रेखाएँ।

(iv) मौसम पूर्वानुमान का प्राथमिक यन्त्र है
(क) तापमापी
(ख) दाबमापी
(ग) मानचित्र
(घ) मौसम चार्ट
उत्तर-(क) तापमापी।

(v) अगर वायु में आर्द्रता अधिक है, तब आई एवं शुष्क बल्ब के बीच पाठ्यांक का अन्तर होगा
(क) कम ।
(ख) अधिक
(ग) समान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) कम।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
(i) मौसम के मूल तत्त्व क्या हैं?
उत्तर-मौसम तत्त्वों के अन्तर्गत तापमान, वायुदाब, पवन, आर्द्रता तथा मेघों की दशाएँ सम्मिलित हैं। इन तत्त्वों के आधार पर वायुमण्डलीय दशाओं में कम समय अन्तराल पर परिवर्तन होता रहता है। इन्हीं तत्त्वों के आधार पर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

(ii) मौसम चार्ट क्या है?
उत्तर-मौसम पूर्वानुमान के लिए मौसम चार्ट प्राथमिक यन्त्र है। ये विभिन्न वायुमण्डलीय दशाओं; जैसे-वायुराशियों, वायुदाब यन्त्रों, वाताग्रों तथा वर्षण को जानने एवं पहचानने में सहयोग करते हैं।

(iii) वर्ग 1 के वेधशालाओं में सामान्यतः कौन-सा यन्त्र मौसम परिघटनाओं को मापने के लिए होता है?
उत्तर-भारत में मौसम वेधशालाओं को उनके यन्त्रों तथा प्रतिदिन लिए गए प्रेक्षणों की संख्या के आधार पर पाँच वर्गों में विभाजित किया जाता है। इनमें उच्चतम वर्ग-1 की वेधशाला है। वर्ग-1 की वेधशाला में अग्रलिखित यन्त्रों द्वारा मौसम के तत्त्वों को मापन किया जाता है

  1. अधिकतम एवं न्यूनतम तापमापी,
  2. पनवेग तथा वात-दिग्दर्शी,
  3. शुष्क एवं आर्द्र बल्ब तापमाण,
  4. वर्षामापी तथा
  5. वायुदाबमापी। |

(iv) समताप रेखाएँ क्या हैं?
उत्तर-मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखाएँ समताप रेखाएँ कहलाती हैं।

(v) निम्नलिखित को मौसम मानचित्र पर चिह्नित करने के लिए किस प्रकार के मौसम प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है?
(क) धुन्ध, (ख) सूर्य का प्रकाश, (ग) तड़ित, (घ) मेघों से ढका आकाश
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 8 Weather Instruments. Maps and Charts (मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट) img 1

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें
(i) मौसम मानचित्रों एवं चार्टी को किस प्रकार तैयार किया जाता है तथा ये हमारे लिए कैसे उपयोगी हैं?
उत्तर–मौसम मानचित्र पृथ्वी या उसके किसी भाग का अल्प समय (एक दिन) के मौसमी परिघटनाओं का समतल धरातल पर प्रदर्शन है। इन मानचित्रों पर एक निश्चित दिन के विभिन्न मौसम तत्त्वों; जैसे—तापमान, वर्षा, सूर्य का प्रकाश, मेघमयता, वायु की दिशा एवं वेग, वायुदाब इत्यादि को दर्शाया जाता है। इनको तैयार करने में केन्द्रीय कार्यालय द्वारा प्राप्त सूचनाओं, अभिलेख, निर्धारित प्रतीक या चिह्न और मौसम मानचित्र विधियों का प्रयोग किया जाता है। अतः मौसम मानचित्र बनाने के लिए मौसम सम्बन्धी सूचनाओं और प्रतीकों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। इन्हीं चिह्नों या प्रतीकों को विभिन्न स्थानों की सूचनाओं के साथ निर्धारित केन्द्रों पर अवस्थित किया जाता है। भारत में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना के बाद से

मौसम मानचित्र एवं चार्यों को नियमित रूप से तैयार किया जाता है। मौसम चार्ट में मौसम सम्बन्धी सूचनाओं एवं प्रतीकों को प्रदर्शित किया जाता है। इस चार्ट के माध्यम से कम स्थान पर मौसम सम्बन्धी अधिकतम सूचनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। इनको तैयार करने में मानचित्र की आवश्यकता नहीं होती, केवल मौसम सूचनाओं को प्रतीकों द्वारा क्रमबद्ध रूप से संयोजन किया जाता है। मौसम मानचित्र एवं मौसम चार्ट सम्बन्धित स्थान की मौसम दशाओं को समझने में अत्यन्त उपयोगी हैं। इनके आधार पर निर्धारित स्थान की मौसम दशाओं के आधार पर कृषि एवं अन्य कार्यों की विशेष योजनाएँ तैयार की जा सकती हैं जो सामाजिक-आर्थिक विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती हैं।

मानचित्र पठन

प्रश्न 1. पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 एवं 8.13 को पढे एवं निम्न प्रश्नों के उत्तर दें
(i) इन मानचित्रों में किन ऋतुओं को दर्शाया गया है?
उत्तर-मानचित्र 8.12 में शीत ऋतु (जनवरी माह) की दशाओं को तथा मानचित्र 8.13 में ग्रीष्म ऋतु (जुलाई माह) की दशाएँ दर्शाई गई हैं।

(ii) पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में अधिकतम समदाब रेखा का मान क्या है तथा यह देश के किस भाग से गुजर रही है?
उत्तर-पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में अधिकतम समदाब रेखा का मान ‘1020 है। यह देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग (जम्मू-कश्मीर) से गुजरती है।

(iii) पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.13 में सबसे अधिक एवं सबसे कम समदाब रेखाओं का मान क्या है। तथा ये कहाँ स्थित हैं?
उत्तर-पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.13 में सबसे अधिक 1010 की समदाब रेखा दक्षिण-पश्चिम (केरल) भारत में तथा सबसे न्यून समदाब रेखा 997 उत्तर-पश्चिमी भारत (राजथान से जम्मू-कश्मीर के सीमान्त भाग) में स्थित है।

(iv) दोनों मानचित्रों में तापमान वितरण का प्रतिरूप क्या है?
उत्तर-पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में उत्तर की ओर तापमान घटता जाता है तथा चित्रे 8.13 में तापमान उत्तर एवं दक्षिण में अधिक है। (v) पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में किस भाग का अधिकतम औसत तापमान तथा न्यूनतम औसत तापमान आप देखते हैं? उत्तर-अधिकतम औसत तापमान दक्षिण भारत (25°C तमिलनाडु) में तथा न्यूनतम औसत तापमान (10°C जम्मू-कश्मीर) उत्तरी भारत में है।

(vi) दोनों मानचित्रों में आप तापमान वितरण एवं वायुदाब के बीच क्या सम्बन्ध देखते हैं?
उत्तर-तापमान बढ़ता है और वायुदाब कम होता जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मौसम मानचित्र क्या है? इसका प्रकाशन किस प्रकार होता है?
उत्तर-मौसम मानचित्र
प्रायः किसी स्थान की एक समय-विशेष की वायुमण्डलीय दशाओं के योग को मौसम कहा जाता है। तापमान, वायुदाबे, आर्द्रता, वर्षा, पवनें तथा आकाशीय दशाएँ वायुमण्डल के प्रमुख अंग हैं, जिन्हें जलवायु या मौसम के प्रमुख तत्त्व कहा जाता है।

जिन मानचित्रों में मौसम-चिह्नों की सहायता से मौसम के विभिन्न तत्त्वों का प्रदर्शन किया जाता है, उन्हें मौसम मानचित्र कहा जाता है। मौसम मानचित्र की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-

मौसम मानचित्र उन मानचित्रों को कहते हैं जिनमें किसी क्षेत्र के निश्चित समय के तापमान, वायुदाब, पवन-संचार, वर्षा आदि के विवरण प्रकाशित किए गए हों।’ मौसम की भविष्यवाणी करने के लिए इने मानचित्रों की विशेष सहायता ली जाती है।

मौसम मानचित्रों का प्रकाशन

मौसम मानचित्रों की उपयोगिता को देखते हुए भारत सरकार ने इनके नियमित प्रकाशन हेतु मौसम विज्ञान की स्थापना की है। इस विभाग का मुख्य कार्यालय पुणे (महाराष्ट्र) में है। उत्तरी भारत में मौसम निदेशालय (Directorate of Meteorology) की स्थापना लोधी रोड, नई दिल्ली में की गई है। इस विभाग द्वारा देश के विभिन्न भागों में स्थित वेधशालाओं से मौसम सम्बन्धी आँकड़े एवं विवरण प्राप्त किए जाते हैं, उन्हीं के आधार पर प्रतिदिन मौसम मानचित्रों की रचना की जाती है। मौसम मनिचित्रों में मौसम सम्बन्धी विवरण मौसम-चिह्नों की सहायता से प्रकाशित किए जाते हैं। यह विभाग मौसम मानचित्रों के साथ-साथ प्रतिदिन मौसम भविष्यवाणियों का रेडियो तथा दूरदर्शन से प्रसारण भी करता है।

प्रश्न 2. मौसम मानचित्रों में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के मौसम चिह्न या प्रतीक बनाइए।
या मौसम चिह्न क्या हैं? विभिन्न प्रकार के मौसम चिह्नों को प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-मौसम चिह्न मौसम मानचित्रों में मौसम के विभिन्न विवरण दर्शाने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें मौसम चिह्न कहते हैं। चिह्नों के अभाव में मानचित्रों की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। वस्तुतः मौसम मानचित्रों का अध्ययन अधूरा है। मौसम-चिह्नों का प्रयोग सर्वप्रथम एडमिरल ब्यूफोर्ट ने 1805 ई० में किया था। 1935 ई० में वारसा में सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान सम्मेलन ने इन चिह्नों को मान्यता प्रदान कर दी है। अब इनका प्रयोग अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों में प्रकाशित होने वाले मौसम मानचित्रों में किया जाने लगा है। महत्त्वपूर्ण मौसम चिह्न अग्रांकित हैं-

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मेघ दशाचिह

मेघ की दशाओं या मेघाच्छादन की मात्रा के चिह्न निम्नांकित चित्र 8.2 में दर्शाए गए हैं
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ब्यूफोर्ट वायुगति चिह

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प्रश्न 3. निम्नलिखित मौसम यन्त्रों का सचित्र वर्णन कीजिए
(i) तापमापी, (ii) वायुदाबमापी, (iii) वातदिग्दर्शी, (iv) पवन वेगमापी, (v) वर्षामापी।
उत्तर-(i) तापमापी ।
किसी स्थान का तापमान थर्मामीटर द्वारा नापा जाता है। अधिकांश तापमापी संकीर्ण बन्द शीशे की नली के रूप में होते हैं, जिनके एक सिरे पर प्रसारित बल्ब होता है। नली के निचले भाग एवं बल्ब में तरल पदार्थ (जैसे—अल्कोहल या पारा) भरा होता है। तापमापी का बल्ब जो वायु के सम्पर्क में रहता है। तात्कालिक अवस्था के परिणामस्वरूप गर्म या ठण्डा होता है। गर्म होने पर पारा ऊपर की ओर चढ़ता है, जबकि ठण्डा होने पर नीचे की ओर गिरता है। शीशे की नली पर एक मापनी बनी होती है, जिससे तापमान पढ़ी जाता है। यह मापनी सेण्टीग्रेड तथा फॉरेनहाइट में तापमान बताती है।
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वायु के तापमान को मापने के लिए उच्च तापमापी (चित्र 8.4) तथा निम्न तापमापी (चित्र 8.5) का उपयोग किया जाता है, जबकि वायु की आर्द्रता मापने के लिए शुष्क बल्ब एवं आर्द्र बल्ब तापमापी प्रयोग में लाई जाती है। इस तापमापी में दो भुजाएँ होती हैं जिनमें पारा भरा होता है। एक भुजा का निचला भाग पानी की बोतल में डूबा हुआ होता है तथा दूसरा शुष्क होने के कारण काँच की थैली के रूप में होता है (चित्र 8.6)।
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(ii) वायुदाबमापी

वायुमण्डलीय दाब को मापने के लिए वायुदाबमापी का प्रयोग किया जाता है। ये विभिन्न प्रकार के होते हैं, पर सबसे अधिक पारद वायुदाबमापी, निद्रव वायुदाबमापी तथा वायुदाब लेखीयन्त्र का उपयोग किया जाता है। वायुदाब मापने की इकाई मिलीबार होती है। पारद वायुदाबमापी एक यथार्थ यन्त्र है। इसका उपयोग मानक के रूप में किया जाता है। निद्रव वायुदाबमापी को एनीरोइड बैरोमीटर भी कहा जाता है। यह शुष्क बैरोमीटर है। इसका आकार घड़ीनुमा होता है जिसे आसानी से जेब में रखकर कहीं भी ले जा सकते हैं।
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यह धातु को बना डिब्बा होता है, जिसे वायु से खाली कर दिया जाता है। इसके अन्दर के भाग में सिंप्रग लगी होती है। ऊपर के भागमें एक डायल होता है जिस पर अंक अंकित होते हैं। मध्य भाग में एक बटन लगा होता है जिससे सुइयाँ सम्बन्धित होती हैं। यह सुई वायु के दबाव से प्रभावित होकर चलती है जिससे वायु को कम या अधिक वायुदाब ज्ञात होता है (चित्र 8.8)।।

(iii) वातदिग्दर्शी

इस यन्त्र द्वारा वायु की दिशा ज्ञात की जाती है। यह यन्त्र किसी ऊँचे स्थान पर जैसे किसी भवन की सबसे ऊपरी मंजिल पर लगाया जाता है। इस यन्त्र के ऊपरी भाग में लगे तीर की नोंक वायु दिशा का संकेत देती है। यन्त्र के निचले भाग में सूचक लोहे की छड़े लगी होती हैं। इन छड़ों की तुलना से तीर की नोंक की स्थिति का निरीक्षण करके वायु की दिशा ज्ञात करते हैं (चित्र 8.9)। वायुदिशा ज्ञात करने का एक अन्य यन्त्र भी होता है जिसमें ऊपर एक मुर्गा बना होता है, जो वायु की दिशा के साथ घूमता है। जिस ओर मुर्गे का मुँह होता है, उस दिशा को पढ़कर दिशा का ज्ञान हो जाता है। इस यन्त्र को वैदर कॉक कहते हैं (चित्र 8.10)।
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(iv) पवनवेगमापी

वायु की गति मापने के लिए पवनवेगमापी (एनीमोमीटर) का प्रयोग किया जाता है। इस यन्त्र को खुले में किसी ऊँचे स्थान पर लगाते हैं। यह यन्त्र एक डिब्बे के अन्दर स्थित धुरी के रूप में होता है। इस धुरी के ऊपरी भाग में चार अर्द्धवृत्ताकार कटोरियाँ लगी होती हैं। वायु भर जाने पर ये कटोरी घूमती हैं तथा धुरी के निचले भाग द्वारा सम्बन्धित अंकित डायल पर मील या किमी प्रति घण्टा के रूप में वायु व्यक्त करती है (चित्र 8.11)।
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(v) वर्षामापी

वर्षामापी द्वारा वर्षा का मापन किया जाता है। सामान्यतः यह एक धातु का बेलनाकार पात्र होता है, जिसमें एक कीप’ लगी होती है। इस कीप पर पड़ने वाली वर्षा की बूंदें पात्र के अन्दर रखी बोतल में एकत्र होती रहती हैं। इस प्रकार 24 घण्टे में होने वाली वर्षा को नापने वाले पात्र जिसमें इंच व सेमी के निशान बने होते हैं, डालकर वर्षा का मापन करते हैं (चित्र 8.12)।

प्रश्न 4. जनवरी के मौसम मानचित्र के आधार पर वायुमण्डलीय दशाओं का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-जनवरी के मौसम मानचित्र का अध्ययन
(1) प्रारम्भिक सूचना :
यह दैनिक मौसम मानचित्र बुधवार, 1 जनवरी, 1986 ई० (पोष 11 शक, 1908) को भारतीय मानक समय (IST) के अनुसार प्रात: 8.30 बजे (ग्रीनविच औसत समय-GMT 0300 बजे) की मौसम सम्बन्धी दशाओं को प्रदर्शित कर रहा है। इस मानचित्र में प्रातः 8.30 बजे मंगलवार 31 दिसम्बर से प्रातः 8.30 बजे बुधवार, 1 जनवरी तक अर्थात् पिछले 24 घण्टे की वर्षा की मात्रा एवं वायुदाब को दिखाया गया है।
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(II) वायुमण्डलीय दबाव
प्रस्तुत मौसम मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि दक्षिणी भारत में 1014 मिबा से और पूर्वी भारत में 1016 मिबा से घिरे निम्न दाब के क्षेत्र से उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भारत की ओर वायुदाब बढ़ता चला गया है। अफगानिस्तान में यह 1024 मिबा हो गया है, जबकि उत्तरी राजस्थान में 1020 मिबा से घिरा उच्च दाब का क्षेत्र स्थापित है। अरब सागर में निकोबार द्वीपसमूह के पास 1010 मिबा से घिरा निम्न दाब का क्षेत्र उपस्थित है। H अक्षर द्वारा उत्तरी राजस्थान में उच्च वायुमण्डलीय दाब तथा L अक्षर द्वारा निकोबार द्वीपसमूह में निम्न वायुमण्डलीय दाब दर्शाया गया है।
1. समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति-प्रस्तुत मानचित्र के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मानचित्र के उत्तर-पश्चिमी भाग की समदाबे रेखाएँ बहुत दूर-दूर हैं। पश्चिमी विक्षोभ, जो पहले उत्तरी पाकिस्तान और निकटवर्ती अफगानिस्तान में था, अब जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर गया है।

2. दाब प्रवणता-उत्तरी भारत में दक्षिणी भारत की अपेक्षा दाब प्रवणता बहुत कम है। समदाब रेखाओं को दूर-दूर होना दाबे प्रवणता की कमी को तथा पास-पास होना दाब प्रवणता की
अधिकता को प्रदर्शित करता है।

(III) पवनें
मौसम मानचित्र में पवनों की दिशा एवं वेग पर उच्च और निम्न वायुदाब के क्षेत्रों की स्थिति तथा दाब प्रवणता का गहरा प्रभाव पड़ता है।
1. पवनों की दिशा-प्रस्तुत मानचित्र से यह स्पष्ट होता है कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पछुवा पवनें चल रही हैं। उत्तर-पूर्वी भारत में उत्तर-पूर्व से पवनें चल रही हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उत्तर और उत्तर-पूर्व से तथा दक्षिणी भारत में उत्तर-पूर्व और उत्तर से पवनें चल रही

2. पवनों का वेग-समस्त उत्तरी भारत में पवनों का वेग 5 नॉट गति/घण्टा से कम है। उत्तर-पूर्व | और दक्षिणी भारत में स्थल पर वायु वेगे 5 नॉट प्रति घण्टा से लेकर 10 नॉट प्रति घण्टा तक है।

(IV) समुद्र की दशा
प्रस्तुत मानचित्र के अध्ययन से ज्ञात होता है कि दक्षिणी अरब सागर में कोचीन पत्तन के पश्चिम में सागर की स्थिति सामान्य तरंगित है, जबकि मिनीकॉय द्वीप के पास क्षुब्ध सागर दिखाया गया है।

(V) आकाश की दशा
1. देश के विभिन्न भागों में आकाश की दशा निर्मल आकाश से लेकर पूर्ण मेघाच्छादन तक है। मेघरहित आकाश बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, दक्षिणी मध्य प्रदेश, दक्षिणी गुजरात और तमिलनाडु में पाया जाता है। जम्मू-कश्मीर में 7/8 आकाश; हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में आधे से 3/4 भाग तक आकाश बादलों से आच्छादित है।
मानचित्र में सभी मेघ निम्न ऊँचाई वाले हैं।

2. अन्य वायुमण्डलीय दशाएँ-प्रस्तुत मानचित्र के दिल्ली, ग्वालियर, इलाहाबाद, डाल्टनगंज, सिलचर, इम्फाल, कोलकाता, आसनसोल, भोपाल, इन्दौर, रायपुर, नागपुर, विशाखपट्टनम, बंगलुरु, मुम्बई, नासिक, कोच्चि और तिरुवनन्तपुरम नगरों में धुन्ध छाई हुई है। लखनऊ, गोरखपुर, गोहाटी और हैदराबाद नगरों के आस-पास में कोहरा प्रदर्शित किया गया है।

(VI) वर्षण
देश के किसी भी भाग में पिछले 24 घण्टों में वर्षा नहीं हुई तथा न ही हिमपात हुआ है।

(VII) न्यूनतम ताप का प्रसामान्य ताप से विचलन
न्यूनतम ताप का प्रसामान्य ताप से विचलन का अर्थ है किसी स्थान पर किसी तिथि का न्यूनतम तापमान उसी स्थान के उसी तिथि के पिछले 30 वर्षों के औसत न्यूनतम ताप (सामान्य न्यूनतम तापमान) से कितने अंश सेल्सियस अधिक या कम है। इसे समान विचलन वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई सम विचलन रेखाओं द्वारा प्रदर्शित करते हैं (देखिए चित्र 8.14)।
* 1 नॉट = 1.84 किमी।
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इस मानचित्र में उत्तरी ओडिशा, बिहार के मैदान और जम्मू में रात्रि का तापमान प्रसामान्य से 4° से लेकर 5° सेल्सियस तक कम है। कुछ भागों में तापमान की यह कमी 2° से लेकर 3° सेल्सियस तक है। प्रायद्वीपीय भारत में कोरोमण्डल तट के साथ और वहाँ से भीतर की ओर बढ़े हुए भाग में न्यूनतम तापमान सामान्य से 2° सेल्सियस तक अधिक है।

(VIII) अधिकतम ताप का सामान्य ताप से विचलन
किसी भी स्थान के 30 या अधिक वर्षों के तापमान का औसत वहाँ का सामान्य (Normal) तापमान होता है। अधिकतम तापमान का सामान्य से विचलने किसी स्थान के किसी तिथि के अधिकतम
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तापमान का उसी स्थान के उसी तिथि के पिछले लगभग 30 वर्षों के औसत अधिकतम तापमान से अन्तर को प्रकट करता है। अधिकतम तापमान उस तिथि के औसत अधिकतम तापमान से अधिक भी हो सकता है और कम भी। कम को ऋणात्मक चिह्न (-) से और अधिक को धनात्मक चिह्न (+) से प्रदर्शित करते हैं (देखिए चित्र 8.15)

इस मानचित्र के उत्तरी भाग में अधिकतम तापमान सामान्य से 2 से 4° सेल्सियस तक नीचे कित किया गया है तथा नेपाल में 6° सेल्सियस तक नीचे है। प्रायद्वीपीय भारत में तटों पर सामान्य से लेकर . भीतरी भाग में 2° सेल्सियस तापमान अधिक पाया जाता है।

अगले 24 घण्टे का पूर्वानुमान

प्रस्तुत मौसम-मानचित्र के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखण्ड की उत्तरी पहाड़ियों में व्यापक रूप से हिमपात और वर्षा होने की सम्भावनाएँ हैं। अण्डमान व निकोबार द्वीपसमूह, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, तटीय तमिलनाडु, दक्षिणी केरल और लक्षद्वीप में कहीं-कहीं वर्षा हो सकती है तथा तेज पवनों के साथ झंझावात आने की प्रबल सम्भावना है।

मौखिक परीक्षा के लिए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मौसम विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर-मौसम की विभिन्न दशाओं एवं उनसे सम्बन्धित लक्षणों का अध्ययन करने वाले शास्त्र को मौसम-विज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 2. मौसम क्या है?
उत्तर-किसी स्थान-विशेष की अल्पकालीन वायुमण्डलीय दशाओं; जैसे–तापमान, वर्षा, वायु वेग एवं दिशा, ओला, कोहरा, ओस आदि को मौसम कहते हैं।

प्रश्न 3. मौसम के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर-तापमान, वायुदाब, वायु-दिशा एवं गति, वर्षा तथा आर्द्रता आदि मौसम के प्रमुख तत्त्व हैं।

प्रश्न 4. तापमान किस यन्त्र से नापा जाता है?
उत्तर-तापमान को तापमापी (थर्मामीटर) नामक यन्त्र से नापा जाता है।

प्रश्न 5. तापमापी कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-तापमापी तीन प्रकार के होते हैं

  • साधारण तापमापी,
  • उच्चतम न्यूनतम तापमापी एवं
  • आर्द्र एवं शुष्क बल्ब तापमापी।

प्रश्न 6. आर्द्रता किस यन्त्र से ज्ञात की जाती है?
उत्तर-आर्द्रता, आर्द्र एवं शुष्क बल्ब तापमापी द्वारा ज्ञात की जाती है।

प्रश्न 7. बैरोमीटर क्या है?
उत्तर-बैरोमीटर, वायुमण्डल का वायुदाब नापने का यन्त्र है।

प्रश्न 8. बैरोमीटर कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-बैरोमीटर तीन प्रकार के होते हैं

  • साधारण बैरोमीटर,
  • फोर्टिन बैरोमीटर एवं
  • एनीरोइड बैरोमीटर।

प्रश्न 9. बैरोमीटर का उपयोग बताइए।
उत्तर बैरोमीटर का उपयोग निम्नलिखित तथ्यों को ज्ञात करने के लिए किया जाता है

  • वायुदाब की माप,
  • आगामी मौसम का ज्ञान,
  • ऊँचाई का ज्ञान एवं
  • तापमान का अनुमान।

प्रश्न 10. वर्षा किस यन्त्र से नापी जाती है?
उत्तर-वर्षा, वर्षामापी यन्त्र द्वारा नापी जाती है।

प्रश्न 11. वायु दिक्सूचक क्या है?
उत्तर-वायु दिक्सूचक द्वारा वायु के चलने की दिशा का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रश्न 12. पवन वेगमापी क्या है? उत्तर-पवन की गति ज्ञात करने वाले यन्त्र को पवन वेगमापी यन्त्र कहते हैं।

प्रश्न 13. सामान्य तापमान का क्या अर्थ है?
उत्तर-सामान्य तापमान लगभग 30-35 वर्षों का औसत तापमान होता है।

प्रश्न 14. अधिकतम तापमान का प्रसामान्य से विचलन किसे कहते हैं?
उत्तर-किसी स्थान पर किसी तिथि के अधिकतम तापमान को उस स्थान के औसत अधिकतम तापमान से अन्तर को प्रसामान्य से विचलन कहते हैं। यह धनात्मक (+) अथवा ऋणात्मक (-) दोनों ही हो सकते हैं।

प्रश्न 15. मौसम मानचित्रों में H और I. अक्षरों से क्या प्रकट होता है?
उत्तर-मौसम मानचित्रों में H अक्षर उच्च दाब और L अक्षर निम्न दाब को प्रकट करता है।

प्रश्न 16. NLM का क्या अर्थ है?
उत्तर-NLM का अर्थ मानसून की उत्तरी सीमा है। इसे प्रकट करने के लिए जुलाई के मानचित्र में दोहरी खण्डित रेखाओं का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 17, IST से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-भारतीय मानक समय को संक्षेप में IST कहते हैं।

प्रश्न 18. GMT का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-ग्रीनविच औसत समय GMT कहलाता है।

प्रश्न 19. भारतीय मौसम विभाग का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर-भारतीय मौसम विभाग का मुख्यालय पुणे में स्थित है।

प्रश्न 20. मौसम चिह्नों का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था?
उत्तर-मौसम चिह्नों का सर्वप्रथम प्रयोग एडमिरल ब्यूफोर्ट (1805) ने किया था।

प्रश्न 21. तापमान मापने की कौन-कौन सी इकाइयाँ हैं?
उत्तर-तापमान को फारेनहाइट, सेण्टीग्रेड तथा यूमर में मापा जाता है। इन इकाइयों को निम्नलिखित सूत्र से एक-दूसरे में परिवर्तित कर सकते हैं –
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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters  (प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर का चयन करें
(i) इनमें से भारत के किस राज्य में बाढ़ अधिक आती है?
(क) बिहार
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) असम
(घ) उत्तर प्रदेश
उत्तर-(ग) असम।

(ii) उत्तराखण्ड के किस जिले में मालपा भू-स्खलन आपदा घटित हुई थी?
(क) बागेश्वर
(ख) चम्पावत
(ग) अल्मोड़ा
(घ) पिथौरागढ़
उत्तर-(घ) पिथौरागढ़।

(iii) इनमें से कौन-से राज्य में सर्दी के महीनों में बाढ़ आती है?
(क) असम
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर-(घ) तमिलनाडु।।

(iv) इनमें से किस नदी में मजौली नदीय दीप स्थित है?
(क) गंगा
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गोदावरी
(घ) सिन्धु
उत्तर-(ख) ब्रह्मपुत्र।

(v) बर्फानी तूफान किस तरह की प्राकृतिक आपदा है?
(क) वायुमण्डलीय
(ख) जलीय ।
(ख) जलीय
(ग) भौमिकी
(घ) जीवमण्डलीय
उत्तर-(क) वायुमण्डलीय।।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 से कम शब्दों में दें
(i) संकट किस दशा में आपदा बन जाता है?
उत्तर-संकट उस दशा में आपदा बन जाता है जब वह आकस्मिक उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में मनुष्य उसका सामना करने के लिए तैयार नहीं होता तथा इसके नियन्त्रण हेतु भी पूर्व प्रबन्धीय तैयारी नहीं की जाती है।

(ii) हिमालय और भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अधिक भूकम्प क्यों आते हैं?
उत्तर–हिमालय और भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में भूकम्प अधिक आते हैं, क्योंकि भारतीय भू-प्लेट उत्तर तथा पूर्व की ओर खिसक रही है तथा यूरेशियन भू-प्लेट से टकराकर इसमें अधिक ऊर्जा एकत्र हो जाती है। यही ऊर्जा इस क्षेत्र से विवर्तनिकता (हलचल) उत्पन्न कर भूकम्प का कारण बनती है। |

(iii) उष्ण कटिबन्धीय तूफान की उत्पत्ति के लिए कौन-सी परिस्थितियाँ अनुकूल हैं?
उत्तर-उष्ण कटिबन्धीय तूफान की उत्पत्ति के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों को अनुकूल माना जाता है

  • पर्याप्त एवं सतत उष्ण व आर्द्र वायु की उपलब्धता जिससे बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा निर्मुक्त हो।
  • तीव्र कोरियोलिस बल जो केन्द्र के निम्न वायुदाब को भरने न दे।’
  • क्षोभमण्डल में अस्थिरता जिससे स्थानीय स्तर पर निम्न वायुदाब क्षेत्र बन जाते हैं।
  • शक्तिशाली उच्च दाबवेज (Wedge) की अनुपस्थिति, जो आई व गुप्त ऊष्मायुक्त वायु के ऊध्र्वाधर बहाव को अवरुद्ध करे।

(iv) पूर्वी भारत की बाढ़ पश्चिमी भारत की बाढ़ से अलग कैसे होती है?
उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ प्रतिवर्ष आती है तथा भारी नुकसान पहुँचाती है। पश्चिमी भारत में बाढ़ कभी-कभी और अचानक आती है। पश्चिमी भारत में पंजाब, हरियाणा, गुजरात राज्यों में प्रवाहित होने वाली नदियों के जलस्तर में जब वृद्धि हो जाती है तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। राजस्थान में कभी आकस्मिक तीव्र वर्षा के फलस्वरूप बाढ़ आ जाती है।

(v) पश्चिमी और मध्य भारत में सूखे ज्यादा क्यों पड़ते हैं?
उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत जिसमें मुख्यत: राजस्थान का पूर्वी भाग, मध्य प्रदेश का अधिकांश भाग तथा महाराष्ट्र के पूर्वी भाग आते हैं जो सूखे से अधिक प्रभावित रहते हैं। इस भाग में अत्यधिक कम वर्षा एवं मानसून के समय पर न आने के कारण सूखे की विपत्ति बार-बार उत्पन्न होती रहती है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दो में दें
(i) भारत में भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करें और इस आपदा के निवारण के कुछ उपाय बताएँ।
उत्तर-भारत में भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्र
भारत में अस्थिर युवा हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएँ, जिसमें उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर तथा असम राज्य, अण्डमान और निकोबार, पश्चिमी घाट, नीलगिरि में अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, भूकम्प प्रभावी क्षेत्र और इन भागों में अत्यधिक मानव क्रियाकलापों वाले वे क्षेत्र जहाँ सड़क और बाँध निर्माण अधिक किए गए हैं, भू-स्खलन से अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों में सम्मिलित हैं।

आपदा निवारण के उपाय-भू-स्खलन से निपटने के लिए निम्नलिखित उपाय उपयोगी होते हैं-

  1. पर्वतीय क्षेत्रों में तीव्र ढाल वाले भागों को काटकर सड़क निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।
  2. इन क्षेत्रों में कृषि कार्य नदी घाटी तथा कम ढाल वाले भागों तक सीमित होना चाहिए तथा बड़ी विकास योजना पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  3. सकारात्मक कार्य जैसे बृहत् स्तर पर वनीकरण को बढ़ावा और जल प्रवाह को नियन्त्रित करने के | लिए बाँध आदि का निर्माण भू-स्खलन के उपायों के पूरक हैं।
  4. स्थानान्तरी कृषि वाले उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जानी चाहिए।

(ii) सुभेद्यता क्या है? सूखे के आधार पर भारत को प्राकृतिक आपदा भेवता क्षेत्रों में विभाजित करें और इसके निवारण के उपाय बताएँ।
उत्तर-सुभेद्यता
सुभेद्यता (Vulnerability) अथवा असुरक्षा किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा क्षेत्र को हानि पहुँचाने की वह दशा या स्थिति है जो मानव के नियन्त्रण में नहीं होती है। दूसरे शब्दो में, यह जोखिम की वह सीमा है जिस पर एक व्यक्ति या समुदाय अथवा क्षेत्र प्रभावित होता है। भारत को सूखा के आधार पर निम्नलिखित भेद्यता (प्रभावित क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है|

1. अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र—इसमें राजस्थान में अरावली के पश्चिम में स्थित मरुस्थली और गुजरात का कच्छ क्षेत्र सम्मिलित है।
2. अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र-राजस्थान का पूर्वी भाग, मध्य प्रदेश का अधिकांश क्षेत्र, महाराष्ट्र | के पूर्वी भाग, तेलंगाना तथा आन्ध्र प्रदेश के आन्तरिक भाग, कर्नाटक का पठार, तमिलनाडु के उत्तरी-पूर्वी भाग, झारखण्ड का दक्षिणी भाग और ओडिशा को आन्तरिक भाग अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र हैं।
3. मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र-इस वर्ग में राजस्थान के उत्तरी भाग, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के दक्षिणी जिले, गुजरात के शेष भाग, झारखण्ड तथा कोयम्बटूर पठार सम्मिलित हैं (मानचित्र 7.1)।

निवारण के उपाय
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सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण पर सूखे का प्रभावित तात्कालिक एवं दीर्घकालिक होता है। अतः इसके निवारण के उपाय भी तात्कालिक व दीर्घकालिक होते हैं|

1. तात्कालिक उपाय-सुरक्षित पेयजल वितरण, दवाइयाँ, पशुओं के लिए चारे और जल की | उपलब्धता तथा मानव और पशुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचानी सम्मिलित है। .

2. दीर्घकालिक उपाय–अनेक ऐसी योजनाएँ बनाई जाती हैं जो सूखे की विपत्ति में उपयोगी हों; जैसे—भूमिगत जल भण्डारण का पता लगाना, जल आधिक्य क्षेत्रों से अल्प जल क्षेत्रों में जल पहुँचाना, नदियों को जोड़ना, बाँध व जलाशयों को निर्माण करना, वर्षा जल का संग्रह करना, वनस्पति आवरण का विस्तार करना तथा शुष्क कृषि फसलों के क्षेत्र में विस्तार करना आदि योजनागत उपाय महत्त्वपूर्ण हैं।

(iii) किस स्थिति में विकास कार्य आपदा का कारण बन सकता है?
उत्तर-भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में ही नहीं वरन् अन्य स्थितियों में भी सामाजिक प्रगति और आर्थिक विकास हेतु विभिन्न विकास कार्य अत्यन्त आवश्यक हैं, किन्तु संकटं या आपदाओं की अनदेखी करके विकास कार्यों को करते रहना अत्यन्त घातक एवं मूर्खतापूर्ण निर्णय कहलाता है। इस परिप्रेक्ष्य में कभी-कभी विभिन्न विकास कार्य आपदा का कारण बन जाते हैं। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य उल्लेखनीय हैं

1. मानव द्वारा बाँध आदि का निर्माण जो सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है। यदि बाँध की ऊँचाई बढ़ाई जाती है तो इसके टूटने से बाढ़ आपदा का संकट उत्पन्न हो सकता है।
2. पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण यद्यपि आवश्यक है, किन्तु तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों को काटकर सड़कें बनाई जाती हैं तथा ढाल के किनारे भूस्खलने अवरोधी दीवारों का निर्माण नहीं किया जाता है तो भू-स्खलन की विपत्ति का सामना करना पड़ सकता है।
3. बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति के लिए जंगलों का बेरहमी से विनाश करना तथा अनियोजित तरीके से लगातार भूमि उपयोग करते रहना वन, जल, वन्य-जीव आदि प्राकृतिक
संसाधनों के ह्रास का कारण बन सकता है।
4. तीव्र औद्योगिकीकरण आर्थिक विकास के लिए अविश्यक है, परन्तु इनसे निकलने वाली गैसें; जैसे–CFCs आदि को यदि इसी प्रकार वायुमण्डल में छोड़ा जाता रहा तो वायु-प्रदूषण की
समस्या में वृद्धि होती रहेगी।
5. परमाणु ऊर्जा, जिसे वर्तमान में विकास के लिए आवश्यक समझा जाता है, के उत्पादन में मानवीय | असावधानी के करिणं रूस की वाणु संयन्त्र में दुर्घटनाओं के समान होने वाली घटनाओं में वृद्धि होती रहेगी।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सामाजिक प्रगति और आर्थिक विकास के लिए विकास कार्य आवश्यक हैं, पर इन्हें प्रारम्भ करने से पूर्व पर्यावरण असन्तुलन का मूल्यांकन तथा आपदा जैसे संकटों को न्यूनतम करने और इनमें वृद्धि न होने के उपायों के लिए योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन करना भी अत्यन्त आवश्यक है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्प प्रलं
प्रश्न 1. प्राकृतिक आपदाएँ होती हैं
(क) जन्तुजनित
(ख) मानवजनित
(ग) वनस्पतिजनित
(घ) प्रकृतिजनित
उत्तर-(घ) प्रकृतिजनित ।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में कौन-सी प्राकृतिक आपदा नहीं है?
(क) ज्वालामुखी विस्फोट
(ख) जनसंख्या विस्फोट
(ग) बादल विस्फोट
(घ) चक्रवात
उत्तर-(क) ज्वालामुखी विस्फोट

प्रश्न 3. भू-प्लेटों के खिसकने से क्या होता है।
(क) ज्वालामुखी विस्फोट
(ख) चक्रवात
(ग) बाढ़
(घ) सूखा
उत्तर-(क) ज्वालामुखी विस्फोट

प्रश्न 4. विश्व में सर्वाधिक भूकम्प कहाँ आते हैं?
(क) जापान
(ख) भारत
(ग) इटली
(घ) सिंगापुर
उत्तर-(क) जापान

प्रश्न 5. भू-स्खलन से सबसे अधिक प्रभावित कौन-सा क्षेत्र है?
(क) पहाड़ी प्रदेश
(ख) मैदानी भाग
(ग) पठारी प्रदेश
(घ) ये सभी
उत्तर-(क) पहाड़ी प्रदेश ।

प्रश्न 6. सागरों में भूकम्प के समय उठने वाली लहरों को क्या कहते हैं?
(क) सुनामी
(ख) चक्रवात
(ग) भूस्खलन ।
(घ) ज्वार-भाटा
उत्तर-(क) सुनामी

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन-सी प्राकृतिक आपदा नहीं है?
(क) सूखा
(ख) चक्रवात
(ग) रेल दुर्घटना
(घ) सूनामी
उत्तर-(ग) रेल दुर्घटना

प्रश्न 8. निम्नलिखित में से कौन-सी आपदा मानव-निर्मित है?
(क) भू-स्खलन
(ख) भूकम्प
(ग) हरितगृह प्रभाव
(घ) सूनामी लहरें
उत्तर-(ग) हरितगृह प्रभाव

प्रश्न 9. सूनामी है
(क) एक नदी
(ख) एक पवन
(ग) एक पर्वत चोटी।
(घ) एक प्राकृतिक आपदा ।।।
उत्तर-(घ) एक प्राकृतिक अपदा ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आपदाओं को ‘सभ्यता का शत्रु क्यों कहा जाता है?
उत्तर–आपदाएँ प्राकृति एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जिससे मनुष्य एवं जीव-जन्तुओं की सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यवधान ही उत्पन्न नहीं होता, बल्कि इसके कारण अनेक लोगों की मृत्यु और सम्पत्ति का विनाश भी होता है। कई सभ्यताएँ; जैसे-हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो, बेबीलोन तथा नील नदी घाटी आदि इसी के कारण नष्ट हुई हैं। इसीलिए आपदाओं को सभ्यता का शत्रु कहा जाता है।

प्रश्न 2. आपदाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर–आपदाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति वृद्धि की दर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन पर निर्भर करती है। वर्तमान भोगवादी अर्थव्यवस्था और जनसंख्या तीव्रता के कारण प्राकृतिक संसाधनों के कुप्रबन्धन एवं ह्रास में वृद्धि हुई है, जिसके कारण प्राकृतिक प्रक्रिया तन्त्र में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण आपदाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 3. प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के नाम निम्नलिखित हैं(1) भूकम्प, (2) ज्वालामुखी विस्फोट, (3) भू-स्खलन, (4) चक्रवाती तूफान, (5) बादल फटना, (6) बाढ़, (7) सूखा, (8) सुनामी आदि। इन सभी आपदाओं को रोकना असम्भव है किन्तु इनसे होने वाले जान-माल के नुकसान को विशेष , सुरक्षात्मक उपायों द्वारा न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है।

प्रश्न 4. चरम घटनाओं से क्या तात्पर्य है।
उत्तर-प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों द्वारा जनित सभी दुर्घटनाएँ चरम घटनाएँ कहलाती हैं। चरम घटनाएँ कभी-कभी ही घटित होती हैं। अतः जब प्राकृतिक प्रक्रम या मानवीय अनुक्रियाएँ इतनी त्वरित हों जिसका अनुमान लगाना कठिन हो और मानव समाज पर इसके प्रतिकूल प्रभाव से संकट या विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो उनको चरम घटनाएँ या आपदा कहा जाता है।

प्रश्न 5. बहिर्जात आपदाएँ कौन-सी होती है? उनके नाम बताइए।
उत्तर–बहिर्जात आपदाओं का सम्बन्ध वायुमण्डल से होता है, इसीलिए इन्हें ‘वायुमण्डलीय आपदाएँ भी कहते हैं। प्रमुख बहिर्जात आपदाओं के नाम इस प्रकार हैं-चक्रवाती तूफान, बादल का फटना, आकाशीय विद्युत का गिरना, तड़ित झंझा, ओलावृष्टि, सूखा, बाढ़, ताप एवं शीत लहर आदि।

प्रश्न 6. मानवजनित आपदाओं को कौन-कौन से वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उतर-मानवजनित आपदाओं को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जाता है(1) मानवजनित भौतिक आपदाएँ, (2) मानवजनित रासायनिक आपदाएँ, (3) मानवजनित सामाजिक आपदाएँ, (4) मानवजनित जीवीय आपदाएँ।

प्रश्न 7. विश्व बैंक ने आपदा को किस प्रकार परिभाषित किया है?
उत्तर–विश्व बैंक ने आपदा को निम्नलिखित प्रकार परिभाषित किया है –
“आपदा अल्पावधि की एक असाधारण घटना है, जो देश की अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से अस्त-व्यस्त कर देती है।”

प्रश्न 8. भू-स्खलन के लिए उत्तरदायी कारक बताइए।
उत्तर-भू-स्खलन के लिए कई प्राकृतिक एवं मानवीय कारक उत्तरदायी होते हैं
प्राकृतिक कारक-भूकम्प, वर्षा की अधिकता, ढालयुक्त कमजोर चट्टानें, पर्वतीय चट्टानों में भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की अधिकता तथा जलप्रवाह में अवरोध उत्पन्न होना।
मानवीय कारक-वनों का अत्यधिक विनाश, अनियोजित भूमि उपयोग, अकुशल विधियों द्वारा उत्खनन, निर्माण कार्यों हेतु पर्वतों का कटान एवं दोषपूर्ण स्थान का चयन।।

प्रश्न 9. भारत में भू-स्खलन से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-भू-स्खलन भीषणता के आधार पर भारत के उत्तर-पश्चिमी एवं पूर्वोत्तर पर्वतीय राज्य सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। इन राज्यों में जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्यों में प्रतिवर्ष भू-स्खलन से सर्वाधिक हानि होती है।

प्रश्न 10. प्रतिरोधक दीवारों का निर्माण किस प्रकार भू-स्खलन रोकने में उपयोगी है?
उत्तर-भू-स्खलन रोकने एवं क्षति को न्यूनतम करने के लिए भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों में प्रतिरोधक दीवारों का निर्माण उपयुक्त युक्ति है। इस प्रकार की दीवारें सड़कों के किनारे तीव्र ढाल को रोकने में सहायक होती हैं। इन दीवारों के बनने पर पत्थर एवं मलबा गिरने से रुक जाता है तथा भू-स्खलन से क्षति न्यूनतम हो जाती है और कुछ समय बाद भू-स्खलन की सम्भावना भी नगण्य रह जाती है।

प्रश्न 11. बाढ़ एवं त्वरित बाढ़ में क्या अन्तर है?
उत्तर-बाढ़ को सामान्य अर्थ स्थलीय भाग को निरन्तर कई दिनों तक जलमग्न होना है। वास्तव में बाढ़ प्राकृतिक पर्यावरण की एक विशेषता है, जिसे जलीय चक्र का संघटक माना जाता है; जबकि त्वरित बाढ़ या फ्लैश फ्लड तब उत्पन्न होती है जब तटबन्ध टूट जाते हैं या बैराज से अधिक मात्रा में जल छोड़ दिया जाता है।

प्रश्न 12. बाढ़ आपदा के लिए उत्तरदायी कारक बताइए।
उत्तर-बाढ़ प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारकों का परिणाम है। प्राकृतिक कारकों में लम्बी अवधि तक उच्च तीव्रता वाली जलवर्षा, नदियों के घुमावदार मोड़, नदियों की जलधारा में अचानक परिवर्तन, भू-स्खलन आदि उत्तरदायी हैं; जबकि मानवीय कारकों में वनों का विनाश, नगरीकरण एवं अनियोजित भूमि उपयोग महत्त्वपूर्ण कारक हैं।

प्रश्न 13. भारत में बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-भारत में पश्चिम बंगाल, असम, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित राज्य हैं। वास्तव में देश की गंगा द्रोणी में बाढ़ का प्रकोप अधिक रहता है। ऐसा अनुमान है कि देश की कुल आपदा की लगभग 60 प्रतिशत हानि केवल गंगा के प्रवाह क्षेत्रों में होती है।

प्रश्न 14. भारत के भीषण सूखा प्रभावित राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर-भारत में राजस्थान एवं गुजरात भीषण सूखा प्रभावित राज्यों की श्रेणियों में आते हैं। यहाँ लगभग प्रतिवर्ष कम वर्षा के कारण कहीं-न-कहीं भीषण सूखे का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 15. भारत में अत्यधिक भूकम्प सम्भावित क्षेत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर-भारत में अत्यधिक भूकम्प सम्भावित क्षेत्र जोन-V के अन्तर्गत आता है। इस क्षेत्र में भारत की हिमालय पर्वतश्रेणी, बिहार में नेपाल का सीमावर्ती क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी उत्तराखण्ड, भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य, कच्छ प्रायद्वीप तथा अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सम्मिलित हैं।

प्रश्न 16. भूकम्प के दौरान प्रबन्ध की विधियाँ बताइए।
उत्तर-भूकम्प के दौरान निम्नलिखित कार्यविधि अपनाना उचित रहता है(1) भूकम्प आने पर घबराएँ नहीं बल्कि साहस बनाए रखें। (2) आप जहाँ हैं, वहीं रहें, परन्तु दीवारों, छतों और दरवाजों से दूरी बनाए रखें। (3) दरारों, पलस्तर झड़ने आदि पर नजर रखें। यदि ऐसा हो तो सुरक्षित स्थान पर जाने का प्रयास करें। (4) यदि चलती कार में हों तो कार को सड़क के किनारे रोक लें, पुल या सुरंग पार न करें। (5) बिजली का मेनस्विच बन्द कर दें, गैस सिलेण्डर का रेगुलेटर बन्द करके सिलेण्डर को सील कर दें।

प्रश्न 17. सुनामी उत्पन्न होने के तीन महत्त्वपूर्ण कारण बताइए।
उत्तर–सुनामी उत्पन्न होने के तीन महत्त्वपूर्ण कारण हैं-(1) भूकम्प, (2) ज्वालामुखी विस्फोट, (3) भू-स्खलन। जब समुद्र या उनके निकटवर्ती क्षेत्रों में इनमें से किसी भी एक आपदा की आवृत्ति होती है। तो सागरों में सुनामी उत्पन्न हो जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आपदाओं का क्या अर्थ है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-आपदा प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जो व्यापक रूप से मनुष्य एवं अन्य जीव-जन्तुओं की सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यवधान डालती है। इसके कारण सम्पत्ति की भारी क्षति ही नहीं होती बल्कि अनेक लोग काल-कवलित भी हो जाते हैं।

प्राचीनकाल में विनाशकारी आपदाओं को प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ के लिए प्रकृति द्वारा दिया गया दण्ड माना जाता था, किन्तु वर्तमान में इसे एक घटना के रूप में देखा जाता है। यह घटना प्राकृतिक या मानवीय दोनों में से किसी भी कारक द्वारा उत्पन्न हो सकती है। आपदाओं और घटनाओं का निकट का सम्बन्ध है। कभी-कभी इन्हें एक-दूसरे के विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है। घटना एक आशंका है तो आपदा दु:खद घटना का एक परिणाम है। विश्व बैंक ने आपदा को इस प्रकार परिभाषित किया है-“आपदा अल्पावधि की एक असाधारण घटना है जो देश की अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से अस्त-व्यस्त कर देती है।”

प्रश्न 2. आपदाएँ कितने प्रकार की होती हैं। किसी एक प्रकार की आपदा का वर्णन कीजिए।
उत्तर–सामान्यतः आपदाएँ दो प्रकार की होती हैं
(i) प्राकृतिक आपदाएँ तथा (ii) मानवकृत आपदाएँ।
प्राकृतिक आपदाएँ-प्राकृतिक रूप से घटित वे सभी आकस्मिक घटनाएँ जो प्रलयकारी रूप धारण का मानवसहित सम्पूर्ण जैव जगत् के लिए विनाशकारी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं, प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। प्राकृतिक आपदाओं को सीधा सम्बन्ध पर्यावरण से है। पर्यावरण की समस्त प्रक्रिया पृथ्वी की अन्तर्जात एवं बहिर्जात शक्तियों द्वारा संचालित होती है। यही वे शक्तियाँ हैं जो पर्यावरण को गतिशील रखती हैं तथा विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संकट और आपदाओं के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 3. सुनामी लहरों से सुरक्षा के क्या उपाय हैं?
उत्तर–सुनामी लहरों से सुरक्षा के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. चेतावनी दिए जाने के बाद क्षेत्र को खाली कर देना चाहिए तथा जोखिम और खतरे से बचने के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेना उपयुक्त रहता है।
  2. कमजोर एवं क्षतिग्रस्त मकानों का निरीक्षण करते रहना चाहिए तथा दीवारों और छतों को अवलम्ब देना चाहिए।
  3. वास्तव में, भूकम्प एवं समुद्री लहरों जैसी प्राकृतिक आपदा से बचने का कोई विकल्प नहीं है। सावधानी, जागरूकता और समय-समय पर दी गई चेतावनी ही इसके ब्रचाव का सबसे उपयुक्त उपाय है।
  4. समुद्रतटवर्ती क्षेत्रों में मकान तटों से अधिक दूर और ऊँचे स्थानों पर बनाने चाहिए। मकान बनाने से पूर्व विशेषज्ञों की राय अवश्य लेनी चाहिए।
  5. यदि आप समुद्री लहरों से प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं तो सुनामी लहरों की चेतावनी सुनने पर मकान खाली करके किसी सुरक्षित समुद्र तट से दूर ऊँचे स्थान पर चले जाएँ। यदि आप स्थान छोड़कर जा रहे हैं तो अपने पालतू पशुओं को भी साथ ले जाएँ।
  6. बहुत-सी ऊँची इमारतें यदि मजबूत कंक्रीट से बनी हैं तो खतरे के समय इन इमारतों की ऊपरी मंजिलों को सुरक्षित स्थान के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  7. खुले समुद्र में सुनामी लहरों की हलचल को पता नहीं चलता। अत: यदि आप समुद्र में किसी नौका या जलयान पर हों और आपने चेतावनी सुनी हो, तब आप बन्दरगाह पर न लौटें क्योंकि इन समुद्री लहरों का सर्वाधिक कहर बन्दरगाहों पर ही होता है। अच्छा रहेगा कि आप समय रहते जलयान को गहरे समुद्र की ओर ले जाएँ।
  8. सुनामी आने के बाद घायल अथवा फँसे हुए लोगों की सहायता से पहले स्वयं को सुरक्षित करते हुए पेशेवर लोगों की सहायता लें और उन्हें आवश्यक सामग्री लाने के लिए कहें।

प्रश्न 4. भूस्खलन के लिए महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–सामान्यतः भूस्खलन का मुख्य कारण पर्वेतीय ढालों या चट्टानों का कमजोर होना है। चट्टानों के कमजोर होने पर उनमें प्रविष्ट जल चट्टानों को बाँध रखने वाली मिट्टी को ढीला कर देता है। यही ढीली हुई मिट्टी ढाल की ओर भारी दबाव डालती है। इस कारण मलबे के तल के नीचे सूखी चट्टानें ऊपर के भारी और गीले मलबे एवं चट्टानों का भार नहीं सँभाल पातीं, इसलिए वे नीचे की ओर खिसक जाती हैं और भूस्खलन हो जाता है। पहाड़ी ढीलों और चट्टानों के कमजोर होने तथा भूस्खलन को उत्प्रेरित करने वाले मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. भूस्खलन भूकम्पों या अचानक शैलों के खिसकने के कारण होते हैं।
  2. खुदाई या नदी-अपरदन के परिणामस्वरूप ढाल के आधार की ओर भी तेज भूस्खलन हो जाते हैं।
  3. भारी वर्षा या हिमपात के दौरान तीव्र पर्यतीय ढालों पर चट्टानों का बहुत बड़ा भाग जल तत्त्व की अधिकता एवं आधार के कटाव के कारण अपनी गुरुत्वीय स्थिति से असन्तुलित होकर अचानक तेजी के साथ विखण्डित होकर गिर जाता है, क्योंकि जल भार के कारण चट्टानें स्थिर नहीं रह सकती हैं; अत: चट्टानों पर दबाव की वृद्धि भूस्खलन का मुख्य कारण होती है।
  4. कभी-कभी भूस्खलन का कारण त्वरित भूकम्प, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, अनियमित वन कटाई तथा सड़कों का अनियोजित ढंग से निर्माण करना भी होता है।
  5. सड़क एवं भवन बनाने के लिए लोग प्राकृतिक ढलानों को सपाट स्थितियों में परिवर्तित कर देते हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों के परिणामस्वरूप भी पहाड़ी ढालों पर भूस्खलन होने लगते हैं।

प्रश्न 5. भारत के मुख्य भू-स्खलन क्षेत्र बताइए।
उत्तर-भारत के मुख्य भू-स्खलन क्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. उत्तरी-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र–इस क्षेत्र में भूस्खलन आपदा से सर्वाधिक हानि होती है, अत: इसे उच्च से अति उच्च भूस्खलन क्षेत्र कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड इसी क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

2. पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र-भारत के समस्त उत्तर-पूर्वी राज्य इस क्षेत्र में सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा ऋतु में उच्च भीषणता वाले भूस्खलन से जान-माल की अधिक हानि होती है।

3. पश्चिमी घाट तथा नीलगिरि की पहाड़ियाँ-भारत के प्रायद्वीप के पश्चिमी घाट के राज्यों का समुद्रतटीय क्षेत्र जिसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल राज्य तथा तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियों का क्षेत्र सम्मिलित है। यहाँ मध्यम से उच्च भीषणता वाला भूस्खलन होता रहता है।

4. पूर्वी घाट–पूर्वी घाट के राज्यों के तटवर्ती क्षेत्र में कभी-कभी सामान्य भूस्खलन की घटनाएँ होती | रहती हैं, जो वर्षा ऋतु में अधिक हानिकारक हो जाती हैं। भीषणता की दृष्टि से यह भारत का निम्न | भूस्खलन क्षेत्र माना जाता है।

5. विन्ध्याचल–यहाँ प्राचीन पहाड़ियों और पठारी भू-भाग वाले क्षेत्र में निम्न भीषणता वाले भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं।

प्रश्न 6. चक्रवात के न्यूनीकरण की मुख्य युक्तियाँ समझाइए।
उत्तर–चक्रवात यद्यपि अत्यन्त विनाशकारी विपत्ति है, किन्तु वर्तमान में भौतिक विकास के साथ-साथ भवन रचनाओं में तकनीकी परिवर्तनों और अन्य शमनकारी रणनीतियों द्वारा इस पर नियन्त्रण तथा क्षति न्यूनीकरण सम्भव है। चक्रवात न्यूनीकरण से सम्बन्धित मुख्य युक्तियाँ निम्नलिखित हैं–

  • चक्रवात सम्भावित क्षेत्रों में समुद्र से निकली भूमि पर नुकीली पत्तियों वाले पेड़ों की हरित पट्टी का विस्तार करनी चाहिए।
  • समुद्रतटीय भाग में विस्तृत भू-भाग पर ऊँचे चबूतरे, तटबन्ध आदि का निर्माण करना चाहिए।
  • तटीय क्षेत्रों में घास-फूस की छतों वाले कच्चे घर बनाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, बल्कि इनके स्थान पर निश्चित विशेषताओं वाले मकान ही बनाए जाएँ।
  • चक्रवात सम्भावित क्षेत्रों में सरकार को मकान बनाने के लिए समुचित मार्गदर्शन तथा ऋण सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।
  • सम्भावित क्षेत्रों में विशेष प्रकार के शरैण-स्थल बनवाए जाने चाहिए जिनसे राहत एवं बचाव दल को सुविधा प्राप्त होगी।

प्रश्न 7. 1999 के ओडिशा के भीषण चक्रवात के प्रभाव का एक स्थिति-विषयक अध्ययन कीजिए।
उत्तर–भारत का पूर्वी तटीय क्षेत्र चक्रवाती तूफानों की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील है। यहाँ ओडिशा में चक्रवाती तूफानों द्वारा कई बार भारी क्षति हो चुकी है। ऐसा ही एक भयंकर चक्रवाती तूफान 29 अक्टूबर, 1999 ई० को आया जिसकी गति 260-300 किमी प्रति घण्टा थी। इस तूफाने का प्रभाव केवल समुद्र तटों तक ही सीमित न रहा, बल्कि 250 किमी अन्दर तक इसने क्षति पहुँचाई। 36 घण्टे की अवधि में इस तूफान ने लगभग 200 लाख हेक्टेयर भूमि नष्ट कर दी और अपने पीछे बरबादी के भयावह नजारे छोड़ गया। यह महाचक्रवाती तूफान इतना विस्तृत और विनाशकारी था कि इसने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया तथा लाखों मकानों को नष्ट कर दिया।

प्रश्न 8. सूखा निवारण के दो महत्त्वपूर्ण उपाय बताइए।
उत्तर-सूखा निवारण के दो महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं

1. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षाजल का संग्रह और जल संरक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है। भारत में वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती है परन्तु वर्षाजल का समुचित उपयोग नहीं किया जाता। जल के अकुशल प्रबन्धन के कारण वर्षा का समस्त जल नदियों में बह जाता है या बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है। अतः वर्षाजल का समुचित संग्रह और प्रबन्धन कर उस जल का उपयोग सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए किया जाना चाहिए।

2. सूखाग्रस्त क्षेत्रों में हरित पट्टी को विस्तार किया जाना चाहिए। हरा-भरा पर्यावरण वातावरण-आर्द्रता के संरक्षण और जलवायु सन्तुलन का सबसे उत्तम माध्यम होता है, जिससे सूखे की समस्या पर नियन्त्रण किया जा सकता है।

प्रश्न 9. आधुनिक काल में प्राकृतिक आपदाओं के स्वरूप में आपको किस प्रकार के परिवर्तन का अनुभव होता है?
उत्तर–आपदाएँ आदि-अनादिकाल से प्रकृति के घटनाक्रम के रूप में प्रकट होती रही हैं। प्राचीनकाल में जनसंख्या अत्यन्त कम थी। दूसरे, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के उपायों का ज्ञान भी मनुष्य को नहीं था। आधुनिक काल में जनसंख्या वृद्धि के कारण मनुष्य के प्रकृति-विपरीत कार्यों में वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति में भी वृद्धि का अनुभव किया जाता है। इसके अतिरिक्त अंब मनुष्य ने अपने तकनीकी ज्ञान का विकास भी पूर्व की अपेक्षा अधिक कर लिया है। अत: यदि इन उपायों का ठीक से पालन किया जाए तो आपदाओं से होने वाली क्षति को पूर्वकाल की अपेक्षा कम किया जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आपदाओं से क्या तात्पर्य है? इनका वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-आपदा का अर्थ
आपदा प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जो व्यापक रूप से मनुष्य एवं अन्य जीव-जन्तुओं की सामान्य जीवनचर्या में भारी व्यवधाम डालती है। इसके कारण सम्पत्ति की भारी क्षति ही नहीं होती, बल्कि अनेक लोग काल-कवलित भी हो जाते हैं। इसीलिए आपदाओं को ‘सभ्यता का शत्रु’ कहा जाता है। कई सभ्यताएँ; जैसे-हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो, बेबोलोन तथा नील नदी घाटी आदि आपदाओं के कारण ही आज इतिहास की विषय-वस्तु बन गई हैं। प्राकृतिक आपदाएँ कभी-कभी इतनी त्वरित या आकस्मिक होती हैं कि इनसे सँभल पाना कठिन हो जाता है। जब इनका प्रभाव विस्तृत या क्षेत्रीय होता है तो समूचा राष्ट्र आक्रान्त हो जाता है। विश्व बैंक के अनुसार, आपदाएँ अल्पावधि की एक असाधारण घटना हैं जो देश की अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से अस्त-व्यस्त कर देती हैं। अत: आपदाएँ देश की अर्थव्यवस्था को ही नहीं, सामाजिक एवं जैविक विकास की दृष्टि से भी विनाशकारी होती हैं।

आपदा एक अनैच्छिक घटना है जो बाह्य शक्तियों के कारण मनुष्य के नियन्त्रण में नहीं है। आपदा की चेतावनी तुरन्त नहीं मिलती; यह थोड़े समय के बाद मिलती है, तब तक आपदा आ चुकी होती है, बेचाव को समय कम मिलता है जिससे जान एवं सम्पत्ति की व्यापक हानि होती है तथा संकटकालीन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है।

आपदाओं का वर्गीकरण

आपदाओं से शक्ति से निपटने के लिए उनकी पहचान एवं वर्गीकरण को एक प्रभावशाली कदम समझा जाता है। आपदाओं को सामान्यत: दो बृहत् वर्गों-(i) प्राकृतिक एवं (ii) मानवकृत आपदाओं में विभाजित किया जाता है। प्राकृतिक आपदाएँ निम्नलिखित चार प्रकारों में वर्गीकृत की जाती हैं|
1. वायुमण्डलीय-इनके अन्तर्गत बर्फानी तूफान, तड़ित झंझा, टॉरनेडो, उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात, सूखा, पाला, लू तथा शीतलहर को सम्मिलित किया जाता है।
2. भौमिक–इनमें स्थलमण्डलीय आपदाएँ शामिल हैं; जैसे—भूकम्प, भू-स्खलन, ज्वालामुखी, मृदा अपरदन तथा अवतलन आदि।
3. जलीय-जल के कारण उत्पन्न आपदाएँ जलीय प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। इनके अन्तर्गत बाढ़, ज्वार, महासागरीय घटनाएँ तथा सुनामी सम्मिलित हैं।
4. जैविक-पौधों के कीट-पतंगे, फफूद, बैक्टीरिया और वायरल संक्रमण, बर्ड फ्लू, डेंगू, मलेरिया, प्लेग आदि जैविक आपदाएँ हैं।

मानवकृत आपदाओं में वे सभी आपदाएँ आती हैं जो मानव की असावधानी या जानकारी होते हुए लापरवाही भी बरतने के कारण घटित होती हैं। इस प्रकार की आपदाएँ आकस्मिक या दीर्घ अवधि दोनों समयान्तरालों में घटित हो सकती हैं। दुर्घटना, जहरीली गैसों का रिसाव, विभिन्न प्रकार के प्रदूषण, परमाणु विस्फोट, बम विस्फोट, आन्तरिक गृह युद्ध, साम्प्रदायिक दंगे, आतंकवादी वारदात आदि मानवकृत आपदाओं के उदाहरण हैं।

प्रश्न 2. क्या प्राकृतिक आपदाएँ विश्वव्यापी होती हैं? यदि हाँ, तो विश्व स्तर पर इन्हें रोकने के क्या प्रयास हैं?
उत्तर- सामान्यत: प्राकृतिक आपदाएँ विश्वव्यापी होती हैं। ये कहीं भी, कभी भी अपने आगोश में जीवजगत को लेकर क्षतिग्रस्त कर सकती हैं। जिस ढंग से प्रत्येक सामाजिक वर्ग इनसे निपटता है वह अद्वितीय होता है, क्योंकि दो आपदाएँ न तो समान होती हैं और न ही उनमें आपस में तुलना की जा सकती है। अत: विश्व समुदाय आपदाओं से आज भी उतना ही भयभीत एवं आक्रान्त है जितना वह प्राचीन काल में था। वर्तमान में प्राकृतिक आपदाओं के परिणाम, गहनता एवं बारम्बारता और इसके द्वारा किए गए नुकसान बढ़ते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण मानव जनसंख्या में वृद्धि तो है ही, साथ ही उसका प्रकृति के प्रति शत्रुरूप में व्यवहार एवं पर्यावरण सिद्धान्त के प्रति उदासीन होना भी है। इन विचारों की पुष्टि निम्नांकित सारणी से भी होती है जो गत 60 वर्षों में 12 गम्भीर प्राकृतिक आपदाओं से विभिन्न देशो में मरने वालों की संख्या को दर्शाती है।

तालिका : विश्व के विभिन्न देशों में गत 60 वर्षों (1948 से 2005)
में प्राकृतिक आपदाओं से हुई मौतें

UP Board Solutions for Class 11Geography Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters  (प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ) img 2
स्रोत: *यूनाइटेड नेशन्स इन्वारनमेण्टल प्रोग्राम (यू०एन०ई०सी०) 1991.
**राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान की न्यूज़ रिपोर्ट, भारत सरकार, नई दिल्ली। वास्तव में आपदा द्वारा पहुँचाई गई क्षति के परिणाम भू-मण्डलीय प्रतिघाते हैं और अकेले किसी राष्ट्र में इतनी क्षमता नहीं है कि वह इन्हें सहन कर सके। इसलिए 1989 में संयुक्त राष्ट्र सामान्य असेम्बली में इस मुद्दे को उठाया गया था और मई 1994 में जापान के याकोहामा नगर में आपदा प्रबन्ध की विश्व कॉन्फ्रेंस में इसे औपचारिकता प्रदान कर दी गई थी। बाद में इसी प्रयास को योकोहामा रणनीति तथा अधिक सुरक्षित संसार के लिए कार्ययोजना कहा गया।

इसी प्रयास के अन्तर्गत 1990-2000 को आपदा न्यूनीकरण का अन्तर्राष्ट्रीय दशक भी घोषित किया गया।

प्रश्न 3. आपदाओं के न्यूनीकरण एवं प्रबन्धन के उपायों की एक योजना प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर—यद्यपि आपदाएँ जीव-जन्तुओं के लिए सामान्य रूप से तथा मानव समुदाय के लिए मुख्य रूप से संकटापन्न होती हैं, परन्तु प्राकृतिक संरचनाओं की दृष्टि से प्राकृतिक आपदाएँ कतिपय लाभदायक भी होती हैं; जैसे—बाढ़ द्वारा बाढ़कृत मैदान का निर्माण जिसकी मिट्टी पोषक तत्वों से युक्त होने के कारण अत्यन्त उपजाऊ होती है। ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाली राख और लावा काली मिट्टी का निर्माण करता है। जो कपास की कृषि के लिए आवश्यक होती है। इसी प्रकार, भू-स्खलन से क्षेत्र में झील का निर्माण तथा भूकम्प के कारण भूमिगत जल के प्रवाह अवरोध से जलभर (Aquifer) (पारगम्य शैल की परत जिसमें जल भरा रहता हो) का निर्माण हो जाता है जो उन क्षेत्रों की जलापूर्ति में सहायक है। इस प्रकार, प्राकृतिक आपदाएँ एक ओर प्रकृति का वरदान हैं तो दूसरी ओर मानव की असावधानी और प्रकृति-विरुद्ध कार्यों में वृद्धि के कारण मानव समुदाय के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप हैं। इसलिए प्राकृतिक और मानवजनित । दोनों ही प्रकार की आपदाएँ जन-धन की क्षति की दृष्टि से अत्यन्त कष्टकारी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं। अत: मानव हित में आपदाओं के न्यूनीकरण एवं प्रबन्धन महत्त्वपूर्ण हैं। प्रबन्ध के लिए निम्नलिखित तीन स्थितियों पर योजना बनाने की आवश्यकता है

1. आपदापूर्व प्रबन्धन योजना-आपदापूर्व प्रबन्धन का अर्थ किसी आपदा या विपत्ति से होने वाले जोखिम को न्यूनतम करने का पूर्व प्रयास है। इसके अन्तर्गत विपत्ति का सामना करने की पूर्ण तैयारी, जनजागरूकता और आपदा न्यूनीकरण के उपायों हेतु योजना बनाई जाती है। पूर्ण तैयारी में आपदा प्रभावित क्षेत्रों की पहचान एवं जोखिम का मूल्यांकन और प्रभाव का पूर्वानुमान लगाया जाता है, फिर इसके आधार पर अन्य तैयारी की रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें पूर्व सूचना प्रणाली को विकसित करना, संसाधन प्रबन्धन पर ध्यान देते रहना और सहायता के लिए अभ्यास करते, रहना आवश्यक है।

2. आपदा के समय प्रबन्धन योजना-आपदा के समय प्रबन्धन से यह अभिप्राय है कि आपदा के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचकर बचाव कार्यों को तत्काल शुरू किया जाए और प्रभावित मानव समुदाय की विभिन्न प्रकार से सहायता की जाए। इस अवधि में मुख्य ध्यान खोज और बचाव तथा राहत सामग्री के उचित रूप से प्रबन्ध एवं वितरण पर दिया जाना आवश्यक है।

3. आपदा के पश्चात् प्रबन्धन योजना-आपदा के पश्चात् पुनर्वास, पुनर्लाभ और विकास कार्यों से सम्बन्धित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इस समय नीति निर्धारकों की अहम् भूमिका होती है। उन्हें वर्तमान में हुई आपदा से क्षतिपूर्ति को पूरा करने के लिए उचित वितरण प्रणाली के साथ-साथ मानक तकनीकों के अनुसार ही विकास कार्यों को पूरा करना चाहिए। इसी अवसर पर आपदापूर्व, प्रबन्धन के अन्तर्गत स्थापित आपात कोष तथा जोखिम स्थानान्तरण संस्थाओं (बीमा कम्पनी) के कार्यों का पूरा उपयोग करते हुए राहत एवं पुनर्वास कार्यों में सहयोग प्रदान करना होता है। अत: आपदा निवारण हेतु आपदा न्यूनीकरण प्रबन्धन को न केवल जीवन के अंग के रूप में बल्कि आवश्यक जीवन रक्षा कौशल के रूप में अपनाकर अपनी और प्रियजनों की सुरक्षा के लिए तत्पर रहना और जनसामान्य को तैयार करना ही सर्वोत्तम उपाय है।।

प्रश्न 4. भूकम्प क्यों आते हैं? भारत में इसके गहनता क्षेत्र बताइए। इस आपदा से होने वाली क्षति | को किस प्रकार न्यूनतम किया जा सकता है?
उत्तर-हमारी पृथ्वी गतिशील सक्रिय ग्रह है। इसकी सबसे ऊपरी सतह क्रस्ट का निर्माण विशाल प्रस्तरीय प्लेटों से हुआ है। विशाल प्रस्तरीय प्लेटें अति प्रत्यास्थ एवं सान्द्र प्रकृति की भीतरी सतह, मैंटिल में उत्पन्न संवहन तरंगों के कारण निरन्तर गतिशल, संघनित एवं प्रसारित होती रहती हैं। इन भू-विवर्तनिकी गतियों के कारण भू-भाग कहीं संकुचित हो जाते हैं तो कहीं परस्पर टकराते हैं और प्रसारित होते हैं, जिससे पृथ्वी पर . कम्पन उत्पन्न होने से भूकम्प आते हैं। अतः भूकम्प का प्रमुख कारण पृथ्वी की प्लेटों का गतिशील होना है। इस गतिशीलता के परिणामस्वरूप भूगर्भीय ऊर्जा का निष्कासन होता है, तभी भूकम्प का अनुभव किया जाता है।

भारत के भूकम्पीय कटिबन्धीय क्षेत्र या वितरण

राष्ट्रीय भू-भौतिकी प्रयोगशाल, भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण, मौसम विज्ञान विभाग तथा कुछ समय पूर्व बने राष्ट्रीय प्रबन्धन संस्थान ने भारत में आए 1,200 भूकम्पों के गहन विश्लेषण के आधार पर देश को निम्नलिखित 5 भूकम्पीय क्षेत्रों (Zones) में बाँटा है

1. अत्यधिक क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-V)-इसमें हिमालय पर्वतश्रेणी, नेपाल, बिहार सीमावर्ती क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी उत्तराखण्ड, देश के उत्तर-पूर्वी राज्य तथा कच्छ प्रायद्वीप और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सम्मिलित हैं।
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2. अधिक क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-IV)-इसके अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, . उत्तराखण्ड (उत्तर-पश्चिमी एवं दक्षिणी भाग), उत्तर प्रदेश.एवं बिहार के उत्तरी मैदानी भाग तथा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं।

3. मध्य क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-II)—इस क्षेत्र का विस्तार उत्तरी प्रायद्वीपीय पठार पर अधिक है।

4. निम्न क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-1)-इसमें उत्तर-पश्चिमी राजस्थान, मध्य प्रदेश का उत्तरी | भाग, पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी ओडिशा तथा प्रायद्वीप के आन्तरिक भाग सम्मिलित हैं।

5. अति निम्न क्षति जोखिम क्षेत्र (जोन-I)-इसके अन्तर्गत जोन II के अन्तर्गत सम्मिलित क्षेत्र के आन्तरिक भाग सम्मिलित हैं।

भूकम्प आपदा से सुरक्षा के उपाय – भूकम्प आपदा से सुरक्षा के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं

  1. भूकम्परोधी भवनों का निर्माण किया जाए।
  2. जनसामान्य को भूकम्प आपदा की जानकारी प्रदान की जाए तथा सुरक्षात्मक प्रशिक्षण दिया जाए।
  3. भूकम्प के दौरान घर की छत, दीवार, दरवाजे और खिड़कियों से दूर रहा जाए।
  4. यदि आप घर से बाहर हैं तो खुले मैदान में रहने का प्रयास करें।
  5. ऐसे समय पर घबराएँ नहीं, साहस रखें और बिजली के खम्भों एवं ज्वलनशील पदार्थों से दूर रहें।

प्रश्न 5. सुनामी लहरें क्या हैं? सुनामी लहरों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–प्राकृतिक आपदाओं में समुद्री लहरें अर्थात् सुनामी सबसे अधिक विनाशकारी आपदा है। सुनामी जापानी मूल का शब्द है जो दो शब्दों सु (बन्दरगाह) और ‘नामी’ (लहर) से बना है अर्थात् सुनामी का अर्थ है—बन्दरगाह की ओर आने वाली समुद्री लहरें। इन लहरों की ऊँचाई 15 मीटर या उससे अधिक होती है । और ये तट के आस-पास की बस्तियों को तबाह कर देती हैं। सुनामी लहरों के कहर से पूरे विश्व में हजारों लोगों के काल-कवलित होने की घटनाएँ इतिहास में दर्ज हैं। भारत तथा उसके निकट समुद्री द्वीपीय देश श्रीलंका, थाईलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार आदि में 26 दिसम्बर, 2004 को इसी प्रलयकारी सुनामी ने करोड़ों की सम्पत्ति का विनाश कर लाखों लोगों को काल का ग्रास बनाया था।

समुद्री लहरों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्य

  1.  सुनामी लहरें अत्यधिक शक्तिशाली होती हैं। इनकी भयावह शक्ति से कई टन वजन की विशाल चट्टान, नौका तथा अन्य प्रकार का मलबा मुख्य भूमि में कई मीटर अन्दर पॅस जाता है।
  2. तटवर्ती मैदानी इलाकों में सुनामी की गति 50 किमी प्रति घण्टा हो सकती है।
  3. कुछ सुनामी लहरों की गति वृहदाकार होती है। तटीय क्षेत्रों में इनकी ऊँचाई 10 से 30 मीटर तक हो सकती है।
  4. समुद्री लहरें एक के बाद एक आती रहती हैं। प्रायः पहली लहर इतनी विशाल नहीं होती। पहली लहर आने के बाद कई घण्टों तक आने वाली लहरों का खतरा बना रहता है। कभी-कभी समुद्री लहरों के कारण समुद्र तट का पानी घट जाता है और समुद्र तल नजर आने लगता है। इसे प्रकृति | की ओर से सुनामी आने की चेतावनी समझना चाहिए।
  5. ये लहरें दिन या रात में कभी भी आ सकती हैं। जलधाराओं या समुद्रों में मिलने वाली नदियों में प्रवेश करने पर सुनामी लहरें उफान पैदा कर देती हैं।
  6. भूकम्प के कारण उत्पन्न समुद्री लहरें कई सौ किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से तट की ओर दौड़ती हैं और भूकम्प आने के कई घण्टों बाद ही तट तक पहुँचती हैं।
  7. गहरे समुद्र में सुनामी लहरों की उत्पत्ति के समय समुद्र में कोई हलचल न होने के कारण ये दिखाई नहीं देतीं। उत्पत्ति के समय इन लहरों की लम्बाई 100 किमी तक होने के बावजूद बीच समुद्र में ये लहरें बहुत ऊँची नहीं उठतीं और कई सौ किमी की रफ्तार से दौड़ती हैं।

सुनामी लहरें अपनी इसी विशाल ऊर्जा के कारण बड़ी तेज रफ्तार से सागर तक पहुँचने में सक्षम होती हैं। इनकी रफ्तार समुद्र की गहराई के साथ बढ़ती जाती है, जबकि उथले सागर में रफ्तार कम होती है। यही कारण है कि समुद्र तट के पास पहुँचने पर सागर की गहराई अचानक कम होने पर लहरों की रफ्तार कम हो जाती है, परन्तु पीछे से तेजी से आती लहरें एक के ऊपर एक सवार होकर लहरों की ऊँची दीवार बना देती हैं। इसी ऊँचाई और ऊर्जा का घातक मेल सागर तटों पर तबाही का कारण बनता है।

प्रश्न 6. सुनामी लहरों की उत्पत्ति क्यों होती है? इनसे प्रभावित क्षेत्र बताइए।
उत्तर-सुनामी लहरों की उत्पत्ति के कारण
विनाशकारी समुद्री लहरों (सुनामी) की उत्पत्ति भूकम्प, भू-स्खलन तथा ज्वालामुखी विस्फोटों का परिणाम है। हाल के वर्षों के किसी बड़े क्षुद्रग्रह (उल्कापात) के समुद्र में गिरने को भी समुद्री लहरों का कारण माना जाता है। वास्तव में, समुद्री लहरें इसी तरह उत्पन्न होती हैं, जैसे तालाब में कंकड़ फेंकने से गोलाकार लहरें किनारों की ओर बढ़ती हैं। मूल रूप से इन लहरों की उत्पत्ति में सागरीय जल का बड़े पैमाने पर विस्थापन ही प्रमुख कारण है। भूकम्प या भू-स्खलन के कारण जब कभी भी सागर की तलहटी में कोई बड़ा परिवर्तन आता है या हलचल होती है तो उसे स्थान देने के लिए उतना ही ज्यादा समुद्री जल अपने स्थान से हट जाता है (विस्थापित हो जाता है) और लहरों के रूप में किनारों की ओर चला जाता है। यही जल ऊर्जा के कारण लहरों में परिवर्तित होकर ‘सुनामी लहरें” कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि समुद्री लहरें सागर में आए बदलाव को सन्तुलित करने का प्राकृतिक प्रयास मात्र हैं।

पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इन समुद्री लहरों को ‘भूगर्भिक बम’ कहते हैं। सन् 1949 में ला–पाल्का आइलैण्ड के उत्तरी तटीय भाग में एक ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था। यह विस्फोट इतनी तीव्र था कि ज्वालामुखी बीच से ही आधा चिटक गया था, किन्तु यह चिटका हुआ भागे समुद्री में नहीं गिरा था अन्यथा वहाँ भी अकल्पनीय विनाशकारी समुद्री लहरें उत्पन्न हो सकती थीं। अब वैज्ञानिकों का मानना है। कि जब भी यह ज्वालामुखी जाग्रत होगा तब 50 अरब टन का ज्वालामुखी का चिटका हुआ आधा हिस्सा अटलाण्टिक महासागर में गिरकर विनाशकारी समुद्री लहरें उत्पन्न कर देगा। समुद्री लहरों से यद्यपि प्रशान्त महासागर के तटीय भाग सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं, परन्तु अटलाण्टिक एवं हिन्द महासागर में भी तटवर्ती भूकम्प एवं ज्वालामुखी मेखलाओं में सुनामी लहरों को कहर होता रहता है।

सुनामी प्रभावित क्षेत्र ।

यद्यपि विश्व के सभी समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों को सुनामी प्रभावित क्षेत्रों के अन्तर्गत रखा जा सकता है, किन्तु भूकम्प संवेदनशील क्षेत्र सुनामी की दृष्टि से अधिक प्रभावशाली होते हैं। विश्व में प्रशान्त महासागर तटवर्ती क्षेत्र, जहाँ भूकम्प आने की सम्भावनाएँ अधिक विद्यमान हैं, में सुनामी का सर्वाधिक जोर रहता है। यह भाग भूकम्प और ज्वालामुखियों की सर्वप्रमुख मेखलाओं से घिरा है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग दो बार सुनामी का प्रकोप हो जाता है। अत: प्रशान्त महासागरीय तट पर, जिसमें अलास्का, जापान, फिलिपीन्स, दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे द्वीप इण्डोनेशिया और मलेशिया तथा हिन्द महासागर में म्यांमार, श्रीलंका और भारत के तटीय भाग सुनामी प्रभावित मुख्य क्षेत्र हैं।

प्रश्न 7. भू-स्खलन क्या है? इसके लिए उत्तरदायी कारक कौन-कौन से हैं? भारत में इसके प्रभाव
एवं प्रभावित क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-भू-स्खलन का अर्थ, प्रभाव एवं प्रभावित क्षेत्र ।
पर्वतीय ढालों का कोई भाग जब जल तत्त्व भार की अधिकता एवं आधार चट्टानों के कटाव के कारण अपनी गुरुत्वीय स्थिति से असन्तुलित होकर अचानक तीव्रता के साथ सम्पूर्ण अथवा विच्छेदित खण्डों के रूप में गिरने लगता है तो यह घटना भू-स्खलन कहलाती है। भू-स्खलन प्रायः तीव्र गति से आकस्मिक उत्पन्न होने वाली प्राकृतिक आपदा है। भौतिक क्षति और जन-हानि इसके दो प्रमुख दुष्प्रभाव हैं। भू-स्खलन अपने मार्ग में आने वाले प्रत्येक पदार्थ-मानव बस्तियों, खेत-खलियान, सड़क आदि सभी को नष्ट कर देता है। भू-स्खलन से नदी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं जिससे नदी के ऊपरी भाग में बाढ़ आ जाती है। कभी-कभी किसी क्षेत्र में बड़ी झील बन जाती है जिसके टूटने पर त्वरित बाढ़ से भारी तबाही होती है। भू-स्खलन मानव समुदाय पर कहर बरसाने वाली प्रकृतिक आपदा है। भारत में इस आपदा का रौद्र रूप हिमालय पर्वतीय प्रदेश एवं पश्चिमी घाट में बरसात के दिनों में अधिक देखा जाता है। वस्तुतः हिमालय प्रदेश युवावलित पर्वतों से बना है, जो विवर्तनिक दृष्टि से अत्यन्त अस्थिर एवं संवेदनशील भू-भाग है। यहाँ की भूगर्भिक संरचना भूकम्पीय तरंगों से प्रभावित होती रहती है। इसलिए यहाँ भू-स्खलन की घटनाएँ अधिक होती रहती हैं।
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भू-स्खलन के लिए उत्तरदायी कारक

भू-स्खलन के लिए कई प्राकृतिक एवं मानवीय कारक उत्तरदायी होते हैं। इन कारकों की गहनता ही भू-स्खलन की तीव्र उत्पत्ति के कारणों को प्रभावी बनाती है। सामान्यतः भू-स्खलन के लिए निम्नलिखित कारक अधिक उत्तरदायी माने जाते हैं—
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प्रश्न 8. उत्तराखण्ड राज्य के भूस्खलन सुभेद्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए तथा इसकी क्षति के न्यूनीकरण की युक्तियाँ बताइए।
उत्तर-उत्तराखण्ड के भूस्खलन सुभेद्य क्षेत्र
उत्तराखण्ड राज्य का भू-स्खलन प्रभावशाली की दृष्टि से विश्व में चौथा स्थान है। यहाँ लगभग 1200 से अधिक गाँवों को भू-स्खलन सुभेद्य क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है। हैदराबाद स्थित सुदूर संवेदन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इनमें से अधिकांश गाँव ऋषिकेश-बद्रीनाथ-गंगोत्री-केदारनाथ मार्ग पर स्थिति हैं। एन०आर०एस० के लैण्ड हेजार्ड जोनेशन मानचित्र के आधार पर अलकनन्दा घाटी में 137, गंगा-अलकनन्दा घाटी में 24, गंगा-चन्द्रप्रभा घाटी में 25, गंगा घाटी में 21 तथा बेतसुथी नदी के निकट 23 गाँव संवेदनशील हैं। रुद्रप्रयाग-ऊखीमठ-केदारनाथ क्षेत्र के 60 तथा पिथौरागढ़-मालपा मार्ग के 13 गाँव अति संवेदनशील बताए गए हैं। राज्य के आपदा प्रबन्धन एवं न्यूनीकरण केन्द्र के अनुसार भी ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर लगभग 600, रुद्रप्रयाग-ऊखीमठ-केदारनाथ मार्ग पर 200, पिथौरागढ़-मालपा मार्ग पर 150 तथा उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग पर 275 गाँव भू-स्खलन सुभेद्य क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

न्यूनीकरण की युक्तियाँ
भूस्खलन के न्यूनीकरण हेतु निम्नलिखित युक्तियाँ महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती हैं।

1. नियोजित भूमि उपयोग–नियोजित भूमि उपयोग भू-स्खलन न्यूनीकरण की महत्त्वपूर्ण युक्ति है। इसके अन्तर्गत विभिन्न कार्यों के लिए उपयुक्त भूमि का चुनाव सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यदि मकानों का निर्माण सुरक्षित स्थानों पर किया जाए तथा वनस्पति के लिए निर्धारित अनुपात में भूमि का उपयोग हो तो भू-स्खलन का जोखिम कम हो जाता है।

2. प्रतिधारण दीवारों का निर्माण-भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों के किनारे तीव्र ढाल को रोकने के लिए विशेष प्रकार की प्रतिधारण दीवारों का निर्माण किया जाता है। रेल लाइनों के लिए बनाई गई सुरंग तथा मार्ग के किनारे काफी दूर तक इन दीवारों को बनाने से पर्वतीय ढाल से आने वाले मलबे को रोका जा सकता है।

3. स्थलीय जल प्रवाह को नियन्त्रित करना-वर्षा तथा अन्य स्रोतों से बहने वाले जल के निकास की उचित व्यवस्था करने से जल तत्त्व चट्टानों पर अपना दबाव नहीं बनाता है। इसीलिए आधार चट्टानें सुरक्षित रहती हैं, जिससे भू-स्खलन की सम्भावनाओं में कमी आती है।

4. इन्जीनियरी संरचना–कुशल अभियन्ताओं द्वारा निर्धारित मानकों के आधार पर भवनों की संरचनाएँ अधिक टिकाऊ होती हैं। अतः भू-स्खलन सम्भावित क्षेत्रों में कुशल इंजीनियरों के मार्गदर्शन में ही भवनों का निर्माण किया जाना उपयुक्त है।

5. वनस्पति आवरण-भू-स्खलन को नियन्त्रित एवं न्यूनतम करने में वनस्पति आवरण सबसे सरल और सस्ता उपाय है। इसके द्वारा चट्टानों को सुरक्षा कवच प्राप्त होता है तथा चट्टानें जल तत्त्व के प्रभाव से मुक्त रहकर भू-स्खलन से प्रेरित नहीं होती हैं।

प्रश्न 9. बाढ़ तबाही से आप क्या समझते हैं। इसके उत्पन्न होने के क्या कारण हैं? भारत के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-बाढ़ का सामान्य अर्थ स्थलीय भाग का कई दिनों तक जलमग्न होना है। सामान्य तौर पर बाढ़ की स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब जल नदी के किनारों के ऊपर प्रवाहित होते हुए विस्तृत क्षेत्र में फैल जाता है। वास्तव में, बाढ़ प्राकृतिक पर्यावरण की एक विशेषता है जिसे जलीय-चक्र का संघटक माना जाता है, किन्तु जब वह लगातार तीव्र गति से कई दिनों तक बनी रहती है तो इसी प्रक्रिया को बाढ़ तबाही या बाढ़ आपदा कहा जाता है।

बाढ़ प्रकोप के कारण

यद्यपि बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है जिसके लिए कई प्राकृतिक कारण उत्तरदायी हैं, किन्तु वर्तमान में उन कारकों को उत्तेजित करने में मानवीय कारकों का विशेष योगदान है। अतः बाढ़ प्राकृतिक एवं मानवजनित कारकों का सम्मिलित परिणाम है। संक्षेप में इन कारणों का वर्णन निम्नांकित है

1. अत्यर्थिक वर्षा-लम्बी अवधि तक घनघोर वर्षा का होना नदियों की बाढ़ के लिए सर्वप्रथम कारक है। नदियों के ऊपरी जल-ग्रहण क्षेत्रों में घनघोर वर्षा के कारण निचले भागों में जल के आयतन में आकस्मिक वृद्धि हो जाती है, जिस कारण नदियों में अपार जलराशि प्रवाहित होकर आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न कर देती है।

2. पर्यावरण हास-मानव द्वारा प्रकृति के कार्यों में अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण पर्यावरण ह्रास या विनाश की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, जो बाढ़ का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों तथा अन्य सभी भागों में तेजी से वन-विनाश हो रहा है। इसलिए भूमि कटाव अधिक होता है। जो नदियों के तल को ऊँचा कर देता है। अत: वर्षा के समय जल नदी के किनारों से बाहर आकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देता है।

3. भू-स्खलन-पर्वतीय क्षेत्रों में भू-स्खलन होने से नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है तथा बड़े-बड़े जलाशय बन जाते हैं। जब कभी अनाचक जलाशय टूटते हैं या नदी का मार्ग खुलता है तो • प्रलयकारी बाढ़ आ जाती है। इस प्रकार की बाढ़ का वेग इतना तीव्र होता है कि वह बड़ी-से-बड़ी बस्ती का अस्तित्व समाप्त कर देती है। उत्तराखण्ड की गंगा घाटी में 1978 में डबरानी तथा 1992 में गंगवाड़ी में इसी कारण बाढ़ आई थी।

4. बाँध या तटबन्ध का टूटना-कभी-कभी अचानक बाँध या नदी के तटबन्ध टूट जाते हैं जिससे प्रचण्ड बाढ़ आ जाती है। 1984 में पूर्वी कोसी नदी का तटबन्ध टूटने के कारण ही बाढ़ की भयावह स्थिति उत्पन्न हुई थी।

5. नगरीकरण-बढ़ता अनियोजित नगरीकरण मानवजनित बाढ़ आपदा का प्रमुख कारण है। नगरीकरण के परिणामस्वरूप भूमि अभाव के कारण निम्न भूमि क्षेत्रों के उपयोग से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र

विश्व में बांग्लादेश के बाद भारत सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित देश है। भारत में बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा असम को प्रतिवर्ष बाढ़ का सामना करना पड़ता है। ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना, राजस्थान व पंजाब को भी कभी-कभी बाढ़ का सामना करना पड़ता है। पर्यावरण में आए परिवर्तनों के कारण तो राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों को विगत कुछ वर्षों से बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। देश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

1. प्रमुख बाढ़ प्रभावित क्षेत्र—भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा की द्रोणी, असम में ब्रह्मपुत्र की द्रोणी तथा ओडिशा में वैतरणी, ब्राह्मणी और स्वर्ण रेखा नदियों की द्रोणियाँ भारत के सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं (चित्र में देखें)। देश की कुल बाढ़ आपदा की लगभग 60% हानि केवल गंगा के जल-प्रवाह क्षेत्रों में होती है। पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष बाढ़ आपदा से सर्वाधिक हानि होती है।
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2. गौण बाढ़ प्रभावित क्षेत्र देश के सामान्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात और राजस्थान राज्य आते हैं। इन राज्यों में 1976-77 के बीच बाढ़ आपदा में देश की कुल बाढ़ क्षति का आधा हिस्सा थी। 1993 की बाढ़ द्वारा पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में 423 व्यक्तियों की मृत्यु तथा लगभग 20 हजार पशु-सम्पदा क्षतिग्रस्त हो गई थी।

प्रश्न 10. भारत में चक्रवात प्रभावित क्षेत्रों मुंख्य वाओं का उल्लेख कीजिए तथा इस आपदा से सुरक्षा के उपाय बताइए।
उत्तर-भारत में, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों के तटीय क्षेत्र चक्रवात प्रभावित क्षेत्र हैं (चित्र)।

UP Board Solutions for Class 11Geography Indian Physical Environment Chapter 7 Natural Hazards and Disasters  (प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ) img 6

भारत विश्व के उन 6 प्रमुख क्षेत्रों में सम्मिलित है जहाँ प्रतिवर्ष उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आते हैं। यद्यपि 1999 के चक्रवात को सुपर साइक्लोन कहा जाता है। इस चक्रवात की गति 250 किमी प्रति घण्टा थी। ओडिशा राज्य में करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो गई थी तथा हजारों की संख्या में लोग काल के ग्रास बन गए थे, किन्तु भारत के आपदा इतिहास के इसके अतिरिक्त भी अन्य अनेक विनाशकारी चक्रवाती तूफानों का आगमन होता रहा है। आन्ध्र प्रदेश के समुद्रतटीय भाग पर 9 मई, 1990 को आया चक्रवात, सन् 1977 के विनाशंकारी चक्रवाते की अपेक्षा लगभग 25 गुना अधिक शक्तिशाली था। इसमें 1000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई थी तथा लगभग 30 लाख लोग बेघर हो गए थे। भारत में चक्रवाती तूफानों के कारण मृत व्यक्तियों का ऐतिहासिक परिदृश्य तालिका से स्पष्ट होता है जिसमें 1737 से 1999 तक मानवे क्षति को दर्शाया गया है

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चक्रवाती आपदा से सुरक्षा के महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं
1. मजबूत एवं ऊँचे मकानों का निर्माण-चक्रवाती तूफानों से प्रभावित समुद्रतटीय क्षेत्रों में फूस की | छतों वाले या कमजोर मकान बनाने पर प्रतिबन्ध होना चाहिए। इसके स्थान पर निर्धारित मानक वाले तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सुझाई विधियों के आधार पर ही मकान बनाने की अनुमति होनी चाहिए। इन क्षेत्रों में ऊँचे टीलों या बल्लियों (मचान) पर घर बनानी अधिक सुरक्षित होता है। चक्रवाती तूफानों से तेज गतिं वाली हवाएँ और समुद्री लहरें उठती रहती हैं जिससे तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं। अतः आवास-स्थल का चयन अत्यन्त सावधानीपूर्वक करना अत्यन्त
आवश्यक है। चक्रवात सम्भावित क्षेत्रों में नक्शे के आधार पर ठोस आधार वाली सन्तुलित इमारतें | सर्वाधिक सुरक्षित रहती हैं।

2. चक्रवातरोधी ढाँचों का निर्माण-हवाओं और मूसलाधार वर्षा के वेग को झेल सकने के लिए समुद्रतटीय भागों में चक्रवातरोधी ढाँचों का निर्माण किया जाना चाहिए। ये ढाँचे निर्धन जनता द्वारा नहीं बनाए जा सकते। इसलिए सरकार द्वारा इन्हें बनाने में विशेष आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाना चाहिए।

3. शरणस्थलों का विकास-चक्रवाते सम्भावित क्षेत्रों में सरकार को चक्रवात शरणस्थलों की | व्यवस्था करनी चाहिए। ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश राज्यों को इस प्रकार के शरणस्थलों के विकास | पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता है।

4. विशेष प्रकार के वृक्षों की हरित पटेर्यों का विस्तार-चक्रवातों और पवनों के वेग को कम | करने की सबसे कारगर रणनीति ऐसे विशेष पेड़ लगाए जाना है, जिनकी जड़े मजबूत तथा पत्तियाँ सुई जैसी हों। इन पेड़ों को उखड़ने से बचाने के लिए उनके चारों ओर बाड़े लगाई जानी चाहिए। वृक्षों की ऐसी हरित पट्टियाँ पूरे तटीय क्षेत्र में बनाई जानी चाहिए।

मानचित्र कार्य

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मानचित्र-2
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions (अपचयोपचय अभिक्रियाएँ)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions (अपचयोपचय अभिक्रियाएँ).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्पीशीज में प्रत्येक रेखांकित तत्व की ऑक्सीकरण संख्या का निर्धारण कीजिए-
(क) NaH2PO4
(ख) Na HSO4
(ग) H4P2O7
(घ) K2MnO4
(ङ) CaO2
(च) NaBH4
(छ) H2S2O7
(ज) KAl(SO4).12H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-1
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactions img-2
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-2

प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों के रेखांकित तत्वों की ऑक्सीकरण संख्या क्या है तथा इन परिणामों को आप कैसे प्राप्त करते हैं?
(क) KI3
(ख) H2S4O6
(ग) Fe3O4
(घ) CH2CH2OH
(ङ) CH3COOH
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-3
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-4
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-5
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-6

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं का अपचयोपचय अभिक्रियाओं के रूप में औचित्य स्थापित करने का प्रयास कीजिए–
(क) CuO(s)+ H2(g) + Cu(s) + H2O(g)
(ख) Fe2O3(s) + 3CO(g)—-→ 2Fe(s) + 3CO2(g)
(ग) 4BCl3(g) + 3LiAlH4(s) → 2B2H6(g) + 3LiCl(s) + 3AlCl3(s)
(घ) 2K(s) + F2(g) → 2K+F (s)
(ङ) 4NH3(g) + 5O2(g) → 4NO(g) + 6H2O(g)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-7
इस अभिक्रिया में, Cu की ऑक्सीकरण अवस्था +2(CuO में) से घटकर शून्य (Cu में) हो जाती है जबकि H की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य (H2 में) से बढ़कर +1(H2O में) हो जाती है। इसलिए अभिक्रिया में CuO का अपचयन तथा H का ऑक्सीकरण हो रहा है। अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-8
इस अभिक्रिया में, Fe2O3 का अपचयन हो रहा है क्योंकि Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +3(Fe2O3 में) से घटकर शून्य (Fe में) हो जाती है। CO का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि C की ऑक्सीकरण अवस्था +2 (CO में) से बढ़कर +4 (CO,2में) हो जाती है। अत: यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया (redox reaction) है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-9
इस अभिक्रिया में, BCl3 का अपचयन हो रहा है क्योकि B की ऑक्सीकरण अवस्था +3 (BCl3 में) से घटकर -3 (B2H6 में) हो जाती है तथा LiAlH4 का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योकि H की ऑक्सीकरण अवस्था -1(LiAlH4 में) से बढ़कर +1 (B2H6 में) हो जाती है। अतः यह एक अपचयोपचय (redox) अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-10
इस अभिक्रिया में, K का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था शून्य से बढ़कर +1 हो जाती है तथा F को अपचयन हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था । शून्य से घटकर -1 हो जाती है। अत: यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-11
इस अभिक्रिया में, NH3 को ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था -3 से बढ़कर +2 हो जाती है तथा O2 का अपचयन हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण अवस्था शून्य से घटकर -2 (H2O में) हो जाती है। अतः यह एक अपचयोपचय (redox) अभिक्रिया है।

प्रश्न 4.
फ्लुओरीन बर्फ से अभिक्रिया करके यह परिवर्तन लाती है
H2O(s) + F2(g) → HF(g) + HOF(g)
इस अभिक्रिया का अपचयोपचय औचित्य स्थापित कीजिए।
उत्तर
H2O(s) + F (g) → HF(g) + HOF (g)
इस अभिक्रिया में, F2 का अपचयन के साथ-साथ ऑक्सीकरण भी हो रहा है क्योंकि यह H (वैद्युत धनात्मक तत्त्व) को जोड़कर HF बनाती है तथा 0 (एक वैद्युत ऋणात्मक तत्त्व) को जोड़कर HOF बनाती है। अत: यह एक ऑक्सीकरण अपचयन अभिक्रिया (redox reaction) है।

प्रश्न 5.
H2SO5, Cr2O2-7 तथा NO3 में सल्फर, क्रोमियम तथा नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए। साथ ही इन यौगिकों की संरचना बताइए तथा इसमें हेत्वाभास | (fallacy) का स्पष्टीकरण दीजिए।
उत्तर
(i) H2SO5 में S की ऑक्सीकरण संख्या :
(+1)x2 + (x) + [(-2)x5]= 0
अथवा x= 10-2= +8
S की ऑक्सीकरण संख्या +8 सम्भव नहीं है क्योंकि s के बाह्य कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं और उसकी अधिकतम ऑक्सीकरण संख्या +6 हो सकती है। अत: H, SO में दो ऑक्सीकरण परमाणुओं को एक-दूसरे से जुड़ा होना चाहिए। इस हेत्वाभास (fallacy) को H2SO4 की निम्नलिखित संरचना द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-12
(ii) Cr2O2-7 में Cr की ऑक्सीकरण संख्या :
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-13
(iii) NO3 में N की ऑक्सीकरण संख्या :
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-14
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-15

प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र लिखिए-
(क) मर्करी (II) क्लोराइड
(ख) निकिल (II) सल्फेट
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड
(घ) थैलियम (I) सल्फेट
(ङ) आयरन (II) सल्फेट
(च) क्रोमियम (III) ऑक्साइड
उत्तर
(क) HgCl2
(ख) NiSO4
(ग) SnO2
(घ) Th2SO4
(ङ) Fe2(SO4 )3
(च) Cr2O7

प्रश्न 7.
उन पदार्थों की सूची तैयार कीजिए जिनमें कार्बन-4 से +4 तक की तथा नाइट्रोजन-3 से +5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-16

प्रश्न 8.
अपनी अभिक्रियाओं में सल्फर डाइऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड ऑक्सीकारक तथा अपचायक-दोनों ही रूपों में क्रिया करते हैं, जबकि ओजोन तथा नाइट्रिक अम्ल केवल ऑक्सीकारक के रूप में ही। क्यों?
उत्तर
SO2 में S की ऑक्सीकरण संख्या +4 होती है। S अपनी अभिक्रियाओं में -2 और +6 के बीच की कोई भी ऑक्सीकरण-संख्या दर्शा सकता है। अत: SO2 में S की ऑक्सीकरण संख्या घट सकती है और बढ़ भी सकती है; अर्थात् इसका ऑक्सीकरण तथा अपचयन दोनों सम्भव है। इस कारण SO2 ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों अभिकर्मकों की तरह व्यवहार करती है। H2O2 की स्थिति भी समान प्रकार की है। H2O2 में, O की ऑक्सीकरण अवस्था -1 होती है। ऑक्सीजन -2 और 0 (शून्य) के बीच की कोई भी ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है (+2 भी जब F से जुड़ा होता है) अतः H2O2 में ऑक्सीजन अपनी ऑक्सीकरण संख्या घटा तथा बढ़ा सकता है। इस कारण H2O2 ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों अभिकर्मकों की तरह व्यवहार करता है।
O3 में, ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है। यह अपनी ऑक्सीकरण-अवस्था को -1 तथा -2 तक घटा सकता है परन्तु अपनी ऑक्सीकरण-अवस्था को बढ़ा नहीं सकता। अत: O3 केवल एक ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करती है। H2O2 की स्थिति भी समान प्रकार की है। HNO3 में, N की ऑक्सीकरण-अवस्था +5 होती है जो N की अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था है। अत: N केवल अपनी ऑक्सीकरण अवस्था घटा सकता है। इस कारण HNO3 केवल ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करता है।

प्रश्न 9.
इन अभिक्रियाओं को देखिए
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6 (aq) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + 2O2(g)
बताइए कि इन्हें निम्नलिखित ढंग से लिखना ज्यादा उचित क्यों है?
(क) 6CO2(g) + 12H2O(I) → C2H12O6 (aq) + 6H2O(I) + 6O2(g)
(ख) O2(g) + H2O2(l) → H2O(I) + O2(g) + O2(g)
उपर्युक्त अपचयोपचय अभिक्रियाओं (क) तथा (ख) के अन्वेषण की विधि सुझाइए।
उत्तर
(क) यह प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की अभिक्रिया है जो कि एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है और अनेक चरणों में सम्पन्न होती है। इस अभिक्रिया में, 12H2O अणु क्लोरोफिल (chlorophyll) की उपस्थिति में पहले अपघटित होकर H2 तथा O2 देते हैं। इस प्रकार निर्मित H2CO2 को अपचयित कर C2H12O6 का निर्माण करती है। अतः अभिक्रिया को एक सरल रूप में अभिक्रिया निम्न प्रकार दिखाया जा सकता है|
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-17
इसलिए इस अभिक्रिया को समीकरण (iii) की भाँति लिखना ज्यादा उचित है। इस निरूपण में 12H2O अणु भाग लेते हैं तथा 6H2O अणु उत्पन्न होते हैं।
(ख) दी गई अभिक्रिया का वास्तविक प्रारूप निम्न प्रकार है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-18
समीकरण (iii) प्रदर्शित करती है कि O2 का एक अणु O3 से प्राप्त होता है, जबकि दूसरा H2O2 से प्राप्त होता है। इसलिए, समीकरण को प्रदर्शित करने की यह विधि अधिक उपयुक्त है। समीकरण (क) तथा (ख) का अन्वेषण ट्रेसर तकनीक (tracer technique) के द्वारा किया जा सकता है। समीकरण (क) में H2O18 तथा समीकरण (ख) में H2O18 (या O183) का प्रयोग कर अभिक्रिया के पथ को निर्धारित किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
AgF2 एक अस्थिर यौगिक है। यदि यह बन जाए तो यह यौगिक एक अति शक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है। क्यों?
उत्तर
AgF2 में, Ag की ऑक्सीकरण-अवस्था +2 होती है जो Ag की अत्यधिक अस्थायी अवस्था है। इसलिए, यह एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने के बाद शीघ्रता से अपचयित होकर स्थायी ऑक्सीकरण-अवस्था +1 प्राप्त कर लेता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-19
इसी कारण AgF2 (यदि प्राप्त हो जाये) एक अत्यन्त प्रबल ऑक्सीकारक की भाँति व्यवहार करता है।

प्रश्न 11.
“जब भी एक ऑक्सीकारक तथा अपचायक के बीच अभिक्रिया सम्पन्न की जाती है, तब अपंचायक के आधिक्य में निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक तथा ऑक्सीकारक के आधिक्य में उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक बनता है। इस वक्तव्य का औचित्य तीन उदाहरण देकर दीजिए।
उत्तर
दिये गये वक्तव्य का औचित्य निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-20
अभिक्रिया (i) में अपचायक (reducing agent) कार्बन अधिकता में है, जबकि अभिक्रिया (ii) में ऑक्सीकारक (oxidising agent) O2 अधिकता में है। अभिक्रिया (i) में CO (कार्बन की O.S.= +2) तथा अभिक्रिया (ii) में CO2 (कार्बन की O.S. = +4) का निर्माण होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-21

प्रश्न 12.
इन प्रेक्षणों की अनुकूलता को कैसे समझाएँगे?
(क) यद्यपि क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट तथा अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट दोनों ही
ऑक्सीकारक हैं। फिर भी टॉलूईन से बेन्जोइक अम्ल बनाने के लिए हम ऐल्कोहॉलिक पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग ऑक्सीकारक के रूप में क्यों करते हैं? इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित अपचयोपचय समीकरण दीजिए।
(ख) क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल डालने पर हमें तीक्ष्ण गन्ध वाली HCI गैस प्राप्त होती है, परन्तु यदि मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थित हो तो हमें ब्रोमीन की लाल वाष्प प्राप्त होती है, क्यों?
उत्तर
(क) यदि टॉलूईन का ऑक्सीकरण क्षारीय अथवा अम्लीय KMnO4 द्वारा किया जाये तो ऑक्सीकरण को नियन्त्रित करना कठिन होगा। इसमें मुख्य उत्पाद बेंजोइक ऐसिड (benzoic acid) के साथ-साथ सह अभिक्रियाओं (side reactions) द्वारा दूसरे उत्पाद भी प्राप्त होंगे। इसलिए टॉलूईन के ऑक्सीकरण के लिये क्षारीय अथवा अम्लीय KMnO4 के स्थान पर ऐल्कोहॉलिक KMnO4 को वरीयता दी जाती है। अपचयोपचय (redox reaction) अभिक्रिया नीचे दी गई है–
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-23
(ख) जब सान्द्र H2SO4 को क्लोराइडयुक्त एक अकार्बनिक मिश्रण में मिलाया जाता है, तो कम वाष्पशील अम्ल H2SO4 अधिक वाष्पशील अम्ल HCl को विस्थापित करता है और HCl गैस की तीक्ष्ण गन्ध आती है।

2NaCl (5) + H2SO4 (l) → 2NaHSO4 (s) + 2HCl(g)

HCl एक दुर्बल अपचायक है। यह H2SO4 को SO2 में अपचयित करने में असमर्थ है। जब मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थित होता है तो अधिक उड़नशील अम्ल HBr विस्थापित होता है। HBr एक अधिक प्रबल अपचायक है और H2SO4 को SO2 में अपचयित कर देता है। यह स्वयं ऑक्सीकृत होकर ब्रोमीन देता है जो लाल वाष्प के रूप में प्राप्त होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-24

प्रश्न 13.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में ऑक्सीकृत, अपचयित, ऑक्सीकारक तथा अपचायक पदार्थ पहचानिए-
(क) 2AgBr(s) + C6H6O2(aq) → 2Ag(s) + 2HBr (aq) + C6H4O2(aq)
(ख) HCHO(7) +2[Ag(NH3)2]+ (aq) + 3OH (aq) → 2Ag(s)+ HCOO7 (aq) +4NH3(aq) +2H2O(7)
(ग) HCHO(1) + 2Cu2+(aq) + 5OH (aq) → Cu2O(s)+ HCOO (aq) +3H2O(l)
(घ) N2H4(l) + 2H2O(l) → N2(g)+ 4H2O(l)
(ङ) Pb(s) + PbO2(s)+ 2HSO4 (aq) → 2PbSO4(s) + 2H2O(l)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-25

प्रश्न 14.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में एक ही अपचायक थायोसल्फेट, आयोडीन तथा ब्रोमीन से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया क्यों करता है?
2S2O2-3 (aq) + I2(s) → S4O2-6(aq) + 2I (aq)
S2O2-3 (aq) + 2Br2(l) + 5H2O(l) → 2SO2-4 (aq) + 4Br(aq) + 10H+ (aq)
उत्तर
प्रस्तुत स्पीशीज (species) में S की ऑक्सीकरण संख्या निम्न है-

S2O2-3 = +2, S4O2-6 = 2.5, SO2-4 = +6

ब्रोमीन, आयोडीन से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है। इसलिये यह S2O2-3 (S की 0.S. = +2) को SO2-4 (S की O.S. = +6) में ऑक्सीकृत कर देता है; जिसमें S उच्च-ऑक्सीकरण अवस्था में है। I2 एक दुर्बल ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करता है। यह S2O2-3 को S4O2-6(S की O.S. = 2.5) में . ऑक्सीकृत करता है, जिसमें S की ऑक्सीकरण-अवस्था कम है। यही कारण है कि S2O2-3, Br2 से I2 से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया करता है।

प्रश्न 15.
अभिक्रिया देते हुए सिद्ध कीजिए कि हैलोजनों में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक तथा हाइड्रोहैलिक यौगिकों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है।
उत्तर
हैलोजनों की ऑक्सीकारक क्षमता का घटता हुआ क्रम निम्न है-F2 > Cl2, > Br2 > I2। F2 एक प्रबल ऑक्सीकारक है तथा यह Cl, Br तथा I आयनों का ऑक्सीकर कर देती है। Cl2 केवल Br तथा I आयनों को और Br2 केवल I आयनों को ही ऑक्सीकृत कर पाती है। I2 इनमें से किसी को भी ऑक्सीकृत करने में असमर्थ है। अभिक्रियायें नीचे दी गई हैं-
F2 की ऑक्सीकारक अभिक्रियाएँ-

F2(g) + 2Cl(aq) -→ 2F (aq) + Cl2 (g)
F2 (g)+2Br(aq) 2F(aq) + Br2 (1)
F2(g) + 2I(aq) → 2F(aq) + I(s)

Cl2 की ऑक्सीकारक अभिक्रियाएँ-

Cl2(g)+ 2Br(aq) -→ 2Cl(aq) + Br (1)
Cl2(g) + 2I(aq) → 2C(aq) + I2(l),

I2 की ऑक्सीकारक अभिक्रियाएँ-

Br2(l) + 2I(aq) → 2Br(aq) + I2(s)

इस प्रकार F2 सबसे अच्छा ऑक्सीकारक है। हाइड्रोलिक अम्लों की अपचायक क्षमता का घटता हुआ क्रम निम्न प्रकार है-

HI> HBr> HCl> HF

HI और HBr सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) को SO2 में अपचयित कर देते हैं, जबकि HCl व HF ऐसा नहीं कर पाते।

2HBr + H2SO4 → SO2+ 2H2O+ Br2
2HI + H2SO4 → SO2 + 2H2O + I2

HCI, MnO2 को Mn2+ में अपचयित कर देता है परन्तु HF ऐसा करने में असमर्थ है। यह दर्शाता है। कि HCl की ऑक्सीकृत क्षमता HBr से अधिक है।

MnO2 +4HCl → MnCl2 + Cl2 + 2H2O
MnO2 + 4HF → कोई अभिक्रिया नहीं

अतः हाइड्रोलिक अम्लों में HI प्रबलतम अपचायक है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित अभिक्रिया क्यों होती है?
XeO4-6(aq) + 2F(aq) + 6H+(aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(I)
यौगिक Na4XeO6 (जिसका एक भाग XeO4-6 है) के बारे में आप इस अभिक्रिया में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-26
इस अभिक्रिया में XeO6 को XeO3 में अपचयन तथा F का F2 में ऑक्सीकरण हो रहा है। यह अभिक्रिया इसलिये सम्पन्न होती है क्योंकि XeO6, F2 से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है। चूंकि XeO4-6 F2 की तुलना में अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है, अत: Na4XeO6 एक प्रबल ऑक्सीकारक होगा।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में-
(क) H3PO2(aq) + 4AgNO3(aq) + 2H2O(l) → H2PO4(aq) + 4Ag(s) +4HNO3(aq)
(ख) H3PO2(aq) + 2CuSO4 (aq) + 2H2O(I)→ H3PO4 (aq) + 2Cu(s) +2H2SO4 (aq)
(ग) C2H5CHO(l) + 2[Ag(NH3)2]+(aq) + 3OH (aq) → C6H5COO (aq) +2Ag(s) +4NH3(aq) +2H2O(l)
(घ) C6H5CHO(l) +2Cu2+ (aq) + 5OH (aq) कोई परिवर्तन नहीं।
इन अभिक्रियाओं से A+ तथा Cu2+ के व्यवहार के विषय में निष्कर्ष निकालिए।
उत्तर
ये अभिक्रिया दर्शाती है कि Ag+,Cu2+ से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है। यह निम्न तथ्यों से स्पष्ट है-

  1. अभिक्रिया (क) और (ख) दर्शाती है कि Ag2व Cu2+ दोनों आयने H3PO2 को H3PO4 में ऑक्सीकृत कर सकते हैं। अत: दोनों ऑक्सीकारक हैं।।
  2. अभिक्रिया (ग) दर्शाती है कि [Ag(NH3)2]+ आयन C6H5CHO को C6H2COOH में ऑक्सीकृत कर सकता है, परन्तु अभिक्रिया (घ) के अनुसार Cu2+ आयन ऐसा करने में असमर्थ है।
    अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि Ag+व Cu2+ दोनों ऑक्सीकारक अभिकर्मक हैं, परन्तु Ag+,Cu2+ से अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है।

प्रश्न 18.
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रियाओं को सन्तुलित कीजिए-
(क) MnO4(aq) +I(aq) → MnO2(s) +I2(s)
(क्षारीय माध्यम)
(ख) MnO4(aq) + SO2(8) → Mn2+ (aq) + HSO4(aq) (अम्लीय माध्यम)
(ग) H2O2(aq) +Fe2+ (aq) → Fe3+ (aq) +H2O(l) (अम्लीय माध्यम)
(घ) Cr2O2-7 +SO2(g) → Cr3+ (aq) + SO2-4(aq) (अम्लीय माध्यम)
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-31
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-32

प्रश्न 19.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरणों को आयन-इलेक्ट्रॉन तथा ऑक्सीकरण संख्या विधि (क्षारीय माध्यम में) द्वारा सन्तुलित कीजिए तथा इनमें ऑक्सीकारक और
अपचायकों की पहचान कीजिए-
(क) P4(s) + OH (aq) → PH3(g) + HPO27 (aq)
(ख) N2H4(l) + ClO3(aq) → NO(g) + Cl(g)
(ग) Cl2O7(g) + H2O2(aq) → ClO2 (aq) + O2(g) + H+(aq)
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-34
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-35
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-36
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-37
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-38
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-39
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-40
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-41

प्रश्न 20.
निम्नलिखित अभिक्रिया से आप कौन-सी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं-
(CN)2(g) + 2OH (aq) → CN (aq) + CNO (aq) + H2O(l)
उत्तर
यह एक असमानुपातन (disproportionation) अभिक्रिया है। इसमें (CN)2 एक ही समय में CN में अपचयित और CNO में ऑक्सीकृत होता है। यह अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है।

प्रश्न 21.
Mn3+ आयन विलयन में अस्थायी होता है तथा असमानुपातन द्वारा Mn2+, MnO2 और H+ आयन देता है। इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित आयनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-43
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-44

प्रश्न 22.
Cs, Ne, I तथा F में ऐसे तत्व की पहचान कीजिए, जो
(क) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
उत्तर
(क) F : यह सर्वाधिक वैद्युत ऋणात्मक तत्त्व है और सदैव -1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) Cs : यह एक क्षार धातु है जो अत्यधिक वैद्युत धनात्मक है। यह सदैव +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) I: यह एक हैलोजन है। इसके संयोजक कोश में सात इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं। इसलिये यह -1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। 4-कोश (orbitals) की उपस्थिति के कारण यह +1, +3, +5, और +7 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी प्रदर्शित करता है।
(घ) Ne: यह एक उत्कृष्ट गैस (noble gas) है तथा किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग नहीं लेती है। इसलिए, यह न तो धनात्मक ऑक्सीकरण-अवस्था में पाई जाती है और न ही ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था में।

प्रश्न 23.
जल के शुद्धिकरण में क्लोरीन को प्रयोग में लाया जाता है। क्लोरीन की अधिकता हानिकारक होती है। सल्फर डाइऑक्साइड से अभिक्रिया करके इस अधिकता को दूर किया जाता है। जल में होने वाले इस अपचयोपचय परिवर्तन के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर
क्लोरीन तथा सल्फर डाइऑक्साइड की अभिक्रिया निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त की जा सकती है

Cl2 + SO2 → Cl + SO2-4

इस अपचयोपचय अभिक्रिया को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से निम्नांकित पदों में सन्तुलित करते हैं-
पद 1. पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं-

Cl2 + SO2 → Cl+ SO2-4

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-

  1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया : SO2 → SO2-4
  2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया : Cl2 → Cl

पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 0 परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं-

SO2 + 2H2O → SO2-4 +4H+

पद 4. सन्तुलित अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया निम्नवत् होगी ।-

Cl2 → 2Cl

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन इस प्रकार करेंगे-

SO2 + 2H2O → SO2-4 +4H+ +2e
Cl2 +2e → 2Cl

पद 6. उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर-

Cl2 + SO2 + 2H2O → 2Cl + SO2-4 +4H+

अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण परमाणुओं की संख्या एवं आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है।

प्रश्न 24.
आवर्त सारणी की सहायता से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(क) सम्भावित अधातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन की अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
(ख) किन्हीं तीन धातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
उत्तर
(क) P4, Cl2 और S हैं।
(ख) Cu, Ga और In| इनकी असमानुपातन की अभिक्रियाएँ निम्न हैं-

2Cu+ (aq) -→ Cu2+(aq) + Cu (s)
3Ga+ (aq) → Ga3+(aq) + 2Ga(s)
3In+ (aq) → In3+(aq) + 2In (3)

ये धातु तीन ऑक्सीकरण अवस्थाओं में पायी जाती हैं, जो निम्न हैं-

Cu: +2, 0, +1
Ga : +3, 0, +1
In : +3, 0, +1

प्रश्न 25.
नाइट्रिक अम्ल निर्माण की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीकरण से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनती है। 10.0 ग्राम अमोनिया तथा 20.00 ग्राम ऑक्सीजन द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की कितनी अधिकतम मात्रा प्राप्त हो सकती है?
उत्तर
प्रक्रम की रासायनिक समीकरण निम्न है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-45
समीकरण के अनुसार 68 ग्राम NH3 के ऑक्सीकरण के लिए 160 ग्राम O2 की आवश्यकता होती है।
∴ 10 ग्राम NH3 के ऑक्सीकरण के लिए होगी [latex]\frac { 160 }{ 68 } \times 10=23.53g[/latex] O2 की आवश्यकता। प्रक्रम में केवल 20g O2 का प्रयोग किया गया है। अत: O2 सीमान्त अभिकर्मक है।
∵ 160g O2 से प्राप्त होती है, NO= 120g
∴ 20g O2 से प्राप्त होगी, NO=[latex]\frac { 120 }{ 160 } \times 20=15.00g[/latex]

प्रश्न 26.
पाठ्य-पुस्तक की सारणी 8:1 में दिए गए मानक विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या इन अभिकारकों के बीच अभिक्रिया सम्भव है?
(क) Fe3+ तथाI(aq)
(ख) Ag+ तथा Cu(s)
(ग) Fe3+(aq) तथा Br (aq)
(घ) Ag(s) तथा Fe3+(aq)
(ङ) Br2(aq) तथा Fe2+
उत्तर
(क) सम्भव है- 2Fe3+(aq) + 2I (aq) → 2Fe2+ (aq) + I2(s)
(ख) सम्भव है- Cu (s) + 2Ag+ (aq) Cu2+ (aq) + 2Ag (s)
(ग) सम्भव है- Cu (s) + 2Fe3+(aq) → Cu2+ (aq) + 2Fe2+ (aq)
(घ) सम्भव नहीं है।
(ङ) सम्भव है— Br2 (aq) +2Fe2+(aq) 2Br (aq) + 2Fe3+(aq)

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के विद्युत-अपघटन से प्राप्त उत्पादों के नाम बताइए-
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO का जलीय विलयन
(ख) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO का जलीय विलयन
(ग) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H,SO4 का तनु विलयन ।
(घ) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl2 का जलीय विलयन।
उत्तर
(क) कैथोड पर Ag प्राप्त होती है। ऐनोड घुलकर Ag+ आयन देगा।
(ख) कैथोड पर Ag, ऐनोड पर O2
(ग) कैथोड पर H2, ऐनोड पर O2
(घ) कैथोड पर Cu, यदि विलयन सान्द्र है तो ऐनोड पर Cl2 अन्यथा O2

प्रश्न 28.
निम्नलिखित धातुओं को उनके लवणों के विलयन में से विस्थापन की क्षमता के क्रम में लिखिए-
Al, Cu, Fe, Mg तथा Zn
उत्तर
Mg > Al> Zn > Fe>Cu

प्रश्न 29.
नीचे दिए गए मानक इलेक्ट्रोड विभवों के आधार पर धातुओं को उनकी बढ़ती अपचायक क्षमता के क्रम में लिखिए-
K+/K= -2.93V, Ag+/Ag= 0.80 V, Hg2+/Hg= 0.79V
Mg2+/Mg = -2.37 V, Cr3+/Cr = -0-74V
उत्तर
Ag < Hg < Cr < Mg < K

प्रश्न 30.
उस गैल्वेनी सेल कों चित्रित कीजिए, जिसमें निम्नलिखित अभिक्रिया होती है
Zn(s) +2Ag+ (aq) → Zn2+ (aq) + 2Ag(s)
अब बताइए कि-
(क) कौन-सा इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है?
(ख) सेल में विद्युत-धारा के वाहक कौन हैं?
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
Zn (s)|Zn2+ (aq) || Ag+ (aq)| Ag (5)
(क) Zn/ Zn2+ इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है।
(ख) बाह्य परिपथ में वैद्युत धारा के वाहक इलेक्ट्रॉन हैं जिनका प्रवाह Zn इलेक्ट्रोड से Ag इलेक्ट्रोड की ओर होता है।
(ग) ऐनोड पर : Zn (s) → Zn2+ (aq) +2e
कैथोड पर : 2Ag+ (aq) + 2e → 2Ag (s)

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
CHC2 में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या है
(i) 0
(ii) + 2
(iii) -2
(iv) +4
उत्तर
(ii) +2

प्रश्न 2.
NaOCl तथा NaClO3 में क्लोरीन की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) + 1, +2
(ii) +1, +5
(iii) -1, +5
(iv) -1,-5
उत्तर
(ii) +1, +5

प्रश्न 3.
OF2 एवं H2O2 में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या है
(i) – 2,- 1
(ii) + 2, – 1
(iii) + 2, + 1
(iv) – 2,+ 1
उत्तर
(ii) +2,-1

प्रश्न 4.
S4O2-6 एवं S2O2-8 में S की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) + 2.5,+ 6
(ii) + 2.5,+7
(iii) – 2.5, + 6
(iv) + 2.5,- 6
उत्तर
(ii) + 2.5,+ 7

प्रश्न 5.
CH2O में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) -2
(ii) +2
(iii) 0
(iv) +4
उत्तर
(iii) 0

प्रश्न 6.
CH2Cl2 में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) +2
(ii) +1
(iii) 0
(iv) +4
उत्तर
(iii) 0

प्रश्न 7.
H2S2O8 में s की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) +4
(ii) +5
(iii) +6
(iv) +7
उत्तर
(iii) +6

प्रश्न 8.
ऑक्सीजन की सर्वाधिक ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित करने वाला यौगिक है
(i) H2O2
(ii) F2O
(iii) Cl2O2-7
(iv) NaOCl
उत्तर
(ii) F2O

प्रश्न 9.
H2SO4, H2SO4 तथा SO2Cl2 में s की ऑक्सीकरण संख्याएँ क्रमशः हैं-
(i) +6, +4, +6
(ii) +6, +6, +4
(iii) +6, -6 +4
(iv) -4, +6, +6
उत्तर
(i) +6, +4, +6

प्रश्न 10.
निम्नलिखित यौगिकों में से किसमें Mn की ऑक्सीकरण संख्या अधिकतम है?-
(i) Mn2O3
(ii) KMnO4
(iii) K2MnO4
(iv) MnO2
उत्तर
(ii) KMnO4

प्रश्न 11.
Mn की ऑक्सीकरण संख्या K2MnO4 तो MSO4 में क्रमशः है-
(i) +7 और 12
(ii) +6 और +2
(iii) + 5 और +2
(iv) +2 और +6
उत्तर
(ii) +6 और +2

प्रश्न 12.
पोटैशियम डाइक्रोमेट में क्रोमियम की ऑपलीकरण संख्या है-
(i) +2
(ii) + 3
(iii) +4
(iv) +6
उत्तर
(iv) + 6

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से किसमें नाइट्रोजन की औसीकरण संख्या भिन्नात्मक है?
(i) N2H4
(ii) Ca3N2
(iii) HN3
(iv) N2F2
उत्तर
(ii) HN3

प्रश्न 14.
एक अभिक्रिया में एक धातु आयन M2+ से दो इलेक्ट्रॉनों के निष्कासित होने के बाद ऑक्सीकरण संख्या हो जाती है-
(i) शून्य
(ii) +2
(iii) +1
(iv) +4
उत्तर
(iv) +4

प्रश्न 15.
क्लोरीन की सर्वाधिक ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित करने वाला यौगिक है–
(i) ClO2
(ii) Cl2O
(iii) Cl2O7
(iv) NaClO3
उत्तर
(iii) Cl2O7

प्रश्न 16.
Sg, S2F2 और H2S में सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या के मान क्रमशः हैं|
(i) + 2, + 1 तथा -2
(ii) -2,-1 तथा + 2
(iii) 0, + 1 तथा + 2
(iv) 0, + 1 तथा – 2
उत्तर
(iv) 0, + 1 तथा – 2

प्रश्न 17.
Cl2 NaOCl तथा ClO3 में Cl की क्रमशः ऑक्सीकरण संख्याओं के मान हैं-
(i) +2, 0, +5
(ii) 0, + 2, +5
(iii) +2, +, +5
(iv) 0, + 1, +5
उत्तर
(iv) 0, +1, +5

प्रश्न 18.
Na2S4O6 की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) + 2
(ii) + 3
(iii) + 15
(iv) + 2.5
उत्तर
(iv) + 2.5

प्रश्न 19.
Ni(CO)4 में Ni की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) 0
(ii) 4
(iii) 8
(iv) 2
उत्तर
(i) 0

प्रश्न 20.
सोडियम नाइट्रोपुसाइड में आयरन (Fe) की ऑक्सीकरण संख्या है-
(i) +3
(ii) +2
(iii) +4
(iv) 0
उत्तर
(ii) +2

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में Mn की न्यूनतम ऑक्सीकरण संख्या वाला यौगिक है-
(i) KMnO4
(ii) MnO2
(iii) KaMnO4
(iv) Mn2O3
उत्तर
(iv) Mn2O3

प्रश्न 22.
O3 तथा H2O2में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या के मान क्रमशः हैं-
(i) 0, -1
(ii) 0, +1
(iii) 0-2
(iv) -2,-1
उत्तर
(i) 0, -1

प्रश्न 23.
निम्न में कौन-सी रेडॉक्स अभिक्रिया है?
(i) AgNO3 + HCl → AgCl + HNO3
(ii) BaO2 + H2SO4 → BaSO4 + H2O2
(iii) SO2 + 2H2S → 2H2O+ 3s
(iv) CaC2O4 +2HCl → CaCl2 + H2C2O4
उत्तर
(iii) SO2 + 2H2S→ 2H2O+ 3s

प्रश्न 24.
निम्नलिखित अभिक्रिया में ऑक्सीकारक है-
2CrO2-2 + 2H+ → Cr2O2-7 + H2O
(i) H+
(ii) CrO2-4
(iii) Cr+3
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(iv) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 25.
निम्न अभिक्रिया में अपचयित होने वाला पदार्थ है–
2CusO4+ 4KI→ Cu2I2 + 2K2SO4+I2
(i) CuSO4
(ii) KI
(iii) Cu2I2
(iv) I2
उत्तर
(i) CuSO4

प्रश्न 26.
हाइड्रोजन द्वारा अपचयित होने वाला ऑक्साइड है
(i) MnO2
(ii) MgO
(iii) CaO
(iv) CoO
उत्तर
(iv) CoO

प्रश्न 27.
4Fe + 3O2 → 4Fe3+ + 6O2- अभिक्रिया में निम्न में कौन-सा कथन सही नहीं है?
(i) रेडॉक्स अभिक्रिया है।
(ii) Fe अपचायक है।
(iii) Fe का अपचयन Fe3+ में हुआ है।
(iv) ऑक्सीजन का अपचयन हुआ है।
उत्तर
(iii) Fe का अपचयन Fe3+ में हुआ है।

प्रश्न 28.
298 K पर अर्द्ध अभिक्रियाओं के मानक अपचयन विभव हैं
(i) zn2+ +2e → Zn (s); – 0.762
(ii) Cr3++ 3e → Cr (3);- 0.740
(iii) 2H+ +2e → H2 (g);- 0.000
(iv) Fe3+ + e → Fe3+(aq); + 0.770
कौन-सा प्रबलतम अपचायक है।
(i) Zn (s)
(ii) Cr (s)
(iii) H2 (g)
(iv) Fe2+ (aq)
उत्तर
(i) Zn (s)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रेडॉक्स अभिक्रिया की व्याख्या एक उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर
परमाणु या आयन जिस अभिक्रिया में इलेक्ट्रॉन त्यागता है, उसे ऑक्सीकरण और जिसमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, उसे अपचयन कहते हैं। ऑक्सीकरण तथा अपचयन क्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं क्योंकि जब कोई परमाणु या आयन एक इलेक्ट्रॉन त्यागेगा तो उसको ग्रहण करने वाला कोई अन्य परमाणु या आयन ही होगा अर्थात् जब किसी अभिक्रिया में एक पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है। तो दूसरे किसी अन्य पदार्थ का अपचयन भी होता है। स्पष्ट है कि ऑक्सीकरण व अपचयन क्रियाएँ साथ-साथ होती हैं। इन ऑक्सीकरण व अपचयन अभिक्रियाओं को सम्मिलित रूप से ऑक्सीकरण-अपचयन अभिक्रिया या रेडॉक्स अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ-
2HgCl2 + SnCl2 → Hg2Cl2 + SnCl4
उपर्युक्त अभिक्रिया में HgCl2 का Hg2Cl2 में अपचयन होता है और HgCl2, SnCl2 को SnCl4 में ऑक्सीकृत कर देता है।

प्रश्न 2.
ऑक्सीकरण संख्या के आधार पर ऑक्सीकारक तथा अपचायक की पहचान किस प्रकार की जाती है? एक उदाहरण से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ऑक्सीकरण संख्या के आधार पर, ऑक्सीकारक वह पदार्थ है जिसकी ऑक्सीकरण संख्या घटती है, जबकि अपचायक पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या बढ़ती है। उदाहरणार्थ-ऑ०सं. प्रति परमणु लिखने पर,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-46
उपर्युक्त अभिक्रिया में SnCl2 में Sn की ऑक्सीकरण संख्या +2 है तथा उत्पाद SnCl4 में +4 है। Sn की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि हो रही है।
∴ SnCl2 अपचायक है जबकि FeCl3 में Fe की ऑक्सीकरण संख्या +3 व FeCl2 में Fe की ऑक्सीकरण संख्या +2 है, अत: FeCl3 ऑक्सीकारक है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अभिक्रिया की दो अर्द्ध अभिक्रियाएँ लिखिए। यह भी उल्लेख कीजिए कि कौन-सी अर्द्ध अभिक्रिया ऑक्सीकरण व कौन-सी अपचयन अभिक्रिया है?
SnCl2 + 2HgCl2 → SnCl4 + Hg2Cl2
उत्तर
प्रश्न में उल्लिखित अभिक्रिया को दो अर्द्ध अभिक्रियाओं में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं-

  1. SnCl2 + Cl2 → SnCl2 (ऑक्सीकरण अभिक्रिया)
  2. 2HgCl2 → Hg2Cl2 + Cl2 ↑ (अपचयन अभिक्रिया)
    इस अभिक्रिया में HgCl2 में Hg की ऑक्सीकरण संख्या +2 है तथा Hg2Cl2 में Hg की ऑक्सीकरण संख्या 0 है। चूंकि ऑक्सीकरण संख्या में कमी हो रही है, अतः Hg2Cl2 ऑक्सीकारक है|

प्रश्न 4.
कारण सहित बताइए कि निम्नलिखित अभिक्रिया में कौन ऑक्सीकारक तथा कौन अपचायक है?
2KI + Cl2 → 2KCI + I2
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-47
चूंकि KI में 1 की ऑक्सीकरण संख्या -1 तथा I2 में 0 है, अर्थात् I की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि हो रही है, अतः KI अपचायक है। इसके विपरीत, Cl2 में CI की ऑक्सीकरण संख्या 0 है तथा KCI में -1 है। चूंकि ऑक्सीकरण संख्या में कमी हो रही है, अतः Cl2 ऑक्सीकारक है।

प्रश्न-5.
ऑक्सीकरण संख्या को उदाहरण सहित समझाइए।
या
ऑक्सीकरण संख्या पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
किसी यौगिक या आयन में तत्त्व के एक परमाणु पर स्थित धन या ऋण आवेशों की संख्या उस तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या कहलाती है, जबकि उस अणु या आयन में उपस्थित अन्य परमाणुओं को उनके सम्भावित आयनों के रूप में पृथक् कर दिया जाता है। यह संख्या धनात्मक व ऋणात्मक दोनों प्रकार की हो सकती है। उदाहरणार्थ-NaCl में Na की ऑक्सीकरण संख्या +1 और Cl की ऑक्सीकरण संख्या -1 है, क्योंकि Na पर इकाई धनावेश तथा Cl पर इकाई ऋणावेश है।

प्रश्न 6.
शून्य, -1 तथा +1 ऑक्सीकरण संख्या से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
एक यौगिक में किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या शून्य (0) से तात्पर्य है कि तत्त्व के परमाणु पर धन या ऋण आवेश नहीं है अर्थात् परमाणु विद्युत उदासीन है। तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या +1 से तात्पर्य यह है कि तत्त्व के परमाणु पर इकाई धन आवेश है, जिसे उदासीन करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की आवश्यकता होती है। तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या -1 से तात्पर्य है कि तत्त्व के ” परमाणु पर इकाई ऋणावेश है, जिसे उदासीन करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन त्यागने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 7.
ब्लू परक्रोमेट में Cr की ऑ०सं० ज्ञात कीजिए।
उत्तर
ब्लू परक्रोमेट की संरचना
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-48
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-49

प्रश्न 8.
सम्बन्धित तत्त्वों की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए
(i) KMnO4 में Mn की
(ii) ClO3में Cl की
(iii) NaOCl में Cr की
(iv) H2S2O6 में S की
(v) Cl2 में Cl की
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-50

प्रश्न 9.
निम्नलिखित यौगिकों में s (सल्फर) की ऑक्सीकरण संख्या बताइए-
(i) Na2S4O6,
(ii) SO2Cl2
उत्तर
(i) Na2S4O6-माना S की ऑक्सीकरण संख्या x है। अत:
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-51
(ii) SO2Cl2-माना S की ऑक्सीकरण संख्या x है। अत:
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-52

प्रश्न 10.
K2FeO4 में Fe तथा NH4 में N की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-53

प्रश्न 11.
I—Cl में ci तथा H—H में H की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए। कारण भी दीजिए।
उत्तर
I—Cl में Cl की ऑक्सीकरण संख्या -1 होगी; क्योंकि Cl की विद्युत ऋणात्मकता I से अधिक है, जबकि H—H में H की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होगी क्योंकि समान परमाणु वाले यौगिक के अणुओं में तत्त्वों के परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होती है।

प्रश्न 12.
S8 अणु में s की संयोजकता तथा ऑक्सीकरण संख्या क्या है?
उत्तर
S8 में S की संयोजकता 2 है, जबकि ऑक्सीकरण संख्या शून्य है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित एवं पूर्ण कीजिए-
SO2+ MnO4+…… → SO2-4 + Mn2+ +…..
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-54

प्रश्न 14.
आयनिक समीकरण Br2 + OH → Br + BrO3 + H2O को सन्तुलित कीजिए तथा ऑक्सीकारक और अपचायक बताइए।
उत्तर
दी गई आयनिक अभिक्रिया समीकरण को अर्द्ध अभिक्रिया समीकरण के रूप में लिखने पर,

Br2 → Br …(i)
Br2 → BrO3 …(ii)

समी० (i) से,
[Br2 +2e → 2Br]x 5
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-55

प्रश्न 15.
(i) Cl2O7 में Cl की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए।
(ii) 2FeCl3 + H2S → 2FeCl2 + 2HCI+S इस अभिक्रिया में ऑक्सीकारक और
अपचायक का नाम लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-56

प्रश्न 16.
निम्न में से किसमें Mn की ऑक्सीकरण संख्या सबसे अधिक है और क्यों?
Mn2O3, MnO2, Mno, K2MnO4
उत्तर
K2MnO4 में Mn की ऑक्सीकरण संख्या सबसे अधिक (+6) है, क्योंकि इसमें ऑक्सीजन परमाणुओं का आपेक्षिक अनुपात बाकी अणुओं से अधिक है।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित कीजिए।
Fe2+ + NO3 + H+ —> Fe2 + …. + H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-57

प्रश्न 18.
विद्युत रासायनिक श्रेणी के आधार पर F, CI, Br तथा I की ऑक्सीकारक क्षमता को समझाइए।
या
कारण देते हुए समझाइए कि हैलोजन ऑक्सीकारक के रूप में क्यों कार्य करते हैं?
उत्तर
हैलोजनों की ऑक्सीकारक क्षमता उनके इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। जिस हैलोजन की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिक होती है वह अधिक प्रबल ऑक्सीकारक होता है। अधिक प्रबल ऑक्सीकारक के रेडॉक्स युग्म का मानक अपचयन विभव अधिक धनात्मक होता है। हैलोजनों (X2) की ऑक्सीकारक क्षमता उनके रेडॉक्स युग्मों (X2/X) के मानक अपचयन विभवों के मान बढ़ने के क्रम में बढ़ती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-58

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक सिद्धान्त के आधार पर ऑक्सीकरण-अपचयन अभिक्रिया को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
ऑक्सीकरण—किसी परमाणु, अणु या आयन के इलेक्ट्रॉनों का पृथक् होना ऑक्सीकरण कहलाता है। इसके फलस्वरूप धनात्मक संयोजकता बढ़ती है तथा ऋणात्मक संयोजकता घटती है जो कि त्यागे गये इलेक्ट्रॉन संख्या के बराबर होती है। चूंकि इस क्रिया में इलेक्ट्रॉन त्यागे जाते हैं अत: इसे इलेक्ट्रॉन वियोजन भी कहते हैं।
उदाहरणार्थ–
(i)
Fe2+ → Fe3+ +e (धनात्मक संयोजकता का बढ़ना)
(ii) 2Cl → Cl2 + 2e (ऋणात्मक संयोजकता का घटना)
अपचयन-किसी परमाणु, अणु या आयन से इलेक्ट्रॉनों का जुड़ना अपचयन कहलाता है। इसके फलस्वरूप धनात्मक संयोजकता घटती है तथा ऋणात्मक संयोजकता बढ़ती है जो कि ग्रहण किये गये इलेक्ट्रॉन संख्या के बराबर होती है। चूंकि इस विभव में इलेक्ट्रॉन ग्रहण किये जाते हैं अतः इसे इलेक्ट्रॉनीकरण भी कहते हैं।
उदाहरणार्थ- (i) Fe3+ + e → Fe2+ (धनात्मक संयोजकता का घटना)
(iii) Cl2 +2e → 2Cl (ऋणात्मक संयोजकता का बढ़ना)

प्रश्न 2.
ऑक्सीकरण संख्या तथा संयोजकता में क्या अन्तर है? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर

  1. किसी तत्त्व की संयोजकता उसके एक परमाणु द्वारा स्थानान्तरित या साझे में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या को कहते हैं, जबकि किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या उसे तत्त्व के किसी यौगिक में उसके एक परमाणु पर उपस्थित आवेश को कहते हैं।
  2. किसी तत्त्व की संयोजकता सदैव पूर्णाक होती है, जबकि किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक भी हो सकती है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित समीकरण को ऑक्सीकरण संख्या के आधार पर सन्तुलित कीजिए। सूत्रों के ऊपर सम्बन्धित तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-59
उत्तर
इस अभिक्रिया में कॉपर और नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या में परिवर्तन हुआ है।
कॉपर की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि = 2 यूनिट प्रति परमाणु Cu
नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या में कमी = 1 यूनिट प्रति अणु HNO3 सन्तुलित समीकरण में ऑक्सीकरण संख्या में हुई कुल वृद्धि और कुल कमी दोनों का बराबर होना
आवश्यक है, अत: समीकरण में HNO3 को 2 से तथा Cu को 1 से गुणा करना आवश्यक है। ऐसा करने पर निम्नलिखित समीकरण प्राप्त होती है
Cu+2HNO3 →Cu(NO3)2 + 2NO2 + H2O
Cu(NO3)2 में एक कॉपर परमाणु से दो नाइट्रेट मूलक संयुक्त हैं, अत: समीकरण को सन्तुलित करने के लिए HNO3 के दो और अणुओं की आवश्यकता पड़ेगी तथा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन परमाणुओं की संख्या सन्तुलित करने के लिए H2O अणु को 2 से गुणा करना आवश्यक है।
Cu+4HNO3 →Cu(NO3)2 + 2NO2 + 2H2O यह समीकरण सन्तुलित है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित अभिक्रिया को ऑक्सीकरण अंक विधि द्वारा पूर्ण एवं संतुलित कीजिए
I2 + HNO3 → NO2 + HIO3
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-60

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अभिक्रिया को सन्तुलित कीजिए-
Zn + HNO3 → Zn(NO3)2 + NO2 + H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-61

प्रश्न 6.
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा अम्लीय माध्यम में निम्न अभिक्रिया की समीकरण सन्तुलित कीजिए
MnO4 + Fe2+ → Fe3+ + Mn2+ + H2O
उत्तर
सर्वप्रथम समीकरण के ऑक्सीकारकों तथा अपचायकों की अर्द्ध-अभिक्रियाएँ पृथक्-पृथक् सन्तुलित की जाती हैं; जैसे-
प्रथम अर्द्ध-अभिक्रिया।

MnO4 → Mn2- (अपचयन)

ऑक्सीजन सन्तुलित करने के लिए 4H2O दाईं तरफ जोड़े जाते हैं। अतः

MnO4 → Mn2+ +4H2O

फिर हाइड्रोजन सन्तुलित करने के लिए 8H+ बाईं तरफ जोड़े जाते हैं। अत:

MnO4 + 8H+ → Mn2+ +4H2O

अब समीकरण में दोनों तरफ आवेश सन्तुलित करने के लिए 5e बाईं तरफ जोड़ने पर निम्नलिखित समीकरण मिलती है-

MnO4 +8H+ +5e → Mn2+ +4H2O …..(i)

दूसरी अर्द्ध-अभिक्रिया

Fe2+ → Fe3+ (ऑक्सीकरण)

आवेश सन्तुलित करने के लिए दाईं तरफ le जोड़ने पर,

Fe2+ → Fe3+ +e …(ii)

अब समीकरण (ii) में 5 की गुणा करके, इसे समीकरण (i) में जोड़ने पर निम्नलिखित समीकरण प्राप्त होती है-

MnO4 + 8H+ + 5Fe2+ +5e → 5Fe3+ + Mn2+ +4H2O+ 5e

इस समीकरण में दोनों तरफ से 5e2 कट जाते हैं। अतः

MnO4 + 8H+ + 5Fe2+ → 5Fe3+ + Mn2+ +4H2O

यही सन्तुलित समीकरण है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रिया की समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से सन्तुलित कीजिए-
K2Cr2O7 + H2SO4 + FeSO4→ Fe2(SO4)3 + Cr2(SO4)3+ K2SO4 + H2O
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-62
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 8 Redox Reactionsimg-63

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऑक्सीकरण संख्या को निर्धारित करने के नियम लिखिए।
उत्तर
ऑक्सीकरण संख्या को निर्धारित करने के नियम किसी यौगिक/आयन में किसी तत्त्व की ऑक्सीकरण संख्या का मान जानने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। ये नियम निम्नवत् हैं-

  1. स्वतन्त्र अथवा तात्त्विक अवस्था में उपस्थित किसी तत्त्व के प्रत्येक परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या सदैव शून्य होती है।
    उदाहरणार्थ- He, H2, O2, Cl2, O3, P4, S8, Na, Mg तथा Al में प्रत्येक परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या शून्य है।
  2. किसी तत्त्व के अपररूपों की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होती है। उदाहरणार्थ-C के अपररूप हीरा तथा ग्रेफाइट दोनों की ऑक्सीकरण संख्या शून्य होती है।
  3. किसी एकपरमाणुक आयन (monoatomic ion) की ऑक्सीकरण संख्या उस पर उपस्थित आवेश के बराबर होती है। उदाहरणार्थ-Na+, Mg2+, Fe3+, Cl2,O2- आयनों की ऑक्सीकरण संख्याएँ क्रमशः 1, 2, 3, -1 तथा -2 हैं।
  4. अधातुओं के साथ यौगिकों में हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या +1 होती है। धात्विक हाइड्राइडों | (जैसे-NaH,MgH2, LiH, CaH2 आदि) में हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या -1 होती है।
  5. अधिकांश यौगिकों में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -2 होती है। परॉक्साइडों (जैसे H2O2, BaO2 आदि) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -1 होती है। सुपर ऑक्साइडों (जैसे-KO2, RbO2 आदि) में प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु के लिए ऑक्सीकरण संख्या -92 निर्धारित की गई है। एक अन्य अपवादस्वरूप ऑक्सीजन डाइफ्लुओराइड (OF2) तथा डाइऑक्सीजन डाइफ्लुओराइड (O2F2) जैसे यौगिकों में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या
    क्रमशः +2 तथा +1 है।
  6. सभी क्षार धातुओं की अनेक यौगिकों में ऑक्सीकरण संख्या +1 होती है तथा सभी क्षारीय मृदा धातुओं की ऑक्सीकरण संख्या +2 होती है। ऐलुमिनियम की उसके यौगिकों में ऑक्सीकरण संख्या सामान्यतः +3 होती है।
  7. सभी यौगिकों में फ्लुओरीन की ऑक्सीकरण संख्या -1 होती है। यौगिकों में क्लोरीन, ब्रोमीन तथा आयोडीन की ऑक्सीकरण संख्या साधारणत: -1 होती है, परन्तु जिन यौगिकों में ये तत्त्व ऑक्सीजन से जुड़े होते हैं उन यौगिकों में इन तत्वों की ऑक्सीकरण संख्या कोई धनात्मक संख्या होती है।
  8. दो अधातु परमाणुओं वाले यौगिकों में अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्त्व के परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या ऋणात्मक होती हैं जबकि कम विद्युत ऋणात्मक तत्त्व के परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या धनात्मक होती है। उदाहरणार्थ-NH2 तथा NI2 में N कम विद्युत ऋणात्मक परमाणु से जुड़ा है इसीलिए इसको -3 ऑक्सीकरण संख्या दी जाती है, परन्तु जब यह NF2 में अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु से जुड़ा होता है, तब इसे +3 ऑक्सीकरण संख्या दी जाती है।
  9. उदासीन यौगिकों में सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का बीजीय योग शून्य होता है। उदाहरणार्थ-CH4 में सभी परमाणुओं का बीजीय योग शून्य है।
  10. जटिल तथा बहुपरमाणुक आयनों में, आयन के सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का बीजीय योग आयन पर उपस्थित आवेश के बराबर होता है।

धात्विक तत्त्वों की ऑक्सीकरण संख्या धनात्मक होती है तथा अधात्विक तत्त्वों की ऑक्सीकरण संख्या धनात्मक या ऋणात्मक होती है। संक्रमण धातु तत्त्व अनेक धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या दर्शाते। हैं। -ब्लॉक के तत्त्वों के लिए उनकी उच्चतम धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या उनकी वर्ग संख्या के बराबर होती है। 2-ब्लॉक के तत्त्वों (उत्कृष्ट गैसों को छोड़कर) के लिए उच्चतम धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या उनकी वर्ग संख्या में से 10 घटाकर प्राप्त की जाती है। यद्यपि p-ब्लॉक के तत्त्वों के लिए उच्चतम ऋणात्मक ऑक्सीकरण संख्या 8 में से संयोजी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या घटाकर प्राप्त की जा सकती है। इसका अर्थ है कि आवर्त सारणी के किसी आवर्त में उच्चतम धनात्मक ऑक्सीकरण संख्या सामान्यत: बढ़ती है। आवर्त सारणी के तीसरे आवर्त में ऑक्सीकरण संख्या +1 से +7 तक बढ़ती है।

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