UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 7 Advent of European Powers in India

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 7
Chapter Name Advent of European Powers in India
(यूरोपीय शक्तियों का भारत में प्रवेश)
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 7 Advent of European Powers in India (यूरोपीय शक्तियों का भारत में प्रवेश)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 1498 ई०
2. 1600 ई०
3. 1664 ई०
4. 1758 ई०
5. 23 जून, 1757 ई०
6. 1765 ई०
7. 1772 ई०
उतर:
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ-संख्या- 134 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्यया असत्य बताइए
उतर:
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 135 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर:
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 135 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर:
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 135 व 136 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में पुर्तगाली सत्ता की स्थापना पर प्रकाश डालिए।
उतर:
सन् 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को-डि-गामा अपने जाहजी बेड़ों के साथ कालीकट पहुँचा। कालीकट के राजा जमोरिन ने उनका आतिथ्य सत्कार किया। पुर्तगालियों ने इस स्वागत और सम्मान का अनुचित लाभ उठाया। 1500 ई० में पड़ो अल्बरेज काबराल ने 13 जहाजों को एक बेड़ा और सेना लेकर जमोरिन को नष्ट करने की कोशिश की। 1502 ई० में वास्को-डि-गामा पुन: भारत आया और मालाबार तटों पर क्षेत्रीय अधिकार कर भारत में पुर्तगाली सत्ता की स्थापना का प्रयास किया।

प्रश्न 2.
भारत में पुर्तगाली शक्ति के उत्थान और पतन पर संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उतर:
पुर्तगाली गर्वनर अल्मोड़ा और अल्बुकर्क के प्रयासों से भारत में पुर्तगाली शक्ति का उत्थान हुआ। पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी तटों पर गोवा के अतिरिक्त दमन, दीव, सालीसट, बेसीन, चोल, बम्बई तथा बंगाल में हुगली आदि पर अधिकार कर 150 वर्षों तक सत्ता का उपभोग किया। भारत में पुर्तगालियों की शक्ति के पतन के विभिन्न कारण रहे हैं। 1580 ई० में पुर्तगाल स्पेन के साथ सम्मिलित होने से अपनी स्वतंत्रता खो बैठा। मुगलों और मराठों ने भी पुर्तगालियों का विरोध किया। बाद में पुर्तगाली व्यापार के प्रति उदासीन हो गए और राजनीति में अधिक हस्तक्षेप करने लगे, जिससे स्थानीय विरोधों के कारण उनकी आर्थिक शक्ति समाप्त होने लगी, जो उनके पतन का मख्य कारण बनी।

प्रश्न 3.
भारत में डचों की प्रगति के इतिहास पर प्रकाश डालिए।
उतर:
भारत में पुर्तगालियों के व्यापारिक लाभ से प्रोत्साहित होकर हॉलैण्ड निवासी, जिन्हें डच कहा जाता है, ने अपना ध्यान भारत की ओर केन्द्रित किया। सन् 1602 ई० में भारत में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य भारत व अन्य पूर्वी देशों में व्यापार करना था। शीघ्र ही डचों ने मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित कर धीरे-धीरे पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर अपने प्रभाव में वृद्धि की।

प्रश्न 4.
कर्नाटक के प्रथम युद्ध का क्या परिणाम हुआ?
उतर:
अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य कर्नाटक का प्रथम युद्ध हुआ। इस युद्ध के कारण फ्रांसीसियों के भारत में साम्राज्य स्थापना के सपने को गहरा आघात पहुँचा परन्तु फिर भी भारत में फांसीसियों की धाक जम गई तथा फ्रांसीसी गर्वनर डुप्ले ने और अधिक उत्साह से देश की आन्तरिक समस्याओं में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया। इस युद्ध ने विदेशियों पर भारत की दुर्बलता को पुर्णत: प्रकट कर दिया और दोनों शक्तियाँ कर्नाटक के आन्तरिक संघर्षों में हस्तक्षेप करने लगीं।

प्रश्न 5.
भारत में पुर्तगालियों की असफलता के दो कारण लिखिए।
उतर:
भारत में पुर्तगालियों की असफलता के दो कारण निम्नलिखित हैं

  • मुगलों एवं मराठों द्वारा पुर्तगालियों का विरोध करना।
  • पुर्तगालियों की धार्मिक कट्टरता, धर्म-प्रचार एवं स्थानीय स्त्रियों से विवाह करने की नीति।

प्रश्न 6.
अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों की पराजय के किन्हीं पाँच कारणों का वर्णन कीजिए।
उतर:
अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों की पराजय के पाँच कारण निम्नलिखित हैं

  • अंग्रेजी कंपनी का व्यापारिक तथा आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठ होना।
  • अंग्रेजों की शक्तिशाली नौसेना
  • मुम्बई पत्तन की सुविधा
  • ब्रिटिश अधिकारियों की योग्यता
  • फ्रांसीसियों द्वारा व्यापार की अपेक्षा राज्य विस्तार पर बल देना।

प्रश्न 7.
अंग्रेजों ने सूरत पर किस प्रकार अधिकार किया?
उतर:
अंग्रेजों ने सूरत में व्यापारिक कोठी की स्थापना करके धीरे-धीरे सूरत पर अधिकार किया।

प्रश्न 8.
इलाहाबाद की संधि क्या थी? उसकी शर्ते का वर्णन कीजिए।
उतर:
इलाहाबाद की संधि( 1765 ई० )- क्लाइव 1765 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) का गर्वनर बनकर पुनः भारत आया। उसने इलाहाबाद जाकर मुगल सम्राट शाहआलम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ अलग-अलग संधि की जो इलाहाबाद की संधि के नाम से प्रसिद्ध है। इस संधि की शर्ते इस प्रकार थीं

  • मुगल सम्राट शाहआलम ने बंगाल, बिहार व उड़ीसा (ओडिशा) की दीवानी अंग्रेजों को प्रदान कर दी।
  • मुगल सम्राट शाहआलम को कड़ा और इलाहाबाद के जिले प्रदान किये गये।
  • अंग्रेजों ने मुगल सम्राट शाहआलम को 26 लाख रुपया वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।
  • नवाब शुजाउद्दौला ने अंग्रेजों को युद्ध के हर्जाने के रूप में 50 लाख रुपया देना स्वीकार किया।
  • शुजाउदौला ने बाह्य आक्रमणों के दौरान भेजी जाने वाली अंग्रेजी सेना का खर्चा वहन करना स्वीकार किया।
  • चुनार का दुर्ग अंग्रेजों के पास यथावत रहने दिया।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन की विवेचना कीजिए।
या
सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय कम्पनियों की गतिविधियों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उतर:
पुर्तगालियों का भारत आगमन- 20 मई, 1498 ई० का दिन भारत और यूरोप के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन कहा जा सकता है क्योंकि इस दिन भारत की धरती पर एक पुर्तगाली वास्को-डि-गामा अपने चार जहाजों और एक सौ अठारह नाविकों के साथ उतरा। एडम स्मिथ ने अमेरिका की खोज और आशा अन्तरीप की ओर से भारत के मार्ग की खोज को “मानवीय इतिहास की दो महानतम् और अत्यन्त महत्वपूर्ण घटनाएँ बताया है।”

आधुनिक अन्वेषणों से पता चलता है कि वास्को-डि-गामा स्वयं भारत नहीं पहुंचा था, बल्कि वह मोजांबिक पहुँचने पर एक भारतीय व्यापारी के जहाज के पीछे-पीछे चलकर कालीकट तक पहुँच पाया। अत: भारत तक उसकी यात्रा ‘वास्को-डि-गामा की नवीन खोज’ न थी। एक प्रकार से उसने इस मार्ग का अनुसरण किया था। कुछ भी हो, कालीकट पहुँचने पर वहाँ के हिन्दू राजा जमोरिन ने उसका स्वागत और आतिथ्य-सत्कार किया। लेकिन पुर्तगालियों ने इस स्वागत और सम्मान का अनुचित लाभ उठाया। 1500 ई० में पेड्रो अल्वरेज काबराल ने 13 जहाजों का एक बेड़ा और सेना लेकर जमोरिन को नष्ट करने की कोशिश की। 1502 ई० में पुन: वास्को-डि-गामा भारत आया और मालाबार तटों पर क्षेत्रीय अधिकार के कुछ प्रयास किए।

आल्मीड़ा या अल्मोडा भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। 1509 ई० में अल्बुकर्क नामक पुर्तगाली गवर्नर बनकर भारत आया। विश्वासघात और पारस्परिक फूट का लाभ उठाकर नवम्बर, 1510 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अपना अधिकार कर लिया। इन्होंने ईसाईयत का मनमाने ढंग से प्रचार किया और व्यापार को बढ़ाया। गोवा के अतिरिक्त दमन, दीव, सालीसट, बेसीन, चोल और बम्बई (मुम्बई), बंगाल में हुगली तथा मद्रास (चेन्नई) तट पर स्थित सान-थोम पुर्तगालियों के अधिकार में चले गए। 150 वर्षों तक सत्ता का उपभोग करने के उपरान्त भारत में उनकी सत्ता का पतन होने लगा और उनके अधिकार में केवल गोवा, दमन और दीव रह गए थे।

भारत में डचों का आगमन- भारत में पुर्तगालियों को व्यापारिक लाभ से प्रोत्साहित होकर हॉलैण्ड निवासी, जिन्हें डच कहा जाता है, ने अपना ध्यान भारत की ओर केन्द्रित किया। उनका पहला व्यापारिक बेड़ा मलाया द्वीप-समूह में आया। केप ऑफ गुड होप होते हुए भारत में 1596 ई० में आने वाला कार्निलियस छूटमैन प्रथम डच नागरिक था। उनके द्वारा भी अन्य यूरोपीय देशों की भाँति भारत में व्यापार हेतु 1602 ई० में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य भारत व अन्य पूर्वी देशों से व्यापार करना था।

शीघ्र ही डचों ने मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया और धीरे-धीरे उन्होंने पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया। डचों ने पुर्तगालियों को मलक्का (1641 ई०) और श्रीलंका (1658 ई०) के तटीय भागों से भगा दिया और दक्षिण भारत में अपने प्रभाव में वृद्धि की। डचों ने भारत में सूरत, भड़ौच, कैम्बे, अहमदाबाद, कोचीन, मसूलीपट्टम, चिन्सुरा और पटना में अनेक व्यापारिक केन्द्र बनाए। वे भारत में सूती वस्त्र और कच्चा रेशम, शोरा, अफीम और नील निर्यात करते थे, परन्तु शीघ्र ही वे भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच की स्पर्धा का शिकार हुए। डचों की कम्पनियाँ शीघ्र ही प्रभावहीन हो गई, जिसका प्रमुख कारण डच सरकार का कम्पनी के कार्यों में अत्यधिक हस्तक्षेप था। सरकारी प्रभुत्व को ज्यादा महत्व दिया गया, व्यापार को कम। यह माना जाता है कि डचों की हार का प्रमुख कारण कम्पनी का सरकारी संस्था होना था।

सर्वप्रथम डच और अंग्रेज लोग मित्रों की भाँति पूर्व में आए ताकि कैथोलिक धर्मानुयायी देश पुर्तगाल तथा स्पेन का सामना कर सकें। परन्तु शीघ्र ही यह मित्रता की भावना लुप्त हो गई तथा आपसी विरोध आरम्भ हो गया। अंग्रेजों की स्पेन समर्थक नीति ने आंग्ल-डच मित्रता पर आघात किया तथा दोनों में एक गम्भीर संघर्ष आरम्भ हो गया। अम्बोयना में हुए अंग्रेजों के हत्याकाण्ड (1623 ई०) के कारण समझौते की सब आशाओं पर पानी फिर गया। गर्म मसाले के द्वीपों में अपनी श्रेष्ठता कायम करने के लिए यह संघर्ष लम्बे समय तक चलता रहा तथा डचों ने अपनी स्थिति को वहाँ सुदृढ़ बनाए रखा।

अंग्रेजों का भारत आगमन- महारानी एलिजाबेथ प्रथम के शासनकाल में 1599 ई० में लन्दन में लॉर्ड मेयर की अध्यक्षता में भारत के साथ सीधा व्यापार करने के लिए एक संस्था बनाने पर विचार हुआ, जो ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ नाम से शुरू की गई। 31 दिसम्बर, 1600 ई० को महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने इस कम्पनी को एक अधिकार-पत्र प्रदान किया। प्रारम्भ में कम्पनी को साहसी लोगों की मण्डली कहा गया क्योंकि इसके सदस्य लूटने में दक्ष थे।

1608 ई० में अंग्रेजों का पहला जहाजी बेड़ा हॉकिन्स के नेतृत्व में भारत आया था। 1613 ई० में सूरत में अंग्रेजों की व्यापारिक कोठी की स्थापना की। 1615 ई० में सर टामस रो व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने के उद्देश्य से मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में आगरा आया और यहाँ तीन वर्ष तक रहा। प्रारम्भ में मुगल दरबारों में पुर्तगालियों का अधिक प्रभाव होने के कारण उसे अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु अन्ततः वह शहजादा खुर्रम से व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में सफल हुआ।

इसके बाद अंग्रेजों ने सूरत, आगरा, अहमदाबाद तथा भड़ौच में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त की। 1640 ई० में अंग्रेज कम्पनी ने मद्रास (चेन्नई) में एक सुदृढ़ फोर्ट (सेंट जॉर्ज) की स्थापना की। 1642 ई० में बालासोर में भी अंग्रेजों ने एक व्यापारिक कोठी बनाई। 1668 ई० में कम्पनी को बम्बई (मुम्बई) प्राप्त हुआ जो ब्रिटिश सम्राट चार्ल्स द्वितीय को 1661 ई० में पुर्तगाली राजकुमारी ब्रेगाजा की केथरीन से विवाह करने पर दहेज के रूप में मिला था। इसी प्रकार 1651 ई० में अंग्रेजों ने एक फैक्ट्री हुगली में और इसके बाद बंगाल में, कलकत्ता (कोलकाता) और कासिम बाजार में कई कोठियाँ स्थापित कीं।

ईस्ट इण्डिया के विरोधी सौदागरों ने 17 वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में एक नई कम्पनी स्थापित की, जिसका नाम ‘न्यू कम्पनी रखा गया। इस नई कम्पनी ने भी घूस व रिश्वत की नीति अपनाई। शीघ्र ही दोनों कम्पनियों में परस्पर स्वार्थवश टकराव हो गया। अन्त में 1702 ई० में दोनों कम्पनियों ने एक संयुक्त कम्पनी बनाकर अपना व्यापार तेजी से बढ़ाया और स्थानीय राजाओं व नवाबों से भी सम्बन्ध स्थापित किए। 1707 ई० में इस कम्पनी ने मुगल बादशाह फर्रुखसियार से व्यापारिक अधिकारों का एक फरमान (अधिकार-पत्र) प्राप्त किया। अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों शक्तियों ने भारत के देशी राजाओं के पारस्परिक झगड़ों तथा उत्तराधिकार के मामले में हस्तक्षेप कर भूमि, धन व अन्य व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कर ली।

अंग्रेजों का डचों तथा फ्रांसीसियों से व्यापारिक संघर्ष हुआ, जिसमें अंग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई। मुगल साम्राज्य के पतन के पश्चात् तो अंग्रेजों का भारत के राजनीतिक क्षेत्र में भी प्रभाव बढ़ा। हॉलैण्ड तथा पुर्तगाल यूरोप के दुर्बल राष्ट्रों में थे। अतः वे अंग्रेजों के आगे न टिक सके और व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता से बाहर हो गए। अब अंग्रेजों की केवल फ्रांसीसीयों से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा थी। दक्षिण भारत में फैली राजनीतिक अव्यवस्था के कारण दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ जाग्रत हो उठीं और राजनीतिक प्रभुत्व के लिए दोनों के बीच तीन युद्ध (1746-1763 ई०) हुए। यूरोप में भी 1756-63 ई० तक दोनों में सप्तवर्षीय संघर्ष चला, जिसमें फ्रांस का पराभव हुआ। अन्त में भारत में अंग्रेजों को निर्णायक सफलता मिली। धीरे-धीरे अंग्रेजों का भारतीय व्यापार पर ही नहीं सम्पूर्ण भारत पर पूर्णरूपेण अधिकार हो गया।

प्रश्न 2.
भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में फ्रांसीसियों की अपेक्षा अंग्रेज क्यों सफल हुए? विस्तारपूर्वक विवेचना कीजिए।
उतर:
भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में फ्रांसीसियों की अपेक्षा अंग्रेज निम्नलिखित कारणों से सफल रहे
(i) अंग्रेजी कम्पनी का स्वरूप- ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक प्राइवेट कम्पनी थी, जिसमें ब्रिटिश सरकार किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती थी। प्राइवेट होने के कारण इस कम्पनी के सदस्य अत्यधिक परिश्रमी थे, जबकि फ्रांसीसी कम्पनी एक सरकारी कम्पनी थी। अत: प्रत्येक निर्णय के लिए फ्रांसीसी कम्पनी फ्रांसीसी सरकार पर निर्भर रहती थी।

(ii) अंग्रेजी कम्पनी का व्यापारिक तथा आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठ होना- अंग्रेजी कम्पनी व्यापारिक एवं आर्थिक दोनों ही दृष्टि से श्रेष्ठ थी। अंग्रेजों के पास व्यापार हेतु पूर्वी समुद्र-तट और बंगाल का समुद्र प्रान्त था, जहाँ से उन्हें अत्यधिक व्यापारिक लाभ होता था, जिससे उन्हें आर्थिक संकट का बिलकुल भी भय नहीं रहता था। जबकि फ्रांसीसियों के पास ऐसा कोई व्यापारिक स्थान न था, जहाँ से समुचित मात्रा में व्यापारिक लाभ की प्राप्ति होती हो।

(iii) अंग्रेजों की शक्तिशाली नौसेना-
अंग्रेजों की नौसेना फ्रांसीसी नौसेना की तुलना में अधिक शक्तिशाली थी। परिणामस्वरूप वे सदैव अपने व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखने में सफल रहे, जबकि फ्रांसीसी नौसेना कमजोर होने के कारण सैनिक और व्यापारियों को किसी प्रकार की सहायता प्रदान न कर सकी।

(iv) मुम्बई पत्तन की सुविधा-
अंग्रेजों की समुद्री-शक्ति का स्थान मुम्बई था, जिसके कारण वे अपने जहाज मुम्बई में सुरक्षित
रख सकते थे। इसके विपरीत फ्रांसीसियों की समुद्री-शक्ति का अड्डा फ्रांस के द्वीप में था, जो बहुत दूर स्थित था। अत: वे | शीघ्र कोई कार्यवाही नहीं कर सकते थे।

(v) डूप्ले की वापसी-
डूप्ले फ्रांस का एक योग्यतम गवर्नर था। उसने भारत में फ्रांसीसी प्रभाव में वृद्धि की थी, किन्तु उसे फ्रांसीसी सरकार ने थोड़ी-सी असफलता प्राप्त होने पर ही वापस बुला लिया, जिससे अंग्रेजों के उत्साह में और अधिक वृद्धि हो गई।

(vi) ब्रिटिश अधिकारियों की योग्यता-
ब्रिटिश कम्पनी को योग्य अधिकारियों की सेवाएँ प्राप्त हुई। क्लाइव, लारेंस, आयरकूट आदि योग्य ब्रिटिश अधिकारी थे। उन्होंने अपनी योग्यता के बल पर ब्रिटिश कम्पनी को उन्नत बनाया, जबकि फ्रांसीसी अधिकारी इतने योग्य नहीं थे। वे आपस में लड़ते-झगड़ते थे। अत: वे फ्रांसीसी कम्पनी की उन्नति में अपना योगदान न दे सके।

(vii) फ्रांसीसियों द्वारा व्यापार की अपेक्षा राज्य–
विस्तार पर बल देना- फ्रांसीसियों की एक बड़ी भूल यह थी कि उन्होंने व्यापार की अपेक्षा राज्य–विस्तार की महत्वाकांक्षा पर अधिक बल दिया। उनका सारा धन युद्धों में व्यर्थ चला गया। फ्रांसीसी सरकार यूरोप तथा अमेरिका में व्यस्त रहने के कारण डूप्ले की महत्वाकांक्षी योजनाओं का पूर्ण समर्थन करने की स्थिति में नहीं थी। दूसरी ओर अंग्रेज अपने व्यापार की कभी उपेक्षा नहीं करते थे।

(viii) यूरोप में अंग्रेजों की विजय-
भारत में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच होने वाला संघर्ष यूरोप में होने वाला फ्रांस और इंग्लैण्ड के बीच संघर्ष का एक भाग था। यूरोप में अंग्रेजों की विजय हुई और फ्रांसीसी पराजित हुए। इसका प्रभाव भारत में भी पड़ा। भारत में अंग्रेज जीतते गए और फ्रांसीसी पराजित होते गए।

(ix) विलियम पिट की नीति-
1758 ई० में इंग्लैण्ड में विलियम पिट ने युद्धमन्त्री का कार्यभार सम्भालते ही क्रान्तिकारी परिर्वतन कर कुछ इस प्रकार की नीति अपनाई कि फ्रांस यूरोपीय मामलों में बुरी तरह फँस गया और हार गया।

(x) लैली का उत्तरदायित्व-
लैली अत्यन्त ही कटुभाषी व क्रोधी व्यक्ति था। अत: कोई भी फ्रांसीसी अधिकारी उसके साथ काम करने से हिचकिचाता था। वास्तव में वह भारत में फ्रांसीसियों के पतन के लिए अधिक उत्तरदायी था।

प्रश्न 3.
डूप्ले की नीति की समीक्षा कीजिए तथा फ्रांसीसियों की असफलता के कारणों का वर्णन कीजिए।
उतर:
डूप्ले की नीति- डूप्ले की नीति को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है
(i) भारतीय शासकों के मामलों में हस्तक्षेप- डूप्ले ने भारत की राजनीतिक स्थिति के अनुसार अनुमान लगा लिया कि सफलता प्राप्त करने के लिए राजाओं के आपसी झगड़ों में हस्तक्षेप करना, व्यापार व राजनीतिक अधिकारों के लिए लाभकारी है, अतः उसने इस नीति का अनुसरण किया। हैदराबाद और कर्नाटक के झगड़ों में उसे सफलता प्राप्त भी हुई।

(ii) फ्रांसीसी साम्राज्य की स्थापना-
डूप्ले फ्रांसीसी सरकार तथा फ्रांसीसी व्यापारियों के लाभ हेतु यहाँ पर भारत के अन्य क्षेत्रों में भी साम्राज्य स्थापित करने की नीति में विश्वास करता था और साम्राज्य स्थापना के लिए वह अत्यधिक सक्रिय हो गया था।

(iii) व्यापारिक नीति में परिवर्तन-
डूप्ले प्रारम्भ में अपने देश की समृद्धि के लिए भारत में व्यापार की वृद्धि करने आया। उसने फ्रांसीसी कम्पनी को भारत में सुदृढ़ नींव पर खड़ा करने का प्रयास किया, परन्तु बाद में वह समझ गया था कि अंग्रेजों के विरुद्ध सफल होने के लिए राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना भी अनिवार्य है। अतः व्यापार की वृद्धि के लिए वह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में जुट गया। इस प्रकार डूप्ले ने फ्रांसीसी कम्पनी की व्यापारिक नीति में परिवर्तन किया तथा दक्षिणी भारत में फ्रांस के राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना की ओर ध्यान दिया।

(iv) भारतीय सैन्य-बल पर प्रयोग-
डूप्ले फ्रांसीसी सेनाओं की दुर्बलताओं से भली-भाँति परिचित था। अत: उसने सैन्य बल का लाभ उठाने की नीति अपनाई थी। उसने भारतीय राजाओं की सेनाओं को पाश्चात्य ढंग से प्रशिक्षण देना शुरू किया।

(v) उपहार ग्रहण करना-
धन की अभिवृद्धि के लिए डूप्ले ने भारतीय राजाओं से उपहार ग्रहण करने की नीति अपनाई। यह नीति राजनीतिक दृष्टिकोण से डूप्ले द्वारा लिया गया अविवेकपूर्ण निर्णय था।

फ्रांसीसियों की असफलता के कारण- फ्रांसीसियों की असफलता के निम्नलिखित कारण हैं
(i) गोपनीयता- डूप्ले अपनी भावी योजना को अन्य समकक्ष अधिकारियों से छिपाकर रखता था। इसका परिणाम यह हुआ कि कम्पनी और फ्रांसीसी सरकार उसकी समय पर सहायता न कर सकी और इस तरह डूप्ले की गोपनीय योजना की यह नीति फ्रांसीसियों के पतन का प्रमुख कारण बन गई।

(ii) व्यापार की दयनीय दशा-
फ्रांसीसियों का व्यापार भी पतनोन्मुख था। ब्रिटिश व्यापारी बहुत चतुर व दक्ष थे। इनका एकमात्र मुम्बई का व्यापार ही सारे फ्रांसीसी व्यापार की तुलना में पर्याप्त था। व्यापारिक अवनति ने भी फ्रांसीसियों का मनोबल कम कर दिया। यह स्थिति फ्रांसीसियों के लिए अंग्रेजों से बराबरी करने में प्रतिकूल सिद्ध हुई। चारित्रिक दुर्बलता- डूप्ले अहंकारी व्यक्ति था। वह अति महत्वाकांक्षी था तथा उसका स्वभाव षड्यन्त्रप्रिय था। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ तथा प्रबन्धक था परन्तु योग्य सेनानायक न था। इसके विपरीत उसका प्रतिद्वन्द्वी क्लाइव योग्य राजनीतिज्ञ तथा प्रबन्धक तो था ही साथ ही कुशल सेनानायक भी था।

(iv) फ्रांसीसी सरकार का असहयोग-
डूप्ले ने भारतीय राज्यों में अपने हस्तक्षेप की बात कम्पनी के डायेक्टरों से छिपाकर अपनी योजना उनके सामने स्पष्ट नहीं की। इस कारण उसको फ्रांसीसी सरकार से कोई सहायता नहीं मिल सकी बल्कि डायरेक्टर उसकी नीति को शंका की दृष्टि से देखने लगे। मजबूरन डूप्ले को अपनी ही अपर्याप्त शक्ति पर निर्भर रहना पड़ा। फ्रांस की तत्कालीन सरकार ने इन परिस्थितियों में अमेरिका में ही अपने उपनिवेश स्थापित करने की ओर ध्यान दिया भारत की ओर नहीं, क्योंकि भारत की स्थिति को डूप्ले ने छिपाए रखा।

(v) फ्रांसीसी सरकार का अपने प्रतिनिधियों से दुर्व्यवहार-
फ्रांसीसी सरकार अपने प्रतिनिधियों के प्रति समुचित स्नेह और आदर का व्यवहार नहीं करती थी। इससे उनका मनोबल टूट जाता था, जिससे वे कार्यों को आत्मिक भाव से न करके उसे सरकारी समझकर असावधानी बरतते थे। डूप्ले तथा लैली के प्रति दुर्व्यवहार किया गया था। डूप्ले को वापस बुला लिया गया तथा लैली को बाद में मृत्युदण्ड दिया गया।

(vi) चाँदा साहब का पक्ष लेना-
डूप्ले को एक भागे हुए तथा मराठों की कैद में वर्षों रहने वाले चाँदा साहब का पक्ष लेना उसकी अदूरदर्शिता थी। चाँदा साहब का कर्नाटक की राजनीति से सम्बन्ध विच्छेद हो चुका था और वहाँ उसका कोई प्रभाव नहीं था। डूप्ले को मुहम्मद अली का पक्ष लेना चाहिए था, जिसका कर्नाटक की जनता पर प्रभाव था और जिसे जनता द्वारा वास्तव में गद्दी का अधिकारी समझा जाता था।

(vii) अति महत्वाकांक्षी होना-
डूप्ले एक ही समय में हैदराबाद और कर्नाटक दोनों स्थानों पर हस्तक्षेप कर सफलता पाना चाहता था, जबकि फ्रांसीसी साधन दोनों स्थानों पर एक साथ सफलता प्राप्त करने के लिए अपर्याप्त थे। उसने अत्यधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण दोनों स्थानों पर एक साथ हस्तक्षेप किया और दोनों ही स्थानों पर वह असफल रहा।

प्रश्न 4.
अंग्रेज तथा फ्रांसीसियों के मध्य हुए संघर्ष का वर्णन कीजिए।
उतर:
भारतीय व्यापार की प्रतिद्वन्द्विता एवं उपनिवेश स्थापना का प्रयास तथा भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापना के प्रश्न पर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों में संघर्ष हो गया। 16वीं तथा 17वीं शताब्दियों में जब मुगलों का चरम उत्कर्ष का काल था तथा केन्द्रीय शक्ति सुदृढ़ थी, यूरोप के व्यापारी विभिन्न छोटे तथा बड़े भारतीय शासकों के दरबारों में प्रार्थी के रूप में आते थे परन्तु अनुकूल परिस्थितियों में उनकी व्यावसायिक प्रवृत्ति धीरे-धीरे साम्राज्यवादी मनोवृत्ति में बदल गई। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ समय उपरान्त ही मुगल साम्राज्य, केन्द्र में होने वाले राजमहलों के षड्यन्त्रों तथा अपने सूबेदारों की स्वार्थपूर्ण देशद्रोहिता के कारण पतनोत्मुख हो चला था। इसके अतिरिक्त 1739 ई० में नादिरशाह तथा 1761 ई० में अहमदशाह अब्दाली के भयंकर आक्रमणों ने दिल्ली के शाही दरबार की दुर्बलता सबके सामने स्पष्ट कर दी। पेशवाओं के नेतृत्व में मराठे अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे जिससे देश की शिथिल केन्द्रीय व्यवस्था नष्ट होने के निकट पहुँच गई थी।

(i) व्यापारिक एकाधिकार की स्थापना का प्रयास- फ्रांसीसी तथा अंग्रेज दोनों ही प्रारम्भ में व्यापारिक एकाधिकार स्थापित करने में संलग्न थे। दक्षिण भारत में दोनों विदेशी जातियों ने अपनी-अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थीं। अत: अंग्रेज तथा फ्रांसीसी संघर्ष अनिवार्य हो गया। दोनों ही राष्ट्रों ने पूर्व में आक्रामक नीति का अनुसरण किया। प्रारम्भ में इन्होंने आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित होकर सेना का निर्माण किया और किलेबन्दी भी की। फिर भारतीय राजाओं और नबाबों के पारस्परिक झगड़ों में हस्तक्षेप किया तथा अपने हित की पूर्ति के लिए अपनी सेना से उनकी सहायता करने लगे। इन संघर्षों में फ्रांसीसी यदि एक ओर होते थे तो अंग्रेज ठीक उसके विपक्षी की ओर। इस प्रकार वे दोनों आपस में लड़ने लगते थे और अपनी-अपनी शक्ति एवं क्षमता का प्रदर्शन करते थे।

(ii) डूप्ले की महत्वाकांक्षा- भारतीय राजनीति में प्रथम राजनीतिक हस्तक्षेप का श्रीगणेश फ्रांसीसियों के गवर्नर डूप्ले ने किया। डूप्ले फ्रांसीसी गवर्नरों में सर्वाधिक साम्राज्यवादी एवं महत्वाकांक्षी था। उसने भारत में फ्रांसीसी व्यापार को उन्नत करने के लिए देशी राजाओं की राजनीति में हस्तक्षेप करना और उन्हें अपने प्रभाव में लाना आवश्यक समझा। अंग्रेज डूप्ले की इस नीति को सहन न कर सके और वे भी भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे। परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष हुआ।

(iii) यूरोप में ऑस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध-1742 ई० में यूरोप में अंग्रेज और फ्रांसीसी परस्पर संघर्षरत थे। दोनों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण 1740 ई० में ऑस्ट्रिया और प्रशा के मध्य युद्ध का होना था। इस युद्ध में अंग्रेज ऑस्ट्रिया की ओर तथा फ्रांसीसी प्रशा की ओर थे। यूरोप में हुए दोनों के बीच संघर्ष का प्रभाव भारत में भी पड़ा, जिससे भारत में दोनों के बीच संघर्ष हुआ।।

(iv) भारत की राजनीतिक दशा-
औरंगजेब के पतन के पश्चात् भारत में अनेक नवीन राज्य एवं शक्तियों का उदय हुआ। इनमें से कोई भी राज्य अथवा शक्ति ऐसी न थी, जो सम्पूर्ण भारत पर अपना नियन्त्रण कायम रखने में सक्षम हो। अत: ऐसी स्थिति में अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों को ही व्यापार के साथ-साथ भारत में अपनी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर प्राप्त हुआ।

(v) उत्तराधिकार के संघर्ष में कम्पनी की भागीदारी-
हैदराबाद के निजाम-उल-हक की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार हेतु नासिरजंग और मुजफ्फरजंग के मध्य संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में व्यापारिक लाभ की कामना से अंग्रेजों ने नासिरजंग और फ्रांसीसियों ने मुजफ्फरजंग का साथ दिया। अत: कहा जा सकता है कि उत्तराधिकार के संघर्ष में दोनों कम्पनियों का भाग लेना दोनों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण था।

प्रश्न 5.
बंगाल में ब्रिटिश शासन की शुरुआत पर एक टिप्पणी कीजिए।
उतर:
बंगाल में ब्रिटिश शासन की शुरुआत- प्लासी और बक्सर के युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्ध थे, जिसके परिणामस्वरूप बंगाल में ब्रिटिश राज्य की नींव पड़ी और भारतीय इतिहास में एक नए अध्याय का आरम्भ हुआ।

बंगाल एक समृद्धिशाली प्रान्त था। उस समय यह मुगलों के अधीन था। व्यापारिक दृष्टिकोण से बंगाल काफी अग्रसर था। अंग्रेजों ने सन् 1651 ई० में अपनी प्रथम व्यापारिक कोठी हुगली में स्थापित की। उस समय वहाँ का सूबेदार शाहजहाँ का पुत्र शाहशुजा था। उसकी स्वीकृति के बाद उन्होंने अपनी कोठियों का विस्तार कासिम बाजार व पटना तक कर लिया। मुगल सम्राट फर्रुखसियार ने 1717 ई० में अंग्रेजों को अत्यधिक सुविधाएँ दीं। उसने उन पर लगे सभी व्यापारिक कर हटा दिए, जिसका अंग्रेजों ने पूर्णरूप से दुरुपयोग किया। उन्होंने कम्पनी के साथ स्वयं का व्यापार भी बिना कर दिए करना शुरू कर दिया।

वस्तुत: भारत में अंग्रेजी राज का प्रभुत्व सर्वप्रथम बंगाल से ही शुरू हुआ। मुगलों द्वारा अंग्रेजों को दी गई छूट अन्ततः उन्हीं के साम्राज्य के पतन का कारण बन गई। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुर्शिदकुली खाँ को बंगाल का सूबेदार बनाया गया। वह एक ईमानदार व योग्य व्यक्ति था। उसके काल के दौरान बंगाल उन्नति की ओर अग्रसर हुआ। उस समय बंगाल मुगल काल का सबसे समृद्धिशाली प्रान्त था। 1727 ई० में मुर्शिदकुली खाँ की मृत्यु हो गई और उसके दामाद शुजाउद्दीन मोहम्मद खान शुजाउद्दौला असदजंग को बंगाल व उड़ीसा का कार्यभार सौंप दिया गया। उसके काल में भी बंगाल ने काफी उन्नति की। शुजाउद्दौला की मृत्यु के उपरान्त 1739 ई० में उसके पुत्र सरफराज ने बंगाल, बिहार व उड़ीसा का राज्य सँभाला। उसने अलाउद्दौला हैदरजंग की उपाधि प्राप्त की।

1739 ई० में बिहार के नाजिम अलीवर्दी खाँ ने अलाउद्दौला की हत्या कर दी और बंगाल का सूबेदार बन बैठा। वह भी योग्य शासक था। उसके काल में मराठों ने बंगाल में छापे मारने शुरू कर दिए, जिससे मुक्ति पाने के लिए उसने मराठों से सन्धि कर ली। मराठों को उड़ीसा व 12 लाख रुपए उसने चौथ के रूप में दे दिए। तदुपरान्त बंगाल की आंतरिक स्थिति को सुधारकर वहाँ पर शान्ति स्थापित कर दी।

अलीवर्दी खाँ के कोई पुत्र न था। अत: उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। राज्यारोहण के समय वह 25 वर्ष का अनुभवशून्य युवक था तथा हठी एवं आलसी होने के कारण उसकी कठिनाइयाँ और भी अधिक बढ़ गई थीं। सर शफात अहमद खाँ के अनुसार- ‘‘सिराजुद्दौला अदूरदर्शी, हठी और दृढ़ था। उसको वृद्ध अलीवर्दी खाँ के लाड़-प्यार ने बिलकुल बिगाड़ दिया था। गद्दी पर बैठने पर भी उसमें कोई सुधार न हुआ। वह झूठा था, कायर था, नीच और कृतघ्न था। उसमें अपने पूर्वजों के कोई गुण न थे और अपने जो गुण थे उनको प्रयोग में लाने की शक्ति उसमें नहीं थी। वह भी अंग्रेजों की कुटिल नीति का उसी तरह शिकार बना जिस तरह दक्षिण के नवाब तथा कुछ अन्य राजा बने थे।

प्रश्न 6.
बक्सर के युद्ध का वर्णन कीजिए तथा उसके परिणामों की विवेचना कीजिए।
उतर:
बक्सर का युद्ध ( 22 अक्टूबर, 1764 ई० )- अंग्रेजों ने अपदस्थ मीरकासिम के स्थान पर मीरजाफर को पुनः बंगाल का नवाब बना दिया। अंग्रेजों के इस रवैये से असन्तुष्ट होकर मीरकासिम ने मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय एवं नवाब शुजाउद्दौला से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक शक्तिशाली संघ का निर्माण किया। इनकी संयुक्त सेना में 40-50 हजार सैनिक थे। कम्पनी की सेना में 7027 सैनिक थे और उसका नेतृत्व मेजर मुनरो कर रहा था। इतिहास प्रसिद्ध यह लड़ाई बक्सर नामक स्थान पर 22 अक्टूबर, 1764 को हुई। इस युद्ध में अंग्रेज विजयी हुए। पराजित मीरकासिम भाग गया। शाहआलम ने अंग्रेजों की शरण ली। इस युद्ध में अंग्रेजों के 847 सैनिक मरे या हताहत हुए, जबकि तीनों की संयुक्त सेना के लगभग 2000 सैनिक मरे या हताहत हुए। परिणामस्वरूप पराजित मीरकासिम इलाहाबाद पहुँचा। वह 12 वर्षों तक भटकता रहा, अन्ततः 1777 ई० में दिल्ली के निकट उसकी मृत्यु हो गई।

बक्सर के युद्ध के कारण- मीरकासिम और अंग्रेजों के मध्य बक्सर युद्ध के निम्नलिखित कारण थे
(i) अंग्रेजों की बेईमानी- यद्यपि मीरकासिम ने कम्पनी को यह आज्ञा दी थी कि कलकत्ता (कोलकाता) में ढाली गई मुद्राएँ तौल और धातु में नवाब की मुद्राओं के समान हों परन्तु कम्पनी घटिया मुद्राएँ ढालती रही तथा जब व्यापारियों ने उन मुद्राओं को लेने से इनकार किया तो कम्पनी की प्रार्थना पर नवाब ने व्यापारियों को दण्ड दिया। फलस्वरूप व्यापारी वर्ग भी कासिम से असन्तुष्ट हो गया।

(ii) कम्पनी का असंयत व्यवहार- मीरकासिम की इतनी ईमानदारी के व्यवहार से भी कम्पनी सन्तुष्ट नहीं थी क्योंकि वह तो नवाब को कठपुतली के समान नचाना चाहती थी। परन्तु मीरजाफर के विपरीत मीरकासिम स्वतन्त्र प्रकृति का व्यक्ति था, वह अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त होना चाहता था।

(iii) राजधानी परिवर्तन- जब मीरकासिम ने देखा कि मुर्शिदाबाद में अंग्रेजों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वह उनके चंगुल से मुक्त नहीं हो सकता तो उसने अपनी राजधानी मुंगेर बदल ली, यद्यपि इस राजधानी परिवर्तन से अनेक अंग्रेज मीरकासिम से असन्तुष्ट हो गए तथा उसे पदच्युत करने का षड्यन्त्र रचने लगे।

(iv) मीरजाफर से अंग्रेजों का समझौता- अंग्रेजों ने पुन: मीरजाफर को गद्दी पर बैठाने का निश्चय किया। मीरजाफर से गुप्त सन्धि की गई जिसके द्वारा मीरकासिम द्वारा दी गई सभी सुविधाएँ कायम रखी गईं परन्तु नवाब की सैनिक संख्या कम कर दी गई। कम्पनी की नमक के अतिरिक्त सभी वस्तुओं पर चुंगी माफ कर दी गई तथा भारतीयों के लिए 25 प्रतिशत चुंगी लगाने का निश्चय किया गया। इसके अतिरिक्त क्षति पूर्ति के लिए भी मीरजाफर ने वचन दिया।

(v) दस्तक प्रथा का दुरुपयोग- इस समय तक मीरकासिम तथा अंग्रेजों के सम्बन्ध बिलकुल बिगड़ चुके थे। इसका कारण व्यापार से सम्बन्धित था। मुगल सम्राट द्वारा दी गई व्यापारिक सुविधाओं का अंग्रेज दुरुपयोग कर रहे थे। दस्तक लेकर सम्पूर्ण देश में अंग्रेज व्यापारी बिना चुंगी दिए व्यापार कर रहे थे तथा अनेक ऐसी वस्तुओं का व्यापार उन्होंने आरम्भ कर दिया था, जिसके लिए उन्हें आज्ञा प्राप्त नहीं थी।

(vi) भारतीयों के साथ अंग्रेजों का व्यवहार- भारतीय व्यापारियों के प्रति उनका व्यवहार अभद्रतापूर्ण था। उनसे बलपूर्वक माल खरीद लिया जाता था तथा उनसे माल पर चुंगी वसूल की जाती थी। कम्पनी मनमाने मूल्य पर कृषकों की खड़ी फसल तथा व्यापारियों का माल खरीद लेती थी, जिसके कारण भारतीय जनता बहुत दु:खी थी। मीरकासिम ने इस विषय पर कम्पनी को अनेक पत्र लिखे परन्तु उसे कोई उत्तर नहीं मिला।

बक्सर के युद्ध के परिणाम- राजनीतिक दृष्टि से बक्सर का युद्ध प्लासी से अधिक महत्वपूर्ण और निर्णायक था और इसके दूरगामी परिणाम हुए
(i) सैनिक महत्व- बक्सर के युद्ध ने प्लासी के युद्ध के द्वारा आरम्भ किए गए कार्य को पूर्ण किया। प्लासी के युद्ध में तो युद्ध का अभिनय-मात्र हुआ था तथा अंग्रेजों को विजय सैनिक योग्यता के कारण नहीं बल्कि कूटनीति के कारण मिली थी, परन्तु बक्सर युद्ध ने यह निश्चित कर दिया कि अंग्रेज युद्ध में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

(ii) अंग्रेजों को दीवानी अधिकार-
इस युद्ध के द्वारा बंगाल तथा बिहार अंग्रेजों के पूर्ण नियन्त्रण में आ गए तथा सम्राट शाहआलम द्वितीय ने बंगाल व
बिहार की दीवानी उन्हें सौंप दी।

(iii) कम्पनी की राजनीतिक प्रतिष्ठा-
अवध भी कम्पनी के प्रभाव में आ गया। इस विजय से कम्पनी का राजनीतिक महत्व स्थापित हो गया। अब वह मात्र व्यापारिक संस्था ही नहीं थी अपितु शासनकर्ता के रूप में उभरी।

(iv) मीरजाफर का पुनः नवाब बनना-
बक्सर के युद्ध में विजय प्राप्त करके अंग्रेजों ने पुन: वृद्ध मीरजाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। मीरजाफर ने अंग्रेजों को बिना चुंगी दिए तथा भारतीयों को 25 प्रतिशत चुंगी पर व्यापार की पुन: व्यवस्था कर दी। उसकी सेना 6 हजार सवार और 12 हजार पैदल निश्चित कर दी गई। युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में नवाब ने काफी धन कम्पनी को दिया तथा एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट भी अपने दरबार में रखना स्वीकार कर लिया। नवाब को कठपुतली बनाकर अंग्रेजों ने बंगाल की धन-सम्पदा को लूटना जारी रखा। मीरजाफर का कोष रिक्त था तथा वह असहाय नवाब अंग्रेजों के चंगुल में पूर्णतया फँसा हुआ था। उसका अन्तिम समय अत्यन्त दु:खपूर्ण था। अन्त में 5 जनवरी, 1765 ई० को मृत्यु ने ही उसे इन संकटों से मुक्त किया।

प्रश्न 7.
बंगाल दोहरा-शासन( द्वैध-शासन ) कब लागू हुआ? उसके लाभ व हानियों पर प्रकाश डालिए।
उतर:
बंगाल में दोहरा-शासन( द्वैध-शासन)-1765 ई० में लॉर्ड क्लाइव जब दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनकर आया तो उसने बंगाल में ‘दोहरे अथवा द्वैध शासन’ की स्थापना की। इस प्रकार की व्यवस्था के अन्तर्गत कम्पनी ने राजस्व सम्बन्धी सभी कार्य अपने हाथ में ले लिए और प्रशासनिक कार्य नवाब के हाथों में रहने दिए। क्लाइव द्वारा बंगाल में प्रशासनिक कार्यों के इस तरह विभाजित करने की प्रणाली को इतिहास में दोहरे अथवा द्वैध शासन प्रणाली के नाम से जाना जाता है। बंगाल में यह प्रणाली 1765 से 1772 ई० तक लागू रही। इस प्रणाली से आरम्भ में अनेक लाभ हुए किन्तु इस प्रणाली में अनेक दोष विद्यमान थे। अतः 1772 ई० में वारेन हेस्टिग्स ने इसे समाप्त कर दिया। दोहरे-शासन से लाभ

  • कम्पनी ने बिना उत्तरदायित्व लिए बंगाल पर अंग्रेजी शिकंजा कस दिया, किन्तु प्रशासन का दायित्व नवाब पर डाल दिया। उपनायबों के माध्यम से राजस्व कम्पनी के कोष में जमा होता रहा।
  • कम्पनी की आर्थिक व सैनिक स्थिति सुदृढ़ हो गई।
  • फ्रांसीसियों व डचों की ईर्ष्या से कम्पनी बच गई व ब्रिटिश संसद का हस्तक्षेप भी नहीं बढ़ सका।
  • क्लाइव ने बंगाल का प्रशासन अपने हाथों में न लेकर कम्पनी को संभावित खतरे से बचा लिया।
  • कम्पनी को लाभ की स्थिति में रखने हेतु उसे केवल व्यापारिक कम्पनी बनाए रखा।
  • दोहरी-शासन प्रणाली से भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव और अधिक मजबूत हो गई। शासन सत्ता की वास्तविक

बागडोर अब अंग्रेजों के हाथ में आ गई और नवाब अब नाममात्र का शासक रह गया। दोहरे-शासन से हानियाँ

  1. दोहरे शासन से न्याय व्यवस्था खोखली हो गई, नवाब तो न्यायाधीशों को समय पर वेतन भी न दे सका। अत: गुलाम हुसैन के अनुसार दोहरे शासन में न्यायाधीशों व राजकर्मचारियों ने न्याय के बहाने अपार धन कमाया।
  2. भू-राजस्व में वृद्धि के साथ-साथ भूमि एक वर्ष के ठेके पर दी जाने लगी। भूमि की उर्वरता की उपेक्षा से भूमि अनुपजाऊ हो गई और किसान भूखों मरने लगे।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi शैक्षिक निबन्य

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name शैक्षिक निबन्य
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi शैक्षिक निबन्य

शैक्षिक निबन्ध

नयी शिक्षा-नीति

सम्बद्ध शीर्षक

  • आधुनिक शिक्षा प्रणाली : एक मूल्यांकन
  • वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष
  • बदलती शिक्षा नीति का छात्रों पर प्रभाव (2013)
  • शिक्षा का गिरता मूल्यगत स्तर [2015]
  • वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में सुधार [2015]
  • आधुनिक शिक्षा-प्रणाली : गुण-दोष [2016]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना
  2. अंग्रेजी शासन में शिक्षा की स्थिति,
  3. स्वतन्त्रता के पश्चात् की स्थिति,
  4. शिक्षा-नीति का उद्देश्य,
  5. नयी शिक्षा नीति की विशेषताएँ,
  6. नयी शिक्षा नीति की समीक्षा,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-शिक्षा मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का सवोत्तम साधन है। प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था मानव को उच्च-आदर्शों की उपलब्धि के लिए अग्रसर करती थी और उसके वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के सम्यक् विकास में सहायता करती थी। शिक्षा को यह व्यवस्था हर देश और काल में तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन-सन्दर्भो के अनुरूप बदलती रहनी चाहिए। भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है, जिसे सन 1835 ई० में लागू किया गया था। अंग्रेजी शासन की गलत शिक्षा-नीति के कारण ही हमारा देश स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी पर्याप्त विकास नहीं कर सका।

अंग्रेजी शासन में शिक्षा की स्थिति–सन् 1835 ईस्वी में जब वर्तमान शिक्षा प्रणाली की नींव रखी गयी थी तब लॉर्ड मैकाले ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि, “अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य भारत में प्रशासन को बिचौलियों की भूमिका निभाने तथा सरकारी कार्य के लिए भारत के लोगों को तैयार करना है। इसके फलस्वरूप एक सदी तक अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के प्रयोग में लाने के बाद भी सन् 1935 ई० में भारत साक्षरता के 10% के आँकड़े को भी पार नहीं कर सका। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भी भारत की साक्षरता मात्र 13% ही थी। इस शिक्षा प्रणाली ने उच्च वर्गों को भारत के शेए समाज से पृथक् रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसकी बुराइयों को सर्वप्रथम गाँधी जी ने सन् 1917 ई० में ‘गुजरात एजुकेशन सोसाइटी’ के सम्मेलन में उजागर किया तथा शिक्षा में मातृभाषा के स्थान और हिन्दी के पक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर तार्किक ढंग से रखा।

स्वतन्त्रता के पश्चात् की स्थिति-स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में ब्रिटिशकालीन शिक्षा-पद्धति में परिवर्तन के कुछ प्रयास किये गये। इनमें सन् 1968 ई० की राष्ट्रीय शिक्षा नीति उल्लेखनीय है। सन् 1976 ई० में भारतीय संविधान में संशोधन के द्वारा शिक्षा को समवर्ती-सूची में सम्मिलित किया गया, जिससे शिक्षा का एक राष्ट्रीय और एकात्मक स्वरूप विकसित किया जा सके। भारत सरकार ने विद्यमान शैक्षिक व्यवस्था का पुनरावलोकन किया और राष्ट्रव्यापी विचार-विमर्श के बाद 26 जून, सन् 1986 ई० को नयी शिक्षा नीति की घोषणा की।

शिक्षा-नीति का उद्देश्य-इस शिक्षा नीति का गठन देश को इक्कीसवीं सदी की ओर ले जाने के नारे के अंगरूप में ही किया गया है। नये वातावरण में मानव संसाधन के विकास के लिए नये प्रतिमानों तथा नये मानकों की आवश्यकता होगी। नये विचारों को रचनात्मक रूप में आत्मसात् करने में नयी पीढ़ी को सक्षम होना चाहिए। इसके लिए बेहतर शिक्षा की आवश्यकता है। साथ ही नयी शिक्षा नीति का उद्देश्य आधुनिक तकनीक की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए उच्चस्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त श्रम-शक्ति को जुटाना है; क्योंकि इस शिक्षा-नीति के आयोजकों के विचार से इस समय देश में विद्यमान श्रम-शक्ति यह आवश्यकता पूरी नहीं कर सकती।

नयी शिक्षा-नीति की विशेषताएँ–
(i) नवोदय विद्यालय-नयी शिक्षा-नीति के अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में विशेषकर ग्रामीण अंचलों में नवोदय विद्यालय खोले जाएँगे, जिनका उद्देश्य प्रतिभाशाली छात्रों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करना होगा। इन विद्यालयों में राष्ट्रीय पाठ्यक्रम लागू होगा।

(ii) रोजगारपरक शिक्षा-नवोदय विद्यालयों में शिक्षा रोजगारपरक होगी तथा विज्ञान और तकनीक उसके आधार होंगे। इससे विद्यार्थियों को बेरोजगारी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

(iii) 10 +2 +3 को पुनर्विभाजन-इन विद्यालयों में शिक्षा 10 + 2 + 3 पद्धति पर आधारित होगी। ‘त्रिभाषा फार्मूला’ चलेगा, जिसमें अंग्रेजी, हिन्दी एवं मातृभाषा या एक अन्य प्रादेशिक भाषा रहेगी। सत्रार्द्ध प्रणाली (सेमेस्टर सिस्टम) माध्यमिक विद्यालयों में लागू की जाएगी और अंकों के स्थान पर विद्यार्थियों को ग्रेड दिये जाएँगे।

(iv) समानान्तर प्रणाली
-नवोदय विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की एक समानान्तर शिक्षा-प्रणाली शुरू की जाएगी।

(v) अवलोकन-व्यवस्था–
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद् शिक्षा-संस्थानों पर दृष्टि रखेगी। एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा संस्था का गठन
होगा। माध्यमिक शिक्षा के लिए एक अलग संस्था गठित होगी।

(vi) उच्च शिक्षा में सुधार-
अगले दशक में महाविद्यालयों से सम्बद्धता समाप्त करके उन्हें स्वायत्तशासी बनाया जाएगा। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा का स्तर सुधारा जाएगा तथा शोध के उच्च स्तर पर बल दिया जाएगा।

(vii) आवश्यक सामग्री की व्यवस्था-
प्राथमिक विद्यालयों में ‘ऑपरेशन ब्लैक-बोर्ड (Operation Blackboard) लागू होगा। इसके अन्तर्गत प्रत्येक विद्यालय के लिए दो बड़े कमरों का भवन, एक छोटा-सा पुस्तकालय, खेल का सामान तथा शिक्षा से सम्बन्धित अन्य साज-सज्जा उपलब्ध रहेगी। शिक्षा-मन्त्रालय ने प्रत्येक विद्यालय के लिए आवश्यक सामग्री की एक आकर्षक और प्रभावशाली सूची भी बनायी है। प्रत्येक कक्षा के लिए एक अध्यापक की व्यवस्था की गयी है।

(viii) मूल्यांकन और परीक्षा सुधार–
हाईस्कूल स्तर तक किसी को भी अनुत्तीर्ण नहीं किया जाएगा। परीक्षा में अंकों के स्थान पर ‘ग्रेड प्रणाली’ प्रारम्भ की जाएगी। छात्रों की प्रगति का आकलन क्रमिक मूल्यांकन द्वारा होगा।

(ix) शिक्षकों को समान वेतनमान–देश भर में अध्यापकों को समान कार्य के लिए समान वेतन के आधार पर समान वेतन मिलेगा। प्रत्येक जिले में शिक्षकों के प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये जाएँगे।

(x) मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना-नयी शिक्षा-नीति के अन्तर्गत सम्पूर्ण देश के पैमाने पर एक मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है। इस मुक्त विश्वविद्यालय का दरवाजा सबके लिए खुला रहेगा; न तो उम्र का कोई प्रतिबन्ध होगा और न ही समय का कोई बन्धन।।

(xi) नयी शिक्षा नीति के अन्तर्गत निजी क्षेत्र के व्यवसायी यदि चाहें तो आवश्यकता के अनुरूप शिक्षण-संस्थान खोल सकेंगे।

नयी शिक्षा-नीति की समीक्षा-वर्तमान शिक्षा प्रणाली में जो अनेकशः दोष हैं उनकी अच्छी -खासी चर्चा सरकारी परिपत्र ‘Challenges of Education : A Policy Perspective’ में की गयी है। इस शिक्षा प्रणाली से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं का भविष्य अन्धकारमय होकर रह गया है। इसके अन्तर्गत केवल अंग्रेजी का ही बोलबाला होगा; क्योंकि इसके लागू होने के साथ-साथ पब्लिक स्कूलों को समाप्त नहीं किया गया है। फलतः इस नीति की घोषणा के बाद देश में अंग्रेजी माध्यम वाले मॉण्टेसरी स्कूलों की गली-कूचों में बाढ़-सी आ गयी है। शिक्षा पर अयोग्य राजनेता दिनोंदिन नवीन प्रयोग कर रहे हैं, जिससे लाभ के स्थान पर हानि हो रही है। शिक्षा के प्रश्न को लेकर बहुधा अनेकों गोष्ठियाँ, सेमिनार आदि आयोजित किये जाते हैं किन्तु परिणाम देखकर आश्चर्य होता है कि शिक्षा प्रणाली सुधरने के बजाय और अधिक निम्नकोटि की होती जा रही है। वस्तुत: भ्रष्टाचार के चलते अच्छे व समर्पित शिक्षा अधिकारी जो संख्या में इक्का-दुक्का ही हैं; उनके सुझावों का प्राय: स्वागत नहीं किया जाता। शिक्षा नीति के अन्तर्गत पाठ्यक्रम भी कुछ इस प्रकार का निर्धारित किया गया है कि एक के बाद दूसरी पीढ़ी के आ जाने तक भी न उसमें कुछ संशोधन होता है, न ही परिवर्तन। पिष्टपेषण की यह प्रवृत्ति विद्यार्थियों में शिक्षा के प्रति अश्रद्धा जगाती है।

निश्चित ही हमारी अधुनातन शिक्षा-नीति, पद्धति, व्यवस्था एवं ढाँचा अत्यन्त दोषपूर्ण सिद्ध हो चुका है। यदि इसे शीघ्र ही न बदला गया तो हमारा राष्ट्र हमारे मनीषियों के आदर्शों की परिकल्पना तक नहीं पहुँच सकेगा।

उपसंहार-नयी शिक्षा नीति के परिपत्र में प्रत्येक पाँच वर्ष के अन्तराल पर शिक्षा नीति के कार्यान्वयन और मानदण्डों की समीक्षा की व्यवस्था की गयी है; किन्तु सरकारों में जल्दी-जल्दी हो रहे परिवर्तनों से इस नयी शिक्षा नीति से नवीन अपेक्षाओं और सुधारों की सम्भावनाओं में विशेष प्रगति नहीं हो पायी है। साथ ही यह शिक्षा नीति एक सुनियोजित व्यवस्था, साधन सम्पन्नता और लगन की माँग करती है। यदि नयी शिक्षा-नीति को ईमानदारी और तत्परता से कार्यान्वित किया जाए तो निश्चय ही हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ सकेंगे।

छात्र और अनुशासन

सम्बद्ध शीर्षक

  • छात्रों में अनुशासनहीनता : कारण और निदान
  • जीवन में अनुशासन का महत्त्व
  • विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन का महत्व (2016)
  • अनुशासन और हम
  • विद्यार्थी जीवन के सुख-दुःख
  • छात्र जीवन में अनुशासन का महत्त्व [2015]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2.  विद्यार्थी और विद्या,
  3. अनुशासन का स्वरूप और महत्त्व,
  4. अनुशासनहीनता के कारण—(क) पारिवारिक कारण; (ख) सामाजिक कारण; (ग) राजनीतिक कारण; (घ) शैक्षिक कारण,
  5. निवारण के उपाय,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना–विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। देश के प्रत्येक प्रकार का विकास विद्यार्थियों पर ही निर्भर है। विद्यार्थी जाति, समाज और देश का निर्माता होता है, अत: विद्यार्थी का चरित्र उत्तम होना बहुत आवश्यक है। उत्तम चरित्र अनुशासन से ही बनता है। अनुशासन जीवन का प्रमुख अंग और विद्यार्थी-जीवन की आधारशिला है। व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने के लिए मात्र विद्यार्थी ही नहीं प्रत्येक मनुष्य के लिए अनुशासित होना अति आवश्यक है। अनुशासनहीन विद्यार्थी व्यवस्थित नहीं रह सकता और न ही उत्तम शिक्षा ग्रहण कर सकता है। आज विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की शिकायत सामान्य-सी बात हो गयी है। इससे शिक्षा-जगत् ही नहीं, अपितु सारा समाज प्रभावित हुआ है और निरन्तर होता ही जा रहा है। अत: इस समस्या के सभी पक्षों पर विचार करना उचित होगा।

विद्यार्थी और विद्या–-‘विद्यार्थी’ का अर्थ है–‘विद्या का अर्थी’ अर्थात् विद्या प्राप्त करने की कामना करने वाला। विद्या लौकिक या सांसारिक जीवन की सफलता का मूल आधार है, जो गुरुकृपा से प्राप्त होती है। इससे विद्यार्थी-जीवन के महत्त्व का भी पता चलता है, क्योंकि यही वह समय है, जब मनुष्य अपने समस्त भावी जीवन की सफलता की आधारशिला रखता है। यदि यह काल व्यर्थ चला जाये तो सारा जीवन नष्ट हो जाता है।

संसार में विद्या सर्वाधिक मूल्यवान् वस्तु है, जिस पर मनुष्य के भावी जीवन का सम्पूर्ण विकास तथा सम्पूर्ण उन्नति निर्भर करती है। इसी कारण महाकवि भर्तृहरि विद्या की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि “विद्या ही मनुष्य का श्रेष्ठ स्वरूप है, विद्या भली-भाँति छिपाया हुआ धन है (जिसे दूसरा चुरा नहीं सकता)। विद्या ही सांसारिक भोगों को, यश और सुख को देने वाली है, विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश जाने पर विद्या ही बन्धु के सदृश सहायता करती है। विद्या ही श्रेष्ठ देवता है। राजदरबार में विद्या ही आदर दिलाती है, धन नहीं; अत: जिसमें विद्या नहीं, वह निरा पशु है।’

फलतः इस अमूल्य विद्यारूपी रत्न को पाने के लिए इसका मूल्य भी उतना ही चुकाना पड़ता है और वह है तपस्या। इस तपस्या का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कवि कहता है-

सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्या, विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥

तात्पर्य यह है कि सुख की इच्छा वाले को विद्या कहाँ और विद्या की इच्छा वाले को सुख कहाँ ? सुख की इच्छा वाले को विद्या की कामना छोड़ देनी चाहिए या फिर विद्या की इच्छा वाले को सुख की कामना छोड़ देनी चाहिए।

अनुशासन का स्वरूप और महत्त्व-‘अनुशासन’ का अर्थ है बड़ों की आज्ञा (शासन) के पीछे (अनु) चलना। जिन गुरुओं की कृपा से विद्यारूपी रत्न प्राप्त होता है, उनके आदेशानुसार कार्य किये बिना विद्यार्थी की उद्देश्य-सिद्धि भला कैसे हो सकती है ? ‘अनुशासन’ का अर्थ वह मर्यादा है जिसका पालन ही विद्या प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के लिए अनिवार्य होता है। अनुशासन का भाव सहज रूप से विकसित किया जाना चाहिए। थोपा हुआ अथवा बलपूर्वक पालन कराये जाने पर यह लगभग अपना उद्देश्य खो देता है। विद्यार्थियों के प्रति प्रायः सभी को यह शिकायत रहती है कि वे अनुशासनहीन होते जा रहे हैं, किन्तु शिक्षक वर्ग को भी इसका कारण ढूंढ़ना चाहिए कि क्यों विद्यार्थियों की उनमें श्रद्धा विलुप्त होती जा रही है।

अनुशासन का विद्याध्ययन से अनिवार्य सम्बन्ध है। वस्तुत: जो महत्त्व शरीर में व्यवस्थित रुधिर-संचार का है, वही विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का है। अनुशासनहीन विद्यार्थियों को पग-पग पर ठोकर और फटकार सहनी पड़ती है।

अनुशासनहीनता के कारण-वस्तुतः विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता एक दिन में पैदा नहीं हुई है। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें मुख्यत: निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है
(क) पारिवारिक कारण-बालक की पहली पाठशाला उसका परिवार है। माता-पिता के आचरण का बालक पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आज बहुत-से ऐसे परिवार हैं, जिनमें माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं या अलग-अलग व्यस्त रहते हैं और अपने बच्चों की ओर ध्यान देने हेतु उन्हें अवकाश नहीं मिलता। इससे बालक उपेक्षित होकर विद्रोही बन जाता है। दूसरी ओर अधिक लाड़-प्यार से भी बच्चा बिगड़कर निरंकुश या स्वेच्छाचारी हो जाता है। कई बार पति-पत्नी के बीच कलह या पारिवारिक अशान्ति भी बच्चे के मन पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है और उसका मन अध्ययन-मनन से विरक्त हो जाता है। इसी प्रकार बालक को विद्यालय में प्रविष्ट कराकर अभिभावकों का निश्चिन्त हो जाना, उसकी प्रगति या विद्यालय में उसके आचरण की खोज-खबर न लेना भी बहुत घातक सिद्ध होता है।

(ख) सामाजिक कारण–विद्यार्थी जब समाज में चतुर्दिक् व्याप्त भ्रष्टाचार, घूसखोरी, सिफारिशबाजी, भाई-भतीजावाद, चीजों में मिलावट, फैशनपरस्ती, विलासिता और भोगवाद, अर्थात् प्रत्येक स्तर पर व्याप्त अनैतिकता को देखता है तो उसका भावुक मन क्षुब्ध हो उठता है, वह विद्रोह कर उठता है। और अध्ययन की उपेक्षा करने लगता है।

(ग) राजनीतिक कारण-छात्र-अनुशासनहीनता का एक बहुत बड़ा कारण राजनीति है। आज राजनीति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर छा गयी है। सम्पूर्ण वातावरण को उसने इतना विषाक्त कर दिया है कि स्वस्थ वातावरण में साँस लेना कठिन हो गया है। नेता लोग अपने दलीय स्वार्थों की पूर्ति के लिए विद्यार्थियों को नौकरी आदि के प्रलोभन देकर पथभ्रष्ट करते हैं, छात्र-यूनियनों के चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल पैसा खर्च करते हैं तथा विद्यार्थियों को प्रदर्शन और तोड़-फोड़ के लिए उकसाते हैं। विद्यालयों में हो रहे इस राजनीतिक हस्तक्षेप ने अनुशासनहीनता की समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

(घ) शैक्षिक कारण-छात्र-अनुशासनहीनता का कदाचित् सबसे बड़ा कारण यही है। अध्ययन के लिए आवश्यक अध्ययन-सामग्री, भवन, सुविधाजनक छात्रावास एवं अन्यान्य सुविधाओं का अभाव, सिफारिश, भाई-भतीजावाद या घूसखोरी आदि कारणों से योग्य, कर्तव्य-परायण एवं चरित्रवान् शिक्षकों के स्थान पर अयोग्य, अनैतिक और भ्रष्ट अध्यापकों की नियुक्ति, अध्यापकों द्वारा छात्रों की कठिनाइयों की उपेक्षा करके ट्यूशन आदि के चक्कर में लगे रहना या आरामतलबी के कारण मनमाने ढंग से कक्षाएँ लेना या न लेना, छात्र और अध्यापकों की संख्या में बहुत बड़ा अन्तर होना, जिससे दोनों में आत्मीयता को सम्बन्ध स्थापित न हो पाना; परीक्षा-प्रणाली का दूषित होना, जिससे विद्यार्थी की योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाना आदि छात्र-अनुशासनहीनता के प्रमुख कारण हैं। परिणामस्वरूप अयोग्य विद्यार्थी योग्य विद्यार्थी पर वरीयता प्राप्त कर लेते हैं। फलतः योग्य विद्यार्थी आक्रोशवश अनुशासनहीनता में लिप्त हो जाते हैं।

निवारण के उपाय-यदि शिक्षकों को नियुक्त करते समय सत्यता, योग्यता और ईमानदारी का आकलन अच्छी प्रकार कर लिया जाये तो प्रायः यह समस्या उत्पन्न ही न हो। प्रभावशाली, गरिमामण्डित, विद्वान् और प्रसन्नचित्त शिक्षक के सम्मुख विद्यार्थी सदैव अनुशासनबद्ध रहते हैं, क्योंकि वह उस शिक्षक के हृदय में अपना स्थान एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में बनाना चाहते हैं।

पाठ्यक्रम को अत्यन्त सुव्यवस्थित व सुनियोजित, रोचक, ज्ञानवर्धक एवं विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए। पाठ्यक्रम में आज भी पर्याप्त असंगतियाँ विद्यमान हैं, जिनका संशोधन अनिवार्य है; उदाहरणार्थ-इण्टरमीडिएट हिन्दी काव्यांजलि की कविताएँ ही बी० ए० द्वितीय वर्ष के हिन्दी पाठ्यक्रम में भी हैं। क्या कवियों का इतना अभाव है कि एक ही रचना वर्षों तक पढ़ने को विवश किया जाये।

छात्र-अनुशासनहीनता के उपर्युक्त कारणों को दूर करके ही हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। सबसे पहले वर्तमान पुस्तकीय शिक्षा को हटाकर प्रत्येक स्तर पर उसे इतना व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए कि शिक्षा पूरी करके विद्यार्थी अपनी आजीविका के विषय में पूर्णतः निश्चिन्त हो सके। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी के स्थान पर मातृभाषा हो। ऐसे योग्य, चरित्रवान् और कर्तव्यनिष्ठ अध्यापकों की नियुक्ति हो, जो विद्यार्थी की शिक्षा पर समुचित ध्यान दें। विद्यालय या विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों की समस्याओं पर पूरा ध्यान दें तथा विद्यालयों में अध्ययन के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाये। विद्यालयों में प्रवेश देते समय गलत तत्त्वों को कदापि प्रवेश न दिया जाये। किसी कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 50-55 से अधिक न हो। शिक्षा सस्ती की जाये और निर्धन, किन्तु योग्य छात्रों को नि:शुल्क उपलब्ध करायी जाये। परीक्षा-प्रणाली स्वच्छ हो, जिससे योग्यता का सही और निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके। इसके साथ ही राजनीतिक हस्तक्षेप बन्द हो, सामाजिक भ्रष्टाचार मिटाया जाये, सिनेमा और दूरदर्शन पर देशभक्ति की भावना जगाने वाले चित्र प्रदर्शित किये जाएँ तथा माता-पिता बालकों पर समुचित ध्यान दें और उनका आचरण ठीक रखने के लिए अपने आचरण पर भी दृष्टि रखें।

उपसंहार—छात्रों के समस्त असन्तोषों का जनक अन्याय है, इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से अन्याय को मिटाकर ही देश में सच्ची सुख-शान्ति लायी जा सकती है। छात्र-अनुशासनहीनता का मूल भ्रष्ट राजनीति, समाज, परिवार और दूषित शिक्षा-प्रणाली में निहित है। इनमें सुधार लाकर ही हम विद्यार्थियों में व्याप्त अनुशासनहीनता की समस्या का स्थायी समाधान ढूँढ़ सकते हैं; क्योंकि विद्यार्थी विद्यालय में पूर्णत: विद्यार्जन के लिए ही आते हैं, मात्र हुल्लड़बाजी के लिए नहीं।

व्यावसायिक शिक्षा के विविध आयाम

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकता,
  3. व्यावसायिक शिक्षा के उद्देश्य-(अ) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास; (ब) जीवन की तैयारी; (स) ज्ञान का जीवन से सहसम्बन्ध; (द) व्यावसायिक एवं आर्थिक विकास; (च) राष्ट्रीय विकास और व्यावसायिक शिक्षा; (छ) शिक्षा का व्यवसायीकरण; (ज) व्यावसायिक शिक्षा का आयोजन–(i) पूर्णकालिक नियमित व्यावसायिक शिक्षा, (ii) अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा, (iii) अभिनव पाठ्यक्रम द्वारा व्यावसायिक शिक्षा, (iv) पत्राचार द्वारा व्यावसायिक शिक्षा,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना-अर्थव्यवस्था किसी भी समाज के विकास की संरचना में महत्त्वपूर्ण होती है। समाजरूपी शरीर का मेरुदण्ड उसकी अर्थव्यवस्था को ही समझा जाता है। समाज की अर्थव्यवस्था उसके व्यावसायिक विकास पर निर्भर करती है। जिस समाज में व्यवसाय का विकास नहीं होता, वह सदैव आर्थिक परेशानियों में घिरा रहता है। व्यावसायिक शिक्षा इसी व्यवसाय सम्बन्धी तकनीकी, वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्षों के क्रमबद्ध अध्ययन को कहा जाता है। इसके अन्तर्गत किसी व्यवसाय के लिए अनिवार्य तकनीकियों एवं विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित ज्ञान प्रदान किया जाता है।

व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकता-वैदिक काल से लेकर ब्राह्मण और बौद्ध काल तक धर्म, काम और मोक्ष को ही शिक्षा के प्रमुख अंगों के रूप में मान्यता प्रदान की गयी थी। अंग्रेजों के शासन काल में भी व्यावसायिक शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। अंग्रेजी सरकार भारत का औद्योगिक विकास न करके इंग्लैण्ड में स्थापित उद्योगों को प्रोत्साहित करना चाहती थी, जिससे वह भारत से कच्चा माल ले जाकर वहाँ से उत्पादित माल ला सके और यहाँ के बाजारों में उसे ऊँचे मूल्य पर बेच सके। इससे भारत का दोहरा शोषण हो रहा था। ब्रिटिश सरकार भारत को स्वावलम्बी बनाना भी नहीं चाहती थी। उसे भय था कि यदि भारत तकनीकी दृष्टि से सशक्त हो गया तो ब्रिटेन में उत्पादित माल भारत में नहीं बिकेगा और उसे यहाँ से कच्चा माल भी नहीं मिल पाएगा।

व्यावसायिक शिक्षा के अभाव को पर्याप्त समय तक अन्य देशों के प्राविधिक सहयोग पर ही निर्भर रहना पड़ा। उन्नते देशों से ऋण लेकर भी तकनीकी क्षेत्र में स्वावलम्बी होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं किया जा सका है। दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण राष्ट्र की मुद्रा का पर्याप्त ह्रास होता है। इसीलिए व्यावसायिक शिक्षा का विकास राष्ट्र की उन्नति की प्राथमिक आवश्यकता है।

व्यक्ति का सर्वांगीण विकास भी तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के विकास द्वारा ही सम्भव हो सकता है। उसका शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक विकास पर्याप्त सीमा तक तकनीकी शिक्षा पर ही आश्रित है।

व्यावसायिक शिक्षा के उद्देश्य-व्यावसायिक शिक्षा, शिक्षा की उपयोगिता और उसके उद्देश्यों को पूरी तरह से स्पष्ट करने में सक्षम है। वास्तव में व्यावसायिक शिक्षा का विकास मानवीय पूर्णता के लिए हुआ है। व्यावसायिक शिक्षा के उद्देश्यों को हम निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं–

(अ) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास–व्यक्ति के व्यक्तित्व को तभी पूर्ण माना जाता है जब उसमें जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास करने की क्षमता उत्पन्न हो जाए। यदि व्यक्ति जीवन के किसी भी क्षेत्र में पिछड़ जाता है तो उसका व्यक्तित्व पूर्ण नहीं माना जा सकता। व्यावसायिक शिक्षा व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकसित होने का अवसर प्रदान करती है। व्यावसायिक शिक्षा शारीरिक श्रम के माध्यम से निरीक्षण, कल्पना, तथ्य-संकलन, नियमन, स्मरण एवं संश्लेषण-विश्लेषण आदि सभी मानसिक शक्तियों का विकास करते हुए शिक्षार्थी को चिन्तन, मनन, तर्क एवं सत्यापन आदि के अवसर प्रदान करती है, जिससे उसका बौद्धिक विकास होता है। विद्यार्थी में किसी व्यवसाय से सम्बन्धित योग्यता एवं कौशल का विकास होने पर आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त उसमें आत्मनिर्भरता की शक्ति भी पैदा होती है।

(ब) जीवन की तैयारी-व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से युवक भावी जीवन के लिए तैयार होता है। वह अपने तथा अपने परिवार के जीवन-यापन के लिए आवश्यक व्यावसायिक योग्यताओं एवं कौशलों को विकसित करने तथा उन्हें प्रयुक्त करने की दृष्टि से सक्षम हो पाता है। आने वाले जीवन में वह संघर्षों के मध्य पिस न जाए इसके लिए भी वह व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से ही शक्ति अर्जित करता है।

(स) ज्ञान का जीवन से सहसम्बन्ध-जो ज्ञान जीवन का अंग नहीं बनता वह निरर्थक और त्याज्य है। जब ज्ञान जीवन का अंग बन जाता है तब वह व्यावहारिक रूप धारण कर लेता है। यदि हमने अपने अर्जित ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में प्रयुक्त नहीं किया तथा उससे लाभ नहीं उठाया तो हम साक्षर तो कहला सकते हैं, लेकिन शिक्षित नहीं कहे जा सकते। व्यावसायिक शिक्षा द्वारा अर्जित ज्ञान जीवन का अंग बन जाता है। वास्तव में वही ज्ञान जीवन का अंग बनता है, जो स्वानुभवों पर आधारित होता है। व्यावसायिक शिक्षा से प्राप्त ज्ञान स्वानुभवों पर टिका होने के कारण जीवन का अंग बन जाता है।

(द) व्यावसायिक एवं आर्थिक विकास–शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त कोई व्यक्ति किसी व्यवसाय को अपना सके तथा उत्तम जीवन व्यतीत करने के लिए सुख-सुविधाओं का संचय कर सके, यह सामर्थ्य शिक्षा द्वारा उत्पन्न की जानी चाहिए। स्वावलम्बी बनना और अपने स्तर को उन्नत बनाना प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य है।

(च) राष्ट्रीय विकास और व्यावसायिक शिक्षा-व्यावसायिक शिक्षा राष्ट्र के उपलब्ध साधनों को विवेकपूर्ण विधि से उपयोग में लाने का दृष्टिकोण भी उत्पन्न करती है। भारत अभी भी खाद्य-पदार्थों, उपभोग की वस्तुओं, उद्योग तथा व्यवसाय को उन्नत करने से सम्बन्धित सुविधाओं एवं बेरोजगारी की समस्या का समाधान निकालने की दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं बन सका है। यदि हमारा देश दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं को स्वयं तैयार कर लेता है तो इससे राष्ट्रीय मुद्रा की बचत होती है तथा देश की आर्थिक समृद्धि भी बढ़ती है। व्यावसायिक शिक्षा इस दृष्टि से हमें सशक्त बनाती है।

(छ) शिक्षा का व्यवसायीकरण-देश की स्वतन्त्रता के 63 वर्षों के बाद भी हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था उसी प्रकार बनी हुई है, जैसी वह अंग्रेजी शासनकाल में थी। आज का शिक्षित युवक बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त है। उसकी शिक्षा न तो उसे और न ही समाज को कोई लाभ पहुँचा रही है। इसका कारण यह है कि अभी तक हमारी शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं किया जा सका है। यदि माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था कर दी जाए तो निश्चित ही बेरोजगारी की समस्या को हल किया जा सकता है।

(ज) व्यावसायिक शिक्षा का आयोजन-व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए हम निम्नलिखित उपाय अपना सकते है–
(i) पूर्णकालिक नियमित व्यावसायिक शिक्षा पूर्णकालिक नियमित व्यावसयिक शिक्षा का आयोजन निम्नलिखित स्तरों पर किया जा सकता है
(अ) निम्न माध्यमिक स्तर पर-कक्षा 7 तथा कक्षा 8 के पश्चात् स्कूल छोड़ने वाले बालकों के लिए निम्नलिखित पाठ्यक्रम को आधार बनाया जा सकता है

  • औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में ऐसे पाठ्यक्रम चलाना, जिनमें प्राथमिक शिक्षा प्राप्त छात्र प्रवेश ले सके।
  • औद्योगिक सेवाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा प्राप्त छात्रों को प्रशिक्षण देना। इससे उनकी श्रम सम्बन्धी कुशलता बढ़ेगी और वे निरक्षर श्रमिकों की अपेक्षा अच्छा कार्य कर सकेंगे।
  • ऐसा प्रशिक्षण देना कि छात्र कक्षा 8 उत्तीर्ण करने के बाद घर पर ही कोई उद्योग या व्यवसाय चला सके। गाँवों के कृषि सम्बन्धी व्यवसाय इसके अच्छे उदाहरण हैं।
  • लड़कियों को गृहविज्ञान के माध्यम से कुछ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए; जैसेसिलाई, कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण। इनका प्रशिक्षण प्राप्त करके लड़कियाँ विवाह के बाद भी इन्हें व्यवसाय के रूप में अपना सकती हैं।
  • स्कूलों में बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम चलाये जाएँ। उन्हें आठवीं कक्षा तक इस प्रकार चलाया जाए कि छात्र/छात्राएँ किसी बेसिक शिल्प में कुशलता प्राप्त कर लें।

(ब) उच्च माध्यमिक स्तर पर-इस स्तर पर कक्षा 8 और हाईस्कूल उत्तीर्ण छात्र व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकते हैं। व्यावसायिक शिक्षा निम्नलिखित दो प्रकार से व्यवस्थित की जा सकती है
(1) पृथक् व्यावसायिक स्कूलों में प्रशिक्षण देकर।
(2) सामान्य शिक्षा के साथ-साथ कोई व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  • पॉलिटेक्निक स्कूलों में व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करके।
  • औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के प्रचलित पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण देकर।
  • बहु-उद्देशीय पाठ्यक्रम के शिल्प या व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर।
  • जूनियर टेक्निकल हाईस्कूलों में प्रवेश देकर।।
  • बहु-उद्देशीय पाठ्यक्रम और जूनियर टेक्निकल स्कूलों के पाठ्यक्रम में समन्वय स्थापित करके।
  • सामान्य शिक्षा के साथ किसी शिल्प का प्रशिक्षण देकर।
  • स्वास्थ्य, वाणिज्य और प्रशासन के उपयुक्त पाठ्यक्रम चलाकर।।

(ii) अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा-कुछ छात्र किन्हीं कारणों से प्राथमिक शिक्षा, कक्षा 8 या हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पढ़ना छोड़ देते हैं और घरेलू व्यवसायों में लग जाते हैं। अपनी जीविका की व्यवस्था में लगे होने के कारण वे नियमित शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्तियों के लिए स्थानीय व्यावसायिक विद्यालयों में अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा दी जा सकती है। इस शिक्षा की मान्यता नियमित शिक्षा के समान होनी चाहिए।
अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा प्राथमिक, माध्यमिक स्तर पर समान रूप से प्रदान की जा सकती है। इन प्रशिक्षणार्थियों को नियमित प्रशिक्षणार्थियों के समान मान्य परीक्षा में बैठाया जा सकता है।

(iii) अभिनव पाठ्यक्रम द्वारा व्यावसायिक शिक्षा-किसी स्थान विशेष अथवा देश की आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न संस्थानों द्वारा नवीनतम व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर आधारित प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

(iv) पत्राचार द्वारा व्यावसायिक शिक्षा अधिकाधिक लोगों को व्यावसायिक शिक्षा सुलभ कराने की दृष्टि से पत्राचार शिक्षा का विशेष महत्त्व है। वर्तमान समय में देश के अनेक विश्वविद्यालय एवं संस्थान विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में पत्राचार शिक्षा की सुविधा प्रदान कर रहे हैं।

उपसंहार-इस प्रकार हम देखते हैं कि औद्योगिक विकास के इस युग में किसी राष्ट्र या उसके नागरिक के विकास के लिए व्यावसायिक शिक्षा की महत्त्वपूर्ण उपयोगिता है। यद्यपि भारत में व्यावसायिक शिक्षा के इस महत्त्व को समझकर इसके विकास हेतु विगत दो दशक से अधिक ध्यान दिया जा रहा है तथापि इसका जितना विकास यहाँ होना चाहिए, वह अभी तक नहीं हो सका है। आवश्यकता इस बात की है कि इस सम्बन्ध में जागरूकता उत्पन्न की जाए।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

विज्ञान : वरदान या अभिशाप [2009, 10]

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञान और समाज [2011]
  • विज्ञान के बढ़ते चरण
  • विज्ञान के चमत्कार [2014]
  • विज्ञान लाभ एवं हानि
  • विज्ञान की देन
  • वैज्ञानिक प्रगति और मानव-जीवन
  • विज्ञान का कल्याणकारी स्वरूप
  • विज्ञान का रचनात्मक स्वरूप [2013, 18]
  • विज्ञान और मानव-कल्याण [2016]

प्रमुख विचार-विन्द

  1. प्रस्तावना,
  2. विज्ञान : वरदान के रूप में—(क) यातायात के क्षेत्र में; (ख) संचार के क्षेत्र में; (ग) दैनन्दिन जीवन में; (घ) स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में; (ङ) औद्योगिक क्षेत्र में; (च) कृषि के क्षेत्र में; (छ) शिक्षा के क्षेत्र में; (ज) मनोरंजन के क्षेत्र में,
  3. विज्ञान : अभिशाप के रूप में,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना-आज का युग वैज्ञानिक चमत्कारों का युग है। मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आज विज्ञान ने आश्चर्यजनक क्रान्ति ला दी है। मानव-समाज की सारी गतिविधियाँ आज विज्ञान से परिचालित हैं। दुर्जेय प्रकृति पर विजय प्राप्त कर आज विज्ञान मानव का भाग्यविधाता बन बैठा है। अज्ञात रहस्यों की खोज में उसने आकाश की ऊँचाइयों से लेकर पाताल की गहराइयाँ तक नाप दी हैं। उसने हमारे जीवन को सब ओर से इतना प्रभावित कर दिया है कि विज्ञान-शून्य विश्व की आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता, किन्तु दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं कि अनियन्त्रित वैज्ञानिक प्रगति ने मानव के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस स्थिति में हमें सोचना पड़ता है कि विज्ञान को वरदान समझा जाए या अभिशाप। अतः इन दोनों पक्षों पर समन्वित दृष्टि से विचार करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित होगा।

विज्ञान : वरदान के रूप में आधुनिक मानव का सम्पूर्ण पर्यावरण विज्ञान के वरदानों के आलोक से आलोकित है। प्रातः जागरण से लेकर रात के सोने तक के सभी क्रिया-कलाप विज्ञान द्वारा प्रदत्त साधनों के सहारे ही संचालित होते हैं। प्रकाश, पंखा, पानी, साबुन, गैस स्टोव, फ्रिज, कूलर, हीटर और यहाँ तक कि शीशा, कंघी से लेकर रिक्शा, साइकिल, स्कूटर, बस, कार, रेल, हवाई जहाज, टी०वी०, सिनेमा, रेडियो आदि जितने भी साधनों का हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं, वे सब विज्ञान के ही वरदान हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि आज का अभिनव मनुष्य विज्ञान के माध्यम से प्रकृति पर विजय पा चुका है-

आज की दुनिया विचित्र नवीन,
प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन ।
हैं बँधे नर के करों में वारि-विद्युत भाप,
हुक्म पर चढ़ता उतरता है पवन का ताप ।
है नहीं बाकी कहीं व्यवधान,
लाँघ सकता नर सरित-गिरि-सिन्धु एक समान ॥

विज्ञान के इन विविध वरदानों की उपयोगिता कुछ प्रमुख क्षेत्रों में निम्नलिखित है-
(क) यातायात के क्षेत्र में प्राचीन काल में मनुष्य को लम्बी यात्रा तय करने में बरसों लग जाते थे, किन्तु आज रेल, मोटर, जलपोत, वायुयान आदि के आविष्कार से दूर-से-दूर स्थानों पर बहुत शीघ्र पहुँचा जा सकता है। यातायात और परिवहन की उन्नति से व्यापार की भी कायापलट हो गयी है। मानव केवल धरती ही नहीं, अपितु चन्द्रमा और मंगल जैसे दूरस्थ ग्रहों तक भी पहुंच गया है। अकाल, बाढ़, सूखी आदि प्राकृतिक विपत्तियों से पीड़ित व्यक्तियों की सहायता के लिए भी ये साधन बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इन्हीं के चलते आज सारा विश्व एक बाजार बन गया है।

(ख) संचार के क्षेत्र में-बेतार के तार ने संचार के क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। आकाशवाणी, दूरदर्शन, तार, दूरभाष (टेलीफोन, मोबाइल फोन), दूरमुद्रक (टेलीप्रिण्टर, फैक्स) आदि की सहायता से कोई भी समाचार क्षण भर में विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाया जा सकता है। कृत्रिम उपग्रहों ने इस दिशा में और भी चमत्कार कर दिखाया है।

(ग) दैनन्दिन जीवन में विद्युत् के आविष्कार ने मनुष्य की दैनन्दिन सुख-सुविधाओं को बहुत बढ़ा दिया है। वह हमारे कपड़े धोती है, उन पर प्रेस करती है, खाना पकाती है, सर्दियों में गर्म जल और गर्मियों में शीतल जल उपलब्ध कराती है, गर्मी-सर्दी दोनों से समान रूप से हमारी रक्षा करती है। आज की समस्त औद्योगिक प्रगति इसी पर निर्भर है।

(घ) स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में मानव को भयानक और संक्रामक रोगों से पर्याप्त सीमा तक बचाने का श्रेय विज्ञान को ही है। कैंसर, क्षय (टी० बी०), हृदय रोग एवं अनेक जटिल रोगों का इलाज विज्ञान द्वारा ही सम्भव हुआ है। एक्स-रे एवं अल्ट्रासाउण्ड टेस्ट, ऐन्जियोग्राफी, कैट या सीटी स्कैन आदि परीक्षणों के माध्यम से शरीर के अन्दर के रोगों का पता सरलतापूर्वक लगाया जा सकता है। भीषण रोगों के लिए आविष्कृत टीकों से इन रोगों की रोकथाम सम्भव हुई है। प्लास्टिक सर्जरी, ऑपरेशन, कृत्रिम अंगों का प्रत्यारोपण आदि उपायों से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलायी जा रही है। यही नहीं, इससे नेत्रहीनों को नेत्र, कर्णहीनों को कान और अंगहीनों को अंग देना सम्भव हो सका है।

(ङ) औद्योगिक क्षेत्र में भारी मशीनों के निर्माण ने बड़े-बड़े कल-कारखानों को जन्म दिया है, जिससे श्रम, समय और धन की बचत के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में उत्पादन सम्भव हुआ है। इससे विशाल जनसमूह को आवश्यक वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करायी जा सकी हैं।

(च) कृषि के क्षेत्र में लगभग 121 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाला हमारा देश आज यदि कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सका है, तो यह भी विज्ञान की ही देन है। विज्ञान ने किसान को उत्तम बीज, प्रौढ़ एवं विकसित तकनीक, रासायनिक खादे, कीटनाशक, ट्रैक्टर, ट्यूबवेल और बिजली प्रदान की है। छोटे-बड़े बाँधों का निर्माण कर नहरें निकालना भी विज्ञान से ही सम्भव हुआ है।

(छ) शिक्षा के क्षेत्र में मुद्रण-यन्त्रों के आविष्कार ने बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन सम्भव बनाया है, जिससे पुस्तकें सस्ते मूल्य पर मिल सकी हैं। इसके अतिरिक्त समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएँ आदि भी मुद्रण-क्षेत्र में हुई क्रान्ति के फलस्वरूप घर-घर पहुँचकर लोगों का ज्ञानवर्द्धन कर रही हैं। आकाशवाणी-दूरदर्शन आदि की सहायता से शिक्षा के प्रसार में बड़ी सहायता मिली है। कम्प्यूटर के विकास ने तो इस क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है।

(ज) मनोरंजन के क्षेत्र में-चलचित्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि के आविष्कार ने मनोरंजन को सस्ता और सुलभ बना दिया है। टेपरिकॉर्डर, वी० सी० आर०, वी० सी० डी० आदि ने इस दिशा में क्रान्ति ला दी है और मनुष्य को उच्चकोटि का मनोरंजन सुलभ कराया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मानव-जीवन के लिए विज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई वरदान नहीं है।

विज्ञान : अभिशाप के रूप में विज्ञान का एक और पक्ष भी है। विज्ञान एक असीम शक्ति प्रदान करने वाला तटस्थ साधन है। मानव चाहे जैसे इसका इस्तेमाल कर सकता है। सभी जानते हैं कि मनुष्य में दैवी प्रवृत्ति भी है और आसुरी प्रवृत्ति भी। सामान्य रूप से जब मनुष्य की दैवी प्रवृत्ति प्रबल रहती है तो वह मानव-कल्याण से कार्य किया करता है, परन्तु किसी भी समय मनुष्य की राक्षसी प्रवृत्ति प्रबल होते ही कल्याणकारी विज्ञान एकाएक प्रबलतम विध्वंस एवं संहारक शक्ति का रूप ग्रहण कर सकता है। इसका उदाहरण गत विश्वयुद्ध का वह दुर्भाग्यपूर्ण पल है, जब कि हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम-बम गिराया गया था। स्पष्ट है कि विज्ञान मानवमात्र के लिए सबसे बुरा अभिशाप भी सिद्ध हो सकता है। गत विश्वयुद्ध से लेकर अब तक मानव ने विज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की है; अतः कहा जा सकता है कि आज विज्ञान की विध्वंसक शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गयी है।

विध्वंसक साधनों के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार से भी विज्ञान ने मानव का अहित किया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथ्यात्मक होता है। इस दृष्टिकोण के विकसित हो जाने के परिणामस्वरूप मानव हृदय की कोमल भावनाओं एवं अटूट आस्थाओं को ठेस पहुंची है। विज्ञान ने भौतिकवादी प्रवृत्ति को प्रेरणा दी है, जिसके परिणामस्वरूप धर्म एवं अध्यात्म से सम्बन्धित विश्वास थोथे प्रतीत होने लगे हैं। मानव-जीवन के पारस्परिक सम्बन्ध भी कमजोर होने लगे हैं। अब मानव भौतिक लाभ के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों को विकसित करता है।

जहाँ एक ओर विज्ञान ने मानव-जीवन को अनेक प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं वहीं दूसरी ओर विज्ञान के ही कारण मानव-जीवन अत्यधिक खतरों से परिपूर्ण तथा असुरक्षित भी हो गया है। कम्प्यूटर तथा दूसरी मशीनों ने यदि मानव को सुविधा के साधन उपलब्ध कराये हैं तो साथ-साथ रोजगार के अवसर भी छीन लिये हैं। विद्युत विज्ञान द्वारा प्रदत्त एक महान् देन है, परन्तु विद्युत का एक मामूली झटका ही व्यक्ति की इहलीला समाप्त कर सकता है। विज्ञान ने तरह-तरह के तीव्र गति वाले वाहन मानव को दिये हैं। इन्हीं वाहनों की आपसी टक्कर से प्रतिदिन हजारों व्यक्ति सड़क पर ही जान गॅवा देते हैं। विज्ञान के दिन-प्रतिदिन होते जा रहे नवीन आविष्कारों के कारण मानव पर्यावरण असन्तुलन के दुष्चक्र में भी फंस चुका है।

अधिक सुख-सुविधाओं के कारण मनुष्य आलसी और आरामतलब बनता जा रहा है, जिससे उसकी शारीरिक शक्ति का ह्रास हो रहा है और अनेक नये-नये रोग भी उत्पन्न हो रहे हैं। मानव में सर्दी और गर्मी सहने की क्षमता घट गयी है।

वाहनों की बढ़ती संख्या से सड़कें पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो रही हैं तो उनसे निकलने वाले ध्वनि प्रदूषक मनुष्य को स्नायु रोग वितरित कर रहे हैं। सड़क दुर्घटनाएँ तो मानो दिनचर्या का एक अंग हो चली हैं। विज्ञापनों ने प्राकृतिक सौन्दर्य को कुचल डाला है। चारों ओर का कृत्रिम आडम्बरयुक्त जीवन इस विज्ञान की ही देन है। औद्योगिक प्रगति ने पर्यावरण-प्रदूषण की विकट समस्या खड़ी कर दी है। साथ ही गैसों के रिसाव से अनेक व्यक्तियों के प्राण भी जा चुके हैं।

विज्ञान के इसी विनाशकारी रूप को दृष्टि में रखकर महाकवि दिनकर मानव को चेतावनी देते हुए कहते हैं—

सावधान, मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार।
तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार ॥
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार।
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार ॥

उपसंहार–विज्ञान सचमुच तलवार है, जिससे व्यक्ति आत्मरक्षा भी कर सकता है और अनाड़ीपन में अपने अंग भी काट सकती है। इसमें दोष तलवार का नहीं, उसके प्रयोक्ता का है। विज्ञान ने मानव के सम्मुख असीमित विकास का मार्ग खोल दिया है, जिससे मनुष्य संसार से बेरोजगारी, भुखमरी, महामारी आदि को समूल नष्ट कर विश्व को अभूतपूर्व सुख-समृद्धि की ओर ले जा सकता है। अणु-शक्ति का कल्याणकारी कार्यों में उपयोग असीमित सम्भावनाओं का द्वार उन्मुक्त कर सकता है। बड़े-बड़े रेगिस्तानों को लहराते खेतों में बदलना, दुर्लंघ्य पर्वतों पर मार्ग बनाकर दूरस्थ अंचलों में बसे लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, विशाल बाँधों का निर्माण एवं विद्युत उत्पादन आदि अगणित कार्यों में इसका उपयोग हो सकता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब मनुष्य में आध्यात्मिक दृष्टि का विकास हो, मानव-कल्याण की सात्त्विक भावना जगे। अतः स्वयं मानव को ही यह निर्णय करना है कि वह विज्ञान को वरदान रहने दे या अभिशाप बना दे।

धर्म और विज्ञान [2016]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. धर्म और विज्ञान का विरोध,
  3. धर्म और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू,
  4. धर्म मनुष्य को भीरु बनाता है और विज्ञान साहसी,
  5. धर्म भी विज्ञान है और विज्ञान भी धर्म है,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-संस्कृत में धर्म को परिभाषित करते हुए कहा गया है–‘ध्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा।’ अर्थात् इस संसार के धारण करने योग्य जो भी बातें हैं, वे सभी धर्म हैं और वे सभी बातें धारण करने योग्य हैं, जो संसार के लिए कल्याणकारी हैं। विज्ञान भी उन्हीं सब कार्यों अथवा अनुसन्धानों को करने की अनुमति प्रदान करता है, जो संसार के लिए कल्याणकारी हैं। इस प्रकार धर्म और विज्ञान का उद्देश्य एक ही है।

धर्म और विज्ञान का विरोध-आध्यात्मिक स्तर पर धर्म और विज्ञान दो विपरीत विचारधाराएँ हैं। धर्म परम-सुख (मोक्ष/परमानन्द) की प्राप्ति के लिए भौतिकवाद का विरोध करते हुए उसे त्यागने की बात करता है, जबकि विज्ञान भौतिक संसार से बाहर किसी सुख की सत्ता तो स्वीकार नहीं करता; अतः वह मनुष्य को परम-सुख की प्राप्ति के लिए भौतिकवाद में किण्ठ डूबने के लिए प्रेरित करता है।

धर्म और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू-वस्तुत: धर्म और विज्ञान दो विरोधी अवधारणाएँ नहीं हैं, वरन् एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ही सत्य के रूप का उद्घाटन करते हैं। हाँ, सत्य के उद्घाटन की दोनों की पद्धतियाँ अवश्य ही अलग-अलग हैं। जहाँ एक ओर धर्म ने मानव को मानसिक शान्ति प्रदान की है, वहीं दूसरी ओर विज्ञान ने भौतिक सुख। धर्म ने मानव के हृदय को परिष्कृत किया है तो विज्ञान ने उसकी बुद्धि को।

धर्म मनुष्य को भीरु बनाता है और विज्ञान साहसी-धर्म सर्वशक्तिमान् एवं अनादि ईश्वर की कल्पना करके मनुष्य को असहाय और भीरु बनाता है। इसी भीरुता के कारण मनुष्य ईश्वर की आलोचना करने से डरता है। ईश्वर के प्रति उसकी अटूट आस्था एवं विश्वास उसे भाग्यवादी बनाकर अकर्मण्य बनाते हैं, जबकि विज्ञान मनुष्य को निर्भीक और साहसी बनाकर उसे निरन्तर कर्म करते हुए रहने की प्रेरणा प्रदान करता है।

धर्म भी विज्ञान है और विज्ञान भी धर्म है-धर्म और विज्ञान का जो विरोध दृष्टिगत होता है, वह धर्म से सम्बन्धित पाखण्डों, अन्धविश्वासों, अन्धश्रद्धा और कर्मकाण्डों की अधिकता और अनिवार्यता के कारण है। वस्तुतः धर्म को यदि हम उसकी परिभाषा के आलोक में देखें तो पाते हैं कि धर्म किसी भी अतार्किक बात की स्वीकृति नहीं देता, वह विज्ञान की भाँति ठोस तर्को का पक्षपाती है। वह भी एक विज्ञान है, जो तर्कों के आधार पर ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करके उसे तर्कपूर्ण विधियों से प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।

धार्मिक लोग जिस भौतिकवाद की दुहाई देकर विज्ञान की आलोचना करते हैं, वह वास्तव में उनका अज्ञान है। विज्ञान केवल मनुष्य के कल्याण का पक्षपाती है, उसने अग्नि की खोज खाना पकाने और ऊर्जा के स्रोत के रूप में मनुष्यमात्र के कल्याण के लिए की, अब अगर कोई उसकी अग्नि से किसी का घर जलाने लगे तो उसमें विज्ञान का क्या दोष? विज्ञान ने तो अपना धर्म निभाते हुए मनुष्यमात्र के कल्याण के लिए अग्नि की खोज की, अब अगर अधर्म का आचरण करके मनुष्य किसी का घर जलाकर विनाश को आमन्त्रण दे तो इससे विज्ञान की धार्मिकता कहाँ कम होती है। धर्म वही है, जिसे प्राणिमात्र के कल्याण केलिए धारण किया जाए तो विज्ञान भी वही है, जिसका प्रत्येक अनुसन्धान प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है। इस प्रकार विज्ञान ही धर्म है।।

उपसंहार-आज यदि आवश्यकता है तो विज्ञान एवं धर्म के पारस्परिक समन्वय की है, क्योंकि न तो विज्ञान से विमुख धर्म मनुष्य का कल्याण करने में समर्थ है और न ही विज्ञान धर्म से अलग होकर अपने कल्याणकारी स्वरूप की रक्षा कर सकता है।

कम्प्यूटर : आधुनिक मानव-यन्त्र [2013, 15, 16]

सम्बद्ध शीर्षक

  • कम्प्यूटर के प्रयोग से लाभ तथा हानि [2013]
  • कम्प्यूटर की उपयोगिता [2010]
  • कम्प्यूटर का महत्त्व
  • कम्प्यूटर की आत्मकथा
  • भारत में कम्प्यूटर का महत्त्व [2013, 14, 18]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना : कम्प्यूटर क्या है ?
  2. कम्प्यूटर के उपयोग,
  3. कम्प्यूटर तकनीक से हानियाँ,
  4. कम्यूटर और मानव-मस्तिष्क,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना--कम्प्यूटर असीमित क्षमताओं वाला वर्तमान युग का एक क्रान्तिकारी साधन है। यह एक ऐसा यन्त्र-पुरुष है, जिसमें यान्त्रिक मस्तिष्कों को रूपात्मक और समन्वयात्मक योग तथा गुणात्मक घनत्व पाया जाता है। इसके परिणामस्वरूप यह कम-से-कम समय में तीव्रगति से त्रुटिहीन गणनाएँ कर लेता है। आरम्भ में, गणित की जटिल गणनाएँ करने के लिए ही कम्प्यूटर का आविष्कार किया गया था। आधुनिक कम्प्यूटर के प्रथम सिद्धान्तकार चार्ल्स बैबेज ( सन् 1792-1871 ई०) ने गणित और खगोल-विज्ञान की सूक्ष्म सारणियाँ तैयार करने के लिए ही एक भव्य कम्प्यूटर की योजना तैयार की थी। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक में अमेरिकी इंजीनियर हरमन होलेरिथ ने जनगणना से सम्बन्धित आँकड़ों का विश्लेषण करने के लिए पंचका पर आधारित कम्प्यूटर का प्रयोग किया था। दूसरे महायुद्ध के दौरान पहली बार बिजली से चलने वाले कम्प्यूटर बने। इनका उपयोग भी गणनाओं के लिए ही हुआ। आज के कम्प्यूटर केवल गणनाएँ करने तक ही सीमित नहीं रह गये हैं वरन् अक्षरों, शब्दों, आकृतियों और कथनों को ग्रहण करने में अथवा इससे भी अधिक अनेकानेक कार्य करने में समर्थ हैं। आज कम्प्यूटरों का मानव-जीवन के अधिकाधिक क्षेत्रों में उपयोग करना सम्भव हुआ है। अब कम्प्यूटर संचार और नियन्त्रण के भी शक्तिशाली साधन बन गये हैं।

कम्प्यूटर के उपयोग-आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटरों के व्यापक उपयोग हो रहे हैं—

(क) प्रकाशन के क्षेत्र में सन् 1971 ई० में माइक्रोप्रॉसेसर का आविष्कार हुआ। इस आविष्कार ने कम्प्यूटरों को छोटा, सस्ता और कई गुना शक्तिशाली बना दिया। माइक्रोप्रॉसेसर के आविष्कार के बाद कम्प्यूटर का अनेक कार्यों में उपयोग सम्भव हुआ। शब्द-संसाधक (वर्ड प्रोसेसर) कम्प्यूटरों के साथ स्क्रीन व प्रिण्टर जुड़ जाने से इनकी उपयोगिता का खूब विस्तार हुआ है। सर्वप्रथम एक लेख सम्पादित होकर कम्प्यूटर में संचित होता है। टंकित मैटर को कम्प्यूटर की स्क्रीन पर देखा जा सकता है और उसमें संशोधन भी किया जा सकता है। इसके बाद मशीनों से छपाई होती है। अब तो अतिविकसित देशों (ब्रिटेन आदि) में बड़े समाचार-पत्रों में सम्पादकीय विभाग में एक सिरे पर कम्प्यूटरों में मैटर भरा जाता है तथा दूसरे सिरे पर तेज रफ्तार से इलेक्ट्रॉनिक प्रिण्टर समाचार-पत्र छापकर निकाल देते हैं।

(ख) बैंकों में कम्प्यूटर का उपयोग बैंकों में किया जाने लगा है। कई राष्ट्रीयकृत बैंकों ने चुम्बकीय संख्याओं वाली चेक-बुक भी जारी कर दी हैं। खातों के संचालन और लेन-देन का हिसाब रखने वाले कम्प्यूटर भी बैंकों में स्थापित हो रहे हैं। आज कम्प्यूटर के द्वारा ही बैंकों में 24 घण्टे पैसों के लेन-देन की ए० टी० एम० (Automated Teller Machine) जैसी सेवाएँ सम्भव हो सकी हैं। यूरोप और अमेरिका में ही नहीं अब भारत में भी ऐसी व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आ गयी हैं कि घर के निजी कम्प्यूटरों के जरिये बैंकों से भी लेन-देन का व्यवहार सम्भव हुआ है।

(ग) सूचनाओं के आदान-प्रदान में प्रारम्भ में कम्प्यूटर की गतिविधियाँ वातानुकूलित कक्षों तक ही सीमित थीं, किन्तु अब एक कम्प्यूटर हजारों किलोमीटर दूर के दूसरे कम्प्यूटरों के साथ बातचीत कर सकता है तथा उसे सूचनाएँ भेज सकता है। दो कम्प्यूटरों के बीच यह सम्बन्ध तारों, माइक्रोवेव तथा उपग्रहों के जरिये स्थापित होता है। सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए देश के सभी प्रमुख छोटे-बड़े शहरों को कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिये एक-दूसरे से जोड़ने की प्रक्रिया शीघ्र ही पूर्ण होने वाली है। इण्टरनेट जैसी सुविधा से आज देश का प्रत्येक नगर सम्पूर्ण विश्व से जुड़ गया है।

(घ) आरक्षण के क्षेत्र में कम्प्यूटर नेटवर्क की अनेक व्यवस्थाएँ अब हमारे देश में स्थापित हो गयी हैं। सभी प्रमुख एयरलाइन्स की हवाई यात्राओं के आरक्षण के लिए अब ऐसी व्यवस्था है कि भारत के किसी शहर से आपकी समूची हवाई यात्रा के आरक्षण के साथ-साथ विदेशों में आपकी इच्छानुसार होटल भी आरक्षित हो जाएगा। कम्प्यूटर नेटवर्क से अब देश के सभी प्रमुख शहरों में रेल-यात्रा के आरक्षण की व्यवस्था भी अस्तित्व में आ गयी है।

(ङ) कम्प्यूटर ग्राफिक्स में कम्प्यूटर केवल अंकों और अक्षरों को ही नहीं, वरन् रेखाओं और आकृतियों को भी सँभाल सकते हैं। कम्प्यूटर ग्राफिक्स की इस व्यवस्था के अनेक उपयोग हैं। भवनों, मोटरगाड़ियों, हवाई-जहाजों आदि के डिज़ाइन तैयार करने में कम्प्यूटर ग्राफिक्स का व्यापक उपयोग हो रहा है। वास्तुशिल्पी अब अपने डिज़ाइन कम्प्यूटर स्क्रीन पर तैयार करते हैं और संलग्न प्रिण्टर से इनके प्रिण्ट भी प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ तक कि कम्प्यूटर चिप्स के सर्किटों के डिजाइन भी अब कम्प्यूटर ग्राफिक्स की मदद से तैयार होने लगे हैं। वैज्ञानिक अनुसन्धान भी कम्प्यूटर के स्क्रीन पर किये जा रहे हैं।

(च) कला के क्षेत्र में कम्प्यूटर अब चित्रकार की भूमिका भी निभाने लगे हैं। चित्र तैयार करने के लिए अब रंगों, तूलिकाओं, रंग-पट्टिका और कैनवास की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है। चित्रकार अब कम्प्यूटर के सामने बैठता है और अपने नियोजित प्रोग्राम की मदद से अपनी इच्छा के अनुसार स्क्रीन पर रंगीन रेखाएँ प्रस्तुत कर देता है। रेखांकनों से स्क्रीन पर निर्मित कोई भी चित्र ‘प्रिण्ट’ की कुञ्जी दबाते ही, अपने समूचे रंगों के साथ कम्प्यूटर से संलग्न प्रिण्टर द्वारा कागज पर छाप दिया जाता है।

(छ) संगीत के क्षेत्र में कम्प्यूटर अब सुर सजाने का काम भी करने लगे हैं। पाश्चात्य संगीत के स्वरांकन को कम्प्यूटर स्क्रीन पर प्रस्तुत करने में कोई कठिनाई नहीं होती, परन्तु वीणा जैसे भारतीय वाद्य की स्वरलिपि तैयार करने में कठिनाइयाँ आ रही हैं, परन्तु वह दिन दूर नहीं है जब भारतीय संगीत की स्वर-लहरियों को कम्प्यूटर स्क्रीन पर उभारकर उनका विश्लेषण किया जाएगा और संगीत-शिक्षा की नयी तकनीक विकसित की जा सकेंगी।

(ज) खगोल-विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटरों ने वैज्ञानिक अनुसन्धान के अनेक क्षेत्रों का समूचा ढाँचा ही बदल दिया है। पहले खगोलविद् दूरबीनों पर रात-रातभर आँखें गड़ाकर आकाश के पिण्डों का अवलोकन करते थे, किन्तु अब किरणों की मात्रा के अनुसार ठीक-ठीक चित्र उतारने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपलब्ध हो गये हैं। इन चित्रों में निहित जानकारी का व्यापक विश्लेषण अब कम्प्यूटरों से होता है।

(झ) चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन भी एक सरल कम्प्यूटर ही है। मतदान के लिए ऐसी वोटिंग मशीनों का उपयोग सीमित पैमाने पर ही सही अब हमारे देश में भी हो रहा है।

(ज) उद्योग-धन्धों में कम्प्यूटर उद्योग-नियन्त्रण के भी शक्तिशाली साधन हैं। बड़े-बड़े कारखानों के संचालन का काम अब कम्प्यूटर सँभालने लगे हैं। कम्प्यूटरों से जुड़कर रोबोट अनेक किस्म के औद्योगिक उत्पादनों को सँभाल सकते हैं। कम्प्यूटर भयंकर गर्मी और ठिठुरती सर्दी में भी यथावत् कार्य करते हैं। इनका उस पर कोई असर नहीं पड़ता। हमारे देश में अब अधिकांश निजी व्यवसायों में कम्प्यूटर का प्रयोग होने लगा है।

(ट) सैनिक कार्यों में आज प्रमुख रूप से महायुद्ध की तैयारी के लिए नये-नये शक्तिशाली सुपर कम्प्यूटरों का विकास किया जा रहा है। हाशक्तियों की ‘स्टार वार्स’ की योजना कम्प्यूटरों के नियन्त्रण पर आधारित है। पहले भारी कीमत देकर हमारे देश में सुपर कम्प्यूटर आयात किये जा रहे थे; परन्तु अब इन सुपर कम्प्यूटरों का निर्माण हमारे देश में भी किया जा रहा है।

(ठ) अपराध निवारण में अपराधों के निवारण में भी कम्प्यूटर की अत्यधिक उपयोगिता है। पश्चिम के कई देशों में सभी अधिकृत वाहन मालिकों, चालकों, अपराधियों का रिकॉर्ड पुलिस के एक विशाल कम्प्यूटर में संरक्षित होता है। कम्प्यूटर द्वारा क्षण मात्र में अपेक्षित जानकारी उपलब्ध हो जाती है, जो कि अपराधियों के पकड़ने में सहायक सिद्ध होती है। यही नहीं, किसी भी अपराध से सन्दर्भित अनेकानेक तथ्यों में से विश्लेषण द्वारा कम्प्यूटर नये तथ्य ढूंढ़ लेता है तथा किसी अपराधी को कैसा भी चित्र उपलब्ध होने पर वह उसकी सहायता से अपराधी के किसी भी उम्र और स्वरूप की तस्वीर प्रस्तुत कर सकता है।

कम्प्यूटर तकनीक से हानियाँ-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटर तकनीकी के निरन्तर बढ़ते जा रहे व्यापक उपयोगों ने जहाँ एक ओर इसकी उपयोगिता दर्शायी है, वहीं दूसरी ओर इसके भयावह परिणामों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि कम्प्यूटर हर क्षेत्र में मानव-श्रम को नगण्य बना देगा, जिससे भारत सदृश जनसंख्या बहुल देशों में बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। विभिन्न विभागों में इसकी स्थापना से कर्मचारी भविष्य के प्रति अनाश्वस्त हो गये हैं।

बैंकों आदि में इस व्यवस्था के कुछ दुष्परिणाम भी सामने आये हैं। दूसरों के खातों के कोड नम्बर जानकर प्रति वर्ष करोड़ों डॉलरों से बैंकों को ठगना अमेरिका में एक आम बात हो गयी है। हमारे देश के बैंकों में बिना कम्प्यूटरों के करोड़ों की ठगी के मामले आये दिन सामने आते रहते हैं। ज्योतिष के क्षेत्र में भी इसके परिणाम शत-प्रतिशत सही नहीं निकले हैं।

कम्प्यूटर और मानव-मस्तिष्क-कम्प्यूटर के सन्दर्भ में ढेर सारी भ्रान्तियाँ जनसामान्य के मस्तिष्क में छायी हुई हैं। कुछ लोग इसे सुपर पावर समझ बैठे हैं, जिसमें सब कुछ करने की क्षमता है। किन्तु उनकी धारणाएँ पूर्णरूपेण निराधार हैं। वास्तविकता तो यह है कि कम्प्यूटर एकत्रित आँकड़ों का इलेक्ट्रॉनिक विश्लेषण प्रस्तुत करने वाली एक मशीन मात्र है। यह केवल वही काम कर सकता है, जिसके लिए इसे निर्देशित किया गया हो। यह कोई निर्णय स्वयं नहीं ले सकता और न ही कोई नवीन बात सोच सकता है। यह मानवीय संवेदनाओं, अभिरुचियों, भावनाओं और चित्त से रहित मात्र एक यन्त्र-पुरुष है, जिसकी बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient : I.O.) मात्र एक मक्खी के बराबर होती है, यानि बुद्धिमत्ता में कम्प्यूटर मनुष्य से कई हजार गुना पीछे है।।

उपसंहार-निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी के भी दो पक्ष हैं। इसको सोच समझकर उपयोग किया जाए तो यह वरदान सिद्ध हो सकता है, अन्यथा यह मानव-जाति की तबाही का साधन भी बन सकता है। इसीलिए कम्प्यूटर की क्षमताओं को ठीक से समझना जरूरी है। इलेक्ट्रॉनिकी शिक्षा एवं साधन; कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी की उपेक्षा नहीं कर सकते। लेकिन इनके लिए यदि बुनियादी शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जाती, देश में टेक्नोलॉजी के साधन जुटाये जाते और पाश्चात्य संस्कृति में विकसित हुई इस टेक्नोलॉजी को देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर धीरे-धीरे अपनाया जाता तो अच्छा होता।।

इण्टरनेट

सम्बद्ध शीर्षक

  • इण्टरनेट : लाभ और हानियाँ [2017, 18]
  • भारत में इण्टरनेट का विकास
  • सूचना प्रौद्योगिकी और मानव-कल्याण [2013, 14]
  • इण्टरनेट की शैक्षिक उपयोगिता [2016]

प्रमुखविचार-बिन्दु–

  1. भूमिका,
  2. इतिहास और विकास,
  3. इण्टरनेट सम्पर्क,
  4. इण्टरनेट सेवाएँ,
  5. भारत में इण्टरनेट,
  6. भविष्य की दिशाएँ,
  7. उपसंहार

भूमिका-इण्टरनेट ने विश्व में जैसा क्रान्तिकारी परिवर्तन किया, वैसा किसी भी दूसरी टेक्नोलॉजी ने नहीं किया। नेट के नाम से लोकप्रिय इण्टरनेट अपने उपभोक्ताओं के लिए बहुआयामी साधन प्रणाली है। यह दूर बैठे उपभोक्ताओं के मध्य अन्तर-संवाद का माध्यम है; सूचना या जानकारी में भागीदारी और सामूहिक रूप से काम करने का तरीका है; सूचना को विश्व स्तर पर प्रकाशित करने का जरिया है और सूचनाओं को अपार सागर है। इसके माध्यम से इधर-उधर फैली तमाम सूचनाएँ प्रसंस्करण के बाद ज्ञान में परिवर्तित हो रही हैं। इसने विश्व-नागरिकों के बहुत ही सुघड़ और घनिष्ठ समुदाय का विकास किया है।

इण्टरनेट विभिन्न टेक्नोलॉजियों के संयुक्त रूप से कार्य का उपयुक्त उदाहरण है। कम्प्यूटरों के बड़े पैमाने पर उत्पादन, कम्प्यूटर सम्पर्क-जाल का विकास, दूर-संचार सेवाओं की बढ़ती उपलब्धता और घटता खर्च तथा आँकड़ों के भण्डारण और सम्प्रेषण में आयी नवीनता ने नेट के कल्पनातीत विकास और उपयोगिता को बहुमुखी प्रगति प्रदान की है। आज किसी समाज के लिए इण्टरनेट वैसी ही ढाँचागत आवश्यकता है जैसे कि सड़कें, टेलीफोन या विद्युत् ऊर्जा।

इतिहास और विकास–इण्टरनेट का इतिहास पेचीदा है। इसका पहला दृष्टान्त सन् 1962 ई० में मैसाचुसेट्स टेक्नोलॉजी संस्थान के जे० सी० आर० लिकप्लाइडर द्वारा लिखे गये कई ज्ञापनों के रूप में सामने आया था। उन्होंने कम्प्यूटर की ऐसी विश्वव्यापी अन्तर्सम्बन्धित श्रृंखला की कल्पना की थी जिसके जरिये वर्तमान इण्टरनेट की तरह ही आँकड़ों और कार्यक्रमों को तत्काल प्राप्त किया जा सकता था। इस प्रकार के नेटवर्क में सहायक बनी तकनीकी सफलता पहली बार इसी संस्थान के लियोनार्ड क्लिनरोक ने सुझायी थी। उनकी यह सूझ पैकेट स्विचिंग नाम की नयी टेक्नोलॉजी थी जो सामान्य टेलीफोन प्रणाली में प्रयुक्त सर्किट स्विचिंग टेक्नोलॉजी से मिलती-जुलती थी। पैकेट स्विचिंग उस पत्र पेटी की तरह थी, जिसका इस्तेमाल चाहे जितने लोग कर सकते थे। इसके जरिये दुनिया में कम्प्यूटर अन्य कम्प्यूटरों से जुड़े बिना भी एक-दूसरे से संवाद कायम कर सकते थे।

इण्टरनेट के इतिहास में 1973 का वर्ष ऐसा था जिसने अनेक मील के पत्थर जोड़े और इस प्रकार अधिक विश्वसनीय और स्वतन्त्र नेटवर्क की शुरुआत हुई। इसी वर्ष में इण्टरनेट ऐक्टिविटीज बोर्ड की स्थापना की गयी। इस वर्ष के नवम्बर महीने में डोमेन नेमिंग सर्विस (डीएनएस) का पहला विवरण जारी किया गया और वर्ष की आखिरी महत्त्वपूर्ण घटना इण्टरनेट का सेना और आम लोगों के लिए उपयोग के वर्गीकरण द्वारा सार्वजनिक नेटवर्क के उदय के रूप में सामने आया तथा इसी के साथ आज प्रचलित इण्टरनेट ने जन्म लिया।

इण्टरनेट का बाद का इतिहास मुख्यत: बहुविध उपयोग का है जो नेटवर्क की आधारभूत संरचना से ही सम्भव हो सका। बहुविध उपयोग की दिशा में पहला कदम फाइल ट्रांसफर प्रणाली का विकास था। इससे दूर-दराज के कम्प्यूटरों के बीच फाइलों का आदान-प्रदान सम्भव हो सका। सन् 1984 ई० में इण्टरनेट से जुड़े कम्प्यूटरों की संख्या 1000 थी जो सन् 1989 ई० में एक लाख के ऊपर पहुँच चुकी थी। 90 के दशक के आरम्भ में इण्टरनेट पर सूचना प्रस्तुति के नये तरीके सामने आये। सन् 1991 ई० में मिनेसोटा विश्वविद्यालय द्वारा तैयार गोफर नामक सरलता से पहुँच योग्य डाक्युमेण्ट प्रस्तुति प्रणाली अस्तित्व में आयी। इससे पहले सन् 1990 ई० में ही टिम बर्नर-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब (www) का आविष्कार करके सूचना प्रस्तुति का एक नया तरीका सामने रखा जो सरलता से इस्तेमाल योग्य सिद्ध हुआ।

सन् 1993 ई० में ट्रैफिकल वेब ब्राउजर का आविष्कार इण्टरनेट के क्षेत्र में एक बड़ी घटना थी। इससे न केवल विवरण वरन चित्रों का भी दिग्दर्शन सम्भव हो गया। इस वेब ब्राउजर को मोजाइक कहा गया। इस समय तक इण्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 20 लाख से अधिक हो गयी थी और आज प्रचलित इण्टरनेट आकार ले चुका था।

इण्टरनेट सम्पर्क–इण्टरनेट का आधार राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सूचना इन्फ्रास्ट्रक्चर होता है जो सामान्यत: हाइबैण्ड विड्थ ट्रंक लाइनों से बना होता है और जहाँ से विभिन्न सम्पर्क लाइनें कम्प्यूटरों को जोड़ती हैं जिन्हें आश्रयदाता (होस्ट) कम्प्यूटर कहते हैं। ये आश्रयदाता कम्प्यूटर प्रायः बड़े संस्थानों; जैसे—विश्वविद्यालयों, बड़े उद्यमों और इण्टरनेट कम्पनियों से जुड़े होते हैं और इन्हें इण्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) कहा जाता है। आश्रयदाता कम्प्यूटर चौबीसों घण्टे काम करते हैं और अपने उपभोक्ताओं को सेवा प्रदान करते हैं। ये कम्प्यूटर विशेष संचार लाइनों के जरिये इण्टरनेट से जुड़े रहते हैं। इनके उपभोक्ताओं/व्यक्तियों के पीसी (पर्सनल कम्प्यूटर) साधारण टेलीफोन लाइन और मोडेम के जरिए इण्टरनेट से जुड़े रहते हैं।

एक सामान्य उपभोक्ता एक निश्चित राशि का भुगतान करके आईएसपी से अपना इण्टरनेट खाता प्राप्त कर लेता है। आईएसपी लॉगइन नेम, पासवर्ड (जिसे उपभोक्ता बदल भी सकता है) और नेट से जुड़ने के लिए कुछ एक जानकारियाँ उपलब्ध करा देता है। एक बार इण्टरनेट से जुड़ जाने पर उपभोक्ता इण्टरनेट की तमाम सेवाओं तक अपनी पहुँच बना सकता है। इसके लिए उसे सही कार्यक्रम का चयन करना होता है। ज्यादातर इण्टरनेट सेवाएँ उपभोक्ता-सर्वर रूपाकार पर काम करती हैं। इनमें सर्वर वे कम्प्यूटर हैं जो नेट से जुड़े हुए व्यक्तिगत कम्प्यूटर उपभोक्ताओं को एक या अधिक सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं। इसे सेवा के वास्तविक प्रयोग के लिए उपभोक्ता को उस विशेष सेवा के लिए आश्रित (क्लाइण्ट) सॉफ्टवेयर की जरूरत होती है।

इण्टरनेट सेवाएँ-इण्टरनेट की उपयोगिता उपभोक्ता को उपलब्ध सेवाओं से निर्धारित होती है। इसके उपभोक्ता को निम्नलिखित सेवाएँ उपलब्ध हैं-
(क) ई-मेल-ई-मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल इण्टरनेट का सबसे लोकप्रिय उपयोग है। संवाद के अन्य माध्यमों की तुलना में सस्ता, तेज और अधिक सुविधाजनक होने के कारण इसने दुनिया भर के घरों और कार्यालयों में अपनी जगह बना ली है। इसके द्वारा पहले भाषायी पाठ ही प्रेषित किया जा सकता था, लेकिन अब सन्देश, चित्र, अनुकृति, ध्वनि, आँकड़े आदि भी प्रेषित किये जा सकते हैं।

(ख) टेलनेट-टेलनेट एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से उपभोक्ता को किसी दूर स्थित कम्प्यूटर से स्वयं को जोड़ने की सुविधा प्राप्त हो जाती है।

(ग) इण्टरनेट चर्चा (चैट)–नयी पीढ़ी में इण्टरनेट रिले चैट या चर्चा व्यापक रूप से लोकप्रिय है। यह ऐसी गतिविधि है, जिसमें भौगोलिक रूप से दूर स्थित व्यक्ति एक ही चैट सर्वर पर लॉग करके की-बोर्ड के जरिये एक-दूसरे से चर्चा कर सकते हैं। इसके लिए एक वांछित व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जो निश्चित समय पर उस लाइन पर सुविधापूर्वक उपलब्ध हो।।

(घ) वर्ल्ड वाइड वेब–यह सुविधा इण्टरनेट के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित उपयोगों में से एक है। यह इतनी आसान है कि इसके प्रयोग में बच्चों को भी कठिनाई नहीं होती। यह मनचाही संख्या वाले अन्तर्सम्बन्धित डॉक्युमेण्ट का समूह है, जिसमें से प्रत्येक डॉक्युमेण्ट की पहचान उसके विशेष पते से की जा सकती है। इस पर उपलब्ध सबसे महत्त्वपूर्ण सेवाओं में से एक सर्विंग है। इण्टरनेट में शताधिक सर्च इंजन कार्यरत हैं जिनमें गूगल सर्वाधिक लोकप्रिय है।

(ङ) ई-कॉमर्स-इण्टरनेट की प्रगति की ही एक परिणति ई-कॉमर्स है। किसी भी प्रकार के व्यवसाय को संचालित करने के लिए इण्टरनेट पर की जाने वाली कार्यवाही को ई-कॉमर्स कहते हैं। इसके अन्तर्गत वस्तुओं का क्रय-विक्रय, विभिन्न व्यक्तियों या कम्पनियों के मध्य सेवा या सूचना आते हैं।
इन मुख्य सेवाओं के अतिरिक्त इण्टरनेट द्वारा और भी अनेक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जिनके असीमित उपयोग हैं।

भारत में इण्टरनेट–भारत में इण्टरनेट का आरम्भ आठवें दशक के अन्तिम वर्षों में अनेट (शिक्षा और अनुसन्धान नेटवर्क) के रूप में हुआ था। इसके लिए भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक विभाग और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी थी। इस परियोजना में पाँच प्रमुख संस्थान, पाँचों भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और इलेक्ट्रॉनिक निदेशालय शामिल थे। अनेंट का आज व्यापक प्रसार हो चुका है और वह शिक्षा और शोध समुदाय को देशव्यापी सेवा दे रहा है। एक अन्य प्रमुख नेटवर्क नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेण्टर (एनआईसी) के रूप में सामने आया, जिसने प्राय: सभी जनपद मुख्यालयों को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ दिया। आज देश के विभिन्न भागों में यह 1400 से भी अधिक स्थलों को अपने नेटवर्क के जरिये जोड़े हुए है।

आम आदमी के लिए भारत में इण्टरनेट का आगमन सन् 15 अगस्त, 1995 ई० को हो गया था, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड ने देश में अपनी सेवाओं का आरम्भ किया। प्रारम्भ के कुछ वर्षों तक इण्टरनेट की पहुँच काफी धीमी रही, लेकिन हाल के वर्षों में इसके उपभोक्ता की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। सन् 1999 ई० में टेलीकॉम क्षेत्र निजी कम्पनियों के लिए खोल दिये जाने के परिणामस्वरूप अनेक नये सेवा प्रदाता बेहद प्रतिस्पर्धा विकल्पों के साथ सामने आये। भारत में इण्टरनेट के उपभोक्ताओं की संख्या वर्ष अप्रैल 2010 तक 7 करोड़ की संख्या को पार कर चुकी है। भारत में इण्टरनेट का उपयोग करने वाले विश्व की तुलना में 5% हैं और भारत पूरे विश्व में चौथे स्थान पर है। सरकारी एजेंसियाँ इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि आईटी का लाभ सामान्य जन तक पहुँचाया जा सके। भारतीय रेल द्वारा कम्प्यूटरीकृत आरक्षण, आन्ध्र प्रदेश सरकार द्वारा शहरों के मध्य सूचना प्रणाली की स्थापना तथा केरल सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा फास्ट रिलायबिल इन्स्टेण्ट एफीशिएण्ट नेटवर्क फॉर डिस्बर्समेण्ट ऑफ सर्विसेज (फ्रेण्ड्स) जैसी पेशकशों ने इस दिशा में देश के आम नागरिकों की अपेक्षाओं को बहुत बढ़ा दिया है।

भविष्य की दिशाएँ-भविष्य के प्रति इण्टरनेट बहुत ही आश्वस्तकारी दिखाई दे रहा है और आज के आधार पर कहीं अधिक प्रगतिशाली सेवाएँ प्रदान करने वाला होगा। भविष्य के नेटवर्क जिन उपकरणों और साधनों को जोड़ेगे, वे मात्र कम्प्यूटर नहीं होंगे, वरन् माईक्रोचिप से संचालित होने के कारण तकनीकी अर्थों में कम्प्यूटर जैसे होंगे। आने वाले समय में केवल कार्यालय ही नहीं निवास, स्कूल, अस्पताल और हवाई अड्डे एक-दूसरे से जुड़े हुए होंगे। व्यक्ति के पास व्यक्तिगत डिजीटल सहायक ऐसे पाम टॉप होंगे, जो वायरलेस और मोबाइल टेक्नोलॉजियों का उपयोग करके किसी भी उपलब्ध नेटवर्क से स्वतः जुड़ जाएँगे। लोग अपने मोबाइल फोन के जरिये ही विभिन्न देयों का भुगतान कर सकेंगे और कारें हाईवे पर भीड़-भाड़ पर नजर रखने और अपने चालकों को सुविधाजनक रास्ते के बारे में सुझाव देने में समर्थ होंगी। इण्टरनेट व्यक्तियों और समुदायों को परस्पर घनिष्ठ रूप से काम के लिए सक्षम बना देगा और भौगोलिक दूरी के कारण आने वाली बाधाओं को समाप्त कर देगा। कम्प्यूटर रचित समुदायों का उदय हो जाएगा और तब दमनकारी शासकों के लिए विश्व में अपनी लोकप्रियता को सुरक्षित रख पाना सम्भव नहीं रह जाएगा। भविष्य में टेक्नोलॉजी का उपयोग संस्कृति, भाषा और विरासत की विविधता की रक्षा के लिए किया जाएगा तथा भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था भी इससे अछूती नहीं रहेगी।

उपसंहार-टेक्नोलॉजियों के लोकप्रिय होते ही सामान्य शिक्षित नागरिकों के लिए भी यह पूरी तरह आसान हो जाएगा कि वह कानून-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी कर सकें। इसके फलस्वरूप कहीं अधिक समर्थ लोकतन्त्र सम्भव हो सकेगा जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के उत्तरदायित्व कुछ अलग प्रकार के होंगे। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती इण्टरनेट टेक्नोलॉजी के दोहन की है जिससे समाज के हर वर्ग तक उसके फायदों की पहुँच सम्भव बनायी जा सके। किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग हमेशा समूचे समाज के लिए होना चाहिए न कि उसको समाज के कुछ वर्गों को वंचित करने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। एक बार यह उपलब्धि हासिल की जा सके तो वास्तव में सम्भावनाओं की कोई सीमा ही नहीं है। संक्षेप में, क्रान्ति तो अभी आरम्भ ही हुई है।

भारत की वैज्ञानिक प्रगति

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ
  • भारतीय विज्ञान की देन

प्रमुख विचार-बिन्द–

  1. प्रस्तावना,
  2. स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की स्थिति,
  3. विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना—सामान्य मनुष्य की मान्यता है कि सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान ईश्वर है, जो इस संसार का निर्माता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। आज विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि वह ईश्वर के प्रतिरूप ब्रह्मा (निर्माता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) को चुनौती देता प्रतीत हो रहा है। कृत्रिम गर्भाधान से परखनली शिशु उत्पन्न करके उसने ब्रह्मा की सत्ता को ललकारा है, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना कर और लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार देकर उसने विष्णु को चुनौती दी है तथा सर्व-विनाश के लिए परमाणु बम का निर्माण कर उसने शिव को चकित कर दिया है।

विज्ञान का अर्थ है किसी भी विषय में विशेष ज्ञान विज्ञान मानव के लिए कामधेनु की तरह है जो उसकी सभी कामनाओं की पूर्ति करता है तथा उसकी कल्पनाओं को साकार रूप देता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान प्रवेश कर चुका है चाहे वह कला का क्षेत्र हो या संगीत और राजनीति का। विज्ञान ने समस्त पृथ्वी और अन्तरिक्ष को विष्णु के वामनावतार की भाँति तीन डगों में नाप डाला है।।

स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की स्थिति–बीसवीं शताब्दी को विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ हासिल करने के कारण विज्ञान का युग कहा गया है। आज संसार ने ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत अधिक प्रगति कर ली है। भारत भी इस क्षेत्र में किसी अन्य वैज्ञानिक दृष्टि से उन्नत कहे जाने वाले देशों से यदि आगे नहीं, तो बहुत पीछे या कम भी नहीं है। 15 अगस्त, सन् 1947 में जब अंग्रेजों की गुलामी का जूआ उतार कर भारत स्वतन्त्र हुआ था, तब तक कहा जा सकता है कि भारत वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर शून्य से अधिक कुछ भी नहीं था। सूई तक का आयात इंग्लैण्ड आदि देशों से करना पड़ता था। लेकिन आज सुई से लेकर हवाई जहाज, जलयान, सुपर कम्प्यूटर, उपग्रह तक अपनी तकनीक और बहुत कुछ अपने साधनों से इस देश में ही बनने लगे हैं। लगभग पाँच दशकों में इतनी अधिक वैज्ञानिक प्रगति एवं विकास करके भारत ने केवल विकासोन्मुख राष्ट्रों को ही नहीं, वरन् उन्नत एवं विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों को भी चकित कर दिया है। भारतीय प्रतिभा का लोहा आज सम्पूर्ण विश्व मानने लगा है।

विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति–डाक-तार के उपकरण, तरह-तरह के घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामान, रेडियो-टेलीविजन, कारें, मोटर गाड़ियाँ, ट्रक, रेलवे इंजिन और यात्री तथा अन्य प्रकार के डिब्बे, कल-कारखानों में काम आने वाली छोटी-बड़ी मशीनें, कार्यालयों में काम आने वाले सभी प्रकार के सामान, रबर-प्लास्टिक के सभी प्रकार के उन्नत उपकरण, कृषि कार्य करने वाले ट्रैक्टर, पम्पिंग सेट तथा अन्य कटाई-धुनाई–पिसाई की मशीनें आदि सभी प्रकार के आधुनिक विज्ञान की देन माने जाने वाले साधन आज भारत में ही बनने लगे हैं। कम्प्यूटर, छपाई की नवीनतम तकनीक की मशीनें आदि भी आज भारत बनाने लगा है। इतना ही नहीं, आज भारत में अणु शक्ति से चालित धमन भट्टियाँ, बिजली घर, कल-कारखाने आदि भी चलने लगे हैं तथा अणु-शक्ति का उपयोग अनेक शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए होने लगा है। पोखरण में भूमिगत अणु-विस्फोट करने की बात तो अब बहुत पुरानी हो चुकी है।

आज भारतीय वैज्ञानिक अपने उपग्रह तक अन्तरिक्ष में उड़ाने तथा कक्षा में स्थापित करने में सफल हो चुके हैं। आवश्यकता होने पर संघातक अणु, कोबॉल्ट और हाइड्रोजन जैसे बम बनाने की दक्षता भी भारतीय वैज्ञानिकों ने हासिल कर ली है। विज्ञान-साधित उपकरणों, शस्त्रास्त्रों का आज सैनिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्त्व बढ़ गया है। अपने घर बैठकर शत्रु देश के दूर-दराज के इलाकों पर आक्रमण कर पाने की वैज्ञानिक विधियाँ और शस्त्रास्त्र आज विशेष महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। धरती से धरती तक, धरती से आकाश तक मार कर सकने वाली कई तरह की मिसाइलें भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा बनायी गयी हैं जो आज भारतीय सेना के पास हैं और अन्य अनेक का विकास-कार्यक्रम अनवरत चल रहा है। युद्धक टैंक, विमान, दूर-दूर तक मार करने वाली तोपें आदि भारत में ही बन रही हैं। कहा जा सकता है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सहायता से विश्व के सैन्य अभियान जिस दिशा में चल रहे हैं, भारत भी उस दिशा में किसी से पीछे नहीं है। गणतन्त्र दिवस की परेड के अवसर पर प्रदर्शित उपकरणों से यह स्पष्ट हो जाता है। फिर भी भारत को इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना है।

विज्ञान ने भारतीयों के रहन-सहन और चिन्तन-शक्ति को पूर्णरूपेण बदल डाला है। भारत हवाई जहाज, समुद्र के वक्षस्थल को चीरने वाले जहाज, आकाश का सीना चीर कर निकल जाने वाले रॉकेट, कृत्रिम उपग्रह आदि के निर्माण में अपना अग्रणी स्थान रखता है। 19 अप्रैल, 1975 को सोवियत प्रक्षेपण केन्द्र से ‘आर्यभट्ट’ नामक उपग्रह का सफल प्रक्षेपण कर भारत ने अन्तरिक्ष युग में प्रवेश किया और तब से आज तक उसने मुड़कर पीछे नहीं देखा। स्क्वैडून लीडर राकेश शर्मा 1984 ई० में रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों के साथ अन्तरिक्ष यात्रा भी कर चुके हैं। भास्कर, ऐपल, इन्सेट, रोहिणी जैसे अनेक उपग्रह अन्तरिक्ष में स्थापित कर भारत विश्व की महाशक्तियों के समकक्ष खड़ा है। इन उपग्रहों से हमें मौसम सम्बन्धी जानकारी मिलती है तथा संचार व्यवस्था भी सुदृढ़ हुई है।

आधुनिक विज्ञान की सहायता से आज भारत ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है। एक्सरे, लेसर किरणें आदि की सहायता से अब भारत में ही असाध्य समझे जाने वाले अनेक रोगों के उपचार होने लगे हैं। हृदय-प्रत्यारोपण, गुर्दे का प्रत्यारोपण, जैसे कठिन-से-कठिन माने जाने वाले ऑपरेशन आज भारतीय शल्य-चिकित्सकों द्वारा सफलतापूर्वक सम्पादित किये जा रहे हैं। सभी प्रकार की बहुमूल्य प्राण-रक्षक ओषधियों का निर्माण भी यहाँ होने लगा है।

ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की प्रगति सराहनीय है। इन्होंने नदियों की मदमस्त चाल को बाँधकर उनके जल का उपयोग सिंचाई और विद्युत निर्माण में किया। सौर ऊर्जा, पवन चक्कियाँ, ताप बिजलीघर, परमाणु बिजलीघर आदि ऊर्जा के क्षेत्र में हमारी प्रगति को दर्शाते हैं। महानगरों में गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण, सड़कें, फ्लाईओवर, सब-वे आदि हमारी अभियान्त्रिकीय प्रगति को दर्शाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के भीतर से जल, अनेक खनिज और समुद्र को चीर कर तेल के कुएँ भी खोज निकाले हैं। बॉम्बे हाई से तेल को उत्खनन इसका जीता-जागता उदाहरण है।

कुछ एक अपवादों को छोड़कर, भारत में अधिकांश कार्य हाथों के स्थान पर मशीनों से हो सकने सम्भव हो गये हैं। मानव का कार्य अब इतना ही रह गया है कि वह इन मशीनों पर नियन्त्रण रखे। आटा पीसने से लेकर गूंधने तक, फसल बोने से लेकर अनाज को बोरियों में भरने, वृक्ष काटने से लेकर फर्नीचर बनाने तक सभी कार्य भारत में निर्मित मशीनों द्वारा सम्पन्न होने लगे हैं। विज्ञान ने मानव के दैनिक जीवन के लिए भी अनेक क्रान्तिकारी सुविधाएँ जुटायी हैं। रेडियो, फैक्स, रंगीन टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर, वी० सी० आर०, सी० डी० प्लेयर, दूरभाष, कपड़े धोने की मशीन, धूल-मिट्टी हटाने की मशीन, कूलर, पंखा, फ्रिज, एयरकण्डीशनर, हीटर आदि आरामदायक मशीनें भारत में ही बनने लगी हैं, जिनके अभाव में मानव-जीवन नीरस प्रतीत होता है। घरों में लकड़ी-कोयले से जलने वाली अँगीठी का स्थान कुकिंग गैस ने और गाँवों में उपलों से जलने वाले चूल्हों का स्थान गोबर गैस संयन्त्र ने ले लिया है। चलचित्रों के क्षेत्र में हमारी प्रगति सराहनीय है। कम्प्यूटर का प्रवेश और उसका विस्तार हमारी तकनीकी प्रगति की ओर इंगित करते हैं।

उपसंहार-घर-बाहर, दफ्तर-दुकान, शिक्षा-व्यवसाय, आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ विज्ञान का प्रवेश न हुआ हो। भारत का होनहार वैज्ञानिक हर दिशा, स्थल और क्षेत्र में सक्रिय रहकर अपनी निर्माण एवं नव-नव अनुसन्धान प्रतिभा का परिचय दे रहा है। इतना ही नहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने विदेशों में भी भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभा की धूम मचा रखी है। आज भारत में जो कृषि या हरित क्रान्ति, श्वेत क्रान्ति आदि सम्भव हो पायी है, उन सबका कारण विज्ञान और उसके द्वारा प्रदत्त नये-नये उपकरण तथा ढंग ही हैं। आज हम जो कुछ भी खाते-पीते और पहनते हैं, सभी के पीछे किसी-न-किसी रूप में विज्ञान को कार्यरत पाते हैं। विज्ञान को कार्यरत करने वाले कोई विदेशी नहीं, वरन् भारतीय वैज्ञानिक ही हैं। उन्हीं की लगन, परिश्रम और कार्य-साधना से हमारा देश भारत आज इतनी अधिक वैज्ञानिक प्रगति कर सका है। भविष्य में यह और भी अधिक, सारे संसार से बढ़कर वैज्ञानिक प्रगति कर पाएगा इस बात में कतई कोई सन्देह नहीं।

मनोरंजन के आधुनिक साधन

सम्बद्ध शीर्षक

  • मनोरंजन के विविध प्रकार

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व,
  2. मनोरंजन के साधनों का विकास,
  3. आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन–(क) वैज्ञानिक साधन; (ख) अध्ययन; (ग) ललित कला सम्बन्धी; (घ) खेल सम्बन्धी; (ङ) विविध,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व-जीवन में मनोरंजन मानो सब्जी में नमक की भाँति आवश्यक है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। यह उसे प्रसन्नचित्त बनाने की गारण्टी तथा जीवन के कटु अनुभवों को भुलाने की ओषधि दोनों ही है। एक नन्हा शिशु भी इसको आकांक्षी है और एक वयोवृद्ध व्यक्ति के लिए भी यह उतना ही महत्त्वपूर्ण है। बच्चों को बेवजह रोना इस बात का संकेत है कि वह उकता रहा है। यदि वृद्ध सनकी और चिड़चिड़े हो उठते हैं तो उसका कारण भी मनोरंजन का अभाव ही है।

मनोरंजन वस्तुत: हमारे जीवन की सफलता का मूल है। मनोरंजनरहित जीवन हमारे लिए भारस्वरूप बन जाएगा। यह केवल हमारे मस्तिष्क के लिए ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए भी परमावश्यक है। मनोरंजन के विविध रूप-खेलकूद, अध्ययन व सुन्दर दृश्यों के अवलोकन से हमारा हृदय असीम आनन्द से भर उठता है। इससे शरीर के रक्त-संचार को नवीन गति और स्फूर्ति मिलती है तथा हमारे स्वास्थ्य की अभिवृद्धि भी होती है।

मनोरंजन के साधनों का विकास मनोरंजन की इसी गौरव-गरिमा के कारण बहुत प्राचीन काल से ही मानव-समाज मनोरंजन के साधनों का उपयोग करता आया है। शिकार खेलना, रथ दौड़ाना आदि विविध कार्य प्राचीन काल में मनोरंजन के प्रमुख साधन थे, परन्तु आजकल युग के परिवर्तन के साथ-साथ मनोरंजन के साधन भी बदल गये हैं। विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में क्रान्ति कर दी है। आज कठपुतलियों का नाचे जनसमाज की आँखों के लिए उतना प्रिय नहीं रहा, जितना कि सिनेमा के परदे पर हँसते-बोलते नयनाभिराम दृश्य।

आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन–
(क) वैज्ञानिक साधन–सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन आदि विज्ञान प्रदत्त मनोरंजन के साधनों ने आधुनिक जनसमाज में अत्यन्त लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। साप्ताहिक अवकाश के दिनों में जनता की भारी भीड़ सिनेमाघरों की खिड़की पर दृष्टिगोचर होती है। रेडियो तो मनोरंजन का पिटारा है। इसे अपने घर में रख सुन्दर गाने, भाषण, समाचार आदि सुन सकते हैं। टेलीविजन तो इससे भी आगे बढ़ गया है। इसमें तो बोलने वाले को सशरीर अपने नेत्रों के सम्मुख देखा जा सकता है तथा विविध कार्यक्रमों, खेलों आदि के सजीव प्रसारण को देखकर पर्याप्त मनोरंजन किया जा सकता है।

(ख) अध्ययन–साहित्य का अध्ययन भी मनोरंजन की श्रेणी में आता है। यह हमें मानसिक आनन्द देता है और चित्त को प्रफुल्लित करता है। पत्र-पत्रिकाएँ और उपन्यास रेल-यात्रा के दौरान बड़े सहायक होते हैं। साहित्य द्वारा होने वाले मनोरंजन से मन की थकान ही नहीं मिटती, ज्ञान की अभिवृद्धि भी होती है।

(ग) ललित-कला सम्बन्धी--संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि ललित-कलाएँ भी मनोरंजन के उत्कृष्ट साधन हैं। संगीत के मधुर स्वरों में आत्म-विस्मृत करने की अपूर्व शक्ति होती है।

(घ) खेल सम्बन्धी–ललित-कलाओं के साथ-साथ खेल भी मनोरंजन के प्रिय विषय हैं। हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलों से खिलाड़ी एवं दर्शकों का बहुत मनोरंजन होता है। विद्यार्थी वर्ग के लिए खेल बहुत ही हितकर हैं। इनके द्वारा उनका मनोरंजन ही नहीं होता, अपितु स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। बड़े-बड़े नगरों में तो इस प्रकार के खेलों को देखने के लिए हजारों की संख्या में दर्शकगण पैसा व समय खर्च करके आनन्द लूटते हैं। गर्मी की साँय-साँय करती लूओं से भरे वातावरण में घर बैठकर साँप-सीढ़ी, लूडो, ताश, कैरम, शतरंज खूब खेले जाते हैं। ये खेल प्रायः ऐसे लोगों का मनोरंजन अधिक करते हैं, जो घर से बाहर निकलना पसन्द ही नहीं करते या कम निकलते हैं।

(ङ) विविध-कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिन्हें अभीष्ट कार्य को पूर्ण करने में ही आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। कुछ लोग अपने कार्य-स्थलों से लौटने के बाद अपने उद्यान को ठीक प्रकार से सँवारने में ही घण्टों व्यतीत कर देते हैं, इससे ही इनका मनोरंजन हो जाती है। कुछ लोगों का मनोरंजन फोटोग्राफी होता है। गले में कैमरा लटकाया और चल दिये घूमने। कहीं मन-लुभावना आकर्षक-सी दृश्य दिखाई दिया और उन्होंने उसे कैमरे में कैद कर लिया। इसी से मन प्रफुल्लित हो उठा। कुछ लोगों का शौक होता है देश-विदेश की टिकटें एकत्रित करने का। इस संग्रह में ही उनका अधिकांश समय बीत जाता है। पुराने लिफाफों पर से टिकटें उतारने में ही उन्हें आनन्द आता है।

मेले-तमाशे, सैर-सपाटे, यात्रा-देशाटन आदि मनोरंजन के विविध साधन हैं। इनसे हमारा मनोरंजन तो होता ही है, साथ-ही-साथ हमारा व्यावहारिक ज्ञान भी बढ़ता है। देशाटन द्वारा विविध स्थान और वस्तुएँ देखने को प्राप्त होती हैं। राहुल सांकृत्यायन तो देशाटन द्वारा अर्जित ज्ञान के कारण ही महापण्डित कहलाये और देशाटन से प्राप्त होने वाले ज्ञान और मिलने वाले मनोरंजन पर ‘घुमक्कड़-शास्त्र’ ही लिख डाला। सन्तों ने तो हर काम को हँसते-खेलते अर्थात् मनोरंजन करते हुए करने को कहा है। यहाँ तक कि ध्यान (Meditation) भी मन को प्रसन्न करते हुए किया जा सकता है—हसिबो खेलिबो धरिबो ध्यानं ।

उपसंहार निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जीवन में अन्य कार्यों की भाँति मनोरंजन भी उचित मात्रा में होना ही चाहिए। सीमा से अधिक मनोरंजन समय जैसी अमूल्य सम्पत्ति को नष्ट करता है। जिस प्रकार आवश्यकता से अधिक भोजन अपच का कारण बन शरीर के रुधिर-संचार में विकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अधिक मनोरंजन भी हानिकारक होता है। हमें चाहिए कि उचित मात्रा में मनोरंजन करते हुए अपने जीवन को उल्लासमय और सरल बनायें।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 9
Chapter Name Crime (अपराध)
Number of Questions Solved 40
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
अपराध की परिभाषा दीजिए। भारत में अपराध के कारणों की विवेचना कीजिए। [2010, 11, 15]
या
अपराध के मुख्य व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2015]
या
अपराध की परिभाषा दीजिए।
अपराध के आर्थिक और सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिए। अपराध के सामान्य कारणों की विवेचना कीजिए। [2007, 10, 11, 12]
या
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए। [2007, 12]
या
क्या आपके विचार में अपराध का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारण आर्थिक कारक है? [2007]
या
अपराध के विभिन्न कारकों का सविस्तार उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर:

अपराध की परिभाषा

अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “अपराध को एक ऐसे समाज-विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसे समाज ‘अमान्य करता है और इसके लिए दण्ड की व्यवस्था करता है।’

लैण्डिस और लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”

थॉमस के अनुसार, “अपराध एक ऐसा कार्य है जो उस समूह के स्थायित्व का विरोधी है, जिसे व्यक्ति अपना समझता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “कानूनी दृष्टिकोण से देश के कानूनों के विरुद्ध व्यवहारों को अपराध कहा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की परिभाषा दो प्रकार से दी गयी है। इसे समाजशास्त्री दृष्टि से, कानूनी दृष्टि से तथा सामाजिक-कानूनी दृष्टि से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध के लिए दो बातें होनी आवश्यक हैं
(अ) वह कार्य समाज-विरोधी समझा जाता है तथा
(ब) उस कार्य को करने वाले को राज्य कानूनी दृष्टि से दण्ड देता है।

अपराध के कारण

अपराध के लिए निम्नलिखित कारण उत्तर:दायी होते हैं
(अ) अपराध के व्यक्तिगत जैविकीय कारण
व्यक्ति की आयु, लिंग, बौद्धिक स्तर, शैक्षणिक स्थिति तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे अनेक व्यक्तिगत व जैविकीय कारण अपराध के लिए उत्तर:दायी बताये गये हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

  1. आयु-आयु की दृष्टि से 17 वर्ष से 24 वर्ष के बीच की आयु में अपराध तीव्र गति से किये जाते हैं। गम्भीर अपराध 20 से 26 वर्ष की आयु में तथा यौन सम्बन्धी अपराध प्रौढ़ावस्था में अधिक होते हैं। अमेरिकी समाज में हुए अध्ययनों से हमें अपराध की प्रकृति और आयु में सम्बन्ध देखने को मिलता है।
  2. लिंग-अपराध की दर महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होती हैं। पुरुष का स्वभाव अधिक आक्रामक होता है, घर से बाहर रहने के कारण उन्हें उच्छृखलता का अवसर अधिक मिलता है तथा उन पर कार्यभार होने के कारण मानसिक तनाव अधिक पाया जाता है।
  3. शारीरिक दोष-व्यक्ति का कोई शारीरिक दोष भी कई बार अपराध का एक कारण बने
    जाता है। गोरिंग ने अपने अध्ययनों द्वारा यह बताया है कि अंग्रेज अपराधी कद में छोटे व वजन में कम होते हैं। यदि शारीरिक विकास आयु के अनुसार अत्यधिक है अथवा अत्यधिक अल्पविकसित है तो भी अपराध की प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती है।
  4. वंशानुक्रमण-वंशानुक्रमण भी अपराध का कारण है। बच्चा जन्म से ही अपराधी प्रवृत्तियाँ लेकर आता है। लॉम्बोसो, गैरोफेलो, फैरी इत्यादि विद्वानों ने अपने अध्ययनों द्वारा अपराध में वंशानुक्रमण का महत्त्व स्पष्ट किया है।

(ब) अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण
अपराध को प्रोत्साहित करने वाली मानसिक दशाएँ निम्नलिखित हैं—

  1. मानसिक दुर्बलता मानसिक दुर्बलता या बुद्धिहीनता भी अपराध का कारण हो सकता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति अच्छे और बुरे कार्यों में अन्तर नहीं कर सकते। गोडार्ड ने मानसिक दुर्बलता को अपराध का प्रमुख कारण बताया है, जब कि एडलर ने इसका विरोध करते हुए इस बात पर बल दिया है कि अधिकांश अपराधी अपने बौद्धिक स्तर में सामान्य व्यक्ति के समान होते हैं।
  2. संवेगात्मक अस्थिरता व संघर्ष-व्यक्ति संवेगात्मक तनाव को दूर करने के लिए भी अपराध करते हैं। हीले तथा ब्रोनर ने अपने अध्ययन द्वारा यह बताया है कि 91 प्रतिशत अपराधी अपनी हीनता की भावना को दूर करने के लिए अपराध करते हैं। अपराध भी एक संवेग है। बर्ट ने भी असन्तुलन तथा अस्थिरता पर बल दिया है।
  3. मानसिक बीमारियाँ-अनेक मानसिक बीमारियाँ भी अपराधी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देती हैं। हीन मनोवृत्तियाँ, हिस्टीरिया, मेनिया इत्यादि मानसिक बीमारियाँ भी अपराध के लिए उत्तर दायी मानी गयी हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति के अनुसार 77 प्रतिशत कैदी किसी-न-किसी रूप में मानसिक रोग से पीड़ित थे। यह अध्ययन 34 जेलों के अपराधियों के मानसिक विश्लेषण पर आधारित था।

(स) अपराध के सामाजिक कारण
सामाजिक कारणों में हम निम्नलिखित दशाएँ सम्मिलित करते हैं–

1. परिवार-बच्चे के समाजीकरण तथा व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान होती है। यदि परिवार का वातावरण ही अच्छा नहीं है तो बच्चों का व्यक्तित्व भी ठीक प्रकारे से विकसित नहीं होता है। सामान्यत: निम्नलिखित गारिवारिक दशाएँ अपराध में सहायक मानी जाती हैं

  • विघटित परिवार-यदि परिवार विघटित है तथा सदस्यों में मतैक्य का अभाव है। तथा परिस्थितियों और भूमिकाओं में असन्तुलन आ गया है तो इसको सदस्यों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और अपराधी प्रवृत्तियाँ अधिक पनपने लगती हैं।
  • नष्ट घर–जब पारिवारिक विघटन अधिक हो जाता है तो उसे नष्ट घर कहते हैं। तलाक, परित्याग, माता या पिता दोनों में से एक या दोनों की मृत्यु से घर नष्ट हो जाता है और बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। अधिकांश बालअपराधी नष्ट घरों के ही होते हैं।
  • तिरस्कृत बालक-यदि बच्चों को परिवार में संरक्षण तथा प्यार नहीं मिलती तथा अनचाहा बालक समझकर उसका तिरस्कार किया जाता है, तो वह अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है। टैफ्ट के अनुसार, “निश्चित रूप से अनचाहा बालक बालअपराधी बन सकता है।”
  • अनैतिक परिवार यदि परिवार के सदस्य अनैतिक कार्यों में लगे हुए हैं तो भी इसका बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वे अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। इलियट के अनुसार, 67 प्रतिशत अपराधी लड़कियाँ अनैतिक परिवारों से आती हैं।
  • अनुचित पारिवारिक नियन्त्रण–यदि सदस्यों पर परिवार का नियन्त्रण ठीक नहीं है और माता-पिता की व्यस्तता के कारण वे बच्चों को ठीक प्रकार से नहीं देख पा
    रहे हैं, तो बालक बुरी संगति में पड़कर आसानी से अपराधी बन जाते हैं।

2. शिक्षा- शिक्षा का भी अपराध से सम्बन्ध स्थापित किया गया है। शिक्षित व्यक्ति अधिकतर नियोजित अपराध करते हैं, जब कि अशिक्षित क्रूर अपराध अधिक करते हैं और सरलता से पकड़े जाते हैं।
3. धर्म-धर्म का नियन्त्रण आज प्रायः समाप्त होता जा रहा है तथा आज धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का जहर पिलाकर अपराधों एवं गैर-कानूनी कार्यों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
4. बुरी संगति-बुरा पड़ोस, अपराधी समूह आदि भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। यदि व्यक्ति की संगति ठीक नहीं है और वह असामाजिक तत्वों के साथ रह रहा है, तो उसमें भी अपराध-वृत्ति पनपने लगती है। अपराध को जन्म देने में संगति का सबसे अधिक सहयोग रहता है।
5. सांस्कृतिक संघर्ष-सांस्कृतिक संघर्ष, सांस्कृतिक मूल्यों में परस्पर विरोध तथा सांस्कृतिक विलम्बन भी समाज में अव्यवस्था लाता है और अपराध-प्रवृत्तियों को विकसित होने में सहायता प्रदान करता है।
6. चलचित्र-चलचित्र को आज के युग में मनोरंजन की दृष्टि से प्रमुख स्थान प्राप्त है तथा इनका व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार पर गहन प्रभाव पड़ता है। काम-वासना के उत्तेजक दृश्यों, मार-धाड़ वाले दृश्यों, बलात्कार जैसे दृश्यों, अश्लील दृश्यों व गानों को युवा पीढ़ी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। चलचित्रों में अपराध के जो दृश्य दिखाए जाते हैं, अनेक अपराधी उनका अनुसरण करके वैसे ही अपराध करना सीख जाते हैं तथा व्यवहार में करते भी हैं। चलचित्र मानसिक संघर्ष की स्थिति भी पैदा कर देते हैं, जो कि अपराध-वृत्ति के विकास में सहायक
7. समाचार-पत्र-समाचार-पत्र व पत्रिकाएँ भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। प्रायः समाचार पत्रों में अपराध सम्बन्धी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है तथा उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, जिसका युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
8. मद्यपाने मद्यपान तथा मादक द्रव्य-व्यसन अपराध का वैयक्तिक तथा सामाजिक कारण दोनों ही हैं। अधिकतर मद्यपान की आदत बुरी संगति, अनैतिक व विघटित परिवार होने के कारण तथा मानसिक तनाव के कारण पड़ती है। मद्यपान व्यक्ति, परिवार, समुदाय तथा समाज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। इससे शारीरिक बीमारियों में वृद्धि होती है, शारीरिक पतन हो जाता है, व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है और कई बार हत्या, आत्महत्या या बलात्कार जैसे अपराध भी कर बैठता है।

(द) अपराध के आर्थिक कारण
निम्नलिखित आर्थिक दशाएँ अपराध के लिए उत्तर:दायी बतायी जाती हैं
1. निर्धनता-निर्धनता अपराध का एक कारण हो सकता है। निर्धनता व्यक्ति को गन्दी बस्तियों में रहने के लिए विवश करती है, जिनका वातावरण अपराधी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने वाला होता है।

2. व्यापारिक स्थिति-अपराध की दर तथा व्यापार-चक्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। व्यापार की गिरावट के कारण रोजगार की कमी हो जाती है, माल का निकास रुक जाता है, पैसे की कमी | पड़ जाती है, भ्रष्टाचार बढ़ जाता है तथा इन सबसे अपराध की सामान्य दर प्रभावित होती है।

3. बेरोजगारी-बेरोजगारी भी अपराध का कारण है। अध्ययनों से पता चलता है कि बेकारी, आवारागर्दी और सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों को बढ़ावा देती है। वेश्यावृत्ति तथा महिलाओं में अनैतिकता को कई विद्वानों ने उनकी आर्थिक स्थिति से जोड़ा है। बेरोजगारी मानसिक तनाव की स्थिति पैदा कर देती है, जिससे व्यक्ति आपराधिक कार्यों की ओर अधिक आकर्षित हो जाता है।

4. आर्थिक असन्तोष व अत्यधिक असमानता-
आर्थिक असन्तोष भी अपराध को प्रोत्साहन देता है। व्यक्ति अपनी अपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी कई बार अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। अत्यधिक आर्थिक असमानता भी आर्थिक असन्तोष को जन्म देती है। आर्थिक असमानताओं से व्यक्ति में मानसिक तनाव पैदा हो जाता है, जो कि अपराध को बढ़ाता है।

5. औद्योगीकरण-
औद्योगीकरण के फलस्वरूप जो समस्याएँ पैदा हो रही हैं, उनसे भी अपराध को प्रोत्साहन मिलता है।

(य) अपराध के भौगोलिक कारण
भौगोलिक कारणों का भी अपराध को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जलवायु, धरातल, ऋतु तथा मौसम के अनुसार अपराध की दरें घटने या बढ़ने सम्बन्धी अध्ययन हमारे सामने आये हैं। समतल क्षेत्र वाले भागों में बलात्कार की संख्या अधिक होती है, परन्तु संम्पत्ति के विरुद्ध अपराध कम होते हैं। अनेक गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में व्यक्ति के विरुद्ध अपराध तथा ठण्डे देशों में सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होने के निष्कर्ष निकाले गये हैं। अपराधशास्त्रियों ने अपराधी कैलेण्डर तक बनाकर यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार विशिष्ट प्रकार के अपराध विशिष्ट महीनों से सम्बन्धित हैं।

क्वेटलेट का कथन है कि “अपराध का प्रमुख सम्बन्ध जलवायु से है। जलवायु तथा मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही अपराध में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।”
लैकेसन ने इस सन्दर्भ में निम्नलिखित विचार व्यक्त किये हैं|
अपराध                                                                             महीना।
1. शिशु-हत्या                                               : जनवरी, फरवरी, मार्च तथा अप्रैल में अधिक
2. मानव-हत्या व अन्य गम्भीर अपराध          : जुलाई में सबसे अधिक
3. पितृ-हत्या                                                : जनवरी व अक्टूबर में सबसे अधिक
4. बच्चों पर बलात्कार                                  : जुलाई, अगस्त तथा सबसे कम दिसम्बर में
5. युवाओं से बलात्कार                                 : सबसे अधिक दिसम्बर और जनवरी में

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध का कोई एक कारण नहीं है, अपितु हो सकता है कि एक ही अपराध के पीछे एक से अधिक कारण हों। आपराधिक कारणों में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कारणों का भरपूर सहयोग रहता है।

प्रश्न 2
अपराध को नियन्त्रित करने हेतु सुझाव दीजिए।
या
अपराध की परिभाषा दीजिए तथा अपराध नियन्त्रण के दो उपाय बताइए।
या
अपराध क्या है? अपराध को नियन्त्रित करने के सुझाव दीजिए। [2015, 16]
उत्तर:

अपराध की परिभाषा

अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “अपराध को एक ऐसे समाज-विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसे समाज ‘अमान्य करता है और इसके लिए दण्ड की व्यवस्था करता है।’

लैण्डिस और लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”

थॉमस के अनुसार, “अपराध एक ऐसा कार्य है जो उस समूह के स्थायित्व का विरोधी है, जिसे व्यक्ति अपना समझता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “कानूनी दृष्टिकोण से देश के कानूनों के विरुद्ध व्यवहारों को अपराध कहा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की परिभाषा दो प्रकार से दी गयी है। इसे समाजशास्त्री दृष्टि से, कानूनी दृष्टि से तथा सामाजिक-कानूनी दृष्टि से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध के लिए दो बातें होनी आवश्यक हैं
(अ) वह कार्य समाज-विरोधी समझा जाता है तथा
(ब) उस कार्य को करने वाले को राज्य कानूनी दृष्टि से दण्ड देता है।
अपराध निरोध के लिए, दण्ड, जेल, परिवीक्षा एवं पैरोल तथा उत्तम-संरक्षण सेवाओं के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव निम्न प्रकार दिये जा सकते हैं

  1. पूर्व बाल-अपराधियों की खोज-हमें ऐसे बच्चों को खोजना होगा जिनके आगे चलकर अपराधी बनने की सम्भावना हो। उनको पहले ही ऐसी परिस्थितियाँ प्रदान की जाएँ कि वे आगे चलकर अपराधी नहीं बनें।
  2. मार्ग-दर्शन-अपराधियों को जेल में इस प्रकार का मार्गदर्शन प्रदान किया जाए, कि वे जेल से छूटने के बाद अपराधी नहीं बनें।
  3. समितियों का निर्माण-ऐसी सामुदायिक एवं पड़ोस समितियों का निर्माण किया जाए जो समुदाय की उन परिस्थितियों का पता लगाएँ जो अपराध के लिए उत्तर दायी हैं।
  4. परिवार का पुनर्गठन–कई अपराधी विघटित एवं टूटे परिवारों से आते हैं। अत: ऐसे उपाय अपनाये जाएँ जिससे परिवार के सदस्यों में प्रेम व सहयोग पनपे तथा मनमुटाव और तनाव समाप्त हो।
  5. स्वस्थ मनोरंजन–वर्तमान युग का अस्वस्थ एवं व्यापारिक मनोरंजन भी अपराध को जन्म देता है। भद्दे, भौंडे तथा नग्न व अर्द्ध-नग्न चित्र, अपराध से परिपूर्ण फिल्में, जासूसी उपन्यास एवं सस्ता साहित्य, नाचघर, नाइट क्लब, कैबरे आदि सभी व्यक्ति के पतन के लिए उत्तर:दायी हैं। इन सभी पर कठोर कानूनी पाबन्दी लगायी जानी चाहिए।
  6. स्वस्थ निवास–गन्दी बस्तियाँ एवं भीड़भाड़युक्त मकान भी अपराध के लिए उत्तर:दायी हैं। अतः सरकार को अधिकाधिक नियोजित बस्तियों का निर्माण करना चाहिए तथा मकान बनाने के लिए ऋण की सुविधाएँ उपलब्ध करायी जानी चाहिए।
  7. स्कूलों के वातावरण में सुधार किया जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षण संस्थाओं में ही मानवता ढलती है एवं व्यक्ति में नैतिकता की भावनाएँ पनपती हैं। वहीं व्यक्ति के चरित्र का गठन भी होता है।
  8. जेलों की दशाएँ सुधारी जाएँ, उनमें चिकित्सा सेवा, स्वस्थ वातावरण एवं निवास की उचित व्यवस्था की जाए तथा अपराधियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाए।
  9. अपराधियों को सुधारने के लिए मन:चिकित्सकों एवं समाजशास्त्रियों की सहायता ली जाए, जिससे वे भविष्य में अपराध न करें।
  10. दण्ड का निर्धारण अपराधी की परिस्थितियों को देखकर किया जाए।
  11. अलग-अलग प्रकार के अपराधियों के लिए अलग-अलग प्रकार के बन्दीगृह हों, क्योंकि प्रथम अपराधी को आदतन अपराधी के साथ रखने से उसके सुधरने के बजाय बिगड़ने के अधिक अवसर रहते हैं।
  12. जनमत में परिवर्तन कर ऐसी प्रवृत्तियों का बहिष्कार किया जाए जो समाज-विरोधी कार्यों को जन्म देती हैं।
  13. अपराधियों को ऋण व प्रशिक्षण की सुविधाएँ दी जाएँ, जिससे वे अपना कोई व्यवसाय चला सकें और अपराधी कार्यों से मुक्ति पा सकें।
  14. जेल में अपराधियों को काम दिया जाए एवं उससे प्राप्त धन में से आधा भाग उनके परिवार वालों को दिया जाए जिससे उनका भरण-पोषण होता रहे।
  15. न्याय सस्ता हो एवं साथ ही उसे शीघ्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  16. अपराधी जनजातियों के सुधार के लिए योजनाबद्ध कार्य किये जाएँ।
  17. समाज में व्याप्त बेकारी एवं ग़रीबी की समस्या को शीघ्र उन्मूलन किया जाए, क्योंकि निर्धनता ही प्रमुखतः सभी अपराधों की जड़ है।

प्रश्न 3
भारत में भ्रष्टाचार निवारण हेतु सुझाव दीजिए। [2007, 08, 09, 15, 16]
या
भ्रष्टाचार एक सार्वभौमिक बुराई है। भारत में भ्रष्टाचार निवारण के उपायों का सुझाव दीजिए। [2008]
उत्तर:
भारत में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के तुरन्त पश्चात् भ्रष्टाचार की समस्या के समाधान के लिए ‘भ्रष्टाचार निरोधक कानून’ (Prevention of Corruption Act) पास किया गया। यह कानून केवल सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित होने के कारण अधिक प्रभावपूर्ण नहीं हो सका। इसके पश्चात् सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण हेतु सुझाव देने के लिए सन् 1962 में सन्तानम कमेटी की नियुक्ति की। इस समिति ने भ्रष्टाचार के सभी क्षेत्रों तथा तरीकों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए अपनी महत्त्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत कीं, लेकिन ये सिफारिशें इतनी आदर्शवादी तथा महत्त्वाकांक्षी थीं कि इन्हें लागू नहीं किया जा सका। सन् 1960 तथा 1970 के बीच हमारे समाज में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया कि भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात करने वाले मन्त्रियों और अधिकारियों के विरुद्ध भी नियोजित षड्यन्त्र चलाये जाने लगे।

सन् 1975 के पश्चात् यह माँग जोर पकड़ने लगी कि मन्त्रियों और बड़े-बड़े अधिकारियों के विरुद्ध जाँच करने वाले आयुक्तों की भी नियुक्ति की जानी चाहिए। इसके फलस्वरूप आज अनेक राज्यों में लोकपाल की नियुक्तियाँ की गयी हैं, जिन्हें बड़े-बड़े अधिकारियों तथा मन्त्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने के अधिकार दिये गये हैं। अनेक राज्यों में भ्रष्ट अधिकारियों को 50 वर्ष की आयु में अनिवार्य रूप से सेवा-मुक्त कर देने का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी जटिलताओं से बचना तथा प्रभावी कार्यवाही करना है।

उपर्युक्त प्रयासों के पश्चात् भी भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं हो सकी। इसका कारण एक ओर, भ्रष्टाचार की जड़ों का बहुत गहराई तक फैला होना है और दूसरी ओर, सरकार तथा प्रशासन की अक्षमता इसके लिए उत्तर:दायी है। केवल यह कहना कि राजनीतिज्ञों, अधिकारियों और जनसाधारण को ईमानदार बनाकर, नैतिक मूल्यों का प्रचार करके तथा राष्ट्रीयता की भावना को प्रोत्साहन देकर भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहिए, एक ख्याली पुलावे पकाना है। भ्रष्टाचार निवारण केवल तभी सम्भव है जब भ्रष्टाचार के मूल कारणों को देखते हुए एक व्यावहारिक योजना के द्वारा इस बुराई को दूर करने के प्रयत्न किये जाएँ। इस योजना के विभिन्न अंगों के रूप में निम्नलिखित सुझाव अधिक उपयोगी हो सकते हैं|

1. व्यापारिक वर्ग में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कर-संरचना में परिवर्तन करना आवश्यक है। व्यापारियों द्वारा सर्वाधिक भ्रष्टाचार करों की चोरी तथा नकली हिसाब-किताब के रूप में मिलता है। यदि प्रत्येक वस्तु के उत्पादन स्थान पर ही पूर्ण सतर्कता के साथ सम्पूर्ण कर (Taxes) ले लिये जाएँ तो सरकार को प्रशासनिक व्यय भी कम करना पड़ेगा और करों की चोरी की सम्भावना भी कम हो जायेगी।

2. छोटे कर्मचारियों में भ्रष्टाचार निवारण के लिए उनके वेतन-स्तर में सुधार आवश्यक है। प्रत्येक स्तर के कर्मचारी को इतना वेतन अवश्य मिलना चाहिए जिससे वह अपने परिवार की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा कर सके।

3. उच्च प्रशासनिक पदों, टेक्निकल कुशलता वाली सेवाओं तथा व्यवसायियों के लिए सेवा के स्थायीकरण (Confirmation of service) की परम्परा प्रजातान्त्रिक समाजों के लिए पूर्णतया गलत है। इन पदों पर एक विशेष अवधि के लिए नियुक्तियाँ की जानी चाहिए। ऐसा करने से प्रत्येक व्यक्ति अपनी कुशलता को बढ़ाने का प्रयत्न करेगा तथा अधिक-से-अधिक ईमानदारी से कार्य करके अपने जीवन को निष्कलंक बनाने के लिए प्रयत्नशील रहेगा।

4. सरकारी कार्यालयों में कामकाजी प्रक्रिया में सरलता लाने से भी रिश्वत और दूसरे प्रकार के भ्रष्टाचारों को दूर किया जा सकता है। प्रत्येक विभाग में कार्य की प्रक्रिया को सरल बनाने तथा प्रत्येक निर्णय के लिए अधिकतम समय सीमा का निर्धारण होना चाहिए।

5. जनसाधारण में प्रत्येक कार्यालय के नियमों तथा कार्यविधि का प्रचार करने से भी रिश्वतों को कम किया जा सकता है। ऐसे प्रचार से सरकारी दफ्तरों में आने वाले लोग वहाँ के बाबुओं पर निर्भर नहीं रहेंगे और न ही उन्हें बाबुओं द्वारा गुमराह किया जा सकेगा।

6. वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों का जनसाधारण में प्रकाशन किया जाये। देश को आज सबसे अधिक हानि ऐसे भ्रष्टाचार से होती है जिसमें मन्त्रियों अथवा अधिकारियों द्वारा लाखों और करोड़ों रुपयों की राशि का उपयोग गुप-चुप ढंग से कर लिया जाता है। लोक सम्पत्ति के उपयोग की पूरी जानकारी जनसाधारण को मिलने से भ्रष्टाचार में कमी हो सकती है।

7. राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण लगाने के लिए यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दलों की वार्षिक आय और व्यय का हिसाब जनसाधारण के लिए प्रकाशित किया जाए। ऐसी सूची प्रकाशित होने से राजनीतिक दलों को चुनाव के समय तरह-तरह के भ्रष्ट व्यवहार करने से रोका जा सकेगा।

8. इन प्रयत्नों के साथ ही देश में एक भ्रष्टाचार विरोधी गुप्त सरकारी संगठन’ का होना आवश्यक है। इस संगठन में प्रशासनिक, तकनीकी तथा व्यावसायिक कुशलता से सम्पन्न अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए। यह आरोप लगाया जा सकता है कि कालान्तर में ऐसे गुप्त संगठनों के अधिकारी भी भ्रष्ट बन सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि दिल्ली में नियुक्त अधिकारियों का दस्ता यदि चेन्नई के किसी गाँव में जाकर निर्माणाधीन सरकारी इमारत में लगने वाली वस्तुओं की किस्म का निरीक्षण करे तो इससे भ्रष्टाचार उन्मूलन में सहायता ही मिलेगी।

9. अन्त में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए दण्ड की प्रक्रिया को कठोर बनाना आवश्यक है। भ्रष्टाचार के अभियोग में पकड़े गये व्यक्तियों को जमानत की सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। भ्रष्टाचार को कानून के द्वारा एक जघन्य अपराध घोषित किये बिना स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता।

गुन्नार मिर्डल ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘एशियन ड्रामा’ (Asian Drama) में एशिया और मुख्य रूप से भारत के लोक जीवन में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनेक सुझाव दिये हैं-

  1. भ्रष्टाचार के अपराधी लोगों को दण्ड देने के लिए सरल कानून बनाये जाएँ;
  2. रिश्वत देने वाले लोगों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए;
  3. आयकर देने वाले लोगों के विवरण को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया जाए;
  4. व्यापारियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिये जाने वाले चन्दों पर रोक लगायी जाएँ;
  5. वेतनभोगी कर्मचारियों को इतना वेतन अवश्य दिया जाए जिससे उनकी सामान्य आवश्यकताएँ पूरी हो सकें;
  6. लाइसेन्स और परमिट देने वाले अधिकारियों की गतिविधियों पर नियन्त्रण रखा जाए;
  7. जो लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत करते हैं, उन्हें सुरक्षा दी जाए;
  8. भ्रष्टाचार सम्बन्धी झूठे समाचार छापने वाले समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं के विरुद्ध कार्यवाही की जाए;
  9. मन्त्रियों तथा उच्च अधिकारियों की आय-व्यय का नियमित निरीक्षण किया जाए तथा
  10. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सतर्कता अभियान को तेज किया जाए।

उपर्युक्त सभी सुझाव इस मान्यता पर आधारित हैं कि एक प्रजातान्त्रिक समाज में भ्रष्टाचार की समस्या जब सभी वर्गों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो जाती है, तो केवल अनुनय, विनम्रता, प्रचार और पुराने कानूनों के द्वारा ही इसका समाधान नहीं किया जा सकता। इस दशा में भ्रष्टाचार का उन्मूलन केवल कठोर अनुशासन और समय के अनुरूप कानूनों के द्वारा ही सम्भव है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन देशों को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का चस्का लग चुका है वे पूँजीवादी स्वार्थों को लेकर अब उन प्रजातान्त्रिक देशों को भ्रष्ट बनाने का षड्यन्त्र कर रहे हैं, जो अपनी प्रगति स्वयं ही करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में हमारी जनतान्त्रिक स्वतन्त्रता पर भले ही अंकुश लग जाए, लेकिन सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि के लिए भ्रष्टाचार पर कठोरता से नियन्त्रण लगाना आज अंत्यधिक आवश्यक है।

प्रश्न 4
‘अपराध राज्य के नियमों का उल्लंघन है।’ स्पष्ट करते हुए अपराध के मुख्य प्रकार बताइए।
उत्तर:

अपराध राज्य के नियमों का उल्लंघन

राज्य में व्यवस्था कायम रखने के लिए और उसका भली-भाँति संचालन करने के लिए कुछ कानून और नियम बनाये जाते हैं। राज्य के हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह कानूनों को माने। किन्तु कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो कानूनों का पालन नहीं करते हैं। वे कानून को भंग करते हैं। भंग करने वालों में दो तरह के लोग होते हैं-एक तो वे लोग, जो अनजाने में कानून-विरोधी कार्य कर डालते हैं और दूसरे वे, जो जान-बूझकर कानून को तोड़ते हैं। कानून को भंग करने का कार्य जब जान-बूझकर किया जाता है, तो ऐसा कार्य कानूनी दृष्टि से ‘अपराध’ कहलाता है।

इसलिए इस दृष्टि से उन बच्चों के गलत कार्यों को अपराध नहीं माना जाता, जो छः वर्ष से कम आयु के होते हैं। यदि कोई छोटा बच्चा कोई गलती करता है, तो उसकी अज्ञानता के कारण हम प्रारम्भ में उसे क्षमा कर देते हैं। नशे में चूर और पागल व्यक्ति यदि कोई गलत कार्य कर बैठता है, तो उसे भी ‘अपराध’ के अन्तर्गत नहीं रखा जाता। प्रत्येक राज्य में समुदाय की आवश्यकता के अनुसार सार्वजनिक कल्याण के आधार पर राज्य के नियम व कानून भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, इसलिए अपराध के अन्तर्गत आने वाले व्यवहारों की कोई ऐसी सूची नहीं बनायी जा सकती जो समाजों तथा समुदायों के लिए सार्वभौमिक हो। इसके उपरान्त भी कानूनी दृष्टिकोण से अपराध की धारणा चार विशेषताओं से सम्बन्धित है

  1. अपराध कोई भी वह व्यवहार है जो एक समुदाय में प्रचलित कानूनों के उल्लंघन से सम्बद्ध हो।
  2. ऐसे व्यवहार में अपराधी इरादे (criminal intentions) की समावेश हो। वास्तव में, व्यक्ति की नीयत’ में जब दोष आ जाता है तथा वह जान-बूझकर किसी निषिद्ध अपराध को करता है, तभी इसे अपराध कहा जाता है।
  3. अपराध का सम्बन्ध एक बाह्य क्रिया (over act) से है। व्यक्ति की नीयत में दोष आने पर भी यदि वह किसी बाह्य क्रिया द्वारा कानून का उल्लंघन नहीं करता तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता।
  4. राज्य की ओर से दण्ड की व्यवस्था अपराध का अन्तिम तत्त्व है। व्यक्ति यदि कोई ऐसा व्यवहार करे जिससे सार्वजनिक जीवन को हानि होती हो, लेकिन राज्य की ओर से ऐसे व्यवहार के लिए कोई दण्ड निर्धारित न हो तो ऐसे व्यवहार को अपराध नहीं कहा जा सकता। उपर्युक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए अनेक विद्वानों ने कानूनी दृष्टिकोण से अपराध को

परिभाषित किया है। डॉ० सेथना के अनुसार, “अपराध कोई भी वह कार्य अथवी त्रुटि है जो किसी विशेष समय पर राज्य द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार दण्डनीय है, इसका सम्बन्ध चाहे ‘पाप’ से हो अथवा नहीं।” लगभग इसी प्रकार हाल्सबरी का कथन है कि, “अपराध एक अवैधानिक त्रुटि है जो जनता के विरुद्ध है और जिसके लिए अभियुक्त को कानूनी दण्ड दिया जाता है। विलियम ब्लेकस्टोन के अनुसार, “किसी भी सार्वजनिक कानून की अवज्ञा अथवा उल्लंघन से सम्बन्धित व्यवह्मर ही अपराध है।’ टैफ्ट ने अपराध की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है, “वैधानिक रूप से अपराध एक ऐसा कार्य है जो कानून के अनुसार दण्डनीय होता है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि कानून का एक बुरे इरादे से जान-बूझकर उल्लंघन करना तथा इस प्रकार सार्वजनिक हित को हानि पहुँचाना ही अपराध है। कानूनी दृष्टि से अपराधी व्यक्ति को राज्य द्वारा दण्ड मिलता है और असामाजिक कार्य करने पर स्वयं समाज व्यक्ति को बहिष्कृत करके, अपमानित करके या हुक्का-पानी बन्द करके दण्डित करता है।

अपराध के प्रकार

विभिन्न समाजशास्त्रियों ने अपराध को अपने-अपने ढंग से वर्गीकृत किया है। सामान्य रूप से अपराध निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
(क) गम्भीरता के आधार पर वर्गीकरण-गम्भीरता के आधार पर अपराध को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है–

  1. कम गम्भीर अपराध या कदाचार-इसमें उन अपराधों को सम्मिलित किया जाता है, जो कानून की दृष्टि से अधिक गम्भीर नहीं होते। जुआ, मद्यपान, बिना टिकट के यात्रा करना। इत्यादि लघु या कम गम्भीर अपराध के उदाहरण हैं।
  2. गम्भीर अपराध या महापराध-इसमें गम्भीर प्रकृति के अपराध सम्मिलित किये जाते हैं। हत्या, बलात्कार, देशद्रोह इत्यादि अपराध इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ऐसे अपराधों के लिए दण्ड भी गम्भीर होता है; जैसे-सम्पत्ति जब्त कर लेना, आजीवन कारावास अथवा मृत्युदण्ड आदि।।

(ख) अपराध के प्रयोजन के आधार पर वर्गीकरण-बोन्जर (Bonger) ने अपराधियों के प्रयोजन के आधार पर अपराध को अग्रलिखित चार श्रेणियों में विभाजित किया है

  1. आर्थिक अपराध;
  2. लिंग सम्बन्धी अपराध;
  3. राजनीतिक अपराध तथा
  4. विविध (Miscellaneous) अपराध।

(ग) उद्देश्यों के आधार पर वर्गीकरण-हेज (Hayes) ने अपराधियों के उद्देश्यों तथा प्रेरणाओं को सामने रखकर अपराध को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है।

  1. व्यवस्था के विरुद्ध अपराध,
  2. सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध तथा
  3. व्यक्ति के विरुद्ध अपराध।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4अंक)

प्रश्न 1
अपराध के लक्षणों का विवरण दीजिए।
उत्तर:
जिरोम हाल ने उन विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनके आधार पर किसी मानवीय व्यवहार को अपराध घोषित किया जाता है। वे इस प्रकार हैं

  1. हानि-अपराधी क्रिया का बाह्य परिणाम ऐसा होना चाहिए जिससे अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हानि हो। इस प्रकार के अपराध से समाज को नुकसान होता हो।
  2. क्रिया-जब तक कोई व्यक्ति अपराधी क्रिया न करे और अपराध करने का केवल मन में . विचार ही रखे, तब तक वह विचार अपराध नहीं माना जाएगा।
  3. कानून के द्वारा निषेध-कोई भी कार्य तब तक अपराध नहीं माना जाएगा जब तक कि उस देश का कानून उसे अवैधानिक घोषित न करे।
  4. अपराधी उद्देश्य-अपराध निर्धारण में अपराधी उद्देश्य एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। जान बूझकर इरादतन किया हुआ कानून-विरोधी कार्य अपराध है। अनजाने में बिना इरादे के या भूल से किये हुए कार्य को हम अपराध तो मानते हैं, किन्तु उतना गम्भीर नहीं जितना कि पूर्व इरादे से किये कार्य को।
  5. उद्देश्य और व्यवहार में सह-सम्बन्ध-अपराध के लिए अपराधी उद्देश्य के साथ ही क्रिया का होना भी आवश्यक है। उद्देश्यहीन क्रिया या क्रियाहीन उद्देश्य अपराध नहीं होगा। दोनों का प्रकाशन साथ-साथ होनी चाहिए।
  6. दण्ड-अपराध करने पर राज्य और समाज अपराधी को दण्ड देता है। यह दण्ड शारीरिक .. दण्ड या जुर्माना आदि के रूप में हो सकता है।
  7. समय व स्थान सापेक्ष-अपराधी क्रियाओं का सम्बन्ध समय व स्थान से भी है। एक समय में एक क्रिया अपराध मानी जाती है, वही दूसरे समय में नहीं। सती–प्रथा, दहेज-प्रथा । और बाल-विवाह कभी अपराध नहीं माने जाते थे, किन्तु आज ये अपराधी क्रियाएँ हैं। इसी प्रकार से जो कार्य भारत में अपराध माने जाते हैं, वे अफ्रीका में भी अपराध माने जाते हों, यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि सभी देशों के अपने-अपने कानून हैं।

प्रश्न 2
अपराधों के कारण सम्बन्धी ‘शास्त्रीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शास्त्रीय सिद्धान्त का विकास 18वीं सदी के अन्त में हुआ। इसके प्रमुख समर्थकों में बैकरिया, बेन्थम और फ्यूअरबेक थे। इस सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले सुखदायी दर्शन (Hedonistic Philosophy) से प्रभावित थे। इस दर्शन की यह मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पूर्व उससे मिलने वाले सुख व दुःख का हिसाब लगाता है और वही कार्य करता है जिससे उसको सुख मिलता है। एक अपराधी भी अपराध इसलिए करता है कि उसे अपराध करने पर दु:ख की तुलना में सुख अधिक मिलता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति चोरी करने से पूर्व यह सोचेगा कि चोरी करने पर उसे जो दण्ड मिलेगी, वह चोरी करने पर मिलने वाले सुख की तुलना में निश्चित ही कम होगा, तभी वह चोरी करेगा अन्यथा नहीं। इन विद्वानों का मत है कि अपराध को रोकने के लिए दण्ड इतना दिया जाए कि अपराध से मिलने वाले सुख की तुलना में वह अधिक हो। उनका मत है कि पागल, मूर्ख, बालक एवं वृद्धों को दण्ड नहीं दिया जाना चाहिए।

इस सिद्धान्त को एकांगी होने के कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह सही नहीं है कि हर समय व्यक्ति सुख-दु:ख से प्रेरित होकर ही कोई कार्य करता है। कई बार वह मजबूरी एवं दुःखों से मुक्ति के लिए भी अपराध करता है। अपराध के सामाजिक कारणों की भी इस सिद्धान्त में अवहेलना की गयी है।

प्रश्न 3
अपराधों के कारण सम्बन्धी इटैलियन सम्प्रदाय अथवा प्रारूपवादी सम्प्रदाय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
या
‘अपराधी जन्मजात होते हैं।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए। [2007, 09]
उत्तर:
इस सम्प्रदाय के जन्मदाता इटली के लॉम्ब्रोसो, उनके समर्थक गैरोफैलों और एनरिकोफेरी थे। इटली के निवासी होने के कारण इस सम्प्रदाय का यह नामकरण किया गया। इस सम्प्रदाय के लोगों ने अपराध के कारणों की व्याख्या अपराधी की शरीर-रचना के आधार पर की है।

लॉम्ब्रोसो इटली की सेना में डॉक्टर थे। अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने देखा कि कुछ सैनिक अनुशासन-प्रिय हैं, तो कुछ उद्दण्ड। अपराधी सैनिकों की शरीर-रचना और सामान्य सैनिकों की शरीर-रचना में उल्लेखनीय अन्तर था। उन्होंने इटली की जेलों का भी अध्ययन किया और पाया कि शरीर-रचना और मानसिक विशेषताओं में घनिष्ठ सम्बन्ध है। उन्होंने उस समय के एक प्रसिद्ध डाकू की खोपड़ी (Skull) और मस्तिष्क (Brain) का अध्ययन किया तो पाया कि उसमें अनेक विचित्रताएँ हैं, जो साधारण मनुष्यों में नहीं होतीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने 383 मृत अपराधियों की खोपड़ियों का भी अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अपराधियों की शारीरिक रचना आदिमानव और पशुओं से बहुत-कुछ मिलती-जुलती है। इसलिए ही उनमें जंगलीपन और पशुता के गुण हैं जो उन्हें अपराध के लिए प्रेरित करते हैं। ये शारीरिक विशेषताएँ वंशानुक्रमण में मिलती। हैं और अपराधियों को विशेष प्रारूप प्रदान करती हैं। इसलिए इस मत को प्रारूपवादी सम्प्रदाय भी कहते हैं। यही कारण है कि अपराधी जन्मजात होते हैं। उन्होंने लगभग 15 शारीरिक अनियमितताओं का उल्लेख किया और बतलाया कि जिसमें भी इनमें से 4 अनियमितताएँ होंगी, वह निश्चित रूप से अपराधी होगा। वे अपराधियों को दण्ड देने के साथ-साथ बाल-अपराधियों के सुधार के पक्ष में भी थे।

इटैलियन सम्प्रदाय की अनेक विद्वानों ने आलोचना की है। उनमें डॉ० गोरिंग और थान सेलिन प्रमुख हैं। गोरिंग ने 12 वर्ष तक तीन हजार अपराधियों का अध्ययन करके बताया कि अपराधी और गैर-अपराधी की शरीर-रचना में कोई अन्तर नहीं होता। यदि अपराधी आदिमानव का प्रारूप है तो क्या सभी आदिमानव अपराधी थे? आज यह भी कोई नहीं मानता कि अपराधी जन्मजात होते हैं और शारीरिक एवं मानसिक लक्षण वंशानुक्रमण में मिलते हैं।

प्रश्न 4
प्राचीर-विहीन जेल पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
डॉ० सम्पूर्णानन्द के प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 1952-53 में चन्द्रप्रभा नदी पर अपराधियों को एक शिविर लगाया गया, जिसमें उनके भोजन, वस्त्र, शिक्षा और मनोरंजन की व्यवस्था की गयी। ऐसे शिविरों में अपराधियों को बन्दी बनाकर नहीं रखा जाता है और न ही उनके लिए चौकीदारी की व्यवस्था की जाती है। केरल, राजस्थान, उत्तर: प्रदेश, तमिलनाडु तथा गुजरात में इस प्रकार की जेलों की व्यवस्था की गयी है।

यहाँ जेलों की ऊँची-ऊंची दीवारों के स्थान पर काँटेदार तार लगाये गये। वह भी इसलिए कि अपराधी उस सीमारेखा का अतिक्रमण न करें। अपराधियों के लिए बने ये शिविर दीवारों से रहित थे। अतः इन्हें प्राचीर-विहीन बन्दीगृह कहा गया। बन्दीगृहों में रहने वाले अपराधियों से कार्य कराया जाता था। उसके बदले उन्हें पारिश्रमिक दिया जाता था। बन्दी अपनी आधी आमदनी अपने घर भेज सकते थे और उसका चौथाई अंश अपने पर व्यय कर सकते थे, जब कि चौथाई अंश कोष में जमा कराया जाता था। उनकी सजा की अवधि समाप्त होने पर उनकी बचत उन्हें सौंप दी जाती थी। सम्पूर्णानन्द शिविर बन्दियों में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान जगाने के माध्यम थे। अपराधी स्वयं सुधरकर, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होकर समाज में पहुँचता था। छूटने पर उसे व्यवसाय करने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती थी। सरकार भी कैदियों की सुरक्षा, रखवाली तथा भारी रख-रखाव के व्यय से बच जाती थी।

प्रश्न 5
परिवीक्षा (Probation) पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
परिवीक्षा में अपराधी को सजा के बदले सशर्त मुक्त कर दिया जाता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह परिवीक्षा की अवधि में अपना आचरण उत्तम रखेगा। इस प्रकार अपराधी को दण्ड के बजाय, दण्ड सुनाने के बाद ही, उसे परिवीक्षा पर छोड़ा जाता है। छूटने से पूर्व परिवीक्षा काल में उत्तम आचरण रखने का प्रमाण-पत्र देना होता है। अपराधी को सरकार की ओर से निर्देशन एवं सहायता प्रदान की जाती है, जिससे वह समाज के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके। परिवीक्षा अधिकारी सरकार की ओर से परिवीक्षा पर छोड़े गये अपराधियों की देख-रेख करता है। वही अपराधी की छानबीन कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है। उत्तर: प्रदेश में प्रत्येक ऐसे अपराधी को प्रोबेशन पर छोड़ने का प्रावधान है जिसकी आयु 21 वर्ष से कम हो तथा जिसे न्यायालय ने 6 माह की सजा सुनाई हो। परिवीक्षा पर छोड़ने से अनेक लाभ होते हैं; जैसे-

  1. अपराधी की मनोवृत्ति में परिवर्तन होता है और उसे भविष्य में समाज-विरोधी कार्य न करने का प्रोत्साहन मिलता है।
  2. वह जेल के दूषित वातावरण से बच जाता है।
  3. उसमें अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है।
  4. जेल में रहने पर उस पर जो खर्च होता है वह परिवीक्षा पर छोड़ने से बच जाता है।

प्रश्न 6
“प्रत्येक मानव व्यवहार सीखा हुआ व्यवहार है-अपराधी व्यवहार भी मानव व्यवहार है, अतः सीखा हुआ व्यवहार है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सदरलैण्ड (Sutherland) का विचार है कि अपराध एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो अन्तक्रिया तथा सम्पर्क के द्वारा एक से दूसरे व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया जाता है, इसे कभी भी वंशानुक्रम के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। यद्यपि इस व्यवहार को किसी भी समूह में रहकर सीखा जा सकती है, लेकिन मुख्यतः यदि व्यक्ति के प्राथमिक समूहों का वातावरण अपराधी हो तो व्यक्ति जल्दी ही अपराधी व्यवहार को ग्रहण कर लेता है। कोई व्यक्ति कितनी परिस्थिति से तथा किस सीमा तक अपराधी व्यवहार को सीखेगा यह प्राथमिक समूहों की चार परिस्थितियों पर निर्भर करता है, अर्थात्

  1. प्राथमिकता,
  2. पुनरावृत्ति,
  3. अवधि तथा
  4. तीव्रता।

इसका तात्पर्य है कि एक व्यक्ति कितनी कम आयु में अपराधी समूहों के सम्पर्क में आया (प्राथमिक), कितनी बार उसे ऐसे सम्पर्क का अवसर मिला (पुनरावृत्ति), कितने अधिक समय तक यह अपराधियों के सम्पर्क में रहा (अवधि) तथा यह सम्पर्क कितनी घनिष्ठता का रहा (तीव्रता) आदि कारक ही इस बात का निर्धारण करते हैं कि अपराधी व्यवहारों की सीख कितनी प्रभावपूर्ण होगी। सदरलैण्ड का कथन है कि अपराधी व्यवहारों की सीख एक व्यक्ति को केवल अपराध के तरीकों का ही प्रशिक्षण नहीं देती बल्कि उसकी मनोवृत्तियों तथा प्रेरणाओं को भी बदल देती है। व्यक्ति की मनोवृत्तियाँ जब इस तरह बदल जाती हैं कि वह नियमों के पालन की अपेक्षा नियमों के उल्लंघन को अपने व्यक्तित्व को अंग बना लेता है तो स्वाभाविक रूप में वह अपराध की ओर बढ़ने लगता है। सीख की यह मात्रा सभी अपराधियों में भिन्न-भिन्न होती है। यही कारण है कि सभी अपराधियों की विशेषताएँ भी एक-दूसरे से कुछ भिन्न होती हैं। इसी आधार पर सदरलैण्ड ने अपने सिद्धान्त को विभिन्नतायुक्त संगति सिद्धान्त’ (Theory of Differential Association) का नाम दिया है। इस सिद्धान्त द्वारा प्रस्तुत मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं-

  1. अपराधी व्यवहार एक सीखा हुआ व्यवहार है;
  2. अपराधी व्यवहार की सीख अन्तक्रिया और संचार के माध्यम से प्रभावपूर्ण बनती है;
  3. अपराधी व्यवहार का एक बड़ा भाग प्राथमिक समूहों में सीखा जाता है;
  4. अपराधी व्यवहार की सीमा अथवा दर सीखने की प्रक्रिया की प्राथमिकता, पुनरावृत्ति, अवधि तथा तीव्रता के अनुसार घटती-बढ़ती है तथा
  5. अपराधी व्यवहार भी अन्य प्रक्रियाओं के समान एक सामाजिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 7
“हमें अपराधी से नहीं अपराध से घृणा करनी चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में मृत्युदण्ड अपराध निरोध का निकृष्टतम साधन है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन बनाये जाते हैं। व्याख्या कीजिए [2007, 11]
या
यह कथन किसका है कि अपराधी बनाये जाते हैं? [2009, 10, 12, 15]
उत्तर:
समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि समाज द्वारा बनाये जाते हैं। सदरलैण्ड के अनुसार, दूसरे व्यवहारों के समान अपराध भी एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो पारस्परिक सम्पर्क तथा अन्तक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। कोई व्यक्ति कितनी शीघ्रता से तथा किस मात्रा में अपराध सीखेगा, यह उसकी आयु, पुनरावृत्ति, अवधि तथा तीव्रता पर निर्भर करता है। यही कारण है कि कुछ अपराधी सामान्य श्रेणी के होते हैं, जब कि कुछ बहुत गम्भीर प्रकार के अपराधी बन जाते हैं।

कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि अपराध को सम्बन्ध बुरी संगति अथवा दोषपूर्ण सामाजिक पर्यावरण से है। इस दृष्टिकोण से अपराध के लिए व्यक्ति की अपेक्षा समाज अधिक उत्तर:दायी है। वास्तव में अनेक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मानसिक और शैक्षणिक दशाएँ संयुक्त रूप से अपराधी व्यवहार को प्रोत्साहन देती हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि अपराधी जन्मजात नहीं होते हैं, बल्कि व्यक्ति जब एक से अधिक कारकों द्वारा प्रभावित होता है, केवल उसी समय उसमें अपराधी प्रवृत्ति जाग्रत होती है।

अपराध के लिए दण्ड-विधान का औचित्य समझने के लिए अपराध के कारणों को समझने की आवश्यकता है। अपराध के लिए अपराधी की जगह व्यक्ति के दोषपूर्ण वंशानुक्रम, मानसिक अस्वस्थता एवं बीमारी, मानसिक अस्थिरता और संघर्ष, औद्योगीकरण और नगरीकरण, व्यापारिक उतार-चढ़ाव, निर्धनता तथा बेरोजगारी, सामाजिक कुरीतियाँ, टूटे परिवार, अशिक्षा आदि को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में किसी भी अपराधी को दण्ड देने की बजाय, सामाजिक दशाओं को बदलने के लिए गम्भीर प्रयास किये जाने चाहिए। हमें अपराधी से नहीं बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से घृणा करनी चाहिए जो अपराधी को जन्म देती हैं।

अतः मृत्युदण्ड को अपराध रोकने का निकृष्टतम साधन कहना सर्वथा उचित ही है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
अपराधी कितने प्रकार के होते हैं ? [2007]
उत्तर:
विभिन्न विद्वानों ने अपराध तथा अपराधियों का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार से किया है। सामान्यतया अपराधी निम्न प्रकार के होते हैं|

  1. जन्मजात अपराधी
  2. अपस्मारी अपराधी-ये अपराधी मानसिक विकारों के कारण उचित और अनुचित में भेद नहीं कर पाते।
  3. आकस्मिक अपराधी-ये अपराधी विशेष परिस्थितियों में ही अपराध करते हैं।
  4. आवेगयुक्त अपराधी-वे अपराधी, जो बहुत शीघ्र आवेग-पूर्ण स्थिति में आकर अपराध करते हैं।
  5. व्यावसायिक अपराधी-ये अपराधी अपराध को अपनी आजीविका का साध्य मानते हैं।
  6. श्वेतवसन अपराधी–ये अपराधी समाज में उच्च वर्ग के सदस्य होते हैं तथा महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों अथवा व्यापार में लगे होते हैं।

प्रश्न 2
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर:
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए।

  1. तलाक, मृत्यु, कलह आदि पारिवारिक दशाएँ।
  2. निर्धनता, बेरोजगारी एवं अशिक्षा जैसे आर्थिक कारक।
  3. औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रियाएँ।
  4. विधवा पुनर्विवाह निषेध, वेश्यावृत्ति, देवदासी प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियाँ।

प्रश्न 3
क्या मद्यपान भी अपराधों का कारण है ?
उत्तर:
मद्यपान (शराबखोरी) ने भी अपराधों को बढ़ावा दिया है। कई लोग सामान्य स्थिति में अपराध नहीं कर पाते, वे शराब पीकर अपराध करते हैं। यौन अपराध, लड़ाई-झगड़े, हत्या, घातक आक्रमण, जुआ, भ्रष्टाचार एवं वाहन द्वारा दुर्घटना आदि अपराध कई बार शराब पीकर ही

किये जाते हैं। शराब पीने पर व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और उसमें उत्तेजना पैदा हो जाती है। परिणामस्वरूप वह अपराध कर बैठता है। शराबी व्यक्ति का अक्सर नैतिक पतन हो जाता है, वह उचित-अनुचित में भेद नहीं कर पाता और अपराध करने लगता है। ब्रुसेल्स ने अपने अध्ययन में यह पाया कि 70 प्रतिशत अपराधी शराब पीते थे। स्पष्ट है कि मद्यपान भी अपराध का एक प्रमुख कारण है।

प्रश्न 4
नगरीकरण कैसे अपराधों का एक कारक है ?
उत्तर:
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण परस्पर सम्बन्धित प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए जो परिस्थितियाँ औद्योगीकरण के कारण अपराध के लिए उत्तर:दायी हैं, लगभग वे ही परिस्थितियाँ नगरों में मौजूद हैं। नगरों में संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है, वहाँ पर आवास-सुविधाओं का अभाव है, नवीनता का आकर्षण एवं फैशन नगरीय जीवन की विशेषताएँ हैं। व्यापारिक मनोरंजन, स्त्री-पुरुषों के अनुपात में अन्तर, स्त्रियों को मिलने वाली स्वतन्त्रता, नैतिकता के बदलते प्रतिमान, जाति एवं संयुक्त परिवार के नियन्त्रण का अभाव आदि कारक नगरीय जीवन में अपराध को जन्म देने में सहायक हो रहे हैं।

प्रश्न 5
औद्योगीकरण कैसे अपराधों का एक कारक है ?
उत्तर:
औद्योगीकरण ने हमारे सामाजिक जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किये हैं। इसके कारण बड़े-बड़े नगरों का जन्म हुआ, लोगों में गतिशीलता बढ़ी, जाति का नियन्त्रण शिथिल हुआ, संयुक्त परिवार टूटे तथा सामुदायिक जीवन का ह्रास हुआ। मिल-मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष बढ़ा, आए दिन हड़ताल, तोड़-फोड़, घेराव, तालाबन्दी और आगजनी जैसे सामूहिक अपराध होने लगे। औद्योगिक केन्द्रों में वेश्यावृत्ति, जुआखोरी एवं शराबी-वृत्ति में भी वृद्धि हुई।

प्रश्न 6
‘आयु भी अपराधों का एक प्रभावी कारक है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अपराध एवं आयु में भी सह-सम्बन्ध पाया जाता है। सामान्यतः 20 से 24 वर्ष की आयु में ही अपराध अधिक किये जाते हैं, बचपन एवं वृद्धावस्था में कम। इंग्लैण्ड में पुरुषों द्वारा सर्वाधिक अपराध 12 से 15 वर्ष की आयु में तथा स्त्रियों द्वारा 15 से 17 वर्ष की आयु में किये गये। इसकी तुलना में अमेरिका में 18 से 44 वर्ष की आयु में अपराध अधिक हुए हैं। अपराध की प्रकृति के साथ-साथ अपराधियों की आयु में भी अन्तर पाया जाता है। हत्या एवं डकैती युवा लोगों द्वारा अधिक की जाती है, बच्चों द्वारा छोटे-छोटे झगड़े एवं चोरियाँ तथा वृद्धों द्वारा यौनसम्बन्धी अपराध अधिक किये जाते हैं। आयु का सम्बन्ध शारीरिक विकास से है। पूर्ण विकसित व्यक्ति ऐसे अपराध अधिक करता है जिनमें शारीरिक शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है।

प्रश्न 7
अपराध के कारणों से सम्बन्धित आर्थिक सिद्धान्त के बारे में बताइए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स, एंजिल्स, विलियम बोंजर आदि का मत है कि अपराध आर्थिक कारणों से ही होते हैं। जब समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती है, लोगों की भोजन, वस्त्र और निवास सम्बन्धी आवश्यक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होतीं, तो मजबूरन उन्हें अपराध का सहारा लेना पड़ता है। किन्तु यह मत एकपक्षीय है, क्योंकि आर्थिक कारणों के अलावा कई अन्य कारण भी अपराध के लिए उत्तर:दायी होते हैं।

प्रश्न 8
पैरोल (Parole) पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पैरोल पर उन अपराधियों को छोड़ा जाता है जिन्हें लम्बी अवधि की सजा मिली हो और उसका कुछ भाग वे काट चुके हों। सजा काटने के दौरान यदि अपराधी का आचरण अच्छा रहता है तो जेल अधिकारी की सिफारिश पर उसे शेष सजा से मुक्ति मिल जाती है। पैरोल का उद्देश्य भी अपराधी का सुधार करना है। पैरोल पर छूटने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह कुछ शर्तों का पालन करेगा। ऐसा न करने पर उसे पुनः दण्ड भुगतने को कहा जाता है। पैरोल पर छूटे अपराधी की देखभाल के लिए पैरोल अधिकारी होता है। पैरोल से भी कई लाभ हैं; जैसे–

  1. राज्य के खर्चे में कमी आती है। तथा अच्छे आचरण को बढ़ावा मिलता है,
  2. जेल के दूषित वातावरण से अपराधी को शीघ्र मुक्ति मिल जाती है और
  3. उसे समाज से अनुकूलन करने का एक अवसर मिल जाता है।

प्रश्न 9
अपराध किसे कहते हैं? [2014]
उत्तर:

अपराध का अर्थ एवं परिभाषा

समाज की व्यवस्था बनाये रखने के लिए नियमों, कानूनों, प्रथाओं और परम्पराओं के अनुपालन पर बल दिया गया है। कुछ समाज-विरोधी ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो नियमों और कानूनों का उल्लंघन करते हैं। उनके द्वारा किए गये राज्य–विरोधी या कानून-विरोधी कार्य ही अपराध कहलाते हैं।

अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को लैण्डिस तथा लैण्डिस ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
लैण्डिस तथा लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
इलियट और मैरिल के अनुसार अपराध की क्या परिभाषा है?
उत्तर:
इलियट और मैरिल के अनुसार, “समाज-विरोधी व्यवहार जो कि समूह द्वारा अस्वीकार किया जाता है, जिसके लिए समूह दण्ड निर्धारित करता है, अपराध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

प्रश्न 2
डॉ० हैकरवाल ने अपराध की क्या परिभाषा दी है ?
उत्तर:
डॉ० हैकरवाल ने अपराध के सामाजिक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि, सामाजिक दृष्टिकोण से अपराध व्यक्ति का एक ऐसा व्यवहार है जो कि उन मानव सम्बन्धों की व्यवस्था में बाधा डालता है, जिन्हें समाज अपने अस्तित्व के लिए प्राथमिक दशा के रूप में स्वीकार करता है।”

प्रश्न 3
‘अपराधी जन्मजात होते हैं। यह कथन किसका है ? [2007, 08, 09, 11, 12, 13, 14, 15]
उत्तर:
यह कथन लॉम्ब्रोसो का है।

प्रश्न 4
“समाज की असन्तुलित आर्थिक व्यवस्था ही अपराध का प्रमुख कारण है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन प्रसिद्ध विद्वान् लॉम्ब्रोसो का है।

प्रश्न 5
“अपराध का प्रमुख सम्बन्ध जलवायु से है। जलवायु तथा मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही अपराधी में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन प्रसिद्ध विद्वान् क्वेटलेट का है।

प्रश्न 6
यह कथन किसका है-‘अपराधी बनाये जाते हैं ? [2009, 10, 15, 16]
या
“अपराधी समाज द्वारा बनाए जाते हैं?” किसका कथन है? [2016, 17]
उत्तर:
सदरलैण्ड का।

प्रश्न 7
“करुणा और ईमानदारी की प्रचलित भावनाओं का उल्लंघन ही अपराध है।” यह किसका कथन है ?
उत्तर:
यह कथन गैरोफैलो का है।

प्रश्न 8
‘अपराध सीखा हुआ व्यवहार है।’ यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन ‘सदरलैण्ड’ का है।

प्रश्न 9
अपराध सम्बन्धी कैलेण्डर किसने बनाया ?
उत्तर:
अपराध सम्बन्धी कैलेण्डर लैकेसन ने बनाया।

प्रश्न 10
अपराधों के कारणों से सम्बन्धित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक कौन हैं?
उत्तर:
अपराधों के कारणों से सम्बन्धित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक सदरलैण्ड

प्रश्न 11
अपराध के लिए जैविकीय कारकों को उत्तर:दायी ठहराने वाले समाजशास्त्री कौन हैं?
उत्तर:
अपराध के लिए जैविकीय कारकों को उत्तर:दायी ठहराने वाले समाजशास्त्री लॉम्ब्रोसो

प्रश्न 12
‘आर्थिक निर्धारणवाद’ अवधारणा से कौन समाजशास्त्री सम्बन्धित है ?
उत्तर:
आर्थिक निर्धारणवाद’ अवधारणा से सदरलैण्ड सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 13
‘प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
उत्तर: ‘
प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी’ नामक पुस्तक के लेखक सदरलैण्ड हैं।

प्रश्न 14
लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को कितने भागों में बाँटा ?
उत्तर:
लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को निम्नलिखित चार भागों में बाँटा है-

  1. जन्मजाते,
  2. अपस्मारी,
  3. आकस्मिक तथा
  4. आवेगयुक्त अपराधी।

प्रश्न 15
किसी भी समाज का अपराध से पूर्णतया रहित हो पाना सम्भव है। (सत्य/असत्य) [2017]
उत्तर:
असत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
‘अपराधिक कैलेण्डर’ के प्रतिपादक कौन थे ?
(क) समनर
(ख) जिंन्सबर्ग।
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) हंटिंग्टन और क्वेटलेट
उत्तर:
(घ) हंटिंग्टन और क्वेटलेट

प्रश्न 2.
कौन-सा सिद्धान्त अपराध की व्याख्या सुख-दुःख की धारणा के आधार पर करता है ?
(क) बहुकारकीय
(ख) जैविकीय
(ग) शास्त्रीय
(घ) आर्थिक
उत्तर:
(ग) शास्त्रीय

प्रश्न 3.
श्वेतवसन अपराध अवधारणा से कौन समाजशास्त्री जुड़ा है ? [2008, 10]
(क) सदरलैण्ड
(ख) लॉम्ब्रोसो
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) एंजिल्स
उत्तर:
(क) सदरलैण्ड

प्रश्न 4.
अपराध के शास्त्रीय सिद्धान्त से सम्बन्धित हैं [2011, 17]
या
अपराध के शास्त्रीय सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन हैं? [2015, 16]
(क) बेन्थम
(ख) मॉण्टेस्क्यू
(ग) बकल
(घ) कार्ल मार्क्स
उत्तर:
(क) बेन्थम

प्रश्न 5.
अच्छे आचरण के कारण बन्दीगृह से अस्थायी मुक्ति को कहते हैं
(क) प्रोबेशन
(ख) पैरोल
(ग) मुक्ति सहायता
(घ) आचरण मुक्ति
उत्तर:
(ख) पैरोल

प्रश्न 6.
सदरलैण्ड किस पुस्तक के लेखक थे ?
(क) सोशल डिसऑर्गेनाइजेशन
(ख) सोशल चेंज
(ग) प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी
(घ) सोसायटी
उत्तर:
(ग) प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 15 Indian Government Act of 1919 and 1935

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 15
Chapter Name Chapter 15 Indian Government
Act of 1919 and 1935
(1919 तथा 1935 का
भारत सरकार अधिनियम)
Number of Questions Solved 13
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 15 Indian Government Act of 1919 and 1935 (1919 तथा 1935 का भारत सरकार अधिनियम)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1919 ई० के अधिनियम की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उतर:
1919 ई० के अधिनियम की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • 1919 ई० के ऐक्ट की मुख्य विशेषता प्रान्तों में द्वैध-शासन की स्थापना थी। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को अलग किया गया।
  • इस अधिनियम के तहत गर्वनर जनरल व गर्वनर के अधिकारों में वृद्धि की गई जिसका उपयोग वे स्वेच्छा से कर सकते थे।
  • गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या को बढ़ाया गया।
  • केन्द्रीय विधान मण्डल को विस्तृत अधिकार दिए गए जिनमें प्रमुख कानून बनाने, कानून परिवर्तन करने तथा बजट पर बहस आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 2.
1935 ई० के गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट की दो प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
उतर:
1935 ई० के गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) केन्द्र में द्वैध-
शासन प्रणाली की स्थापना- 1919 ई० के अधिनियम में प्रान्तों में द्वैध-शासन पद्धति की स्थापना लागू की गई थी, जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके पश्चात् 1935 ई० के अधिनियम के द्वारा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना की गई। केन्द्रीय विषयों को दो भागों-आरक्षित एवं हस्तान्तरित में विभक्त किया गया। आरक्षित भाग में प्रतिरक्षा, वैदेशिक और धार्मिक मामले थे, जो गवर्नर जनरल की अधिकारिता में थे। हस्तान्तरित विषयों के अन्तर्गत शेष सभी विषय थे। मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से गवर्नर जनरल इन विषयों की प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता था। मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी होती थी और गवर्नर जनरल मन्त्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य न था। अत: वास्तविक शासन गवर्नर जनरल के हाथों में केन्द्रित था।

(ii) विधायी शक्तियों का वितरण-
सम्पूर्ण विधायी विषयों को केन्द्रीय सूची, प्रान्तीय सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया था। केन्द्रीय अथवा संघ सूची में 59 विषय, प्रान्तीय सूची में 54 और समवर्ती सूची में 36 विषय निर्धारित किए गए। समवर्ती सूची पर गवर्नर जनरल का अधिकार निहित था जो स्वविवेक से केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय विधानमण्डलों को हस्तगत कर सकता था।

प्रश्न 3.
1935 ई० के अधिनियम के चार प्रमुख दोष लिखिए।
उतर:
1935 ई० के अधिनियम के चार प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

  • इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता को बरकरार रखा गया। भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान नहीं किया गया।
  • प्रान्तों में स्थापित द्वैध-शासन प्रणाली को हटाकर अब नए रूप में केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली लागू कर दी। इसका स्पष्ट मतलब था कि अंग्रेज भारतीयों को किसी प्रकार की सुविधा देने के पक्ष में न थे।
  • भारतीयों द्वारा साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति का विरोध करने के बावजूद इस अधिनियम में इसे समाप्त नहीं किया गया।
  • इस अधिनियम द्वारा गवर्नर जनरल व गवर्नरों के अधिकारों में वृद्धि की गई। इस प्रकार भारतीय प्रशासन पर इंग्लैण्ड का पर्ण नियन्त्रण था।

प्रश्न 4.
1919 ई० के अधिनियम में प्रान्तीय कार्यपालिका में क्या परिवर्तन किए गए?
उतर:
1919 ई० के अधिनियम में प्रान्त में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना की गई। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को पृथक कर दिया गया। इसके पश्चात् प्रान्तीय विषयों को दो भागों में विभक्त कर दिया गया-

  • सुरक्षित विषय; जैसे- अर्थव्यवस्था, शान्ति व्यवस्था, पुलिस आदि।
  • हस्तान्तरित विषय; जैसे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा आदि।

प्रश्न 5.
1935 ई० के अधिनियम के प्रति राष्ट्रीय दलों का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उतर:
1935 ई० के अधिनियम के सम्बन्ध में जवाहरलाल नेहरू ने कहा “यइ इतना प्रतिक्रियावादी था कि इसमें स्वविकास का कोई भी बीज नहीं था।” उन्होंने और आगे कहा कि 1935 ई० का विधान, दासता का एक नवीन राजपत्र था। वह दृढ़ आरोपों से युक्त ऐसा यंत्र था जिसमें इंजन नहीं था। मदनमोहन मालवीय ने इसे ‘बाह्य रूप से जनतंत्रवादी और अंदर से खोखला कहा। चक्रवती राजगोपालचारी ने इसे द्वैध शासन पद्धति से भी बुरा एवं बिलकुल अस्वीकृत बताया।

प्रश्न 6.
1919 ई० के भारत शासन अधिनियम की क्या उल्लेखनीय विशेषता थी?
उतर:
प्रान्तों में द्वैध-शासन की स्थापना 1919 ई० के ऐक्ट की मुख्य विशेषता थी। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को पृथक् किया गया था। इसके पश्चात् प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया

  • सुरक्षित विषय; जैसे- अर्थव्यवस्था, शान्ति-व्यवस्था, पुलिस आदि और
  • हस्तान्तरित विषय; जैसे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा आदि।

सुरक्षित विषयों का शासन गवर्नर अपनी परिषद् के सदस्यों की सलाह से करता था और हस्तान्तरित विषयों का शासन गवर्नर भारतीय मन्त्रियों की सलाह से करता था। इस व्यवस्था से गवर्नर की कार्यकारिणी भी दो भागों में बँट गई- गवर्नर और उसकी परिषद् तथा गवर्नर और भारत मन्त्री। इससे प्रान्तीय शासन के दो भाग हो गए- पहला शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में सुरक्षित विषय थे अर्थात् गर्वनर और उसकी परिषद् जो शासन का उत्तरदायित्वहीन भाग था और दूसरा शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में हस्तान्तरित विषय थे अर्थात् गवर्नर और भारत मन्त्री जो शासन का उत्तरदायित्वपूर्ण भाग माना जा सकता था। शासन के इसी विभाजन के कारण इस व्यवस्था को द्वैध-शासन कहा जाता है।

प्रश्न 7.
1935 ई० के भारत शासन अधिनियम द्वारा देशी रियासतों के सम्बन्ध में क्या व्यवस्था थी?
उतर:
1935 ई० के भारत शासन अधिनियम द्वारा सभी रियासतों का एक संघ बनाने की व्यवस्था थी। किन्तु संघ के निर्माण की प्रक्रिया को अत्यन्त जटिल बना दिया गया था। संघों में प्रान्तों को आवश्यक रूप से सम्मिलित होना था; किन्तु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था। अधिकांश रियासतों के शासक ऐसी केन्द्रीय सरकार के अन्तर्गत संगठित होने को तैयार न थे।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1919 ई० के मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार कानून के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन करते हुए उनकी कमियों पर प्रकाश डालिए।
उतर:
सन् 1918 ई० में मॉण्टेग्यू और चेम्सफोर्ड ने संयुक्त हस्ताक्षरों से भारत में सुधारों के लिए एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई जिसके आधार पर 1919 ई० का भारत सरकार कानून बनाया गया। इसे भारत सरकार अधिनियम-1919 या मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम के नाम से जाना जाता है। मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम के प्रावधान

(i) भारत सचिव व इंग्लैण्ड की संसद द्वारा भारतीय शासन पर नियन्त्रण में कमी की गई। भारत सचिव के कार्यालयों का सम्पूर्ण खर्चा भी ब्रिटिश राजस्व से ही लिया जाना था। इससे पहले यह खर्चा भारतीय राजस्व से लिया जाता था, जिसका भारतीय विरोध कर रहे थे।

(ii) इंग्लैण्ड में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में एक नवीन पद का सृजन किया गया। इस नए पदाधिकारी को भारतीय उच्चायुक्त’ कहा गया। भारतीय उच्चायुक्त को भारत सचिव से अनेक अधिकार लेकर दे दिए गए। भारतीय उच्चायुक्त की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा की जानी थी तथा उसका खर्च भी भारत को ही वहन करना था।

(iii) गवर्नर जनरल व गवर्नरों के अधिकारों में वृद्धि की गई, जिनका उपयोग वे स्वेच्छा से कर सकते थे।

(iv) भारतीयों की यह माँग कि साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति को समाप्त कर दिया जाए, को स्वीकार नहीं किया गया। इसके विपरीत इस प्रणाली को और बढ़ावा दिया गया। इस अधिनियम के अनुसार सिक्खों, एंग्लो-इण्डियन्स, ईसाइयों और यूरोपियनों को भी पृथक् प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया।

(v) केन्द्रीय- 
शासन व्यवस्था में उत्तरदायी शासन लागू नहीं किया गया। अत: केन्द्रीय शासन पूर्ववत् स्वेच्छाचारी तथा नौकरशाही के नियन्त्रण में ही रहा।

(vi) गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में भारतीय सदस्यों की संख्या को बढ़ाया गया।

(vii) एक सदन वाले केन्द्रीय विधानमण्डल का पुनसँगठन किया गया। अब दो सदन वाले विधानमण्डल की व्यवस्था की गई। उच्च सदन को राज्य परिषद् तथा निचले सदन को केन्द्रीय विधानसभा कहा गया।

(viii) केन्द्र में पहली बार द्विसदनात्मक व्यवस्था की गई। पहले सदन को विधानसभा कहा गया। विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 145 थी, जिनमें 41 नामजद सदस्य थे और 104 चुने हुए सदस्य होते थे। दूसरे सदन को राज्यसभा कहा गया। राज्यसभा के कुल 60 सदस्य थे। उनमें 33 चुने हुए तथा 27 नामजद सदस्य होते थे।

(ix) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में 8 सदस्यों की संख्या निश्चित की गई, जिनमें से 3 सदस्यों का भारतीय होना आवश्यक था।

(x) भारत परिषद्
के कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या न्यूनतम 8 व अधिकतम 12 निश्चित कर दी गई। इनमें से आधे सदस्य वे होंगे जो दीर्घकाल से भारत में रहते आए हों। इनका कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया।

(xi) केन्द्रीय विधान
मण्डल को विस्तृत अधिकार दिए गए जिनमें कानून बनाने, कानून परिवर्तन करने तथा बजट पर बहस करने के अधिकार आदि प्रमुख थे।

(xii) इस अधिनियम
के अनुसार केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों का पहली बार बँटवारा किया गया। 47 विषयों को केन्द्रीय विषय बनाया गया। उदाहरणस्वरूप- प्रतिरक्षा, विदेशों से सम्बन्ध, विदेशियों को भारत की नागरिकता प्रदान करना, आवागमन के साधन, सीमा शुल्क, नमक, आयकर, डाकखाने, सिक्के तथा नोट, सार्वजनिक ऋण, वाणिज्य जिसमें बैंक तथा बीमा इत्यादि शामिल थे, केन्द्र को दिए गए। प्रान्तीय सूची में 50 विषय रखे गए। स्थानीय स्वशासन, स्वास्थ्य, सफाई, चिकित्सा, शिक्षा, पुलिस तथा जेल, न्याय, जंगल, कृषि, भू-कर इत्यादि विषय प्रान्तीय सरकारों को दिए गए। जो विषय सूची में शामिल नहीं किए गए उन पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र को होगा।

(xiii) प्रान्तों में द्वैध- 
शासन की स्थापना 1919 ई० के ऐक्ट की मुख्य विशेषता थी। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को पृथक् किया गया था। इसके पश्चात् प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया- (क) सुरक्षित विषय; जैसेअर्थव्यवस्था, शान्ति-व्यवस्था, पुलिस आदि और (ख) हस्तान्तरित विषय; जैसे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा आदि। सुरक्षित विषयों का शासन गवर्नर अपनी परिषद् के सदस्यों की सलाह से करता था और हस्तान्तरित विषयों का शासन गवर्नर भारतीय मन्त्रियों की सलाह से करता था। इस व्यवस्था से गवर्नर की कार्यकारिणी भी दो भागों में बंट गईं- गवर्नर और उसकी परिषद् तथा गवर्नर और भारत मन्त्री। इससे प्रान्तीय शासन के दो भाग हो गए- पहला शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में सुरक्षित विषय थे अर्थात् गर्वनर और उसकी परिषद् जो शासन का उत्तरदायित्वहीन भाग था और दूसरा शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में हस्तान्तरित विषय थे अर्थात् गवर्नर और भारत मन्त्री जो शासन का उत्तरदायित्वपूर्ण भाग माना जा सकता था। शासन के इसी विभाजन के कारण इस व्यवस्था को द्वैध-शासन कहा जाता है।

(xiv) इस अधिनियम
द्वारा एक लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई। भारत सचिव को इस आयोग की नियुक्ति का कार्य सौंपा गया।

(xv) 1919 ई० का
अधिनियम भी केन्द्रीय विधानसभा को ब्रिटिश संसद से मुक्त नहीं कर सका। भारत की केन्द्रीय विधानसभा ब्रिटिश संसद के किसी कानून के विरुद्ध विधेयक पास नहीं कर सकती थी।

(xvi) इस अधिनियम
के लागू होने के 10 वर्षों के अन्दर एक आयोग की नियुक्ति की जानी थी, जिसका कार्य इस अधिनियम के प्रति प्रतिक्रियाओं की रिपोर्ट इंग्लैण्ड की संसद को देना था।

अधिनियम की कमियाँ- मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम में निम्नलिखित कमियाँ थीं
(क) केन्द्र में उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं की गई थी।
(ख) द्वैध-शासन प्रणाली सिद्धान्ततः दोषपूर्ण थी। एक ही प्रान्त में दो शासन करने वाली संस्थाएँ कैसे कार्य कर सकती हैं?
(ग) द्वैध-शासन प्रणाली के अन्तर्गत विषयों का विभाजन भी अत्यन्त अतार्किक एवं अव्यवहारिक था। ऐसे विभाग जो एक-दूसरे से सम्बन्धित थे, अलग-अलग संस्थाओं के अधीन कर दिए गए थे। उदाहरण के लिए- सिंचाई व कृषि का घनिष्ठ सम्बन्ध है, किन्तु दोनों को अलग-अलग कर दिया गया था। मद्रास (चेन्नई) के तत्कालीन मन्त्री श्री के०वी० रेड्डी ने लिखा है, “मैं विकास मन्त्री था, किन्तु वन विभाग हमारे अधिकार में नहीं था। मैं कृषि मन्त्री था, किन्तु सिंचाई विभाग पृथक् था।”
(घ) गवर्नर को अत्यधिक शक्ति प्रदान की गई थी। गवर्नर किसी भी मन्त्री के प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकता था।
(ङ) इस अधिनियम में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया था।

प्रश्न 2.
1919 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित द्वैध-शासन से आप क्या समझते हैं? यह क्यों असफल रहा?
उतर:
उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
1919 ई० के भारत सरकार अधिनियम की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उतर:
उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
1919 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्र एवं प्रान्तीय विधान सभाओं के अधिकारों की समीक्षा कीजिए।
उतर:
उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 5.
1935 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत स्वायत्तता, गर्वनरों के लिए स्वायत्तता थी, न कि प्रान्तीय विधान मण्डल और मन्त्रियों के लिए।” व्याख्या कीजिए।
उतर:
सर सैमुअल होर द्वारा संयुक्त समिति की रिपोर्ट के आधार पर, ब्रिटिश संसद में 19 दिसम्बर, 1934 को भारत सरकार विधेयक प्रस्तुत किया गया। ब्रिटिश संसद ने इस विधेयक को बहुमत से पारित कर 3 अगस्त, 1935 को अपनी सहमति प्रदान की। यह अधिनियम भारत शासन अधिनियम, 1935 ई० (गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट 1935 ई०) के नाम से जाना जाता है। सर्वप्रथम प्रान्तों में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना 1919 ई० के अधिनियम में की गई थी जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके बाद 1935 ई० के अधिनियम द्वारा केन्द्र में जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके बाद 1935 ई० के अधिनियम द्वारा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली को लागू किया गया।

केन्द्रीय विषयों को आरक्षित एवं हस्तान्तरित नामक दो भागों में विभाजित किया गया। आरक्षित भाग में प्रतिरक्षा, धार्मिक एवं वैदेशिक मामले थे जो गवर्नर जनरल की अधिकारिता में थे। हस्तान्तरित विषयों के अन्तर्गत शेष सभी विषय थे। मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से गवर्नर जनरल इन विषयों की प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता था। मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी होती थी और गवर्नर जनरल मन्त्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं था। अत: वास्तविक शासन गवर्नर जनरल के हाथों में था।

1935 ई० के अधिनियम में 1919 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों में स्थापित द्वैध-शासन प्रणाली को समाप्त करके स्वायत शासन प्रणाली को स्थापित कर दिया गया और प्रान्तों को नवीन संवैधानिक अधिकार दिये गये थे। प्रशासन का कार्य गवर्नर मन्त्रिपरिषद् के परामर्श पर करता था। मन्त्रिपरिषद् विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी थी। गवर्नरों से मन्त्रिपरिषद् के सुझावों के आधार पर कार्य करने की अपेक्षा की गई थी। गवर्नरों को इतनी शक्ति प्रदान की गई थी कि प्रान्तीय स्वायतता के बावजूद प्रान्तीय स्वायता नाम मात्र की रह गई थी।

प्रश्न 6.
1935 ई० के अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या और उसकी संक्षिप्त आलोचना कीजिए।
या
भारत के प्रजातांत्रिकरण में 1935 ई० के अधिनियम ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
उतर:
1935 ई० के अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं
(i) केन्द्र में द्वैध- शासन प्रणाली की स्थापना- 1919 ई० के अधिनियम में प्रान्तों में द्वैध-शासन पद्धति की स्थापना लागू की गई थी, जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके पश्चात् 1935 ई० के अधिनियम के द्वारा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना की गई। केन्द्रीय विषयों को दो भागों-आरक्षित एवं हस्तान्तरित में विभक्त किया गया। आरक्षित भाग में प्रतिरक्षा, वैदेशिक और धार्मिक मामले थे, जो गवर्नर जनरल की अधिकारिता में थे। हस्तान्तरित विषयों के अन्तर्गत शेष सभी विषय थे। मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से गवर्नर जनरल इन विषयों की प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता था। मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी होती थी और गवर्नर जनरल मन्त्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य न था। अत: वास्तविक शासन गवर्नर जनरल के हाथों में केन्द्रित था।

(ii) विधायी शक्तियों का वितरण-
सम्पूर्ण विधायी विषयों को केन्द्रीय सूची, प्रान्तीय सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया था। केन्द्रीय अथवा संघ सूची में 59 विषय, प्रान्तीय सूची में 54 और समवर्ती सूची में 36 विषय निर्धारित किए गए। समवर्ती सूची पर गवर्नर जनरल का अधिकार निहित था जो स्वविवेक से केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय विधानमण्डलों को हस्तगत कर सकता था।

(iii) व्यापक विधान-
भारत सरकार अधिनियम -1935 अत्यन्त लम्बा और जटिल विधान था। इसमें 451 धाराएँ और 15 अनुसूचियाँ थीं। कुछ विशेष कारणों से इसका विशाल होना स्वाभाविक भी था। एक तो यह जटिल परिसंघीय संविधान की व्यवस्था करता था जो परिसंघात्मक संविधानवाद के इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलता। दूसरे, यह भारतीय मन्त्रियों और विधायकों द्वारा कदाचार के विरुद्ध विधिक सुरक्षाओं का उल्लेख करता था।

(iv) उद्देशिका का न होना-
1935 ई० के अधिनियम की अपनी कोई उद्देशिका नहीं थी। स्मरणीय है कि, 1919 ई० के अधिनियम के अधीन सरकार की घोषित नीति, ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी शासन का क्रमिक विकास था। 1935 ई० के अधिनियम के पश्चात् 1919 ई० के अधिनियम को उद्देशिका के अलावा निरस्त कर दिया गया।

(v) अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव-
इस अधिनियम की सर्वप्रमुख विशेषता थी- पहली बार भारत में संघात्मक शासन प्रणाली को लागू किया जाना। सभी भारतीय प्रान्तों व देशी रियासतों का एक संघ बनाने का प्रस्ताव था। संघ के दोनों सदनों में राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया। संघीय असेम्बली में 375 में से 125 व कौंसिल ऑफ स्टेट में 260 में से 104 सदस्य नियुक्त करने का उन्हें अधिकार दिया गया, किन्तु संघ के निर्माण की प्रक्रिया को अत्यन्त जटिल बना दिया गया था। संघों में प्रान्तों को आवश्यक रूप से सम्मिलित होना था, किन्तु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था। अधिकांश रियासतों के शासक ऐसी केन्द्रीय सरकार के अन्तर्गत संगठित होने के लिए तैयार न थे। अतः यह क्रियान्वित नहीं हो सका।

(vi) भारतीय परिषद् का विघटन-
भारत में भारतीय कौंसिल के विरोध को देखते हुए भारतीय कौंसिल को समाप्त कर दिया गया। इसका स्थान भारत सचिव के सलाहकारों ने ले लिया। भारत सचिव की सलाहकार समिति में अधिकतम 6 सदस्य हो सकते थे। इनमें से आधे ऐसे होते थे जो कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत सरकार की सेवा में ही रहे हों। इस प्रकार भारत सचिव का नियन्त्रण उन क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया जिनमें गवर्नर जनरल संघीय मन्त्रिमण्डल की सलाह नहीं मानता था, अथवा, अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करता था।

(vii) विधानमण्डलों का विस्तार-
1935 ई० के अधिनियम के अनुसार संघीय विधानमण्डल का स्वरूप दो सदन वाला था। उच्च सदन को राज्य परिषद् और निचले सदन को संघीय विधानसभा कहते थे। राज्य परिषद् के सदस्यों को चुनने का अधिकार सीमित लोगों को ही था। संघीय विधान सभा में 375 सदस्य होते थे, जिनमें से 125 भारतीय नरेशों के प्रतिनिधि और मुसलमानों के 80 सदस्य होते थे। संघीय विधान सभा के अधिकार सीमित थे।

(viii) प्रान्तीय स्वायत्तता-
1919 ई० के अधिनियम द्वारा प्रान्तों में स्थापित द्वैध-शासन को समाप्त करके 1935 ई० के अधिनियम में स्वायत्त शासन की स्थापना की गई तथा प्रान्तों को नवीन संवैधानिक अधिकार प्रदान किए गए। प्रशासन का कार्य गवर्नर मन्त्रिपरिषद् के परामर्श पर करता था। मन्त्रिपरिषद् विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी थी। गवर्नरों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे मन्त्रिपरिषद् के सुझावों के अनुसार ही कार्य करें, किन्तु प्रान्तीय स्वायत्तता के बावजूद भी गवर्नरों को इतनी शक्तियाँ प्रदान कर दी गई कि स्वायत्तता नाममात्र की रह गई।

1935 ई० के अधिनियम की आलोचना- इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता को बनाए रखा गया तथा भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान नहीं किया गया। प्रान्तों में से द्वैध-शासन प्रणाली को हटाना तथा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली को लागू करने का मतलब था कि अंग्रेज भारतीयों को कोई सुविधा देने के पक्ष में नहीं थे। पं० जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में यह नियम इतना प्रतिक्रियावादी था कि इसमें स्वविकास का कोई भी बीज नहीं था।” उन्होंने आगे कहा कि 1935 ई० का विधान दासता का एक नवीन राजपत्र था। वास्तव में इस अधिनियम में एक ओर भारतीयों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया गया कि उन्हें सब कुछ दे दिया गया है कि उन्होंने कुछ भी नहीं खोया है। इस प्रकार यह अधिनियम भारतीयों की आकांक्षाओं को सन्तुष्ट नहीं कर सका। विश्व के प्रत्येक संघ में निचले सदन के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति को अपनाया गया था। इस प्रकार 1935 ई० के अधिनियम में जनतान्त्रिक शक्तियों की उपेक्षा की गई थी।

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